(1) अधिकांश ग्राहकों का चन्दा दिसम्बर अंक के साथ पूरा हो जाता है। इन पंक्तियों से चन्दा समाप्ति की सूचना और नये वर्ष का चन्दा 12) भेजने का अनुरोध समझना चाहिए।
(2) इस महंगाई के जमाने में उतने ही अंक छापे जाते हैं जितने ग्राहक होते हैं। इसलिए अपना तथा अन्य साथियों का चन्दा यथा सम्भव जल्दी ही भिजवाना चाहिए ताकि उसी हिसाब से अंक छापे जायें।
(3) जिनका चन्दा बीच के किसी महीने समाप्त होता है उन्हें सन् 76 के शेष महीनों का चन्दा 1) प्रति अंक के हिसाब से भेजकर जनवरी से दिसम्बर वाला क्रम बना लेना चाहिए। वही हर दृष्टि से सुविधाजनक रहता है।
(4) उधार का क्रम अब चल सकना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। जिन्हें जितनी पत्रिकाएं मंगानी हों नकद ही मंगानी चाहिए।
गत वर्षों में उधार में बड़ी राशि डूब जाने से तिलमिला देने वाला आर्थिक संकट उत्पन्न हो गया है।
(5) मनीआर्डर अक्सर बहुत देर में मिलते हैं इसलिए पोस्टल आर्डर या बैंक ड्राफ्ट से पैसा भेजना अधिक सुविधाजनक रहता है।
(6) फुटकर अंक अक्सर रास्ते में खोते रहते हैं और ग्राहकों को न पहुँचने की शिकायत करनी पड़ती है। इस झंझट से बचने के लिए यह तरीका अच्छा है कि जहाँ 20 से अधिक प्रतियाँ जाती हैं वहाँ एक ही व्यक्ति के नाम से रजिस्ट्री से सारे अंक मंगा लिए जायें और उन्हें आपस में बाँट लिया जाये।
(7) सभी सदस्यों को अपने पते के साथ पिनकोड नम्बर अवश्य लिखना चाहिए उससे डाक वितरण में सुविधा और शीघ्रता होती है।
(8) ग्राहकों को अपना पूरा नाम, पता हिन्दी या अंग्रेजी में स्पष्ट अक्षरों में लिखना चाहिए। साथ ही यह भी लिख देना चाहिए कि वे नये ग्राहक हैं या पुराने। पुराने ग्राहकों को अपना ग्राहक नम्बर भी लिखना चाहिए।
(9) ग्राहक बनाने के लिए टोली बनाकर यदि प्रभावशाली परिजन निकलें तो पुरानों से चन्दा वसूल करने और कुछ नये बनाने का अभियान बहुत सफल हो सकता है। इस वर्ष इस दिशा में प्रत्येक सदस्य को विशेष रूप से प्रयत्न करना चाहिए और इस प्रयोजन के लिए चन्दा वसूल करने की छपी रसीद बहियाँ अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा से मंगा लेनी चाहिएं।
(10) बसन्त पर्व अपने मिशन का जन्म दिन है। उस अवसर पर श्रेष्ठतम श्रद्धांजलि अखण्ड ज्योति के अधिकाधिक सदस्य बढ़ाने के रूप में दी जानी चाहिए। इस संदर्भ में आगे बढ़ने की हम सबको परस्पर स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए।
(11) पत्रिका न पहुँचने की शिकायत उसी मास की बीस तारीख के तुरन्त बाद मथुरा भेज देनी चाहिए अन्यथा पत्रिका समाप्त होने पर दुबारा पत्रिका भेजने में कठिनाई होती है।
(12) युग - निर्माण पत्रिकाओं का चन्दा एवं युग-निर्माण साहित्य सम्बन्धी पत्र - व्यवहार युग-निर्माण योजना के पते से करना चाहिए। अखण्ड ज्योति एवं गायत्री साहित्य सम्बन्धी धनराशि अखण्ड ज्योति संस्थान के पते से भेजना चाहिए। दोनों स्थान दूर - दूर होने से एक साथ डाक आने में असुविधा होती है और अनावश्यक विलम्ब होता है।
- व्यवस्थापक
अपनापन ही सबसे अधिक प्रिय है। आत्मबोध से ही जीवन और संसार के रहस्यों पर से पर्दा उठता है। आत्म जागृति ही दिव्य -जीवन में प्रवेश का द्वार है। आत्म-विश्वास से हिम्मत बंधती है और प्रबल पुरुषार्थ करके बढ़ी-चढ़ी सफलताएँ प्राप्त करना सम्भव होता है। आत्म तृप्ति के लिए ही सारी दौड़−धूप हो रही है। आत्मसन्तोष पाने के लिए बड़े से बड़े कष्ट सहे जा सकते हैं। आत्म-परिष्कार के साथ देवत्व की सारी सिद्धियाँ जुड़ी हुई हैं। जीवन का लक्ष्य है - आत्म कल्याण। आत्मा से बढ़कर और कुछ नहीं। विकसित आत्मा ही दूसरे शब्दों में परमात्मा कहा जाता है।
वैभव की व्याख्या आत्म विस्तार के रूप में की जायेगी। जिस वस्तु पर अपना अधिकार है, मोह है, सम्बन्ध है, वही प्रिय लगती है। यहाँ सब कुछ पराया है- सब कुछ कुरूप है। जो अपना है वही प्रिय है, वही सुन्दर है। पंचतत्वों से बने निर्जीव पदार्थों और मल-मूत्र के पिटारे शरीर में प्रिय लगने लायक भला है ही क्या? जिसे हम सुन्दर कहते हैं और प्रिय मानते हैं वह अपनेपन के आरोपण से ही वैसा लगता है।
यदि हमें इस संसार में अधिक प्रिय पदार्थों का संग्रह करना हो और अधिक प्रियजनों के साथ रहना हो तो आत्मीयता का अधिकाधिक विस्तार करना चाहिए। जिस पदार्थ या व्यक्ति पर आत्मीयता का आरोपण जितनी मात्रा में करते चलेंगे वह उतना ही प्रिय, सुन्दर और सुखद लगता जायेगा। यदि आत्मीयता का विस्तार समस्त संसार तक कर दिया जाये तो सर्वत्र अनन्त आनन्द का अनुभव और असीम सौंदर्य का दर्शन हर घड़ी होता रहेगा।
बच्चों ने घरौंदा बनाने की ठानी, समुद्र की लहरें उनके लिए बालू ढोकर लाईं। जब बन गया तो उन्होंने तोड़ने की ठानी और ठोकर मारकर उसे विस्मार कर दिया। सृजन की तरह अपने ध्वंस प्रयास में उन्हें मजा आया और ताली बजाते हुए खुशी से नाचने लगे। समुद्र ने इस हंसी में भी उनका साथ दिया। लहरों ने अपनी गर्जन उसी ह्रास में मिलाई और आनन्द को दूना बना दिया। दुहरा रोल क्यों ? इस प्रश्न के उत्तर में समुद्र ने इतना ही कहा - “निश्छल आत्माओं के साथ हंसना उसे सदा ही भला लगता है।”
हमारा सृजन दुरभिसंधियों से रहित होना चाहिए उसके पीछे आत्मा की कलाकारिता का स्पन्दन भरा होना चाहिए। किन्तु आवश्यक हो गया हो तो ध्वंस का भी आनन्द लिया जा सकता है। किसी समय के भवन दूसरे समय खण्डहर बन जाते हैं, तब उन्हें उखाड़ फेंकना पड़ता है और नई इमारत का शिलान्यास करना पड़ता है। भवन चिनने में आनन्द है, पर नींव खोदने में क्रिया की भिन्नता रहते हुए भी कुछ कम आनन्द नहीं है। मीनार बनाना अपनी जगह अच्छा है। पर क्या कुएं बनाते हुए जो नीचे उतरता जा रहा है, वह कुछ बुरा कर रहा है। भवन की अट्टालिकाएं दूर से दीख पड़ेंगी और गौरवान्वित होंगी, पर कुएं का जल भी तो प्राणियों और पौधों की प्यास ही बुझायेगा। क्रिया की विपरीतता देखकर भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है सदुद्देश्य के लिए सृजन जितना आवश्यक है उतना ही ध्वंस भी। धर्म दोनों का समर्थन करता है। समुद्र हर निश्छल क्रिया के साथ जुड़े हुए आनन्द में सहभागी बनता है। धर्म भी समुद्र की तरह ही महान है, उसकी एक भुजा सृजन को वरदान देती है और दूसरी ओर ध्वंस को उपहार।
जड़ता धर्म नहीं है। परम्परा को शास्त्र नहीं कह सकते। समय की गति के साथ पक्षी चहचहाते और कमल खिलते हैं। युग की पुकार विवेक को झकझोरती है और सृजन की ही तरह ध्वंस की भी पुकार करती है। प्रभात काल का अरुणिमा सूर्य इसीलिए तो अभिनन्दनीय माना जाता है कि वह अन्धकार से लड़ने में लहूलुहान होते - होते भी प्रकाश की स्थापना करता है। अपने समय की अवाँछनीयताओं से जूझने में यदि परम्पराएं टूटती हैं तो चिन्ता नहीं। मोर कब परवा करता है कि उसके नृत्य में कभी बाँई ओर और कभी दाहिनी ओर पंख लहराते हैं। समीक्षा करने वाले भौंरे की गुंजार में उलटी-सीधी स्वर लहरी की अव्यवस्था देखते हैं। पर जिन्हें कला का ज्ञान है - उन्हें भ्रमर नृत्य में उन्मुक्त थिरकन भली भी लगती है और भोली भी।
कोल्हू का बैल बन विहारी मृगों को निरुद्देश्य पर्यटक कहता है। बूढ़ा अजगर फुदकने वाली गौरैया को उच्छृंखल ठहराता है। लोग तो विचित्र हैं प्रीतिभोजों में छककर माल उड़ाते हैं और कहते हैं बड़ी दावतों में कानून का उल्लंघन होता है, इन्हें रोका जाना चाहिए। सूर्य की ओर पीठ करके चलने वाले छाया को ही विधि-विधान मानते हैं और उसी का अनुसरण करने का उपदेश देते हैं। उनकी दृष्टि में प्रकाश की ओर मुँह करके चलने वाला अधार्मिक है क्योंकि छाया को अपने पीछे चलाने का प्रयास करता है। उनकी दृष्टि में सूर्य नहीं छाया वन्दनीय है। समुद्र को शान्त और नदी को अचल रखा जाना चाहे सम्भव भले ही न हो, पर पुरातनवादी चाहते यहीं हैं। उनकी दृष्टि में परम्परा ही सब कुछ है परिवर्तन में वे अशालीनता देखते हैं।
खलील जिब्रान ने आर्फलीज निवासियों को सम्बोधित करते हुए कहा था - “तुम कोलाहल को घृणा करते हो और शान्ति के समर्थन की दुहाई देते हो - सो कहो। नगाड़ों की चमड़ी उखाड़ सकते हो और तुरही का छेद बन्द कर सकते हो, पर कोयल को कूकने से रोक नहीं सकते, वह बिना किसी की परवा किये प्रभात का सन्देश सुनाने के लिए निर्भय होकर पंचम स्वर में कूकती ही रहेगी।
इस ब्रह्माण्ड की रचना इस प्रकार हुई है कि उसकी पोल में हर वस्तु अधर लटकी रहती है। गिरने की बात तो तब बनती है जब उस पर कोई दबाव पड़ता है और बलपूर्वक अपनी ओर खींचता है। यदि दबाव न पड़े तो वह पोले आकाश में अपनी जगह अनन्त काल तक बनी रहेगी।
पृथ्वी में आकर्षण शक्ति है, इसलिए वह अपने प्रभाव क्षेत्र में दूसरी वस्तुओं को अपनी ओर खींचती है। इसी खिंचाव से प्रेरित होकर चीजें ऊपर से नीचे गिरती हैं। वजन क्या है ? वजन उस शक्ति का नाम है जो अमुक वस्तु को पृथ्वी की ओर खिंचने से रोकने के लिए जमानी पड़ती है। दूसरे शब्दों में पदार्थ पर पड़ने वाले पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के दबाव को वजन कह सकते हैं।
यह दबाव सदा सर्वदा एक सा नहीं होता। परिस्थितियों के अनुसार वह घटता बढ़ता रहता है, अस्तु चीजों का वजन भी घट-बढ़ जाता है। एक पदार्थ खुली जगह में जितना भारी रहेगा उतना पानी में डुबोकर तोलने पर न रहेगा। क्योंकि उतना पानी आकर्षण शक्ति के प्रभाव को कम करता है अस्तु पदार्थ भी तोल में हलका होगा। आकर्षण शक्ति पृथ्वी की सतह पर पूरे जोर पर होती है और जितने ऊपर उठते जायं उतनी कम होती जाती है। जमीन पर वस्तु का जितना वजन होता है उतना बहुत ऊँचे पर्वत शिखर पर पहुँचने से नहीं रहता और ऊपर आकाश में उड़ें तो वजन और भी अधिक घटेगा।
हाँ इस तोल- नाप में एक बात ध्यान में रखनी होगी कि तराजू और बाँट इस प्रकार के बने हों कि उन पर पृथ्वी की आकर्षण शक्ति का दबाव न पड़े अन्यथा वजन ज्यों का त्यों ही बना रहेगा।
व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है और इस प्रकार के तत्वों से बना है कि अपने स्थान पर खड़ा रह सके। उसे कहीं गिरना न पड़े। गिरावट के कारण साँसारिक आकर्षण हैं। जिन्हें विभिन्न परिस्थितियों के अनुरूप विभिन्न नाम दिये गये हैं। जब यह आकर्षण इंद्रियों को प्रभावित करता है तब उसे वासना कहते हैं। मन को प्रभावित करता है तब उसी का नाम तृष्णा बन जाता है। जब उसका उद्गम धन होता है तो लोभ कहते हैं और जब व्यक्ति में खिंचाव आता है तो उसे मोह कहते हैं। वस्तुतः वे सभी आकर्षण एक ही स्तर के हैं। चीजें हमें अपनी ओर खींचती हैं। जितनी गति से हम उससे प्रभावित होते और खिंचते हैं, उसी का नाम गिरावट या पतन है। यह पतन कितना हो रहा है और उसे रोकने के लिए कितनी शक्ति लगानी पड़ेगी - इसे जुटा लिया जाय तो हमारा वजन नापा जा सकता है।
कौन आदमी कितना वजनदार है ? उसकी गुरुता एवं महानता कितनी है ? इसका पता लगाना हो तो उसकी तोल उस शक्ति के समतुल्य होगी जो उसे गिरने से रोकती है। जिसके पास निरोध का कोई साधन नहीं, जो आकर्षण शक्ति से नहीं जूझ सकता उसे पतित होना ही है। गिरने से रोकना हो तो तराजू के दूसरे पलड़े में उतने ही भारी बाँट रखने पड़ेंगे। जब दोनों ओर का वजन तुल जायेगा तो तराजू के एक पलड़े में रखा हुआ पदार्थ अधर में लटका रहेगा, फिर पृथ्वी की आकर्षण शक्ति उसे अपनी ओर नहीं खींच सकेगी। मनुष्य के पास यदि पतन को रोक सकने वाले मनोबल के बाँट हों तो वह तराजू के दूसरे पलड़े में बिना नीचे गिरे मजे में बैठा रहेगा और यथा स्थान लटकता रहेगा। मनुष्य कितना वजनदार है, कितना हलका, कितना महान, कितना तुच्छ है ? इसका उत्तर उसके पास अवाँछनीय आकर्षणों से अपने आपको रोक सकने वाले मनोबल की मात्रा देखकर ही दिया जा सकेगा। अन्य कोई साधन उसकी स्थिति जानने का है नहीं। बाँट न हों तो वजन कैसे तौला जाय ?
मनुष्य की ऊँचाई का अनुपात इसी आधार पर नापा जायगा कि उस पर भौतिक आकर्षण का दबाव कितना पड़ रहा है ? हवाई जहाज ऊपर उठते हैं। भीतर बैठे संचालक जब यह जानना चाहते हैं कि वे कितने ऊपर उठ आये तो इसका उत्तर उस यन्त्र द्वारा मिलता है जो यह नापता है कि यहाँ आने पर पृथ्वी की आकर्षण शक्ति का दबाव कितना घट गया। ऊँचाई इसी आधार पर नापी जाती है। हवाई जहाज की तरह मनुष्य की ऊँचाई नापने का भी तरीका यही है कि वह आकर्षणों में कितना ज्यादा लिप्त है। भव बन्धन उसे कितनी मजबूती से बाँधे हुए हैं। जिसके ऊपर इस पकड़ का असर जितना कम है उसे उसी अनुपात से ऊँचा उठा हुआ कह सकते हैं। उच्च पद या उच्च सम्मान मिलने का वास्तविक आधार यही है।
कारण स्पष्ट है। श्रेष्ठ चिन्तन और श्रेष्ठ कर्तव्य तभी संभव है जब मनःस्थिति स्वार्थ और संकीर्णता के वजन से कम लदी हो। स्वतंत्र चिन्तन का निर्वाह उसी स्थिति में सम्भव है और तभी कुछ ऐसा प्रयास सम्भव है जैसा कि जीवन मुक्त महामानवों से बन पड़ता है। ‘मुक्ति’ को जीवन लक्ष्य माना गया है। इसका तात्पर्य इतना ही है कि अमुक वस्तुओं तथा अमुक व्यक्तियों के साथ मनःस्थिति जकड़ी हुई नहीं है। उनकी पकड़ से ऊँची उठ गई और सुविस्तृत क्षेत्र को देख सकने में समर्थ हो गई। उन्मुक्त आकाश में विचरण करते हुए जहाज पर सवार होकर बहुत दूर तक देखा जा सकता है। वैसा करना एक बन्द मकान में बैठे रहने पर सम्भव नहीं था। बन्धन में जकड़ा वह पड़ा है जो सीमित क्षेत्र की बात सोचता है। अपने शरीर या परिवार भर के लिए सब कुछ चाहता है। मुक्त वह है, जिसने व्यापक दृष्टिकोण अपनाकर जीवनोद्देश्य की पूर्ति कर सकने वाले व्यापक उत्तरदायित्वों को संभालने के लिए व्यापक क्षेत्र में प्रवेश किया। ऐसे लोग विश्व नागरिक एवं मानव समाज के परिष्कृत घटक कहलाते हैं, वे वैयक्तिक स्वार्थपरता और संकीर्णता की परिधि को लाँघ कर लोक मंगल को अपना कार्यक्षेत्र मानते हैं और आत्मीयता का विस्तार करते हुए परमार्थ प्रयोजनों में संलग्न रहते हैं।
नीचे रहने पर भार बढ़ने और ऊँचे उठने पर उसका हलका होने की स्थिति को ऐसी तराजू से नापा जा सकता है, जो स्वयं दबाव मुक्त है। अपनी या दूसरों की बढ़ती-घटती गरिमा को केवल उस परिष्कृत विवेक बुद्धि से ही नापा जा सकता है जिसे ‘ऋतम्भरा’, ‘प्रज्ञा’ एवं ‘भूमा’ कहते हैं। विकृत बुद्धि तो पतन में उत्कर्ष, और उत्थान में अपकर्ष देखती है। विकृत चिन्तन के आधार पर बड़े आदमी वे हैं जिनने अपने लोभजन्य परिग्रह का अधिकाधिक भार अपने ऊपर लाद कर रख लिया है। इस दृष्टि से संयम शीलता और परमार्थ परायणता को मूर्खता ही ठहराया जा सकता है। तात्विक विश्लेषण के लिए यथार्थ चिन्तन कर सकने योग्य सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता है। सत्य को प्राप्त कर सकना इसके बिना संभव हो ही नहीं सकता। विकृत बुद्धि तो सत् को असत् आर असत् को सत् ही बताती रहेगी। उसके आधार पर यथार्थता का निर्णय हो ही नहीं सकेगा। तराजू का-विवेक बुद्धि का-भार मुक्त होना वस्तु स्थिति समझने के लिए नितान्त आवश्यक है।
वस्तुतः इस विशाल ब्रह्माण्ड में कोई दिशा हैं नहीं। हर वस्तु जहाँ हैं वहीं बनी रह सकती है। चन्द्रमा हमें ऊपर लगता है और चन्द्रमा पर जाने से प्रतीत होता है कि पृथ्वी ऊपर आसमान में उगी हुई है। यही बात अन्य ग्रह−नक्षत्रों के बारे में है। यदि हम उनमें से किसी पर जा पहुँचें तो देखेंगे कि अपना लोक नीचा है और पृथ्वी ऊपर आकाश में उसी तरह॰ जगमगा रही है जैसे कि हम किसी तारे को देखते हैं। आकर्षण शक्ति के खिचाव से खिंचने का नाम ही गिरना है गिरने की दिशा नीची मानी जाती है।
हम मंगल ग्रह की ओर उड़ें तो जब तक पृथ्वी की आकर्षण शक्ति से लड़ते हुए आगे चलेंगे, तब तक सोचेंगे कि ऊपर उठ रहे हैं। जब मंगल की आकर्षण शक्ति के क्षेत्र में प्रवेश करेंगे तो प्रतीत होगा कि गिरना आरम्भ हो गया। खिचाव का दबाव जितना बढ़ता जायगा उसी अनुपात में गिरने की गति बढ़ती जायगी। इस तथ्य पर विचार करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि पतन और कुछ नहीं-नीचता और कहीं नहीं- इसी आधार पर निर्भर है कि हम आकर्षणों से किस कदर प्रभावित होते हैं। इनसे मुक्त रह कर ही यह सम्भव है कि अपनी मूल स्थिति में बने रहा जाय, अपनी यथार्थ सत्ता में टिके रहा जाय। आकर्षणों के हम जितने समीप पहुँचते हैं उतनी ही तेजी से गिरावट की गति बढ़ जाती है। आत्मिक प्रगति के लिए इन आकर्षणों में अवरोध खड़ा करना पड़ता है जो हमें अधोगामी स्थिति में मजबूती से पकड़ने के लिए अपने बाहुपाश में जकड़ते हैं।
हर ग्रह नक्षत्र का अपनी-अपनी न्यूनाधिक आकर्षण शक्ति है, तदनुसार वहाँ का भार भी उसी अनुपात से घटता-बढ़ता है। पृथ्वी की तुलना में चन्द्रमा पर आकर्षण शक्ति बहुत कम है। इसलिए वहाँ पहुँचकर हम हलके हो जाते हैं। इसके विपरीत बृहस्पति या शनि में आकर्षण शक्ति बहुत अधिक है। वहाँ पहुँचने पर हम अपने ऊपर असह्य भार लदा हुआ अनुभव करेंगे। लोभ, मोह, वासना, तृष्णा और अहंता के पाँच ग्रहों की आकर्षण शक्ति का दबाव अत्यधिक है। इनके असह्य भार से छुटकारा पाकर ही ऊर्ध्वगामी प्रगतिशीलता की बात सीधी और क्रियान्वित की जा सकती है।
लोहा भारी कहा जाता है और रुई हलकी। इस हलके भारीपन का कारण यह है कि रुई के परमाणु हलके होते हैं और लोहे के भारी। हलके उन्हें कहते हैं, जिनके भीतर प्रोटोन इलेक्ट्रॉन की संख्या कम होती हैं। भारी का मतलब है उनकी संख्या अधिक होना। हाइड्रोजन अणु के भार से आक्सीजन अणु का भार 16 गुना होता है और यूरेनियम का 238 गुना। जिनने अपनी भौतिक महत्वाकाँक्षाएँ जितनी अधिक बढ़ा रखी हैं, उनका भार अधिक और आयतन कम होगा। इसके विपरीत तृष्णा की न्यूनता रहने पर स्थिति हलकी फुलकी रहेगी और रुई की तरह उनका व्यक्तित्व अधिक विकसित दृष्टिगोचर होगा। इस हलकेपन का एक कारण यह भी है कि उन वस्तुओं के परमाणु कितने अधिक सघन और कितने विरल हैं। जिनके सघन होंगे वे भारी कहलावेंगे और उनके बीच जितनी विरला रहेगी उसी स्तर पर उनका हलकापन अनुभव किया जायगा, जिसकी लिप्सा जितनी सघन है, वह उतना ही बोझिल होगा। जिनका मन उस दिशा में जितना उपराम अनुभव करेगा उसे अपनी आकुल-व्याकुलता से मन पर लदे भार से राहत मिलती चली जायगी।
पानी और भाप दोनों एक ही वस्तु हैं, पर उनके अणु यथावत् रहते हुए भी भाप की स्थिति बनने पर विरल हो जाते हैं। एक इंच घेरे का पानी भाप बनने पर 1660 इंच के घेरे में फैल जाता है। मोहाशक्ति से यही विरला मनुष्य के व्यक्तित्व को सुविस्तृत बनाती हैं। आदर्शवादी चिन्तन और कर्तृत्व तभी संभव होता है जब भीतरी लिप्सा का खिंचाव, दबाव और तनाव कम हो सके। महामानव को हम सुविकसित व्यक्तित्व की विभूतियों से युक्त देखते हैं यह उनके आन्तरिक परिष्कार विस्तार पर ही निर्भर होता है।
हाइड्रोजन के परमाणु सबसे हलके होते हैं, अस्तु वायुमण्डल के सबसे ऊँचे स्तर पर उन्हीं का साम्राज्य है। इतने पर भी जब वे दूसरे भारी तत्वों के साथ जकड़ जाते हैं तो उन्हें भी निचले परत पर पड़ा रहना पड़ता है। यह कुसंग का ही फल है कि परमात्मा के अमर पुत्र आत्मा को दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों के साथ बाँधकर अधोगामी, दीन-हीन परिस्थितियों में पड़ा रहना पड़ता है।
किसी गुब्बारे में हाइड्रोजन गैस भरदी जाय तो वह रबड़ या धातु का बना होने पर भी हवा में ऊपर उड़ता चला जायगा। विवेकशीलता की प्रखरता हाइड्रोजन गैस की तरह है जो विषम परिस्थितियों में घिरे हुए मनुष्य को भी महामानवों जैसा उच्चस्तरीय जीवन-यापन का अवसर दे सकती है, पानी पर कटोरी तैरती रहती है। समुद्र पर जहाज दौड़ते रहते हैं। कटोरी या जहाज भारी धातु के बने होने पर तैरते हैं। इसका कारण यह है कि पानी के भार की तुलना में उस धातु का तथा उसमें भरी हवा का मिला-जुला वजन पानी से हलका बैठता है। जब तक यह हलकापन बना रहेगा तब तक डूबने का प्रश्न न आवेगा, पर उनके पैंदे में छेद हो जाने या अन्य किसी कारण उनमें पानी भरने लगे तो फिर डूबना निश्चित है।
साँसारिक उत्तरदायित्वों से बोझिल होने पर भी यदि भीतर उत्कृष्ट चिन्तन की हवा भरी रहे तो हम डूबेंगें नहीं पर यदि भीतर ही हवा के स्थान पर लिप्सा पानी की तरह भरने लगी तो फिर डूबना निश्चित है। तैरना तभी तक संभव है जब तक पानी से हलके परमाणुओं वाली हवा जहाज में भरी रहे। हमारा चिन्तन स्वच्छ हो- और आदर्श स्पष्ट हो तो साँसारिक जीवनयापन करते हुए भी इस भव सागर से पार हमारा जीवन जहाज आसानी से तैरते हुए पूर्णता के नियत लक्ष्य तक सरलता पूर्वक पहुँच सकता है।
- जिसे अपनाकर अपनी सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों की देव सम्पदा को हर घड़ी प्रसन्न रहने के लिए पर्याप्त माना जा सकता है। स्वर्ग और नरक कोई क्षेत्र नहीं वरन् लोक है। लोक का अर्थ है दृष्टिकोण। निष्कृष्ट चिन्तन की प्रतिक्रिया नारकीय दुख दारिद्रय से भरी हुई होती है और उत्कृष्टता भरी विचारणाओं का प्रतिफल स्वर्ग जैसी सुख शान्ति प्रस्तुत करता रहता है। ईश्वर विश्वास की राह पर चलता हुआ मनुष्य स्वर्गीय वातावरण प्रस्तुत करता है, उसमें स्वयं रहते हुए आनन्द अनुभव करता है और समीपवर्ती क्षेत्र को उसी प्रकाश से दीप्तिवान बनाता है।
आस्तिकता का तीसरा प्रतिफल है - मुक्ति। मुक्ति का अर्थ है - अवाँछनीय भव बन्धनों से छूटना। अपनी दुष्प्रवृत्ति, मूढ़ मान्यताएं एवं विकृत आकाँक्षाएं ही वस्तुतः सर्वनाश करने वाली पिशाचिनी हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, छल, चिंता, भय, दैन्य जैसे मनोविकार ही व्यक्तित्व को गिराते, गलाते, जलाते हैं। आधि और व्याधि इन्हीं के आमन्त्रण पर आक्रमण करती हैं। आस्तिकता इन्हीं दुर्बलताओं से जूझने की प्रेरणा भरती हैं। सारा साधना शास्त्र इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों को उखाड़ने, खदेड़ने की पृष्ठभूमि विनिर्मित करने के लिए खड़ा किया गया है। इनसे छुटकारा पाने पर देवत्व द्रुतगति से उभरता है और अपनी स्वतन्त्र सत्ता का उल्लास भरा अनुभव होता है।
मनुष्य कितने ही दुराग्रहों, पूर्वाग्रहों, पक्षपातों, प्रचलनों, अनुकरणों से घिरा बँध कंटकाकीर्ण राह पर घिसटता रहता है। स्वतन्त्र चिन्तन की विवेक दृष्टि उसे कदाचित ही मिल पाती है। यदि वह मिली होती तो निश्चय ही औचित्य को प्रश्रय दिया गया होता और तथाकथित मित्र, परिचित क्या कहते हैं ? इसकी पूर्णतया उपेक्षा करके विवेक के प्रकाश में कदम बढ़ाने का साहस सँजोया होता। महामानव इसी सत्साहस के बल पर स्वयं धन्य बनें हैं और अपने युग को - क्षेत्र को धन्य बनाया है। जीवन-मुक्त पुरुष अवाँछनीय चिन्तन से मुक्त होते हैं और आत्मिक स्वतन्त्रता का आनन्द लेते हैं। स्पष्ट है कि ईश्वर भक्तों को संयमी, स्वार्थपरता से रहित, लोकोपयोगी ब्राह्मण और साधु स्तर का जीवन जीना पड़ता है। इसी में मनुष्य जीवन की सार्थकता है। ईश्वर विश्वास अपनाकर हम जीवन लक्ष्य प्राप्त करने की ओर अग्रसर होते हैं और उसे पाकर रहते हैं।
वह क्या प्रार्थना जो कष्ट की निवृत्ति और स्वार्थ की सिद्धि का उद्देश्य लेकर की जाय ? प्रार्थना तो वह है जो तन्मयता और आनन्द की अन्तः सम्पदा को अधिकाधिक बढ़ाते चलने के लिए की जाती है कष्ट निवृत्ति और स्वार्थ सिद्धि न होने पर प्रार्थना के बदले खोल उत्पन्न होनी है, इससे लगता है उसका आधार ही गलत था। सच्ची प्रार्थना तो हमारी अपूर्णता का घट क्रमशः भरती ही जाती है। कल की अपेक्षा आज अपना अन्तः पात्र अधिक भरा देखकर आनन्द के उपासक को सन्तोष ही होगा। सत् चित आनन्द भरी सत्ता के निकट पहुँचने की चेष्टा में-उपासना में निराशा और खीज कैसे हाथ लग सकती है आनन्द की दिशा में बढ़ाया गया हर कदम तो सुखद ही होना चाहिए। आधार को विकृत कर लेने पर जो भटकाव आता है खीज उसी का प्रतिफल है।
प्रार्थना हमें ऊँचा उठाती है और उनसे मिलाती है जो ऊँचे उठे हुए है। उपास्य ऐसा होना चाहिए जिसके समीप पहुँचने वाला रोना भूलकर मुस्काना सीखे और अपनी हँसी से समीपवर्ती सारे वातावरण को हँसा दे।
अतृप्ति और व्यथा तो हमारे इष्ट नहीं हैं, फिर उन्हें के आवाहन विसर्जन का अनुष्ठान क्यों किया जाय ? परम तत्व की ओर बढ़ते हुए हमारे प्रत्येक कदम सत्य के, शिव के, सुन्द के अधिकाधिक निकट पहुँचते जायेंगे। तन्मयता और आनन्द अपने आप में वरदान है। अतृप्ति का चिन्तन इन दोनों अनुदानों की सहज प्राप्ति में अवरोध ही उत्पन्न करता है। यदि प्रार्थना ही करनी है तो क्यों न आनन्द को-उल्लास को अपनायें और उसी के साथ एकाग्र तन्मयता के सूत्र बाँधे।
प्रार्थना याचना नहीं हो सकती, उसमें समर्पण ही समर्पण भरा रहता है। लोगों ने पाने का लाभ देखा है, पर देने का आनन्द नहीं समझा। प्रभु को अपना आपा सौंपकर हमें सर्वोपरि दान का जो गौरव प्राप्त होता है उसकी तुलना उसी लाभ या सन्तोष के साथ नहीं हो सकती।
अपनी आकाँक्षा हटने लगे और प्रभु की इच्छा उस स्थान को ग्रहण करने लगे तो समझना चाहिए कि उसी अनुपात से प्रार्थना सफल हो रही है। प्रभु के दर्शन उसी रूप में होते हैं। कि वे अन्तःकरण की कुरूपता समेट लेते हैं। और उस स्थान पर अपना सौंदर्य सँजो देते हैं। इसे और भी अधिक स्पष्ट समझना हो तो कष्ट निवृत्ति और स्वार्थ सिद्धि जैसे मनोरथों के स्थान पर उन उत्कृष्ट आदर्शों की स्थापना होती है जो तन्मयता और आनन्द के रूप में अनवरत रूप से अपना सौरभ बखेरते रहते हैं। प्रभु को समर्पण करने का अर्थ है अहं का-उसके कामना परि-कर का समापन। प्रभु की इच्छाएँ अपनी मानकर अपनाने वाला और अनुसरण करने वाला देखता है कि परम तत्व स्वयं चलकर उसके समीप आ रहा है, उसकी यात्रा परिधि पूरी हो गई।
किन शब्दों में प्रार्थना करें ? कहाँ बैठकर पुकारने से उसकी सुनवाई होती हैं ? इष्ट का दर्शन कहाँ पहुँचकर हो सकता है ? जैसे प्रश्नों के उत्तर किसी विधान या स्थान को तलाश करने से न मिल सकेंगे। वाणी उस तक नहीं पहुँचती। उपचार के पदार्थ भी इधर-उधर ही बिखर जाते हैं। स्थानों में प्रकृतिगत विशेषता हो सकती है, पर कहीं भी आत्मा का समाधान कर सकने वाला प्रकाश नहीं मिल सकता। आंखें जिसे देख ही नहीं सकतीं, उसका दर्शन किस रूप में किस जगह हो सकता है ?
