समष्टि ने अपने बच्चे की ओर देखा और अपनी ओर। वह बहुत गम्भीर हो गई। अपने किशोर पुत्र के सिर पर वह हाथ फिराती रही और व्यथा भरे शब्दों में बोली - लाल, तुम एक बार मुझे बन्धन मुक्त करा दो, मेरी अपहृत चेतना वापिस दिलादो, मेरा वेष सम्भाल दो। बस एकबार केवल एकबार - तुम इतना कर सको तो मैं तुम्हें सदा सर्वदा के लिए सुखी और समुन्नत रह सकने योग्य बना दूँगी।
जीवन एक वन है जिसमें फूल भी है और कांटे भी; जिसमें हरी-भरी सुरम्य घाटियाँ भी हैं और ऊबड़-खाबड़ जमीन भी। अधिकतर वनों में वन्य-पशुओं और वनवासियों के आने-जाने से छोटी-मोटी पगडण्डियाँ बन जाती हैं। देखने में तो यह सुव्यवस्थित रास्ते प्रतीत होते हैं किन्तु यह जंगलों में जाकर लुप्त हो जाते हैं। आसानी और शीघ्रता के लिए बहुधा यात्री इन पगडंडियों को पकड़ लेते हैं और सही रास्ते को छोड़ देते हैं।
जीवन-वन में ऐसी पगडंडियाँ बहुत हैं जो छोटी दीखती हैं, पर गंतव्य स्थान तक पहुँचती नहीं है। जल्दबाज लोग पगडंडियाँ ही ढूंढ़ते हैं, किन्तु उनको यह मालूम नहीं होता है कि ये अन्त तक नहीं पहुँचती और जल्दी काम बनने का लालच दिखाकर दल-दल में फँसा देती है। ये रास्ते वास्तव में बड़े ही आकर्षक होते हैं।
पाप और अनीति का मार्ग जंगल की पगडंडी, मछली की वंशी और चिड़ियों के जाल की तरह है। अभीष्ट कामनाओं की जल्दी से जल्दी, अधिक से अधिक मात्रा में पूर्ति हो जाये, इस लालच से लोग वह काम करना चाहते हैं जो जल्दी ही सफलता की मंजिल तक पहुँचा दे। जल्दी और अधिकता दोनों ही वाँछनीय हैं, पर उतावली में उद्देश्य को ही नष्ट कर देना, बुद्धिमत्ता नहीं माना जायगा।
जीवन-वन का राजमार्ग सदाचार और धर्म है। उस पर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँचना समय-साध्य तो हैं, पर जोखिम उसमें नहीं है। ईमानदारी के राजमार्ग पर चलते हुए मंजिल देर में पूरी होती है, उसमें सीमा और मर्यादाओं का भी बन्धन है, पर अनीति का वह दल-दल, वन की वह कँटीली झाड़ियाँ और ऊबड़-खाबड़ जमीन राजमार्ग में कहाँ ? जिनमें फँसकर जीवनोद्देश्य ही नष्ट हो जाता है। हम पगडंडियों पर न चलें, राजमार्ग ही अपनावें। देर में सही, थोड़ी सही, पर जो सफलता मिलेगी, वह स्थायी भी होगी और शान्तिदायक भी।
महाभारत के उद्योग पर्व में लिखा है-
“सत्य स्वर्गस्य सोपान पारावा रस्नौरिव।”
-अर्थात् जिस प्रकार नाव का आश्रय व्यक्ति को समुद्र पार करा देता है, उसी प्रकार सत्य व्यक्ति को संसार-सागर से पार कर स्वर्ग तक पहुँचा देता है।
यह एक सारपूर्ण सिद्धान्त है। सत्य का मार्ग देखने और चलने में कठिन और दुरूह प्रतीत होता है किन्तु सत्य जैसा सरल मार्ग दूसरा नहीं। एक असत्य को छिपाने के लिए लाल लाख असत्य बोलने पड़ते हैं, नमक-मिर्च लगाना पड़ता है। मस्तिष्क को विभिन्न प्रकार की कसरत करनी पड़ती है तो भी सत्य छिपाने से छिप नहीं पाता। एक दिन असत्य खुलता ही है और तब असत्यवादी सबका विश्वास भी खो बैठता है और अपना सम्मान भी। उसे किसी का सहयोग नहीं प्राप्त होता।
असत्य का मार्ग पकड़ कर लोग थोड़े दिनों तक लाभ अर्जित कर सकते हैं, अपनी आमदनी और इज्जत बढ़ा सकते हैं, अपनी शान-शौकत जताकर लोगों को थोड़े दिन तक उल्लू बना सकते हैं, किन्तु रामलीला के नकली रावण को जैसे ही दियासलाई लगती है, विशालकाय रावण थोड़ी ही देर में जलकर भस्म हो जाता है। वैसे ही असत्य का अनावरण एक न एक दिन होता ही है। स्थिरता केवल सचाई में है। उसको समझने में देर भले ही लग सकती है। अन्ततः विजय सत्य की होती है। “सत्यमेव जयते नानृतमः”।
सत्य-साधन कठिन इसलिए प्रतीत होती है कि उसमें असत्य की चमक-दमक नहीं है। सत्य संयम है, व्रत है। सत्य सारे साधनों की आधार शिला है। कोई भी साधना कितनी ही ऊँची क्यों न हो, बिना सत्य-साधना के सफल नहीं हो सकती। आध्यात्मिक प्रगति के लिए सत्य का अवलम्बन करने पर अन्य साधनों की आवश्यकता नहीं रहती। ईमानदारी, सहिष्णुता, उदारता, भयहीनता आदि गुण सत्य के सहचर हैं। सत्य-पथ का पथिक न कभी अशान्त होता है, न शोक करता है, न सन्ताप करता है। यह सब असत्य-परायणों के लिए ही निश्चित हैं। सत्य-परायण के लिए लोक में शान्ति एवं सम्मान तथा परलोक में स्वर्ग सुरक्षित रखा है, जिसे वह अधिकारपूर्वक प्राप्त करता है। सत्य का अनुसरण करने वाला क्या भौतिक और क्या आध्यात्मिक किसी भी क्षेत्र में असफल नहीं होता। सत्य बोलने, सत्य के अनुरूप सोचने और सत्य से स्वीकृत कर्म करने से ही मनुष्य सत्य-स्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर सकता है।
भारतीय धर्म में सत्य को परमात्मा का स्वरूप माना है। सत्य को नारायण कहा गया है। सत्य-नारायण कहा गया है। सत्य-नारायण व्रत एवं कथा यह चिर-प्रचलित है। यह सत्य-नारायण कोई व्यक्ति या देवता नहीं है वरन् सचाई को अन्तःकरण, मस्तिष्क और व्यवहार में प्रतिष्ठापित करने की प्रगाढ़ आस्था ही है। जो सत्य-निष्ठ है वही सत्य-नारायण भगवान् का समीपवर्ती साधक है। स्वर्ग और मुक्ति, सिद्धि और समृद्धि तो उसके करतल गत ही है।
सत्य शाश्वत होता है। मानवीय नियमों की भाँति वे बदले और संशोधित नहीं किये जा सकते। जीवन और सृष्टि का एकमात्र आधार सत्य ही है। सत्य ही व्यक्ति के जीवन में बल एवं प्रकाश और क्षमता निखरती है। असत्य का आश्रय लेने पर व्यक्ति और समाज का अध;पतन होता है।
असत्य का त्याग करना जीवन में आनन्द और विकास के बीज बोने के समान है। ‘सत्य शिव सुन्दरम्’ सत्य ही शिव है- कल्याणकारी है और वही सुन्दर है। असत्य का आचरण हर प्रकार से अमाँगलिक होता है। मनीषियों ने सत्य को मनुष्य के हृदय में रहने वाला ईश्वर बताया है। सत्य ही वह सार्वकालिक और सार्वदेशिक तथ्य है जो सूर्य के समान हर स्थल पर समान रूप से चमकता है।
आइन्स्टाइन एक ऐसे फार्मूले की खोज में थे, जिससे जड़ और चेतन की भिन्नता को एकता में निरस्त किया जा सके। प्रकृति अपने आप में पूर्ण नहीं है, उसे पुरुष द्वारा प्रेरित प्रोत्साहित आर फलवती किया जा रहा है। यह युग्म जब तक सिद्ध नहीं हो जाता, तब तक विज्ञान के कदम लँगड़ाते हुए ही चलेंगे।
जड़ और चेतन के बीज की खाई अब पटने ही वाली है। द्वैत को अद्वैत में परिणत करने का समय अब बहुत समीप आ गया। विज्ञान क्रमशः इस दिशा में बढ़ रहा है कि वह जड़ को चेतन और चेतन को जड़ सिद्ध करके दोनों को एक ही स्थान पर संयुक्त बनाकर खड़ा कर सके। जीवन रासायनिक पदार्थों से-पंचतत्वों से बना है इस सिद्धान्त को सिद्ध करते-करते हम वही पहुँच जाते हैं जहाँ यह सिद्ध हो सकता हो कि जीवन से पदार्थों की उत्पत्ति हुई है।
उपनिषद् का कहना है कि ईश्वर ने एक से बहुत बनने की इच्छा की, फलतः यह बहुसंख्यक प्राणी और पदार्थ बन गये। यह चेतन से जड़ की उत्पत्ति हुई। नर-नारी कामेच्छा से प्रेरित होकर रति कर्म में निरत होते हैं। फलतः राज शुक्र के संयोग से भ्रूण का आरम्भ होता है। यह भी मानवी चेतना जड़ शरीर की उत्पत्ति है। जड़ से चेतन उत्पन्न होता है, इसे पानी में कोई और मिट्टी में घास उत्पन्न होते समय देखते हैं। गन्दगी में मक्खी-मच्छरों का पैदा होना, सड़े हुए फलों में कीड़े उत्पन्न होना यह जड़ चेतन की उत्पत्ति है।
पदार्थ विज्ञानी इस बाद पर बहुत जोर देते हैं कि ‘जड़’ प्रमुख है। चेतन उसी की एक स्थिति है। ग्रामोफोन का रिकार्ड और उसकी सुई का घर्षण प्रारम्भ होने पर आवाज आरम्भ हो जाती है, उसी प्रकार इकट्ठे होने पर आवाज आरम्भ हो जाती है, उसी प्रकार अमुक रसायनों के अमुक स्थिति में-अमुक अनुपात में इकट्ठे होने पर चेतन जीव की स्थिति में जड़ पदार्थ विकसित हो जाते हैं। जीव-विज्ञानी अपने प्रतिपादनों में इसी तथ्य को प्रमुखता देते हैं।
जीव-विज्ञान को दो भागों में बांटा जा सकता है। वनस्पति विज्ञान (वौटनी), प्राणि विज्ञान (जूलौजी) इन दो विभाजनों से भी इस महा समुद्र का ठीक तरह विवेचन नहीं हो सकता। इसलिये इसे अन्य भेद-उपभेदों में विभक्त करना पड़ता है।
सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों से जिन जीवधारियों को देखा समझा जाता है। उसके सम्बन्ध में जानकारी सूक्ष्म जैविकी (माइक्रो बायोलॉजी) कही जाती है।
आकारिकी (मारफोलाजी) शारीरिकी (अनाटोमी) ऊतिकी (हिस्टोलाजी) कोशिकी (साइटोलोजी) भ्रूणी (एम्ब्रोलाजी) शरीर क्रिया (फिजियोलॉजी) वर्गिकी (पैलेन्टिओलाजी) परिस्थिति की (एकोलाजी) आनुवाँशिकी (जैनेटिक्स) जैव विकास (आरगैनिक एवूलेशन) आदि।
इन सभी जीव-विज्ञान धाराओं ने यह सिद्ध किया है कि जीवन और कुछ नहीं जड़ पदार्थों का ही विकसित रूप है।
रासायनिक दृष्टि से जीवन सेल और अणु के एक ही तराजू पर तोला जा सकता है। दोनों में प्रायः समान स्तर के प्राकृतिक नियम काम करते हैं। एकाकी एटम-मालेक्यूल्स और इलेक्ट्रोन्स के बारे में अभी भी वैसी ही खोज जारी है जैसी कि पिछली तीन शताब्दियों में चलती रही है। विकिरण-रेडियेशन और गुरुत्वाकर्षण, ग्रेविटेशन के अभी बहुत से स्पष्टीकरण होने बाकी है। जो समझा जा सका है वह अपर्याप्त ही नहीं असन्तोषजनक भी है।
यों कोशिकाएँ निरन्तर जन्मती-मरती रहती है, पर उनमें एक के बाद दूसरी में जीवन तत्व का संचार अनवरत रूप से होता रहता है। मृत होने से पूर्व कोशिकाएँ अपना जीवन तत्व नवजात कोषा को दे जाती हैं, इस प्रकार मरण के साथ ही जीवन की अविच्छिन्न परम्परा निरन्तर चलती रहती है। उन्हें मरणधर्मा होने के साथ-साथ अजर-अमर भी कह सकते हैं। वस्त्र बदलने जैसी प्रक्रिया चलते रहने पर भी उनकी अविनाशी सत्ता पर कोई आँच नहीं आती।
नोबेल पुरस्कार विजेता डा0 एलेक्सिस कारेल उन दिनों न्यूयार्क के राक फेलर चिकित्सा अनुसन्धान केन्द्र में काम कर रहे थे। एक दिन उन्होंने एक मुर्गी के बच्चे के हृदय के जीवित तंतु का एक रेशा लेकर उसे रक्त एवं प्लाज्मा के घोल में रख दिया। वह रेषा अपने कोष्ठकों की वृद्धि करता हुआ विकास करने लगा। उसे यदि काटा-छाँटा न जाता तो वह अपनी वृद्धि करते हुए वजनदार माँस पिण्ड बन जाता। उस प्रयोग से डा0 कारेल ने यह निष्कर्ष निकाला कि जीवन जिन तत्वों से बनता है यदि उसे ठीक तरह जाना जा सके और टूट-फूट को सुधारना सम्भव हो सके तो अनन्तकाल तक जीवित रह सकने की सभी सम्भावनाएं विद्यमान हैं।
प्रोटोप्लाज्मा जीवन का मूल तत्व है। यह तत्व अमरता की विशेषता युक्त है। एक कोश वाला अमीबा प्राणी निरन्तर अपने आपको विभक्त करते हुए वंश वृद्धि करता रहता है। कोई शत्रु उसकी सत्ता ही समाप्त करदे यह दूसरी बात है अन्यथा वह अनन्त काल तक जीवित ही नहीं रहेगा वरन् वंश वृद्धि करते रहने में भी समर्थ रहेगा।
रासायनिक सम्मिश्रण से कृत्रिम जीवन उत्पन्न किये जाने की इन दिनों बहुत चर्चा है। छोटे जीवाणु बनाने में ऐसी कुछ सफलता मिली भी है, पर उतने से ही यह दावा करने लगना उचित नहीं कि मनुष्य ने जीवन-सृजन करने में सफलता प्राप्त कर ली।
जिन रसायनों से जीवन विनिर्मित किये जाने की चर्चा है क्या उन्हें भी-उनकी प्रकृतिगत विशेषताओं को भी मनुष्य द्वारा बनाया जाना सम्भव है? इस प्रश्न पर वैज्ञानिकों को मौन ही साधे रहना पड़ रहा है। पदार्थ की जो मूल प्रकृति एवं विशेषता है यदि उसे भी मनुष्यकृत प्रयत्नों से नहीं बनाया जा सकता तो इतना ही कहना पड़ेगा कि उसने ढले हुए पुर्जे जोड़कर मशीन खड़ी कर देने जैसा बाल प्रयोजन ही पूरा किया है। ऐसा तो लकड़ी के टुकड़े जोड़कर अक्षर बनाने वाले किन्नर गार्डन कक्षाओं के छात्र भी कर लेते हैं। इतनी भर सफलता से ड़ड़ड़ड़ निर्माण जैसे दुस्साध्य कार्य को पूरा कर सकने का दावा करना उपहासास्पद गर्वोक्ति है।
कुछ मशीनें बिजली पैदा करती हैं- कुछ तार बिजली बहाते हैं, पर वे सब बिजली तो नहीं हैं। अमुक रासायनिक पदार्थों के सम्मिश्रण से जीवन पैदा हो सकता है सो ठीक है, पर उन पदार्थों में जो जीवन पैदा करने की शक्ति है वह अलौकिक एवं सूक्ष्म है। उस शक्ति को उत्पन्न करना जब तक सम्भव न हो तब तक जीवन का सृजेता कहला सकने का गौरव मनुष्य को नहीं मिल सकता।
ब्रह्माण्ड की शक्तियों का और पिण्ड की-मनुष्य की शक्तियों का एकीकरण कहाँ होता है शरीर शास्त्री इसके लिए सुषुम्ना शीर्षक, मेडुला आवलाँगाटा-की ओर इशारा करते हैं। पर वस्तुतः वह वहाँ है नहीं। मस्तिष्क स्थित ब्रह्मरंध्र को ही वह केन्द्र मानना पड़ेगा, जहाँ ब्राह्मी और जैवीय चेतना का समन्वय सम्मिलन होता है।
ऊपर के तथ्यों पर विचार करने से यह एकाँकी मान्यता ही सीमित नहीं रहती कि जड़ से ही चेतन उत्पन्न होता है इन्हीं तथ्यों से यह भी प्रमाणित होता है कि चेतन भी जड़ की उत्पत्ति का कारण है। मुर्गी से अण्डा या अण्डे से मुर्गी-नर से नारी या नारी से नर- बीज से वृक्ष या वृक्ष से बीज जैसे प्रश्न अभी भी अनिर्णीत पड़े हैं। उनका हल न मिलने पर भी किसी को कोई परेशानी नहीं। दोनों को अन्योन्याश्रित मानकर भी काम चल सकता है। ठीक इसी प्रकार जड़ और चेतन में कौन प्रमुख है इस बात पर जोर न देकर यही मानना उचित है कि दोनों एक ही ब्रह्म सत्ता की दो परिस्थितियाँ मात्र हैं। द्वैत दीखता भर है वस्तुतः यह अद्वैत ही बिखरा पड़ा है।
ब्रह्मज्ञान कौन प्राप्त कर सकता है। जिसकी भोगों की इच्छा दूर हो गई हो, जिसके मनोरथ न रहे हों और जिसकी बुद्धि व्युत्पन्न हो गई हो, वह ब्रह्मज्ञान का अधिकारी है। — श्री योगवशिष्ठ
ऋग्वेद की एक ऋचा है— ‘इह व्रवीतु य उतश्चिकेतत्’, अर्थात इस विश्व के सब रहस्यों को यदि कोई जानता है तो वह यहाँ आकर बताए।
तैत्तिरीय ब्राह्मण की एक श्रुति है— “यह विश्व किससे उत्पन्न हुआ, यह कौन जानता है? इसके रहस्यों को कौन कह सकता है? देवता भी तो पीछे जन्में हैं, वे अपने उद्भव से पूर्वकाल का वृत्तांत कैसे जान पाए? जिसका एक फल यह पृथ्वी है, उस ब्रह्मांड-वृक्ष का जन्म किस आरण्यक में हुआ, इसे कौन जानता है? इस सबका जो अधिष्ठाता है, उसे कौन जानता है? वह अधिष्ठाता भी अपने विस्तार का सम्पूर्ण रहस्य जानता है या नहीं, इसे कौन जाने?”
कापर्निकस भी सत्य की शोध में एक सीमा तक ही बढ़ सका। उसने पृथ्वी को विश्व का केंद्र तो नहीं माना, पर वह सेहरा सूर्य के सिर बाँध दिया। वह कहता था ब्रह्मांड का मध्य केंद्र सूर्य है। उसी के इर्द-गिर्द समस्त ग्रह-नक्षत्र परिक्रमा करते हैं। उसे क्या पता था कि बेचारा सूर्य भी कभी अनंत ब्रह्मांड की परिभ्रमण प्रक्रिया का एक नन्हा-सा बाल-पथिक ही माना जाने लगेगा।
प्राचीन ज्योतिष शास्त्र की मान्यता यही रही है कि पृथ्वी स्थिर है और सूर्य चल एवं ग्रह-नक्षत्र उसकी परिक्रमा करते हैं। पृथ्वी को चपटी तश्तरीनुमा माना जाता था। यों पीछे पाइथागोरस, अलबरूनी, आर्यभट्ट आदि ने पृथ्वी को गोल तो माना, पर उसे भ्रमणशील वे भी नहीं मानते थे।
पहली बार पृथ्वी के भ्रमणशील होने का प्रतिपादन पोलैंड निवासी कापर्निकस ने किया और इसके प्रमाण-तर्क का प्रतिपादन उसने अपने ग्रंथ आकाशमंडल के भ्रमण-पथ पर नामक ग्रंथ में किया। उसे अनुमान था कि इस प्रतिपादन से पुरातन पंथी ईसाई समाज उसका घोर विरोध करेगा। इसलिए उसने चतुरता से काम लिया, उसे रोम के पोपपाल तृतीय को समर्पित और ऊपर से ऐसी लीपा-पोती की, प्राचीन प्रतिपादन का खंडन होते हुए भी कटुता उत्पन्न नहीं हुई। पोप की आड़ में कुछ दिन तो यह चाल सफल रही, पर पीछे जैसे ही उसे लोगों ने बारीकी से पढ़ा वैसे ही ईसाई धर्म के दोनों ही वर्ग प्रोटेस्टेंट और रोमन कैथोलिक उसके विरोध में हाथ धोकर पीछे पड़ गये। अन्ततः पोप के आदेश से उस पुस्तक को जब्त कर लिया गया। प्रतिपादनकर्त्ता पर वे अपराध लगाए गये, जिनका फल उसे मृत्युदंड ही भुगतना पड़ सकता था। अच्छा इतना ही हुआ अपराध लगाए जाने से 73 वर्ष पूर्व ही कापर्निकस मर चुका था। अन्यथा उसे भी धरती को भ्रमणशील बताने वाले एक अन्य खगोलज्ञ बूनी की तरह जीवित जला दिया जा सकता था। ऐसे ही प्रतिपादनों पर गैलीलियो को भारी उत्पीड़न सहने पड़े थे।
गैलीलियो ने खगोल का दूरदर्शन कर सकने योग्य दूरबीन सबसे पहले 1609 में बनाई। इससे पूर्व जितना तारामंडल आँखों से देखा जा सकता था उसी की खोज सम्भव थी और की गई। आचार्य लगध, आर्यभट्ट, वराहमिहर, भास्कराचार्य और टालमी, कोपर्निकस, केपलर आदि ज्योतिर्विदों ने आँखों से जो देखा जा सकता था उसी आधार पर खगोल विद्या की खोज-बीन की है।
समस्त ब्रह्मांड के बारे में जानना तो बहुत दूर की बात है हम अपने सौरमंडल के बारे में ही बहुत कम जानते हैं। पृथ्वी के बारे में हमारी जानकारी का क्रमिक विकास हुआ है। चंद्रमा को प्राचीनकाल में एक स्वतंत्र और पूर्ण ग्रह माना जाता था अब वह मान्यता बदल दी गई है और माना गया है कि पृथ्वी का उपग्रह मात्र है।
चंद्रमा पृथ्वी से 3,80,000 किलोमीटर दूर है। प्रकाश की किरणें उस दूरी को सवा सेकेंड में पूरी कर लेगा। सूर्य से पृथ्वी 14,9500000 किलोमीटर दूर है। इतनी दूरी पूरी करने में प्रकाश किरणों को साड़े आठ मिनट लगते हैं। अपने सौर-मण्डल का अंतिम ग्रह प्लूटो, सूर्य से 590 करोड़ मील कि. मी. है। इस दूरी को प्रकाश किरणें साड़े पाँच घंटे में पूरा करती हैं। इसी से हम अनुमान लगा सकते हैं कि ‘प्रकाश समय का क्या अर्थ होना चाहिए। एक सेकेंड में प्रकाश किरणें 1,8600 मील अर्थात् 3,00,000 किलो मीटर की यात्रा करती है। ग्रह-नक्षत्रों की दूरी नापने में इस आधार पर बनाई गई समय इकाई के प्रकाश वर्ष बनाये गए हैं। एक प्रकाश वर्ष, अर्थात् 1,00,00,00 करोड़ किलोमीटर दूरी।
मंगल को भौम— भूमिपुत्र आदि नामों से पुकारा जाता है और कहा जाता है कि वह अति प्राचीनकाल में पृथ्वी का ही एक अंग था। प्रकृति के विग्रह से यह टुकड़ा कटकर अलग हो गया और स्वतंत्र रूप से ग्रह बनकर अपनी कक्षा में भ्रमण करने लगा। इतने पर भी मिलती-जुलती हैं। उस पर प्राणियों की उपस्थिति पर जो विश्वास किया जाता रहा है, उसमें कमी नहीं आई, बुद्धि एवं पुष्टि ही हुई है।
सोवियत खगोलवेत्ता मिरवाइल यारोव ने अभी हाल में रूस तथा अमेरिका द्वारा भेजे गए मंगल खोजयानों की रिपोर्टों का अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला है कि वहाँ जीवन होने की बहुत संभावना है। वे कहते हैं मंगल मृत ग्रह नहीं है। उसमें पिछले दिनों ऐसी उथल-पुथल होती रही हैं, जिनका प्राणियों की उत्पत्ति में प्रधान हाथ रहता है। अगले दिनों वहाँ के ध्रुवों के पिघलने की पूरी संभावना है। इससे कुछेक केंद्रों में संग्रहित और ठोस स्थिति में हरने वाला पानी नदी-नालों और बादलों के रूप में जगह-जगह पहुँचने लगेगा। उस स्थिति में स्वभावतः ऐसे प्राणी उत्पन्न होने लगेंगे, जो वहाँ की जलवायु में भली प्रकार जीवनयापन कर सकें।
मंगल में पानी तो है, पर वह वहाँ फटते रहने वाले ज्वालामुखियों द्वारा हवा में भाप बनाकर बुरी तरह उड़ाया जा रहा है। उसके भूतल का प्रायः एक लाख गैलन पानी भाप बनकर आकाश में उड़ जाता है। इसी से सघन बादल जो उसके ऊपर छाए हुए हैं और भी अधिक सघन बनते जाते हैं।
अंतरिक्ष खाजी मैनियर ने जो सूचनाएँ भेजी हैं, उनका विश्लेषण करते हुए डॉ. मासूरस्की ने एक निष्कर्ष यह भी निकाला है कि मंगल जब सूर्य की परिक्रमा करते हुए उसके निकटतम पहुँच जाता है तो गर्मी की अधिकता से उसके ध्रुव प्रदेशों की बर्फ पिघलकर नई नदियों तथा झीलों का निर्माण करती है। जब वह बहुत दूर निकल जाता है तो गर्मी की कमी से हिम-प्रलय भी होती है। इन हिम युगों के बीच प्रायः 25000 वर्षों का अंतर रहता है।
हम पृथ्वी निवासियों की शरीर रचना डिआक्सीराइवो न्यूक्लिक एसिड (डी.एन.ए.) रसायन से संभव हुई है। यह जलीय स्तर का तत्त्व है। उसका विकास जहाँ जल की उपस्थिति होती, वहाँ सम्भव हो सकेगा। पर यह अनिवार्य नहीं कि यह एक ही रसायन सभी ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति में जीवन उत्पन्न करता हो, उसके और भी बहुत से आधार हैं।
अमेरिका की नेशनल माइन्स काँग्रेस ने मंगल ग्रह की नवीनतम स्थिति को ध्यान में रखते हुए भी यह आशा व्यक्त की है कि वहाँ जीवन का अस्तित्व हो सकता है। डी.एन.ए. के अतिरिक्त भी जीवन के अन्य आधार हो सकते हैं। पृथ्वी पर भी ऐसे बैक्टीरिया पाए गए हैं, जो मंगल जैसी परिस्थितियों में रखे जाने पर जीवित रह सकते हैं। उन्हें ऑक्सीजन की जरा भी जरूरत नहीं पड़ती, यहाँ तक कि ऑक्सीजन में उलटे दम तोड़ने लगते हैं।
रूस की साइन्स एकेडेमी के अंतर्गत चलने वाले माइक्रो बायोलॉजिकल इन्स्टीट्यूट ने एक ऐसी प्रयोगशाला विनिर्मित की है, जिसमें मंगल ग्रह जैसा वातावरण है। इसमें पृथ्वी पर उत्पन्न होने वाले पिग्मेन्टे बैक्टीरिया भली प्रकार विकसित हो रहे हैं। घातक अल्ट्रावायलेट विकिरण भी उन्हें कुछ हानि नहीं पहुँचा सकता। ऐसे ही कुछ पौधे भी हैं, जो उस वातावरण में जीवनयापन कर रहे हैं।
मैरीनर- 9 यान द्वारा भेजी गई सूचनाओं का जेट प्रोपल्शन लैबोरेटरी में अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला गया है कि वहां के दक्षिण ध्रुव पर हिमाच्छादित वातावरण है। डॉ. रुडोल्फ हैनेल ने इन्हीं सूचनाओं से यह भी नतीजा निकाला है कि वहां की हवा में भाप का भी अच्छा अंश है। ऊपर के वातावरण में तेज गर्मी अवश्य है, पर मंगल के धरातल का तापमान सह्य है। मंगल के दो चंद्रमा उसकी परिक्रमा करते हैं।
अमेरिका अपना मंगल यात्रा पर जाने वाला चार यात्रियों सहित एक यान 1 मई 1986 को भेजने की संभावना घोषित कर चुका है। सूर्य, मंगल और पृथ्वी की चाल को देखते हुए वह दिन ऐसा होगा, जिसको चलने से कम-से-कम यात्रा करने पर भी लक्ष्य तक पहुंचा जा सकेगा। यों मंगल की न्यूनतम दूरी पृथ्वी से 620 लाख और अधिकतम दूरी 650 लाख मील है। इस यान के लौटने की तारीख 25 जुलाई 1987 निर्धारित की गई है। इस यात्रा पर 750 खरब डॉलर खर्च आने की संभावना है।
पोलिश खगोल विज्ञानी जान गाडोमिस्की ने ब्रह्मांड में जीवन की संभावनाओं पर प्रकाश डालने वाली एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक लिखी है— ‘मेनुअल ऑन स्टेलर एकोस्फियर्स’, उसमें उनने अपने निकटवर्त्ती तीन ऐसे ग्रहों का उल्लेख किया है, जिनमें जीवन होने की पूरी-पूरी संभावना है। वे हमसे दस-ग्यारह प्रकाश वर्ष की दूरी पर हैं।
सन् 1950 में एक उल्काश्म पृथ्वी पर गिरा था। उसका विश्लेषण करने में अमेरिका के मूर्धन्य विज्ञानवेत्ता जुटे। डॉ. सिसलर की अध्यक्षता में चली उस शोध का निष्कर्ष यह था कि इसमें अमीनो, नाइट्राइड, हाइड्रोकार्बन जैसे जीव रसायन मौजूद हैं। और जहां से यह आया है वहां जीवन की संभावना है। कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय ने डॉ. काल्विन के नेतृत्व में इसी उल्काश्म की दूसरे ढंग से खोज कराई। उनने भी सिसलर की जीवन संभावना वाली बात को पुष्ट कर दिया।
पृथ्वी से पचास मील ऊपर कितनी ही उल्काएँ उड़ती रहती हैं। प्रयत्न यह किया जा रहा है कि इनमें से कुछ को गिरफ्तार करके लाया जाए और उनके मुँह से ब्रह्मांड के छिपे हुए रहस्यों को उगलवाया जाय। यों धरती पर से भी एस्ट्रोरेडियो सिस्टम के सहारे संसार की कितनी ही वेधशालाएँ इस दिशा में खोज-बीन करने में निरत हैं। ओजमा प्रोजक्ट का रेडियो टेलिस्कोप इस दिशा में कितनी ही महत्त्वपूर्ण खोजें प्रस्तुत करने में सफल हो चुका है।
अपने सौरमण्डल में 9 ग्रह, 31 उपग्रह और जो गिन लिए गए, ऐसे 20 हजार क्षुद्र ग्रह हैं। यह सभी अपनी-अपनी कक्षा-मर्यादाओं में निरंतर गतिशील रहने के कारण ही दीर्घजीवन का आनंद ले रहे हैं। यदि वे व्यक्तिक्रम पर उतारू हुए होते तो इनमें से एक भी जीवित न बचता। कब के वे परस्पर टकराकर चूर्ण-विचूर्ण हो गए होते।
इन नौ ग्रहों में से छह पुराने हैं और तीन नए। बुध, शुक्र, राहु (पृथ्वी) मंगल, बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेपच्यून, प्लूटो। इनमें जो ग्रह सूर्य के जितना समीप है, उसकी परिक्रमा गति उतनी ही तीव्र है। बुध सबसे समीप होने के कारण प्रति सेकेंड 48 किलोमीटर की गति से चलता है और एक परिक्रमा 88 दिन में पूरी कर लेता है। पृथ्वी एक सेकेंड में 28.6 किलोमीटर की चाल से चलती हुई 365.25 दिन में परिक्रमा पूरी करती है। प्लूटो सबसे दूर है, वह सिर्फ 4.3 कि. मी. प्रति सेकेंड की चाल से चलता है और 248.43 वर्ष में एक चक्कर पूरा करता है।
इनमें से बुध और शुक्र में अतिताप है। मंगल मध्यवर्त्ती है। बृहस्पति, शनि, यूरेनस, नेपच्यून, प्लेटो बहुत ठंडे हैं। पृथ्वी का तापमान संतुलित है।
सूर्य से पृथ्वी की ओर चलें तो पाँचवाँ और पृथ्वी से सूर्य की ओर चलें तो तीसरा ग्रह बृहस्पति है। वह अपने नौ ग्रहों में सबसे बड़ा है। शेष आठ ग्रहों का सम्मिलित रूप भी बृहस्पति से कम पड़ेगा। उसकी दूरी सूर्य से भी उतनी ही है जितनी पृथ्वी से, अर्थात् कोई साठ करोड़ मील अधिक-से-अधिक और छत्तीस करोड़ मील कम-से-कम। उसका मध्य व्यास 88,700 मील है। सामान्यतया उसे पृथ्वी से दस गुना बड़ा कहा जा सकता है। गैस के बादलों की 10 हजार से 20 हजार मील तक की मोटी परत उस पर छाई हई है। पानी और हवा का अस्तित्व मौजूद है। बृहस्पति के इर्द-गिर्द 12 चन्द्रमा चक्कर काटते हैं। इनमें से चार का तो विस्तृत विवरण भी प्राप्त कर लिया गया है। बृहस्पति का गुरुत्व पृथ्वी से ढाई गुना अधिक है। वहाँ दिन 10 घण्टे का होता है किंतु वर्ष लगभग 12 वर्ष में पूरा होता है। उसकी चाल धीमी है एक सेकेंड में आठ मील। जबकि अपनी पृथ्वी एक सेकेंड में अठारह मील चल लेती है।
विश्व-जीवन का कीर्तिमान 210 फारेनहाइट तक जीवित रह सकने का बन चुका है। उतनी गर्मी सहन करने वाले जीवधारी बृहस्पति जैसे दूसरा सूर्य समझे जाने वाले हाइड्रोजन गैस प्रधान ग्रहों पर आसानी से निर्वाह कर सकते हैं।
वैज्ञानिक यहाँ तक कहते हैं कि सूर्य के विस्फोट से जिस प्रकार सौरमंडल के अन्य ग्रह बने हैं, उस तरह बृहस्पति नहीं बना। वह अपने बारहों उपग्रहों समेत एक स्वतंत्र नक्षत्र है। किसी प्रकार सूर्य की पकड़ में आकर उसकी अधीनता स्वीकार करने में विवश हो गया है। तो भी उसमें स्वतंत्र तारक जैसी विशेषताएँ बहुत अंशों में विद्यमान हैं। यदि बृहस्पति स्वतंत्र तारक रहा होता तो उसके बारह उपग्रहों में चार को प्रधानता मिलती। इन प्रधान चंद्रमाओं को गैलीलियो ने अपनी दूरबीनों से देख लिया था और उनके नामकरण आई॰ ओ॰ यूरोपा- गैनीमीड- कैलिस्टो कर दिया था। अन्य आठ उपग्रह इसके बाद देखे पहचाने गए।
सौर परिवार के ग्रह पिंड अपनी पृथ्वी के सहोदर भाई हैं। हम उनके बारे में जो जानते हैं, वह इतना कम है जिसे बालकों जितना स्वल्प ज्ञान ही कह सकते हैं। सौर परिवार जैसे अरबों-खरबों तारक मंडल जिस ब्रह्मांड में भरे पड़े हैं, उसकी विशालता की कल्पना तक कर सकना अपनी बुद्धि के लिए संभव नहीं है।
