(महाकवि रवीन्द्र नाथ की एकला चलो का अनुवाद)
यदि तेरी पुकार सुनकर भी कोई पास न आये। चल तू चलता रहा एकाकी अविचल कदम बढ़ाये।
हो ऐसा दुर्भाग्य, न खुलकर बात करे यदि कोई मुख फेरे हो सबने डरकर सारी हिम्मत खोई
तो निज प्राण उलीच हृदय का राग मुक्त तू गाये। चल तू चलता रहा एकाकी अविचल कदम बढ़ाये।
बीहड़ पथ पर छोड़ अगर सब बनें पलायनवादी कोई मुड़कर भी न लखे जब तुझे समझ उन्मादी
तब भी नव पगों से पथ कंटक पिस जाये। चल तू चलता रहा एकाकी अविचल कदम बढ़ाये।
जब बरसाती रैन अंधेरी बन जाये तूफानी, घर के द्वारा बंद हो जाये मिले न ज्योति निशानी
तब सीने पर वज्रघात ले पंजर स्वयं जलाये। चल तू चलता रहा एकाकी अविचल कदम बढ़ाये।
अनुवादक -डा0 हरगोविन्द सिंह
मानव का निर्माण जड़ एवं चेतन दोनों के युग्म से हुआ है। जब तक शरीर में चेतना है तब तक हमारी सभी इन्द्रियाँ क्रियाशील है और शरीर में हल चल है लेकिन जिस क्षण चेतना या आत्मा शरीर से अलग हो जाती है। शरीर मिट्टी का ढेला मात्र ही रहता है। कोई स्पन्दन कोई क्रिया कोई सार्थकता नहीं रह जाती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि शरीर एवं आत्मा का संयोग कोई जहाँ जीवात्मा का कोई मूल्य नहीं है। उल्टे वह भय का कारण बन जाता है और उसे हम घर से शीघ्र ही बाहर निकालते हैं फिर जलाने का प्रबन्ध करते हैं।
अपने जीवन का प्रत्येक क्षण हम अपने शरीर के सुख साधन जुटाने में खर्च करते हैं और इन्द्रियजय भोगों में मरते खपते रहते हैं। लेकिन मृत्यु के समय हम अपनी वासनाओं तृष्णाओं और लिप्साओं को तुष्ट नहीं कर पाते।
सन्तत आत्मा जिसके लिये हमने कभी नहीं सोचा दीनावस्था में रोती कलपती रहती है और असन्तुष्ट होकर शरीर से अलग होती है।
आत्मा परमात्मा का अंश है। जिन भोगों से शरीर को आनन्द मिलता है। उन्हीं से आत्मा को भी मिले आवश्यक नहीं। जिस क्षण से हम इस दुनिया में आते हैं उससे लेकर मृत्यु तक आत्मा हमारे शरीर में उपस्थित है। शरीर के भिन्न भिन्न अवयवों की क्षमता विशेषता एवं क्रिया कलाप के बारे में बहुत सी बातें जानते हैं और अधिक जानने का प्रयास करते हैं। लेकिन अपने ही अन्दर छिपी आत्म को जानने पहचानने समझने एवं विकसित करने की बात हम नहीं जानते।
शरीर को पुष्ट बनाने के लिए हम व्यायाम आहार और देख भाल के लिए सदैव प्रयत्नशील करते हैं। यदि शरीर के किसी अंग में पीड़ा या कमी आये तो हम उसकी चिकित्सा कराते हैं और उसकी शक्ति पुनः वापस आ जाय इसके लिये हम अपनी सामर्थ्य भर प्रयास करते हैं। यदि रोग मुक्त हो गये तो हमें प्रसन्नता होती है इसके लिए परमात्मा को धन्यवाद देते हैं।
परन्तु अपने आत्मा की पीड़ा पर हम कभी ध्यान नहीं देते। वह रोती है कलपती है। क्षत विक्षत होकर तड़पती है लेकिन उसका कभी हम ख्याल नहीं करते क्योंकि शरीर को ही सब कुछ मान बैठे है। जब तक अपनी मूल आस्थाओं में हम फेर फेर परिष्कार नहीं करेंगे तब तक हमें सच्चे आनन्द की प्राप्ति नहीं हो सकती है।
जीवन के समग्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए वह आवश्यक है कि हम शरीर एवं आत्मा दोनों के समन्वित विकास परिष्कार एवं तुष्टि पुष्टि का दृष्टिकोण बनावे। एक को ही सिर्फ विकसित करे और एक को अपेक्षित करें ऐसा दृष्टिकोण अपनाने से सच्चा आनन्द नहीं मिल सकता। सिर्फ आत्मा का ही परिष्कार एवं विकास करें और शरीर को उपेक्षित करें इससे भी अपना कल्याण नहीं हो सकता। उसी प्रकार जब आत्म को कष्ट पहुँचता है तो मन दुःखी होकर शरीर को प्रभावित करता है।
शरीर की शक्ति सीमित है। लेकिन आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति उसे शक्ति का अकूत भण्डार बना देते हैं।
जिन्होंने अपनी आत्म को दीन हीन स्थिति में रखा है और उसकी प्रचण्ड शक्ति से परिचित नहीं है वे मुर्दों जैसा जीवन जीने के लिए मजबूर होते हैं। वे शारीरिक सामर्थ्य रहते हुए भी बड़ी गयी गुजरी स्थिति में रहते हैं और निराशा चिन्ता एवं निरर्थक जीवन बिताते रहते हैं। जबकि अपाहिज अपंग क्षीणकाय रुग्ण एवं दुर्बल व्यक्तियों ने भी अपने आत्मबल के द्वारा ऐसे कार्य सम्पादित किये है जिनसे वे इतिहास में अमर हो गये है। सैकड़ों लोगों के लिए वे प्रेरणा के स्रोत बने है। उनकी गाथायें कितनी में आशा विश्वास एवं प्रेरणा का संचार करती है।
प्रेम के अभाव में हमारी सत्ता पृथक और अकेली रह जाती है मानव अपने को निस्सहाय महसूस करते हैं। अहं का भाव उभरकर प्रधान बनता है। स्वार्थ का विकास होने लगता है। वह अपने तक ही सीमित रहता है। प्रत्येक व्यक्ति स्वयं में बन्द हो जाता है। इस प्रकार की संकीर्णता की गति मृत्यु की ओर अग्रसर होती है। जीवन तो पारस्परिकता में है संबंधों में है जितनी पारस्परिकता एवं आत्मीयता बढ़ेगी उतना ही जीवन खिलेगा विकसित होगा उत्कृष्ट होगा।
प्रेम का तत्व सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त है किन्तु कही अधिक और कही कम। अपनत्व सभी में स्थित है पशु पक्षी मानव आदि सभी अपने का प्यार कतरे है। डाकू दूसरों की हत्या करता है किन्तु अपनी तथा अपने बाल बच्चों की सुरक्षा का ध्यान रखता है। हिंसक सिंह भी पशुओं का भक्षण करता है। किन्तु अपनी सिंहनी के प्रति प्रेम का ही व्यवहार करता है विकराल सर्प दूसरों के लिए काल है किन्तु अपनी नागिन के लिये प्रेम विह्वल है। यदि प्रेम या निजत्व न हो तो सृष्टि ही नष्ट हो जावे।
आत्मा और परमात्मा एक ही है तुलसीदास जी ने कहा है ईश्वर अंश जीवन अविनाशी “समुद्र की लहर समुद्र से भिन्न नहीं है, छटाकाश आकाश से भिन्न नहीं है। वैसे ही आत्मा परमात्मा से भिन्न नहीं है। आत्मा से ही आत्मीयता शब्द बना है जो आत्म का भाव वाचक नाम है। इसी को निजत्व अपनत्व कहते हैं यही प्रेम है। यदि दूसरे शब्दों में कहें तो इस प्रकार कह सकते हैं कि मैं सर्व सत्ता से पृथक और अन्य नहीं हूँ आत्मा परमात्मा सर्वव्यापक है। यह हम भूल जाते है और अपने को पृथक अकेला रात लेते हैं। लहर अपने को समुद्र से पृथक कहे तो यह उसका अज्ञान ही है। जो व्यक्ति आत्म सर्वभूतेषु देखता है वही समझदार और पण्डित है। जब वह आत्मनः प्रतिकूलानि न समाचरेत्। का व्यवहार करता है वही प्रेम का प्रकाशन है। जितनी प्रेम की व्यापकता में वृद्धि करता जायेगा उतना ही अहं अथवा मैं का घेरा कम होता जाएगा।
जब कोई व्यक्ति किसी व्यक्ति के लिए प्रति अपने “मैं” को छोड़ देता है तो उसे प्रेम कहते हैं जब कोई ‘सर्व’ के प्रति अपने ‘मैं’ को छोड़ देता है तो वह भक्ति कहलाती है। मानव में प्रभु के मिलन के लिए प्रेम आवश्यक है। श्री रामानुजाचार्य के पास एक व्यक्ति दीक्षित होने आया और बोला प्रभु के पाने के लिए आप मुझे दीक्षा दीजिए। श्री रामानुजाचार्य बोले तुमने किसी से प्रेम किया है उसने कहा कि नहीं हम तो प्रभु से मिलना चाहते हैं। तब रामानुजाचार्य बोले मैं दीक्षा देने में असमर्थ हूँ क्योंकि यदि तुम्हारे पा सप्रेम होता तो मैं उसे परिशुद्ध कर ईश्वर की ओर ले जाता लेकिन तुम में प्रेम ही नहीं है।
प्रेम और सत्य एक रुपये के दो पहलू है एक दूसरे के पूरक और आधार है। सत्य का आधार मस्तिष्क है तो प्रेम का आधार हृदय है। सत्य में वह आत्मीयता नहीं जो प्रेम में है। सत्य यदि रुक्ष और कटु है तो प्रेम मधुर और कोमल है। सत्य जैसे जानने की बात है तो प्रेम वैसा ही होने की भी। सत्य से निर्भयता आती है और प्रेम से निराभिमानता।
आज कल प्रेम के विषय में गलत भ्रान्ति है। काम को ही प्रेम समझा जाता है। इस भ्रम के फैलाने में सिनेमा गन्दे उपन्यास तथा कहानियों का प्रधान हाथ है। जो दर्शकों और पाठकों को गलत दिशा दे रहे हैं। काम प्रेम का आभास तथा भ्रम है। जैसे कोई व्यक्ति कोहरे का धुँआ समझ लेता है मृग मरुभूमि में प्रकाश के झिलमिलाने से उसे पानी समझ लेता है। और प्यास बुझाते को दौड़ता है। जिसे मृग तृष्णा कहते हैं। जैसे उसे आभास और भ्रम हो जाता है। वैसे ही मान को भी काम में प्रेम का आभास या भ्रम दिखाई देता है।
प्रेम और काम में बहुत अन्तर है प्रेम जितना विकसित होता है काम उतना ही संकीर्ण हो जाता है। प्रेम सृजनात्मक शक्ति का ऊर्ध्वीकरण है तो काम सृजनात्मक शक्ति की पतनोन्मुखी स्थिति है इसलिए जब प्रेम पूर्णता की स्थिति में बढ़ता है तो काम शून्यता की स्थिति में पहुँचता जाता है। इस प्रकार की स्थिति में जीने वाला व्यक्ति ब्रह्मचर्य की दशा को प्राप्त करता जाता है। अपनी सृजनात्मक शक्ति के द्वारा ही आत्मबल दूसरों के हित में रह रहना प्रेम का रूप है। प्रेम का व्यावहारिक रूप सेवा है। काम तो प्रकृति ही सम्मोहन शक्ति है जो सन्तति के उत्पन्न हेतु निर्मित है उसकी अधिकता या उसका दुरुपयोग करना व्यभिचार है। काम के दमन से काम से मुक्ति नहीं हो सकती और प्रेम के द्वारा ही उससे मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। तुलसीदास जी बड़े कामुक थे। जब उनका प्रेम भगवान में लग गया तो काम वासना छूट गई। राम गुणगान में रामचरित मानस का सृजन किया। सही सृजनात्मक शक्ति प्रेम के द्वारा पतनोन्मुख दिशा में न बहकर सर्वभूत हिते रता हुई यही प्रेम और भक्ति का परिणाम है।
प्रेम का विकास अपने परिवार में प्रारम्भ होता है। यह उसकी प्रथम सीढ़ी है और पास पड़ोस ग्राम देश और विश्व में व्याप्त होता जाता है। वह केवल मानव समाज तक ही सीमित नहीं रहता पेड़ पौधे पशु पक्षी आदि सृष्टि में व्याप्त होता जाता है सब में अपनत्व भाव का विकास होने लगता है। जब अन्तिम सीढ़ी पर प्रेम पहुँचता है तो वही प्रभु की स्थिति है वह स्थिति प्रभु सारूप्य की स्थिति है किन्तु प्रथम या निम्न सीढ़ी के आधार बिना अन्तिम सीढ़ी तक पहुँचना असम्भव है। प्रेम साधना की पराकाष्ठा ही प्रभु दर्शन है।
प्रभु आनन्द धन है। यदि आनन्द की प्राप्ति करना है तो प्रेम ही उसकी प्राप्ति का मुख्य साधन है। जिस परिवार या जिस समाज में परस्पर प्रेम है एक दूसरे से आत्मीयता है वह एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के दुख को अपना ही दुख मानता है। उसके निवारण हेतु वैसा ही प्रयत्न करता है जैसा कि अपने दुख के निवारण हेतु करता है। उसे आत्मवत् ही समझता है । उस परिवार और समाज में कैसे कटुता रहेगी? कैसे विषमता रहेगी? कैसे एक दूसरे की हानि करेंगे? वह तो यह समझेंगे कि उसकी हानि की हमारी हानि हैं वह परिवार और समाज सुखी रहेगा और उस प्रेम के द्वारा आनन्दघन प्रभु के निकट पहुँचेगा।
यदि आज संसार में कुटुम्ब की स्थिति हो जाय परिवार की भाँति एक देश के मानव दूसरे देश के मानवों से प्रेम करने लगे तो विश्व में आज जो घृणा द्वेष की विषम स्थिति बनी हुई है वह मिट जावे। विध्वंसक हथियार न बने। ज्ञान विज्ञान की शक्ति नाश की दिशा में न चलकर विकास की दिशा में प्रवाहित हो। आज जो संसार नरक सदृश बना है। जीवन घुट रहा है वह संसार स्वर्ग सदृश बन सकता है।
आंसुओं की दो बूंदें आंखों से ढुलकीं और गिरते पड़ते एक जलाशय में जाकर इकट्ठी हो गई। सजातीय मिलन से दोनों ने प्रसन्नता अनुभव की और परस्पर एक दूसरों परिचय पूछने लगी।
पहली ने कहा- मैं उस युवती की आँखों से ढुली जिस के पति को एक दूसरी युवती ने अपने प्रेम जाल में फँसा लिया और वह बेचारी निरी होकर रह गई।
दूसरी बूँद ने कहा- ओ, हो तब तो तुम मुझ से ही सम्बन्धित हो। मैं उस युवती की आँखों से ढुली जिसने तुम्हारी मालकिन को निरीह बनाया था पर कुछ ही दिन बाद वह युवक तीसरी युवती की ओर खिसक गया तो मेरी मालकिन सिहर उठी, कि मैंने क्यों अनैतिक व्यक्ति पर भरोसा किया।उसे पश्चाताप का रोना आया तो मैं जमीन परा आ गिरी और किसी प्रकार यहाँ आ पहुँची।
जड़ में जीवन पाया जाता है यह ठीक है। यह भी ठीक है कि जीवन सत्ता द्वारा पड़ का संचालन होता है। किन्तु यह मान्यता सही नहीं कि जड़ से जीव की उत्पत्ति होती है जीवन जड़ता की एक स्फुरणा मात्र है। अधिक से अधिक यह कह सकते हैं कि जीवन की स्फुरणा से जड़ तत्वों में हलचल उत्पन्न होती है और वह अचेतन होने के बावजूद चेतन दिखाई पड़ता है। मूल सत्ता जड़ की नहीं चेतना की है। चेतना से जड़ का संचालन परिवर्तन परिष्कार हो सकता है किन्तु जड़ में न तो जीवन उत्पन्न करने की शक्ति है और न उसे उत्पन्न प्रभावित करने में समर्थ है। चेतन जड़ का उपयोग उपभोग कर सकता है। यही ब्रह्म विद्या की मान्यता परख की कसौटी पर खरी उतरती है।
यह सिद्धान्त एक प्रकार से अकाट्य ही है कि जीवन से जीवन की उत्पत्ति है। निर्जीव से जीव नहीं बनता है। कृत्रिम जीवन उत्पन्न करने के लिए पिछले दिनों जो सफलता पाई गई है उसकी व्याख्या अधिक से अधिक यही हो सकती है कि विकसित जीवन स्तर को विकसित जीवन में परिष्कृत किया गया। अभी ऐसा सम्भव नहीं हो सका कि निर्जीव तत्व को जीवित स्तर का बनाया जा सके। संभवतः ऐसा कभी भी न हो सकेगा।
जीवन अविनाशी है। वह सृष्टि के आरम्भ में पैदा हुआ और अन्त तक बना रहेगा। स्थिति के अनुसार परिवर्तन होना स्वाभाविक है। क्योंकि इस जगत का प्रत्येक अणु परिवर्तित होता है हलचलों के कारण ही यहाँ तरह तरह की जन्मने बढ़ने और मरे की गतिविधियाँ दृश्यमान होती है। हलचल रुक जाय तो उसकी विकल्प प्रलय जड़ नीरवता ही हो सकती है। जीवन भी हलचलों से प्रभावित होता है और वह जन्मता बढ़ता और मरता दीखता है। स्थूल काया की तरह सूक्ष्म कोशिकाएँ भी जन्मती बढ़ती और मरती है फिर भी उनके भीतर का मूल प्रवाह यथावत बना रहता है। एक से दूसरे स्थान में एक से दूसरे रूप में स्थानान्तरण होता दीखता है। यह हलचलों का केन्द्र है। इसी में सृष्टि की शोभा विशेषता है। इतना सब होते हुए भी जीवन की मूल सत्ता यथावत अक्षुण्ण बनी रहती है। उसका बहिरंग की बदलता है। अन्त रंग की मूल प्रकृति की अविनाशी सत्ता ही कहा जा सकता है। उसके अस्तित्व को कोई चुनौती नहीं दे सकता भी नहीं।
अति आदिम अवस्था में एक कोषीय प्राणी द्विखण्डित होकर दो कोषों अर्थात् दो जीवों में विखण्ड हो जाता है। इन जीवों की न कोई माता होती है न पिता। क्योंकि एक कोष के दो में बंट जाने से प्रथम कोष का अस्तित्व ही नहीं रह जाता। फिर इन नवीन कोषों का भी विखण्ड होता है। इस प्रकार अतीत काल से लेकर अद्यावधि जीवनी शक्ति का अखण्ड स्रोत प्रवाहित होता आया है और वह जीव सत्ता अविनाशी बनी हुई है।
एक कोष का विखण्डन होने पर जिस नवीन जी की उत्पत्ति होती है। उसमें कोई नवीनता नहीं होती प्रथम कोष की ही तरह वे नये कोश भी होते हैं। किन्तु मैथुन द्वारा उत्पन्न प्राणियों में दो जीवों की सम्मिश्रित विशेषता कोषों को दो भागों में बाँटा जा सकता है। (1) देहकोष साइटोप्लाज्म (2) बीजकोष जर्म प्लाज्म पर नारी के बीजकोषों के संयोग से भ्रूणकोष उत्पन्न होते हैं। इसी एक भ्रूणकोष से सहस्रों कोष उत्पन्न होते हैं। इसमें कुछ बीजकोष होते हैं कुछ जीवकोष।
वैज्ञानिक बाइजमैन के अनुसार देहकोषों में तो परिवर्तन होते रहते हैं पर बीजकोषों में परिवर्तन नहीं होता बीजकोष से देहकोष की उत्पत्ति होती है देहकोष लिए यह सम्भव नहीं कि वह बीजकोष उत्पन्न कर सके बीजकोषों के द्वारा नित्य नूतन परिपूर्ण देह बनती रहती है। वह प्रवाह सन्तानों में चला जाता है। सब प्रकार जीवन अजर अमर बना रहता है। जीव विज्ञानी वाल्टर ने अपने वंशानुक्रम ग्रन्थ में आत्मा की अमरता के सिद्धान्त को लगभग इसी स्तर पर प्रतिपादित किया है जिस प्रकार कि भारतीय अध्यात्म की मान्यता रही है।
मानव में जड़ पदार्थों का जितना अंश है उसका मूल्याँकन उपहासास्पद है। वह तुच्छ और नगण्य है। कायिक विश्लेषण से जो कुछ सामने आता है उसका कोई मूल्य नहीं। हमारी देह में 65 प्रतिशत पानी 16 प्रतिशत प्रोटीन 14 प्रतिशत चर्बी 5 प्रतिशत खनिज और 10 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट होता है। माँस शरीर में 42 प्रतिशत है। उसमें तीन चौथाई पानी और एक चौथाई प्रोटीन जैसे दूसरे पदार्थ है। इन सबका आर्थिक या रासायनिक मूल्यांकन किया जाय तो वह दस रुपये से भी कम बैठेगा।
अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य की शारीरिक शक्ति स्वरूप है। शक्ति के हिसाब से एक औसत घोड़ा औसत मनुष्य की तुलना में 22 गुना अधिक शक्तिशाली होता है। दीर्घजीवन की दृष्टि से भी वह कितने ही जीवों से बहुत पीछे है। संसार में सबसे दीर्घजीवी मनुष्य जिगली सिस्लिमाव नामक रूप के अजरवेजान गांव में रहता है। संसार में सबसे लम्बा मनुष्य जीककर्ल है। जिसकी ऊँचाई 9 फुट 7 इंच है। सबसे भरी डैनियल लैम्बर्ट है जिसका भार 760 पौंड है। यह सब आंकड़े आश्चर्यजनक है। पर इससे क्या अकेली ह्वेल मछली ही हाथी से पाँच गुनी बड़ी और भारी होती है। ह्वेल साधारणतया 8200 पौंड की होती है।
जीवों में मनुष्य अद्भुत है। उसकी अन्तःचेतना में ऐसी विशेषताएँ पाई जाती है जो जीव विज्ञान की सामान्य मर्यादाओं और मान्यताओं का विलक्षण ढंग से अतिक्रमण करती है। ऐसा अन्य प्राणियों में नहीं होता वे एक सीमा तक ही अपने वंश के निर्धारित स्तर का उल्लंघन करते हैं पर मनुष्य की विशेषताएँ जब उभरती है तो सारे नियम कानून तोड़कर रख देती है और ऐसे अद्भुत प्रमाण उत्पन्न करती है कि जीव विज्ञानी दांतों तले उंगली दबाये रह जाते हैं और उसे सृष्टि का अद्भुत एवं अनुपम रचना कह कर अपना समाधान करते हैं।
चार्ल्स स्टिन मेज जब 16 वर्ष का था तभी उनका वजन 585 पौण्ड था। उसके भार में असाधारण रूप से वृद्धि होती चली गई। 28 वर्ष का होने तक उसका वजन 740 पौण्ड हो गया। उसकी खुराक आश्चर्यजनक रूप से बढ़ती जाती थी। मरने से पूर्व तो वजन की वृद्धि और भूख में अद्भुत उभार किया गया। वह कहता था यह खाऊ पन और वजन बढ़ना ही मेरी मौत का कारण बनेंगे। सचमुच ऐसा ही हुआ था केवल 15 दिन में उसका भार 70 पौण्ड बढ़ गया और उतना खाया कि खिलाने वाले चकित रह गये। यह अति वृद्धि ही दो सप्ताह में ही उसे मौत के मुँह में घसीट ले गई।
अमेरिका के मान्टेऐलो में जन्मा एक बालक राबर्ट अर्ल ह्यूजेस अपने जन्म समय में ही 11 पौण्ड का था। वह 32 वर्ष का होकर सन 1958 में मरा तब तक उसका वजन 1041 पौण्ड हो गया था। उसी देश में फ्लोरा नामक एक नीग्रो महिला मृत्यु के समय तक 840 पौण्ड की हो चुकी थी। संसार की सबसे पतली और हलकी महिला मैक्सिको की लूसिया जेरट है जो 20 वर्ष की उम्र में 13 पौण्ड की थी।
संसार में लम्बे व्यक्तियों में इलनोइस प्रान्त के एल्टन नामक स्थान में जन्मे राबर्ट पशिंग वैदली थे। वे 1940 में 22 वर्ष की उम्र में मरे तब तक उनकी लम्बाई 8 फुट 10 इंच पहुँच चुकी थी वजन 491 पौण्ड । इससे पूर्व फिनलैंड का कैथानूस नामक व्यक्ति लम्बाई का कीर्तिमान स्थापित कर चुका था। वह 9 फुट 4 इंच का था। उसकी हड्डियां अभी भी लन्दन म्यूजियम नीदरलैण्ड में सुरक्षित हैं।
यह तो वृद्धि कील बात हुई अब छोटे और हलके रह जाने की बात लीजिए। 26 फरवरी 1846 में जन्मी राजकुमारी पोलिन कद में दृष्टि से बहुत छोटी थी वह 9 वर्ष की होकर मरी तब तक केवल 24 इंच ऊँची हो पाई थी। इटली की कैरोलिन क्राचमी भी 9 वर्ष की उम्र तक 20 इंच ऊँची ही हो पाई थी आस्ट्रिया की राजकुमारी कोली वारी 25 वर्ष की आयु में मरी। तब तक वह 27 इंच बढ़ पाई थी वजन 5 किलोग्राम थी।
जातियों में की दृष्टि से अफ्रीका के रुआण्डा वुरुण्डी के कुछ कबीलों की लम्बाई 6 से 7 फुट तक ही होती है इसके विपरीत अण्डमान निकोबार के आदिवासी 4 फुट से ऊँचे नहीं उठते काँगो के बौने लोग तो इससे भी छोटे 3-4 फुट तक ही पाये जाते हैं।
कुछ दिन पूर्व समाचार पत्रों में भारत की एक अद्भुत महिला समाचार छपा थे बनारस के गंगाघाट पर बस्तर जिले की एक आदिवासी महिला भिक्षावृत्ति करके अपना गुजारा करती थी। उसकी उम्र 22 वर्ष की थी, पर इतना ही आयु में उसकी लम्बाई 9 फुट 1 इंच पहुँच गई। लम्बाई के साथ साथ उसकी खुराक भी बढ़ी वह ढाई किलो चावलों के बना भात खा लेने पर ही क्षुधा तृप्त कर पाती थी उसके गरीब पति के लाए इतना आहार जुटा सकना सम्भव न रहा तो वह बनारस गंगा किनारे उसे छोड़ गया ताकि किसी प्रकार अपना पेट पालन कर सके।
मनुष्य पशु वर्ग का प्राणी माना जाता है पर मस्तिष्क की दृष्टि से उसने सबको पीछे छोड़ दिया है। हाथी का मस्तिष्क उसे शरीर का 600 वाँ भाग की होता है। पर मनुष्य के दिमाग का भार उसके शरीर का 60 वाँ भाग है। इतना भारी विस्तृत और विकसित मस्तिष्क अन्य किसी जीव का नहीं होता।
उसकी मस्तिष्कीय संरचना विलक्षण है। उसकी सूक्ष्मता इतनी बारीकी और इतनी संवेदनशीलता अन्य किसी प्राणी में नहीं पाई जाती। मस्तिष्क विद्या के ज्ञाता उसमें फीलिंग, कान्सनैस, परशेप्शन, आइडिया, जेनरलाइ जेशन, इरिटेविलिटी आदि क्षमताएँ इतनी अधिक विकसित देखते हैं जितनी कि किसी प्राणी में नहीं पाई जाती। ये शरीर विश्लेषण की दृष्टि से इस मस्तिष्क संस्थान को नर्व फाइवर्स और नर्वसैल का मज्जा घटक मात्र कह सकते हैं रासायनिक दृष्टि से उसे माँस पिण्ड भर कहा जा सकता है। पर चेतनात्मक दृष्टि से उसकी संवेदनशीलता और सूक्ष्मता ऐसी है जिसे प्राणि जगत के अन्य किसी के साथ नहीं तोला जा सकता।
जीवन को जड़ ठहराना दुराग्रह है। उसी प्रकार मनुष्य को पशु या वानर ठहराना व्यर्थ है। चेतना का अपनी स्तर है अपना स्वरूप और अपना अस्तित्व। वह अन्य जड़ पदार्थों की तरह किसी प्रकृति मर्यादा में सर्वथा आबद्ध नहीं है। जीवन, जड़ पदार्थों का उपयोग, उपभोग करता है वह उनसे उत्पादित या प्रतिबंधित नहीं है।
अभी अभी एक महिला हेलन केलर प्रकाश में आई है अंधी और बहरी होते हुए भी उच्च शिक्षा प्राप्त की है अध्यापिका बनी है और भविष्य में साहित्यकार बनने जा रही है। मिलान इटली का समाचार है कि हाल ही में 28 वर्षीया पिन्यूसिया मेनेटी ने एक अच्छे स्कूल में अध्यापिका सका उत्तरदायित्व सम्भाला है। लड़की एक भयंकर बीमारी में फंसी और देखने तथा सुनने की शक्ति से वंचित हो गई।
एक रिटायर्ड अध्यापिका ग्रुविना ब्राँकोलिनी ने उसके साथ कई वर्ष तक अथक परिश्रम दिया और अंग्रेजी तथा फ्रांसीसी भाषाएँ सिखाई तथा कई परीक्षाएँ पास कराई। अब व ब्रेल लिपि में कई विदेशी भाषाओं की पुस्तकों का अनुवाद करेगी।
मनुष्य की मनस्विता प्रधान है साधन अथवा परिस्थितियाँ नहीं। इस तथ्य को जो जानते हैं वे अपनी संकल्प शक्ति बढ़ाने की एक निष्ठा और तन्मयता बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं साधनों के अभाव एवं परिस्थितियों की प्रतिकूलता का रोना नहीं रोते।
विज्ञान ऊर्जा का प्रतिनिधि है। उसके द्वारा मानव पंच महाभूतों पर स्वामित्व प्रस्थापित करने की महत्वाकांक्षा रखता है। विज्ञान ने न्यूटन के काल तक मुख्यतः सैद्धान्तिक क्षेत्र में ही विचरण किया तब तक मानव उसके प्रति कौतूहल दृष्टि से देखता था। मानो वह उसकी बाल्यावस्था थी। फेरडे का विद्युत चुम्बकीय सिद्धान्त जब विज्ञान के व्यावहारिक क्षेत्र में आया तब से मानव के दैन दिन आधिभौतिक जीवन में कतिपय सुख सुविधाएँ वैज्ञानिक आविष्कारों ने प्रदान की और मानव का आत्म विश्वास बढ़ाया।
परन्तु बाल्यावस्था से यौवन में प्रवेश करते समय विज्ञान का उपनयन संस्कार नहीं हुआ। इसलिए वैचारिक आध्यात्मिक क्षेत्र में समाज के प्रगतिशील पुनर्जीवनीकरण में विज्ञान मार्ग दर्शन नहीं कर सका। विज्ञान स्वयं असंस्कारित रहा और मानव के वैचारिक सिद्धान्तों को उसने असंस्कारित ही छोड़ा।
विज्ञान तर्क है सत्य का बोध करता है। यथार्थ का दर्शन भी करता है परन्तु पदार्थों की जानकारी तक ही उसकी गति सीमित है। इसीलिये आध्यात्मिक विचारो से विज्ञान का उपनयन होना जरूरी है शरीर को सर्वस्व मानकर आत्मा से उन्मुख होना जितना गलत है उतना ही पदार्थों की जड़ शक्ति की ओर लक्ष्य केन्द्रित करते हुए उनकी चेता का रहस्य भूल जाना ही तर्क विद्या से विपरीत होगा। परन्तु शुभ और मंगल की प्रगति और निर्मित अध्यात्म से होती है। इस आधार के बिना विज्ञान का प्रभाव स्थायी और संरक्षक कैसे होगा?
