प्राणधारी को दिये गये ईश्वरीय उपहारों मानव शरीर सर्वोपरि है। इससे बड़ी कोई और सम्पदा ईश्वर के पास है ही नहीं। इसे उसकी सर्वोत्तम कलाकृति कहा जा सकता है। जिन विशेषताओं के साथ इसे सँजोया गया है उसका दर्शन समस्त संसार में अन्यत्र कहीं नहीं हो सकता। इसमें जितनी अद्भुत सम्भावनाएँ भरी पड़ी हैं उसे देखते हुए नर को नारायण का छोटा स्वरूप कहने में कोई अत्यधिक नहीं है। इसका स्वरूप और उपयोग यदि समझा जा सके और ठीक तरह प्रयुक्त किया जा सके तो मनुष्य देवोपम हर्षोल्लास भरा-जीवन जी सकता है और अपने संबद्ध क्षेत्र को सुख शान्ति भरे स्वर्गीय वातावरण का लाभ दे सकता है।
यदि जीवन का महत्व, स्वरूप और उपयोग समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि और कुछ शेष नहीं है। जो मिला है उसी का सही प्रयोग करना सीखना है। आरोग्य, आनन्द, धन, बल, यश एवं वर्चस्व के समस्त आधार अपने भीतर मौजूद है। कमी एक ही है कि अपने आपको समझना-जीवन सम्पदा का मूल्याँकन करना और उपलब्धियों का सदुपयोग करना नहीं आता। यदि यह भूल सुधारी जा सके तो प्रतीत होगा कि अपने चारों ओर अनन्त आनन्द का समुद्र लहलहा रहा है और उच्चस्तरीय प्रगति का सोपान पूर्णतया खुला पड़ा है।
घर बार और राज-परिवार छोड़कर सिद्धार्थ ने सत्य की खोज में स्वयं को समर्पित किया तो स्वाभाविक ही था कि अनेकों कष्ट, कठिनाइयों से मुकाबला पड़ा हो। राजसी सुविधाओं के अभ्यस्त सिद्धार्थ के लिए अरण्यवास वैसे ही असुविधाजनक रहा था और फिर ऊपर से कठिन तितिक्षा, साधनायें और कठोर व्रत उपवास। भोजन की मात्रा घटाते-घटाते एकदम निराहार रहने लगे, वस्त्र इतने कम हो गये कि दिशायें ही वस्त्र बन गयीं फिर भी प्रात्वव्य दूर ही रहा। तो लगा कि मन को शान्ति ही मृगतृष्णा है। संसार आसार तो है ही परन्तु सत्य भी यही है। जिस धैर्य का सम्बल पकड़ कर वे साधना समर में उतरे थे वह जवाब देने लगा और हम भ्रम से स्वयं को निकालने के लिए उठने लगे बुद्ध। घर वापस लौटने की तैयारी करने लगे।
जब वे घर की ओर लौट रहे थे, तो रास्ते में एक ठण्डे जल की झील आयी। ‘झील’ के किनारे खड़े होकर वे उसे देखने लगे। उनकी दृष्टि एक गिलहरी पर पड़ी वो बार-बार झील में डुबकी लगाती, बाहर आती, रेत में लोटती और पुनः झील में डुबकी लगाने के लिए दौड़ पड़ती। बुद्ध को बड़ा आश्चर्य हुआ। देर तक वे उसे देखते रहे जब गिलहरी की क्रिया में कोई अन्तर नहीं आया तो आखिर वे पूछ ही बैठे- नन्ही गिलहरी यह क्या कर रही हो तुम।’
‘इस झील ने मेरे बच्चों को खा लिया है जब मैं इसे खाली करके ही रहूँगी।’
हँसी आ गयी सिद्धार्थ को-तो क्या तुम सोचती हो कि तुम्हारी पूँछ को पानी में डुबोने से इतनी बड़ी झील खाली हो जायेगी।’
‘यह तो मैं नहीं सोचती परन्तु जब तक झील खाली न हो जाये तब तक ऐसा ही करती रहूँगी।’
‘भला बताओ लगाने का मेरे पास समय नहीं है
‘इस जन्म में तो सम्भव नहीं है।’
‘भले ही न हो। मेरा सारा जीवन ही इसमें लग जाय परन्तु इतना तो निश्चित है कि इस प्रकार चुल्लू-चुल्लू भर पानी निकाल कर मैं अपना काम तो पूरा करने की ओर बढ़ती ही रहूँगी।’-और गिलहरी यह कहकर अपने काम में पुनः लग गयी कि-’मेरे पास बातें करने का समय नहीं है, मुझे काम करने दो।
गिलहरी की इन बातों को सिद्धार्थ ने कानों से तो कम हृदय से ही अधिक सुना और उनका खोया हुआ आत्म-विश्वास पुनः लौट आया। उनकी अन्त चेतना से यह आवाज आयी कि यह नन्ही-सी गिलहरी भी अपनी सामर्थ्य, समय और क्षमता का विचार किये बिना आजीवन इस बोझिल कार्य को पूरा करने के लिए सन्नद्ध है तो मैं ही क्यों इतनी जल्दी हार मान लू जबकि मेरा लक्ष्य तो सुनिश्चित है और उसके पथ पर भी काफी हद तक बढ़ चुका हूँ। उन्होंने बीच में ही अपना इरादा बदल लिया और खोया हुआ धैर्य पुनः जुटाकर तपः स्थली की ओर लौट गये।
बुद्ध यह निश्चय कर लोटे के-जब तक मैं अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लूँगा तब तक कोई बात मन में नहीं लाऊँगा नहीं कोई निर्णय लूँगा, अपने मार्ग के सम्बन्ध में। इस गिलहरी ने मेरे जीवन का एक नया अध्याय खोल दिया है। यह मेरी गुरु है और सफलता के लिए अन्तिम साँस तक प्रयत्न करूंगा।
सिद्धार्थ फिर ध्यानावस्थित हो गये और उस समय तक साधना में लगे रहे जब तक कि उन्हें निर्वाण प्राप्त नहीं हो गया।
मोटी दृष्टि से मनुष्य हाड़-माँस का पिण्ड और सोचने, बोलने वाला पौधा मात्र समझा जाता है। स्थूल विश्लेषण करने पर अन्य प्राणियों की तुलना में अनेक प्रकार पिछड़ा हुआ प्राणी है भी वैसा ही। पर जब सूक्ष्म दृष्टि से उसका पर्यवेक्षण किया जाता है तो उसकी बौद्धिक एवं भावनात्मक क्षमता में असीम सम्भावनाएँ सन्निहित दृष्टिगोचर होती है।
कृषि, उद्योग, शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, कला, विज्ञान आदि क्षेत्रों में आश्चर्यजनक प्रगति करके वह सृष्टि का मुकुटमणि बना है यह उसकी बौद्धिक क्षमता का प्रमाण है। सहानुभूति की कोमल सम्वेदनाओं ने पारस्परिक सम्बन्धों को कितना मधुर बनाया है और आत्म-चिन्तन के क्षेत्र में कितना रस विभोर रह सकने का अवसर प्राप्त किया है यह उसकी भावनात्मक विकास प्रक्रिया का परिचय है। अन्य प्राणी इस दृष्टि से कितने अधिक पिछड़े हुए है उनके साथ तुलना करते हुए प्रतीत होता है कि मनुष्य को वैसा ही श्रेय सौभाग्य मिला है जैसा कि हम अपनी तुलना में देवताओं के बारे में सोचते हैं।
मनुष्य की अतीन्द्रिय चेतना तो और भी आश्चर्य जनक है। मस्तिष्क को जादुई पिटारा कहा जाता है यह उसके सामान्य चिन्तन की व्याख्या है। इससे भी गहरे अन्तराल में उतरने पर प्रतीत होता है कि उसमें वे दिव्य चेतनाएँ भी भरी हैं जिन्हें अलौकिक और अतींद्रिय कहा जा सकता है। जिनकी व्याख्या सामान्य मस्तिष्कीय गतिविधियों के आधार पर नहीं की जा सकती।
हमारे पूर्व पुरुष योग साधना के आधार पर उस दिव्य चेतना को विकसित करने में बहुत बड़ी सीमा तक सफल हुए थे। पिछले दिनों आलस्यवश वे क्षमताएं गँवा दी गई। उनके स्थान पर बाजीगरी को ठग विद्या को प्रश्रय मिल गया। तथाकथित चमत्कार धूर्त लोगों द्वारा भूखों को भ्रमग्रस्त करके स्वार्थ साधन के लिए प्रयुक्त किये जाते रहे। उससे योग विज्ञान के प्रति लोगों की अश्रद्धा बढ़ती गई।
अब विज्ञान के आधार पर मनुष्य की अतीन्द्रिय चेतना को सोचा जा रहा है। दिन-दिन अधिक उत्साह वर्धक प्रमाण सामने आ रहे हैं। लगता है- यह प्रगति हमें उस स्थान तक पहुँचा देगी जहाँ हम पूर्व पुरुष विकसित आत्म शक्ति के सहारे देव भूमिका का निर्वाह करने में सफल हुए थे।
फ्रांसीसी परामनोविज्ञान वेत्ता डा.पाल गोल्डीन अतीन्द्रिय चेतना की जानकारी सर्वसाधारण को देने और उसकी उपयोगिता समझाने के लिए संसार भर में दौरा कर चुके है। वे भारत भी आये थे। यहाँ उनने प्रबुद्धजनों की गोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा था-पाँच ज्ञानेन्द्रियों को सुनने, बोलने, देखने, सूँघने तथा स्पर्शानुभूति क्षमता से हम सभी परिचित है, पर इनसे भी महत्वपूर्ण एक और शक्ति है परा चेतना शक्ति जिसे छठी इन्द्रिय कहा जा सकता है। आश्चर्य है कि हम लोग इस बलवती सामर्थ्य के बारे में बहुत कम जानते हैं। किन्हीं-किन्हीं में यह संयोगवश प्रकट होती है और देखने वालों को आश्चर्यचकित करती है किन्तु वह आकस्मिक नहीं है। प्रयत्नपूर्वक उसे बढ़ाया जा सकता है और उससे अधिक लाभ उठाया जा सकता है जो पाँच ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से प्राप्त किया जाता है।
सुकरात कहते थे मेरे भीतर एक ‘डेमन’ रहता है। उसी के सहारे वे दूरानुभूति के आश्चर्यजनक प्रमाण प्रस्तुत करते थे। गेटे को भी ऐसी ही अदृश्य अनुभूतियाँ होती थीं जिनका कोई प्रत्यक्ष आधार तो नहीं था, पर वे प्रायः सत्य ही सिद्ध होती थीं।
यह ‘डेमन’ क्या हो सकता है इसके उत्तर में उनने स्वयं ही कहा था यह सुविकसित अन्तःकरण का ही दूसरा नाम है, किसी प्रेत वेताल का नहीं।
अध्यात्म सिद्धान्तों को विज्ञान ने आरम्भ में निराधार भावुक मान्यताओं की सजा दी थी और कहा था उनका कोई प्रमाणिक आधार नहीं है, पर अब वैसी बात नहीं रही। चेतना के क्षेत्र में जो खोजें हुई है उनने यह तथ्य सामने खड़ा कर दिया है कि मस्तिष्क मात्र चिन्तन का एवं शरीर संचालन का ही उत्तरदायित्व निभाने तक सीमित नहीं है। उसकी परिधि इतनी व्यापक है कि अतीन्द्रिय अनुभूतियों को भी तथ्य स्वीकार कर लिया जाय।
पूरा मनोविज्ञान को आरम्भ के दिनों में भूत विद्या जैसी जादुई चर्चा कहा गया था। पीछे तथ्यों ने उसकी गम्भीरता और वास्तविकता मानने के लिए विवश कर दिया। अमेरिका की विज्ञान संस्था (ए.ए.ए.एस.) ने सन् 1969 में परामनोविज्ञान संस्था को अपना पूर्ण सदस्य माना और उसके प्रतिनिधि प्रथम बार सन् 1970 से अन्य वैज्ञानिकों के साथ बैठे। परामनोविज्ञान का क्षेत्र बहुत विस्तृत है उसमें मस्तिष्क को प्रभावित करने वाले और मस्तिष्क द्वारा प्रभावित होने वाले सभी आधारों को सम्मिलित रखा गया है। उसकी एक शाखा अतीन्द्रिय विज्ञान की है जिसे पी.एस.आई. कहा जाता है। इसमें टेलीपैथी, पूर्व ज्ञान-अतीन्द्रिय दृष्टि, भविष्य आभास स्वप्नदोष, साइकोकाइनेसिस आदि धाराएँ सम्मिलित है।
विचार संचालन, टेलीपैथी के अंतर्गत बिना यन्त्रों संकेतों या इन्द्रियों की सहायता के दूरस्थ व्यक्तियों द्वारा परस्पर विचार विनिमय की प्रक्रिया आती है। अतींद्रिय दृष्टि में बिना आँखों की सहायता के दृश्यों को देखा जाना सम्मिलित है। पूर्व ज्ञान से बीती हुई घटनाओं को जानना और भविष्य ज्ञान में भावी सम्भावनाओं का परिचय प्राप्त करने की बात है। स्वप्न बोध में, स्वप्नों में व्यक्ति की स्थिति अथवा अविज्ञात घटना क्रमों के भूतकालीन अथवा भावी संकेत समझे जाते हैं। साइकोकाइनेसिस के अंतर्गत मस्तिष्क का वस्तुओं पर पड़ने वाला प्रभाव आँका जाता है। लूथर वरबेन्क ने पौधे, फूल, कीड़े, पक्षी और पशुओं पर अपनी भाव सम्वेदनाओं के भिन्न-भिन्न प्रभाव डालने में जो सफलता प्राप्त की है उससे शोधकर्ताओं का उत्साह बहुत बढ़ा और वे न केवल प्राणियों पर वरन् पदार्थों पर भी विचार शक्ति के आश्चर्यजनक प्रभावों को प्रमाणित कर सकने में सफल हुए।
मनोविज्ञान शास्त्र के जन्मदाताओं में अग्रणी फ्रायड ने अपने अनुसंधान प्रकरण में ‘अब चेतना’ का वर्णन किया है। फ्रेडरिक मायर्स ने उसे ‘सुप्रालिमिनल सेल्फ’ की संज्ञा दी थी। इसी संदर्भ में ‘मत लिमिनल सेल्फ’ को भी गिना जा सकता है। इसे हम उपचेतना कह सकते हैं।
मायर्स ने उपचेतना की अतींद्रिय शक्ति का विस्तृत विवेचन किया है और उसकी सम्भावनाओं पर ब्यौरे बार प्रकाश डाला है। उनका कथन है कि बिना इंद्रियों की अथवा उपकरणों की सहायता के भी मानवी मस्तिष्क इतना कुछ जान सकता है जिसे सामान्य नहीं असामान्य कहा जा सके। विशेष व्यक्ति विशेष अवसरों पर भविष्य में घटने वाली घटनाओं का पूर्व परिचय देते देखे गये हैं। अथवा तत्काल उसका विवरण बता देते हैं। अशरीरी प्रेतात्माओं द्वारा ऐसे प्रमाण प्रस्तुत करा सकना जिनसे उनके अस्तित्व की प्रामाणिकता सिद्ध होती हो इसी रहस्य ज्ञान के अंतर्गत आता है। किन्हीं व्यक्तियों को अनायास ही प्रेरणा मिलती देखी गई है जिसे अपनाकर उन्होंने प्रगति के नये सोपान उपलब्ध किये हैं।
मायर्स यों वैज्ञानिक थे और उनकी प्रतिपादन प्रणाली पूर्णतया वैज्ञानिक थी फिर भी उसका स्वयं का जीवन बड़ा रहस्यवादी रहा। उसे निज के जीवन में ऐसी अनुभूतियाँ होती रहीं जो रहस्यमय जगत के अस्तित्व को प्रमाणित करती थीं। अन्ततः उसने इस सम्बन्ध में विधिवत् शोधकार्य आरम्भ किया। पीछे हेनरी सिजविक नामक एक दूसरे वैज्ञानिक का सहयोग उसे प्राप्त हुआ। उन लोगों ने मिलकर ऐसे तथ्यों का संकलन किया जिनसे अदृश्य जगत और अतीन्द्रिय चेतना को चुनौती देकर सिद्ध किया जा सकता था। पीछे इन लोगों ने सुप्रसिद्ध साइकिकल रिसर्च सोसाइटी की स्थापना की उसके प्रामाणिक शोध कार्य से प्रभावित होकर ब्रिटेन के दो प्रख्यात प्रधान मन्त्री बालफूर और ग्लेडस्टर भी उस संस्था के सदस्य बने और एल फ्रेडवालेस, आलिवरलाज, विलियम क्रुक्स, डबल्यू.एफ. वैरेट जैसे सम्भ्रान्त व्यक्तियों ने उस कार्य में उत्साहपूर्वक योगदान दिया।
विचार संचार विद्या का टेलीपैथी नाम मायर्स का ही दिया हुआ है। टेली अर्थात् दूरवर्ती पैथी अर्थात् अनुभूति। रेडियो संचार से भी अधिक द्रुतगति से विचारों की तरंगें बहती हैं और वह देशकाल की समस्त मर्यादाओं को लाँघती हुई क्षण भर में ब्रह्मांड के किसी भी कोने में जा पहुँचती है। इसी प्रकार उसने अतीन्द्रिय विद्या के अन्य पक्षों पर बहुत कुछ खोजा जाना, संग्रह किया और पुस्तक रूप में प्रकाशित किया, यह सामग्री इस योग्य थी कि उसके पीछे भी उत्साह पूर्वक उस दिशा में प्रयास जारी रखे जा सकते थे। रखे भी गये।
अदृश्य लोक पर मायर्स की अटूट विश्वास था। जनवरी सन् 1901 में उनकी मृत्यु हुई। मरते समय उन्होंने बहुत ही प्रसन्न मुद्रा में अपने मित्रों से कहा- ”एक अनदेखे और अनजाने देश में छुट्टियाँ बिताने भर के लिए जा रहा हूँ।
दूरानुभूति क्रमशः एक अकाट्य तथ्य सिद्ध होती चली गई। परामनोविज्ञान को विश्व विद्यालयों के पाठ्य-क्रम में सम्मिलित किया गया। इस दिशा में पहला कदम उत्तरी केरोलिना के ड्यूक विश्व विद्यालय ने उठाया डा.राइन के नेतृत्व में परीक्षण का जो सिलसिला चला उससे प्रामाणिकता परिपुष्ट ही हुई। पीछे अन्य विश्व विद्यालयों ने उसका अनुगमन किया। क्वीनमेरी कालेज के गणित प्राध्यापक डा.एस.जी. सोल, कैंब्रिज विश्व विद्यालय के डा. हृटले कैरिगटन की खोजों से अतीन्द्रिय विज्ञान की एक नई धारा प्रकाश में आई जिसे ‘प्रीमानिशन’ नाम दिया गया। घटनाएँ घटित होने से पूर्व उनका आभास मिलना इस विद्या का शोध विषय है।
सम्मोहन विद्या का वशीकरण मूर्छा प्रयोग दैवी आवेश आदि के रूप में प्रचलन तो पहले भी था, पर उसे व्यवस्थित रूप अठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में आस्ट्रिया निवासी डाक्टर फ्रान्ज मेम्मर ने दिया। उन्होंने मानवी विद्युत का अस्तित्व, स्वरूप और उपयोग सिद्ध करने में घोर परिश्रम किया और उसके आधार पर कठिन रोगों के उपचार में बहुत ख्याति कमाई। वे अपने शरीर की बिजली का रोगियों पर आघात करते साथ ही लौह चुम्बक भी आवश्यकतानुसार प्रयोग में लाते। इस दुहने प्रभाव से न केवल शारीरिक वरन् मानसिक रोगों के उपचार में भी उनने आशातीत सफलता प्राप्त की।
मेस्मर के शिष्य प्युइसेग्यूर ने प्रयोग को अधिक तत्परतापूर्वक आगे बढ़ाया और उन्होंने चुम्बकीय शक्ति द्वारा तन्द्रा उत्पन्न करने में नई सफलताएँ पाइ। यह तन्द्रा मानसिक तनाव को विश्राम द्वारा शान्त करने और अब चेतना के रहस्यमय परतों को खोलने में बहुत कारगर सिद्ध हुई। इस प्रकार बिना चिकित्सक की सहायता के भी कोई व्यक्ति स्वनिर्देशन विधि का उपयोग करके अपनी शारीरिक एवं मानसिक चिकित्सा आप कर सकता है।
सम्मोहन प्रयोग से गहरी निद्रा लाकर गहरे आपरेशन करने में समग्र सफलता सबसे पहले डा. ऐसडेल को मिली। उन्होंने लगभग 300 ऐसे आपरेशन किये। उनके दावे विवादास्पद माने गये अस्तु सरकारी जाँच कमीशन बिठाया गया कमीशन ने अपनी उपस्थिति में ऐसे आपरेशन कराये और ऐसडेल के प्रयोगों को यथार्थ घोषित किया। यह प्रक्रिया संसार भर में फैली। फ्रांस के डा. सार्क को इस विधि से हिस्टीरिया को अच्छा करने में कारगर सफलता मिली। मनोविश्लेषण विज्ञान को मूर्त रूप देने वाले डा.फ्रायड ने अपने प्रतिपादनों में डा.सार्का के प्रयोगों से विशेष प्रेरणा ली थी।
इंग्लैंड की रायल मेडिकल सोसाइटी के अध्यक्ष तथा लन्दन विश्व-विद्यालय में चिकित्सा विज्ञान के प्राध्यापक डा. जान एलियट सन ने सम्मोहन विज्ञान में सन्निहित तथ्यों को बहुत उपयोगी पाया और वे इस प्रयत्न में जुट पड़े कि रोगी को पीड़ा की अनुभूति से बचाकर आपरेशन करने में इस विद्या का उपयोग किया जा सकता है उन दिनों बेहोश करने की दवाओं का आविष्कार नहीं हुआ था। आपरेशन के समय रोगी कष्ट पाते थे। इस कठिनाई को हल करने में सम्मोहन विज्ञान बड़ी सहायता कर सकता है। इसी दृष्टि से उनका अनुसन्धान एवं प्रयोग कार्य चलता रहा इसमें उन्हें आरम्भिक सफलता भी मिली।
इसी शोध संदर्भ में इंग्लैंड के एक दूसरे डाक्टर जेम्स ब्रेड ने यह सिद्ध किया कि दूसरे के प्रयोग से ही नहीं वरन् आत्म निर्देशों से एवं ध्यान की एकाग्रता से भी सम्मोहन निद्रा की स्थिति बुला लेना सम्भव है। दूसरों के दिये सुझाव को बिना किसी तर्क-वितर्क के स्वीकार कर लेना एक अद्भुत बात है। इसमें तर्क शक्ति लगभग प्रसुप्त स्थिति में चली जाती है और आदेश अनुशासन पालन करने वाली श्रद्धा का आधिपत्य मस्तिष्क पर छाया रहता है। इस स्थिति में लाभ उठाकर उपचारकर्ता मन में जमी हुई अवाँछनीय परतों को उखाड़ कर उस जगह नई स्थापनाएँ करता है। यह शारीरिक सर्जन जैसी क्रिया है। सड़े अंग काट कर फेंक देना और उस स्थान पर ई चमड़ी, नया माँस जोड़ देना सर्जरी के अंतर्गत सरल ह। इसी प्रकार सम्मोहन विद्या-हिप्नोटिज्म के प्रयोगों से मन की विकृतियों के झाड़-झंखाड़ उखाड़ना और उनके स्थान पर नई पौध जमाना सम्भव होता है। उपचारकर्ता यही करते हैं। यों इन प्रयोगों का एक हानिकारक पक्ष भी है जिसे भूतकाल में तान्त्रिक लोग किन्हीं को क्षति पहुँचाने के लिए मरण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि रूपों में करते रहे हैं।
अपोलो 14 अन्तरिक्षयान के तीन सदस्यों में से एक थे एडगर मिचेल। उन्होंने अपनी यात्रा के साथ-साथ एक व्यक्तिगत परीक्षण भी सम्मिलित रखा। क्या पृथ्वी की आकर्षण शक्ति के बाहर भी विचार संचालन का क्रम चल सकता है? क्या टेलीपैथी अंतर्ग्रही ही आदान-प्रदान का माध्यम बन सकती है? क्या लोक लोकान्तरों के निवासी परस्पर विचार विनिमय कर सकते हैं। यदि ऐसा सम्भव हो सके तो इसे चेतना के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी उपलब्धि कहा जायगा।
मिचेल ने चन्द्र यात्रा की लम्बी उड़ान में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से बाहर निकलने के बाद अपने कुछ मित्रों के साथ टेलीपैथी के आधार पर दिचार विनिमय किया। कुछ सन्देश भेजने और कुछ पाने के लिए समय निर्धारित रखा जो उन्होंने भेजा उसे उनके मित्रों ने और जो मित्रों ने भेजा उसे उन्होंने ग्रहण किया। लौटने पर लेखा-जोखा लिया गया तो उसमें शत-प्रतिशत तो नहीं, पर बड़ी मात्रा में यथार्थता पाई। श्री मिचेल ने इस संदर्भ में अपना अभिमत व्यक्त करते हुए कहा- ’यह स्थापना हो चुकी है कि टेलीपैथी एक यथार्थता है। उसकी शोध उसी प्रकार होनी चाहिए जिस प्रकार अन्य वैज्ञानिक तथ्यों की होती है।
अब वे दिन लद गये जिनमें यह कहा जाता था कि-’मस्तिष्क में इन्द्रिय छिद्रों के अतिरिक्त अन्य किसी माध्यम से ज्ञान का प्रवेश नहीं हो सकता।’ प्लेटो की मान्यताएँ ऐसी ही थी। पर अब वैसा कोई नहीं कहता- ई.सी.पी. के विद्युताग्र मस्तिष्क को असाधारण रूप से प्रभावित करते हैं। उस सफलता के आधार पर यह वायदा किया जाने लगा है कि बिना सर्जरी के ही अमुक विचार प्रवाह से किसी के या किन्हीं के मस्तिष्क की स्थिति बदली जा सकेगी। उसे अपनी मान्यताएँ बदलने, चिन्तन की धारा बदलने और नये किस्म का कुछ भी सोचने के लिए विवश किया जा सकेगा। अब मस्तिष्क व्यक्तिगत सम्पत्ति न रहकर सार्वजनिक प्रयोग परीक्षण का-क्रीड़ा विनोद का क्षेत्र बनता जा रहा है। पार्क में सैर करने की तरह किसी के मस्तिष्क में भी अनिच्छित विचार प्रवेश कर सकते हैं और उन्हें स्थान देने के लिए किसी भी व्यक्ति को बाध्य किया जा सकता है।
यह कुछ थोड़ी सी उपलब्धियां हैं जो सम्मोहन विज्ञान, दूर-दर्शन, दूरश्रवण, दूरानुभूति, विचार संचालन आदि के क्षेत्र में प्राप्त हुई हैं। अगले दिनों इस दिशा में बहुत कुछ प्राप्त होने की आशा की जा रही है और माना जा रहा है कि मनुष्य अतीन्द्रिय चेतना के क्षेत्र में भी प्रगति करके सिद्ध पुरुषों और योगियों की स्थिति तक पहुंच सकेगा।
पदार्थों को बड़ी मात्रा में एकत्रित करके अधिक वैभव, बल या सुख पाया जा सकता है यह मान्यता अब बहुत पुरानी हो गई। मात्रा की अपेक्षा अब गुण को महत्व मिलने लगा है जो उचित भी है। ‘खोदा पहाड़ निकली चुहिया’ वाली कहावत वहाँ लागू होती है जहाँ यह सोचा जाता है कि जो जितना बड़ा है- साधन, सम्पन्न है वह उतना ही सशक्त है। शक्ति का स्त्रोत हर छोटे पदार्थ, व्यक्ति एवं साधन में मौजूद है। यदि हम बारीकी से ढूँढ़ना, परखना और सही रीति से प्रयुक्त से करने की विद्या जान जायें तो थोड़ी-सी सामग्री से ही प्रचुर शक्ति सम्पन्न बन सकते हैं। हमारे छोटे-छोटे व्यक्तित्व ही ऐसे महान कार्य सम्पन्न कर सकते हैं जिन्हें देखकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़े।
अणु शक्ति इस तथ्य को प्रत्यक्ष रूप से प्रमाणित करती है। पदार्थ का छोटे से छोटा घटक ‘अणु’ कितना सशक्त है और वह कितने बड़े कार्य कर सकता है इसे देखने, समझने पर इस सच्चाई को हृदयंगम करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि छोटा समझा जाने वाला व्यक्ति भी यदि अपने को समझ सके तो जो कुछ वह है उतने का ही सही उपयोग कर सके तो वह कर सकता है जिसके लिए सामान्य बुद्धि बहुत बड़े साधनों की आवश्यकता अनुभव करती हैं।
अब परमाणु पदार्थ की सबसे छोटी इकाई नहीं रहा उसके भीतर 100 से भी अधिक ऐलिमेन्टरी पार्टिकल-प्राथमिक कण-खोज निकाले गये हैं। इनको भी अन्तिम इकाई नहीं कहा जा सकता। इनके भीतर जो सूक्ष्मता के अनुपात से अधिक रहस्यमय स्पंदन, स्फुरण भरे पड़े हैं उनका रहस्योद्घाटन होना अभी शेष है। अब विज्ञान अधिक गहराई में प्रवेश कर रहा है। पिछले दशकों के प्रतिपादन अब झुठलाये जा रहे हैं। यथा-’ईथर’ की कल्पना का अनस्तित्व पिछले दिनों मोर्स तथा माइकेलसन ने सिद्ध कर दिया है। शब्द तरंगों के बहन करने वाले इस ईथर की खोज पर फिट्ज गेराल्ड और लारेन्टज को बहुत ख्याति मिली थी और उनकी शोध की बड़ी उपयोगी मानकर सर्वत्र मान्यता मिली थी। पर अब उसके नकारात्मक प्रबल प्रतिपादन ने विज्ञान की अन्य मान्यताओं के भी खोखली होने की आशंका उत्पन्न कर दी है। आइन्स्टाइन का सापेक्षवाद अब उतना उत्साहवर्धक नहीं रहा उसमें बहुत सी शंकाओं और त्रुटियों की सम्भावना समझी जा रही है। गैलीलियो-न्यूटन आदि की मान्यताएँ अब पुरातन पंथी वर्ग की कल्पनाएँ ठहराई जा रही है।
महर्षि कणाद ने अपने वैशेषिक दर्शन में अपने ढंग से यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि यह संसार छोटे-छोटे कणों से मिलकर बना है। ईसा से 400 वर्ष पूर्व यूनानी दार्शनिक देमोकिन्तु भी अरगुवाद का प्रतिपादन करते थे। इससे पूर्व यह जगत् पंचतत्वों का बना माना जाता था। जब पंचतत्व का बहुत मोटा वर्गीकरण है। पानी अपने आप में मूल सत्ता नहीं रहा उसे कुछ गैसों का सम्मिश्रण मात्र स्वीकार किया गया। पुरानी मान्यताएँ अपने समय में बहुत सम्मानित थीं, पर वे अब त्रुटि पूर्ण ठहरादी गई हैं।
न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त एक सीमा तक ही सही है। यदि कोई राकेट प्रकाश की गति से एक सेकिण्ड में 300000 किलोमीटर उड़ने लगे तो वे गुरुत्वाकर्षण नियम गलत हो जायेंगे।
रेडियम धातु द्वारा उत्पन्न होने वाले विकिरण की खोज होने तक यही मान्यता थी कि पदार्थ की ऊर्जा में नहीं बदला जा सकता है दोनों का दायित्व स्वतन्त्र है पर अब अणु विस्फोट के पश्चात् यह स्वीकार कर लिया गया है कि पदार्थ और ऊर्जा वस्तुतः एक ही सत्ता के दो रूप है और उन्हें आपस में बदला जा सकता है। क्वांटम और मैक्सवैल के सिद्धान्तों को आइन्स्टाइन की नई खोजों ने बहुत पीछे छोड़ दिया है। चुम्बक सम्बन्धी पुरातन मान्यताओं में रेदरफोर्ड में रेदरफोर्ड ने नये तथ्य जोड़े उनने सिद्ध किया कि रेडियम धर्मी विकिरण का एक भाग जब एक दिशा में मुड़ता है तो उसे विकिरण का एक भाप जब एक दिशा में मुड़ता है तो उसे ‘अल्फा’, विपरीत दिशा में मुड़ता है तो ‘वीटा’ और बिलकुल न मुड़ने वाला प्रवाह ‘गामा’ किरणों के रूप में निसृजित होता है। यह तीनों प्रवाह अपने-अपने ढंग के अनोखे हैं। अल्फा विकिरण कागज की एक पतली झिल्ली में रोका जा सकता है किन्तु वीटा विकिरण एल्युमिनियम की कुछ मिली मीटर मोटी चादर को भी पार कर सकता है। नामा विकिरण को शीशे की मोटी परत ही शोषित कर सकती है।
पुरानी मान्यता का परमाणु ठोस था। पीछे उसमें भी ढोल की पोल पाई गई है। आकाश में घूमने वाले पिण्डों की तरह परमाणु के गर्भ में कुछ प्राथमिक कण भ्रमण तो करते हैं फिर भी उसमें खाली जगह बहुत बच जाती है। यदि इलेक्ट्रॉन रहित परमाणुओं के नाभिकों की पूरी तरह सटा कर दबाया जा सके तो एक घन सेन्टीमीटर नाभिकीय द्रव्य का भार 10 करोड़ टन के लगभग हो जायगा।
पुरानी मान्यताओं के अनुसार जीव तुच्छ हेय पानी, पतित भव-बन्धनों में जकड़ा हुआ-जन्म-मरण के कुचक्र में बँधा हुआ नगण्य था। उसे अपने उद्धार उत्थान के लिए किसी गुरु-मन्त्र या देवता की सहायता अपेक्षित थी, पर जब आत्म सत्ता में सन्निहित गरिमा पर विचार किया जाता है तो स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि आत्मा अणु होते हुए भी परमात्मा-विभु की समस्त विशेषताएँ अपने भीतर छिपाये हुए हैं। जीवात्मा के सम्बन्ध में अनेक पुरातन मान्यताओं को निरस्त करते हुए वेदान्त ने ‘अयमात्मा ब्रह्म’ प्रज्ञानं ब्रह्म-तत्व मसि सोऽहम्, शिवोऽहम् का उद्घोष किया है तो वह अहंमन्यता नहीं जैसी कि तथ्यपूर्ण यथार्थता परमाणु के सम्बन्ध में सामने आई है। धूलि मिट्टी का एक अत्यन्त छोटा घटक होने के कारण उसका प्रत्यक्ष मूल्य नगण्य है, पर यदि उसका वैज्ञानिक ढंग से उपयोग किया जाय तो उससे समस्त संसार का अभाव दारिद्र दूर हो सकता है। शक्ति का असाधारण स्त्रोत करतल गत किया जा सकता है।
अणु शक्ति की झाँकी तो करली गई है, पर साथ ही यह खतरा भी सामने है कि विस्फोट से जो हानिकारक विकिरण उत्पन्न होगा उस पर नियन्त्रण कैसे किया जा सकेगा। अणु विज्ञान के उदय काल में यह कल्पना की गई थी कि चने की बराबर प्लूटोनियम के ऐजिन लगाकर मोटरें चलाई जा सकेंगी। पर वह अब पूरी होती नहीं दीखती क्योंकि अणु विस्फोट में जो नाभिकीय विकिरण फैलता है वह न केवल पदार्थों को वरन् जीव कोषों को भी नष्ट करके रख देता है। उससे बचाव करने के लिए चने की बराबर अणु इंजन के लिए किले जैसी मोटी दीवारें खड़ी करनी पड़ेगी। ऐसी दशा में वह कल्पना की गई हलकी और सस्ती अणु मोटर मात्र मस्तिष्कीय उड़ान बनकर ही रह जायगी।
फिर भी अणु बिजली घर बनाये जा रहे हैं और प्रयत्न किया जा रहा है कि इस शक्ति को वशवर्ती बनाकर मनुष्य की शक्ति आवश्यकता को पूरा किया जाय। इस दिशा में सफलता भी मिली है और आशा भी बँधी है। वह दिन दूर नहीं जब हानि रहित अणु बिजली घर सामान्य बिजली घरों की तरह की कार्यान्वित होने लगेंगे। अब तक जितना यूरेनियम’ प्राप्त कर लिया गया है वह 900 अरब टन कोयले से मिलने वाली शक्ति के बराबर है।
अणु ऊर्जा-एटामिकइनर्जी-हमारे लिए कितने ही उपयोगी प्रयोजन सिद्ध कर सकती हैं। चिकित्सा जगत, कृषि उद्योग, यातायात-युद्ध कौशल आदि कितने ही प्रयोजन उससे चमत्कारी स्तर पर पूरे किये जा सकते हैं।
केन्सर चिकित्सा के लिए अणु शक्ति द्वारा विनिर्मित विशिष्ट ‘कोवालट’ बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। जहाँ एक्सरे यन्त्र काम नहीं करते वहाँ ‘गेइनर काउन्टर’ वस्तुस्थिति का पता आसानी से लगा लेता है। रेडियो सक्रिय अणुओं के द्वारा एनीमिया-रक्ताल्पना का इलाज सफलतापूर्वक होने लगा है। पैलीसा इथोमिया वीरा नामक कष्टसाध्य रक्त रोग के उपचार में रेडियो सक्रिय फास्फोरकस के इन्जेक्शन सफल रहे हैं। ऐजिलना पैक्टोरिस नामक हृदय रोग में तथा थाइराइड केन्सर में रेडियो सक्रिय आयोडीन अच्छा काम करता है। शरीर के पाले भागों में जहरीला पानी भर जाने की स्थिति रेडियो सक्रिय स्वर्ण ट्यूमर और आँख के केन्सर में रेडियो सक्रिय आइसोटोपों से मनुष्यों तथा पशुओं के कितने ही रोगों की सफल चिकित्सा होने लगी है। अमेरिका में इस प्रकार के उपचारों के लिए विशेष रूप से अतिरिक्त आणविक अस्पताल ही खुले हुए हैं।
कृषि क्षेत्र में अणु ऊर्जा की सहायता से किस प्रकार अधिक मात्रा में और अधिक पौष्टिकता युक्त अन्न, शाक, फल आदि उगाने के सम्बन्ध में सुविस्तृत खोज हो रही है और पता लगाया जा रहा है कि बलिष्ठ पौधे, सशक्त खाद, कीड़ों से फसल की रक्षा, अधिक उत्पादन के लिए अणु ऊर्जा का किस प्रकार और किस हद तक सहायक हो सकती है। शोध संस्थानों को आशा है कि अणु शक्ति की सहायता से पौधों की ऐसी नस्लें पैदा की जा सकेंगी जो सर्दी, गर्मी, पानी और खाद की कमी तथा कीड़ों के आक्रमण का सामना करते हुए अपनी प्रगति का स्तर बनाये रह सके।
अमेरिकी एटामिकइनर्जी एजेन्सी के अध्यक्ष ग्लीन सीवर्स ने अणु- विज्ञानियों की एक अन्तर्राष्ट्रीय गोष्ठी में कहा था-अणु शक्ति की खोज बड़े मौके पर हो गई। यदि उसमें विलम्ब हुआ होता तो ईंधन के अभाव में समस्त संसार की प्रगति का क्रम बेतरह ठप्प पड़ जाता।
अभी अणु शक्ति उत्पादन में यूरेनियम धातु का उपयोग प्रधान रूप से होता है, पर आगे चलकर उसका स्थान थोरियम ले लेगा। यूरेनियम की कमी है, पर थोरियम आसानी से और अधिक मात्रा में उपलब्ध किया जा सकेगा।
अब कोयले की कमी पड़ने की भावी चिन्ता से छुटकारा पाया जा सकेगा। 9 पौण्ड यूरेनियम से उतनी ऊर्जा प्राप्त की जा सकेगी जितनी 1500 टन कोयला जलाने पर प्राप्त होती है।
अतीत काल में जब आग मनुष्य के हाथ लगी थी तब भी उसके सामने यही समस्या थी कि उसकी हानियों से कैसे बचा जाय और लाभ कैसे उठाया जाय। देर-सवेर में उसने इसका रास्ता भी निकाल लिया। अब हम आग से बेखटके लाभ उठाते हैं और उसकी भयंकर सम्भावना से अपना बचाव कर लेते हैं। अगले दिनों अणु ऊर्जा के सम्बन्ध में प्रस्तुत कठिनाई को भी हल कर लिया जायगा और इस महादैत्य को मनुष्य की सेवा करने के लिए बाध्य किया जा सकेगा।
