ईश्वर का अस्तित्व असिद्ध नहीं हैं।

ईश्वर दिखाई नहीं देता इसलिए उसे न माना जाय, यह कोई युक्ति नहीं हैं। अनेकों वस्तुएँ ऐसी है जो आँख से नहीं दीखती, फिर भी उन्हें अन्य आधारों से अनुभव करते और मानते हैं। कोई वस्तु नेत्रों के बहुत समीप हो तो भी वह नहीं दीखती। अपने पलक या आँखों में लगा काजल अपने को कहाँ दीखता है।

ईश्वर के अस्तित्व से केवल इस कारण इनकार करना कि वह आज के विकसित विज्ञान या बुद्धिवाद की, कसौटी पर खरा नहीं उतरता कोई कारण नहीं। प्रत्यक्ष के आधार पर तो यह भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि हमारा पिता वस्तुतः कौन है। माता की साक्षी ही इसका प्रमाण मान लिया जाता है।

मानव−जीवन की अनेकों महत्वपूर्ण अवस्थाएं उस विज्ञान के आधार पर निर्भर हैं जिसे अध्यात्म विज्ञान कहते हैं। पदार्थ विज्ञान से नहीं अध्यात्म विज्ञान से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है। ईश्वर का अवलम्बन करके ही मानव जाति की अब तक की प्रगति सम्भव हुई हैं। प्रेम, करुणा, उदारता, दान, संयम, सदाचार, पुण्यपरमार्थ जैसे सद्गुणों का विकास आस्तिकता के आधार पर ही सम्भव हो सका है और इन्हीं गुणों के द्वारा सामाजिकता की प्रवृत्ति बढ़ी हैं। यदि इस महान आदर्श का परित्याग कर दिया जाय तो व्यक्ति का आन्तरिक स्तर इस प्रकार का ही बनेगा जिससे द्वेष, घृणा, संघर्ष और आतंक का मार्ग अपनाने के लिए मन चलने लगे।


सुख−दुख केवल तुलना शैली पर निर्भर है।

संसार में दुःख क्या है और सुख क्या हैं? इसकी परिभाषा कर सकना कठिन हैं। वस्तुतः यहाँ न तो कुछ सुख है और न कुछ दुःख। घटनाएँ अपने ढंग से घटित होती रहती हैं और वस्तुएँ अपने तरीके से बदलती रहती हैं। आने और जाने का−हानि और लाभ का−परिवर्तन यहाँ अनवरत रूप से चल रहा है। जो वस्तु अभी जिस रूप में है, अगले ही क्षणों वह वैसी न रह जायगी। तब जिस प्रकार उस क्षण उसे सुखद माना जा रहा था वैसा कुछ समय बाद न माना जा सकेगा। तब यह कैसे कहा जाय कि वह वस्तु या स्थिति सुख रूप है या दुःख रूप ।

प्रातःकाल का सूर्य सुहावना लगता है और उसकी धूप तापने को जी करता है, किन्तु कुछ समय बाद दोपहर की कड़ी धूप और कड़ी चमक कष्टकारक लगती है और उससे बचने के लिए छाया तलाश करनी पड़ती है। तब कैसे कहा जाय कि सूर्य और उसकी धूप सुखद है या सुखद। यह परिस्थितियों पर निर्भर है। सापेक्ष है। ठण्ड की स्थिति में सूर्य प्रिय है और गर्मी में अप्रिय।

भूख में भोजन की उत्कट लालसा रहती हैं। रूखा−सूखा भी स्वादिष्ट लगता है। किन्तु पेट भरा होने अथवा रुग्ण रहने की दशा में स्वादिष्ट भोजन भी अरुचिकर लगता है और उसकी ओर देखने को भी जी नहीं करता। भोजन अपने आप में न स्वादिष्ट है न अस्वादिष्ट वह एक पदार्थ मात्र है। भूख के अनुरूप वह कभी प्रिय लगता है कभी अप्रिय। यदि भोजन की अपनी कुछ विशेषता होती तो वह सदा एक जैसी ही बनी रहती।

हम धनी हैं या निर्धन इसका कोई पैमाना नहीं। कितना धन होने पर किसी को धनी कहा जाय और कितनी मात्रा को निर्धन की परिधि में लाया जाय, इसका कोई माप दण्ड नहीं बन सकता। जब हम अपनी तुलना किसी साधन सम्पन्न धनी के साथ करते हैं तो पाते हैं कि अपनी स्थिति निर्धनों जैसी दयनीय है। किन्तु यदि निर्धनों और अभावग्रस्तों के साथ अपनी तुलना करने लगें तो प्रतीत होगा कि−हम कितने अधिक साधन−सम्पन्न, धनवान और भाग्यवान है। जिसके लिए दूसरे लोग बुरी तरह तरसते हैं वे साधन अपने पास कितनी बड़ी मात्रा में मौजूद हैं। इस तुलना क्रम में हेर−फेर होते हैं, एक क्षण में धनी अपने को निर्धन और निर्धन अपने को धनवान मानने लग सकता है।

बलवान पहलवान की तुलना में अपनी दुर्बल काया दुर्भाग्यपूर्ण है, सुन्दरों की तुलना में अपनी कुरूपता अभिशाप है, किन्तु यदि अपंग एवं असाध्य रोगग्रस्तों की और अपनी स्थिति का अध्ययन करें तो पता चलेगा कि जो कुछ मिला हुआ है वह भी सुख मानने और गर्व करने के लिए पर्याप्त हैं।

दुखों से निवृत्ति पाने और सदा सुखी रहने के लिए अमुक प्रकार की परिस्थितियाँ प्राप्त होना आवश्यक हैं। यह नहीं सोचा जाना चाहिए, वरन् अपनी तुलनात्मक चिन्तन करने की शैली को बदलना चाहिए। अपने में छोटे और पिछड़े हुए लोग यदि दृष्टि में रहें तो जो मिला हैं वह भी सुखद और पर्याप्त होता रहेगा और अपने को सुखी अनुभव करने की मनःस्थिति सदा ही बनी रहेगी समुन्नत लोगों को अपना गुरु मानें, उनने जिन सद्गुणों को अपनाकर प्रगति की है, उन्हें अपनाने, बढ़ाने का प्रयास करें। इस क्षेत्र में तुलना करते हुए जो बढ़ाना आवश्यक उसे बढ़ायें तो बड़ों के साथ की जाने वाली तुलना श्रेयस्कर हो सकती हैं। दुखों से स्थायी निवृत्ति और सुख की सुस्थिर उपलब्धि का यही मार्ग हैं। प्रगति के लिए प्रयास तो तत्परतापूर्वक करें पर दुखी किसी भी स्थिति न रहें यही बुद्धिमत्ता है।


जीवात्मा की सत्ता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

जीवात्मा आखिर है क्या? उसका लक्षण, स्वरूप, स्वभाव और लक्ष्य क्या है? इस प्रश्न पर विज्ञान अपने बचपन में विरोधी था, वह कहता था जड़ तत्वों के−अमुक रसायनों के−एक विशेष संयोग सम्मिश्रण का नाम ही जीव है। उसकी सत्ता वनस्पति वर्ग की है। अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य भी एक चलता−फिरता पेड़ हैं। रासायनिक संयोग उसे जन्म देते, बढ़ाते और बिगाड़ देते हैं। ग्रामोफोन के रिकार्डों पर सुई का संयोग होने से आवाज निकलती है और वह संयोग−वियोग में बदलते ही ध्वनि प्रवाह बन्द हो जाता है। जीव अमुक रसायनों के अमुक मात्रा में मिलने से उत्पन्न होता है और वियोग होते ही उसकी सत्ता समाप्त हो जाती हैं। अणु अमर हो सकते हैं, पर शरीर ही नहीं, उसकी विशेष स्थिति चेतना भी मरणधर्मा है।

यही था वह प्रतिपादन जो चार्वाक मुनि के शब्दों को विज्ञान दुहराता रहा। उसकी दलील यही थी−‘भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरागमने कुतः’ शरीर नष्ट होने पर आत्मा भी नष्ट हो जाती है। इस मान्यता का निष्कर्ष यही निकला कि जब शरीर के साथ ही अस्तित्व−नष्ट होते हैं तो परलोक का भय क्या करना? जितना सुख−जिस प्रकार भी सम्भव हो लूट लेना चाहिए इसी में जीवन की सार्थकता है। नास्तिकवाद ने जन−साधारण को यही सिखाया−‘यावज्जीवेत सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्’ जब तक जियो सुख से जियो−कर्ज लेकर भी घी पियो। चूँकि अब घी हजम नहीं होता और वह तथाकथित सभ्यता का चिह्न भी नहीं है इसलिए आधुनिक चार्वाकों ने “कुकर्भ करके धन कमाओ−नशा पियो और मजा उड़ाओ” के सूत्र रच दिये। इन दिनों जन−मानस इसी प्रेरणा का अनुगमन कर रहा है।

बचपन से आगे बढ़कर विज्ञान जब किशोरावस्था में पहुँचा तो उसने जीव को एक स्वतन्त्र चेतना के रूप में मानना स्वीकार किया। मनः शक्ति को मान्यता दी गई। आरम्भिक दिनों में जीवाणु ही शरीर और मन का आधार था। पीछे माना गया मनःचेतना की अपनी सत्ता है वह अपने अनुकूल जीवाणुओं पर सवारी गाँठती है। उन्हें अपनी इच्छा आवश्यकतानुसार ढालती है। मरणोत्तर स्थित में भी उसकी सत्ता बनी रहती हैं। इतने पर भी उसे बिजली, चुम्बक, ताप, प्रकाश, शब्द स्तर की एक भौतिक अदृश्य शक्ति ही माना गया। अब इस युग से विज्ञान आगे बढ़ रहा है उसकी प्रौढ़ता समीप है और थोड़ी हिचकिचाहट के साथ उसकी तैयारी इसी दिशा में कदम बढ़ाने की है कि जीवन को अणु निर्मित भौतिक जगत की तरह, चेतना जगत को स्वतन्त्र सत्ता का एक घटक मान लिया जाय। यह मान्यता लगभग उसी प्रकार की होगी जैसी कि अध्यात्म के क्षेत्र में जीव के स्वरूप लक्षण एवं गुण के सम्बन्ध में व्याख्या की जाती रही हैं।

आशा की जानी चाहिए कि विज्ञान जब अपनी अधेड़ परिपक्वावस्था में पहुँचेगा तो उसे जीवन के लक्ष्य एवं विकास का वह स्वरूप भी मान्य हो सकेगा जो आत्मा को परमात्मा स्तर का बनाने के लिए योग और तप का अवलम्बन लेने के लिए तत्वदर्शियों ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि के आधार पर कहा बताया था। विज्ञान की पदयात्रा क्रमशः नास्तिकता से आस्तिकता की ओर बढ़ रही है और प्रत्यक्ष है।

पदार्थ को शक्ति के रूप में अब मान्यता मिल चुकी है और यह विज्ञान के प्रारम्भिक विद्यार्थियों को तो नहीं पर मूर्धन्य स्तर पर यह स्वीकार्य है कि यह विश्व एक शक्ति सागर भर है। शक्ति की दो धाराएँ मानी जाती रही हैं उसी परम्परा के अनुसार एक को भौतिक और दूसरी को प्राणिज माना गया है। दोनों आपस में पूरी तरह गुँथी हुई है इसलिए जड़ में चेतन का और चेतन में जड़ का आभास होता है। वस्तुतः वे दोनों ज्वार−भाटे की तरह लहरों के मूल और ऊर्ध्व में निचाई−ऊँचाई का अन्तर दीखने की तरह है और एक अविच्छिन्न युग्म बनाती हैं। यद्यपि उन दोनों की व्याख्या अलग−अलग रूपों में भी की जा सकती है और उनके गुण, धर्म पृथक बताये जा सकते हैं। एक को जड़ दूसरी को चेतन कहा जा सकता है। इसी विभेद की चर्चा अध्यात्म ग्रन्थों में परा और अपरा प्रकृति के रूप में मिलती हैं।

मस्तिष्कीय विद्या के−मनोविज्ञान के आचार्य−न्यूरोलॉजी, मैटाफिजिक्स, साइकोलॉजी आदि के संदर्भ में मस्तिष्कीय कोशों और केन्द्रों की दिलचस्प चर्चा करते हैं। उनकी दृष्टि में वे कोश ही अपने आप में पूर्ण हैं। यदि यही ठीक होता तो मृत्यु के उपरान्त भी उन कोशों की क्षमता उसी रूप में या अन्य किसी रूप में बनी रहनी चाहिए थी। पर वैसा होता नहीं। इससे प्रकट है कि इन कोशों में मनः तत्व भरा हुआ है जीवित अवस्था में वह इन कोशों के साथ अतीव सघनता के साथ घुला रहता है। जब इन दोनों का अलगाव हो जाता है तो उस मृत्यु की स्थिति में मस्तिष्क के चमत्कारी कोश सड़ी−गली श्लेष्मा भर बनकर रह जाते हैं।

मनः शास्त्र के यशस्वी शोधकर्ता कार्ल गुस्तायजुँग ने लिखा है−मनुष्य के चेतन और अचेतन के बीच की शृंखला बहुत दुर्बल हो गई हैं। यदि दोनों के बीच सामंजस्य स्थापित किया जा सके तो प्रतीत होगा व्यक्ति की परिधि छोटे से शरीर तक सीमित नहीं है वरन् वह अत्यधिक विस्तृत हैं। हम हवा के सुविस्तृत आयाम में साँस लेते और छोड़ते हैं उसी प्रकार विश्व−व्यापी चेतन और अचेतन की संयुक्त सत्ता के समुद्र में ही हम अपना व्यक्तित्व पानी के बुलबुले की तरह बनाते, बिगाड़ते रहते हैं। जैसे हमारी अपनी कुछ रुचियाँ, प्रवृत्तियाँ और आकाँक्षाएँ हैं, उसी प्रकार विश्व−व्यापी चेतना ही धाराएँ भी किन्हीं उद्देश्य पूर्ण दिशाओं में प्रवाहित हो रही हैं।

गैरल्ड हार्ड ने आइसोटोप ट्रेसर्स के सम्बन्ध में हुए नवीनतम शोधकार्य की चर्चा करते हुए कहा है कि जीव विज्ञान अब हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि शरीर की कोशिकाओं और परमाणुओं पर मनःशक्ति का असाधारण नियन्त्रण है। चेतन और अचेतन रूप में जिन दो धाराओं की विवेचना की जाती हैं वस्तुतः वे दोनों मिलकर एक पूर्ण मनःशक्ति का निर्माण करती हैं। यह मनः चेतना सहज ही नहीं मरती वरन् एक ओर तो वंशानुक्रम विधि के अनुसार गतिशील रहती है दूसरी ओर मरणोत्तर जीवन के साथ होने वाले परिवर्तनों के रूप में उसका अस्तित्व अग्रगामी होता है। मनःचेतना का पूर्ण मरण पिछले दिनों सम्भव माना जाता रहा हैं जब हम इस निष्कर्ष पर पहुँचने ही वाले है कि चेतना अमर है और उसका पूर्ण विनाश उसी तरह सम्भव नहीं जिस प्रकार कि परमाणुओं से बने पदार्थों का।

भौतिक विज्ञान के नोबुल पुरस्कार विजेता श्री पियरे दि कास्ते टु नाऊ ने विज्ञान और व्यक्ति के बीच सामंजस्य स्थापित करते हुए लिखा है− अब हमें यह मानने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि मनुष्य में अपनी ऐसी चेतना का अस्तित्व मौजूद है जिससे आत्मा कहा जा सके। यह आत्मा विश्वात्मा के साथ पूरी तरह सम्बद्ध है। उसे पोषण इस विश्वात्मा से ही मिलता है। चूँकि विश्व अमर ही होना चाहिए।

‘ह्यूमन डेस्टिनी’ ग्रन्थ के लेखक ‘लेकोस्ते टू नाउं ने जीव सत्ता की स्वतन्त्र व्याख्या अगले कुछ ही दिनों में प्रचलित विज्ञान मान्यताओं के आधार पर ही की जा सकने की सम्भावना व्यक्त की है और कहा है कि हम इस दिशा में क्रमशः अधिक द्रुतगति से बढ़ रहे हैं।

प्राणि का ‘अहम्’ उसके स्वतंत्र अस्तित्व का सृजन करता है और जब तक वह बना रहता है तब तक उसकी अन्तिम मृत्यु नहीं हो सकती। स्वरूप एवं स्थिति का परिवर्तन होता रह सकता है। इस अहम् ईगो−सत्ता व स्वरूप निर्धारण अब इलेक्ट्रो डाइनैमिक सिद्धान्तों के अन्तर्गत प्रमाणित किया जाने लगा है। इस व्याख्या के अनुसार यह मानने में कठिनाई नहीं होती कि जीव सत्ता जन्म−मरण के चक्र में घूमती हुई भी अपनी आकृति−प्रकृति में हेर−फेर करती रहकर भी−अपनी मूल सत्ता का अक्षुण्ण बना रह सकती है।

‘दि सूट्स आफ कोईसिडेनस’ ग्रन्थ के लेखक में मनीषी आर्थर कोइंसिडेनस ने जीव सत्ता के आयाम स्वीकार किया है और कहा है कि प्राणी की सत्ता विशेषता को सर्वथा आणविक या रासायनिक नहीं ठहराया जा सकता।

‘यू डू टेक इट विद यू’ के लेखक भी डिविट मिलर इस बात से सहमत है कि मस्तिष्कीय कोशों को प्रभावित करने वाली एक अतिरिक्त चेतना का उसी क्षेत्र में घुला मिला किन्तु स्वतन्त्र अस्तित्व है।

मृत्यु के उपरांत प्राणी की चेतना शक्ति उसी प्रकार बची रह सकती हैं जैसे कि अणु गुच्छक एक पदार्थ से टूट बिखर कर किसी अन्य रूप में परिणत होते रहते हैं। शक्ति के समुद्र इस विश्व में प्राणियों की सत्ता बुलबुलों की तरह अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाती है− विकसित करती है और समयानुसार अपने मल उद्गम में लीन हो जाती है। जड़−चेतन मिश्रित इस शक्ति सागर को कहा जा सकता है। यदि इन्हें अलग से कहना आवश्यक हो तो एक को ‘प्रकृति’ और दूसरे को ‘पुरुष’ कह सकते हैं।

अपने समय में मूर्धन्य खगोलवेत्ता डा0 गुस्ताफस्ट्रोम वर्ग की पुस्तक ‘दि सोल आफ युनिवर्स’ में जीवन क्या है? विशेषतया मनुष्य क्या है? इस प्रश्न पर प्रस्तुत वैज्ञानिक दृष्टिकोण की मार्मिक समीक्षा की है। वे विज्ञान से पूछते हैं−क्या मनुष्य ब्रह्माण्ड की कुछ धूलि का ताप और रासायनिक घटकों की औंधी−सीधी क्रिया−प्रक्रिया मात्र है? क्या वह प्रकृति की किसी अनिच्छित क्रिया के अवशेष उच्छिष्ट से बना खिलौना मात्र है? क्या मानव जीवन वस्तुतः लक्ष्य हीन, अर्थहीन बेतुका राग मात्र है? क्या उसकी सत्ता आणविक और रासायनिक हलचलों के बनने बिगड़ने वाले संयोगों की परिधि तक ही सीमित है? अथवा वह इससे आगे भी कुछ है?

इस प्रश्नों के सही उत्तर प्राप्त करने के लिए स्ट्रोमवर्ग ने तत्कालीन विज्ञान की दार्शनिक विवेचना करने वाले मनीषियों से भी परामर्श किया। उन्होंने इस सम्बन्ध में एफ॰ आर॰ मोस्टन, वास्टर आडम्स, आर्थर एडिंगटन, थामस हैट मार्गन, जान वूदिन, कारेलहूजर, ओ॰ एल॰ स्पोसलर आदि प्रख्यात मनीषियों के सामने अपना अंतर्द्वंद्व रखा और जानना चाहा कि विज्ञान सम्मत दर्शन द्वारा क्या मानव चेतना की इतनी ही व्याख्या हो सकती है जितनी कि वह अब तक की गई हैं। अथवा उससे आगे भी कुछ सोचा जा सकता है।

अपनी जिज्ञासा, दृष्टि, कठिनाई, समीक्षा और विवेचना का एक विचारणीय स्वरूप स्ट्रोमवर्ग, के ‘दि सोल आफ’ ग्रन्थ में हैं। इस पुस्तिका की भूमिका लिखते हुए आइन्स्टीन ने प्रस्तुत जिज्ञासा को युग चिन्तकों के सामने अति महत्वपूर्ण चुनौती माना है और कहा है हमें किन्हीं पूर्वाग्रहों से प्रभावित हुए बिना सम्भावित सत्य के आधार पर ही इस प्रश्न पर विचार करना चाहिए।

फ्रायड ने प्रेरणाओं का प्रधान स्रोत ‘काम’ को माना था और उसकी व्याख्या ‘सेक्स’ के रूप में की थी। इसके बाद उन्होंने अपने ही जीवन में उसे यौन लिप्सा से आगे बढ़ाकर कामना इच्छा तथा वासना तक पहुँचा दिया। इसके बाद जुँग और एडलर ने उसे काम वृत्ति की व्याख्या कामाध्यात्म के रूप में की और उसे आनन्द, उल्लास की सहज सुलभ प्रवृत्ति के साथ जोड़ दिया।

जुँग का कथन है कि आत्मा की अमरता को यद्यपि अभी भी प्रयोगशालाओं में सिद्ध नहीं किया जा सका फिर भी ऐसी अगणित अनुभूतियाँ मौजूद हैं जो यह बताती हैं कि आदमी मरणधर्मा नहीं है वह मौत के बाद भी जीवित रहता है।

मनः शास्त्र का विकास क्रमिक गति से आगे बढ़ा है। आरम्भ में विज्ञान ने एक जागृत चेतन मन ही स्वीकार था। पीछे अचेतन मन की खोज की गई। इस अचेतन की भी कई शाखा प्रशाखा खोजी गई। सब कान्शस− अर्ध चेतन और रैशियल अनकान्शन−जातीय अचेतन, इसकी प्रमुख धाराएँ इन दिनों सर्वविदित हैं। फ्राइड की कल्पना पर सुपरईगो− उच्चतर अहं और सेन्सर−अंकुश तथ्य छाये रहे। उन्होंने इसी परिधि में मनः शास्त्र की संरचना की हैं। तब से अब तक पानी बहुत आगे बह गया और मनोविज्ञान ने कितने ही नये−नये रहस्यों का उद्घाटन किया है।

जर्मनी के मनः शास्त्री हेन्सावेन्डर ने अतीन्द्रिय क्षमता के अनेकों प्रमाण संग्रह करके यह सिद्ध किया है कि मनुष्य की सूक्ष्म सत्ता उससे कहीं अधिक सम्भावनाओं से भरी पूरी है जैसी कि अब तक जानी जा सकी हैं। टेलीपैथी के शोधकर्ता रेने वार्कोंलियर ने मनःचेतना को ज्ञात भौतिकी से ऊपर वाले सिद्धान्तों पर आधारित बताया हैं। वे कहते हैं−“मन की व्याख्या पदार्थ विज्ञान के प्रचलित सिद्धान्तों के सहारे नहीं हो सकती।”

विश्व विख्यात लेखक एस॰ जी0 वेल्स ने अपनी पुस्तक “ इन दि डेज आफ दि क्रामेट” में यह सम्भावना व्यक्त की है कि निकट भविष्य में मनुष्य का मन और दृष्टिकोण अधिकाधिक परिष्कृत होता चला जायगा। तब मनुष्य में सहृदयता, सहयोग−भावना तथा दूरदर्शिता बढ़ती जायगी। फलस्वरूप समाज का ढाँचा और मानवी आचार इतना उपयोगी बन जायगा जिसे अब की अपेक्षा काया−कल्प जैसा कहा जा सके। तब कोई युद्ध का समर्थन न करेगा और चिंतन की दिशा सहयोग पूर्वक शान्ति एवं प्रगति के लिए प्रयुक्त हो सकने वाले आधारों को ढूँढ़ने के लिए प्रयुक्त होगी।

शंकराचार्य कहते थे स्व और पर का भेद भ्रान्ति हैं। हम सब भिन्न दीखते भर है वस्तुतः सब एकता के सघन सूत्र में पिरोये हुए मनकों की तरह हैं। ‘ईसा कहते थे−अपने पड़ौसी को प्यार करो ताकि तुम्हारा विकसित प्यार तुम्हें निहाल कर दे।’ बुद्ध ने कहा था−‘करुणा से बढ़ कर मनुष्य के पास और कोई दिव्य सम्पदा नहीं। जो ममता और करुणा से भरा है वही दिव्य हैं।’

जीव चेतना का लक्ष्य और विकास क्रम का पूर्णत्व इसी स्तर पर विज्ञान को भी पहुँचा देगा जो ऋषियों और तत्वदर्शियों ने बताया था। यदि विज्ञान का उद्देश्य सत्य की खोज हैं तो उसे आत्मा की वर्तमान स्वीकृति को परमात्मा स्तर प्राप्त करने तक भी पहुँचना होगा। इसके लिए कल न सही परसों की प्रतीक्षा की जा सकती हैं।


जब तक तुम्हारी जड़े मजबूत हैं (kahani)

उस दिन भारी तूफान आया। बड़े−बड़े विशाल वृक्ष उखड़ कर धराशायी हो गये। किशोर पौधे उखड़े तो नहीं, पर डर बुरी तरह गये। वे काँप रहे थे कि अगली कल आने वाला तूफान उन्हें भी इसी तरह उखाड़ फेंकेगा।

रात्रि भर चिन्ता से खिन्न उस वन के सभी नवोदित वृक्ष सकपकाये बैठे रहे, उनके चेहरों पर गहरी उदासी छाई थी।

प्रभातकालीन मलायानिल उधर से निकला तो उसने उपवन में छाई इस उदासी का कारण पूछा−मालूम हुआ कि अन्धड़ ने विशाल वृक्षों को उखाड़ फेंका है इसी असमंजस में ये किशोर पौधे डरे सहमे बैठे हैं। संकट कहीं उन्हें भी न धर दबोचे।

मलायानिल ने किशोर वृक्षों को दिखाया कि बूढ़े पड़े अन्धड़ ने कहीं उखाड़े उनकी जड़े पहले से ही सड़ गई हैं। अन्धड़ का बहाना लेकर वे खुद ही गिरे और खुद ही मरे है।

किशोरों को ढाढ़स बंधा और उन्होंने साहस पूर्वक पूछा−क्या हमारे लिए कोई संकट नहीं हैं।

मलायानिल ने उन्हें पूर्ण आश्वस्त करते हुए कहा− अन्धड़ से जरा भी मत डरो। जब तक तुम्हारी जड़े मजबूत हैं तब तक तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अपनी जड़े मजबूत रखो और निर्भयता पूर्वक जीवनयापन करो।


मानवी चेतना में सन्निहित दिव्य शक्तियाँ

मानवी चेतना का मोटा उपभोग वस्तुओं के उपभोग और प्राणियों के साथ व्यवहार, कौशल के रूप में ही प्रतीत होता है, पर जैसे−जैसे रहस्यमय पर्दे उठते जा रहे हैं वैसे−वैसे सिद्ध होता जा रहा है कि इस स्थूल के भीतर कोई दिव्य चेतना होता जा रहा है कि इस स्थूल के भीतर कोई दिव्य चेतना लोक जगमगा रहा है और उसमें प्रवेश करके बहुमूल्य रत्न राशि ढूँढ़ लाने की क्षमता भी मनुष्य में विद्यमान हैं। मन को साधारणतः इच्छा, ज्ञान और क्रिया में संलग्न रखने वाली चेतना के रूप में जाना जाता रहा है, पर अब उसकी अतीन्द्रिय चेतना पर विश्वास किया जाने लगा है। ऐसे अगणित प्रमाण सामने आ रहे है जिनसे प्रतीत होता है कि हाड़−माँस को सोचने, बोलने वाला पिण्ड जो कर सकता है उससे कहीं अधिक परिधि मानवी चेतना की है। उसमें अति मानवी असाधारण शक्तियाँ भी सन्निहित हैं।

अमेरिका के टोरेन्टो टेलीविजन स्टूडियो में एक व्यक्ति की कल्पनाएँ मूर्तिमान रूप में किस प्रकार दिखाई देती हैं इस रहस्य के प्रामाणिक चित्र लिये गये। 49 वर्षीय ट्रक ड्राइवर थियोडर सेरिओंस का दावा था कि उसके विचार इतने स्पष्ट होते हैं कि उन्हें शायद चित्र रूप में भी उतारा जा सके। उपरोक्त प्रयोगशाला में उसे प्रस्तुत किया गया। इसके लिए कम्पनी में बना सील बन्द पोलारायड कैमरा खरीदा गया और फिल्म बनाने वाली कम्पनी से सीधे ही उसमें फिल्म भराई गई। यह कैमरा ऐसा है जो अपने आप ही एक मिनट में तैयार फोटो हाथ में रख देता है। यह प्रयोग उपकरण इसलिए ऐसी सावधानी के साथ प्रयुक्त किये गये कि किसी को यह सन्देह न रहे कि−किसी व्यक्ति विशेष की ख्याति के लिए कोई बाजीगरी की गई हैं। उपकरणों की ओर फोटोग्राफी की शुद्धता के लिए कई साक्षी भी साथ रखे गये।

थियोडर ने जो−जो कल्पनाएँ की, मस्तिष्क के सामने लगे कैमरे ने ठीक उन्हीं चित्रों को उतार दिया। इस विशिष्टता की चर्चा जब अधिक हुई तो कोलरेडो विश्व−विद्यालय ने उस व्यक्ति के सम्बन्ध में गहराई तक जाँच करने का निश्चय किया और इसके लिए डा0 आइसनवद के नेतृत्व में एक विशेष विभाग ही बना दिया जो न केवल इस चमत्कारी की वरन् उसके कारणों की भी जाँच करे। जाँच दो वर्ष तक चली और उसका निष्कर्ष इतना ही निकला कि उस व्यक्ति में निश्चित ही यह अद्भुत शक्ति हैं। उसके कारण नहीं जाने जा सके केवल कुछ सम्भावनाओं की चर्चा की गई।

यूरीगैलर को आरंभ में बाजीगर माना जाता था पीछे उसने अपनी शक्तियों को वैज्ञानिकों प्रयोग के लिए प्रस्तुत किया और उसके दावे सही निकले तो योरोप भर के पत्रों में उसकी चर्चा छपी। उसे प्रयोग प्रदर्शन के लिए योरोप भर में बुलाया गया। वह इच्छा शक्ति के चमत्कार दिखाता था। एक प्रदर्शन में उसने मजबूत अँगूठी के दो टुकड़े कर दिये। लंदन में उसने एक घड़ी को देखा जिसमें 4-45 बज रहे थे उसने दूर बैठकर घड़ी की सुइयां उलटी घुमाई और 3-12 पर रोकी। उसने दूर रखे चम्मच को बीच में से मोड़कर दुहरा कर दिया। म्युनिख प्रदर्शन तो उसने कमाल ही कर दिया सड़कों पर दौड़ती ट्रामों और मोटरों को उसने अपने संकल्प बल से रोक कर खड़ा कर दिया और वे जहाँ की तहाँ निस्तब्ध खड़ी रह गई।

इंग्लैंड के वायुयान इंजीनियर जे0 डन अपने सपने को एक प्रकार की भविष्यवाणी सिद्ध करते रहे। उनमें इस विलक्षणता की यथार्थता का पता लगाने के लिए उसे प्रस्तुत किया। उन्हें जो सपने आते थे उन्हें वे दूसरों को नोट कराते−लोग कौतूहलपूर्वक प्रतीक्षा करते और अन्ततः एक समय ऐसा आ जाता जब स्वप्नों को एक तथ्य रूप में सिद्ध करने वाली घड़ी सामने आ पहुँचती।

रूस में अतीन्द्रिय घटनाओं को जालसाजी और किंवदंती मात्र कहकर हँसी में उड़ाया जाता था, बीस वर्ष पूर्व प्रकाशित रूसी शब्दकोश में चमत्कारी की भरपूर खिल्ली उड़ाई गई थी। पर अब उस देश में ही सबसे अधिक दिलचस्पी इस दिशा में ली जा रही है और जो शोध निष्कर्ष सामने आ रहे हैं, उनसे वे लोग उसे तथ्य रूप में स्वीकार करने लगे हैं। वैज्ञानिकों की सभा में भेज पर रखी वस्तुओं को इच्छा शक्ति के आधार पर खींचने, धकेलने और इधर−उधर करने का सफल प्रदर्शन श्रीमती मिखाइलोबी ने किया तो सभी को यह मानने के लिए विवश होना पड़ा कि मनुष्य की संकल्प शक्ति में असामान्य बल हो सकता है।

‘टाइम’ पत्रिका ने रूप की उन तीन लड़कियों का विवरण विस्तारपूर्वक छापा था जो आँखों से पट्टी बाँधकर किसी भी वस्तु की आकृति और रंग बिना छुए बता देती थीं। उनमें से एक को घोर अन्धेरे में पुस्तक पढ़कर सुना देने का कमाल हासिल हैं इनके नाम हैं नाडियालोवानोवा, रोशाकुले शोवा, लेनाडिलजनोवा। एक अन्य रूसी महिला नेग्या मिखेलोवना की यह विशेषता है कि वह अपने संकल्प बल से चलती घड़ियों की चाल रोक देती है, उनकी गति में तेजी या मन्दता उत्पन्न कर देती है। रूस में बाजीगरी करके जनता को भ्रम में डालने की गुंजाइश नहीं हैं। वहाँ के जादूगरों को सबसे पहले यह घोषणा करनी पड़ती हैं कि यह सिर्फ धोखाधड़ी और हाथ की सफाई भर है। वहाँ अतीन्द्रिय शक्ति का दावा करने वाले को सर्व प्रथम वैज्ञानिकों की कठिन परीक्षा के लिए अपने को प्रस्तुत करना पड़ता है अन्यथा कठोर कारावास भुगतना पड़ता है।

परा मनोविज्ञान यह पता लगाने के लिए प्रयास कर रहा है कि अतीन्द्रिय क्षमता के स्रोत आखिर हैं कहाँ? संसार भर के प्रायः प्रत्येक देश में इस प्रकार की अगणित घटनाएँ अभी भी होती रहती हैं जिनसे मनुष्य में असामान्य क्षमताओं के होने का प्रमाण मिलता है। भूतकाल की चमत्कारी घटनाओं को किंवदंती कहा जा सकता है, पर जो सामने प्रत्यक्ष खड़ा हैं और अपनी सचाई को हर कसौटी पर कसे जाने का दावा प्रस्तुत कर रहा है उसे झुठलाया कैसे जाय? अस्तु मस्तिष्क विद्या की एक विशेष धारा पैरा साइकोलॉजी के अंतर्गत अतीन्द्रिय शक्ति सम्बन्धी खोजे सभी विकसित देशों में बड़े उत्साह के साथ चल रही हैं।

मनः शास्त्र के महानीषी डा.जोसेफ राइन ने सर्व प्रथम अतीन्द्रिय विज्ञान पर अपनी वैज्ञानिक आधार पर लिखी हुई पुस्तक एक्ट्रा सेन्सरी पर्सेरशन’ प्रकाशित कराई थी। तब से लेकर अब तक इस संदर्भ में शोधकार्य बहुत आगे चला गया है। डा. जोसेफ ने प्रायः 84 हजार घटनाओं की साक्षियों का विश्लेषण करके कुछ निष्कर्ष निकाले थे। उनने कहा है−‘बिना संचार साधनों की सहायता के एक मन दूसरे मन को प्रभावित कर सकता है। मन में पदार्थों को प्रभावित करने की सामर्थ्य मौजूद हैं। मनः शक्ति की लम्बी दौड़ में दूरी ताप, ऊँचाई, गहराई अथवा अन्य कोई भौतिक कारण व्यवधान उत्पन्न नहीं करते।’

रूसी परा मनोविज्ञानवेत्ता एल॰ एल॰ वेसिलियेव ने एलेक्ट्रो मैगनेटिज्म−एक्सरेंज आदि के व्यवधान उत्पन्न करके यह पता लगाने का प्रयत्न किया कि मन की दूरबोध शक्ति में उनके कारण कोई अड़चन उत्पन्न होती हैं या नहीं। पर पाया यही गया कि जिनमें यह शक्ति मौजूद हैं उनका कार्य प्रत्येक वैज्ञानिक बाधा के बावजूद यथावत् चलता रहता है। मन की क्षमता को कोई भौतिक शक्ति प्रभावित नहीं करती। इससे वे यह सोचने को बाध्य होते हैं कि मन की शक्ति कोई अभौतिक शक्ति हो सकती हैं।

अब विज्ञान के मूर्धन्य क्षेत्रों में यह सोचा जा रहा है कि ज्ञात पदार्थ भौतिकी से आगे कोई अविज्ञात अतिभौतिकी होनी चाहिए। तरंग याँत्रिकी, ऊर्जाणुवाद, सापेक्षवाद आदि सिद्धान्तों ने पदार्थ विज्ञान को असमंजस भरे एक ऐसे गतिरोध केन्द्र पर लाकर खड़ा कर दिया है जहाँ से आगे की बात कुछ सूझ नहीं पड़ रही हैं। विज्ञान की भूतकालीन सरल व्याख्याओं से अब कुछ काम नहीं चल रहे हैं। वे बाल−बोध के लिए गढ़ी गई लाल बुझक्क कहानियों जैसी रह गई हैं। खोज की गहराई ने विज्ञान को उन मूल तथ्यों तक पहुँचा दिया है जहाँ से आगे क्या हो सकता है इस संदर्भ में कुछ भी सोच सकना सम्भव नहीं हो रहा हैं। इस असमंजस ने एक नई अतिभौतिकी के आविष्कार की सम्भावना को बहुत बल दिया हैं।

डा. जोसेफ राइन अपने ग्रन्थ ‘दि रीच आफ माइन्ड’ में इस सम्भावना के बीज छोड़े गये हैं कि−‘भविष्य में अध्यात्म को उच्चस्तरीय विज्ञान के रूप में प्रस्तुत करना पड़ेगा और एक नई अतिभौतिकी का जन्म होगा।’

पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति आधार अब विज्ञानवेत्ताओं को एक विशिष्ट तत्व ‘ग्रैविटी’ के रूप में हाथ लगा है। यह ग्रैविटी प्रत्येक पिण्ड से निकलता है और उसकी आकर्षण शक्ति के स्तर की संरचना करता है। इसी के आधार पर एक ग्रह दूसरे की खींचता है और यह विश्व ब्रह्माण्ड एक व्यवस्थित सम्बन्ध शृंखला में जकड़ा हुआ हैं।

ग्रह−नक्षत्रों की तरह ही मनुष्य में भी एक विशिष्ठ विद्युत का प्रवाह निःसृत होता है। वह एक दूसरे को बाँधता है। इस प्रकार समस्त मनुष्य जाति का प्रत्येक सदस्य एक दूसरे के साथ अनजाने ही बँध हुआ हैं और जिन धागों को यह बन्धन कार्य करना पड़ता है वही एक से दूसरे तक उसकी सत्ता का भला−बुरा प्रभाव पहुँचाता है। एक व्यक्ति दूसरे के विचारों से अनायास ही परिचित और प्रभावित होता रहता है यह आगे की बात है कि वह प्रभाव कितना भारी−हलका था और उसे किस कदर, किसने, स्वीकार या अस्वीकार किया।

आइन्स्टीन ‘समग्र ज्ञान’ को सामान्य ज्ञान की परिधि से आगे की बात मानते थे वे कहते थे जिज्ञासा, प्रशिक्षण, चिन्तन एवं अनुभव के आधार पर जो जाना जाता है उतना ही ‘ज्ञान’ नहीं हैं वरन् चेतना का एक विलक्षण स्तर भी है जिसे अन्तर्ज्ञान कहा जा सकता है। संसार के महान आविष्कार इस अन्तर्ज्ञान प्रज्ञा के सहारे ही मस्तिष्क पर उतरे हैं। जिन बातों का कोई आधार न था उनकी सूझ अचानक कहाँ से उतरी? इसका उत्तर सहज ही नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उसका कोई संगत एवं व्यवस्थित कारण नहीं हैं। रहस्यमय अनुभूतियाँ जिस प्रजा से प्रादुर्भूत होती है उन्हें अति मानवीय मानना पड़ेगा।

अध्यात्म शास्त्र में जिन पाँच कोशों की विवेचना की है वे भौतिक विज्ञान सम्मत भी। अन्नमय कोश को ‘मैटर’−प्राणमय कोश को ‘सेल’−मनोमय कोश को ‘माइण्ड’, विज्ञानमय कोश को ‘पर्सनालिटी’ और आनन्द मय कोश को−‘इण्ट्यूशन’ कहा जा सकता है।

