अनादि काल से सृष्टि कर्म की धुरी में घूमती चली आ रही है। विश्व में कर्म को ही प्रधानता दी गई है, जो जैसा कार्य करता है; उसी के अनुरूप उसे फल भी भोगना पड़ता है। संसार एक कर्म भूमि है। यहाँ आकर मनुष्य जैसा बोता है उसे वैसा ही काटना पड़ता है।
अन्तःकरण रूपी खेत में विचार, बीज स्वरूप होते हैं। यही विचार अंकुरित होकर कर्मरूपी फसल का रूप धारण करते हैं। व्यक्ति जिस तरह के विचारों को मन में आश्रय देता है वे ही पुष्पित तथा पल्लवित होते रहते हैं तथा इस संसार में जो भी सुख-दुख की परिस्थितियाँ हमें दृष्टिगत होती है वह कुछ और नहीं हमारे ही बुरे या अच्छे विचारों का परिणाम होती है।
यदि कोई किसान अपने खेत में धान बोये और गेहूँ की फसल काटना चाहे तो यह उसी प्रकार असम्भव है जैसे व्यक्ति बुरे कर्म करके भगवान से यह आशा लगाये कि उसका जीवन सुखी एवं समृद्ध बने।
जीवन को श्रेष्ठ एवं समुन्नत बनाने के लिए यह आवश्यक है कि हम नित्यप्रति के जीवन में उच्च विचारों की दिव्य-ज्योति से अन्तःकरण को अलोकित करते रहे। मनुष्य महानता से उत्पन्न हुआ है; उसका लक्ष्य महान होना चाहिए। इसके लिए मनुष्य को कर्मरूपी गांडीव लेकर अपने मन में नित्यप्रति उत्पन्न होने वाले विकारों से युद्ध करना चाहिए और अपने को शुद्ध एवं सात्विक बनाते चलना चाहिए। शुभ कर्म तथा विचारों वह सीढ़ी है जिसका सहारा लेकर चढ़ने से मनुष्य उच्च आदर्शवादी एवं महान बन सकता है।
ईश्वर का द्वार सबके लिए समान रूप से खुला है। उसमें जो भी चाहे प्रवेश कर सकता है।
सूरज नित्य उदय होता और अपनी राह चला जाता है। हम चाहें तो धूप में पहुँचकर उससे मिल सकते हैं। यदि घर में बैठे रहे और आंखें बन्द करलें तो फिर उससे मिलना कठिन है। सूर्य से कृपा की याचना व्यर्थ है वह तो अनवरत रूप से बरसा ही रहा है। बन्द तो हमने अपने दरवाजे और अपनी आंखें कर ली है। खोलना इन्हीं को है। कृपा तो अपने ऊपर अपने आपको करनी है। अन्धा यह सोचे कि मेरी आंखें ठीक है केबल दुनिया ही अंधेरी हो गई, तो फिर वस्तुस्थिति को समझना कठिन है। भगवान रुष्ट हो गये है और में अपनी स्थिति पर सन्तुष्ट है, यह माना जाता रहा तो फिर कोई समाधान मिल न सकेगा।
ईश्वर हमारे लिए अपरिचित है। हम केवल अपने परिचित अज्ञान और मनोविकारों को ही जानते हैं। परिचितों का स्वगत किया जाता है और अपरिचितों को आश्रय देने में संकोच पड़ता है। ईश्वर को अपने में आत्मसात करना अथवा अपने के उसमें घुला देना यह दोनों ही स्थितियाँ हमें अत्यन्त कठिन होती है; फिर परम प्रभु से मिलन कैसे हो।
हम ईश्वर को जिस गज से नापते हैं वह बहुत छोटा है। अपने गज से महामानवों तक को लोग न नाप सके, उनके रहते उनका उपहास और असहयोग करते रहे। फिर इतने विशाल परमेश्वर को अपना छोटापन रहते किस प्रकार जाने? उसे कैसे पावे? और कैसे अपनावें?
ईश्वर का स्वरूप है-’महानता’। इस विशाल ब्रह्माण्ड को उसकी एक छवि के रूप में देखा जा सकता है और इस सुविस्तृत विस्तार के अंतर्गत हो रही ज्ञात और अविज्ञात हलचलों को उस महासागर की तरंगें समझा जा सकता है। इसे प्राप्त करने का हमें अपनी संकीर्णता छोड़नी पड़ेगी और उतनी महानता अपनानी पड़ेगी जिसके सहारे उस महान परमेश्वर को देखा जा सके। गड्ढे में बैठकर छोटी-सी परिधि ही दिखाई देगी। समतल भूमि पर बैठ कर कुछ मील तक के दृश्य दृष्टिगोचर हो सकते हैं किन्तु यदि सुविस्तृत अंतरिक्ष की झाँकी करनी हो तो अधिकाधिक ऊंचाई पर पहुँचने और वहाँ से दृष्टि पसारने के अतिरिक्त और किसी प्रकार अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती।
हम जितने की संकीर्ण है, ईश्वर से उतनी ही दूर है। उदात्त दृष्टिकोण और उदार रीति-नीति अपनाकर ही उसके समीप पहुँचाने वाली मंजिल पर अग्रसर हो सकते हैं। छोटे पात्र में बड़े पदार्थ नहीं रखे जा सकते हैं। जितना सामान हो उसे रखने के लिए पात्र भी उतना ही बड़ा होना चाहिए। बड़ी जलराशि गहरे तालाब में ही भरी जा सकती है। ईश्वर महान है। महानता के रूप में ही उसकी स्थापना अन्तःकरण में हो सकती है। महामानवों को ही दूसरे शब्दों में ईश्वर भक्त कह सकते हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता की धुन्ध जितनी मात्रा में निरस्त करते हैं उतने ही स्पष्ट दर्शन भगवान के हो सकते हैं।
ईश्वर खुला आकाश है- कोई व्यक्ति नहीं। हम आकाश में उड़े उसका आँचल खुला पड़ा है। आकाश हमें खींचकर ऊपर नहीं उड़ायेगा। अपना लक्ष्य और प्रयत्न हो तो साधन बन जायेंगे।
समुद्र न तो नदियों को बुलाता है और न रोकता है। कोई नदी चाहे तो तालाब में रुक जाय। कोई चाहे तो बहती चले और समुद्र में मिल जाय। ईश्वर को प्राप्त करने के लिए उसे समझना आवश्यक है। मिन्नतें करके और मनौती मनाने की उलझी पगडंडी पर चलकर उस तक नहीं पहुँचा जा सकता। उदात्त चिन्तन और परिष्कृत व्यक्तित्व के राजमार्ग पर चलकर ही उस परम प्रभु तक पहुँचा जा सकता है; जिसे पाना हमारा जीवन-लक्ष्य है।
आत्मा क्या है? वह परमात्मा सत्ता का प्रतीक कैसे है? इन प्रश्नों का समाधान करते हुए केनोपनिषद में बड़ी मार्मिक चर्चा की गई है। जिज्ञासु पूछता है-
केनेषितं पतितं प्रेषितं मनः? केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः? केनेषिताँ वाचमिमाँ वदन्ति? चक्षुः श्रोत्रं क उ देवोयुनक्ति॥
अर्थात्- मन किसकी प्रेरणा से दौड़ाया हुआ दौड़ता है? किसके द्वारा प्रथम प्राण संचार सम्भव हुआ? किसकी चाही हुई वाणी मुख बोलता है? कौन देवता देखने और सुनने की व्यवस्था बनाता है?
मन अपने आप कहाँ दौड़ता है। आन्तरिक आकाँक्षाएं ही उसे जो दिशा देती है, उधर ही वह चलता है, दौड़ता है और वापिस लौट आता है। यदि मन स्वतन्त्र चिन्तन में समर्थ होता तो उसकी दिशा एक ही रहती। सबका सोचना एक ही तरह होता, सदा सर्वदा एक ही तरह का चिंतन बन पड़ता; पर लगता है पतंग ही तरह मन का उड़ाने वाला भी कोई और है, उसकी आकाँक्षा बदलते ही मस्तिष्क की सारी चिन्तन प्रक्रिया उलट जाती है। मन एक पराधीन उपकरण है- वह किसी दिशा में स्वेच्छा पूर्वक दौड़ नहीं सकता। उसके दौड़ने वाली सत्ता जिस स्थिति में रह रही होगी, चिन्तन की धारा उसी दिशा में बहेगी। मन को दिशा देने वाली मूल सत्ता का नाम ‘आत्मा’ है।
दूसरे प्रश्न में जिज्ञासा है कि माता के गर्भ में पहुँचने पर प्रथम प्राण कौन स्थापित करता है? उसमें जीवन संचार के रूप में हलचलें कैसे उत्पन्न होती है। रक्त-माँस तो जड़ है। जड़ में चेतना कैसे उत्पन्न हुई? यहाँ भी उत्तर वही है- वह आत्मा का कर्तृत्व है। भ्रूण अपने आप में कुछ भी कर सकने में समर्थ नहीं। माता-पिता की इच्छानुसार सन्तान कहाँ होती है? पुत्र चाहने पर भी कन्या गर्भ में आ जाती है। जिस आकृति-प्रकृति की अपेक्षा की उससे भिन्न प्रकार की संतान जन्म लेती है। इसमें माता-पिता का प्रयास भी कहाँ सफल हुआ। तब भ्रूण को चेतना प्रदान करने का कार्य कौन करता है? उपनिषद्कार इस प्रश्न के उत्तर में आत्मा के अस्तित्व को प्रमाण रूप में प्रस्तुत करता है।
मृत शरीर में प्राण संचार न रहने से उसके भीतर वायु भरी होने पर भी साँस को बाहर निकालने की सामर्थ्य नहीं होती। श्वांस-प्रश्वांस प्रणाली यथावत् रहने पर भी प्राण स्पन्दन नहीं होता। प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान प्राणों द्वारा शरीर और मन के विभिन्न क्रिया-कलाप संचालित होते हैं, पर महाप्राण के न रहने पर शरीर में उनका स्थान और कार्य सुनिश्चित होते हुए भी सब कुछ निश्चल हो जाता है। अंडों की स्थिति यथावत रहते हुए भी जिस कारण मृत शरीर जड़वत् निःचेष्ट हो जाता है वह महाप्राण का प्रेरणा क्रम रुक जाना ही है। इस सूत्र संचालक महाप्राण को ही ‘आत्मा’ कहते हैं।
तीसरा प्रश्न उत्पन्न होता है किसकी चाही हुई प्राणी मनुष्य बोलते हैं। निस्सन्देह यह कार्य मुख का नहीं है। शरीर और इन्द्रियों का भी नहीं है। यदि ऐसा होता तो भूखा होने पर पात्र-कुपात्र के आगे समय-कुसमय का ध्यान रखे बिना भोजन याचना की जाती है। कामुक आवश्यकता की पूर्ति के लिए किसी शील संकोच को आड़े न आने दिया गया होता। पर शरीर और मन की आवश्यकताओं को बहुधा रोककर रखा जात है। अन्तःकरण क्षुब्ध होने पर मुख से कटु वचन निकलते हैं और उत्कृष्ट स्थिति में अमृतोपम वाणी निसृत होती है। यदि वाणी स्वतंत्र होती तो वह तोता की तरह अभ्यस्त शब्दों का ही उच्चारण करती रहती। वाणी से विष और अमृत, ज्ञान और अज्ञान निसृत करने वाली अन्तःचेतना उससे पृथक और स्वतन्त्र है- उसी का नाम ‘आत्मा’ है।
आंखें किसकी प्रेरणा से देखती है, कान किसकी इच्छानुसार सुनते है? यह प्रश्न उपस्थित करते हुए यह देखा जा सकता है कि क्या आँखों में देखने की या कानों में सुनने की स्वतंत्र शक्ति है। निश्चित रूप से वह नहीं ही है। यदि होती तो मृतक या मूर्च्छित स्थिति में भी आंखें देखती और काम सुनते। ध्यान मग्न होने की स्थिति में आँखों के आगे से गुजरने वाले दृश्य भी परिलक्षित नहीं होते और कानों के समीप ही बात-चीत होते रहने पर भी कुछ सुना नहीं जाता। अनेक दृश्यों में से आंखें अपने प्रिय विषय पर ही टिकती है। कई तरह की आवाजें होते रहने पर भी काम उन्हीं पर केन्द्रित होते हैं जो अपने को प्रिय है। इन ज्ञान प्रधान काम और चक्षु इन्द्रियों में अपनी निज की क्रियाशीलता नहीं है, जिसकी प्रेरणा से वे सक्रिय रहते हैं वह सत्ता “आत्मा” की ही है।
दूसरे मन्त्र में ऋषि ने इन प्रश्नों का समुचित उत्तर स्वयं ही प्रस्तुत कर दिया है-
“श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्धाचो हवाज स उ प्राणस्य प्राणश्चक्षुषंतिमुच्य धीराः। प्रेत्यास्माल्लोकादंमृता भवन्ति।”
अर्थात्- कान में जो सुनने की शक्ति है, मन में जो मनन करने की शक्ति है, वाणी में जो बोलने की शक्ति है, प्राण में जो संचालन शक्ति है, आंखों में जो देखने की शक्ति है, वह देवात्मा ही जीवन का संचार करती है।
जब प्रश्न उत्पन्न होता है यह आत्मा आखिर है क्या? उसके उत्तर में ऋषि कहता है-
‘छायातपौ वेदविदो वदन्ति’।
अर्थात्- यह आत्मा धूप के साथ जुड़ी हुई छाया की तरह है। उसको अस्तित्व परमात्मा सत्ता पर अवलम्बित है। सूर्य की धूप चन्द्रमा को प्रकाशित करती है। चन्द्रमा की चाँदनी से धरती प्रकाशवान होती है। उसी तरह परमात्मा की सत्ता आत्मा पर प्रतिबिंबित होती है और फिर उसकी ज्योति इन्द्रियों को आलोकित करके उन्हें सम्वेदनाएँ अनुभव करने योग्य बनाती है।
यथार्थ ज्ञान के शोधकर्ता इन्द्रिय ज्ञान से ऊपर उठकर आत्म ज्ञान का प्राप्त करते हैं और फिर उससे ऊंची परमात्मा सत्ता में अपने आपको विलीन करते हुए ऊपर उठते हैं और अमृत को प्राप्त करते हैं। इस तथ्य का प्रतिपादन करते हुए उपनिषद्कार कहता है-
‘अतिमुच्य धीरा प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति’।
अर्थात्- आत्म-ज्ञानी, धीर पुरुष इन्द्रियों के प्रेरक जीवात्मा का अतिक्रमण करके इस लोक से अर्थात् जन-साधारण के द्वारा अपनायें गये निष्कृष्ट स्तर से ऊपर उठ कर अमृतत्व को प्राप्त करते हैं।
यहाँ अमृतत्व का अर्थ है अनन्त जीवन को मान्यता और तद्नुरूप दृष्टिकोण अपनाकर तद्नुरूप चिन्तन एवं कर्तृत्व का निर्धारण। लोग अपने का मरणधर्मा मानते हैं, तात्कालिक लाभों को अवाँछनीय होते हुए भी उन्हें ही सब कुछ समझ कर टूट पड़ते हैं और भविष्य को भूलकर उसे अन्धकारमय बनाते हैं। खाओ, पियो मौज उड़ाओ। कर्ज लेकर मद्यपान करते रहो की नीति अपना कर लोभ, मोह में ग्रसित वासना, तृष्णा के लिए आतुर मनुष्यों का दृष्टिकोण मरणधर्मा है। उसे अपनाने वाले जीवित मृतक है। इसके विपरीत जो अनन्त जीवन का भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए आज कष्ट उठाने की तपश्चर्या का स्वागत करते हैं वे दूरदर्शी विवेकवान् अमर कहलाते हैं अमृतत्व को प्राप्त होना इसी परिष्कृत दृष्टि-कोण को अपनाने के साथ जुड़ा हुआ है।
ऊपर धीर शब्द का उपयोग हुआ है। अध्यात्म शास्त्र में ‘धीर’ शब्द निर्विकारी के लिए और ‘मूढ’ सविकारी के लिए प्रयुक्त होता है। धृति को धर्म का प्रथम चरण इसीलिए माना गया है कि मनुष्य निर्विकार रह सकने की अपनी अविचल अध्यात्म निष्ठा का परिचय देता है। इसके विपरीत विकारों को अपनाने में उतावली करने वाले अधीर कहलाते हैं। उन्हीं अदूरदर्शियों को ‘मूढ’ संज्ञा दी गई है। “विकार हेतौ सति विक्रियन्ते येषाँ न चेताँसि त एव धीराः”।
अर्थात्- विकारग्रस्त होने की परिस्थितियाँ रहने पर भी अविचल बने रहते हैं वे ही ‘धीर’ है।
धीर व्यक्ति आत्मबोध प्राप्त करते हुए जिस परमात्म सत्ता में प्रवेश करते है; उसे इन्द्रियों से प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता। आत्मानुभूति ही उसे उपलब्ध करने का एकमात्र साधन है। यदि इन्द्रियों से उसे देखने का प्रयत्न किया जाय तो निराशा अथवा भ्रान्ति ही हाथ लगेगी। इस संदर्भ में केनेपनिषद का अगला प्रतिपादन है-
‘न नत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्यो न विजानीमो यथैतदनु शिष्यादन्य देव तद्धिदितादयों अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषाँ ये न स्तद्वया चचक्षिरे”।
अर्थात्- उसे आंखें नहीं देख सकती, वाणी नहीं कह सकती, मन नहीं जान सकता। हम नहीं जानते कि उसे जिज्ञासाओं को किस प्रकार समझाया जाय। हमने जो सुना जाता है उससे वह ब्रह्म विलक्षण है। वह इन्द्रियातीत होने पर भी नहीं है ऐसा नहीं कहा जा सकता।
वृहदारण्यक उपनिषद् में इसी तथ्य को दूसरे शब्दों में कहा गया है-
‘विज्ञातारं अरे किम् विजानीयात्’
अरे, उस जानने वाले को किसके सहारे जताया जाय?
सूर्य को दीपक से कैसे देखे? वह तो स्वयं ही प्रकाशवान है। प्रकाश को प्रकाश से देखने की क्या आवश्यकता? दृष्टि की सत्ता अनुभव करने के लिए नई बुद्धि कहाँ से लाई जाय? अंधेरे को देखने के लिए दीपक और अन्यान्य पदार्थों को जानने के लिए बुद्धि की आवश्यकता रहती है, पर दीपक और बुद्धि तो स्वयं ही प्रत्यक्ष है। प्रत्यक्ष को फिर किस प्रत्यक्ष से जाने?
हम है और इन्द्रियों को प्रेरणा देने वाले है- इन्द्रियों के कारण हम चैतन्य नहीं, वरन् हमारे कारण इन्द्रियों में चेतना है, यह जान लेने पर आत्मा का अस्तित्व प्रत्यक्ष हो जाता है। आत्मा पर मल आवरण विक्षेप के कषाय कल्मष चढ़ जाने से वह मलीन बनता है और दीन दयनीय दुर्दशाग्रस्त परिस्थिति में पढ़ा जकड़ा दुख भोगता है। मलीनता की इन आवरण परतों को उतार फेंकने पर उसका निर्मल स्वरूप प्रकट होने लगता है। दर्पण पर जमी हुई धूलि हटा देने से उसमें अपना प्रतिबिम्ब सहज ही देखा जा सकता है।
आत्म-साक्षत्कार इसी का नाम हैं- इसे ही परमात्मा का दर्शन एवं परब्रह्म की प्राप्ति कहते हैं। आँखों से किसी देवावतार के स्वरूप को देखने की लालसा एक भ्रान्ति मात्र है- जिसका पूरा हो सकना सम्भव नहीं। ईश्वर को धर्म चक्षुओं से नहीं, ज्ञान चक्षुओं से ही देखा जा सकता है। आंखें पंच भौतिक पदार्थों की बनी होने के कारण अपने सजातीय जड़ पदार्थों को ही देख सकती है। उनके लिए चेतन को उसकी गतिविधियों को देख सकना सम्भव नहीं न अन्य इन्द्रियों से उसकी अनुभूति हो सकती है। आत्मा को देख सकना तो दूर उसकी अनुभूतियों को प्रसन्नता-अप्रसन्नता, आशा-निराशा, स्नेह-द्वेष, संतोष-असन्तोष तक की इन्द्रियों से अनुभव नहीं किया जा सकता तब सर्वव्यापी नियामक सत्ता को-परमात्मा को इन्द्रियों से सहारे कैसे देखा सुना या जाना जा सकेगा?
आत्मा का परिष्कृत रूप ही परमात्मा है। जीवात्मा वह जो लोभ, मोह से- वासना, तृष्णा से प्रभावित होकर स्वार्थ-परता एवं संकीर्णता के बन्धनों में जकड़ा पड़ा है। अपना चिन्तन, कर्तृत्व शरीर और कुटुम्ब के भौतिक लाभों तक सीमित रखने वाला भव-बन्धनों में जकड़ा जीव है। मुक्त उसे कहा जायगा जिसने अपनेपन की, आत्म-भाव की परिधि को अधिकाधिक विस्तृत बना लिया है। जिसके लिए समस्त विश्व अपना परिवार है। समस्त प्राणी जिसके अपने कुटुम्बी है। औरों के सुख को अपना दुख मानकर जो उसके निराकरण का प्रयास करता है। औरों को सुख देकर सुखी होता है। अपने और औरों के बीच की दीवार तोड़कर सर्वत्र एक ही आत्मा का विस्तार देखता है वह दिव्यदर्शी ही दूसरे शब्दों में परमात्म दर्शी कहा जाता है। आत्मा का परिष्कृत एवं विकसित रूप ही परमात्मा है। परमात्मा स्तर को प्राप्त करना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है।
आदमी मर गया या अभी जीवित है, इसकी घोषित मान्यता यह है- कि मस्तिष्क काम करना बन्द कर दे। इलेक्ट्रॉन से फेलोग्राम (ई॰ ई॰ जी0) मस्तिष्कीय कम्पनों की हरकत अंकित करने से इनकार कर दे तो समझना चाहिए कि आदमी मर गया। ऐसे व्यक्ति को मृतक घोषित करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। चिकित्सा जगत की पूर्व मान्यता यही है। फ्राँस की नेशनल मेडिकल एकेडेमी के एक मृत्यु के फैसले को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए विधिवत यह घोषणा करनी पड़ी थी कि यदि किसी व्यक्ति का ई॰ ई॰ जी0 48 घण्टे तक लगातार निष्क्रियता प्रकट करता रहे तो उसकी ‘कानूनी मृत्यु’ घोषित की जा सकती है।
मृत्यु की परिभाषा करते हुए मस्तिष्क विशेषज्ञ डा0 हैनीवल, हैषलिन ने भी यही कहा था- मस्तिष्क की मृत्यु को अन्तिम मृत्यु कहा जा सकता है। हारवर्ड मेडिकल कालेज के डा0 राबर्ट एस॰ शवाव ने भी यही मत निर्धारित किया था कि यदि मस्तिष्क जबाब दे गया है तो हृदय का पम्प करके जीवित रखने का प्रयत्न करना बेकार है।
इस पूर्व मान्यता को झूठलाने वाली एक घटना अंकारा युनिवर्सिटी के डाक्टर ने स्वयं ही प्रस्तुत कर दी। डा0 रील 30 वर्ष के नवयुवक थे। वे एक मरीज का एक्सरे ले रहे थे कि गलती से बिजली का नंगा तार छू गये। जोर का आघात लगा और उनके दिमाग ने काम करना बन्द कर दिया। ई॰ ई॰ जी0 के हरकत न करने के आधार पर उन्हें मृतक घोषित कर दिया जाना चाहिए था, पर वैसा किया नहीं जा सका। क्योंकि उस हालत में भी उनके चेहरे पर और उंगलियों में हरकत पाई गई। उनकी आँखें खुली हुई थी और कभी-कभी पलक झपकते देखे गये। डाक्टरों ने उनके मुँह में नली डालकर पेट में बेबीफूड, फलों का रस, सीरस आदि पहुँचाया फलतः उनका दिल तक दूसरे अंग काम करते रहे।
इस विलक्षण जीवित मृतक को देखने के लिए अमेरिका, जापान, रूस, इंग्लैण्ड, फ्राँस और जर्मनी के डाक्टर हवाई जहाजों से अंकारा पहुँचे और यह देखकर चकित रह गये कि मस्तिष्क के पूर्णतया निष्क्रिय हो जाने पर भी डा0 रील पौधे की तरह जी रहे थे और उन्हें माँस का पौधा कहा जाने लगा। यों रोगी को जीवित तो न किया जा सका, पर आशा से बहुत अधिक दिनों तक वे जिये।
इससे इस नये सिद्धान्त की पुष्टि हुई कि मस्तिष्क का वह भाग जो ई॰ ई॰ जी0 की पकड़ में आता है उससे भी भीतर एवं उससे भी गहरी कोई और सत्ता है जो जीवन के लिए मल रूप से उत्तरदायी है। मस्तिष्क तो उस चेतना का एक औजार मात्र है।
जापान की कोवे युनिवर्सिटी के प्रो0 स्यूडा डा0 के किटो और डा0 सी0 आदाशी के त्रिगुट्ट ने मृत दिमाग का जीवित और जीवित को मृतक बनाने में एक नई सफलता प्राप्त की है। उन्होंने बिल्ली का दिमाग निकाल कर शून्य से 20 डिग्री नीचे शीत वातावरण में जमा कर रखा और 203 दिन बाद उसे धीरे-धीरे तापमान देकर पुनः सक्रिय किया। भय था कि आक्सीजन के अभाव में मस्तिष्क की कोशिकाएँ मर गई होगी और दिमाग निकम्मा हो गया होगा, पर वैसा हुआ नहीं। 203 दिन तक भी दिमाग जीवित रहा और उसे फिर सक्रिय बनाकर दूसरी बिल्ली में मस्तिष्क में फिट किया जा सका।
पिछले दिलों वैज्ञानिक क्षेत्रों में आत्मा के स्वतन्त्र अस्तित्व को अमान्य ठहराया जाता रहा है और कहा जाता रहा है कि मस्तिष्क ही आत्मा है और उसकी गतिविधियाँ समाप्त होने ही आत्मा का अंत हो जाता है। नास्तिकवादी मान्यता मनुष्य को चलता-फिरता, पेड़-पौधा भर बताती रही है और कहती रही है कि शरीर के साथ ही जीवन का सदा के लिए अन्त हो जाता है। पर विज्ञान की नवीनतम शोधों ने सिद्ध किया है- मस्तिष्क चेतना के प्रकटीकरण का एक उपकरण मात्र है मूल चेतना उससे भिन्न है और मस्तिष्कीय गतिविधियाँ समाप्त हो जाने पर भी वह अपना काम करती रह सकती है। यह आस्तिकवादी सिद्धान्त का प्रकारान्तर से समर्थन ही माना जायगा।
जो कुछ इन आँखों से देखते हैं क्या यही संसार है? इस प्रश्न का उत्तर हाँ में ही दिया जा सकता है, पर वह वस्तुतः नितान्त बालकों को ही होगा। वस्तुतः जो कुछ हम देखते हैं वह उन अस्तित्वों का अति स्वल्प अंश है जिसे हम देख नहीं सकते। न केवल खुली आँखों से वरन् सूक्ष्मदर्शी यन्त्र भी उन्हें देखने में ही नहीं अनुभव करने में भी असमर्थ रहते हैं।
कई बार दृश्य के अदृश्य में और अदृश्य के दृश्य में परिणत होने की घटनाएं घटित होती रहती हैं और वे इतनी विचित्र होती हैं कि उन्हें भूत-प्रेत, देवी-देवता की करतूत, सिद्धि चमत्कार अथवा अतीन्द्रिय चेतना की अनुमति आदि कहकर मन समझाना पड़ता है। वास्तविकता क्या है इसका सही पता लगा सकना और उन अद्भुत घटनाओं का समाधान करण विश्लेषण कर सकना प्रायः सम्भव नहीं हो पाता।
इस संदर्भ में आये दिन जहाँ-तहाँ घटित होने वाली घटनाओं में से दो इस प्रकार है-
(1) मनीला की यू0पी0 आई नामक प्रामाणिक समाचार एजेन्सी ने पूरी खोज बीन के पश्चात एक समाचार प्रकाशित कराया था कि- कार्नेलियो क्लोजा नामक एक बारह वर्षीय छात्र जब तक अनायास ही अदृश्य हो जाता है। स्कूल के क्लास से गायब हो जाना और दो-दो दिन बाद वापिस लौटना आरम्भ में लड़के की चकमेबाजी समझा गया। किन्तु पौधे उसके दिये गये ब्यौरे पर ध्यान देना पड़ा। वह कहता था कोई समवयस्क परी जैसी लड़की उसे खेलने के लिए अपने पास बुलाती हैं और वह रुई की तरह हलका होकर उसके साथ खेलने, उड़ने लगता है। पुलिस ने बहुत खोज की उस पर विशेष पहरा बिठाया गया। यहाँ तक कि उसके पिता ने कमरे में बन्द रखा तो भी उसका गायब होना रुका नहीं। पीछे किसी पादरी के मंत्रोच्चार से वह संकट दूर हुआ।
(2) फ्राँसीसी वैज्ञानिक सेलारियर जिनकी विश्वासनीयता पर किसी को उंगली उठाने का साहस नहीं हो सकता। उनने एक घटना का उल्लेख किया है- पैरिस की एक प्राचीन प्रतिमा की जब वैज्ञानिकों का एक दल परीक्षा कर रहा था तो वह मूर्ति देखते-देखते अदृश्य हो गई और उसके स्थान पर एक दूसरी विशालकाय मूर्ति आ विराजी जो पहली की तुलना में कही बड़ी थी।
यह घटना अभी बहुत पुरानी नहीं हुई हैं जिसमें टेनेसी राज्य के गालटिन नगर के एक घनी किसान डेविड लेंग के अचानक गायब हो जाने के समाचार ने दूर दूर तक आतंक पैदा कर दिया था और उस सम्बन्ध में भारी जाँच पड़ताल हुई थी। वह किसी जरूरी काम से घर से बाहर जा रहा था कि देखते-देखते आंखों के सामने से अदृश्य हो गया और फिर कभी नहीं लौटा। कोई ऐसी वजह भी नहीं थी जिससे वह जान-बूझकर भाग जाता। हँसता-हँसाता यह कहकर घर से निकला था कि “अभी दस मिनट में आता हूँ।” जिस स्थान से वह गायब हुआ था उसके आस-पास पंद्रह फुट के घेरे की घास बुरी तरह झुलस गई थी। पुलिस तथा दूसरे खोजी सिर तोड़ प्रयत्न करने पर भी उसका कुछ पता न लगा सकें।
ऐसी घटनाओं की विवेचना करते हुए वैज्ञानिक क्षेत्रों में कई प्रकार से चर्चा होती रहती है। अब विज्ञान इस निश्चय पर पहुँच चुका है। कि मनुष्य की इन्द्रिय चेतना के आधार पर विकसित बुद्धि जितना जान पाता है, दुनिया वस्तुतः उससे कहीं अधिक है। उसे न बुद्धि समझ पाती है और न मानव निर्मित यन्त्र ही उसे पूरी तरह पकड़ पाते हैं। फिर भी कुछ विशेष सूक्ष्म सम्वेदना वाले यन्त्र थोड़ी बहुत जानकारी कभी कभी देते रहते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि प्रत्यक्ष दर्शन न केवल अधूरा वरन् भ्रामक भी है।
हम नित्य ही सूर्य की ‘धूप’ को देखते हैं। पर सच यह है कि धूप कभी भी नहीं देखी जा सकती। उसके प्रभाव से प्रभावित पदार्थ विशेष स्तर पर चमकने लगते हैं, यह पदार्थों की चमक है। सूर्य किरणें जो इस चमक का प्रधान कारण है हमारी दृश्य शक्ति से सर्वथा परे है। अन्तरिक्ष में प्रायः पूरे सौरमण्डल को प्रकाशित एवं प्रभावित करने वाली धूप वस्तुतः सोलर स्पेक्ट्रमा-सौरमण्डलीय वर्ण क्रम है। उसे ऊर्जा की तरंगों एवं स्फुरणाओं की एक सुविस्तृत पट्टी कह सकते हैं। इस पट्टी में प्रायः 10 अरब प्रकार के रंग हैं। पर उनमें से हमारी आँखें लाल से लेकर बैंगनी तक एक एक रंग सप्तक की तथा उसके सम्मिश्रणों को ही देख पाती है। बाकी सारे रंग हमारे लिए सर्वथा अदृश्य अपरिचित और अकल्पनीय है।
अब हम कुछेक सूक्ष्म किरणों की कीन्हीं विशेष यन्त्रों की सहायता से देख समझ सकने में थोड़ा-थोड़ा समर्थ होते जाते हैं। जैसे धूप में “इन्फ्रारेड” तरंगें देखी तो नहीं जाती पर जलन के रूप में अनुभव होती है। इन किरणों का फोटोग्राफी में प्रयोग करके दुनिया का वास्तविक रंग विचित्र पाया गया है। घास-पात, पेड़-पौधे, वस्तुतः बिल्कुल सफेद हैं, आसमान समुद्र बिल्कुल काले। जबकि पंक्तियाँ हरी और आसमान तथा समुद्र नीले देखते हैं। इन किरणों की सहायता से अमेरिका ने क्यूबा में लगे रूसी प्रक्षेपणास्त्रों के फोटो हवाई जहाज में खीचते थे। आश्चर्य यह कि उसमें वे उन जलती सिगरेटों के फोटो भी आ गये जो 24 घण्टे पहले वहाँ के कर्मचारियों ने जलाई थी और वे तभी बुझ भी गई थी। दृश्य जगत में पदार्थ समाप्त हो जाने पर भी वह अन्तरिक्ष में अपनी स्थिति बनाये जा सकता है यह अजूबा हमें भूत और वर्तमान के बीच खिंची हुई लक्ष्मण रेखा से आगे बढ़ा ले जाता है। जो वस्तु अपने अनुभव के अनुसार समाप्त हो गई वह भी अन्तरिक्ष में ‘वर्तमान’ की तरह यथावत मौजूद हैं, हय कैसी विचित्रता है।
ट्रेवर जेम्स ने इन्फ्रारेड मूवी फिल्म के लिए प्रयुक्त होने वाले एक विशेष कैमरे आई॰ आर॰ 135 का उपयोग करके मोजाबें रेगिस्तान के अन्तरिक्ष की स्थिति चित्रित की है। फिल्म में ऐसे पक्षी दिखाई पड़ते हैं जो अपनी आँखों से कभी भी दिखाई नहीं पड़ते। जीवाणुओं की अपनी अनोखी दुनिया है वे मिट्टी घास-पात, पानी और प्राणियों के शरीरों में निवास करते और अपने ढर्रे की मजेदार जिन्दगी जीते हैं। पर हम उनमें से कुछ को ही सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से देख पाते हैं। बाकी तो इतने सूक्ष्म है कि किसी भी यन्त्र की पकड़ में नहीं आते किन्तु अपने क्रिया-कलाप बड़ी शान के साथ जारी रखते हैं।
शास्त्रकार ने उसे “अणोरणीयान् महतों महीयान्” कहा है। परमाणु से भी गहरी- उसकी संचालनकर्ती सूक्ष्मता को देखा और जाना तो नहीं जा सका पर उसका आभास पा लिया गया है। महतो महीयान की बात भी ऐसी ही है। विशालकाय ग्रहपिण्ड और निहारिका समुच्चय अत्यन्त विशाल है इतना विशाल जिसकी तुलना में अपना सौरमण्डल बाल बराबर भी नहीं हैं। फिर भी वह सब कुछ अधिक दूरी होने के कारण दीखता नहीं। रेडियो, दूरबीनें जिन आकाशीय पिंडों का परिचय देती हैं यह आँखों से देखे जा सकने वाले सितारों की तुलना में अत्यधिक विस्तृत हैं। आश्चर्य यह है कि यह रेडियो, दूरबीनें भी पूरी धोखेबाज है वे अब से हजारों लाखों वर्ष पुरानी उस स्थिति का दर्शन करती हैं जो सम्भवतः अब आमूलचूल ही बदल गई होंगी सम्भव है वे तारे बूढ़े होकर मर भी गये हों जो हमारी रेडियो, दूरबीनों पर जगमगाते दीखते हैं।
अल्ट्रा वायलेट फोटोग्राफी से ऐसे प्राणियों के अस्तित्व का पता चलता है जो हमारी समझ परख और प्रामाणिकता के लिए काम में लाई जाने वाली सभी कसौटियों से ऊपर है। इन प्राणियों को ‘प्रेत मानव’ अथवा ‘प्रेत प्राणी’ कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी। अब हमारे परिवार में यह अदृश्य प्राणधारी भी सम्मिलित होने आ रहे हैं। सूक्ष्म जीवाणु की तरह उनकी हरकतें और हलचलें भी अपने अनुभव की सीमा में आ जायेंगी।
हर्बर्ट गोल्डस्टीन ने अपने शोधर निबन्ध “प्राँपगेशन आफ शार्ट रेडियो वेव्स” में यह सिद्ध करने का प्रयत्न किये हैं कि वायुमण्डल में संव्याप्त अपवतानाँव प्रवणता के पर्दे से पीछे अदृश्य प्राणियों की दुनिया है। वह दुनिया हमारे साथ जुड़ी हुई है और दृश्यमान सहचरों से कम प्रभावित नहीं करती। वर्तमान सूक्ष्मदर्शी साधन अपर्याप्त हैं तो भी हमें निराश न होकर ऐसे साधन विकसित करने चाहिए जो इस अति महत्वपूर्ण अदृश्य संसार के साथ हमारी अनुभव चेतना का सम्बन्ध जोड़ सकें।
साधारणतया हमारी जानकारी पदार्थ के तीन आयामों तक सीमित है- लम्बाई चौड़ाई और ऊँचाई। अब इसमें “काल” को चौथे आयाम के रूप में सम्मिलित कर लिया गया है। आइंस्टीन ने अपने सापेक्षवाद सिद्धान्त की विवेचना करते हुए यह समझाने का प्रयत्न किया है कि यह भौतिक संसार वस्तुतः “संयुक्त चतुर्विस्तारीय दिक्−काल जगत” है। वे देश और काल की वर्तमान मान्यताओं को एक प्रकार से सापेक्ष और दूसरे प्रकार से अपूर्व अवास्तविक मानते हैं।
कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के डा. राबर्ट सिरगी अपने दल के साथ ऐसे उपकरण बनाने में संलग्न है जिनसे पदार्थ के चौथे आयाम को समझ सकना सम्भव हो सकें। वे कहते हैं जो हम जानते और देखते हैं उनसे आगे की गतियाँ और दिशाएँ मौजूद है, हम केवल तीन आयामों की परिधि में आने वाले पदार्थों का ही अनुभव कर पाते हैं जबकि इससे आगे भी एक विचित्र दुनिया मौजूद है। उस विचित्रता को समझे बिना हमारी वर्तमान जानकारियाँ बाल बुद्धि स्तर की ही बनी रहेगी। दृश्य का अदृश्य बन जाना और अदृश्य का दिखाई देने लगना मोटी बुद्धि से बुद्धि भ्रम अथवा कोई दैवी चमत्कार ही कहा जा सकता है। इतना होते हुए भी एक ऐसे सूक्ष्म जगत का अस्तित्व मौजूद हैं जो अपने इस ज्ञात जगत की तुलना में न केवल अधिक विस्तृत वरन् अधिक शक्तिशाली भी है। भूतकाल में उसे सूक्ष्म जगत एवं दिव्य लोक कहा जाता रहा हैं। उसमें पदार्थों का ही नहीं प्राणियों का भी अस्तित्व मौजूद है। वे प्राणी मनुष्य की तुलना में बहुत छोटे भी हो सकते हैं और बहुत बड़े भी। आवश्यकता एवं परिस्थितियाँ उनकी भी हो सकती है और जिस प्रकार हम उस सूक्ष्म जगत के साथ सम्बद्ध जोड़ने को उत्सुक है उसी प्रकार वे भी हमारे सहचरत्व के लिए इच्छुक हो सकते हैं। प्राणियों और पदार्थ का लुप्त एवं प्रकट होते रहना इन स्थूल और सूक्ष्म जगत के बीच होते रहने वाले आदान प्रदान का एक प्रमाण हो सकता है।
सुप्रसिद्ध विज्ञान काथा लेखन एच0जी0वेल्स ने अपनी एक पुस्तक “दि इन विजिविल मौन” अदृश्य मानव में उन सम्भावनाओं पर प्रकाश डाला है, जिनके अनुसार कोई अदृश्य वस्तुएं दृष्टिगोचर होने लग सकती है। इन विज्ञान की उन्होंने अपर्वतनाँक -रिफ्रैक्टिव इण्डिसेन्स - नाम देकर उसके स्वरूप एवं क्षेत्र का विस्तृत वर्णन किया है।
हम ज्ञात को ही पर्याप्त न माने। प्रत्यक्ष को ही सब कुछ न कहें। प्रस्तुत मस्तिष्कीय और यान्त्रिक साधनों को सीमित मानकर न चलें और जो अविज्ञात है उसकी शोध में बिना किसी पूर्वाग्रह के लगे रहें तो इस अणोरणीयान महतो महीयान जगत के वे रहस्य जानने की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं जो अभी तक नहीं जाने जा सकें।
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा था-” अहिंसात्मक स्वराज्य की कुँजी आर्थिक समानता है। हमारा उद्देश्य देश के मुट्ठी भर धन कुबेरों को नीचे लाना और करोड़ों भूखे नंगों को ऊपर उठाना है। स्वतन्त्र भारत में जबकि सबको समान अधिकार है, नई दिल्ली के भव्य भवनों और गरीब मजदूरों की झोंपड़ियों का अन्तर एक दिन भी नहीं चल सकेगा। अगर जन-हित के लिए स्वेच्छापूर्वक उस वैभव और अधिकार का त्याग नहीं किया गया तो निश्चय ही एक दिन भयंकर हिंसात्मक क्रांति होकर रहेगी।”
पृथ्वी से बाहर के ग्रह-नक्षत्रों में जीवन की संभावना पर चिरकाल से विचार होता चला आया हैं। उपलब्ध प्रमाण सामग्री के आधार पर दावे के साथ तो नहीं कहा जा सका, पर आशा यही बँध रही थी कि ‘जीवन’ अकेली पृथ्वी की ही बपौती नहीं हो सकता उसका अस्तित्व अन्यत्र भी हो सकता है और हैं।
इस दिशा में अधिक उत्साहपूर्वक प्रयास आरसिवाँ दक्षिण अमेरिका के प्यूरटोरिकन कस्बे में स्थापित एक वेधशाला के द्वारा प्रारम्भ हुआ हैं। इस वेधशाला एक नाम नेशनल एस्ट्रोनामी एण्ड आयनोस्फियर सेन्टर’ है। इसने 1000 फुट व्यास की रेडियो दूरबीन लगाई गई है और साथ ही शक्तिशाली रेडर ट्रान्समीटर फिट किये गए हैं। यह स्थापना अपने ढंग की अनोखी और अत्यन्त शक्तिशाली हैं।
नई नये दूरवीक्षण संयंत्र के सहारे अब बुध, शुक्र, मंगल और चन्द्रमा के कुछ हिस्सों को अधिक स्पष्ट रूप से देख सकना सम्भव हो गया हैं। इन दिनों मंगल की खोजबीन इसलिए की जार ही है कि अमेरिका अपना ‘वाइकिंग-ए राकेट सन् 1976 में मंगल को धरती पर उतारने का निश्चय कर चुका है। उसके उतरने का स्थान चुनने के लिए स्थान का चुनाव अभी से करना होगा।
इस संयंत्र द्वारा समस्त ब्रह्मांड के लिए सौरमण्डल का नक्शा, मानव शरीर की रचना और प्रकृतिगत परिस्थितियों की आरम्भिक जानकारी प्रसारित की गई है, ताकि यदि मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी कही रहते हों और उनका ज्ञान इसी सीमा तक विकसित हो गया हो तो वे इन संकेतों को समझकर तदनुकूल उत्तर दें और पृथ्वी से संपर्क बनाने का प्रयत्न में।
कारनेल विश्वविद्यालय की वेधशाला के निर्देशक और प्रस्ताव प्रयोग शास्त्री डा0 कार्ल एडवर्ड स्वाँगग विशेष रूप से प्रयत्नशील है। उन्होंने एक अंतर्गत ही भाषा के रूप में ‘मैसेज वायनरी’ का आविष्कार किया है जिसके सहारे रेडियो विज्ञान के जानकार किसी भी लोक में रहने वाले प्रेषित विचारों को समझ सकेंगे और उसी आधार पर उत्तर दे सकेंगे। यह भाषा चित्र प्रधान है।
हार्बर्ट विश्वविद्यालय के फिलिप मारसिन- शिकागो विश्वविद्यालय के स्टेनले मिलर के सहयोग से ऐसी प्रयोगशाला बनाना सम्भव हो गया है, जिसमें मंगल ग्रह जैसा वातावरण है उसमें ऐसे जीवाणुओं का विकास किया गया जो मंगल जैसी परिस्थितियों में निर्वाह कर सकें।
डा0 साँगा और रूस के अन्तरिक्ष विज्ञानी इबोसेफ शक्लोवस्की ने संयुक्त रूप से इस संदर्भ में एक पुस्तक लिखी हैं- ‘इस्ट्रिटेलिजेन्ट लाइफ इन दि युनिवर्स’ इसमें अन्तर्ग्रही जीवन की सम्भावना उसके स्वरूप एवं पृथ्वी निवासियों के साथ संपर्क के सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा गया है। यदाकदा उड़न तश्तरियों जैसे तथ्य सामने आते रहते हैं आर उनसे अंतर्ग्रही संपर्क का आभास मिलता है। ऐसे प्रमाणों की गहरी छानबीन करने में ‘अमेरिका ऐसोसिएशन फॉर दि एडवांसमेंट आप साइंस’ नामक संस्था संलग्न है, उसकी शोधें भी इन सम्भावना को बली देती हैं कि ब्रह्मांड में अन्यत्र भी जीवन है और कितने ही ग्रहों पर पृथ्वी से भी अच्छी स्थिति मौजूद हैं।
यह मान्य तथ्य है कि हम विकसित हो रहे हैं। अभी यह विकास क्रम विज्ञान के आधार पर भौतिक क्षेत्र में बढ़ा हैं और उसने कई प्रकार के सुख साधन प्रस्तुत किए हैं। अगले दिनों अध्यात्म सक्रिय होगा और विचारणा तथा भावना की विभूतियाँ भी उसे उपलब्ध होंगी। ज्ञान और विज्ञान का उभय-पक्षीय विकास हमें अपूर्णता से पूर्णता की ओर अग्रसर करेगा। इस मार्ग पर चलते हुए मनुष्य अपने अन्य सजातियों को इस निखिल ब्रह्माण्ड में कही न कही से खोज ही लेगा। जब ब्रह्मांडीय मानव चेतना एक जुट होकर कुछ अच्छा सोचने और कुछ अच्छा करने में प्रवृत्त होगी तो निश्चय ही यह संसार बहुत सुन्दर सुहावना दृष्टिगोचर होगा।
प्राण साधना योगशास्त्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। इसके लाभों का विस्तार, अणिमादि अगणित ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में किया गया है और ब्रह्मतेजस् के रूप में उसकी आध्यात्मिक उपलब्धियों की चर्चा की गई है प्राणायाम इस दिशा में प्रथम सोपान है। दुर्बल विकृत प्राण को बहिष्कृत कर उसके स्थान पर महाप्राण की स्थापना करना इस साधना का लक्ष्य है। संध्या वन्दन जैसे नित्यकर्मों का उसे अनिवार्य आधार इसलिए बनाया गया है कि इस प्रकार प्रारम्भिक परिचय तथा अभ्यास करते हुए क्रमशः आगे बड़ा जाय और प्राणवान बनते हुए जीवन लक्ष्य को पूर्ण करने की दिशा में अनवरत रूप से गतिशील रहा जाय।
प्राणतत्व समस्त भौतिक और आत्मिक सम्पदाओं का उद्गम केन्द्र हैं। वह सर्वत्र संव्याप्त है। उसमें से जो जितनी अंजलि भरने और उसे पीने का समर्थ होता है वह उसी स्तर का महामानव बनता चला जाता है। प्राण शक्ति का पर्यायवाची है। उसकी परिधि में भौतिक संपदाएं और आत्मिक विभूतियाँ दोनों ही आती हैं।
शारीरिक परिपुष्ट के रूप में ओजस्वी मनोबल सम्पन्नता के रूप में मनस्वी सामाजिक सहयोग सम्मान के रूप में यशस्वी और आत्मिक उत्कृष्टता रूप में तेजस्वी बन जाता है। यह चतुर्विधि क्षमताएं जिस मूल स्त्रोत में उत्पन्न होती हैं उसे प्राण शक्ति कहते हैं। प्राण साधना इन्हीं सिद्धियों का प्राप्त कर सकना सम्भव बनाती है।
प्राण की गरिमा और विवेचना का आर्ष ग्रन्थों में विशद वर्णन मिलता है। अथर्ववेद के प्राण सूक्त में आता है-
प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे, यो भूतः सर्वस्येश्वरों यस्मिन्त्सर्व प्रतिष्ठितम।
अर्थात्- उस प्राण को नमस्कार जिसके वश में यह सब कुछ है। जो सब प्राणियोँ का अधिष्ठाता है। जो सब में समाया है जिसमें सब समाये हैं।
अंग्रेजी में श्वास के अर्थ में प्राण का प्रयोग होता है। यह भ्रम शायद इसलिए पैदा हुआ कि प्राणायाम में श्वास प्रश्वास किया ही प्रधान होती है। रेचक, पूरक, कुम्भक, के माध्यम से प्राणायाम किया जाना है। उसमें साँस की अमुक क्रम से छोड़ने, खींचने की विधि की प्रमुखता रहने से प्राण को उसी रूप में समझ लिया गया है।
स्वामी विवेकानन्द ने प्राण की विवेचना ‘साइकिक फोर्स’ के रूप में की है। इसका मोटा अर्थ ‘मानसिक शक्ति’ हुआ। मोटे रूप में तो यह कोई मस्तिष्कीय हलचल हुई पर प्राण तो विश्व व्यापी है। यदि समष्टि को मन की शक्ति कहें य सर्वव्यापी चेतना शक्ति का नाम दें तो ही यह अर्थ ठीक बैठ सकता है। व्यक्तिगत मस्तिष्कों की प्रथम मानसिक शक्ति की क्षमता प्राण के रूप में नहीं हो सकती। सम्भवतः स्वामी जी का संकेत समष्टि मन की सर्वव्यापी क्षमता की ओर ही रहा होगा।
मानसिक एवं शारीरिक क्षमताओं के रूप में प्राण शक्ति के प्रकट होने का, प्रखर होने का परिचय प्राप्त किया जा सकता है, पर वह मूलतः वह इन सब जाने हुए विवरणों से कही अधिक सूक्ष्म हैं।
वैदिक साहित्य में प्राण के साथ वायु विशेषण भी लगा है, और उसे ‘प्राण वायु’ कहा गया है। उनका तात्पर्य ऑक्सीजन, नाइट्रोजन आदि वायु विकारों से नहीं वरन् उस प्रवाह से है जिसकी गतिशील विद्युत तरंगों के रूप में भौतिक विज्ञानी चर्चा करते हैं। अणु विकरण, ताप, प्रकाश आदि की शक्ति धाराओं के मूल में संव्याप्त सत्ता से कहा जा सकता है। यदि इसके अध्यात्म स्वरूप का विवेचन किया जाय तो अंग्रेजी का ‘लेटन्ट लाइट’ शब्द इसके लिए लगभग अधिक उपयुक्त बैठता है।
प्रश्नोपनिषद् में प्राण का उद्गम केन्द्र सूर्य को माना गया है-
स एष वैश्वानरो विश्व रुपः प्राणोऽग्निरुद यते। -प्रश्न0 1-7
यह भौतिक व्याख्या है। सभी जानते हैं कि पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति का श्रेय सूर्य किरणों को हैं।
स्थूल जगत की जीवनी शक्ति का केन्द्र सूर्य हैं। उसके पाँच प्राण पाँच तत्व है।
आदित्यों हवैं बाह्यः प्राण उदयत्येष ह्रोनं चाक्षुयं प्राण। मनु गृहणानः पृथिव्याँ या देवता सैषा पुरुष-स्थापना। मवष्टभ्यन्तरा यदाकाशः स समानो वायु व्यनिः तेजो हवै उदानः। -प्रश्नोपनिषद्
यह सूर्य ही बाह्य प्राण है। उदय होकर दृश्य जगत की हलचलों को क्रियाशील करता है। इस विश्व रूपी शरीर को यह सूर्य का महाप्राण ही जीवन्त रखता है। पाँच तत्वों में वह पाँच प्राण बनकर संव्याप्त हैं।
प्राण को तत्वदर्शियों ने दो भागों में विभक्त किया है- (1) अणु (2) विभु। अणु वह जो पदार्थ जगत में सक्रियता बनकर परिलक्षित होता है। विभु वह जो चेतन जगत में जीवन बनकर लहलहा रहा है। इन दो विभागों को अधिदैविक, कास्मिक और आध्यात्मिक माइक्रो कास्मिक अथवा हिरण्य गर्भ कहा जाता है।
आधि दैविकेन समष्टि व्याधि रूपेण हैरण्य गर्भेण प्राणात्मनैवैतद् विभुत्व माम्नायते नाध्यात्मिकेन। -ब्रह्मसूत्र शंकर भाष्य
समष्टि रूप हिरण्य गर्भ विभु है। व्यष्टि रूप आधिदैविक अणु।
इस अणु शक्ति को लेकर ही पदार्थ विज्ञान का सारा ढाँचा खड़ा किया गया है। विद्युत ताप, प्रकाश, विकरण आदि की अनेकानेक शक्तियाँ उसी स्त्रोत में गतिशील रहती है। अणु के भीतर जो सक्रियता है। वह सूर्य की है। यदि सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक न पहुँचे तो यह सर्वथा नीरव स्तब्धता परिलक्षित होगी। कही कुछ भी हलचल दिखाई न पड़ेगी। अणुओं की जो सक्रियता पदार्थों का आविर्भाव अभिवर्धन एवं परिवर्तन करती है उसका कोई अस्तित्व दिखाई न पड़ेगा। भौतिक विज्ञान से इस सूर्य द्वारा पृथ्वी को प्रदत्त अणु शक्ति के रूप में पहचाना है और उसे विभिन्न प्रकार के आविष्कार करके सुख साधनों का आविर्भाव किया है। शक्ति के कितने ही प्रचंड स्त्रोत करतल गत किए है। पर यह न ही मान बैठना चाहिए। विश्वव्यापी शक्ति भण्डार मात्र अणु शक्ति की भौतिक सामर्थ्य तक ही सीमाबद्ध है।
जड़ जगत में शक्ति तरंगों के रूप में संव्याप्त सक्रियता के रूप में प्राण का परिचय दिया जा सकता है और चेतन जगत में सम्वेदना उसे कहा जा सकता है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया इसी सम्वेदना के तीन रूप में है। जीवन्त प्राणी इसी के आधार पर जीवित रहते हैं। उसी के सहारे चाहते, सोचते और प्रयत्नशील होते हैं। इस जीवनी शक्ति की जितनी मात्रा जिसे मिल जाती है वह उतना ही अधिक प्राणवान कहा जाता है। आत्मा को महात्मा देवात्मा और परमात्मा बनने का अवसर इस प्राण शक्ति की अधिक मात्रा उपलब्ध करने पर ही सम्भव होता है। चेतना की विभु सत्ता जो समस्त विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है चेतन प्राण कहलाती है। उसी का अमुक अंश प्रयत्न पूर्वक अपने में धारण करने वाला प्राणी- प्राणवान एवं महाप्राण बनता है।
वह प्राण हमारे अनुभव में जड़ पदार्थों की सक्रियता के रूप में और चेतन प्राणियों की सजगता के रूप में दिखाई पड़ता है। इससे प्रतीत होता है कि वस्तुओं एवं प्राणियों के उत्पन्न होने के उपरान्त ही इस शक्ति का उद्भव हुआ होगा, पर बात ऐसी नहीं है वह सृष्टि से पहले ही मौजूद तो था। उस सूक्ष्म प्राण शक्ति ने समयानुसार परा और अपरा प्रकृति का रूप धारण करके इस दृश्य जगत का सृजन किया है। शास्त्र में इसका वर्णन इस प्रकार आता है-
असद्धा इदमग्न आसात तदाहुः कि तदसदासी-दित्यृषयों वा व। तेऽग्नेऽसदासीत्, तदाहुः के ते ऋषभ इति प्राणा वा ऋषय। -शतपथ
सृष्टि से पहले ‘असत्’ था। यह असत् क्या? उत्तर में कहा गया वे ऋषि थे। ये ऋषि क्या थे? - तब उत्तर में कहा गया -वे प्राण थे। प्राण ही ऋषि है।
यहाँ असत् शब्द अभाव के अर्थ में नहीं अव्यक्त के रूप में प्रयुक्त हुआ हैं। प्राण सृष्टि से पूर्व भी विद्यमान था। जब दृश्य पदार्थ विनिर्मित हुए तो उनमें प्राण को हलचल करता हुआ देखा गया। यह देखना ही ‘व्यक्त’ हैं।
प्राण को जेष्ठ और श्रेष्ठ कहा गया है-
प्राणो वा व ज्येष्ठश्च श्रेष्ठश्च। -छाँदोगय 5, 1, 1
सृष्टि से पूर्व उसकी सत्ता विद्यमान होने से वह ज्येष्ठ है। श्रेष्ठ इसलिए कि समस्त पदार्थों और शरीरों में, उसी की विभिन्न हलचलें दृष्टिगोचर हो रही हैं। वस्तुतः जीवन के अर्थ में ही प्राण का प्रयोग होता रहा है।
यस्नात्कस्यामाण्डात्त्राण उत्क्रामति तदेव तच्छऽयति। -वृहदारण्यक
जिस किसी अंग से प्राण निकल जाता है, वह सूख जाता है।
संस्कृत में प्राण शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘अत्’ धातु से होती है। ‘अन्’ धातु (प्राणने) जीवनी शक्ति- चेतना वाचक है। इस प्रकार प्राण शब्द का अर्थ चेतना शक्ति होता है। जीवधारियों को प्राणी कहते हैं। प्राण और जीवन दोनों एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।
प्राण आत्मा का गुण हैं। वह परम आत्मा से परब्रह्म से निसृत होता है आत्मा भी परमात्मा का एक अविच्छिन्न घटक है। उसके अंग रूप होते हुए भी मूल सत्ताधीश के सारे गुण विद्यमान है। व्यक्तिगत प्राण धारण करने वाला प्राणी जब सुविकसित होता है तो वह बूँद के समुद्र में पड़ने पर सुविस्तृत होने की तरह व्यापक बन जाता है। व्यापक महाप्राण का अंश प्राणी है अथवा प्राणधारियों को समष्टि चेतना महाप्राण है, इसमें तात्विक कोई अन्तर नहीं यह शब्दों की ही हेरा−फेरी हैं।
प्राण के स्वरूप को समझते हुए शास्त्रकारों ने उसका परिचय कई प्रकार दिया है। उसे सृष्टि का सूत्र संचालक और परब्रह्म से निसृत जीवन सता के रूप में समझाने के लिए ही यह कई प्रकार के प्रतिपादन प्रस्तुत किए है- यथा-
स प्राणमसृजत प्राणाँच्छद्धाँ खं वायुर्ज्योंति रुपः प्रथिविन्द्रिय मनोऽन्नम। -प्रश्न 6-4
उसने प्राण उत्पन्न किया। प्राण से श्रद्धा, बुद्धि आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन और अन्न आदि बने।
जड़ से चेतन उत्पन्न होने की बात भौतिक विज्ञानी कहते हैं। आत्म विज्ञान का मत इससे भिन्न है वह कहता है चेतना से जड़ की उत्पत्ति हुई। जड़ में न कुछ सोचने की शक्ति है न करने की वह निर्जीव होने के कारण अवतरण अभिवर्धन एवं परिवर्तन की कोई क्रिया नहीं कर सकता, उसकी हलचलें चेतना की ही देन है। चेतना की इच्छा एवं आवश्यकता के अनुसार प्राणियों के शरीर बनते और बदलते रहे है इस तथ्य को तो भौतिक विज्ञानी भी मानते हैं। ऐसी दशा में चेतन प्राण को ही प्रथम मानना पड़ेगा। सृष्टि से पूर्व निस्सन्देह उसकी सत्ता सूक्ष्म चेतना के रूप में रही है और महाप्राण इस विश्व के सूत्र संचालक परब्रह्म का परमात्मा- अथवा आत्मा का ही ब्रह्म तेजस् रहा है। वह कोई भौतिक शक्ति नहीं हैं।
आत्मन’ एषः प्राणो जायते। -प्रश्न 3-3
इस प्राण की उत्पत्ति आत्मा से होती है।
यदिदं किंच जगर्त्सव प्राण एजति निःसृजत्। -कठ॰ 6-3
यह समस्त जगत प्राण के स्पन्दन से निःसृत होता है।
यथोग्ने क्षुद्रा विस्फलिंगा वयुच्च्रन्त्येव मेवास्मादात्मनः रार्वे प्राणः। -वृहदारण्यक
जैसे अग्नि से छोटी-छोटी चिनगारियां निकलती है वैसे ही आत्मा से सब प्राण निकलते हैं।
इस प्राण सत्ता का जब जिस प्रयोजन के लिए प्रयोग होता है तब उसके नाम उसी क्रिया आधार को ध्यान में रखते हुए रख दिए जाते हैं। एक व्यक्ति दुकानदारी, रसोइया, चोरी आदि कई काम करता है। जिस समय उसे जो काम करते देखा जाता है तब उसे उसी आधार पर दुकानदार, रसोइया, चोर आदि कहा जाता है। ताँगे वाला उसे सवारी, व्यापी उसे ग्राहक, डाक्टर उसे रोगी, अध्यापक उसे विद्यार्थी के नाम से पुकारता है। इतने पर भी वह एक ही व्यक्ति होता है। इसी प्रकार प्राण की जहाँ जो गतिविधियाँ होती है उसी प्रकार उसे नाम दिया जाता है। साधारणतया पाँच, दस या ग्यारह प्रकार से उसके वर्गीकरण होते रहे है-
यः प्राणः ए वायुः स एष वायुः पंचविधिः। प्राणोऽपानोव्यान उदानः समानः। -शतपथ
यह प्राण वायु पाँच प्रकार का है- प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
दशये पुरुषे प्राणा आत्मैकादश। -वृहदारण्यक
मनुष्य में रहने वाली दस इन्द्रियाँ और ग्यारहवाँ मन यह सब प्राण है।
इतने पर भी उसे वायुः इन्द्रियाँ या मन नहीं कहा जा सकता। वस्तुतः वह इस सबके भीतर काम करने वाली जीवनी शक्ति है।
न वायु क्रिये पृथगुपदेशात। -ब्रह्मसूत्र 2-4
यह प्राण वायु या इन्द्रियाँ नहीं है। शास्त्रों में उसका उपदेश भिन्न रूप से किया गया है। प्रश्नोपनिषद् में यह तथ्य और भी अधिक स्पष्ट कर दिया गया है-
तान्वरिष्ठः प्राण उवाच मा मोहमा पद्य था अहमेवैतत्पंचधात्मानं प्रविभज्यैत द्वाणमवष्टभ्य विधार यामि। -प्रश्न0 2-3
उस वरिष्ठ प्राण ने मन और इन्द्रियों से कहा- तुम मोह में मत पड़ो। मैं ही पाँच रूप बनाकर इस शरीर को धारण किए हुए हूँ।
न वायु प्राणो नापि करण व्यापरः। -ब्रह्म दूत्र 2-4-9
यह प्राण, वायु नहीं है और न वह इन्द्रियों का व्यापार ही है।
एत स्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च। -मुण्डक 2,1,3
यह प्राण मन और इन्द्रियों से भिन्न है।
प्राणायाम को गहरी साँस लेने का फेफड़े पुष्ट करने वाला व्यायाम नहीं माना जाना चाहिए। वस्तुतः वह निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त चेतना के समुद्र से बड़ी मात्रा में जीवनी शक्ति अपने भीतर धारण करके सामान्य लोगों की तुलना में अत्यधिक सामर्थ्यवान बनने का परिष्कृत विज्ञान सम्मत सुनिश्चित प्रयास है। इसे यदि विधिपूर्वक जाना और अपनाया जाय तो उसमें हमारे महत्वपूर्ण अभावों की पूर्ति हो सकती है।
जानकारी का महत्व समझाते हुए सुकरात ने अपने शिष्यों से कहा- जो अनजान है और अपने को जानकार मानता है उससे बचो! जो अनजान है और अपनी अल्पज्ञता से परिचित है उसे -सिखाओ। जो जानता तो है पर अपने ज्ञान के बारे में शंकालु है उसे जगाओ और जो जानता है पर साथ अपनी जानकारी के प्रति आस्थावान है वह बुद्धिमान हैं। ऐसे ही व्यक्ति के पीछे चलो।
विज्ञान और अध्यात्म अन्योन्याश्रित है। एक दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरे की गति नहीं। विज्ञान हमारे साधनों को बढ़ाता है और अध्यात्म आत्मा को। आत्मा को खोकर साधनों की मात्रा कितनी ही बड़ी-चढ़ी क्योँ न हो उनसे मनुष्य भोगी, व्यसनी, अहंकारी और स्वार्थी ही बनेगा। महत्वाकांक्षाएं मनुष्य को नीति तक सीमित नहीं रहने देती। आकुल व्याकुल व्यक्ति कुछ भी कर गुजरता है; उसे अनीति अपनाने और कुकर्म करने में भी कोई झिझक नहीं होती। अध्यात्म चिन्तन को, आकांक्षाओं को, क्रिया को उन मर्यादाओं की परिधि में बाँधकर रखता है जिसमें व्यक्ति का चरित्र और समाज का व्यवस्था क्रम अक्षुण्ण बना रह सकें। अस्तु दोनों ही अपने-अपने क्षेत्र में समान रूप से उपयोगी हैं।
पुरुषार्थ के साथ प्रगति को जोड़ा जाना वैज्ञानिक दृष्टि है। जो होने वाला है, जो भाग्य में लिखा है, जो ईश्वर को करना है सो होकर रहेगा। यह मान्यता अवैज्ञानिक है। जन्मपत्री के आधार पर कितने दिन जीना है यह निर्धारण करना मिथ्या है। अब से पचास वर्ष पूर्व रूस की औसत आयु 23 साला थी अब बह बढ़कर 68 साल हो गई स्वीडन और स्विट्जरलैंड में वह बढ़कर 80 के करीब जा पहुँची जबकि हम भारतवासी 32 वर्ष की औसत आयु से आगे नहीं बढ़ सकें। इसमें भाग्य विधान नहीं पुरुषार्थ ही कारण है। भौतिक प्रगति के लिए चिन्तन और कर्तृत्व को विकसित करना विज्ञान है। जिसे अध्यात्म की ही तरह आवश्यक माना जाना चाहिए।
ईसा कहते थे- मनुष्य केवल रोटी के सहारे नहीं जी सकता। साथ ही यह भी सही है कि मनुष्य रोटी के बिना नहीं जी सकता। इसलिए रोटी की व्यवस्था भी होनी चाहिए और उन तत्वों की भी जिनके बिना, मात्र रोटी की वह उपयोगिता नहीं रह जाती जिसके सहारे मनुष्य की आत्म को जीवित रखा जा सके। रोटी केवल शरीर को जिन्दा रख सकती है जैसा कि खुराक के सहारे मक्खी मच्छर आदि अन्य प्राणी जीवित रहते हैं
हमारा चिन्तन सर्वांगीण होना चाहिए न कि एकाँकी। रोटी के बिना संन्यासी भी नहीं जी सकता। वह संसार को असार- माया मिथ्या कहता भले ही रहे पर उन पदार्थों के बिना एक दिन का भी गुजारा नहीं जो ‘माया’ के अंतर्गत आते हैं। पिछले दिनों हम ब्रह्मवाद के बढ़े-चढ़े प्रतिपादन करते रहें। और भौतिक क्षमताओं को उपेक्षित बनाये रहे हैं फलतः उस एक पक्षीय प्रगति ने हमें भौतिक दृष्टि से दुर्बल बना दिया इस दुर्बलता का लाभ विदेशी आक्रमणकारियों ने उठाया और हमें लंबे समय तक गुलामी के शिकंजे में कसकर रखा।
भौतिक पदार्थों की विवेचना एवं उपलब्धि प्रस्तुत करने वाला विज्ञान मिथ्या नहीं हो सकता। वह सत्य है। सत्य के नियम होते है- झूठ के नहीं। विज्ञान नियमों पर आधारित है। स्वप्न का। मिथ्या का कोई नियम नहीं। यदि यह संसार मिथ्या होता तो उसमें कोई नियम क्रम दिखाई न पड़ता।
पिछले दिनों हमने वैज्ञानिक दृष्टि गंवा दी और विवेक रहित श्रद्धा को छाती से लगाये रहे। फलतः पग-पग पर मार खाते रहें। विदेशी आक्रमणों से जूझने की भौतिक तैयारी न थी। मन्त्रों की अथवा देवताओं की शक्ति से सरो संकट पार होने की बात सोची जाती रही फलतः आक्रमणकारी सरलतापूर्वक सफल होते चले गये। यदि हमारे पास वैज्ञानिक दृष्टि होती तो यथार्थ चिन्तन सम्भव होता आत्मा को परिष्कृत बनाने के लिए अध्यात्मिक को शरीर को, और समाज को परिपुष्ट करने के लिए समर्थता की आवश्यकता अनुभव करते और तद्नुरूप साधन जुटाते। वैज्ञानिक दृष्टि का अर्थ है- मान्यताओं आग्रहों, आस्थाओं की गुलामी से छुटकारा पाकर यथार्थता को समझ सकने योग्य विवेक का अवलम्बन। उसमें अन्धविश्वासों और परम्पराओं के लिए कोई स्थान नहीं। तथ्यों और प्रमाणों की कसौटी पर जो खरा उतरे उसी को अपनाना वस्तुतः सत्य की खोज है। इसे हटा देने पर अध्यात्म निष्प्राण ही नहीं, भ्रमोत्पादक और भय संवर्धक बन जाता है। हम निष्ठावान बनें, श्रद्धालु रहें, पर वह सब विवेक युक्त होना चाहिए। बुद्धि बेचकर मात्र परम्परावादी आग्रह अपनाएं रहने से अध्यात्म का उद्देश्य और लाभ प्राप्त न हो सकेगा।
विज्ञान एवं धर्म अध्यात्मिक को एक दूसरे का विरोधी तब कहा जाता है। जब यथार्थ चिन्तन की अवज्ञा करके किन्हीं पूर्वाग्रहों को साथ ही चिपटे रहने पर बल दिया जा रहा हो। हम यह भूल जाते हैं कि प्रगति की ओर हम क्रमशः ही बढ़े है और यह अनादि काल से चला आ रहा क्रम अनन्त काल तक चलता रहेगा। जो पिछले लोगों ने सोचा था किया था वह अन्तिम था उसमें सुधार की गुँजाइश नहीं यह मान बैठने से प्रगति पथ अवरुद्ध हो जाता है। और सत्य की खोज के लिए बढ़ते चलने वाले हमारे कदम रुक जाते हैं। विज्ञान ने अपने को भूत पूजा से मुक्त रखा है और पिछली जानकारियों से लाभ उठा कर आगे की उपलब्धियों के लिए प्रयास जारी रखा हैं। अस्तु वह क्रमशः अधिकाधिक सफल समुन्नत होता चला गया। अध्यात्म ने ऐसा नहीं किया उसने ‘बाबा वाक्यं प्रमाणम्’ की नीति अपनाई। समय आगे बढ़ गया, पर आग्रह शीलता की बेड़ियों ने मनुष्य को उन्हीं मान्यताओं के साथ जकड़े रखा जो भूतकाल की तरह अब उपयोगी नहीं समझी जाती। पूर्वजों से आगे की बात सोचना उनका अपमान करना है ऐसा सोचना क्रमशः आगे बढ़ते चले आने के सार्वभौम नियम को झुठला देना है।
इस पृथ्वी के जन्म समय क्या परिस्थितियाँ थी और आदिम काल का मनुष्य कैसा था, इसे जानने के उपरान्त आज की परिस्थितियों के साथ तुलना करने पर मध्यवर्ती इतिहास देखना पड़ता है। उस निरीक्षण से स्पष्ट हो जाता है कि यह प्रगति क्रमशः ही संभव हुई है। आगे कदम बढ़ाने के लिए पैर को वह स्थान छोड़ना पड़ता है जहाँ वह पहले जमा हुआ था। पिछले स्थान से पैर न उठाया जाय तो वह आगे कैसे बढ़ सकेगा? विज्ञान ने इस तथ्य को स्वीकारा और अपनाया है किन्तु अध्यात्म को न जाने क्यों इस प्रकार का साहस संचय करने में हिचकिचाहट रही है।
पिछले दिनों विज्ञान ने अपनी पूर्व निर्धारित ऐसी मान्यताओं को बहिष्कृत कर दिया जो किसी समय सर्वमान्य रही है, पर नवीनतम खोजों ने जिन्हें झुठला दिया हैं। इन बहिष्कृत मान्यताओं में कुछ इस प्रकार है। (1) सौर मंडल का केन्द्र पृथ्वी हैं। (2) तारक का आकार विस्तार और उनकी एक दूसरे से दूरी सम्बन्धी मान्यताएं (3) ग्रह तारक व्यक्ति विशेष पर अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं। (4) पृथ्वी चपटी है। (5) पृथ्वी कुछ हजार वर्ष ही पुरानी है। (6) ऊपर से गिराने पर हल्की की अपेक्षा भारी वस्तु जल्दी नीचे गिरेगी (7) वस्तुएं तभी गति करती है जब उनमें बल लगाया जाय। (8) पदार्थ को ऊर्जा में नहीं बदला जा सकता (9) ब्रह्मांड स्थिर है। (10) प्रकृति रिक्तता (बैकुम) से घृणा करती है और कही पोल नहीं रखना चाहती। (11) जीव विज्ञान की किस्में अपरिवर्तनीय है। (12) जीव उत्पत्ति के लिए अमुक जीव कोष ही उत्तरदायी है। (13) पानी और हवा शूल तत्व हैं। (14) परमाणु पदार्थ की अन्तिम न्यूनतम और अखंडित इकाई है। आदि ऐसी अगणित मान्यताएं ऐसी है जिन्हें अवास्तविक ठहरा दिया गया है फिर भी उनके प्रतिपादनकर्ताओं का सम्मान यथावत् बनायें रखा गया है। कारण कि जिस समय उन्होंने यह मान्यताएं प्रचलित की थी उस समय की प्रचलित मान्यताएं और भी अधिक पिछड़ी हुई थी। उन दिनों उन प्रतिपादनों को भी क्रान्तिकारी माना गया है। प्रगति के पथ पर चलते हुए सत्य की दिशा में जो कुछ इस समय जाना माना गया है आवश्यक नहीं कि वह भविष्य में भी इसी तरह माना जाता रहें। इस बात की पूरी संभावना है कि अब की अपेक्षा भावी प्रतिपादन और भी अधिक क्रान्तिकारी माने जायें। ऐसी स्थिति का आज के वैज्ञानिक सहर्ष स्वागत करने के लिए तैयार है।
धार्मिक मान्यताओं में भी क्रमशः परिवर्तन होता आया है यद्यपि कहा यही जाता है कि धर्म सनातन और शाश्वत है। बारीकी से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि धर्म न तो अनादि और अनन्त। वह स्थिर भी नहीं है और अपरिवर्तनशील भी नहीं। उसका जाने अनजाने क्रमिक विकास होता रहा है। इस स्थिति को सुधार वाद कहा जा सकता है। धर्म वेत्ता, मनीषी, अवतारी, देवदूत समय-समय पर इसी प्रयोजन के लिए अवतरित होते रहे है कि न केवल परिस्थिति को वरन् तत्कालीन लोक मनःस्थिति को भी बदलें। उनने अपने से पूर्व के प्रचलनों के स्थान पर ऐसे प्रतिपादन प्रस्तुत किये जिन्हें उस समय निश्चित रूप से क्रान्तिकारी समझा गया है और तत्कालीन पुरातन पंथियों ने उसका घोर विरोध भी किया था।
ईश्वर संबंधी आज की मान्यताएँ उसमें भिन्न है जो आदिम ने मनुष्य के अपने मस्तिष्क में स्थापित की थी। देवताओं के रुष्ट और प्रसन्न होने का आधार और परिणाम-धर्म के नियम और प्रतीक-उपासनात्मक-कर्मकाण्ड और विधान आदि के संबंध में क्रमशः इतने अधिक परिवर्तन होते रहे है कि भूतकालीन मान्यताएँ न केवल विचित्र वरन् बहुत अंशों में अब के प्रतिपादनों में लगभग सर्वथा विपरीत पड़ते हैं। धर्म संस्थापक, सुधारक एवं अवतारी व्यक्ति वस्तुतः अपने समय की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष परिस्थितियों मान्यताओं एवं प्रथाओं में- क्रान्तिकारी परिवर्तन करके सुधारवादी प्रतिष्ठापनाएं करने वाले लोग ही थे।