परमतत्व के सामीप्य के लिए सबसे निकटवर्ती। स्थान अपना अन्तःकरण ही है। वही अन्तःकरण की पुकार से निकलने वाले मन्त्रों की शक्ति ही काम करती है। आवश्यक नहीं कि शास्त्रों द्वारा सिखाये और गुरुओं द्वारा बताये गये हों। आत्मा जब परमात्मा के निकट पहुँचती है तो भाषा की परिधि टूट जाती है और मिलन की अनुभूति अपने आप ही श्रुति शृंखला की तरह निनादित होने लगती है। अपने अन्तः करण से बढ़ कर साक्षात्कार का और कोई उपयुक्त स्थान नहीं। सही प्रार्थना वह है जो कामनाओं को भावना में बदल दे। पाने की अपेक्षा देने की आतुरता जब मचलने लगे तो समझना चाहिए उपास्य का अनुग्रह मूर्तिमान हो चला।
संसार की शोभा, सुषमा, सरसता में पानी का योगदान है। पानी न रहे तो वनस्पतियाँ सूख जायं और प्यासे प्राणी जीवित न रह सकें। ठीक यही बात शरीर संसार की है, उसकी सारी गतिविधियाँ उस जीवन उस पर निर्भर हैं, जिसे हम रक्त के नाम से जानते हैं। मोटे तौर पर यह लाल रंग का पानी है जो नस नाड़ियों में ऐसे ही मन मौजी घुमक्कड़ की तरह घूमता फिरता रहा है। यदि बारीकी से देखा जाय तो किसी देश या नगर की जल व्यवस्था की तरह रक्तसंचार प्रक्रिया भी अनेकानेक गुत्थियों को सुलझाती हुई व्यवधानों का निराकरण करती हुई ही गतिशील हो रही हैं। उसकी गतिविधियाँ देखकर आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है।
सारे शरीर में रक्त की एक परिक्रमा प्रायः डेढ़ मिनट में पूरी हो जाती है। हृदय और फेफड़े के बीच की दूरी पार करने में उसे मात्र 6 सेकेंड लगते हैं, जब कि उसे मस्तिष्क तक रक्त पहुँचने में 8 सेकेंड लग जाते हैं। रक्त प्रवाह रुक जाने पर हृदय भी 5 मिनट जी लेता है, पर मस्तिष्क तीन मिनट में ही बुझ जाता है। हृदय फेल होने की मृत्युओं में प्रधान कारण धमनियों से रक्त की सप्लाई रुक जाना ही होता है। औसत दर्जे के मनुष्य शरीर में पाँच से छः लीटर तक खून रहता है। इसमें 5 लीटर तो निरन्तर गतिशील रहता है। और एक लीटर आपत्ति कालीन आवश्यकता के लिए सुरक्षित रहता है। 24 घण्टे में हृदय 13 हजार लीटर खून का आयात निर्यात करना पड़ता है। 10 वर्ष में इतना खून फेंका समेटा जाता है जिसे यदि एक बारगी इकट्ठा कर लिया जाय तो उसे 400 फुट घेरे की 80 मंजिली टंकी में ही भरा जा सकेगा। इतना श्रम यदि एक बार ही करना पड़े तो उसमें इतनी शक्ति लगानी पड़ेगी जितनी कि दस टन बोझ जमीन से 50 हजार फुट उठा ले जाने में लगानी पड़ेगी। शरीर में जो तापमान रहता है, उसका कारण रक्त प्रवाह के कारण उत्पन्न होने वाली ऊष्मा ही है।
अपने चार वर्ण और चार आश्रमों की तरह रक्त के भी चार वर्ण हैं। भगवान मनु ने मनुष्य जीवन की क्रम व्यवस्था इन चार भागों में की थी। लेण्ड स्टीनर ने रक्त की चार श्रेणियों का रहस्योद्घाटन किया था। सब मनुष्यों का रक्त एक जैसा नहीं होता, इनके बीच कुछ रासायनिक भिन्नता रहती है। इसकी को ध्यान में रखते हुए उसे (1) ए॰ (2) बी॰ (3) ए॰ बी॰ (4) ओ॰ इन चार नामों से वर्गीकरण किया है। किसी की नसों में किसी का रक्त चढ़ाने से पहले यह विधि वर्ग मिला लिया जाता है अन्यथा भिन्न रक्त चढ़ा देने से रोगी भयंकर विपत्ति में फँस जायगा और मृत्यु संकट सामने आ खड़ा होगा।
हमारा रक्त लाल रंग का एक गाढ़ा तरल पदार्थ है जो हवा लगने पर जम जाता है उसे दो भागों में विभक्त कर सकते हैं। (1) तरल पदार्थ-प्लाज्मा (2) ठोस कण-सारतत्व। प्लाज्मा रक्त में 55 प्रतिशत होता है, इसे भूरे, पीले रंग के पानी जैसी शकल में देखा जा सकता है। उसमें नमक, ग्लूकोज, प्रोटीन आदि घुले रहते हैं। कुछ ठोस पदार्थ उसमें घुल नहीं पाते और तैरते रहते हैं। इन ठोस कणों को तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं (1) एरिथ्रोसाइट खून के लाल कण (2) ज्यूकोसाइट-खून के सफेद कण (3) प्लेट-लेट-खून की पपड़ियाँ।
लाल कण शरीर के प्रत्येक अंश,-तंतु और कोप को आहार एवं आक्सीजन पहुँचाते हैं। मूल रूप निकली कार्बनडाइ आक्साइड गैस को ढोकर फेफड़ों तक ले जाते हैं, ताकि वहाँ से साँस द्वारा उसे बाहर निकाला जा सके।
सफेद कण वस्तुतः कोषाणु हैं। उनकी संख्या कम ही होती हैं। 650 लाल कणों के पीछे एक। इन्हें शत्रु रोगाणुओं से लड़ने वाले सैनिक कहा जा सकता है। शरीर के किसी भाग में यदि रोग कीट हमला करदें तो यह श्वेत कण उनसे लड़ने को तत्काल जा पहुँचते हैं। आवश्यकता के समय अपनी जाति वृद्धि कर लेने की उनमें अद्भुत क्षमता है।
रोगों के कीटाणु हवा, पानी, आहार, छूत या चोट आदि के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। वे इतने भयंकर होते हैं कि देखते-देखते सारे शरीर पर कब्जा कर सकते हैं और किसी को भी रोग ग्रस्त करके मौत के मुँह में धकेल सकते हैं। ईश्वर को लाख धन्यवाद है कि इस रोग कीटाणुओं से भरे शत्रुओं के चक्रव्यूह में आत्मरक्षा करने के लिए हमें श्वेत कणों की सुदृढ़ सेना दी है। यदि यह न मिली होती तो पग-पग पर मृत्यु संकट सामने खड़ा रहता।
श्वेत कोषाणु रोग कीटाणुओं से अधिक प्रबल होते हैं और वे शत्रुओं को मार-काट कर धराशायी करने में प्रायः सफल ही रहते हैं। इस युद्ध में उनमें से भी बहुतों को शहीद होना पड़ता है। मृत श्वेत कणों के ढेर को सफेद पीव के रूप में देखा जा सकता है।, वह चमड़ी तोड़कर बाहर निकलता है। अपनी विशेषताओं के आधार पर उन श्वेत कणों की भी कई जातियाँ हैं यथा-न्यूट्रोफिल, ईओसिनोफिल, वेसोफिल, लिम्फोसाइट, मोनोसाइट आदि। इनकी आवश्यकता से अधिक बढ़ जाना या घट जाना भी चिन्ता का विषय है इनकी असाधारण वृद्धि ‘ल्यूकोसाइटोसिस’ और कभी ‘ल्यूकोपेनिया’ कहलाती हैं।
साधारणतया प्रति घन मिली मीटर रक्त में 5 से 10 हजार तक श्वेत कण होते हैं। पर कभी-कभी यह संख्या बढ़ कर ढाई लाख तक जा पहुँचती है तब यह वृद्धि आत्मघाती सिद्धि होती है। कैंसर की संभावना बढ़ जाती है।
रक्त रस-प्लाज्मा में 90 प्रतिशत जल और 10 प्रतिशत में चर्बी, हारमोन, नाइट्रोजन, आक्सीजन, कार्बनडाइ आक्साइड आदि पदार्थ मिले होते हैं। इस हल्के पीले रंग के तरल पदार्थ में लाल और श्वेत रक्त कणिकाएँ तथा विम्बाणु तैरा करते हैं। लाल रक्त कण इतने छोटे होते हैं। कि वे 3000 की संख्या में सीधे एक लाइन में रख दिये जायँ तो एक इंच से भी कम लम्बाई होगी। युवा मनुष्य के शरीर में 25,000,000,000,000 लाल रक्त कण होते हैं वे चार महीने जीवित रहकर मर जाते हैं और उनका स्थान लेने के लिए नये पैदा हो जाते हैं।
रक्त की चाल धमनियों में प्रति घण्टा 65 कि0 मी0 की है। रक्त कणिकाएँ लौह ओर आक्सीजन से मिलकर बने पदार्थ होमोग्लोबिन अपने साथ प्रोटीन, प्राण वायु आदि अपने पोषक पदार्थ अपने ऊपर लाद कर चलता है और उस खुराक को शरीर के कण-कण तक पहुँचाता है। उसे दुहरा काम करना पड़ता है। इधर से उपयोगी पदार्थों का पहुँचाना, उधर से कार्बनडाइ आक्साइड तथा दूसरी हानिकारक गन्दगियों को समेट कर फेफड़े द्वारा बाहर निकाल दिये जाने के लिए उन तक पहुँचाना यह दुहरी ढुलाई उसे करनी पड़ती है। अपने काम को रक्त द्रुत गति से करता है। पोषण पहुँचाने तथा गन्दगी साफ करने के रसोई महाराज और सफाई जमादार की दुहरी ड्यूटी देने में उसे कोई आपत्ति नहीं होती।
लाल रक्त कणिकाएँ प्रायः 4 महीने में लगभग 1500 चक्कर सारे शरीर के लगा देने के बाद बूढ़ी होकर मर जाती हैं। तिल्ली के जिम्मे उनका अंत्येष्टि संस्कार करना और लाश को तोड़-फोड़ कर मलद्वारों से बाहर निकालने की व्यवस्था उसी को जुटानी पड़ती है। हमारा छोटा सा शरीर वस्तुतः बहुत बड़ा है। एक पूरी पृथ्वी के बराबर जीवधारी उसमें रहते हैं। इसलिए उसके व्यवस्था कर्मचारियों की संख्या भी लगभग उसी अनुपात से रहती है। इन 2500 करोड़ लाल रक्त कणों को यदि एक सीधी पंक्ति में सटाकर बिठा दिया जाय तो इतना छोटा आकार रहते हुए भी वे इतनी बड़ी लाइन में होंगे जो समस्त पृथ्वी की चार बार परिक्रमा कर सकें।
ऊपर कहा जा चुका है कि रक्त में तीन जाति के कण रहते हैं। लाल रक्त कणों की चर्चा हो चुकी है। अब शेष कर्मचारियों में 1 करोड़ 20 लाख श्वेत रक्ताणु और 50 लाख लाल रक्त विम्बाणु और रहते हैं। एक बूँद खून में प्रायः 11 हजार श्वेत कण होते हैं। इन का मुख्य कार्य शरीर में बाहर से प्रवेश करने वाले अथवा भीतर से ही पैदा होने वाले रोग कीटाणुओं से लड़कर उन्हें परास्त करना और उनके मृत शरीरों को देह से बाहर निकाल देना होता है। बीमारियाँ तभी प्रकट होती हैं जब ये श्वेत कण रोगाणुओं से हारते हैं। अन्यथा हमें पता भी नहीं चलता है और रोग निवारण का अधिकाँश कार्य इन श्वेत कणों द्वारा भीतर ही भीतर निपटा दिया जाता है। बाहरी रक्त शरीर में प्रवेश कराया जाय या किसी दूसरे व्यक्ति का कोई अंग किसी की देह में आरोपित कराया जाये तो यह श्वेत कणिकाएं ‘बाहरी पदार्थ के विरुद्ध विद्रोह खड़ा कर देती हैं और लेने के देने पड़ जाते हैं। यही कारण है कि डाक्टर लोग किसी रोगी को वही रक्त चढ़ाते हैं जो उसके अपने रक्त का सजातीय हो। अंगों का आरोपण करते समय इन श्वेत कणों को मूर्छित करने की औषधियाँ देकर चुप कर दिया जाता है।
तीसरे किस्म के रक्त विम्बाणु कभी चोट आदि लगने पर बाहर बहते हुए रक्त को जमाने की भूमिका सम्पादित करते हैं। यह न हो तो आघात लगने पर रक्त बाहर बहता ही रहे और उसके न रुकने पर मृत्यु हो जाय। एक बूँद खून में इनकी संख्या 3 लाख के करीब होती है और प्रायः 10 घण्टे ही जीवित रहते हैं।
यदि रक्त में लाल कण कम पड़ जायें या होमोग्लोबिन की मात्रा घट जाये तो ‘एनीमिया’ रोग हो जाता है, शरीर थका-थका सा रहता है और सिर चकराता है।
रक्त के अभाव में हृदय तो पाँच मिनट भी अपना काम चला लेता है, पर मस्तिष्क तीन मिनट में ही निर्जीव हो जाता है।
बांई पसलियों में 9 वीं 10 वीं और 11 वीं के नीचे आमाशय के पीछे तिल्ली का स्थान है यह लाल बैंगनी रंग की है। इसमें रक्त एकत्रित रहता है। उसकी 12 सेन्टीमीटर लम्बाई तथा 7 सेन्टीमीटर चौड़ाई होती है। वजन 150 से 200 ग्राम तक। इसमें रक्त को एकत्रित करने और निकालने की विशिष्ट क्षमता है।
पुराने जर्जर लाल रक्त कण अक्सर इसी में समाधिस्थ होते रहते हैं। गर्भावस्था में उसे रक्त बनाने के एक विशेष कारखाने का काम करना पड़ता है। किसी दुर्घटना के समय रक्त अधिक निकल जाये अथवा मज्जा में कोई दोष उत्पन्न हो जाये तो तिल्ली को उस आपत्ति काल में विशेष कार्य करना पड़ता है और उस क्षति की पूर्ति वहीं से हो जाती है।
बाहरी रोग कीटाणुओं के आक्रमण से शरीर की रक्षा करना तिल्ली का मुख्य कार्य है। तपैदिक, टाइफ़ाइड, सिफलिस, कालाजार, मलेरिया आदि रोगों के विषाणुओं से लड़ने वाली फौज विशेषतया तिल्ली में ही तैयार होती है तब उसका वजन भी बढ़ जाता है। रक्त कैंसर - ल्यूकीमिया - में तो तिल्ली 20 गुना तक बढ़ जाती है और एक प्रकार से सारे पेट पर ही कब्जा कर लेती है।
रक्त संचार की दुनिया कितनी महत्वपूर्ण और कितनी सुव्यवस्थित है, फिर भी हम उसे देख समझ नहीं पाते और न रक्त शुद्धि के उपयुक्त रीति-नीति अपना कर परिपुष्ट सुविकसित दीर्घजीवन जी पाते हैं। अकेली रक्त सम्पदा के सम्बन्ध में ही क्या जीवन वैभव के साथ जुड़ी हुई अगणित विकृतियों के सम्बन्ध में हमारी अज्ञानता और उपेक्षा अत्यधिक गहरी है, इसी आत्म विस्मृति ने तो हमें हर क्षेत्र में दीन दयनीय बना रखा है।
गति प्रकृति का अनिवार्य नियम है। इसी के आधार पर यह सारा संसार अपनी हलचलें जारी रख रहा है। पदार्थ की मूल इकाई द्रुतगति से दौड़ लगा रही है। पर वह क्रमबद्ध, व्यवस्थित और मर्यादित है। सूर्य परिवार जिसमें अपनी पृथ्वी भी सम्मिलित है किसी ध्रुव की ओर बढ़ रहा है। अणु से लेकर ब्रह्माण्ड तक पदार्थ की प्रत्येक इकाई सक्रिय है। जीवन न होते हुए भी क्रियाशीलता की दृष्टि से हर पदार्थ जीवित है। उसकी सुन्दरता, सामर्थ्य, उपयोगिता इसी कारण है। यदि हलचलें समाप्त हो जायें तो वस्तुएं इतनी भारी हो जायेंगी कि फिर एक तिनका उठाने के लिए भी आज की बड़ी क्रेनें अपर्याप्त सिद्ध होंगी।
जीवन गतिशील है। भ्रूण कक्ष में प्रवेश करने से लेकर मरण पर्यन्त प्राणी निरन्तर बढ़ता है। शारीरिक दृष्टि से भी और मानसिक दृष्टि से भी। आरम्भ में काया छोटी होती है फिर वह क्रमशः बढ़ती है। किशोरावस्था, यौवन, अधेड़, वृद्धता का विकासक्रम एक दिन वहाँ जा पहुँचता है जहाँ पुराना शरीर जीर्ण वस्त्र की तरह उतार फेंकना पड़ता है और नया धारण करने के लिए नया शिशु शरीर ग्रहण करना पड़ता है। मन का भी यह क्रम है। बच्चे की अपेक्षा किशोर का - किशोर की अपेक्षा तरुण का और तरुण जी अपेक्षा वृद्ध का मन कितनी केंचुल बदल चुका होता है। बच्चों की रुचि, आकाँक्षा और प्रसन्नता का तरुण के साथ कोई तालमेल नहीं।
वनस्पति वर्ग से लेकर प्राणी वर्ग तक सर्वत्र अपने अपने ढंग की हलचलें हो रही हैं। इस संदर्भ में जड़ और चेतन दोनों ही अपनी- अपनी पटरी पर अपनी अपनी गति से दौड़ रहे हैं। सभी के चरण प्रगति की दिशा में बढ़ रहे हैं। बादलों से लेकर नदियों तक सब का प्रवाह क्रम चल रहा है। जहाँ कहीं गति में अवरोध उत्पन्न होगा वहीं सड़न उत्पन्न होगी। तालाबों का पानी सड़ता है, पर झरने की पतली सी धारा भी अपनी स्वच्छता बनाये रहती है। शरीर के अवयव जिस क्षण अपनी गतिशीलता पर विराम लगाते हैं, उसी क्षण मरण सामने आ खड़ा होता है।
प्रगति के नियम को समझें, प्रकृति के सन्देश को सुनें और चलते हुए पवन से सीखें कि गतिशीलता की नीति अपनाये बिना किसी का गुजारा नहीं। जड़ता न अपनायें। पुरातन को जकड़ कर न बैठें। भूत अपने लिए अनेकों निष्कर्ष छोड़कर गया है उसके अनुभव भरे पृष्ठों से लाभ उठायें, पर दृष्टि भविष्य पर रखें। मुड़कर देखने से अनुभवों की संपदा तो बढ़ाई जा सकती है, पर उलटे पैरों दूर तक नहीं चला जा सकता है। आँखें आगे की ओर लगाई गई हैं, वे आगे ही देख सकती हैं। पंजों की बनावट आगे की ओर चल सकने योग्य है। यह संरचना बताती है कि जीवन की सार्थकता आगे की ओर देखने और आगे की ओर चलने में ही है। पिछली बातों को सोचते रहने और जो बीत चुका उसका भला - बुरा विश्लेषण करते रहने में ही समय गुजारना व्यर्थ है। जो चला गया वह अब कभी भी लौटकर आने वाला नहीं है। वास्ता तो भविष्य से पड़ना है इसलिए उसी के बारे में सोचें उसी की तैयारी करें यही बुद्धिमत्तापूर्ण है।
हर दिन, नई समस्याएं लेकर उदय होता है और वे समस्याएं नित नये समाधान माँगती हैं। खुला मस्तिष्क रखकर ही वे समाधान ढूंढ़े जा सकते हैं। आज की परिस्थिति आज है और वह आज के अनुरूप हल चाहती है। प्रस्तुत परिस्थितियों को ध्यान में रखकर हम भूतकालीन घटनाक्रमों के सहारे समाधान खोजेंगे तो भटक जायेंगे। बचपन की अनुभवों से युवावस्था में क्या काम चलेगा ? गतिशील जीवन-क्रम, चिन्तन के क्रम और क्रिया-कलापों में बदली हुई परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तन चाहता है। सामयिक परिवर्तनों को ध्यान में रखते हुए चिन्तन में प्रगतिशीलता का समावेश किया ही जाना चाहिए।
ईश्वर विश्वास की इसलिए आवश्यकता है कि उसके सहारे हम जीवन का स्वरूप, लक्ष्य एवं उपयोग समझने में समर्थ होते हैं। यदि ईश्वरीय विधान को अमान्य ठहरा दिया जाय तो फिर मत्स्यन्याय का ही बोलबाला रहेगा। आंतरिक नियन्त्रण के अभाव में बाह्य नियन्त्रण मनुष्य जैसे चतुर प्राणी के लिए कुछ बहुत अधिक कारगर सिद्ध नहीं हो सकता। नियंत्रण के अभाव में सब कुछ निश्चित और अविश्वस्त बन जायेगा। ऐसी दशा में, हमें आदिमकाल में, वन्य स्थिति में वापिस लौटना पड़ेगा और शरीर निर्वाह करते रहने के लिए पेट, प्रजनन एवं सुरक्षा जैसे पशु प्रयत्नों तक सीमित रहना पड़ेगा। ईश्वर विश्वास ने आत्म-नियन्त्रण का पथ-प्रशस्त किया है और उसी आधार पर मानवी सभ्यता का, आचार संहिता का, स्नेह, सहयोग एवं विकास परिष्कार का पथ प्रशस्त किया है। यदि मान्यता क्षेत्र से ईश्वरीय सत्ता को हटा दिया जाये तो फिर संयम और उदारता जैसी मानवी विशेषताओं को बनाये रहने का कोई दार्शनिक आधार शेष न रह जायगा। तब चिन्तन क्षेत्र में जो उच्छृंखलता प्रवेश करेंगी उसके दुष्परिणाम वैसे ही प्रस्तुत होंगे जैसे कि पुराणकाल की कथा गाथाओं में असुरों के नृशंस क्रिया-कलाप का वर्णन पढ़ने-सुनने को मिलता है।
ईश्वर अन्ध-विश्वास नहीं एक तथ्य है। विश्व की व्यवस्था सुनियन्त्रित है, सूर्य, चन्द्र, ग्रह नक्षत्र आदि सभी का उदय- अस्त क्रम अपने ढर्रे पर ठीक तरह चल रहा है, प्रत्येक प्राणी अपने ही जैसी सन्तान उत्पन्न करता है और हर बीज अपनी ही जाति के पौधे उत्पन्न करता है। अणु-परमाणुओं से लेकर समुद्र, पर्वतों तक की उत्पादन वृद्धि एवं मरण का क्रिया- कलाप अपने ढंग से ठीक प्रकार चल रहा है। शरीर और मस्तिष्क की संरचना और कार्यशैली देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। इतनी सुव्यवस्थित कार्यपद्धति बिना किसी चेतना शक्ति के अनायास ही नहीं चल सकती। उस नियन्ता को अस्तित्व जड़ और चेतन के दोनों क्षेत्रों में प्रत्यक्ष और परोक्ष की दोनों कसौटियों पर पूर्णतया खरा सिद्ध होता है। वह समय चला गया जब अधकचरे विज्ञान के नाम पर संसार क्रम को स्वसंचालित और प्राणी को चलता-फिरता पौधा मात्र ठहराया गया था। अब पदार्थ विज्ञान और चेतन विज्ञान में इतनी प्रौढ़ता आ गई है कि वे नियामक चेतना शक्ति के अस्तित्व को बिना किसी आना-कानी के स्वीकार कर सके।
कर्मफल की व्यवस्था भी उसी नियन्त्रण के अंतर्गत आती है। समाज और शासन द्वारा दण्ड, पुरस्कार की व्यवस्था है। ईश्वरीय न्याय में भी सत्कर्मों और दुष्कर्मों के लिए समुचित दण्ड और पुरस्कार का विधान है। देर तो मुकदमा फैसला होने में भी लगती है और बीज बोने के बाद फसल काटने में भी। इस व्यवस्था को स्थूल बुद्धि समझ नहीं पाती। सत्कर्मों का फल तत्काल न मिलने पर लोग अधीर होने लगते हैं और दुष्कर्मों का तात्कालिक लाभ देखकर उनके लिए आतुरता प्रकट करते हैं। इन भूलभुलैयों में भटका व्यक्ति अपना और समाज का भविष्य अन्धकारमय बनाता है और वर्तमान को अवाँछनीयताओं से भर देता है। इस गड़बड़ी की रोकथाम में ईश्वर विश्वास से भारी सहायता मिलती है और व्यक्तिगत चरित्र-निष्ठा एवं समाजगत सुव्यवस्था का आधार सुदृढ़ बना रहता है। इन्हीं सब दूरगामी परिणामों को देखते हुए तत्वज्ञानियों ने ईश्वर विश्वास को दृढ़तापूर्वक अपनाये रहने के लिए जन-साधारण को विशेष रूप से प्रेरणा दी है। वह आधार दुर्बल न होने पाये, हर रोज स्मृतिपटल पर जमा रहे इसलिए साधना, उपासना के धर्मकृत्यों का सुविस्तृत विधि-विधान विनिर्मित किया है। इन्हें अपनाकर मनुष्य दिव्यसत्ता को अपने भीतर-बाहर विद्यमान देखता है और कुमार्ग से विरत रहकर सुमार्ग पर चलने का अधिक उत्साह के साथ प्रयत्न करता है। ईश्वर विश्वास के फलस्वरूप पशु प्रवृत्तियों के नियन्त्रण में भारी सहायता मिलती है और व्यक्ति तथा समाज का स्तर सन्तुलित बनाये रहने का प्रयोजन बहुत अंशों तक पूरा होता है। नास्तिकता अपनाकर विश्व-शान्ति का मानवी उत्कृष्टता का आधार ही डगमगाने लगेगा, इसलिए तत्वदर्शियों ने आध्यात्मिक अनास्था की - नास्तिकता की कठोर शब्दों में भर्त्सना की है।
जीवन दर्शन को ईश्वर से उच्चस्तरीय प्रेरणा मिलती है। संसार के सभी प्राणी ईश्वर के पुत्र हैं। कोई न्यायप्रिय, निष्पक्ष पिता अपनी सभी सन्तानों को लगभग समान स्नेह और समान अनुदान देने का प्रयत्न करता है। ईश्वर ने अन्य प्राणियों को मात्र शरीर निर्वाह जितनी बुद्धि और सुविधा दी तथा मनुष्य को बोलने, सोचने, पढ़ने, कमाने, बनाने आदि की अनेकों विभूतियाँ दी हैं। अन्य प्राणियों की और मनुष्यों की स्थिति की तुलना करने पर जमीन आसमान जैसा अन्तर दिखाई पड़ता है। इसमें पक्षपात और अनीति का आक्षेप ईश्वर पर लगता है। जब सामान्य प्राणी अपनी सन्तान को समान स्नेह, सहयोग देते हैं तो फिर ईश्वर ने इतना अन्तर किसलिए रखा ? एक को इतना ऊँचा और दूसरों को इतना नीचा कैसे रखा ? इस विभेद को समझने में प्रत्येक विवेक सम्पन्न व्यक्ति को भारी उलझन का सामना करना पड़ता है।
तत्वदर्शी विवेक बुद्धि इस विभेद के अन्तर का कारण भली प्रकार स्पष्ट कर देती है। मनुष्य को अपने वरिष्ठ सहकारी जेष्ठ पुत्र के रूप में सृजा गया है। उसके कन्धों पर सृष्टि को अधिक सुन्दर, समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने का उत्तरदायित्व सौंपा गया है। इसके लिए उसे विशिष्ठ साधन उसी विशिष्ठ प्रयोजन के लिए अमानत के रूप में दिये गये हैं। मिनिस्टरों को सामान्य कर्मचारियों की तुलना में सरकार अधिक सुविधा साधन इसलिए देती है कि उनकी सहायता से वे अपने विशिष्ठ उत्तरदायित्वों का निर्वाह सुविधापूर्वक कर सकें। यह सुविधाएं उनके व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं वरन् जनसेवा के लिए दी जाती हैं। बैंक के खजांची के हाथ में बहुत सा पैसा रहता है यह उसके निजी उपभोग के लिए बैंक प्रयोजन के लिए अमानत रूप में रहता है। निजी प्रयोजन के लिए तो क्या मिनिस्टर, क्या खजांची सभी को सीमित सुविधा मिलती है। अत्यधिक साधन जो उनके हाथ में रहते हैं उन्हें वे निर्दिष्ट कार्यों में ही खर्च कर सकते हैं। निजी कार्यों में उपभोग करने लगें तो यह दण्डनीय अपराध होगा।
ठीक इसी प्रकार मनुष्य के पास सामान्य प्राणियों को उपलब्ध शरीर निर्वाह भर के साधनों से अतिरिक्त जो कुछ भी श्रम, समय, वैभव, धन, प्रभाव, प्रतिभा आदि की विभूतियाँ हैं, वह सभी लोकोपयोगी प्रयोजनों के लिए मिली हुई सार्वजनिक सम्पत्ति है। शरीर रक्षा एवं पारिवारिक उत्तरदायित्वों के लिए औसत नागरिक स्तर का निर्वाह कर लेने के अतिरिक्त मनुष्य के पास जो कुछ बचता है उसकी एक-एक बूँद उसे लोक कल्याण के लिए नियोजित करनी चाहिए। इसी में ईश्वरीय अनुदान और मानवी गरिमा की सार्थकता है। प्रत्येक आस्तिक को सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन की गरिमा, उपयोगिता और जिम्मेदारी समझनी चाहिए तथा उसी के अनुरूप अपने चिन्तन तथा कर्तव्य का निर्धारण करना चाहिए। अपनी विशेषताओं का उपयोग इसी महान प्रयोजन के लिए करना चाहिए।
जीवन दर्शन की यह उत्कृष्ट प्रेरणा ईश्वर विश्वास के आधार पर ही मिलती है। जीवन क्या है, क्यों है, उसका लक्ष्य एवं उपयोग क्या है ? इन प्रश्नों का समाधान मात्र आस्तिकता के साथ जुड़ी हुई दिव्य दूरदर्शिता के आधार पर ही मिलता है। इसी प्रेरणा से प्रेरित मनुष्य संकीर्ण स्वार्थपरता से - वासना, तृष्णा के भव-बन्धनों से छुटकारा पाकर आत्म-निर्माण की ओर - आत्मविस्तार की ओर - आत्मविकास की ओर अग्रसर होता है और ऐतिहासिक महामानवों जैसी देव भूमिका अपनाने के लिए अग्रसर होता है। व्यक्ति और समाज के कल्याण के महान आधार खड़े करने वाली यह एक बहुत बड़ी दार्शनिक उपलब्धि है। यदि आस्तिकता के सही स्वरूप समझा जा सके और जीवन दर्शन के साथ उसे ठीक प्रकार जोड़ा जा सके तो निश्चय ही मनुष्य में देवत्व का उदय और इसी धरती पर स्वर्ग का अवतरण सम्भव हो सकता है। यही तो ईश्वर द्वारा मनुष्य सृजन का एकमात्र उद्देश्य है।
सृष्टि के सभी प्राणी एक पिता के पुत्र होने के नाते सहोदर भाई हैं और वे परस्पर एक दूसरे का स्नेह, सहयोग पाने के अधिकारी हैं। आस्तिकता यही मान्यता अपनाने के लिए प्रत्येक विचारशील को प्रेरणा देती है। इसका अनुसरण करके प्राणीमात्र के बीच आत्मीयता की भावना विकसित हो सकती है और उसके आधार पर एक दूसरे के दुख दर्द को अपना समझने एवं उदार व्यवहार करने की आकांक्षा प्रबल हो सकती है। विश्व कल्याण की दृष्टि से इस प्रकार की भावनात्मक स्थापनाएं अतीव श्रेयस्कर परिणाम प्रस्तुत कर सकती हैं। कहना न होगा कि यह दृष्टिकोण हर दृष्टि से - हर क्षेत्र से उज्ज्वल भविष्य की भूमिका प्रस्तुत कर सकने वाला सिद्ध हो सकता है।
ईश्वर विश्वास के कल्पवृक्ष पर तीन फल लगते बताये गये हैं - (1) सिद्धि (2) स्वर्ग (3) मुक्ति। सिद्धि का अर्थ है प्रतिभावान परिष्कृत व्यक्तित्व और उसके आधार पर बन पड़ने वाले प्रबल पुरुषार्थ की प्रतिक्रिया अनेकानेक भौतिक सफलताओं के रूप में प्राप्त होना। स्पष्ट है कि चिरस्थायी और प्रशंसनीय सफलताएं गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता के फलस्वरूप ही उपलब्ध होती हैं। मनुष्य को दुष्प्रवृत्तियों से विरत करने और सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के लिए उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाना पड़ता है। यह सभी आधार आस्तिकतावादी दर्शन में कूट-कूटकर भरे हैं। आज का विकृत अध्यात्म-दर्शन तो मनुष्य को उलटे भ्रम जंजालों में फँसाकर सामान्य व्यक्तियों से भी गई गुजरी स्थिति में धकेलता है, पर यदि उसका यथार्थ स्वरूप विदित हो तो उसे अपनाने का साहस बन पड़े तो निश्चित रूप से परिष्कृत व्यक्तित्व का लाभ मिलेगा। जहाँ यह सफलता मिली वहाँ अन्य सफलताएं हाथ बाँधकर सामने खड़ी दिखाई पड़ेंगीं। महामानवों द्वारा प्रस्तुत किये गये चमत्कारी क्रिया कलाप इसी तथ्य की साक्षी देते हैं। इसी को सिद्धि कहते हैं। अध्यात्मवादी आस्तिक व्यक्ति चमत्कारी सिद्धियों से भरे-पूरे होते हैं। इस मान्यता को उपरोक्त आधार पर अक्षरशः सही ठहराया जा सकता है। किन्तु यदि सिद्धि का मतलब बाजीगरी जैसी अचम्भे में डालने वाली करामातें समझा जाये तो यही कहा जायेगा कि वैसा दिखाने वाले धूर्त और देखने के लिए लालायित व्यक्ति मूर्ख के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
आस्तिकता के कल्पवृक्ष पर लगने वाला दूसरा फल है - स्वर्ग। स्वर्ग का अर्थ है - परिष्कृत गुणग्राही विधायक दृष्टिकोण। परिष्कृत दृष्टिकोण होने पर अभावग्रस्त दरिद्र मानने की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि मनुष्य जीवन अपने आप में इतना पूर्ण है कि उस सम्पत्ति को संसार की समस्त एकत्रित सम्पदा की तुलना में भी अधिक भारी माना जा सकता है। शरीर यात्रा के अनिवार्य साधन प्रायः हर किसी को मिले होते हैं, अभाव तृष्णाओं की तुलना में उपलब्धियों से कम आँकने के कारण ही प्रतीत होता है। अभावों की कठिनाइयों की विरोधियों की लिस्ट फाड़ फेंकी जाय और उपलब्धियों, सुविधाओं सहयोगियों की सूची नये सिरे से बनाई जाये तो प्रतीत होगा कि कायाकल्प जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। दरिद्र चला गया, उसके स्थान पर वैभव आ विराजा। छिद्रान्वेषण की आदत हटाकर गुण ग्राहकता अपनाई जाये तो प्रतीत होगा कि इस संसार में ईश्वरीय उद्यान की - नन्दन वन की सारी विशेषताएं विद्यमान हैं। स्वर्ग इसी विधायक दृष्टिकोण का नाम
उस दिन बच्चे ने लट्टू घुमाया। कुछ देर वह पूरे जोश में घूमता रहा, पर जल्दी ही उसकी चाल शिथिल होती गई और अन्त में वह गतिहीन होकर जमीन पर लुढ़क गया। मानो उसके जोशीले जीवन का अन्त हो गया हो।
मैं देर तक सोचता रहा क्या हमारा जीवन भी लट्टू की तरह निरुद्देश्य ही नहीं घूम रहा है ? और क्या उसका अन्त ऐसे ही भूमिसात् लुढ़कने के रूप में नहीं होने जा रहा है।
क्षण भर पूर्ण जोश में घूमने वाला और पलक मारते निष्क्रिय होने वाला लट्टू कई दिन तक मस्तिष्क पर छाया रहा और रह रह कर यही प्रश्न उठता रहा क्या हमारा जीवन लट्टू की हलचल मात्र है ?