अध्यात्म के बिना विज्ञान जितना निर्बल है उतना ही विज्ञान के बिना अध्यात्म। अवैज्ञानिक अध्यात्म मरुवर्गीय नैतिक आचरण में आत्म पर्याप्त स्वार्थ ही भावना को जगाता है। कठमुल्लापन की पण्डागिरी पैदा करता है। अध्यात्म के सुवर्ण को रूढ़ी, झूठे आचार और कर्मकाण्ड ने ढंक दिया है। उसमें वैज्ञानिक आज से शुचिता लाना अत्यन्त आवश्यक है।
विज्ञान में विश्लेषण की भेदक दृष्टि हैं उसकी मदद से धर्म में जो अंधेर आया है उससे समय धन और मनोयोग की भारी बरबादी हो रही है। उससे एक ओर अंधश्रद्धा की और दूसरी ओर भ्रांति विस्तारक के आधार पर खुली लूट खसोट की वृत्ति पैदा हो रही है। धर्म को पुनर्जीवित करके समाजोन्मुख करना हो- लोगों को ‘वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि’ बनाना हो तो अध्यात्म को भेद चिन्तन से समझना होगा और वह काम विज्ञान की मदद से ही कुशलता पूर्वक हो सकता है।
मानवी प्रगति की विज्ञान और अध्यात्म दो आंखें है। वैज्ञानिक कट्टरवाद और आध्यात्मिक उदासीनता दोनों ही अवाँछनीय है। इन आँखों को तीव्र भेदक और दिव्य दृष्टि युक्त बनाना हो तो उनमें सामाजिक दृष्टिकोण भरना चाहिए।
विज्ञान के अनगिनत लाभों से आदमी लालायित हो उठा है। यदि विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय किया गया, विज्ञान का उपनयन संस्कार किया गया तो मानवी प्रगति सर्वांगीण होगी। मनुष्य का भौतिकवादी निर्धारण उस अवस्था में तर्क और विचार के साथ चलेगा विज्ञान को इस तरह नियंत्रित करना इसी का अर्थ है विज्ञान का उपनयन संस्कार।
तब विज्ञान स्पर्धा के लिए नहीं-सहकारिता के लिए ये भोग के लिये नहीं, योग के लिये सत्ता के लिए नहीं महत्ता के लिये और विध्वंस के लिए नहीं- समन्वय के लिये उपयोग में लाया जायेगा। विज्ञान का नियन्त्रण सत्यान्वेषियों के मानवतावादियों के हाथ में रहेगा और फिर यथार्थ रूप में मानव प्रगति के पथ पर अग्रसर होता रहेगा।
नृतत्व विज्ञान अब एक से एक गहरी एवं रहस्यमय ऐसी परतों का उद्घाटन करता जा रहा है जिनसे प्रतीत होता है कि स्थूल शरीर की हरकतें स्वेच्छया संचालित नहीं है उनका नियन्त्रण कोई अतीन्द्रिय शक्ति करती है।
कुछ समय पूर्व रक्त माँस के पिण्ड को आहार विहार द्वारा संचालित माना जाता था और कहा जाता था कि रुग्णता एवं स्वस्थता का आधार आहार विहार है। पीछे मालूम पड़ा कि आहार शरीर रूपी इंजन को गरम बनाये रहने के लिए मात्र ईंधन का काम करता है। निर्जीव आहार को सजीव रक्त में परिणत करने की पूर्ति महत्वपूर्ण रासायनिक प्रक्रियाएं पाचन यन्त्रों से संचित होने वाले रसों द्वारा सम्पन्न होती हैं स्वसंचालित मानव शरीर भोजन से मात्र ईंधन प्राप्त करता है। यदि ऐसा न होता तो दुम्बामेंढ़ा और सुअर के शरीर में इतनी बड़ी मात्रा में चर्बी कैसे जमा हो जाती जबकि उनके आहार में चिकनाई का अंश नाम मात्र ही होता है। असल में उनके पाचन स्राव उन रासायनिक विशेषताओं से परिपूर्ण होते हैं। जिनके कारण सामान्य घास को ही चर्बी के रूप में परिणत किया जा सके। यह तथ्य सामने आने पर भोजन विश्लेषण सम्बन्धी अत्यधिक आग्रह में शिथिलता आई और इतना ही पर्याप्त माना जाने लगा कि यदि शरीर पर अनावश्यक दबाव न डाले अपने प्रकृति के अनुरूप ही भोजन संतुलित मात्रा में लेते रहे तो स्वास्थ्य रक्षा एवं शरीर पुष्टि का प्रयोजन भली प्रकार पूरा होता रहा सकता है।
शरीर संचालन की शोध में आगे बढ़ने पर पाया गया कि पेट हृदय और फेफड़ों को संचालक तत्व नहीं माना जा सकता। शरीर के समस्त क्रिया कलापों का संचालन मूलतः चेतन और मस्तिष्कों द्वारा होता है। उन्हीं की प्रेरणा से विविध अंग अपना अपना काम चलाते हैं अस्तु स्वास्थ्य बल एवं बुद्धिबल को विकसित करने के लिए मस्तिष्क विद्या के गहरे पर्तों का अध्ययन आवश्यक समझा गया है और अभीष्ट परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए उसी क्षेत्र को प्रधानता दी गई। पिछले दिनाँक जीवन विज्ञानियों ने शरीर शोध अन्वेषण की आरे से विरत होकर अपना मुँह मन शास्त्र को ऊहापोह कर केन्द्रित किया है।
अब एक और नया रहस्य सामने आ खड़ा है हारमोन ग्रन्थियों का। उनसे अत्यन्त स्वल्प मात्रा में निकलते रहने वाले स्राव ऐसे महत्वपूर्ण हैं जो केवल शारीरिक ही नहीं मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करते हैं और उनमें आश्चर्यचकित करने वाले उतार चढ़ाव उत्पन्न करते हैं। यह हारमोन चेतन या अचेतन मस्तिष्क से भी प्रभावित नहीं होते। इनको घटाने बढ़ाने में एक शरीर से दूसरे शरीर में पहुंचाने के परम्परागत प्रयास प्रायः असफल ही हो चुके हैं। एक शरीर से निकाल कर दूसरे शरीर में प्रवेश कराने में भी इन हारमोनों में वृद्धि न्यूनता अथवा नियन्त्रण सन्तुलन प्राप्त नहीं किया जा सका। लगता है वे शरीर और मस्तिष्क के अतिरिक्त अन्य किसी ऐसे तत्व से प्रभावित होते हैं जिसे अतीन्द्रिय संज्ञा दी जा सकें।
मस्तिष्क के निचले भाग में मटर के दाने के बराबर लटकी हुई पीयूष ग्रन्थि से निकलने वाले हारमोन गोनेडोट्रोफिक का ही कमाल है कि वह साधारण किशोरों को नवयुवती के रूप में परिणत करने वाले सारे साधन अनायास ही जुटा देता है।
गोनेडोट्रोफिक रक्त में मिलकर अण्डाशय को जागृत करता है और उस जागृति के फलस्वरूप वहाँ एक नये हारमोन एस्ट्रोजन की उत्पत्ति होने लगती है। एक दिन में उसकी मात्रा चीनी के दाने के हजारवें भाग की बराबर नगण्य जितनी होती है पर उतने से ही प्रजनन अवयवों का द्रुतगति से विकास होता है और प्रायः दो वर्ष पूर्व की किशोरी युवती के सभी चिन्हों से सुसज्जित हो जाती है।
अण्डाशय यों प्रायः 4 लाख कोशिकाओं का बना होता है पर उसमें से 4-5 सौ ही विकसित होकर अण्ड बनता है। ग्यारह से लेकर चौदह वर्ष की आयु में क्रमशः एक एक अण्ड विकसित होता है। उसके आधार पर प्रायः 28 वें दिन रजो धर्म होने लगता है। जो तीन से लेकर आठ दिन तक स्रवित होता रहता है। वाशिंगटन विश्व विद्यालय के डा0 एडगर एलन तथा एडवर्ड ए॰ डीजी ने पीयूष ग्रन्थि के प्रभाव से अण्डाशय में उत्पन्न होने वाली ऐसी अनेक संवेदनाओं का पता लगाया है जो यौन आकांक्षाओं के उतार चढ़ाव के लिए महत्वपूर्ण भूमिका उत्पन्न करती है। उनके प्रभाव से मस्तिष्क और प्रजनन अंगों में ऐसी उत्तेजना उत्पन्न होती है जिसके कारण यौन आकाँक्षा में तीव्रता मन्दता अथवा मध्यवर्ती स्थिति बनी होती है। दोष अथवा श्रेय प्रजनन अंगों की रचना को दिया जाता है। पर इन मानसिक संवेदनाओं के पीछे वस्तुतः पीयूष ग्रन्थि का सूत्र संचालन ही काम करता है।
पीयूष ग्रन्थि का एक हारमोन है प्रोलेक्टिव यह स्तनों को प्रभावित करता है उनका विस्तार करता है एवं दुग्ध उत्पादन प्रणाली को गतिशील बनाता है। इसकी न्यूनता रहे तो न तो स्तनों का विकास होगा और दुग्ध का उत्पादन भी स्वल्प ही होगा।
यदि पीयूष ग्रन्थि में थोड़ी से खराबी रह जाय और एस्ट्रोन तथा प्रोजेस्टेरोन हारमोन समुचित मात्रा में न बने तो अण्ड का विकास न हो सकेगा और नारी बन्ध्या ही बनी रहेगी। गर्भाशय की स्थानीय खराबी से तो बहुत ही कम संख्या में सन्तान रहित रहती है। वे खराबियाँ तो मामूली उपचार से ठीक हो जाती है पर पीयूष ग्रन्थि के किसी अंग के अविकसित रहने पर हारमोन उपचार ही सफल हो सकता है। नपुंसकता नर की हो या नारी की प्रधानतया पीयूष ग्रन्थि की खराबी के कारण ही होती है। जननेन्द्रिय की स्थानीय कमी वासना अथवा प्रजनन को अधिक प्रभावित नहीं करती। सन्तान के प्रति माता का प्यार क्यों कम या ज्यादा पाय जाता है इसका स्रोत भी पीयूष ग्रन्थि से स्रवित होने वाले प्रोलेक्टिन हारमोन में पाय गया है।
पिछले दिनों यौन संवेदना को मनः शास्त्रियों के मनुष्य की प्रेरक शक्ति माना था ओर कहा था मनुष्य के व्यक्तित्व का उत्थान पतन इसी केन्द्र से होता था। शूर साहसी कायर निराश प्रसन्न दुखी आदर्शवादी ईश्वर भक्त अपराधी अविकसित स्तर का निर्माण इसी केन्द्र से होता है। पर जब नया सिद्धान्त कायम हुआ है कि हारमोन ही यौन संवेदनाओं के लिए उत्तरदायी है अब सबसे जटिल प्रश्न यह उत्पन्न हुआ है कि यह हारमोन किससे नियन्त्रित होते हैं। उनके स्रावों में उतार चढ़ाव कौन लाता है।
इस अनबूझ पहेली का समाधान शरीर और मस्तिष्क की समस्त संरचना की उलट पुलट कर डालने पर भी खोजा जा सकेगा। इसका आधार ढूंढ़ने पर वह जीव चेतना के साथ जुड़े हुए जन्म जन्मान्तरों के संग्रहित संस्कारों एवं उसकी प्रबल संकल्प शक्ति में ही मिलेगा जीव सत्ता का स्वतन्त्र अस्तित्व मानने में अभी जो हिचकिचाहट विज्ञान के क्षेत्र में चल रही है उस पर से अगले दिनों पर्दा उठने ही वाला है। जीव चेतना का अपन स्वतन्त्र अस्तित्व और उसकी भावनात्मक चिन्तनात्मक अभ्यस्त प्रवृत्तियों की सम्पदा से सुसज्जित होना अब मान लिया जायगा तो इस प्रश्न का समाधान होगा कि हारमोन ग्रन्थियों से निकलने वाले अत्यन्त स्वल्प किन्तु अत्यंत शक्तिशाली स्रावों की न्यूनाधिकता जो विभिन्न व्यक्तियों में पाई जाती है उसका कारण क्या है? और उनमें कुछ परिवर्तन करना हो तो उसके लिए ताला खोलने की चाबी कहाँ मिलेगी। जीवन का स्वतन्त्र अस्तित्व शरीर में ऊपर भी विद्यमान है। और उसकी अपनी उपार्जित विभूतियाँ भी रहती है यह मान लेने पर हारमोन अन्वेषण में जो गतिरोध इन दिनों उत्पन्न हो गया है इस प्रश्नवाचक चिन्ह का सहज समाधान निकल जावेगा।
माया का प्रस्तार है कुछ का कुछ दिखाई पड़ता है जो बात जैसी न हो उसे उस तरह से कहना मिथ्या भाषण कहलाता है। इसी प्रकार जो वस्तु जैसी नहीं है उसे वैसी मान बैठना ‘मिथ्या ध्यास’ कहलाता है। संसार को मिथ्या इसी अर्थ में वेदान्तकार ने कहा है प्रकृति परमाणु उनकी हलचल पदार्थ की सत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता पर उनकी यथार्थता और प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में मोटी बुद्धि को प्रायः को प्रायः भ्रम ही नहीं विपर्यय ही रहता है अपने आप को ईश्वर का अविनाशी अंश अपने भीतर समस्त विभूतियों और परिस्थितियों के बीज केन्द्र मूल सता के रूप में कोई विरले ही मानते हैं। शेष तो शरीराध्यास में ही डूबे रहते हैं। अपने को शरीर और मन मानकर उन्हीं के सुख सन्तोष का साधन जुटाने में निमग्न रहते हैं। यदि इतनी देर भर वस्तुस्थिति विदित होती है कि हम आत्मा है शरीर से अलग है शरीरी परिधान मात्र है अपना कल्याण इन्द्रियजन्य लिप्सा और मनोजन्य लालसा से भिन्न है ता फिर सब कुछ ठीक हो जाता है।
जीवन का लक्ष्य खाओ पीओ मौज करो के अतिरिक्त कुछ और ही रहा होगा यदि हमने अपना अवतरण ईश्वर के सहायक सहयोगी के रूप में उसकी सृष्टि को सुन्दर समुन्नत बनाने के लिए हुआ अनुभव किया होता पर किया क्या जाय बुद्धिमान समझे जाने वाले मनुष्य पर अदूरदर्शिता और मूर्खता भी उतनी ही सघन बनकर छाई हुई है।
आत्मा में केन्द्रित प्रियता को वस्तुओं में खोजना अबुद्धिमता ही है। जड़ पदार्थों में न कुछ सुखद है और न दुखद। इस तथ्य को थोड़ी सी खोज बीन करने पर सहज ही जाना जा सकता है। और सुख के लिए प्रिय पात्रता के लिए कस्तूरी मृग की तरह बाहर मारे मारे फिरने की अपेक्षा अन्तर्मुखी हुआ जा सकता। तिनके के पीछे ताड़ छिपा होने के इसी आश्चर्य को माया कहा जाता है। माया और कुछ नहीं केवल वह अज्ञान है जो बाहरी मोटी सामने की तात्कालिक बातों को ही देखता हे और कुछ गहराई में उतर कर वस्तुस्थिति समझने का कष्ट उठाने के लिए तत्पर नहीं होता।
तत्वदर्शी ऋषियों ने अनन्त सुख शान्ति की ओर अंगुलि निर्देश करते हुए कहा है अन्वेषक प्रकाश को भीतर की ओर मोड़ दो। कार्लाइल प्रभृति पाश्चात्य दार्शनिक भी यही रहे हैं टर्न द सर्च लाइट इन वार्डस। कठोपनिषद् 2।1।1 में इस महासत्य को समझने और अपनाने के लिए प्रत्येक श्रेयार्थी को परामर्श दिया है -
वस्तुओं और व्यक्तियों में कोई आकर्षण नहीं है अपनी आत्मीयता जिस किसी से भी जुड़ जाती है वही प्रिय लगने लगती है यह तथ्य कितना स्पष्ट किन्तु कितना गुप्त है लोग अमुक व्यक्ति या अमुक वस्तु को रुचिर मधुर मानते हैं और उसे पाने लिपटाने के लिए आकुल व्याकुल रहते हैं। प्राप्त होने पर वह आकुलता जैसे ही घटती है वैसे ही वह आकर्षण तिरोहित हो जात ह। किसी कारण यदि ममत्व हट या घटा जाय तो वही वस्तुतः जो कल तक अत्यधिक प्रिय प्रतीत होती थी और जिसके बिना सब कुछ नीरस लगता था। बेकार और निकम्मी लगने लगेंगी वस्तु या व्यक्ति वही किन्तु प्रियता में आश्चर्यजनक परिवर्तन बहुधा होता रहता है। इसका कारण एक मात्र यही है कि उधर से ममता का आकर्षण कम हो गया।
तह तथ्य यदि समझ जाय तो ममता का आरोपण करके किसी भी वस्तु या व्यक्ति को कितने ही समय तक प्रिय पात्र बनाये रखा जा सकता है। यदि यह आरोपण क्षेत्र बड़ा बनाते चले तो अपने प्रिय पात्रों की मात्रा एवं संख्या आश्चर्यजनक रीति से बढ़ती चली जाएगी और जिधर भी दृष्टि डाली जाय उधर ही रुचिर मधुर बिखरा पड़ा दिखाई देगा और जीवन क्रम में आशाजनक आनन्द उल्लास भर जायगा। आत्मविद्या के इस रहस्य को जानकर भी लोग अनजान बैठे रहते हैं। आनन्द की खोज में प्रिय पात्रों के पीछे मारे मारे फिरते हैं। यदि इस माया मरीचिका को छोड़ दिया जाय जिसे प्रियपात्र बनाना हो तो उसी पर ममता बखेर दी जाय तो केवल वही व्यक्ति प्रियपात्र रह जायेंगे जिनकी घनिष्ठता समीपता मित्रता वस्तुतः हितकर है।
बिछुड़ने एवं खोने पर प्रायः दुख होता है। यदि समझ लिया जाय कि मिलन की तरह वियोग जन्म की तरह मृत्यु भी अवश्यंभावी है तो उसके लिए पहले से ही तैयार रहा जा सकता है साँस लेते समय भी यह विदित रहता है कि उसे कुछ ही क्षण पश्चात छोड़ना पड़ेगा इसलिए श्वास प्रश्वास की दोनों क्रियाएँ समान प्रतीत होती। न एक में दुख होता न दूसरी में सुख। एक का मरण दूसरे का जन्म है। मृत्यु के रुदन के साथ ही किसी घर का जन्मोत्सव बँधा हुआ है। व्यापार में एक को नफा तब होता है जब दूसरे को घाटा पड़ता है। धूप छाँह की तरह दिन रात की तरह सर्दी गर्मी की तरह यदि मिलन विछोह और हानि लाभ को परस्पर एक दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप से मानकर चला जाय तो राग द्वेष एवं हानि लाभ के सामान्य सृष्टिक्रम में न कुछ प्रिय लगे न अप्रिय। हमारा अज्ञान ही है जो अकारण हर्षोन्मत्त एवं शोक आवेश के ज्वार भाटे में उछलता भटकाता रहता है। यदि मायाबद्ध अशुद्ध चिंतन से छुटकारा मिल जाय और सृष्टि के अनवरत जन्म बुद्धि विनाश के अनिवार्य क्रम को समझ लिया तो मनुष्य शान्त सन्तुलित स्थिर सन्तुष्ट एवं सुखी रह सकता है। ऐसी देवोपम मनोभूमि पल पल में पग पग में स्वर्गीय जीवन की सुखद संवेदनाएं सम्मुख प्रस्तुत किये रह सकती है। चिन्तन में बैठे अज्ञानी बालक के ज्वार से प्रसन्न और भाटा से अप्रसन्न होने की तरह हमें उद्विग्न बनाये रहता है।
मल मूत्र की गठरी के ऊपर प्रकृति ने एक आकर्षण खोल चढ़ाया हुआ है ताकि वह घृणित पिटारा सर्वत्र दुर्गन्ध बखेरता न फिरे। लोग इस आवरण पर मुग्ध हो जाते हैं। रूप यौवन पर लट्टू होते हैं। सौंदर्य की शाश्वत प्यास सुकोमल पुष्प से लेकर बाल सुलभ भोलेपन तक से सर्वत्र सहज ही तृप्त की जा सकती पर विकारी दृष्टि के साथ जुड़ी हुई कामुक लिप्सा नर नारियों को बेतरह उद्विग्न करती रहती है और उन्हें न चलने योग्य मार्ग पर चलाती है। मूत्र त्याग के घृणित अंगों की तनिक सी खुजली न जाने किससे क्या क्या नहीं करा लेती। यदि मोहान्ध दृष्टि का पर्दा उठ सका होता तो शारीरिक रूप यौवन की यौन लिप्सा की मदोन्मत्तता का नशा सहज की उतर जाता और पंचभूतों से बने जड़ कलेवर के पीछे आत्मा की ज्योति जगमगाती दीखती। कामुकता का स्थान पवित्र प्रेम भावनाओं ने ग्रहण कर लिया होता और नर नारी के बीच के सम्बन्ध प्रकृति और पुरुष को तरह एक दूसरे के पूरक बनकर श्रेय साधन में संलग्न रहे होते। आज का नारकीय दाम्पत्य जीवन तब स्वर्गीय सुषमा बखेर रहा होता। ऐसे उच्च आदर्शों को आधार बनाकर बनाये गये गृहस्थ तब स्वर्ग की प्रतिमूर्ति बनकर धरती को आनन्द उल्लास से भर रहे होते ओर नर रत्नों की पीढ़ियां सृजी जातीं। यह पिशाचिनी माया ही है जिसने रूप सौंदर्य को परखने का दृष्टि दोष उत्पन्न करके आत्मतत्व को तिरस्कृत और चमड़ी की चमक को गौरव प्रदान किया है।
अपना स्वरूप अपना लक्ष्य अपना कर्तव्य यदि मनुष्य समझ सका होता तो उसका चिन्तन और कर्तव्य अत्यन्त उच्च कोटि का होता ऐसे नर को नारायण कहा जाता और उसके चरण जहाँ भी पड़ते वहाँ धरती धन्य हो जाती। पर अज्ञान के आवरण को क्या कहा जाय जिसने हमें नर पशु के स्तर पर देखने ओर उसी प्रकार की रीति नीति अपनाने के लिए निष्कृष्टता के गर्त में धकेल दिया है। माया का वही आवरण हमें नारकीय यातनाएँ सहन करते हुए रोता कलपता जीवन व्यतीत करने के लिए विवश करता है।
संसार को जैसा कि हम देखते हैं समझते हैं वह पूर्व प्रचलित भ्रान्त धारणाओं पर और मस्तिष्क सहित इन्द्रियों के ज्ञान पर आधारित है। यदि हम एक बार इन दोनों आधारों की अप्रामाणिकता और अक्षमता को स्वीकार कर ले तथा नये सिरे से अपने सम्बन्ध में सम्बन्धित व्यक्तियों तथा पदार्थों के समस्त विश्व ब्रह्मांड के सम्बन्ध में नये तर्क पूर्ण वैज्ञानिक दृष्टिकोण से विचार करना संभव करे तो तथ्य बिलकुल दूसरे ही स्तर के सामने आवेंगे और वही प्रतिपादन सोलहों आने सत्य सिद्ध होगा जिसे वेदान्त दर्शन में निर्धारित किया गया है।
जिस प्रकार हर प्रीत को हम देखते हैं कि और हर रात को गहरी नींद में सोते हैं। ठीक उसी प्रकार थोड़ी अधिक विस्तृत भूमिका में जन्म और मरण की प्रक्रिया चलती रहती है। सूर्य हर दिन डूबता उगता है। जीवन भी नियम अवधि में उत्पन्न और समाप्त होता रहता है जिस तरह एक के बाद दूसरे दिन का लम्बा जीवनयापन चलता रहता है। उसी प्रकार एक जन्म के बाद दूसरे जन्म की शृंखला चलती है। यह तथ्य यदि सामने प्रस्तुत रहे तो फिर जीवन की लम्बी शृंखला की योजना इसे ध्यान उज्ज्वल बनाने की सम्भावना सामने हो तो इसके लिए एक दिन के कष्ट कठिनाई से व्यतीत करने की बात किसी को अखरती नहीं ऐसी भूल भी कोई समझदार आदमी नहीं कर सकता कि एक दिन शौक मौज मनाने के लिए कोई ऐसा अवाँछनीय कार्य कर डाला जाय जिसके लिए जीवन के शेष समस्त दिन विपत्ति में फंसकर व्यतीत करने पड़े। मनुष्य जीवन की भोजन व्यवस्था बनाते समय भी यदि यही रीति नीति अपनाई जा सके तो समझना चाहिए कि अनन्त जीवनों की जुड़ हुई शृंखला का स्वरूप समझ लिया जाय। ऐसी दशा में न वस्तुओं से लोभ हो सकता है और न व्यक्तियों के प्रति कर्तव्य पालन का भाव ही मन में उठता रह सकता है।
एक जन्म को ही पूरा जीवन मान बैठने से मनुष्य आज ही जी भरकर शौक मौज करने के लिए आतुर होता है। और भविष्य में अन्धकारमय बनता है यदि अनन्त जीवन में एक एक जन्म को एक दिन की तरह नगण्य महत्व का माना जाय तो फिर विद्यार्थी के विद्याध्ययन पहलवान और कृषक की तरह अनवरत कष्ट साधन करते के लिए उत्साह बना रहेगा और उज्ज्वल भविष्य की आज में आज की कठिनाइयों को तुच्छ माना जायगा। पर होता ऐसा कहाँ है? इसका कारण वर्तमान को ही सब कुछ मान बैठने का मायावादी अज्ञान ही है। इसी में फंसकर मनुष्य दुर्बुद्धि अपनाता और पापकर्म करता है। यदि माया का पर्दा हट जाय तो फिर बाल क्रीड़ाओं को छोड़ कर वयस्कों और बुद्धिमानों जैसी गति विधियाँ अपनाने की ही प्रवृत्ति बनेगी।
हम सब सराय में ठहरे गये मुसाफिरों की तरह की दिन व्यतीत कर रहे हैं। जल प्रवाह में बहते हुए तिनकों की तरह ही इकट्ठे हो गये है। जब मिल ही गये तो सराय के नियमों का सड़क पर चलने के कानूनों का क्षेत्र के नागरिक कर्तव्यों का पालन करना ही पड़ेगा इस दृष्टि के विकसित होकर पर यह अज्ञान हट जाता है कि कोई हमारा है या हम किसी के है। सब ईश्वर के हैं और ईश्वर ही सबका हितू है। प्रत्येक प्राणी अपनी कर्म रज्जु में बंध अपनी धुरी पर धूम रहा है। समय का परिपाक बहुतों को परस्पर जुड़वाता और बिछुड़वाता रहता है। यह सत्य यदि समझ में आ जाय तो न किसी के मोह बंधन में बंधा जाय न बाँधा जायं आत्मीयता के विस्तार द्वारा सम्पन्न होने वाला प्रेम हर किसी पर परिपूर्ण मात्रा में बखेरा जाय पर उसमें विवेक का समुचित पुट रहे। परिवारी लोगों के प्रति अत्यधिक आसक्ति पक्षपात और मोह के कारण उन्हें अनुचित लाभ देने की जो प्रवृत्ति पाई जाती है उससे हर किसी का घोर अहित होता है। मुफ्त में अनावश्यक सहायता पाकर परिवार के लोग मुफ्तखोर बनते हैं और अपने श्रम साधनों से जो लोक मंगल सम्भव था उससे समाज को वंचित रहना पड़ता है। और व्यक्ति परमार्थ का कल्याणकारी लाभ लेने से वंचित रह जाता है। यह माया बंधनों का परिणाम ही है जिसने मोह जाल में जकड़ पर विश्व हित को श्रेय साधना से वंचित करके पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचने में भारी व्यवधान प्रस्तुत किया।
वस्तुएँ हमें इसलिए मिलती है कि उनका श्रेष्ठतम सदुपयोग करके उनसे स्व पर कल्याण की व्यवस्था बनाई जाय। साधन जड़ जगत के अंग है और वे विभिन्न रंग रूप बदलते हुए इस जगत की शोभा बढ़ाते रहने के लिए है। उन्हें अपने गर्व गौरव का विलास वैभव का आधार बनाकर संग्रह करते चले। अहंकार का पोषण तृष्णा की तुष्टि अथवा विलासिता के अभिवर्धन में धन को शारीरिक मानसिक विभूतियों को नियोजित रखा जाय तो उत्कृष्ट जीवन जी सकने का द्वार अवरुद्ध ही बना रहेगा। संकीर्ण और स्वार्थी जिन्दगी ही जी जा सकेगी और इस कुचक्र में यह सुरदुर्लभ अवसर निरर्थक ही चला जायगा।
शरीर और मन को अपना आपा मान बैठना और उसकी वासनाओं तृष्णाओं की पूर्ति में इतना निमग्न हो जाना कि आत्मा का स्वरूप और लक्ष्य पूरी तरह विस्मृत हो जाय तो दूरदर्शितापूर्ण नहीं है। शारीरिक और मानसिक उपलब्धियों के लिए जितना श्रम किया जाता है और मनोयोग लगाया जाता है जोखिम उठाया जाता है उतना ही विनियोग यदि आत्मोत्कर्ष आदि के लिए आत्मबल सम्पादन के लिए लगाया जा सके तो मनुष्य इसी जीवन में महामानव बन सकता है। और उन विभूतियों को करतलगत कर कसता है हो देवदूतों में पाई जाती है। इतना उच्चकोटि का लाभ छोड़कर नगण्य सी लिप्साओं में डूबे हुए न करने योग्य काम करना उनके कटु कर्म परिपाक सहना किसी विवेकवान के लिए उपयुक्त न होगा। किन्तु देखा जाता है कि अधिकाँश व्यक्ति उचित छोड़कर अनुचित का लाभ छोड़कर हानि का रास्ता अपनाते हैं इसे क्या कहा जाय? यह माया का खेल ही है जिससे भ्रमित होकर मनुष्य जल में थल थल में जल देखने की तरह हानि को लाभ और लाभ को हानि समझता है। अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारता है।
भारतीय स्वतन्त्रता के अग्रगन्य सेनानी खान अब्दुल जिन्हें बादशाह खान कहा जाता है। गफ्फार खाँ उन दिनों डेरा इस्माइल खाँ की जेल में कैद थे। उन्हें सपरिश्रम कारावास की लम्बी सजा मिली थी।
बूढ़ा शरीर बीस सेर गेहूं हर दिन पीसना उनके लिए बहुत कष्ट कर था तो भी वे परिश्रम और ईमानदारी के साथ दिन भर लगे रहकर निर्धारित कार्य को पूरा कर ही लेते थे।
जेल के एक सहृदय छोटे कर्मचारी से उनका कष्ट नहीं देखा गया। हाथों में पड़े छाले और दुखते कंधे बादशाह खान को कितना कष्ट देते हैं यह उसे विदित था। सो सोचने लगा किसी प्रकार उनकी सहायता की जाय।
वह सहृदय कर्मचारी अनाज पीसने की व्यवस्था का अधिकारी था। सो उसने एक सस्ती तरकीब खोज निकाली। बीस सेर गेहूं में पन्द्रह सेर आटा और पाँच सेर गेहूं मिलाकर लाया और चुपके से चक्की चलाने लगे। पिसे हुए आटे को पीसने में आपके लिए सरलता भी रहेगी और आराम का अवसर भी मिल जायगा।
खान अब्दुल गफ्फार खाँ ने उस सहृदय अधिकारी सहानुभूति के लिए गहरी कृतज्ञता प्रकट की। किन्तु पिसा हुआ आटा यह कहकर वापस कर दिया छल कपट करके शरीर को सुविधा तो मिलेगी पर आत्मा को जो कष्ट होगा और भी भारी पड़ेगा।
इस जगत में स्थिर कुछ नहीं सब कुछ चलायमान है। मनुष्य अपने अधिकारी एवं संपर्क के पदार्थों एवं व्यक्तियों के बिछुड़ने पर उद्विग्न होता है तब वह यह भूल जाता है कि यह प्रकृति का अनिवार्य नियम है। एक का मरण ही दूसरे का जन्म है। एक ही हानि ही दूसरे का लाभ है। यदि पदार्थ और व्यक्ति एक स्थिति में यथावत ही बने रहे तो फिर यहाँ स्तब्ध जड़ता का ही साम्राज्य होगा हलचलें ही इस विश्व की शोभा बनाये हुए है। उत्पादन वृद्धि ओर मरण का क्रम ही इस संसार में शोभा सुषमा सक्रियता और नवीनता बनाये रहने में समर्थ हो रहा है। इच्छा अथवा अनिच्छा से इस विधि विधान को हमें स्वीकार करना ही पड़ता है।
न केवल मनुष्य जीवन से सम्बद्ध क्षेत्र में वरन् इस विश्व ब्रह्मांड में प्रत्येक क्षेत्र में उलट पुलट ही महान गतिविधियाँ निरन्तर चल रही है। अपनी धरती की ही ले उसके दृश्यमान क्षेत्र में कितने अद्भुत परिवर्तन होते रहते हैं। आज जहाँ जल है वहाँ कल थल बन जाता है। और जहाँ थल है वहाँ जल का विशाल भंडागार दिखाई पड़ता है। परिवर्तन के प्राकृत नियम से अपना भूतल तक तो बच नहीं सका तो फिर बेचारा मनुष्य सदा एक ही स्थिति में बना रहे यह कैसे हो सकता है।
पृथ्वी के जल थल भाग का जैसा नक्शा आज हम भूगोल एवं एटलस की पुस्तकों में देखते ह। सदा वे वैसी ही स्थिति नहीं रही है उसे में ढेरों बार उलट-पुलट होती है। जहाँ आज अथवा जलराशि का समुद्र फैला हुआ हैं वहाँ किसी समय थल भाग था और जहाँ इन दिनों भूखण्ड है वहाँ कभी गहरा समुद्र था। पृथ्वी सिकुड़ती साँस लेती और करवट बदलती रही है। इस उथल पुथल में जल का स्थान थल ने और थल का जल ने लिया हैं महाद्वीप जितने अब गिने जाते हैं भूतकाल में कभी उससे ज्यादा रहे हैं कभी कम। जिन क्षेत्रों में आवागमन में इन दिनों समुद्र बाधक है वहाँ कभी निर्वाध रीति से पैदल अथवा थल वाहनों से आना जाना बना रहता था। उन दिनों का सुविस्तृत थल क्षेत्र कट कटकर अब टुकड़े टुकड़े हो गया है। बीच में समुद्र आ जाने से अब वे क्षेत्र सम्बद्ध न रहकर असम्बद्ध हो गये है।
भारत क्षेत्र को ही ले। वह उत्तर की ओर खिसकता चला आ रहा है और दक्षिण भाग समुद्र में डूबता जा रहा है। खगोल शास्त्रियों के अनुसार पिछले एक करोड़ वर्ष में वह 30 डिग्री उत्तर को खिसक आया है और वह क्रम अभी भी जारी है।
आज भूगोल को पूर्वी पश्चिमी गोलार्धों में बाँटा जाता है, भूतकाल में यह स्थिति नहीं थी तब उत्तरी दक्षिणी गोलार्ध थे। उतरी गोलार्ध में पूरा एशिया योरोप उत्तर अमेरिका सम्मिलित थे। दक्षिणी गोलार्ध में आस्ट्रेलिया अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका आदि थे। दोनों गोलार्धों के बीच में समुद्र तो थापर इतना चौड़ा और गहरा नहीं। आज जहाँ अटलांटिक महासागर है वहाँ कभी अफ्रीका और दक्षिणी अमेरिका का महाद्वीप था। ईसा से 100 वर्ष पूर्व के तत्वज्ञानी तथा विज्ञान पोसीडोनियस ने इस महाद्वीप की भूतकालीन स्थिति के सम्बन्ध में बहुत कुछ तथ्य प्रस्तुत किये है और उसका नाम अतलाँतीस लिखा है। ईसा से 700 वर्ष पूर्व के प्रख्यात कार्व हैसिवड और रोमन विहान होरेस ने भी उसी महाद्वीप का उल्लेख है उस समय उस समुद्र तल में डूबे भूभाग के सम्बन्ध में आवश्यक प्रमाण मौजूद है। सिसीलियन विद्वान डायोडारिस स्पेनिश न्यायाधीश सटोरियस महा मनीषी पाइथियम महाकवि होमर आदि की रचना में उस लुप्त महाद्वीप के सम्बन्ध में तत्कालीन जन श्रुतियों एवं उपलब्ध तथ्यों का उल्लेख पाया जाता है।
विद्वान प्लेटो ने अपने ग्रन्थ ‘टाइमेयस’ में इस महाद्वीप का न केवल भौगोलिक वर्णन किया है, वरन् वहां की राजकीय आर्थिक और सामाजिक स्थिति के बारे में बहुत कुछ लिखा है। अचानक एकबार महा भयंकर भूचाल आया और प्रलय जैसे दृश्य उपस्थिति हो गये। बहुत बड़ा भू भाग समुद्र में समय गया और समुद्र में डूबी जमीन थल के रूप में ऊपर आ गई। प्लेटो ने यह सब यों ही नहीं लिखा उसने ईसा से 400 वर्ष पूर्व उस क्षेत्र में लम्बी शोध यात्राएं की थीं और उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर उस समय के थल क्षेत्र को किसी समय का समुद्र तल सिद्ध किया था।
प्रो. शूल्टन, रिचार्ड हैनिंग, ऐडोल्फ शूल्टन जैसे पुरातत्त्ववेत्ताओं ने भी उस जल प्रलय को तथ्य समर्थित बताया है जिसने बहुत बड़े क्षेत्र को जल से थल में और थल से जल में बदल दिया था। जर्मन प्रोफेसर शूल्टन ने इस विषय में अत्यधिक दिलचस्पी ली है। उन्होंने न केवल ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर अपना प्रतिपादन किया वरन् खुदाई के कितने ही प्रयोग करके पृथ्वी के करवट बदलने की बात को सर्वथा सत्य सिद्ध किया। इनकी खोजों के आधार पर वार्सीलोना विश्व-विद्यालय ने उन्हें डाक्टरेट की उपाधि से सम्मानित किया। उन्हें इस ओर दिलचस्पी किसी भूतकालीन पुरातत्त्ववेत्ता अप्पियन के ग्रन्थ आइवेरिका से मिली थी, जिसमें जल प्रलय की प्रतिक्रिया का विशद वर्णन था। शूल्टन की शोध 12 खण्डों में प्रकाशित हुई है। शूल्टन की शोध 12 खण्डों में प्रकाशित हुई है। इस ग्रन्थ में पृथ्वी के आरम्भ काल से लेकर अब तक समय-समय पर होती रही उलट-पुलट का सचित्र वर्णन है।
ध्रुव तारे के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वह स्थिर है, पर वस्तुतः यह कहने भर की बात है इस समस्त विश्व ब्रह्माण्ड में जब कुछ भी स्थिर नहीं तब बेचारा ध्रुव किस प्रकार एक स्थान पर जमा बैठा रह सकता है।
पृथ्वी यों नारंगी की तरह गोल तो है, पर सूर्य की परिक्रमा करते हुए अपनी धुरी पर भी घूमती है। वह बिलकुल सीधी स्थिति में नहीं वरन् अपनी धरी पर एक तर झुकी हुई है यह झुकाव उसकी भ्रमणशीलता के बीच भी यथावत् बना रहता है। इस झुकाव की ठीक सीध में जो तारा पड़ता है उसे ध्रुव कहते हैं।
झुकाव स्थल पर सूर्य का प्रभाव भी विलक्षण प्रकार का- अन्य स्थानों से सर्वथा भिन्न स्तर का पड़ता है। इसलिए वहां छह महीने का दिन छह महीने की रात- आकाशीय ज्योति- विभिन्न प्रकार के प्रकाशों का आभास जैसी विचित्रताएं दिखाई पड़ती हैं। उन्हीं अचम्भों में से एक यह भी है कि जो तारा उस क्षेत्र की सीध में पड़ता है वह अचल दिखाई पड़ता है। वस्तुतः उसकी वैसी स्थिति है नहीं। अन्य तारकों की तरह वह भी चलता ही रहता है।
अचल होते हुए भी पृथ्वी के स्थानों के अनुरूप ध्रुव का स्थान भी बदलता दीखेगा। हरिद्वार में जिस स्थान पर वह दिखाई देगा बम्बई, रंगून आदि से देखने पर वह उस स्थान की अपेक्षा काफी नीचा या ऊंचा दिखाई देगा। भू-मध्य रेखा के दक्षिण में जाने पर तो उसके दर्शन नहीं हो सकेंगे।
पृथ्वी, समुद्र, ध्रुव आदि स्थिर दीखने वाले पदार्थ जब अस्थिर हैं तो फिर न जाने- मनुष्य ही क्यों आशा करता है कि उसका शरीर, वैभव एवं कुटुम्ब सदा स्थिर एक रस बना रहेगा? प्रकृति की परिवर्तन प्रक्रिया को यदि हम विनोदपूर्वक देख सकें तो ही प्रसन्न रह सकेंगे सुखद परिवर्तनों के साथ दुखद भी आते ही रहेंगे हमें दोनों के लिये प्रबुद्ध मनःस्थिति अपनाकर स्वागत के लिए तैयार रहना ही चाहिए।
हर व्यक्ति को श्रम करना चाहिए। हर श्रम इच्छुक को श्रम मिलता नहीं। हर उपयोगी श्रम का पुरस्कार सम्मान के अतिरिक्त धन भी होना चाहिए। धन की प्रत्येक इकाई उचित आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित रहनी चाहिए। कहीं भी इतनी सम्पत्ति जमा नहीं होनी चाहिए कि उसमें सड़न उत्पन्न हो और वह वातावरण को दूषित करे।
जीवन और मरण के चक्र में घूमते हुए, इस विशाल ब्रह्माण्ड के ग्रह-नक्षत्र, आये दिन उत्पन्न होते और मृत्यु के मुख में चले जाते हैं। उनका जीवन काल अरबों, खरबों वर्ष का है। उनका विस्तार अपनी पृथ्वी से लाखों, करोड़ों गुना बड़ा है तो भी जन्म-मरण के बन्धनों में वे भी बंधे हुए हैं। क्या छोटे क्या बड़े सभी काल के ग्रास बने हुए हैं। प्राणी ही नहीं ग्रह-नक्षत्र भी इसी नियति क्रम के आधार पर उदय और अस्त होते रहते हैं।
ब्रिटेन के खगोल फ्रेड हायल का कथन है कि ब्रह्माण्ड अनादि काल से लेकर अनन्त काल तक फैलता ही चलेगा। ग्रह-नक्षत्र आपस की दूरी बढ़ाते हुए आगे ही आगे दौड़ते चले जाते हैं। बीच में जो खाली जगह रह जाती है उसमें अपने आप हाइड्रोजन गैस उत्पन्न हो जाती है और फिर उससे नये पिण्ड बनने आरम्भ हो जाते हैं।
कैंब्रिज के अन्तरिक्ष शोधक मार्टिन राइल का कथन है कि चिर अतीत में एक भयंकर विस्फोट हुआ था, उसी से विरल गैसों के छाये बादलों में गर्मी और तेजी आई, वे दौड़ने लगे और सघन बने। विल्सन तथा पालोमर ने सृष्टि का अन्त कैसे होता है इस प्रश्न पर प्रकाश डालते हुए कहा है- द्रुतगति से फुलाव की ओर दौड़ते हुए ग्रह-नक्षत्र अन्ततः थक जाते हैं। उनकी दौड़ शिथिल हो जाती है। तब उनका गुरुत्वाकर्षण उभर कर आयेगा और बूढ़े तारों में से सब एक दूसरे को निकट खींचने लगेंगे। तारे एक दूसरे से लड़ पड़ेंगे और प्रलय का दृश्य उपस्थित करेंगे। उसके बाद उस टकराव से उत्पन्न हुई गरम धूलि द्वारा पुनः नवीन सृष्टि का क्रम चल पड़ेगा।
इनकी दूरी तथा विस्तार परिधि को हम खुली आँखों से नहीं देख सकते। उनकी जानकारी प्राप्त करने के उन सूक्ष्मग्राही यन्त्रों का सहारा लेना पड़ता है जो दूरवर्ती तारकों से निसृत होने वाली प्रकाश किरणों को पकड़ने और परखने से समर्थ होते हैं।
यह ग्रह-नक्षत्र न केवल प्रकाश तरंगें फेंकते हैं वरन् उनका शक्ति प्रेषण जो सैकड़ों प्रकार का है उनमें एक प्रेषण रेडियो शक्ति तरंगों का भी है। हमें उनकी जानकारियाँ इन रेडियो तरंगों के आधार पर ही होती है। पिछले दशक में डेनिश खगोलवेत्ता मार्टेन रियाडट ने प्रचण्ड शक्तिशाली क्वासर किरणों का पृथ्वी पर आगमन का पता लगाया था। उनका उद्गम आठ अरब प्रकाश वर्ष माना गया है। किन्तु इनका प्रवाह भी स्थिर नहीं वह ज्योति हमसे प्रति सेकेंड 2,40,00 किलोमीटर की चाल से दूर हटती चली जा रही है। इसका कारण वह फुलाव विस्तार की भगदड़ प्रक्रिया ही है।
विस्तार, संकुचन, जन्म-मरण, सक्रियता, विश्राम जैसी परस्पर विरोधी लगने वाली पर वास्तविक पूरक क्रिया-कलाप के आधार पर ही सृष्टि की गतिविधियाँ चल रही हैं इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें यह मानकर चलना चाहिए कि अपनी स्थिति भी सदा एक जैसी नहीं रह सकती। आज की समर्थता कल की असमर्थता में परिणत हो सकती है। इसलिये वर्तमान का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात सदा सोचनी चाहिए। इस पश्चाताप का अवसर नहीं आने देना चाहिए कि अमुक समय हमें ऐसे सत्कर्म करने का अवसर था, पर हम उस समय आलस्य, प्रमाद अथवा लोभ-मोह वश वैसा नहीं कर सके। आज का जीवन कल मृत्यु में परिणत होना ही है, जब इतने विशालकाय ग्रह-नक्षत्र एक जैसी स्थिति में नहीं रह सकते तो हम तुच्छ प्राणी कैसे सदा विकसित एवं समर्थ रह सकते हैं।
ब्रह्माण्ड को देखने समझने के लिए मानवी जिज्ञासा अब इस प्रयास में संलग्न है कि सौरमण्डल से बाहर निकल कर विशाल ब्रह्माण्ड की झाँकी की जाय और अनुमान को प्रत्यक्ष में परिणत करके यह देखा जाय कि आखिर यह सारा प्रसार है क्या? है कैसा?
