अपने आप में केन्द्रीभूत होकर हम उन समस्त सम्पदाओं से वंचित हो जाते हैं जो इस संसार के प्रत्येक कण में भरी पड़ी है। आहार-विहार के समस्त साधन बाहर ही उत्पन्न होते हैं और उन्हें उपार्जित करके उपभोग के द्वारा शरीर की गतिविधियाँ चलाते हैं। अपने हाथ पैर खाकर तो पेट नहीं भरते। शिक्षा, व्यवसाय, चिकित्सा, विवाह, विनोद आदि उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए भी दूसरों का द्वार खटखटाते हैं और जो जितने मात्रा में मिल जाता है उससे उतनी ही मात्रा में प्रसन्न होते हैं। वे एकान्त में बैठकर मनमोदक खाते रहने से हर्षोल्लास के अवसर प्राप्त नहीं ही होते। विविध विधि पदार्थों का सहारा लेना पड़ता है, जो अपने भीतर नहीं बाहर ही मिलते हैं।
दूर दर्शिता इस बात में है कि अपने को संकीर्ण संकुचित न बनाये वरन् संसार के साथ घुल मिलकर समुद्र के विशद क्षेत्र में विचरण करने वाली और जीवनोपयोगी समस्त साधन उपलब्ध करने वाली मछली की नीति अपनाये। बुद्धिमत्ता इस बात में है कि सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को अपनाकर आकर्षण के ऐसे केन्द्र बने जिस पर हर दिशा में अनवरत स्नेह सहयोग की वर्षा होने लगे कुशलता इस बात में है कि अपने उन दोष-दुर्गुणों को सुधारे जो प्रगति के प्रत्येक पग पर अवरोध बन कर खड़े होते हैं। प्रवीणता इस बात में है कि उदात्त चिन्तन का अभ्यास करे सद्व्यवहार की रीति-नीति अपनाये, अपने को दूसरों के साथ और दूसरों को अपने साथ घुला मिला कर देखे। आत्म विस्तार का यही रास्ता है।
भगवान् बुद्ध को परमज्ञान की उपलब्धि तो अन्तिम जन्म में हुई; इससे पूर्व उन्हें कई बार जन्म लेना पड़ा और तप, त्याग तथा तितिक्षा साधनाओं के माध्यम से अपने अंतरंग को निखारना पड़ा। उन सभी पूर्व जन्मों का विवरण जातक कथाओं के नाम से उपलब्ध है। त्याग, प्रेम, करुणार्द्र और सत्यनिष्ठा के उच्च स्तर पर वे किस गरिमा के साथ पहुँच चुके थे, इसका उत्कृष्ट उदाहरण व्याघ्री जातक प्रसंग में आता है।
उस जन्म में वे एक महान् ब्राह्मण कुल के सदस्य थे। पूर्वार्जित संस्कारों और आध्यात्मिक उपलब्धियों के परिणामस्वरूप वे स्वभावतः ही मेधावी, जिज्ञासु और उद्यमी थे। परिणामस्वरूप जातक धर्म, उपनयन आदि संस्कारों के उपरान्त अल्प समय में ही ज्ञान साधना में उनकी अच्छी गति हुई थी। वंश परम्परा के अनुरूप सभी विद्याओं में पारंगतता प्राप्त कर जब वे आचार्य पद पर प्रतिष्ठित हुए तो लगा कि इस पद पर रहते हुए लोक-मंगल के लिए पर्याप्त और अभीष्ट श्रम नहीं कर पा रहा हूँ। यद्यपि उनकी कीर्ति और ख्याति देशकाल की सीमाओं को पार कर दिक् देशान्तर में व्याप्त हो रही थी, परन्तु इससे उन्हें संतोष नहीं हो रहा था।
निदानतः प्रव्रजित होने का निश्चय किया और आत्मकल्याण के साथ-साथ लोक-मंगल की सेवा-साधना में निरत होने के लिए कटिबद्ध होकर पारिवारिक दायित्वों से निवृत्त हो गये। प्रव्रज्या ग्रहण कर वे वनगिरी में जा रहने लगे। पवित्र आचरण, आत्म-संयम, संतोष और करुणा भरे तेजस्वी व्यक्तित्व ने वहाँ निवास करने वाले व्यक्तियों को अप्रतिम रूप से प्रभावित किया। उनका स्वयं का अन्तरंग और बहिरंग तो निखर कर सामने आया ही था किन्तु भी असाधारण रूप से परिवर्तित होने लगा। वनगिरी के निवासियों में शाँतिरस की धारा बहने लगी।
बोधिसत्व के शिष्यों की संख्या बढ़ने लगी और स्वयं भी आत्म-साधना के साथ-साथ अपने शिष्यों व शील, संयम सजगता और साक्षित्व के मार्ग पर अग्रसर करने लगे। एक समय व अपने शिष्यों के साथ विहार कर रहे थे कि मार्ग में किसी गुफा के अंदर से बाघ का आर्तनाद सुनाई पड़ा। करुणार्द्र बोधिसत्व उसी दिशा में बढ़ चले और उनका अनुगमन करते हुए शिष्यगण भी जाकर देखा तो एक युवती बाघिन जो कुछ समय पूर्व प्रसव से गुजरी थी, प्रसव पीड़ा से पीड़ित और शिथिल हुई क्षुधार्त होकर कराह रही थी।
रह-रहकर उसकी दृष्टि अपने नवजात शिशुओं पर जाती। मातृत्व की ममता और भूख की पीड़ा में अन्तर्द्वन्द्व चल रहा था। क्षुधा तो बाध्य कर रही थी इन नवजात शिशुओं का भक्षण करने के लिए परन्तु मातृत्व का ममता भरा हृदय उसे निरंतर दमित किये दे रहा था। ममता भूख की बढ़ती ज्वाला को कब तक शाँत रखे रहेगी कहा नहीं जा सकता। बोधिसत्व बाघिन की पीड़ा को अंतर्चक्षुओं में समझ रहे थे। उन्होंने अपने सभी शिष्यों को बाहर जाते और बाघिन का आहार ढूंढ़ कर लाने के लिए कहा। यद्यपि उनका मनोगत कुछ और ही था।
अनात्म, असार, विनाशवान और दुखमय शरीर यदि दूसरों के काम आ सके तो यह खेदजनक नहीं, आह्लादनीय ही है और उन्होंने अपनी अर्जित आध्यात्मिक शक्ति के बल पर शरीरोत्सर्ग कर दिया। जिसे बाघिन ने खा लिया और क्षुधा तृप्त होकर जैसे उसमें नये प्राण संचरित हो उठे। अभी जो अपने ही बच्चों को खाने के लिए आतुर दिखाई दे रही थी वही उन्हें प्यार से खिलाने लगी। शिष्यगण जब लौटे तो उन्हें वहाँ बोधिसत्व की मृत देह के अतिरिक्त कुछ नहीं मिल
मनुष्य शरीर में किसी भी भाग पर आघात या चोट पहुँचती तो उससे देह का रोम-रोम काँप उठता है। पाँव की अंगुली में चोट लगे तो मस्तिष्क भी उद्विग्न हो उठता है, हाथ भी काम करने से इन्कार कर देते है- कहने का अर्थ यह कि शरीर का अंग-अंग प्रभावित होता है। शरीर की चेतनता का यह एक चिन्ह है। दृश्य और अदृश्य प्रकृति- समूचा ब्रह्माण्ड भी इसी प्रकार एक चेतन पिण्ड है, जिसमें किसी भी छोर पर कुछ घटित होता है तो अन्यान्य स्थानों पर भी उसका प्रभाव परिलक्षित होता है। वैज्ञानिक खोजों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सका है कि जिसे हम जड़ समझते हैं वह वस्तुतः जड़ है नहीं, चेतना उसमें भी विद्यमान है और संसार में घटने वाले घटनाक्रमों से लेकर प्राकृतिक हलचलों का भी उस पर प्रभाव पड़ता है।
विज्ञान जिन निष्कर्षों पर पहुँच रहा है, भारतीय तत्व मनीषी उस पर हजारों वर्ष पूर्व पहुँच चुके है। जड़ और चैतन्य का भेद वस्तुतः हमारी स्थूल दृष्टि के कारण ही है। वस्तुतः जड़ता कहीं भी नहीं है- सब में आत्म-चेतना विद्यमान है। यह प्रतीत इसलिए होती है कि वह चेतना व्यक्त अलग-अलग प्रकारों से होती है। इसी आधार पर ऋषि विश्वात्मा तक पहुँच सके।
भारत में इस तत्व दर्शन को प्रतिपादित करने के लिए जो वैज्ञानिक प्रयत्न चले उन्हें ज्योतिर्विज्ञान का नाम दिया गया। यह बात अलग है कि इस विशुद्ध विज्ञान का-जिसका उद्देश्य आकाशीय स्थिति और ग्रह-नक्षत्रों का मौसम विज्ञान और प्राणियों पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन था- सर्वाधिक दुरुपयोग हुआ है।
ज्योतिर्विज्ञान की एक मान्यता है कि सूर्य, मात्र अग्नि का धधकता पिण्ड ही नहीं एक जीवन्त और सक्रिय अग्नि पुंज है। वेदों में तो सूर्य को सर्व समर्थ देवता मानकर उसकी कई ऋचायें लिखी गई है। गायत्री मंत्र में भी सूर्य को सविता का-परमात्मा का प्रतीक माना गया है। लेकिन विज्ञान मानता आ रहा था कि सूर्य केबल आग का एक जलता हुआ गोला भर है। रूस के एक वैज्ञानिक चीनेवस्की भी अपनी वैज्ञानिक शोधों से इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि सूर्य एक जीवित अग्नि पिण्ड है। यही नहीं 1920 में उन्होंने यह भी सिद्ध किया- ‘सूर्य पर प्रति ग्यारहवें वर्ष एक आणविक विस्फोट होता है और जब भी यह विस्फोट होता है तो पृथ्वी पर युद्ध और क्रान्तियाँ जन्म लेती है।’ इस मान्यता को सिद्ध करने के लिए उन्होंने तेरहवीं शताब्दी से तब तक ही महत्वपूर्ण राज्य क्रान्तियों और ऐतिहासिक युद्धों का विवरण एकत्रित किया व प्रमाणित कर दिखाया।
यह तो सभी जानते हैं कि सूर्य पृथ्वी के जीवन का केन्द्र है। प्रतिपल सूर्य से ही पृथ्वी के जीवों को प्रकाश और प्राण मिलते हैं। चीनेवस्की का कहना था कि पृथ्वी पर घटित होने वाले किसी भी बड़े परिवर्तन का सूर्य से सम्बन्ध होता है।
इन्हीं आधारों पर सन् 1950 में विज्ञान की एक नयी शाखा खुली। जियोजारजी गिआरडी नामक वैज्ञानिक ने ब्रह्माण्ड रसायन को जन्म दिया। गिआरडी का कहना था कि समूचा ब्रह्माण्ड एक
शरीर है और इसका कोई भी अंग अलग नहीं, वरन् संयुक्त रूप से एकात्म है। इसलिए कोई भी तारा कितनी ही दूर क्यों न हो पृथ्वी के जीवन को प्रभावित करता है और प्राणियों की हृदयगति बदल जाती है।
ग्यारह वर्षों में हर बार सूर्य पर आणविक विस्फोट की धारणा को प्रतिपोषित करते हुए जापान के प्रख्यात जैविकी शास्त्री तोनातो इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि जब भी ये विस्फोट होता है, पृथ्वी पर पुरुषों के रक्त में जल तत्व बढ़ जाते हैं और पुरुषों का खून पतला पड़ जाता है।
सूर्य ग्रहण के समय प्रकृति पर पड़ने वाले प्रभाव तो आसानी से देखे व समझे जा सकते हैं। जब सूर्य का ग्रहण होता है चौबीस घंटे पूर्व से ही कुछ पक्षी चह-चहाना बन्द कर देते हैं, बन्दर वृक्षों को छोड़कर चुप-चाप जमीन पर आकर बैठ जाते हैं। सदा चंचल रहने वाला बन्दर उस समय इतना शाँत हो जाता है कि लगता है उस जैसा शाँत और सीधा प्राणी कोई है ही नहीं। बहुत से जंगली जानवर भयभीत से दीखने लगते हैं।
अमेरिका के रिसर्च सेण्टर आफ ट्री रिंग ने यह पता लगाया कि वृक्षों के तनों में प्रति वर्ष पड़ने वाला एक वृत्त हर ग्यारहवें वर्ष सामान्य वृत्तों की अपेक्षा बड़ा होता है। स्मरणीय है वनस्पति विज्ञान के वृक्षों के जीवन का अध्ययन करने के लिए वृक्ष के तनों में बनने वाले वर्तुलों का अध्ययन किया जाता है। यह एक तथ्य है कि वृक्ष में प्रतिवर्ष एक वृत्त बनता है, जो उसके द्वारा छोड़ी गयी छाल से निर्मित होता है। रिसर्व सेण्टर आफ ट्री रिंग के प्रो0 डाँगलस ने इस दिशा में खोज करते हुए यह भी पता लगाया कि ग्यारहवें वर्ष जब सूर्य पर आणविक विस्फोट होते हैं तब वृक्ष का तना मोटा हो जाता है और उसी कारण बड़ा वृत्त बनता है।
कहने का अर्थ यह कि सूर्य पर होने वाले परिवर्तनों से मनुष्य और पशु-पक्षी ही नहीं पेड़-पौधे भी प्रभावित होते हैं। यही नहीं जड़ कहे जाने वाले नदी, नाले भी प्रभावित होते हैं, उनका भी पानी घटता-बढ़ता है-बिना वर्षा और बिना गर्मी के ही सूर्य ही नहीं चन्द्रमा का भी पृथ्वी के जीवन पर असाधारण रूप से प्रभाव पड़ता है। समुद्र में पूर्णिमा के दिन ही अक्सर तूफान और ज्वार आते हैं अपेक्षाकृत अन्य दिनों के। इसके विपरीत अमावस के दिन अन्य दिनों की तुलना में समुद्र शाँत रहता है। समुद्र तट पर रहने वाले और इस सम्बन्ध में थोड़ा बहुत जानने वाले लोग यह अच्छी तरह जानते हैं। इसका कारण यह बताया जाता रहा है कि चन्द्रमा और पृथ्वी एक दूसरे के समीप है इसलिए चन्द्रमा जब अपनी सोलहों, कलाओं के साथ उदित होता है तो पृथ्वी के समुद्र का पानी उफनता है परन्तु अब यह भी पता लगाया जा चुका है कि न केवल समुद्र ही वरन् मनुष्य भी प्रभावित होता है।
अमेरिका के पागलखानों में किये गये सर्वेक्षण के अनुसार मानसिक रोगी पूर्णिमा के दिन अधिक विक्षिप्त हो जाते हैं। साधारण और कमजोर मनोभूमि के व्यक्ति को भी इस दिन पागलपन के दौरे पड़ने लगते हैं और अमावस के दिन धरती पर लोग सबसे कम पागल होते हैं। न केवल पूर्णिमा और अमावस के दिन वरन् चाँद के बढ़ने घटने के साथ भी मनुष्यों में पागलपन बढ़ता-घटता है। विक्षिप्त मनुष्यों के साथ-साथ सामान्य स्वस्थ व्यक्तियों की चित्त दशा पर भी इन उतार-चढावों का प्रभाव पड़ता है। सम्भवतया इसी कारण भारतीय तत्वदर्शियों ने प्रत्येक पूर्णिमा पर धर्म-कर्म में व्यस्त रहने का निर्देश दिया है।
पृथ्वी सौरमंडल का ही एक सदस्य है और चन्द्रमा उसका ही एक उपग्रह। वैज्ञानिक दृष्टि से पृथ्वी और चन्द्र की उत्पत्ति सूर्य से ही हुई है इसलिए इन तीनों के बीच एक अंतर्संबंध बन सकता है। एक दूसरे पर इसका प्रभाव हो सकता है परन्तु यह स्थिति मात्र यहाँ तक ही सीमित नहीं है, प्रोफेसर ब्राउब के अनुसार अन्य ग्रहों से भी पृथ्वी का जीवन प्रभावित होता है। उन्होंने यह भी सिद्ध कर दिखाया कि मनुष्य शरीर की संरचना और मानवीय काया की संरचना में एक अद्भुत साम्य है। पृथ्वी पर समुद्र में पानी और नमक का जितना अनुपात है वही अनुपात मनुष्य देह में भी है। यही नहीं पृथ्वी पर 65 प्रतिशत पानी है तो मनुष्य शरीर में भी इतना रही जल तत्व है।
प्रोफेसर ब्राउन में मंगल, बृहस्पति, शुक्र और शनि आदि ग्रहों का अध्ययन कर यह सिद्ध किया कि उनकी गतियों और स्थितियों के परिवर्तनों का भी पृथ्वी पर प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों ने इन सबको समानुभूति का नाम दिया। पृथ्वी, चन्द्र, मंगल, बृहस्पति और शुक्रादि ग्रहों का उद्भव सूर्य से हुआ। ये सभी सूर्य की सन्तान है इसलिए इनकी जीवन व्यवस्था एक दूसरे से प्रभावित होती है। जुड़वा जन्म लेने वाले बच्चों के सम्बन्ध में भी यही सिद्धान्त घटित होता है।
न केवल सौरमंडल के सदस्यों में एक समानुभूति है वरन् दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले तारा नक्षत्र भी पृथ्वी के जीवन पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं। विभिन्न विषयों में किये गये प्रयोगों से अनायास ही जो निष्कर्ष सामने आये है उनसे वैज्ञानिकों का ध्यान अनायास ही ब्रह्माण्ड- रसायन की ओर आकृष्ट हुआ है। इस दिशा में जैसे-जैसे आगे बढ़ा जा रहा है यह स्पष्ट होता चल रहा है कि समूचा ब्रह्माण्ड एक चैतन्य शरीर है; जिसका हर स्पन्दन समूचे जीवन को प्रभावित करता है। जिस प्रकार कि शरीर के किसी भी हिस्से पर आघात हमारी समग्र चेतना को छूता और कष्ट या आनन्द पहुँचाता है।
कहना नहीं होगा कि ज्योतिर्विज्ञान इसी दिशा में गहरे और ठोस प्रमाण जुटाने के लिए सचेष्ट था; परन्तु लोगों ने जैसे ही उसका दुरुपयोग किया- दिशा भटक गयी। यह निश्चित है कि विज्ञान आज नहीं तो कल ऐसे प्रमाण खोज लेगा जिनके आधार पर ग्रहों की स्थिति और दूसरी अन्य वस्तुओं पर उनके प्रभाव का अध्ययन कर उससे लाभान्वित हुआ या हानि से बचा जा सकेगा। भारतवर्ष ने इस दिशा में बड़ी प्रगति की थी। आर्य भट्ट का - ज्योतिष सिद्धान्त, काल क्रिया पाद, गोलपाद, सूर्य सिद्धान्त और उस पर नारदेव, ब्रह्मगुप्त के संशोधन परिवर्धन, भास्कर स्वामी का महाभाष्कारीय आदि ग्रन्थ उन अमूल्य खोजो और निष्कर्षों से भरे पड़े है, जिनके आधार पर कुछ प्रयत्न किये जायं तो वैज्ञानिक पद्धति से भी विश्वात्मा के साथ सम्बद्ध हुआ जा सकता है।
एक बगीचे में एक बाँस का झुरमुट था और पास ही आम का वृक्ष उगा खड़ा था।
ऊँचाई में बाँस ऊपर था और आम नीचा। सो बाँस ने आम से कहा- देखते नहीं मैं तुमसे कितना ऊँचा हूँ। मेरी वरिष्ठता तुम्हें स्वीकार करनी चाहिए।
आम कुछ बोला नहीं- चुप होकर रह गया।
गर्मी का ऋतु आई। आम फला से लद गया। उसकी टहनियाँ फलों के भार से नीची झुक गई।
बाँस तना खड़ा था। बोला- तुम्हें तो इन फलों की फसल ने और भी अधिक नीचे गिरा दिया अब तुम मेरी तुलना में और भी अधिक छोटे हो।
आम ने फिर भी कुछ नहीं कहा। सुनने के बाद उसने आंखें नीची करली।
उस दिन थके मुसाफिर उधर से गुजरे। कड़ाके की दुपहरी आग बरसा रही थी सो उन्हें छाया की तलाश थी। भूख-प्यास से बेचैन हो रहे थे अलग।
पहले बाँस का झुरमुट था। वही बहुत दूर से ऊंचा दीख रहा था। चारों ओर घूमकर देखा उसके समीप छाया का नाम भी नहीं था। कंटीली झाड़ियां सूखकर इस तरह घिर गई थी कि किसी की समीप तक जाने की हिम्मत न पड़े।
निदान वे कुछ दूर पर उगे आम के नीचे पहुँचे। यहाँ दृश्य ही दूसरा था। सघन छाया की शीतलता और पककर नीचे गिरे हुए मीठे फलों का बिखराव। उनने भूख बुझाई। समीप के झरने में पानी पिया और शीतल छाँह में संतोषपूर्वक सोये।
जब उठे तो बाँस और आम की तुलनात्मक चर्चा करने लगे।
उस घुसफुस की भनक बाँस के कान में पड़ी। उसने पहली बार उस समीक्षा के आधार पर जाना कि ऊँचा होने में और बड़प्पन में क्या कुछ अंतर होता है।
‘अधिकस्य अधिकं फलम्’ वाली उक्ति हर जगह लागू नहीं होती। सूक्ष्म की शक्ति को अब अधिक अच्छी तरह समझा जाने लगा है, शर्त एक ही है, कि उस सूक्ष्म का उपयोग ठीक तरह किया जा सके।
एक किलो मिट्टी का ढेला वह काम नहीं कर सकता जो अदृश्य जैसी स्थिति में रहने वाला परमाणु। परमाणु क्या है? विद्युत बिन्दुओं का संघात मात्र। इन्हीं में शक्ति का अजस्र स्त्रोत छिपा है और उसी से विश्व का अति सामर्थ्य युक्त क्रिया-कलाप चल रहा है।
शरीर में उत्पन्न होने वाली गड़बड़ी और उसकी साज संभाल के संदर्भ में होम्योपैथी के जन्म दाता हनिमैन ने औषधि की सूक्ष्म शक्ति को महत्व दिया है। उनके बाद डा0 शुशलर ने अपने ‘दिशु रेमिडीज’ सिद्धान्त में इसी बात पर जोर दिया है।
विकास बाद के जन्मदाता डार्विन को सूक्ष्मता के सिद्धान्त में अत्यंत रुचि थी। एक बार एक डच वैज्ञानिक ने उन्हें लिखा था कि एट्रोपिन की एक ग्रेन का एक लाखवाँ भाग भी आंखों पर प्रभाव डालता है। आर्विन ने अपना अनुभव उन्हें बताते हुए लिखा था- “अमोनिया के एक ग्रेन के एक करोड़ वे भाग को भी आँत्र बाहक स्नायु को तेज झटका देते मैंने देखा है। नमक की एक ग्रेन का बारह करोड़वाँ भाग भी वैसा ही प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है।”
डा0 ए॰ शिगर ने अपने प्रयोगों से सिद्ध किया कि स्वस्थ शरीर पर कामिक एसिड जितना विषैला प्रभाव उत्पन्न करता है, उसका दो लाखवाँ भाग भी वैसा ही प्रतिफल उत्पन्न करता है।
शुशलर ने सिद्ध किया था कि नमक की बड़ी मात्रा खाने पर तो वह भार बन जाती है और व्यर्थ निकल जाती है। जीव कोषों द्वारा ग्रहण किये जाने के लिए तो उसकी बहुत छोटी मात्रा ही पर्याप्त है।
दूध में पाये जाने वाले लोहाँश को बहुत सराहा जाता है और कहा जात है दूध की उपयोगिता उसकी लौह पोषक शक्ति से संबंधित है। यह लौह दूध में कितना होता है? एक पाव में एक ग्रेन का छह लाखवाँ भाग। मात्रा की दृष्टि से यह अत्यंत उपहासास्पद है पर चूँकि वह जीव कोषों में घुलने लायक इसी स्थिति में उपयुक्त होता है इसलिए लाभ उचित अनुपात में घुले हुए दूध से ही संभव होता है। यदि इस अनुपात से बहुत गुना बढ़ा कर लौह मिश्रण दिया जाय तो उससे लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होगी।
शरीर के तापक्रम पर हजार भाग पानी में एक भाग हाइड्रोक्लोरिक एसिड घुला हो तो माँस को फाइव्रित एवं दालों के ग्लूटिन को आसानी से पचा देगा किंतु यदि हाइड्रोक्लोरिक एसिड की मात्रा अधिक हो तो उससे पाचन क्षमता बढ़ेगी नहीं घट ही जायगी।
लाल रक्ताणुओं की शक्ति उसके लोहाँश पर निर्भर रहती है पर उस अंश की मात्रा कितनी स्वल्प होगी यह भी जानना आवश्यक है। एक क्यूविक इंच के 120 लाख वे हिस्से से बड़ा एक रक्ताणु नहीं होता। एक छोटी सी रक्त बूँद में इस तरह के प्रायः तीन लाख होते हैं। इतनी छोटी इकाई कितना कम लोहाँश अपने में लाद कर लिये फिर सकती है, यह कल्पना की जा सके तो प्रतीत होगा कि शक्ति के लिए उपयुक्त अनुपात कितना स्वल्प हो सकता है।
मनुष्य की मूल सत्ता कितनी छोटी है इसका अनुमान लगाने के लिए हमें जानना चाहिए कि जो शुक्राणु डिम्ब के साथ मिलकर भ्रूण में परिणत होता है, वह मूलतः एक क्यूविक मिलीमीटर का दस लाखवाँ भाग होता है। इतनी छोटी सत्ता में मनुष्य का पूरा शारीरिक और मानसिक ढाँचा समाया रहता है।
रेडियम से सारी दुनिया की चिकित्सा की जा सकती है वह संसार भर में 4-5 ओंस है। इसे लगातार खर्च करते रहे तो भी वह कम से कम 24 हजार वर्ष में समाप्त होगा।
कस्तूरी की शीशी का बार-बार धोते रहने पर भी उसकी गंध आती रहती है, इससे प्रतीत होता है कि सूक्ष्मता का प्रभाव उससे कही अधिक होता है जितना कि आम लोग समझते हैं।
स्थूल संसार, स्थूल जीवन को मोटी दृष्टि से देखने पर वह सब कुछ जाना पहचाना, घिसा-पिटा, मामूली, महत्वहीन और ढर्रे का दिखाई पड़ता है। उसमें न कुछ विशेषता है न महत्ता। पर जब गहराई में उतरने और अधिक खोजने, समझने और प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है तो यहाँ सब कुछ अद्भुत और रहस्य मय दिखाई पड़ने लगता है। भौतिक जगत में भी यही बात है और आत्मिक जगत में भी। गहराई में उतरना ही शक्ति को खोजने और प्राप्त करने का एक मात्र उपाय है। उस उपाय को भौतिक क्षेत्र में प्रयुक्त करना विज्ञान कहलाता है और आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रयोग करना योग साधन- तत्व-दर्शन इससे हमें दोनों ही क्षेत्रों में एक से एक बढ़कर उपलब्धियाँ प्राप्त हो सकती है।
दृश्य का अदृश्य में और अदृश्य का दृश्य में बदल जाना वस्तुतः विश्व का एक चमत्कार है। पर यह है सरल, सहज और स्वाभाविक। शक्ति पदार्थ में प्रकट होती है और पदार्थ का शक्ति में लय होता है। ब्रह्म माया में परिणत होता है और माया ब्रह्म सत्ता मैं लीन होती है, कैसा है यह सहज ही समझ में न आ सकने वाला गोरख धंधा। पर विज्ञान एक के बाद एक रहस्यों की परतें खोलता चला जा रहा है और हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचा रहा है कि निर्जीव स्थूल के भीतर प्रचंड शक्ति सम्पन्न सूक्ष्म सन्निहित है। जड़ में भी संव्याप्त चेतना का दर्शन हमें इस आधार पर ही हो सकता है। विज्ञान क्रमशः अध्यात्म के सिद्धान्तों का समर्थन करने की दिशा में आगे बढ़ता चला जा रहा है।
भौतिक विज्ञान के दो भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) पदार्थ (2) ऊर्जा। पदार्थ उन वस्तुओं को कहते हैं जो हमारे चारों ओर बिखरी पड़ी है, जिन्हें हम देखते या अनुभव करते हैं, इन्हें तोला जा सकता है। वे ठोस, द्रव एवं गैस के रूप में रहते हैं और एक स्थिति से दूसरी स्थिति में परिस्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं।
ऊर्जा उस विभाग को कहते हैं जिसमें ताप, विद्युत, चुम्बक, प्रकाश, शब्द आदि की गणना आती है। इन्हें तोला तो नहीं जा सकता फिर भी उन्हें तरंगों के रूप में गतिशील देखा जा सकता है, और उनकी सामर्थ्य को अनुभव किया जा सकता है।
ठोस पदार्थ अपना रूप बिना किसी बाहरी दबाव के नहीं बदलते। उनके परमाणुओं में घनिष्ठता होती है। तरल पदार्थों के अणुओं में उतना आकर्षण नहीं होता इस लिए वे बहने लगता है। जिस पात्र में रखे उसी की आकृति ग्रहण कर लेते हैं। गैस के अणुओं में परस्पर कोई बंधन नहीं होता वे सब दिशाओं में फैलते हैं। जरा सी गैस एक बड़े कमरे में भर सकती है। तीनों स्थितियाँ एक होते हुए भी परस्पर बहुत भिन्न है तो भी ऊर्जा की थोड़ी सी हलचल उन्हें कुछ से कुछ बना देती है। तापमान 100 से0 से अधिक घट जाने पर पानी बर्फ बन जाता है और 1050 से अधिक बढ़ जाने पर भाप बन जाता है।
पदार्थ जिन परमाणुओं से मिलकर बनता है; वे निरन्तर गतिशील रहते हैं। यह गति तापमान से प्रभावित होती है। गति बढ़ने से अणुओं के पारस्परिक संबंध सूत्र में परिवर्तन होता है और वे अपनी संघबद्ध आकृति बदलने लगते हैं।
अत्यधिक ठंडा करने पर लोहा रेत की शकल में बदल सकता है। ऊर्जा का हेर-फेर वस्तुओं की शकल को इतनी अधिक बदल सकता है कि उनके पूर्व रूप की कल्पना तक पर विश्वास करना कठिन पड़ेगा।
जो कुछ हम आँखों से देखते हैं वह वस्तुतः वैसा ही नहीं होता। आकाश का रंग हम नीला देखते हैं। गहरे पानी का रंग भी नीला होता है। पर क्या जो कुछ हम देखते हैं वह सत्य है। वस्तुतः यह आँखों का सरासर धोखा खाना है। आकाश या पानी इन दोनों में से एक भी नीला नहीं है, दोनों ही बिना रंग के है। प्रकाश की रश्मियाँ एक विशेष कोण से दिखाई पड़ने के कारण यह नीलापन भ्रम के रूप में हमारे मस्तिष्क में घुस पड़ता है। क्या फूलों का वास्तविक रंग वही होता है जो हमारी आंखें देखती है। वैज्ञानिक परीक्षण हमारी आँखों को भ्रम ग्रस्त सिद्ध करते हैं। प्रकाश की किरणें पदार्थों से टकरा कर जिस प्रकार के अनुभव देती है वस्तुएँ उस रंग की लगती भर है। वस्तुतः वे उस रंग की होती नहीं।
देखने में हर चीज स्थिर दिखाई पड़ती है; पर उनके भीतर अणुओं की भारी धमा चौकड़ी हर घड़ी मची रहती है। समतल दिखाई पड़ने वाले भी वस्तुतः खुरदरे और छेदों से भरे होते हैं। मेज की सतह को आंखों से देख कर या हाथ से छूकर समतल ही कहा जा सकता है पर माइक्रोस्कोप से देखने पर उसमें असंख्य छिद्र दिखाई पड़ते हैं। पानी में पोल दिखाई नहीं पड़ती पर जब चीनी उसमें घोलते हैं फिर भा आयतन नहीं बढ़ता तो पता चलता है कि उसके अणुओं में पोल मौजूद थी। रेत को पानी में डालने से आयतन बढ़ता है पर नमक डालने से नहीं। इससे स्पष्ट है कि पानी के अणु नमक या चीनी को अपने भीतर भर लेने के लायक जगह पहले से ही रखे हुए थे। यद्यपि रेत के कण भिन्न स्तर के होने के कारण उनमें घुल नहीं पाते।
परमाणु पदार्थ की सबसे छोटी इकाई है और उसे ठोस समझा जाता है पर वस्तुतः उससे भी 90 प्रतिशत स्थान पोला होता है। संसार में असंख्य पदार्थ है, उनकी गणना नहीं हो सकती पर जिन तत्वों, एलीमेन्टस्, से वे बने है उनकी संख्या अब तक मात्र 106 गिनी जा सकी है। इन्हीं कणों के मिलने बिछुड़ने एवं अनुपात घटने बढ़ने से तरह-तरह की आकृति-प्रकृति वाले पदार्थ बनते बिगड़ते रहते हैं।
अब पदार्थों का ऊर्जा में और ऊर्जा का पदार्थोँ में परिवर्तन संभव हो गया है। प्रकृति यही खेल करती रहती है, वह कभी पदार्थ को ऊर्जा में बदलती है कभी ऊर्जा को पदार्थ में, कभी निराकार साकार बनता है और कभी साकार का निराकार में विलयन हो जात है। हमारे चूल्हे, वायलर यही उलट-पुलट करने में लगे रहते हैं।
हमारी इन्द्रियाँ भी कितनी विलक्षण है। समीपवर्ती क्षेत्र में चल रहे इलेक्ट्रॉन स्पंदनों की सूचना अपने-अपने छिद्रों द्वारा मस्तिष्क तक पहुँचाती है। बस इतनी भर नगण्य घटना को मस्तिष्क शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श के मीठे कडुए अनुभवों के साथ अनुभव करता है और उनमें प्रिय अप्रिय की प्रतीति होती है। यदि मस्तिष्क में रसानुभूति की विशेषता न होती तो और वह ऊर्जा अंकन यंत्र मात्र रहा होता तो जो अनुभूतियाँ हमें होती है। उनके से एक भी न होती, मात्र अणुओँ की हलचलें नोट होती रहती और उनका प्रभाव उतना ही होता जितना कि समीपवर्ती तरंगों के साथ जुड़ा होता। रसानुभूति जैसी कोई स्थिति इस संसार में नहीं है। हमारे मस्तिष्क की विलक्षण संरचना ही है जो हमें कभी हर्ष कभी विषाद, कभी प्रिय और कभी अप्रिय अनुभव कराती है। कभी हम रोते हैं कभी गाते हैं, इसका घटनाओं से नहीं मात्र अपने निज के अनुभूति तंत्र से ही संबंध है।
सन्त राविया जब ईश्वर प्रेम की मस्ती में आती तो कहती- ऐ मेरे मुहब्बी, मुझे ऐसी दुनिया में ले चल जहाँ तेरे सिवा और कोई न हो। जन्नत (स्वर्ग) तू अपने दोस्तों को दे। दोजख (नरक) में अपने दुश्मनों को डाल। मेरे लिये तो एक तू ही काफी है।
प्रकृति और पुरुष का, जड़ और चेतन का, स्थूल और सूक्ष्म का यह अद्भुत समन्वय अज्ञानी को सामान्य और ज्ञानी को असामान्य प्रतीत होता है। मोटी दृष्टि से यहाँ सब कुछ कूड़ा-करकट भरा पड़ा है; पर तत्वदर्शी देखता है कि कण-कण शक्ति का अनंत भंडार भरा पड़ा है। भावना की प्रत्येक तरंग में अमृत कलश छलक रहा है। वस्तुतः यहाँ सब कुछ निरर्थक है और सब कुछ सार्थक। सामान्य में असामान्य के दर्शन हो सकते हैं, पाषाण में भगवान प्रकट हो सकते हैं, पर इसके लिए सूक्ष्म दृष्टि की आवश्यकता है। गहराई में जितने ही हम उतरते हैं उतने ही चकित करने वाले चमत्कारों का दर्शन करते हैं। यदि दर्शन प्रखर हो तो हर दिशा में उतनी विभूतियाँ परिलक्षित होगी जिनके आधार पर अपनी इसी दुनिया को चमत्कारों से भरा देव लोक कहा जा सके।
पृथ्वी और सूर्य को आदर्श पति-पत्नी कहा जा सकता है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है, उससे प्रकाश ग्रहण करती है और जीवित रहती है। आदर्श पत्नी को पति के इर्द-गिर्द घूमना चाहिए, उसकी सत्ता के साथ अपनी सता जुड़ी रखनी चाहिए। उससे प्रकाश ग्रहण करना चाहिए, योग्यता से लाभान्वित होना चाहिए और यदि वह सूर्य जैसा प्रकाशवान है, जो उसके जीवन से अपने जीवन को आलोकित भी करना चाहिए। सूर्य भी अपने उत्तरदायित्वों की उपेक्षा नहीं करता। अपनी समग्र सम्पदा का अजस्र अनुदान उसे मुक्त हस्त से प्रदान करता है और उसके रोम−रोम में जीवन संचार करने में अपने साथ ग्रन्थि वन्दन को, पाणिग्रहण को सार्थक बनाता है।
कभी सूर्य और पृथ्वी एक ही गोलक में संयुक्त थे जैसे सृष्टि के आरम्भ में नर और नारी एक थे। पीछे परिस्थितियों ने दोनों को अलग कर दिया फिर भी उनकी महानता में कोई अन्तर नहीं आया। परमात्मा का एक अंश ही जीव है। कभी दोनों एक थे, अब वे अलग हो गये फिर भी मूल सत्ता की विशेषता दोनों पक्षों में यथावत् विद्यमान है। पृथ्वी सूर्य से अलग है तो भी अपने भूल केन्द्र के विशेष वैभव की उत्तराधिकारिणी बनी हुई है। परमात्मा का समस्त वैभव बीज रूप में आत्मा में मौजूद हैं। पृथ्वी का ठोस पिण्ड थोड़ी सी परिधि में सीमित है पर उसका शक्ति क्षेत्र, वायुमंडल बहुत बड़े क्षेत्र में संव्याप्त हैं।