- सन्त वास्वानी
व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पूँजी है - साहस। इसी के बल पर कुछ कर गुजरने की परिस्थितियाँ बनती हैं। भले और बुरे दोनों ही प्रकार के कठिन कार्य केवल साहसी ही कर पाते हैं। चोरी, डकैती जैसे क्रूर कर्म भी साहस के बिना नहीं हो पाते हैं। उद्दण्ड, आततायी और अपराधी आतंक उत्पन्न करने वाले लोग अपने दुर्गुणों का समयानुसार दंड पाते और दुख भोगते हैं। किन्तु जो क्षणिक सफलता उन्हें मिलती है वह साहस की ही प्रतिक्रिया होती है। साहस वह हुण्डी है जिसे किसी भी बाजार में भुनाया जा सकता है और उसके बदले किसी भी दुकान से कुछ भी खरीदा जा सकता है। भलाई खरीदनी है या बुराई यह निर्णय करना अपना काम है। खरीदना जो कुछ भी हो उसके लिए साहस का सिक्का तो चाहिए ही।
डरा हुआ व्यक्ति अपनी वास्तविक क्षमता का एक बड़ा अंश अनायास ही गँवा बैठता है। शत्रु से लड़ने और विपत्ति का सामना करने में जितनी शक्ति खर्च होती है उससे कहीं अधिक भयभीत मनः स्थिति में नष्ट हो जाती है। भूत, साँप, चोर आदि से डरे हुए व्यक्ति किस प्रकार काँपते हाँफते हैं, इसे कभी भी देखा जा सकता है। यह प्राण संकट का भय मनुष्य को रोमांचित कर देता है, दम फुला देता है और कँपकँपी बुला देता है। इस स्थिति में मनुष्य की घिग्घी बँध जाती है। हक्का-बक्का बनकर वह किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाता है। समझ नहीं पाता कि क्या करे, क्या न करे ? हतप्रभ अर्धविक्षिप्त व्यक्ति बेमौत मारा जाता है। अजगरों से डरे पक्षी और व्याघ्रों से डरे बन्दर अपने बचाव के उपाय छोड़ बैठते हैं और सहज ही मृत्यु के मुख में घुसते चले जाते हैं।
इससे कुछ ही हलका डर असफलता का होता है। वह मृत्यु के बराबर भयंकर न होते हुए भी दुर्बल मनःस्थिति के लोगों को लगभग वैसा ही प्रतीत होता रहता है। भविष्य में कठिनाइयाँ आयेंगी, असफलताएं मिलेंगी, अवरोध उत्पन्न होंगे, उपद्रव खड़े होंगे, विरोधी आक्रमण करेंगे, कुसमय विपत्ति बनकर त्रास देगा आदि अनेकानेक आशंकाएं कुशंकाएं चित्र विचित्र रूप बनाकर सामने आती और कल्पित विभीषिकाओं से डराती हैं। ऐसे मनुष्य के लिए दिन काटना ही कठिन पड़ता है। कोई बड़ा काम करने का साहस कर सकना उसके लिए सम्भव नहीं होता। आत्म विश्वास की कमी यह अनुभव ही नहीं करने देती कि वह कुछ कर सकता है और उसे किसी क्षेत्र में सफलता मिल सकती है। बहुत हिम्मत करके किसी दिशा में कुछ कदम बढ़ाना भी है तो मनोबल देर तक साथ नहीं देता। कुछ ही
संसार हमारे ही मन का प्रतिबिम्ब है।
समय में वह टूट जाता है और जल्दी सफलता न मिलने की उतावली से निराश होकर उन प्रयासों को छोड़ बैठता है जो थोड़े दिनों और जारी रहते तो सफलता के निकट पहुँच सकते थे।
प्रगति के पथ पर अग्रसर होने के लिए जिन साधनों की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है, उनमें सर्वप्रथम है - आत्म विश्वासजन्य साहस। इसे जुटा लेने पर फिर आगे की मंजिल सरल हो जाती है। साहसी व्यक्ति किसी मार्ग को चुनने से पहले उसके सभी पहलू भली प्रकार देखता, सोचता है, पर जब निर्णय कर लेता है कि यह करना ही है तो फिर तत्परतापूर्वक अभीष्ट प्रयोजन के लिए जुट पड़ता है। पराक्रम भरा पुरुषार्थ पहाड़ों पर रास्ता बनाता है, नदियाँ उसके लिए राह देती हैं, साधन जुटाती हैं और अनेकों का सहयोग उपलब्ध होता है। साहस का चुम्बक साधनों के लौह कण सहज ही खींचता, समेटता चलता है। सफलता ऐसे ही मनस्वी व्यक्तियों के चरण चूमती हैं।
संगठन का अर्थ है सहयोग। यों उसका मखौल तो कागजी संस्थाएं खड़ी करके भी लोग उड़ाते रहते हैं, उससे विनोद कौतूहल भर होता है, कोई बड़ा प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। शक्ति तो सहयोग के बल पर उत्पन्न होती है। बिजली के ठण्डे गरम तार अलग - अलग पड़े रहें तो वे व्यर्थ हैं, पर जब वे मिल जाते हैं तो ‘करेंट’ चालू हो जाता है। एकाकी व्यक्ति की अपनी थोड़ी सी सीमा मर्यादा है, अपने बलबूते पर भी कुछ तो हो ही सकता है पर वह होगा नगण्य ही। बड़ी प्रगति - बड़ी सम्भावना तो सम्मिलित शक्ति के द्वारा ही मूर्तिमान होती है। एक - एक सैनिक अलग अलग फिरे तो उनके छुट पुट कार्य एक सुगठित सैन्य टोली जैसे नहीं हो सकते।
कई तरह की योग्यताएं मिलजुलकर अपूर्णता को पूर्ण करती हैं। परिवार को ही लें उसमें कई स्तर के कई विशेषताओं के मनुष्य मिलजुलकर रहते हैं तो एक अनोखे आनन्द का सृजन करते हैं। पति-पत्नी की योग्यताएं भिन्न-भिन्न प्रकार की होती हैं जब वे मिलकर एक हो जाते हैं तो दोनों को ही लाभ होता है, दोनों ही अपने अभावों की पूर्ति करते हैं। वृद्धों का अनुभव, बालकों का विनोद, उपार्जनकर्ताओं का धन आदि मिलकर एक ऐसा संतुलन बनता है जिसमें परिवार के सभी सदस्यों का हित, साधन होता है। सभी एक दूसरे का - सहयोग का लाभ उठाते हुए आनन्द से रहते और उत्साह पाते हैं। किन्तु यदि परिवार के सदस्यों में सहयोग न हो, मात्र एक सराय में रहने वाले अजनबी मुसाफिरों की तरह निर्वाह करें, तो उनका असहयोग और मनोमालिन्य उस समूह को आनंद रहित, नीरस और समस्याओं से भरा हुआ बना देंगे और उसका बिखर जाना ही श्रेयस्कर प्रतीत होगा।
कितने लोग कहाँ इकट्ठे होते हैं, इसका कोई महत्व नहीं। भीड़ तो सदा अड़चन, गन्दगी और अव्यवस्था ही उत्पन्न करती है। मेलों-ठेलों में अधिक लोग जमा होते हैं पर इससे कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। इसके विपरीत जहाँ थोड़े से लोग भी पारस्परिक सहयोग पूर्वक आदान-प्रदान करने और किसी निर्धारित लक्ष्य की ओर मिलजुलकर चलने के लिए एकत्रित होते हैं, वे सम्मेलन जो निश्चय करते हैं उनके दूरगामी परिणाम उत्पन्न होते हैं। बड़ी संख्या में जमा होते हुए भी यदि लोगों में स्नेह, सहयोग और सामंजस्य नहीं है तो वे सभी अपने आपको एकाकी अनुभव करते रहेंगे। जहाँ घनिष्ठता की मनःस्थिति होगी, एक दूसरे के दुख सुख में सहायक बनकर रहे होंगे - जिनमें एक दूसरे के हित साधन और कष्ट निवारण में जितना उत्साह होगा उनमें उतनी ही प्रसन्नता और निश्चिन्तता दिखाई पड़ेगी। वे उसी अनुपात में समर्थ सम्पन्न निर्भय और प्रभावशाली बनकर रह रहे होंगे। उस समूह का भविष्य उज्ज्वल ही बनता जा रहा होगा।
जिसका ‘अपनापन’ जितना संकुचित है वह आत्मिक दृष्टि से उतना ही छोटा है। जिसने अपनेपन की परिधि जितनी बड़ी बना ली है उसे उतना ही विकसित परिष्कृत माना जायेगा। स्वार्थी व्यक्ति समाज की चिन्ता तो दूर अपने परिवार के हित अनहित तक का विचार नहीं करते और मात्र अपनी ही सुविधा समेटने में लगे रहते हैं। ऐसे लोग अपनी शरीर सुविधा और क्षणिक प्रसन्नता पा सकते हैं पर उनकी अन्तरात्मा इस क्षुद्रता के लिए कचोटती ही रहती है। परिचित लोग घृणा करते हैं और सम्बद्ध व्यक्ति रुष्ट रहते हैं। उन्हें न कभी कहीं से सच्चा सम्मान मिलता है और न आड़े वक्त में किसी का कारगर सहयोग। जो दूसरों के दुख दर्द में शामिल नहीं होता उसे अपने आपत्तिग्रस्त होने पर किसी की सहायता नहीं मिलती। जिसे दूसरों से कुछ सहानुभूति नहीं उसके साथ भी सहानुभूति कौन व्यक्त करेगा।
उदारचित्त मनुष्य देखने में घाटा उठाते दिखते हैं क्योंकि उन्हें दूसरों की सहायता करने में अपना समय, मस्तिष्क और धन खर्च करते हुए देखा जाता है। मोटे तरीके से यह घाटा उठाने का चिह्न है। पर ध्यानपूर्वक देखा जाये तो बात ठीक उलटी दिखाई पड़ती है। बीज गलता है तो लगता है वह घाटे में रहा, पर जब उसका अंकुर फूटता है, पौधा बनता है, विशाल वृक्ष होकर फूलों-फलों से लदता है तो प्रतीत होता है बीज का गलना मूर्खतापूर्ण नहीं था। उसने जितना खोया उसकी तुलना में पाया कहीं अधिक है। दूसरों के साथ उदार सहयोग का बरतना - अपनी अन्य आत्मिक सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाता है, दूसरों के मन में अपने लिए श्रद्धा, सम्मान का स्थान बनाता है और अपने चुम्बकत्व से अन्य लोगों का स्नेह- सहयोग आकर्षित करता है। इस प्रकार उदार व्यक्ति घटता नहीं बढ़ता ही है। सहयोग की प्रतिक्रिया सुखद सहायता बनकर चारों ओर से बरसती है।
धर्म शास्त्रों में दान पुण्य की बहुत महिमा गाई गई है और उसे हर शुभ कार्य के साथ जोड़ा गया है। इसका कारण मात्र धन को एक से दूसरे के हाथ में पहुँचाना नहीं वरन् उदार सहयोग की सत्प्रवृत्ति को विकसित करना है। हम अपने ही दुख को दुख न समझें वरन् दूसरों के कष्टों में भी समान सम्वेदना अनुभव करें। किसी की पीड़ा अपने अन्तःकरण में करुणा और दया उत्पन्न करती हो तो समझना चाहिए आत्मा की कोमलता जागरुक है और व्यक्ति आत्मोत्कर्ष के मार्ग पर चल रहा है। जो जितना कठोर है उसे दूसरों को कष्ट पीड़ित देखकर तनिक भी दया नहीं आती ऐसे लोग पर पीड़ा का क्रूर कर्म स्वयं भी करते रहते हैं और दूसरों को करते देखकर प्रसन्न होते हैं अथवा निरपेक्ष बने रहते हैं। इस आन्तरिक स्थिति को ही असुरता कहते हैं। ऐसे लोग अपने लाभ के लिए ही नहीं, अकारण भी पीड़ा का आनन्द लेते हैं और उस दुष्टता को वीरता का नाम देते हैं। कसाई, शिकारी, डाकू, हत्यारे प्रायः ऐसी ही असुर मनोवृत्ति के होते हैं। अपराधी मनोवृत्ति इसी कठोरता की पृष्ठभूमि पर पनपती है।
मनुष्य असुरता छोड़े और देवत्व की दिशा में अग्रसर हो इसका एक ही उपयोग है उदार सहकारिता की मनोवृत्ति का विकास - उसे अन्तः भूमि में परिपक्व करने वाले क्रिया कलापों का अभ्यास। दान-पुण्य की महिमा इसी प्रयोजन को ध्यान में रखकर गाई गई है। आज तो इस क्षेत्र में भी मूढ़ मान्यताओं का साम्राज्य है। लोग अमुक वंश या वेश के लोगों को दान लेने का ठेकेदार मानते हैं और देवी -देवताओं तथा पितरों को प्रसन्न करने की दृष्टि से पैसा पानी की तरह बहाते हैं। कुछ लोग अपने को उदार दानी होने का प्रचार विज्ञापन करने की दृष्टि से तीर्थयात्रा, ब्रह्मभोज, स्मारक आदि में धन खर्च करते हैं। यह आज के घटिया मनुष्य के घटिया चिन्तन का घटिया स्वरूप है। वस्तुतः दान एक सत्प्रवृत्ति है जो मात्र धन देकर ही नहीं, श्रम, समय, प्रोत्साहन, स्नेह, सत्परामर्श, सहानुभूति आदि के माध्यम से भी उसे चरितार्थ किया जा सकता है। दानी के लिए धनी होना आवश्यक नहीं। निर्धन भी अपने उदार चित के आधार पर धन कुबेरों से भी बढ़ी चढ़ी सेवा सहायता कर सकते हैं। सद्भावना की कमी न हो, स्वभाव में उदारता सम्मिलित हो, दूसरों के दुख में सहायता करने की कसक उठती हो, किसी को सुखी बनाने में रस आता हो तो समझना चाहिए दानशीलता के अनेकानेक आचरण स्वयमेव होते चले जायेंगे और उसके लिए व्यस्त एवं त्रस्त स्थिति में भी पग - पग पर सुअवसर मिलते रहेंगे।
आवश्यक नहीं कि कोई पीड़ित या पतित मिले तब के लिए दान की प्रतीक्षा में बैठे रहा जाय अथवा उन्हें खोज - खोजकर बुलाया जाता रहे। यह तो आपत्ति धर्म है कि कभी कोई दुखी व्यक्ति दिखाई पड़े तो उसकी उचित एवं शक्य सहायता विवेकपूर्वक की जाय। भावावेश में अनुचित सहायता करने से तो भिक्षावृत्ति पनपती है और कुपात्रों के लिए एक घिनौना व्यवसाय अपनाकर अकर्मण्य बनने का दुर्भाग्य पल्ले पड़ता है। इस क्षेत्र में पूरे विवेक का प्रयोग करने की आवश्यकता है। विवेकपूर्ण सहृदयता ही लाभदायक सिद्ध होती है। माता को बच्चे के फोड़े का आपरेशन कराते समय जो कठोरता धारण करनी पड़ती है वस्तुतः वह भी विवेकपूर्ण करुणा का ही एक अंग है।
अपने स्वजन, सम्बन्धियों, पड़ोसी, परिचितों से कोई हारी -बीमारी हो तो उसी दवादारू परिचर्या पूछताछ सहानुभूति आश्वासन के लिए कुछ समय या प्रयत्न करके अपनी सद्भावना का परिचय दिया जा सकता है। अन्य प्रकार की मुसीबतें तथा कठिनाई भी लोगों के सामने आती रहती है। ऐसे अवसरों पर लोग अक्सर अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं और औंधे-सीधे विचार करके अपने स्वजन, सम्बन्धियों, पड़ोसी, परिचितों से कोई हारी -बीमारी हो तो उसी दवा दारु परिचर्या पूछताछ सहानुभूति आश्वासन के लिए कुछ समय या प्रयत्न करके अपनी सद्भावना का परिचय दिया जा सकता है। अन्य प्रकार की मुसीबतें तथा कठिनाई भी लोगों के सामने आती रहती है। ऐसे अवसरों पर लोग अक्सर अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठते हैं और औंधे-सीधे विचार करके अवाँछनीय मार्ग अपनाते लगते हैं यह मनःस्थिति भी शारीरिक बीमारी से कम भयंकर नहीं। अपने संपर्क क्षेत्र में अक्सर कई व्यक्ति ऐसी आपत्ति में फंसे होते हैं। उनके साथ सहज आत्मीयता विकसित करनी चाहिए और अपने विश्वास क्षेत्र में लेना चाहिए। इतना कर सकने पर ही स्नेह सिक्त, तर्क और तथ्यों से भरा परामर्श प्रभावी बनता है। ऐसा मार्ग दर्शन कर सकना-धन दान करके किसी दीन-दुखी की सहायता करने से किसी प्रकार कम महत्व का नहीं है। साधारण वार्तालाप में भी संपर्क में आने वालों को बिना उनके स्वाभिमान को चोट पहुँचाये-बिना निन्दा, भर्त्सना किये सहज सत्परामर्श दिये जा सकते हैं और उनके भी धन दान जैसे ही सत्प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं। अपना चरित्र आदर्श बनाकर उसे अनुकरणीय एवं प्रेरणाप्रद बना लिया जा तो वह भी प्रकारान्तर ही माना जायगा।
घर में ऐसी परम्परा प्रचलित करनी चाहिए जिसमें सभी को एक दूसरे की सहायता करने की उत्सुकता बनी रहे। इसके लिए उन्हें बराबर अवसर भी मिलते रहने चाहिए। बड़ी क्लास के लड़के अपने से छोटी कक्षा के भाई-बहिनों को पढ़ाने के लिए नियमित रूप से हर रोज समय निकालें और उन्हें खिलाने, हंसाने, अच्छी आदतें अपनाने, ज्ञान बढ़ाने आदि में सहायता करें। छोटी आयु के बच्चे बड़ों के कामों में हाथ बंटाने में, उनकी छोटी-मोटी आवश्यकताएं स्वयं जुटा देने रुचि रखें, बराबर वालों के साथ जी खोलकर हँसने, बोलने और मिल-जुलकर साथ साथ काम करने का क्रम बनायें। दूसरों की बिखरी चीजों को यथास्थान रख देना एक छोटा सा काम है, पर उससे यह छाप पड़ती है कि हमारे प्रति कितना ध्यान है। ऐसे छोटे छोटे सहयोग देकर साथ वालों की सद्भावना एवं कृतज्ञता अर्जित की जा सकती है।
सार्वजनिक हित के सामूहिक कार्यों में सदा अग्रणी रहना चाहिए। लोक -मंगल के लिए चल रहीं गतिविधियों में पूरे उत्साह के साथ भाग लेना चाहिए। इन सत्प्रवृत्तियों में भाग लेने से विश्व सेवा के विशाल क्षेत्र में प्रवेश करने का अवसर मिलने से आत्म विस्तार का लाभ मिलता है साथ ही समाज को समुन्नत बनाने का जीवनोद्देश्य भी प्राप्त होता है। जिस प्रकार व्यक्तिगत एवं पारिवारिक लाभ के कार्यों में रुचि रखी जाती है उसी प्रकार समाज को भी बड़ा परिवार मानकर उसे समुन्नत बनाने वाले सामूहिक सार्वजनिक कार्यों में हमारा भाव भरा अनुदान एवं सहयोग सदा ही सम्मिलित रहना चाहिए।
अन्तः करण की उदारता को विकसित करना - अपना स्तर बढ़ाना और दूसरों का सम्मान सद्भाव अर्जित करना है। यह लाभ जो कमाता है वह देने की अपेक्षा प्रकारान्तर से कहीं अधिक प्राप्त कर लेता है। स्वार्थपरायण व्यक्ति चतुर दिखता है पर वह एकाकी रहकर खोता ही अधिक है। अस्तु हर विवेकवान का प्रयत्न यह होना चाहिए कि वह अपनी आत्मीयता का क्षेत्र विस्तृत करे, दूसरों के दुख को बँटाने और अपने सुख को बाँटने में उत्साह रखे। सहयोग का स्वभाव बनायें और जहाँ भी आवश्यकता हो - अवसर हो सहकारिता की सत्प्रवृत्ति चरितार्थ करने में पूरी तत्परता बरतें। सद्भाव और सहयोग के बल पर ही परिवार बनते, सुदृढ़ होते और बढ़ते हैं। संगठन का मूल तत्व यही है। मानवी प्रगति सहयोग के आधार पर ही सम्भव हुई है उस मनुष्य को दिये गये ईश्वरीय अनुदान का हमें अधिकाधिक विकास करना चाहिए ताकि सुख शान्ति का अधिकाधिक सम्वर्धन सम्भव हो सके।
किसी दूसरे के साथ इस तरह व्यवहार किया जाय कि गया-गुजरा, अशक्त, अरोग्य और पिछड़े हुए स्तर का हो तो वह निश्चय ही नाराज होगा और ऐसी अभिव्यक्ति को अपना अपमान समझेगा। यह उचित भी है। आत्म सम्मान मानवीय अन्तःकरण की एक स्वाभाविक वृति है। अपना गौरव और वर्चस्व सिद्ध करने और सम्मान पाने की इच्छा से ही लोग बहुत से सही गलत काम करते हैं। पेट भरने में तो थोड़ा सा समय श्रम ही पर्याप्त होता है। अधिकतर समय और चिन्तन तो बड़प्पन पाने के साधन संग्रह करने और इस तरह का ठाट बाट रोपने में ही खर्च होता रहता है। पेट की भूख और यौन लिप्सा के बाद सबसे प्रबल आकाँक्षा बड़प्पन पाने की है कई बार तो वह इतनी उग्र होती है कि आदमी उसके लिए भयंकर खतरे उठाने को भी तैयार हो जाता है।
इतने पर भी कितने ही व्यक्ति ऐसे होते हैं ; जो अपने आप अपना तिरस्कार स्वयं करते रहते हैं और उसके अभ्यस्त बन जाते हैं। दब्बूपन उनका स्वभाव बन जाता है। सही, खरी, उचित और सामान्य बात भी किसी के सामने नहीं कह पाते। मुँह खोलने में उन्हें बहुत डर लगता है और भय बना रहता है कि वह न जाने क्या समझ बैठे, रुष्ट न हो जाय, झिड़क ने दे। वस्तुतः यदि वैसा हो भी जाय तो भी उससे बड़ी हानि नहीं हो सकती किन्तु दब्बू आदमी अपनी बड़ी से हानि करके भी इतना साहस नहीं जुटा पाता कि सीधी सी बात को सरल स्वाभाविक रीति से दूसरे के सामने रखकर अपना मत व्यक्त कर दें और गलतफहमी के जो कारण अकारण , मति भ्रम, घुटन अथवा खाई उत्पन्न कर रहे हैं; उनका निराकरण कर दे। साहस की कमी ऐसे व्यक्तियों को दयनीय स्थिति में डाले रहती है।
बचपन में प्रेम और सम्मान का न मिलना, उपेक्षा उपहास तथा अभाव ग्रस्त स्थिति के समय गुजारते रहने वाले बच्चे बड़े होने पर प्रायः आत्महीनता के शिकार बन जाते हैं। बीमार अपंग मंदबुद्धि बच्चे भी बार बार डाँट-झपट सुनते रहते हैं। फलतः उनका मन यह मान बैठता है कि उनकी स्थिति दूसरों की अपेक्षा है ही गुजरी। उनका भाग्य कुछ ऐसा ही बना है। पिछड़ी समझी जाने वाली जातियों के लोग तथा महिलाएं आरम्भ से ही घटिया समझी जाने की -उपेक्षित स्थिति में रहने के कारण अपने आप को हेय स्थिति का स्वयं ही मान बैठती है और उसी स्तर का अपने को समझते हुए सोचने का ढंग ऐसा बना लेते हैं, मानों वे बने ही घटिया मिट्टी से हैं। इस मान्यता के कारण दब्बूपन उनकी प्रत्येक क्रिया से टपकता रहता है। दूसरों के सामने वे अपने आपको ठीक तरह व्यक्त नहीं कर सकते।
कुछ लोग किसी बाहरी दबाव या अभाव से नहीं अपनी दब्बू प्रकृति के कारण ही अपने को हेय स्थिति में डाल लेते हैं। वे दूसरों के बड़प्पन अपने हेय होने की बात का अकारण ही बड़ा-चढ़ा कर मान बैठते हैं और एक बहुत ऊंची-नीची खाई खोद लेते हैं।
हीनता ग्रस्त व्यक्ति को सहजता से पहचाना जा सकता है वह आलसी, असन्तुष्ट, दब्बू, चापलूस तथा बात-बात पर रूठने वाला होगा। जरूरत से ज्यादा नम्रता प्रदर्शित करता है। उससे कोई भी बेगार ले सकता है, उधार माँग सकता है, ठग सकता है। मन में वैसा न करने की बात रहते हुए भी इतनी इनकार करने की हिम्मत नहीं होती तो सामने वाला का आग्रह टालते नहीं बनता। ऐसे व्यक्ति किसी मिलन गोष्ठी में एक कौने में दबे सहमे सकुचे बैठे होंगे ताकि कोई उनसे कुछ पूछ न बैठे। कुशल प्रश्नों का उतर देना तक उन्हें भारी पड़ता है। ऐसे लोग आये दिन ठगे जाते हैं, उनसे कोई भी बेगार लेता है और काठ का उल्लू समझता है। लाभ उठाने वाले कुछ एहसान भी नहीं मानते क्योंकि वे समझते हैं जो पाया कमाया है वह दब्बू आदमी की दुर्बलता का चतुरता पूर्वक लाभ उठा लेना भर था, इसमें ठगे जाने वाले की कोई उदारता थोड़े ही थी।
कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त 22 मनोविज्ञान वेत्ताओं के एक आयोग को चिन्ता के कारणों को पता लगाने का काम सौंपा था। उस दल ने इस मर्ज के हजारों मरीजों की कुरेद बीन करने पर यह पाया कि ऐसे लोग वस्तुतः परले सिरे के डरपोक होते हैं। भूत और साँप का न सही भविष्य का आशंकाओं का डर उन्हें निरन्तर सताता रहता है। इसके अतिरिक्त वे अपनी वर्तमान स्थिति अपर्याप्त असन्तोषजनक समझते रहते हैं। यों निर्वाह में कठिनाई उत्पन्न करने वाला अभाव इनमें से किसी विरलेको ही होता है, आयोग ने यह भी बताया कि भय एक संक्रामक रोग है वह छूत की बीमारी की तरह साथ रहने वाले पर भी असर करता है। छोटा बालक जो अभी संसार की परिस्थितियों के बारे में कुछ भी नहीं समझता, माता को डरी हुई देख कर स्वयं भी रोने लगता है। उसे डरे हुए की दयनीय स्थिति को देखकर स्वयं डर लगता है।
कन्धा झुकाये हुए, जमीन में आंखें गाड़े हुए, कुछ लोग डरे सहमे लोगों की आँखों से अपने को बचाते हुए सड़क पर चलते दिखाई पड़ेंगे। उनके पैर डगमगाते से लगेंगे। सीधी लाइन चलना उनसे बन नहीं पड़ेगा। साँप की तरह टेड़े तिरछे चलेंगे , पैर एक दूसरे में लिपटते से दिखाई पड़ेंगे। इसके विपरीत कुछ लोग सीना ताने फौजियों जैसे कदम मिला कर चलते हुए सीधी लाइन चल रहे होंगे। चेहरे पर विश्राम भरी मुस्कान दीख रही होगी और आँखों से चमक निकलती दिखाई पड़ेगी। यह अन्तर शरीर स्थिति से नहीं मानसिक स्तर से सम्बन्ध रखता है। जिन पर आत्महीनता सवार है वे न केवल सड़क पर चलते हुए वरन् हर कार्य में अपनी दयनीय दुर्बलता व्यक्त कर रहे होंगे। जबकि आत्म विश्वासी व्यक्ति की तेजस्विता उनके हर क्रिया कलाप से हर भाव भंगिमा सके टपक रही होगी।
अत्यधिक हीनता ग्रस्त व्यक्ति उसके भार दब जाता है, हिम्मत खो बैठता है और उज्ज्वल भविष्य की आशा छोड़कर हताश रहने लगता है अपनी क्षमता पर अविश्वास करने वाला एक प्रकार से हाथ पाँव रहते हुए अपंग और बुद्धि रहते हुए भी संशय ग्रस्त रहता है। वह करने की तो बहुत कुछ सोचता है। पर साहस के अभाव में कुछ कर नहीं पाता । करता है तो फल पकने तक किसी वृक्ष को सींचते रहने के लिए जितने धैर्य की आवश्यकता पड़ती है, उतनी जुटा नहीं पाता। अस्तु अधिकाँश कार्यों में असफल रहता है और हर असफलता उस और भा अधिक निरुत्साहित करती चली जाती है।
दब्बूपन के अतिरिक्त विकृत आत्महीनता उद्धत बनकर उभरती है। वह ऐसे कृत्य करने को उकसाती है, जिससे लोग उसे भी असाधारण समझें। विधिवत असाधारण बनने के लिए मनुष्य को व्यक्तित्व का समग्र निर्माण करना पड़ता है और आदर्शवादी गति-विधियाँ अपनाने का उदात्त साहस जुटाना पड़ता है। पर उद्धत काम करने के लिए उच्छृंखलता अपनाने और आतंकवादी रास्ते पकड़ने से काम चल जाता है। यों आरम्भ में होता तो यह भी कठिन है, पर उसी स्तर के आवारा लोगों का साथ ढूंढ़ लेने में वह अभ्यास जल्दी ही हो जाता है और गुण्डागर्दी से दूसरों को आतंकित करने की सफलता पाकर आत्मगौरव की भूख बुझाली जाती है। साथ ही आर्थिक तथा दूसरे लाभ भी कमा लिये जाते हैं। सस्ती तरकीब से दुहरा लाभ पाने से उत्साहित होकर वे इस प्रकार की गति विधियाँ एक पेशे के रूप में अपना लेते हैं। अपराधों में संलग्न उच्छृंखल गुण्डागर्दी अपनाने वाले व्यक्ति बहुत करके आत्महीनता की ग्रन्थि से ग्रसित ही होते हैं। निजी जीवन में थोड़ी सी भी विपत्ति आने पर उन्हें बेतरह रोते कलपते पाया जाता है।
अधिक बन ठन कर रहने वाले और साज श्रृंगार करने वाले नर-नारियों में अधिकाँश ऐसे होते हैं, जो अपने आप को तिरस्कृत, उपेक्षित एवं हेय स्तर का मानते हैं। वे श्रृंगार और चमचम करते जेवर पहन कर दूसरों के साथ अधिक आकर्षण बनने का प्रयत्न करते हैं ताकि लोग उन्हें असाधारण समझे। अमीरी का ढोंग रचते हुए पैसों का अपव्यय करते हुए कई व्यक्ति अपने परिचितों पर यह छाप छोड़ना चाहते हैं कि वे बड़े आदमी हैं और बड़े आदमियों की तरह चाहे जितना पैसा फूँक सकने में समर्थ हैं। ऐसे आदमी कम कीमत की मजबूत चीजें खरीदने की अपेक्षा महंगी और कमजोर चीजें खरीदते हैं, इस खरीद में उनका प्रयोजन दूसरों पर अपनी सुरुचि एवं कलाकारिता की छाप छोड़कर बड़प्पन का आतंक जमा भर होता है। ऐसे लोग सदा ऋणी बने रहते हैं और आर्थिक तंगी भुगतते हैं। लाभ इतना ही होता है कि उनकी आत्महीनता को कुछ समय के लिए राहत मिल जाती है।
अमेरिका में 20 हजार पीछे एक व्यक्ति हर साल आत्महत्या करके मरता है। किसी-किसी वर्ष तो यह अनुपात बहुत अधिक बढ़ जाता है। एक साल तो यह संख्या 15400 पहुँच गई थी। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ अधिक संख्या में आत्महत्या करती हैं।
लोग क्यों आत्मघात करते हैं ? इस प्रश्न के उतर में दरिद्रता, बेकारी शारीरिक कष्ट, पारिवारिक कलह, असफल प्रेम, अपमान, निराशा, विपत्ति की आशंका आदि कई कारण गिनाये जा सकते हैं। पर सबसे बड़ा कारण होता है मानसिक असन्तुलन जिसके कारण लोग छोटी-छोटी कठिनाइयों या असफलताओं को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर मान लेते हैं और उस भयंकरता से बचाव का कोई उपाय न सोचने पर किंकर्तव्य विमूढ हुआ व्यक्ति अपने ऊपर ही आक्रमण कर बैठता है और दूसरों को मार डालने का साहस न जुटा करने पर अपने आप का ही वध कर डालता है।
आत्महीनता की व्यथा से ग्रसित व्यक्तियों को मनःचिकित्सकों का परामर्श है कि-वे उचित और अनुचित का अन्तर करना सीखें ओर इतना साहस जुटाएं कि जो सही है उसी को अपनाने और जो गलत है उससे इनकार करने में अपना स्पष्ट मत व्यक्त कर कर सकें। सहमत होना और हाँ कहना अच्छी बात है, पर जो उचित नहीं जंचता उसे अस्वीकार करने की हिम्मत भी रखनी चाहिए। सोचने में यह बात भी सम्मिलित रखनी चाहिए कि हर सही-गलत बात में हाँ हाँ करते रहने से दूसरों की दृष्टि में अपना वजन घट जाता है और इज्जत चली जाती है। विकसित व्यक्तित्व का अर्थ है- अपनी मान्यता का स्पष्ट किन्तु नम्र ओर संतुलित शब्दों में कह सकना। जो ऐसा नहीं कर सकता वह अपने मूल्य को आप ही गिराता है। हंसना और हंसाना एक ऐसी आदत है जिसे पैदा कर लेने से आत्महीनता की ग्रन्थि जमने नहीं पाती और जम भी जाय तो धीरे-धीरे खुलती चली जाती है।
जन संपर्क के काम करने की आदत डालना भी इस दृष्टि से एक अच्छा उपचार है। चार दुकानों पर मोल भाव करके और घटिया-बढ़िया तलाश करके शाक-भाजी खरीदने का नुस्खा छोटा होने पर भी इस रोग में बड़े काम का है। अपने हाथों टिकट खरीदने, सामान बुक कराने, सीट रिजर्व कराने, जैसे छोटे काम करने से भी हिम्मत खुलती है। आदान प्रदान में वार्तालाप करना आवश्यक हो जाता है। गोष्ठियों और प्रतियोगिताओं में भाग लेने से भी अपनी अभिव्यक्तता प्रकट करनी पड़ती है। यह अच्छे अभ्यास हैं।
अपने बारे में यह नहीं सोचना चाहिए कि मैं कुछ नहीं हूँ वरन् यह कहना चाहिए कि मैं भी कुछ हूँ। एक महत्वपूर्ण और प्रतिभावान व्यक्ति हूँ। अपने प्रति और दूसरों के प्रति न्याय उपलब्ध कराने के लिए मेरे विचारों और प्रयत्नों का वजनदार मूल्य है। विश्व भर में संव्याप्त असीम बुद्धि चेतना और प्रचंड शक्ति सामर्थ्य का समुचित अंश मुझ में विद्यमान है। आत्म विकास और सामाजिक प्रगति में मेरी प्रतिभा की अपने गरिमा है जिसे अक्षुण्ण रखना और विकसित करना मेरे परम पवित्र उत्तरदायित्व हैं।
मनुष्य की गरिमा के तीन आधार स्तम्भ हैं (1) जीवन की पवित्रता (2) क्रिया-कलाप की प्रामाणित और (3) लोक सेवा के प्रति श्रद्धा। जिनके पास यह तीन विभूतियाँ हैं उनके लिए महामानव बनने का द्वार खुला पड़ा है।
प्रामाणिक व्यक्ति किसे कहना चाहिए। इसकी व्याख्या करते हुए दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने कहा है जो अपनी असफलताओं का दोषारोपण दूसरों पर नहीं करता। बचकाने लोग अपनी असफलताओं के लिए व्यक्तियों, पदार्थों और परिस्थितियों को दोषी ठहराते रहते हैं, इससे एक बड़ी हानि यह होती है कि आत्म समीक्षा का अवसर चला जाता है और वे त्रुटियाँ समझ में नहीं आती, जिनके कारण आवश्यक प्रतिभा न जुटाई जा सकी और आगे बढ़ने के अवसर हाथ से निकल गये।
जो लोग असफल रहे है वे एक प्रकार से बालक हैं। हर असफलता के बाद अधिक गहराई से उत्पन्न कठिनाइयों पर विचार करना और उनके निराकरण का उपाय खोजा जाना चाहिए। बाल बुद्धि के लोग साहस और पुरुषार्थ की दृष्टि से पिछड़े होते हैं और तनिक सा अवरोध आने पर निराशाग्रस्त होकर अपने प्रयास बन्द कर देते हैं। योग्यता जुटाने में उत्साह नहीं दिखाते और हर असफलता के बाद दूने उत्साह से पुरुषार्थ करने की आवश्यकता अनुभव नहीं करते। यही होता है कि उनकी असफलता का मूल कारण। ऐसे व्यक्ति निश्चित रूप से चेतना की दृष्टि से अपरिपक्व होंगे। बालकों पर कटाक्ष करने से क्या लाभ? उन्हें यथार्थता समझाई जानी चाहिए। यदि इतना भी न बन पड़े तो कम से कम स्वयं के लिए शिक्षा तो ग्रहण करनी ही चाहिए कि जिन कारणों से दूसरे असफल हुए हैं उन्हें हम तो न अपनायें।
प्रामाणिक व्यक्ति की एक विशेषता है स्वतन्त्र चिन्तन। लोग क्या सोचते हैं, क्या कहते हैं ? इस बात की ओर उसका ध्यान नहीं होता, वह सदा तथ्यों को ढूंढ़ता है और उचित को अपनाता है; भले ही इस दृष्टि से वह अकेला पड़ता हो और दूसरे उसका उपहास करते हों। स्पष्ट है कि यथार्थता को समझने की और उचित को अपनाने की शक्ति किन्हीं विरले लोगों में ही होती है। ऐसी दशा में उच्चस्तरीय रीति-नीति अपनाने वालों को दूसरों का समर्थन कदाचित ही मिल पाता है, उसे अपनी लम्बी मंजिल अकेले चलकर ही पर करनी पड़ती है।
विरोधियों से झगड़ने और दुर्घटनाओं की स्मृति में उलझने का जिसे अवकाश नहीं, जो निरन्तर सृजन की ही बात सोचता है- वह प्रामाणिक है। अशुभ चिन्तन से क्षोभ बढ़ता है और उपयोगी शक्तियाँ उसी जंजाल में उलझ कर नष्ट हो जाती हैं। यदि चिन्तन के इस अपव्यय से बचा जा सके तो उस बचत से बहुत कुछ किया जा सकता है। झगड़ना आसान है पर सृजन के लिए प्रतिभा और परिपक्वता चाहिए। अच्छा यही है कि अपना ध्यान प्रौढ़ता के संग्रह में एकाग्र रखा जाय। प्रामाणिक व्यक्ति यही करते हैं।
प्रामाणिक व्यक्ति किसी से काम निकालने की फिराक में नहीं रहते वरन् उसे प्रखर व्यक्तित्व को सींचे जाने के विश्व नियम के अनुरूप उदार सहयोग देने के लिए बाध्य करते हैं। इस आधार पर अधिक समर्थ लोगों की प्रचुर सहायता अनायास ही आकर्षित की जा सकती है।
सन्त कन्फ्यूशियस के अनुसार प्रामाणिकता मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। वह उत्तरदायित्व निबाहने, मर्यादाओं का पालन करने और कर्तव्य पालन में सतत् जागरुक रहने वालों को मिलती है। जिसने इसे पा लिया उसके लिए अभीष्ट मार्ग पर द्रुत गति से बढ़ चलना नितान्त सरल होता है। मनुष्य में रूप, चातुर्य, बुद्धि वैभव, कलाकारिता आदि कितनी ही ऐसी विशेषताएं हो सकती हैं जो दूसरों को प्रभावित करें, पर सबसे अधिक प्रभावोत्पादक आकर्षण- प्रामाणिकता जिन्होंने उसका उपार्जन किया है वे हर क्षेत्र में ऊपर उठे और चमकते हुए दिखाई पड़ेंगे।
मनुष्य पारदर्शी काँच की तरह है। वह जिस तरह के रंग के संपर्क में आता है, उसी रंग का दीखने लगता है। परिस्थितियाँ उसे जहाँ भी जैसे भी वातावरण में रखती हैं वह उसी स्तर का बनता जाता है। जहाँ ऊंचा उठाने वाली परिस्थितियों में रहकर व्यक्ति समुन्नत बनता है, वहाँ निष्कृष्ट परिस्थितियाँ उसे निरन्तर गिराती चली जाती है और उस स्थिति तक पहुँचा देती है जहाँ उसे नर-पिशाच की संज्ञा दी जा सके।
अंग्रेजी काल में एक भेड़िया मानव मध्य प्रदेश में पकड़ा गया था। नागपुर से जबलपुर जाने वाली सड़क पर एक गाँव था -’सन्त बावड़ी’। उसके आस-पास चोरों ने बहुत आतंक मचा रखा था। आसपास के गाँव आतंकित हो उठे थे और राहगीरों ने लूट के भय से उस रास्ते आना जाना बन्द ही कर दिया था।
सरकार ने उसकी रोकथाम के लिए लेफ्टिनेंट कवरले की ड्यूटी लगाई। उन्हें चारों के अतिरिक्त एक और आतंक भी छाया मिला कि रात को घरों से मनुष्य गायब हो जाते हैं और वे फिर कभी नहीं मिलते। कौन करता है-बाघ, भेड़िया भूत, राक्षस, डाकू , तान्त्रिक ? जो हो घटनाएं इतनी घट चुकी थी कि उनका पता लगाना भी आवश्यक था। लेफ्टिनेंट ने उस जाँच-पड़ताल को भी अपने कार्यक्रम में सम्मिलित कर लिया।
अनेक गुम हुए व्यक्तियों और ले जाये जाते समय उनके शरीर से टपके हुए रक्त को देखकर यह अनुमान लगाया गया कि यह कार्य किसी भेड़िये का है। किन्तु पैरों के निशान बड़े विचित्र थे उसे देखकर भूत, राक्षस, तान्त्रिक आदि की बात वहाँ के ग्रामीण कहते थे। ध्यान से देखने से यह समझ में आया कि यह किसी घुटने और कोहनी के बल पर चलने वाले मनुष्य के निशान हैं। क्या कोई मनुष्य और भेड़िये का सम्मिश्रित प्राणी यह कार्य करता है ? पदचिह्नों की अधिक खोज करने पर इसी बात की अधिक पुष्टि हुई।
खोज तेजी से आरम्भ कर दी गई और इस कार्य में आदिवासियों, शिकारियों और कुत्तों की एक बड़ी संख्या सुनियोजित ढंग से खोज करने के लिए नियुक्त कर दी गई। अन्ततः पता चल ही गया। भेड़ियों की एक माँद में मनुष्यों की अधखाई लाशें पाई गई ओर उन्हें गोली से उड़ा दिया गया। आश्चर्य तब हुआ जब उसी माँद में एक मनुष्य युवक भी पाया गया, जिसका जीवन-क्रम पूर्णतया भेड़ियों जैसा था। उसे जीवित पकड़ लिया गया और कई दिन तक बाँधकर रखकर देखा गया कि यह इस स्थिति में कैसा आ गया।
कोई प्रामाणिक सबूत तो नहीं मिले, पर अनुमान लगाया गया कि किसी मादा भेड़िया ने उसे कहीं से चुराया होगा और अपना बच्चा न रहने पर थनों का दूध हलका करने के लिए उसे पाल लिया होगा । बड़ा होने पर वह अपनी अतिरिक्त बुद्धि के कारण भेड़ियों की, मनुष्य के शिकार में सहायता करने लगा होगा और उन्हीं जैसे जीवन का अभ्यस्त हो गया होगा।
कई दिन तक उस नर भेड़िये को जंजीरों से बाँध कर रखा गया। कौतूहल पूरा करने के लिए दूर-दूर से लोग उसे देखने आये। पर अब प्रश्न यह उत्पन्न हुआ कि इसका क्या किया जाय ? वह भेड़िये की आदतें छोड़कर मनुष्य स्वभाव अपनाने के लिए तैयार नहीं हो रहा था। लेफ्टिनेंट से उसे ईसाई मिशनरियों ने माँगा और उन्हें वह दे भी दिया गया। उन्होंने उसे फिर मनुष्य की आदत में लौटाने के लिए भरपूर प्रयत्न किया किन्तु वे सफल नहीं हो सके। एक वर्ष के भीतर ही वह लड़का मर गया। रुडर्याड किपलिंग ने सम्भवतः इसी घटना-क्रम को अपना कल्पना आधार बनाकर ‘वृक मानव’ नामक एक कहानी भी लिखी।
एक सभ्य देश और सभ्य परिवार में उत्पन्न हुई असभ्य वातावरण और असभ्य लोगों के बीच लम्बे समय तक रहने के पश्चात किस प्रकार निकृष्ट स्तर की बन गई इसकी रोमाँचकारी कथा नीचे की पंक्तियों में पढ़ने के बाद हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वातावरण का कितना अधिक प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है।
अफ्रीका का एक देश काँगो द्वितीय महायुद्ध से पहले बेल्जियम का उपनिवेश था। युद्ध के बाद मित्र राष्ट्रों की नीति के अनुसार काँगो को भी स्वतन्त्रता मिली। पर खोजे गये गोरों ने वहाँ गृह-युद्ध करा दिया और ऐसी स्थिति पैदा कर दी जिसमें उन्हें शान्ति स्थापित करने के बहाने वहाँ से पैर जमाने का अवसर मिल सके।
गृह-युद्ध रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपनी सेनाएं भेजीं और एक ऐसा प्रतिनिधि मण्डल भी जो आपस में लड़ने वाले कवाइली लोगों को समझा-बुझाकर शान्ति और प्रगति का मार्ग अपनाने के लिए रजामन्द कर सके। इस प्रतिनिधि मण्डल के नेता थे-स्वीडन के कप्तान नेल्स वोहेमन। उन्होंने सुदूर क्षेत्र में फैले हुए कवाइली सरदारों की बस्तियों में जाने और उन्हें समझाने का कार्य हाथ में ले लिया। दौरे में उन्हें भयंकर जंगलों में रहने वाले नर-भक्षी आदिवासियों की बस्तियों में जाना पड़ा। सो उनकी सुरक्षा का प्रबन्ध था, पर एक जगह वे बाक्कटू लोगों के नर-भक्षी कवीले की पकड़ में आ गये और अपहरण करके वहाँ पहुँचा दिये गये जहाँ वे लोग नरबलि देने का उत्सव मनाया करते थे।
नेल्स वोहेमन को भी बलिवेदी पर प्रस्तुत किया गया। वहाँ के भयंकर वातावरण को देखकर वे समझ गये कि अब उनका अन्त निकट आ गया। रस्सों से वे इस कदर जकड़े हुए थे कि बचने की कोई सम्भावना दिखाई नहीं पड़ रही थी । सबसे बड़ा आश्चर्य उन्हें इस बात से हुआ कि इन नरमेधों का सूत्र संचालन और नेतृत्व करने वाली देवी काले कबीलों में से नहीं वरन् एक गोरी यूरोपियन युवती थी। उस देवी का नाम था ‘रुआना’।
सहसा उन्हें अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ कि सभ्य देशों में उत्पन्न हुई अंग्रेजी और फ्रेंच अच्छी तरह बोल सकने वाली यह युवती आखिर इस भयंकर जंगल में किस प्रकार आ पहुँची और ऐसे नृशंस कृत्य कराने का नेतृत्व कैसे करने लगी।
कप्तान ने साहस बटोरा और मरने से पूर्व कुछ बातचीत का सिलसिला बनाकर यह जानने का प्रयत्न किया कि वह कैसे यहाँ आई, कैसे यह सब करने लगी। उतर में रुआना ने बताया था, वह फ्रेंच कुमारी है। उसका असली नाम है-’जानेटीफेव्रे’। जब वह 14 वर्ष की थी तब अपने माता-पिता के साथ काँगो सैर के लिए आई थी। नाव उलट जाने से माता-पिता तो डूब गये, पर वह बेहोश स्थिति में नदी नट पर पड़ी थी। संयोगवश कितने ही काले साँप उसके शरीर से लिपट गये। नर-भक्षियों ने मूर्च्छित सुन्दरी पर काले नागों का लिपटा होना, उसे देवी प्रकट होना मान लिया और उसे पवित्र देवी तथा स्वामिनी बना लिया। उसे उनकी मर्जी पर चलना पड़ा और रीति-रिवाजों को अपनाना पड़ा। जान बचाने के लिए कोई रास्ता न था। आरम्भ में तो आयेदिन की नरबलि उसे अखरी पर पीछे उसका मन अभ्यस्त हो गया और उन कृत्यों में ही मजा आने लगा । अब उसे नर बलि एक मनोरंजक और उत्साहवर्धक प्रथा लगती है। यहाँ से भागकर अन्यत्र जाने का उसका मन भी नहीं होता, वह अपनी वर्तमान स्थिति से पूर्णतया सन्तुष्ट है।
इतनी वार्ता के बाद कप्तान को आशा थी कि राष्ट्रसंघ के प्रतिनिधि और सभ्य गोरे होने के नाम पर वे अपने प्राणों की भिक्षा माँग सकेंगे और किसी प्रकार छुटकारा पा सकेंगे। पर इसके लिए बहुत प्रयास करने पर भी वे सफल नहीं हो सके। रुआना का मन पूर्णतया दया विहीन हो चुका था।
कप्तान ने मृत्यु से छुटकारे का अन्तिम प्रयास किया और वे किसी प्रकार अपनी पिस्तौल संभालने और गोली चलाने में सफल हो गये। उन्होंने रुआना को मार डाला-कवाइलियों में भगदड़ मच गई और वे वहाँ से भागने में सफल हो गये।
प्रकृति की अनेक शक्तियाँ हमें प्रभावित करती हैं। कई बार तो उनका उपयोगी-अनुपयोगी प्रभाव-दबाव अत्यधिक होता है, तो भी मानवी चेतना की विशेषता यह है कि वह अनुपयोगी प्रभाव से अपने को बचाने में कोई मार्ग ढूंढ़ निकालती है। उपयोगी प्रभावों से अधिक लाभान्वित होने का उपाय भी उसे मिल ही जाता है।
सर्दी-गर्मी, आँधी-तूफान, अतिवृष्टि-अनावृष्टि आदि के उलटे-सीधे झंझावात आने ढंग से चलते रहते हैं। दूसरे प्राणी अपनी शारीरिक विशेषताओं के कारण तथा प्रजनन शक्ति के कारण अपना अस्तित्व बचाये रहते हैं। मनुष्य इन दोनों ही दृष्टियों से पीछे है फिर भी प्रकृति के आघात सह सकने की व्यवस्था बना लेता है, यह उसका बुद्धि वैभव ही है।
सूर्य को ही ले, उसका अनुदान पृथ्वी पर- प्राणियों पर अनवरत रूप से बरसता है, पर यदाकदा उसकी ऐसी स्थिति भी होती है जो पृथ्वी पर अपना अनुपयोगी प्रभाव डाले। उन दबावों को रोक न सकने पर भी पूर्व जानकारी के आधार पर बचाव के उपाय ढूंढ़ लिये जाते हैं। सतर्कता बरतना आने आप में एक बड़ा उपाय है, जिससे अनायास ही बहुत कुछ बचाव हो जाता है। इसी प्रकार उसके उपयोगी संपर्क को बढ़ाकर वे लाभ पाये जा सकते हैं जो अनजान स्थिति में पड़े रहने पर मिल सकने सम्भव नहीं है।
साधारणतया सूर्य आग का एक ऐसा गोला है जिसके किसी प्रभाव को रोकना अपने लिए कठिन ही हो सकता है फिर भी सूर्योपासना के कितने ही भौतिक शक्तियों से अधिक लाभान्वित बन सकना संभव हो जाता है। अनावश्यक ताप से बचने के लिए छाया के कितने ही उपाय किये जाते हैं। सूर्य की अपनी महत्ता है और अपनी उपयोगिता। पर उससे भी अधिक प्रशंसा मानवी बुद्धि की है जो इतने समर्थ शक्ति पुंज से उपयोगी प्रभाव ग्रहण करने और अनुपयोगी से बच निकलने का रास्ता खोज लेती है।
सूर्य के उदय होते देखकर ऋषि गाता है-” प्राणः प्रजानाँ उदयति एष सूर्यः”। सन्ध्या वंदन की सूर्योपस्थान क्रिया को करते हुए गायत्री मन्त्र बोला जाता है ओर उसके माध्यम से माँगा जाता है कि सविता देव हमारी विवेक बुद्धि को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करें।
यह अध्यात्म मान्यता है जिसके अनुसार सूर्य प्राण पुंज और बुद्धि चेतना को प्रेरणा दे सकने योग्य माना जाता है।
भौतिक विज्ञान प्रत्यक्षवाद पर निर्भर रहा है। ‘प्रत्यक्ष’ की उसकी परिभाषा पिछले दिनों बहुत उथली और भोथरी थी। अब धीरे-धीरे वह पैनी ओर गहरी होती जा रही है। पिछले दिनों भौतिक विज्ञानियों की दृष्टि में वह मात्र आग का गोला था, गर्मी, रोशनी भर देता था। पदार्थ की दृष्टि से सूर्य की इतनी ही व्याख्या पर्याप्त प्रतीत हुई थी, पर अब बात आगे बढ़ गई और विचार अधिक गहराई तक होने लगा है। पिछले दिनों विज्ञान के लिए ‘पदार्थ’ ही सब कुछ था। भावना और अध्यात्म के सम्बन्ध में उपेक्षा और उदासीनता थी। अधिक से अधिक शरीर के एक अवयव मस्तिष्क की हरकतों को मनःशास्त्र के नाम से एक विशेष स्थान दिया जा सका था। श्वास-प्रवाह, रक्त संचार, स्नायु संचालन की तरह ही मस्तिष्क को भी सोचने वाला यन्त्र मान लिया गया था और उसकी हलचलों को मन, बुद्धि चित आदि की संज्ञा दे दी गई थी। इतना ‘पदार्थ’ क्षेत्र में आता है इसलिए उतना ही पर्याप्त माना गया। चेतना की गहराई को देखने समझने की दिशा में बहुत समय तक कोई कहने लायक दिलचस्पी नहीं ली गई। तद्नुसार सूर्य का भी चेतना से कुछ सम्बन्ध हो सकता है, इस पर विचार नहीं किया गया। पर अब उस संदर्भ में गहराई तक जाने और गम्भीर विचार करने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है।
सूर्य को अब जीवन का केन्द्र माना जा रहा है। वनस्पतियाँ उसी से जीवन ग्रहण करती हैं और प्राणियों को भी अपनी प्राण शक्ति के लिए बहुत करके सूर्य पर ही निर्भर रहना पड़ता है। विज्ञान स्वीकार करता है कि सूर्य और पृथ्वी के बीच की जो दूरी है वह जीवन और उत्पत्ति एवं स्थिरता के लिए आदर्श है। यदि यह दूरी कुछ घट जाय या बढ़ जाय तो फिर या तो हमारा भूलोक आग्नेय हो उठेगा या हिमाच्छादित बन जायगा तब प्राणियों या वनस्पतियों की उपस्थिति यहाँ सम्भव न हो सकेगी।
सूर्य में जो काले धब्बे हैं, वे उसमें समय-समय पर पड़ते रहने वाले खड्ड हैं। ये कभी गहरे हो जाते हैं, कभी उथले बन जाते हैं, तब वे कम या अधिक दिखाई पड़ते हैं। पहले उन धब्बों से अपना कुछ बनता-बिगड़ता नहीं माना जाता था, पर ऐसा नहीं समझा जाता है। वैज्ञानिक उन्हें बहुत बारीकी से देखते हैं और इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि इनका क्या प्रभाव-परिणाम अपनी पृथ्वी पर पड़ेगा ?