सौरमण्डल से बाहर निकलने के लिए हमें तीव्रतम गति की आवश्यकता होगी और दीर्घकालीन जीवन अभीष्ट होगा अन्यतम अकल्पित दूर तक पहुँचना और लौटना सम्भव ही कैसे हो सकेगा। इस संदर्भ में वैज्ञानिकों के जो प्रयास चल रहे हैं, उनमें आशा की एक क्षीण किरण दिखाई पड़ने लगी है।
अब तक प्रकाश की गति को ही सर्वोपरि गति माना जाता रहा है। प्रकाश एक सेकेंड में 1 लाख 86 हजार मील चलता है। आइंस्टीन कहते थे, इससे तीव्रगति नहीं हो सकती। पर अब ‘कर्क’ निहारिका की-गतिविधियों का विश्लेषण करते हुए इस गतिशीलता का नया कीर्तिमान सामने आया है आक्सफोर्ड विश्व विद्यालय के डा0 एल. एल. और डा0 ज्याफे एनडीन ने इस निहारिका के विद्युतीय चुम्बकीय क्षेत्र की चल रही गतिशीलता को प्रति सेकेंड 5,95,200 मील नापा है जो प्रकाश गति की तुलना में लगभग चार गुना अधिक है। इस निहारिका के मध्य एक छोटा सूर्य ऐसा पाया गया है जिसका तापमान अपने सूर्य से 100 गुना अधिक है। वह अपनी धुरी पर प्रति सेकेंड 33 बार परिक्रमा कर लेता है, यह भ्रमण गति भी अब तक की कल्पनाओं से बहुत आगे है।
काकभुशुण्डि, अगस्त, नारद आदि ऐसे पुराण पुरुषों का उल्लेख मिलता है जो अन्तरिक्ष यात्राएँ करते रहते थे और दीर्घजीवी थे। अन्तरिक्ष यात्रा के लिए यों दीर्घजीवी होना अनिवार्य मालूम पड़ता है ताकि द्रुतगामी यानों पर सवार होकर जाने पर भी लम्बा फासला पूरा करने में जो समय लगता है उतनी अवधि तक जीवित रहा जा सके। पर अब स्पष्ट हो गया है कि सामान्य स्वास्थ्य और सामान्य जीवन अवधि के लोग भी लम्बी अन्तरिक्ष यात्राएँ करने में सफल हो सकते हैं। आइन्स्टाइन द्वारा प्रतिपादित सापेक्षवाद के अनुसार प्रकाश की गति से जरा कम वेग से चलने वाले नक्षत्र यान में समय की प्रवाह गति- पृथ्वी पर समय की प्रवाह गति की अपेक्षा धीमी होती है। इसी बात को अधिक सरलतापूर्वक समझने के लिये यों भी कहा जा सकता है कि अति तीव्रगामी यान में पृथ्वी की अपेक्षा समय धीमी गति से गुजरता है। प्रकाश की गति एक लाख छियासी हजार मील प्रति सेकेंड है। यदि अन्तरिक्षयान की गति इसकी 99 प्रतिशत हो तो पृथ्वी पर जितना समय 100 वर्ष में गुजरेगा उतना समय अन्तरिक्ष-यान से 14 वर्ष के करीब ही होगा। पृथ्वी निवासी 30 वर्ष का युवक 100 वर्ष में 130 वर्ष का जराजीर्ण हो जायगा किन्तु अन्तरिक्ष यात्री की आयु 14 वर्ष ही बढ़ेगी दानों युवक जब 100 वर्ष बाद मिलेंगे तो एक 130 वर्ष का होगा और दूसरा 44 वर्ष का। इस सुविधा का लाभ उठाकर नारद आदि अन्तरिक्ष यात्री दीर्घजीवी रहे हों तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है
मुझे रास्ता मालूम है। वह तंग किन्तु सीधा है वह खांड़े की धार जैसा है। उस पर चलने में मुझे आनन्द आता है। जब फिसल जाता हूँ तो जी भरकर रोता हूँ। भगवान् का वचन है-कल्याण पथिक की दुर्गति नहीं होती। इस आश्वासन पर मुझे अटूट श्रद्धा है। इस श्रद्धा को गँवाऊँगा नहीं। जिस दिन काया पूर्णतः वश में आ जायगी उस दिन उस दिव्य ज्योति के दर्शन पाऊँगा, इस पर मेरा अविचल विश्वास है।
-महात्मा गाँधी
सीमित ज्ञान को असीम तक पहुँचाने की जिज्ञासा की तरह सीमित व्यक्तित्व को असीम बनाने के लिए-अपूर्णता को पूर्णता में परिणत करने के लिए भी मानवी अन्तःक्षेत्र में प्रबल उमंगे उठनी चाहिए। महत्वपूर्ण उपलब्धियों के लिए तीव्रता की अनिवार्य आवश्यकता है। मन्दगति से किसी प्रकार जीवन शकट को लुढ़काते रहने में कोई बड़ी सफलता नहीं मिल सकती थी। आगे बढ़ने और अधिक पाने के लिए हमारी चेतना को-क्रियाशीलता को उसी प्रकार तीव्रगामी बनाया जाना चाहिए जिस प्रकार कि सौरमण्डल से आगे के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए अधिक तीव्र गति प्राप्त करने की चेष्टा की जा रही है। संकल्पों ने असम्भव समझी जाने वाली बातों को सम्भव करके दिखाया है, भूतकाल की तरह भविष्य भी वैसा होता रहेगा।
इस संसार में कितने ही प्रकार के कला-कौशल हैं। उनमें से जो जिस कला में निष्णात हो जाता है वह उस क्षेत्र में ख्याति भी पाता है और सुविधा भी। कला का आकर्षण सर्वविदित है। जो सबके पास नहीं है, किसी ने जिस विशेषता को पाया या उगाया है उस अद्भुत को देखने के लिए सामान्य जनों का आकर्षित होना स्वाभाविक है। कलाकारों को विभूति सम्पन्न माना जाता है, अस्तु उनकी ओर सर्वसाधारण का मन सहज ही खिंच जाता है।
कलाएँ अगणित हैं। गीत, वाद्य, नृत्य, अभिनय, चित्रकारी, साहित्य, काव्य, शिल्प आदि के नाम से वे प्रख्यात हैं। सरस भावुकता से इनका घना सम्बन्ध है। निष्ठुर प्रकृति और जड़ बुद्धि के लोग कलाकार नहीं हो सकते। सरसता को ही कला की जन्मदात्री माना जाता रहा है। कहना न होगा कि कलाकार अपनी उपलब्धियों पर स्वयं ही प्रमुदित रहता है और दूसरों को भी आकर्षित करता है यह दुहरी सफलता उसे भीतर और बाहर के दोनों क्षेत्रों में उत्साह प्रदान करती रहती है। इसलिये लोग न केवल कलाकारों से प्रभावित रहते हैं वरन् स्वयं भी कला का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं।
शरीर और साधनों की विशेषता पर अवलम्बित कलाओं से सम्पन्न होना उन्हीं के लिए सम्भव है जिन्हें उपयुक्त सुविधाएँ मिली हैं। किसी का कण्ठ मधुर न हो तो वह प्रयत्न करने पर भी प्रख्यात गायक नहीं बन सकता। अंगों की कोमलता और सरसता युक्त व्युत्पन्न मति जिन्हें मिली है वे नर्तक अभिनेता आदि हो सकते हैं। यही बात साहित्यकार अथवा कवि बनने के सम्बन्ध में है। कागज, कलम और स्याही के आधार पर साहित्य सृजन नहीं हो सकता। स्कूली पढ़ाई भी उसमें बहुत काम नहीं आती इसके लिए विलक्षण प्रतिभा चाहिए। भले ही वह जन्म-जात रूप से मिली हो अथवा उपयुक्त परिस्थितियाँ, अत्यन्त गहरे मनोयोग पूर्वक अनवरत साधना करके प्राप्त की गई हों। हर हालत में विशिष्ठ परिस्थितियाँ तो उपलब्ध होनी ही चाहिए।
साधन सुविधाओं का अभाव देखकर किसी को यह न मान बैठना चाहिए कि कलाकार बनने का द्वार हमारे लिए सर्वथा बन्द है। ईश्वर ने हर किसी को इसके लिए एक द्वार ऐसा खुला रखा है जो निताँत सरल है और उसमें प्रवेश करके श्रेष्ठतम कलाकारिता का श्रेय प्राप्त किया जा सकता है।
जीवन जीने की कला, संसार में दृष्टिगोचर होने वाली कलाओं में सर्वश्रेष्ठ है। जिसको सही रीति से जिन्दगी जीना आ गया उसे अत्यन्त उच्चकोटि का कलाकार कहना चाहिए। वह दूसरों को प्रभावित, आकर्षित करने से लेकर अन्तःकरण को प्रमुदित करने तक के उन समस्त लाभों को कहीं अधिक मात्रा में प्राप्त करता है जो भौतिक विशेषताओं से सम्पन्न कलाकारों में से किसी-किसी को कभी-कभी या कठिनाई से ही उपलब्ध होते हैं।
करीने और सलीके की जिन्दगी जी लेना इतना बड़ा काम है जिस पर समुचित गर्व किया जा सकता है। ऐसे लोग हर दृष्टि से गौरवशाली ही माने जायेंगे। व्यक्तित्व को देवोपम विशेषताओं से सुसज्जित कर लेना इतनी बड़ी कला है कि उसके लिए समस्त संसार को श्रद्धावनत अभिनन्दन करना पड़ता है।
अपने मानवी गौरव की रक्षा के लिए सचेष्ट रहने वाले मर्यादा युक्त गतिविधियाँ अपनाते हैं और चरित्रवान प्रामाणिक लोगों की पंक्ति में बैठने का प्रयत्न करते हैं। बड़प्पन नहीं, उनका लक्ष्य-आदर्श होता है। उन्हें अमीरी नहीं महानता प्यारी लगती है। सामान्य जन जहाँ प्रचुर भौतिक साधनों द्वारा वर्चस्व और ऐश्वर्य द्वारा विलासिता एवं अहंता की पूर्ति करने में संलग्न रहते हैं और सोचते हैं कि इस दिशा में जितनी अधिक सफलता प्राप्त की जा सकेगी उतना ही मान गौरव बढ़ेगा। इसके विपरीत आदर्शवादी यह सोचता है कि अपने व्यक्तित्व को श्रेष्ठ सज्जनों जैसा विनिर्मित करके लोगों के सम्मुख अनुकरणीय आदर्शों का प्रकाश दिया जा सकता है और उन्हें ऊँचा उठाने में सहायता कर सकने वाला मार्ग-दर्शन किया जा सकता है। जो ऐसा कर सके उसे अपने आपको गौरवास्पद अनुभव करने का पूरा अधिकार है। इस आत्म-गौरव की अनुभूति जिसे निरन्तर होती रहे, उसे ऐसे आन्तरिक आनन्द की उपलब्धि होती रहेगी जिसके आगे भौतिक क्षेत्र की समस्त कलाओं एवं विशेषताओं का सन्तोष हलका और उथला प्रतीत होता रहे।
बालकों जैसा स्वच्छ हृदय छल, कपट से सर्वथा रिक्त सरल व्यवहार सौम्य सादगी से भरी सरलता-विनम्र सज्जनता-निर्दोष क्रिया-कलाप-मधुरता और ममता से भरे वचन व्यवहार किसी भी व्यक्तित्व को इतना सुकोमल बना देते हैं कि उसका आन्तरिक सौंदर्य देखते-देखते दर्शकों की आंखें ही तृप्त नहीं ऐसे पारिजात पुष्प पर न जाने कितने मधु लोलुप कीट-पतंग मंडराते रहते हैं और उसके पराग से लाभान्वित होकर धन्य बनते रहते हैं।
संयम की शोभा देखते ही बनती है। इन्द्रिय संयम की महिमा पर जिसे विश्वास है, उसकी आँखों का तेज, वाणी का प्रभाव, चेहरे का ओज, संपर्क में आने वालों को सहज ही प्रभावित करेगा। बुद्धि की प्रखरता और विवेकशील दूरदर्शिता की कमी न रहेगी। वासना और तृष्णा पर नियंत्रण करने वाला व्यक्ति सहज ही इतने साधन और अवसर प्राप्त कर लेता है जिससे महानता के उच्च-शिखर पर चढ़ सकना तनिक भी कष्टकर न रहकर अत्यन्त सरल बन जाय। ऐसे लोग शरीर और मन के दोनों ही क्षेत्रों में समुचित समर्थता से सम्पन्न रहते हैं। न तो वे रुग्ण रहते हैं और न दीन दुर्बल। उन्हें कभी भी कातर स्थिति में नहीं देखा जा सकता है। विपत्तियाँ भी उनके धैर्य और साहस को चुनौती नहीं दे सकतीं।
अपने साधनों और उपकरणों को सम्भालकर स्वच्छता और व्यवस्था के साथ रख सकना कलात्मक दृष्टिकोण की सहज उपज है। जीवन जीने की कला पर जिसे आस्था है उसके शरीर को, वस्त्रों को, घर को, सामान को गन्दा, कुरूप एवं अव्यवस्थित नहीं देखा जा सकता। कलाकार सौंदर्य का उपासना करता है। सौंदर्य का अर्थ सज-धज, टीपटाप, तड़क-भड़क का फूहड़ प्रदर्शन करते फिरना नहीं वरन् यह है कि हर वस्तु को अपना सहज सौंदर्य यथा स्थान-यथा स्थिति में रहते हुए प्रकट करने का अवसर मिले। करीने से रखे हुए बर्तन-कपड़े, पुस्तकें एवं अन्यान्य उपकरण सहज ही शोभायमान प्रतीत होंगे और यह घोषणा करेंगे कि इन वस्तुओं का उपयोग करने वाले में कला-संवेदन जीवित है।
शरीर को मैला-कुचैला, कपड़ों को फटा-टूटा रखना न तो सादगी है और न ब्रह्मज्ञान। यह बेढंगापन आदमी के आलसी और प्रमादी होने का विज्ञापन है। वस्तुएँ भले ही थोड़ी हों-भले ही सस्ते मोल की हों पर वे जब तक पास हैं जब तक उन्हें उतना ही सम्मान देना चाहिये जितना कि हम अपने व्यक्तित्व के लिए चाहते हैं। वस्तुओं का भी एक व्यक्तित्व है भले ही उनमें बोलने-सोचने की शक्ति न हो, पर है तो इस संसार की एक महत्वपूर्ण इकाई ही। फिर जो वस्तुएँ अपने संपर्क में है उन्हें अपनी विशेषताओं से युक्त होने का अवसर मिलेगा ही। कोयला बेचने वाले के कपड़े-फर्श आदि काले हो जाते हैं। सुगन्धकार की वस्तुओं में इत्र की ओर घासलेट बेचने वाले की दुकान में बदबू सहज ही बिखरी रहती है। जिसका व्यक्तित्व अस्त-व्यस्तता ने कुरूप बनाकर रख दिया है उसकी हर चीज गंदगी और फूहड़पन से लदी होगी। बेतरतीब घर, कपड़े, शरीर तथा सामान को देखकर यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि इस व्यक्ति का स्तर क्या होना चाहिए।
जीवन जीने की कला में सौंदर्य का महत्वपूर्ण स्थान है। शरीर की बनावट कैसी है यह अपने हाथ की बात नहीं। प्रकृति प्रदत्त आकृति को शिरोधार्य करना ही पड़ेगा। किन्तु यदि अपना शरीर कुरूप कहे जाने की श्रेणी में आता हो तो भी निराश होने की कोई बात नहीं। हँसने मुस्कराने की-प्रसन्न रहने की आदत डालकर चेहरे को इतना सुन्दर बनाया जा सकता है कि कोई दर्शक मन्त्र मुग्ध हुए बिना न रह सके। दाँत चाहे कितने ही भद्दे क्यों न हों जब वे खिलते हों तो मोतियों की लड़ी को सजाते हैं। मुसकराहट चेहरे का जादू है यदि उसमें व्यंग अहंकार या कुटिलता का विष घुला हुआ न हो। आन्तरिक हलकेपन का-सन्तोष का-सहज सौम्यता का पुट जिसमें लगा हुआ हो वह मुसकराहट सचमुच एक उच्च-कोटि की कला है। हँस सकने और हँसा सकने वाला कलाकार सदा ही लोगों के ऊपर अपनी गहरी छाप छोड़ता रहेगा।
समय का पालन-नियमित दिनचर्या-उद्देश्यपूर्ण क्रिया-कलाप जैसे सद्गुणों को अपनाकर कोई भी व्यक्ति निर्दिष्ट क्रिया-कलाप में अपने को व्यस्त रख सकता है और निर्धारित लक्ष्य में आशातीत सफलता प्राप्त कर सकता है। असफलताओं का प्रमुख कारण एक ही रहता है पूरे मनोयोग और पूरी श्रम-साधना का समन्वय न होना। यह असंबद्धता उन्हीं में पाई जाती है जो अपनी दिनचर्या को व्यस्त एवं व्यवस्थित रखने का प्रयत्न नहीं करते। जब जैसे जी आया जब वैसे समय गुजार दिया- जब जैसा भाया वैसा कर लिया की बेढंगी आदत जिसके पीछे लग गई वह कितना ही सुयोग्य क्यों न हो हर क्षेत्र में असफल रहेगा और दुर्भाग्य का रोना रोयेगा। समय और मन का समन्वय और नियमित क्रम निर्धारण की बात कहने-सुनने में तुच्छ जैसी लगती है, पर व्यवहार में लाने पर प्रतीत होगा कि यह ऐसा योगसाधन है जिसके फलस्वरूप पग-पग पर चमत्कारी वरदान उपलब्ध होते हैं।
आय-व्यय सन्तुलन मिलाना-उपयोगी मदों को उभारना और अनावश्यक खर्चों को काटना यह अर्थ सौंदर्य जिसे आता है वह न तो कभी ऋणी बनता है और न दरिद्री कहलाता है। आजीविका बढ़ाने के प्रयत्न जिस हद तक सफल हों उसी हद तक अपने निर्वाह का स्तर रखा जाय तो कम आमदनी में भी शान्ति और शान के साथ रहा जा सकता है। कितने ही अच्छी आमदनी वाले व्यक्ति अपव्यय के आदी होते हैं और अनावश्यक मदों में पैसे को उड़ाकर आवश्यक खर्च के लिए रोते-झींकते हैं। इसे आर्थिक फूहड़पन कहना चाहिए। इस बुरी आदत का परिणाम दरिद्रता तक ही सीमित नहीं रहता वरन् अवाँछनीय आजीविका कमाने की विवशता के रूप में भी सामने आता है। अपव्ययी नीतिवान नहीं रह सकता। जो नीतिवान नहीं उसकी अप्रामाणिकता उसे हर किसी की आँख में तिरस्कृत ही बनाये रहेगा। अमीरी का ढोंग बनाने के लिए बरता गया अपव्यय वस्तुतः परले सिरे की मूर्खता है, इस रहा पर वे ही चल सकता हैं जिन्हें कलात्मक जीवन के लिए शालीनता के समन्वय की बात का ज्ञान नहीं होता।
हम जिन्दगी जीने की कला सीखें। अपने दृष्टिकोण, चिन्तन, व्यवहार को कलात्मक बनायें। व्यवस्था का प्रत्येक क्रिया-कलाप में समावेश करें। सौंदर्यवान अपने प्रत्येक संबद्ध पदार्थ को स्वच्छ बनाये। अपने वचन और व्यवहार जीवन जिया जा सकता है। कलाकारिता का यह अति महत्वपूर्ण क्षेत्र हर किसी के सामने खुला पड़ा है-इस मार्ग पर कदम बढ़ाते हुए हममें से कोई भी सर्वोत्कृष्ट कलाकारिता की उपलब्धि का रसास्वादन कर सकता है।
नये सेये गये रेशम के कीड़े इतने छोटे होते हैं कि केवल 1 पौण्ड वजन में 7 लाख आ जाते हैं। परन्तु केवल छह सप्ताह के छोटे समय में उनका वजन बढ़कर 9500 पौंड हो जाता है। यह प्रगति उनके वजन का नौ लाख पचास हजार प्रतिशत है। पर इस प्रगति से क्या लाभ हुआ। बेचारे अपने ही बताये हुए खोखलों में जकड़ कर मर जाते हैं। उनके पास की वह जमा पूँजी जिसे वे किसी काम में नहीं ला पाते, दूसरों का मन ललचाती हैं और वे बेचारे लालचियों द्वारा मारकाट कर समाप्त कर दिये जाते हैं।
रेशम के कीड़ों की तरह कितने ही लोग सम्पत्तिवान बनते हैं, पर उसका सदुपयोग न जानने के कारण लालची, दुष्टता का ही भरण पोषण भर कर पाते हैं।
सदुद्देश्य सामने रखकर काम किया जाय सो ठीक है, पर उतने से ही काम नहीं चलता। सूक्ष्मदर्शी दृष्टि से यह भी सतर्कता पूर्वक देखा जाना चाहिए कि इस प्रयास का कोई अन्धेरा-हानिकारक पक्ष तो नहीं हैं। एकाकी आवेश से सदुद्देश्य भी कई बार वैसा ही घातक होता है जैसा कि राजा के प्यारे पालतू बन्दर द्वारा उसके सोते समय रखवाली में मक्खी उड़ाने के लिए तलवार चलाकर घायल कर देने की कथा में बताया गया है। जल शोधन की दिशा में इन दिनों किये जाने वाले रासायनिक प्रयास ऐसे ही अदूरदर्शितापूर्ण सिद्ध हो रहे हैं भले ही उन्हें आरम्भ करने वालों का कितना ही सदुद्देश्य क्यों न रहा हो।
ओहियो अनुसंधान परिषद ने क्लोराइड मिश्रित जल की खामियों को जन-साधारण के सामने प्रस्तुत किया था और अपने शोध निष्कर्षों की डेलीमेल-सण्डे डिस्पैच आदि पत्रों में छपाया था। जिसमें उसे प्रयुक्त न करने का परामर्श दिया गया था।
अमेरिका की कितनी ही स्वास्थ्य संस्थाओं का एक संयुक्त विरोध सरकार के तथा जनता के सामने प्रस्तुत किया गया था जिसे उस संयुक्त मोर्चे के अध्यक्ष जे0 मकफारलेन फोर्ब्स ने ‘स्काट्स मैन’ आदि पत्रों में विस्तार पूर्वक छपाया था। इस विरोध पत्र में क्लोराइड मिश्रित जल की खामियाँ गिनाई गईं थीं और कहा गया था कि उससे शोधन के नाम पर विषाक्तता का समावेश होता है।
न्यूवर्ग में क्लोराइड सहित और किंग्स्टन में उससे रहित पानी देकर उसके परिणामों की जाँच की गई। उसका विवरण “पेनग्विन साइन्स न्यूज” पत्रिका में छपा। जिसमें बताया गया कि इस रासायनिक जल से दाँतों की खराबियों और जोड़ों के दर्द की शिकायत उत्पन्न होती है।
वर्ल्ड हैल्थ आर्गनाइजेशन के जिनेवा कार्यालय से प्रकाशित एक बुलेटिन में क्लोरीन युक्त पानी के सम्बन्ध में कई ख्यातिनामा स्वास्थ्य विशेषज्ञों के लेख छपे हैं जिनमें प्रायः सभी ने इस रासायनिक सम्मिश्रण का विरोध किया है। पक्ष समर्थन में तो केवल एक ही लेख है फ्लोरिडा विश्व-विद्यालय के रसायन प्रमुख ए0पी0 ब्लैक का।
जल शोधन के लिए नगरपालिकाएँ अक्सर पानी में क्लोरीन मिलाती है। पानी में घोला हुआ यह सोडियम क्लोराइड एक तीव्र रसायन है जो जल में पाये जाने वाले स्वाभाविक कैल्शियम क्लोराइड की तुलना में 85 गुना अधिक तीक्ष्ण है। शोधन के लिए प्रयुक्त किया गया यह रसायन एक मंद विष के रूप में पीने वालों के शरीर में प्रवेश करता और जमता चला जाता है। आरम्भ में तो उसकी उतनी हानि प्रतीत नहीं होती, पर तीस-चालीस वर्ष बाद उसके दुष्परिणाम कई मंद और तीव्र रोगों के रूप में फूटने लगते हैं। इस तथ्य को समझते हुए स्वीडन, फ्राँस, पश्चिम, जर्मनी, आस्ट्रेलिया, स्विट्जरलैंड आदि ने इस सम्मिश्रण को बन्द कर दिया है। अमेरिका के 580 नगरों में भी इसे बन्द कर दिया गया है।
वैज्ञानिक सफलताएँ भी अन्य सफलताओं की तरह तब दुर्भाग्यपूर्ण बन जाती है। जब वे अत्युत्साह एवं अहंकार उत्पन्न करती है। कुछेक सफलताओं के कारण अपनी सर्वांगपूर्ण बुद्धिमत्ता का अभियान किया जाने लगता है और यह भुला दिया जाता है कि कुछ काम की कुछ सीमा तक मिली सफलता का अर्थ यह नहीं है कि अपना हर चिन्तन और हर प्रयास सही या सफल ही होगा। सफलता के लिए क्रिया ही काफी नहीं-सतर्कता भी आवश्यक है। भूल न होने पाये इस पक्ष को ध्यान में रखकर फूँक-फूँक कदम बढ़ाने की नीति यदि छोड़ दी जाय और जल्दीबाजी में कुछ भी कर गुजरा जाय तो ऐसे ही दुष्परिणाम सामने आ सकते हैं जैसे कि जल शोधन सम्बन्धी प्रयास की त्रुटि के संदर्भ में सामने आ रहे हैं।
कोई मृतात्मा किसी जीवित व्यक्ति के शरीर में प्रवेश कर सकती है और उस पर इच्छित समय तक अधिकार बनाये रह सकती है। इसके भी कितने ही उदाहरण मिले हैं। इन उदाहरणों से सिद्ध होता है कि आत्मा मात्र शरीर की परिधि में ही बँधा हुआ नहीं है वह इस सीमा का उल्लंघन करके अन्य शरीरों में भी प्रवेश कर सकता है। इच्छित समय तक अधिकार बनाये रह सकता है और उसे छोड़ सकता है। ऐसा किस स्थिति में होना सम्भव है किस स्थिति में नहीं इसका ठीक से निर्णय तो नहीं हो सकता पर इतना कहा जा सकता है ऐसा होना असम्भव या अविश्वस्त नहीं है। यद्यपि ऐसा झूठा प्रदर्शन कई बार ढोंग बना कर भी किया जाता रहता है।
हारवर्ड विश्वविद्यालय अमेरिका के डाक्टर आसवन ने अपनी मनोवैज्ञानिक खोजों में ऐसी घटनाओं का भी उल्लेख किया है जिसमें किसी व्यक्ति के शरीर में किसी अन्य आत्मा का अधिकार होना भी सम्भव सिद्ध होता है। उनने एक बर्तन बनाने वाले कारीगर का उल्लेख किया है जो एक दिन अनायास ही अपने औजार फेंक कर चिल्ला पड़ा कि मैं यहाँ कैसे आ गया और यह बेकार काम कैसे करने लगा? वस्तुतः वह दो वर्ष से अपना असली घर छोड़कर गायब हो गया था और इसी आत्मा के प्रभाव में घर छोड़कर अन्यत्र चला आया और वह काम करने लगा जिसका उसे पुराना कोई अभ्यास न था। होश आने पर उसे अपने घर की याद आई और वापस लौट गया तब वह प्रेतात्मा के प्रभाव से मुक्त था जब तक प्रभाव में रहा तब तक उसे अपने असली नाम तथा घर का ज्ञान बिलकुल भूला रहा।
इंग्लैण्ड निवासी पादरी हाना का भी उदाहरण ऐसा ही है। घोड़ा गाड़ी से गिरने पर उनके सिर में गहरी चोट लगी। इस आघात के साथ ही उनका व्यक्तित्व बदल गया। वे बच्चों की तरह बोलने, सोचने और आचरण करने लगे, बहुत समय बाद उनकी स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ। तब समय बदल कर उनके शरीर में बालक की और युवक की दो आत्माएँ रहने लगी। जब जिस आत्मा का आधिपत्य होता तब वह शरीर वैसा ही आचरण करता था।
बोस्टन निवासी डाक्टर नार्टन प्रिंस ने अपनी चिकित्सा में आई एक ऐसी महिला का उल्लेख किया है जिसके शरीर में कुछ समय तक किसी प्रेतात्मा का निवास रहता था। स्वभावतः यह मितभाषी थी पर जब अन्य आत्मा का प्रभाव उस पर होता तो वह बेतरह की वाचाल बन जाती और अपना नाम सैली बताती थी।
ऐसी ही एक घटना रीड्स नगर निवासी सेसलवूर्न की है। वह बैंक से कुछ रुपया निकाल कर वापस लौट रहा था कि उसे अपने अस्तित्व की विस्मृति हो गई। उसने अपने को जे0 ब्राउन कहना शुरू कर दिया ओर जन्मभूमि छोड़कर अमेरिका जा पहुँचा। बहुत समय बाद उसे अपना होश लौटा तब वह तुरन्त अपने घर को पास चल पड़ा।
जगद्गुरु शंकराचार्य के बारे में कहा जाता है कि उनकी आत्मा कुछ समय के लिए अपना शरीर छोड़कर किसी राजा के शरीर में रहने लगी थी और वहाँ उन्होंने काम-कला के रहस्य सीखकर विदुषी भारती के प्रश्नों का उत्तर देते हुए शास्त्रार्थ जीता था।
यह एक भिन्न प्रकार का उदाहरण है जिससे एक नये तथ्य पर प्रकाश पड़ता है कि कोई जीवित आत्मा भी किसी मृत शरीर पर अपना कब्जा करके उससे जीवितों जैसा प्रयोजन सिद्ध कर सकता है।
बात यही तक समाप्त नहीं होती। जड़ समझी जाने वाली वस्तुओं के भी प्रेत देख गये हैं। जिन भवनों’ वाहनों का सम्बन्ध अनेकों प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ जुड़ा रहा है उनके साथ जड़-चेतन का अद्भुत संयोग हो जाता है ओर ऐसे पदार्थों के नष्ट होने पर भी उनके प्रेतात्मा काम करते रहते हैं।
कई बार समुद्री मल्लाहों ने डूबे हुए जहाजों की प्रेतात्मा सागर में तैरती देखी है। उनने उसे असली जहाज समझा और रास्ता छोड़ने के चक्कर में स्वयं क्षतिग्रस्त हो गये। पीछे वास्तविकता का पता लगने पर उधर किसी असली जहाज का अस्तित्व सिद्ध न किया जा सका -देखने वालों की बात भी गलत नहीं थी, वस्तुतः वह डूबे हुए जहाज का प्रेत था।
सामान्यतया मनुष्य का जन्म मनुष्य योनि में ही होता है। उसकी बौद्धिक चेतना इतनी विकसित हो चुकी होती है कि किसी अविकसित मस्तिष्क वाले म्यान में उसे ठूँसा नहीं जा सकता । बड़ी उम्र के व्यक्ति को छोटे बच्चे के कपड़े नहीं पहनाये जा सकते। इसलिए मनुष्य का अगला जन्म मनुष्य में ही होने की मान्यता अधिक तथ्यपूर्ण है। बुरे-भले कर्मों का फल तो मनुष्य शरीर में भी मिल सकता है, मिलता भी है।
किन्तु इस नियम के भी अपवाद पाये गये है। मनुष्य का अन्य शरीर में प्रवेश अथवा जन्म जो कुछ भी कहा जाय उसके उदाहरण भी देखने को मिलते हैं। पशुओं के शरीर तथा मन में ऐसी विशेषताएँ पाई गई हैं जो उनमें आश्चर्यजनक मात्रा में मानवी भावना एवं प्रकृति होने का प्रमाण प्रस्तुत करती है।
पश्चिम बंगाल के व वर्दवान जिले में चाँदमारी कालोनी आसन सोल निवासी अध्यापक श्री रामनरायण सिंह की गाय ने 30 अक्टूबर 69 को एक बछड़े को जन्म दिया। बंगाली नस्ल की काली गाय ने बछड़ा भी काला ही दिया। इस बछड़े की प्रकृति में मनुष्य जैसी मनो वृत्ति और आदतें देखने को मिलीं। इसकी विलक्षण प्रकृति को देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते थे और अनुभव करते थे कि यह पूर्व जन्म का कोई भावुक मनुष्य ही रहा होगा।
बछड़ा आदमी की गोद में बच्चे की तरह सोने का प्रयत्न करता था। जब कोई प्यार से उसे सुला लेता तो आनन्द विभोर होकर ऐसी मुद्रा में चला जाता मानों होश−हवास खोकर गहरी निद्रा में चला गया। जब कभी अपने मालिक की गोद में किसी बच्चे को बैठा देख लेता तो उसे उतार कर ही छोड़ता और उस जगह पर खुद जा बैठता। यों खाता तो घास भी था पर जब थाली में मनुष्य का भोजन दिया जाता तो खाने की तरतीब और सलीका देखते ही बनता। चाय का पूरा शौकीन- वह गर्म कितनी ही क्यों न हो देखते-देखते प्याला साफ कर देता। पास बैठे मनुष्य को हलका धक्का देकर यह इशारा करता कि उसे घास या रोटी हाथ से खिलाई जाय। बिना दाल-साग के रूखी रोटी देने पर उसे खाता नहीं और नाराजी जाहिर करता। गृह स्वामिनी उसके प्रति आवेश प्रकट करती तो घर के एक कोने में सट कर जा बैठता और आँसू बहाने लगता। यों प्रसाद में तुलसी के पत्ते वह प्रसन्नतापूर्वक खाता किन्तु आँगन में लगी तुलसी के गमले पर उसने कभी मुँह नहीं डाला। पूजा के समय शान्तिपूर्वक आकर बैठ जाता। रस्सी से बँधा होता तो उसे तुड़ाने का प्रयत्न करता और पूजा के समय देवस्थान तक पहुँचने का प्रयत्न करता।
इन प्रमाणों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर सहज ही पहुँच सकत हैं कि शरीर के साथ ही जीवन का अन्त हो जाने वाली वह मान्यता सही नहीं है जो पिछले दिनों जीव विज्ञानी वैज्ञानिकों ने बड़ेउत्साह के साथ प्रतिपादित की थी। वे कहते थे शरीर में चेतना का आस्तित्व मात्र, जीवन काल तक ही रहता है। मरने के बाद चेतना का पूर्णतया लोप हो जाता है। यह मान्यता इन प्रमाणों के आधार पर सहज ही कट जाती है जो मरणोत्तर जीवने के अनेकानेक अकाट्य प्रमाण आये दिन प्रस्तुत करते रहते हैं। अनन्त जीवन की अस्तित्वादी मान्यता के सहारे ही मानवी सदाचार के प्रति निष्ठा बनाये रखी जा सकती है अन्यथा कर्मफल कर सिद्धान्त भी कट जायगा और मनुष्य इसी जन्म में अधिकाधिक सुखोपभोग के लिए कुछ भी कर गुजरने के लिए तत्पद रहेगा। मरणोत्तर जीवन की मान्यता हमें आस्तिक बनाये रह सकती है और उस आधार पर ही वैयक्तिक एवं सामाजिक सदाचार अक्षुण्ण रखाजा सकता है।
जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं उसका व्यास 8000 मील है। उसकी परिधि 25000 मील है। ऐसी-ऐसी मोटी बातें ही हम अपनी इस धरती के बारे में जानते हैं। जिस पर हम मनुष्य लाखों वर्षों से रहते चले आ रहे हैं और जिस पर अपना अधिकार माने बैठे हैं। धरती की खोज-बीन बहुत हुई है उसके बारे में बौद्धिक ऊहापोह और यान्त्रिक निरीक्षण के आधार पर बहुत कुछ जानने का प्रयत्न किया गया है-बहुत कुछ जाना भी है पर जो कुछ जाना गया है वह अत्यंत स्वल्प है। अभिनव खोजों से पता चलता है कि भूतत्व के सम्बन्ध में अब तब की लाखों वर्षा की जानकारी बहुत स्वल्प थी। अगले दिनों उसके सम्बन्ध में बहुत कुछ जानना दोष है।
यों पृथ्वी का व्यास और परिधि का जो माप किया गया है वह स्थिर नहीं है। पृथ्वी क्रमशः फूल रही है। उसका फुलाव यों बहुत मन्द गति से है पर वह चलता रहा तो वर्तमान माप से सैकड़ों मील की वृद्धि करनी पड़ेगी। समुद्र क्रमशः सूख रहा है। फलस्वरूप थल भाग बढ़ता जा रहा है। अनुमान है कि पाँच लाख वर्ष बाद पृथ्वी का थल क्षेत्र अब की प्राणधारी वनस्पतियों तथा प्राणियों पर लागू होता है, वही पृथ्वी के बारे में भी है। पृथ्वी भी तो एक देवी है-इसकी सजीवता के कारण ही तो इसे धरती माता कहते हैं।
मनुष्य भले ही निश्चेष्ट बैठे-भले ही उदास, निराश दिखाई पड़े पर धरती उछलती-कूदती-नाचती, थिरकती अपनी मोद-विनोद भरी जीवन-यात्रा पर अनवरत गति से चलती चली जस रही है। हम साधारणतया इतना ही समझते हैं कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर काटती है और अपनी धुरी पर घूमती है। पर बहुत ही उसकी चाल में नृत्य जैसी की कुटकन-फुटकन भी शामिल है इसे अभी अभी ही जाना गया है।
सूर्य अपने ग्रह-उपग्रहों के विशाल परिवार को साथ लेकर एक महासूर्य की परिक्रमा करता है। पृथ्वी भी सौर परिवार के साथ बँधी, जकड़ी उस महायात्रा में घिसटती चली जाती है। इतना ही नहीं वह महासूर्य भी हमारे सौर मण्डल जैसे अनेक तारक समूहों को साथ लेकर किसी महाध्रुव की परिक्रमा में संलग्न हैं। बेचारी पृथ्वी उस यात्रा में भी अपने छोटे अस्तित्व के साथ भाग लेती है। यह सूर्य- महासूर्य- महा-महासूर्य का सिलसिला कितना बड़ा है और परिक्रमाओं का विस्तार कितना विस्तृत है इसे सोचते, खोजते वैज्ञानिकों की बुद्धि भी चकराती है।
पृथ्वी की एक गति और भी है जिसे ‘थिरकन’ कहा जा सकता है। वह अपनी धुरी पर सर्वथा स्थिर नहीं है। उसकी अक्ष और सिरे बना स्थान बदलते रहते हैं। 14 महीने की अवधि में यह विचलन प्रायः 72 फीट तक होता पाया गया है। यों सदा चार करोड़ व्यास वाली पृथ्वी के कलेवर को देखते हुए 72 फीट नगण्य है तो भी उससे उसकी गति और स्थिति का पता तो चलता ही है। इंग्लैण्ड के खगोल वेत्ता जेम्स ब्रेडले ने इस थिरकन की सम्भावना व्यक्त की थी जो अब विधिवत् यन्त्रों द्वारा नापी जाने लगी है। ध्रुव जिन्हें स्थिर मानकर ही उनका नामकरण किया गया था अब पता चला है कि उनका भी तन-मन डोलता है और वे भी इधर-उधर भटकते हैं, एक जगह छोड़ते और दूसरी पकड़ते रहते हैं।
यह थिरकन क्यों होती है इसका सही पता तो नहीं चला पर कुछ अनुमान ऐसे लगाये गये हैं जिन्हें सारगर्भित कहा जा सकता है। यथा ध्रुव क्षेत्रीय बर्फ पिघलने से उत्पन्न असन्तुलन-समुद्रीय जल का भटकाव-भूगर्भ में भरे हुए गर्म लावे का पुनर्वितरण एवं उद्वेलन आदि।
इस थिरकन के सम्बन्ध में अधिक जानकारी ज्ञात करने के उद्देश्य से उत्तरी ध्रुव के चारों ओर 40 अक्षांश पर पाँच वेधशालाएं स्थापित की जा रही है। (1) जापान में मिजुसावा (2) समरकन्द के निकट केताव (3) इटली में सार्डीनिया द्वीप का कार्लीफोर्ते (4) अमेरिका में गैदर्ज वर्ग तथा (5) यूक्रिया इन पाँचों केन्द्रों का संचालन इंटरनेशनल पोलरमोशन सर्विस द्वारा किया जा रहा है। इनमें लगे शोध यन्त्र अत्यंत संवेदनशील हैं। इसलिए उन तक गर्मी एवं रोशनी का कम से कम प्रभाव पड़े ऐसी व्यवस्था बनाई गई है। वहाँ बत्तियाँ अत्यंत क्षीण ज्योति की जलती है जिनके सहारे अँधेरे में टटोलने की कठिनाई हल हो सके। खिड़कियाँ हर समय खुली रखी जाती है ताकि कार्यकर्त्ताओं के शरीर की गर्मी जमा होकर यन्त्रों को प्रभावित न करने लगे।
अपनी धरती को हम धूलि-मिट्टी की बनी ऊबड़-खाबड़ कुरूप मात्र देखते हैं। यह अति निकटता की अवज्ञा है। वस्तुतः वह बहुत ही सुन्दर और सुसज्जित है इस शोभा, सौंदर्य को थोड़ा-सा ही दूर हट कर देखा जा सकता है। वह साज-सज्जा युक्त नववधू की तरह अथवा किसी अति सुन्दर रंग-बिरंगे वस्त्रों, आभूषणों से सुसज्जित देव प्रतिमा की तरह किसी चतुर कारीगर द्वारा गढ़ी गई सी प्रतीत होती है। अपोलो 8 पर यात्रा करते हुए अन्तरिक्ष यात्रियों ने बताया कि उन्होंने अन्तरिक्ष में पृथ्वी को इस तरह देखा मानों काली मखमल की चादर पर किसी ने रंग-बिरंगे रत्नों से जगमगाता हुआ प्रकाशवान थाल लटका दिया हो। चन्द्रमा हमें एक ही सुनहरे रंग का दीखता है पर चन्द्र तल से पृथ्वी रंग-बिरंगी दीखती है। वनस्पतियों का रंग हरा, समुद्र का नीला और रेत का भूरा, बर्फ का सफेद स्पष्ट दीखता है। लगता था कई रंगों से सजा हुआ विशालकाय प्रकाश पिण्ड आकाश पर अपना साम्राज्य स्थापित किये हुए है।
बाहर से शान्त, निश्चेष्ट पड़ी दीखने वाली धरती के भीतर निरन्तर उद्वेग भरी हलचलें होती रहती है। अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ने के लिए उसका व्यग्र असन्तोष कभी-कभी फूट पड़ता है जो हम काँप उठते हैं। भूकम्पों के रूप में वह अक्सर प्रकट होता रहता है। आन्तरिक विक्षोभ ही क्रान्तिकारी हलचलों के रूप में फूटते हैं। धरती ज्यों की त्यों नहीं पड़ी रहना चाहती। वही अपनी वर्तमान स्थिति में परिवर्तन और परिष्कार चाहती है। इसके लिये उसके भीतर ही भीतर चलने वाली हलचलें अक्सर विस्फोट बनकर बाहर आती रहती है। कई वार तो यह विस्फोट भूकम्प बहुत ही भयानक होते हैं और अपनी असाधारण भली-बुरी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करते हैं।
पृथ्वी के गर्भ में 25 मील गहरे उतरने पर इतनी गर्मी है कि उसमें पत्थर भी पिघल जाय। वहाँ सब कुछ पिघले हुए लोहे की तरह द्रव रूप में है। अपने जन्म काल में पृथ्वी भी सूर्य की तरह आग का गोला थी। वह क्रमशः ठण्डी होती गई ऊपर की परतें इतनी ठण्डी हो गई कि उस पर वनस्पतियों और प्राणियों का जीवन सम्भव हो सके; किन्तु भीतर की आग अभी भी बहुत गरम है। ठण्डक जैसे-जैसे भीतर घुसती जाती है वैसे ही वैसे गरम परतों का विस्तार सिकुड़ता है और वहाँ उत्पन्न होने वाली भाप परतें फोड़ कर ऊपर निकलने का प्रयास करती है। इसी विस्फोट को ज्वालामुखियों के रूप में देखा और भूकम्पों के रूप में अनुभव किया जाता है।
सन् 1967 में 11 दिसम्बर को महाराष्ट्र के कोयना नगर के समीपवर्ती क्षेत्र में जो भूकम्प हुआ उसमें 80 किलोमीटर लम्बी और छह फुट चौड़ी एक दरार ही जमीन में फट गई थी। जान-माल का विनाश भी रोमाँचकारी था। पूरा नगर खण्डहर में परिणत हो गया था।
कोयना भूकम्प के बारे में भूगर्भ शास्त्री डाक्टर कृष्णन का अनुमान था कि बाँध बनाकर उस क्षेत्र में जो शिव सागर झील बनाई गई है उसका पानी धरती के नीचे की परतों में उतर कर इस भूकम्प का कारण बना होगा।
कभी-कभी भूकम्पों का परिणाम वरदान जैसा भी होता है। सन् 1956 में मैक्सिको के दक्षिणी रेगिस्तान में एक भयंकर भूकम्प आया था जिसके कारण वहाँ मीठे पानी का एक विशालकाय फव्वारा फूट पड़ा और पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसने वाला वह क्षेत्र हरा-भरा उपजाऊ और मनुष्यों के रहने योग्य बन गया।
सन् 1923 में 1 दिसम्बर, को जापान की राजधानी टोकियो में ऐसा भूकम्प आया था जिसने प्रायः सारे नगर को उजाड़ दिया। बुरी तरह आग लगी और लगभग ढाई लाख मनुष्यों की जाने गई। सन् 1906 में 12 अप्रैल को सेनफ्राँसिस्को में भी ऐसा ही भूकम्प आया था जिसने तीन लाख मनुष्यों को बेघर वार बना दिया और हजारों की जाने ले लीं।
भारत में 1737 का भूकम्प इतिहास प्रसिद्ध है जिसने तीन लाख मनुष्य मारे थे। सन् 1950 में आसाम के भूकम्प में करीब 60 झटके लगे थे और डेढ़ हजार जानें गई थी। 1934 का विहार भूकम्प का आतंक दूर नहीं हो पाया था कि एक वर्ष बाद ही क्वेटा में एक और भूकम्प हुआ जिसने 30 हजार मनुष्यों को उदरस्थ किया। काँगड़ा का भूकम्प भी बहुत विनाशकारी था।
अब से कोई दो हजार वर्ष पूर्व इटली का विसूवियस भाग एक ऐसे ज्वालामुखी के रूप में फूटा था जिसमें आग की नदी बहने लगी थीं। विस्फोट से 7 मील दूर बसा पोम्पियाई शहर पूरी तरह विस्मार हो गया था। ऐसा ही एक भयंकर विस्फोट प्रशान्त महासागर के सुन्डा द्वीप में सन् 1893 में हुआ था। उसने उस द्वीप का अता-पता ही मिटा दिया।
धरती के आरम्भिक जीवन में भूकम्पों और ज्वालामुखियों की भरमार थी पर अब जैसे-जैसे ठण्डक गहराई तक घुसती जा रही है वह विस्फोटों का सिलसिला घट रहा है। इतने पर भी प्रायः डेढ़ लाख छोटे-बड़े भूकम्प अभी भी पृथ्वी पर अनुभव किये जाते हैं जिनमें से कम से कम दस तो महा विनाशकारी अवश्य ही होते हैं।
पृथ्वी के गर्भ में क्या-क्या भरा पड़ा है इस सम्बन्ध में केवल 15 प्रतिशत की ही जानकारी हमें है। भूगर्भ का 85 प्रतिशत भाग ऐसा है जिसके बारे में हम सर्वथा अनजान हैं। धरती से जो लाभ अब तक उठाया जाता रहा है उससे मनुष्य को सन्तोष नहीं वह चाहता है कि क्यों न उसकी समस्त सम्पदा का पता लगा लिया जाय और उसमें क्यों न भरपूर लाभ उठाया जाय?
इसके लिए धरती की गहरी खुदाई करनी होगी तभी भीतरी परतों के बारे में यथार्थ जानकारी प्राप्त की जा सकेगी अभी तो इस सम्बन्ध में जो जाना गया है वह अनुमानों पर ही आधारित है।
इसके लिए होनोलूलू का उत्तर पश्चिमी प्रशान्त महा सागर का 170 मील का क्षेत्र चुना गया है। यहाँ पनडुब्बीनुमा 6 मकान बनाये जा रहे हैं जो समुद्र में 18000 फुट गहराई में रहा करेंगे। इसमें एक शक्तिशाली ‘ड्रिलिंग संयंत्र’ रहेगा। यह ‘टर्वो कोरक’ यन्त्र लगातार 203 घण्टे चलने और दो मील गहरा छेद करने में सफल हो चुका है इसकी नोंक बहुमूल्य हीरों से बनाई गई है। जो गरम और कठोर परतों में भी छेद करती चली जायेंगी। यह छेद गहरे समुद्र तलसे ही आरम्भ करना उचित समझा गया है ताकि 18 हजार फुट तक की गहराई का छेद करने का परिश्रम एवं व्यय बचाया जा सके।
यों सन् 1952 में गार्डनलिल ने इस संदर्भ में बहुत दौड़-धूप की थी और काफी गहराई तक खुदाई भी की पर जितना आवश्यक था उतना कार्य न हो सका, सन् 1961 में वैस्कम योजना के अंतर्गत कैलीफोर्निया समुद्र तट पर यह प्रयत्न फिर आरम्भ हुआ और समुद्र तल से 600 फुट गहराई तक जाने में सफलता प्राप्त करलीं। अब वे प्रयत्न और अधिक तेज किये गये हैं।
एक बार ऐसा भी सोचा गया था कि जमीन के आरपार छेद कर दिया जाय। पर उसका खतरा जल्दी ही समझ लिया गया। समुद्र का पानी धरती की गरम परतों में समा कर न केवल सूख ही जायगा वरन् उसकी भाप से भयंकर ज्वालामुखी उठेंगे और धरती की ऊपरी परतों के चिथड़े उड़ जायेंगे। इन विभीषिकाओं को ध्यान में रखते हुए धरती में गहरा छेद करने के उत्साह के अगले कदम फूँक-फूँक कर ही उठाये जा रहे हैं। ‘अब तक 11 हजार फुट की गहराई में खोदी जा चुकी है। पर उतना पर्याप्त नहीं। आवश्यक ज्ञान प्राप्त करने के लिए 20 हजार फुट गहराई तक तो जाना ही पड़ेगा।
पृथ्वी के रहस्य इतने अधिक हैं जिन्हें पूरी तरह जानने में कदाचित् ही कभी मानवी बुद्धि समर्थ हो सकें; फिर भी धरती माता उदारतापूर्वक अपनी आन्तरिक स्थिति का थोड़ा-थोड़ा परिचय हमें अनायास ही देती रहती है। माता अपने बच्चों को सहज ही बहुत कुछ सिखाती रहती है। पृथ्वी कभी अपनी अविज्ञात सम्पदाओं के बारे में हम मनुष्यों को इशारा करती रहती है और बताती रहती है कि वे चाहें तो इन संकेतों को समझ कर बहुत हद तक लाभान्वित होते रह सकते हैं।
भूमिगत खनिजों के सम्बन्ध में उस क्षेत्र में उगे हुए पेड़-पौधे का विश्लेषण करके भी जानकारी प्राप्त कर सकना सम्भव हो गया है। अमुक खनिज अथवा रसायन का बाहुल्य होने से अमुक वृक्ष या वनस्पति अधिक उगते और बढ़ते हैं। इस विज्ञान का क्रमशः अधिकाधिक विकास होता जाता है।
ब्रिटिश कोलम्बिया के पहाड़ी प्रदेश में ऐसे वृक्ष पाये गये जिनके तनों तथा पत्ते में स्वर्ण मिश्रित रसायन पाये गये ।इन वृक्षों के नाम हैं डग्लसफर, ड्वार्फ ज्युनियर, लार्जपोल पाइन, फीलेपाइन, इन वृक्षों के समीपवर्ती क्षेत्र की तलाश करने पर वहाँ सोने की खदानें पाई गई। इसी प्रकार न्यू मैक्सिको में पाये जाने वाले प्रिंस व्लूम, टबल, मर्स्टड, पेप्पर ग्राप्त आदि पौधों में गन्धक की अधिक मात्रा देखकर उस क्षेत्र में गन्धक की खदानें ढूँढ़ ली गई। कैलीफोर्निया में पाई गई ताँबे की खदानों का सुराग वहाँ पाये जाने वाले ‘पोपी’ वृक्ष के विश्लेषण से ही चला था।
भगवान का बनाया हुआ यह विश्व ब्रह्माण्ड चमत्कारी और रहस्यों से भरा पड़ा है। उसकी एक छोटी सी गुड़िया अपनी धरती है। उसे कितनी कारीगरी से बनाया गया और कितने रहस्यों से सँजोया गया है इसे देखकर अपनी बुद्धि चकित रह जाती है। धरती की भीतरी और बाहरी गतिविधियों का थोड़ा-सा परिचय जानने पर हम अवाक् रह जाते हैं और सोचते हैं जो जाना गया है उससे असंख्य गुना जानने के लिए शेष है।
इस जगत में जड़ के नाम से जाना गया भाग भी वस्तुतः चेतन है। उसमें चेतन की सारी विशेषताएँ विद्यमान है। अपनी धरती जड़ समझी जाती है पर थोड़े गहन निरीक्षण से पता चलता है कि उसमें, चेतन में पाये जाने वाले समस्त गुण मौजूद है। ब्रह्माण्ड के पिण्ड रहस्य कितने असीम है और मानव बुद्धि कितनी ससीम है; इसका थोड़ा-सा आभास तब मिलता है जब हम अपनी चिरसंगिनी धरती माता के अद्भुत रहस्यों के सम्बन्ध में मिलती आ रही जानकारी पर विचार करते हैं।
अपने बुद्धि बल पर इतराने वाले मनुष्य को प्रकृतिगत रहस्य व्यंगपूर्वक मुसकराहट के साथ देखते हैं और कहते हैं परमेश्वर की संरचना के रहस्य तुम्हारी परिधि से बहुत अधिक और बहुत बड़े हैं। उदाहरण के लिए धरती सम्बन्धी जो जानकारियाँ मिल रही है वे भी हमें आश्चर्यचकित कर देने के लिए कम नहीं है।
सन् 1962 में शुक्र ग्रह की खोज-खबर लेने के लिए अमेरिका ने ‘मेरीनर-1’ राकेट छोड़ा था। पर उस योजना पर खर्च हुए करोड़ों डालर, बेकार चले गये। राकेट अपने रास्ते से भटक कर कहीं का कहीं चला गया।
इस असफलता का कारण क्या था? इसकी जाँच बिठाई गई। पता चला कि यात्रा पथ निर्धारित करने में जो गणित किया गया था, उसमें एक स्थान पर एक ऋण चिन्ह (-) गणित कर्त्ताओं की भूल से छूट गया था। उतनी सी छोटी भूल से संसार भर में अमेरिका अन्तरिक्ष विज्ञानियों को नीचा दिखाया।
अमेरिका के अन्तरिक्ष विज्ञानी जार्ज मुलर के दफ्तर में ठीक उनके सामने की दीवार पर एक मात्र चित्र टंगा है जिस पर ऋण (-) चिन्ह की एक छोटी सी रेखा भर चित्रित की गई है। उसके नीचे लिखा है-“भूल चाहे इतनी सी ही छोटी क्यों न हो, हानि इतनी बड़ी कर सकती है जिसके लिए बहुतों को बहुत पश्चाताप करना पड़े।
कुछ अपंग विक्षिप्त ओर जन्म-जात अविकसित लोगों को छोड़कर कोई भी सामान्य स्तर का मनुष्य ऐसा नहीं है जिसमें अभीष्ट दिशा में प्रगति कर सकने की क्षमता विद्यमान न हो। अगणित सामर्थ्य मनुष्य में बीज रूप में विद्यमान रहती हैं। उन्हें उभार कर ऊपर लाने और क्रियात्मक जीवन में अपनी भूमिका निभा सकने योग्य बनाया-विकसित करना-अपने प्रयत्न, पुरुषार्थ एवं मनोबल के ऊपर निर्भर है। यदि सच्चे मन से किन्हीं योग्यताओं के विकसित करने का संकल्प एवं प्रयत्न किया जाय तो कोई कारण नहीं कि आज का अयोग्य समझा जाने वाला व्यक्ति कल सुयोग्य न बन सके।
लोग तरह-तरह के मनोरथ करते हैं और विविध-विधि सुख-साधन प्राप्त करना चाहते हैं। सफल एवं समुन्नत बनना चाहते हैं। पर चाहना ही तो पर्याप्त नहीं। चाहना और सफलता के बीच में एक चौड़ी खाई है; जिसे पाटने से ही बात बनती है। अभीष्ट प्रयोजन पूरा कर सकने के लिए आवश्यक योग्यता सम्पादन करना अनिवार्य है इसके बिना हम भविष्य की सुखद कल्पनाएं करते रहने वाले स्वप्नदर्शी भर बने रहेंगे। सफलताएँ अनायास ही किसी को नहीं मिली वे तो उपयुक्त समर्थता सम्पादन करने वाले को दैवी उपहार की तरह मिला करती हैं।
योग्यता को दो भागों में बाँट सकते हैं एक मनस्विता दूसरी प्रयास परायणता, समर्थता का प्रथम चरण मनोबल है। जिसके आधार पर वर्तमान परिस्थिति और प्रगति की दिशा में बढ़ने वाले कदम का तालमेल बिठाना पड़ता है। आरम्भ तो वहीं से हो सकता है जहाँ हम आज है। भविष्य में जब यह परिस्थितियाँ प्राप्त होंगी तब यह आरम्भ करेंगे इस तरह सोचना व्यर्थ है। वे कल्पित परिस्थितियाँ सम्भव है कभी भी न आवें और जिधर बढ़ना चाहते हैं उधर बढ़ सकना सम्भव ही न हो सके। इसलिये आगत की प्रतीक्षा को छोड़कर विचार यही करना चाहिए कि आज हम जहाँ हैं वहाँ से-उन्हीं साधनों से क्या कुछ किया जा सकता है। जो कर सकना आज सम्भव है वस्तुतः वही यथार्थ है। मनस्वी वह है जो यथार्थवाद को अपनाकर चलता है और अपने आज के साधनों की परिधि से आगे बढ़ने का प्रयास करता है।
जो करना है उसके गुण, दोषों पर-भली बुरी सम्भावनाओं पर हजार बार विचार करना चाहिए। उजेले ओर अँधेरे पक्षों की गम्भीरतापूर्वक विवेचना करनी चाहिए। इसमें थोड़ी देर लगती हो तो हर्ज नहीं। आवेशग्रस्त उतावली, मनःस्थिति में बढ़े-चढ़े निर्णय कर डालना और फिर प्रस्तुत कठिनाइयों को देखकर निराश हो बैठना बचकाना तरीका है। इससे अपनी हिम्मत टूटती है और जग हँसाई होती है। एक पक्षीय विचार करने की दुर्बलता ही अक्सर ऐसे कदम उठा देती है जो वर्तमान परिस्थितियोँ में नहीं उठाये जाने चाहिए थे। मनोबल का प्रथम कार्य आवेशग्रस्त उतावलेपन पर नियन्त्रण रखना और जो सम्भव है उसके गुण, दोषों पर विचार करने के उपरान्त किसी सही निष्कर्ष पर पहुँचना है। मनस्वी दूरदर्शी होते हैं और विवेकवान भी। इसलिए उनके निर्णयों के पीछे व्यावहारिकता का पुट रहता है। अतएव उनके संकल्प भले ही छोटे स्तर के हाँ पर सफल होकर रहते हैं।
मनस्वी जो निर्णय करते हैं उस पर दृढ़तापूर्वक आरुढ़ रहते हैं। आवश्यक साधन जुटाने के लिए सूझ-बूझ का पूरा प्रयोग करते हैं और प्रयास प्रयत्नों में किसी प्रकार की कभी नहीं रहने देते। आलस्य और प्रमाद ही प्रायः प्रगतिशीलता के मार्ग में सबसे अधिक बाधा करते हैं। समझ कर काम न करना- पूरे मन और पूरे श्रम से काम न करना- बेगार भुगतने की तरह मंद उत्साह और मंद गति से काम करना-यह सब आलस्य के चिन्ह है। आधे अधूरे काम करने का दुर्गुण क्रियाशीलता का ऐसा कलंक है जो किये गये प्रयास को चौपट करके रख देता है। करना तो पूरे मन से करना न करना तो न करने वाली नीति अपनाकर चलने वाले-आलसी आदतों के साथ कुछ-कुछ करते रहने की अपेक्षा कहीं अधिक लाभ में रहते हैं। शरीर का आलस्य और मन का प्रमाद जुड़वा भाई है। मन में उत्साह न हो और शरीर काम करता रहे तो उसका परिणाम जेल में रहने वाले कैदियों द्वारा बेगार भुगतने के लिए किये जाने वाले कामों की तरह अपर्याप्त और अनुपयुक्त ही रहेगा। मन लगाकर पूरी दिलचस्पी के साथ-व्यवस्थापूर्वक काम न करना और उसे अधूरा लंगड़ा रहने देना मानसिक प्रमाद का चिन्ह है। ऐसे लोगों को यह सूझता ही नहीं कि प्रस्तुत कार्य को कैसे अधिक सुन्दर और अच्छे स्तर का बनाया जा सकता है। मनस्वी व्यक्ति को आलस्य और प्रमाद से जूझना पड़ता है और अपनी शारीरिक, मानसिक तत्परता को इतना प्रखर बनाना पड़ता है कि उसकी धार तेज तलवार की तरह जौहर दिखाती हुई विजय श्री प्राप्त करके ही रहे।
हिम्मत, बहादुरी दूरदर्शिता और दिलचस्पी के साथ जो भी काम किये जायेंगे वे सफल होकर रहेंगे। मनस्वी सर्वप्रथम अपनी स्वभाव जन्य दुर्बलता पर विजय प्राप्त करके अपनी योग्यता की प्रथम परीक्षा में उत्तीर्ण होते हैं। उन्हें दूसरी परीक्षा यह देनी पड़ती है कि जिस कार्य को हाथ में लिया गया है उसके लिए आवश्यक ज्ञान-अनुभव एवं अभ्यास का उपार्जन करें। इसके बिना अनगढ़ और अनजान मनःस्थिति में केवल भटकाव ही हाथ लगेगा। अँधेरे में ढेला फेंकते रहने से निशाना कहाँ लगता है।
जो करना है उसके लिए आवश्यक कौशल उपलब्ध किया जाना चाहिए और इस मार्ग में कहाँ, कब, कैसे, क्यों उतार-चढ़ाव आते हैं उन्हें समझा जाना चाहिए और यह पता लगाना चाहिए कि उन अवरोधों से निपटने का तरीका क्या है? नौकरों अथवा साथियों की योग्यता एवं जानकारी पर पूरी तरह निर्भर रहना, स्वयं उस विषय में अनजान रहना ठीक नहीं। मनस्वी व्यक्ति सफल जीवन के लिए योग्यता संपादन में इस तथ्य को भी जुड़ा रखते हैं कि जिस कार्य को हाथ में लिया गया है उसके लिए अधिकाधिक योग्यता, कुशलता एवं जानकारी का संग्रह किया जाता रहें।
सफलता के लिए व्यवस्था बुद्धि की अत्यधिक आवश्यकता रहती है। काम करने के साधन यदि कम हैं तो उस कमी के अनुपात से कार्य का विस्तार घटाना अथवा जिस-तिस प्रकार साधन जुटाना; यही दो पहिये हैं जिन पर प्रगति की गाड़ी आगे चलती है। कार्य तो साधन जुटाने से ही सम्भव होता है। साधन और कार्य विस्तार का तालमेल बिठाना व्यवस्था बुद्धि पर निर्भर है। कम साधनों से अधिक कार्य कैसे सम्भव हो सकता है, ढूँढ़-खोज करने पर इस की भी कई तरकीबें हाथ लग जाती हैं। सिलसिले बार सम्भालकर आवश्यक देखभाल और हिसाब-किताब के साथ योजनाबद्ध रीति से काम करने का ढर्रा बनाया जाय तो उसमें आशातीत सफलता मिलेगी। समय की चोरी तो नहीं होती, वस्तुओं की चोरी तो नहीं होती इन दो सतर्कताओं को तो रखना ही चाहिए, साथ ही यह भी न भूल जाना चाहिए कि काम बेगार भुगतने की तरह तो नहीं निपटाया जा रहा है और असुरक्षित अधूरी स्थिति में बिखरा छोड़कर चल देने वाली अवांछनीयता तो नहीं घुस पड़ी है। यह ऐसी बुरी आदतें हैं जिनके कारण उसी कार्य में अपने को भारी घाटा उठाना पड़ता है जिसमें दूसरे लोग पर्याप्त लाभ उठा रहे थे और सफल हो रहे थे। अव्यवस्था को दरिद्रता की सगी बहिन कहना चाहिए। बड़ी बहिन अव्यवस्था है और छोटी दरिद्रता। बड़ी बहिन को छोटी बहिन प्राणों से प्यारी है जहाँ वह रहेगी छोटी बहिन भी देर सवेर में जा ही पहुँचेगी।
अधिक मात्रा में-अधिक सस्ता उपार्जन करना आमतौर से अधिक लाभदायक समझा जाता है, पर यह भुला दिया जाता है कि इस भगदड़ में घटिया वस्तुएँ ही बनेंगी। सस्ते मोल में घटिया चीजें खरीदने वाले यों रहते तो सदा ही हैं, पर वे कुछ ही समय में यह समझ जाते हैं यह नीति उसकी अपेक्षा कहीं अधिक महंगी पड़ती है जिसमें बढ़िया चीजें खरीदने की प्राथमिकता दी जाती है भले ही उनके लिए कुछ अधिक मूल्य चुकाना पड़े। समझदारी जहाँ भी होगी वहाँ अच्छे स्तर के उपार्जन का सम्मान किया जायगा और उसके लिए कुछ अधिक मूल्य भी खुशी-खुशी चुकाया जायगा। यह तथ्य जिनने समझ लिया है वे ‘घटिया किन्तु सस्ता’ काम करने की अपेक्षा ‘बढ़िया भले ही महंगा’ की नीति अपनाते हैं। इस नीति से व्यापारिक, सामाजिक, शारीरिक आदि किसी भी क्षेत्र में जो भी काम किया जायगा वह सफल रहेगा और सम्मानास्पद भी समझा जायगा। ऊँचा और अच्छा काम करने की साख जमा लेने पर क्या श्रमिक, क्या व्यापारी, क्या समाज-सेवी, हर किसी को अन्ततः अभीष्ट सफलता का लाभ मिलता है। आरम्भिक दिनों में अपनी प्रामाणिकता और काम की उत्कृष्टता सिद्ध करने के लिए अवश्य ही अधिक धैर्य और अधिक प्रयत्न करने की आवश्यकता पड़ती है। पर पीछे लोग उसी से आश्वस्त रहते हैं और उत्साहवर्धक सहयोग प्रदान करते हैं।
किसी प्रकार सफलता प्राप्त करने की नीति बुरी है। अधिक जल्दी और अधिक लाभ प्राप्त करने की धुन में लोग अनैतिक काम करने पर उतारू हो जाते हैं और अपराधियों जैसी गतिविधियाँ अपनाते हैं। सम्भव है उससे आरम्भ में कुछ लाभ भी रहे, पर पीछे वस्तुस्थिति प्रकाश में आते ही वह बालू का महल पूरी तरह धराशायी हो जाता है। निन्दनीय और अप्रामाणिक ठहराया गया व्यक्ति हर किसी की आँखों से गिर जाता है। उसका नैतिक पतन न केवल व्यक्तित्व को ही अवाँछनीय ठहराता है वरन् उसके किये कामों में भी अविश्वसनीयता का ढिंढोरा पीटता है। ऐसे व्यक्तियों को एक प्रकार से सामाजिक पक्षाघात ग्रसित ही कहना चाहिए। उनके कार्य जब अविश्वस्त ठहराये जाने लगें तो फिर एक से दूसरे तक वह हवा उड़ेगी और हर कोई सतर्क रहने एवं बचने का प्रयत्न करेगा ऐसी दशा में उन्हें असहाय, असफल की तरह सदा तिरस्कृत बहिष्कृत ही रहना पड़ेगा। तब वे बार-बार वेष बदलने अथवा काम बदलने पर भी कोई अच्छी सफलता न पा सकेंगे। जिसने अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करके लोक विश्वास अर्जित नहीं किया समझना चाहिए उसकी कमाई उड़ते हुए तिनके की तरह है, जिसे स्थिरता का लाभ कभी भी न मिल सकेगा।
सफल, प्रगतिशील विकासोन्मुख और सम्मानित जीवन-यापन करना जिन्हें अभीष्ट हो उन्हें इसके लिए अन्तरंग से छिपे हुए सामर्थ्य बीजों को अंकुरित करने का प्रयत्न करना चाहिए। वे आमतौर से उपेक्षित पड़े रहते हैं, लोग बाह्य साधनों में सफलताओं की सम्भावना एवं कामनाओं की पूर्ति के आधार ढूँढ़ते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि वे आधार बाहर नहीं भीतर है जिनसे व्यक्तित्व को विकसित करना सम्भव होता है और सफलताओं के रुके हुए द्वार खुलते हैं।
बाहरी साधनों की, व्यक्तियों के सहयोग की, परिस्थितियों की, अनुकूलता की आवश्यकता रहेगी ही और सफलता के लिए उन्हें जुटाने की बाह्य क्षेत्र में भी चेष्टा करनी ही पड़ेगी, पर इतने से ही काम चलने वाला नहीं है। इन सबके साथ मूल आधार पर भी ध्यान देना होगा, वह है अपना परिष्कृत व्यक्तित्व। भौतिक सफलताओं की दृष्टि से परिष्कृत व्यक्तित्व की परिभाषा, प्रखर मनस्विता और प्रयत्नों की समस्वरता के रूप में ही की जा सकती है। हमारी मनःस्थिति न तो उथली होनी चाहिए और न असन्तुलित। इसी प्रकार हमारी चेष्टाएँ न तो आलस्य प्रमाद से घिरी हुई हों और न उनमें अदूरदर्शिता एवं अव्यवस्था का ही समावेश हो। आंतरिक स्थिति को सही बनाने का प्रथम चरण पूर्ण होते ही बाह्य परिस्थितियों में आशाजनक अनुकूलता उत्पन्न होती है और प्रगति का पथ अनवरत रूप से प्रशस्त होता चला जाता है।
शिष्य ने गुरु से पूछा देव, नदियों का पानी तो मीठा होता है फिर समुद्र जो उन्हीं नदियों के जल संग्रह से अपना भण्डार भरता है खारे जल से क्यों भरा रहता है?