मनुष्य के भीतर जड़ अणु शक्ति से भी उच्चकोटि की जीवाणु शक्ति मौजूद है। जड़ से चेतन की गरिमा सर्वविदित है अणु से जीवाणु की क्षमता अत्यधिक प्रचण्ड होना स्वाभाविक है। अणु समूह का थोड़ा सा यूरेनियम जब इतनी शक्ति उत्पन्न कर सकता है तो असंख्य जीवाणुओं के समूह मानवी व्यक्तित्व की क्षमता कितनी महान हो सकती है, इसका अनुमान लगाया जाना कुछ कठिन नहीं होना चाहिए।
प्रकृति प्रदत्त शक्ति स्रोतों में झंझावात, कवन्ध, आँधी, तूफान तथा ज्वार-भाटे अद्भुत हैं। इनमें सन्निहित शक्ति को यदि संग्रहित करके किसी उपयोगी दिशा में लगाया जा सके तो उससे भी बहुत काम चलता है। औसत दर्जे की आँधी में प्रायः एक हजार अणु बमों की बराबर शक्ति होती है।
निस्संदेह इस जड़ जगत में सर्वत्र शक्ति का सागर भरा पड़ा है। पदार्थ के कण-कण में से ऊर्जा की प्रचण्ड लहरे उठ रही है। इस बिखराव को समेटने और सही ढंग से प्रयुक्त करने की विद्या जब मनुष्य के हाथ लग जायगी तो फिर अशक्ति जन्य सभी कठिनाइयों का निवारण हो जायगा। मनुष्य के हाथ में सामर्थ्य का अजस्र स्त्रोत होगा।
निस्सन्देह यदि चेतना जगत में संव्याप्त आनन्द और उल्लास लेकर सिद्धियों, समृद्धियों और विभूतियों के वरदानों की उपलब्धि जिस समय मनुष्य के हाथ में आ जायगी तब वह जीव चेतना के प्रत्येक घटक जीवाणु में समाई सत्ता को देखना, परखना, समेटना और प्रयुक्त करने की कला में निष्णात बन जायगा। इस स्थिति में पहुँच कर ही हम नर से नारायण रूप में विकसित हो सकेंगे और अपूर्णता से पीछा छुड़ाकर पूर्णता सम्पन्न होने का जीवन-लक्ष्य प्राप्त कर सकेंगे।
आर्य सभ्यता उस समय अपने विकास के चरम शिखर पर थी। भारत में कई आर्य प्रान्त थे। सब स्वाधीन, स्वतन्त्र, सर्वप्रभुत्व सम्पन्न और स्वशासित। इन्हीं आर्य प्रान्तों के बन बीहड़ों में रहती थी अनार्य जातियाँ। आर्य जनता के सुखी, सुविधा सम्पन्न और समृद्ध जीवनयापन से ईर्ष्यालु होकर अनार्य जातियों ने एक वाहिनी तैयार कर ली और लोगों को परेशान करने लगे। उनके लूट-खसोट, मार-काट और डकैती तो सामान्य कर्म थे, शासन तन्त्र और राज्य व्यवस्था को भी नष्ट-भ्रष्ट करने तक उनके हौसले बढ़े।
उनके उत्पात बढ़ने लगे और इधर आर्य-प्रान्तों की सेनायें नर्वस हो उठीं। अनार्य जातियाँ जब दूसरे राज्यों में भाग जाती तो वे हाथ मलकर देखते रह जाते और उन दस्युओं का उत्पीड़न चक्र वहाँ चलने लगता। वे भी इसी तरह परेशान हो जाते। आखिर सब हार, थककर पहुँचे ऋषि शौनक के आश्रम में। पूर्व, पश्चिम, दक्षिण, ईशान आदि प्रान्तों के नरेशों ने ऋषिवर के चरणों में प्रणाम किया और अपनी समस्या सामने रखी तथा विजय का आशीर्वाद माँगा तो शौनक ने कहा- आर्यजन, विजय आशीर्वादों से नहीं शक्ति और सामर्थ्य से मिलती है। तुम शक्तिवान बनो और ‘बल प्राप्त करो।’
‘शक्ति तो हमारे पास कम नहीं। हम दस्युओं से निर्बल नहीं है। फिर भी हमें पराजय क्यों भोगनी पड़ती है।’ पूर्व देश के नरेश ने कहा।
‘शायद तुम्हारा संकेत बाहुबल की ओर है परन्तु वही पर्याप्त नहीं है इससे भी बड़ी और एक शक्ति है।’
‘तो पूज्यपाद उस बल से भी अधिक शक्ति हमारी सैनिक क्षमता में है। हमारे पास सैनिकों की कमी नहीं।’-पश्चिम प्रान्त के राजा का कहना था।
‘सैन्य शक्ति भी अपर्याप्त है उस शक्ति के अभाव में।’
‘शस्त्रों से ही सेना ही सामर्थ्य बढ़ती है। उससे भी हम प्रचुर सम्पन्न हैं।’ दक्षिण नरेश बोले।
‘शस्त्र बल से भी महान् शक्ति है एक और जो मेरा आशय है’-ऋषि शौनक ने कहा।
‘सम्भवतया आपका आशय धन, बल से है’-ईशान अधिपति ने कहा।
‘नहीं आर्य शरीर, सेना, शस्त्र और ‘धन बल’ से भी अधिक समर्थ एक और ‘शक्ति है’-उपस्थित नरेशों की मुख मुद्रा पर तैरती आतुरता को पढ़ते हुए ऋषि ने कहा- ’एकता का बल। संघ शक्ति की सामर्थ्य।’
‘यह बल किस प्रकार अर्जित किया जाय’-आर्य नरेशों ने जिज्ञासा वश पूछा तो ऋषि बोले-’इस अर्जन का पहला सूत्र है- संगच्छध्वम्-एक साथ मिलकर चलो। तुम लोग अलग-अलग दस्युओं के आक्रमण का सामना करत हो इसी से वे लोग तुम पर भारी पड़ते हैं। दूसरा सूत्र है- संबदध्वम् एक स्वर में बोलो। दस्युओं के सम्बन्ध में अलग-अलग मत व्यक्त करना उनके हौसले को बढ़ाना है इसलिए मिलकर एक निश्चय करो- संवो मनासि जानताम्- एक निर्णय लो और एक जुट होकर लड़ो तो विजय तुम्हारे हाथ है यही तीसरा और अन्तिम सूत्र है।
ऋषि की प्रसाद वाणी से अपनी त्रुटियों का बोध प्राप्त कर समस्त नरेश वहाँ से चले और उन्होंने एकमत होकर योजना बनायी, उस पर अपनी सहमति व्यक्त की, स्वीकृति दी और समर भूमि में डट गये। जब संगठित होकर आगे आये और समस्त दस्युओं, अनार्यों को उनसे लोहा लेना पड़ा तो आत्म-समर्पण करते ही बना।
मनसा, वाचा और कर्मणा, एकता-मिलकर सोचने, एक स्वर में बोलने और एक साथ चलने की विविध एकता योजना-संघ साधना ही महान लक्ष्यों को प्राप्त करने का अभियान, अनुष्ठान है। जिसे कोई भी सम्पन्न कर विजेता बन सकता है।
मानव शरीर भगवान की सर्वोत्कृष्ट रचना है। अनय प्राणियों की तुलना में भगवान ने उसे ऐसे अनेक साधन एवं अनुदान दिये हैं जो दूसरे प्राणियों को प्रयत्न करके भी नहीं प्राप्त होते हैं, भोजन को निश्चिन्तता, आवास की सुविधा, वैज्ञानिक उपकरणों का प्रयोग, रक्षा सामग्री, मनोरंजन के साधन, न्याय, शासन तंत्र, सेना आदि ऐसी अनेक सुविधाएँ मनुष्यों को प्राप्त हैं जिनका कि लाख और करोड़वाँ भाग भी अन्य जीवों के पास नहीं हैं। ‘मनुष्य प्रकृति का मुकुट मणि है’ यह कथन अक्षरशः सत्य है। अन्य योनियों में भ्रमण करने वाले जीवों को अपना सम्पूर्ण जीवन भोजन की तलाश तथा आये क्षण शत्रुओं से बचाव करते रहते ही व्यतीत करना पड़ता है। जैसे कि देवलोक की काल्पनिक सुख सुविधाओं के लिए हमारा मन लालायित बना रहता है उसी प्रकार दूसरे जीव भी हमारी जैसी सुविधाएँ प्राप्त करने के लिए लालायित हों तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। कुत्ता, बिल्ली, चूहा, कीड़े, पतिंगे आदि की जीवन सम्बन्धी असुविधाओं को देखते हुए हम अपने सम्बन्ध में विचार करें तो हमें मानना पड़ेगा कि मानव जीवन जैसा जीवन कोई दूसरा नहीं है।
मानव शरीर मिलने के बाद परमात्मा से हमें जो दूसरा महान् उपहार प्राप्त हुआ है, वह है “मानवी अन्तःकरण”। जिसे यह मिल गया वह इस सृष्टि के कण-कण में स्वर्गीय आनन्द का उपभोग करता हुआ अपने को धन्य समझता है। देवता, ऋषि, मुनि तथा अवतार-जिन्हें हम ईश्वर के ही प्रतिरूप मानते हैं-शरीर से तो हम जैसे ही थे परन्तु उनमें ‘अन्तः करण का विकास’ सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक था-उन्होंने जीवन का सदुपयोग करना सीखा था। अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए-लोक-कल्याण के लिए उन्होंने जीवन जिया था, चन्दन के वृक्ष की तरह उनका सम्पूर्ण जीवन स्वयं तो सुगन्धित रहा वे ही अपने चारों ओर का वातावरण भी सुगन्धित करते रहे तथा उन्होंने काटने वाले की कुल्हाड़ी को भी सुगन्धित बना दिया। वे तो सच्चे पारसमणि थे जिनके संसर्ग में आने वाला गला-सड़ा लोहा भी स्वर्ण बन गया और इसीलिए हमने उन्हें देवता की संज्ञा दी। वे महापुरुष बने और अवतारों की तरह उनकी पूजा हुई वे आज भी हमारे सम्मान और श्रद्धा के पात्र बने हुए हैं।
जिसने इस मानवीय अन्तःकरण का सदुपयोग करना नहीं सीखा वह नर-पशु कहलाया। खाने-पीने, बच्चा पैदा करने और सोने की मस्ती में बहुमूल्य जीवन के कौड़ियों के मोल बहा देने वाले मनुष्यों को नर पशु न कहा जाये तो क्या कहा कहें? ईश्वर की महती कृपा के फलस्वरूप प्राप्त होने वाला यह जीवन यदि इसी प्रकार निरर्थक, व्यर्थ की बातों में बरबाद होता रहा तो यह हमारा बहुत बड़ा दुर्भाग्य कहा जायेगा। मानवता का प्रकाश यदि अन्तःकरण में नहीं आ सका तो शारीरिक सुख के लिए संग्रहित सारे साधन एवं सामान बिजली कल-कारखाने मोटर, रेल, वायुयान और सुरक्षा के लिए करोड़ों रुपये बरबाद कर बनाये गये अणुबम, उद्जन बम कभी कुछ निरर्थक हैं। ये सभी मानवता के रक्षक नहीं, वरन् भक्षक हैं।
मानवता के अनुरूप ही यदि हमारे विचार बन जावें-हमारी प्रवृत्ति सतोगुणी बन जाये तो निश्चय ही जीवन सार्थक हो गया। सद्भावनाएँ, उदारता, सज्जनता, मधुरता, नम्रता एवं ममता आदि वृत्तियों का विकास जब हमारे अन्दर होता है, तब हम देवत्व की कोटि में पहुँच जाते हैं ओर जब स्वार्थपरता, संकीर्णता, आलस्य, काम-क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष आदि के चक्कर में फंसकर अपने कर्त्तव्यों को भूल जाते हैं तो हमारी स्थिति नर-पिशाच, असुर और नीच पशु जैसी हो जाती है।
पशुता का प्रधान लक्षण है- तमोगुणी वृत्ति का विकास-सदैव अपनी ही बात सोचना। जब हम अनुचित उचित का ध्यान न करते हुए धर्म और अधर्म का विचार किये बिन केवल अपने लाभ की ही बात सोचते हैं तो हमें उस समय ‘असुर’ की संज्ञा मिल जाती है। इस प्रकार का ‘असुरत्व’ आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में फैला हुआ है।
मानवता का दूसरा लक्षण है कि दूसरों की सुख सुविधाओं का ध्यान रखते हुए अपने सुख एवं उन्नति की व्यवस्था करना। हम आगे तो बढ़ें पर ध्यान रहे कि हमारी दौड़ से दूसरे का पतन तो नहीं हो रहा है। जो अपने सूख को तिलांजलि देकर दूसरों की सूख-सुविधा के लिए प्रयत्न करते हैं, उन्हें देवता कहा जाता है। देवता अचीत् देने वाला। जिनने अपनी शक्तियों को-शरीर, धन, बल, बुद्धि विवेक आदि को लोक कल्याण के लिए विसर्जन करना सीख लिया निश्चय ही वे देवता है। जिस घर, गाँव या देश में ऐसे व्यक्तियों का निवास हो जाता है निश्चय ही वह घर, गाँव या देश स्वर्ग बन जाता है। वहाँ सदैव सुख और समृद्धि की वर्षा होती रहती है। दुःख दारिद्र पास नहीं भटकते हैं।
मानव जीवन की एक और बड़ी विशेषता उसकी चेतना शक्ति का विकास है। यदि हमारी चेतना शक्ति अविकसित एवं मुरझाई हुई रही तो फिर जीवन की सार्थकता कहाँ रही? शरीर की सुविधा के लिए तो हमने मकान, वस्त्र, वाहन, नौकर तथा अनेक प्रकार के उपकरण जीवन भर जुटाये परन्तु उसके स्वामी आत्मा की क्षुधा शान्त करने के लिए कुछ नहीं किया। हम इन्द्रियों के स्वामी हैं, दास नहीं परन्तु व्यवहार में इन्द्रियाँ स्वामी बनकर रहीं और हम उनके सेवक। ‘रथ’ की उपेक्षा ही बनी रही तो यह कहाँ की बुद्धिमानी रही?
आत्मा की भूख तो सद्गुणों के विकास से तृप्ति होती है सद्गुणों की सच्ची सम्पत्ति पाकर के ही आत्मा अपने को समुन्नत समझती है। सद्गुणों से शून्य हृदय तो श्मशान की तरह डरावना लगता है और उसमें आनन्द और उल्लास के बीज तो बोये ही नहीं जा सकते हैं।
अन्तःकरण में जब उच्च विचार उत्पन्न होंगे तो हमारे कार्य भी उत्कृष्ट होंगे। उत्कृष्ट विचार मस्तिष्क रूपी गुफा में बन्द कर नहीं रखे जा सकते हैं वे तो सूर्य की किरणों के प्रकाश की तरह सारे अन्तरिक्ष एवं वायुमण्डल को आलोकित कर देंगे। विचारों की अभिव्यक्ति कर्म का रूप धारण करती है। कर्म की उत्कृष्टता या निकृष्टता विचारों की ही प्रतिक्रिया होती है। सत्कर्मों की प्रेरणा सद्भावनाओं से ही प्राप्त होती है अतः जीवन सुखमय एवं सुन्दर बनाने के लिए विचार ओर कर्म में एकरूपता होनी चाहिए। कर्मों को देखकर ही किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का पता आसानी से लगाया जा सकता है। सत्कर्मों की प्रेरणा सद्भावनाओं से प्राप्त होती है तथा कुकर्म दुर्भावनाओं के बीच जन्म लेते हैं। यश-अपयश, पाप-पुण्य, अपकार-उपकार दण्ड, पुरस्कार कर्मों के फलस्वरूप ही प्राप्त हुआ करते हैं। भावनाओं की उत्कृष्टता तथा कर्मों की सजीवता ये दोनों मिलकर ही जीवन को सार्थक बनाते हैं।
क्रियमाण कर्म ही तो संस्कारों के जनक हैं और संस्कारों के आधार पर ही तो स्वर्ग, नरक एवं पुनर्जन्म की स्थिति का निर्माण होता है। हमारी भाग्य-लिपि तो पूर्व जन्म में किये गये कर्मों की अमिट निशानी है, जन्म के साथ आने वाले संस्कार हमारे पूर्व जन्म में किये गये कर्म ही तो है। अगले जीवन की तैयारी भी हमें अभी से करना प्रारम्भ कर देना चाहिए। जिन्हें नारकीय यातनाओं, राग-द्वेष, ईर्ष्या, कलह, मार-पीट, लूट-खसोट, रक्तपात आदि के भोगने में किसी प्रकार के कष्ट का अनुभव न होता तो उन्हें कुकर्म करने की खुली छूट है तथा इसके विपरीत जिन्हें स्वर्गीय सुख-शान्ति प्राप्ति करने की उत्कृष्ट आकाँक्षा हो उनके लिए सत्कर्मों को जीवन में उतारना चाहिए। सद्भावनाओं एवं सत्कर्मों के समन्वय से मिलने वाला आनन्द अवर्णनीय होता है और उसकी यदि उपलब्धि हो जाये तो समझना चाहिए कि हमारा जीवन सार्थक हो गया।
मनुष्य जीवन मोटी दृष्टि से देखने पर समुद्र जैसा स्थिर और सीमित दीखता है। कमाने, खाने और सोने, जागने का उसका एक निश्चित निर्धारित ढर्रा है, उसी पर उसकी जीवनचर्या लुढ़कती प्रतीत होती है, पर गम्भीरतापूर्वक देखने से उसकी गहराई और विस्तीर्णता समुद्र जैसी ही विशाल है जो मोटी बुद्धि से समझ में नहीं आती उसके लिए गम्भीर चिन्तन और तात्विक सर्वेक्षण की आवश्यकता पड़ती है।
पृथ्वी के अन्तराल में कितनी आग और कितनी सम्पदा भरी पड़ी है इसे बिना गहराई में उतरे ऐसे ही मोटी बुद्धि से नहीं जाना जा सकता। इसी प्रकार समुद्र एक स्थिर तालाब जैसी लगता है उसमें ज्वार भाटे ही थोड़ी हलचल उत्पन्न करते हैं, पर वास्तविकता इससे कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी है। समुद्र का अन्वेषण करने पर लगता है उसमें निर्जीव स्थिरता नहीं घोर सक्रियता काम कर रही है। उसकी सम्पदा की विस्तीर्णता का क्षेत्र उससे कहीं अधिक है जितना कि चर्मचक्षुओं और मोटी बुद्धि से देखा, समझा जा सकता है। जीवन की स्थिति भी ऐसी है। हम सामान्य रीति से खाते, सोते हैं वह स्थूल परिचय है। वस्तुतः इतनी अधिक विभूतियाँ और सम्भावनाएँ मनुष्य में भरी पड़ी हैं जिन्हें पृथ्वी और समुद्र के अन्तराल में सन्निहित क्षमता एवं सम्पदा से किसी भी प्रकार कम नहीं आँका जा सकता।
समुद्र पृथ्वी पर भरा हुआ एक तालाब जैसा प्रतीत होता है, पर वस्तुतः थल की तुलना में जल कहीं अधिक है। मनुष्य जीवन में स्थूलता जड़ता की अपेक्षा सरस सम्भावनाओं से भरा पूरा जलीय अंश ही अधिक है।
पृथ्वी का क्षेत्रफल 1,96,94,0000 वर्ग मील है। इस क्षेत्रफल का 136, 715 000 वर्ग मील भाग में समुद्र जल भरा है। इसका अर्थ यह हुआ कि 71 प्रतिशत भू-भाग समुद्र में डूबा पड़ा है। संसार के सब छोटे-बड़े समुद्रों में 33 करोड़ धन मील यही खारा पानी भरा है। गहराई का औसत इतना है जितने में थल भाग ऊँचे से ऊँचे पर्वतों समेत पूरी तरह डूब जाय। थल भाग यदि किसी कारण समुद्र में डूब जाय तो वह 12000 फुट गहराई में डूबा हुआ दिखाई पड़ेगा। विशालता को दृष्टि में रखकर यदि किसी ने पृथ्वी का नामकरण किया होता तो उसे महासमुद्र कहना पड़ता। थल भाव तो बीच-बीच में उठे हुए छोटे-बड़े टापुओं की तरह है।
मानवी जीवन को जड़ सम्पत्ति के आधार पर विकसित-अविकसित माना जाता है, पर वस्तुतः उसकी चेतनात्मक सरस सम्वेदनाओं का क्षेत्र ही बड़ा है। उसकी सम्वेदनाओं का मूल्य महत्व ही अधिक है।
अनादि काल से मनुष्य समुद्र को देखता तो रहा है, पर उसकी स्थिति को सही रूप से इतनी लम्बी अवधि में कभी भी नहीं जाना जा सका। जानकारियों का विस्तार अन्वेषण के बिना हो ही नहीं सकता। वस्तुओं का जितना मूल्य है उससे कहीं अधिक महत्व अन्वेषण प्रक्रिया का है। किसी समय एक ही समुद्र समझा जाता था, पर जब उसके विस्तार क्षेत्र चार गुना हो गया है, एक नहीं चार महासागर हैं।
स्थूल दृष्टि से मनुष्य चलता-फिरता पेड़-पौधा है पर सूक्ष्म दृष्टि से उसे सत, रज, तम के तीन गुणों में-सत्य शिवं सुंदरम् भी तीन महानताओं में- सत् चित आनन्द के तीन वर्षों में-स्थूल, सूक्ष्म और कारण के तीन स्तरों में विभक्त किया जा सकता है।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की चतुर्विधि विभूतियाँ प्राप्त कर सकना उसके लिए पूर्णतया सम्भव है। आकाश की ही चार दिशाएँ नहीं है मनुष्य जीवन की भी चार स्थितियाँ हैं-पिशाच, पशु, मनुष्य और देव। इन पर चारों वेदों में विस्तारपूर्वक विवेचन किया गया है। जीवन विकास के लिए भारतीय धर्म में चार वर्ण और चार आश्रमों का विधि-विधान किया गया है। एक ही जीवन का तीन या चार भागों में विभाजन करना उसी तत्वान्वेषी दृष्टी को अपनाने से सम्भव हो सका। जिसके आधार पर एक समझा जाने वाला समुद्र अब चार महासागरों की जानकारी के रूप में हमारे सामने प्रस्तुत है।
समुद्रों का वर्गीकरण चार महासागरों और अनेकों सागरों के रूप में किया गया है। महासागर चार है- (1) हिन्द महासागर (2) प्रशान्त महासागर (3) अटलांटिक महासागर (4) आर्कटिक महासागर।
समुद्र में मनुष्य की दिलचस्पी यों सदा से ही रही है, पर कुछ समय से उस ओर अधिक ध्यान दिया जाने लगा है। इस संदर्भ में सबसे पहली और खोजपूर्ण पुस्तक अँग्रेज रसायन शास्त्री राबर्ट वायल ने लिखी यह सन् 1670 में प्रकाशित हुई। बेंजामिन फ्रेंकलिन ने भी कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले। मेथ्यूमोरी ने सारे संसार के समुद्रों का चक्कर लगाया और समुद्र विज्ञान पर प्रामाणिक पुस्तक लिखी। लुइस अगेसिज, अलेक्जेण्डर, एडवर्ड, फारब्स ने इन खोजों को और आगे बढ़ाया। चार्ल्स डार्विन ने और भी अधिक प्रकाश डाला। सर्वांगपूर्ण समुद्र विज्ञान के अन्वेषण का कार्य केष्टिन सी.डबल्यू. थामसन ने किया। उसे ब्रिटेन की नौ सेना का एक जलयान ‘चैलेन्जर’ मिल गया। उसके सहारे उसने 68890 मील की यात्रा साढ़े तीन वर्ष में पूरी की। इस बीच जो शोध सामग्री उसने एकत्रित की उसका विश्लेषण करने में पूरे बीस वर्ष लगे। वे सब निष्कर्ष पचास मोटी जिल्दों में प्रकाशित हुए हैं। समुद्र विज्ञान का इसे प्रथम विश्व कोष कह सकते हैं।
इसके बाद संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में हिन्द महासागर की खोज सन् 1962 में की गई। जिसमें 13 देशों के जलयानों ने योगदान दिया।
समुद्र की आन्तरिक सक्रियता ही उसे महत्वपूर्ण बनाये हुए हैं। यदि उसमें निष्क्रियता होती तो अब तक कब का गन्दा तालाब बनकर गड़ गया होता और इस सारी धरती पर दम घोंटने वाली विष भरी सडांद के अतिरिक्त और कुछ दिखाई न देता। सक्रियता ही चेतना प्रदान करती है और उसी के आधार पर अपनी गरिमा बनाये रहना तथा संपर्क क्षेत्र को महत्वपूर्ण अनुदान दे सकना सम्भव होता है। समुद्र की भी यही स्थिति है और यही मनुष्य जीवन की भी।
धरती घूमती है और अपनी हलचल से हर जड़ चेतन को प्रभावित करती है। समुद्र भी अपवाद नहीं हो सकता। उसमें भी क्रिया विश्रान्ति की अनवरत हलचलें होती है। मनुष्य को विश्राम की, सुखोपभोग की इच्छा तो होती है, पर यह भी स्पष्ट है कि सक्रिय श्रमशीलता का ही दूसरा पक्ष प्रगतिशीलता है। ठण्ड और गर्मी का सन्तुलन इस धरती पर समुद्र की गहराई में अनेकानेक हलचलों का और सुखद सम्भावनाओं का सृजन कर रहा है।
धरती सूर्य के इर्द-गिर्द चक्कर लगाती है और अपनी धुरी पर भी घूमती है। भूमध्य रेखा के आसपास वाले भाग में पृथ्वी पर सूर्य का प्रकाश अधिक पड़ता है। अस्तु वह क्षेत्र अधिक गरम रहता है। समुद्री पानी भी वहाँ काफी गर्म हो जाता है और गर्म जल के हलके होने के कारण उसका प्रवाह उत्तर एवं दक्षिण ध्रुवों की ओर चल पड़ता है।
ध्रुव प्रदेशों के पानी की स्थिति इसके विपरीत है। वहाँ ठण्डक अधिक रहने से पानी भारी हो जाता है। अधिक ठण्डा अधिक भारी पानी तली में बैठ जाता है। यह तली में बैठा पानी भूमध्य रेखा पर गरम पानी बहने के कारण खाली हुई जगह को भरने के लिए दौड़ता है। इस प्रकार तालाब की तरह बन्द दिखाई पड़ने वाले समुद्र में भी नदियों जैसा प्रवाह बना रहता है और उसमें सड़न उत्पन्न नहीं होने पाती।
अन्तः प्रवृत्तियाँ बाह्य जीवन में सक्रियता उत्पन्न करती है। भीतर की हलचलें दृश्यमान नहीं होती-भीतरी गतिशीलता का परिचय भी नहीं मिलता। लगता है मनुष्य बाहर से ही सक्रिय है, भीतर स्थिरता रहती होगी, पर वस्तुतः ऐसा नहीं है वे मन्द समझी जाने वाली आकांक्षाएं और प्रेरणाएँ ही हमें सक्रिय सुयोग्य एवं सफल बनाती है। भीतर का भारीपन ही ऊपर के हलके-फुलके जीवन में स्फूर्ति भरे रहता है।
समुद्र की ऊपरी सतह में अधिक हलचल रहती है क्योंकि ऊपर खारापन कम और नीचे अधिक है। यों यह भारी जल भी रेंगता है, पर उसकी गति ऊपरी सतह की अपेक्षा कहीं कम होती है।
बेंजामिन, फ्रेंकलिन के जमाने में ही इन समुद्री जलधाराओं का कुछ-कुछ पता चल गया था। ब्रिटेन से अमेरिका जाने वाले जहाजों को दो सप्ताह अधिक लगते थे जब कि अमेरिका जहाज दो सप्ताह पहले ब्रिटेन जा पहुँचते थे। चाल को घटाने और बढ़ाने में समुद्री जल धाराओं का सीधा या उल्टा प्रवाह ही इस अन्तर का मुख्य कारण था। कुशल नाविकों ने इन जलधाराओं का नाम ‘गल्फ स्ट्रीम’ रखा था और उनके नक्शे बनाये थे। जलधाराएँ उथली गहरी, चौड़ी, संकरी पाई जाती है। उनकी चाल का अनुपात प्रति घण्टा 6080 फुट आँका गया है। मोटेतौर पर सतही प्रवाह द्रुतगामी और गहराई में प्रवाह मन्दगति वाला होता है।
इस प्रवाह के तीन कारण माने जाते हैं-(1) ज्वार-भाटा से उत्पन्न (2) समुद्री हवाओं से धकेले जाने के कारण (3) खारे पानी के घनत्व में अन्तर आते रहने से यह जलधाराएँ प्रवाहित होती हैं। उनकी गति में मन्दी एवं तीव्रता भी इन्हीं कारणों से घट बढ़ होते रहने से उत्पन्न होती है। यह जलधाराएँ अपने समीपवर्ती क्षेत्रों को बहुत तरह प्रभावित करती हैं। मानसून की कमीवेशी, दौड़ने की गति तथा दिशा का निर्धारण, तूफानों की उत्पत्ति, जलयानों की यात्रा में सरलता एवं रुकावट।
लहरों का सम्बन्ध विशेषतया हवा से है। वे प्रायः 100 फुट से कम ही ऊँची रहती है। यों मनीला से सेनडिगो जाते हुए “रैमेयो” जलयान के कप्तान ने 7 फरवरी 1933 की रात में प्रशान्त महासागर में उठती हुई लहरों की ऊंचाई 112 फुट तक आँकी थी पर ऐसा कभी-कभी ही होता है। लहरें तट से सीधी नहीं टकराती वे कोण-बनाकर भूतल का स्पर्श करती हैं।
बाह्य परिस्थितियों का प्रभाव यदि कभी आन्तरिक स्थिति को उद्विग्न करदे तो उसके परिणाम बड़े घातक होते हैं, यह विपत्ति समुद्रों पर भी जाती है कभी-कभी सूर्य, चन्द्र आदि के प्रभावों का सामना वे नहीं कर पाते फलतः अपने को तूफानी परिस्थितियों में फँसा लेते हैं और विनाशकारी घटनाएँ उत्पन्न करते हैं। असन्तुलित ओर उद्विग्न मनः स्थिति वाले मनुष्य भी यही करते हैं।
ज्वार-भाटे, सूर्य और चन्द्र की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से उत्पन्न होते हैं। उनके कारण समुद्र का समूचा पानी ऊपर उठ आता है। इतना ही नहीं पृथ्वी का थल भाग भी फैलता, सिकुड़ता है। धरती के चारों ओर भरा हुआ वायुमण्डल भी मीलों ऊपर उठता है, नीचे आता है। इतना ही नहीं हमारे शरीर का भार विस्तार भी इनसे प्रभावित होता रहता है। सन 1912 की वह दुर्घटना समुद्री इतिहास में कभी भुलाई नहीं जा सकती जिसमें अमेरिकी जहाज टाइटैनिक समुद्र में तैरते हुए एक हिमि पर्वत से जा टकराया था और हजारों यात्रियों समेत डूब गया था। ग्रीनलैण्ड के समुद्र में अभी भी ऐसे दर्जनों हिम खण्ड तैरते रहते हैं। उधर से निकलने वाले जहाजों को इस टकराव से बचने के लिए बहुत सतर्कता बरतनी पड़ती है।
एशिया का पूर्वी तट इन कवन्ध तूफानों का देश है। जापान को यह दैत्य तरह-तरह से धमकाते, झकझोरते रहते हैं और भी कितने ही द्वीप समूह उनसे प्रभावित होते हैं। अमेरिकी तटों से टकराने वाले तूफान ‘हरीकेन’ कहलाते हैं। भारत पर हमला करने वाले तूफान चीनी सागर में उठने वाले टायफ्रन्स के चेले चपाटे हैं वे इधर चले आते हैं और बंगाल की खाड़ी के इलाके में बहुत हानि पहुँचाते हैं।
कभी-कभी समुद्री सतह पर छाया रहने वाला हवा का दबाव अचानक घट-बढ़ जाता है इससे पानी में हलचल मचती है और हवा में उथल-पुथल पैदा होती है। तूफान इन्हीं परिस्थितियों में पैदा होते हैं। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है तो उससे एक विशेष शक्ति उत्पन्न होती है जिसे ‘कोरिओली’ कहते हैं।’ तूफानों को इस ‘कोरिओली’ की दिशा और सहायता मिल गई तब तो वे और भी भयंकर हो उठते हैं।
समुद्री तूफान कई बार तटवर्ती लोगों के लिए भारी विपत्ति सिर पर लादकर लाते हैं। पिछले दिनों उड़ीसा में जो तूफान आया था उसने दस लाख व्यक्तियों का सर्वस्व अपहरण करके उन्हें असहाय बना दिया। कटक तथा वालासोर जिलों की 1200 वर्ग मील जमीन भी पूरी तरह बर्बाद हो गई। एक हजार से ऊपर मनुष्य उसमें भरे थे।
दक्षिण रामेश्वरम् के तूफान ने और भी अधिक कहर ढाया था। सौ फुट ऊँची लहरें एक सवारी रेलगाड़ी को ही बहा ले गई उसमें सवार यात्रियों में से एक भी जीवित न बच सका। रामेश्वरम् द्वीप को मुख्य भूमि से जोड़ने वाले 6700 फुट लम्बे पुल को उखाड़ कर समुद्र में बहुत दूर फेंक दिया।
अक्सर बंगाल की खाड़ी में तीन-चार बड़े तूफान हर साल आ ही जाते हैं। इनकी चाल 150 से 500 मील तक प्रतिदिन की होती है। इन समुद्री तूफानों को कबन्ध भी कहा जाता है।
कबन्ध उस क्षेत्र में पैदा होते हैं जिनका तापमान 26-27 डिग्री सेन्टीग्रेड से ऊपर हो-ठण्डे समुद्रों तक पहुँचते-पहुँचते वे स्वतः समाप्त हो जाते हैं। सामान्यतया कवन्ध की जिन्दगी 6 दिन से 10 दिन तक की होती है।
यह विनाशकारी उथल-पुथल, हवा, सूर्य आदि के प्रभावों का सामना न कर सकने की असंतुलित स्थिति से ही उत्पन्न होती है। सामान्य तथा समुद्र अपनी स्थिरता को बनाये रहता है तभी तो संसार की क्रम व्यवस्था चलती है। मनुष्य भी जब तक अपनी आँतरिक दृढ़ता विवेकपूर्वक बनाये रहते हैं, तब तक वे शालीन, सज्जन और महापुरुषों के स्तर पर बने रहते हैं। आकर्षणों और उत्तेजनाओं से ग्रसित होकर जब वे असंतुलित होते हैं तभी विनाशकारी विभीषिकाएँ उपस्थित होती हैं। यह समुद्र की भी हेय स्थिति है और मनुष्य की भी।
आर्कटिक और अंटार्टिका समुद्र पर जमी हुई तर्क की मोटाई औसतन 7500 फुट है। कहीं-कहीं वह मोटाई 13000 फुट तक पहुँच गई है। एक जगह तो यह मोटाई तीन मील से भी अधिक है। यह सारा बर्फ यदि पिघल जाय तो संसार भर के समुद्रों का पानी सैकड़ों फुट ऊँचा उठ आवेगा। हर साल बादल जितना पानी बरसाते हैं यदि इस बर्फ से वह काम लिया जाय तो 50 साल तक वर्षा कराने के लिए यही बर्फ काफी है।
मनुष्य की महानता ध्रुव प्रदेश में जमी हुई बर्फ की तरह है वह जब तक स्थिर है तभी तक यह संसार स्थिरता प्रगति एवं सुख-शान्ति से लाभान्वित हो सकता है। यदि वह मानवी गरिमा और शालीनता अपनी शीतलता छोड़कर उद्दण्ड उत्तेजना अपनाने और पतन की दिशा में वह चले तो समझना चाहिए कि अब सर्वनाश की घड़ी आ पहुँची उसमें वह स्वयं भी नष्ट होगा और इस सुन्दर संसार को भी नष्ट भ्रष्ट करके रहेगा।
समुद्र की अथाह जल राशि में भी आग लगती दीख पड़ सकती है। शर्त यह है कि उसके अन्तराल में गर्मी भरी पड़ी हो और उसे फूट पड़ने का अवसर मिल सके। सन् 1866 में सान्तिरिन के समुद्र में आग लगी देखी गई। दर्शकों ने आँखों से देखा कि समुद्र जल ज्वाला बना हुआ है और उसकी लपटें तल से 25 फीट तक ऊँची उठ रही हैं। हुआ यह था कि समुद्र की तली में धरती के भीतर कोई ज्वालामुखी फटा और वह इतना तीव्र था कि समुद्र जल को चीरता हुआ अपनी लपटें ऊपर तक उछालने लगा और दर्शकों को लगा कि समुद्र का पानी ही आग बनकर जाज्वल्यमान हो रहा है।
मनुष्य के भीतर की आग जब कभी विद्रोह बनकर फूटती है तो वह व्यापक क्रान्ति की दावानल बनकर दृष्टि-गोचर होती है, पर तत्वदर्शी देखते हैं कि उसके मूल्य में किसी प्राणवान चेतना की अन्तर्वेदना ही प्रज्वलित हो रही है।
सोचने का तरीका विकृत हो जाने पर सामान्य परिस्थितियाँ भी प्रतिकूल दिखाई पड़ती हैं और उनसे डरा, घबराया हुआ व्यक्ति अपना सन्तुलन गँवा बैठता है। झाड़ी का भूत बन जाना, रस्सी का सर्प दिखाई पड़ना, भ्रम की प्रतिक्रिया को प्रत्यक्ष कर देता है। प्रतिकूलताएँ वस्तुतः उतनी होती नहीं जितनी कि समझी जाती हैं। मनुष्य हर स्थिति में गुजारा कर सकने योग्य शरीर और हर परिस्थिति में मुस्कुराते रह सकने योग्य मन लेकर जन्मा है। इनकी मूल संरचना में कोई दोष नहीं है। शरीर ‘व्याधि’ से और मन आधि’ से यदि ग्रसित होता है तो उन विपत्तियों का कारण अपनी ही भूल होती है। असंयम हमें रुग्ण बनाता है और असन्तुलन से हम अर्धविक्षिप्त दिखाई पड़ते हैं।
शरीर के साथ अनीति बरती जाय तो वह देर सवेर में रुग्ण होकर रहेगा। कमजोरी और बीमारी उसे धर दबोचेंगी और रोती, कराहती स्थिति में घसीट ले जायेंगी। मस्तिष्क के साथ यदि अनीति बरती गई है तो उसे कुसंस्कारी चिन्तन का अभ्यासी बनाया गया है तो या तो परिस्थिति पैदा कर लेगा या फिर सामान्य स्थिति में ही विपरीतता का आरोपण करके विक्षुब्ध रहने लगेगा। इस विक्षुब्धता को ही मानसिक रुग्णता कहा जाता है।
इन दिनों शारीरिक रोग भी बेतरह बढ़ रहे हैं। नई-नई किस्म के-नई-नई आकृति-प्रकृति के रोग हर साल उठ खड़े होते हैं और डाक्टर उनका अता-पता चलाने एवं उपचार खोजने में नित नई परेशानी अनुभव करते हैं। पुराने जमाने के परिचित रोगों की भी अब इतनी अधिक शाखा-प्रशाखाएँ फूट पड़ी हैं कि उन्हें नये रोग की संज्ञा देने में भी कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मानसिक रोगों की बढ़ोतरी इससे भी अधिक तेज और भयंकर हैं। जिस तरह पूर्ण स्वरूप कहे जा सकने योग्य शरीर कठिनाई से ही ढूंढ़े मिलेंगे, उसी तरह ऐसे मनुष्य कदाचित ही मिलेंगे जिनका मस्तिष्क मानसिक रोगों के कारण विकृत जर्जर बना हुआ न हो। आज की बढ़ी हुई अनैतिकता एवं असामाजिकता ऐसी समस्याएँ उत्पन्न करती हैं जिससे सामान्य मनोबल का व्यक्ति सहज ही विक्षिप्त हो उठता है। घटा, गिरा मनोबल भी इतना अपंग हो चला है कि सीधे-साधे, सरल स्वाभाविक-मनुष्य जीवन के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई अनुकूलता, प्रतिकूलताओं को विपत्ति मान बैठता है और रो-रो कर जमीन, आसमान को सिर पर उठा लेता है। कभी सचमुच ही ऐसी घटनाएँ घटित होती हैं जिन्हें असाधारण या अप्रत्याशित कहा जा सके। शौर्य-साहस के सहारे इनका सामना किया जा सकता है। जूझने से हर विपत्ति हलकी पड़ती है। यदि कुछ आपत्ति आ ही जाय तो उसे सन्तुलन बनाये रखकर सहा जा सकता है। संकट को हलका मानने से वह बहुत कुछ हलका पड़ जाता है और यदि असह्य मान लिया जाता है तो उसका वजन पर्वत से भी भारी हो जाता है। सामान्य बुद्धि के लोग परिस्थितियों को ही सुख-दुख का कारण मानते हैं और यह भूल जाते हैं कि मान्यताओं की जादुई शक्ति कितनी अद्भुत है। मामूली-सी बात असह्य संकट के रूप में दीखना और सचमुच ही किसी बड़ी विपत्ति का आक्रमण मामूली ही विपरीतता भर लगना अपने चिन्तन की ही दो चमत्कारी दिशाएँ हैं। इनमें से किसी को भी अपनाया जा सकता है और सन्तुलन को बनाये रह सकना या गँवा बैठना सम्भव हो सकता है।