जब काले धब्बे बढ़ते हैं तो सूर्य से प्रकाश एवं गर्मी की ही नहीं दूसरे उन उपयोगी तत्वों की भी कमी पड़ जाती है जो प्राणियों के लिए विचित्र प्रकार से स्वास्थ्य संरक्षक होते हैं। जिस साल सूर्य के धब्बे बढ़ते हैं उस साल अनाज की, फलों की पैदावार कम होती है। पौधे अभीष्ट गति से नहीं पनपते। दाने पतले होते हैं और उनमें पोषक तत्व अपेक्षाकृत कम पाये जाते हैं। खाद और पानी का समुचित प्रबन्ध रहने पर भी इस कमी का कारण जब सूर्य के धब्बों में खोजा जाता है तो यह निष्कर्ष भी निकलता है कि उसमें ‘जीवनी शक्ति’ भी भरी पड़ी है जो पृथ्वी को -उस पर रहने वाली प्राणधारियों को मिलती है। इस प्रकार सूर्य मात्र गर्मी देने वाली अंगीठी और रोशनी देने वाली लैम्प के स्तर का न रहकर प्राणवान्-प्राणदाता भी बन जाता है और वैदिक ऋषि की वह आस्था सही मालूम पड़ती जिसमें उसने उदीयमान सूर्य का अभिवन्दन करते हुए उसे प्राण का उद्गम कहा था।
बात बहुत आगे बढ़ गई है। सूर्य की स्थिति का प्राणियों के शरीरों और मनः संस्थानों पर क्या प्रभाव पड़ता है? यह एक अति महत्वपूर्ण शोध विषय बन गया है। जन्मकाल को ही लें। रात्रि और दिन में जन्म लेने वालों की प्रकृति में अन्तर पाया जाता है। जहाँ सूर्य की किरणें तिरछी पड़ती है उन शीत प्रधान और जहाँ सीधी पड़ती है उन उष्णता प्रधान क्षेत्रों के लोगों की जीवनी शक्ति एवं प्रकृति में अन्तर पाया जाता है। अपने ही देश में बंगाली, पंजाबी, मद्रासी, गुजराती यों सभी भाई-भाई हैं पर उनकी शारीरिक मानसिक स्थिति में कितनी ही सूक्ष्म विशेषताएं पाई जाती है। इसका कारण उन क्षेत्रों के वातावरण की भिन्नता में पृथ्वी के विभिन्न स्थानों के साथ होने वाला सूर्य संयोग ही मुख्य आधार है। अफ्रीका के नीग्रो, इंग्लैंड के गोरे, उतरी ध्रुव के एस्किमो, चीन के मंगोलियन अपनी-अपनी आकृति-प्रकृति की भिन्नताएं रखते हैं, यों सभी एक मानव परिवार के सदस्य हैं। यह क्षेत्रीय विशेषताएं या भिन्नताएं जिस आधार पर उत्पन्न होती हैं उनमें सूर्य को प्रमुखता देनी पड़ेगी।
सूर्योपासना की वैज्ञानिक विधियों का सहारा लेकर मन और शरीर पर पड़ने वाले सूर्य के प्रभाव को न्यूनाधिक किया जाता है। सूर्य चिकित्सा के अनेक विधि विधान शारीरिक रोगों के निवारण करने में अत्यधिक सहायक सिद्ध होते हैं; जबकि ऐसे ही खुली सर्दी-गर्मी से रोगग्रस्त हो जाना सम्भव है। इसी प्रकार सूर्य मन पर पड़ने वाले प्राकृतिक प्रभाव का विश्लेषण करके ध्यान आदि उपयोगी को बढ़ाने और अनुपयोगी को हटाने का क्रम बन सकता है। सविता देवता के प्रभावों को उपासना रूपी छलनी में छानकर ग्रहण करने में पानी को छानकर पीने में उसमें घुली अस्वच्छता से बचने जैसा लाभ मिलता है। सूर्योपासना मानवी विवेक की एक अति उपयोगी उपलब्धि थी, जिसे हम क्रमशः भूलते जा रहे हैं।
सूर्य द्वारा प्राप्त होने वाली जीवनी शक्ति का- एक प्राण शक्ति का प्राकृतिक प्रभाव धरती पर-उसी प्रकृति सम्पदा और प्राणि परिवार पर पड़ता है। यह तथ्य स्पष्ट हो जाने के उपरान्त यह विचारणीय विषय हो जाता है कि क्या हम उस शक्ति को अभीष्ट मात्रा में ग्रहण करके लाभान्वित हो सकते हैं। सर्दी की ऋतु का शरीर पोषण के लिए उपयोग हो सकता है। अक्सर स्वास्थ्य संवर्धन के प्रयोग उन्हीं दिनों होते हैं। इसके विपरीत सर्दी के संपर्क में आकर निमोनिया, जुकाम जैसे रोगों को भी गले बाँधा जा सकता है। सूर्य की गर्मी रोशनी बरसती तो एक जैसी है, पर हम उसमें एक आवश्यक मात्रा ही लेते हैं। इसी प्रकार प्राणशक्ति की सन्तुलित मात्रा ही ग्रहण करें यह भी हो सकता है। सामान्य वितरण की अपेक्षा कुछ विशेष पाया, समेटा जा सकता है अथवा अनावश्यक एवं अवाँछनीय को हटाया-घटाया जा सकता है। यदि ऐसी सन्तुलित विधि हाथ लग सके तो सूर्य को योग कहा जायगा।
अग्नि का अस्तित्व अनादिकाल से संसार में मौजूद था, पर उसे मनुष्य ने पाया-पहचाना बहुत समय बाद पाने के बाद उसके उपयोग के अनेकों नियम-विधानों की प्रक्रिया क्रमशः विकसित होती गई और उससे उसी क्रम से अधिकाधिक लाभ उठा सकना सम्भव होता गया। बिजली आदि शक्तियों के बारे में भी यही बात है। सूर्य ताप का प्राकृतिक लाभ को सहज ही मिलता रहता है, आवश्यकता इस बात की है, कि उसकी प्राण शक्ति को पहचाना जाय और सर्वतोमुखी प्रगति के लिए उसका उपयोग किया जाय यों सूर्य से जो रोशनी और गर्मी मिलती है उसके भी सदुपयोग की बहुत बड़ी सम्भावना मौजूद है।
गुण, दोषों की विवेचना कर सकने वाली मानवी क्षमता सूर्य जैसी शक्तिशाली सत्ता से अपने लिए उपयोगी प्रभाव ग्रहण करने और अनुपयोगी दबाव निरस्त करने का रास्ता निकाल लेती है। वही विवेक शक्ति यदि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में काम करती रहे तो संसार में निरन्तर चलती रहने वाली सशक्त प्रतिकूलताओं में भी अपनी सुरक्षा को अक्षुण्य बनाये रह सकती है। प्रकृति की शक्तियाँ बड़ी है, पर मनुष्य की उपलब्ध विवेक शक्ति का भी कम महत्व नहीं है; जो उसका ठीक उपयोग कर सके उनके लिए बड़े संकट भी उसी तरह टल जाते हैं, जिस प्रकार सूर्य की प्रतिकूल स्थिति के कारण उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों से निपटने का कोई रास्ता निकाल लिया जाता है।
शास्त्रों में जीवन अग्नि की दो शक्तियाँ मानी गई हैं- एक ‘स्वाहा’ दूसरी ‘स्वधा’। ‘स्वाहा’ का अर्थ है-आत्म-त्याग और अधर्म से लड़ने की क्षमता। ‘स्वधा’ का अर्थ है- जीवन व्यवस्था में ‘आत्म-ज्ञान’ को धारण करने का साहस।
लौकिक अग्नि में ज्वलन और प्रकाश यह दो गुण पाये जाते हैं। इसी तरह जीवन अग्नि में उत्कर्ष की ओर बढ़ने को पुरुषार्थ और आत्म-निर्माण का संकल्प इन दो गुणों का समावेश है। भौतिक जीवन में अग्नि की उपयोगिता सर्वविदित है। आत्मिक जीवन को प्रखर बनाने के लिए उस जीवन अग्नि की आवश्यकता है, जिसे “स्वाहा” और “स्वधा” के नाम से प्रगति के लिए संघर्ष और आत्म-निर्माण के नाम से पुकारा जाता है।
चिंतन का एक भारी दोष, एक पक्षीय विचार करना है। हमें चाहिए कि हर कार्य के गुण-दोषों का उभय पक्षीय विचार करें और उसकी उपयोगिता-अनुपयोगिता पर समग्र विचार करने के उपरान्त किसी निर्णय पर पहुँचे।
प्रायः भावुकता एवं अत्युत्साह के आवेश में मनुष्य एक पक्षीय विचार क्षेत्र में इतना अधिक निमग्न हो जाता है कि दूसरा पक्ष सूझता ही नहीं और कुछ सोचा जा रहा था उसे ही उपयुक्त मान लिया जाता है। ऐसे मनुष्य अनुपयुक्त मान्यताएं बनाते हैं- अकारणीय कार्य करते हैं और पीछे जब वस्तुस्थिति सामने आती है तब अपने भूल का अनुभव करके पछताते हैं।
एकाँकी निर्णय एक प्रकार का अन्धापन है। स्वार्थान्ध, कामान्ध, क्रोधान्ध, मोहान्ध मनुष्यों को बौद्धिक दृष्टि से अपंग या असमर्थों की श्रेणी में गिना जाना चाहिए। उनमें समझ तो होती है, पर बुद्धि नहीं। बुद्धि का काम है गुण दोषों पर गम्भीर विवेचना करते हुए नीर-झीर विवेक की गहराई में उतरना-वास्तविकता, अवास्तविकता का विश्लेषण करना और तब किसी उपयुक्त निष्कर्ष पर पहुँचना।
कई बार अपनी भावुकता किसी पक्ष विशेष के समर्थन में इतनी अधिक प्रभावित हो जाती है कि मस्तिष्क में जमी हुई बात ही सर्वोत्तम या सर्वोपरि मालूम पड़ती है। उसमें लाभ ही लाभ दीखता है। अपनी मान्यता सर्वथा सत्य प्रतीत होती है। आवेश में यह दोष रहता है कि वह जिस भी भली-बुरी बात पर अड़ जाय उसी को सही और सर्वोत्तम मान लेता है। सोचने के लिए इतनी गुंजाइश रहती है नहीं कि विपरीत पक्ष, विरोधी तर्क या विकल्प पर भी विचार कर सके। हठी और दुराग्रही लोग अक्सर ऐसी ही आवेशग्रस्त भावुकता के शिकार होते हैं। वे बेईमानी से हठ नहीं करते उनकी मनःस्थिति की कुछ ऐसी विलक्षण होती है कि चिन्तन का जो प्रवाह मस्तिष्क में चल पड़ा है उससे भिन्न भी कुछ हो सकता है यह सोचने के लिए अवकाश ही नहीं रहता।
एक पक्षीय चिन्तन अधूरा और अनुपयुक्त होता है। उसमें गलत निर्णय करने- अवास्तविक निष्कर्ष पर पहुँचने ओर अवाँछनीय कार्य कर बैठने का पूरा-पूरा खतरा रहता है। यह एकाँगी चिन्तन कई बार ऐसी स्थिति में फंसा देता है जिसमें जीवन को नष्ट कर डालने जैसे जोखिम सामने आ खड़े होते हैं।
आतुर भावुकता सबसे अधिक ठगी का शिकार होती है। धूर्तों की चतुरता मनुष्य की इसी कमजोरी पर प्रहार करके उसे अपने चंगुल में फंसाती है। ’भेड़िये’ हिरन के बराबर नहीं दौड़ सकते पर उनमें यह चतुरता होती है कि एकाएक आक्रमण करके मुँह नोंचते हैं और उनकी आंखें फोड़ते हैं। अन्धा हिरन सहज ही उन भेड़ियों द्वारा दबोच लिया जाता है। शिकारी कुत्ते भी ऐसी ही धूर्तता करते हैं वे हिरन के अण्डकोषों को दाँतों से पकड़कर उन्हें आशक्त बना देते हैं और अपने से अधिक समर्थ होने पर भी शिकार करने में सफल होते हैं। ठगों का धन्धा यही होता है। वे अपनी दयनीय स्थिति बताकर भावुक लोगों की करुणा उभारते हैं और फिर उसकी हजामत उलटे उस्तरे से बनाते हैं। अनायास लाभ की मृग-मरीचिका में उलझा कर भी भोले लोगों को शिर मूंड़ा जाता है। वे आवेशग्रस्त मनःस्थिति में केवल एक पक्षीय बात सोचते हैं और ऐसे जाल में फंसते हैं कि जिसमें से निकलना बहुत भारी और कष्टसाध्य होता है।
संसार की धूर्तता से अपरिचित भावुक लड़कियाँ कामान्ध लोगों द्वारा वाग्-जाल में फंसा ली जाती है। जो कहा जा रहा है, जो आश्वासन जा रहे हैं वे आदि से अन्त तक फरेब हैं यह उन्हें विदित ही नहीं होता। कथनी और करनी में कुछ अन्तर भी हो सकता है, ऐसी आशंका जिन्हें नहीं रहती, वे भोली लड़कियाँ ऐसे जंजाल में फंस जाती है है फिर उनके भविष्य में अन्धकार के अतिरिक्त और कुछ शेष ही नहीं रहता। कुछ ही दिन में उन्हें पता चल जाता है कि उन्हें सिर्फ ठगा गया था। यह समझ जब आती है तब बहुत समय आगे बढ़ गया होता है और अपनी भूल पर पछताना ही हाथ रह जाता है।
बेशक दुनिया में सभी बुरे नहीं होते हैं- और विश्वास करके भी चलना पड़ता है पर किसी के भले-बुरे या विश्वस्त-अविश्वस्त होने की बात कड़ी कसौटी पर कसनी चाहिए और आग में तपाई जानी चाहिए। यदि यथार्थता असंदिग्ध दीखे तो ही विचार को कार्य का रूप देना चाहिए। दूसरों का सहयोग लेने या देने से पूर्व काफी शंकाशील रहने और तथ्यों का गहराई से पता लगाने की आवश्यकता है। यदि स्थिति संदिग्ध दिखाई पड़े तो सहयोग का आदान-प्रदान उतनी ही सीमा तक करना चाहिए, जिससे खतरे के बिन्दु तक न पहुँचा जाय।
कोई व्यक्ति न तो पूर्णतया बुरा है और न अच्छा। हर किसी में कुछ दोष पाये जाते हैं और कुछ गुण रहते हैं। जागरुकता का तकाजा यह है कि दोषों से बचते हुए उसके गुणों से ही लाभ उठाया जाय। किसी व्यक्ति को न तो पूरा देवता मान लेना चाहिए और न असुर। दोनों स्थितियों के समन्वय से जो कुछ बनता है उसी का नाम मनुष्य है। इसलिए उस पर न तो पूरी तरह अविश्वास किया जा सकता है और न विश्वास। इसी प्रकार किसी को सर्वथा उपयोगी या अनुपयोगी भी नहीं कहा जा सकता। हमें दूसरों से व्यवहार करते समय इस तथ्य को सतर्कतापूर्वक ध्यान में रखना चाहिए कि अमर्यादित निर्भरता के शिकार न बन जाय। गरम दूध से जलने का खतरा उन्हें कम ही उठाना पड़ता है जिनने छाछ को भी फूँककर पीना सीख लिया है। भावुकता के तूफान में फंसकर अपने अस्तित्व को संकट में डालने के खतरे से ऐसे विचारशील लोग सहज ही बच जाते हैं। ठगी के जाल में फंसकर वे अपनी उतनी हानि नहीं करते जितनी कि आतुर भावुकता से ग्रसित लोगों को उठानी पड़ती है।
न्यायाधीश दोनों पक्ष की बातें ध्यानपूर्वक सुनता है। वादी और प्रतिवादी पक्ष के वकील अपने समर्थन और दूसरे के विरोध में दलीलें प्रस्तुत करते हैं। दोनों के प्रतिपादनों में कितना औचित्य है, कितना अनौचित्य इसका विवेचन विश्लेषण न्यायाधीश की निष्पक्ष बुद्धि करती है। मंथन के बाद ही नवनीत निकलता है। समर्थन और विरोध में जितना कुछ सामने आवेगा सही निर्णय पर पहुँचने में उतनी ही सरलता रहेगी। विवेचन की गहराई में उतरे बिना तथ्यों के मोती हाथ नहीं आते।
हम आज जो सोचते हैं, जिसे सही समझते या समर्थन करते हैं, उसके प्रतिपक्ष को दलीलों को, सामने रखना चाहिए और तुलनात्मक विश्लेषण करके वस्तुस्थिति समझने का प्रयत्न करना चाहिए। यही सत्य तक पहुँचने का सही तरीका है। यदि एक पक्ष की बात ही पकड़े रहा जाय और दूसरे पक्ष की बात सुनने से इनकार किया जाता रहे तो फिर हम पक्षपाती और दुराग्रही ही कहे जाते रहेंगे। सत्य के साथ अपना दूर का भी रिश्ता न रहेगा। यद्यपि प्रतीत वह दुराग्रह भी सत्य जैसा ही होगा।
जिस वातावरण में हम रहते है- जिस वंश, कुल या धर्म में पैदा होते हैं स्वभावतः उसकी मान्यताएं एवं परिस्थितियाँ अभ्यास में आ जाती हैं और अनुकूल लगती हैं। उन्हें ही सत्य, तथ्य एवं उपयुक्त माना जाने लगता है। सहज चेतना उसी का समर्थन करती है और उसी को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए औंधे-सीधे तर्क एवं प्रमाण गढ़ कर खड़े करती है। जो उसी स्थिति से सन्तुष्ट हैं, वे एक पक्षीय चिन्तन के शिकार रहेंगे और यदि सत्य उन मान्यताओं से भिन्न पड़ता होगा तो उस सत्य को भी असत्य ठहराने में न चूकेंगे। इससे आत्मतुष्टि भले ही हो जाय सत्य की पुष्टि नहीं हो सकती। आवश्यक नहीं कि अपने अभ्यास या संपर्क की मान्यताएं ही सही हों। हो सकता कि वे भी उतनी ही असत्य हो जितना कि आज हम प्रतिपक्षी विचारों को अमान्य ठहराते हैं।
दुराग्रह में कितने ही खतरे हैं। सबसे बड़ा खतरा यह है कि हर वर्ग इस मूढ़ता का शिकार होकर अपनी ही बात पर अड़ेगा और दूसरों को उसे ही मारने के लिए विवश करेगा। इससे विग्रह भी बढ़ेगा और विद्वेष भी। भूतकाल में एक धर्म मान्यता को दूसरे धर्म वालों पर लादने के लिए कितने अत्याचार, बलात्कार किये गये हैं, इसके रोमाँचकारी विवरणों को पढ़ने से समूची धर्म सत्ता से ही घृणा होने लगती है और यह सोचना पड़ता है कि जिस धर्म के लिए इतनी नृशंसता बरती जा सकती है उसे अपनाकर भला किस का क्या हित साधन हो सकता है ? वस्तुतः यह अत्याचार धर्म के लिए आग्रह एवं पक्षपात के उन्माद में किये गये थे। धर्म इतना विस्तृत है कि उसमें जितना अंश अपनी मान्यताओं में है उतना ही प्रतिपक्षी के धर्म में भी हो सकता है। मधुमक्खी की तरह सब धर्मों में से सारभूत तत्व लेकर ही हम समग्र धर्मों के निकट पहुँच सकते हैं। इसके लिए दूरदर्शी विवेक विकास करना होगा। अन्यथा पक्षपाती मान्यताएं ही यथार्थता का छद्मवेश धारक करके हमारी आँखों पर पर्दा डालती रहेगी और बुद्धि को झुठलाती रहेगी।
व्यक्तिगत जीवन के चिन्तन और कर्तव्य को यथार्थता की कसौटी पर कसना चाहिए और अपने गुण, कर्म, स्वभाव को- अभिरुचि एवं आकाँक्षा को सत्य के अधिकतम निकट पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिए। मूढ मान्यताओं से अपना मस्तिष्क घिरा हो सकता है और अपनी आदतों, अभिरुचियों एवं आकाँक्षाओं में गहरी अवाँछनीयता घुसी हो सकती है। इसे समीक्षात्मक बुद्धि से ही जाना परखा जा सकता है। अन्यथा हर मूर्खता और दृष्टता का भी समर्थन करने के लिए कुछ न कुछ तर्क मस्तिष्क में गढ़े ही जाते रहेंगे। हमारा व्यक्तित्व कभी भी परिष्कृत न हो सकेगा। निष्पक्ष समीक्षा ही हमें सत्य के निकट पहुँचाती है और उसी को अपनाकर हम कल्याणकारी आधारों को उपलब्ध करते हैं।
समाज में प्रचलित अनेकों मान्यताएं ऐसी है जिनकी आज की स्थिति में कोई उपयोगिता नहीं रही फिर भी वे धर्म, संस्कृति, दर्शन अथवा राजनीति के स्तर पर अपना अड्डा जन-मानस में जमाये बैठी है। पृथक-पृथक जातियों, धर्मों, संस्कृतियों राष्ट्रों भाषाओं का विभेद मानव जाति के लिए अभिशाप बनकर ही रह रहा है। इन विभेदों को एकता के - एकरूपता के स्तर पर विकसित करना पड़ेगा। विज्ञान ने दुनिया को छोटे से गाँव, मुहल्ले के रूप में समीप ला दिया है अब हम एक मानव जाति के रूप में-एक प्रकार के आचार-व्यवहार को-अपनाकर ही सुख शान्ति से रह-
रूस के उपन्यासकार और नोबेल पुरस्कार विजेता डा0 बोरिस पास्तरनाक ने अपनी पुस्तक ‘डाक्टर जिवागो’ में एक स्थान पर लिखा है -” जो लोग स्वतन्त्र नहीं होते हैं वे अपनी गुलामी को ही आदर्श बना लेते हैं।” इस तथ्य को हम अपने चारों ओर बिखरा देखते हैं। जिन्हें ज्ञान की राह मालूम नहीं उनके लिए अज्ञान ही आदर्श है। जो सत्य से दूर है उनके लिए असत्य ही आग्रह बन जाता है।
सकते हैं। इस संदर्भ में पूर्व मान्यताओं, परम्पराओं एवं आग्रहों को इस कसौटी पर कसना होगा कि उनमें समय के अनुरूप औचित्य कितनी मात्रा में शेष है। सत्य तथ्य एवं औचित्य को ध्यान में रखकर हमें अपनी विचारणा, रीति-नीति, समाज व्यवस्था अभिरुचि एवं मान्यताओं का नवीनीकरण करना होगा। यह तभी सम्भव है जब पूर्व पक्ष और उतर पक्ष के गुण, दोषों की निष्पक्ष समीक्षा की जा सके और उचित निष्कर्ष पर पहुँचा जा सके। इसके लिए हमें आतुर भावुकता, पक्षपात, एकाँगी चिन्तन को तिलांजलि देनी पड़ेगी। इस प्रयोजन को जितनी जल्दी पूरा कर सकें उतना ही व्यक्ति और समाज का कल्याण है।
जो कुछ हम देखते, जानते या अनुभव करते हैं- क्या वह सत्य है ? इस प्रश्न का मोटा उतर हाँ में दिया जा सकता है; क्योंकि जो कुछ सामने है, प्रत्यक्ष है, अनुभव किया जा रहा है, उसके असत्य होने का कोई कारण नहीं। चूँकि हमें अपने पर, अपनी इन्द्रियों और अनुभूतियों पर विश्वास होता है इसलिए वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति के बारे में जो समझते हैं, उसे भी सत्य ही मानते हैं। इतने पर भी जब गहराई में उतरते हैं, तो प्रतीत होता है कि हमारी मान्यताएं और अनुभूतियाँ हमें नितान्त सत्य का बोध कराने में असमर्थ हैं। वे केवल पूर्व मान्यताओं की अपेक्षा से ही कुछ अनुभूतियाँ करती हैं। यदि पूर्व मान्यताएं बदल जायं तो फिर अपने सारे निष्कर्ष या अनुभव भी बदलने पड़ेंगे।
हमारा बुद्धि संस्थान केवल अपेक्षाकृत स्तर जानकारियाँ दे सकने में ही समर्थ है। इतने से यदि सन्तोष होता हो तो यह कहा जा सकता है कि हम जो जानते या मानते हैं वह सत्य है। किन्तु अपनी मान्यताओं को ही यदि नितान्त सत्य की कसौटी पर कसने लगें तो प्रतीत होगा कि यह बुद्धि संस्थान की बेतरह भ्रम ग्रसित हो रहा है फिर उसके सहारे नितान्त सत्य को कैसे प्राप्त किया जाय ? यह एक ऐसा विकट प्रश्न है जो सुलझाये नहीं सुलझता।
वजन जिनके आधार पर वस्तुओं का विनिमय चल रहा है एक मान्यता प्राप्त तथ्य है। वजन के बिना व्यापार नहीं चल सकता। पर वजन सम्बन्धी हमारी मान्यताएं क्या सर्वथा सत्य हैं ? इस पर विचार करते हैं तो पैरों तले से जमीन खिसकने लगती है। वजन का अपना अस्तित्व नहीं। पृथ्वी की आकर्षण शक्ति का जितना प्रभाव जिस वस्तु पर पड़ रहा है उसे रोकने के लिए जितनी शक्ति लगानी पड़ेगी वही उसका वजन होगा। तराजू बाटों के आधार पर हमें इसी बात का पता चलता है और उसी जानकारी को वजन मानते हैं, पर यह वजन तो घटता-बढ़ता रहता है। पृथ्वी पर जो वस्तु एक मन भारी है वह साड़े तीन मील ऊपर आकाश में उठ जाने पर आधी अर्थात् बीस सेर रहा जायगी। इससे ऊपर उठने पर वह और हलकी होती चली जायगी। पृथ्वी और चन्द्रमा के बीच जगह ऐसी आती है जहाँ पहुँचने पर उस वस्तु का वजन कुछ भी नहीं रहेगा। वहाँ अगर एक विशाल पर्वत भी रख दिया जाय तो वह बिना वजन का होने के कारण जहाँ का तहां लटका रहेगा। अन्य ग्रहों की गुरुता और आकर्षण शक्ति भिन्न है वहाँ पहुँचने पर अपनी पृथ्वी का भार माप सर्वथा अमान्य ठहराया जाय। ऐसी दशा में यही कहा जा सकता है कि वजन सापेक्ष है। किसी पूर्वमान्यता, स्थिति या तुलना के आधार पर ही उसका निर्धारण हो सकता है।
लोक व्यवहार की दूसरी इकाई है ‘गति’। वजन की तरह ही उसका भी महत्व है। गति ज्ञान के आधार पर ही एक स्थान के दूसरे स्थान तक पहुँचने के विभिन्न साधनों का मूल्यांकन होता है; पर देखना यह है कि ‘गति’ के सम्बन्ध में हमारे निर्धारण नितान्त सत्य की कसौटी पर खरे उतरते हैं या नहीं।
हम अपनी कुर्सी पर बैठे लिख रहे हैं और जानते हैं कि स्थिर है। पर वस्तुतः एक हजार प्रति घण्टा की चाल से हम एक दिशा में उड़ते चले जा रहे हैं। पृथ्वी की यही चाल है। पृथ्वी पर बैठे होने के कारण हम उसी चाल से उड़ने के लिए विवश हैं। यद्यपि यह तथ्य हमारी इन्द्रियजन्य जानकारी की पकड़ में नहीं आता और निरन्तर स्थिरता प्रतीत होती है। पैरों से या सवारी से जितना चला जाता है, उसी को गति मानते हैं।
पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, इसलिए इस क्षण जहाँ हैं वहाँ वापिस 24 घण्टे बाद ही आ सकेंगे। पर यह सोचना भी व्यर्थ है; क्योंकि पृथ्वी 666000 मील प्रति घण्टा की चाल से सूर्य की परिक्रमा जिये दौड़ी जा रही है। वह आकाश में जिस जगह है वहाँ लोट कर एक वर्ष बाद ही आ सकती है; किन्तु यह मानना भी मिथ्या है क्योंकि सूर्य महासूर्य की परिक्रमा कर रहा है और पृथ्वी समेत अपने सौर परिवार के समस्त ग्रह उपग्रहों को लेकर और भी तीव्र गति से दौड़ता चला जा रहा है और वह महासूर्य अन्य किसी अति सूर्य की परिक्रमा कर रहा है। यह सिलसिला न जाने कितनी असंख्य कड़ियों से जुड़ा होगा। अस्तु एक शब्द में यों कह सकते हैं कि जिस जगह आज हम है कम से कम इस जन्म में तो वहाँ फिर कभी लौट कर आ ही नहीं सकते। अपना आकाश छूटा तो सदा सर्वदा के लिए छूटेगा। इतने पर भी समझते यही रहते हैं कि जहाँ थे उसी क्षेत्र, देश या आकाश के नीचे वहीं जन्म भर बने रहेंगे।
स्थान की भाँति गति की मात्रा भी भ्रामक है। दो रेल गाड़ियां समान पटरियों पर साथ-साथ दौड़ रही हों तो वे साथ-साथ हिलती-जुलती भर दिखाई पड़ेगी दो मोटरें आमने सामने से आ रही हों और दोनों चालीस-चालीस मील प्रति घण्टे की चाल से चल रही हों तो जब वे बराबर से गुजरेंगी तो 80 मील की चाल का आभास होगा। जब कभी आमने सामने से आती हुई रेल गाड़ियाँ बराबर से गुजरती है तो दूना वेग मालूम पड़ता है; यद्यपि वे दोनों ही अपनी-अपनी साधारण चाल से चल रही है वही गति और दिशा अन्य ग्रह नक्षत्रों की रही होती तो आकाश पूर्णतया स्थिर दीखता। सूर्य तारे कभी न उगते न चलते न डूबते। जो जहाँ हैं वहीं सदा बना रहता। तब पूर्ण स्थिरता की अनुभूति होते हुए भी सब गतिशीलता यथावत् रहती।
गति सापेक्ष है। अन्तर कितनी ही तरह निकला जा सकता है। सौर में से नब्बे निकालने पर दस बचते हैं। तीस में से बीस निकालने पर भी-पचास में से चालीस निकालने पर भी दस बचेंगे। अन्तर एक ही निकले इसके लिए अनेकों अंकों का अनेक प्रकार से उपयोग हो सकता है। इतनी भिन्नता रहने पर भी परिणाम में अन्तर न पड़ेगा। एक हजार का जोड़ निकालना हो तो कितने ही अंकों का कितनी ही प्रकार से वही जोड़ बन सकता है। गति मापने के बारे में भी यही बात है। भूतकाल के खगोलवेत्ता सूर्य को स्थिर मान कर ग्रह गणित करते रहे हैं। चन्द्र-ग्रहण, सूर्य-ग्रहण सौर मण्डल के ग्रह-उपग्रहों का उदय अस्त दिन मान, रात्रि मान आदि इसी आधार पर निकाला जाता रहा है। फिर भी वह बिलकुल सही बैठता रहा है। यद्यपि सूर्य को स्थिर मानकर चलने की मान्यता सर्वथा मिथ्या है। मिथ्या आधार भी जब सत्य परिणाम प्रस्तुत करते हैं; तो फिर सत्य असत्य का भेद किस प्रकार किया जाय, यह सोचने तक बुद्धि थककर बैठ जाती है।
दिशा का निर्धारण भी लोक व्यवहार में आवश्यक है। इसके बिना भूगोल नक्शा, यातायात की कोई व्यवस्था ही न बनेगी। रेखा गणित में आड़ी, सीधी, तिरछी रेखाओं को ही आधार माना गया है। दिशा ज्ञान के बिना वायुयान और जलयानों के लिए निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकना ही सम्भव न होगा। पूर्व, पश्चिम आदि आठ और दो ऊपर नीचे की दिशो दिशाएं लोक व्यवहार की दृष्टि से महत्वपूर्ण आधार हैं, पर ‘नितान्त सत्य’ का आश्रय लेने पर यह दिशा मान्यता भी लड़खड़ा कर भूमिसात् हो जाती है।
यह लम्बी नाली लगातार खोदते चले जायं तो प्रतीत होगा कि वह सीधी समतल जा रही है, पर वस्तुतः वह गोलाई में ही खुद रही है और वह क्रम चलता रहने पर खुदाई उसी स्थान पर आ पहुँचेगी जहाँ से वह आरम्भ हुई थी। रबड़ की गेंद पर बिलकुल सीधी रेखा खींचने का मतलब उसके दोनों सिरों का अन्तर सदा बना रहना ही होना चाहिए, पर जब वे अंततः एक में आ मिले तो फिर सीधी लकीर कहाँ हुई ? कागज पर जमीन पर या कहीं भी छोटी बड़ी सीधी लकीर खींची जाय वह कभी भी सीधी नहीं हो सकती। स्वल्प गोलाई अपने नाप साधनों से भले ही पकड़ में न आवे, पर वस्तुतः वह गोल ही बन रही होगी। जिस भूमि को हम समतल समझते हैं वस्तुतः वह भी गोल है। समुद्र समतल दीखता है, पर उस पर चलने वाले जहाजों का मस्तूल ही पहले दीखता है इससे प्रतीत होता है कि पानी समतल प्रतीत होते हुए भी पृथ्वी के अनुपात में गोलाई लिए हुए है। जमीन पर खड़े होकर जमीन और आसमान मिलने वाला क्षितिज प्रायः 3 मील पर दिखाई पड़ता है पर यदि दो सौ फुट ऊंचाई पर चढ़ कर देखें तो वह बीस मील दूरी पर मिलता दिखाई देगा। यह बातें पृथ्वी की गोलाई सिद्ध करती हैं। फिर भी मोटी बुद्धि से उसे गोल देख पाने का कोई प्रत्यक्ष साधन अपने पास नहीं है। वह समतल या ऊंची-नीची दीखती है गोल नहीं। ऐसी दशा में हमारा दिशा ज्ञान भी अविश्वस्त ही ठहरता है।
चन्द्रमा हमसे ऊंचा है पर यदि चन्द्रतल पर जा खड़े हों तो प्रतीत होगा कि पृथ्वी ऊपर आकाश में उदय होती है सौर मण्डल से बाहर निकल कर कहीं आकाश में हम जा खड़े हों तो प्रतीत होगा कि पूर्व, पश्चिम, उतर, दक्षिण ऊपर नीचे जैसी कोई दिशा नहीं है। दिशाज्ञान सर्वथा अपेक्षाकृत है। दिल्ली, लखनऊ से पश्चिम से पश्चिम में बम्बई में पूर्व से मद्रास में उतर से और हरिद्वार से दक्षिण में है। दिल्ली किस दिशा में यह तो कहना किसी की तुलना अपेक्षा ही सम्भव हो सकता है वस्तुतः वह दिशा विहीन है।