हम अपनी ज्ञानपरक उपलब्धियों पर गर्व करें सो ठीक है, पर साथ ही यह भी ध्यान में रखें कि अनंत ज्ञान की तुलना में हमारी जानकारियाँ अत्यंत ही स्वल्प और नगण्य हैं। इतनी तुच्छ जानकारी के आधार पर हमें सर्वज्ञाता बनने का दुस्साहस नहीं करना चाहिए और ईश्वर एवं आत्मा के अस्तित्व तक से इनकार करने की इसलिए ढीठता नहीं बरतनी चाहिए कि हमारी बुद्धि उसे प्रत्यक्षवाद की प्रयोगशाला में प्रकट नहीं कर सकी।
एक तपस्वी ने इन्द्र देव की आराधना की। वे प्रसन्न हुए और वरदान देने पहुँचे। तपस्वी ने उनका वज्र माँगा ताकि संसार को आतंकित करके चक्रवर्ती शासन कर सके।
इन्द्रदेव रुष्ट होकर वापिस चले गये। वरदान न पाने के दुख में तपस्वी निराशाग्रस्त मनःस्थिति में शरीर त्याग गया।
इन्द्र को यह समाचार मिला तो वे बहुत दुखी हुए और सोचने लगे तपस्वी को कष्ट देने की अपेक्षा उनकी मनोकामना पूर्ण करना उचित है।
कुछ समय बाद किसी तपस्वी ने फिर इन्द्र की वैसी ही आराधना की। निदान उन्हें वरदान देने के लिए जाना पड़ा।
अब की बार वे वज्र साथ ही लेकर गये और पहुँचते ही बिना माँगे वज्र तपस्वी के आगे रख दिया। तपस्वी ने आश्चर्यचकित होकर उस निरर्थक वस्तु को देने का कारण पूछा- तो इन्द्र ने पूर्व तपस्वी का सारा वृत्तांत कह सुनाया।
वज्र को लौटाते हुए उसने निवेदन किया देव, ऐसे वरदान से क्या लाभ जिसे पाकर अहंकार भरी तृष्णा जगे और न मिलने पर निराशाग्रस्त मरण का वरण करना पड़े। मुझे तो ऐसा वर दीजिए कि उपलब्ध तप शक्ति का सत्प्रयोजनों के लिए नियोजित कर सकूँ।
आदिम काल से लेकर अब तक मनुष्य ने प्रगति पथ की अनेकों सीढ़ियां पार की हैं। इसी के साथ-साथ धर्म का भी विकास होता चला आया है। आदिम काल से मनुष्य ने पशु के आहार, निद्रा, भय, मैथुन की सीमित परिधि से आगे बढ़कर जब अपने इर्द-गिर्द के वातावरण को समझने का प्रयत्न किया होगा तो उसे भय लगा होगा। आग का गोला सूर्य, आकाश में चमकने वाले चाँद-तारे, दिन-रात का चक्र, बादलों की घटाएं, बिजली की कड़क, नदियों की चाल, समुद्र की लहरें, सिंह और सर्पों के उत्पात, जन्म और मरण जैसी विस्मयजनक हलचलों को उसने किन्हीं अदृश्य अतिमानवों की करतूत समझा होगा और उनके कोप से बचने एवं सहायक बनाने के लिए पूजा उपक्रम का कुछ ढंग सोचा होगा। सम्भवतः यहीं से उपासनात्मक अध्यात्म का आरम्भ हुआ है। एकाकी स्वेच्छाचार ने जब समूह में रहने की प्रवृत्ति अपनाई होगी तो आचार संहिता की आवश्यकता पड़ी होगी, अन्यथा सहयोग का अभिवर्धन और टकराव का समाधान ही सम्भव न होता। धर्म यहीं से चला है। अब हम धर्म और अध्यात्म को दो धाराओं में बाँटते हैं, पूर्व काल दोनों एक थे।
भय के बाद लोभ की प्रवृत्ति पनपी। उसने अतिमानवों से, देवताओं से अभीष्ट लाभ पाने की आशा रखी होगी। उनसे अवरोधों को दूर करने और वाँछित फल प्रदान करने का सहयोग माँगा होगा। तब मानव अपने पुरुषार्थ की तुच्छता और आकाँक्षाओं की प्रबलता का वह तारतम्य नहीं बिठा पा रहा होगा जिसे पशु-पक्षी सहज ही बिठा लेते हैं। उपलब्ध परिस्थितियों और निजी आकाँक्षाओं का वे सहज ही ताल-मेल बिठा लेते हैं और जो कुछ है उसी में सन्तुष्ट रहकर अपनी प्रकृति को तद्नुरूप ढाल लेते हैं। मनुष्य की आकाँक्षाएं बढ़ी और साधन सीमित रहे। ऐसी परिस्थिति में किन्हीं अदृश्य अतिमानवों का-देव-दानवों का पल्ला पकड़ना उसने उचित समझा होगा। देवाराधन का स्वरूप उस विकास युग में से थोड़ा-थोड़ा छुटकारा पाने और लोभ-लालच की परिधि में प्रवेश करने का बना होगा। स्वर्ग-नरक, शाप-वरदान, जिन अदृश्य शक्तियों द्वारा दिया जाता है उनके कोप से बचना और प्रसन्न करके लाभान्वित होना तब एक दिव्य कौशल रहा होगा। उन्हीं दिनों मन्त्र-तन्त्र के-देव परिकर के रूप, विधान गढ़े गये। संयोग वश जो भले-बुरे अवसर आते गये उन्हें दैवकृत माना जाता रहा इसी आधार पर अमुक विधान का खण्डन अमुक का मंडन क्रम चलता रहा।
धर्म के विकास का इतिहास मनुष्य की चेतना के-चिन्तन के साथ-साथ कदम से कदम मिलाकर चलता आया है। भय और लोभ की व्यक्तिवादी आकाँक्षाओं से आगे बढ़कर मनुष्य अधिकाधिक समाज पर निर्भर होते चलने की स्थिति में यह समझने के लिए बाध्य हुआ कि समूहगत हलचलें मनुष्य को अत्यधिक प्रभावित करती हैं। पारस्परिक सहयोग असहयोग के, नीति पालन और उल्लंघन के क्रिया-कलाप अधिकारिक सुविधा-असुविधा उत्पन्न करते हैं। सुख और दुख यही परिस्थितियाँ उत्पन्न करती हैं। अतएव व्यक्ति और समाज की नीति-मर्यादाओं को अधिक सबल अधिक परिष्कृत बनाया जाय। इस मान्यता ने नीति के, उपकार के तत्व ज्ञान को धर्म में सम्मिलित किया और इसके लिए आचार शास्त्र का विकास हुआ। धर्म की व्याख्या, नीति-पालन एवं उदारता के लिए उत्साह प्रदर्शन के रूप में की गई। यह और भी अधिक महत्वपूर्ण कदम था।
इससे आगे और भी विकसित स्थिति आती है जब ‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ की-‘सूत्र माणि गणा इव’ की मान्यता की आधार शिला रखी गई। यह ब्रह्मविद्या का युग है। एक ही आत्मा सब में समाया हुआ है- सब में अपनी ही सत्ता जगमगा रही है- अपने भीतर सब है- सब में एक ही आत्मा का प्रतिबिंब है। सब अपने और -‘अपना’ सब का है। यह विश्व मानव की, विश्व परिवार की एकात्म अद्वैत बुद्धि सचमुच धर्म की अद्भुत और अति उपयोगी दैन है। बढ़ती हुई समाज निर्भरता का सन्तुलन इसी मान्यता के साथ बैठता है। बढ़ी हुई जनसंख्या-वैज्ञानिक उपलब्धियों ने संचार और द्रुतगामी वाहनों के जो साधन प्रस्तुत किये हैं उनसे सुविस्तृत क्षेत्र में फैली हुई दुनिया का फैलाव सिकोड़ कर रख दिया है। अब कुछ घण्टों में ही धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक पहुँचा जा सकता है। कोई देश अपने पड़ौसियों के कारण ही नहीं-दूर देशों की आन्तरिक परिस्थितियों के कारण भी प्रभावित होता है। व्यक्ति की प्रगति और अवगति अब उसके निजी पुरुषार्थ पर निर्भर नहीं वरन् सामाजिक परिस्थितियाँ उसे बनने, बदलने के लिए विवश करती हैं। व्यक्ति की सत्ता समाज की मुट्ठी में केन्द्रित होती चली जा रही है। व्यक्ति पूरी तरह समाज यंत्र का पुर्जा मात्र बन गया है। इन परिस्थितियों में यदि व्यक्ति को समाजनिष्ठ बनने के लिए कहा जाय, उसे अपनी प्रगति अवगति को समाज के उत्थान-पतन के रूप में जोड़ने के लिए कहा जाय तो यह सर्वथा उचित और सामयिक है।
जो परिस्थितियाँ आज अनिवार्य हो गई हैं कुछ समय पहले ही उनकी संभावना दूरदर्शियों ने भाँप ली थी और धर्म एवं अध्यात्म को अधिकारिक समाजनिष्ठ बनाना आरम्भ कर दिया गया है। अहंकार को, स्वार्थ को, परिग्रह को-घृणा-वासना को- त्यागने के लिए कहने का तात्पर्य व्यक्तिवाद की कड़ी पकड़ से अपनी चेतना को मुक्त करना ही हो सकता है। सेवा, परोपकार, जनकल्याण, दान-पुण्य, त्याग-बलिदान के आदर्श मनुष्य को समाजनिष्ठ बनाने के लिए विनिर्मित हुए हैं। व्यक्तिवाद को झीना करने और समाजवाद को परिपुष्ट करने के लिए सुविकसित अध्यात्म एक अच्छी पृष्ठभूमि तैयार करता है। उसमें संयम की, तप की, तितीक्षा की, पवित्रता की, मितव्ययिता की, शालीनता की, सज्जनता की, सन्तोष और शान्ति की वे धाराएं सम्मिलित की गई हैं जो मनुष्य को अपने लिए अपनी शक्तियों का न्यूनतम भाग खर्च करने की प्रेरणा देती है और तन-मन, धन का जो भाग इस नीति को अपनाने के कारण बच रहता है उसे जन-कल्याण में खर्च करने की ओर धकेलती हैं।
ईश्वर का स्वरूप भी अब भयंकर, वरदाता, नीति-निर्देशक की क्रमिक भूमिका से आगे बढ़ते-बढ़ते इस स्थिति पर आ पहुँचा है कि हम विराट् ब्रह्म के-विश्व दर्शन के रूप में उसकी झाँकी कर सकें और श्रद्धा-विश्वास जैसे उत्कृष्ट चिन्तन को भवानी शंकर की उपमा दे सकें।
अग्निहोत्र की व्याख्या यदि जीवन यज्ञ के-सर्वमेध के साथ जोड़ी जाने लगी है तो यह अत्यन्त ही सामयिक परिभाषा का प्रस्तुतीकरण है। क्रिया-काण्ड को यदि भाव परिष्कार का प्रतीक संकेत कहा जाय तो वस्तुतः यह प्राचीन ईश्वर की अविकसित मनःस्थिति का आधुनिक ईश्वर की परिष्कृत चेतना ही कहा जायगा। अब प्रसाद खाकर या प्रशंसा सुनकर प्रसन्न होने वाले ईश्वर का रूप बदल रहा है। प्रतिमाओं का दर्शन करने, नदी, तालाबों में नहाने, मन्त्रों के जपोच्चार से-चित्र-विचित्र कर्मकाण्डों से अब ईश्वर के प्रसन्न होने की बात पर केवल बहुत पिछड़े लोग ही विश्वास करते हैं। विचारशील वर्ग का ईश्वर उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य के साथ एकाकार हो गया है और उसकी पूजा श्रेष्ठ व्यक्तित्व एवं समाज के लिए प्रस्तुत किये गये अनुकरणीय अनुदानों के रूप में ही मानी जानी जा रही है। यह ईश्वर का मनुष्य जाति के साथ-साथ प्रगति पथ पर बढ़ता हुआ साहसिक चरण है।
आदिम ईश्वर सर्वतन्त्र स्वतन्त्र था। जिस पर प्रसन्न हो उसे लाभ देना और जिस पर अप्रसन्न हो उसे हानि पहुँचाना ही उसका काम था। मनुष्यों से वह भेंट, पूजा और स्तवन की आकाँक्षा करता था पुरोहित वर्ग उसका एजेंट था। उन्हें प्रसन्न करना ही प्रकारान्तर से ईश्वर को प्रसन्न करना था। यह स्थिति जब विकसित हुई तो नीति पालन और परोपकार को ईश्वर की प्रसन्नता का आधार समझा गया। अब का ईश्वर एक नियम है। उसने समस्त जड़-चेतन को सुसंबद्ध नियन्त्रण में जकड़ा है- यहाँ तक कि अपने को भी कायदे-कानून के बन्धनों में बाँध लिया है। आधुनिक ईश्वर को पूजा मात्र से नहीं सद्भाव सम्पन्न और सत्कर्म परायण व्यक्तित्व के आधार पर ही प्रभावित किया जा सकता है। कुछ समय पूर्व ईश्वर सर्व-शक्तिमान था और उसे प्रसन्न करने के लिए धर्म विधान था। अब इस द्वैत को अद्वैत के रूप में परिणत किया जा रहा है। ईश्वर की झाँकी स्थूल शरीर में सत्कर्म के रूप में और मन में सद्भावों के रूप में की जाने लगी है। परिष्कृत व्यक्तियों की गणना दैवी अथवा अवतार के रूप में की जाने लगी है। यह शुभ चिन्ह है।
धर्म और ईश्वर जिस क्रम से विकास पथ पर चल रहे हैं उसे देखते हुए अगले दिनों नास्तिक और आस्तिक का झगड़ा दूर हो जायगा। धर्म और विज्ञान के बीच जो विवाद था उसका हल निकल आवेगा। साम्प्रदायिक विद्वेष की भी गुंजाइश न रहेगी। पिछले और पिछड़े संप्रदाय अपने-अपने ईश्वरों के अलग-अलग आदेशों को प्रथक प्रथा-परम्पराओं के रूप में मानते थे और मतभेद रखने वालों को तलवार के घाट उतारते थे। अब वैसी गुँजाइश नहीं रहेगी। सद्भावना एवं सज्जनता की परिभाषाएं यों अभी भी कई तरह की जाती है पर उनमें इतना अधिक मतभेद नहीं है जिनका समन्वय न किया जा सके।
दुनिया अब एक धर्म, एक आचार, एक संस्कृति, एक राष्ट्र, एक भाषा के आधारों को अपनाकर एकता की ओर चल रही है। ऐसी दशा में एक सर्वमान्य ईश्वर और उसका एक सर्वसमर्थित पूजा विधान भी होना ही चाहिए। अब इस दिशा में अधिक आशाजनक स्थिति उत्पन्न होने जा रही है। लगता है धर्म और ईश्वर अब एक हो जायेंगे। पिछले दिनों ईश्वर अलग था-धर्म उसे प्रसन्न करने की प्रक्रिया थी। अब दोनों मिलकर एक हो जायेंगे। धार्मिक ही ईश्वर भक्त माना जायगा और ईश्वर भक्त को धार्मिक बनना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में इसे अद्वैत सिद्धि कह सकते हैं। अनेकता और बहुरूपता के कारण जो मतिभ्रम और विद्वेष उत्पन्न होता है वह जब संसार के विविध क्षेत्रों में से मिटाया जा रहा है तो फिर ईश्वर और धर्म का क्षेत्र भी क्यों अछूता रहेगा। धर्म और कर्म का मर्म समझने वाले ब्रह्मपरायण व्यक्ति ईश्वर को निर्विवाद स्थिति तक पहुँचा कर ही रहेंगे।
उन दिनों तुर्की और ईरान में लड़ाई चल रही थी। तुर्की हारते हुए पीछे लौटे किन्तु ईरान के सूफी सन्त फरीदुद्दीन को अपने साथ पकड़ ले गये और उन्हें मृत्यु दण्ड सुना दिया।
इस समाचार से प्रत्येक ईरानी को बहुत दुख हुआ। जनता पक्ष ने तुर्की के पास समाचार भेजा कि सन्त को छोड़ दें और उनके वजन के बराबर सोना ले लें। तुर्की ने इस प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और सजा बहाल रखी।
ईरान के शाह को भी कम दुख न था। उसने प्रस्ताव भेजा कि तुर्की ईरान का सारा राज्य ले लें और बदले में सन्त को छोड़ दें।
इस प्रस्ताव पर आश्चर्यचकित तुर्कों के सुलतान ने उलट कर ईरान के शाह से पूछा-जिस राज्य को हम लड़कर न जीत सके उसे आप लोग एक आदमी के बदले भला क्यों हारने जा रहे हैं?
इस पर शाह का उत्तर था राज्य नश्वर है किन्तु सन्त अविनाशी हैं। सन्त को खोकर ईरान सदा के लिए कलंकित हो जायगा, किन्तु राज्य खोकर उसे थोड़ी सी ही क्षति उठानी पड़ेगी।
तुर्की के सुलतान की आँखें खुल गईं। उनने समझ लिया कि जिस देश में सन्तों का इतना आदर है उसे कोई सहज ही नहीं जीत सकता। उन्होंने सन्त फरीदुद्दीन को आदर सहित बन्धन मुक्त कर दिया था।
दुःख और सुख को मनुष्य उपार्जित तो स्वयं करता है पर उन्हें अकेला हजम नहीं कर सकता। मिल-बाँटकर खाने से ही वे पचते और हलके होते हैं। अकेले इनका भार वहन कर सकना कठिन है।
एकाकी रोते-कलपते रहने वाला मनुष्य श्मशान में रहने वाले प्रेत-पिशाच की तरह उद्विग्न रहता है। जिसके आँसू पोंछने वाला कोई नहीं-जिसे सहानुभूति और आश्वासन के शब्द सुनने को नहीं मिलते वह अपनी घुटन में आप घुटता है और अपनी जलन में आप जलता है। यह एकाकीपन उस दुख से भी भारी पड़ता है जिसने कसक और कराह की स्थिति उत्पन्न की। दुख कष्टकर अवश्य होते हैं पर वे तब मधुर भी लगते हैं जब इस बहाने मित्रों की सहानुभूति और संवेदना उस दुखिया पर बरसती है।
आपत्ति के समय आशा-बंधाने वाले और यथासम्भव सहायता से यत्किंचित् भार हलका करने के लिए प्रयत्नशील मित्र दैवी वरदान की तरह लगते हैं। डूबते को तिनके का सहारा भी बहुत होता है। संकट की अंधेरी निशा में छोटे से दीपक की हलकी सी किरण भी अनिश्चित भटकाव को दूर कर सकती है और उबरने की राह तक पहुँचा सकती है। विपदा का सबसे बड़ा आघात, आक्रमण यह होता है कि वह हिम्मत तोड़ती और निराश बनाती है। मनुष्य दिशा भूल जाता है और उबरने की चेष्टा छोड़ बैठता है। यदि कोई इन आघात के घावों पर मरहम लगा सके तो संत्रस्त मनुष्य आगे बढ़कर विपत्ति से लड़ सकता है और क्षति पूर्ति का आधार ढूंढ़ सकता है। यों मनस्वी अपने आप भी अपने को लड़खड़ा कर गिरने से अपनी हिम्मत के बलबूते भी बचाये रह सकते हैं। किन्तु यदि कोई सच्ची सहानुभूति प्रकट करने वाला-आशा और विश्वास दिलाने वाला मित्र मिल जाय तो दुख का बोझ अनायास ही आधा रह जाता है।
हमें ऐसे विश्वासी चरित्रनिष्ठ और परिष्कृत दृष्टिकोण के मित्र तलाश करने चाहिए जो स्वयं गिरने से बचे रह सकें हों ओर दूसरों की गिरी स्थिति से उबारने की सामर्थ्य संग्रह कर सके हों। इस प्रकार के साथी केवल उन्हें ही मिलते हैं जिनने स्वयं आगे बढ़ कर समय-समय पर दूसरों के दुख बंटाये हैं जो कष्टों को बंटाने वाली करुणा से सम्पन्न हैं उनके कष्टों को बंटाने वाले सहज ही उत्पन्न होते हैं और विपत्ति का बोझ हलका करने में कन्धा लगाते हैं।
हम सभी में एक ही आत्मा समाई हुई है। एक धागे में पिरोये हुए मनकों की माला की तरह ही हम सब परस्पर जुड़े और गुँथे हुए हैं। सुख को अकेले हजम करने का प्रयत्न करने वाला अन्तरात्मा की धिक्कार का-परमात्मा के कोप का और विश्वात्मा के प्रतिशोध का भोजन बनाता है। निष्ठुरता, कृपणता और संकीर्ण स्वार्थपरता को सरकारी कानून भले ही दण्डनीय न मानता हो पर ईश्वर के कानून ऐसे व्यक्ति को पतित ही घोषित करते रहेंगे, जिसने आप ही कमाया और आप ही खाया। मिल बाँटकर खाने की नीति जिसे सुहाती नहीं-उदारता के लिए जिनकी भावना उमंगती नहीं-उसे नर-पशु से अधिक और कुछ नहीं कहा जा सकता ऐसे लोग उस आनन्द से सर्वथा वंचित रहते हैं जो मानव-जीवन का उद्देश्य समझने वाले और उदार आचरण करने वालों को सहज ही मिलता रहता है।
कपास बेच कर पैसा जमा कर लेने में बुराई कुछ नहीं- वरन् सुविधा ही रहती है। सुख को बेचकर बदले में लोक-सम्मान और आत्म-सन्तोष से अनेकों ऐसे सद्गुणों का विकास होता है जो व्यक्तित्व में प्रखर प्रतिमा उत्पन्न करते हैं। लोक-सम्मान पाकर मनुष्य जितना गौरवान्वित होता है उतना लालची के लिए कल्पना कर सकना भी सम्भव नहीं। सुख को बाँटकर खाना घाटे का काम दीखते हुए भी वस्तुतः अतिशय लाभदायक ही सिद्ध होता है।
प्राणी यो प्रकृति की विपरीत चपेट में आकर अवसर अस्तित्व गंवा बैठता है। नियति के उग्र परिवर्तनों का सामना कर पाता और विपरीत परिस्थिति के सामने अपने को निरीह असमर्थ अनुभव करता है, पर ऐसा तभी होता है जब वह उस आपत्ति का सामना करने के लिए पहले से ही तैयार न हो।
यदि प्राणी को विपरीत अनभ्यस्त परिस्थिति में रहने की विवश होना पड़े तो वह अपने अस्तित्व की रक्षा करने के लिए क्रमशः ऐसे परिवर्तन उत्पन्न कर लेता है- ऐसी विशेषता को उत्पादन कर लेता है जिसके आधार पर वह प्राणघातक समझी जाने वाली परिस्थितियों से भी तालमेल बिठा ले और अपना अस्तित्व कायम रख सके, सुविधा पूर्वक निर्वाह कर सके।
जीवाणुओं की असह्य तापमान पर मृत्यु हो जाती है। वे अधिक उष्णता एवं शीतलता सहन नहीं कर सकते, यह मान्यता अब पुरानी पड़ चली है। पानी खोलने से अधिक गर्मी ओर 270 आ॰ से॰ नीचे शीत पर जीवाणुओं की मृत्यु हो जाने की बात ही अब तक समझी जाती रही है। इसका कारण यह था कि शरीर में पाया जाने वाला ग्लिसरोद रसायन असह्य तापमान पर नष्ट हो जाता है और जीवाणु दम तोड़ देने हैं। अब वे उपाय ढूंढ़ निकाले गये हैं कि इस रसायन को ताप की न्यूनाधिकता होने पर भी बचाया जा सके और जीवन की अक्षुण्ण रखा जा सके।
अत्यधिक और असह्य शीतल जल में भी कई प्रचार के जीवित प्राणी निर्वाह करते पाये गये हैं इनमें से प्रोटोजोआ, निमैटोड, क्रस्टेशिया, मोलस्का आदि प्रमुख हैं।
येलोस्टोन की प्रयोगशाला में लुइवाक और टामन नामक दो सूक्ष्म जीव-विज्ञानी-माइक्रो बायोलॉजिस्ट यह पता लगाने में निरत हैं कि जीव सत्ता के कितने न्यून और कितने अधिक तापमान पर सुरक्षित रह सकने की सम्भावना है। वे यह सोचते हैं कि जब पृथ्वी अत्यधिक उष्ण थी तब भी उस पर जीवन सत्ता मौजूद थी। क्रमशः ठण्डक बढ़ते जाने से उस सत्ता ने क्रमिक विकास विस्तार किया है, पर इससे क्या-अति प्राचीन काल में जब जीवन सत्ता थी ही तो वह विकसित अथवा अविकसित स्थिति में अपनी हलचलें चला ही रही होगी भले ही वह अब की स्थिति की तुलना में भिन्न प्रकार की अथवा पिछड़े स्तर की ही क्यों न रही हो। विकसित प्राणी के लिए जो तापमान असह्य है वह अविकसित समझी जाने वाली स्थिति में काम चलाऊ भी हो सकता है।
यदि यही तथ्य हो तो फिर जीवन की मूल मात्रा को शीत, ताप के बन्धनों से युक्त माना जा सकता है और गीताकार के शब्दों में यह कहा जा सकता है कि आत्मा को न आग जला सकती है, न पवन सुखा सकता है न जल डुबा सकता है। पंचभूतों की प्रत्येक चुनौती का सामना करते हुए वह अपना अस्तित्व सुरक्षित रख सकने में पूर्णतया समर्थ है।
समुद्र तट के सभी पर्वतीय क्षेत्रों में पाई जाने वाली धूसर रंग की मक्खी ‘एफिड्रिल’ की 45 डिग्री से 51 डिग्री से0 के बीच तापमान वाले गर्म जल में प्रवेश करते देखा गया है। यह प्राणियों के जीवित रहने के असम्भव बनाने वाली गर्मी है। सामान्यतया धरती की सतह पर 12 डिग्री से0 तापमान रहता है। प्राणियों को उतना ही सहन करने का आभास होता है। अधिक उष्ण या अधिक स्थिति के अभ्यास ही कह सकते हैं।
एफिड्रिल मक्खी के अतिरिक्त कुछ जाति के बैक्टीरिया भी ऐसे पाये गये हैं जो खौलते पानी के 92 डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान में भी मजे से जीवित रहते हैं। अमेरिका के येलोस्टोन नेशनल पार्क में स्थित गर्म जल के झरने प्रायः इसी तापमान के हैं और उनमें जीवित बैक्टीरिया पाये गये हैं। इन गर्म झरनों अथवा कुण्डों में से एक प्रकार की काई की मोटी परत जमी रहती है जिसे हिन्दी में शैवाल कहा जाता है। अंग्रेजी में उसका नाम एल्गी है। इसमें जीवन रहता है। आमतौर से वह 750 से0 तक गर्म जल में मजे का निर्वाह करती है बैक्टीरिया उसी के सहारे पलते हैं। एफिड्रिड मक्खी का प्रमुख भोजन यह एल्गी ही है। उसे प्राप्त करने के लिए वह उस असह्य तापमान के जल में डुबकी लगाती है और बिना जले झुलसे अपना आहार उपलब्ध करती है।
यह तो हुई छोटे जीवों की बात अब अधिक कोमल समझे जाने वाले मनुष्यों की बात आती है वह भी प्रकृति की असह्य कही जाने वाली स्थिति में निर्वाह करने के लिए अपने को ढाल सकता है। उत्तरी ध्रुव प्रदेश में रहने वाले एस्किमो लोग अत्यधिक शीत भरे तापमान में रहते हैं। भालू, हिरन और कुत्ते भी उस क्षेत्र में निवास करते हैं। वनस्पतियाँ और वृक्ष न होने पर पेट भरने के लिए माँस प्राप्त कर लेते हैं इसके लिए उनने बर्फ की मोटी परतें तोड़ कर नीचे बहने वाले समुद्र में से मछली पकड़ने की अद्भुत कला सीखली है आयुध साधन रहित होते हुए भी हिरन, भालू और कुत्तों का भी वे शिकार करना सीख गये हैं और लाखों वर्ष से उस क्षेत्र में निर्वाह कर रहे हैं।
दूसरे जीवों की तुलना में मनुष्य को अनेक अनुदान ऐसे उपलब्ध हैं जिन्हें असाधारण ही कह सकते हैं। बुद्धि की विशेषता, इच्छा शक्ति, भाव सम्वेदना लक्ष्य निर्धारण, स्मृति जैसी मस्तिष्कीय विशेषताएं ऐसी हैं जो अन्य प्राणियों को बहुत ही स्वल्प मात्रा में मिली हैं। उसके देखने तथा सुनने की शक्ति अत्यधिक संवेदनशील है। घ्राण शक्ति तो अन्य प्राणियों में अधिक है पर वे मनुष्य जैसी उच्चस्तरीय दृष्टि एवं श्रवण शक्ति का वरदान नहीं ही पा सके हैं। मनुष्य की मस्तिष्कीय संरचना की अन्य किसी प्राणी से तुलना नहीं की जा सकती। उसकी बनावट अपने आप में विलक्षण है।
अन्य प्राणी प्रकृति के आक्रमण को एक सीमा तक ही सहन कर सकते हैं और अधिक दबाव पड़ने पर दम तोड़ देते हैं पर मानवी काया का निर्माण इतना लोचदार है कि वह विपन्न परिस्थितियों में भी निर्वाह कर सकता है और अपने आपको इस प्रकार ढाल सकता है, जिससे प्रकृति का दबाव उसे चुनौती न दे सके।
‘न्यूरोफिजियोलाजिकल वेसिस आफ साइन्स’ ग्रंथ में उदाहरणों और प्रमाणों में यह बताया गया है कि मनुष्य का सामान्य निर्वाह 150 में होता है पर वह 10 हजार फुट से अधिक ऊँचाई पर जहाँ टेंपरेचर- 150 सेन्टीग्रेड होता है तथा आक्सीजन की कमी से असुविधा पड़ती है वहाँ भी कुछ ही दिनों के अभ्यास से सरलता पूर्वक निर्वाह करने लगता है। यहाँ तक कि 20 हजार फुट पर जहाँ 250 सेन्टीग्रेड तापमान रहता है वहाँ भी जिन्दा रह सकता है और 25 हजार से अधिक ऊंचाई पर जहाँ 45 डिग्री सेन्टीग्रेड शीत होता है, सामान्य बुद्धि के हिसाब से मनुष्य का जीवित रह सकना सम्भव नहीं, पर उसकी लोच ऐसी है जो वहाँ भी जिन्दा बनाये रह सकती है।
हिमालय पर रहने वाले हिम-मानव की जीवनचर्या भी कम रहस्यमय नहीं है। यह प्राणी मनुष्य जैसी आकृति प्रकृति का है उसे रीछ और मनुष्य का सम्मिश्रण कह सकते हैं। अत्यन्त शीत भरे हिमाच्छादित प्रदेश में उतनी ऊँचाई पर वह रहता है जहाँ साँस लेने के लिए आक्सीजन के सिलेण्डर पीठ पर बाँधकर पर्वतारोही जाया करते हैं और खुली हवा में साँस लेना मृत्यु को निमन्त्रण देना मानते हैं। लम्बे समय से वह एकाकी जीवन जीता चला आ रहा है। युगीय सभ्यता से दूर रहते हुए भी उसने अपने रहस्यमय जीवन-क्रम को किसी प्रकार अक्षुण्ण बनाये ही रखा है।
हिमालय के उत्तुँग शिखरों पर रहने वाला हिममानव अपने अस्तित्व के समय-समय पर अगणित परिचय देता रहा है। पर अभी तक उसे पकड़ने के प्रयास सफल नहीं हो सके। इस अद्भुत प्राणी के सम्बन्ध में अधिक जानने के लिए उसे निकट से देखना, समझना आवश्यक है। यह तभी हो सकता है जब वह पकड़ में आवे। किन्तु अति बुद्धिमान समझे जाने वाले मनुष्य को भी यह हिममानव अभी तक चकमा ही देता आया है उसके पकड़ने के प्रयत्नों को निष्फल ही बनाता है। इतने पर भी हिममानव का अस्तित्व प्रायः असंदिग्ध ही समझा जाता है।
सन् 1970 की 25 मार्च को अन्नपूर्णा शिखर पर चढ़ाई करने और उस क्षेत्र की सबसे ऊँची चोटी पर विजय पताका फहराने के उद्देश्य से ब्रिटिश पर्वतारोहियों का एक दल अपनी दुस्साहस भरी यात्रा कर रहा था। दल के लोग कैंप में विश्राम कर रहे थे। चन्द्रमा की चाँदनी सारे हिमाच्छादित प्रदेश को आलोकित कर रही थी। अभी वे लोग सोने भी न पाये थे कि हाथी जैसी भयानक आकृति अपनी लम्बी परछाई सहित उधर घूमती हुई दिखाई दी। खतरे की आशंका से वे लोग बाहर निकल आये और रायफलें तान लीं। गौर से देखने पर पाया गया कि यह प्राणी ठीक वैसा ही है जैसा कि हिममानव का वर्णन करते हुए समय-समय पर कहा या सुना जाता रहा है। आधा घण्टे तक उसकी हरकतें दल ने शान्तिपूर्वक देखी। उनका उद्देश्य मारना नहीं जानना था। सो उन्होंने आँखें भर कर देखा। थोड़ी देर में वह उछल-कूद करता हुआ पर्वत श्रृंखलाओं की ओट में गायब हो गया।
रात को पहरा देने की पद्धति अपनाकर बारी-बारी से दल के लोग सोये तो सही पर आक्रमण का आतंक रात भर छाया रहा। प्रातःकाल वे लोग तलाश करने गये कि कुछ वास्तविकता भी थी या कोई भ्रम ही था। उन लोगों ने मनुष्य जैसे किन्तु बहुत बड़े साइज के पद चिन्ह देखे जिनके उन लोगों ने फोटो लिये। वे फोटो तत्कालीन कई प्रमुख पत्रों में उस देखे हुए विवरण के साथ प्रकाशित भी हुए।
इससे पूर्व सन् 1958 में एक अमेरिकी पर्वतारोही दल विशेषतया हिममानव को जीवित अथवा मृतक किसी भी स्थिति में पकड़ने का उद्देश्य लेकर ही आया था। इस दल के एक सदस्य प्रो0 टेम्बा अपने साथ कुछ शेरपा लेकर एक क्षेत्र खोज रहे थे। उनने आश्चर्य के साथ एक झरने के किनारे बैठे देखा वह पानी में से मेंढक और मछलियाँ बीन-बीन कर बिना चबाये निगल रहा था। प्रो0 टेम्बा ने उस रात में प्लेश लाइट जलाई तो क्रुद्ध हिममानव उनकी ओर दौड़ा। शेरपा समेत वे बड़ी कठिनाई से अपनी जान बचाकर वापिस लौटने में सफल हुए।
सन् 1958 में इटली के प्रख्यात पत्रकार माडविन हिममानव की खोज में अपने दल समेत हिमाच्छादित चोटियों पर घूमे। एक जगह उनकी मुठभेड़ हो ही गई। रायफल का घोड़ा दबाने की अपेक्षा उनने कैमरे का बटन दबाना अधिक उपयुक्त समझा। कुछ ही मिनट सामने रहकर वह विशालकाय प्राणी भाग खड़ा हुआ। उसे पकड़ा या मार तो न जा सका पर फोटो बहुत साफ आये। उसके पैरों के निशानों के भी फोटो उनने लिये और अपने देश जाकर उन चित्रों को छापते हुए हिममानव के अस्तित्व की सृष्टि की।
तिब्बत और चीन की सीमा पर किसी प्रयोजन के लिए गये एक चीनी कप्तान ने भी हिममानव से सामना होने का विवरण अपने फौजी कार्यालय में नोट कराया था।
स्विट्जरलैंड का एक पर्वतारोही दल एवरेस्ट पर चढ़ाई करने के लिए आया था। उनके साथ पन्द्रह पहाड़ी कुली थे। दल का एक कुली थोड़ा पीछे रह गया। उस पर हिममानव ने आक्रमण कर दिया। चीख-पुकार सुन कर अन्य कुली उसे बचाने दौड़े और घायल स्थिति में उसे बचाया।
सन् 1887 में कर्नल बेडैल के नेतृत्व में एक ब्रिटिश पर्वतारोही दल भारत आया था उसने सिक्किम क्षेत्र में यात्रा की थी। 16 हजार फुट ऊँचाई पर उनने बर्फीली चोटियों पर पाये गये हिममानव के ताजे पद चिन्हों के फोटो उतारे थे।