परिस्थितियों के साथ चिन्तन का उपयुक्त तालमेल न बिठा सकने के कारण अब असंख्य व्यक्ति मानसिक रोगों से ग्रसित होते चले जा रहे हैं। यह अवाँछनीयता महामारी की तरह-आँधी, तूफान की तरह बढ़ रही है और लगता है कि स्वस्थ और सन्तुलित मस्तिष्क वाले व्यक्ति अगले दिनों ढूंढ़ पाना कठिन हो जायगा।
शरीर की तुलना में मन का मूल्य हजारों गुना अधिक है। उसी प्रकार शरीर-रोगों की तुलना में मानसिक रोगों की क्षति अत्यधिक है। शरीर रोगी रहे किन्तु मस्तिष्क स्वस्थ हो तो मनुष्य अनेकों मानसिक पुरुषार्थ कर सकता है किन्तु यदि मस्तिष्क विकृत हो जाय तो शरीर के पूर्ण स्वस्थ होने पर भी सब कुछ निरर्थक बन जायगा।
इन दिनों मानसिक रोगों की बाढ़ जिस तूफानी गति से आ रही है- दावानल की तरह बढ़ती, धधकती चली जा रही है उसे देखते हुए लगता है मनुष्य जीवन से उसका सहज सुलभ आनन्द छिनने ही जा रहा है। यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है। सनकी, वहमी, शेखचिल्ली, उद्विग्न, क्रुद्ध, रुष्ट, असन्तुष्ट, आशंकाग्रस्त, चिन्तित, निराश, भयभीत, उदासीन व्यक्ति क्रमशः अपने लिए भार बनते चले जाते हैं। उनके मस्तिष्क में ऐसे चक्रवात उठते रहते हैं जो सोचने की स्वस्थ शैली को बेतरह तोड़-मरोड़कर रख देते हैं। टूटी हुई मनः स्थिति में तथ्य को समझना सम्भव नहीं रहता। कुछ के बदले कुछ समझ सकना और कुछ करने के स्थान पर कुछ करने लगना ऐसी विपत्ति है जिसके कारण मनुष्य अर्धविक्षिप्त स्थिति में चला जाता है। अपने आपके लिए तथा दूसरों के लिए एक समस्या बन जाता है।
बढ़ते हुए मनोरोगों से क्रमशः सारा मनुष्य साज जकड़ता चला जा रहा है। सन्तोष इतना ही है कि यह विपत्ति पूर्ण उन्माद की स्थिति तक नहीं पहुँची है। मस्तिष्क के छोटे-छोटे हिस्सों पर ही उसने आधिपत्य जमाया है और लोग अर्धविक्षिप्त जैसे ही दिखाई पड़ते हैं। जो सही नहीं सोच सकता, सही निष्कर्ष नहीं निकाल सकता और साधनों का उपयोग करने एवं परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने से समर्थ नहीं है उसे मानसिक दृष्टि से रोगी ही कहा जायगा। ऐसे व्यक्ति दर्द से कराहते भले ही न हो पर उनकी जीवन सम्पदा एक प्रकार से कूड़ा-करकट ही बन जाती है न वे स्वयं चैन से रहते हैं और न साथियों को चैन से रहने देते हैं। इन दिनों कुछ मानसिक रोगों की तो भरमार ही हो चली है।
मनुष्य की अनेकानेक मनोवृत्तियों का विवेचन विश्लेषण और वर्गीकरण करते हुए मनः शास्त्री प्रो.शेल्डि के अनुसार उनकी मूलतः दो ही धाराएँ बतायी हैं एक प्रिय दूसरी अप्रिय। एक सुख दूसरी दुख। इन दोनों का परिस्थितियों से कम और मान्यताओं से अधिक सम्बन्ध होता है। कौन व्यक्ति किस स्थिति में दुख और किस में सुख अनुभव करता है यह उसका अपना इच्छित विषय है। एक व्यक्ति जिस स्थिति में दुखी रहता है और उससे अच्छी स्थिति न मिलने के कारण असन्तोष व्यक्त करता है उसी में दूसरे लोग बहुत प्रसन्न रहते हैँ। इतना ही नहीं कितने व्यक्ति उसे प्राप्त करके आनन्द विभोर हो सकते हैं जिसमें कि असन्तुष्ट व्यक्ति अपने को दुखी अनुभव कर रहा है।
ज्वर, दर्द आदि कष्ट और भूख-प्यास,सर्दी, गर्मी जैसे अभाव प्रायः सभी को दुख देते हैं, पर इन दुखों में भी भयंकर विपत्ति अथवा सामयिक समस्या की छोटी सी झलक मान लेने पर उनका कष्ट हलका और भारी हो सकता है। इस प्रकार की कठिनाइयाँ थोड़ी ही होती है। वस्तुतः अधिकाँश सुख और दुख काल्पनिक होते हैं। वे मान्यताओं और इच्छाओं से सम्बन्ध रखते हैं। सोचने का तरीका बदला जा कसता है और दुख सुख की, प्रसन्नता-अप्रसन्नता की, सन्तोष-असन्तोष की स्थिति में आमूलचूल नहीं तो अत्यधिक परिवर्तन अवश्य ही किया जा सकता है।
एडवर्ड कारपेन्टर का कथन है- ’दुख की मान्यता वस्तुतः मन की पराधीनता प्रकट करती है।’ मन की स्वाधीनता मिलने पर वह सहज ही समाप्त हो जाती हैं। बाहरी व्यक्ति या बाहरी पदार्थ हमें बहुत ही कम सहायता कर सकते हैं या सुख दे सकते हैं। उनके योगदान का न्यून या अधिक मूल्याँकन करके ही हम प्रसन्नता, अप्रसन्नता अनुभव करते हैं यदि अनुभूति की प्रक्रिया में परिवर्तन कर लिया जाय। अपने सद्गुणों और सत्प्रयत्नों को ही सफलता मान लिया जाय और उतने ही क्षेत्र में प्रसन्नता को केन्द्रित कर लिया जाय तो प्रायः हर स्थिति में प्रसन्न एवं संतुष्ट रहने का अवसर
मिल सकता है। मन की स्वाधीनता का यही प्रत्यक्ष प्रतिफल है। व्यक्तियों, वस्तुओं या पदार्थों पर अपनी प्रसन्नता को निर्भर बना देना मानसिक पराधीनता है उस स्थिति में कोई न तो सुखी रह सकता है और न संतुष्ट।
दार्शनिक स्पिनीजा भी यही कहा करते थे, उनने अपने दर्शन में इसे मौलिक सत्य माना है कि “विक्षुब्ध मनः स्थिति, मानसिक पराधीनता की ही अवस्था है। स्वावलम्बन की स्थिति में कोई उद्वेग ठहर ही नहीं सकता।
हमें किन-किन वस्तुओं का अभाव है, किन-किन व्यक्तियों ने कब-कब, क्या-क्या दुर्व्यवहार किया, अब तक कितनी बार असफलताएँ मिलीं और हानियाँ उठानी पड़ी इसका लेखा-जोखा लेते रहा जाय तो कोई भी मनुष्य अपने आपको दुख दुर्भाग्य से ग्रसित अनुभव करेगा किन्तु यदि वही अपने उपलब्ध साधनों की बहुलता, दूसरों के सहयोग-सद्भाव एवं समय-समय पर मिली सफलताओं की लिस्ट तैयार करने लगे तो प्रतीत होगा कि वह जन्म जात वरदान लेकर सुख और सफलताओं के लिए ही पैदा हुआ है। चिंतन की विकृति का नाम ही दुख है इस कथन में कोई अत्युक्ति नहीं हैं।
वियना के पोलोक्लिनिक अस्पताल में मानसिक चिकित्सा के विशेषज्ञ डा.विक्टर ई. फ्रेंक्ल ने अपने 50 वर्षों के चिकित्सा अनुभवों का सार बताते हुए लिखा है- ”जो मनुष्य यह अनुभव करेगा कि उसका जीवन निरर्थक है। उसका मन और शरीर कभी स्वस्थ न रहेगा। सार्थकता की अनुभूति न होने पर मनुष्य जिंदगी को लाश की तरह ढोता है और उस नीरस निरानन्द स्थिति में सचमुच ही जीवन बहुत भारी पड़ता है। उस दबाव से इतनी थकान आती है कि कुछ करते धरते नहीं बनता। हारा थका आदमी धीरे-धीरे गिरता धुलता जाता है और मरण को निकट बुलाने वाली बीमारियों को निमंत्रण देकर स्वेच्छा संकल्प के आधार पर कष्ट ग्रसित रहने लगता है।
स्काटलैंड के मनोरोग चिकित्सक डा.रोनाल्ड डैकिटलेंज ने मनुष्य के मानसिक रोग ग्रसित होने के कारण और उनके निवारण के उपाय बताने के संदर्भ में दो बड़े ग्रन्थ लिखे हैं-(1) दि पालिटिक्स आफ एक्पीरियेन्स और (2) दि पालिटिक्स आफ फैमिली इन दोनों में उसने समाज की वर्तमान परिस्थितियों की भर्त्सना करते हुए कहा इनमें जकड़े रहने पर मनुष्य को मानसिक रोगों का शिकार होते रहना पड़ेगा और सहज स्वाभाविक रीति से व्यक्तित्व का विकास कर सकना उसके लिए संभव न होगा। सामान्य व्यवहार में वे कूटनीतिक चालबाजी की दुर्गंध देखते हैं, और कहते हैं, मनुष्य को दवा, सता कर बाधित नहीं किया जाना चाहिए उसे प्रत्येक क्षेत्र में अपने विवेक को विकसित करने का अवसर मिलना चाहिए।
समर्थ वर्ग को अधिक सुविधा देने वाली और असमर्थ वर्ग को यथा स्थान बने रहने की नीति ने वर्तमान कानूनों एवं परम्पराओं का सृजन किया है। इस असंतुलन ने एक पक्ष को उद्धत और दूसरे को भौतिक दृष्टि से दीन और आत्मिक दृष्टि से हीन बनाया है। अस्तु दोनों ही पक्षों में अपने अपने ढंग के मानसिक रोग उत्पन्न हुए हैं। यदि हर किसी को लगभग समान अवसर मिले होते और अनावश्यक बंधन न जकड़े गये होते तो लोग मानसिक दृष्टि से प्रसन्नता एवं संतोष अनुभव करते। तदनुसार वे शारीरिक दृष्टि से भी स्वस्थ रहते और आर्थिक पारिवारिक और सामाजिक स्थिति में भी सुसंपन्नता दृष्टि गोचर होती है।
अत्यधिक हताश व्यक्ति कभी एक तरह की, कभी दूसरे तरह की गड़बड़ियाँ करते रहते हैं। इन हरकतों को प्रेरणा देने वाली मनोवृत्ति को, ‘एजीटटेड डिप्रेसिव साइकोसिस’ कहा जाता है। न्यूरोटिक डिप्रेशन अथवा साइकोटिक डिप्रेशन उस स्थिति का नाम है जिसमें निराशा छाई रहती है, चित्त उदास और खिन्न रहता है। कुछ नया सोचने या नया करने को जी नहीं करता। चुपचाप बैठे या पड़े रहना, एक ही सीमित विचार में निमग्न रहना इन रोगियों को पसंद होता है। ये न कुछ चाहते हैं, न कुछ कहते हैं, न करते हैं। किसी प्रकार दिन काटते रहना ही उनके लिए पर्याप्त है।
मेनिक डिप्रेशन और एण्डोमेनिक डिप्रेशन की स्थिति में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, कभी उत्तेजना कभी निष्क्रियता। कुछ दिन या कुछ समय वे सक्रिय दीखते हैं, किन्तु फिर ऐसा कुछ हो जाता है कि जो किया था, या सोचा था उसे जहाँ का तहाँ छोड़कर फिर ठप्प हो जाते हैं। आलोडित हताश, एजीटेटेड डिप्रेशन, ग्रसित रोगियों की स्थिति एक जैसी नहीं रहती। उनकी चित्र-विचित्र हरकतें अदलती-बदलती रहती है, कभी मूड़ एक तरह का होता है तो कभी दूसरी तरह का।
बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँधने वाले, किंतु परिस्थिति वश वैसे बन न सकने वाले लोग यदि अधीर और भावुक प्रकृति के हैं तो उन पर उस असंतोष का गहरा असर पड़ता है। उन्हें अमुक व्यक्तियों का अमुक परिस्थितियों से बहुत शिकायत होती है, जिनके कारण वे अपना खेल बिगड़ा मानते हैं। कभी-कभी तो अपने भाग्य या प्रयत्न को भी वे दोष देते हैं, पर अधिकतर उनकी खोज दूसरों पर रहती है। वे सोचते हैं उनके प्रयत्न पर्याप्त थे, उनकी योग्यता कम नहीं थी, किंतु दूसरों ने उन्हें गिरा या हरा दिया। इन दूसरों की पंक्ति बहुत लम्बी होती है, इसमें ग्रह नक्षत्र, भाग्य विधान से लेकर दोस्त-दुश्मन, परिचित-अपरिचित सभी आ सकते हैं। वे किसी को भी, किन्हीं को भी, उस असफलता का कारण मान सकते हैं। यह मान्यता आरंभ में खीज, झुंझलाहट, द्वेष क्रोध आदि के रूप में प्रकट होती है, पर इससे भी जब कुछ बनता नहीं दीखता, तो वह व्यक्ति अपने को दीन-हीन असहाय और असमर्थ मानकर प्रयत्न छोड़ बैठता है, पूछताछ करने पर शिकायतें करने के अतिरिक्त और उसके पास कुछ नहीं होता। दोषारोपण के विचार मस्तिष्क को इतना आच्छादित कर लेते हैं कि कुछ और सोचने की उसमें गुंजाइश ही नहीं रहती।
अपने काम में गलती देखना और उसे बार-बार करने का प्रयत्न करना ‘आपसेसिव कम्पलसिव न्यूरोसिस’ कहलाता है। बार-बार दाढ़ी बनाना और ऐसा अनुभव करना मानो अभी भी, बाल ठीक तरह साफ नहीं हुए, बार-बार झाड़ू लगाना और सोचना अभी भी गंदगी मौजूद है, बार हाथ, कपड़े, बर्तन आदि धोना, घंटों नहाना और यह सोचते रहना कि काम पूरा नहीं हुआ, इसी रोग का लक्षण है। पवित्रता सफाई, व्यवस्था की ऐसी सनक रहती है कि उस धंधे में ही अधिक समय उलझे रहने से इच्छित स्थिति प्राप्त करना तो दूर उलटे उपहासास्पद स्थिति बन जाती है।
सरकारी मानसिक अस्पतालों में प्रायः आक्रमण कारी पागल ही पहुँचते हैं। गहरी उदासी, मानसिक तनाव, भुलक्कड़पन, आदि व्यथाओं से पीड़ित लोग भी इलाज कराने जाते हैं। इससे हलके दर्जे की विक्षिप्तता न तो उपचार योग्य समझी जाती है और न उसकी हानि का लेखा जोखा लिया जाता है। तलाश किया जाय तो जनसंख्या में से आधे आदमी ‘इन्सेनिटी’ विक्षिप्तता के नजदीक ही पहुँची स्थिति में पाई जायेंगे। कितनी ही शारीरिक समझी जाने वाली बीमारियाँ वस्तुतः मानसिक होती है। डाक्टर पैथालॉजी को तथा दूसरी जाँच पड़तालों के आधार पर निरोगता व्यक्त करते हैं, पर रोगी की व्यथाएँ ऐसी होती है जिनसे वह गलता घुलता ही चला जाता है। दवा-दारु का उपचार भी कुछ काम नहीं करता क्योंकि बीमारी शारीरिक बीमारियाँ बनकर सामने आती है और वे डाक्टरों के लिए असाध्य एवं समझ में न आने वाली ही बनी रहती है।
दूसरों की तुलना में अपने को हेय या हीन समझने की स्थिति भी कितनों को ही मानसिक रोगों का मरीज बना देती है। कुरूपता, मंद बुद्धि, गरीबी, किसी भूल के कारण स्थायी घृणा, अपमान, छूत रोग, लोक निन्दा आदि कारणों से कितने ही व्यक्ति अपने को हेय स्थिति में पाते हैं और एम्प्यूटेशन से ग्रसित होकर रुग्ण संज्ञा में गिने जाने योग्य बन जाते हैं। वे कभी विरक्ति की बात सोचते हैं, कभी आत्म-हत्या की। आत्म-हीनता की ग्रन्थि में बँधकर या तो वे घेर दब्बू हो जाते हैं या फिर ‘ऐस्जाइटी टेशन’ उन्हें तोड़-फोड़ करते रहने में लगा देते हैं।
प्रेक्टिस आफ नैचरोपैथी ग्रन्थ के लेखक डाक्टर लिड लेहर ने कितने ही प्रमाण देकर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि ‘क्षय’ वस्तुतः शारीरिक नहीं मानसिक रोग है। आत्म ग्लानि की भावनाओं से पीड़ित मनुष्य ही बहुत करके यक्ष्मा के शिकार बनते हैं। उनमें से अधिकाँश ऐसे असन्तुष्ट व्यक्ति होते हैं जिन्हें जिन्दगी नीरस और भारी पड़ रही होती हैं जिन्हें जिन्दगी नीरस और भारी पड़ रही होती है उनकी अन्तःचेतना इस स्थिति से ऊबकर किसी ऐसी विपत्ति को आमन्त्रित करती हैं जो इस अवाँछनीय स्थिति से छुटकारा दिला सके। इस आमन्त्रण को पाकर क्षय जैसे मृत्यु दूत सामने आ खड़े होते हैं।
अन्तरावरोध और अंतर्द्वंद्व बढ़ते-बढ़ते ‘शिजोफ्रेनिया’ बन जाता है। बुद्धि और विवेक के सहारे उचित और अनुचित भेद करके उसमें से जो उपयुक्त है उसे लेना और जो अनुपयुक्त है उसे हटा देना साधारण नियम है। किन्तु कभी-कभी दो सर्वथा विपरीत पक्षों को मान्यता देने की स्थिति भी देखी गई है। एक आर यह विचार उठता है कि इसे करेंगे फिर विपरीत पक्ष उठता है नहीं करेंगे। विवेक कुण्ठित हो जाता है और दोनों प्रतिपक्षी मान्यताएँ समान रूप से मस्तिष्क पर हावी रहती हैं। न किसी को छोड़ते बनता है और न अपनाते। दोनों में मल्लयुद्ध होता है और उनका अखाड़ा विचार बुद्धि से आगे बढ़कर अन्तः चेतना के क्षेत्र में प्रवेश कर जाता है यही अन्तरावरोध या अंतर्द्वंद्व है। इस मानसिक विषमता से घिरे मनुष्य की आन्तरिक स्थिति ऐसी हो जाती है। जैसे दो सांडों के लड़ने के क्षेत्र में उगे हुए पौधे कुचल कर चकनाचूर हो जाते हैं और ऊबड़-खाबड़ निशान बन जाते हैं।
शिजोफ्रेनिया का रोगी बात-बात में दुटप्पी बात करता है। उसकी नीति दोगली होती है और गतिविधियाँ दुरंगी। अभी वह एक बात का समर्थन कर रहा था, अभी असहमत हो गया। अभी तीव्र इच्छा प्रकट की जा रही थी अभी अनिच्छा घोषित कर दी गई। साथी लोग हैरान रहते हैं कि उसका किस प्रकार विश्वास करें और उससे क्या आशा रखें। ऐसे व्यक्तियों के दैनिक व्यवहार में भी ऐसे विचित्र परिवर्तन होते हैं कि उनका निर्वाह करने से जिनका सम्बन्ध है वे असमंजस में पड़े रहते हैं। नीतियाँ, रुचियाँ योजनाएँ बदलते रहने से वे स्वयं किसी प्रयत्न की न तो जड़ जमा पाते हैं और न किसी बात में सफल हो पाते हैं। आधे अधूरे कामों का और विपरीत विचारों का चित्र-विचित्र, लेखा-जोखा देखते हुए उन्हें अस्थिर मति एवं विचित्र व्यक्ति ही कहा जा सकता है। इस स्थिति में वे स्वयं ही लज्जा एवं ग्लानि अनुभव करते हैं, पर विवशता उन्हें उबरने नहीं देती। दूसरों की खीज और भर्त्सना से वे परिचित होते हैं, पर अंतर्द्वंद्वों में से कोई बुखार की तरह उन पर चढ़ बैठता है और वे किसी बाज के पंजों में फँसे चूहे की तरह कहीं से कहीं उड़ते चले जाते हैं।
केटाटोनिक शिजोफ्रेनिया, सिम्पल शिजोफ्रेनिया आदि इस मनोरोग के कितने ही भेद-प्रभेद हैं। जिनमें मनुष्य का प्रेम और द्वेष ज्वार-भाटे की तरह चढ़ता-उतरता है। उत्साह और अवसाद चरमसीमा पर पहुँचता है। हर्ष-शोक के झूले में झूलते हुए और विपरीत स्तर की बातें सोचते, कहते, करते उसे देखा जा सकता है। इस अस्थिरता के कारण दूसरे लोग उसे ठीक तरह समझ ही नहीं पाते कि आखिर वह क्या है- क्या करना चाहता है।
मानसिक रोग देखने में इतने कष्टकारक नहीं होते कि रोगी पीड़ा से चीत्कार करता रहे। शान्त, निष्क्रिय, मौन, उदास स्थिति में वह अपने आप में खोया, भूला रहता है। दूसरों की कुछ सहायता कर सकना तो दूर अपनी जीवन-यात्रा के लिए भी दूसरों की सहायता पर निर्भर रहता है। इस प्रकार का जीवन-भूत जीवन तब तक तो धकेला जाता रहता है जब तक रोगी को अपनी दयनीय दशा का बोध नहीं होता और वह इस स्थिति में दूसरों को ही गलत या दोषी मानता है, पर जब कभी स्थिति सामान्य हो जाती है और अपनी दुर्दशा का-दूसरों पर भार भूत होने का अनुभव करना है तो उसे मानसिक कष्ट भी बहुत होता है और उस व्यथा से उसकी बीमारी फिर बढ़ जाती है।
हम दूसरों से अलग है- हमारा व्यक्तित्व एकाकी अथवा स्वतन्त्र है यह मानना अपने आपको असहाय एवं दीन-दुर्बल स्थिति में ले जाकर पटक देना है। अकेला व्यक्ति सर्वथा नगण्य एवं तुच्छ बनकर ही रहेगा, भले ही वह कितना ही समर्थ एवं साधन सम्पन्न क्यों न हो। अँधेरे में जाने अथवा एकाकी यात्रा में डर लगता है, आशंका बनी रहती है और उदासी छाई रहती है। इसका कारण एकाकीपन की अवाँछनीयता ही समझी जानी चाहिए।
मेले-ठेले में जाने से अनेक प्रकार की असुविधाएँ उठानी पड़ती है, पर वहाँ जाने को मन इसलिए करता है कि एकत्रित हुए जन-समूह की एक इकाई अपने को मान लेने की मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया सहज ही अपने को प्रमुदित बनाती है। सेना का अंग बनकर चलने वाला सैनिक साहस और उत्साह से भरा रहता है जबकि एकाकी चलने पर उसे अनुत्साह और अवसाद घेरता है।
हम अकेले हैं-सम्बन्धित लोग अपनी सुविधा बढ़ाने मात्र के लिए है ऐसा सोचते ही मनुष्य असुर बन जाता है। वह पत्नी का तरह-तरह से शोषण करता रहता है और उसे कठपुतली, पैर की जूती, क्रीत दासी बनाकर रखने से कम में संतुष्ट नहीं होता। मतभेद या असहमति व्यक्त करते ही आग-बबूला हो जाता है और क्षण भर पहले जो प्रेम प्रदर्शित करने की विडंबना चल रही थी वह न जाने कहाँ चली जाती हैं उसके स्थान पर जल्लाद जैसी दुष्टता ताण्डव नृत्य करती दिखाई पड़ती है। यह सब एकाकी मनोभूमि के दुष्परिणाम हैं।
परिवार के लोगों को असह्य, अभावग्रस्त और दुखी परिस्थिति में भटकता छोड़कर कितने ही लोग नशेबाजी, यारबाजी, शौकीनी मटरगश्ती में पैसा उड़ाते, रहते हैं। उन्हें अपनी थोड़ी-सी इच्छा पूर्ति सर्वोपरि मालूम पड़ती है। इसके कारण परिवार के अन्य सदस्यों को कितना वास सहना करना पड़ेगा, यह बात उनकी समझ में ही नहीं आती। एकाकी मनोभूमि के लोगों के लिए अपना आपा ही सब कुछ होता है। दूसरों से क्या और कैसे लाभ उठाया जा सकता है वे इतना ही सोच पाते हैं। माता-पिता के पास जो कुछ है वह किस तरह झटक लिया जा सकता है इसमें उनकी बुद्धि तीव्र होती है, पर क्या उनकी सहायता करना भी कर्तव्य है यह बात सूझती नहीं। छोटे लड़के माता का जेवर चुराकर बम्बई सैर करने निकल जाते हैं। घर में कैसा कुहराम मच रहा होगा इसकी उन्हें कल्पना भी नहीं होती। अपनी मौज उन्हें बहुत कुछ लगता है। विछोह में बिलखते अभिभावक उनके लिए महत्व हीन मिट्टी के पुतले भर बन जाते हैं। एकाकीपन मनुष्य को कितना निष्ठुर बना देता है इसकी कल्पना करना भी कठिन है।
तनिक से लाभ या मनोरंजन के लिए, तनिक से अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए बहुत लोग प्राणघातक आक्रमण कर देते हैं। ऐसा मात्र आवेश में ही नहीं होता कारण गहरा होता है। वे दूसरों को चलते-फिरते गाजर, बैंगन जैसे अनुभव करते हैं। उनको कितना कष्ट होगा या उनके परिवार को कितना व्यथा सहनी पड़ेगी यह सोचना उनके लिए सम्भव नहीं रहता। एकाकी मनुष्य स्वार्थपरता की भूमिका में जितना उतरता जाता है उतना ही निष्ठुर बनता जाता है। चोर, डाकू, हत्यारे, ठग, प्रपंची, दुराचारी प्रकृति के अपराध परायण लोग इन क्रूर कर्मों में गर्व और विनोद इसलिए अनुभव करते हैं कि उन्हें एकाकी मन की स्वार्थ परायण निष्ठुरता मिल गई।
ऐसे ही लोग अपने तनिक से लाभ के लिए देश धर्म, समाज, संस्कृति का बड़ से बड़ा अहित कर सकते हैं। किसी के प्रति दया बरतने की उन्हें कुछ भी आवश्यकता अनुभव नहीं होती। उनके लिए गाजर और मुर्गी में कुछ अन्तर नहीं रहता। वे दोनों को बिना किसी दया, माया का अन्तर किये समान रूप से कच्चा चढ़ा सकते हैं। माँसाहार के लिए पशु-पक्षियों का वध उन्हें अखरता नहीं। अवसर मिले तो वे अपने स्वजन सम्बन्धियों को भी इसी तरह काट पकाकर खा सकते हैं। स्त्री-बच्चों की, भाई बहिनों की नृशंस हत्या कर डालने के समाचार आये दिन सुनने को मिलते हैं इनमें तात्कालिक कारण कोई छोटा आवेश भी हो सकता है, पर वास्तविक कारण उनकी एकाकी मनोभूमि ही होती है। स्वार्थपरता जहाँ जितनी सघन है वहाँ उतनी ही भयावह असुरता विद्यमान रहेगी। ऐसे मनुष्य की मित्रता किसी के लिए भी प्राणघातक संकट सिद्ध हो सकती है वे तनिक सा लाभ देखकर मित्र के गले पर वे रोक-टोक छुरी फिरा सकते हैं। ठग लेना, विश्वास घात करना और बुरी आदतों या संकटों में फँसा देना तो उनके लिए बांये हाथ का खेल होता है।
अपराधों की संख्या अनेक हैं। उनके स्वरूप भी विभिन्न हैं। क्रूर कर्मों के प्रयोग विनियोग कई-कई तरीकों से होते हैं, पर वस्तुतः वे सब एक ही स्वार्थ वृक्ष के पत्र पुष्प होते हैं पर वस्तुतः वे सब एक ही स्वार्थ वृक्ष के पत्र पुष्प होते हैं। स्वार्थी मनुष्य यदि साहस हीन, डरपोक हुआ तो धोखेबाजी का सहारा लेगा और यदि उग्र उद्दण्ड हुआ तो उत्पीड़क, शोषक, आतंकवादी आचरण करेगा। आग जहाँ रहती है वहीं जलाती है, स्वार्थी जिसके भी संपर्क में आता है उसी का सर्वनाश करता है। इसके अपवाद उसके स्त्री, बच्चे भी नहीं कितनी ही स्त्रियाँ स्वार्थी पतियों द्वारा पग-पग पर दी जाने वाली प्रताड़नाओं से इतनी संत्रस्त रहती है मानों उन्हें हर घड़ी जल्लाद को छुरी के नीचे रहना पड़ता हो। नरक नाम का कोई स्थान कहीं नहीं हैं उसकी घिनौनी भयंकरता तो स्वार्थ परायण वातावरण में अपने आस-पास ही कहीं भी देख सकते हैं।
डरावने प्रेत-पिशाचों की कल्पना के साथ यह मान्यता भी जुड़ी रहती है कि वे मरघट जैसे किसी वीभत्स स्थान में एकाकी निवास करते हैं। ऐसे भूत, पलीत होते हैं या नहीं यह संदिग्ध है। पर यह असंदिग्ध है कि स्वार्थी मनुष्य की मनःस्थिति सर्वथा इसी प्रकार की होती है। वे एकाकी रहते हैं। अपनी वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए कुछ भी करने को उद्यत रहते हैं। दूसरों की लाशें पास में जलती रहें इसका उन पर कोई असर नहीं पड़ता वरन् विनाश के विनोद को देखने की उनकी दुष्टता को पोषण मिलता है। सृजन तो वे कर नहीं सकते ध्वंस देखकर वे प्रसन्न होते हैं। सुना है भूतों का काम दूसरों को डराना, बीमार करना या अन्य प्रकार की हानियाँ पहुँचाना होता है। मुफ्त के उपहार पाने के लिए वे तरह-तरह के दबाव डालते हैं। यह पिशाच वृत्ति अनेकों में देखी जा सकती है और उन्हें जीवित रहते हुए भी मरा हुआ कहा जा सकता है। उन्हें प्रेत पिशाच की संज्ञा देना अनुपयुक्त नहीं है।
प्रसन्नता एकाकी मन में सम्भव ही नहीं हो सकती। उपनिषद् के ऋषि का प्रतिपादन है कि-”सृष्टि के आदि में ईश्वर अकेला था। इस एकाकीपन में उसे ऊब आई ओर खीज उठी। इस स्थिति में देर तक रह सकना उसे लिए अशक्य हो गया अस्तु एक से बहुत बनने की ठान ठान। अपने को खण्ड-विखण्ड कर डाला जड़, परमाणु और चेतन जीवाणु उसने बनाये। पदार्थ और प्राणी सृजे। इसके बाद उनमें रमण करता हुआ प्रसन्न प्रमुदित रहने लगा। यह तथ्य अलंकारिक भी हो सकता है, पर मानव जीवन में यह सचाई असंदिग्ध है। व्यक्ति एकाकी मनःस्थिति में खीजता और ऊबता रहेगा। उसे अपनी आत्मीयता का क्षेत्र बढ़ाये बिना चैन न पड़ेगा। अपनापन जितने विस्तृत क्षेत्र में बिखरा होगा उतना ही अधिक आनन्द, उल्लास का कार्य क्षेत्र उसे उपलब्ध होगा। रमण करना-प्रसन्न प्रमुदित रहना तो विस्तृत जन-समूह के साथ अपने को जोड़ने से ही सम्भव हो सकता है।
पुण्य-परमार्थ के जितने भी श्रेष्ठ सत्कर्म जहाँ तहाँ उभरते दृष्टिगोचर होते हैं वहाँ मनुष्य की उदारता एवं सहृदयता काम कर रही होगी। यह उदारता क्या है? वस्तुतः यह और कुछ नहीं केवल आत्म विस्तार की भावना ही है। हम जब अपने आपको सुविस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ देखते हैं तो सभी वस्तुएँ अपनी प्रतीत होती हैं और जिस तरह अपने निज के प्रयोग में आने वाली, अपने स्वामित्व की परिधि में समाने वाली वस्तुओं को सँभाल कर रखते हैं उसी प्रकार उस सुदूर क्षेत्र में फैली हुई-पराई कही जाने वाली वस्तुएँ भी अपनी ही लगती है। तब उन्हें सँभालकर रखने और सदुपयोग करने में भी वैसी ही प्रवृत्ति होती है जैसी कि निजी वस्तुओं में अमुक वस्तु हमारी नहीं है इसलिए उसे सँजोये जाने या बर्बाद होने में अपने को क्या लेना देना, यह विचार तभी मन में आवेगा जब अपनत्व का दायरा सीमित होगा। जिसने इस दायरे को जितना बढ़ा रखा होगा। वह बिना अपने पराये का भेदभाव किये सभी वस्तुओं को अपने ईश्वर की-ममता की परिधि की मानेगा और उनकी सुरक्षा, सुव्यवस्था एवं सुसज्जा का पूरा-पूरा ध्यान रखेगा।
संकुचित स्थिति में केवल अपना शरीर ही अपना होता है। उसकी सुविधा के लिए संबद्ध परिवार वालों की उपेक्षा भी की जाती है ओर उनके साथ अनीति बरतना भी खूब होता है। पर जब आत्मीयता बढ़ती है तो स्वयं कष्ट उठाकर-अभावग्रस्त रहकर कुटुम्ब के सदस्यों को सुखी बनाने के साधन जुटाये जाते हैं। अविकसित मनोभूमि पत्नी तक बहुत हुआ तो बच्चों तक सीमित होकर रह जाती है किन्तु जिनने अपने को बढ़ाया है वे माता-पिता, भाई-बहिन से लेकर मित्र, पड़ौसी तक की सुख-शान्ति में पूरी दिलचस्पी लेते हैं, और अपने से जो बन पड़ता है उसमें कुछ उठा नहीं रखते। आत्म-विकास की मात्रा यदि अधिक हुई तो उसी अनुपात से ग्राम, नगर, प्रान्त देश और अन्ततः समस्त बिखरे हुए मानव प्राणियों में यह ममत्व फैलता है। वे सब आत्मीयजन लगते हैं। उनके दुख दर्द अपने प्रतीत होते हैं ओर निज के कष्टों का निवारण करने के लिए जैसी चिन्ता एवं चेष्टा रहती है वैसी ही उनके लिए भी सहज ही बन पड़ती है। वसुधैव कुटुम्बकम् की विश्व परिवार की मान्यता इसी स्थिति में परिपक्व होती है। तब सबमें एक ही आत्मा-एक ही विश्वात्मा ओत-प्रोत दीखती है। सभी अपने प्रतीत होते हैं। पराया कोई दीखता ही नहीं। जहाँ अपनापन होगा वहाँ प्रेम की उमंगे उठेंगी। सहानुभूति जगेगी फलतः उदारता, सेवा, सहायता का भाव भरा सहृदय व्यवहार ही सबके साथ बन पड़ेगा। यह आत्म-विस्तार ही समस्त अध्यात्म विज्ञान का एकमात्र लक्ष्य है।
आत्मीयता का विस्तार मनुष्यों तक सीमित न रहकर क्रमशः प्राणिमात्र में विस्तृत होता चला जाता है। तब अन्य प्राणी भी अपना ही कुटुम्बी लगता है। उनकी सुविधाओं का भी ध्यान रखता है। उनके कष्टों में भी अपने जैसे कष्ट की अनुभूति होती है। मानवी अन्तःकरण का जहाँ सन्तोषजनक स्तर तक विकास होगा वहाँ स्नेह, सौजन्य का समुद्र उमड़ रहा होगा। अकारण कष्ट किसी भी प्राणी को दे सकना सम्भव न रहेगा। ऐसे मनुष्य प्राणियों का वध करके उनका माँस खाने की कल्पना भी नहीं कर सकते। यह नृशंस कृत्य उन्हें उतना ही कष्टकारक होता है जितना किसी सामान्य व्यक्ति को अपने बच्चे या भाई को मारकर खाना। जीभ के स्वाद अथवा शरीर पुष्टि की लालसा जैसे अत्यंत तुच्छ स्वार्थ के लिए अन्य प्राणियों को मर्मान्तक पीढ़ा देना केवल पाषाण हृदय असुरों से ही बन पड़ सकता है जिसमें आत्मा की सत्ता मौजूद है और वह सुविकसित कहे जा सकने वाले स्तर तक जा पहुँचा है उसके लिए माँसाहार का ग्रास हाथ से उठा सकना भी सम्भव न होगा। इस कृत्य को करते हुए उसका हृदय धड़केगा और हाथ काँपेंगे।
यह समस्त सृष्टि हमारे ही लिए नहीं बनाई गई हैं। समस्त विश्व वसुधा हमारी वपौती नहीं है। अन्य प्राणी भी ईश्वर के बनाये हैं और उस धरती पर रहने तथा प्रकृति सम्पदा का उपभोग करने का अधिकार उन्हें भी है। सबके अधिकार छीनकर, सबके अस्तित्व को खतरे में डालकर हम अपनी ही स्वार्थ लिप्सा पूरी करने की बात सोचे तो यह संकीर्ण स्वार्थपरता अनीति मूलक ही होगी। उससे मानवता का गौरव गिरेगा ही।
हम अपने को एकाकी अनुभव न करें। अपनत्व का दायरा विस्तृत करते चले जायं तभी व्यक्ति की महानता और समाज की सुख-शाँति स्थिर रह सकेगी।
मनुष्य अधिक उन्नति की-अधिक उपलब्धि की बातें सोचता किन्तु यह भूल जाता है कि जो उपलब्ध है उसका श्रेष्ठतम उपयोग करके भविष्य की लम्बी-चौड़ी आशाएँ बाँधे रहने और लालसाओं में उलझे रहने की अपेक्षा अधिक लाभान्वित हुआ जा सकता है।
भविष्य आशाजनक भी है और निराशाजनक भी। यह ठीक है कि अधिक पुरुषार्थ करके भविष्य में अबकी अपेक्षा अधिक सुख साधन प्राप्त किये जा सकते हैं, पर साथ ही यह भी समझने योग्य बात है कि आयु बर्फ की तरह गलती चली जा रही है और विनाश का दिन क्रमशः निकट आता चला जा रहा है। भविष्य की आशा रखी जानी चाहिए, पर साथ ही उसके साथ द्रुतगति से कदम बढ़ाकर चलते आ रहे महाविनाश को भी देखना चाहिए और यह सोचना चाहिए कि समस्त आशाओं पर पानी फेर देने वाली मृत्यु द्वारा गरदन मरोड़ दिये जाने से पूर्व कुछ ऐसा कर लिया जाय तो सन्तोषजनक हो। यह तभी सम्भव है जब मनुष्य भविष्य चिन्तन की बालक्रीड़ा में ही न उलझा रहे वरन् वर्तमान के श्रेष्ठतम सदुपयोग की प्रौढ़ बुद्धिमत्ता का परिचय देना स्वीकार करे।
भविष्य की आशा रखी जानी चाहिए, पर विनाश के अवश्यम्भावी तथ्य को पूर्णतया विस्मृत नहीं कर दिया जाना चाहिए। अधिक प्रगति करने की योजनाएं बनाते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मरण अवश्यम्भावी और वह निर्धारित आशाएँ पूर्ण होने से पहले भी आ धमक सकता है। इसलिए जो उपलब्ध है उसके सदुपयोग की बात को प्रधानता दी जाय, अत्यधिक आशान्वित कल्पनाएँ करते रहने से, वर्तमान आँखों से ओझल हो जाता है और दुहरी मार पड़ती है। ध्यान दूर देश पर अटका रहने से इन क्षणों में जो किया जा सकता था वह भी बन नहीं पता और भविष्य की सम्भावनाएँ तो दिवास्वप्न हैं उनमें से कौन कितनी पूरी होती हैं यह पुरुषार्थ के साथ-साथ परिस्थितियों पर भी निर्भर होने के कारण सर्वथा अनिश्चित रहता है।