पृथ्वी कितनी बड़ी है इसका उत्तर छोटी कक्षा के विद्यार्थी तुरन्त 8000 मील व्यास बता कर दे सकते हैं। पर चूँकि वायु मण्डल भी पृथ्वी का ही अंग है धरती की वायु भूत सम्पदा जिस क्षेत्र में उड़ती फिरती हैं, उसे भी उसी का एक अंग क्यों न माना जाय। इस प्रश्न के अनुसार पृथ्वी का विस्तार और अधिक बढ़ जाता है। अब से 50 वर्ष पूर्व यह वायु मंडल 7-8 मील माना जाता था। पीछे माया गया कि वह 100-150 मील तक फैला हुआ है। रेडियो संचार की खोज ने उसे 250-300 मील तक पहुँचा दिया। पर अन्त यहाँ भी नहीं होता। प्रकृति की दिव्य रंग बिरंगी, झूमती, लहराती, उरु ज्योतियाँ, आऊरोरल लाईट्स दिखाई पड़ती रहती है वे भी बिना वायु मंडल के कैसे चमकती होंगी। यह सोचकर अब वायु मंडल का विस्तार 700 मील ऊंचाई तक मानना पड़ा।
रूसी और अमेरिकी उपग्रहों ने नये समाचार यह लाकर दिए कि वायुमंडल बहुत आगे तक फैला हुआ हैं। पृथ्वी की भूमध्य रेखा के चारोँ और दो मोटे-मोटे कवच है मानो पृथ्वी ने कमर में मजबूत मेखलाएं पहन रखी हों। पृथ्वी तल से इनकी दूरी क्रमशः 2 हजार और बीस हजार मील है। यह मेखलाएं किस चीज की बनी है, इसके उत्तर में उस स्थिति को ‘प्लाज्मा’ कहा गया है। पिछले दिनों पदार्थ के तीन स्वरूप बताये जाते रहे हैं। (1) ठोस (2) तरल (3) वायव्य। अब एक चौथा तथ्य और सामने आया है -प्लाज्मा। यह गैसीय स्थिति से भी विरल स्थिति है इतनी विरल कि उसमें परमाणुओं का विघटन हो जाता है। असल में ठोस पृथ्वी का वायव्य विस्तार इतने बड़े क्षेत्र को घेरे हुए है, यही मानकर चलना चाहिए। पृथ्वी का वास्तविक कलेवर इतना ही सुविस्तृत है।
पिछले दिनों यह माना जाता रहा है कि ग्रह नक्षत्रों के बीच अन्तरिक्ष क्षेत्र नितान्त शून्य है। अब यह माना गया है कि शून्य नाम की कोई चीज नहीं। सर्वत्र किसी न किसी रूप में पदार्थ की सत्ता मौजूद है। अन्तरिक्ष भी विद्युन्मय चैतन्य से भरा है उसमें भी स्पन्दन मौजूद है और प्लाज्मा अथवा अन्य रूपों में पदार्थ की सत्ता विद्यमान है। पृथ्वी की ठोस परिधि समाप्त होते ही वायु मंडल की परत आरंभ होती है और वायु मंडल के समाप्त होते ही प्लाज्मा की परत आरंभ हो जाती है तो फिर प्लाज्मा को भी पृथ्वी की ही परिधि में क्यों न गिन लिया जाय? पृथ्वी का यह चुम्बकीय क्षेत्र है। प्लाज्मा की हलचलों को सूर्य से गति मिलती है अस्तु सूर्य और पृथ्वी के बीच का सारा क्षेत्र चुम्बक मण्डल बन जाता है। उसी से सूर्य और पृथ्वी के बीच अति महत्वपूर्ण आदान-प्रदान चलते रहते हैं।
पति पत्नी का स्थूल कार्य क्षेत्र में घर परिवार की छोटी सीमा में सीमाबद्ध प्रतीत होता है पर वस्तुतः उसका कर्तव्य और उत्तरदायित्व, समाज, राष्ट्र और विश्व की सुविस्तृत सीमाओं का स्पर्श करता है। सूर्य पृथ्वी का पोषण करता है पर उतने एक सीमित नहीं है वह अन्य ग्रह उपग्रहों को भी अपने अनुदान देता है और अनन्त आकाश को अपनी सामर्थ्य से प्रभावित प्रकाशित करता है; यही बात पृथ्वी की भी है वह सूर्य की अनुचरी तो है। पर अपने शिशु चन्द्रमा सहित सुविस्तृत प्रभाव क्षेत्र अपने अनुदान बखेर कर ब्रह्मांड व्यापी आदान-प्रदान प्रक्रिया के निर्वाह का पूरी तरह ध्यान रखती है। न सूर्य न पृथ्वी कोई किसी के लिए सीमित नहीं होते यद्यपि कर्तव्य पालन में कोई त्रुटि भी नहीं रहने देते ।
जिस तरह पृथ्वी का वायुमण्डल सैकड़ों मील तक फैला हुआ है उसी तरह सूर्य का वायव्य कवच लाखों मील तक फैला हुआ है। सूर्य का पीलापन लिए जो प्रभामंडल दूरबीनों से दीख पड़ता है वह उसके इर्द गिर्द का 6000 मील का आवरण वर्ण मंडल हैं। इसके बाद एक और क्षीण आलोक हैं यह एक लाख मील विस्तार का है इसे सूर्य किरीट कहते हैं। इस किरीट आवरण की हलचलें और आगे बढ़कर लाखों मील एक देखी गई है।
सूर्य के वर्ण मण्डल में कई बार आग की अत्यन्त विशालकाय लपटें सूर्य से अलग स्वतंत्र रूप से उड़ती और शून्य में विलीन होती देखी जाती हैं। वे जिधर भी जाती होंगी उधर अन्य ग्रहों से सम्बन्धित प्लाज्मा को प्रभावित करती होंगी,
विकिरण मेखलाओं को क्षेत्र इतना विशाल है कि उसकी व्याख्या मीलों तक नहीं की जा सकती है और न उन्हें किसी ग्रह विशेष की सम्पदा माना जा सकता है यह समस्त विश्व का एक संयुक्त वैभव है जिसमें सभी ग्रह उपग्रह सम्मिलित है।सूर्य मण्डल का कामनवैल्थ तो निश्चित रूप से इस शृंखला में मजबूती के साथ बँधा हुआ है ही। सूर्य को प्रसन्नता होती होगी कि उसकी परिपोषित पत्नी निखिल ब्रह्मांड को अपनी सत्ता से प्रभावित करती है और स्वतंत्र स्वावलम्बी बनकर अपने प्रखर एवं परिपक्व अस्तित्व का परिचय देती है। पति को इतना ही उदार होना चाहिए। अपनी पोषित को अपने उपभोग के लिए ही सीमाबद्ध नहीं करना चाहिए। क्षेत्र की व्यापकता होने से भी उनके परस्पर प्रेम और आकर्षण में किसी प्रकार की कमी नहीं आती।
पति अपना सारा उपार्जन अनुदान पत्नी को ही दे दे और अन्यान्य कर्तव्यों का पालन करने के लिए कुछ भी शेष न रखे यह आवश्यक नहीं। आवश्यकता के अनुरूप आदान-प्रदान ही उचित है। समूचा आधिपत्य-अधिकार तो संकीर्ण होना और संकीर्ण बनाना ही कहा जायगा। पृथ्वी ओर सूर्य में से कोई भी ऐसा अनुदान नहीं है।
सूर्य की गर्मी और रोशनी जो ब्रह्मांड में चारों और बिखरती रहती है उसका दो करोड़वाँ भाग ही पृथ्वी को मिलता है। यह थोड़ी सी सम्पदा ही पृथ्वी को जीवन प्रदान करती है। यदि इसकी थोड़ी सी सम्पदा में थोड़ी? सी भी कमीवेशी पड़ जाय तो लेने के देने पड़ जायें। गर्मी बढ़ते ही धरती की परत झुलस जाय और थोड़ी कमी पड़ जाय तो सब कुछ शीत से अकड़ कर ठंडा हो जाय। ग्रहण और प्रदान में औचित्य का ध्यान रखा ही जाता है।
पृथ्वी के पास एक से एक बढ़ी चढ़ी शक्तियाँ है उनमें एक अति महत्वपूर्ण है- गुरुत्वाकर्षण। इसी के आधार पर वह सौर परिवार के साथ अपना सम्बन्ध संतुलन बनाये हुए है। इसी के कारण उस पर रखे पदार्थ और प्राणी उछल कर अनंत आकाश में उड़ जाने से बचे रह सकते हैं। यह गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी को सूर्य से मिला स्नेह, सौजन्य सद्भाव ही कहा जायेगा। यदि वह उसका सही उपयोग कर सकें तो पृथ्वी के समान ही अपने सुविस्तृत संपर्क क्षेत्र को सुसंतुलित बनाये रह सकता है।
न्यूटन द्वारा प्रतिपादित ‘आकर्षण नियम’ की अभी भी पूरी तरह व्याख्या नहीं हुई है। उसका एक अंश ही जाना जा सका है। गुरुत्वाकर्षण क्यों है? क्या है? किस तरह है? जैसे प्रश्नों का उत्तर देने में न्यूटन ने अपनी अनभिज्ञता प्रकट की थी अभी वे प्रश्न जहाँ के तहाँ है। इस बीच कुछ नई खोजें जमा हुई हैं। समान आवेश वाले कणों का परस्पर धकेला जाना ओर विपरीत आवेश वालों का आपस में खिंचना। यह विद्युत चुम्बकीय बल हैं। आइन्स्टीन ने इस बल को फोटोन नामक अणु अंश द्वारा निःसृत सिद्ध किया है। जर्मन खगोल वेत्ता मिलिगेट और अंग्रेज वानी पोल डिराक ने यह संभावना व्यक्त की कि हो न हो गुरुत्वाकर्षण इसी विद्युत चुम्बकीय बल का स्थूल रूप है। इन्हीं 40 वर्षों में परमाणु के भीतर एक सौ से भी अधिक सूक्ष्म कण खोजे जा चुके हैं। उन्हें परस्पर बाँधे रहने की क्षमता सम्पन्न एक नया नाभिकीय बल खोजा गया है। अनुमान यह लगाया गया है कि विद्युत चुम्बकीय बल का केन्द्र यह नाभिकी सत्ता है जो विकसित एवं विस्तृत होकर गुरुत्वाकर्षण का रूप धारण करती है।
अपने शोध निष्कर्षों का निर्णय यह है कि गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी का अपना उपार्जन नहीं है वह सूर्य का ही अजस्र अनुदान है जो पृथ्वी ने अपने भीतर मजबूती के साथ गहराई तक जकड़ पकड़ लिया है।
ऐसी ओर भी अनेक शक्तियाँ है। धरती पर बिखरा पड़ा जीवन भी सूर्य का ही अनुदान है। अदृश्य आकाश में वायु, विद्युत, रेडियो विकिरण आदि न जाने क्या-क्या भरा पड़ा है। चुम्बकत्व और प्रकाश को भी इसी प्रकार के सूर्य द्वारा पृथ्वी को दिये गये उपहार कहा जा सकता है।
इस संसार में तीन प्रकार की चुम्बकीय शक्तियाँ काम कर रही है। (1) प्राणि चुम्बक (2) धातु चुंबक (3) पृथ्वी चुंबक। इन तीनों की त्रिविध शक्तियाँ इस संसार में विभिन्न प्रकार की हलचलों को जन्म देती और उनमें रूपांतरण प्रस्तुत करती है।
प्राणि चुम्बक वह है जिसके आधार पर एक प्राणी अपनी भौतिक एवं आत्मिक विशेषताओं का एक दूसरे के साथ आदान प्रदान करता है। संगति प्रभाव से लेकर प्रजनन प्रक्रिया तक में इस का चमत्कार देखा जा सकता। इसके अंतर्गत मनोबल, साहस, शौर्य, पराक्रम, तेजस्विता, ओजस् आत्मबल जैसी विशेषताएं आती हैं, रूप सौंदर्य के आकर्षण भी इसी से जुड़े हुए है एक दूसरे के निकट आने और दूर हटने की अविज्ञात हलचलें भी आधार पर होती रहती है। शाप, वरदान, सिद्धि चमत्कार और अतीन्द्रिय चेतना को भी इसी परिधि में लिया जा सकता है।
प्राणि विद्युत पर पिछली शताब्दी में गहरी खोजें हुई है। थियो फ्रास्टस्पैरा सेल्सस, वान हेलमान्ट स्काचमेंन मैक्स वेल, मैस्मर सैटामेली, कान्स्टैट पुसिगर, ला फान्टेन्ट आदि विद्वानों ने इस संदर्भ में गहरे अन्वेषण किए है। और सिद्ध किया है कि मनुष्य की शरीर गत और मनोगत विद्युत शक्ति न केवल व्यक्तित्व को उठाने गिराने में वरन् दूसरों को सहायता देने में भी बहुत बड़ी भूमिका प्रस्तुत कर सकती है। इस विज्ञान का इलेक्ट्रो वायोलजिकल्स् के रूप में मान्यता मिली और उस पर गहरे अनुसंधान हुए। डा0 डुरान्ड डे ग्रास और डा0 लीवाल्ट ने इस शक्ति का चिकित्सा शास्त्र में सफल प्रयोग किया, स्टैटिक इलेक्टि सिटी का वैसा ही प्रयोग जीवित प्राणियों की शारीरिक और मानसिक क्षमता सुव्यवस्थित करने के लिए किया गया जैसा कि वस्तुओं के हेर-फेर में सामान्य बिजली का प्रयोग किया जाता है। उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव चुम्बक के केन्द्र माने जाते हैं वहाँ से निसृत होने वाली विद्युत धाराएं धातुओं को प्रभावित करती है। यह शक्ति रासायनिक पदार्थों के रूप में परस्पर संमिश्रण के द्वारा नवीन योगिकों का सृजन करती है। अणुओं को उनके अवयवों के साथ सटाये रहती है। बिजली की उत्पत्ति का केंद्र यही है। खदानें इसी आधार पर जमा होती है और भी बहुत कुछ इसके द्वारा होता है। कम्पास की सुई का सिरा सदा उत्तर की ओर रखने में यही धातु चुम्बक ही काम करता है।
धरती को सूर्य से मिला एक उपहार है प्रकाशं इसकी अनेकों धाराएं हैं। इन धाराओं में एक का नाम है ‘लेसर’। इसकी खोज कुछ ही समय पूर्व हुई है। वैज्ञानिक इसके आधार पर बड़ी बड़ी आशाएं लगा रहें हैं। और उसे अणु शक्ति हाइड्रोजन शक्ति से भी बड़ी मानकर करतल गत करने का प्रयत्न कर रहे हैं।
आमतौर से प्रकाश रश्मियाँ जैसे जैसे आगे बढ़ती हैं, फैलती चली जाती है। अस्तु दिन-रात जाने से कुछ दूर जाकर उनका अस्तित्व समाप्त हो जाता है। साधारण प्रकाश यदि चन्द्रमा की दूरी ढाई लाख मील तक फेंका जाय तो वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते वह पच्चीस हजार मील चौड़ा हो जायगा।
लेसर किरणों की विशेषता उनके सीधे चलने में हैं वे अपनी निर्धारित दिशा में ही बढ़ती है और इधर उधर नहीं छितराती। इसी विशेषता के कारण उनके कम्पन ज्योँ के त्यों बने रहते हैं। अन्य प्रकाश दूरी के अनुपात से अपने रंग बदलते रहते हैं, पर लेसर किरणें अपना मूल रंग ज्यों का त्यों बनाये रहती हैं।
आमतौर से प्रकाश तरंगें अलग अलग लम्बाई की होती है, उनसे मिलकर दृश्यमान प्रकाश बनता है। सबसे बड़ी तरंगों को लाल और सबसे छोटी को बेंजनी रंग की माना जाता है। बल्ब हो या मोमबत्ती सभी प्रकाश इन्हीं बड़ी छोटी तरंगों से मिलकर बने होते हैं। प्रत्येक तरंग की एक आवृत्ति होती है। इन आवृत्ति पुंजों का संयुक्त स्वरूप प्रकाश के रूप में दृष्टिगोचर होता है।
‘लेसर’ अपने ढंग का अनोखा प्रकाश है। उसकी सभी तरंगें एक ही आवृत्ति की होती हैं। प्रत्येक तरंग एक दूसरे के समानान्तर चलती है। उनमें तनिक भी कालान्तर नहीं रहता। साधारण प्रकाश चारों ओर फैलता है। किन्तु लेसर एक दिशा में चलता है यही वह विशेषताएं है जिनके कारण वह अन्य प्रकाशों की तुलना में अत्यधिक शक्तिशाली सिद्ध हो सका।
लेसर की सभी किरणें एक दूसरे का साथ देती है फलस्वरूप उनकी शक्ति भी उसी अनुपात से बढ़ती जाती है। एक सेन्टीमीटर के दस हजारवें भाग जितनी छोटी जगत पर लेसर किरणें एकत्रित की गई तो उनकी गर्मी एवं चमक सूर्य को भी मात देने वाली बन गई। कुछ वर्ष पूर्व पृथ्वी से ढाई लाख मील दूरी पर घूमने वाले चन्द्रमा पर लेसर प्रकाश की टार्च फेंकी गई थी। उसने एक सेकेंड में इतनी लम्बी यात्रा पूरी करली और दो मील क्षेत्र को प्रकाश से भर दिया। लेसर की सहायता से घने अन्धकार में आवश्यक चित्र लिए जा सकते हैं और अधिक से अधिक एवं छोटी से छोटी दूरी तक उसे भेजा जा सकता है। देखते देखते एक फुट मोटी लोहे की चद्दर में छेद किया जा सकता है।
लेसर सुविधाओं से युक्त छड़ी अब बनने जा रही है। जो अंधों के लिए आँखों का काम देगी। उसे हाथ में लेकर वे चलेंगे और जानते रहेंगे कि उनके मार्ग में कितनी दूरी पर क्या बाधा है।
विभिन्न प्रयोजनों के लिए पृथ्वी से अंतरिक्ष में कितने ही उपग्रह भेजे जाते रहते हैं। इनकी कक्षा तथा चाल सुधारने के लिए इन किरणों का प्रयोग होने लगा हैं। आकाश में उड़ने वाले किसी भी शत्रु पक्ष के विमान अथवा उपग्रह को जलाकर भस्म कर देना इन किरणों की सहायता से अब बहुत ही सरल हो गया हैं। छोटे से छोटे काम यहाँ तक कि सिगरेट जलाने की जेबी माचिस बक्स तक इन्हीं किरणों से बनने लगे हैं।
पृथ्वी का लाड़ला पुत्र मनुष्य अपने पुरुषार्थ से उपार्जित ऊर्जा को आवश्यकता से कम अनुभव कर रहा है। उसे नये शक्ति स्रोतों की आवश्यकता पड़ रही है। इसके लिए उसे पिता सूर्य के आगे ही हाथ पसारना पड़ेगा। वह अपनी पत्नी पृथ्वी का और उसकी संतान का पालन करने में कभी भी कंजूसी बरतने वाला नहीं हैं।
संयुक्त राष्ट्र संघ की संग्रहित सूचनाओं के अनुसार संसार में ऊर्जा का उपयोग अत्यधिक तेजी से बढ़ रहा है। इसकी पूर्ति पैट्रोल, गैस, कोयले एवं बिजली से न हो सकेगी। अणु ऊर्जा की बात भी वन नहीं पड़ रही क्योंकि उससे उत्पन्न विकिरण को नियंत्रित करने का कोई निश्चित मार्ग निकल नहीं पाया है। ऐसी दशा में सूर्य ऊर्जा ही निरापद प्रतीत होती है।
ब्रिटेन के नोबुल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सर जार्जपार्टर ने कहा है कि विश्व में ऊर्जा आवश्यकता जिस तेजी से बढ़ रही है उसकी पूर्ति सूर्य किरणों के अतिरिक्त और किसी प्रकार से नहीं हो सकती।
परमात्मा शक्ति का पुँज है वह अपनी पत्नी आत्मा की उसके परिवार की सभी आवश्यकताएं पूरी कर सकता है। जैसा की सूर्य पृथ्वी की उसकी संतान की आवश्यकताएं पूरी करने के लिए वचन बद्ध है। पर इसके लिए वैसे ही घनिष्ठ संपर्क की आवश्यकता है। जैसा कि पृथ्वी ने सूर्य के साथ बनाया हुआ हैं ।
जीवन की तरह आकाश भी असीम और अनन्त सत्ताओं और सम्भावनाओं से भरा है। इसका सामान्य स्वरूप ही मोटे साधनों से देखा समझा जा सकता है। आँखों की शक्ति बहुत स्वल्प है वह पीछे की चीजों को बिल्कुल नहीं देख सकती- दाँया बाँया भी थोड़ा सा ही दीखता है। चार दिशाओं में से सही रीति से वह केवल एक ही सामने वाली दिशा में देख पाती है। सो भी एक सीमित फासले तक और सीमित आकार तक। चर्म-चक्षुओं से सामने प्रस्तुत संसार को भी पूरी तरह नहीं देखा जा सकता तो अन्तः क्षेत्र में काम करने वाली सत्ताओं के देखने समझने में उनसे क्या सहायता मिल सकती है? आत्मा परमात्मा अन्तःकरण और अन्तर्निहित दिव्य सत्ताओं को देख समझ सकना चर्म-चक्षुओं का नहीं ज्ञान चक्षुओं का काम है।
जीवन की तरह आकाश की भी असीमता है- उसका अधिकाँश आँखों की पकड़ से बाहर है। ज्ञान चक्षुओं की तरह आकाश का पर्यवेक्षण करने के लिए भी विशिष्ठ उपकरण चाहिए। यह उपकरण दूरबीन है। इस साधन को जितना जितना विकसित किया जा सका है उसी अनुपात से आकाश सम्बन्धी जानकारियाँ बढ़ती चली आई हैं। खगोल विद्या की उपलब्धियों का श्रेय इन दूरबीनों को दिया जायगा जैसा कि आत्म विद्या की उपलब्धियों का श्रेय ज्ञान चक्षुओं की पैनी दृष्टि को मिलता रहा हैं।
मेला-ठेला या प्राकृतिक दृश्यों को देखने के लिए पर्यटकों को गले में लटकती हुई दो नाली वाली दूरबीनों का जिक्र नहीं हो रहा है। इन्हें तो मनोविनोद के लिए अथवा दूर दृश्यों को अधिक समीप से दिखाने वाले ‘बाइनोक्यूलर टेलिस्कोप’ कहते हैं। फौजी उद्देश्यों के लिए उनसे कुछ सुधरे हुए टेलिस्कोप काम में आते हैं।
आकाश की छीन बीन करने के उद्देश्य से गैलीलियो ने सबसे पहली दूरबीन सं0 1609 में बनाई थी। वह वस्तुओं को सिर्फ तीस गुना बड़ा दिखाती थीं उन दिनों इतना भी बहुत था। सूर्य के धब्बे, चन्द्रमा के पहाड़ बृहस्पति चार चाँद उससे भी देख लिए गये थे।
अमेरिकी खगोल वेत्ता एल्लरी हाले ने 1936 में सौ इंच व्यास की दूरबीन बनाई जिसे विल्सन पर्वत पर स्थापित किया गया। इससे 60 करोड़ प्रकाश वर्ष तक आकाशीय ज्योति पिण्ड देखे जा सकते थे। इसके बाद हाले ने 200 इंच व्यास की दूरबीन बनाने का काम हाथ में लिया जो उनकी मृत्यु के 10 वर्ष बाद पूरा हो सका। इसे 1948 में पालोमर पर्वत पर स्थापित किया गया। बहुत समय से वही संसार की सबसे बड़ी दूरबीन होने का गौरव प्राप्त करती रही।
सोवियत रूस इस क्षेत्र में भी अमेरिका से बाजी मर ले गया उसने 238 इंच व्यास वाली दूरबीन बनाई और उसे सेमिकोदनिकी पर्वत पर स्थापित किया। अमेरिकी दूरबीन 450 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर तक प्रकाश को दिखा सकती है तो रूसी दूरबीन 7 अरब प्रकाश दूरी के दृश्य आँखों के सामने लाकर खड़े कर देती है।
इस बड़ी दूरबीन से दस हजार किलो मीटर पर खड़ा हुआ मनुष्य ऐसा दिखाई पड़ेगा मानो बीस मीटर की दूरी पर खड़ा है। इतनी दूरी पर कोई माचिस की तीली जलायें तो इसकी सहायता से वह प्रकाश भी साफ दिखाई देखा। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि हमारी आँखों की तुलना में इस अमेरिकी दूरबीन की ताकत दस लाख गुनी और रूसी दूरबीन की तीस लाख गुनी अधिक है।
दूरबीन का काँच बनाना बहुत ही मुश्किल काम है। उन्हें घिसना, पालिश करना इतना नाजुक है कि एक धूलि का कण भी आड़े आ जाय तो सारी मेहनत बेकार हो जायगी। इतने घिसाव में 70 ग्राम काँच की एक परत उतारनी पड़ेगी और उस परिवर्तन से उस मशीन को फिट करने में नये सिरे से हेर-फेर करने पड़ेंगे। तक उस खरोंच को निकालने के लिए पूरे काँच पर से एक माइक्रोन की पूरी परत उतारनी पड़ेगी। रूसी दूरबीन 850 टन भारी है। इसका फोकस ठीक करने तथा दिशा घुमाने के लिए स्वसंचालित बिजली की मशीनें लगी हुई हैं।
ना तो सुविस्तृत आकाश की जानकारियाँ देने वाली दूरबीन बनाना सरल है और न अंतर्दृष्टि को विकसित करना। यह दोनों ही बड़े प्रयत्न और मनोयोग के सहारे विनिर्मित होती है उनके लिए उपलब्ध साधनों को भी झोंकना पड़ता है। किन्तु इस उपलब्धि में जितनी सफलता मिलती है उतनी ही सशक्तता हाथ लगती है। अन्तर्ग्रही उड़ानों की सम्भावना इन दूरबीनों के कारण ही सम्भव हुई हैं। भविष्य में मनुष्य विश्व ब्रह्मांड पर जितना आधिपत्य स्थापित कर सकेगा उसमें भी योगदान इन दूरबीनों का ही रहेगा। अन्तःचेतना की ज्ञान वृद्धि ही मानव जीवन के असीम विकास का पथ प्रशस्त करती है।
दृष्टिगोचर होने वाले अनन्त आकाश को प्राचीन खगोल वेत्ताओं ने बारह भागों में बाँटा है, जिन्हें बारह राशियाँ कहते हैं। कौन सा ग्रह नक्षत्र किस समय कहाँ है इसका निर्धारण राशि क्षेत्र का विभाजन किए बिना हो ही नहीं सकता। जिस प्रकार अंक गणित में 9 तक के अंक और एक शून्य की मान्यता स्थिर कर लेने के उपरान्त ही गाड़ी आगे चलती है उसी प्रकार खगोल विद्या में आकाश का विभाजन कर लेने पर ही किस ग्रह की स्थिति कब कहाँ कैसी थी या होगी इसका आधार खड़ा किया जा सकता है।
बारह, महीने, सूर्य की तरह राशियों के हिसाब से बने है। एक महीने सूर्य एक राशि पर रहता है। बारह महीनोँ में यह वर्ष प्रदक्षिणा पूरी हो जाती है। यों प्रदक्षिणा पृथ्वी की ही होती है और सूर्य का स्थान बदलना वस्तुतः पृथ्वी के स्थान बदलने की प्रतिक्रिया रूप से ही परिलक्षित होता है। तो भी इससे सूर्य की राशि कक्षा निर्धारित करने में कुछ अन्तर नहीं पड़ता।
आकाश को देखकर राशियों का क्षेत्र विभाजित करने का क्रम उन चिन्हों के आधार पर निरूपित किया गया है। जो चिरस्थायी बने रहते हैं और जिनकी मूल स्थिति में अन्तर नहीं आता। यह चिन्ह आकाश स्थित निहारिकाओं के रूप में स्थिर किये गये है। निहारिकाओं के अब तो नाम भी दे दिए गये हैं। प्राचीन काल में इन्हें आकृतियों की समतुल्यता का आधार पर पहचाना जाता था। यह पहचान ऐसी है जिसमें भूल होने की कम से कम सम्भावना है।
खगोलवेत्ता बराह मिहिर ने अपने वृहज्जातक ग्रन्थ में बारहों राशियों की आकृतियों का निर्धारण किया हैं। यूनानी ज्योतिषी भी प्रायः उसी से मिलती जुलती मान्यता रखते रहे हैं। अब नवीनता ज्योतिषी विज्ञान ने राशियों का क्षेत्र विभाजन जिन निहारिकाओं को मील के पत्थर मानकर किया है उन्हें भी आकृति की दृष्टि से पुराने ज्योतिष शास्त्र की तुलना में ही लिया जा सकता है।
वैदिक पंचांग में मेष राशि को सींग वाले मेढें की आकृति का माना है। निहारिका एन0जी0सी0 4449 का फोटो भी इसी आकृति का है। वृष राशि का सींगों वाला साँड़ निहारिका ‘ओरायन’ से बिल्कुल मिलता है। कर्क निहारिका एम॰ 17 केकड़े की आकृति जैसी ही है। कन्या को नाव पर बैठी एक लड़की के रूप में अंकित किया जाता है यह एन0जी0सी0 4594 के चित्र से मिल जाती है। धनु राशि को आधा घोड़ा और आधा धनुर्धर मनुष्य अंकित किया गया है और एन0जी0सी0 6618 निहारिका से बिल्कुल मिलता जुलता है। मकर राशि को मगर की आकृति का माना गया है यह एन0जी0सी0 7479 से बिल्कुल मिलती है। कुम्भ घड़े की आकृति है। यह एन॰ जी0सी0 7293 की छवि है। मीन की आकृति दो तैरती हुई मछलियों जैसी है जिनका मुख एक दूसरे की पूँछ की तरफ है। यह निहारिका एन॰ जी0सी0 253 से पूरी तरह मेल खाती है।
इस प्रकार आठ राशियों का आकृति निहारिकाओं के चित्रों से मिल जाती है। शेष चार की आकृति इसलिए नहीं मिलती कि उस क्षेत्र की निहारिकाएं बहुत विरल है और उनके फोटो उतने स्पष्ट नहीं आते। इन दिनों जितने अन्तर्ग्रही ही स्पष्ट चित्र खींचने वाले कैमरे उपलब्ध है उतना कार्य प्राचीन काल में खुली आँखें नहीं कर पाती थी।
यूनानी पंचांगों में भी लगभग भारतीय पंचांगों की तरह ही राशियों की आकृतियाँ अंकित की गई है। राशि चित्रों को बहुत समय तक कपोल कल्पना समझा जाता रहा है, पर अब विकसित खगोल विज्ञान ने यह स्वीकार कर लिया है कि इस चित्रण के पीछे निहारिकाओं को मील के पत्थर मानकर उनकी आकृतियों के साथ संगति मिलाते हुए राशियों का चित्राँकन किया गया है।
निहारिकाओं के अतिरिक्त राशि क्षेत्रों में विशेष रूप से चमकने वाले तारों को मिलाकर देखने से भी लगभग उसी प्रकार की आकृति बन जाती है जैसी की राशियोँ की भारतीय पंचांगकर्ताओं ने अंकित की है।
पंचाँगों में राशियों की आकृतियाँ छपी है। मेष- मेढ़ा- वृष बैल - मिथुन, पति-पत्नी-कर्क, केकड़ा-सिंह, सिंह-कन्या, नाव में बैठी कन्या-तुला, तराजू- वृश्चिक, बिच्छू-धनु, घोड़े और मनुष्य का धनुर्धारी शरीर- मकर, मगर- कुम्भ, घड़ा-मीन, मछली। इन आकृतियों को तुलनात्मक समझना चाहिए। आकाश को बारह भागों में विभाजित करके उसके एक-एक क्षेत्र में अवस्थित प्रमुख तारागणों के देखने पर किस आकृति का आभास मिलता है, इसी आधार पर उपरोक्त राशि चित्र बनाये गये है। यह मान लेना भूल होगी कि आसमान में मेढ़ा, बैल, सिंह, मगर, मछली आदि प्राणी निवास और भ्रमण कर रहे है।
ठीक इसी प्रकार देवी-देवताओं का चित्रांकन समझा जाना चाहिए। उस आकृति-प्रकृति के कोई जीवधारी देवता अमुक स्थान पर, अमुक प्रकार का जीवनयापन करते होंगे जो ऐसा समझते हैं वे भूल करते हैं। वस्तुतः विभिन्न शक्तियों और विभिन्न चेतनाओं की क्षमताओं और सम्भावनाओं को ध्यान में रखकर उनकी अलंकारित प्रतिमाएँ गढ़ ली गई है। इस गढ़ने की प्रक्रिया को बालबोध कह सकते हैं। छोटे बालकों का आरम्भिक कक्षा में अ-अमरूद, आ-आम, इ-इमली, ई-ईख आदि आकृतियाँ दिखाकर अक्षर बोध कराते हैं, उसी प्रकार संघ शक्ति को दुर्गा, धन शक्ति को लक्ष्मी, ज्ञान शक्ति को सरस्वती आदि अलंकारिक प्रतिमाएँ गढ़ कर यह बताया गया है वह सभी भौतिक और आत्मिक शक्तियाँ उपलब्ध करने योग्य है।
राशियों की आकृतियाँ न तो अनावश्यक है और न भ्रान्त। वस्तुस्थिति समझाने का यह प्रतीक निर्धारण अलंकार है। इससे समझना सरल पड़ता है। दिव्य शक्तियों के देव सत्ता के रूप में चित्रित किया जाना भी इसी स्तर का है। उनकी पूजा प्रक्रिया में अप्रत्यक्ष रूप में उन चेष्टाओं का संकेत है जो उन विभूतियों को उपलब्ध कराने में सहायक होती है। आकाश खोजने के लिए दूरबीन आवश्यक है और जीवन सत्ता की असीम सम्भावनाओं को समझना तथा उस दिशा में प्रगति करने का आधार हमारी सूक्ष्म दृष्टि ही हो सकती है। शंकर का तृतीय नेत्र, मनुष्य का आज्ञाचक्र इसी ज्ञान-चक्षु उन्मूलन की आवश्यकता का संकेत करते हैं।
अल्जीरिया की मडामनेपियर के पास एक कुत्ता था। वह नित्य ही एक झोला मुँह में लटका कर जाता। डबलरोटी वाला गिनकर बारह डबलरोटी उसमें रख देता और वह ले आता। कुछ दिन से ग्यारह ही रोटियां आने लगी। मालिक ने दुकानदार से पूछा। मालूम पड़ा कि मैं तो बारह ही रखता हूँ। तब कुत्ते की छिपकर जाँच की गई। पाया गया कि बाहर एक बीमार कुतिया है। एक रोटी नित्य वह झोले में से उसे ही दे आता है। तब तेरह रोटियाँ भेजने का कहा गया। घर पर बारह रोटियाँ पहुँचने लगी। कुछ दिन बाद घर पर तेरह रोटियाँ पहुँची। तब फिर पता लगाया गया और पाया गया कि वह कुतिया अब चलने-फिरने योग्य हो गई है और अपना भोजन स्वयं जुटा लेती है।
काश! छल, बेईमानी, स्वार्थपरता तथा अविश्वास की ओर दौड़ता हुआ मानव इन निरीह प्राणियों से ही कुछ सीख सकता है।
व्यक्ति और समाज, शरीर और उसके अंगों के सदृश है दोनों परस्पर पूरक है, एक के बिना दूसरे का स्थायित्व सम्भव नहीं है। आपसी सहयोग आवश्यक है।
मनुष्य की समाज के प्रति एक जिम्मेदारी है जिसके बिना समाज सुव्यवस्थित नहीं बन सकता है।
इसे हम मनुष्य शरीर के उदाहरण द्वारा भली-भाँति समझ सकते हैं। मनुष्य शरीर के विभिन्न अंग यदि अपना काम करना छोड़ दे तो शरीर शिथिल एवं जर्जर हो जायगा, शरीर को सुदृढ़ और बलिष्ठ बनाने के लिए प्रत्येक अंग का कार्यरत एवं क्रियाशील होना अत्यावश्यक है, ठीक यही दशा समाज के लिए आवश्यक है समाज को समुचित स्थिति में रखने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने उत्तरदायित्व को निभाने के लिए क्रियाशीलता अपेक्षित है।
भिन्न अंगों के भिन्न ढंग से कार्य करने पर एक असहयोग की अवस्था पैदा होगी। तब शरीर की दशा अत्यन्त शोचनीय हो जायेगी। शरीर एक मशीन के समान है जिसके सारे पुर्जे यथास्थान फिट रहकर कार्य करते हैं यदि एक पुर्जा बिगड़ जाय तो सारी मशीन ठप्प हो जाती है, इसी प्रकार शरीर और समाज की भी दशा है।
व्यक्ति का स्वार्थमय जीवन भी समाज के लिए अत्यंत दुःखदायी है जो समाज के लिए पापपूर्ण है। इस दशा में समाज का सदस्य सुखी नहीं रह सकता है, समाज में शक्ति सम्पन्नता और उसका विकास पूर्णतया असम्भव है।
यदि किसी व्यक्ति ने अपनी उन्नति या विकास कर लिया; किन्तु उससे समाज को कोई लाभ न मिला तो उसकी सारी उपलब्धियाँ व्यर्थ है। जिस प्रकार जंगल में किसी सुगन्धित और मनमोहक पुष्प का खिलकर मुरझा जाना, क्योंकि उसके सौंदर्य एवं सुगन्धि का किसी ने भी लाभ नहीं उठा पाया अतः प्रमाणित है कि व्यक्ति की मर्यादा समाज में ही अपेक्षित है।
संकुचित और स्वार्थी व्यक्ति समाज का शोषण एवं अहित करते हैं। इस तरह के व्यक्ति समाज के घातक शत्रु होते हैं जो सदैव समाज में असहयोग की भावना फैलाते हैं और उसमें अनेक अव्यवस्थाएँ उत्पन्न करते हैं।
ऐसे व्यक्ति समाज को पतन के गर्त में ले जाते हैं। इस प्रकार के व्यक्ति अविश्वास, छली, सन्देहास्पद, भ्रष्ट, लूट-खसोट करने वाले एवं झगड़ालू होते हैं और ये स्वार्थी एवं व्यक्तिवादी विचारधारा के कारण, समाज में पैदा होते और पनपते हैं।
स्वार्थपरता को समस्त पापों की जननी समझना चाहिए। अतः सुखी और सम्पन्न समाज तभी निर्मित हो सकता है जब मानव व्यष्टिवादी विचारधारा छोड़कर समष्टिवादी बने इसी में समाज का कल्याण है और व्यक्ति का भी हित है। समाज में पारस्परिक हमदर्दी, आपसी मदद, प्रेमभावना, उदारता, सेवा एवं संगठन की भावनाएँ अत्यन्त आवश्यक है तभी समाज का विकास और समृद्धि सम्भव है।
समाज में व्यक्ति का सबसे महान दायित्व समाज कल्याण एवं परमार्थ है। समाज के दीन-हीन अपंग, वृद्ध, जर्जर एवं निराश्रित व्यक्तियों की सेवा-सुश्रूषा एवं पालन करना व्यक्ति का एक महान दायित्व है।
दूसरों के प्रति प्रेम, सहयोग, सहायता, त्याग और सहानुभूति की भावना के अभाव में जो व्यक्ति, समाज के लिए हितकारी सिद्ध नहीं हो सकता है ऐसा व्यक्ति समाज के लिए कलंक है वह स्वयं ही अपने विकास को रोक देता है इससे समाज का विकास स्वतः ही रुक जाता है। अतः समाज की समृद्धि एवं विकास के व्यक्ति का दूसरों का कल्याण करना एवं परमार्थी बनना अत्यावश्यक दायित्व है।
