मुंडकोपनिषद् में कहा गया है-
सत्यमेव जयते नानृतं, सत्येन पंथा विततो देवयानः। येनः क्रमन्त्यृषयोह्याप्त कामा यत्र तत्सप्यत्य परम निधानम्॥ -मुण्डक 3।1।1
सत्य ही जीतता है, असत्य नहीं। सत्य से ही देवयात्रा प्रशस्त होती है। सत्य से ही ऋषिगण अपनी कामनाओं को जीतते हैं। सत्य रूप परमात्मा को प्राप्त करते हैं।
विश्व के सभी मनीषियों ने सत्य की महिमा गाई है। सभी धर्म-ग्रन्थ, महापुरुषों के संदेश इसी तथ्य की ओर निर्देश करते हैं कि मनुष्य सत्य मार्ग का अनुसरण करे।
दार्शनिक प्लेटो का वचन है - ‘सत्य को ईश्वर और उसके प्रतिबिम्ब को प्रकाश कहते हैं।’ महात्मा शेखसादी की उक्ति है - ‘ईश्वर को प्राप्त करने का एकमात्र मार्ग सत्य को अपनाना है। जो सचाई के मार्ग पर चलता है वह भटकता नहीं।’ मनीषी कान्ट का कथन है - ‘सचाई वह तत्व है जिसे अपनाने पर मनुष्य भले और बुरे की परख कर सकता है। हृदयगत सभी सद्गुणों के विकास की कुंजी मनुष्य की सत्यनिष्ठा में सन्निहित है। विद्वान ऐनोन कहा करता था - ‘यह मत देखो कि कौन कह रहा है वरन् यह देखो कि सत्य कहाँ से कहा जा रहा है।’ होरेसमन का अभिमत है - ‘यह जरूरी नहीं कि बिना पात्र-कुपात्र का ख्याल किये हर सच्ची बात पूरी की पूरी हर किसी से कह दी जाय, परन्तु इतना ध्यान अवश्य रखा जाये कि जिससे जितना कहा जाये वह सत्य ही होना चाहिये। संत सिल्वियो वैलिको ने कहा है -’ईश्वर से प्रेम करना और सत्य से प्रेम करना एक ही बात है।’
अमेरिका का रौगरमार्टन यों दूसरों की आँखों में बहुत उन्नतिशील और सुसंपन्न व्यक्ति था। उसके वैभव को देखकर लोग ईर्ष्या करते थे और चाहते थे कि उन्हें भी भगवान उसी जैसी सम्पन्नता प्रदान करे। पर यह दूसरों का ही दृष्टिकोण था। स्वयं रौगरमार्टन को जिस तनाव, दबाव, उद्वेग और खीज का सामना करना पड़ता था उसे वह अकेला ही जानता था। जिन परेशानियों और विफलताओं में होकर उसे रोज ही गुजरना पड़ता था उससे दुखी होकर उसने जीवन के प्रति एक विचित्र दृष्टिकोण बना लिया था। वह कहने लगा था - ‘जिन्दगी एक गन्दगी भर है।’
मार्टन के स्वजन सम्बन्धियों, मित्रों और विश्वासपात्रों तक ने उसे बुरी तरह ठगा और बहकाया। सो उसने यही अनुमान लगाया कि दुनिया में वफादारी और ईमानदारी नाम की कोई चीज है नहीं। एक दूसरे को भरमाने के लिए लोग ऐसे ही आदर्शवाद के ढकोसले रचते हैं, पर जब वक्त आता है तब उस व्यवहार की कसौटी पर कोसों दूर रह जाते हैं। दूसरों के बारे में जैसा समझा जाता है वे वस्तुतः वैसे होते नहीं।
शान्ति की खोज में उसने मद्य-पान की आदत डाली, पर जैसे ही होश आता - विक्षोभ फिर उसके सिर पर सवार हो जाते आखिर हर घड़ी नशे में अचेत पड़े रहना भी तो नहीं बनता था। उसने आत्महत्या की भी कोशिश की, पर वह प्रयत्न भी अधूरा असफल बनकर रह गया।
इस प्रकार के अनेक उतार-चढ़ावों के बीच भटकने के बाद उसने धर्म का तात्विक अध्ययन किया तो पाया कि साम्प्रदायिक जंजाल और धर्म के तत्वदर्शन में मनुष्य के भीतर उतर सके तो वह रोशनी मिल सकती है जिसके आधार पर खीज को एक विनोदी हलचल के रूप में देखा जा सके और सन्तुलित मनःस्थिति अपना कर आत्म निर्भर जीवन जिया जा सके।
इस निष्कर्ष पर पहुँचने के बाद उसे लगा कि मनुष्य जाति की सबसे बड़ी सेवा उसे धार्मिक आस्थाओं को समझने, अपनाने का अवसर देना है। इस प्रयोजन के लिए उसने अपनी सारी सम्पत्ति दान कर दी और एक धर्मान्वेषी संस्था स्थापित की - “फाउण्डेशन आफ रिलीजन एण्ड फिलॉसफी” अर्थात् धर्म और मनोविज्ञान की संस्था। धर्म और मनोविज्ञान के समन्वित स्वरूप को यदि हम चाहें तो व्यवहारवादी अध्यात्म भी कह सकते हैं।
भारतीय तत्ववेत्ता अति प्राचीन काल से ही इस निष्कर्ष पर पहुँच गये थे कि मनुष्य की अन्तःस्थिति जब तक उत्कृष्ट चिन्तन के साथ लिपटी हुई न रहेगी तब तक उसका विकास उस दिशा में न हो सकेगा जिससे कि व्यक्ति और समाज की सुख-शान्ति जुड़ी हुई है। उत्कृष्ट अन्तःस्थिति के बिना किया गया भौतिक उपार्जन विपत्ति का कारण ही बनेगा उससे सौभाग्य का उदय नहीं होगा वरन् दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति ही उत्पन्न होगी।
स्वल्प साधनों में भी सुखी रहने - विपरीत परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने और प्रतिशोध, प्रत्याक्रमण के उद्वेग से बचकर स्नेह, सुधार की ओर मुड़ने - उपभोग को उदारता में परिणत करने से ही मनुष्य अपने आप में सुखी सन्तुष्ट रह सकता है और समाज के लिए श्रेयस्कर अनुदान दे सकता है।
व्यक्ति और समाज को श्रेष्ठता एवं सम्पन्नता से सुसज्जित करने का आधार धर्म तत्व की सुदृढ़ संस्थापना के अतिरिक्त और कोई हो ही नहीं सकता। विचारवान अमेरिकी नागरिक ने धर्म विडम्बना को धर्म विज्ञान के रूप में परिणत करने के लिए जो अपने ढंग से एक सराहनीय कदम उठाया, हम सब भी इसी दिशा में कुछ सोचें और करें तो अपनी अपने समाज की महती सेवा साधना कर सकते हैं।
जब तक समुद्र की खोज नहीं की गई थी, तब तक वह जहाँ-तहाँ भरा हुआ पानी का एक छोटा-सा खड्डा मात्र था। जिन देशों की सीमा से समुद्र लगता है वे समझते थे उनके यहाँ से कुछ ही मील तक यह पानी का उथला सा गड्ढा भरा है। हाथ से चलने वाली नावों की पहुँच से कुछ और अधिक दूरी तक उनका विस्तार होगा, ऐसी मान्यता थी। हर देश के निकट एक प्रथक समुद्र है, ऐसा लाखों वर्षों तक मनुष्य ने जाना और माना।
अब जबकि ज्ञान की सीमा और खोज की तत्परता बढ़ी है तो समुद्र के बारे में नये-नये एक से एक अद्भुत तथ्य सामने आये और भूतकालीन मान्यता की तुलना में उसे इतना अधिक महत्व मिला है जो अपनी पृथ्वी से भी कहीं अधिक है।
धरती का तीन चौथाई भाग पानी में डूबा पड़ा है। थल सम्पदा का तो दोहन होता रहा है, पर इस जल क्षेत्र के गर्भ में छिपी हुई लक्ष्मी का किसी ने स्पर्श भी नहीं किया है। अब इस ओर ध्यान दिया जा रहा है कि मनुष्य की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए इस सम्पदा को उपलब्ध किया जाय। पिछली शताब्दियों में समुद्र से मछलियों की ही सम्पदा समेटी जाती रही है। अब प्रमुख उपलब्धि तेल की होगी जो गहरे गर्तों को छेद कर ऊपर निकाला जाने वाला है। ऐसे उपकरण बनाये जा चुके हैं जो 12000 फुट गहरे समुद्र तल में बिखरी सम्पदा को समेट कर ऊपर लावें। 6000 मीटर गहरे समुद्र तल में जाकर 1000 मीटर गहरा छेद करने और वहाँ जो कुछ मिले उसे खींच लाने के साधन बन गये हैं। मैक्सिको की खाड़ी में 3582 मीटर गहराई में जाकर 200 मीटर गहरा छेद करने और वहाँ से बहुमूल्य संपत्ति ऊपर लाने में जो सफलता मिली है उससे इस दिशा में उत्साह और भी अधिक बढ़ा है।
धरती की ऊँचाई का कीर्तिमान एवरेस्ट की चोटी है। उसकी ऊँचाई 29000 फुट है। यदि उसे उठा कर समुद्र के सबसे गहरे गड्ढे में डाल दिया जाय तो वह ने केवल डूब जायगी वरन् उसके ऊपर 6000 फुट पानी और भी चढ़ा होगा। समुद्र में हिमालय जैसे कितने ही पर्वत ऊँचाई 2000 फुट है। जबकि समुद्र की औसत गहराई 12000 फुट। 6000 फुट तो उसकी छिछली गहराई मानी जाती है।
सभी समुद्रों का सम्मिलित जल 32 करोड़ घन मील है। इसकी विशालता इस आधार पर नापी जा सकती है कि यदि समुद्र पूरी तरह खाली हो जाये तो उसे पूरी करने में धरती की समस्त नदियों का वर्तमान प्रवाह कोई 800 वर्षों में उसे पूरा कर सकेगा।
समुद्र तल में न केवल जलचर, पर्वत और खड्ड हैं वरन् उसमें विशालकाय वन-प्रदेश भी हैं। वृक्षों और वनस्पतियों की कमी नहीं। इनमें से अधिकाँश ऐसे हैं जो पानी में तैरते रहते हैं इन्हें कहीं जड़ जमाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। समुद्र-तल में यों खनिज पदार्थों की पर्तें ही अधिक हैं फिर भी वहाँ काई सरीखी वनस्पति पाई जाती है। ईल घास के फूल और बीज भी होते हैं और वे पानी में ही जन्म लेते बढ़ते और मरते हैं
औषधियों में काम आने वाले रसायन धरती की अपेक्षा समुद्र में से प्राप्त करने पर उनकी प्रभाव शक्ति कहीं अधिक पाई गई है। उदाहरण के लिए जमीन पर पाये जाने वाले सोडियम, साइनाइड विष की तुलना में समुद्र में पाया जाने वाला वही विष दस हजार गुना अधिक प्रभावोत्पादक होता है।
यों समुद्र बँधा हुआ मालूम पड़ता है, पर वस्तुतः वह भी नदियों की तरह चलता-फिरता है अन्यथा उस जल में सड़ांध पैदा हो जाती। ज्वार-भाटों की हलचलें कारणों से समुद्र-तल में प्रचण्ड जल-धाराएँ बहती हैं जो पानी को इधर से उधर बहाती रहती हैं।
मनुष्य की सत्ता समुद्र की तरह सुविस्तृत है। उसके बारे में क्षुद्र-बुद्धि बहुत कम जानती है - उसे तुच्छ नगण्य समझा जाता है, पर जब गम्भीर तात्विक दृष्टि से अवलोकन किया जाता है तो प्रतीत होता है कि वह न तो छोटा है, न दरिद्र न विभक्त। एक सार्वभौम चेतना इस विराट ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है। उसकी अनेकानेक लहरें अनेक जीवधारियों के रूप में अपनी प्रथक हलचलें करती दिखती हैं। इतने पर भी वे मूलतः एक हैं। चमड़े की आँखों से मनुष्य का आकार और वैभव स्वल्प है, पर तत्व-दृष्टि से प्रतीत होता है कि उसकी ऊँचाई और गहराई इतनी अधिक है कि बुद्धि चकरा जाय। उसके गर्भ में इतनी विभूतियाँ भरी पड़ी हैं जिन्हें यदि ढूंढ़ा और पाया जा सके तो सहज ही इन्द्र और कुबेर से बढ़कर बना जा सकता है। समुद्र मंथन की कथा में बताया गया है कि पुरुषार्थ करके विज्ञात सम्पत्ति को करतल गत किया जा सकता है। मंथन, शोधन, दोहन बड़ी बात है। देवता और असुरों ने मिलकर चौदह रत्न निकाले थे। जीवन समुद्र को यदि मथा जा सके तो उसमें से इतने अधिक और इतने बहुमूल्य रत्न मिल सकते हैं जिनके आगे पौराणिक चौदह रत्नों की सम्पत्ति नगण्य प्रतीत होने लगे।
कहा जाता है कि जब पृथ्वी आग के गोले से क्रमशः ठण्डी होकर ठोस बनती जा रही थी तो उस सिकुड़न के प्रभाव से एक टुकड़ा कटकर उछल गया और चन्द्रमा के रूप में चक्कर लगाने लगा। जो जगह खाली रह गई वहाँ विपुल वर्षा का जल भर जाने के कारण समुद्र बन गये। यह घटना प्रायः 30 खरब वर्ष पुरानी मानी जाती है।
कुछ छोड़ने से कुछ प्राप्त होता है का सिद्धान्त अनभ्यस्त होने के कारण अखरने वाला तो है, पर उससे उसकी उपयोगिता में कमी नहीं आती। यदि चन्द्रमा वाला टुकड़ा पृथ्वी ने छोड़ा न होता तो वह कहीं जमा न हो पाता। चन्द्रमा वाला अंशदान करके पृथ्वी ने अपने लिए एक सुन्दर प्रकाश-दीप पाया। समुद्र की विशाल जल राशि और उसके द्वारा मिलने वाले अनेकानेक लाभों का उपयोग किया। त्याग के फलस्वरूप वरदान इसी नीति के अनुसार पाया जाता है। जिनने त्याग का महत्व जाना उन्हें महामानवों की पंक्ति में बैठने का वह सम्मान-गौरव प्राप्त करने का अवसर मिला जो कृपण एवं स्वार्थी को किसी भी प्रकार नहीं मिल सकता।
स्वजनों की समीपता अधिक प्रभावशाली परिणाम उपस्थित करती है, पर वह सम्बन्ध जब झीना और दूरवर्ती होता जाता है तो उसके लाभ भी घटने लगते हैं। चन्द्रमा पृथ्वी से दूर तो चला गया पर समुद्र पार बसने वाले प्रवासी भारतीयों की तरह अपनी मातृभूमि की सेवा में अभी भी प्रयत्नशील है। ज्वार भाटे समुद्र की स्वच्छता के लिए तथा ऋतु व्यवस्था बनाये रहने के लिए नितान्त आवश्यक हैं। उन्हें चन्द्रमा ही उत्पन्न करता है। चन्द्रमा जब समीप था तब वे ज्वार-भाटे तेजी पर थे। अब वे मध्यवर्ती बन गये हैं। पर जब कुछ समय बाद वह और भी दूर चला जायेगा तो ज्वार-भाटे अत्यन्त मन्द पड़ जायेंगे तब समुद्री विकृति के कारण अनेक समस्याएँ उत्पन्न होंगी और उनसे धरती निवासी बुरी तरह प्रभावित होंगे।
इन दिनों ज्वार-भाटों के बीच प्रायः 20- 30 फुट का अन्तर रहता है। यह इसलिए है कि चन्द्रमा हटते हटते 2॥ लाख मील दूर चला गया है। जब वह अलग हुआ ही होगा और पृथ्वी के नजदीक होगा तो निश्चय ही बड़ी प्रचण्ड लहरें उठाता रहा होगा। जन्म से लेकर अब तक की लम्बी अवधि में ने केवल चन्द्रमा ही दूर हटा है वरन् पृथ्वी के घूमने की गति भी बहुत शिथिल पड़ गई है। प्रारम्भिक दिनों में वह 4 घण्टे में ही अपनी धुरी पर घूम लेती थी। हर चार घंटे बाद दिन और हर चार घण्टे बाद रात का दृश्य सामने आता था। अब तो उसमें तीन गुनी शिथिलता आ गई है और 24 घण्टे का दिन रात होता है। खगोलवेत्ताओं का दिन और इतनी ही बड़ी रात होगी। चन्द्रमा दूर खिसकते-खिसकते इतना हट जायेगा कि उसका प्रभाव ज्वार-भाटे के रूप में नगण्य ही दृष्टिगोचर होगा।
अनियन्त्रित उफान और उत्साह - जिसे अनुकूल दिशा न मिली हो कई बार घोर दुष्परिणाम उत्पन्न करता है - जैसा कि ज्वार-भाटों द्वारा नदियों के मुहानों पर उठी हुई जल भित्तियाँ भयंकर परिणाम उपस्थित करती हैं।
नदियाँ जमीन का नमक तथा मिट्टी बहा-बहाकर लगातार समुद्र में पटकती रहती हैं? अस्तु वह दिन-दिन खारा ही नहीं उथला भी होता चला जा रहा है। यों समुद्र का खारी होना हमें निरर्थक लगता है और अखरता है, पर वस्तुतः उससे बहुत लाभ है। सूर्य ताप कर खारा पानी जल्दी भाप नहीं बनता और ठण्डक में जल्दी बर्फ नहीं बनता। यदि पानी मीठा रहा होता तो बादलों का कोई ठिकाना न रहता और लगभग आधा समुद्र हर साल बर्फ बनकर जम जाया करता। खारी समुद्र का भी कहीं-कहीं यह हाल है कि वहाँ सूर्य किरणें सीधी पड़ने से बेहिसाब बादल उठते हैं। लाल सागर के और अटलाँटिक महासागर के धुँआधार बादल वहीं-वहीं बरस कर क्षति पूर्ति न करते रहते तो वे समुद्र कब के सूखकर बादलों में उड़ गये होते। यदि पानी मीठा होता तब तो न जाने क्या विपत्ति हम धरतीवासियों पर आती।
सदा मीठापन ही नहीं कभी-कभी खारीपन और कटु व्यवहार भी आवश्यक होता है। मिठास की ही तरह कटुता की भी अपनी उपयोगिता है। आत्म-रक्षा के लिए प्रायः आक्रमणकारियों के प्रति ऐसी ही कठोरता भरा कडुआपन आवश्यक होता है। समुद्र का पानी यदि खारी न होता तो सूर्य अब तक उसे कब का भाप द्वारा उड़ा ले गया होता। भारी पानी ही अपनी सत्ता को बचाये रखने में सफल रह रहा है। हलके व्यक्तित्वों को अपनी आत्म-रक्षा तक कठिन हो जाती फिर वे बड़े काम तो कर ही कैसे पावेंगे।
लाल सागर के गरम गड्ढों का तापमान 60 अंश तक प्राचीन शोध संकेतों के अनुसार पूर्वी अफ्रीका के तट पर वह क्षेत्र डूबा हुआ है जो कभी ‘लिमूरिया’ के नाम से सम्बोधित किया जाता था। आजकल जिस क्षेत्र में सीशेल्स द्वीप समूह है वहाँ प्राचीन काल में एक विशाल महाद्वीप था। इस क्षेत्र की समुद्री तलहटी में तेल मिलने की पूरी सम्भावना है। अरब देशों में पाई गई तेल पट्टी इसी क्षेत्र में होकर प्रवाहित हो रही है।
मनुष्य की अन्तः सत्ता को यदि टटोला और उभारा जा सके तो भौतिक और आध्यात्मिक जीवन को समुन्नत बनाने वाले उन साधनों की कमी नहीं रहेगी जिनके अभाव में आज हम असहाय, दीन-दरिद्र बने दयनीय जीवन जी रहे हैं।
समुद्र की लहरों में कई बार भयंकर भँवर पड़ जाते हैं। उनकी चपेट में कोई नाव आ जाय तो उसका बच निकलना असम्भव है। चतुर नाविक इस विपत्ति से भी बच निकलते हैं। वे कोई बड़ी वस्तु इस भँवर में फेंक देते हैं फलतः पानी का क्रम टूट जाता है और कुछ समय के लिए भँवर की सत्ता समाप्त हो जाती है, इसी बीच मल्लाह अपनी नावें निकाल ले भागते हैं।
विपत्ति आने पर यदि हम घबराये नहीं और सन्तुलित मति से उसके निवारण का उपाय सोचें तो कोई ऐसा छोटा आधार ही उस संकट के निवारण का मिल सकता है जैसा कि समुद्री भँवर की सर्वभक्षी विभीषिका से बचने के लिए एक मामूली सा लकड़ी का टुकड़ा काम दे जाता है।
समुद्र जितना महान है उतनी ही बड़ी उसकी क्षमता, सम्पदा और शिक्षा भी है। समुद्र खोजा जाना चाहिए और उससे साधन सम्पदा प्राप्त की जानी चाहिए। मानवी अस्तित्व को गहराई तक समझा और उभारा जाना चाहिए ताकि सुख-शान्ति का अक्षय भण्डार हाथ लग सके।
यह युग औद्योगिक एवं भौतिकवादी युग है। इसमें मैश्यू आरनाल्ड के शब्दों में प्रत्येक व्यक्ति ‘पीड़ित आतुरता एवं खण्डित उद्देश्यों’ को लेकर चल रहा है। एक अजीब सी व्यस्तता चारों ओर दिखाई देती है। जिस भी व्यक्ति से किसी कार्य के लिए कहिए, “समय नहीं है” यही एक उत्तर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्राप्त होता है। अधिकतर शुभ कार्यों के करने के लिए तो किसी के पास समय है ही नहीं।
क्या मनुष्य के पास वास्तव में समय नहीं रह गया है? ‘क्या वह इतना व्यस्त हो गया है?’ यह एक प्रश्न हमारे समक्ष उपस्थित हो गया है। आईये हम इस पर विचार करें।
दिन में 24 घण्टे होते हैं। एक वयस्क के लिए 6-7 घण्टे सोना पर्याप्त होता है। 8 घण्टे कार्यालय, फैक्टरी अथवा व्यवसाय के लिए रख लीजिए। शेष आपके पास 9-10 घण्टे बचते हैं। प्रातः एक घण्टे का समय शौच, मंजन, स्नानादि के लिए रख लीजिए और एक घण्टे का सायंकाल विविध कार्यों के लिए रख लें। इस प्रकार लगभग 8 घण्टे नित्य बचते हैं। इसमें यदि 2 घण्टे हम और मनोरंजन, भोजन, मार्ग में आने-जाने का समय निकाल दें तो 6 घण्टे दैनिक हमारे पास रह जाते हैं। रविवार और अन्य दिनों की छुट्टियाँ इसके अतिरिक्त होंगी। अपने आवश्यक कार्यक्रमों के लिए उदारता से समय देने पर भी आपके पास 6 घण्टे शेष रह ही जाते हैं। हम इनका क्या उपयोग करते हैं। यदि उपयोग नहीं करते तो वर्ष में हम 2190 घण्टे अर्थात् 3 महीने 6 घण्टे व्यर्थ बरबाद कर देते हैं। यह समय किसी भी राष्ट्र एवं किसी भी व्यक्ति के लिए अमूल्य निधि है। जीवन-पर्यन्त हमारा कितना समय बरबाद होता है, हम इसका सहज ही अनुमान लगा सकते हैं।
हमारा समय कहां और कैसे नष्ट होता है, यह विचारणीय है। इस प्रकार से समय नष्ट होने का मूल कारण यह है कि हम इसकी उपयोगिता के बारे में जागरुक नहीं हैं। अधिकतर हमारा समय आलस्य, प्रमाद, लापरवाही में जाता है। हमारा जीवन-क्रम अव्यवस्थित है। किसी भी कार्य का समय निर्धारित नहीं है। यहाँ तक कि लोग समय से कार्यालय भी नहीं पहुँचते। “हिन्दुस्तानी आदमी” और “हिन्दुस्तानी समय” बहुप्रचलित शब्द हो गये हैं। गेटे का कहना था कि - “काल बेहद लंबा है। अगर उसका पूर्ण उपयोग किया जाये तो अधिकतर चीजें प्राप्त की जा सकती हैं। यदि व्यवस्थित ढंग से काम किया जाये तो थोड़े समय में काफी काम किया जा सकता है।