वनस्पति विज्ञानी प्रो0 हेनरी ल्यूस जिन दिनों वनस्पति शोध के संदर्भ में हिमाच्छादित प्रदेशों में भ्रमण कर रहे थे तब उन्होंने मनुष्याकृति के विशालकाय प्राणी को आँखों से देखा था। वह तेजी से एक ओर से आया और दूसरी ओर के पहाड़ी गड्ढों में कहीं गायब हो गया। ठीक इसी से मिलते-जुलते साथी सन् 1921 में एवरेस्ट चढ़ाई पर निकले कर्नल हावर्ड व्यूरी की है उनके सामने से भी वैसा ही वन-मानुष से मिलता-जुलता प्राणी निकला था। उस क्षेत्र में आने-जाने वाले बताते थे कि वह अकेले दुकेले आदमियों और जानवरों की अवसर मार कर खा जाता है।
भारतीय हिम-यात्री ए॰ एन॰ तोम्बाती ने सिक्किम क्षेत्र में हिममानव देखने का विवरण बताया था। स्विट्जरलैंड के डायरन फर्थ ने भी सन् 1925 में उसे आँखों देखा था। नार्वे के दो वैज्ञानिक थोरवर्ग और फसिस्ट किसी अनुसन्धान के सम्बन्ध में सिक्किम क्षेत्र में गये थे। उन पर हिममानव ने हमला कर दिया और कन्धे नोंच डाले। गोलियों से उसका मुकाबला करने पर ही वे लोग बच सके। गोली उसे लगी नहीं किन्तु डर कर वह भाग तो गया ही। सन् 1951 में एक ब्रिटिश यात्री एरिक शिपटन ने भी हिममानव के पैरों के निशानों के बर्फीले क्षेत्र से फोटो खींचे थे। ऐसे ही फोटो प्राप्त करने वालों में डा0 एडमंड हिलेरी का भी नाम है। सन् 1954 में कंचन जंघा चोटियों पर सन् जानहन्ट के दल ने 20 हजार फुट ऊँचाई पर हिममानव के पद चिन्हों के प्रमाण एकत्रित किये थे। वे निशान प्रायः 18 इंच लम्बे थे। न्यूजीलैंड के पर्वतारोही जार्जलोंव ने उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर हिममानव के अस्तित्व को असंदिग्ध बताया था।
सन् 1955 में इंग्लैण्ड के दैनिक पत्र ‘डेलीमेल’ ने अपना एक खोजी दल मात्र हिममानव सम्बन्धी अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए भेजा था। दल ने बहुत समय तक हिमाच्छादित प्रदेशों में दौरे किये इस बीच उन्होंने हिममानव देखा या पकड़ा तो नहीं पर ऐसे अनेक प्रमाण अवशेष एवं चित्र संग्रह करके उस पत्र में छपाये जिनसे हिममानव सम्बन्धी जन श्रुतियाँ सारगर्भित सिद्ध होती हैं।
असह्य माने जाने वाले व्यक्ति शीत और ताप से प्राणियों का विशेषतया मनुष्य जैसे कोमल प्रकृति जीवधारी का निर्वाह होते रहने के उपरोक्त प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि प्रतिकूलताएं कितनी ही बड़ी क्यों न हों जीव उन सबसे लड़ सकने में समर्थ हैं। उसका संकल्प बल ऐसी परिस्थितियाँ पैदा कर सकता है जिसमें असह्य को सह्य और असम्भव को सम्भव बनाया जा सके। न केवल प्रकृति से जूझने में वरन् पग-पग पर आती रहने वाली कठिनाइयों को निरस्त करने में भी संकल्प बल की प्रखरता का तथ्य सदा ही सामने आता रहता है।
न्यूयार्क की वेस्टिंग हाउस प्रयोगशाला में कुछ समय पूर्व ऐसा परीक्षण किया गया, जिससे लगातार और क्रमबद्ध रूप से किये जाने वाले काम की प्रचण्ड शक्ति का पता चलता है। प्रयोगशाला में आधा टन भारी 8 फुट लम्बा लोहे का गार्डर बीचों बीच एक जंजीर में बाँध कर छत में लटकाया गया, उसमें पास ही आधा ओंस भारी बोतलें बन्द करने के काम आने वाला कार्क एक धागे में बाँध कर लटकाया गया, साथ ही यह व्यवस्था बनाई गई कि कार्क एक नियत क्रम से लोहे के गार्डर से टकराता रहे। मोटेतौर से यही समझा जा सकता है कि इतनी भारी चीज पर इतनी अधिक हलकी वस्तु के टकराव का भला क्या असर हो सकता है? किन्तु परिणाम भिन्न प्रकार का दृष्टिगोचर हुआ। 15 मिनट बाद ही गार्डर में कंपकंपी उठती पाई गई और एक घण्टे बाद वह घड़ा के पेण्डुलम की तरह अपने आप आगे-पीछे हिलने लगा।
लगातार-नियमित रूप से-मनोयोग पूर्वक और व्यवस्थित रूप से काम करने का कितना चमत्कारी परिणाम होता है इसका थोड़ा सा आभास हम भारी गार्डर पर हलके से कार्क के आघात की प्रतिक्रिया को देखकर भी सहज अनुमान लगा सकते हैं।
सरल और सहज की चाह तो हर किसी को रहती है, पर उसकी पूर्ति होना शक्य नहीं। प्रकृति चाहती है कि हर प्राणी को -संघर्ष की पाठशाला में पढ़कर शौर्य साहस की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिले। सरल जीवन में सुविधा तो है, पर हानि यह है कि प्राणी की प्रखरता नष्ट हो जाती है उसकी प्रतिभा अविकसित रह जाती है। प्रतिकूलता से जूझे बिना जीवन के शस्त्र पर धार नहीं धरी जा सकती, चमक और पैनापन लाने के लिए उसे पत्थर पर घिसा ही जाता है। मनुष्य समर्थ, सबल और प्रखर बना रहे इसके लिए संघर्षरत रखने की सारी व्यवस्था प्रकृति ने कर रखी है। इसी व्यवस्था क्रम में एक भयंकर लगने वाली रोग कीटाणु संरचना भी है जो जीवन को मृत्यु में बदलने के लिए निरन्तर चुनौती देती रहती है।
आँखों से न दीख पड़ने वाले अत्यन्त सूक्ष्म रोग कीटाणु हवा में घूमते रहते हैं- प्रयोग में आने वाली वस्तुओं के सहारे रेंगते रहते हैं और अवसर पाते ही हमारे शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। उनकी वंश वृद्धि आश्चर्यजनक गति से होती है। उनकी विषाक्त एवं मारक शक्ति भी अद्भुत होती है। शरीर में साँस, जल या दूसरे किन्हीं आधारों पर वे प्रवेश कर जाते हैं और वहाँ पहुँच कर अपनी गतिविधियों से भयानक रोगों का सृजन करते हैं। उनके प्रतिरोध की प्रकृति ने व्यवस्था की है। रक्त में पाये जाने वाले श्वेत कीटाणु इन शत्रुओं से जूझते हैं। शरीर की गर्मी तथा विभिन्न स्थानों से निकलने वाले स्राव उन्हें मारते हैं। इस युद्ध में बहुधा मनुष्य की जीवनी शक्ति ही विजयी होती है तभी तो स्वास्थ्य रक्षा सम्भव होती है अन्यथा इन विषाणुओं के द्वारा होते रहने वाले अनवरत आक्रमण से शरीर का एक दिन भी जीवित रह सकना सम्भव न हो सके।
इन रोग कीटाणुओं की असंख्य जातियाँ हैं और उनके क्रिया-कलाप भी अद्भुत हैं। वर्तमान रोग परीक्षा पद्धति में यह पता लगाने का सर्वप्रथम प्रयत्न किया है कि रोगी के शरीर में किन रोग कीटाणुओं का आधिपत्य है। मल-मूत्र, कफ, रक्त आदि की परख करके इसकी जानकारी प्राप्त की जाती है तद्नुरूप उन्हें मारने की विशेषताओं वाली औषधियों का प्रयोग किया जाता है। विषाणुओं की अनेक जातियों के अनुरूप ही उनकी मारक औषधियाँ ढूँढ़ी गई हैं। इन्हें एंटी बायोटिक्स कहते हैं। इन दिनों इन औषधियों का निर्माण और उपयोग खूब हो रहा है। रोग निवारण का इन दिनों यह प्रमुख आधार है।
पेन्सिलीन- स्ट्रेप्टोमायसिन वर्ग की रोग कीट नाशक एंटी बायोटिक्स औषधियों में अब एक और चमत्कारी चरण जुड़ गया है वह है लैडरली लैबोरेटरी द्वारा प्रस्तुत किया गया रसायन डी. एम-सी.टी.। इसका पूरा नाम है- डिमिथाइल क्लोर टैटरासाइक्लिन, इन दवाओं की चमत्कारी औषधियों को ‘वन्डर ड्रग्स’ कहा जाता है। इनका मूल उद्देश्य है शरीर में उत्पन्न हुए या प्रविष्ट हुए रोग कीटाणुओं को निरस्त करना। विकृत बैक्टीरियों-वायरसों के उपद्रव ही विभिन्न रोगों के प्रधान कारण माने जाते हैं। यह मारक औषधियाँ इन कीटकों पर आक्रमण करती हैं- इन्हें मूर्छित करतीं और मारती हैं फलतः रोगों के जो कष्टकारक उपद्रव लक्षण थे वे शमन होते दिखाई देते हैं।
इन मारक रसायनों के प्रयोग का उत्साह इसलिए ठंडा हो जाता है कि वे विषाणुओं के मारने के साथ रक्षाणुओं को भी नहीं बख्शती। उनकी दुधारी तलवार बिना अपने पराये का, मित्र-शत्रु का भेद-भाव किये जो भी उनकी पकड़ परिधि में आता है उन सभी का संहार करती हैं। पेन्सिलीन के चमत्कारी लाभों की आरम्भ में बहुत चर्चा थी, पर जब देखा गया कि उसके प्रयोग से दानेदार खुजली जैसे कितने ही नये रोग उत्पन्न होते हैं और किसी-किसी को तो उसकी प्रतिक्रिया प्राणघातक संकट ही उत्पन्न कर देती है। तब वह उत्साह ठण्डा पड़ा। अब कुशल डाक्टर पेन्सिलीन का प्रयोग आँखें मूँदकर नहीं करते। उसके लिए उन्हें फूँक-फूँककर कदम धरना होता है। कुनैन से मलेरिया के कीटाणु तो मरते थे, पर कानों का बहरापन-नकसीर फूटना जैसे नये रोग गले बंध जाते हैं। इस असमंजस ने उसके प्रयोग का आरम्भिक उत्साह अब शिथिल कर दिया है। कुनैन का अन्धाधुन्ध प्रयोग अब नहीं किया जाता।
लन्दन के बारथोलोम्यूज का अस्पताल में विभिन्न स्तर की एण्टी बायोटिक औषधियों का प्रयोग परीक्षण 275 प्रकार के बैक्टीरियाओं से ग्रसित मरीजों पर उलट-पुलट कर किया गया। इन परीक्षाओं में नव-निर्मित डी. एम. सी. टी. इस दृष्टि से अधिक प्रशंसनीय मानी गई कि उसने विषाणुओं का जितना संहार किया उतनी चोट रक्षाणुओं को नहीं पहुँचाई। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वह पूर्णतया हानि-रहित है। इससे केवल रोग ही नष्ट होते हैं जीवनी शक्ति को क्षति नहीं पहुँचती ऐसा दावा करना किसी के लिए भी सम्भव नहीं हो सका है।
हल्की खाँसी, तीसरे पहर बुखार की हरारत, भूख की कमी, वजन का घटना, रात्रि के अन्तिम पहर में पसीना आना जैसे सामान्य लक्षणों से क्षय रोग की सम्भावना का पता लगाया जा सकता है। इन चिन्हों के आधार पर क्षय का आक्रमण हो चला है।
वस्तुस्थिति का पता तो छाती का स्क्रीनिंग अथवा एक्सरे एवं रक्त थूक आदि का परीक्षण करने पर ही चलता है इसके लिए माँस मिनिएचर रेडियोग्राफी (एम.एम.आर.) की सरल परीक्षा पद्धति भी सामने आई है।
आमतौर से क्षय उपचार में लगातार दो-तीन महीने ‘स्टेप्टो माइसिन’ के इन्जेक्शन लगाये जाते हैं एवं आइसोनेक्स-पी.ए.एस. जैसी दवाओं का स्थिति के अनुरूप सेवन कराया जाता है।
बचाव उपचार में बी. सी. जी. (वेसीलस काल्मेटेग्वेरिन) के टीके लगाये जाते हैं। यह नामकरण उसके आविष्कर्त्ताओं के नाम पर ही किया गया है। 40 सुइयों की खरोंच वाला यह टीका आरम्भ में बहुत उत्साहवर्धक समझा गया था, पर अब उसकी प्रतिक्रिया संदिग्ध आशंका के रूप में सामने आ रही है। अब क्षय से सुरक्षा प्राप्त करने का यह टीका अमोघ उपचार नहीं राह वरन् उसके दुष्परिणाम पीछे किसी अन्य व्यथा को साथ लायेंगे ऐसा माना जाने लगा है।
आवश्यक नहीं कि आक्रमण बाहर से ही हों अपनी आन्तरिक दुर्बलता भी ग्रह युद्ध खड़ा कर देती है। ‘घर का भेदी लंका ढाये’ वाली कहावत भी बहुत बार सामने आती है। अवाँछनीय व्यवहार से रुष्ट होकर अपने उपयोगी तत्व विद्रोही बनकर आक्रमणकारी शत्रु का रूप धारण कर लेते हैं और उस अन्तः विस्फोट का स्वरूप भी विप्लवी गृह युद्ध जैसा बन जाता है। इस प्रकार उत्पन्न हुए रोगों और विषाणुओं की संख्या भी कम नहीं होती।
जब कारण वश शरीर के कुछेक जीवकोष विद्रोही हो जाते हैं तो सामान्य रीति-नीति की मान-मर्यादा तोड़कर उद्धत उच्छृंखल गतिविधि अपनाकर मनमर्जी की चाल चलते हैं। यह उद्धत विद्रोही ही केन्सर का मूल कारण हैं।
आमतौर से जीवकोष अपनी भूख तथा आवश्यकता तरल रक्त से प्राप्त करते रहते हैं किन्तु जब उनमें से कुछ असन्तुष्ट अपने मनमर्जी का वैभव चाहते हैं तो समीपवर्ती जीवकोषों पर टूट पड़ते और उन्हें लूट-खसोटकर अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ाते हैं इतना ही नहीं वे अपने लिए निर्धारित क्षेत्र और कार्य की मर्यादाओं को तोड़कर रक्त प्रवाह में तैरते हुए किसी भी अंग में जा घुसते हैं और वहाँ भी कत्लेआम का दृश्य उपस्थित करते हैं। जहाँ भी उन्हें पैर टिकाने की जगह मिली वहीं के अधिकारी बनकर बैठ जाते हैं। यही है केन्सर की मूल प्रकृति।
केन्सर को उत्पन्न करने वाले उपकरण ‘कारसिनोज’ कहे जाते हैं। कोलतार, रेडियम, मादक द्रव्य इसी वर्ग में आते हैं। इनका गहरा प्रभाव शरीर पर पड़ेगा तो केन्सर की आशंका बढ़ेगी। अधिक आग तापने अथवा किसी अंग विशेष का अनावश्यक अतिघर्षण होते रहने से भी यह विपत्ति सामने आ खड़ी होती है। रतिक्रिया की सीमा एवं कोमलता का व्यतिक्रम होने से स्त्रियों की जननेन्द्रिय केन्सरग्रस्त हो जाती हैं।
एक ओर विषाणुओं की विभीषिका सामने खड़ी है और रुग्णता से लेकर भरण तक के साज संजो रही है वहाँ दूसरी ओर जीवन रक्षा की सेना भी कमर कसकर सामने खड़ी है । हमारे शरीर में ही एक विशालकाय महाभारत रचा हुआ है। कौरवों की कितनी ही अक्षौहिणी सेना जहाँ अपने दर्प से दहाड़ रही है वहाँ पाण्डवों की छोटी टुकड़ी भी आत्म-रक्षा के लिए प्राण हथेली पर रखकर युद्ध क्षेत्र में डटी हुई है। रक्ताणु हमारी जीवन रक्षा के अदम्य प्रहरी हैं वे विषाणुओं को परास्त करके जीवन सम्पदा को बचाने के लिए कट-कट कर लड़ते हैं अपने प्राण देकर के भी शत्रु का अपनी भूमि पर अधिकार न होने देने का प्रयत्न करते हैं। हमारे अन्तःक्षेत्र में, धर्मक्षेत्र में, कर्मक्षेत्र में चलती रहने वाली यह महाभारत जैसी पुण्य प्रक्रिया देखने समझने ही योग्य है।
रक्त को नंगी आँखों से देखें तो वह लाल रंग का गाढ़ा प्रवाही मात्र दिखाई देता है, पर अणुवीक्षण यन्त्र से देखने पर उसमें असंख्य रक्ताणु दिखाई देते हैं। इनकी आकृति-प्रकृति की अब अनेकों जातियाँ जानी परखी जा चुकी हैं। यह रक्ताणु भी कोशिकाओं की तरह ही जन्मते-मरते हैं। प्रायः उनकी आयु तीन महीने होती है। उनकी बनावट स्पंज सरीखी समझी जा सकती है जिसके रन्ध्रों में ‘होमोग्लोबिन’ नामक रसायन भरा होता है। यह रक्ताणु रक्त के साथ निरन्तर समस्त शरीर में भ्रमण करते रहते हैं और अपने तीन मास के स्वल्प जीवन काल में प्रायः तीन सौ मील का सफर कर लेते हैं।
होमोग्लोबिन कभी रक्त का प्रमुख रसायन माना जाता था। अब उसे चार श्रृंखलाओं में जुड़ा हुआ प्रायः 600 अमीनो अम्लों का समूह पाया गया है। नोबेल पुरस्कार विजेता लाइनस सी0 पलिंग ने अपने दो साथियों के साथ इन रक्ताणुओं की शोध में अभिनव जानकारियों की कितनी ही कड़ियाँ जोड़ी हैं।
कितने ही रोग इन रक्ताणुओं के साथ जुड़े होते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं। कुछ विशेष कबीलों में कुछ विशेष प्रकार के रक्ताणु पाये जाते हैं तद्नुसार उनकी शारीरिक स्थिति में अमुक रोग का प्रतिरोध करने की-अमुक रोग से आक्रान्त होने की विशेष स्थिति देखी गई है। शारीरिक ही नहीं मानसिक क्षेत्र में भी यह रक्त विशेषता जमी रहती है। कुछ परिवारों के लोग बहुत भोले और डरपोक पाये जाते हैं जबकि किन्हीं वर्गों में आवेश, उत्तेजना और लड़ाकू प्रवृत्ति का बाहुल्य रहता है। राजपूतों की लड़ाकू प्रवृत्ति और जुलाहों का डरपोकपन प्रसिद्ध है। सम्भवतः ऐसी विशेषताएं रक्ताणु की परम्परागत स्थिति के कारण उत्पन्न होती है।
पिछले पन्द्रह वर्षों में तीस से अधिक प्रकार के असामान्य होमोग्लोबिन वर्गों का पता लगाया जा चुका है। कैंब्रिज विश्व-विद्यालय के प्रो0 बर्नाव एम. इंग्राम ने इनके वर्गीकरण तथा क्रिया-कलापों की गहरी शोध करके यह पाया है कि शरीर एवं मन के रुग्ण एवं स्वस्थ होने में यह रक्त रसायन असाधारण भूमिका सम्पन्न करते हैं। अफ्रीका में कोई 80 हजार बच्चे इन रक्त रसायनों की विकृति के साथ जन्म लेने के कारण स्वल्प काल में ही मृत्यु के ग्रास बन जाते हैं। इसी प्रकार उस महाद्वीप के एक कबीले में ऐसे रक्ताणु पाये गये जो मलेरिया के ‘प्लास्पोडियम फाल्सी पैरम’ कीटाणुओं से शरीर को तनिक भी प्रभावित नहीं होने देते। अन्य कबीलों के लोग उस क्षेत्र में आकर रहे तो तुरन्त मलेरिया ग्रसित हो गये किन्तु वहाँ के मूल निवासी मुद्दत से इन्हीं मच्छरों के बीच रहते हुए कभी बीमार नहीं पड़े।
स्वीडन के शरीर विज्ञानी प्रो0 फोलिंग इस बात पर जोर देते हैं कि विषाणुओं को मारने के लिए एन्टीबायोटिक अथवा दूसरी प्रकार की जो मारक औषधियाँ दी जा रही हैं उनका प्रचलन बन्द किया जाय और स्वस्थ रक्ताओं को अधिक समर्थ बनाने के प्रयोगों को प्राथमिकता दी जाय। रोगों का स्थायी निवारण और सुदृढ़ स्वास्थ्य का संरक्षण इसी नीति को अपनाने से सम्भव होगा।
मारक औषधियाँ मित्र शत्रु का-अपने पराये का भेद किये बिना अपनी अन्धी तलवार दोनों पक्ष के योद्धाओं को मारने के लिए प्रयुक्त करती है। विषाणु मरें, सो ठीक है, पर स्वस्थ कणों की सम्पदा खोकर तो हम इतने दीन-हीन बन जाते हैं कि वह दुर्बलता भी रुग्णता से कम कष्टकारक नहीं होती। उससे भी मन्द गति से दीर्घकाल तक चलती रहने वाली रुग्णता ही जम बैठती है।
प्रकृति ने जीवन की प्रखरता को संजोये रखने के लिए संघर्ष आवश्यक समझा और विषाणुओं, रक्ताओं में निरन्तर संघर्ष होते रहने की व्यवस्था बना दी ताकि हम युद्ध कौशल में प्रवीण होकर सच्चे अर्थों में समर्थ और प्रगतिशील बन सकें।
इस युद्ध से एक निष्कर्ष यह निकलता है कि शत्रु को मारने वाले से भी अधिक उपयोगी आत्म-पक्ष को सबल बनाने की है। संसार में फैली हुई अनीति के दमन के लिए आवेश में आकर उपयोगी-अनुपयोगी की परख किये बिना अन्धाधुन्ध तलवार चलाना हानिकारक है। लाभ इसमें है कि नीति पक्ष को परिपुष्ट किया जाय जिससे बिना कठिन संघर्ष के ही शत्रु पक्ष परास्त हो सके साथ ही आत्म-पुष्टि से चिरस्थायी स्वास्थ्य सन्तुलन की-शान्ति और प्रगति की अभिवृद्धि हो सके। हमारी जीवन नीति एवं सुधार व्यवस्था का संचालन इसी आधार पर होना चाहिए।
निर्झर तट पर ही विशाल वृक्ष के नीचे वह छोटा पौधा अभी-अभी ही उगा था। अपने थोड़े से पत्ते कोपलों में सिमटे उत्साह को जब आगे बखेरा तो सबसे निकट प्रवाहमान निर्झर पर ही उसकी दृष्टि पड़ी। उसकी अनवरत गति को देखकर पौधा अवाक् रह गया। आखिर यह दौड़ कहाँ के लिए? किस के लिए लग रही है?
जिज्ञासा का समाधान करने के लिए नवजात पौधे ने अपने सिर पर छाया करने वाले वयोवृद्ध वृक्ष से पूछा-दादा, यह निर्झर आखिर कहाँ दौड़े जा रहे हैं? किसलिए दौड़े जा रहे हैं?
वृक्ष मुस्कराया उसने शिशु की जिज्ञासा का समाधान करते हुए संक्षिप्त उत्तर दिया-‘समुद्र में मिलने-उस जैसा बनने।’
पौधे को सन्तोष नहीं हुआ उसकी समझ में तब भी यह न आया कि पर्वत जैसी उच्च और सुन्दर स्थिति को छोड़कर समुद्र की नीची और एकरस स्थिति में मिलने से आखिर इस निर्झर को क्या सुख मिलेगा जिसके लिए इतना कष्टसाध्य प्रयास करने के लिए उन्हें यह वैराग्य धारण करना और कठिन तप करना पड़ रहा है।
वृक्ष अब अधिक गम्भीर हो गया उसने दार्शनिकों जैसी मुद्रा में कहा-पर्वत की कठोरता में न रस है न तृप्ति और न असीमितता। फिर जल का सजातीय भी तो पर्वत नहीं है। विजातीय से मिलन कहाँ? और जहां मिलन नहीं आनन्द कैसा? तात् तुम जब बड़े हो जाओगे तब जानोगे कि हम सब आनन्द में से उत्पन्न होते हैं और परमानन्द की प्राप्ति के लिए ही व्याकुल रहते हैं। यह आनन्द प्राप्ति की व्याकुलता ही निर्झर की गति है।
पौधे और वृक्ष का संवाद सुनकर जानने वाले ने जाना कि आत्मा की आकुल गतिविधियाँ पर्वत जैसी जड़ता से निकलकर परमात्मा रूपी महासागर में मिलने के लिए ही आकुल दौड़ लगाती हैं निर्झर की तरह उसे चैन तभी मिलता है जब लघुता का महानता में विसर्जनपूर्ण हो जाता है।
जिसने जन्म लिया है उसका मरण सुनिश्चित है। सृष्टि का क्रम ही जन्म-मरण की धुरी पर घूम रहा है। जो जन्मा है सो मरेगा ही। जीवनेच्छा कितनी ही प्रबल क्यों न हो मरण से बचा नहीं जा सकता। मृत्यु की चलती चक्की में अन्न के दानों की तरह हमें आज नहीं, कल पिसकर ही रहना है। इस तथ्य को न तो झुठलाया जा सकता है और न उसका सामना करने से बचा जा सकता है। मरण को एक ध्रुव सत्य ही मानकर चलना चाहिए। अनिच्छा, भय-भीरुता अथवा कृपण-कायरता कुछ भी मन में क्यों न हो, प्रकृति का सुनिश्चित क्रम रुकेगा नहीं; हमारा परमप्रिय लगने वाला आज का सुनिश्चित अस्तित्व कल महान शून्य में विलीन होकर रहेगा। आज की यथार्थता कल विस्मृति के गर्त में गिरकर सदा के लिए अविज्ञात अन्तरिक्ष में बिखर जायेगी।
मरण से भयभीत होकर आतुर लोग ऐसा सोचते हैं कि इन्हीं क्षणों जितना अधिक आनन्द उठा लिया जाय उतना ही उत्तम है। वे इन्द्रिय लिप्सा एवं मनोविनोद के लिए अधिकाधिक साधन जुटाते हैं और उसके लिए जो भी उचित-अनुचित करना पड़े उसे करने में नहीं चूकते। यह उपभोग की आतुरता कई बार तो इतनी बढ़ी-चढ़ी ओर इतनी अदूरदर्शी होती है कि उपभोग का आरम्भ होते-होते विपत्ति का वज्र सिर पर टूट पड़ता है। अपराधियों और कुकर्मियों की दुर्गति होती आये दिन देखी जाती है। कइयों को तुरन्त ही प्रतिरोध या प्रतिशोध का सामना नहीं करना पड़ता। सामयिक सफलता भी मिल जाती है, पर ईश्वरीय कानून तो उलटे नहीं जा सकते। कर्मफल की सच्चाई न केवल अध्यात्म-दर्शन के आधार पर वरन् भौतिक मनोविज्ञान के सिद्धान्तों से भी सुनिश्चित है। कुकर्मी को इस तरह न सही तो उस तरह दुर्गति का सामना करना ही पड़ता है।
जब तक जीना तब तक मौज से जीना-ऋण करके मद्य पीने वाली नास्तिकतावादी नीति मरण की भयंकरता के अनुरूप जीवन को भी भयानक बना लेने की मूर्खता करना है। असीम उपभोग चाहा गया और अप्रत्याशित संकट उभरा यह कहाँ की समझदारी हुई। उच्छृंखल भोगलिप्सा मन में उठने से लेकर तृप्ति का अवसर आने तक हर घड़ी आशंका, व्यग्रता, जुगुप्सा, चिन्ता की इतनी भयानकता अपने साथ जुड़ी रखती है कि उपभोग की तृप्ति बहुत भारी पड़ती है। सच तो यह है कि अभाव सहने की अपेक्षा उसका कहीं अधिक मूल्य चुकाना पड़ता है।
यह तो मृत्युभय को और भी अनेक गुना बढ़ा देने वाली बात हुई। सोचा यह गया है कि मरने तक जितना अधिक आनन्द उठाया जा सकता हो, उतना उठा लिया जाय। इसलिए अचिन्त्य-चिन्तन और अकर्म करण को अपनाने का दुस्साहस भी किया गया, पर सृष्टि व्यवस्था ने उसे भी कहाँ पूरा होने दिया। तृप्ति के क्षण आने से हपले इतनी आत्म-प्रताड़ना सहनी पड़ी कि उपभोग की सारी सरसता ही नष्ट होकर रह गई। जो मिला वह इतना अधिक दुष्परिणाम साथ लाया कि कामना पूर्ति के सुख की अपेक्षा व्यथा वेदना भरा पश्चाताप अपेक्षाकृत कष्टसाध्य ही सिद्ध हुआ।
इस आतुरता से कुछ प्रयोजन सिद्ध न होगा। एक दिन मरने की अपेक्षा आत्म-प्रताड़ना की आत्म-हत्या का कष्ट पग-पग पर सहन करना कहाँ की बुद्धिमत्ता है। एक दिन तो सभी को मरना पड़ेगा पर आतुर उपभोग की ललक कुकर्मों पर उतारू मनुष्य हर कदम पर मृत्यु जैसी झुलसी व्यथा को सहन करता है। मरणोत्तर जीवन पर अविश्वास करने वाले नास्तिक प्रकृति के मनुष्य निश्चित रूप से उनकी अपेक्षा अधिक घाटे में रहते हैं जो अध्यात्म दर्शन के आधार पर मृत्यु को एक वस्त्र परिवर्तन जैसी सहज सामान्य प्रक्रिया मानते हैं और आत्मा को मरणोत्तर जीवन बना रहने की बात पर विश्वास करते हैं।
मृत्यु वस्तुतः उतनी भयानक है नहीं जितनी कि समझी जाती है। आत्मा का अस्तित्व अब एक सुनिश्चित तथ्य मान लिया गया है। वे दिन लद गये जब नौसिखिये, अत्युत्साही बुद्धिवादी मनुष्य को एक जड़ उत्पादन कहा करते थे और शरीर की मृत्यु के के साथ ही आत्मा का अस्तित्व न रहने का प्रतिपादन करते थे। पुनर्जन्म के अतिरिक्त सूक्ष्म शरीर धारण किये रहने तक के अब तक इतने सुदृढ़ प्रमाण मिल चुके हैं कि उनकी यथार्थता से इनकार करने का कोई साहस नहीं कर सकता। जन्म-जात विशेषताओं का बहुत पहले वंश परम्परा के साथ सम्बन्ध जोड़ा जाता था अब यह मान लिया गया है कि वंश परम्परा से सर्वथा भिन्न प्रकार की जो असाधारण विशेषताएं मनुष्यों में जन्मजात रूप से पाई जाती हैं उनका कारण प्राणी के पूर्व जन्म के संचित संस्कार ही हो सकते हैं। विज्ञान और बुद्धिवाद ने पिछली शताब्दियों में जो प्रगति की है उसके आधार पर मरणोत्तर जीवन की प्रामाणिकता में सन्देह करने का कोई कारण शेष नहीं रहा है। पैरा साइकोलॉजी-मैटरफिजिक्स एवं आकाल्ट साइंस के क्षेत्र में एक के बाद एक ऐसे तथ्य प्रस्तुत किये जा रहे हैं जो मरणोत्तर जीवन की यथार्थता को एक सुनिश्चित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
बुद्धिमत्ता अब यह नहीं कहती कि मरने के बाद अस्तित्व नहीं रहेगा, इसलिए अधिकाधिक उपभोग के लिए अनीति स्तर तक बढ़ा जाय। यह सोचना दोनों ही दृष्टि से गलत है। एक तो मरणोत्तर जीवन और कर्मफल के पुराने सिद्धान्त अब नई कसौटियों पर भी तथ्यपूर्ण सिद्ध हो रहे हैं। दूसरे अनियन्त्रित उपभोग के प्रयत्नों में और उपभोग के उपरान्त उत्पन्न हुए संकटों में जो कष्टकर स्थिति जुड़ी रहती है वह उस क्षणिक एवं स्वल्प उपभोग की तुलना में कहीं अधिक महंगी पड़ती है।
मृत्यु से डरने की अपेक्षा यही उत्तम है कि उसे एक सुनिश्चित तथ्य मानकर जीवन की सहचरी मानकर चला जाय और अनन्त जीवन प्रवाह में मरण को एक छोटा विश्राम मात्र समझा जाय। जीवन भी सृष्टि प्रवाह और परमेश्वर की तरह ही अनादि और अनन्त है। रात्रि में जिस प्रकार हर रोज सोया जाता है और दूसरे दिन सवेरे ही उठकर फिर नया कार्यक्रम चलाया जाता है;उसी प्रकार मरण का विश्राम लेकर हर बार नया जीवन नये दिन की तरह आरम्भ होता है। अगले दिनों की-भविष्य की- चिन्ता व्यवस्था में हम सर्वदा संलग्न रहते हैं। रात्रि को सोना पड़ेगा अथवा सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व रहेगा। दोनों ही अवसरों पर सुखद परिस्थितियों की आवश्यकता पड़ेगी और वे साधन आज के सत्प्रयत्नों से ही उपयुक्त समय के लिए संचित किये जा सकते हैं। अस्तु मरण का तथ्य ध्यान में रखते हुए हमें मरणोत्तर जीवन के समय के लिए उपयोगी साधन सामग्री जुटाने के लिए निरत रहना चाहिए। यह प्रयोजन सत्कर्म साधना से ही सम्भव हो सकता है। अस्तु उसे जीवन काल में परिपूर्ण तत्परता के साथ ही करते रहना उचित है।
पुराने कपड़े उतारकर नये कपड़े बदलने में हमें तनिक भी बुरा नहीं लगता वरन् प्रसन्नता होती है। आज के बोझिल जीवन की अपेक्षा भविष्य में अधिक कोमल हलका और प्रफुल्ल अवसर बालकपन के रूप में मिलेगा तो इसमें खिन्न होने की क्या बात है? आज शरीर और परिवार की छोटी-सी परिधि में कोल्हू के बैल की तरह चक्कर काटने की भारवाही स्थिति से आगे बढ़कर कुछ समय उन्मुक्त अन्तरिक्ष में विचरण करने का अवसर मिलेगा और ईश्वर की अदृश्य गतिविधियों के संपर्क में रहना पड़ेगा तो उस कौतूहलपूर्ण स्थिति में रस लेने में भय क्यों माना जाय? यात्राओं का-प्रवास पर्यटन का आनन्द उठाने की इच्छा सभी को रहती है। उन दिनों घर छोड़ना पड़ता है और ढर्रे का जीवन क्रम सम्भव नहीं रहता। तो भी अजनबी और अनोखी वस्तुएं देखने, नयों के संपर्क में आने की प्रसन्नता सन्तोष देती है यही बात मरणोत्तर जीवन के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है; उसे सुखद यात्रा प्रसंग गिना जा सकता है।
मृत्यु का भय उन्हें ही भयभीत करता है जिन्होंने मरणोत्तर जीवन के लिये सुखद स्थिति प्राप्त करने की कोई पूर्व तैयारी नहीं की है। अनिश्चित अन्धकार में प्रवेश करना ही भयानकता की आशंका बनकर मनुष्य को डराता है। विशेषतया यह डर तब और भी अधिक बढ़ जाता है जब अगले दिनों अधिक गहरी विपत्ति सामने प्रस्तुत होने की आशंका रहती हो। जिनने संकीर्ण स्वार्थपरता और अनैतिकता का आशय लेकर जिन्दगी के दिन काटे हैं उनकी अन्तरात्मा को अदृश्य चेतना आगाह करती रहती है कि इन आज की दुष्प्रवृत्तियों का परिणाम कल भयानक विपत्ति के रूप में ही सामने आ रहा है। यह आगाही ही मृत्यु भय को सघन बनाती है और मरने का नाम सुनते ही कंपकंपी आती है।