जब हमारे घर पर आक्रमण होगा तब उससे भुगत लेंगे, ऐसा सोचना और निश्चिन्त रहना अदूरदर्शितापूर्ण है। विपत्ति जब घेर लेती है तब उसके नाखून इतने गहरे घुस चुकते हैं कि उन्हें निकाल सकना शपथ नहीं रहता। हिंस्र जन्तुओं का आक्रमण हो जाने के उपरान्त यह सोचना कि उसे परास्त करने का रास्ता ढूंढ़ लिया जायगा- अदूरदर्शितापूर्ण है। जब व्याघ्र के पैने नाखून अपने माँस में घुस चुके होंगे तब पीड़ा की छटपटाहट ही मस्तिष्क का सन्तुलन बिगाड़ देने के लिए पर्याप्त होगी। उस समय उपाय ढूंढ़ना और प्रतिकार करना उस तरह सम्भव ही न होगा जिस प्रकार दीर्घ सूत्री आलस्य ग्रस्तता की स्थिति में सोचा जाता रहा था। विपत्ति का सामना उसके आक्रमण से पहले ही करना चाहिए। सुरक्षा योजना इसी आधार पर बनती है और बननी चाहिए।
शरीर बीमार पड़ेगा तब उसकी चिकित्सा कर लेंगे, यह सोचने की अपेक्षा हमें स्वास्थ्य रक्षा के उन नियमों का पालन रुग्णता आने से पूर्व की करना आरम्भ कर देना चाहिए जो आरोग्य बनाये रहने के लिए आवश्यक है। आर्थिक संकट आयेगा तब उसका उपाय खोजेंगे अभी से क्या चिंता करे ऐसा सोचने वाले वृद्धावस्था तथा बीमारी एवं विवाह शादी के अवसर आने पर भारी असुविधा अनुभव करते हैं और उस विपत्ति से निकलने का रास्ता नहीं पाते। ऐसी स्थिति आने से पूर्व यही उचित है कि आय-व्यय का ऐसा सन्तुलन बनाकर चला जाय जिसमें थोड़ी बचत की भी गुंजाइश बनी रहे और कुसमय के लिए कुछ संग्रह होता रहे।
बढ़े हुए परिवार का पोषण, शिक्षण, स्वावलंबन बन न पड़े और बालक दुर्दशाग्रस्त जीवन जिये ऐसी स्थिति आने से पूर्व ही यह निश्चय करना चाहिए कि बच्चे उतने ही उत्पन्न किये जायेंगे कि जितने को सुविकसित बना सकने की अपने की सामर्थ्य है। समय से पूर्व जो नहीं चेतते उन्हें यथासमय सजग न होने की भूल पर सिर धुन कर पछताना पड़ता है। जवानी में शक्तियों का असंयमपूर्ण अनावश्यक क्षरण करने वाले असामयिक वृद्धावस्था से ग्रसित होते हैं और दुर्बलता, रुग्णता एवं अशक्तता का कष्ट भुगतते हैं। यदि वे समय रहते, चेते होते और भविष्य की सुरक्षा का ध्यान रखते तो उस विपत्ति से बच सकते थे जिसे प्रमाद ने उनके ऊपर लाकर थोप दिया।
उद्दण्ड आततायियों के अनैतिक आक्रमण जब अपन ऊपर होंगे तब देखा जायगा यह सोचना भूल है। जब उन्हें आक्रमण की सफलता प्राप्त करके ही उनके हौसले बढ़ते हैं। यह स्थिति पनपती रही तो समीपवर्ती क्षेत्र में पनपने वाली गुण्डागर्दी एक दिन अपने को भी लपेट में लिये बिना न रहेगी। इसलिए दूसरों पर हुए हमले को अपने ऊपर हुआ आक्रमण ही मानना चाहिए और आतंकवाद का मिल-जुलकर सामना करना चाहिए। अन्यथा अपराधी तत्व परिपुष्ट होकर अधिक बड़े दुस्साहस करेंगे और उनका क्षेत्र उतना ही बड़ा न रहेगा जितना आज है। तब उन आक्रमणकारियों के उपद्रव से अनेकों को संत्रस्त होना पड़ेगा। उन्हीं उत्पीड़न सहन करने के लिए विदेश हुए लोगों में एक गणना अपनी भी हो सकती है। ऐसी स्थिति न आने देने के लिए समय से पूर्व चेतना चाहिए और जहाँ भी गुण्डागर्दी बढ़ रही हो वही संगठित प्रतिरोध के लिए आगे बढ़ना चाहिए। भले ही उस समय अपने ऊपर सीधा हमला न हो रहा हो- भले ही तब कोई और ही उस आतंकवाद का शिकार हो रहा हो। आज यदि हम किसी आतंक पीड़ित की सहायता नहीं करते तो कल कोई दूसरा अपनी सहायता करने के लिए क्यों आयेगा तब हमें भी उसी प्रकार उत्पीड़ित होना पड़ेगा।
हमें ऐसी स्वस्थ परम्पराएँ पैदा करने के लिए आगे आना चाहिए कि आक्रमणकारी को यह अनुभव होता रहे कि उसे एक पर हमला करके उतने बड़े समूह का सामना करना पड़ेगा जो उसे कुचल कर छोड़े बिना न रहेगा। इतना भय उत्पन्न किये बिना आतंकवाद रोका नहीं जा सकता। पाँच गुण्डे मिलकर पचास हजारों की नाक में दम करने में आज जिस तरह सफल होते हैं भविष्य में भी उसी तरह होते रहेंगे।
मुहल्ले में लगी आग को बुझाने के लिए आगे बढ़ना मानवी कर्त्तव्य एवं परमार्थ की दृष्टि से तो आवश्यक है ही इसलिए भी उचित है कि स्वार्थ का भी यही उपाय है यदि मुहल्ले में लगी आग को निरपेक्ष होकर देखते रहे तो वे लपटें अपने घर को ही अगले क्षणों जलाकर नष्ट किये बिना न रहेंगी। जब अपना घर जलेगा तब बुझाने की बात सोचेंगे, दूसरों की मुसीबत में हम क्यों कूदे ऐसा सोचने वाले- अपने मतलब से मतलब रखने वाली नीति का दुष्परिणाम भोगते हैं और उससे कही अधिक हानि में रहते हैं जो उन्हें दूसरों की सहायता करते हुए उठानी पड़ती।
पड़ौस में जमे हुए कूड़े-करकट के ढेर सड़न पैदा करेंगे तो उससे अपने घर पर भी बीमारियों का आक्रमण होगा भले ही अपने यहाँ कितनी ही अधिक सफाई क्यों न रखी गई हो। गाँव, मुहल्ले में चोर, उचक्के रहते हो तो अपनी भलमनसाहत बनाये रहने से भी काम नहीं चलेगा। वे लोग तरह-तरह के उपद्रव करके अपनी शाँति प्रियता को नष्ट कर देंगे। इसलिए अपनी शाँति को स्थिर बनाये रहने की मोर्चाबन्दी उस पंक्ति पर खड़ी करनी चाहिए जिसके अनुसार गाँव के चोर, उचक्कों की हरकतें रोकी जा सके। पड़ौस में जमा कूड़े-करकट के ढेर को हटाने का उपाय सोचे बिना अपने घर की सफाई कर लेना सर्वथा अपर्याप्त है। आप अच्छे रहकर ही बच्चे को अच्छे नहीं बना सकते। स्कूल और पड़ोस के जिस संपर्क में वे आते हैं उसका वातावरण यदि न सुधारा गया तो लाख प्रयत्न करने पर भी अपने बच्चे उन बुरी बातों के शिकार हुए बिना न रहेंगे जो समीपवर्ती क्षेत्र में बेतरह फैली हुई है।
जीवन इतना छोटा नहीं है कि उसे सीमित परिधि में ही सुन्दर, सुव्यवस्थित बनाया जा सकें। इसके लिए बड़ी घेराबंदी की जरूरत है। वैयक्तिक उत्तमता का बढ़ाना अच्छी बात है, पर उसे पर्याप्त नहीं मान लेना चाहिए। मनुष्य समाज का एक अंग है यदि समाज में भ्रष्ट परंपराएं प्रचलित रहेंगी तो व्यक्ति विशेष की श्रेष्ठता से भी कुछ बात बनेगी नहीं। समाज में क्या हो रहा है- इसे देखे बिना और समाज में क्या होना चाहिए इसे सोचे बिना अपनी निज की उन्नति और शांति की स्थिरता सम्भव ही नहीं रह सकती।
हमें अदूरदर्शी नहीं होना चाहिए आज की ओर अपनी परिधि तक सुख शान्ति को सीमित नहीं करना चाहिए। समय से पूर्व चेतना चाहिए और सुरक्षा की परिधि अधिकाधिक विस्तृत करनी चाहिए। इस दूरदर्शिता को अपनाकर ही हम दूरगामी और व्यापक स्थिरता को सुरक्षित रख सकते हैं। चिन्तन की संकीर्णता को ही स्वार्थपरता कहा जाता है। जो लोग आज की - अभी की ही बात सोचते हैं और भविष्य की कठिनाइयों का ध्यान नहीं रखते वे अदूरदर्शी है। जिनने अपनेपन का दायरा निज के शरीर, परिवार तक सीमित रखा है वे स्वार्थी है अदूरदर्शी और स्वार्थी लोग दूर की बात सोच नहीं पाते और प्रगति के लिए जिस विस्तृत परिधि को ध्यान में रखना पड़ता है उसे देख नहीं पाते फलतः उसकी संकीर्ण स्वार्थपरता अन्ततः घाटे के व्यवसाय की तरह हानिकार ही सिद्ध होती है।
दूरगामी सत्परिणामों के लिए आज संयम बरतना या असुविधा सहना बुद्धिमत्तापूर्ण है। बीज गलता है तब वृक्ष के रूप में फलता है। किसान को साल भर कष्ट साध्य प्रक्रिया अपनाने को बाद फसल का लाभ मिलता है। विद्यार्थी भी वर्षों ज्ञान तप करके विद्वान बनकर पद वैभव पाते हैं। तुरन्त का लाभ यदि दूरगामी लाभ के लिए छोड़ा न जा सकें तो भविष्य को उज्ज्वल बनाने की संभावनाएं नहीं बन सकती। इसी प्रकार समूहगत स्वार्थ को व्यक्तिगत स्वार्थ का आधार न माना जा सकें तो सच्ची और स्थिर स्वार्थ सिद्धि भी सम्भव न हो सकेंगी। दूरदर्शिता और परमार्थ परायणता से ही अपना वास्तविक स्वार्थ सधता है इसलिए उसे परमार्थ के नाम से सम्मानास्पद एवं प्रशंसनीय भी ठहराया गया है।
शरीर पर मस्तिष्क की नियंत्रण है। शरीर रोगों का मोटा कारण आहार विहार का विकृति माना जाता है पर यह ध्यान रखने की बात है कि न केवल शरीर गत वरन् जीवन के सभी क्षेत्रों में बढ़ती जा रही विकृतियोँ का मूल कारण मानसिक विकृतियाँ ही होती है। असंयमी अस्त-व्यस्त व्यक्ति मानसिक दृष्टि से अविकसित होता है उसे अपने कलपुर्जों का अंग अवयवों का ठीक तरह उपयोग करना नहीं आता, फलतः वे टूट-फूट कर अवांछनीय विहार की सामान्य गड़बड़ियों से पीड़ित होते हैं वे औषधि लेने एवं परहेज करने से जल्दी ही अच्छे हो जाते हैं, पर जिनकी जड़े मस्तिष्क की गहराई में घुसी होती है वे शरीर चिकित्सा के अनेक साधन जुटाने पर भी अच्छे नहीं होते।
मानसिक रोगों में एक बहुत प्रचलित रोग है ‘हिस्टेरिया’। यों यह स्त्री पुरुष, बाल-वृद्ध किसी को भी किसी भी आयु में आरम्भ हो सकता है, पर उसका अधिक आक्रमण स्त्रियों पर होता है और उसके आरम्भ होने की आयु किशोरावस्था अथवा उसके बाद नव यौवन में प्रवेश करते समय की होती है। मस्तिष्क का शरीर पर से कुछ समय के लिए नियंत्रण टूट जाने और अचेतन में जमी विकृतियों का नंगा नृत्य दिखाने की अवाँछनीय स्थिति को हिस्टेरिया, अपस्मार, मृगी आदि नामों से पुकारते हैं।
हिस्टीरिया को एक किस्म का सामयिक एवं मानसिक पक्षाघात कर सकते हैं। साधारण लकवे में भी गड़बड़ी तो मस्तिष्क की ही होती है, पर उसमें सोचने की शक्ति का लोप नहीं होता। किन्तु शरीर के हाथ-पैर, मुँह आदि अन्य अंग भी प्रभावित होते हैं। परोक्ष में स्नायु संस्थान को जो आघात लगा हैं उसे यंत्रों द्वारा जाना, आँका जा सकता है। हिस्टीरिया की स्थिति इससे थोड़ी भिन्न होती है। उसका दौरा कुछ ही अच्छा हो जाता है। नाड़ी संस्थान की जाँच करने पर उसमें कोई खराबी प्रतीत नहीं होती। चेतना का पूर्ण लोप अथवा आँशिक व्यवधान दो ही बातें हो सकती है। पूरा दौरा पड़ने पर रोगी बेहोश होकर गिर जाता है। आग में जलने या गहरी चोट लगाने तक का पता नहीं चलता दाँत भिच जाते हैं, साँसें लम्बी चलती है, घबराहट जैसी आवाजें निकलती है, मुँह से झाग गिरता है, हाथ-पैरों में अकड़न तथा ऐंठन के लक्षण दीखते हैं। अधूरे दौरे में गिरने की नौबत नहीं आती। रोगी जो कर रहा था वही करता रहता है। दौरे से पूर्व हाथ जो कर रहे थे, पैर जिधर चल रहे थे उधर ही उनकी गति बनी रहती है। आँखें खुली रहने पर भी ठीक से देख नहीं पाती। इसी प्रकार कान जीभ आदि भी मस्तिष्कीय नियंत्रण, छूट जाने से अव्यवस्थित हो जाते हैं। दौरे के समय रोगी इच्छापूर्वक किसी अंग से काम नहीं ले सकता। इच्छा शक्ति तक गायब हो जाती है। मस्तिष्क न कुछ सोच सकता है और न कुछ करने का आदेश शरीर के किसी अवयव को दे सकता है। गिर पड़ने वाली और ऐंठन, अकड़न उत्पन्न करने वाली स्थिति तो यह नहीं है फिर भी मस्तिष्क और इन्द्रियों का सम्बन्ध विच्छेद तो हो ही जाता है। इन्हीं सभी लक्षणों की न्यूनाधिक मात्रा को सामयिक पक्षाघात कहा जा सकता है।
हिस्टीरिया का नामक करण डा0 हिपोक्रिट ने किया। वे इसे गर्भ कोष की गड़बड़ी मानते थे। ग्रीक भाषा में ‘हिस्टेरो’ गर्भाशय को कहते हैं। काम संवेदनाएं मन मस्तिष्क और जननेन्द्रिय को समान रूप से प्रभावित करती है। एक की स्थिति का प्रभाव दूसरी पर पड़ता है। अस्तु यह संगति मिलाई गई कि गर्भकोष की विकृतियाँ नाड़ी संस्थान के माध्यम से मस्तिष्क को प्रभावित करती है और उभार की स्थिति में दौरे पड़ते हैं।
गैलेन, फ्रायड वैविनोस्क होप आदि के मन विशेषज्ञों के अपने विचार है वे कहते हैं असंतोष से मानसिक संतुलन बिगड़ता है उसी की एक प्रतिक्रिया ‘हिस्टेरिया’ है। उनने इसका दोष कामेच्छा एवं दूसरी इच्छाओं की अतृप्ति के सिर थोपा है। शारकोट अर वैविनोस्की आदि विशेषज्ञ इसे भय की प्रतिक्रिया मानते हैं वे कहते हैं कि किसी घटना से अथवा कल्पना, आशंका से डरने वाला मनुष्य हिस्टेरिया का रोगी हो सकता है। शारकोट की खोजों में हिस्टेरिया ग्रसित रोगियों में दो तिहाई संख्या नव युवतियों की होती है और उनमें से अधिकाँश का मानसिक संतुलन दाम्पत्य जीवन की विसंगतियों के कारण बिगड़ा होता है। वे कहते हैं स्त्रियाँ प्रायः मानसिक दृष्टि से बहुत भावुक और कोमल होती हैं। दाम्पत्य जीवन संतुलित रहने पर वे जहाँ बहुत पुलकित पाई जाती है वहाँ उस संदर्भ में छोटे मोटे, आघात भी उन्हें तिलमिला देते हैं। यह असंतुलन कितने ही मानसिक रोगों को जन्म देता है। उन्हीं में से एक बहुत प्रचलित रोग हिस्टीरिया भी है।
शरीर विकास क्रम में कई बार तीव्र उभार आते हैं। शैशव पार करके किशोरावस्था में प्रवेश किशोरावस्था पर यौवन का नशा- जबानी में असंख्य उत्तरदायित्वों का लद जाना, प्रौढ़ावस्था से बुढ़ापे की गई गुजरी और जरा जीर्ण स्थिति का आधमकना जैसे परिवर्तन एक चलते ढर्रे में भारी व्यतिरेक उत्पन्न करते हैं अभ्यस्त स्थिति छोड़कर अनभ्यस्त में प्रवेश करना पड़ता है। इससे कई उलझने और कई उत्तेजनाएं पैदा होती है। यदि व्यक्ति में साहस का अभाव है तो इस प्रकार आगे धकेले जाने और पिछले प्रिय के छिनने से उसे असुविधा होती है और डर लगता है। इस स्थिति में उत्पन्न हुई उलझनें मानसिक विक्षोभ उत्पन्न करती है और उनके कारण कई अटपटे रोग उत्पन्न होते हैं। जिन्हें ‘प्रिडिस्पाजिंग संज्ञा दी जाती है।
ऐसी स्त्रियाँ परिवार के अन्य लोगों के साथ ही नहीं, अपने बच्चों के प्रति भी उदास या कर्कश रहने लगती है। और उनके लालन-पालन में, स्नेह दुलार में उपेक्षा बरतती हैं। उन्हें समय कुसमय मारती पीटती तथा भार भूत मान कर दूसरी तरह की प्रताड़नाएं देती है।
गर्भ धारण के दिनों स्वास्थ्य का गड़बड़ा जाना, उस स्थिति में भी पिसते पिटते रहना, प्रसव की असह्य पीड़ा प्रसूति काल में असाध्य रोगी जैसी दुर्बलता नवजात शिशु की आठों प्रहर साज संभाल, परिवार के लोगों द्वारा अछत समझ कर दूर-दूर करना जैसी बातें मिलकर इतना बुरा असर डालते हैं कि प्रथम प्रजनन में ही उनका मानसिक स्वास्थ्य टूट जाता है। जल्दी-जल्दी अनिच्छित संतानें जनने की विवशता उन्हें अपनी असहाय स्थिति पर आँसू बहाने वाली प्रतीत होती है और वे खिन्न उद्विग्न रहने लगती है।
किशोरावस्था की दहलीज पर पैर रखते -रखते लड़कियों को मासिक धर्म होने लगता है। देखने में यह एक नियम कालीन मल विसर्जन जैसी क्रिया प्रतीत होती है, पर वस्तुतः वह भीतर ही भीतर असाधारण परिवर्तन साथ लेकर आती है। कितने ही नये ‘हारमोन’ विकसित होते, प्रजनन अंगों की पुष्टि एवं उत्तेजना सारे शरीर को विशेषतया मस्तिष्क को प्रभावित करती है। नाड़ी संस्थान में विचित्र हलचलें उत्पन्न होती है। उस स्थिति में उन्हें सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें क्या न करें? सहज विकास की रीति उपलब्ध न हो तो अवाँछनीय चिन्तन एवं क्रिया कलाप में उलझनें से भय, आशंका दुराव, उमंग नियंत्रण आवेश आदि का संमिश्रण कई प्रकार के मानसिक रोग उत्पन्न कर देते हैं। जो बच्चियाँ छोटी आयु में बहुत ही सरल थी वे इस विचित्र स्थिति में पड़ कर अपना मानसिक संतुलन गँवाती और सनकी, अव्यवस्थित बनती दीखती है।
सुशिक्षित सुविकसित प्रगतिशील परिवारों की बात दूसरी है। वयस्क सहेलियों से पुस्तकों पत्रिकाओं से उन्हें गृहस्थ जीवन की भावी संभावनाओं का बहुत कुछ आभास मिल जाता है और वे उसके लिए मानसिक तैयारी करती रहती है; जिससे समय पर ससुराल जाना उन्हें अटपटा नहीं लगता और कष्टकारक भी नहीं होता, पर अविकसित वातावरण में अथवा भोली अनजान मनःस्थिति में रहने के कारण उन्हें जब अचानक ससुराल में जाना पड़ता है, वहाँ तो पूर्णतया अनभ्यस्त वातावरण मिलता है; साथ ही नियन्त्रण की कठोरता, आलोचना, भर्त्सना और रूखे पन से भरे व्यवहार का सामना करना पड़ता है तो वे सकपका जाती है। प्रिय परिवार का विछोह उन्हें सताता है। पति का स्नेह-सौजन्य एवं मृदुल-कोमल व्यवहार सान्त्वना दे सकता था पर अनाड़ी वातावरण में वह भी संभव नहीं। काम कौतुक उनके सामने नृशंस बलात्कार के रूप में जाता है फलतः ये बेतरह भयभीत हो उठती है। आजीवन आये दिन उन पर यही अत्याचार होने है, यह सोचकर ये बेतरह घबरा उठती है। छुटकारे का, बचाव का कोई मार्ग न पाकर उनकी मनःस्थिति आतंक ग्रस्त बन जाती है और उसमें भूतोन्माद, हिस्टेरिया तथा अन्य कई प्रकार के मानसिक रोग उठ खड़े होते हैं। भारत के पिछड़े क्षेत्रों में आधे से अधिक नव वधुओं को इसी विपत्ति का मुख्य कारण है। ससुराल की कठोरता बदनाम है। ऐसी दशा में नव वधुओं को कितने ही प्रकार के मानसिक रोगों से ग्रसित पाया जाता है। पारिवारिक कलह, दाम्पत्य जीवन में असामंजस्य, बेशऊर, फूहड़, आलसी, अनाड़ी, अवज्ञाकारी होने के लाँछन वस्तुतः उन मानसिक रोगों की ही देन है जो ससुराल पहुंचते-पहुँचते नव वधुओं को बेतरह दबोच लेते हैं।
नारी की मानसिक संरचना में भावुकता के तत्व अधिक है। मुद्दतों से चली आ रही सामाजिक अनीति ने नारी को मानवोचित अधिकारों से वंचित करके उसे पिछड़े वर्ग की दयनीय स्थिति में धकेल दिया है, फलस्वरूप उसे अपमान जनक और पराधीन स्थिति में रहना पड़ता है, पग-पग पर अपनी भावनाओं को दबाना पड़ता है, यह कुचली हुई मनःस्थिति इतनी दुर्बल हो जाती है कि तनिक सी प्रतिकूलता में वह संतुलन खो बैठती है। प्रतिकूलताओं के साथ ताल मेल बिठा लेने का गुण साहसी और विवेकवानों में होता है पर जिनकी स्थिति वैसी नहीं है वे सामान्य जीवनक्रम से आगे बढ़कर जब अनभ्यस्त प्रक्रिया में प्रवेश करते हैं तो उनका मानसिक ढाँचा लड़खड़ाने लगता है और वे घबराहट में अनाड़ी, फूहड़, भुलक्कड़ जैसे स्तर के अव्यवस्थित आचरण करने लगते हैं। इस पर और उलटी डाँट पड़ती है। यह भर्त्सना उन्हें और भी अधिक असंतुलित करती है। प्रतिकूलताएँ चाहे कितनी ही छोटी क्यों न हो भावुक और दुर्बल संरचना के मस्तिष्क पर इतना दबाव डाल सकती है मानो कोई भार विपत्ति सामने आ खड़ी हुई हो। ऐसी दशा में हिस्टेरिया के दौरे जैसे रोग भी उन्हें अपने चंगुल में कस सकते हैं।
नई उम्र का उभार ही लड़कियों में अनभ्यस्त उत्तेजना उत्पन्न करता है और वे उस उभार में उलटा सीधा सोचने और उलटा-सीधा करने लगती है। एक ओर मानसिक उभार दूसरी और सामाजिक प्रतिबंधों की भय चक्की के दो पाटों के बीच में पड़े अनाज की तरह वे पिसने लगती है इस स्थिति के कई प्रकार के मानसिक रोग उन्हें आ घेरते हैं उन्हीं में एक अति चिन्ताजनक हिस्टेरिया भी है।
मनोविज्ञानी जुँग का कथन है-मनुष्य की आन्तरिक तृप्ति स्नेह से होती है, वह सबसे अधिक जिस वस्तु को चाहता है वह है -प्यार। इसे मानसिक विकास के लिए उतना ही महत्व दिया जाना चाहिए जितना कि शरीर रक्षा के लिए अन्न−जल को और पौधों के लिए खाद पानी की। जिसे प्यार न मिलेगा उसकी मनःस्थिति मुरझाई रहेगी, उसकी उर्वरता मंद पड़ जायगी और जरा-जरा सी बात में वह उलझा खोया और चिन्तित दिखाई पड़ेगा। कभी-कभी तो वह अवज्ञाकारी और उच्छृंखल -उद्धत भी हो जाता है। प्यार से मनुष्य बँधता और बाँधता है। इसके अभाव में यह एकाकी हो जाता है। वह न किसी का होता है न किसी को अपना मानता है। उपेक्षा और तिरस्कार के वातावरण में पलना सचमुच ही एक बड़ा दुर्भाग्य है। यह अन्न जल की कमी से दुर्बल बने शरीर की तरह ही मनोबल को क्षीण करने वाली स्थिति है।
प्यार का अभाव, अनुरक्षण की आशंका, कठोर नियंत्रण आशंका युक्त चिंता कुसंग से उत्पन्न विकृतियाँ बालपन से ही मनुष्य के विकास क्रम में लड़खड़ा देती है। छोटेपन में वे विकृतियाँ दूसरे रूप में रहती है पर बड़े होने पर उनका झुण्ड इकठ्ठा होकर हिस्टीरिया या उन्माद की और कोई स्थिति उत्पन्न कर देती है। घुटन कई रूप में फूटती है मनुष्य को अवाँछनीय आचरण करने के लिए प्रेरित करती है। उसे बाँध तोड़कर बाहर निकलने के एक प्रकार को इस प्रकार भी देखा जा सकता है।
हिस्टेरिया का एक दूसरा प्रकार है, ‘सामयिक उन्माद’ इसे भूत, पलीत या देवी देवताओं के आवेश के रूप में देखा जा सकता है। शिक्षितों में यह आवेश दूसरी कई तरह की सामयिक उचंगों के रूप में आता है और वे अपने आप को क्रोध आदि आवेशों से ग्रसित पाते हैं। कई बार तो ऐसी स्थिति अपने लिए तथा संपर्क में आने वाले व्यक्तियों के लिए घातक बन जाते हैं। आवेश ग्रस्त स्थिति के साथ रोगी जब भूत-प्रेतों के या देवी देवताओं के आक्रमण के साथ संगति बिठा लेता है तक वह प्रवाह उसी दिशा में बहने लगता है और ऐसे लक्षण प्रकट होते हैं जिनमें ऐसा प्रतीत होता है मानो सचमुच ही कोई भूत बेताल उन पर चढ़ दौड़ा हो।
‘ऐक्जाइटी न्यूरो सिस’ एवं हिस्टरिक न्यूरोसिस को हिस्टीरिया तो नहीं कहा जा सकता पर उसकी ‘सहेली’ या ‘छाया’ कहने में हर्ज नहीं है। कोई कल्पना जब मस्तिष्क पर असाधारण रूप से हावी हो जाती है तो उसे अनुभूतियाँ भी उसी प्रकार की होने लगती है। भूत-प्रेतों के आवेश प्रायः इसी स्थिति में आते हैं। मस्तिष्क में असंतुलन का दौरा पड़ता है। रोगी के मस्तिष्क का एक बहुत छोटा अंश यह अनुमान लगाने की चेष्टा करता है कि इस आकस्मिक हलचल का कारण क्या हो सकता है। उसे दूसरे लोगों पर भूतों का आवेश आने की जानकारी देखने या सुनने से पहले ही मिल चुकी होती है अस्तु क्षण भर में अपनी स्थिति उसी प्रकार की मान लेने का विश्वास जम जाता है। बस, इतनी भर मान्यता शरीर के हिलने, झूमने, गरदन डुलाने, लम्बी साँसें, उत्तेजना आदि भूतोन्माद के लक्षण प्रस्तुत कर देती है।
इसी श्रेणी में देवी-देवताओं को आवेशों की गणना की जा सकती है। भूतोन्माद अधिक अविकसित, अशिक्षित और असंस्कृत लोगों को आते हैं। उनमें भय आक्रोश का बाहुल्य रहता है और हरकतों में तथा बचनों में निम्न स्तर की स्थिति टपकती है। जब कि देवोन्माद में अपेक्षा कृत सज्जनता एवं शिष्टता की मात्रा अधिक रहती है। आवेश एवं वार्तालाप भी ऐसा ही होता है मानों कोई देव स्तर का व्यक्ति कर रहा हो। जिन लोगों ने देवी देवताओं की चर्चा अधिक सुनी है, स्वयं उस पर विश्वास करते हैं उनका मस्तिष्क आवेश की स्थिति में अपनी कल्पना, साथ ही हरकतें भी उसी स्तर की बना लेता है। वस्तुतः इन आवेशों में देव स्तर सिद्ध करने वाली कोई प्रमाणिकता नहीं होती। स्तर के अनुरूप इनका वर्गीकरण भूतोन्माद या देवोन्माद के रूप में किया जा सकता है, पर उनके बीच कोई बड़ा भेद नहीं होता।
आयुर्वेद ग्रन्थों में भूतोन्माद की कितनी ही शाखा प्रशाखाओं का वर्णन है उसे रोग की संज्ञा दी गई है और उपचार विधि बताई गई है। वस्तुतः उसे उन्माद का यदा कदा आने वाला दौरा ही कह सकते हैं। आवेश गहरा हो तो रोगी के अवयव ही उत्तेजित होते हैं और वह उन्मत्त जैसी हरकतें करता है किंतु यदि दौरा हल्का हो तो एक प्रकार से नशे जैसी स्थिति बन जाती है। भूत का व्यक्तित्व अपने ऊपर थोप कर वह ऐसी ही बातें करता है मानो वह सचमुच ही भूत की स्थिति में पहुँच गया हो। भूत को जो कहना चाहिए सो ही वह कह रहा हो। यह कथन क्रम बद्ध तो होता है, उसकी संगति बैठती है पर होता सर्वथा काल्पनिक है। भोले लोग उसे तथ्य मान बैठते हैं और उन्माद की स्थिति में जो कहा गया था उसी पर विश्वास करके वैसा ही करने या मानने लगते हैं।
कई मनुष्यों को ऐसी सुनाई पड़ती है। मानो किसी ने उनसे कुछ बात जोर देकर कही है। लगता है उन्होंने वैसा सुना है। किसी किसी को ऐसा लगता है कोई भीतर से बोल रहा है। पेट में बैठकर या शिर पर चढ़ कर कुछ बता रहा हैं इस बीमारी को ‘हैवीफ्रेनिक शिजोफेनिया’ कहते हैं। भूत पलीतों के देवी देवताओं के सन्देह, आह्वान, आदेश प्रायः इसी प्रकार के होते हैं। प्रेमी और प्रेमिकाओं को इसी प्रकार की अनुभूतियाँ होती है मानो उनका प्रिय पात्र सामने खड़ा कुछ इशारे कर रहा है यह कह रहा है। जिनके प्रियजन जल्दी ही मरें है, उनका वियोग निरन्तर छाया रहता उन्हें भी झपकी आते ही मृतात्मा निकट आकर कुछ करती कहती दिखाई पड़ती है। भक्त लोगों को उनके इष्ट देव भी ऐसे ही कौतूहलवर्धक परिचय देते हैं।
मानसिक अस्त-व्यस्तता को दो भागों में विभाजित किया जाता है (1) न्यूरोसिस (2) साइकोसिस।
न्यूरोसिस वह स्थिति है जिसमें मनुष्य अन्ट-सन्ट सोचता और आयँ-बाँय बोलता है। बेकार की चिंताएं और बेसिर पैर की कल्पनाएं उसे हैरान करती रहती है। चिन्ता में डूबा, आशंकाओं से, ग्रसित भयभीत एवं असंभव चिन्तन के घोड़े दौड़ाते हुए उसे आये दिन देखा जा सकता है। कभी कुछ कभी कुछ खब्त सवार रहता है।
साइकोसिस इससे आगे की और अधिक बिगड़ी हुई स्थिति है। उसमें व्यक्ति पूर्ण रूप से तो नहीं पर किसी विशेष प्रसंग में पगलाया रहता है। किसी विशेष समय, परिस्थिति, घटना, वर्ग या व्यक्ति के सम्बन्ध में उसके कुछ ऐसे भले या बुरे आग्रह जम जाते हैं जिनका वास्तविकता के साथ बहुत कम सम्बन्ध होता है। उसकी अपनी कल्पना और मान्यता एक अलग से स्वप्न लोक रच लेती है और उन्हीं में वह खोया रहता है।
मानसिक रोगों की निदान पुस्तकों में आवसेसिव कम्पलसिक न्यूरोसिस एग्जाइरी जैसे विश्लेषणों के साथ अनेक रूपों में लक्षणों और उदाहरणों के साथ चित्रित किया गया है, साइकोसिस शाखा में से आर्गेनिक साइकोसिस फैक्शनल, पैरानायड् जैसे भेद उपभेद है। संक्षेप में न्यूरोसिस हल्की और साइकोसिस बढ़ी हुई स्थिति को कहते हैं। हल्की स्थिति में दूसरों के समझाने में रोगी अपनी गलती और सोचने की पद्धति में त्रुटि होने की बात स्वीकार कर लेता है किन्तु बढ़ी स्थिति में नशा इतना गहरा होता है कि यह अनुभव या स्वीकार ही नहीं होता कि वह कुछ गलती कर रहा है। गहरे पागलपन में यही स्थिति हो जाती है। उसे यह तनिक भी आभास नहीं होता है कि वह किसी मानसिक रुग्णता का कष्ट भुगत रहा है। वह अपने को सामान्य मानता है दूसरों के द्वारा अपने प्रति किए गये असामान्य व्यवहारों के द्वेष दुर्भाव की संज्ञा देता है।
कई बार दुहरे परस्पर विरोधी विचार एक ही व्यक्ति या कार्य के सम्बन्ध में आते हैं। ज्वार में पानी बहुत ऊँचा उठता है और भाटा आने पर वह नीचा चला जाता है। नशा चढ़ने पर ताकत फूटी पड़ती है और उतरने पर शिथिलता बेतरह आ घेरती है। बच्चे के गड़बड़ करने पर क्रोध में माता कस कर चाँटा जड़ देती है पर बच्चे के सुपक कर रोते ही उसकी करुणा जग पड़ती है और अपने को कोसते हुए बच्चे को वात्सल्य पूर्वक छाती से चिपटा लेती है। यह परस्पर विरोधी परिस्थितियाँ हुई कुछ मस्तिष्क में प्रिय और अप्रिय भावनाओं के ऐसे ही ज्वार-भाटे आते रहते हैं। आज अमुक व्यक्ति बहुत प्रिय है कल वही बहुत बुरा लगा, आज जो काम खराब लगता है कल उसी को करने के लिए आकुलता उठने लगी, आज जो निर्माण किया जा रहा है कल उसी को तोड़ डालने की योजना बन कर तैयार हो गई। इस दोगली मनोवृत्ति को “कैटै टोनिक शिजीफ्रेनिया” कहते हैं।
मानसिक रोगों का परिवार बहुत बड़ा है। उसमें शिवजी की बरात जैसे चित्र विचित्र स्तर के विभिन्न आकृति-प्रकृति के विक्षोभ भरे पड़े है, उनके प्रकट होने के स्वरूप अलग-अलग है। इतने पर भी यह कहा जा सकता है कि यह सब मानसिक असंतुलन के परिणाम है। पेट की गड़बड़ी से शरीर रुग्ण होता है और असंतुलन से मस्तिष्क। आवश्यकता इस बात की है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए आहार बिहार का सही तरीका सीखा जाय और मन को स्वस्थ रखने के लिए परिस्थितियों के निर्माण करने, उनके साथ ताल मेल बिठाने अथवा बदल डालने का साहस उत्पन्न किया जाय, विकसित मनोबल उत्पन्न किया जाना उतना ही आवश्यक है जितना कि शरीर को निरोग रखना हमें व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से इन दोनों ही दिशाओं में सुधार के आवश्यक प्रयत्न करने चाहिए।
अपने संकुचित दृष्टिकोण से जब हम संसार को देखते हैं तो वह बड़ा संकीर्ण और तुच्छ दिखाई पड़ता है। जब उसे स्वार्थ दृष्टि से देखा जाता है तब वह स्वार्थ ग्रस्त दीखता है। किन्तु जब उसे उदार और मित्रता की दृष्टि से देखा जाता है, तो संसार में हमें मित्रता उदारता और सज्जनता की भी कमी दिखाई नहीं देती ।
यों जीवन साधना का क्रम सारे दिन हर समय चलने का हैं। पर उसका प्रारम्भ, शुभारम्भ एक चिन्तन पद्धति के साथ किया जाना चाहिए। इस पद्धति के तीन अंग हैं- (1) जीवन के स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग को समझना और उसके अनुरूप गतिविधियों का निर्माण करना, (2 “हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत” सूत्र के अनुसार जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग करने के लिए दिन भर की शारीरिक कार्य पद्धति एवं मानसिक विचार पद्धति का निर्धारण करना। (3 रात को सोते समय मृत्यु के समय आवश्यक वैराग्य का अनुभव करना। इन तीन चिन्तन क्रम में से दो को प्रातः और तीसरे को रात्रि के सोते समय प्रयुक्त करना चाहिए।
हर दिन प्रातःकाल उठते ही बिस्तर पर बैठकर अपने आपसे इस संदर्भ में तीन प्रश्न पूछने चाहिए और उनके उत्तर भी स्वयं ही उपलब्ध करने चाहिए। पर प्रश्नोत्तर प्रातःकाल जीवन का क्रम आरम्भ करते हुए नित्य ही दुहराने चाहिए ताकि जीवन का स्वरूप, उद्देश्य और उपयोग सदा स्मरण बना रहे और इस स्मरण के आधार पर अपनी दिशाएं ठीक रखने में भूल-चूक न होने पावें।
अपने आपस तीन प्रश्न पूछने चाहिए-
(1) भगवान के सभी प्राणी समान रूप से प्रिय पात्र है। फिर मनुष्य को ही बोलने, सोचने, लिखने एवं असंख्य सुख, सुविधाएं प्राप्त करने का विशेष अनुदान क्यों मिला? मनुष्य को हर दृष्टि से उत्कृष्ट स्तर का प्राणी बनाने में इतना असाधारण श्रम क्यों किया?
उत्तर एक ही हो सकता है- “अपने उद्यान - इस संसार को अधिक सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए परमेश्वर को साथी सहचरों की जरूरत पड़ी और अपनी क्षमताओं से सुसज्जित एक सर्वांगपूर्ण प्राणी- मनुष्य इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए बनाया। विशेष साधन सुविधाएं इसलिए दी कि उनके द्वारा वह ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति ठीक तरह कर सकें।”
(2) दूसरा प्रश्न अपने आपसे पूछना चाहिए कि- “जो सुविधाएं विभूतियाँ संपदाएं हमें उपलब्ध हैं- उनका लाभ यदि हम अकेले ही उठाते हैं तो इसमें क्या कोई हर्ज है?”