अब तक विज्ञान मैटर के बारे में ही कुछ कहने लायक जानकारी प्राप्त कर रहा हैं। कुछ कदम ‘सेल’ और ‘माइण्ड’ के बारे में भी बढ़े हैं। पर्सनालिटी और ‘इंट्यूशन’ के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए अब वैज्ञानिकों को कटिबद्ध होना होगा। समुद्र जैसी अगाध सम्भावनाओं से युक्त मेरुदण्ड में छह चक्रों के अति महत्वपूर्ण रक्त भाण्डागार अपने भीतर विद्यमान है; यदि उन्हें ढूँढ़ा, कुरेदा जा सके तो भौतिक जगत में जो कुछ है उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण विभूतियाँ करतलगत हो सकती हैं।

षट् चक्रों में से चार का अस्तित्व अब विज्ञान ने स्वीकार कर लिया है। मूलाधार चक्र−पैल्विक प्लेक्सस, मणिपूर−चक्र−सोलर प्लेक्सस, अनाहत चक्र, कार्डियल प्लेक्सस, विशुद्ध चक्र−फैरिजियल प्लेक्सस के रूप में जाने जा चुके हैं। इनके दृश्यमान स्वरूप की झाँकी कर लेने पर अब यह पता लगाया जाना शेष है कि शरीर संचालन की सामान्य भूमिका के अतिरिक्त इनकी अतीन्द्रिय गतिविधियाँ एवं क्षमताएँ क्या हो सकती हैं।

आशा की जानी चाहिए कि स्थूल जगत से जो चमत्कारी शक्तियाँ प्राप्त की जा सकी है उसकी तुलना में असंख्य गुनी दिव्य शक्तियाँ हमें अपनी अन्तः चेतना में सन्निहित मिलेंगी। उनका प्राप्त करना और सत्प्रयोजन के लिए प्रयुक्त कर सकना सम्भव हो सका तो निस्सन्देह मनुष्य, नर−शरीरधारी होते हुए भी सच्चे अर्थों में देव−दिव्य सत्ता सम्पन्न सिद्ध होकर रहेगा।


Quotation

मनुष्य का मूल्याँकन करने के लिए उसके कथन को अथवा पिछले कामों को जानना पर्याप्त नहीं। देखना यह होगा कि वह क्या बनने जा रहा है।

−अरविन्द


अंगदान की परम्परा भी चलेगी

मानव शरीर का मृत्यु के उपरान्त लोकोपयोगी कार्यों के लिए कुछ उपयोग हो सके इसकी परम्परा वेन्थन महोदय ने डाली। उन्होंने वसीयत की थी कि उन्हें कब्र में न गाढ़ा जाय वरन् अस्पताल में चीर−फाड़ करके छात्रों की ज्ञान वृद्धि के लिए दे दिया जाय। उनका अस्थिपंजर भी अध्ययन के लिए सुरक्षित रखा जाय।

जब एक के अंगों को दूसरे के शरीर में लगाने की प्रत्यारोपण पद्धति प्रकाश में आई तो उदार लोगों ने अपने शरीर के हृदय, फेफड़े, जिगर, गुर्दे आदि दान देने आरम्भ कर दिये। यों यह प्रत्यारोपण, एक व्यक्ति के शरीर का कोई अवयव लेकर दूसरे में जीवित स्थिति में भी किया जा सकता है, जैसा कि एक जीवित व्यक्ति का रक्त दूसरे जीवित व्यक्ति को दिया जा सकता है। पर यह कार्य काफी कठिन है इसमें देने वाले को अधिक क्षति उठानी पड़ती हैं और यह खतरा भी रहता है कि यदि आपरेशन सफल न हुआ तो यह या दोनों पक्षों को बहुत घाटा पड़ सकता है।

अस्तु यह अधिक उपयुक्त समझा गया कि ‘मृत्यु’ के उपरान्त उदार व्यक्ति दूसरे जरूरतमंदों को अपने अवयवों का दान कर दें। इसके लिए ‘मृत्यु’ की परिभाषा इतनी ही पर्याप्त मानी गई हैं कि मस्तिष्क की गतिविधियों के विद्युत रेखाचित्र खिंचने बन्द हो जायं और उसे गतिहीन घोषित कर दिया जाय। यदि मुर्दा कुछ अधिक देर पड़ा रहा तो वह सड़ने लगेगा और उसके विषाक्त अवयव किसी काम के न रहेंगे।

उपरोक्त स्तर की मृत्यु घोषित होते ही मृत शरीर को तत्काल ऐसे उपकरणों में जकड़ दिया जाता है कि वह फाड़−चीड़ करने में लगने वाले समय तक सड़न से बचा रहे। इसके लिए तत्काल मृत शरीर के हृदय को मशीन द्वारा ऑक्सीजन मिला हुआ रक्त देना आरम्भ कर दिया जाता है ताकि उसके कोष, ऊतक और स्नायु कठोर न होने पायें।

ऐसे एक विशेष अनुदान का उल्लेख अंग प्रत्यारोपण के प्रसंगों में अविस्मरणीय है। इसमें सर्वांग दान किया गया था। न्यूयार्क के एक 57 वर्षीय नागरिक ने अपना शरीर न्यूयार्क मेमोरियल अस्पताल को दे दिया। वह कष्टसाध्य रोग से पीड़ित था और मरना लगभग निश्चित था। ऐसी दशा में भी इतना दान साहस भी कम सराहनीय नहीं था।

मृत्यु से पहले ही डाक्टरों ने यह जाँच करली थी कि उसका कौन−सा अंग प्रत्यारोपण के उपयुक्त है। साथ ही यह भी निश्चित कर लिया गया था कि उसका कौन−सा अंग किस रोगी को लगाया जायगा। उसकी पूरी तैयारी करके रखीं गई ताकि बिना समय गँवाये तत्काल वह कार्य सम्पन्न किया जा सके।

20 फरवरी की शाम को उस व्यक्ति की मृत्यु हुई। डा0 जैक ब्लाक, डा0 जैरी ने कुछ ही मिनटों में उसका दिल निकाल लिया और उसे 36 वर्षीय एक हृदय रोगी का दिल निकाल कर उसकी जगह यह नया दिल फिट कर दिया गया। जिगर एक 27 वर्षीय यकृत केन्सर की मरीज महिला को लगा दिया गया। दो गुर्दों में से एक 29 वर्षीय युवक के और एक 38 वर्षीय स्त्री के शरीर में लगाया गया। दो आँखों में से एक को एक तरुण की और एक को एक वृद्ध की आँखें में से एक को एक तरुण की और एक को एक वृद्ध की आँखों में फिट किया गया।

प्रत्यारोपण विशेषज्ञा डा0 एडवर्ड वीटो और डा0 लिल्लेहाई ने खोज करके बताया है कि मनुष्य शरीर के 27 अवयव ऐसे है जो एक से निकाल कर दूसरे के शरीर में लगाये जा सकते हैं, इस प्रकार एक मुर्दा सत्रह जरूरतमन्दों की आवश्यकता पूरी करते हुए अपनी मृत्यु को भी सार्थक बना सकता है।

मानवी उदारता निकट भविष्य में न केवल अपना धन, बुद्धि, वैभव, श्रम लोक−मंगल के लिए समर्पित करेगी वरन् जीर्ण−शीर्ण अंग अवयवों को भी अधिक जरूरतमंदों को देने की पुण्य परम्परा प्रचलित करेगी, ऐसे उत्साह वर्धक चिन्ह अभी से दीख पड़ रहे हैं।


ईश्वर को साथी बनाकर सफल जीवन जिये

सच्चा साथी प्यार करता है, सलाह देता है तथा सुख−दुख में सहयोग भी देता है। इसके अलावा वह शक्ति और सुरक्षा भी दे और प्रत्युपकार की जरा भी अपेक्षा न रखे तो वह सोने में सुहागा हो जायेगा। ईश्वर जैसा ही साथी है।

ईश्वर को जिसने जीवन का सहचर बनाया उसे सन्त ज्ञानेश्वर की तरह पूरा विश्व अपना ही घर लगता है। सामान्य मानव संकट में, विफलता में कहता है कि दुनिया में राम कहीं नहीं हैं। परन्तु ईश्वर को मित्र बनाने वाले को लगता है कि दुनिया में राम के अलावा कुछ भी नहीं हैं। उसे इस बात का विश्वास होता है कि विश्व का सारा ऐश्वर्य उस परमात्मा के नाम मंगल सूत्र के रूप में विश्व ने धारण किया है। यह धारणा मन में दृढ़ हुई तो उसको ईश्वर के साथ मित्रता का पूर्ण लाभ मिलता है।

किसी के घर के आँगन में धन गढ़ा हो परन्तु उसको इस बात का पता ही न हो तो वह गरीबी का ही अनुभव करता रहेगा और चिन्ता, उलझनों, में डूबकर समस्याओं का सामना करने में जिन्दगी बिताता रहेगा। यदि एक वार उसको उस धन का पता लग जाय तो मन में आत्म−विश्वास जागृत होगा। सघनता का, समृद्धि का यह विश्वास और सहारा उसके जीवन के दृष्टिकोण को ही बदल देगा। ईश्वर उस गढ़े हुए धन की तरह है। उसके सान्निध्य का अनुभव आदमी की जिन्दगी की दिशा ही बदल देता है।

मित्र माँ की तरह होता है। बालक के सामने से माता ओझल हुई तो वह सशंक, भयभीत नजर से इधर−उधर देखता है परन्तु माता के नजदीक होने का विश्वास मन में आते ही वह प्रसन्नता से खिलता है, स्वयं को सुरक्षित अनुभव करने लगता है। जिसने ईश्वर को साथी माना वह इसी विश्वास से चलता रहता है। उसमें साहस जागृत होता है, फिर विजयश्री कैसे दूर रह सकेगी ‘साहसे श्रीः प्रतिवसति।’

जो ईश्वर को भूलता है उसे हमेशा अकेलापन अनुभव होता है। जिन्दगी का सारा बोझ अपने ही कन्धे पर उठाकर थकावट आने लगती है, साहस जवाब देने लगता है। आशा और विश्वास क्षीण होने लगते हैं और आपत्तियाँ सामने आने पर भय और आशंकाओं से पैर लड़खड़ाने लगते हैं। ऐसी अवस्था में भी यदि उसने अनन्य भाव से ईश्वर को पुकारा तो वह निरपेक्ष मित्र सहायता के लिये जा पहुँचता है। तो फिर क्यों न अर्जुन की तरह अपने उस परम मित्र और हित चिन्तक के हाथ में अपने जीवन रथ की बागडोर दी जाये?

ईश्वर को साथी बनाने में अनन्त लाभ हैं। अपना बल साधन यदि कम पड़ने लगें तो अपने साथ अनन्त शक्तियां एवँ साधनों का भण्डार है, यह विश्वास बड़ा ही प्रेरणादायक होता है। इससे उमंग और उत्साह बढ़ जाते हैं और निराशा का कभी अनुभव ही नहीं होता। ईश्वर को अपना चिरसाथी मानने से दुर्धर परिस्थितियों में भी मन डगमगाता नहीं। इसकी साक्षात् प्रतीति मीरा के जीवन में मिलती हैं। राणा ने इतना विरोध किया, विष का प्याला भी दिया तो भी मीरा जरा भी विचलित नहीं हुई।

जीवन एक संग्राम है और विगत−ज्वर होकर ही उसका डटकर सामना करना पड़ता है। यह भावना तभी दृढ़ होती है जब ईश्वर की मित्रता का मन में विश्वास होता है। फिर थकावट नहीं लगती और मन को विश्राम मिलता है। रेलगाड़ी में स्थान सुरक्षित करने पर सफर में विश्राम किया तो भी मञ्जिल पर पहुँचने का अटल भरोसा रहता है क्योंकि चलाने वाले की कुशलता तथा सम्पूर्ण सहयोग पर अपना दृढ़ विश्वास रहता है। परन्तु स्वयं अपने पर ही सब जिम्मेवारी लेकर, अपनी ही कार में अकेला बैठकर पूरा बोझ उठाया तो थकावट आने लगती हैं और ‘कोई कुशल साथी होता तो कितना अच्छा होता’ यह विचार वार−बार मन में आता है।

ईश्वर को अपना निकटतम साथी बनाने में एक और लाभ है। कभी रास्ता भूलकर भटक जाने का सवाल ही नहीं उठता। जिसे कोई बताने वाला ही नहीं होता या हो भी तो बताने वाले की बात पर विश्वास नहीं होता वही भटक सकता है। योग्यायोग्य विवेक के रूप में अपने अंतरात्मा में सदैव निवास करने वाला यह निजी दोस्त हमेशा प्रेरणा देता रहता है और “यतो देवस्ततो जयः।”

जो ईश्वर को साक्षी मानकर अच्छे बुरे का विवेक करता है वह निर्भय बनता है। डर उसके पास भी नहीं आता। उसे इस बात का पता होता है कि यह संसार एक पुण्य उपवन है। यहाँ तो सर्वत्र आनन्द ही आनन्द भरा है। महाराष्ट्र के पुण्य पावन तीर्थ स्थान पढरपुर में विट्ठल की मूर्ति कमर पर दोनों हाथ रख कर खड़ी हैं। इसका मतलब बताते हुए तुकाराम महाराज कहते हैं कि ईश्वर यह विश्वास दे रहा है−‘जो उस पर दृढ़ श्रद्धा रखेगा और उसको अपना परम साथी मानेगा उसके लिये यह भवसागर केवल कमर तक ही गहरा हैं। उसको डरने का कोई कारण नहीं।

इतनी दृढ़ श्रद्धा रखने वाला सुख और दुख दोनों में अपना सन्तुलन बनाये रखता है यह ईश्वर की मित्रता का एक और लाभ है। जिस तरह पूर्व दिशा सूरज उगते समय तथा डूबने के समय भी लाल दिखती है उसी तरह सुख−दुख में, जय−पराजय में, आशा−निराशा में ईश्वर का स्नेही एकरूप ही रहता है। उसकी हिम्मत कभी हारती ही नहीं।

ईश्वर को कोई मित्र माने या न माने वह तो सबके प्रति स्नेह की भावना रखना है। वह हारे की हिम्मत है, टूटे, की ताकत है, बिगड़े हुए का श्रृंगार है और पापी की पुकार भी है। रोने वाले के आँसू भी वही है और गाने वाले की तान भी वही हैं। ऐसे महान को अपना परम मित्र मानकर, सूर्य की किरणों की तरह वह अपने जीवन में पूर्णतया छाया हैं, इस अनुभूति का आनन्द लेने से ही उसका पता लग सकता है।

ईश्वर की उपेक्षा करने से, जीवन की सन्ध्या से ‘बार−बार तू आया, पर मैंने पहचान न पाया’ ऐसे उद्गार निकालने से बचना हो तो इस मित्र को अपनाने में ही बुद्धिमत्ता है। उसका मित्रता का हाथ हमेशा ही आगे हैं उस हाथ में अपना हाथ दिया तो यश और श्री के होने में तिल मात्र भी सन्देह कैसा? स्वर्ग−मुक्ति का परम लाभ भी इसी समर्पण वृत्ति के साथ ही जुड़ा हुआ हैं।


Quotation

यह जग संघर्षात्मक नहीं सृजनात्मक हैं। बीज वृक्ष के रूप में संघर्ष करने के लिये नहीं, अपने स्वतः के साक्षात्कार के लिये प्रकट होता है। उसके जीवन का उद्देश्य किसी का विनाश नहीं वरन् किसी के लिए अपने आप को समर्पित कर देना है। सम्पूर्ण सृष्टि एक दूसरे का सहयोग देती हुई चल रही हैं। पञ्च महातत्व इसलिये मिलकर एकत्रित नहीं होते कि उन्हें मिलकर किसी से संघर्ष करना है, अपितु इसलिये कि वह उनकी प्रकृति है, उसी के द्वारा वे सृष्टिकर्ता की इच्छा को पूर्ण कर सकते हैं। यदि हम विकासवादी है तो सृजन का नियम हमें स्वीकार करना चाहिए, विसर्जन या संहार का नहीं। यदि सम्पूर्ण सृष्टि में, सभी प्राणियों की किसी एक शक्ति की प्रेरणा और इच्छा से काम कर रही है तो निश्चित ही वह विधायक है, निर्माणात्मक और भावात्मक हैं, विनाशक और विभेदक नहीं। अभी प्रलयकाल नहीं सृजन की बेला है।

−दीनदयाल उपाध्याय


क्या नर और नारी एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं।

यह कहा जाता है कि नर−नारी एक दूसरे के पूरक हैं, एक के बिना दूसरे का काम नहीं चलता। दोनों के बीच का आकर्षण उन्हें घनिष्ठता के सूत्र में बाँधता है इसलिए उन्हें एक दूसरे से पृथक न रहकर साथ−साथ रहना चाहिए।

यह प्रतिपादन एक सीमा तक ही ठीक है। माता−पिता की सहायता के बिना पुत्र या पुत्री का काम नहीं चलता। बहन−भाई के दुलार के बिना घर में उदासी रहती। परिवार में चाची−ताई, बुआ, भाभी, बहिन, बेटी आदि का अपना पक्ष है, और बेटे, पोते, भाई, चाचा, ताऊ आदि−आदि का अपना। दोनों पक्ष साथ−साथ मिल जुल कर एक घर में रहते हैं तो उससे नर−नारी के समन्वय से उत्पन्न एक पूरक स्थिति बनती है और उस द्विपक्षीय स्नेह, सहयोग से परिवार का वातावरण खिल पड़ता है। यह तथ्य ऐसा है जिससे इनकार करने की कोई आवश्यकता नहीं है। सहयोग हर क्षेत्र में सुखद होता है नर−नारी का सहयोग भी इस दृष्टि से उचित भी है−आवश्यक भी और श्रेयस्कर भी।

पर इस प्रतिपादन में कोई सार नहीं कि यौनाचार के लिए नर−नारी का सम्मिश्रण हुए बिना− विवाह बन्धन में बंधे बिना कोई अपूर्णता रहती है। मनुष्य की क्या सभी प्राणियों की रचना इस प्रकार हुई है कि वह अपने आप में पूर्ण हैं। उनके भीतर ‘रयि’ और प्राण दोनों ही तत्व विद्यमान हैं और वे अपने भीतर ही नर−नारी मिलन से जो शक्ति उत्पन्न होने की बात कही जाती है उसे अनायास ही पूरा करते रहते हैं। नारी पक्ष और नर पक्ष दोनों ही उसके भीतर विद्यमान है। उसमें से जो अधिक विकसित हो जाता है प्रधानता अवश्य उसी स्तर की होती है पर इसका अर्थ यह नहीं कि किसी तत्व को ऐसी कमी होती हैं जिसकी प्राप्ति के लिए नर को नारी से या नारी को नर से कामुक सम्बन्ध बनाये बिना काम ही न चले।

छोटी जातियों के प्राणी प्रत्यक्षतः उभयलिंगी होते हैं। वे अपने आप में ही नर और नारी की दोनों ही विशेषताओं युक्त होते हैं। उन्हें किसी एक जाति का घोषित नहीं किया जा सकता। वनस्पतियों में यही बात होती हैं, पुष्पों के माध्यम से उनका रजोधर्म होता है। खिलने का अर्थ है गर्भ धारण करने योग्य यौवन का उभार। हवा के साथ उड़कर या मक्खी, तितली आदि कीड़ों के सहारे पुष्पों का पराग एक दूसरे तक पहुँचता है। उससे उनका निषेचन होता है और गर्भ धारण करके फल देने लगते हैं। फूलों में उभयपक्षीय पराग पाया जाता है। गर्भ धारण करने की और गर्भ धारण कराने की भी दोनों ही क्षमताएँ उनमें पाई जाती हैं। न्यूनाधिक मात्रा होने की बात दूसरी है, पर सभी पुष्प होते उभयलिंगी हैं उनके परागों में दोनों लक्षण पाये जाते हैं। प्रयत्न पूर्वक उनके किसी भी पक्ष को उभारा जा सकता है। जिसे आज नारी जाति का पराग कहते हैं उसमें थोड़ा सा प्रयत्न करके उन्हें नर जाति का बना दिया जाता है। अधिकाँश वनस्पतियों में तो दूसरे पौधों का पराग पाने की आवश्यकता ही नहीं होती, उनके भीतर अपने आप ही अंतर्मिलन का उपक्रम बनता रहता है और फूल, फल, बीज उत्पन्न होते रहने की प्रक्रिया चलती रहती है। दूब जैसी घास अपने आप में वंश वृद्धि की दृष्टि से पूर्ण है। उसे इसके लिए किसी बाहरी सहयोग की जरूरत नहीं पड़ती।

बहुत से पौधे ऐसे हैं जिनकी लकड़ी काटकर अन्यत्र गाड़ देने पर नया पौधा उग आता है। गन्ना इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। उसकी हर गाँठ में नर−नारी के उभयपक्षीय चिन्ह होते हैं और वे अपने पेड़ से अलग होने पर स्वतन्त्र वंश वृद्धि करने लगते हैं। गुलाब आदि कितने ही पुष्प जाति के पेड़−पौधे इसी प्रकार के है। बरगद, गूलर जैसे वृक्षों की डाली काट कर अन्यत्र लगा देने से नया पेड़ उत्पन्न होने लगता है। वनस्पति जगत प्रायः पूरा ही इस प्रकार का है कि प्रजनन की उभयपक्षीय आवश्यकताएँ अपने भीतर से ही उत्पन्न कर लें।

एक कोषीय ‘अमीबा’ जीवधारियों में सबसे पुरातन है। वह अपने शरीर के टुकड़े काट−काट कर पृथक करता रहता है और वे स्वयमेव एक स्वतन्त्र जीव बनते रहते हैं।

यौन आकर्षण को प्रजनन प्रेरणा के नाम से वैज्ञानिक जगत में पुकारा जाता है। उनका कहना है कि स्त्री और पुरुष के बीच जो भावनात्मक आकर्षण पाया जाता है उसके पीछे प्रकृति की प्रजनन प्रेरणा ही काम करती है। उनकी बात इस सीमा तक ही ठीक है। इन दो वर्गों में एक में वामपक्षीय और दूसरे में दक्षिण पक्षीय विद्युत शक्ति काम करती है और वे परस्पर मिलकर वंश वृद्धि का सरंजाम जुटाते हैं। इससे आगे बढ़कर यह कहना गलत है कि एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। दोनों जब तक कामुक उद्देश्य से मिलेंगे नहीं तब तक उनमें अभाव बना रहेगा एवं अतृप्ति अनुभव होगी। यह कहना इसलिए गलत है कि तृप्ति, उल्लास एवं अपूर्णता को पूर्णता में विकसित करने वाले आवश्यक तत्व हर प्राणी में मौजूद है। उनमें विकास की समस्त आवश्यकताएँ पूरी की जाती है, कि जा सकती है। मनुष्य भी इनका अपवाद नहीं हैं।

छोटी जाति के जीवधारियों में अधिकाँश उभयलिंगी होते हैं और वे अपनी प्रजनन आवश्यकता आत्मरति से ही पूर्ण कर लेते हैं। इनमें डिम्ब कीट भी होते हैं और शुक्र कीट भी। एक स्थान से दूसरे स्थान तक रेंग कर वे भीतर ही भीतर निषेचन एवं गर्भ धारण का कार्य पूरा कर लेते हैं और वे जीव बिना दूसरे साथी की सहायता के अपनी वंश वृद्धि एकाकी पुरुषार्थ से करते रहते हैं।

कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के शोध विभाग ने छोटे जलचरों की ऐसी 300 से अधिक जातियाँ ढूँढ़ निकाली है जो प्रजनन के मामले में पूर्णतया आत्म−निर्भर है। जमीन पर रेंगने वाले और उड़ने वाले कीड़ों में भी हजारों ऐसे है जिनमें काम सेवन के योग्य अवयव नहीं होते उनका अपना यौवन ही उन्हें जनक एवं जननी दोनों का श्रेय प्रदान करने लायक रासायनिक द्रव्य अपने भीतर से ही उत्पन्न कर लेता है और वे स्वतन्त्र रूप से एकाकी संतानोत्पादन करते रहते हैं।

‘आर्कोपोडा’ कीड़ा का ‘इनसेक्टा’ वर्ग में आता है उसकी बिरादरी आये दिन अपना लिंग परिवर्तन करती रहती हैं। कभी नर कभी नारी के अवयव विकसित होते और बदलते रहते हैं। कहा नहीं जा सकता कि वह कब तक नर रहेगा और कब नारी बन जायगा। कब उसे पिता कहा जायगा और कब उसे माता की श्रेणी में गिना जायगा। उसके साथी ऐसे ही उलट−पुलट करते रहते हैं। पति कभी पत्नी बन जाता है और कभी पत्नी पति बनकर अकड़ती फिरती है। यह परिवर्तन कुछ अद्भुत नहीं है क्योंकि उनके भीतर दो ही तत्व रहते हैं। थोड़ी प्रतिशत का ही अन्तर रहता है जिस प्रकृति की छोटी सी हलचल ज्वार−भाटे की तरह घटा−बढ़ा देती है और वे कभी इधर कभी उधर लुढ़कते बदलते रहते हैं।

बड़ी जाति की मछलियों में यौन परिवर्तन तो नहीं पर प्रजनन तत्व आसानी से घटाये बढ़ाये जा सकते हैं। बर्लिन के जल जीव शोध संस्थान ने मछलियों में कई प्रकार के विशिष्ट विद्युत प्रकाश देकर उनकी पिट्यूटरी ग्रन्थि में पाये जाने वाले स्टियुलिंटिंग और लूटिनाइजिंग हारमोनों की मात्रा बढ़ाने में सफलता प्राप्त कर ली हैं। इस प्रयोग से उन मछलियों में चार गुनी प्रजनन क्षमता बढ़ी और उनने उसी अनुपात में अण्डे दिये। कैटफिश आमतौर से जुलाई और सितम्बर के बीच केवल एक बार पर किया है, वे भी लिंग परिवर्तन के अपने प्रयोगों में पूर्ण सफल रहे हैं।

मनुष्यों में इस प्रकार के प्रत्यक्ष परिवर्तन अब बहुत बड़ी संख्या में प्रायः हर देश में सामने आ रहे हैं। नर में नारी के और नारी में नर के यौन चिन्हों का प्रकट, विकसित और परिपुष्ट होना−अस्पतालों में शल्य चिकित्सा द्वारा उनका पूर्णरूपेण लिंग परिवर्तन होना अब आश्चर्य कौतूहल का विषय नहीं रहा। ऐसी घटनाएं आये दिन समाचार पत्रों में छपती रहती हैं। अब यह मान लिया गया है कि ऐसा होना शरीर विकास का एक छोटा सा दिशा परिवर्तन मात्र है कोई असम्भव या प्रकृति क्रम का व्यतिरेक या विपर्यय नहीं। अब ऐसी घटनाएँ जो अस्पतालों के रिकार्डों में दर्ज हैं हजारों की परिधि को लाँघ चली हैं।

जोर्डन लेग्ले हाल तीस वर्ष की आयु तक एक प्रसिद्ध अँग्रेज लेखक रूप में विख्यात थे। उनकी अमेरिका में धाक थी। सम्मानित पत्र−पत्रिकाओं में उनके लेख छपते थे और उसी आधार पर वे अच्छी आजीविका उपार्जित करते थे। रहस्य प्रकट होने से पूर्व कई वर्ष से वे अनुभव कर रहे थे कि उनका सैक्स बदल रहा है। वे नर से नारी के रूप में क्रमशः परिवर्तित हो रहे है। मूँछों पर पहले सामान्य लोगों की तरह बाल आते थे पीछे वे उगने बन्द हो गये। वक्षस्थल पर स्तन उभरने लगे और जननेन्द्रिय छोटी होते−होते मात्र मूत्र विसर्जन का माध्यम रह गई। उन्हें लगने लगा कि भीतर ही भीतर एक नई जननेन्द्रिय उभर रही है जो नारी जैसी है।

कुछ समय ऐसे ही छिपाये रहने के पश्चात् उन्होंने अपनी डाक्टरी परीक्षा कराई तो विदित हुआ कि वे लगभग पूर्ण नारी की स्थिति में पहुँच चुके। इसके लिए एक छोटा आपरेशन कराना मात्र शेष है। वह कराया गया और वे सचमुच ही नारी बन गये। अमेरिका के चार्त्सटन नगर के लोगों ने कौतूहल पूर्वक इस समाचार को सुना और समाचार पत्रों में उनकी चर्चा हुई। बात इतने तक ही समाप्त नहीं हुई। उन्होंने अपना नाम बदला और एक नीग्रो युवक जानपाल सिमोन्स से अपना विवाह कर लिया यह विवाह भी बहुत चर्चा का विषय रहा और उसका भरपूर विरोध हुआ क्योंकि दक्षिणी अमेरिका अपेक्षाकृत रंग भेद की नीति में अधिक कट्टर है और वहाँ गोरी लड़की का काले लोगों के साथ विवाह करने को सामाजिक अपराध माना जाता है। इतने पर भी वह विवाह हुआ और उन्होंने सफल दाम्पत्य जीवन निवाहा।

इन लिंग परिवर्तित व्यक्तियों के स्वभाव में तो बहुत पहले से ही अन्तर आ गया था पर परिवर्तित यौन उभार पीछे दिखाई पड़े। शल्य क्रिया के पश्चात् उनकी स्थिति परिपक्व होती चली गई और वे पिछली आदतों का भूल कर पूर्णतया नर से नारी की आकृति एवं प्रकृति में बदल गये। उनने अपने विवाह किये और सुखी गृहस्थ भोगा। पिछले दिनों एक कमी थी कि ऐसे परिवर्तित लिंग वाले विवाह जोड़े सन्तानोत्पादन नहीं कर पा रहे थे अब यह बाँध भी टूट गया। कुछ समय पूर्व चार्ल्सटन (दक्षिणी कैलीफोर्निया) में जान लेगलेपाल साइमन्स नामक महिला, नर–यौन परिवर्तन कराकर नारी बनी थी। उनने विवाह किया−गर्भिणी बनीं और सन्तान को जन्म दिया। इस प्रकार की संसार में यद्यपि यह पहली घटना है तो भी यह सिद्ध तो हो ही गया कि परिवर्तन उस सीमा तक भी सम्भव है।

यह परिवर्तन क्रम यों रिकार्ड में पिछले पचास वर्ष से ही आया है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि भूतकाल में ऐसा होता नहीं रहा होगा। चूँकि यह विषय गोपनीय एवं लज्जास्पद माना जाता है इसलिए जहाँ ऐसे परिवर्तन हुए होंगे वहाँ छिपा कर रखा जाता रहा होगा। जनखे तो अभी भी हर देश में पाये जाते हैं। भारत में तो उनकी एक बिरादरी ही बन गई हैं। अरब देशों में भी वे इसी तरह होते हैं। अन्य देशों में वे विन्यास तो नहीं बदलते पर मनःस्थिति एवं आदतें तो अक्सर विपरीत लिंग वालों की तरह होती हैं। नपुँसकों का वर्ग ऐसा ही है। स्त्रियों जैसे वस्त्र, आभूषण एवँ श्रृंगार किये नाचने, गाने का पेशा करने वाले उसी प्रकार के हाव−भाव व्यक्त करने वाले जनखे कहीं भी पाये जा सकते हैं। इनमें से अधिकाँश ऐसे होते हैं जो पुरुष वर्ग के थे पर यौन व्यवधान ने उन्हें स्त्री बना दिया। मुगल काल में उनके बहुत बड़े हरम जिनमें सैकड़ों बीवियाँ रहती थीं, यह जनखे उनकी पहरेदारी करते थे।

नारियों में भी हर क्षेत्र में ऐसी अनेकों पाई जाती हैं जिनकी अधिकाँश चेष्टाएँ पुरुषों जैसी होती है उनमें से कितनी ही तो मर्दों जैसी पोशाक भी पहनती हैं और उसी ठसक से चलती, बोलती है। इनमें से कितनों के दाढ़ी, मूँछ भी निकलती है।

समलिंगी मैथुन एवं विपरीत रति का प्रकरण लज्जास्पद एवं अवाँछनीय होने के कारण प्रायः पर्दे के पीछे ही छिपा रहता है पर यदि पर्दे को उघाड़ा जाय तो प्रतीत होगा कि ऐसे नर−नारी भी कम नहीं जिनकी यौन तृप्ति अपने वर्तमान लिंग से भिन्न प्रकार की चेष्टाओं से ही होती है। उनके कामुक चिन्तन की धुरी प्रायः भिन्न वर्ग के अनुरूप होती है। ऐसे व्यक्तियों के बारे में यह अनुमान लगाया जाता रहा है कि वे पिछले जन्म में दूसरे लिंग के रहे होंगे अथवा जिस दिशा में उनकी मनोभूमि चल रही हैं उसे देखते हुए वे अगले जन्म तक अपना लिंग बदल लेंगे। वैज्ञानिक विश्लेषण इस स्थिति का यह है कि हर मनुष्य में उभयलिंगी के तत्व रहते हैं। सामान्यतया स्वाभाविक रूप में जो जिस संज्ञा का है उसमें उसी प्रकार की आकृति−प्रकृति पाई जाती है पर सम्भव यह भी है कि भिन्न स्थिति जो प्रायः सुप्त स्थिति में पड़ी होती है क्रमशः जागती और प्रबल होती चली जाय। दोनों तत्वों में से जो बढ़ेगा वह दूसरे को झीना करेगा। लिंग भेद की स्थिति में जो विपरीत कामुक विचारणाएँ एवं चेष्टाएँ पार्ट जाती है उनका यही कारण है। यह सब अनायास आन्तरिक परिवर्तनों एवं उभारों के कारण भी होता है किन्तु यदि कोई चाहे तो संकल्प पूर्वक भी ऐसी विपरीत स्थिति में अपने को ढाल सकता है। क्योंकि मूलतः हर प्राणी में, हर मनुष्य में दोनों स्तर के तत्व मौजूद हैं। नारी तत्व को ‘रयि’ और नर तत्व का ‘प्राण’ कहते हैं। एक में ए. सी.करेंट की दूसरे में डी. सी. करेंट की प्रधानता है पर जिस प्रकार विद्युत यन्त्रों में परिवर्तन किया जा सकता है उसी प्रकार प्राणियों की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति भी हेर−फेर सम्भव है।

उपरोक्त विवेचन विश्लेषण के आधार पर पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि प्रत्येक प्राणी विशेषतया मनुष्य अपने आप में न केवल अन्य सभी दृष्टियों से वरन् लिंग भेद की दृष्टि से भी पूर्ण है। आत्मा पूर्ण से पैदा होती हैं इसलिए पूर्ण है। “पूर्ण मदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुदध्यते” वाले श्रुति वचन में जिस तथ्य का प्रतिपादन किया गया है वह हर कसौटी पर खरा है। मनुष्य पूर्ण है उसकी दोना इकाइयाँ नर और नारी के रूप में भिन्नता युक्त तो हैं, एक दूसरे के लिए आवश्यक उपयोगी एवं सहयोगी भी पर यह कहना उचित नहीं कि एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। दूसरे पक्ष की सहायता बिना उसकी आत्मिक या भौतिक प्रगति रुकी पड़ी रहेगी। नारी कला, कोमलता का और नर शौर्य साहस का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनकी विशेषता अधिकता जरूर रहती है पर इसका अर्थ वह नहीं कि दोनों पक्षों में से कोई ऐसी विशेषताओं से रहित है जो उसकी शारीरिक, मानसिक और आत्मिक पूर्णता में बाधा पहुँचती है। नर और नारी तथा नारी और नर परस्पर स्नेह सहयोग से रहें यह सब प्रकार उचित सराहनीय और मानवी गरिमा के उपयुक्त हैं पर किसी को किसी की अनिवार्य रूप से ऐसी आवश्यकता है जिसके बिना गुजारा ही नहीं यह सोचना व्यर्थ है। यह तर्क उन कामुक लोगों का है जो यौनाचार को अत्यधिक महत्व देते हैं। वस्तुतः वह तर्क एक सीमा तक ही सही हैं उसमें उतना तथ्य नहीं जैसा कि इन दिनों कहा बताया जा रहा है।


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कालिदास ने लिखा है ‘न रुपं पाप वृत्तये’ रूप की प्रशंसा तो है पर पाप वृत्ति में यदि वह प्रयुक्त होने लगे तो नहीं। ऐथेन्स के दार्शनिक पैरिक्लीस ने जनता का उद्बोधन करते हुए कहा था− “हमें कला चाहिए, विलास नहीं। हम विज्ञान की उपासना करते हैं किन्तु मानव का विनाश नहीं चाहते।’


धर्म का अन्तःकरण और आवरण

वैसे तो सृष्टि ही हर वस्तु का उसका अपना धर्म हैं। सूर्य का धर्म प्रकाश प्रदान करना तो चन्द्रमा का धर्म शीतलता प्रदान करना है। पर जड़−जंगम में संव्याप्त इस धर्म से हटकर एक धर्म और है जो मानव चेतना के स्तर को छूता है। वस्तुतः मानव धर्म की जब चर्चा होती है तब धर्म एक विशिष्ट परिवेश में सामने आती हैं। वैसे चेतना तो अन्य प्राणियों में भी है पर इस धर्म का सम्बन्ध मानव चेतना से ही विशेष रूप में हैं। इस धर्म−भावना ने ही मानव को मानव−संज्ञा से विभूषित कराया हैं।

‘धर्म−निरपेक्षता’ शब्द में एक भ्रान्ति प्रवेश कर गई है। धर्म को मजहब, सम्प्रदाय का पर्यायवाची मान लिया गया है। परिणामतः धर्म शब्द की गरिमा संदिग्ध हो गई

जहाँ हर मानव को धार्मिक कहलाने में गर्व का अनुभव करना चाहिए, वहाँ धार्मिक कहलाना संकोच का विषय बन गया है, आशंका का हेतु बना गया है।

वस्तुतः धर्म जीवन की वह रीति−नीति है जो कि मनुष्य को मानव बनाकर खड़ा कर देती है। धर्म धारण करने की वस्तु है। तभी धर्म मानवीय तत्वों के संरक्षण में कुछ महत्वपूर्ण अनुदान दे सकता है। “धर्मों रक्षति रक्षितैः’ इसीलिये सृष्टि निर्माण में मानवीय चेतना के प्रादुर्भाव के साथ ही साथ कर्तव्य अकर्तव्य की भावना ने सामाजिक प्राणी मानव के सामने धर्म का रूप प्रस्तुत कर दिया धर्म−भावना ईश्वरवादी दृष्टि से भी ऊँची है। रूस जैसा अनीश्वरवादी राष्ट्र भी अधार्मिक होकर जी नहीं सकता, क्योंकि मानव मात्र के कल्याण के लिए जो कुछ भी सम्भव हो सकता है वह सब मानव धर्म की सीमाओं में रहकर ही।

मनुष्य का धर्म यही है कि वह अपने बाह्य−व्यवहार एवं आन्तरिक वृत्तियों का परिशोधन कर अपने मूल रूप को जीवन में व्यक्त करे। यही शुद्ध स्वरूप ज्ञान “आत्मवत् सर्वभूतेषु” की श्रेष्ठतम भावनाओं को स्फुटित कर लोक मंगल को सहज साध्य बना सकता है।

स्थूल−स्तर पर हम धर्म को दो रूपों में दे सकते हैं। एक वह रूप जो देश, काल, पात्र के अनुरूप आचार संहिता प्रस्तुत करता है और आवश्यकता अनुसार यथोचित परिवर्तन के साथ लोक मंगल की दिशाएँ, सक्रिय बनाता रहता है। धर्म का यह रूप देश, काल, पात्र सापेक्ष होता है।

जिस देश में जलाभाव हो वहाँ सप्ताह में एक बार नहाना भी धार्मिक−कृत्य हो सकता है और जहाँ प्रकृति ने हर दिशा में जल राशि बिखरा रखी हो, वहाँ स्वास्थ्य संरक्षण के लिये प्रतिदिन स्नान करना धार्मिक कृत्य होगा ही। गरमी में जो वस्त्र काल−धर्म के प्रतीक होंगे वे शीत ऋतु में नहीं। इसी प्रकार पात्रानुसार धर्म−आचरण अपने आप में एक तथ्य है।

एक निरन्तर माँस भक्षण पर ही जीवित रहने वाले व्यक्तियों से माँस छुड़ाने का कार्य असम्भव सा लगता है महावीर स्वामी द्वारा कौवे का माँस छोड़ देने में धर्म बताकर माँस छोड़ने के शुभारम्भ की विधि के रूप में धार्मिक−प्रेरणा दी है। बहुविवाह ग्रसित समाज पर अंकुश लगाने हेतु मात्र चार विवाह को ही धार्मिक कृति बताकर मोहम्मद साहब ने धार्मिक आवरण का शुभारम्भ ही कराया था। धर्म का दूसरा रूप धर्म के मूल तत्वों से सम्बन्धित है जो शाश्वत है, अपरिवर्तनीय है। यह है मानव की आध्यात्मिक शक्तियों का उस चरम बिन्दु तक विकास जहाँ धरती पर स्वर्ग और मनुष्य में देवत्व का अवतरण हो जाता है। अर्थात् मानव का बाह्य आचरण एवं आन्तरिक विचारणा मानव मात्र के कल्याण की दिशा में उन्मुख हो जाते हैं। धर्म का यह स्वरूप सार्वभौमिक, सार्वकालिक एवं सर्वजनीन होता है। यहीं आकर मानव मात्र “वसुधैव कुटुम्बकम्” की उदात्त भावना−स्थली पर बिहार करने लगता है। धर्म के इस शाश्वत स्वरूप को कौन नकार सकता है।