समय नष्ट होने का एक कारण यह भी है कि - हम अपने काम में रुचि नहीं लेते, काम को टालने की एक आदत सी बन गई है। इससे कितने ही काम तो शुरू ही नहीं हो पाते और कितने ही काम अधूरे रह जाते हैं। जब अधूरे कामों को अम्बार हमारे सामने लग जाता है तो हम सोच-सोचकर ही परेशान हो जाते हैं। न तो फिर हम अधूरे कामों को ही पूरा कर पाते हैं और न ही नये काम को ही प्रारम्भ कर पाते हैं। यदि हम अपने कार्यों में रुचि लें और धैर्य तथा लगन से काम करें, तो सभी कार्य पूरे हो जाते हैं।
जीवन का एक-एक क्षण उपयोगी होता है। राजा परीक्षित ने केवल सात दिनों में जीवन के रहस्यों को समझा था। ध्रुव और शंकराचार्य ने छोटे जीवन में ही अपने जीवन की सार्थकता सिद्ध कर दी थी। गाँधीजी समय का मूल्य पहचानते थे तभी महात्मा हो सके।
यदि हम समय का मूल्य समझ सकें तो स्वयं अपने लिए ही नहीं, देश और राष्ट्र के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। कितना समय हमारा गाड़ियों में बीत जाता है, यदि हम उसी का सही उपयोग करें, अध्ययन और चिन्तन में लगावें तो जीवन सार्थक हो सकता है। फुरसत की घड़ियों में भी हम व्यस्तता का रंग भर सकें तो जीवन, चित्र की भाँति सुन्दर हो जायेगा।
शरीर और मन की क्षमताएँ सर्वविदित हैं उन्हीं को बलिष्ठ बनाकर लोग ऊँचे उठते, आगे बढ़ते और सुख समृद्धि के साधन एकत्रित करते हैं। इससे ऊँची मानवी सत्ता है - अंतरात्मा, इसको परिष्कृत करने की साधना में संलग्न होकर मनुष्य अतीन्द्रिय शक्तियों से सम्पन्न होता है - अति मानव की भूमिका में प्रवेश करता है और हर दृष्टि से असाधारण बन जाता है।
अति मानवी चेतना के जागरण से जहाँ मनुष्य में देवोपम गुणों की वृद्धि होती है और उसके निखरे व्यक्तित्व से समाज को भारी लाभ मिलता है वहाँ उसकी वे विशेषताएँ भी बढ़ जाती हैं जिन्हें अतीन्द्रिय एवं चमत्कारी सिद्धियों के नाम से जाना जा सकता है।
स्वामी विवेकानन्द ने अपने एक भाषण में कहा था कि एक बार एक दिव्य-दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति से उनकी भेंट हुई। उस व्यक्ति ने एक कागज दिया और उस पर कुछ भी लिखकर अपने पास रखे रहने का निर्देश किया। मैंने इच्छित बात कागज पर लिखकर अपनी जेब में रख ली। मेरी बात संस्कृत भाषा में थी। मेरे साथियों ने अरबी में, जर्मन भाषा में अपनी बातें लिखीं। एक ने डाक्टरी के गूढ़ विषय लिखे। यह भाषाएँ तथा वे प्रसंग दिव्य-दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति जानता न था। तो भी उसने प्रत्येक पर्चे की बात उसी भाषा में, उसी तरह लिख दी, जैसे कि हम लोगों ने लिखी थीं। हम सब आश्चर्यचकित रह गये।”
प्रकाश तरंगों से भी अधिक गतिशील, सुपरसोनिक वेव, पराध्वनिक तरंगें - इस संसार में विद्यमान हैं। उनसे भी अधिक सामर्थ्यवान तथा द्रुतगामी विचार तरंगें हैं - जो क्षण भर में कल्पना की दौड़ के समतुल्य गति से संसार के एक कोने से दूसरे कोने तक जा पहुंचती हैं। सामान्यतया विचार-धावन को कल्पना की उड़ान कहकर उसे उपहासास्पद गिना जाता है, पर अब उसे एक तथ्यपूर्ण विज्ञान का रूप मिल गया है। विचार संक्रमण, चेतना संवहन, अतीन्द्रिय ज्ञान एवं टेलीपैथी के नाम से इस विद्या को अब विज्ञान क्षेत्र में समुचित मान्यता मिलती जाती है।
हीटर अपने प्रभाव क्षेत्र को गरम रखते हैं और कूलर एक सीमा तक ठण्डक उत्पन्न करते हैं विचार का प्रभाव अपने समीपवर्ती क्षेत्र में इसी प्रकार का पड़ता है। मिट्टी पर जिस गन्ध का जल गिरता रहे वह सूखने पर भी उसी गन्ध से गन्धित रहेगी। जिस स्तर के विचार, जिस वातावरण में भरे रहेंगे उनका प्रभाव वहाँ वैसा ही देखा जा सकेगा। कहते हैं ऋषियों के आश्रमों में गाय और सिंह एक घाट पानी पीते थे यह सर्वथा सम्भव है। व्यक्ति के विचार उसकी क्रिया के साथ समन्वित होकर प्रौढ़ बनते हैं और उस वैचारिक प्रौढ़ता से वातावरण प्रभावित होता है। सज्जनों के निकट रहने पर एक अद्भुत शान्ति मिलती है और कितनी ही उद्विग्नताओं का सहज ही समाधान होने लगता है। दुष्ट दुर्जनों के साथ रहने पर धीरे-धीरे भले मानुष भी उसी रंग में रंगने लगते हैं और उसी ढाँचे में ढलने लगते हैं। यह प्रभाव तब उत्पन्न होता है जब कोई व्यक्ति अपने विचारों से इतना प्रभावित हो कि उसका व्यक्तित्व एवं क्रिया- कलाप भी उसी दिशा में गतिशील हो चलें।
यों विचार तो वे भी हैं जिन्हें कल्पना -जल्पना कहते हैं। पर उनमें शक्ति बहुत स्वल्प होती है। वे मस्तिष्क में बेमौसमी बादलों की तरह उड़ते छितराते जल-कण अधिक मात्रा में इकट्ठे होकर घनीभूत होते हैं - मूसलाधार वर्षा करते हैं। इसी प्रकार जो विचार, कल्पना मात्र न रहकर प्रभावशाली होते हैं और चिन्तन करने वाले को अपने रंग में रंगकर उसी स्तर की गतिविधियाँ अपनाने के लिए बाध्य कर देते हैं, उनमें शक्ति रहती है। यही शक्ति कल्पनाओं को सफलता के रूप में परिणत करने के साधन जुटाती है और इसी प्रखरता के आधार पर समीपवर्ती क्षेत्र, वातावरण एवं व्यक्तियों को प्रभावित करने वाला आधार बनता है। विचारों की शक्ति का प्रभाव तभी अनुभव किया जा सकता है जब वे प्रौढ़, प्रचण्ड एवं क्षमता सम्पन्न हों।
फ्राँस के ख्याति नामा चिकित्सक एमेल क्वे ने अनेक रोगियों पर प्रयोग करके यह सिद्ध किया कि विचार संचरण से किसी भी औषधि की तुलना में रोगियों को अधिक लाभ पहुँचाया जा सकता है और औषधियों की उस हानि से बचा जा सकता है जो रोग के साथ जीवनी शक्ति को क्षति पहुँचाती हैं। उनने अपने उपचार में औषधियों का प्रयोग लगभग बन्द ही कर दिया था - देते थे तो केवल रोगी की दुर्बल मनःशक्ति को सान्त्वना देने भर के लिए। उनने कष्ट साध्य रोगियों को अपना विचार-बल देकर और रोगी में आशा एवं उत्साह की वृद्धि करके ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं जिससे रोगी तेजी के साथ सुधार की दिशा में बढ़ते चले गये।
“इसिस अनवेल्ड” ग्रन्थ ऐसे कितने ही उल्लेख हैं जिनमें विचार शक्ति द्वारा दूसरों को भले या बुरे प्रयोजन के लिए प्रभावित किये जाने के उल्लेख हैं। पुस्तक में “जैक्यूज पैलिसियर” नामक व्यक्ति का उल्लेख है जो अपनी वेधक दृष्टि से चिड़ियों को मूर्छित करके पकड़ लेता था और अपनी आजीविका चलाता था। डाक्टर एलगर ने अपनी साक्षी सहित वह विवरण विस्तारपूर्वक प्रकाशित कराया है जिसमें उपरोक्त व्यक्ति उड़ती चिड़ियों को किस प्रकार वशवर्ती करके उनके प्राण हरण करता था।
विचारों से वस्तुओं को प्रभावित करने की विद्या का जिस प्रयोजन के लिए प्रयोग होता रहा है वे उससे भर जाते हैं और फिर जहाँ भी उनका प्रयोग होता है वहाँ वे उस क्षमता का परिचय देते हैं जो उनने दीर्घकालीन संपर्क से संचित की थी।
हाथ देखकर या जन्म-पत्र, पंचांग पढ़कर फलित ज्योतिष की सस्ती विधि के आधार पर किया गया भविष्य कथन और घटना-क्रम का पूर्वाभास प्रकट करना अशक्य है। अस्तु बाजारू पोथी-पाड़े को यदि उपहासास्पद कहें और भ्रम जंजाल फैलाने की दोषी यदि उन्हें बतायें तो यह उचित ही है, इतने पर भी यह तथ्य है कि किन्हीं विशिष्ठ व्यक्तियों में पाई जाने वाली अतीन्द्रिय शक्ति वर्तमान तथा भविष्य की उन परिस्थितियों को जान सकती हैं जो सर्व साधारण के लिए प्रकट नहीं है। भूतकाल का घटना-क्रम बता देना तो और भी अधिक सरल है क्योंकि उसके चित्र एवं शब्द अनन्त आकाश में पहले से ही भ्रमण कर रहे होते हैं और उन्हें अपेक्षाकृत अधिक सरलता से पकड़ा पहचाना जा सकता है। भूत-कथन अध्यात्म शक्ति सम्पन्न व्यक्तियों के लिए सहज और सुगम है। वर्तमान की अविज्ञात परतें उखाड़ना, इससे कठिन है और सबसे कठिन भविष्य ज्ञान है। कारण कि सूक्ष्म जगत में जो प्रवाह चल रहे हैं और जिनके आधार पर भविष्य को जाना जाता है वे पत्थर की लकीर नहीं हैं। अवरोध उन्हें निरस्त भी कर सकते हैं और तीव्र सहयोग से उनकी गति एवं स्थिति में भारी उभार आ सकता है ऐसी दशा में आज की दृष्टि से किया गया भविष्य कथन कल गलत भी हो सकता है।
संसार के राजनेताओं में से ऐसे कितने ही मूर्धन्य सत्ताधीश रहे हैं जिन्होंने परखे हुए अतीन्द्रिय शक्ति सम्पन्न लोगों से महत्वपूर्ण घटना-क्रम का निर्धारण करने के लिए परामर्श लेते रहना आवश्यक समझा और उसकी उचित व्यवस्था बनाई।
अमेरिकी राष्ट्रपति जान्सन और सेक्रेटरी मैकेनहारा, वियतनाम युद्ध की चालें निर्धारित करने में एक देवज्ञ से अक्सर परामर्श करते रहते थे। हिटलर और चर्चिल के बारे में जो रहस्य अब प्रकट हुए हैं उनसे यह तथ्य वक्ताओं के परामर्श को सदा असाधारण महत्व दिया। चर्चिल ने लुई व्हाल को यह जासूसी सौंपी थी कि वे यह पता लगा दिया करें कि हिटलर के ज्योतिषी ने उसे क्या-क्या परामर्श दिये हैं। कहते हैं कि गलत भविष्य कथन करने के अपराध में एक भविष्य-वक्ता को हिटलर ने मौत के घाट उतरवा दिया था।
संसार की प्रसिद्ध राजनैतिक घटनाओं के सम्बन्ध में पूर्व कथन करने वाले भविष्य दृष्टाओं की बातें जब सच निकलीं तो बाजारू ज्योतिषियों के कारण उत्पन्न हुआ सर्वजनीन अविश्वास फिर रुका और विचारशील लोग सोचने लगे कि क्या उसे जानना सम्भव है जो अभी तक घटित नहीं हुआ है? क्या भविष्य पूर्व निर्धारित हैं? क्या मनुष्य नियति के हाथ का खिलौना भर है। इन प्रश्नों का सही उत्तर तर्क संगत आधार पर अभी नहीं मिला है, पर भविष्यवाणियाँ पहले की तरह अभी भी जब सही उतरती हैं तो बुद्धिवाद को एक विचित्र असमंजस में डाल देती हैं।
राष्ट्रपति कैनेडी की हत्या की पूर्व सूचना भविष्य वक्ता पीटर वीडल प्रकाशित करा चुके थे। एक ज्योतिषी ने अन्य आधार पर प्रेसीडेन्ट केनेडी की ठीक उसी समय मरने की बात प्रकाशित कराई थी जिस समय कि वे वस्तुतः मर गये। उसका विचित्र तर्क यह था कि नियति का विधान हर बीस वर्ष बाद एक अमेरिका प्रेसीडेन्ट को उदरस्थ कर जाता है। चाहे वह स्वाभाविक मौत से मरे या हत्या से। सन् 1861 में लिंकन, 1881 में गारफील्ड, 1901 में मैकिन्ले, 1921 में हार्डिंग, 1941 में रुजवेल्ट मरे थे। इसी शृंखला में 1961 में केनेडी प्रेसीडेन्ट बने हैं उन पर भी वैसा ही संकट हो सकता है। कहना न होगा कि यह आशंका पूर्ण रूप से सही हुई। लगता है सन् 81 में जो व्यक्ति अमेरिका में प्रेसीडेन्ट पद के लिए खड़ा होगा उसे इस भयावह तथ्य को भी ध्यान में रखना पड़ेगा। प्रेसीडेन्ट कैनेडी की हत्या की पूर्व सूचना प्रकाशित करने वालों में श्रीमती जीन डिक्सन और श्रीमती शर्ल स्पेन्सर नामक दो महिला देवज्ञ भी हैं।
उन दिनों पाकिस्तान से दिल्ली आये हुये 40 बस्ती बसाई जा रही थी। योजना पूरी तैयार थी, पर पानी का विकट प्रश्न था। यमुना वहाँ से 18 मील दूर थी इतनी लम्बी पाइप लाइन तुरन्त बिछाना कठिन भी और खर्चीला भी। इंजीनियर पहले ही बता चुके थे उस इलाके की जमीन में नलकूप लगाये जाने योग्य पानी नहीं है। समस्या बड़ी विकट थी।
तभी श्री नेहरू को याद आया कि जाम साहब नवा नगर ने एक बार उनसे किसी ऐसे व्यक्ति की चर्चा की थी जिसमें भूमिगत पानी का पता लगाने की अद्भुत शक्ति है। तत्काल जामसाहब के पास सन्देश पहुँचाया गया और वह व्यक्ति साधारण किसान की वेषभूषा वाला “पानी वाला महाराज” दिल्ली जा पहुँचा। महाराज को लेकर उस क्षेत्र की 3500 एकड़ जमीन
घृणा राक्षसों की संपत्ति है। क्षमा मनुष्यों का लक्षण है और प्रेम करना देवताओं का गुण है।
- भर्तृहरि
का पर्यवेक्षण किया। उसने पैर से ठोक-ठोककर कई जगह जमीन जाँची और दस जगहों पर निशान लगवाये कि यहाँ पानी है, तद्नुसार नलकूप खोदे गये और सचमुच ही वहाँ जल के गहरे स्रोत निकले। इनमें से हर कुँआ अभी भी तीन हजार गैलन पानी हर घण्टे की गति से दे रहा है। इससे पूर्व इस पथरीले इलाके में इतना पानी मिलने की किसी इंजीनियर ने कल्पना भी नहीं की थी।
भौतिक उपलब्धियों के लिए भौतिक जगत में भौतिक साधनों की सहायता से पुरुषार्थ करने पर साँसारिक सम्पदाएँ उपलब्ध की जाती हैं। ठीक उसी प्रकार अति मानवी अतीन्द्रिय विभूतियों को प्राप्त करने के लिए यदि आत्मशोधन एवं आत्म-विकास का पुरुषार्थ योग एवं तप के आधार पर किया जाये तो उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ मिल सकती हैं जिनके लिए संसारी लोग बेतरह मरते-खपते रहते हैं।
भारत ही नहीं विश्व के विभिन्न देशों के भी वे महापुरुष जो सदियों पहले इस संसार से गुजर गये, लेकिन उनकी पावन स्मृति अपने देश में ही नहीं दूसरे-दूसरे देशों में भी बनी हुई है। उनकी स्मृति में अनेक स्मारक बनाये गये हैं जिन पर अभी भी हम श्रद्धा - सुमन प्रतिदिन अर्पित करते हैं और करते रहेंगे।
धर्म की पृष्ठभूमि क्या है? धर्म हमें क्या सिखाता है? इस पर जरा गम्भीरतापूर्वक विचार करना है। अच्छे कार्यों को जीवन का अंग बनाकर उन पर चलना ही तो धर्म कहलाता है। वही स्थान तीर्थस्थान हुए जहाँ हमारे सन्त- महात्माओं तथा महापुरुषों ने संसार के उद्धार के लिए अपने शुभ कर्म किये, तप किये।
आज हम राम की पूजा, बुद्ध की पूजा और गाँधी की पूजा क्यों करते हैं? रावण की पूजा, किसी डाकू की पूजा और नाथूराम गोडसे की पूजा क्यों नहीं करते?
करोड़ों मानव इस धरती पर आते और जाते ही रहते हैं। यह तो प्रकृति का नियम है। लेकिन कोई विरले ही ऐसे होते हैं, जिन्हें युग-युग तक याद किया जाता है।
क्या हम राम और बुद्ध के सुन्दर राजकुमार वाले शरीर की पूजा करते हैं? क्या गाँधी जी की बेडौल काया और हाथ में लिए लाठीधारी की पूजा करते हैं? नहीं। ज्यों ही हमारी दृष्टि राम की मूर्ति पर जाती है या उनके नाम स्मरण करते हैं तो उनके गुणों के समूहों की याद आ जाती है। गलत कार्य करने वाला व्यक्ति भी उनके नाम और काम को स्मरण कर अपनी गतिविधि बदल लेता है।
रावण अपने में कितना समर्थ और शक्तिशाली व्यक्ति था, फिर भी वह राक्षस कहलाया। कोई भी उसके आगे नतमस्तक नहीं होगा। श्रद्धा से कोई एक पुष्प भी समर्पित नहीं करता। रावण का नाम स्मरण आते ही उसके द्वारा किये गये अनर्थ, अत्याचार, अनाचार का दृश्य सामने आ जाता है। मन में घृणा हो जाती है। अश्रद्धा की दृष्टि से उसे देखते हैं।
न आज धनुर्धारी राम है न अनाचारी रावण है फिर भी क्रमशः उनके द्वारा मानवोचित और अमानवोचित जो भी कार्य किये गये उसका असर युग - युग तक रहेगा। राम, बुद्ध और गाँधी के आदर्श मानव उद्धारवादी विचार ही तो पूजे जाते हैं। उनके गुणों का गुणगान करते हैं। सदियाँ बीत चुकीं लेकिन इन महापुरुषों की प्रेरणा आज भी हमें प्रेरित किया करती हैं।
बाग में बहुत तरह के फूल रहते हैं। जिनमें टेसु अपनी सुन्दरता के लिए बेजोड़ है, फिर भी उसे कोई अपनी छाती से नहीं चिपकाता। गुलाब की एक छोटी सी कली भी लोगों को मदहोश बना देती है। उसकी सुगन्ध पाकर उसे कौन अपनाना नहीं चाहता।
यदि हम चाहते हैं कि अपने जीवन को सही दिशा दें तो अपने गुणों की अभिवृद्धि करनी पड़ेगी। गुणों की अभिवृद्धि मात्र से हम किसी की नजर में अच्छे नहीं हो सकते। इसके लिए यह भी आवश्यक है कि उन गुणों को अपने कर्म में ढाल दें। तभी वस्तुतः व्यक्ति को समाज में सम्मान मिलता है। जीवन से कलुषता, अकर्मण्यता, कटुता, ईर्ष्या-द्वेष, घृणित विचारधारा इन निकृष्टताओं को निकाल कर दूसरों के प्रति ममता, दयालुता, निष्कपटता, सहृदयता, सहानुभूति, सज्जनता ऐसी श्रेष्ठताओं को स्थान देना पड़ेगा। ये सद्गुण जब सहज स्वभाव के रूप में उतर जायेंगे तो कोई वजह नहीं है कि दुनिया हमें सम्मान न दे।
दुनिया में जितने महापुरुष हुए उन सब की एक विशेषता रही है - उनने अपने सुख की कामना न कर लोक-कल्याण के लिए ही अपना सर्वस्व त्याग किया है। ऐसे उदारचेता महामानवों को दुनिया ने सब दिन सम्मानित किया है और करेगी।
मन्त्र सिद्धि में चार तथ्य सम्मिलित रूप से काम करते हैं - (1) ध्वनि विज्ञान के आधार पर विनिर्मित शब्द शृंखला का चयन और उसका विधिवत् उच्चारण (2) साधक की संयम द्वार, निग्रहित प्राण शक्ति और मानसिक एकाग्रता का संयुक्त समावेश (3) उपासना प्रयोग में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ उपकरणों की भौतिक किन्तु सूक्ष्म शक्ति (4) भावना प्रवाह, श्रद्धा, विश्वास एवं उच्चस्तरीय लक्ष्य दृष्टिकोण। इन चारों का जहाँ जितने अंश में समावेश होगा वहाँ उतने ही अनुपात से मन्त्र शक्ति का प्रतिफल एवं चमत्कार दिखाई पड़ेगा। इन तथ्यों की जहाँ उपेक्षा की जा रही होगी और ऐसे ही अन्धाधुन्ध गाड़ी धकेली जा रही होगी- जल्दी -पल्दी वरदान पाने की धक लग रही होगी वहाँ निराशा एवं असफलता ही हाथ लगेगी।
मन्त्र विज्ञान भी अन्यान्य विज्ञानों की तरह ही एक सुव्यवस्थित प्रक्रिया है, जिसे धैर्य एवं सावधानी के साथ अपनाना पड़ता है। उसके हर अंग उपाँग को यथास्थान नियोजित करना पड़ता है। घड़ी का हर कलपुर्जा अपने स्थान पर सही रूप से फिट हो तभी वह ठीक तरह चलती और समय बताती है। इसी प्रकार मन्त्र विज्ञान के उपरोक्त तीनों आधार यदि सतर्कता पूर्वक व्यवस्थित किये जा सकें तो कोई कारण नहीं कि अभीष्ट परिणाम प्राप्त न किया जा सके। मन्त्र विद्या निष्फल एवं उपहासास्पद इसीलिए बनती जाती है कि कुपात्र, उतावले और अवैज्ञानिक दृष्टि वाले लोग साधना की विडम्बना रचते हैं और हथेली पर सरसों न जमे तो तरह - तरह के लाँछन लगाते हैं।
मन्त्र शक्ति में ध्वनि प्रवाह का सही होना प्रथम आधार है। सर्वविदित है कि बहते पानी में किन्हीं आघातों के कारण लहरें उत्पन्न होती हैं और वे प्रवाह की दिशा में ही बहती हैं। रुके जल में वे चारों ओर भी फैलती हैं। वायु बहती तो है, पर उसकी लहरें प्रवाह की ओर ही नहीं वरन् सभी दिशाओं में फैलती हैं। शब्द वस्तुतः एक प्रकार की कम्पन लहरें ही हैं। मनुष्य के मन में कोई विचार उत्पन्न होता है। मस्तिष्क को अभ्यास है कि किस विचार से बाह्य जगत को परिचित कराने के लिए किन स्वर यन्त्रों में किस प्रकार की हलचल की जानी चाहिए। इच्छा शक्ति से प्रेरित पूर्वाभ्यास उच्चारण यन्त्रों में जो उभार उत्पन्न करता है उससे मुख में भरी हुई तथा बाहर की वायु को आघात लगता है और उससे ध्वनि तरंगें उत्पन्न होनी आरम्भ हो जाती हैं। हमारे कान उन्हें ही सुनते हैं और उनका विश्लेषण करके मस्तिष्क यह निर्णय करता है किसने, किस प्रयोजन के लिए क्या कहा?