उत्तर एक ही मिलेगा- “अन्य प्राणियों के अतिरिक्त जितनी भी बौद्धिक आर्थिक, प्रतिभायुक्त एवं अन्य किसी प्रकार की विशेषताएं हैं, वे विश्व मानव की ही पवित्र अमानत हैं और इनका उपयोग लोक मंगल के लिए ही किया जाना चाहिए। शरीर रक्षा भर के आवश्यक उपकरण के अतिरिक्त इन साधनों का विश्व कल्याण के लिए ही उपयोग किया जाय।”
(3) तीसरा प्रश्न अपने आपसे करना चाहिए कि- “ क्या इस सुरदुर्लभ मानव शरीर का सही सदुपयोग हो रहा है?”
उत्तर यही मिलेगा- “हम सदाचारी संयमी, परिश्रमी, उदार, सज्जन, हँसमुख, सेवाभावी बने बिना मानव जीवन को सार्थक नहीं बना सकते। इसलिए इन सद्गुणों का अभ्यास बढ़ाने के लिए जीवनयापन की रीति-नीति में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का सभ्यता और सज्जनता का -पुरुषार्थ और साहस का समुचित समावेश करना चाहिए।’
इन्हीं प्रश्नोत्तरों में अध्यात्म तत्वज्ञान का सार सन्निहित हैं। यदि वे प्रश्न जीवन की महान समस्या के रूप में सामने आयें और उन्हें सुलझाने के लिए हम अपने पूरे विवेक का उपयोग करें तो भावी जीवन यापन के लिए एक व्यवस्थित दर्शन और कार्यक्रम सामने आ खड़ा होगा। यदि इस तत्वज्ञान को ठीक तरह हृदयंगम किया जा सका तो आकाँक्षाओं और कामनाओं का स्वरूप बदला हुआ होगा। रीति-नीति और कार्य पद्धति में वैसा परिवर्तन परिलक्षित होगा जैसा आत्म ज्ञान सम्पन्न मनुष्य में प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर होना चाहिए।
(2) इसके बाद - “हर दिन नया जन्म- हर रात नई मौत” इस सूत्र को मन ही मन दुहराना चाहिए और भावना करनी चाहिए कि आज का दिन हमें एक नये जन्म के रूप में मिला है। वस्तुतः निद्रा और जागरण -मृत्यु और जन्म का ही एक छोटा नमूना है। उसमें असत्य भी कुछ नहीं। सचमुच की मृत्यु भी एक लम्बी रात की गहरी नींद मात्र है। हर दिन को एक जन्म कहा जाय तो ऊपर से ही हँसी की बात लगती है, वस्तुतः वह एक स्थिर सचाई है। अतएव इस मान्यता में अत्युक्ति और निराधार कल्पना जैसी कोई भी बात नहीं है।
आज का नया जन्म अपने लिए एक अनमोल अवसर है। कहते हैं कि चौरासी लाख योनियों के बाद एक बार मनुष्य शरीर मिलता है, उसका सदुपयोग कर लेना ही शास्त्रकारों ने सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता मानी है। अस्तु हमें प्रातःकाल चारपाई पर पड़े पड़े ही विचारना चाहिए कि आज का दिन अनमोल अवसर है, उसे अधिक से अधिक उत्कृष्टता के साथ व्यतीत करना चाहिए। कोई भूल, उपेक्षा अनीति, दुर्बुद्धि उसमें न रहे। आदर्शवादिता का सद्भावना और सदाशयता का उसमें अधिकाधिक समावेश रहे ऐसा दिन भर का कार्यक्रम बना कर तैयार किया जाय।
शारीरिक कार्यक्रमों के साथ-साथ मानसिक क्रिया पद्धति भी निर्धारित करनी चाहिए। किस कार्य को किस भावना के साथ करना है, इसकी रूपरेखा मस्तिष्क में पहले से ही निश्चित रहनी चाहिए। समय-समय पर बढ़े ओछे संकीर्ण स्वार्थपूर्ण हेय विचार मन में उठते रहते हैं। सोचना चाहिए कि आज किस अवसर पर किस प्रकार का अनुपयुक्त विचार उठने की सम्भावना है, उस अवसर के लिए विरोधी विचारों के शस्त्र पहले से ही तैयार कर लिए जाये।
दिन भर के समय विभाजन तथा विचार संघर्ष की योजना बनानी चाहिए और ऐसी दिनचर्या तैयार करनी चाहिए, जिसमें शरीर से ठीक तरह कर्तव्य पालन और मन में ठीक तरह सद्भाव चिन्तन होता रहे। इस कार्य के लिए पन्द्रह मिनट से लेकर आधा घन्टे का समय पर्याप्त होना चाहिए। उस निर्धारित दिनचर्या को कागज पर नोट कर लेना चाहिए और समय-समय पर जाँचते रहना चाहिए कि निर्धारण के अनुरूप कार्यक्रम चल रहा है या नहीं? जहाँ भी चूक होती हो वही उसे तुरंत सुधारना चाहिए। यदि सतर्कतापूर्वक दिनचर्या के पालन का ध्यान रखा जाय, शारीरिक आलस्य और मानसिक प्रमाणिकता से पग-पग पर लड़ते रहा जाय तो प्रातःकाल की निर्धारित योजना रात को सोते समय तक ठीक ही चलती रहेगी।
इस प्रकार हर दिन नया जन्म वाले मन्त्र का आधा भाग रात को सोते समय तक पूरा होते रहना चाहिए हर घड़ी अपने को सतर्क, जागरुक रखा जाय, चूक को बचाने के लिए सतर्क रहा जाय- उत्कृष्टता का जीवन में अधिकाधिक समावेश करने के लिए प्रयत्न किये जाय तो निस्संदेह वह दिन पिछले अनय दिनों की अपेक्षा अधिक सन्तोषप्रद अधिक गौरवास्पद होगा। इस प्रकार हर दिन पिछले दिन की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक आदर्श बनता चला जायेगा और कर्मयोग के तत्व दर्शन में हमारी जीवन पद्धति ढलती चली जायेगी।
(3) अब मंत्र का आधा भाग प्रयुक्त करने का अवसाद आता है- “हर रात नई मौत” इस भावना को रात्रि सोते समय प्रयुक्त करना चाहिए। सब कामों में निवृत्त होकर जब निद्रा देवी की गोद में जाने की घड़ी आये तब कल्पना करनी चाहिए कि -”एक सुन्दर नाटक का अब पटाक्षेप हो चला। यह संसार एक नाट्यशाला है आज का दिन अपने को अभिनय करने के लिए मिला था सो उसको अच्छी तरह खेलने का ईमानदारी से प्रयत्न किया। जो भूलें रह गई उन्हें याद रखेंगे और अगले दिन वैसी पुनरावृत्ति न होने देने की अधिक सावधानी बरतेंगे
“अनेक वस्तुएं इस अभिनय में प्रयोग करने को मिली। अनेक साथियों का साथ रहा। उनका सान्निध्य एवं उपयोग जितना आवश्यक था कर लिया गया, अतः उन्हें यथा समय छोड़कर पूर्ण शान्ति के साथ अपने आश्रयदात्री माता निद्रा -मृत्यु की गोद में निश्चित होकर शयन करते हैं।
इस भावना में वैराग्य का अभ्यास है। अनासक्ति का प्रयोग है। उपलब्ध वस्तुओं में से एक भी अपनी नहीं साथी व्यक्तियों में से एक भी अपना नहीं। वे सब अपने परमेश्वर के और अपने कर्तृत्व की उपज है। हमारा न किसी पर अधिकार है, न स्वामित्व। हर पदार्थ और हर प्राणी के साथ कर्तव्य बुद्धि से ठीक व्यवहार कर लिया जाय, यही अपने लिए उचित है। इससे अधिक मोह, ममता के बन्धन बाँधना-स्वामित्व और अधिकार की अहंता जोड़ना -निरर्थक है। अपना तो यह शरीर भी नहीं- कल परसों इसे धूलि बन कर उड़ जाना हैं। तब तो संपदा, प्रयोग सामग्री, पद, परिस्थिति, उपलब्ध है उस पर अपना स्वामित्व जमाने का क्या हक? अनेक प्राणी सृष्टि के आदि से लेकर अब तक अपने कर्म भोगो को भुगतने अनेकों के साथ, आये दिन आयोग-वियोग करते रहते हैं। अपने साथ भी आज कितने ही प्राणी एक सज्जन साथी की तरह रह रहे है, इनके लिए कर्तव्य धर्म का ठीक तरह पालन किया जाय इतना ही पर्याप्त है। उनसे आवश्यक ममता जोड़कर ऐसा कुछ न किया जाय। जिससे अनुचित पाप कर्मों में संलग्न होना पड़े।
यह विवेक हमें रात को सोते समय जागृत करना चाहिए और अनुभव करना चाहिए कि अहंता और ममता के बन्धन तोड़कर एकात्म भाव से भगवान की मंगलमय गोदी -निद्रा मृत्यु में परम शान्ति और सन्तोषपूर्वक निमग्न हुआ जा रहा है।
इस प्रकार की मनोवृत्ति का विकास होने से जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रगति होने की संभावना रहती है और अन्त में मानव जन्म की सार्थकता उपलब्ध हो सकती है।
कड़ाके की ठंड पड़ी। पृथ्वी पर रेंगने वाले कीटक उससे सिकुड़ कर मरने लगे। वन्य प्राणियों के लिए आहार की समस्या उत्पन्न हो गई। लोग शीत निवारण के लिए जलावन ढूंढ़ने निकले। सब के शरीर अकड़ रहे थे तो कष्ट निवारण का उपाय किसी से बन नहीं पड़ रहा था।
वृक्ष से यह सब देखा न गया। इन कष्ट पीड़ितों की सहायता के लिए उसे कुछ तो करना ही चाहिए। पर करें भी तो क्या। उसके पास न बुद्धि थी न पुरुषार्थ न धन न अवसर।
फिर भी वह सोचता ही रहा- क्या मेरे पास कुछ भी नहीं है? भला ऐसा कैसे होगा सर्वथा साधन हीन तो इस सृष्टि में एक कण भी नहीं रचा गया है? गहराई से विचार किया तो लगा कि वह भी साधनहीन नहीं है। पत्र-पल्लवों की प्रचुर संपदा प्रकृति ने उसे उन्मुक्त हाथों से प्रदान की है। वृक्ष ने संतोष की साँस ली। पुलकन उसके रोम-रोम में दौड़ गई।
वृक्ष ने अपने सारे पत्ते जमीन पर गिरा दिए। रेंगने वालों ने आश्रय पाया, पशुओं को आहार मिला, जलावन को समेट कर मनुष्यों ने आग तापी और जो रहा बचा सो खाद के गड्ढे में डाल दिया। दुम हिलाते रंग बदलते गिरगिट अपनी कोतर से निकला और वृक्ष से पूछने लगा- अपनी शोभा सम्पदा गँवाकर तुम ढूँठ बन गये। इस मूर्खता में आखिर क्या पाया।
वृक्ष गिरगिट को निहारता भर रहा पर उत्तर कुछ नहीं दिया। कुछ समय उपरान्त बसन्त आया। उसने ढूँठ बनकर खड़े हुए वृक्ष को दुलारा और पुराने पके पत्तों के स्थान पर नई कोपलों से उसका अंग प्रत्यंग सजा दिया। यह तो उसके दान का प्रतिदान था। अभी उपहार का अनुदान शेष था सो भी बसन्त ने नये बसंती फूलों से मधुर फलों से लाद कर पूरा कर दिया। वृक्ष गौरवान्वित था और सन्तुष्ट भी।
गिरगिट फिर एक दिन उधर से गुजरा। वृक्ष पहले से अधिक सम्पन्न था। उसने देने की नीति अपना कर खोया कम और पाया ज्यादा यह उसने प्रत्यक्ष देखा।
पूर्व व्यंग की निरर्थकता का उसे अब आभास हुआ सौ लज्जा से लाल पीला होता हुआ वह फिर अपने पुराने कोंतर में वापिस लौट गया।
किस प्राणी की कितनी आयु होनी चाहिए ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि शरीर विकास में जितना समय लगता है उससे छह गुने समय तक उसे जीना चाहिए। अमेरिका मेडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष डा0 एडवर्ड एल॰ बोर्त्ज ने इसकी पुष्टि में अनेक प्राणियों की आयु का प्रमाण सहित उल्लेख दिया है। वे कहते हैं कि मनुष्य 25 वर्ष की आयु में अपना पूर्ण विकास कर लेता है अस्तु उसे 150 वर्ष जीना चाहिए।
लेकिन ऐसा होता क्यों नहीं ? इसके कुछ कारण इस प्रकार गिनाये जा सकते हैं। थका मोटा हृदय शरीर में उतना रक्त नहीं फेंक पाता जितना कि उसे तरोताजा बनाये रखने के लिए आवश्यक है। 50 की आयु तक पहुँचता है, पसलियाँ और छाती की हड्डियां कड़ी हो जाती हैं अस्तु लचीलापन घट जाने से फेफड़ों से उतनी साँस नहीं ली जाती जितनी कि आवश्यक हैं आयु वृद्धि के साथ-साथ गुर्दों की क्षमता ढलती उम्र में आधी रह जाती है। नसों और नाड़ियों के कम्पन 20 प्रतिशत घट जाते हैं। इस सबका निष्कर्ष यह है-आदमी साठ वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते सूखना आरम्भ कर देता है। उसमें पानी की मात्रा घट जाती है फलस्वरूप जीवित कोशाणुओं में मुरझायापन बढ़ता जाता है। कैल्शियम की कमी से हड्डियां कठोर और कमजोर होती चली जाती है। यह सूखापन ही बुढ़ापा है। बुढ़ापा मृत्यु का सहोदर भाई है। बुढ़ापे के चिन्ह जितने ज्यादा स्पष्ट हों तो आदमी मौत के नजदीक उसी तेजी से बढ़ता चला जायगा।
बुढ़ापे में मस्तिष्क की कोशाएँ भी अकड़ जाती हैं और स्मरण शक्ति, निर्णय शक्ति और आत्म-नियन्त्रण शक्ति तीनों ही घट जाती है। सीखने की क्षमता चली जाती है और जो कुछ सीखा जाता है उसी का दुराग्रह स्वभाव का अंग बन जाता है। कृपणता, चिड़चिड़ापन, सन्देह स्वादेन्द्रिय और कामुकता सम्बन्धी विकृत भटकाव बुढ़ापे में अधिक उभरते हैं। युवावस्था में इन पर काबू पाना सरल हैं, पर बूढ़ा आदमी अपने को कदाचित ही सँभाल सुधार पाता है।
डा0 सी0 वार्ड क्रेम्पटन का कथन है बुढ़ापा कैलेंडर के आधार पर नहीं ‘क्षति’ के आधार पर आता है। रक्त की विषाक्तता-कोशाओं की कठोरता, मानसिक तनाव और भोजन का ठीक तरह हजम न होना यह चार कारण है जो मृत्यु को स्वाभाविक समय की अपेक्षा कहीं जल्दी बुलाकर सामने खड़ी कर देते हैं। क्रेम्पटन का कथन है बुढ़ापा यकायक नहीं, किश्तों में आता है। कुछ अंग शिथिल पड़ जाते हैं, उनका दबाव दूसरों पर पड़ता है और वे भी लड़खड़ाने लगते हैं। इसी प्रकार पूर्ण मौत आने से पहले आंशिक मौत किन्हीं भीतरी अवयवों की होने लगती है।
हमें जल्दी मौत के मुंह में धकेलने वाला सबसे अधिक दोष आहार सम्बन्धी नियमों के व्यतिक्रम का है। हम वह खाते हैं जो नहीं खाना चाहिए-उतना खाते हैं जितना पचा नहीं सकते। भूल देखने में जरा सी मालूम पड़ती है, पर उसके परिणाम बहुत ही घातक होते हैं। स्वाद के प्रलोभन में फंसकर आहार सम्बन्धी मर्यादाओं का उल्लंघन करना अन्ततः बहुत ही महँगा पड़ता है। शिकागो विश्व विद्यालय ने चूहों को कम भोजन देकर तथा उन्हें सप्ताह में आधे दिन का उपवास कराकर यह निष्कर्ष पाया कि हर घड़ी मुंह चलाने वाले चूहों से वे अधिक स्वस्थ रहे। कार्नेल की भोजन प्रयोगशालाओं ने यह घोषित किया है कि अधिक पोषक और अधिक विटामिन युक्त कीमती भोजन की अपेक्षा मध्यम श्रेणी के लोगों द्वारा अपनाया जाने वालो सस्ता भोजन जल्दी पचता है और अधिक पोषण देता है। कोलम्बिया विश्व-विद्यालय के प्राध्यापक प्रो0 हेनरी क्लेग शरकन ने चूहे और खरगोशों को चिकनाई युक्त भोजन देकर यह निष्कर्ष निकाला कि वे मोटे तो जरूर हो गये, पर उनकी स्फूर्ति जाती रही। चिकनाई में रहने वाला ‘कोलेस्टेरोल’ नाडियों के भीतरी भाग में जकड़न पैदा करता है। यदि इस जकड़न से बचा जा सके तो मनुष्य 70 वर्ष की उम्र में पूरा जवान रह सकता है।
जार्जटाउन विश्व-विद्यालय के शोध विभाग ने अपने शोध प्रतिवेदन में बताया है। अभिभावक बच्चों को किशोरावस्था में प्रवेश करने तक स्वास्थ्य संबंधी सतर्कता बरतें। किशोरों में यह आकाँक्षा जग पड़े कि वे जल्दी नहीं मरना चाहते। अधेड़ व्यक्ति शक्ति क्षय के संबंध में अधिक मुस्तैदी बरतें तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य बीमारियों से घिरा पड़ा रहे ओर पूरी सौ का होने ये पहले ही काँच केर जाय। शरीर एक सुकोमल यन्त्र है इसे सावधानी के साथ प्रयोग में लाया जाये तो देर तक सही काम देता रहेगा किन्तु यदि अनाड़ी और उद्दण्ड बालकों की तरह उससे खिलवाड़ की जाय तो फिर उस जीवन से जल्दी ही पिण्ड छुड़ाया जा सकता है जो नितान्त बहुमूल्य होते हुए भी हमारे लिये कूड़ा-कबाड़ा मात्र बना हुआ है। जिन लोगों ने इन बातों का ध्यान रखा है और अपनी जिंदगी को महत्वपूर्ण समझते हुए उसे बुद्धिमत्तापूर्वक प्यार किया है उन्हें प्रकृति ने खुले हाथों दीर्घजीवन का उपहार दिया है।
पं0 जवाहरलाल नेहरू अस्सी के करीब ही जा पहुँचे थे, पर उन्होंने न कभी अपने को वृद्ध कहा और न किसी को कहने दिया।
यूनानी नाटककार सोफोक्लीज ने 90 वर्ष की आयु में अपना प्रसिद्ध नाटक ‘आडीपस’ लिख था। अंग्रेजी कवि मिल्टन 44 वर्ष की उम्र में अन्धे हो गये थे। इसके बाद उन्होंने सारा ध्यान साहित्य रचना पर केन्द्रित कर दिया 50 की उम्र में उन्होंने ‘पैराडाइज लास्ट’ लिखा। 62 वर्ष में उनका ‘पैराडाइज रीगेन्ड’ प्रकाशित हुआ। जर्मन कवि गेटे ने अपना ग्रन्थ ‘फास्ट’ 80 वर्ष की आयु में पूरा किया। 92 वर्ष का अमेरिकी दार्शनिक जानडेवी अपने क्षेत्र में अन्य सभी विद्वानों में अग्रणी था।
अंग्रेजी राजनीति का इतिहास जिनने पढ़ा है वे ग्लेस्टन का नाम अवश्य जानते होंगे। उसने अपना प्रायः सारा ही जीवन राजनीति की सेवा में लगाया और अच्छी लोकप्रियता प्राप्त की। 70 वर्ष की आयु में उन्होंने राज्य का उत्तरदायित्व संभाला और तीसरी बार भी जब वे प्रधान मंत्री बने तब उनकी आयु 79 वर्ष की थी, आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी में होमर पर उनका भाषण अत्यन्त शोध पूर्ण माना जाता है वह उन्होंने 80 वर्ष की आयु में दिया था। बुढ़ापे में भी वे चैन से न बैठे। 84 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘ओडेसी आफ हारस’ ग्रन्थ की रचना की।
आठवीं जर्मन सेना का सेनापतित्व पालवान हिन्डैन वर्ग को जब सौंपा गया तब वे 67 वर्ष के थे। 78 वर्ष की आयु में वे पार्लमेन्ट के अध्यक्ष चुने गये। वे 87 वर्ष की आयु तक जिये तब तक उसी अध्यक्ष पद पर प्रतिष्ठित रहे।
हैनरीफिलिप मिटेन जब फ्राँस के प्रधान मंत्री बने तब वे 84 वर्ष के थे। उसी देश की नेशनल असेम्बली के अध्यक्ष स्टवर्ड हैरियो 79 वर्ष की आयु में चुने गये। 84 वर्ष की आयु में उनका स्वर्गवास हुआ, तब तक वे उस पद का बड़ी योग्यतापूर्वक निर्वाह करते रहे।
लायड जार्ज ब्रिटेन के मूर्धन्य राजनेता रहे हैं। 75 वर्ष की आयु में भी उनकी कार्य शक्ति नौजवानों जैसी थी। चर्चिल ने द्वितीय महायुद्ध काल में जब इंग्लैण्ड का प्रधान मंत्री पद संभाला तब वे 80 वर्ष के थे। जनरल मेक आर्थर 73 वर्ष की आयु में 45 वर्ष जैसे सक्रिय थे। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति सिगमन 80 वर्ष की आयु में भी पूरी तरह क्रियाशील पाये गये थे।
भारत के राजनेताओं में से जिन्हें महत्वपूर्ण पदों का उत्तरदायित्व संभालना पड़ा उनमें अधिकाँश 60 वर्षों से ऊपर के रहे हैं।
महान साहित्यकार जार्ज वनर्डिशा की 93 वीं वर्षगाँठ मनाई गई तो उनने बताया कि इन दिनों वे इतना अधिक लिखते हैं जितना कि 40 वर्ष की आयु में भी नहीं लिख पाते थे। दार्शनिक वेनैदित्तों क्रोचे 80 वर्ष की अवस्था में भी नियमित रूप से 10 घण्टे काम करते थे। उनने दो पुस्तकें तब पूरी की जब वे 85 वर्ष के थे। बटेन्ड रसैल को जब नोबेल पुरस्कार मिला तब वे 78 वर्ष के थे। मारिस मैटर लिंक का देहावसान 88 वर्ष की आयु में हुआ। मरने के दिनों ही उनकी अन्तिम पुस्तक दि एवाट आफ सेतुवाल’ प्रकाशित हुए जिसे उनकी रचनाओं में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ब्रिटेन के प्रख्यात पत्र ‘डेली एक्सप्रेस’ के संचालक लार्ड वीवन वर्क लगभग 80 वर्ष की आयु तक पहुँचते हुए भी अपने दफ्तर में जम कर दस घंटे बैठते थे।
अमेरिका के प्रख्यात तेल व्यवसायी अरब पति राक फेलर पूरे 100 वर्ष जिये। उन्हें कभी बेकार समय गुजारते नहीं देखा गया। एक दूसरे व्यवसायी कोमोडोर विन्डरविट ने 70 वर्ष की आयु में व्यापार क्षेत्र में प्रवेश किया और दस वर्ष के भीतर ही वे सफल उद्योगपतियों की श्रेणी में जा पहुँचे। मोटर उत्पादक हैनरी फार्ड 82 वर्ष की आयु में भी उतने ही चुस्त पाये जाते थे। जितने कि जवानी में वे थे।
दार्शनिक ‘कैन्ट’ को साहित्यिक ख्याति 74 वर्ष की आयु में मिली जब उसकी ‘एन्थ्रो पोलोजी’ ‘मेटा फिजिक्स आफ ईथिक्स” और स्ट्राइफ आफ फैकल्टीज’ प्रकाश में आई। गेटे की महत्वपूर्ण कृति ‘फास्ट’ उन्होंने 80 वर्ष की आयु में पूरी की थी। टैनीसन ने अपना प्रख्यात ग्रन्थ ‘क्रासिंग दी वार’ 83 वर्ष की आयु में पूरा किया था। होब्स ने 88 वर्ष की उम्र में ‘इलियड’ का अनुवाद प्रकाशित कराया था। चित्रकार टीटान का विश्व विख्यात चित्र ‘बैटिल आफ लिमान्टो’ जब पूरा हुआ तब वे 98 वर्ष के थे।
अमेरिका की सुप्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री ‘दादी रेनाल्डस’ ने पाश्चात्य जगत में बहुत ख्याति प्राप्त की है। उनकी फिल्म समूची जीवन साधना का ही एक छोटा अंग है। पैंसठ साल की उम्र में वे चार बच्चों की माँ और दर्जनों नाती-पोतों की दादी बन चुकी थीं। तब उन्हें उत्साह उठा कि जो शिक्षा उन्होंने प्राप्त कर रखी है वह कम हैं उन्हें सफल जीवन जीने के लिये अधिक विद्या उपार्जित करनी चाहिये। सो वे कालेज जाने लगी और 69 साल की उम्र में कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय की स्नातिका बन गई। इसके बाद उन्होंने हालीवुड का दरवाजा खटखटाया। जिस आत्म-विश्वास के साथ वे बातें करती थी उसे देखकर डायरेक्टरों ने उन्हें छोटा काम दे दिया। उनके परिश्रम मधुर स्वभाव और आकर्षक व्यक्तित्व ने उस क्षेत्र में बढ़-बढ़ कर काम करने के अवसर दिया अस्तु उन्होंने लगातार तेरह वर्षों तक प्रख्यात फिल्मों में काम किया।
82 वर्ष की उम्र में वे एक विद्वान शरीर -शास्त्र से यह परामर्श लेने गई कि उनके पेट का माँस थुलथुल हो गया है यह कसा हुआ कैसे हो सकता है। डाक्टर गेलार्ड हाजर ने उपचार बताये तद्नुसार उनका पेट भारमुक्त हो गया। साथ ही डाक्टर ने उसकी इतनी लंबी आयु और चुस्ती के कारण पूछा तो उनने बताया कि आहार संबंधी सतर्कता-व्यायाम में नियमितता और जीवन के पति आशावादी दृष्टि कोण ही उनकी वृद्धावस्था को जवानी स्तर को बनाये रहने में समर्थ हुआ है। वे जिंदगी को प्यार करती हैं और हर दिन को बहुत ही आनंद का रसास्वादन करते हुए जीना चाहती हैं। मोटे तौर से यही हैं उनकी वृद्धावस्था को जवानी की स्थिति में बनाये रहने वाले कारण।
रूस का दक्षिणी भाग जार्जिया स्टालिन की जन्म-भूमि थी। काकेशस पर्वत मालाओं से घिरा हुआ यह क्षेत्र शतायु लोगों का भण्डार माना जाता है। इस क्षेत्र में 100 से भी कम आयु में मरने वालों की संख्या बहुत कम होती है। अधिक तर तो लंबी उम्र तक जीने वाले लोग ही पाये जाते हैं इस छोटे से क्षेत्र में सर्वेक्षण करने पर पाया गया कि 2100 व्यक्ति ऐसे हैं, जो 125 वर्ष की आयु पार चुके यह लोग 100 वर्ष की आयु में ही इतने भी सक्रिय पाये जाते हैं जितने कि आमतौर से लोग 40-45 वर्ष की उम्र में होते हैं।
इस क्षेत्र का एक किसान मखमूद ईवाजोव 150 वर्ष का था। उसके 23 बेटी-बेटे थे। पोते पर पोते 150 इस प्रकार उसका अकेले का परिवार 175 आदमियों का बन गया उसकी सबसे छोटी लड़की 120 वर्ष की थी।
इसी प्रकार अबखाजिया क्षेत्र का मामसीर नूट नामक मजूर मृत्यु के समय 150 वर्ष का था। टेल्से एविजिवे नामक महिला 180 वर्ष की होकर मरी दाघेस्तान पहाड़ी की तलहटी में बसे एक छोटे गाँव में रहने वाला गड़रिया लिडयोव पझाक 156 को होकर मरा। उसके भाई भी ऐसे ही दीर्घजीवी थे, एक लूवा 123 वर्ष और दूसरा पैलेडी 120 वर्ष तीसरी बहिन जीनिया 114 वर्ष। वज्रोव पहाड़ी क्षेत्र का निवासी शिराली मुस्लीमोव को दीर्घ जीवन के सिलसिले में अधिक ख्याति मिली हैं। वह 158 वर्ष की आयु में अपने घोड़े पर चढ़कर तेल दौड़ का आनन्द लेता था।
इस क्षेत्र में इतने अधिक दीर्घजीवी क्यों होते हैं इसका पता लगाने के लिये शरीर शास्त्री ईवान वेसीलेविन के नेतृत्व में एक दल बहुत समय तक इस क्षेत्र में भ्रमण करके आवश्यक जानकारियाँ एकत्रित करता रहा। दलने जो रिपोर्ट दी उसमें बताया गया कि ऊँचे पर्वतीय क्षेत्रों में ऑक्सीजन से अधिक उपयोगी एक प्राण वायु होती हैं ओजोन ऊँचे स्थानों में उसकी मात्रा नीचे स्थान की अपेक्षा कही अधिक होती है अस्तु वहाँ के निवासी इस विशिष्ठ प्राण वायु का लाभ उठाकर दीर्घ जीवी बनते हैं। दूसरा कारण है कठोर श्रम। तीसरा सादा जीवन और प्रकृति के अनुरूप भोजन। चौथा कारण है अन्त तक हंसी खुशी का जीवन, तनावों का अभाव, सौम्य सरल सामाजिकता। इन थोड़ी सी सुविधाओं के कारण ही इतनी लंबी आयु जी लेते हैं। गहरी नींद वहाँ सभी लोग सोते हैं। कोई किसी को तब तक सोने से नहीं जगाता जब तक कोई भारी विपत्ति ही सामने आकार खड़ी न हो जाय। परिवार में वृद्धजनों की अपेक्षा नहीं होती, उन्हें समुचित सम्मान दिया जाता है। उन्हें मौत की प्रार्थना कभी नहीं करनी पड़ती। परिस्थितियाँ जरूर कठोर श्रम करने और अभावग्रस्तता जैसी होती हैं, फिर भी उनने अपने को उसी में संतुष्ट एवं प्रसन्न रहने की मनःस्थिति में ढाल लिया है।
रूसी वैज्ञानिक वोगोमोलेत्स का कथन है कि आदमी यदि 60-70 वर्ष पार कर चुका हो तो उसे फिर यही सोचना चाहिये कि उसने अभी आधी उम्र ही भोगी है इतने ही वर्ष उसे और जीवित रहना है। बुढ़ापा एक प्रकार की बीमारी है, अस्तु उसका इलाज भी अन्य रोगों की चिकित्सा की ही तरह किया जा सकता है।
दार्शनिक एडवर्डस् का कथन है उम्र को वर्षों से नहीं स्वास्थ्य और स्वभाव के आधार पर आँकना चाहिये। संसार में अनेकों ऐसे शक्ति हुए हैं जिन्होंने आयु के प्रभाव को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया और मृत्यु पर्यंत युवावस्था को अक्षुण्ण बनाये रखा।
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस 50 वर्ष की आयु के पश्चात लिखना आरंभ किया। रवीन्द्र नाथ टैगोर 90 वर्ष की आयु तक अपने लेखन कार्य में संलग्न रहे।
गाँधी जी ने सन् 1932 में एक विदेशी पत्रकार को उत्तर देते हुए कहा था, “मैं 63 वर्ष का जरूर हो गया पर मुझे कभी खयाल भी नहीं आता कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ। जिस आदमी को ऐसा लगेगा वह पाठशाला के एक विद्यार्थी की तरह कैसे उर्दू का अध्ययन करेगा और कैसे बंगला तमिल, तेलगू पढ़ने के सपने देखेगा?”
जवानी का उम्र से विशेष संबंध नहीं वह वृद्धावस्था में भी बनी रह सकती हैं और छोटी आयु में भी विकसित हो सकती है। बचपन, जवानी, और बुढ़ापे का संबंध आयु से भी कुछ तो है ही पर उसकी धुरी मनुष्य के चिन्तन पर टिकी हुई है यदि कम उम्र का व्यक्ति अपने आपको प्रौढ़ समझे और तद्नुरूप उत्तरदायित्व ओढ़े तो वह प्रौढ़ों की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। इसके विपरीत उपेक्षा और अवसाद से जवानी बुढ़ापे में बदल सकती हैं। बुढ़ापे में जवान भी रहा जा सकता है यह सब कुछ मनुष्य के साहस, उत्साह, श्रम, उत्तरदायित्व निर्वाह और दृष्टिकोण पर निर्भर है। कम आयु में परिष्कृत व्यक्तित्व का परिचय देने वाले मूर्धन्य व्यक्तियों की संख्या भी संसार में कम नहीं रही है।
आदि शंकराचार्य 32 वर्ष की आयु तक पहुँचने से पूर्व ही अपना विशाल साहित्य निर्माण ओर चारों धामों की स्थापना कार्य पूरा कर चुके थे। 16 वर्ष यदि लग्न पूर्वक किसी दिशा में जुटा दिये जाये तो उतना कर गुजरना किसी के लिये भी संभव हो सकता है जो आदि शंकराचार्य ने किया।
ब्लेज पास्कल ने ज्यामिती पर अपनी प्रसिद्ध पुस्तक लिखी और 16 वर्ष की आयु में उसने गणना यंत्र ‘एडिंग मशीन’ का आविष्कार विल्वर राइट और आर्विल राइट बीस और तीस वर्ष की आयु के बीच ही वायुयान बना कर उस पर उड़ने का परीक्षण करने लगे थे। शक्ति चालित हवाई उड़ान भरने का लक्ष्य जब उन लोगों ने पूरा करके संसार को आश्चर्य चकित कर दिया तब आर्बिल की आयु 32 वर्ष सिल्वर की आयु 36 साल थी।
सन्त ज्ञानेश्वर ने अपनी प्रख्यात पुस्तक 15 वर्ष की आयु में लिखी थी। सिंगमंड फायड ने 26 वर्ष की आयु में मनोविज्ञान शास्त्र का प्रामाणिक ढाँचा संसार के सामने प्रस्तुत कर दिया था। चार्ल्स डार्विन ने अगणित जीव-जातियों का अध्ययन करके जब विकासवाद का क्रम बद्ध आधार खड़ा किया, तब उनकी आयु 27 वर्ष की थी। विज्ञान के महापंडित अर्ल्वट आइन्स्टाइन ने 15 वर्ष की आयु में ही न्यूक्लिड न्यून्टन और स्थिनोजा के सिद्धान्तों में प्रकाण्ड प्राप्त कर लिया था। जब वे 26 वर्ष की आयु के निकट पहुँचे तो उन्होंने सापेक्षता सिद्धान्त की रूप रेखा प्रस्तुत करके विज्ञान जगत में हलचल मचा दी थी।
वैज्ञानिक क्षेत्र की कितनी ही प्रतिभाएँ ऐसी हुई हैं जिन्होंने छोटी उम्र में ही अविस्मरणीय आविष्कार किये थे। एली ह्रिटवी ने 28 वर्ष की आयु में कपास ओटने की मशीन का आविष्कार किया। चार्ल्स मार्टिन हाल ने 23 वर्ष की आयु में विद्युत संश्लेषण द्वारा एल्युमिनियम उत्पादन की नई विधि पेटेन्ट कराई। जेम्स वाट ने 25 वर्ष की आयु में भाप इंजन की कल्पना की और 33 वर्ष का होने तक काम में आ सकने योग्य इंजन बना डाला। सैम्युअल कोल्ट ने 16 वर्ष की आयु में रिवाल्वर का लकड़ी का मॉडल बनाया। पीछे उसे धातु का बनाया और 21 वर्ष की आयु में गोली चलाने में पूरी तरह सफल रिवाल्वर बना कर तैयारी कर दी।
कला क्षेत्र में भी ऐसे कितनी ही प्रतिभाएँ हुई हैं जिनने छोटी आयु में ही अपनी प्रतिभा का परिचय देना आरंभ कर दिया। माइक्लेंजेली ने 17 वर्ष की उम्र में ‘सेन्टर का युद्ध’ नामक प्रतिमा बनाई। 26 वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उसने पियेक्त और वाक्स मूर्तियां गढ़कर कला क्षेत्र में अपने लिए अति सम्मानास्पद स्थान प्राप्त कर लिया। लुड विग फान बीठोफेन का प्रथम संगीत ग्रन्थ तब प्रकाशित हुआ तब वह मात्र 13 वर्ष का था। 23 वर्ष की आयु तक पहुंचते-पहुंचते तो वह संगीत संसार में मूर्धन्य कलाकार गिना जाने लगा। रवीन्द्रनाथ टैगोर की प्रथम कविता पुस्तक तब छपी जब वे 16 वर्ष के उस प्रथम कृति की भी उस समय के साहित्य मर्मज्ञ भूरि-भूरि प्रशंसा की थी।
ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध साहित्यकार और राजनेता बेजा डिजराइली कहते थे-जिसने जवानी गंवादी उसके लिये और कुछ बचा ही नहीं।’ उनका अभिप्राय यह था महत्वपूर्ण कार्य कर गुजरने की क्षमता केवल युवावस्था में ही होती हैं। बुढ़ापे में तो किसी बंधे बंधाये ढर्रे लकीर पीटते रहना भर ही संभव होता है।
सिकन्दर महान 20 साल की आयु में सिंहासनारूढ़ हुआ ओर 27 वर्ष की आयु तक उसने दिग्विजय करली महात्मा गाँधी जब दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का नेतृत्व कर रहे थे तब वे 24 वर्ष के थे।
ऐलेग्जेण्डर ग्राहम बेल ने 20 वर्ष की आयु में टेलीफोन आविष्कार पर प्रयत्न आरंभ किये और 29 वर्ष की में उसने सफल टेलीफोन यंत्र को पेटेन्ट करा लिया ‘बिजली का मतदान यंत्र’ पेटेन्ट कराने वाला वैज्ञानिक केवल 21 वर्ष की आयु का है यह देखकर लोग आश्चर्य चकित रह गये।
अल्पायु में प्रौढ़ता का परिचय देने वाले और वृद्धावस्था में यौवन को अक्षुण्ण रखने में सफल उपरोक्त उदाहरणों से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि मानसिक सतर्कता ओर जीवन यापन में सुव्यवस्था बन रह कर हम सुदृढ़ निरोग और हंसता-हंसाता और महत्वपूर्ण जीवन सरलता पूर्वक जी सकते हैं।
फरिश्ते ने जैसे ही इंसान को देखा तो आश्चर्य से चकित रह गया। इंसान के मस्तिष्क पर छिटकी पसीने की प्रत्येक बूँद में भगवान विराजमान थे।
-महाकवि नागोची
संसार में एक ओर जनसंख्या की वृद्धि हो रही है दूसरी ओर कल कारखाने और उद्योग धब्बे बढ़ रहे हैं। इन दोनों ही अभिवृद्धियों के लिये पेयजल की आवश्यकता भी बढ़ती चली जा रही है। पीने के लिये, नहाने के लिये, कपड़े धोने के लिये, रसोई एवं सफाई के लिये हर व्यक्ति को-हर परिवार को पानी चाहिये। जैसे-जैसे स्तर ऊँचा उठता जाता है उसी अनुपात से यह पानी की आवश्यकता भी बढ़ती है। खाते-पीते आदमी अपने निवास स्थान में पेड़-पौधे, फल-फूल, घास-पात लगाते हैं, पशु पालते हैं, इस सबके लिये पानी की माँग और बढ़ती है। गर्मी के दिनों में तरावट और छिड़काव के लिये पानी चाहिये।
कल कारखाने निरन्तर पानी माँगते हैं। जितना बड़ा कारखाना, उतनी बड़ी पानी की माँग। भाप से चलने वाली रेलगाड़ियां तथा दूसरी मशीनें पानी की अपेक्षा करती हैं। शोधन-संशोधन ढेरों पानी लेता है। शहरों में फ्लश के पखाने, सीवर लाइनें तथा नाली आदि की सफाई के लिये अतिरिक्त पानी की जरूरत पड़ती है। कृषि और बागवानी का सारा दारोमदार ही पानी पर ठहरा हुआ है। हरियाली एवं वन सम्पदा पानी पर ही जीवित है। पशु पालन में चारा पानी अनिवार्य रूप से चाहिये। और भी न जाने कितने ज्ञात-अज्ञात आधार हैं जिनके लिये पानी की निरन्तर जरूरत पड़ती रहती है।
यह सारा पानी बादलों से मिलता है। पहाड़ों पर जमने वाली बर्फ-जिसके पिघलने से नदियाँ बहती हैं वस्तुतः बादलों का ही अनुदान है। सूर्य की गर्मी से समुद्र द्वारा उड़ने वाली भाप बादलों के रूप में भ्रमण करती हैं। उनकी वर्षा से नदी-नाले, कुँए, तालाब, झरने-सोते बनते हैं। उन्हीं से उपरोक्त आवश्यकताएं पूरी होती हैं। जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ वृक्ष वनस्पतियों की-अन्न, शाक, पशु वंश की, कल कारखानों की, जो वृद्धि होती चली जा रही है उसने पानी की माँग को पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ा दिया है। यह माँग दिन-दिन अधिकाधिक उग्र होती चली जा रहीं है। बादलों के अनुदान से ही अब तक सारा काम चलता रहा है। सिंचाई के साधन नदी, तालाब, कुओं से ही पूरे किये जाते हैं। इनके पास जो कुछ है बादलों की ही देन हैं। स्पष्ट है कि बादलों के द्वारा जो कुछ दिया जा रहा है वह प्रस्तुत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये कम पड़ता है। संसार भर में पेयजल अधिक मात्रा में प्राप्त करने की चिन्ता व्याप्त है ताकि मनुष्यों की, पशुओं की, वनस्पति की, कारखानों की आवश्यकता को पूरा करते रहना संभव बना रहे।
बादलों पर किसी का नियन्त्रण नहीं, वे जब चाहें जितना पानी बरसायें। उन्हें आवश्यकता पूरी करने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता। वे बरसते भी हैं तो अन्धाधुन्ध बेहिसाब। वर्षा में वे इतना पानी फैला देते हैं कि पृथ्वी पर उसका संग्रह कर सकना संभव नहीं होता और वह बहकर बड़ी मात्रा में समुद्र में जा पहुँचता है। इसके बाद शेष आठ महीने आसमान साफ रहता है। गर्मी के दिनों में तो बूंद-बूँद पानी के लिये तरसना पड़ता है। इन परिस्थितियों में मनुष्य को जल के अन्य साधन स्त्रोत तलाश करने के लिये विवश होना पड़ रहा है, अन्यथा कुछ ही दिनों में जल संकट के कारण जीवन दुर्लभ हो जायेगा। गंदगी बहाने-हरियाली उगाने और स्नान रसोई के लिये भी जब पानी कम पड़ जायेगा तो काम कैसे चलेगा? कल कारखाने किस के सहारे अपनी हलचल जारी रखेंगे?