विनाश की कल्पना डरावनी है और वह आवेशग्रस्त हो तो शिथिलता और निराशा भी लाती है किन्तु यदि तथ्यों का अनिवार्यता को ध्यान में रखते हुए यथार्थता को समझा जाय और वस्तुस्थिति को ध्यान में रखकर जीवन नीति का निर्धारण किया जाय तो यह दूरदर्शी विवेकशीलता ही कही जायगी।
अन्त हर चीज का होना है। हमारी पृथ्वी का भी और उसके जन्मदाता सूर्य का भी जन्म के साथ ही मरण का विधान चल पड़ता है और जैसे-जैसे दिन गुजरते आते हैं वह भयावह घड़ी सामने आ खड़ी होती है जिसके सामने अनिच्छा रहते हुए भी सिर झुकाना पड़ता है। क्या परम तेजस्वी, शक्तिशाली और लोक पालक सूर्य का भी अन्त हो जायगा? इस प्रश्न के उत्तर में इस सम्भावना को भी वैज्ञानिक दृष्टि रखकर निश्चित रूप से सामने खड़ा देखा जा सकता है। बड़ी सत्ता विकसित होने में और नष्ट होने में अपने आकार विस्तार के अनुसार अधिक समय ले सकती हैं। मनुष्य जैसी तुच्छ सत्ताएँ स्वल्प काल में समाप्त हो सकती है और अन्तर रहते हुए भी भरण तो ऐसा सुनिश्चित तथ्य हैं जिसे कोई टाल नहीं सकता।
वैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार सूर्य की हाइड्रोजन का एक ओर से जलना दूसरी ओर हिलियम की मजबूत परतें जमा कर रहा है। इसकी मोटी परतें फुटबाल पर चढ़े हुए चमड़े की खोल की तरह उसकी भीतरी स्थिति की एक दायरे में रोकथाम करती है। इस आवरण से गामा किरणें उसके भीतर बड़ी मात्रा में कैद होती चली जा रही हैं। कभी-कभी गामा किरणें हिलियम के आवरण को छेदकर ऊपर निकल आती हैं तब सूर्य से भयंकर चुम्बकीय तूफान उठते दिखाई पड़ते हैं, पर यह खोल जब अधिक मजबूत हो जायेगा तो उनका बाहर निकल सकना भी रुक जायगा।
अन्ततः सूर्य को किस स्थिति का सामना करना पड़ेगा इसके सम्बन्ध में दो मत हैं एक तो यह है कि हाइड्रोजन समाप्त हो जाने पर वह तेल चुकने वाले दीपक की तरह बुझकर शान्त हो जायगा। दूसरा मत यह है कि हिलियम परतों के भीतर गामा किरणें एक अत्यन्त भयंकर विस्फोट करेंगी उसके टुकड़े-टुकड़े होकर अनन्त आकाश में छितरा जायेंगे। भूतकाल में महासूर्य एक विस्फोट कर चुका है। वर्तमान सौरमण्डल के ग्रह-उपग्रह उसी से बने हैं। अब रहा बचा वर्तमान सूर्य फिर विस्फोट करेगा तो उससे भी छोटे-छोटे ग्रह पिण्ड बन जायेंगे, पर मूल सूर्य की शक्ति समाप्त हो जाने पर अब के तथा उस समय के ग्रह पिण्ड किस केन्द्र सूर्य की परिक्रमा करेंगे यह नहीं कहा जा सकता, सम्भव है कोई बहुत दूर का महासूर्य इन अनाथों को अपनी ओर खींच ले और अपने बाड़े में जकड़ कर कैद कर लें।
सूर्य ही नहीं अन्यान्य ग्रह-नक्षत्र भी प्रगति विस्तार के साथ-साथ मरण विनाश की दिशा में भी द्रुतगति से भागे चले जा रहे हैं। ब्रह्मांड रूप महादैत्य-शरीर में अपनी पृथ्वी एक कोशिका की बराबर है जिनका जन्म और मरण स्वल्पकालीन ही होता है। विशाल पिण्डों की तुलना में अपनी पृथ्वी छोटी होने के कारण वह और भी जल्दी मरेगी। महाविनाश का पूर्णाभ्यास खण्ड प्रलयों के रूप में खेल-खेल के साथ करती भी रहती है जैसा कि मनुष्य मृत्यु का पूर्वाभ्यास कठिन रोगों से ग्रसित होकर करता रहता है।
पृथ्वी अब तक कई बार खण्ड प्रलय के कुचक्र में पिसते-पिसते बच चुकी है। आगे कब तक वह अपनी सुरक्षा स्थिर रखे रह सकेगी कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।
पिछली खण्ड प्रलयों का विश्लेषण करते हुए भू-गर्भ वेत्ता बताते हैं कि धरती एक विशाल चुम्बक है। उसके गर्भ में दो तरल द्रव भरा हुआ है वही उसे आकर्षण शक्ति का विपुल भण्डार प्रदान करता है। पृथ्वी की सतह पर जो बल कार्य कर रहे हैं उनसे न केवल पदार्थों की वरन् प्राणियों की भी वर्तमान स्थिति बनी हुई है।
जिस प्रकार सभी चुम्बकों के दो ‘पोल’ होते हैं उसी प्रकार पृथ्वी के भी हैं। मोटेतौर से उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों को पृथ्वी के ‘पोल’ कहा जाता है, पर वे भौगोलिक ध्रुव मात्र है- चुम्बकीय ध्रुव उनसे हटकर है और वे क्रमशः एक दूसरे का स्थान ग्रहण करने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। भौगोलिक ध्रुव बहुत धीमी गति से बदलते हैं, पर चुम्बकीय ध्रुवों के बारे में ऐसी बात नहीं है वे तेजी से अपना स्थान परिवर्तन कर सकते हैं और एक स्थान दूसरा ग्रहण कर सकता है। जब ऐसा पूर्ण परिवर्तन सम्पन्न होता है तो बीच का कुछ समय ऐसा आता है जिसमें एक प्रकार से चुम्बकीय रिक्तता उत्पन्न हो जाती है। यह बहुत ही संकट एवं उथल-पुथल का समय होता है।
भूगोल शास्त्री उस खण्ड प्रलय की बात जानते हैं जब स्थिर हुई पृथ्वी और व्यवस्थित रीति से चल रही प्राणि सृष्टि में अचानक व्यवधान उत्पन्न हुआ था। अन्धाधुन्ध बादल बरसे थे और थल ने जल का- जल ने थल का स्थान ग्रहण कर लिया था। जब वह खण्ड प्रलय रुकी तो पहले के प्राणी अधिकतर नष्ट हो गये थे और जो बचे थे उनने अपनी आकृति-प्रकृति में भारी अन्तर कर लिया था। तब ‘रेडियो लारिया’ नामक समुद्री एक सेल वाले जीव की नई जातियाँ प्रकाश में आई थीं और पुरानी जातियाँ सर्वथा लुप्त हो गई अथवा आमूल-चूल बदल गई थी। यह ध्रुवीय परिवर्तन की सान्ध्यवेला का चमत्कार था।
बढ़ते-बढ़ते जब चुम्बकीय ध्रुव उत्तर से दक्षिण में और दक्षिण से उत्तर में जा पहुँचते हैं तो कुछ समय के लिए चुम्बकीय शून्यता आती है और उससे एक प्रकार से अंतर्ग्रही ही अराजकता फैला जाती है। पृथ्वी ने अपने चारों ओर एक चुम्बकीय घेरा बनाया हुआ है। उस ढाल पर अन्तरिक्ष से बरसने वाली कास्मिक किरणें टकराकर इधर-उधर छितरा जाती हैं। यदि वे सीधी धरती तक आने लगें तो उनका भौतिक प्रभाव तो होगा ही जीवधारियों की आनुवांशिक परिस्थितियाँ भी उलट जायेंगी। प्राणियों को उत्पन्न करने वाले ‘जीन’ अपनी परम्परागत विशेषताएँ खो बैठेंगे और उनमें ऐसे हेर-फेर हो जायेंगे जिससे नई पीढ़ियाँ आपने पूर्वजों की अपेक्षा सर्वथा बदली हुई आकृति एवं प्रकृति की बन जायें। जीव सेलों के मध्य में रहने वाला ‘क्रोमोटीन’ नामक पदार्थ कास्मिक किरणों से अत्यधिक प्रभावित होता है।
चुम्बकीय ध्रुव परिवर्तन की वह घड़ी जिसमें चुम्बकीय शून्यता उत्पन्न होगी सबसे अति निकट संकट सामने आ खड़ा होगा। तब कास्मिक रेडियेशन का सामना पृथ्वी वालोँ को करना पड़ेगा। उसका वर्षा, बर्फ, गर्मी, तूफान आदि के रूप में क्या ऋतु प्रभाव पड़ेगा इसका सही अनुमान तो नहीं लगाया जा सका है, पर आनुवांशिक उत्परिवर्तन, जेनेटिक म्यूटेशन की आशंका निश्चित रूप से की जा रही है। उस परिवर्तन से मनुष्यों एवं अन्य प्राणियों की शरीर रचना-रोग स्थिति एवं उपचार पद्धति का नये सिरे से ककहरा पढ़ते। प्राणियों की आकृति ही नहीं कार्य क्षमता, रुचि एवं आवश्यकता भी बदल सकती है तदनुसार नये किस्म के भौतिक शास्त्र का श्रीगणेश हो सकता है।
प्रायः 15 करोड़ वर्ष बाद यह ध्रुवीय परिवर्तन आते हैं। पिछले परिवर्तन से पृथ्वी के दो महाद्वीप उलट-पुलट करके पाँच बन गये थे। भविष्य में स्थिति क्या और कैसी बनेगी-इस सम्बन्ध में अभी केवल आशंका भरी अटकलें ही लगाई जा सकी हैं।
बीच-बीच में हिमयुग आते हैं और धरती को अस्त-व्यस्त करके रख जाते हैं। प्राणियों का तो महाविनाश ही होता है उनके लिए तो वह भी महाप्रलय ही होती है। जहाँ-तहाँ जो जीवधारी बचते हैं वे ही नई परिस्थितियों में अपना वंश चलाते और नई परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढालते हैं।
पृथ्वी पर अब तक कितने ही हिमयुग आ चुके हैं। उनमें से आरम्भिक काल में वे बहुत लम्बे समय तक टिकने वाले भी रहे हैं। पीछे कुछ स्वल्पकालीन भी रहे हैं। सम्भवतः वे उष्ण युग के मध्यान्तर थे जो ज्वार-भाटों की तरह पाक्षिक रूप से ही नहीं हर दिन भी हलके-हलके आते रहते हैं।
संसार के मौसम विज्ञानी इन दिनों यह बता रहे हैं कि एक छोटे हिमयुग का आरम्भ हो चुका है और वह तेजी से निकट आ रहा है। सर्दी बढ़ने से संसार के सामने जो समस्याएँ उत्पन्न होंगी उनमें बड़ी समस्या खाद्यान्न उत्पादन में भारी-कमी होने की भी है। ठण्ड अधिक पड़ने का बुरा प्रभाव पौधों पर पड़ता है, उनका उगना बढ़ना रुक जाता है और फूलने-फलने में भारी कमी पड़ती है। यह तथ्य सर्वविदित है।
इंग्लैंड के मौसम विज्ञानी ह्यूर्वट लैम्ब ने हिसाब लगाकर बताया है कि अब हर वर्ष ठण्ड बढ़ती जायगी इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में अर्थात् अब से तीस-चालीस वर्ष बाद ठण्ड इतनी अधिक बढ़ जायगी कि उससे शारीरिक और आर्थिक प्रभाव का सामना करने की तैयारी अभी से करदी जानी चाहिए।
अपने प्रतिपादन की पुष्टि में अनेक अन्य प्रमाण प्रस्तुत करते हुए डा. ह्यूवर्ट ने एक प्रमाण यह भी दिया है कि आर्मडिलो जाति के प्राणी जो गर्म मौसम पसन्द करते हैं कुछ समय पूर्व उत्तरी देशों में बस गये थे अब वे उस क्षेत्र को खाली करके दक्षिणी गर्म भागों में उत्तर रहें हैं। कहना न होगा कि इन प्राणियों का भविष्य ज्ञान असंदिग्ध ही होता है।
वैज्ञानिक अनुमान है कि इक्कीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में बढ़ी हुई ठण्ड के कारण भारत के कई भाग बर्फ से ढक जायेंगे। न केवल भारत वरन् संसार के कितने ही अन्य क्षेत्र भी हिमाच्छादित दिखाई पड़ेंगे।
प्रागैतिहासिक काल में कितने ही हिमयुग आये हैं। प्रथम हिमयुग अब से 60 करोड़ वर्ष पहले आया था जिसने भारत समेत, यूरोप, चीन, दक्षिणी अफ्रीका, आस्ट्रेलिया के अधिकाँश भागों को हिमाच्छादित कर दिया था। दूसरा हिमयुग जिसे परमोकार्वा निफेरस’ काल कहते हैं दक्षिणी अमेरिका, दक्षिणी अफ्रीका, आस्ट्रेलिया में लम्बे समय तक रहा उसमें भारत भी प्रभावित हुआ था। अब से 25 लाख वर्ष पूर्व तीसरा हिमयुग आया था, उस समय को ‘प्लीस्टीसीन’ कहते हैं। इसका प्रभाव उत्तरी अमेरिका, इंग्लैंड, रूस, चीन, आस्ट्रेलिया आदि पर पड़ा था एक तिहाई धरती बर्फ से ढंक गई थी। इसके बाद मौसम गर्म हुआ और मोटी बर्फ सिर्फ उत्तरी दक्षिणी ध्रुवों पर जमी रह गई। बढ़ती हुई गर्मी का अधिकतम तापमान ईसा से 5000 वर्ष पूर्व से लेकर 3000 वर्ष पूर्व तक रहा। उस दो हजार वर्ष की अवधि को अब तक के उपलब्ध प्रमाणों में सबसे अधिक गरम कह सकते हैं। इसके बाद ठंड गर्मी के छोटे-छोटे उतार-चढ़ाव आते रहे हैं, कोई बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं हुआ। ईसा से 200 वर्ष पूर्व से ठण्ड बढ़ी सन् 1000 से गर्मी का उभार आया जो 200 वर्ष चला। फिर गर्मी फिर सर्दी की लहरों में सत्रहवीं सदी में यूरोप के कितने ही देश ठंड से बहुत प्रभावित हुए। 1690 का यूरोप का अकाल जिसमें इंग्लैंड सबसे अधिक प्रभावित हुआ, ठण्ड के कारण ही पड़ा था। फसल बुरी तरह नष्ट हो गई थी और जानवर मर गये थे। टेम्स नदी उन्हीं दिनों सबसे अधिक समय तक जमी रही थी।
अब 1940 के बाद फिर शीत की लहर आई है और तापमान बराबर घटता जा रहा है। यह अभी गिरता ही जायगा। इक्कीसवीं सदी इससे अत्यधिक प्रभावित होगी। इससे मनुष्य पर शारीरिक, मानसिक प्रभाव पड़ेंगे। वृद्धि रुकेगी। क्या जानवर क्या पौधे सभी को विकसित होने में कठिनाई पड़ेगी। वे सिकुड़ते गिरते चले जायेंगे। हिम त्रास से बचने के लिए अधिक ईंधन की जरूरत पड़ेगी। सबसे बड़ी बात होगी खाद्यान्नों की कमी। ठंड पौधों के विकास में बाधा पहुँचाती है, उपयुक्त सिंचाई के साधन न मिलने पर उन्हें ठंड का शिकार होकर नष्ट होना पड़ता है। ऊर्जा की कमी पड़ने से कल कारखाने ठप्प हो जाते हैं, मशीनें गरम रखने के लिए अधिक ईंधन की जरूरत पड़ती है। शीत वृद्धि के साथ-साथ कितने ही रोग पनपते हैं और कमजोरों की जान पर आ बनती है।
हिमयुग क्यों आते हैं? इसके उत्तर में कई बातें कही जा सकती है। पृथ्वी पर जो गर्मी आती है वर विशुद्ध रूप से सूर्य का अनुदान है। यदि सूर्य अपना हाथ सिकोड़ ले तो अपनी धरती देखते-देखते बर्फ का गोला बन जायगी और जीवन के समस्त चिन्ह समाप्त हो जायेंगे और। सूर्य की किरणें जहाँ भी जब सीधी पड़ती हैं तब वहाँ तापमान बढ़ जाता है। जब किरणें तिरछी पड़ती हैं तो ठंड बढ़ने लगती है। सर्दी और गर्मी के मौसम सूर्य किरणों के तिरछी या सीधी होने के कारण ही आते हैं। सूर्य के चारों ओर पृथ्वी परिक्रमा करती है, उसकी कक्षा में अंतर आना भी तापमान घटने-बढ़ने का कारण होता है। सौर-मण्डल के अन्य ग्रहों का गुरुत्वाकर्षण भी घटता-बढ़ता रहता है और वह सर्दी-गर्मी को घटाता-बढ़ाता है।
जंगलों का कटना, कल कारखानों का बढ़ना जैसे कारणों से भी आकाश का सन्तुलन बिगड़ता है। हवा से बढ़ी हुई कार्बनडाइ आक्साइड तथा धुँआ और धूलि कणों से छाने वाली धुँध सूर्य और पृथ्वी के बीच एक मोटा आवरण खड़ा करती हैं और आदान प्रदान रोकती हैं। धरती अपनी अनावश्यक गर्मी ऊँचे आकाश में उड़ा नहीं पाती दूसरी ओर सूर्य ऊर्जा भी उस छतरी से रुक जाती है। इस असंतुलन में जो पलड़ा भारी पड़ता है उसी के अनुसार सर्दी या गर्मी के ज्वार-भाट उठते हैं और नया परिवर्तन होने तक उसी ढर्रे पर लुढ़कते रहते हैं।
इन बड़े तथ्यों को हम देखें तो स्पष्ट दिखाई देगा कि सूर्य और पृथ्वी सहित समस्त विश्व ब्रह्मांड विकास और विनाश के झूले में झूल रहा है। मनुष्य जैसा तुच्छ प्राणी भी इसका अपवाद नहीं है। वह बढ़ता तो है पर मरता भी निश्चित रूप से है। केवल विकास ही विकास के रंगीन सपने देखना और विनाश की विभीषिका से आँखें मूँद लेना गलत है। बुद्धिमत्ता यही है कि दोनों को संतुलित दृष्टि से देखें और ऐसी नीति निर्धारित करें जो जीवन और मरण की उभय पक्षीय संभावनाओं को संतुलित बनाये और एकाँगी चिन्तन को भूल से सतर्कता पूर्वक बचायें।
कीड़े-मकोड़े हमें अपनी तुलना में दयनीय स्थिति में पड़े हुए दिखाई पड़ते, पर वस्तुस्थिति वैसी हैं नहीं। हमारी अपनी दुनिया है और कीट-पतंगों की अपनी। हमें अपनी चेतना के अनुरूप जिस दुनिया का ज्ञान एवं अनुभव है वह हमारे लिए विभिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ और परिस्थितियाँ प्रस्तुत करती रहती हैं। हम अपनी दुनिया को जानते और समझते हैं उसे परिपूर्ण मानते हैं, जो उसमें लाभ-हानि है उन्हें ही सर्वांगीण मानते हैं, पर यह मान्यता मिथ्या हैं। वस्तुतः भगवान ने हर प्राणी का एक संसार बनाया है वह उसमें खोया रहता है और अनुभव करता है कि न केवल उसका कार्यक्षेत्र पूर्ण है वरन् उसकी चेतना भी उसके लिए पर्याप्त सुखद है। उसे जो ज्ञान मिला है वह उसके अपने संसार के साथ मनोरंजक सम्बन्ध बनाये रहने के लिए पर्याप्त है।
शरीर में अगणित जीवाणु काम करते हैं। वे जड़ नहीं है, चेतन सत्ता उनमें काम करती है। उस चेतना के द्वारा वे जीव कोष अपने निर्धारित कर्तव्यों को भली प्रकार पूरा कर लेते हैं। उपयोगी से लाभ उठाना और अनुपयोगी को मार, पछाड़ कर दूर कर देना उनका दैनिक कृत्य है। पारस्परिक सहयोग के विधान से वे पूर्ण परिचित है और उसका समुचित व्यवहार करते हैं। जन्मने, प्रौढ़ होने, मरने, पुरुषार्थ करने, सन्तानोत्पादन करने, उत्तराधिकारियों को प्रशिक्षित करने आदि का कैसा सुन्दर क्रम जीवाणु जगत में चल रहा है उसे देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। यदि हम जीवाणु होते और किसी शरीर के एक घटक बनकर रह रहे होते तो अनुभव करते कि अपना कार्य क्षेत्र इतना ही सुखद, सुन्दर एवं सुविधाजनक है जितना कि मनुष्य अपने कार्य क्षेत्र को अनुभव करता है। शक्ति और अनुभूति मनुष्य को अपने ढंग का काम चलाने के लिए मिली है और जीवाणुओं को अपने ढंग की। दोनों का निर्माण पृथक-पृथक ढंग से और पृथक-पृथक कार्यों के लिए हुआ है। अस्तु उन्हें शरीर और अनुभूतियाँ भी उसी स्तर का निर्वाह करने के योग्य मिली हैं। यदि हम जीवाणु होते तो मनुष्यों से कोई शिकायत न करते कि आप इतने सुविकसित है और हम इतने पिछड़े। हमें भी हाथी से कहाँ कुछ शिकायत है कि आपको इतना बड़ा शरीर, इतना बल मिला है, आप इतना अधिक भोजन खाते रहने में समर्थ हैं जबकि हम मुट्ठी भर अनाज भी ठीक से नहीं पचा पाते।
कीड़े-मकोड़ों की दुनिया दयनीय नहीं है। उन्हें बेचारे समझना गलत हैं। अपनी दुनिया में वे अपने ढंग का पूरा-पूरा कोशल दिखाते होंगे और उस स्थिति में सम्भवतः उतने ही रुष्ट-तुष्ट रहते होंगे जितने कि हम मनुष्य अपने कार्य क्षेत्र में उपलब्ध शरीर और मन के सहारे सुखी-दुखी रहते हैं।
मकड़ी छोटा-सा घिनौना जीव है पर उसके सम्बन्ध में उपलब्ध तथ्य काम मनोरंजक नहीं है। ब्रिटिश कीट विज्ञानी जोसेफ आरेल्ड ने हिसाब लगाया है कि उस देश के चरागाहों में प्रति एकड़ पीछे 22 लाख मकड़ियाँ रहती हैं। इनकी छोटी-बड़ी 550 किसमें गिनी जा चुकी है। उनका आधा समय शिकार पकड़ने और खाने में लगता है। वे बहुत खाती और बहुत पचाती हैं। इंग्लैंड की मकड़ियाँ जितने कीड़े खाती हैं उनका वजन उससे भी अधिक बैठेगा जितना कि उस देश में मनुष्यों का वजन है।
तपते हुए रेगिस्तानों में, हिमाच्छादित पर्वत शिखरों पर, कोयले की गहरी खदानों में, मरुस्थलों और दलदलों में, अँधेरी गुफाओं में सर्वत्र मकड़ी को अपने सुरक्षित जाल में विराजमान पाया जा सकता है।
संसार भर में 50 हजार जाति की मकड़ियाँ गिनी गई हैं, इनमें पिन की नोंक के बराबर छोटी से लेकर ‘माइगेल’ जैसी दैत्याकार सम्मिलित है। दक्षिणी अमेरिका में पाई जाने वाली माइगेल चिड़ियों, छिपकलियों, गिरगिटों, गिलहरियों और चूहे, मेंढ़कों को सहज ही उदरस्थ कर लेती है। ब्लैक विडो, शूवेटन, आवर ग्लेस जैसी मकड़ियाँ जहरीले साँपों से भी कहीं अधिक विषैली होती है।
मकड़ी के पिछले भाग में छह रस स्रावी ग्रन्थियाँ होती हैं, उसी से वे रस निकालती हैं जो सूखते-सूखते रेशम जैसा धागा बन जाता है इसी को कुशलता पूर्वक घुमा फिरा कर वे जाला बुनती हैं, जिससे वे अपने निवास, विश्राम की और शिकार पकड़ने की आवश्यकता पूरी करती हैं। नदी, नाले पार करने के लिए वे तार के पुल बनाती हैं। इसके लिए वे किसी ऊँचे पेड़ पर चढ़ जाती हैं और अनुकूल हवा की प्रतीक्षा करती हैं। अवसर मिलते ही वे तार बुनना शुरू कर देती हैं और उसी से अपने को बाँध कर पतंग की तरह उड़ती हुई इस पार से उस पार जा पहुँचती है। कुछ तो तालाबों की सतह पर अपना जाल बिछाती और भुनगे पकड़ती देखी गई है।
मादा मकड़ियाँ नर से मजबूत, बड़ी और खूँखार होती है। उनका ऋतु काल आने पर मादक गन्ध से आकर्षित होकर मकड़े निकट आते तो हैं पर अपनी जान की खैर मनाते हुए ही फूँक-फूँक कर कदम धरते हैं। दूर रहकर वे नाचते-कूदते हैं और प्रणय प्रस्ताव करते हैं। मकड़ी को प्रस्ताव स्वीकार हुआ तो उसे समीप बुलाती है और अपना काम बनाकर उस अभागे को तत्काल उदरस्थ कर लेती है। यदि प्रस्ताव स्वीकार न हुआ तो तुरन्त उसका झटका कर देती है। चतुर मकड़े छोटी मकड़ियों को पाल कर उनके युवा होने की प्रतीक्षा करते हैं इस स्नेह, सान्निध्य के सहारे वे अपनी जान बचा लेते हैं और गृहस्थ भी भोग लेते हैं।
मकड़ी का जाला संसार का सबसे मजबूत किस्म का धागा है। अमेरिका में आँखों के आपरेशन में सिलाई के लिए, इसी प्रकार से अर्जियोपे जाति की मकड़ी के जाले से बना धागा काम में लाया जाता है। आस्ट्रेलिया के आदिवासी एक बड़ी जाति की मकड़ी के जाले के मछलियाँ और चिड़ियाँ पकड़ने के कई तरह के मजबूत जाल बुनते हैं वे मुद्दतों चलते हैं और सहज ही नहीं टूटते। इस धागे की मोटाई एक इंच का लाखवाँ भाग होती है, साधारणतया जो एक धागा हमें दिखाई पड़ता है उसमें दर्जनों पतले धागे होते हैं उनसे मिलकर एक इकाई बनती है। वे परस्पर किस कुशलता के साथ काते और ऐंठे गये होते हैं यह देख कर स्तब्ध रह जाना पड़ता है। यह धागे लचकदार होते हैं और अपने आकार से सवाये खिंच कर बढ़ सकते हैं। जब कोई धागा टूट जाता है तो मकड़ी उसमें नया लस लगाकर मरम्मत कर देती है। इस प्रकार वे टूट-फूट के कारण नष्ट होने से बचे रहते हैं।
घरेलू झींगुर रात को जब अपना आरचेस्ट्रा सजाता है तो लगता है स्वर ताल का समग्र ज्ञान रखने वाला कोई कुशल कलावन्त सधे हुए हाथ से वायलिन के स्वर झंकृत कर रहा है और साथ ही उसके सहायक अन्य बाजे बज रहे है। उसकी ध्वनि इतनी तीव्र होती है मानो वाद्य यन्त्र के साथ किसी ने शक्तिशाली लाउडस्पीकर फिट कर दिया हो। यह ध्वनि-विस्तार-यन्त्र सहित वायलिन उसकी पीठ पर लदा होता है।
झींगुर की पीठ पर दो चौड़े भूरे रंग के पंख होते हैं। इन्हीं के सहारे वह कुलाचें भरता है। इन पंखों में कुछ धारियाँ होती हैं, इन्हीं को परस्पर घिस कर वह अपना संगीत प्रवाह निसृत करता है। यही वह उपकरण है जिससे कई प्रकार की स्वर धारायें निकलतीं हैं। मोटे रूप से एक जैसी ध्वनि सुनाई पड़ती है, पर ध्यान देने पर प्रतीत होता है कि इसमें एक नहीं कितने ही उतार-चढ़ाव भरे स्वर हैं। उनमें मुख्यतया तीन और विशेषतया सत्रह स्वर सुने जा सकते हैं। कभी धीमी कभी तीव्र आवाजें उनमें से निकलती हैं और वे सदा एक जैसी नहीं होती वरन् राग-रागनियों की तरह अपने द्वारा प्रवाह में हेर-फेर उत्पन्न करती हैं।
भारतीय संगीत शास्त्र ऋतु एवं समय के अनुरूप राग-रागनियाँ गाये बजाये जाने का अनुशासन है। अब वह परम्परा संगीतज्ञों ने छोड़ना शुरू कर दिया है पर झींगुर अपने लिए प्रकृति द्वारा निर्धारित संगीत परम्परा का पूरी तरह पालन करते हैं। उनके गीत वातावरण के तापमान का प्रतिनिधित्व करते हैं। 55 अंश फारेनहाइट से कम तापमान पर झींगुर मौन साधे रहते हैं। 100 से ऊपर यह गर्मी निकल जाय तो भी वे चुप हो जाते हैं। 55 और 100 डिग्री के बीच का तापक्रम रहेगा तो ही वे अपना वायलिन बजायेंगे। उनका संगीत न निरुद्देश्य होता है और न स्वर, ताल में रहित। इस गायन में उनकी प्रसन्नता, कठिनाई, क्षुधा, भय, आक्रोश, प्रणय निमन्त्रण आदि के भाव भरे रहते हैं। स्वर, ताव में ऐसी क्रम बद्धता रहती है कि वे संगीत शास्त्र की परीक्षा में शत-प्रतिशत नम्बरों से उत्तीर्ण हो सकते हैं। उनकी झंकार एक मील की दूरी तक टेप की गई है।
मादा और बच्चों को यह कला नहीं आती केवल प्रौढ़ झींगुर ही अपना राग अलापते हैं। विभिन्न देशों के वातावरण के अनुरूप उनकी आवाज में अन्तर आ जाता है। न केवल उनका रंग, रूप वरन् ध्वनि प्रवाह भी बदल जाता है। प्रकृति-विज्ञानी झींगुरों के स्वर का अध्ययन करके वातावरण का तापमान सही-सही बता देते हैं। इतना ही नहीं निकट भविष्य में वर्षा होने न होने, मौसम में उतार-चढ़ाव आने, आँधी तूफान की सम्भावना, शकुन-अपशकुन आदि का निष्कर्ष निकालते हैं मानो झींगुर, मात्र कीटक न होकर कोई निष्णात भविष्य वक्ता हो।
कीट-पतंग हमें गूँगे, बहरे दिखाई पड़ते हैं पर वस्तुतः वैसा ही नहीं वे आपस में घुल-घुल कर बातें करते हैं एक दूसरे के साथ विचार विनियम करते हैं और पारस्परिक सहयोग जुटाने मेँ उस संभाषण का प्रयोग करते हैं। यह अलग बात है कि उनके सम्भाषण उपकरण मनुष्यों से भिन्न है और उनका शब्द कोष हमारे उच्चारण विधान से मेल नहीं खाता।
मिशिगन विश्वविद्यालय के कीट विज्ञानी डा.चाडाँक के अनुसार कीड़े-मकोड़े भी परस्पर विचारों का आदान-प्रदान करते हैं यदि उनमें यह क्षमता न रही होती तो उनका जीवित रहना ही असम्भव हो जाता, पक्षी निरर्थक चहचहाते मालूम पड़ते हैं पर वस्तुतः वे अपनी प्रसन्नता, व्यथा, योजना, जानकारी आदि की सूचनायें अपने साथियों को देते हैं। ध्वनि के साथ-साथ उनकी मन-स्थिति घुली होती है जिसकी
जानकारी उस वर्ग के अन्य पक्षी प्राप्त करते हैं और उससे लाभ उठाते हैं। खतरा किसी एक को मालूम पड़ जाय तो वह अपनी भाषा में अपने साथियों को सूचित कर देता है, फिर सब मिलकर उसी का उच्चारण करते हैं ताकि न केवल साथियों को आगाही हो जाय वरन् शिकारी शत्रु को उनकी सतर्कता एवं आक्रामक सम्भावना के कारण आक्रमण करने का इरादा ही बदलना पड़े।
छोटे-कीड़ों की भाषा नहीं होती वे अंग स्पर्श से विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। यह स्पर्श ऐसे ही निरर्थक नहीं होता वरन् उसकी एक व्यवस्थित संकेत शृंखला होती है जिससे उस वर्ग के कीड़े भली प्रकार परिचित होते हैं। एक दूसरे के किस अंग को किस पकड़ के साथ छुए और क्या हलचल करे इस प्रक्रिया से वे साथियों को अपने मन की बात बता देते हैं। ध्वनि, स्पर्श, दृष्टि और हलचल के माध्यम से छोटे जीवों का आदान-प्रदान चलता है। हम अपने स्तर पर उन्हें मूक कह सकते हैं पर वस्तुतः बोलते वे भी हैं। उनका उच्चारण इतना मन्द होता है कि हमारे कान उन्हें सुन, समझ नहीं सकते फिर भी वे जिह्वा से न सही शरीर के विभिन्न अंगों की हलचलों या रगड़ से ऐसी क्रमबद्ध ध्वनि उत्पन्न करते हैं जिसे उनकी भाषा कहा जा सकता है।
बरसात में मेंढ़कों की टर्र-टर्र अकारण नहीं होती इसमें वे अपनी मानसिक स्थिति का परिचय देते हैं। टिड्डे अपने पंखों को पिछले पैरों से रगड़ कर ध्वनि उत्पन्न करते हैं झींगुर की टाँगें मनुष्यों द्वारा बजाये जाने वाले किसी वाद्य यन्त्र की तुलना का ध्वनि प्रवाह निसृत करती हैं। जर्मन कीट विज्ञानी फेवर ने टिड्डों की भाषा खोजने के लिए योरोप भर के जंगलों की खाक छानी है उनने टिड्डों के लगभग 400 ध्वनि संकेत और चौदह स्तर के प्रणय निवेदन टेप किये हैं। इन ध्वनियों को टेप पर सुनकर भी अन्य कीड़े उस जानकारी के अनुरूप ही अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। योरोप के ग्राइलस, कम्पेस्टस, ग्रावाइमैकुलेटस आदि झींगुर जातियाँ अपने अन्य साथियों की तुलना में अधिक मुखर होती हैं। मादा और नर के स्वरों में अन्तर होता है इससे वे लिंग भेद को आसानी से पहचान लेते हैं और तद्नुरूप शिष्टाचार बरतते हैं।
मधुमक्खी विशेषज्ञ मार्टिन लिण्डेयर ने मधुमक्खियों के आदान-प्रदान के माध्यम को नृत्य माना है। वे अनेक तरह की कलाबाजियों के नृत्य करती हैं और संग्रहित सूचनाओं की जानकारी छत्ते के अन्य साथियों को देती हैं। इसी आधार पर उनका झुण्ड मकरंद प्राप्त करने के लिए उपयुक्त दिशा की जानकारी पाता है और कूच करता है। कुछ मक्खियाँ इस खोज कला में और सूचना-संवाद देने की कुशलता में बहुत प्रवीण होती हैं, वे प्रायः इसी कार्य को रुचि पूर्वक करती रहती हैं।
प्रो.राबर्ट हिण्डे के अनुसार पक्षी ही नहीं कीड़े भी आँखों के इशारे से अपने बहुत से मनोभाव साथियों को बता देते हैं। यों आँखों की हलचल और चितवन में भी थोड़ा बहुत अन्तर पड़ता है पर पुतलियों की संवेदनशीलता में वैसा बहुत कुछ रहता है। जिससे एक दूसरे की भावनाओं का आदान-प्रदान हो सके। इस दृष्टि से छोटे प्राणी मनुष्यों से पीछे नहीं हैं। यों मनुष्य भी आँखों और पुतलियों के सहारे अपनी गुह्य मनः स्थिति को जाने अनजाने साथियों पर प्रकट करते रहते हैं।
कार्लबाल फ्रिच ने मधुमक्खी नृत्य की अनेक मुद्राओं के फिल्म लिये हैं और बताया है कि उनकी क्या हलचल-कितनी दूर, किस दिशा में, किस स्तर की, क्या स्थिति है इसकी सूचना ठीक प्रकार देती है। मधुमक्खियों की इस संकेत भाषा के आधार पर उनने परीक्षा की तो उनका प्रतिपादन शत-प्रतिशत सही निकला।
जुगनू की तरह और भी कई कीड़े अपने शरीर से प्रकाश निकालते हैं। कैल कीड कीड़ा तो रेलवे सिगनलों की तरह लाल, हरी रोशनी जलाता बुझाता रहता है। यह प्रकाश सदा एक जैसा नहीं चमकता उसके जलने बुझने, मन्द एवं तीव्र होने में जो बारीक अन्तर रहते हैं उससे वे अपनी जाति वालों से आपसी वार्तालाप करते रहते हैं।
कितने ही जीवों का कात उनकी घ्राण शक्ति से ही चलता है। जीवनोपयोगी कितनी ही जानकारियाँ वे वस्तुओं एवं जीवों के शरीरों से निकलने वाली गन्ध के आधार पर ही प्राप्त करते हैं। इतना ही नहीं उनकी विभिन्न शारीरिक, मानसिक परिस्थितियों से विभिन्न प्रकार की गन्धें निकलती हैं, उस वर्ग के प्राणी इन्हें सूँघ कर एक दूसरे की स्थिति का परिचय प्राप्त करते रहते हैं। रति प्रयोजन के लिए उनके शरीरों से विशेष रूप से तीव्र गन्ध निकलती है, यही वह सूत्र है जो उनकी वंश रक्षा की व्यवस्था जुटाये रहता ह। बहुत छोटे अदृश्य कीड़े तो इस गन्ध के आदान-प्रदान से ही गर्भ धारण कर लेते हैं। ई.ए.विल्सन के अनुसार चींटियां अपने शरीर से एक रस निकालती और टपकाती चलती हैं ताकि अन्य चींटियां उनके आह्वान पर विशेषज्ञ प्रयोजन के लिए उसी रास्ते को सूँघती हुई बढ़ती चली आवें। चींटियों का पंक्तिबद्ध चलना इसी गन्ध के आधार पर होता है।
जिस दुनिया में हम रहते हैं वह केवल मनुष्यों तक ही सीमित है। अन्य जाति के प्राणियों की- कीट-पतंग और पशु-पक्षियों की अपनी-अपनी दुनिया है और उसमें उन्हें निर्वाह करने, प्रसन्न रहने, पुरुषार्थ दिखाने के सुविस्तृत कार्य क्षेत्र मौजूद है। हम पृथ्वी पर रहते हैं यह एक छोटा क्षेत्र है, हमारी जानकारी तथा संपर्क की सीमा इसी छोटे क्षेत्र तक सीमित है। समस्त ब्रह्मांड में न जाने कितने स्तर के अणु परमाणु होंगे और न जाने कितनी भिन्नता वहाँ की परिस्थितियों में होगी। इसी प्रकार यदि वहाँ प्राणी रहते होंगे तो न जाने उनका स्तर क्या होगा? हम समस्त ब्रह्मांड की जड़ चेतन स्थिति का क्या अनुमान लगा सकते हैं। वे दुनियाएँ अलग और अनोखी होंगी। ठीक इसी प्रकार छोटे प्राणी अपनी दुनिया में मस्त और सन्तुष्ट होंगे। सम्भवतः वे हम मनुष्यों के संसार से परिचित न हों। हम भी कहाँ कीट-पतंगों की और ब्रह्मांड वासी अन्यान्य प्राणियों की दुनियाओं से परिचित हैं। भगवान ने कितने संसार रचे हैं यह देखकर बुद्धि थकित और चकित होकर रह जाती है।
संघर्ष और दुर्घटना मात्र है। जो अनावश्यक विकृतियाँ अथवा अवाँछनीय, असावधानियाँ एकत्रित होने के फलस्वरूप ही प्रस्तुत होती हैं। अनौचित्य की प्रतिक्रिया को संघर्ष कहा जा सकता है। यह प्रकृति नहीं विकृति है। सृष्टि संचालन प्रकृति करती है, विकृतियाँ तो केवल अवरोध उत्पन्न करती हैं। इसलिये उन्हें हटाने के लिए संघर्ष की आवश्यकता पड़ती है। इन्हें अपवाद कह सकते हैं। अवरोध सामान्य प्रवाह में व्यतिरेक उत्पन्न होने का काम है। व्यतिरेक सृजनात्मक उद्देश्य पूरा नहीं करते, उनसे सतर्कता की तीक्ष्णता भर पैदा होती है। शान चढ़ाने वाला पत्थर तलवार का प्रयोजन पूरा नहीं करता। तलवार तो मजबूत लोहे से बनती है। पत्थर तो धार तेज करने के काम भर आता है। संघर्ष को अधिक से अधिक धार तेज करने वाले पत्थर की संज्ञा दी जा सकती है।