मृत्यु के उपरान्त जीव के कर्मों का लेखा-जोखा परमेश्वर के सामने होता है और न्याय-तुला पर तौलकर दण्ड पुरस्कार का विधान बनता है। अपराधी मनःस्थिति यह जानती है सर्वांतर्यामी न्यायाधीश से कुछ छिपा नहीं है वह कर्म और उसके उद्देश्य को भली प्रकार जानता है और बिना किसी पक्षपात अथवा दया-निर्दयता का आशय लिये परिणाम भुगतने के लिए प्राणी को बाध्य करता है। इस परीक्षा की घड़ी में अपना खोटापन-अपने लिए कितने विघातक परिणाम प्रस्तुत करेगा यह पंगा तथ्य जब अचेतन मन की आँखों के सामने घूमता है तो उसकी बेचैनी का ठिकाना नहीं रहता। वध-स्थल पर ले जाये जाने वाले भयभीत बलि-पशु की तरह मृत्यु के भय सामने आते ही अपनी चेतना भी उसी प्रकार काँपती है।
जिन्होंने सत्कर्म किये हैं और जीवन की विभूतियों का सदुपयोग किया है उन्हें निश्चिंतता रहती है कि अपना भविष्य उज्ज्वल है। ऊँचे पद पर स्थानान्तर होने वाले कर्मचारी खिन्न नहीं प्रसन्न होते हैं वे जानते हैं कि जहाँ जा रहे हैं वहाँ अधिक सम्मान और सुविधा साधन मिलेंगे। ऐसे लोग पुराना स्थान छोड़ते हुए दुखी नहीं प्रसन्न होते हैं। दुख होता भी है तो वह विदाई बिछोह जैसा क्षणिक होता है। ऐसे तो कन्या भी ससुराल जाते समय अपनी सखी-सहेलियों से बिछुड़ते हुए दुखी होती है, पर वह दुख क्षणिक होता है। विदाई के तुरन्त बाद उसे ससुराल के सुहागरात के सुखद सपने आने लगते हैं और वियोग के हलके से भार को भी कुछ ही क्षणों में भुला देती है। सुकृत कर्मी लोग मरने के समय स्वजन सम्बन्धियों से बिछुड़ते समय कुछ खिन्न भी हो सकते हैं, पर सुखद भविष्य की निश्चितता के कारण वह कष्ट उन्हें न तो भारी पड़ता है और न देर तक ठहरता है। उनके लिए मृत्यु एक पदोन्नति सहित होने वाले सुखद स्थानान्तरण जैसी प्रसन्नता और निश्चिंतता लिये हुए ही आती है।
सत्कर्म और सदुद्देश्य लेकर ही जीना उचित है। इस राह पर चलते हुए यदि अभाव, अवरोध अथवा संकट का सामना करना पड़े और वह मृत्यु जैसा कष्ट लेकर सामने आ उपस्थित हो तो भी विचलित होने की आवश्यकता नहीं। मरना तो एक दिन निश्चित है। वह घड़ी कब आ पहुँचे इसका भी ठिकाना नहीं। जब सामान्य रीति से कभी भी मरना हो सकता है तो सदुद्देश्य की रक्षा में मृत्यु आ उपस्थित होने पर ही क्यों भीरुता प्रकट की जाय। सामान्य मौत से मरने की अपेक्षा सदुद्देश्य के लिए मरना आत्म-सन्तोष देता है अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करता है और शूर, साहसी महामानवों की श्रेणी में अपने को बिठाता है। इतने लाभ जिस मृत्यु के साथ जुड़े हुए हैं वस्तुतः वह चारपाई पर मरने वालों की तुलना में कहीं अधिक श्रेयस्कर एवं सौभाग्यशालिनी है।
मौत-जिन्दगी की सहचरी है। दोनों जुड़वा बहिनें हैं। एक जहाँ रहेगी वहाँ दूसरी देर-सवेर में आ पहुँचेगी। एक के बिना दूसरी अपूर्ण है। हमें इन दोनों का ही सम्मान करना चाहिए और दोनों का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए योजनाबद्ध जीवन पद्धति का निर्धारण करना चाहिए।
ईश्वर संसार का शासन करता है। हमें बुद्धिमत्ता से अपना कर्तव्य-पालन करना चाहिए और इस प्रश्न को उसी के सुपुर्द छोड़ देना चाहिये।
— वाक्यजानजें
सामान्य अवस्था में सामान्य मानव सच्चा, सरल ईमानदार और उद्यमशील होता है। परन्तु जब प्रलोभन का अवसर आता है तो परीक्षा की उस घड़ी में बहुधा वह अपने सामान्य स्तर से फिसल कर नीचे आ जाता है।
उदाहरण के लिए सामान्य अवस्था में सभी व्यक्ति अपने श्रम और ईमानदारी का पैसा लेते हैं; परन्तु यदि महंगाई हो जाये, कोई रिश्वत दे, कहीं रुपया पड़ा मिले या चोरी का अवसर मिले तो इस स्थिति का लाभ न उठाने वाले और केवल अपनी मेहनत की कमाई पर सन्तोष करने वाले विरले ही होते हैं। वे सामान्य स्तर से ऊपर के व्यक्ति हैं।
सामान्य अवस्था में क्रोध नहीं आता; परन्तु यदि कोई अपने व्यवहार से उत्तेजित करे तो आत्म नियन्त्रण और मानसिक सन्तुलन कठिन हो जाता है। ऐसी अवस्था में सन्तुलन बनाये रखने वाला व्यक्ति असामान्य होता है।
इसी प्रकार सामान्य स्थिति में हम सब सुखी और सन्तुष्ट हैं। परन्तु यदि प्रत्येक प्रतिकूल परिस्थिति में भी हम अपना सन्तुलन बनाये रह सकें, मृत्यु, पीड़ा, पराजय, भूख-प्यास में भी दुख का अनुभव न करें, अपने ज्ञान में दृढ़ आस्था बनाये रखें, अपने सिद्धान्त पर डटे रहें, अपनी भावनाओं पर काबू रखें तो समझा जायगा कि हम सामान्य स्तर से ऊपर के हैं।
काम, क्रोध, लोभ, मोह के विकारों का आवेश मनुष्य को अन्धा कर देता है। उसका विवेक ठीक काम नहीं करता, उचित-अनुचित, कर्तव्य-अकर्तव्य का उसे ध्यान नहीं रहता और वह उस प्रकार का व्यवहार कर बैठता है जिससे उसे स्वास्थ्य से हाथ धोना पड़ता है, समाज में अपयश होता है, दूसरों से सम्बन्ध खराब होते हैं और वह अविश्वास का पात्र बन जाता है।
सम्बन्धियों, धन और यश में आसक्ति वाला मनुष्य लेन-देन में पक्ष-पात करता है। चोरी, ठगी और बेईमानी करता है, दूसरों को धोखा देता है, झूठे वादे करता है और चालाकी से काम लेता है। वह भूल जाता है कि पक्षपात से समाज की व्यवस्था खराब होती है, चोरी और बेईमानी से असुरक्षा और भय की स्थिति पैदा होती है, जिसका प्रभाव स्वयं उसके ऊपर भी पड़ सकता है। झूठ और चालाकी से उसका नैतिक पतन होता है और उस अनीति से जो लाभ होता है वह स्थाई नहीं होता।
धर्म, नीति, श्रम और सदाचार के मार्ग से धन जुटाना कठिन है। इसीलिए हम इन्द्रिय सुख और सम्मान के लोभ में अनुचित साधनों का सहारा लेते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि अधर्म के मार्ग से हम समाज की श्रद्धा, आदर, विश्वास, प्रेम, सहयोग और सहानुभूति खोकर व्यक्तिगत रूप से घाटे में ही रहते हैं तथा इस तरह सामाजिक जीवन के अस्त-व्यस्त और विषाक्त हो जाने पर हमें भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है; जबकि धर्म के मार्ग से हम अपने को समाज में श्रद्धा और विश्वास का पात्र बनाकर समाज में सहयोग का वातावरण पैदा करते हैं।
हमारे संकुचित स्वार्थ और संकीर्ण दृष्टिकोण के कारण ही धन-धान्य से सम्पन्न, प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर, सुजला, सुफला शस्यश्यामला धरती निराशा, नीरसता, चिन्ता, उद्विग्नता, भय और शंका का वास बनी हुई है। सुख-सुविधा और सम्पन्नता से हम वंचित ही हैं।
स्वर्ग और नरक कहीं और नहीं है। इन्हें मानव स्वयं इसी धरती पर बनाता है। जब मानव नीति, संयम, त्याग, सेवा, तप और सहानुभूति का जीवन जीते हैं तो समाज में स्वास्थ्य, सुख, शान्ति, बाहुल्य, सद्भावना, प्रेम, हंसी-खुशी और पारस्परिक विश्वास का कल्प-वृक्ष उगता है। यही स्वर्ग है। संकुचित स्वार्थ, असंयम, आलस्य, घृणा, द्वेष और दम्भ समाज में उत्पीड़न, भय, असन्तोष, अभाव और अविश्वास का वातावरण बना देते हैं। यही नरक है। हमारा चिन्तन, भावनाएं और कर्म ही स्वर्ग और नरक का निर्माण करती है। अपने लिए-समस्त संसार के लिए हम स्वर्ग का सृजन करें अथवा नरक का निर्माण करें यह हमारी इच्छा और चेष्टा पर पूर्णतया निर्भर हैं।
विश्व की समस्याओं पर गम्भीर दृष्टि से विचार करने वालों का कथन है कि इस युग की सबसे बड़ी समस्या बढ़ती हुई जनसंख्या है। बढ़ती हुई आबादी चक्रवृद्धि गति से अधिकाधिक बच्चे उत्पन्न करती चली जा रही है इसका परिणाम विस्फोटक होगा।
इन दिनों अणु आयुधों के महायुद्ध में विश्व के सर्वनाश की विभीषिका देखी जाती है पर उससे भी बड़ा संकट बढ़ते हुए प्रजनन का है। महायुद्ध टाला जा सकता है अथवा पुराने हथियारों के लड़ा जा सकता है; किन्तु बढ़ती हुई आबादी का कोई समाधान नहीं। प्रस्तुत संकट कंपा देने वाला है। अगली शताब्दी में यह समस्या धरती पर मानवी अस्तित्व को चुनौती देगी और जीवन-मरण की विभीषिका बन कर सामने प्रस्तुत होगी।
द्रुतगति से बढ़ती हुई जनसंख्या ने अगणित ऐसी अत्यन्त जटिल समस्याओं को जन्म दिया है जिनका समाधान एड़ी चोटी का पसीना एक करने पर भी मिल नहीं रहा है। धरती की उपज इस क्रम से नहीं बढ़ सकती जिस क्रम से आबादी बढ़ रही है। फलतः संसार भर में अन्न संकट बढ़ता ही चला जा रहा है और धरती से नजर आगे बढ़ाकर समुद्र की ओर ताका जा रहा है। मछली उत्पन्न करने, पकड़ने और उसे प्रमुख आहार का अंग बनाने से मानवी आहार प्राप्त करने की शोध चल रही है। धरती के पशुओं को समाप्त कर देने की योजना है ताकि उनके काम आने वाली घास तथा जमीन को मनुष्य के लिये प्रयुक्त किया जा सके। अन्न कम पड़ने की दशा में घास में से आहार निकाला जायगा। निकट भविष्य में मनुष्य घास को अन्न के स्थान पर, प्रयोग करेंगे। दूध मूँगफली, सोयाबीन आदि का बनेगा। घी की जरूरत तेल पूरी करेंगे। कृषि मशीनों से होगी।
पशुओं के बाद वृक्षों का सफाया होगा, वे भी बहुत जंगल और जमीन घेरे हैं। लकड़ी, घास की लुगदी से बना करेगी। ईंधन का काम बिजली से लिया जायेगा। जंगलों, पहाड़ों और रेगिस्तानों को विस्मार कर दिया जायेगा। सड़कें जमीन नीचे चलेंगी। मकान कई मंजिले बनेंगे ताकि खाद्य उत्पादन के लिए अधिक जमीन मिल सके। समुद्र पर तैरती बस्तियाँ और फैक्ट्रियां फिरा करेंगी। बढ़ी हुई जनसंख्या को आखिर कहीं तो स्थान देना ही पड़ेगा।
बढ़ी हुई आबादी वाली देश खाली जमीन वाले देशों में अपना जनता को धकेलना चाहेंगे। और खाली जमीन वाले अपनी सुविधा बनाये रहने के लिए उन्हें रोकेंगे। छोटे या बड़े युद्धों का यही प्रमुख कारण होगा ऐसे युद्ध टाले न जा सकेंगे। और उस संघर्ष में करोड़ों अरबों की मौत और प्रचुर संपत्ति का नाश होकर रहेगा।
वृक्ष न रहने से, कारखाने बढ़ने से वायु प्रदूषण पैदा होगा, पानी की कमी पड़ेगी-पेड़ों से रहित दुनिया में वर्षा घटेगी। पेड़ कार्बन गैस खाते और आक्सीजन छोड़ते हैं। मनुष्य का प्रधान आहार आक्सीजन है। उसकी कमी पड़ने से दम घुटने जैसी स्थिति पैदा हो जायगी। घनी बस्तियों में स्वास्थ्य संकट ही नहीं नैतिक अनाचार भी बढ़ेगा। व्यस्त एकाकी मनःस्थिति में रहने की सामाजिक स्थिति बनती जायगी और मनुष्य स्वार्थपरायण एवं खीज खिन्नता से ग्रसित पाये जायेंगे। विलासिता और अभाव-ग्रस्तता की दुहरी मार से वे दिन-दिन दुर्बल होते जायेंगे और पीढ़ियाँ क्रमशः दीन-दुर्बल होती चली जायेंगी, मक्खी मच्छरों की तरह लोग बेमौत मरा करेंगे।
बढ़ती हुई आबादी का प्रश्न जिस विकट रूप से अब सामने आया है वैसा इस दुनिया के इतिहास में पहले कभी नहीं आया। वैज्ञानिक प्रगति ने सुख-सुविधाएं बढ़ाई हैं- चिकित्सा विकास ने मृत्यु दर घटाई है- विलासी उत्तेजनाओं ने प्रजनन बढ़ाया है और चक्रवृद्धि गति से मनुष्योत्पादन अधिक से अधिकतम होता चला गया है। अब सबसे विकट समस्या संसार के सामने एक ही है इस प्रजनन संकट से कैसे बचा जाय ?
परिवार नियोजन की दृष्टि से चलने वाले नसबन्दी रबड़ थैली, लूप- गोलियां जैसे प्रयोग जैसे प्रयोग भी कुछ बड़ी रोक थाम नहीं कर सके क्योंकि दुनिया में पिछड़ी हुई जनता ही अधिक है। वह नियोजन का महत्व नहीं समझती और इन साधनों का प्राप्त करने एवं उपयोग करने में झिझकती है। प्रकृति दुर्बलों को सन्तान भी अधिक देती है। नियोजन के प्रचार से केवल शिक्षित और समझदार लोग प्रभावित होते हैं और वे ही आँशिक रोक-थाम करते हैं। इससे रोक-थाम तो नहीं के बराबर होती है। उलटे विकसित वर्ग का संख्या सन्तुलन घटता जाता है। इस प्रकार उस आन्दोलन से जितने लाभ की आशा की गई थी वह तो नहीं मिला पर एक परिणाम अवश्य हुआ कि जहाँ कुछ समय पहले सन्तानोत्पादन को सौभाग्य का आधार माना जाता है वहाँ अब लोग उसके दुष्परिणामों के बारे में भी समझ। सोचने लगे है। इस तरह जो लोक-मानस जन रहा सम्भव है उसका कुछ अच्छा परिणाम भविष्य में सामान्य आये और लोग आज की मान्यता से सर्वथा भिन्न प्रकट से यह सोचने लगे कि प्रजनन का उत्साह व्यक्ति और समाज दोनों के लिए ही-हर दृष्टि से घातक है।
विश्व के मूर्धन्य विचारकों की इस समस्या को सुलझाने के लिए विवाह संस्था में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने को बात समझ में आ रही है और वे सरकारों से यह अनुरोध कर रहे हैं कि प्रजनन को निरुत्साहित करने वाले कड़े कदम उठाने का दुस्साहस करें भले ही प्रचलित परम्पराओं को उनसे आधार पहुँचे और पुरातन पन्थी उसका विरोध करें। इसी प्रकार वे बुद्धि-जीवियों और समाज नेताओं पर यह दबाव डाल रहे हैं कि प्रजनन पर नियन्त्रण करने वाले हर उपाय का वे समर्थन करे। वैध-अवैध और उचित-अनुचित के विचार को छोड़ने की बात वे इस आधार पर कहते हैं कि जीवन-मरण की प्रस्तुत समस्या का समाधान आपत्ति धर्म के अनुरूप खोजा जाना चाहिए। एक और मरण का सर्वनाश है दूसरी ओर उचित-अनुचित। वे कहते हैं ऐसी स्थिति का सामना युद्ध संकट की आपत्तिकालीन स्थिति को तरह किया जाना चाहिए।
इन विशेषज्ञों का एक सुझाव यह है कि उच्च वर्ग के लोग विवाह तो करें पर सन्तानोत्पादन बिलकुल न करें। वे निम्न वर्ग के लोगों के बच्चे ले लें और उन्हें अपने आश्रय में रखकर पालें-पोसें। इस प्रकार उनकी सन्तान विनोद की आवश्यकता भी पूरी होती रहेगी। उनमें परोपकार की उदार वृत्ति भी पनपेगी और निम्न वर्ग में उत्पन्न हुए बालकों को उच्च वर्ग का बनने में सहायता मिलेगी।
दूसरा सुझाव यह है कि विवाह की आयु कानून बना कर बढ़ा दी जाय। लड़कियाँ पच्चीस वर्ष से पहले और लड़के तीस वर्ष से पहले विवाह न करने पायें । जो करें वे कड़ा दण्ड भुगतें और वे विवाह गैर कानूनी ठहरा दिये जाये। सन्तानोत्पादन की आधी वृद्धि इसी आयु में ही हो लेती है। लड़कियाँ पच्चीस वर्ष की आयु तक आधा उत्पादन पूरा कर देती है। शेष सारी उम्र में जितने बच्चे पैदा होते हैं उतने बीस पच्चीस वर्ष तक की महिलायें जन चुकती है।
तीसरा उपाय यह है कि अल्प वयस्कों के विवाह से स्थापित हुए गर्भों को जेल में गर्भपात कराके नष्ट करने का कानून बना दिया जाय और दो या तीन बच्चे पैदा कर चुकने पर प्रत्येक नर-नारी को सरकारी दबाव ने बन्ध्य कर दिया जाय। अधिक सन्तान उत्पन्न करने वालों के साथ समाजद्रोही जैसा व्यवहार किया जाय उन्हें सरकारी और सामाजिक क्षेत्र में पिछड़ा माना जाय और उपेक्षापूर्ण व्यवहार किया जाय। निर्धनों के बच्चे जब्त कर लिये जायें और उन्हें सरकार वाले ताकि घटिया नागरिकों की भरमार न होने पाये।
स्कूलों में एक अनिवार्य विषय के रूप में परिवार नियोजन पढ़ाया जाय और रेडियो, सिनेमा, अखबार आदि साधनों से जनता की इस दिशा में निरन्तर प्रशिक्षण किया जाय। सरकारी नौकरियों में बिना बच्चे वाले या कम बच्चे वालों को ही लिया जाय ताकि वे आर्थिक तंगी से विवश होकर भ्रष्टाचार अपनाने के लिए बाध्य न हो।
ब्रह्मचर्य पालन करके जनसंख्या नियंत्रण की बात इन विचारकों की दृष्टि में आदर्शवादी चर्चा का विषय बन सकती है पर उसकी कोई व्यावहारिक उपयोगिता नहीं है। वर्तमान वातावरण साहित्य ने, कला ने, शृंगारिकता के प्रचलन ने इतना कामोत्तेजक बना दिया है कि इन दिनाँक ब्रह्मचर्य अपवाद ही रह सकता है। सर्वसाधारण उसे हृदयंगम कर सकें और व्यावहारिक जीवन में ला सकें यह असम्भव है। इस मान्यता के आधार पर वे विवाह और प्रजनन की दो ही प्रक्रियाओं का वर्तमान ढाँचा बदलना चाहते हैं। इसके लिये उनके कुछ विचित्र लगने वाले किन्तु विचारणीय सुझाव है।
एक सुझाव यह है कि नर-नारी के बीच विवाह भले ही होते रहें; पर वे सन्तानोत्पादन न करने की शारीरिक स्थिति उत्पन्न कर लें। बंध्य-करण का आपरेशन करालें अथवा अन्य निरोधक उपाय बरतते रहें।
दूसरे उपाय बहुपति प्रथा को पुनर्जीवित करने का बताया गया है। उनका तर्क है कि प्राचीन काल में द्रौपदी और कुन्ती के उदाहरण मौजूद हैं; जिन्होंने एक साथ कई पतियों को भली प्रकार सन्तुष्ट रखा था। प्रमाण के लिए कहा जाता है कि उत्तर प्रदेश के देहरादून जिले के जौनसार बावर क्षेत्र में यह प्रथा सफलता पूर्वक चलती देखी जाती है। वहाँ मात्र बड़ा भाई विवाह करता है, छोटे सब भाई उसी भावज को अपनी पत्नी मानते हैं। जो बच्चे पैदा होते हैं वे चाचाजी न कहकर बड़े पिताजी मझले पिताजी, छोटे पिताजी आदि कहते हैं। बड़े सुख पूर्वक वे परिवार चलते हैं। सीमित घर और जमीन में कितनी ही पीढ़ियाँ गुजारा करती रहती हैं। कई पति कमाने वाले रहने से पत्नी को भी प्यार उपहार से लेकर घर की अर्थ व्यवस्था ठीक रखने में सहायता मिलती है। घर, खेत, सम्पत्ति के बँटवारे का कोई प्रश्न नहीं उठता। संयुक्त परिवार एक गृह स्वामिनी के खूँटे से बँधा रहता है और कभी नहीं बिखरता। उस क्षेत्र में अनेक सभ्यताभिमानी पहुंचने है और अलग विवाह की बात कहते हैं पर लोग अनुभव के आधार पर अपने प्रचलन को अधिक सुख-शान्ति भरा बताते हैं। उदारता, ममत्व और सामूहिकता की श्रेष्ठता की बात कह कर वे अपने को अधिक सुसंस्कृत बताते हैं। उलटे ईर्ष्या, अलगाव एवं संकीर्ण स्वार्थपरता के इल्जाम इन उपदेशकों पर लगाते हैं। तर्क यह है कि जब हर क्षेत्र में सहकारिता और मिल-जुलकर रहने की वृत्ति लाभदायक है तो विवाह ही क्यों उसका अपवाद रहे। यदि सोचने का तरीका बदल लिया जाय तो बहुपति प्रथा को अधिक सुखद, सुविधाजनक पाया जा सकता।
तीसरा उपाय इन विचारकों की दृष्टि में समलिंगी विवाहों का प्रचलन है। वे कहते हैं नर का नर से और नारी का नारी से विवाह हो समता है और उससे भी दाम्पत्य-जीवन की आवश्यकतायें पूरी हो सकती हैं। जनखे संसार में बहुत बड़ी संख्या में हैं और वे पुरुष होते हुए भी नारी का स्थान ग्रहण करते हैं। आवश्यक नहीं कि इसके लिए एक नर एक नारी बने। दोनों ही नर की स्थिति में रहकर जीवन व्यवस्था के हर पक्ष में सहयोगी रह सकते हैं। इसी प्रकार नारियाँ भी स्नेह-सूत्र में बँध कर ऐ दूसरे की साथी सहयोगी रह सकती हैं।
इस स्तर के प्रयोग भी पाश्चात्य देशों में हो रहे हैं। उन्हें देखकर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया जा रहा है कि तीनों प्रक्रियायें सहज, सरल, उपयोगी एवं व्यावहारिक हैं।
अमरीकी ‘साइन्स डाइजेस्ट’ में रोपल विश्वविद्यालय के डेन ब्राइन का एक लेख छपा है जिसमें उन्होंने अफ्रीका के कई ऐसे संगठनों का हवाला दिया है जो महिलाओं की परस्पर शादी कराने की कानूनी पृष्ठभूमि बनाने में सहायता करते हैं। वहाँ हर वर्ष ऐसे सैकड़ों वैध विवाह होते हैं जिनमें वर और और वधू दोनों ही नारियाँ होती हैं। लेखक का कथन है कि नारियों में यह प्रवृत्ति सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता का उपभोग करने की दृष्टि से पनपी है।
नारी मुक्ति आन्दोलन अब विश्वव्यापी होता जा रहा है उसका एक नारा यह भी है कि-“क्यों नर मौज उड़ाये और क्यों नारी यातना सहे ?” वे कहती हैं दोनों को समान यातना सहने या मौज करने का अवसर मिलना चाहिए। उस आन्दोलन की सदस्याओं ने नारी समाज में प्रचलित समस्त श्रृंगार साधनों का बहिष्कार कर दिया है वे कहती हैं कि नर-नारी के बीच वेष-विन्यास, पोशाक हाव-भाव आदि की कोई भिन्नता न रहने देनी चाहिए। नारी को नारी से विवाह करके जीवनयापन करने की प्रेरणा इस आन्दोलन ने दी है।
जनसंख्या विचारकों की दृष्टि से इस आन्दोलन में जनसंख्या नियंत्रण की सभी किरणें मौजूद हैं भले ही इससे वर्तमान समाज व्यवस्था में गड़बड़ी उत्पन्न हो। वे कहते हैं वस्तुतः उत्पादन नारी करती है। नर तो योगदान मात्र करता है यदि मूल उत्पादक उसे खतरा समझने लगे और उससे बचने लगे तो समस्या सहज ही हल हो जाती है वे पुरुषों की अपेक्षा नारी समाज को प्रजनन की हानियों से परिचित कराने पर और निःसन्तान रहने की सुविधाओं की ओर आकर्षित करने पर बहुत जोर देते हैं। इस दृष्टि से उन्होंने नारी मुक्ति आन्दोलन के उस पक्ष का समर्थन किया है जिसमें महिलाओं को सन्तानोत्पादन से बचने के लिये का गया है।
ऊपर की पंक्तियाँ ध्यान पूर्वक पढ़ने से हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि बढ़ता हुआ सन्तानोत्पादन वस्तुतः एक विश्व संकट है उस पर नियंत्रण किया ही जाना चाहिए। वह स्थिति न आने देनी चाहिए कि अवैध और अनैतिक उपायों तक को स्वीकार करने के लिये विवश होना पड़े। समय रहते हम स्वेच्छा सन्तानोत्पादन को निरुत्साहित करें। नैतिक मार्ग पर चलते हुए-वर्तमान समाज व्यवस्था को स्थिर रखते हुए-संयम, सदाचार का पालन करते हुए हम प्रजनन को घटा सकते हैं। पिछड़े हुए निम्नवर्ग में संतानोत्पादन को सौभाग्य माना जाता है और उसके लिये उन्हें लालायित पाया जाता है। सन्तान न होने पर दूसरा विवाह करने की बात सोचते हैं- दुखी रहते हैं- तरह-तरह के उपाय करते हैं- वंश चलने की, पिण्डदान की मूढ़ मान्यताओं पर विश्वास करते हैं। उत्तराधिकार के लिए गोद लेने की बात सोचते हैं। इन लोगों को समझाया जाना चाहिए, कि सन्तान न होना ईश्वर प्रदत्त सौभाग्य और वर्तमान स्थिति में समाज द्रोह से सहज ही बचे रहने का सुअवसर है। जो अब तक कई सन्तानें पैदा कर चुके हैं वे तुरन्त उस पर नियंत्रण करें। जिनके अभी बच्चे नहीं हैं वे अपनी शक्तियों को विश्व संकट में बढ़ावा देने की अपेक्षा किसी उपयोगी कार्य में खर्च करें। सन्तानोत्पादन के हर्षोत्सवों का भी मृतक भोज की तरह बहिष्कार किया जाय। क्योंकि वह वस्तुतः खुशी का नहीं रंज का अवसर है कि विश्व संकट पर एक वजन और लद गया।
कामुकता के विचारों को कला की ईश्वर भक्ति की, परमार्थ की दिशा में मोड़ा जा सकता है इस परिष्कार से आनन्द, उल्लास का अधिक उपयोगी और ऊँचा स्तर प्राप्त हो सकता है। पति-पत्नी भी निर्विकार स्नेह सौजन्य के आधार पर मधुर दाम्पत्य-जीवन जी सकते हैं। हमें ऐसे ही नैतिक उपायों से प्रजनन रोकने की बात सोचनी चाहिए अन्यथा बढ़ता हुआ विश्व संकट जब जीवन-मरण की स्थिति में पहुँचेगा तो उन उपायों को भी स्वीकार करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा जो आज अनैतिक और अवाँछनीय प्रतीत होते हैं और किसी प्रकार गले नहीं उतरते।
लोग इस बात का ताना-बाना बुनते रहते हैं कि किस तरह जिया जाना चाहिए, यह पर कोई बिरले ही सोचते हैं कि क्यों जीना चाहिए ? जीवन के प्रति हमारा दृष्टिकोण स्पष्ट होना चाहिए। लक्ष्य विहीन जिन्दगी हवा में उड़ते हुए पत्तों की तरह दिशा विहीन इधर-उधर छितराती रहेगी और उसका न तो कुछ प्रतिफल निकलेगा और न स्वाद मिलेगा।
ठाठ-बाठ के साधनों से अथवा अभाव ग्रस्त परिस्थितियों में रहने से जीवन तत्व के मूल्य में कोई कमी नहीं आती, शर्त एक ही है कि उसके पीछे कोई ऊँचा उद्देश्य और लक्ष्य रहना चाहिए।
विज्ञान ने अध्यात्म को अस्वीकृत कर दिया है। वह कहता है मनुष्य भी अन्य पदार्थों की तरह एक पदार्थ है। घास-पात की तरह उगता है सूख कर नष्ट हो जाता है। यही उनका आदि और यही उसका अन्त है। परलोक की, पुनर्जन्म की, कर्म-कल की बातें प्रमाण रहित हैं इसलिए उनके भय से उन कामों से हाथ नहीं रोकना चाहिए जो हमारी सुखानुभूति में सहायक होते हैं।
इस अस्वीकृति के दूरगामी परिणाम क्या होंगे यह तो समय ही बतायेगा, पर इतना आज भी प्रत्यक्ष है- कि समस्त मर्यादाओं को तोड़ कर उपभोग के लिए आतुर व्यक्ति प्रकृति के व बन्धन भी अस्वीकार कर बैठा जो उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को स्थिर बनाये रखने के लिए आवश्यक थे। फलतः आधि और व्याधि उसे अपने चंगुल में जकड़ती चली जा रही हैं। शरीर खोखले हो चले और मन का संतुलन बिगड़ कर रुग्णता का जिस तेजी से शिकार होता जा रहा है उसे देखकर विज्ञान द्वारा आविष्कृत चिकित्सा शास्त्र और आहार शास्त्र भी अपनी व्यर्थता स्वीकार करने लगे हैं। समाज को जो कुछ भुगतना पड़ रहा है वह और भी अधिक दुखद है। अपराध एक प्रकार से शानदार कृत्य बन चले हैं। चातुर्य और आतंक का परिचय देने वाला सराहा जाता है- क्योंकि उसने किसी भी प्रकार लाभान्वित होने में सफलता प्राप्त कर ली। यह प्रवाह समाज की उन नीवों को खोखला करता चला जा रहा है, जिस पर कि उसका विशाल भवन खड़ा किया गया था। व्यक्ति जब सज्जनता शालीनता और सद्भावना को प्रत्यक्ष लाभ में बाधक मानेगा तो उन्हें अंगीकार क्यों करेगा ? ऐसी दशा में निरंकुश उच्छृंखलता के लिए उसे खुली छूट मिलेगी ही चतुर व्यक्ति इस नये आधार को अपनाकर तत्काल किसी कदर लाभान्वित हो भी सकता है पर संसार में से वे आधार उठे जा रहे हैं जिन्हें प्रेम, विश्वास, सद्भाव, सौजन्य एवं आत्म-भाव आदि नामों से पुकारा जाता रहा है। चूंकि यह सब अप्रत्यक्ष है इनके द्वारा तत्काल इन्द्रिय-सुख मिलता दिखाई नहीं पड़ता। ऐसी दशा में उन्हें अपनाने की मूर्खता करने के लिए कोई तैयार नहीं। परिणाम स्पष्ट है मनुष्यों को परस्पर सघन सहयोग के बन्धनों में बाँधे रहने वाले-उदार परंपराएं बनाये रहने वाले सभी सूत्र क्रमशः टूटते जा रहे हैं। परिवार तक उसकी लपेट में आ गये। पति-पत्नि, भाई-भाई, पिता-पुत्र, भाई-बहिन के पवित्र सम्बन्ध अब क्रमशः उपयोगिता के आधार पर, उतनी सीमा तक, उतने समय तक स्वीकार किये जाते हैं जब तक उनसे सबल पक्ष को लाभ दिखाई देता है। दुर्बल का भार वहन करके कोई अपने को घाटे में क्यों रखें ? इस सूत्र से परिवार के जिन दुर्बल सदस्यों को पोषण मिलता था वह अब बन्द होता चला जाता है। बालक, वृद्ध, बीमार, दुर्बल, कुरूप, अपंग, कम कमाने वाले, मन्द बुद्धि सदस्य अब परिवार में पोषण एवं स्नेह, सहयोग प्राप्त करने के अनाधिकारी बनते जाते हैं। उन्हें अपनी मौत मरना पड़ता। सम्पन्न देशों की सरकारें उस पिछड़े वर्ग का भार उठा लेती हैं पर भारत जैसे गरीब देशों की सरकारें वैसा भी नहीं कर सकतीं। ऐसी दशा में उन्हें अनाथ और अपंगों की दुर्दशा में दम घुटने की यंत्रणा सहते हुए जीवित मृतकों की पंक्ति में खड़ा होना पड़ता है और जब तक मौत स्वीकार न करे तब तक साँस लेते रहना पड़ता है। बेशक, सबल पक्ष को अपना भार हलका लगता है और वह अधिक सुखोपभोग कर सकता है।
समाज जिस आधार पर ‘समाज’ कहा जाता था वह मूल्य अब ध्वस्त हो रहे हैं। अब हम भीड़ में, मेले में, रह रहे हैं जहाँ चेहरे तो बहुत दीखते हैं उनमें से कितने ही आकर्षक भी लगते हैं पर इनमें अपना कोई नहीं-सच तो यह है कि कोई किसी का नहीं। शुष्क शिष्टाचार अब सभ्यता का अंग भर रह गया है। थेंक्यू, ओ.के. प्लीज, सौरी आदि रटे रटाये शब्द जीभ की नोंक पर नाचते रहते हैं। वे कितने ही नीरस, कितने बनावटी, कितने बाजारू होते हैं यह देखते ही बनता है। लाइन में खड़े होना- समय की पाबन्दी, सफाई आदि कई तरीके ऐसे भी हैं जिन्हें पसन्द किया जाना चाहिए और समय की विकसित सभ्यता का नाम दिया जाना चाहिए। इससे आगे गहराई में उतरेंगे तो सूनापन, खीज, आशंका, अनिश्चितता, अविश्वास और एकाकीपन से ही हर व्यक्ति का अन्तःकरण घिरा होगा वह अनाथ सभीत मृग शावक की तरह चारों ओर नजर उठाकर अपने को शेषकों से ही घिरा देखेगा। ऐसे मरुस्थल में उसे अपना अस्तित्व फँसा धँसा दिखाई देगा, जहाँ उसका अपना कोई नहीं है, जहाँ कठिन समय में वह किसी से किसी प्रकार के सहयोग की आशा नहीं कर सकता।