बेईमान भी ईमानदार साथी चाहता है, विश्वासघाती भी विश्वासपात्र मित्र चाहता है, आचरणहीन पति−पत्नी भी आचरणावन पत्नी−पति चाहते हैं। इन्हीं सर्वमान्य विभूतियों का विकास धर्म का मूल स्वरूप है, पावन उद्देश्य है। यह धर्म वर्तमान को ही सब कुछ मानकर नहीं चलता, अपितु अतीत और आगत को वर्तमान के श्रेष्ठतम आचारों की शृंखला जोड़ता चलता है। यही उसकी शाश्वतता है।

लेकिन दुर्भाग्य से मानव धर्म के मूल तत्व भी देश, काल, पात्र की−संकुलित सीमाओं में बाँधकर साम्प्रदायिक−संकट का कारण बना दिये गये हैं। हम यह भूल जाते हैं कि सृष्टि के प्रारम्भ में मानवीय चेतना में उद्भूत ईश्वरीय प्रेरणा जन्य ज्ञान की पुस्तक ‘ऋग्वेद’ को एक से चार क्यों होना पड़ा? वैदिक कालीन जीवन क्रम के बीच बुद्ध और महावीर को क्यों अवतरित होना पड़ा? इसी क्रम की बढ़ती शृंखला में आचार्य शंकर को धर्म−विजय के लिये प्रयाण क्यों करना पड़ा? इन सारे प्रश्नों के उत्तर देश, काल, पात्र की आवश्यकता के परिवेश में सहज ही दिये जा सकते हैं, सब ही श्रद्धा से सम्मानित किये जा सकते हैं, सब ही श्रद्धा से सम्मानित किये जा सकते हैं। पर हमने विवेक को तिलाञ्जलि दे मानव धर्म को मजहब एवं सम्प्रदाय के शिकंजे में फँसने दिया और अनिष्टकर स्थिति पैदा करते चले गये।

सर्वजनहिताय, सर्वजनसुखाय के सन्देशवाहक मानव धर्म को हमने स्थूल धार्मिक−क्रिया−कलापों की अपनी−अपनी सीमाओं में बाँध, धर्म की इतिश्री मान ली और अपनी सहज धार्मिक वृत्ति को थोड़ी सन्तुष्टि दे, धर्म−आचरण से मुख मोड़ लिया।

वस्तुतः धर्म का और नैतिकता का कितना घनिष्ठ सम्बन्ध है, इसे हमें न समझ सके। हमने धर्म क्षेत्र और कर्म क्षेत्र को अलग−अलग करके मानव जीवन को खण्डित करके रख दिया। हमारी इस धर्म की सत्ता ने जहाँ हमसे निर्दयता पूर्वक पशु−बलि तक करवा डाली, वहाँ हमारे आत्मबल को निर्बल बनाकर दया के नाम पर अन्याय, अनाचार के सामने समर्पण करने का आदी बना दिया।

ऐसी ही निर्बल−दया ग्रसित अर्जुन के कठोर कर्त्तव्य से विमुख होने पर योगिराज श्रीकृष्ण ने ‘अश्रु पूर्णा कुलेक्षणम्’ एवं ‘विषीदन्तम्’ की आकुल−व्याकुल मनःस्थिति की भर्त्सना करते हुये ‘कृपया परमाविष्टः’ की हीन वृत्ति को पाप बताया है। वास्तविक मानव धर्म नैतिक बनने की प्रेरणा देता है, साहसी बनने की स्फुरणा देता है। तभी हम गीता का उपदेश सुनने की अपेक्षा किसी द्रौपदी के चीर हरण की रक्षा में सन्नद्ध हो सकते हैं। धार्मिकता जन्य इसी नैतिक साहस में मानव कल्याण के लिये उत्सर्ग कर सकने की क्षमता है मानवीय एकता की ममता है।

ऐसे मानव धर्म के प्रचार−प्रसार एवं पुनः स्थापना के लिये “नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः” के गुणों से परिवेष्टित आत्मबल को जंगलों, गुफाओं, कुटियों, मन्दिरों से बाहर निकाल कर खेतों, खलिहानों, कलों−कारखानों, कार्यालयों, न्यायालयों, झोंपड़ियों, महलों में लाना होगा और उसे मानवीय पीड़ाओं का अनुभव कराना होगा। तब कहीं मानव−वेदना से पीड़ित आत्म−बल लोक मंगल के लिए ‘भर्तृहरि’ के कथन को साकार करने का साहस जुटा सकेगा। “चाहे नीति−निपुण लोग निन्दा करें या प्रशंसा, चाहे लक्ष्मी आये या जहाँ उसकी इच्छा हो चली जाये, मृत्यु आज हो या सौ वर्ष बाद, धीर पुरुष तो वह है जो न्याय के पथ से तनिक भी विचलित नहीं होता।”

समस्त आत्माओं की पीड़ा अनुभव कर उनके यथासामर्थ्य त्राण हेतु अथक पुरुषार्थ ही मानव धर्म हैं। ऐसा धर्म हमारे बिखरे व्यक्तित्व को सुसंगठित करता है, हमारी सम्पूर्ण आत्मस्थ−शक्तियों का सर्वांगीण विकास करता है। हमें शिव से शिवत्व की ओर ले जाता है और हमारी सर्वशक्तिमत्ता की अनुभूति करा हमें नर से नारायण बना देता है।

फिर मजहब, सम्प्रदाय, पन्थ, ग्रन्थ सब अपने सीमित ‘स्व’ को इस धर्म के ‘स्व’ में समर्पित कर अभिन्न हो जाते हैं, अद्वैत हो जाते हैं और लोक मंगल मानव जीवन में सहज साधक हो जाता है, परम आराध्य हो जाता है। धर्म की इस उदात्त पृष्ठभूमि पर आते ही नास्तिकता अपने ही अस्तित्व को नकारने का नाम हो जाती हैं। क्योंकि नास्तिकता ईश्वर पर अविश्वास नहीं अपितु स्वयं पर ही अविश्वास है।


साधन सिद्धि समय साध्य है।

आध्यात्मिक साधनाएँ भी वटवृक्ष की तरह अपने क्रम से बढ़ती और परिपक्व होती हैं। बड़े कार्यों में बड़ा समय लगना, बड़ा पुरुषार्थ करना और बड़ा धैर्य रखना भी आवश्यक होता है। उतावले लोग हथेली पर सरसों जमाने के लिए आतुर रहते हैं और तुर्त−फुर्त अपनी मन चाही उपलब्धि प्राप्त करने में अधीर बने रहते हैं। इस बाल अधीरता से काम कुछ नहीं बनता। जिस कार्य के लिए जितना समय लगना चाहिए वह तो लगेगा ही।

नवजात बालक को प्रौढ़ बनने में पच्चीस वर्ष लगते हैं। बाल कक्षा में प्रवेश लेने के उपरान्त एम. ए. पास करने में 14 वर्ष लगते हैं। बोई हुई खजूर 20 वर्ष में फल देती है। माँ के पेट में 9 महीने बच्चा रहता है। इन कार्यों में आतुरता प्रदर्शित की जाय और अभीष्ट परिणाम तत्काल मिलने की अधीरता दिखाई जाय इससे क्या वरन् हड़बड़ी से उत्पन्न हुई निराशा समय पर अभीष्ट प्रतिफल मिल सकने के लिए जो प्रयास किये जाने थे उनका रास्ता भी बन्द कर देगी। आतुरता में वह सम्भावना भी नष्ट हो जाती है। जो अब नहीं तो तब लक्ष्य तक पहुँचा सकती थी।

आध्यात्मिक साधनाएं वस्तुतः चेतनात्मक क्षेत्र के शैशव को प्रौढ़ावस्था तक पहुँचाने की एक वैज्ञानिक पद्धति है, जिसे फलित होने में समय लगता है। उसकी धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा किये बिना गुजारा नहीं।

अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचने में इतना भी समय लग सकता है जो वर्तमान जीवन में शेष रहे थोड़े से समय की अपेक्षा अधिक हो। ऐसी दशा में यह नहीं सोचा जाना चाहिए। कि हमें असफल रहना पड़ेगा। आत्मा की मृत्यु कभी नहीं होती केवल चोला बदलता रहता है। इस कमीज को पहन कर भोजन न किया उस कुर्ते को पहनकर कर लिया इससे क्या बनता बिगड़ता है।

ऐसी कितनी ही घटनाएँ देखने में आती हैं जिनमें लोगों में अनायास ही अद्भुत शक्तियाँ विकसित होती देखी गई है, जबकि उन्होंने कुछ भी साधना नहीं की है। यह उनके पूर्व जन्मों के प्रयासों का प्रतिफल है। ऐसे कितने ही अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न विवरण उपलब्ध हैं जिनमें इस जन्म की कोई विशेष साधनाएँ न होते हुए भी उनके अन्दर आश्चर्यजनक विशेषताएँ पाई गई।

हालैंड की यूट्रेक्ट युनिवर्सिटी के पैरासाइकोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रो0 विलियम तेनहाफ ने कितने ही अतीन्द्रिय शक्ति का दावा करने वाले लोगों की जाँच करने की दृष्टि से उनके साथ भेंट की है। उनके शोध संग्रह में कितने ही प्रमाणों में सबसे अधिक प्रत्यक्ष उदाहरण यूट्रेक्ट नगर के एक सरल सौम्य नागरिक जेराई क्रोयसेत का है। यह 56 वर्षीय व्यक्ति अपने बेटे, पोतों के साथ साधारण आजीविका उपार्जन के घरेलू धन्धों में लगा रहता है। दिव्य दर्शन उसका न तो व्यवसाय है और न वह इस क्षेत्र में अपनी कोई शोहरत चाहता है फिर भी उसमें जो जन्मजात उपलब्धि है वह लोगों को अचम्भे में डाल देती हैं और कौतूहलों की दृष्टि से कितने ही लोग उसके छोटे से घर पर जा पहुँचते हैं और तरह−तरह की पूछ−ताछ करते हैं।

क्रोयसेत की असाधारण क्षमता की ओर इस संदर्भ में दिलचस्पी रखने वाले कितने ही शोध कर्त्ता उसके पास पहुँचे है। उसने सहज स्वभाव से सबका स्वागत किया है और उस जाँच−पड़ताल में पूरा−पूरा सहयोग दिया है। न केवल हालैंड के वरन् आस्ट्रिया, फ्रांस, जर्मनी, इटली, स्विट्जरलैंड आदि के अतीन्द्रिय विज्ञान के सम्बन्ध में जाँच−पड़ताल करने वाले लोग उसके पास पहुँचे हैं। विलियम तेनहाफ ने तो उसके सम्बन्ध में क्रमबद्ध खोज की है और उसे सर्वसाधारण की जानकारी के लिए प्रकाशित भी किया है। उस खोज में कुछ घटनाओं को विशेष महत्व दिया गया है।

6 जनवरी सन् 1957 की बात हैं यूट्रेक्ट यूनिवर्सिटी में 24 दिन बाद एक लेक्चर होता था। उसके लिए आगन्तुकों की सीटें तो जमा दी गई थीं पर यह मालूम न था कि कौन दर्शक आवेगा और किस स्थान पर बैठेगा। प्रो0 तेनहाफ ने क्रोयसेत को वह लेक्चर हाल दिखाया और अन्य प्रोफेसरों की उपस्थिति में यह पूछा कि क्या आप बता सकते हैं कि नौ नम्बर की सीट पर 31 जनवरी की मीटिंग में कौन दर्शक बैठेगा? यह उसके भविष्य ज्ञान सम्बन्धी जानकारी की जाँच के सम्बन्ध में पूछा गया था।

क्रोयसेत कुछ देर ध्यान मग्न रहे और फिर बताना शुरू किया कि दिहेग नगर की रहने वाली एक अधेड़ महिला वहाँ बैठेगी। उसके हाथ की एक उँगली अभी−अभी डिब्बी खोलते समय कट गई है वह उस पर पट्टी बाँध रही है। यह महिला एक पशु पालक परिवार में जन्मी है जब वह छोटी थी तब उसके घर में आग लगी थी और एक कोठे में बँधे कुछ जानवर जल गये थे आदि।

वह सारा विवरण नोट कर लिया गया। वह बात गुप्त रखी गई। नियत तारीख को सचमुच ही उसी विवरण के अनुरूप एक दर्शक महिला वहाँ आ बैठी और उससे पीछे पूछ−ताछ की गई तो उसके सम्बन्ध में बताई गई बातें सभी सच निकलीं।

क्रोयसेत ने अपराधियों का और चोरियों का पता लगाने में पुलिस की अच्छी मदद की है। एक बार एक बहुमूल्य हीरों का हार चोरी होने की सूचना पुलिस में दर्ज हुई, क्रोयसेत से पूछा तो बताया वह हार चोरी नहीं गया। नाली में गिर पड़ा हैं और बहते−बहते अमुक स्थान पर जा पहुँचा है। लोग दौड़े और बताये हुए ठीक स्थान पर हार प्राप्त कर लिया गया।

नार्वे की मोयराना बस्ती में जा बसे एक डच नागरिक ने टेलीफोन से पूछा उसकी 15 वर्षीय लड़की जोर्ग हाडजेन अचानक लापता हो गई है क्या आप उसका कुछ पता बात सकते हैं। क्रोयसेत ने टेलीफोन पर ही उत्तर दिया कि वह एक झरने में डूबी पड़ी हैं। लाश को अमुक स्थान पर जाकर निकला लिया जाय वह आधी डूबी पड़ी है और आधा भाग ऊपर चमक रहा है। ढूँढ़ने पर ठीक उसी स्थान पर लाश प्राप्त कर ली गई।

लन्दन के कुख्यात अपराधी जिंजर मार्क को क्रोयसे की सहायता से पुलिस ने पकड़ा था। ऐसी−ऐसी अनेकों घटनाएँ है जिनमें उसकी अतीन्द्रिय शक्ति की यथार्थता का समर्थन किया गया है। उस व्यक्ति को यह क्षमता जन्म जात रूप से प्राप्त है इसके लिए उसने कोई विशेष साधना आदि नहीं की है। वह भोला व्यक्ति अतीन्द्रिय शक्ति के सिद्धान्तों के बारे में भी अधिक कुछ बता नहीं सकता। केवल जो कुछ वह है उसे प्रकट करने में बिना संकोच अपने को प्रस्तुत करता रहता है।

जिनने योग साधना एवं तपश्चर्या के कठोर प्रयत्नों से इन्हें पाया जगाया है उनकी बात समझ में आती हैं पर जिनने ऐसा कुछ नहीं किया फिर भी अद्भुत शक्तियाँ सम्पन्न पाया जाता है तो असमंजस उत्पन्न होता है कि जो बात सर्वसाधारण में नहीं है वहीं एक अन्य सामान्य व्यक्ति में कैसे उत्पन्न हो गई।

जिनने योग साधना एवं तपश्चर्या के कठोर प्रयत्नों से इन्हें पाया जगाया है उनकी बात समझ में आती हैं पर जिनने ऐसा कुछ नहीं किया फिर भी अद्भुत शक्तियाँ सम्पन्न पाया जाता है तो असमंजस उत्पन्न होता है कि जो बात सर्वसाधारण में नहीं है वहीं एक अन्य सामान्य व्यक्ति में कैसे उत्पन्न हो गई।


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पराजय एक उपयोगी शिक्षा है− जिसके सहारे मनुष्य विजय के रहस्यों को समझ सकने योग्य बनता है।

−वेंडेल फिलिप


भारतीय संस्कृति अनन्त काल तक अक्षुण्ण बनी रहेगी

“मानव की विविध साधनाओं की सर्वोत्तम परिणति का नाम संस्कृति है।” यह परिभाषा में संस्कृत मानव जाति की उच्चतम उपलब्धियों एवं विचारधाराओं का समवेत रूप है। किसी देश की संस्कृति का प्राण वहाँ की धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक तथा साहित्यिक उपलब्धियाँ होती हैं।

परन्तु वर्तमान युग में संस्कृति और सभ्यता पर्यायवाची से प्रतीत होते हैं। अज्ञान के कारण हमने सभ्यता के विकास को ही संस्कृति मान लिया है। रहन−सहन, वेष−भूषा, खान−पान, वैज्ञानिक विकास सभ्यता के अंतर्गत के। मनुष्य का सम्पूर्ण बाह्य विकास सभ्यता है और अन्तरंग विकास संस्कृति हैं।

हम आज सभ्यता के लिए निर्धारित माप दण्ड से भले ही विदेशियों से पीछे हों परन्तु सैकड़ों वर्षों की पराधीनता के बाद भी हमारी संस्कृति जीवित है। इसके लिए हमें गर्व है, जबकि समकक्ष ही पनपने वाली यूनान, रोम, मिश्र की संस्कृति केवल इतिहास के पृष्ठों की ही बात रह गई हैं।

भारतीय संस्कृति की मूल विशेषता है−‘अनेकत्व में एकत्व की भावना।’ सारे देश के प्राणी, चाहे वे किसी भी कोने में क्यों न रहते हों, यह अनुभव करने को बाध्य है कि हम सब भाई−भाई है। अध्यात्म का मधु ‘अनेकता से एकता की ओर’ हमने अपनी माँ के दूध के साथ ही पान किया है। उनके सम्प्रदाय, धार्मिक अनुष्ठान, तथा उपासना पद्धति बाह्य रूप में भले ही भिन्न दिखाई देती हो, परन्तु उसका मूल रूप तो ऋग्वेद की वाणी में छिपा है, “एक सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।”

भारतीय संस्कृति धर्म से अनुप्राणित है। धार्मिक सहिष्णुता की व्यापकता के कारण हमने विचार स्वतन्त्रता का पूरा सम्मान किया है। विभिन्न दर्शनों और मतों की बातें बड़ी श्रद्धा से सुनी है। धर्म रूपी देवता की तुष्टि के लिए यहाँ सदैव अमृत की धारा बही है, रक्त की नदियाँ नहीं।

पाश्चात्य देशों में धर्म के नाम पर बड़ा अत्याचार हुआ है। कैथोलिक और प्रोटेस्टेण्टों ने एक दूसरे से दिल खोल कर बदला लिया है। एक ने अकारण ही दूसरे धर्मावलम्बियों को अग्नि में जीवित जलवा दिया है। हमारे देश में धर्म के नाम पर जो अन्याय और अत्याचार हुए वे सब यवन संस्कृति की दैन है।

वह कौन सी प्रेरणा है जिसके वशीभूत होकर पर्व और उत्सव के अवसर पर आज भी लाखों की संख्या में व्यक्ति किसी विशेष तालाब, नदी या समुद्र के किनारे इकट्ठे होते हैं और उसमें गोता लगाकर सुख और शान्ति का अनुभव करते हैं? हरिद्वार, उज्जैन, नासिक और प्रयागराज के अर्द्धकुम्भ और पूर्ण कुम्भ की झाँकी देखते ही बनती है। त्रिवेणी में मृत्यु के बाद किया जाने वाला विसर्जन इसी भावनात्मक एकता का द्योतक है कि यदि हम जीवन में कभी न मिल पाये हों मृत्यु के बाद हमारी अस्थियों का सम्मेलन तो एक जगह हो ही जाना चाहिए। पुरातन विचारधारा की जीवन भर भर्त्सना करने वाले पं0 जवाहरलाल नेहरू ने भी यह कामना व्यक्त की थी कि मृत्यु के बाद मेरी अस्थियों का विसर्जन त्रिवेणी में हों।

अथर्ववेद के पृथ्वी सूत्र में कहा गया है “यह भूमि मेरी माँ है और मैं इसका पुत्र हूँ।” ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।’ यद्यपि इसमें बसने वालों की विभिन्न भाषाएँ हैं, अनेक रीति−रिवाज है, अनेक प्रकार की वेश−भूषा है, तथापि “जनं विभ्रती बहुधा विवाचसं, नानाधर्माणं पृथिवी यथौकसमू” के आधार पर भिन्नताएँ होते हुए भी पृथ्वी उन्हें स्वीकार करती है। तुम्हारी ही गोद का आश्रय पाकर हमारे पूर्वजों ने अनेक विक्रम के कार्य किये हैं− “यस्याँ पूर्वे पूर्वजना विचक्रिरे” और उनके पराक्रम के कार्य ही हमारा इतिहास है। यह पृथ्वी, पर्वत, मैदा, पठार, अरण्य बन, उपवन और नदियों का लाव मात्र नहीं हैं वरन् वह हमारी जन्मदात्री माता की तरह स्वर्ग से भी श्रेष्ठ है−‘जननी जन्मभूमिश्य स्वर्गादपि नरीयसी।’ यहाँ की पवित्र जल धाराओं और हिम−शिखरों ने हमारी सीमा को नहीं बाँध रखा है। गंगोत्री तथा यमुनोत्री का जल कन्धे पर लेकर पैदल चलता हुआ कोई तीर्थ−यात्री जब रामेश्वरम् पहुँचता है, उसकी श्रद्धा तथा भक्ति का मूल्याँकन नहीं किया जा सकता है। भौगोलिक सीमाएँ हमारी साँस्कृतिक एकता को विच्छिन्न करने में असमर्थ है।

हमारी संस्कृति की एक अन्य विशेषता व्यैक्तिक जीवन के कल्याण हेतु “आश्रम चतुष्टय” ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास तथा सामाजिक सुख−शान्ति हेतु ‘वर्ग चतुष्टय’ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र हैं। इन चारों वर्णों का निर्माण गुण और कर्म के आधार पर हुआ था। गीता में भगवान कृष्ण की वाणी ‘चातुर्वण्यं मया सृष्टम् गुण, कर्म विभागशः’ इस सत्य का प्रतिपादन करती है। परन्तु कालान्तर में वर्ण व्यवस्था जन्म के आधार पर चलने लगी और जब बढ़ते−बढ़ते इस जातिवाद के विषधर ने हमारा सारा जीवन अस्त−व्यस्त एवं संघर्षमय बना दिया है।

जीवन लक्ष्य की सिद्धि के लिए भी जो चार पुरुषार्थ धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष निश्चित किये गये थे उनमें धर्म का स्थान सबसे पहले रखा गया था। यदि इसे एक वृक्ष मान लिया जाये तो हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि इसी जड़ धर्म है तथा अन्तिम ‘मोक्ष’ फल है। अर्थ, काम तो तना तथा शाखाओं की तरह है। वृक्ष में तने तथा शाखाओं के महत्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है परन्तु जड़ और फल के बिना तो सब कुछ व्यर्थ है। अतः भारतीय संस्कृति में पहले धर्म और अन्त में मोक्ष को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है ‘अर्थ’ तथा ‘काम’ को गौण। परन्तु अब जीवन में ‘अर्थ’ को प्रधान स्थान मिल गया है। धर्म की बातें पालन करने के संदर्भ में कहने मात्र को शेष रह गई है। अर्थ के पीछे धार्मिक सिद्धान्तों की हत्या करने में अब कोई दोष नहीं माना जाता है।

प्राचीन वैदिक साहित्य में विभिन्न शक्तियों की अर्चना देवताओं के रूप में की गई है। उनके अनुग्रह पर जीवन को सुखमय बनाने का प्रयास ही तो ‘ऋचाओं’ के रूप में अभिव्यक्त है। वह साहित्य हजारों वर्ष पूर्व लिखा गया था, अतः वर्तमान मान्यताओं के माप−दण्ड से उनको नापना सर्वथा अनुचित है। वैदिक ऋचाओं पर भी चिन्तन होता रहा और कालान्तर में ‘यज्ञ कर्म’ से ही इहलोक तथा परलोक में सुख मिलने वाली बात का ‘दर्शन−ग्रन्थ’ तथा उपनिषदों में जोरदार खण्डन हुआ। चिन्तन की प्रधानता बढ़ी ज्ञान सर्वोपरि स्वीकार किया गया।

भगवान शंकराचार्य द्वारा देश की चारों दिशाओं बद्रीनाथ, रामेश्वरम् पुरी और द्वारिका में मठों का स्थापन बड़ा ही महत्वपूर्ण एवं स्तुत्य प्रयास कहा जायेगा क्योंकि इन पाद−पीठों की स्थापना में उनका एक ही उद्देश्य था ‘भारतीय संस्कृति की भावनात्मक एकता सदैव अक्षुण्ण रहे।’

जीवन निर्माण के लिए ‘षोडश संस्कार की परम्परा’ भी भारतीय संस्कृति के महत्वपूर्ण सिद्धान्तों में से एक है। जिस प्रकार खान से निकले हुए कच्चे लोहे, ताँबे, सोने, चाँदी आदि धातुओं को उपयोगी बनाने के लिए उनके अनेक प्रकार के संस्कार किये जाते हैं, उसी प्रकार पशुतुल्य मानव जीवन को भी संस्कारों की भट्टी में तपाना अत्यावश्यक है। अतः जन्म के पूर्व होने वाले ‘पुँसवन संस्कार’ से लेकर “अंत्येष्टि” तक सोलह संस्कारों की व्यवस्था भारतीय संस्कृति की ही दैन है, इस बात को स्वीकार करने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

‘कर्मों का फल आज नहीं तो कल भोगना ही पड़ेगा’ इस प्रतिपादन ने जहाँ एक ओर जन साधारण को बुरे कर्म करने से रोका। वहाँ उच्छृंखलता भी बढ़ी।

आज देश का मानचित्र ही कुछ दूसरा होता। अनेकता में एकता वसुधैव कुटुम्बकम् का उद्घोष, उदारता, गुण ग्राहकता, संशिलष्टता, वर्ग चतुष्टय, आश्रम चतुष्टय तथा पुरुषार्थ चतुष्टय के सिद्धान्त, संस्कारों की परम्परा, कर्मफल का सिद्धान्त, भारतीय संस्कृति के वे मूलाधार है जो कि हजारों वर्षों के बाद भी नाना प्रकार के घात प्रतिघातों को सहते हुए भी इसे जीवन्त बनाये रखने में सक्षम है।


हम सुसंस्कृत बने संस्कारवान् बनें

आज−कल ‘संस्कृति का प्रयोग बहुत किया जाता है। संस्कृति किसे कहते हैं, इस संदर्भ में अनेक विद्वानों ने अपने विचार व्यक्त किये हैं। संस्कृत साहित्य में संस्कृति का प्रयोग नहीं मिलता। अस्तु यह शब्द प्राचीन नहीं कहा जा सकता।

अँग्रेजी ‘कल्चर’ एवं उर्दू के ‘इल्मतमुद्दुन’ शब्द के समानार्थक शब्द के रूप में संस्कृति शब्द का व्यवहार होने लगा है।

संस्कृति के भाव को व्यक्त करने वाला भारतीय ग्रन्थों में कौन सा शब्द प्रयुक्त? एत्दर्थ अनेक विद्वानों ने अपने विचार प्रकट किये हैं। कुछ विद्वानों में मतानुकूल ‘संस्कृति’ शब्द उतना व्यापक है जितना कि प्राचीनकाल में धर्म था।

संस्कृति शब्द पर यदि हम गम्भीर रूप से विचार करते हैं तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि संस्कृत साहित्याकाश में संस्कार और संस्कृत ही ऐसे शब्द है जो ‘संस्कृति’ शब्द के निकटवर्ती ही सकते हैं।

संस्कारों का भारतीय जीवन में बड़ा महत्व हैं। संस्कृति शब्द से सबसे सामीप्य सम्बन्ध संस्कार का ही माना जाना समयोचित है। संस्कृत और हिन्दी को कोषग्रंथों में संस्कार शब्द के अनेक अर्थ दिये गये हैं जो इस प्रकार हैं−शुद्धि, परिष्कार, सुधार, मन, रुचि, आचार−विचार को परिष्कृत तथा उन्नत करने के कार्य, मनोवृत्ति या स्वभाव का शोधन, पूर्व जन्म की वासना या पूर्व जन्म, कुल−मर्यादा, शिक्षा−सभ्यता आदि का मन पर पड़ने वाला प्रभाव। वैसे संस्कृत शब्द का अर्थ भी संस्कार शब्द से मिलता−जुलता है। कोष−ग्रन्थों में इसका अर्थ शुद्ध किया हुआ, परिमार्जित, परिष्कृत, सुधारा हुआ, ठीक किया हुआ, सँवारा हुआ आदि किया गया है। पर अर्थों के विवेचनोपरान्त ऐसा लगता है कि मानव में जो दोष हैं उनका शोधन करने के लिए और उन्हें सुसंस्कृत करने के लिए ही संस्कारों का प्रावधान किया गया है। अतएव सुसंस्कार मानव−जीवन के उत्कर्ष हेतु नितान्त अपेक्षित है।

संस्कारों का प्रारम्भ अभ्यास से होता है। अनवरत अभ्यासोपरान्त हम किसी कार्य को करने के आदी होते हैं। तदन्तर उसे अभ्यास से आदत कहा जाता है। आदत के पश्चात् जब वह प्रवृत्ति हमारे जीवन के साथ ओत−प्रोत हो जाती है तब उसे संस्कार की संज्ञा से अलंकृत किया जाता है। संस्कार के बाद जब वह कार्य सहज प्रवृत्ति में परिणत हो जाता है तब उसे स्वभाव कहते हैं।

संस्कार डालना पड़ता है क्योंकि दोषों का परिशोधन प्रयास पूर्वक ही होता है जबकि स्वभाव व्यक्ति की सहज किया है जिससे परित्राण कठिन होता है। आदत से छूटना सम्भव भी है पर स्वभाव से परांगमुख होना दुष्कर है।

आदत अच्छी एवं बुरी दोनों प्रकार की होती है। कालान्तर में संस्कार को भी अच्छा एवं बुरा मानते हुए कुसंस्कार और सुसंस्कार शब्द प्रचलित हो गये। संस्कार शब्द की मूल प्रकृति पर विवेचनोपरान्त उसके साथ ‘कु’ अथवा ‘सु लगाना व्यर्थ प्रमाणित होता है क्योंकि उसका अर्थ ही शुद्धि एवं दोषों का परिष्कार है। अस्तु कु−संस्कार कहने की अपेक्षा बुरा अभ्यास कहना न्यायोचित है और संस्कार शब्द का प्रयोग सदा, सर्वदा अच्छाई के लिए ही होना चाहिए।

जीवन के साथ संस्कारों का घनिष्ठ सम्बन्ध है। पूर्व संस्कार या पूर्व जन्म के संस्कार भी होते हैं और मरणोपरान्त भी संस्कारों की परम्परा जन्म−जन्मान्तरों तक चलेगी। एक व्यक्ति का संस्कार केवल उसी के जीवन से ही सम्बन्धित नहीं है वरन् उसके कुटुम्ब एवं कुल पर भी संस्कारों का अमिट प्रभाव पड़ता है, जिससे हम कुल−परम्परा या कुल−संस्कार कहते हैं। अस्तु संस्कारों की परम्परा एवं प्रभाव अद्वितीय हैं।

संस्कारों का कार्य एवं उद्देश्य गुणों का अधिकतम विकास करना हैं। दोषों का परिष्कार या परिहार करने की क्षमता सर्वाधिक मानव−जीवन में ही हैं क्योंकि मनुष्यों के गुण, दोष परक बुद्धि होती है जबकि पशु−पक्षी एवं अन्य प्राणियों में इस प्रशक्ति का अभाव होता है, अस्तु वे नहीं कर सकते। हम विचारों से ही बनते बिगड़ते हैं, अतएव विचारों की शुद्धि या चित्त−शुद्धि की नितान्त अपेक्षा है। इसी कारण सारे धार्मिक अनुष्ठान चित्त−शुद्धि हेतु की सम्पादित होते हैं।

संस्कारों का सर्वाधिक महत्व चित्त−शुद्धि में हैं। मन की मलीनता ही सबसे अधिक दुखदायी है। काया की मलीनता तो साबुन, पानी से धोयी भी जा सकती हैं पर मन तो न जाने कहाँ−कहाँ भटकता रहता है और प्रति पल अशुभ चिन्तन के द्वारा वह प्रदूषित होता रहता है। इन्द्रियों का प्रेरक भी वहीं है, इसलिए उसी की शुद्धि का निरन्तर ध्यान एवं प्रयत्न करना चाहिए। योग सूत्र में ‘चित्त वृत्ति निरोध’ को योग कहा गया है, जबकि निरोध करना सहज कार्य नहीं है, अस्तु सर्वप्रथम चित्त को अशुभ से हटाकर शुभ प्रवृत्तियों में लगाना चाहिए क्योंकि चित्त को कुछ न कुछ अवलम्बन तो अपेक्षित ही है। यदि उच्चादर्श एवं ध्येय में हम लगे रहेंगे तो बुरी आदतों की ओर हमारा ध्यान नहीं जायगा और यदि कभी गया भी तो बुरा करने के लिए समय ही न मिलेगा। गीताकार ने कहा है− ‘जहाँ तक जीवन है कुछ न कुछ प्रवृत्ति तो करनी ही पड़ेगी, पर आसक्ति का परित्याग कर दें तो विष के निकल जाने से हमें नुकसान नहीं पहुँच सकेगा।’

आत्म−निरीक्षण प्रतिपल नहीं तो प्रतिदिन तो करना आवश्यक है ही। उसके द्वारा जो दोष हमारे आभ्यन्तर हो उनका निवारण कर एवं जिन गुणों की कमी हैं, उनकी पूर्ति करते जायें यही संस्कृति है कल्चर है।

स्वर्गीय भगवानदीन जी ने ‘संस्कृति’ का अर्थ मांजना किया है। अर्थात् आत्मा के दोषों का परिमार्जन परिष्कृति एवं गुणों का विकास ही संस्कृति है। जिन कार्यों अथवा प्रवृत्तियों से हमारा उत्कर्ष हो, हृदय की शुद्धि हो, उन्हें ही संस्कृति का कार्य कहना चाहिए, न कि आधुनिकतम नृत्यगानादि को संस्कृति का परिचायक समझना चाहिए।


भगवन बुद्ध का अंतिम सन्देश (sandesh)

भगवान बुद्ध का जब मरण काल निकट आया तब उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाकर कुछ उपदेश दिये। उन्होंने कहा−

“धर्म मनुष्य को मर्यादाओं में रखता है और शालीन बनाता है। बिना तट की सरिता उच्छृंखल होकर अपना और सबका विनाश करती है। धर्म के सीमा बन्धन तोड़ना मत।”

“परस्पर एक होकर रहना। कारण कुछ भी हो− पृथकतावाद मत अपनाना। जो तुम में फुट डाले उनसे सतर्क रहना और उन्हें कभी क्षमा मत करना।”

“जहाँ रहते हो उसे पथ विश्राम मात्र मानना। तुम्हारा घर तो वहाँ हैं, जहाँ जीवन लक्ष्य पूर्ण होता है। रास्ते के साथियों से मिलना जरूर, पड़ावों पर ठहरना भी, पर उनके साथ इतने मत उलझ जाना कि मञ्जिल ही भूल जाये।”

“भिक्षुओं, बोलना कम, करना ज्यादा। जितना ज्यादा बोलोगे उतना ही तुम्हारा सम्मान गिरेगा। उथले लोग ही बहुत बकवास करते हैं। तुम जो बोलो−ठोस, मर्यादित, थोड़ा, अनुभूत और विश्वास पूर्वक बोलना। उस थोड़े से भी बड़ा प्रयोजन सधेगा।”


मनुष्यों के बीच पाई जाने वाली भिन्नता और उसका विश्लेषण

जीवित रहने और मरने का बाहरी तरीका प्रायः सभी मनुष्यों का एक जैसा रहता है। किन्तु उद्देश्य में अन्तर आ जाने से जीवन का स्वरूप बदल जाता है और मृत्यु का स्तर भी। निरुद्देश्य जीवन और मरण कूड़े−करकट की तरह निरर्थक एवं भारभूत रहता है जबकि उद्देश्यपूर्ण जीवनयापन ऐतिहासिक बनता है और उससे मानवता को धन्य बनने का अवसर मिलता है।

सभी मनुष्य समान रूप से पेट भरते, वस्त्र पहनते, घरों में रहते, रात में सोते, मल त्याग करते हैं। शरीर की पाचन प्रणाली से लेकर श्वास प्रक्रिया तक विभिन्न क्रिया−कलापों का स्तर भी प्रायः एक जैसा ही रहता है। शरीरों की बनावट में भी कोई बहुत अधिक अन्तर नहीं होता। जन्मते भी माता के उदर से हैं और हृदय की धड़कन रुकने पर मरते भी सब एक ही तरह है। जन्म के समय असुविधा और मरण के समय कष्ट भी सभी को एक जैसा होता है। बचपन, जवानी, बुढ़ापा और मौत का क्रम भी एक समान रहता है। इतने पर भी एक जहाँ नर−पिशाच या नर−पशु जैसी जिन्दगी जीता है वहाँ दूसरा नर देव अथवा नर−नारायण बनकर रहता है। स्वयं महान बनता है और असंख्यों को अपनी महानता की नाव पर बिठाकर पार करता है। इस आकाश−पाताल जैसे अन्तर को देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है और यह जानने की इच्छा होती है कि जब जीवनयापन की पद्धति सब सन्त−असन्तों की एक जैसी होती है तो यह असाधारण अन्तर किस प्रकार उत्पन्न हो जाता है।

निरुद्देश्य जीवन पशु स्तर का है। शरीर के साथ संलग्न भूखे प्रायः मस्तिष्क को सोचने और शरीर को श्रम करने के लिए विवश करती हैं। जड़−पदार्थों में यह भूखे अत्यन्त स्वल्प होती हैं इसी के वे न कुछ सोचते हैं जिसे हम ‘जड़’ कहते हैं। यों पूर्णतया जड़ तो इस जगत में एक कण भी नहीं हैं। चेतन प्राणियों की तुलना में अत्यन्त चेतना रहने से ही उन पदार्थों को जड़ की संज्ञा दी गई है।

प्राणी की भूखे दो है। सक्रियता बनाये रहने वाली ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए आहार प्राप्त करने का प्रयत्न करना, यह शरीर की प्रथम भूख है। सृष्टि में प्राणियों की वंश परम्परा मिट न जाय, इसलिए प्रकृति प्रदत्त कामुकता की भूख को दूसरी आवश्यकता कह सकते हैं, जो जन्म के साथ तो नहीं होती, पर पीछे प्रौढ़ावस्था आने पर अनायास ही उत्पन्न हो जाती हैं। इसे मानसिक भूख कह सकते हैं। शरीर को क्षुधा पूर्ति की और मन को काम तृप्ति की आकाँक्षा प्राणियों में सहज ही रहती है। इसके लिए किसी को कुछ चिन्तन नहीं करना पड़ता।

प्राणी की जीवन रक्षा और उसकी वंश प्रवाह जारी रखने की दृष्टि से प्रकृति ने प्राणियों को यह दो प्रेरणाएँ दी हैं। इन्हीं से प्रेरित होकर वे घड़ी के पेंडुलम की तरह इधर−उधर हिलते हैं− भाग−दौड़ करते हैं−सोचते−विचारते हैं और सचेतन एवं सक्रिय दीखने वाली जिन्दगी पूरी कर लेते हैं। कीट−पतंगों से लेकर पशु−पक्षियों तक प्रायः सभी प्राणी इन्हीं दो आकाँक्षाओं से प्रेरित होकर विविध हलचलें करते दिखाई पड़ते हैं। मनुष्य भी इसी प्रवाह में बहता रहता है।

मनुष्य में अन्य प्राणियों की तुलना में एक विशेष क्षमता है जिसे ‘मनन’ कहते हैं। मनन करने वाले प्राणी को ही ‘मनुष्य’ कहा गया है। मनन उसे कई नये प्रश्नों पर सोचने के लिए विवश करता है। अन्य प्राणियों से ऊँचे स्तर की इन्द्रियाँ और चेतना उसे किस प्रयोजन के लिए मिली? और उनका सही सदुपयोग क्या हो सकता हैं? इन प्रश्नों पर गहराई से विचार करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि जो अन्य प्राणियों को नहीं मिला वह उसे अतिरिक्त रूप से उपलब्ध है तो अवश्य ही उसके साथ कुछ विशिष्ट उत्तरदायित्व भी जुड़ा होना चाहिए। यदि एक प्राणी को अन्य सभी की तुलना में अधिक ऐश्वर्य एवं उपभोग के साधन नियामक सत्ता देती तो स्पष्ट ही एक भारी अन्याय होता और फिर सृष्टि के समस्त प्राणी उस पक्षपात से रुष्ट होकर नियामक सत्ता को कोसते।