गुरु ने कहा-वत्स उदारता, दान, सेवा और समर्पण का अपना मिठास है। वही नदियों के जल को मीठा बनाये रहता है। समुद्र ने केवल लेना और संग्रह करना ही जाना है उससे उसके अन्तरंग में पश्चाताप के ज्वार-भाटे उठते रहते हैं और कृपणता का कडुआपन उसके पानी को भी अपेय बना देता है।
क्रियाशीलता का अपना महत्व है। श्रम और पुरुषार्थ की महिमा सर्वविदित है। आलस्य और निष्क्रियता की सर्वत्र निन्दा की गई है। इतने पर भी यह सोचना शेष ही रह जाता है कि हमारी क्रियाशीलता निरर्थक अथवा विकृत न हो। सुनियोजित और सुव्यवस्थित श्रम ही सत्परिणाम उत्पन्न करता है। निरर्थक और उद्देश्य रहित चेष्टाएँ न केवल उपहासास्पद होती हैं वरन् अपने व्यक्तित्व का वजन घटाती है।
कुछ लोगों को शरीर के विभिन्न अंगों से विभिन्न प्रकार की निरर्थक क्रिया करने की आदत होती है। इसे मानसिक अस्त-व्यस्तता ही कहना चाहिए। बिना विचारे काम करने की ऐसी निष्प्रयोजन क्रियाएँ जिनके करने की कोई आवश्यकता या उपयोगिता नहीं है लगातार या बार-बार करना यह सिद्ध करता है कि मस्तिष्क के साथ शारीरिक क्रिया-कलाप का सम्बन्ध टूट गया। काम करने से पूर्व उसके प्रयोजन को ध्यान में रखने की व्यवस्था असम्बद्ध हो गई। यह बड़ी उपहासास्पद और दयनीय स्थिति है।
कुर्ते या कोट के सामने वाले बटन मरोड़ना, उंगलियां चटकाना, जमाइयाँ लेते रहना, आँखें मिचकाना, बैठे-बैठे पैर हिलाना, हाथ में कोई चीज लेकर उसे मरोड़ना, खटखटाना, पेन्सिल को मुँह में डालना, पिन से कान या दाँत कुरेदना, मूँछें ऐंठते रहना, नाक में उँगलियाँ डालते रहना, दाँत से नाखून कुतरना, किसी के घर जाकर उसकी पुस्तकें तथा वस्तुएँ उलटना-पलटना, किसी के शरीर को धक्के दे देकर बात करना आदि ऐसी हरकतें हैं जो आदत से सम्मिलित हो जाने के बाद अपने को तो बुरा नहीं लगता, पर दूसरे लोग इन्हें बहुत ही बचकाना मानते हैं।
उपरोक्त हाथ पैरों की हरकतों की तरह मुँह से भी कितने ही लोग ऐसे ही बेतुके कार्य करते रहते हैं। बात-बात में गालियाँ देना, असम्मान सूचक भाषा का प्रयोग करना, अकारण निन्दा चुगली करना, तम्बाकू पान के कारण अथवा ऐसे ही जहाँ-तहाँ थूकते रहना, जोर-जोर से बोलना, जल्दी-जल्दी अथवा अस्पष्ट भाषा में बोलना, इस तरह बोलना कि मुँह से थूक उड़े, होठों की अगल-बगल में थूक जमा लेना अथवा दाँतों से थूक के तार उठाना, खाते समय मुँह खुला रखना और चप-चप की आवाज करना, घूमते-फिरते खाना, जब-तब गाने लगना, अपनी शेखी बघारते रहना, बात को अतिशयोक्तिपूर्ण करके कहना, जैसी बुरी आदतें अशिष्टता की गणना में आती हैं और ऐसे व्यक्ति को असंस्कृत माना जाता है।
बुरी आदतें तब पड़ती हैं जब आवेश ही प्रधान बन जाता है और निरीक्षण नियंत्रण को ध्यान में रखने की बात भुला दी जाती है। साधारण बुद्धि के लोग भी अपने कार्य व्यवसायों में निरीक्षण और नियन्त्रण की आवश्यकता समझते हैं, पर न जाने क्यों लोग अपनी आदतों और हरकतों के बारे में असावधानी बरतते हैं और आवेश में अंग संचालन का जो उत्साह आता है उसे मर्यादित रखने की बात भुला देते हैं फलतः उन्हें उपहासास्पद और छिछोरा बनना पड़ता है। अपनी शक्ति नष्ट होती है और दूसरे उसे असामाजिकता मानकर नाक भौं सिकोड़ते हैं इस असम्मान के कारण उन्हें अव्यवस्थित, असावधान एवं अप्रमाणिक तक मान लिया जाता है। दूसरे लोग उनके हाथ कोई महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व सौंपते या सहयोग देते हुए झिझकते हैं और सोचते हैं जो अपनी आदतों का निरीक्षण नियन्त्रण नहीं कर सकता वह किसी बड़े कार्य को पूरा करने में या दिये हुए सहयोग का सदुपयोग करने में कैसे समर्थ हो सकेगा?
किसी भी क्षेत्र में प्रगति का मूल आधार व्यवस्था बुद्धि होती है। जीवन जीना भी एक बड़ा कार्य क्षेत्र है इसमें व्यवस्था बुद्धि का उपयोग इस दिशा में भी सतर्कतापूर्वक किया जाना चाहिए कि अपनी आदतें बिगड़ने न पायें। निरर्थक और अनर्थ उत्पन्न करने वाली बुरी आदतें असावधानी के कारण हमारे स्वभाव का अंग बन जाती हैं और परिपक्व होने पर जड़ें इतने गहरी जमा लेती हैं कि उन्हें हटाना बहुत ही कठिन एवं प्रयत्न साध्य होता है।
मनुष्य प्रगति की दिशा में आगे बढ़े यह उचित है। विज्ञान की प्रगति इस युग की एक बड़ी उपलब्धि है उसने मनुष्य जाति को एक नया उत्साह दिया है कि उज्ज्वल भविष्य के लिए अधिकाधिक सुख सम्वर्धन के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है, सो किया भी जा रहा है। इन्हीं शताब्दियों में वैज्ञानिक खोजों ने मनुष्य को बहुत कुछ दिया है और कितने ही क्षेत्रों में आशा भरा उत्साह उत्पन्न किया है। इस उपलब्धियों के महत्व को झुठलाया नहीं जा सकता।
वैज्ञानिक प्रगति के साथ-साथ मानवी सुख-सुविधाओं में जो वृद्धि हुई है उसकी महत्ता से इनकार नहीं किया जा सकता यातायात, कल-कारखाने, कृषि व शिल्प विनोद, चिकित्सा, शिक्षा आदि के क्षेत्रों में आज का मनुष्य सौ दो सौ वर्ष पूर्व के लोगों की तुलना में कहीं अधिक साधन सम्पन्न है। बिजली, रेडियो, तार, टेलीफोन, प्रेस अखबार आदि के सहारे जो सुविधाएँ मिली हैं वे अभ्यास में आने के कारण कुछ आश्चर्यजनक भले ही प्रतीत न होती हों, पर आज से पाँच सौ वर्ष पूर्व का कोई मनुष्य आकर यह सब देखे और अपने जमाने की परिस्थितियों के साथ तुलना करे तो उसे प्रतीत होगा कि वह किसी अनजाने दैत्यलोक में विचरण कर रहा है। द्रुतगामी वाहनों की अपनी शान है, रेल, मोटर, वायुयान, पनडुब्बी, जल पोतों के कारण मिलने वाली सुविधाएँ कम नहीं आँकी जानी चाहिए। चिकित्सा एवं शल्य क्रिया की उपलब्धियां कम नहीं हैं सिनेमा और लिए भी मनोरंजन की सुविधा सम्भव हो गई है। अन्तरिक्ष यात्रा के क्षेत्र में हुई प्रगति ने मनुष्य के चरण, तीन चरण में जीन लोक नाप लेने वाले वामन भगवान जितने लम्बे बना दिये हैं। शस्त्रार्थों की दुनिया में अब मारण का व्यवसाय इतना सरल बन गया है कि एक बच्चा भी पृथ्वी पर निवास करने वाले समस्त प्राणधारियों का अस्तित्व क्षण भर में समाप्त कर सकता है।
“पशु-पक्षियों और वृक्ष-वनस्पतियों की वर्णशंकर जातियाँ उत्पन्न करने की कृत्रिम गर्भाधान, टेस्ट ट्यूबों की- सफलता प्राप्त करके मनुष्य सृष्टि निर्माण विधाता के पद पर आसीन होने की तैयारी कर रहा है। विशालकाय स्वसंचालित यन्त्रों से पौराणिक दैत्यों का काम लिया जा रहा है। वरुण से जल भराने, वायु से पंख झलवाने, अग्नि से ऋतु प्रभाव संतुलित कराने का काम रावत लेता था आज जल-कल, बिजली की बत्ती, फेन, रेफ्रिजरेटर, हीटर, कूलर आदि के माध्यम से वे रावत जैसी उपलब्धियाँ हर किसी के लिए सम्भव हो गई हैं। पुष्पक विमान पर अब हर कोई उड़ सकता है और समुद्र लाँघने की हनुमान जैसी शक्ति अब किसी भी वायुयान और जलयान यात्री को सहज ही उपलब्ध है।
‘सोमियोलाजी’ नामक मस्तिष्क विद्या की एक शाखा के अंतर्गत ऐसे अनुसन्धान हो रहे हैं कि मनुष्यों की चिंतन पद्धति कुछ समय के लिए आवेश रूप में नहीं वरन् स्थायी रूप में बदली जा सकेगी। जिस प्रकार प्लास्टिक सर्जरी से अंगों की काट-छांट करके कुरूपता को सुन्दरता में बदल दिया जाता है उसी प्रकार मस्तिष्क की विचारणा एवं सम्वेदना का आधार भी बदल दिया जाय जिससे वह सदा के लिए अपने मस्तिष्क चिकित्सक का आज्ञानुवर्ती बनने के लिए प्रसन्नतापूर्वक सहमत हो जाय।
समुद्र के खारी पानी को मीठे जल में बदलने की-कृत्रिम वर्षा कराने की रेगिस्तानों को उपजाऊ बनाने की-अणु शक्ति से ईंधन का प्रयोजन परा करने की-समुद्र सम्पदा के दोहन की जराजीर्ण अवयवों का नवीनीकरण करने की योजनाएं ऐसी ही हैं जिनसे आँखों में आशा की नई ज्योति चमकती है।
इन उपलब्धियों से मदोन्मत्त होकर मनुष्य अपने को प्रकृति का अधिपति मानने का अहंकार करने लगा है और अपने को सर्वशक्तिमान बनाने की धुन में मारक अणु आयुध बनाने से लेकर-जीवनयापन की प्रक्रिया में उच्छृंखल स्वेच्छाचार बरतने के लिए आतुरतापूर्वक अग्रसर हो रहा है। सफलताओं के जोश में उसने होश गँवाना आरम्भ कर दिया है। इसका दुष्परिणाम भी उसके सामने आ रहा है। अमर्यादित और अनैतिक प्रगति प्रकृति को स्वीकार नहीं वह उसे रोकने का प्रयास करेगी। ही आखिर उसे भी तो अपना सन्तुलन बनाये रखना है।
अर्नाल्ड टायनवी ने अपने ग्रन्थ ‘ए स्टडी आव हिस्ट्री’ में पाश्चात्य सभ्यता की स्थिति और प्रगति पर उनके दृष्टिकोणों से प्रकाश डाला है और यह निष्कर्ष निकाला है कि ‘प्रगति के अत्युत्साह में दिशा भूलकर हम जिस ओर-जिस तेजी से बढ़ते चले जा रहे हैं उसका अन्त महाविनाश के रूप में ही सामने प्रस्तुत होगा। टायनवी के अन्य ग्रन्य ‘नेशनलिटी एण्ड दि वार’ और ‘दि न्यू योरोप’ में पाश्चात्य जनमानस का विश्लेषण करते हुए उसकी लक्ष्य विहीन प्रगति के दुष्परिणामों पर प्रकाश डाला है कि यह अग्र गमन निकट भविष्य में हमें पीछे हटने से भी अधिक महँगा पड़ेगा।
कल-कारखानों की वृद्धि करके अधिकाधिक सुविधा-साधनों को बढ़ाने की अन्धी दौड़ इन दिनों द्रुतगति से चल रही है। यातायात को सरल और स्वल्प समय साध्य बनाने के लिए जल, थल और नभ में चलने वाले यन्त्र वाहनों का विस्तार हो रहा है। इन यन्त्रों में कोयला, तेल, गैस, बिजली, अणु विषैला धुँआ आकाश में उड़ता है और उससे साँस लेने के लिए उपयोगी-वायु अंश नष्ट होकर विषाक्तता बढ़ती है। यह वायु प्रदूषण इस तेजी से बढ़ रहा है कि निकट भविष्य में सार्वभौम स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होने की सम्भावना प्रत्यक्ष दिखाई पड़ती है। कल कारखानों में और बड़े शहरों में उपभोग के बाद जो पानी बचता है वह घुमा-फिराकर नदी, तालाबों में होता हुआ समुद्र में जा पहुँचता है। इस गन्दगी से जल प्रदूषण भी इस गति से बढ़ रहा है कि अगले दिनों पीने योग्य स्वच्छ जल प्राप्त करने की समस्या अधिकाँश लोगों के सामने आ खड़ी होगी।
बढ़ते हुए वायु प्रदूषण का परिणाम यह हो सकता है कि पिछली हिम प्रलय की तरह फिर एक हिम युग सामने आ खड़ा हो और लम्बी अवधि के लिए धरती का एक बड़ा भाग प्राणियों के रहने योग्य न रहे उस पर प्रचण्ड शीत की सत्ता स्थापित हुई दीखने लगे।
अमेरिका के वातावरण ऐजेन्सी के मौसम विशेषज्ञ विलियम काँव का कथन है कि यदि 5 करोड़ टन दूषित पदार्थ अपने वायुमण्डल में और मिल गये तो पृथ्वी का तापमान 11 अंश सेन्टीग्रेड गिर जायगा। जिससे वृक्ष, वनस्पतियाँ और कोमल शरीर वाले प्राणियों का जीवित रहना कठिन पड़ जायगा। तब दुनिया में प्रायः आधी हरियाली नष्ट हो जायगी।
डा0 अर्ल, डबल्यू वारेट ने हिसाब लगाया कि वायुमण्डल में 25 लाख टन दूषित पदार्थ घुस चुके हैं। 5 करोड़ टन के संकट बिन्दु तक पहुँचने में यों अभी 20 गुना अधिक दूषण घुसने के लिए कुछ समय लगेगा पर प्रदूषण जिस क्रम में बढ़ रहा है उसे देखते हुए शायद हजार वर्ष भी इन्तजार नहीं करना पड़ेगा और हिम प्रलय की विभीषिका धरती निवासियों के सामने आ खड़ी होगी। यह प्रदूषण धुन्ध की तरह छा जायगा और सूर्य की किरणें उस छतरी को भेदकर कम मात्रा में ही भूतल तक पहुँच पायेंगी। ऐसी दशा में हिम युग आने की सम्भावना स्पष्ट है।
विलासिता के प्रसाधनों और तुरन्त प्रसन्नता पाने के लिए नशेबाजी की आदतें तेजी से बढ़ रही हैं। कामोपभोग की लालसा अत्यन्त उग्र हो उठी है। स्वादिष्ट व्यंजनों से जिह्वा तृप्ति की आतुरता रोके नहीं रुक रही है। इन सबका प्रतिफल आर्थिक बर्बादी, शारीरिक रुग्णता, मानसिक असन्तुलन एवं सामाजिक अनाचार के रूप में सामने आ रहा है।
होठों को रँगने के लिए काम आने वाले लिपस्टिकों की खपत अमेरिका में 80,000,000 डालर की है। उनमें जो रंग काम आते हैं उनका परीक्षण करने पर पाया गया कि उनमें विषाक्तता की बड़ी मात्रा है। उन रंगों को खिलाने पर चूहे अनेकों बीमारियों के शिकार हो गये। अस्तु सरकार ने उस कार्य में प्रयुक्त होने वाले 17 रंगों को लिपस्टिकों में प्रयोग न करने का प्रतिबन्ध लगा दिया है। अब दूसरे किस्म के नये रंग खोजे गये हैं।
साल्ट लेक अमेरिका के डाक्टर स्पेन्स ने प्रख्यात मासिक ‘लिस्टन’ के अगस्त 1969 के अंक में पृष्ठ 5 पर तमाखू के फलस्वरूप होने वाली हानियों की सुविस्तृत चर्चा की है। उसमें पाये जाने वाले 24 घातक विषों का उल्लेख किया है और उनके दुष्परिणामों से सिगरेट पीने वालों को सचेत किया है। उनका शोध निष्कर्ष यह है कि सिगरेट, प्रत्येक पीने वालों की आयु में 18 मिनट की कमी करती चली जाती है।
अमेरिका के सामान्य नागरिकों का ध्यान अब तमाखू के दुष्परिणामों की ओर अधिकाधिक आकर्षित होने लगा है फलस्वरूप पिछले ही दिनों 2,10,00,000 व्यक्तियों ने सिगरेट पीना छोड़ा है इनमें 1,00,000 तो डाक्टर ही हैं। जिन्होंने यह समझ लिया है कि इस व्यसन को अपनाकर वे अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते हैं।
स्विट्जरलैंड की सेन्डोज कम्पनी की प्रयोगशाला में डा0 एलवर्ट हाफमेन इस शोध कार्य में निरत थे कि नाड़ी संस्थान पर प्रभावशाली असर डालने वाले रसायन तलाश किये जायें। जई आदि की पत्तियों पर बनने वाली एक फफूँद का नाम एकगट रखा गया यह नशीली भी होती है यह कुछ सुधार संशोधन एवं सम्मिश्रण के साथ बाजार में कई प्रकार से चिकित्सा उपचारों के लिए बिकती है। अब तक प्राप्त हुए नशों में यह सबसे विलक्षण प्रकार का है। इसमें मात्र मदहोशी ही नहीं आती चित्र−विचित्र प्रकार के दृश्य भी दिखाई पड़ते हैं और ऐसा लगता है मानों उसकी नसों में से कोई विलक्षण बिजली का प्रवाह फूट रहा हो।
आस्ट्रेलिया में सबसे अधिक बीयर (हलकी शराब) पी जाती है। वहाँ प्रति व्यक्ति उसकी वार्षिक खपत 52 गैलन है। इसके बाद दूसरा नम्बर चैकोस्लेविया वालों का है जहाँ औसतन हर व्यक्ति 29 गैलन इस शराब को एक वर्ष में पी जाता है।
भारत इस क्षेत्र में किसी से पीछे नहीं। बढ़ती हुई गरीबी, बेकारी और अस्वस्थता के बावजूद उसने नशेबाजी में सभ्यताभिमानी देशों से कम प्रगति नहीं की है। यहाँ नशेबाजी पूरे जोश पर है और अगले दिनों उसके गगनचुम्बी बनने के पूरे-पूरे आसार मौजूद हैं।
पाश्चात्य देशों में कामोपभोग की दृष्टि से एक नई विचारधारा अत्यन्त प्रबल वेग से यह उठी है कि यौनचर्या को भावनात्मक न बनने दिया जाय और दाम्पत्य-जीवन को यौन सदाचार के बंधनों में न बँधनों में न बाँधा जाय। घर-परिवार चलाने के लिए विवाह किये जायें पर पति-पत्नी दोनों को ही रतिक्रिया करने का अन्यत्र उपभोग करने की पूरी छूट रहे। इसमें कोई किसी का बाधक न बने वरन् एक दूसरे की सहायता करके उसके मनोरंजन को अधिक सुविधा प्रदान करते हुए विश्वस्त मित्रता का परिचय दे।
अमेरिका में इन दिनों “क्लब 101” नामक ऐसे सहस्रों संस्थान हैं जहाँ नर-नारी स्वच्छन्द यौनाचार की तृप्ति के लिए नित नये साथी सहज ही प्राप्त करते रहते हैं। इस मान्यता वाले व्यक्तियों को ‘स्विगर्स’ कहा जाता है। कहते हैं कि इस वर्ग के नर-नारियों की संख्या वहाँ लाखों से आगे बढ़कर करोड़ों तक पहुँच गई है।
‘स्विगर्स’ अब पाश्चात्य देशों में कोई अनैतिक वर्ग नहीं रहा वरन् उसका अपना एक दर्शन है। नृतत्व शास्त्री गिलवर्ट वारटैल की ‘ग्रुप सैक्स’ (सामूहिक भोग) पुस्तक एक करोड़ से अधिक बिकी है। कैलीफोर्निया के मनोवैज्ञानिक जेम्स ग्रोल्ड ने उस आन्दोलन को एक लोक मान्यता प्राप्त प्रचलन बताया है और कहा है कि प्रायः 20 लाख विवाहित और अविवाहित नर-नारी ‘क्लब 101’ विनोद गृहों की सदस्यता स्वीकार कर चुके हैं। इस विषय पर प्रायः 50 पत्र-पत्रिकाएं लेख और विज्ञापन छापती है।
पाश्चात्य देशों में ‘दी सेक्स बुक’ की 30 लाख प्रतियाँ पिछले ही वर्ष बिकी हैं। जर्मनी के लूथरिन युवा केन्द्रों ने इसे अपनी पाठ्य-पुस्तक बनाया है। जे0 हरवले ने इसका अमेरिका संस्करण तैयार किया गया है और विलमैक्स ब्राइड ने इसे चित्रों से सजाया है जिसमें रतिक्रिया का प्रत्यक्ष चित्रण किया गया है और समलिंगी मैथुन एवं आत्म-रति को निरापद बताया गया है। कामोपभोग को अधिक समय तक-अधिकाधिक उत्साहवर्धक अधिक कौतुक कौतूहलपूर्ण कैसे बनाया जा सकता है यही सुविस्तृत शिक्षण इन पुस्तकों में है। वे यह भी कहते हैं, यौनाचार को समस्त कानूनी और सामाजिक बन्धनों से हटाकर उसे अन्न, जल, वायु की तरह स्वच्छन्द उपभोग की प्रक्रिया बना दिया जाना चाहिए।
यही बात स्वादिष्ट व्यंजनों के आहार से जिह्वा की स्वाद तृप्ति के बारे में कही जा रही है। प्रकृति के अनुरूप आहार-विहार के आचरण को दकियानूसी बताया जा रहा है और आहार-विहार को प्रत्येक प्रतिबन्ध से मुक्त, मात्र प्रसन्नता वृद्धि के लिए प्रयुक्त करने की बात का जोरों से समर्थन हो रहा है। साथ ही साथ इस उद्धत उच्छृंखलता के दुखद परिणाम भी सामने आ रहे हैं।
अमेरिका की राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य समिति की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि उस देश में 17 में से 1 व्यक्ति मानसिक रोगों से पीड़ित है। इनमें से आधे अस्पतालों में पड़ रहते हैं और आधे अपने घरों में ही सनकते रहते हैं। दाँतों की खराबी के सम्बन्ध में तो स्थिति और भी अधिक दयनीय है प्रायः आधी जनता के दाँत खराब है। इस संकट के संदर्भ में रिपोर्ट में कहा गया है कि इस मानसिक रुग्णता और दाँतों की खराबी का कारण है, अमेरिकनों की आर्थिक समृद्धि। जिसका सही उपयोग न जानने के कारण वे ठूँस-ठूँस कर खाते हैं- भरपेट शराब पीते हैं और अन्धाधुन्ध दवाइयाँ खाते हैं।
अमेरिका में 3 करोड़ 60 लाख मानसिक तनाव के अभ्यस्त रोगी हैं। उन्हें निद्रा लाने एवं तनाव घटाने के लिए मनःशान्ति प्रदायक नशीली गोलियाँ खानी पड़ती हैं। इस प्रकार की 50 गोलियों की कीमत प्रायः 30 रुपये के बराबर होती है। यह गोलियाँ हर दिन कई-कई खानी पड़ती हैं अस्तु उन पर उस देश में प्रायः 1 अरब रुपया हर साल खर्च होता है। स्वार्थपूर्ण व्यक्तिवाद और अनियन्त्रित इन्द्रिय भोगों के फल आर्थिक बर्बादी, मानसिक असन्तुलन और असामाजिक एकाकी जीवन के रूप में सामने आना ही चाहिए सो क्रमशः आता भी जा रहा है।
अमेरिकी जन- गणना की रिपोर्ट है कि पिछले दस वर्षों में तलाकों की संख्या 80 प्रतिशत अधिक बढ़ गई है। इस वर्ष पूर्व हर वर्ष प्रायः चार लाख तलाक स्वीकार होते थे, पर अब उनकी संख्या सात लाख से भी अधिक बढ़ गई है। परिस्थितियों को देखते हुए यह अनुमान लगाया जाता है कि अगले इस वर्ष में यह वृद्धि अब की अपेक्षा दूनी गति से बढ़ जायगी।
अमेरिका ही कोई अपवाद नहीं है। महामारी की छूत संसार के हर देश को लग गई है। जो जितना समृद्ध, शिथिल और साधन सम्पन्न है वह उसी अनुपात से सुखोपभोग के उन्मादी आवेश में उसी क्रम से अग्रसर हो रहा है। अमेरिका की चर्चा तो इसलिए बार-बार हो जाता है कि वहाँ के बुद्धिजीवी अपने देश की हर भली-बुरी स्थिति
अच्छा होता हम अपनी धरती ही सुधारते और बेचारे चन्द्रमा को अपने भाग्य पर छोड़ देते। अभी तक हमार मूर्खताएं धरती तक ही सीमित रही हैं उन्हें ब्रह्मांडव्यापी बनाने में मुझे तो ऐसी कोई बात प्रतीत नहीं होती जिस पर विजयोत्सव मनाया जाय। -वट्रेड रसेल
को प्रकाश में लाते रहते हैं। अन्य देशों में वैसा उत्साह कम रहने के कारण आंकड़े भी उतनी सरलता से नहीं मिलते। चर्चा में प्रमुखतापूर्वक अमेरिका के अधिक उदाहरण दिये जाने का यही कारण है।
समय आ गया है कि जोश के साथ होश कायम रखने की बात पर सतर्कतापूर्वक ध्यान दिया जाय। वैज्ञानिक प्रगति की जाय पर उसके विनाशक पक्ष को भी ध्यान में रखा जाय। बुद्धिवाद को प्रश्रय मिले-वैयक्तिक सुविधा और समाज-सुधार की बात भी आगे बढ़े पर यह न भुला दिया जाय कि कहीं अपने पैरों में ही कुल्हाड़ी तो नहीं मारी जा रही है। विकास के नाम पर विनाश को तो आमन्त्रित नहीं किया जा रहा है।
कोई विरले परिवार ही शान्ति एवं सुव्यवस्थापूर्वक निर्वाह करते दिखाई देंगे अधिकाँश में असन्तोष और मन मुटाव की आग जलती पाई जायगी। हमारी परिवार संस्था टूटती-फूटती नजर आ रही है। इस पर गम्भीरता पूर्वक विचार करना होगा।
इसका प्रमुख कारण हैं विभिन्न रूपों में परिवार की टूटती हुई मर्यादायें। परिवार को सम्भालने वाले का गलत दृष्टिकोण परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा अपने कर्त्तव्यों में अनिष्ठा। फलस्वरूप परिवार की शान्ति समाप्त हो चुकी है। कलह का साम्राज्य स्थापित हो चुका है। जब शान्ति ही नहीं तो सुख कैसा ? मनुष्य अपने आपमें इतना अधिक भ्रष्ट, इतना स्वार्थी, इतना दुष्ट हो गया हैं जो अपनी आत्मा की हत्या स्वयं कर रहा है।
वास्तव में स्वर्ग और नरक कोई भिन्न सत्ता नहीं । यह तो आत्मा के विस्तार और हत्या की बात है। ऐसी रामायण की चर्चा हैं कि एकबार उस के सम्बन्ध में जब अयोध्या से राजा जनकजी के दूत विशेष समाचार लेकर मिथिला लौटे तो मिथिलावासियों ने बड़ी ही व्यग्रता से पूछा, कहो अयोध्यावासियों को क्या हाल है ? वहाँ के परिवार में तुमने क्या विशेषता पाई। दूत ने कहा वहाँ के परिवार की सबसे बड़ी विशेषता यह हैं कि घर-घर में स्वर्ग है।
इसका तात्पर्य यह हैं कि अयोध्या का पारिवारिक जीवन बड़ा ही आदर्श जीवन था। कहीं आपसी अंतर्द्वंद्व नहीं दिखाया गया है।
यदि हमारे पारिवारिक जीवन में भी भाई-भाई का प्रेम, पुरुषोत्तम राम के भाइयों की तरह स्थापित हुआ होता तो हमारा परिवार क्यों भिन्न-भिन्न दिखलाई पड़ता। बड़े भाई का त्याग छोटों के लिए किस तरह का हो। राज्य संचालन एवं सुख-भोग की कामना को जिसने छोटे भाई के लिए ठुकरा दिया। भरत को जिसने माता की आज्ञा का बोध कराया। भरत जिसे बड़े भाई द्वारा राज्य संचालन का सहर्ष अधिकार दिया गया, उसने भी अधिकारी होते सुख-भोग को अपनी मुट्ठी में कसकर रख लिया।
वस्तुतः उस रामायण काल में गृहस्थ जीवन में कितना अधिक मर्यादा का पालन किया गया है जो राष्ट्रीय जीवन की साँस्कृतिक धरोहर कही जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं। इतना ही नहीं हमारे पारिवारिक जीवन में स्वर्गीय सुखों का अवतरण किस प्रकार हो सकता है इसका ठोस आधार भी है।
यदि हमारा पारिवारिक जीवन कुछ न कर सके तो कम से कम उसके सभी पहलुओं को अपने जीवन का केन्द्र बिन्दु मानकर चलें तो उससे स्वर्गीय आनन्द का अवतरण कोई कठिन नहीं। हमें रामायण से जीवन के किस पहलू की प्रेरणा नहीं मिलती।
परिवार में एक-दूसरों के प्रति हमारा क्या कर्त्तव्य होना चाहिए ? छोटों के प्रति बड़ों का क्या उत्तरदायित्व होता है ? बड़े अपने से छोटों के प्रति किस तरह निष्पक्ष रूप से व्यवहार और निर्णय करें। आपसी न्याय का प्रतिपादन किस प्रकार किया जाय ? पारिवारिक जीवन में सद्भावना का क्या स्थान है आदि ऐसे महत्त्वपूर्ण पहलू हैं जिसका अनुपालन परिवार में होने लग जाय तो सुख और शान्ति की आनन्दानुभूति सबको होने लग जाये।
परिवार में सदस्यों के बीच अपनेपन का विशेष अनुभव होना, परिवार के टिकाऊपन का सर्वश्रेष्ठ गुण है। जब अपनों में अपनेपन का भाव समाप्त हो जाता है तभी आपसी प्रेम के टुकड़े होने लगते हैं। स्वार्थपरता आने लगती है। अतः आपने अन्तर में अपनत्व की भावना पैदा करनी पड़ेगी। अपनत्व की भावना ही भेद-भाव को जीवन से दूर भाग देती है। परन्तु विचारों में भेद-भाव की उत्पत्ति से न जाने परिवार की कितनी बुरी दशा होती है। भेद भावना पारिवारिक जीवन की एक ऐसी चिनगारी है तो भीतर ही भीतर जलाती रहती है। प्रेम के अंकुर उसमें पनप ही नहीं सकते। आज परिवार की ऐसी ही विषम स्थिति है।
माता के हृदय में अपने छोटे बालकों के प्रति कितनी उदारता की भावना रहती है। बच्चों के लालन-पालन में अपने भूखे रहकर भी उसकी भूख की चिन्ता रखा करती है। अपने सिर पर हर तरह का बोझ उठा लेती है लेकिन बच्चे को किसी प्रकार का कष्ट न हो यह बराबर ध्यान रखती है। कितना बड़ा त्याग उसके जीवन में रहता है। सचमुच माता त्याग की साक्षात् प्रतिमा है। ऐसा ही त्याग करने की भावना, घर के हर समझदार व्यक्ति के हृदय में आ जाये तो कलह-विग्रह के परिताप में बचा जा सकता है। कलह-विग्रह से परिवार की शान्ति भंग हो जाती है। यह तो परिवार का बहुत बड़ा दुर्भाग्य है।
भावना हृदय की आन्तरिक वस्तु है। यदि हम झूठे भाव से अपने पारिवारिक सदस्यों के बीच अपनत्व, उदारता और त्याग का भाव प्रदर्शन करना चाहेंगे तो कभी न कभी इसकी सत्यता परिलक्षित हो ही जायगी। तब अन्य सदस्यों का दृष्टिकोण हमारे प्रति कितना गलत हो जायेगा। लोग सशंकित हो जायेंगे। हमारे प्रति अश्रद्धालु हो जायेंगे। इस मर्यादा का पालन आन्तरिक गुण है कि हम परिवार में श्रद्धा के पात्र समझे जायं। यह प्रदर्शन की वस्तु नहीं भावना की वस्तु है।