अपराधों की प्रवृत्ति बेतरह बढ़ रही है। अनपढ़ लोग उसे फूहड़ ढंग से करते हैं और चतुर लोग उसे चातुर्य का रंग चढ़ा कर प्रयोग में लाते हैं। खाद्य पदार्थों में मिलावट, कम तोलना, उठाईगीरी जैसे धन्धे निचले वर्ग के लोग करते हैं। ऊपर के लोग इसमें लाभ कम और बदनामी अधिक देखते हैं इसलिए वे ऐसे जाल बुनते हैं जिनमें एक साथ ढेरों पकड़ा जा सके एक-एक मछली पकड़ने के लिए धूप में बाँस की वंशी पकड़े बैठे रहना उन्हें मूर्खतापूर्ण लगता है। वे बड़े हैं इसलिए बड़ा लाभ कमाने के लिए बड़ी दुरभिसन्धि रचते हैं। अब अपराध एक फैशन है जिसे अपनाकर कोई लज्जित नहीं होता वरन् अपनी उद्दण्ड चतुरता की दाद मिलने की आशा करता है। जो अपराध न कर सके वह बुद्धू, प्रतिगामी, डरपोक आदि न जाने क्या-क्या नाम धराता है। इन परिस्थितियों में वह सामाजिक शालीनता कैसे जीवित रह सकती है, जिसके आधार पर उसके सदस्य कर्तव्य परायण नागरिक, आदर्शवादी उदार चेता एवं महामानव उत्पन्न होते थे और सर्वतोमुखी प्रगति का, सुख-शान्ति भरा सतयुगी वातावरण उत्पन्न करते थे। अवाँछनीय सामाजिक परिस्थितियाँ केवल अनैतिक स्तर के व्यक्ति ही पैदा कर सकते हैं। यह प्रत्यक्ष है, बड़े आदमी बढ़ रहे हैं और महामानव अदृश्य होते चले जा रहे हैं। अब ऐसे व्यक्तियों को ढूंढ़ निकालना दुष्कर है जिन्हें सच्चे अर्थों में आदर्शवादी कहा जा सके। धूर्त, दुष्ट, विलासी और अपराधी प्रवृत्ति के लोग जिस समाज में भरे होंगे उसकी स्थिति कितनी दयनीय हो सकती है इसे हम प्रत्यक्ष देख सकते हैं।
विज्ञान ने हमें अगणित उपलब्धियाँ प्रदान की हैं। सुख-साधनों के पर्वत सामने खड़े कर दिये हैं फिर भी व्यक्ति को निराश, हारा, टूटा और व्यथित ही देखा जाता है। समाज के सामने इतनी बड़ी कठिनाइयाँ, समस्याएं, उलझनें, विभीषिकाएं, विकृतियाँ खड़ी हैं कि राजनेता यहाँ किंकर्तव्यविमूढ़ हो चले हैं, सुधार और सुव्यवस्था के उसके सारे प्रयास निष्फल होते जा रहे हैं। वे समझ नहीं पाते कि सुरक्षा और सुव्यवस्था की गुत्थी कैसे सुलझाई जाये। रस्सी को दो हाथ जोड़ते हैं, चार हाथ टूट जाती है।
कैसी विडम्बना है कि सुखोपभोग के प्रचुर साधनों के साथ-साथ सार्वभौमिक भय और अविश्वास का आतंक भी बढ़ता चला जा रहा है। एक ओर प्रसन्नता देने वाली वस्तुएं जमा हो रही हैं दूसरी ओर सर्वभक्षी विभीषिकाएं हमारे अस्तित्व को निगल जाने के लिए मुँह फाड़े खड़ी हैं।
क्या यही स्थिति बनी रहेगी ? हम असहाय की तरह महाविनाश के गर्त में इसी गति से बढ़ते चले जायेंगे ? हमारा विश्वास है कि ऐसा नहीं हो सकता अतीत का इतिहास बताता है कि मानव जाति के सामने ऐसे अनेकानेक अवसर आये हैं जिसमें उसके सामने महाविनाश के संकट उत्पन्न हुए हैं और अस्तित्व की चुनौती आई है। ऐसे हर अवसर पर मनुष्य की आत्मा ने अपनी तेजस्विता का परिचय दिया है और प्रवाह को उलट कर नया मोड़ दिया है। भगवान के अवतारों से लेकर सुधारवादी एवं क्राँतिकारी महापुरुषों तक की समस्त गतिविधियाँ इसी प्रयोजन के लिए प्रादुर्भूत हुई हैं कि अवाँछनीयता की चुनौती स्वीकार की जाय और पतन को उत्थान में उलट दिया जाय। इतिहास में ऐसे अगणित अवसर विद्यमान हैं जिनमें प्रचण्ड असुरता के कराल काल जैसे दिखने वाले दाँत और नाखून तोड़कर रख दिये गये हैं और कालिया नाग को नाथ कर उसे निर्विष खिलौना मात्र बना दिया गया है।
विज्ञान एवं बुद्धिवाद भूतकाल में भी रहा है। उसका स्वागत, समर्थन और उपयोग यथोचित रीति से किया गया है, पर ध्यान रखा गया है कि इस आग को स्वच्छन्द न छोड़ा जाय इसे ससीम रखा जाय और सदुपयोग के लिए ही प्रयुक्त किया जाय। आज की भूल यह हुई कि धर्म और अध्यात्म के इस अंकुश को ही तोड़ दिया गया जिससे कि भौतिक प्रगति के मदोन्मत्त गजराज को काबू में रखा जाता था और उससे शानदार प्रयोजनों को पूरा कराया जाता था। अब यह निरंकुश गजराज अपने विराने का बिना ध्यान रखे सब कुछ कुचल डालने के लिए आकुल व्याकुल हो रहा है।
मनुष्य आखिर ‘मनुष्य’ है वह सहज ही मरण स्वीकार नहीं करेगा। भूल को समझना और सुधारना उसकी सहज प्रकृति है। आवेश में कई बार वह कुपथ पर भी चल लेता है पर जब कांटे लगते हैं और मार्ग अवरुद्ध दीखता है तो लौटने में भी संकोच नहीं करता। अगले दिनों यही होने जा रहा है। निरंकुश विज्ञान ने अपनी चमत्कार दिखा दिया और उसका परिणाम देख लिया। अब ज्ञान की पारी है। उसका प्रभाव भी अगले दिनों देखने को मिलेगा। बागी हाथी को पकड़ने के लिए प्रशिक्षित हाथी भेजे जाते हैं। भोगवादी, नास्तिकता समर्थक बुद्धिवाद को तत्वज्ञान के उस दिग्गजों द्वारा दबोचा जायेगा जो ऐसे आपत्ति काल आने पर विसंगतियों का शमन करने के अभ्यस्त रहे हैं।
भौतिकवादी उच्छृंखल बुद्धिवाद की टक्कर में अगले ही दिनों आदर्शवादी तत्वज्ञान की सेनाएं खड़ी होंगी। लगता है अगले ही दिनों एक प्रचण्ड तूफान ऐसे आन्दोलन के रूप में खड़ा होगा जिसे पुराने धार्मिक या अध्यात्म के नाम से न सही पुनर्निर्माण के अन्य किसी नाम से पुकारा जाय किन्तु आवश्यकता उसी प्रयोजन को पूरा करने की करेगा। भारतीय संस्कृति के नाम से न सही, विश्व संस्कृति या मानव संस्कृति के नाम से सही एक ऐसी पुनःस्थापना अवश्य होगी जिससे प्रस्तुत विषाक्तता का निराकरण हो सके। इस बिखरे हुए कालकूट को समेट कर अपने गले में भर लेने वाला कोई न कोई शिव अभियान अवश्य प्रकट होगा।
अन्धकार कहीं से भी क्यों न फैलाया गया हो, प्रकाश की किरणें सदा पूर्व दिशा से ही उदय हुई हैं। भारत एक देश नहीं, मानवी संस्कृति का एक सेतु है जिससे टकरा कर प्रत्येक तूफान को पीछे लौटना पड़ा है। अगले दिनों मानवी गरिमा को विनाश के गर्त से उबारने के लिए भारत अपनी महती भूमिका सम्पादित करेगा। भारत अपने नवोदय के रूप में फिर उभरेगा और वह देशकाल की समस्त सीमाओं को लाँघता हुआ विश्वव्यापी तपन को शान्त करने वाली अमृत वर्षा करेगा।
यह सपना नहीं एक तथ्य है कि अगले दिनों भारत अपनी खोई हुई आत्मा को पुनः कहीं न कहीं से खीज निकालेगा। इस पृथ्वी पर ऋषियों और देवताओं के वर्चस्व वाला युग पुनः अवतरित होगा - भारत अपने तत्वज्ञान का युगान्तरीय आविष्कार पुनः करेगा, यह आशा लगाये मानवता आज भी सजल नेत्रों से प्रतीक्षा कर रही है। यह विश्वास नहीं होता कि जो कुछ खो दिया गया वह पुनः प्राप्त न हो सकेगा। नव जागरण का प्रभात हमें यह आश्वासन देता प्रतीत होता है कि अन्धकार के अब पैर जमे न रह सकेंगे। संसार को ज्योर्तिमय आलोक से लाभान्वित होने का अवसर फिर आ गया।
दूसरों के क्या अनुदान विश्व मानव को मिले। इसका लेखा-जोखा रखना अन्य लोगों का काम है। भारत की आत्मा सदा की भाँति इन विषम परिस्थितियों में मूक दर्शक न रहेगी वह उभरेगी। भारतीय संस्कृति अगले दिनों विश्व संस्कृति के उस रूप में उभरेगी जिसके आधार पर मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न साकार हो सके।
जो व्यक्ति ऊँचे विचारों की सुखद संगति में रहते हैं, वे कभी अकेले नहीं हो सकते।
— फिलिप सिडनी
विश्वास मनुष्य का महत्वपूर्ण आलम्बन है। जीवन में उसे नानाविधि कठिनाइयों, समस्याओं, असुविधाओं से द्वन्द्व करना पड़ता है। आत्म-विश्वास ही उसे इस संकट से मुक्ति देता है। मनुष्य वही श्रेष्ठ माना जायेगा जो अपनी कठिनाइयों से अपनी राह निकालता है। आत्मविश्वास की पतवार लेकर उसे अपनी जीवन-नैया खेनी पड़ेगी, आँधी तूफानों से संघर्ष करने के लिए उसे अपना दिल मजबूत बनाना होगा, अपनी आत्मसत्ता को जागृत करना पड़ेगा।
जामवन्त ने पवनपुत्र के आत्म विश्वास को जागृत किया, जबकि सभी वानरी-व्यूह विशाल समुद्र को देख निष्प्रभ हो गये थे। इस परिस्थिति में ऋक्षराज जी ने हनुमान जी को सम्बोधन करके कहा - पवन-तनय तुम्हारा जन्म राम कार्य के लिए हुआ है तुम्हारा बल अथाह है इन प्रोत्साहन भरे शब्दों को सुनकर हनुमान “कनक भूधराकार शरीरा” हो गये। वे समुद्र लाँघकर जनकतनया-सीता का पता लाये। यही दुष्कर कार्य आत्मविश्वास के बल पर सामान्य गया।
आत्मविश्वास संसार में प्रायः महान कार्यों को जन्म देता है। महात्माजी का विश्वास कह रहा था कि स्वतन्त्रता हमें मिलकर रहेगी। इस आत्मविश्वास के बल पर वे सत्य, अहिंसा के अस्त्र को लेकर स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु स्वतन्त्रता संग्राम में कूद पड़े। अन्ततो गत्वा भारत माता की दासता रूपी बेड़ी को काटने में सफलता अर्जित की। लिंकन ने अथक प्रयास कर दासों को मालिकों के शिकंजे से मुक्त किया। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा था, “मैंने अपने भगवान को वचन दिया है कि दासों की मुक्ति के कार्य को अवश्य पूरा करूंगा।” इसी आत्मविश्वास ने कोलंबस को अमेरिका की खोज में सहयोग दिया था। नैपोलियन ने इसी शक्ति के आलम्बन पर अपने सेनापति से कहा था, “यदि आल्पस हमारा मार्ग रोकता है तो वह नहीं रहेगा और सचमुच उस विशाल पर्वत को काटकर रास्ता बना लिया गया।
विश्वास सफल जीवन का मूल मन्त्र है। महात्मा गाँधी ने कहा था - “विश्वास हमारी जीवन-नैया को तूफानी सागर में भी खेता है। विश्वास पर्वतों को डिगा देता है। विशाल सागर को लाँघ सकता है। विश्वास कोमल पुष्प नहीं है जो साधारण वायु के झोंके से गिर जाय। स्वेट मार्डेन ने लिखा है - “विश्वास जीवन के उस मार्ग की खोज करता है जो हमें मंजिल तक पहुँचाता है। राजा भगीरथ को गंगावतरण में इस आत्मविश्वास ने सफलता पहुँचायी थी।
आत्मविश्वास के समक्ष अभाव, अभिशाप दीनता, दारिद्रय निष्क्रिय हो जाते हैं। ये विषमतायें उसमें गत्यावरोध उपस्थित नहीं करतीं। संसार में ऐसी कितनी ही विभूतियों ने जन्म लिया है जो इन बाधाओं को ठोकर मारते हुए मंजिलों पर पहुँची हैं।
मनुष्य अपने व्यक्तित्व का निर्माता स्वयं है। उसके पास आत्मविश्वास का बहुत बड़ा सम्बल है। बढ़ई का कार्य करने वाला बिना औजार के दरवाजे चौखट आदि काष्ठ निर्मित चीजें नहीं बना सकता। उसी भाँति मनुष्य को अपने चरित्र, गुण एवं व्यक्तित्व निर्माण के लिए आत्मविश्वास आवश्यक है। कुछ लोगों में अच्छी शिक्षा अच्छा साधन, अच्छा ज्ञान होता है फिर भी उनको अपने कार्यों में सफलता इसलिए नहीं प्राप्त होती क्योंकि उनमें आत्मविश्वास की कमी है।
छोटी-मोटी असफलताओं पर ध्यान न देकर अपनी मंजिल की ओर बढ़ते जाना चाहिये। संसार का कर्णधार वही बन सकता है जिसमें आत्म-विश्वास है। नये मार्गों के शोधक भी वे ही व्यक्ति होते हैं। अतः आत्मविश्वास के महत्व को हृदयंगम कर उसमें प्रगति लाने के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।
हम एक लम्बी यात्रा के राहगीर हैं। बहुत दूर चल चुके, पर जो शेष पड़ा है वह भी कम नहीं है। लक्ष्य तक यथासमय पहुँचने के लिए वर्तमान गति को तीव्र करना होगा अन्यथा अनावश्यक विलम्ब होते चलने से हम पिछड़ते ही चले जायेंगे।
आत्मा अन्य प्राणियों का शरीर धारण करता हुआ मनुष्य योनि तक पहुँच पाया है। पिछले दिनों के खट्टे-मीठे अनुभवों को ध्यान में रखते हुए इस बहुमूल्य अवसर का सही सदुपयोग कर लेने का सौभाग्य उसे मिला है। पेट और प्रजनन तक की गतिविधियों में सीमाबद्ध जीवन-क्रम कितना सरस, कितना नीरस, कितना मृदुल, कितना कटुक, कितना सारगर्भित, कितना निस्सार होता है उसे पिछली पिछड़ी योनियों में जाना जा चुका है, अब उसी अनुभव को दुहराने की आवश्यकता हमें नहीं पड़नी चाहिए। मनुष्य जन्म को यात्रा के लक्ष्य तक पहुँचने में अधिक सहायक बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।
अपूर्णता से पूर्णता तक पहुँचना जीवन लक्ष्य है। इसी के लिए अनेक प्राणियों के शरीरों में ठहरते विरमते इस सुखद स्थिति तक पहुँचा जा सका है जहाँ से लम्बी छलाँग लगाई जा सकती है और मंजिल पूरी की जा सकती है। इस अवसर को इन्द्रिय लिप्सा और तृष्णा अहंता की उस निम्न स्तरीय पूर्ति में नष्ट नहीं किया जाना चाहिए जिनके लिए पिछले दिनों अनवरत प्रयत्न किये जाते रहे हैं और कुछ हाथ नहीं लगा है। बिजली की कौंध की तरह इन्द्रिय लिप्सा की पूर्ति का सुख क्षण भर को चमकता है और फिर पीछे के लिए गहरा अन्धेरा छोड़कर कहीं चला जाता है।
जन्म-मरण की जराजीर्णता और रुग्णता की रस्सियों में बँधा हुआ, जीवन-मरण के गर्त में जा गिरने के लिए किसी अदृश्य शक्ति द्वारा घसीटा जा रहा है। जिन्दगी का लट्ठा दिन रात की काले सफेद दाँतों वाली आरी से निरंतर चीरा जा रहा है। आज का अखण्ड, कल का खण्डित होना निश्चित है। नाटक का पटाक्षेप कब हो जाये - पता नहीं। ऐसी सर्वथा अनिश्चित परिस्थितियों में रहते हुए - धूप-छाँह जैसी नगण्य उपलब्धियों पर इतराना और तृष्णा, अहंता की तनिक-सी पूर्ति पर गर्वोन्मत्त होना बालबुद्धि का चिन्ह है। तृष्णा कब किसी की पूरी हुई है। किसी काम में थोड़ी सफलता मिली भी तो आग में घी पड़ने की तरह ललक और भी चौगुनी-सौगुनी बढ़ती है और अभिलाषा की आग पहले से भी अधिक प्रज्ज्वलित हो जाती है।
शरीर को गलाते चलने वाली वासना और मन को जलाते रहने वाली तृष्णा की ही पूर्ति करना अभीष्ट हो तो मनुष्य जन्म सबसे निरर्थक है। अन्य योनियों में इन दोनों की आवश्यकता स्वल्प रहती है और आसानी से पूरी हो जाती है। मनुष्य की अधिक चैतन्य मनःस्थिति भोग और संग्रह के लिए अधिक लालायित रहती है और उनकी पूर्ति सीमित साधनों से सम्भव नहीं होती। अतएव अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य को अधिक असन्तुष्ट-उद्विग्न रहना पड़ता है। इस दृष्टि से विचार करने पर तो लगता है अन्य प्राणियों का जीवन - क्रम अधिक शान्त सन्तुष्ट है। आकाँक्षाओं की न्यूनता और उपलब्धि की सरलता से वे अपेक्षाकृत अधिक सुखी रहते होंगे।
मनुष्य जीवन का लक्ष्य सुख सम्पादन नहीं आनन्द की प्राप्ति है। इसे आत्मबल का परिणाम कह सकते हैं। आत्मबल सम्पन्न आनन्दी उत्साह से भरा अन्तःकरण ही उच्चस्तरीय चिन्तन और श्रेष्ठ कर्तृत्व अपना सकता है। इन्हीं दो साधनों के सहारे अपूर्णता को पूर्णता में परिणत करने का अवसर मिलता है और जीवन लक्ष्य पूरा होता है। लम्बी यात्रा इसी सफलता की प्राप्ति के लिए करनी पड़ती है जब तक गन्तव्य स्थान तक नहीं पहुँच जाते तब तक अशान्ति में ही भटकना पड़ेगा।
यात्रा को सफलतापूर्वक सम्पन्न करने की दृष्टि से मनुष्य जीवन की विशिष्ट स्थिति को ध्यान में रखना होगा और उसके सदुपयोग के लिए अधिक तत्परतापूर्वक कटिबद्ध होना होगा। यहाँ प्रमाद बरतने से - उस सौभाग्य से वंचित हो जाना पड़ेगा जो इन दिनों थोड़ी सतर्कता बरतने पर सहज ही उपलब्ध किया जा सकता है।
बुद्धिमान यात्री रास्ते के मनोरम दृश्यों को देखते भर हैं उनसे मोहित नहीं होते। मोहित होने पर तो उन्हीं में रमने का जी करेगा और उन खेल-खिलौनों में उलझ जाने से गंतव्य स्थान तक पहुँचना कठिन हो जायेगा। मार्ग में कितने ही राहगीरों से परिचय होता है और उनमें से कोई-कोई घनिष्ठ भी बन जाते हैं। जहाँ तक सौजन्य का प्रश्न है सभी से सद्भावना रखी जानी चाहिए, उस सद्भाव विस्तार में साथ चलने वाले राहगीरों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। यहाँ तक सब कुछ ठीक है, पर जब इन राहगीरों के साथ इतनी घनिष्ठता जोड़ली जाय कि उनके पीछे चलकर अपना गन्तव्य ही याद न रहे तो उसे अबुद्धिमत्तापूर्ण ही कहा जायेगा।
जीवन यात्रा के मार्ग में कहीं मीठी, कहीं कड़ुई वस्तुएं तथा परिस्थितियाँ मिलती ही चलेंगी उन्हें देखना, समझना चाहिए। उनका उपयोग भी करना चाहिए और अनुभव भी लेना चाहिए। पर यह सब कर्तव्य और औचित्य की परिधि में ही किया जाना चाहिए। सुखद स्थिति को देखकर उसी में रम जाने की - प्रिय व्यक्तियों को देखकर उन्हीं के हो जाने की बालबुद्धि नहीं बरतनी चाहिए अन्यथा लक्ष्य तक पहुँचना कठिन हो जायेगा। व्यामोह के जंजाल में - पैर फँसा बैठने पर गन्तव्य की प्राप्ति कठिन हो जायेगी।
वस्तुओं का लोभ और प्राणियों में मोह रहने की प्रकृति हमें इसलिए मिली है कि अधिक अभिरुचि और अधिक तत्परता के साथ उन्हें सम्भाला सँजोया जा सके। यदि प्रयोग के लिए मिली वस्तुओं में ममता न हो तो उनकी साज-सम्भाल न हो सकेगी और वे उपेक्षापूर्वक जहाँ-तहाँ बिखरी पड़ी रहेंगी। लोभ वृति इसीलिए मिली हैं कि हर व्यक्ति अपने उपयोग की वस्तुओं की ठीक तरह रुचिपूर्वक व्यवस्था रखें। यही बात मोह के सम्बन्ध में है। जिनके साथ पारिवारिक या सामाजिक सम्बन्ध जुड़े हुए हैं उनकी सेवा सहायता करने में उपेक्षा बुद्धि उत्पन्न न हो जाये इसलिए परमात्मा ने इस सम्बद्ध परिकर को मोह-बन्धनों में बाँधा है। जहाँ अपनापन जितना गहरा होता है वहाँ सेवा, साधना अधिक अच्छी तरह बन पड़ती है। जिम्मेदारी अधिक सतर्कतापूर्वक निभ जाती है। मोह न हो तो सम्भव है एक दूसरे के साथ सहयोग और सद्भाव उतना न बरते जितना बरता जाना चाहिए। यही है लोभ और मोह का उपयुक्त प्रयोजन। औचित्य की सीमा में यह दोनों ही प्रवृत्तियां अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं।
इन्हें निन्दनीय और हानिकारक तब ठहराया जाता है जब वे मर्यादा का उल्लंघन करके अति के क्षेत्र में प्रवेश करती हैं। उपलब्ध की वस्तुओं के प्रति - धन सम्पदा के प्रति यदि लालच इतना अधिक बढ़ जाय कि उन्हें अधिक संग्रह करने की ललक लगी रहे और सदुपयोग करने की बात चित्त से उतर जाये तो समझना चाहिए कि लोभ निन्दनीय बिन्दु तक पहुँच गया। इस स्तर तक पहुँची हुई लिप्सा अनीति उपार्जन पर उतर आती है और उसका उचित उपयोग होने से कृपणतापूर्वक रोकती है। लोभ की आसक्ति ऐसी लौह शृंखला होती है जिसमें बंधा हुआ मनुष्य न तो मानवोचित कर्तव्यों का पालन कर पाता है और न लक्ष्य की ओर बढ़ सकने में सफल हो पाता है।
मोह की अति का दुष्परिणाम और भी अधिक भयावह है। जिन व्यक्तियों को अपनी संपत्ति मान लिया जाता है उनके प्रति असन्तुलित व्यवहार होने लगता है। या तो स्त्री, बच्चों को इन्द्र जैसे सुख-साधनों से लाद देने की ललक रहती है या फिर उनके अवज्ञाकारी निकले पर सिर काट लेने जैसा क्रोध आता है। यह न बन पड़े तो फिर अपना ही सिर फोड़ने को जी करता है। दोनों ही प्रकार की मनःस्थिति अतिवादी है। इससे मोह पात्रों को दुहरी हानि होती है। उनको विलासी वैभव का अमर्यादित उपभोग करने का लाभ मिलते रहने में उनकी आदतें बिगड़ती हैं और जीवन संग्राम में जूझते हुए प्रगति पथ पर बढ़ चलने की - प्रतिभा नष्ट होती है। यदि कड़े अनुशासन में बाँधा गया तो भी उनका मस्तिष्क एवं व्यक्तित्व दीन-दासता में जकड़ कर बेतरह कुचल जाता है और उसकी मौलिकता और व्युत्पन्न मति का ही अन्त हो जाता है। स्वतन्त्र चिन्तन और स्वतन्त्र पुरुषार्थ में चाहे खतरा ही क्यों न हो वह कठोर परावलम्बन की अपेक्षा कहीं अधिक उत्तम होता है। मोहग्रस्त अभिभावक अपने प्रियजनों के प्रति कभी न्याय नहीं कर सकते और न उनके स्वस्थ विकास में कोई महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।
लोभ की तरह ही मोह के बन्धन भी विकट हैं। उनमें भारी खिंचाव और भारी आकर्षण रहता है। कुछेक व्यक्तित्वों के लिए बहुत कुछ- सब कुछ करने सोचने की मनःस्थिति जहाँ होगी वहाँ इस परिधि से बाहर के कर्तव्यों का पालन बन ही नहीं पड़ेगा। समाज के प्रति हर व्यक्ति के कुछ कर्तव्य और उत्तरदायित्व हैं। उन्हें पूर्ण किये बिना महानता का परिपोषण हो नहीं सकता। मोहग्रस्त व्यक्ति की दुनिया चन्द व्यक्तियों तक सीमित होकर रह जाती है। उन्हीं के लिए वह इतना मरता-खपता है कि अन्य किसी के सम्बन्ध में कुछ सोच सकने या कर सकने की गुंजाइश ही नहीं रहती। आसक्ति के साथ जुड़ा हुआ पक्षपात ऐसा विकट होता है कि समस्त जीवन रस को निचोड़ कर वह कुटुम्बियों के लिए ही खपा देने के अतिरिक्त अन्य किसी कार्य के लिए कुछ उपयोगी अनुदान प्रस्तुत करने ही नहीं दे सकता।
जीवन यात्रा का लक्ष्य स्थान मनुष्य जन्म की दहलीज के साथ जुड़ा हुआ है। यदि जागरुकता बरती जा सके और दूरदर्शिता का प्रयोग हो सके तो ऐसी सन्तुलित रीति- नीति अपनाई जा सकती है जिसमें शरीर निर्वाह, परिवार पालन करते हुए लक्ष्य की ओर अग्रसर बना सकने वाले क्रिया-कलापों को भी ठीक तरह अपनाया जा सके। उपलब्ध वस्तुओं का श्रेष्ठतम सदुपयोग और सम्बद्ध व्यक्तियों के साथ आदर्श कर्तव्य पालन को ध्यान में रखते हुए चला जाय तो धन का संग्रह तथा विलासी उपयोग न किया जायेगा और न अनीति उपार्जन की इच्छा होगी। यह उद्धत आचरण तो लोभ की अति से ही बन पड़ते हैं। परिवार के सम्बद्ध स्वजनों को स्वावलम्बी सद्गुणी बनाने की बात को प्रधानता दी जाय उनके लिए विलासी साधन जुटाते रहने की मूर्खता न बरती जाय तो घर खर्च मितव्ययितापूर्वक अच्छी तरह चलेगा और सभी छोटे-बड़े उपार्जन तथा बचत से योगदान देकर अर्थ तन्त्र को सही रखेंगे। इसमें उनके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का विकास लाभ तो सुनिश्चित ही है। इन लाभों से वे ही परिवार लाभान्वित हो सकते हैं जिन पर मोहग्रस्तता की कालिमा ने काली चादर नहीं फैलाई है।
हमारी दृष्टि जीवन-यात्रा के गन्तव्य स्थल पर रहनी चाहिए। भूल नहीं जाना चाहिए कि हम ऐसे लम्बे मार्ग के पथिक हैं जिसे लगातार द्रुतगति से और सतर्कतापूर्वक चलते रहना ही उचित है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्यों की दो टाँगें ही इस यात्रा को पूरी करा सकती हैं। उन्हें लोभ और मोह के आक्रमण से बचाना चाहिए अन्यथा घायल होने पर वे चरण आगे बढ़ ही न सकेंगे और वह बहुमूल्य अवसर हाथ से चला जायेगा जिसे गँवा देने पर मात्र पश्चाताप से हाथ मलते रहने के सिवाय और कुछ शेष न रहे।
समझदार व्यक्ति अपने जीवन-लक्ष्य को पूरा करने के लिए निरन्तर प्रयत्न करता है। वह एक क्षण भी व्यर्थ नहीं जाने देता। एक-एक कदम आगे बढ़ाता चलता है, पर उसके हर कदम को सफलता चूमती ही हो, यह कोई अनिवार्य तथ्य नहीं है। कभी - कभी विफलता का मुँह भी देखना पड़ता है। इस असफलता से उस व्यक्ति को दुख तो होता है, बड़ी निराशा भी होती है, पर वह अपने कर्तव्य पथ से विचलित नहीं होता। वह सावधान जरूर हो जाता है। अपनी विफलता से यह प्रेरणा प्राप्त करता है कि उसे अधिक तत्परता के साथ कठोर परिश्रम करना चाहिए। ऐसे अवसरों पर लोगों को अपनी भूल सुधारने का अवसर मिलता है। यदि मनुष्य को पग-पग पर सफलता प्राप्त हो, तो वह अवश्य ही मदोन्मत्त हो जायेगा। ऐसा व्यक्ति फिर आगे बढ़ नहीं सकता। अवनति के गर्त में जरूर गिर जायेगा।
मनुष्य जो कार्य करता है, उसका परिणाम उसे अवश्य मिलता है। यह एक वास्तविकता है। कोई क्रिया होती है तो उसकी प्रतिक्रिया भी होती है जो कुछ कार्य किया जाता है, उसका प्रतिफल भी तो प्राप्त होता है, पर उस मनुष्य को उसका फल कब मिलेगा ? उसका परिणाम कितना होगा ? कैसा होगा वह - ये सब निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। उसे अपने कार्य में सफलता भी मिल सकती है और विफलता भी। ये दोनों ही बातें परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। कोई घुड़सवार कितनी देर में कितनी दूर पहुँच जायेगा ? इसका कोई एक उतर हो ही नहीं सकता। क्योंकि कई बातों से इस उतर का सम्बन्ध है। वह घुड़सवार घोड़े की सवारी में कितना कुशल है ? डरपोक तो नहीं है ? उसका घोड़ा तेज चलने वाला है अथवा मरियल टट्टू है। इन बातों की सही जानकारी होने पर ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वह घुड़सवार कितनी देर में अपनी मंजिल पर पहुँच जायेगा।
हम जो कार्य करते हैं उसे सफलता प्राप्ति की आशा से करते हैं। आशा ही क्यों, पूरे विश्वास के साथ करते हैं। उसमें सफलता प्राप्त होने पर साहसपूर्वक आगे कदम बढ़ाते हैं। किन्तु दुर्भाग्य से यदि उस कार्य में असफलता मिलती है तो बड़ा दुख होता है। मनुष्य का यह स्वभाव है कि इच्छा पूरी होने पर उसे सुख का अनुभव होता है और किसी प्रकार की कठिनाई आती है तो दुख होता है।
सफलता सुखदायी होती है। इसलिए हम उसे प्राप्त करना चाहते हैं। उसके लिए दिन-रात एक कर देते हैं। हमारी यह मनोकामना कब पूर्ण हो जायेगी ? इसका एक निश्चित उतर नहीं दिया जा सकता। उतर देने के पूर्व विभिन्न परिस्थितियों पर विचार करना पड़ता है। हमारा स्वभाव, सामयिक सूझ-बूझ, परिश्रमशीलता, पर्याप्त योग्यता, दूसरों की मदद, तत्कालीन परिस्थितियाँ, साधन का अच्छा या खराब होना, हमारी तत्कालीन उत्तरदायित्व, स्वास्थ्य आदि अनेक बातों से सफलता का सम्बन्ध है। ये सारी बातें हमेशा अनुकूल नहीं रहतीं। केवल प्रयत्न करके सफलता की आशा नहीं की जा सकती।
सफलता प्राप्त करने के लिए हमें भरपूर कोशिश तो करनी चाहिए, पर असफलता का दुख सहन करने के लिए भी तत्पर रहना चाहिए। उन्नति के मार्ग पर चलने वाले हर व्यक्ति को इनका सामना करना पड़ा है। दिन और रात की भाँति सफलता और विफलता का चक्र भी चलता रहता है। हमेशा सफलता की आशा करना नासमझी है। विवेकशील व्यक्ति ऐसा कभी नहीं सोचता। केवल सफलता की आशा करना और उसके न मिलने पर उदास होना ओछे और कमजोर लोगों का काम है। जीवन की बहुमूल्य शिक्षा यह है कि छोटी-मोटी सफलताओं से आनन्द में पागल न हो जावें और न ही असफलता को देखकर हिम्मत हारें। उसका भी स्वागत करें सफलता प्राप्त होने पर जैसी सुख-सुविधा की अनुभूति होती है वैसी ही विफलता से आत्म-सुधार और धीर-वीर बनने की प्रेरणा मिलती है।
योग-विज्ञान के प्रति संसार के प्रायः सभी प्रगतिशील देशों में इन दिनों भारी उत्साह है और उस दिशा में उत्सुकतापूर्वक खोज और प्रयोग के लिए प्रयास चल रहे हैं भौतिक जगत के बाहर कोई अध्यात्म शक्ति या चेतना नहीं है - कोई अध्यात्म नहीं है, जब तक यह निराशा छाई रही, तब तक का समय योग की उपेक्षा का समय था, पर अब जबकि भौतिक शक्तियों की तरह ही अध्यात्म शक्तियों की सता सामने स्पष्ट हो रही है तो स्वभावतः खोज का वह नया क्षेत्र होना ही चाहिए। व्यक्ति की कायिक और मानसिक चेतना के अंतर्गत एक अत्यन्त सुविस्तृत रहस्यमय क्षेत्र का अस्तित्व स्वीकार किया जा चुका है और यह स्वीकार किया जा चुका है कि यदि मानवी सता के इन रहस्यमय परतों का उद्घाटन किया जा सके तो मनुष्य में ऐसी असाधारण विशेषताएं प्रकट हो सकेंगी जैसी कि योगी और सिद्ध पुण्यों में बताई पाई जाती हैं। योग इन्हीं रहस्यमय शक्तियों को उभारने और उनका अभीष्ट उपयोग करने की महत्वपूर्ण विद्या ही तो है।