मनुष्य को सोचने, बोलने पढ़ने जैसी शारीरिक सुविधाओं से लेकर प्रकृति की वस्तुओं और शक्तियों का परिपूर्ण उपभोग करने की सुविधा प्राप्त है। यह असाधारण अनुदान न तो अनायास ही मिला है और न अकारण ही। सृजेता की इच्छा है कि यह विशिष्ठ सुविधा सम्पन्न मानव प्राणी अपनी गतिविधियों का निर्धारण एक ऐसे उच्च उद्देश्य के लिए करे तो पेट और प्रजनन के पशु प्रयोजनों ये ऊँचा हो। यह उद्देश्य अपनी चेतना को उच्चतम स्तर तक विकास करना और क्रिया−कलाप को अधिकाधिक लोकोपयोगी बनाना ही होता है।

उत्कृष्ट चिन्तन के आधार पर बने सुसंस्कृत व्यक्तित्व अपने आप में प्रकाश स्तम्भ जैसे महान होते हैं उनकी गतिविधियाँ दूसरे के लिए प्रेरणाप्रद एवं अनुकरणीय बनती हैं। मानव समाज को आदर्शवादिता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना इतना महान कार्य है कि उसका प्रतिफल चेतन और जड़ जगत में स्वर्गीय सुख−शान्ति और शोभा सौंदर्य के रूप में सामने आता है। यही है मानव जीवन का विशिष्ट प्रयोजन जिसे असाधारण अनुदानों के साथ नियन्ता ने असामान्य उत्तरदायित्व के रूप में उसके कन्धे पर छोड़ा हैं।

मनन शक्ति का जिसमें विकास हुआ वस्तुतः वही मनुष्य है। नर जन्म का स्वरूप, प्रयोजन और उपभोग क्या हो सकता है−क्या होना चाहिए इसके तलाश करने में चिन्तन शक्ति की तत्परता को ‘मनन’ कहते हैं। मनन के आधार पर आत्म−बोध होता है और आत्मा के अस्तित्व को−गौरव को अनुभव करते हुए उसकी क्षुधा पूरी करने की आकाँक्षा जागृत होती हैं। जबकि अविकसित प्राणी पेट और प्रजनन के साधन जुटाने की परिधि से आगे की बात सोच ही नहीं सकते। उनके भीतर मात्र प्रकृति प्रेरणा ही काम करती हैं। उन्हें मनुष्य जैसा उत्कृष्ट चिन्तन तन्त्र मिली ही नहीं जिसके आधार पर मनन कर सकना सम्भव हो सके जो अभिनव उद्देश्य की पूर्ति के लिए तड़पन उठा सके।

प्रकृति ने मनुष्य को उत्कृष्ट स्तर का तन्त्र प्रदान किया। उसका गौरव इसी में है कि उस अनुदान की सार्थकता सिद्ध करे और कृमि−कीटकों से ऊँचे स्तर की जिन्दगी जीकर दिखाये। यह उत्कृष्टता उपभोग की नहीं हो सकती। जैसा कि असंख्य नर−पशु सोचते हैं। अन्य प्राणी प्रकृति प्रदत्त कच्चा आहार करते हैं। मनुष्य उसे पका कर स्वादिष्ट बनाकर खाता है। अन्य प्राणी निर्लज्ज काम−सेवन करते हैं, मनुष्य उसे कलात्मक बनाकर कुछ अधिक रस लेता है। कीट−पतंग उतना उपार्जन ही पर्याप्त समझते हैं। जिससे पेट भर जाय, मनुष्य आगे के लिए संग्रह करता है। इसे विकसित क्षुधा प्रयोजन का अर्थ उपार्जन कह सकते हैं।

दूसरे प्राणी कामकौतुक करके घोंसले या माँदें बनाते और बच्चे के बड़े होने तक उसके पोषण−रक्षण का प्रबन्ध करते हैं। मनुष्य विवाह करता−परिवार बसाता और उसके लिए सुविधा साधन जुटाता है। इसे विवाह विस्तार कह सकते हैं।

अर्थ संग्रह और विवाह विस्तार को विद्वानों ने लोभ और मोह का नाम दिया है। पाशविक प्राणि−प्रेरणाओं को थोड़े अच्छे ढंग से प्रयुक्त कर लेना−उपभोग को थोड़ा अधिक सरस बना लेना ही मानव जीवन का उद्देश्य, उपभोग आमतौर से समझा जाता है और उतना ही कुछ लोग सोचते, करते हैं। मनन परायण व्यक्ति अनुभव करता है कि यह प्रचलित लोक−प्रवाह मानव जीवन के गौरव को सार्थक नहीं बनाता। यह तो मात्र पाशविक प्रयोजनों की ही पूर्ति हुई।

मननशील व्यक्ति का निष्कर्ष यह होता है कि अपनी चेतना में उत्कृष्ट चिन्तन का समावेश किया जाय और अपनी कार्य−पद्धति के साथ आदर्शवादी क्रिया−कलाप जोड़ कर रखा जाय। दोनों के समन्वय का नाम है परिष्कृत व्यक्तित्व। आत्मा को इसी स्तर पर पहुँचने की आकुलता रहती है। उसका निर्माण जिन तत्वों से हुआ है वे इससे कम ऊँचाई पर रहकर सन्तुष्ट ही नहीं हो सकते। मनन के फलस्वरूप जब यह विश्वास होता है कि हमारा अस्तित्व मात्र काया तक सीमित नहीं हैं वरन् उससे ऊँची उठी कोई आत्मसत्ता भी विद्यमान है, तो यह भी निश्चित करना पड़ता है कि आत्मा की क्षुधाएँ समझने और उसकी पूर्ति के लिए भी प्रयत्न किया जाना चाहिए। जिस प्रकार शरीर की भूख पेट और प्रजनन की−लोभ और मोह की गतिविधियों के साथ तृप्ति का अनुभव करती है, उसी प्रकार आत्मा का सन्तोष परिष्कृत व्यक्तित्व के साथ जुड़े रहने वाले उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की परिधि में ही सम्भव होता है।

मननशील व्यक्ति शरीरगत पशु प्रवृत्तियों के समाधान तक अपने चिन्तन और कर्तृत्व को अवरुद्ध नहीं करता वह उसका स्तर ऊँचा उठाता है। आत्म−निरीक्षण, आत्मसुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की बात सोचता है। इसका प्रयोजन केवल इतना ही है कि सोचने और करने के घटिया स्तर को ऊँचा उठाकर वैसा बनाया जाय जिससे मानवता गौरवान्वित हो− आत्मा को सन्तोष मिले और व्यक्तित्व को देव स्तर का विकसित हुआ माना जाय।

यह चिन्तन प्रक्रिया समुद्र मंथन जैसी आन्तरिक हल−चल उत्पन्न करती है और इस नतीजे पर पहुँचाती है कि नियन्ता के अनुदान को सार्थक बनाया जाय। मानव−जीवन की गरिमा को मूर्तिमान किया जाय, ऐसा निर्णय जब गंभीरतापूर्वक किया जाता है तो उसी मार्ग पर चलने का साहस भी उत्पन्न होता है और पुराने ढर्रे की आदतें, प्रेरणाएँ छोड़ने में देर नहीं लगती। उस मार्ग पर अग्रसर होने से रोकने वाले अवरोध एवं परामर्श भी तब निस्सार प्रतीत होते हैं और उनके सामने झुकने में उतनी ही लज्जा अनुभव होती है, जितनी कि पशु स्तर के मनुष्यों को आदर्शवादी रीति−नीति अपनाने में झिझक लगती हैं।

चिन्तन का स्तर ही मनुष्य के व्यक्तित्व, गौरव, अस्तित्व एवं क्रिया−कलाप के अस्तर में जमीन−आसमान जैसा अन्तर उत्पन्न करता है। बाह्य दृष्टि से मानव प्राणियों के बीच बाह्य क्रिया−कलाप का अन्तर नगण्य जितना ही होता है। सन्त−असन्त−निकृष्ट और महान−खाते−सोते एक ही तरह है, पर उनका चिन्तन एवं किया−कलाप भिन्न दिशाओं में चलता है−भिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होता है। नर−पशुओं के लिए इतना ही पर्याप्त है कि इन्द्रियजन्य वासनाओं और मनोजन्य तृष्णाओं की एक सीमा तक पूर्ति कर सकें। अर्थ संग्रह एवं परिवार विस्तार में एक हद तक सफल हो सकें। पेट और प्रजनन के प्रयोजनों में निरत रहना उनकी कामनाओं को पूर्ण करने के लिए आवश्यक भी रहता है और पर्याप्त भी।

किन्तु मनन परायण विवेकवान व्यक्ति गहराई में उतरते हैं और दूर की सोचते हैं उन्हें उदरपूर्ति और कामतृप्ति जैसे क्षुद्र लाभ अपर्याप्त लगते हैं। मानवी गरिमा का स्वरूप और लक्ष्य समझ में आ जाने से वे निरन्तर उस महानता की ओर अग्रसर होते हैं; जिसे मनीषियों ने आध्यात्मिकता का नाम दिया है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व मनन मंथन की महानतम उपलब्धि है। आत्म−बल का उदय इसी पृष्ठभूमि पर होता है और उसी के प्रकाश में ऐसा नीति निर्धारण बन पड़ता है जिसे देवोपम कहा जा सके। मनुष्य मनुष्यों के बीच पाई जाने वाली निष्कृष्टता और महानता की भिन्नता का यही है आन्तरिक विवेचन−विश्लेषण।


Quotation

बर्रों का छत्ता बहुत बड़ा था। पास की डाली पर मधु मक्खियाँ एक छोटा छत्ता बनाने में परिश्रमपूर्वक जुटी थीं।

एक बर्र निकली और व्यंगपूर्वक बोली, उह, इतना छोटा छत्ता और इतनी मक्खियों का इतना शोरगुल।

मधु मक्खियों में से एक ने नहले पर दहला मारा। बोली−बहन, तुम इससे भी छोटा छत्ता बनाकर दिखा दो जिसमें हमारे छत्ते जैसा शहद भरा हो।


मानवी अस्तित्व को चुनौती देने वाली समस्या की ओर से हम आँखें न मूँदे

इन दिनों संसार के सामने सबसे भयंकर समस्या है जनसंख्या की असामान्य अभिवृद्धि। लोग बिना सोचे−समझे बच्चे पैदा करते चले जा रहे हैं। साधन स्वल्प, उपभोक्ता अधिक होने से वस्तुओं का अभाव पड़ रहा है। निवास, अन्न, वस्त्र, शिक्षा, चिकित्सा, आजीविका, यातायात के साधनों के लिए किस बुरी तरह खींच−तान हो रही है, यह किसी से छिपा नहीं हैं। जिस चक्रवृद्धि क्रम से जनसंख्या बढ़ रही है उसके जो दुष्परिणाम निकट भविष्य के समाने आने वाले हैं उनकी कल्पना करके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि अब से सौ वर्ष बाद, मनुष्यों की स्थिति मक्खी, मच्छरों जैसी हो जायगी और वे, बेमौत काल के गाल में घुसते चले जायेंगे। जीवन निर्वाह के साधन समाप्त होने के कारण मनुष्यों को भी निर्वाह के हर क्षेत्र में गतिरोध दिखाई देगा और वे बरसाती कीड़ों की तरह चारों ओर रेंगते, गन्दगी फैलाते, मरते−खपते दिखाई पड़ेंगे।

जनसंख्या नियमन आज की खाद्य, शिक्षा, चिकित्सा, आजीविका एवं युद्ध वर्जना से भी बड़ी समस्या है। उस एक समस्या को मूल और अन्यों को पत्ते कहा जा सकता है। जड़ को सींचने, सम्भालने से काम चलेगा पत्ते पोतने से नहीं। जनसंख्या सीमित हो तो धरती के अनुदानों से प्रकृति सम्पदा से लाभान्वित रहा जा सकता है और विभिन्न प्रकार के टकरावों से बचा जा सकता है अस्तु यदि संसार के विचारशील लोग इस समस्या के−समाधान के विभिन्न उपाय सोच रहे हैं और विवेकवान वर्ग विभिन्न प्रयोग कर रहे हैं तो यह सराहनीय चेष्टा ही कहीं जायगी।

इन दिनों प्रबुद्ध वर्ग में यह विचार दिन−दिन जोर पकड़ रहा है कि लोग अविवाहित जीवन व्यतीत करें−यदि विवाह भी करें तो सन्तानोत्पादन न करने का आरम्भ से ही निश्चय कर लें−जिनकी आर्थिक, बौद्धिक एवँ शारीरिक क्षमता सन्तान को समुन्नत बनाने की है वे न्यूनतम संख्या में बच्चे पैदा करे। एक या दो पर्याप्त माने जाने चाहिए। यह विचार न केवल चिन्तन क्षेत्र में ही वरन् कार्यान्वित भी किये जा रहे हैं। इस दिशा में कई देश बहुत आगे हैं।

जापान क्षेत्रफल की दृष्टि से बहुत छोटा देश है वहाँ के प्राकृतिक साधन भी स्वरूप हैं। इस वस्तुस्थिति हर नागरिक परिचित हैं। वे जानते हैं कि यदि अनियन्त्रित सीमा में बच्चे पैदा किये जाने लगें तो वह छोटा−सा टापू पचास−चालीस वर्ष के भीतर ही टिड्डी दल की तर मनुष्यों से भर जायगा और वे बरसाती मक्खी, मच्छ की तरह अभावग्रस्त होकर बेमौत मरेंगे। इस दयनीय दुर्दशा के खतरे को समझकर वहाँ का हर नागरिक बात के लिए सचेष्ट रहता है कि जनसंख्या बढ़ने न पाये यही कारण है कि हजारों वर्षों से समुन्नत स्थिति का देश उपभोग कर रहा है और उन खतरों से बचा हुआ जो भारत जैसे देशों के सिर पर नंगी तलवार की तं नाच रहा है।

जापान के नर−नारी विवाह से बचते हैं। उनमें प्रायः एक तिहाई लोग आजीवन अविवाहित रहते हैं। विवाह करते हैं वे बच्चे न होने की आवश्यक व्यवं अपनाये रहते हैं। जो बच्चे पैदा करते हैं उनकी सं कम ही होती है। वे सभी एक दो सन्तान के बाद झंझट को समाप्त कर देते हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि पिता की आर्थिक स्थिति पर, माता के स्वास्थ्य पर, देश के विकास पर बढ़ती हुई सन्तान कितना अधिक भार डालती है। जितना बोझ उठाने की कन्धों में सामर्थ्य हो उतना ही उठाना समझदारी है। उस देश में विवाह कमजोरी या मजबूरी का कारण माना जाता है और उसे उपेक्षणीय माना जाता है। वहाँ विवाहों की बधाई नहीं बटती। क्योंकि वह एक प्रतिगामी कदम माना जाता है।

अब विवाहों की आयु बढ़ रही है। भारत जैसे देश के पागल लोग तो दुधमुंहे बच्चों के विवाह भी कर सकते हैं और उस सन्तान हत्या की खुशी भी मना सकते हैं, पर प्रगतिशील देशों के लोग यह सोचते हैं जब तक प्रगति की विविध समस्याएँ सामने हैं तब तक व्यर्थ का अड़ंगा उत्पन्न करके अपने विकास प्रयत्नों में अवरोध क्यों खड़ा किया जाय। निश्चित रूप से विवाह के साथ इतने अधिक उत्तरदायित्व शिर पर आते हैं, उस गाड़ी को खींचने में उसका सारा कचूमर निकल जाता है, कोई बड़ी बात सोचना, कोई बड़े कदम उठाना, कोई बड़ी प्रगति करना उसके लिए समय, शक्ति, चिन्तन और धन के अभाव में सम्भव ही नहीं हो पाता। जो कुछ है वह इसी गृहस्थ की भट्टी में जलता चला जाता है।

विवाह की आयु प्रगतिशील देशों में वह समझी जाती है जिसमें मनुष्य थकान अनुभव करने लगे और महत्वाकाँक्षाओं की इतिश्री कर दे। जिन्हें विवाह करना होता है वे चालीस वर्ष के पश्चात करते हैं ताकि अपने परिपक्व अनुभव से एक दूसरे के साथ अधिक अच्छी तरह निर्वाह कर सकें। नई उम्र के जोशीले बच्चे तो भावुकता के घोड़े पर चढ़े होते हैं। अभी प्राणाधिक प्यार, अभी अपेक्षा, अभी आवेश अभी तलाक, अभी आत्म−हत्या यह उपद्रव नई उम्र वाले ही करते हैं। प्रकृति के अनुसार बच्चे पैदा करने का उभार भी नई उम्र में ही होता है। ढलती आयु में उसे उफान से शरीर स्वयं बचता है। स्थिर बुद्धि के अनुभवी लोग अपना सहयोग भी दूरदर्शी सहिष्णु सिद्धान्तों के आधार पर शान्त चित्त से निभा लेते हैं और एक दूसरे के लिए अधिक उपयोगी−सहायक सिद्ध होते हैं।

राष्ट्र संघ द्वारा संग्रहित आँकड़ों की पुस्तक ‘डोमोग्राफिक ईयर बुक’ के अनुसार संसार भर की औसत गणना के आधार पर महिलाएँ 24 वर्ष की आयु में और पुरुष 27 वर्ष की आयु में विवाह करते हैं। आयरलैंड का अनुपात इस दृष्टि से सबसे ऊँचा है। वहाँ विवाह आयु 31 वर्ष है। उस देश में आमतौर से महिलाएँ 45 वर्ष वाद और पुरुष 54 वर्ष बाद विवाह बन्धन में बँधना पसन्द करते हैं। आधे लोग तो आजीवन अविवाहित ही रहते हैं।

यह आँकड़े बताते हैं कि कुछ अनुभव हीन नर−नारी बीस−पच्चीस वर्ष की आयु में भी विवाह करते होंगे और कुछ दूरदर्शी लोग 40 के आस−पास उस बन्धन में बँधते होंगे तभी तो अनुपात औसत इतना आता होगा। संसार भर की नारियों की औसत आयु जब 24 वर्ष और पुरुषों की 27 वर्ष मानी गई है तो उसमें भारत जैसे बारह−चौदह वर्ष की आयु में ब्याह करने वाले लोगों की गणना भी सम्मिलित होगी। बुद्धिमानों का औसत फैलाया जाय तो वह 30 और 40 वर्ष के बीच ही पहुँचेगा। यह हवा यदि ठीक तरह चलने लगी और लोगों ने जनसंख्या वृद्धि के खतरे को ध्यान में रखते हुए−व्यक्तियों को अधिक विकसित करने की आवश्यकता समझते हुए यदि विवाह की आयु बढ़ाने का ध्यान रखा तो सामने खड़ी सर्वनाशी विपत्ति से जरूर राहत मिलेगी।

अक्सर यह दलील दी जाती है कि अविवाहित असंयमी हो जाते हैं। जहाँ तक शरीर निचोड़ने का सम्बन्ध है विवाहित लोग ही उस प्रकार की क्षति अधिक उठाते हैं। व्यभिचार एक मनः स्थिति है। वह विवाहितों में कम नहीं अधिक ही पनपा हुआ देखा जा सकता है। नैतिक प्रश्न मनुष्य के चिन्तन, दृष्टिकोण एवं चरित्र से जुड़ा हुआ है। यह तथ्य विवाहित और अविवाहित दोनों ही पक्षों को समान रूप से प्रभावित कर सकते हैं। संयमी, सदाचारी रहने और उच्छृंखल अनाचारी बनने में विवाह न कुछ सहायक होता है न बाधक। एक क्षण के लिए यह मान भी लिया जाय कि विवाह से यौन सदाचार होता होगा तो उससे जितना लाभ है उससे अधिक वैयक्तिक और सामाजिक हानि वे है जो शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और राष्ट्रीय समस्याओं को बेतरह प्रभावित करती हैं। तुलनात्मक विवेचन करने पर− यौन सदाचार को अत्यधिक महत्व देने पर भी यह सिद्ध नहीं होता कि उतने भर से व्यक्ति अपने को, अपनी पत्नी को, अपने बच्चों को और अपने समाज को कोई अच्छी स्थिति दे सके।

जहाँ तक साथी, सहचर, मित्र, घनिष्ठ या आत्मीय का सम्बन्ध है और मिल−जुलकर जीवन जीने की व्यवस्था का प्रश्न है वहाँ नर−नारी का कोई खास महत्व नहीं, क्या दो भाई या दो बहिनें मिलकर साझीदारी की जिन्दगी नहीं काट सकते? जहाँ तक जीवन व्यवस्था में दो साथी सहचरों का सम्बन्ध है−दो पुरुष या दो नारियाँ भी इस तरह की साझीदारी बना सकती हैं। यौन आचरण की बात को यदि अलग रख दिया जाय तो विवाह का 80 प्रतिशत प्रयोजन दो घनिष्ठ मित्र मिलकर भली प्रकार पूरा कर सकते हैं। मात्र यौन आचरण के लिए विवाह करना वस्तुतः विवाह संस्था को अत्यन्त निकृष्ट स्तर पर पटक देना है, यदि ऐसा ही है तो उसे कानूनी वेश्यावृत्ति से अधिक और क्या कहा जायगा।

आवश्यकतानुसार नर−नारी भी मिल−जुलकर रह सकते हैं और विवाह बन्धन में बँधे रह सकते हैं। यदि उनके सामने पारस्परिक उत्कृष्ट सहयोग का अथवा मिल−जुलकर समाज के लिए उपयोगी काम करने का लक्ष्य हो तो वे बिना संतानोत्पादन का उत्तरदायित्व कन्धे पर उठाये अपने आनन्द का लक्ष्य यौनाचार से−सन्तानोत्पादन से सहज ही ऊँचा रख सकते हैं।

अब इस तरह के प्रयोग भी कम नहीं चल रहे हैं। उनकी संख्या बढ़ रही है। समान प्रकृति के पुरुष−पुरुष अथवा नारी−नारी साझेदारी की जिन्दगी शान्ति और स्नेह पूर्वक जी सकते हैं और एक−दूसरे के सुख−दुख में सहयोगी एवं वफादार रह सकते हैं। इससे यौनाचार के अतिरिक्त विवाह की अन्य सभी महत्वपूर्ण आवश्यकताएँ पूरी हो सकती है। नर−नारी के बीच भी यदि विवाह होता हो तो क्या आवश्यकता है कि सन्तानोत्पादन को अनिवार्य या आवश्यक ही समझे। क्या व्यक्ति और समाज का भार बढ़ाने की अपेक्षा नर−नारी का मिलन किन्हीं अन्य उपयोगी कार्यों में प्रयुक्त नहीं हो सकता?

क्या पच्चीस साल से भी कम आयु के शारीरिक और मानसिक दृष्टि से अपरिपक्व ओर अविकसित बच्चों का विवाह बन्धन में बँधकर अपनी प्रगति के द्वार बन्द कर देना और अनावश्यक दबाव में दबकर अपना भविष्य अन्धकारमय बना लेना उचित है इस प्रश्न पर इस तथ्य को भी ध्यान में रखकर विचार करना होगा कि बढ़ती हुई जनसंख्या की दर मानवी अस्तित्व को धरती पर से मिटा देने के लिए एक भयंकर विभीषिका के रूप में सामने खड़ी हैं।


फर्क केवल समझ का है (kahani)

“एक अधेड़ और एक नवयुवती महिला कही साथ−साथ जा रही थीं। अधेड़ चौथी तलाक लेकर कहीं सहारा ढूँढ़ने के फेर में थी। युवती को अभी पहला विवाह करना था। समय काटने के लिए दोनों ने आपस में बातें शुरू की।”

“अधेड़ ने अपनी यात्रा का उद्देश्य बताया−उलझन, डाँट−डपट, कष्ट, खतरा, संदेह, चिन्ता, निराशा और जान को जंजाल मोल लेने के लिए सहारे की खोज।”

“नव−युवती ने झल्लाकर कहा−ऐसी बेकार बातों में उलझने की मुझे तनिक भी इच्छा नहीं हैं। मैं तो विवाह कर सुखी रहना चाहती हूँ।”

“अधेड़ ने युवती के कन्धे पर हाथ रखकर मुसकराते हुए कहा−बहन हम दोनों बिलकुल एक ही रास्ते पर है। फर्क केवल समझ का है। अनुभव तुम्हें बतायेगा कि शादी में यही सारे सुख होते हैं जिनकी गणना मैंने कराई।”

—‘वाशिंग टन पोस्ट’ में प्रकाशित


सुखी दाम्पत्य जीवन इस तरह बनता है।

सुख के साधनों के साथ स्नेह, प्रेम और आत्मीयतापूर्ण भावनाओं के सम्मिश्रण को ही स्वर्ग कहा जा सकता है। यह स्वर्ग हमारे घर में ही मौजूद है, हम भले ही न देख पाते हों, यह स्वर्ग है− दाम्पत्य−जीवन का सुख, किसी ऊपर वाले स्वर्ग से कम सरस, सुखद और रुचिपूर्ण नहीं हैं।

इस स्वर्ग को बनाने के लिये पति−पत्नी को अपने कर्त्तव्यों का पालन करना होगा, हम अपने कर्त्तव्यों का पालन करके ही अपने घर को स्वर्ग बना सकते हैं, यह कर्त्तव्य कई प्रकार के होते हैं।

दाम्पत्य−जीवन का महत्व मनुष्य की अनेकों कोमल एवं उदार भावनाओं, विचारशीलता तथा सद्वृत्तियों पर खड़ा होता है। स्नेह, आत्मीयता, त्याग, उत्सर्ग, सेवा, उदारता आदि अनेकों दैवी गुणों पर दाम्पत्य−जीवन की नींव लगती हैं।

दाम्पत्य−जीवन यथार्थ की धरती पर कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व का सम्मिलित रूप है। जो स्त्री और पुरुष के परस्पर स्नेह, आत्मीयता, त्याग, बलिदान, जीवन की कठोरताओं और शुष्क−मरुभूमियों को भी सींचकर उन्हें सरस और स्वर्गीय बना देता है। अनेकों कठिनाइयों में भी इस सम्मिलित प्रयास से पग−पग पर नई आशा, नई उमंग, नई प्रेरणा जगी रहती है। पुरुष नारी की सरलता, सहिष्णुता, त्याग, सेवा से सशक्त बना रहता है तो नारी पुरुष के स्नेहपूर्ण, संरक्षण, आत्मीयता, आदर−सम्मान को पाकर सबला, देवी, गृहिणी के रूप में प्रतिष्ठित होती हैं।

पति−पत्नी की परस्पर आलोचना दाम्पत्य−जीवन के मधुर सम्बन्धों में खटास पैदा कर देती है। इससे एक दूसरे की आत्मीयता, प्रेम, स्नेहमय आकर्षण समाप्त हो जाता है। कई व्यक्ति अपनी पत्नी की बात−बात पर आलोचना करते हैं। उनके भोजन बनाने, रहन−सहन, ओढ़ने−पहने, बोल−चाल आदि तक में नुक्ताचीनी करते हैं। इससे स्त्रियों पर दूषित प्रभाव पड़ता है। पति की उपस्थिति उन्हें बोझ−सी लगती हैं वे उनकी उपेक्षा तक करने लगती है। इसी तरह स्त्रियों द्वारा पति की उपेक्षा आलोचना करना भी इतना ही बुरा है। पुरुषों को अपने काम से थक कर घर आने पर, उसे घर में प्रेम एवं उल्लास का समुद्र लहराता यदि मिले तो उनकी दिनभर की थकान, क्लाँति, परेशानी उसमें घुल जाती है। इसके स्थान पर यदि पत्नी की कटु आलोचना, एवं व्यंग्यबाण का सामना करना पड़े तो उस व्यक्ति की क्या दशा होगी इसका अनुमान तो कोई भुक्तभोगी ही लगा सकता है।

पति−पत्नी की एक−दूसरे के प्रति कट्टरता और अविश्वास की भावना भी गृहस्थी को नष्ट−भ्रष्ट कर देती है। जब पति−पत्नी एक−दूसरे के चरित्र, व्यवहार, रहन−सहन पर सन्देह करने लगते हैं तो पारस्परिक मधुर सम्बन्धी के बीच गहरी खाई पैदा हो जाती है और वह धीरे−धीरे बढ़ती जाती हैं। इससे दाम्पत्य−जीवन की सुख−शान्ति तो नष्ट होती ही है कालाँतर में घृणा, अलगाव, असहयोग, झूँठ बोलना, धोखेबाजी के रूप में अनेक दुर्भावनाओं की सृष्टि होती है। वस्तुतः परस्पर सचाई, नम्रता, सहिष्णुता और उदारतापूर्ण क्षमा से ही दाम्पत्य−जीवन निभता है।

सफल दाम्पत्य−जीवन के लिए परिष्कृत भावनायें और परिमार्जित दृष्टिकोण आवश्यक है। स्त्री−पुरुष के स्वभाव मिलते हों, एक−दूसरे के लिए आत्म−दान की भावना हो तो अल्प साधन, कम शिक्षा और स्वल्प सौंदर्य वाले दम्पत्ति भी मस्ती का, हँसी−सुखी का जीवन जी सकते हैं। विवाहों में जो कर्मकाण्ड आदर्श और संस्कार डालते जाते हैं उनका उद्देश्य भावनात्मक दृष्टि से स्त्री और पुरुष को चारों ओर से खींचकर एक केन्द्रबिन्दु पर लाना ही होता है। जिन घरों में उन आदर्शों पर अमल होता है वहाँ आमोद−प्रमोद, हास−विलास का जीवन सदैव उभरता हुआ रहता है। उन घरों में स्वर्ग जैसी परिस्थितियों का रसास्वादन किया जाता है।

सन् 1912 की घटना है, एक टाइटैनिक नामक अँग्रेजी जहाज समुद्र में डूब रहा था। कर्मचारी लाइफ बोटों द्वारा आवश्यक सामान और व्यक्तियों को बचाने का प्रयत्न कर रहे थे श्रीमती इसाडोर और श्री स्टास नाम का एक जोड़ा उस जहाज में यात्रा कर रहा था। लाइफ बोट में उन दोनों में से एक को बचाया जा सकता था। श्री स्टास ने अपनी पत्नी को लाइफ बोट में पहुँचा दिया ताकि उसकी जीवन रक्षा हो जाय, पर वोट अभी छूटा भी नहीं था कि इसाडोर कूदकर अपने जहाज में आ गई और बोली ‘स्वामी हम जीवन भर साथ रहे फिर अन्तिम समय क्यों अलग हों? साथ जिये हैं तो साथ ही मरेंगे। इन शब्दों में कितनी आत्मीयता कितना प्रेम, कितनी अभिन्नता थी। जिन दम्पत्तियों में इतना प्रगाढ़ स्नेह होता है उन्हीं का जीवन सफल माना जाता है।

दाम्पत्य−जीवन की सफलता के लिए भावनात्मक परिष्कार का उद्देश्य स्त्री−पुरुष को नेक और सुशील बनाना होता है। पुरुष में पुरुषत्व के, स्त्री में स्त्रीत्व के गुण विद्यमान हों तो कोई कारण नहीं कि दाम्पत्य−जीवन सुख से न बीते। अन्य सारी योजनायें−इन्हीं गुणों के विकास की माध्यम है। मुख्य रूप से पुरुष में शक्ति, साहस, सक्रियता और निर्भयता आदि गुणों का समावेश हो और स्त्री में कोमलता, मृदुता, दयालुता, स्नेह, सौम्यता और सहानुभूति के गुण होने चाहिए। दोनों के स्वभाव में अपने−अपने गुणों का पर्याप्त स्थान हो तो प्रेम, विश्वास, आत्मीयता आदि का परिमार्जन अपने आप होता है और दाम्पत्य−जीवन में घनिष्ठता बढ़ती जाती हैं और उनके जीवन में आनन्द की कोई कमी नहीं रहती ऐसे ही घरों में श्रेष्ठ और सद्गुणी सन्तानें जन्म लेती है और उनसे सामाजिक एवं राष्ट्रीय जीवन सुखी एवं समुन्नत होता है इसलिए दाम्पत्य−जीवन को पवित्र बनाना उद्देश्यपूर्ण रखना प्रत्येक गृहस्थ का मूल धर्म कर्त्तव्य है। दाम्पत्य जीवन और प्रेम−दाम्पत्य−जीवन को सुखी एवं सन्तुष्ट बनाये रखने के लिए जिस प्रेम की आवश्यकता है, जिन सद्भावनाओं की उपयोगिता है वे कभी भी किसी बाह्य उपकरण, वशीकरण मन्त्र आदि से उपलब्ध नहीं किये जा सकते। इसके लिए तो अपने आप में ही आवश्यक हेर−फेर करना पड़ेगा। अपनी द्वेष−दुर्भावनाओं को हटाकर विचार विनिमयपूर्वक फिर से समस्या का सुधार करना पड़ेगा। इसके अतिरिक्त ओर कोई उपाय नजर नहीं आता, प्रेम मानव अन्तःकरण की आध्यात्मिक प्यास है। हर पत्नी अपने घर से यह आकाँक्षा लेकर आती है कि उसे ससुराल में सामान्यतया सबका और विशेषतया अपने पति का प्यार मिलेगा। पति यह चाहता है कि उसकी स्त्री उससे प्रेम और ममत्व बनाये रखेगी। यह सर्वमान्य तथ्य है कि सारे झगड़े प्रेम के अभाव में उठ खड़े होते हैं।

इससे ऐसे अवसरों की तलाश करते रहना चाहिये जब दूसरे के साथ अधिक आत्मीयता, सहृदयता प्रदर्शित की जा सके। मुरझाये हुए अन्तःकरण प्यार की हलकी−सी बौछार से भी जी उठते हैं, अपने आप को न्यौछावर कर देने के लिए उद्यत हो उठते हैं। दाम्पत्य−जीवन को व्यवस्थित बनाये रखने के लिए धन की उतनी आवश्यकता नहीं, आलीशान महल, मकान भी उतने आवश्यक नहीं जितना प्रेमपूर्ण वातावरण होता है। सुख−सन्तोष का जीवन फँस की झोपड़ी में भी जिया जा सकता है, बशर्ते कि लोगों के अन्तःकरण पारस्परिक प्रेम−भावनाओं को स्थिर रख सकें।

आज के पारिवारिक जीवन को फिर से नया रूप देने की आवश्यकता सभी विचारवान पुरुष अनुभव कर रहे हैं। लोगों को शिक्षित बनाने, आमोद−प्रमोद के साधन जुटाने के भी अनेक कार्य सामाजिक और राजनैतिक स्तर पर चल रहे हैं किन्तु गृहस्थ जीवन को सुव्यवस्थित, सुखी एवं संतुष्ट बनाने के लिए प्रेम, आत्मीयता के अभाव में सारी योजनाएँ विफल ही लग रही है। दाम्पत्य जीवन को फिर से सुदृढ़ बनाने के लिए, फिर से पति और पत्नियों को गुण, कर्म स्वभाव में परिवर्तन को प्राथमिकता देनी होगी। दाम्पत्य−जीवन की सफलता के लिए धन जुटायें पारिवारिक शिक्षा पर ध्यान दें और भी जो साधन उचित हों ग्रहण करें वह न भूलें कि पारस्परिक प्रेम आत्मीयता के अभाव में दाम्पत्य−जीवन सफल न होगा। इसके लिए प्रेम, विश्वास, सहिष्णुता, उदारता और आत्म−त्याग का आश्रय लेना पड़ेगा। इसी के आधार पर घरों में स्वर्ग उतरेगा।

दाम्पत्य−जीवन को सफल बनाने के लिए, पति−पत्नी को अपने कर्त्तव्यों का पूर्ण रूप से पालन करना चाहिए तभी घर में स्वर्ग होने की कल्पना पूर्ण हो सकेगी।


अन्तरिक्षीय सहयोग की प्रयास प्रक्रिया

मनुष्य की अदम्य जिज्ञासा इस प्रयत्न में संलग्न है कि वह धरती की परिधि में ही कूप−मण्डूक की तरह सीमाबद्ध न रहकर यह जाने की अनन्त आकाश में कहाँ क्या हैं? खगोल विद्या का विकास विस्तार इसी आधार पर सम्भव हुआ है। चन्द्रमा तक मनुष्य पहुँच चुका। उसकी भूमि पर झण्डा पहुँचा चुका। वहाँ क्या है और क्या नहीं? यह जान चुका। इस प्रयास से उसे भार हीनता में रहने−गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में प्रवेश प्राप्त करने एवं उससे निकलने, अन्तरिक्षीय परिस्थितियाँ जानने जैसी अगणित ऐसी जानकारियाँ प्राप्त हुई है जो धरती पर रहते हुए उपलब्ध नहीं हो सकती है। इस प्रयास का अभी प्रत्यक्ष लाभ कुछ बहुत बड़ा प्रतीत न होता हो पर जो ज्ञान सञ्जय किया गया है वह भावी मानवी प्रगति के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होगा वह निश्चित है।

इस सुविस्तृत ब्रह्माण्ड में हम पृथ्वी निवासी ही बुद्धिमान प्राणी हों, ऐसी बात नहीं है। असंख्य ग्रह पिण्डों में अवश्य ही ऐसे लोग होंगे जहाँ मनुष्य से भी अधिक बुद्धिमान प्राणी निवास करते हों। हम जिस प्रकार अन्य ग्रहों की खोज−खबर लेने के लिए अपने मानव सहित और मानव रहित यान आये दिन भेजते रहते हैं, उसी प्रकार यह भी स्वाभाविक है कि उन विकसित ग्रह तारकों के निवासी पृथ्वी की परिस्थितियों का पता लगाने के लिए अपने यान भेजते हों।

कभी−कभी ऐसे यान अपने आकाश में उड़ते और उतरते देखे भी गये है जिन्हें पृथ्वी निवासियों ने नहीं भेजा है। वे दृष्टि भ्रम भी नहीं थे। जाँच−पड़ताल के उपरान्त उन्हें सचाई के रूप में स्वीकार किया गया है। इन यानों की उपस्थिति और उनकी हलचलों से इस विश्वास को बहुत बल मिलता है कि अन्य लोकों में भी बुद्धिमान प्राणी मौजूद है और वे भी हमारी ही तरह ब्रह्माण्डव्यापी परिस्थितियों को जानने एवं जहाँ बुद्धिमान प्राणी मिलें वहाँ संपर्क स्थापित करने के लिए उत्सुक हैं। समय−समय पर देखे गये ऐसे अन्तरिक्षीय यान जिन्हें ‘उड़न तश्तरी’ कहा जाता हैं−इस तथ्य को साक्षी रूप में परिपुष्ट करते हैं।

जर्मनी के राकेट विशेषज्ञ हरमन ओवर्थ उन दिनों अमेरिकी सरकार के एक अत्यन्त गोपनीय प्रक्षेपणास्त्र शोध कार्य में संलग्न थे। उन्होंने एक भरी सभा में उड़न तश्तरियों के अस्तित्व का समर्थन ही नहीं किया वरन् यहाँ तक कह डाला कि इस सम्बन्ध में कितनी ही महत्वपूर्ण जानकारियाँ सरकार के पास है। उन्होंने इसके सम्बन्ध में विस्तृत प्रकाश डाला और बताया कि वे ‘एप्सिलोन एरिडैनी’ और ‘ताओ सेटि’ तारकों के किसी ग्रह से आती हैं।

जिन्होंने सन् 30 में ‘प्लूटो’ ग्रह खोज निकाला था वे अन्तरिक्ष विज्ञानी क्लाइड डबल्यू डाम्बा पिछले दिनों अमेरिका में प्राकृतिक उपग्रहों की खोज में संलग्न थे। उन्होंने भी अपनी सार्वजनिक साक्षी देते हुए कहा था−मैंने ही नहीं मेरी पत्नी ने भी इन्हीं आँखों से उड़न तश्तरियों को अपनी आँखों देखा था विज्ञान वेत्ता सिल्योर हेम ने कहा था उन्होंने एरिजोना क्षेत्र में एक ऐसी उड़न तश्तरी देखी जो धातु की बनी और ईंधन से चलती दिखाई देती थी।

ब्राजील की वायु सेना ने तो एक ऐसा प्रतिवेदन सन् 1955 में सार्वजनिक रूप से प्रकाशित कराया था जिसमें उस देश के वैज्ञानिकों द्वारा उड़न तश्तरियों के विवरण सम्बन्धी विचार निष्कर्षों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया था। कनाडा की सरकार ने ओटावा के समीप अवस्थित एक अनुसन्धान शाला शाला द्वारा सन् 1953 में उड़न तश्तरियों सम्बन्धी खोज कराई थी। उसके निर्देशक विर्ल्वट मथ ने घोषित किया था उड़न तश्तरियों के अस्तित्व सम्बन्धी ठोस प्रमाण मौजूद है। वे किसी अन्य ग्रह से जाती है। अर्जेण्टाइन के विज्ञानी ने मार्कस ग्युएकि तथा अन्य कई अफसरों ने दो उड़न तश्तरियाँ कारडोवा हवाई अड्डे के पास देखी थीं। यह वहाँ की सरकार द्वारा प्रकाशित एक विज्ञप्ति द्वारा स्पष्ट है। रूस के दो वैज्ञानिक कैजेन्त्सेव और एग्रेस्त उनका अस्तित्व सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं।

फ्रान्स के “रैसिस्तैन्स” पत्र में स्वीडन में अनेक लोगों द्वारा देख गई उड़न तश्तरियों का विस्तृत विवरण अपने 11 जुलाई 1946 के अंक में विस्तार पूर्वक प्रकाशित किया था। स्टाक होम में ऐसी ही ज्योतियाँ देखी गई उन का विवरण ‘लामोन्द’ समाचार ने ‘रहस्यमय ज्योति बम’ नाम देकर प्रकाशित किया था। ब्रिटेन के ‘डेली मेल’ ने अपना प्रतिनिधि इन समाचारों का पता लगाने भेजा उसने स्वीडन तथा डेनमार्क के फौजी अफसरों तक को इस चिन्ता से ग्रसित पाया कि कहीं उड़न तश्तरियाँ कोई खतरा तो उत्पन्न नहीं करने वाली हैं, इन देशों के अनेक सम्भ्रान्त नागरिक आँखों देखे विवरण को साक्षी रूप से प्रस्तुत करते हुए उड़न तश्तरियों के स्वरूप की बात स्पष्ट कर रहे थे।

केनेथ आरनल्ड का वह विवरण अनेक पत्रों में छपा था जो उसने अपने वायुयान के निकट नौ उड़न तश्तरियों का एक जत्था आँखों के पश्चात प्रकाशित कराया था।

अमेरिकी सरकार द्वारा इस सम्बन्ध में जो अनुसन्धान कराया था उसका विवरण कमाण्डर मैक्लाफलिन ने एक प्रतिवेदन के रूप में छपाया है। उसमें उन्होंने उड़न तश्तरियों को किसी अन्य ग्रह के बुद्धिमान प्राणियों द्वारा भेजा गया बताया है और उनका आकार औसत 40 फुट चौड़ा 100 फुट लम्बा बताया है तथा उनकी की ऊँचाई कोई 2 लाख फुट निर्धारित की।

इस संदर्भ में वैज्ञानिकों का एक सम्मेलन बुलाया गया था। उसमें जनरल सैमफोर्ड ने न केवल उड़न तश्तरियों के अस्तित्व को स्वीकार किया वरन् उनकी शक्ति का उल्लेख करते हुए यह भी माना कि उनमें इतनी शक्ति है जिसको हम न तो समझ पाते हैं और न माप सकते हैं।

सन् 1961 में जब केप केनेडी से पोलरिस नामक राकेट उड़ाया गया तो राडार ने नोट किया कि उसके ऊपर किसी ‘अज्ञात वस्तु’ ने भयंकर झपट्टा मारा और फिर वह गायब हो गई। इस आघात ने राकेट के साथ वैज्ञानिकों का संपर्क ही तोड़ दिया। बहुत प्रयत्न करने पर 14 मिनट बाद फिर कहीं ढूँढ़ा देखा जा सका। ऐसा ही एक झपट्टा इस ‘अज्ञात वस्तु’ ने व्यूनस आयर्स के एजेजिया हवाई अड्डे के समीप उड़ते हुए ‘पैनिग्रा डी सी. 8 नामक जेट विमान पर मारा और उसे नियम समय पर उतरने से रोक दिया। यों सरकारी विज्ञप्ति ने इन समाचारों पर पर्दा डालने की कोशिश की पर जिन्होंने इन दृश्यों को आँखों से देखा वे उन विज्ञप्तियों को कैसे स्वीकार करते?