समय की ईकाई लोक व्यवहार में एक तथ्य है। घण्टा मिनट के सहारे ही दफ्तरों का खुलना बन्द होना रेलगाड़ियों का चलना रुकना-संभव होता है। अपनी सारी दिनचर्या समय के आधार पर ही बनती है। पर समय की मान्यता भी असंदिग्ध नहीं है। सूर्योदय और सूर्यास्त का समय वही नहीं होता जो हम देखते या जानते हैं। जब हमें सूर्य उदय होते दीखता है उससे प्रायः 8॥ मिनट पहले ही उग चुका होता है। उसकी किरणें पृथ्वी तक आने में इतना समय लग जाता है। अस्त होता जब दीखता है, उससे 8॥ मिनट पूर्व ही वह डूब चुका होता है। आकाश में कितने ही तारे ऐसे हैं जो हजारों वर्ष पूर्व अस्त हो चुके पर वे अभी तक हमें चमकते दीखते हैं। यह भ्रम इसलिए रहता है कि उनका प्रकाश पृथ्वी तक आने में हजारों वर्ष लग जाते हैं। जब वे वस्तुतः अस्तु हुए है उसकी जानकारी अब कहीं इतनी लम्बी अवधि के पश्चात हमें मिल रही है। सौर मण्डल के अपने ग्रहों के बारे में भी यही बात है, वे पंचांगों में लिखे समय से बहुत पहले या बाद में उदय तथा अस्त होते हैं।
जो तारा हमें सीध में दीखता है आवश्यक नहीं है कि उसी स्थिति में है। प्रकाश की गति सर्वथा सीधी नहीं है। प्रकाश भी एक पदार्थ है और उसकी भी तोल है। एक मिनट में एक वर्ग मील जमीन पर सूर्य का जितना प्रकाश गिरता है उसका वजन प्रायः एक ओंस होता है। पदार्थ पर आकर्षण शक्ति प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। तारों का प्रकाश सौर मण्डल में प्रवेश करता है तो सूर्य तथा अन्य ग्रहों के आकर्षण के प्रभाव से लड़खड़ाता हुआ टेढ़ा तिरछा होकर पृथ्वी तक पहुँचता है। पर हमारी आंखें उसे सीधी धारा में आता हुआ अनुभव करती है। हो सकता है कि कोई तारा सूर्य या किसी अन्य ग्रह की ओट में छिपा बैठा हो पर उसका प्रकाश हमें आँखों की सीध में दीख रहा हो। इसी प्रकार ठीक सिर के ऊपर चमकने वाला तारा वस्तुतः उस स्थान पर बहुत नीचा या तिरछा भी हो सकता है। इस प्रकार दिशा ही नहीं समय सम्बन्धी मान्यताएं भी निभ्रान्त नहीं है।
दार्शनिक विवेचनाओं से देश, काल का उल्लेख होता रहता है। उसे कोई मुल्क या घण्टा मिनट वाला समय नहीं समझ लेना चाहिएं यह पारिभाषिक शब्द है। वस्तुओं की लम्बाई चौड़ाई मोटाई को ‘देश’ कहा जाता है और उनके परिवर्तन को ‘काल’। आमतौर से वस्तुएं देश की अर्थात् लम्बाई, चौड़ाई, मोटाई के आधार पर ही देखी जाती है जब कि उनकी व्याख्या विवेचना करते हुए काल का चौथा ‘आयाम’ भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। किन्तु गतियाँ और दिशाएं अनिश्चित भी हैं और भ्रामक भी। काल तो उन्हीं पर आश्रित है यदि आधार ही गड़बड़ा रहा है तो काल का परिणाम कैसे निश्चित हो। अस्तु वस्तुओं को तीन आयाम की अपेक्षा चार आयाम वाली भी कहा जाय तो भी बात बनेगी नहीं। वस्तुएं क्या है ? उनका रूप, गुण, कर्म, स्वभाव क्या है ? यह कहते नहीं बनता क्योंकि उनके परमाणु जिस द्रुतगति से भ्रमणशील रहते हैं उस अस्थिरता को देखते हुए एक क्षण में गई व्याख्या दूसरे क्षण परिवर्तित हो जायगी।
कौन बड़ा कौन छोटा इसका निश्चय भी निःसंकोच नहीं किया जा सकता है। पाँच फुट की लकड़ी छह फुट वाली की तुलना में छोटी है आर चार फुट वाली की तुलना में बड़ी। एक फुट मोटाई वाले तने की तुलना में दो फुट वाला मोटा अधिक है और दो फुट वाले की तुलना में एक फुट वाला पतला। वह वस्तुतः मोटा है या पतला ऐसा कुछ नहीं कहा जा सकता । तुलना बदलते ही यह छोटा या बड़ा होना-पतला और मोटा होना सहज ही बदल जायगा।
कौन धनी है और कौन निर्धन, कौन सुखी है और कौन दुःखी, कौन सन्त है, कौन ज्ञानी है कौन अज्ञानी कौन सदाचारी है, कौन दुराचारी, इसका निर्णय अनायास ही कर सकना असम्भव है। इस प्रकार का निर्धारण करने से पूर्व यह देखना होगा कि किस की तुलना में यह निर्णय किया जाय। नितान्त निर्धन की तुलना में वह धनी है जिसके पास पेट भरने के साधन हैं। किन्तु लक्षाधीश की तुलना में वह निर्धन ही है। जिसे दस कष्ट हैं उसकी तुलना में तीन कष्ट वाली सुखी है, पर एक कष्ट वाले की तुलना में वह दुखी है यह नहीं कहा जा सकता। डाकू की तुलना में चोर सहृदय है किन्तु उठाईगीरे की तुलना में वह भी अधिक दुष्ट है। एक सामान्य नागरिक की तुलना में उठाईगीरा भी दुष्ट है; जबकि वह सामान्य नागरिक भी सन्त की तुलना में पिछड़ा हुआ है गया-गुजरा है। सन्त भी किसी महा सन्त आत्मत्यागी शहीद की तुलना में हलका बैठेगा।
अपेक्षा से हम किसी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति का मूल्याँकन करते हैं तुलना ही एक मोटी कसौटी हमारे पास है जिससे किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। जिनके बारे में वह निर्धारण किया गया है वे वस्तुतः क्या हैं? इसका पता लगाना अपनी ज्ञानेन्द्रियों के लिए जिनके मस्तिष्क भी सम्मिलित है, अति कठिन है। क्योंकि वे सभी अपूर्ण और सीमित हैं। कई अर्थों में तो उन्हें भ्रान्त भी कहा जा सकता है। सिनेमा के पर्दे पर तस्वीरें चलती-फिरती दिखाई देती हैं वस्तुतः वे स्थिर होती है; उनके बदलने का क्रम ही इतना तेज होता है कि आंखें उसे ठीक तरह पकड़ नहीं पाती और आकृतियों को ही हाथ पैर हिलाती, बोलती, गाती समझ बैठती हैं।
हमारी अपूर्ण क्षमताएं तब और भी अधिक गड़बड़ा जाती हैं जब हम अवाँछनीय तुलना करने पर उतारू हो जाते हैं। इस दुहरी मार से लड़खड़ाई हुई चेतना हमें उस स्थिति में पटक देती है जिसे हम भ्रम अज्ञान एवं माया कहते हैं। वेदान्त दर्शन का प्रतिपादन यह है कि संसार मिथ्या और स्वप्न है। परमाणुओं की द्रुतगामी हलचलों को न समझते हुए आंखें जब वस्तुओं को स्थिर देखती है तो वैज्ञानिकों को यही कहना पड़ता है कि हम सब वस्तुस्थिति नहीं समझ पाते , मात्र स्वप्न देखते हैं। अपेक्षा का माप दण्ड सही न रखकर ही हम खीचते झल्लाते, रोते-कलपते ओर दुःख-शोक के सागर में डूबते उतराते हैं। बाहरी परिस्थितियों के बारे में वह मान्यता बनाते हैं, जिनकी यथार्थता असंदिग्ध है। सत्य का आग्रह भर करते हैं, पर नितान्त सत्य क्या है- यह समझ सकना ही अपने बुद्धि संस्थान एवं इन्द्रिय चेतना के लिए अति कठिन है।
शाश्वत सत्य को प्राप्त करने के लिए हमें उच्चस्तरीय आदर्शों का आश्रय लेना पड़ेगा। मानवी गरिमा का उज्ज्वल रूप है जिनकी आवश्यकता अन्तरात्मा को निरन्तर होती रहती है और हर स्थिति का व्यक्ति अपने प्रति दूसरों से वैसी ही अपेक्षा करता है। हम चाहते हैं दूसरों का व्यवहार हमारे प्रति सज्जनता, प्रामाणिकता और उदारता से परिपूर्ण हो यही आत्यान्तिक सत्य है। वस्तुओं व्यक्तियों और परिस्थितियों में सुख ढूंढ़ने की अपेक्षा जब हम मनःस्थिति का भावनात्मक परिष्कार करते हुए दिव्य चिन्तन को अपनाने के लिए तत्पर होते हैं, तो अपना आपा ही इतना सर्वांग सुन्दर बन जाता है कि बाहर भटकने की अपेक्षा अन्तरात्मा के आलोक में निरन्तर आनन्द मग्न रहा जा सके। यह आत्मबोध ही यथार्थ ज्ञान है जो इंद्रियानुभूति से नहीं परिष्कृत आत्मचेतना से ही उपलब्ध हो सकता है।
यह संसार विकसित हो रहा है; क्योंकि हम विकास की ओर अग्रसर हो रहे हैं। अति प्राचीनकाल में यह धरती एक फर्श की तरह थी, उस पर नीले आसमान की चाँदनी टंगी थी, जिसमें छोटे-छोटे सितारों के जुगनू चमकते थे और सूर्य चन्द्रमा के रूप में दो झाड़ फानूस टंगे थे। समुद्र एक छोटे तालाब कि तरह था पर अब बात बहुत आगे बढ़ गयी है। अब हमारी पृथ्वी विशालकाय ब्रह्माण्ड की एक राई-रत्ती जितनी छोटी सदस्या है। उसके जैसे असंख्य पिण्ड इस अनन्त आकाश में छितरे पड़े है। समूचे ब्रह्माण्ड का विस्तार मनुष्य की कल्पना शक्ति के बाहर है। अपनी धरती पर भी जितना दृश्य पदार्थ है उसे असंख्य गुना विस्तृत और शक्तिशाली वह है जो विद्यमान रहते हुए भी अदृश्य है। प्राचीन और अर्वाचीन कल्पनाओं में कितना विचित्र अन्तर है अपने इसी विश्व ब्रह्माण्ड के बारे में। हम बढ़े हैं- हमारे ज्ञान एवं साधन क्षेत्र का विस्तार हुआ है। तद्नुसार यह विश्व भी अधिकाधिक विस्तृत होता चला गया है। भविष्य में जिस गति से हम बढ़ेंगे हमारा विश्व भी उसी अनुपात से अधिक विकसित होता चला जायगा।
यूनान के लोग मानते थे कि पृथ्वी हरक्यूलस देवता के खम्भे पर टंगी है। हम लोग शेषनाग के फन पर, गाय के सींग पर एवं कछुए की पीठ पर उसे टिकी मानते थे। सूर्य देवता के रथ में सात घोड़े जुते होने और अरुण सारथी द्वारा हाँके जाने की मान्यता को अब सूर्य किरणों के सात रंग और अरुण को प्रभात कालीन रक्ताभ आलोक कहकर सामयिक साधन करना पड़ा।
किसी समय चटाई की तरह चपटी बिछी रहने वाली पृथ्वी को हिरण्याक्ष कागज की तरह लपेट कर भाग गया था और समुद्र में जा छिपा था तथा विष्णु भगवान ने बाराह बनकर उससे छीनकर छुड़ाया था। आज वे बाते बाल कल्पना हैं। पृथ्वी के लपेटे जाने की बात उसी पर भरे हुए समुद्र में छिपा लेने की बात अब समझ की परिधि से बाहर है पर किसी समय यही मान्यता शिरोधार्य थी। विद्वान आर्य भट्ट ने पांचवीं शताब्दी में पहली बार उसे गोल गेंद की तरह बताया। पीछे बारहवीं शताब्दी में भास्कराचार्य ने उसमें आकर्षण शक्ति होने की बात भी जोड़ दी। प्राचीन ज्योतिष विज्ञान धरती को स्थिर और सूर्य को चल मानता था, सहज बुद्धि वही बता सकती थी। पर पीछे पृथ्वी को भी भ्रमणशील बताया गया, तो बताने वालों को उपहासास्पद ही नहीं माना गया वरन् उन्हें नास्तिकता के अपराध में शूली पर भी चढ़ा दिया गया।
अब हम अनन्त विश्व के एक नगण्य से घटक बन कर रह रहे हैं। अपने विश्व की असंख्य निहारिकाएं है। वे इतनी बड़ी हैं कि उनके एक कोने में करोड़ों सूर्य पड़े रह सकें। वे हमसे इतनी दूर है कि उनका प्रकाश पृथ्वी तक आने में लाखों प्रकाश वर्ष लग जाते हैं जबकि प्रकाश एक सेकिण्ड में एक लाख छियासी हजार मील की चाल से चलता है। आसमान में जो तारे दिखाई पड़ते हैं उनमें से कई तो अपने सूर्य से भी हजारों गुने बड़े महासूर्य हैं। उनके अपने-अपने सौरमण्डल तथा ग्रह-उपग्रह हैं जो अपनी आँखों को दिखाई नहीं पड़ते। वे आपस में नजदीक दीखते भर हैं वस्तुतः उनके बीच का फासला अरबों खरबों मील है। वे सभी एक दूसरे के साथ पारस्परिक आकर्षण शक्ति के रस्सों से बंधे हैं। आकाश के नीचे गिरने या ऊंचे उछलने जैसी कोई शक्ति नहीं है। उस पोल में हर वस्तु अधर में सहज ही लटकी रह सकती है। हलचल तो ग्रह नक्षत्रों की अपनी आकर्षण शक्ति के कारण उत्पन्न होती है। उसी के प्रभाव से वे अपनी धुरी पर तथा कक्षा में घूमते हैं। यह बातें सुनने में बड़ी विचित्र लगती हैं, पर हैं सत्य। अब से कुछ सौ वर्षों तक इन बातों पर कोई विश्वास नहीं कर सकता था, पर अब हम बढ़े हैं और हमारा विश्व बढ़ा है। अस्तु इन मान्यताओं को स्वीकार करने में कोई आपत्ति नहीं होती।
अपने सौरमण्डल का केन्द्र सूर्य है। उसका व्यास पृथ्वी से 109 गुना वजन तीन लाख तीस हजार गुना और घनफल तेरह लाख गुना बड़ा है। उसके एक वर्ग इंच स्थान में तीन लाख मोमबत्तियों से मिलकर होने जितना प्रकाश है, गर्मी छह हजार डिग्री जिसकी तुलना में अपनी धरती की आग की बरफ जैसी ठंडी माना जा सकता है। इतनी अधिक गर्मी के कारण सूर्य का सारा पदार्थ पिघला हुआ है। उसमें सदा भयंकर तूफान उठते रहते हैं। जिनके कारण कभी-कभी इतने बड़े खड्ड हो जाते हैं जिनमें अपनी कई धरती समा सके। यही खड्ड सूर्य में काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं।
पिछले जमाने में सूर्य को ठण्डा माना गया था उसे आतप कहा गया था। आतप वह जो स्वयं तो ठंडा हो, पर दूसरों को प्रकाश दे। यह मान्यता इसलिए थी कि हम जितने भी ऊंचे बढ़ते थे ठंडक बढ़ती है। पहाड़ों पर बर्फ जमी रहती है। जितनी ऊंचाई उतनी ठंडक- इस सिद्धांत ने सूर्य को ठंडा होने की कल्पना दी थी। पर आब उस बात पर कोई विश्वास नहीं करता । ताप के संचालन, संवाहक एवं विकरण गुणों के बारे में पदार्थ विज्ञान के प्रारम्भिक छात्र भी बहुत कुछ जानते हैं। संचालन वह प्रक्रिया है जिसके अनुसार किसी ठोस पदार्थ का एक हिस्सा गर्म करने पर दूसरा भी गर्म हो जाता है। जैसे लोहे की छड़ का एक सिरा तपाने से पूरी छड़ गरम हो जाती है। संवाहन वह है जिसके अनुसार गर्म हुआ पदार्थ स्वयं ही भागने लगता है जैसे भाप। तीसरी क्रिया विकरण वह है जिस पारदर्शी पोल को चुपचाप पार करती हुई गर्मी अन्त में जहाँ टकराती है उसी जगह को गर्म करती है। सूर्य की गर्मी 9 करोड़ मील की पोली हवा रहित जगह को पार करती हुई चुपचाप चली आती है, पर जब पृथ्वी से वे किरणें टकराती है तो भूतल गर्म हो उठता है। धरती को छूकर जो ताप उत्पन्न होता है वह ऊंचाई की दिशा में धीरे-धीरे कम होता जाता है। और ऊंचे पहाड़ों का चोटियों पर बर्फ जमने लगती है। भूतकाल में यह जानकारियाँ उपलब्ध न रहने से सूर्य को आतप अर्थात् दूसरों को गर्मी देने वाला कहकर सन्तोष करना पड़ा होगा।
सौर परिवार का सबसे निकटस्थ ग्रह बुद्ध है। इसके बाद शुक्र, इसके बाद हमारी पृथ्वी। फिर मंगल। इसके बाद क्षुद्र ग्रहों की एक पूरी पट्टी है जिसमें हजारों अवान्तर पिण्ड चक्कर काट रहें हैं। इनमें बड़े से बड़ा 480 मील का और छोटे से छोटा 550 गज का नापा गया है। इससे छोटे भी कुछ हो सकते हैं जो अभी देखे नहीं जा सके । इसके बाद पृथ्वी, फिर शनि। प्राचीन काल में यही अन्तिम ग्रह था। सूर्य से बहुत दूर जाने के कारण उसकी प्रदक्षिणा बहुत देर में अर्थात् साड़े उनतीस वर्ष में पूरी हो पाती है। उसकी चाल पृथ्वी से अधिक है तो भी दूरी के कारण देरी तो हो ही जाती है। इस देरी की चाल को कभी समझा गया और उसे शनैः चर एवं मन्द कहा गया। इन शब्दों का अर्थ होता है धीमे चलने वाला।
पीछे सौरमण्डल के तीन सदस्य और भी ग्रह खोज लिए गये -(1) यूरेनस-वारुणी जो पृथ्वी से वजन में पन्द्रह गुना-घनफल में चौसठ गुना बड़ा है। यह सूर्य की परिक्रमा 84 वर्ष में पूरी करता है। (2) नेपच्यून -वरुण-यह पृथ्वी से 17 गुना भारी है। यह 165 वर्ष में परिक्रमा करता है। (3) प्लेटो-यम- यह सूर्य की परिक्रमा 300 वर्षों में पूरी करता है। अपने ही सौर मण्डल में तीन सदस्य अब और बढ़ गये हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि पहले थे ही नहीं। हम बढ़े हैं-हमारा ज्ञान साधन बढ़ा है -तो फिर हर क्षेत्र में नये आधार मिलेंगे ही। उदाहरण के लिए अपने सौर परिवार में तीन और बड़े-बड़े सदस्य मिले।
चन्द्रमा किसी जमाने में पूर्ण ग्रह था। उसे तारापति माना जाता था। सौरमण्डल के सदस्यों का ही नहीं आकाश में चमकने वाले समस्त तारकों का वह अधिनायक था। अब नये तथ्य सामने आये हैं चन्द्रमा पूर्ण ग्रह नहीं, पर सूर्य की नहीं पृथ्वी की परिक्रमा करता है, इसलिए उसी का उपग्रह है। बहुत समीप मात्र ढाई लाख मील दूर होने के कारण ही वह बड़ा लगता है। सूर्य की तुलना में तो वह उसका करोड़वाँ हिस्सा भी नहीं है। आकार में पृथ्वी का 49 वाँ वजन में 81 वाँ भाग है। उसका व्यास मात्र 2160 मील जितना उपहासास्पद है। वह पृथ्वी की परिक्रमा भर करता है, अपनी धुरी पर नहीं घूमता इसलिए हमें सदा उसका लगभग आधा भाग ही दीखता है। उसकी जमीन बहुत ऊंची-नीची है, सबसे ऊंची चोटी 27 हजार फुट और तीन हजार ज्वालामुखी फटने से बने बड़े-बड़े खड्ड हैं। वहाँ न हवा है न पानी न हरियाली। दिन में खौला देने वाली गर्मी ओर रात में जमा देने वाली सर्दी पड़ती है। परिक्रमा करते समय जब हमारी पृथ्वी की आड़ में हो जाता है तब अमावस्या के दिन से दीखना बन्द हो जाता है क्रमशः यह आड़ जब कम ज्यादा होती जाती है तो उसी अनुपात से शुक्ल पक्ष में बढ़ना और कृष्ण पक्ष में घटता शुरू हो जाता है। पृथ्वी, सूर्य और चन्द्रमा की अपनी-अपनी अलग-अलग गतियाँ हैं। इस चक्र में कई बार सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा के ऊपर पड़ने के मार्ग में पृथ्वी आ जाती है तो चन्द्र ग्रहण दीखता है। पृथ्वी और सूर्य के बीच चन्द्रमा आ जाता है तो सूर्य ग्रहण पड़ता है। कौन कितना आड़े आया इसी हिसाब से ग्रहण की छाया न्यूनाधिक दीखती है।
अब राहु केतु राक्षस चन्द्र, सूर्य पर आक्रमण नहीं करते। पुरानी मान्यताओं का यह कहकर समाधान करना पड़ता है कि वे राक्षस मात्र इस ग्रहों की छाया ही समझे जाने चाहिए । चन्द्रमा का दर्जा तारापति से- पूर्ण ग्रह से उतार कर छोटे उपग्रह का कर दिया गया। आक्रमणकारी राक्षस विदा कर दिये गये। इतना ही नहीं मानवी प्रगति ने ऐसी-ऐसी कितनी ही पुरातन मान्यताओं को अस्वीकार कर दिया है और वह कड़ुई गोली किसी प्रकार पुरातन पंथियों को भी गले उतारनी पड़ी है।
अपनी पृथ्वी उतर से दक्षिण को 7896 मील और पूर्व से पश्चिम को 7926 मील है। उसका 71 प्रतिशत भाग समुद्र में डूबा पड़ा है। समुद्रों की अधिक से अधिक गहराई 35 हजार फुट है। भूतल के ऊंचे से ऊंचे पहाड़ 29 हजार फुट तक के है। उस सूर्य की एक परिक्रमा करने में 58 करोड़ 46 लाख मील की यात्रा एक वर्ष में पूरी करनी पड़ती है। उसकी चाल 66600 मील प्रतिघण्टा है। अपनी धुरी पर 24 घण्टे में घूम लेती है। पोले आकाश में सांस लेने योग्य हवा कुछ ही दूर तक है। इससे आगे बन्द राकेटों में साँस लेने का अतिरिक्त प्रबन्ध करके ही जाया जा सकता है। प्राचीन काल के लोग अन्यान्य लोकों में ऐसे ही विचरण करते थे, ऐसे कथा, प्रसंगों से पुराण, साहित्य भरा पड़ा है। वैसा करना या मानना अब नितान्त असंभव हो गया है।
अपने पंचांगों में राहु, केतु नामक दो ग्रहों का वर्णन है और वे अन्य ग्रहों की तरह ज्योतिष गणना में अपना सुनिश्चित स्थान बनाये हुए हैं ; पर वे हैं क्या ? यह ठीक से नहीं कहा जा सकता । राहु को पृथ्वी की छाया मान लिया गया है। केतु की व्याख्या पुच्छल तारों के रूप में करते हुए काम चला लिया गया है। पर वे पुच्छल तारे न तो किसी स्थान पर टिकते हैं न इनका आकार निश्चित है। वे घुमक्कड़ सेलानियों की तरह घूमते हैं और अपनी आकृति को घटाते बढ़ाते रहते हैं। केतु एक नहीं वरन् अनेकानेक होते हैं। वे गैसें के बने होते हैं। छोटे-छोटे कंकड़-पत्थर भी उनमें रहते हैं। धुएं के बादलों की तरह एक पारदर्शी बहुत लम्बी पूँछ कभी-कभी आकाश में दिखाई पड़ती है यह पुच्छल तारे केतु कहे जा सकते हैं। यह पूँछ करोड़ों मील लम्बी होती है। उसका एक सिरा पृथ्वी पर और दूसरा सूर्य पर हो सकता है। वे पृथ्वी से लाखों गुने बड़े होते हैं पर वजन में वे धरती के लाखवें हिस्से के बराबर भी नहीं होते। उस पूँछ के बीच में से पृथ्वी मजे से पार हो जाती है ओर हमसे से किसी का उसका आभास तक नहीं मिलता। उनकी पूंछ कटती और उगती रहती है। कई केतु सूर्य की अनियमित परिक्रमा करते हैं कई अनन्त आकाश में ऐसे ‘ही जहाँ-तहाँ स्वेच्छापूर्वक भ्रमण करत रहते हैं। कुछ तो अपनी पुरानी जगह कभी लौटकर नहीं आते और बहुत दिन बाद फिर अपनी पुरानी जगह की खोज खबर लेने आ धमकते हैं। अपने सौरमण्डल में एक केतु है जिसे हैली कहते हैं। पिछले 1800 वर्षों में 21 बार प्रदक्षिणा कर चुका है। वह सन् 1910 में देखा गया था अब 1986 में फिर लौटने वाला है। अब हम इन्हीं घुमक्कड़ों गैसीय बादलों को केतु ग्रह मानकर पुरानी मान्यताओं के साथ कुछ बिठाने का प्रयत्न करते हैं।
उल्कापात किसी समय देवताओं अथवा प्रेतात्माओं की हलचलों के रूप में माना जाता था। किसी महापुरुष के मरने पर एक तारा टूटता है। देवता लोग उल्कापात के माध्यम से पृथ्वीवासियों पर विपत्ति भेजते हैं। यह मानकर लोग भयभीत होकर देव पुष्टि के कर्मकाण्ड रचा करते थे। उल्कापात अब प्रकृति की एक साधारण सी घटना है।
अनन्त आकाश में किन्हीं ग्रह नक्षत्रों के टूटे-फूटे टुकड़े कंकड़ पत्थरों के रूप में उड़ते रहते हैं। वे कभी पृथ्वी के वायुमण्डल में घुस पड़ते हैं तो हवा के घर्षण से वे जलकर खाक हो जाते हैं। यह जलना और दौड़ना ही उल्कापात है। कभी कभी एक साथ सैकड़ों कंकड़ घुसते हैं तो आकाश में आतिशबाजी जैसी लगने लगती है। कुछ पिण्ड बहुत बड़े और अधिक कठोर होते हैं तो उनकी ऊपर परत ही जल जाती है और अधजला हिस्सा धरती पर आ गिरता है। ऐसी उल्काएं संसार भर में जब तक गिरती रहती हैं। उनके छोटे-बड़े नमूने अजायबघरों में प्रदर्शनार्थ रखे गये मिलते हैं। उतर प्रदेश के जालोन जिले में सन् 1928 में एक पचास मन की उल्का गिरी थी और उससे दो किसान तत्काल मर गये थे। उसकी आवाज बीस मील तक सुनी गई थी। आरिजोना अमेरिका में गिरी एक उल्का ने एक मील चौड़ा और सात फुट गहरा गड्ढा कर दिया था। साइबेरिया में 30 जून 1908 में सबसे प्रचण्ड उल्का गिरी थी, उसने पचास मील का जंगल जलाकर खाक कर दिया था। हजारों मनुष्य और पशु-पक्षी मरे थे। अब इन उल्काओं को प्रकृति का साधारण सा खेल माना जाता है, देवात्मा का आतंक नहीं।
पृथ्वी आरम्भ में आग के गोले की तरह थी उसकी ऊपरी परत धीरे-धीरे ठंडी होती गई है और उस पर प्राणियों तथा वनस्पतियों का निवास सम्भव हुआ है। तो भी उसके भीतर अभी भी अचंड गर्मी है। सारा पदार्थ पिघला हुआ है और कड़ाही में खौलते तेल की तरह खुदबुद करता रहता है। इसकी भाप अक्सर धरती के ऊपरी परत बेधकर निकलती रहती है। जिधर से वह निकलती है वहाँ या तो ज्वालामुखी फटते हैं या मामूली भूकम्प आते हैं। यह हलचलें निरन्तर होती रहती हैं। औसतन हर तीसरे दिन में बड़ा और दस मिनट में हलका भूकम्प पृथ्वी पर कहीं न कहीं आता ही रहता है। इनके अनेक कारण होते हैं। समुद्र की तली से पानी रिसकर उस आग्नेय द्रव पदार्थ तक पहुँचता है तो उसकी भाप विस्फोट करती हुई ऊपरी सतह को फाड़ती है। नये पहाड़ों के भीतर जहाँ तहाँ गुफाओं की तरह बड़ी-बड़ी पोल हैं, वे धंसकती रहती है। पृथ्वी के ऊपरी पपड़ी सिकुड़ती रहती है। ऐसे-ऐसे अनेकों कारण ज्वालामुखी फटने अथवा भूकम्प आने के हैं। उससे नये टापू निकलते, पुराने डूबते तथा भयंकर समुद्री तूफान आते हैं। संसार में ऐसी पट्टियाँ भी मौजूद है जिनके क्षेत्र में अक्सर भूकम्पों का ताँता लगा रहता है। उन्हें भू-गर्भ की सामान्य हलचलों में एक सहज प्रक्रिया मान लिया गया है।
हम प्रगति के पथ पर क्रमशः बढ़ रहे हैं। हमारा ज्ञान बढ़ रहा है साथ ही पुरानी मान्यताओं के स्थान पर नये प्रतिपादनों की स्थापना करती पड़ रही है। यह क्रम अनादिकाल से चला आ रहा है और अनन्त काल तक चलता रहेगा। आज की अपनी स्थापनाओं में भी भविष्य के विकास क्रम के अनुरूप परिवर्तनों की शृंखला चलती ही रहेगी।
हमें दुराग्रही नहीं होना चाहिए और पूर्वजों के प्रति पूर्ण आस्थावान रहते हुए भी यह मानकर चलना चाहिए कि भूतकाल में जो माना या कहा जाता रहा है वही अन्तिम नहीं है। विकास क्रम के साथ-साथ मान्यताओं का हर क्षेत्र में विकास उसी तरह होता रहेगा जैसा कि अपनी पृथ्वी और सौरमण्डल सम्बन्धी प्रतिपादनों के संदर्भ में हुआ है।
“निद्राचार” रोग से ग्रसित मनुष्य उठकर चल देता है और सामान्य मनुष्यों की तरह कुछ काम करता रहता है और फिर आकर अपनी जगह सो जाता है। जागने पर उसे यह स्मरण नहीं रहता कि वह बीच में कहीं उठकर गया था और कुछ करके फिर अपनी जगह पर वापिस आ गया था।
हमारे जीवन के क्रम लगभग इसी अर्ध तन्द्रित अवस्था में होते रहते हैं। कोई स्वप्न आवेश में कुछ करता रहता है और हम किसी अवचेतन चेतना से बँधे हुए कुछ करते रहते हैं। क्यों करते हैं ? किस प्रयोजन के लिए करते हैं ? यह सोचने की न तो आवश्यकता पड़ती है और न फुरसत रहती है। सम्मोहित व्यक्ति किसी प्रयोक्ता के इशारे पर अपनी इच्छा शक्ति एवं स्वतन्त्र चेतना को पूरी तरह गँवा कर ऐसी क्रियाएँ करता है, जिनसे उसका कोई प्रयोजन या हित-साधन नहीं होता।
दार्शनिक आस्पेंस्की ने जन-साधारण की मनःस्थिति को ‘स्वविस्मृति’ की अर्धतन्द्रा के समतुल्य बताया है। तारे दिन में भी बने रहते हैं, पर वे धूप की तेजी के कारण हमारी आँखों को दीखते नहीं। यह स्वविस्मृति भी बनी रहती है जब हम अपने को जागता हुआ समझते हैं। किसी गहरे कुएँ में घुसकर यदि आकाश को देखें तो वहाँ से तारे उगे हुए दिखाई पड़ेंगे क्योंकि धूप की रोशनी वहाँ पर हमारी आँखों को चौंधिया न रही होगी। यदि अपना अभ्यस्त स्वविस्मृति से कुछ हटकर वस्तुस्थिति से समझने की कोशिश करें तो प्रतीत होगा कि जो कुछ चल रहा है वह विशुद्ध उस सपने की स्थिति है जिसे जागृत स्वप्न कहा जा सकता है।
कैनेथ वाकर की उस उक्ति में बहुत सार है जिसमें मनुष्य को सामान्य स्थिति को सम्मोहित व्यक्ति जैसी बताते हुए कहा था कि-”उसे यह विदित नहीं कि वह क्या और क्यों यह सब कुछ करता है ? कौन उसे किस निमित्त प्रयुक्त कर रहा हैं ? निश्चय ही यदि वह अपने को जान-समझ सका हाता और अपनी गतिविधियाँ स्वयं निर्धारित करता तो वे उससे सर्वथा भिन्न होती जो आज दृष्टिगोचर हो रही हैं।
एक व्यक्ति बातें करने में हाथ से उँगलियाँ मरोड़ता और चटकाता जाता है, जमीन कुरेदता जाता है। यह सब क्यों और क्या कर रहा है ? यह पूछने पर वह यही कह सकता है, ऐसा वह ‘होश’ में नहीं कर रहा था। वैसा कुछ अपने आप ही हो रहा था।
दार्शनिक एवकिसंन ने लोगों से पूछा है-बताओ तो, हम जीवन भर लम्बी यात्रा पर चलते रहते हैं, पर अन्त तक तनिक भी आगे नहीं बढ़ पाते, जहाँ के तहाँ बने रहते हैं। क्या ऐसा सपने की स्थिति के अतिरिक्त और किसी प्रकार हो सकता है ?