सहयोग वह तथ्य है जिस पर प्रगति की समस्त सम्भावनाएँ आधारित हैं। मानव जाति की प्रगति का इतिहास यदि एक शब्द में कहना हो तो उसे पारस्परिक सहयोग ही कह सकते हैं। दुर्बलकाय एक बन्दर-वंशीय नगण्य से प्राणी को सृष्टि का मुकुट-मणि बना देने का श्रेय उसकी सहकारी मनोवृत्ति को ही दिया जा सकता है। यों लोगों को यह कहते भी सुना जाता है कि मनुष्य की बुद्धिमत्ता, मननशीलता ने उसे प्रगति के पथ पर आगे बढ़ाया है पर यह बात सही नहीं है। तथ्य यह है कि सहयोग के आधार पर एक दूसरे के साथ घनिष्ठता स्थापित करते हुए पारस्परिक आदान प्रदान का क्रम चला और उससे मस्तिष्कीय विकास का द्वार खुला।
बोलना, सोचना, पढ़ना, लिखना, कृषि, पशुपालन, अग्नि उपयोग, उपकरण निर्माण, वस्त्राच्छादन आदि उपलब्धियों को प्रगति का आरम्भिक चरण माना जाता है, इन्हीं सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मनुष्य ने आगे बढ़ने और ऊँचे उठने की राह पाई है। यह सब किसी एक मनुष्य के प्रयास का फल नहीं है। इसमें सहस्रों वर्ष लगे हैं और एक के अनुभव का दूसरे ने लाभ उठाया है। एक की उपलब्धियाँ दूसरे ने सीखी हैं और जो मार्ग मिला उस पर क्रमशः आगे कदम बढ़ाया है। आज हम जहाँ हैं वहाँ तक पहुँचने की लम्बी मंजिल इसी प्रकार पार हुई हैं।
परिवार निर्माण की सारी आधार शिला पारस्परिक सहयोग पर रखी हुई है। पति-पत्नि के बीच सन्तान-अभिभावक के बीच, भाई-बहिन के बीच जो घनिष्ठता पाई जाती है, उसमें स्वार्थ साधन की मात्रा स्वल्प और एक दूसरे के साथ उदार सहयोग करने की मात्रा अधिक रहती है। यदि ऐसा न होता स्वार्थ सिद्धि की ही प्रधानता रहती तो वे सम्बन्ध क्षणिक रहते और तात्कालिक स्वार्थ सिद्ध होते ही बिखर जाते। निम्नकोटि के प्राणियों में ऐसा ही होता है। उनका पारिवारिक सहयोग अत्यन्त स्वल्प रहता है। कामोन्माद के कारण नर मादा कुछ ही क्षणों के लिए पति-पत्नी बनते हैं और वह आवेश उतरते ही दोनों अपरिचित बन जाते हैं। तनिक-सा स्वार्थ व्यवधान पड़ने पर इस क्षण के पति-पत्नि अगले ही क्षण एक दूसरे पर प्राण घातक आक्रमण करने में नहीं चूकते। सन्तान को मादा सम्भालती है और वह भी तब जब तक वह अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता है। इसके बाद जब बच्चा स्वावलम्बी हो जाता है तो न माता को सन्तान से स्नेह रहता है और न सन्तान माता से कोई रिश्ता रखती है। बाप सन्तान पालन में यत्किंचित् ही सहयोग देता है। माता को प्रकृति ने यह क्षणिक वात्सल्य इसलिए दिया है कि उस प्राणी का वंश नष्ट न होने पावे। विवेकपूर्ण सहयोग के आधार पर इन प्राणियों का परिवार नहीं बनता यदि बना होता तो उसमें स्थिरता और सघनता का क्रम आगे ही चलता रहता। पर वैसा प्रायः देखने में नहीं आता। प्रायः इसलिये कहा गया है कि कुछ प्राणी सहयोग भावना से युक्त भी पाये जाते हैं और उससे अपनी सुरक्षा का लाभ लेते हैं। किन्तु इन्हें अपवाद ही करना चाहिए।
मनुष्य की विशेषता उसकी सहयोग परक सत्प्रवृत्ति ही है। उसी ने परिवार बसाये। उनमें सरसता और उदारता का समावेश किया। इससे कुटुम्ब का छोटा बड़ा हर सदस्य लाभान्वित हुआ। यह प्रवृत्ति आगे चलकर सामाजिकता के रूप में विकसित हुई। समाज व्यवस्था-शासन व्यवस्था की संरचना परिवार पद्धति की आचार संहिता के आधार पर ही बन सकी है। अर्थ तन्त्र का पूरा ढाँचा सहकारिता ही है। वस्तुओं का उत्पादन और विनिमय वितरण क्रम ही धीरे-धीरे वर्तमान अर्थव्यवस्था तक बढ़ता आया है। शिल्प, चिकित्सा, शिक्षा, कला-कौशल और विज्ञान के लम्बे चरण यकायक नहीं उठे हैं। अमुक आविष्कार का श्रेय अमुक व्यक्ति को मिला यह दूसरी बात है पर वस्तुतः सफल आविष्कार की पृष्ठभूमि बहुत पहले से ही बनने लगी थी और उसमें अनेकों का चिन्तन एवं प्रयास जुड़ते हुए वह आधार बन सका था जिसके सहारे उसे अन्तिम रूप से उद्घोषित किया गया। धर्म, दर्शन, अध्यात्म जैसी उच्चस्तरीय भावनात्मक चेतनाएँ किसी एक व्यक्ति की कृति नहीं है। इनके क्रमिक विकास में अनेकानेक पीढ़ियों की सहस्राब्दियां नियोजित हुई है। यह सब सहयोग का ही परिणाम है।
एकाकी मनुष्य को आज की परिस्थितियों में ठीक तरह जीवित रह सकना तक कठिन है। भोजन वस्त्र, निवास, शिक्षा, चिकित्सा जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं के लिए उसे दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस माने में पशु-पक्षी भाग्यवान हैं जो अपने आहार-बिहार के साधन अभी भी प्रकृति से सीधी तरह प्राप्त कर लेते हैं। मनुष्य के लिए अब यह भी सम्भव नहीं रहा। कोई अपने लिए अन्न उपार्जित करना भी चाहे तो उसे कृषि उपकरणों के लिए दूसरों पर निर्भर रहना होगा। वस्त्रों के लिये कपास उगाना, कातना, बुनना, सीना किसी एक आदमी के लिए सम्भव नहीं। इसके लिए जिन साधनों एवं अनुभवों की आवश्यकता है उन्हें कोई अकेला व्यक्ति किस तरह जुआ सकेगा। बिना पढ़ाये कोई किस तरह अपने आप पढ़ सकता है? जो बहरे होते हैं उन्हें गूँगा भी रहना पड़ता है क्योंकि वाणी हमारी उपलब्धि नहीं है। भाषा ज्ञान तो दूसरों से सुनकर नकल करने के रूप में ही उपलब्ध किया जाता है। उसका अवसर न रहे तो पशु-पक्षियों की तरह एकाकी मनुष्य के लिए भी वार्तालाप कर सकना सम्भव न होगा।
दैनिक जीवन में कितनी ही आवश्यकताएँ ऐसी पड़ती हैं जो सरलतापूर्वक पूरी होती रहने से तुच्छ प्रतीत होती हैं, पर वे हैं अत्यन्त महत्वपूर्ण। यातायात के वाहन और मार्ग पारस्परिक सहयोग से ही बने हैं। औषधियाँ, पुस्तकें हमारे आपने अन्वेषण अथवा निर्माण से नहीं बनी हैं। बटन से लेकर माचिस तक सहस्रों वस्तुएँ हैं जो रोज ही प्रयोग में आती हैं। यदि पिछली पीढ़ियों से पारस्परिक सहयोग द्वारा निर्माण एवं अन्वेषण प्रक्रिया अनवरत रूप से न चली आती तो हमें इन छोटी किन्तु आवश्यक वस्तुओं से वंचित रहना पड़ता। तब निश्चय ही हम अब की अपेक्षा कहीं अधिक असुविधाओं और कठिनाइयों में पड़े हुए पिछड़ा हुआ अनगढ़ जीवन जी रहे होते।
आज की हमारी प्रायः सभी आवश्यकताएँ आकाँक्षाएं यह अपेक्षा करती हैं कि दूसरों का समुचित सहयोग प्राप्त हो। यदि वह उपलब्ध न होगा तो कोई कितना ही बुद्धिमान या साधन सम्पन्न क्यों न हो एक कोने में पड़ा सड़ता रहेगा। व्यापार द्वारा धन उपार्जन तभी सम्भव है जब ग्राहकों का उदार सहयोग व्यापारी को मिलता रहे। वकील, डाक्टर, कलाकार, शिल्पी एकाकी बैठे-बैठे मक्खियाँ ही मारते रहेंगे। उनके गुणों से लाभ लेने वालों की शृंखला जितनी बड़ी होगी उतनी ही सफलता उन्हें मिलेगी। संघ शक्ति को इस युग की सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। पारस्परिक सहयोग के आधार पर मिल-जुलकर किये गये काम चाहे वैयक्तिक लाभ के हों अथवा सामूहिक लाभ के क्रमशः सफल ही होते चले जायेंगे। सहकारिता की कड़ी जहाँ जितनी शिथिल होगी वहाँ का चरखा निश्चित रूप से लड़खड़ा रहा होगा।
अपने चारों ओर घिरी समस्याओं के सुलझाने के लिये हमें सहयोग का अधिकाधिक सम्पादन करना चाहिए। अपनी शक्तियों के बिखराव को समेट कर एक केन्द्र पर इकट्ठा करना चाहिये और उन्हें अभीष्ट प्रयोजन में नियोजित करना चाहिए। श्रम और मनोयोग में समुचित सहयोग बनता चले तो प्रगति की ओर दूनी चौगुनी गति से बढ़ चलना सम्भव हो सकता है। अधूरा श्रम अर्थात् आलस्य अधूरा मनोयोग अर्थात् प्रमाद। यही दो प्रधान व्यवधान हैं जो असफलताओं और विपन्नताओं के लिए प्रधान रूप से उत्तरदायी है।
दाम्पत्य-जीवन की सफलता पति-पत्नि के सहयोग अनुपात पर टिकी हुई है। परिवार के सदस्यों में जितना घनिष्ठ सहयोग और ताल-मेल रहेगा, उतना ही उन सबको सुखी रहने और समुन्नत बनने का अवसर मिलेगा। मजूर और मालिक जहाँ जितने अधिक सहयोग से काम कर, रहे होंगे वहाँ उतना ही अधिक लाभ मिल रहा होगा। सरकारी समितियों के माध्यम से यदि उत्पादन एवं उपभोक्ता दोनों ही लाभान्वित होंगे। संस्था संगठनों के माध्यम से वर्ग विशेष के अधिकारों की रक्षा जैसी अच्छी तरह हो सकती है वैसी अलग-अलग रहने और अपनी ढपली अपना राग अलापने से सम्भव नहीं। वाद्य-यन्त्रों का साज जब एक ताल ध्वनि में बजता है तो उसे सुमधुर संगीत कहा जाता है। यदि हर बाजा अपना-अपना अलग-अलग स्वर निकाले तो उससे कर्ण कदु कोलाहल ही उत्पन्न होगा। बुहारी में बँधी हुई सींकें ही घर, आँगन साफ करती हैं। एक-एक सींक अलग रहे तो उनसे कुछ काम बनता तो दूर उलटे अस्तित्व ही संकट में पड़ा रहेगा। धागे मिलकर वस्त्र बनते हैं अलग रहकर तो वे टूटते ही रहेंगे। सूत्र में बँधे हुए मन के ही माला के रूप में सम्मानास्पद होते हैं बिखर जाने पर तो उनकी स्थिति दयनीय ही हो जायेगी।
हमें अपने में उस प्रतिभा एवं कोमलता का विकास करना चाहिए जिसके आधार पर दूसरों का हृदय जीतना और उन्हें अपना घनिष्ठ सहयोगी बना सकने सम्भव हो सके। कोई किसी को न तो अनायास ही सहयोग देता है और न अकारण द्वेष करता है। अपनी प्रकृति एवं प्रवृत्ति ही दूसरों पर भली-बुरी छाप छोड़ते हैं। उस प्रतिक्रिया से प्रेरित होकर ही लोगों का व्यवहार, मित्रता एवं शत्रुता का बनता है। अपना स्तर जिस प्रकार का होगा उसी स्तर के लोग संपर्क में आवेंगे-घनिष्ठ बनेंगे और उस परिकर के द्वारा जिस प्रकार का वातावरण बन सकता है, उसी प्रकार का अपने इर्द-गिर्द बनेगा। कहना न होगा कि यह संपर्क मण्डल ही हर व्यक्ति के जीवन में भली-बुरी भूमिकाएँ प्रस्तुत करता है। अपने विकास की बात सोचते हुए हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि अभीष्ट सहयोग का संचार कर सकने योग्य विशेषताएँ अपने व्यक्तित्व में समाहित करनी ही होगी। प्रगति का प्रथम प्रयास यही आरम्भ किया जाना चाहिये।
संघर्ष को इन दिनों बहुत महत्व दिया जाता है लड़-झगड़ कर अपना अभीष्ट लाभ प्राप्त करने की बात सोची जाती है। गुण्डागर्दी और आतंकवाद के आधार पर जल्दी अधिक लाभ मिलने की बात सूझती है और लड़ाकूपन का परिचय देकर शूर वीर कहलाने की इच्छा रहती है। वहाँ ध्यान रखने की बात इतनी है कि लड़ाई अपवाद है आवश्यकता नहीं। उसी उपयोगिता उतनी ही है जितनी आटे में नमक। अवाँछनीय परिस्थितियों से निपटने के लिए उसे कभी-कभी हो काम में लाने की आवश्यकता पड़ती है और पड़नी चाहिए। यदि यह मात्रा बढ़ेगी तो यह संघर्षशील सामने वाले की अपेक्षा आक्रमणकर्ता का ही अधिक अहित करेगी।
हमें अवसर आने पर लड़ने के लिये आवश्यक शौर्य, साहस भी सँजोना चाहिए और अवाँछनीयता से निपटने के लिये जितना संघर्ष आवश्यक है उसके लिए तत्पर भी रहना चाहिये किन्तु ऐसा न हो कि हम स्वभाव ही लड़ाकू, झगड़ालू बन जाय और उसी गर्व गौरव अनुभव करने की लत पड़ जाय। यह आज अपने लिये ही घातक सिद्ध होगी। प्रतिभा की इस झंझट में बर्बादी होती है।
यह यही है कि मनुष्य की इच्छा शक्ति और पुरुषार्थ परायणता उसे बहुत हद तक उन्नति-अवनति का अवसर प्रदान करती है पर यह सर्वाशतः सत्य नहीं है। नियति की विधि-व्यवस्था भी उसे बलात् अपने विशिष्ट प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त करती रहती है और मनुष्य विवश होकर उसके सामने नतमस्तक होता रहता है।
सृष्टि संतुलन के लिए प्रकृति मनुष्य को कभी प्रगति के मार्ग पर कभी अवगति के मार्ग पर धकेलती है। कभी उत्पादन के अवसर प्रस्तुत करती है, कभी विनाश की विभीषिकाएँ सामने लाकर खड़ी कर देती हैं और मनुष्य को यह सोचने के लिए विवश करती है कि जहाँ वह बहुत कुछ है वहाँ प्रकृति के हाथ का नगण्य सा खिलौना भी है। उसे अपनी स्थिति पर अनावश्यक अहंकार नहीं करना चाहिए।
डा.क्लारेन्स ए.मिल्स ने अपनी खोज पूर्ण पुस्तक “क्लाइमेट मेक्स दि मैन” में ऐसे आँकड़े प्रस्तुत किये हैं जिनसे स्पष्ट होता है कि मौसम के उतार-चढ़ाव के अनुसार अमुक बीमारियाँ घटती और अमुक बढ़ती हैं इसी प्रकार लोगों की प्रसन्नता-अप्रसन्नता शान्ति तथा उद्विग्नता में भी अनायास ही अन्तर आता है। जुलाई, अगस्त में जब सड़ी गर्मी पड़ती है तब अक्सर पारिवारिक कलह बढ़ते हैं। अप्रैल से अगस्त तक की अवधि में सामूहिक उपद्रवों की बाढ़ आती है। मौसम की गर्मी लोगों का पारा गरम कर देती है। मानसून आने पर इस प्रकार के फिसाद अपने आप कम हो जाते हैं।
मौसम का मनुष्य की प्रवृत्तियों पर क्या असर पड़ता है इसका विशाल अध्ययन प्रो.ई.डेक्सटर ने किया है। उन्होंने 40 हजार अपराधों की घटनाओं की जाँच-पड़ताल करके यह पाया कि जैसे-जैसे मौसम गरम होता गया वैसे-वैसे अपराध बढ़ते गये और जिस क्रम से ठण्डक आई उसी अनुपात से अपराधों की संख्या घटती चली गई।
जार्ज स्टीवर्ट ने अपने ग्रन्थ ‘स्टार्म’ में यह दर्शाया है कि मौसम के उतार-चढ़ाव राज-सत्ताओं को उखाड़ सकने वाले उपद्रवों की पृष्ठभूमि बना सकते हैं और ठण्डक में लोग निराश एवं ठण्डी तबियत के साथ दिन गुजार सकते हैं।
बसन्त ऋतु मनुष्यों में ही नहीं अन्य प्राणियों में भी कामोत्तेजना उत्पन्न करती है। गर्भ धारण का आधा औसत उन्हीं दो महीनों में पूरा हो जाता है जबकि शेष दस महीनों में कुल मिलाकर उतनी ही मात्रा पूरी होती है। कोई अविज्ञात शक्ति प्राणियों कं मन में अकारण ही प्रणयकेलि के लिये उत्साह भर देती है और वे उस दिशा में किसी के द्वारा खींचे, धकेले जाने वाले की तरह उस प्रयोजन में प्रवृत्त हो जाते हैं।
सूर्य विशेषज्ञों का कथन है कि जिन दिनों सूर्य में लम्बे धब्बों की लाइनें बनती हैं, भयंकर विस्फोट होते हैं उन दिनों लोगों के दिमागों और परिस्थितियों में भी भयंकर उथल-पुथल होती है। अमेरिकी क्रान्ति, फ्राँसीसी राज क्रान्ति, रूसी क्रान्ति उन्हीं दिनों हुई जिन दिनों सूर्य में विस्फोट के चिह्न धब्बों रूप में दिखाई पड़ रहे थे। इनका असर मौसम, फसल, वनस्पति, समुद्र तथा प्राणियों की शारीरिक और मानसिक स्थिति पर असाधारण रूप से पड़ता है।
समष्टि प्रकृति को अनुकूल बनाने के लिए जनन मानस की आंतरिक स्थिति को उत्कृष्ट रखना आवश्यक होता है। उपासनात्मक, आध्यात्मिक उपचार इसी प्रयोजन के लिए है। यों प्रकृति के दबाव के आगे मनुष्य को नतमस्तक होना पड़ता है फिर भी वह उस दबाव को प्रतिकूल न बनने देने के लिए अपनी उत्कृष्ट आत्म-शक्ति का उपयोग कर सकता है। इस प्रकार विवश दिखाई पड़ने पर भी समर्थता उसके हाथ में बनी ही रहती है।
हमारी शारीरिक, मानसिक हलचलों से लेकर कृषि, उद्योग आदि हर काम में शक्ति खर्च होती है। शक्ति का उत्पादन ऊर्जा से होता है। ऊर्जा उत्पन्न करने के लिये ईंधन की आवश्यकता है।
मनुष्य क्रमशः बौद्धिक और आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न हाता जा रहा है तद्नुसार उसकी आवश्यकताएँ भी बढ़ रही हैं। पूर्ति के साधन जुटाने के लिये अनेक वस्तुओं का उत्पादन करना पड़ता है और अनेक प्रकार की व्यवस्थाएँ जुटानी पड़ती हैं इस सबके लिये शक्ति चाहिए। ऊर्जा उत्पादन के लिये ईंधन अनिवार्य है। क्रमशः ईंधन की खपत बढ़ती जा रही है। जन-संख्या वृद्धि ने उस खर्च और भी अधिक बढ़ा दिया है। सन् 1800 में जितनी ‘शक्ति’ मनुष्य की सेविका थी अब औद्योगिक क्षेत्र में उससे दो हजार गुनी शक्ति खर्च होती है। घरेलू काम में खर्च होने वाली शक्ति जिसमें बिजली प्रमुख है उसके अतिरिक्त है। सन् 1900 में प्रति व्यक्ति पीछे 2 अश्व शक्ति बिजली प्राप्त थी, पर अब वह पाँच गुनी बढ़कर 10 अश्व शक्ति का उत्पादन औसत आता है।
ऊर्जा सम्बन्धी माँग भर में बेतरह बढ़ रही है। हर साल यह माँग इतनी बढ़ जाती है जितनी 3000 लाख टन कोयले से पूरी की जा सकती है। सन् 1900 से लेकर 1950 तक यह माँग तीन गुनी हो गई थी। 1950 से 1970 तक बीस वर्षों में ही वह फिर तीन गुनी हो गई है। अब सन् 1980 तक पहुँचते फिर वह माँग तिगुनी हो जायगी। इसके बाद सम्भव है हर वर्ष पिछले वर्ष की तुलना में यह आवश्यकता तीन गुने क्रम में बढ़ सकती है।
अमेरिका की आबादी संसार की जनसंख्या का छठा भाग है किन्तु उसकी आवश्यकता संसार में उत्पन्न बिजली का एक तिहाई भाग प्राप्त कर लेने पर ही पूरी हो पाती है। औसतन हर अमेरिकी इतनी बिजली खर्च करता है, जितनी 46 पौंड कोयला, 9॥ गैलन पेट्रोल, आधे पिण्ट परमाणु शक्ति द्वारा उपलब्ध हो सकती है। सम्भावना यह है कि सन् 1985 तक वहाँ यह खपत दूनी हो जायगी।
समस्त संसार में प्रस्तुत पर्यवेक्षण के अनुसार 48,656000 लाख टन कोयले का भण्डार है। इसमें भारत में प्रस्तुत घटिया-बढ़िया कोयले का कुल भण्डार 1080000 लाख टन कूता गया है। यह कुल उत्पादन का 203 प्रतिशत है। जबकि अपने देश की जनसंख्या विश्व की आबादी का छठा भाग है। संसार भर में गैस भण्डार 2300000 मेगाटन है, जिसमें भारत में केवल 41155 मेगाटन है।
संसार भर में जितना कोयला भण्डार कूता गया है वह वर्तमान खपत क्रम को देखते हुए 100 वर्ष काम दे सकता है। किन्तु तेल के बारे में ऐसी बात नहीं है। उससे पचास वर्ष का ही काम मुश्किल से चलेगा। भारत जैसे गरीब देश वन सम्पदा को नष्ट करके लकड़ी जलाते हैं और कृषि के लिये अत्यन्त उपयोगी खाद, गोबर को उपले बनाकर चूल्हा गरम करते हैं, यह अपने पैरों कुल्हाड़ी मारने की तरह है। वन काटने से वर्षा घटेगी ओर जमीन कटेगी। गोबर को जला लेने पर भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट हो जायगी। रासायनिक खादों से तत्कालिक लाभ होता है, भूमि की उर्वरा शक्ति नहीं बढ़ती। अपने देश में भी घरेलू ईंधन के लिये दूसरे साधन ढूंढ़ने पड़ेंगे साथ ही कल-कारखानों के लिये तेल, गैस, बिजली का उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। विदेशों से तेल, कोयला मँगाकर हम अपनी गर्दन दूसरों के हाथ सौंपते हैं और अनिश्चित सम्भावनाओं में भटकते हैं।
अमेरिका के पास कोयला काफी है। वे सोचते हैं कि इस भण्डार से अगले 100 वर्ष तक मजे में काम चल जायगा। पर वर्तमान तेल भण्डार 10 वर्ष में
प्राकृतिक गैस भण्डार और यूरेनियम 13 साल में ही चुक जायगा। अगले दिनों नई खदानें निकलें तो बात अलग है।
अमेरिका के बाद ऊर्जा की खपत करने वाले देशों में जापान का नम्बर आता है। विकास की वर्तमान रफ्तार जारी रखने के लिए उसे अगले वर्ष 3000 लाख टन तेल की जरूरत पड़ेगी और दस वर्ष में वह आवश्यकता दूनी बढ़ जाने की सम्भावना है। उसका अपना तेल उत्पादन, मात्र एक महीने के लिए ही है। उसे अपनी यह आवश्यकता अन्य देशों से पूरी करनी पड़ती है। तेल के मामले में रूस की स्थिति अच्छी है। संसार भर में हर साल निकलने वाले तेल का 15 प्रतिशत अर्थात् 4000 लाख टन तेल अकेले रूस में निकलता है। गैस का उसके पास विपुल भण्डार ह। 35000 बिलियन घन फुट गैस वह पैदा कर लेता है। यह सब होते हुए भी उसे अपने अधीनस्थ पूर्वी योरोप के कम्युनिस्ट देशों की आवश्यकता पूरी करने के लिए कुछ ही दिनों में बाहर से तेल खरीदने की जरूरत पड़ जायगी।
पश्चिम योरोप के 9 देशों ने तेल आयात के लिए निश्चित नीति अपनाने के लिये यूरोपीय इकोनोमिक कम्यूनिटी (ई.ई.सी.) बनाई है। यह लोभ 60 प्रतिशत तेल प्रधानतया अरब देशों से तथा छुट-पुट अन्यत्र से खरीदते हैं। इनकी जरूरत बढ़ रही है और अगले पाँच वर्ष में वे अब की अपेक्षा दूना अर्थात् 80-80 लाख टन तेल आयात करने के लिए विवश होंगे। फ्राँस की दशा तो और भी दयनीय है उसका कोयला भण्डार क्रमशः चुकता चला जा रहा है। दस वर्ष पूर्व उसका कोयला उत्पादन 550 लाख टन था। पर अब वह घटते-घटते 300 लाख टन रह गया है। आगे यह गिरावट और भी बढ़ेगी।
ब्रिटेन के अर्थशास्त्री स्टेनली जोवोन्स ने अपने ग्रन्थ ‘दि कोल क्विश्चन-एन इन्क्वारी’ में लिखा है- आज कोयले के आधार पर जो देश अपने उद्योग चला रहे हैं उन्हें पीछे लौटना पड़ेगा और इस जल्दी समाप्त होने वाले ईंधन का आधार छोड़कर नये ऊर्जा साधन ढूंढ़ने पड़ेंगे।
विज्ञानी टोनी लोफ्टास ने गरीब देशों का सलाह दी है कि वे पनचक्की जैसे साधनों से छोटे बिजलीघर बनाये और अपने सीमित साधनों से स्वावलम्बी योजनाएँ बनाएँ। परावलम्बी साधनों के आधार पर बनाई गई उनकी लम्बी-चौड़ी योजनाएँ अन्ततः उन्हें पश्चाताप ही प्रदान करेंगी।
मध्य पूर्व और अफ्रीका में संसार के तेल भण्डार का 66 प्रतिशत है जबकि वहाँ खपत 4 प्रतिशत ही है। संसार की तेल आवश्यकता को देखते हुए यह देश अपने दाम बढ़ा रहे हैं फलतः ऊर्जा महंगी ही नहीं अनिश्चित भी होती जाती है। तेल देशों ने अपनी अच्छी स्थिति को राजनैतिक सौदेबाजी का मोहरा भी बना लिया है। इसलिये उनका रुख, कब किस देश के लिए क्या होगा इस सम्बन्ध में कुछ भी कहा नहीं जा सकता।
ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक और आस्टन विश्वविद्यालय के कुलपति डाक्टर जे.ए. पापा ने हिसाब लगाकर बताया है कि जिस गति से आजकल पैट्रोल खर्च हो रहा है उसी गति से वह खर्च होता रहे तो अब तक उपलब्ध तेल स्रोतों का सारा, भण्डार 31 वर्षों में समाप्त हो जायगा किन्तु यदि पैट्रोल के खर्च में थोड़ी-सी अर्थात् 5 प्रतिशत भी वृद्धि हुई तो वह 20 वर्षों में ही चुक जायगा। आशा की गई है कि अभी नये तेल स्त्रोत और मिल सकते हैं। इस सम्भावना को स्वीकार करते हुए डा.पापा ने कहा है कि यदि यह उपलब्धियाँ अबकी तुलना में 5 गुनी बढ़ जायें तो 50 वर्ष तक, दस गुनी बढ़ जायें तो 78 वर्ष तक ही धरती का पैट्रोल मोटरें चलाने में काम दे सकेगा।
औद्योगिक ऊर्जा में 97 प्रतिशत तेल, कोयला आदि अतिरिक्त ईंधनों का प्रयोग होता है इनके जलने से जो कार्बन, नाइट्रोजन, सल्फर आक्साइड आदि बनते हैं उनसे जहरीली हवा पैदा होती है और वायुमण्डल को खराब करती हैं। इसी प्रकार परमाणु विस्फोटों से जो विषाक्त विकिरण पैदा होता है उससे जल-थल और नभ में विचरण करने वाले प्राणियों के लिए अनेकों विभीषिकाएं पैदा होती हैं। बड़ी भट्टियाँ पृथ्वी के वायुमण्डल को लगातार गरम कर रहीं है यह बढ़ती हुई गर्मी मौसमी सन्तुलन को बिगाड़ने, ध्रुव प्रदेशों की बर्फ पिघलाकर समुद्री बाढ़ में बहुत-सी धरती डुबो देने जैसी भयंकर सम्भावनाएँ सामने खड़ी कर सकती है।
इन कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए विचारशील वर्ग द्वारा वृद्धि और विकास की सीमा निर्धारण करने की माँग जोरों से उठाई जा रही है अन्यथा प्रकृति के नाम पर चल रही अन्धी दौड़ कुछ ही समय में सर्वनाश के दृश्य उपस्थित करेगी।
ईंधन की बढ़ती माँग को प्रकृति के वर्तमान स्त्रोत पूरा नहीं कर सकते हैं। धरती के पास जितना मसाला है वह बहुत दिन चलने वाला नहीं हैं। वह दिन दूर नहीं जब हम ईंधन की दृष्टि से बुरी तरह दिवालिये हो जायेंगे और ऊर्जा के अभाव में अपने विलासी जीवन-क्रम का भार न ढो सकने के कारण बेमौत मरेंगे। अणु ऊर्जा के प्रति पिछले दिनों बहुत उत्साह था और बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँधी गई थी, पर अणु भट्ठियों से निकलने वाले विकिरण विष का कोई समाधान न निकलने के कारण उसका उपयोग भी सर्प के मुख में उँगली डालने से कम खतरनाक प्रतीत नहीं हो रहा है।
ईंधन के लिए हमें अन्ततः सविता देवता की आराधना करनी पड़ेगी। जीवन उसी से मिला है। धरती की समस्त जड़-चेतन, हलचलें उसी की कृपा से चल रही हैं। भविष्य की ईंधन समस्या सहित अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए हमें उन्हीं की शरण लेनी पड़ेगी।
पृथ्वी पर जितनी सूर्य शक्ति अवतरित होती है, उसका 99 प्रतिशत बेकार चला जाता है केवल 1 प्रतिशत का ही कुछ उपयोग हो पाता है। सारी पृथ्वी पर जितनी शक्ति का व्यय होता है उससे 20 हजार गुनी शक्ति निरन्तर पृथ्वी पर भेजता रहता है।
सूर्य ऊर्जा अतुलनीय है। किसी राजस्थानी रेगिस्तान के सौ वर्ग मील टुकड़े की सूर्य शक्ति यदि वशवर्ती की जा सके तो उससे पूरे भारत की शक्ति आवश्यकता मजे में पूरी हो सकती है। दर्पणों के प्रतिबिंब द्वारा सूर्य शक्ति का उपयोग करने की बात सोची गई थी, पर उसमें जितना सरंजाम इकट्ठा करना पड़ता है उसकी तुलना में उपलब्धि कम होती है। ‘सिलीकॉन’ के पतले परतों द्वारा सूर्य ऊर्जा से बैटरियाँ बनाई गई थीं छोटे प्रयोजनों के लिये वह सफल तो थीं, पर प्रारम्भिक स्थिति में उसमें भी लागत अधिक आई। सूर्य शक्ति और अणु ऊर्जा का स्तर एक ही है पर सूर्य किरणें आठ मिनट की यात्रा करके जब धरती पर पहुँचती हैं तो वे इतनी हल्की हो जाती हैं कि प्राणी और वनस्पति उनका सुकोमल स्पर्श सुखपूर्वक कर सकते हैं और लाभ उठा सकते हैं। इसके विपरीत धरती पर उत्पन्न की गई अणु ऊर्जा किसी बलिष्ठ दैत्य के समान है उसका उपयोग केवल ऐसे ही कामों में हो सकता है जो गर्मी का तीव्र दबाव सहन कर सकें।
अध्यात्म उपासनाओं में सूर्योपासना सर्वोपरि है। गायत्री महामन्त्र का अधिष्ठाता सूर्य देवता है। ब्रह्मरंध्र में अवस्थित सहस्रार सूर्य चक्र ही अन्याय षटचक्रों को प्रभावित करता है। आकाशस्थ सूर्य नवग्रहों और उपग्रहों पर अनेकानेक स्तर की शक्तियाँ प्रदान करके उन्हें अपने कर्म चक्र पर चलते रहने का साधन प्रदान करता है। हमारी पृथ्वी पर जो जीवन उपलब्ध है वह मात्र सूर्य देवता का ही अनुदान है।
तत्वदर्शी महामनीषियों ने शरीर को सूर्य संपर्क में रखकर जीवनी शक्ति प्राप्त करने और मनोभूमि सविता देवता की आराधना करके ओजस्वी, तेजस्वी एवं ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न बनाने का साधना विज्ञान विनिर्मित किया था। अब भौतिक विज्ञानी भी हर दिशा से निराश होकर सूर्य देवता की शरण में जाने की तैयारी कर रहे हैं। विश्व की ऊर्जा समस्या का कोई अन्य समाधान आधार नहीं।
जीवन और जगत के समस्त कार्य-व्यापार शक्ति के संस्पर्श से ही संचालित है। शक्ति हीनता, जड़ता एवं मृत्यु की द्योतक है। विद्युत की शक्ति से लोहे, एवं ताँबे के बने पंखे, मोटर, बल्ब आदि कितने जीवनोपयोगी कार्य सम्पन्न किये जाते हैं। परमात्मा ने अपने प्रिय राजकुमार मानव को जो अतिरिक्त अनुदान प्रदान किया है उसे विचार के नाम से जानते हैं। वस्तुतः विचार ही शक्ति का जनक है और शक्ति, मुक्ति की जननी हैं। जहाँ विचार नहीं, वहाँ शक्ति नहीं। जहाँ शक्ति नहीं, वहाँ कर्म नहीं एवं जहाँ कर्म नहीं, वहाँ जीवन नहीं। अर्थात् जहाँ विचार नहीं, वहाँ जीवन नहीं। दूसरे शब्दों में शक्ति ही जीवन का पर्याय है।
विचारों का संबंध मानसिक शक्ति से है और मन की शक्ति प्रचण्ड एवं अपार है। मन ही जीवन के उत्थान-पतन का केन्द्र बिन्दु है। यदि मन की दासता को मनुष्य त्याग दे और उसका स्वामी बन जाये तो स्वर्गीय जीवन एवं मुक्ति मार्ग दूर नहीं। आर्ष ग्रन्थों के सृष्टा मनीषियों ने सत्य को तप का पर्याय निरूपित करते हुए उसको शक्ति का स्त्रोत कहा है। साथ ही आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में सत्य को नारायण एवं नारायण को सत्य कहा है। दिव्य-तत्व उत्कृष्टता की उपलब्धि जो मानव जीवन का अभीष्ट है आत्म-शक्ति के संवर्धन से ही सम्भव होती है।
शक्ति का स्त्रोत गतिशील, कर्म में से ही फूटकर निकलता है। अकर्मण्यता, निष्क्रियता से शक्ति का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। क्रियाशीलता नित्य नवीन शक्ति प्रदान करती हैं। बेकार पड़ी रहने वाली भूमि बंजर और उपजाऊ हो जाती है, बेकार पड़ी रहने वाली मशीन जंग ग्रस्त हो जाती है।
शक्ति सम्बर्द्धनार्थ, कर्मशीलता और कर्मसाधना की महती आवश्यकता होती है। कर्म कैसा भी हो अन्ततोगत्वा वह कर्म ही कहा जायेगा। सैनिक, व्यापारी लेखक, उपदेशक, श्रमिक, मजदूर सभी अपने-अपने स्थान पर कर्मशील हैं।
किसी कर्म को निष्ठा एवं दृढ़ लगन के साथ करना ही ‘कर्म-साधना’ है जिससे शक्तियों के स्त्रोत खुलते हैं। यही शक्ति स्त्रोत सिद्धियाँ बनकर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता और यश के वरदान प्राप्त करते हैं।
कर्म की पूजा ही मानव का वास्तविक धर्म है। कर्म से शक्ति, पौरुष, साहस एवं तेजस् की उपलब्धि होती है।
एक कहावत प्रचलित है ईश्वर उनकी सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते हैं। वस्तुतः “दैव को दुर्बलता का घातक” बताकर शास्त्रकारों ने एक कटु सत्य का ही उद्घाटन किया है।
शक्ति की उत्पत्ति अवरोध से होती है। नदी का प्रवाह वही तीव्र होता है जहाँ चट्टानों, पहाड़ों द्वारा गत्यावरोध उत्पन्न किया जाता है। मैदानी नदियों का प्रवाह तीव्र नहीं होता। अवरोध और घर्षण के सिद्धान्त पर बिजली की शक्ति का उद्भव होता है। धनुष की डोरी जब तनती है तब उसमें तीर को दूर फेंकने की शक्ति आती है। यदि डोरी ढीली पड़ी रहे तो तीर फेंकने का काम जरा भी न हो सकेगा। वैज्ञानिकों, योगियों एवं आत्मवेत्ताओं ने भी अगणित सिद्धियाँ प्राप्त की हैं उन सबका श्रेय मन को रोककर एक दिशा में लगाये रहने की सफलता में ही सन्निहित है।
संघर्ष का ही दूसरा नाम जीवन है। जहाँ सक्रियता समाप्त हुई वहाँ जीवनाँत समीप समझिये। आलसी, अकर्मण्यों को जीवित अवस्था में भी मृत की संज्ञा दी जाती है। जिसने पुरुषार्थ के प्रति अनास्था व्यक्त की वह जीवन के प्रति आस्था ही खो बैठा मनुष्य की सच्ची वीरता युद्ध के मैदान में दुश्मनों को पराजित करने में नहीं, बल्कि मनोशक्ति के द्वारा अपनी वासनाओं और तृष्णाओं के हनन करने में निहित हैं।
जो असमर्थ है उन्हें सहायता देना उचित है ताकि साधनों के अभाव में जो प्रगति रुकी पड़ी थी उसका पथ-प्रशस्त हो सके। समुन्नत व्यक्तियों का कर्तव्य है कि वे दूसरे पिछड़े हुए व्यक्तियों को ऊँचा उठाने के लिए साधन उपलब्ध करें और वह प्रकाश भरी प्रेरणा प्रदान करें जिससे निराशा और अवसाद की मनः स्थिति को साहस एवं उत्साह का जन-जीवन मिले सके। ऐसी सहायता करना किसी समर्थ व्यक्ति की उदारता का चिन्ह है, दूसरे शब्दों में इसे महानता की प्रतीत भी कह सकते हैं। यह उदार सहकारिता समाज को स्वस्थ परम्परा प्रस्तुत करती है और हर सामर्थ्यवान को यह उद्बोधन करती है कि सफलताओं का लाभ अपने तक ही सीमित न रखा जाय वरन् उससे उन्हें भी लाभान्वित होने दिया जाय जो उचित मार्ग-दर्शन एवं सहकार के अभाव में गई-गुजरी स्थिति में पड़े हुए दिन काट रहे हैं। यह उदारता की सद्भावना का उज्ज्वल पक्ष हुआ।