इच्छा से गति और गति से तरंगें उत्पन्न होती हैं। यह कम्पन मोटे शब्दों में वायु से हुए कहे जा सकते हैं, पर वस्तुतः वे वायु के भीतर रहने वाले एक सूक्ष्म तत्व ‘ईथर’ से होते हैं। साधारणतया एक सेकेंड में 32 तक होने वाले कम्पनों को हमारे कान सुन लेते हैं, इससे कम होंगे तो सुन न जा सकेंगे इस प्रकार अधिक से अधिक 68 तक सुन सकते हैं इससे ज्यादा होंगे तो भी कानों को उन्हें सुन-समझ सकना सम्भव न होगा। ईथर तत्व के परमाणु अत्यन्त सूक्ष्म और अति संवेदनशील हैं। वे एक सेकेंड में 34 अरब तक कम्पन उत्पन्न कर सकते हैं। जब यह कम्पन चरमसीमा पर पहुँचते हैं तो उनसे एक अखण्ड प्रकाश की किरणें निकलने लगती हैं। इन्हीं किरणों को ‘एक्सरेज’ कहा जाता है।
इन किरणों में अद्भुत गतिशीलता होती है, वे एक सेकेंड में प्रायः एक करोड़ मील चल लेती हैं। रेडियो टेलीविजन आदि का निर्माण इसी विज्ञान के आधार पर सम्भव हुआ है। वायु के कम्पन नष्ट हो जाते हैं, पर ईथर के कम्पनों का कभी नाश नहीं होता वे सदा अमर रहते हैं। जैसे-जैसे वे पुराने होते जाते हैं वैसे-वैसे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की सतह पर जाकर स्थिर हो जाते हैं। जहाँ वे बलिष्ठ होने पर अपने समान धर्मी अन्य कम्पनों को अपनी ओर खींचते हैं अथवा दुर्बल होने पर दूसरों की ओर खिंच जाते हैं। इस प्रकार जीर्ण होने पर भी एक नई चेतना को संघ शक्ति के आधार पर जन्म देते हैं और ऐसे चुम्बकत्व का सृजन करते हैं जो उन शब्दों के साथ जुड़ी हुई चेतनाओं से मनुष्यों को प्रभावित कर सके। यहाँ भी सहधर्मिता का नियम लागू होता है जिन मनुष्यों के मस्तिष्क की स्थिति उन प्राचीन किन्तु संगठित शब्द कम्पन शक्ति से मिलती - जुलती होगी। असमानता की स्थिति में कोई विचार या शब्द प्रभाव किसी को प्रभावित नहीं कर सकता केवल अपनी उपस्थिति का परिचय दे सकता है।
ध्वनि एक प्रत्यक्ष शक्ति है। वह यों निराकार है, पर साकार बनाई जा सकती है। अब ध्वनियों के फोटो लिये जाने लगे हैं और उस आधार पर उस व्यक्ति की आकृति पहचानी जा सकती है जिसने अमुक ध्वनि अपने मुँह से निकाली थी। आवाज की फोटोग्राफी के विज्ञान ने इस सच्चाई को सामने रख दिया है कि शब्द एक शक्तिशाली पदार्थ हैं, जिस पर अणु शक्ति का, बिजली का, ताप का उपयोग होता है वैसा ही शब्द का भी हो सकता है। मन्त्रों के शब्द प्रवाह का जो चित्र बनता है उसी के आधार पर उनके अधिष्ठाता देवताओं की आकृतियों का निर्धारण किया गया है और मन्त्र सिद्धि में उन देवताओं के पूजन ध्यान से निर्धारित ध्वनि प्रवाह को सशक्त बनाने का अध्यात्म विज्ञानियों द्वारा निर्देश किया गया है।
कैलीफोर्निया के वायु सेना ट्रेविस केन्द्र के एक 25 वर्षीय वायु सैनिक का कोई मार्शल हुआ। वह टेलीफोन केन्द्र पर एक्सचेंज पर नियुक्त लड़कियों के साथ अश्लील छेड़-छोड़ करने का अपराधी पाया गया। यों वह अपना नाम पता प्रकट न होने देने के सम्बन्ध में पूरी सतर्कता बरत रहा था तो भी पुलिस ने वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से उसे पकड़ लेने में सफलता प्राप्त कर ही ली।
आवाज की फोटोग्राफी का प्रयोग इस प्रयोजन के लिए किया गया। जो आवाज टेलीफोन पर आती थी उसका फोटो लिया गया। फिर सम्भावित अपराधी की आवाज से उसे मिलाया गया तो वे प्रिन्ट बिलकुल मिल गये। यद्यपि अपराधी इन्कार करता रहा तो भी अदालत ने सबूत को प्रामाणिक माना और उसे सजा सुनादी।
आवाज का फोटो, विज्ञान की अनोखी देन है। इस पद्धति के आविष्कारक हैं डा0 कर्स्टा उन्होंने ध्वनि अंकन - व्वाइस स्पेक्ट्रोग्राम की तीन आयाम वाली ऐसी प्रक्रिया ढूंढ़ निकाली है जिसके अनुसार किसी की भी आवाज का फोटो लिया जा सकता है। उनका कहना है कि जिस प्रकार किसी की अँगूठा छाप किसी दूसरे से नहीं मिलती उसमें भिन्नता अवश्य होती है उसी प्रकार किसी की आवाज भी दूसरे से नहीं मिलती। अस्तु आवाज के फोटोग्राफ भी किसी अन्य की आवाज के समान नहीं होते। इस पद्धति के अनुसार खींचे गये आवाज के फोटो पूर्णतया प्रामाणिक माने जाते हैं और उनके आधार पर महत्वपूर्ण गुप्त रहस्यों को जानने एवं अपराधियों को पकड़वाने में बहुत सहायता मिलती है।
डा0 कर्स्टा के अनुसार हर बालक बोलना सीखते समय अपने होठ, दाँत, जीभ, तालू, कण्ठ आदि का प्रयोग एक विशेष ढंग से करता है और उच्चारण की व्यवस्था बनाता है, इससे माँस-पेशियों में जो हलचल होती है उसका दबाव मुँह में भरी तथा बाहर फैली हवा पर पड़ता है। इस दबाव से ध्वनि उत्पन्न होती है। चूँकि उच्चारण यन्त्रों की हलचल का उतार-चढ़ाव, हर किसी का स्वनिर्मित एवं अलग होता है इसलिए मुख से निकले शब्दों में भी कुछ न कुछ अन्तर रहता है। यह अन्तर ही ध्वनि भिन्नता का आधार बनता है और किसी की आवाज किसी से न मिलने का क्रम चल पड़ता है।
न्यूजर्सी के डा0 मार्टिमर श्वार्त्ज ने शरीर की आन्तरिक स्थिति का पता लगाने और रुग्णता के कारणों का विश्लेषण करने के लिए मनुष्य की आवाज को महत्वपूर्ण आधार माना है वे कहते हैं जब अन्तर जानकर रक्त-संचार की स्थिति जानी जा सकती है तो शरीर की भीतरी स्थिति से प्रभावित होने वाले उच्चारण को बारीकी से समझने पर किसी की अन्तःव्यथा एवं स्थिति को समझना क्यों अशक्य होगा। उनके प्रयोगों ने रोग निदान के क्षेत्र में एक नया आधार खड़ा किया है।
बीज मन्त्रों का अर्थ कुछ नहीं उनकी शक्ति परिधि अवश्य है। मन्त्र शास्त्र में ह्रीं, श्रीं, क्लीं, यं, वं, रं, लं, ऐं, ओं, हुँ आदि अनुस्वारान्त एकाक्षरी कितने ही बीज मन्त्रों का उल्लेख और उनके प्रभाव तथा विधान का वर्णन है। यह बीज विज्ञान विशुद्ध रूप से शब्द शक्ति पर अवलम्बित है। शब्द की अपनी शक्ति एवं प्रक्रिया है।
पदार्थ विज्ञान के अनुसार शब्द से कम्पन उत्पन्न होते हैं। साथ ही यह भी एक तथ्य है कि मुख अथवा किसी पदार्थ विशेष में शक्ति का प्रयोग होने से शब्द प्रवाह विनिसृत होता है। शब्द अपने आपमें कम्पन प्रवाह की एक स्थिति विशेष है। बाहरी वायु से जब हमारी भीतरी वायु की टक्कर होती है तो शब्दोच्चार- स्वर प्रवाह आरम्भ होता है।
तीर्थ स्थान किसी समय साधना पीठ के रूप में बने विकसित हुए थे। वहाँ अमुक साधना के अभीष्ट उपयुक्त वातावरण - आवश्यक साधन एवं अनुभूत मार्ग दर्शन प्रस्तुत रहता था। अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति को लोग वहाँ जाते थे और सफल मनोरथ होकर आते थे। आज तीर्थों की दुर्दशा सर्वविदित है। यह उस मूल प्रयोजन से सर्वथा भिन्न है जिनके लिए इनकी रचना की गई थी।
यों शरीर भी एक छोटा किन्तु पूरा विश्व है। इसमें सभी तीर्थों के बीज पीठ विद्यमान हैं। इनमें से कोई एक अथवा एक साथ अनेक पीठों को जागृत एवं प्रखर बनाया जा सकता है। कोई-कोई व्यक्तित्व मूर्तिमान शक्ति पीठ होते हैं इन्हीं सिद्ध पुरुष मानवी चेतना में घुसा हुआ विजातीय तत्व है उसे निकालने, हटाने में थोड़ा सा ही प्रबल प्रयत्न सफल हो सकता है। साधना इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए है। साधन समर में यदि आत्म-तत्व बाजी ले गया तो फिर पौराणिक समुद्र मंथन में प्राप्त 14 रत्नों से भी अधिक मूल्य की अगणित दैवी संपदाएं प्राप्त होती हैं। उन्हें पाकर मनुष्य आप्त काम हो जाता है फिर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। साधन काल दैवी आसुरी संघर्षों की तुमुल युद्ध की - अवधि है। इसमें पूरे कौशल चातुर्य एवं साहस का प्रयोग करना पड़ता है। यह युद्ध उपेक्षा पूर्वक - ज्यों-त्यों करके ढीले-पोले मन से बेगार भुगतने की तरह नहीं लड़ा जा सकता है। उसमें पूरे मनोयोग एवं प्रबल पराक्रम की आवश्यकता पड़ती है।
श्रेय पथ पर गतिशील ऊर्ध्वगामी मनःस्थिति को दैवी कहते हैं और पतनोन्मुख वासना, तृष्णा में निरत आकाँक्षा स्तर को ‘आसुरी’ कहा जाता है। इनमें से प्रथम आकर्षक और द्वितीय विकर्षक चेतना प्रवाह है। व्यक्ति सत और तक का सम्मिलित उत्पादन है। रज दोनों की मध्य स्थिति है। तम को सत की ओर ले जाने में मध्यवर्ती स्थिति की समुद्र मंथन से तुलना की जाती है। दोनों ओर रस्साकशी होती है। चिर अभ्यस्त पतन क्रम अपने बन्धनों को ढीला नहीं करना चाहता। साधक उसे उत्थान की ओर बढ़ाने में प्रयत्नशील है फलतः समुद्र मंथन की - महाभारत की - संघर्षात्मक स्थिति हमारे आन्तरिक धर्म-क्षेत्र, कर्म क्षेत्र में उत्पन्न हो जाती है। असुरता को सौभाग्य मिल गया।
साधना जब साधक का सर्वप्रिय विषय बन जाय - उसमें निरत रहने को स्वयमेव मन चले- उन क्षणों को घटाने की नहीं बढ़ाने की ललक रहे - उपासना से उठने पर शरीर में स्फूर्ति और मन में सरसता लगे तो समझना चाहिये कि परिपक्वता आ गई और इसका श्रेयस्कर सत्परिणाम अत्यन्त सन्निकट है। आरम्भ में यह स्थिति बलपूर्वक उत्पन्न करनी पड़ती है। कल्पना और संकल्प शक्ति का उपयोग करके वैसी मानसिक स्थिति नकली रूप में बनानी पड़ती है। थोड़े समय में वह स्थिति स्वाभाविक बन जाती है। बलपूर्वक मारधाड़ और धड़पकड़ द्वारा बलात्कार पूर्वक उच्चस्तरीय मनःस्थिति बनाने के काल को ही साधना काल कहते हैं जब वह स्थिति सहज बनी रहने लगे तो समझना चाहिये कि सिद्धावस्था प्राप्त हो गई।
आत्मा का परमात्म सत्ता के साथ घनिष्ठ- एकाकार- तादात्म्य तन्मय होने की स्थिति को साधना की प्रखरता कहते हैं। जब दोनों का सघन मिलन होता है तो आत्म-विभोर स्थिति को समाधि कहा जाता है। आवश्यक नहीं कि उस स्थिति में योगनिद्रा अथवा मूर्छा ही आवे। ज्ञान साधना में स्थिति प्रज्ञ की - कर्म साधना में अनासक्त कर्त्तव्य परायण की - भक्ति साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की - स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती पर आत्मज्ञान का आलोक एवं सन्तोष समाधान का अनवरत अनुभव होता है। साधक अपने को भगवान में और भगवान को अपने में एकाकार देखता है। दोनों की इच्छाएँ एवं क्रियाएँ एक ही स्तर की होती हैं। परमात्मा का क्षेत्र व्यापक है और आत्मा का सीमित। एक अणु है - दूसरा विभु - इतने पर भी दोनों के स्तर में अद्भुत साम्य रहता है। परमात्मा को अपने सुख की चिन्ता नहीं वह मात्र ब्रह्माण्ड चेतना को सुस्थिर, सुविकसित बनाने के लिए जुटा रहता है और उस कर्तृत्व में खोया, समाया दीखता है। साधक की परिष्कृत आत्मा बिलकुल इसी स्तर की होती है। उसे अपने धन कुटुम्ब की - यश वर्चस्व की नहीं - लोक मंगल की चिन्ता रहती है। वही उसे अपना सुखद कर्तृत्व परिलक्षित होता है। उसी में निरत रहना और स्वाभाविक एवं सन्तोषजनक प्रतीत होता है। जब मान्यता, निष्ठा, श्रद्धा विकसित होकर गुण, कर्म, स्वभाव में ओत-प्रोत हो जाये - कर्म में परिलक्षित होने लगे तो समझना चाहिये कि नाली और गंगा के मिलन में जैसा एकाकार होता है वैसा ही आत्मा और परमात्मा का सुखद मिलन है।
इन्द्रिय संयम और मानसिक एकाग्रता की दोनों धाराएँ मिलकर मानवी विद्युत शक्ति का निर्माण करती हैं। बिजली ठण्डे और गरम दो तारों के द्वारा प्रवाहित होती है। इसी प्रकार शरीर और मन की शक्तियों को वासना और तृष्णा में बिखरने ने देने से वह सामर्थ्य जमा होती है जिसे प्राण शक्ति अथवा जीजस् कहा जाता है। योगशास्त्र में साधना क्षेत्र के छात्रों को यह नियम बरतने का शारीरिक और मानसिक कहा गया है। यदि इन दोनों बड़े छेदों में होकर मानवी विद्युत नष्ट होती रहे तो फिर मन्त्र रूपी इंजन को चलाने के लिए तेल, कोयला, ईंधन - कहाँ से आवेगा। मात्र शब्दोच्चारण का नाम ही तो मन्त्र साधना नहीं है।
प्राण स्वसंचालित है और मन्त्र पर संचालित। अपनी प्राण शक्ति को उग्र बनाना साधक का प्रथम कार्य है। मन्त्र वह कमान है जिस पर चढ़ाकर विभिन्न स्तर के तीर फेंके जा सकते हैं। फेंकना धनुष का अर्थात् परिष्कृत व्यक्तित्व का काम है। यदि वह सही रूप से काम न कर रही होगी तो मन्त्र की विधि एवं विद्या के सही काम करने पर भी अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति न हो सकेगी। इसी प्रकार प्राण शक्ति अकेली महत्वपूर्ण होते हुए भी मन्त्र शक्ति का उपयोग किये बिना प्रसुप्त शक्तियों के जागरण का कार्य न कर सकेगी।
योग और तप की मानसिक और शारीरिक साधना में शक्ति का उद्भव होता है। पर यदि यह उपार्जन काल में अथवा उत्पन्न होने के पश्चात सुरक्षित न रखा गया तो वह देखते-देखते बारूद की तरह जलकर भस्म हो जाती है। खुली बोतल में रखी हुई स्प्रिट उड़ जाती है इसी प्रकार असुरक्षित रखी हुई शक्तियां ही निरर्थक चली जाती है।
उपार्जन काल में सात्विक आहार-विहार, ब्रह्मचर्य, मौन, एकान्त सेवन, परिमार्जित दिनचर्या, मनन-चिन्तन द्वारा साधन को सींचा जाता है। उसके उपरान्त उसे सस्ती प्रशंसा लूटने के लिए दिखाये जाने वाले चमत्कारों से बचाया जाता है। सिद्धियों को लोभ, मोह के उथले प्रयोजन पूरा करने में भी खर्च किया जा सकता है और अपने को तथा दूसरों को आत्म-कल्याण की दिशा में प्रेरित करने के लिए भी उसका उपयोग हो सकता है। स्वल्प श्रम में अधिक भौतिक सफलताएँ पाना कर्म विज्ञान के विपरीत है। उसके लिए यदि मन्त्र शक्ति का प्रयोग किया जायेगा तो वह देर तक टिक न सकेगी और उसी खिलवाड़ में नष्ट हो जायेगी। हाँ यदि आत्म कल्याण के लिए उसका प्रयोग होगा तो उससे उसमें और भी तीव्रता आयेगी जैसे कि चाकू को पत्थर पर रगड़ने से उसका धार तेज होता है और जंग छूटकर चमक आती है।
मन्त्र सिद्धि के लिए साधक के शरीर को पोषण देने वाली उसका रक्त और ओजस बनाने वाली वस्तुओं का विशेष महत्व है। आहार से शरीर और बिहार से मन परिपुष्ट होता है। पदार्थों में परसंचालित शक्ति के सहारे गतिशील किया जा सकता है। कोयला तेल और पानी में भाप बनाने की शक्ति हैं। पर वह आग एवं प्रयोक्ता की स्वसंचालित शक्ति के सहारे ही प्रकट हो सकती हैं। पदार्थों की शक्ति को भी साधना काल में प्रयोग किया जाता है अनेक विधि निषेध एवं वस्तु प्रयोग इसी दृष्टि से बने हैं। किस मंत्र की सिद्धि के लिए किन पदार्थों से हवन किया जाय। आहार में क्या वस्तुएं प्रयुक्त की जाय। पूजा के उपकरणों में किस स्तर को प्रधानता दी जाय। आदि की विधियाँ- परसंचालित शक्ति को स्वसंचालित शक्ति का साथ देने के लिए उभारने के लिए है। इंजन में भाप बनाने और उसे पहिये घुमाने में लगाने की प्रक्रिया इसी प्रकार सम्पन्न होती है।
आहार और परिधि-बिहार तक विस्तृत है। इसलिए साधन सफलता के क्षेत्र में उसे भी सम्मिलित रखा गया है। किन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जो खाया जाता है वही आहार नहीं है। नासिका और रोम कूपों द्वारा साँस ली जाती है उसमें आक्सीजन आदि कितने ही तत्व घुले रहते हैं, वह भी आहार ही है। इन्जेक्शनों द्वारा आहार शरीर में पहुँचाने की बात सर्वविदित हैं। हवन, यज्ञ को भी नासिका मार्ग से पहुँचाया गया इन्जेक्शन ही माना जाना चाहिए। अनुष्ठानों में हवन, यज्ञ का विधान जोड़कर रखा गया है वह औषधि का सूक्ष्म एवं कारण भाग शरीर द्वारा सोखे जाने की प्रक्रिया ही हैं। अमुक वृक्ष के तले अमुक वनस्पतियों का रस का सेवन या स्नान, उबटन, मालिश आदि के प्रयोग भी इसी प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। आहार में विशिष्ट सूक्ष्म गुणों से युक्त धान्य,शाक,फल दूध आदि का ग्रहण करना-जहाँ से उन्हें प्राप्त किया गया है उन स्रोतों को अधिकाधिक पवित्र एवं प्रखर बनाना यह भी साधना का ही एक अंग हैं । किस वृक्ष की लकड़ियों से, किन उपकरणों से, किन व्यक्तियों के सहयोग से वह आहार बन गया है और किस मनःस्थिति में उसे खाया गया है यह प्रक्रिया साधक के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं। अभक्ष्य एवं निकृष्ट स्तर का निकृष्ट वातावरण में-निकृष्ट व्यक्तियों द्वारा पकाया परोसा भोजन साधक के सारे श्रम को निरर्थक बनाकर रख देता है। इसलिए उपासना काल में आहार पर सर्व प्रथम ध्यान देना पड़ता है।बिहार भी इसी कोटि में आता है-बिहार का तात्पर्य समग्र दिनचर्या से है उसे सात्विक रहना चाहिए।
आहार के भले-बुरे, घटिया-बढ़िया होने का परिणाम शरीर पर सहज ही देखा जाता है हमारा प्रमुख आहार वनस्पतियाँ ही हैं। दूध, शहद एवं माँस आदि भी प्राणियों द्वारा किया गया वनस्पतियों का रूपांतरण ही हैं। वस्तुतः शरीर का निर्वाह वनस्पतियों द्वारा ही होता है। मनुष्य में जिस प्रकार स्थूल-सूक्ष्म और कारण शक्तियाँ होती हैं, उसी प्रकार वनस्पतियों की भी होती हैं। तुलसी, पीपल,आँवला आदि को, महत्व उनकी दिव्य-करण शक्ति को देखते हुए दिया गया है। चिकित्सकों द्वारा वनस्पतियों की-रासायनिक सूक्ष्म शक्तियों का लाभ उठाया जाता है। स्थूल रूप उनका वह है जो रंग, रूप ,गन्ध, स्वाद आदि के आधार पर जाना जाता है।
बिहार का एक अत्यन्त शक्तिशाली पक्ष है-ब्रह्मचर्य। इसका अर्थ वीर्यपात न करना माना जाता है वस्तुतः उसका अभिप्राय शरीर और मन की समस्त चेतनाओं-आकाँक्षाओं एवं वासनाओं को अस्त-व्यस्त होने से रोकना है। बन्दूक की नली में थोड़ी सी बारूद की शक्ति को एक दिशा में प्रयुक्त किया जाता है। तभी वह अपनी प्रचण्ड शक्ति का परिचय देती है। यदि उतना ही बारूद खुले मैदान में बखेर कर आग लगाई जाये तो वह झक से जल जायेगी और विनोद मात्र प्रस्तुत करेगी। इन्द्रियों की -मानसिक चेतना की -उपभोगों को अन्य दिशाओं में अस्त-व्यस्त न करके अभीष्ट अध्यात्म प्रयोजन में लगा दिया जाय तो निस्सन्देह चमत्कार होता है। औषधि है। शरीर के साथ मन का पोषण भी अभीष्ट है।
ब्रह्मचर्य विज्ञान को एक प्रकार से मानवी विद्युत विज्ञान कहना चाहिए। काम-क्रीडा का उल्लास ही उत्पन्न नहीं करता वरन् नर-नारी की विद्युत शक्ति का भी एक दूसरे में आवान्तरण करता है। नारी शरीर की विद्युत आकर्षण और नर शरीर की विकर्षण होती है। रति के स्खलन-क्षेत्रों में नारी खींचती है और नर शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शक्तियों के बारे में भी है। काम-क्रीडा में निरत होकर साधक यदि नर हो तो उसे गंवाना ही पड़ेगा। सहयोगिनी नारी को यत्किंचित् लाभ भी हो सकता है, पर साधक की दिव्य क्षमता क्षीण होगी और उसकी सफलता का मार्ग लम्बा हो जायेगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ब्रह्मचर्य को महत्व दिया गया है।
सिद्धि का चौथा आधार है औषधि। अर्थात् उपचार में प्रयुक्त होने वाली वस्तुएं। औषधि का अर्थ यहाँ वह नहीं है जो रोगी को ज्वर आदि रोगों के निवारण के लिये चिकित्सकों द्वारा दी जाती है। अध्यात्म प्रयोजनों में औषधि शब्द उन वनस्पतियों के अर्थ में आता है जो मुख, नासिका रोमकूप आदि छिद्रों द्वारा शरीर में प्रवेश कराई जाती है और उनकी सूक्ष्म शक्तियों को अपनी चेतना में समाविष्ट करके आत्म सत्ता को इस योग्य बनाया जाता है कि वह मन्त्र शक्ति से ठीक तरह लाभान्वित हो सके।
साधना ग्रन्थों में वनस्पतियों के अनेकानेक विधि-विधान शास्त्रकारों ने बताये हैं। माला किस वृक्ष के फल, मूल या मध्य भाग की बनी हो- आसन, कुशा खजूर आदि किस का बना हो-कमण्डल, नारियल, लौकी आदि किस के फल से बना हो, बालों को धोने में-शरीर पर लेपन में- किस मिट्टी या किस वनस्पति का उपयोग किया जाय। हवन सामग्री में किस प्रयोजन के लिए किन वनस्पतियों का और किन समिधाओं का किस प्रकार प्रयोग किया जाय यह सारे विधान वस्तुतः साधक की आहार प्रक्रिया में ही सम्मिलित
मन्त्र विद्या में प्रयुक्त होने वाला चौथा तत्व है- भावना। साधना की श्रद्धा, उपासना विज्ञान पर इतनी गहरी होनी चाहिए कि उसमें संशय की -अविश्वास की कहीं कोई गुँजाइश न रहे। परीक्षा बुद्धि कौतूहल एवं शंकालु मन लेकर की गई साधना निष्फल चली जाती है। श्रद्धा अपने आप में एक शक्ति है। पैट्रोल, भाप, बिजली की तरह उसकी भी अपनी सामर्थ्य है। श्रद्धालु साधक पूर्णरूपेण सफल होकर रहते हैं जबकि शंकाशीलों को खाली हाथ रहना पड़ता है। विश्राम में पग-पग पर देखा जा सकता है कि आध्यात्मिक प्रगति एवं सफलता के लिए तो उसे प्राण ही कहना चाहिए। साधक का मन्त्र शक्ति पर अटूट विश्वास होना चाहिए और उसे पूर्ण श्रद्धा, एकाग्रता, मनोयोग एवं भावनापूर्वक अपने क्रिया-कृत्य में संलग्न होना चाहिए।