टमेरिका की आबादी 20 करोड़ है। वहाँ कृषि एवं पशु पालन में खर्च होने वाली पानी का खर्च प्रति मनुष्य पीछे प्रतिदिन 13000 गैलन आता है। घरेलू कामों में तथा उद्योगों में खर्च होने वाला पानी भी लगभग इतना ही बैठता है। इस प्रकार वहाँ हर व्यक्ति पीछे 26 हजार गैलन पानी की नित्य जरूरत पड़ती है। यहाँ की आबादी विरल और जल स्त्रोत बहुत हैं, तो भी चिन्ता की जा रही कि आगामी शताब्दी में पानी की आवश्यकता एक संकट के रूप में सामने प्रस्तुत होगी।
भारत की आबादी अमेरिका की तुलना में ढाई गुनी अधिक है। किन्तु जल साधन नहीं कम हैं। बड़े शहरों में अकेले बम्बई को ही लें तो वहाँ की जरूरत 34 करोड़ गैलन प्रतिदिन की हैं जबकि पूरी सप्लाई कठिनाई से 22 करोड़ गैलन हो पाती है। यही दुर्दशा न्यूनाधिक मात्रा में अन्य शहरों की है। देहाती क्षेत्र में अधिकाँश कृषि उत्पादन वर्षा पर निर्भर है। जिस साल वर्षा कम होती हैं, उस साल भयंकर दुर्भिक्ष का सामना करना पड़ता है। मनुष्यों और पशुओं की जान पर बन आती है। यदि इन क्षेत्रों में मानव उपार्जित जल की व्यवस्था हो सके तो खाद्य समस्या का समाधान हो सकता है।
नये जल-आधार तलाश करने में दृष्टि समुद्र की ओर ही जाती है। धरती का दो तिहाई से भी अधिक भाग समुद्र में डूबा पड़ा है। किन्तु वह है खारी। जिसका उपयोग उपरोक्त आवश्यकताओं में से किसी की भी पूर्ति नहीं कर सकता। इस खारी जल को पेय किस प्रकार बनाया जाय इसी केन्द्र पर भविष्य में मनुष्य जीवन की आशा इन दिनों केंद्रीभूत हो रही है।
इस संदर्भ में राष्ट्रसंघ में एक आयोग नियुक्त किया था जिसने संसार के 46 प्रमुख देशों में दौरा करके जल समस्या और उसके समाधान के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इस रिपोर्ट का साराँश राष्ट्र संघ से प्रगतिशील देशों में खारी पानी का शुद्धि करण नामक पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया है जिसमें प्रमुख सुझाव यही है कि समुद्री जल के शुद्धिकरण पर अधिकाधिक ध्यान दिया जाना चाहियें। यों वर्षा के जल को समुद्र में जाने से रोकने के लिये तथा जमीन की गहराई में बहने वाली अदृश्य नदियों का पानी ऊपर खींच लाने को भी महत्व दिया गया है और कहा गया है कि बादलों के अनुदान तथा पर्वतीय बर्फ के रूप में जो जल मिलता है उसका भी अधिक सावधानी के साथ दुरुपयोग किया जाना चाहिये।
उत्तर और दक्षिण ध्रुव प्रदेशों के निकटवर्ती देशों के लिये एक योजना यह है कि उधर समुद्र में सैर करते फिरने वाले हिम पर्वतों को पकड़ कर पेय जल की आवश्यकता पूरी की जाये तो यह अपेक्षाकृत सस्ता पड़ेगा ओर सुगम रहेगा। संसार भर में जितना पेयजल है उसका 80 प्रतिशत भाग ध्रुव प्रदेश ऐन्टार्कटिक के हिमावरण, आइस कैंप-में बंधा पड़ा है। इस क्षेत्र में बर्फ के विशालकाय खण्ड अलग होकर समुद्र में तैरने लगते हैं और अपना आकार हिम द्वीप जैसा बना लेते हैं। वे समुद्री लहरों और हवा के दबाव से इधर उधर सैर सपाटे करते रहते हैं। दक्षिण ध्रुव के हिम पर्वतों को गिरफ्तार करके दक्षिण अमेरिका-आस्ट्रेलिया और अफ्रीका में पानी की आवश्यकता पूरी करने के लिये खींच लाया जा सकता है। इसी प्रकार उत्तरी ध्रुव के हिम पर्वत एक बड़े क्षेत्र की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। यद्यपि उसमें संख्या कम मिलेगा।
अमेरिका के हिम विज्ञानी डा0 विलियम कैम्बेल और डा0 विर्ल्फड वीकंस ने इसी प्रयोजन के लिये कैम्ब्रिज इंग्लैण्ड में बुलाई गई एक अर्न्राष्ट्रीय गोष्टी इन्टर नेशनल सिम्पोजियम आन दि हाइड्रोलाजी आफ ग्लेशियर-में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा था-हिम पर्वतों को पकड़ने की योजना को महत्व दिया जाना चाहिये ताकि पेयजल की समस्या को एक हद तक सस्ता समाधान मिल सके।
भू उपग्रहों की सहायता से फोटो लेकर यह पता लगाया जा सकता है कि किस क्षेत्र में कैसे ओर कितने हिम पर्वत भ्रमण कर रहे हैं। इन पर्वतों का 83 प्रतिशत सतह से ऊपर दिखाई पड़ता है। इन्हें पाँच हजार मील तक घसीट कर लाया जा सकता है। इतना सफर करने में उन्हें चार-पाँच महीने लग सकते हैं।
ढुलाई का खर्चा और सफर की अवधि में अपेक्षाकृत गर्म वातावरण में बर्फ का पिघलने लगना यह दो कारण यद्यपि चिन्ताजनक हैं तो भी कुल मिलाकर यह पानी उससे सस्ता ही पड़ेगा जितना कि हम जमीन पर रहने वालों को औसत हिसाब से उपलब्ध होता है।
हिसाब लगाया गया है कि ऐमेरी से आस्ट्रेलिया तक ढोकर लाया गया हिम पर्वत दो तिहाई गल जायेगा और एक तिहाई शेष रहेगा। रास से दक्षिण अमेरिका तक घसीटा गया हिम पर्वत 14 प्रतिशत ही शेष रहेगा। धीमी चाल से घसीटना अधिक लाभदायक समझा गया है ताकि लहरों का प्रतिरोध कम पड़ने से बर्फ की बर्बादी अधिक न होने पाये। 7-8 हजार हार्सपावर का एक टग जलयान आधा नाट की चाल से उसे आसानी साथ घसीट सकता है। अपने बन्दरगाह से चलकर हिमपर्वत तक पहुँचने और वापिस आने में जो खर्च आवेगा और फिर उस बर्फ को पिघलाकर पेयजल बनाने में जो लागत लगेगी वह उसकी अपेक्षा सस्ती ही पड़ेगी जो म्युनिसपेलिटियाँ अपने परम्परागत साधनों से जल प्राप्त करने में खर्च करती है। सबसे बड़ी बात यह है कि बर्फ का जल डिस्टिल्डवार स्तर का होने के कारण स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत ही उपयोगी, स्वच्छ और हानिकारक तत्वों से सर्वथा रहित होगा। उसके स्तर को देखते हुए यदि लागत कुछ अधिक भी बैठती हो तो भी उसे प्रसन्नता पूर्वक सहन किया जा सकता है।
दूसरा उपाय यह सोचा गया है कि समुद्र किनारे अत्यन्त विशालकाय अणु भट्टियां लगाई जाये उनकी गर्मी से कृत्रिम बादल उत्पन्न किये जायें उन्हें ठण्डा करके कृत्रिम नदियाँ बहाई जायें, उन्हें रोक बाँधकर पेयजल की समस्या हल की जाय।
तीसरा उपाय यह है कि वर्षा का जल नदियों में होकर समुद्र में पहुँचता है उसे बाँधों द्वारा रोक लिया जाये और फिर उनसे पेयजल की समस्या हल की जाये।
दूसरे और तीसरे नम्बर के उपाय जोखिम भरे हैं। अत्यधिक गर्मी पाकर समुद्री जलचर मर जायेंगे, तटवर्ती क्षेत्रों का मौसम गरम हो उठेगा और ध्रुव प्रदेशों तक उस गर्मी का असर पहुँचने से जल प्रलय उत्पन्न होगी और धरती का बहुत बड़ा भाग जलमग्न हो जायेगा। इतनी बड़ी अणु भट्टियां अपने विकिरण से और भी न जाने क्या क्या उपद्रव खड़े करेंगी। तीसरे उपाय से यह खतरा है कि जब समुद्रों में नदियों का पानी पहुंचेगा ही नहीं तो वे सूखने लगेंगे। खारापन बढ़ेगा और उस भारी पानी से बादल उठने ही बंद हो जायेंगे। तब नदियों का पानी रोकने से भी क्या काम चला। ध्रुवों के घुमक्कड़ हिम द्वीप भी बहुत दूर तक नहीं जा सकते उनका लाभ वे ही देश उठा सकेंगे जो वहाँ से बहुत ज्यादा दूर नहीं हैं।
उपरोक्त सभी उपाय अनिश्चित एवं अधूरे है। पर इससे क्या? पेयजल की बढ़ती हुई माँग तो पूरी करनी ही पड़ेगी अन्यथा पीने के लिये, कृषि के लिये कारखानों के लिये, सफाई के लिये भारी कमी पड़ेगी और उस अवरोध के कारण उत्पादन और सफाई की समस्या जटिल हो जाने से मनुष्य भूख, गन्दगी और बीमारी से त्रस्त होकर बेमौत मरेंगे।
यह सारी समस्याएं बढ़ती हुई आबादी पैदा कर रही है। मनुष्य में यदि दूरदर्शिता होती तो वह जनसंख्या बढ़ाने की विभीषिका अनुभव करता और उससे अपना हाथ रोकता, पर आज तो न यह होता दीखता है और न पेयजल का प्रश्न सुलझता प्रतीत होता है। मनुष्य को अपनी वज्र मूर्खता का सर्वनाशी दण्ड आज नहीं तो कल भुगतना ही पड़ेगा। अनुमान है कि यह विषम परिस्थिति अगली शताब्दी के अन्त तक संसार के सामने आ उपस्थित होगी।
अमेरिका के राष्ट्रपति एन्ड्रु जैक्सन की माता को एक सहज पर नर्स के रूप में विदेश जाना पड़ा। तब जैक्शन चौदह वर्ष के थे। माता ने अपने पुत्र को एक बहुमूल्य सन्देश भेजा जिसमें लिखा था एन्डरु यदि मैं जीवित वापिस न लौटूँ तो जिन्दगी भर मेरी एक बात याद रखना-”इस संसार में हर मनुष्य को अपना रास्ता आप बनाना पड़ता है। आगे बढ़ने के लिये सच्चे दोस्तों की जरूरत पड़ती है और वे उन्हें ही मिल सकते हैं जो स्वयं ईमानदार है।”
यों मस्तिष्क कुछ न कुछ विचार करता ही रहता है। पर वे होते हैं अप्रासंगिक, असम्बद्ध और अस्त-व्यस्त। इस बिखराव के कारण ही वे निरर्थक सिद्ध होते हैं और मस्तिष्क में थोड़ी-सी हलचल उत्पन्न करके अन्तरिक्ष में विलीन हो जाते हैं। यह चिन्तन तन्त्र पर पड़ने वाला एक अनावश्यक भार है।
सोचना वस्तुतः एक बहुमूल्य क्रिया हैं। यह अदृश्य तो अवश्य रहती है किन्तु सभी दृश्यमान कर्म उन्हीं के फलस्वरूप आकार धारण करने में समर्थ होते हैं। जो कुछ किया जाता है वह ऐसे ही-अनायास ही नहीं हो जाता। बहुत पहले से उनका ताना-बाना मस्तिष्क में बुना जाता है। लाभ-हानि का विश्लेषण किया जाता है-सम्भव असम्भव का पता लगाया जाता है और साधनों के साथ इस आकाँक्षा का तालमेल बिठाया जाता है। इतना मंथन हो चुकने के बाद किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने की स्थिति आती है। जब मस्तिष्क में पूरी तरह पककर कोई विचार सुनिश्चित संकल्प के रूप में परिणत हो जाता है तब उसके लिए साधन जुटाने और सक्रिय कदम बढ़ाने की स्थिति आती है। इतनी मस्तिष्कीय खिचड़ी पके बिना किसी कार्य का आरम्भ हो ही नहीं सकता। चलते हुए कामों का ढर्रा सहज प्रक्रिया भी अभ्यस्त रूप से करती रहती हैं उसमें सामान्य व्यवस्था के अतिरिक्त कुछ बहुत बड़ा सोच-विचार करने की आवश्यकता नहीं पड़ती किन्तु किसी कार्य का प्रारम्भ तो विचार मंथन के बिना हो ही नहीं सकता। दैनिक कार्य-पद्धति में भी गुण दोष एवं हानि-लाभ देखने और परिवर्तन परिवर्धन की व्यवस्था करने वाली विचार प्रक्रिया को सजग रखकर ही चलना पड़ता है। अन्यथा चलते हुए क्रिया-कलाप का अभ्यस्त ढर्रा भी लड़खड़ाने लगेगा और काम का स्तर गिरने लगेगा।
निरर्थक काम करते रहने वाले की भर्त्सना की जाती है-उसे मूर्ख ठहराया जाता है क्योंकि कर्तृत्व शक्ति को उपयोगी प्रयत्नों में लगाने की अपेक्षा वह उसे बर्बाद करता है। इससे समय एवं श्रम शक्ति नष्ट होती है और उससे जो लाभ उठाया जा सकता था उससे वंचित रहना पड़ता है। ठीक इसी प्रकार विचार शक्ति की बर्बादी को भी हानिकारक और अबुद्धिमत्तापूर्ण ठहराया जाना चाहिए। चिन्तन वस्तुतः अदृश्य रूप से किया जाने वाला कर्म ही है। क्रिया शक्ति को बर्बाद करना और विचार शक्ति को निरर्थक बखेरना वस्तुतः एक ही भूल के दो रूप है।
विचारों को क्रमबद्ध और योजनाबद्ध बनाना चाहिए। मनोनिग्रह की बात योगाभ्यास के प्रसंग में बार-बार कही जाती है। एकाग्रता की महिमा गाई जाती है और उसे बढ़ाने के लिए ध्यान साधना कराई जाती है। इस सबका मतलब विचारों के उत्पादन अथवा प्रवाह का रोक देना नहीं है। वैसा तो हो भी नहीं सकता। मानवी मस्तिष्क की संरचना ही ऐसी है जिसके कारण हर घड़ी अगणित विचार तरंग उठते रहने का क्रम चलता ही रहेगा और उसे किसी भी प्रकार रोका न जा सकेगा। एकाग्रता अथवा मनोनिग्रह का मतलब यही है कि अस्त-व्यस्त ढंग से सोचने की बुरी आदत को क्रमबद्ध एवं सुसंस्कृत बनाया जाय। इतना अभ्यास यदि हो सके तो एक सुनिश्चित दिशा में विचारों का प्रवाह चलने लगेगा और उसका आश्चर्यजनक सत्परिणाम सामने प्रस्तुत होगा।
वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं दूसरे बुद्धिजीवी कलाकार अपने अभीष्ट प्रयोजन पर समय चिन्तन को एकत्रित करते हैं। छोटे से आतिशी शीशे के घेरे में बिखरी हुई सूर्य किरणों को जब एक केन्द्रबिन्दु पर एकत्रित कर लिया जाता है तो उससे प्रचण्ड गर्मी उत्पन्न होती है आग जलने लगती है। ठीक यही बात विचारों के केन्द्रीकरण के सम्बन्ध में लागू होती है यदि किसी निर्धारित लक्ष्य पर देर तक गम्भीरतापूर्वक चिन्तन कर सकने की आदत बढ़ जाय तो इस संदर्भ में आशातीत और आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ हस्तगत होती है।
हमें अपने विचारों तन्त्र का गहराई के साथ निरीक्षण करना चाहिए और यह देखना चाहिए के निष्प्रयोजन निरर्थक असंबद्ध और अस्त-व्यस्त, सोच-विचार करते रहने की बुरी आदत तो अपने को नहीं लग गई है। यदि ऐसा कुछ हो तो उसे बर्बादी को रोकने के लिए सक्रिय कदम बढ़ाने चाहिए। जीवन के साथ जुड़ी हुई असंख्य दिशाएँ एवं समस्याएँ सामने होती है। उन पर क्रमबद्ध रूप से विचार करें और किसी उपयोगी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए तर्क, तथ्य और प्रमाणों करें तो कुछ ही समय में ऐसे निष्कर्ष ढूंढ़े निकाले जा सकेंगे जिन्हें कार्यान्वित करके वर्तमान स्थिति में क्रान्तिकारी सुधार कर सकना सम्भव हो सके।
स्वास्थ्य-संवर्धन, ज्ञान-सम्पादन, परिवार-निर्माण, अर्थ सन्तुलन, समय का क्रमबद्ध विभाजन जैसी व्यक्तिगत समस्याओं पर लगातार गहराई तक विचार करते रहें और स्थिति के हर पहलू का निरीक्षण करते रहें तो ऐसे निष्कर्ष निकाले जा सकेंगे जिनके आधार पर आज की अपेक्षा कल कहीं अधिक अच्छी रीति-नीति अपनाई जा सके। इन सभी महत्वपूर्ण विषयों में सुधार करने की काफी गुंजाइश मिलेगी। जो इन दिनों किया जा रहा है वह सर्वथा ठीक ही हो और उसमें परिष्कार करने की तनिक भी आवश्यकता न हो ऐसी बात नहीं है। वर्तमान गतिविधियों में उपयोगी हेर-फेर करके कल अधिक अच्छी स्थिति प्राप्त करने की सदा की गुंजाइश रहती है। इस संदर्भ में ढूंढ़े-खोज जारी रखा जाय और जहाँ सुधार की आवश्यकता प्रतीत हो वहाँ उसके लिए कदम बढ़ाया जाय तो क्रमशः उत्कर्ष के अनेकों अवसर सामने आते चले जायेंगे। विचारों का दिशा निर्धारण दिन-दिन नित नये चमत्कार प्रस्तुत करता चला जायगा।
आवश्यक नहीं कि निरन्तर अपनी व्यक्तिगत समस्याओं में ही उलझें रहा जाय। परिवार के हर सदस्य के व्यक्तित्व को अपेक्षाकृत अधिक विकसित करने का प्रश्न भी उतना ही अहम् है जितना कि अपने उत्कर्ष का। प्रत्येक के सम्बन्ध में अनेकों विकल्प हो सकते हैं किसी एक ही बात पर अड़े रहने की अपेक्षा उन सभी विकल्पों पर विचार करना चाहिए। जो रास्ते सूझे उनमें से अधिक सरल और अधिक उत्तम को कार्यान्वित करने का प्रयत्न किया जा सकता है। सोचने की यह आदत अपने परिवार का भी बहुत भला कर सकती है। इस चिन्तन के आधार पर ऐसे उपाय सामने आ सकते हैं जिनसे वर्तमान परिस्थिति के रहते हुए भी कुटुम्ब के लोग अधिक उन्नति कर सके अधिक सुख पा सकें।
कितनी ही ऐसे सामाजिक समस्याएँ प्रथा परम्पराएँ तथा घिरी हुई परिस्थितियाँ ऐसी हो सकती है जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से हमें प्रभावित कर रही है। उन्हें यथास्थान रहने देने से कई प्रकार की हानियाँ उठानी पड़ती है। इनसे किस प्रकार बचा जाय, इन्हें किस प्रकार बदला जाय। जिस समाज में हम रह रहे हैं उसमें प्रचलित अनेकानेक परंपराएं हमें उठाती गिराती है। इनमें जो उपयोगी हों उन्हें बढ़ाना और जो हानिकारक हों उन्हें मिटाना आवश्यक है।
धार्मिक आध्यात्मिक, राजनैतिक, दार्शनिक प्रचलनों में से ऐसे कितने ही हैं जिन पर नये सिरे से विचार किया जाना चाहिए। बदलती परिस्थितियाँ पुराने ढर्रे में पग-पग पर नये मूल्यों की स्थापना चाहती है। यह सब किस प्रकार सम्भव हो सकता है, इसे केवल कुछेक बड़े लोगों पर नहीं छोड़ा जा सकता है। हममें से प्रत्येक को समान रूप से विश्व नागरिकता के कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व मिले हैं इसलिए आवश्यक है कि जो कहा और बताया जा रहा हैं उस पर गहराई से विचार करके यह देखें कि यथार्थता एवं उपयोगिता के निकट पहुँचने के लिए क्या कुछ सुधर, परिवर्तन किया जाना चाहिए।
ऊपर की पंक्तियों में चिन्तन के लिए कुछ उपयोगी आधारों के संकेत हैं। ऐसी अनेकों धाराएँ हैं जिन पर हमारी विचार शक्ति यदि केन्द्रित रखी जा सके तो उसके परिणाम निश्चित रूप से श्रेयष्कर होंगे। ऐसा सम्भव तभी होगा जब अस्त-व्यस्त रीति से असंबद्ध विचार करते रहने की मानसिक बर्बादी के कारण उत्पन्न होने वाली क्षति को समझें और उसे रोकने के लिए साहसपूर्ण कदम बढ़ाये।
गणित शास्त्र के कुछ अजूबे हैं जिनके कारण कई पद्धतियां अपनाकर भी एक ही निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। एक स्थान तक पहुँचने के कई रास्ते हो सकते हैं और उनके बीच में पड़ने वाले स्थानों के नाम रूप स्वभावतः भिन्न होंगे फिर भी निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचना उनमें से किसी भी मार्ग से हो सकता है। यही बात धर्मों के संबंध में भी हैं वे रास्तों की तरह है जो भिन्न होते हुए भी हमें संयम और उदारता के कदम बढ़ाते हुए पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचने में सहायता करते हैं। आवश्यक नहीं इन धर्म मान्यताओं के ढाँचे में एकरूपता हो, प्रतिपादनों की भिन्नता होते हुए भी एक ही निष्कर्ष पर पहुँच सकना पूर्णतया संभव है।
उदाहरण के लिये ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति के संबंध में भूतकालीन और अर्वाचीन मान्यताओं को लिया जा सकता है, उनमें भारी अन्तर है तो भी निष्कर्ष निकालने का जहाँ तक संबंध है उसमें कोई अन्तर नहीं आता। सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण की भविष्यवाणी आज की तरह भूतकाल में भी की जाती थी और वह अब की तरह तब भी पूर्णतया सही होती थी। ज्योतिष संबंधी प्राचीन मान्यताएं अब झुठला दी गई हैं और यह प्रामाणित कर दिया गया है कि भूतकालीन ज्योतिषों की मान्यताएं अबकी अपेक्षा भिन्न प्रकार की थीं। इतने पर भी उस खण्डन से कोई अन्तर नहीं पड़ा। प्राचीन ज्योतिष के आधार पर भी ग्रहण समय संबंधी निष्कर्ष अभी भी जहाँ के तहाँ हैं और वे तब की तरह अब भी सही है।
भारतीय ज्योतिष आज के खगोल विज्ञान के साथ तालमेल नहीं खाती। फिर भी ग्रहण संबंधी उसकी परिणति सही निकल आती है।
भारतीय ज्योतिष के अनुसार सूर्य ही पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है। जैसा कि चन्द्रमा लगाता है।
पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाने वाले नौ ग्रहों में से सूर्य भी एक है।
यह मान्यता वर्तमान खगोल विज्ञान से भिन्न हैं फिर भी उसका निष्कर्ष ग्रहण के संदर्भ में ठीक बैठ जाता है। इसका कारण यह है कि सूर्य को स्थिर और पृथ्वी को चल अथवा पृथ्वी को स्थिर और सूर्य को चल मानकर चलने में परिणामतः कोई अन्तर नहीं आता। चलती रेल में बैठकर देखने से पेड़ पीछे को भागते प्रतीत होते हैं। यह पेड़ों के पीछे भागने की गति वही होती है जो रेलगाड़ी के आगे दौड़ने की। चूंकि पृथ्वी 24 घंटे में 360॰ चलती है यदि इसी बात को सूर्य का 24 घण्टे में 360॰ चलना कहा जाये तो भी परिणाम वही रहेगा।
पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घंटे में एक पूरा चक्कर लगाती है। भिन्न-भिन्न अक्षाँशों पर उसकी गति भिन्न रहती है। विषवत् रेखा पर यह गति 1040 मील प्रति घंटा 30 अक्षाँश पर यह गति 900 मील 45 अक्षाँश पर 735 मील और 60 अक्षाँश पर 520 मील प्रति घण्टा रहती है। पृथ्वी की दूसरी गति सूर्य की परिक्रमा है। जिसमें 185 मील प्रति सेकेंड की गति से उसे 365 दिन लगते हैं। वस्तुतः इस अवधि की ठीक गणना की जाय तो वह 365 दिन 5 घंटा 48 मिनट और 41 सेकेंड से कुछ कम होती है। पृथ्वी की धुरी जिसके चारों ओर वह प्रतिदिन घूमती है अपने परिक्रमा पथ के समकोण नहीं हैं वरन् 62.5 झुकी हुई।
आकाश में सूर्य का मार्ग 16 चौड़ा है जिसमें सूर्य चन्द्र तथा अन्य ग्रह चलते दिखाई देते हैं। आकाश इस मार्ग को-जोडिएक कहा जाता है। इसे पहचान के लिये उसे 12 भागों में विभाजित किया गया है जिन राशियाँ कहते हैं। प्रत्येक राशि 30 की होती है। सभी को एक राशि से दूसरी में प्रवेश करने में दो घण्टे लगाती है। जाते हैं। इन राशियों को मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ, मीन नाम दिये गये हैं वह सर्वविदित हैं।
घूमता हुआ लट्टू जब गिरने को होता है तो अपनी कीली पर घूमता हुआ लड़खड़ाने लगता है, उसकी कीली भी घूमने लगती है, पृथ्वी की कीली भी अपनी कटि पर इसी प्रकार घूमती रहती हैं। यदि इसकी कीली को आकाश में बहुत ऊँचे तक बढ़ाया जाय तो वह वहाँ पर एक अलग गोल चक्कर बना देगी। यह पृथ्वी की एक विशेष गति है जिसका ज्ञान भूगोल सामान्य विद्यार्थियों को नहीं होता। इस पूरे चक्कर के पूरा होने में 26000 वर्ष लगते हैं। पृथ्वी की इस गति का ग्रहणों के क्रम पर भी प्रभाव पड़ता है।
चन्द्रमा 29 दिन 7 घण्टे 43 मिनट 11 5 सेकेंड में पृथ्वी की एक परिक्रमा पूरी करता है इसे नक्षत्र मास कहते हैं। इस अवधि में चन्द्रमा अपनी एक परिक्रमा पूरी करके यथास्थान आ जाता है। किन्तु इस बीच पृथ्वी अपनी वार्षिक परिक्रमा में काफी आगे बढ़ जाती है। पृथ्वी के मान से चन्द्र को एक परिक्रमा पूरी करने के लिए और आगे बढ़ना पड़ता है। इस तरह उसे कुल 26 दिन 12 घण्टे 44 मिनट 28 सेकेंड लग जाते हैं। इस अवधि को संयुुति मास कहते हैं।
यदि पृथ्वी और चन्द्रमा के वृत्त एक ही तल पर होते तो प्रत्येक पूर्णिमा को चन्द्र ग्रहण और प्रत्येक अमावस्या को सूर्य ग्रहण दिखाई देता। जब चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करना होता है तो उसका वृत्त अन्तरिक्ष में उसके समानांतर रहता है। उन वृत्तों को काटने वाली रेखा वर्ष में कम से कम दो दो बार सूर्य के केन्द्र की दिशा की और इंगित करती है और तब सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी एक सीधी रेखा में हो जाते हैं यही ग्रहण का अवसर होता है। इससे यह भी स्पष्ट है कि वर्ष में कम से कम दो ग्रहण जो दोनों सूर्य के भी हो सकते हैं अवश्य ही पृथ्वी के किसी न किसी भाग में दिखाई देंगे। वर्ष में ग्रहणों की अधिकतम संख्या 7 है जिनमें 4-5 सूर्य के और शेष चन्द्रमा के होते हैं।
चन्द्रमा पृथ्वी से अधिकतम 2,53,0000 और न्यूनतम 2,21,600 मील दूर रहता है। जब वह पृथ्वी के निकट होता है तो चाल बढ़ जाती है, दूर होता है तो घट जाती है।
पृथ्वी और चन्द्रमा में अपना कोई प्रकाश नहीं होता है। सूर्य द्वारा पाये प्रकाश से ही वे चमकते हैं। पृथ्वी, चन्द्र और सूर्य की अपनी-अपनी अनोखी चालें है। इस चला−चली में वे जब एक ही, एक समतल पर सीधी रेखा में आ जाते हैं तब ग्रहण पड़ता है। जब बीच में चन्द्रमा हो तो पृथ्वी पर से पूरे सूर्य को नहीं देखा जा सकता। सूर्य का जितना हिस्सा चन्द्रमा के बीच में आने से पृथ्वी पर से नहीं दीखता वह सूर्य ग्रहण होता है। इसी तरह जब पृथ्वी बीच में हो तो सूर्य का प्रकाश चन्द्रमा के उतने क्षेत्र में पड़ने से रोक देता है यही चन्द्र ग्रहण है। चन्द्र ग्रहण के समय यदि कोई व्यक्ति चन्द्रमा पर हो तो उसे उस समय सूर्य ग्रहण दिखाई देगा।
भारतीय ज्योतिष में चन्द्रमा की छाया को केतु और पृथ्वी की छाया को राहु कहा गया है। यह छाया भी अपने ग्रहों के अनुसार सही गति से नियमबद्ध रूप से भ्रमण करती हैं इसलिए नवग्रहों में उन्हीं भी सम्मिलित कर लिया गया है।
चूंकि चन्द्रमा की गति प्रति घण्टा उसके व्यास के बराबर 2100 मील है। अतः खग्रास अधिक से अधिक दो घंटे का हो सकता है। इसके अतिरिक्त स्पर्श से लेकर मोक्ष तक में एक घण्टा और भी लग सकता है।
ग्रहण सम्बन्धी अब के प्रतिपादन ऊपर दिये गये हैं। प्राचीन काल में राहु और केतु के आक्रमण को चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण का कारण माना गया था। पृथ्वी और सूर्य में से कौन स्थिर और कौन चल है इस विषय पर भी मान्यताएँ बदलती रहती है। धर्म और दर्शन भी इसी प्रकार अपने कई रूप बदलता रहा है पर इससे उस लक्ष्य में कोई अन्तर नहीं आता जो जीवन की पूर्णता का केन्द्र बिन्दु हैं।
ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी की तरह सूर्य, चन्द्र और पृथ्वी की भी स्थिति है। उनकी गतिशीलता स्वतन्त्र रीति से चलता है। जब कभी व्यतिक्रम होता है तो ग्रहण पड़ता है। भावना, विचारणा और क्रिया का व्यतिक्रम भी मनुष्य जीवन पर ग्रहण जैसा कलंक लगा देता है।
औसतन प्रत्येक शताब्दी में प्रायः 154 चन्द्र ग्रहण और 237 सूर्य ग्रहण होते हैं। पर इनका कोई सुनिश्चित क्रम नहीं रहता। इस निश्चितता के कारण ही उनके सम्बन्ध में तरह-तरह के अनुमान लगाये जाते थे।
ईसा से हजारों वर्ष पूर्व भारतीय ज्योतिषियों ने ग्रहणों की प्रत्यावर्तन अवधि जान ली थी। इसे चान्द्र चक्र कहा जाता था। इस चक्र का एक घेरा 6581 1/3 दिन निश्चित किया गया था। इसका अर्थ यह था कि यदि आज कोई ग्रहण हुआ हो तो ठीक 6585 दिन बाद वही ग्रहण होगा। चूँकि पृथ्वी चन्द्र और सूर्य की गतियाँ भिन्न है उनमें सदा कुछ न कुछ अन्तर पड़ता ही रहता है इस लिए ग्रहण का भी उद्देश्य व दिन ठीक उसी प्रकार उतना ही होना तो सम्भव नहीं पर बहुत कुछ तालमेल खा जाता है और इतने दिन बाद ग्रहणों की पुनरावृत्ति वाली बात बन जाती हैं।
प्रकृति चक्र अपनी धुरी पर घूमता है। दिन के बाद रात-रात के बाद दिन। जन्म के बाद मरण-के बाद जन्म यह परिवर्तन का एक सुनिश्चित क्रम है। सुख और दुख भी इसी प्रकार आते जाते रहते हैं। इस परिवर्तन प्रक्रिया के गोलाकार चक्र का संकेत ग्रहणों का चक्र फिर पूर्ववत् चल पड़ता है। जब श्रेष्ठ परिस्थिति चली गई और उनके स्थान पर निकृष्टता की निशा आसीन हो गई तो कोई कारण नहीं कि फिर उत्कर्ष की अरुणिमा ऊषा का उदय न हो। हमारा भविष्य उज्ज्वल बनाने में काल चक्र अपनी भूमिका सम्पादित कर ही रहा है।
भगवान् महावीर प्रव्रज्या करते हुए संयोगवश सकडाल कुम्हार के घर ठहरे। वार्तालाप तो विदित हुआ कि सकडाल पूरा भाग्यवादी है। जो कुछ होता है सो भाग्य से होता है, यह बात उसके मन में न जाने क्यों बहुत गहराई तक जमकर बैठ गई थी।
करुणार्द्र अर्हन्त ने सोचा-इस अज्ञानी का भ्रम तो दूर करना ही चाहिए। वे पूछने लगे-तात, तुम्हारे मृत्तिका पात्र कैसे बनते-पकते हैं। उसने उत्तर दिया मिट्टी, जल, बालू, श्रम और अग्नि का संयोग जब भाग्यवश मिल जाता है तो ये बर्तन बन जाते हैं। सब कुछ निर्यात के निर्धारण से ही होता है। हम सब तो निमित्त मात्र है।
अर्हन्त ने पूछा-तात, यदि कोई उद्दंड व्यक्ति इन बर्तनों को लाठी से तोड़ने लगे तो क्या करोगे ?