योग-दर्शन का एक और पक्ष है - मानसिक असन्तुलन को सन्तुलन में बदलना - अशान्त, उद्विग्नता को शान्त समस्वरता में परिणत करना। आज जीवन की समस्याएं इतनी उलझी हुई हैं कि मनुष्य को पग- पग पर क्षुब्ध, चिन्तित और उद्विग्न होना पड़ता है। पारस्परिक स्नेह, सद्भाव प्रायः घटते-मिटते चले जा रहे हैं। समाज की व्यवस्था मर्यादा टूट रही। झुण्ड और भीड़ मात्र में हम रह रहे हैं, समाज में जो सुरक्षा और प्रगति का वातावरण होना चाहिए वह तिरोहित होता चला जा रहा है। अपराध, असहयोग, शोषण और छल की बढ़ती हुई प्रवृत्तियों ने किसी को किसी का होने की स्थिति में नहीं छोड़ा है। एक दूसरे पर घात लगाये हुए और अपनी सुरक्षा के लिए चिन्तित रहकर ही प्रायः जन-जीवन व्यतीत होता है। ऐसी दशा में मनुष्य निरन्तर क्षुब्ध, संत्रस्त और आशंकित आतंकित ही रह सकता है।
यदा-कदा मानसिक उद्विग्नता के क्षण आते हैं तो स्वाभाविक जीवन-क्रम को तोड़-मरोड़कर रख देते हैं। यदि वैसी विक्षुब्ध स्थिति निरन्तर बनी रहे तो फिर क्या दशा होगी, क्या बीतेगी, इसका विवरण भुक्तभोगी ही दे सकते हैं। वैज्ञानिक, आर्थिक और बौद्धिक प्रगति ने सुख साधन कितने ही अधिक क्यों न जुटाये हों, निश्चित रूप से उसने मनुष्य की मानसिक स्थिति को मरघट जैसे वीभत्स वातावरण में रहने के लिए बाध्य कर दिया है। उन्नतिशील देश अनुभव करते कि एकांगी भौतिक प्रगति उन्हें बहुत महंगी पड़ी है। आध्यात्मिक आस्थाओं को गंवाकर उन्होंने जो खोया है वह प्रगति के नाम पर मिली चमक-दमक से कहीं अधिक मूल्यवान था।
विक्षोभ और असन्तोष के जाल-जंजाल में से निकलने के लिए निराशा का एक छोर है - हिप्पीवाद। जो अपने ढंग से पनप रहा है किन्तु चूल्हे में से निकलकर भाड़ में घुसने की तरह - नाश का इलाज महानाश से करने की तरह- उससे भी कुछ काम नहीं चलता। उसमें विक्षोभ और विद्रोह का प्रकटीकरण ही तो है समाधान नहीं। खीज का प्रकटीकरण ही तो समाधान नहीं है। मनुष्य अपनी जलन का - गुत्थी का हल चाहता है। इस दिशा में गहरा चिन्तन करने पर अध्यात्म की शरण में जाने का ही एकमात्र उपाय सूझता है। भूतकाल के ऋषि युग की सुख-शान्ति का उज्ज्वल इतिहास उन्हें समाधान के लिए अपनी ओर आने के लिए आकर्षित आमन्त्रित करता है। अस्तु भारतीय अध्यात्म की ओर उनकी प्रवृत्ति छाई हुई विपत्ति के अनुपात से तीव्रगति से उभर रही हो तो आश्चर्य की बात नहीं।
योग के सम्बन्ध में इन दिनों पाश्चात्य जगत में मारी दिलचस्पी है। इस सम्बन्ध में वे पुस्तकों की बहुत खोज-बीन करते हैं। भारत को वे योग का उद्गम केन्द्र मानते हैं। कोई विचारशील जैसा भारतीय उन्हें दिखाई पड़ता है तो योग की बात बड़ी दिलचस्पी के साथ पूछते हैं। उनकी भारत की लम्बी यात्रा करने का मुख्य प्रयोजन प्रायः योग सम्बन्धी जानकारी एवं शिक्षा प्राप्त करना ही होता है, इस स्थिति को चतुर लोगों ने भाँपा है। अस्तु भारत से पिछले दिनों तथाकथित योगियों का निर्यात बहुत ही उत्साहपूर्वक हुआ है। उन्होंने जहाँ-तहाँ योग-शिक्षा के सेन्टर खोले हैं और तनिक से प्रयास से आकाश-पाताल जैसी सफलताएं प्राप्त की हैं। इन दिनों विदेश में जाकर टूटी-फूटी योग शिक्षा देने लगना और योगाचार्य बन जाना बहुत ही सरल है। जिसने दस - पाँच योग की पुस्तकें उलट-पुलट ली हों और अंग्रेजी में बोलने का ठीक से अभ्यास कर लिया हो, इन दिनों योरोप और अमेरिका में ऐसे भारतीय योगियों द्वारा चलाये गये योग सेन्टरों की भरमार है। शिष्य लोगों की कौतूहलग्रस्त भीड़ उनमें धकापेल बनी रहती हैं।
यह अत्यन्त ही उपयुक्त अवसर था जबकि प्राचीन काल की तरह अध्यात्म का सही और सुसन्तुलित रूप विश्व को समझाया जा सकता था। लोगों को मरण के भंवर से उबार कर जीवन के तट पर पहुँचाया जा सकता था। अध्यात्म की गरिमा का वर्चस्व समझाकर भारतीय को जगद्गुरु का श्रद्धा सम्मान पुनः उपलब्ध कराया जा सकता था। यह मानवता की - ब्रह्मविद्या की महती सेवा साधना होती। इस युग की इसे एक महानतम दैन कहा जा सकता था, पर यह हो सब तभी सकता था जब हमारा दृष्टिकोण लोकरंजन नहीं लोकमंगल रहा होता। सस्ती और नकली चीजें अबोध बालकों के हाथों बेचकर अधिक पैसे कमाने वाले गली-कूचे में फिरने वाले फेरी वाले से अधिक ऊँची स्थिति हमारी होती। आज का बालक - मस्तिष्क सस्ती - जल्दी निपटने वाली और चमत्कारी चीजें चाहता है। योग के बारे में भी उसकी शिशु मान्यताएं इसी स्तर की हैं। जैसी माँग वैसा माल तैयार करने के लिए सिनेमा वाले, पुस्तक विक्रेता चित्र प्रकाशक जुटे हुए हैं और दोनों हाथों माल कमा रहे हैं। यदि वही मनोवृत्ति योग- शिक्षा में भी रहेगी तो आज का उत्साह कल ठण्डा ही पड़ेगा। ऊँची आशा दिलाकर आरम्भिक उत्साह जगाया जा सकता है यह ठीक है, पर यह उससे भी ज्यादा ठीक है कि कुछ ही समय में जो असफलता जन्य निराशा सामने आती है उससे उबरना फिर कभी भी सम्भव नहीं होता। योग को सस्ता और उथला बनाकर हम ब्रह्मविद्या की सेवा नहीं कुसेवा ही कर रहे हैं।
विदेशों में योग प्रचार का जो क्रम इन दिनों चल रहा है उसमें छोटी-मोटी शारीरिक और मानसिक कसरतें ही सीमाबद्ध होकर रह जाती हैं। आमतौर से अंकों को तोड़ने-मरोड़ने की क्रिया - आसन पद्धति को मार्डन योग का प्रमुख आधार माना गया है। योग सेन्टरों में वैसा ही कुछ शिक्षण चलता है। गहरी साँस लेने के कई तरीके उलट-पुलक कर प्राणायाम बता दिये जाते हैं। इससे आगे की दो मानसिक साधनाएं हैं। एक ध्यान की एकाग्रता मेडीटेशन - दूसरी स्वसंकेतन हिप्नोटिज्म। बस सारा योग इतने में ही समाप्त हुआ समझा जाना चाहिए। विदेशों में भारतीयों द्वारा चलाये जाने वाले योग सेन्टर इसी परिधि में चक्कर काटते हैं। क्रिया-कलाप और शिक्षा विधि में - कहने, समझाने के ढंग में थोड़ा अन्तर रहता है, पर तथ्य इसी सीमा में भ्रमण करता रहता है।
इस शिक्षा से यत्किंचित् लाभ भी होते हैं। आसनों के व्यायाम पाचन सम्बन्धी तथा दूसरी छोटी-मोटी शारीरिक कठिनाइयाँ हल करते हैं। प्राणायाम से फेफड़े खुलते हैं और स्फूर्ति का अनुभव होता है। मस्तिष्क की घुड़दौड़ घटाने वाला मेडीटेशन भी मानसिक विश्राम की आवश्यकता कुछ दूर तक तो हल करता ही है। हिप्नोटिज्म - स्वसंकेत - से अनियन्त्रित मानसिक प्रवाह को अभीष्ट दिशा में मोड़ने की थोड़ी सी सहायता मिल सकती है। बस इतना ही लाभ इस बचकानी योग-शिक्षा का है। बात को बढ़ाकर कुछ भी कहा जा सकता है और कहा भी जाता है।
योग और अध्यात्म को छुट-पुट शारीरिक, मानसिक व्यायामों तक सीमाबद्ध कर देना वस्तुतः उसकी गरिमा को नष्ट करना है और विश्व जिस आशा से मानवी समस्याओं के समाधान का हल अध्यात्म क्षेत्र से निकालने के लिए टकटकी लगा रहा है उसे हताश और निराश बना देना है। भारत के अध्यात्म क्षेत्र को इस दिशा में समय रहते सचेत होना चाहिए अन्यथा समय की माँग पूरा न कर सकने पर यह अवसर फिर सदा के लिए हाथ से चला जायेगा।
योग में शारीरिक और मानसिक व्यायामों के लिए - साधनात्मक कर्मकाण्ड के लिए भी स्थान है, पर उसकी मूल प्रवृत्ति चिन्तन के स्वरूप को - ऊँचा उठाना है। अपनी सता और दिशा को परिष्कृत करना है। पदार्थों और व्यक्तियों के प्रति दृष्टिकोण का परिमार्जन करना है। वस्तुतः योग एक दर्शन है। सर्वत्र आत्म-सत्ता की अनुभूति से विश्व मानव की - विश्व परिवार की भावना विकसित होती है और स्नेह-सौजन्य का उभार आता है। इसी पृष्ठभूमि में ममता और आत्मीयता घनिष्ठ होती है। चरित्र निखरता है। संयम और सेवा के लिए उत्साह उमंगता है। दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों की जड़ कटती है। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का आधार वे आत्मवादी आस्थाएं ही हो सकती हैं जिनकी प्रतिष्ठापना के लिए योग एवं अध्यात्म का सुविस्तृत कलेवर खड़ा किया है। अध्यात्म-ज्ञान और योग शिक्षा की पृष्ठभूमि में इसी परिष्कृत दार्शनिकता का प्रसार होना चाहिए। भौतिकता से विक्षुब्ध लोक-मानस को राहत, उन्हीं आस्थाओं की लोक-मानस में पुनः स्थापना से मिलेगी।
योग का बहिरंग रूप शारीरिक और मानसिक व्यायामों के रूप में सामने आये तो हर्ज नहीं। कर्मकाण्डों और साधना-विधानों को भी उसमें स्थान रहने की गुंजाइश है। पर यह भूल नहीं जाना चाहिए कि यह योग कलेवर है - उसका प्राण नहीं। प्राण तो उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की प्रेरणा देने वाले उपनिषद् प्रतिपादित उस अध्यात्म दर्शन में है जिसे प्राचीन काल में ब्रह्मविद्या कहा जाता था - जिसके आधार पर व्यक्ति अपनी सता का समष्टि में - समर्पण करता था। आत्मा को परमात्मा स्तर तक पहुँचाना - नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम, अणु को विभु - लघु को महान बनाना जिसका लक्ष्य था। चिन्तन स्तर की अन्तरंग उमंगें ही बहिरंग जीवन पर आच्छादित होती हैं। उन्हीं से परिस्थितियाँ बनती हैं, घटनाएं घटती हैं और दिशाएं मुड़ती हैं। अध्यात्म शिक्षा का उद्देश्य इसी भावनात्मक मानवी मर्मस्थल को परिष्कृत और सन्तुलित करना होना चाहिए। योग की - सार्थकता इसी प्रयास की सफलता के साथ जोड़ी आँकी जानी चाहिए।
खेद है कि विदेशों में भारतीयों द्वारा चलाये जाने वाले वर्तमान योग प्रचार में इन तथ्यों का अभाव है। उनमें बाल सुलभ चपलता और कौतूहल प्रियता की उथली तृप्ति मात्र है। सस्ते प्रयास से अधिकतम लाभ लेने की जुआ प्रवृत्ति के आधार पर जो खेल खड़े किये जा रहे हैं वे आरम्भ में बचकानी भीड़ इकट्ठी कर सकते हैं और हाथों हाथ सफलता का चमत्कार दिखा सकते हैं, पर यदि
उनमें उच्चस्तरीय दार्शनिकता का अभाव रहा तो वह प्रयोजन पूरा हो ही नहीं सकेगा जिसके लिए भौतिकता से विक्षुब्ध प्रगतिशील जन-मानस ने योग एवं अध्यात्म की ओर आशा लगाना आरम्भ किया है। अच्छा हो प्रगतिशील देशों में अध्यात्म प्रसार के स्वर्ण अवसर को हम गम्भीरतापूर्वक देखें और विश्व मानव की युग माँग को पूरा करने के लिए ऐसे कदम बढ़ायें जिससे अध्यात्म की गरिमा को पुनः प्राचीन काल जैसी सर्वोच्च श्रद्धा को विश्व-व्यापी बनाना सम्भव हो सके। इस अवसर को यदि हमने खिलवाड़ में गंवा दिया तो यह भारत के लिए - अध्यात्म के लिए और लोक-मानस के लिए दुखद दुर्भाग्य की ही बात होगी।
दुनिया की तीन मूर्खताएँ कितनी उपहासास्पद होते हुए भी कितनी व्यापक हो गई हैं, यह देखकर आश्चर्य होता है। एक यह कि लोग धन को शक्ति मानते हैं। दूसरी यह कि लोग अपने को सुधारे बिना दूसरों को धर्मोपदेश देते हैं। तीसरी यह कि कठोर श्रम से बचे रहकर भी आरोग्य की आकांक्षा की जाती है।
जो बागुड़ रक्षा करती थी, खेत उसी ने ही चर डाला। धर्म-विधान बना था,
हमको पाप-ताप से मुक्ति दिलाने। दुष्कर्मों से दूर हटाकर, सद्कर्मों की ओर बढ़ाने॥
आज धर्म व्यवसाय बन गया, आडम्बर की लगी दुकानें। स्वार्थ-सिद्धि के लिए धर्म ने धारण किये धर्म के बाने॥
संरक्षक, भक्षक बन बैठा, अन्धकार, बन गया उजाला। जो बागुड़ रक्षा करती थी, खेत उसी ने ही चर डाला॥
जन-मानस प्रेरित करने, साहित्य-सृजन अनुपम साधन था। जीवनभर साहित्य-साधना सरस्वती का आराधन था॥
सद्प्रवृतियाँ जाग्रत करना ही साहित्यकार का प्रण था। जन-मंगल के लिए समर्पित उसका सारा ही जीवन था।
पिला रहा है जन-मानस को वही वासना-विष का प्याला। जो बागुड़ रक्षा करती थी खेत उसी ने ही चर डाला॥
सामाजिक-विकास करने को बनी हुई थीं सभी प्रथाएं। सामाजिक-उन्नति में हाथ बंटाया करती थी मर्यादाएं॥
रीति-नीतियाँ थीं निर्धारित, जिनसे टलती थीं विपदाएं। निर्धन और धनी सबकी ही निभ जाया करती थीं क्षमताएं॥
बन बैठीं जब वे कुरीतियाँ पड़ गया पतन से पाला। जो बागुड़ रक्षा करती थीं खेत उसी ने ही चर डाला॥
मनुज, मनुज का दर्द मिटाने को इस दुनिया में आया था। वसुधा विहँस उठी थी, जिस दिन उसने मानव को पाया था॥
दीनों, दुखियों की दुनिया में आशा का अम्बर छाया था। घृणा, द्वेष से आहत घावों ने अपने को सहलाया था॥
अश्रु पौंछने वाले ने ही रुला दिया पर अश्रु न ढाला। जो बागुड़ रक्षा करती थी खेत उसी ने ही चर डाला॥
- मंगल विजय
दीपक जब आलोकित होता है तब अन्धकारमय वातावरण प्रकाश से जगमगा उठता है। गुलाब का फूल पूरे बगीचे में अपनी खुशबू बिखेरता है। वीणा में तार जब झनझनाते हैं तो मधुर स्वर लहरी फैलकर सुनने वाले के हृदय में आनन्द का सृजन करती है। इसी प्रकार यदि मनुष्य का मन गुलाब बन जाय तो सद्विचारों की सुगन्ध संसार में फैल जाय। यदि दीपक बन जाय तो दिव्य प्रकाश के रूप में वसुदेव कुटुम्बकम की भावना फैलेगी। मन वीणा में से जन-कल्याण की मधुर स्वर लहरी फूटेगी।
आत्मा आनन्द से भर उठता है तो जो भी उसके संपर्क में आता है, आनन्द प्राप्त करता है। आत्मा का आनन्द जब मन में उतरता है, तब उसे प्रेत कहते हैं। जब क्रिया रूप में परिणत होता है तो उसे अहिंसा की संज्ञा दी जाती है। अहिंसा आनन्द का मूर्तरूप हैं ‘जो विश्व के कण- कण में मिलकर उसे मधुर और मंगलमय बनाता है।’ हमारे मन की बुराइयां जब क्रिया का रूप लेती हैं तब हिंसा कहलाती हैं।
महात्मा गाँधी ने अहिंसा को बहादुर व साहसी व्यक्ति का शस्त्र कहा था। अहिंसक की कायरता उनकी दृष्टि में हिंसा से भी बदतर थी। उनका कहना था कि - अहिंसक का प्रथम कार्य अभय होना है। जहाँ तक हमारे में कायरता है, भय है, वहाँ तक हम सच्चे अहिंसक नहीं है।
संसार के जितने भी धर्म हैं सबकी आधार शिला अहिंसा है। हिंदुओं के मूल ग्रन्थ वेदों में स्थान-स्थान पर हिंसा की महत्ता प्रतिपादित की गई है। तुलसीदास जी महाराज ने भी कहा है - ‘परम धर्म श्रुति विदित अहिंसा’ महाभारत में भी अहिंसा को परम धर्म बताया है - ‘अहिंसा परमोधर्मस्तथा अहिंसा परमं तपः।
ईसाई धर्म की आधारशिला अहिंसा और प्रेम है। ईसाइयों के मूल ग्रन्थ बाइबल का उपदेश है कि कोई तुम्हें एक गाल में तमाचा लगावे तो दूसरा गाल उसके सामने कर दो। यह भी अहिंसा का एक गुण है। मुसलमानों के धर्म ग्रन्थ कुरानशरीफ में भी अहिंसा पर जोर दिया है ‘व मन् अह्या हाफक अन्नमा अह्यऽऽनास जमी अत्।’ जिसने किसी की जान बचायी उसने मानो प्रवर्तक मुहम्मद साहब कहा करते थे कि - ‘जानवरों पर भी रहम करो।’
बौद्ध व जैन धर्म तो अहिंसा के प्रचार के लिए ही स्थापित हुए। भगवान बुद्ध दया, ममता के सागर थे। और भगवान महावीर जो जैन धर्म के प्रमुख तीर्थंकर माने जाते हैं, उन्होंने तो साँप तक पर भी क्रोध नहीं किया। पारसी लोग होरमज्द की मानते हैं उनके प्रमुख ग्रन्थ अवेस में लिखा है कि ‘सबसे प्रेम करें, सबकी सेवा करें।’
यहूदियों को ईश्वर यहोबा है। यहोवा की दस आज्ञाएं हैं उनमें से एक आज्ञा है ‘तू किसी की हत्या मत कर’ ‘तालमुद ग्रन्थ में यहोवा के सम्बन्ध में लिखा है यहोबा परमदयालु है उसमें करुणा व प्रेम भरा है वह क्षमाशील है।’
चीन में बौद्ध धर्म के अतिरिक्तताओं धर्म तथा कनफ्यूश धर्म के अनुयायी हैं। कनफ्यूश धर्म के प्रवर्तक काँगफ्यूत्सी का कथन है ‘भाईचारा, प्रेम दूसरों के साथ वैसा व्यवहार मत करो जैसा कि तुम नहीं चाहते कि वे तुम्हारे साथ करें।”
इस प्रकार प्राचीन काल से लेकर अब तक जितने धर्म, जितने सन्त, जितने विचारक हुए हैं उन्होंने अहिंसा को ही आधार बनाया हमारी आजादी के मूल में महात्मा गाँधी का सत्य और अहिंसा ही थी। हमारे यहाँ तो अहिंसा की पग-पग पर प्रशंसा और आवश्यकता बतलाई गई है।
किसी को मार देना ही हिंसा नहीं है। भगवान महावीर ने किसी को मार देना स्थूल हिंसा कहा है। उनका कहना है कि किसी को मारना या जिलाना आपके हाथ में नहीं है। अन्तर जगत में किसी को पीड़ा या मार डालने के विचार आना भी हिंसा कहलाती है।
गीता द्वारा प्रतिपादित ब्रह्मविद्या के प्रमुख आधार अनासक्ति - योग में दो शब्द हैं - एक अनासक्ति और दूसरा योग। अनासक्ति निषेधात्मक और योग विधेयात्मक पद हैं। विषयों के प्रति आसक्ति का निषेध अनासक्ति है। केवल निषेध या अस्वीकृति से योजना पूर्ण नहीं होती। एक के परित्याग द्वारा रिक्त स्थान की पूर्ति हेतु कुछ की स्वीकृति आवश्यक है। असत् की अस्वीकृति के साथ सत् की स्वीकृति की प्रक्रिया चल पड़ती है।
योग का अर्थ है जोड़ना। कुछ अवाँछित, अनावश्यक जीर्ण के ध्वंस के भूमिका पर नव-निर्माण स्वाभाविक है। इसी प्रकृति की प्रक्रिया के ज्ञानपूर्वक अनासक्त चित्त को भगवान में जोड़ने की प्रवृत्ति योग है।
वस्तुतः विषय-भोग से निवृत्ति की क्रिया के साथ विराट् भगवान् की ज्ञान-भक्ति, कर्मपरक प्रवृत्ति की क्रिया का कुशलतापूर्वक ताल-मेल बिठाना ही अनासक्ति योग है।
प्रायः अनासक्ति का नितान्त गलत मायना लगाया जाता है। प्रचलित धारण के मुताबिक संसार से अलग हो जाना वैराग्य या अनासक्ति है। इसी तरह पारिवारिक सामाजिक तथा लौकिक-साँसारिक दायित्व की पूर्ति हेतु किये गये कर्म को आसक्ति कह देते हैं। इस मान्यता से निष्क्रियता- अकर्मण्यता की स्थिति उत्पन्न होती है।
प्रश्न यह है कि हमारी विवेक-बुद्धि जिम्मेदारी निर्वाह निमित्तक कर्म को ‘आसक्ति’ कैसे मान लें ? इस विषय में श्रीकृष्ण का मत सही उत्तर देता है। गीता का ‘मा कर्म-फल हेतु र्भूः’ “कर्म-फल के प्रति आसक्ति का निषेध करता है। अकर्म बुरा है - मा ते संगोंऽस्त्वकर्मणि। अकर्म में आसक्ति न हो, लेकिन कर्म तो स्वाभाविक धर्म है। बिना कर्म किये मनुष्य एक क्षी नहीं रह सकता। अतः कर्म-त्याग की चर्चा ही अवैज्ञानिक है।
वास्तव में अनासक्ति का सही अभिप्रायः कर्म-फल के त्याग से ही है। तभी तो गीताकार भगवान कृष्ण महाभारत के युद्ध के सर्वाधिक सक्रिय तत्व होकर भी अनासक्त रहते हैं। जय-पराजय, मानापमान, सुख-दुख आदि के द्वन्द्वों से परे रहना भगवान की एक दिव्य स्थिति है। यही है संसार में रहते हुए साँसारिक विषयों से अप्रभावित रहने की कला ‘अनासक्ति’।
मानव जीवन का परम लक्ष्य है पूर्णता। ‘पूर्णता’ भगवत्-प्राप्ति का आधार और स्वरूप भी हैं। भगवान के गुणों को ग्रहण करते हुए उनके सदृश बन जाना ही उनकी प्राप्ति अथवा उनका साक्षात्कार कहलाता है। यह उपलब्धि अनासक्ति - योग से सम्भव है।
इस योग की सम्पूर्ण साधना में लोकहित के लिए कर्म करते हुए स्वयं को फलासक्ति के मोह का पूर्ण परित्याग करना पड़ता है। अनासक्ति को साधन और उसे ही साध्य मानकर समस्त कर्तव्य किये जाते हैं। यही कारण है कि महात्मा गाँधी कहा करते थे - ‘हमें भगवान की प्राप्ति नहीं करनी है, बल्कि भगवान बनना है। जब तक मनुष्य भगवान नहीं बन जाता तब तक शान्ति नहीं प्राप्त होती।”
जहाँ तक भगवान बनने का सम्बन्ध है वह तो विगत जमाने के तीन महापुरुष शंकर, रामानुज और तिलक के ज्ञान-भक्ति-कर्म के योगत्रय की समवेत साधना पूर्ण अनासक्ति की प्राप्ति से ही सम्भव है। ज्ञानयोग से वैराग्य रूपी वैचारिक अनासक्ति, भक्तियोग से भावनात्मक अनासक्ति और कर्मचोग से विषय विकारों सम्बन्धी अनासक्ति प्राप्त होती है।
अतएव अनासक्ति को परम लक्ष्य या साध्य इष्टदेव मानने वाला पूर्ण मंजिल तक पहुँचने के लिए अपना कर्तव्य सम्यक् प्रकारेण पहले निश्चित कर लेता है। तभी सबसे प्रेम, सबकी सेवा, आत्मवत् सर्वभूतेषु का प्रयोग, समाज एवं वसुधा को कुटुम्ब मानकर अपने सर्वस्व का उनके हित समर्पण ही उसके जीवन का सहज व्यवहार बन जाता है।
पर्याप्त काल पर्यन्त एक लक्ष्य के प्रति नियमितता और निरन्तरतापूर्वक जुटे रहने पर मंजिल नजदीक आने लगती है। एक राह पर सतत् चलते रहने की स्थिति मात्र एक विलक्षण रस का सृजन करती है। उस रस-सागर में मानसिक अवगाहन से ही परमानन्द पीयूष-पान के विशिष्ट स्वाद की सुखद अनुभूति मिलती है।
परन्तु इसी बीच कर्मफल अपना रंग दिखाता ह। साधना पथ पर आरुढ़ कर्मठ तपस्वी को और कुछ मिले या न मिले, मान- बड़ाई की वर्षा होने लगती है। यही सबसे बड़ा बाधा, विघ्न या खतरा है। आने वाली शेष आपत्तियों का यही मूलाधार बन जाती है। कंचन कामिनी के त्यागी को भी मान-बड़ाई का आकर्षण पतन के गर्त में धकेल सकता है। इसकी भूल-भुलैया में जो पड़ा, उसी फिर खैर नहीं। उसकी शान्ति अशान्ति में और स्थिरता अस्थिरता में बदल जाती है।
इससे सिद्ध होता है कि सेवा के बदले मेवा पाने की प्रवृत्ति ही फलासक्ति का प्रतीक है। स्वार्थमय लक्ष्य कर्मफल की आकाँक्षा किम्वा फलासक्ति को जन्म देती है। मनोविज्ञान के अनुसार चेतन सत्ता की प्रवृत्तियां बुद्धि, इच्छा और भाव हैं। इनको निर्मल करने के उपरान्त चैतन्य सत्ता ही शेष रह जाती है, जिसे ‘आत्मोपलब्धि’ भी कहते हैं।
ज्ञानयोग द्वारा बुद्धितत्त्व, कर्मयोग द्वारा इच्छा तत्व और भक्तियोग द्वारा भाव तत्व की प्रवृत्तियों को निर्मूल करने का विधान है। इससे कर्मफल की कामना मिट जाती है। तब सहज ही समग्र दृष्टि केवल लक्ष्य पर केन्द्रित हो जाती है। यही सहज लक्ष्य तो अनासक्ति है।
इसी अनासक्ति को निष्काम कर्मयोग के रूप में साधन कहा गया है किन्तु दूसरी ओर यही अनासक्ति साध्य भी है। ‘अनासक्ति’ इष्ट की प्राप्ति या भगवत् साक्षात्कार का द्योतक स्वरूप है। निर्वाण, मुक्ति व मोक्ष ‘अनासक्ति’ की पूर्णतम उपलब्धि का ही नाम है।
एक फकीर ने जंगल में अपने लिए एक झोंपड़ी बनाई। इतनी छोटी - जिसमें वह एकाकी पैर पसार कर सो भर सके।
एक बार सर्दी के दिन थे। जोर की वर्षा हो रही थी। एक प्रहर रात बीत गई। कोई भूला-भटका राहगीर उधर आ निकला। वर्षा और सर्दी के कारण वह काँप रहा था।
झोंपड़ी के बाहर खड़े होकर उसने दरवाजा खटखटाया। सोता फकीर उठा और कारण पूछा। राहगीर ने अपनी कठिनाई बताई और कहा - रात काटने को यहाँ जगह मिल जाती तो अच्छा होता।
फकीर ने राहगीर को भीतर बुलाते हुए कहा - इस झोंपड़ी में एक आदमी के लायक सोने की जगह है पर बैठकर तो दो भी रात काट सकते हैं। सो आओ - मिल बैठकर रात काट लें।
एक घण्टा भी न बीतते पाया होगा कि किसी ने फिर दरवाजा खटखटाया। उसे खोला गया। पूछने पर मालूम हुआ कि वह भी कोई भूला -भटका राहगीर है और रात काटने के लिए आश्रय चाहता है।
फकीर ने उसे भी भीतर बुला लिया और कहा - झोंपड़ी में एक के लिए सोने की जगह थी। बैठकर हम दो गुजर कर रहे थे पर जब जरूरत ही आ पड़ी तो खड़े होकर हम तीनों भी रात काट लेंगे।
संसार में जितने भी जड़-चेतन पदार्थ हैं सभी अपूर्ण, विकार युक्त, हैं। कोई भी निर्विकार एवं पूर्ण नहीं हैं। फिर भी उसमें कुछ गुण अवश्य हैं। भले-बुरे तत्व सभी में विद्यमान हैं। केवल एक मात्र ब्रह्म परमात्म-सत्ता ही पूर्ण निर्विकार है।
मनुष्य इतना निकृष्ट दृष्टिकोण का है कि वह केवल एक कृष्ण पक्ष को ही ग्रहण करता है। दूसरों के दोष-दुर्गुण ही देखा करता है। अच्छाई उसे नजर नहीं आती क्योंकि उसने प्रतिगामी दृष्टिकोण का चश्मा पहिना है। जिस रंग का चश्मा आँखों पर चढ़ा होता है वैसा ही रंग इस दृश्य दुनिया का दिखाई देता है। एक बढ़ई एक पेड़ को इमारती लकड़ी, दार्शनिक विश्व चेतना और जड़ के सम्मिलित सौंदर्य, पशु भोजन तथा साधारण व्यक्ति केवल लकड़ी के रूप में देखता है।
हमारे मानसिक विचार ही बाह्य संसार के प्रति दृष्टिकोण के रूप में सामने आते हैं। हमारा दृष्टिकोण जैसा रहता है उसी के अनुसार हमें संसार दिखाई देता है। पुरोगामी दृष्टिकोण वाला संसार में अच्छाई देखकर मित्र समझता है। प्रतिगामी दृष्टिकोण वाली उसी संसार में बुराई देखकर शत्रु समझता है।
जिस दृष्टिकोण से वह देखता है उसी के अनुसार उसे सोचता है। उसे वातावरण भी उसी के अनुसार प्राप्त हो जाता है। बुराई देखने वाला अच्छी वस्तु को भी बुरी तथा अच्छाई देखने वाला बुरी वस्तु को भी अच्छा समझता है। एक चाकू को डाकू या हत्यारा पराक्रम में सहयोगी, चाकू का शिकार प्राणघातक तथा एक गृहस्थ स्त्री सब्जी काटने का उपकरण समझती है।
दुर्योधन और युधिष्ठिर से पूछा गया था कि सभा में कितने बुरे तथा कितने अच्छे लोग है ? दुर्योधन ने सभी को बुरा गया और युधिष्ठिर की दृष्टि से सभी अच्छे थे। इससे यह ज्ञात होता है कि हमारा दूसरों के प्रति दृष्टिकोण ही हमारे अन्तर की सच्ची भावना है। वह पूर्ण रूप से परिचय करा देती है कि कौन व्यक्ति किस तरह का है। हमारा बाह्य जीवन आन्तरिक भावों की छाया है। जिन राह से आन्तरिक जीवन गमन करता है बाह्य जीवन की छाया उसी पथ से अनुगमन करती है।
मनुष्य अपने लिये अपनी कब्र तैयार करता है।अपने इन छिद्रान्वेषी विचारों के द्वारा सारे संसार को अपना विरोधी देखकर भीषण आपत्ति, दुख, असन्तोष आदि प्राप्त करता है। यह अमृतमय संसार नीरस एवं वीभत्स लगता है। इसी परेशानी की उधेड़-बुन में उसका जीवन नरक के समान बन जाता है। गुणग्राही को यही नारकीय संसार अमृतमय, मित्र, सहायक दिखाई देता है। कठिनाइयों को शिक्षक, मार्गदर्शक, सद्गुणवर्धन की कसौटी और साथी मानता है। कठिनाइयों को सहर्ष सहकर उनसे गुण, शिक्षा और निर्देशन प्राप्त करता है।
जो प्रतिगामी होते हैं वे दूसरों के साथ लड़ने-झगड़ने, पीड़ित करने के आदी हो जाते हैं। जब उन्हें अपने विरोधी नहीं मिल पाते या स्वयं को असमर्थ पाते हैं तब स्वयं को ही परेशान कर आत्महत्या तक कर लेते हैं। अपना तन, मन, धन दूसरों की बुराई के लिए नष्ट कर देते हैं। प्रतिरोधी के प्रति नुक्ताचीनी का अवसर खोजते रहते हैं। इसी में अपने बहुमूल्य समय और धन का अपव्यय करते रहते हैं। अपने चारों और बुराई का कीचड़ उछालते रहते हैं। किन्तु भला मनुष्य दूसरों के सुख सम्वर्धन में अपना समय, सहयोग अर्पित कर भलाई की सुगन्ध बिखेरता रहता है।
यह संसार ईश्वर की कृति है। कहीं भी बुरा, गन्दा अपवित्र नहीं है। मंगलमय भावना की यह कृति मंगलमय है। मनुष्य के देखने का तरीका गन्दा हो जब चारों ओर गन्दा संसार देखकर दिन-रात बेचैन रहेगा। वह ईश्वर को, अपने भाग्य को सभी को गालियाँ देता है। सारा दोष उन पर लादता है। स्वयं को दुखी, अभागा, परेशान, संकटग्रस्त ही देखता है। अन्तर्वेदना सुनाते समय विश्व का सारा दुख, परिताप एवं अभाव अपने ऊपर ही लदा हुआ पाता है। इतिहास के पन्नों से पता चलता है कि सारे सुख एक साथ किसी के पास नहीं रहे। अभाव अवश्य रहा है।
जो विवेकशील, विचारवान होते हैं वे प्राप्त सुविधाओं के लिए ही ईश्वर को धन्यवाद देते हैं। स्वर्ग के समान सुख अनुभव करते हैं। कुछ अभाव एवं दुख कौतूहल लगते हैं। जो विकृत दृष्टि वाले होते हैं अनेकों सुविधाओं को कम मानते हैं। इस असन्तोष की धारा में अपने समय और बल का अपव्यय करके सुर-दुर्लभ जीवन को पशु के समान गंवा देते हैं। विवेकवान इस समय कठिनाइयों के हल करने में उपयोग करता है। कष्टों से छुटकारा पाकर सुखी बन जाता है। मकान में आग लगने पर रोने-धोने में समय खर्च न करके आग बुझाने के साधन जुटाकर अग्नि से रक्षा करेगा किन्तु बुरा व्यक्ति भाग्य को कोसता, रोता चिल्लाता ही दुख का सागर सिर पर बाँध लेगा तथा कुछ भी रक्षा नहीं कर पायेगा।
एक परीक्षा में अनुत्तीर्ण छात्र दुखी होकर आत्महत्या तक कर लेता है। किन्तु समझदार को अपनी स्थिति देखकर सन्तोष होगा। भविष्य में अच्छी पढ़ाई करने को तत्पर होगा। अपनी तुलना अभावग्रस्तों से करने पर हमें अपना जीवन सुखदायक प्रतीत होगा। कुछ आर्थिक कमी रहने पर आय के अन्य साधन ढूंढ़कर आय वृद्धि करेगा या खर्च कम करेगा। इन तरीकों से पूर्ति न हो तो अभाव ग्रस्तों की तुलना में अपने को सुखी मानकर सन्तोष करेगा, किन्तु बुरे लोग अपनी तुलना साधन सम्पन्न से करके ईर्ष्या, असन्तोष की आग में जलते रहेंगे। यह दृष्टिकोण का अन्तर है।