उपासना जिस प्रयोजन के लिए की जा रही हो वह उच्चस्तरीय होना चाहिए। भौतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए उसे प्रयुक्त नहीं करना चाहिए। संसार सुख तो योग्यता, कुशलता एवं पुरुषार्थ की कीमत पर पाये जाते हैं उन्हें उसी आधार पर खरीदना चाहिए। आध्यात्मिक शक्तियों का उपयोग संपत्ति बढ़ाने के लिए विभूतियों के अभिवर्धन में ही किया जाना चाहिए। उनके आधार पर आन्तरिक क्षमताएं विकसित की जानी चाहिए।
साधक को अपना व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व उत्कृष्ट रखना चाहिए। उसका दृष्टिकोण सिद्धियों का -चमत्कारों का प्रदर्शन करने के लिये बाल कौतूहल नहीं अपनाना चाहिए वरन् देव मानव की तरह आत्म कल्याण एवं विश्व-कल्याण के लिए सच्चे हृदय से इतना निष्ठावान होना चाहिए कि लिप्सा-लालसाओं से विरत होकर अन्तरात्मा, ज्ञान-विज्ञान में रस लेने गये। जिसका चिन्तन और कर्तव्य महान है वस्तुतः उसी भावना शिव की जटाओं की तरह स्तर की मानी जा सकती है कि उस पर मन्त्र शक्ति रूपी अध्यात्म गंगा का अवतरण सम्भव हो सके।
मस्तिष्कीय क्षमता से हर कोई परिचित है। बुद्धिमान, दार्शनिक, कलाकार, वैज्ञानिक अपनी पैनी सूझबूझ के आधार पर ही अनोखी सफलताएं प्राप्त करते हैं। परिचित मस्तिष्क से ऊपर एक और दिव्य चेतना स्रोत है जहाँ चित शक्ति निवास करती है। मनोवैज्ञानिकों की भाषा में इसे अचेतन मन कहते हैं-सुपर ईगो-के रूप में इसी की विवेचना की जाती है। योग शास्त्रों में इसे देवलोक अतीन्द्रिय चेतना का केन्द्र एक ऋद्धि-सिद्धियों का भण्डार माना गया है। इस क्षेत्र पर अधिकार प्राप्त करने वाला अलौकिक-असाधारण अतिमानव एवं सिद्ध पुरुष बन सकता है।
यह एक अद्भुत संयोग है कि जब अचेतन जागता है तब प्रबुद्ध मस्तिष्क सोता है और जब प्रबुद्ध मस्तिष्क जागता है तो चित सोता रहता है, दोनों एक साथ कार्यरत नहीं रह सकते। योगनिद्रा उत्पन्न करके पूर्ण या आँशिक समाधि में जाया जा सकता है और अति मानवी अनुभूतियों के क्षेत्र में प्रवेश किया जा सकता है। कभी-कभी संयोगवश, संस्कार वश योगनिद्रा-सामान्य निद्रा में सामान्य लोगों को भी प्राप्त हो जाती है और वे ऐसे स्वप्न देखते हैं जो तथ्य पूर्ण भविष्य का आभास देने वाले होते हैं। सामान्य स्वप्न तो आमतौर से निरर्थक ही होते हैं पर सार्थक स्वप्नों के प्रमाण भी कम नहीं मिलते।
शिकागो विश्वविद्यालय के एक मनोविज्ञानी डा0 डेविड नीडर ने स्वप्नों के साथ जुड़े रहने वाले तथ्यों पर लम्बे समय तक खोज की है। उनका कथन है कि बहुत सपने आश्चर्यजनक रीति से तथ्यपूर्ण होते हैं। उनमें कई बार समस्याओं के ऐसे समाधान मिलते हैं जैसे जागृत अवस्था में बहुत माथा फोड़ी करने पर भी नहीं मिल पाते।
मनःशास्त्री डा0 हेवलाक एलिस का कथन है- हमारा अचेतन स्वप्नों की भाषा में ऐसे तथ्यों को प्रकट करता है जिसे समझने पर हम अत्यन्त महत्वपूर्ण जानकारियों प्राप्त कर सकते हैं। कई बार तो वे हमें हमारी समस्याओं के अद्भुत किन्तु सही समाधान प्रस्तुत करते हैं।
रोम में भी ऐसी एक घटना हुई जिसमें स्वप्नों की सचाई का आभास मिला। श्रीमती ऐमीलिया का व्यापारी पति अचानक गायब हो गया। उसने पुलिस में रिपोर्ट की और साथ ही यह भी लिखाया कि ऐसीहुलिया व्यक्ति को उसकी हत्या करते सपने में देखा। सपना नोट कर लिया गया पर उसकी प्रामाणिकता पर किसी को विश्वास नहीं हुआ; क्योंकि खोये व्यक्ति के मर जाने तक का कोई सबूत न था फिर हत्या की बात कैसे सच मानी जाय। बहुत दिन बाद हत्या के प्रमाण मिले और गुप्तचर विभाव ने छद्म रूप में पादरी बनकर रह रहे हत्यारे को खोज निकाला। सुराग आगे चले और हत्या उसी व्यक्ति द्वारा किये जाने की बात पूरी तरह प्रमाणित हो गई।
आयरलैण्ड की पुलिस ने एक हत्यारे को पकड़ने और उसका अपराध सिद्ध करके फाँसी दिलाने में सपने द्वारा प्राप्त सूचना के आधार पर सफलता प्राप्त की थी। तियेरासी निवासी एक व्यक्ति हिकी ने अपने मित्र को पैसा लूटने के उद्देश्य से चाकू मारकर कत्ल कर दिया। मृतक गायब होने भर की सूचना पुलिस को दी वह यह पता लगाने में व्यस्त थी कि आखिर उस व्यक्ति का क्या हुआ। इस खोज-बीन में एक छोटे होटल के मालिक रोजर्स ने पुलिस को बताया कि उस युवक की हत्या की गई और वह उस हत्या का सुराग दे सकता है। पूछ-ताछ में रोजर्स की पत्नी ने बताया कि कुछ दिन पूर्व दोनों उसके होटल में जलपान करने आये थे। इससे पूर्व उसने ठीक उसी हुलिया के दो व्यक्तियों में से एक के द्वारा दूसरे की हत्या किये जाने का सपना देखा था। इस समता से उसे बहुत आश्चर्य हुआ और उसने उन्हें उस भवितव्यता की सूचना देकर कुछ दिन होटल में ठहरे रहने की सलाह दी किन्तु वे चले गये। सपने में जिस स्थान पर हत्या हुई उसका चित्र पत्नी के मस्तिष्क में है; वह उस जगह को खोजने में सहायता दे सकती है। पुलिस ने इस दम्पत्ति की सहायता ली और उस झाड़ी को खोज निकाला जहाँ युवक की लाश पड़ी थी। हत्यारे का जो हुलिया बताया गया था वह हिकी से मिलता था अस्तु उसे पकड़ा गया। अन्ततः हत्या को प्रमाणित करने वाले ऐसे अनेक सूत्र मिल गये जिनके आधार पर अदालत द्वारा हत्यारे को फाँसी की सजा दी जा सकी।
विश्व प्रसिद्ध गणितज्ञों में से कई ऐसे हैं जो अपने आविष्कृत सिद्धान्तों की सफलता का श्रेय स्वप्नों में उपलब्ध हुई प्रेरणाओं को देते हैं। इन गणितज्ञों में फुडसियनस्रित और हेनरीफार- के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
सम्राट सीजर और हेनरी तृतीय को अपनी हत्याओं की पूर्व सूचना सपनों में मिल चुकी थी जिसे उन्होंने अपने प्रियजनों को बता दिया था। प्रयत्न करने पर भी वे हत्याएं टली न जा सकी। चर्चिल, लार्ड किचनर और जनरल गेडार्ड को कई भयंकर दुर्घटनाओं की पूर्व सूचना सपनों में मिल गई थी। अवसर आने पर उन्होंने सपने की बात को ध्यान में रखते हुए विशेष सतर्कता बरती और अपनी जानें बचा लीं।
एक दूसरे नोबेल पुरस्कार विजेता डा0 पाडलिंग ने भी यह बताया था कि उन्हें अनेक नये वैज्ञानिक विचारों की प्रेरणा सपनों में मिली है।
बेंजीन परमाणुओं के सम्बन्ध में नई खोज करने के लिए वैज्ञानिक केकुल ने अच्छी ख्याति प्राप्त की थी उन्होंने अपनी खोज की प्रेरणा का स्रोत अपने एक स्वप्न से उपलब्ध किया था।
ऐसा ही अनुभव विज्ञान वेता लुई ऐगासिज का है उनकी जीवाश्म सम्बन्धों खोजें कैसे सफल हुई इस इशारे से अपनी खोज आगे बढ़ाने का अक्सर प्रेरणा मिलती रही है।
अमेरिका के औषधि शास्त्रज्ञ डा. आट्टोलोवी ने जिन आविष्कारों के आधार पर नोबेल पुरस्कार जीता, उसकी मूल प्रेरणा उन्हें स्वप्नों में ही मिली थी। शारीरिक तन्तुओं, स्नायुओं और कोशाओं पर वे कुछ शोध कर रहे थे पर ऐसे आधार नहीं मिल रहे थे जिनके सहारे किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सके। ईस्टर की पहली रात को सपने में उन्हें आवश्यक सूत्र हाथ लगे जिन्हें उन्होंने आँख खुलते ही नोट कर लिया। एक दिन दोपहर को भी इसी खोज के सम्बन्ध में ऐसा सपना दीखा जिसमें वे कुछ प्रयोग कर रहे थे उसे भी उन्होंने नोट किया। यद्यपि आरम्भ में वे नोट अटपटे लगे पर अन्ततः वे उसी आधार पर अपने प्रयोगों में सफलता प्राप्त करने में समर्थ हुए।
अपनी अद्भुत कल्पनाओं के उठने का मूल स्रोत कहाँ है? इस प्रश्न का उतर देते हुए महा वैज्ञानिक आइंस्टीन ने एक बार कहा था प्रायः निद्रित अथवा अनिद्रित स्थिति में कभी-कभी ऐसे समय आते हैं जब तक मस्तिष्क अपनी सामान्य मर्यादाओं का उल्लंघन करके ऐसी सूचनायें देने लगता है जिसके आधार पर आविष्कारों की आधार शिला रखी जो सके।
आइंस्टीन कहते थे विज्ञान और गणित के आधार पर यह सिद्ध किया जा सकता है कि यह दृश्य संसार स्वप्नों के अतिरिक्त और कुछ नहीं। उन्होंने ‘ लाइफ’ पत्रिका के प्रतिनिधि को भेंट देते हुए कहा था- सामने खड़ा हुआ वृक्ष यद्यपि अपना अस्तित्व भली प्रकार प्रमाणित कर रहा हो तो भी वस्तुतः यह एक स्वप्न के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म, क्लेरो वायन्स, टेलीपैथी आदि की स्थिति प्रबुद्ध मस्तिष्क को प्रसुप्त करके ही उत्पन्न की जाती है यदि चेतन मस्तिष्क सजग रहे और तर्क बुद्धि के साथ निद्रित न होने का संकल्प किये रहे तो उनमें से जो एक भी आध्यात्मिक स्थिति उत्पन्न नहीं हो सकती। जागुत मन को निद्रित करके ही ड़ड़ड़ड़ को अध्यात्म भूमिका में कुछ अधिक योगदान दे सकने योग्य बनाया जा सकता है।
प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि यह चार अवस्थाएं प्रबुद्ध की स्वाभाविक चंचलता को निग्रहित करके एकाग्रता के केन्द्र बिन्दु पर रोके रखने के लिए की जाती है। इनमें जितनी सफलता मिलती जाती है मस्तिष्क शाँत और समाहित होता चला जाता है साथ ही चितशक्ति का जागरण, आरम्भ हो जाता है। हठयोगी कई प्रकार की समाधि लगाते हैं उसे थोड़े समय में आरम्भ करके लम्बे समय तक ले जाते हैं। कई घण्टे से लेकर कहीं महीने तक समाधि लगाने वाले योगियों का वर्णन प्रमाणिक प्रत्यक्ष दर्शियों द्वारा मिलता है। इससे प्रतीत होता है कि मानवीय संकल्प बल न केवल बाह्य प्रयोजनों में वरन् अपने शरीर की अनिवार्य गतिविधियों को इच्छानुसार नियन्त्रित अवरुद्ध करने में भी सफल हो सकता है।
पंजाब के महाराजा रणजीत से अंग्रेजों ने एक राजनैतिक सन्धि की। इसी संदर्भ में अंग्रेज सरकार का एक प्रतिनिधि मण्डल महाराजा से मिलने अदीना नगर पहुँचा। उन दिनों वे वहीं ठहरे हुए थे। अंग्रेजी दल में पोलिटिकल सेक्रेटरी डब्ल्यू0एच॰ मैकनाटन, पोलिटिकल ऐजेन्ट कप्तान वार्ड, मिलिटरी सेक्रेटरी डब्ल्यू0जी0 ओसवार्न, कप्तान जी. मैकग्रेवर, डा0 डूमण्ड आदि थे। घटना 1838 की है।
उन दिनों पंजाब में एक ऐसी योगी की बहुत ख्याति थी जो महीनों तक समाधि लगाकर भूमि में गढ़ा रहता था। अंग्रेजी दल ने राजनैतिक बातों से निपटकर महाराजा से उस योगी के चमत्कार दिखाने की व्यवस्था कर देने का अनुरोध किया। महाराजा ने साधु से पूछवाया और उसके सहमत होने पर प्रदर्शन की व्यवस्था बना दी। इस भूमि समाधि का विस्तृत विवरण उस दल के एक सदस्य डब्ल्यू0जी0 ओसवार्न ने लिखी है। पुस्तक का नाम है-” रणजीत सिंह।”
उस पुस्तक में लिखा है- महाराज, अनेक सरकार और अंग्रेजी दल में योगी ने अपने मुख, नाक, कान, के छिद्रों को छोड़कर मोम से बन्द किया ताकि किसी रोमकूप से उसके भीतर वायु आवागमन न हो। इसके बाद योगी समाधिस्थ हो गया। शरीर को एक मजबूत बोरी में बन्द किया गया और पर शील पर मुहर लगा दी गई। बोरी को सन्दूक में बन्द किया गया और उस पर ताला लगा दिया गया। गड्ढे में मिट्टी भरी गई। मिट्टी पोली न रहे इसलिये उसे भली प्रकार रोंदा गया। इसके बाद उस जमीन जौ बो दिये गये ताकि कोई उखाड़-पछाड़ की जाय तो उसकी साक्षी जौ के पौधे दे सके। यह सारी क्रिया जनरल वेनट्ररा ने अपनी हाथों पूरी की ताकि उसमें कहीं किसी आशंका की गुँजाइश न रहे। समाधि भूमि पर मिलिटरी का कड़ा पहरा बिठा दिया गया।
दस महीने बाद गड्ढा खोदा गया। खोदते समय सारे अफसर मौजूद थे। कप्तान वार्ड ने अपने हाथों सन्दूक निकाला और शील खोली। योगी की नाड़ी और हृदय की धड़कन बिलकुल बन्द थी तो भी वे जीवित थे। सारा शरीर ठण्डा था। सिर्फ कपाल गर्म था। उन्हें गर्म पानी से स्नान कराया गया धीरे-धीरे दो घण्टे में वे होश में आ गये। इस लम्बी अवधि में योगी के नाखून और बाल नहीं बड़े थे।
इसी प्रकार की एक अन्य भूमि-समाधि का वर्णन डा0 मैक ग्रेवर ने अपनी पुस्तक ‘हिस्ट्री आफ दी सिख्स’ में दिया है। उसमें हरिदास नामक एक योगी द्वारा लाहौर में 40 दिन के लिए ली गई समाधि का वर्णन है। यह भी महाराजा रणजीत और अंग्रेज अफसरों की उपस्थिति में ली गयी और खोली गई थी। इन्हीं साधु ने एक समाधि जैसलमेर में भी ली थी।
समाधि स्थिति को पूर्ण प्राप्त करने में कई प्रकार के लाभ उठाये जा सकते हैं। (1) प्रबुद्ध मस्तिष्क को गहरा विश्राम देकर उसे अधिक स्वस्थ, सक्रिय एवं बुद्धिमान बनाया जा सकता है। (2) अचेतन मस्तिष्क को जागृत करके उसकी अतीन्द्रिय क्षमता बढ़ाई जा सकती है और चमत्कारी सिद्ध पुरुषों की देव भूमिका में पहुँचा जा सकता है। (3) शरीर की गतिविधियाँ रोक सकने में समर्थ संकल्प बल की आग में संसार की कठिनाइयों को गलाया जा सकता है। जो कठिन है, उसे सरल बनाया जा सकता है। दूसरों को आध्यात्मिक योगदान देकर सुखी बनाया जा सकता है। (4) दीर्घ जीवन का उद्देश्य को पूरा करने के लिए कायाकल्प का रहस्यमय अमृत प्राप्त किया जा सकता है। यह चार लाभ प्रत्यक्ष हैं अन्य छोटे-बड़े वरदान और भी इस स्थिति के साथ जुड़े हुए हैं।
रामायण कथा के अनुसार रावण का भाई कुम्भकरण छह महीने सोता था और छह महीने जागता था। यदि यह कथा सही है तो उस प्रक्रिया के द्वारा मनुष्य को जरा मरण से मुक्त किया जा सकता है। छह महीने की सुषुप्तावस्था में कोषाओं की इतनी क्षति पूर्ति हो सकती है कि वे पुनः कायाकल्प की तरह नये सिरे से नव जीवन जैसा कार्य प्रारम्भ कर सकें। इस प्रकार आमदनी तथा खर्च बराबर होते रहने की प्रक्रिया अनन्त काल तक चलती रह सकती है और मनुष्य को अमरता का लाभ मिल सकता है। वृद्धावस्था थकान का नाम है। थकान का अर्थ है आमदनी से खर्च का अधिक होना- विकृतियों के निराकरण में अवरोध उत्पन्न होना। मौत के निकट घसीट ले जाने वाली यही कठिनाइयों हैं जिन्हें प्रसुप्त निद्रा पद्धति अपनाकर निरस्त करने की बात आजकल वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में चल रही है।
विज्ञान ने यह स्वीकार कर लिया है कि यदि मनुष्य को चिर निद्रा में सुलाया जा सके तो उसे रोगों और थकान के पंजे से छुड़ा कर नव जीवन प्रदान किया जा सकता है। समाधि की विधि-व्यवस्था तो भौतिक विज्ञान में नहीं है पर उनने शीतनिद्रा का एक नया तरीका ढूंढ़ा है। विज्ञानी डल कारएन्टर का कथन है कि मनुष्य को ठण्डा करके गहरी सुषुप्तावस्था में सिद्धांततः पहुँचाया जा सकता है। अब उसका व्यावहारिक रूप ही सामने लाना बाकी है। न्यून तापमान में भी जीव कोषों में पाया जाने वाला ‘ग्लाइसकोल’ रसायन प्राणी को जीवित रख सकता है। इस प्रयोजन से एक विशेष रसायन खोज निकाला गया है। ‘डाय मिथाहुल सल्फो आक्साइड’ इसकी सहायता से गहन शीतनिद्रा में मनुष्य को भेजा जा सकेगा साथ ही उस स्थिति में उत्पन्न हो सकने वाले संकटों की संभावना से भी उसे बचाया जा सकेगा।
शीत निद्रा की समाप्ति कैसे होगी, इसके सम्बन्ध में अभी कल्पना यही है कि वैसा करना वातावरण में तापमान बढ़ाकर ही सम्भव हो सकता है। जो प्राणी शीत ऋतु में निद्रा मग्न होते हैं वे गर्म ऋतु के प्रभाव वातावरण में आने से उत्तेजना ग्रहण करते हैं। अभीष्ट तापमान उपलब्ध होने पर उनकी जीव कोशिकाएं सजग होने लगती है। शीत ऋतु के प्रभाव वातावरण में आने से उत्तेजना ग्रहण करते हैं। अभीष्ट तापमान उपलब्ध होने पर उनकी जीव कोशिकाएं सजग होने लगती हैं। शीत ऋतु में सोये मेढ़कों और भोजन की तलाश में उछल-कूद करने लगे। शीत निद्रा में सुलाये गये मनुष्य को जब जगाना हो तब उसके लिए प्रयत्न पूर्वक तथा सुसंचालित पद्धति से ऐसी व्यवस्था करनी पड़ेगी कि नियत समय पर आवश्यक गर्मी उत्पन्न होने लगे और सोया हुआ मनुष्य उस निद्रा को त्यागकर पुनः सक्रिय हो सके।
प्रयत्न शीत निद्रा के भौतिक हों- हिप्नोटिज्म स्तर के मानसिक हों- अथवा समाधि स्तर के आध्यात्मिक हों हर हालात में सर्वतोमुखी विश्राम एवं शाँत, एकाग्र समाधान की आवश्यकता अति महत्वपूर्ण समझी जाती रहेगी। उसे प्राप्त करके हम अतीन्द्रिय शक्ति सम्पादन से नये क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं। निःसंदेह वह क्षेत्र इतना बहुमूल्य है कि जो उसमें प्रवेश करेगा वह असामान्य अति मानवीय विभूतियाँ उपलब्ध करके रहेगा।
बर्रों का छत्ता बहुत बड़ा था। पास की डाली पर मधु मक्खियां एक छोटा छत्ता बनाने में परिश्रम पूर्वक जुटी थीं। एक बड़ी बर्र निकली और व्यंगपूर्वक बोली, उह, इतना छोटा छत्ता और इतनी मक्खियों का इतना शोर-गुल। मधु मक्खियों में से एक ने नहले पर दहला मारा बोली- बहन, तुम इससे भी छोटा छत्ता बनाकर दिखा दो जिसमें हमारे छत्ते जैसा शहद भरा हो।
मनुष्य का शरीर भले ही आहार-बिहार से परिपुष्ट होता है पर उसका चेतन तो आस्थाओं के आधार पर होता है। दर्शन ही किसी देश, समाज को पतित एवं समुन्नत बना सकने में समर्थ हुआ। दर्शन का अत्यधिक महत्व है। यह सदा से माना जाता रहा है। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि ‘दर्शन’ तथ्य को अर्थ वाला होने के कारण उसकी भयानक दुर्गति उपस्थित हो गयी। दर्शन का वास्तविक अर्थ है-तत्व चिंतन-आस्था को प्रभावित करने वाला विचार प्रवाह-फिलॉसफी। उसका दूसरा प्रचलित अर्थ है- देखना। लोगों ने इस सस्ती प्रक्रिया को तत्व दर्शन के महात्म्य के साथ जोड़कर सारा गुड़ गोबर कर दिया। देखने को बहुत कुछ माना जाना लगा। लोग तीर्थ स्थानों को, मन्दिर प्रतिमाओं को, सन्त ज्ञानियों को देखने के लिए घर दौड़े और आँखों से देखे गये दृश्य को ही पर्याप्त समझकर यह मानने लगे कि हमें दर्शन का शास्त्र वर्णित सत्परिणाम प्राप्त हो जायगा। दर्शन शब्द के द्विअर्थक होने के कारण उसकी जो दुर्गति हुई- अर्थ का जो अनर्थ किया गया- उससे हर विचारशील को दुख ही हो सकता है।
दर्शन का अर्थ है तत्व ज्ञान। इसकी तीन धाराएं है। (1) आस्तिकता (2) आध्यात्मिकता (3) धार्मिकता। प्रथम में लक्ष्य का निर्धारण-समर्थता का सान्निध्य और सत्कर्म की सत्परिणति का व्यवस्था विश्वास जमना है। दूसरी के आधार पर आत्मबोध होता है और आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण एवं आत्म-विकास की जीवन साधना चल पड़ती है। तीसरी का उद्देश्य है कि सामाजिक क्रिया-कलापों एवं मर्यादाओं का सुव्यवस्थित निर्वाह। व्यक्ति और समाज के बीच टकराव को निरस्त करते हुए सघन सहयोग का निर्वाह। यह तीनों ही धाराएं मिलकर जिस तीर्थराज संगम का निर्माण करती हैं उसी को आदर्शवादी दर्शन कहते हैं। यह दार्शनिकता जिस देश, समाज के उच्च स्तर पर टिकी रहेगी वह हर दृष्टि से समुन्नत , विकसित दिखाई देगा। जिसका दर्शन भ्रष्ट होगा वह समाज, व्यक्ति या युग निश्चित रूप से पतन के गर्त में गिरेगा और अनेकानेक संकटों में निरन्तर गहरा फंसता चला जायगा। भारत की भूत कालीन गरिमा और आज की संकटापन्न स्थिति का तात्विक कारण दर्शन की उत्कृष्टता और निकृष्टता के साथ ही जोड़ा जाना चाहिए। स्वार्थी, संकीर्ण, दुष्ट और भ्रष्ट व्यक्ति दुखदायी परिस्थितियों में ही फंसता जायगा। यह समस्त दुर्गुण निकृष्ट मान्यताओं के आधार पर ही उत्पन्न होते हैं। मानवी सत्ता का प्राण उसका आस्था स्तर ही है- इसी को श्रद्धा, विश्वास अथवा दर्शन कहते हैं। यही है वह मर्म बिन्दु से मनुष्य को प्रेरणा प्राप्त होती है और दिशा निर्धारण की प्रक्रिया विनिर्मित होती है।