कुम्भकार ने कहा प्रतिरोध करूंगा और अकारण हानि पहुँचाने वाले का सिर तोड़ दूँगा। इसी प्रकार का दूसरा प्रश्न ओर लगे हाथों पूछा गया-कोई आततायी तुम्हारी पत्नी पर आक्रमण करके उसका शील भंग करना चाहे तो ? कुम्भकार आवेश में आ गया और बोला-ऐसे दुष्ट का तो प्राण लेकर ही रहूँगा।
मुसकाते हुए भगवान् बोले-जिस प्रकार आक्रमणकारियों का प्रतिरोध करना आवश्यक है, उसी प्रकार सौभाग्य लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए भी प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। भाग्यवश न तो सफलताएँ मिलती हैं और न संकट टलते हैं।
सकडाल का समाधान हो गया, उसने भाग्य को नहीं पुरुषार्थ की प्रधानता स्वीकार करली।
मनुष्य में दबी हुई प्रसुप्त शक्तियाँ उससे कही अधिक हैं जितनी कि प्रकट में देखी जाती है। धरती के ऊपर जितनी वस्तुएँ है उनसे हजारों, लाखों गुनी सम्पदाएँ भू-गर्भ में दबी पड़ी है। ठीक इसी तरह मनुष्य जैसा कुछ देखा समझा जाता है उसकी तुलना में उसका आन्तरिक वैभव अत्यधिक बढ़ा-चढ़ा हैं। दृश्य क्षमताएँ और विशेषताएँ बढ़ाकर अनेक प्रकार की सफलताएँ प्राप्त करने का क्रिया-कौशल लोग जान गये हैं, पर यह नहीं समझ पा रहे हैं जो अतीन्द्रिय एवं अति मानवी सामर्थ्य उसके भीतर भरी पड़ी है उसे कैसे जगाया जाय और उसका किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार उपयोग किया जाय।
कुछ समय पहले तक भौतिक विज्ञानी मनुष्य को ऐ बोलते-चलते वृक्ष की उपमा देते थे, वे उसे उतना ही मानते थे जितना कि आंखों से दिखाई देता है अथवा प्रत्यक्ष रूप से नापा तोला जा सकता है। अब उसकी गहन क्षमताओं को धीरे-धीरे समझा जा रहा है और अनुभव किया जा रहा है-कि मनुष्य के बारे में जो सोचा गया था वस्तुतः वह उससे कहीं अधिक है।
अति मानवी विलक्षण शक्तियों का केन्द्र अब प्रसुप्त मन को माना जा रहा है और उस क्षत्र की तत्परता पूर्वक शोध हो रही है। समझा गया है कि चेतन मस्तिष्क की धमाचौकड़ी के कारण प्रसुप्त मन खिन्न होकर एक कोने में जाकर सो जाता है। उसे जागृत होने और अपना काम करने का अवसर तब मिलता है जब मस्तिष्कीय प्रबुद्ध चेतना को लय किया जा सके या सुषुप्ति अवस्था में पहुँचाया जा सके।
प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के अनेक प्रकार और अनेक प्रयोग हैं उनके द्वारा जागृत मस्तिष्क को किसी बिन्दु पर केन्द्रित करके ध्यानावस्था में लय किया जाता है। यह लय योग है। प्रकाश का ध्यान विंदुयोग, विभिन्न प्रकार की ध्वनियों का श्रवण नादयोग, खेचरी मुद्रा सोमरस का पान, षट्चक्र वर्धन, आज्ञाचक्र उन्मीलन आदि ध्यानयोग परक क्रियाएँ इसी प्रयोजन के लिए हैं। इनमें प्रबुद्ध मस्तिष्क एक केंद्र पर केन्द्रीभूत होता है-एकाग्रता की स्थिति में जाकर अपनी धमाचौकड़ी बन्द कर देता है, इस शान्त वातावरण में अचेतन मन को अपने लिए कार्यक्षेत्र मिल जाता है और उसके साथ जुड़ी हुई शक्तियाँ उगने-बढ़ने और फलने-फूलने का अवसर प्राप्त कर लेती है।
दूसरा मार्ग समाधि मार्ग है। इसकी बाल कक्षा मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म जैसे वेधक दृष्टि एवं संकल्प शक्ति के प्रयोग द्वारा सिखाई जाती है। इन प्रयोगों में भी प्रबुद्ध मस्तिष्क योगनिद्रा में धकेल दिया जाता है और अचेतन मन जागृत होकर अपनी विशिष्ठ भूमिका निबाहने के लिए अभ्यस्त होने लगता है।
स्व सम्मोहन का अपना अलग प्रयोग हैं। इसमें भी संकल्प शक्ति की प्रखरता ही प्रधान है। मस्तिष्क को निश्चेष्ट होने से शरीर निष्क्रिय हो जाता है इसे समाधि अथवा ‘योगनिद्रा’ कहते हैं। शरीर के निश्चेष्ट होने में मस्तिष्क सुषुप्ति अवस्था में चला जाता है इसे सामान्य निद्रा कहते हैं। यह रोज ही कई घण्टे आती है। उसमें अचेतन मन अपना काम तो करता है, पर वह बेतुका होता है उसमें स्वप्न दिखाई पड़ते हैं। वह स्वप्न अनगढ़ होते हैं। जो देखा सुना या सोचा गया है उसी का घुला मिला रूप सपनों के रूप में सामने आता है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि साधारण निद्रा में भी योगनिद्रा की स्थिति बन जाय ऐसा हो सके तो सपने सार्थक होते हैं उनमें भूत या भविष्य की सारगर्भित झाँकी रहती है।
यह पुरानी योगशास्त्र सम्मत परिपाटियाँ हैं अतीन्द्रिय चेतना विकसित करने के लिए शारीरिक संयम एवं तप का- मानसिक तप के लिए ध्यान एवं भक्ति साधना का आश्रय लिया जाता था। अब भौतिक विज्ञान द्वारा यह प्रयास हो रहे है कि शरीर और मन को वस्तुओं के द्वारा प्रभावित करके वह स्थिति पैदा की जाय जिससे प्रबुद्ध मस्तिष्क को सुषुप्त अवस्था में पहुँचाकर फिर अचेतन मन से वे काम लिये जाय तो योगाभ्यास द्वारा लिये जाते रहे हैं। इस संदर्भ में अब हिप्नोटिज्म स्तर के प्रयोग अब पुराने पड़ते जाते हैं। उसमें यो शरीरगत मानवी विद्युत को संकल्प बल द्वारा दूसरे शरीर में धकेला जाता था इसलिए उसे अर्धभौतिक एवं अर्ध आध्यात्मिक माना जाता था।
सम्मोहन विद्या द्वारा मनुष्य की विशिष्ठ योगनिद्रा ग्रस्त स्थिति कैसे बन जाती है इस पर प्रकाश डालते हुए येल विश्व विद्यालय के स्नायु विशेषज्ञ डा0 कैबिज ने ‘अमेरिकन सोसाइटी आफ क्लिनिकल हिप्नोसिस’ के एक अधिवेशन में अपने प्रयोगों के आधार पर बताया था कि मस्तिष्कीय हलचलों का स्नायविक स्थिति पर पड़ने वाला प्रभाव ही सम्मोहन का मूल कारण है। मस्तिष्क के कुछ विशिष्ठ केन्द्रों में विद्युतीय आवेश की मात्रा अधिक बढ़ जाने से उसका प्रभाव ‘नियोकार्टेक्स’ नाम उसे केन्द्र क्षेत्र पर पड़ता है जो तर्क, निर्णय, संकल्प, इच्छा, विवेक आदि उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी है। यह केन्द्र जब अर्थ मूर्च्छित स्थिति में चला जाता है तो तो अन्यान्य ऐसे केन्द्र काम करने लगते हैं जो सामान्य मनःस्थिति में प्रायः प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहते हैं। इनका जागरण ही न केवल सम्मोहन विद्या की भूमिका प्रस्तुत करता है वरन् अन्यान्य अतींद्रिय चमत्कारों का भी कारण होता है।
साधारणतया मनुष्य का मस्तिष्क चिन्तनरत रहता है। कई बार तो यह चिन्तन अत्यंत व्यस्त और उद्विग्न होता है। ऐसी स्थिति में वहाँ उत्तेजना और तनाव की मात्रा बढ़ी रहना स्वाभाविक है। इस उद्विग्नता के तूफान में उन विशिष्ठ केन्द्रों की स्थिति दयनीय हो जाती है जो अतीन्द्रिय चेतना को विकसित करके उसे ‘दिव्य’ बना सकते हैं।
क्रिया लाभ की दृष्टि से मन की प्रशान्त और शिथिल स्थिति अवाँछनीय है। मन शिथिल पड़ा रहेगा तो चिंतन धीमा और हल्का होगा साथ ही उत्साह एवं स्फूर्ति में भी न्यूनता आवेगी तद्नुसार क्रिया का परिमाण स्वल्प रहेगा और मनुष्य आलसी एवं मन्द कमी बनती दिखाई देगी। सामान्य बुद्धि से ऐसी स्थिति अनुत्पादन होने के कारण अवांछनीय है। उससे प्रत्यक्ष प्रगति में बाधा पहुँचती है। आलसी और प्रमादी प्रायः होते भी इसी स्तर के हैं। यदि ऐसी स्थिति आदत बन जाय और शिथिलता, निरुद्देश्यता, निष्क्रियता की पर्यायवाची बन जाय तो निस्सन्देह वह हानिकारक है। पर जब वह शिथिलता विशिष्ठ प्रयोजन के लिए संकल्पपूर्वक उत्पन्न की जाती है और उस प्रशान्त स्थिति का लाभ अन्य प्रकार के महत्वपूर्ण उत्पादन अभिवर्धन के लिए उठाया जाता है तो उसे हेय नहीं ठहराया जा सकता है। योगनिद्रा एवं समाधि स्थिति इसी प्रयोजन के लिए हैं। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की साधनाएँ मस्तिष्क की बहुमुखी हलचलों को रोककर न केवल केन्द्रीभूत करता है वरन् मन क्षेत्र ने शान्ति शिथिलता और निष्क्रियता का वातावरण भी उत्पन्न करती है। ध्यान का अर्थ मात्र एकाग्रता नहीं है-वरन् मस्तिष्क के महत्वपूर्ण केन्द्रों को प्रशान्त वातावरण का लाभ देकर उन्हें सजग एवं परिपुष्ट बनाना भी है। इन्हीं केंद्रों से चमत्कारी अतीन्द्रिय उपलब्धियाँ उत्पन्न होती है।
समाधि की स्थिति में मस्तिष्क में अल्फा तरंगें अधिक मात्रा में निकलती हुई पाई गई हैं। मन के एकाग्र होने पर वीटा, डेल्टा और यीटा तरंगों का निस्सरण कहीं अधिक बढ़ जाता है। मन और बुद्धि की मंदता और प्रखरता की जानकारी मस्तिष्क से निकलने वाली अल्फा किरणों को मापकर जानी जा सकती है।
मस्तिष्कीय आवेश से कई प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न होती है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह ध्वनियाँ ई॰ एस॰ बी0 इलेक्ट्रिक्ल स्टि मुलेशन आफ व्रेन से उद्भूत होती है। योगी लोग अनहद नाद के रूप में इसी प्रवाह को सुनते हं इस सूक्ष्म श्रवण से यह पता चलता है कि मस्तिष्क में विद्युतीय ऊर्जा किस स्तर पर काम कर रही है।
मिशिगन विश्व विद्यालय के चिकित्सा संस्थान द्वारा समाधि की स्थिति के शरीर और मन की स्थिति का विवेचन करने के लिए एक भारतीय योगी शान्तानन्द को चुना था। प्रयोगशाला में उनकी समाधि स्थिति का अनेक यन्त्रों से परीक्षण किया गया था उससे निष्कर्ष निकला कि उस अवस्था में शरीर की आन्तरिक हलचलें अत्यन्त न्यून हो जाती हैं-मस्तिष्क मूर्च्छा स्थिति में चला जाता है फिर भी शरीर में सड़न अथवा विघटन की कोई बुरी प्रक्रिया आरम्भ नहीं होती। यहाँ तक कि विभिन्न छिद्रों से निसृत होते रहने वाले मलों में प्रक्रिया रुक जाने से भी कोई विषाक्त प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता।
हारवर्ड इन्स्टीट्यूट फार साइकिक एण्ड कलचर रिसर्च की ओर से डा0 थेरेस ब्रोसे अपने दल के साथ भारत में योग विलक्षणता की शोध करने आई थीं। उन्होंने समाधिस्थ योगियों के शरीरों की उसी स्थिति में पूरी-पूरी जाँच की ओर पाया कि वे लगभग मृत स्थिति में पहुँचने पर भी सामान्य स्थिति में जीवित रह रहे है और उनके शरीर से कोई अवांछनीय स्थिति उत्पन्न हो रही है। इस सम्बन्ध में आगे के अनुसन्धान करने के लिए श्रीमती ब्रोसे एक फ्राँसीसी शरीर डा0 माइलोवेनोविच के साथ भारत आई थीं, उन्होंने इस सम्बन्ध में अपने शेष सन्देहों को भी दूर कर लिया। कुछ समय के लिए दिल की धड़कन बिल्कुल बन्द कर लेने का दावा भी उनने सही पाया। ऐसे योगी तो बहुत से हैं जो सामान्यतया प्रति मिनट 72 बार की धड़कन को घटाकर 301 की संख्या तक शिथिल कर लेते हैं। तीन दिन से लेकर 28 दिन तक बिना साँस लिए, बिना अन्न, जल ग्रहण किये, बिना मल-मूत्र विसर्जन किये-समाधिस्थ रहने वाले योगियों में से भी अधिकांश के दावे सही पाये गये। उनके संज्ञा शून्य होने की बात उनका हाथ बर्फ में दबाये रहने और आगे का स्पर्श करने पर भी परीक्षा में खरी उतरी। एक योगी संकल्प बल से जिस भी अंग से कहा जाय उसी से पसीना निकाल देते थे।
अमेरिका के अन्तरिक्ष विज्ञानी अब इस खोज में लगे हुए हैं कि लम्बी अन्तरिक्ष यात्राओं में जाने वाले लोगों के शरीरों में ऐसी विशिष्टताएँ उत्पन्न की जायं जिनके आधार पर वे उस कष्टकर अवधि को स्वल्प साधनों से सुविधापूर्वक सम्पन्न कर सके। सर्दी, गर्मी, भूख-प्यास आदि पर लम्बे समय तक बिना कष्ट सहे, क्या विजय प्राप्त की जा सकती हैं ? क्या देर तक मूर्च्छित और शीतल रहा जा सकता है ? इस संदर्भ में वे योगियों में पाई जाने वाली विलक्षणताओं को अपना शोध आधार बना रहे है।
अन्तरिक्ष अनुसन्धान विज्ञानी टावी फ्रेडमेन का एक लेख कुछ समय पूर्व ‘लाइफ’ पत्रिका में छपा था। जिसमें उन्होंने चमत्कारी योगियों को विलक्षणताओं के कारण जानने पर बहुत जोर दिया था। उन्होंने कहा है-चमत्कार नामक कोई वस्तु इस संसार में नहीं। यहाँ जो कुछ होता है वह सब विज्ञान के नियमों के आधार पर ही होता है-चमत्कार हम इसलिए कहते हैं कि वे क्रियाएँ प्रचलित नहीं है और उनके कारण सर्वविदित नहीं है। जिस दिन उनका रहस्य जान लिया जाता है, उस दिन वे सामान्य क्रिया-कलाप बन जाते हैं। चमत्कारी योगियों में यदि कोई विशेषता दिखाई पड़ती है तो उसका कारण प्रकृति के मान्य सिद्धान्तों पर ही आधारित होना चाहिए और वह विशेषता उत्पन्न करना किसी भी पुरुषार्थी के लिए सम्भव होना चाहिए।
भारतीय योगीजन साधना के लिए शीत प्रधान हिमालय जैसे पर्वतों को अपना निवास स्थान बनाते थे और ध्यान समाधि द्वारा प्रबुद्ध चेतना को निद्रित करके अन्तः चेतना की गहराई में उतरते थे। अब ध्यान द्वारा समाधि का तो नहीं केवल शीत का उपयोग करके समाधि स्थिति उत्पन्न करने का गुर ढूंढ़ निकाला गया है। अत्यधिक शीत में शरीर के अंग-प्रत्यंगों को विश्राम मिलता है मस्तिष्क को भी। अस्तु आयु का आगे बढ़ना रुक जाता है। शीत समाधि में जो जिस समय उतारा गया था वह आयु की दृष्टि से जहाँ का तहाँ बना रहता है। दस वर्ष के लड़के को शीत समाधि दी जाय और उसे पन्द्रह वर्ष बाद जगाया जाय तो वह पच्चीस वर्ष का युवक नहीं वरन् दस वर्ष का बच्चा ही मिलेगा। इन पन्द्रह वर्षों में दो लाभ और भी होंगे एक यह कि जन्म से दस वर्ष की आयु तक जितनी शक्ति खर्च हुई होगी उसकी क्षति पूर्ति हो जायगी। जीवाणु अभिनव उत्साह से काम करने योग्य बन जायेंगे। दूसरा लाभ है, प्रबुद्ध मस्तिष्क के सुषुप्ति स्थिति में रहने के कारण अचेतन को अपनी हलचलें जारी रखने में रहने के कारण अचेतन को अपनी हलचलें जारी रखने का अवसर मिल जायेगा और अतीन्द्रिय क्षमता विकसित करने का अवसर मिल जायेगा। चूहे आदि छोटे जीवों को कृत्रिम शीत वातावरण में रखकर निद्रित करने में सफलता प्राप्त कर ली गई हैं। अब यह सोचा जा रहा है कि मनुष्य को भी क्यों न इस स्थिति का लाभ लेने दिया जाये। शीत निद्रा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि कोशिकाओं और तन्त्रिकाओं को उतने समय तक काम करने से छुट्टी मिल जाती हैं। शरीर निर्वाह के लिये जब उन्हें कुछ नहीं करना पड़ता तो वे अपनी दुर्बलता को दूर करने में लग जाती है। ऐसे विश्राम काल में उन्हें नव-जीवन प्राप्त होता है। अस्तु जागरण के उपरान्त वे अपेक्षाकृत अधिक अच्छी तरह जीवन यात्रा को चला सकने में समर्थ होती हैं। वृद्धि और क्षति का क्रम रुक जाने से भी उन दिनों का लाभ दीर्घजीवन की-बुढ़ापे को आगे खिसकाने की दृष्टि से भी मिलता ही है।
सचेत पक्षियों के शरीर का तापमान प्रायः 100 फारेनहाइट होता है। शीतकाल में सुषुप्त पक्षियों के शरीर में वह घटकर 65 डिग्री ही रह जाता है।
ठण्डे प्रदेश के चमगादड़ अति शीत ऋतु में गहरी नींद में सोये रहते हैं। ठंडे प्रदेशों में रहने वाले रीछ और गिलहरियाँ अधिक ठण्ड के दिनों में सोते तो रहते हैं, पर उनकी निद्रा बहुत गहरी नहीं होती। वे उस ऋतु के लिये भोजन जमा कर लेते हैं और बीच-बीच में उठ-उठकर खाने और मल-मूत्र त्यागने की आवश्यकता पूरी कर लेते हैं।
इस नींद में शरीर की आन्तरिक गतिविधियाँ इतनी शिथिल हो जाती हैं कि उस प्रसुप्त शरीर में कहीं कुछ विषाणु प्रवेश करा दिये जाये तो वे जहाँ के तहाँ पड़े रहेंगे आगे बढ़कर शरीर में अन्यत्र कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न न कर सकेंगे।
ऐसी सुषुप्तावस्था में इन प्राणियों का तापमान घट जाता है, श्वसन गति न्यून हो जाती हैं, हृदय की धड़कन घट जाती हैं, ऑक्सीजन की भी उन्हें बहुत थोड़ी आवश्यकता रहती हैं, शरीर की समस्त मैटावोलिक क्रियाएं मन्द होती चली जाती हैं। इस स्थिति की गहराई जब होती हैं तब प्रायः सभी जीवन क्रियाएं एक प्रकार से अवरुद्ध ही हो जाती हैं और वह मृतक जैसा दिखाई पड़ता है। इस अवस्था को शरीर विज्ञानियों के शब्दों में ‘एनावायोसिस’ कहा जाता है।
जिन जलाशयों की ऊपरी सतह पर बर्फ जमती हैं उनमें रहने वाले कीड़े उस स्थिति का सामना करने के लिये निद्राग्रस्त हो जाते हैं। मछलियाँ यों पानी पर तैरती तो रहती है, पर उनकी स्थिति भी निद्रालु जैसी रहती हैं।
सर्वविदित है कि मेढक शीत ऋतु में सुषुप्तावस्था में चले जाते हैं और वर्षा की अनुकूल ऋतु आने पर उस घोर निद्रा का परित्याग करते हैं। न केवल मेढक वरन् घोंघे, केंचुए, साँप और कई तरह के सरीसृप भी प्रतिकूल ऋतु प्रभाव से बचने के लिये लंबे समय की समाधि लगा लेते हैं। आहार, जल आदि की उन्हें उस स्थिति में आवश्यकता नहीं पड़ती। संचित चर्बी से ही शरीर को आवश्यक ऊर्जा उस अवधि में मिलती रहती हैं। घोंघे एवं अन्य जाति के निमेटोड कीड़े कड़ी सर्दी से प्राण रक्षा करने के लिये अपने भीतर से ही एक विशेष प्रकार का रस निकाल कर उसका कवच मढ़ लेते हैं और उसी के भीतर प्रतिकूल ऋतु में पड़े-पड़े सोते रहते हैं।
शीत समाधि पर जोर इसलिये दिया जा रहा है कि उसके माध्यम से मनुष्य सैकड़ों वर्ष लंबी अन्तरिक्ष यात्राएं पूरी कर सकेगा। उसे नित्य कर्म के लिये किसी वस्तु की आवश्यकता न पड़ेगी। नियत कार्य करके लौटने पर यथासमय स्वसंचालित यन्त्र उसे गरमी देकर पुनर्जीवित कर दिया करेंगे। इसके अतिरिक्त शीत समाधि में पड़ा हुआ व्यक्ति रोगी या बढ़ा होगा तो उस विश्रान्ति काल में प्रकृति जीर्ण-शीर्ण शरीर की मरम्मत करके नया कर दिया करेगी। इस प्रकार कायाकल्प का पुराना उद्देश्य इस नवीन ढंग से पूरा हो जाया करेगा।
इतने पर भी योग समाधि की उपयोगिता अपने स्थान पर बनी हुई हैं। उसमें संकल्प शक्ति इतनी सुदृढ़ बनानी पड़ती है कि शरीर की स्वसंचालित क्रियाओं का घटाया बढ़ाया जाना पूर्णतया रोका जा सके सामान्यतया यह कार्य भौतिक विज्ञान की दृष्टि से अति कठिन माना जाता है। संकल्प शक्ति यदि इतनी परिपक्व हो गयी है कि वह श्वास-प्रश्वास, आकुँचन-प्रकुंचन, रक्त-संचार जैसी क्रियाओं को रोक सके तो निश्चय ही उसका प्रयोग प्रबुद्ध मस्तिष्क के अथवा अचेतन मन के किन्हीं रहस्यमय संस्थानों को जागृत करने एवं मूर्च्छित करने के लिये भी किया जा सकता है। ऐसा पूर्ण स्वशासन मनुष्य को सच्चे अर्थों में महा सिद्ध पुरुष बना सकता है।
भूमि समाधि की घटनाओं में से एक का परीक्षण उदयपुर आयुर्विज्ञान, महाविज्ञान के प्राँगण में ली गई एक समाधि का हुआ था। डाक्टरों ने समाधि से पूर्व विविध परीक्षाएं लीं। योगी के शरीर के साथ ‘इलेक्ट्रो कार्डियो’ ग्राम आदि कई यन्त्र फिट किये और उनका लेखा-जोखा बाहर निरन्तर अंकित होता रहे ऐसी व्यवस्था की। आठ दिन में समाधि खोली गईं। योगी मूर्च्छित था उसका तापमान 87.6 था जबकि सामान्यतया 98.4 होता है। निर्धारित सूचना के अनुसार गरम पानी से स्नान कराया गया और मालिश की गई तो चेतना फिर लौट आई।
समाधि में वही हाइवर्नेशन स्थिति उत्पन्न हो जाती हैं जिसमें मेढक, रीछ आदि लंबे समय तक पड़े रहकर जीवित बने रहते हैं। इसमें वेसलमेटा वोतिक रेट-घट जाने से जीवन काल बढ़ जाता है। समाधि के लिये प्रयुक्त संकल्प शक्ति मस्तिष्क स्थित बुद्धि केन्द्र के उस मर्म स्थल पर प्रहार करती है जिसे डाक्टरी भाषा में सोरिब्रल कार्टेस कहते हैं। यहीं से हाइपोथैलेमस नामक ग्रन्थि का नियन्त्रण होता है। यह ग्रन्थि ओटोर्नामिक नर्वस सिस्टम-स्वसंचालित नाडी मण्डल का नियमन करती हैं। स्वतन्त्र स्नायु मण्डल की नियामक सत्ता जिस ‘वेगस नर्व’ में मानी जाती हैं उसका मूल केन्द्र यही है। मेडयुला आब्लामेटा पर यदि इच्छा शक्ति का नियन्त्रण हो जाये तो शरीर की वह स्थिति बन सकती हैं जिसे तापमान और हृदय स्पन्दन की गिरी हुई स्थिति में बन पड़ने वाली समाधि कह कहते हैं।
सम्मोहन एवं शीत समाधि जैसे प्रयोग एक सीमित उद्देश्य ही पूरे कर सकेंगे। यदि अचेतन मन की दिव्य शक्तियों से लाभान्वित होना हो तो विज्ञान को ध्यान एवं समाधि स्तर के उन्हीं योग साधनों को अपनाना पड़ेगा जो न केवल अतीन्द्रिय शक्तियों को जागृत करके उसे चमत्कारी सिद्धि शक्तियों से संपन्न करते हैं वरन् शक्ति के भाव स्तर को भी देव भूमिका तक पहुँचाकर उसे नर शरीर में निवास करने वाला नारायण बना देते हैं।
पश्चिम जर्मनी के म्युनिक नगर में एक आठ वर्षीय बालक एलमर ने अपनी गणित संबंधी प्रतिभा से शिक्षा क्षेत्र में एक आश्चर्य उत्पन्न कर दिया है। बच्चे को चार वर्ष की उम्र में अनायास ही गणित में असाधारण रुचि उत्पन्न हुई। वह जमीन पर लकीरें खींचकर रेखागणित का अभ्यास करने लगा। पिता ने उसकी थोड़ी सहायता की तो एक वर्ष के भीतर ही रेखागणित, बीजगणित और अंकगणित का इतना ज्ञान प्राप्त कर लिया जितना प्रवेशिका कक्षाओं के अध्यापक को होता है।
एलमर के पिता डा0 एडर फिजिक्स इन्स्टीट्यूट म्युनिक में गणित प्राध्यापक हैं। वे कहते हैं बालक की गणित प्रतिभा ऐसी है जिसे विलक्षण और असाधारण ही कहा जा सकता है।
वंश परम्परा से लेकर वातावरण और प्रशिक्षण की कोई अनुकूल सुविधा न होने पर बालकों में इस प्रकार की अदभुत प्रतिभाएं जब अचानक उभर आती हैं तो मन शास्त्री यह सोचने के लिये विवश होते हैं यह कोई ऐसा संचय है जिसे पुनर्जन्म की मान्यता के आधार पर ही समझा जा सकता है।
विचार यों अपने आप में एक शक्ति है और अपनी निर्धारित रीति-नीति से अपने लिये तथा दूसरों के लिये परिणाम प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। पर उनमें प्रचण्डता तब आती हैं जब वे प्राणी शक्ति के चुंबकीय विद्युत प्रवाह के साथ जुड़े होते हैं। प्राण को मानवी व्यक्तित्व के आधार पर ढली हुई विशिष्ठ ऊर्जा कह सकते हैं, यह हर किसी में बहुत ही स्वल्प मात्रा में होती हैं। बहुमुखी इच्छाएं और अस्त-व्यस्त, क्रिया-प्रतिक्रियाएं तथा अस्थिर अभिरुचियाँ मनुष्य के जीवन संवेगों को बखेर देती हैं और वह सब कुछ बनने के प्रयास में कुछ भी नहीं बन पाता। ऐसे लोगों का व्यक्तित्व कौतूहलवर्धक तो होता है, पर कहना विदूषक जैसा ही है, उसमें वह दिशा या प्रेरणा नहीं होती जो एकाग्रता रखने और एक दिशा अपनाने से उत्पन्न होती है। लक्ष्य निर्धारित करके एक दिशा में यदि मनोयोगपूर्वक सोचने और करने का उपक्रम चलता रहे तो उससे व्यक्तित्व ढलेगा। यह क्रियाकलाप निकृष्टता संपन्न ही हो सकता है और उत्कृष्टता संपन्न भी। प्राण शक्ति में यह स्तर बड़ी मात्रा में घुला रहता है और उसी आधार पर उसका स्तर विनिर्मित होता है।
प्राण का यों मोटे तौर पर प्राणिज विद्युत, जीवनी शक्ति, विटल फोर्स आदि के नाम से पुकारते हैं। प्रत्यक्षतः उसका यही रूप हैं, पर जब उसमें निष्ठाओं ओर भावनाओं का गहरा पुट होता है तो प्रभावी क्षमता उत्पन्न होती है। एंप्लिफायर के माध्यम से हल्की सी आवाज को इतना शक्तिशाली बनाया जा सकता है कि उसे दूर-दूर तक बैठे हुए हजारों लाखों व्यक्ति सुन सकें। विचार को वाणी और प्राण को बिजली के रूप में माना जाय तो यह समझना सरल पड़ेगा कि किस प्रकार विचारों में प्रखरता उत्पन्न होती हैं। किसी के विचार क्यों अत्यन्त प्रचण्ड, प्रभावशाली ओर साकार होते हैं इसका कारण उसकी विचारधारा में प्राण शक्ति को सघन सम्पुट के रूप में देखा समझा जाना चाहिये।
विचारों का प्रवाह मन्द, मध्यम और प्रखर स्तर का क्यों होता है इसका उत्तर विचारों की गहराई, आस्था और प्राण शक्ति युक्त व्यक्तित्व के आधार पर समझा जा सकता है। उथले व्यक्तित्व, बिखरे मस्तिष्क से यों ही उपेक्षापूर्वक कुछ सोचते रहे तो उसका परिणाम स्वभावतः मंदगामी होना चाहिये। भाव भरी विचारधारा, प्रांगण निष्ठापूर्वक उनका हृदयंगम किया जाना और निजी व्यवहार में उन मान्यताओं को स्थान मिलना वह स्थिति है जिसमें विचारों की शक्ति मध्यवर्ती होती है। पर जब कोई व्यक्ति सब ओर से मन हटाकर किसी आदर्श विशेष में तन्मय हो जाता है। अनवरत चिन्तन एवं आकाँक्षाओं को केन्द्रीकरण किसी विशेष बिन्दु पर हो जाता तो मनुष्य उसी उधेड़−बुन में लगा रहता है और हर घड़ी उसी प्रयोजन के लिये अपनी हलचलें गतिशील रखता है। इस प्रकार विचारणा, आस्था और क्रिया का जहाँ भी त्रिविध समन्वय होता है वहाँ अत्यन्त ही प्रचण्ड मस्तिष्कीय ऊर्जा विनिसृत होती है। शक्तिशाली झरने के रूप में वह धारा फूटती है और अवरोधों से टकराती हुई प्रवाहशील सरिता की नाई अपनी महत्वपूर्ण भूमिका संपादित करती हैं
हमारी विचार शक्ति किस स्थिति में बढ़ती या घटती है। इसका उत्तर यही हो सकता है कि अन्यमनस्कता आलस्य, अवसाद, उपेक्षा एवं अस्त-व्यस्तता की मनोभूमि में उपजने वाले विचार ऐसे ही मुरझाते, कुम्हलाते और बुझते, मरते रहते हैं उनका कोई प्रभावशाली परिणाम न अपने जीवन में परिलक्षित होता है और न दूसरे उनसे कुछ प्रेरणा ग्रहण करता है। अक्सर प्रवचनकर्ता और वक्ताओं की मनःस्थिति ऐसी ही होती है। उन्हें कुछ बातें रटी हुई होती है उन्हें ही घुमा फिराकर शब्द चातुर्य के चाक पर घुमाकर तरह-तरह के बर्तन बनाते रहते हैं। गहन अनुभूतियों की गर्मी उनमें लगी नहीं होती फलतः इस प्रकार वाचालता की भुरभुरी मिट्टी से बने हुये कच्चे बर्तन पानी पड़ते ही गल जाते हैं। जिनका उद्गम मस्तिष्क का उथला स्तर है जो जिह्वा के अग्र भाग से ही निकले हैं, वे विचार निकलते हैं। वे सुनने में मधुर और समझने में आकर्षक हो सकते हैं किंतु उनमें प्राण शक्ति की अभीष्ट मात्रा जुड़ी न रहने से वैसा प्रभाव नहीं होता जैसा होना चाहिये। इसके विपरीत भले ही धारा प्रवाह या लच्छेदार शब्दावली का प्रयोग न हो सके यदि भावना, आस्था और अनुभूति से संपुटित विचार व्यक्त किये जाये तो उनका प्रभाव शब्द बेधी बाण की तरह होगा। महामानवों की वाणी में जनमानस को झकझोर देने की जो अद्भुत क्षमता पाई जाती हैं उसका रहस्य यही है।
जब तब जैसा-तैसा विचार कर लेना एक बात है और लगातार गहराई तक किसी विषय का अवगाहन, अध्ययन और निदिध्यासन करना दूसरी चीज है। दार्शनिक और वैज्ञानिक गहराई तक देर तक एक ही विषय बिन्दु पर विचार करते रहने की रुचि और आदत उत्पन्न करते हैं फलतः वे समुद्र में गहरे उतरने वाले गोताखोरों की तरह बहुत से मणि मुक्ता ढूंढ़ लाते हैं। किनारे पर टहलने वाले दर्शकों के तो सीप और घोंघों के बेकार छिलके ही हाथ लगते हैं। जिस संदर्भ में हमारी आन्तरिक अभिरुचि जुड़ जाती है, उसी पर एकाग्रता संभव होती है। उथले और गहरी व्यक्तित्वों का यही अन्तर होता है। उथले लोग उड़ते हुए तिनके की तरह हवा का रुख देखकर अपनी गतिविधियाँ बदल देते हैं, पर जिनकी किसी आदर्श एवं लक्ष्य पर गहरी आस्था जम गई वे उसी में रम जाते हैं और चट्टान की तरह अटल रहते हैं। ऐसे ही लोगों के विचार दूसरे के लिये प्रेरणादायक एवं अनुकरणीय बनते हैं।
व्यक्तिगत एकाकी विचारों का भी महत्व हैं। उससे पूरे व्यक्तित्व का कण-कण निर्धारित लक्ष्य में तन्मय हो जाता है तो मनुष्य की प्रभावशीलता देखते ही बनती है। इसके अतिरिक्त सामूहिक विचारों की भी अपनी उपयोगिता है और अपनी प्रभावशीलता। देवालयों में निरन्तर पूजा उपासना, प्रार्थना होती रहती है। भक्ति भावना संपन्न लोग ही वहाँ आते हैं और एक ही स्तर की गतिविधियाँ लगातार चलती है। इसका प्रभाव वहाँ के वातावरण पर ही नहीं इमारत पर भी पड़ता है। वह उसी रंग में रंग जाती है और आगन्तुकों में अपने ढंग की सहज प्रेरणा उत्पन्न करती है। तीर्थों का निर्माण भी इसी आधार पर किया गया है। सत्संग भवनों की महिमा इसी प्रयोजन को पूरा करते करते बढ़ जाती है। मनस्वी महामानवों के निवास स्थान इसी दृष्टि से प्रेरणाप्रद बन जाते हैं उन्हें दिव्य स्मारकों के रूप में सुरक्षित रखने का यही प्रायोजन है।
दुर्भावों का सम्मिलित शक्ति का प्रभाव कहीं भी देखा जा सकता है। साफ सुथरे पड़े होने पर भी कसाईखाने में घुसते ही हम आतंकित होते हैं। श्मशान में कोई चिता न जल रही हो तो भी वहाँ वीभत्स वातावरण की अनुभूति होती है। जहाँ अवाँछनीयता की परिस्थितियाँ सामूहिक रूप से विनिर्मित की जायेंगी वहाँ उसी स्तर के पतन के लिये आकर्षित करने वाला प्रभाव निश्चित रूप से उत्पन्न होगा।
सामूहिक सत सम्मेलनों एवं धर्मानुष्ठानों के पीछे तक बड़ा प्रयोजन सामूहिक विचार प्रवाहों के मिलने के एक सम्मिलित शक्ति का उद्भव करना भी होता है। सामूहिक प्रार्थना, पर्व त्यौहारों के सम्मिलित आयोजन इसी प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। इकट्ठे होकर धर्म प्रयोजन पूरे करने में छुटपुट अलग-अलग प्रयत्न करने की अपेक्षा कहीं अधिक लाभ होते हैं। साधु संस्थाओं का जन्म इसी आधार पर हुआ था, वे इकट्ठे रहकर एक दूसरे को प्रेरणा ही नहीं देते थे वरन् प्रचण्ड वातावरण भी विनिर्मित करते थे। बौद्ध बिहार, चैत्य, साधु आश्रम इसी दृष्टि से विनिर्मित किये जाते हैं। सत्कर्मों के सामूहिक आयोजन का जितना विस्तार हो सके उतना ही सदुद्देश्यों का विस्तार और प्रेरक प्रभावों को अधिक बलिष्ठ बनाया जा सकेगा।
विचारों की शक्ति और संपदा का यदि महत्व समझा जा सके और उनके सदुपयोग का मार्ग अपनाया जा सके तो निस्सन्देह सफल और समुन्नत जीवन की मंगलमयी उपलब्धियाँ प्रचुर परिमाण में प्राप्त कर सकते हैं।
निश्चय ही प्रोटीन शरीर का प्रमुख पदार्थ है। माँसपेशियों के ठोस भाग में पांचवां हिस्सा प्रोटीन ही भरी हुई है। मस्तिष्क से लेकर गुर्दे, हृदय आदि तक सभी महत्वपूर्ण अवयव प्रोटीन से ही भरे हैं उसका संतुलन सही रहने से शरीर ठीक तरह सक्षम बना रहता है और कमी पड़ने पर शरीर की वृद्धि रुक जाती है, देह सूखने लगती हैं, रोग प्रतिरोधक क्षमता घट जाती है, अधिक परिश्रम नहीं हो पाता, तथा मृत्यु और बुढ़ापे का संदेश जल्दी ही सामने आ उपस्थित होता है। निरन्तर हमारी कोशिकाओं का क्षरण होता रहता है उसकी पूर्ति के लिये प्रोटीन की उपयुक्त मात्रा हमारे भोजन में बनी रहे यह आवश्यक है।