दान वृत्ति का एक अंधेरा पक्ष भी है। वह यह कि कोई व्यक्ति अपने पैरों पर खड़ा होने की स्थिति में रहने पर भी-श्रम और मनोयोग का उपयोग करने में आलस्य, प्रमाद बरतें, काम से जी चुरायें, मेहनत से कतरायें और दूसरों के कन्धों पर लदकर सुविधाएँ प्राप्त करते रहने का प्रयास करें। यह बुरी बात है। इसे भिक्षावृत्ति के हेय नाम से पुकारा जाता है। किसी समर्थ व्यक्ति के लिए इससे अधिक अपमान की बात दूसरी नहीं हो सकती कि वह स्वयं निर्वाह कर सकने की क्षमता सम्पन्न होते हुए भी गुजारे के लिए दूसरों के सामने हाथ पसारे, ऐसा परावलम्बन उन्हें ही स्वीकार हो सकता है जो आत्म-सम्मान खो चुके हों।
अहिर्निशि निर्वाह व्यवस्था करना विज्ञ समाज का कर्तव्य है सो किया भी जाता है। लोकसेवी साधु, ब्राह्मणों का सम्मानपूर्वक ब्रह्मभोज एवं दान दक्षिणा से कृतज्ञता सम्पन्न जनता चिरकाल से करती रही है किन्तु वह लाभ जब वैसा ही वेष बनाकर व्यक्तिवादी जीवन जीने वाले मुफ्तखोर लोग प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ते हैं तो इससे भ्रष्टाचार पनपता है। जो बिना उचित बदला चुकाये प्राप्त किया गया है वह स्पष्टतः अनाधिकार है- अग्राह्य है। मुफ्तखोरी को चारित्रिक भ्रष्टता का पापाचार माना जाना चाहिए। भले ही उसे अपनाने वाले किसी भी वेष या वंश के लोग क्यों न हों।
मुफ्तखोरी को प्रोत्साहन देना उस उद्देश्य से सर्वथा विपरीत है जो उदार दानवृत्ति के साथ जुड़ा हुआ है। सहायता इसलिए दी जानी चाहिए कि प्रगति पथ पर आगे बढ़ने के लिए उन साधनों की उपलब्धि हो सके जिसके बिना पिछड़े हुए व्यक्ति को विकास की दिशा में कदम उठा सकना शक्य नहीं हो रहा था, दान का उपयोग बीज बोने की तरह किया जाना चाहिए जिसका प्रतिफल बहुमुखी प्रगति एवं समृद्धि के रूप में देखा जा सके।
जो सर्वथा अपंग है जिनकी समस्त उपार्जन क्षमताएँ समाप्त हो गई उन्हें जीवित रहने के लिए समाज की उदारता पर निर्भर रहने का अधिकार है। उस असमर्थ व्यक्ति को करुणापूर्वक निर्वाह मिलना चाहिए। किन्तु इससे आगे बढ़ने वाली भिक्षावृत्ति को सर्वथा निरुत्साहित किया जाना चाहिए। बहुत से व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनका एकाध अंग ही असमर्थ है वे उसकी पूर्ति अन्य अंगों से कर सकते हैं और चाहें तो अपने निर्वाह का उपार्जन कर सकते हैं। अँधे लँगड़े, लूले, गूँगे, बहरे, पंगे आदि बाधित लोग अपनी अन्य इंद्रियों का उपयोग करके निर्वाह के लायक कमा सकते हैं और स्वावलम्बी जीवन जी सकते हैं। ऐसे लोगों को मुफ्तखोरी की आदत का अभ्यस्त बना देना उनके साथ अन्याय करना है। प्रकृति ने उन्हें बाधित बनाया मनुष्य का कर्तव्य है कि उस बाधा पर विजय प्राप्त करने के लिए पुरुषार्थ का परिचय दे। अपंगों को, अविकसितों को, पिछड़े हुओं को ऐसा सहकार मिलना चाहिए जिसके आधार पर वे काम करके उपार्जन की क्षमता, एवं सुविधा प्राप्त कर सकें। इसके लिए श्रम संस्थाएँ एवं उद्योग ग्रहों की स्थापना होनी चाहिए।
सस्ती भावुकता के साथ प्रदर्शित की गई दान शीलता कई बार पुण्य के बदले भयंकर पाप जैसा दुष्परिणाम उत्पन्न करती है। अपने को लोगों की दृष्टि में पुण्यात्मा प्रदर्शित करने के लिए कितने ही दान शीलता के पाखण्ड रचते हुए अनेक व्यक्ति देखे जाते हैं। दम, प्रदर्शन और अहंकार की पूर्ति के लिए सस्ती विज्ञापनबाजी जैसी भ्रष्ट दानशीलता का ही आज बाहुल्य है। धर्म के नाम पर ऐसी ही विडम्बनाएँ चलती रहती है। इसका परिणाम एक ही होता है अकर्मण्यता और परावलम्बन का अभिवर्धन। प्रकारान्तर से यह प्रवृत्ति समाज और व्यक्ति के लिए अभिशाप ही सिद्ध होती है। भिक्षुक ने निर्वाह के लिए कुछ प्राप्त करके जो लाभ उठाया उसकी तुलना में आत्म-गौरव खोने तथा परोपजीवी निष्क्रियता जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ ओढ़ लेने की हानि भी तो उठानी पड़ी। वस्तुतः यह हानि इतनी बड़ी है जिसकी तुलना में भिक्षा से मिला लाभ नगण्य ही समझा जाना चाहिए।
वातावरण ऐसा बनाया जाना चाहिए जिसमें भिक्षावृत्ति को प्रोत्साहन न मिले। आज के भिक्षुकों में अधिकाँश ऐसे हैं जो यदि चाहें तो प्रसन्नतापूर्वक उपार्जन कर सकते और स्वावलंबी सम्मानित जीवन जी सकते हैं उन्हें भिक्षा मँगाने की आदत इसलिए हो जाती है कि उथली भावुकता, दम्भी, अहंकारिता और धर्मध्वजी बनने की प्रदर्शन प्रियता कहीं न कहीं अपना पैसा बखेरेगी ही। उसे कोई तो लेगा ही। यह आलसी और दान वृत्ति के लिए बढ़कर आगे आ जाते हैं और हाथ पसार कर उन धर्म दम्भियों की मनोकामना पूर्ण करते हैं जो कुछ ही पैसे देकर सस्ती स्वर्ग की टिकट खरीदने के लिए आतुर फिरते रहते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि जिन्हें दान दिया जा रहा है उन्हें मुफ्तखोरी की बुरी आदत लगाने और स्वाभिमान बेचकर आत्मिक पतन के गर्त में धकेलने का कितना बड़ा उपहास उनके साथ किया जा रहा है। उथली दानशीलता यदि दूरदर्शी विवेक में रहती और इन समर्थ भिक्षुकों को निराश रहना पड़ता तो सम्भवतः इनमें तीन चौथाई लोग अपने स्वावलम्बी उपार्जन की समस्या हल कर चुके होते। ऐसा नहीं बन पड़ा इसका एक कारण जहाँ भिक्षुकों की आत्म-हीनता को कारण माना जायगा वहाँ इस सस्ते दानवीरों को भी कम दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
पूजा, उपासना करते हुए स्वर्ग मुक्ति का लाभ उठाने की प्रक्रिया विशुद्ध व्यक्तिवादी है। अपने लिए लाभ उठाने में निरत लोग अपने निर्वाह के लिए दूसरों पर निर्भर करे यह बड़ी अजीब बात है। जब किसान, दुकानदार, शिल्पी अपने उपार्जन भर निर्वाह करते हैं तो कोई भजनानन्दी ही भिक्षा पर निर्भर क्यों रहे? प्राचीन काल के साधु, ब्राह्मणों की परम्परा अलग थी वे भजन भी करते थे, पर साथ ही लोक-मंगल के लिए इतना अथक श्रम करते थे जिसका मूल्य उन्हें दी गई भिक्षा से हजारों गुना अधिक होता था पर आज तो वैसा कुछ नहीं होता। ऐसी दशा में केवल वेष या वंश के आधार पर भिक्षा माँगने या देने की बात किसी भी दृष्टि से औचित्यपूर्ण नहीं रह जाती।
उदारता की सत्प्रवृत्ति को जीवित रहना चाहिए। सेवा, सहकार और दान परम्परा को पूरा प्रोत्साहन मिलना चाहिए ताकि समर्थता को गौरवान्वित होने का अवसर मिले-पिछड़े लोग ऊँचे उठें और मानवीय सहयोग की पुण्य परम्परा का अधिकाधिक पोषण सम्भव हो सके। समाज से पिछड़ापन दूर करने के लिए भौतिक एवं आत्मिक प्रगति के विविध विध क्रिया-कलापों का अभिवर्धन होना चाहिए और उसमें धनी एवं निर्धन हर व्यक्ति को सहयोग देना चाहिए। यह सब विवेकशीलता और दूरदर्शिता के साथ होना चाहिए। दान का परिणाम मानवी सद्गुणों और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के रूप में आना चाहिए। असमर्थता को सकरुण सहयोग मिलना चाहिए। तभी यह कहा जा सकेगा कि हम अविवेकी भावुकता से ऊपर उठकर उदार दानशीलता के महत्व समझ सकने योग्य बन सके।
मनुष्य का अस्तित्व अदृश्य से दृश्य बनने की अवधि में उससे कितने प्रयत्न पुरुषार्थ की अपेक्षा करता है इसे बहुत कम लोग जानते हैं। प्रकृति उसकी इस विकास चेष्टा को सफल बनाने में सहायता करती है यह सही है, पर उससे ज्यादा सही यह है कि नन्हा-सा प्राण जो एक शुक्राणु के भीतर केन्द्रित होता है, इस दिशा में घोर प्रयत्न रत होता है। यदि उसने वैसा न किया होता तो सम्भव न था जो बाल की नोंक से भी छोटी सत्ता का मूल प्राणी गर्भास्थ भ्रूण बनता-विकसित होता-जन्म लेता और एक पूर्ण मनुष्य बन सकता। यह विकास क्रम उसकी घोर प्रयत्नशीलता का ही परिणाम है। पुरुषार्थियों को प्रकृति की ओर से-परमात्मा की ओर से पूरी सहायता मिलती है यह तथ्य तो सदा से सुनिश्चित है।
मनुष्य को अपना अस्तित्व प्रकट करते समय कितना घोर प्रयत्न करना पड़ता है इसे बहुत कम लोग जानते हैं। पिता के शरीर से निकला हुआ शुक्राणु इतना छोटा होता है कि आलपिन की नोंक पर उसके हजारों भाई बैठ सकते हैं। उसे बिना शक्तिशाली सूक्ष्म दर्शक यन्त्र के खुली आँखों से तो देखा तक नहीं जा सकता।
रतिक्रिया से उसमें अत्यन्त तीव्र विद्युत स्पन्दन आरम्भ होते हैं जिसके कारण वह शान्त पड़ा रहने वाला जीव उत्तेजित हो उठता है और अपनी स्वतन्त्र सत्ता का निर्माण करने के लिए सहयोगी की तलाश में द्रुतगति से परिभ्रमण करता है। बिना आँख, हाथ होते हुए भी वह अपनी अन्तः चेतना की आवश्यकता से प्रेरित होकर अभीष्ट साथी को तलाश करता है और जहाँ माता का डिंबाणु होता है वहाँ दौड़कर उसके चरणों में अपना मस्तक भुकाकर आत्म-समर्पण करता है।
लक्ष्य के लिए समर्पित मनुष्य महामानव बनता है साथी के प्रति समर्पण करने वाले, गृहस्थ स्वर्गीय आनन्द की अनुभूति करते हैं। आत्मा को परमात्मा में-व्यक्ति को समष्टि में घुला देने वाले जीवन का लक्ष्य प्राप्त करते हैं। जो अपने अहं को सीमित बनाये रहा, संकीर्णता की लौह शृंखला में जकड़े, रहा उसके भाग्य में तुच्छ कूप मण्डूक रहकर-जोहड़ का सड़ा पानी बनकर किसी प्रकार सांसें पूरी कर लेना ही बदा है। पर जिसने उच्च आदर्श सामने रखने का निश्चय किया उसके लिए समर्पण का ही एकमात्र मार्ग है। बीज अपनी सत्ता भूमि को समर्पित करता है और वृक्ष बनकर उगता है। शुक्राणु को मनुष्य जैसा विकसित प्राणी बनने के लिए डिम्बाणु को अपना समर्पण प्रस्तुत करना पड़ता है। उसका यह उदार साहस ही उसे विकास की अगली भूमिकाएँ प्रस्तुत कर सकने योग्य बनाता है।
इस नतमस्तक शुक्राणु की माँग पर दया करके डिम्ब उसे अपनी शरण में ले लेता है, गोदी में बिठा लेता है। इसी आत्मसात की क्रिया निषेचन कहते हैं। गर्भोत्पत्ति का यही प्रथम प्रयास है।
शुक्र और डिम्ब जब दोनों मिलते हैं तो दोनों की पूर्व सत्ता-पूर्व उन दोनों का अपना-अपना स्वरूप, कलेवर था, पर अब निषेचन के बाद उस पूर्व स्थिति का पूर्णतया समापन हो जाता है। दोनों की एक सम्मिलित स्वतन्त्र स्थिति बनती है। दो मिलकर सदा के लिए अविच्छिन्न रूप से एक हो जाते हैं। इससे पूर्व शुक्राणु को डिम्बाणु तक पहुँचने में इतनी लंबी यात्रा करनी पड़ती है जिसे एक मनुष्य द्वारा पूरी पृथ्वी की यात्रा करने जितना नापा जा सकता है। इस यात्रा पर स्खलन के समय लाखों शुक्राणु अभीष्ट मनोरथ की पूर्ति के लिए निकलते हैं, पर उनमें से सफल कोई एक ही भाग्यशाली होता है शेष तो उस लम्बी और कष्ट साध्य यात्रा को पूरा करते-करते ही अपना दम तोड़ देते हैं।
दो सहधर्मियों का, सहकर्मियों का मिलन यदि किसी महत्वपूर्ण उद्देश्य के लिए हुआ हो तो उसकी प्रगति देखते ही बनती है। शुक्र और डिम्ब दोनों का मिलकर बना हुआ कमल मुश्किल से बाल की नोंक की बराबर होता है, पर उनका प्रबल प्रयास और प्रगति क्रम तो देखिये। वह एक महीने के भीतर ही अपने प्रथम आकार की तुलना में 50 गुना और वजन में 8000 गुना बढ़ जाता है। वह चौथाई इञ्च का बुलबुला यदि परीक्षण विश्लेषण की मेज पर रखा जाय तो आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। उसके सिर, धड़ को देखा जा सकता है। पैर पूँछ की तरह होते हैं, हाथ तो साफ नहीं होते, पर हृदय धड़कता हुआ और नसों में रक्त चक्कर लगाता हुआ देखा जा सकता है। निषेचन के समय दो जीवाणु मिलकर एक जरूर हुए थे पर उनकी इस एकता ने अनेकता का उत्पादन तत्काल आरम्भ कर दिया होता है। एक से दो-दो से चार-चार से आठ का क्रम बनाती हुई लाखों कोशिकाएँ बनकर तैयार हो जाती हैं ताकि उनके सहारे शरीर के विभिन्न अवयवों का ढाँचा खड़ा हो सके।
सहकारिता की शक्ति कितनी बड़ी होती है इसका प्रथम परिचय मनुष्य को गर्भाशय में प्रवेश करते ही प्रकृति करा देती है। यदि भ्रूण में बुद्धि रहती होगी तो वह मानवी प्रगति के इतिहास पर दृष्टि डालकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचता होगा कि बुद्धि के आधार पर नहीं, मनुष्य अपनी सहयोगी विशेषता के कारण ही उस स्थिति में पहुँचा है जिसमें आज है। बुद्धि ने सहकारिता की शिक्षा नहीं दी। वह तो अभी भी स्वार्थपरता और व्यक्तिवाद का समर्थन करती है। प्रगति का मूल सहकारिता की वृत्ति है जिसने बुद्धि समेत अनेकानेक विभूतियाँ उसे प्रदान की हैं। शुक्राणु और डिम्बाणु का परस्पर सहयोग-समर्पण उनके मिलन संगम को कितना शक्तिशाली बनाता है कि एक नई सत्ता का अवतरण प्रत्यक्ष बन जाता है।
माता के शरीर में रहने वाला रक्त, माँस काफी भारी होता है। भ्रूण उतना भारी आहार पचा नहीं सकता। इसलिये उसे अपने चारों ओर एक परत चढ़ानी पड़ती है जो गर्भाशय में उपलब्ध सामग्री में से छना हुआ पोषक पदार्थ ही भ्रूण तक जाने देती है इस भक्षणशील परत को ‘ट्रोफोब्लास्ट’ कहते हैं। माता और बालक के बीच आदान-प्रदान का यही पर्दा महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादन करता है। आक्सीजन और रसायन मिश्रित जल इसी में होकर पहुँचता है। बात इतने से ही समाप्त नहीं होती, भ्रूण मल भी बनता है। यह परत उस मल को बाहर लाती है और माता के रक्त में धकेल जाती है। उसकी सफाई माता के रक्त को अपनी निज की सफाई के साथ-साथ ही करनी पड़ती है।
संसार में बहुत कुछ है वह सभी अपने खाने, निगलने के लिये नहीं है। उसमें से उतना ही ग्रहण किया जाना चाहिए जो अपने लिये नितान्त आवश्यक हो। गर्भस्थ शिशु की चेतना इस तथ्य को जानती है। तभी वह माता के शरीर सागर में से एक स्वल्प मात्रा ही स्वीकार करती है। मानव जीवन की यही नीति होनी चाहिए, उसे उपभोग में न्यूनतम ग्रहण करना चाहिए और शेष को संसार की प्रगति समृद्धि के लिये छोड़ना चाहिए। यदि अनावश्यक को ग्रहण किया जायगा तो अपने लिये विपत्ति ही बनेगी।
आत्म-शोधन की नीति आरम्भ से ही बनती है। उत्पन्न होने वाले मल-विकारों को हटाना, शरीर के लिये ही नहीं मन के लिये भी-मन के लिये ही नहीं समग्र चेतना के लिए आवश्यक है। भ्रूण मल उत्पन्न करता है और त्यागता है। यह क्रिया यदि सदैव चलती रहे तो पेट, मस्तिष्क और भाव क्षेत्र में मलावरोध की विपत्ति उत्पन्न न हो।
लोग ऐसा सोचते हैं कि माता का रक्त ही भ्रूण की नसों में घूमता होता है। बात ऐसी बिलकुल नहीं है। बच्चे का रक्त अपना स्वतन्त्र होता है। यह बात दूसरी है कि उसके लिए निर्माण सामग्री माता के शरीर में से ली गई है।
माता के शरीर की हलचलें बच्चे को कष्ट न पहुँचाये इस प्रयोजन के लिए भ्रूण एक जलीय जाकेट पहन लेता है। चूँकि बच्चा अब पढ़ने लगा है और उस पर माता के पेट के अवयव दबाव डाल सकते हैं। चलने-फिरने, दौड़ने, उलटने-पलटने की क्रिया भ्रूण को झटका दे सकती है इसलिये यह सुरक्षात्मक जाकेट बहुत ही कारगर होती है। दूसरे महीने गर्भ को इस
कवच को धारण किये देखा जा सकता है मानो किसी बड़े युद्ध की तैयारी के लिये उसने अपने आपको भली प्रकार सुसज्जित कर लिया हो।
स्वावलंबन अपनी सतर्कता से आत्म-रक्षा की शिक्षा जन्म लेने के पश्चात् नहीं, विकास काल के आरम्भ में ही सीखनी पड़ती है। प्रकृति उसे यही सिखाती है। माता अनुदान भर दे सकती है, पर उस अनुदान से लाभ उठाना न उठाना पूर्णतया चेतन प्राणी के अपने हाथ में है। भ्रूण अपनी स्वतन्त्र क्रियाशीलता का परिचय देता है और आत्म-रक्षा के उपकरणों से सुसज्जित होता है। यदि उसे जन्म लेने के बाद भी प्रगति अभीष्ट हो तो इसी नीति का सदा ही अवलम्बन करते रहना होता है।
हृदय और मस्तिष्क यह दो अवयव मानव शरीर में अति महत्वपूर्ण हैं। तीसरे महीने इनका विकास शुरू हो जाता है। आरम्भ में वे सर्वथा अविकसित होते हैं उनके कलपुर्जे न तो स्पष्ट होते हैं और न पूर्णतया गतिशील। हाँ उनमें स्पन्दन, ऐंठन, हलचल जरूर हो रही होती है। यही है वह क्रिया जिससे इन अविकसित अवयवों को आगे चलकर अपना स्पष्ट और समर्थ रूप धारण करना है। आंतें एक अनगढ़ रस्सी की तरह होती हैं, पर उनमें हलचल उस अनुपात में हो रही होती है जो पूर्ण मनुष्य की हलचलों से हजार गुनी अधिक गतिवान कही जा सके।
गर्भस्थ शिशु चुपचाप नहीं बैठा रहता, उसे घोर प्रयत्न रत रहना पड़ता है। शरीर के भीतरी और बाहरी कलपुर्जे द्रुतगति से सचेष्ट होते हैं। यह उस अदृश्य जीव सत्ता की प्रेरणा है जो जानती है कि विकास घोर और अनवरत पुरुषार्थ पर ही टिका हुआ है। इसमें उपेक्षा करने पर वह वरदान नहीं मिल सकता जो मानवी कलेवर में अवतरित होने के लिये उसने चाहा है।
एक महीने का भ्रूण एक इञ्च के दशवाँश जितना लम्बा होता है उसका सिर धड़ और पूँछ देखी जा सकती है। इस स्थिति में ही उसके हृदय और मस्तिष्क बनने शुरू हो जाते हैं और फेफड़े तथा आँतें अपना रूप प्रकट करने लगते हैं।
गुर्दे बनने का कार्य देखते ही बनता है। भ्रूण अपनी आवश्यकतानुसार उन्हें कई बार तोड़-फोड़कर नई आकृतियों में परिवर्तित करता है। आरम्भिक गुर्दा मछली के गुर्दे जैसा-पीछे मेढ़क जैसा बनता है। मनुष्य जैसा गुर्दा बनने में उसे कई मंजिलें पार करनी पड़ती हैं और कई ढाँचे तोड़-मरोड़ करके उपयोगी यन्त्र गढ़ना पड़ता है। रेल का इंजन पहले पहल कैसा बना था और पीछे उसमें क्या-क्या सुधार होते आये और अब इन दिनों उसका कितना सुधरा हुआ रूप उपलब्ध है इसका इतिहास क्रमबद्ध रूप से सामने रखा जाय तो वह गर्भस्थ बालक के गुर्दों के विकास क्रम से अधिक आश्चर्यजनक न लगेगा।
एक महीने की आयु का भ्रूण चौथाई इञ्च लम्बा-एक छल्ले की तरह मुड़ा सिकुड़ा-ऊपर एक गोली (भावी शिर) नीचे पूँछ (भावी पैर) छोटी सी गरदन उसके दोनों ओर चार दरारें। बस यही है वह आरम्भ जिसे आगे चलकर पूर्ण मनुष्य के विकसित रूप में परिणित होना है।
दूसरे महीने में प्रवेश करने और उसे पूरा करने की अवधि में भ्रूण के प्रगति क्रम में कमी नहीं वरन् बढ़ोतरी ही होती है। उसकी लम्बाई पहले महीने की तुलना में छह गुनी और वजन 500 गुना बढ़ता है। अब उसमें हड्डियों तथा माँस पेशियों की निशानियाँ देखी जा सकती है। आँख, कान, नाक, मुँह आदि ज्ञानेन्द्रियों के निशान देखे जा सकते हैं। यद्यपि वे स्पष्ट नहीं होते तो भी यह समझा जा सकता है कि निकट भविष्य में यहाँ क्या उत्पादन और क्या निर्माण होने जा रहा है। रीढ़ की हड्डी भी इसी अवधि में बन आती है जिनके माध्यम से तन्त्रिकाओं तथा हड्डियों का ढाँचा उसके साथ जुड़ने जा रहा है।
तीसरे महीने वह भिन्नताएँ पैदा होती हैं जिनके आधार पर उसका लिंग भेद किया जा सकता है। दो महीने की अवधि में लिंग भेद पहचान कराने वाला कोई लक्षण प्रकट नहीं होता। इससे पूर्व भ्रूण में उभय लिंगी लक्षण होते हैं। तीसरे महीने जब एक दिशा विशेष में परिवर्तन होता है तो एक लिंग के लक्षण क्षीण होने लगते हैं। यद्यपि उन दोनों की पूर्ण समाप्ति कभी भी नहीं होती। नर और नारी के चिन्ह हर मनुष्य में बने रहते हैं। इनमें से जो पक्ष विकसित होने लगेगा उसी की प्रमुखता हो जायगी और दूसरा पक्ष समाप्त तो नहीं होगा, पर सुषुप्त अवस्था में जा गिरेगा। जीव तत्वतः किसी लिंग का नहीं। मनुष्य भी नहीं। जीवधारियों में अनेक प्राणी ऐसे हैं जो आवश्यकतानुसार अपना लिंग बदलते रहते हैं अथवा उभय लिंगी हैं। मनुष्य भी उन्हीं में से एक हैं। वंश परंपरा के अनुसार नर और नारी की मिश्रित विशेषताएं उसमें विद्यमान हैं। तीसरे महीने एक पक्ष का पलड़ा भारी होने लगता है और एक का ऊपर उठने लगता है। इस असन्तुलन से ही भ्रूण को नर या नारी बनने के प्रवाह में बहना पड़ता है और तद्नुरूप अपनी अनेक विशेषताओं में हेर-फेर करना पड़ता है।
जीवन के इन आरम्भिक दो महीने में जीव को इतना घोर परिश्रम और इतना अद्भुत विकास करना पड़ता है जितना वह गर्भावस्था के शेष 7 महीनों में तो क्या सारे जीवन भर में नहीं करने पाता। यद्यपि देखने में यह दो महीने किसी परख पहचान के अनुसार विशेष महत्वपूर्ण नहीं मालूम-पड़ते।
बुद्धि और विकास का क्रम अब अधिक स्पष्ट दिखाई पड़ता है। तीसरे चौथे महीने में वह सबसे अधिक वृद्धि गत पर होता है इसी अवधि में वह छह से आठ इंच तक का हो जाता है। जन्म के समय की लम्बाई का यह आधा भाग है।
प्राणी की प्रकृति उसके आरम्भिक समय में ही यह बता देती है कि पुरुषार्थ की सम्भावनाएँ असीम हैं। उस पर कोई अंकुश नहीं और कोई अनुपात नहीं। साधन स्वल्प हों तो चिन्ता की कोई बात नहीं उत्कृष्ट चेष्टा में वह जादू भरा पड़ा है कि साधन कहीं से भी इकट्ठे कर लेती है- अनुकूलताएँ, सहायताएँ कहीं से भी आकर्षित होती चली आती हैं। गर्भस्थ बालक भौतिक दृष्टि से असहाय, अपंग और अभावग्रस्त परिस्थिति में ही होता ह, पर उसके अपने प्रयत्न कितने अधिक कारगर होते हैं-उसे कितनी अदृश्य सहायता मिलती है इसका परिचय उसे तीन मास का भ्रूण होने तक भी भली प्रकार सिखा दिया जाता है। पुरुषार्थ क्रम जितना तीव्र होगा अदृश्य अनुदान की सम्भावना उतनी ही प्रशस्त होती चली जायगी।
सिर बड़ा, धड़ चौड़ा और टाँगे बहुत पतली बहुत छोटी यही है भ्रूण का स्वरूप। दो महीने में सिर सारे शरीर का आधा भाग-तीसरे से पांचवें महीने तिहाई और उससे अगले महीनों में वही चौथाई रह जाती है। विकसित मनुष्य का शिर उसके समूचे शरीर की तुलना में मात्र दसवाँ भाग होता है। विकास का प्रधान साधन मस्तिष्क है। बल की अधिकाँश सम्भावना मनःक्षेत्र में रहती है। इसलिए उसे जन्म काल से ही बड़े अनुपात का मस्तिष्क मिलता है। मानसिक विकास की उपेक्षा करके पदार्थों से खेलने में लग जाने पर जन्म लिया हुआ मनुष्य उतने लाभ नहीं उठा पाता जितना कि मस्तिष्कीय अभिवृद्धि के कारण उसे गर्भ काल में मिलते हैं।
गर्भस्थ बालक चुपचाप नहीं बैठा रहता। शुक्राणु से भ्रूण बनने में सफलता प्राप्त करने के लिए उसने जो प्रबल पुरुषार्थ किया था वह कायवृद्धि के साथ-साथ और भी प्रबल होता जाता है। वह हिलता-डुलता है, शरीर को तानता है हाथ पैर फैलाता है। इन सब हलचलों को माता इस तरह अनुभव करती है मानो कोई जीवित पक्षी उसे पेट में बैठा हुआ पंख फड़फड़ा रहा हो। नव जीवन प्राप्त करने के लिए यह उसका प्रबल प्रयास है जो उसकी सामर्थ्य को देखते हुए किसी भी प्रकार नगण्य नहीं कहा जा सकता।
जन्म देती तो माता ही है, पर उसके लिए पूर्व तैयारी बालक ही करता है। वह व्यायामशाला में अभ्यास करने वाले पहलवान की तरह उदर से बाहर निकलने के छोटे-बड़े अभ्यास करना पाँच मास का गर्भ बनने से पूर्व ही आरम्भ कर देता है।
पांचवें महीने बसी ग्रन्थियाँ स्वेद ग्रंथियां, बनती हैं-त्वचा अपने परत ठीक करती है। फुट भर लम्बा एक पौण्ड भारी होते हुए भी वह इस योग्य नहीं होता कि पेट से बाहर के वातावरण में फैले हुए विकिरण को सहन कर सके। यदि इसी स्थिति में उसका जन्म हो जाय तो कुछ ही साँस ले सकेगा दो चार बार ही हाथ पाँव हिला सकेगा, शायद एकाध हलकी चीख मुख से निकले बस इतना भर करके यह ठण्डा हो जायगा। बाह्य जगत की परिस्थितियों में जूझने की क्षमता उसमें अभी तक उत्पन्न नहीं हुई होती। छह महीने का बालक इससे सुदृढ़ हो सकता है।
सातवें महीने वह अपना विकास इस सीमा तक कर चुका हाता है कि जन्म लेने के बाद जीवित रह सके। अगले दो महीने उसके परिपक्व होने के लिए हैं। इस अवधि में वह वे सब अभ्यास कर लेता है जो उसे जन्म लेने के उपरान्त करने पड़ेंगे माँस पेशियों का सिकुड़ना, फैलना, रक्त संचार, श्वास, प्रश्वास आदि हलचलें जो जीवित रहने के लिए आवश्यक है वे इन दिनों होने लगती है और उनका अभ्यास क्रमशः परिपक्व होने लगता है। इन महीनों में उसे कभी सक्रिय कभी निष्क्रिय देखा जा सकता है। मानो वह रुक-रुक कर व्यायाम कर रहा हो।
सामान्यतया ऋतु स्राव के अन्तिम दिन 280 वें दिन जनम लेने का उपयुक्त समय होता है। यों यह कोई अनिवार्य नियम नहीं है। एक दो सप्ताह इसमें घट-बढ़ भी हो सकती है। प्रकृति उसे बन्धन मुक्त तब तक करती है जब वह अपनी परिपक्वता प्रमाणित कर देता है। 280 दिनों में उसे यही परीक्षा उत्तीर्ण करने की तैयारी करनी पड़ती है।
जन्म लेते ही बालक हाँफता है, फेफड़ों में हवा भरता और निकालता है यह क्रिया उसके चीखने, चिल्लाने के रूप में सुनाई पड़ती है। बाहरी दुनिया और भीतरी दुनिया का जो अपरिचित अन्तर है उसी की प्रतिक्रिया में बालक का हर अंग संघर्षरत दिखाई पड़ता है। हाथ पैर फैंकने, रोने चिल्लाने के साथ-साथ उसके भीतरी और बाहरी अंग सभी अत्यन्त गतिशील होते हैं मानो वे अनभ्यस्त और अपरिचित परिस्थितियों का सामना करने के लिए अपने आपको सक्षम बना रहे हों॥
अब तक बालक पराधीन था परमुखा पेक्षी थी और पराश्रित। माता से उसे सभी प्रकार का पोषण मिलता था, अब उसे स्वतन्त्र इकाई के रूप में अपने अस्तित्व की रक्षा करने के लिए अपना उत्तरदायित्व आप बहन करना है। इसकी घोषणा गर्भ रज्जु काट कर ली जाती है। अब माता और बालक का सम्बन्ध एक प्रकार से कट गया ही समझा जा सकता है। बंधन कटने पर ही स्वतन्त्र सत्ता के प्रकटीकरण का अवसर मिलता है।
जन्म लेते ही बालक अपने आपको द्रुतगति से विकसित करता है आरम्भ में उसके फेफड़े छोटे, सघन और ठोस होते हैं, पर थोड़ी सी सांसें ही उन्हें शहद की मक्खी के छत्ते की तरह फुला देती है। उनके हलके स्पंजनुमा कितने ही छोटे-छोटे वायु कोष्टक बन जाते हैं और अपना काम करने लगते हैं। यों नियमित साँस लेने के अभ्यास में कई दिन लग जाते हैं।
छोटा-सा हृदय धीरे-धीरे धड़कना आरम्भ करता है और फिर अपनी रफ्तार पकड़ लेता है। आँतों में जो मल जमा होता है वह टट्टी के रास्ते निकल जाता है, मुख में लार ग्रन्थियाँ तो होती हैं, पर स्राव रहित, आँखों में अश्रु ग्रन्थियाँ भर होती हैं, पर रोते समय आँख से नहीं टपकते। यह विकास धीरे-धीरे होता है। आंखें प्रकाश और अन्धकार का अन्तर तो समझती हैं पर उनके कोष्टक इस योग्य नहीं होते कि कोई सही फोकस बनाकर उसकी अनुभूति मस्तिष्क को करा सके।
प्रकृति इतनी समस्त क्रियाएँ हर नवजात बालक को समान रूप से सिखाती है। इन समान रूप में सीखे गये पाठों में से कौन कितने याद रखता है और कौन कितने भुला देता है यही है वह रहस्य जिसके आधार पर मनुष्य की अपनी स्वतन्त्र प्रगति करने का अथवा अवनति के गर्त में जा गिरने का अवसर मिलता है।
आँवला एक बहुत उपयोगी फल है। यह विशिष्ट गुण सम्पन्न है। इसके वृक्ष भारत के हर क्षेत्र में पाये जाते हैं। हिमालय की चार हजार फुट ऊँची पहाड़ियों से लेकर भारत के धुर दक्षिण और लंका तक तथा जम्मू से लेकर पूर्व में असम की गारो-खासी की पहाड़ियों तक इसके वृक्ष लहलहाते देखे जा सकते हैं। यह बहुत ही सहिष्णु पेड़ है। पाले और लू की समान रूप से उपेक्षा करता हुआ जंगलों, वाटिकाओं दोनों की शोभा बढ़ाने से सर ऊँचा किये रहता है।
चाहे इसका फल जंगल से प्राप्त हो चाहे अमीर के उद्यान से, समान रूप से गुणकारी होता है। हाँ स्वाद और आकार में कुछ अन्तर हो सकता है। सस्ता होने के कारण यह गरीब की कुटिया में तथा विटामिन प्रधान होने के कारण अमीर के राज प्रसादों में समान रूप से आदर पाता है। इसके सस्तेपन के कारण ही अमीर इसका तब तक निरादर करता रहा, जब तक कि वैज्ञानिक परीक्षणों ने इसकी महिमा को पुनर्स्थापित नहीं कर दिया। अब तो विदेशों में भी इसकी अच्छी माँग हो रही है और वहाँ भी इससे अनेक औषधियाँ बनाई जा रही हैं।
आज से हजारों वर्ष पूर्व भारत में आँवले को सर्वोत्तम रसायन की मान्यता प्राप्त थी। भारतीय महर्षियों ने इसके जीवनीय गुणों का परीक्षण किया था और इसे प्रथम आहार माना था। बाद में दुर्भाग्यवश ज्ञान के अन्धकार युग में इसके भी गुण भुला दिये गये। अब पुनः वैज्ञानिक परीक्षणों ने इसकी महिमा को पुनर्जीवन देने में भरपूर सहायता दी है। इन परीक्षणों से पता चला है कि इसके फल में 9.6 प्रतिशत एसीटिक अम्ल, 35 प्रतिशत टेनिक व गेलिक अम्ल तथा 10 प्रतिशत ग्लूकोज होता है। इनके अतिरिक्त प्रोटीन 0.5 प्रतिशत वसा 0.1 प्रतिशत खनिज लवण 0.7 प्रतिशत रेशे 3.4 प्रतिशत और कार्बोहाइड्रेट 4.1 प्रतिशत पाये जाते हैं।
विटामिनों का तो यह भण्डार ही है। विटामिन ‘सी’ इसमें सबसे अधिक पाया जाता है। इसमें संतरे के रस से 20 गुना और सेब के रस से कई गुना अधिक विटामिन ‘सी’ पाया जाता है। यह विटामिन शारीरिक और मानसिक दोनों विकास के लिये अति आवश्यक है। अतः यह बच्चों, बूढ़ों, नौजवानों और गर्भिणियों के लिए अति उपादेय है।
आँवले की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह सभी प्रकार के प्रकृति वाले व्यक्तियों की, सभी प्रकार के ज्वर, मूत्रकच्छ, योनिदाह एवं उपर्युक्त अनेकानेक रोगों में रामबाण की तरह अचूक पाया गया है।
आँवले में जीवनदायिनी शक्ति पाई जाती है। यह शक्तिवर्धक और स्वास्थ्यवर्धक दोनों ही है। यह शरीर की ऊष्मा को सुरक्षित रखता है, नेत्रों की ज्योति बढ़ाता है बालों की जड़ों को मजबूत बनाता है, दन्त पंक्तियों को उज्ज्वल चमक देता है। यह हृदय तथा मस्तिष्क को बल प्रदान करता है यह मस्तिष्क के तन्तुओं के तरावट रखता है।
इसकी सेवन विधि भी सुगम हैं। मुरब्बा व अचार के रूप में इसका लोकप्रिय प्रयोग तो सर्वविदित है। नमक और कालीमिर्च के साथ इसका कच्चा फल बहुत स्वादिष्ट लगता है। भोजन के बाद इस रूप में इसका सेवन जठराग्नि को प्रदीप्त करता है। क्षुधा को बढ़ाता है। रक्त को साफ रखता है और दांतों को मोती की तरह चमकाने लगता है और शरीर को निरोगता प्रदान करता है। आँवले की चटनी भी बनाई जाती है। धनिया, पुदीना के साथ खटाई के स्थान पर इसका प्रयोग गुणकारी होता है। इसके सूखे टुकड़े सुपारी की तरह खाये जाते हैं। आँवले को आग में भूनकर नमक के साथ भर्ता बनाकर खाया जाता है। भोजन के साथ या बाद में इसके सेवन से परिपाक ठीक रहता है और मस्तिष्क में स्फूर्ति बनी रहती है। त्रिफला एवं अन्य भेषजों में इसका प्रयोग भेषजीय रूप में होता है।
आहार मात्र पेट भरने के लिए नहीं है और न जिह्वा का स्वाद तृप्ति करने के लिए। उसे शरीर को उचित पोषण प्रदान करने की दृष्टि से ग्रहण किया जाना चाहिए। गन्ध, स्वरूप और स्वाद की दृष्टि से नहीं वरन् उसे इस दृष्टि से परखा जाना चाहिए कि उपयुक्त पोषण प्रदान कर सकने के तत्व उसमें हैं या नहीं। उपयुक्त भोजन के सम्बन्ध में सतर्कता बरतने पर ही हम नीरोग और दीर्घजीवी बन सकते हैं। इस दिशा में बरती गई उपेक्षा एवं भूल का दुष्परिणाम हर किसी के लिए बहुत महँगा पड़ता है।
डाक्टर लोग अपने बीमारों को जीवनी शक्ति बढ़ाने के लिए विटामिन ‘बी’ प्रयोग करने की सलाह देते हैं और दवाओं से उसे सम्मिलित करते हैं। रक्त की कभी, अपच, थकान, स्नायु, दुर्बलता जैसी कठिनाइयों में तो उसका उपयोग एक तरह से आवश्यक ही माना जाता है। लोग उसे खरीदते और खाते भी हैं। वह लाभ स्थायी रूप से मिलता नहीं जो विटामिनों के शरीर में समाविष्ट होने पर मिलना चाहिए।