दूरदर्शी तत्वज्ञानी इस तथ्य को भली प्रकार समझते हैं कि हाड़-माँस के मनुष्य में जो कुछ महान, विशिष्ट है- वह उसका दर्शन चिन्तन ही है। चेतना इसी प्रभाव में ऊंची उठती या नीचे गिरती है। जो यह विश्लेषण विवेचन कर सकते हैं वे समय विकृतियों को दूर करने के लिए- समस्याओं को सुलझाने के लिए-तत्कालीन दर्शन भ्रष्टता का सूक्ष्मदर्शी निरीक्षण करते हैं और जहाँ कई विकृतियाँ दिखती है वहाँ करारी चोट करके अवाँछनीयता को औचित्य की दिशा में मोड़ते-मरोड़ते हैं। सन्तों, सुधारकों और अवतारों को बार-बार इसी एक प्रयोजन के लिए अपनी असाधारण भूमिका निभानी पड़ती है। अखण्ड ज्योति को यही सब करना पड़ा। उसने अपने जन्म दिन से लेकर आज पर्यन्त इसी मोर्चे पर कट-कटकर लड़ाई लड़ी है और जब तक वह जीवित है अन्तिम साँस तक अवतारी प्रवाह सदा एक ही लक्ष्य सामने लेकर आते रहे हैं “ समय की दार्शनिक भ्रष्टता को दूर कर उसे उच्चस्तरीय चिन्तन स्तर तक घसीट ले जाना” कहा जा सकता है। श्रेष्ठता का आधार सनातन है-शाश्वत है-निकृष्टता की दिशाएं भी गिनी-चुनी हैं। उतार -चढ़ाव उसी झूले में झूलते रहते हैं, पर पुरानी सुधार प्रक्रिया हर बार नई बदलनी पड़ती है क्योंकि मूल-तथ्य यथा-स्थान रहने पर भी सामयिक परिस्थितियों के साथ जुड़ी हुई विकृतियों का स्वरूप पहले की अपेक्षा सर्वथा भिन्न होता है। भगवान बुद्ध के समय यज्ञीय हिंसा की वाममार्गी असुरता अट्टहास कर रही थी तो स्वामी दयानन्द के समय में पाखण्डी अनाचार गगनचुंबी बना हुआ था। विवेकानन्द ने भारतीय संस्कृति की की अनास्था के दुष्परिणाम देखे और गान्धी ने जनमानस में घुसी हुई पराधीनता प्रिय निराशा को जड़ जमाये पाया। इन सब ने अपने सुधार आन्दोलन अलग-अलग ढंग से चलाये। वे मूलतः एक ही सुधार प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होते हुए भी बाह्य दृष्टि से सर्वथा भिन्न थे उनमें न एकरूपता थी न एक दिशा। कारण स्पष्ट है, समय-समय पर विकृतियों पृथक-पृथक परिधान ओढ़कर आती हैं।
अपने युग में अनाचार की गतिविधियाँ पूर्व काल की अपेक्षा भिन्न हैं। इस समय दार्शनिक भ्रष्टता ने जिस दिशा में बहना आरम्भ किया है वह भूत कालीन दिशा से भिन्न है। इसलिए सुधार की प्रक्रिया भी नवीनतम होनी चाहिए उसमें सामयिक विकृतियों की समीक्षा और निराकरण के सामयिक आधार रहने चाहिए।
इस शताब्दी में विज्ञान ने असाधारण प्रगति की है। उसके साथ-साथ ही बुद्धिवाद भी बढ़ा है। विज्ञान ने अपने प्रतिपादनों को यथार्थता की कसौटी पर खरा सिद्ध किया है अस्तु उसकी प्रामाणिकता सर्वमान्य हो गई है। ठीक उसी प्रकार बुद्धिवाद को भी मान्यता मिली है। अब तर्क, तथ्य और प्रमाणों को प्रस्तुत किये बिना किसी गंभीर बात को किसी के गले नहीं उतारा जा सकता। कोई समय था जब शास्त्र वचन, श्रद्धा के लिए पर्याप्त आधार थे। पर अब ऐसा कुछ नहीं रहा। अब शास्त्र वचन और सामयिक सामान्य पुस्तक के उल्लेख में कोई खास अन्तर नहीं किया ज ता बात नई है या पुरानी इसे कोई नहीं पूछता। देखा यह जाता है कि तर्क, तथ्य और प्रमाणों के आधार पर कोई प्रतिपादन किस हद तक खरा उतरता है।
भौतिक क्षेत्र में विज्ञान की प्रगति को पचा लिया गया पर आध्यात्मिक क्षेत्र में बुद्धिवाद का सामना करने का साहस न किया जा सका। श्रद्धा एवं परम्पराओं के आधार पर जो कहा जाता है उसे बुद्धिवाद ने स्वीकार नहीं किया। फलतः दोनों के बीच भारी खाई उत्पन्न हो गई। एक-दूसरे के बचने का प्रयत्न ही नहीं करते रहे विरोधी कारणों से एक दूसरे को भ्रष्ट भी कहने लगे। विज्ञान ने आस्तिकवाद, अध्यात्मवाद और धर्मवाद को भरपूर गालियाँ दी और दूसरी ओर धर्म क्षेत्र में बुद्धवादियों को असुर नास्तिक पथ भ्रष्ट आदि कह कर अपना मन हलका किया। जी की जलन ठण्डी करने के लिये दोनों पक्षों ने सत्ता समाधान तो ढूंढ़ लिया पर यह भूल गये कि दोनों के समन्वय के बिना एक पहिये की गाड़ी चल नहीं सकेगी। भौतिक क्षेत्र में जो महत्व विज्ञान का है वही चिन्तन के क्षेत्र में दर्शन का है। व्यक्ति और समाज की सर्वांगीण प्रगति दोनों को मिलाकर ही हो सकती है। बहिरंग और अंतरंग जीवन को पृथक नहीं किये जा सकते। उभय पक्षीय प्रगति ही सर्वांगीण हो सकती है और उस समन्वय से ही सुख शाँति की स्थिरता रखी जा सकती है।
युग चिन्तन के कन्धों पर समय ने यह गुरुतम भार डाला कि वह बुद्धिवाद और दर्शन का समन्वय करे-भौतिक और आत्मिक तथ्यों को परस्पर संबद्ध करे और द्वैत को मिटा कर अद्वैत की जनमानस की प्रतिष्ठानों करे। कार्य अत्यधिक जटिल है। उसे कुत्ते और बिल्ली का विवाह कराने के समान अशक्य और उपहासास्पद समझा जा सकता है। इतना सब होते इस भी युग की चुनौती स्वीकार की ही जानी चाहिए तर्क, तथ्य एवं प्रमाणों के बुद्धिवादी, विज्ञान-वादी आधारों को लेकर उत्कृष्टता के दर्शन का इस प्रकार प्रतिपादन किया जाना चाहिए कि उसे उपयुक्त ही नहीं, व्यावहारिक एवं उपयोगी भी माना जा सके। समय की विकृतियों-समस्याओं के समाधान में क्या चिन्तन की उत्कृष्टता का भी कोई योगदान हो सकता है जब इस बात को बुद्धि संगत ढंग से खोजा जायगा तो विचारशील वर्ग यह स्वीकार करेगा कि यही समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है, जिस बुद्धिवाद से आस्तिकता को निरस्त करके भौतिकता को प्रतिष्ठापित किया था वही बुद्धिवाद अब नई धार चढ़ जाने के कारण-नई दिशा मिल जाने के कारण, नास्तिकता को आस्तिकता में, निकृष्टता को उत्कृष्टता में बदल सकने में पूरी तरह समर्थ हो सकता है। इस युग की यह एक बहुत बड़ी दैन है जिस पर अखण्ड-ज्योति परिवार का हर सदस्य गर्व कर सकता है।
अब पिछड़े लोगों की तरह प्राचीन काल में भी लोगों का यह विश्वास रहा कि मृत आत्माएं जीवित स्थिति की तरह ही भूख प्यास अनुभव करती है -इन्द्रिय सुख और विलास प्रमोद चाहती है। यह वस्तुएं पाने के लिए वे अपने उत्तराधिकारियों से अपेक्षा रखती है। जुटा देने पर वे प्रसन्न, सन्तुष्ट होकर उपहार, वरदान देती है। अन्यथा रुष्ट, कुपित होकर वे अपने कुटुम्बी, सम्बन्धियों को डराती सताती है।
अब भी लोग मृत शरीरों के साथ रुपया, पैसा, जेवर, वस्त्र, खाने-पीने की चीजें गाढ़ते, जलाते हैं ताकि वे वस्तुएं उन मृतात्माओं के उपभोग में आ सकें। मरने के बाद पिण्डदान के कर्म-काण्ड तो किये ही जाते हैं। महा ब्राह्मणों को शय्या, अन्न, वस्त्र, अलंकार, बर्तन आदि भी इसी निमित्त दिये जाते हैं कि दी हुई वस्तु सीधी मृतात्मा तक पहुँच जायेंगी और वे उनके उपयोग में उसी तरह आवेंगी जैसे कि जीवित अवस्था में उनके काम आती थी।
कहीं-कहीं के लोग पुराने समय में इस सम्बन्ध में और भी अधिक गहरे अन्धविश्वासों में डूबे हुए थे वे सोचते थे जहाँ मृत शरीर गाड़ा गया है वहीं प्रेतात्मा रहती है इसलिए उपयोग की वस्तुएं उसी जगह सुरक्षित रहनी चाहिए जो लोग कब्रों और समाधियों का निर्माण अभी भी यही समझ कर करते हैं कि मृतात्मा को वही स्थान सर्वप्रिय होगा जहाँ उनका शरीर ठिकाने लगा है अस्तु उनके निवास विश्राम के लिए वहीं कुछ छोटा-बड़ा बनाया जाना चाहिए। पुराने लोगों का यह विश्वास और भी अधिक गहरा था। वे मृतात्माओं को प्रसन्न करने और उनके क्रोध से डरने में और अधिक आगे थे। अस्तु इस सम्बन्ध में अधिक मुस्तैदी से प्रयत्न करते थे कि मृतकों को अधिक सन्तुष्ट करने के लिए अधिक बहुमूल्य उपहार जुटाये जायें।
यह अन्धविश्वास तब चरम सीमा तक पहुँचता था जब मृत सम्पन्न लोगों के, सत्ताधीशों के साथ उनके उपयोग के लिए ढेरों सुन्दर युवतियाँ और सैकड़ों नौजवान सेवक जीवित ही दफना दिये जाते थे सोचा जाता था कि मृतात्मा इनका उसी तरह उपयोग करेगी जैसा कि वह जीवित स्थिति में करती थी। यह अन्ध-विश्वास अपने देश में सतीप्रथा के रूप में था। पत्नी दिवंगत पति की सेवा करने के लिए उसके मृत शरीर के साथ जलना पड़ता था जो नहीं जलती थी उसकी निन्दा की जाती थी। मिस्र आदि देशों ने यह उत्तराधिकारियों का कर्त्तव्य हो जाता था कि अपने मृत संबंधियों के लिए न केवल उपयोग की वस्तुओं को वरन् पत्नियों और सेवकों का भी प्रबन्ध करे। जिस मृत के साथ जितने अधिक नर-नारी परलोक भेजे जा सकें वह उतना ही बड़ा सौभाग्यशाली माना जाता था और उसके परिजन उतने ही अपने पितरों के भक्त, पुण्यात्मा माने जाते थे। गरीब मृतकों को तो तब भी मिठाई, पकवान, छोटे-मोटे मुर्गी, बकरे शराब पात्र, नये पुराने बर्तन, कपड़े साथ ले जाकर सन्तोष करना पड़ता था। मध्यवर्ती लोग अधिक बहुमूल्य वस्तुएं और कुछेक नर-नारी दफनाते थे पर राजा , बादशाहों के लिए यह प्रतिष्ठा का प्रश्न था। अन्यों की तुलना में वे पीछे नहीं रहना चाहिए थे। कम से मृत शरीरों के साथ जीवित बलियों के संबंध में तो उन्हें अधिकाधिक सौभाग्यशाली होना ही चाहिए।
मिश्र के राजाओं की श्मशान भूमि सुविस्तृत क्षेत्र में फैली पड़ी है। ऊंची पहाड़ियाँ, भयंकर खड्ड, सूखा रेगिस्तान, इसी को बादशाहों की घाटी कहा जाता है। राजा लोग अपने लिए सुरक्षित स्थान देख थेवेस चले गये थे। काहिरा की अपेक्षा यहां उन्होंने अधिक सुविधा समझी और वहां रहना प्रारम्भ किया। इसी के समीप वह घाटी जिसमें उनके बहुमूल्य कब्रिस्तान बने हुए हैं। पिरामिडों के इस इलाके में नूतन खामन की वह कब्र थी जिस को सबसे अधिक मूल्यवान समझा जाता था। उसकी तलाश में इंग्लैण्ड के एक साहसी युवक हार्वर्ड कार्टर ने अनवरत परिश्रम किया इसके लिए उसे लार्ड कानरिवन का प्रोत्साहन एवं आर्थिक सहयोग भी मिला। अन्ततः उसने उस कब्र को ढूंढ़ ही निकाला।
यह कब्र ईसा से कोई एक हजार वर्ष पूर्व बनी थी। पिरामिड जितना मूल्यवान था उससे भी अधिक कीमती वह संपत्ति थी जो मृतक की सुरक्षित लाश के साथ गाड़ी गई थी। खुदाई में स्वर्ण निर्मित पलंग, आभूषण, बर्तन तथा दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुएं ऐसी मिली हैं जिनका बाजारू मूल्य भी करोड़ों रुपया है। कला की दृष्टि से वे और भी अद्भुत हैं। मृत शरीरों को रासायनिक पदार्थों से भर कर एवं पोत कर किस प्रकार हजारों वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है इस कला से मिश्र के लोग अब से पाँच हजार वर्ष पूर्व ही परिचित हो गये थे। आरम्भ में यह प्रयोग था पीछे जब बहुत प्रचलित हो गया तो उसे मध्य श्रेणी के लोगों के लिए भी प्रयुक्त किया जाने लगा। यहाँ तक कि बड़े आदमियों के पालतू पशु भी इसी प्रकार सुरक्षित बनाकर दफनाये जाने लगे।
कब्रों में मृत शरीरों के साथ बहुमूल्य पदार्थ भी रखे जाते थे। उनका लोभ लुटेरे सहन न कर सके और उन्होंने कब्रों को कुरेद कर संपत्ति निकालना आरम्भ कर दी। स्वाभाविक था कि इस उखाड़-पछाड़ में लाशें भी क्षत-विक्षत हो जायें। इस संकट से बचने के लिए कब्रों के ऊपर विशालकाय पिरामिड बनाने की आवश्यकता अनुभव की गई। तदनुसार वे बने और प्रतिस्पर्धा में एक के बाद एक अधिकाधिक विशालकाय और सुदृढ़ बनते चले गये। पिरामिडों के निर्माण का कार्य ईसा से दो हजार वर्ष पूर्व आरम्भ हो चुका था।
27 विशालकाय और सैकड़ों छोटे पिरामिडों में नूतन खामन की कब्र न केवल सम्पत्ति के हिसाब से वरन् कला की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। कब्र के भीतर का कमरा बहुत ही सुन्दर है वह 17 फीट लम्बा 11 फीट चौड़ा और 9 फीट ऊंचा है। इससे लगे हुए अन्य कमरे भी मिले हैं जिनकी दीवारों पर अत्यन्त कौशल के साथ ऐसे टिकाऊ रंगों से चित्रकारी हुई है जो इतना समय दीन बीन जाने पर भी थोड़े से ही हलके पड़े हैं। इन चित्रों से पता चलता है कि मृतक की शव यात्रा से लेकर उसे दफनाने तक की क्रिया किस प्रकार सम्पन्न होती थी। साथ ही यह भी विदित होता है कि उस समय मरणोत्तर जीवन के सम्बन्ध में किस प्रकार की मान्यताएं थी।
मृत शरीर के भीतर से रक्त, माँस प्रायः सभी निकाल लिया जाता था चमड़ी और अस्थियाँ ही शेष रहती थी। उन पर रासायनिक पदार्थ पोते जाते थे और भीतर ठोस पदार्थ भर कर ऊपर से मोम की परत इस प्रकार चढ़ा दी जाती थी कि मृत शरीर जीवित स्थिति जैसा ही दृष्टिगोचर होता रहे। इस मृत शरीर को ममी कहा जाता था। इसे शरीर की आकृति के एक सन्दूक में बन्द करते थे पीछे उसे बड़े सन्दूक में किया जाता था। नूतन खामन का संदूक तो पूरा ठोस सोने का बना पाया गया है। इनके शरीर के इर्द-गिर्द स्वर्णाभूषण, रत्न राशि तथा चाँदी, सोने के पात्र अस्त्र-शस्त्र, श्रृंगार, साधन आदि रखे जाते थे ताकि परलोक में किसी वस्तु की कमी न पड़े। दैनिक उपयोग की वस्तुएं सोने, चाँदी की इसलिए बनाई जाती थी कि परलोक में उनकी हेटी न होने पाये और चिरकाल तक अपनी शोभा के साथ सुरक्षित बनी रहे।
उन दिनों मिस्र वासियों का विश्वास था कि मनुष्य के शरीर में दो आत्माएं निवास करती हैं- एक “वा” जो शरीर के मर जाने के बाद आकाश में भ्रमण करती है और फिर वापिस मृत शरीर में लौट आती है। दूसरी “का” जो है तो अमर पर मृत शरीर की देखभाल करती रहती है ताकि उसे ओसिरिस देवता स्वर्गलोक में उसी शरीर सहित निवास कर सकने का असर मिल सके। यदि मृत शरीर बचा कर रखा जा सकेगा तो वे दोनों आत्माएं उसे पुनर्जीवित करके स्वर्गलोक का आनन्द प्रदान कर सकेंगी। यह मान्यता उन दिनों मिस्र निवासी राजा-प्रजा सबके मन में बहुत गहराई तक उतर गई थी। फलतः न केवल राजाओं के वरन् मध्यवर्ती साधन सम्पन्न लोगों के शरीर भी किसी प्रकार चिरकाल तक सुरक्षित बनाये रखने का प्रयत्न होने लगा था। पिरामिडों का निर्माण इसी मान्यता के कारण हुआ था।
इन पिरामिडों का निर्माण का बहुत रक्त रंजित इतिहास है। फराऊन राजा अपने मरने से पूर्व स्वयं ही अपने लिए पिरामिड तैयार कराते थे, ताकि उसके उत्तराधिकारी उपेक्षा करके उनकी लोकोत्तर सुख-सुविधा को जुटाने में कुछ कोताही न करने पायें। प्रायः बीस-बीस साल में उनका निर्माण हुआ है। इतनी अवधि तक प्रजा को इस निर्माण के लिए अतिरिक्त कर देना पड़ा। समीपवर्ती राज्यों पर आक्रमण इसलिए किया जाता था कि वहाँ के नौजवानों को युद्ध बन्दी बनाकर पिरामिडों में काम करने वाले, श्रमिकों के रूप में प्रयुक्त किया जा सके। प्रायः एक समय में एक-एक लाख श्रमिक काम करते थे। वे पच्चीस तीस साल के होते थे किन्तु दस साल में ही उनकी दम निकल जाती थी तब उन्हें मृतकों में गिन कर छोड़ दिया जाता था और उनके स्थान पर नये युद्ध बन्दी पकड़ लिये जाते थे। यह क्रम सदियों तक चला है। थके हुए श्रमिकों की शक्ति बढ़ाने के लिए एक बार उन्हें प्रलोभन दिया गया कि यदि वे अधिक उत्साह से काम करने का वचन दें तो उनकी औरतों को बुला दिया जाय। जिनने वायदा किया उनकी औरतें भी पकड़ बुलाई गई। अब इनके बच्चे होने लगे। इन बच्चों का क्या हो? फैसला किया गया कि उन्हें नील नदी में डुबो दिया जाया करे। इस प्रकार इन गुलामों के लाखों बच्चे नील नदी में डुबो दिये गये।
पिरामिडों में भारी चट्टानें लगी हैं और वे इतनी घिसी गई हैं कि एक के ऊपर दूसरी रखने पर सुई बराबर साँध न रहे। उनमें कहीं गारे का उपयोग नहीं हुआ है। मोकत्तम के पहाड़ों से टनों भारी चट्टानें काटकर उन्हें छाती से रस्सी बाँधकर घसीटते हुए पिरामिडों की दूरी तक ले पहुँचना और फिर चार-चार सौ फुट की ऊंचाई तक रेंगते हुए ले जाना कितना कठिन कार्य है इसकी आज के यन्त्र युग में तो कल्पना भी नहीं की जा सकती पर उस जमाने के गुलामों से विवशता यह सब कुछ करा लेती थी। न करते तो उन्हें हन्टरों की मार से पिटते हुए मर जाने के अतिरिक्त और कोई चारा भी तो न था।
मिस्र के जलते रेगिस्तानों और सूखी आवहवा ने रासायनिक द्रव्यों से पुती हुई लाशों को देर तक सुरक्षित रखने में सहायता की है पर दुर्दान्त दस्युओं से वह भी इन लाशों की रक्षा न कर सके। उनके साथ जो विपुल सम्पदा दफनाई जाती थी उनका प्रलोभन इतना बड़ा था कि डाकुओं के अन्तर्राष्ट्रीय गिरोह, साधन- उपकरणों के साथ इन पिरामिडों पर चढ़ाई करने लगे और करोड़ों की संपत्ति लूटने में सफल होते रहे। इस कार्य में अरब डाकुओं ने अच्छी ख्याति पाई और उन्होंने उसे एक पुश्तैनी धन्धा बनाया। यों लाशों के सायं दबी संपत्ति का ब्यौरा गुप्त रखा जाता था पर वे किसी प्रकार सुराग लगा ही लेते कि कहाँ कितने मूल्य की संपत्ति इन कब्रों में दबी हुई है।
मिस्र में छोटे-बड़े पिरामिडों की संख्या बहुत बड़ी है इनमें कितने नर-नारी मृतकों के साथ बलि रूप में गढ़े है इसका ठीक से लेखा-जोखा कठिन है पर अनुमान है कि उनकी संख्या सहस्रों को पार करके लाखों तक पहुँची होगी और जिन्होंने श्रमिकों के रूप में अपना रक्त, माँस गला दिया भूख, पिटाई और पिसाई में जिनके प्राण और भी कष्ट कर स्थिति में तिलतिल करके धुलते, जलते निकले उनकी संख्या तो निस्संदेह लाखों को भी पार करके करोड़ों तक पहुँची होगी। इन अभागे जीवित मृतकों के प्रियजनों पर आश्रितों पर क्या बीती होगी इसकी कल्पना करने तक से किसी सहृदय व्यक्ति की छाती फटने लगती है।
ईराक में दजला और फरात नदियों के मुहाने पर अब से कोई पाँच हजार वर्ष पहले ‘ऊर’ को राजधानी बनाकर उस क्षेत्र पर एक रानी राज्य करती थी शुवाद। पुरातत्व वेत्ता डा0 बूली ने उसकी कब्र को सन 1927 में खोदा तो उसके अस्थि-पंजर पर पहना हुआ रत्न जटित स्वर्ण मुकुट मिला। इसके अतिरिक्त और भी अनेकों बहुमूल्य स्वर्ण आभूषण उसके शरीर पर धारण किये हुए थे। श्रृंगार प्रसाधनों की कई पिटारियाँ थीं तथा दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुएं कीमती वस्तुओं से बनाकर सजधज के साथ रखी हुई पाई गई। समय बहुत बीत जाने पर भी वे बहुत अधिक नष्ट नहीं हुई थी। पास ही दो पुरुष अस्थि-पंजर पाये गये। सम्भवतः वे उसके प्रिय सेवक थे जो मरणोत्तर जीवन में उसकी सेवा करने के लिए बलि के रूप में साथ ही दफना दिये गये थे। इससे कुछ ही दूर दस और भी अस्थि-पंजर पाये गये इनमें नौ स्त्रियाँ थी और एक पुरुष। पुरुष कलावन्त था उसकी छाती से चिपका हुआ सितार पाया गया। स्त्रियाँ रानी की दासी थी, जिन्हें परलोक में भी सेवा करनी थी, इन सभी के समीप जहर के प्याले उलटे पड़े थे। उन्हें यही पीकर मरना पड़ा होगा।
डा0 बूली को उसी क्षेत्र में एक राजा की दूसरी कब्र मिली, जिसके इर्द-गिर्द 74 अस्थि-पंजर और भी पाये गये। यह सभी व्यक्ति मृत राजा के मरणोत्तर जीवन में विविध प्रकार की सेवा सहायता करने के लिए बलि किये गये थे और उसी के समीप उपयोगिता की दृष्टि से पंक्तिबद्ध करके गाढ़े गये थे।
मिस्र में ही नहीं मृतकों के लिए बलि प्रदान करने की प्रथा पुराने समय में न्यूनाधिक मात्रा में सर्वत्र फैली हुई थी। अमेरिका में मय सभ्यता की खोज करते हुए ऐसे ही प्रमाण पुरातत्व वेत्ताओं ने उस क्षेत्र में भी पाये। पादरी दिएगो दे लान्दा की डायरी में ऐसा उल्लेख है कि अब से पौने दो हजार वर्ष पूर्व इस क्षेत्र के सुसम्पन्न राजाओं में से किसी की मृत्यु होती थी तो उसके साथ बहुमूल्य रत्न, आभूषणों के अतिरिक्त अनेकों सुन्दर युवतियाँ तथा युवा कर्मचारी एक मृत्यु कूप में धकेल दिये जाते थे। इस प्रकार उस कूप में अतुलित स्वर्ण सम्पदा दबी पड़ी है। बड़े प्रयत्नों के बाद टामसन ने न केवल मयों की राजधानी को वरन् उसने बलि कूप को भी खोज निकाला, वह 80 फुट गहरा था। एक साधन सम्पन्न खोजी दल ने उस कुँए की सफाई आधुनिक यन्त्रों की सहायता से की तो विपुल मात्रा में सोने ओर चाँदी के पात्र, आभूषण, हथियार मिले और असंख्य अस्थि पंजर निकाले गये।
उस क्षेत्र के मोस्तेजूमा दुर्ग में देव राजा के लिए बलियों का एक कूप स्मारक पाया गया है जिसमें बहूमूल्य स्वर्णालंकारों के अतिरिक्त 1,30,000 खोपड़ियाँ भी खोद निकाली गई है। यह उन अभागे लोगों की है जिन्हें मृत राजा की सेवा करने के लिए परलोक में जाने को बलात् बाध्य होना पड़ा।
एक दुर्बोध मय पाण्डु लिपि के आधार पर इतिहासकार फिग्ररोजा ने लिखा है -” विचेन इत् जा” के लोग मृत राजा के लिए 60 दिन का एक श्राद्ध अनुष्ठान करते थे। हर घर से एक युवती पकड़ी जाती थी और उसे मृतात्मा की प्रसन्नता के लिए धूम-धाम के साथ बलि कूप में धकेल दिया जाता था। इसके अतिरिक्त युद्धों में पकड़े गये युद्ध बन्दी भी उसी समारोह के समय उस कुँए में धकेल दिये जाते थे।
अन्ध विश्वास यों भोलेपन और पिछड़ेपन का चिह्न माना जाता है और सरल दयनीय सा लगता है पर वह कितना क्रूर, निर्मम और रोमांचकारी होता है इसे बहुत कम लोग जानते है; अन्धविश्वास ने भूतकाल में करोड़ों लोगों का रक्त पिया है और अब भी असंख्य लोगों का रक्त खूनी जोक की तरह पी रहा है। भारत में विवाहोन्माद, मृतक भोज, भूत-पलीत, पशु बलि, जाति पाँति, छूत-छात, बाल-विवाह, नारी उत्पीड़न, पर्दा प्रथा, आदि के नाम पर करोड़ों लोगों ने मानवी अधिकारों को अपने जूते की नोंक से रोंदना कहा है। धर्म की आड़ में छिपा बैठा अधर्म का महादैत्य अन्धविश्वास हमारी मान्यताओं का अंग बना बैठा है इसलिए सह्य ही नहीं प्रिय भी लगता है पर क्रूरता तनिक भी कम नहीं है।