एक भोगी पत्नी को भोग का साधन मानता है। सफल गृहस्थ सहचरी मानता है। कामुकता से प्रेरित युवा एक युवती को वासनात्मक दृष्टि से देखता है। अध्यात्मवादी उसे ही आत्मा की सुरम्य आभा की खान देख पुलकित होता है। भगवान की मूर्ति को आस्तिक घट-घट वासी ब्रह्म, एक भौतिकवादी सजावट तथा चोर उसकी कीमत आँकता है। इसी दृष्टि के प्रतिफल से वे अलग-अलग फल प्राप्त करते हैं।
वास्तविक सुख का आगार भावनाएं हैं, दृष्टिकोण है। भौतिकता के पदार्थों में सुख नहीं है। भावनाओं को ऊंचा उठाने से, परिष्कृत करने से, आदर्शवाद का पुट देने से आध्यात्मिकता की वृद्धि होती है, प्रत्येक सुन्दर, सुरम्य, आनन्ददायक दृष्टिगोचर होकर कण-कण में व्याप्त प्रभु के दर्शन होते हैं।
हमारे जीवन में बाह्य पवित्रता, सुन्दरता, व्यावहारिक जीवन है तथा आन्तरिक पवित्रता भावनाओं में दृष्टिगोचर होती है। हमें गुणों का पौधा पल्लवित करने के लिए दुर्गुणों का कचरा उखाड़ कर फेंकना होगा। दूसरों के गुण देखने तथा अपने अवगुण देखने से विश्व के जीव चराचर सभी मित्र तथा सहयोगी दिखाई देंगे। आत्म सुधार होगा , इसके विपरीत दूसरों के अवगुण को अपने गुण देखने से सारा विश्व दुश्मन दिखाई देगा तथा अनेकानेक दुर्गुणों के शिकार बनते जायेंगे।
निकृष्ट विचारधारा कलह, कटुता के बीच बोती है। वह निरादर, मुसीबत, अविश्वास एवं असहयोग का पात्र बनाती है। सहानुभूति अन्तःकरण की गहन, मौन तथा अव्यक्त कोमलता है। इससे संसार की वास्तविक आनन्दमयी रसानुभूति होने लगती है। हमारा दृष्टिकोण ही मित्र-शत्रु, सुख-दुख, आनन्द-परिताप, सन्तोष-असन्तोष आदि का कारण है। हमें जीवन का सही लाभ लेने के लिए दृष्टिकोण को उत्कृष्ट रखकर इस सुरदुर्लभ मानव -तन का फल प्राप्त करना चाहिए।
जिन्दगी में कोई रहस्यवाद नहीं है- वह सीधी-सादी सचाई है उसे जितना रहस्यमय सोचते हैं उतनी ही उलझन और बढ़ जाती है। कोई अविज्ञात तथ्य हमें ऊंचा उठायेंगे, आगे बढ़ायेंगे इस ‘शार्टकट’ को ढूंढ़ते फिरने वाले लोगों का समय या प्रयास अवास्तविक वस्तुओं के खोजने में लगा रहता है और वे सामान्य जीवन-क्रम में सुव्यवस्था लाकर जितना कुछ कर सकते थे, जो पा सकते थे उससे भी वंचित रह जाते हैं।
जिन्दगी एक हल की हुई समस्या है। आवश्यकता इतनी भर है कि उसे कायदे करीने से जी लिया जाय। बेतुकापन और बेढंगापन यही है जीवन के विकास क्रम का सबसे बड़ा व्यवधान। यदि सज्जनोचित शालीनता के साथ सुव्यवस्थित क्रम से जीवनयापन की व्यवस्था बना ली जाय तो हंसी-खुशी से सन्तोष भरे दिन कट सकते हैं और प्रगति के पथ पर कदम सहज से बढ़ते रह सकते हैं।
हमें हर कार्य को पूरी दिलचस्पी और जिम्मेदारी से पूरा करना चाहिए। पर वह सब होना चाहिए जिस तरह खिलाड़ी अपने कार्य को पूरा करते हैं। खेल में हार भी होती है और जीत भी। खिलाड़ी लोग उसे बहुत महत्व नहीं देते। केवल खट्टा-मीठा रसास्वादन मानते हैं। जीत पर न तो वे हर्षातिरेक से उन्मत्त होते हैं और न हार पर सिर धुनते, रोते-कलपते हैं। यद्यपि खेल के समय उनकी तत्परता एवं दिलचस्पी देखते ही बनती हैं। सुध−बुध खोकर वे बाजी जीतने में अपनी समग्र एकाग्रता एवं स्फूर्ति नियोजित करते हैं तो भी उस भागदौड़ को समझते खेल ही है। यही बात अभिनेताओं के बारे में भी है वे रंगमंच पर अपना क्रिया-कलाप ऐसी अच्छी तरह प्रस्तुत करते हैं मानो घटना-क्रम पूरी तरह उन्हीं के व्यक्तिगत जीवन का हो और वास्तविक हो। इतने पर भी अभिनय में जो हर्ष शोक के अवसर आते हैं उनका उनके मनःक्षेत्र पर कोई गहरा प्रभाव नहीं पड़ता। अभिनय समाप्त होते ही उस विनोद प्रहसन ने निपट कर वे अपने सामान्य जीवन-क्रम में लग जाते हैं।
खिलाड़ी अथवा अभिनेता की भावना से जो जी सकता है उसी को जीवन का कलाकार कहना चाहिए। वे स्वयं हंसते रहते हैं और दूसरों को हंसाते रहते हैं। भाव-अभाव, हर्ष-शोक, विजय-पराजय, हानि-लाभ, उनके लिए रंगमंच पर आते जाते रहने वाले उतार-चढ़ाव मात्र हैं। वह सब उन्हें करना पड़ता है क्योंकि कराया गया है। अथवा विनोद के लिए समय क्षेप के लिए किया गया है। यह मान लेने से जिन्दगी बहुत हलकी हो जाती है और उसका रस लेते हुए जिया जा सकता है।
भावुक प्रकृति के लोग छोटी-छोटी घटनाओं को-परिस्थितियों को बहुत महत्व देते हैं किसी के कहे हुए मीठे-कडुए वचनों को गिरह बाँधे रहते हैं ओर सोचते रहते हैं कि वे शब्द कोई अत्यन्त ही महत्वपूर्ण निधि या पत्थर की लकीर थे। जबकि होता यह है कि भावावेश की भली-बुरी मुद्रा वे लोग प्रायः अनगढ़ वचन बोलते रहते हैं और पीछे शान्त मनःस्थिति होने पर अचम्भा करते हैं कि भला हमने भी कभी ऐसा कुछ कहा था ? भला हम ऐसे अनुत्तरदायी वचन बोल सकते हैं। मनःस्थिति के उतार-चढ़ाव में कहे जाने वाले प्रिय-अप्रिय वचनों को महत्व देना व्यर्थ है। ध्यान देने योग्य, वह मनःस्थिति ही है, जिसकी उत्तेजना में उस प्रकार को प्रिय या अप्रिय बात दूसरों ने हमसे कह दी थी। ज्वर के आवेश में मरीज न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहता है। परिचर्या करने वाले यदि उन शब्दों की अपेक्षा न करें तो उनका सेवा कार्य ही असम्भव हो जायगा।
बड़े उज्ज्वल भविष्य की बड़ी से बड़ी और अच्छी से अच्छी आशा करनी चाहिए किन्तु बुरी से बुरी परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। आवश्यक नहीं कि हमने जिस प्रकार की आशा लगा रखी है- घटना-क्रम उसी रीति से घटित होता चले। हमारी इच्छा और चेष्टा ही सब कुछ नहीं है। जो हम चाहें वही होना चाहिए इसके लिए प्रकृति के नियम बंधे हुए नहीं है। परिस्थितियों के उतार-चढ़ाव कई बार ऐसे अप्रत्याशित घटना क्रम सामने कर देते हैं जिनसे आश्चर्य चकित रह जाना पड़े। कल क्या होने वाला है- इसे कोई नहीं जानता है। हम केवल आशा और चेष्टा कर सकते हैं। परिणाम के लिए घटना-क्रम पर निर्भर रहना पड़ता है। जो इस कड़ुई सचाई को समझते हैं वे कड़ुवा-मीठा दोनों की तरह का स्वाद चखने को तैयार रहते हैं। इसके लिए दिन की भी उपयोगिता होती है और रात्रि की भी । दोनों में से जो हमें प्रिय है- वही सदा बना रहे ऐसा कोई चाहेगा तो सफल मनोरथ न होगा। प्रिय प्रसंग ही सदा सामने आये-अप्रिय घटनाएं घटित न हों- इस तरह सोचना बाल बुद्धि का काम है। जो संसार को - जीवन को समझते नहीं वे ही एकाँगी चिन्तन अपनाते हैं और एक पक्षीय दुराग्रह के लिए अड़े बैठे रहते हैं।
जिन्दगी के करीने और सलीके से जीना चाहिए जो मिला हुआ है उसी को अधिकाधिक बुद्धिमत्तापूर्ण सदुपयोग करने की बात सोचनी चाहिए। अपने पास प्रस्तुत साधन भी इतने अधिक होते हैं कि उनका सही रीति से प्रयोग किया जा सके तो उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएं एक-एक करके समीप आती चली जाती है। स्वच्छता और व्यवस्था यह दो बहुमूल्य विभूतियाँ जिनके स्वभाव में सम्मिलित हैं वे स्वल्प साधनों में भी अपने व्यक्तित्व को प्रखर और प्रतिभावान बना सकते हैं उनकी जागरुकता हर कार्य में टपकती है और हर संबद्ध पदार्थ स्वच्छता एवं व्यवस्था के साथ सम्भाला संजोया गया होता है। फलतः सम्पन्न किन्तु फूहड़ व्यक्तियों की तुलना में वे कहीं अधिक सम्पन्न, समुन्नत एवं सुसंस्कृत दृष्टिगोचर होते हैं।
अधिक अच्छे साधन मिलने पर अधिक अच्छी तरह रहना, अधिक प्रसन्न सन्तुष्ट रह सकेंगे यह सोचना व्यर्थ है। जिन्हें जीना आता है वे आज के साधनों का ही श्रेष्ठतम उपयोग करने की बात सोचते हैं और उसी पर ध्यान केन्द्रित करते हैं जो आज की परिस्थिति में किया जा सकना सम्भव है। यथार्थवादी व्यक्तियों की रीति-नीति यही रहती है। वे क्षुब्ध, रुष्ट, खिन्न, असन्तुष्ट उद्विग्न एवं व्यग्र दिखाई नहीं पड़ते हैं। जो मिला है उसे ही सौभाग्य मानकर प्रसन्नता का रसास्वादन किया जाय और जो नहीं है उसके लिए उत्साह पूर्वक परिश्रम किया जाय। जिनने यह सोच रखा है वे कम और अधिक साधनों के समान रूप से हंसते-हंसाते हुए जीवनयापन करते पाये गये हैं।
कर्म को खेल मानकर उत्तरदायित्वों के निर्वाह में गौरव अनुभव किया जाय। अपने बारे में बहुत अधिक सोचा न जाय। कुसंस्कारों और असामाजिक लोगों जैसी प्रवृत्तियां तो कहीं अपने पल्ले नहीं बंध गई इस बात पर सावधानी बरती जाय तो समझना चाहिए आनन्दित जीवन का आधा द्वार खुल गया। आधा द्वार तब खुलता है जब हम अपनी अपेक्षा दूसरे के सुख-दुख की बात अधिक सोचते हैं। छिद्रान्वेषण, निन्दा, चुगली अथवा ईर्ष्या-द्वेष को हटाकर यदि हम दूसरों के दुख हटाने और सुख बढ़ाने की बात सोचे और वैसे ही प्रयत्नों में संलग्न रहें तो उसकी प्रतिक्रिया चारों ओर से सद्भावना और सहकारिता के रूप में बरसती हुई दिखाई देगी। दूसरों की सुविधा का ध्यान रखना और उन्हें प्रसन्नता एवं सहयोग देना घाटे का नहीं लाभ और बुद्धिमता भरी रीति-नीति का है। उसे जो भी अपनायेगा उसे प्रतीत होगा कि दुनिया कितनी भली है और परिस्थितियों में अनुकूलता की कितनी अधिक लचक है।
जिन्दगी की प्रसन्नता एवं सफलता का कोई खास रहस्य नहीं। प्रगति एवं गरिमा प्राप्त करने का भी कोई जादू नहीं है। भले मानसों जैसे शालीन और व्यस्त व्यय स्थिति लोगों जैसा क्रिया-कलाप अपनाया जा सके तो उसमें उज्ज्वल भविष्य की किरणें झाँकती हुई दिखाई पड़ेगी, उत्कृष्ट जीवन जीने की आकाँक्षा और चेष्टा को संजोये रखा जाय और उसके लिए सामर्थ्य भर प्रयास करते रहा जाय तो जिन्दगी स्वयमेव उस दिशा में चलने लगती है जिसमें सफलता और प्रसन्नता के अनेकानेक आधार स्वयमेव सामने आते चले जाते हैं।
रोगों का उपचार यही हो सकता है कि आहार-विहार की जिस विकृति के कारण वे उत्पन्न हुए हैं उसे बदल और सुधार दिया जाय। शरीर में रोग निरोधक शक्ति मौजूद है, वह बाहर से होने वाले विषाणुओं से भली प्रकार निपटने में समर्थ है और भीतर उत्पन्न होने वाले उपद्रवों को निकाल बाहर करने की क्षमता भी उसमें विद्यमान है। बीमारी के दिनों अनावश्यक श्रम से शरीर को बचाये रखे और प्रकृति को अपना काम करने दे। हो सके तो जल, मिट्टी, धूप आदि की सहायता प्रकृति की कुछ सहायता प्राप्त करें। घबराने की अपेक्षा रोग निवृत्ति में जो थोड़ा समय लगे उसे तितीक्षा बुद्धि से धैर्य पूर्वक सहन कर ले तो बीमारियों से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता हैं
शरीर के भीतर रोग निरोधक शक्ति का विपुल भण्डार भरा पड़ा है जिसके द्वारा भीतर से उत्पन्न हुए अथवा बाहर से प्रवेश पाकर पहुँचे हुए रोग कीटाणुओं का विनाश निरन्तर होता रहता है।
आँख में कभी कोई विष कीटक जा पहुँचे तो तुरन्त आँसू निकलेंगे। इन आँसुओं में ‘लाइसोजीम’ नामक पदार्थ रहता है जिसकी निरोध शक्ति अद्भुत है। यदि एक गैलन पानी में एक बूँद आँसू डाल दिया जाय तो वह एक अच्छा खासा कीटाणु नाशक बन जाता है।
शरीर में ऐसे ही अन्य कितने ही रोग निरोधक तत्व विद्यमान है। यथा लेउकिन्स, लाइसिन्स प्लैकिन्स आदि। मुँह से स्रवित होने वाले रस, आमाशय से स्राव और आँतों से निकलने वाले पदार्थों में वह शक्ति पूरी तरह विद्यमान है कि बाहर से प्रवेश करने वाले किन्हीं भी रोग कीटाणुओं को नष्ट कर दें। नासिका की श्लेष्मा में रहने वाला ’नेटा’ साँस के साथ प्रवेश करने वाली विषाक्तता से निपट लेने में पूर्णतया समर्थ रहता है। शरीर में पाया जाने वाला ‘लिउकोसिट्स’ तत्व अपनी चुम्बकीय विशेषता के कारण कहीं भी जमे रोग कीटकों पर घेराबंदी आक्रमण करता है और उन्हें मारकर ही चैन नहीं लेता वरन् उनके कचूमर की चमड़ी में छेद करके बाहर निकालने में अन्त्येष्टि करने तक युद्ध कार्य में जुटा ही रहता है। रक्त में पाया जाने वाला प्लाज्मा इस लिउकोसिट्स के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर सहायता करता है। गामा ग्लोबूलिन भी कीटाणु विरोधी धर्म युद्ध में अपनी भूमिका प्रस्तुत करते हुए आश्चर्यजनक रीति से दो-दो हाथ दिखाता है।
थोड़े से कष्ट से घबराकर तत्काल जादुई परिणाम देखने के लिए उतावले लोग ऐसी दवाएं ढूंढ़ने के लिए दौड़ पड़ते हैं जो क्षण भर में चमत्कार उपस्थित करें। डाक्टर बीमार की इस कमजोरी को समझता है अस्तु वह वैसी ही दवाएं देता है। इन दवाओं में शरीर की रोग निवारक क्षमता की-कष्ट अनुभूति की ज्ञान-तन्तु प्रणाली को दुर्बल करने भर की क्षमता होती है। रोग कीटाणुओं को मारकर वे उग्र लक्षणों का भी शमन करती हैं, पर साथ ही छोड़ती जीवन रक्षक तत्वों को भी नहीं। वे मित्र शत्रु का भेद किये बिना शत्रु का भेद किये बिना शत्रुवध ओर आत्महत्या के दोनों मिलने पर भी अन्ततः रोगियों को इतनी अधिक चिरस्थायी हानि उठानी पड़ती है कि वह जादुई चिकित्सा उन्हें बहुत महंगी पड़ती है।
तीव्र औषधियों के दुष्परिणाम जब बड़े पैमाने पर सामने आते हैं और वावेला मचता है बत कहीं उन पर प्रतिबन्ध लगता है। इतनी अवधि में तो वे जनता को बहुत भारी क्षति पहुँचा चुकी होती है। न्यूनाधिक मात्रा में यही प्रभाव लगभग सभी एलोपैथिक दवाएं छोड़ती हैं। मन्द औषधियाँ अपना मन्द प्रभाव छोड़ती हैं। इसलिए उनके दुष्परिणाम भी उग्र नहीं होते और उनके विरुद्ध आन्दोलन भी बड़ा नहीं होता इसलिए वे चलती रहती है पर हानियाँ उनसे भी कम नहीं होती।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के चिकित्सा विशेषज्ञों ने संसार के विभिन्न से संग्रहित सूचनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि प्रख्यात औषधि ‘पेन्सलीन’ का अन्धाधुन्ध प्रयोग नहीं होना चाहिए। उसकी प्रतिकूल प्रतिक्रियाओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। अकेले अमेरिका में उस औषधि की विपरीत प्रतिक्रिया के कारण पिछले ही दिनों एक हजार से अधिक व्यक्ति बेमौत मर रहें हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदन में कहा गया है कि पेन्सलीन का उपयोग कुशल चिकित्सकों को बहुत सोच विचार कर ही करना चाहिए। जुकाम जैसी छोटी बीमारियों में उसे नहीं देना चाहिए और इस औषधि से बनी हुई मरहमों को भी निरापद नहीं मानना चाहिए।
अमेरिका में बुखार और दर्द दूर करने के लिए दो दवाएं बहुत दिनों से प्रचलित थीं। (1) एमिनोपाइसि (2) डाइपिरोन। इन्हें चिरकाल से धड़ल्ले के साथ प्रयोग में लाया जाता रहा पर पीछे उनकी प्रतिक्रियाएं जो सामने आई वे बहुत चिन्ताजनक सिद्ध हुई। काफी लम्बी और गहरी खोजबीन के बाद अमेरिका मेडिकल एसोसिएशन और यूनाइटेड स्ट्रेट्स फूड एण्ड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने खतरनाक घोषित कर दिया है और डाक्टरों को हिदायत ही है कि इसमें कोलीहटिस होने का डर रहता है इसलिये इनका प्रयोग बन्द कर दिया जाय। ब्रिटेन के स्वास्थ्य मन्त्रालय ने ब्रिटेन के समस्त डाक्टरों को चेतावनी दी है कि नेग्राम औषधि के कारण दृष्टि मन्दता, मति विभ्रम चर्म रोग की शिकायतें उत्पन्न होने और नाड़ी संस्थान पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के प्रमाण मिले हैं अस्तु इस औषधि के खतरे को पूरी तरह ध्यान में रखा जाय।
ब्रिटिश मेडिकल जनरल पत्रिका में दस्त साफ कराने के लिए आमतौर से प्रयुक्त होने वाली दवा ‘लिक्विड पैराफीन’ से होने वाली हानियों के विरुद्ध चेतावनी देते हुए छापा है कि उससे निमोनिया की पृष्ठभूमि बनती है। लंदन के सन्डे टाइम्स ने विश्व स्वास्थ्य संघ की उस चेतावनी को प्रमुख स्थान पर छापा था जिसमें कहा गया है पेन्सिलीन का उपयोग वे समझे-बूझे चाहे किसी पर न किया जाय। असावधानी के साथ उसका प्रयोग रोगी के लिए प्राणघातक हो सकता है। न्यू साइंटिस्ट पत्रिका ने एण्टी बायोटिक दवाओं के दुष्परिणामों को ध्यान में रखने के लिए डाक्टरों को विशेष रूप से सजग किया है।
कार्टिजोन, स्टेप्टो माइसिन, पेनसिलीन, क्लोरम फेनिकोला, क्लोरटेट्रा साइक्लीन, आक्सीट्रेंटा साइक्लीन आदि दवाओं के विरुद्ध योरोप के प्रमुख अखबारों में काफी कुछ छपता रहा है और वे तथ्य सर्व साधारण के सामने प्रस्तुत किये जाते रहे हैं। जिनसे सिद्ध होता है कि ये चमत्कारी समझी जाने वाली दवाएं निरापद नहीं है। तत्काल कुछ लाभ दिखा देने के बाद भी वे रोगी के शरीर को अन्य अनेक रोगों के लिए एक उत्पादक क्षेत्र बना देती हैं और तुरन्त लाभ के बदले रोगी को बहुत समय तक आये दिन कष्टग्रस्त रहना पड़ता है।
अमेरिका के हेरीजोन्स मेडिकल अस्पताल के चीफ मेडिकल आफीसर डा0 केनिथ ए॰ वर्के के नेतृत्व में चल रहे एक सर्वेक्षण से पता लगा है कि उस देश में प्रत्येक 14 में से एक बच्चा शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से विकृत उत्पन्न होता है। हर साल लगभग 550000 बच्चे इन जन्मजात अपूर्णताओं के कारण मृत्यु के मुख से चले जाते हैं ओर 250000 मरते तो नहीं पर जीवन भर अपनी जन्म जात अपूर्णताओं के कारण कष्ट उठाते हैं।
संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रेषित एक शोधकर्ता दल ने संसार के कुछ प्रमुख देशों का दौरा किया और उनके बड़े अस्पतालों में हुए प्रसवों के आधार पर यह पता लगाया कि अन्यत्र जन्म जात अपंग बालकों की दर क्या है ? दल ने जो रिपोर्ट दी उसके अनुसार एक अपंग बालक का औसत स्वास्थ्य बालकों के पीछे इस प्रकार था। जोहान्स वर्ग (अफ्रीका) 43 पीछे, मेलबोर्न (आस्ट्रेलियन) 53 पीछे, सायपालो (ब्राजील) 62 पीछे, मैड्रिड (स्पेन) 75 पीछे, जग्रिव (यूगोस्लाविया) 78 पीछे सिकन्दरिया (मिस्र) 68 पीछे, क्वालालपुर (मलेशिया) 95 पीछे और बम्बई (भारत) 116 पीछे।
यह केवल अस्पतालों की रिपोर्ट है। घरू प्रजनन ही पिछड़े देशों में अधिक होता है। उसका कोई विवरण ज्ञात नहीं इसलिए इन आंकड़ों से कुछ निश्चित निष्कर्ष तो नहीं निकलता पर आभास अवश्य मिलता है कि भारत जैसा पिछड़ा हुआ देश इस सम्बन्ध में अमेरिका जैसे सुसम्पन्न देश कहीं अधिक सौभाग्यशाली है। अन्य देशों से, धन में न सही - अपंग बालकों के सम्बन्ध में अधिक सुखी हैं।
गर्भावस्था में महिलाओं के पेट की खराबी तथा सिर दर्द आदि की शिकायत रहने लगती है उसके लिए वे आये दिन कुछ न कुछ दवाएं लेती है। ताकत बढ़ाने के नाम पर ‘टानिक’ निगलती है। प्रसव काल का दर्द कम करने के लिए भी कई नशीली दवाएं ली जाती है। नशे पीने की आदत ने केवल पुरुषों की होती है वरन् स्त्रियों में भी बढ़ रही है। इन सबका बुरा असर जितना गर्भवती पर होता है उसकी अपेक्षा कहीं अधिक घातक प्रभाव गर्भस्थ शिशुओं पर होता है।
लन्दन के प्रसिद्ध बाल चिकित्सक डा0 आरनेल्ड वैकेट ने कहा है कि तेज औषधियाँ गर्भवती महिलाओं को देना उनके गर्भस्थ शिशुओं के साथ अत्याचार करना है। ‘लासऐन्जल टाइम्स’ पत्र में कुछ चिकित्सकों का एक सम्मिलित मन्तव्य, लेख रूप में छपा है जिसमें कुमारी विवाहिता अथवा गर्भवती उन सभी महिलाओं को जो अगले दिनों गर्भ धारण करने की तैयारी कर रही है एक गम्भीर चेतावनी दी है। जिसमें कहा गया है कि वे नशेबाजी और बहुत दवाएं खाने की आदत से बाज आयें-अन्यथा उनकी सन्तान का इसका दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। कुछ दवाओं का नाम तो इस संदर्भ में विशेष रूप से लिया गया है- थैलीमाईड, कोटीजोन, एस्प्रीन, सैलीसाइलटेस, इन्सुलिन, पेन्सलीन, स्टेप्टो माइसिन एड्रेनालीन आदि।
सिरदर्द नई सभ्यता की एक सुनहरी दैन है जिससे विकसित कहलाने वाले देश दिन-दिन अधिकाधिक क्षति होते चले जा रहे हैं। इसके प्रयुक्त होने वाली घरेलू दवा एम्परीन है। इसका असली नाम एसिटाई सेली सीलिक एसिड है। इसका काम उन चौकीदारों को लकवा ग्रस्त देना है जो हमारी अन्तःस्थिति का विवरण प्रकट करते हैं। दर्द तो ज्यों का त्यों बना रहता है केवल उसकी अनुभूति रुक जाती है।
अकेले अमेरिका में हर साल कम से कम 6000 टन एस्परीन खपती है। इसके उत्पादक सिरदर्द, जुकाम तथा दूसरे दर्दों को दूर करने वाली रामबाण दवा के रूप में विज्ञापन करते हैं। जो प्रत्यक्षतः बहुत कुछ सही भी है। इसका चमत्कारी लाभ तत्काल देखा भी जा सकता है।
किन्तु उसका लगातार प्रयोग करने पर कितने दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं यह तथ्य अब भली प्रकार स्पष्ट होता चला जा रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार एस्परीन के सेवन का हृदय पर बुरा असर पड़ता है। कान गूँजने लगते हैं। शरीर का तापमान गिर जाता है और एक नशीली अशक्तता का अनुभव होने लगता है। यह प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले लक्षण हैं- उसके दूरगामी और मन्दगति से बढ़ते चलने वाले दुष्परिणाम और भी अधिक हैं। वे इतने कष्टकर हैं कि एक प्रकार से सिरदर्द, जुकाम आदि के मरीज इन बीमारियों से छुटकारा पाना तो दूर और कई प्रकार के स्नायु रोगों से ग्रसित बन जाता है।
ऐसे अनेक मूर्धन्य एलोपैथ डाक्टर है जिन्होंने गम्भीरता से औषधि प्रणाली की त्रुटियाँ और उनके द्वारा उत्पन्न होने वाली घातक प्रतिक्रियाओं को समझा है। उन्होंने ईमानदारी से जो कुछ समझा उसे सर्व साधारण के सामने व्यक्त किया और अपना हाथ दवाओं के उपयोग अथवा समर्थन से पूरी तरह खींच लिया।
न्यूयार्क के प्रो0 स्मिथ ने कहा है- रक्त में प्रवेश कराई गई दवाएं उतनी ही हानिकारक सिद्ध होती है जितनी कि उन रोग कीटाणु-जिन्हें मारने के लिए इंजेक्शन लगाया गया था। डाक्टर फ्रैंक ने कहा-हम विशेषाधिकार प्राप्त हत्यारों द्वारा हर साल हजारों उन निरीह लोगों को अटकल पच्चू दवाओं के द्वारा मौत के घाट उतार दिया करते हैं जो अपने कष्ट से राहत पाने के लिए हमारी शरण आये थे।
न्यूजीलैण्ड के रेडियम चिकित्सक डा0 उलरिक विलियम्स तो एकबार खीजकर अपने धन्धे के बारे में यहाँ तक कह बैठे थे कि औषधि विज्ञान और कुछ नहीं मात्र नई बीमारी को पुरानी बीमारी में बदल देने का गोरखधन्धा है।
लंदन के डेली हैरल्ड में डा0 चार्ल्सहिल का एक लेख छपा है जिसमें उनने कहा है- औषधियों की गोलियाँ बन्दूक की गोली की तरह घाव तो नहीं करती; पर मनुष्य को हानि लगभग उतनी ही पहुँचती हैं। न्यूयार्क टाइम्स में नार्थ वोर्स्टन युनिवर्सिटी की एक शोध रिपोर्ट का साराँश छपा है जिससे कहा गया है कि ताकत के नाम पर खरीदे और खाये जाने वाले विटामिन लाभ के स्थान पर हानिकारक सिद्ध होते हैं।
बाल रोग विशेषज्ञ डा0 हालेन ने कहा है कि -छोटे बच्चों पर प्रयोग की गई दवाएं उनकी शक्ति को बेतरह क्षीण करती है फलतः वे दुर्बलताजन्य अनेकानेक शिकायतों के चंगुल में फंसकर असमय में ही अपनी जीवन लीला समाप्त कर जाते हैं।
लन्दन के प्रख्यात शरीर शास्त्री डा0 वेली ने कहा है- अब मेरा विश्वास दवाओं पर उठ गया है। क्योंकि दवाएं रोग मुक्ति में जितना सहारा देती हैं उससे कहीं अधिक रोगी की शक्ति को क्षीण और उसके रक्त को विषाक्त बनाती चली जाती हैं फलतः रोगी औषधियों से लाभ उठाने के स्थान पर घाटे में ही रहता है।
इंग्लैण्ड के मूर्धन्य डाक्टर जान एवरनेथी इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि डाक्टरों की वृद्धि के कारण भी उस देश में बीमारियाँ बढ़ी हैं।
अंग्रेज सर्जन सर एस्टले कपूर ने अपने धन्धे की अपूर्णता पर क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा था- औषधि विज्ञान अटकलबाजियों से उत्पन्न हुआ है और हत्याओं के साथ विकसित हुआ है।
न्यूयार्क कालेज आफ फिजिशियन एण्ड सर्जन प्रो0 ए0एच॰ स्टीवन्स ने अपनी विस्तृत जानकारी के आधार पर कहा है- ज्यों-ज्यों डाक्टर बूढ़ा होता जाता है त्यों-त्यों उसका विश्वास औषधियों पर से उठता जाता है।
फिलाडलफिया के जेफरसन मेडिकल कालेज के प्रोफेसर एस॰ डी ग्रोस ने कहा बीमारियों के असली कारणों के सम्बन्ध में हमारी जानकारी नगण्य होती है और जिन दवाओं को हम उपयोग करते हैं उनकी प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में तो हम बहुत ही कम जानते हैं यद्यपि दावे हमारे बहुत लम्बे-चौड़े होते हैं।
एक दुखी व्यक्ति किसी सिद्ध महात्मा के पास पहुँचा और कठिनाइयों से छुड़ाने का उपाय बताने के लिए प्रार्थना करने लगा।
सिद्ध पुरुष ने कहा- तुम किसी सर्व सुखी मनुष्य का कुर्ता माँग लाओ जिसे किसी प्रकार का दुख न हो।
दुखी मनुष्य दूर-दूर तक गया और हर स्तर के मनुष्यों से मिला। पर हर एक ने अपने का किसी न किसी प्रकार के दुख में ग्रसित ही बताया।
अन्त में एक साधु बहुत ही प्रसन्न चित्त दिखाई पड़ा। पूछने पर उसने बताया कि मैं सुखी हूँ। पर कुर्ता तो उसके पास था ही नहीं - वह नंगे बदन रहता था।
लौटकर दुखी मनुष्य ने सारा वृत्तांत सिद्ध पुरुष को सुनाया। इस पर उनने गम्भीर होकर कहा - तात, जिसके पास जितना अधिक संग्रह है उसे उतना ही अधिक दुख है। सुखी तो ऐसा अपरिग्रही ही रह सकता है जिसे तृष्णा और कामना से छुटकारा मिल गया है।
दुखी मनुष्य - दुखों का कारण समझ गया और जो पास में है उसी से सन्तोष करने का निश्चय करके हंसता, मुस्कुराता घर लौट गया।
संसार में किसी भी महान कार्य के सम्पादन हेतु स्वस्थ, दीर्घ जीवन की आवश्यकता है। क्योंकि कार्य की महानता, सुदीर्घ अनुभूति की दिव्यता एवं उसकी उपलब्धि का ही परिणाम होता है। संसार के महान पुरुषों ने जो उत्तम उपलब्धियाँ संसार को दी हैं वह लगभग 60 वर्ष की आयु के होने के पश्चात ही सम्पन्न कर विश्व को प्रदान की हैं। प्रसिद्ध नाटककार बर्नार्डशा 94 वर्षों की लम्बी अवधि तक लेखन कार्य करते रहे। जर्मन कवि और नाटककार गेटे ने जब अपना “फ्रास्ट” पूरा किया तब वह 80 वर्ष की आयु को पार कर चुके थे। श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर 90 वर्ष की जीवन अवधि में लेखन कार्य करते रहे और विश्व को उत्तम साहित्य प्रदान किया। साहित्य के ही क्षेत्र में नहीं विज्ञान, राजनीति, समाज-सुधार आदि सब में दीर्घ जीवन की अनुभूति से ही महानता की चमक आती है। अतएव दीर्घ जीवन प्राप्ति स्वयं में एक महान समस्या है ? भारत में मानव 50 - 60 वर्ष में अपने को वृद्ध मान लेता है और 70 - 80 तक काल के गाल में जा बैठता है।
इसी संसार में वे मानव भी देखे जाते हैं जिनकी आयु 150 वर्ष और उससे भी अधिक समय की होती है। वैसे तो 100, 125 वर्ष की आयु के व्यक्ति कुछ देशों में विरले मिल जाते हैं। किन्तु दक्षिणी काकेशिया के छोटे से जार्जिया क्षेत्र में जरा- वैज्ञानिकों के दल द्वारा सर्वेक्षण करने से ज्ञात हुआ कि 100 या 100 से अधिक की आयु के 2100 व्यक्ति वहाँ थे। काकेशस पर्वत की मालाओं से घिरे रूस के सम्पूर्ण दक्षिणी प्रदेश में शतायु व्यक्तियों की कमी नहीं है। मखमूद बागीर ओगली श्वाजोव उत्तर पूर्व काकेशस के एक किसान थे वह 1959 में 150 वर्ष की आयु में चल बसे उनके 23 बेटे-बेटियाँ, 150 नाती-नातनियाँ, पोते-पोतियाँ थीं। मृत्यु के समय उनकी सबसे बड़ी लड़की 120 वर्ष की थी। उनकी कुल सन्तान 175 के लगभग थीं। इन सभी दीर्घ जीवन वालों का आखिर जीवन रहस्य क्या था ?