गलती करना मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। यदि जाने-अनजाने हमसे किसी प्रकार की गलती हो जाती है जिसका आभास हमें नहीं हो रहा हो तो ऐसी गलती को स्वीकार कर लेना चाहिए। अपने गलती को स्वीकार कर लेने वाला व्यक्ति जीवन में पुनः गलती करने से सावधान रहता है। इसके लिए आवश्यक हैं कि अपने यहाँ पारिवारिक गोष्ठी की व्यवस्था अवश्य बना ली जाय।
इस संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी आ जाती हैं कि हम अपने परिवार में एक दूसरे के प्रति आदर की भावना बनाये रखें। चाहे कोई छोटा बच्चा ही क्यों न हो उसके प्रति भी आदर की भावना होनी चाहिए। बच्चों का इससे मनोबल बढ़ता है। उपेक्षित बालक कभी भी प्रभावशाली नहीं बन सकता। यह बात जरूरी हैं कि बच्चे भी बड़ों का आदर करना जानें। इसकी जानकारी उसे होनी चाहिए। इससे हमारे परिवार की मर्यादा बढ़ती है।
अभिभावक की उदात्त भावना उसकी उत्कृष्टता का परिचायक है। उसके अन्दर कभी ऐसी भावना की उपज नहीं होनी चाहिए जो अहंकार पैदा कर दे। अहंकार मनुष्य के व्यक्तित्व को गिरा देता है। यह सोचकर अभिभावक को यह नहीं मानना चाहिए कि मैं ही पूरे परिवार का पालन करता हूँ। बल्कि ऐसा सोचना चाहिए कि मैं तो एक माध्यम मात्र हूँ। पालनकर्ता तो परमपिता परमात्मा है। पालन करने की शक्ति वही प्रदान करते हैं। बच्चों के जीवन में इसका अद्भुत प्रभाव पड़ता है। वह भी उदार और नम्र स्वभाव का बन जाता है।
मनुष्य की प्रकृति बराबर स्वतन्त्र रहने की होती है। स्वतन्त्रता उसका जन्म सिद्ध अधिकार हैं। व्यक्तिगत स्वतन्त्र विचारधारा पर परिवार में किसी के द्वारा आक्षेप नहीं होना चाहिए। लेकिन यह ध्यान रखा जाना आवश्यक होगा कि उस विचारधारा से पारिवारिक शान्ति में कोई व्यवधान तो नहीं हो रहा है। उस विचारधारा से प्रभावित होकर कोई अपनी नैतिकता तो नहीं खो रहा है। वह विचारधारा सामाजिक जीवन को अस्त-व्यस्त तो नहीं कर रही है। यदि ऐसी विचारधारा है तब तो इसका विरोध और इसकी आलोचना उस व्यक्ति के समक्ष करना ही चाहिए। उसे उपयुक्त सुझावों से आकृष्ट कर सही रास्ता दिखलाना चाहिए। हाँ, यदि किसी परिवार में रूढ़िगत परम्परा का प्रचलन हैं जिसको मानकर चलने में किसी को आपत्ति हैं तो इसके लिए किसी को लाचार भी नहीं करना चाहिए। एक दूसरे के प्रति हमारा फर्ज हो जाता है कि हम एक दूसरे की रुचियों को अपने हृदय में स्थान दें। इस तरह परिवार में एक स्वाभाविकता बनी रहेगी और सारा परिवार सुख-शान्ति की गोद में अपार आनन्द का अनुभव करेगा।
व्यापक दृष्टिकोण को अपनाने की परम्परा का प्रस्फुटन तभी होगा जब हम अपने-अपने परिवार को उत्कृष्ट बनाने की प्रक्रियाओं और विशेषताओं को धारण करेंगे। वे विशेषताएं जो प्राचीन काल की पारिवारिक आदर्श व्यवस्था थी जिसके आधार पर परिवार का पारस्परिक प्रेम अक्षुण्ण रहता है। हमें अपनानी ही पड़ेगी।
स्वास्थ्य का संरक्षण और संवर्धन सरल है यदि सादगी का सरल स्वाभाविक जीवनयापन पसन्द करें तो बिना किसी बड़ी जानकारी का संग्रह किये-बिना कोई बहुमूल्य आहार खरीदे-बिना किसी दवादारु का उपयोग किये दीर्घजीवी हो सकते हैं और बीमारियों से बचे रहकर परिपुष्ट जीवन जी सकते हैं। बुद्धिमत्ता के नाम पर कृत्रिमता अपनाकर ही वस्तुतः हमने अपने स्वास्थ्य का सर्वनाश किया है।
इन दिनों जिसे देखें वही कब्ज का मरीज पाया जायेगा। यदि सवेरे का नाश्ता छोड़ दिया जाये और दिन में केवल दो बार ही भोजन किया जाये तो कब्ज से निन्यानवे प्रतिशत व्यक्तियों को छुटकारा मिल सकता है।
महात्मा गाँधी ने अपने एक संस्मरण में लिखा है-
“जोहानिस वर्ग (दक्षिण अफ्रीका) में मुझे कब्ज रहता था और कभी-कभी सिर भी दुखा करता था। खाने-पीने में पथ्य का ध्यान तो रखता था, पर उससे भी मैं रोग मुक्त न हो सका। सोचता था दस्तावर दवाओं में छुटकारा मिल जाये तो अच्छा हो। इन्हीं दिनों मैंने मैनचेस्टर (इंग्लैण्ड) में हुई ‘नो ब्रेक फास्ट एसोसिएशन’ की स्थापना का समाचार पढ़ा। उसकी दलील थी-अंग्रेज बहुत बार से बहुत मात्रा में खाते हैं। फलतः रोगी बनते हैं। यदि उस उपाधि से बचना हो तो सवेरे का नाश्ता तो बिल्कुल ही छोड़ देना चाहिए। मुझे अपनी भी आदत अंग्रेजों जैसी लगी। सोचा नाश्ता छोड़कर देखूँ। सो छोड़ दिया। कुछ दिन तो अखरा पर सिर दर्द बिलकुल मिट गया। मैं इस नतीजे पर पहुँचा कि अधिक खाने के कारण ही कब्ज रहता था। और सिर दर्द होता था।”
मैदे से बनी डबल रोटी, बिस्किट और माँसाहार ही इन दिनों सभ्य समान का प्रमुख भोजन हैं। जबकि यह दोनों ही वस्तुयें स्वास्थ्य के लिए घातक हैं।
मैदे से बनी सफेद रोटियाँ खाने का प्रचलन बढ़ रहा है। अधिक पीसने और चौकर निकल जाने से मैदा एक प्रकार से विटामिनों और खनिज लवणों से रहित ही रह जाती है। कुछ समय पूर्व अमेरिका में मैदा को अधिक उपयोगी बनाने की दृष्टि से आटा मिल वालों ने कई प्रकार की मिलावटें करने के प्रयोग कराये थे। उन प्रयोगों में नाइट्रोजन, ट्रिक्लोराइड नामक पदार्थ का सम्मिश्रण भी था। इस प्रकार की मैदा से बनी रोटियाँ कुत्तों को खिलाई गई तो उन्हें हिस्टीरिया आने लगा। फलतः उस देश के फूट एण्ड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने इस प्रकार के सम्मिश्रण पर रोक लगादी। इसी प्रकार का एक दूसरा प्रयोग जिसमें क्लोराइन डाक्साइट मिलाकर मैदे को उपयोगी बनाने का प्रयोग किया गया, पर उसे भी हानिकारक घोषित करना पड़ा।
एक भाई ने गाँधी जी से पूछा-हमारे देश में मशीनों के उद्योग विकास का आप विरोध क्यों करते हैं?
गाँधी जी ने उत्तर दिया-मशीनों की मदद से आप एलिन, मोटर, हवाई जहाज या ऐसी ही कोई दूसरी चीज भले ही बनायें। पर मशीनों से आटा पीसने का-सूत कातने का और कपड़ा बुनने का तो मैं विरोध ही करूंगा। कल के आटे के कारण आज इसमें कोई सत्व नहीं रहा। उसके सारे जीवन तत्व नष्ट हो जाते हैं।
बहुभोजन और माँसाहार के गुण बहुत गाये जाते हैं, पर वस्तुतः यह बहुत ही हानिकारक भोजन है। विश्व विख्यात पहलवान जैविस्को को जब भारतीय पहलवान गामा ने पछाड़ दिया तो उसे उन्होंने बड़े यत्नपूर्वक बहुत व्यायाम और कीमती खुराक की प्रचुर मात्रा लेकर बनाया था। उनके दैनिक भोजन में 20 किलो दूध, 1 किलो घी, 1 किलो बादाम-पिस्ता, 6 किलो फल और 3 किलो माँस सम्मिलित था। दंडबैठक भी हजारों की संख्या में नित्य करते थे। कुश्ती तथा दूसरे व्यायाम भी उनकी दिनचर्या के अंग थे।
जवानी में कई कुश्तियाँ उनने पछाड़ी और विश्व विजयी बने, पर बुढ़ापा बुरी तरह कटा। उन्हें श्वाँस, खाँसी आदि कितनी हो बीमारियों ने आ घेरा और अन्ततः हड्डियों को ढाँचा मात्र बनकर बहुत कष्टपूर्ण जीवन बिताते हुए मृत्यु के मुख में चले गये।
भारत जैसे गरीब देश के लोगों का काम बहुमूल्य घी, मेवे आदि बिना भी आसानी से चल सकता है यदि वे अपने आस-पास बिखरी पड़ी सस्ती किन्तु बहुमूल्य घी, मेवे आदि बिना भी आसानी से चल सकता है यदि वे अपने आस-पास बिखरी पड़ी सस्ती किन्तु बहुमूल्य वस्तुओं के गुणों के बारे में जानें और उनका उपयोग करना सीखें।
गाजर बहुत सस्ती चीज है, पर गुणों की दृष्टि से उसे बहुमूल्य फलों की श्रेणी में रखा जा सकता है। गाजर में विटामिन ‘ए’ विशेष मात्रा में और विटामिन ‘बी.सी.जी.’ और के0 साधारण मात्रा में पाये जाते हैं। गाजर के ताजा रस में सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नेशियम, सल्फर, सिलकन और क्लोराइन आदि रसायनों की उपयोगी मात्रा पाई जाती है। गाजर में 10 प्रतिशत एक ऐसी शकर पाई जाती है जो बिना जिगर पर अतिरिक्त भार डाले सहज ही हजम हो सके। स्टेरेलटी-इन डावरिन ग्लेण्डस् एड्रोनल्स, मोनाइस, डेमीटिट्स, ओफथोलिमिया, कंजू-डिविट्स कुछ रोग ऐसे हैं जिनके लिए गाजर रामबाण औषधि सिद्ध हो सकती है।
भारत सरकार के हैल्थ बुलेटिन नं0 23 के अनुसार आँवले में विटामिन सी0 की पर्याप्त मात्रा रहती है। उसमें प्रोटीन, चिकनाई, खनिज तत्व कार्बोहाइड्रेट, कैल्शियम, फास्फोरस सरीखे उपयोगी पदार्थ भी रहते हैं। प्रति सौ ग्राम आँवले में 1.2 मिलीग्राम लोहा और प्रति सौ आँवलों में 600 मिली ग्राम विटामिन सी0 रहता है।
बादाम, पिस्ता, काजू जैसे मूल्यवान मेवे बड़े आदमी खायें सो ठीक है, पर गरीब अपना वही काम मूँगफली से भी चला सकते हैं। वस्तुतः मूँगफली बादाम से किसी भी प्रकार घटिया नहीं है। यह तथ्य निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट होता है।
पदार्थ मूँगफली बादाम
रेचक 4.6 5.2
प्रोटीन 26.7 20.8
चिकनाई 40.1 58.6
खनिज 1.6 2.6
रेशा 3.1 1.7
कार्बोहाइड्रेट 20.3 10.5
कैल्शियम 0.5 0.23
फास्फोरस 0.36 0.46
लोहा (मि.ग्रा.) 1.6 3.5
कैलरी (प्रति सौ ग्राम) 546 655
विटामिन ए. (अन्तर्रा. इकाई) 6 0.3
विटामिन बी-1 (मि.ग्रा.) 0.60 0.44
निकोटिनक एसिड (मि.ग्रा.) 14.1 2.5
रिवोफ्लेविन बी-2 (मि.ग्रा.) 0.13 0.12
इसी प्रकार अन्यान्य सस्ती शाक-भाजियाँ और ऋतु-फल हमारे लिए बहुमूल्य पदार्थों की तुलना में कहीं अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं और सरलतापूर्वक मिल सकते हैं।
पेट में कब्ज होने पर उपवास का सहारा लेकर हम सहज ही अपनी चिकित्सा आप कर सकते हैं और खोई हुई पाचन शक्ति को पुनः प्राप्त कर सकते हैं। उपवासों की दस पद्धतियाँ विज्ञान सम्मत हैं, इनमें से यथासमय उपयुक्त उपवास चुन लिये जाया करें ताकि पेट की स्थिति ठीक बनी रहे और अनेकानेक बीमारियों में फंसने का दुर्भाग्य पूर्ण अवसर न आये। दस उपवास निम्नलिखित हैं-
(1) प्रातःकालिक उपवास- अर्थात् नाश्ता छोड़ देना (2) सायंकालिक उपवास- दोपहर को एकबार ही भोजन करना- रात्रि का भोजन बन्द कर देना (3) एकाहारोपवास- एक समय में एक ही वस्तु खाना। जैसे दोपहर की रोटी खानी है तो शाम को केवल शाक अथवा दूध। (4) रसोपवास- फलों के रस अथवा सब्जियों के सूप (रसा) पर रहना (5) फलोपवास- केवल फलों पर रहना (6) दुग्धोपवास- चार-पाँच बार जितना पच सके उतना दूध लेकर रहना (7) तक्रोपवास- छाछ पर रहना (8) पूर्णोपवास- केवल जल पीकर रहना (9) साप्ताहिकोपवास उपवास- सप्ताह में एक दिन केवल जल लेकर अथवा दूध, रस, सूप आदि पर उपवास करना (10) लघु उपवास- सामान्य भोजन की अपेक्षा आधे परिमाण में खाना।
कठिन रोगों के निवारण के लिये यदि औषधियों की आवश्यकता पड़े तो उसके लिये स्थानीय क्षेत्र में उगने वाली जड़ी-बूटियों के आधार पर चिकित्सा करना ऐलोपैथिक तीव्र औषधियों की अपेक्षा कहीं उत्तम हैं। सन्त बिनोवा का सुझाव है कि-हर गाँव में कुछ वनस्पतियाँ लगा देनी चाहिए। स्थानीय रोगों के लिये स्थानीय वनस्पतियों का ताजा रस जितना उपयोगी होगा उतना गुण बाहर की दवाओं में नहीं हो सकता। सीधी-सीधी जड़ी-बूटियों का उपयोग प्राकृतिक चिकित्सा के अंतर्गत ही समझा जाना चाहिए।
रोग निवारण के लिये औषधियों पर अधिक निर्भर रहना और उनसे बड़ी-बड़ी आशायें करना ठीक नहीं। आपत्ति काल में किसी समय उसका उपयोग हो सकता है, पर साधारणतया उनसे जितना बचा जा सके उतना ही उत्तम है।
औषधियों के सम्बन्ध में विशेषतया ऐलोपैथिक दवाओं के सम्बन्ध में कुछ अनुभवी लोगों के अभिमत इस प्रकार हैं।
औषधियों में से अधिकतर मारक गुणों से युक्त होती हैं। उनमें सृजनात्मक क्षमता क्वचित् ही रहती है। दवाओं की प्रत्येक खुराक मनुष्य की जीवनी शक्ति को न्यून करती जाती है। -प्रो0 आलोंजी क्लार्क
पृथ्वी पर जितने लोगों को डाक्टरों ने मारा है उतने दुर्भिक्ष, महामारी एवं लड़ाइयों से मिलकर भी न मरे होंगे। --डा0 मेलन गुड
औषधियों से होने वाले लाभ से मूल में उनमें रहने वाले रासायनिक पदार्थ नहीं वरन् रोगी के वे विश्वास हैं जो चिकित्सक एवं औषधियों पर आरोपित हो गये हैं। वस्तुतः यह विश्वास एवं संकल्प बल का ही चमत्कार है जिसका श्रेय अकारण ही औषधियों और चिकित्सकों को मिल जाता है। -योगी अरविन्द घोष
इंग्लैण्ड राज्य परिवार के चिकित्सक लार्ड डाडसन अकसर कहा करते थे कि मनुष्य इसलिये बीमार पड़ता है कि उस ठोकर को खाने के बाद वह आँखें खोले और सही आहार-बिहार का तरीका सीखकर भविष्य में स्वास्थ्य रक्षा सम्बन्धी सावधानी बरते।
स्वास्थ्य पैसे से खरीदा नहीं जो सकता और न उसे चिकित्सकों के अनुग्रह से प्राप्त किया जाता है। यदि ऐसा हुआ होता तो कोई अमीर अथवा चिकित्सक न तो कमजोर दिखाई पड़ता और न बीमार। वे अपने साधनों के बल पर ही हृष्ट-पुष्ट रह सकते थे। आरोग्य तो सतर्क संयम और कठोर परिश्रम करने वालों के ही हिस्से में आता है भले ही वे गरीब या अनपढ़ क्यों न हों।
इंग्लैण्ड के सुप्रसिद्ध अध्यात्मवादी और अतीन्द्रिय विज्ञान के अन्वेषक प्रो0 मायर्स के समकालीन मनोविज्ञान शास्त्री विलयम जैम्स ने मायर्स के जीवन संस्मरणों में लिखा है-वे सूक्ष्म शरीर और अतीन्द्रिय विद्या में जितने अधिक निमग्न रहने लगे, उतने ही वे सुन्दर बनते चले गये। आयु के ढलने से कुरूपता नहीं आई वरन् सौंदर्य बढ़ा। उनके चेहरे पर उत्तरोत्तर एक अलौकिक आभा दीप्तिमान होता चली गई और वे सुन्दर से सुन्दरतम बनते चले गये। मृत्यु के समय उन्हें शारीरिक कष्ट तो था, पर मन बहुत प्रसन्न था। चलते समय उन्होंने उपस्थित लोगों से निश्चिन्तता और हलके मन से कहा-मैं एक अनदेखे और अनजाने प्रदेश में सिर्फ छुट्टियाँ बिताने जा रहा हूँ।
मोटी दृष्टि से बड़ी वस्तु अधिक बहुमूल्य मालूम पड़ती है और छोटी को महत्वहीन समझा जाता है, पर बारीकी से देखने पर मूल्य परिमाण का नहीं वरन् वस्तु के भीतर छिपी शक्ति को पहचानने और उसका उपयोग करने का है। सामान्य जड़ी-बूटियाँ तथा रासायनिक पदार्थों का निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार सम्मिश्रण करने पर वे चमत्कारी औषधियाँ बन जाती है। यह सूक्ष्म शक्ति का उपयोग ही है। जड़ समझी जाने वाली धातुएं भी भस्म बना कर अनुपात एवं परिमाण में सेवन की जाती है तो संजीवनी का काम करती है।
पदार्थ की मात्रा अधिक होगी तो उसका उपयोग एवं लाभ भी अधिक होगा यह मोटी बात हैं गहराई से किसी छोटे से छोटे पदार्थ के लघुत्तम भाग की -अणु परमाणु की-क्षमता पर जब विचार करते हैं तो आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है कि परमाणु कहलाने वाले नगण्य से पदार्थ घटक, अपने में कितनी अद्भुत क्षमता दबाये बैठे है। इससे भी गहराई में उतरते हैं तो मात्र विद्युत तरंगें भी अनन्त समुद्र सागर में उठने वाली लहरों की तरह लहराई दीखती है। उन्हीं का मूर्त रूप परमाणु हैं। इन परमाणुओं का साफ बाजार अणु है और फिर अणुओं का संगठित पदार्थ बनकर सामने आता है।
बड़ी वस्तुएं छोटे-छोटे घटकों से मिलकर बनी हैं और छोटे से छोटा घटक किसी बड़े पदार्थ के साथ जुड़ा हुआ अवयव है। स्वतन्त्र सत्तावान होते हुए भी प्रत्येक परमाणु को किसी का अंग बनकर रहना पड़ता है। पदार्थ को भी अपनी अस्तित्व मूर्त रूप में लाने के लिए इन तुच्छ समझे जाने वाले घटकों का संग्रह करके आत्मसात् करने में सफलता प्राप्त करनी पड़ती है। अन्योन्याश्रय की इसी क्रम पद्धति को अपनाकर संसार का काम चल रहा है। यदि कोई किसी को अपना न माने हर कोई स्वतन्त्र स्वच्छंद विचरे तो फिर उस स्वतन्त्रवादी की तो दुर्गति होती है कोई उपयोगी पदार्थ न बन सकने के कारण यह संसार भी धूलि भर अणु-अन्धड़ के अतिरिक्त और कुछ न रह जायगा।
व्यक्ति और समाज का सम्बन्ध परमाणु और पदार्थ जैसा है। परमाणुओं का संगठन अणु हैं। मनुष्यों का प्राथमिक उत्पादन, अभिवर्धन एवं संगठन-परिवार के रूप में बनता है और उन परिवारों की इकाइयाँ मिलकर समाज बनाती हैं। समाज को व्यक्ति के विकास का समुचित आधार बनाना पड़ता है और व्यक्ति को समाज की प्रगति एवं शान्ति को निज की ही मान कर रहना पड़ता है। जहाँ भी इस महाक्रम का व्यक्तिक्रम हुआ कि अव्यवस्था फैल जाती है और उस आग की लपेट में आने वाले क्षेत्र को विविध-विधि अड़चनों का सामना करना पड़ता है।
परमाणु छोटे-छोटे विद्युत कणों के संगठन से बने हुए हैं। वे विद्युत कण धन या ऋण विद्युन्मय होते हैं धन विद्युन्मय कणों को प्रोटोन और ऋण विद्युत कणों को इलेक्ट्रॉन कहते हैं। इलेक्ट्रॉन प्रोटोन की तुलना में हलके होते हैं।
परमाणु की संरचना सूर्य मण्डल से मिलती-जुलती होती है। सौरमण्डल में जिस प्रकार सूर्य का स्थान केन्द्र में होता है और वह अपनी धुरी पर घूमता है तथा अन्य ग्रह अपनी-अपनी कक्षाओं में दौड़ते हुए सूर्य की परिक्रमा करते हैं। उसी प्रकार परमाणु रचना में एक मध्य केन्द्र होता है और अनेक इलेक्ट्रॉन केन्द्र के चारों ओर तीव्र गति से अपनी-अपनी कक्षाओं में भ्रमण करत हैं।
इस अनुशासित क्रम बद्धता ने ही सौरमण्डल को व्यवस्थित शृंखला में बाँध रखा है। उसी से अणु परमाणु अपने क्रिया-कलाप में संलग्न है। यही वह रीति-नीति है जिसे अपनाकर मनुष्य, परिवार और समाज की गतिविधियाँ संचालित हो रही हैं शरीर को ही ले वह छोटे-छोटे जीव कोषों की सम्मिलित इकाई मात्र है। वे कोष यदि विगठित होने लगें तो जीवन का अन्त ही समझिये।
शक्ति का सर्वत्र विपुल भण्डार भरा पड़ा हैं। जड़-चेतन सभी में अपरिमित शक्ति स्रोत भरे पड़े हैं। कठिनाई एक ही है कि वे प्रसुप्त स्थिति में हैं उन्हें किसी प्रकार जगाया जा सके तो प्रतीत होगा कि शक्ति सागर की प्रचण्ड लहरें कण-कण में लहरा रहा हैं
अणु विखण्डन को इन दिनों नये शक्ति-स्रोत के रूप में विकसित किया जा रहा है। भाप, कोयला, तेल, बिजली, गैस आदि ईंधनों के भण्डार क्रमशः चुकते चले जा रहे हैं। अस्तु यह उचित समझा गया कि अनन्त अणु शक्ति को मानवी उपभोग के लिए प्रस्तुत किया जाय। इसके लिए अणु की भीतरी शक्ति को उभार कर ऊपर लाने के लिए- उसकी मूर्छा जगाने के लिए विखण्डन प्रक्रिया अपनाई गई है। इसके लिए अपेक्षाकृत अधिक सरल और सुविधाजनक पदार्थ यूरेनियम चुना गया हैं यों सिद्धान्ततः विस्फोट किसी भी पदार्थ के अणु का हो सकता है।
यूरेनियम एक खनिज है जिसमें विखण्डनशील और उर्वर पदार्थों का सम्मिश्रण है। उर्वर को भी विखण्डनशील बनाया जा सकता है। उर्वर यूरेनियम पर जब न्यूट्रान चोट करते हैं तो वह प्लूटोनियम में परिवर्तित हो जाता है जो विखण्डन की दृष्टि से और भी अधिक उपयुक्त होता है परमाणु ईंधन सामान्य ईंधनों की अपेक्षा अत्यधिक शक्तिशाली होता है एक घनफुट यूरेनियम में इतनी शक्ति होती है जितनी 17 लाख टन कोयले में- अथवा 72 लाख बैरल तेल में- अथवा 320 खरब घन फुट प्राकृतिक गैस में पाई जाती है।
मोटी दृष्टि से उर्वर प्रधान समझा जाने वाला यूरेनियम सूक्ष्म दृष्टि से परखने पर शक्ति का भण्डार सिद्ध होता है यह विखण्डन यदि उपयोगी दिशा में हो और उस शक्ति का बिखराव रोक कर रचनात्मक कार्य में लगा दिया जाय तो उसका परिणाम इतना बड़ा होता है कि ईंधन की शक्ति उत्पादन की सारी समस्याओं को जरा-सा यूरेनियम हल कर दे। किन्तु यदि स्वच्छन्द उच्छृंखल छोड़ दिया जाय तो वही विखंडन विस्तृत क्षेत्र का-उसमें रहने वाले धन-जन का सर्वनाश कर सकता है।
अणु विस्फोट से उत्पन्न रेडियो विकिरण का प्रभाव यों हवा, पानी और वनस्पति आदि सभी पर होता है। पर धातुएँ उसे अधिक चूसती हैं और अपने भीतर देर तक जमा करने के लिए सोख लेती है। जेवर पहले हुए लोग अणु विस्फोट से अधिक प्रभावित होते हैं। विस्फोट के प्रभाव से बचने के लिए भूमि खोद कर शरण गृह बनाये जा रहे हैं उनमें धातु निर्मित वस्तुएँ न हों इसका ध्यान रखा गया है।
भली-बुरी परिस्थितियों का अपना महत्व है पर उनका प्रभाव हर किसी पर समान नहीं होता। मनुष्य भी अपनी स्थिति के अनुरूप ही बाहर प्रभाव अथवा असर डाल सकते हैं। विकिरण को धातुएं चूसती है और खाइयाँ बचाव करती हैं। अपनी आन्तरिक स्थिति धातु या खाई जैसी होगी तो प्रभावों से प्रभावित होने अथवा बचे रहने की परिस्थिति भी उसी आधार पर बन जायगी।
पेन्सिलवेनिया के रेडियोलाजी के प्रो0 मारिस ने इलियोनिस में स्थित एक अणु शक्ति रियेक्टर के आस-पास के क्षेत्रों में बच्चों की मृत्यु दर काफी बढ़ जाने की सूचना दी है। यह स्थान शिकागो से 80 मील दक्षिण पश्चिम में स्थित हैं। रियेक्टर चालू होने से पूर्व इस क्षेत्र में बच्चों की मृत्यु दर उतनी ही थी जितनी अन्य क्षेत्रों में पर अब वह दर आश्चर्यजनक रूप में बढ़ गई है। कहा जाता है कि उस क्षेत्र में रेडियो विकिरण की मात्रा बढ़ जाने से उसका प्रभाव बच्चों के लिए अधिक अहितकर सिद्ध हुआ है।
यह तथ्य सिद्ध करते हैं कि शक्ति का उत्पादन उतना कठिन नहीं जितना कि उसके अवाँछनीय प्रभावों को रोकने के सम्बन्ध में सतर्कता बरतना। सम्पदायें एवं सफलताएँ सदा लाभदायक ही नहीं होती उनको व्यर्थ एवं अनर्थ जैसी दिशा में उपलब्धियाँ भी विघातक ही होंगी।
अणु शक्ति का उत्पादन रचनात्मक दिशा में करने का उनके उत्पादकों का इरादा नहीं है। वे अपने प्रतिद्वन्द्वी को समाप्त करने और विश्वव्यापी वर्चस्व जमाने के लिए उसे प्रयुक्त करने की महत्वाकाँक्षाओं को अपने भीतर दबाये हुए हैं। कभी-कभी तो अपना प्रयोजन दबी जवान से स्पष्ट भी कर देते हैं।
वेल ऐरो सिस्टम कम्पनी के उपाध्यक्ष डानवज्रर ने योजना बनाई थी कि अन्तरिक्ष में उड़ा कर सैकड़ों अणु बम एक साथ रूस पर छोड़े जायें और उसके समृद्ध नगरों को पूरी तरह नष्ट कर दिया जाए।
अन्तरिक्षयानों की सफलता पर अमेरिकी पत्र न्यूज एण्ड वर्ल्ड रिपोर्ट ने बिना छिपाये इन प्रयत्नों का रहस्यमय उद्देश्य प्रकट करते हुए स्पष्ट शब्दों में लिखा है- “हमारा ध्येय अन्तरिक्ष में प्रभुत्व स्थापित करना है।”
शक्तियों की प्रतिद्वंद्वी शक्ति भी होती हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया से -ध्वनि की प्रतिध्वनि से-पदार्थ की छाया से सभी परिचित हैं। शक्ति भी अपनी प्रतिद्वंद्वी शक्ति उत्पन्न करती है जैसे कि देवत्व का प्रतिपक्षी असुरत्व चुनौती देने के लिए सामने आता है अणु का प्रतिअणु-पदार्थ का प्रतिपदार्थ भी वैज्ञानिकों ने खोज निकाला है। एण्टी एटम- एण्टी मैटर- एण्टी युनिवर्स हलचल में जितनी शक्ति सन्निहित है ठीक उतनी ही उसके प्रतिपक्ष में भी सन्निहित है उसे भी यदि पकड़ने और प्रयुक्त करने में सफलता मिल जाय तो आज के ही साधन कल दूना प्रयोजन पूरा कर सकते हैं।
मनुष्य के अन्दर देवत्व है इसका सदुपयोग विकास के लिए हो सकता है। इसके प्रतिपक्षी असुरत्व का भी अपना उपयोग हैं। क्रोध एवं घृणा को अवाँछनीयता से लड़ाने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। लोभ और मोह को व्यक्तिगत लाभ से हटा कर सर्वजनीन प्रगति एवं समृद्धि के लिए जुटाया जा सकता है। कोमल संवेदनाएं जिन्हें ‘काम’ कहते हैं शरीर को निचोड़ने की अपेक्षा कलात्मक उल्लास के विकास में संलग्न होकर व्यक्तित्व को प्रफुल्ल बनाने की भूमिका सम्पादन कर सकती हैं। अहंकार को आत्म-गौरव एवं आत्म-बोध की दिशा में मोड़ा ज सकता है। देवत्व का प्रतिपक्ष असुरत्व है पर वह भी सर्वथा अनुपयोगी नहीं है। अणु शक्ति की प्रतिपक्षी प्रतिअणु शक्ति भी यदि वैज्ञानिकों के हाथ लग गई ता मनुष्य को सर्वशक्तिमान बनने में देर ने लगेगी। प्रश्न यहाँ भी सदुपयोग दुरुपयोग का प्रधान रहेगा। शक्ति की इस संसार में कमी नहीं। जौ मौजूद है उसे समेट लेना कोई बड़ी बात नहीं हैं बड़ी बात उस विवेकशीलता का उत्पादन है जिसके आधार पर दुरुपयोग की रोक-थाम और सदुपयोग की प्रेरणा कार्यान्वित हो सकती है बुद्धिमता की सबसे बड़ी देन उपलब्ध सदुपयोग कर सकने की क्षमता ही होती हैं यदि वह मिल सके तो अणु शक्ति का तथा अन्यान्य आश्चर्यचकित करने वाली सामर्थ्यों का उपार्जन सार्थक हो सकता हैं
एक जागीरदार अपने ठिकाने का विस्तार और वैभव दार्शनिक सुकरात को सुना रहा था। डींगें सुनते-सुनते जब बहुत देर हो गई तो सुकरात ने एक पृथ्वी का नक्शा मँगाया और पूछा-बताना इसमें तुम्हारा ठिकाना कहाँ हैं।
नक्शे में उस ठिकाने का उल्लेख न था केवल प्रान्त ही मटर के बराबर जगह में दिखाई पड़ता था उसने उसी की ओर इशारा किया।
सुकरात ने फिर पूछा यह तो एक प्रान्त का नक्शा हुआ तुम अपने ठिकाने का स्थान और अनुपात बताओ। जागीरदार ने कहा इस नक्शे के अनुपात से मेरा ठिकाना एक सुई का नोंक के बराबर होना चाहिए।
सुकरात हँस पड़े। उनने ब्रह्मांड के नक्शे में पृथ्वी को एक तिल भर बताते हुए कहा- इस पृथ्वी में भी तुम्हारा ठिकाना अदृश्य जितना कम है फिर समस्त ब्रह्मांड की तुलना में तो वह अत्यन्त उपेक्षणीय होगा। इतनी छोटी वस्तु पाकर तुम इतनी बड़ी डींगें क्यों हाँकते हो ?