खाद्यों में प्रोटीन का उपयुक्त भाग रहे यह ध्यान रखना चाहिये। इस दृष्टि से उनका चयन करते हुये समुचित सावधानी बरतनी चाहिये। जिनमें प्रोटीन की उपयुक्त मात्रा है उनमें लोग भ्रमवश माँस अंडा आदि को ही सर्वोपरि मानते हैं पर बात ऐसी बिल्कुल भी नहीं है। माँस की अपेक्षा दालों में प्रोटीन का अंश कही अधिक है। वर्गीकरण के हिसाब से अण्डों में 13 प्रतिशत, मछली में 16 प्रतिशत, माँस में 20 प्रतिशत, मूँग की दाल में 24 प्रतिशत, मसूर की दाल में 25 प्रतिशत, उड़द की दाल में 30 प्रतिशत, मूँगफली में 26 प्रतिशत, और सोयाबीन में 42 प्रतिशत प्रोटीन होता है। इस प्रकार माँस की अपेक्षा दालों में ड्यौढ़ा दूना प्रोटीन प्राप्त होता है जो कि सस्ता भी है और नैतिक भी।
प्रोटीन को संपूर्ण ओर अपूर्ण इन दो वर्गों में विभक्त कर सकते हैं। पूर्ण वे हैं जिनमें खनिज लवण वसा आदि की उपयुक्त मात्रा सम्मिलित रहती है। अपूर्ण वह जिसमें अपना वर्ग तो पर्याप्त होता है पर दूसरी उपयोगी वस्तुओं की कमी रहती हैं। इस कमी को पूरी करने के लिये अन्यान्य वस्तुओं का समावेश करना पड़ता है।
प्रोटीन की दृष्टि से इन दिनों अंडे खाने का रिवाज बढ़ रहा है समझा जाता है कि उसमें इस तत्व की अधिकता होने से वह अधिक लाभदायक रहेगा। परन्तु लोग यह भूल जाते हैं कि वह जितना लाभदायक दीखता है वस्तुतः वह वैसा है नहीं, पाचन की दृष्टि से वह काफी कठिन पड़ता है। भारत जैसे गर्म देशों में तो वह पेट में जाते ही सड़ने लगता है और विष पैदा करता है। तेल में उबाले और भुने हुये अंडों के समान दुष्पाच्य शायद ही और कोई पकवान होता हो, उसमें जितना पीलापन होता है उसी की कुछ उपयुक्तता समझी जा सकती है। सफेदी वाला अंश तो हानि के अतिरिक्त और कुछ करता ही नहीं।
माँस में पाया जाने वाला प्रोटीन उन खनिजों और लवणों से रहित होता है जिनकी शरीर को नितान्त आवश्यकता रहती है। आमतौर से माँसाहारी लोग माँस पेशियाँ ही पकाकर खाते हैं उनमें खनिजों और लवणों की उपयुक्त मात्रा न होने से उस खाद्य को अपूर्ण एवं घटिया प्रोटीन वर्ग में ही सम्मिलित किया जा सकता है। माँसाहारी खाद्य विश्लेषणकर्ताओं ने उस प्रकार की आदत वालो को केवल गुर्दे, मूत्र यंत्र, हृदय, मस्तिष्क और क्लोम यंत्र खाने को कहा है और माँस-पेशियाँ न खाने की सलाह दी है। जब कि प्रचलन के अनुसार ये अवयव अस्वादिष्ट होने के कारण आमतौर से फेंक ही दिये जाते हैं।
जिन अवयवों को पुष्टिकर बताया जाता है उनमें एक और विपत्ति जुड़ी रहती है-यूरिक एसिड की अधिकता यह तत्व शरीर के भीतर जमा होकर गठिया, मूत्र रोग, रक्त विकार जैसे अनेकों रोग उत्पन्न करता है। माँस अम्ल धर्मी पदार्थ है वह आँतों में जाकर सड़न पैदा करता है। कुछ समय पहले माँस का रसा बना कर रोगियों को दिया जाता था, पर अब खाद्य विशेषज्ञों ने यह घोषित किया है कि उसमें न तो उपयुक्त मात्रा न पौष्टिक तत्व रहते हैं और न और न वह सुपाच्य ही है। उसे रोगियों को पिलाना उनके दुर्बल पेट के साथ अत्याचार करना है।
बीमारियाँ मनुष्यों में ही नहीं उन प्राणियों में भी होती है जिनका माँस खाया जाता है। बहुत बढ़िया और स्वस्थ शरीर के पशु तो कदाचित ही माँस के लिए मारे जाते हैं, आमतौर से बूढ़े, बीमार और निकम्मे पशुओं का ही वध होता है इनमें से अधिकाँश की शारीरिक स्थिति अवांछनीय होती है और उनमें अनेक प्रकार के रोग कीटाणु भरे रहते हैं। स्पष्ट है कि माँस के साथ वे भी खाने वाले के शरीर में प्रवेश करेंगे और उन्हें देर सबेर में रुग्ण बनाकर छोड़ेंगे।
प्राणिज प्रोटीन की प्रशंसा उसमें पाये जाने वाले विटामिन ‘ए’ के आधार पर की जाती है। वह तत्व दूध में भी प्रचुरता पूर्वक पाया जा सकता है। माँस की तुलना में छैना, पनीर, दही आदि कही अच्छे है।
और तो और माँस से तो सोयाबीन ही कहीं अधिक बेहतर है। उसमें कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, विटामिन ए. वी. डी. ई. वसा आदि तत्व इतने रहते हैं जितने माँस में भी नहीं होते। उसे उबाल कर, बिना उबाले पीस कर बढ़िया दूध बन सकता है। उसमें नीबू का रस डाल दिया जाय तो छैना भी बन जायेगा। उसका दही भी जमाया जा सकता है। चीन ने अपनी पौष्टिक खाद्य प्राप्त करने की समस्या का हल सोयाबीन के सहारे ही किया है। हमारे लिये भी उसका प्रचलन हर दृष्टि से उपयुक्त है। माँसाहार का स्थान सोयाबीन पूरी तरह ले सकता है। एक दिन भिगोकर फुलाया हुआ अथवा अंकुरित किया हुआ सोयाबीन तो और भी अधिक गुणकारी बन जाता है। वरन् कई दृष्टि से वह अधिक उपयुक्त भी है। दूध अन्य पदार्थों का प्रोटीन 65 प्रतिशत तक पच जाता है जबकि माँस का प्रोटीन आधा भी नहीं पच पाता है।
सामान्य दालें भी यदि फुलाकर या अंकुरित करके बिना छिलका उतारे भाप के सहारे मंदी आग पर पकाकर खाई जाये तो वे भी प्रोटीन की आवश्यकता पूरी करती हैं। दुष्पाच्य तो उन्हें हमारी त्रुटिपूर्ण पकाने की प्रक्रिया बनाती हैं जिसमें छिलके उतारना तथा तेज आग के सहारे पकाने और छोंक बधार देने मसाले तथा घी आदि भर कर स्वादिष्ट बनाने पर अधिक ध्यान दिया जाता है।
पशुओं में सबसे बलवान हाथी है, उससे भी शक्तिशाली गेंडा माना जाता है। यह दोनों ही शाकाहारी हैं। यह जानते हुए भी न जाने क्यों लोग शाकाहार की शक्ति पर सन्देह करते हैं।
कलकत्ता विश्व विद्यालय के एप्लाइड केमिस्ट्री विभाग ने वृक्षों की पत्तियों तथा हरी घास से प्रोटीन निकाल कर दिल्ली के विश्व कृषि मेला में प्रदर्शित किया था और लोगों को बताया था कि मनुष्य की खाद्य आवश्यकता का सबसे महत्वपूर्ण भाग प्रोटीन सामान्य घास और मामूली पत्तियों में भी पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हो सकता है और उनके आधार पर मजे में जीवित रहा जा सकता है।
हमारे पाचक रसों में बद्ध सामर्थ्य है कि अपने स्वाभाविक खाद्य पदार्थों में से वह तत्व खींचलें जो उसके लिए आवश्यक है। इसके लिए यह आवश्यक नहीं कि जिन वस्तुओं की आवश्यकता है उन्हें ही खाया जाय। सुअर के शरीर में सबसे अधिक चर्बी होती है-टुम्बा मेंढ़ा की पूँछ में भी अतिरिक्त चर्बी होती है। उन बेचारों को घी, दूध, मक्खन कौन खिलाता है। सामान्य घास-पात से ही वे आवश्यक मात्रा में चर्बी प्राप्त कर लेते हैं। जो आवश्यक है उसी को भोजन द्वारा पेट में ठूँसे यदि यह बात सही रही होती तो फिर अन्धों को आंखें खिलाकर लँगड़ों को टाँगे खिलाकर, गूँगों को जीभ खिलाकर चिकित्सा की जा सकती है जिसकी हड्डियां कमजोर हों उसे हड्डियां पीस-पीसकर खिलाई जानी चाहिए। पर वैसा ही नहीं सकता। ठीक इसी प्रकार माँस खाकर माँस बढ़ाने और रक्त पीकर रक्त बढ़ाने की बात सोचना भी बाल-बुद्धि का परिचायक है।
प्रोटीन की मात्रा आवश्यक रूप से हमें चाहिए सो ठीक है, पर उसके लिए हमारा शाकाहारी भोजन ही पर्याप्त है उससे उचित मात्रा में उपयुक्त स्तर को प्रोटीन हमें मिल सकती है। बलिष्ठता के सारे तत्व मनुष्य के स्वाभाविक भोजन शाकाहार में पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हैं, उन्हीं से हमें उपलब्ध करने चाहिए। इसके लिए माँसाहार जैसे माध्यम का अवलम्बन करने की आवश्यकता किसी भी प्रकार नहीं।
महाभारत के विश्वयुद्ध के प्रायः समस्त भूखण्ड के नरेशों, अधिपतियों ने भाग लिया था। कोई दोनों पक्षों के समर्थक बनकर अपनी वाहनियों सहित सफ्रिय भाग ले रहे थे, तो कुछ तटस्थ प्रेक्षक के रूप में भी वहाँ उपस्थित थे। ऐसे ही तटस्थ दर्शकों में था बब्रू वाहन-सबसे कम वय का नरेश ! महाभारत के युद्ध में दर्शक बनकर जाने की आकाँक्षा माँ के सम्मुख व्यक्त की तो माँ ने कहा-बेटा तुम जैसे क्षत्रिय और शूरवीर के लिए इस युद्ध में तटस्थ रहना लगभग असम्भव ही होगा। दोनों पक्ष जिस भीषणता के साथ लड़ेंगे उसे देखकर निस्तेज और निर्बल व्यक्ति का भी आविष्ट होना स्वाभाविक होगा, इसलिये पहले मुझे यह बताओ कि ऐसा अवसर आया तो तुम किस ओर से मैदान में उतरोगे।
जिस पक्ष को मातुश्री का समर्थन प्राप्त हो-मातृ-परायण बब्रू वाहन का कहना था। बब्रू वाहन अपने समय का अजेय योद्धा था और जिस ओर से वह लड़ता, उसके शत्रु पक्ष में विनाशकारी कहर गिरना सुनिश्चित ही था। इसलिये माँ ने कहा-बेटा ! वीरों की मर्यादा है निर्बल की सहायता करना। कौरव और पाण्डव दोनों ही हमें समान रूप से प्रिय है। इसलिए जहाँ तक हो सके तुम तटस्थ ही रहना फिर भी कदाचित न रह सको तो उसी पक्ष का अपना समर्थन देना जो निर्बल हो रहा हो।
बब्रू वाहन मातृ-आज्ञा को शिरोधार्य कर रणागण में पहुँचा। दोनों ही पक्षों ने इस अजेय योद्धा को देखा तो अपनी-अपनी ओर मिलाने की लालसा लेकर पहुँचे परन्तु बब्रु वाहन ने अपने संकल्प का संदर्भ देकर संप्रति तटस्थ रहने की बात स्पष्ट कर दी।
युद्ध आरम्भ हुआ।
दुर्जेय वाहनियों और अचूक शस्त्रास्त्रों से युद्ध के होते हुए भी कौरव सेनायें कमजोर पड़ने लगी। लगने लगा कि बब्रू वाहन अब युद्ध में उतरेगा ही।
भगवान कृष्ण ने इस अनर्थ को रोकने के लिए ब्राह्मण का वेश बनाया और जा पहुँचे बब्रू वाहन के पास। युवराज ने ब्राह्मण वेशधारी कृष्ण को प्रणाम किया तो श्रीकृष्ण बोले-शुभाशीष ! वत्स ! तुम्हारी जय हो।
बब्रू वाहन ने पूछा-कहिए महात्मन् कैसे आना हुआ। अब तक तटस्थ कैसे बने हो। तुम्हारी कीर्ति के सम्बन्ध में हमने बहुत कुछ सुना है।
‘प्रभु ! मैं। अपनी माँ के सम्मुख प्रतिज्ञाबद्ध हूँ कि दुर्बल की सहायता करूंगा कुछ समझ में नहीं आ रहा। आप ही स्पष्ट कीजिये ना। कौन दुर्बल है। पाण्डव तो अभी जमकर लड़ रहे हैं और कौरवों में भी खूब दम हैं।
‘मैं कुछ नहीं कहना चाहता वत्स ! हमें इन राजनैतिक मसलों से क्या सम्बन्ध। हम तो भिक्षा जीवी ब्राह्मण ठहरे। बन पड़े तो अपनी स्थिति के अनुरूप कुछ दीजिये।
ब्राह्मण कृष्ण ने याचना की।
‘माँगिये विप्र श्रेष्ठ ! आप जो भी चाहो, हम देने को तैयार है। ब्राह्मणों की इच्छा पूरी करना तो हमारा कर्त्तव्य है।’
‘ठीक है वत्स ! लेकिन जो मैं माँगना चाहता हूँ शायद तुम न दे सको।’
‘माँग कर तो देखो पूज्यपाद। यदि न दे सकूँ तो आप मेरा सिर उतार लेना।’
‘तो ठीक है ! सिर ही दे डालिये’-भगवान कृष्ण ने अपना मंतव्य कहा। बब्रूवाहन आश्चर्यान्वित तो हुआ परन्तु उसने अपना वचन नहीं तोड़ा और तत्काल ही खड्ग से अपना सिर काटकर याचक के भिक्षापात्र में रख दिया। अन्तिम साँस लेने में कुछ समय लगा और इसी बीच भगवान कृष्ण ने वास्तविकता बता दी। अपनी वचन मर्यादा का निष्ठापूर्वक पालन करते हुए बब्रू वाहन ने प्रयाण कर दिया।
महिला जागरण अभियान का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत है, उसे भारत की आँधी जनसंख्या को गहरे गर्त से-सडांद भरे दलदल से निकाल कर उस धरातल तक ऊँचा उठाना है जिस पर कि आज का प्रगतिशील मानव रह रहा है और कल का सुसंस्कृत कार्यक्षेत्र की जो कल्पना करते हैं उसकी ऊँचाई हिमालय जितनी, गहराई समुद्र जितनी प्रतीत होती है। राजसत्ताओं को अपने देशवासियों की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, शिक्षा संचार, यातायात, न्याय आदि के क्षेत्र में थोड़े से उत्तरदायित्व निबाहने पड़ते हैं। इन क्षेत्रों में से भी अधिकाँश की व्यवस्था निजी क्षेत्रों में ही बनती रहती है। महिला जागरण अभियान को इतना बड़ा कार्य करना है जिसे अन्य क्षेत्रों में प्रगति के लिए होने वाले सरकारी और गैर सरकारी प्रयासों के-सम्मिलित प्रयत्नों के समतुल्य कहा जा सके।
स्पष्ट है कि इस अभियान का महायुद्ध दो मोर्चों पर लड़ा जाना है। एक है निवारक, दूसरा विधायक। प्रतिबन्धित, पराधीनता के अभिशाप ने अनेकानेक दुखद अवाँछनीयताएँ नारी के गले बाँध दी है। शारीरिक दृष्टि से वह पुरुष की तुलना में कहीं अधिक दुर्बल और रुग्ण है। बौद्धिक दृष्टि से शिक्षा के अभाव ने उन्हें आवश्यक जानकारियों से भी वंचित कर दिया है। कूप मण्डूक से अधिक अच्छी स्थिति उनकी हो ही नहीं सकती जिनके लिए ज्ञानार्जन स्रोत अवरुद्ध हो गये हैं। मानसिक दृष्टि से दुर्व्यवहार सहते-सहते वह अपेक्षाकृत अधिक अनुदार और असहिष्णु बन गई है। संयुक्त परिवार निभ नहीं पा रहे हैं, पेड़ से टूटे पतों की तरह लोग अलग-अलग करके एकाकी जीवन जीने के लिए-पक्षियों की तरह अलग-अलग घोंसले बनाने के लिए विवश हो रहे हैं। संयुक्त परिवार में जो प्रगति, सन्तुष्टि और निश्चिन्तता रह सकती है, उसका अनुभव अब कदाचित ही किसी को होता है। कई महिलाएँ घर में रहकर स्नेह सौजन्य का आनन्द ले नहीं पातीं। वे मनोमालिन्य, कलह और झंझट खड़े किये रहती है और अन्ततः दुखी होकर लोगों की अलग घर बनाने पड़ते हैं। इसमें अन्य कारण कम और स्त्रियों की अनुदारता असहिष्णुता मूल्य कारण होती है।
सामाजिक दृष्टि से पिछड़ी नारी अधिक संकोची और व्यवहार शून्य पाई जायगी। उस पर अन्ध-विश्वासी आसानी से सवार हो जाते हैं। भूत-पलीत, कल्पित देवी-देवता, जादू-टोना, आये दिन उन्हें वास देते रहते हैं और समय तथा पैसा खर्च कराते रहते हैं। पण्डे, पुजारी, ज्योतिषी, साधुबाबा, ओझा, अपना शिकार उन्हें ही बनाते हैं और तरह-तरह के डर तथा प्रलोभन दिखाकर उन्हीं का शोषण करते हैं। कीमती वस्त्र, आभूषणों की, सजधज के लिए श्रृंगार सामग्री की फरमाइशें आये दिन खड़ी करती रहती है। ओछा व्यक्तित्व ही ऐसे भोंडे प्रदर्शनों के लिए लालायित रहता है। यदि वे हीन भावनाओं से ग्रसित न होती तो शालीनता और सुसंस्कारिता के प्रतीक स्वच्छता और सादगी से भरे परिधान ही उन्हें पर्याप्त प्रतीत होते। तब वह अनावश्यक अपव्यय न होता जो आज फैशन के नाम पर पानी की तरह बहता चला जा रहा है।
सामाजिक कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों का बोझ भी मनुष्य पर होता है इसका कभी आभास तक उन्हें नहीं मिलता-इस तरह सोचने की आदत भी नहीं है। घर के पुरुष यदि किसी सामाजिक कार्य में समय या पैसा खर्च करें तो सबसे पहले घर की नारियों का ही विरोध असहयोग सामने आता है। वे सोचती है पैसा कमाने के बाद का बचा हुआ समय घर के कामों में-घर के लोगों के लिए लगाना चाहिए। समाज सेवा में अपने को क्या मिलता है-अपना क्या लाभ है। हमें अपने मतलब से मतलब रखना चाहिए। अपने सुख-दुख की बात सोचनी चाहिए। दूसरों के झंझट में पड़ने या दूसरों के लिए कुछ करने की अपने को क्या आवश्यकता? व्यक्तिवादी चिंतन से बाहर की बात सोचना उनके लिये कठिन है क्योंकि कभी सामाजिकता की-सामाजिक कर्तव्यों की आवश्यकता उपयोगिता के बारे में उन्हें कभी जताया समझाया ही नहीं गया। जब वे घर के लोगों को रोकती हैं तो स्वयं तो उस दिशा में कुछ करेंगी ही क्या? यही कारण है कि जिनके पास अवकाश की बहुलता है वे नारी उत्कर्ष के कार्यों में कोई भाग नहीं लेतीं। उस दिशा में उनका तनिक भी उत्साह नहीं होता। निरर्थक कामों में किसी प्रकार समय तो काटेंगी, पर अपने वर्ग को दयनीय दुर्दशा से उबारने के लिये थोड़ा भी प्रयास न करेंगी। कारण एक ही है कि उन्हें सामाजिक कर्तव्यों की बात सुनने समझने का अवसर ही नहीं मिला।
आर्थिक दृष्टि से हर नारी पराधीन है। स्वयं तो वह सीधे कुछ कमाती नहीं, पिता के घर से भी जो मिलता है, उस पर ससुराल वालों का अधिकार हो जाता है। स्त्री धन के नाम पर कभी आड़े वक्त काम आने के लिये उन्हें जेवर मिलते थे। पर अब इस घोर महंगाई में जब घर का खर्च ही नहीं चलता-आभूषण बनाने वालों ने आधा असली, आधा नकली की नीति अपनाली है-बैंक में धन रखना सुरक्षित समझा जाने लगा हैं-जेवर पहनना फूहड़पन का चिह्न बन गया है तो वह सब भी चला गया-चला जा रहा है। कभी होली, दिवाली कुछ मिल जाता हो तो उतने ही पैसे उनके बक्से में पड़े होते हैं। धन रखने का शौक सबको है तो उन्हें भी हो सकता है ऐसी दशा में घर खर्च से काट छाँट-पत्तियों की जेब की तलाशी में कुछ हाथ लग जाय उतना ही उनका होता है। वे नौकरी करें तो भी जो मिले पिता या पति का परिवार छीन लेता है। जहाँ तक व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति का प्रश्न है कि आड़े समय के लिये उनके पास क्या कुछ हैं? तो अधिकाँश नारियों को तो खाली हाथ ही पाया जायेगा। इस अर्थ युग में सर्वथा खाली हाथ रहने वाला अपने को कितना असहाय-असुरक्षित अनुभव करेगा यह कहने की नहीं, अनुभव करने की बात है।
अनुदान, अनवरत, प्रतिदान कुछ नहीं। यदि कुछ है तो वह निंदा तिरस्कार भर है। न कभी अवकाश-न विश्राम-न विनोद। निरन्तर नुक्ताचीनी, दोषारोपण, डाँट-डपट, यदि ये कडुए घूँट न पिये जा सके तो गाली, पिटाई, धमकी, भर्त्सना, बहिष्कार परित्याग से लेकर प्राण हरण तक के दण्ड मौजूद है।
कुरीतियों को अपनाये रहने में उनका आग्रह कम नहीं। विवाह के बाद सन्तान जल्दी न हो तो उनकी बेचैनी देखते ही बनती हैं। घर, पड़ौस की औरतें उन नव-वधुओं पर व्यंग बाण छोड़ती ओर अभागी कहती देखी जाती है। कन्या की गरिमा यों पुत्र से कहीं अधिक हैं, पर कन्या और पुत्र का भेदभाव पुरुषों की अपेक्षा नारियों में ही अधिक पाया जाता है। दैनिक व्यवहार में वे लड़कों को दुलार से लेकर सुविधा-साधनों तक अधिक देती हैं और लड़कियों को कम। जबकि यदि पक्षपात करना ही आवश्यक हो तो अपनी जाति का-लड़कियों का ही करना चाहिये। तथाकथित देवी-देवताओं की पूजा पत्री में ढेरों खर्च कराने का आग्रह उन्हें ही रहता है। लड़के के विवाह में अधिक दहेज पाने का-कम दहेज लाने पर वधू को तिरस्कृत करने में पुरुषों से अधिक उत्साह घर की स्त्रियों में ही देखा जायेगा। तीज-त्यौहारों पर बहू के घर से बेकार की चीजें मंगाने के-और बेटी के घर अगड़म-झगड़म भेजने के-अलन-चलन उन्हीं के सामने प्रतिष्ठा का प्रश्न बनकर खड़े रहते हैं। सन्डे-मुस्टंडे, ढोंगी बाबाओं के हाथों ठगे जाने का भोलापन उन्हीं में देखा जायेगा। पुत्र का वरदान पाने के लिये-पति को वश में करने के तन्त्र मन्त्रों पर विश्वास करने से लेकर-लड़कियां जनने पर सिर पीटते हुए उन्हीं को देखा जायेगा। बाँझ बहू को घर से विशाल देने और दूसरा विवाह करने के लिये बेटे को प्रोत्साहित करने में सास को ही प्रधान भूमिका निभाते देखा जायेगा। पर्दा प्रथा पर पुरुषों का जितना आग्रह होता है घर की स्त्रियाँ उससे कहीं अधिक जोर देती है।
यह कुछ थोड़े से उदाहरण है जिनके आधार पर यह अनुभव किया जा सकता है कि नारी की स्थिति कितनी दयनीय हैं, इन अवाँछनीयताओं की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उन्हें उखाड़ने में काफी श्रम करना पड़ेगा। नारी की तीन चौथाई शक्ति इन्हीं कुचक्रों में नष्ट होती रहती है। वे अपने लिये या परिवार के लिये कुछ कर सकें इसका प्रश्न तो तब उठेगा जब उनकी स्थिति उस योग्य हो। जो कुछ इस स्थिति में भी उनके पास बचा है, वह सारे का सारा इन्हीं छिद्रों में होकर रिसता, टपकता रहता है। इन अवाँछनीयताओं को यदि रोका जा सकता होता तो उनकी क्षमताएं कदाचित इस योग्य होती कि प्रगति की दिशा में-कुछ कदम उठ सकते। उनका, परिवार का तथा समाज का कुछ भला हो सकता।
निवारक प्रयत्न करने की कितनी अधिक आवश्यकता है, इसे विचारशील सहज ही समझ सकते हैं। निषेध, विरोध, उन्मूलन के लिये कितना बड़ा क्षेत्र सामने पड़ा है। अनुचित को रोकना उचित के बढ़ाने के साथ-साथ ही जुड़ा हुआ है। महिला जागरण अभियान को इसके लिये घनघोर और व्यापक प्रयत्न यह करने पड़ेंगे कि प्रस्तुत अनुपयुक्त परिस्थितियों को जड़-मूल से उखाड़ फेंकने के लिये क्या किया जाये? किस प्रकार किया जाये? अनुभव एवं साधन के अनुसार निवारक कार्यक्रमों में हेर-फेर होता रहेगा, पर उस दिशा में साहसपूर्ण द्रुतगामी कदम उठाने अवश्य पड़ेंगे। उसमें जनशक्ति, चिन्तन शक्ति एवं साधन शक्ति जुटाने से लेकर झोंकने तक की तैयारी युद्ध स्तरीय योजना जैसी करनी पड़ेगी।
दूसरों मोर्चा ‘विधायक’ है। निवारण एकाँगी है। कंटीली झाड़ियां साफ की जायें सो ठीक हैं, पर उनके स्थान पर खेत या बगीचा भी तो बोया, उगाया जाना चाहिए। दुर्गुण हटा दिये सो ठीक पर उनके स्थान पर सद्गुणों को भी तो स्वभाव में सम्मिलित किया जाना चाहिये। चोरी की रोकथाम हो गई सो ठीक-पर आर्थिक उन्नति के लिये उपार्जन के साधन भी तो बढ़ने चाहिये। शत्रुओं के आक्रमण को निरस्त कर दिया गया, पर इतने से ही तो देश सुखी नहीं होगा, उसके लिये उत्पादन बढ़ाने एवं प्रगति के अनेक साधन भी तो जुटाने पड़ेंगे। ठीक यही बात नारी उत्कर्ष के महान लक्ष्य की पूर्ति के संबंध में भी लागू होती है। निवारक प्रयत्न का पहला पहिया बनाने के साथ-साथ विधायक प्रयासों का दूसरा पहिया भी विनिर्मित होना चाहिये। दोनों जब तक तैयार न हो जायेंगे गाड़ी पर वजन लादने और सवारी करने का समग्र स्वप्न साकार नहीं हो सकता।
विधायक प्रयत्नों में वे सभी कार्यक्रम आते हैं जिनसे नारी की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक, भावनात्मक, आर्थिक, सामाजिक स्थिति को सुधारा जा सके। इस अभिवर्धन पर ही तो उसकी समर्थता का विकास निर्भर है। क्षयग्रस्त रोगी के शरीर से रोग कीटाणुओं को नष्ट कर देना ही पर्याप्त नहीं, लंबे समय की रुग्णता ने उसकी काया को जीर्ण-शीर्ण, दुर्बल दयनीय बनाकर रख दिया उस अस्थिपंजर को पुनः रक्त माँस युक्त बनाने के लिये उपयुक्त आहार’-विहार की व्यवस्था बनानी होगी ताकि खोई हुई शक्ति को पुनः अर्जित करने का उसे अवसर मिल सके। नारी जागरण के लिये इस प्रकार की असंख्य विधेयात्मक रचनात्मक प्रवृत्तियों का सृजन करना होगा जिनकी ‘बैसाखी’ का सहारा पाकर उसे खड़ा होने और चलने में सुविधा हो सके।
सरकार ने हरिजनों को कई प्रकार के अतिरिक्त संरक्षण तथा विशेष सुविधायें दूसरों की तुलना में अधिक मात्रा में दी है। इसका कारण यह है कि जिन्हें इतने लंबे समय से पिछड़ी स्थिति में डालकर रखा उस समाज को अतिरिक्त सुविधायें देकर अपने पाप का प्रायश्चित करना चाहिये। दूसरों की तुलना में अधिक तीव्रता से प्रगति कर सकने के सुविधा साधन मिलें तभी वे पिछड़ेपन से छूटकर समान स्थिति में पहुँच सकेंगे। यह तर्क न्याय संगत है। ठीक इसी न्याय की अपेक्षा नारी समाज भी करता है। उसे शिक्षा की, स्वावलंबन की, अनुभव संपादन की, क्रिया कौशल की, अधिकाधिक सुविधायें मिलनी चाहिये ताकि उसे भी अपने पिछड़ेपन से पीछा छुड़ाने और समान क्षमता संपन्न होकर समर्थ सहयोगी के रूप में-पुरुष की-समाज की प्रगति में योगदान कर सकने की भूमिका निबाहने का अवसर मिल सके।
नारी उत्कर्ष के लिये अवाँछनीय परिस्थितियों का निवारण और अभीष्ट क्षमताओं के संवर्धन की उभयपक्षीय सुविधायें उत्पन्न की जानी चाहिये। महिला कल्याण के लिये निवारक और विधेयक दोनों ही प्रकार के समन्वयात्मक कार्यक्रम बनाये जाने चाहिये।
अपच एक अत्यंत भयंकर रोग है। पाचन तंत्र खराब होने से खाये हुए पदार्थ पेट में सड़ते हैं और तरह-तरह के विष उत्पन्न करते हैं। वे विष रक्त में घुलते हैं और जहाँ कही अवसर पाते हैं वहीं बीमारियाँ पैदा करते हैं। आयुर्वेद के मतानुसार समस्त रोगों की एकमात्र जड़ें मलावरोध, अपच है। पर यह अपच अब इतना बहु प्रचलित हो गया है कि उसे स्वाभाविक एवं सार्वजनिक माना जाता है। कोई विरला ही ऐसा होगा जो अपच ग्रस्त न हो, आहार-बिहार की अनियमितता का यह स्वाभाविक परिणाम भी है।
अपच की तरह ही अब एक दूसरा रोग बहुप्रचलित एवं सार्वजनिक बनता जा रहा है वह है हृदय रोग और उसका दूसरा अनुचर रक्तचाप। यो चिकित्सा शास्त्र की दृष्टि से यह दोनों अलग रोग है और उनका उपचार भी अलग हैं पर वस्तुतः वे पूर्णतया सजातीय है। अपच और मलावरोध भी दो अलग रोग है। आमाशय में पड़ा आहार अपच कहलाता है और आँतों पर पड़ा अन्न मलावरोध। इन स्थितियों में चिकित्सक अन्तर कर सकते हैं, पर तथ्य ढूंढ़ने वालो की दृष्टि में दोनों सहोदर है। ठीक इसी प्रकार रक्तचाप और हृदय रोग दोनों को एक पंक्ति में खड़ा किया जा सकता है।
यह दोनों ही रोग अब द्रुतगति से अपना क्षेत्र बढ़ा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्र में रहने वाले श्रमजीवी यों इस व्यथा से अभी भी मुक्त है, पर शहरों में रहने वाले और कुर्सी पर बैठे रह कर मस्तिष्कीय श्रम करने वालों में से अधिकाँश व्यक्ति इसके शिकार बनते जाते हैं। शरीर शास्त्री इसका कारण अवाँछनीय आहार, शारीरिक श्रम की कमी, नशेबाजी, धूल धुँओं से भरी गन्दी हवा आदि का बताते हैं। इतनी बात सही है पर इन सब से भी बड़ा कारण है-मस्तिष्कीय तनाव उत्पन्न करने वाले मनोविकारों की अभिवृद्धि, चिंता, क्रोध, उद्वेग, खीज, आशंका, ईर्ष्या, द्वेष असुरक्षा एवं कामुकता जैसे विचारों में डूबा रहने वाला मस्तिष्क उसी तरह विकृत होता है जिस तरह आहर बिहार की गड़बड़ी से पेट में अपच उत्पन्न होता है।
कभी पेट को प्रधानता दी जाती थी और दिल की मजबूती एवं रक्त शुद्धि को सुदृढ़ स्वास्थ्य का आधार माना जाता था, अब नवीनतम शोधों ने यह सिद्ध कर दिया है कि मनुष्य की न केवल विचारणा वरन् शारीरिक स्थिति भी मानसिक स्थिति के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। उद्विग्न रहने वाला व्यक्ति कभी भी अपने शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा नहीं कर सकता। उसे अर्धविक्षिप्त, सनकी, अदूरदर्शी सिद्ध करने वाले अनेकों ऐसे दोष पैदा हो जायेंगे जो दिखाई तो नहीं पड़ते पर उस मनुष्य का जीवन भार रूप अपेक्षणीय, निन्दा योग्य एवं उपहास विरोध से घिरा हुआ बना देते हैं। ऐसे मनुष्य पग-पग पर असफलताओं का मुँह देखते हैं और अपने तथा दूसरों के ऊपर निरन्तर खोजते रहते हैं।
मस्तिष्क ही वस्तुतः शरीर का वास्तविक संचालक है। रक्ताभिषरण, आकुंचन-प्रकुंचन, श्वास-प्रश्वास जैसी निरन्तर चलने वाली क्रियाएं अचेतन मस्तिष्क द्वारा ही संचालित होती है। विचारों का हारमोन वाही ग्रंथियों पर भला-बुरा प्रभाव पड़ता है और वहाँ से निकलने वाले स्राव शरीर में ऐसी विचित्र स्थिति उत्पन्न करते हैं जिसका आहार-बिहार से कोई सीधा संबंध प्रतीत नहीं होता। प्रसन्न चित्त और संतुष्ट रहने वाले निर्धन की तुलना में चिन्तित और उद्विग्न धनाधीश का स्वास्थ्य सदा गिरा बिगड़ा पाया जायेगा भले ही उसका आहार-बिहार कितना ही बहुमूल्य एवं सुविधाजनक क्यों न हो।
आज की विकृत मन स्थिति ही रक्तचाप और हृदय रोगों की वृद्धि का प्रमुख कारण है यों नशेबाजी, कामुकता, चटोरापन,, श्रम असंतुलन, जलवायु की गन्दगी जैसे कारण भी स्वास्थ्य बिगाड़ने में कम भूमिका प्रस्तुत नहीं करते। लगता है कुछ दिनों में अपच की तरह रक्त-चाप और हृदय-विकार भी सामान्य और सर्वव्यापी रोग का रूप धारण कर लेंगे। अपच सह्य था, उसके रहते हुए भी जिन्दगी की गाड़ी लुढ़कती रहती थी और कोई जोखिम मेरा कष्ट नहीं सहना पड़ता था, पर हृदय रोग उतने हल्के नहीं है। वे कभी भी प्राण हरण कर सकते हैं। जब उनका दौरा होता है तो आदमी तिलमिला जाता है और काम करने की क्षमता गँवा बैठता है। रक्त चाप की बेचैनी भी दयनीय होती है। अपच को लेकर आदमी गिरता-पड़ता दुर्बल-बीमार रहता अपना काम चलाता रहता है, पर इन रोगों से तो गतिरोध की स्थिति ही पैदा हो जाती है।
बढ़ते हुए हृदय रोग मनुष्य के सामने एक भयंकर संकट की खतरे से भरी घंटी है। उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। नहीं की जानी चाहिए। अस्तु इन दोनों रोगों के स्वरूप, कारण और निवारण के संबंध में हमें आवश्यक जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न करना ही चाहिए।
संसार में हृदय रोगों से मरने वाले की संख्या दिन-दिन तेजी से बढ़ रही है। जिन्हें रोगों से कष्ट उठाना पड़ता है उनकी संख्या अब कुल रोगियों में एक तिहाई के करीब पायी जाती है। हार्ट अटैक-हार्ट फैल्योर शब्द अब ऐसे हैं जिनका अर्थ हर कोई समझने लगा है।
हृदय का मुख्य काम है शरीर भ्रमण से लौटे हुए अशुद्ध रक्त को ग्रहण करना और आक्सीजन युक्त शुद्ध रक्त को धमनियों के माध्यम से समस्त शरीर में पहुँचाना। जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत उसे अहिर्निशि यह कार्य करना पड़ता है।
सर्व विदित है कि शरीर के किसी अंग को किसी कारण रक्त की सप्लाई कम मिले तो वह शिथिल, संज्ञा शून्य, शिथिल होते होते किसी समय वह बन्द भी हो जायेगा, कईबार यह कार्य अत्यन्त तीव्र गति से होता है तो उसे प्राण घातक ‘हार्ट अटैक’ कहते हैं। यह क्रिया मंद गति से हो तो सामान्य हृदय रोग की स्थिति में वर्षों बना रहता है और थोड़े बहुत कष्ट को सहन करते हुए काम चलता रहता है।
जिस तरह हृदय सिकुड़ता-फूलता है उसी प्रकार रक्त वाहिनी आर्ट रीजवेन्स भी सिकुड़ती-फूलती है और हृदय के कार्य में सहायता पहुँचाती है। यदि वे नाड़ियाँ कड़ी हो जायँ अथवा सिकुड़ जायँ तो रक्त संसार कार्य पूरा करने में हृदय को दूना और लगाना पड़ता है। इससे उसका श्रम बहुत बढ़ जाता है इतने पर भी नाड़ियों में अवरोध होने के कारण उसका कार्य पूरा नहीं हो पाता। इस दुहरी मार से वह थकावट एवं रुग्णता से ग्रसित होने लगता है यही है-हृदय रोगों की सामान्य पृष्ठ भूमि।
अधिकाँश हृदय रोगी धमनियों के रुँधने या अकड़ने के कारण व्यथित रहते हैं। यो देखने में ऐसे रोग आकस्मिक प्रतीत होते हैं, पर वस्तुतः वे जीर्ण रोग होते हैं जिनकी जड़ तीव्र लक्षण प्रकट होने के बहुत पहले से ही जमती चली जाती है। वस्तुस्थिति का पता तब चलता है जब तड़पाने वाले दौरे पड़ना आरंभ हो जाता है।
धमनियों की कोमलता नष्ट होने और उनमें कड़ापन आने के साथ-साथ उनकी दीवारें मोटी होने लगती है और रक्त का दौरा चलते रहने का मार्ग सिकुड़कर छोटा हो जाता है। इसके अतिरिक्त एक दूसरा कारण यह होता है कि रक्त में छोटी-छोटी फुटकियाँ पड़ जाती है। वे कभी-कभी रक्त वाहिनी नाड़ियों में बुरी तरह फँस जाते हैं और रक्त संचार की सामान्य प्रक्रिया को बंद कर देते हैं। हृदय को रक्त ने मिलने से वह अपने लिए आवश्यक आहार से वंचित रहकर भूख से तड़पने लगता है इसी को हृदय का तीव्र दौरा कहा जाता है। डाक्टरी भाषा में इसे कोरोनरी थ्राम्बोसिस कहते हैं।