यह ठीक है कि परिस्थितियाँ मनुष्य को उठाने अथवा गिराने में बहुत सहायक होती हैं। कई बार ऐसे अवसर आते हैं जिनमें अयोग्य व्यक्तियों को अप्रत्याशित लाभ मिल जाते हैं। इसके विपरीत ऐसे उदाहरण भी कम नहीं जिनमें सुयोग्य व्यक्तियों को विपरीत परिस्थितियों ने उलट कर रख दिया और पराजय का मुँह दिखाया। इस अकाट्य परिणामों को देखकर कई व्यक्ति भाग्यवाद का समर्थन करने लगते हैं और देव को अनुकूल बनाने के उपाय ढूंढ़ते हैं।
अपवादों को तथ्य मान कर चलना अबुद्धिमत्तापूर्ण है। संसार का सामान्य नियम यह है कि मनुष्य अपनी प्रतिभा एवं क्षमता का विकास करता है और उस विनिर्मित व्यक्तित्व के आधार पर अनुकूल वातावरण उत्पन्न करता है। परिस्थितियाँ लौह कणों की तरह है जो प्रखर व्यक्तित्व के शक्तिशाली चुम्बक के पास खिंचती घिसटती चली आती है। परिस्थितियों की अनुकूलता प्राप्त करने के लिए क्या करना चाहिए इसका सुनिश्चित उत्तर यही है कि अपने चिन्तन में-स्वभाव में, क्रिया-कलाप में जो अवाँछनीय तत्व घुस पड़े हो उन्हें ढूंढ़ने और हटाने में तत्परता पूर्वक जुट जाया जाय। परिष्कृत व्यक्तित्व में जिन गुणों की आवश्यकता पड़ती है उन्हें बढ़ाने का परिपूर्ण प्रयत्न किया जाय।
परिस्थितियाँ आमतौर से किसी के पास अनायास ही नहीं जा पहुँचती; वे बुलाने पर जाती हैं। यह बुलाया वाणी मात्र का नहीं होता वरन् अपनी योग्यता एवं पात्रता के आधार पर प्रस्तुत किया जाता है। परिस्थितियाँ की देवी ऐसे ही आमन्त्रणों पर ध्यान देती और स्वीकार करती है। जीभ की नोंक से तो हर कोई अनुकूल परिस्थितियों को बुलाता है; पर वे बुलावे ऐसे ही उपेक्षापूर्वक रद्द होकर रह जाते हैं।
चोरी करके धन कमाने की आकाँक्षा उस प्रकार के लोगों के साथ संपर्क बनाती है। उस तरह के अनुभव एवं अभ्यास संग्रह करती है। चोरी के स्थान तथा अवसर खोजती है। आवश्यक उपकरण जुटाती है। यह सब प्रयास गुप-चुप चलते रहते हैं और वह दिन आ जाता है जब चोर कर्म में प्रवीणता मिल जाती है। कहना न होगा कि साथ-साथ ही वह बात फैलती है-अविश्वसनीयता का वातावरण बनता है और अन्ततः पकड़े जाने एवं जेल भुगतने का अवसर भी आ जाता है। एक भले, चंगे आदमी को उसकी आकाँक्षा ने ही एक-एक कदम बढ़ाते हुए यह सारी परिस्थितियाँ इकट्ठी की होती हैं। वे अनायास ही उसके सिर पर नहीं जा टपकती।
यही क्रम हर परिस्थिति के बारे में चलता है। किस दिशा में चलना है यह निर्णय करना अपना काम है। चुनाव भलाई का किया जाय या बुराई का, इसकी हमें पूरी-पूरी छूट है। जैसे ही आकाँक्षा परिपक्व होकर निष्ठा बनती है वैसे ही तरह-तरह की दृश्य ओर अदृश्य हलचलें आरम्भ हो जाती हैं। मन का उत्साह यदि शिथिल न हो तो वह प्रगति अपनी गति से कदम बढ़ाती चलती है और वहाँ जा पहुँचती है जिन्हें संबद्ध परिस्थितियाँ कहा जा सकेगा।
जिनके मन में अध्ययन की प्रबल अभिलाषा है उनकी अन्तः चेतना पुस्तकें, समय, मार्गदर्शक आदि का साधन जुटा लेती है और आरम्भ में जो बात असम्भव दीखती थी वह कुछ ही समय में सम्भव बन जाती है। जब अध्ययन की अभिलाषा जगी थी तब चारों और दृष्टिपात करने से अन्धकार, अभाव और असम्भव की ही ध्वनि गूँजती थी; पर जैसे ही समर्थ आकाँक्षा की ऊषा उगी वैसे ही कुहरा छंटता चला गया और वह दिखाई पड़ने लगा जो कुछ समय पहले अविज्ञात अनिश्चित बना हुआ था। मानवी उत्कण्ठा में ऐसा विलक्षण जादू है कि उसके प्रभाव से देर-सवेर में प्रतिकूलता और अनुकूलता में परिणत होना पड़ता है।
पतन एवं उत्थान की परिस्थितियों में पड़े हुए मनुष्य इस स्थिति में अनायास ही नहीं पहुँचे हैं उन्होंने बहुत समय पूर्व यह निश्चय किया था कि हमें इस दिशा में चलना है। इस संकल्प ने उन्हें साधनों की ओर आगे बढ़ाया और अनुकूलता निकट आती चली गई। कई व्यक्ति पतन के मार्ग को अपनाकर उत्थान की बात सोचने में भूल करते हैं। वे प्रकृति के इस नियम की उपेक्षा करते हैं जिसमें भले का परिणाम भला एवं बुरे का बुरा होना निश्चित है। आकाँक्षा तो इतना ही कर सकती है कि मनोरथ की दिशा में बड़ चलने के साधन जुटा दें। सन्त बनने के इच्छुकों को वैसे व्यक्ति साधन एवं अवसर मिलते चले जाते हैं और प्रयत्नों का परिणाम अभीष्ट पूर्ति का पथ प्रशस्त करता चला जाता है। दस्यु बनने की आकाँक्षा भी उसी तरह क्रम संचालन करेगी। यह सोचना अपना काम है कि सन्त बनना ठीक है अथवा दस्यु। प्रकृति इस निर्णय की स्वाधीनता में कोई हस्तक्षेप नहीं करती।
परिश्रम, मनोयोग, संयम और तत्परता के आधार पर हम किसी भी दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। जहाँ यह गुण होंगे वहाँ परिस्थितियों अनुकूल होती चलेगी और सफलता निकटतम आती जायेगी। असफल वे रहते हैं जिन्हें डटकर परिश्रम करने की आदत नहीं। ऐसे ही हलके-फुलके कुछ औंधी-सीधी उलट-पुलट करके काम बना लेने के सपने देखने वालों को निराशा ही हाथ लगती है। यदि आलसी, अकर्मण्य और अस्त-व्यस्त व्यक्ति भी सहज सफलता प्राप्त कर लिया करते तो फिर किसी को मनोयोग पूर्वक कठिन परिश्रम करने की आवश्यकता क्यों पड़ती? पात्रता के नियम को झुठलाया नहीं जा सकता। पसीने से सिंचाई किये बिना प्रगति का पौधा ऊंचा उठता ही नहीं। कल्पना और जल्पना की उड़ाने उड़ते रहने से नहीं कड़ी मेहनत करने से ही असम्भव को सम्भव बनाया जाता है।
कोल्हू के बैल की तरह काम का शारीरिक पक्ष पूरा करते रहना पर्याप्त नहीं। श्रम की सार्थकता और तत्परता की दोनों धाराएं मिलने से वह विद्युत प्रवाह उत्पन्न होता है जो सफलता के लिए अभीष्ट मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न कर सके। गिरे हुए, टूटे हुए, हारे हुए मन से बेगार भुगतने की तरह-लकीर पीटने की तरह कोई काम करते रहें तो उससे चिन्ह पूजा होती रहेगी वह प्रकाश उत्पन्न न हो सकेगा जिसके आधार पर सफलता का लक्ष्य स्पष्ट दृष्टिगोचर हो सके। जिन्होंने कठोर परिश्रम और समग्र मनोयोग को एकत्र करने की साधना कर ली उसे सफल जीवन के अनेकानेक वरदान पा सकने योग्य सत्पात्र साधक कहा जा सकता है। ऐसे लोग कदाचित् ही असफल रहते देखे गये हैं।
कार्य पद्धति का सही निर्धारण करने के लिए दूर-दर्शिता एवं व्युत्पन्न मति की आवश्यकता होती है। जहाँ पहुँचना है उसका सही मार्ग पहले से ही ज्ञात होना चाहिए; अन्यथा अस्त-व्यस्त दिशा में घुड़दौड़ लगाने से भी काम न चलेगा। हर काम अपने लिए उपयुक्त समय माँगता है और साधन चाहता है। वे यह भूल जाते हैं कि अपने स्वल्प साधनों में देर लगनी स्वाभाविक है। साधन सम्पन्न लोग जिस काम को एक वर्ष में करते हैं उसमें साधन हीन व्यक्तियों को दो वर्ष लगने ही चाहिए। ऐसा धैर्य जिनमें नहीं उनके अत्युत्साह को निराशा में बदलते देर नहीं लगती। हथेली पर सरसों जमाने के लिए अधीर मनुष्य प्रायः हिम्मत हार कर बैठ जाते हैं और अति निकट सफलता से मुँह मोड़ कर दुर्भाग्य का रोना रोते हैं।
सफलता के लिए दूसरों का सहयोग आवश्यक है और उसे पाने के लिए हमें हर दृष्टि से प्रामाणिक बनना चाहिए। अनुकूल परिस्थितियाँ सत्पात्रों के लिए सुरक्षित हैं। इसलिए हमें अपनी पात्रता बढ़ानी चाहिए। अनायास ही दैव अनुग्रह से लाभदायक परिस्थितियाँ मिल जायें और बिना आवश्यक मूल्य चुकाये अभीष्ट मनोरथ सरलता पूर्वक पूरे हो जायें ऐसा सोचना उपहासास्पद ही माना जायेगा।
भगवती देवी शर्मा
मानव जाति नर और नारी के दो भागों में विभक्त है। दोनों की संख्या लगभग समान है। इन दो पहियों पर ही मानव समाज की गाड़ी लुढ़कती है। एक पहिया टूट जाय तो फिर समझना चाहिए कि गतिशीलता समाप्त हो गई और पूरा ढाँचा लड़खड़ा गया। भारतीय नारी की दयनीय दुर्दशा किस स्तर पर पहुँच चुकी है यह किसी से छिपा नहीं है। मध्य युग के अज्ञानान्धकार में उसके प्रायः सभी मानवोचित अधिकार छीन लिये गये और खरीदे हुए पशु जैसी उसकी स्थिति बना दी गई। शिक्षा, स्वास्थ्य, अनुभव, अधिकार, स्वावलम्बन आदि सभी क्षेत्रों में वह पुरुष की तुलना में अत्यधिक पिछड़ गई है, जब व्यक्तित्व को स्थिर और विकसित करने के अवसर ही छिन गये तो दुर्बलता और दुर्दशा का गले बंधना स्वाभाविक ही था। यों भारत का पुरुष वर्ग भी वाँछनीय स्तर कहाँ पा सका है? संसार के अन्य देशों की तुलना में अपने देश का पिछड़ापन सर्वविदित है फिर पुरुषों की तुलना में नारी की स्थिति तो और भी अधिक दयनीय है।
इस स्थिति से भारतीय नारी को उबारे बिना हमारी स्वतन्त्रता सर्वथा अधूरी रहेगी। हम राजनैतिक दृष्टि से स्वतन्त्र हुए पर पराधीनता के बन्धनों में आधा समाज ज्यों का त्यों जकड़ा पड़ा है। विदेशी शासन में जो उत्पीड़न और शोषण भारतीय जनता हो होता था उससे कम कुछ अधिक ही नर द्वारा नारी का होता रहा है-हो रहा है। आधे समाज को इस प्रकार बन्धन ग्रस्त होते हुए भी देश के स्वतन्त्र होने का दावा करना एक प्रकार से विडम्बना ही है।
स्थिति यथावत् नहीं रहने दी जा सकती है। विश्व का भविष्य उज्ज्वल बनाने में भारत समुचित योगदान दे सके, इसके लिए अपने समाज को हर दृष्टि से समुन्नत बनाना पड़ेगा और इस दिशा में भयंकर पिछड़ेपन को दूर करने के लिए-नारी उत्कर्ष के लिए घनघोर प्रयत्न करना होगा। गाड़ी के दोनों पहिये ठीक न हो सके तो प्रगति के आधार किसी भी प्रकार अग्रगामी न हो सकेंगे। आधी जनसंख्या को पशु स्तर से ऊंचा उठाकर मनुष्य स्तर पर लाने का काम इतना आवश्यक एवं इतना महत्वपूर्ण है कि उसकी किसी भी प्रकार उपेक्षा नहीं की जा सकती।
कदाचित् यह रहस्य बहुत कम लोगों को विदित होगा कि गुरुदेव के विवाहित रहने का प्रधान उद्देश्य नारी जागरण अभियान के लिए अपना एक तीसरा हाथ उगाना था। भारत में नारी को ही प्रत्यक्ष मोर्चा संभालना पड़ेगा। नर उसमें परोक्ष रूप से ही सहायता कर सकता है। प्रत्यक्षतः तो उसे इस क्षेत्र में प्रवेश ही नहीं मिल सकता। कोई जबरदस्ती से घुसेगा तो लाँछन सहता हुआ निराश वापस लौटेगा। गुरुदेव की नारी जागरण आकाँक्षा का एक नगण्य सा उपकरण यदि मुझ अनुचरी को माना जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी। यों उनके अन्यान्य कार्यों में मुझे समय-समय पर हाथ बंटाने पड़े हैं पर उनकी भूल दृष्टि सदा यही निर्वाह करने के लिए अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना है।
शान्ति कुंज निर्माण के विचार की व्याख्या करते हुए आरम्भ से ही यह कहा जाता है कि मथुरा के गायत्री तपोभूमि आश्रम को पुरुष वर्ग प्रधान और हरिद्वार शाँति कुंज आश्रम को नारी वर्ग प्रधान बनाया गया है। यों किसी आश्रम में किसी दूसरे वर्ग के प्रवेश करने का निषेध नहीं हैं; पर प्रधानता अलग-अलग स्तर की ही रहेगी। इससे न केवल कार्य का विभाजन वितरण होगा वरन् अपने-अपने क्षेत्र पर अधिक ध्यान केन्द्रित करना और अधिक तत्परता से कार्य करना सम्भव हो सकेगा। दोनों आश्रमों में अपने-अपने ढंग के साधन भी जुटते रहेंगे और गति-विधियों का भी संचालन होता रहेगा। शान्ति कुंज की स्थापना-व्यवस्था आदि में मुझे इसी दृष्टि से आगे रखा गया है। यों हर कोई जानता है कि कठपुतली के धागे कहाँ से हिलते हैं और इस सारे तमाशे का सूत्रधार कौन है।
नव युग के अवतरण में नारी का अति महत्वपूर्ण योगदान रहेगा। उसमें अध्यात्म तत्वों की प्रकृति प्रदत्त बहुलता है। यदि ऐसा न होता तो वह पति के लिए, सन्तान के लिए, ससुराल में पराये घरवालों के लिए, इतना असामान्य आत्मदान कर सकने में समर्थ न हो सकी होती। ममता, करुणा, शुचिता और उदारता की उसे मूर्तिमान प्रतिभा कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। उसकी इस मूल भूत विशेषता को उभारे बिना परिवारों के वातावरण में स्वर्ग का अवतरण करने, अगली पीढ़ी में देवत्व की झलक देखने का स्वप्न साकार नहीं हो सकेगा। पशु प्रवृत्ति की मानवी रीति-नीति में बदलने के लिए अगले दिनों नारी की विशेषताओं का समुचित उपयोग किया जाना है। उसे बहुत समय तक हर क्षेत्र में नेतृत्व अपने कन्धों पर वहन करना पड़ेगा। नर का पिछला कर्तृत्व क्रूरता भरा रहा है, उसके खोदे हुए खाई-खन्दकों को पाटने के लिए नारी को आगे आना होगा।
सन् 1975 का बसन्त पर्व इसी के लिए विशेष सन्देश लेकर उतरा है। यों ऐसे सन्देश सदा गुरुदेव भी लपेट लिया गया है। नारी जागरण के लिए इन्हीं क्षणों में ठीक उसी प्रकार शंखनाद किया जा रहा है, जैसा कि कुछ समय पूर्व युग-निर्माण योजना का उद्घोष करते समय किया गया था।
20 जून 71 को मथुरा छोड़कर जब हम लोग हरिद्वार आये तो शान्ति कुंज का उद्घाटन अखण्ड दीपक पर कन्याओं द्वारा महापुरश्चरण के रूप में आरम्भ किया गया। इस धर्मानुष्ठान के पीछे यही घोषणा थी कि इस भूमि से भविष्य में किन गति विधियों का संचालन होना है। इसके बाद एक-एक करके कन्या शिक्षा-योजना प्रशिक्षण सत्र आदि की व्यवस्था क्रमशः बनती चली गई। अब उस संकल्प को अधिक सुव्यवस्थित एवं योजनाबद्ध रूप से अग्रगामी बनाया जा रहा है। इसी बसन्त पर्व का सत्र संचालक शक्ति के निर्देश इस संदर्भ में मिले थे उन्हें कार्यान्वित करने में अविलंब हम लोग जुट गये हैं। गुरुदेव की सत्र शिविर प्रक्रिया भी चलती रहेगी और साथ ही महिला जागरण अभियान की जड़े गहराई तक जमाने का प्रयास बढ़ता रहेगा। आशा की जानी चाहिए कि देशव्यापी संगठन अप्रैल, मई, जून में स्थापित की नहीं गतिशील भी हो जायगा और पत्रिका पुस्तक प्रकाशन कन्या विद्यालय का क्रिया-कलाप 1 जुलाई 75 से चल पड़ेगा। तब तक आवश्यक इमारत बनाने का रुका हुआ कार्य भी किसी न किसी सीमा तक आगे बढ़ ही जायगा।
महिला जागरण अभियान इस वर्ष चार चरणों में आरम्भ किया गया है-
(1) महिला जागरण साहित्य का प्रकाशन। (अ) हिन्दी मासिक पत्रिका ‘महिला जागरण’ का आरम्भ (ब) महिला जागरण की प्रेस की स्थापना (स) महिला जागरण अभियान सम्बन्धी पुस्तकों का प्रकाशन।
(2) वर्तमान महिला शिक्षण सत्रों की तीन-तीन महीने वाली शिविर व्यवस्था का और भी अधिक सुव्यवस्थित रीति से संचालन।
(3) कन्या प्रशिक्षण का एक वर्ष वाली शिक्षा व्यवस्था का अधिक सुचारु ढंग से अब पुनः प्रारम्भ की स्थापना करना। उनके द्वारा रचनात्मक कार्यक्रमों का व्यापक रूप से संचालन।
इन चारों क्रिया-कलापों का सूत्र संचालन केन्द्र शाँति कुंज रहेगा। इस वर्ष सभी प्रवृत्तियां चल पड़ेगी जड़ जमा लेंगी और गति पकड़ लेगी ऐसी आशा की जा सकती है। अगले दिनों उनका क्रमशः अधिकाधिक विस्तार होता चला जायगा और कुछ ही समय में यह नव आरोपित पौधा विशालकाय वटवृक्ष बनकर महिला जागरण लक्ष्य को गगनचुम्बी बनाता हुआ दिखाई देगा।
उपरोक्त चारों प्रवृत्तियों का विवरण इस प्रकार है-
प्रकाशन-
(1) अखण्ड-ज्योति साइज की, उतने ही पृष्ठों की, उसी कलेवर की, हिन्दी मासिक पत्रिका ‘महिला जागरण’ इसी 1 जुलाई 75 से आरम्भ होगी। मूल्य भी अखण्ड-ज्योति जितना ही रहेगा। महिला जीवन से सम्बन्धित सभी पक्षों पर उसमें आवश्यक मार्ग दर्शन रहेगा। घर और बाहर दोनों ही क्षेत्रों को नारी अपनी गरिमा से किस प्रकार आलोकित कर सकती है इसका सर्वांगपूर्ण प्रशिक्षण लेकर यह पत्रिका भावनाशील जीवन्त महिला समाज के पास पहुँचेगी और परिस्थितियों में व्यापक परिवर्तन लाने योग्य प्रकाश एवं साहस प्रदान करेगी।
देश व्यापी महिला जागरण आन्दोलन से सम्बन्धित अपने मिशन के आवश्यक समाचारों के लिए इसी पत्रिका में कुछ पृष्ठ सुरक्षित रहेंगे। शाखा संगठनों को इससे एक दूसरे के परिचय एवं अनुभव उठाने का अवसर मिलता रहेगा।
(2) भारतीय नारी और उसके प्रधान क्षेत्र घर-परिवार की अपने देश में अगणित समस्याएं है, उन पर भारतीय ढंग से विवेचन एवं समाधान प्रस्तुत करने वाली पुस्तकें नहीं के बराबर छपी हैं। इस अभाव की अभाव पूर्ति यह प्रकाशन विभाग करेगा। महिला पुस्तकालयों के लिए, महिला विद्यालयों के लिए अभिनव के अंतर्गत तेजी से छापा जायगा।
(3) पत्रिका तथा पुस्तकों के प्रकाशन के लिए एक प्रेस भी शान्ति कुंज में ही लगाया जायगा। इसमें जहाँ अपने प्रकाशन में सुविधा होगी, वहाँ साहित्यिक रुचि रखने वाली महिलाओं को प्रेस उद्योग की आवश्यक शिक्षा प्राप्त करके स्वावलम्बी एवं सम्मानित जीवनयापन का एक नया मार्ग मिलेगा। सुशिक्षित महिलाएं इस विभाग के संपर्क में रहकर पत्रकार, साहित्यकार एवं प्रेस संचालक का महत्वपूर्ण कार्य कर सकने की योग्यता प्राप्त कर सकेंगी।
इसी विभाग के अंतर्गत ‘रबड़ की मुहरें’ बनाने का एक ऐसा उद्योग भी जुड़ा रहेगा जो स्वतन्त्र भी कहा जा सकता है और संबद्ध भी। संबद्ध इसलिए कि उसमें प्रेस के टाइप, कम्पोज आदि के ही उपकरण काम आते हैं और स्वतन्त्र हुए भी कोई व्यक्ति केवल थोड़ा सा टाइप और छोटी सी मशीन खरीद कर आजीवन अच्छी आजीविका कमाते रहने योग्य बन सकता है।
महिला जागरण प्रेस के कम्पोज, बाइंडिंग आदि कार्यों में केवल महिला कर्मचारी ही काम करेगी। यह सीखी हुई महिलाएं कही भी अपना निजी प्रेस खड़ा कर सकेंगी। दहेज देने की अपेक्षा यदि कन्याओं के पिता छह हजार की लागत का एक प्रेस दे दें तो वह पति सहित ससुराल के कई सदस्यों को उसी गृह उद्योग में लगाकर सब की आजीविका का एक नया साधन खड़ा हो सकती है। रबड़ की मुहरें तथा प्रेस उद्योग में उपरोक्त विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता भी पूरी होती है। मिशन का अपना प्रकाशन कार्य तो उससे सुविधापूर्वक चलता ही है।
भविष्य में प्रेस तथा प्रकाशन विभाग से थोड़ी बचत भी हो सकती है और उससे शाँति कुंज की अर्थ व्यवस्था में कुछ न कुछ योगदान मिलता रह सकता है। इससे भावी क्रिया-कलापों के निश्चितता पूर्वक चलते रहने की सुविधा होगी और जिनके कन्धों पर इस मिशन का उत्तराधिकार उत्तरदायित्व पड़ेगा वे थोड़ी राहत अनुभव करेंगे।
युग निर्माण परिवार के लाखों सदस्य जिस श्रद्धा और तत्परता के साथ सृजन सैनिकों की भूमिका निभा रहे हैं वह देखते ही बनती है। पर उसमें उनके घर की महिलाओं का-विशेषता पत्नियों का योगदान नगण्य ही रहता है कई बार तो वे अपनी नासमझी के कारण उस अपने परिवार और समाज को हर दृष्टि से ऊंचा उठाने वाले कार्य में तरह-तरह के अवरोध भी उत्पन्न करती हैं। जबकि होना यह चाहिए था कि वे अपने घर के लोक सेवी पुरुषों का दाँया बांया हाथ बनकर उन सत्प्रवृत्तियों को आगे बढ़ाने में योगदान करती। इसका कारण उनकी आन्तरिक संकीर्णता ही कही जा सकती है। वे जिस वातावरण में पत्नी और बढ़ी है उसमें वैसा वातावरण मिली ही नहीं जिसमें वे महान आदर्शों का मानव जीवन की सफलता के साथ क्या सम्बन्ध है यह समझ सकतीं।
जीवन कला एवं परिवार निर्माण विद्या की समुचित जानकारी के बिना कोई नारी सच्चे अर्थों में गृह लक्ष्मी नहीं बन सकती और न नारी सुलभ उत्तरदायित्वों को वहन कर सकती है। स्कूली शिक्षा ऊंची से ऊंची क्यों न हो वह नौकरी दिलाने आदि में सहायता कर सकतीं है पर सुगृहिणी बनाने में उसका कोई विशेष योगदान नहीं रहता। सफल जीवन के लिए पग-पग पर काम आने वाले ज्ञान का आज सर्वथा अभाव है। इसके बिना साधन सम्पन्न घर परिवार भी नरक बने रहते हैं। जबकि नारी जीवन का तत्वज्ञान समझने वाली महिलाएं अभाव ग्रस्त और अन्यान्य कठिनाइयों से भरे हुए परिवार में भी स्वर्गीय वातावरण का सृजन कर सकने में पूरी तरह सफल हो सकती है और दूसरों को भी सुखी बना सकती है। किन्तु उस स्तर का न कहीं शिक्षण मिलता है और न वातावरण। अस्तु प्रतिभा सम्पन्न, सुयोग्य एवं सुशिक्षित महिलाएं भी अपने मूल प्रयोजन में प्रायः असफल ही रहती है।
नारी जीवन अपने आप में एक अगणित विशेषताओं से भरा ईश्वरीय वरदान है। उसका स्वरूप और उप और उत्साहवर्धक हो सकती है जिसकी कल्पना मात्र से सिहरन उत्पन्न हो। पति, परिवार और पीढ़ी के निर्माण में सुसंस्कृत नारी का कितना बड़ा योगदान हो सकता यह आज सुखद कल्पना मात्र तक सीमित रहना वाला विषय बना हुआ है उसे मूर्त रूप में प्रस्तुत कर सकने वाले साधन अभी बने ही कहाँ हैं?