सुख और आनन्द में मौलिक अन्तर हैं। सुख शरीर का मिलता है और आनन्द आत्मा को। सुख, साधनों पर निर्भर है और आनन्द दृष्टिकोण पर
जिसके पास जितने अधिक सुविधाजनक साधन होंगे वह उतना ही सुखी ही सुखी कहा जा सकेगा। इन्द्रियाँ इन सुखों की अनुभूति करती हैं। उनकी भूख जितनी होती है और तृप्ति का अनुपात जितना होता है उसी हिसाब से सुख अनुभव किया जाता है इन्द्रियाँ शिथिल हो जायें और विविध प्रकार के तृप्ति साधन उपलब्ध हों तो भी सुख न मिलेगा और इन्द्रियों की माँग प्रबल हो किन्तु साधन उससे हलके पड़ते हों तो भी तृप्तिदायक सुखानुभूति में व्यवधान ही पड़ा रहेगा। कौन कितना सुखी है इसे नापने के लिए यह पता लगाना पड़ेगा कि किस की आकाँक्षाएँ कितनी प्रबल थीं और उसके अनुपात से उपभोग की व्यवस्था कितनी मात्रा में सम्भव हो सकी।
मस्तिष्क को ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया हैं स्वादेन्द्रिय, कामेन्द्रिय आदि दसों इन्द्रियाँ अपने-अपने भोग और रसपान के लिए जिस प्रकार लालायित रहती है उसी प्रकार मन इन्द्रिय भी संग्रह की तृष्णा और बड़प्पन की अहंता के लिए आतुर रहती हैं स्वादिष्ट व्यंजन पाकर जीभ को सन्तोष होता है कामुक विषयासक्ति से कामेन्द्रिय की लिप्सा पूरी होती हैं। कण, नेत्र आदि भी अपने-अपने विषयों की पूर्ति चाहते हैं। जितने क्षणों जितनी मात्रा में माँग और पूर्ति का तारतम्य अनुकूल बैठता है उतने समय उतनी मात्रा में इन्द्रियजन्य सुखानुभूति होती है। मन की तृष्णा एवं अहंता का उभार जितना ऊँचा होता है उसी हिसाब से तृप्तिदायक साधनों ओर परिस्थितियों की अपेक्षा रहती है। कम आकाँक्षा वाले व्यक्तियों को जितने से तृप्ति मिल जाती है उसकी तुलना में अधिक आकांक्षा वाले को उतने ही साधन ओछे पड़ते हैं और सन्तोषजनक रहते हैं किसको कितना सुख कितनी साधन सामग्री मिलेगी इसका कोई माप दण्ड नहीं रखा जा सकता। तृष्णा एवं अभिलाषा बढ़ेगी तो साधन की उपलब्धि भी उतनी ही अधिक बढ़ने की अपेक्षा रहेगी अभिलाषा बढ़ती रहे तो संसार से सारे सुख-साधन मिलकर भी एक आदमी को सन्तोष दे सकने की दृष्टि से अपर्याप्त रहेंगे।
इसलिए सुखाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए यह आवश्यक माना जाता रहा है कि अभिलाषाएँ घटाई जायें- आवश्यकताएं कम की जायें- ताकि स्वल्प साधनों में भी सुख-सन्तोष अनुभव किया जा सके। इसके विपरित अधिक बढ़ी अभिलाषाओं के लिए अत्यधिक साधन जुटाने का विकल्प अत्यन्त कष्टसाध्य होगा। पूर्ति के साथ-साथ आकाँक्षा बढ़ेगी और प्रस्तुत साधन अपर्याप्त लगेंगे ऐसी दशा में तृप्ति को राहत नहीं मिलेगी। तालाब में पानी जितना बढ़ता है कमल की बेल उसी हिसाब से ऊपर उठ आती है ओर पत्ते पानी में डूबने ही नहीं पाते। ठीक इसी तरह साधनों का जल, जीवन के तालाब में कितना ही बढ़ता जाय उपभोग की ललक का कमल पत्र उतना की ऊपर उठ आवेगा और उसकी स्थिति जल में डूबने से वंचित ही बनी रहेगी। इस प्रकार सुखाकाँक्षा की पूर्ति कभी किसी की नहीं हो सकेगी अब तक हुई भी नहीं है। इस दिशा में संतोष लाभ करना उन्हीं के लिए सम्भव हुआ है जिन्होंने इच्छाओं को -तृष्णा एवं वासना को घटाकर उपलब्ध साधनों की तुलना में कुछ नीचे स्तर पर ही रखा हैं ऐसे ही लोग इस संसार में रहकर किसी कदर सुख अनुभव कर सकते हैं अन्यथा अपर्याप्त और अतृप्ति की रट लगाये हुए अभावों की जलन में जलते हुए ही जिन्दगी बितानी पड़ती है।
आनन्द की प्राप्ति में ऐसा कोई व्यवधान नहीं है। आदर्शवादी क्रिया-कलाप अपनाने की प्रेरणा दे सकने में समर्थ उत्कृष्ट विचारधारा अब मस्तिष्क में घुमड़ती है तो वह सहज ही हमें सामान्य धरातल से ऊँचा उठा कर उस भावना लोक में पहुँचा देती है जिसे पौराणिक भाषा में स्वर्ग कहा जाता रहा हैं स्वर्ग किसी स्थान विशेष का नाम नहीं है। वह कल्पना अब अवास्तविक सिद्ध हो चुकी है जिसके अनुसार किन्हीं लोक विशेषों को स्वर्ग बताया गया और कहा था स्वादेन्द्रिय, कामेन्द्रिय की इस लोक में अतृप्त रहने वाली लिप्साओं को पूर्ण कर सकने वाली साधन सामग्री प्रचुर मात्रा में विद्यमान है। वह बात इसलिए भी बेतुकी ठहरती है कि जब स्थूल शरीर ही समाप्त हो गया और उसकी इन्द्रियाँ ही जल या गल गई तो फिर स्वर्ग की, भोग सामग्री का उपभोग किस प्रकार सम्भव हो सकेगा। मरने के बाद जो सूक्ष्म शरीर रहता है वह चिन्तन के चेतन तत्वों से बना होता है उसे यदि कुछ सुखद अनुभूति हो सकती है तो उसका आधार उत्कृष्ट चिन्तन का अवसर देने वाली परिस्थितियाँ ही होनी चाहिए स्वर्ग में जिस प्रकार के आनन्द का वर्णन किया जाता है उस प्रकार का ता नहीं पर उच्च लोक में ऐसा वातावरण हो सकता है जहाँ उच्च दृष्टिकोण बनाये रहने की स्थिति हो और वहाँ निरन्तर आनन्द मग्न वाली अनुभूति मिलती रहें।
ऐसा स्वर्ग मरने के बाद किसे, कब, कितनी अवधि के लिए मिलेगा यह सब अनिश्चित है। फिर जो अवसर किसी दूसरी सत्ता ने दिया है उसके छिनने का भी भय बना ही रहेगा। पराये अनुग्रह से मिली सफलता उनके अहसान से लदी रहती है जिनने कृपापूर्वक वैसा अनुदान प्रदान किया। यह अहसान से लदी सफलता नीरस हो जाती है क्योंकि उस पर परावलम्बन का -दूसरों के अनुग्रह का भारी बोझ लदा होता है। उसमें लज्जा खोकर देवताओं का दिया स्वर्ग अनुदान किसी स्वाभिमानी को कदाचित् ही कुछ अधिक सुखद अनुभव होगा।
तृप्तिदायक स्वर्ग वही होगा जिसे अपने हाथों बनाया आरे अपने पुरुषार्थ से कमाया गया हों अपने निकृष्ट चिन्तन और हेय क्रिया-कलाप से व्यक्तित्व को सुसज्जित-सुसंस्कृत बनाया जा सके तो उस सफलता के साथ जुड़ी हुई सरस अनुभूतियों का रसास्वादन निरन्तर होता रहेगा। यही वास्तविक स्वर्ग है।
आनन्द की उपलब्धि के लिए अमुक साधनों की-अमुक परिस्थितियों की आवश्यकता नहीं पड़ती। उसके लिए अपना चिन्तन और अपना स्तर ही पर्याप्त होता है। पुष्प की कोमलता, सुषमा ओर सुगन्ध ही उसे हँसते-खिलते रहने के लिए पर्याप्त हैं। उस पर किसी दूसरे द्वारा रंग पोता जाना या सुगन्ध छिड़का जाना अभीष्ट नहीं आदर्शवादी व्यक्तित्व खिले हुए सुगन्धित पुष्प की तरह है जो स्वयं भी धन्य होता है और संपर्क में आने वालों को भी आनन्द प्रदान करता है। ऐसे व्यक्तियों को देव कहा जा सकता है और उनके निवास क्षेत्र को बिना संकोच स्वर्ग घोषित किया जा सकता है। प्रखर विचारों में वह क्षमता होती ही है जिसके आधार पर संपर्क क्षेत्र को स्वर्गीय वातावरण से ओत-प्रोत किया जा सके।
अपने व्यक्तित्व को आनन्दमय बनाने के लिए संयम, सदाचार, कर्त्तव्य निष्ठा, आत्मीयता, करुणा, जैसी सद्भावनाओं को अन्तःकरण में प्रतिष्ठापित करने की आवश्यकता पड़ती है। संपर्क क्षेत्र को प्रभावित करने के लिए नम्रता, प्रामाणिकता और पुरुषार्थ परायणता जहाँ भी होगी वहाँ विविध सफलताएँ अनायास ही उपलब्ध होती रहेंगी और जन सहयोग एवं लोक सम्मान का भी अभाव न रहेगा। ऐसी परिस्थितियों को प्रत्यक्ष स्वर्ग कहा जा सकता है। इसका विनिर्मित करना किसी के लिए भी कठिन नहीं है। सुख-साधनों की -भौतिक सफलताओं की प्राप्ति में कई प्रकार की अड़चने तथा आशंकाएं हो सकती है पर अपने मनःक्षेत्र की आदर्शवादी चिन्तन से भरे रखने में और सज्जनोचित आचरण करने में न तो कोई व्यक्ति बाधक हो सकता है और न कारणं आनन्द, उल्लास की स्वर्गीय परिस्थितियाँ यदि हमें सचमुच अभीष्ट हों तो थोड़ा साहस जुटायें और अपने अन्तरंग, बहिरंग जीवनक्रम का परिष्कृत परिवर्तन कर डालें। तब स्वर्ग जैसी आनन्दमयी रसानुभूति हमें हर घड़ी उपलब्ध होती रहेगी।
लोग भाग्य की सराहना और निन्दा करते नहीं थकते। वे हर सफलता का श्रेय और हर असफलता का दोष भाग्य का देते रहते हैं। जो लोभ मिला उसे भाग्य ने उपस्थित किया और जो हानि हुई उसका दोषी भाग्य ही था, ऐसी चर्चा करते हुए अनेकों को सुना जाता है।
यदि भाग्य इतना ही प्रबल है कि उसे हर सफलता असफलता का कारण कहा समझा जा सके तो फिर पुरुषार्थ का कोई महत्व नहीं रह जाता। तब परिश्रम करना और सूझ बूझ का उपयोग करना बेकार हैं उस सिर फोड़ी अथवा दौड़ धूप से जब कुछ बनने वाला ही नहीं है सब कुछ तो भाग्य लेख के आधार पर होता तो यही उचित प्रतीत होता है कि किसी प्रकार के प्रयत्न पुरुषार्थ के झंझट में न पड़ा जाय। अमिट भाग्य रेख के आधार पर यह मानकर चला जाय कि पेट भरना आवा भूखे मरना सब कुछ विधि के विधान के आधार पर होगा फिर बेकार के झंझट मोल लेने से क्या प्रयोजन। चैन से बैठे बैठे समय क्यों न गुजारा जाय? शरीर और मन को क्यों कष्ट में डाला जाय?
क्या ऐसा सम्भव है? प्रबल भाग्यवादी भी ऐसा नहीं कर सकते। भले ही वे कहते- प्रतिपादित करते- कुछ भी रहें। रोटी कमाने का प्रयत्न न करें- घर परिवार की व्यवस्था न बनायें- परिजनों के बीमार पड़ने पर दवादारु न करें- चोरी और विघ्न कर्ताओं से बचने का प्रयत्न न करें- तो ही यह कहा जा सकेगा कि यह सच्चा भाग्यवादी है। भाग्य और पुरुषार्थ में से एक ही मान्यता दी जा सकती है। दोनों प्रत्यक्षतः एक दूसरे के विपरीत है। भाग्यवादी यदि पुरुषार्थ करता है तो व्यर्थ की विडम्बना करता है। यदि किसी को पुरुषार्थ करता है तो व्यर्थ की विडम्बना करता है। यदि किसी का पुरुषार्थ ही करना पड़ा तो फिर भाग्य पर विश्वास होने वाली बात पूरी तरह कट गई। दोनों को मिलाकर नहीं चला जा सकता। दोनों पक्ष एक दूसरे के विरोधी है।
भाग्यवाद के पक्ष में अधिक से अधिक इतना ही तर्क उपस्थित किया जा सकता है कल का पुरुषार्थ आज पककर भाग्य के रूप में सामने आया कल का जमाया हुआ दूध आज दही बन गया कल का बोया बीज आज अंकुर बनकर उपजा कल का आहार आज रक्त के रूप में परिणत हुआ यह रूपांतरण भाग्य कहा जा कसता है। पर इतने पर भी उसे श्रेय देने की या उस पर आश्रित रहने की बात जरा भी नहीं बनती। दूध न होगा तो दही कहाँ से आ जाएगा? बीज न होगा तो अंकुर कैसे फूटेगा? आहार न मिलेगा तो रक्त किस प्रकार बनेगा? पुरुषार्थ न होगा तो भाग्य की रचना कैसे हो जायगी? ध्वनि की प्रतिध्वनि होती है और क्रिया की परिणति तकदीर में होती है। वस्तुतः तदवीर ही समय की साड़ी ओढ़े तकदीर के रूप में दीख पड़ती है। उसका स्वतन्त्र रूप से कोई अस्तित्व नहीं।
कल जो किया था उसे आज भोगना पड़ रहा है। यह ठीक है। साथ ही यह भी ठीक है कि आज कर रहे हैं उसका सुनिश्चित परिणाम कल आने ही वाला है। कल का पिसा आटा आज का भोजन बन चुका इसलिए अब कल के लिये आटे की व्यवस्था करने से मुँह मोड़ा जाय इसका कोई औचित्य नहीं।
भाग्यवाद की इतनी ही उपयोगिता है कि आज की असफलताओं को भूतकाल में पुरुषार्थ की कमी का परिणाम समझें और यह प्रेरणा ग्रहण करें कि हमें आलस्य प्रमाद को तनिक भी प्रश्रय नहीं देना चाहिए अन्यथा आज की तरह ही कल भी हमें असफलताओं का मुँह देखना पड़ेगा। कल विषैली चीजें पेट में भरी फलस्वरूप आज पतले दस्त लग गये और पेट में मरोड़ हुई। इस पेचिश को भाग्य का खेल समझ कर जो हाथ पर हाथ रखकर बैठेगा और विधि विधान की चर्चा करते हुए निष्क्रिय बैठेगा वह बेमौत मरेगा। पेचिश का इलाज करने के लिये डाक्टर के पास दौड़ना चाहिए उपचार में संलग्न होना चाहिए ताकि पिछली भूल का परिमार्जन हो सके, साथ ही आगे के लिये सावधान होना चाहिए कि आहार में अमुक प्रकार की भाल करने का दुष्परिणाम यह होता है कि आगे के लिए वैसी गलती फिर न होने पावे। अप्रत्याशित अप्रिय घटनाओं के सामने आने पर यदि भाग्य की चर्चा करनी है तो पेचिश के कष्ट, उपचार और उपदेश के रूप में ही उसका ऊहापोह होना चाहिए।
कर्म विपर्यय का दोष यदि भाग्य के मत्थे थोप कर हम निश्चिन्त बनना चाहेंगे तो यह एक भयंकर भूल होगी। हम भाग्य के गुलाम हैं। विधाता के कर्म रेख पहले से ही लिख रखी है जैसी मान्यताओं की यदि प्रश्रय दिया गया तो उसकी प्रतिक्रिया हमें परावलम्बी और कर्महीन बना देगी। आशा और उत्साह का दीपक बुझा देगी। साहस और पुरुषार्थ को समाप्त कर देगी। तब आत्म-निरीक्षण ओर आत्म-निर्माण की दिशा में सोचते भी न बन पड़ेगा। सब कुछ जब ग्रह-नक्षत्रों की-विधि-विधान की कृपा से होता है तो मानवी कर्म को न तो कोई श्रेय दिया जाना चाहिए और न दोष। फिर हर सफलता, असफलता को विधाता का उपहार, अभिशाप माना जायगा। यदि विधाता किसी को उपहार और किसी को अभिशाप देता है तो इसे उसका भयानक पक्षपात कहा जायगा। प्राणियों के साथ यह उसका क्रूर व्यंग ही हो सकता है।
जब सभी प्राणी, सभी मनुष्य ईश्वर के बनाये हैं- उसी के पुत्र है तो फिर न्याय यही है कि पिता का कर्तव्य पालन करते हुए वह सभी बच्चों के साथ समान नीति अपनाये और दुख-सुख देने की प्रक्रिया किसी औचित्य के आधार पर ही निश्चित करे। किसी को दुखी, किसी को सुखी-किसी को धनी किसी को निर्धन-किसी को समुन्नत किसी को पतित-बनाने का खेल यदि उसने खेला है तो उसे ईश्वर के साथ जुड़े हुए-समदर्शी, करुणासिन्धु-दयानिधान, दीनबन्धु, निष्पक्ष-न्यायकारी आदि विशेषणों से सर्वथा विपरीत क्रूर-कर्मा ही माना जायगा। तब मनुष्यों की सारी विपत्तियों का दोष ईश्वर के मत्थे ही मढ़ा जायगा। तब दूसरों के साथ अनीतिपूर्ण, निर्दयता बरतने वाले दुष्टकर्मा लोगों की पंक्ति में ही ईश्वर को भी खड़ा किया जायगा। ऐसा ईश्वर विक्षिप्त, उन्मत्त अथवा कुकर्मी ही ठहराया जायगा-उसकी आराधना करके वैसा ही स्वयं भी बनने की चेष्टा कोई न्यास निष्ठ व्यक्ति तो करेगा ही नहीं। आतंक से भयभीत होकर गिड़गिड़ाने वाले आर्त भक्तों की बात दूसरी है।
वस्तुतः भाग्यवाद को अधिक महत्व देने-उसमें दिलचस्पी रखने का कोई कारण नहीं। भविष्य पूछने या बताने में कोई सार नहीं। मनुष्य लोहे, पत्थर का बना हुआ नहीं है जो बदला न जा सके और न कोई विधिविधान ऐसा है जिसे टाला, सुधारा न जा सके। उपचार करने पर विष खाने वाले के भी प्राण बच जाते हैं। फिर कोई कारण नहीं कि पिछली भूलों के कारण विनिर्मित हुए परिणाम को-भाग्य को-हटाया, बदला न जा सके। वाल्मीकि-अंगुलिमाल-अजामिल-बिल्व मंगल जैसे हेय स्तर के मनुष्य अपने को साहस पूर्वक बदल सकते हैं और पिछले दिनों दिख पड़ने वाला अन्धकारमय भविष्य एवं घृणित जीवन उलट सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि प्रयत्न पूर्वक सामने प्रस्तुत भाग्य को बदला न जा सके।
कभी-कभी अद्भुत, आश्चर्यजनक, अप्रत्याशित घटनायें ऐसी होती रहती हैं जो मनुष्य के सामान्य क्रिया-कलाप से भिन्न प्रकार के घटना क्रम सामने प्रस्तुत कर देती हैं। संयमी का रोगी हो जाना, पुरुषार्थी का असफल रहना आदि। इन विपर्ययों को अपवाद कह सकते हैं। मन को समाधान न मिलने पर भाग्य का खेल इन्हें कहा जा सकता है और किसी पूर्व जन्म के शुभ-अशुभ कर्म के साथ उसकी संगति जोड़ कर सामयिक उद्वेग को शान्त किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त भाग्यवाद की और कोई उपयोगिता नहीं है। कर्मनिष्ठा एवं पुरुषार्थ परायणता-आज्ञा, उत्साह एवं साहस को जो शिथिल बनाता हो ऐसा भाग्य तो निश्चित रूप से अहितकर है- अवास्तविक तो वह है ही।
संसार के वे पदार्थ हमें दिखाई पड़ते हैं जो स्थूल हैं। उनके भीतर काम करने वाली सत्ता जो सूक्ष्म में सन्निहित है न तो आँख से दिखाई देती है और न प्रत्यक्ष उपकरणों के समझ में आती है। जो सशक्त है वह सूक्ष्म है, स्थूल तो उसका आवरण है। काया को हम देख पाते हैं और मनुष्य को उसके कलेवर के रूप में ही पहचानते हैं, पर असली चेतना तो प्राण हैं जो न तो दिखाई पड़ता है और न उसका स्तर सहज ही समझ में आता है। जो सूक्ष्म है वही शक्ति को स्रोत हैं, उसे समझने और उपभोग करने के लिये अधिक गम्भीर और वेधक दृष्टि चाहिए। उसका उपयोग करने तथा उससे लाभान्वित होने के लिये तो और भी अधिक पैनी दृष्टि चाहिए।
चिकित्सा पद्धतियों में से सूक्ष्मता पर अवलम्बित एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होम्योपैथी की है। उसमें विष को विष से मारने की- काँटे से काँटा निकालने की- शठेशाठ्याँ समाचरेत् की नीति को मान्यता दी गई है, साथ ही यह भी प्रतिपादन किया गया है कि वस्तु के स्थूल कलेवर में जितनी सामर्थ्य है उसकी अपेक्षा उसके अन्तराल में सन्निहित सूक्ष्म शक्ति की गरिमा अत्यधिक है। चिकित्सा में काम आने वाली औषधियों के बारे में भी यही बात है, उन्हें मोटे रूप में सेवन किया जाय तो उसी पदार्थ की सामर्थ्य अनेक गुनी बढ़ जायेगी और अपना चमत्कारी प्रभाव प्रस्तुत करेगी। होम्योपैथी को एक प्रकार से सूक्ष्मता की शक्ति का प्रतिपादन ही कहना चाहिए।
छोटे से बीज में वृक्ष का विशालकाय कलेवर छिपा रहता है, एक शुक्राणु में मनुष्य का सारा ढाँचा पूरी तरह सन्निहित है, अणु की नगण्य सी सत्ता में एक पूरे सौर मण्डल की प्रक्रिया पूरी तरह विद्यमान है। यह सब जानते हुए भी हम ‘सूक्ष्मता की शक्ति’ से एक प्रकार अपरिचित ही बने हुए हैं।
जर्मनी के डा0 हैनियन ने जब होम्योपैथी के और डा0 शुकालत ने वायोकैमी के सिद्धांतों का प्रतिपादन करते हुए अपनी चिकित्सा पद्धतियों का विवेचन किया तो उनका मजाक उड़ाया गया और विरोध किया गया। भला बाल की नोंक से भी बहुत कम मात्रा में दी गई औषधि भी किसी पर कुछ असर कर सकती है? उतने भर से क्या किसी के कठिन रोग का निवारण हो सकता है?