कारण एक ही हे कि उनकी स्वाभाविक स्थिति और स्वाभाविक मात्रा सामान्य खाद्य पदार्थों के माध्यम से पेट में जाकर जब पचती है और रक्त में सम्मिलित होती है तभी उसे शरीर अंगीकार करता है। ऊपर की ठूँस-ठाँस को वह स्वीकार ही नहीं करता और उस बोझ को उतार कर फेंक देता है। अक्सर विटामिन बी की गोलियाँ खाने पर पेशाब पीला हो जाता है। यह पीलापन मुंह से खाये विटामिनों का मूत्र मार्ग से बहिर्गमन ही है।
दवाओं के माध्यम से दिये हुए पोषक पदार्थ यदि शरीर में घुले गये होते तो फिर किसी धनी को कमजोर या बीमार रहने की कठिनाई न सहनी पड़ती। सभी चीजें खरीदी और खाई जा कसती थी अथवा उनके इन्जेक्शन लेकर काम चलाया जा सकता था। पर ऐसा होता नहीं क्योंकि पाचन तन्त्र की स्वाभाविक प्रक्रिया में होकर गुजरे हुए-स्वाभाविक खाद्य पदार्थ ही जितना कुछ उपयोगी तत्व शरीर में पहुँचा पाते हैं उसी को स्थायित्व मिलता है।
विटामिन ‘सी’ के अभाव में रीढ़ की हड्डियों के जोड़ ढीले हो जाते हैं वे अपनी जगह से हिलने और हटने लगते हैं, जिससे कमर का दर्द शुरू हो जाता ह। कई बार रीढ़ की मणिकाओं में आवश्यक लोच और चिकनाई की कमी के कारण आपस में घिसावट होने लगती है। जोड़ तन्तु कोमलास्थि, माँस पेशियाँ तथा रक्त नलिकाएँ विटामिन सी के अभाव में कठोर हो जाता है और शरीर के सामान्य क्रिया-कलाप में विशेषतया अंग संचालन में अकड़न एवं भारीपन अनुभव होता है।
अमेरिका मेडिकल ऐसोसिएशन के सदस्यों ने जन साधारण को ताजे रसदार फलों और प्रायः सभी खट्टे फलों का सेवन करते रहने की सलाह दी है ताकि विटामिन ‘सी’ के अभाव में जो जीवनी शक्ति की कमी पड़ती है उसकी पूर्ति होती रहे मसूड़े और दाँत के रोगों का प्रधान कारण विटामिन ‘सी’ की कमी को ही बताया गया है। आँवला, नीबू टमाटर जैसे खट्टे फलों में विटामिन ‘सी’ प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
उत्तम और पर्याप्त रक्त शरीर में बना रहे इसके लिए रोटी, आलू, घी, चीनी, माँस जैसे प्रचलित आहार की इतनी आवश्यकता नहीं जितनी कि क्षार लवण और खनिजों की। आयरन, कैल्शियम, पोटेशियम, फास्फोरस आदि जिनमें आधिक हों वे ही रक्त का स्तर एवं बाहुल्य बनाये रह सकते हैं। ऐसे पदार्थों में शाकों और फलों की ही गणना हो सकती है।
शरीर संचालन की क्रिया को ठीक तरह सम्पन्न करने में कैल्शियम की अत्यधिक आवश्यकता पड़ती है। रक्त में उसका बहुत बड़ा अंश रहता है जिसे बड़ी मात्रा में ‘सीरम’ में घुला हुआ देखा जा सकता है। सीरम रक्त का वह लसदार भाग है जो उसके कणों का ठीक प्रकार संचालन करने में सहायता करता है। रक्त में अम्ल का संतुलन बनाये रहने की उसकी भूमिका अति महत्वपूर्ण रहती है, कोई अंग कट जाने पर रक्त निकलने लगता है। उसे बन्द करने में कटे हुए स्थान पर जो पपड़ी सी जमा होती है, उसमें कैल्शियम की ही प्रधानता रहती है। यदि उसका उपयुक्त अंश न रहा होगा तो बहते हुए रक्त का रुकना कठिन हो जायगा। वह जम ही नहीं सकेगा।
कैल्शियम, विटामिन बी-1 के सहयोग से स्नायु तन्तुओं की संवेदना शक्ति को बल देता है। हाइड्रो कारबोरेट के सहयोग से स्नायु तंतु उसी के द्वारा अपना संतुलन बनाये रहते हैं। माँस-पेशियों का लचीलापन उनका सिकुड़ना-फैलना कैल्शियम की सहायता से ही संभव होता है यदि उसकी कमी पड़ जाय तो सारे शरीर में अकड़न अनुभव होगी यहाँ तक कि हृदय की रक्त संचालन क्रिया में भी व्यवधान उत्पन्न होने लगेगा।
शरीर में हड्डियों की आवश्यकता इसलिए है कि वह सुदृढ़ और खड़ा रह सके। इसके अतिरिक्त उन्हें कैल्शियम का सुरक्षित भण्डार भी समझा जा सकता है। जब कभी उसकी कमी पड़ती है तो उस आवश्यकता की पूर्ति हड्डियों के कोष में लेकर शरीर पूरी करता है।
शरीर में कैल्शियम की कमी पड़ने पर दाँत सड़ने उखड़ने और टूटने लगते हैं। शिर के बाल झड़ते हैं। उंगलियों के नाखूनों की लाली घट कर सफेदी आ जाती है। कटे हुए स्थान से रक्त देर तक बहता है और घाव जल्दी नहीं भरते। चमड़ी की चिकनाई घट जाती है और उस पर मुर्दनी तथा रूखापन छा जाता है। चोट लगने पर नीले दाग पड़ जाते हैं। पैरों में भड़कन और माँस-पेशियों तथा जोड़ों में अकड़न उत्पन्न होती है। कमर में दर्द रहता है और जल्दी थकावट आती है। हड्डियाँ टेड़ी होने लगती हैं और जरा से आघात में उनके टूटने का डर रहता है। रोगों से लड़ने की सामान्य क्षमता घट जाती है।चिकित्सक कैल्शियम की कमी को उसके इंजेक्शन लगाकर तथा गोलियाँ खिलाकर पूरा करना चाहते हैं, पर कठिनाई यह है कि शरीर इस प्रकार के अनुदान को लेने से इनका करता रहता है। खाई हुई गोलियों का प्रभाव मल मार्ग से बाहर निकल जाता है। इंजेक्शनों से उसे पहुँचाने पर वह प्रायः हड्डियों की ऊपरी परत पर चिपक कर रह जाता है इस रक्त नालियों की दीवारों पर भी बाहर से लिया हुआ कैल्शियम चिपका हुआ पाया गया है। इससे अभीष्ट लाभ मिलना तो दूर उलटे नाड़ियों में कठोरता जन्य अवरोध उत्पन्न होने का नया संकट सामने आ खड़ा होता है।
एक अभाव पूर्ति के लिए किये गये वे प्रयत्न निरर्थक बन कर रह जाते हैं शरीर प्रायः उन्हीं तत्वों को स्वीकार करता है जो सामान्य आहार के साथ अपने प्राकृतिक रूप में, संतुलित मात्रा में भीतर आते हैं और पाचन की स्वाभाविक प्रक्रिया में भ्रमण करते हुए रक्त में सम्मिलित होते हैं।
जिन पदार्थों में कैल्शियम की अधिक मात्रा पाई जाती है उनमें छेना, मलाई, दूध, चुकन्दर, गोभी, खजूर, अंजीर, नीबू, संतरा, नासपाती, रसभरी, पालक, शलजम, मूली, प्याज, गाजर आदि प्रमुख हैं। दूध को आग पर अधिक उबाला जाय तो उसका स्वाभाविक कैल्शियम नष्ट हो जायगा यह बात भी ध्यान रखने की है। चीनी मिला दूध पियें तो भी वह मिठास उस विशेषता को अपने पचाने के लिए चूस लेता है और उसकी विशेषता नष्ट कर देता है।
पूर्वी योरोप में एक करोड़ की आबादी का एक छोटा-सा देश है हंगरी। उसे बहुत समय तक राजनैतिक पराधीनता के बंधनों में जकड़ा रहना पड़ा। तब वह गरीबों और बीमारों का वेश बना हुआ था। स्वतंत्रता के बाद उसने नये सिरे से अपना निर्माण और उत्थान शुरू किया। इन आयोजनों से खाद्य समस्या का हल निकालना मुख्य है। शाक और फलों के उत्पादन पर उस देश में बहुत अधिक ध्यान दिया गया दूध की डेरियाँ खोलने के लिए विशेष प्रबंध किया गया है। फलस्वरूप आटे की खपत घट गई है। भारत की 40 प्रतिशत आजादी वह है जिसकी आयु 15 वर्ष से कम है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भूत पूर्व निर्देशक डा.स्वामी नाथन ने चेतावनी दी थी कि यदि देश में निम्न मानसिक स्तर के लोगों की भरमार नहीं करनी है तो बालकों के लिए पोषक आहार की व्यवस्था करनी पड़ेगी। तथ्य यह है कि मस्तिष्क का वजन और विकास 10 वर्ष की आयु तक जड़ें जमा लेता है पीछे तो उसका परिपक्व होना मात्र शेष रह जाता है। यदि छोटी आयु के बालकों को उपयुक्त पोषण न मिलेगा उनके आहार में प्रोटीन तथा दूसरे तत्व न रहेंगे तो वे शारीरिक ही नहीं मानसिक दृष्टि से भी अविकसित रह जायेंगे। तब पूरे देश और समाज में भरी हुई व्यापक दुर्बलता आवेगी और उसका दुष्परिणाम हम सब को भोगना पड़ेगा।
इजराइल के दक्षिण भाग के नेगेव रेगिस्तानी क्षेत्र में एक धुकक्लड़ जाति रहती है- विदोइन। इसके वंशजों में से कभी किसी को हृदय रोग नहीं होते। तीस वर्ष की आयु के बाद जब कि सामान्य लोगों का रक्त गाढ़ा होने लगता है और हृदय रोग उत्पन्न होने का प्रधान हेतु बनता है वहाँ इन लोगों का रक्त बुढ़ापे तक पतला ही बना रहता है। तदनुसार उन्हें हृदय रोग ही नहीं अन्य रोग भी बहुत कम होते हैं। उनमें से कदाचित ही कोई मोटा होता है। इसलिए रेगिस्तानी कड़ी गर्मी को भी वे आसानी से सह लेते हैं। उनकी सहन शक्ति बढ़ी-चढ़ी होती है।
इजराइल के स्वास्थ्य विशेषज्ञ गंभीरता पूर्वक यह खोज कर रहे हैं- आखिर क्या कारण है जिससे इन लोगों को यह असाधारण प्रकृति-वरदान प्राप्त है। इस शोध कार्य के लिए वहाँ के वैज्ञानिकों की एक समिति काम कर रही है। जिसके अध्यक्ष होवरो विश्वविद्यालय के प्रोफेसर फ्रिट्ज डेलफस है। वे आहार विशेषज्ञ भी हैं। इस समिति में जीव रसायन विशेषज्ञ डा.ई. यरवन,आहार शास्त्री डा.मिरियम क्लोक, नृतत्व विज्ञानी मिनी लैबी जैसे मूर्धन्य लोगों को लिया गया है।
समिति के विदोइन लोगों के आहार के बारे में यह जाना है कि वे जौ, गेहूँ जैसे अनाजों की मोटी रोटियाँ पकाते हैं और अपनी भेड़ बकरियों के दूध को नहीं पीते वरन् दही जमाकर खाते हैं। दही और रोटी ही उनका प्रमुख भोजन है। मछली वे बिल्कुल नहीं खाते। माँस सिर्फ त्यौहारों पर यदा-कदा पकता है। अण्डा भी वे नहीं खाते। फल सब्जी वे पसंद तो करते हैं पर उस रेगिस्तानी इलाके में वे उगते ही नहीं इसलिए दही रोटी पर ही उन्हें गुजर करनी पड़ती है।
(1) कड़ाके की भूख लगने पर ही खाना, (2) पेट को ठूँस-ठूँस कर न भरना उसमें आधी जगह हवा पानी के लिए रहने देना, (3) मुँह में भली प्रकार दांतों से पिस जाने के बाद ही ग्रास को गले से नीचे उतारना (4) भुने, तले, मिर्च मसाले वाले जायके दार पदार्थों की अपेक्षा ताजे हरे फल शाकों की प्रमुखता देना, (5) दूध, दही, छाछ को यथा संभव संतुलित मात्रा में लेने का प्रयत्न करना, (6) अन्न चिकनाई और शकर की मात्रा कम से कम लेना यह छह नियम ऐसे हैं जिनका ध्यान रखने पर हमारा आहार समुचित पोषण दे सकता है। और हम निरोग दीर्घ जीवी रह सकते हैं।
प्राचीन भारत के बहुमूल्य अवशेष आज भी उपलब्ध है, उन्हें देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इससे अधिक परिष्कृत सभ्यता अब तक इस धरती पर अवतरित नहीं हुई। इस महान सभ्यता ने समस्त विश्व को चिर काल तक ऐसा प्रकाश दिया जिससे शान्तिमय सह जीवन की सुनिश्चित दिशा का पता चल सका। विश्व की अन्य सभ्यताएँ एकाँगी और सीमित हैं जब कि हिन्दू सभ्यता का प्रकाश सूर्य की तरह अत्यंत उच्च और व्यापक कहा जा सकता है।
गंगा भारत भूमि की सर्व प्रधान रक्त धमनी है। उसके धार्मिक आध्यात्मिक महत्व पर कोटि-कोटि धर्म प्रिय भारतीय विश्वास करते हैं। उसके संपर्क सान्निध्य में शान्ति प्राप्त करते और प्रेरणा ग्रहण करते हैं। उसकी मान्य पवित्रता को, सद्ज्ञान की गरिमा के साथ जोड़ते हुए तत्वदर्शी लोग ज्ञान गंगा की तुलनात्मक चर्चा करते हैं।
आर्थिक दृष्टि से उसके द्वारा होने वाली, सिंचाई नौका नयन, भूमि को उपजाऊ बनाने जैसे कितने ही महत्व है। स्वास्थ्य की दृष्टि से विचार किया जाय तो उसका जल अमृत है और समीपवर्ती क्षेत्रों में जो वातावरण बनता है उसका अपना महत्व है। तटवर्ती क्षेत्र में उगे हुए वृक्ष, गुल्म और वनस्पति न केवल आर्थिक दृष्टि से वरन् स्वास्थ्यकर वायु प्रदान करने की दृष्टि से भी अत्यंत उपयोगी है।
पदार्थ विज्ञान के बाल्यकाल में वस्तुओं की रासायनिक स्थिति को ही मान्यता दी गई थी यह नहीं स्वीकारा गया था कि-”उनका प्रभाव मनुष्य के मनः स्तर को उठाने गिराने में भी सहायक होता है। उपयोग की दृष्टि से अमुक वस्तु जितनी लाभदायक होती है वह उतनी ही प्रिय लगती हैं और उसी अनुपात से उसका मूल्य आँका जाता है” पदार्थ किसी की चेतनात्मक उत्कृष्टता-निष्कृष्टता को प्रभावित कर सकते हैं तब ऐसा नहीं माना जाता था। यही कारण है कि माँस और शराब जैसे पदार्थों के शरीर पर पड़ने वाले प्रभाव को ही सब कुछ माना जाता था और उनका किसी की आन्तरिक भावनात्मक या मानसिक स्थिति पर कोई प्रभाव पड़ेगा, यह नहीं स्वीकारा जाता था। पर अब ऐसी बात नहीं रही। खाद्य पदार्थ मन को भी प्रभावित करते हैं इस आध्यात्मिक मान्यता के निकट ही अब विज्ञान खिंचता चला आ रहा है और फासला बहुत कुछ पट चुका है।
गौ जैसे पशु वट, पीपल, आँवला जैसे वृक्ष तुलसी जैसे पौधे मनुष्य की चेतना में शान्ति एवं शालीनता की वृद्धि करते हैं इसका परीक्षण खुली चुनौती की तरह किया जा सकता है। नशे, मसाले मनुष्य को क्रोधित एवं उद्विग्न बनाते हैं। यह तथ्य अब किसी को अस्वीकार्य नहीं, गंगा जैसे जल प्रवाह न केवल शारीरिक, आर्थिक प्रभाव रखते हैं वरन् उनकी क्षमता मनुष्य के मानसिक संतुलन को उच्चस्तरीय बनाये रखने में भी योगदान देती है। धार्मिक क्षेत्र की यह मान्यता अब विज्ञान के क्षेत्र में भी उपहासास्पद नहीं हैं। उसे क्रमशः अधिक तथ्य पूर्ण माना जा रहा है। गंगा स्नान, गंगा तट पर निवास, गंगा जल पान का महात्म अब मात्र श्रद्धा का विषय ही नहीं है उसके पीछे अनेक तथ्य, तर्क और प्रमाण भी जुड़ते जा रहे हैं।
गंगा के आध्यात्मिक, मानसिक एवं शारीरिक प्रभावों को मात्र हिन्दू धर्मावलम्बी ही स्वीकार करते हों सो बात नहीं, भूतकाल में उसकी विशेषताओं को अन्य धर्मावलम्बी भी स्वीकार करते रहे हैं। अब उसमें कभी नहीं वरन् वृद्धि ही हो रही है। गंगा की गरिमा को सार्वभौम और सर्वजनीय स्तर पर मान्यता मिल रही है। आशा की जानी चाहिए कि भविष्य में उसकी बहुमुखी विशेषताओं को और भी अच्छी तरह समझा जायगा और जन साधारण द्वारा उसका और भी अधिक लाभ उठाया जायगा।
इतिहास के पृष्ठ बताते हैं कि गंगा जल को बिना किस धार्मिक भेदभाव के किस तरह उपयोगी एवं महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।
इब्नबतूता नामक एक भ्रमणशील लेखक अफ्रीका महाद्वीप, एशिया की लम्बी यात्रा करते हुए भारत भी आया था। उसने जो स्मरण लिखे हैं उनका गिव्स ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है। इस पुस्तक में तत्कालीन सुल्तान मुहम्मद तुगलक के शासन का विस्तृत वर्णन है। उसमें यह भी उल्लेख है कि बादशाह गंगा जल पीते थे। उनके लिए दैलतावाद गंगा-जल पहुँचाने में 40 दिन लग जाते थे।
अबुल फजल ने अपने ग्रन्थ “आईने अकबरी” में लिखा है अकबर को गंगा जल से भारी प्रेम था। उन्हें नित्य गंगा जल मिलता रहे इसके लिए उन्होंने 20 व्यक्तियों का दल नियुक्त किया। जब बादशाह आगरा या फतेहपुर सीकरी रहते हैं तब गंगा जल सोरों से आता है और जब वे पंजाब जाते हैं तब हरिद्वार से।
फ्रांसीसी यात्री बर्नियर सन् 1456 से 1467 तक आठ वर्ष भारत रहा। उसने शाहजादा दाराशिकोह की चिकित्सा भी की थी। औरंगजेब के भोजन के साथ गंगा जल भी रहता है। बादशाह ही नहीं अन्य दरबारी भी गंगाजल का नियमित प्रयोग करते हैं। यात्रा में भी वे ऊँटों पर लदवा कर गंगा जल अपने साथ ले जाते थे।
एक दूसरे फ्रांसीसी यात्री टैवर्नियर ने लिखा है हिन्दुस्तान के राजे और नवाब समान रूप से गंगा जल का दैनिक उपयोग करते हैं।
ब्रिटिश कप्तान एडवर्ड मूर ने अपने स्मरणों में लिखा है, शाहनवर के नवाब केवल गंगा जल पीते थे इसके लिए उन्होंने काफिला तैनात कर रखा था।
इतिहासकार गुलाम हुसैन ने अपनी पुस्तक ‘रियाजु स-सलातीन’ में लिखा, हिन्दुओं की तरह इस देश के अन्य धर्मावलम्बी भी गंगा जल की बड़ी कद्र करते हैं और उसे स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत उपयोगी मानते हैं।
पेशबाओं के पीने का पानी गंगा जल ही होता था। गढ़मुक्तेश्वर तथा हरिद्वार से वहँगियों द्वारा उनके लिए गंगा जल पहुँचता था।
दक्षिण भारत के राजा कृष्णराव को सन् 1925 में कोई असाध्य रोग हो गया था। उन्होंने सब दवाएँ छोड़कर केवल गंगा जल लेना आरंभ किया और वे उसी से अच्छे हो गये।
अंग्रेजी शासन के दिनों वैज्ञानिक हैकिन्स ने गंगा जल की विशेषताओं के संबंध में प्रचलित किंवदंतियों पर शोध कार्य किया था। उन्होंने काशी नगर के गन्दे नालों का जल जाँचा जिसमें हैजे के असंख्य कीटाणु भरे हुए थे। वही नाला जब गंगा में मिला तो उसमें रहने वाले विषाणु तत्काल भर गये। सड़े हुए मुर्दों की लाश से निकलने वाला विष भी गंगा में घुलते ही अपनी हानिकारक प्रकृति खो बैठता है। कुँए में तथा अन्य जलों में हैजा के कीटाणु डाले गये तो वे तेजी से बढ़े किन्तु गंगा जल में मिलते ही स्वयमेव नष्ट हो गये।
नन्दा देवी, गुरला, मान्धाता, धौलागिर, गोसाई थान, कंचन चंगा, एवरेस्ट जैसे संसार के सबसे ऊँचे गिरी शिखरों का पिघलता हुआ बर्फ हिमालय में इधर उधर चक्कर काटता हुआ गोमुख पर एकत्रित होकर गंगा जल के रूप में दृष्टिगोचर होता है। इन विशिष्ट भू क्षेत्रों की धातुएँ तथा रासायनिक वस्तुएँ ऐसी हैं जो गंगाजल को मानवी उपयोग के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं।
रसायन विज्ञानी प्रो.एन.एन. गोडवोले ने गंगाजल की विशेषताओं का कारण ढूँढ़ने के लिए लम्बी रासायनिक छान-बीन की। उन्होंने गंगा जल में कुछ ऐसे विशेष ‘प्रोटेक्टिव कालौइड’ पाये जो उसे सदा पवित्र एवं कीटाणु रहित बनाये रहते हैं। यह तत्व अन्य नदियों में बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। गोडवोले ने अपने शोध निष्कर्ष में लिखा है, गंगाजल जीवाणु वृद्धि को रोकता ही नहीं वरन् उनका विनाश भी कर देता है। उनका यह भी कथन है गंगा जल का वास्तविक स्वरूप प्रयाग तक ही पाया गया, बाद में कई बड़ी नदियाँ मिल जाने से उसके वह गुण नहीं रहते जो इससे ऊपर पाये जाते हैं।
आयुर्वेद शास्त्र में गंगा जल को शारीरिक और मानसिक रोगों का निवारण करने वाला और आरोग्य तथा मनोबल बढ़ाने वाला बताया गया है।
गंगा वारि सुधा समं बहु गुणं पुण्यं सदायुष्करं, सर्व व्याधि विनाशनं बलकरं वर्ण्यं पवित्रं परम्। ह्वद्य दीपन पाचनं सुरुचिम्मिष्टं सु पथ्यं लघुस्वान्तध्वान्त निवारि बुद्धि जननं दोष त्रयध्नं वरम्।
अर्थात् गंगा का जल अमृत के तुल्य बहु गुण युक्त पवित्र उत्तम, आयु का बढ़ाने वाला, सर्व रोगनाशक, बलवीर्य वर्द्धक, परम पवित्र, हृदय को हितकर, दीपन, पाचन, रुचिकारक, मीठा उत्तम पथ्य और लघु होता है तथा भीतरी दोषों का नाशक, बुद्धि-जनक, तीनों दोषों का नाश करने वाला सब जलों में श्रेष्ठ है।
गंगा का भौतिक परिचय भी कम महत्व का नहीं। वह अनेक नदियों का सहयोग अपने में समन्वित कर सकने में सफल हुई है। एकाकी सत्ता कितनी ही समर्थ क्यों न हो वह नगण्य, दुर्बल और स्वल्प प्रयोजन पूरा कर सकने में ही समर्थ हो सकेगी। बड़े कार्य समन्वय से ही संभव होते हैं। गंगा एक पवित्र नदी है। उसका गौरव इस बात में भी है कि उसने अपने में एक बड़ा परिवार घुलाया और आत्म-सात किया है। यही कारण है कि उसका विस्तार वैभव इतने बड़े क्षेत्र को जल सुविधा देते हुए भी घटा नहीं वरन् बढ़ता ही गया है। बंगाल में पहुँचते-पहुँचते उसकी अनेक धाराएँ हो गई हैं और वे सभी जल राशि से सदा भरी पूरी रहती हैं।
समुद्र तल से 13800 फुट की ऊँचाई पर अवस्थित गंगोत्री से निकल कर 1557 मील की यात्रा करती हुई गंगा अनन्त सागर में विलीन होती है। इन दिनों जहाँ गंगोत्री तीर्थ है वहाँ से 10 मील ऊपर गोमुख नामक स्थान से गंगा की धारा निकलती है, पर वह समूचा क्षेत्र गंगोत्री ही कहलाता है।
गंगा में कितनी ही छोटी बड़ी नदियाँ मिलती हैं। इनमें से कितनी ही उल्लेखनीय है। यथा-नन्द प्रयाग में विष्णु गंगा, स्कंद प्रयाग में पिण्डर, रुद्र प्रयाग में मन्दाकिनी, देव प्रयाग में अलकनन्दा, प्रयाग में यमुना, आगे चलकर गोमती, घाघरा, सोन, गण्डक कोसी, सरयू, ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियाँ उसी में जा मिलती हैं। राम सागर, बागमती, महानंदा आदि अन्य कई नदियाँ भी उसी में मिली हैं।
गंगा तट पर मैदानी इलाके में काशी और प्रयाग तीर्थ प्रसिद्ध हैं। हिमालय क्षेत्र में कई काशी और कई प्रयाग हैं। जैसे गुप्त काशी-उत्तर काशी। रुद्र प्रयाग, विष्णु प्रयाग, सोन प्रयाग, देव प्रयाग, कर्ण प्रयाग, नन्द प्रयाग आदि।
गंगा से कितनी सिंचाई होती है कितने बाँध तालाब भरे जाते हैं, उससे कितनी उपलब्धियाँ मिलती हैं इसका लेखा-जोखा आश्चर्य चकित करता है वह भारत की अर्थ समृद्धि में भी भारी योग दान देती है। अपनी सूक्ष्म दिव्य शक्ति के कारण उसकी विशिष्ट गौरव गरिमा तो यथा स्थान है ही।
गंगा का कुल जल ग्रह क्षेत्र 9 लाख 97 हजार वर्ग किलोमीटर है। गंगा नहरों से इन दिनों 6 लाख 95 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। सिंचाई के अतिरिक्त गंगा की प्रवाह शक्ति का उपयोग करके भद्रावाद, मुहम्मद पुर और पथरी पर विशाल काय बिजली घर बने हैं। वर्षा में गंगा का फालतू पानी जो व्यर्थ ही बह कर समुद्र में चला जाता है, उसे दक्षिण की कावेरी नदी में मिलाने की योजना विचाराधीन है। यदि वह नहर संभव हो सकी तो वह छह राज्यों को पानी देती हुई दक्षिण भारत की जल व्यवस्था में भी बहुत योगदान देगी।
धन्य हैं हम भारत वासी जिन्हें गंगा जैसी सर्वगुण सम्पन्न माता के पयपान करने का अवसर मिलता है।
सन्ध्या हो चली। सूर्य गंभीर मुख मुद्रा बनाये खिन्न खड़े थे।
दिक् पालों ने उस खिन्नता का कारण पूछा तो सूर्य देव ने उलट कर प्रश्न पूछा तुम्हीं बताओ, मेरे चले जाने के बाद प्रकाश देने का उत्तरदायित्व कौन संभालेगा?
दसों दिक्पाल चुप खड़े थे। विदाई के लिए प्रस्तुत देवता भी बंगले झाँकने लगे। उस निस्तब्धता को तोड़ते हुए एक नन्हें से मिट्टी के दीपक ने कहा- देव, आप शान्त चित्त से विदा हों, अपनी अकिंचन सामर्थ्य के अनुरूप हम आपके पथ का अनुगमन करेंगे।
भारतीय धर्म नारी के प्रति निष्ठुर नहीं वरन् परम उदार है। मध्य-कालीन सामन्त वादी आतंक में नारी को बाधित करने की परम्परा चल पड़ी थी। उसकी छाया धर्म पुस्तकों में भी कहीं-कहीं झलकती है और लगती है कि भारतीय-धर्म, पुरुष को अधिक सुविधाएँ देता है नारी को अनुचित रीति से प्रतिबंधित करता है। ऐसे पक्षपात पूर्ण प्रसंगों को निन्दनीय और हेय ठहराया जाना उचित ही है। पर उन थोड़े से प्रक्षिप्त प्रसंग या प्रमाणों से ऐसा नहीं मान लेना चाहिए कि भारतीय धर्म नारी के प्रति अनुदार है।
भारतीय परम्परा नर से नारी को श्रेष्ठ मानने की है। उसको अधिक सम्मान दिया गया है और अधिक सद्व्यवहार करने के लिए निर्देश किया गया है। जहाँ भूलों का, बंधनों का प्रश्न है वहाँ नारी के साथ उदारता ही बरती गई है। नारी की गरिमा निस्संदेह पुरुष से अधिक है। नर को उसका अनुदान महान है। ऐसी स्थिति में उसे अधिक कृतज्ञता पूर्ण भाव भरा सम्मान और सद्व्यवहार मिलना ही चाहिए। आवश्यकतानुसार आपत्ति काल में उसके साथ सामाजिक नियमों से भी उदार सुविधाएँ भी मिलनी चाहिए। शास्त्रों में ऐसा ही उल्लेख है-
यो धर्म एकपत्नीमा काक्षन्ती तमनुत्तमम्। 12। मन 2/12
पुरुषों के लिए एक पत्नी व्रत ही उत्तम है।
स्त्रीषु प्रीतिविशेषण स्त्रीष्वपत्यं प्रतिष्ठितम्। धर्माथौं स्त्रीयु लक्ष्मीश्च स्त्रीयु लोकाः प्रतिष्ठिताः॥ चरक चि.स्थान भ्रं 2
स्त्रियों में स्नेह की मात्रा विशेष रूप से अधिक रहती है, धर्म की मात्रा उनमें अधिक रहती है। इसलिए उन्हें धर्मपत्नी का पद दिया जाता है। उनमें अर्थ तत्व भी है इसलिए उन्हें गृहलक्ष्मी कहते हैं। काम रूप होने से संतान को जन्म देती है। शक्ति रूप से लोक में प्रतिष्ठित होकर मोक्ष देती है।
तारः पतिः श्रुतिर्नारी क्षमा सा स स्वयं तपः। फलम्पतिः सत्क्रिया सा धन्यौ तो दम्पती शिवे। शिव पुराण
यदि पति ओंकार है तो स्त्री वेदश्रुति है। यदि स्त्री क्षमारूपिणी है तो पुरुष तपोरूप है। यदि पति फल है तो स्त्री सत्क्रिया है। हे पार्वती! जो ऐसे हैं वे दोनों ही स्त्री पुरुष महा धन्य हैं।
पोषितामनवमानेन प्रकृतेश्च पराभवः। देवी भगवन
नारी का अपमान उस पराशक्ति का अपमान है। इससे मनुष्य का पतन पराभव होता है।
जननी जन्य काले च स्नेह काले च कन्यका। भार्या भोगाय सम्पृक्ता अन्तकाले च कालिका। एकैव कालिका देवी विहरन्ती जगत्त्रये॥ महाभारत
वही महाशक्ति जननी के रूप में जन्म देती है, पुत्री के रूप में स्नेह पात्र बनती है। पत्नी के रूप में भाग प्रदान करती है। अन्त में कालिका चिता के रूप में अपनी गोदी में चिरनिद्रा में सुला देती है। वही तीनों लोकों में संव्याप्त है।
या काविद्गना लोके सा मातृ कुलसम्भवा। कुप्यन्ति कुलयोगिन्यों बनिताना ध्यतिक्रमात॥
स्त्रियं शतापराधञ्वेत पुष्पेणापि न ताडयेत्। दोषान्त गणयेत् स्त्रीणा गुणानैव प्रकाशयेत्॥ स्कंद पुराण
संसार की समस्त नारियाँ माता तुल्य हैं। उनका तिरस्कार होने से कुल देवी रुष्ट हो जाती है। स्त्रियों में सौ अपराध होने पर भी भूल से भी ताड़ना न करे। उनके दोषों पर ध्यान न दें। गुणों का ही बखान करें।
मोहादनादिगहनादनन्तगहनादपि। पतितं व्यवसायिन्यस्तारयन्ति कुलस्त्रिमः॥
शास्त्रार्थगुरुमत्रादि तथा नोत्तरणक्षमम्। यथैताः स्नेहशालिन्यो भतृणाँ कुलयोषितः॥
सखा भ्राता सुहद् भृत्यों गुरुमित्रं धनं सुखम। शास्त्रामायतनं दासः सर्व भर्तुः कुलाँगना॥
समग्रानन्दवृन्दानामेंतदेवोपरि स्थितम्। यत्समानमनोवृतित्तसंगमास्बादने सुखम्॥ -योगवशिष्ठ
सुशील स्त्रियाँ मनुष्य को मोह अन्धकार से पार कर देती है। शास्त्र, गुरु और मंत्र से भी वे संसार सागर से पार होने में अधिक सहायक सिद्ध होती है। स्नेह भरी स्त्रियाँ अपने पति के लिए सखा, बन्धु, सुहृद, सेवक, गुरु, मित्र, धन, सुख, शास्त्र, मंदिर आदि सभी कुछ होती हैं।
संसार के सब सुखों से बड़ा सुख समान गुण स्वभाव के पति-पत्नी को एक-दूसरे के साथ रहने में प्राप्त होता है।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत् कुलम्। न शोचन्ति तु यत्रैता बर्द्धते तद्धि सर्वदा॥ -मनु.
जिस घर में नारी का सम्मान होता है वहाँ देवता निवास करते हैं। जहाँ नारी का तिरस्कार होता है वहाँ पग-पग पर असफलता मिलती है। जहाँ स्त्रियों को दुख रहता है, उत्पीड़न सहती है, वह कुल नष्ट हो जाता है। उन्नति वहाँ होती है जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती है।
समझा जाता है कि पुरुष को कितने ही विवाह कर लेने, व्यभिचार करने आदि की छूट है और सारे बंधन नारी के मत्थे ही मढ़े गये हैं। बात ऐसी नहीं हैं। दोनों को ही सदाचारी होना चाहिए पर आपत्ति काल प्रस्तुत होने पर नारी को भी वैसी ही छूट प्राप्त करने का अधिकार दिया गया है। जैसी कि पुरुष प्राप्त करते चले आ रहे हैं। अचार-संहिता, नीति, धर्म, में किसी के साथ पक्षपात नहीं किया गया है। आपत्ति-कालीन सुविधाएँ स्त्रियों को भी प्राप्त हैं।
न स्त्री दुव्यति जारेण न विप्रो वेदकर्मणा। बलात्कारापभुक्ता चेद्वैरिहस्तगताअपि वा॥ -अग्नि पुराण
यदि अज्ञान वश स्त्री से व्यभिचार बन पड़ा हो, किसी ने अपहरण कर लिया हो या बलात्कार किया हो तो उस स्त्री को अशुद्ध नहीं समझना चाहिए।
असवर्णेस्तु यों गर्भः स्त्रीणाँ योनी निषिच्यते। अशुद्धा सा भवेन्नारी यावर्द्गभ न मुञ्चति॥
विमुक्ते तु ततः शल्ये रजश्रापि प्रदृश्यते। तदा सा शुद्धयते नारी विमलं काञ्चनं यथा॥
स्वयं विप्रतिपन्ना या यदि वा विप्रतारिता॥ बलान्नारी प्रभुक्ता वा चौरभुक्ता तथाअपि वा। न त्याज्या दूषिता नारी न कामोअस्या विधीयते॥ -अत्रि स्मृति
कदाचित कोई स्त्री अन्य व्यक्ति से गर्भ धारण करले तो उसे तभी तक अशुद्ध मानना चाहिए जब तक कि उदर में गर्भ है। प्रसव के पश्चात् प्रथम मासिक धर्म होने पर वह पूर्ववत् पुनः शुद्ध हो जाती है।
यदि किसी ने स्त्री को बहका लिया हो, छल से बल से उसका सतीत्व भंग किया हो। तो भी स्त्री का त्यागना उचित नहीं। क्योंकि वह उसने इच्छा तथा विवेक से नहीं किया है।
सोमः शौचं तासाँ गन्धर्वाश्च शुभाँ गिरम्। पावकः सर्वभक्षयत्वं नेध्या वै यौषितो ह्यतः॥ -याज्ञवल्क्य स्मृति 15
विवाह से पूर्व व्यभिचार आदि अपराध यदि स्त्री से बन पड़े हों तो फिर उन पर ध्यान नहीं दिया जाना चाहिए। सोम, गंधर्व और अग्नि का स्त्रियों में जो निवास रहता है, उससे वे सर्वदा शुद्ध ही रहती है।
व्यभिचारादृतौ शुद्धिर्गर्भे त्यागो विधीयते। गर्भभतृवधादौ च तथा महति पातके॥ -याज्ञवल्क्य स्मृति
अप्रकाशित व्यभिचार के पाप की शुद्धि स्त्रियों को रजोदर्शन के साथ स्वतः हो जाती है।
पूर्व स्त्रियः सुरैर्मुक्ताः सोमगर्न्धववन्हिभि। भुञ्जते मानुषा पश्चान्नैता दुष्यन्ति केनचित्॥
असर्वेणेन यो गर्भः स्त्रीणा योनौ निपिच्यते। अशुद्धा तु भवेन्नारी यावच्छल्य न मुञ्चति॥ निः सृते तु ततः शल्ये रजसा शुध्यते ततः। -अग्नि पुराण
स्त्रियाँ सोम, गंधर्व और अग्नि इन तीन देवताओं द्वारा सेविता हैं। सो मनुष्य द्वारा उपभोग कर लेने पर भी वे अशुद्ध नहीं होतीं।
यदि उनके पेट में अवाँछनीय गर्भ आ जाता है तो वे गर्भ रहने तक ही अशुद्ध रहती है। प्रसव के उपरान्त उनकी पवित्रता फिर पूर्ववत् हो जाती है। मासिक धर्म स्त्रियों को हर महीने शुद्ध करता रहता है।
अदुष्टापतिताँ भायर्या यौवने यः परित्यजेत्। स्रपजन्म भवेत् स्त्रीत्व वैधव्यञ्च पुनः पुनः॥ -पाराशर स्मृति
जो निर्दोष पत्नी को युवावस्था में त्याग देता है। वह उस पाप से सात जन्मों तक स्त्री जन्म लेकर बार बार विधवा होता है।
नष्टे मृते प्रव्रजिते क्लीवे च पतिते पतौ। पञ्चस्वापत्सु नारीणा पतिरन्यौ न विद्यते॥ -पाराशर स्मृति
पति के मर जाने पर, नष्ट हो जाने पर, संन्यास ले लेने पर, नपुंसक होने पर स्त्री अन्य पति वरण कर सकती है।
अपुत्राँ गुर्वनुज्ञातो देवरः पुत्रकाम्यया। सपिण्डो वा सगोत्रो वा घृताभ्यक्त ऋतावियात़॥ -याज्ञवल्क्य स्मृति
जिसे पुत्र की कामना है। पर वह अपने पति से नहीं होती हो, तो वह गुरुजनों की आज्ञा प्राप्त कर देवर अथवा सपिण्ड व्यक्ति से गर्भोत्पत्ति करे।
मातृवत् परदारंश्च परद्रव्यणि लोष्ट्रवत़। आत्मवत़ सर्वभूतानि यः यश्यति स पश्यति॥ -आयस्तम्ब स्मृति
जो पराई स्त्रियों को माता के समान, पराया धन धूलि समान और सब प्राणियों को अपने समान मानता है। वही सच्चा आँखों वाला है।
अनुकूलकलत्रोय स्तस्य स्वर्ग इहैव हि। प्रतिकूलकत्रस्य नरको नात्र संशयः॥ स्वर्गेअपि दुर्लभं ह्योतदनुरागः परस्परम्। -दक्ष स्मृति
जहाँ पति-पत्नी प्रेम पूर्वक रहते हों, वहाँ स्वर्ग ही है। जहाँ प्रतिकूलता रहती हो वहाँ प्रत्यक्ष नरक ही है। सच्चा प्यार तो स्वर्ग में भी दुर्लभ है।
जिज्ञासु ने ज्ञानी से पूछा-शरीर में सर्वोत्तम दो अंग कौन से हैं? ज्ञानी ने उत्तर दिया-जीभ और हृदय।
उसने पूछा- और देह में सब से निकृष्ट दो अंग कौन से हैं। विद्वान ने फिर वही शब्द दुहराये-जीभ और हृदय।
जिज्ञासु ने चकित होकर पूछा-भला यह अंग भले भी और बुरे भी दोनों कैसे हो सकते हैं?