इस अभाव में पूर्ति के लिए तीन-तीन महीने के महिला प्रशिक्षण सत्रों की व्यवस्था की गई है जो सिखाया जाना चाहिए उसके लिए यह समय अत्यन्त स्वल्प है पर बाल बच्चे वाले-गृहस्थ संभालने वाले विवाहित महिलाओं से इससे अधिक समय की आशा भी तो नहीं की जा सकती।
युग निर्माण परिवार के सदस्यों को ध्यान में रखते हुए यह शिविर व्यवस्था बनाई गयी कि वे पत्नियों का बहिनों को, पुत्रियों को अथवा अपने घर परिवार की अन्य महिलाओं को इन सत्रों में भेजें और उन्हें सुगृहिणी बन सकने का आवश्यक ज्ञान एवं वातावरण प्रदान करने का एक अवसर प्रस्तुत करें। स्वयं कुछ न करें-जैसी कुछ है उसे निबाह न सकें, आये दिन घर में कलह प्रस्तुत करें तो यह उचित न होगा।
आशा की गई है कि अपने परिवार के सदस्य इन प्रशिक्षणों के लिए अपने घरों की प्रतिभा सम्पन्न महिलाओं को को भेजने की तैयारी करेंगे।
इन तीन महीनों में नारी जीवन को सफल समुन्नत बना सकने योग्य प्रायः सभी जानकारियों का समावेश किया गया है। स्वास्थ्य रक्षा, सन्तान पालन, पारिवारिक सौजन्य, मधुर दाम्पत्य सम्बन्ध, अर्थ सन्तुलन, सुखाद्य, चिन्तन में दूरदर्शिता का समन्वय, सौम्य शिष्ट व्यवहार हंसी-खुशी का हलका-फुलका वातावरण स्वच्छता एवं सुसज्जा, सद्गुणों का संवर्धन, कलह का समाधान, सफल संयुक्त परिवार के आधार भूत तथ्य, कुरीतियों के दुष्परिणाम, जीवन कला का सामान्य ज्ञान, पग-पग पर विवेकशीलता का उपयोग जैसी अनेकों महत्वपूर्ण जीवन क्रम में कायाकल्प प्रस्तुत कर सकने वाली शिक्षाओं का आवश्यक समावेश करने का प्रयत्न किया गया है और आशा की गई है कि तीन महीने में उत्साहवर्धक तत्वों का समावेश करके घर वापस लौटेंगी।
यो इन्हीं तीन महीने की अवधि में कपड़ों की सिलाई रंगाई-घरेलू शाक ,वाटिका, टूट-फूट की मरम्मत, साबुन, मोमबत्ती, सुगन्धित तेल, शरबत स्याहियाँ आदि व्यापार योग्य रसायन बनाना जैसे कला-कौशल एवं गृह उद्योग भी सम्मिलित रखे गये हैं।
अपने क्षेत्र में महिला जागरण के लिए संगठनात्मक प्रचारात्मक कार्य करने के लिए प्रवचन देने की, संगीत के माध्यम से कथा-कीर्तन कर सकने की, हवन संस्कार कराने की, प्रौढ़ महिला विद्यालय चलाने की एवं यथा स्थिति अन्य रचनात्मक प्रवृत्तियों के संवर्धन की शिक्षा भी इस तीन महीने के प्रशिक्षण में सम्मिलित है ताकि शिक्षार्थी महिलाएं अपने-अपने क्षेत्र में नारी जागरण अभियान को सफलता पूर्वक अग्रसर कर सकने में समर्थ हो सकें।
कन्या शिक्षा-
कन्या पाठ्यक्रम एक वर्ष का रखा गया है। 1 जुलाई से आरम्भ होकर 31 मई को समाप्त हुआ करेगा। पढ़ाई 11 महीने चलेगी। 14 वर्ष से अधिक आयु की और आठवें दर्जे से अधिक शिक्षा प्राप्त लड़कियों को ही प्रवेश मिलेगा।
इस प्रशिक्षण में निम्न लिखित वर्ग हैं
(1) सफल गृहिणी बन सकने के लिए वे सभी आवश्यक जानकारियों जिन्हें तीन महीने वाले महिला प्रशिक्षण सत्रों में समाविष्ट किया गया है।
(2) व्यक्ति और संसार के सामान्य किन्तु प्रत्येक आवश्यक विषय की समुचित जानकारी, ब्रह्मांड विश्व, भूगोल, पदार्थ विज्ञान, जीव विज्ञान, वनस्पति शास्त्र, शरीर रचना, आरोग्य शास्त्र, चिकित्सा समाज शिक्षा, अर्थ नीति, राजनीति, कानून, मनोविज्ञान, शिष्टाचार आदि विषयों की सभी जानकारियाँ दी जायेगी जिन्हें जाने बिना मनुष्य कूप-मंडूक की स्थिति में पड़ा हुआ ही कहा जा सकता है।
(3) आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी जीवनयापन कर में फिलहाल इन उद्योगों की व्यवस्था की गई (अ) प्रेस उद्योग- किसी प्रेस में नौकरी कर सकने या स्वयं प्रेस चला सकने की शिक्षा (आ) हर प्रकार की रबड़ की मुहरें बनाकर अच्छा गुजारा कर सकना। (इ) कपड़ों की इस स्तर की सिलाई की, कि दर्जी की दुकान चलाई जा सके, और मशीनों से कपड़ों पर वेल बूटे काढ़ना। (ई) ड्राई क्लीनिंग पद्धति से रेशमी, ऊनी, सूती कपड़े तत्काल धोकर देने की आधुनिक पद्धति तथा नवीन एवं सुगम विधि से कपड़े धोने की वे विधियाँ जिनके अनुसार धुलाई, रंगाई की अच्छी फाउन्ड्री चलाई जा सके (उ) मशीनों की सहायता से एक दिन में कई-कई ऊनी स्वेटर तथा मफलर, टोपे, मोजे आदि बुन सकने की कारीगरों सीख कर अच्छी आजीविका कमा सकना (ऊ) फाउन्टेन पेन तथा बाल पेन्सिलें बनाने का शिल्प तथा उद्योग व्यवसाय स्तर का ज्ञान (ए) कई स्तर के कई प्रकार के खिलौने बनाने और बेचने की जानकारी (ऐ) डबल रोटी, बिस्किट, कोक, नान खताई आदि बनाने की ‘बेकरी शिक्षा’ (ओ) साबुन, मोमबत्ती, अगरबत्ती, तरह-तरह की स्याहियाँ, सुगन्धित तेल, फलों के शरबत आदि रासायनिक वस्तुएं व्यवसाय स्तर पर बनाना (औ) हाथ के बने यज्ञोपवीत उस स्तर पर बनाना जिससे बिना पढ़ी महिलाएं रोजी रोटी कमा सके। उपरोक्त दस शिल्प इस स्तर के हैं जिसमें से किसी को भी स्वावलंबी आजीविका के रूप में चुना और अपनाया जा सकता है। कन्या शिक्षा के एक वर्ष में सामान्य जानकारी तो इन सभी की करा दी जायेगी। पर विशेष कुशल उनकी रुचि के किन्हीं दो विषयों में ही बनाया जा सकेगा।
(4) सामान्य गृहशिल्प की दृष्टि से बर्तनों की टूट-फूट ठीक करना, जूतों की पालिस तथा मरम्मत, चारपाई पलंग बुनना, स्टोव, लालटेन, टार्च, फाउन्टेन पेन आदि उपकरणों की मरम्मत, चाकू-कैंची आदि पर शान रखना, फर्नीचर पर पालिस, किवाड़ों पर रंग मकान पोतना, मकान की टूट-फूट सुधारना, तरह -तरह के अचार, स्वादिष्ट व्यंजन घर में साग भाजी, फूल-बेले उगाना, पुस्तकों की जिल्द बाँधना, रद्दी चीजों के नये उपयोग करना जैसे कार्य सम्मिलित रखे गये हैं।
(5) संगीत अच्छे स्तर पर रखा गया है। हारमोनियम, तबला, ढोलक, मजीरा, घुंघरू, वेंजों वंशी जैसे वाद्य-सुगम संगीत की गायन प्रक्रिया-नाटक, अभिनय, गीत नाटिकाएं, प्रहसन भी इसी वर्ग में सम्मिलित हैं।
(6) खेलकूद, व्यायाम, फौजी कवायद, आसन, प्राणायाम, लाठी, तलवार, भाला, छुरा तीर कमान, हवाई बन्दूक चलाने एवं निशाने लगाने की शिक्षा। सरकारी स्वीकृति मिल सकी तो कारतूसों वाली असली बन्दूक चलाने का प्रबन्ध किया जायगा।
(7) महिला जागरण अभियान को चला सकने के लिए भाषण, संगठन, संस्कार, हवन, कथा का अभ्यास। महिला विद्यालय चला सकने की जानकारी। अपने क्षेत्र में नारी उत्कर्ष की अन्यान्य रचनात्मक प्रवृत्तियों के संचालन की क्षमता का विकास।
उपरोक्त प्रशिक्षण एक वर्ष के स्वल्प समय को देखते हुए कठिन प्रतीत होता है, पर शिक्षा विधि सरकारी स्कूलों की तरह 4-5 घण्टे की न रखकर पूरे आठ घण्टे की रखी गई है। कन्याओं को व्यस्त तो बहुत रहना पड़ेगा, पर जिस मनोयोग से उन्हें शिक्षण मिलना है उसे देखते हुए यही आशा की जा सकती है कि वे इतना सीख लेंगी।
यों यह प्रशिक्षण इतना उपयोगी है कि जिन्हें नौकरी नहीं करनी करानी है, सफल समर्थ और सुसंस्कृत प्रतिभा का विकास करना है वे इसी पाठ्यक्रम की 12 वर्ष से 20 वर्ष की आयु तक पूरे आठ वर्ष में विस्तारपूर्वक और निष्णात अभ्यास के साथ पूरा करें। इसके लिए अपने ही परिवार की ढेरों कन्याएं मिल सकती हैं। पर शान्ति कुंज के स्वल्प साधन को सुविस्तृत अखण्ड ज्योति परिवार की आवश्यकता को देखते हुए फिलहाल इतना ही बन पड़ा है कि एक-एक वर्ष का पाठ्य-क्रम रखा जाय जिसमें थोड़ा उथला ज्ञान सही पर अनेक बालिकाओं को लाभान्वित होने का अवसर मिल सके। प्रयत्न यह किया जायेगा कि एक वर्ष में ही चार वर्ष की पढ़ाई जितना लाभ शिक्षार्थी को मिल सके।
महिला और कन्या शिक्षण सत्र में सम्मिलित होने वाली छात्राओं को भोजन व्यय 60) मासिक लगेगा। जिन्हें सम्मिलित होना हो उन्हें। (1) अपना पूरा नाम (2 पूरा पता (3) पिता या पति का नाम (4) आयु (5) शिक्षा (6) घर का व्यवसाय (7) अब तक के जीवन काल का विवरण लिखकर आवेदन पत्र हरिद्वार भेजना चाहिए और जिस सत्र में आने की स्वीकृति मिले उसमें आने की तैयारी करनी चाहिए।
बच्चों समेत आने की किसी को भी स्वीकृति न मिलेगी। शिक्षार्थियों का शारीरिक मानसिक रोगों से मुक्त, अनुशासन प्रिय-कम से कम आठवीं कक्षा की शिक्षा योग्यता का होना आवश्यक है।
महिला जागरण अभियान-
उपरोक्त तीनों प्रवृत्तियों की व्यवस्था शान्ति कुंज में है। महिला पत्रिका एवं साहित्य का प्रकाशन-तीन महीने का महिला प्रशिक्षण -एक वर्ष का कन्या शिक्षा पाठ्य क्रम यह तीनों ही विभाग हरिद्वार में रहेंगे शान्ति कुंज इन्हीं प्रवृत्तियों का केन्द्र बनता चला जायगा। इसके अतिरिक्त देश-व्यापी, महाअभियान के रूप में नारी-जागरण की विविध प्रवृत्तियों के साथ सुविस्तृत से किया जायेगा। इसका संचालन सूत्र शान्ति कुंज सम्भालेगा, पर उसका विस्तार शाखा, प्रशाखाओं, केन्द्र संगठनों के रूप में व्यापक बनेगा। आन्दोलन को - संघ, संस्था, परिषद, सभा आदि का रूप न देकर ‘अभियान’ माना जायेगा। इसका पूरा नाम ‘महिला जागरण अभियान’ है। जहाँ भी शाखाएं स्थापित होंगी वे अपना नामकरण ‘महिला जागरण अभियान’ शाखा ........... के रूप में करेंगी। उनके साइन बोर्ड, लेटर पैड, रबड़ स्टैंप इसी नाम से बनेंगे।
यह संगठन युग-निर्माण योजना के सृजन सैनिकों को अपनी-अपनी महिलाएं आगे करके यथा सम्भव जल्दी ही आरम्भ कर देने चाहिए। जो भी महिला नारी जागरण की आवश्यकता अनुभव करती है, उसमें दिलचस्पी रखती है और इसके लिए तैयार है वह संगठन की सदस्य बन सकती है। इसका आर्थिक शुल्क नहीं है। ये सदस्यता पत्र भरेगा। उन्हें सदस्य स्वीकार करके शाखा द्वारा सदस्यता का प्रमाण पत्र दिया जायेगा। इन सदस्यों द्वारा अधिक से अधिक दस वयस्क एवं शिक्षित महिलाओं की कार्यकारिणी समिति बना लेनी चाहिये। वह समिति अपने में से एक कार्यवाहक एवं एक कोषाध्यक्ष नियुक्त करेगी। इसकी सूचना हरिद्वार भेजकर शाखा का पंजीकरण प्रमाण पत्र एवं कार्यवाहक का नियुक्ति पत्र मँगा लें। पदाधिकारियों की भीड़ अपने संगठनों में नहीं लगाई जाती, इससे व्यर्थ का ईर्ष्या-द्वेष फैलता है। शाखा संचालन की दृष्टि से एक कार्यवाहक पर्याप्त है। सभी सदस्याएं टीम स्प्रिट से मिल जुलकर अपनी योग्यता का लाभ संगठन को देती रहेंगी।
(1) हर शाखा संगठन सप्ताह में एक बार अपनी एक विचारगोष्ठी, मीटिंग करता रहेगा। उसमें चार कार्यक्रम होंगे (1) सामूहिक गायत्री जप (2) संक्षिप्त गायत्री हवन (3) सहगान कीर्तन - यह तीन कृत्य प्रायः एक घण्टे में पूरे कर लिये जायेंगे और शेष एक दो घण्टे में यह चर्चा होगी कि स्थानीय शाखा द्वारा महिला जागरण की प्रवृत्तियों को किस प्रकार अग्रगामी बनाया जाय। (4) इसे कार्यक्रम परक प्रवचन कह सकते हैं। सामान्यतया शाखाओं को अपने साप्ताहिक कार्यक्रम इन्हीं चार प्रक्रियाओं के साथ आरम्भ करने चाहिए। यह साप्ताहिक कार्यक्रम एक केन्द्र पर भी होते रह सकते हैं और बारी - बारी आमन्त्रण करने वाली महिलाओं के घरों पर भी हो सकते हैं।
(2) सदस्य महिलाओं के जन्म दिन मनाना। इसके लिए उनके घरों पर जाकर आयोजन करना। स्मरण रहे बच्चों के जन्मदिन निजी रूप से भले ही मनाये जायें शाखा की ओर से अनेक आयोजन न हों।
(3) जहाँ सम्भव हो वहाँ रामायण कथाओं का रात्रि में अथवा दिन में तीसरे प्रहर कार्यक्रम चलाया जा सकता है। यह सप्ताह के रूप में या महीने पन्द्रह दिन में जैसी सुविधा हो वैसे क्रम से चलाया जा सकता है।
(4) सत्य नारायण कथा एक दिन की अथवा पाँच जाय।
(5) पुँसवन संस्कार, नामकरण, अन्न-प्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ यह पाँच संस्कार सदस्याओं के बालकों के मनाये जा सकें ऐसा प्रबंध किया जाये।
(6) तीसरे प्रहर 2 से 5 बजे तक चलने वाले प्रौढ़ महिला विद्यालय के संचालन की व्यवस्था बनाई जाय। उसके लिए अध्यापिका का एवं छात्राएँ जुटाने का प्रयत्न किया जाये।
(7) शाखा में महिला पुस्तकालय आरम्भ किया जाय। उसकी पुस्तकें अपने नगर की शिक्षित महिलाओं के घर पर पहुँचाने एवं वापस लाने का प्रबन्ध किया जाये।
(8) स्कूलों में जाने वाली लड़कियों की शिक्षा को परिपक्व कराने के लिए जहाँ सम्भव हो वहाँ रात्रि पाठशालाएं चलाई जायं।
(9) संगीत एवं भाषण में रुचि रखने वाली महिलाओं को उस प्रकार का अभ्यास कराया जाये ताकि वे स्थानीय शाखा में प्रवक्ता की आवश्यकता पूरी कर सकें।
(10) पर्व त्यौहार आदि पर स्थानीय महिलाओं के सामूहिक आयोजन किये जायें और वर्ष में एक बार वार्षिकोत्सव के रूप में बड़ा आयोजन करने की तैयारी करते रहा जाय।
भविष्य में अपने महिला जागरण अभियानों को बड़े-बड़े काम करने हैं पर अभी आरम्भिक कार्य पद्धति के रूप में दस-दस सूत्री योजना को ही कार्यान्वित करना चाहिए। जब यह क्रम चल पड़े और संगठन में स्थिरता प्रौढ़ता एवं गतिशीलता उत्पन्न हो जाये तो उस परिपक्व पृष्ठभूमि पर आगे की दीवार चुनी जाय और विशाल भवन बनाने का ढाँचा खड़ा किया जाये।
निकट भविष्य में दूसरे चरण के रूप में महिला जागरण अभियान की शाखाओं को जो करना है वह यह है कि जिस प्रकार हरिद्वार में तीन तीन महीने वाले पूर्ण तो नहीं पर उसी आधार पर - उसी से मिलते -जुलते पाठ्यक्रम चलाये जायें। तीन महीने की शिक्षा में प्रायः 75 बौद्धिक प्रवचन महिलाओं को मिलते हैं। उन्हें जल्दी ही छाप दिया जायेगा। हर दिन एक प्रवचन एक लाख शाखाएं अपनी सदस्याओं को सुनावेंगी तो उन्हें यह आभास मिल जायेगा कि शान्ति कुंज से प्रौढ़ महिलाओं को क्या सोचने के लिए - क्या बनने के लिए और क्या करने के लिए कहा जा रहा है। हरिद्वार पाठ्यक्रम का संगीत, शिल्प आदि व्यवस्थाएं भी बन पड़े तब तो सोना सुगन्ध वाली बात रहेगी अन्यथा कम से कम बौद्धिक प्रकाश एवं प्रेरणात्मक मार्ग दर्शन तो मिल ही जायेगा। उतना भी कुछ कम नहीं है।
ठीक इसी प्रकार शान्ति कुंज में चल रही एक वर्षीय कन्या शिक्षा की बौद्धिक शिक्षाएं भी 300 पाठों के रूप में छाप दी जायेंगी। उन्हें भी शाखाएं अपनी कक्षाओं में चला सकती हैं। कुछ गृह उद्योग भी यथा सम्भव उनमें सम्मिलित किये जा सकते हैं और किसी कदर छोटा पूरा एक वर्षीय शिक्षण क्रम भी हर शाखा में चल सकता है। एक बार तीन महीने वाला, दूसरी बार एक वर्ष वाला या फिर जैसा भी जहाँ जो बन पड़े वह शिक्षण क्रम भी किसी न किसी रूप में चलना है। महिला पुस्तकालयों का घर - घर पहुँचाने वापस लाने का क्रम अगले दिनों और भी अधिक सुव्यवस्थित रूप से गतिशील किया जाना है। गोष्ठियों एवं सम्मेलनों में, प्रभात फेरी, जुलूस, प्रदर्शन से आरम्भ करके आवश्यकता पड़ने पर दहेज, मृत्यु भोज, पशु बलि जैसे अवाँछनीय कृत्यों के विरुद्ध सत्याग्रह तक उस प्रखरता को विकसित करना है। इससे आगे की और भी बहुत सी योजनाएं जिनकी समय पूर्व चर्चा करना अनुपयुक्त ही रहेगा।
जिन शाखाओं में अधिक जीवन दिखाई पड़ेगा उन्हें अपने कार्य को अधिक गति देने के लिए एक दस दिवसीय शिविर सम्मेलन करने के लिए कहा जायेगा। उसकी रूप-रेखा समयानुसार बता दी जायेगी। इसके लिए हरिद्वार से दो प्रचारिकायें भेज दी जायेंगी और भरसक प्रयत्न करेंगी। विश्वास किया जाना चाहिए कि वह दो प्रचारिकाओं का जत्था निर्धारित लक्ष्य को बहुत हद तक पूरा करा सकने में सफल होकर रहेगा।