जीवन का आधार मन और शरीर की क्रियात्मक शक्ति का समन्वित रूप है। कहा है कि “मन के हारे हार है और मन के जीते जीत” इसका अर्थ यही है कि अपने मनोबल को क्षीण न होने दें। उसे उत्तम भावों से आपूरित रखें इससे वह आशावान् होता है। फिर वह परिस्थितियों पर प्रभाव डालता है। कठिन से कठिन परिस्थिति का उज्ज्वल पक्ष भी होता है। सब को देखता है साहस रखता है। इन सब का प्रभाव शरीर पर पड़ता है फिर वह भी स्वस्थ रहता है। चिन्ता करने वाले व्यक्ति का शरीर क्षीण और रोगों से ग्रसित रहेगा, इसलिए मन की प्रसन्नता शरीर की स्वस्थता में सहायक है।
शरीर के जिस अंग से कार्य न लिया जायेगा वही अंग निष्प्राण सा हो जावेगा। यदि मशीन के कल-पुर्जों से काम न लिया जावेगा तो उनमें जंग लग जायेगी। पानी के प्रवाह को रोका गया तो उसमें विकृति, गन्दगी उत्पन्न होने लगेगी। प्रकृति के इसी नियमानुसार मन और तन दोनों का यथाशक्ति सक्रिय रहना ही जीवन का लक्षण है।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक एडीसन जब किसी कार्य में असफल होता था तब वह असफल होने पर यह कहा करता था कि “मैंने एक और तरीका जान लिया है कि जिससे काम नहीं करना चाहिए” इस वाक्य से भाव विदित होता है कि उसका मन टूटता नहीं था धैर्य और आशावादिता ही उसके आन्तरिक जीवन का आधार था। शारीरिक जीवन की स्वस्थता के लिए उन दीर्घजीवी मानवों के रहन-सहन से पता चलता है कि पूर्ण सक्रिय रहते, सादा भोजन करते, दूध-दही फलों का आहार लेते, खुले आकाश में पूर्ण गहरी निद्रा लेते थे। शुद्ध आक्सीजन वायु का अधिक से अधिक सेवन करते थे। उसकी विधि गहरी साँस लेना है, जो बचपन से ही अभ्यास में लायी जा सकती है। उन दीर्घजीवी व्यक्तियों के मन और शरीर के समन्वय को देखकर यह विश्वास उत्पन्न होता है कि दीर्घजीवन जीने की यही कला है।
मन में क्षोभ, अशान्ति, चिन्ता न हो तो उसका प्रभाव शरीर पर न पड़ेगा। शारीरिक रोग तो मानसिक विक्षिप्ति का परिणाम है। पहले मनोजगत में विकृति उत्पन्न होती है फिर उसका घनत्व होता जाता है उसका इतना घनत्व बढ़ जाता है कि वह रोगों के विभिन्न रूपों में परिणत हो जाता है। वार्धक्य भी मनःस्थिति की परिणति है। यह किसी को देर में और किसी को शीघ्र घेर लेती है। यह मानसिक स्थितियाँ वंशानुक्रम से रक्त में प्रवाहित होती चली आ रही हैं।
शरीर का निर्माण सूक्ष्म परमाणुओं से होता है। जिन्हें वैज्ञानिक भाषा में जीवन कोषों का समूह है। इन जीवन कोषों में अर्द्ध तरल पदार्थ भरा रहता है जो जीवन रस कहलाता है। जब यह रस सूख जाता है तब शरीर नष्ट हो जाता है। जीवन रस का निर्माण प्रकृति के 23 मौलिक तत्वों से होता है। जीवन-कोष इन तत्वों को खाद्य पदार्थों से प्राप्त करते हैं। भोजन का सार ही जीवन रस में बदल जाता है इसकी वृद्धि से कोषों का आकार बढ़ता है वह जीवन कोष ‘सेल्स’ बंटकर दो हो जाता है शरीर की वृद्धि होती चलती है।
शरीर में जब तक तन्तुओं का संगठन ठीक रहता है तब तक वह स्वस्थ रहता है और जब वे निर्बल, जीर्ण-शीर्ण होने लगते हैं तभी वार्धक्य आक्रमण करता है। मूल इकाई जीव-कोष है। उनको स्वस्थ रखना, उनमें जीवन-रस प्रवाहित होना ही महत्व की वस्तु है जो भोजन के पदार्थों से प्राप्त होती है। भोजन सात्विक, पौष्टिक, शीघ्र पाचक ही लाभप्रद है।
इस वैज्ञानिक युग में जीव-कोष पोषण की एक विशेष पद्धति प्रचलित हुई है मानव मृत तभी कहा जाता है जब कि शरीर में रक्त संचार बन्द हो जाता है और चेतना लुप्त हो जाती है। किन्तु मानव शरीर पूर्ण रूपेण मृतक नहीं हो पाता है कभी कभी उसके जीव-कोष मृत्योपरान्त भी जीवित रहते हैं, कुछ जीव-कोष 120 घण्टे तक जीवित रहते हैं। वर्तमान नेत्रदान इसी का जीता-जागता उदाहरण हैं।
डा0 नाइन्हेस का कथन है कि पशु और मानव के भ्रूणों के जीव कोषों की रासायनिक क्रिया प्रतिक्रिया वयस्कों के जीव कोषों की प्रक्रिया से लाखों गुनी बलशाली होती है। इसके जीवन कोष मानवों में पहुँचाने पर शरीर की नष्ट हुई शक्ति पुनः लौट आती है इस प्रकार प्रवेश कराये गये जीव कोष कभी मरते नहीं इन्जेक्शन द्वारा प्रवेश करा देते हैं। डा0 कैरेल ने पहला प्रयोग फ्रांस में मुर्गी के बच्चों पर किया था फिर डा0 नाइन्हेस ने पौरुष हीन व्यक्तियों के शरीर में प्रजनन अवयवों के नये जीव कोष लगाकर उन्हें फिर से यौवन प्रदान किया। नाटों के रोग दूर किये। बोने को उन्होंने पशु की ग्रन्थि के जीव कोषों के इन्जेक्शन दिये जिससे 6 इंच ऊँचाई बढ़ गई। हृदय रोगों में जीव कोष भ्रूण के हृदय के जीव कोषों के इन्जेक्शन देने से रोगी का हृदय सामान्यावस्था में आ गया। आज के युग में हृदय को निकाल कर उसे पुनः जीवित फिट करने लगे हैं। अब ऐसा अनुभव होने लगा है कि शारीरिक त्रुटियों को तो आपरेशन से काट-छाँट कर अन्य पशुओं की सहायता से उन अंगों की पूर्ति हो सकती है। मेडिकल साइन्स की वर्तमान प्रगति से स्पष्ट हो रहा है कि शरीर में जीवन रस की कितनी प्रधानता है। यह प्राकृतिक भोजन से प्राप्त होता है और जीवन कोषों में समाहित होता है शरीर के संचालन का आधार है शरीर में चेतना की स्थिति ? अतः जीवन स्वस्थ शरीर और स्वस्थ चेतना का समन्वय है जो भौतिक प्राकृतिक भोजन और स्वस्थ विचारों से निर्मित होता है।
तर्क के सहारे मनुष्य ज्ञानवान बनता है, सत्य के सहारे शांति पाता है, विवेक के सहारे सुखी बनता है और संयम बरतने पर दीर्घजीवी बनता है।
— महाभारत
नवयुग निर्माण अभियान का शंखनाद विगत 38 वर्ष से ‘अखण्ड-ज्योति’ मिशन के रूप में निनादित हो रहा है और उसकी प्रतिध्वनि से वातावरण गूँज रहा है, इस हम सब अपने इन्हीं आँख, कानों से देख सुन रहे हैं। मनुष्य मनुष्य बनकर रहे - पेट और प्रजनन के लिए कृमि-कीटकों की तरह न जिये - वरन् उस लक्ष्य की ओर बढ़े जिसके लिए उसका महान अवतरण हुआ है इस सन्देश को इस लम्बी अवधि में जन-मानस में उतारा और हृदयंगम कराया गया है। यह प्रेरणा निष्फल नहीं गई। उससे प्रेरित होकर कोटि-कोटि मनुष्यों ने आत्म-निरीक्षण किया है, अपने को सुधारा और बनाया है। आत्म-निरीक्षण किया है, अपने को सुधारा और बनाया है। आत्म विकास की दिशा में बढ़ते हुए कितनों ने अपना चोला नर से बदलकर नारायण का पहना है - कितने पुरुष पुरुषोत्तम बने हैं - उसका लेखा-जोखा लेने से सहज ही यह विश्वास होता है कि अखण्ड-ज्योति का ज्वलन्त आलोक अन्धकार को प्रकाश में बदलने की अपनी साधना में बहुत हद तक सफल रहा है। इसके 38 वर्ष निरर्थक नहीं गये।
बसन्त पर्व पर अखण्ड-ज्योति का 38 वाँ जन्मोत्सव मनाते हुए उसके परिवार का हर सदस्य गर्व और गौरव अनुभव कर सकता है - सन्तोष और मुस्कान व्यक्त कर सकता है कि हम लोगों ने मिल जुलकर सही दिशा में सही कदम बढ़ाये और उसके सही परिणाम निकले।
लोक परम्परा के अनुरूप इसी 16 फरवरी में अपने मिशन का जन्मोत्सव सदा की भाँति इस वर्ष भी मनाया जा रहा है। मानवी प्रकृति के अनुसार श्रेष्ठ अवतरणों की जयन्तियाँ मनाने का प्रचलन है। यह परम्परा उचित है और आवश्यक भी। प्रसुप्त चेतना को इस स्रोत से अभिनव प्रेरणा प्राप्त करने का अवसर मिलता है, जिसका कि अवतरण दिन मनाया गया। अखण्ड-ज्योति मिशन ने हर वर्ष नये उत्साह के साथ नये कदम बढ़ाये हैं और उनके सत्परिणाम एक से एक बढ़कर सामने आये हैं।
16 फरवरी को कुछ विशेष कठिनाई ग्रसित अथवा कुछ बहुत शिथिल लोगों को छोड़कर प्रायः 99 प्रतिशत परिजन अपने -अपने यहाँ किसी न किसी रूप में उस दिन हर्षोत्सव की व्यवस्था करेंगे। जहाँ सामूहिक रूप में सम्भव होगा, वहाँ प्रभात-फेरी, सामूहिक जप, हवन, प्रवचन संगीत, भजन, कीर्तन, दीपदान आदि की तैयारी की जा रही है। पत्रिका के नये सदस्य बनाना, पुरानों से चन्दा इकट्ठा करके भिजवाना यह कर्मठ कार्यकर्ताओं के लिए -
अध्यात्म सिद्धान्तों का समर्थन ही नहीं अनुकरण भी शाखा संचालकों के लिए हर वर्ष का एक सामयिक परम पवित्र कर्तव्य है। तो भी उसे बसन्त पर्व की श्रद्धांजलि के रूप में गिना गया है। हर वर्ष इसके लिए प्रतिस्पर्धा होती है - लोग इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाते हैं और प्रतियोगिता में एक दूसरे से बाजी मारने वाले दंगल का रूप देते हैं। यह स्वस्थ परम्परा एवं भावभरी प्रतियोगिता है, इसे सराहा ही जा सकता है। यों ‘एक से दस’ का नारा पुराना है, पर इस वर्ष उस पर विशेष रूप से बल दिया गया है और कहा गया है कि कोई पत्रिका पन्ने उलटकर रद्दी में नहीं फेंकी जानी चाहिए वरन् उसके कम से कम दस अनुपाठक अवश्य होने चाहिए। जिसने मंगाई उसी ने पढ़ी तो समझना चाहिए एक वृक्ष पर एक ही फल लगा। ऐसा कहीं भी नहीं होना चाहिए। यदि एक लाख ग्राहक है तो उसके पाठक दस लाख से कम नहीं होने चाहिए। जब तक रेडियो से कई व्यक्ति समाचार सुन सकते हैं तो एक अखण्ड ज्योति के कई पाठक क्यों नहीं होने चाहिए। घर के-बाहर के सभी क्षेत्रों में इस विचारधारा का-ज्ञान-गंगा का लाभ मिलना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य बसन्त पर्व के सन्देश के रूप में यह समझा जाना चाहिए-जिस लक्ष्य को लेकर अखण्ड-ज्योति पिछले 38 वर्षों से चल रही है उसे ठीक तरह समझने के लिये प्रयत्न किया जाय और यदि वह सही प्रतीत हो तो मात्र समर्थन देने तक सीमित न रहकर उसे व्यावहारिक जीवन में उतारने का साहस जुटाया जाय।
तत्व-ज्ञान इन दिनों चर्चा का-कथन श्रवण का एक विषय बनकर रह गया हैं जबकि उसकी सार्थकता तब बनती है जब उसे निष्ठा बनकर व्यावहारिक जीवन में उतरने का साहस जुटाना चाहिए। यदि ऐसा हो सके तो समझना चाहिए इस वर्ष अधिक सार्थक रूप से बसन्त पर्व मनाया गया।
अखण्ड - ज्योति अपने जन्म दिन से लेकर अन्तिम श्वाँस तक एक ही सत्य को प्रतिपादित करती रहेगी कि मनुष्य सम्पत्तियों से नहीं-विभूतियों से ही सुखी और समुन्नत हो सकता है। गुण, कर्म, स्वभाव को उच्च स्तरीय बनाये बिना-दृष्टिकोण में उत्कृष्टता का समावेश किये बिना-कर्त्तव्य को आदर्शवादी बनाये बिना आत्मिक उत्कर्ष को प्राप्त कर सकता तो दूर प्रचुर सम्पत्ति के होते हुए भी चैन से नहीं रहा जा सकता। अस्तु हमारे प्रयत्न आत्म संशोधन और आत्म-निर्माण की दिशा में बढ़ने चाहिए। यही सबसे बड़ी दूरदर्शिता है। उलझी हुई अगणित समस्याओं का समाधान इस एक ही सूत्र में सन्निहित है। सर्वतोमुखी प्रगति के एकोंएक आधार इसी मार्ग पर चलने वाले को मिलते हैं। व्यक्ति की अन्तःचेतना निकृष्ट स्तर की बनी रहे तो कुबेर जैसा धनी और इन्द्र जैसा समर्थ होते हुए भी उसे निरन्तर असन्तोष एवं विक्षोभ की आग में जलते रहना पड़ेगा।
संक्षेप में अखण्ड-ज्योति के अब तक के समस्त वाचन का यही साराँश हैं अध्यात्म और धर्म का विशाल कलेवर इसी तथ्य को हृदयंगम कराने के लिये खड़ा किया गया है। आस्तिकता-आध्यात्मिकता एवं धार्मिकता की त्रिवेणी में स्नान करके ही मानवी चेतना धन्य बनती है।
अध्यात्म की दो भुजा है एक योग दूसरा तप। योग का अर्थ है अपनी कामनाएँ, लिप्साएँ, तृष्णाएँ, वासनाएँ सब कुछ को ईश्वर रूपी समष्टि में-उत्कृष्ट आदर्शवादिता में जोड़ देना-व्यक्तिवाद को समूहवाद में बदल देना। तृष्णा के अनगढ़ लोहे को संयम, अपरिग्रह की आग में पकाकर बहुमूल्य लौह भस्म बना देना। मनोकामनाओं को पूर्ण करने के लिए उन्हें समाप्त अथवा परिष्कृत करने के लिये अध्यात्म का सहारा लिया जाता है। तृष्णाएँ असीम है। एक व्यक्ति की कामनाएँ समस्त देवता मिलकर भी पूरी नहीं कर सकते। संसार में जितनी सामग्री है वह एक व्यक्ति की इच्छाएं पूरा कर सकने में भी स्वल्प है। एक की पूर्ति होते ही नई हजार उठ खड़ी होती है। उनकी प्राप्ति ही नहीं सुरक्षा भी अत्यधिक कष्टसाध्य है। फिर वह जंजाल इतना बड़ा है कि उसमें उलझा हुआ व्यक्ति जीवन-लक्ष्य की ओर चलना तो दूर अपनी व्यस्तता के कारण उस दिशा में कुछ सोच तक नहीं सकता। अस्तु आत्म-कल्याण की आवश्यकता अनुभव करने वाले को पहला कदम न्यूनतम निर्वाह के साधन मिलने पर सन्तुष्ट रहना और अपनी बची हुई शक्तियों को सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में लगाना। अध्यात्म का प्रतिफल मनोकामनाओं की पूर्ति नहीं वरन् उस अनावश्यक जंजाल की मन क्षेत्र में जड़ कट जाना है। ऐसे ही लोग आप्तकाम कहलाते हैं। उन्हीं को अपनी दिव्यता विकसित करने का अन्तरात्मा को निर्मल बनाने का अवसर मिलता है। ऐसे लोगों को ही अपने भीतर ईश्वर की झाँकी होती है। वे ही अपना ओर दूसरों का कल्याण कर सकने में समर्थ बनते हैं।
उपरोक्त पंक्तियों में अध्यात्म की एक धारा योग का उल्लेख हुआ। नाला अपने आप को गंगा में मिलाकर गंगा बनता है। भक्त अपनी समस्त आकांक्षाएं ईश्वर के आदेशों में घुलाकर भगवान बनता है। यह ईश्वर को अपनी इच्छानुसार नहीं नचाना चाहता वरन् उसकी इच्छानुसार नाचना चाहता है। अध्यात्म की दूसरी धारा है तप। तप का अर्थ है तपना, कष्ट सहना। कुछ लोग धूप में खड़ा होना, ठण्ड में नहाना, नंगे बदन, नंगे पाँव रहना, मौन रहना, अन्न जल ग्रहण न करना आदि शारीरिक कष्ट सहन करने को तप समझते हैं और सोचते हैं इन बातों से दया-द्रवित होकर ईश्वर हमारे प्रति कृपालु हो जायेंगे। ऐसा सोचना ईश्वर जैसी महान और नियामक सत्ता के सम्बन्ध में ओछा दृष्टिकोण अपनाना है। अकारण शारीरिक कष्ट सहने वालों से - शरीर को हठपूर्वक जलाने वालों से ईश्वर को क्यों और क्या सहानुभूति हो सकती है ? तप के नाम पर इन दिनों इसी प्रकार की अन्ध-मान्यताओं का बोलबाला है।
तप का वास्तविक अर्थ है- संसार में संव्याप्त पीड़ा और पतन की निवृत्ति के लिये अपनी सुख-सम्पदा का बड़े से बड़ा भाग दे डालना। दूसरों पर बखेर देना। स्वभावतः दुख बँटाने वाले और सुख बाँटने वाले लोग भौतिक दृष्टि से गरीबों जैसे स्तर पर निर्वाह करते हैं। अमीरी का उपभोग तो केवल वे पाषाण हृदय कर सकते हैं जिन्हें दूसरों के कष्टों से कोई सहानुभूति नहीं। जब समस्त मानव जाति के लोग हमारे कुटुम्बी हैं तो हमारा निर्वाह स्वभावतः अपने भाइयों के स्तर पर होना चाहिए। गरीबी में रहने से न किसी का स्वास्थ्य खराब होता है और न अन्य दिशा में हानि होती है। ऋषि जीवन इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। प्राचीनकाल के साधु और ब्राह्मण अपना निर्वाह गरीबों जैसा करते थे ताकि उस उपभोग की बचत का लाभ समाज को ऊंचा उठाने में-सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में-पीड़ा और पतन के निराकरण में लगाया जा सकना सम्भव हो सके। ऐसा तपस्वी दृष्टिकोण अपनाकर जीवन की गतिविधियों का निर्धारण करने वाले को सच्चे अर्थों में तपस्वी कह सकते हैं। ऐसे लोगों में उन सभी दिव्य शक्तियों का अवतरण हो सकता है जिनका वर्णन योग और तप के माहात्म्यों के संदर्भ में लिखा गया या कहा गया है।
आज का हमारा धर्म और अध्यात्म सचमुच उतना ही घिनौना है जिसकी सड़ांध में सहज ही नास्तिकता जैसी महामारियाँ उपजें। धर्म क्या है- अमुक वंश, अमुक वेश के लोगों को लूट-पाट का खुला छूट पत्र। धर्म क्या है- कुरीतियों मूढ़ताओं, रूढ़ियों, भ्रांतियों का पुलिंदा। अध्यात्म क्या है- थोड़ी-सी पूजा-पाठ की विडम्बना रच कर देवताओं सहित ईश्वर को अपना वंशवर्ती बना लेने और उनसे उचित-अनुचित मनोकामनाएं पूरी करने के लिए बन्दर की तरह नचाने का दुःस्वप्न। आज का अध्यात्म लगभग जादू मन्तर के स्तर पर पहुँच गया है जिसके अनुसार कुछ अनगढ़ शब्दों का उच्चारण और कुछ वस्तुओं की औंधी-सीधी, उलट-पुलट। इन्हीं क्रिया कृत्यों की बाल क्रीडा करने वाले लोग शेखचिल्ली जैसी उड़ानों के साथ किसी कल्पना लोक में विचरण करते रहते हैं और चमत्कारी ऋद्धि-सिद्धियों के मन-मोदक खाते रहते हैं। इस सनकी समुदाय के हाथ क्या कुछ लग सकता था-लगा भी नहीं, वे टूटे हारे लोग नकटा सम्प्रदाय के गुण गाते रहते हैं और अपनी भूल पर पर्दा डालते रहते हैं। यही है आज के तथाकथित अध्यात्मवादियों की नंगी तस्वीर जिसे देखकर हमारा शिर लज्जा से नीचे झुक जाता है और रुलाई आती है। इतने लोगों का इतना श्रम, समय, धन एवं मन यदि सच्च अध्यात्म के लिये नियोजित हुआ होता तो वे स्वयं धन्य बन सकते थे और अपने प्रकाश से सारे वातावरण में आलोक भर सकते थे।
मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा, सबसे बड़ी सफलता आत्मिक उत्कर्ष रूप से बनता है। यह महानता परलोक के ही लिये उपयोगी नहीं है इस लोक में भी उपार्जनकर्ता को देवोपम स्तर पर ले जाकर रख देती है। भले ही उसके पास भौतिक साधन स्वल्प हों, पर उसके स्थान पर जो आत्म कमाई उसके पास संग्रहित रहती है वह क्षण भंगुर सम्पत्तियों की तुलना में हजारों, लाखों गुना हर्षोल्लास, गौरव वर्चस्व प्रदान करती है। ऐसा व्यक्ति जहाँ भी रहता है वहीं स्वर्गीय वातावरण उत्पन्न करता है। उसके भीतर की सुगन्ध चन्दन वृक्ष की तरह दूर दूर तक फैलती है और समीपवर्ती झाड़-झंखाड़ों को भी सुगन्ध युक्त कर देती है। मनुष्य में देवत्व का उदय कोई कल्पना नहीं है। स्वयं प्रकाशित और समीपवर्ती क्षेत्र को प्रकाशित करने वाला व्यक्ति सच्चे अर्थों में देव है। उसे किसी देवलोक में जाने की अपेक्षा नहीं रहती क्योंकि जहाँ कहीं भी उसका रहना होता है; वहाँ सहज ही देव वातावरण बनकर खड़ा होता है। अध्यात्म किसी को स्वर्ग में भेजता नहीं वरन् साधक को कहीं भी स्वर्ग का सृजन कर लेने की सामर्थ्य प्रदान करता है। अस्तु हमें अध्यात्म की गरिमा समझनी चाहिए और उसकी उपलब्धि के लिए धन, बल, शिक्षा, स्वास्थ्य आदि संग्रह करने में भी अधिक ध्यान देना चाहिए। शरीर-गत वासनाएँ और मनोगत तृष्णाएँ अपनी तृप्ति माँगती हैं और उसके लिए हमारा सारा समय, श्रम एवं मनोयोग हथिया लेती है। आत्मा की भूख और पुकार की और नितान्त उपेक्षा बढ़ती जाती है; उसके क्षुधार्त रहने से कितनी क्षति उठानी पड़ती है उसे हम वासना, तृष्णा के गुलाम नर कीटक देख समझ ही नहीं पाते। हमारी दृष्टि और दिशा बदली जानी चाहिए।
अखण्ड-ज्योति इन 39 वर्षों में यह बताती सिखाती रही है कि आध्यात्मिक उद्देश्य का एक आरम्भिक चरण उपासना अवश्य है, पर उतने भर से लक्ष्य की प्राप्त नहीं हो सकती। पूजा करते रहने भर से किसी को भी आत्मबल नहीं मिल सकता। इसके लिए जीवन साधना अभीष्ट है। हमारी आस्थाएँ विचारणाएँ गतिविधियाँ तीनों ही उस स्तर तक परिष्कृत होनी चाहिए जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादिता के नाम से कहा समझा जा सकता है। साधना व्यक्तित्व के अन्तरंग और बहिरंग स्वरूप में काया-कल्प उपस्थित करती है। दुनिया वाले जिस तरह सोचते और जिस राह पर चलते हैं। उससे अध्यात्मवादी की दिशा इतनी भिन्न होती है कि गीतकार को योगी और भोगी लोगों में दिन रात जितना अन्तर बताना पड़ा। गीता में एक जगह आता है जब दुनिया सोती है तब योगी जगता है। जब दुनिया जगती है तब योगी सोता है। अलंकारित रूप से संकेत यह है कि पेट और प्रजनन के लिए मरने, खपने वाले अधम नर-पशुओं से भरी हुई इस दुनिया में योगी की गड़रिये की भूमिका प्रस्तुत करनी चाहिए। उनके पीछे नहीं चलना चाहिए वरन् उन अन्धी भेड़ों को अपनी लाठी से हाँकने का प्रयास करना चाहिए। लोगों की सलाह नहीं चाहिए वरन् उन्हें अपनी सलाह पर चलने की जिम्मेदारी सम्भालनी चाहिए।
अखण्ड ज्योति ने अपनी प्रिय परिजनों को सदा से यह कहा है- लोग बड़े निकम्मे हैं- लोक-प्रवाह पतन और नरक की दिशा में बह रहा है। तुम इनके साथ मत चलो-इनके प्रवाह में मत बहो- इनकी सलाह मत मानो अन्यथा इनके साथ-साथ तुम भी उस गर्त में औंधे मुँह गिरोगे जिसमें से उबरना अति कठिन है। लोग प्रशंसा करें तो समझना तुम किसी निन्दनीय आधार को पकड़े खड़े हो। लोग उपहास उड़ायें तो समझना, तुमने विवेकशीलता का परिचय देना आरम्भ कर दिया। मछली जल की धारा चीरकर उलटी चलने का साहस करती है तुम लोक-प्रवाह से-उलटे वही। अपना आदर्श उपस्थित करो और प्रकाश स्तम्भ बनो। माया और भ्रांति का सबसे बड़ा लक्षण ग्रह है कि मनुष्य लोगों का मुँह तके- उनसे प्रशंसा सुनने की आशा करे। लोगों ने कभी किसी को अच्छी सलाह नहीं दी। किसी के स्वजन सम्बन्धी कदाचित ही किसी को महान बनने का परामर्श देते हों। उनको बड़प्पन पसन्द है, भले ही वह कितने ही अवाँछनीय तरीकों से उपार्जित क्यों न किया गया हो जिसे ‘महान’ बनना है उसे पहला कदम यहाँ से उठाना पड़ेगा कि अपनी अन्तरात्मा को-अपने भगवान को और आदर्शवादी परम्पराओं के परामर्श को पर्याप्त मानें। जहाँ यह तीनों मिल सकें वहाँ फिर लोगों की सलाह को सर्वथा उपेक्षित करने का साहस सँजोलें। इन दिनों इससे कम में कोई सच्चा आध्यात्मवादी नहीं बन सकता। आत्मबल का अर्थ है- दिव्य प्रयोजनों के लिए बढ़ चलने के समस्त अवरोधों को कुचल सकने वाला प्रचण्ड शौर्य और अटूट साहस। हमें आत्मबल सलाह करना चाहिए और देव-मानव की भूमिका सम्पादित करने के लिए आगे बढ़ना चाहिए।
पिछले पृष्ठों पर संक्षेप में यह बता दिया गया है कि पूरे 39 वर्षों में अखण्ड-ज्योति ने सनातन अध्यात्म तत्व-ज्ञान को किस प्रकार अनेक तर्क, उदाहरण, प्रमाण और आधार प्रस्तुत करते हुए स्वजनों के सामने रखा है। यदि 39 वर्ष के अंकों को निचोड़ा जाय तो उसमें से सार तत्व की इतनी ही बूँदें मिलेंगी जिन्हें इन पृष्ठों पर अंकित कर दिया गया है।
प्रसन्नता की बात है कि विचारशील वर्ग द्वारा सैद्धान्तिक रूप से इसे सही माना गया। प्रतिपादन की यथार्थता को सराहा गया। इस पसन्दगी और समर्थन का ही प्रभाव है कि अखण्ड ज्योति इतनी बड़ी संख्या में लोकप्रिय हो सकी और उसकी अनुवाद रूप में अँग्रेजी, गुजराती, मराठी, उड़िया आदि भाषाओं में दूसरी पत्रिकाएँ, प्रकाशित करनी पड़ी। लाखों व्यक्ति अपने को युग-निर्माण मिशन का अनुयायी कहने लगे।
सफलता का प्रथम चरण समर्थन के रूप में सामने आया यह सन्तोष की बात है, पर इससे कुछ अधिक प्रयोजन सिद्ध न होगा। बात तब बनेगी जब लोग उस राह पर चलना आरम्भ करें। कुछ आध्यात्मवादी आगे आयें और बतायें कि इस क्षेत्र में प्रवेश करने वाले देव मानव आखिर होते कैसे है। इस जीवन्त प्रतिभाओं के दर्शन करके ही लोग गहरी प्रेरणा प्राप्त करेंगे और उनके सान्निध्य में आकर अपने को उस साँचे में ढालने का प्रयत्न करेंगे। समर्थन को साकार होने के लिए आवश्यक है कि उस महान आदर्श को लोग अपने व्यवहार में उतारें और प्रेरणा की प्रत्यक्ष प्रतिमा बनकर दूसरों को अनुगमन का साहस प्रदान करें।
स्वजनों ने इस दिशा में कुछ-कुछ साहस भी किया है। न किया होता तो इतना बड़ा संगठन और उसकी उत्साहवर्धक गतिविधियाँ कैसे चल सकी होती। यदाकदा थोड़ा समय और थोड़ा पैसा खर्च कर देने से भी बूँद-बूँद घट भरता है और उस सम्मिलित प्रयास के फलस्वरूप कुछ न कुछ हलचल पैदा होती है। अभी उतना ही होता रहा है। ऐसे साहसी लोग उँगलियों गिनने जितने ही आगे आये हैं और अपने को लोभ, मोह की गहरी दलदल में से निकाल कर अपनी आन्तरिक विभूतियों और भौतिक सम्पत्तियों का इतना अंश आदर्श निष्ठा के लिए समर्पित कर सके जिससे उनकी साहसिकता सिद्ध होती है - जिसे देखकर दूसरों में अनुगमन की प्रेरणा दे सकने वाला प्रकाश उत्पन्न हो सके।
अखण्ड परिजन इस बसन्त पर्व पर इस दिशा में विशेष रूप से विचार करें कि क्या वे सच्चे अध्यात्म के सच्चे अनुयायी बन सकने का साहस जुटा सकते हैं ? यदि वैसी कुछ उमंग अन्तःकरण में उठती दिखाई पड़े तो कुछ कदम अवश्य ही उस दिशा में उठाने की चेष्टा करनी चाहिए। आदर्शों की चर्चा से नहीं उन्हें जीवन में उतारने से काम चलता है। हमें ध्यान रखना चाहिए कि अगणित व्यक्तिगत दोष, दुर्गुणों को अलग-अलग करके - एक-एक करके नहीं हटाया जा सकता है। रानी मधुमक्खी जहाँ रहती है वहाँ पूरा शहद का छत्ता जमा रहता है और अन्य मक्खियों का पूरा झुण्ड वहाँ जमा रहता है। संकीर्ण स्वार्थपरता की रानी मक्खी जब तक उड़ेगी नहीं तब तक दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का छत्ता ज्यों का त्यों बना रहेगा, हमें विचारना चाहिए कि पेट और प्रजनन के लिए, वासना और तृष्णा के लिए, सर्वतोभावेन समर्पित हमारा जीवन क्या परमेश्वर के लिए, आदर्शों के लिए-नियोजित किया जा सकता है ? यदि हाँ तो कितना, कैसे और किस प्रकार ? बसन्त पर्व पर हमें हजार बार इस तथ्य पर आत्म चिन्तन करना चाहिए और यदि कुछ अन्तः प्रकाश उत्पन्न हो तो अगले वर्ष अपने समय, श्रम, मनोयोग एवं मन का कोई महत्वपूर्ण अंश युग की पुकार को पूरा करने के लिए नियत करना चाहिए। जितना स्वार्थ पर अंकुश लगाया जा सकेगा उतने अनुपात में परमार्थ बन पड़ेगा। सादगी, संयम, अपरिग्रह और स्वल्प संतोष की आध्यात्मिक आस्थाएँ बढ़ाई जा सके तो अपने पास इतना अधिक वैभव दृष्टिगोचर होगा कि उसे युग देवता के चरणों पर समर्पित करके अध्यात्म को अपने को सच्चे अर्थों में प्रकाश पुँज सिद्ध किया जा सके।
आज भावनाशील प्रबुद्ध आत्माओं कि दसों दिशाओं से पुकार उठ रही है। उनकी आँतरिक और वाह्य विभूतियाँ लोक-मंगल के लिए नियोजित हो सकें तो प्रस्तुत नरक को स्वर्ग में बदला जा सकना सम्भव हो सकता है। इस संदर्भ में नवम्बर अखण्ड-ज्योति के पृष्ठ 56 पर युग देवता का आह्वान छपा है। बसन्त पर्व का आध्यात्मिक चिन्तन परिजनों को उस दिशा में धकेल सके तो समझना चाहिए कि इस वर्ष का बसन्तोत्सव सच्चे अर्थों में सार्थक हो गया। अध्यात्म का स्वरूप समझाने में अखण्ड-ज्योति को सफलता मिली यदि वह कुछ ऐसे व्यक्ति विनिर्मित कर सके जो अपने जीवन को अध्यात्म आदर्शों के अनुरूप प्रस्तुत करे तो समझना चाहिए अखण्ड-ज्योति का अब तक का जीवन श्रम सार्थक हो गया। 38 वें जन्म दिन पर इसी सफलता के लिए प्रबुद्ध परिजनों से साहसिक कदम बढ़ाने की अपेक्षा है।
*समाप्त*