ऐसे ही और भी कई प्रामाणिक विवरण उपलब्ध है। यथा−न्यू मैक्सिको के प्रक्षेपणास्त्र अधिकारी स्टोक्स द्वारा ऊलामागोर्दा के निकट अपनी कार के समीप से एक भीमकाय यन्त्र को उड़ते हुए देखा जाना−18 जून 1963 में कैलीफोर्निया में जेट विमानों द्वारा एक उड़न तश्तरी का पीछा किया जाना−केनेवरा (आस्ट्रेलिया) में एक लड़खड़ाते लाल प्रकाश पिण्ड को अनेकों द्वारा देखा जाना−लिस्वन की वेधशाला द्वारा उड़न तश्तरियों का आक्रमण नोट किया जाना, आदि−आदि।

जन साधारण द्वारा अनेकों बार खुले आकाश में विचरण करती हुई उड़न तश्तरियाँ देखी गई है। एक दो ने नहीं वरन् असंख्यों ने उन्हें आँखों से देखा है। इनके समाचार समय−समय पर अखबारों में छपते रहे हैं।

1.पैरिस के विकट बरनाल नगर के निकट अँधेरी रात में पौन घण्टे तक एक नीली रोशनी वाले प्रकाश पिण्ड का घुमड़ते रहना और उसका व्यापारी बर्नार्ड तथा दूसरे अनेकों प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा देखा जाना (2) क्वारोबल के निकट एक उड़न तश्तरी का उतरना और उसमें से समुद्री पोशाक जैसे वस्त्रों वाले दो व्यक्तियों का निकलना, उन्हें मेरियस डिवाइल्ड का अपने साथियों सहित देखना एवं उस दृश्य के सहस्रों साक्षी मिलना, (3) लिस्वन के निकट फातिमा में और न्यूगिनी में बच्चों द्वारा छह बार देव मानवों के साथ भेंट का विवरण प्रस्तुत किया जाना (4) पादरी विर्कर लीरिया द्वारा आकाश में किसी देवदूत का प्रकाश विमान में बैठकर आना और उसकी कैथोलिक चर्च द्वारा पुष्टि किया जाना (5) कोइम्ब्रा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक अलमीदा गैरत द्वारा एक भयंकर अन्तरिक्ष यान के गुजरने का विस्तृत वर्णन उसकी साक्षी में 70000 दर्शकों का समर्थन (6) रेवेण्डर विलियम वूथ गिल, डा. के. हाउस्टन, मेजर डोनाल्ड की हो जैसे सम्भ्रान्त व्यक्तियों द्वारा आँखों देखा घटना क्रम उड़न तश्तरियों की गतिविधियों का वर्णन (7) कनाडा के समुद्री तट ‘शाका हार्वर’ पर 4 अक्टूबर 1967 को सहस्रों दर्शकों द्वारा एक विशालकाय अग्नि पिण्ड का आकाश से उतर का समुद्र में प्रवेश करते हुए देखा जाना (8) अन्तरिक्ष शोधक एंडयूब्लासम की प्रकाशित डायरी में अनेकों आकाश पिण्डों के धरती पर आवागमन के देखे गये विवरणों का संग्रह (9) ब्रिटेन के विक्टोरिया जलयान द्वारा माल्टा के निकट तीन चमकदार उड़न तश्तरियों का समुद्र से निकल कर आकाश में उड़ जाने का विवरण उसके नाविकों द्वारा प्रकाशित कराया जाना (10) अमेरिकी जलपोत अलास्का का सेतल के निकट समुद्र से एक 250 फुट व्यास के पिण्ड का निकलना और आकाश में उड़ना, जहाज पर सवार विज्ञानी राबर्ट एस॰ क्राफर्ड द्वारा उसका वह विवरण बताया जाना जिसमें उस पिण्ड पर तोपें दागने की भी नाविकों ने तैयारी कर ली थी।

ऊपर कुछ प्रमुख घटनाएँ है इनके अतिरिक्त संसार के विभिन्न भागों में असंख्य लोगों द्वारा देखी गई ऐसी हजारों साक्षियाँ है जिनसे ‘उड़न तश्तरियों’ के अस्तित्व, स्वरूप एवं क्रिया−कलाप पर प्रकाश पड़ता है। यह प्रमाण इतने अधिक हैं और ऐसे लोगों के है जिन्हें सहज ही झुठलाया नहीं जा सकता।

‘फेट’ पत्रिका में ए॰ मार्शल का वह प्रत्यक्ष दर्शन छपा है जिसमें उन्होंने वर्जीनिया के मैनबोरो स्थान पर एक आकाशयान को अपने निकट से गुजरने की बात का विस्तार पूर्वक वर्णन किया है। लेखक एम॰ के0 जेसप ने अपनी ‘उड़न तश्तरियों की खोज’ पुस्तक में उन कितनी ही घटनाओं का उल्लेख किया है जो बहुचर्चित बन चुकी है और जिनकी साक्षी में अनेकानेक प्रत्यक्ष दर्शी प्रस्तुत किये जा सकते हैं। (1) स्काटलैंड में इववनिस नगर के लोगों द्वारा रात्रि के घने अँधेरे में उछल−कूद मचाते हुए दो प्रकाश पिण्ड (2) इटली के बेनिस नगर में रात को बादलों के बीच एक घण्टे तक दौड़−धूप करने वाले दो प्रकाश पुञ्ज (3) इंग्लैंड के वेल्सद्वीप पर तेज रफ्तार से चक्कर काटती हुई दो दीप्ति धाराएँ (4) लेनिक ग्राड के जंगली नाले के निकट आँख मिचौनी खेलते हुए तीन प्रकाश−गोलक (5) चीन सागर में ब्रिटिश जलयान कैरोलीन के कप्तान नारकाक द्वारा लगातार दो घण्टे तक समुद्र देखी गई दो प्रकाश नौकाएँ (6)ब्रिटिश जलया लिएन्डर के नाविकों द्वारा समुद्र की सतह पर सात घण्टे ठना रहा प्रकाश नृत्य (7) जान फिलिप वेसर द्वारा बताया गया उड़न तश्तरियों का क्रीड़ा विवरण आदि−आदि।

संसार के विभिन्न क्षेत्रों में देखी गई उड़न तश्तरियों के बारे में जब विस्तृत विवरण ‘डेली मिरर’ और ‘न्यूयार्क टाइम्स’ जैसे प्रख्यात पत्रों ने छापे तो उनकी उपेक्षा सम्भव न हो सकी। प्रक्षेपणास्त्र योजना के रियर एडमिरल डी0 एस॰ फाहर ने और हाउस आफ रिप्रेजेन्टेटिव के स्पीकार जान मैककोर मैन तक को प्रामाणिक साक्षियों पर विचार करने के बाद यह कहना पड़ा−‘अन्य ग्रहों द्वारा धरती से सम्बन्ध बढ़ाने की जो हलचलें इन दिनों चल रही है उनकी उपेक्षा नहीं की जा सकती।

उड़न तश्तरियों के अस्तित्व सम्बन्धी पक्ष−विपक्ष के प्रमाण एकत्रित करने के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय संस्था वाशिंगटन में गठित हुई, जिसका नाम हैं−नेशनल इनवेस्टीगेशन कमेटी आन एरियल फिनामिलना’ इसका संक्षिप्तीकरण है−“निकैप” इससे सम्बन्धित विषय में दखल रखने वाले विशेषज्ञों को ही सदस्य बनाया गया है। संसार में उनकी संख्या पाँच हजार के लगभग है। उसने जो प्रमाण सामग्री एकत्रित की है वह एक महापुराण जितनी । इनमें से जो अधिक महत्वपूर्ण था उसका प्रकाशन भी हुआ है। जो नहीं छापे जा सके वे घटना क्रम भी अपने ग के अनोखे हैं और उन्हें प्रस्तुत करने वाले ऐसे नहीं जिन्हें सिर फिरे अथवा गपबाज कहकर झुठलाया जा सके।

जो साक्षियाँ इन प्रकाश पुञ्ज आकाशीय पिण्डों के सम्बन्ध में प्राप्त हुई है उनमें से एक चौथाई वायुसेना के ऐसे प्रतिष्ठित पदाधिकारियों की है। जिन्हें गपबाजी फैलाने का दोषी कदाचित् ही कोई ठहरा सके। कुछ घटनाएँ तो ऐसी है जिनमें उन्हीं पर मुसीबत टूटी।

जुलाई 1948 की बात है अमेरिका में मेडिसन विल केन्टुकी की पुलिस को सूचना मिली कि गाडमैन हवाई अड्डे के इर्द−गिर्द एक विशालकाय उड़न तश्तरी चक्कर काट रही है। उसका पीछा करने के लिए ‘एफ॰ 51’ किस्म के तीन लड़ाकू विमान कप्तान थामस मेन्टल के नेतृत्व में उड़ाये गये। कप्तान ने आकाश में पहुँच कर रेडियो से सूचना दी हमें उड़न तश्तरी प्रत्यक्ष दीख रही है। उसे हमारे पीछा करने का पता चल गया है। इसलिए वह तेजी से भागने लगी है। हम भी 360 मील की चाल से उसका पीछा कर रहे है। 20 हजार फुट की ऊँचाई तक उसका पीछा करेंगे यदि पकड़ में न आई तो इसके बाद लौट पड़ेंगे। बाद में कप्तान के दो साथियों ने बताया कि मेन्टल का जहाज भी उड़न तश्तरी के साथ गायब हो गया। सरकार ने दो वर्ष तक इस विषय पर चुप्पी साधे रहने के पश्चात् इतना ही कहा− ‘मेन्टल अपना सन्तुलन खो बैठा और उसका जहाज नष्ट हो गया।’

इसी से मिलती−जुलती 23 नवम्बर 1953 की वह घटना है। लेक सुपीरियर आकाश में राडार यन्त्र ने एक विशालकाय उड़न तश्तरी के चक्कर काटने की खबर दी। उसका पीछा करने किनरास हवाई अड्डे से एक एफ॰ 89 जेट उड़ाया गया। सञ्चालक था−मौन्कला बिल्सन। राडार पर अंकित होता रहा कि जेट तेजी से उड़ता हुआ तश्तरी के निकट जा पहुँचा है। इसके बाद दृश्याँकन यकायक बन्द हो गया। दोनों ही गायब हो गये। जेट का मलबा उस पूरे क्षेत्र में तलाश किया गया पर कहीं कोई सुराग न मिला। उस रहस्य पर पर्दा डाल देने के अतिरिक्त और कोई रास्ता न था।

कप्तान विलियम ने अमेरिकी पत्रकारों के सामने बताया 24 फरवरी 1959 की रात को उन्होंने बताया डी0 सी0 6 यान जब पेन्सिलवेनिया से डिट्राएट की ओर उड़ता जा रहा था उसके सामने तीन उड़न तश्तरियाँ एकाकी और देर तक चक्कर काटती रहीं मानो वे जहाज का गम्भीर अध्ययन कर रही हों। इसके बाद वे एक भयंकर झटका देकर उसी अँधेरे आकाश में खो गई जिसमें से कि प्रकट हुई हुई थीं। इस घटना को उस क्षेत्र में उड़ते हुए अन्य हवाबाजों ने भी देखा था।

6 नवम्बर 1957 को ओटावा के आकाश में वास्काटाँग झील के ऊपर रात्रि के 9 बजे एक उड़न तश्तरी देखी गई। उसने उस क्षेत्र का रेडियो सञ्चार तब आरम्भ हुआ जब उनका आतंक समाप्त हो गया।

अन्तरिक्षीय यानों के धरती पर आवागमन की इन साक्षियों से हम इस निष्कर्ष पर सहज ही पहुँच सकते हैं कि इस ब्रह्माण्ड में हम मनुष्यों की अपेक्षा कहीं विकसित सम्पदाएँ मौजूद है। हमारे उड्डयन ज्ञान एवं साधनों की अपेक्षा वे कहीं आगे हैं। यदि ब्रह्माण्डव्यापी चेतन सत्ता पारस्परिक सहयोग के आधार पर आदान−प्रदान का द्वार खोज सके तो दूरवर्ती ग्रह तारकों के भी निकटवर्ती पड़ौसी बन कर रहने की सुखद परिस्थितियाँ प्राप्त हो सकती हैं। विज्ञान ने इस पृथ्वी पर रहने वाले सुदूरवर्ती लोगों को यातायात साधनों के आधार पर एक गली, मुहल्ले में रहने वालों की तरह बना दिया अब अन्तर्ग्रही सहयोग एवं आदान−प्रदान का द्वार खुलने की बारी हैं।

एक ओर अन्तर्ग्रही सहयोग के प्रयास और दूसरी ओर मनुष्य का अधिकाधिक संकीर्णतावादी स्वार्थपरायण बनते जाना−कैसी है यह विधि की विचित्र विडम्बना।


हम सब सनकी बनते जा रहे हैं।

सनकें जब अपने पूरे उभार पर होती है तो वे अपने वाहन को इस कदर आवेश ग्रस्त कर देती है और विश्वासों की इतनी गहरी भूमिका में उतार देती है कि वह बेचारा सम्भव असम्भव का भी भेद भूल जाता है अपनी तर्क शक्ति गँवा बैठता है और जो कुछ भी उसे सनक ने मान बैठने के लिए कहा था उन्हीं पर पूरा विश्वास करने लगता।

सनकी की मनःस्थिति के अनुरूप वे कल्पनाएँ कई बार एक सचाई की तरह मस्तिष्क में जड़ जमाती है और धीरे−धीरे व्यक्ति गहरा विश्वास करने लगता है कि वस्तु स्थिति वही है जो उसके कल्पना क्षेत्र में उमड़−घुमड़ रही है। ऐसी स्थिति में उसके लिए कल्पना, कल्पना न रहकर एक सचाई बन जाती है और वह अपनी ही उड़ानों में मान्यताओं में मकड़ी की तरह बेतरह जकड़ जाता है। पूर्ण या आँशिक भावोन्माद की यह स्थिति कितने ही लोगों में देखी गई है। पागलखाने के डाक्टर ऐसे लोगों को पागल नहीं कह सकते क्योंकि अमुक विशिष्ठ सनक के अतिरिक्त अन्य बातों में वे साधारण लोगों की तरह सोचते और काम करते हैं यदि वे पागल होते हो सभी बातों में पागल होते। डाक्टर अधिक से अधिक उन्हें सनकी कह सकते हैं।

सनक का एक विचित्र उदाहरण देखिए। अमेरिका में एक बहुत ही सुसम्पन्न और सुशिक्षित व्यक्ति अंतर्ग्रहीय उड़ानों की कल्पना करते−करते सनक की इस स्थिति में जा पहुँचा जहाँ वह यह मान्यता बना बैठा कि वह शुक्र ग्रह के बारे में न केवल बहुत कुछ जानता भी है वरन् उस लोक की यात्रा तक कर आता है। वह शुक्र के राजकुमार का मित्र है ओर ऐसा अन्तरिक्ष यान बनाने की विधि जान चुका है जो अन्तर्ग्रही यात्राएँ बड़ी सरलता से और कम खर्च में कर सकें।

यह व्यक्ति दो करोड़पति कम्पनियों का अध्यक्ष था उम्र पचपन साल। नशेबाजी से बिलकुल दूर विवाहित, दो बच्चों का पिता, धार्मिक प्रकृति, नियमित रूप से गिरजा जाने वाला, निवासी वाशिंगटन का, नाम हेराल्ड जैसी बर्नी।

अन्तरिक्ष यात्राओं के सम्बन्ध में अति भावुकता पूर्वक एकाकी चिन्तन करते−करते उसने यह मान्यता बना ली कि वह दो बार शुक्र ग्रह की यात्रा कर चुका है− वहाँ के राजकुमार को अपना मित्र बना चुका है और ऐसी एक कम्पनी बनाने में उसका सहयोग प्राप्त कर चुका है जो उसके कल्पित ‘मैगनेटिक फ्लस मोडलेटर’ सिद्धान्त के अनुसार सस्ते, सरल और सुविधाजनक अन्तरिक्षयान बनाया करेगी। उसने इस कम्पनी का नाम रखा “प्रोपल्सन रिसर्च लेवोरेटरीज” बर्नी अपने को संसार का सर्व प्रथम शुक्र ग्रह यात्री मानता था और उसने अपनी दो यात्राओं का विवरण बताने वाली पुस्तक “शुक्र ग्रह में दो सप्ताह” भी लिखी वह 118 पृष्ठ की थी। उसकी सीमित प्रतियाँ टाइप की गई थी प्रेस में नहीं छपाई गई थीं। क्योंकि विषय ‘अत्यन्त गोपनीय था’ इस आविष्कार के आधार पर ‘अरबों खरबों की सम्पत्ति कमाई” जानी थी।

वर्नी अपनी सनक में पूरी तरह सो गया था। कल्पना और यथार्थता का अन्तर भुला देने वाली उसकी मनःस्थिति बन गई थी। उसने आवेश में अपने 169000 डालर बन गई थी। उसने आवेश में अपने 169000 डालर के शेयर बेच डाले। आश्चर्य यह कि जिस आत्मविश्वास के साथ बातें की उससे प्रभावित होकर अनेक सुसम्पन्न लोग उसकी बातों पर यकीन करने लगे और उसके शुक्र ग्रह अभियान में सम्मिलित हो गये उस कार्य के लिए इन लोगों ने भी अपना प्रचुर धन लगा दिया। सनक का स्वरूप इतना बड़ा और इतना योजनाबद्ध हो सकता है, इसका इतना आश्चर्यजनक उदाहरण अन्यत्र कदाचित् ही मिलेगा।

बर्नी की महिला सेक्रेटरी ‘एन्जेलिका’ पूरी तरह इन गतिविधियों पर विश्वास करती थी। उसे बेचारी को पता तक न था कि जिस प्रयोजन के लिए वह इतनी दौड़−धूप कर रही है, वह मात्र हवाई किला है, एक दिन बर्नी को और भी विचित्र सनक चढ़ी उसने ‘शुक्रग्रह से अपनी सेक्रेटरी को वहाँ के राजकुमार यूसीलस’ की ओर से फोन कराया कि इस ग्रह पर आकर बर्नी बीमार हो गये हैं और अपने साथियों के नाम अमुक सन्देश नोट कराते हैं जो उन तक पहुँचा दिया गया। “सेक्रेटरी ने वैसा ही किया। इसके बाद कुछ समय उपरान्त ही उसके मरने का समाचार आ गया।”

सेक्रेटरी ने उचित समझा कि अमेरिका का भाग्य बदल देने वाली इतनी बड़ी योजना को अधूरी न पड़ी रहने दे वरन् राष्ट्रपति को बता दे। बदहवासी में किन्तु पूरे आत्म−विश्वास के साथ ऐंजेलिका राष्ट्रपति आइजन हावर से मिली। बर्नी की दो शुक्र यात्राओं से लेकर उसका अन्तरिक्ष यान बनाने की योजना और उस लोक में जाने का पूरा विवरण बताया और सुझाव दिया कि वे स्वयं इस कार्य को हाथ में लें और आगे बढ़ायें।

राष्ट्रपति ने इस रोमांचक एवं विचित्र विवरण पर विश्वास न कर उनने सारा मामला गुप्त पुलिस के उच्च अधिकारियों को सौंप दिया। पुलिस ने गहरी छान−बीन की तो शुक्र पर मरा हुआ ‘बर्नी’ धरती पर ही जीवित अवस्था में अर्धविक्षिप्त स्थिति में पाया गया। वह अपने वतन से बहुत दूर एक साइवोर्ड बनाने वाले के यहाँ पेट भरने जितनी मजदूरी कर रहा था, भिखारियों जैसे फटे हाल में रहता हुआ पुलिस ने उसे पकड़ लिया। अदालत में उस पर झूठी अफवाहें फैलाने और धोखाधड़ी करने के अपराध में मुकदमा चलाया और इसके लिए अदालत ने उसे जेल की सजा भी सुना दी।

मानसिक रोगों में सनक का अपना स्थान है। यह रोग दिन−दिन बढ़ रहा है लोग तर्क शक्ति का उपयोग नहीं करते, विवेक पर जोर नहीं देते। मानसिक आलस्य और नशेबाजी का सम्मिश्रण मानसिक स्तर को इतना दुर्बल बना देता है कि उसमें सनकों के पलने की सम्भावना बढ़ती ही चली जाती हैं।

ब्रिटेन के अस्पतालों में अब मानसिक रोगों के शिकार व्यक्तियों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही हैं। इनमें न केवल प्रौढ़ व्यक्ति वरन् छोटे बच्चे भी शामिल है। बड़ी आयु के लोग चिन्ताओं, मानसिक दबावों अथवा नशेबाजी आदि कारणों से विक्षिप्त हो सकते हैं पर छोटे बच्चे क्यों इन रोगों के शिकार होते हैं इस सम्बन्ध में वहाँ बहुत अधिक चिन्ता की जा रही हैं। इस सम्बन्ध में सर सूलियन हक्सले के नेतृत्व में जो शोध आयोग बना उसने रिपोर्ट दी है कि पाँच में से एक मानसिक रोगी यह व्यथा अपने माँ−बाप से लेकर आता है। अर्थ विक्षिप्त और सनकी नर−नारी अपेक्षाकृत अधिक बच्चे उत्पन्न करते हैं और उन बालकों में वे बीमारियाँ जन्म से ही आती है जो आयु वृद्धि के साथ−साथ अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट होने लगती है।

शारीरिक और मानसिक उच्छृंखलता बरतने से विवेक बुद्धि खीजने लगती है और लगती है जब अपनी विवेचना और निष्कर्ष का कुछ उपयोग ही नहीं जो चाहा सो बरता वाली नीति चल रही है तो फिर उखाड़−पछाड़ करने का क्या लाभ? ऐसी थकी बुद्धि की पहरेदारी शिथिल पड़ने पर सनकों को फलने−फूलने का अवसर मिल जाता है और ऐसे उदाहरण सामने आते हैं जिनमें से एक का वर्णन ऊपर दिया गया है।

गहराई से विचार करें तो हम में से अधिकाँश व्यक्ति अपने ढंग के सनकी है। जीवन का लक्ष्य, स्वरूप, उपभोग हम लगभग पूरी तरह भूल चुके हैं। उपलब्ध अद्भुत क्षमताओं, अनुपम परिस्थितियों और दिव्य अनुदानों का क्या सदुपयोग हो सकता है यह हमें तनिक भी नहीं सूझता। जो न सोचने योग्य है वह सोचते हैं और जो न करने योग्य है सो करते हैं, मिथ्या विडम्बनाओं में उलझे और मोद मनाते रहते हैं। अन्ततः पापों की गठरी सिर एक बाँध कर अन्धकारमय भविष्य के गर्त में गिरने के लिए चले जाते हैं। क्या यह सनकीपन नहीं है? आत्म−निरीक्षण करें, अपनी वर्तमान गति−विधियों पर विचार करें तो प्रतीत होगा कि अमेरिका के उपरोक्त सनकी से अपना भी सनक भरा जीवन क्रम किसी प्रकार कम नहीं हैं।

सनक की बढ़ती हुई बीमारी लोक व्यवहार और दृष्टिकोण निर्धारण के दोनों ही क्षेत्रों को अपने चंगुल में कसती चली जा रही है यह कम चिन्ता का विषय नहीं हैं।


दूसरों के गुण और अपने दोष देखें

संसार गुण−दोषों से भरा है। अकेला परमात्मा ही दोष रहित हैं। प्रायः मनुष्यों में दोष देखने का भाव रहता है। वह अच्छी से अच्छी वस्तु में, यहाँ तक कि परमात्मा में भी दोष निकाल लेते हैं। उसकी सारी शक्ति और समय इसी दोष−दर्शन में रहता है अतः वह किसी प्रकार की उन्नति नहीं कर पाता।

छिद्रान्वेषक व्यक्ति संसार की किसी बात में सुन्दरता नहीं देख सकता, क्योंकि उनका मस्तिष्क तो कुरूपताओं से भरा पड़ा हैं। यदि उसे किसी महापुरुष, समाज−सेवी तथा लोक−नायक के भी दर्शन कराकर उनकी महानता की चर्चा की जावे जो खिन्न मन से सुनेगा और मौका पाते ही दोष अलापना शुरू कर देगा। उन्हें अहंकारी, स्वार्थी आदि दोषों से अभिव्यक्ति कर दोषी ही सिद्ध करेगा।

दोष−दर्शी का बड़ा दुर्भाग्य है कि वह किसी वस्तु में गुण देख ही नहीं पाता, यदि वह अच्छे को अच्छा कहता है तो उसका छुद्र हृदय डाह की आग से जलने लगता है। दूसरों की निन्दा तथा आलोचना में ही उसे सन्तोष, सुख और शान्ति मिलती है।

दोष−दर्शी की दृष्टि महान व्यक्तियों के परिश्रम, पुरुषार्थ, त्याग, बलिदान, निःस्वार्थ एवं सच्चे सेवा−भाव की ओर जाती ही नहीं, जो कि उन्नति के वास्तविक हेतु होते हैं। अन्ततः किसी भी काम में सफलता नहीं पाता और उसका दोषी दूसरों को बनाता है।

सारी सृष्टि गुण−दोषों से भरी है। दुष्ट व्यक्ति दोषों की खोज में रहते हैं, जबकि साधु−पुरुषों की दृष्टि गुणों ही पर पड़ती है। उन्हें दूसरों के दोष दिखाई ही नहीं पड़ते, वे तो दुष्टों में भी गुण खोज लेते हैं। दूसरों के विषय में वार्तालाप के आधार पर कोई भी व्यक्ति अपने विषय में आसानी से जान सकता है कि वह दोषदर्शी है अथवा गुणदर्शी। जो व्यक्ति इस कसौटी पर अपने को परदोष−दर्शी पाये उसे चाहिये कि वह अपनी इस दुर्बलता को दूर करके अपना दृष्टिकोण गुण−दर्शी बनाये। क्योंकि दोष दर्शन की दुर्बलता एक ऐसा अभिशाप है जो मनुष्य का लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार का पतन कर देता है।

परदोष−दर्शी निन्दक व्यक्ति के मित्र कम तथा शत्रु अधिक होते हैं। संसार में कदाचित ही कोई ऐसा प्रमाण मिले कि किसी व्यक्ति ने दूषित दृष्टिकोण तथा पर निन्दा की वृत्ति रखकर भी जीवन में कोई सफलता प्राप्त की हो। संसार का इतिहास इस बात के उदाहरणों से अवश्य भरा पड़ा है कि घोरतम निन्दा, आलोचना एवं विरोध होने पर भी जिन सत्पुरुषों ने किसी की निन्दा नहीं की और अपनी गुण ग्राहिका वृत्ति में विश्वास बनाये रहे, उनकी संसार में पूजा हुई है और दोषदर्शी निन्दक जहाँ के तहाँ कीचड़ में पड़े रहकर कीड़े−मकोड़ों की मौत मरे हैं।

परदोष दर्शन की दुर्बलता त्याग कर आत्म−दोष दर्शन का साहस विकसित कीजिये। जब दृष्टि गुण, दोष देखने में समर्थ है तो वह गुण, दोष दोनों देखेगी। जब आप स्वयं ही अपने दोष तथा दूसरों के गुण देखने में लग जायेंगे, तो दूसरों के दोष देखना छिद्र खोजना तथा आलोचना करने में अपने अमूल्य समय का अपव्यय न करके उसे सत्कार्य में लगायेंगे तो संसार में सम्मान और सफलतापूर्वक जीकर परलोक के पवित्र मार्ग को प्राप्त करने में समर्थ होंगे।

रात और दिन की तरह दोनों की प्रकार के कारण, पदार्थ तथा व्यक्ति इस संसार में मौजूद हैं। यदि वह एक ही प्रकार के हो जायँ तो संसार की शोभा ही नष्ट हो जाय। भिन्नता को हटाकर सुविधायें उत्पन्न करने के लिए ही हमारे सारे प्रयत्न चलते हैं।

संसार की रचना में दोष और ईश्वर की भूल ढूँढ़ने की अपेक्षा हमें यही सोचना चाहिये कि क्या ऐसा सम्भव है कि अप्रिय के दुष्प्रभावों से बचा रहा जा सके और प्रिय के लाभ प्राप्त हो सके? विचार करने पर प्रतीत होता है कि ऐसी सुविधा भी परमात्मा की सृष्टि में मौजूद है। यदि हमें सचमुच प्रिय की प्राप्ति और अप्रिय से मुक्ति चाहिये तो इसके लिए सुगम मार्ग होगा, प्रिय दर्शन।

संसार में सभी वस्तुयें अच्छी और बुरी हैं। जिस प्रकार हम उसे देखने लगते हैं वह उसी तरह दिखाई देने लगती है। भागवत की कथा में प्रसंग है कि− जिस समय कंस की राज सभा में श्रीकृष्ण जी ने प्रवेश किया उस समय वे किसी को योद्धा, किसी को काल, किसी को ब्रह्म, किसी को बालक आदि रूपों में दिखाई दिये। यह आश्चर्य की बात नहीं है। हर आदमी, हर वस्तु को अपनी भावना के अनुरूप देखता है।

महर्षि दत्तात्रेय ने जब अपनी दोष−दृष्टि त्याग कर श्रेष्ठता ढूँढ़ने वाली वृत्ति जागृत कर ली, तो उन्हें चील, कुत्ते, मकड़ी, मछली आदि तुच्छ प्राणी भी गुणों के भाण्डागार दिखाई पड़ने लगे वे उन्हीं को अपना गुरु बनाते गये और उनसे शिक्षा ग्रहण करते गये। हम चाहें तो चोरों से भी सावधानी, सतर्कता, साहस आदि अनेक गुणों को सीख सकते हैं। वे इस दृष्टि से हम से कहीं आगे होते हैं। पाप की उपेक्षा कर पुण्य को तलाश करने का यदि हमारा स्वभाव बन जाये तो इस संसार में हमें सर्वत्र आनन्द की आनन्द झरता दीखने लगे। सारी दुनिया हमारे लिये उपकार, सहयोग, स्नेह और सद्भावना का उपहार लिए खड़ी है। पर हम उसे देख कहाँ पाते हैं, मन की मलीनता तो हमें केवल दुर्गन्ध सूँघने ओर गन्दगी ढूँढ़ने के लिए ही विवश किये रहती हैं।

सारे संसार को अपनी इच्छानुकूल बना लेना कठिन हैं। क्योंकि यह ईश्वर का बनाया हुआ है और अपनी इस कृति को वही बदल सकता है। इसी प्रकार मनुष्य भी अपनी बनाई हुई निजी दुनिया को बदल सकता है। यदि यह दृष्टिकोण बदल लिया जाय तो अपनी दुनिया फिर अनोखी ही बनती है और जीवन में आनन्द और सन्तोष की मंगलमय अनुभूतियाँ उपलब्ध होती रहती हैं।

ईर्ष्या एक अनैतिक गुण है। जिसके मन में इसका समावेश हो जाता है उसकी प्रगति के सभी द्वार बन्द हो जाते हैं। हर किसी को बुरा बताना, सब में दोष निकालना और उन्हें अपना शत्रु मानना बड़ा अवगुण है। जिसके कारण अपने भी विराने हो जाते हैं। जो लोग प्यार करते थे, सहयोग देते थे वे भी उदासीन, असन्तुष्ट और प्रति पक्षी बन जाते हैं।

आलसी और छिद्रान्वेषी और ईर्ष्यालु मनुष्य के लिये यह संसार नरक के अतिरिक्त कुछ नहीं है। पापी और दुराचारी, चोर और व्यभिचारी की न लोक में प्रतिष्ठा है और न परलोक में स्थान। यह ईर्ष्या रूपी पिशाचिनी भीतर ही भीतर कलेजे को चाटती रहती है और उन्नति तथा प्रगति के सभी द्वार बन्द कर देती है।

सामाजिक प्राणि होते हुए आपका निर्वाह समान से दूर रहकर नहीं हो सकता। ईर्ष्या बाधकत्व के दायरे में आबद्ध करती है, अतः याद रखिये कि ईर्ष्या से हम दूसरों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते, बल्कि स्वयं ही अपनी हानि करते हैं। समाज में रहकर दूसरों से अच्छे सम्बन्ध जोड़िये और अपने आपको उनका शुभ−चिन्तक बनाइये।

आग जहाँ रक्खी जाती है पहले उसी जगह को जलाती है। ईर्ष्या से दूसरों का कितना अहित किया जा सकता है, यह अनिश्चित है, पर यह पूर्ण निश्चित है कि कुढ़न के कारण अपना शरीर और मस्तिष्क विकृत होता रहेगा जिससे अपना स्वास्थ्य एवं मानसिक सन्तुलन धीरे−धीरे घटने लगेगा।

अभी तक किसी महापुरुष के जीवन में कोई ऐसा उदाहरण नहीं मिला, जहाँ घृणा, द्वेष, परदोष−दर्शन तथा प्रतिशोध के द्वारा किसी मंगल कार्य की सिद्धि हुई हो।

दूसरों के दोष देखने ही हो तो घृणा की अपेक्षा सुधार की दृष्टि से देखने चाहिए। डाक्टर जिस दृष्टि से रोगी का निरीक्षण करता है और बिना किसी घृणा, द्वेष के उसे कष्ट मुक्त करने के प्रयास में निरत होता है, वही दृष्टिकोण हमारा भी रहना चाहिए। उपयुक्त तो यही है कि हम अपनी सारी चेतना को आत्मा−निरीक्षण और आत्म−सुधार पर केन्द्रित करें।


स्वच्छ जलवायु के बिना स्वास्थ्य रक्षा सम्भव नहीं

परिपुष्ट शरीर और दीर्घजीवन की आकाँक्षा करने वालों को अपना आहार−बिहार प्रकृति की प्रेरणा के अनुरूप बनाना चाहिए। विलासी और कृत्रिम जीवन सरल भले ही लगता हो, पर उसके साथ परोक्ष रूप से अनेकानेक दुष्परिणाम जुड़े हुए हैं। प्रकृति से प्रतिरोध करके विकृत जीवन पद्धति अपनाकर हम अपने चातुर्य का परिचय देते तो हैं, पर यह भूल जाते हैं कि अप्राकृतिक रीति−नीति अपनाकर अन्ततः हम अपने ही पैरों कुल्हाड़ी मारते हैं। प्रकृति की नियम शृंखला को झुठला कर मनमर्जी का रहन−सहन अपनाने की उच्छृंखलता बरतना अन्ततः मूर्खता पूर्ण ही सिद्ध होती हैं। हम प्रकृति को परास्त नहीं कर सकते।

सुकरात को 65 वर्ष की आयु में विष दिया गया तब उसका स्वास्थ्य पूर्णतया सुगठित था। उनका विद्यालय खुले मैदान में चलता था। ढलती आयु में भी वे नित्य नृत्य करते और अपने शिष्यों को पढ़ने के अतिरिक्त विनोदी और श्रमनिष्ठ दिनचर्या बनाने की प्रेरणा देते थे ताकि वे न केवल विद्वान वरन् सुदृढ़ और समर्थ भी बन सके।

आहार−बिहार के साथ−साथ हमें उपयुक्त वातावरण में रहने का प्रयत्न करना चाहिए। शहरी जीवन का दूषित वातावरण, धन उपार्जन तथा दूसरे लाभों की दृष्टि से भले ही अच्छा लगे पर स्वास्थ्य संरक्षण की दृष्टि से ही हमें स्वच्छ जलवायु का सह्य तापमान का वातावरण ही चाहिए। अवाँछनीय वातावरण में रहकर हम अपनी स्वास्थ्य सम्पदा को सुरक्षित नहीं रख सकते।

भारत के महान वैज्ञानिक डा0 सी0 बी0 रमन ने जल की जीवनदायिनी शक्ति का वर्णन करते हुए लिखा है−आरोग्य के लिए लोग तरह−तरह की दवाएँ तो खोजते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि उनके निकट ही वास्तविक जीवनदाता ‘जल’ प्रचुर परिमाण में भरा पड़ा हैं।

शरीर का तापमान 98 डिग्री होता है। डाक्टर वाल्डविन के अनुसार उसे 68 डिग्री तापमान सह्य पड़ता है। इससे ऊँचे एवं नीचे में उसके निर्वाह में कठिनाई पड़ती है और विकृति उत्पन्न होती है।

डा0 ल्यूसीन ब्रूहा के नेतृत्व में तापमान के मानव शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव के सम्बन्ध में जो अनुसन्धान किया गया उसमें विभिन्न कारखानों में 40 से लेकर 52 डिग्री तक तापमान रखकर श्रमिकों की कार्य शक्ति के बारे में पता लगाया गया तो निष्कर्ष यह निकला कि अधिक ताप ने सामान्य श्रम का औसत 11 के अंक से घटाकर 8 पर पहुँचा दिया अर्थात् लगभग एक चौथाई क्षमता कम हो गई।

वस्तुएँ अपने आप नहीं सड़ती। वायुमण्डल का प्रभाव उन्हें सड़ाता है। जहाँ की जलवायु सड़न उत्पन्न करने में सहायता नहीं करती वहाँ चीजें मुद्दतों तक यथावत् सुरक्षित बनी रहती हैं। दक्षिण अफ्रीका के समीप एक छोटा द्वीप है− ‘इचामोई’ यहाँ पहुँचने पर प्रायः 150 वर्ष पूर्व मरे मुर्दे ऐसी स्थिति में पाये गये, मानो वे अभी−अभी मरे हों। इस द्वीप की मिट्टी में मरी मछलियाँ भरी पड़ी हैं उनके द्वारा उठने वाली गैसें सड़न को रोकती है। मैक्सिको का एक पर्वतीय क्षेत्र ‘नोयान जुमाटो’ इन विशेषता के लिए प्रसिद्ध है कि वहाँ की विचित्र हवा के कारण न तो कोई वस्तु सूखती है और न सड़ती हैं। इस क्षेत्र के रहने वाले अपने मृतकों को कपड़े पहनाकर पहाड़ी गुफाओं से बिठा देते हैं और वे मुद्दतों तो ऐसे ही समाधि लगाये सन्तों की तरह बैठे रहते हैं।

अफ्रीका के अंकोला क्षेत्र का एक भाग ऐसा है जहाँ बनाया हुआ भोजन बहुत समय तक खराब नहीं होता। वहाँ के लोग एकबार भोजन बनाकर रख लेते हैं और उससे महीनों काम चलाते हैं।

ध्रुव प्रदेश इस दृष्टि से ओर भी अधिक आश्चर्यजनक है। इंग्लैंड का एक अन्वेषक दल दक्षिणी ध्रुव सम्बन्धी शोध करने के लिए सन् 1842 में कैप्टन कौस के नेतृत्व में गया था। मौसम की प्रतिकूलता के कारण उसे वापिस लौटना पड़ा। इस दल का एक तम्बू और उसमें कुछ खाद्य पदार्थ वहीं छूट गये। सन् 1911 में नार्वे के अन्वेषी रोल्ड एमण्डसन जब वहाँ गये तो 71 वर्ष बाद भी वे वस्तुएँ पूर्णतया सुरक्षित और उपयोग के लायक पाई गई।

अमेरिका का एक पर्वतारोही विल्सन एवरेस्ट की चोटी पर चढ़ाई करने सन् 1934 में आया था। लक्ष्य तक पहुँचने से पूर्व ही वह रास्ते में ठण्ड से अकड़ कर मर गया। दूसरे साल एक दूसरा अन्वेषक दल एरिक सिम्पटन के नेतृत्व में उधर पहुँचा तो उसे पूर्ववर्ती यात्री का शव पूर्णतया सुरक्षित मिल गया।

आर्कटिक हिमक्षेत्र में प्रागैतिहासिक काल के कितने दुर्लभ प्राणी गढ़े हुए पाये गये है। इनमें दो हजार वर्ष पूर्व मरे एक वेरेसोविका जाति का यहाँ गज भी था जिसका माँस इस स्थिति में बना हुआ था कि उसे खाया जा सके। रूस के शोधकर्ताओं ने पाँच हजार वर्ष पुराना एक सरीसृप हिम प्रदेश में इस स्थिति में पाया कि उसका शवच्छेद करके उस प्राणी की शरीर रचना को भली प्रकार जाना जा सका।

सह्य सुखद एवं उपयुक्त वातावरण में न केवल शरीर ही स्वस्थ रहता है वरन् पेड़−पौधे तक अधिक विकसित होते और फलते−फूलते हैं।

उत्तर प्रदेश में पंत नगर स्थित कृषि विश्व−विद्यालय से प्रकाशित ‘फारमर्स डाइजेस्ट’ पत्र में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि वहाँ की खोजों से यह सफलता मिल गई है कि हवा में आक्सीजन की मात्रा घटाकर पौधों को दुगुनी तेजी से उगाया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण खोज स्टेनफोर्ड कैलीफोर्निया की कारोनगी संस्था के सहयोग से सफल हो सकी हैं।

सामान्यतया वातावरण में ऑक्सीजन की मात्रा 21 प्रतिशत होती है। उसे घटाकर 5 से 9 प्रतिशत कर दिया गया तो पौधे दूनी तेजी से उगे और फल−फूल देने में आश्चर्यजनक जल्दी सम्भव हो सकी।

यों अधिक ठण्ड भी उपयोगी नहीं, पर अधिक गर्मी का वातावरण भी स्वास्थ्य की दृष्टि से अनुकूल नहीं पड़ता। बड़े आदमी हीटर, कूलर और एयर−कंडीशन यन्त्रों का उपयोग करके कृत्रिम रूप में सह्य वातावरण बनाने का प्रयत्न करते हैं फिर भी उसमें प्रकृति−प्रदत्त, समस्वरता और जीवनदायिनी शक्ति कहाँ रहती है?