योरोप में इंग्लैंड के न्यूटन, इटली के गैलीलियो, पोलैण्ड में केपलर आदि वैज्ञानिकों ने अपने समय में क्रान्तिकारी वैज्ञानिक सिद्धान्त प्रतिपादन किये थे। धार्मिक मान्यताओं में भारी सुधार प्रस्तुत कराने वाले मनीषियों में जर्मनी के लूथर, स्विट्जरलैंड के ज्विंगी, फ्राँस के केल्विन, स्काटलैण्ड के जोन नोक्स आदि अग्रणी रहे है। न केवल भारत में भी ऐसे ही अनेकानेक उदाहरण है वरन् समस्त विश्व में अपने ढंग से यह सुधारवादी प्रक्रिया चलती रही है। भौतिक और अध्यात्मिक क्षेत्रों में सदा ही प्रगति ही कुसमुसाहट जारी रही है। उसी ने मानव को उस स्तर तक पहुँचाया है जिसमें कि वह आज है।
जूलियन हक्सले ने इस बात पर बहुत जोर दिया है कि विज्ञान की तरह ही अध्यात्म का आधार भी तथ्यों को रखा जाना चाहिए। लोभ और भय से उसे मुक्त किया जाना चाहिए, काल्पनिक मान्यताओं का निराकरण होना चाहिए और चेतना को परिष्कृत करने की उसकी मूल दिशा एवं क्षमता का प्रभावी बनाया जाना चाहिए। विचार और कार्य, विश्वास और श्रद्धा, शंका और निराशा, ज्ञान और कर्त्तव्य, व्यक्ति और समाज, पदार्थ और आत्मा, जाति और सभ्यता, कथा और इतिहास, प्रेम और घृणा, त्याग और भक्ति, जैसे असंख्य प्रश्न अभी अनिर्णीत पड़े है। इस संदर्भ में अध्यात्म द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखकर शोध करनी चाहिए और जो निष्कर्ष सामने आये उनसे मानव जाति को लाभान्वित करना चाहिए।
सामाजिक परिस्थितियाँ या तत्कालीन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जो दबाव देती है। उसने वैज्ञानिक अपने खोज प्रयासों के लिए दिशा एवं प्रेरणा उपलब्ध करते हैं। ठीक इसी प्रकार अध्यात्म वेत्ताओं को भी समय की माँग को पूरा करने के लिए विचारणा एवं श्रद्धा के शक्तिशाली चेतना तत्वों को नये सिरे से ढालना पड़ता है। और उस प्रयोग का प्रचलन योजना बद्ध रूप से करना पड़ता है।
विज्ञान और धर्म वस्तुतः मानव जीवन के दो ऐसे पहलू है जो अविच्छिन्न रूप से एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए है। उन्हें परस्पर विरोधी न तो माना जा सकता है और न रखा जाता है यदि वास्तविक प्रगति की सुस्थिर सुख-शाँति की अपेक्षा हो तो इन दोनों महान शक्ति स्रोतों को गाड़ी के दो पहियों की तरह समन्वित रहने और गतिशील रहने के लिए बाध्य करना होगा।
हे मानव जाति के आदर्शों की पोषक भारत भूमि तुझे नमस्कार है। शताब्दियों तक अगणित आक्रमण सहते रहने पर भी तेरी गरिमा न तो मलीन हुई और न कलुषित। तेरा स्वागत है। हे श्रद्धा, प्रेम, कला और विज्ञान की जन्म दात्री तुझे नमस्कार है।
-लुई जेकोलिमेट
दक्षिणी अफ्रीका के पोर्ट एलिजाबेथ के अजायबघर में एक दो मुँह का साँप था। वह खाता तो दो मुँह से था पर पेट एक ही था। एक दिन साँप के दोनों फन आपस में लड़ने लगे और एक दूसरे पर आक्रमण करने लगे। उस दिन पहरेदार ने उसे देख लिया और हस्तक्षेप करके लड़ने से रोक दिया, पर वे द्वेष मन में बसाते और बढ़ाते ही चले गये फनों में आये दिन खटपट होती रहती और पहरेदार बीच-बचाव करता रहता। अन्त में अवसर पाकर दोनों सिर आपस में बुरी तरह जूझ पड़े और तब छूटे जब उनकी जान चली गई।
एक ऐसा ही दुमुँहा सर्प न्यूयार्क के अजायबघर में था उसका नाम प्रोवेल्टिस रखा गया था। दर्शकों का वह प्रमुख आकर्षण था। संरक्षक जब उसे दूध पिलाने आते तो दोनों फन खुद पी जाने और दूसरे का न पीने देने के लिए झगड़ते। इसका बीच-बचाव करने के लिए संरक्षक को दो प्याले दो दिशाओं में रखने पड़ते या फिर दोनों फनों के बीच एक दफ्ती का टुकड़ा खड़ा करना पड़ता ताकि एक दूसरे को देख न सके और शाँतिपूर्वक पेट भर ले। इस साँप के दोनों मस्तिष्क पृथक-पृथक ढंग से सोचते थे। एक पूर्व को चलना चाहता था तो दूसरा पच्छिम को, इस खींचतान में शरीर की बुरी तरह दुर्गति होती थी। दोनों मस्तिष्कों के साथ जुड़े हुए ज्ञान तन्तु विलक्षण स्थिति में होते। दोनों की परस्पर विरोधी आज्ञाएँ एक ही समय में किस प्रकार पालन की जायं इसका कोई हल न निकलने पर शरीर बुरी तरह इठता, अकड़ता, खिंचता, टूटता और थककर चूर-चूर होता हुआ दीखता था।
थाईलैंड के अजायबघर में ठीक ऐसा ही एक-दो सिर कछुआ था। वह भी उपरोक्त सर्पों की तरह चिड़ियाघर में रखा गया था और उसी को सबसे पहले देखने के लिए दर्शक आतुर रहते थे। वह सिर एक ही ओर नहीं थे वरन् विपरीत दिशाओं में थे। अगले पैर उस सिर का हुक्म मानते थे जो उनके समीप होता था। दोनों और बढ़ने के लिए दोनों पैर जोर लगाते थे। फलस्वरूप बीच के धड़ की रस्साकशी जैसी खींचतान होती रहती थी। बेचारा कछुआ कोल्हू का बैल बना। एक ही जगह आगे पीछे चलने-लौटने की हरकतें करता रहता था।
इन दो मुँहे साँप और कछुओं की मूर्खता पर हंसी आती है कि वे अपने ही एक अंग को अपना प्रतिद्वंद्वी मानकर उस पर आक्रमण करने की नासमझी में अपने को ही हानि पहुँचाते रहे और विज्ञ लोगों की दृष्टि में उपहासास्पद बनते रहे।
हम सब शारीरिक दृष्टि से तो दुमुंहे साँप जैसी आकृति के नहीं है, पर प्रकृति लगभग उसी प्रकार की है। अपने ऊपर आप ही निरन्तर आक्रमण करते रहते हैं और अपने हाथों इतनी हानि पहुँचाते हैं जितनी कि शत्रु समझे जाने वाले लोग सब मिलकर एकबारगी आक्रमण करके भी नहीं पहुँचा सकते। आहार-विहार की अनियमितताएं अपनाकर अपना स्वास्थ्य अपने आप ही हम नष्ट करते हैं। जीभ की लिप्सा से पेट खराब होता है और कामुकता की अति जीवन रस को निचोड़ कर गंदी नाली में बहा देती है। फिर खोखले शरीर से जिन्दगी की भारी भरकम लाश को ढोना कठिन हो जाता है। चिन्तन की भ्रष्टता दृष्टिकोण की निकृष्टता अपनाकर हंसी-खुशी का हलका-फुलका जीवन जी सकना असम्भव हो जाता है।
दूसरे हमसे घृणा इसलिए करते हैं कि हम अपने आप से घृणा करते हैं। संसार में हमारी उपेक्षा अवज्ञा इसलिए हुई कि हमने स्वयं अपना सम्मान नहीं किया। हम आप ही अपने काटने गिराने में लगे रहे, अपने हाथों आत्म-हत्या करते रहे और इस कष्टप्रद एवं उपहासास्पद स्थिति में पड़े है जिसमें रहकर दुमुंहे साँप दुर्दशा भुगतते हैं।
आमतौर से ऐसा समझा जाता है कि इच्छित परिस्थितियाँ प्राप्त होने पर मनुष्य सुखी होता है। पर वास्तविकता इससे सर्वथा विपरीत है। परिष्कृत दृष्टि कोण से सोचने का तरीका इतना सरल और सुँदर होता है कि सामान्य वस्तुएं भी सुंदर लगती है। अंधेरे में जो वस्तुएं अदृश्य रहती है अथवा काली लगती है वे ही प्रकाश की किरणें पड़ने पर अपना पूरा स्वरूप दिखाती है और चमकने लगती है। यही बात परिष्कृत मनःस्थिति के संबंध में है। सोचने की प्रकाशवान प्रक्रिया को ऐसा दिव्य आलोक कहा समझा जा सकता है जिसके प्रकाश में सारा समीपवर्ती क्षेत्र अंधकार की कालिमा में से निकल कर मनोरम आभा लिये हुए दिखाई देने लगे।
जर्मन पत्रिका ‘मेडिजिनिशे क्लीनिक’ में छपे एक विस्तृत लेख में कई शरीर विज्ञानियों के अनुभवों का साराँश छपा है जिसमें बताया गया है कि दर्द में जितना अंश शारीरिक कारणों का होता है उसमें कही अधिक मानसिक तथ्य जुड़े होते हैं। ऐसे प्रयोग किये जा चुके है जिनमें मात्र पानी की सुई लगाकर रोगी को यह बताया गया कि ‘यह गहरी नींद की दवा है,’ उसी से दर्द पीड़ितों का दर्द बंद हो गया और वे सो गये। इसके विपरीत मर्फिया के इंजेक्शन देकर यह कहा गया कि, “यह हलकी दवा है शायद इससे थोड़ा बहुत दर्द हल्का पड़े और संभव है कुछ नींद आये।” यह संदेह उत्पन्न कर देने पर रोगी दर्द की शिकायत कर सके और अधूरी निद्रा में झपकी लेते रहे। इस प्रयोग के बाद उन्हीं इंजेक्शनों को जब विपरीत व्याख्या करते हुए भिन्न दबा बनाकर रोगियों को दिया गया तो उसकी पहले की अपेक्षा सर्वथा भिन्न प्रतिक्रिया हुई। पहले दिन पानी का इंजेक्शन जब मामूली दबा बताकर लगाया गया तो उसने दर्द कम नहीं किया और मर्फिया को बड़ी शक्ति का बताकर निश्चित रूप से नींद आने का आश्वासन देकर लगाया गया तो रोगियों को गहरी नींद आई। इन प्रयोगों से डाक्टर इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि दबाएं जितना परिणाम प्रस्तुत करती है उससे अधिक प्रभाव मान्यताओं को होता है।
एक ही स्तर के दर्द को भिन्न-भिन्न मनःस्थिति के लोग अलग अलग तरह अनुभव करते हैं। डरपोक रोगी इतने से ही दर्द में बेतरह चीखते चिल्लाते हैं। मध्यम मनःस्थिति वाले मात्र हलके हलके कराहते रहते हैं। साहसी लोग उसी कष्ट को बहुत हल्का मानते हैं। युद्ध मोर्चे के घायल अपनी बहादुरी की मान्यता के आवेश से कम कष्ट अनुभव करते हैं और कम चीखते चिल्लाते हैं जब कि उतने की कष्ट में सामान्य लोग तीन गुना अधिक दर्द अनुभव करते हैं।
भावनात्मक स्थिति भी कई बार दर्द में परिणत हो जाती है। सिर दर्द, पेट का दर्द, जोड़ों का दर्द, छाती का दर्द कमर का दर्द बहुत करके मनोवैज्ञानिक कारणों से होते हैं। इनके मूल में कोई चिन्ता, आशंका भय की भावी कल्पना अथवा भूत काल की कोई दुखद स्मृति काम करती रहती है। मन की वह विपन्न अवस्था शरीर के किन्हीं अंगों पर आच्छादित होकर उन्हें पीड़ा अनुभव कराती है जब कि शारीरिक दृष्टि से उन अवयवों में उस तरह से कष्ट का कोई कारण नहीं होता।
कई बार ऐसी स्थिति भी देखी गई कि डाक्टर अपने समस्त निदान परीक्षण करने के उपरान्त भी रोगी में कोई अस्वस्थता का कारण नहीं दीखता और रोग का कारण जानने में अपनी असमर्थता प्रकट करता है। किंतु रोगी बराबर कष्ट से पीड़ित रहता है। दिन-दिन दुबला होता जाता है और साधारण काम काज कर सकने में भी समर्थ नहीं रहता, उसका पीड़ा जन्य कष्ट स्पष्ट दीखता है। ढोंग बनाने का कोई कारण नहीं होता। क्योंकि दूसरों पर नहीं उस रुग्णता का पूरा मार अपने ही कंधों पर आता है।
इस विचित्र स्थिति में मनोवैज्ञानिक कारण ही काम कर रहे होते हैं। कोई पुरानी आघात करने वाली अनुभूति मस्तिष्क के किसी भाग पर आक्रमण करती है और उसे अकचका देती है। चूँकि मस्तिष्क की प्रत्येक कोशिका अपने सूत्र तंतुओं के सहारे अन्य अनेक कोशिकाओं के साथ जुड़ी होती है। और उनसे कई तरह के आदान-प्रदान करती रहती है। इसी प्रक्रिया के अंतर्गत लगे हुए घायल अपने संबद्ध केन्द्र को प्रभावित करने तक सीमित न रहकर जब शरीर के किसी अनय अवयव से संबद्ध केन्द्र से जा टकराते हैं तो वह अंग ही रुग्णता अनुभव करने लगता है। वह अंग शारीरिक दृष्टि से निरोग होता है, पर मस्तिष्क विद्युत प्रवाह उस स्थान पर ठीक तरह नहीं पहुँच पाता क्योंकि संप्रेषण वाले मस्तिष्कीय कोष रुग्णावस्था में पड़े है। प्रेषण की गड़बड़ी उस अंग को पूरी खुराक और सही निर्देश नहीं दे पाती इस विचित्र स्थिति की अनुभूति मस्तिष्क के अन्य तंतुओं को अमुक रोग जैसी होती है। रोगी वस्तुतः उन्हीं कष्टों से पीड़ित होता है जैसा कि यह बताता है। पर डाक्टर क्या करे, उसकी परीक्षा पद्धति तो अंगों के रक्त माँस आदि से संबंधित स्थिति के आधार पर बनी है। मानसिक भूल भुलैया की उसे जानकारी नहीं होती। अस्तु ऐसे रोगियों को किसी मानसोपचारक के पास जाने की सलाह देकर वह अपना पीछा छुड़ा लेता है। अनिश्चित स्थिति में वह उपचार करे भी तो क्या करे।
मानसिक आघात लगता किस कारण से होता है इसका भी एक जैसा विवेचन नहीं होता। कई व्यक्ति आये दिन अपमान सहते हैं और उसके अभ्यस्त हो जाते हैं उन पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ता, पर कोई ऐसे भी होते हैं जो उतनी सी बात को अत्यधिक महत्व देकर तड़प उठते हैं। द्रौपदी ने दुर्योधन से एक निर्दोष मजाक करते हुए ही यह कहा था कि ‘अंधों के अंधे होते हैं।’ उल्टी व्याख्या करके उसे असभ्य अपराध मान लिया गया और प्रतिशोध की चरम सीमा का दंड उसे दिया गया। अपनी दृष्टि में दुर्योधन भी सही हो सकते हैं। उनके मस्तिष्क ने उन शब्दों को तिलमिला देने वाला अपमान समझा हो और उस आघात को गहराई के समतुल्य प्रतिशोध ढूंढ़कर अपने आघात को हल्का करने का उपाय निकाला हों। ऐसे ही हर व्यक्ति की अपनी-अपनी व्याख्या और अनुभूति होती है कौन किस घटना को किस दृष्टि से देखेगा और उसकी प्रतिक्रिया ग्रहण करेगा इसका कोई निश्चित माप दण्ड नहीं हो सकता। सामाजिक और शासकीय माप दण्ड निर्धारित है कि इस सीमा का असामाजिक आचरण करने पर उसे दंडनीय माना जायेगा पर उसमें भी अपराधी की नीयत, परिस्थिति, प्रतिक्रिया आदि का ध्यान रखा जाता है। संभव है अपराध गलती, गफलत या भ्रान्त स्थिति में बन पड़ा हो, ऐसी दशा में दण्ड हल्का दिया जाता है। मन के लिए ऐसी आचार संहिता निर्धारित नहीं कि वह किस घटना को किस रूप में ग्रहण करें। यदि कोई घटना अप्रिय या अवाँछनीय स्तर की सामने आई है तो सका आघात किस पर कितना पड़ेगा यह उसकी भावुकता एवं विचार शक्ति के समन्वय पर निर्भर है।
कितने ही व्यक्तियों के सामने हत्या, मारकाट, उत्पीड़न के दृश्य आते ही रहते हैं उन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता किन्तु किसी अनभ्यस्त और भावुक व्यक्ति पर उन्हीं घटनाओं का इतना प्रभाव पड़ सकता है कि वह किसी भयंकर अवसाद में डूब जाये अथवा विक्षिप्त हो उठे। अपमान, असफलता, हानि, विछोह, जैसी अप्रिय घटना, यों मनुष्य जीवन का एक पक्ष है और वह भी घटित होता ही रहता है। सम्मान, सफलता, लाभ मिलन जैसे प्रसन्नतादायक प्रसंग आते हैं तो उससे भिन्न प्रकार की घटनाएं क्यों घटित न होंगी। रात और दिन के विपरीत प्रसंगों की तरह जीवन की संरचना प्रिय और अप्रिय घटनाओं के लाने वाले से हुई है। सदा एक जैसी स्थिति में विशेषतया प्रिय स्थिति में सदा सर्वदा के लिए बने रहना किसी के लिए भी संभव नहीं उतार चढावों का आना स्वाभाविक है। धनवान, विद्वान, बलवान, व्यक्ति को भी प्रियजनों का विछोह बढ़ी-चढ़ी महत्वाकाँक्षाओं में असफलता, शारीरिक रुग्णता, मित्रों का छल-कपट दुख का कारण बन सकता है। सबसे बड़ी बात है अपने रचे हुए कल्पना लोक में अवाँछनीय चिन्तन का चल पड़ना। आशंकाएं प्रायः इसी स्तर की होती है। दूसरे व्यक्तियों का व्यवहार, परिस्थितियों का प्रवाह निकट भविष्य में हमारे प्रतिकूल चलेगा और उससे भयंकर विपत्ति आवेगी ऐसा चिन्तन कितने ही व्यक्ति करते और अत्यधिक उद्विग्न रहते हैं। जब कि वैसा व्यवहार एवं घटनाक्रम कदाचित ही सामने आता है। अधिकाँश आशंकाएं निर्मूल होती हैं। वे कल्पना लोक की काली घटाएं बरसती नहीं केवल गर्जन तर्जन करके चली जाती है। पर इससे क्या, जिसने आशंकाओं की भयभीत करने वाली कल्पनाओं का जल बुना था उसके लिए तो वही असह्य पीड़ा देने के लिए बहुत बड़ा कारण बन गया।
मानसिक आघात विपरीत परिस्थितियों के वास्तविक एवं काल्पनिक घटनाक्रमों के सहारे लगते हैं ।अब यह व्यक्ति की भावुकता या संवेदना शक्ति पर निर्भर है कि वह उन्हें ऐसे ही मजाक में टाल देता है- साहस समेट कर निपटने का फैसला करता है, या भयभीत होकर असन्तुलित हो बैठता है। यदि व्यक्ति डरपोक प्रकृति का और अति भावुक है तो उसके लिए छोटी घटना भी बहुत बड़ी हो सकती है और नन्ही सी अशुभ कल्पना से तिलमिला कर उद्विग्न हो सकता है। जो हो आघातों का पूरे मानसिक संस्थान पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इसी प्रतिक्रिया शरीर पर भी भयंकर होती है। ज्वर, सिरदर्द आदि की स्थिति में शरीर असहाय बन जाता है। उसे कुछ करते धरते नहीं बनता, बेचैनी सताती है। मानसिक असन्तुलन इससे भी बुरी स्थिति पैदा कर देता है। पूरे शरीर पर मन का नियंत्रण है। रक्त माँस से नहीं मानसिक निर्देशों से ही देह अपनी गाड़ी चलती है। मन के विकृत होने पर शरीर का स्वस्थ बने रहना असंभव है। चिकित्सा शास्त्र द्वारा निर्धारित निदान व्यवस्था का व्यतिक्रम करके मनुष्य ऐसे रोगों में ग्रसित हो सकता है जो शरीर शास्त्रियों की पकड़ से बाहर है।
मानसिक रोग उत्पन्न करने वाले आघात अमुक घटनाओं या परिस्थितियों के कारण लगेंगे ऐसा कुछ निश्चित नहीं। यह व्यक्ति के अपने निजी स्तर पर निर्भर है कि वह किस प्रकार की घटनाओं को किस दृष्टि से देखता हे और उनकी क्या प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। एक ही घटना की अनेक व्यक्तियों पर परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएं हो सकती है। घटनाओं को रोका नहीं जा सकता है। समाज का पुनर्निर्माण हो, व्यक्तियों के स्वभाव व्यवहार बदलें, यह दोनों ही बाते संसार से मानसिक रोगों को दूर कर सकती हैं, पर वैसी स्थिति बनना आज की स्थिति में कठिन है। तत्काल तो यही हो सकता है कि मनुष्यों को सोचने का सही तरीका सिखाया जाय ताकि वे परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठा सकें। और अपनी चिन्तनात्मक दुर्बलता के कारण ऐसे मानसिक रोगों से अपना बचाव कर सकें तो उनके जीवन क्रम को एक प्रकार से अस्त−व्यस्त और निरर्थक बनाकर रख देते हैं।
भूतप्रेत और देवी देवता जादू टोना से होने वाली हानि असंख्यों को पीड़ित करती है। अवास्तविक की ऐसी प्रतिक्रिया जो वास्तविकता से किसी भी प्रकार कम नहीं होती, आश्चर्य जनक है। अवास्तविक भूत प्रेतों से भयाक्रांत व्यक्ति वस्तुतः उतना ही कष्ट उठाता है जितना कि वास्तविक भूत होते तो अपने आक्रमण से हानि पहुँचाते। दूसरों से भारण, उच्चाटन, वशीकरण करके हमें सताया जा रहा है। यह मानकर कितने ही व्यक्ति वस्तुतः उद्विग्न, विक्षिप्त एवं परमासन्न होते देखे गये हैं। कितनी ही जाने इस कुचक्र में चली जाती है। अघोरी, ताँत्रिक, कापालिक, डायने कितने ही लोगों के लिए आतंक का कारण बनते हैं, कितने ही राहु, शनिश्चर आदि की अशुभ ग्रह दशा की कल्पना से हर घड़ी चिन्ताग्रस्त रहते हैं, कइयों को स्वप्न की डरावनी घटना, अपशंकुचों की सूचना बहुत कष्ट कारक होती है। यह आशंकाएं प्रायः सर्वथा निर्मल होती है, इनके पीछे तथ्य राई रत्ती भी नहीं होता, पर जिस पर उनका आतंक छा गया है, उनकी दयनीय मनोदशा देखकर तरस आता है। यह लोग एक संवेदन के शिकार होते हैं। किसी औंधे-सीधे आधार के सहारे उनकी आशंका इस स्तर की विभीषिका बन जाती है कि मनुष्य को प्राण संकट जैसी भयभीत स्थिति में होकर गुजरना पड़ता है। झाड़-फूँक, मंत्र तंत्र से कई मनुष्यों को बहुत राहत मिलती है और संतोषजनक लाभ होता है। यह सब क्या है? निश्चित रूप से यह उस व्यक्ति की स्वसंवेदना ही है जो विधेयक बनकर सामने आई और उत्साह प्रदान करके सरल स्वाभाविक अच्छी स्थिति को जादू कर परिणाम बताकर अपना वरदान दे गई है। पिछड़े हुए लोगों में अभी भी भूत पलीतों और जादू टोनों का पूरा जोर है। उससे वे वस्तुतः हानि उठाते और लाभान्वित होते हैं यह चमत्कार अपनी कल्पना शक्ति एवं मान्यताओं का है जो अवास्तविक को भी प्रत्यक्ष वास्तविकता से भी बढ़कर तथ्यमय बना देती है।
मानसोपचार कर्ता डा0 फ्लीडर्ड ने अपनी अनुभव पुस्तक में ऐसे अनेक रोगियों का उल्लेख किया है जो चिकित्सा पर बहुत खर्च करा चुके है और पीड़ा से छुटकारा नहीं पा रहे थे। डाक्टर असहाय थे उन्हें सूझता ही न था कि उपचार किस रोग और किस आधार पर किया जाय। रोगी के बताये लक्षणों से जिस रोग का आभास होता था। उसकी चिकित्सा करने पर भी कोई लाभ न हुआ। ऐसी दशा में उन्हें मानसोपचार का ही आश्रय लेना पड़ा और वही जाकर उनकी गुत्थी सुलझी। एक दूसरे मनोविज्ञानी डा0 डर्नवार ने ऐसे रोगियों के विवरण प्रकाशित कराये है जो मानसिक विक्षोभ से पीड़ित थे किन्तु उपचार शरीर चिकित्सकों से कराते कराते थक गये थे। जब उनके अंतर्मन में लगे हुए घाव कुरेदे गये और उनकी मरहम पट्टी की कई तो वे सामान्य स्वास्थ्य की स्थिति में लौट आये।
खीज से मुक्ति पाने, दिलाने के लिए दूसरे लोग किसी की बहुत कम सहायता दे सकते हैं। असली उपचार तो रोगी को स्वयं ही करना पड़ता है। उसे हय मानकर चलना चाहिए कि यह दवा दारु से अच्छी हो सकने वाली बीमारी नहीं वरन् अपने आप से पैदा की गई और अपने प्रयत्न से हट सकने वाली एक छोटी सी आदत भर है। यह मान लाने पर आदत से आदत को काट करने वाले प्रयत्न उत्साह पूर्वक आरम्भ किये जा सकते हैं और वे भली प्रकार सफल भी हो सकते हैं।
अपने आस-पास अनुकूलताएं तलाश करनी चाहिए। प्रिय पात्र, प्रिय पदार्थ, प्रिय दृश्य अवश्य दिखाई पड़ेंगे उनकी उपस्थिति का तनिक अधिक गहराई से देखा समझा जाय और जो उपलब्ध है उसका मुसकान के साथ स्वागत किया जाय। पेड़ पौधे, फूल, खिलौने, चित्र, किसी कदर हमारा मन हलका कर सकते हैं। पक्षियों की चहचहाट आसानी से सुनी जा सकती है। छोटे बच्चे घर में ही उछलते कूदते, तोतली बोली बोलते और भोलेपन भरी अटपटी हरकतें करते हुए आसानी से देखे जा सकते हैं। उन्हें दिलचस्पी के साथ देखा जाय तो मुसकान भरी प्रसन्नता की एक लहर चेहरे पर दौड़ सकती है।
खीज यदि प्रकट न हो तो वह घुटन के रूप में बदल जाती है और मन ही मन आदमी न जाने क्या-क्या वे सिर पैर की बातें सोचता चला जात हैं। कड़ी से कड़ी मिलती जाती है और चिन्तन की धारा शैतान की आँख की तरह कही से कही जा पहुँचती है। प्रिय स्वप्न दर्शी भी कई होते हैं। जो सुखद कल्पनाओं एवं संभावनाओं के लोग बिना पर लगाये ही उड़ते रहते हैं। उसके ठीक विपरीत खीज ग्रस्त लोगों की मनःस्थिति होती हैं छिद्रान्वेषण, दोषारोपण अशुभ भविष्य अनिष्ट संभाव्य के कुरूप - कई बार तो भयावह तक चित्र समाने आते हैं और आतंक करके आस-पास ही लुके-छिपे आँख मिचौली करते रहते हैं।
इस जंजाल से निकलने का एक सुगम तरीका यह है कि किसी सहानुभूति युक्त, उदार हृदय एवं संतुलित मस्तिष्क वाले व्यक्ति के सामने अपने मन की घुटन प्रकट कर दी जाय अथवा कोई ऐसा प्रसंग छेड़ दिया जाय जिससे उत्साहवर्धक एवं आशा की झलक दिखाने वाले प्रकाश, परामर्श मिल सकें। तनाव के रोगी यदि ऐसे सलाहकार, परामर्श दाता, सद्भाव सम्पन्न स्नेही प्राप्त कर सकें तो समझाना चाहिए कि उन्हें बिना फीस का आधा डाक्टर मिल गया।
जिस समय खीज चढ़ रही हो उस समय मनोदिशा पलट देना एक उत्तम उपचार है। उठकर चल दें और किस मनोरंजक वातावरण को ढूंढ़लें। रेडियो सुनने लगें, घूमने चले जायें, पुस्तक पढ़ने लगें। जिस प्रसंग को लेकर मन उद्विग्न हो रहा था उसे जहाँ का तहाँ अधूरा छोड़ दिया जाय। उस स्थिति में जितना अधिक सोचा जायगा उतनी ही गुत्थी और उलझेगी। उत्तेजित मस्तिष्क कभी कोई सही निष्कर्ष नहीं निकाल सकता, सही निर्णय नहीं का सकता। खीज भरी मनःस्थिति में प्रस्तुत प्रसंग पर अधिक सोचना अपने लिए गलत निर्णय से उत्पन्न और अधिक भारी विपत्ति को आमंत्रित करना है।
कई समस्याएं एक साथ मन पर चढ़ जाती है और सभी जल्दी जल्दी अपने संबंध में विचार किए जाने की माँग करती है। इस धमा चौकड़ी में अधूरी एकाँगी उथली समझ ही काम करती है और कुछ निष्कर्ष निकलना तो दूर उल्टे शिर चकराने लगता है। प्रतीत होता है जाने उलझनों के घटा टोप चढ़ आये हैं। इन विचारों के हुड़दंग को रोकना चाहिए और एक समय में एक विचार को अपना कर बारी-बारी शान्त चित से प्रस्तुत समस्याओं पर विचार करना चाहिए। इस तरह अधिक आसानी से दिमाग का बोझ हल्का होता चलेगा और क्या करना है क्या नहीं इसका सहज समाधान मिलता रहेगा।
कुछ लोग इस लिए भी खीजते पाये जाते हैं कि वे अपनी हर इच्छा को ऊँचे स्तर पर पूर्ण हुआ देखना चाहते हैं। मनोकामनाओं में विलम्ब या व्यतिरेक उन्हें असह्य होता है। प्रत्येक सम्बन्धी कहना माने, हर परिस्थिति अनुकूल रहें। हर साधन अपनी मर्जी का जुटता रहे, हर घटना अपनी कल्पना के अनुरूप घटे, इस तरह सोचने वाले पाते तो कुछ नहीं खोते बहुत है। वे भूल जाते हैं यह दुनिया उन्हीं के लिए नहीं बनी है। वे भी अनेकों में से एक है। व्यक्ति अपनी मिट्टी को उठे है और घटना प्रवाह अपने क्रम से घटित होता है, इस सबके साथ तालमेल मिलाकर चलने में ही ठिकाना है। जो उपलब्ध है उस पर खुशी मनाई जाय और जो नहीं मिला है उसके लिए आशा रखी जाय। प्रयत्न और पुरुषार्थ को अपने प्रयास की सफलता मानकर चला जाय तो आदमी सन्तोषपूर्वक जीवन बिता सकता है। खीज से बचने के लिए मनःस्थिति को इसी पृष्ठ भूमि पर परिपक्व करना चाहिए। वर्चस्व नहीं सहयोग हमारी नीति होनी चाहिए। अपने ऊपर बड़प्पन नहीं लादना चाहिए वरन् चल रहे प्रवाह को एक हल्की सी लहर जितनी ही अपनी स्थिति सोचनी चाहिए। इस प्रकार मन पर लदा हुआ वह भारी पत्थर हट जाता है; जिसे मालिकी, बड़प्पन एवं अधिकारी के रूप में अपने ऊपर लाद लिया था। तनाव भारी पन का ही दूसरा नाम है। हम हल्के रहें, हल्की फुल्की, संतोष और मस्ती की जिन्दगी जिये तो आज का गरदन तोड़ तनाव कल तेज हवा में उड़जाने वाले बादल की तरह तिरोहित हुआ प्रतीत होगा। अवाँछनीय चिन्तन से उत्पन्न तनाव को सहज सरलता की जादुई छड़ी से देखते देखते गायब किया जा सकता है।
किन्हीं अप्रिय एवं अवाँछनीय घटनाओं से अथवा शारीरिक मानसिक विकृतियों से हल्की उद्विग्नता चढ़ आती है। इस स्थिति को खीज या परेशानी भी कहा जा सकता है। डाक्टरों की भाषा में इसे तनाव कहते हैं। नर्वस सिस्टम की कमजोरी वाले व्यक्ति इस स्थिति के जल्दी शिकार होते हैं। वे जो भी सामने आवे उसी पर अकारण झल्लाते हैं। चूँकि खीज भीतर भरी होती है और वह किसी न किसी को निमित्त बनाकर बाहर निकलना चाहती है। इसके लिए जो भी सामने आ जाय उसी पर कुछ न कुछ दोषारोपण करके उल्टी-सीधी कहने लग जाता है। न कहा जाय तो भी क्रोध या नाराजगी नहीं तो उपेक्षा अवज्ञा का व्यवहार तो बन ही पड़ता है। कई बार इस स्थिति में लोग खिन्नता, लाचारी एवं निराशा व्यक्त करते हुए दुखित बने मुँह लटका कर बैठे भी देखे जाते हैं।
मानसिक रोग चिकित्सा की एक पद्धति है बिहेवियर एण्ड थैरेपी जिसमें रोगी के साथ सद्व्यवहार और सहानुभूति की समुचित मात्रा रखी जाती है। और उसे स्नेह दुलार एवं सहयोग का अनुभव करने दिया जाता है। इस उपचार से रोगी क्रमशः डिसेसिटाइज होता चलता है साथ ही मनोव्यथाओं से राहत भी अनुभव करता है।
मानसिक रोगियों के साथ मारपीट, भर्त्सना तिरस्कार जैसे- निर्भय व्यवहार उसे और भी अधिक दुखी करते हैं और रोग की स्थिति बिगड़ती जाती है। शारीरिक रोगियों की तरह मानसिक रोगी भी दया के पात्र है उनके उपचार में स्नेह-सौजन्य और सुविधाओं का यदि समावेश किया जा सकें, विक्षोभों को शान्त करने वाले वातावरण में उन्हें रखा जा सकें तो औषधि उपचार की अपेक्षा उन्हें कही अधिक और जल्दी ही लाभ हो सकता है।
इलिनाएस सोसाइटी फॉर साइकिक रिसर्च द्वारा इस संदर्भ में कल्पना के फोटोग्राफ उतारने के सम्बन्ध में ट्रेड की स्थिति का जो पता लगाया, उसका विवरण पालिन ओहलर ने ‘फेट’ पत्रिका में प्रकाशित कराया है। उसमें बताया गया है कि “अनेक वैज्ञानिकों, फोटोग्राफरों और बुद्धिजीवियों को सतर्क मौजूदगी में ट्रेड सीरियम की कल्पना का फोटो दे सकने की क्षमता जाँची गई। इसके लिए पोलाराएड लेण्ड कैमरे इस्तेमाल किये गये। उन्हें कल्पनाएँ दी गई और उसके फोटो आसमान में से उतारे गये। प्रयोगों की वास्तविकता के सम्बन्ध में उपस्थित लोगों में से किसी को कोई संदेह नहीं है। इसमें कोई चाल नहीं पाई गई। फोटो पूर्ण सतर्कता के साथ लिये गये और परीक्षा की दृष्टि से समाधान कारक पाये गये।
ड्यूक विश्वविद्यालय की परामनोविज्ञान प्रयोगशाला अमेरिकन सोसाइटी फॉर साइकिक- तथा कुछ अन्य विश्वविद्यालयों ने इस सम्बन्ध ने कुछ रुचि दिखाई, पर ट्रेड के सनकी व्यवहार से खीजकर उन्होंने भी अपना हाथ सिकोड़ लिया और बात जहाँ की तहाँ अधूरी रह गई।
इंटर नेशनल गिल्ड आफ हिप्नोटिस्टस संस्था के प्रभावी सदस्य स्टैनले मिशेल से ट्रेड का परिचय हुआ और कल्पना के फोटो ठीक उतरे तो उस संस्था ने इस संदर्भ में एक पूरी फिल्म ही बनाकर रख दी। इससे उस ओर अनेक लोगों को ध्यान गया और वस्तुस्थिति को जानने के लिए अधिक ठोस प्रयास हुए।
उन्हीं दिनों जार्ज जोहानस फ्लोरिडा में यह पता लगाने के लिए बहुत माथापच्ची कर रहे थे कि स्वेन के समुद्र में डूबे जहाजों का कीमती खजाना किस प्रकार बाहर निकाला जाय। इस सिलसिले में उन्होंने कई अतीन्द्रिय विद्या के दावेदारों की सहायता भी जुटाई थी। इसी ढूंढ़-खोज में किसी ने उन्हें ट्रेड सीरियम का पता बता दिया। उसे साथ लेकर वे खजाने का पता लगाने में तो कोई सहायता प्राप्त न कर सके, पर कल्पना का फोटो खींचे जा सकने के ट्रेड के दावे के समर्थक बन गये। उन्होंने स्वयं उसे कुछ कल्पनाएँ दी और उनके चित्र स्वयं उतरे वे ठीक उसी प्रकार के थे जैसा कि सोचने के लिए उसे कहा गया था। चित्र बिलकुल सही और साफ आये। अस्तु जोहान्स ने नात को आगे बढ़ाया और उसे प्रामाणिक वैज्ञानिक शोधकर्ताओं के हवाले कर दिया।
शिकागो का विलक्षण व्यक्ति ट्रेड सीरियस इस बात के लिए विश्व विख्यात है कि उसकी कल्पनाओं के फोटो खींचे जा सकते थे। यह शौक उसे तीस वर्ष की आयु में लगा था। वह अनुभव करता था कि उसकी कल्पनाएँ धुँधली नहीं, वरन् इतनी स्पष्ट होती है जैसे वे मूर्तिमान होकर सामने ही खड़ी हो। उसने अपने कैमरे का लेन्स अपने सिर की दिशा में करके अपने आप फोटो खींचे और उनमें उस तरह की तस्वीरें आई जैसी कि उसकी कल्पना में तैरती थी।
यह फोटो उसने अपने मित्रों को दिखाये तो उसे सनकी, शेखीखोर और जाल-साज बताया गया। उसका शौक बढ़ा और साथ ही पागलपन की जैसी सनक भी उभरी उसे अधपगला समझा जाता रहा और जो कुछ वह कहता उसे मजाक समझकर उड़ा दिया जाता।