एक दिन कार्लवोन नागेली ने एक लीटर भाप से उड़ाये हुए एक लीटर पानी में ताँबे के संयोगवश चार पैसे डाल दिये। उस पानी को ऐसे ही उसने अपने बगीचे के स्पाइरोगिर पौधों में डाल दिया। आश्चर्य यह कि वे पौधे कुछ ही मिनटों में मर गये। आखिर पानी में ऐसा क्या विष मिल गया जो इतनी जल्दी इतने पौधे समाप्त हो गये। देखा तो उसमें चार ताँबे के पैसे जरूर पड़े थे। पर इससे क्या, पैसों में तो कोई विष नहीं होता फिर इतने सारे पानी में इतने कम ताँबे का ऐसा क्या असर होता है- फिर ताँबा कोई विष भी तो नहीं है। जो हो, इस संदर्भ में अधिक शोध करना आवश्यक समझा गया। प्रयोगों और विश्लेषणों में यह पाया गया कि अधिक और स्थूल मात्रा की अपेक्षा स्वल्प और सूक्ष्म मात्रा की शक्ति कम नहीं होती वरन् प्रकाराँतर से वह और भी अधिक बढ़ जाती है।
चार्ल्स डार्विन को ‘सूक्ष्म मात्रा सिद्धांत में’ बहुत रुचि थी। एक दिन जब डच विज्ञानी प्रो0 डान्डर ने यह बताया कि एक ग्रेन एट्रोपिन का लाखवाँ भाग भी नेत्र गोलकों पर भारी प्रभाव डालता है तो डार्विन के आश्चर्य का ठिकाना न रहा और सूक्ष्मता के सिद्धांत के बारे में उन्होंने इससे भी अधिक गहरी दिलचस्पी लेनी आरम्भ कर दी।
डा0 शुकालर अपनी ‘टिशू केमिडीज’ चिकित्सा पद्धति के द्वारा यही प्रतिपादन करते रहे कि मात्रा की सूक्ष्मता में शक्ति की गुणन प्रक्रिया चलती है। फलस्वरूप अधिक शक्ति के लिए अधिक सूक्ष्मीकरण की बात सही ठहरती है।
रसायन शास्त्री लीविंग ने यह सिद्ध किया कि रुग्ण शरीर के तन्तुओं का घनत्व इतना बढ़ जाता है कि उनमें औषधियों का अन्तः प्रवेश कठिनाई से ही हो पाता है। पर यदि अजैव लवणों को उनके प्राकृत रूप में उपयोग किया जाय तो उनकी वेधकता तन्तुओं को प्रभावित कर सकती है। अणुओं के अलग-अलग होने की स्थिति में-अधिक सूक्ष्म होने की स्थिति में वे इस योग्य रहते हैं कि सघनता का वेधन करके प्रभावशाली परिणाम प्रस्तुत कर सकें।
शरीर में जिस अनुपान में जो वस्तु है उससे न्यून अनुपात का पदार्थ यदि सेवन किया जायगा तो उसे शरीर में प्रवेश करने का अवसर मिल जायगा किन्तु यदि उसका गाढ़ापन अथवा घनत्व अधिक होगा तो शोषक छिद्र उसे आत्म-सात करने में असमर्थ रहेंगे। दूध के एक क्वाट्र में एक ग्रेन का छह लाखवाँ भाग ही लौह होता है। बच्चे आधा पाइन्ट दूध पीकर आवश्यक मात्रा में लौह प्राप्त कर लेते हैं। शरीर में क्लोरीन की मात्रा लोहे से भी कम है यदि क्लोरीन या लोहे की स्थूल मात्रा दी जाय तो वह कितने ही कम होने पर भी शरीर के अनुपात से कहीं अधिक होगी और उसका दबाव बुरा प्रभाव उत्पन्न करेगा।
संसार भर में रेडियम धातु कठिनाई से 4-5 ओंस होगी, पर उतने से ही संसार भर के चिकित्सा तथा दूसरे प्रयोजन पूरे किये जाने की योजनाएँ बन रही हैं। रेडियम से निरन्तर निकलने वाला विकिरण अन्ततः समाप्त होगा ही, पर इसमें अब से 25 हजार वर्ष लगेंगे तब कहीं वह शीशे के रूप में ठण्डा हो पायेगा। यही बात धरती पर पाये जाने वाले यूरेनियम के सम्बन्ध में है। उससे भी विकिरण निकलता है। समाप्त तो उसे भी होना है, वह भी ठण्डा होकर शीशा ही बन जायगा, पर इसमें आठ अरब वर्ष लगेंगे। सूक्ष्मता की क्षमता और अवधि कितनी व्यापक और दीर्घकालीन हो सकती है, इसका अनुमान रेडियम और यूरेनियम धातुओं के क्रिया-कलाप को देखकर लगाया जा सकता है।
परमाणु ऊर्जा की प्रतिक्रिया पर बकेरेल, रथरफोर्ड, सौरी, क्यूरी आदि अनेकों मूर्धन्य वैज्ञानिक प्रकाश डाल चुके हैं और कहते रहे हैं-अणु शक्ति मूल ईकाई नहीं है वह जिनके संयोग से बनती है वे एल्फा, बीटा और गामा किरणें ही वस्तुतः शक्ति के मूलभूत उद्गम हैं। अणु संचलना अपने आप में स्थूल भी है और परावलंबी भी उसका उद्गम केन्द्र इन तीन किरणों में है। यदि उन पर नियन्त्रण किया जा सके तो अणु शक्ति के असंख्य गुनी शक्ति करतल गत की जा सकती है।
हमारी स्थूल बुद्धि केवल दृश्यमान स्थूल पदार्थों को ही देख पाती है और उनका मोटा मूल्याँकन करके मोटा उपयोग ही समझ पाती है फलतः सम्बन्धित व्यक्तियों एवं पदार्थों से हम बहुत मोटा सा ही लाभ ले पाते हैं। कदाचित उनकी सूक्ष्म शक्ति की समझें और उनसे निसृत होने वाली चेतना एवं प्रेरणा को समझें तो हर प्राणी और हर पदार्थ हमें इतना अधिक अनुदान दे सकता है कि सिद्धियों और विभूतियों की किसी प्रकार कमी न रहे।
यज्ञ प्रक्रिया में हव्य पदार्थों को सूक्ष्मतम बनाकर उन्हें प्राण वायु के सहारे शरीर के कण-कण तक पहुँचाने एवं प्रभावित करने का प्रयास किया जाता है फलतः वे सूक्ष्मीकृत पदार्थ न केवल हमारे स्थूल शरीर की वरन् सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर को भी निरोग एवं बलिष्ठ बनाते हैं। होम्योपैथी से भी अधिक महत्वपूर्ण एवं सूक्ष्मता के शक्ति सिद्धांतों पर आधारित यज्ञ प्रक्रिया है वह न केवल शरीर की रुग्णता की वरन् अन्तःचेतना पर चढ़ी हुई मलीनता को भी निरस्त करने में चमत्कारी प्रभाव उत्पन्न करती है।
भौतिक विज्ञान स्थूल के अंतर्गत छिपी सूक्ष्म शक्ति को ढूंढ़कर उसे महत्वपूर्ण प्रयोजनों में प्रयुक्त करता है अध्यात्म विज्ञान सूक्ष्म से सूक्ष्मतर एवं सूक्ष्मतम में प्रवेश करके उसकी असीम शक्ति का प्रयोग आत्मबल बढ़ाने एवं ब्रह्म तेजस् जमाने में करता है। ब्रह्म विद्या के इस तत्व दर्शक को यदि समझा जा सके तो हम समृद्धियों और विभूतियों से सम्पन्न बनकर देवोपम स्थिति तक पहुँच सकते हैं। होम्योपैथी की सफलता इसका एक बहु प्रचलित उदाहरण हमारे सामने मौजूद है।
केन्सर का नाम सुनते ही रोमाँच हो आता है उसे दुसह जलन से जला-जलाकर प्राण लेने वाला मृत्यु दूत ही कह सकते हैं। यह भयानक रोग क्या है? इसका उत्तर संक्षेप में देना ही तो इतना ही कहा जा सकता है- ’चन्द कोशिकाओं की उच्छृंखलता। सामान्यतया शरीर की समस्त कोशिकाएँ अपनी नियम मर्यादा का पालन करती है। और निर्धारित रीति-नीति अपनाकर कार्यरत बनी रहती हैं। किन्तु कभी-कभी उनमें से कुछ को विद्रोह की-मर्यादाओं का उल्लंघन करके उच्छृंखल गतिविधियाँ अपनाने की बात सूझती है। वे व्यवस्था मानने से इनकार कर देती हैं। बेहिसाब बढ़ती हैं और जहाँ उनका स्थान नहीं है वहाँ भी संरक्षकों को धक्का मारती हुई जा धमकती हैं।
शरीर में अरबों कोशिकाएं हैं वे सभी संभ्रांत नागरिकों की तरह अपना काम करती हैं, पर केन्सर की उद्धत कोशिकाएँ चाहे जहाँ पहुँचने और जो चाहे करने पर उतारू रहती हैं फलस्वरूप उनकी उपस्थिति जहाँ भी होती है सामान्य कारोबार ठप्प हो जाता है और गदर जैसा मच जाता है, वे पेट में जा पहुँचे तो पाचन प्रणाली गड़बड़ा जाती है, फेफड़ों में जा धमके तो आक्सीजन की तंगी पड़ती है, गुर्दों में पहुँचें तो सफाई का काम ठप्प, किसी भी अवयव में वे पहुँचें वहाँ के सामान्य क्रिया-कलाप में संकट उत्पन्न कर देती हैं और उनका विद्रोही दल एक प्रकार से विप्लव खड़ा करता है और जहाँ अड्डा जमालें वहाँ सब कुछ विस्मार करके छोड़ती हैं।
केन्सर से बचने का तरीका डाक्टरों ने यह बताया है कि नशेबाजी, उत्तेजक मसालों से भरा आहार और आवेशग्रस्तता से बचा जाय। इन तीन आधारों का सैद्धांतिक अवलम्बन करके हम केन्सर ग्रसित जैसी दुखद जीवन स्थिति से भी बच सकते हैं। हम ऐसे आहार-विहार से चिन्तन और कर्तृत्व से बचें, जो विद्रोह उत्पन्न करता है तो अपना शारीरिक ही नहीं मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य भी अक्षुण्ण बना रह सकता है।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद संसार में हैजे की बीमारी बेतरह फूटी और उसने लाखों लोगों के प्राण ले लिये। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार सन 1945 से 1950 तक हर वर्ष प्रायः 164000 व्यक्ति हैजे से काल कवलित होते रहे। अब जबकि वह प्रकोप बहुत हलका पड़ गया है तो भी हर वर्ष 14000 मनुष्यों को उदरस्थ कर लेता है। जो बच रहते हैं उनकी संख्या एक लाख से ऊपर है। विश्व स्वास्थ्य संघ ने चेतावनी दी है कि यदि स्वास्थ्य संदर्भ में अस्वच्छता एवं असावधानी को समय रहते न सुधारा गया तो कभी भी पिछले जैसा विस्फोट खड़ा हो सकता है।
पेट में पीड़ा, वमन, सफेद रंग के पतले दस्त, ऐंठन, शरीर में पानी की कमी, आँखों में गड्ढे बैठते जाना, बेचैनी जैसे लक्षणों को देखकर हैजे के प्रकोप का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। यह छूत का रोग एक से दूसरे को लगता है। रोगियों के मल-मूत्र किसी प्रकार जलाशयों में पहुँच जायँ तो उससे भी यह छूत फैल सकती है। हवा के साथ उड़ते हुए यह विषाणु साँस और पात्र भी इस छूत को फैलाते हैं। मक्खियाँ भी इन्हें फैलाने में सहायता करती हैं।
हैजा का तात्कालिक उपचार कुछ भी क्यों न हो, उस विभीषिका से बचने के लिए स्वच्छता का अधिकाधिक ध्यान रखा जाना और गन्दगी को एकत्रित न होने देने के लिए सतर्क रहना, यही वह उपाय है जिससे न केवल हैजा की वरन् दूसरी बीमारियों की भी जड़ काटी जा सकती है।
बहिरंग जीवन की अनेकानेक विकृतियाँ हमारे अन्तरंग जीवन की वमन ही कही जा सकती हैं। अन्दर गंदगी न जमने दें, मलीनता को प्रश्रय न दें और घड़ी-घड़ी स्वच्छता का अभियान जारी रखें तो हैजे के समय उत्पन्न होने वाली प्राणघातक विपत्ति की तरह ही जो विपन्न परिस्थितियां आये दिन सामने खड़ी रहती हैं उनसे सहज ही बचा जा सकता है।
बाह्य जगत में आक्रमणकारी और विघातक तत्व कम नहीं हैं। वे पग-पग पर भरे पड़े हैं। पर वे आक्रमण करने और विजय पाने में सफल तभी होते हैं, जब अपने भीतर उनके लिए गुंजाइश हो। घाव हो तो मक्खी बैठेगी। यह बात टेट्नस जैसे घातक रोग पर भी लागू होती है। सामान्य कूड़े-कबाड़े में उसके कीटाणु प्रचुर परिणाम में विद्यमान रहते हैं, पर वे आक्रमण तभी करते हैं जब शरीर कहीं घाव हो। बाह्य जगत में टेट्नस विषाणुओं की तरह अन्य अगणित दोष, दुर्गुण, पाप अनाचार और विक्षोभ भरे पड़े हैं, पर उनका आक्रमण हर किसी पर सम्भव नहीं हो सकता। वे हमला तभी करते हैं जब अपने भीतर दुर्बलता भरी पड़ी हो। जिस व्यक्तित्व में अवाँछनीयताओं का कड़ा प्रतिरोध करने की शक्ति है उसे सुदृढ़ सुरक्षा दुर्गम बैठे रहने की हर घड़ी अनुभूति होती रहती है।
शरीर में छोटी-मोटी खरोंच लगने पर भी हवा और धूप में उड़ने वाले विषाणु उस जख्म में प्रवेश कर सकते हैं और फिर वहाँ से रक्त में मिलकर अपनी वंशवृद्धि करते हुए प्राणघातक संकटों को खड़ा कर सकते हैं। इसी प्रकार का एक संकट है- ’टेट्नस’ जिसे धनुष टंकार, धनुस्तम्भ, अपतानक आदि नामों से भी पुकारा जाता है।
जिन विषाणुओं से टेट्नस होता है उन्हें ‘क्लास्ट्रिडियम टेटेनाई’ कहते हैं। घोड़े, बैल आदि के गोबर में यह सदा रहता है यों इसका अस्तित्व मनुष्यों के रक्त में भी कहीं न कहीं रहता ही है। यह वैसिलस इतना ढीठ होता है कि उबलते पानी में जीवित रह सकता है और पाँच प्रतिशत का एसिड घोल भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। वह आक्सीजन के अभाव में ही जीता है। खुली हवा में उसे प्राण गँवाने पड़ते हैं।
टेट्नस का विष मुँह से भी खाया जाय तो उसका कोई असर नहीं होता, पर यदि वह किसी जख्म आदि के द्वारा रक्त में मिल जाय तो भयंकर संकट उत्पन्न कर देता है।
आरम्भ में जख्म के आस-पास जकड़न होती है और झटके लगते हैं, पर पीछे उसका असर सारे शरीर पर होता है और पूरा बदन जकड़ने-इठने लगता है, मुँह का जबड़ा बन्द होने लगता है और रोगी को लगता है मानो उसका सारा शरीर ऐंठा-मरोड़ा जा रहा है। यह कष्ट दौरे के रूप होता है। झटकों की प्रबलता मन्द और बन्द होती है और फिर उठ खड़ी होती है। रोगी मरते समय तक होश में बना रहता है।
टेट्नस की प्रधान औषधि है ‘ए0 टी0 एस0’ की सुई। इसके अतिरिक्त दौरों का प्रकोप कम करने के लिए पैरेल डिहाइड, टालसिरम, लारगेक्टिल, पेन्सलीन, ऐनेस्थीसिया, प्रभृति दवाएँ गोली अथवा सुई के रूप में दी जाती हैं। आक्सीजन देने और श्वाँस नली काटकर श्वाँस अवरोध दूर करने का भी प्रयत्न किया जाता है। पूर्व सावधानी के रूप में लोग ए0 टी0 एस0 की सुई भी लगवा लेते हैं। इतने पर भी इस रोग का उग्र प्रकोप होने पर बहुत कम ही सौभाग्यशाली रोगी बच पाते हैं।
जो बात केन्सर, हैजा और टेट्नस के सम्बन्ध में कही गई है वही समस्त रोगों पर लागू होती है। क्षय, मधुमेह, रक्तचाप, अनिद्रा, अपच, जैसे रोग अब सभ्यता के उपहार की तरह अधिकाँश लोगों पर हावी हो रहे हैं। इसका कारण इन रोगों के कीटाणुओं में आकस्मिक उभार आना नहीं वरन् यह है कि हमारी जीवनचर्या प्रकृति के प्रतिकूल चल रही है और संयम-सन्तुलन से विरत होते चले जा रहे हैं। रोग कीटाणुओं को निरस्त करने वाले उपचार सामने आ रहे हैं सो ठीक हैं, पर रुग्णता के सर्वतोमुखी आक्रमण से बचने के लिए हमें जीवनी शक्ति को सुरक्षित एवं विकसित करने का मार्ग ही अपनाना पड़ेगा । मानसिक रोगों और आन्तरिक उद्वेगों के आक्रमण से बचने के लिए भी हमें उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व से उत्पन्न समर्थता का ही संचय करना पड़ता है।
अखण्ड-ज्योति इस अंक के साथ अपने जीवन के 37 वर्ष समाप्त करके 38वें वर्ष में प्रवेश करती है। अपने इस छोटे से जीवन काल पर उसे गर्व है। मनुष्य शरीर के लिए जिस प्रकार अन्न-जल की आवश्यकता है उसी प्रकार मानवी चेतना को सजीव रखने के लिए उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य के लिए सक्षम बनाने वाले तत्व चिन्तन की आवश्यकता है। विषाक्त अन्न-जल से शरीर, दुर्बल, रुग्ण होता है और अकाल में ही काल कवलित हो जाता है विकृत दृष्टिकोण से मनुष्य में दुर्भावनायें बढ़ती हैं-दुष्प्रवृत्तियाँ पनपती हैं। वह अनेक आधि−व्याधियों से ग्रसित होकर अपने और अपने समाज के लिए भार बन जाता है। इस विपन्नता से मानवी चेतना को उबारना अपने स्थान पर अति महत्वपूर्ण है। इसे अन्न-जल जुटाने से भी अधिक आवश्यक माना जा सकता है। अखण्ड-ज्योति ने अपने अद्यावधि जीवन काल में ऐसे आलोक का निर्माण किया है जिसके सहारे जन मानस को ऊँचा उठने और बढ़ने की प्रेरणा मिले। सही दिशा में-पूरी कर्तव्य निष्ठा और अनवरत श्रम करने वालों को जो सन्तोष एवं गर्व होना चाहिए, वह अखण्ड-ज्योति को भी है।
अखण्ड-ज्योति वाचन-विनोद की सामग्री जुटाने वाला छपे कागजों का पुलिंदा नहीं रही। उसने जन जीवन में प्राण फूँकने की आवश्यकता पूरी करने के लिए ही अपने समस्त प्रयासों को जुटाये रखा है। उसका परिणाम सामने है। एक लाख से ऊपर नव युग की संरचना में संलग्न कर्मठ युग सैनिकों के रूप में अपना परिवार कुछ कर गुजरने के लिए कमर बाँध कर कर्म क्षेत्र में खड़ा है। राजनैतिक स्वतन्त्रता के बाद लोगों का ध्यान अर्थ समृद्धि की ओर तो गया पर यह भुला दिया गया कि एक सहस्राब्दी से भारत जिन कारणों से दुर्दशा ग्रस्त रहा है, उनको हटाया जाना भी आवश्यक है। राजनैतिक क्रान्ति के उपरान्त अपने देश में बौद्धिक क्रान्ति की, नैतिक क्राँति की और सामाजिक क्रान्ति की अनिवार्य आवश्यकता समझी जानी चाहिए थी। क्योंकि इन्हीं क्षेत्रों के पिछड़ेपन ने हमें लम्बे समय तक दुर्दशा ग्रस्त रखा और आज दयनीय परिस्थितियों में ला पटका। इन क्षेत्रों की विकृतियों के रहते हम न राजनैतिक स्वाधीनता का पूरा लाभ उठा सकते हैं और न आर्थिक समृद्धि का।
नए वर्ष का नये प्रयास के लिए आमन्त्रण
अखण्ड-ज्योति का कार्य यों लेखन और प्रकाशन के माध्यम से आरम्भ हुआ पर उतने तक सीमित नहीं रहा। पाठकों ने प्रेरणा ग्रहण की-वे बदलें-और दूसरों को बदलने वाले प्रचारात्मक और संघर्षात्मक शत सूत्री कार्यक्रमों में संलग्न हो गये। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण का सुविस्तृत सेवा क्षेत्र सामने पड़ा है। सत्ता, सम्मान, पद और ख्याति के भूखे लोग वहाँ दौड़ते हैं जहाँ उन्हें यह छोटी चीजें जल्दी और बड़ी मात्रा में मिल सकें। नींव का पत्थर बन कर मानवी गरिमा का भवन खड़ा करना कठिन काम है। इस कर्म क्षेत्र में उतरने के लिए किसी को साहस नहीं हो रहा था। प्रसन्नता की बात है कि अखण्ड-ज्योति परिवार ने उस महती आवश्यकता को पूरा करने में एक अनोखी भूमिका निबाही। नव युग के अवतरण में संलग्न कर्मवीर युग सैनिकों की एक सुदृढ़ सेना खड़ी करदी। उसके क्रिया-कलापों ने समूचे देश को, जन-मानस को जिस तत्परता के साथ झकझोरा अपने उस परिवार पर अखण्ड-ज्योति को सन्तोष एवं गर्व अनुभव करने का पूरा अधिकार है।
हमने मंजिल का एक पड़ाव पूरा कर लिया। अभी लक्ष्य दूर है। इसलिए कूच को पूरे उत्साह के साथ जारी रखना है। कभी अखण्ड-ज्योति एक प्रकाशन था-फिर एक मिशन बना, अब वह युगान्तर की अभिनव भूमिका का निर्वाह करने में संलग्न एक सुगठित परिवार है। अब हमें अखण्ड-ज्योति शब्द का प्रयोग युग सैनिक के संघबद्ध सैन्य दल के रूप में ही करना चाहिए। हमारी यात्रा तब तक अनवरत गति से चलती ही रहेगी जब तक मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता।
अखण्ड-ज्योति मिशन का जन्म दिन बसन्त पंचमी है। यह अपने परिवार का सबसे बड़ा प्रेरक पर्व है। एक-एक करके अनेकों महत्वपूर्ण कदम इसी शुभ दिन से आरम्भ करते रहे हैं। इस बार उस परम्परा का निर्वाह हमें दूने उत्साह के साथ करना है। इस बार 16 फरवरी को बसन्त पर्व है। उस दिन संयोगवश रविवार भी है। रविवार को आमतौर से सरकारी छुट्टी रहती है। इस सुविधा के कारण वह दिन प्रभातफेरी, सामूहिक गायत्री जप, हवन, संगीत, प्रवचन, दीप दान, श्रद्धांजलि समर्पण जैसे कार्यक्रमों के साथ सम्पन्न किया जा सकता है। सामूहिक रूप से मिल-जुल कर और व्यक्तिगत रूप से अपने-अपने घरों में जहाँ जो कुछ सम्भव हो सके किसी न किसी रूप में हर्षोत्सव का आयोजन किया जाना चाहिए। इससे उत्साह और उल्लास की वृद्धि होगी। अपने और सम्मिलित होने वालों के मन में एक उमंग उत्पन्न होती है और उसे अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति के लिए कुछ कर गुजरने में प्रयुक्त किया जा सकता है। अपने परिवार ने बसन्त पर्व को अपना सबसे बड़ा भाव-त्यौहार माना है। इस मान्यता में शिथिलता न आने पावे इसलिए अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक सदस्य को इस दिशा में कुछ तैयारी अभी से आरम्भ कर देनी चाहिए। विचारशीलों को इस आयोजन में सम्मिलित करने और मिशन के उद्देश्यों, कार्यक्रमों और अब तक जो हो चुका है, आगे जो होने वाला है उसकी रूप-रेखा से सर्व साधारण को परिचित कराया जाना चाहिए। इसके लिए बसन्त पर्व का अवसर तो अनिवार्य रूप से प्रयुक्त होना चाहिए।
यह तथ्य कभी भी नहीं भुलाया जाना चाहिए कि अभिनव चेतना के प्राण फूँकने में अखण्ड-ज्योति ने मिशन के मेरुदण्ड की भूमिका निबाही है। आगे भी उसके माध्यम से बहुत कुछ होना है। उसके पाठक कुछ ही दिन में आत्म-निर्माण और समाज-निर्माण की भूमिका निबाहने लगते हैं। अस्तु पत्रिका के सदस्यों की संख्या बढ़ाने के लिए बसन्त पर्व पर विशेष प्रयत्न किया जाना चाहिए। इस दिशा में किया गया प्रयत्न मिशन के प्रति सच्ची और सार्थक भाव भरी श्रद्धांजलि हो सकती है। टोलियाँ बनाकर यदि इस प्रयास के लिए निकला जाय तो पिछले वर्ष की तुलना में अगले वर्ष की ग्राहक संख्या अवश्य ही अधिक हो सकती है। इस वर्ष तो यह प्रयत्न इसलिए और भी अधिक आवश्यक हो गया है कि कागज, छपाई, स्याही की कमर तोड़ महंगाई ने पत्रिका का चन्दा ड्यौढ़ा कर देने के लिए बाध्य कर दिया है। यों कुछ पृष्ठ भी बढ़ा दिये गये हैं पर इससे क्या-पाठकों की जेब से तो अधिक ही जायगा। इस घोर महँगाई के जमाने में लोगों को अपने जीवन निर्वाह के साधन जुटाने कठिन पड़ रहें हैं। ऐसी दशा में पत्रिका का बढ़ा हुआ चन्दा अखर सकता है और ग्राहक संख्या घट सकती है। यदि ऐसा होता है तो मिशन के प्रसार-विस्तार को गहरा धक्का लगेगा। यह स्थिति न आने पावे इसलिए इस वर्ष तो पत्रिका के ग्राहक बनाये रखने और बढ़ाने के लिए और भी अधिक ध्यान रखा जाना चाहिए। इस श्रद्धांजलि को प्रतिष्ठा का प्रतिस्पर्धा का प्रश्न बनाया जाना चाहिए।
इस बसन्त पर्व से एक कार्य और हाथ में लिया जाना चाहिए कि प्रत्येक अखण्ड-ज्योति सदस्य अपनी पत्रिका को कम से कम दस व्यक्तियों को पढ़ाया करे। “एक से दस” के रूप में विकसित होने का यह सहज किन्तु सर्वोत्तम तरीका है। अपने परिवार, संपर्क एवं प्रभाव क्षेत्र में जिन्हें भी विचारशील समझा जाय उनके पास पत्रिका पहुँचाने और वापिस लाने का क्रम चलना ही चाहिए। थोड़ी व्यवहार कुशलता का परिचय दिया जाय तो हर अखण्ड-ज्योति सदस्य के पीछे दस अनुपाठक हो सकते हैं और आज यदि उसके पाठक एक लाख हो तो अगले महीने से ही उनकी संख्या बढ़कर दस लाख हो सकती है। देखने में छोटा किन्तु व्यवहार में यह अत्यधिक प्रभावी प्रयास है। इस बसन्त पर्व पर ग्राहक बढ़ाने के प्रयास के साथ-साथ प्रत्येक सदस्य को दस अनुपाठक बनाने का भी संकल्प लेकर चलना चाहिए।
हमारी इच्छा यह है कि अखण्ड-ज्योति के सभी भावनाशील सदस्यों को अगले दिनों हमारे व्यक्तिगत संपर्क सान्निध्य में रहकर कुछ सीखने और सिखाने का आदान-प्रदान चलता चाहिए। शान्ति-कुंज में हमें कितने दिन रहना पड़ेगा और बिस्तर कभी भी खाली करना पड़ सकता है, ऐसी दशा में फिर कभी की प्रतीक्षा न करके ‘कल नहीं आज’ की नीति अपनाई जानी चाहिए और स्वजनों को कुछ समय हमारे पास रहने की तैयारी करनी चाहिए। यों प्रत्यक्षतः प्रवचन सुनने और अमुक साधन करने भर की बात प्रतीत होती है, पर परोक्ष रूप से देखा जा सकता है कि उसमें अदृश्य किन्तु अति महत्वपूर्ण आदान-प्रदान की विशिष्टता जुड़ी हुई है। साधनाएँ तो घर पर भी की जा सकती हैं, प्रवचन अखण्ड-ज्योति में छापे जा सकते हैं। वैसे जो कहा बताया जा चुका है, उसके अतिरिक्त कोई नई बात है भी नहीं, पर जिस उद्देश्य के लिए शान्ति-कुंज ने परिजनों को आमन्त्रित किया है उसमें विशिष्ठ एक सूक्ष्म आदान-प्रदान की बात मुख्य है जिसके लिए सान्निध्य आवश्यक हो जाता है। गर्मी पाने के लिए आग के समीप बैठना पड़ता है। प्राणों का आदान-प्रदान भी सान्निध्य की अपेक्षा करता है।
नवम्बर 74 की अखण्ड-ज्योति में शान्ति-कुंज में इन दिनों चल रहे शिक्षण सत्रों का विस्तृत विवरण छपा है। उस अंक को परिजन अपने लिये व्यक्तिगत निमन्त्रण समझें और देखें कि वे अपने लिए किस सत्र को अधिक उपयोगी समझते हैं और कब पहुँचने की अनुकूलता अनुभव करते हैं। जिन्हें जो अनुकूल प्रतीत हो उसमें आने की तैयारी करनी चाहिए। जिन्हें शिक्षण और सान्निध्य उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक प्रतीत होता हो उन्हीं का आना सही है। मात्र दर्शन या आशीर्वाद के लिए आने की काई उपयोगिता नहीं। दर्शन छपे फोटो से, आशीर्वाद पत्र से मिल सकता है। इन छोटे कामों के लिए किसी को किराया-भाड़ा और समय खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। इन प्रशिक्षण सत्रों में केवल उन्हीं को आमंत्रित किया गया है जो लगातार अखण्ड-ज्योति पढ़ते रहे हैं और हमारे मन्तव्यों को गहराई तक समझ चुके हैं। अशिक्षित, अपरिचित लोग पर्यटन और प्रशिक्षण की एक म्यान में दो तलवारें ठूँसते हैं तो वे दुहरा लाभ उठाने की अपेक्षा दोनों ही आनन्द खो बैठते हैं। स्त्री, बच्चे, मित्र, पड़ोसी, सम्बन्धी लेकर इन अति महत्वपूर्ण सत्रों में चल पड़ना अवाँछनीय भावुकता है, इससे सत्रों का स्तर गिरता है और हमारी शिक्षण योजना का उपहास बनता है। इसलिए इन सत्रों में उच्च उद्देश्यों से प्रेरित होकर ही आना चाहिए। दर्शन, आशीर्वाद, पर्यटन जैसे छोटे प्रयोजनों के साथ शिक्षण को मिलाकर गड़बड़ी पैदा नहीं करनी चाहिए।
यह अंक जिन दिनों पाठकों के हाथ में पहुँचेगा शान्ति-कुंज में कनिष्ठ वानप्रस्थ चल रहा होगा। दो महीने का अवकाश लेकर अपने कर्मठ कार्यकर्ता इस शिक्षण में सम्मिलित होते हैं उन्हें एक महीने शान्ति-कुंज में सैद्धांतिक शिक्षा प्राप्त करनी होती है और पीछे एक महीने के लिये शाखाओं में संलग्न, शिविर संचालन एवं प्रचार कार्य के लिए जाना पड़ता है। यह सत्र 20 नवम्बर से चल रहे हैं। अब अंतिम सत्र 20 जनवरी से 20 फरवरी तक हरिद्वार में चलेगा और 20 मार्च तक कार्यक्षेत्र में रहकर दो महीने की अवधि पूरी करनी पड़ेगी। इसके बाद यह अवसर एक वर्ष बाद आयेगा जिन्हें अवकाश हो 20 जनवरी से आरम्भ होने वाले सत्र के लिए स्वीकृति प्राप्त कर सकते हैं।
इसके बाद दस-दस दिन के जीवन-साधना सत्र 20 फरवरी से 12 मई तक चलेंगे। इसके बाद वह शृंखला 1 जुलाई से आरंभ होगी। इसमें तीन शिक्षाएँ जुड़ी हुई हैं। पाँच-पाँच दिन के प्रत्यावर्तन सत्रों में जो अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश जागृत करने की पंचकोशी उच्चस्तरीय गायत्री साधना सिखाई जाती थी, उसका पूरा समावेश है। जपयोग, विन्दुयोग, लययोग, प्राणयोग, ब्रह्मयोग की सरल किन्तु आलोक भरी उस साधना को जोड़ दिया गया है जिसका लाभ पिछले वर्ष हजारों निष्ठावान साधक उठा चुके हैं और हजारों के आवेदन-पत्र पड़े हुए हैं। दूसरा आधार इस दस दिवसीय शिक्षा का यह है कि जीवन जीने की कला, संजीवनी विद्या के सभी महत्वपूर्ण पक्ष समझा दिये जायें और यह तथ्य हृदयंगम कराया जाय कि अपने गुण, कर्म, स्वभाव, दृष्टिकोण एवं कर्तव्य में क्या परिवर्तन करके सामने पड़ी जटिल समस्याओं को सुलझाया जाना और समृद्धियों, विभूतियों से भरी प्रगति को प्राप्त कर सकना कैसे सम्भव हो सकता है। निरर्थक बने हुए इसी जीवन को सार्थक कैसे बनाया जा सकता है। कहना न होगा कि व्यावहारिक अध्यात्म का नाम ही संजीवनी विद्या रहा है। इसे अपनाकर हम हलका-फुलका और हँसी-खुशी का समुन्नत जीवन जी सकते हैं। तीसरा आधार जीवन साधना सत्र का है- संभाषण कला का अभ्यास। निजी जीवन में प्रभावशाली वार्तालाप का क्रम जनसाधारण के सामने विचार विनिमय के सिद्धांत-गोष्ठियों और सभाओं में प्रवचन करने की क्षमता का विकास। आमतौर से लोग संकोच वश उन विचारों को दूसरों के सामने व्यक्त नहीं कर पाते जिन्हें कहना आवश्यक भी है और उपयोगी भी। इस संकोचशीलता को हटाने और निर्भीक अभिव्यक्ति का अभ्यास भी इस दस दिवसीय साधना का एक अंग है।
अखण्ड ज्योति परिवार के विचारशील व्यक्तियों को इन सत्रों में सम्मिलित होने की तैयारी करनी चाहिए। प्रत्यावर्तन सत्रों की तुलना में समय तो दूना अवश्य लगेगा पर इस परिष्कृत प्रशिक्षण का लाभ भी कई गुना है। जो लोग प्रत्यावर्तन में सम्मिलित हो चुके हैं उन्हें भी इनमें सम्मिलित होने की स्वीकृति मिल सकती है। जिनने पाँच दिवसीय प्रत्यावर्तन सत्रों के लिए आवेदन पत्र दे रखे हैं वे उन्हें रद्द समझें और अब जीवन साधना सत्र ही चलेंगे यह मानकर दस दिन का अवकाश निकालने और उसमें सम्मिलित होने के आवेदन पत्र नये सिरे से भेजें।
गर्मी की छुट्टियों में ग्रेजुएट स्तर के अध्यापकों के लिए पन्द्रह-पन्द्रह दिन के तीन सत्र लगाये जाने हैं। पहला 14 मई से 28 मई तक। दूसरा 29 मई से 12 जून तक। तीसरा 13 जून से 27 जून तक। पूर्व सूचना तीन सप्ताह के दो सत्रों की छपी थी पर अब अधिक व्यक्तियों को प्रशिक्षित करने की दृष्टि से वह अवधि तीन सप्ताह से घटाकर पन्द्रह दिन कर दी गई है। इनमें अध्यापकों के अपने पद के अनुरूप गरिमा को विकसित करना-स्कूली पाठ्य क्रम के साथ-साथ छात्रों को विवेकशीलता चरित्र निष्ठा एवं समाज सेवा के भाव भरते रहने की विशिष्ठ कुशलता की अभिनव विधि-व्यवस्था सिखाई जायगी। आशा की जानी चाहिए कि इस जानकारी के आधार पर शिक्षक और छात्र दोनों ही अपने महान उद्देश्य की पूर्ति में बहुत हद तक सफल हो सकेंगे। प्रौढ़ शिक्षा-जीवन शिक्षा की दिशा में किस प्रकार वातावरण तैयार किया जा सकता है और व्यवस्था जुटाई जा सकती है इस मार्ग दर्शन के सहारे अध्यापक अपने क्षेत्र में समाज-सेवा के एक अति महत्वपूर्ण अभियान का नेतृत्व कर सकते हैं।
इन पन्द्रह दिनों में लेखन शिक्षा की विशेष कक्षा जुड़ी रहेगी। पत्र पत्रिकाओं के लिए सा गर्भित लेख लिखने और उन्हें प्रकाशित करा सकने में सफलता प्रदान करने वाले वे सभी तथ्य बता दिये जाते हैं जो आमतौर से सर्वविदित नहीं हैं किन्तु उन्हें जाने बिना उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति भी सफल लेखक नहीं बन पाते। पुस्तक लेखन अपने आप में एक विशिष्ठ कला है। उसे अनुभवी ही जानते हैं। प्रकाशन व्यवसाय में प्रवेश करने की-प्रेस चला कर आजीविका कमाने की-स्थानीय चार पन्ने वाले साप्ताहिक पत्र चलाने की कितनी ही योजनाओं का मार्ग-दर्शन भी इसी पन्द्रह दिवसीय शिक्षण योजना से जोड़ दिया गया है। जिस प्रकार जीवन साधना सत्रों में भाषण कला का आकर्षण समावेश है, ठीक उसी प्रकार अध्यापन सत्रों को दूसरे शब्दों में लेखन सत्र भी कह सकते हैं। आवश्यक नहीं कि स्कूलों के अध्यापक ही इसमें भाग लें अन्य व्यक्ति भी जिनका शिक्षा के सुधार ओर प्रसार में अभिरुचि है इसमें भाग ले सकते हैं पर उनकी निजी शिक्षा बहुत कम नहीं होनी चाहिए।
इन्हीं दिनों तीन-तीन महीने के महिला जागरण सत्र चल रहे हैं। यह अंक पहुँचने तक जनवरी से मार्च तक का सत्र चला रहा होगा। अब अगला सत्र 1 अप्रैल से 30 जून तक का चलेगा। इनमें आठवें दर्जे से अधिक पढ़ीं महिलाएँ एवं वयस्क कन्याओं को प्रवेश मिल सकेगा। नारी जीवन को सफल बनाने वाले प्रायः सभी सिद्धान्त इन सत्रों में सिखाये जाते हैं। स्वास्थ्य संरक्षण, शिशु पालन, घर की स्वच्छता और व्यवस्था, अर्थ सन्तुलन में नारी का योगदान, संयुक्त परिवार को सुदृढ़ रखने के आधार, आनन्द, उल्लास एवं सहयोग, सद्भाव का वातावरण बनाये रहने के सूत्र, विवाहित जीवन की मधुरता, सफलता और सार्थकता के रहस्य, परिवार में धार्मिकता का समावेश, कुरीतियों और मूढ़ मान्यताओं के दुष्परिणाम आदि अनेकों सारगर्भित शिक्षायें इन सत्रों में दी जाती हैं जिनके आधार पर घर-परिवार में स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण किया जा सकता है।
सामान्य संगीत शिक्षा, की व्यवस्था रखी गई है। सिलाई, कई तरह के खिलौने बनाना, डबल रोटी, बिस्किट आदि बनाना, साबुन, मोमबत्ती, सुगन्धित तेल, शर्बत आदि बनाना, शाक वाटिका, वस्तुओं की टूट-फूट और मरम्मत जैसे गृह-उद्योगों का समावेश हैं। लाठी चलाना, फौजी शिक्षा इसी बीच दे दी जाती हैं धार्मिक शिक्षा में हवन कराना- पुंसवन, नामकरण, अन्न प्राशन, विद्यारम्भ, मुण्डन, जन्म दिन, विवाह दिन, इन संस्कारों का कराना, रामायण-कथा, सत्य नारायण-कथा एवं प्रवचन करने का अभ्यास कराया जाता है। अपने यहाँ एक महिला प्रौढ़ विद्यालय वे चला सकें और स्थानीय महिला संगठन के महिला जागरण का नेतृत्व अपने हाथ में ले सकें, इतनी प्रवीणता इन तीन महीनों की स्वल्प अवधि में उन्हें प्राप्त हो जाती है।
अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों को अपने घर की एक महिला इस प्रशिक्षण के लिए भेजनी चाहिए ताकि वे उनके कन्धे से कन्धा मिला कर नव-निर्माण में योगदान दे सकें और महिला जागरण की मुहीम सँभाल सकें। अपने घर-परिवार का सुनियोजित पुनर्निर्माण करने की योग्यता के सम्पादन का प्रथम और प्रत्यक्ष लाभ तो है ही। बच्चों समेत या बीमार महिलाओं को प्रवेश नहीं मिलता।
इन सत्रों में प्रवेश पाने के लिये अखण्ड-ज्योति परिवार के सभी प्रबुद्ध नर-नारियों को आग्रह पूर्वक आमन्त्रित किया जा रहा है। जिनकी स्थिति इनमें सम्मिलित होने की है उन्हें (1) अपना पूरा नाम (2) पूरा पता (3) शिक्षा (4) जन्मतिथि (5) व्यवसाय (6) शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य ठीक होने का आश्वासन (7) शिक्षा काल में निर्व्यसन, अनुशासन प्रिय एवं सज्जनोचित शील, सदाचार बरतने की घोषणा (8) जिस महीने के जिस सत्र में सम्मिलित होना हो उसका उल्लेख (9) अखण्ड-ज्योति के नियमित पाठक कब से रहे हैं इसकी जानकारी (10)जीवन के महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय घटनाक्रमों का विवरण इन दस बातों की पूरी जानकारी समेत आवेदन पत्र भेजना चाहिये और स्वीकृति प्राप्त होने के पश्चात ही आने की तैयारी करनी चाहिये।
शान्ति कुँज की युगान्तर चेतना प्रक्रिया अगले दिनों अधिक विस्तृत और व्यवस्थित शिक्षा योजना का विस्तार करेगी। इस प्रयोजन के लिये वर्तमान इमारत छोटी पड़ती है। नया निर्माण आरम्भ कराया जा रहा है। यदि अर्थ प्रबन्ध की अड़चन हल हो सकी तो आशा की जानी चाहिये कि नये 40 कमरे जून 75 तक बनकर तैयार हो जायेंगे। तब 1 जुलाई से नव-निर्माण के लिये युग सैनिकों को प्रशिक्षित करने की योजना को अधिक विस्तृत एवं व्यवस्थित बनाया जा सकेगा।
अखण्ड ज्योति का 28वाँ बसन्त पर्व आगामी 16 फरवरी को आ रही है उस अवसर पर हमें (1) सामयिक समारोह, (2) ग्राहकों की वृद्धि का प्रयत्न (3) पत्रिका दस को पढ़ाते रहने का संकल्प (4) शाँति कुज में चल रहे प्रशिक्षित में सम्मिलित होने की तैयारी यह चार प्रयत्न करने के लिये अभी से कटिबद्ध होना चाहिये। मिशन के जन्म दिन का यह पावन पर्व इस प्रकार मनाया जाना चाहिये कि उससे निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में उत्साहवर्धक सहयोग मिल सकें।
(झलकनलाल वर्मा)
देते जाओ स्नेह दान तुम, मैं दीपक-सा जलता जाऊं,मैं आश्रित तुम आश्रयदाता तुमको छोड़ कहां मैं जाऊं?
पीड़ाओं का केन्द्र जगत है, सुख के साधन पनप न पाते।मैं स्वीकार किये चलता हूं, अधिवासी होने के नाते।।
पर अधिवासी तो बन्दी है परवशताओं की सीमा का-देते जाओ शक्तिदान तुम, मैं सीमाओं पर जय पाऊं।देते जाओ स्नेह-दान तुम, मैं दीपक-सा जला जाऊं।।
उज्ज्वल कर फैला अम्बर से नित्य जोड़ते भू से नाता।तम का दर्प नहीं दलपाते यद्यपि हैं आलोक-विधाता।।
अमृतमयी किरणों का सम्बल देकर मुझमें स्फूर्ति जगाओ,तम है नित्य-अनित्य ज्योति है यह सन्देह समूल मिआऊं।देते जाओ स्नेह दान तुम, मैं दीपक-सा जलता जाऊं।।
बैठ रसालों पर गा जाती कोकिल मधुऋतु की गाथायें।किन्तु नहीं शीतल होती हैं आतप की भीषण ज्वालाएं।।
पीड़ा के तांडव ने जर्जर करदी जग की कोमल काया,नयनों में सावन धन दे दो, उत्पीड़न की आग बुझाऊं।।देते जाओ स्नेह दान तुम, मैं दीपक-सा जलता जाऊं।।
जो धरती की करें अवज्ञा, धूप-दीप नैवेद्य गगन को-देकर आंक लिया करते हैं, नभ से ऊंचा निज जीवन को।।
नर से नारायण बनने की बात नहीं जिनको भाती है,दी ऐसे आशीष उनका उनको नारायण बनना सिखलाऊं।देते जाओ स्नेह-दान तुम, मैं दीपक-सा जलता जाऊं।।
*समाप्त*