कोल्हू का बैल भी अपने लिए न सही तेली के लिए कुछ उपार्जन कर देता है, पर हम तो किसी के लिए कुछ भी उपार्जन नहीं कर पाते यह निष्फल दौड़−धूप सपने से बढ़कर नहीं हो सकती।
निद्राचार एक प्रकार का अपस्मार है। हिस्टीरिया के रोगी को शारीरिक क्रियाएँ चलती रहती हैं, पर मन संज्ञा शून्य हो जाता है। मृगी के कुछ रोगी तो बेहोश होकर गिर पड़ते हैं, दाँत मिच जाते हैं ओर मुँह से झाग निकलने लगता है किन्तु कुछ ऐसे ही होते हैं जो दौरा पड़ने से पहले जो काम कर रहे थे उसे ही तब तक करते रहते हैं जब तक कि पूर्ववत् होश में नहीं आ जाते। ऐसे रोगी यदि दौरा पड़ने से पूर्व चल रहे थे तो जिस दिशा में-जिस गति से वे चल रहे थे तो जिस दिशा में-जिस गति से वे चल रहे थे ठीक उसी तरह चाबी वाले खिलौने की तरह चलते चले जायेंगे। हाथ से यदि पेन्सिल छील रहे थे तो दौरा समाप्त होने तक पेन्सिल का वही हिस्सा छीलते रहेंगे जिसे पहले छील रहे थे। यह भी अपस्मार का एक प्रकार है। इसमें मनुष्य स्वयं तो संज्ञाशून्य रहता है, पर शरीर की अमुक गतिविधियाँ यथाक्रम चलते रहने से देखने वालों को साधारण स्थिति में काम करते हुए ही प्रतीत होते हैं।
इसी स्थिति का बढ़ा हुआ रूप ‘निद्राचार’ है। सोते-सोते चारपाई से उठकर चल देना और किसी अभ्यस्त क्रम से अभ्यास दिशा में पैरों का उठते जाना, इस क्रम का दौरे के अन्त तक चलते रहना, होश में आने पर अपने को विचित्र स्थिति में पाना, वापिस लौटना और फिर बिस्तर पर सो जाना यह बीमारी या आदत कई व्यक्तियों को देखी जाती है। बचपन में यह शिकायत अधिक होती है। उम्र बढ़ने पर मस्तिष्क का सचेतन भाग प्रखर होता जाता है और अचेतन को ऐसी गड़बड़ियाँ पैदा करने से रोक देता है। इसलिए बचपन में जिन्हें इस तरह की व्यथा होती है उनमें से अधिकाँश की बड़े होने पर छूट जाती है। फिर भी बहुत से व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें सदा बनी रहती है। कइयों को यह रोग बचपन में नहीं युवा अथवा अधेड़ अवस्था में उत्पन्न होता है और बहुधा आजीवन बना रहता है।
कई बार तो इस रोग की बड़ी विचित्र स्थिति देखी जाती हैं जो देखने में ही नहीं कहने-सुनने में भी बड़ी अजीब लगती है। रोगी कोई काम भले चंगों की तरह करता है, उसमें पूरी समझदारी बरतता है, सवाल जवाब करता है, गतिविधियों में हेर-फेर करना होता है तो बिलकुल भले चंगों जैसी समझदारी का परिचय देता है। किसी को सन्देह भी नहीं होता कि यह सब वह अपने सचेतन की मूलसत्ता को प्रसुप्त स्थिति में छोड़कर उसके कामचलाऊ उधार अंश के सहारे यह सारी हरकतें कर रहा है। इस सबके साथ एक विलक्षणता और भी जुड़ी होती है कि जब दौरा समाप्त होने को होता है तो अचेतन उसे चुपचाप वापिस लौटा लाता है और जिस स्थिति में दौरा आरम्भ हुआ था ठीक उसी में ले जाकर छोड़ देता है। फलस्वरूप रोगी को उस पूरे घटना-क्रम का तनिक भी स्मरण नहीं रहता जो उसने घण्टों तक पूरे समझदार आदमी की तरह चलाया था।
फ्राँस के मनोरोग चिकित्सक डा0 जैने ने अपने इलाज में आये हुए निद्राचार के अनेक रोगियों का विस्तृत विवरण छपाया है। इनमें एक बीस साल की युवती आइरीन का विवरण है। जिसे यह रोग अपनी माता की डरावनी मौत के साथ आरम्भ हुआ और मुद्दतों चलता रहा। यह निद्राचार ग्रस्त स्थिति में घंटों बनी रहती और अपनी माता की मृत्यु का घटना-क्रम यथावत् एक नाटक के ढंग से दुहराती रहती। यथा-स्थिति आने पर उसे उसे अभिनय के बारे में तनिक भी स्मरण नहीं रहता था।
डा0 जैने ने निद्राचार का एक और भेद बताया है-’फ्यूग’। इस स्थिति में कुछ समय तक मनुष्य अपनी मूल स्थिति को भूलकर किसी विशिष्ट स्थिति में कल्पित कर लेता है और अपने को सचमुच ही उस स्थिति में मान लेता है। यह मान्यता दूसरे की दृष्टि में कल्पना हो सकती है, पर वह स्वयं उस दौरे की अवधि में सचमुच उस स्थिति में पहुँचा हुआ मानता है। ऐसे व्यक्ति कोई कहानी गड़ लेते हैं और उसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़कर इस तरह वर्णन करते हैं मानो वह सब कुछ निश्चित रूप से उनके साथ घटित हुआ हो और बिना किसी छल वृक्ष के वे किसी यथार्थता का विवरण सुना रहे हों।
ऐसे दौरे थोड़े समय के हों तो अपनी अनुभूति को भूल भी सकते हैं। कई बार उस समय की स्मृति किसी दिव्य-दर्शन की तरह चिरकाल तक स्मरण भी बनी रहती है। देवी-देवताओं के दर्शन की स्मृतियाँ प्रायः इसी प्रकार की भ्रमित मन-स्थिति में होती हैं। भूत-प्रेतों का साक्षात्कार भी बहुधा इसी प्रकार का होता है। किसी को अवसर सर्प आदि दिखाई पड़ते हैं जबकि वस्तुतः वहाँ भूत, सर्प आदि का कोई अस्तित्व नहीं होता।
अकेले पैरिस नगर में प्रायः 18000 लोग इसी तरह खो जाते हैं। यह खोने वाले न तो बच्चे होते हैं और न विक्षिप्त। अच्छे-खासे पढ़े-लिखे और काम-धन्धे में लगे हुए लोग यह तरीका अपनाते हैं। इनमें से कुछ ही ऐसे होते हैं जो विस्मृति विक्षिप्तता सरीखे किसी मानसिक रोग से ग्रसित होकर ऐसा करते हैं। पुलिस को इन खोये लोगों का पता लगाने के लिए एक विशेष विभाग खोलना पड़ा है जिसके प्रयास से प्रायः 30-35 प्रतिशत तक यह ‘गुमशुदा’ लोग पकड़ लिये जाते हैं और उनकी पुरानी जगह पहुँचा दिया जाता है।
सम्भवतः हमें भी अपने को भुला देने में ही शराबियों की तरह गम गलत करने में कुछ राहत मिलती हो। उनका अचेतन उन्हें विस्मृति के गर्त में धकेल कर विवेक अपनाने पर कन्धे पर चढ़ने वाले उत्तरदायित्वों से छुटकारा दिला देता हो।
निद्राचार से ग्रसित एक डाक्टर का विवरण अतीव विचित्र और भयंकर हैं उसका आत्मबोध पूरी तरह सोया रहता था। अचेतन में दबी प्रवृत्ति अत्यन्त तीव्र हो उठती थी और वह सचेतन के एक भाग पर कब्जा करके उसके शरीर और मस्तिष्क से मनचाहा काम कराती थी। यह स्थिति जब तक अचेतन चाहता, बनाये रहता और जब उसकी तृप्ति हो जाती तो शरीर को लाकर उसी चारपाई पर पटक देता जहाँ से उसे उठाया था। नींद से उठने के बाद उस डाक्टर को उस सारे घटना-क्रम की स्वप्न जैसी धुँधली स्मृति भी नहीं रहती थी। इतना गहरा विस्मरण भी अचेतन का ही अभिशाप था।
सन् 1888 की बात है उन दिनों सारे लन्दन में आतंक छाया हुआ था। एक हत्यारा पुलिस थानों के इर्द-गिर्द ही नृशंस हत्याएँ करने में संलग्न था। अस्पतालों में गुर्दे की जिस तरह चीर-फाड़ की जाती है, लगभग उसी तरह वह हत्यारा अपने शिकार का कतर-व्यौंत करके रख देता था। यह हत्याएँ धन के लालच से नहीं की जाती थी क्योंकि सारे गये लोगों के शवों के साथ उनकी कीमती वस्तुएं तथा नकदी यथावत् मिलती थी। हत्याओं की संख्या दर्जनों को पार करके सैकड़ों के अंग छूने लगी थी।
इस संदर्भ में पुलिस को लज्जित होना पड़ रहा था कि वह इन नृशंस अपराधों को रोकने और अपराधियों को खोजने में असफल रहते हैं। यद्यपि पुलिस के जासूसी विभाग ने जी तोड़ कोशिश की थी और सन्देह में कितनों को ही पकड़ा भी था, पर वास्तविक हत्यारे का कुछ सुराग मिल ही नहीं रहा था। हत्यारे का अखबारों न ‘जैक दि रिपर’ के कल्पित नाम से उल्लेख करना आरम्भ कर दिया था।
हत्यारे का पता लगाने में एक साधारण व्यक्ति की अतीन्द्रिय शक्ति ने जो भूमिका निबाही उससे वह प्रसंग और भी अद्भुत बन गया था। इंग्लैण्ड के एक सामान्य नागरिक राबर्ट जेम्स लीज ने ऐसे ही पड़े-पड़े सपना देखा कि-” एक तगड़ा व्यक्ति एक युवती का पीछा करते हुए गली में मुड़ा और जैसी ही एकान्त स्थान आया उस व्यक्ति ने चीते की तरह चाकू से युवती पर आक्रमण किया, गला काटा, पेट चीरा और खून से सने हाथ लाश से पोंछकर चलता बना।” इस सपने से लीज डर गया और उसकी रिपोर्ट लिखाने पुलिस दफ्तर पहुँचा। उसकी रिपोर्ट तो लिखली गई, पर उसे ‘सनकी’ कहकर भगा दिया गया।
एक दिन लीज अपनी पत्नी के साथ ट्राम में कहीं जा रहा था। उसने सपने वाले आदमी को पास ही बैठा देखा। उसके मन ने कहा यहीं वह प्रख्यात हत्यारा है जिसका आतंक मचा हुआ है; उसी को उसने उस दिन स्वप्न में देखा था। लीज अपनी पत्नी को घर जाने के लिए कहकर उस व्यक्ति के पीछे ही लिया, रास्ते में ड्यूटी पर खड़े पुलिस सिपाही से उसने अपने सपने के आधार पर पहचाने हत्यारे को पकड़ने के लिए कहा-पर उसने भी उसे सनक ही समझा और टाल दिया।
अबकी बार लीज अपना ऐसा सपना सुनाने फिर पुलिस दफ्तर पहुँचा और बताया कि हत्यारा लाश के कान काटकर ले जा रहा था। कान काटने की बात ने पुलिस अफसर को चौंका दिया क्योंकि हत्यारे ने पार्सल से उसी दिन कटे हुए कान भेजे थे और चुनौती दी थी कि-”यह पत्र उसी का लिखा है- उसे पकड़ कर कोई दिखायें।” लीज की बात में सार मालूम हुआ और पुलिस ने उसकी सहायता स्वीकार कर ली।
एक दिन लीज पुलिस को साथ लेकर ढूँढ़ता-ढूँढ़ता एक शानदार कोठी के सामने जा खड़ा हुआ और बोला हत्यारा इसी के अन्दर है। वह कोठी एक सुप्रसिद्ध डाक्टर की थी। पुलिस को संकोच था कि ऐसे प्रतिष्ठित व्यक्ति के यहाँ वह किस प्रकार प्रवेश करें। तो भी वे लोग भीतर गये ही। डाक्टर से पूछताछ की तो उसने हत्याओं के सम्बन्ध में अपने को सर्वथा अनजान बताया। उनकी स्त्री ने गहरी पूछताछ में इतना भर स्वीकार किया कि वे कभी-कभी अपने को सर्वथा भूल जाते हैं और उठकर कहीं चले जाते हैं। लौटते हैं तो कहते हैं न जाने मैं कहाँ भटक जाता हूँ और क्यों कहीं घूमघाम कर वापिस आता हूँ।
तलाशी ली गई तो खून से सने ढेरों कपड़े उनके यहाँ पाये गये, जिन्हें हत्याओं में लिए गये खून के नमूनों से विशेषज्ञों ने बिलकुल मिलते हुए रक्त से सने बताया। मुकदमा चला। अनेकों प्रमाणों से डाक्टर ही अपराधी सिद्ध हुआ।
आखिर डाक्टर ऐसा क्यों करता था ? इसकी गहरी खोज-बीन से पता चला कि उसे मस्तिष्कीय कोई ऐसी बीमारी थी जिसके कारण वह आपे से बाहर होकर किसी विशेष मदहोशी में चला जाता था और धर से बाहर जाकर यह कुकृत्य बड़ी कुशलता पूर्वक करता था। घर लौट आने पर उसे इतनी ही याद रहती थी कि उसने कुछ ऐसा किया है जो बुरा है। घर से निकलने से लेकर वापिस आकर खून से सने कपड़े यथा स्थान रखने तक उसकी ऐसी ही स्थिति बनी रहती थी। यहाँ तक कि एक बड़ा ऊनी ओवरकोट इसी काम के लिए ले जाता था कि हत्या से पहले उसे उतार कर दूर रखदे और खून के दाग वाले कपड़ों के ऊपर उसे पहनकर बिना किसी को सन्देह उत्पन्न किये घर वापिस आ सके।
मुकदमे के अन्त में जब डाक्टर ने जाना कि सचमुच उसने ही इतनी हत्याएँ की हैं तो वह रो पड़ा। उसने अदालत से आग्रहपूर्वक कहा-”मुझे जल्दी ही मौत की सजा दीजिए। मैं ऐसा नर-पिशाच रहा हूँ यह जानने के बाद अब मेरे लिए इस दुनिया में जी सकना कठिन है।”
डाक्टर को विशेषज्ञों ने एक खास किस्म का पागल माना और उसे पागलखाने में बन्द रहने की सजा दी गई।
लगता है हम सब ऐसे ही निद्राचार रोग से ग्रसित हैं। हम क्या हैं ? जीवन क्या है ? जीवन का प्रयोजन क्या है ? जो कुछ हम कर रहे हैं क्या वह करणीय हैं ? जिस कोल्हू में हम जुत रहे हैं, उससे क्या पल्ले पड़ने वाला है ? मृत्यु कितनी निकट और विकट है। उसकी तैयारी के लिए क्या कुछ हो रहा है ? ईश्वर के दरबार में उपस्थित होने पर जिन कर्त्तव्यों का लेखा-जोखा माँगा जाता है, उनका विवरण क्या है ? मृग-तृष्णा में अब तक भटकने पर क्या मिला और उसी की पुनरावृत्ति आजीवन करते रहने पर आगे क्या मिलना है ? दुनिया वाले जिस प्रवाह में बहकर खो ही खो रहे हैं, उसी में बहते हुए हम क्या पाने की आशा करें ? आदि मुख्य प्रश्न अनसुलझे पड़े हैं। सच तो यह है कि हमें आत्म-विस्मृति ने बुरी तरह जकड़ लिया है और निद्राचारग्रस्त व्यक्ति मानसिक रोगी की तरह पशु-प्रवृत्ति के वशीभूत होकर नर-कीटकों जैसा निकृष्ट जीवन जीने की इस मनुष्य जन्म में भी पुनरावृत्ति मात्र कर रहे हैं।
च्वाँगत्सु ने एकबार सपना देखा कि वह तितली बन गया है और स्वच्छन्दतापूर्वक सुरम्य फूलों पर उड़ता, बैठता फिर रहा हैं। सवेरे उठा तो हम सपने का उस पर गहरा असर था। दिन में कल वह आदमी था तो रात में तितली कैसे बन गया है। यदि सपने में आदमी तितली बन सकता है तो यह भी असम्भव नहीं कि तितली आदमी होने का सपना देख रही हो। च्वाँगत्सु अपनी सारी अक्ल खर्च करके बहुत समय तक इस गुत्थी को सुलझाने में लगा रहा कि कहीं वह कोई तितली ही तो नहीं है जो कहीं सोई पड़ी हो और वह आदमी का वैसा सपना देख रही हो जैसा कि वह इन क्षणों जीवनयापन कर रहा हैं।
हम जी रहे हैं या सपना देख रहे हैं, इसे खोजने पर ऐसा सन्देह होता है हम कहीं निद्राचारग्रस्त रोगी की स्थिति में ही तो नहीं रह रहे हैं।
अपने देश में गरीबी के कारण पौष्टिक खाद्य-पदार्थ समुचित मात्रा में प्राप्त कर सकना अपने देशवासियों के लिए बहुत कठिन पड़ता है। इससे भी बड़ी कठिनाई यह है कि जो कुछ उपलब्ध है उसे भी ठीक तरह पकाने और खाने की विधि से हम अपरिचित हैं। फल-स्वरूप जो सामने है उसका भी पूरा लाभ उठा नहीं पाते। पोषक तत्व को निकाल डालते हैं और उसके सारहीन भाग को ग्रहण करते हैं। पकाने और खाने की बुरी आदतें गरीबी से अधिक महंगी पड़ती हैं और भोजन करने के उद्देश्य को ही समाप्त कर देती है।
इंटरनेशनल क्लब के लखनऊ द्वारा आयोजित एक विचार गोष्ठी में हाइजीन इन्स्टीट्यूट के संचालन डा0 के0 गाविल ने बताया कि भारत में शाक-भाजी और फलों का उत्पादन कम होने से जन-साधारण को उपयुक्त पौष्टिक आहार की तो कमी पड़ती ही थी। अब भूमि की उर्वरा शक्ति घट जाने से एक नया संकट और उसमें जुड़ गया है। अब फल और शाकों में पोषक तत्व उससे कहीं कम रहते हैं जितने कि अब से पचास वर्ष पूर्व रहते थे।
स्वास्थ्य संरक्षण के लिए कैल्शियम, फास्फोरस, लौह, पोटाश आदि जिन रसायनों की जरूरत पड़ती है उन्हें प्राकृतिक रूप से फलों और शाकों में ही पाया जाता है। औषध रूप में इन्हें लिया जाय तो वे रक्त में उस तरह नहीं धुल पाते जैसे कि फलों के द्वारा ग्रहण करने पर शरीर के अंग बनते हैं। आँवला, टमाटर, मौसम्बी जैसे फलों में विटामिन सी. की समुचित मात्रा रहती है। गाजर, चुकन्दर, बन्दगोभी जैसे सामान्य एवं सस्ते शाकों से विटामिन ‘ए’ की पूर्ति सहज ही हो जाती है। सस्ता और प्रचुर परिमाण में कहीं भी उगाया जा सकने वाला केला तक विटामिन ए.बी.सी.डी. और ई. से भरा-पूरा होता है।
भारत में संसार के अन्य सभी देशों की तुलना में फल और शाकों की भारी कमी है। फलों की वार्षिक उपज 60 लाख टन और तरकारियों की 40 लाख टन है। इसका अर्थ हुआ हर व्यक्ति पीछे 1.6 ओंस फल और 1.3 ओंस तरकारी। जबकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार हर व्यक्ति को कम से कम 3 ओंस फल और 10 ओंस तरकारी स्वास्थ्य संरक्षण की दृष्टि से आवश्यक है।
फल महँगे पड़ें तो मौसमी सस्ते फलों से भी काम चल सकता है। अमरूद, आम, बैर, जामुन आदि फल अपनी ऋतुओं पर प्रायः सस्ते ही बिकते हैं। खरबूजा, तरबूजा, ककड़ी, खीरा जैसे बेलों पर लगने वाले फल भी गरीबों के लिए कीमती फलों की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। गाजर, टमाटर, मूली, भिंडी आदि शाक ऐसे हैं जो कच्चे खायें जा सकते हैं। पालक, सलाद आदि की पत्तियाँ बहुत उपयोगी होती हैं। नीबू और आँवला अधिक महँगे नहीं होते, पर उपयोगिता की दृष्टि से उनकी गिनती किसी कीमती फल से कम नहीं।
शाकों को पकाने में हम बहुत भूल करते हैं। यह नहीं सोचते कि अधिक जलाने-भूनने से उनके पोषक तत्व नष्ट हो जायेंगे और फिर उस निर्जीव भोजन से पेट भरने के अतिरिक्त और कोई प्रयोजन सिद्ध न होगा। शाकों को पकाने में यदि थोड़ी सावधानी बरती जाय तो उसकी उपयोगिता अक्षुण्ण रह सकती है।
केवल ताजी और अच्छी तरकारियाँ छाँटिये, सस्तेपन के लोभ में सड़ी-गली और बासी-बुसी मत खरीदिये। चूँकि वे खरीदी जा चुकी इसलिए अब तो उनकी पेट में डाल ही लिया जाय, इस तरह मत सोचिये। खराब चीजें खरीदने में पैसा चला गया ता अब उसके साथ ही स्वास्थ्य भी गवा देना चाहिए।
पकाने से पूर्व उन्हें अच्छी तरह घोल लीजिये ताकि उनके ऊपर चिपकी हुई अदृश्य से ठीक तरह छुटकारा पाया जा सके।
उतनी पकाइये जितने से वे खाने योग्य थोड़ी मुलायम हो जायँ। देर तक इतना मत पकाइये जिससे वे बुरी तरह धुल जायं। स्मरण रखिये उन्हें जितना अधिक पकाया जायेगा उतना ही उनका पोषक तत्व नष्ट होता चला जायगा।
जहाँ तक हो सके पानी में उबालने की अपेक्षा भाप से उबालिये। तेज आग की अपेक्षा मन्दी आग का उपयोग कीजिए, भले ही पकाने में कुछ देर लग जाय। जब पानी खोलने लगे तब उसमें सब्जियाँ डालिए, आरम्भ में ही डाल देने पर अधिक देर अग्नि संस्कार के कारण वे अपना गुण खो बैठती हैं। प्रेशर, कुकर या कोयले से प्रयुक्त होने वाले भाप कुकर सब्जियाँ पकाने की दृष्टि से सर्वोत्तम हैं।
पकाने में पानी उतना ही डालिए जो उन्हीं में खप जाय, फेंकना न पड़े। इस पानी में सब्जियों का बहुत सा सार तत्व रहता है। फेंकने की अपेक्षा तो उसे सूप बनाकर पी लेना अच्छा है।
जहाँ तक सम्भव हो छिलके समेत सब्जियाँ पकाइये। बहुत कड़े या अत्यन्त अस्वाद छिलके ही हटाने चाहिए। बहुत छोटे टुकड़े काटने की अपेक्षा बड़े टुकड़े रहने दीजिए।
सन्तरे का रस निकालकर यदि उसे आधा घण्टा पड़ा रहने दिया जाय तो उसमें रहने वाला विटामिन सी. नष्ट हो जायगा। काटकर खुले पटक देने पर अन्य फल भी अपनी विशेषता खो देते हैं। शाक-भाजियों में रहने वाले विटामिनों का भी यही हाल है। उन्हें यदि तेज आग पर पकाया जायगा तो बहुमूल्य तत्व नष्ट हो जायेंगे और शाक की छूंछ भर खाने के लिए शेष रह जायगी। घी, तेज, आदि में भून डालने पर तो उनका रहा-सहा कचूमर भी निकल जाता है और वे शाक-भाजियाँ की कोयला भर बनकर शेष रह जाती हैं। स्वाद का उद्देश्य भले ही पूरा हो जाय, पर वह प्रयोजन तो कोसों पीछे रह जायगा, जिसमें स्वास्थ्य संवर्धन के लिए शाक-भाजियों की आवश्यकता का प्रतिपादन किया गया है।
बर्तनों में सबसे हानिकारक और कुरूप है कढ़ाई। उसका पैंदा ही सदा काला नहीं रहता, हर खाद्य-पदार्थ का प्राकृतिक सौंदर्य नष्ट करके उसे भी वह काला कलूटा, कलुषित और कुपाच्य बना देती है। तलने और भूनने के बराबर खाद्य-पदार्थों के साथ दूसरा अत्याचार नहीं है। पूड़ी पकवान, मिठाई तथा तले-भुने शाक, पकौड़े, नमकीन आदि भी उसी में पकते हैं। यह सारी चीजें सर्वथा हानिकारक ही है, पर उनसे धन तथा समय की बर्बादी, पेट की तबाही और स्वास्थ्य की गड़बड़ी जैसी अनेकों हानियाँ उत्पन्न होती हैं। इन हानियों के साधन जुटाना ही जिसका एकमात्र काम है, उस कढ़ाई को कलमुँही कहें तो उचित है। उसे देश निकाला न दिया जा सके तो कम से कम चौके से बाहर तो रखना ही चाहिए।
फसल पर कच्चे अन्न मिलते हैं, वे सूखे और पिसे अनाज की तुलना में कहीं अधिक पोषक होते हैं। मक्का, उबार, बाजरा, गेहूँ, मटर आदि को थोड़ा-सा भून लेने पर वे और भी अधिक स्वादिष्ट हो जाते हैं, वैसे उन्हें कच्चा भी खाया जा सकता है। सूखे अन्न को भी पानी में भिगोकर अंकुरित किया जा सकता है। और उन्हें कच्चा अथवा उबाल कर खाया जा सकता है। रोटी की अपेक्षा तो कम पीसा, कम जलाया-तपाया दलिया भी अधिक लाभदायक होता है।
सूखे बीजों में जीवन तत्व बहुत स्वल्प मात्रा में होता है। उन्हें अंकुरित कर लेने पर पोषक तत्व कई गुने बढ़ जाते हैं। उनमें ऐसे रासायनिक परिवर्तन हो जाते हैं। जिससे पाचन अधिक सरल हो जाय। अंकुरित बीजों के अणु अमिनोएसिड के रूप में बदल जाते हैं और उनकी पौष्टिकता तथा पाचन क्षमता में आशाजनक वृद्धि हो जाती है। अंकुरित बीज फल, सब्जी और माँसाहार की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। गेहूँ, जौ, चना, सोयाबीन, मूँग, मसूर, मटर, मूँगफली जैसे बीजों को अंकुरित करके खाया जाय तो वे साधारण आटे या दाल के रूप में खाने की अपेक्षा कहीं अधिक गुणकारक सिद्ध होंगे।
कूड़ा-करकट बीने हुए, अनाज को स्वच्छ जल में धोकर किसी काँच या चीनी के बर्तन में रखकर उस पर इतना पानी डालें जिसमें कि वह डूब जाय। इसे 24 घण्टे पानी में डूबा रहने दें। इसके बाद पानी निकाल कर उसे किसी मोटे कपड़े में लपेट कर लटका दें। 24 घंटे इसी तरह टँगी रहने दें। बीच-बीच में पोटली पर पानी के छींटे देते रहें ताकि कपड़ा सूखने न पावे। अनाज अंकुरित हो जायगा। स्थान एवं ऋतु के अनुरूप अंकुरित होने में थोड़ा न्यूनाधिक समय भी लग सकता है।
बिना पकाये अन्नों के प्रयोग में गेहूँ की घास बना कर खाने की एक नई कड़ी और जुड़ी है और उस विधि को प्रयोगकर्ताओं एवं उपभोग कर्त्ताओं द्वारा अतीव उपयोगी बताया गया हैं।
अमेरिका की एक महिला डाक्टर एन. विरामोर ने अंग्रेजी भाषा में एक 30) मूल्य का ग्रन्थ प्रकाशित किया है-’हृीट ग्रोस मेनुअल”। इस पुस्तक में उनके उन अनुभवों और प्रयोगों का उल्लेख है, उन्हें गेहूँ की घास का सेवन कराकर अनेक रोगियों को चँगा करने का विस्तृत विवरण लिपिबद्ध किया है। वे गेहूँ की घास के रस को हरा रक्त कहती हैं और बताती हैं कि यह रस मनुष्य के रक्त से 40 फीसदी मेल खाता है। वे कहती हैं कि इसके सेवन से रोग निरोधक शक्ति आश्चर्यजनक रीति से बढ़ती है और पोषण के लिए उपयुक्त इतने बहुमूल्य तत्व उपलब्ध होते हैं, जितने अच्छी से अच्छी खुराक से भी प्राप्त नहीं होते। इसे किसी भी रोग में दवा के रूप में दिया जा सकता है और कोई भी इसे श्रेष्ठतम पोषक आहार के रूप में सेवन कर सकता है।
इस हरित रक्त को बनाने की विधि बहुत सरल है। 10-12 टूटे-फूटे टोकरे या लकड़ी की रद्दी पेटियाँ ले लीजिए, उन में खाद मिली मिट्टी भर दीजिए। इनमें बारी-बारी गेहूँ के अच्छे बीज बोइये। इन्हें छाया में रखिए और पानी देते रहिए। तीन-चार दिन में वे उग आवेंगे, और आठ -दस दिन में एक बालिश्त (7-8 इंच) ऊँचे हो जायेंगे। इनमें से पहले दिन बोये हुए गेहूँ के 30-40 पेड़ उखाड़ लीजिए। जड़ें काटकर हटा दीजिए। अंकुरों को धोकर थोड़े पानी के साथ सिल पर पीसकर कपड़े में छान लीजिए। बस हो गया “हरित रक्त” तैयार इसका एक गिलास नित्य पिया जाय।
दूसरे दिन, दूसरे दिन के बोये अंकुर लिये जायं। जिस टोकरे में से उखाड़ लिए गये हैं, उनमें फिर बो दिया जाय ताकि कम बराबर बना रहे। एक और से समाप्त होते जाएँ तो दूसरी और से वे बोये और उगाये जाते रहें। इस प्रकार सिलसिला टूटने न पायेगा और सदा ही यह गेहूँ की घास मिलती रहेगी। यह ध्यान रखने की बात है कि अंकुर उखड़ने के बाद यथासम्भव जल्दी ही उन्हें, पीसने, रस निकालने और पीने का कार्य पूरा कर लिया जाय। रस को दूर तक नहीं रखा जा सकता। एक घंटे में ही वह गुणहीन होने लगता है और तीन-चार घंटे रखा रहने पर तो वह बिल्कुल बेकार हो जाता है। हाँ पौधों को उखाड़ कर आवश्यकतानुसार 4-6 घंटे रखा भी जा सकता है। वैसे उनका भी ताजा सेवन ही अधिक लाभदायक है।
उपरोक्त महिला डाक्टर ने रोगी और नीरोग सभी पर इस गेहूँ घास रस के चमत्कारी सत्परिणामों का वर्णन किया हैं और कहा है कि वह रस दवा और टानिक दोनों का ही काम करता है।
एक और प्रयोग भी उनने लिखा है-जो गेहूँ घास रस की बराबर तो नहीं फिर भी बहुत कुछ लाभदायक है। यह विधि यह है कि आधा कप धुले बिने गेहूँ किसी काँच या चीनी के बर्तन में डालिये और उन पर दो कप पानी डालकर ढक दीजिए। 12 घण्टे बाद गेहूँ को मसल कर अलग कर दीजिए और पानी को छानकर पीजिए। यह पानी भी बहुत गुणकारी है। भीगे हुए गेहूँ दलिया आदि में काम लिये जा सकते हैं या उबाल कर-अंकुरित कर काम में लाये जा सकते हैं।
साराँश यह है कि खाद्य पदार्थों को यथासम्भव उनके प्राकृतिक रूप में लिया जाय। कम से कम भूना पकाया जाय और उनके उपयोगी अंश को नष्ट न होने दिया जाय। इतनी मामूली-सी सावधानी बरती जा सकें तो अपना गरीबी जैसा उपलब्ध आहार भी अपनी पोषक विशेषताओं को बनाये रह सकता है और उससे भी स्वास्थ्य रक्षा का प्रयोजन पूरा होता रह सकता है।
बुढ़ापा नहीं रोका जा सकता लेकिन यौवन को आजीवन अक्षुण्ण रखा जा सकता है। प्रकृति के नियम हर पदार्थ और हर प्राणी को अपने, बढ़ने, परिपक्व होने, ढलने और नष्ट होने की मर्यादा में जकड़े हुए हैं।
फिर यौवन कैसे अक्षुण्ण रह सकता है ? इस प्रश्न के उत्तर में यह समझना चाहिए कि यौवन शारीरिक नहीं किन्तु मानसिक स्थिति है उस पर शरीर पर पड़ने वाले प्रकृति प्रवाह का प्रभाव नहीं पड़ता। मनःक्षेत्र स्वसंचालित है उसमें उतार-चढ़ाव भीतरी कारणों से आते हैं, बाहरी कारणों से नहीं। बच्चों का अविकसित मस्तिष्क अपने क्रम से परिपक्व होता है, पर वयस्क व्यक्ति की मानसिक स्थिति उसके अपने चिन्तन पैर निर्भर रहती है। सामान्य लोगों की दृष्टि में जो परिस्थितियाँ आपत्ति की श्रेणी में गिनी जा सकती है। उनमें कोई मनस्वी व्यक्ति पूर्ण सन्तुष्ट और प्रफुल्लित रह सकता है। इसके विपरीत सर्वजनीन मान्यता जिन साधनों को वैभव मानती है उनके प्रचुर मात्रा में रहते हुए भी कोई व्यक्ति मानसिक विसंगतियों में ग्रसित होकर अत्यन्त दुःखी और उद्विग्न रहता देखा जा सकता है।
चेहरे पर भले ही झुर्रियाँ पड़ गई हों, चमड़ी लटक गई हो, बाल सफेद पड़ गये हों और दाँत उखड़ गये हों इन लक्षणों को देखकर यह कहा जा सकता है कि यह बूढ़ा आदमी है। ऐसे व्यक्तियों की इन्द्रियाँ शिथिल पड़ सकती हैं और श्रम शक्ति घट सकती है। पर फिर भी यदि वह मनस्वी है तो यौवन अपने स्थान पर अविचल खड़ा रह सकता है और उसकी स्थिरता में मृत्यु पर्यन्त कोई आँच नहीं आ सकती। जो अपने को भरा-पूरा अनुभव करता है, वह जवान है। जिसे अपने साधन उपकरण सामान्य निर्वाह के लिए पर्याप्त मालूम पड़ते हैं। और असंख्यों की तुलना में अपनी उपलब्धियों की बढ़ी-चढ़ी मानता है, उस सन्तुष्ट व्यक्ति के चेहरे पर हलकी मुस्कान दिखाई पड़ेगी। वस्तुतः यही जवानी की निशानी है।
शरीर से माँसल और नख-शिख की बनावट से आकर्षण होते हुए भी कोई तरुण व्यक्ति नितान्त बूढ़ा हो सकता है। जिसका आशा दीप बुझ गया, जिसे अपने चारों और अन्धकार ही दीखता है, जिसे अपने साधन अपर्याप्त मालूम पड़ते हैं, जिसे स्वजन-संबंधियों से अनेकों शिकायत हैं, वह हारा और खीजा दिखाई पड़ेगा। सरसता विदा हो गई होगी और असन्तोष का भार लद गया होगा, वह मानसिक दृष्टि से बूढ़ा है। संपर्क में आने पर सहज ही पता चल जाता है कि यह अर्धमूर्छित बूढ़ा आदमी नीरस और कर्कश जीवन जी रहा है। उसके घनिष्ठ संपर्क में रहने की किसी की भी इच्छा नहीं हो सकती।
जो वर्तमान से निर्भय है, आत्म-विश्वास जिसे भरोसा दिखाता है, वह बड़ी से बड़ी कठिनाई से भी साहस पूर्वक लड़ने में आनन्द ले सकता है। जो भविष्य को उज्ज्वल सम्भावनाओं से भरा-पूरा देखता है, जिसे अपने वर्तमान साधन असन्तोषजनक नहीं लगते; जो कुछ कर-गुजरने के ताने-बाने बुनता रहता है, वह जवान है। भले ही ऐसे व्यक्ति की उम्र कितनी ही क्यों न हो चुकी हों। भले ही वह मृत्यु के निकट जा पहुँचा हो।
यह ठीक है कि परिस्थितियाँ आदमी को झुका देती हैं, पर इससे भी ज्यादा यह बात ठीक है कि मनस्वी व्यक्ति अपनी आन्तरिक परिपक्वता के कारण बाहरी क्षेत्र की किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं और अपने सरस यौवन को आजीवन अक्षुण्ण बनाये रह सकते हैं।
परिवार-शिक्षण की दृष्टि से घर के बड़े यह परम्परा आरम्भ कर सकते हैं कि दिन भर की काम-काजी, बात-चीत में समय-समय पर हल्के-फुल्के ढंग से यह परामर्श देते रहें कि इस कार्य को किस तरह अधिक अच्छी तरह किया जा सकता है। इसमें सिद्धान्त और व्यवहार दोनों का जिक्र किया जाय। लड़की यदि आँगन में बुहारी लगा रही है और वह उस कार्य को ठीक तरह कर नहीं पा रही है तो उसे अच्छी तरह सफाई करके दिखानी चाहिए और बताया जाना चाहिए कि भूल कहाँ होती है और उसे दूर करके अच्छी सफाई करने का सिद्धान्त और तरीका क्या है ? इसी प्रकार बच्चों द्वारा किये जाने वाले कामों को किस प्रकार अधिक सुन्दर ढंग से किया जा सकता है, बड़ों को इसका मार्ग-दर्शन व्यावहारिक और सैद्धान्तिक दोनों ही रीति से करते रहना चाहिए। कार्यों की तरह ही विचार भी प्रकट होते रहते हैं। इस ओर भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कौन किस सम्बन्ध में क्या सोचता है और उसके सोचने में कितना औचित्य तथा कितना अनौचित्य मिला हुआ है ? परामर्श इस सम्बन्ध में भी दिया जाना चाहिए।
इस संदर्भ में एक विशेष बात ध्यान में रखनी चाहिए कि सुधार का परामर्श देना बहुत ही टेड़ी खीर है। इसमें दूसरे को अपना अपमान अनुभव हो सकता है, उसके स्वाभिमान को ठेस लग सकती है। आमतौर से यह सहन नहीं होता। गलती बताने वाले को निंदक, विद्वेषी, सनकी आदि कहा जाता है और किसी भी उलटे-सीधे तर्क का सहारा लेकर उस परामर्श की काट की जाती हैं। अशिष्ट लोग मुँहजोरी करने लगते हैं और शिष्ट मुँह से तो कुछ नहीं कहते, पर व्यवहार में उपेक्षा एवं अवज्ञा बरत कर अपना विरोध प्रकट करते हैं। दोनों ही परिस्थितियों में बात एक ही सिद्ध होती है कि परामर्शदाता के मार्गदर्शन को अस्वीकार कर दिया गया।
ऐसे प्रसंगों में खीजने और बुरा मानने की अपेक्षा यह देखना चाहिए कि सत्परामर्श और उपयोगी शिक्षण की भी अवज्ञा क्यों हो रही है ? होता यह है कि परामर्श के साथ-साथ भर्त्सना, कटुता, तिरस्कार एवं मूर्ख अनाड़ी सिद्ध करने वाली भावभंगिमा तथा शब्दावली का पुट लग जाता है और सुनने वाले को उतना अंश ही तिलमिला देता है। एक गिलास दूध में एक मक्खी पड़ जाने से सारा दूध अपेय बन जाता है। ठीक इसी प्रकार सत्परामर्श के साथ तिरस्कार अपमान, कटु शब्दों का समावेश कर दिया जाय-अपना अहंकार और दूसरे को मूर्ख ठहराया जाय तो इतने भर से सारी बात बिगड़ जाती है और गुड़ को गोबर में बदलते देर नहीं लगती।
परामर्शदाता की भूमिका निभाने से पूर्व वाणी की यह कलाकारिता सीखी जानी चाहिए कि किस तरह दूसरे के सम्मान-स्वाभिमान की रक्षा करते हुए-उसे खिजाने नहीं, प्रोत्साहित करने के ढंग से अभीष्ट शिक्षा किस प्रकार दी जा सकती है। जो किया जा रहा है, उसमें जितना श्रम हुआ है, जितना उत्साह दिखाया गया है उतने अंश की पहले प्रशंसा की जानी चाहिए; इसके बाद जो कमी रही है उसकी भूल का उल्लेख न करते हुए यह बताया जाना चाहिए कि उस कार्य को और भी अधिक कुशलता, सुन्दरता एवं सफलता के साथ किस प्रकार किया जा सकता है। खंडन परक चर्चा हर प्रसंग में हानिकारक होती है। समीक्षा करना टेड़ी खीर है। उसे कोई बिरले ही गले उतार पाते हैं और कोई विरले ही सन्तुलित ढंग से उसे कर पाते हैं। आमतौर से समीक्षा, कटुता एवं मनोमालिन्य का रूप धारण कर लेती है। इससे दुःखी होकर वह सोचा जाने लगता है कि-”बुरा जमाना आ गया, लोग ढीठ हो गये, सत्परामर्श सुनने को कोई तैयार नहीं-ऐसी दशा में आँखों पर पट्टी और मुँह पर ताला लगाये रहना ही उचित है।”
यहाँ समझने की बात इतनी ही है कि कड़ुई कुनैन खाने के लिए प्रौढ़ और दूरदर्शी व्यक्ति ही तैयार हो सकते हैं, बच्चे उसे खाने को रजामंद नहीं होंगे। खाने के लिए जोर दिया जाय तो वे उसे फेंक-फाँक देंगे और खाने का बहाना बना लेंगे। उन्हें खिलाना हो तो चीनी की परत चढ़ाकर गले उतारने की व्यवस्था बना सकते हैं। हमें यही मानकर चलना चाहिए कि भर्त्सना भरा परामर्श किसी को भी स्वीकार नहीं हो सकता। ऐसी समीक्षा से किसी को सहमत करना कठिन है जिसमें उसकी मूर्खता सिद्ध की गई हो।
समीक्षा किये बिना-परामर्श दिये बिना, सुधार सम्भव नहीं। अपने आप अपनी गलती ढूँढ़ लेने और सुधार लेने वाले तो सन्त होते हैं, सामान्य मनुष्य नहीं उन्हें सँभालने, सुधारने और दिशा देने की आवश्यकता रहेगी ही। इसलिए मध्यवर्ती सन्तुलित मार्ग निकालना चाहिए और प्रशंसा युक्त निन्दा करने की कला सीखनी चाहिए। जिसे परामर्श दिया जा रहा है उसे अपने और उसके बीच घनिष्ठ आत्मीयता और गहरी सद्भावना का विश्वास भी दिलाते रहना चाहिए। समीक्षक के प्रति निन्दक और द्वेषी होने की आशंका जगती है अस्तु उसे निरस्त करने के लिए परामर्श देने से पूर्व अपनी सद्भाव सम्पन्न घनिष्ठता का विश्वास किसी न किसी रूप में अवश्य ही स्मरण करा देना चाहिए। हर काम में कुछ न कुछ श्रम और मनोयोग लगा ही होता है, उतने की प्रशंसा किये बिना समीक्षा की शुरुआत कभी नहीं करनी चाहिए। जो गलती रही है उससे होने वाली हानि को प्रधानता न देकर उस कल्पना चित्र में रंग भरना चाहिए जो सुधार होने पर सुखद सम्भावना सामने आने की आशा जगाता है। वर्तमान भूल से होने वाली हानि की चर्चा परामर्श के अन्त में और हल्के ढंग से करनी चाहिए ताकि उसे अभीष्ट जानकारी मिलने और सँभलने की सतर्कता तो जग जाय, पर यह अनुभव न हो कि उसे तिरस्कृत किया जा रहा है। जिन परिस्थितियों में भूल होती रही है, दोषी उन परिस्थितियों को बता देने से भी काम बन जाता है। परामर्शदाता का उद्देश्य निन्दा करना या जी दुखाना तो हाता नहीं; वह सुधार ही तो चाहता है। इस प्रयोजन के लिए व्यक्ति की निन्दा करने की अपेक्षा परिस्थितियों का दोष कह देने से भी काम चल सकता है। इसमें मानापमान का झंझट भी नहीं रहता, साथ ही परोक्ष रूप से असावधानी की भर्त्सना भी हो जाती है। मन्तव्य इतने भर से हल हो सकता है।