ज्ञानी ने समाधान करते हुए कहा- मधुर भाषी जीभ और सद्भाव सम्पन्न हृदय को मानव जीवन की सर्वोपरि उपलब्धि कहा गया है पर यदि वे कटुवचन एवं दुर्भाव से भरे हों तो उनकी निकृष्टता भी असंदिग्ध है।
प्रकृति एक सारगर्भित पुस्तक है, उसे खुली आँखों से देखें तो उन तथ्यों के निकट पहुँच सकते हैं जो मनुष्य के वैयक्तिक और सामाजिक जीवन के लिए अति महत्वपूर्ण और मार्गदर्शक निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं।
मनुष्य कृत पुस्तकों में भ्रान्त धारणाओं का प्रतिपादन हो सकता है किन्तु प्रकृति की पुस्तक ऐसे महान लेखक द्वारा लिखी गई है जो इस विश्व का मूल सृजेता है। वह हम जीवधारियों को जो सिखाना समझाना चाहता है वह सब कुछ उस महान ग्रन्थ में लिखकर रख दिया है जिसके पन्ने हमारे चारों ओर बिखरे पड़े हैं। आवश्यकता उन सूक्ष्मदर्शी नेत्रों की है जो उन संकेतों को देश समझ सकें और उन्हें हृदयंगम करके समुचित लाभ उठा सकें।
अनन्त अन्तरिक्ष पर जब हम दृष्टिपात करते हैं तो करोड़ों निहारिकाओं और उनके इर्द-गिर्द घूमने वाले अरबों तारकों का अस्तित्व देखते हैं। खुली आँखों से तो आकाश में कोई तीन हजार ही तारे दीखते हैं, पर दूरबीनों और रेडियो से उनकी संख्या सहस्रों गुनी अधिक दीखती।
अपने सौरमण्डल में जो ग्रह है उनके बारे में सहस्रों वर्षों से खोजा और जाना जा रहा है। पर कुछ ही समय पूर्व क्षूद्र ग्रहों की एक पट्टी देखने में आई है जो अपने बिलकुल समीप है ओर जिनकी संख्या आश्चर्यजनक है। उनकी जो जानकारियाँ मिली हैं वे जितनी आश्चर्यजनक हैं उतनी ही शिक्षाप्रद भी।
सूर्य के समीपवर्ती ग्रहों में बुध, शुक्र, पृथ्वी और मंगल को गिना जा सकता है। दूरवर्ती शनि, यूरेनस और नेपच्यून है। बृहस्पति मध्यवर्ती है। दूरवर्ती वर्ग के तीनों ग्रह अपेक्षाकृत समीप हैं इसी प्रकार निकटवर्ती चार ग्रहों का फासला भी आपस में कम है। इन्हें दो गुटों में बँटा हुआ कह सकते हैं। बृहस्पति बीच में अकेला पड़ता है। उसकी दूरी दोनों ही वर्गों से काफी अधिक है। बीच के सुविस्तृत अन्तरिक्ष में वह अकेला ही अपना आधिपत्य जमाये हुए है।
समीपवर्ती वर्ग के ग्रहों में अन्तिम मंगल है। उससे बृहस्पति की दूरी पैंतीस करोड़ मील है। इस सुविस्तृत क्षेत्र को पहले खाली पड़ा हुआ समझा जाता था, पर अब जान लिया गया है कि उस विशाल विस्तार वाले आकाश पर सूर्य के बीते वेदों का अधिकार है और वे वहाँ आनंदपूर्वक निवास करते हैं। सूर्य के इन बौने बेटों को क्षुद्रग्रह, लघुग्रह, अवान्तर ग्रह अथवा एस्ट्रायड कहा जाता है।
इनका पता पहले पहल सिसली की वेधशाला ने सन् 1801 में लगाया उसके अध्यक्ष प्रो.पियाज्जी ने एक छोटा तारा मंगल और बृहस्पति के बीच में घूमते देखा और उसका नाम सिसली की देवी के नाम पर ‘सैरस’ रख दिया। इसके बाद दूरबीनों से एक के बाद दूसरा लघुग्रह पहचानना आरम्भ कर दिया। हेनरिख, ओल्वेर्स, प्लास, जूनो, बेस्ता आदि नाम उन्हें दिये गये। जो पकड़ में आते गये उन्हें रोमन, ग्रीक, जर्मन, नार्वेजियन, देवी-देवताओं के नाम पर संबोधित किया जाता रहा पीछे वे इतनी बड़ी संख्या में देखे गये कि नामकरण का उत्साह ही ठंडा पड़ गया। खगोलशास्त्री रिचर्डसन के समय तक वे 44 हजार की संख्या में गिन लिये गये थे। अब रूसी वैज्ञानिकों ने उनकी संख्या एक लाख से भी अधिक सिद्ध कर दी है।
यह लघु ग्रह कौन है? क्या है? कैसे बने? आदि प्रश्नों का सही उत्तर ढूंढ़ने में खगोल शास्त्री गम्भीरता पूर्वक संलग्न है। इस शोध में संलग्न ओल्वेर्स, हाइडेवर्ग एवं ओर्ट का कथन है कि अति प्राचीन काल में मंगल और बृहस्पति के बीच दो पूर्ण ग्रह भ्रमण करते थे, वे एकबार आपस में टकरा गये और उनका चूरा छितरा कर इन लघुग्रहों के रूप में बिखर गया और एक नियत कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करने लगा।
सहयोग-संघर्ष के भले-बुरे परिणाम हमारे सामने हैं। पारस्परिक सहयोग के बल पर सौरमण्डल के ग्रह कितने सुन्दर समुन्नत हैं और फल-फूल रहे हैं। सूर्य का सहयोग पाकर पृथ्वी कितनी सुसंपन्न है। यदि उसे सविता देवता का अनुदान न मिला होता तो ठण्डे और अँधेरे किसी अविज्ञात ग्रह पिण्ड के रूप में वह उपेक्षित जीवन जी रही होती। सूर्य भी यदि सहयोग देकर सौरमण्डल के ग्रहों को संभालने का उत्तरदायित्व वहन न करता तो उसे वह श्रेय न मिलता जो आज उपलब्ध है। तब वह अन्य किसी सूर्य की परिक्रमा में निरत एक छोटा तारक मात्र रह जाता और उसकी गरिमा का किसी को लाभ मिलना तो दूर परिचय भी प्राप्त न होता। सहयोग देकर और लेकर सूर्य ने कुछ खोया नहीं पाया ही है। स्वयं भी लाभान्वित हुआ है और दूसरों को भी लाभान्वित किया है।
दूसरी ओर वे मूर्ख दो ग्रह थे जो आवेशग्रस्त हुए, भटके और परस्पर टकरा गये। यदि वे जीवित रहे होते तो नवग्रहों की अपेक्षा ग्यारह ग्रहों वाला अधिक समृद्ध अपना सौरमंडल होता और वे स्वयं भी अपनी गरिमा से ब्रह्मांड की शोभा बढ़ाते। उनके अस्तित्व का लाभ न जाने कितने प्राणियों और ग्रह पिण्डों को किस-किस प्रकार मिलता, पर टकरा कर उन्होंने पाया कुछ नहीं खोया ही खोया। अब उनका चूरा बुरादा उपहासास्पद स्थिति में छितराया हुआ भ्रमण कर रहा है और अपने पूर्वजों की मूर्खता के इतिहास का वर्णन कर रहा है।
ये लघुग्रह बहुत छोटे-छोटे हैं। इनमें कुछ बड़े भी हैं। सीरीज का 2500 और पलास का व्यास 500 किलोमीटर है। सैरस का 427, वेस्ता का 400, जूनो का 200 और ईरोस का 15 मील व्यास है। इससे भी छोटों में आमीर 5 मील का एलवर्ट और जेवी का तीन-तीन मील है। एक-एक मील के व्यास के तो हजारों हैं। इनसे भी छोटों को ठीक तरह गिना और नापा नहीं जा सका है। जो जितना छोटा है उसकी अपनी आकर्षण शक्ति भी कम है और वह दूसरों के खिचाव से उतना ही कम बँधा होता है। अस्तु इनकी उच्छृंखलतापूर्वक किधर भी दौड़ पड़ने की आशंका सदा ही बनी रहती है अक्सर वे अपना नियत निर्धारित मार्ग छोड़कर पथ भ्रष्ट होते रहते हैं।
इन्हीं में से एक मनचला सूर्य का बौना बेटा सन् 1908 में धरती की सैर करने चल पड़ा था। बेचारा पृथ्वी के वायुमण्डल में घुसते ही बुरी तरह जल गया और उसका ढाँचा साइबेरिया के जंगल में जा गिरा। यह कंकाल एक हजार फुट व्यास के एक उल्कापिण्ड के रूप में था। वह जहां गिरा वहाँ गहरा खड्ड बना दिया और समीपवर्ती क्षेत्र में भयंकर अग्निकाण्ड खड़ा कर दिया।
इनमें से कुछ क्षुद्र ग्रहों ने अपनी विचित्र भ्रमण कक्षाएँ बना ली हैं। ईरोस पृथ्वी के पास डेढ़ करोड़ मील तक समीप आ पहुँचता है और उसकी प्रचण्ड आकर्षण शक्ति से डर कर फिर वापिस लौट जाता है। किसी दिन बढ़ने की हिमायत की तो उसकी भी वही दुर्गति होगी, किन्तु पृथ्वी को भी उस टक्कर से कम नुकसान नहीं पहुँचेगा। हाइडाल्गो को शनि का धाई छूने का शौक चर्राया है वह वहाँ तक पहुँचता तो है, पर उस महादैत्य द्वारा निगल लिये जाने की आशंका से डरकर वह भी वापिस लौट जाता है। इकारस इन सबसे ढीठ है, वह सूर्य और बुध के बीच के भयंकर गरम क्षेत्र में घुस पड़ता है। किसी दिन उसकी भी शामत आई ही रखी है। एक बार तो उसने पृथ्वी से टकराकर आत्म-हत्या करने की ही ठान ली थी सन् 1968 का मुहूर्त उसे इसके लिए अच्छा नहीं लगा और कुछ सोच-समझकर वापिस लौट गया। इससे पूर्व सन् 1937 में हर्मेय भी पृथ्वी के बिलकुल नजदीक पाँच लाख मील पर ही आ धमका था पर उसकी अकल मृत्यु भी किसी प्रकार टल गई।
क्षुद्रता उच्छृंखलता के रूप में विकसित होती है और दूसरों के लिए ही नहीं अपने लिए भी संकट उत्पन्न करती है। जो महान हैं वे इस तथ्य को समझते हैं और मर्यादा में रहकर अपनी शालीनता का परिचय देते हैं। क्षुद्रता का अनाचार बरतने और उद्धत आचरण करने में ही मजा आता है। उस स्तर की सत्ताएँ अपनी बहादुरी आतंकवादी गतिविधियों के रूप में प्रदर्शित करती हैं। उनका अहंकार इस रूप में प्रकट होता है कि सब लोग कमजोर थे इसलिए वे सीधी राह पर चले और वे अधिक साहसी थे इसलिए उच्छृंखलता, स्वेच्छाचार बरतने लगे। सोचने का यह तरीका बचकाना ही नहीं हानिकारक भी है इसे न वे शुद्र ग्रह ही समझते हैं और न उसी स्तर की मनोवृत्ति वाले हममें से अधिकाँश लोग।
चन्द्रमा पर वायुमण्डल नहीं है इसलिए वहाँ जलने का खतरा न देखकर वे क्षुद्र ग्रह उल्काओं के रूप में जा पहुँचते हैं। उनका जो हस्र होता है वह प्रत्यक्ष है। उनने टकराकर चन्द्रमा में गहरे खड्ड किये हैं उसे कुरूप बनाया है साथ ही अपना अस्तित्व भी सदा के लिए समाप्त कर लिया है।
चन्द्रमा को कुरूप उन्होंने बनाया, इतने दुस्साहस पर वे प्रसन्न भी हो सकते हैं पर बिगाड़ने में भी भला क्या कोई बड़प्पन है, इसे वे नहीं सोच पाते। दूसरे का बिगाड़ करने में उनने सफलता जरूर पाई, पर साथ ही अपना अस्तित्व भी तो खो बैठे। चन्द्र तल को कुरूप बनाने की सफलता के लिए उनकी कौन प्रशंसा करेगा। बड़े से बड़ा बिगाड़ अग्निकाण्ड तो यह छोटी दियासलाई भी कर सकती है- बड़प्पन बनाने में है। किसने क्या बनाया, इसी आधार पर महानता नापी जाती है इस तथ्य का यदि इन अभागे क्षुद्र ग्रहों को पता रहा होता तो चन्द्र तल से टकराकर आत्म हत्या करने की अपेक्षा उन्होंने कोई रचनात्मक गतिविधि अपनाई होती ओर अपनी गतिविधियों से कहीं किसी को लाभान्वित किया होता और स्वयं श्रेय पाया होता।
धरती वाले इन पर पैनी निगाह लगाये हुए हैं। जिस प्रकार चिर प्राचीन काल में मनुष्य ने पशुओं को जंगल में से पकड़ा अपना वशवर्ती बनाया और उनसे तरह-तरह के लाभ लिये। ठीक इसी प्रकार अब इन क्षुद्र ग्रहों की बारी है। इनका गुरुत्वाकर्षण बहुत क्षीण है। वे अन्य साथियों के साथ-भी मजबूती से बँधे हुए नहीं हैं। कोई बड़ा ग्रह भी उन्हें अपनी छत्रछाया में जिम्मेदारी के साथ सँभालता नहीं है। अस्तु वे एक प्रकार से अनाथ और असहाय की स्थिति में रह जाते हैं। जंगली हाथियों को जिस प्रकार मजबूत रस्सों से पकड़ कर वशवर्ती बना लिया जाता है उसी प्रकार इनमें से भी कुछ को पकड़ा घसीटा और अभीष्ट प्रयोजन के लिए जोता जा सकेगा, ऐसा वैज्ञानिकों का विश्वास है। आकाश सागर में विचरण करते इन मगरमच्छों को पकड़ने के लिए मानवी प्रयोगशालाओं में ऐसे रस्से बँटे जा रहे हैं जिनसे इनकी मुश्के बाँधी जा सकें और नाक में नकेल ढाली जा सकें।
सोचा यह गया है कि इन क्षुद्र ग्रहों को अन्तर्ग्रही मात्राओं में पड़ाव की तरह इस्तेमाल किया जा सकेगा। उन पर सराय खड़ी की जा सकेगी। कुछ पर उपयोगी प्रयोगशालाएँ बनाई जा सकेंगी। वहाँ से पृथ्वी की संचार व्यवस्था को सुलभ बनाया जा सकेगा। सौरमण्डल की परिधि में तथा उससे बाहर की सीमा में दूर-दूर तक देख सकने वाली आँखें भी इनमें फिट की जा सकेंगी, जो पृथ्वी वालों को आवश्यक जानकारियाँ प्रदान करती रहें। इनमें से कुछ को पकड़ कर धरती पर लाया जायगा और उनको चीर-फाड़कर यह पता लगाया जायगा कि वे आखिर है क्या? और किसलिए आकाश में उच्छृंखल मटरगश्ती कर रहे हैं।
धरती वाले जो सोचते हैं सो नीति युक्त ही है। क्षुद्रता को नियन्त्रण में रखने के लिए चेष्टा होती ही है। उच्छृंखलता बरतने वाले बाँधे और पकड़े जाते हैं। जिन्होंने अपनी गरिमा छोड़ दी महानता सुरक्षित नहीं रखी और क्षुद्रता को अपनाया उनकी दुर्गति होनी ही है जैसी कि निकट भविष्य में इन क्षुद्र ग्रहों की होनी सम्भव है। ऐसा न भी हो सके तो वे बौने उपहासास्पद तो बने ही रहेंगे और अपनी तथा अपने पूर्वजों की क्षुद्रता का प्रमाण ही प्रस्तुत करते रहेंगे। यही सब हेय उपलब्धियाँ वे लोग प्राप्त करते हैं जिन्होंने महानता का राजमार्ग छोड़कर क्षुद्रता की उच्छृंखलता को अपनाया।
अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को अपनी विशिष्ट स्थिति का मूल्याँकन करना चाहिए और अपने को विशेष उद्देश्य को लेकर अवतरित हुआ मानना चाहिए। वह अपने को जागरुक रखें और मूर्च्छा में पड़े हुए अथवा दिवा स्वप्न देखने वाले मूढ़ मति लोगों को जगाने की जिम्मेदारी संभाले। आँधी में उड़ते फिरने वाले पत्तों की तरह उसे निष्प्रयोजन इधर उधर उड़ते फिरना नहीं हैं, वरन् समुद्र में खड़े हुए प्रकाश स्तंभों के समतुल्य बनना है जो घोर अन्धकार में स्वयं चमकते रहते हैं और अपने प्रकाश से उधर से निकलने वाले जहाजों को डूबने से बचाते हैं। इस लक्ष्य को हमें अपने जीवन क्रम में दृष्टिकोण में सम्मिलित करना चाहिए और तद्नुरूप अपनी गतिविधियों का निर्धारण करना चाहिए।
जिस समय में हम पैदा हुए हैं इतिहास में वह अतीव मार्मिक है। इन दिनों मानवी संस्कृति जीवन मरण के दुराहे पर खड़ी है। लोग बुद्धि भ्रम में बेतरह उलझ गये हैं। व्यक्तिवादी अति संकीर्ण दृष्टिकोण अपना कर हर मनुष्य आपाधापी की निकृष्ट मनः स्थिति के दलदल में गरदन तक फँस गया है। जैसे बने वैसे स्वार्थ सिद्धि की ललक ने उसे अति घिनौनी अपराधियों जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाये रहने का अभ्यस्त बना दिया है। अविचार और अनाचार का बोलबाला है। इस लोक प्रवाह ने सामाजिक वातावरण को विषाक्त बनाकर रख दिया। स्नेह सौजन्य के दर्शन अब कहीं कठिनाई से ही होते हैं। सज्जनता और सहृदयता कहने सुनने भर की वस्तुएँ रह गई हैं। अविश्वास और आशंका का साम्राज्य छाया हुआ है। आज का मित्र कल शत्रु सिद्ध न होगा, इसका कोई भरोसा नहीं। मनुष्य की क्षुद्रता किस स्तर तक उतर आई है उसे देखते हुए लगता है मानवी सभ्यता क्रमशः इस धरती पर से उठती चली जा रही है।
यों शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, विज्ञान आदि की इन दिनों भारी वृद्धि हुई है। और अगणित सुख साधन उपलब्ध हुए हैं किन्तु दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों की वृद्धि ओर भी अधिक द्रुतगति से हुई है। इस दावानल में सर्वजनीय सुख-शान्ति नष्ट-भ्रष्ट होती चली जा रही है बड़े छोटों को निगल जाने के लिए आतुर बैठे हैं। विश्वयुद्ध की विभीषिकाएँ दिन-दिन सघन होती चली जा रही हैं। आशंका यही बनी रहती है कि कहीं कोई अणुबम इस सुन्दर भूलोक को भस्मसात् कर देने का निमित्त न बन जाय और मानवी सभ्यता का सदा सर्वदा के लिए अन्त न हो जाय।
व्यक्ति और समाज किस प्रकार विपन्न परिस्थितियों में घिरते चले जा रहे हैं यह देख कर भविष्य अन्धकारमय बनता जा रहा है। हम सचमुच जीवन मरण के दुराहे पर खड़े हैं। एक ओर सर्वनाश अट्टहास कर रहा है दूसरी ओर मानवता सहमी खड़ी है। मरण ने अपना सरंजाम पूरे ठाठ-बाठ के साथ खड़ा कर लिया है। जीवन इस असमंजस में घिरा खड़ा है कि हमारा क्या होना है। हमारा अस्तित्व अगले दिन भी रहना है या उसकी इतिश्री होने की घड़ी आ गई। जिस राह पर व्यक्ति और समाज ने चलने की ठान-ठानी है वह अत्यन्त भयावह है। हर क्षेत्र की हर स्थिति उलझती चली जा रही है और गतिरोध ने आगे बढ़ने का रास्ता बन्द कर दिया है। विवेक किंकर्तव्य विमूढ़ होकर हतप्रभ बना खड़ा है। सूझ नहीं पड़ता आगे क्या होना है क्या किया जाना है?
समय की इस विषम वेला में जागरुक आत्माओं का विशेष कर्तव्य है। अखण्ड-ज्योति परिवार को इस आपत्ति काल में अपनी विशेष भूमिका निभानी है। उसे सामान्य नर कीटकों की तरह पेट प्रजनन के लिए नहीं जीना है। अपनी प्रतिभा को उसी कीचड़ में नहीं सड़ाना है जिसमें कि सर्वनाश के गर्त में गिरने वाली अन्धी भेड़े दौड़ती हुई चली जा रही है। हमें अपनी विशिष्ट स्थिति का अनुभव बार-बार करना चाहिए। ऊँचा उठकर सोचना चाहिए और ऐसा कुछ करना चाहिए, जिससे ऊँचे आदर्शों का निर्वाह होता हो। युग की उलझी हुई समस्याओं को सुलझाने में हमें कुछ तो करना ही होगा, अपनी जागरुकता का परिचय दिये बिना अब काम चलेगा नहीं। प्रहरी सोते रहेंगे तो दस्युओं के आतंक वाली इस अन्धकार भरी निशा में कुछ भी हो सकता है और ऐसा हो सकता है जिसका परिमार्जन करने का समय फिर कभी आवे नहीं।
व्यक्तिगत स्वार्थी की पूर्ति ही तो चौरासी लाख योनियों में करते रहे हैं। यह क्रम तो लाखों वर्षों से चला आ रहा है और आगे भी उसी कुचक्र में घूमते हुए लाखों वर्ष सहज ही बिताने को मिल सकते हैं। हम अखण्ड-ज्योति के परिजन यदि एक जन्म युग संकट से जूझने में लगादें और उसमें व्यक्तिगत स्वार्थ साधनों में निरत रहने की बात कुछ समय के लिए पीछे छोड़ दें तो भी कोई बहुत बड़े घाटे की बात नहीं हैं। इन दिनों हम पीड़ित मानवता ने अपने परित्राण की आशा से पुकारा है और आँसू भरे नेत्रों से निहारा है। इसे विमुख इसलिए न किया जाय। इसके लिए अपने को पशु प्रयोजनों से कुछ पीछे हटना पड़े तो संकोच न किया जाय।
जन मानस का भावनात्मक परिष्कार अपने समय की सबसे बड़ी माँग है। विकृत चिन्तन से निकृष्ट कर्म बनते हैं और निकृष्ट गति विधियाँ ही अनेकानेक संकटों का सृजन करती हैं इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है। व्यक्ति और समाज की उलझी हुई अगणित समस्याओं का एक ही समाधान है- लोक मानस में गहराई तक घुस पड़ी चिन्तन विकृतियों का निराकरण। इस एक ही शस्त्र हाथ में लेकर हम असुरता की चतुरंगिणी सेना को निरस्त कर सकते हैं। हमें इसी केन्द्र पर केन्द्रित होना है। अपनी गतिविधियों को, अपनी प्रतिभाओं और साधनों को जितना संभव हो इसी महायज्ञ के लिए प्रस्तुत करना है।
अखण्ड ज्योति परिजनों को इस विषम बेला में विशेष रूप से युग निमन्त्रण मिला है उन्हें अपना सम्पूर्ण समय, श्रम, ज्ञान, प्रभाव, धन मात्र लोभ और मोह के परिपोषण में ही नहीं लगाये रहना हे वरन् उसमें से एक बड़ा अंग काटकर युग देवता के चरणों में प्रस्तुत करना है। यदि इस विषम बेला में इतना भी न बन पड़ा तो इस में हम सब का ही नहीं समूची मानव जाति का दुर्भाग्य माना जायगा। जागरुक आत्माएँ ही यदि हथियार डाल देंगी, वे भी सदुद्देश्यों के लिए कुछ साहसिक कदम बढ़ाने के लिए तैयार न होंगी तो फिर पशु प्रवृत्तियों में उलझे हुए सामान्य आमन्त्रण को हम इस आधार पर अस्वीकार करदें कि “इससे क्षुद्र स्वार्थपरता की पूर्ति में कमी पड़ जायगी” तो भी फिर यही कहना चाहिए कि आदर्शों का जमाना लद गया। धर्म, अध्यात्म, आस्तिकवाद और तत्वज्ञान जैसी बातें कहने सुनने और ढकोसले रचने भर के लिए शेष रह गई है। अब उनका अनुकरण करने वालों की पीढ़ी समाप्त हो गई।
अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक परिजन को हजार बार अपनी स्थिति पर विचार करना चाहिए और वह साहस जुटाना चाहिए जिसे अपनाने में ही उसके विशिष्ट जीवन की सार्थकता है। वर्तमान समय की सबसे बड़ी तपश्चर्या युग साधना है। इससे बढ़कर पूजा, भजन, जप, तप, ज्ञान, ध्यान और दूसरा नहीं हो सकता कि आदर्शवादिता को जीवित रखने के लिए हम अपनी सारी शक्तियों को झोंक दें। यह आपत्ति काल है नास्तिकवादी अनास्था अपने प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न कलेवरों में पूरे जोर-शोर से मैदान में डटी हुई है। उसकी आक्रामक व्यूह रचना यदि सफल हो गई तो समझना चाहिए कि वे सारे आधार ही नष्ट हो जायेंगे, जिनके सहारे आत्म-कल्याण की, आत्म-ज्ञान की बात सोची जा सकती है।
आपत्ति काल के आपत्ति धर्म होते हैं। हमें आपत्ति धर्म के रूप में अपने जलते हुए जमाने पर पानी डालने के लिए आगे आना चाहिए और छुट-पुट प्रयोजनों को पीछे धकेलने में यदि भौतिक दृष्टि से कुछ घाटा दीखता हो तो उसके लिए भी साहस बटोरना चाहिए।
बड़ी बात सोचने, बड़ा साहस सँजोने और बड़े कदम बढ़ाने के लिए तो सुविस्तृत क्षेत्र फैला पड़ा है, उससे कितना ही आगे चला जा सकता है। समय-समय पर महामानव अपनी बड़ी आहुतियाँ देते रहें हैं उन्हीं के जीवन दीपकों ने जलकर अपने समय के अन्धकार को दूर किया है और अपने जमाने के भटकते हुए जन-मानस को रास्ता दिखाया है। छोटी सी छोटी परिस्थिति के व्यक्ति की बड़ी से बड़ी मनःस्थिति हो सकती है और वह ऐसा कुछ कर सकता है जिसे देख कर प्रचुर साधन सम्पन्न व्यक्ति आश्चर्यचकित होकर रह जाय। पर यह तो बड़े साहस की बात हुई। यहाँ तो न्यूनतम की चर्चा हो रही है। एक छोटी इकाई हमें ऐसी बना लेनी चाहिए जिसके बारे में यह कहा जाय कि अपने आदर्शवाद की प्रतिष्ठापना में अग्रसर अखण्ड ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य को अनिवार्य अनुदान मानना पड़े और उसके लिए इतना तो करना ही है यह सोचना पड़े।
बार-बार के अनुरोध आग्रहों का सिलसिला अब समाप्त होने जा रहा है। उसकी पुनरावृत्ति आखिर कब तक की जाती रहेगी। अब अन्तिम बार उसका आरम्भ और अन्त जोड़ लेना चाहिए और यदि कुछ कर सकना सम्भव हो तो उसका हाँ अथवा ना एक बारगी निश्चय कर लेना चाहिए। हमारा परामर्श, अनुरोध रहा है कि जागृत परिजनों को अपनी विशिष्ट स्थिति का मूल्याँकन करना चाहिए और एक न्यूनतम कदम तो निश्चित रूप से उठाना ही चाहिए। सर्वथा अस्वीकृत कर देना और उपेक्षा दिखाना सरल है, पर अन्ततः परिणाम और परिपाक की दृष्टि से बहुत ही अबुद्धिमत्तापूर्ण निर्णय होगा। इस घाटे की पूर्ति सहज ही न हो सकेगी और चिरकाल तक पछताना पड़ेगा। इसलिए यदि सम्भव हो तो न्यूनतम प्रयास के लिए साहस समेट ही लेना चाहिए।
वह कदम यह है कि अपने समय, श्रम, और मनोयोग का एक अंश नियमित रूप से युग देवता के चरणों में भावभरी श्रद्धाञ्जलि की तरह समर्पित करते रहने की साधना को दैनिक जीवन का एक अविच्छिन्न अंग बना लेना चाहिए। पेट और परिवार के लिए 23 घण्टे लगाये जा सकते हैं तो क्या देश, धर्म, समाज, संस्कृति के लिए एक घण्टा प्रतिदिन देना भी सम्भव नहीं हो सकता? यदि चाह होगी तो राह जरूर निकल आवेगी। कितने ही लोग भजन-पूजन की विडम्बना में घंटों गुजारते रहते हैं फिर क्या हम विवेकशील लोगों के लिए यह सम्भव नहीं कि उतना समय जन-मानस का नव-निर्माण करने के लिए लगाते रहने का संकल्प कर सकें। सच पूछा जाय तो इससे बढ़कर ईश्वर की सच्ची उपासना और दूसरी तरह हो ही नहीं सकती। हमें इस समय दान को ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट पूजा के रूप में नियोजित करना चाहिए। यही न्यूनतम अनुदान है जिसकी आशा अखण्ड-ज्योति परिवार के प्राणप्रिय परिजनों से हम बहुत ही आशा भरे नेत्रों से कर रहे हैं।
यह समय दान कैसे किस रूप में प्रयुक्त होगा? वह विस्तारपूर्वक अगले अंक में पढ़ने की प्रतीक्षा की जानी चाहिए। इन पंक्तियों में तो उस पृष्ठ-भूमि को बनाने की बात कही जा रही है जिसमें उस एक घण्टे के समय को बोया जाया करेगा। खेत न हो तो बोये किसमें? बाग न हो तो माली का श्रम किसलिए, कहाँ, कैसे सम्भव होगा? आरम्भ में हम सबको खेत बनाने, उद्यान लगाने का कदम बढ़ाना चाहिए और इसके लिए कार्यारम्भ में जिस प्रकार विशेष प्रयत्न किया जाता है विशेष साधन जुटाये जाते हैं वैसा ही हमें भी विशेष आयोजन करना चाहिए।
इस पुण्य प्रतिष्ठापना का शुभ मुहूर्त गायत्री जयंती, गंगा जयन्ती ज्येष्ठ सुदी 10 तारीख 18 जून बुधवार का है। इस अनुष्ठान की पूर्णाहुति गुरु पूर्णिमा व्यास पूर्णिमा-आषाढ़ सुदी पूर्णिमा तारीख 23 जुलाई बुधवार को होनी चाहिए। इन 35 दिनों को एक विशेष पुरश्चरण का अवधि मानकर चलना चाहिए और उसमें जितना अधिक समय दिया जा सकता हो, जितना श्रम किया जा सकता हो, जितना मनोयोग लग सकता हो उसे, एकबार अपनी पूरी श्रद्धा को झकझोरते हुए लगा ही देना चाहिए।
कहना न होगा कि नव-निर्माण जैसे महान अभियान एकाकी प्रयत्नों से किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकते भले ही वे कितने ही बढ़े-चढ़े क्यों न हों। इसके लिए संघ शक्ति का जागरण अनिवार्य है। राम रीछ-वानरों द्वारा कृष्ण ग्वाल-बालों द्वारा-बुद्ध आत्मदानी भिक्षुओं द्वारा और गाँधी सत्याग्रही सैनिकों द्वारा अपने समय की विभीषिकाओं को निरस्त करने में समर्थ हुए थे। नव निर्माण के लिए कुछ कहने लायक कार्य बिना संगठन के किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। हमें इन 35 दिनों का युग संगठन खड़ा करने में लगाना चाहिए।
भीड़ जोड़ने से कुछ काम न चलेगा। जिन्हें मिशन की विचारधारा का परिचय नहीं उन्हें ऐसे ही संगठन में शामिल कर लेना और सदस्य बना लेना नितान्त उपहासास्पद है। उनसे झूठी आत्म प्रवंचना होती है। अपने संगठन में सम्मिलित होने वालों के लिए प्रथम शर्त यही है कि वे लगातार-नियमित रूप से अपनी विचारधारा को रुचिपूर्वक पढ़ते हों। इस कसौटी पर केवल वे ही लोग खरे उतरते हैं जो अखण्ड-ज्योति के नियमित पाठक हैं। अपना संगठन अभी इन्हीं लोगों तक सीमित रखा जाना चाहिए। इसके लिए यह किया जाय कि जहाँ भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है वहाँ के दो-तीन परिजनों की एक टोली आगे कदम बढ़ाये और अन्य सदस्यों के घरों पर मिलने जाकर संगठन का सदस्य बनने का अनुरोध करें। आशा की जानी चाहिए कि उनमें से अधिकाँश लोग उसे स्वीकार कर लेंगे। जो स्वीकार करें उनसे वही एक घण्टा समय देने का प्रस्ताव करना चाहिए। पहली बार यह समय विचार गोष्ठी में एकत्रित होते रहने के रूप में माँगा जाय। साप्ताहिक सत्संग क्रम चलाया जाय। सप्ताह का एक दिन इसके लिए नियत जाय और उपरोक्त 35 दिनों में जो 5 सप्ताह पड़ते हैं उनमें 5 विचार गोष्ठियों के लिए 5 सदस्यों के स्थान निर्धारित कर लिये जायं। जो संगठनकर्ती टोली आगे कदम बढ़ाती हुई उभरी है उसका काम है कि जिनके पास भी अखण्ड-ज्योति पहुँचती है उनके घर कई बार चक्कर लगायें और उनसे बार-बार अनुरोधपूर्वक संगठन के अंग बनने का आग्रह करो कम से कम इन पाँच सप्ताहों में पाँच दिन पाँच स्थानों पर जो विचारगोष्ठी नियत की जाय उसमें सम्मिलित होने के लिए तो रजामन्द कर ही लें। इतना काम जो टोली पूरा कर लेगी उससे यह आशा की जायगी कि अपने क्षेत्र में व्यापक प्रकाश उत्पन्न करना और समर्थ संगठन खड़ा करना उसे के लिए आवश्यक ही सम्भव हो जायेगा। इन। टोलियों का गठन यह अंक पढ़ने के दिन से ही आरम्भ हो जाना चाहिए। उनका संकल्प होना चाहिए कि इन 35 दिनों के प्रयत्न से स्थानीय संगठन निश्चित रूप से खड़ा कर दिया जायेगा।
युग-निर्माण शाखा संगठन की सदस्यता की शर्त एक घण्टा समय ज्ञान-यज्ञ के लिए नित्य देते रहना है। आवश्यक नहीं कि यह हर दिन ही दिया जाय। सप्ताह के सात घण्टे एक छुट्टी के दिन भी दिये जा सकते हैं। महीने में 30 घण्टे किसी न किसी प्रकार दे ही देने चाहिए। जिनके पास समय कम हो वे विचारगोष्ठियों में सम्मिलित होने के समय को भी इसी अनुदान में जोड़ सकते हैं। यों साधारणतया वह समय ज्ञान-यज्ञ प्रसार के लिए, जन-संपर्क के लिए नियोजित होने चाहिए। व्यस्त लोगों को विशेष छूट के रूप में विचारगोष्ठियों में उनका सम्मिलित होना भी उसी में गिन लिये जाने की बात कही गई है।
सदस्यता का कोई अलग फार्म आदि नहीं है। साधारण कागज पर एक घण्टा नित्य समय देने की प्रतिज्ञा पर हस्ताक्षर कराये जा सकते हैँ। संगठन की गतिविधियों को सुसंचालित रखने के लिए जायं। अपने संगठनों में प्रधान, मन्त्री आदि अनेक पदाधिकारी नहीं चुने जाने चाहिए। उससे अनावश्यक प्रतिद्वंद्विता और अहंकारिता फैलती है। कार्यवाहक के अतिरिक्त दूसरा पदाधिकारी कोषाध्यक्ष ही हो सकता है।
इन पाँच सप्ताहों की विचारगोष्ठियों में चर्चा को प्रधान विषय यह होना चाहिए कि 23 जुलाई को गुरु पूर्णिमा उत्सव उत्साहवर्धक रीति से कैसे मनाया जाय? उन दिनों वर्षों की सम्भावना रहेगी, इसलिए आयोजन छाया वाले स्थान में होना चाहिए और उतने ही व्यक्ति बुलाने चाहिए जिनके बैठने को स्थान हो। इस अवसर पर बड़ा आयोजन नहीं हों सकता यह तो परिजनों का प्रतिज्ञा पर्व है जिसमें उन्हें विधिवत् शपथ लेनी है कि मिशन का प्रकाश फैलाने के लिए वे एक घण्टा समय नियमित रूप से देते रहेंगे।
यों युग-निर्माण संगठन बहुत समय से चला आ रहा है, पर अब यह उसका नवीनीकरण है। कायाकल्प है। कुछ शाखाएँ नाम मात्र की है, कुछ ऐसे ही मूर्च्छित स्थिति में पड़ी है। अब नये उत्साह और नये साहस के साथ कदम बढ़ाने हैं। इसलिए सभी परिजनों को अपनी सदस्यता का नया कल्प करना चाहिए। श्रावणी पर्व पर हर साल नये यज्ञोपवीत बदले जाते हैं। इस वर्ष के इस प्रयास को उसी स्तर का गिन लिया जाना चाहिए और यह प्रक्रिया इन्हीं 35 दिनों की अवधि में पूरी कर लेनी चाहिए।
गुरुपूर्णिमा से आरम्भ होने वाले अगले वर्ष में व्यक्तिगत रूप से हर सदस्य को ‘एक से दस’ अभियान के अंतर्गत अपनी पत्रिकाएँ तथा पुस्तकें कम से कम दस व्यक्तियों को पढ़ाते रहने को उत्तरदायित्व सँभालना है। एक घण्टा समय उसी में लगाना है। घर, परिवार के पड़ौसी परिचय के लोगों में से कम से कम 10 ऐसे व्यक्ति प्रत्येक परिजन के प्रभाव क्षेत्र में रहने ही चाहिए जो विचार क्रान्ति अभियान के प्रकाश साहित्य को पढ़ने में उत्साह रखे रहें।
सामूहिक रूप से शाखा संगठनों को यथासम्भव उत्साही सदस्यों के जन्म दिन मनाने की व्यवस्था बनानी चाहिए। साप्ताहिक या पाक्षिक रूप से विचार गोष्ठी, सत्संग का क्रम चलाना चाहिए और सब पर्व तो सामूहिक रूप से अनिवार्य रूप से मनाते ही चाहिए। इसके लिए अतिरिक्त बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रांति के लिए प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं संघर्षात्मक शत सूत्री कार्यक्रमों का सुविस्तृत कार्यक्षेत्र सामने पड़ा है जहाँ जो सम्भव हो वह आरम्भ करना चाहिए। अगले वर्ष का न्यूनतम कार्यक्रम घोषित है (1)व्यक्तिगत रूप से ‘एक से दस’ का प्रसार विस्तार (2)साप्ताहिक विचारगोष्ठियों, जन्म दिनों का पर्वों का आयोजन। इससे कम की गुंजाइश नहीं-अधिक जो भी सम्भव हो किया जाय।
गुरु पूर्णिमा पर्व के आयोजन में सामूहिक गायत्री पाठ, यज्ञ, भजन-कीर्तन, प्रवचन, समय दान की प्रतिज्ञा, दीप दान, प्रभात-फेरी आदि जहाँ जो बन पड़े वहाँ उस प्रकार के आयोजन की व्यवस्था बना लेनी चाहिए। लाल मशाल को गुरु प्रतीक माना जाय और उसके चित्र के सम्मुख श्रद्धाँजलि, पुष्पाँजलि अर्पित की जाय। उस दिन से अगले वर्ष के कार्य-क्रम नियमित रूप से सुसंचालित कर दिये जायं।
यह भूलना नहीं चाहिए कि यह वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय महिला जागरण वर्ष है। अपने हर संगठन के साथ महिला जागरण अभियान शाखाएँ निश्चित रूप से बनाली जायं। जहाँ मात्र पुरुषों का ही संगठन होगा और महिला शाखा स्थापित न हो सकेगी। वहाँ अधूरापन ही माना जायगा। जहाँ युग-निर्माण शाखाओं का नवीनीकरण करना है वहाँ समानान्तर महिला शाखाएँ भी स्थापित करनी है। इसके लिए क्या करना चाहिए इसका विस्तारपूर्वक वर्णन मार्च, अप्रैल और मई की अखण्ड-ज्योति में किया जा चुका है। संगठन टोलियाँ यह मानकर कर चलें कि जहाँ अखण्ड-ज्योति परिजनों का एक सुनियोजित संगठन खड़ा करना है वहाँ महिला शाखाओं की स्थापना भी उतनी ही आवश्यक है।
इस दिशा में जो भी प्रयास किये जायं और सफलता मिले उसके प्रकाशनार्थ समाचार युग-निर्माण योजना मथुरा के पते पर भेजे जायं। साथ ही उनकी प्रतिलिपि शान्ति-कुंज, सप्त सरोवर हरिद्वार के पते पर भी भेजी जायं। सर्वविदित है कि हम लोग अब हरिद्वार ही रहते हैं और यहीं से परिजनों को आवश्यक स्नेह, सहयोग एवं प्रकाश देते रहते हैं।
फूलों की शय्या को तजकर, जो काँटों का नथ अपनाता। वह मानव ही इस वसुधा पर, नर से नारायण बन जाता॥
तप-त्याग भरा जिसका जीवन, परहित में अर्पित तन-मन-धन। जिसके सुख से पुलकित जन-जन जो है शोषित का संजीवन॥
जो दीपक-सा तिल-तिल जलकर, पथ आदर्शों का दिखलाता। वह मानव ही इस वसुधा पर, नर से नारायण बन जाता॥
जो सूरज-सा बरसों तपकर, चमका हीरे-सा विमल प्रखर। सब ऋद्धि-सिद्धियाँ भी पाकर, चलता-फिरता सेवक बनकर॥
हर प्राणी जिसका सम्बन्धी, परनारी है जिसकी माता। वह मानव ही इस वसुधा पर, नर से नारायण बन जाता॥
जो बात धर्म की नित्य कहे, पर रूढ़िवाद में नहीं बहे। हँस-हँसकर जो आघात सहे, संघर्षों में भी सौम्य रहे॥
जो जीवन का विष पी-पीकर, पीयूष धरा पर बरसाता। वह मानव ही इस वसुधा पर, नर से नारायण बन जाता।
मिल जाते जो भी दीन कहीं बन जाता उनका बन्धु वहीं। निज वैभव में आसक्ति नहीं, खोजे अपनी ही मुक्ति नहीं॥
जग का सन्ताप मिटाने को, जो सुख समाधि को ठुकराता। वह मानव इस वसुधा पर, नर से नारायण बन जाता॥
-डा. हरगोविन्द सिंह
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*समाप्त*