धमनियों की भीतरी दीवारों पर अशुद्ध रक्त प्रवाह के कारण उसका तलछट जमने लगता है जिसमें कोलेस्टरोल, कैल्शियम, फायवरस टिश्यू सरीखे श्वेत जातीय पदार्थ होते हैं। रक्त संचार के सामान्य प्रवाह को जारी रखने में हृदय पर जो अतिरिक्त दबाव पड़ता है उच्च रक्त चाप हाई ब्लड प्रेशर प्रायः उसी को कहा जाता है रक्त चाप हाई ब्लड प्रेशर प्रायः उसी को कहा जाता है रक्त में बढ़ा हुआ-कोलेस्टरोल, धमनियों के कड़ेपन, एथिरोइस्वले रोसिस, के लिये बहुधा उत्तरदायी पाया जाता है।
हृदय रोगों के कारणों में बढ़ा हुआ रक्तचाप, रक्त में अशुद्धता की वृद्धि, शरीर की भार वृद्धि, अधिक खाना, आराम तलबी, नशेबाजी, चिंताग्रस्त रहना, मधुमेह, वंश परम्परा जैसी अवाँछनीयताएं मुख्य है। चिकनाई प्रधान आहार की अधिकता और उसका पाचन ठीक तरह न होना भी एक कारण और जोड़ा जा सकता है। स्वाद की दृष्टि से अमीर लोगों घी तेल आदि बसा वर्ग के पदार्थों का सेवन तो बहुत करते हैं पर उन्हें पचाने के लिए जितना शारीरिक श्रम अपेक्षित है उसे नहीं करते। फलतः वह अनपची चिकनाई रक्त में सम्मिलित होकर उसे गाढ़ा एवं फुटकी दार बनाने लगती है। इन दिनों वनस्पति घी का प्रचलन बढ़ा है, वह हृदय रोगों की दृष्टि से हानिकारक है। सामान्य तेल जो अपने स्वाभाविक रूप में हानिकारक नहीं थे जमाने की, हाइड्रोजिनेशन, प्रक्रिया में होकर गुजरने के कारण दुष्पाच्य हो जाते हैं और हृदय रोगों का कारण बनते हैं।
श्रम जीवियों की अपेक्षा बड़े आदमी कहलाने वालों को हृदय रोग अधिक घेरते हैं। इस दृष्टि से उनकी शारीरिक श्रम से बचे रहने की आराम तलबी बहुत महँगी पड़ती है। इसी प्रकार उनका चिकनाई प्रधान मसालेदार, भुना-तला बहुमूल्य आहार अमीरी की शान तो बढ़ाता है पर परिणाम में वह भी हृदय रोग जैसी विपत्ति खड़ा करता है।
यों हृदय रोगियों को पूर्ण विश्राम की सलाह दी जाती हैं पर यह तीव्र आयात के समय ही ठीक है। सामान्य तथा उन्हें टहलने, मालिश करने, हलके आसन जैसे कम दबाव डालने वाला शारीरिक श्रम करते रहना ही चाहिए ताकि रक्त संचार प्रणाली में अवरोध उत्पन्न न हो उसी प्रकार उन्हें आहार भी फल, शाक प्रधान बना लेना चाहिए। चिकनाई कम से कम लें दूध भी मक्खन निकाल कर लें तो अच्छा है।
स्वस्थ मनुष्य के हृदय में एक बटा आठ हार्स पावर शक्ति काम करती है। इसे यदि बिजली में परिवर्तित कर दिया जाय तो साठ-साठ बाट के दो बल्ब जल सकते हैं। छह हृदय मिलकर एक स्कूटर इंजन का काम दे सकते हैं
इतना सब होते हुए भी पेट का अपच, इन्द्रिय असंयम का अपव्यय और मानसिक उत्तेजनाओं का दबाव मिलकर हृदय की दीवारों को कमजोर या कठोर बना देते हैं। रक्त में गाढ़ा पन और विषैलापन अधिक रहने से भी हृदय कमजोर होता चला जाता है फिर तनिक से आघात लगने पर भयंकर रोगों से ग्रसित हो जाता है। यदि उसे अनावश्यक दबावों से बचाया जा सके तो वह सहज ही पूर्ण सौ वर्ष तक काम देते रहने योग्य बना रह सकता है।
सामान्य स्वास्थ्य की स्थिति में नाड़ी की चाल प्रति मिनट इस प्रकार होनी चाहिए। पैदा होते समय 130 से 150 बार। 1 से 2 वर्ष की आयु तक 110 से 120 बार तक। 2 से 4 साल तक 60 से 110 बार तक 6 से 10 साल तक 60 से 100 तक। 10 से 14 साल तक 80 से 90 तक। युवा मनुष्य की लगभग 78 बार तक।
श्वासों का आवागमन भी आयु के हिसाब से घटता बढ़ता रहता है। सामान्यतया प्रति मिनट इसका औसत हिसाब इस प्रकार हे-पैदा होने पर 40 बार। 2 वर्ष की आयु में 28 बार 4 वर्ष में 25 बार। 10 वर्ष में 20 बार। युवावस्था में 12 से 16 तक।
स्वस्थ रक्त में पाये जाने वाले अणुओं की मात्रा एक व्यवस्थित क्रम से रहती है। उनमें से पोली मार्फ 40 से 75 प्रतिशत, इजीना फिल 1 से 6 प्रतिशत, वेसोफिल ॰ से 1 प्रतिशत, पाये जाते हैं। न्यूकीमिया जिसे एक प्रकार का रक्त केन्सर माना जाता है। इसलिए उत्पन्न होता है कि रक्त में श्वेत अणु अपरिपक्व अवस्था में भारी मात्रा में बढ़ने लगते हैं।
रक्त में एक घुलनशील प्रोटीन रहता है-’फाइव्रिनाजन’ । चोट लगने पर यह फाइव्रिन के रूप में बदलता है और मकड़ी के जाले जैसा जाल रक्त में बुन देता है। रुधिर कण उसमें अटक जाते हैं। यही वह थक्का है जो चोट लगने के स्थान से बहते हुए रक्त का द्वार बन्द करके उसे रोकता है।
कभी कभी शारीरिक विकृतियों के कारण रक्त में यह थक्के बनने की प्रक्रिया अपने आप विकसित हो जाती है, रक्त नलिकाओं में भ्रमण करने लगते हैं और रक्त विवाह की स्वाभाविक प्रक्रिया में अड़चने उत्पन्न करते हैं। जहाँ अटक जाते हैं वहाँ बेचैनी, भड़भड़ाहट उत्पन्न करते हैं। हाथ पैर हृदय से दूर है अस्तु इन थक्कों को वहाँ के हल्के रक्त प्रवाह में अधिक ठहरने रुकने की सुविधा मिल जाती है। फलतः जरा-जरा सी बात पर हाथ पैरों में भड़भड़ाहट होने लगती है। दबाने से कुछ राहत मिलने का कारण यह है कि उन थक्कों को इस प्रकार की कूट-पीट से आगे बढ़ने की बात एक सीमा तक बन जाती है।
इन थक्कों को ‘थ्राम्बोसिस’ कहा जाता है, वे अभी कभी हृदय नलिका में जा पहुँचते हैं और ‘हार्ट अटैक’ जैसा प्राण घातक संकट उत्पन्न करते हैं यदि उनका अवरोध कुछ मिनट ही रक्त प्रवाह को अवरुद्ध करदे तो समझना चाहिए कि हृदय की धड़कन बन्द हुई और प्राण गये। थोड़ी देर का अवरोध भी भयंकर छटपटाहट पैदा कर देता है और रोगी को लगता है कि वह अब गया- तब गया।
बालकोमं का सामान्य रक्त चाप लगभग 120 मिली मीटर एच0बी0 सिस्टोलिंक और लगभग 80 किलोमीटर एच0जी0 डायास्टेलिक होता है। इसे सामान्यतः 120/80 मिली मीटर एच.जी. लिखा जाता है। आमतौर से रोगी की आयु में 90 और जोड़ दिया जाता है। यही स्वाभाविक रक्त चाप है ।10 का अंक व्यक्तिगत विशेषता को ध्यान में रखते हुए न्यूनाधिकता के लिए छोड़ा जाता है। जैसे मनुष्य की आयु 40 वर्ष हो तो उसमें 90 जोड़ने से 130 बना। इसमें 10 न्यूनाधिकता के लिए छोड़ा जाय तो 120 से 140 तक का सामान्य स्वाभाविक माना जायगा। इससे घटना और बढ़ना असाधारण स्थिति है। स्फिग्मों मैनोमीटर नामक यंत्र से रक्त चाप नापा जाता है।
बढ़े हुए रक्त चाप से अनिद्रा दुर्बलता मूर्च्छा दौरे पड़ना अपच, बुरे स्वप्न, पसीने की अधिकता जैसी शिकायतें होती हैं।
रक्त में खटाई की मात्रा का बढ़ना तथा शरीर एवं मस्तिष्क का उत्तेजित रहना बढ़े हुए रक्त चाप का मुख्य कारण है। घटा हुआ रक्त चाप बताता है कि अवयवों के संचालन में जितनी ऊर्जा जुटाई जानी चाहिए वह जुट नहीं पा रही है। इन विकारों को दवा दारु के द्वारा सामयिक रूप से ही ठीक किया जा सकता है। स्थायी समाधान एक ही है कि शरीर यात्रा को प्राकृतिक आहार बिहार के अनुरूप सुसंयत किया जाय और मस्तिष्क को मनोविकारों से रहित बना कर चित्त की स्थिति हल्की फुलकी और हँसी-खुशी की बनाये रखी जाय।
संक्षेप में शारीरिक और मानसिक संयम ही वह चिरस्थायी उपाय है जो न केवल हृदय रोग एवं रक्त चाप को दूर करता है वरन् अन्य सभी बीमारियाँ एवं कमजोरियों की जड़ पर कुल्हाड़ा चलाता है। अध्यात्म का समस्त कलेवर इस शारीरिक मानसिक असंयम को दूर करने के लिए ही खड़ा किया गया है उसे अपना कर हम उन रक्त चाप, हृदय रोग, अनिद्रा, मधुमेह जैसे उन प्राण घातक रोगों से छुटकारा पा सकते हैं जो निकट भविष्य में अपच की तरह ही सर्वजनीन बनते जा रहे हैं और मनुष्य को हर दृष्टि से दीन दुर्बल बनाने के लिए तुले हुए हैं।
सुप्रसिद्ध लेखिका मेरी स्टोप्स जब सोलह वर्ष की थी तो किसी ने उनके रूप सौंदर्य की अतिशयोक्ति पूर्ण प्रशंसा कर दी। इस पर उन्हें बहुत गर्व रहने लगा।
बात उनके पिता को मालूम हुई तो उन्होंने बेटी को बुला कर कहा- बच्ची किशोरावस्था की सुन्दरता प्रकृति की देन है, उस पर केवल प्रकृति के अनुदान को ही सराहा जा सकता है। तुम्हें अपने सौंदर्य पर गर्व करना हो तो साठ वर्ष की आयु के पश्चात करना। क्योंकि यदि तब भी तुम सुन्दर रही तो वह सौंदर्य सचमुच तुम्हारा अपना ही उपार्जन होगा।
यह तथ्य हममें से प्रत्येक को भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि युग-निर्माण अभियान की सफलता असफलता पर मनुष्य जाति का भविष्य निर्भर है। मानवी सभ्यता के जीवन मरण का फैसला इन प्रयासों की सफलता असफलता के साथ जुड़ा हुआ है। इसका महत्व आज भले ही न समझा जाय पर जब कभी वास्तविकता समझने का प्रयत्न किया जायगा तो इसी निर्णय पर पहुँचना पड़ेगा कि लोक मानस को निष्कृष्टता के चंगुल से छुड़ाकर उसे परिष्कृत बनाने के अतिरिक्त कल्याण का और कोई मार्ग नहीं। भयंकर अग्निकाण्ड होने पर सबसे प्रमुख कार्य एक ही बन जाता है कि पानी से, धूल से, या जो कुछ मिल सके उसी से आग बुझाने का प्रयत्न किया जाय। छोटी-लोक-सेवा के नाम पर चल रहे उन उपहासास्पद कामों से दूर रहे जो मात्र आत्म विज्ञापन के लिए किए जाते हैं।
लोग अपनी नामवरी के लिए छुटपुट खेल खिलौने बनाने और उनसे खेलने में उलझें रहते हैं। तरह-तरह की चित्र विचित्र परमार्थ प्रवृत्तियों की हमारी सद्भावना अस्त-व्यस्त होती रहती है और वह मूल प्रयोजन भूख प्यास से मूर्च्छित पड़ा रहता है जिसके ऊपर सुख-शान्ति का समृद्धि और प्रगति का ही नहीं- समूची मानवी सत्ता का भविष्य निर्भर है। हमने अनेक बार अनुरोध किया है कि इस आपत्ति काल में अपने को अपने प्रयत्नों को बखेरें नहीं- केवल एक ही तथ्य को ध्यान में रखें- छोटी साज-सँभाल की जाती हरें और चढ़ती हुई आग की उपेक्षा की जाय तो फिर बात बनेगी नहीं।
प्रगति और समृद्धि के नाम पर अनेक क्षेत्रों में अनेक प्रयत्न चल रहे हैं। अखण्ड-ज्योति ने अपने प्रयासों को उस उद्गम पर केन्द्रित किया है जहाँ से विनाश और विकास के दोनों ही झरने फूटते हैं। विकृत चिन्तन का निवारण व जन-मानस में परिष्कृत दृष्टिकोण का प्रतिष्ठापन यही है हमारा विचार क्रान्ति अभियान- यही है इस युग का सर्वोपरि महत्वपूर्ण धर्मानुष्ठान -ज्ञान-यज्ञ। युग-निर्माण योजना इन्हीं प्रयत्नों में प्राण -प्रण से संलग्न है। उसने अपने प्रभाव क्षेत्र में एक ही बात गले उतारने का प्रयत्न किया है कि पुण्य परमार्थ की बात यदि किसी के मन में तनिक भी हो तो उसे अस्त व्यस्त दिशाओं में बखेरें नहीं केवल युग धर्म को ही प्राथमिकता दें और जनमानस के परिष्कार प्रयत्नों में विचार क्रान्ति अभियान में अपना, अपने परिवार का और समस्त मानव जाति का हित साधन देखें और इस विषम बेला में ध्यान योगी की तरह इसी एक लक्ष्य पर केन्द्रीभूत रखें।
इन दिनों हमें दो तथ्यों को अपनी मनोभूमि में अत्यधिक गहराई तक उतारना चाहिए (1) जन-मानस का परिष्कार किए बिना व्यक्ति और समाज का कल्याण सम्भव नहीं, इसलिए उसी पर आज हमारा सारा ध्यान केन्द्रित रहना चाहिए (2) इतना बड़ा प्रयोजन संघ शक्ति का उदय किए बिना और किसी तरह सम्भव नहीं हो सकता। व्यक्तिगत जीवन के सामान्य निर्वाह तक जन सहयोग के बिना सम्भव नहीं होते तो फिर युग परिवर्तन सा महान प्रयोजन तो उसके बिना सम्भव हो ही नहीं सकता। अस्तु यदि लोक मंगल की, उज्ज्वल भविष्य की कामना हो तो विचार क्रान्ति अभियान का अंग चलाना चाहिए और उसके लिए संघ शक्ति जुटाने में जन सहयोग एकत्रित करने में प्राण-प्रण से जुट जाना चाहिए।
अखण्ड-ज्योति के संचालक सूत्र अपने प्रिय परिजनों को लगभग इसी स्तर का उद्बोधन पिछले 37 वर्षों से करते रहे हैं। कभी संकेत रूप में कभी सुझाव रूप में, कभी अनुरोध रूप में कभी आदेश रूप में -परिजनों को इन्हीं तथ्यों को हृदयंगम करने के लिए कहा जाता समझाया जाता रहा है। अब वह प्रकरण इसी तरह बार-बार नहीं ठहराया जाता रह सकता कहने वाले सूत्र अपना बिस्तर समेट रहे है। अस्तु, बार -बार सुनाने का झंझट भी नहीं रहेगा। अब हमें ‘हाँ’ या “ना” में से एक का चयन कर लेना चाहिए ताकि अनुरोध और उपेक्षा का सिलसिला ही समाप्त हो जाय। दोनों पक्ष अपना मन हल्का करके निश्चित हो जाय। आशा-निराशा के झूले में झूलते रहना भी कम तक चलेगा? बात तो जमीन पर खड़े होने और कदम बढ़ाने से ही बनती है। मंजिल तो उसी से पार होती है।
इस बार किसी निर्णय पर पहुँचने का निश्चय किया गया है। पिछले अंक में गायत्री जयन्ती से गुरुपूर्णिमा तक के 18 जून से 23 जुलाई तक के 35 दिन इसी समुद्र मंथन के लिए घोषित किए गये थे। प्रत्येक परिजन से अनुरोध किया गया था कि यदि उसे अपना मिशन सचमुच ही उपयुक्त लगा हो तो सहमत रहने तक सन्तुष्ट नहीं रहना चाहिए वरन् एक कदम आगे बढ़कर उसमें सहयोग का एक कण समन्वित करना चाहिए। सहमति को सक्रियता के रूप में विकसित होना चाहिए। समर्थन को योगदान के रूप में एक कदम आगे बढ़ाना चाहिए। यह अवधि उसी आत्म चिन्तन की है।
यों अब तक के युग निर्माण अभियान की सफलता में सारा श्रेय अखण्ड-ज्योति परिजनों का ही है, जिनके योगदान से संसार को आश्चर्यचकित कर देने की स्थिति तक उसने अपना वर्चस्व सिद्ध किया है । उस पर गर्व किया जा सकता है-सन्तोष नहीं। गर्व इसलिए कि इस परिवार में अनेक उच्चकोटि की आत्माएं जुटी हुई है और वे भौतिक लिप्सा से अपना मन पीछे हटाकर नवनिर्माण की युग पुकार पुरी करने के लिए बढ़ चढ़कर त्याग, बलिदान प्रस्तुत कर रहे हैं। गर्व इसलिए भी किया जा सकता है कि आज के अगणित संस्था संगठनों के बीच इतनी उत्कृष्ट जन शक्ति और कही भी तलाश नहीं की जा सकती। इतने पर भी असन्तोष इसलिए बना रहता है। उन युग सैनिकों की संख्या इतनी कम है जिसे देखकर दुख होता है। जिस उद्यान को इतने परिश्रम से इतनी आशाओं से पूरे जीवन का एकनिष्ठ तप करके सींचा गया है उसमें इतने थोड़े पेड़-पौधे इतनी थोड़ी मात्रा में फल-फूल दे सके तो यह स्थिति कष्टकर है। माली के लिए इसमें प्रसन्न होने का सन्तोष व्यक्त करने का कोई उत्साहपूर्वक अवसर नहीं है। अधिक से अधिक यह ईमानदारी से कर्तव्य पालन की बात स्मरण करके अपने मन को हल्का भर कर सकता है।
इस बार एक बार फिर पूरा साहस बटोरकर अन्तिम अनुरोध करने की बात सोची गई है और उसे पिछले अंक में व्यक्त किया गया है। कहा इतना ही गया है कि अखण्ड ज्योति परिवार का प्रत्येक परिजन अपने दैनिक आवश्यक एवं व्यक्तिगत कामों में एक महत्वपूर्ण कार्य युग साधना को भी सम्मिलित कर लें। उसे व्यक्तिगत कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों में गिनलें। किसी पर अहसान समझ कर नहीं वरन् अनिवार्य कर्तव्य के रूप में स्वीकार करे। इसके लिए 24 घण्टे में से न्यूनतम एक घण्टा लगाना आरम्भ कर दें।
जहाँ सच्ची सहानुभूति होगी वहाँ ‘फुरसत न मिलने’ का बहाना न किया जायगा। सूरज की तरह स्पष्ट है कि जिन कार्यों को मन से निरर्थक महत्व हीन माना होगा उन्हीं के लिए फुरसत न मिलेगी। जो कार्य ‘आवश्यक’ समझे जाते हैं उन्हें तो रोटी खाना छोड़कर भी पूरा किया जाता है और कार्यक्रमों में उन्हीं को प्राथमिकता दी जाती है। जिसने युग धर्म के निर्वाह में कुछ योगदान करने की आवश्यकता सच्चे मन से अनुभव की होगी वह फुरसत न मिलने जैसे उपहासास्पद शब्द होठों पर ला ही नहीं सकेगा। इस बहाने से कोई अपना मन बहला सकता है पर ईश्वर की- आत्मा को यहाँ तक कि हमें भी उस कथन से तनिक भी समाधान नहीं मिलेगा।
इस बार हम अपने प्रत्येक परिजन को यह समझाना चाहते हैं कि भगवत् भजन के समतुल्य ही युग साधना के लिए लगाया गया समय पवित्र एवं पुण्य फलदायक है। उसमें आत्म कल्याण, लोक-मंगल और भगवत् प्रसन्नता के तीनों ही तथ्य मिले हैं। इसलिए यह त्रिवेणी सर्वोत्कृष्ट परमार्थ प्रयोजनों में प्राथमिकता पाने योग्य है। इसके लिए एक घण्टा समय लगाना किसी को भारी नहीं पड़ना चाहिए। इसे समय का अपव्यय नहीं माना जाना चाहिए। वरन् जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए आज की स्थिति में किए जा सकने वाले विवेकपूर्ण कार्यों में सर्वोपरि समझा जाना चाहिए।
यह समय दान किस कार्य में लगाना है इसका स्पष्टीकरण पिछले अंक में कर दिया है। हमें देव शक्तियों की संघटना खड़ी करनी है। भावभरी जागृत आत्माओं को एक सूत्र में पिरोकर युग देवता के चरणों पर चढ़ाने योग्य पुष्पहार बनाना है। संगठन के बिना युग परिवर्तन जैसे महान लक्ष्य की दिशा में एक इंच भी बढ़ सकना सम्भव न होगा, कार्य तो अनेकों करने पड़े है। बौद्धिक क्रान्ति, नैतिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति का विशाल कार्य क्षेत्र सुनसान पड़ा है। उसे उर्वर बनाने के लिए जिन प्रचारात्मक रचनात्मक और संघर्षात्मक कार्यों का अभियान खड़ा किया जाना है उनका सुविस्तृत उल्लेख शत सूत्री युग निर्माण योजना के रूप में अनेकों बार किया जा चुका है।
युगान्तरकारी कार्यक्रमों की रूपरेखा अनेकों बार प्रकाशित कर चुके है; उन क्रिया-कलापों का छकड़ा ज्यों-त्यों करके चलता, रेंगता भी देखा जा सकता है। पाक्षिक युग-निर्माण योजना में छपते रहने वाले समाचारों को पढ़कर यह आभास प्राप्त किया जा सकता है कि अभियान के अंतर्गत क्या हो चुका- क्या हो रहा है और क्या होने वाला है।
प्रश्न मूल पूँजी का है। संघ शक्ति के अभाव में जो बन पड़ रहा है उसे दूसरों की दृष्टि में कितना ही महत्व क्यों ने मिल रहा हो अपनी दृष्टि में नगण्य है। क्योंकि अखण्ड ज्योति परिवार के एक लाख परिजनों में से मात्र कुछ हजार की ही वै हलचलें है। यदि पूरा परिवार अपना एक एक बूँद सहयोग लेकर खड़ा हो जाय तो जो कुछ हो रहा है उसकी प्रगति सौ गुनी तीव्रगति पकड़ सकती है और जिसे आज आश्चर्य मात्र समझा जा रहा है वह कल चमत्कार बनकर सामने खड़ा हो सकता है।
यह बन पड़े तो हमें इस सम्भावना को सार्थक बना कर दिखाना चाहिए। आज कितने भी परिजन है उन सबको संघ सूत्र में आबद्ध हो जाना चाहिए। इसके लिए क्या करना चाहिए इसका सुझाव पिछले अंक में दिया जा चुका है। दो तीन उत्साही परिजनों की एक संगठनकर्ती टोली बने और वह वर्तमान अखण्ड-ज्योति सदस्यों के घर घर जाकर उनसे संपर्क साधे और कहे कि उन्हें संघबद्ध होने के अनुरोध को स्वीकार करना चाहिए। सदस्यता का शुल्क एक घण्टा समय प्रतिदिन ज्ञान-यज्ञ की शर्त पालन करना है। यह घण्टा नित्य न सही महीने में कुल मिलाकर 30 घण्टे सुविधानुसार दिये जा सकते हैं। यह समय आगे अन्य बड़े कामों में भी लग सकता है, पर इस वर्ष तो प्रधानतया दो ही कामों में लगता है। (1) युग-निर्माण परिवार की विचारगोष्ठियों में सम्मिलित होकर वर्तमान परिजनों के बीच घनिष्ठता पैदा करना और एक दूसरे को प्रोत्साहन देना और संगठन में सक्रियता उत्पन्न करना (2) ‘एक से दस’ योजना के अनुसार अपने परिवार, पड़ोस, परिचय क्षेत्र में कम से कम दस व्यक्तियों को अखण्ड-ज्योति युग निर्माण तथा दूसरा मिशन का साहित्य नियमित रूप से पढ़ाते रहने का क्रम चलाना। इससे अपना प्रभाव, प्रकाश एवं विस्तार क्षेत्र इसी वर्ष दस गुना हो जायगा।
संगठन टोली को स्थानीय अखण्ड-ज्योति सदस्यों के संपर्क में 23 जुलाई के गुरुपूर्णिमा पर्व तक कई बार आना चाहिए और उन्हें उस दिन के उत्सव में सम्मिलित रहने के लिए अनुरोध करना चाहिए। जो संगठन से रुचि दिखाये उनसे समय दान की प्रतिज्ञा उसी पावन पर्व पर करा लेनी चाहिए और भविष्य में चेष्टा चलती रहनी चाहिए कि की हुई प्रतिज्ञाएँ निभती रहे उनमें आलस्य, अनुत्साह उत्पन्न न होने पावे। बसन्त पर्व तक की अवधि के छह महीने यदि यह समय दान की प्रक्रिया नियमित रूप से कल गई तो विश्वास किया जाना चाहिए वह भविष्य में भी एक सरस अभ्यास के रूप में स्वभाव का अंग बन जायगी और अगले वर्ष जो गुरुपूर्णिमा पर्व मनाया जायगा उसमें यही आज के मात्र ‘पाठक’ दीखने वाले परिजन सृजन सैनिकों की अग्रिम पंक्ति में खड़े दिखाई देंगे। सोची हुई यह संगठन प्रक्रिया यदि साकार हो सकी तो आज की तुलना में अगले वर्ष की स्थिति कितनी अधिक उत्साहपूर्वक होगी इसकी कल्पना मात्र से आंखें चमक उठती है।
यह अंक पाठकों तक पहुँचने में जुलाई का प्रथम सप्ताह बीत चुका होगा। गुरुपूर्णिमा ता0 20 जुलाई के लगभग दो सप्ताह बचे होंगे। जहाँ अभी तक संगठन टोलियाँ सक्रिय न हुई हो वहाँ इन्हीं 15 दिनों में वह कार्य पूरा कर लेना चाहिए, गायत्री जयन्ती से गुरुपूर्णिमा तक के संगठन पुरश्चरण के लिए निर्धारित था। जहाँ कुछ प्रयास चल रहे है वहाँ इन 15 दिनों में पूरी तीव्रता उत्पन्न कर लेनी चाहिए। गुरुपूर्णिमा पर्व के समारोह में कितने परिजन एकत्रित हो सके और समय दान की प्रतिज्ञा ले सके इस बात पर उस समारोह की सफलता आँकी जायगी। वर्षा के दिन होने के कारण उस समय खुला अधिवेशन और बड़ा समारोह तो सम्भव नहीं हो सकता; फिर भी छाया वाले स्थान का प्रबन्ध करके स्वजन सम्मेलन तो हो ही सकता है। आम जनता के लिए वह समय सुविधा का नहीं होगा तो भी अपनों को अपनों के साथ मिल बैठने में- एक छोटा धर्मोत्सव मनाने में किसी न किसी प्रकार साधन जुट ही सकता है। प्रभात-फेरी, सामूहिक जप, छोटा गायत्री यज्ञ, सहगान कीर्तन, प्रवचन, लाल मशाल चित्र के सम्मुख पुष्पांजलि समर्पण, समय दान की प्रतिज्ञा, दीपदान आदि जैसी भी जहाँ व्यवस्था बन पड़े बना लेनी चाहिए। जहाँ अखण्ड-ज्योति का एक भी सदस्य है वहाँ किसी न किसी रूप में बसन्त पर्व और गुरुपूर्णिमा पर्व के दो आयोजन- छोटे या बड़े रूप में मनाये ही जाते रहने चाहिए। इस दिशा में क्या किया गया, किस रूप में कितनी सफलता मिली इसका विस्तृत विवरण शाँति-कुँज हरिद्वार, युग-निर्माण योजना मथुरा दोनों ही जगह भेजा जाना चाहिए। यह परम्परा इस वर्ष में तो सुनिश्चित ही कर देनी चाहिए और उसका शुभारम्भ करने में कही भी शिथिलता नहीं बरती जानी चाहिये।
इसी अवसर पर विशेष स्मरण रखने योग्य है कि महिला जागरण अभियान के शाखा संगठन, युग निर्माण संगठनों के साथ साथ ही समानान्तर चल पड़ने चाहिए। परिजनों को अपने अपने घरों की सक्रिय एवं शिक्षित महिलाएँ आगे धकेलनी चाहिए। और उन्हें सदस्य बना कर, संगठन का कार्यालय आदि नियत कर देना चाहिए। साप्ताहिक सत्संगों का चल पड़ना ही महिला शाखाओं की सजीवता और सक्रियता का प्रमाण बना जायगा। आगे तो उन्हें भी बहुत कुछ करना है पर बसन्त पर्व तक उन्हें साप्ताहिक सत्संगों को नियमित बना देने का लक्ष्य तो पूरा कर ही लेना चाहिए।
संगठन कर्ता टोलियों के कंधों पर दुहरा उत्तरदायित्व सौंपा गया है कि वे (1) अखण्ड ज्योति ग्राहकों को संघ बद्ध करे और युग निर्माण शाखा बनाये। (2) उनके परिवारों की सक्रिय महिलाओं को आगे बढ़ाकर महिला जागरण अभियान की शाखा खड़ी कर दे। इन दोनों संगठनों को बसन्त पर्व तक अपने पैर मजबूत करने चाहिए। छह महीने बाद, बसन्त पर्व से कुछ नये कदम उठाने के लिए कहा जायगा। हर छह माही पर एक एक कदम उठाते हुए पाँच वर्ष में दस कदम उठा सकेंगे और इतने में ही वह परिस्थिति उत्पन्न हो जायगी जिसे आशा जनक उत्साहपूर्वक न कह कर आश्चर्य चकित करने वाली कहा जा सकेगा।
हमें विदित है इस परिवार में पूर्व जन्मों की संग्रहित तेजस्विता वाली आत्माएँ ही बहुत करके एकत्रित की गयी है। उनके पास संस्कार सम्पदा की कमी नहीं। शक्ति और सामर्थ्य का संग्रहित भंडार भी बहुत बड़ा है। कमी केवल एक ही है- आत्म विस्मृति ने उन्हें मूर्छा ग्रसित कर दिया है। मेघनाद के शस्त्र प्रहार से वे लक्ष्मण की तरह मूर्छित होकर पड़ गये है। आवश्यकता उन हनुमानों की है जो जागृति की संजीवनी बूटी लाने और पिलाने का पर्वत उखाड़ने जैसा कठिन कार्य स्वयं कर सके। सूत्र संचालक और उनके परिवार को राम लक्ष्मण की उपमा दी जा सकती है। दोनों के सहयोग से हो चुके दैत्य को निरस्त किया जाना संभव होगा। लंका विजय और राम राज्य की स्थापना का लक्ष्य पूरा करने में हनुमानों की बढ़ी-चढ़ी भूमिका होनी चाहिए हर जगह दो-दो तीन-तीन सदस्यों की जो संगठनों टोलियाँ आगे बढ़कर आवेंगी उन्हें युग दृष्टा तत्वदर्शी निश्चित रूप से ही हनुमान की उपमा देंगे। महाकाल ने उन्हीं के कंधों पर उपरोक्त दोनों संगठनों के ढाँचे खड़े कर देने का उत्तरदायित्व सौंपा है। विश्वास किया जाना चाहिए कि जहाँ भी अखण्ड-ज्योति का थोड़ा बहुत प्रकाश पहुँचा होगा वहाँ एक-दो हनुमान भी अवश्य सजग रहे होंगे और वे युग के आमन्त्रण को स्वीकार करके समुद्र लाँघते और अपनी पूँछ जलाकर लंकादहन में निरत दिखाई पड़ेंगे।
अखण्ड-ज्योति परिवार से जुड़े हुए प्रायः सभी परिजन समय की विषमता को समझने हैं और यह मानते हैं कि उन्हें अपनी जागरुक आत्मा को सन्तोष देने के लिए कुछ न कुछ करना ही चाहिए। वे यह भी समझते हैं कि संगठन का आधार खड़ा किये बिना युग परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण कार्य सम्भव नहीं हो सकते। विचार क्रान्ति के अतिरिक्त युग की अनेकानेक समस्याओं के स्थिर समाधान का कोई दूसरा विकल्प नहीं। इतना सब समझते हुए भी आश्चर्य इसी बात का है इस जागरुक परिवार में से युगी उत्तरदायित्वों के निर्वाह में संलग्न कर्मवीरों की संख्या नगण्य है। उन नगण्य संख्या वालों के आधार पर ही अपने समय का अद्भुत कार्य सम्पन्न हो रहा है। होना यह चाहिए कि अपने प्रखर परिवार में नगण्य व्यक्ति ही आलस्यग्रस्त ढूंढ़ें जा सके है। सभी सक्रिय कर्मनिष्ठ का निर्वाह कर रहे हों। इस अभाव की पूर्ति के लिए संगठन टोलियों को आगे आना है। उन्हें अपनी व्यक्तिगत कामों में हर्ज करके भी राग-काज में जुटना हैं। वह संजीवनी बूटी उन्हें ही लानी-पिलानी है जिसके सहारे अपना लक्ष्मण जैसा समर्थ परिवार पुनः सक्षम, सक्रिय, सजीव होकर उठ खड़ा हो।
विचारशीलों और सद्भाव संपन्नों को कमी नहीं-अभाव तो आगे बढ़ाकर नेतृत्व करने का होता है। सत्प्रयोजनों के लिए आगे बढ़ने में विचारवान भी झेंपते सकुचाते रहते हैं। आगे बढ़कर जो दूसरों को झकझोर सके, सोतों को जगा सके, जगों को खड़ा कर सके, खड़ों को चला सके ऐसी प्रखर तेजस्विता किसी-किसी में ही पाई जाती है। जिनमें पाई जाती है उन्हें प्राणवान कह सकते हैं। आवश्यकता आज प्राणिवानों की है।
इस बार-इस विशेष अवसर पर तो हमें अपने विशाल परिवार में से ऐसे प्राणवान मोती ही ढूंढ़ने हैं। उनकी परख परीक्षा के लिए यह चुनौती प्रस्तुत की गई है कि हमारी सबसे बड़ी-सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता को पूरा करने के लिए अपना काम छोड़कर दरवाजे-दरवाजे पर धक्के खाने के लिए-व्यंग, उपहार, तिरस्कार, आरोप सहने के लिए आगे आवें और कम से कम इतना मनोयोग, इतना समय तो इस कार्य के लिए समर्पित कर ही दें। जितने में स्थानीय परिजनों का संगठित ढाँचा खड़ा हो सके और साथ ही महिला जागरण अभियान का शुभारम्भ सम्भव हो सके।
विगत 18 जून गायत्री जयन्ती से आरम्भ हुआ समुद्र मंथन अनुष्ठान निकटवर्ती 23 जून की 35 दिन की अवधि पूरी करने जा रहा है। समुद्र मंथन में 15 रत्न निकले थे। हमें एक की ही अपेक्षा है-प्रखर संगठन शक्ति का उदय। नर-पक्ष और नारी-पक्ष के दो पृथक संगठन इसलिए बनाने पड़े कि दोनों की समस्याओं और परिस्थितियों में इन दिनों इतना अधिक अन्तर आ गया है कि उन्हें सुधारने, सुलझाने के लिए दो पृथक मंच खाली करने पड़ रहे हैं। यों वे दोनों भी एक दूसरे के लिए पृथक तरह जुड़े हुए हैं- एक दूसरे के पूरक हैं और सफलता लिए परस्पर अन्योन्याश्रित हैं।
आज तो साहसी रीछ, वानरों को ढूंढ़कर एक में भर्ती करने का समय है। इन घड़ियों में, गोवर्धन उन में योगदान दे सकने योग्य दुस्साहसी ग्वाल-बालों तलाश है। आज तो भिक्षु-भिक्षुणियों को दीक्षा सम में सम्मिलित करके चीवर धारण कराने का पर्व है। मंगल प्रभात में गाँधी ने सत्याग्रही स्वयंसेवकों को है। ब्रह्ममुहूर्त के अरुणोदय की इस पुण्य वेला में जागरण का संदेश दसों दिशाओं में वितरित किया जा रहा है। जो सुन सकें, जो उठ सकें और जो कर सकें तो आना समस्त साहस समेट कर कुछ आगे बढ़ाने के लिए अपनी वरिष्ठता सिद्ध करें।
जिसने सृष्टि रची है उसने कोई कमी नहीं छोड़ी है। रची, सृष्टि को स्वर्ग बनाने, सामग्री पूरी-पूरी है।।
हरी-भरी धरती दी उसने, दिये रसीले फल खाने को। निर्मल नदियों की पनिहारी, सोंपी हैं पानी लाने को।।
रंग-बिरंगे फूल खिलाये, हंसने और हंसाने को। मन बहलाने, धीर बंधाने चन्दा-सूरज की जोड़ी है।।
हैं समतल मैदान बनाये, समता अपने चरण धर सके। पर्वत खड़े किये हैं, जिनकी चोटी, पौरुष वरण कर सके।।
श्रम को सोंपी धरा- उर्वरा साहस को सोंपा रतनाकर- विस्तृत-नभ है, जहां कल्पना, पंख लगा करके दौड़ी है।।
अपनी जान डालकर उसने मानव का निर्माण किया है। अपने श्रेष्ठ गणों का मानव के मिस ही क्रियमाण किया है।।
स्नेह जन्म-सहभोग, शुद्धता, निश्छलता, समता की धारा- देवलोक से मनुज-लोक में, अरमानों के संग मोड़ी है।।
उसने स्वप्न सजाया था यह मनुज-लोक ही स्वर्ग बन सके। देवों को दुर्लभ- तन पाकर मनुज देवता स्वयं बन सके।।
पर न धरा यह स्वर्ग बन सकी और न मनुज देव बन पाया- कमी न थी साधन की, फिर भी आशा हुई न क्यों पूरी है।।
सचमुच कोई कमी नहीं थी, इस धरती को स्वर्ग बनाने। पर मानव रह गया स्वयं ही देव-शक्ति को बिन-पहिचाने।।
मानव की ही भाव-भूमि में स्वर्ग-सृजन की कमी रह गई- उतना दूर स्वर्ग, देवों के चरित्र से जितनी दूरी है।।
स्वार्थ-सिद्धि में ग्रसित मनुज के लिये स्वर्ग भी नर्क बनेगा। सेवा, त्याग, स्नेह, समता से रहित मनुज को सुख न मिलेगा।।
अज्ञानी, स्वार्थान्ध मनुज ने स्वार्थ भरी बारूद बिछाकर- सबके ही सुख की दुनिया में निर्मम चिनगारी छोड़ी।।
*समाप्त*