जिन्हें अपना घर-परिवार सँभालना हो उन्हें सभी सदस्यों को पग-पग पर तो नहीं, पर अवसर देखकर भूलों के लिए टोकने और अधिक अच्छा करने का उपाय बताने की प्रक्रिया अनवरत रूप से जारी रखनी व्यक्ति एवं परिवार की तरह यही रीति-नीति समाज सुधार के क्षेत्र में भी प्रयुक्त होनी चाहिए और प्रत्येक शुभाकांक्षी को सत्परामर्श देने का प्रयास निरन्तर जारी रखना चाहिए। यह प्रयत्न किस चट्टान से टकराकर टूटते हैं ? जो इस जान लेगा वह सामने वाले के सम्मान, अपमान का सम्वेदनाओं का समुचित ध्यान रखे रहेगा। फलतः उसका तीर ठीक निशाने पर बैठता रहेगा और यह शिकायत करने का कोई कारण न रहेगा कि लोग सत्परामर्श भी सुनने-मानने को तैयार नहीं हैं।
प्रत्येक विकासोन्मुख परिवार को अपने यहाँ परामर्श गोष्ठी का नियमित रूप से प्रचलन आरम्भ कर देना चाहिए। इसे ज्ञान-चर्चा नाम दिया जाय। इसके लिए रात्रि को भोजन से निवृत्त होने के पश्चात् अवकाश वाला समय अधिक उपयुक्त रहता है। इस प्रचलन की जहाँ उपयोगिता समझी जाय वहाँ भोजन जल्दी बनने और जल्दी खाने की परम्परा डाली जानी चाहिए अन्यथा देर तक यही झंझट चला रहा तो गोष्ठी में सम्मिलित होने का अवकाश ही न रह जायेगा, बच्चे तो तब तक सो ही जायेंगे।
गोष्ठी में कथा, कहानियाँ सुनाने की प्रक्रिया चले। बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी नर-नारी कथा प्रसंगों को बड़े चाव के साथ सुनते हैं। बच्चों के लिए तो प्रायः कथा साहित्य ही छपता है। बड़ों के लिए पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ की ही भरमार रहती है। प्रेसों में प्रायः आधी छपाई तथा साहित्य की होती है। इस रुचि का उपयोग धर्म क्षेत्र में भी चिरकाल से होता आया है। संस्कृत में पुराण, उपपुराण, काव्य, नाटक, ग्रन्थों का विस्तार अन्य विषयों पर लिखे गये समस्त साहित्य की तुलना में भी अधिक है। रामायण, भागवत आदि ग्रन्थ धर्म क्षेत्र में भक्ति भावना साथ पढ़े, सुने जाते हैं और इसका पुण्य माहात्म्य बताया जाता है। यह सब कथा श्रवण के प्रति मनुष्य की सहज रुचि का परिचायक है।
घरों में चुनी हुई- धार्मिक, सामाजिक, नैतिक एवं आदर्शवादी दिशा देने वाली प्रेरणाप्रद कथाएं इस ज्ञान गोष्ठी में सुनाई जानी चाहिए। यदि पुराणों को महत्व देना हो तो एक सिरे से उनका वाचन अन्धाधुन्ध नहीं होना चाहिए। उनमें से उपयोगी अंश ढूंढ़े और उभार जाने चाहिए। इन ग्रन्थों में ऐसी चर्चाएं भी कम नहीं जो आज की स्थिति में ने केवल निरर्थक है वरन् कई बार तो अनर्थ का भी समर्थन करती हैं। अस्तु यह नितान्त आवश्यक है कि पुराण ग्रन्थों को केवल उपयुक्त शिक्षा देने वाले प्रसंगों को छाँटकर ही सुनाया जाय।
इतिहास में ऐसे प्रेरक घटना-क्रम असंख्य हैं जो मानव जीवन के विविध पक्षों पर प्रकाश डालते हैं और अवाँछनीयताओं की हानि तथा सन्मार्ग पर चलने के लाभ सिद्ध करते हैं। ऐसे कथा-प्रसंगों पर अनेकों प्रेरणाप्रद पुस्तकें बाजार में-पुस्तकालयों में मिल सकती हैं। कल्पित कहानियों एवं उपन्यासों की भी कमी नहीं। अपनी ‘युग-निर्माण’ मासिक पत्रिका इसी प्रकार की पाठ्य-सामग्री से भरी रहती है।
ज्ञान-चर्चा गोष्ठी में इसी प्रकार की कथा साहित्य सुनाया जाया करें। इसमें सम्मिलित होने के लिए न आग्रह करना पड़ेगा और न समझाने, दबाव डालने की आवश्यकता पड़ेगी। बाल-वृद्ध, नर-नारी सभी उसमें उपस्थित होने के लिए स्वयं ही उत्सुक रहेंगे और कोई यह अनुभव न करेगा कि यह उपदेश प्रवचन का रूखा विषय है और उसे सुधारने संभालने के लिए ही सारा सरंजाम खड़ा किया गया है। परोक्ष शिक्षा जितनी सफल होती है उतनी प्रत्यक्ष निर्देश की शैली नहीं। कथा-प्रसंगों का यह उपक्रम वस्तुतः परिवार के लोगों की मनोभूमि एवं चिन्तन दिशा परिष्कृत करने के लिए बहुत सरल, सरस और सफल माध्यम है। इसे हर परिवार में आरम्भ किया जाना चाहिए।
‘नानी की कहानी’ वाली बात अभी भी मुहावरों में आती है। दादी या नानी के जिम्मे एक काम यह भी होता था कि वे बच्चों को कहानियाँ सुनाये। बच्चे उन्हें घेर कर बैठ जाते थे और वे बड़ी हंसी-खुशी के वातावरण में शिक्षा और मनोरंजन का समन्वय करते हुए कहानियाँ कहती थी। न केवल बालक वरन् पूरा परिवार उन्हें चावपूर्वक सुनता था। चौपालों पर भी बड़े-बूढ़े, सिंहासन बत्तीसी, बेताल पच्चीसी, बीरबल विनोद आल्ह खण्ड एवं कथा पुराणों के प्रसंग सुनाते थे और उन्हें सुनने के लिए बड़ी संख्या में छोटे-बड़े उपस्थिति होते थे। अब मनोरंजन के दूसरे साधन बन गये-व्यस्तता बढ़ गई और आलस छा गया-ऐसी दशा में वह कहानियों वाला प्रचलन भी बन्द हो गया। रामायण की कथा रात्रि को मुहल्ले-मुहल्ले में होती थी और उसे सुनने के लिए उस क्षेत्र के बहुत लोग इकट्ठे होते थे। इस प्रचलन से ज्ञानवृद्धि और मनोरंजन का दुहरा लाभ है। यह दोनों ही ऐसे हैं जिन्हें निरर्थक नहीं कहा जा सकता। सामूहिकता की प्रवृत्ति घटने और वैयक्तिकता बढ़ने से इस दिशा में शिथिलता बढ़ती जाती है। यह चिन्ता की बात है।
इसी प्रचलन को अब नये सिरे से हमारे घरों में आरम्भ किया जाना चाहिए। पुराने लोग पुस्तकों के तथा शिक्षा के अभाव में कहानियाँ जवानी याद रखते थे। अब वैसी आवश्यकता नहीं रही। इस उद्देश्य को पूरा कर सकने वाली ढेरों पुस्तकें बाजार में उपलब्ध है। मुहल्ले का पुस्तकालय इस आवश्यकता की पूर्ति कर सकता है। हर घर में नई-नई पुस्तकें खरीदते रहना तो कठिन पड़ेगा, पर एक मुहल्ले में एक छोटा पुस्तकालय इस प्रयोजन के लिए लाभदायक हो सकता है और उससे अदल-बदलकर प्रत्येक परिवार पुस्तकें प्राप्त करने, सुनाने, वापिस करने का सिलसिला चल सकता है। एक ही जगह खरीदी हुई पुस्तकों से पूरे मुहल्ले का काम चल सकता है।
घर का कोई उत्साही सदस्य इस कार्य को अपने कन्धे पर ले सकता है। बदल-बदल कर कई व्यक्ति भी इसे पूरा करते रह सकते हैं। कहने वाले वक्तृत्व कला का अभ्यास होगा और मनोरंजन की एक उत्साहवर्धक परिपाटी चल पड़ेगी। अपने कहानी कहने वालों की एक विशेष पद्धति यह होनी चाहिए कि कहानी के हर मोड़ पर एक छोटी समीक्षात्मक-विवेचनात्मक टिप्पणी अपनी ओर से लगाते चलें। जिससे उसी में से कितनी प्रकार के निष्कर्ष निकलते रहें और नई नई दिशाओं, प्रेरणाओं तथा भाव सम्वेदनाओं का लाभ मिलता रहे। यह शैली मासिक ‘युग-निर्माण योजना’ द्वारा भली प्रकार सीखी जा सकती है। कितने छोटे-छोटे जीवन चरित्र तथा कुछ और भी पुस्तकें इस प्रयोजन के लिए छपी है। प्रसंगों एवं जीवन वृत्तांतों को टिप्पणी समेत प्रस्तुत किया जाय। हर व्यक्ति निष्कर्ष नहीं निकाल सकता । कथाओं में हर मोड़ पर कुछ समझने योग्य तथ्य दिये होते हैं उन्हें उभारा जा सके तो उससे सुनने वालों की अन्तः चेतना नई-नई अनुभूतियों से लाभान्वित होती रह सकती है। परिवार शिक्षण का यह बहुत अच्छा तरीका है। जिन सत्प्रवृत्तियों को घर के लोगों ने उगाया जगाया जाना आवश्यक है उनके लिए सीधा उपदेश देने की अपेक्षा कथा माध्यम से परोक्ष रूप से गले उतारना अधिक श्रेयस्कर है। सीधी शिक्षाएं रोज-रोज नहीं दी जा सकती। इससे ऊबने और खीजने लगने का खतरा है, पर कथा माध्यम से तो हर दिन उसी तथ्य को पुष्ट किया जाया रहे तो भी हर्ज नहीं। उन्हें हर दिन उसी उत्साह और चाव के साथ सुना जा सकता है।
अपने परिवार में जिन वृत्तियों की कमी दिखाई पड़ती है - जिन्हें बढ़ाया जाना आवश्यक है। उसी स्तर की कहानियों का चुनाव करते रहने से- कहने की शैली निखारते रहने से परिवार शिक्षण का काम भली प्रकार से चलता रह सकता है।
सप्ताह में एक बार या अवसर के अनुरूप घर की छोटी-बड़ी समस्याओं पर परस्पर विचार विनिमय करते रहने के लिए भी यही कथा अवसर बहुत उपयुक्त हैं। घर की व्यवस्था एवं प्रगति के सम्बन्ध में हर व्यक्ति को कुछ सोचने और कुछ करने का अवसर मिले तो इससे उपेक्षा और अन्यमनस्कता की स्थिति दूर होगी। परिवार के विकास में इस प्रकार दिलचस्पी जग सकती है और उसका वास्तविक लाभ कुछ ही दिनों में सामने खड़ा दिखाई दे सकता है।
यह आवश्यक नहीं कि कोई बहुत बड़ी समस्याएं सामने आने पर ही यह परामर्श विचार -विमर्श किया जाय। कल क्या साग-दाल बननी चाहिए-परसों का त्यौहार किस तरह मनाया जाना चाहिए ? जैसी छोटी-छोटी बातें भी परामर्श का विषय हो सकती हैं और अर्थ-व्यवस्था, सुसज्जा, शिक्षा, सुधार जैसे समस्या प्रसंगों की जानकारी घर के सभी लोगों को देकर उन्हें पूछा बताया तथा कुछ सोचने एवं करने के लिए उत्साहित किया जा सकता है। परिवार में हमारा भी कुछ उत्तरदायित्व एवं योगदान है, यह अनुभव घर के सभी सदस्य करने लगें तो उस रुझान एवं सहयोग से परिवार निर्माण का उत्साहवर्धक पथ प्रशस्त हो सकता है।
आवश्यक नहीं कि हर दिन कहानियाँ ही सुनाई जाय। समाचार पत्रों को महत्वपूर्ण घटनाएं भजन, कीर्तन रामायण कथा, पहेलियाँ, प्रश्नोत्तर जैसे कई आधार समय-समय पर बदले जाते रह सकते हैं। जिस घर में इन माध्यमों में से जो अधिक पसन्द किया जाय, वहाँ उसकी प्रधानता रखी जा सकती है।
विचार परिष्कार की दृष्टिकोण विकसित करने की, आदर्शवादी उमंगे उत्पन्न करने की दृष्टि से रात्रि को कहानियाँ कहने प्रचलन देखने से छोटा किन्तु परिणाम में बहुत बड़ा ही सिद्ध हो सकता है। इस अति प्राचीन किन्तु अति नवीन परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए हमें नये सिरे से प्रयत्न आरम्भ करना चाहिए। परिवार निर्माण में जहाँ भी रुचि हो वहाँ यह नया प्रयोग परीक्षण आरम्भ किया जाना चाहिए कि यह छोटा सा शुभारम्भ कितना बढ़ा चढ़ा सत्परिणाम प्रस्तुत करता है।
परिवार निर्माण का अर्थ -सन्तान संख्या का विस्तार करना नहीं और न यह कि किसी तरह मन से सर्वथा पृथक लोगों को एक बाड़े में बन्द किये रहने का आग्रह करते रहा जाय। कुटुम्ब बड़ा हो या छोटा उसकी शोभा सफलता इस बात में है कि सुव्यवस्था एवं सुसंस्कारिता को उसमें कितना प्रश्रय मिल रहा है और गुण, कर्म, स्वभाव की विभूति सम्पदा वहाँ किस कदर बढ़ रही है। इस प्रयोजन में गरीबी या व्यस्तता बाधक नहीं है। कठिनाई एक ही रहती है कि घर के लोगों को शरीर सुख ही ध्यान में रहता है, उनके दृष्टिकोण एवं भावना स्तर को ऊंचा उठाने की आवश्यकता अनुभव नहीं की जाती और न उसके लिए कुछ प्रयत्न ही किया जाता है।
बात तब बनेगी जब यह समझा जाय कि शारीरिक सुख या आर्थिक सुविधा का महत्व अति स्वल्प है, उतने भर से आलसियों, विलासियों और अहंकारियों जैसी विडम्बनाएं ही हाथ लगती हैं। व्यक्तित्व का विकास, चिन्तन एवं दृष्टिकोण की प्रखरता पर निर्भर रहता है। आध्यात्मिक न सही-भौतिक ही सही-किसी भी क्षेत्र में दूसरों को प्रभावित कर सकने वाला व्यक्ति ही सफल हो पाता है। यह आकर्षण वेश विन्यास का नहीं गुण सम्पदा का ही होता है। दुर्गुणी व्यक्ति अपने निकटतम व्यक्तियों को भी रुष्ट रखता है और उनके सहज सहयोग तक से वंचित बना रहता है। इसके विपरीत सद्गुणी अपनी सुगन्ध से रास्ता चलने वालों तक को आकर्षित करता है और उन्हें अपना प्रशंसक मित्र और सहयोगी बना लेता है।
बाप-दादों की कमाई बैठे-बैठे खाना अथवा चोरी चालाकी से वैभव खड़ा कर लेना दूसरी बात है, पर यदि किसी को -किसी भी क्षेत्र में वास्तविक सफलता प्राप्त करनी हो तो उसके लिए सद्गुणों की सम्पदा अनिवार्य रूप से आवश्यक है। मानवी प्रगति के प्रत्येक पक्ष में दूसरों का सहयोग आवश्यक होता है। यह सहयोग किसी को अनायास ही नहीं मिल जाता; वरन् प्रामाणिकता की परख पर सही सिद्ध होने वालों को ही यह अनुदान उपलब्ध होता है। चोर-चोर मौसेरे भाई हो तो सकते हैं पर यह रिश्ता तभी तक चलता है जब तक वे एक दूसरे के अनैतिक स्वार्थों को सिद्ध करते रहते हैं। जैसे ही उसमें शिथिलता आई वैसे ही वह मैत्री बालू की दीवार की तरह विस्मार होती दिखाई देती है। प्रगति के ठोस आधारों में दूसरों का विश्वास और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप मिलने वाला सद्भाव भरा सहयोग अनिवार्य रूप से आवश्यक होता है। जिसने यह उपार्जन कर लिया, समझना चाहिए कि उसकी प्रगति का द्वार खुल गया, वह भौतिक या आत्मिक किसी भी क्षेत्र में अपने स्नेही, सहयोगियों की सहायता से आगे बढ़ सकने में समर्थ हो सकता है।
दूरदर्शी गृहपति अपने परिवार के लिए आर्थिक साधन जुटाते रहने में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर देते ; वरन् पूरी सतर्कता और गम्भीरता के साथ यह अनुभव करते हैं कि इन आत्मीयजनों को चिन्तन एवं स्वभाव की दृष्टि से भी सुसम्पन्न बनाया जाय। जहाँ यह मान्यता काम कर रही होगी और इसके लिए प्रयत्न चल रहें होगे वहाँ सुसंस्कारिता बढ़ेगी और उसकी बहुमूल्य फसल के घर के लोग यथासमय लाभान्वित होंगे। परिवार के प्रति मोह, ममता तो सभी रखते हैं, पर जहाँ यह दूरदर्शी आकाँक्षा जग रही हो समझना चाहिए कि परिवार के प्रति उत्तरदायित्व निबाहने की बात यहीं बन पड़ रही है।
स्पष्ट है कि किसी को भी हर घड़ी आदर्शवादिता अपनाने की शिक्षा नहीं दी जा सकती। इस दिशा में अति करने से उलटी प्रतिक्रिया होती है। समयानुसार परोक्ष रूप से ही इस प्रकार का प्रशिक्षण किया जा सकता है। किसी दिशा में अधिक सोचना उसकी उपयोगिता समझना और जो उपयुक्त जंचे उसे अपनाना मनुष्य का अपना काम है। इस संदर्भ में सहायता भर की जा सकती है। आग्रह थोपा नहीं जा सकता। यदि थोपा जा सका होता तो गाँधी जैसे महापुरुष के बड़े पुत्र हीरालाल गाँधी को जहाँ-तहाँ भर्त्सना क्यों सहनी पड़ती ? तब हिरण्यकश्यपु जैसे प्रभावशाली का पुत्र क्यों न अपने पिता का अनुसरण करता। थोपने से मनुष्य की जीवन चेतना को किसी दिशा में ढाला नहीं जा सकता, बाध्य तो शरीर ही किया जा सकता है। अन्तः चेतना को दिशा देने वाले साधन ही जुटाये जा सकते हैं। उस प्रकार की रुझान उत्पन्न करने वाला वातावरण ही बनाया जा सकता है। उसी के लिए शक्ति भर प्रयत्न करना गृहस्वामी का कर्तव्य है। इस दिशा में सतर्क और प्रयत्नशील रहा जाय तो उतने भर से बहुत काम चल सकता है।
इस संदर्भ में जो साधन सामग्री जुटाई जानी चाहिए उसमें प्राथमिकता घरेलू पुस्तकालय को-ज्ञान मन्दिर को दी जानी चाहिए। यह हर विचारशील परिवार को अनिवार्य आवश्यकता है। पेट की भूख बुझाने के लिए हर परिवार का एक रसोई घर, अन्न भण्डार अनिवार्य रूप से आवश्यक होता है। ठीक उसी प्रकार मस्तिष्क की- अन्तःकरण की -भूख बुझाने के लिए ज्ञान भण्डार भी होना चाहिए। पेट का महत्व समझा जाय और अन्तःकरण की उपेक्षा की जाय तो ही ज्ञान भण्डार को निरर्थक कहा जा सकता है। जो चेतना का, चिन्तन का दृष्टिकोण का, अन्तःकरण का, भाव सम्वेदनाओं का कोई मूल्य नहीं समझते जिनके लिए धन और विलास ही सब कुछ है, उन्हें ज्ञान सम्पदा का महत्व बताया, समझाया जा सकना कठिन है। पर जिन्होंने यह समझ लिया है कि मानवी सता चिंतन और चेतना के स्तर पर ही समुन्नत और पतित होती है सम्पन्न और दरिद्र बनती है उन्हें यह स्मरण भर दिलाना पर्याप्त होगा कि शरीर की तरह आत्मिक चेतना की भी कुछ भूख होती है और उसका साधन जुटाना पेट भरने की सामग्री जुटाने से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही आवश्यकता है। घरेलू पुस्तकालय की स्थापना इसी अभाव की पूर्ति करती है।
कूड़े-कचरे की तरह किस्सा, कहानियों की धर्म ढकोसलों की बेकार पुस्तकें हर घर में पाई जा सकती है; पर ऐसे विचारशील परिवार विरले ही मिलेंगे जिनने घर के हर सदस्य को भावनात्मक परिष्कार कर सकने वाले साहित्य को प्रयत्न करके तलाश किया हो। अच्छी पुस्तकें खरीद ली जाय तो उन्हें उपेक्षापूर्वक किसी मेज, अलमारी में पटक दिया जाय तो उतने भर से भी कुछ काम नहीं चलता। उन्हें आवश्यक महत्व देने के लिए सुसज्जित स्थान पर सुसज्जित रूप से रखना उनका महत्व समझाना और स्नेह, दुलार के साथ पढ़ने या सुनने के लिए सहमत करना भी एक बड़ा काम है।
निम्नगामी मानसिक हलचलें उत्पन्न करने वाले ओछे उथले साहित्य में तो हर किसी की सहल रुचि होती है। पानी के नीचे की ओर तो अपने आप बहता है, पर यदि उसे ऊपर लाना हो तो कई तरह के साधन जुटाने और श्रम करने की आवश्यकता पड़ेगी। ठीक यही बात कुरुचि और सुरुचि की ओर मोड़ने के सम्बन्ध में भी है। विवेकशीलता उत्पन्न करने वाला साहित्य आमतौर से नीरस समझा जाता है और उसे पढ़ने में अरुचि रहती है; इस ओर रुचि उत्पन्न करना उपयोगी पुस्तकें खरीदे कर घर में रख देने से भी अधिक कठिन काम है। पैसा तो किसी प्रकार खर्च किया जा सकता है, पर यदि खरीदी पुस्तकों को किसी ने पढ़ा ही नहीं तो घर में बेकार का कूड़ा करकट बढ़ा और उद्देश्य कुछ भी पूरा न हुआ। अस्तु जहाँ ज्ञान मन्दिर की उपयोगिता समझी जाय वहाँ यह जिम्मेदारी भी मानी जाय कि सारी व्यवहार कुशलता का प्रयोग करके उन्हें पढ़ने के लिए प्रोत्साहन भी दिया जायगा और इसकी देखभाल भी रखी जायेगी कि वैसा ही भी रहा है या नहीं।
जो बिना पढ़े हैं उन्हें पढ़कर सुनाया जाना चाहिए। एक तरीका यह भी है कि इस प्रकार का साहित्य पढ़े जाने और सुने जाने का क्रम बनाया जाय और उसके लिए नियत समय निर्धारित किया जाय। यदि गृहपति स्वयं पुस्तकें सुनाने लगें और कुछ पढ़ा या सुना गया है उसे गहराई से समझने की परीक्षा रूप में पूछताछ करने लगे तो उस पाठन का महत्व और भी बढ़ सकता है और कुछ दिन में सारे परिवार की सहज रुचि उस और ढल सकती है।
अब गुरुकुल रहे नहीं -धर्मोपदेश के नाम पर निरर्थक विडंबनाएं चलती और भ्रम फैलाती रहती हैं। जीवनोपयोगी शिक्षा के लिए घर के लोगों को किसी विद्यालय में पढ़ने भेजा जाय यह भी सम्भव नहीं। ऐसे सुयोग्य शिक्षक अपने घर में आकर रहने लगें यह तो असम्भव है। फिर ऐसे सूक्ष्मदर्शी प्रभावशाली लोग हैं भी कहा जो व्यक्ति की, समाज की वर्तमान समस्याओं का सही और सामयिक समाधान प्रस्तुत कर सकें। इन सब कठिनाइयों का समाधान घरेलू पुस्तकालय की स्थापना से ही सम्भव हो सकता है। जीवित या स्वर्गीय महामानवों की अति महत्वपूर्ण शिक्षा किसी भी समय कितने ही देर प्राप्त करते रहने उनके साथ सत्संग करते रहने का उपाय एक ही है उनके ग्रन्थों को ध्यानपूर्वक श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाय और यह मनन किया जाय कि उस कसौटी पर अपनी स्थिति कितनी खरी उतरती है। साथ ही यह भी मनन किया जाय कि उत्कृष्टता अपनाने के लिए कुछ किया जा सकता है ?
बड़े-बड़े धर्मग्रन्थों से घर की शोभा बढ़ती है। आध्यात्मिक और दार्शनिक ग्रन्थ विशिष्ट लोगों के लिए विशिष्ट प्रयोजनों के लिए लिखे हैं। परिवार के लोगों को उनके स्तर के अनुरूप उनकी समस्याओं का समाधान करने वाली सरल पुस्तकें ही उपयोगी हो सकती हैं। बछड़े की पीठ पर हाथी का हौदा नहीं लादा जा सकता है। बच्चों, किशोरों, महिलाओं छात्रों तथा काम काजी तरुणों की उनकी वर्तमान स्थिति में जो समस्याएं सामने हैं उनका व्यावहारिक हल बताने वाली पुस्तकें ही घरेलू पुस्तकालय के काम ही हो सकती हैं। बड़े धर्म ग्रन्थों के प्रति श्रद्धा तो रखी जाय, पर साथ ही यह समझा जाय कि वे परिवार के सदस्यों का सामयिक एवं व्यावहारिक मार्ग दर्शन नहीं कर सकते। ऐसी दशा में उन्हें पढ़ने का आग्रह किया जाय और वह कार्यान्वित होने भी लगे तब भी अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध न होगा। अस्तु घरेलू पुस्तकालय की स्थापना पढ़ने के लिए प्रोत्साहन का क्रम बनाने के साथ उपयोगी पुस्तकों के चुनाव का भी अति सतर्कता पूर्वक ध्यान रखा जाना चाहिए।
इस प्रयोजन के लिए कुछ तो पैसा खर्च होना ही है। उसे अन्न, शाक, दूध, दवा कपड़ा, साबुन स्तर का अनिवार्य रूप से आवश्यक दैनिक खर्च मानकर ही चलना चाहिए। कभी उत्साह, कभी उपेक्षा का उतार-चढ़ाव उसमें नहीं चलना चाहिए। यह दैनिक और अनिवार्य खर्च है ? इसको स्मरण रखने और आदत का अंग बनाने के लिए यह विधि अपनाई जानी चाहिए कि घर के किसी पवित्र स्थान पर, पूजा स्थल पर ज्ञानघट स्थापित किया जाय और इस मद को जितना महत्व दिया गया हो उतना पैसा उस पेटी में नियमित रूप से डाला जाय। खुले पैसों की वैसे तो किल्लत नहीं रही, पर यदि उसमें झंझट लगता हो तो उतने पैसे की एक छोटी पर्ची उसमें डाली जा सकती है और उन्हें हर महीने नोट रुपयों में बदला जा सकता है। इस राशि को हर महीने का पैसा इकट्ठा करके एक साथ कई नई पुस्तकें खरीदी जा सकती है।
आरम्भिक स्थापना के अवसर पर कुछ अधिक खर्च हो सकता है। इसके लिए अलग से से एक सुन्दर कपाट बन सकता हो और उस पर ज्ञान मन्दिर का कपाट बन सकता हो तो घर में आने वाले अन्य लोगों को भी इसकी उपयोगिता समझने का अवसर एवं प्रोत्साहन मिल सकता है। आरम्भ में कुछ अधिक पुस्तकें खरीदने से ही तो यह स्थापना सम्भव होगी इसलिए उसे रेडियो, टेलीविजन, जेवर सिलाई की मशीन बिजली का पंखा जैसी उपयोगी वस्तुएं खरीदने की तरह ही आवश्यक कार्य मानकर साहसपूर्वक कुछ राशि खर्च कर देनी चाहिए। मुहल्ले का, गाँव का पुस्तकालय स्थापित करना भी इस प्रयोजन की पूर्ति का एक महत्वपूर्ण अंग है, उसके लिए भी उतना ही उत्साह, त्याग एवं प्रयत्न करना आवश्यक है जितना कि घरेलू पुस्तकालय के लिए। इस सामूहिक पुस्तकालय से तो माँगकर भी अपने परिवार की आवश्यकता पूरी की जा सकती है।
मित्र को जाने दो। उसकी विदाई पर शोक प्रकट न करो और नहीं सुखद यात्रा को अपने आँसुओं से दुःखद बनाओ। जिसके कारण तुम उसे प्रेम करते थे, वे कुछ विशेष गुण ही थे, कारण दूसरों को तुलना में वह अधिक भाया और सुहाया था। उन गुणों को अधिक अच्छी तरह समझने का अवसर तो वियोग के उपरान्त ही लगेगा। पर्वतारोही की अपेक्षा हिमाच्छादित गिरिशृंखला का दर्शन लाभ वे अधिक अच्छी तरह ले सकते हैं जो किसी दूरवर्ती समतल क्षेत्र में खड़े होकर उस सौंदर्य को निहारते हैं। समीपवर्ती मित्र की अपेक्षा दूरवर्ती अधिक श्रेष्ठ है, क्योंकि एकरस और एकाँगी प्रेम करना केवल उसी से प्रभाव से सम्भव है। निकटवर्ती तो निरन्तर उतार-चढ़ाव उत्पन्न करता रहता है।
मैत्री मधुरता का उल्लास भरती है, रिक्तता की पूर्ति के लिए उसका उपयोग नहीं हो सकता। रिक्तता भरने के लिए जिनकी अपेक्षा की जाती है वे भोग्य उपकरण है। उनकी आवश्यकता हो सकती है, पर मैत्री नहीं निभ सकती। मित्रता का आनन्द बन सकती। गुणों का स्पर्श आवश्यक नहीं उसके चिन्तन से भी काम चल सकता है। मित्र की उपस्थिति की अपेक्षा मैत्री की उपस्थिति कितनी अधिक सरस होती है, इसे कोई प्रेमी ही जानता है।
ईश्वर से प्रेम करना इसीलिए संभव है कि वह हम से दूर एवं अप्रत्यक्ष है। यदि वह शरीरधारी की तरह हमारे साथ रहता है उसके साथ मैत्री नहीं हो पाती। उसकी अपेक्षा के अनुरूप हमारे आचरण और हमारी अपेक्षा के अनुरूप उसके आचरण बने रहना कठिन पड़ता, ऐसी दशा में किसी न किसी पक्ष का उभरता असन्तोष मैत्री के आनन्द में गांठें लगाता रहता। यह अच्छा ही है कि ईश्वर हमसे दूर है और उसके गुणों का चिन्तन करते हुए निर्वाध मैत्री सम्बन्ध बनाये रह सकना सम्भव हो सका।
मैत्री अदृश्य है और व्यवहार दृश्य। मैत्री गुणों पर निर्भर है और व्यवहार उपयोगिता पर। कौन हमारे लिए कितना उपयोगी हो सकता है ? कौन हमारी कितनी आवश्यकताएं पूर्ण कर सकता है, इस आधार पर जिससे भी मित्रता होगी वह उतनी ही उथली रहेगी और उतनी ही क्षणिक अस्थिर रहेगी। यदि किसी ने आजीवन मैत्री निबाहनी हो ता उसका एक ही उपाय है-मित्र की गुण परक विशेषताओं को ध्यान में रखें और सोंचे कि यह सद्गुण परमेश्वर के-परम ज्योति के वे स्फुल्लिंग है जो कभी भी बुझ नहीं सकते। जिनमें मलीनता नहीं आ सकती, उनमें न कभी शिथिलता आवेगी और न न्यूनता दृष्टिगोचर होगी।
न माता में, न स्त्री में, न सगे भाई में और न पुत्र में ऐसा विश्वास होता है कि जैसा स्वाभाविक मित्र में होता है।
मित्रता विशुद्ध आध्यात्मिक अनुभूति है जो किसी में उच्च गुणों की स्थापना के आधार पर उदय होती है। जिसे निकृष्ट समझा जायगा, उसकी कारणवश चापलूसी हो सकती है, पर श्रद्धाजन्य मैत्री का उदय नहीं हो सकता। श्रद्धा और मैत्री उत्कृष्टता के देवता की दो भुजाएं हैं। यदि हम किसी से मैत्री करने से पूर्व इस तत्व को समझ लें कि अमुक सद्गुणों के आधार पर व्यक्ति विशेष से प्रेम करना है तो समझना चाहिए कि कि उसके बदल जाने या दूर चले जाने से भी उस शाश्वत अमृत प्रवाह में कोई अन्तर नहीं आवेगा, जो यथार्थ मित्रता के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहता है।
इसलिए तत्वदर्शी कहते हैं कि जाने वालों को जाने दो। उन्हें रोको मत। क्योंकि इससे मित्रता के निर्वाह में कोई अन्तर आने वाला नहीं हैं।
भगवान बुद्ध ने समस्त शासकों को चेतावनी देते हुए कहा-”जिस राज्य में मदिरा आदर प्राप्त करेगी वह महाकाल के अभिशाप ने नष्ट होता चला जायगा। वहाँ दुर्भिक्ष पड़ेंगे, औषधियाँ निष्फल होंगी और विपत्तियां मंडराएंगी। मदिरा पान महा हिंसा है।”
महात्मा गाँधी कहते थे- अगर में एक घण्टे के लिए भी सारे हिंदुस्तान का सर्वशक्ति सम्पन्न शासक बना दिया जाऊं तो पहला काम जो मैं करूंगा वह यह होगा कि तुरन्त तमाम मदिरालयों को बिना किसी मुआवज़ा दिये बंद करा दूँगा।
नेपोलियन कहते थे- हमें शत्रु की अपेक्षा मदिरा से अधिक डरना चाहिए।
अलाउद्दीन खिलजी की क्रूरताओं और खून खराबियों से इतिहास के पन्ने रंगे पड़ें हैं वह परले दरजे का शराबी था।
एक बार ऐसा योग बना कि उसे शराब उपलब्ध न हो सकी। इस पर उसका अन्तःकरण जगा और अपने दुष्ट जीवन के लिए पूर्णतया उत्तरदायी शराब को माना।
जीवन के अन्तिम दिनों वह शराब का घोर शत्रु हो गया था। उसने सदा साथ रहने वाली शराब की सुराही जमीन पर दे मारी। महल के सारे, मद्य-पात्र उसने अपने हाथों चूर किये। संग्रहित शराब सारे आँगन में ऐसे फैली पड़ी थी मानो भारी वर्षा हुई हो। इतना ही नहीं उसने शराब के विरुद्ध कड़े फरमान निकाले और शराब बनाने, बेचने और पीने वालों को कड़े दण्ड दिये।
शराबखोरी सारे संसार में अपने पैर फैला रही है। अमरीका, ब्रिटेन, फ्राँस, बेल्जियम, इटली और अफ्रीका के कुछ नवोदित धनी देशों में उसका विस्तार आश्चर्यजनक रूप हुआ है 4॥ करोड़ की आबादी वाले फ्राँस में हर 68 मनुष्यों पीछे एक शराब घर है। लगभग दो तिहाई आदी पियक्कड़ हैं। हर फ्राँसीसी पुरुष 54 लीटर और हर महिला 18 लीटर के अनुपात से शराब पीते हैं। ब्रिटेन की दशा इस क्षेत्र में दयनीय है। वहाँ 3 वर्ष के बच्चों से लेकर 70 वर्ष के बूढ़ों तक शराब के आदी हैं। औसत अंग्रेज को अपनी कमाई का 20 प्रतिशत शराब तथा सिगरेट में खर्च करना पड़ता है। बेल्जियम में 102 व्यक्तियों पीछे और पश्चिमी जर्मनी में 96 के पीछे एक शराब घर है। वीयर बेल्जियम में हर व्यक्ति पीछे 130 लीटर और जर्मनी में 212 लीटर खपती है। जर्मनी के आंकड़े बताते हैं कि वह 1220 करोड़ रुपये की बिकी।
अमेरिका में 30 प्रतिशत दुर्घटनाएं, 42 प्रतिशत हत्याएं, 28 प्रतिशत आत्म-हत्याएं, 37 प्रतिशत असावधानी जन्म मृत्युएं, 35 प्रतिशत तलाकें शराब के फलस्वरूप होती हैं। अपराधों में से कुल मिलाकर 56 प्रतिशत के लिए वहाँ शराबखोरी ही जिम्मेदार गई है।
अपने को प्रगतिशील और सुधारवादी कहने वाले रूस की भी इस क्षेत्र में स्थिति दयनीय है। वहाँ हत्याओं और बलात्कार के अपराधियों में 60 प्रतिशत और सड़कों तथा कारखानों में दुर्घटना करने वालों में 90 प्रतिशत शराबी होते हैं। तलाकों के मुकदमे जिनके आये उनमें 40 प्रतिशत शराबी थे, उनकी पत्नियों ने ऐसे साथी को छोड़ देना ही उचित समझा। कुल मिलाकर विविध प्रकार से कानून तोड़ने वाले और दंड पाने वालों में 66 प्रतिशत शराबी ही होते हैं।
फ्राँस में हिंसा और दुर्घटनाओं का अधिकाँश श्रेय शराब को था। 63 प्रतिशत दुर्घटनाएं, 39 प्रतिशत हत्याएं शराब के नशे में हुई। अपनी असावधानी से आप मरने वालों में आधे लोग शराब पिये हुए पाये गये।
क्या शीत प्रधान देशों के लिए शराब उपयोगी है ? इस सम्बन्ध में नशा विशेषज्ञ श्री जी0ई॰ गोलिन का एक लेख लिकर कन्ट्रोलो में छपा है। उसमें लिखा है-”ठण्ड से बचाव करने के लिए शराब न केवल व्यर्थ है वरन् खतरनाक भी है। अनुनठी प्रिट्जोफ की तरह मैं भी ठण्ड से बचाव के लिए शराब पीने के पक्ष में दी जाने वाली दलीलों के बिलकुल खिलाफ हूँ और शराब के दुष्परिणामों को देखते हुए यहाँ तक कहने को तैयार हूँ कि शराब पीकर ठण्ड बचाने से बेमौत मरने तक का खतरा है।”
डा0 ट्राले ने अपने ग्रन्थ “ दि ट्रू टेम्परन्स प्लेटफार्म” और अलकोलिक कन्ट्रोवर्सीज ग्रन्थों में उन मिथ्या मान्यताओं का सप्रमाण खंडन किया है, जिसके अनुसार शराब जैसे नशों को गर्मी, स्फूर्ति एवं शक्तिदायक कहा माना जाता है। उनने सिद्ध किया है कि मद्यपान के उपरान्त जो थोड़ी सी उत्तेजना दिखाई पड़ती है वस्तुतः वह जीवनी शक्ति जैसे बहुमूल्य तत्व को जलाकर चमकाई गई फुलझड़ी मात्र ही होती है। वस्तुतः मनुष्य नशे पीकर अधिक थकता और अधिक निर्बल होता चला जाता है।
दिल्ली को 1970 की रिपोर्ट में 2519 प्राणघातक सड़क दुर्घटनाएं हुई जिनमें 1750 चालक पाये गये। इसमें 972 ड्राइवर शराब पिये हुए थे। उतर प्रदेश के जेल सर्वेक्षण में पाया गया कि कारागार भुगतने में से 70 प्रतिशत ने शराब के नशे में धुत होकर अपराध किये थे।
भारत में बढ़ता हुआ शराब का प्रचलन बहुत चिन्ताजनक है। शहरों में वह 234 प्रतिशत और गाँवों में 117 प्रतिशत की दर से हर वर्ष बढ़ जाती है। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में तो उसकी वृद्धि गगनचुम्बी गति से बढ़ रही है। उपलब्ध सूचना के अनुसार दिल्ली में पिछले चार पिछले चार वर्षों की स्वल्प अवधि में विदेशी शराब 200 प्रतिशत ओर देशी शराब 465 प्रतिशत बढ़ी। वीयर ने भी 160 प्रतिशत बढ़ोतरी कर ली। यह तो कानूनी बिक्री की रिर्पोट है। गैर कानूनी शराब बनाने और बेचने का धन्धा जिस जोर-शोर से चल रहा है उसे देखते हुए यह अनुमान लगाना गलत नहीं है कि जितनी शराब कानूनी बिकती है उससे कम गैर कानूनी की भी खपत नहीं है।
शराब मनुष्य के शरीर को तो गलाती, धुलाती ही है, उसका प्रभाव बुद्धि की तीक्ष्णता और मस्तिष्क की सम्वेदना शक्ति पर भी कम नहीं पड़ता। शरीर और मस्तिष्क की बर्बादी-धन की अन्धाधुन्ध तबाही और उसके दूरगामी सामाजिक परिणाम ऐसे हैं जिससे सब प्रकार विनाश ही विनाश प्रस्तुत होता है।
समझदारी का तकाजा इसी में है इस सर्वभक्षी असुर से हम अपने समय की बर्बादी को बचाने के लिए कुछ कारगर प्रयत्न करें।
याकूब से सुना था सन्त तालसुद पहुँचे हुए फकीर हैं। उनकी दुआ से दुःखी लोग भी आनन्दित होकर आते हैं।
सो याकूब उन्हें खोजता-ढूंढ़ता एक वियावान में जा पहुँचा। वे एक टोकरी में दाना लिए चिड़ियों को चुगा रहे थे। उनकी प्रसन्नता भरी फुदकन और चहचहाहट को देखते हुए आनन्द विभोर हो रहे थे।
याकूब बहुत देर बैठा रहा, पर जब सन्त का ध्यान ही उसकी ओर न गया तो झल्लाया।
तालसुद ने उन्हें उंगली के इशारे के पास बुलाया और हाथ की टोकरी उनके हाथ में थमाते हुए कहा- लो अब तुम चिड़िया चुगाओ और उनकी प्रसन्नता को देखकर आनन्द का लाभ करो। अपना दुःख भूलकर दूसरों के आनन्द में जुट जाने के सिवाय और दूसरा रास्ता आनन्दित होने का इस दुनिया में है नहीं याकूब का समाधान हो गया।
सृष्टि के साथ “श्रम” की भी रचना प्रजापति ने की है। सृष्टि रचना के समय-
“सहयज्ञा प्रणाँ सृष्टवा पुरोवाच प्रजापति”
प्रजापति ब्रह्म ने यज्ञायोजनों की व्यवस्था के निमित्त मनुष्य मात्र को “कर्म” करते रहने अर्थात् “श्रम” शील बने रहने का ही अनुदेश दिया था। “यज्ञ” और कुछ नहीं, वरन् हमारे शुभ कर्म ही हैं व शुभ कर्म श्रम के ही पर्याय हैं इससे “श्रम” का स्थान सृष्टि के अस्तित्व के लिए एक अनिवार्य तत्व के रूप में है।
मनुष्य शरीर ही एक ऐसा शरीर है जिसमें कार्य करने की अद्भुत क्षमता प्रभु ने दी है। ‘कुछ जीवों यथा-साँप , हाथी, कछुआ, कौआ आदि को छोड़कर मनुष्य सबसे अधिक दीर्घजीवी प्राणी है। औसतन 100 वर्ष की हमारी आयु होती है, इतनी बड़ी आयु के साथ ही देवी उपहार की तरह उसे श्रम करने की क्षमता की अद्भुत मिली है। एक मनुष्य 24 घण्टों में 8 घण्टे आराम आदि के बाद 16 घण्टे काम करता रहता है इसमें 8 घण्टे तो आजीविकोपार्जन की दृष्टि से व शेष 8 घण्टे व्यक्तिगत व पारिवारिक कामों में लगाता है। इस प्रकार अन्य प्राणियों की तुलना में दुगुना श्रम करने की क्षमता उसमें निहित है।
यह इतना सारा चमत्कार ‘श्रम’ का तो है परन्तु मात्र ‘श्रम’ तो गधे, घोड़े, बैल, मजदूर भी करते हैं परन्तु उनमें ‘मन’ व ‘योग’ नहीं होता वे मात्र यन्त्रवत् अपना श्रम करते रहते हैं अतः उनके श्रम को इस श्रम से भिन्न करना होगा। मानव द्वारा जो ‘श्रम’ किया जाता है व उसमें जो मानव मस्तिष्क लगता है, उस श्रम को हम इस प्रगति का श्रेय देते हैं। ‘श्रम’ में मन-मस्तिष्क के ‘योग’ को ही ‘श्रमयोग’ कहा जा सकता है।