खुली आँख से भले ही न देखा जा सके, पर जिसे सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से देखा जा सकता है- फोटो उतारा जा सकता है उसे प्रत्यक्ष पदार्थ की ही संज्ञा दी जा सकती है। इस दृष्टि से विचार एक पदार्थ हुआ। कल्पना विचार ही तो है। कल्पना का जब फोटो खिंच सकता है तो उसकी गणना सहज ही पदार्थ संज्ञा में होगी। पदार्थ के छोटे से छोटे अणु में भी प्रचण्ड शक्ति रहती है यह अणु विस्फोट के समय निकलने वाली ऊर्जा को देखकर भली प्रकार निश्चय हो गया है। विचारों की तरंगें, प्रकाश, ताप, ध्वनि एवं विद्युत की अपेक्षा दुर्बल नहीं सशक्त ही है। इतना जान लेने के बाद हमें विचार शक्ति का मूल्य समझना चाहिए और उसका बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करना चाहिए।
सद्गुरु की महिमा गाते-गाते शास्त्रकार थकते नहीं। मनीषियों ने निरन्तर यही कहा है कि आत्मिक प्रगति के लिए गुरु की सहायता आवश्यक है। इसके बिना आत्म-कल्याण का द्वार खुलता नहीं। साधन सफल होता नहीं। सामान्य जीवन-क्रम में माता, पिता और गुरु को देव माना गया है और उनकी अभ्यर्थना समान रूप से करते रहने का निर्देश किया गया है।
सामान्य अर्थ में शिक्षक को गुरु कहते हैं। साक्षरता का अभ्यास कराने वाले- शिल्प-उद्योग, कला, व्यायाम आदि क्रिया कौशलों की शिक्षा देने वाले भी गुरु ही है। तीर्थगुरु, ग्रामगुरु, कुलगुरु आदि कितने ही उनके नियमित वर्ग भी बन गये है। असाधारण चातुर्य में प्रवीण व्यक्ति को भी व्यंग में ‘गुरु’ कहते हैं। जिसका वास्तविक अर्थ होता है हरफनमौला- तिकड़मी अथवा धूर्तराज। कितने ही लोग धर्म की आड में चेली-चेला मूंड़ने का धंधा परम्परा के आधार पर ही चलाते हैं। हमारा बाप तुम्हारे बाप का गुरु था इसलिए हम तुम्हारे गुरु बनेंगे यह दावा करने वाला और इसी तर्क से प्रभावित करके अपना धंधा चलाने वाला एक बहुत बड़ा वर्ग मौजूद है। परम्परावादी लोगों के गले यह दलील उतर ली जाती है और वे योग्य अयोग्य का विचार किये बिना इन तथाकथित गुरुओं का नमन करते हुए भेंट पूजा करते रहते हैं। गले में कण्ठी बंधाई और कान फुकाए तो आजीवन कुछ दान-दक्षिणा देते ही रहनी पड़ेगी। शिष्य लोग एक प्रकार से धर्म संतोष कर लेते हैं, भले ही यह निराधार हो। गुरु लोग इस विडम्बना को मुफ्त में मान और धन प्राप्त करते रहने का एक स्वर्ण सुयोग मानकर अपने सौभाग्य पर गर्व करते हैं। इस विडम्बना को जड़ जमाये हुए किसी भी बौद्धिक क्षेत्र में पिछड़े हुए क्षेत्र में आसानी से देखा जा सकता है।
यह तो प्रचलन की बात हुई। परम्परा से परम्परा- ढर्रा से ढर्रा- उसमें नुक्ताचीनी करने की गुंजाइश नहीं रहती। लोगों की बुद्धि भी विलक्षण है। एक ओर जहाँ फूँक-फूँककर कदम रखने और गुण, दोष परखने की क्षमता पाई जाती है दूसरी ओर परम्परागत बातों में उनका अंतर्मन इतना रूढ़िवादी हो जाता है कि ढर्रे को ही सही माने रहने के अतिरिक्त उनकी बौद्धिक क्षमता एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाती। कितने ही क्षेत्र में बड़े तार्किक और प्रतिभाशाली व्यक्ति कितनी ही ऐसी रूढ़ियों एवं मान्यताओं में जकड़े देखे जाते हैं जिनको तात्विक दृष्टि से देखने पर उपहासास्पद और निरर्थक ही ठहराया जा सकता है। इतने पर भी वे लोग इस बुरी तरह उनसे चिपके होते हैं। मानो यथार्थता की कसौटी पर कसकर ही उन्होंने उस मान्यता को अंगीकार किया हो। यह कैसी विचित्रता है कि एक ही व्यक्ति एक दिशा में प्रखर बुद्धि और दूसरे क्षेत्र में सर्वथा मूढ़मति सिद्ध होता है।
गुरुवाद के ऊपर यह बात आश्चर्यजनक रूप से लागू होती है। कोई बिरला ही ऐसा होगा जो इस क्षेत्र में उपयोगिता, आवश्यकता एवं यथार्थता की कसौटी लेकर आगे बढ़ता हो। अनुकरण, अतिशयोक्ति, मूढ मान्यताओं एवं अन्ध परम्पराओं का ही उस क्षेत्र में बोलबाला रहता है। अस्तु गुरु शिष्य परम्परा का वर्तमान स्वरूप लगभग वैसा बन गया है जिसे विचारशील अनावश्यक ही नहीं अवाँछनीय भी कह सकते हैं। इस रूढ़ि से आत्मिक प्रगति का नहीं अवगति का ही द्वार खुलता है।
शास्त्रकारों ने जिस गुरु तत्व की महिमा का वर्णन और आवश्यकता का निरूपण किया है वह प्रचलित विडम्बना के साथ कोई ताल-मेल नहीं खाता। शब्द साम्य भर उनमें है तात्विक अन्तर तो उनके बीच जमीन-आसमान जितना है। शास्त्र सम्मत गुरु तत्व और विडम्बनाग्रस्त गुरु वस्तुतः एक दूसरे से सर्वथा भिन्न है।
जिस सद्गुरु का माहात्म्य वर्णन शास्त्रकारों ने किया है वह वस्तुतः मानवी अन्तःकरण ही है। निरन्तर सद् शिक्षण और ऊर्ध्वगमन का प्रकाश दे सकना इसी केन्द्र तत्व के लिए सम्भव है। बाहर के गुरू शिष्य की वास्तविक मनःस्थिति का बहुत ही स्वल्प परिचय प्राप्त कर सकते हैं, अस्तु उनके परामर्श भी अधूरे ही रहेंगे। फिर कोई बाहरी गुरु हर समय शिष्य के साथ नहीं रह सकता जबकि उसके समाने निरूपण और निराकरण के लिए अगणित समस्याएँ पग-पग पर-क्षण-क्षण में - प्रस्तुत होती रहती है। इनमें से किस का किस प्रकार समाधान किया जाय? इसका मार्ग-दर्शन करने के लिए किसी व्यक्ति विशेष पर निर्भर नहीं रहा जा सकता, भले ही वह कितना ही सुयोग्य क्यों न हो! सुयोग्य व्यक्ति अपने गज से सबको नाप सकते हैं और ऐसी सलाह दे सकते हैं जो उन्हीं के लिए फिट बैठती। दूसरों की स्थिति में भिन्नता रहने से परामर्श का स्तर भी बदल जाता था- वह अन्तर कौन करे? इसे केवल अपना अन्तःकरण ही कर सकता है। क्योंकि भीतरी और बाहरी परिस्थितियों की वास्तविक जानकारी जितनी अपने आपको हो सकती है उतनी और किसी को नहीं।
अपने अन्तःकरण को निरन्तर कुचलते रहने-उसकी पुकार को अनसुनी करते रहने से आत्मा की आवाज मंद पड़ जाती है। पग-पग पर अत्यन्त आवश्यक और अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रकाश देते रहने का उसका क्रम शिथिल हो जाता है। आत्मा की अवज्ञा करते रहने वालों को ही दुर्बुद्धिग्रस्त और दुष्कर्म लिप्त पाया जाता है अन्यथा सजीव आत्मा की प्रेरणा सामान्य स्थिति में इतनी प्रखर होती है कि कुमार्ग का अनुसरण कर सकना मनुष्य के लिए संभव ही नहीं होता। यह आत्मिक प्रखरता ही वस्तुतः सद्गुरु है इसी का नमन, पूजन और परि-पोषण करना गुरु भक्ति का यथार्थ स्वरूप है।
गुरु-दीक्षा इस व्रत धारणा का नाम है कि “हम अन्तरात्मा की प्रेरणा का अनुसरण करेंगे।” ऐसा निश्चय करने वाला व्यक्ति मानवोचित चिन्तन और कर्तृत्व से विरत नहीं हो सकता। जैसे ही अचिन्त्य चिन्तन मनःक्षेत्र में उभरता है वैसे ही प्रतिरोधी देवतत्व उसके दुष्परिणाम के सम्बन्ध में संचेत करता है और भीतर ही भीतर एक अंतर्द्वंद्व उभरता है। यदि अन्तःचेतना को कुचल-कुचलकर मूर्च्छित न बनाया गया हो तो वह इतनी प्रखर होती है कि अचिन्त्य चिन्तन के साथ विद्रोह खड़ा कर देती है और उस अवाँछनीय विजातीय तत्व के पैर उखाड़ कर ही दम लेती है।
रक्त के श्वेत कण शरीर में रोग विषाणुओं के प्रवेश करते ही उनसे लड़ने के लिए एकत्रित हो जाते हैं और उन विषाणुओं को पूरी तरह खदेड़ देने तक प्रबल संघर्ष करते रहते हैं। रक्त को पहले से ही विषाक्त या दुर्बल बना लिया हो तो बात दूसरी है अन्यथा श्वेत रक्त कण शरीर को रोगों के आक्रमण में बचाये रहने का अपना उत्तरदायित्व पूरी तरह निभा देते हैं। ठीक इसी प्रकार चेतना के क्षेत्र में अन्तःकरण द्वारा यही उत्तरदायित्व निवाहा जाता है। अनैतिक और निकृष्ट स्तर का कोई विचार उस मस्तिष्क में देर तक अपने पैर नहीं जमा सकता; जिसका संरक्षण आन्तरिक ‘सद्गुरु’ सतर्कतापूर्वक कर रहा है। सद्विचारों की रखा पंक्ति का भेदकर मानवी चेतना पर दुर्विचारों का आधिपत्य जम सकना तभी संभव होता है जब अन्तरात्मा मूर्च्छित या मृतक स्थिति में पहुँचा दी गई हो।
कुकर्म करते समय- शरीर-गत दिव्य चेतना का विद्रोह देखते ही बनता है। पैर काँपते हैं, दिल धड़कता है, गला सूखता है, सिर चकराता है और भी न जाने क्या क्या होता है। ध्यानपूर्वक देखने से कुकर्म के लिए कदम बढ़ाते समय की भीतरी स्थिति ऐसी होती है, मानो किसी निरीह पशु को वध करने के लिए ले जाते समय कातर स्थिति में देखा जा रहा हो। सामान्य व्यक्तियों में से अधिकाँश की आन्तरिक स्थिति ऐसी हो जाती है कि वे विचार अधूरा छोड़कर अथवा असफल होकर वापिस लौट आते हैं। वस्तुतः यह पराजय- यह असफलता उस अंतर्द्वंद्व से ही उत्पन्न की होती है जो कुकृत्य न करने के पक्ष में प्रबल प्रतिपादन कर रहा था। सद्गुरु डूबते को उबारते हैं वाली उक्ति ऐसे ही अवसरों पर सर्वथा लागू होती है।
जिन्हें क्रूर कर्म करने होते हैं वे प्रायः उसके लिए गहरा नशा कर लेते हैं ताकि अन्तःचेतना उस कुकृत्य को करने से रोकने की बाधा उपस्थित न करें। हत्या करने जैसे कार्य तो शराब जैसे नशे पिये बिना किसी उस कला में पारंगत व्यक्ति से ही हो पाते हैं। नशे का प्रचलन न हो पाता तो सम्भवतः आधे से अधिक दुष्कर्म सम्भव ही न हो पाते और मस्तिष्क का आधा भाग, आधा समय जिस अचिन्तय चिन्तन में रुचिपूर्वक संलग्न रहता है वह बात भी न बन पाती। अन्तरात्मा की पुकार को निरस्त करने में नशे ने शैतान के प्रमुख शस्त्र का काम किया है।
अन्तरात्मा को कुचलते जाना, अपने आपको सर्वतोमुखी पतन के गर्त में धकेलना है। उज्ज्वल भविष्य को अन्धकारमय बनाने का प्रधान कारण आत्मा की पुकार को अनसुनी करते हुए उसे क्षीणतम दीन-दुर्बल बनाते जाना ही है। स्थिर और उच्चस्तरीय प्रगति के लिए उत्कृष्ट गुण कर्म, स्वभाव की आवश्यकता पड़ती है। व्यक्तित्व इसी आधार पर निखरता है और प्रतिभा इसी सम्बल के सहारे उभरती है। सफल जीवन- प्रबल पुरुषार्थी महामानवों की प्रधान विशेषता उनका मनस्वी होना ही है। मनस्वी वे है जो बाहरी प्रलोभनों एवं परिस्थितियों की परवा न करते हुए उच्च आदर्शों के लिए अपनी विचारणा एवं क्रियाशीलता को व्यवस्थित रूप से सँजोया करते हैं। ऐसे लोग बाहरी परामर्श की अपेक्षा नहीं करते और न जनप्रवाह किधर बहता जा रहा है वह देखते हैं। उन्हें अपनी जीवन नीति अन्तरात्मा की पुकार को प्रधानता देते हुए निर्धारित करनी पड़ती है। जो इतना साहस सँजो सके उन्हीं को असाधारण, अति मानव बनने का सुअवसर मिला है। इसे सद्गुरु कृपा का सबसे बड़ा अनुग्रह एवं वरदान कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।
शास्त्रकारों ने सद्गुरु का वंदन करते हुए उसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश की उपमा दी हैं। परमानंददायक परब्रह्म कहा है। यह उपमा किसी व्यक्ति विशेष के लिए प्रयुक्त नहीं हो सकती भले ही वह कितना ही सुयोग क्यों न हो। यह वर्णन विशुद्ध रूप से परिष्कृत अन्तःकरण के लिए ही किया गया है। गुरु को गोविन्द से बढ़कर मानने की मान्यता अन्तरात्मा को परमात्म का उपलब्धि आधार समझने के लिए ही प्रतिष्ठापित की गई है। निरन्तर सत्परामर्श देने के लिए अहिर्निश साथ रहना उसी के लिए सम्भव हैं। अपनी वस्तुस्थिति को समझने और तद्नुरूप प्रगति पथ पर आगे बढ़ने का क्रम निर्धारण कर सकना उसी के लिए सम्भव है। अस्तु सद्गुरु की उपमा ऐसी परिष्कृत और प्रखर अंतरात्मा को ही दी गई है जो अवाँछनीयता का डटकर प्रतिरोध खड़ा कर सकें और अकर्म में उद्यत उन्मुक्त हाथी जैसे दुस्साहस हो जंजीरों में जकड़ कर उल्टा टाँग सकें।
व्यक्ति विशेष को गुरु मानने की भी आवश्यकता पड़ती है। पर उसका कार्य सद्गुरु की पहचान करा देना- उसका भक्त उपासक बना देना भर है। इतने भर से उसकी आवश्यकता पूरी हो जाती है। किसी व्यक्ति को सद्गुरु कहना उसकी अहंकारिता का पोषण करना है। यात्रा पूरी करने में टाँगों की ही प्रधान भूमिका रहती है लाठी तो सहारा भर देती है। सद्गुरु हमें पार उतारते हैं उन्हें प्राप्त करने के लिए शरीरधारी गुरु भी अपने ढंग की आरम्भिक किन्तु महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करते हैं इसलिए पूजन वन्दन उनका भी किया जाता है।
सद्गुरु भक्ति को ईश्वर भक्ति के तुल्य माना गया है, पर वह बात सही तभी सिद्ध होगी जब अन्तःकरण को सद्गुरु माना जाय और उसे स्वाध्याय सत्संग चिन्तन, मनन जैसी सेवा साधना के आधार पर प्रखर और परिष्कृत बनाया जाय। हर कुविचार की काट कर देना और कुकर्म में प्रतिरोध कर सकना सद्गुरु का ब्रह्मा तेजस है जिसके कारण उसे ब्रह्माग्नि की उपमा दी गई है। सत्प्रवृत्तियों को उभार सकना- सद्भावनाओं को समर्थ बना सकना- सद्गुरु का अनुदान वरदान है। जब अपना अन्तःकरण ज्ञान भक्ति की विविध साधना से सम्पन्न होकर शिष्य के व्यक्तित्व पर छा जाने योग्य बन जाय तो समझना चाहिए कि सच्चे सद्गुरु के मिलन का सौभाग्य प्राप्त हो गया। शिष्यत्व के साथ जो दीक्षा संकल्प जुड़ा रहता है वह यही है कि सद्गुरु के निर्देश को शिरोधार्य किया जायगा उसकी प्रेरणा का सच्चे हृदय के अनुगमन किया जायगा। ऐसी ही गुरु भक्ति को ईश्वर भक्ति के तुल्य ठहराया गया है। वास्तविकता भी ऐसी ही है।
मनुष्य दीन-हीन बना रहने के लिए उत्पन्न नहीं हुआ है। वह दिव्य है और उसे दिव्यता की ओर बढ़ना चाहिए। महानता उसका लक्ष्य है और महान विभूतियाँ उसके अन्दर विद्यमान है। भगवान ने दिव्य सम्पदाओं से विभूषित करके उसे इस पृथ्वी पर भेजा है। उसके पास दिव्य शक्तियों की बहुमूल्य सम्पदा है। यदि वह चाहे तो उसका उपयोग करके क्षुद्र से महान लघु से विराट बन सकता है; किन्तु फिर भी मनुष्य दुखी एवं दरिद्र बना रहता है यह स्थिति मानवीय गरिमा के विरुद्ध है।
लाचारी दरिद्रता एवं मूर्खता की दशा में पड़े रहना आत्म गौरव के विरुद्ध है। आत्म गौरव बनाये रखने के लिए व्यक्ति को सम्मान पूर्ण स्थिति में रहना चाहिए जिसमें उसका क्रमिक विकास सम्भव हो। जब व्यक्ति आन्तरिक दरिद्रता के शिकंजे से निकल कर आत्मिक समृद्धि की ओर बढ़ता है तब उसे एसो आभास होता है कि प्रगति के विशाल प्रवाह की ओर अग्रसर हो रहा है। उसका मार्ग निर्विघ्न होता है। इन परिस्थितियों में वह सुख-सन्तोष अनुभव करता है। ऐसे व्यक्ति ही अपनी विकासशील आन्तरिक अवस्था के सहारे कुछ कर दिखाते हैं।
जब व्यक्ति संकीर्णता छोड़कर व्यापक दृष्टि अपनाता है तो उसे पता चलता है कि जिस वस्तु को वह खोज रहा था वह तो स्वयं ही उसके पास है। हम अपने मन से स्वार्थ पूर्ण एवं कुत्सित विचारों को निकाल दें तो हमें परमात्मा के निकट अपने को पायेंगे। कुविचार और कुकृत्य ही हमारा रास्ता रोके हुए हैं। दुष्कर्म करने से ही मनुष्य की आँखों में अन्धकार का पर्दा पड़ जाता है जिसके कारण हम परमात्मा और उसकी श्रेष्ठता के दर्शन नहीं कर पाते हैं।
मन में दरिद्रता के भावों को स्थान देकर हम पवित्रता अथवा समृद्धि की आकाँक्षा करते हैं यह हमारी भूल है। हम यह क्यों नहीं सोचते कि कुत्सित विचारों के फेर में अभीष्ट वस्तु हमें मिल नहीं सकती है? ठीक वैसे ही जैसे प्रयत्न करें किसी वस्तु के लिए और आज लगायें दूसरी की तो यह कैसे सम्भव है। ध्यान देने योग्य बात है कि हम समृद्धि की चाहे कितनी ही तीव्र आकाँक्षा क्यों न करें दारिद्रय और दुर्दैव के विचार हमें निरुत्साहित ही करते रहेंगे?
परमात्मा ने मनुष्य के लिए जो ढाँचा बनाया है क्या उसमें कही दरिद्रता, गरीबी एवं न्यूनता के लिए कोई स्थान है? नहीं है। परमात्मा का भण्डार समृद्धि की विपुल सामग्री से भर हुआ हैं; पर आश्चर्य की बात है कि हम समृद्धि के भवन में रहते हुए भी दीन और दरिद्र हैं। यह हमारे विचारों की क्षुद्रता एवं संकीर्णता का ही कारण है। दरिद्र वह व्यक्ति नहीं है जिसके पास पैसा नहीं है, सुविधाएं नहीं है वरन् दरिद्र वह है- जिसके विचार दरिद्र है, जिसके अन्तःकरण में कुविचारों का डेरा है। व्यक्ति को अपने दिव्य विचारों की अलौकिक ज्योति से दरिद्रता, कंगाली, संकीर्णता आदि अन्धकार युक्त विचारों को छिन्न भिन्न कर देना चाहिए तथा उस दिव्य ज्योति में अपने अंदर छुपे हुए पारस रूपी गुणों एवं विभूतियों के भण्डार को जानने एवं समझने का प्रयास करना चाहिए जिन्हें ढूंढ़ता हुआ वह बाहर जगत में भटकता रहता है।
महान व्यक्तियोँ ने बाहरी सफलताओं से महानता प्राप्त नहीं की है वरन् वह तो उनकी आन्तरिक सफलता का ही रहस्य था। जिसके सहारे वह ऊँचे उठे और उठ कर दुनिया को प्रकाशित किया।
प्रायः व्यक्ति समृद्धि एवं सौभाग्य का अर्थ इच्छित वस्तु की प्राप्ति से लगा लेते हैं पर वस्तुतः यह समृद्धि और सौभाग्य आत्मिक ज्ञान की पूँजी से प्राप्त होता है।
यदि पशु पक्षियों को प्रशिक्षित करने पर ध्यान दिया जाय तो वे भी मनुष्यों की तरह बुद्धिमान हो सकते हैं। मनुष्य भी आदिम काल में अन्य प्राणियों की तरह ही अनगढ़ था। सहयोग की वृत्ति अधिक रहने से एक ने दूसरे की सहायता की और संचित अनुभव का लाभ अपने साथियों को मिल सके इसका प्रयत्न किया। एक का अनुदान दूसरे को मिलने की पुण्य प्रक्रिया ने मनुष्य को पीढ़ी दर पीढ़ी अधिक बुद्धिमान और अधिक किया कुशल बनाया है। यदि वही आधार अन्य प्राणियों को मिल सके तो वे भी अब की अपेक्षा कहीं अधिक बुद्धिमान हो सकते हैं। उनमें भी वे सब तत्व मौजूद है जो मनुष्य की तरह बुद्धिमान बन सकने का द्वार खोल सकते हैं। मनुष्य चाहे तो इस दिशा में अन्य प्राणियों की बहुत सहायता कर सकता है। अविकसित मस्तिष्क के बालकों को कुशल अध्यापक लिखा पड़ा कर बुद्धिमान बना देता है तो कोई कारण नहीं कि अन्य प्राणियों को प्रशिक्षित बनाने के लिए किये गये प्रयत्नों को सफलता न मिले।
इस संदर्भ में अमेरिका में मिसिसिपी राज्य के अंतर्गत पोपरबिल नामक कस्बे के निवासी केलर बिलेण्ड नामक एक अधेड़ सज्जन विशेष रूप से प्रयत्न कर रहे है यों वे मनोविज्ञान शास्त्र के स्नातक है, पर उनने अपना प्रमुख कार्य तरह-तरह के प्राणियों को उनके वर्तमान स्तर से आगे को शिक्षा देकर अधिक बुद्धिमत्ता का परिचय दे सकने योग्य बनाने का अपनाया हैं। पशु मनोविज्ञान शास्त्र में उनके प्रयत्नों ने नई कड़ियाँ सम्मिलित की है।
बिलैण्ड की पत्नी मेरियन भी इस प्राणि प्रशिक्षण कार्य में पूरी सहायता कर रही है। इन दिनों उनने लगभग 40 किस्म के जीवों को अपने स्कूल में ‘भर्ती किया हुआ है। जिनमें मछली, चूहे, कुत्ते, बिल्ली, मुर्गे, तोते आदि सभी किस्म के प्राणी सम्मिलित हैं। अब तक उनके स्कूल के लगभग एक हजार प्राणी आश्चर्यजनक कार्य कर सकने और आकर्षण केन्द्र बन सकने योग्य विशेषताएँ प्राप्त करके विदा हो चुके हैं। प्रशिक्षित जीवों को खरीदने वाले शौकीनों की कमी नहीं रहती, वे अपने मन पसन्द के प्राणी अच्छा मूल्य देकर खरीद ले जाते हैं और मनोरंजन का आनन्द लेते हैं। शिक्षकों को भी इस धंधे से अच्छी आजीविका प्राप्त होती रहती है।
इस विद्यालय की एक कक्षा का मुर्गियाँ आज्ञा देने पर जूक वाक्स का स्विच दबाकर फिल्मी रिकार्ड चालू कर देती है और उनकी ध्वनि कर ताल बद्ध नृत्य करती है।,
मुर्गे टीम बनाकर खिलाड़ियों की तरह अपने-अपने मोर्चे पर आमने सामने खड़े होते हैं और उस क्षेत्र में प्रचलित ‘वैसवाल’ खेल, सही कायदे, कानून के अनुसार खेलते हैं। उनके साथ कोई बेईमानी चालाकी करता है और न आलस्य न लापरवाही। जो पार्टी हार जाती है वह बिना अपमान अनुभव किये पर फैला कर रेत में बैठ जाती है।
रेनडियर प्रेस की मशीन चलाते हैं। कुत्ते बास्केट बाल खेलते हैं। बतखें स्वसंचालित ढोल बजाने की मशीन को चलाती हैं, दर्शक उस बाजे का आनंद लेते हैं।
खरगोश पियानो बजाते ओर दस फुट दूरी तक ठोकर मारकर गेंद फेंकते हैं। बकरियाँ कुत्ते के बच्चों को पालती और अपना दूध पिलाती हैं।
यह सारी शिक्षा क्रिकेट ने पुरस्कार का प्रलोभन देकर पूरी कराने की तरकीब निकाली है। वे इन प्राणियों को आरम्भ में एक कार्य सिखाते हैं। पीछे जब वे मालिक की मर्जी समझने और निबाहने का संकेत समझ लेते हैं तो प्रत्येक सफलता पर स्वादिष्ट भोजन देने का उपहार दिया जाने लगता है। उन्हें सामान्य रीति से भोजन नहीं मिलता। उपहार पर ही उन्हें निर्वाह करना पड़ता है। लोभ से, आवश्यकता से अथवा विवशता से प्रेरित होकर वे सिखाये गये कामों को पूरा करते हैं और दर्शकों का मनोरंजन तथा शिक्षकों का पारिश्रमिक जुटते हैं काम करो तो खाना मिलेगा अन्यथा नहीं। यह तरीका सारी प्रशिक्षण प्रक्रिया की धुरी हैं।
कुछ जानवर स्वभावतः चतुर होते हैं और कुछ मंद बुद्धि। चतुर अपनी सीखी विधि को फुर्ती के साथ इशारा पाते ही पूरा कर देते हैं पर कुछ या तो भूल जाते हैं या उपेक्षा करते हैं। उन्हें कठिन और बढ़िया काम से हटाकर सरलता से हो सकने वाले खेल सिखा दिये जाते हैं। एक रैकून को जब बचत के पैसे जमा करने वाले डिब्बे में गिनती के पैसे डालने में अभ्यस्त न बनाया जा सका तो सीटी बजाने की सरल शिक्षा देकर छुट्टी दे दी गई।
संदेशवाहक कबूतर, नियमित रूप से नियत स्थानों पर पहरेदारी करने वाले कुत्ते, बिखरे समान को इकट्ठा करने वाली बिल्लियाँ, रेडियो बजाने के शौकीन रैकून अपने बताये हुए काम ठीक तरह करते हैं।
अधिक समझदार जानवरों में कुत्ते और बन्दर आते हैं। ये किसी छोटी फैक्टरी या दुकान के मालिक का पूरी तरह हाथ बटाते हैं। ढेर की वस्तुओं को छाँटकर अलग-अलग कर देना उन्हें अलग-अलग स्थानों पर यथा क्रम लगा देना। उन्हें कुछ ही दिन में आ जाता है। घड़ी देखकर नियम समय का अनुमान कर लेना और तदनुसार अपनी ड्यूटी में हेर फेर कर देना उनमें से अधिकाँश को आ जाता है। प्रेशर, कुकर में भोजन पकते छोड़कर मालिक चला जाता है और जब पकजाने की सीटी बजती है तो बंदर द्वारा स्विच बंद करके उस काम को पूरा कर देना सहज ही आता है। ऐसे-ऐसे अनेक काम वे सीख जाते हैं। तोता, मैना मनुष्य की बोली की नकल करने के लिये प्रसिद्ध थे ओर अन्य कई पशु-पक्षियों को भी थोड़ा बहुत मानवी भाषा और उसका तात्पर्य समझने का अभ्यास होने लगा हैं।
ब्रिलेण्ड केलर का 280 एकड भूमि पर बना प्राणि प्रशिक्षण गृह-”एनीमल बिहेवियर एन्टर प्राइस’ के नाम से प्रसिद्ध है। उसकी वार्षिक आमदनी 25 लाख रुपया हैं। इस आय से वे नई प्रयोगशालाएं और नये प्रशिक्षण गृह स्थापित करते जा रहे हैं। अब तक सरकस वालों को ही पद श्रेय प्राप्त था कि वे खतरनाक जानवरों को कुछ खेल दिखाने के लिये प्रशिक्षित करते हैं। इस दिशा में ब्रिलेण्ड के प्रयोग प्राणियों के बौद्धिक विकास की समस्या सुलझाने की दृष्टि से हो रहे हैं। उनकी शिक्षण पद्धति को ‘कंडीशनिंग थियरी’ कहा जाता है। जिसका आधार प्राणियों को यह समझा देना कि ‘ऐसा करने से ऐसा होगा।’ कर्मफल का सिद्धान्त जानकर पशु-पक्षी भी यह समझ जाते हैं कि हमारे लिये क्या करना लाभदायक है और क्या हानिकारक। एक मनुष्य ही ऐसा है जो सब कुछ सीख कर भी जीवन समस्याओं के सुलझाने में भूल पर भूल करता रहता है और कर्मफल के सिद्धान्त का जानकर होते हुए भी नशेबाजी जैसे अनेक प्रसंगों में उसकी पूरी उपेक्षा करता है।
प्रशिक्षण से पशु पक्षी बौद्धिक विकास की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं और अपने लिये तथा दूसरों के लिये अधिक उपयोगी हो सकते हैं। ऐसा ही उपयोगी शिक्षण 400 करोड़ आबादी वाले संसार में रहने वाले 300 करोड़ पिछड़े लोगों को भी मिल सके तो वे आज की स्थिति से निस्संदेह कहीं ऊँचे उठा सकते हैं।
एक सीप कराह रही थी उसके पेट में मोती था। प्रसव पीड़ा उसे कष्ट दे रही थी।
कराह का कारण जानने के बाद सीप की सहेली ने संतोष की साँस ली और अपने भाग्य को सराहते हुये कहा-मैं मजे में हूँ मुझे प्रसव पीड़ा का झंझट नहीं सहना पड़ा।
एक बुड्ढा केकड़ा कुछ दूर बैठा-बैठा यह सब देख सुन रहा था-उसने गरदन उठाकर देखा और कहा-आज की पीड़ा से एक को सुँदर मोती की जन्म दात्री बनना है और दूसरी का चैन उसे सदा दरिद्र बनाये रहने वाला है ये क्यों नहीं जानती कि पीड़ा ही कष्ट और चैन ही सुख नहीं हैं।
अन्य लोकों से आने वाले अन्तरिक्षीय यान जिन्हें हम आमतौर से ‘उड़ान तश्तरी’ कहते हैं। हमारे मानव रहित शोध राकेटों की तरह नहीं होते, वरन् उनमें जीवित प्राणी रहते हैं इस बात के भी प्रमाण मिले हैं। यह प्राणी अपनी पृथ्वी की परिस्थितियों का अध्ययन करते हैं और आवश्यक सूचनायें अपने लोकों को भेजते हैं। इतना ही नहीं वे यहाँ के मनुष्यों से भी संपर्क स्थापित करते हैं, ताकि उनकी जानकारियों का आधार अधिक विस्तृत एवं प्रामाणिक बन सके।
उड़न तश्तरी अनुसंधान संस्था ‘निकैप’ ने ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण प्रकाशित कराया है। जिनसे अन्य लोकों के प्रबुद्ध व्यक्तियों का अपनी धरती पर आना सिद्ध होता है। मई 1967 में कालरैडो हवाई अड्डे के रेडार से उड़न तश्तरी के आगमन की जो सूचना प्राप्त हुई थी उसे झुठलाना उनसे भी नहीं बन पड़ा जो उड़न तश्तरी मान्यता का उपहास उड़ाते थे। अमेरिकी सरकार ने इस संदर्भ में एक अनुसंधान समिति की स्थापना की थी। उसके एक सदस्य जेम्समेकओनल्ड ने दल की रिपोर्ट से प्रथम अपनी पुस्तक लिखी हैं-’उड़न तश्तरियाँ-हाँ,” इसमें उन्होंने इन यानोँ की संभावना का समर्थन किया हैं।
डा0 एस॰ मिलर और डा0 विलीले का कथन हैं इस विशाल ब्रह्माण्ड में एक लाख से अधिक ऐसे ग्रह पिण्ड हो सकते हैं। जिनमें प्राणियों का अस्तित्व हो। इनमें से सैकड़ों ऐसे भी होंगे जिनमें हम मनुष्यों से अधिक विकसित स्तर के प्राणी रहते हों। हम पृथ्वी निवासियों के लिये ऑक्सीजन और नाइट्रोजन गैसें आवश्यक हो सकती हैं, पर अन्य लोकों के प्राणी ऐसे पदार्थों से बने हो सकते हैं जिनके लिये इन गैसों की तनिक भी आवश्यकता न हो। इसी प्रकार जितना शीत-ताप हमारे शरीर सह सकते हैं उसकी तुलना में हजारों गुने शीत, ताप में जीवित बने रहने वाले प्राणियों का अस्तित्व होना भी पूर्णतया संभव है। हम अन्न, जल और वायु के जिस आहार पर जीवन धारण करते हैं अन्य लोकों के निवासी अपनी स्थानीय उपलब्धियों से भी निर्वाह प्राप्त कर सकते हैं।
डा0 ले के कथनानुसार अन्तरिक्ष में 1000 अरब तारे हैं, उनमें से 1 करोड़ में जीवित प्राणियों के रह सकने योग्य अवश्य होंगे।
अन्तरिक्ष विज्ञानी डा0 फानवन का कथन है कि इस विशाल ब्रह्माण्ड में ऐसे प्राणियों का अस्तित्व निश्चित रूप से विद्यमान है जो हम मनुष्यों की तुलना में कहीं अधिक समुन्नत हैं।
कैलीफोर्निया के रेडियो एम्ट्रानामी इन्स्टीट्यूट के डायरेक्टर डा0 रोनाल्ड एन॰ ब्रेस्वेल ने ऐसे आधार प्रस्तुत किये हैं। जिनसे सिद्ध होता है कि अन्य ग्रह तारकों में समुन्नत सभ्यता वाले प्राणों निवास करते हैं और वे अपनी पृथ्वी के साथ संपर्क स्थापित करने के लिये प्रयत्नशील हैं। वे इस प्रयोजन के लिये लगातार संचार उपग्रह भेज रहे हैं। ये उपग्रह कैसे हैं इसका विशेष विवरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा हैं, वे फुटबाल की गेंद जितने होते हैं। उनमें कितने रेडियो यंत्र और कंप्यूटर लगे रहते हैं उनमें सचेतन जीव सत्ता भी उपस्थित रहती है जो बुद्धि पूर्वक देखती सोचती और निर्णय लेती हैं। इन उपग्रहों द्वारा पृथ्वी निवासियों के लिये कुछ विशेष रेडियो संदेश भी प्रेरित किये जाते हैं जिन्हें सुन तो सकते हैं। पर समझ नहीं पाते।
अन्य ग्रहों पर निवास करने वाले प्राणी आवश्यक नहीं कि मनुष्य जैसी आकृति प्रकृति के ही हों, वे वनस्पति कृमि-कीटक, झाग, धुँआ जैसे भी हो सकते हैं और महादैत्यों जैसे विशालकाय भी। जिस प्रकार की इन्द्रियाँ हमारे पास हैं उनसे सर्वथा भिन्न प्रकार के ज्ञान तथा कर्म साधन उनके पास हो सकते हैं।
उड़न तश्तरियों के क्रिया-कलाप में मनुष्य जाति को अधिक दिलचस्पी लेना शायद उनके संचालकों को पसंद नहीं आया हैं अथवा वे प्राणी एवं वाहन ऐसी विलक्षण शक्ति से संपन्न हैं जिसके संपर्क में आने पर मनुष्य की सुरक्षा के लिये खतरा उत्पन्न हो जाता है।
24 जून 1967 को न्यूयार्क में उड़न तश्तरी शोध सम्मेलन चल रहा था। उसी समय सूचना मिली इस रहस्य की अनेकों जानकारियाँ संग्रह करने वाले फ्रेंक एडवर्ड का अचानक हृदय गति रुक जाने से स्वर्गवास हो गया। यह मृत्यु ठीक उसी तारीख को हुई जिससे कि उनने यह शोध कार्य हाथ में लिया था। 24 जून ऐसा अभागा दिन है जिसमें दस शोध कार्य में संलग्न बहुत से वैज्ञानिक एक-एक करते मरते चले गये हैं। अकेले फ्रेक एडवर्ड ही नहीं, क्वीनथ अरनोल्ड, आर्थर ब्रायेट, रिचर्ड चर्च, फ्रेक सवली, विले ली आदि सब इसी तारीख को मरे हैं। दस वर्षों में 137 उड़नतश्तरी विज्ञानियों का मरना अत्यंत आश्चर्यजनक हैं। इस अनुपात से तो कभी किसी विज्ञान क्षेत्र के शोध कर्ताओं को मृत्यु दर नहीं पहुंची। जार्ज आदमस्की ने कैलीफोर्निया के दक्षिण पार्श्व में एक उड़न तश्तरी आँखों देखी थी। दर्शकों में एक प्रत्यक्ष दर्शी जार्ज ट्रैट विलियम भी था। वे घटना का विस्तृत विवरण प्रकाशित कराने में संलग्न थे। इतने में आदमस्की की हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई और हैट न जाने कहाँ गुम हो गया फिर कभी किसी ने उसका अता पता नहीं पाया। ट्रमेन क्थाम अपनी आँखों देखी की तैयारी कर रहा था कि अपने बिस्तर पर ही अचानक लुढ़क कर मर गया। ऐसी ही दुर्गति, बर्नी हिल नामक एक गवाह की हुई।