यदि हम सचमुच जिन्दगी से प्यार करते हों और स्वास्थ्य सम्पदा के मूल्य से परिचित हों तो धनी या बड़े आदमी बनने का लोभ छोड़कर हमें सह्य और स्वच्छ जलवायु का देहाती जीवन अपनाना चाहिए।


दूसरों को मरते देखकर डर के मारे−स्वयं ही मर गये हैं (kahani)

एकबार यमराज ने मृत्यु को बुलाकर एक हजार मनुष्य अमुक क्षेत्र में से मार लाने के लिए आदेश दिया।

मृत्यु ने वह कार्य तुर्त−फुर्त पूरा करने के लिए हैजा, प्लेग जैसे दूतों को भेज दिया। दूतों ने अपना काम मुस्तैदी से किया और कुछ ही समय में दो हजार मनुष्य मार कर यमराज के सामने प्रस्तुत कर दिये।

कार्य जल्दी पूरा हुआ इस पर तो यमराज ने प्रसन्नता व्यक्त की, पर साथ ही आश्चर्य से यह भी पूछा कि जब एक हजार मृतकों की आवश्यकता थी तो दो हजार का प्राण हरण क्यों किया गया?

दूतों ने निश्चित स्वर में कहा−देव, हमने गिनकर एक हजार ही मारे है। शेष तो दूसरों को मरते देखकर डर के मारे−स्वयं ही मर गये हैं और पीछे−पीछे खुद ही साथ चले आये हैं।


सम्पत्ति की खोज में जल−थल और नभ का मानवी मंथन

धरती की खोज भी अभी जारी है और वह तलाशा जा रहा है कि भू−गर्भ की−सम्पत्ति को कहाँ तक और किस हद तक मनुष्य की सुख−सुविधा के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। धरती की ऊपरी सतह वनस्पतियाँ उगाने एवं मिट्टी, पत्थरों के अनुदानों तक सीमित हैं। मूल्यवान धातुएँ, रसायन, तेल, गैस, कोयला आदि गहराई में उतरने पर निकलते हैं। इसलिए भूतल की मोटी जानकारियाँ प्राप्त कर लेने के उपरांत अधिक ध्यान इस ओर दिया जा रहा है कि भू−गर्भ में दबी सम्पदा को उखाड़ कर ऊपर लाया जाय और उससे मानवी समृद्धि का भण्डार बढ़ाया जाय।

मनुष्य की क्षुधा बहुत अधिक है धरती की सम्पत्ति उसकी तुलना कम पड़ती हैं। इसलिए समुद्र की खोज गहराई तक की जा रही है। समुद्र मंथन द्वारा 14 रत्न प्राप्त करने के लिए विज्ञान अब फिर तुल गया है। अनुमान है कि जो कुछ धरती पर है उससे बहुत अधिक समुद्र में है। कुछ समय पहले तक नौकानयन और मत्स्यचयन के दो ही काम समुद्र से लिये जाते थे अब खाद्य, धातुएँ, रसायन, निवास आदि अनेक प्रयोजनों के लिए समुद्र को टटोलने, खोजने, खखोरने का निश्चय किया गया है। यह कार्य पिछले दिनों जिस उत्साह और संकल्प के साथ आरम्भ किया गया था अब उसमें और भी अधिक वृद्धि कर दी गई हैं।

25 अगस्त 1934 का दिन समुद्री शोध के इतिहास में एक अविस्मरणीय दिन माना जायगा। उस दिन वरमूधा द्वीप के नाँसच बन्दरगाह के समीप खड़े एक जलयान से हो वैज्ञानिक समुद्र−तल में उतरे और महत्वपूर्ण दृश्य आँखों देखकर आये। यह वैज्ञानिक थे, डाक्टर बीच और डाक्टर र्टन। उनका वाहन एक दस फुट ऊँचा और प्रायः उतना लम्बा−चौड़ा फौलाद का बना सन्दूक था जिसमें पारदर्शी खिड़कियां लगी थीं। इसके भीतर ऑक्सीजन की तुम्बियाँ, कैमरा, टेलीफोन, बिजली के उपकरण थे। यह सन्दूक जहाज पर लोहे की रस्सी से बँधा था और मशीनों द्वारा नीचे उतारा जा रहा था। वे लोग 3028 फुट गहराई तक नीचे उतरे और जो कुछ उन्होंने समुद्र के गर्भ में देखा उसे टेलीफोन से सुनाया इस टेलीफोन संवाद को लाउडस्पीकरों द्वारा उत्सुक जनता को सुनाया जाता रहा।

यह आँखों देखा हाल प्रायः उसी ज्ञान की पुष्टि करना था जो पिछले ज्ञान को अन्यान्य शोध उपकरणों से जाना गया था और यह सब कुछ आँखों देखे हाल समाचार की तरह मुँह से बोलकर सुनाया जा रहा था।

इस डुबकी में अद्भुत बात एक ही थी, समुद्री जीवों में से अनेकों ऐसे थे जिनके शरीर से बड़ी चमकदार प्रकाश किरणें निकलतीं थीं और उस घने अन्धकार में चलते हुए बिजली के बल्बों की तरह भ्रमण करती थीं। कुछ मछलियां तो कई प्रकार के रंगों की आभा फैलाती थीं। आग उगलने वाली, बिजली के झटके देने वाली, रोशनी फैलाने वाली और तरह−तरह की रंगी−बिरंगी आभा बखेरने वाली इन मछलियों को देखकर ऐसा लगता था, मानो सघन अन्धकार में आकाश के नक्षत्रों की तरह कुछ जल−जन्तु प्रकाश की आवश्यकता पूर्ण करते हुए विचरण कर रहे हैं।

समुद्र द्वारा अपने उदर में निगल लिये गये टिटहरी के अण्डों की कथा सर्वविदित है। टिटहरी ने समुद्र से लड़ाई मोल ली थी, अपनी चोंच में भरकर समुद्र में मिट्टी डालना और उसे सुखा कर अपने अण्डे वापिस लाने का दृढ़ संकल्प आखिर सफल ही हुआ था। अगस्त मुनि से उसके न्यायोचित संकल्प को पूरा करने में सहायता की थी यह पुराण गाथा सर्वविदित है।

उसी प्रयत्न की पुनरावृत्ति हमारे दुस्साहसी समुद्र शोधक कर रहे हैं। उन्होंने निश्चय किया है कि समुद्र ने जो कुछ धरती की सम्पादक उदरस्थ की है उसे वे उगलवा कर रहेंगे। इस संदर्भ में फिलहाल दो कार्यक्रम हाथ में लिये गये हैं−एक यह कि समुद्र के गर्भ में किसी समय के जो सुन्दर नगर, द्वीप और भूखण्ड डूबे पड़े हैं उनकी सांस्कृतिक सम्पदा को−धन सम्पत्ति को तलाश करके बाहर लाया जाय ताकि उन परिस्थितियों का पता लगाया जा सके जिनके कारण इन भूखण्डों को समुद्र ने निगला। इसके अतिरिक्त पुरातन इतिहास की एक कड़ी भी इस खोज में जुड़ सकती हैं। साथ ही जो सम्पदा वहाँ दबी पड़ी है उसे भी मनुष्य के उपभोग के लिए प्रस्तुत किया जा सकेगा।

दूसरा चरण समुद्र के गर्भ के डूबे हुए जहाजों को खोज निकालना है। पुराने जहाज निर्माण वस्तुकला−डूबने से समुद्र की दुर्दान्त हलचलें ओर उनका सामना न कर सकने की इन यानों को दुर्बलता भी इस प्रयास में खोजी जा सकेगी। जहाज अवश्य ही कुछ न कुछ सम्पत्ति लेकर डूबे होंगे और उसमें से कम से कम बहुमूल्य धातुएँ तो अभी भी उपयोग के लायक होंगी। इन सब उपलब्धियों के लिए समुद्र तल को मँझारा जा रहा है। इसके लिए सुव्यवस्थित अभियान देर से चल रहा है। पुरातत्त्ववेत्ता राबर्ट एफ॰ मार्क्स ने इस मिशन के लिए अपना पूरा जीवन ही लगा दिया। यह दुस्साहसी गोताखोर अपनी छोटी पनडुब्बी यू0 एस॰ एस॰ मार्नटर में निर्वाह तथा खोज के लिए आवश्यक सामग्री लेकर संसार के प्रमुख समुद्रों की खोज प्राण हथेली पर रखकर करता रहा। उसकी खोज बेकार नहीं गई वरन् बहुत कुछ ऐसा उसने खोज निकाला जिसके लिए संसार भर में उसके प्रशंसा हुई। सन् 1957 अखबारों में सर्वत्र उसकी साहस पूर्ण खोजों के सम्बन्ध में लम्बे विवरण प्रकाशित हुए थे।

मार्क्स ने “पोर्ट रायल” नामक अत्यन्त सुरम्य ब्रिटिश द्वीप को खोज निकाला। इसकी कला और सम्पत्ति किसी समय इतनी बड़ी−चढ़ी थी कि अंग्रेज उस पर गर्व करते थे। 7 जून 1672 में एक भयंकर भूकम्प और तूफान आया जिसके कारण धरती धँसकी और वह द्वीप समुद्र के गर्त में चला गया। तब से उसकी गहराई में प्रवेश करने की न किसी ने हिम्मत की और न आवश्यकता समझी। मार्क्स ने गोताखोरी के साधन जुटाकर वह सामग्री प्रस्तुत की हैं जिससे उस समय के कला−कौशल सभ्यता स्तर का पता चलता है और उन परिस्थितियों पर प्रकाश पड़ता है जो उसे डुबो देने का कारण थीं।

इसी प्रकार मार्क्स ने डूबे हुए दो स्पेनिश जहाज के कंकालों को समुद्री कब्रिस्तान में से उखाड़ कर उनकी पूरी तरह खाना तलाशी लेली हैं। इनमें से एक जहाज ‘अवर लेडी आफ दि मीराकल’ सन् 1741 में मैक्सिको की खाड़ी में डूबा था। दूसरा यूकाटन की खाड़ी में। इनका सामान ऊपर लाने में पूरे तीन वर्ष तक लगातार प्रयत्न किया गया। इस दुस्साहस पर टिप्पणी करते हुए, वाशिंगटन की एक शोध संस्था स्मिथ सोनियन इन्स्टीट्यूट ने कहा था− “अब तक के समुद्रीय पुरातत्व अन्वेषण में मार्क्स के प्रयत्न अद्भुत हैं।”

यह श्रेय धुन के धनी मार्क्स ने सहज ही प्राप्त नहीं कर लिया वरन् हर घड़ी उसे भयानक खतरों से जूझना पड़ा है। उसने अपने कुछ संस्मरणों में दिल दहलाने वाली घटनाओं का उल्लेख किया है।

“पोर्ट रायल के निकटवर्ती समुद्र का पानी बहुत गन्दला है। दो−तीन इंच से आगे की कोई चीज उसमें नहीं देखी जा सकती। झुण्ड बनाकर घूमने वाली भयंकर जेली मछलियों का पता तब चलता है जब वे मात्र दो−तीन इंच दूर रह जाती हैं। इसके अतिरिक्त अन्य जल−पिशाच भी बड़ी मात्रा में और चित्र−विचित्र आकृतियों में घूमते रहते हैं जिनकी पकड़ में आने के बाद फिर किसी का बच निकालना कदाचित ही सम्भव हो सकता है। शार्क मछली हमला कर बैठे तो फिर समझना चाहिए कि गोताखोर का ढेर हो गया। ऐसे खतरनाक समुद्रों में देर तक लेने के लिए ऑक्सीजन के बड़े−बड़े थैले ले जाने पड़ते थे वह तरीका काफी सिर−दर्दी का था इसलिए नया एक्वानाट यन्त्र बनाया गया। जिसमें ऑक्सीजन के थैले समुद्र सतह पर तैरते रहने और नली द्वारा गोताखोर तक हवा पहुँचाने की सुविधा बन सकी। अन्य यन्त्र भी ऊपर हैं रह इससे हलका फुलका गोताखोर अधिक तेजी और चुस्ती−फुर्ती के साथ अपना काम करते रहने में समर्थ सके। ऐसे−ऐसे कई अनोखे आविष्कार मार्क्स पर रहा और अत्यन्त कष्टमय एवं खतरे से भरी जिंदगी जीकर वह मनुष्य जाति की ज्ञान शृंखला में एक नई कड़ी जोड़ने के लिए अनवरत प्रयत्न करता रहा।

संसार के सभी समुद्रों में सबसे गहरी खाइयाँ पाँच गिनी गई हैं। इनकी गहराई 6000 मीटर तक है। गहराई में पानी का दबाव बहुत बढ़ जाता है। एक वर्ग सेंटीमीटर पर यह दबाव लगभग एक टन होता है। इतना दबाव सामान्य प्राणी सहन नहीं कर सकते। इतने पर भी इन गहरी खाइयों में लगभग 150 जातियों के जल जीव निवास करते हैं और आसानी से निर्वाह करते हुए अपन वंश वृद्धि क्रम चलाते हैं। इन जीवों की रीढ़ की हड्डी नहीं होती। घोर अन्धेरे में रहने के कारण उनकी आँखें भी नहीं होतीं। दबाव को सहन करने योग्य उनके शरीर है। सामान्य जल−जीवों की तुलना में वे पाँच गुने बड़े हैं। पृथ्वी पर वायुमंडल का दबाव घटने−बढ़ने से जीवधारियों के शरीर बड़े या छोटे होते हैं इस तथ्य की नई जानकारी समुद्र तल से मिली है और सोचा जा रहा है कि यदि प्राणियों की नस्लें छोटी या बड़ी बनानी हों तो इसके लिए वायु का कृत्रिम दबाव उत्पन्न करके वैसा किया जा सकता है। धरती पर रहने वाले पशुओं की तरह जलचरों से न केवल माँस कर वरन् और भी कई प्रकार के सहयोग लेने का रास्ता ढूँढ़ लिया गया है। समुद्र की तली खोदकर बहुमूल्य खदानें निकाली जानी हैं और पानी को उबाल, छानकर सम्पत्ति का बहुत बड़ा भण्डार किस प्रकार उपलब्ध किया जाय यह तैयारी बहुत हद तक पूरी कर ली गई है।

भविष्य में जो युद्ध लड़े जायेंगे उनका प्रधान क्षेत्र थल नहीं जल होगा। जल में छिपी हुई पनडुब्बियाँ उतनी आसानी से देखी−जानी नहीं जा सकतीं जितनी कि थल पर की सेनाएँ अथवा फैक्ट्रियां। आणविक मिसाइलें 2500 मील तक की मार करने वाली बनाई गई है वे अब वायुयानों पर नहीं पनडुब्बियों पर ही लाद दी गई हैं।

वर्तमान अन्तर्राष्ट्रीय परम्परा यह है कि किसी देश का निकटवर्ती 12 मील का क्षेत्र उस देश के अधिकार में माना जाता है। इसके आगे का क्षेत्र प्रत्येक देश के लिए समान रूप से खुला है। इसके अतिरिक्त यह भी अन्तर्राष्ट्रीय परम्परा है कि 200 मीटर से अधिक गहराई पर पाई जाने वाली खनिज सामग्रियाँ को कोई भी साधन सम्पन्न देश निकाल सकता है। इन्हीं सुविधाओं का लाभ उठा कर रूसी और जापानी मच्छीमार जहाज जहाँ भी ‘माल’ देखते हैं वहीं उसे समेटने के लिए जा पहुँचते हैं। अब अगले दिनों धरती की तरह ही सारे समुद्र का भी बँटवारा किया जाना है जिस पर अमुक देश अपना अधिकार जमा सके और उसका अपनी पृथ्वी की तरह ही दोहन कर सके।

धरती माता का दोहन मनुष्य हजारों लाखों वर्षों से करता चला आ रहा है। समुद्र पिता को अब खटखटाया जा रहा है। अन्तरिक्ष गुरु की भी झोली, झोंपड़ी टटोलने के लिए राकेटों, उपग्रहों के जासूस कमर कसकर जुट गये है। थल, जल और नभ में जो कुछ भी सम्पदाएँ छिपी पड़ी हैं उन सबको उदरस्थ करतलगत करने के लिए मनुष्य की तृष्णा आकुल−व्याकुल हो रही है। अतृप्ति को तृप्त करने के लिए ब्रह्माण्ड का कोना−कोना मंझार लेने की तैयारी पूरे जोश−खरोश के साथ चल रही है।

यों मनुष्य तुच्छ−सा प्राणी है−उसकी आवश्यकताएँ भी नगण्य और स्वल्प प्रयास से सहज पूरी हो सकने जितनी है। किन्तु तृष्णा की सुरसा का फैलता हुआ मुख प्रयत्न पुरुषार्थ के हनुमान से बड़ा ही रहेगा। अतृप्ति को तृप्त किया जा सकेगा इसमें पूरा सन्देह है। पौराणिक रावण, हिरण्याक्ष और ऐतिहासिक सिकन्दर, नैपोलियन, अपने को दरिद्र, कंगाल अनुभव करते हुए चले गये तो आज का लिप्साग्रस्त विज्ञानी मानव सन्तोष की कोई झाँकी प्राप्त कर सकेगा इसमें पूरा सन्देह हैं।

तृप्ति दे सकने लायक विभूतियों की खदान मनुष्य के अन्तरंग में है। अन्तर्मुखी होकर यदि वहाँ कुछ ढूँढ़ा, खोजा गया होता तो इतना अधिक मिल सकता था जितना धरती, समुद्र और आकाश तीनों में मिलाकर नहीं है। यदि प्रयास अन्तःकरण को खोजने में लगे होते तो इतनी विभूतियाँ मिल सकती थीं जिन्हें पाकर हममें से हर मनुष्य इन्द्र−कुबेर से बढ़कर अपने को सुसंपन्न अनुभव करता।


दूध पीना ही हो तो केवल गाय का पियें

अमेरिकन एकेडेमी आफ जनरल प्रेक्टिस के नेशनल आफीसर डाक्टर और फ्लोरिज (अमेरिका) के ख्याति नामा डाक्टर वाल्टर डबल्यू साकेट का कथन है कि आदमी जिन फिजूल बातों में उलझ गया है उनमें एक यह भी है कि दूध और उससे बने पदार्थों को आवश्यक मानकर पेट में ठूँसते रहना। उनने अपनी पुस्तक “ब्रिगिंग आफ बेवीज” में लिखा है कि दूध बेशक एक महत्वपूर्ण पदार्थ है। उसमें सब तो नहीं, पर बहुत सारे पोषक पदार्थ मिलते हैं। पर वह उपयुक्त केवल बच्चों के लिए ही हैं। “दूध एक पूर्ण भोज्य पदार्थ है।” इस मान्यता का मैं तभी समर्थन करूंगा जब उसमें ‘केवल शिशुओं के लिए’ शब्द और जोड़ दिया जाय। वे कहते हैं चुहिया से लेकर हाथी तब तक सभी प्राणियों के बच्चे ही दूध पर रहते हैं और बड़े होकर सब दाँतों से कुतरी जाने वाली खुराक पर निर्भर रहते हैं तो वही बात मनुष्य पर क्यों लागू नहीं होनी चाहिए।

दूध के सम्बन्ध में विरुद्ध विचार रखने वालों में डा0 साकेट अकेले नहीं हैं उनके मत का समर्थन संसार के अन्यान्य स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी किया है। न्यूयार्क सिटी हैल्थ डिपार्टमेन्ट ब्यूरो आफ न्यूट्रिशन के अधिकारी डा0 नार्मन जोलिफ ने कहा है मनुष्य को अधिकाधिक तीस प्रतिशत ही वसा ऊर्जा प्राप्त करनी चाहिए और वह हमारे शाकाहारी भोजन से सहज ही प्राप्त हो जाती है। दूध अथवा माँस, मछली की आवश्यकता मनुष्य को बिलकुल भी नहीं हैं।

अमेरिकन मेडिकल ऐसोसिएशन के अधिवेशन में कनाडा के प्रतिनिधि डाक्टर हान्स सिलाई ने बताया कि उनके परीक्षणों में यह निष्कर्ष सामने आया है कि कैल्शियम की अनावश्यक मात्रा ग्रहण करने वाले लोगों को समय से पहले बुढ़ापा आ घेरता है। दूध में कैल्शियम की बहुलता है यदि उसके सेवन में अनावश्यक उत्साह दिखाने वाले अपना यौवन समय में पहले गँवा बैठते हैं। उनने छोटे बालकों को बाहरी दूध की अपेक्षा फलों के रस पर पालने की सलाह देकर अपने संरक्षण में कितने ही बालकों को उनकी अपेक्षा देकर अपने संरक्षण में कितने ही बालकों को उनकी अपेक्षा अधिक स्वस्थ बनाया जिनको बाहरी दूध पर पाला गया था। उन्होंने गर्भिणी महिलाओं को भी दूध के स्थान पर फलों का रस लेने की ही सलाहें दी है और इसका अधिक अच्छा परिणाम देखा है।

अपने देश में दूध का उत्पादन ही बहुत कम हैं। दुबले दुधारू पशु बहुत थोड़ा दूध देते हैं और उनमें से अधिकाँश भरी जवानी में ही कसाई के घर चले जाते हैं। गरीबी के कारण इन दिनों तो लोग इतना महंगा दूध खरीद भी नहीं पाते। जो खरीद सकते हैं उन्हें पानी अरारोट आदि न जाने क्यों मिला सफेद पानी मिलना है। ऐसी दशा में दूध का मोह छोड़ा भी जा सकता है। यदि खरीदना और पीना ही हो तो गाय के दूध को ही प्रमुखता देनी चाहिए।

गोदुग्ध में ए. बी. सी. डी. ई. वर्ग के विटामिन समुचित मात्रा में विद्यमान हैं, जबकि भैंस के दूध में वे बहुत ही कम पाये जाते हैं। उसमें कैरोटिन तत्व न रहने से एक कठिनाई यह भी रहती है कि वे जल्दी ही नष्ट हो जाते हैं। गोदुग्ध में जो पीलापन पाया जाता है वह उसकी अति महत्वपूर्ण रासायनिक विशेषता है।

गोदुग्ध में प्रोटीन 3.3 वसा 3.6 शकर 4.9 और क्षार 7.75 प्रतिशत होते हैं उसके प्रोटीन को तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है। (1) एलब्यूमिन (2) केसिन (3) लैक्टोगलो व्यूमेन। यह तीनों ही मानव शरीर की महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। संसार के विविध पदार्थों में पाये जाने वाले प्रोटीनों में गोदुग्ध का प्रोटीन सर्वोत्तम माना गया है उसमें जो एमिनोएसिड पाये जाते हैं वैसा संतुलित स्तर अन्यत्र कहीं नहीं पाया जाता है।

इस दृष्टि से उपयोगिता केवल गोदुग्ध की है। भैंस का पीने की अपेक्षा तो सोयाबीन पानी में पीसकर उसका सफेद पानी दूध के स्थान पर काम में लेना अधिक सस्ता ओर अधिक उपयोगी है।


अपव्यय की आदत जीवन को नरक बनाती है।

धन कमाने का मुख्य उद्देश्य जीवनयापन की हमारी दैनिक एवं मूल आवश्यकताओं की पूर्ति करना माना गया है। जो लोग धन को परिश्रम से कमाते हैं वे उसका महत्व समझते हैं। जो धन को धन के लिये कमाते हैं और उसका उपयोग हमारी मानसिक, शारीरिक और आत्मिक प्रगति करने वाले कार्यों में नहीं करते वे अपने वास्तविक मार्ग से भटक जाते हैं।

हमारे देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं जो मितव्ययिता का अर्थ समझते हों। धन के सदुपयोग के बजाय हमने उसकी उपयोगिता झूठी शान−शौकत, दिखावे, फैशन परस्ती एवं दुर्व्यसनों की पूर्ति में समझ ली है। केवल अमीर ही नहीं, गरीब भी अपनी शान−शौकत के दिखावे के लिये मितव्ययिता का मूल मन्त्र नहीं अपनाता और अनेक कष्टों का सामना जीवन भर करता रहता है।

मितव्ययिता का जीवन में बड़ा महत्व है। यह अपने आप में एक गुण है। जो लोग इसके महत्व को नहीं समझते और उसकी शक्ति से अपरिचित होते हैं वे हमेशा आर्थिक कठिनाइयों में फँसे रहते हैं, साथ ही परिवार की उन्नति हर तरह से रोक देते हैं।

जिसने भी जीवन की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये धन का उपयोग किया है, अपव्यय नहीं किया है, उसका जीवन सुखी ही रहा है दुःखी नहीं। सुख पैसा नहीं देता बल्कि उसका सदुपयोग हमारे सुख का कारण होता है। हजार आठ सौ रुपये पाने वाला व्यक्ति एक 70-80 रुपये पाने वाले व्यक्ति की तुलना में हाथ फैलाते दिख सकता है अगर उसने पैसे को सही ढंग से खर्च नहीं किया है। विवेकानन्द के पता की फिजूल खर्ची की आदत का परिणाम परिवार को भोगना पड़ा इसके विपरीत संसार में बड़े−बड़े विद्वान एवं विचारवान पुरुषों के जीवन से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सादा जीवन उच्च विचार ने उन्हें महान बनाया। वे महान मितव्ययी थे। जिसके कारण आर्थिक दुख नाम की चीज उनके जीवन में न रही।

सत्य यह है कि हमने उचित एवं अनुचित खर्च पर विचार न कर, दिखावट, फैशन, सिनेमा, सिगरेट, शराब आदि फिजूलखर्ची की मूर्खता में हम उलझ गये। फिजूल खर्ची एक ऐसा अवगुण है जिससे मनुष्य स्वयं अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता है। इससे लाभ की आशा तो हमें करना ही नहीं चाहिए, उल्टी बुरी आदतों में फँस जाते हैं। अपव्यय कितने भयंकर दुष्परिणाम हमारे जीवन में पैदा कर सकता है इसका बहुत कुछ अनुभव आज हम और हमारा समाज कर रहा है और आगे इससे भी बुरे अनुभव हो सकते हैं अगर हमने अपव्यय को न रोका और मितव्ययिता को न समझा या न अपनाया।

अपव्यय का कारण केवल हमारी अदूरदर्शिता है। धन को हमने झूठी शान−शौकत की पूर्ति का साधन मान लिया। हम इस सीमा तक भी जा सकते हैं कि भले ही हमारे बच्चे भरपेट भोजन के लिये तरसते हों पर हम अपनी शान के लिये, सिनेमा, सिगरेट, शराब आदि दुर्व्यसनों पर अवश्य खर्च करेंगे। यहाँ तक खर्च करेंगे कि हम कर्जदार बन जायेंगे। कर्ज भी वह जिसे आजीवन चुका भी न सकें।

अपव्यय की प्रवृत्ति मनुष्य के थोथेपन, उथलेपन और संकुचित दृष्टिकोण का प्रतीक हैं। वास्तविकता यह है कि जो जितना महान होगा वह उतना ही सजावट और प्रदर्शन जो जितना महान होगा वह उतना ही सजावट और प्रदर्शन के विरुद्ध होगा। हम केवल इस प्रवृत्ति के वशीभूत होकर दूसरे हमें अपने से किसी प्रकार कम न समझें, पैसे को अनाप−शनाप खर्च करते चलते हैं। यह हमारी कभी न खत्म होने वाली अभिलाषा बन जाती है। उसे समय जो हमारी सामर्थ्य में नहीं होता वह भी खर्च करते चलते हैं। समाज में ऐसे अनेक उदाहरण मिलेंगे कि जिनकी ताकत 10-15 रुपये से ज्यादा का पेन्ट या 20-25 रुपये से ज्यादा की साड़ी लेने की नहीं पर वे 40-50 रुपये का पेन्ट, 70-80 रुपये की साड़ी खरीदते हैं। यह केवल दिमाग का दिवालियापन है। यहाँ तक की इस निकम्मी शान के लिये हम कर्जदार बनना भी पसन्द करते हैं।

मिथ्या फैशन के नाम पर समाज में होड़ लगी है। फैशन के नाम पर कितना भी खर्च करने में हम नहीं हिचकिचाते। इसके कारण न जाने कितने लोगों को जीवन निर्वाह की कठिनाइयाँ उठानी पड़ती है। फैशन वालों की पारिवारिक दशा बड़ी दयनीय मिलेगी।

फैशन के व्यसन से आज स्त्री और पुरुष दोनों ही ग्रस्त है। स्त्रियों में फैशन के बढ़ावे के कारण न केवल अपव्यय हो रहा है बल्कि अंग प्रदर्शन फैशन का अंग बन गया है और हमारे नैतिक मूल्यों पर बड़ा गहरा असर पड़ रहा है। परिवार में झगड़े, भाई−भाई में कटुता आदि बुराइयाँ इस धन के लालच और लालसा के कारण पनपती जा रही हैं।

विद्यार्थी वर्ग इससे अछूता नहीं बचा है बल्कि उनमें फैशन और दिखावे की लालसा बड़ी विस्तृत होती जा रही है। माँ−बाप जो अपने बच्चों के फैशन की पूर्ति नहीं कर सकते, उनकी बुरी आदतों की पूर्ति के लिये पैसा नहीं दे सकते वे बच्चों की निगाह में गिरे हुए है या फिर आर्थिक संकट उठा रहे है।

जिस प्रकार फैशन और दुर्व्यसन हमारे अपव्यय का कारण है उसी प्रकार स्त्रियों के आभूषण भी एक नशा है। यह गृह−कलह का एक बड़ा कारण बन गया है। प्रतिस्पर्धा परिवार में शुरू हो जाती हैं।

लालसा जब अपने धन से पूरी न हो तो फिर मनुष्य की प्रवृत्ति दूसरों का धन हड़प करने की होती है जिसके कारण चोरी और बच्चों की हत्यायें तक की जाती हैं।

इस समय हमारे समाज में दहेज प्रथा साथ ही वैवाहिक कुरीतियाँ आदमी को आर्थिक रूप से खोखला किये दे रही हैं। अगर आर्थिक दृष्टि से कमजोर नहीं भी होता है तो भी अमीर लोगों के विवाहों में अनावश्यक खर्चों को देखकर मध्यम वर्ग आपत्ति में पड़ जाता है।

इन सब के बावजूद दान−पुण्य करना दूसरों की सहायता करना प्रशंसनीय अवश्य है पर यदि यह कार्य अपनी सामर्थ्य के बाहर या परिणाम पर बगैर विचार किये करते हैं तो भी आदमी दुःख भोगता है। हानिकारक व्यसन के बारे में भी यही बात हैं कि हम उनके दुष्परिणाम जो हमारे मन पर और शरीर पर हो सकते हैं, उन पर कभी नहीं सोचते ओर उन्हें जीवन में अपनाये चलते हैं।

यह केवल मूढ़ लोगों की दृष्टि होती है जो फैशन,जेवर या व्यसन को बड़प्पन या अमीरी का चिन्ह मान लेते हैं। धन तो अहंकार पैदा करता है। धन संग्रह जब इतना दुःखदायी हो सकता है तो उसका अपव्यय कितना दुःखदायी होता है यह हम से छुपा नहीं हैं।

हम जिस ढंग से इतना ज्यादा पैसा खर्च करते हैं, जिन अनावश्यक बातों के लिये, अगर उनके उचित अनुचित परिणामों पर सन्तुलित रूप से विचार करें और उस अपव्यय को रोक कर उसी पैसे को अच्छे व्यवसाय, काम, शिक्षा या समाज उत्थान के कार्यों में लगायें तो न केवल मुनाफा प्राप्त होगा, हमारी शारीरिक, मानसिक और सामाजिक उन्नति भी हो सकती। दरअसल हम जितनी आवश्यकतायें बढ़ाते हैं, परेशानियाँ उतनी ही बढ़ती जाती हैं और उनकी पूर्ति के लिये उचित अनुचित साधनों का प्रयोग करना पड़ता है। हम प्रत्यक्ष में इसके परिणाम, बेईमानी, घूस, चोरी, हत्या, गृह कलह आदि के रूप में देख रहे हैं।

ऐसे आभूषण पहनने से क्या लाभ जो हमारे शरीर के अंगों को भी कष्ट दें। भारत ने धन के व्यय अपव्यय के अर्थ को गम्भीर दृष्टि से देखा है। हमारे धर्म शास्त्र तक में यह समझाया गया है (यजुर्वेद) कि कभी कर्जदार मत बनो। व्यर्थ कार्य मत करो जिससे कि कर्ज लेना पड़े।

भारतीय संस्कृति इन ओजपूर्ण विचारों से धनवान है। सादगी का जीवन उच्च जीवन हमारे यहाँ बताया गया है। अपव्यय की बात हम अपने पुराणों में नहीं देख पाते बल्कि यही शिक्षा हमें मिलती है कि मितव्ययिता का व्यवहार रखने से हम केवल सुखी एवं सज्जन कहलाने का ही सौभाग्य प्राप्त नहीं करते हैं बल्कि आत्म−गौरव, सादगी और वास्तविकता की अनुभूति भी करते हैं।


अंक और उनका मनुष्य जीवन से सम्बन्ध

अंक सामान्यतया गणित संबंधी कार्यों में प्रयुक्त होते हैं। उनका प्रयोजन उतने ही क्षेत्र में सीमित माना जाता है। किन्तु कभी−कभी ऐसे विलक्षण संयोग सामने आते हैं; जिनसे प्रतीत होता है कि उनका क्रम मनुष्य जीवन को भी प्रभावित करता है। कोई अंक किसी के लिए शुभ और किसी के लिए अशुभ साबित होता है यद्यपि इसका कुछ कारण समझ में नहीं आता। इसी प्रकार घटनाक्रमों की एक जैसी पुनरावृत्ति में कई बार अंकों की अद्भुत पुनरावृत्ति पाई जाती हैं। पंचांग कर्त्ता बताते हैं कि अमुक क्रम से ग्रह−नक्षत्र अपने चक्र में घूम कर यथा स्थान आते रहते हैं और जो पंचाँग उपस्थित होता है।

फिर भी यह तो एक आश्चर्यजनक बात ही है कि कई अंक किसी व्यक्ति विशेष को अच्छे या बुरे आधार लेकर सामने आयें। अंकों के हिसाब से घटनाक्रमों की पुनरावृत्ति भी कई बार ऐसी ही विलक्षण होती है जिन्हें मात्र संयोग न कह कर कुछ रहस्यमय कारण होने की बात सोचनी पड़ती हैं।

कुछ विशेष तिथियाँ न जाने कैसा अज्ञात प्रभाव लेकर आती हैँ; जिनका व्यक्ति विशेष पर कुछ विलक्षण प्रभाव पड़ता है। वे तिथियाँ जब भी आती हैं तब कुछ विचित्र संयोग बिठा देती हैं। नैपोलियन और ड्यूक आफ विलिंगडन के जीवन क्रम में तारीखों की दृष्टि से अद्भुत समता है, दोनों 15 अगस्त 1760 को जन्मे। दोनों के पिताओं की मृत्यु उनके सोलहवें वर्ष में हुई। ड्यूक को जिस दिन जनरल का पद मिला उसी दिन नेपोलियन की नियुक्ति लेफ्टिनेंट पद पर हुई। आश्चर्य है कि वे दोनों मरे भी एक ही दिन।

हिटलर और नैपोलियन के जीवन में भी तिथियों संबन्धी ऐसी ही समता है। वर्षों की दृष्टि से 129 वर्ष का अन्तर जरूर है, पर उनके क्रिया−कलापों में कितनी ही घटनाएँ पुनरावृत्ति जैसी हैं। नैपोलियन 20 अप्रैल 1760 में जन्मा और हिटलर 29 अप्रैल 1879 को। फ्राँस में राज्य−क्रान्ति 1789 में हुई और जर्मनी में 1918 को, नैपोलियन ने 1804 में सत्ता हथियायी और हिटलर ने 1933 में। नैपोलियन ने रूप पर हमला 1812 में किया था और हिटलर ने 1941 में। वियना संधि 1815 में हुई और जर्मन संधि 1944 में। यह ऐसे संयोग हैं जिनके आधार पर हिटलर को नैपोलियन का दूसरा संस्करण कहा जा सकता है।

अमेरिका के दो राष्ट्रपतियों में भी ऐसी विलक्षण समता है। अब्राहमलिंकन 1860 में राष्ट्रपति चुने गये और केनेडी 1960 में। दोनों की हत्याएं शुक्रवार के दिन हुई और उन दुर्घटनाओं के समय दोनों की ही पत्नियाँ साथ थीं। लिंकन का हत्यारा जान बिल्किस बूथ 1839 में पैदा हुआ था। इन दोनों हत्यारों की अदालत द्वारा कोई सजा सुनने से पूर्व की हत्या हो गई। ये दोनों ही दक्षिण अमेरिका में जन्मे थे। लिंकन के निजी सचिव ने उन्हें उस दिन नाट्य ग्रह न जाने की सलाह दी थी, जिसे उन्होंने नहीं माना। ठीक ऐसा ही केनेडी के साथ हुआ। उनके निजी सचिव उलास ने उन्हें उस यात्रा पर न जाने के लिए कहा था। जिन्हें उन्होंने भी नहीं माना और उसी तरह गोली के शिकार हुए जिस तरह की लिंकन मरे थे।