मन-मस्तिष्क के चमत्कारी संस्थान की महिमा तो अवर्णनीय है। इसकी रचना ऐसी बुद्धिमता के साथ हुई है कि जिस ओर भी मनोयोग लगा दिया जाय उधर ही चमत्कार होने लगता है। संसार में जो अनेकों विवित्रताएं, विलक्षणताएं एवं विशेषताएं लक्षित हैं उनके मूल में मानवीय आकाँक्षा अभिरुचि एवं तत्परता ही काम करती है। मानव मन के इस मनोयोग पूर्ण श्रम का ही यह प्रतिफल हम देख रहे हैं कि प्रकृति की अनेकानेक शक्तियाँ यथा अग्नि, जल, वायु विद्युत अणु आदि मनुष्य ने अपने अधीन कर ली है कि मनुष्य को इस सृष्टि का स्वामी ही मानते को बाध्य होना पड़ता है। अब तक की हुई प्रगति व आगे की संभावनाओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है, मानवीय मस्तिष्क तक जीता जागता जादू है। जादूगर भी अपने मनोयोग से व अपनी कला से चमत्कार दिखाता है जिससे ऐसा लगने लगता है कि उसका काम जादू है परन्तु वास्तव में वह है उसकी जीवन कला उसका मनोयोग व श्रम।
हर तरह का श्रमयोग नहीं है हमें ‘श्रम’ में मानव मन को नियोजित रखते हुए पूर्ण तल्लीनता, उत्साह व पूरे मनोयोग से अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए उद्योग करना होगा तभी तो वह श्रम, श्रमयोग की श्रेणी में आ सकेगा। अपने अभीष्ट की प्राप्ति के लिए अपने मन, बुद्धि एवं शक्ति को तथा समस्त चित-वृत्तियों को एक ही ओर लगा देने से जो कर्म होगा वह ‘कर्मयोग’ हुआ व इस कर्म में श्रम जुड़ा हुआ रहा तो व श्रमयोग हुआ। मनुष्य के लिए पूरे मनोयोग से कर्म अथवा श्रम करना ही भगवान से पूजा माना है। “योगः कर्मसु कौशलम्” में भगवान ने श्रमयोग की ओर की संकेत किया है कि हम अपने लिए निर्धारित कार्य अपने पूरे मनोयोग से करते जायं तो यही पूजा है, यही योग है।
एक किसान जो दिन भर गर्मी-सर्दी में अपने खेत पर श्रम करता है, एक मजदूर जो कारखाने में अपने पूर मन व मस्तिष्क से काम करता है, एक वैज्ञानिक जो अपनी प्रयोगशाला में अपने मन व मस्तिष्क को श्रम में नियोजित करता है वह सब श्रमयोग है, कर्मयोग है, भगवान की पूजा है, उपासना है। सृष्टि संचालन, शरीर संचालन के लिए यह श्रमयोग इतना अनिवार्य तत्व है।
भगवान भुवन भास्कर अपने श्रम व कर्म में तनिक देरी कर दें, ढिलाई कर दें तो अनर्थ हो जाय, थोड़ी देर के लिए बिजली चली जाय तो जन-जीवन ठप्प हों जाय अतः प्रत्येक मनुष्य यदि आलस्य या प्रमादवश क्षणभर को कर्म विमुख हो श्रम से जी चुराले तो पूरी व्यवस्था बिगड़ने का डर रहता है। इस सृष्टि का हर जीवधारी इसका एक आवश्यक अंग है चाहे छोटा हो या बड़ा हम सब घड़ी के पुर्जे है यदि एक छोटे से पुर्जे ने भी काम करना बन्द कर दिया तो पूरी घड़ी बन्द हो जाती है।
इधर कुछ समय से ‘श्रम’ की गरिमा की अवहेलना सी हो रही है। ‘श्रम’ में ‘शरम’ महसूस होती है परन्तु ऐसा आलस्य, प्रमाद सा अज्ञान अधिक घर करता गया तो हमारी प्रगति अवरुद्ध होना निश्चित है। आलस्य की बढ़ती हुई प्रवृत्ति व श्रम से जी चुराने की आदत हमें ऐसी स्थिति में ले जावेंगी जहाँ जीवन जीना भी कठिन होगा। प्रगति की किसी भी दिशा में अग्रसर होने के लिए सबसे पहला साधन ‘श्रम’ ही है। जो जितना परिश्रमी होगा, उतना ही उन्नतिशील होगा। आलस्य व प्रमाद हमारे जीवन सूर्य के लिए राहू-केतु की तरह ‘ग्रहण’ है। इस ग्रहण की छाया मात्र से हमारा जीवन अंधकारमय ही जावेगा; अतः हमें श्रम के प्रति जागरुकता का भाव लिए आलस्य-प्रमाद से संघर्ष कर उन्हें दूर ही रखना होगा।
चलते रहना-श्रम की ओर गतिशील हो ना ही प्रगति है। बैठे रहना तो अवनति के गर्त में गिरना है। हमारी सफलता किसी मन्त्र, जाप का प्रतिफल, किसी देय की पूजा का प्रसाद व किसी भगवान् का अनुग्रह नहीं, वरन् हमारी कर्मठता, श्रमशीलता व हमारा मनोयोग ही है। हमारी भुजाओं में रहने वाला श्रमदेव व हमारे मन मस्तिष्क में रहने वाला हमारा विवेक ये दो ही देव ऐसे हैं कि इसकी आराधना से सारी समृद्धियां सुलभ हो जाती है। श्रम के देवता ने किसी को निराश नहीं किया है। श्रम व मनोयोग के इन दो देवताओं की पूजा व्यर्थ नहीं जाती। हम इन दो देवताओं को पूजे व दो असुरों आलस्य व प्रमाद जो राहू-केतु हैं- को दूर रखें तो हमें अपने कर्म में सफलता अवश्य मिलेगी।
हमें जीवन विकास के मूल तत्वों की ओर ही अपने को केन्द्रित करना होगा। ईश्वर के दिये शरीर और मन को हम सुव्यवस्थित रूप में ऐसा नियोजित करें कि निरन्तर श्रम व कर्म होता रहे व एक क्षण का समय ही व्यर्थ न जाय, जो श्रम हम करें वह भी ऐसा हो कि श्रम भी निष्फल न जाय, व्यर्थ न जाय। मनोयोग पूर्वक रुचि से जो भी श्रम करें ऐसा करें कि उससे एक निराली ही छटा बिखरे। सजीव ‘श्रम’ चाहे छोटे प्रकार का ही क्यों न हो वह श्रमिक के व्यक्तित्व व गौरव को बढ़ाने वाला होता है। सफलता की सीढ़ी चढ़ने में जो सफल हुए हैं उनका यही तरीका था, हम भी परिश्रमी बने, काम को रुचिपूर्वक मन लगाकर बिना आलस्य, प्रमाद के एक भी क्षण गंवाए- करें कि हमारा ”श्रम”-”योग” बन जाय तो अष्टसिद्धि नवनिधियाँ हमारा भी वरण करेगी। आलस्य व प्रमाद में समय गंवाने वालों पर कृपा होगी राहू-केतू की। श्रम योगियों पर कृपा होगी-सफलता की उत्कर्ष की कारण कि जहाँ भगवान् कृष्ण के रूप में “मनोयोग” है-जहाँ अर्जुन के रूप में “श्रम” है, जहाँ अर्जुन व कृष्ण के विचारों में साम्य है, जहाँ कृष्ण सम्मत अर्जुन है-जहाँ कर्तव्य कर्म में, सत्कर्म में सद्भाव सम्पन्न मनोयोगमय श्रम अर्थात् श्रमयोग है, वहीं विजय है, वही सफलता है, वही भगवान् हैं।
साधन होने पर मनुष्य साहसिक सफलताएं प्राप्त कर सकता है या अन्तःक्षेत्र में प्रचण्ड इच्छाशक्ति रहने पर अद्भुत कार्य कर सकने की क्षमता एवं सुविधा जुटा सकता है। इस प्रश्न का अनेकों बार समाधान हो चुका है। मनुष्य ने असम्भव समझे जाने वाले कार्य हाथ में लिए हैं और पूरे कर दिखाये हैं। साधन होते हुए भी कितने ही व्यक्ति कोई महत्वपूर्ण कदम उठा नहीं पाते, मात्र उन्हें शौक-मौज में गुजारते रहते हैं किन्तु यदि लगन हो तो नहीं केवल क्षमता विकसित होती है, पर साधन सामग्री भी जुटती है, सहायक मिलते हैं और ऐसे काम सम्भव हो जाते हैं, जिन्हें सामान्य बुद्धि से देवी चमत्कार ही कह सकते हैं।
अब दक्षिणी ध्रुव जानना उतना कठिन नहीं रहा वहाँ की परिस्थितियों के बारे में बहुत कुछ जाना जा चुका है और उस प्रदेश में कुछ समय ठहरना हो तो उसके लिए आवश्यक साधनों का निर्माण तथा ले जाने का प्रबन्ध बन गया है- पर पिछली शताब्दी में वैसा करना तो दूर कल्पना करना भी कठिन था।
बर्फ से जमा समुद्र, अपने तटीय क्षेत्र तक भी जलयानों को पहुँचने की छूट देने को तैयार नहीं था। बर्फ का समतल मैदान होता तो भी एक बात थी। विचित्र प्रकार की चट्टानें, खाई, खड्ड जैसे पहाड़, भयंकर दर्रे, डरावनी गुफाएं, जहाँ-तहाँ लटकते हुए बर्फ के बन्दनबार, घाटियाँ शान्त ज्वालामुखियों के गहरे कुओं जैसे विवर, हड्डियों को कड़वा देने वाली सर्दी यही है उस क्षेत्र की माटी जानकारी जिसे समीप से देखने वालों में मौत से जूझने वाला साहस होना चाहिए।
पर इससे क्या उस क्षेत्र की अधिक जानकारी प्राप्त करना आवश्यक समझा गया ? विस्तार की दृष्टि से दक्षिणी ध्रुव क्षेत्र इतना बड़ा है जिसमें कई रूस और कई अमेरिका बसाये जा सकते हैं। वहाँ न जाने कितनी उपजाऊ जमीन ओर न जाने कितनी खनिज सम्पदा पाई जा सकती है। इस क्षेत्र पर अधिकार कर दे वहाँ की सम्पदा को हस्तगत करके एक नई दुनिया बसा सकने जितने आधार उपलब्ध हो सकते हैं। इतनी बड़ी सम्भावना को आँख से ओझल कैसे किया जा सकता है। किन्तु वह सरल भी तो नहीं है। इस प्रदेश की खोज इतनी बड़ी चुनौती है जिसे प्राण संकट का जोखिम उठाकर ही स्वीकार किया जा सकता है।
मनुष्य के दैत्य का कोई अन्त नहीं, वह डरपोक, कायर और स्वार्थी भी परले दर्जे का है किन्तु सदा ही वैसा नहीं होता, सभी वैसे नहीं होते। जिन्हें अपने मानवी पौरुष का सम्मान भरा बोध होता हे वे विशिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अनादिकाल से भयंकर खतरे उठाते रहे हैं। सो भी डरते, सहमते किसी प्रलोभन या भय के कारण नहीं स्वेच्छापूर्वक का अवलंबन लेकर ऐसे दुस्साहसों को वरण करते रहे हैं जिनमें लोकहित के साथ-साथ उन्हें प्रखर पुरुषार्थ के प्रकटीकरण का अवसर मिल सके।
दक्षिणी ध्रुव की खोज के विचार को कार्यान्वित करने की आवश्यकता ने एक मामूली से फिटर को एक अद्भुत आविष्कार करने का अवसर दिया। वह यह सोचता रहा कि बर्फ की मोटी सतह छेदकर समुद्र के गहरे जल में प्रवेश कर सकना और वहाँ की ठंडक को कम करके खोज के लायक तापमान उत्पन्न कर सकना कैसे सम्भव हो सकता है ? उस फिटर ने विज्ञान पढ़ा और समुद्र में पानी की ठंडी, गरम परतों के बारे में गहरा अध्ययन किया। इस जानकारी के आधार पर वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि बर्फ के नीचे ठंडा पानी और ठंडे पानी के नीचे गरम पानी की परतें हैं यही हाल आकाश में हवा का भी है। ठंडी गरम परतों के रूप में हवा भी ऊपर आकाश में फैली हुई हैं। समुद्र का भी यही हाल है। ऐसी दशा में यह सम्भव है कि नीचे के गरम पानी को ऊपर के ठंडे पानी के नीचे धकेलने का रास्ता बन सके तो दक्षिणी ध्रुव के समुद्र में गहरे गोते लगाये जा सकते और नीचे क्या कुछ भरा पड़ा है , इसका पता लगाया जा सकता है। ऊपर कई जगहें ऐसी हैं जहाँ सिर्फ 15 फुट मोटी बर्फ है उसमें छेद करके पानी में जाने का रास्ता बना लेना तो प्रस्तुत औजारों से ही हो सकता है। उसमें कुछ विशेष कठिनाई नहीं है।
आखिर इस प्रयोजन को सिद्ध करने वाली मशीन बना ही ली गई उसका नाम रखा गया ‘ऐकाथर्म’ इसका प्रयोग कई झीलों में और खुले समुद्रों में किया गया वह अपना प्रयोजन पूरा करने में समर्थ थी। इसे लेकर समुद्री गोताखोर जिमथार्न स्वयं इस क्षेत्र में पहुँचा। इसके लिए अमेरिकी जलसेना का एक जलयान एडिस्टोपर और एक हैलिकाप्टर प्राप्त कर लिया गया। आवश्यक उपकरण लेकर जो मंडली दक्षिणी ध्रुव से नई जानकारियाँ प्राप्त करने के लिए रवाना हुई उसमें ऐसे पाँच व्यक्ति थे जो शोधकार्य की आवश्यक योग्यता से सम्पन्न थे।
इन लोगों ने ध्रुव क्षेत्र की लम्बी यात्राएं कीं। बहुत कुछ ढूंढ़ा-खोजा और पाया। उसका विस्तृत विवरण देना यहाँ अशक्य और अनावश्यक है। हमें इतना जान लेना ही पर्याप्त है कि उन लोगों को पग-पग पर प्राण संकट सहने भरे काम करने पड़े। इन्हीं में एक कार्य सील मछली पर सवारी गाँठना भी शामिल था। ये खौफनाक विशालकाय मगर मच्छ कभी-कभी ध्रुवीय बर्फ में जहाँ-तहाँ पाये जाने वाले छेदों में होकर ऊपर उछल आती हैं और बर्फ पर धूप सेंकने का आनन्द लेती हैं। साधारण मनुष्य उनका नाम सुनते ही डर सकता है। पर जिमथार्न ने दौड़कर उनमें ऐ एक पर सवारी गाँठ ली और उस ऊंट की तरह बलबलाती मछली पर चढ़कर तब तक यात्रा की जब तक कि वह अपनी सुरंग के प्रवेश द्वार तक न पहुँच गई। ऐसे-ऐसे अनेक दृश्यों के चित्र और वहीं की परिस्थितियों के प्रमाण साधन ढूंढ़कर लाये जिनसे आगे चलकर उस क्षेत्र का सम्बन्ध में उन जानकारियों की शृंखला बन गई जो आगे चलकर समस्त मानव जाति की प्रगति के महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।
मनुष्य पुरुषार्थ का पुतला है, उसकी शक्ति और सामर्थ्य का अन्त नहीं। वह बड़े से बड़े संकटों से लड़ सकता है और असम्भव के बीच सम्भव की अभिनव किरणें उत्पन्न कर सकता है शर्त यही है। कि वह अपने को समझे और अपनी सामर्थ्य को मूर्त रूप देने के लिए साहस को कार्यान्वित करे।
अगला अंक
जनवरी 76 का अखण्ड-ज्योति अंक उन साधनाओं का विज्ञान तथा स्वरूप समझाने वाला होगा जो सही रीति से अपनाये जाने पर व्यक्तित्व को सामान्य से असामान्य बना सकने में पूरी तरह समर्थ है। अखण्ड-ज्योति पाठकों में से जो इन्हें करना चाहेंगे उन्हें विशेष रूप से मार्ग दर्शन एवं सहयोग भी मिलेगा। यह साधना विज्ञान पचास वर्ष की साधना का निचोड़ निष्कर्ष कहा जा सकता है। साधना की स्वर्ण जयन्ती का इस अंक को विशेष उपहार माना जाना चाहिए और उसे अलभ्य सामग्री की तरह सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
यों बसन्त पर्व अनादिकाल से महा सरस्वती के अवतरण दिन के रूप में मनाया जाता है। ज्ञान की दोनों धाराएं-शिक्षा और विद्या, भौतिक और आत्मिक ज्ञातव्य के रूप में गंगा-यमुना की तरह प्रवाहित होती हैं इन्हीं को वीणा एवं पुस्तक के रूप में चित्रित किया गया है। नर पशु को गोदी में उठा कर नरदेव बनने की उच्च स्थिति तक पहुँचा देने की सामर्थ्य विद्या में ही। विद्या रानी है-संपत्ति और सबलता उसकी चेरी। विद्या के अभाव में संपत्ति और सशक्तता का दुरुपयोग ही बन पड़ता है और उससे आना और अपने संपर्क क्षेत्र का विनाश ही सम्भव होता है। शरीर रक्षा के लिए जिस प्रकार आहार की आवश्यकता है, उसी प्रकार आत्मिक क्षुधा बुझाने के लिए विद्या की उपयोगिता है। लोग रोटी तो जुटाते हैं, पर विद्या के लिए ध्यान नहीं देते और अन्तरात्मा को भूखा मारते रहते हैं। इस भूल को सुधारने के लिए, उपेक्षा को उत्साह में परिणत करने के लिए, विद्या में उत्साह उत्पन्न करने के लिए बसन्त पर्व भगवती सरस्वती के जन्मदिन की तरह मनाया जाता है।
अगला वर्ष स्वर्ण-जयन्ती वर्ष मनाया जाय
अन्यान्य पर्वों की प्रेरणा अपने ढंग की अपनी है। दिवाली से अर्थ-व्यवस्था, गीता जयन्ती से कर्मनिष्ठा, होली से यज्ञीय जीवन, रामनवमी से मर्यादा पालन, गंगा दशमी और गायत्री जयन्ती से पवित्रता, आध्यात्मिकता, गुरुपूर्णिमा से अनुशासन, श्रावणी से प्रायश्चित, परिमार्जन, कृष्णाष्टमी से योग सन्तुलन, विजयदशमी से सशक्तता सम्पादन की प्रेरणा मिलती है। इन समस्त विभूतियों का उपार्जन-अभिवर्धन सद्ज्ञान चेतना का विकास बन पड़ने से ही सम्भव होता है। अस्तु विद्या की देवी सरस्वती का जन्म दिन बसन्त पर्व का सबसे बड़ा त्यौहार माना जा सकता है। यों उत्सव समारोह परम्परा के हिसाब से होली, दिवाली को बड़ा माना जाता है, पर यदि प्रेरणात्मक गरिमा को ध्यान में रखा जाय तो प्रथम स्थान बसन्त का ही मानना पड़ता है। बुद्धि जीवियों के लिए सर्वोपरि प्रेरणा इसी से मिलती है। जन मानस को विद्या की महिमा समझाने की प्रचारात्मक दृष्टि से भी उसे अधिकाधिक उत्साह के साथ व्यापक रूप से मनाया जाना आवश्यक ठहरता है।
युग निर्माण अभियान यों एक छोटा सा संगठन या आन्दोलन जैसा प्रतीत होता है, पर वस्तुतः वह चेतना जगत में उत्पन्न हुई अपने समय की अति महत्वपूर्ण हलचल है। जनमानस का भावनात्मक परिष्कार समूची मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य का केन्द्र बिन्दु है। उसकी प्रगति मानवी स्तर के उज्ज्वल भविष्य की बहुमूल्य संभावनाएं अपने साथ जोड़े हुए है। अभियान की सफलता विश्वशान्ति के प्रमुख आधारों पर परिपुष्ट करेगी। दूरगामी से देखने पर इस हलचल को अगणित सामयिक समस्याओं के एकमात्र हल के रूप में एक दिव्य अवतरण इसे माना जा सकता है। ऐसी महत्वपूर्ण हलचल जिसमें युग प्रवाह को उलट देने की संभावनाएं विद्यमान है, भविष्य के लिए आशा केन्द्र समझी जायं तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
हम सब को गर्व करने और गौरवान्वित होने का अधिकार है कि ऐसी दिव्य हलचल को जन्म देने और उसे अग्रसर करने में भावनापूर्वक अनवरत श्रम कर रहे हैं। इस चिन्तन और कर्तृत्व के लिए प्रेरणा प्रवाह उत्पन्न करने वाले उद्गम के रूप में युग निर्माण अभियान को देखा समझा जा सकता है। बसन्त पर्व के दिन ही इस युगान्तरीय चेतना का श्रीगणेश हुआ-इस घटना को भगवती सरस्वती के जन्म दिन के साथ संगति मिलाने पर हम लोगों के लिए यह और भी अधिक उत्साहवर्धक बन जाता है।
सर्वविदित है कि अब से 38 वर्ष पूर्व ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका का प्रकाशन ठीक बसन्त पर्व के दिन ही प्रारम्भ हुआ था। यों देखने में वह भी एक साहित्यिक प्रयास जैसा लगता है, पर जिन्होंने उसे निकट से देखा है ये जानते हैं कि यह एक प्रकाश पुंज है। जिसने एक दीपक से असंख्य दीपक जलने वाले काव्यालंकार को प्रत्यक्ष कर दिखाया है। आत्मा को अखण्ड-ज्योति का दिव्य-दर्शन, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि के क्षेत्र से आगे बढ़ाकर व्यवहार के कार्यक्षेत्र में उतारा जा सकता है। इस अनोखेपन का अभिनव प्रयोग करने का दुस्साहस किया गया और वह सफल होकर रहा-यही है एक शब्द में कहा जा सकने योग्य अखण्ड-ज्योति का इतिहास। युगान्तरीय चेतना की गंगोत्री उसे माना जा सकता है उसका साधना क्षेत्र युग निर्माण योजना के रूप में आज अति विस्तृत क्षेत्र में लहलहाता हुआ देखा जा सकता है। जन-मानस के सर्वतोमुखी भावनात्मक नव निर्माण का लक्ष्य आधी दूर है पर उस दिशा में जिस उत्साह के साथ चरण बढ़ रहे हैं, उन्हें देखते हुए किसी समय जो असंभव समझा जाता था, वह अब सम्भव प्रतीत होने लगा है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण-कभी ‘दिवा-स्वप्न’ कहा गया था, पर अब दूरदर्शी लोग यथार्थता के निकट आकर देखते हैं तो कहते हैं-कठिन होते हुए भी यह असम्भव नहीं है। कल यह सुनने के लिए भी हमें तैयार रहना चाहिए कि कभी जो कठिन समझा जाता था वह सरल बनकर सामने आ गया।
अखण्ड-ज्योति लगती भर पत्रिका है, वस्तुतः वह एक मिशन है; जो किसी वर्ग, क्षेत्र, धर्म की सीमित परिधि में नहीं बंधता और न छुट-पुट सामयिक हलचलों तक सीमित होता है। फुन्सियों पर मरहम पट्टी करने की औपचारिकता स्वीकार करते हुए भी उसका लक्ष्य रक्त शोधन प्रक्रिया है। इसके लिए टिटहरी द्वारा समुद्र पाटे जाने वाले दुस्साहस की पुनरावृत्ति करने वाली विनम्र हलचल को अखण्ड-ज्योति कहा जा सकता है। आज उसका बाजारू मूल्य थोड़ा ही आँका जा सकता है, पर वस्तुतः है वह अत्यन्त गरिमा युक्त एवं बहुमूल्य। कहना न होगा कि इस महान प्रयास के सूत्र संचालन में जितना मनोयोग लगा है उससे कहीं अधिक सहयोग अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों का संलग्न रहा है। यदि यह एक पक्षीय प्रयास रहा होता तो गाड़ी थोड़ी दूर लुढ़क सकने में समर्थ न हुई होती।
जो हो, अखण्ड-ज्योति की प्रतिष्ठापना से लेकर उसकी अद्यावधि प्रगति हम सबके लिए उल्लास एवं सन्तोष का कारण है। उसका जन्म दिन मनाने में बसन्त पर्व हमारे लिए दुहरा आकर्षण बन जाता है। एक ही नहीं अनेक और भी आधार एक के बाद एक, शृंखलाबद्ध रूप में उभरे है और उन सब का जन्म भी इसी दिन होता चला आया है। अखण्ड ज्योति बसन्त पंचमी को आरम्भ हुई। कुछ समय बाद उसी दिन युगनिर्माण अभियान ने जन्म लिया। गायत्री तपोभूमि जैसी विशालकाय संस्था का निर्माण एवं धर्मचेतना में संलग्न जीवित आत्माओं को एक सूत्र में पिरोकर एक परिवार के रूप में विकसित करने का प्रयास-सहस्र कुण्डी गायत्री यज्ञ-जैसे अपने दो प्रमुख कार्य इसी दिन आरम्भ हुए। शांतिकुंज की नींव इसी दिन रखी गई। महिला-जागरण की युगान्तरीय चेतना का श्री गणेश इसी मुहूर्त में किया गया। ऐसे-ऐसे छोटे-बड़े ढेरों ही क्रिया-कलाप इसी शुभ दिन से आरम्भ किये जाते रहे है। अब से 50 वर्ष पूर्व एक दिव्य प्रेरणा के प्रत्यक्ष मार्ग-दर्शन में 24 लख के जप 24 महापुरश्चरणों की 24 वर्षों में सम्पन्न हुई तप साधना का संकल्प किया गया था। अखण्ड-घृत दीप की स्थापना भी उसी दिन हुई और वह साधनात्मक प्रयास सूक्ष्म से परिपुष्ट होते-होते स्थूल में विकसित होता चला आया है। इस प्रकार अपनी गतिविधियाँ 38 वर्ष पूर्व नहीं 50 वर्ष पहले अवतरित हुई मानी जानी चाहिए। पत्रिका का प्रकाशन एवं संगठनात्मक हलचलें तो वृक्ष के पुष्प पल्लव हैं। उसके बीजारोपण को यदि महत्व दिया जाय तो फिर यही कहना होगा कि इस अभिनव चेतना का अवतरण अब से 50 वर्ष पूर्व हुआ और आधी शताब्दी से चल रही यह मात्रा अनवरत गति से अनेक पड़ावों पर ठहरते, सुस्ताते-यहाँ तक आ पहुँची जहाँ आज हम हैं। पीछे मुँह कर इस लम्बी अवधि पर दृष्टिपात करते हैं तो श्रम की सार्थकता और सफलता पर सन्तोष की साँप लेने को जी करता है-यों अभी आगे की यात्रा की शेष दूरी भी कुछ कम नहीं है।
प्रचलित परम्पराओं में किसी उत्साहवर्धक कार्य की जयन्तियाँ मनाई जाती है। 25 वर्ष पर रजत-जयन्ती और 100 वर्ष पर शताब्दी मनाई जाती है। इन आयोजनों के पीछे पिछली सफलता पर हर्ष अनुभव करने और आगे के लिए अधिक उत्साह भरने का उद्देश्य रहता है। यह अच्छी परम्परा है। मनुष्य भी अपने निजी जीवन में ऐसे-ऐसे हर्षोत्सव मनाते हैं। सफल संस्थाएं भी ऐसे आयोजन करती हैं। अखण्ड-ज्योति का स्वर्ण जयन्ती वर्ष मना सकते हैं और उस का शुभारम्भ बसन्त वर्ष मना सकते हैं। अगली बसन्त पंचमी 5 फरवरी 76 गुरुवार की पड़ेगी। उस दिन सदा की अपेक्षा कुछ अधिक उत्साह प्रदर्शित किया जाय और पहले सभी आयोजकों की तुलना में बड़ा आयोजन मनाया जाय तो यह हर दृष्टि से उचित ही होगा।
अब तक हर वर्ष ‘अखण्ड-ज्योति’ के परिजन अपने सर्वश्रेष्ठ त्यौहार के रूप में बसन्त पंचमी को स्मरण करते हैं और उस दिन एक अच्छे उत्सव आयोजन की व्यवस्था करते हैं। प्रभात फेरी-सामूहिक जप, हवन, कीर्तन, प्रवचन, रात्रि को दीपदान, श्रद्धाभिव्यक्ति, भावी गतिविधियों का संकल्प जैसे कार्यक्रम इस उत्सव के प्रधान अंक होते हैं। जहाँ जिस प्रकार जैसी सुविधा होती है वहाँ प्रबन्ध कर लिया जाता है। अखण्ड-ज्योति के प्रायः सभी ग्राहक; पाठक अपने प्रियजनों सहित इस उत्सव में एकत्रित होकर अपनी भावभरी श्रद्धा का परिचय देते हैं। यह सम्मेलन मात्र हर्षोत्सव बनकर समाप्त नहीं हो जाता वरन् हर उपस्थित व्यक्ति को उसके आध्यात्मिक कर्तव्यों का स्मरण दिलाता है और भविष्य में अधिक साहस पूर्ण कदम बढ़ाने का उत्साह भरता है। आयोजन पर जो श्रम किया जाता है उसे आयोजनकर्ता पूर्णतया सार्थक हुआ अनुभव करते हैं क्योंकि उसके फलस्वरूप अपने रचनात्मक प्रयत्नों में निश्चित रूप से तीव्रता उत्पन्न होती है।
जहाँ बड़े रूप में सार्वजनिक आयोजन संभव नहीं होते वहाँ इसी क्रिया-कलाप को छोटे पारिवारिक उत्सव की तरह घर पर मना लिया जाता है। अपना निजी जन्मोत्सव कितने ही लोग अपने घरों पर मनाते हैं और पास पड़ोस के परिचित लोगों को उसमें सम्मिलित होने के लिए आमन्त्रित लोगों को उसमें सम्मिलित होने के लिए आमन्त्रित करते हैं। जो अपने निजी जन्म दिन की तरह ही अपने प्रेरणा, स्रोत का जन्म भी महत्वपूर्ण मानते हैं वे उसे भी उसी उत्साह से सम्पन्न करते हैं। सार्वजनिक बड़ा आयोजन न बन पड़ा तो न सही, पर भावनाओं के प्रखर रहते निजी उत्सव-पारिवारिक आयोजन के रूप में बसन्त पर्व मना लेना कभी किसी के लिए कठिन नहीं पड़ा है। यही कारण है कि कुछ बहुत ही अनुत्साही अवसाद ग्रस्त लोगों को छोड़ कर अखण्ड-ज्योति के प्रायः सभी परिजन बसन्त पर्व को सार्वजनिक रूप से बड़े स्तर पर अथवा निजी रूप में छोटे उत्सव स्तर पर उसे मनाते रहते हैं। यह परम्परा प्रायः पिछले 25 वर्षों से तो एक प्रकार से नियमित जैसी ही बन गई है।
इस वर्ष इस उत्साह को दूना कर दिया जाय तो यह उचित ही होगा। स्वर्ण जयन्ती बड़ा पर्व है। 50 वर्ष की आदर्शवादी यात्रा का अनवरत गति से अग्रगामी रहना बड़ी बात है। जो बन पड़ा है गर्व करने और सन्तोष व्यक्त करने योग्य है। यह अनुभूतियाँ जिन्हें होंगी, वे अपनी प्रसन्नता सुविस्तृत क्षेत्र में बखेरने और उस प्रकाश वितरण से अनेकों को अभिनव उत्साह प्रदान करने की बात सोचे बिना नहीं रह सकते। महामानवों की देवताओं की श्रेष्ठ घटनाक्रमों की जयन्तियाँ मनाई जाती हैं तो कोई कारण नहीं कि अखण्ड-ज्योति को अपने मिशन की स्वर्ण जयन्ती मनाये जाने के लिए उत्साह उत्पन्न न हो।
इस बार का बसन्त पर्व कहाँ किस तरह मनाया जा सकता है, इसकी स्थापना परिजनों का काम है। वे अपनी परिस्थिति के अनुरूप जो कुछ सम्भव हो करें पर लक्ष्य निर्धारित करते समय अनुपात का ध्यान रखें। सामान्य साधारण वार्षिक उत्सव की अपेक्षा स्वर्ण जयन्ती की गरिमा स्वभावतः अधिक होती है अस्तु इस वर्ष का आयोजन भी बड़ा ही होना चाहिए। साधारणतया उसका आवरण पिछले वर्ष से दूना तो होना ही चाहिए। जहाँ अब तक कभी कुछ भी नहीं हुआ है वहाँ इस स्वर्ण जयन्ती वर्ष पर्व से उस उपेक्षा एवं असमर्थता को सर्वथा समाप्त ही कर दिया जाना चाहिए। होली मिलन की तरह बसन्त पर्व अखण्ड-ज्योति परिजनों का एक सुनिश्चित दिन होना चाहिए। इस बार की स्वर्ण जयन्ती ने उसकी आवश्यकता को और भी अधिक बढ़ा दिया है।
यह सामयिक उत्सव आयोजन की चर्चा हुई। इससे भी बड़ी बात यह है कि इस बोधि वृक्ष को सूखने से बचाने और खाद पानी देकर परिपुष्ट करने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है ? सूत्र संचालकों एवं संयोजकों के श्रम की सार्थकता उसी अनुपात से बढ़ेगी; जिससे कि उसके पाठकों की संख्या में बढ़ोतरी होगी। इस प्रकाश से थोड़े लोगों का संपर्क हो तो प्रभाव क्षेत्र छोटा होकर ही रह जायगा पर यदि उस संपर्क में अधिक लोग आवें तो हलचलें भी उसी अनुपात से बढ़ेगी और लक्ष्य तक पहुँच सकना भी अपेक्षाकृत उतनी ही जल्दी हो सकेगा। अतएव हम सब को सम्मिलित प्रयत्न यह हो कि पिछले वर्ष की तुलना में न केवल बसन्त पर्व का आयोजन ही दूना बढ़ा हो वरन् उस अवसर पर समर्पित हो जाने वाली श्रद्धांजलि का लक्ष्य भी दूना कर दिया जाय।
हर वर्ष भावनाशील परिजन टोलियाँ बनाकर निकलते हैं। पुराने ग्राहकों से चन्दा वसूल करते और प्रभाव क्षेत्र में घूम−फिर कर नये पाठक बनाते हैं। चिरकाल से यही क्रम चला आ रहा है और इसी प्रयास से अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या क्रमशः बढ़ती आई है। इस प्रयत्न के लिए यदि दूना उत्साह बढ़ा दिया जाय, और जन संपर्क के लिए अधिक समय निकाला जाय, टोलियों में अधिक प्रभावशाली लोग लिए जायं तो कोई कारण नहीं कि पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष असाधारण रूप से पाठकों की संख्या वृद्धि न हो सके।
अपने परिवार का दूना विस्तार सहल ही हो सकता है, यदि अखण्ड-ज्योति के वर्तमान पाठक उसे चुनाव जीतने जैसा प्रतिष्ठा प्रश्न बना लें और उसके लिए उतनी ही दौड़ धूप करें जितनी कि शासन संस्थाओं के सदस्य बनने के आकाँक्षी अपनी निजी सफलता के लिए परिपूर्ण तत्परता के साथ प्रयत्न करते हैं। कहना न होगा कि पाठकों की संख्या बढ़ने के हिसाब से ही अपने इस महान मिशन की सफलता सुविस्तृत होगी जिसका यह जन्म दिन है और जिसकी स्वर्ण जयन्ती मनाई जा रही है।
हर अखण्ड-ज्योति को कम से कम दस व्यक्ति पड़ा करें यह एक से दस वाला क्रम बहुत दिन से चल रहा है। उसके अतिरिक्त इस वर्ष और विशेष लक्ष्य रखा जाना चाहिए कि अपने जितने भी अखण्ड-ज्योति अंक हों उन पर मजबूत कागज चिपकाकर नये सिरे से सीकर कुछ दिन टिकाऊ रह सकने योग्य मजबूत बना लिया जाय और फिर उन्हें अपने प्रभाव परिचय क्षेत्र में अधिकाधिक लोगों को पढ़ाते रहने का निश्चय किया जाय। यह झोला-पुस्तकालय बहुत ही सरल है। अपने संपर्क में कितने ही लोग आते रहते हैं, उनमें से जो विचारशील प्रतीत हों उन्हें पुरानी पत्रिकाएं पढ़ने चाहिए। यदि यह क्रम एक साल भी जारी रखा जा सके तो जयन्ती वर्ष में 108 व्यक्तियों को पत्रिका के अनेकों अंक पढ़ा देने की प्रतिज्ञा पूरी हो सकती है। लक्ष्य 108 की प्रचार माला पूरी करने का रखा जा सकता है। यदि वह संकल्प एक वर्ष की अवधि में पूरा न हो सके तो आगे कभी तक भी घसीट कर ले जाया जा सकता है। आशा की जायगी कि इस प्रकार की प्रतिज्ञा उत्साही परिजनों में से प्रत्येक की होगी और उसे पूरा करने का प्रयास यह अंक पढ़ने के दूसरे दिन से ही आरम्भ कर दिया जायगा। जिन्हें पढ़ाया जाय उनके नाम पते नोट करके रखे जायं ओर वह सूची जयन्ती वर्ष में हर तीसरे महीने भेजी जाती रहे। अब से लेकर बसन्त पंचमी तक ग्राहक बढ़ाने और पुराने अंक पढ़ाने में जितनी सफलता मिले उसका विवरण भी पर्व आयोजन मनाने की सूचना समेत शान्ति-कुंज सप्तसरोवर, हरिद्वार के पते पर भेजी जानी चाहिए।
निजी जीवन में आदर्शवादिता और उदारता का अधिकाधिक समावेश करने की दृष्टि से इस पर्व पर आत्म-चिन्तन विशेष रूप से किया जाना चाहिए और भविष्य के लिए आत्म सुधार की-आत्म निर्माण की सुनिश्चित योजना बनाई जानी चाहिए। लोक-मंगल के लिए समय दान और साधन दान का परिणाम भी अगले वर्ष बढ़ना चाहिए। भौतिक प्रगति की तरह ही आत्मिक प्रगति के लिए भी हमारे अन्तःकरणों में प्रबल उत्कण्ठा उठनी चाहिए। बसन्त पर्व से आदर्शवादी नव-जीवन की उपलब्धि के लिए गत अंक में दिये गये परामर्श को अपने व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट करने के लिए समूची साहसिकता और तत्परता को प्रदीप्त करना चाहिए। हर वर्ष बसन्त पर्व नई प्रेरणा और नई चेतना देने के लिए आया करे तभी तो अखण्ड-ज्योति परिवार को सार्थक हुआ होना माना जा सकता है।
महिला जागरण हमारी इस वर्ष की विशेष गतिविधि है। महिला शाखाओं की स्थापना हर जगह की जानी चाहिएं तत्सम्बन्धी गतिविधियों की अग्रगामी बनाने के लिए महिला सम्मेलनों द्वारा जस मानस में उभार उत्पन्न किया जाना चाहिए और महिला पाठशालाओं की स्थापना जैसे रचनात्मक कार्यों के लिए विशेष प्रयत्न किये जाने चाहिए।
रामायण सप्ताह, गायत्री यज्ञ, शतसूत्री कार्यक्रम, युग-निर्माण पत्रिकाओं का प्रचार-प्रसार, प्रचार फेरी, तीर्थयात्रा जैसे युग-निर्माण योजना कार्यक्रमों में शिथिलता तनिक भी नहीं आने देनी चाहिए। अपनी सभी प्रचारात्मक, रचनात्मक और सुधारात्मक गतिविधियों में पूरा-पूरा उत्साह बना रहना चाहिए।
शान्ति कुंज में चल रहे सत्र अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं, वे कब तक चलते रह सकेंगे यह कहा नहीं जा सकता। इनमें सम्मिलित होने के लाभ से वंचित नहीं रहा जाना चाहिए। सन् 76 में कुछ समय शान्ति-कुंज में रह कर अभिनव प्राण चेतना उपलब्ध करने के लिए किसी ने किसी सत्र में हरिद्वार पहुँचने की बात अभी से ध्यान में रखनी चाहिए, जो पहले किन्हीं सत्रों में आ चुके हैं वे भी योगतप सत्रों में आने का अवसर निकाल पायें तो उनके लिए यह हर दृष्टि से श्रेयस्कर ही सिद्ध होगा। योगतप सत्रों का एक संक्षिप्त संस्करण व्यस्त लोगों के लिए दस-दस दिन का भी बना दिया गया है। जो एक महीने नहीं रह सकें, वे वही सब शिक्षा संक्षिप्त रूप से दस दिन में भी प्राप्त कर सकें ऐसी व्यवस्था बना दी गई है। रामायण, गीता, भागवत आदि के माध्यम से लोक-शिक्षण के सत्र अगले वर्ष डेढ़ महीने के नहीं दो-दो महीने के होंगे। वे (1) मई, जून (2) जुलाई, अगस्त में चलेंगे। जिनमें जिन्हें आना हो वे समय से पूर्व ही स्वीकृति प्राप्त कर लें।
बसन्त ऋतु में पेड़ पौधे सभी हरे भरे होते और फलते-फूलते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के उद्यान को इस बसन्त पर्व पर अधिक हरा भरा होना चाहिए और महकने फलने-फूलने में पिछले सभी प्रयासों को पीछे छोड़ कर नया कीर्तिमान स्थापित करने की प्रतिस्पर्धा में जुटना चाहिए। स्वर्ण-जयन्ती वर्ष मनाने की प्रत्येक परिजन से ऐसी ही अपेक्षा है।
पिछले पाँच वर्षों से अखण्ड ज्योति से पृष्ठों पर अध्यात्म सिद्धांतों को विज्ञान के आधार पर प्रतिपादित करने का प्रयास चला है। अब इस वर्ष उस प्रशिक्षण का दूसरा चरण बढ़ रहा है। जनवरी 73 से साधना एवं उपासना का विज्ञान समझाने वाली प्रक्रिया आरम्भ होगी। उपासना में क्या त्रुटियाँ रहने से उनका घोषित प्रतिफल मिल नहीं पाता? क्या सतर्कता बरतने से हमारी साधना सिद्धि रूप में परिणत हो सकती है ? यह सभी तथ्य अगले वर्ष, तर्क, प्रमाण, अनुभव एवं विज्ञान सिद्धांतों के आधार पर प्रस्तुत किये जाते रहेंगे।
अगले वर्ष के अंकों में कितनी ही लेख शृंखलाएं परस्पर संबद्ध रहेंगी। कोई अंक गड़बड़ हो जाने से वे महत्वपूर्ण जानकारियाँ अधूरी रह जायेगी, अस्तु भविष्य में प्रत्येक अंक को क्रमबद्धता का ध्यान रखते हुए पूरी तरह संभाल कर रखा जाना चाहिए।
फूलों के संग तो सब ही मुस्का लेते हैं- कांटों के संग हंसे- बड़ा इन्सान वही है।। तट पर लहरों से सब ही खेला करते हैं- बड़ा मजा आता है, किल्लोलें करने में।। पर वह क्या जाने, कितनी मेहनत पड़ती है- डाड़ चलाते हुए थपेड़ों को सहने में।। किये बिना परवाह-अतल गहराई की जो- पहुंचाये उस पार सही जलयान वही है।। बौरायी-सी गंध, बड़ी मादक लगती है- बैठ सभी लेते हैं, शीतल अमराई में।। पर बसंत में याद जिन्हें पतझर रहता हो- ऐसे अलि कितने होते हैं तरुणाई में।। सूखी डालों को भी सींचे और सरसाये- हर मौसम सह ले, अच्छा उद्यान वही है।। जीवन पथ पर मिलते नित्य सैकड़ों राही- दो क्षण संग रहते, फिर सभी बिछड़ जाते हैं।। सच कहना? कितने होते हैं ऐसे सहचर- संवेदनमय- स्नेह सने, जिनके नाते हैं।। दुख में छोड़े नहीं- न सुख में करे ईर्ष्या- साथ अन्त तक दे- सच्ची पहचान वही है।। दिन गुजारते हंसी-खुशी के सब हंस-हंसकर- रंगरलियों में हो जाते मदहोश सभी हैं।। तब आते कब याद निराशा, कष्ट उदासी- विपदाओं की आशंका होती न कभी है।। संघर्षों, कष्टों को भी मुस्का कर झेले- सच पूछे कोई- तो, व्यक्ति महान् वही है।। कांटों के संग हंसे- बड़ा इन्सान वही है।।
-माया वर्मा
*समाप्त*