डा0 रेमेण्ड बर्नाड ने उड़न तश्तरियों पर कई पुस्तकें लिखी हैं। अचानक एक दिन उनकी मृत्यु घोषणा कर दी गई। पर कोई नहीं जानता था कि वे कब मरे, कहाँ मरे, कैसे मरे? संदेह है कि वे अभी भी जीवित है पर कोई नहीं जानता कि वे कहाँ हैं? इसी विषय पर एक अन्य पुस्तक प्रकाशित करने वाले डा0 मौरिस केजेसप ने खुद ही आत्म हत्या करली। अपने मोजों से गला घोट कर आत्म हत्या करने वाली ‘डोली’ और अनशन करके प्राण छोड़ने वाली ‘ग्लोरा’ के बारे में कहा जाता है कि एक उड़न तश्तरी के चालकों से भेंट के उपरान्त उन्हें ऐसा ही निर्देश मिला था जिसे टाल नहीं सकीं। कैप्टन एडवर्ड रुपेल्ट और विलवर्ट स्मिथ अपने मौत के स्वयं ही उत्तरदायी थे। राष्ट्र संघ के प्रमुख डाग हेयर शोल्ड का वायु यान 19 सितंबर 1961 को जलकर नष्ट हुआ था और वे उसी में मरे थे। दुर्घटना के प्रत्यक्ष दर्शी टिमोथी मानास्का ने शपथ पूर्वक कहा था कि उसने उस यान पर एक चमकदार तश्तरी झपट्टा मारती देखी थी। ये सभी लोग वे थे जिन्होंने उड़न तश्तरियों का पता लगाने के संबंध में गहरी दिलचस्पी ली थी।
कुछ को चेतावनी देकर भी छोड़ दिया गया हैं। ग्रे वारकर इस विषय पर एक पुस्तक प्रकाशित कर रहे थे कि उनके दरवाजे पर एक सवेरे प्रातःकाल पर्चा चिपका मिला,”उड़न तश्तरियों के बारे में चुप रहो नहीं तो बेमौत मारे जाओगे।” एक विज्ञानी राबर्ट एस. ईसले 25 फरवरी 1968 को इस विषय पर भाषण देकर लौट रहे थे कि किसी दिशा से उनकी कार पर दनादन गोलियाँ बरसने लगीं। घर पहुँचते ही टेलीफोन पर उन्होंने किसी का संदेश सुना-”आगे से इस विषय पर कुछ मत बोलो नहीं तो दुरुस्त कर दिये जाओगे।”
यों उड़न तश्तरी अभी भी एक रहस्य ही है और उनके संचालकों का किया कलाप और भी अधिक विचित्र है। फिर भी यह विश्वास किया जाता है कि कल नहीं तो परसों उन रहस्यों पर से पर्दा उठेगा और हम ऐसे युग में प्रवेश करेंगे जिसमें क्षुद्र आपापूती की संकीर्णता से ऊपर उठकर हमें विस्तृत अत्यन्त सुविस्तृत को ध्यान में रखकर सोचना पड़ेगा और उसी आधार पर अपनी गतिविधियों का निर्धारण करना पड़ेगा।
कुछ समय पूर्व इण्डोनेशिया में यूनेस्को के तत्वावधान में 150 वन विशेषज्ञों की एक अंतर्राष्ट्रीय गोष्ठी हुई थीं, जिसमें विश्व की घटती हुई वन संपदा पर चिंता प्रकट की गई थी। आमतौर से लोग वृक्षों का महत्व नहीं समझते। लकड़ी का लोभ और खेती के लिये अधिक जगह मिलने के लालच का लोभ और खेती के लिये अधिक जगह मिलने के लालच में पेड़ों को काटते चले जाते हैं वे यह भूल जाते हैं कि इन तुच्छ लाभों की तुलना में वृक्ष विनाश से होने वाली हानि कितनी अधिक भयंकर हैं। उपरोक्त प्री पैसिफिक साइन्स कान्फ्रैन्स ने संसार को चेतावनी दी कि वृक्ष सम्पदा विनाश का वर्तमान क्रम चलता रहा तो उसके भयानक परिणाम भुगतने पड़ेंगे।
उपरोक्त गोष्ठी में जापान, आस्ट्रेलिया, कनाडा, अमेरिका, जर्मनी, फ्राँस, इंग्लैण्ड, नीदरलैण्ड, भारत आदि 20 देशों के वन विज्ञानी उपस्थित थे। गोष्ठी में कनाडा के प्रतिनिधि डा0 ब्लादीमीर क्रजीना ने कहा-मनुष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता साँस लेने के लिये शुद्ध वायु मिलना है। वृक्ष हमारी इस आवश्यकता को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करते हैं। संसार में बढ़ते हुए वायु प्रदूषण का समाधान करने के लिये वृक्षों की रक्षा की जानी चाहिये। यदि हम वन संपदा को गंवा बैठेंगे तो फिर शुद्ध साँस का अभाव इतना जटिल हो जायेगा कि उसका समाधान अन्य किसी उपाय से संभव न हो सकेगा।
अन्य देशों के प्रतिनिधियों ने भी जो विचार व्यक्त किये उनसे स्पष्ट था कि वृक्ष रक्षा एवं अभिवर्धन का प्रश्न उतना उपेक्षणीय नहीं है जितना कि उसे समझा जा रहा हैं। उसे पशु पालन के स्तर पर रखा जाना चाहिए। सच तो यह है कि इससे भी अधिक महत्व उसे दिया जाना चाहिए। पशुओं को गंवाकर उनके द्वारा मिलने वाले श्रम, दूध, माँस, चमड़े से एवं गोबर से वंचित होना पड़ता है। वृक्षों को गंवाने की हानि उनसे भी अधिक है। वायु शोधन-वर्षा का संतुलन और पत्तों से मिलने वाली खाद, धरती के कटाव का बचाव, कीड़े खाकर फसल की रक्षा करने वाले पक्षियों के आश्रय के अभाव में सफाया आदि कितने ही ऐसे संकट हैं जो वृक्षों के घटने के साथ-साथ बढ़ते ही चले जायेंगे।
पिछले दिनों कल कारखानों की वृद्धि को-विकास का आधार माना जाता रहा है। खाद्य उत्पादन के लिये कृषि तथा सिंचाई पर भी जोर दिया जाता रहा है। बहुत हुआ तो यातायात के साधनों को बढ़ाने की बात भी आर्थिक प्रगति के लिये जोड़ दी गई। वन संपदा की महत्ता समझने की ओर जितना ध्यान देना आवश्यक था उतना दिया ही नहीं। सच तो यह है वनों को जमीन घेरने वाला माना जाता रहा और उन्हें काटकर कृषि करने की बात सोची जाती रही। जलाऊ लकड़ी तथा इमारती आवश्यकता के लिये भी वृक्षों की अन्धाधुन्ध काटा जाता रहा और उनके स्थान पर नये लगाने की ओर अपेक्षा बरती जाती रही। आज हम वन संपदा की दृष्टि से निर्धन होते चले जा रहे है और उसके कितने ही परोक्ष दुष्परिणामों को प्रत्यक्ष हानि के रूप में सामने खड़ा देख रहे हैं।
‘सहारा कान्क्वेस्ट’ ग्रन्थ के लेखक सेन्टवार्व बेकर ने सहारा रेगिस्तान की 20 लाख वर्ग मील भूमि के संबंध में लंबा और गहरा सर्वेक्षण करके लिखा है यह क्षेत्र किसी समय बहुत ही हरा-भरा था, पर लोगों ने ना समझी से उसे उजाड़ दिया। इससे क्रुद्ध हुई प्रकृति ने पूरा प्रतिशोध चुकाया। तेज हवा, सूर्य की सीधी धूप और पाले ने अच्छी-खासी उपजाऊ मिट्टी को रेत बना दिया। तेज हवाएं उस धूल को भी इधर से उधर उड़ाने लगीं, सिर्फ ऊसर और पथरीली जमीन ही टिकी हुई हैं। यह रेगिस्तानी विशाल भूखण्ड अब निकटवर्ती हरी-भरी जमीन को भी महासर्प की तरह निगलता चला जा रहा है। हर साल तीस वर्ग मील हरी-भरी जमीन उस रेगिस्तान की चपेट में आकर सदा−सर्वदा के लिये मृतक बन जाती हैं।
द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् एक बार अमेरिकी राष्ट्रपति रुजवेल्ट हवाई जहाज से मिश्र की भूमि से गुजरे, उन्होंने लेबनान के इतिहास प्रसिद्ध सिडार वृक्षों के वन्य प्रवेश की बड़ी प्रशंसा पढ़ी थी। पर जब उन्होंने नीचे झाँक कर देखा कि वहाँ नंगे पहाड़ खड़े हैं और जहाँ-तहाँ दस-बीस वृक्ष दीख रहे हैं तब उन्हें इसका बड़ा दुख हुआ। संसार में अन्यत्र भी ऐसी ही मूर्खता बरती जा रही हैं इसकी विस्तृत जानकारी प्राप्त करके उन्हें और भी अधिक वेदना हुई। उनके आदेश पर राष्ट्रसंघ पर अमेरिकी प्रतिनिधियों ने दबाव डाला कि विश्व खाद्य और कृषि संगठन में वन संपदा के संरक्षण को भी महत्वपूर्ण स्थान मिलना चाहिये वैसा हुआ भी। राष्ट्रसंघ के तत्वावधान में संसार में वन संपदा बढ़ाने के लिये जो प्रयत्न चल रहे हैं उन्हीं के अंतर्गत एक बड़ी आर्थिक सहायता देकर लेबनान में नये सिरे से सिडार वन लगाये गये हैं और हजारों एकड़ जमीन फिर से हरी-भरी बनाई गई हैं। ऐसे ही प्रयास अन्यत्र भी हुए हैं।
इज़राइल में हरा-भरा क्षेत्र एक तिहाई और सूखा रेगिस्तानी दो तिहाई हैं। उन लोगों ने इस सूखे भूखण्ड को हरा-भरा बनाने का संकल्प किया है और इन दिनों इस दिशा में अथक परिश्रम किया जा रहा है। पिछले दिनों ही 10 करोड़ नये पौधे उन लोगों ने लगाये हैं।
आइसलैण्ड वाले बहुत दिनों से अपनी वन संपदा उजाड़ते चले आ रहे थे फलस्वरूप वे अपनी उपजाऊ भूमि से हाथ धो बैठे। सन् 1946 के बाद उनकी आंखें खुली और योजनाबद्ध रूप से 20 लाख नये पेड़ लगाये। टस्मानिया का भी यही हाल हुआ। उन लोगों ने वृक्ष संपदा गंवाई फलस्वरूप रेतीली आंधियों का सर्वनाशी सिलसिला आरम्भ हो गया। घास-पात तक को उनने अपने पेट में निगल लिया। जब जीवन-मरण का सवाल पैदा हुआ तो उन्होंने ऊँचे चीड़ और देवदारु के पेड़ लगाकर रेतीली हवाओं से रोकथाम की है और 1500 एकड़ जमीन रेगिस्तान के मुँह में से उगलवाई है। स्काटलैण्ड में कुल्विन सेन्डम नामक छह मील लंबा और दो मील चौड़ा एक छोटा-सा रेगिस्तान था। उन लोगों ने इस अजगर का मुँह कुचल कर रख दिया है और अब वहाँ हरे-भरे उद्यान लहलहा रहे हैं। लीविया ने अपने रेगिस्तानों को छोटी झाड़ियों से पाट देने का निश्चय किया है और वे उस प्रयास में भली प्रकार सफल हो रहे हैं। आस्ट्रेलिया ने अपने 7 इंच जितनी स्वल्प वर्षा वाले क्षेत्र में संसार भर से 83 जाति के ऐसे पौधे मंगाकर वहाँ रोपे हैं जो सूखी आव हवा में भी पनपा सकते हैं। आग की तरह तपने वाले बूमेटा रेगिस्तान का एक बड़ा भाग अब वृक्षारोपण के अभिनव प्रयासों से हरा-भरा बनाया जा चुका है। उसे क्षेत्र के एक किसान डेस्माड फाइलिस ने अपने एकाकी प्रयत्न से 6000 वृक्ष लगाये हैं जो अब 20 फुट से भी ऊंचे हो गये हैं। इन वृक्षों ने उस क्षेत्र की भयंकर खुश्की को मनुष्यों और पशुओं के रहने योग्य बना दिया है।
मोरक्को ने अपनी कुंभकरणी नींद त्यागकर अपनी नष्ट होती वन सम्पदा को संभाला हैं। इन्हीं दिनों उन लोगों में 65 हजार जैतून के 2700 बादाम के और 1,3100 सदा बहार के बड़े वृक्ष लगाये हैं। इस कार्य के लिये उन्हें राष्ट्रसंघ से भी अनुदान मिला है।
चीन अपनी उत्तरी पश्चिमी सीमा को सुरक्षित रखने के लिये फ्राँस की प्रसिद्ध लौह प्राचीर की तरह वृक्षों की हरी दीवार खड़ी कर रहा है यह दीवार 6000 मील लंबी और कई मील चौड़ी होगी। वहाँ बंजर प्रदेशों को वृक्षों से पाट देने का कार्यक्रम चल रहा है।
अब संसार का हर देश समझ गया है कि मनुष्य जीवन के लिये पशु संपदा से भी बढ़कर वन संपदा का महत्व है इसलिए उसे राष्ट्रीय सम्पत्ति में उच्च स्थान दिया जा रहा है और उसे बढ़ाने के प्रयास को खाद्य उत्पादन स्तर का महत्व दिया जा रहा है।
स्काटलैण्ड के वनस्पति विज्ञानी राबर्ट चेर्म्बस ने लिखा है-बन नष्ट होंगे तो पानी का अकाल पड़ेगा। भूमि की उर्वरा शक्ति घटेगी और फसलों की पैदावार कम होती चलेगी। पशु नष्ट होंगे। पक्षी घटेंगे और मछली प्राप्त करना कठिन हो जायगा। वन विनाश का अभिशाप जिन पाँच पुराने प्रेतों की भयंकर विभीषिका बनाकर सामने खड़ा कर देगा वे हैं बाढ़, सूखा, गर्मी, अकाल और बीमारी। हम जान और अनजान में वन सम्पदा नष्ट करते हैं और उससे जो पाते हैं उसकी तुलना में कहीं अधिक गँवाते हैं।
धर्म शास्त्रों में वट, पीपल, आँवला आदि वृक्षों को देव संज्ञा में गिना है। उनके प्रति किसी समय कितनी गहरी श्रद्धा रही है इसका परिचय इस बात से मिलता है कि अभी भी वृक्षों के साथ लड़कियों का विवाह होने की प्रथा जहाँ-तहाँ पाई जाती है।
तिरहुत में मंगली लड़की का विवाह पीपल के पेड़ के साथ कर दिया जाता है। ताकि नक्षत्र दोष का अनिष्ट पीपल पर पड़े और मनुष्य वर को किसी विपत्ति का सामना न करना पड़े।
आन्ध्र के कुडप वंशी ग्रामीणों में कन्या का विवाह बारह वर्ष तक कर देने का रिवाज था, पर यदि किसी कारणवश विवाह न हो सका तो किसी फलदार पेड़ से उसका विवाह कर देते हैं और उसे सुहाग के सभी प्रतीक धारण करा देती है। इसके पश्चात् उसका ‘पुनर्विवाह’ किसी भी आयु में हो सकता है। यदि विवाह न हो तो भी उसे सुहागिन के सभी सामाजिक अधिकार मिल जाते हैं और बिरादरी के लोग विवाह न होने का लांछन नहीं लगाते।
नेपाल की नेवार जाति के लोग अपनी लड़कियों का विवाह विल्व वृक्ष के साथ करते हैं। इसके पश्चात् जब किसी पुरुष के साथ विवाह होता है तो वह उपपति कहलाता है। उपपति को कोई स्त्री कभी भी बहिष्कृत कर देती है, उसे नृत्य जितने ही अधिकार प्राप्त होते हैं।
हिसार जिले की धुमकूड बावरिया जाति में और सरगुजा के भीलों में यह प्रथा है कि विवाह की अनिच्छुक लड़कियों का विवाह पीपल के वृक्ष से कर देते हैं और यह मान लेते हैं कि उसका कुमारी रहने का ‘दोष’ निपट गया।
हरियाली को मनुष्य जीवन सहचरी का स्थान मिलना चाहिए और उसके परिपोषण के लिए प्रत्येक नागरिक में व्यक्तिगत रूप से दिलचस्पी उत्पन्न की जानी चाहिए।
महाकवि अलेक्जेन्डर स्मिथ प्रकृति को असीम प्यार करते थे और विचारशील लोगों को सम्बोधन करके कहते थे-अपनी स्मृति पीछे के लिए छोड़ जाना चाहते हो तो भवन बनाने और पदक प्राप्त करने की अपेक्षा वृक्ष लगाने पर ध्यान दो वे इन दोनों की अपेक्षा अधिक चिरस्थायी होते हैं।
संसार में सबसे पुराना वट वृक्ष ताइवान में ढूंढ़ निकाला गया है। ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर अब उसकी आयु 4128 वर्ष है। वह 48 मीटर ऊँचा है तने की मोटाई का व्यास 80 फीट से अधिक हैं चिजायी प्रान्त के मिएन युएह ग्राम के पास की पहाड़ी पर यह उगा हुआ है। वहाँ के निवासियों ने उस महावृक्ष का नाम ‘चेनी पौरिस’ रखा है। यह वृक्ष होने पर भी अभी सैंकड़ों वर्षों तक मजे में अपना अस्तित्व बनाये रहने योग्य सुदृढ़ है।
इसके अधिक सस्ता, अच्छा, ऊँचा, चिरस्थायी एवं अतीव उपयोगी स्मारक और क्या हो सकता है। मनुष्य अपना नाम चाहने की दृष्टि से ही सही वृक्षारोपण को महत्व दे तो भी उससे बहुत हित साधन हो सकता है। बिहार के हजारी बाग जिले का नामकरण इसी आधार पर हुआ है कि उस क्षेत्र के हजारी किसान ने अनवरत श्रम करके उस क्षेत्र में हजार बाग लगवाने में सफलता प्राप्त की थी।
इसके अधिक सस्ता, अच्छा, ऊँचा, चिरस्थायी एवं अतीव उपयोगी स्मारक और क्या हो सकता है। मनुष्य अपना नाम चाहने की दृष्टि से ही सही वृक्षारोपण को महत्व दे तो भी उससे बहुत हित साधन हो सकता है। बिहार के हजारी बाग जिले का नामकरण इसी आधार पर हुआ है कि उस क्षेत्र के हजारी किसान ने अनवरत श्रम करके उस क्षेत्र में हजार बाग लगवाने में सफलता प्राप्त की थी।
पशु ने बोलने के कारण कष्ट उठाता है और मनुष्य अधिक बोलने के कारण।
-लुकमान
पृथ्वी के इर्द-गिर्द सामान्यतया शान्त वातावरण है, पर जब कभी वायुमण्डलीय उथल-पुथल के छोटे-छोटे कारण बन जाते हैं तो उसका प्रतिफल भयंकर आँधी-तूफानों और बवंडरों के रूप में सामने आता है। कहना न होगा कि इन विद्रूप विद्रोहों के कारण असंख्यों को असंख्य प्रकार के कष्ट उठाने पड़ते हैं। साथ ही उस उथल-पुथल के कारण नये प्रकार के अवसर उत्पन्न होते रहते हैं।
प्रशाँत महासागर में टाइफून और अटलाँटिक महासागर में हरिकेन एवं टारनेडो तूफान आते हैं। उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों को ट्रापिकल साइक्लोन कहा जाता है।
पृथ्वी की गति के कारण उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध की हवाएँ परस्पर विरोधी दिशाओं में घूमती है। सूर्य की तेजी से हवाएँ ऊपर उठती है फलस्वरूप अगल बगल की हवाएँ नीचे की खाली जगह को भरने को दौड़ती हैं। उसी उथल-पुथल में हवा के कितने ही चक्रवात बन जाते हैं और वे जिधर से निकलते हैं उधर ही अपनी प्रचण्ड शक्ति का परिचय देते हैं। वे अक्सर 100-150 मील प्रति घण्टे की चाल से चलते हैं, पर कभी-कभी 200 मील की भी उनकी गति देखी जाती है। इनकी परिधि 25 से 600 मील तक की पाई जाती है। कभी-कभी वह तूफान अपने साथ समुद्र की लहरों को 15 फुट ऊँची उठा लेते हैं और समुद्र तट के क्षेत्र पर धावा बोल देते हैं। ‘टारनेडो’ अपने सजातियों में सबसे भयंकर होते हैं। वे विस्तार की दृष्टि से तो बहुत बड़े नहीं होते पर अपनी विनाश शक्ति का आश्चर्यजनक परिचय देते हैं। मजबूत पेड़ों को वे तिनके की तरह उखाड़ कर फेंक देते हैं। अमेरिका के इलिनाइज राज्य में एकबार एक तूफान ने एक गिरजाघर का समूचा शिखर उखाड़ लिया था और उसे पन्द्रह मील दूर ले जाकर पटका था। अन्य छोटी-बड़ी इमारतों को उखाड़ फेंकने की घटनाएँ तो आयेदिन होती रहती है।
भयंकर तूफानों का एक कारण तो उनमें रहने वाली हवा की ही तेजी होती है दूसरी वजह यह है कि चक्रवात के मध्य भाग में वायु भार बहुत हल्का रह जाता है। साधारणतया मनुष्य शरीर पर हर घड़ी हवा का 15 टन भार लदा रहता है। पर उस तूफान के मध्य भाग में यह वजन प्रायः आधा रह जाता है। इससे वस्तुएँ के ऊपर उठ जाने या फट जाने की स्थिति पैदा हो जाती है। इस भारहीनता के कारण जो क्षति होती हैं वह वायु वेग की तुलना में कम नहीं अधिक ही होती है। इस दुहरी मार के कारण ही इन चक्रवातों द्वारा इतना भयंकर विनाश होता है।
अमेरिका के दक्षिणी राज्य और एशिया के जापान, फारमोसा, फिलीपाइन आदि भाग इनके अधिक शिकार होते हैं। हिन्द महासागर में भी इनकी धूम रहती है और बंगाल की खाड़ी में वे अपना रौब दिखाने अकसर आ धमकते हैं। कभी-कभी वे इतने भयंकर होते हैं कि भूगर्भ को प्रभावित करके ज्वालामुखी फूटने, भूकम्प उत्पन्न करने कीक घटनाएँ खड़ी कर देते हैं। कितने ही नये द्वीपों का उदय होना और कितने ही टापुओं का समुद्र तल में समा जाना अक्सर तूफानों के साथ-साथ ही घटित होता है। ऐसे तूफान कई बार पृथ्वी के भीतर घटित होने वाली अन्य घटनाओं के कारण भी उत्पन्न होते देखे गये हैं।
पृथ्वी पर जो महत्व वायुमंडल का है, वही मानवी जगत में विचार प्रवाह का हैं। अवांछनीय विचार विप्लव जहाँ समूचे विश्व को पतन और विनाश की नारकीय परिस्थितियों में धकेल सकता है वहाँ प्रखर विचारणा की प्रेरणा से स्वर्गीय वातावरण भी पैदा किया जा सकता है। बौद्धिक उथल-पुथल को सुनियोजित बनाया जाय सके तो यह तूफानी शक्ति विनाश के स्थान पर विकास का आधार भी बन सकती है।
उपनिषद्कार का वचन है-’आत्मानंनावमन्येत, आत्मानंनावसादयेत्’ अर्थात् अपने आपकी अवमानना, अवज्ञा, मत करो। अपने को अवसदित मत करो, उदास न रखो।
उत्साह रहित स्थिति का नाम उदासी है। यह स्थिति प्रज्ञ, परमहंस जीवन मुक्त की अत्यंत उच्च कोटि की अध्यात्म स्थिति प्राप्त होने पर भी हो सकती है। साक्षी, दृष्टा, निरपेक्ष है। उसी स्तर पर पहुँचे हुए ब्रह्म वेत्ता, संसार में प्रभु की क्रीड़ा विनोद की हलचलें देखते हैं और कमल पत्र निर्मित भाव से उसके उस कौतुक को देखते हैं। अपने को आत्म चेतना की सुविस्तृत शृंखला की एक कड़ी मानकर नियत निर्धारित कर्म प्रयोजन में लगे रहते हैं। इस व्यवस्था संचालन के एक नट अभिनेता की तरह कर्म निरत रहते हुए न उन्हें हर्ष होता है न विषाद। इतने पर भी उनकी कर्म निरति के लिए आवश्यक स्फूर्ति एवं तत्परता में कोई कम नहीं होती। यदि उस तरह की कमी हो जाय तो शरीर काम करेगा और न मस्तिष्क। अवसादग्रस्त होकर वे जीवित मृत बन जायेंगे और मनुष्य जीवन के साथ जुड़ी हुई अनिवार्य कर्मनिष्ठ पूरी न करने के पाप-भागी बनेंगे। वह उच्च अध्यात्म स्थिति की बात हुई जिसमें जीवन अन्तः भूमिका में दृष्टा अथवा उदासीन रहता है, मनः स्थिति को अनासक्त रखता है किन्तु इससे उसकी शारीरिक मानसिक तत्परता में कोई अन्तर नहीं आता। भौतिक जगत में उदासी जिस स्थिति को कहते हैं उसे परिभाषा के अंतर्गत तत्वज्ञानी की मनोभूमि को नहीं ही रखा जा सकता। सन्त मत का ‘उदासीन’ सम्प्रदाय ‘अवसाद’ की निर्जीवन से भिन्न है।
जीवन का अमृत उत्साह है उसी से सजीवता और सरसता उत्पन्न होती है। इंद्रियों की तृप्ति उनके भोग पाकर भी सकती हैं किन्तु अन्तःकरण का उल्लास सरसता का निर्भर है। दाम्पत्य जीवन का प्राण उसकी सरसता है। पति पत्नी एक दूसरे को देखकर चन्द्र-चकोर जैसी प्रसन्नता अनुभव करते हैं-एक दूसरे के लिए उमगते रहते हों तो समझना चाहिए उन्हें इन्द्र और शची के काम और रति के जोड़े से अधिक आनन्द मिल रहा होगा, भले ही उनका शरीर रुग्ण अथवा कुरूप ही क्यों न हो, भले ही वे दरिद्रता और कष्टकर कठिनाइयों से ग्रसित ही क्यों न रहे हों। यही बात अन्य स्वजनों, मित्रों के संबंध में है उनके बीच उमंगे विद्यमान हों तो ‘मिलन’ का जो भाव मरा माहात्म्य गाया जाता है वह पूरी तरह सार्थक हो रहा होगा।
उदासी को दूसरे शब्दों में भावनात्मक मृत्यु कहना चाहिए। शरीर नित्य कर्म करता रहता है, मस्तिष्क को भी सामने प्रस्तुत समस्याओं को हल करना पड़ता है, पर यह सब होता मशीन की तरह है। नीरसता एक अन्य मनस्कता के कारण उत्साह चला जाता है और साथ ही उल्लास भी। इस भाव शून्यता को एक प्रकार से जड़ता ही कहा जा सकता है। किसी घड़ी उपलब्धि की आशा इस स्थिति के रहते हो ही नहीं सकती। उदासी जीवन को असफलताओं को श्मशान बनाकर रख देती है। उसे एक प्रकार का अभिशाप ही कहना चाहिए। इस विपत्ति में जो ग्रसित हो गये हैं उन्हें अपने उद्धार का शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए।
मनः शास्त्र वक्ता उदासी को एक मानसिक रोग गिनते और कहते हैं। छोटा दीखने पर भी वह अत्यन्त भयावह है। इस स्थिति में कोई तेजस्वी, ओजस्वी और मनस्वी बन ही नहीं सकता। इस प्रकार की चमक रही भी हो तो उसे स्थिर नहीं रखा जा सकता। उदासी को मनोविज्ञानी तीन भागों में विभक्त करते हैं-(1) ट्राँशिएन्ट डिप्रेशन अथवा ‘द ब्लूज’ इसे अस्थिर उदासी कह सकते हैं जो कभी भी आ जाती है और कभी भी चली जा सकती है। (2) पीरियाडिग डिप्रेशन अथवा ‘मूड स्विग्स’ इसमें कई कारण जुड़े रहते हैं अमुक ऋतु में, अमुक परिस्थितियों में उसका उभार आता है और स्थिति में परिवर्तन होने पर वह चला भी जाता है। (3) मेलेकोलिया अर्थात् ऐसी स्थिर उदासी जो प्रायः बनी ही रहती हो। अनुकूलताएं, प्रसन्नता एवं सुविधा के पर्याप्त साधन रहने पर भी उसमें कमी नहीं आती।
अस्थिर उदासी अमुक शारीरिक अथवा मानसिक कारणों से उत्पन्न होती है। जिगर की खराबी, कब्ज, आंतों की सूजन, स्नायु संस्थान की गड़बड़ जैसे शारीरिक कारण एवं प्रियजनों की उपेक्षा, प्रिय वस्तुओं का अभाव, प्रयत्नों में असफलता, अपमान आदि मानसिक कारण उदासी की स्थिति पैदा करते हैं। चिन्ता, भय, शोक, निराशा, आशंका, जैसी व्यथाएँ देर तक घेरे रहें तो भी कुछ समय बाद मनुष्य हतप्रभ होकर उदास रहने लगता है परिस्थिति बदल जाने पर, ध्यान उन बातें से हट जाने पर, कोई सुखद प्रसंग सामने आ जाने पर इसमें परिवर्तन भी हो जाता है। उदास रहने वाला व्यक्ति प्रसन्न रहता दीखने लगता है और उसमें फिर से उत्साह जागृत होता है।
सामयिक उदासी में मन का अमुक परिस्थितियों से डर जाना और उनमें विपत्ति की आशंका अनुभव करना प्रधान कारण होता है। अमुक ऋतु, अमुक व्यक्ति, अमुक स्थान, अमुक गृह दशा, अपने लिए विपत्ति उत्पन्न करती है यह विश्वास आरंभ में मनुष्य को उद्विग्न, भयभीत करते हैं पीछे जब उस दबाव से मन टूट जाता है तो कातरता आती है और उसे भी सहन कर सकने पर भाव क्षेत्र की उर्वरता चली जाती है। ऊसर भूमि की तरह उसमें भला बुरा कुछ भी नहीं उपजता।
स्थिर उदासी अधिक भयंकर है। उसमें परिस्थितियाँ कम और आत्म अवमानना प्रधान कारण होती है। आत्म हीनता, आत्म प्रताड़ना, आत्म अवमानना एक प्रकार से हल्के किस्म की आत्म हत्याएँ ही है। उद्विग्न मनुष्य अपने हाथों अपना आत्म हनन करते देखे जाते हैं। शरीर से प्राण को सर्वथा पृथक कर देने का नाम आत्म हत्या है। स्थिर उदासी उस स्तर तक तो नहीं पहुँचती पर उमंगों की वह उर्वरता नष्ट कर देती है जिसके आधार पर किसी दशा में प्रगति कर सकना एवं रसानुभूति का आनन्द पा सकना संभव होता है। ऐसे व्यक्ति अपने को अक्सर दुर्भाग्य ग्रस्त, दैवी प्रकोप के शिकार मानते हैं और कई बार दार्शनिकता की आड़ लेकर दुनिया को माया, मिथ्या, स्वप्न, भव बन्धन आदि बताकर उससे दूर भागने का उपक्रम रचते हैं। यद्यपि वे रहते इसी दुनिया में हैं और गुजारा भी इसी से पाते हैं, पर कहते यही है-दुनिया छोड़ दी या छोड़ रहे है। कलियुग और उसमें उत्पन्न होने वाली बुराइयों का वर्णन चाहे कितना ही भ्रामक क्यों न हो स्थिर उदासीनता की दशा में वही सुनिश्चित तथ्य प्रतीत होता है। भवितव्यता तो भवितव्यता ही है, उसे बदलना-पलटना संभव नहीं यह मान कर वे खिन्नता और निराशा युक्त उदासीनता में डूबे रहते हैं।
उदासी की व्यथा और उसकी निवृत्ति के संबंध में श्रीमती मारजोरे वोल्टन ने अपने शोध और उपचार प्रयत्नों का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा है कि उस स्थिति से उबरने के लिए अवसाद ग्रसित को स्वयं ही उसकी हानियों को समझने और उससे पीछा छुड़ाने के लिए प्रयत्न करने पड़ते हैं। दूसरे लोग तो वैसी सुविधा जुटाने में थोड़ी सहायता भर कर सकते हैं।
वोल्टन कहता है-उदासी ग्रस्त मनुष्यों को अपने सोचने की दिशा बदलनी चाहिए और यह मानकर चलना चाहिए कि जीवन में आती रहने वाली कठिनाइयों में से कोई भी असह्य नहीं है। हर संकट या अभाव का सामना किया जा सकता है। यदि उन्हें बदलना संभव न हो सके तो भी उनके साथ तालमेल बिठाकर गयी ढर्रा चलाया जा सकता है। असह्य तो केवल वह भीरुता है जो कठिनाई का सामना न कर सकने की अक्षमता का समर्थन करती है। वस्तुतः ग्लानि और भीरुता ही असली विपत्ति है घटना क्रम की विपन्नता नहीं, अपनी भीरुता से लड़ सकना हर किसी के लिए सरल और संभव है। यह मान्यता यदि सुदृढ़ की जा सके तो आत्मा हीनता और आत्म प्रताड़ना का दबाव घट सकता है और उदासीनता से पीछा छुट सकता है।
संगीत, साहित्य, शिल्प, कला, शोध, बागवानी, खेल कूद, पर्यटन आदि के नये शोक या कार्यक्रम बना लेने से भी अर्थ मनस्कता को बदलने का अवसर मिलता है। लोक सेवा के सार्वजनिक कार्यों में रुचि लेना भी आत्म संतोष और आत्म गौरव जगाने में सहायता करता है।
एकान्त वासी होने से उदासी पनपती और बढ़ती है। इसलिए लोगों के साथ घुलने मिलने की, हँसने-खेलने की, अपनी कहने और दूसरों की सुनने की आदत डालनी चाहिए। मिलनसार बनने और व्यस्त रहने के प्रयत्न करने चाहिए अनावश्यक संकोच शीलता को सज्जनता या बड़प्पन का चिन्ह मान बैठना गलत है। गंभीर होना अलग बात है और गीदड़ों की तरह डर कर कोने में छिपे बैठे रहना और संकोच के कारण मुँह खोलने का साहस न जुटा पाना दूसरी। संकोची मन ही मन घुटता है और उसकी घुटन प्रकारान्तर से व्यक्तित्व का गला घोंटती चली जाती है। उदासी इसी प्रकार की गिरी-मरी मनोदशा से सड़ी गली अभिव्यक्ति है। उसे बदलने का साहस न करने से तो दुर्भाग्य का सर्वतोमुखी दबाव बढ़ता ही जायेगा।
भूत काल की अप्रिय घटनाओं का चिन्तन भुला देना चाहिए और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं के आशा भरे चित्र बनाने चाहिएं जो बीता सो गया। अब उसे लौटाया नहीं जा सकता। अतीत में जो दुखद घटनाएं घटित हो चुकी उनको बदलना किसी भी प्रकार संभव नहीं। जो लौटाया नहीं जा सकता उसके बारे में सोचना भी निरर्थक है। भविष्य को उज्ज्वल बनाना अपने हाथ में है और उसी की तैयारी में लगा जा सकता है। जिस भी स्थिति में है-उसी में प्रगति की दिशा में एक कदम आज ही बढ़ाया जा सकता है और वह यह है कि उज्ज्वल संभावनाओं पर विचार करना उसका ढाँचा बनाना तत्काल आरंभ कर दिया गया। अतीत की कटुता को भुलाया जाना और भविष्य की आशंकाओं को निरस्त करना उचित कठिन नहीं है जितना कि उदासीनता ग्रसित मनःस्थिति में प्रतीत होता है।
जिन कारणों से उदासीनता उत्पन्न होती है उनमें यथा संभव सुधार करना चाहिए। संभव हो तो परिस्थितियों को बदलने और कुछ समय के लिए स्थान परिवर्तन करने की व्यवस्था बनाना चाहिए। मित्रों और कुटुम्बियों को उदासीन व्यक्ति का कुकल्पनाओं का झूठी सहानुभूति दिखाने के लिए समर्थन नहीं करना चाहिए अन्यथा व्यथा की जड़ें और गहरी बन जायेंगी। उनका कर्तव्य है कि उज्ज्वल भविष्य के सामने दिखायें और वर्तमान में सरसता उत्पन्न करने वाले जो भी प्रयत्न बन पड़े उन्हें कार्यान्वित करने की चेष्टा करें। हँसने-हँसाने हल्की-फुलकी बातें करने, खेल विनोद का वातावरण बनाने के लिए यदि कुछ किया जा सके तो उसे उपचार का उपयुक्त प्रयास माना जायेगा।
उदासी का आक्रमण परिस्थितियों के कारण मनःस्थिति की दुर्बलता के आधार पर होता है इसलिए उसके निराकरण में बाह्य उपचार क्रम और रोगी के निजी प्रयास अधिक सफल हो सकते हैं। आत्महीनता अनजाने ओढ़ ली गई अब जान बूझ कर आत्मोत्कर्ष का साहस करना चाहिए। उदासी को, हानियों को समझना, उसे दूर करने की आवश्यकता अनुभव करना, चिंतन की दिशा और अवांछनीय परिस्थितियों को बदलने में संलग्न होना, जैसे उपाय अपना कर इस घातक मनोविकार से पीछा छुड़ाया जा सकता है जो देखने में छोटा दीखता है किन्तु जीवन की सरसता और सफलता को नष्ट भ्रष्ट करके रख देता है।
प्राणियों की आवश्यकताएँ तथा इच्छाएँ उनकी शारीरिक, मानसिक शक्तियों तथा भौतिक परिस्थितियों का सृजन करती हैं इस तथ्य को, थोड़ा अधिक गहराई से विचार करने पर सहज ही जाना सकता है और उसके अनेकों प्राण पाये जा सकते हैं।
समझा जाता था कि वर्षा होने से वृक्ष वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं, पर पाया यह गया है कि वृक्षों की आवश्यकता उधर उड़ने वाले बादलों को पकड़ कर घसीट लाती है और उस अपने क्षेत्र पर बरसाने के लिए उन्हें बाध्य करती हैं। कुछ दिन पूर्व जहाँ बड़े रेगिस्तान थे पानी नहीं बरसता था और बादल उधर से सूखे ही उड़ जाते थे, पर अब जब वहाँ वन लगा दिये गये हैं तो प्रकृति का पुराना क्रम बदल गया और अनायास ही वर्षा होने लगी है। अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों के बारे में अब यह नया सिद्धान्त स्वीकार किया गया है कि वहाँ की वन सम्पदा बादलों पर बरसने के लिए दबाव डालती है। बादलों की तुलना में चेतना का अंश वृक्षों में अधिक है इसलिए वे विस्तार में बादलों से कम होते हुए भी सामर्थ्य में अधिक है। अतएव दोनों की खींचतान में चेतना का प्रतिनिधि वृक्ष ही भारी पड़ता है।