तिथियों का कुछ विचित्र संयोग देखिये−चन्द्रवरदाई और पृथ्वीराज चौहान घनिष्ठ मित्र थे वे दोनों एक ही दिन जन्मे और एक ही दिन मरे भी।

महाकवि शेक्सपियर के लिये 23 अप्रैल जन्म देने भी आई और वही 23 अप्रैल उन्हें उठा भी ले गई।

विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता के जीवन में अक्टूबर मास महत्वपूर्ण घटनायें प्रस्तुत करता रहा। वे 24 अक्टूबर 1867 में जन्मी 22 अक्टूबर 1865 को उनसे विवेकानन्द को अपना समर्पण दिया। 20 अक्टूबर को उन्होंने महर्षि अरविंद से महत्वपूर्ण भेंट की और 13 अक्टूबर 1611 में वह संसार छोड़कर चली गई।

वीर सावरकर के जीवन में फरवरी मास अशुभ रहा। हेग के अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय ने उन्हें 25 फरवरी 1611 को सजा दी और ठीक 55 वर्ष बाद 26 फरवरी 1966 को उनकी मृत्यु हो गई।

लोकमान्य तिलक के जीवन की महत्वपूर्ण घटनायें मंगलवार को घटित होती रही हैं। उनका केशरी पत्र मंगलवार को प्रकाशित हुआ। स्वतंत्रता संग्राम में वे मंगल को पकड़े गये और जमानत पर भी मंगल के दिन ही छूटे। मंगलवार से मुकदमा चला और जेल से छूटने का दिन भी वही बार था।

शुक्रवार को लोग शोक दिवस मानते हैं। ईसा, सुकरात, गाँधी, लिंकन, केनेडी आदि कितने ही महापुरुषों को शुक्रवार ने उदरस्थ किया है।

किन्हीं के जीवन में कुछ अंकों की विशेष महत्ता रही है। प्रिंस विस्मार्क को 3 का अंक कुछ विलक्षण संयोग लाता रहा। उनने अपने तीन नाम रखे लाएन वर्ग-शोवासेनी और विस्मार्क। उन्हें तीन उपाधियाँ मिलीं प्रिंस, ड्यूक तथा काउण्ट। वे तीन कालेजों में पढ़े। उनके तीन बेटे हुए। वे तीन देशों में राजदूत रहे।वह तीन युद्धों में लड़ने गये। इनमें तीन घोड़े गँवाये। तीन बार इन पर घातक आक्रमण हुए। तीन बार उन्होंने त्याग पत्र दिये।

लालबहादुर शास्त्री के लिए 10 के अंक से कुछ अनोखे संबन्ध थे। वे अंग्रेजी वर्ष के दसवें महीने अक्टूबर में जन्मे। उनने मन्त्रित्व आदि 10 महत्वपूर्ण पद सँभाले। उनके दिल्ली निवास स्थान का नम्बर 10 था। उनकी मृत्यु 10 तारीख को हुई। रोमन लिपि में लालबहादुर शब्द लिखने में 10 अक्षर ही प्रयुक्त होते हैं।

साइप्रस के शासनाध्यक्ष मकरिआस के लिए 13 का अंक कुछ ऐसे ही संयोग लाता रहा। वे 23 अगस्त 1913 को जन्मे। 13 वर्ष की आयु में चर्च में भर्ती हुए। 13 नवम्बर 1946 में उनने प्रोस्ट दीक्षा ली। 23 जून 1948 में वे विशप बने तथा राजगद्दी पर बैठे। 13 मार्च 1952 में यूनान के राजा ने उनका अभिनन्दन किया। 13 दिसम्बर 1959 को वे राष्ट्र पति चुने गये।

प्रधान मंत्री इन्दिरा गाँधी के लिए 13 का अंक महत्वपूर्ण रहा है। उन्हें 13 महीने की जेल भुगतनी पड़ी। उनका असली नाम प्रियदर्शिनी है जिसे रोमन लिपि में लिखने पर 13 अक्षर प्रयुक्त होते हैं। उन्हें 49 वर्ष की आयु में प्रधान मंत्री पद मिला। इन 4 और 9 का जोड़ 13 होता है। उनके चुनाव में कुल संसदीय मतदान 526 का था। जिसमें से उन्हें 355 मत मिले। जो 38 प्रतिशत हुआ इन दोनों संख्याओं के प्रयुक्त होने वाले अंकों का जोड़ 13-13 ही होता है।

संसार कितना विचित्र और विलक्षण है इसके रहस्यमय परत क्रमशः ही खुले और खुलते जा रहे हैं। मानवी बुद्धि प्रकृति के रहस्यों को धीरे धीरे ही जानने समझने लायक बनी है और बनती चली जा रही हैं। अंकों का क्या कुछ सम्बन्ध मनुष्य जीवन के साथ जुड़े हुए घटनाक्रमों से भी हैं यह तथ्य की यथार्थता कभी न कभी स्पष्ट होकर ही रहेगी।


लानत (kahani)

सुकरात से चिढ़े हुए एक व्यक्ति ने चुनौती देते हुए कहा- अपने अपमान का कसकर बदला न ले सकूँ तो मुझ पर लानत।

बदले में सुकरात ने भी उसी आवेश के साथ उतर दिया- तुम्हें अपना घनिष्ठ मित्र न बना सकूँ तो मुझ पर लानत।


भ्रष्टता का प्रतिरोध किया ही जाना चाहिए

एक जमाना था, भारत के विद्वानों के पास रहकर समस्त पृथ्वी के मानव, चरित्र की शिक्षा लेने आते थे। इस प्रसंग में मनु ने लिखा हैं-

‘एतद् देश प्रसूतस्य सकाश दग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्र शिक्षेरन् पृथिव्याँ सर्वमानवाः॥

परन्तु आज हमारी चरित्र-भ्रष्टता बहुत बढ़ गयी है। अखबारों के पत्र इन घटनाओं से नित्य रंगे मिलते हैं। विश्वासघात, छल-कपट, धोखाधड़ी, शोषण, दमन-उत्पीड़न, राहजनी, चोरी-डकैती, अपहरण, बलात्कार, हमले और हत्या आदि बुराइयाँ व्यापक होती जा रही हैं। राह चलती लड़कियों से छेड़खानी, चोरबाजारी, मिलावट जैसी बदनीयती आम बीमारी बन गयी है। व्यभिचार, घूसखोरी और मुनाफाखोरी को प्रायः पाप भी नहीं मानते। अन्याय और पक्षपात तो सभी करने लगे हैं। भले कहे-जाने वाले लोग भी सामाजिक दिव्य अनुदानों का बिना प्रति-मूल्य चुकाये ही खुद उपभोग करते हैं। अनीति से धन संचय आवश्यकता बनती जा रही है। दूसरों के श्रम, अधिकार एवं साधनों का अपने लिये उपयोग में नहीं हिचकते। यहाँ तक कि कंचन-कामिनी व मान−प्रतिष्ठा के निमित्त बुरे से बुरा काम भी कर सकते हैं।

परन्तु इन सभी बुराइयों के लिए हम सरकार किम्वा अन्य किसी पर पूरा दोष मढ़ दिया करते हैं। प्रशासन की निन्दा अनेक अंशों में सही होती है। कई लोग नये जमाने को दोषी मानते हैं। कुछ कलियुग पर सारा दोषारोपण कर देते हैं। स्वयं को छोड़कर और सभी का दोष दिखता है। अनेक अपराध व विकार हमारे अपने चारित्रिक पतन के कारण उपजते हैं। सत्य, अहिंसा और संयम-नियम आदि को व्यावहारिक जीवन में न अपना कर हम स्वयं समाज-व्यवस्था बिगाड़ने में बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। हमारे अनीतिपूर्ण जीवन, सामाजिक उत्तरदायित्वों के प्रति उपेक्षा, अन्याय व अत्याचार के समक्ष आँख मूँद कर हाथ पर हाथ धरे बैठ जाने की प्रवृत्ति से ही बुरे तत्वों को प्रोत्साहन मिलता है।

हमारी सबसे बड़ी कमजोरी है कि हम धर्म, सिद्धांत नीति, नियम और आदर्शों की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। स्वयं व्यवहार में प्रयोग करना नहीं चाहते। हर दुकानदार सरकार-पुलिस आदि के भ्रष्टाचार की जी खोलकर निन्दा करता है। वह स्वयं ग्राहक को कम तोलता है। मिलावट और चोरबाजारी कर उपभोक्ता को लूटता है। इसी प्रकार हम सभी आततायी और गुण्डों को बुरा भला कहते हैं। पर स्वयं भी अनेक प्रकार की बुराइयों में निरत रहते हैं।

चरित्र सम्बन्धी विकारों के उपचार हेतु सबसे पहले हमें अपनी चिकित्सा भगवान् मनु के इन निर्देश से करनी पड़ेगी-

‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्।’

जो खुद को पसन्द न पड़े, उसे दूसरों के प्रति मत करो। जैसे हम नहीं चाहते कि कोई हमारा अपमान करे तो हमें भी अन्य व्यक्ति का अपमान नहीं करना चाहिये। हम कामना करते हैं कि हमारे स्वजन, सम्बन्धी, संतान-सेवक आदि झूठ न बोलें तो हमें भी सच बोलने की आदत पहले डालनी पड़ेगी।

दूसरी बात है सामाजिक जिम्मेदारी निभाने की। हमें घर-गृहस्थी तथा जीविकोपार्जन के दायित्व के साथ ही सामाजिक कार्यों में भी हाथ बँटाना चाहिये। उनकी उपेक्षा का परिणाम सबको कभी-न -कभी भुगतना ही पड़ता है। अड़ोस-पड़ोस में चोर-बदमाश रहता है। अनैतिक कार्यों का अड्डा चलता है। समाज-विरोधी एवं देश के दुश्मन अपनी गतिविधियों का संचालन करते हैं। पर बहुत कम लोग इनकी सूचना अधिकारियों तक पहुँचाते हैं। सच तो यह है कि इनके विरुद्ध आवाज उठाना अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते। हम जान-बूझकर सब कुछ देखते और सहते रहते हैं।

इस प्रकार अपराधी निःशंक बुरे काम करता है। दूसरे भी देखा देखी इसी दिशा में अग्रसर होते हैं। निहित-स्वार्थ अवाँछनीय तत्वों को सहारा ही नहीं देते अपितु उनका बचाव भी करते हैं। इनका भंडाफोड़ करना हमारा फर्ज हैं।

चरित्र-भ्रष्टता जनित दोषों को दूर करने के लिये प्रतिरोध से उत्पन्न संकट का मुकाबला करना अनिवार्य हैं। घातक घाव के ऑपरेशन कराना बुद्धिमानी है। विकार बढ़ जाने पर बीमार के मरने का भय रहता है। मानवता को दानवता से बचाना है तो समय रहते तैयारी करनी ही पड़ेगी।

इसके लिए जहाँ संकल्प और प्रयास अकेले करे, वहीं समाज को भी संगठित करे। हमें जानना चाहिए कि अकेले कोई बच नहीं सकता। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। संघ की शक्ति में अपनी शक्ति को शामिल करने में उसे कम खतरा प्रतीत होता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि सामूहिक आन्दोलन में जनता सहज ही सहयोग करने लगती हैं। एक को संघर्ष हेतु प्रस्तुत देखकर दूसरों की आत्मा भी सन्मार्ग पर अभिमान के निर्मित आन्दोलित हो पड़ती है।

इस प्रकार सामूहिक चिन्तन एवं क्रान्ति-अभियान के फलस्वरूप अन्ततः अपराधी मनोवृत्ति घटने लगती हैं। छुटपुट छिपते-भागते देवों पर दानव सदैव हावी रहे। पर उन्हीं देवों की संगठित शक्ति असुरता के विनाश में समर्थ हो गयी। पलायनवादी मानव स्वार्थ परायणता की भौतिक चिन्तन धारा में मोड़ लाकर अपने आचरण सुधारें।

भारत की अध्यात्मवादी घोषणा स्पष्ट है, ‘संधे शक्ति कलौ युगे।’ तदनुसार सामूहिक संघर्षों को भ्रष्टाचारिता के विरुद्ध हर जगह चालू करें। सामाजिक उत्तरदायित्व खतरे उठा कर भी पूरा करना होता है।

अन्त में अपने कार्यों वे सामूहिक आंदोलनों का विश्लेषण नीति, न्याय और धर्म की कसौटी पर करके परख लिया करें। इस प्रकार से आज भी हम सामाजिक दायित्व-बोध युक्त समाज की संगठित शक्ति द्वारा चरित्र-भ्रष्टता जनित विकारों का उपचार कर सकते हैं।


क्रियाशील श्रद्धा (kahani)

दो आदमी थे उनके समाने दो पत्थर रखे थे।

एक ने सामने के पत्थर को देखा। हाथ जोड़े। मन रोक और ध्यान के लिए आंखें मूँद ली। पत्थर भी उसी मुद्रा में निस्तब्ध पड़ गया।

दूसरे ने आँख खोली। मन को उछाला और छैनी हथौड़े हाथ में लेकर पत्थर की देव प्रतिमा गढ़ने लगा।

वह लगातार लगा रहा। मूर्ति बन कर तैयार हो गई। सुन्दर अति सुन्दर। दर्शकों का ताँता लग गया कलाकार की कला को मुक्त कंठ से सराहा गया। अन्ततः किसी श्रद्धालु ने उसे खरीदा और विशाल देवालय बनाकर उस प्रतिमा की प्रतिष्ठापना कर दी।

पहले आदमी का पहला पत्थर अभी भी जहाँ का तहाँ उसी ऊसर जमीन में पड़ा था। भक्त का हाथ जोड़ना-आंखें मूँदना और मन को रोकना अभी भी उसी क्रम से चल रहा था।

एक दिन वे दोनों व्यक्ति मिले। अपने-अपने आराध्य की चर्चा करने लगे। एक ने जड़ता की शिकायत की और दूसरे ने प्रगति का हर्ष संवाद सुनाया।

उसी रात्रि उन पत्थरों की आत्मायें भी भेंट का अवसर पा गई। एक ने भक्त की जड़ता पर दुःख प्रकट किया और दूसरी ने क्रियाशील श्रद्धा को मुक्त कंठ से सराहा।


मनुष्य न तो सर्वोपरि है और न सर्वशक्तिमान

मनुष्य अपने को सब बातों में अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ और विकसित मानता है यह उसकी अहंमन्यता एक सीमा तक ही सही है। उसका मस्तिष्क अधिक विकसित है इसलिए वह अनेक दिशा में पक्ष विपक्ष की बाते सोच सकता है और अनेक स्तर के निष्कर्ष निकाल सकता है। उसे हँसने की, बोलने की, लिखने-पढ़ने की विशेषतायें भी मिली हैं। कृषि, पशु-पालन, शिल्प, व्यवसाय, संचार जैसे साधन उसने सीखे और विकसित किये हैं। विज्ञान क्षेत्र, अर्थ क्षेत्र, युद्ध क्षेत्र आदि में उसकी उपलब्धियाँ निस्सन्देह अन्य प्राणियों से अधिक है। किन्तु उसका यह दावा करना गलत है कि सभी बातों में वह बढ़ा-चढ़ा है।

छोटे-छोटे जीवन जिन्हें आमतौर से तुच्छ और नगण्य समझा जाता है अपनी विशेषताओं के क्षेत्र में मनुष्य से कहीं आगे है।

मनुष्यों को गर्व हो सकता है कि वे दुनिया भर में छाये हुए हैं और उनकी संख्या 400 करोड़ है। इस अहंकार को टिड्डी दल चुनौती दे सकता है और कह सकता है कि हमारी संख्या एवं शक्ति अधिक है, जिसका सामना तुम मनुष्यों की बुद्धि और सामर्थ्य नहीं कर सकती।

टिड्डी दल छोटे भी होते हैं और बड़े भी। औसतन प्रत्येक दल का वजन 80000 टन होता है। एक वर्ग किलो मीटर क्षेत्र में उनकी संख्या 8 करोड़ 30 लाख कूती गई है जिनका वजन 407 मीट्रिक टन बैठेगा। रेगिस्तानी टिड्डियाँ जब धावा बोलती है तो प्रायः 1 करोड़ 10 लाख वर्ग मील क्षेत्र को प्रभावित करती है। जिसमें भारत ही नहीं दूसरे देश भी चपेट में आते हैं। ये दल बहुल लम्बी उड़ानें उड़ते हैं। तुर्की से तंज़ानिया तक उनकी उड़ानें देखी गई हैं।

सन् 1654 में एक टिड्डी दल ने मोरक्को की लगभग 8 करोड़ की फसल चट कर ली थी। सन् 1658 में इथोपिया का 1,67000 टन अनाज व साफ कर गई थीं। पिछली दशाब्दी में ईरान, पाकिस्तान, भारत और अरब देशों की टिड्डियों ने भारी क्षति पहुँचाई हैं। सन् 1652 में भारत में सबसे बड़ा टिड्डी दल आया था उसने 45150 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में तहलका मचा दिया था। जब भी वे आती हैं करोड़ों रुपयों की फसल नष्ट कर देती हैं। सन् 1642 में जो टिड्डी दल अरब में उत्पन्न हुआ था। उसने पूरे 15 वर्ष तक समीपवर्ती देशों पर तबाही बरसाई। टिड्डी पीड़ित 20 देशों ने अपनी एक संगठन डैजर्ट लोकस्ट कन्ट्रोल कमेटी बनाई। टिड्डी विशेषज्ञ ओ0 वी0 लीन के नेतृत्व में इन शत्रुओं से बचाव के उपाय खोजे और कार्यान्वित किये गये किन्तु बहुत हाथ पैर पीटने पर भी कहने लायक सफलता नहीं मिली। इन देशों का संग्रह किया हुआ चंदा 13 लाख 73 हजार डालर और अमेरिका का दिया अनुदान 40 लाख डालर ऐसे ही रसायन छिड़कने 60000 वर्ग मील का हवाई दौरा करने और तरह-तरह के उपाय खोजने सोचने में बर्बाद हो गया। जार्ज पोपोफ की टिड्डी शोध के अनुसार मादा टिड्डी एक बार में 120 अंडे देती है। उनमें से दो सप्ताह में बच्चे निकल आते हैं। जब मादायें प्रजनन पर उतरती हैं तो एक वर्ग फुट जमीन में 5000 तक अण्डे दे जाती हैं। बच्चे आरम्भ में ही 2 से 10 मील तक की प्रतिदिन उड़ान उड़ लेते हैं। जवान होने पर तो उनकी उड़ानें कई गुनी तेज हो जाती हैं क्या मनुष्य इन सब क्षमताओं से अपनी क्षमता अधिक होने का दावा कर सकता है। क्या इन बातों से मनुष्य जाति टिड्डी दल से आगे गिनी जा सकती हैं।

युद्ध कौशल और आत्म-रक्षा के प्रयत्नों में छिपकली मनुष्य जाति के बड़े-बड़े सेनापतियों और छापामारों को चुनौती देती है। समय पड़ने पर वह प्रबल शत्रु को ऐसा चकमा देती है कि प्रस्तुत प्राण संकट से वह सहज ही बच निकले।

छिपकली की पूँछ दुधारे शस्त्र का काम करती है। गोह गिरगिट जाति की बड़ी छिपकलियाँ अपनी पूँछ का ऐसा प्रहार करती हैं जैसा कि गधे घोड़े दुलत्ती झाड़ते हैं। उस की करारी चोट खाकर शत्रु तिलमिला उठता है और उसे भागते ही बनता है।

छोटी छिपकलियाँ जब किसी बलवान शत्रु से घिर जाती हैं तो अपनी पूँछ फटकार कर उसे तोड़ कर अलग कर देती है। तेजी से हिलती हुई उस कटी पूँछ को ही शत्रु पूरी छिपकली समझ लेता है और उसी से गुँथ जाता है उसी बीच छिपकली भाग खड़ी होती है और अपनी प्राण रक्षा कर लेती है। आश्चर्य यह है कि उस कटी पूँछ के स्थान पर फिर नई पूँछ, उग आती है और कुछ ही दिन में पहले जैसी बन जाती है।

शत्रुओं से निपटने के लिए मनुष्य युद्ध सामग्री सैन्य सज्जा के अनेकानेक अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण कर रहा है जिनमें विषाक्त गैसें और अणु आयुध भी सम्मिलित हैं। एक देश दूसरे देश को अपना शत्रु मानता है और उसका अस्तित्व मिटा देने के लिए बड़े-चढ़े दावे पेश करता है। क्या यह धमकियाँ सफल हो सकती हैं, यह पूँछने के लिये चूहा चुनौती देता है और अँगूठा दिखाता है कि तुम मनुष्य प्राणी मुझे अपना शत्रु मानते हो और मेरी हस्ती दुनिया से मिटा देने के लिए पीढ़ियों से सिर तोड़ प्रयत्न कर रहे हो पर इसमें कितनी सफलता मिली? यदि तुम मुझ साधन हीन चूहे का कुछ नहीं बिगाड़ सकते तो शत्रु देशों का क्या कर लोगे? तुम्हीं सब कुछ तो नहीं हो-मारने वाले से बचाने वाला ईश्वर बड़ा है यह क्यों भूल जाते हो।

संसार भर में प्रायः 3 करोड़ 60 लाख टन अनाज चूहे खा जाते हैं और इससे भी अधिक उनके द्वारा बर्बाद किया जाता है घरेलू मुर्गियों के अंडे-बच्चे चुराने में ये बहुत घाघ होते हैं। कुत्ते बिल्लियों के छोटे बच्चों पर यहाँ तक कि सोते हुए मनुष्य के बच्चों पर भी घातक आक्रमण करते हैं। यों चूहा शाकाहारी माना जाता है पर जब उसे माँस हाथ लग जाय तो छोड़ता उसे भी नहीं।

चूहों से कैसे निपटा जाय वह बड़ा पेचीदा प्रश्न हैं। इस दिशा में मनुष्य का बुद्धि कौशल लगातार मात खाता चला आता है। चूहे दान पिंजड़े दो चार दिन काम करते हैं। अपने साथियों की दुर्गति देख कर वास्तविकता समझने में उन्हें देर नहीं लगती। पीछे पिंजड़े में कुछ भी रखते रहिए एक भी उसमें नहीं फटकेगा। जो उधर ललचा रहा होगा उसे भी साथी लोग सावधान कर देते हैं। अजनबी घर में पहुँच कर बिल्ली उन्हें दबोच सकती है पर जब वह उसी धर में रहने लगती हैं तो चूहे वे दाव पेंच निकाल लेते हैं जिनसे उन पर कोई विपत्ति न आवे। कहीं-कहीं तो मजबूत चूहे मिलकर कमजोर बिल्ली पर आक्रमण तक कर बैठे हैं। साधारण तथा अभ्यस्त चूहे बिल्ली से डरते नहीं वरन् अँगूठा दिखाते हुए आँख मिचौनी खेलते रहते हैं। गोदामों की सुरक्षा के लिए नेवले-साँप, बीजल, फरेट पाले गये ताकि वे चूहों से निपट सकें पर इसका भी कोई बहुत अच्छा परिणाम न निकला।

चूहों से फलने बीमारी पिछले दिनों प्लेग ही मानी जाती थी पर अब पता चला है कि वे टाइफ सट्रिकिना-लेप्टोस्पाइरोसिस सरीखे अन्य कई भयानक रोग भी पैदा करते हैं।

चूहों को मारने के लिए पिछले दिनों कई विष प्रयुक्त होते रहे हैं। स्ट्रिक्लीन-जिंक फास्फाइड वारफैरिन आदि का प्रयोग किया जाता रहा है। इन्हें उपयुक्त मात्रा में खा लेने पर तो वे मर जाते हैं पर यदि थोड़ी मात्रा में ही खायें तो उनका शरीर इन विष रसायनों से आत्मरक्षा करने में अभ्यस्त हो जाता है। फिर वे मजे से उसे खाते रहते हैं। उनकी पीढ़ियां इस प्रकार की बन जाती हैं कि इन घातक विषों का भी उन पर कुछ अधिक प्रभाव नहीं पड़ता।

बम्बई की रिपोर्ट है कि अकेले बोरी बन्दर स्टेशन पर एक वर्ष 1600 बोरी बिखरा और कूड़ा कचरा मिला हुआ अनाज नीलाम करना पड़ा था। यह करतूत चूहों की थी। बम्बई के अस्पतालों में एक साल 20 हजार मरीज चूहों के काटने पर घावों की मरहम पट्टी कराने गये थे इनमें से कई सौ तो जान ही गँवा बैठे। सन् 1648 में भारत में जो प्लेग फैला था उसमें एक करोड़ के करीब मरे थे। यह चूहों की कृपा का ही फल था।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चूहों से होने वाली आर्थिक और शारीरिक हानि का जो विवरण प्रकाशित किया है उससे स्पष्ट है उनके द्वारा मनुष्यों को पहुँचाई जाने वाली क्षति नगण्य एवं उपेक्षणीय नहीं है।

प्रयोगशाला से निकाले गये निष्कर्ष के अनुसार औसत चूहा 24 घंटे में 12 ग्राम अनाज खाता है। खेतों में घुस कर वह 40 ग्राम अनाज उगा सकने वाले अंकुरों का कतरव्योंत कर देता है। पहनने के कपड़े, कंबल, बोरी आदि के बीच वे छिपे बैठे रहते हैं और काट-काट कर उनका सत्यानाश करते रहते हैं। दरवाजे, खिड़कियां अलमारियाँ यदि लकड़ी के हैं तो उनके बीच में से छेद बना कर आवागमन का रास्ता बना लेना उनके बांये हाथ का खेल हैं। घरों में रखे खाद्य-पदार्थ ही नहीं खेतों में उगे हुए साग, भाजी, फल-फूल खाना और काट कर छितरा देना उनका प्रिय विनोद है। अनाज खाने के साथ-साथ वे अपनी जहरीली विष्ठा भी उसी में छोड़ते जाते हैं जिसे यदि अलग न किया जाय तो कितनी ही बीमारियों का शिकार बनना पड़ता है।

धरती केवल मनुष्यों के लिए ही नहीं बनाई गई है उस पर रहने का और निर्वाह साधन प्राप्त करने का अन्य प्राणियों को भी अधिकार है। मनुष्य चाहता है कि उसे ही धरती की सारी उपलब्धियाँ मिल जायँ, अन्य प्राणी जो कुछ प्राप्त करते हैं वह उनसे छीन लिया जाय। इस दृष्टि से उसने चूहों को अपना प्रतिद्वंद्वी-हानिकारक शत्रु माना और उनके विनाश के लिए जो कुछ सम्भव हुआ वह सब कुछ किया। पर प्रकृति उसके मनोरथ पूरे नहीं होने दे सकती। उसे मनुष्य की ही तरह अन्य प्राणियों के अस्तित्व की भी रक्षा करनी है। इसलिए उनकी सुरक्षा के लिए भी कुछ न कुछ व्यवस्था जुटा ही देती है।

चुहिया छह महीने में वयस्क हो जाती है और बच्चे देने लगती है। वह एकबार में प्रायः एक दर्जन बच्चे देती है। यदि यह सब जीवित रहे तो एक चुहिया के बच्चे दस वर्ष के भीतर संसार के कोने-कोने में भरे हुए दिखाई पड़ सकते हैं।

प्रकृति मनुष्यों से कहती है तुम्हारे और बिल्ली उल्लू आदि माँसाहारी जीवों के प्रयत्नों को निष्फल बनाने के लिए मैंने चुहिया को पर्याप्त प्रजनन शक्ति दे रखी है उसके रहते तुम कभी भी उस छोटे प्राणी का अस्तित्व समाप्त न कर सकोगे।

अच्छा होता मनुष्य अपने को संसार के जीवन परिवार का एक छोटा सदस्य मानता और सर्वोपरि सर्वाधिकारी का दावा न करके इस तरह रहता जिससे पारिवारिक सन्तुलन की सुन्दरता बनी रहती ।


जल की बूँद (kahani)

जल की बूँद अथाह सागर में गिरी तो सुवक कर रोने लगी। अपना अस्तित्व में क्यों मिटाऊँ? समर्पण के झंझट में मैं क्यों पड़ूं? ‘अहं’ को खोने पर मेरे पास बच ही क्या रहेगा?

पृथक व्यक्तित्व के लिए रुदन करती हुई जल बिन्दु को अधीरता समझी तो सागर बोला-’भद्र’। तुम समाप्त कहाँ हो रही हो-एकाकीपन से अपने जैसे ही अगणित भाई-बहनों के समन्वय में सम्मिलित हो रही हो। मैं तुम सबका सम्मिलित स्वरूप ही तो हूँ। अलग से तो मेरी भी सता नहीं।

बूँद का समाधान नहीं हुआ। वह पृथक अस्तित्व की रट लगाये ही रही। सागर ने उसके बचपन को समझा तो सूर्य के साथ उसे जहाँ चाहे वहाँ रहने के लिये भेज दिया।

बूँद को भाप होकर उड़ना पड़ा। बदली बनी। वर्षों के साथ जमीन पर गिरी और रज-कणों ने उसे सोख लिया। स्वतन्त्र अस्तित्व फिर खतरे में पड़ गया तो जलबिन्दु का रुदन फिर आरम्भ हो गया।

पवन ने बच्ची को मचलते देखा तो रुक गया और कहा-नादान, यह जगत समन्वय और समर्पण की धुरी पर भ्रमण कर रहा है तू अकेलेपन की अहंता लेकर यहाँ कहाँ रह सकेगी? कैसे जी सकेगी?


सर्प उतना भयंकर नहीं जितना उसे समझा जाता हैं

साँप का नाम सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उसे मृत्यु का दूत माना जाता है, उसे देखते ही कंपकंपी छूटती हैं और प्राण संकट के भय से कलेजा काँपने लगता है। यह सर्प संकट नहीं वरन् अपडर का मास है। हम सामान्य से कीड़े को इतना भयंकर मान लेते हैं जितना कि वस्तुतः वह हैं नहीं। पाये जाने वाले सर्पों में से बहुत ही कम विषैले होते हैं। उनमें से अधिकाँश तो ऐसे हैं जिनसे बिना किसी प्रकार का जोखिम उठाये खिलौने की तरह खेलते रहा जा सकता है। मनुष्य शरीर से और बुद्धि से बड़ा है वह चाहे तो किसी भी आक्रमणकारी सर्प से सहज ही निपट सकता है, पर जब डर हावी हो जाय तो फिर न बुद्धि काम देती है और न कोई उपाय ही सूझता है। इसी भयभीत स्थिति में प्रायः लोग साँपों से काटे जाते हैं और उपाय की ओर मस्तिष्क को न दौड़कर भयाक्राँत हो जाने से काटे हुए लोगों में से अनेकों ऐसे मर जाते हैं जो थोड़ी विवेक बुद्धि का परिचय देने पर सहज ही बच सकते थे।

दस पीछे, दो ही साँप विषैली होते हैं शेष निर्विष। वह हर तीसरे चौथे महीने केंचुली बदलता है। उसे रात में भी साफ दिखाई पड़ता है। रीढ़ इतनी लचीली होती है कि यदि कड़ा झटका मार दिया जाय तो वह टूट जायगी और इतने मात्र से वह अधमरा हो जायगा। पेट के स्नायु सशक्त होने के कारण ही वह सपाटे के साथ रेंग सकता है। वे अपने से बड़े आकार के शिकार को निगल जाते हैं। अजगर साँप समूचे हिरनों को निगलते देखे गये है। उनकी पाचन शक्ति इतनी तीव्र होती है कि हड्डियाँ भी उसमें गल जाती हैं। उसकी पकड़ इतनी मजबूत होती है कि जिसे भी कस कर पकड़ ले उसे मरोड़ कर या तोड़कर ही छोड़ता है। केंचुली की तरह उसके दाँत भी बार-बार गिरते उगते रहते हैं।

सांपों के सम्बन्ध में कितनी ही किंवदंती प्रचलित हैं, किन्तु उनमें से एक में भी तथ्य नहीं। साँप अपनी साँस से पक्षियों को खींच लेता है- आँखों की चमक से शिकार सम्मोहित होकर अचल खड़ा रह जाता है। सर्प और सर्पिणी में से एक को मार डालने पर दूसरा मारने वाले से बदला लेता है, गायों के थन से लिपट कर दूध पी जाता है, बीन सुनने के लिए या सुगन्धित पुष्प सूँघने के लिए वह अपने बिलों से निकल आता है, गढ़े हुए खजाने पर पहरा देता है, मन्त्र शक्ति से खिंचकर चला आता है और काटे हुए स्थान का विष चूसता है आदि बातें कपोल कल्पना मात्र हैं। साँप भी दूसरे अन्य कीड़ों की तरह एक कीड़ा है फुर्तीलापन और विषैलापन आदि उसकी अपनी विशेषताएँ हैं।

भारत में किंग कोबरा ही एक ऐसा है जिसका दंशन तत्काल मृत्यु की गोद में सुला देता है। शेष साँपों में कम विष होता है और उसे चिकित्सा द्वारा अच्छा किया जा सकता है। सर्प के विष से ही सर्पदंशन की अमोघ औषधियाँ निकली है। विष से विष मारने की उक्ति सर्प चिकित्सा पर पूरी तरह लागू होती है। काटने पर मरने वालों में से आधे लोग विष की अधिकता से नहीं वरन् मृत्यु की सम्भावना से भयभीत होकर मरते हैं। अकारण आक्रमण करने वाले साँप कम ही होते हैं वे प्रायः आघात लगने पर या वैसी आशंका होने पर ही हमला बोलते और काटते हैं।

संसार भर में लगभग ढाई हजार किस्म के साँप पाये जाते हैं, जिनमें भारत में पाये जाने वालों की संख्या 216 हैं। यह सभी जहरीले नहीं होते। अपने देश में अधिकाँश विषहीन होते हैं उनमें से केवल 52 जातियाँ ही विषैली हैं।

सर्प विष उसके तालू में लगी हुई विष ग्रन्थियों में भरा होता है। इन ग्रन्थियों का रस उसके पोले विष दन्तों में होकर काटे जाने वाले के शरीर में प्रवेश करता है। यह पूरी इन्जेक्शन पद्धति है। पोले विष दन्त इन्जेक्शन सुई का और विष थैली पिचकारी का काम देते हैं। काटने पर सर्प इन्हीं पोले विष दन्तों को माँस में चुभोता और उस चुभन के साथ ही विष उड़ेल देता है। यह रक्त में मिलकर सारे शरीर में फलता है और काटें वाले की मृत्यु का कारण बनता है। विभिन्न जाति सर्पों द्वारा उड़ेले जाने वाले विष भिन्न-भिन्न होते हैं और की मात्रा भी न्यूनाधिक निकलती है। मिली ग्रामों में विष की औसत मात्रा इस प्रकार है- क्रीटलेस 600 घी ग्राम, कोबरा 317 मि0 ग्राम, रसेल वाइपर 108, एकैथोफिस 84 एडक्रिस्टोडोन 55 मि0 ग्राम, नोटिलस मिली ग्राम।

सर्पों में पाये जाने वाले विष रसायनों में कुछ बहुमूल्य हैं। न्यूरोटाक्सिन हायल्यूरोनाइडेज, राइवोन्यूक्लिएज, की आक्सीडेज, फस्फोडी एस्टेज, न्यूक्लियोटाइडेज दें। इनकी कीमत प्रति मिली ग्राम 1500 रुपये तक पहुँचती है।

एलोपैथी में सर्प विष से बनी औषधियाँ कैंसर, क्षय, ल्यूकोडर्मा, साइफि लिटिक, इलाप्स, एपिस, मेलीफि का दे रोगों में प्रयुक्त होती है। होम्योपैथी में सर्प विष लेप्सी, एस्थमा, न्यूराल्जिया, न्यूराइटिस, लेम्बेगो टिका, टिक्स, काँजोडायानिया, लेरिंजाइटिस, रसी, डिविलिटी, इन्सोमीनिया आदि रोगों में प्रयुक्त जाता है। आयुर्वेद ग्रंथों में तो उसके अनेकानेक भरे पड़े हैं। इन दिनों उसका सर्वाधिक प्रयोग सर्प के इलाज के लिए एंटी सीरम के रूप में किया जाता है। काँटे से काँटा निकालने की तरह, मारने वाला जीवन दान कर सकने की बात को प्रमाणित करता है। भयंकर और हानिकारक समझी जाने वाली वस्तु का मानवी बुद्धि चाहे तो सदुपयोग कर सकती है। आग, ली आदि ऐसी शक्तियाँ है जिनके खतरे स्पष्ट हैं, पर मानवी बुद्धि कौशल ने उन्हें अपने वशवर्ती कर लिया है उनसे समर्थ सेवक की तरह काम लिया जा रहा है। बुद्धि द्वारा सर्प को मृत्यु दूत से बदल कर दुधारू कामधेनु गौ की तरह प्रयुक्त किया जा रहा हैं।

बैंकाक के सर्प फार्म ने विष एकत्रित करने और बेचने में कीर्तिमान स्थापित किया है। वहाँ सप्ताह में एकबार पालतू साँपों का विष संग्रह किया जाता है। उनका मुँह विशेष यन्त्रों की सहायता से चौड़ा दिया जाता है और विष थैली में नली लगादी जाती है जिसमें प्रायः दो चाय चम्मच में भरा जा सकने जितना विष निकल आता है। उसके बाद उन्हें फिर अपने पिंजड़े में वापिस भेज दिया जाता है।

जापान में पुरानी मान्यता अभी भी चली आती हैं कि सर्पचूर्ण तपेदिक और गठिया की अच्छी दवा है। फलतः वहाँ सैकड़ों लोग सर्पचूर्ण बनाने का व्यवसाय करते हैं उन्हें तन्दूर पर सुखा कर कड़ा किया जाता है और फिर कूट कर चूर्ण बना दिया जाता है। उस देश में इसी प्रयोजन के लिए प्रायः पचास हजार साँपों को अपनी जान गँवानी पड़ती है।

अब दवाओं के लिए सर्प विष की बहुत माँग हैं। इसलिए उसकी कीमत 30 पौण्ड तक मिल जाती हैं। शिकारियों ने जाल में फँसा कर उसे पकड़ने की सहज तरकीब ढूंढ़ निकाली है और उस धन्धे से खूब कमाई करते हैं। फलतः अब उनकी वंश रक्षा तक के लिए संकट उत्पन्न हो गया है।

डा0 जोनाथन लीकी द्वारा स्थापित नैरोवी से 180 मील दूर सर्पोद्यान और ट्रान्सवाल के डा0 के0 सी0 व्रेन एवं डा0 फिट्जसिमोन्स का सर्प संस्थान इस प्रयास में संलग्न है कि विषैले सर्पों को पाल कर उन्हें दुधारू गौओं एवं पालतू मधुमक्खियोँ की तरह अधिक लाभदायक बनाया जाय। सर्प विष सोने से भी कई गुना महंगा बिकता है क्योंकि उससे कितनी ही विष निवारक दबाएँ बनती हैं और भारी माँग रहती हैं।

भारत में पाये जाने वाले किंग कोबरा और तक्षक से भी भयंकर पूर्वी और दक्षिणी अफ्रीका क्षेत्र का सबसे विषैला सर्प ‘मम्वा’ माना जाता है। यह दो प्रकार के होते हैं एक काला दूसरा हरा। काला मम्वा औसतन 14 फुट और हरा उससे कुछ छोटा 10 फुट का होता है। उनकी चाल 10 से 15 मील प्रति घण्टा तक देखी गई है।

मम्वा के दंश में कितने ही प्रकार के विषैली रसायन मिले होते हैं। न्यूरोटानिक्स-जो स्नायु तन्त्र को ठप्प कर देता है। श्वाँस झिल्ली पर लकवा मार देता है फलतः ऑक्सीजन के अभाव आदमी दम घुटने जैसी छटपटाहट के साथ मर जाता है। उसके वंश में एक और भी विष घुला रहता है- हीमोटाक्सिन जो रक्त संचार प्रणाली में खून के थक्के जमा देता है और कोशिकाओं को जलाता चला जाता है। ट्रान्सवाल से केनिया तक के विशाल क्षेत्र में इस जाति के सर्व सर्वत्र पाये जाते हैं। नाटाल, जुलूलेण्ड, वेचुआनालेण्ड तक के बीज हर साल हजारों लोगों को इन्हीं की चपेट में प्राण गँवाने पड़ते हैं। पाँच मिनट से लेकर दो घण्टे की अवधि में काटा हुआ व्यक्ति दम तोड़ देता है।