आत्म-रक्षा प्राणियों की एक महती आवश्यकता है। जीवों में जागरुकता और पराक्रम वृत्ति को जीवन्त बनाये रखने के लिए प्रकृति ने शत्रु पक्ष का निर्माण किया है। यदि सभी जीवों को शान्तिपूर्वक और सुरक्षित रहने की सुविधा मिली होती तो फिर वे आलसी और प्रमादी होते चले जाते उनमें जो स्फूर्ति और कुशलता पाई जाती है वे या तो विकसित ही न होतीं या फिर जल्दी ही समाप्त हो जाती।
सिंह, व्याघ्र, सुअर, हाथी, मगर आदि विशालकाय जन्तु अपने पैने दांतों से आत्म-रक्षा करते हैं और उनकी सहायता से आहार भी प्राप्त करते हैं। साँप, बिच्छू, बर्रे, ततैया, मधुमक्खी आदि अपने डंक चुभो का शत्रु को परास्त करते हैं। घोंघा, केंचुआ आदि के शरीर से जो दुर्गन्ध निकलती है उससे शत्रुओं को नाक बन्द करके भागना पड़ता है। गेंडा, कछुआ, सीपी, घोंघा, शंख, आर्मेडिलो आदि की त्वचा पर जो कठिन कवच चढ़ा रहता है उससे उनकी बचत होती है। टिड्डे का घास का रंग तितली फूलों का रंग, चीते पेड़-पत्तों की छाया जैसा चितकबरापन गिरगिट मौसमी परिवर्तन के अनुरूप अपना रंग बदलता है ध्रुवीय भालू बर्फ जैसा श्वेत रंग अपनाकर समीपवर्ती वातावरण में अपने को आसानी से छिपा लेते हैं और शत्रु की पकड़ में नहीं आते। कंकड़, पत्थर, रेत, मिट्टी, कूड़ा−करकट आदि के रंग में अपने को रंग कर कितने ही प्राणी आत्म-रक्षा करते हैं। शोक मछली बिजली के करेंट जैसा झटका मारने के लिए प्रसिद्ध है। कई प्राणियों की बनावट एवं मुद्रा ही ऐसी भयंकर होती है कि उसे देखकर शत्रु को बहुत समझ-बूझकर ही हमला करना पड़ता है।
शिकारी जानवरों को अधिक पराक्रम करना पड़ता है इस दृष्टि से उन्हें दाँत नाखून, पंजे ही असाधारण रूप से मजबूत नहीं मिले वरन् पूँछ तक की अपनी विशेषता है। यह अनुदान उन्होंने अपनी संकल्प शक्ति के बल पर प्रकृति से प्राप्त किये है।
शेर का वजन अधिक से अधिक 400 पौंड होता है जबकि गाय का वजन उससे दूना होता है। फिर भी शेर पूंछ के सन्तुलन से उसे मुँह में दबाये हुए 12 फुट ऊँची वाड़ को मजे में फाँद जाता है।
प्राणियों की शरीर रचना और वृद्धि संस्थान भी अपने स्थान पर महत्वपूर्ण है, पर उनकी सबसे बड़ी विशेषता है संकल्प शक्ति, इच्छा तथा आवश्यकता। यह सम्वेदनाएँ जिस प्राणों की जितनी तीव्र है वे उतने ही बड़े अनुदान प्रकृति से प्राप्त कर लेते हैं। मनुष्य को जो विभूतियाँ उपलब्ध हैं उनका कारण उसकी बढ़ी हुई संकल्प शक्ति ही मानी गई है।
आज भौतिक प्रगति और वैज्ञानिक उन्नति के लिए जो सरंजाम खड़े किये गये हैं उनमें यह ध्यान नहीं रखा गया है कि मानव जीवन को समुन्नत स्तर को बनाये रखने के लिये वातावरण को कोलाहल पूर्ण न बनाया जाय। अन्यथा प्रगति के नाम पर जो कुछ हाथ जगेगा, वह बहुत महंगा पड़ेगा। घने शहर बसते जा रहे हैं और विशालकाय कल-कारखानों का विस्तार हो रहा है। रेलों का जाल बिछ रहा है और मोटरों की घुड़दौड़ अधिकाधिक विस्तृत होती जा रही है। इन सबको मिलाकर ऐसी विक्षुब्ध परिस्थितियाँ बन रही हैं जिन्हें एक प्रकार का आतंकवाद ही कह सकते हैं। धन और ठाठ-बाठ का विस्तार इससे भले ही होता है जीवन विकास की मूलभूत आवश्यकताओं का एक प्रकार से बेतरह विनाश ही होता चला जा रहा है।
शहरों में सड़कों के किनारे मोटरों की भगदड़ से प्रायः 70-80 डेसीबल का शोर उत्पन्न होता है बड़े कारखानों की मशीनें 100 डेसीबल तक का कोलाहल करती हैं। सामान्य हवाई जहाज भी इतने ही दहाड़ते हैं। जेट विमान तो गजब ही करते हैं उनका दहला देने वाली आवाज 150 डेसीबल तक जा पहुँचती हैं। इसका प्रसार इतना होता है मानो किसी ने तानकर घूँसा मारकर तिलमिला दिया हो।
दूरदर्शी देशों में यह प्रयत्न किया जा रहा है कि 100 डेसीबल से अधिक की आवाज पर तत्काल प्रतिबन्ध लगा दिया जाय और उसे अधिकाधिक नीचे लाने के लिये क्रमिक प्रयत्न किया जाय। लाउडस्पीकरों पर अनावश्यक शोर करने की किसी को भी छूट न हो। बिना संतोषजनक कारण बताये लाउडस्पीकरों का उपयोग करने की इजाजत किसी को भी न मिले। विशेषतया रात्रि को जबकि निद्रा के लिये कोलाहल रहित वातावरण की आवश्यकता रहती हैं।
शान्त जलाशय को ढेला फेंकने पर लहरे उत्पन्न होती है और वे किनारे की ओर बढ़ती चली जाती हैं। इसी प्रकार आकाश में भरे हुए ईथर तत्व में कोई आवाज होने पर ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं। पानी की लहरें केवल सतह पर बहती है पर ध्वनि तरंगें हर दिशा में गोल गेंद जैसा घेरा बनाकर बढ़ती चली जाती हैं। यह ध्वनि लहरें आन्दोलन या कंपन कहलाती है। पानी में बड़ा पत्थर अधिक जोर से फेंकने पर लहरें अधिक तथा प्रबल उठती हैं, यदि ढेला छोटा या हल्का हो तो लहरें भी हलकी होंगी। उसी के अनुसार ध्वनि तरंगों की शक्ति भी न्यूनाधिक रहेगी।
एक सेकेंड में कितनी ध्वनि तरंगें उठीं, इस आधार पर शब्द शास्त्री अपना लेखा-जोखा रखते हैं। मनुष्य के कानों की रचना इस प्रकार की है कि वे एक सेकेंड में 20 से कम और 20 हार से अधिक कंपन गति को नहीं सुन सकते। आमतौर से एक हजार और पाँच हजार के बीच की ध्वनि तरंगें ही आसानी से सुनी जाती हैं। कई पशु-पक्षी इससे न्यून तथा अधिक ध्वनि प्रवाहों को भी सुन सकते हैं। चमगादड़ 20 हजार से ऊँचे कंपन भी सुन सकता है। मछली के कान नहीं होते उसका मस्तिष्क बिना कानों के ही शब्द प्रवाह के आधार पर आवश्यक जानकारी प्राप्त कर लेता है।
मंद से मंद ध्वनि जो मनुष्य के कानों से सुनी जा सकती है उसे ‘शून्य डेसीबल’ इकाई माना गया है। कानाफूसी की घुसफुस प्रायः 10 से 20 डेसीबल तक ही होती है। 140 डेसीबल की ध्वनि मनुष्य के कान के पर्दे फाड़ सकती है और उसे बहरा कर सकती है। 150 पर तो शरीर में भारी विक्षोभ उत्पन्न हो सकता है और मृत्यु तक हो सकती है। यों शरीर 75 को ही असहाय मानकर उसके विरुद्ध विद्रोह करने लगता है। तेज शोर के बीच रहने वाले लोगों की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति मंद या तीव्र रोगों की ओर बढ़ती जाती है।
हवाई जहाज इतना शोर करते हैं कि यदि 100 फीट दूरी से उनकी आवाज सुनी जाय तो सिर चकराने लगेगा। हवाई जहाजों के भीतर बैठे यात्रियों और चालकों को यह शोर कष्ट न दे इसलिये भीतर ध्वनि अवरोधक यन्त्र लगे होते हैं, पर बाहर आकाश में तो वह शोर होता ही है। इस ध्वनि का प्राणियों पर क्या प्रभाव होता है यह जाँचने के लिये गिनीपिग चूहों को जेट इंजन के शोर में रखा गया। कुछ ही मिनट में वे सब झुलस कर मर गये। तेज ध्वनियों का मानव शरीर पर बुरा असर पड़ता है यह भली प्रकार अनुभव कर लिया गया है। वैज्ञानिकों ने अब इतनी तीव्र ध्वनियों का आविष्कार कर लिया कि उनके शोर मात्र से बारूद या पेट्रोल की तरह देखते-देखते भयंकर अग्निकाण्ड हो सकता है।
आस्ट्रिया के ध्वनि विज्ञानी डा0 ग्रिफिथ का कथन है कि कोलाहल में रहने वाले अपेक्षाकृत अधिक जल्दी बूढ़े होते हैं। इंग्लैंड को स्वास्थ्य रिपोर्ट में शोर वाले क्षेत्र में एक चौथाई लोगों को न्यूरोसिस, सनक की मस्तिष्कीय विकृति में ग्रस्त पाया गया। अमेरिका के आवाज करने वाले कारखानों में एक चौथाई के कान अपनी स्वाभाविक क्षमता गंवाते चले आ रहे हैं।
सुपर मगनक लड़ाकू विमानों की दहलाने वाली आवाज के केन्योन की ऐतिहासिक गुफाओं में दरारें डाल दीं। ब्रिटेन और फ्राँस के सहयोग से बने कनकार्ड जेट ने लन्दन के सेन्टपाल गिरजाघर और पार्लमेन्ट भवन तक के लिये खतरा उत्पन्न कर दिया था। फलतः उस क्षेत्र में उसके उड़ने पर प्रतिबंध लगाया गया। डाक्टरों ने उस विमान की भयंकर आवाज के संबंध में यह भी चेतावनी दी थी कि उसकी उड़ान मार्ग के इर्द-गिर्द 100 मील तक के हृदय रोगियों का जीवन संकट में पड़ जायेगा।
मनुष्य के कान 25-30 डेसीबल तक की आवाज को सहन कर सकते हैं। इससे अधिक कोलाहल जहाँ भी होगा वहाँ कान के जरिये अवाँछनीय तनाव मस्तिष्क पर पड़ेगा और फिर वह उत्तेजना शरीर के विभिन्न अवयवों पर बुरा असर डालेगी। सेना फ्राँसिस्को के कैलीफोर्निया मेडिकल कॉलेज द्वारा ध्वनि प्रवाह के विभिन्न परिणामों का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है-विषैली जलवायु की तरह ही कोलाहल युक्त वातावरण भी स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव डालता है।
सन् 1966 में रूस के गोर्की नगर में अनभ्यस्त शोर का प्रभाव पशुओं पर क्या पड़ता है इसका परीक्षण किया गया तो यही पाया गया कि वे कर्कश ध्वनियों को सुनने के कारण अपनी सामान्य दिनचर्या छोड़ बैठते हैं और उद्विग्न रहने लगते हैं। उनकी कार्य क्षमता घट जाती है और अस्वस्थता आ घेरती है। पालतू पक्षी भी शोर से घबराते हैं। जो पालतू नहीं हैं वे कोलाहल से हटकर अन्यत्र अपने घोंसले बनाने की तैयारी करते हैं।
टैक्सास के एक शोध संस्थान ‘कैलीयर हीयरिंग एण्ड स्पीच सेन्टर’ द्वारा की गई ध्वनि प्रतिक्रिया शोध का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए उसके निर्देशक डा0 ग्लोरिंग डलास ने बताया कि अधिक शोर करने वाले कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों में से अधिकाँश को आँशिक बहरापन आ घेरता है। साथ ही उनकी कार्यक्षमता एवं सहनशीलता घट जाती है। चैकोस्लोवाकिया में शोर करने वाले और शोर रहित व्यवस्था वाले कारखानों की उत्पादन शक्ति कास लेखा-जोखा लिया गया तो प्रतीत हुआ कि शान्ति के वातावरण में शारीरिक और मानसिक श्रम कहीं अधिक मात्रा में संभव हो सकता है।
हारवर्ड विश्वविद्यालय के प्रो0 वैरोल विलियम्स ने सुविस्तृत क्षेत्र में दीर्घकालीन पर्यवेक्षण करके यह निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्य की जीवनी शक्ति को नष्ट करने और उसे अकाल मृत्यु का ग्रास बनने के लिए बाध्य करने में कोलाहल का बहुत बड़ा हाथ हैं। बड़े शहरों में सड़क के किनारे बने हुए घरों में जो लोग रहते हैं दौड़ती हुई मोटरों की आवाजें उनके मस्तिष्क को क्षुब्ध करती रहती हैं। फलतः अन्य मुहल्लों में रहने वालों की अपेक्षा वे अनिद्रा, घबराहट, धड़कन, बधिरता, रक्त-चाप, अपच जैसे रोगों से कहीं अधिक अनुपात में बीमार पड़ते हैं।
जार्जिया विश्वविद्यालय के डा0 विलियम एफ॰ गेबर ने चूहों को कोलाहल भरे वातावरण में रखकर देखा तो वे दिन-दिन दुबले होते गये और उन दिनों गर्भ में आये लगभग सभी बच्चे किसी न किसी बीमारी से ग्रसित एवं अविकसित अंग लेकर जन्मे पाये गये।
ओहियो के शरीर शास्त्री लीस्टर डबल्यू0 सानताँग ने गर्भवती महिलाओं में से जो शोर ग्रस्त क्षेत्र में रहने वाली थी उन्हें दुर्बल और रुग्ण संतान को जन्म देने वाली पाया।
सन् 1963 में लेनिन ग्राड के निकटवर्ती क्षेत्र में बुलडोजरों की सहायता से ऊबड़-खाबड़ जमीन साफ की गई। इन दैत्याकार यन्त्रों का प्रभाव समीप के मुर्गी फार्मों पर बहुत बुरा पड़ा। इन पक्षियों के पंख इस बुरी तरह झड़े कि वह विचित्र तरह के कुरूप हो गये। उदास रहने लगे और अण्डे देना रुक गया। असहाय शोर से मुर्गियां घबराने लगी और उनकी सामान्य दिनचर्या अस्त-व्यस्त हों गई।
वातावरण का कोलाहल असंदिग्ध रूप से मनुष्य के लिए अत्यन्त हानिकारक हैं। उसमें निवास करते हुए मात्र पौष्टिक आहार-विहार के अथवा दवादारु के आधार पर सामान्य स्वास्थ्य संरक्षण भी संभव नहीं हो सकता है। जिन्हें धन ही सब कुछ प्रतीत होता है वे भले ही घने शहरों में या गहरे समुद्रों में रहने पर जिन्हें जीवन की समस्वरता से प्यार हैं उन्हें अपना निवास प्रकृति के सान्निध्य में-शान्त वातावरण में व्यतीत करना चाहिये। कोलाहल किसी को सहाय अथवा प्रिय ही क्यों न प्रतीत होता हो, पर वस्तुतः उसकी विषाक्तता इतनी घातक है कि उसके दुष्परिणामों से बचा नहीं जा सकता।
ठीक इसी प्रकार मानसिक उद्विग्नता का बुरा प्रभाव भुगतना पड़ता है। चिन्ता, भय, आशंका, निराशा, क्रोध, आदेश, ईर्ष्या, ललक, लिप्सा का कोलाहल जिनके मन मस्तिष्क में निरन्तर उद्विग्नता पैदा करता रहता है उन्हें चैन की-शान्ति ओर संतोष की सुखद घड़ियां कदाचित ही मिल सके। वातावरण का कोलाहल शरीर और मन को विक्षुब्ध करता है। चिंतन क्षेत्र का कोलाहल मनुष्य को एक प्रकार से विक्षिप्त ही बनाकर रख देता है। ऐसा जीवन जीकर भला क्या कोई सुखी रह सकता है।
गुलाब का पौधा राजनीतिज्ञ के पास कुछ सीखने के उद्देश्य से पहुँचा। राजनीतिज्ञ ने उसे सिखाया ‘जो जैसा व्यवहार करता है उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिये। दुष्ट के साथ दुष्टता करना ही नीति है, यदि ऐसा न किया गया तो संसार तुम्हारे अस्तित्व को मिटाने में लग जायेगा।’
गुलाब ने उस राजनीतिवेत्ता की बात की गाँठ बाँध ली। घर लौटकर आया और अपनी सुरक्षा के लिए कांटे उत्पन्न करने लगा जो कोई उसकी ओर हाथ बढ़ाता वह कांटे छेद देता था।
कुछ दिनों बाद उस पौधे को एक साधु से सत्संग करने का भी अवसर मिल गया। साधु ने उसे बताया ‘परोपकार में अपने जीवन को खपाने वाले से बढ़कर सम्माननीय कोई दूसरा नहीं होता।’
परिणाम स्वरूप गुलाब ने उसी दिन अपने प्रथम पुष्प को जन्म दिया। उसकी मनुष्य दूर-दूर फैलने लगी, जो भी पास से गुजरता कुछ क्षण के लिए उसके सौंदर्य तथा सुरभि से मुग्ध हुए बिना न रहता।
आज गुलाब ने जो सम्मान पाया है वह अपने काँटों केवल पर नहीं वरन् अपने पुष्पों के सौंदर्य-सौरभ के बल पर ही पाया है।
सभी जानते हैं कि आक्सीजन मनुष्यों के लिए और कार्बन गैस पेड़-पौधों के लिए उपयोगी होती हैं। विज्ञान के आरम्भिक विद्यार्थी भी यह समझते हैं कि आग जलाने से उस क्षेत्र की आक्सीजन खर्च होती है और कार्बन बढ़ती है। सामान्य जानकारी के आधार पर अनावश्यक रूप से आग जलाना मानवी श्वास संपदा को हानि पहुँचाता है। इस दृष्टि से हवन-यज्ञ को भी विरोध किया जाता है और उसे हानिकारक बताया जाता है।
पर यह मोटी दृष्टि भर है। बारीकी से पर्यवेक्षण करने पर नये तथ्य सामने आते हैं। विष साधारणतया मारक गुण वाला होता है। पर उसे विशेष प्रकार से शोधित करके विशेष सम्मिश्रण विधान से तैयार करके देने पर असाध्य रोगों की चिकित्सा होती है और “विषस्य विष भौषधम्” की उक्ति चरितार्थ होती है। अग्निहोत्र के संबंध में भी वही बात लागू होती है।
साँस के साथ जो वायु भीतर जाती है उसमें प्रायः 20 प्रतिशत ऑक्सीजन और 0.3 प्रतिशत कार्बनडाइ ऑक्साइड होती है। जब साँस छोड़ी जाती है तो उसमें 3 प्रतिशत कार्बनडाइ ऑक्साइड और 16 प्रतिशत ऑक्सीजन रहती है।
यदि किसी कारण शरीर को ऑक्सीजन बम मिले-अशुद्ध वायुमण्डल में उसका अंश कम हो-अथवा शरीर की भीतरी स्थिति उसे कम मात्रा में सोख सके तो शारीरिक बीमारियों के अतिरिक्त मानसिक विकृतियाँ भी खड़ी हो जायेगी। लड़खड़ा कर बोलना, आंत्रशोध, चिड़चिड़ापन, थकावट, भय एवं आशंका समलिंगी मैथुन, अभिलाषा जैसे मनोविकारों और स्नायविक असंतुलनों से गति व लोग देख गये हैं जिनके शरीर में आक्सीजन की कमी और कार्बनडाइ ऑक्साइड की अतिरिक्त मात्रा पाई जाती है। कई बार ऑक्सीजन की अधिक मात्रा का शरीर द्वारा शोषण किया जाना भी हानिकारक होता है यद्यपि उसके लक्षण भिन्न प्रकार के होते हैं।
वायु संतुलन की चिकित्सा पद्धति मानसिक रोगियों के लिए प्रयुक्त की जाती है। डा0 लोवनहार्ट ने सन् 1926 से यह प्रयोग आरम्भ किये थे। उन्होंने वैटेट्रेंनिक शिजोफेनिया के रोगियों पर- कार्बनडाइ ऑक्साइड के उपचार किये और आशाजनक परिणाम प्राप्त किये ।इन सफलताओं से प्रभावित होकर सन् 1947 में वान मेन्डुला ने साइकोन्यूरोसिस के मरीजों पर कार्बन ऑक्साइड की मात्रा को उपचार का केन्द्रबिन्दु मानकर अपने प्रयोग किये। इसके सत्परिणामों को उन्होंने विस्तार पूर्वक सन् 1950 में निबन्ध रूप में प्रकाशित कराया।
उन्होंने कई रोगियों को कार्बनडाइ ऑक्साइड 30 प्रतिशत और ऑक्सीजन 70 प्रतिशत मिलाकर फेस माक्स उपकरण में भरी और उसमें साँस लेने की व्यवस्था की, रोगी 20-24 बार इस कृत्रिम वायु में गहरी साँस लेते। एक दिन छोड़कर वह उपचार किया जाता। उस समय तो रोगी को घुटन अनुभव होती और चेहरे तमतमा जाते, पर पीछे उन्हें राहत मिलती। ऐसे 25 उपचारों के बाद रोगियों को काफी राहत मिली और उनकी अधिकाँश व्यथाएं दूर हो गई।
ऑक्सीजन की समुचित मात्रा कोशिकाओं को किसी वजह से न मिले तो मस्तिष्कीय विकृतियाँ उत्पन्न होगी। नवीनतम न्यूरोलॉजी शोध तरह-तरह के मनोविकारों का शमन करने के लिये कार्बनडाइ ऑक्साइड की विभिन्न मात्राएं देते हैं और रोग निवारण में सफलता प्राप्त करते हैं। अग्निहोत्र द्वारा उत्पन्न हुई कार्बनडाइ ऑक्साइड ठीक इसी प्रकार का उपचार है जो प्रत्यक्ष में हानिकारक देखते हुए भी अनेकों मानसिक रोगों के निवारण में इतना अधिक सहायक होता है जिसे देखते हुए थोड़ी सी ऑक्सीजन का आग जलने से खर्च हो जाना कोई बड़ी हानि नहीं है।
समझा जाता है कि बीमारियाँ, विषाणु उत्पन्न करते हैं। इसलिए उन्हें मारने का उपाय खोजना चाहिए और इन रोग उत्पादक शत्रुओं से छुटकारा पाना चाहिये। औषधि विज्ञान का महत्वपूर्ण पक्ष इसी क्षेत्र में काम कर रहा है। पौष्टिक औषधियाँ तो खोजी नहीं जा सकी पर मारक दवाओं के निर्माण में बहुत हद तक सफलता मिल चुकी है। यदि बलवर्धक कोई रसायन बन सका होता तो धनी वर्ग में से एक भी दुर्बल अथवा रुग्ण न रहता। कम से कम चिकित्सक लोग तो अक्षय स्वास्थ्य का लाभ प्राप्त कर ही रहे होते।
हाँ मारक औषधियाँ ऐसी बनी है जो विषाणुओं के मारने में अपना चमत्कारी प्रभाव दिखाती है। पर उस जादू से भी कुछ बना नहीं। कीटाणु नाशक औषधियों ने कैमिस्टों के तीन चौथाई गोदाम भरे रहते हैं, वे ही बिकती भी अधिक हैं, पर विषाणु मरते रहने पर भी अमर ही बने रहते हैं। जिन बीमारियों को मारने के लिए वे मारक दवाएं बनी है वे घटने के स्थान पर बढ़ ही रही है। उनके त्रास से मनुष्य को तनिक भी छुटकारा नहीं मिल सका।
इस असफलता का कारण खोजते हुए हमें अपनी मान्यताओं में आमूल जल परिवर्तन करना ही पड़ेगा और यह चेतना होगा कि बीमारियों का जनक विषाणु नहीं है वरन् वे विकृत-शरीर-स्थिति में स्वतः भीतर से ही पैदा होते हैं। बाहर से वे तभी प्रवेश कर सकते हैं जब भीतर उनकी जड़े जगाने और फलने -फूलने की उपजाऊ परिस्थिति उत्पन्न हो चुकी हो। ऐसी परिस्थिति आहार-विहार की अवाँछनीयता और चिन्तन में आवेश ग्रस्तता घुस पड़ने पर ही विनिर्मित होती है। यह स्थिति न सुधारी जायेगी तो कीटनाशक दवाएं कोई बड़ा प्रयोजन पूरा न कर सकेगी।
विषाणु अकेले नहीं मरते। उस ‘कत्ले आम’ में वे सुरक्षा प्रहरी भी धराशायी हो जाते हैं जिनके ऊपर स्वास्थ्य रक्षा का सारा उत्तरदायित्व हैं। यह क्षति कीटाणु मरने के लाभ की तुलना में अधिक बड़ी है। फिर उनकी उत्पादन गति इतनी तीव्र है कि यदि पाँच प्रतिशत भी किसी कोने में बचे रहे तो अवसर पाते ही आँधी तूफान की तरह फिर बढ़ जाते हैं और साथियों के मरण से खाली हुआ मोर्चा फिर ज्यों का त्यों संभाल लेते हैं। बाहर से भी हवा, धूल, अन्न जल के साथ शरीर में प्रवेश करना रोका नहीं जा सकता। सफाई एवं रोक थाम के हजार उपाय करने पर भी दे किसी न किसी मार्ग से भीतर घुस पड़ने में सफल हो ही जायेंगे। रोकथाम का उपाय तो एक ही है कि रक्त स्वस्थ, स्वच्छ और समर्थ रहे ताकि कोई विषाणु उसमें प्रवेश करने पर बच ही न सके। ऐसी स्थिति स्वास्थ्य मर्यादाओं का कड़ाई के साथ पालन करने पर ही बनी रह सकती है।
यह कोई ऐसे नये तथ्य नहीं है जिन्हें किसी ने जाना न हो फिर भी जल्दी विषाणुओं को मारकर रोग मुक्ति पाने का लालच छूटता नहीं और आहार विहार को संतुलित सात्विक रखने का झंझट उठाते बनता नहीं। अस्तु कृमि नाशक दवाओं के निर्माण और उपयोग पर भी निरन्तर जोर दिया जा रहा है और उस नीति की उपेक्षा की जा रही है जिसे अपनाने पर विषाणुओं के प्रवेश करने और पनपने की संभावना ही समाप्त होती है।
गैरहार्ड डोमार्क ने सन् 1932 में ‘सल्फा ड्रग’ जाति की औषधियों की एक शृंखला प्रस्तुत की। उन दिनों यह आविष्कार बहुत उपयोगी माना गया। इसके बाद भी उस दिशा में खोजें जारी रही और अधिक शक्तिशाली ‘एन्टीबायोटिक्स जाति की औषधियाँ सामने आईं।
एन्टीबायोटिक्स जीवित कोषों में उत्पन्न होने वाले रासायनिक पदार्थ है। जो शरीर में घुसे हुए विषाणुओं का संहार करते हैं और बढ़ती हुई विपत्ति को रोकते हैं। इस वर्ग की औषधियाँ प्रायः सीजो माइटीस एक्टीनो, माइसीटीज मोल्ड जाति के पौधों से भी विनिर्मित होती हैं। इसी वर्ग की एक औषधि ‘पेन्सिलीन’ प्रकाश में आई। यह फफूँदी से विनिर्मित होती है। इसके बाद इसी जाति की और भी प्रभावशाली औषधियाँ बनाईं गई। स्ट्रैप्टोमाइसीन, क्लोरोमाइसिटीन, टेट्रा साइकिलीन ओरियो माइसीन, एकरो माइसीन, लीडर माइसीन, टेरा माइसीन, सिनर माइसीन, टेट्रामाइसीन, होरटाड साइकिलीन, आदि औषधियों का आविष्कार हुआ। यह विभिन्न जाति के विषाणुओं पर अपने अपने प्रभाव दिखाने में बहुत प्रख्यात हुई हैं। इनका प्रयोग कई रूपों में होता है, कैप्सूल, ड्राप्स, सिरप, टेबलेट, ट्राची, स्पर सायड मरहम, ससपेनशन्, इण्ट्राबीनसे इन्जेक्शन इनमें मुख्य हैं।
इन औषधियों के प्रयोग से जो कत्लेआम मचता है उनसे रोगकीट मरते हैं और बीमारी का बड़ा चढ़ा उपद्रव घट जाता है। इस चमत्कारी लाभ से सभी प्रसन्न हैं। रोगी इसलिये कि उसका बढ़ा कष्ट घटा। डाक्टर इसलिये कि उन्हें श्रेय मिला। विक्रेता इसलिये कि उन्हें धन मिला। निर्माता इसलिये कि उन्हें यश मिला। रोग भी प्रसन्न है कि हमारा कुछ नहीं बिगड़ा। हम जहाँ के तहाँ बने रहे और अपना विस्तार करने के लिये उन्मुक्त क्षेत्र पाते रहे। लाभ वस्तुतः रोग कीटकों के मरने का नहीं वरन् स्वस्थ कणों के दुर्बल हो जाने के कारण जो संघर्ष चल रहा था वह शिथिल पड़ जाने के कारण मिलता है। यह तत्काल का लाभ पीछे स्वास्थ्य की जड़ें ही खोखली कर देता है। फलतः नित नये रोगों का घर रोगी का शरीर बन जाता है।
बी. सी. जी. के विशेषज्ञ डा0 नोबेल इरबिन ने अपनी पुस्तकें बी.सी0 वोक्सिनशन थ्योरी एण्ड प्रेक्टिस में इस टीके से उत्पन्न होने वाली हानिकारक प्रतिक्रियाओं तथा उससे उत्पन्न होने वाली बीमारियों का विस्तारपूर्वक वर्णन और भण्डाफोड़ किया है। उस पुस्तक के पढ़ने से उस महात्म्य पर पानी फिर जाता है जो इन दिनों वी. सी. जी. के टीके लगाकर तपैदिक की रोकथाम के बारे में बताये जाते हैं।
जो देश इन मारक औषधियों में जितने अग्रगामी हैं वे स्वास्थ्य की दृष्टि से उतने ही दुर्बल होते जा रहे हैं। एक के बाद एक रोग की फसल उनके पूरे समाज में उगती कटती रहती हैं। इंग्लैण्ड में इन दिनों खाँसी की फसल पूरे जोश पर है यद्यपि उसकी निवारक औषधियों की भी भरमार हैं।
ब्रिटेन में खाँसी एक बहुप्रचलित रोग बन गए हैं। ‘प्रेक्टीश्नर’ पत्रिका अनुसार संसार का सबसे अधिक खाँसी ग्रस्त देश ब्रिटेन हैं जहाँ ब्रोकाहिम के रोगी सभी अस्पतालों में सबसे अधिक इलाज कराने आते हैं। उस देश में दस लाख पीछे 559 व्यक्ति इसी रोग से मृत्यु को प्राप्त होते हैं। बीमा कंपनियों को इस रोग के रोगियों को 70 लाख पौण्ड का भुगतान करना पड़ता है।
भोजन पचाने के लिये आमाशय से जो रस निकलते हैं, इन्हें एन्जाइम्स कहा जाता है। यह कई प्रकार के होते हैं। इनमें पेप्सिन, ट्रिप्सिन, अमाइलेज आदि मुख्य हैं। जब इन स्रावों की कमी हो जाती हैं तो अपच की शिकायत पैदा होती हैं और गैस बनने लगती है। आंतों में कुछ खास किस्म के बैक्टीरिया जीवाणु होते हैं जो भोजन पचाने में सहायता करते हैं। लंबे समय तक एन्टीबायोटिक दवाएं खाने या दूसरे कारणों से जब इनमें कमी पड़ जाती है तो भी अपच के साथ-साथ गैस की शिकायत रहने लगती है। कई अन्य विषैले दृश्य या अदृश्य हुकबार्म, जियारडिया कीड़े भी पानी के साथ पेट में पहुँच जाते हैं और वहाँ कई प्रकार की गड़बड़ी पैदा करते हैं।
कार्बोहाइड्रेट पदार्थ का जब फारमन्टटेशन ठीक प्रकार नहीं होता तो भी अपच की शिकायत रहने लगती हैं।
सिर दर्द क्यों होता है इसके मोटे कारण कितने ही गिनाये और बताये जाते हैं। यथा, बदहजमी, रक्तचाप, स्नायु दौर्बल्य, मानसिक तनाव, चोट या ब्रण, सर्दी-गर्मी का प्रकोप आदि। भूखे रहने, अधिक खाने, कम सोने, अधिक श्रम करने, नशेबाजी, भय, चिन्ता, आशंका, क्रोध जैसे मनोविकार आदि। चिड़चिड़े, क्रोधी और आवेश ग्रस्त व्यक्तियों को अक्सर सिर दर्द रहता है।
डाक्टरों के पास इसके गिने गिनाये उपचार हैं। बदहजमी, गैस बनने जैसे कारणों का अनुमान लगाकर कैस्टोफीन जैसी कोई हलके जुलाब की दवा दे देते हैं। एस्प्रीन जैसी शामक औषधि से भी तत्काल कुछ राहत मिलती है। शरीर में ‘हिस्टेमाइन’ नामक विष की अधिकता हो जाने पर ‘विषस्य विष मौषधम् के सिद्धान्तानुसार उसी विष को इंजेक्शन द्वारा और भी रक्त में प्रवेश करा देते हैं। इन सभी सामयिक उपचार हैं। तत्काल कुछ राहत मिल सकती हैं, पर जड़ कटने की आशा नहीं की जा सकती।
एक जर्मन औषध निर्माता ने ‘थैलिडोमाइड’ नामक अनिद्रा नाशक चमत्कारी औषधि बनाई। कुछ ही दिनों में उसकी लोक प्रियता आकाश चूमने लगी, पर पीछे पता चला कि वह गर्भस्थ शिशुओं पर घातक असर डालती हैं। उसके कारण एक लाख से अधिक बच्चे जन्म से पूर्व अथवा जन्म के बाद काल के गाल में चले गये, जो बच गये वे अपंग होकर जिये।
इसे एक दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि रोग निवारण की बुरी अब मारक औषधियों के साथ जुड़ गई है जब कि प्रत्येक ईमानदार चिकित्सक का कार्य यह होना चाहिये कि रोगी को अप्राकृतिक गतिविधियों से विरत होने और सरल सौम्य जीवन-यापन करने की प्रक्रिया अपनाने के लिये जोर दे और उसे समझायें कि स्थायी रूप से रोग मुक्ति पा सकना इतना परिवर्तन किये बिना संभव हो ही नहीं सकता।
एक रोग हल्का करने के लिये दस नये रोग आमंत्रित करना, एक समय का कष्ट घटाने के लिये सदा के लिये चिरस्थायी रुग्णता को शरीर में प्रश्रय देना यदि बुद्धिमत्ता हो तो ही मारक औषधियों की प्रशंसा की जा सकती हैं। यदि शरीर को समर्थ बनाने एवं शुद्ध रक्त की, नारियों में अभिवृद्धि करके निरोगिता एवं दीर्घ जीवन अभीष्ट हो तो चिकित्सा विज्ञानियों को एन्टीबायोटिक्स दवाओं के गुणगान करने की अपेक्षा सात्विक जीवन की गरिमा समझानी पड़ेगी और संयत आहार विहार अपनाने के लिये जन मानस तैयार करना होगा। इस उलट-पुलट में बढ़े-चढ़े चिकित्सा विज्ञान को बढ़ा-चढ़ा अज्ञान मान कर चलना होगा ओर उसके नित नये विकास का जो उन्माद छाया हुआ है उसे नियन्त्रण में लाने की बात सोचनी पड़ेगी।
आज के चिकित्सा विज्ञान में ऐसे अनेक विषयों का समावेश है जिनका विशेषज्ञ होने की दृष्टि से तो कुछ उपयोग भले ही हो पर स्वास्थ्य रक्षा और स्वास्थ्य संवर्धन के लिए उनका सामान्यतः कुछ विशेष उपयोग नहीं हैं।
मेक्नो, थैरेपी, इलेक्ट्रो थैरेपी, थर्मोथैरेपी, रेडियोथैरेपी, बाइब्रोथैरेपी, थल्मोथैरेपी, एम्ब्रियोलाँजी, फिजियोलॉजिकल केमिस्ट्री, टाक्सिकोलाजी, पथोलाजिकल हिस्टालाजी, बैक्टीरियालाजी, गायनोकोलाजी, बायोकेमिस्ट्री आदि इतने अधिक विषयों का डाक्टरों शिक्षण में समावेश करने से शिक्षार्थी का मस्तिष्क उन्हीं उलझनों में फंसकर रहा जाता है। वह प्रकृति के अनुसरण और सौम्य आहार विहार की उपयोगिता एवं रीति-नीति जैसे सामान्य किन्तु अति महत्वपूर्ण विषय को समझने से वंचित रह जाता है।
हम प्रवचन सुनते हैं, शास्त्र पढ़ते हैं और मन्दिर देवालयों में नमन करते हैं लेकिन अपने भीतर भरे हुए और बाहर बिखरे हुए परमात्मा के अनन्त सौंदर्य को देखने से आँखें ही बन्द किये रहते हैं।
हमारा विवेक जगे तो देखें कि इस वसुधा के कण कण में कितना सौंदर्य बिखरा पड़ा है और हर दिशा में कितनी मर्मस्पर्शी संगीत अनहद नाद गुँजित हो रहा हैं। ईश्वर आँखों से नहीं देखा जाता, वह कान से नहीं सुना जाता उसे केवल अन्तरात्मा ही भावभरी संवेदनाओं के रूप में अनुभव कर सकती हैं।
-स्वामी रामतीर्थ
शरीर रचना के आधार पर जाना जा सकता है कि कौन प्राणी शाकाहारी है, कौन मांसाहारी। यों माँसाहारी प्राणी भी सृष्टि में है और वे उसी आहार पर गुजारा करते हैं पर उनकी शरीर रचना एवं प्रकृति शाकाहारियों से भिन्न होती हैं।
भोजन करने के प्रधान माध्यम दाँत हैं। उन्हीं से वह कुचले और चबाये जाने के उपरान्त पचने योग्य बनता और पेट में जाता है। प्रकृति में निर्धारित आहार के अनुरूप दाँतों की संरचना की है। बाघ, चीते, कुत्ते, बिल्ली आदि के दाँत माँस को नोंच-नोंच कर खाने योग्य नुकीले बनाये गये हैं और चीड़-फाड़ के लिये दो दाँत अधिक बड़े और अधिक मजबूत बनाये गये है। इसके विपरीत शाकाहारी गाय, बकरा, घोड़े गधे आदि के समतल, और छोटे होते हैं। मनुष्य की दन्त रचना भी शाकाहारी वर्ग की है।
माँसाहारी जानवरों के बच्चे जन्मते समय आँख बन्द किये हुये पैदा होते हैं। कई दिन बाद उनकी आँखें खुलती है। शाकाहारी के बच्चे आँख खोले पैदा होते हैं। मनुष्य ऐसा ही हैं।
मांसाहारी जीवों के शरीर से पसीना नहीं निकलता इसलिये उससे तेज गंध आती रहती है। शाकाहारी के शरीर से पसीना निकलता है।
मांसाहारी जीभ लपलपाते हुये चप-चप करके पानी पीते हैं। इसके विपरीत शाकाहारी घूँट भरकर पीते हैं।
शाकाहारी रात में सोते और दिन में जागते हैं। इसके विपरीत माँसाहारी सोते बेखबर प्राणियों को पकड़ने के लिये रात में विचरते हैं अस्तु उनकी आँखें अंधेरे में देख सकने योग्य चमकीली होती हैं। शाकाहारियों की आँखें दिन में और माँसाहारियों की रात में काम कर सकने योग्य बनी होती है। मनुष्य की आँखें दिवाचरों की तरह ही बनी है।
मांसाहारी शिकार के शरीर को अपने दाँतों और पंजों से दबोच सकते हैं, फाड़ चीर करके खा सकते हैं। ऊपर से चमड़ी बाल आदि उतारने की जरूरत नहीं पड़ती, भेड़िये तो हड्डी तक पचा जाते हैं। शाकाहारी वैसा नहीं कर सकते। मनुष्य के लिये बिना पका माँस पचाना संभव नहीं। हड्डी आंतें, बाल, चमड़ी आदि अनेक भाग हटाकर वह केवल माँसपेशियाँ ही पका कर खा पाता है उसकी मूल प्रकृति मांसाहारियों जैसी है ही नहीं।
मांसाहारी जीवों की आँतें छोटी होती हैं और शाकाहारियों की बड़ी। मनुष्य बड़ी आँतें वालों में से हैं।
माँस में जो प्रोटीन पाया जाता है वह बहुत ही घटिया दर्जे का है। पाचन में जटिल है। उसकी तुलना में मूँग, सोयाबीन आदि के प्रोटीन अधिक उच्च कोटि के तथा पाचन में सरल हैं। पालतू पशुओं के शरीरों में भी अब मनुष्यों की तरह ही कई प्रकार के विषाणुओं की भरमार रहने लगी है। वे माँस के साथ खाने वाले के पेट में पहुँचते हैं और उसे तरह-तरह की बीमारियों का शिकार बनाते हैं।
मांसाहारी प्राणी क्रूर, निष्ठुर और छली प्रकृति के होते हैं। वैसी ही प्रकृति माँस खाने वाले मनुष्यों की बन जाती है। दया और करुणा मनुष्य की सर्वोत्कृष्ट प्रवृत्तियां हैं। प्राणी का माँस रोमाँचकारी पीड़ा देकर ही प्राप्त किया जा सकता है। यह क्रूर कर्म वधिक की ही तरह खाने वाले की आत्मा को भी निर्दय बनाता है और वह अपने स्वजनों संबंधियों से भी वैसा ही व्यवहार करता है। समाज में अनेकानेक दुष्प्रवृत्तियां निष्ठुरता से ही जन्मती हैं और उसे मानवी स्वभाव में सम्मिलित करने का बहुत कुछ उत्तरदायित्व माँसाहार का है।
मांसाहार करने वाले यदि उपरोक्त नो तथ्यों पर विचार करे तो उन्हें इस कुटेब को छोड़ना ही श्रेयस्कर प्रतीत होगा।
नारी की आज जो स्थिति हैं, उसे किसी भी प्रकार न्यायोचित नहीं कहा जा सकता। मनुष्य के कुछ जन्म सिद्ध अधिकार हैं। प्रत्येक मानव प्राणी को अपनी मर्जी का यौगिक जीवन जी सकने की स्वतन्त्रता रही है और रहनी चाहिये। मैत्री के आधार पर कोई किसी के लिये कुछ भी त्याग कर सकता है पर कैदी के अतिरिक्त अन्य किसी को बलात् बंधन में बाँधने का-उसको बलात् उपयोग करने का अधिकार नहीं है। पर नारी इस मूलभूत मानवी अधिकार से भी वंचित है। कन्या को उसके अभिभावक कहीं भी किसी के साथ मानकर कर सकते हैं या बेच सकते हैं। पति उसे बलपूर्वक अति अधिकार में रख सकता है और अनिच्छा होते हुए भी जा वाह सो अपनी मर्जी के अनुसार करा सकता है। उसके साथ चाहे जैसा व्यवहार कर सकता है, पशुओं जैसी मारपीट कर सकता है, लुक’-छिपकर जान भी ले सकता है, यह स्थिति मनुष्य के मूल अधिकारों के विपरीत हैं। स्वच्छ जीवन जीने पर इतने कड़े प्रतिबंधों का होना किसी भी दृष्टि से न्यायोचित नहीं हैं। पर्दा-प्रथा के अनुसार जिस स्थिति में नारी का रहना पड़ता है उसे मानवोचित नहीं कह जा सकता। किन्तु शताब्दियों से चल रही अवाँछनीय परम्पराओं ने इन्हीं विडम्बनाओं को “मर्यादा” के रूप में मान्यता देदी हैं। अब लोग इन बातों को अन्याय तक नहीं मानते वरन् उचित आवश्यक तक कहते हैं और उन्हीं तर्कों का-धर्म प्रचलनों का सहारा लेकर उन प्रतिबंधों का समर्थन करते हैं।
इस स्थिति में चिरकाल से रहती चली आ रही नारी धीरे-धीरे अपनी मानवी उपलब्धियों से वंचित होती चली गई और आज की दुखद स्थिति में आ पहुँची घर के छोटे से पिंजड़े में आजीवन कैद रहने के कारण उसका स्वास्थ्य चौपट हो गया। खुली हवा, खुली धूप, हाथ-पाँव हिलाने की स्थिति न मिलने पर स्वास्थ्य का सर्वनाश होता ही हैं। छोटी आयु में विवाह हो जाने पर किशोरावस्था और नव-यौवन के दिनों होने वाले शारीरिक विकास की जड़े ही कट जाती है। शरीर शास्त्र का स्पष्ट निष्कर्ष हैं कि बीस वर्ष से कम आयु में कामोपभोग और पच्चीस वर्ष की कम आयु में संतानोत्पादन नारी के स्वास्थ्य को मटियामेट करके रख देता है। उसे छोटी-बड़ी अनेकों बीमारियाँ आरम्भ से ही घेर लेती हैं और मरने दम तक साथ रहती है। पेडू का दर्द, कमर का दर्द, पेट दुखना, मासिक धर्म की अनियमितता, श्वेत-प्रदर, पेशाब में जलन, जैसे रोग स्पष्टतः शक्ति से अधिक मात्रा में ज्ञानेन्द्रिय का दुरुपयोग किये जाने के ही दुष्परिणाम हैं। छोटी आयु से ही कच्चे अंग अवयवों पर जब दाम्पत्य हलचलों का अमर्यादित भार पड़ेगा तो उससे स्वास्थ्य की जड़े खोखली होती ही हैं। स्त्रियों में से अधिकाँश को अपच, सिरदर्द, अनिद्रा, हाथ-पैरों में भड़कन, आँखों में जलन, मुँह में छाले, थकान, सुस्ती, बेचैनी, उदासी जैसी शिकायतें बनी रहती हैं। इसका कारण उनकी जीवनी शक्ति का क्षीण हो जाना ही होता है। जिन लड़कियों का अपना शरीर ही सुविकसित नहीं हो पाया उनके ऊपर समय से पहले बच्चे पैदा करने का भार पड़ेगा तो वह शक्ति जो अपना शरीर पुष्ट कर सकती है-महज ही समाप्त हो जायेगी। बच्चे का शरीर आखिर माता का शरीर काटकर ही तो बनता है। उसका रक्त मास, हड्डी आदि तो कुछ है वह स्पष्टतः माता के पास जो शरीर संपत्ति थी उसी का एक टुकड़ा अलग से टूट कर खड़ा हो गया है जो दूध बच्चा पीता है वह माता के रस रक्त के अतिरिक्त और क्या हैं ? उसे बच्चा पीता रहेगा तो माता के शरीर में उसकी कभी पड़ेगी ही। जो रक्त माँस लड़कियों के अपने स्वास्थ्य संवर्धन के लिए आवश्यक था, वही यदि सन्तान में निकलता चला जाय तो स्पष्ट है कि इस कारण उसे स्वास्थ्य की दृष्टि से दुर्बल, रुग्ण और गई-गुजरी स्थिति में रहना पड़ेगा। दुर्बल के पास न रूप बचता है, न यौवन, न सौंदर्य, न उत्साह, न स्फूर्ति, न ताजगी, न मुस्कान। लड़कियों को छोटी आयु से ही दाम्पत्य-जीवन के दबाव में जिस प्रकार पिसना पड़ता है वह उनकी अकाल मृत्यु का बहुत बड़ा कारण है। प्रसव पीड़ा से लाखों महिलाएँ हर साल बेमौत मरती है इसका कारण उनके प्रजनन अंगों का दुर्बल स्थिति होते हुए भी असह्य दबाव पड़ना ही एकमात्र कारण है। प्रसव काल में जितना रक्त जाता है, जितना कष्ट होता है उसे परिपुष्ट माता का स्वास्थ्य ही सहन कर सकता है। कमजोर शरीर वालों लड़कियों के लिए तो यह बेमौत मारे जाने जैसा अभिशाप है। स्वास्थ्य की दृष्टि से अविवाहिताएँ तथा विधवाएँ-सुहागिनों की तुलना में कहीं अच्छी पाई जाती है इसका कारण यही है कि उन्हें दाम्पत्य कर्म का बोझ नहीं सहना पड़ा।
यहाँ यह नहीं कहा जा रहा है कि विवाह नहीं करना चाहिए-दाम्पत्य-जीवन अनावश्यक है और बच्चे उत्पन्न नहीं करने चाहिए। यह सब बाते सहज स्वाभाविक रीति से होने चाहिए। स्त्री का स्वास्थ्य जितना सहन कर सके उस पर उतना ही दबाव पड़ना चाहिए। किन्तु इस क्षेत्र में नारी सर्वथा असह्य है वह इस संदर्भ में मुंह नहीं खोल सकती। पति की इच्छा पूर्ति के लिए उसे विवश रहना पड़ता है। संतानोत्पादन के लिए शरीर में गुंजाइश न होने पर भी उसे वह भार बलात् उठाता पड़ता है। अपना स्वास्थ्य नष्ट होने-दुर्बलता, रुग्णता और अधिक बढ़ने, अस्वस्थ सन्तानें जनने, गर्भपात आदि होते रहने, असह्य प्रभव पीड़ा न सह सकने, अकाल मृत्यु को गले न बाँधने जैसे विचार उसके मन में उठते रह सकते हैं, पर वह कह कुछ नहीं सकती-कर कुछ, नहीं सकती। पराधीन की स्वेच्छा क्या ? उसकी अपनी मर्जी कहाँ ? बन्दी को मालिकों को मर्जी पर चलता पड़ता है। उसे अपने स्वास्थ्य की बात सोचने का अधिकार ही किसने दिया है।
सोने उठने का कोई समय नहीं। मर्द रात को 12 बजे आवें तो उसी समय चूल्हा फूँकना चाहिए। सब लोग खा जायँ उसके पीछे खाना चाहिए। सबसे पीछे सोना और सब से जल्दी उठना चाहिए। विश्राम के लिए समय की माँग न करनी चाहिए। रुग्ण रहते हुए दिन-रात पिसना चाहिए। यही आज को नारी का धर्म कर्तव्य बताया गया है। इससे कम में कोई ‘अच्छी बहू’ नहीं कहला सकती। यह सब धकापेल चलता रहे-चले-पर प्रकृति किसी को बख्शती नहीं। उसे अपने नियमों से काम। दुरात्मा हो या पुण्यात्मा बिजली के खुले तार जो भी छुएगा वही मारेगा। स्वास्थ्य के नियमों का उल्लंघन निरन्तर करते रहने-पर प्रकृति दंड देगी ही। दुर्बलता, रुग्णता, अकाल मृत्यु के चक्र में उसे पिसना ही पड़ेगा। नारी ने यह व्यतिक्रम स्वेच्छा से किया या उसे विवशता में करना पड़ा यह सोचने की प्रकृति को फुरसत नहीं है। नारी नर की तुलना में शारीरिक दृष्टि से कितनी दीन, दुर्बल बनकर रह रही है यह सहज स्वाभाविक स्थिति नहीं है। सभ्य देशों की महिलाएं-हर क्षेत्र में-स्वास्थ्य से भी पुरुष के समतुल्य हैं। यह अभागा भारत ही है जिसने नारी को मानवोचित अधिकारों से वंचित किया। फलस्वरूप जो परिस्थिति उत्पन्न हुई उसने नारी के स्वास्थ्य को खा लिया। इसे भाग्य का-भगवान का दोष कहकर मन समझाया जा सकता है पर वस्तुतः यह हमारे ही अनाचार अत्याचार का दुष्परिणाम है जिसे रोते-कराहती नारी तो भुगतती है, पर इस स्थिति में नर भी कुछ अधिक प्रसन्न नहीं रह सकता है, इसमें उसे भी कुछ लाभ उठने का अवसर नहीं है। शोषित तो मिटता ही है-शोषक को भी विधि का विधान सुख की साँस नहीं लेने देता। नारी को अस्वस्थ बनाकर उसके मालिक-पालने हारे भी इस स्थिति में क्या सुख सन्तोष अनुभव कर रहे हैं। रोते-कराहते स्वर, आखिर उन्हें भी कुछ तो कष्ट देते हो। सहानुभूति समाप्त हो गई हो तो भी खोज और झूँझल तो सताती ही रहेगी-उनसे तो पीछा नहीं ही छूटेगा। शारीरिक स्वास्थ्य की तरह मानसिक स्वास्थ्य से भी नारी को वंचित रहना पड़ रहा है। जिसको अपनी कोई इच्छा, महत्वाकांक्षा, मर्जी, पसंदगी न हो-जिसे जन्म से मरण तक बिना उचित-अनुचित का अन्तर किये केवल आज्ञापालन ही करना है उसके लिए अपना भविष्य निर्माण करने की बात सोचना ही निरर्थक है। प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के विकास से स्वतन्त्र चिन्तन का, महत्वाकांक्षाओं का, कुछ कर सकने का, परिस्थिति का प्रधान योगदान होता है। वह न मिले तो खाद, पानी न मिलने वाले पौधे की तरह ज्वलंत संभावनाएं भी नष्ट हो जाती है। ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा कितनी ही क्यों न हो-पालने वालों की मर्जी के बिना उसका उपयोग कर सकने का नारी के लिए कोई अवसर नहीं। इच्छा तो आखिर हर किसी को कुछ न कुछ होती ही है। उन्हें फलवती करने का जब अधिकार ही नहीं तो आकांक्षाओं की चिता और राख मनः क्षेत्र में घुटने की दुर्गन्ध ही भरे रहेगी।
पग-पग पर प्रतिबन्ध, क्षण-क्षण में तिरस्कार जिसके भाग्य में लिखा हो, वह दुर्भाग्य के आंसू ही बहाता रह सकता है। नारी निष्प्राण मशीन रही होती तो अच्छा था। पर जानदार प्राणी होने के कारण उसका अपना निज का मन भी है और निज की कुछ इच्छाएँ भी। स्वभावतः वे फैलने, फूटने का-फूलने-फलने का अवसर चाहती है, पर इसके लिए अधिकार रहित नारी के लिए गुंजाइश कहाँ। चौबीसों घण्टे उसे मन को मारना पड़ता है और उस दुष्ट को देखो जो मरता तो है नहीं उल्टे विद्रोही बनकर नाना प्रकार के उपद्रव खड़े करता है। इन्हें तरह’-तरह के मनोरोगों के-मनोविकारों के रूप में देखा जा सकता है। मृगी-हिस्टीरिया से ग्रसित रोगियों में तीन चौथाई नारी और एक चौथाई मर्द होते हैं। तरह-तरह की सनकें, चिड़चिड़ापन, लड़-झगड़, अनुदारता, दुराव, असन्तोष, आशंका, दोषारोपण जैसी मानसिक विकृतियाँ उन्हें घेरे रहती है। सनकी, जिद्दी, अव्यवस्थित, नासमझ, बेवकूफ, स्वार्थी आदि न जाने कितने दोष उन पर लगाये जाने रहते हैं। जो किसी कदर ठीक भी होते हैं। निराशा चिन्ता, भय-भीरुता, आशंका, अविश्वास से ग्रसित उनमें से बहुतों को देखा जाता है। सन्तोषजनक मुस्कान किसी के चेहरे पर हर घड़ी खेलती हुई देखा जायेगा। यह आदत जिनमें बचपन से भी थी बस गृहस्थ की चक्की में पिसने के कुछ ही दिन बाद समाप्त हो जाती है। असन्तोष और क्षोभ से उद्विग्न और खिन्न मूल मुद्रा में ही प्रायः उन्हें देखा जाता है। मन कैसा छलिया है। उसे जहाँ उद्विग्न करता है वह खिलौने देकर पुचकारता भी है। शृंगार, सजधज, फैशन की भोंड़ी तरकीब बताकर कहता है कुछ न सही तो इस खिलौने से ही मन बहलाओ-अपना जी हलका करो! प्रायः विकृत मन वाली महिलाएँ ही शृंगार प्रसाधन अपनाकर अपना खोया सम्मान इस बनावट के सहारे किसी हद तक प्रयास कर लेने की बात सोचती है और उस तरह के आडम्बर बनाती है। इसमें सन्देह उन्हें मिलता कुछ नहीं। पैसा और समय तो गंवाती ही है मूर्ख, उपहासास्पद और छिछोरी भी बनती है। प्रशंसा पाने चली थीं, पर उपहास लेकर लौटती है। व्यंग रूप में ही कोई मसखरा उनके मुंह पर उस सजधज की शायद प्रशंसा भी कर देता होगा। यह विडम्बनाएँ वे स्वेच्छा से नहीं छलिया मन के विचित्र बहकावे में फँसकर रचती है। असन्तोष को सन्तोष में परिणत करने का कुछ भी औंधा-सीधा मार्ग वे खोजती हैं। इन्हीं में से एक शृंगारिक सजधज भी है। अन्यथा शालीन नारी का व्यक्तित्व तो स्वच्छ, सभ्य और सज्जनोचित सरलता के-सादगी के साथ ही जुड़ा रहता है। विवेक और उद्धत श्रृंगार का प्रत्यक्ष वैर है जहाँ एक रहेगा वहाँ से दूसरे को पलायन करना ही पड़ेगा।
स्मरण शक्ति की कमी, आवेश, ग्रस्तता, जिद्दीपन, शंकालु, अनुदारता, अदूरदर्शिता, मन्द बुद्धि आदि मानसिक त्रुटियाँ स्त्रियों में बहुधा अधिक होने की बात कही जाती है। यदि वह सच है तो इतना ही कहा जा सकता है कि यह उनकी आन्तरिक घुटन की प्रतिक्रिया है अन्यथा मानसिक बनावट और प्रखरता में वे नर से पीछे नहीं आगे ही रहती है। स्कूल, कालेजों के परीक्षा फल इसके प्रमाण में प्रस्तुत किये जा सकते हैं। लड़के अधिक और लड़कियां कम फेल होती है। अच्छे डिवीजन लड़कियों के हिस्से में आते हैं। वे छुरे, चाकू, हाकी लेकर नकल के बल पर पास होने के उद्दंडता भी नहीं बरततीं, अपनी सहज प्रतिभा और स्वाभाविक श्रमशीलता के आधार पर अच्छे नंबरों से पास होना रहता है। अन्य क्षेत्रों में भी नारी को जब भी-जितना भी अवसर मिला है सदा उसने अपनी बौद्धिक प्रखरता का ही परिचय दिया है। न वे शरीर की दृष्टि से दुर्बल हैं और न मानसिक दृष्टि से पिछड़ी हुई हैं परिस्थितियों ने ही उन्हें दुर्दशा ग्रस्त बना दिया है। आज तो वे दुर्बल और रुग्ण ही नहीं मन्द बुद्धि और मानसिक रोगों की व्यथा भी बेतरह सहन कर रही है।
इस शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता ग्रसित स्थिति से नारी को उबारा जाना चाहिए। अन्यथा वह अपने लिए परिवार के लिए, समाज के लिए कुछ महत्वपूर्ण योगदान दे सकना तो दूर पिछड़ेपन के कारण भार भूत ही बनी रहेंगी। रुग्ण व्यक्ति अपनी बेकारी, पीड़ा, परिचर्या, चिकित्सा आदि के कारण स्वयं दुखी रहता है और अपने संबंधियों को दुखी करता है। नारी की शारीरिक और मानसिक अस्वस्थता हर दृष्टि से-हर क्षेत्र के लिए दुखद दुष्परिणाम ही प्रस्तुत कर रही है।
राजनैतिक दृष्टि से पराधीन रहने वाला देश आर्थिक दृष्टि से ही शोषित नहीं होता वरन् साँस्कृतिक, मानसिक, चारित्रिक और बौद्धिक दृष्टि से पराधीन बनाई गई नारी भी अपनी प्रखरता और उपयोगिता खो बैठी है। तथ्य को समझा जाना चाहिए और विष वृक्ष के पत्ते तोड़ने की अपेक्षा उसकी जड़ काटी जानी चाहिए। नारी को हर क्षेत्र में विकास का अवसर मिलना चाहिए और उसके पिछड़ेपन को मिटाने के लिए हर सम्भव प्रयत्न किया जाना चाहिए। अपहरणकर्ता के रूप में पुरुष का दोष अधिक हैं इसलिए प्रायश्चित, परिमार्जन, प्रतिकार की दृष्टि से उसी को आगे आना चाहिए। आयात पहुँचाने वाले को उसका हर्जाना भी देना चाहिए और क्षति पूर्ति के लिए प्रबल प्रयास करके कलंक कालिमा को धो डालने के लिए तत्पर होना चाहिए।
शिवाजी उन दिनों मुगलों के विरुद्ध छापा मार युद्ध लड़ रहे थे। रात को थके माँदे वे एक वनवासी बुढ़िया की झोंपड़ी में जा पहुँचे और कुछ खाने-पीने की याचना करने लगे।
बुढ़िया के घर में कोंदों थी सो उसने प्रेमपूर्वक भात पकाया और पत्तल पर उसके सामने परस दिया।
शिवाजी बहुत भूखे थे। सो सपाटे से भात खाने की आतुरता में उंगलियां जला बैठे और तुम्हें मुंह से फूँककर जलन शान्त करने लगे।
बुढ़िया ने आंखें फाड़कर उसे देखा और बोली-सिपाही तेरी शकल शिवाजी जैसी लगती है और साथ ही यह भी लगता है कि तू उसी जैसा मूर्ख भी है।
शिवाजी स्तब्ध रह गये उनने बुढ़िया से पूछा-भला शिवाजी की मूर्खता तो बताओ और साथ ही मेरी भी।
बुढ़िया ने कहा-तू ने किनारे-किनारे से ठण्डी कोंदों खाने की अपेक्षा बीच के गरम भात में हाथ सारा और उंगलियों जलालीं। यही बेअकली शिवाजी करता है, वह दूर किनारों पर बसे छोटे किलों को आसानी से जीतते हुए शक्ति बढ़ाने की अपेक्षा बड़े किलों पर धावा बोलता है और मार खाता है।
शिवाजी को अपनी रण नीति की विफलता का कारण विदित हो गया। उन्होंने बुढ़िया की सीख मानी और पहले छोटे लक्ष्य बनाये और उन्हें पूरा करने की रीति-नीति अपनाई। छोटी सफलताएँ पाने से उनकी शक्ति बढ़ी और अन्ततः बड़ी विजय पाने में समर्थ हुए।
हमारे ज्ञान की परिधि कितनी सीमित है-कई बार तो हम मोटी बातें भी नहीं जानने। हम साथी को सब प्राणियों में बड़ा समझते हैं, पर असल में वह गौरव ह्वेल मछली से प्राप्त है। पक्षियों में गरुड़ नहीं बाज सबसे तेज उड़ता है। आंखें हिरन की बड़ी मानी जाती है, पर शरीर के अनुपात से घोड़े की आंखें अधिक बड़ी होती है। कड़ी धूप में संसार के हर प्राणी को पसीना आ जाता है, पर कुत्ते इसके अपवाद है। स्तनपायी प्राणियों के शरीर पर बाल रहते हैं एक गेंडा ही ऐसा है जो स्तनपायी होने पर भी बिना बाल का रहता है। कमल का फूल सबसे बड़ा माना जाता है, पर असल में सबसे बड़ा फूल जीवों सुमीबा में पाया जाने वाला ‘रैफतेशिया’ का है जिसका घेरा 10 फुट और वजन 6 किलोग्राम तक होता है। वृक्षों में कट वृक्ष दीर्घजीवी माना जाता है, पर भारत में पाये जाने वाले पेड़ों में सबसे अधिक दिन जैतून का पेड़ जीवित रहता है।
मेंढक के पैदा होते समय दुम होती है, पर पैर नहीं। पर जब वह मरता है तो पैर रहते हैं, पर दुम नहीं।
हंस के बारे में किंवदंती है कि वह मिले हुए दूध पानी में से दूध पी लेता है और पानी अलग करता है। साथ ही यह भी कहा जाता है कि वह मोती खाता है। यह दोनों ही किम्वदंतियां मिथ्या है। हंस भी अन्य पक्षियों की तरह कीड़े, बीज आदि का आहार करते हैं।
स्वातिनक्षत्र में वर्षा होने पर सीप में मोती, केले से कपूर और बाँस में वंशलोचन पैदा होता है यह मान्यता सर्वथा कपोल कल्पित है, इससे सचाई का एक अंश भी नहीं है। चातक स्वातिनक्षत्र की वर्षा का ही जल पीता है, वह बात भी बेसिर पैर की है वह अपनी आवश्यकतानुसार बेरोक-टोक पानी पीता है।
हममें से कितनों को मालूम है कि मक्खी अपने जीवन काल में औसत 10, 80, 320 अण्डे देती है।
दस-बीस भाषाओं और एक दर्जन मजहबों के अतिरिक्त कौन जानता है कि संसार में 3064 भाषाएँ बोली जाती है और 600 मत मतान्तर है।
कोयला और हीरा रासायनिक दृष्टि से बिल्कुल सजातीय है उनके अणुओं की चाल में तनिक-सा अन्तर रहने से दोनों के मूल्य में भारी अन्तर पड़ जाता है। कोयले में कठोर कार्बन मिले तो वह हीरा बन जायेगा किन्तु यदि नरम मिले तो वह पेन्सिलों में काम आने वाला ‘सुरमा’ मात्र बनकर रह जाएगा। तनिक सा अन्तर फलितार्थ में कितना बढ़ा-चढ़ा होता है वह देखने ही योग्य है।
हमारा सामान्य ज्ञान कितना स्वल्प है इस बात का पता इससे चलता है कि अपनी मान्यता प्राप्त जानकारियों में कितनी उपहासास्पद मान्यताएं भरी पड़ी हैं और कितनी मिथ्या धारणाएँ संजोये बैठे हैं, पर विवेक को अपनाने के लिए कोई तैयार नहीं।
कुत्ते को यदि खरगोश का पीछा करने के लिए छोड़ दिया जाय तो वह दौड़ते-दौड़ते बेदम हो जाने पर भी प्रसन्न दिखाई पड़ेगा भले ही उसके हाथ खरगोश न लगे। इसके विपरीत यदि उसे कोल्हू में चलने के लिए कहा जाय भोजन की सुनिश्चित व्यवस्था बनादी जाय तो वह उससे प्रसन्न न होगा। यो विवेक की दृष्टि से खरगोश के पीछे दौड़ने की अपेक्षा कोल्हू में चलने का श्रम अधिक उपयोगी और निश्चित परिणाम देने वाला है। शिकार पकड़ने का परिणाम अनिश्चित है किन्तु उस उद्योग में उसकी भी नियमित व्यवस्था बनी रहेगी। इतने पर भी कुत्ता अपनी आदत के अनुसार शिकार के पीछे भागने की अनिश्चित दौड़−धूप ही पसन्द करता है। हमारी कार्यशैली भी लगभग इसी प्रकार की है। अभ्यस्त दौड़−धूप ही रुचि कर लगती है। इससे अच्छी भी कोई उपयुक्त रीति-नीति हो सकती है-प्रस्तुत ढर्रे से लाभदायक भी कोई जीवन-क्रम हो सकता है इसे सुनने-समझने और जानने-मानने के लिए कोई तैयार होता दिखाई नहीं पड़ता।
अमेरिका में लड़े गये उस मुकदमे को लोग कभी भी भूले न सकेंगे जो देखने में जरा-सा था, पर उस पर ध्यान उस देश के लोगों का ही नहीं, सारी दुनिया का आकर्षित हुआ। उसके समाचार विश्व की अति महत्व पूर्ण घटनाओं की तरह संसार भर में मोटी सुर्खियों के साथ तब तक छपते रहे जब तक कि मुकदमा अदालत में चलता रहा। यह मुकदमा “मंकी ट्रायल” के नाम से विश्व विख्यात हुआ।
मुकदमा जानस्कोप्स नामक एक अध्यापक पर चला। वह टेनेसी राज्य के एक छोटे से कस्बे ‘डेटन’ में जीव विज्ञान पढ़ाता था। उस राज्य के सरकारी कानून में यह प्रतिबन्ध था कि स्कूलों में जो कुछ पढ़ाया जाय वह बाइबिल के प्रतिपादनों के अनुरूप ही होना चाहिए। उससे भिन्न या विपरीत नहीं।
जीवन विकास के सम्बन्ध में आधुनिक विज्ञान की मान्यता है कि विकास छोटे जीवों में हुआ है और वह क्रमशः बढ़ते-बढ़ते उन उच्चस्तर के प्राणियों तक बढ़ा है जिनमें से एक मनुष्य भी है। पुरातन पंथियों की मान्यता इससे विपरीत हैं। वे कहते हैं मनुष्य ऊपर से उतरा-आसमान से टपका और जमीन पर आ गिरा। नीचे से ऊपर उठने की परम्परा रही है अथवा ऊपर से नीचे गिरने की। यह प्रमुख मतभेद है पुरातन पंथियों और नवीन विचारकों में। यह मतभेद उस छोटे स्कूल में भी उभर आया। जीव विज्ञानी जानस्कोप अपना विषय पढ़ाता था। स्कूली पाठ्य-क्रम बाइबिल के अनुसार निर्धारित थे सो पढ़ाता तो वह उन्हें भी था, पर साथ ही यह भी कह देता था कि मेरा इन बातों पर विश्वास नहीं है। मेरी मान्यता तो इस समर्थन में जाती है कि जीवन नीचे से ऊपर उठा है और वह क्रमशः ऊपर ही उठता जायगा। मेरी समझ यह नहीं करती कि हम ऊपर से नीचे गिरे हैं और इस पतन क्रम के गर्त में निरन्तर अधिक गहरे गिरते चले जायेंगे।
एक दिन की मामूली सी घटना थी। रेप्पेलीए नामक एक इंजीनियर किसी पादरी से बहस में उलझ पड़ा और कहने लगा जीवन विकास के सम्बन्ध में डार्विन का विकासवाद राही है। पादरी बाइबिल की बातें तो कहता, पर कोई तर्क संगत उत्तर न दे पाता। अस्तु उसने स्कूल के जीव विज्ञान शिक्षक को अपने समर्थन के लिए बुला भेजा ताकि वह इंजीनियर की बात का ही समर्थन करने लगा। इसने यही कहा-इंजीनियर का कथन सही है। जीवन नीचे से ऊपर को उठा है।
इस पर पादरी झल्ला गया। एक धार्मिक राज्य में, निर्धारित धर्म मान्यताओं के विरुद्ध कोई अध्यापक मतभेद रखे और छात्रों में भी अनास्था पैदा करे, यह सहन नहीं किया जा सकता। सीधा तरीका तो यह था कि अध्यापक को नौकरी से निकाल दिया जाता, पर बात कुछ अन्य प्रकार की वन गई। स्कूल के अधिकारियों ने यह उचित समझा कि अध्यापक पर अदालत में मुकदमा चलाया जाय और उसे दंडित कराके वह जाहिर किया जाय कि ऐसा करना अपराध है और जो अपराध करेगा वह दंड भुगतेगा। निदान 9 मई 1925 को वह मुकदमा अदालत में दायर कर दिया गया।
कानूनी प्रश्न तो इतना भर था कि टेनेसी राज्य के प्रचलित कानून का उल्लंघन जिस अध्यापक ने किया है उस दण्ड दिया जाय। पर उसकी पृष्ठ-भूमि बहुत बड़ी थी। मुख्य विवाद धर्म और विज्ञान के बीच था। पूर्व मान्यताएँ ही ठीक मानी जाती रहें या जो बुद्धि संगत है उसे स्वीकारा जाय। विवाद का मुख्य केन्द्र यहाँ आटिका। अदालत को गौर इस विषय पर भी करना था कि शिक्षण सही है गलत। अध्यापक अपना उत्तरदायित्व यथार्थ शान देने के रूप में निभा रहा है या नहीं। कानून का पालन एवं यथार्थ शिक्षण यह दो प्रश्न साथ-साथ जुड़ जाने से विवाद का विषय काफी बड़ा हो गया।
मुकदमा एक अध्यापक और स्कूल अधिकारियों के बीच उठे एक मामूली से विवाद का था, पर उसने बहुत बड़ा रूप धारण कर लिया। विज्ञान पक्षधरों का जोश उमड़ पड़ा। और वे मुकदमे को सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाने की तैयारी करने लगे। दूसरी ओर भी जोश कम न था पुरातन पंथियों ने विवाद को, प्रतिष्ठ का प्रश्न बना लिया और अभियोग को सिद्ध करने के लिए पूरी तैयारी के साथ कसकर खड़े हो गये। कोई पक्ष न झुकने को तैयार था न हार मानने को। अस्तु मुकदमा पुरी तैयारी के साथ और पूरे जोश के साथ लड़ा गया। “सत्य की शिक्षा देने के लिए किसी अध्यापक को दंडित न होगा पड़े” इसके समर्थन के लिए अमेरिका की नागरिक स्वतन्त्रता यूनियन ने मुकदमा लड़ने का निश्चय किया और सफाई पक्ष की ओर से अमेरिका के सबसे प्रख्यात वकील क्लरेस डेरों खड़े किये गये। उस देश की धर्म संस्थाओं ने मिलकर वादी पथ के वकील के रूप में डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर तीन बार राष्ट्रपति पद के लिए मनोनीत विलियम ब्राउन को खड़ा कर दिया।
मुकदमे ने अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। संसार भर के प्रमुख पत्रों के एक सौ से अधिक संवाददाता नित्य अपने-अपने पत्रों के लिए खबरें भेजने के लिए हवाई जहाजों से उड़ कर आये। तार घर को 22 नये तार कर्मचारी नियुक्त करने पड़े और नई लाइनें बिछानी पड़ी। प्रतिदिन प्रायः दो लाख शब्दों के समाचार वहाँ से भेजे जाने लगे। उस छोटे से कस्बे की आबादी मात्र डेढ़ हजार थी। लेकिन मुकदमे के दिनों देश के कोने-कोने से आये दिलचस्पी लेने वालो-विदेशी संवाददाताओं-तम्बुओं में बने होटलों और सरकार के व्यवस्था कर्मचारियों की इतनी भीड़ हो गई मानो अच्छा−खासा मेला लगा हो।
प्रमुख वकील तो दोनों पक्षों के एक-एक ही थे किन्तु उनकी सहायता के लिए अमेरिका भर के चोटी के दर्जनों वकील आकर जमा हो गये। टेनेसी राज्य के एटर्नी जनरल टापस स्टीवर्ट स्वयं सरकार की ओर से मुकदमा लड़ने आये। ब्राइन अद्भुत वक्ता थे और भी सभी कई वकील चोटी के थे जो अपराध सिद्ध करने में एड़ी चोटी का पसीना एक कर रहे थे। सफाई पक्ष में डैरो के अतिरिक्त उड़लेफील्डमेलन और गारफील्ड हैज ऐसे थे जिन्हें अमेरिका के अदालती क्षेत्र का प्रत्येक व्यक्ति भली प्रकार जानता था। इन लोगों की उन दिनों चाक थी। दोनों पक्ष के गवाहों में विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकों से लेकर वैज्ञानिकों धर्माध्यक्ष, संसद सदस्यों तथा दूसरे मूर्धन्य लोगों की लम्बी नामावली थी। वे सभी बारी-बारी गवाहियाँ देते आये। मुकदमा काफी समय तक चला। किन्तु आश्चर्य इस बात का था कि मुख्य न्यायाधीश जान काल्स्टन ही एक कानूनी बारीकियों को समझते थे। जूरी 12 थे। उनमें से तीन तो ऐसे थे जिनने बाइबिल के अतिरिक्त और कोई पुस्तक ही नहीं पढ़ी थी। एक बिल्कुल अनपढ़ था। शेष ऐसे ही अर्ध शिक्षित थे।
दोनों पक्षों की ओर से जोरदार बहसें की गई अनोखे तर्क दिये गये ओर वक्तृताओं की ऐसी धारा बहाई गई कि उसे सुनना भर श्रोताओं के लिए एक बहुत बड़ा दिलचस्प कौतूहल था। हजारों की संख्या में लोग उन बहसों को सुनने मात्र के लिए दूर-दूर से आकर वहाँ जमा हुए।
बहस के कुछ स्फुट प्रसंग लोगों की नोटबुकों में अभी तक लिखे है। सफाई पक्ष के वकील डेरो ने अदालत को सम्बोधित करते हुए कहा था-आज सत्य की शिक्षा देने से अध्यापक रोके जा रहे है, कल वैसा साहित्य प्रकाशित करने पर रोक लगाने के और परसों सोचने या बोलने पर प्रतिबंध लगाये जायेंगे और हमें उस सोलहवीं सदी में धकेल दिया जायगा जिसमें ज्ञान की चेतना उत्पन्न करने वालों को धर्मांध लोगों द्वारा सरेआम जीवित जला दिया जाता था।’
वादी पक्ष के ब्राइन ने कहा--युगों से धर्म चेतना उत्पन्न करने वाली ईश्वरी पुस्तक बाइबिल को आज की गलत पुस्तकें नहीं काट सकती। ईश्वर की कही हुई बातें झूठी नहीं हो सकती है। बन्दर मनुष्यों का पूर्वज नहीं हो सकता।,
मेलोन ने सचाई पर कोई बन्धन न लगाने का आग्रह करते हुए कहा-सत्य से किसी को नहीं लड़ना चाहिए। वह अजेय है। तथ्य भले ही पूर्वाग्रहों से भिन्न हों, पर उन्हें विवेक और न्याय का समर्थन मिलना चाहिए।
डेरो एक के बाद एक प्रश्न बड़ी गम्भीरता और संजीदगी से पूछते रहे। उनने ब्राइन से पूछा-आप तो बाइबिल पर अक्षरशः विश्वास करते हैं न ?
ब्राइन बाइबिल पर अनेक लेख लिख चुके थे और सारगर्भित भाषण दे चुके थे। वकील की तरह बाइबिल विशेषज्ञ के रूप में भी उनकी ख्याति थी। उत्तर में ‘हाँ’ अतिरिक्त और कुछ वे कह भी सकती थे।,
डेरो ने बाइबिल का एक वाक्य पढ़ा-”और तब सुबह और शाम से मिलकर पहला दिन बना।” “सूरज की सृष्टि चौथे दिन हुई। और पूछा-क्या आप बता सकते हैं कि-सूरज के बिना सुबह और शाम कैसे हुई ? ओर जब सूरज था ही नहीं तो चार दिन बाद उसके उगने का हिसाब कैसे लगाया गया ?”
डेरो ने दूसरा प्रश्न किया-बाइबिल के अनुसार आदम और हव्वा के वर्जित फल खाने के लिए बहकाने पर ईश्वर ने साँप को पेट के बल रेंगने का शाप दिया था। पर इससे पहले साँप किस प्रकार चलता था ?