एशिया का किंग कोबरा और आस्ट्रेलिया का टाइपान भी विष की दृष्टि से ऐसे ही होते हैं, पर वे डरपोक होने के कारण बिना छेडे नहीं काटते। मम्वा इनसे उद्दंड है वह स्वभावतः क्रोधी और आक्रामक होता है और अकारण हमला बोलता है। हाथ-पैर में काटा हो तो बचने की थोड़ी आशा भी है, पर यदि हृदय और मस्तक के नजदीक काटा होगा तो फिर बचने की कोई गुंजाइश नहीं है।

इतना सब होते हुए मम्वा की अपनी निजी दुर्बलताएँ ही ऐसी हैं जो उसके लिए पग-पग पर प्राणघातक संकट उत्पन्न करती रहती हैं। कोई छोटी चुहिया उसे काट खाये तो भी जख्म जल्दी नहीं पुरेगा और सेप्टिक होने से उसकी मौत हो जायगी। बरुथी जैसे छोटे कीड़े कई बार उसकी मुलायम चमड़ी पर चिपक जाते हैं और अपनी संख्या वृद्धि करते हुए उसके माँस को तब तक खाते ही रहते हैं जब तक कि यह छटपटा-छटपटा कर मर नहीं जाता। बाज, गरुड, उल्लू, जंगली कुत्ते, बन विलाब भी उसको दबोचने की घात लगाये बैठे रहते हैं।

दुष्ट देखने में बड़े दुर्दान्त मालूम पड़ते हैं, पर उनकी अपनी निजी कमजोरियाँ ही ऐसी होती है जो उन्हें पानी के बबूले की तरह देखते-देखते मिटाकर रख देती है। हर बात हर आततायी पर लागू होती है और मम्वा पर भी। जैसा कि वह दूसरों को हानि पहुँचाने में बलिष्ठ मालूम होता है यदि उस की सता भी वैसी ही मजबूत रही होती तो शायद उस क्षेत्र का कोई प्राणी जीवित न बचता। ईश्वर को धन्यवाद है कि उसने मम्वा सहित हर पर पीड़क को ऐसी आन्तरिक दुर्बलताओं से घिरा रखा है जो बात की बात में उसका विनाश करके रख देती हैं। तनिक सा जख्म होते ही सड़-सड़कर मर जाना, चुहियों और चींटियों द्वारा उसे जीवित ही उदरस्थ कर लिया जाना यह सिद्ध करता है कि आततायी वस्तुतः अतीव दुर्बल होते हैं और वे तनिक से आघात से बिखर जाते हैं।

सपेरे की बीन सुनकर साँप का मुग्ध हो जाना जन मान्यता में अपना स्थान बना चुका है पर है, गलत। वस्तुतः साँप के कान नहीं होते और वह सुन नहीं सकता। वह पूरी तरह बहरा होता है यहाँ तक कि बन्दूक की आवाज भी उसे सुनाई नहीं पड़ती। बीन बजाने की ध्वनि पर सर्प के फन फैलाकर भाव नृत्य करने की बात में तथ्य यह है कि सपेरा साँप की आँख से आंखें मिलाये रहता है और सिर घुमाने तथा पुतलियों को नीचा-ऊंचा करने के संकेत करता रहता है। बीन का हिलना-जुलना भी काम आता है। सर्प सपेरे की आँखों में अपने लिए आक्रामक सम्भावना देखता है और आत्म-रक्षा के लिए उसी तरफ अपना सिर हिलाता-जुलाता है जिस ओर कि सपेरे के नेत्र एवं उपकरण हिलते-जुलते हैं। यदि सपेरे और साँप के बीच में एक मोटी चादर तान दी जाय और बीन बजता रहे तो साँप पर कुछ भी प्रतिक्रिया न होगी। उसे प्रभावित ध्वनि नहीं, बल्कि दृश्य हलचलें करती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संघ की सूचनानुसार संसार भर में प्रायः 40 हजार व्यक्ति साँप काटने के कारण मरते हैं। अन्वेषकों का कहना है कि इनमें एक चौथाई की मृत्यु के लिए वे विषधर दोषी हैं। शेष तो भयभीत मनःस्थिति को आशंका कुशंकाओं से ग्रसित होकर बेमौत मरते हैं सन्तुलित मस्तिष्क से बिना घबराहट के सामयिक उपाय करने में असमर्थ रहने की स्थिति भी उनका जीवन हरण करती हैं। सर्प इतना भयंकर नहीं जितना उसका अपडर जिसने जन-साधारण के मस्तिष्क को अपना प्रभाव क्षेत्र बनाया हुआ है।


अपनों से अपनी बात - पहला जागरण अभियान का कार्यारंभ इस प्रकार किया जाय

गत अंक में महिला जागरण अभियान पर इस वर्ष ध्यान केन्द्रित करने के लिए परिजनों का आह्वान गया था। प्रसन्नता की बात है कि उसकी आशाजनक क्रिया हुई हैं। आधी मनुष्य जाति को प्रभावित करने इस अत्यन्त महत्वपूर्ण समस्या को सुलझाने के लिए प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता है। उसके लिए शक्ति जुटानी पड़ेगी। यह तभी सम्भव है जब व्यक्तित्व उस और ज्यों-त्यों करके नहीं पूरी तत्परता के साथ संलग्न हों। आह्मन इसी आशा से किया गया सन्तोष की बात है कि प्रायः भी जागृत परिजन दशा में अत्यन्त उत्साहपूर्वक जुट गये हैं।

इस दिशा में काम तो पहले से भी हो रहा था। तब उसे पूर्ण व्यवस्थित किया जा रहा है। क्योंकि अगले दिनों उसका स्वरूप देश, जाति और धर्म की सीमाएँ अन्तर्राष्ट्रीय सार्वभौम बनने वाला हैं। इतने आँदोलन को सुगठित और सुव्यवस्थित बनाकर बना होगा। जहाँ भी सार्वजनिक जीवन के लिए हो वहाँ महिला जागरण अभियान की शाखाएँ इतनी स्थापित करली जानी चाहिए।

कहा जा चुका है आरम्भ में प्रथम भूमिका नर की भूमिका नारी की होगी। शाखा संगठन खड़ा करने उसे स्वावलम्बी गतिशील बनाने तक का उत्तरदायित्व उन्हें ही निभाना होगा। घायल नारी आज की स्थिति में अकेली इतना बड़ा साहस नहीं कर सकती। बहुत कम ही स्त्रियाँ ऐसी होंगी जो अपने बलबूते इस प्रकार के संगठन खड़े कर सकें और उन्हें उत्साहपूर्वक चला सकें। लोकमंगल में अभिरुचि रखने वाले सृजन सैनिकों को अपने घरों की महिलाओं को ही इसके लिए आगे धकेलना होगा। उन्हें प्रोत्साहन प्रशिक्षण, मार्ग-दर्शन, अवकाश देते हुए इसके लिए अन्य सभी साधन जुटाने होंगे।

संगठन की ‘सदस्य’ तो महिलाएं ही होंगी, पर सहायक सभ्य पुरुष भी हो सकेंगे। महिलाएँ अग्रिम मोर्चा सम्भालेंगी। कार्यक्रमों को स्वयं सम्भालेंगी। सहायक पुरुष पर्दे के पीछे रहकर सारी व्यवस्था करेंगे और साधन जुटायेंगे। पहला कदम ‘सदस्य’ और ‘सभ्य’ बनाने का हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य अपनी पत्नी बहिन, पुत्री या जो भी थोड़ी सक्रिय दिखाई पड़ें उन्हें सदस्य बनाये और स्वयं ‘सहायक’ बनें। कुछ लोग टोली बना कर निकल पड़ें और अपने प्रभाव परिचय क्षेत्र में दोनों प्रकार के सदस्य बना डालने का काम पूरा करलें। जो महिला सबसे अधिक सक्रिय कुशल और समय दे सकने वाली हो उसे ‘कार्य वाहक’ चुन लें और एक कोषाध्यक्ष भी चुन लें। अधिक पदाधिकारी न बनायें। ‘सदस्य’ और ‘सभ्य’ बनाने के लिए प्रतिज्ञा पत्र और उन्हें प्रमाणित करने वाले प्रमाण−पत्र छपाये गये हैं। बड़े साज के आकर्षक दुरंगे सदस्यता पत्रों और प्रमाण-पत्रों वाली दोनों पक्षों के लिए ‘सदस्य पुस्तकें’ छाप दी गई हैं। दोनों में 25-25 फार्म हैं। मूल्य सवा-सवा रुपया हैं। इनकी जहाँ जितनी आवश्यकता हो वहाँ उतनी मँगा लेना चाहिए।

दोनों प्रकार के सदस्य जितने अधिक बन सकें प्रथम प्रयास में ही बना लिये जायं ताकि उनके सहारे शाखा आरम्भ की जाय। पीछे तो उनका बनना-बढ़ना जारी ही रहेगा। सदस्यों और सभ्यों के पूरे पते समेत लिस्ट तथा कार्यवाहक का नाम शाखा कार्यालय का स्थान तथा पत्र व्यवहार का पूरा पता हरिद्वार भेज देना चाहिए। जहाँ शाखा पंजीकृत करती जायेंगे और (1) पंजीकरण प्रमाण पत्र तथा (2) कार्यवाहक का नियुक्ति पत्र भेज दिया जायेगा। इतना कार्य हो जाने पर समझा जाना चाहिए कि शाखा संगठन की स्थापना का कार्य पूरा हो गया। आशा की जायगी कि बिना समय गँवाये पूरे उत्साह से यह कार्य किया जायेगा और अगले महीने तक जहाँ भी सम्भावना है वहाँ सुव्यवस्थित शाखाएँ स्थापित होने का कार्य पूरा कर लिया जायेगा।

आगे साप्ताहिक सत्संगों को नियमित रूप से चालू करने का दूसरा कार्य है। यह सत्संग एक स्थान पर हों या सदस्यों के घरों पर अदलते-बदलते यह स्वयं ही निर्णय करना चाहिए। सत्संगों में (1) सामूहिक रूप से 24 गायत्री मन्त्रों का पाठ। (2) आधा घण्टे में हो सकने वाला संक्षिप्त हवन। (3) रामायण की चौपाइयों एवं प्रेरक गीतों के आधार पर सहगान कीर्तन। (4) प्रवचन। वह चार कार्यक्रम सत्संगों के रहा करेंगे। इसके लिए आरम्भिक सत्संगों में महिलाओं को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। पीछे तो वे स्वयं ही अपना काम आप कर लिया करेंगी। उपरोक्त प्रयोजनों के लिए तीन नई पुस्तकें छाप दी गई हैं। (1) सर्वसुलभ हवन-विधि (2) रामायण, कीर्तन (3) सहगान कीर्तन। इन्हें इतनी संख्या में मँगाना चाहिए जिससे उपस्थित महिलाएँ मिल-जुलकर उच्चारण करने आ आधार प्राप्त कर सकें।

पीछे घर-घर रामायण कथा, सत्यनारायण कथा कहने तथा जन्म-दिन, पुँसवन, नामकरण, अन्न-प्राशन, मुण्डन और विद्यारंभ संस्कार कराने के आयोजन भी महिला सदस्याएँ ही किया करेंगी। इस आधार पर परिवार निर्माण के लिए आवश्यक प्रशिक्षण की शृंखला सुचारु रूप से चल पड़ेगी। इस प्रयोजन के लिए फिलहाल दो पुस्तकें छापी गई हैं-(1) सत्यनारायण व्रत की प्रेरणा (2) संक्षिप्त संस्कार एवं पर्व पद्धति।

सन् 75 में महिला जागरण अभियान के चार चरण पूरे करने का लक्ष्य हैं। (1) सुव्यवस्थित शाखा संगठन की स्थापना (2) साप्ताहिक सत्संगों की नियमितता (3) कथाओं और संस्कारों के माध्यम से परिवार प्रशिक्षण तथा धर्म परम्पराओं का पुनरुत्थान (4) महिला प्रौढ़ पाठशाला की स्थापना। तीसरे प्रहर दो से पाँच बजे तक का समय ही महिलाओं को अवकाश का मिलता है। उस समय पाठशालाएँ चलाई जानी चाहिए। उसमें उस मुहल्ले की महिलाओं को पढ़ने आने का क्रम चलाया जाय। अशिक्षित महिलाएँ साक्षर बनें। साक्षरता (1) संगीत (2) गृह उद्योग (3) लोक-व्यवहार के लिए उपयोगी सामान्य ज्ञान (4) व्यक्ति तथा समाज की प्रस्तुत समस्याओं का स्वरूप तथा समाधान। इन चार विषयों को पढ़ें। इन अति महत्वपूर्ण पाठ्य-क्रमों के लिए कुछ है समय में पुस्तकें छप जायेंगी। जून के अन्त तक संगठन सत्संग, प्रचार शृंखला के तीन कार्य चल पड़े तो आशा की जानी चाहिए कि 1 जुलाई से प्रौढ़ पाठशालाओं स्थापना सम्भव हो सकेगी। पाठशालाओं का वर्ष 1 जुलाई से ही आरम्भ हुआ करेगा।

शाखा के कार्यालय का बोध कराने वाला 20*1 साइज के चार रंगों के बने टीन के साइन बोर्ड में तैयार करा लिये गये हैं। सदस्य जब भी आयोजनों उपस्थित हों तब सीने पर बिल्ले लगा कर आवे इसलिए बिल्ले भी तैयार करा लिये गये हैं।

यह सभी वस्तुएँ छुट-पुट तैयार कराने में मंत्र पड़ती हैं। आवश्यकता तो इन सभी वस्तुओं की पड़ेगी ऐसी दशा में यही उचित समझा गया कि इन वस्तुओं को इकट्ठी ही तैयार करा लिया जाय और महिला शाखाएँ इन्हें आवश्यकतानुसार शान्ति-कुञ्ज से मँगाती रहें। इनके अतिरिक्त साप्ताहिक सत्संगों के लिए हवन उपकरण-प्रौढ़ पाठशालाओं के लिए विविध उपकरणों की जरूरत पड़ेगी। सदस्यता शुल्क तो कुछ रखा नहीं गया है। पैसे की आवश्यकता मिल-जुलकर मासिक चन्दा या मुट्ठी अनाज फण्ड, ज्ञानघट आदि से ही करना पड़ेगा। इसके लिए शाखाओं द्वारा प्रयुक्त होने वाली चन्दा वसूल करने की रसीद बहियाँ भी छपा दी गई हैं। प्रारम्भिक खर्च के लिए सामान्यतया 100) की राशि तो जमा कर ही ली जानी चाहिए। इसके लिए संगठन की स्थापना के साथ-साथ ही प्रयत्न आरम्भ कर दिया जाना चाहिए।

महिला जागरण अभियान का सूत्र संचालन हरिद्वार से हो राह है इसलिये तत्सम्बन्धी पत्र व्यवहार मथुरा के पते पर न किया जाय वरन् सम्बन्धित लिखा-पढ़ी महिला जागरण अभियान, शान्ति-कुञ्ज पो0 सप्त सरोवर हरिद्वार के पते पर की जाय।

शान्ति-कुञ्ज में महिला एवं कन्या प्रशिक्षण की व्यवस्था अब और भी अधिक सुनियोजित ढंग से कर दी गई हैं। महिलाओं की शिक्षा तीन-तीन महीने की है। कन्या शिक्षा का पाठ्य-क्रम एक वर्ष रखा गया था, पर अत्यधिक आवेदन पत्र आने और सभी को अवसर देने की दृष्टि से वह समय घटाकर छह महीने का कर दिया गया है। एक सत्र जुलाई से दिसम्बर तक और दूसरा जनवरी से जून तक हर वर्ष हुआ करेगा। प्रथम सत्र में जिन्हें अपनी कन्याएँ भेजनी हों वे इसके लिए छपा आवेदन पत्र मँगालें। महिलाओं की सीटें दिसम्बर 75 तक पूरी हो चुकी है। अब नये आवेदन पत्रों का प्रवेश जनवरी 76 से ही सम्भव होगा। यह शिक्षण सत्र गत वर्ष इतने अधिक उपयोगी सिद्ध हुए हैं कि परिवार के सभी स्वजन अपने घरों की महिलाओं को भेजने के लिए अत्यधिक उत्सुक हैं। छः महीने की कन्या शिक्षा के बारे में ऐसी ही उत्साह वर्धक प्रतिक्रिया सामने आवेगी।

महिला जागरण अभियान के संदर्भ में जो साहित्य एवं उपकरण अभी-अभी तैयार हुए हैं उनकी सूची इस प्रकार हैं-(1) सदस्याओं के प्रतिज्ञा पत्रों तथा प्रमाण पत्रों की 25 पृष्ठों वाली बड़े साइज की पुस्तक 1) 25 (2) सहायक सभ्यों के प्रतिज्ञा पत्र तथा प्रमाण पत्रों की 5 पृष्ठों वाली बड़े साइज की पुस्तक 1) (3) चन्दा वसूल करने की 50 पृष्ठ वाली पुस्तक 1) रु. (4) आठ पृष्ठ की दुरंगी छपाई वाली बीस प्रचार पुस्तकों का सैट 2) (5) सहगान कीर्तन-1) 50 (6) रामायण परायण 1) (7) नई संक्षिप्त हवन-विधि 50 पैसा, (8) संक्षिप्त संस्कार पद्धति 40 पैसा, (9) सत्यनारायण व्रत की प्रेरणा 1) (10) शाखा कार्यालय पर लगाने का 20*15 साइज की टीन बोर्ड 2) 50 (11) सदस्यों के बिल्ले 1) 50 पैसे।

यह सभी सामग्री बहुत सस्ती साथ ही भारी है। डाक से मँगाने पर लगभग मूल्य के बराबर ही डाक खर्च बैठ जायगा। साइन बोर्ड और बिल्ले तो डाक से जा ही नहीं सकते। इसलिए हरिद्वार आने जाने वालों के हाथ ही यह सामग्री मँगाई जानी चाहिए।

आशा की गई है कि अखण्ड ज्योति परिवार का प्रत्येक सदस्य महिला जागरण अभियान के लिए पूरी तत्परता व्यक्त करेगा। युग की इस महती आवश्यकता को पूरा करने में हम सब का भाव भरा साहसिक योग दान होना चाहिए।

अभियान में प्रत्येक परिजन दिलचस्पी ले

मनुष्य जाति की सर्वोपरि समस्या नारी पुनरुत्थान के लिए व्यापक प्रयत्न संगठित आन्दोलन के रूप में ही हो सकते हैं। इसके लिए अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों को कहा गया है कि वे अपने प्रभाव क्षेत्र की महिलाओं को आगे धकेलकर छोटा-मोटा शाखा संगठन खड़ा करने और नियमित साप्ताहिक सत्संग चल पड़ने तक उसका पूरा सूत्र संचालन करें। पीछे तो प्रगति अपनी गति से घूमने लगेगा, तदनुसार उनका उत्तरदायित्व भी हल्का हो जायेगा।

किन्तु ऐसे भी अनेक व्यक्ति हैं जो संगठन खड़ा कर सकने की स्थिति में नहीं है उनका अनुभव उत्साह इस दिशा में कम हैं फिर व्यस्तता या अन्य कारणों से वैसा करना उनके लिए सक्रिय रूप से अधिक कुछ कर सकना कठिन है। ऐसे व्यक्ति अपने घर परिवार को ही नारी पुनरुत्थान का छोटा घटक मान कर चल सकते हैं और उतने क्षेत्र में भी बहुत कुछ कर सकते हैं। परिवार में पुरुष भी होते हैं और स्त्रियाँ भी। पुरुष वर्ग अपने घर की नारियों को उनकी स्थिति के अनुरूप किसी न किसी प्रकार अधिक सुयोग्य, अधिक समर्थ बनने का मार्ग दर्शन करें तथा सुविधा सहयोग प्रदान करें। नारियाँ उस प्रयत्न में पूरी रुचि लें और प्रयत्न यह करें कि आज की अपेक्षा कल वे अधिक समर्थ, सक्रिय, सुयोग्य बन सकें, इस प्रकार प्रत्येक घर परिवार अपनी छोटी सीमा के सहज संगठन को नव जागरण आलोक की किरणों से आलोकित कर सकता है। इस स्तर का प्रयत्न तो हर भावनाशील व्यक्ति कर सकता है। अस्तु हम में से एक को भी यह कहने का अवसर नहीं रह जाता है कि हम इस अभियान में सम्मिलित हो सकने या उसमें सहायता कर सकने की स्थिति में नहीं हैं।

झोला पुस्तकालय चलाने की अपनी पुरानी परम्परा है और वह बहुत ही सफल हुई है। युग-निर्माण अभियान उसी माध्यम से सुविस्तृत क्षेत्र में फला है। वैसा प्रयास अब महिला जागरण अभियान को सुविस्तृत बनाने के लिए तत्काल आरंभ करना चाहिए। इस उद्देश्य के लिए 20 छोटी प्रचार पुस्तिकाओं का सैट बना दिया गया है। उसका मूल्य दो रुपया है। उसे नर और नारी अधिकाधिक संख्या में पढ़ेंगे, तो युगान्तर चेतना का प्रकाश निश्चित रूप से फैलेगा। हम लोग कुछ सैट अपने पास रखें। उन्हें अपने संपर्क क्षेत्र में पढ़ाने का क्रम बनावें। उन सैटों को बेचें, एवं वितरित करें। इस प्रकार अभियान की उपयोगिता, आवश्यकता की ओर जन साधारण का ध्यान जायेगा और उनमें उत्साहजनक प्रतिक्रियाएँ- हलचलें उत्पन्न होंगी।

एक छोटे घर परिवार के क्षेत्र में वे कार्य-क्रम बड़े रूप में नहीं चल सकते, जो शाखा संगठनों के द्वारा किये जाने हैं, पर वे छोटे रूप में, बीज रूप में, हर घर में प्रचलित हो सकते हैं। इस प्रकार हर परिवार मिशन की गति विधियों का एक छोटा घटक और केन्द्र रह सकता है तथा उतने क्षेत्र में भी नारी उत्कर्ष की हलचलें उत्पन्न कर सकता है।

इसके लिए भी नियमित निरन्तर मार्ग दर्शन आवश्यक होगा। इस क्षेत्र की अगणित समस्याएँ हैं जिनमें से कुछ अवाँछनीयताओं के निवारण से सम्बन्धित हैं और कुछ सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन के रूप में हैँ। इनका समाधान कैसे होना चाहिए इस संदर्भ में हमें बहुत कुछ जानना समझना होगा। प्रस्तुत प्रयोजन के लिए महिला जागरण हिन्दी मासिक पत्रिका 1 जुलाई से निकलने लगेगी। उसमें मात्र संगठन का सूत्र संचालन ही नहीं होगा वरन् प्रत्येक घर परिवार में क्या सोचा और क्या किया जाना चाहिए? इसका अति महत्वपूर्ण मार्ग दर्शन रहेगा। अस्त, उसकी उपयोगिता मात्र संगठनों को ही नहीं, प्रत्येक परिवार को रहेगी।

नारी पुनरुत्थान में जिन्हें तनिक भी दिलचस्पी है उन्हें दिशा एवं प्रगति के संबंध में अनेकानेक जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करने के लिए भी इस पत्रिका को पढ़ना चाहिए। प्रबुद्ध व्यक्ति चिन्तन एवं दिशा निर्धारण की दृष्टि से भी प्रस्तुत पत्रिका से बहुत कुछ प्राप्त कर सकते हैं। इस प्रकार जो कुछ भी नहीं कर सकते, पर अभियान में दिलचस्पी रखते हैं उनके लिए भी उसका वाचन आवश्यक है। कहना न होगा कि अब तक जिस घिसे-पिटे ढंग से महिला समस्या पर सोचा जाता रहा है- लिखा पढ़ा और किया जाता रहा है उसकी अपेक्षा अपना चिन्तन सर्वथा मौलिक और विशिष्ट स्तर का ही होगा और ऐसा होगा जिसमें हर किसी की रुचि होनी चाहिए। क्योंकि नारी समस्या हर किसी को कहीं न कहीं से निश्चय ही प्रभावित करती है। माता, पुत्री भगिनी और पत्नी के रूप में ही नहीं, मानव तत्व का आधा पक्ष होने के कारण नारी समस्त विश्व की एक अत्यन्त महत्वपूर्ण सता है। उस में दिलचस्पी रखना अपने आप में रुचि रखने का ही दूसरा नाम है।

इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह आवश्यक समझा गया है कि महिला जागरण पत्रिका के अधिकाधिक व्यक्ति सदस्य बनें। 1 जुलाई को ‘महिला जागरण’ पत्रिका का प्रथम अंक शान्ति कुञ्ज के अपने युगान्तर चेतना प्रेस से छपकर प्रकाशित हो जायेगा। इसका उत्साहवर्धक स्वागत होना चाहिए। वार्षिक चन्दा 6 रुपये हैं। पृष्ठ भी उतने होंगे जितने कि अधिक पैसे भी अधिक से अधिक दिये जा सकते हैं। सुन्दर बनाने का यथा सम्भव प्रयत्न किया जायेगा। उसे उतनी संख्या में छापा जायगा जितने कि ग्राहक होंगे। फालतू छपा कर रख लेने से जो घाटा पड़ेगा उसे सह सकना कठिन है। ऐसी दशा में यही उचित समझा गया है कि जिन्हें उसका सदस्य बनना हो वे अभी से अपने नाम नोट करादें अथवा सदा भेज दें। यह कार्य अप्रैल मई में पूरा हो जाय तो 1 जून से पत्रिका उतनी ही छपनी आरम्भ कर दी जायगी, जितने कि नाम नोट हो चुके होंगे।

शाखा संगठनों को दो-दो प्रतियाँ महिला और पुरुष सदस्यों के लिए कहा गया है उसे तो अनिवार्य ही माना जाय। शेष इस अभियान से रुचि रखने वाले सज्जन व्यक्तिगत रूप में उसे मँगाने और अपने घर परिवार को अभियान के प्रकाश से आलोकित करने का प्रयास कर सकते हैं। आशा है प्रस्तुत पत्रिका की ग्राहक सूची अप्रैल और मई में पूरी हो जाय। इसके लिए सभी परिजन उत्साह पूर्वक सहयोग देंगे।

रामायण प्रधान वानप्रस्थ सत्र

गत दो वर्षों से शान्ति कुञ्ज में वानप्रस्थ सत्र सफलता पूर्वक चल रहें हैं। प्रशिक्षित वानप्रस्थों ने उपलब्ध ज्ञान के आधार पर अपने निजी व्यक्तित्वों को असाधारण रूप से प्रतिभा सम्पन्न बनाया है और अपने-अपने क्षेत्रों में इतना कार्य किया है जिसे उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं का प्रत्यक्ष प्रमाण एवं सुनिश्चित आश्वासन कहा जा सकता है।

वानप्रस्थ प्रशिक्षण के माध्यम से जन-मानस का भावनात्मक नव निर्माण करने में जो असाधारण योगदान मिल रहा है उसे देखते हुए यह आवश्यक समझा गया है कि इन सत्रों को यदा-कदा करते रहने से काम नहीं चलेगा, वरन् उसे स्थायी बनाने से ही समय की माँग पूरी करनी होगी। आज ऐसे असंख्य कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है जो अपने उज्ज्वल चरित्र और उत्कृष्ट सेवा साधना से युग परिवर्तन धर्मचक्र को तेजी से घुमा सकें। उन्हें तैयार करने में वानप्रस्थ परम्परा को अधिकाधिक प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है। अस्तु शान्ति कुञ्ज की वानप्रस्थ शिक्षण प्रक्रिया को स्थाई बनाया जा रहा है और उसमें थोड़े उत्साहवर्धक हेर-फेर किये गये है।

अब तक वह शिक्षण दो महीने का था। एक महीना हरिद्वार में शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती थी और एक महीने कार्य क्षेत्र में व्यावहारिक सेवा शिक्षण के लिए जाना पड़ता था। दो महीने में शिक्षा पूरी होती थी। अब आगे से डेढ़ महीने शिक्षा प्राप्त करनी होगी और कार्य क्षेत्र में जाना अपनी सुविधानुसार कभी भी अब या फिर कभी पूरा किया जा सकेगा। बाहर जाने को स्वेच्छा विषय बना दिया गया है। शिक्षण एक महीने का वर्तमान बढ़े हुए पाठ्यक्रम के अनुसार कम पड़ता था अस्तु उसे डेढ़ महीने का कर दिया गया है।

भविष्य में अपना अधिकांश लोकशिक्षण रामायण और भागवत के माध्यम से हुआ करेगा। भगवान राम और भगवान कृष्ण का अवतरण भी उसी प्रयोजन के लिए हुआ था जिसके लिए अपने समय में युग-निर्माण योजना कार्य हो रहा है। अभी रामायण को हाथ में लिया गया है अगले वर्ष भागवत द्वारा लोक शिक्षण का ढाँचा खड़ा कर दिया जायेगा।

रामायण में तुलसीकृत रामचरित मानस को प्रधान आधार रखा गया है। साथ ही वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण का भी आवश्यक समावेश कर दिया हैं। जगह-जगह प्रातःकाल रामायण की साप्ताहिक हुआ करेंगी और साथ ही सायंकाल रामायण सम्मेलनों जैसी प्रवचन व्यवस्था सार्वजनिक सभा के रूप रहा करेगी। अन्तिम दिन गायत्री यज्ञ हुआ करेगा। विषय में युग निर्माण शाखाएँ अपने वार्षिकोत्सव प्रायः प्रकार सम्पन्न किया करेगी। इन आयोजनों में जाकर के शिक्षण की आवश्यकता शान्ति कुञ्ज के प्रशिक्षित वानप्रस्थों की जोड़ी भली प्रकार पूरी कर दिया करेगी। मण्डलियाँ स्वेच्छा पूर्वक अपने घर, पड़ौस, गाँव तथा सत्र में भी रामायण प्रचार के माध्यम से युग निर्माण अभियान की जड़ें बहुत ही गहराई तक जमा देने का फल प्रयत्न करती रहेगी। इसके लिए किन्हीं शाखाओं आमन्त्रण की अथवा किसी बड़ी पूर्व तैयारी की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी। कभी भी कहीं भी यह रामायण सप्ताह नियोजित किये जा सकेंगे। वर्तमान शाखाओं के सीमित क्षेत्र तक अवरुद्ध न रह कर जनसंपर्क का विशाल क्षेत्र पकड़ सकना इसी प्रकार सम्भव होगा।

इस प्रयोजन के लिए वानप्रस्थों का प्रशिक्षण इस वर्ष रामायण के मध्यम से किया गया है जिन्हें संस्कृति का भी ज्ञान होगा, उन्हें अगले वर्ष में भागवत भी पढ़ाई जाने लगेगी। रामायण सप्ताह का कथा-वाचन तथा युग की समस्याओं का स्वरूप तथा समाधान प्रस्तुत करने वाले रामायण के माध्यम से दिये जाने वाले भाषण दे सकना इस शिक्षण का मुख्य पाठ्यक्रम है, साथ ही भाषण-शैली निखारने का निरन्तर अभ्यास करना होगा। इतना संगीत सिखा देना भी इसी प्रशिक्षण में जुआ हुआ है जिसके सहारे चौपाइयाँ, दोहे तथा कीर्तन हारमोनियम, खंजरी, तबला, मजीरा, घुंघरू, इकतारा आदि वाद्य यन्त्रों के सहारे गाये जा सकें। संगीत शिक्षा के लिए छः सप्ताह कम है और वह उपयुक्त कण्ठ और दिमागी पकड़ न होने पर हर किसी के लिए सम्भव भी नहीं है तो भी यह प्रयास किया जायेगा कि अपनी योग्यता के अनुरूप शिक्षार्थी जितना अधिक संगीत ज्ञान प्राप्त कर सकें, उन्हें उसके लिए पूरा-पूरा अवसर सरलतम शिक्षण पद्धति के सहारे उपलब्ध कराया जाय। रामायण के कथा-प्रसंग वैसे ही अपने देश में बहुत लोकप्रिय हैं, उनमें साथ-साथ संगीत का समावेश रहने से आकर्षण और भी अधिक बढ़ जायेगा। लोकमंगल के साथ लोकरंजक के इस अभिनव प्रयास में सफलता की बहुत बड़ी आशा किरणें छिपी हुई हैं।

गायत्री हवन पद्धति, संस्कार प्रक्रिया, पर्व पद्धति, सत्य नारायण कथा आदि धर्म तन्त्र से लोक निर्माण की शिक्षाएँ साथ-साथ चलेंगी और सिखाया जायगा कि व्यक्ति परिवार और समाज की अभिनव रचना के लिए बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्रान्ति के लिए, क्या और कैसे प्रचारात्मक रचनात्मक एवं संघर्षात्मक कदम उठाये जाने चाहिये।

कहना न होगा कि यह प्रशिक्षण सृजन सेना के प्रत्येक सैनिक को अनिवार्य रूप से प्राप्त करना चाहिए। निज के व्यक्तिगत जीवन के परिष्कार और लोक मंगल के लिए अभीष्ट कुशलता प्राप्त करने के लिए यह सामयिक और कितना प्रभावोत्पादक है इसे सहज ही प्रयोग की कसौटी पर भली-भाँति परखा जा सकता है। जीवन साधना के महत्वपूर्ण तथ्यों का समावेश रहने से इन सत्रों की उपयोगिता और अधिक बढ़ गई है।

सामयिक वानप्रस्थ युग के अनुरूप एक अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, अमुक समय तक साधु ब्राह्मण की पुण्य परम्पराओं का निर्वाह करके फिर अपने सामान्य जीवन में लौट जाना तथा समय-समय पर उस व्रत को धारण करके अपनी आत्मिक स्थिति तपस्वी, अनुष्ठानकर्ता जैसी बनाते रहना, आत्मिक प्रगति का क्रमिक विकास करने की दृष्टि से हर दृष्टि से उपयोगी हैं। जिन्हें वर्ष में एक दो महीने का भी समय इस प्रयोजन के लिए मिल सकें उन्हें बड़भागी कहा जायेगा। ऐसे लोग अपने परिवार में बहुत हो सकते हैं। उन्हें इन रामायण बहुल, वानप्रस्थ सत्रों में आग्रह पूर्वक आमन्त्रित किया जा रहा हैं।

इन दिनों प्रथम सत्र 16 मई से 20 जून तक दूसरा सत्र 1 जुलाई से 15 अगस्त तक और तीसरा सत्र 16 अगस्त से 30 सितम्बर तक हैं। फिलहाल तीन सत्रों की ही घोषणा की गई है। वे यों चलेंगे तो आगे भी, पर उनकी तारीखें पीछे घोषित की जायगी। आने के इच्छुक अभी तो इन तीन में से जिसमें आने की सुविधा हो उन्हीं में आने के लिए आवेदन पत्र भेजें। आवेदन−कर्त्ताओं का शारीरिक, मानसिक दृष्टि से निरोग निर्व्यसनी और अनुशासन प्रिय होना आवश्यक है।

दस−दस दिवसीय साधना सत्रों की शृंखला 3 जुलाई तक चलेगी। कुछ समय बन्द रहने के उपरान्त अक्टूबर में उसके तीन सत्र फिर होंगे।

शिक्षार्थियों को छोटे बच्चे साथ लेकर चलने के लिए पहले से ही कठोर प्रतिबन्ध है अब अशिक्षित महिलाओं को साथ लाने या उनकी स्वीकृति माँगने पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। बच्चों से व्यस्त प्रशिक्षण प्रक्रिया में गड़बड़ी फैलती है और अशिक्षित महिला कुछ सीख समझ न पाने के कारण व्यर्थ ही जगह घेरती हैं यह प्रतिबन्ध बार−बार दुहराया जाता रहा है कि शान्ति कुञ्ज में धर्मशाला जैसी ठहरने की व्यवस्था नहीं है। पर्यटक, दर्शनार्थी, मिलने भेंटने के इच्छुक पहले ठहरने का अन्यत्र प्रबन्ध करें, पीछे एक से पाँच बजे के बीच मिलने के लिए आयें। आशा है कि विवशता को ध्यान में रखते हुए इस अनुरोध का उल्लंघन करके हमें असमंजस में न डालेंगे।

गायनों और प्रवचनों के टेप

टेप रिकार्डर के माध्यम से प्रेरक संदेश जन−जन तक पहुँचाने की प्रक्रिया अब व्यवस्थित रूप से चल पड़ी है। इस वर्ष के लिए दस गायन और इस प्रवचन प्रसारित किए गये हैं। गायन शान्ति कुञ्ज की कन्याओं द्वारा गाये गये है और प्रवचन गुरुदेव के हैं।

गीतों के बोल हैं− (1) युग युग से हम खोज रहे हैं सुरपुर के भगवान को (2) जिसने सुपन्थ दिखाया करें उस व्यक्ति का जयकार (3) घर घर में निराली ज्योति जले (4) जोश न ठण्डा होने पाए कदम मिलाकर चल (5) हम धनी न चाहे हों धन के पर हृदयधनी होवें (6) है अगर प्रभु प्रेम पाना तो हृदय में प्यार भरलो (7) एक दिन ही जी मगर इंसान बन कर जी (8) कहाँ छुपा बैठा है अब तक वह सच्चा इंसान (9) जीवन के बुझते दीपों में हम फिर नव ज्योति जलायेंगे (11) नर से नारायण बन जायें।

प्रवचनों के शीर्षक है−(1) जीवन लक्ष्य और उसका स्वरूप (2) समस्त समस्याओं का एक ही हल (3) हम बदलें तो दुनिया बदले (4) व्यक्ति निर्माण के 3 आधार (5) परिवार निर्माण की अनिवार्यता (6) समाज निर्माण का उत्तरदायित्व (7) महिला जागरण और उसकी आवश्यकता (8) महिला जागरण अभियान का स्वरूप और कार्य पद्धति (9) विवाहोन्माद (10) स्वच्छ प्रजातन्त्र की स्थापनाएँ हमारी भूमिका।

इन्हें कोई भी परिजन अपने टेपों पर उतार कर ले जा सकते हैं। जो डाक से भेजेंगे उन्हें उतार कर डाक से ही वापिस भेज दिया जायगा। भेजने का डाक खर्च देना होगा।

अपने टेप रिकार्डर कैसेट प्रणाली के हैं। अतः केवल कैसेट टेपों पर ही प्रवचन तथा गीत टेप करके भेजे जा सकते हैं। जिनके पास स्थूल प्रणाली के टेप रिकार्डर है उन्हें अपनी मशीन रिकार्डिंग के लिए शान्ति कुञ्ज भेजनी होगी। कैसेट 90 मिनट वाले ही होने चाहिए क्योंकि भाषण 45-45 मिनट के हैं। सी 90 टेपों में एक ओर एक भाषण ठीक प्रकार आ जाते हैं।

एक बात और ध्यान रखी जाय। टेप सभी मैगनेटिक होते हैं। उन्हें लोहे के डिब्बे अथवा अलमारी में नहीं रखना चाहिए। उनके पास लोहे की वस्तुएँ भी नहीं रखनी चाहिए। अन्यथा टेपों में भरी आवाज खराब हो जाती हैं। टेप शान्ति कुञ्ज भेजने में भी डिब्बों का प्रयोग न किया जाय।


पूजित वर्चस्व


पूजित वर्चस्व (kavita

विश्व हितों में जो बढ़कर मिटने की हिम्मत दिखलाएगा। उसका ही वर्चस्व जगत में युग-युग तक पूजा जाएगा।।

आया है संक्रांति काल कलियुग को अब जाना ही होगा। उसकी जगह नये सत् युग को और आज आना ही होगा।।

पर वह होगा तभी मनुज जब कर्म क्षेत्र में उतर पड़ेगा। औ निज श्रम से आगत युग की मनभावन नव मूर्ति गढ़ेगा।।

याद करेगा विश्व सदा उसको- जो ‘अब’ आगे आएगा। उसका ही वर्चस्व जगत में युग-युग तक पूजा जाएगा।।

माना कठिनाई होती है पहले पहल जूझ जाने में। माना, कुछ हिम्मत गिरती है, अपना ही बल अजमाने में।।

किन्तु जिन्दगी की परिभाषा ही संघर्ष और हिम्मत है। सत्प्रयास में मिट जाता जो, उसकी ही स्मृति चिर-शाश्वत है।।

निश्चय ही वह सफल बनेगा जो अपना बल अजमायेगा। उसका ही वर्चस्व जगत में युग-युग तक पूजा जायेगा।।

यदि अपने जलने से सौ प्राणों को नव ऊष्मा मिलती हो। यदि अपने से किसी हृदय की मुरझाई कलिका खिलती हो।।

तो हंसते-हंसते मिटने में- सच मानो सुख बहुत बड़ा है। बहुत सरल यह कार्य- मात्र लगता है जैसे बहुत बड़ा है।।

त्यागपूर्ण साहस से नवयुग का इतिहास लिखा जाएगा। उसका ही वर्चस्व जगत में युग-युग तक पूरा जाएगा।।

*समाप्त*