ब्राइन कोई उत्तर न दे सके मात्र बड़बड़ाते रहे और उन पर नास्तिक होने का आरोप लगाते रहे। तो भी धैर्य पूर्वक यही पूछते रहे-क्या आप सचमुच इन बातों पर विश्वास करते हैं जिन पर आज कोई भी बुद्धिमान विश्वास नहीं कर सकता।
मुकदमें का अन्त हुआ। अदालत ने एक छोटा-सा फैसला लिखा और उसे नौ मिनट में सुना दिया। “सौ डालर जुर्माना और मुकदमे के सरकारी खर्च की अदायगी।
धर्म पक्ष के लोगों ने इस पर खूब खुशियाँ मनाई। पर विचारशील लोगों ने उसे मुकदमे की जान भर कहा-विवाद की विजय के रूप में उसे नहीं स्वीकारा यहाँ तक कि प्रमुख प्रवक्ता ब्रायन भी अपने मन में वैसा ही मानते रहे ओर अपने बुद्धि कोशल की अनुपयुक्तता पर पश्चाताप करते हुए जीत के दो दिन बाद ही परलोकवासी हो गये।
डेटन का अब बहुत विकास हो गया है और वहाँ ब्रायन के नाम एक अच्छा−खासा विश्वविद्यालय बना हुआ है। टेनेसी राज्य का वह पुराना कानून अभी तो मौजूद है जिसमें बाइबिल के मत से भिन्न कुछ भी नहीं पढ़ाया जा सकता। किन्तु वह कानून सिर्फ कागजों पर छपा रह गया है उसका प्रयोग नहीं होता। ब्रायन विश्वविद्यालय में भी डार्बन के विकासवाद को बिना किसी रोक-टोक के पढ़ाया जाता है। मिलान में मुकदमे के दौरान जो बौद्धिक की माँग की थी और अदालत से कहा था-’सत्य से किसी को नहीं लड़ना चाहिए-वह अजेय है। तथ्य भले ही पूर्वाग्रहों से भिन्न हों, पर उन्हें विवेक और न्याय का समर्थन मिलना चाहिए। यह मार्ग उस समय जानराल्स्टन की अदालत ने स्वीकार नहीं की थी, पर आज विवेक को अदालत ने उसे स्वीकार कर लिया है यह कारण है उन्हीं पुराने कानूनों की-उसी प्रबल समर्थन ब्रायन के नाम पर चलकर विश्वविद्यालय में ही खुली अवज्ञा हो रही है। यद्यपि पूर्वाग्रह अपने स्थान पर अभी भी यथास्थान जमे बैठे है।
‘मंकी ट्रायल’ मुकदमा देखने को जन-साधारण की इच्छा को देखते हुए एक प्रख्यात फिल्म बना है-”इन हेरिट दी ब्रिड यह फिल्म संसार भर में बड़े चाव से देखी गई है। मुकदमे में हारा हुआ डार्विन का बन्दर फिल्म के पर्दे पर जन विवेक से यह पूछता दिखाया गया है बताइए मेरा नीचे का ऊपर चढ़ना ठीक है या परम्परा वादियों के अनुसार मुझे ऊपर से नीचे गिराने की बात सीखनी चाहिए।
मानवी चेतना की पाँच भागों में विभक्त किया गया है। (1) अन्न मय कोश (2) प्राण मय कोश (3) मनोमय कोश (4) विज्ञान मय कोश (5) आनन्द मय कोश।
अन्न मय कोश का अर्थ है इन्द्रिय चेतना, प्राण मय कोश अर्थात् जीवनी शक्ति, मनोमय कोश अर्थात् विचार बुद्धि, विज्ञान मय कोश अर्थात् भाव प्रवाह, आनन्द मय कोश अर्थात् आत्म-बोध-आत्म स्वरूप में स्थिति। यह पाँच चेतना स्तर है। निम्न स्तर के प्राणी इनमें निम्न भूमिका में पड़े रहते हैं। कृमि कीटकों की चेतना इन्द्रियों को प्रेरणा के इर्द-गिर्द अपना चिन्तन सीमित रखती है। वे शरीर की जीवनी शक्ति मात्र से जीवित रहते हैं संकल्प बल उनके जीवन-मरण में सहायक नहीं होता। मनुष्य की जिजीविषा इस शरीर के अशक्त-असमर्थ होने पर भी जीवित रख सकती है, पर निम्न वर्ग के प्राणी मात्र सर्दी गर्मी बढ़ने जैसे ऋतु प्रभावों से प्रभावित होकर अपना प्राण त्याग देते हैं उन्हें जीवन संपर्क के अवरोध में पड़ने की इच्छा नहीं होती। पेट और प्रजनन मात्र के लिए जीवित रहने वाले, जीवन और मरण के संबंध में उदास रहने वाले किसी प्रकार दिन गुजारने मर की बात सोचने तक सीमित रहने वाले निम्न स्तरीय प्राणि अन्न मय कोश तक ही विकसित हो पाये यह नहीं कहा जा सकता है। मनुष्यों में भी कितने ही इसी स्तर के पाये जाते हैं। वे अपने का परिस्थितियों के प्रवाह में जिस तिस दिशा में उड़ते रहने वाला तिनका भर मानते हैं। उनकी अन्तःचेतना कोई ऊँची प्रेरणा या दिशा नहीं देती। वे इन्द्रिय उत्तेजना से ही प्रेरित होकर विविध कर्म करते हैं। भूख लगती है तो रोटी कमाते या खाते हैं। कामोत्तेजना से विवश होकर रति कर्म का रास्ता ढूंढ़ते हैं। नींद आने पर सो जाते हैं और सर्दी गर्मी लगने के भय से वस्त्र या निवास का प्रबन्ध करते हैं। रोटी कपड़ा और मकान तक उनकी शारीरिक आवश्यकताएँ सीमित रहती है। सुख की परिभाषा वे स्वादिष्ट भोजन, कामोपभोग, श्रम से बचने की सुविधा, आदि में जिनकी आवश्यकता, इच्छा एवं प्रसन्नता सीमित है उन्हें इसी निम्न वर्ग का कह सकते हैं। भले ही वे कृमि कीटक हों या मनुष्य।
प्राण मय कोश की क्षमता जीवनी शक्ति के रूप में प्रकट होती है। जीवित रहने की सुदृढ़ और सुस्थिर इच्छा शक्ति के रूप में करो देखा जा सकता है। स्वस्थ सुदृढ़ और दीर्घ जीवन का लाभ शरीर को इसी आधार पर मिलता है। मनस्वी, ओजस्वी और तेजस्वी व्यक्तित्व ही विभिन्न क्षेत्रों में सफलताएँ प्राप्त करते हैं। इसके विपरीत दीन−हीन, भयभीत, शंकाशील, निराश, खिन्न, हतप्रभ व्यक्ति अपने इसी दोष के कारण उपेक्षित, तिरस्कृत एवं उपहासास्पद बने रहते हैं। उत्साह के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े रहने वाली कर्मनिष्ठ का जहाँ अभाव होगा वहाँ अवनति और अवगति के अतिरिक्त और कुछ रहेगा ही नहीं। साहस बाजी मारता है। बहादुरों के गले में ही अनादि काल से विजय बैजन्ती पहनाई जाती रही है और अनन्त काल तक यही क्रम चलता रहेगा।
शौर्य साहस को श्रम, निष्ठा, तत्परता, तन्मयता और अदम्य उत्साह के रूप में देखा जाता है। कायर और भयभीत संकोची और हतप्रभ व्यक्तियों से कुछ करते धरते नहीं बनता। जो करते हैं वह आधा अधूरा भौंड़ा और अव्यवस्थित होता है। पैट्रोल के अभाव में मोटर खर्च-खर्च करके रह जाती है। तेल के अभाव में दीपक टिम-टिम जलता बुझता दीखता है। साहस हीन व्यक्ति किसी तरह अपने सामने पड़े कार्य को रोता झींकता पूरा करने का कुछ प्रयत्न करता है पर जीवट के अभाव में वह सदा आधा अधूरा और काना कुबड़ा ही बनकर रह जाता है। उसका स्तर इतना घटिया होता है कि उपलब्ध परिणाम उपहासास्पद एवं असंतोषजनक बनकर रह जाता है।
डाकू से लेकर सिद्ध पुरुषों तक, समाज-सेवियों से लेकर राजनेताओं तक हर किसी को अपने प्रयास में सफल होने के लिये जीवट की आवश्यकता पड़ती है। इसी की व्याख्या अलभ्य उत्साह, अविचल धैर्य और मर मिटने के कटिबद्ध शौर्य के रूप में देखी जाती है। प्राण मय कोश इसी शक्ति का भाण्डागार है। सिंह जैसे पशु और गरुड़ जैसे पक्षी यों हिंसक होने के कारण मानवी गरिमा से बहुत पिछड़े हुए हैं तो भी उन्हें प्राण वान कह सकते हैं। शौर्य, साहस, एवं पुरुषार्थ के कारण ही वे अपने अपने वर्ग के अधिपति बने हुए हैं। यों शरीर बल की दृष्टि से उनकी तुलना में अन्य कई प्राणी अधिक समर्थ स्थिति के भी मौजूद हैं।
मनोमय कोश का अर्थ हैं विचार शीलता विवेक बुद्धि। यह तत्व जिसमें जितना सजग होगा उसे उसी स्तर का मनस्वी या मनोबल सम्पन्न कहा जायेगा। यों मन हर जीवित प्राणी का होता है। कीट पतंग भी उससे रहित नहीं हैं। पर मनोमय कोश के व्याख्याकारों ने उसे दूरदर्शिता, तर्क प्रखरता एवं विवेक शीलता के रूप में विस्तार पूर्वक समझाया है। मन की स्थिति हवा की तरह है वह दिशा विशेष तक सीमित न रहकर स्वेच्छाचारी वन्य पशु की तरह किधर भी उछलता-कूदता है। पक्षियों की तरह किसी भी दिशा में चल पड़ता है। इसे दिशा देना, चिन्तन को अनुपयोगी प्रवाह में बहने से बचा कर उपर्युक्त मार्ग पर सुनियोजित करना मनस्वी होने का प्रधान चिन्ह हैं। मनोनिग्रह-मनोजय इसी का नाम है। जंगली हाथी को पकड़ कर अनुशासित बनाने का काम तो कठिन हैं, पर इसकी उपयोगिता अत्यधिक हैं। जंगली हाथी फसलें उजाड़ते और झोपड़ियाँ तोड़ते हैं और भूखे प्यासे अनिश्चित स्थिति में भटकते हैं। किन्तु पालतू बन जाने पर उनकी जीवन चर्या भी सुनिश्चित हो जाती हैं और साथ ही वे अपने मालिक का भी बहुत हित साधन करते हैं। सधे हुए मन की तुलना पालतू हाथी से की जा सकती हैं और अनियंत्रित मन को उन्मत्त जंगली हाथी कहा जा सकता है।
आवेग और आवेश ग्रस्त होकर उन उत्तेजनाओं से प्रेरित मनुष्य कुछ भी सोच सकता है और कुछ भी कर गुजर सकता है। वह चिन्तन और कर्तव्य इतना असंगत हो सकता है कि फलस्वरूप जीवन भर पश्चाताप करना पड़े और असीम हानि उठानी पड़े। किन्तु आवेगों के प्रवाह में बुद्धि पर पर्दा पड़ जाता है और कुछ सूझ नहीं पड़ता। उन्मत्तों की तरह दूसरों की हत्या, आत्महत्या न सही ऐसे काम तो सहज ही बन पड़ते हैं जिन पर शान्त मन स्थिति में विचार करने पर स्वयं ही अपने पर क्रोध आता है। असंख्य मनुष्य ऐसे ही उद्धत कर्म करते हैं अथवा मरे हुए मन से अकर्मण्य बने हुए जीवन की लाश ढोते हैं। स्थिति से उबरने का कोई प्रकाश भी उन्हें नहीं मिलता।
प्रायः एक समय में एक प्रकार के विचार एक ही दिशा में दौड़ते हैं। यह प्रवाह जिधर भी चलता है उधर लाभ ही लाभ, औचित्य दिखाई पड़ता है। जब कि वास्तविकता कुछ और ही होती है। प्रवाह को रोक कर, धारा द्वारा उससे बाँध या बिजली घर बनाये जाते हैं। मन के प्रवाह को जिस दूसरी प्रतिरोध शक्ति से रोका जाता है, उचित अनुचित के मंथन से उलट-पुलट कर नवनीत निकाला जाता है, तब पता चलता है कि क्या सोचना सार्थक है क्या निरर्थक? लाभ किसमें हैं, और हानि किसमें? तत्काल के क्षणिक लाभ को ही सब कुछ न मान कर भविष्य के चिरस्थायी परिणाम का विचार करने में समर्थ एवं परिपक्व बुद्धि मन के प्रवाह को अवाँछनीय दिशा में रोक सकती, उसे उचित में नियोजित कर सकती हैं। इस परिष्कृत चिन्तन प्रक्रिया को मनोमय कोश की उपलब्धि कह सकते हैं।
महा मनीषी, तत्व दर्शी, शोध कर्ता एवं मनस्वी व्यक्ति ही महा मानवों की पंक्ति में बैठ सकने में समर्थ हुए हैं। उनने संसार का नेतृत्व किया है और अपने महान कर्तव्यों से इतिहास को यशस्वी किया है। इन सभी की यह प्रमुख विशेषता रही है कि उन्हें अपने मन पर अंकुश करना और उसे दिशा देना सीखा। सामान्य लोगों का मन हवा के साथ उड़ते फिरने वाले तिनके की तरह अपनी मानसिक चेतना को निरर्थक अथवा अनर्थ मूलक स्थिति में भटकने देता है जब कि मनस्वी व्यक्ति उसकी प्रत्येक लहर को सुनियोजित करता है। उचित और अनुचित की कसौटी का अंकुश रख कर मन को उसी दिशा में, उसी गति से चलने देता है जिससे कुछ महत्वपूर्ण हित साधन हो सके।
इच्छाओं को मोड़ने में, चिन्तन को सुनियोजित करने में सफलता प्रखर-तर्क बुद्धि से उत्पन्न होती है और आत्म-दमन कर सकने की साहसिकता से मनोनिग्रह वन पड़ता है। एकाग्रता का, चित-वृत्ति-निरोध का बहुत माहात्म्य योगशास्त्रों में बताया गया है। इसका अर्थ चिंतन प्रक्रिया को ठप्प कर देना, एक ही ध्यान में निमग्न रहना, नहीं वरन् यह है कि विचारों का प्रवाह नियत निर्धारित प्रयोजन से ही रुचि पूर्वक लगा रहे। यह कुशलता जिनकी करतल गत हो जाती है वे जो भी लक्ष्य निश्चित करते हैं उसमें प्रायः अभीष्ट सफलता ही प्राप्त करके होते हैं। बिखराव की दशा में चिन्तन की गहराई में उतरने का अवसर नहीं मिलता अस्तु किसी विषय में प्रवीणता और पारंगतता भी हाथ नहीं लगती। संसार में विशेषज्ञों का स्वागत होता है, यहाँ हर क्षेत्र में ‘ए-वन’ की माँग है और यह उपलब्धि कुशाग्र बुद्धि पर नहीं सघन मनोयोग के साथ सम्बद्ध है। यह मनोयोग का वरदान प्राप्त करने के लिए जो प्रयास व्यायाम करने पड़ते हैं उन्हें ही मनोमय कोश की साधना करते हैं।
विज्ञानमय कोश को सामान्य भाषा में भावना प्रवाह कह सकते हैं। यह चेतना की गहराई में अवस्थित अन्तःकरण से सम्बन्धित है। विचार शक्ति से भावशक्ति कहीं गहरी है, साथ ही उसकी क्षमता एवं प्रेरणा भी अत्याधिक सशक्त है। मनुष्य विचारशील ही नहीं संवेदन शील भी है। यह संवेदनाएँ ही उत्कट स्तर की आकांक्षाएं उत्पन्न करतीं हैं और उन्हीं से प्रेरित होकर मनुष्य बेचैन-विचलित हो उठता है जब कि विचार प्रवाह, मात्र मस्तिष्कीय हलचल भर पैदा कर पाता है। देव और दैत्य का वर्गीकरण इस भाव चेतना के स्तर को देखकर किया जाता है। आसुरी प्रकृति के व्यक्ति आत्मश्लाघा, दर्प, आतंक, निष्ठुरता, वर्चस्व जैसी उद्धत आकांक्षाओं में डूबे रहते हैं। उन्हें अपना गौरव दूसरों पर रौब गाँठने के लिए क्रूर कर्म करने में प्रतीत होता है। सृजन के लिए उच्च स्तरीय वरिष्ठता चाहिए पर ध्वंस तो निष्कृष्ट तम व्यक्ति कर सकता है। अहंकारी और उद्धत व्यक्ति सदा विनाश की, आतंक की, क्रूर कर्मों की बात सोचते हैं और आतंक वादी रीति नीति अपनाते हैं। ध्वंस देखकर ही उन्हें अपने गौरव का अनुभव होता है और तदनुसार वे संतोष लाभ करते हैं। ऐसे लोग यदि साहस हीन होते हैं तो विलासी, संग्रही, धनी, आकर्षक, अपव्ययी बन कर दूसरों की तुलना में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के ताने बाने बुनने लगते हैं। असुरता की परिभाषा इस लोभ मोह और अहंकार के साथ जुड़े हुए व्यक्तिवाद उद्धतता के रूप में की जा सकती है।
विज्ञानमय कोश की सुसंतुलित साधना मनुष्य को दयालु, उदार, सज्जन, सहृदय, संयमों एवं शालीन बनाता है। उसे दूसरों को दुखी देखकर उसकी स्थिति में अपने को रखकर व्यथित होने की ‘सहानुभूति’ का अभ्यास होता है। तदनुसार औरों का दुख बँटाने की, सेवा परायणता की आकांक्षा सदा उठती रहती है। विभिन्न प्रकार के परमार्थ इसी स्थिति में बन पड़ते हैं। ऐसे व्यक्तियों की आत्म भावना सुविस्तृत होते-होते अतीव व्यापक बन जाती है। तब दूसरों के सुख में भी अपने निज के सुख जैसा आभास मिलता है। अपनी उपलब्धियों का उपभोग एकाकी कर सकना उनके लिए संभव ही नहीं होता। ‘बाँट कर खाओ’ उनकी सहज प्रकृति बन जाती है। जिओ और जीने दो दो की उदार दृष्टि उन्हें इस बात के लिए विवश करती है कि अपनी उन्नति और समृद्धि की तरह ही दूसरों को सुखी समुन्नत बनाने के लिए भी प्रयत्न किया जाय। अपने ऊपर खर्च होने वाले श्रम, समय, चिन्तन, प्रभाव एवं धन की मात्रा उन्हें न्यूनतम स्तर तक ले जानी पड़ती है ताकि दूसरों के लिए अधिक से अधिक कर गुजरने के लिए कुछ कहने लायक बचत हो सके। संयम इसी का नाम है। इन्द्रिय संयम तो इस दिशा में चलने की प्रथम सीढ़ी है। वस्तुतः वासना और तृष्णा पर संयम करके सादगी भरी मितव्ययी जीवन चर्या बनाना और अपनी उपलब्धियों से संसार में संव्याप्त पीड़ा और पतन का भार हटाने के लिए तत्पर रहना यही है भाव प्रवाह की सत्पथ गामिनी अन्तःचेतना का स्पष्ट परिचय। किसका विज्ञानमय कोश किस स्तर का है इसका पता लगाने के लिए इसी कसौटी को सक्रिय करना पड़ता है।
आनन्दमय कोश का विकास यह देख कर परखा जा सकता है कि मनुष्य क्षुब्ध, उद्विग्न, चिंतित, खिन्न, रुष्ट, असंतुष्ट रहता है अथवा हँसती मुस्कराती, हल्की फुलकी, सुखी सन्तुष्ट जिन्दगी जीता है। मोटी मान्यता यह है कि वस्तुओं, व्यक्तियों अथवा परिस्थितियों के कारण मनुष्य सुखी दुखी रहते हैं पर गहराई से विचार करने पर यह मान्यता सर्वथा निरर्थक सिद्ध होती है। एक ही बात पर सोचने के अनेकों दृष्टि कोण होते हैं। सोचने का तरीका किस स्तर का अपनाया गया-यही है मनुष्य के खिन्न अथवा प्रसन्न रहने का कारण।
अपने स्वरूप का, संसार का वास्तविकता का बाघ होने पर सर्वत्र आनन्द है। दुख तो अपने आपे को भूल जाने का, संसार को कुछ से कुछ समझ बैठने के अज्ञान का है। यह अज्ञान ही भव बन्धन है, इसे ही माया कहते हैं। प्राणी त्रिविध ताप इसी नरक की आग में जलने से सहता है। सच्चिदानन्द परमात्मा के इस सुरम्य नन्दन वन जैसे उद्यान में दुख का एक कण भी नहीं दुखी तो हम केवल अपने दृष्टि दोष के कारण वस्तु व्यक्ति और परिस्थिति का विकृत रूप देखकर ही डरते और भयभीत होते हैं। यदि यह दृष्टि दोष सुधर जाय तो मिथ्या आभास के कारण उत्पन्न हुई भ्रान्ति का निवारण होने में देर न लगे और आत्मा की निरन्तर आनन्द उल्लास से परिपूर्ण परितृप्त रहने की स्थिति बनी रहे।
प्रिय और अप्रिय यह दोनों प्रकार के परस्पर विरोधी अनुभव वस्तुतः एक दूसरे के पूरक है। अन्धकार के कारण ही प्रकाश की सत्ता है यदि संसार में कहीं अन्धकार दिखाई न पड़े तो फिर प्रकाश नाम का कोई तत्व ही अनुभव में अ आवेगा। तब प्रकाश की स्थिति का किसी को पता भी न चलेगा। प्रकाश सापेक्ष है। उसे अनुभव तभी किया जाता है, उसकी तुलना की जायं। ठीक इसी प्रकार सुख अथवा प्रिय नामक कोई स्वतन्त्र पदार्थ नहीं है। दुख की तुलना में जो सामान्य स्थिति अधिक अनुकूल मालूम पड़ती है वह अनुकूलता ही सुखानुभूति है।
इस तत्व दर्शन को समझने वाला व्यक्ति जादूगर की कलाकारिता को देखकर हँसता रहता है और अपना पेट फाड़ने से लेकर हाथ में से रुपया बरसाने तक के चित्र विचित्र खेलों को तटस्थ भाव से देखता रहता है। कर्म प्राणी का कर्त्तव्य है। कर्त्तव्य को दोष न लगे इसलिए वह पूर्ण उत्तरदायी और कर्मनिष्ठ की तरह अपना हर कार्य पूरी कुशलता, तन्मयता एवं कलाकारिता के साथ सम्पन्न करता है और अपने उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्त्तृत्व मात्र से सन्तुष्ट तथा प्रसन्न बना रहता है। उसे आनन्दित रहने के लिए किसी बाहरी वस्तु-व्यक्ति या परिस्थिति की आवश्यकता नहीं पड़ती। कोई घटना-क्रम-कोई परिवर्तन उसकी स्थिर आनंदानुभूति में व्यवधान डाल सकने में समर्थ नहीं होता। उसे अनुकूल प्रतिकूल हर स्थिति में हँसता, मुसकराता-हल्का फुलका-देखा जा सकता है। नाटक के पात्रों की तरह वह अपनी भूमिका भर निबाहता रहता है। इतने पर भी उसे पानी में रहने वाली नाव की तरह-कीचड़ में उगे कमल की तरह अपनी स्वतन्त्र स्थिति बनाये रहने में कोई कठिनाई नहीं होती।
पाँच कोशों की भावनात्मक पृष्ठ भूमि यही है। इन्हीं कसौटियों पर कसकर किसी व्यक्ति की आन्तरिक स्थिति के बारे में जाना जा सकता है कि वह आत्मिक दृष्टि से कितना गिरा पिछड़ा है अथवा उठने विकसित होने में सफल हुआ है।
पंचकोशों की साधन में जप, तप, ध्यान, प्राणायाम, बंध, मुद्रा आदि को प्रयोग करना पड़ता है। इसके राजयोग, हठयोग, लययोग, प्राणयोग, ऋतुयोग, ज्ञानयोग भक्तियोग, कर्मयोग, तत्वयोग, आदि 84 योगों के आधार पर अनेकानेक व्यायाम क्रम बताये गये है। साधक उन्हें अपनी परम्परा एवं पात्रता के अनुसार अपनाते है॥ इन सब साधनाओं में ज्ञान और कर्म से सम्मिश्रित तत्वयोग की साधना है जिसमें स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और सरलतापूर्वक लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
शांति-कुंज, हरिद्वार की स्थापना एक ऐसे ‘आरण्यक’ के रूप में की गई है जिसमें व्यक्तियों को सुधारा ढाला और परिपक्व किया जा सके।
प्राचीन काल में सामान्य छात्रों की शिक्षा के लिए गुरुकुल होते थे और विशिष्ठ छात्रों के लिए ‘आरण्यक’। गुरुकुलों में भौतिक जीवनयापन के आवश्यक क्रिया-कलापों के साथ-साथ मानवी गरिमा के अनुरूप दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा मिलती थी। दस वर्ष आयु से लेकर पच्चीस वर्ष के होने तक पन्द्रह वर्ष का शिक्षण क्रम वहाँ चलता था और छात्र शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक क्षेत्रों में अभीष्ट सफलताएँ प्राप्त करने योग्य होकर निकलते थे। यह गुरुकुल पद्धति हुई। आरण्यकों का एक ही निर्धारित विषय होता है-आत्म-बोध, आत्म-विकास और आत्म-बल का संचय। इसके लिए उन्हें तत्व दर्शन पढ़ना होता है-जीवन के साथ आदर्शों का समन्वय करने का लोक-व्यवहार जानना पड़ता है और साथ ही आत्म-बल संचय करने के लिए साधनात्मक तपश्चर्याओं की आग में तपना पड़ता है। इन त्रिविध पुण्य-प्रक्रियाओं से संस्कारित छात्र दीप्तिमान स्वर्ण को तरह तपे हुए निकलते थे। वे आत्म-कल्याण का जीवन लाभ लेते थे और असंख्यों को अपनी नाव में बिठा कर भव-सागर पार कराते थे।
शान्ति-कुंज का आरम्भ इसी प्रयोजन विशेष के लिए आरण्यक शिक्षा प्रक्रिया की तरह हुआ है। उसे एक ऐसी शिक्षण संस्था कहना चाहिए जिसमें व्यक्तियों को परिष्कृत करना और उनमें प्रखरता उत्पन्न करने का लक्ष्य रखा गया है। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य-युग-निर्माण अभियान के सृजन सैनिक उसके लिए उपयुक्त पात्र समझे गये। उन्हें प्रयत्न पूर्वक खोज-खोजकर एक ऐसी माला में पिरोया गया है कि जिसे पहनकर मानवता पुनः गौरवास्पद बन जाती है।
अच्छा तो यह होता कि कुछ थोड़े से छात्र यहाँ रहते और दीर्घकालीन साधना करके अपनी प्रतिभा विकसित करते और उसका लाभ समस्त समाज को देते। पर समय की आवश्यकता ने दूसरी माँग की और अधिक लोगों को अधिक लाभ देने की नीति अपनानी पड़ी। इसे आपत्ति धर्म कहा जा सकता है। सम्भव है आगे चलकर इस आरण्यक का स्वरूप वही बन जाय कि थोड़े से परखे हुए छात्र यहाँ रहे और दीर्घकालीन एकान्त साधना करके विशिष्ठ आत्म-बल प्राप्त करें और उस सम्पदा को दसों दिशाओं में बिखेर कर विश्व में चिरस्थायी सुख-शान्ति की भूमिका सम्पादित करें। पर अभी तो आज की आवश्यकता ही प्रधान है। संस्कृति की सीता को, लंका के बन्दीगृह से छुड़ाने के लिए योग्यता की दृष्टि से पिछड़े हुए रीछ, वानरों को स्वल्पकालीन शिक्षा देकर युद्ध के मोर्चे पर भेजना है। इन दिनों शान्ति-कुंज की गतिविधियाँ ऋष्यमूक पर्वत पर बन रही योजनाओं और तैयारियों के रूप में ही समझी जा सकती है। अपने छोटे वानर परिवार को लंका की ओर ले चलने के लिए आतुर है। विलम्ब की गुंजाइश नहीं। सुयोग्य सेनाध्यक्षों को प्रशिक्षित करने में जितना समय लगता है उतने की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती। आज तो बूढ़े जामवन्त, जरठ जटायु, दुर्बल गिलहरी और वनवासी रीछ, वानर ही युग धर्म निबाहने का साहस एकत्रित करेंगे।
शान्ति-कुंज में गत ढाई वर्षों से जो सत्र शिक्षण प्रक्रिया चल रही है उसकी प्रगति पर दृष्टिपात करने से आशातीत सन्तोष होता है। शिक्षार्थियों की पूर्व भूमिका को देखते हुए कम ही आशा थी कि वे कुछ अधिक लाभ प्राप्त कर ही दिया गया था। परिणाम आश्चर्यजनक निकला है। विभिन्न स्तर के शिक्षण सत्रों में विभिन्न वर्ग के लोग आते रहे है। उनकी पात्रता एवं अन्तःस्थिति के अनुरूप जो मिला है उसे स्वल्पकालीन प्रयास को देखते हुए ‘आशातीत’ कहा जाय तो तनिक भी अत्युक्ति नहीं होगी। अब तक के शिक्षार्थियों पर हमारी पैनी दृष्टि है। उनकी प्रगति पर ध्यान रखा है और जानकारी प्राप्त की है। जो विवरण उपलब्ध है उससे स्पष्ट है कि ऐसे लोग बहुत ही कम है जिनने अपनी तमिस्रा को तनिक भी नहीं हटाया। ऐसों को अपवाद ही कह सकते हैं। शेष को न्यूनाधिक मात्रा में ऐसी अन्तः चेतना की उपलब्धि हुई है जिसके सहारे उनकी आत्मिक प्रगति सन्तोषजनक रीति से अग्रगामी बनी है। उनके दृष्टिकोण में- क्रियाकलाप में ऐसा परिवर्तन हुआ है जिसके सत्परिणाम सामने आने ही चाहिए थे। वे स्वयं अपने परिवर्तन पर प्रसन्न हैं और उनके सहचर अनुभव करते हैं कि व्यक्तित्व का काया-कल्प करने वाली यह प्रेरक प्रक्रिया कितनी सरल-कितनी सफल और कितनी सुखद है।
आत्मिक प्रगति कोई ऐसा रहस्य नहीं है जिसकी अपने को प्रतीति न हो, या जिसका फल देखने के लिए परलोक की प्रतीक्षा करनी पड़े। वह नकद धर्म है। थोड़े धन, विद्या, बल, पद आदि का जितना लाभ होता है उसी अनुपात से मनुष्य की स्थिति पहले की अपेक्षा ऊँची उठी दिखाई पड़ती है। ठीक इसी प्रकार आत्मिक सम्पदा थोड़ी भी बढ़े तो उसका प्रभाव शारीरिक स्फूर्ति, मानसिक प्रफुल्लता, पारिवारिक सौजन्य, अर्थ संतुलन दूसरों द्वारा सहयोग सम्मान का उपहार, चेहरे पर मुसकान स्वभाव में माधुर्य, आदर्शवादी चिन्तन में अभिरुचि, उत्कृष्ट क्रियाकलाप में उत्साह, उज्ज्वल भविष्य की आशा, निर्भीक तेजस्विता का उदय, अन्तरंग और बहिरंग क्षेत्र में संव्याप्त अनौचित्य से संघर्ष जैसी अनेक विभूतियाँ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती है। शान्ति-कुंज के शिक्षण सत्रों में सम्मिलित होने वाले शिक्षार्थियों ने ऐसी विभूतियाँ क्या कुछ कम पाई ? इस दिशा में सूक्ष्म अन्वेषण से जो जाना गया है, उससे यही पता चलता है कि वे अपने प्रयास एवं साहस की तुलना में अनेक गुना लाभ प्राप्त कर सकने में सफल हुए है। वे अनुभव करते हैं कि इन सत्रों में सम्मिलित होने में जितना समय लगा वह सच्चे अर्थों में सार्थक हुआ और अविस्मरणीय बना। किराये भाड़े में जो पैसा लगा उससे बढ़कर सन्तोष देने वाला खर्च जीवन भर में कमी किसी दान पुण्य में उनसे नहीं वन पड़ा। इन सत्रों का सार्थकता का अनुमान उनमें सम्मिलित होने वालों को मिले लाभ को देखकर ही लगाया जा सकता है। इस दृष्टि से एक शब्द में अब तक के इस प्रयास को पूर्ण सफल कहने में किसी प्रकार का संकोच अनुभव नहीं होता।
प्रशिक्षण सत्रों का निर्धारण एक वर्ष के लिए करने का क्रम चल रहा है। अगले वर्ष क्या होगा, इसकी घोषणा सामयिक परिस्थितियों के अनुसार आगे की जायगी वर्तमान स्थिति में इतना ही सम्भव है कि एक वर्ष की कार्य-पद्धति निश्चित की जाय और आगे जैसा आवश्यक हो वह आगे फिर बता दिया जाय। प्रस्तुत एक वर्ष में शान्ति-कुंज की प्रशिक्षण व्यवस्था इस प्रकार बनी है।
कन्या प्रशिक्षण-
1 जुलाई 75 से कन्या प्रशिक्षण सत आरम्भ ही गया है यह 11 महीने चलेगा। 31 मई 76 को यह पूर्ण हो जायेगा। इसमें 80 कन्याओं के लिए स्थान बन सका है। शेष आवेदन-पत्र अगले वर्ष के लिए रोक लिये गये हैं। पाठ्य-क्रम में संगीत, अभिनय, रामायण प्रवचन, वक्तृत्व कला, हवन संस्कार, पर्व आदि धर्मकृत्यों का अभ्यास, प्रेस उद्योग, रबड़ की मुहरें, बिस्किट, डबल रोटी बनाना, खिलौने, साबुन, मोमबत्ती, स्याहियाँ, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई आदि उद्योगों को सम्मिलित रखा गया है। स्वास्थ्य विज्ञान, जीवन-कला, गृह-व्यवस्था, शिशु-पालन, पारिवारिक स्नेह-सहयोग, नारी जागरण अभियान का नेतृत्व आदि विषयों का भी समावेश है। आशा की जानी चाहिए कि इस प्रशिक्षण को प्राप्त करके जाने वाली लड़कियां जहां भी रहेंगी वहां स्वर्गीय वातावरण का सृजन करेंगी।
महिला प्रशिक्षण-
जिन्हें घर गृहस्थी का उत्तरदायित्व संभालना पड़ता है वे अधिक समय घर से बाहर नहीं रह सकतीं। उन्हें अपने व्यक्तित्व का परिष्कार, परिवार की सुव्यवस्था, नारी जागरण अभियान में उपयुक्त भूमिका निभा सकने की क्षमता का विकास जैसी आवश्यक क्षमताएं विकसित करने लायक अवसर इन तीन महीनों में ही मिल जाता है, संगीत, भाषण, गृह-उद्योग आदि की जितनी शिक्षा इस थोड़ी अवधि में सम्भव है उसका समावेश भी रखा गया है।
इस वर्ष मात्र दो ही सत्र महिला प्रशिक्षण के चलेंगे (1) अक्टूबर, नवम्बर, दिसम्बर 75 (2) जनवरी, फरवरी, मार्च 76। युग-निर्माण परिवार सदस्यों को अपने घरों से एक-एक महिला इस प्रशिक्षण में भेजनी चाहिए ताकि उन्हें अपना निजी परिवार आदर्श स्तर का बनाने तथा लोक-मंगल के कार्यों में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाला एक नया सुयोग्य साथी मिल सके। इन सत्रों में भेजकर पुराने ढर्रे की पत्नी को प्रगतिशील सहयोगिनी के रूप में बदला जा सकता है। महिला जागरण शाखाओं को भी अपनी एक प्रतिनिधि भेजनी चाहिए ताकि उसके सहयोग से शाखा का कार्य अधिक अच्छी तरह सम्पन्न हो सके। अक्टूबर से दिसम्बर वाले सत्र की संख्या पूरी हो चुकी, अब जनवरी, फरवरी, मार्च 76 के एक सत्र की ही भर्ती शेष है, जिन्हें इच्छा हो वे जल्दी ही अपना स्थान सुरक्षित करालें।
जीवन साधना सत्र-
सन् 75 में अब अक्टूबर, नवम्बर ही में दस-दस दिवसीय दो जीवन साधना सत्र होंगे। अक्टूबर पूरा हो गया। नवम्बर में कुछ सीटें बाकी हैं। इनके पूरे होते ही सन् 75 की भर्ती पूरी हो जायगी। इसके उपरान्त सन् 76 में जनवरी, फरवरी, मार्च में दस-दस दिन के हिसाब से मात्र नौ सत्र होंगे। इसके बाद पूरे 76 में और कोई जीवन साधना सत्र नहीं होगा। सीटें पूरी हो जाने पर नौ महीने बाद 77 के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। पांच-पांच दिन के प्रत्यावर्तन सत्रों में जो लोग आ चुके हैं उन्हें इन सत्रों में प्राथमिकता दी जायगी। वस्तुतः जीवन साधना सत्रों को प्रत्यावर्तन सत्रों का उत्तरार्ध ही कहना चाहिए। दोनों को मिला देने से ही एक पूरा प्रशिक्षण बनता है।
योग एवं तपश्चर्या सत्र-
अगल वर्ष के यह नये सत्र हैं। यह एक-एक महीने के होंगे। पहला सत्र दिसम्बर 75 में, दूसरा अप्रैल 76 में, तीसरा अगस्त 76 में होगा।
इन सत्रों में सवा लक्ष गायत्री पुरश्चरण, अस्वाद व्रत, पाप प्रायश्चित के लिए विशिष्ठ तपश्चर्याएं करने के विशेष विधान पालने पड़ेंगे। बीच-बीच में मौन तथा दूसरे आत्मानुशासनों का निर्वाह करना होगा। जपयोग, ध्यानयोग, बिन्दुयोग, नादयोग, प्राणयोग के अतिरिक्त योगाभ्यास की साधनाएं पात्रता के अनुरूप साथ-साथ चलेंगी। गंगा स्नान, गंगाजल पान इस सत्रों में अनिवार्य रहेगा।
घर रहकर एक वर्ष की साधना से जो उपलब्धि हो सकती है उतनी शान्ति-कुंज के दिव्य वातावरण एवं प्रखर संरक्षण में एक माह रहकर मिल सकेगी। योगाभ्यास एवं तप साधना में जिन्हें रुचि हो उनके लिए यह सत्र एक प्रकार से अलभ्य अवसर है।
लोक साधना सत्र-
भगवान बुद्ध ने अपने समय में लाखों धर्म चक्र प्रवर्तक उत्पन्न किये थे और उन्हें देश देशान्तरों में भेज कर युग परिवर्तन का महान प्रयोजन पूरा किया गया था, आज भी समय की वैसी ही मांग है। साठ करोड़ की आबादी के भारत का हमें भावनात्मक नव निर्माण करना है और इससे आगे प्रवासी भारतीयों से लेकर संसार के कोने-कोने में मानव धर्म की, विश्व धर्म की, पुनः प्राण प्रतिष्ठा करनी है। इसके लिए हजारों लाखों धर्म प्रचारकों की आवश्यकता पड़ेगी। उसकी पूर्ति के लिए विचारशील चरित्र निष्ठा एवं प्रतिभावान ऐसे लोक सेवी तैयार करने पड़ेंगे जो अपनी पूँछ में आग लगा कर आसुरी-अनीति की लंका को भस्मसात् करने में समर्थ हो सकें।
अगले दिनों व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण का, बौद्धिक नैतिक एवं समाज क्रान्ति का, अभियान रामचरित्र और कृष्ण चरित्र को माध्यम बना कर चलाया जायेगा। इसके लिये रामायण और भागवत की लोक प्रियता का उपयोग करना आवश्यक समझा गया हैं। तुलसी कृत रामायण के साथ वाल्मीकि रामायण और भागवत के साथ महाभारत जोड़कर रखे गये हैं ताकि अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति के लिये उपयुक्त सामग्री उपलब्ध हो सके। अपना कार्य क्षेत्र 80 प्रतिशत आबादी के 82 प्रतिशत अशिक्षित लोगों के बीच हैं। उनमें, मानसिक पृष्ठ भूमि में धार्मिकता का कुछ अंश मौजूद है। राजनीति अर्थशास्त्र, समाज विज्ञान जैसे जटिल विषयों का आधार लेकर उन्हें कुछ समझाया जाय तो सफलता न मिलेगी। रामायण भागवत में वह बहुत कुछ मौजूद हैं जिससे युग की आवश्यकता के अनुरूप लोक मानस ढालने में सफलता प्राप्त की जा सके।
भारतीय संस्कृति में वे सभी बीज मौजूद हैं जिनको अंकुरित, पल्लवित और फलित करके उज्ज्वल भविष्य के सभी साधन जुटाये जा सकते हैं। नैतिक पुनरुत्थान एवं सामाजिक परिवर्तन के साथ साथ हमें उस संस्कृति की पुनः प्राण प्रतिष्ठा भी करनी हैं, जो मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण में पूरी तरह समर्थ हो। भारतीय धर्म वस्तुतः विश्व धर्म हैं, अपनी संस्कृति ही अगले दिनों विश्व संस्कृति बनने जा रही हैं, उसे युग के अनुरूप ढाँचे में ढालकर इस योग्य बनाना हैं कि अनास्थावानों में भी पुनः आस्था का संचार कर सकना संभव हो सके।
इसके लिये भारतीय धर्म एवं संस्कृति में प्रचलित सभी कर्म काण्डों, को धर्म कृत्यों को प्रेरणाप्रद शैली में सर्वसाधारण के सम्मुख प्रस्तुत करना होगा। अपने पर्व त्यौहारों में सामाजिक समस्याओं के समाधान और षोडश संस्कारों में परिवार निर्माण के सभी तथ्य पूरी तरह सन्निहित हैं। जन्म दिन यदि प्रेरक ढंग से मनाये जाने लगे तो उन उत्सवों के सहारे व्यक्ति निर्माण के सभी प्रमुख सिद्धान्त अन्तःकरण में प्रविष्ट कराये जा सकते हैं।
संगीत की उपयोगिता सर्वविदित हैं। अन्तःकरण तक प्रवेश कर जाने की क्षमता उसमें विद्यमान हैं। बाल-वृद्ध, नर-नारी शिक्षित-अशिक्षित सभी उसके द्वारा आनन्द और प्रकाश का दुहरा लाभ प्राप्त कर सकते हैं। अस्तु प्रचारकों का यदि कंठ थोड़ा भी साथ दे और मस्तिष्क में ताल स्वर की जरासी भी पकड़ हो तो फिर संगीत अवश्य ही सीखना चाहिए और सहगान कीर्तनों के माध्यम से जन मानस को झकझोरने में आशाजनक सफलता प्राप्त करनी चाहिये।
उपरोक्त सभी तथ्यों का समावेश करके युग धर्म के लोक नायकों के लिये एक वर्षीय पाठ्यक्रम तैयार किया गया हैं। इसमें (1) रामायण कथा तथा रामचरित्र के सहारे युगान्तर कारी प्रवचन, (2) भागवत कथा तथा कृष्ण चरित्र के आधार पर युग परिवर्तन के बीजारोपण (3) जनमानस को भाव-विभोर कर सकने योग्य संगीत, (4) पर्व, संस्कार, यज्ञ, आदि धर्म कृत्यों के सहारे पारिवारिक एवं सामाजिक छोटे बड़े उत्सव आयोजनों का सूत्र संचालन (5) युग की प्रमुख उलझनों के स्वरूप और उनके समाधान का तत्वदर्शन (6) लोक सेवी के उपयुक्त व्यक्तित्व ढालने योग्य जीवन साधना एवं तपश्चर्या का अभ्यास।
उपरोक्त छहों तथ्यों को अभ्यास में लाने और उनमें प्रवीणता प्राप्त करने के लिये न्यूनतम अवधि एक वर्ष ही हो सकती। इससे कम में उपरोक्त प्रशिक्षण किसी भी प्रकार संभव नहीं हो सकता। यह शुभारंभ इसी वर्ष से किया जा रहा है। एक जनवरी से 30 दिसंबर 76 तक यह शिक्षण चलेगा। जिनमें उपरोक्त शिक्षण के योग्य प्रतिभा हो वे ही इसके लिये आवेदन करें। भावी जीवन में जिन्हें धर्म प्रचारक की भूमिका निभानी हो उन्हीं के लिये यह प्रशिक्षण उपयुक्त पड़ेगा।
रामायण सत्र
पिछले दिनों डेढ़-डेढ़ महीने के तीन रामायण सत्र चल चुके हैं। इस स्वल्प काल में भी विद्यार्थी अपने परिवार तथा समीपवर्ती क्षेत्र में रामायण के माध्यम से नव जीवन संचार कर सकने की क्षमता प्राप्त करके गये है। रामायण कथा, रामचरित्र के सहारे युग धर्म की प्रेरणा देने वाले प्रवचन इस थोड़ी अवधि में भी सिखा दिये जाते हैं। साथ ही पर्व, संस्कार, यज्ञ आदि कर्मकाण्डों का भी इतने ही दिनों में अभ्यास हो जाता है। यह शिविर उन लोगों के लिये हैं जो कृषि, व्यवसाय, नौकरी आदि आजीविका उपार्जन में व्यस्त होने के कारण अधिक समय तो नहीं निकाल सकते पर अपने समीपवर्ती क्षेत्र में नव निर्माण का आलोक उत्पन्न करने के इच्छुक हैं। स्वल्प समय के शिक्षण को देखते हुए वे भी आश्चर्य जनक योग्यता प्राप्त करके जाते हैं।
यह सत्र अगले वर्ष दो ही चलेंगे, (1.) एक मई से 15 जून तक 20 जून तक (2) नवम्बर 75-कन्या प्रशिक्षण, महिला सत्र, जीवन साधना (4) जनवरी 73-कन्या सत्र, लोक साधना सत्र, जीवन साधना सत्र, (5) फरवरी 73-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, जीवन साधना सत्र, (6) मार्च-कन्या सत्र, (8) मई 73-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र (9) जून 76-लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र, (10) जुलाई 76-कन्या सत्र, लोक सेवा सत्र, रामायण सत्र।
कन्या सत्र जुलाई से आरम्भ होकर फिर एक साल चलेगा। लोक सेवा सत्र दिसंबर तक चलता रहेगा। अगस्त 76 से दिसंबर तक चलता रहेगा। अगस्त 76 से दिसंबर 76 तक की अवधि में जीवन साधना और महिला सत्रों की व्यवस्था फिर होगी जिनकी सूचना अगले वर्ष दी जायेगी। अभी अगले 10 महीनों का ही सुनिश्चित कार्यक्रम घोषित किया जा रहा है।
उपरोक्त सत्रों में अधिकारी व्यक्ति ही प्रवेश पा सकेंगे। सैलानी पर्यटक और कष्ट निवृत्ति का आशीर्वाद पाने की इच्छा से आये लोग भी कभी-कभी स्त्री बच्चों समेत सत्रों में घुस पड़ते हैं और सारी व्यवस्था ही गड़बड़ा देते हैं। इसकी रोकथाम अतीव आवश्यक हो गई हैं। इसलिये अलग-अलग आवेदन पत्र छपा दिये गये हैं। इच्छुकों को अपने सत्र का छपा आवेदन पत्र मंगा लेना चाहिए और उसे भरकर भेजने के उपरान्त स्वीकृति पाये किसी को भी ऐसे ही नहीं चल पड़ना चाहिये। व्यवस्था की दृष्टि से इस प्रकार का अनुशासन अब और भी अधिक कठोर बना देता आवश्यक हो गया हैं। इससे अवाँछनीय भीड़ बढ़ने से अव्यवस्था उत्पन्न न होगी ओर सत्पात्रों पर अधिक शक्ति खर्च करके उन्हें अधिक लाभान्वित कर सकना संभव होगा।
प्रशिक्षण का यह सुअवसर कब तक उपलब्ध रहेगा कहा नहीं जा सकता, इसलिये जिन्हें यह सब उपयोगी प्रतीत हो उन्हें यथा संभव अगले ही वर्ष इनमें सम्मिलित होने का प्रत्येक सदस्य को इसके लिये इन पंक्तियों द्वारा आमंत्रित किया जा रहा हैं।
जो पैदा करता है और दान करता है वह पवित्र जीवन के उपायों को जानता है। जो संपत्ति जमा करके रखी जाती हैं, वह उसी प्रकार मूल्य हीन है जैसे गहरे भू-गर्भ में छिपा सोना। मनुष्यों के प्रयोग में लगाओ, क्योंकि जो धन पैदा करते हैं वे जानते हैं कि उसका सदुपयोग कैसे किया जा सकता है और जो लोग धन पा जाते हैं वे उसे उड़ाना ही जानते हैं।
-गुरु नानक
मानव - मानस प्यासा है सौजन्य प्रेम का। मानव ! तुम सौहार्द्रय-स्नेह ने धन बन जाओ॥
आँख उठी जिस तरफ वेदना ही तो पायी। करक रही सपनों से दुखती सबकी आंखें॥ चिन्ता, ऊब, निराशा हर मन पर छायी है॥ सूख चली है मनचाही आशा की पाखें॥
मेटो यह मानसिक दैन्य की बढ़ती आंधी। मृदुल बयार प्रेम की बनकर तुम लहराओ॥ थककर बैठा बीच डगर में जीवन-रहा। टूट गया उत्साह, प्रेरणा विदा हो गया॥
कैसे पहुँचेंगे मंजिल तक थके पांव से। चार कदम चलने की भी तो चाहे सो गया॥ ऐसे हारे हुए व्यक्ति को भरो बांह में। और जगाकर साहस फिर नव शक्ति जगाओ॥
हर तन है घायल, हर आत्मा भी प्यासी है। टूट रहा है हर हृदय वेदना इतनी गहरी ॥ रोती है हर साँस, अधूरे सूखे है सबक। सिसक-सिसक सो गया अरे ! प्राणों का प्रहरी॥
तोड़ो गहन उदासी अपने सौ मनस्य से। प्राण-प्राण को प्रेमामृत आकण्ठ पिलाओ॥ रीति मिट चली है जीवन में प्रेम-प्यार की। अपने तक सीमित रहने है दुख पाये हैं।
पर होते इंसान, सही अर्थों में वे हो। जिनके नयन पराये दुख से भर आते हैं॥ मेरे साथ चलो तुम आज दुलार बांटने। संवेदन का कोष मुक्त हो आज लुटाओ॥
-माया वर्मा
*समाप्त*