तीन महीने वाले सत्रों के लिए - एक साल वाले पाठ्यक्रमों के लिए, महिला पुस्तकालयों के लिए जिस साहित्य की आवश्यकता पड़ेगी उसे लिखने और प्रकाशित करने की योजना अत्यन्त गम्भीरता पूर्वक बनाई जा रही है और उस आवश्यकता की पूर्ति के लिए घोर प्रयत्न करने की ठान ठानी गई है। यही सामग्री गोला बारूद का काम करेगी और उस असुरता के किले पर धुँआधार बरसेगी जिसने नारी की गरिमा एवं क्षमता को पैरों तले रौंदकर रख दिया है। जिसने स्वर्ग का सृजन कर सकने में सर्वथा समर्थ देवी को वासना की कठपुतली और पराधीनता के निविड़ बन्धनों में जकड़ी हुई क्रीत दासी मात्र बनाकर रख दिया है।
महिला जागरण अभियान आरम्भ करने के लिए तत्काल कुछ सामग्री की आवश्यकता पड़ेगी। जैसे (1) सदस्यता के आवेदन पत्र और स्वीकृति के 25 प्रमाण पत्रों वाली सुन्दर सदस्य पुस्तिका (2) शाखा के नियम, संगठन, कार्यक्रम एवं विभिन्न हलचलों के सम्बन्ध में आने वाली समस्याओं का समाधान बताने वाली मार्ग दर्शक पुस्तिका (3) आवश्यक कार्यों के लिए धन संग्रह की रसीद बही (4) छपे हुए लेटर पैड, अंतर्देशीय, कार्ड, लिफाफे आदि तथा रबड़ की मुहर जो रसीद बही समेत इन सभी पर स्थान वाली खाली जगह पर लगाई जा सकें। इस पद्धति से थोड़े से पैसों से ही सब आवश्यक स्टेशनरी शाखाओं को उपलब्ध हो जायेंगी।
यह सभी वस्तुएं महिला शाखाओं को अति स्वल्प मूल्य में उपलब्ध कराने की व्यवस्था बनाई जा रही है और यह प्रयत्न किया जा रहा है कि शाखा के लिए साइन बोर्ड भी सस्ते मूल्य में मिल सकें।
इनके अतिरिक्त महिला आन्दोलन से सम्बन्ध रखने वाले छोटे प्रचार पत्रक, पोस्टर, कार्ड, रबड़, स्टैंप आदि की एक शृंखला बनाने की योजना है। स्लाइड प्रोजेक्टर पर महिला समस्याओं को रंगीन प्रकाश चित्रों के रूप में प्रदर्शित किये जा सकने के उपकरण जुटाये जायेंगे और संभव हुआ तो चलते-फिरते, बोलते, गाते फिल्म भी शान्ति-कुंज से ही बनने लगेंगे जिनके आधार पर गली-गली, मुहल्ले-मुहल्ले, गाँव- गाँव आकर्षक मनोरंजन के साथ -साथ महिला जागरण का सन्देश सुनाया जा सके और युगान्तर चेतना का पांचजन्य बजाया जा सके। अभी यह योजनाएं तैयारी के क्षेत्र में पक रही हैं। पर आशा की जानी चाहिए कि मनुष्य की कल्पनाएं निष्फल हो सकती हैं, पर महाकाल के संकल्प तो मूर्तिमान होकर ही रहते हैं। आज नहीं तो कल इन योजनाओं को भी कार्यान्वित होना उसी प्रकार देखा जा सकेगा जिस प्रकार भूतकाल में असम्भव समझे जा सकने वाले कार्य एक के बाद एक क्रम से सम्भव होते चले गये हैं।
साधन बड़ा या साहस इसका निर्णय ढूंढ़ने के लिए नारवे के एक उत्साही युवक थोर हेयर डेहले ने एक उदाहरण लोगों के सामने प्रस्तुत किया। उपदेश करने की अपेक्षा यह तरीका उसे अच्छा लगा कि उदाहरण प्रस्तुत करके लोगों को अपनी स्वतन्त्र चेतना द्वारा किसी निर्णय पर पहुँचने का अवसर दिया जाय। यह उत्साही युवक साहस को प्रधान मानता है और कहता है साहसी या तो साधन प्राप्त कर लेता है अथवा न्यूनतम साधनों से भी आगे बढ़ने और सफलता पाने का रास्ता निकाल लेता है।
थोर का प्रयोग यह था कि ‘सरकंडे’ की नाम के सहारे भी कठिन दिखने वाली लम्बी समुद्र यात्रा सफलतापूर्वक सम्पन्न की जा सकती है। इस लोहे विशालकाय यन्त्र सज्जित जहाजों के जमाने में सरकंडे जैसे दुर्बल साधनों से बनी नाव की क्या तुलना हो सकती है। पर उसके उपयोग से यह तो साबित किया ही जा सकता है कि मनुष्य का पुरुषार्थ और मनोयोग इतना प्रबल है कि साधन न होने पर भी उसके द्वारा साधन सम्पन्नों जैसे कर्तृत्व दिखाये जा सकें।
नारवे के उपरोक्त युवक ने इथोपिया की कैडझील में काम करने वाले मछुआरों की सहायता से पहली सरकंडों से बनी नाव बनाई। यह उतनी अच्छी नहीं बनी और अपना लक्ष्य पूरा न कर सकी। वह 4352 मील चलकर अटलांटिक सागर में अपना दम तोड़ गई। पर इससे थोर निराश नहीं हुआ। आरम्भिक असफलताओं से उसका मन जरा भी छोटा नहीं हुआ। हिम्मत हारने की तो इसमें बात ही क्या थी। सफलता एक बार के ही प्रयत्न से मिल जाया करे तो फिर उसे कोई भी प्राप्त कर लिया करे? साहस की परीक्षा तो असफलता की कसौटी पर ही होती है।
हेयर डेहल ने दूसरी नाव लैटिन अमेरिका के वोलोविया क्षेत्र में स्थित नितचाचा झील में काम करने वाले मछुआरों की सहायता से बनाई। यह भी सरकंडों की ही थी। इस नाव में विभिन्न देशों के सात अन्य यात्री भी अपने सामान सहित सवार हुये। 17 मई 1970 को मोरक्को (अफ्रीका) के साफी बन्दरगाह से यह नाव रवाना हुई और 12 जुलाई 70 को दक्षिणी अमेरिका के बारण्डोस क्षेत्र के ‘ब्रिज’ टाउन बन्दरगाह पर पहुँची।
ब्रिज टाउन पहुँचने पर इस सरकण्डे की नाव पर इतना लम्बा और इतना दुस्साहसपूर्ण सफर करने वाले दल की अगवानी बीस लकड़ी की नावों ने पंक्तिबद्ध होकर बड़े भावपूर्ण वातावरण में की। बन्दरगाह दर्शकों की भीड़ से खचाखच भरा हुआ था। स्वागत की आवश्यक सजधज लोगों ने पूरे उत्साह के साथ की थी। दर्शकों को इस निष्कर्ष पर पहुंचने में सहायता ही मिली, कि अदम्य साहस स्वल्प साधनों से भी बड़ी सफलताएँ प्राप्त कर सकता है जबकि मनोबल और पुरुषार्थ के अभाव में विपुल साधन रहते हुए भी असफलताएँ ही हाथ लगती हैं।
इस यात्रा में सभी थोर दल को कई बार समुद्री तूफानों और विशालकाय जल जन्तुओं से टकराना पड़ा। कठिन दिनचर्या को अपनाये बिना तो यह यात्रा हो ही नहीं सकती थी। थोर कितने ही स्थानों से समुद्र जल के नमूने भर कर लाये और उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ को यह नमूने प्रस्तुत करते हुए कहा कि समुद्री जहाज जिस कदर समुद्र के तल पर विषाक्त चिकनाई छोड़ रहे हैं उसके फलस्वरूप कुछ ही दिन में समुद्री जल जीवों पर संकट उत्पन्न हो जायेगा और बादलों में वह विषाक्त अंश मिलकर सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध होगा।
सरकण्डे की नाव ने अपनी यात्रा का उद्देश्य पूरा कर लिया अब उसे ओसलों (नारवे) के कोनटिक संग्रहालय में इसलिए सुरक्षित रखा गया है कि दर्शकों साधनों के अभाव में भी साहस की प्रबलता का महत्व समझ सकें।
असन्तुलित आहार-बिहार ही वह खदान है जहाँ से अनेकानेक नाम लक्षणों वाले रोग उत्पन्न होते हैं। विधाता ने शरीर का निर्माण जिन तत्वों से किया है वे इतने समर्थ हैं कि स्वास्थ्य को क्षति पहुँचाने वाले बाहरी आक्रमणों का भली प्रकार सामना कर सकें। जिस प्रकार मनुष्य अपनी गलतियों का दोष भाग्य को ग्रह-नक्षत्रों को देकर मन बहला लेता है उसी प्रकार बाहर के रोग कीटाणुओं के आक्रमण की बात कहकर रोगी अपनी निर्दोषता सिद्ध करता है पर वस्तुतः वैसी बात है नहीं। यदि हम अपने रक्त को दुर्बल न करें तो उसमें रहने वाले सुरक्षा सैनिक-श्वेत कण किन्हीं भी भयंकर से भयंकर रोग कीटों को शरीर में प्रवेश करते ही मार-पीट कर बाहर खदेड़ दे सकते हैं।
वस्तुतः हमारी आन्तरिक दुर्बलताएं ही रोगों की जननी हैं। चिन्तन को विकृत करके हम मानसिक रोगों को बुलाते हैं और आहार-बिहार को भ्रष्ट करके स्वाभाविक शरीर यात्रा को अवरुद्ध करते हैं और बीमारियों को आमन्त्रित करते हैं।
इन दिनों शारीरिक और मानसिक उच्छृंखलता चरम सीमा पर है। प्रकृति को पग-पग पर चुनौती देना सभ्यता का अंग बन गया है। कृत्रिमता और विलासिता स्वभाव का अंग होती जाती है। इसका प्रतिफल कुछ ऐसे रोगों के रूप में सामने आ रहा है जो दिन-दिन अधिक व्यापक होते जाते हैं। इन्हें सभ्यता के रोग कहा जा सकता है। हृदय रोग, अनिद्रा, प्रपंच, मधुमेह, रक्तचाप यह पाँच रोग ऐसे हैं, जिन्होंने एक चौथाई लोगों को अपने चंगुल में ग्रस लिया है और वे क्रमशः अपना कार्य क्षेत्र विस्तृत करते चले जा रहे हैं।
इन पंक्तियों में मधुमेह की चर्चा की जा रही है। शरीर में शर्करा की मात्रा बढ़ जाने से पेशाब में रक्त का अनुपात बढ़ जाता है। यह बढ़ोत्तरी कितने ही प्रकार के दुखदायी लक्षण उत्पन्न करती है। बार-बार, जल्दी-जल्दी पेशाब जाने से सामान्य कार्यों में विशेष उत्पन्न होता है। राम में बार-बार नींद टूटती है। फलस्वरूप थकान छाई रहती है। रक्तचाप बढ़ने लगता है। सभी जानते हैं कि बड़ा हुआ ब्लड प्रेशर कितनी थकान और बेचैनी उत्पन्न करता है। सिर में चक्कर आने लगते और लकवा हो जाने का हार्ट अटैक होने का डर हर समय बना रहता है। कहीं छोटा-सा जख्म हो जाय तो मुद्दतों में अच्छा होता है। कभी-कभी तो वह अच्छा होने के स्थान पर बढ़ता ही जाता है और ऐसा गलाब बन जाता है कि जान देकर ही हटता है। आपरेशन करना तो डाक्टरों के लिए कठिन हो जाता है क्योंकि मधुमेह के रोगी के घाव भरना टेड़ी खीर होती है।
हम जो कुछ खाते हैं उस आहार में से अधिकतर भाग मुख और आमाशय से निकलने वाले रसों के सम्मिश्रण से शर्करा के रूप में बदल जाता है। इस शर्करा में से जितनी मात्रा शरीर के लिए आवश्यक है उतनी सोख ली जाती है और शेष को मल-मूत्र, स्वेद, साँस आदि के मल विसर्जन भागों से बाहर कर दिया जाता है। इस शर्करा नियन्त्रण का कार्य एक विशेष रसायन द्वारा सम्पन्न होता है जिसे ‘इन्सुलिन’ कहते हैं।
पाचन ग्रन्थि-पेनक्रयाज-जिसे अग्न्याशय भी कहते हैं इन्सुलिन का उत्पादन उद्गम है। इस उत्पादन में गड़बड़ी होने के कारण शर्करा पर से नियन्त्रण उठ जाता है और वह पेशाब एवं रक्त में सम्मिलित होकर अनेक प्रकार के उपद्रव खड़े करती है। अवयवों की दृढ़ता को नष्ट कर उन्हें लिबलिबा-लुचलुचा बना देने की विकृति इस बढ़ी हुई शर्करा के कारण ही उत्पन्न होती हैं।
जीवन संचार के महत्वपूर्ण अंग इस बढ़ी हुई शर्करा के कारण अपनी स्वाभाविक क्षमता खोते चले जाते हैं। फलतः कई प्रकार के चित्र-विचित्र रोग सामने आते हैं। गुर्दे, आँखें और नाड़ियाँ इस विषमता से विशेषतः प्रभावित होते हैं। आँखों की ज्योति घटती जाती है-नाड़ियों में अकड़न और इठन रहती है- गुर्दे गलते हैं और पेशाब में न केवल मिठास वरन् चिकनाई, गाढ़ापन तथा खटाई बढ़ने से बदबू भी आने लगती है। सिर दर्द, चक्कर आना, रक्तचाप भी क्रमशः बढ़ते जाते हैं रक्त ऐसा अशक्त हो जाता है कि कहीं घाव या फुन्सी हो जाय तो उसे अच्छा करने के लिए जिस भीतरी रासायनिक क्षमता की आवश्यकता होती है उसे जुटाना भी सम्भव नहीं होता। फलतः छोटे-छोटे जख्म अच्छे होने में लम्बा समय ले जाते हैं कभी-कभी तो वे बढ़ते-बढ़ते जीवन संकट तक उत्पन्न कर देते हैं। गुब्बारे में एक छेद होने से जिस प्रकार उसके अस्तित्व को खतरा उत्पन्न हो जाता है वैसे ही छोटे-छोटे जख्म भी मधुमेह के रोगी के लिए संकट उत्पन्न कर देते हैं।
जिन कोशिकाओं से इन्सुलिन का उत्पादन होता है वे पेनक्रयाज (अग्न्याशय) के एक बहुत छोटे भाग में रहती हैं। इसे उस संस्थान का एक प्रतिशत भाग कह सकते हैं। फिर भी उत्पादन इतनी बड़ी मात्रा में होता है कि प्रस्तुत इन्सुलिन से पूरे आहार की शर्करा पर नियन्त्रण किया जा सके। हमारी आन्तरिक व्यवस्थायें भी कैसी विलक्षण हैं।
कई बार मधुमेह वंश परम्परा के साथ भी चलता है। इसलिए इस रोग से पीड़ितों को सन्तानोत्पादन से बचना चाहिए ताकि भावी पीढ़ी को इस अभिशाप से ग्रसित जीवन न जीना पड़े। आहार का सन्तुलन बनाये रहने से मोटापा बढ़ने से रोका जा सकता है। कहना न होगा कि भेद वृद्धि भी मधुमेह का एक बड़ा कारण है। हलके व्यायाम और शारीरिक हलचलों को बनाये रहने वाली दिनचर्या का ध्यान रखा जाय तो इस रोग की सम्भावना बहुत घट जायगी। कुर्सी पर बैठे रहने वाले-चारपाई तोड़ने वाले आरामतलब लोग अवसर इस व्यथा के शिकार बनते हैं। रोगी होने पर तो इस भूल को सुधारना ही चाहिए। कठिन परिश्रम के योग्य तो उनका शरीर नहीं रहता पर टहलना और शारीरिक हरकतें करते हुए थकान उत्पन्न करने तक श्रमशील बनने की चेष्टा तो उन्हें करनी ही चाहिए।
सामान्यतया आमाशय में पचा हुआ श्वेत सार रक्त के साथ यकृत में पहुँचता है। वहाँ शकर की अधिक मात्रा ग्लाइकोजन में बदल जाती है। रक्त में जितनी शकर की आवश्यकता है उतनी तो उसमें रहती है शेष बाहर निकाल दी जाती है। मधुमेह के रोगियों की स्थिति में एक गड़बड़ी तो यह होती है कि पाचन ग्रन्थियों द्वारा निकलने वाले ‘इन्सुलिन’ की कमी पड़ जाने से भोजन में रहने वाले श्वेतसार एवं शकर स्तर के पदार्थों का पाचन एवं अभिशोषण ठीक प्रकार नहीं हो पाता। दूसरी ओर यकृत में जमा रहने वाला ग्लाइकोजन घटने के कारण ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है। इस गड़बड़ी के कारण रक्त में शकर की मात्रा बढ़ जाती है। उसे निकालने के लिए गुर्दों को अत्यधिक कार्य करना पड़ता है। वे बढ़ी हुई शकर को मूत्र मार्ग से बाहर निकालने में जुटे रहते हैं और जितना सम्भव है उतना उसे बाहर निकालते रहते हैं। जो अंश नहीं निकल पाता वह रक्त में मिला रह जाता है। मूत्र में शकर की अधिकता की स्थिति को डाक्टरी भाषा में ग्लोडको यूरिया कहते हैं।
मधुमेह धीरे-धीरे बढ़ता है। आरम्भ में मूत्र की मात्रा बढ़ने और उसके जल्दी-जल्दी आने के लक्षण प्रकट होते हैं। शरीर का वजन घटने लगता है। आँखों की ज्योति कम होना, थकान, कमजोरी, प्यास की अधिकता, चमड़ी का ढीली होना तथा रूखी रहना मूत्रेन्द्रिय में खुजलाहट, शरीर में सनसनाहट जैसी और भी कई विकृतियाँ उत्पन्न होती जाती हैं।
सामान्यतया हमारे रक्त में 0.08 से लेकर 0.10 प्रतिशत तक शर्करा रहती हैं यदि वह मात्रा बढ़ कर 0.25 तक पहुँच जाय तो इससे जिगर, गुर्दे तथा क्लो ग्रन्थियों को भारी हानि पहुँचाती है।
जिन पदार्थों में श्वेतसार की मात्रा न्यून है और जो मधुमेह के रोगियों के लिए उपयुक्त आहार तालिका दी है। जिसमें 1 से 5 प्रतिशत ‘न्यूनतम’ श्वेतसार वाले पदार्थों में पत्तेदार शाक,, सरसों की पत्ती, मेथी, पात गोभी, फूल गोभी, लौकी, खीरा, ककड़ी, मूली, टमाटर, नीबू, जामुन, मीठा नीबू, छाछ प्रधान हैं। इससे कुछ अधिक मात्रा में अर्थात् 5 से 10 प्रतिशत तक श्वेतसार वाले पदार्थों में तोरई, चुकन्दर, गाजर, शलजम, परबल, भिण्डी, प्याज, लोविया, सेम, खरबूजा, तरबूज, नारंगी जैसे प्रधान फल आते हैं। इससे आगे 10 से 15 प्रतिशत श्वेतसार वाले पदार्थों में हरी मटर, हरा चना, अमरूद, सेब, अंगूर, नाशपाती आदि की गणना है। सूखे अनाजों में श्वेतसार कहीं अधिक रहता है इसलिए वे मधुमेह के रोगी के लिए उपयुक्त नहीं पड़ते।
ऐसे रोगियों को पियामिन नियासिन, रिबोल्फैबिन और विटामिन बी0 12 जैसे तत्वों की अधिकता वाले खाद्य पदार्थ लेने चाहिए। यह चीजें, गाजर, शलजम, चुकन्दर, हाथीचक, पनीर और पत्तीदार हरे शाकों से मिल सकते हैं। चूने की भी ऐसे रोगियों के शरीर में कमी पड़ती है इसके लिये केला लेना चाहिए।
मधुमेह के रोगी को प्यास अधिक लगती है फलतः पेशाब भी अधिक होता है। अतः पेशाब के साथ विटामिन बी ओर विटामिन सी की मात्रा निकल जाती हैं। अस्तु उन्हें इन तत्वों की पूर्ति कर सकने वाले आहार को भी प्रमुखता देनी चाहिए।
मशीन का साफ किया चावल, मिल का पिसा आटा और दानेदार चीनी यह तीनों ही चीजें ऐसे अखाद्य हैं जिनसे मधुमेह उत्पन्न हो सकता है और बढ़ सकता है। अस्तु हाथ के कुटे चावल, घर की चक्की के पिसे चोकर समेत आटे को ही प्रधानता देनी चाहिए। चीनी से गुड़ अच्छा है पर जब मधुमेह का कोप हो चले तब तो गुड़ भी बेकार है। मिठाई के अलावा किसी तरह काम न चले तो सेकरिन ली जा सकती है पर है तो वह भी कोलतार से बनी होने के कारण हानिकारक ही है।
आयुर्वेद के मतानुसार जामुन, वेल और करेला का उपयोग मधुमेह के लिए लाभदायक माना गया है। यह सब शरीर शास्त्रियों द्वारा बताया गया विवेचन एवं उपचार है। अध्यात्म उपचार यह है कि अपने भोजन को तुरन्त परिवर्तित किया जाय। शाकाहार, फलाहार और छाछ को प्रधानता दी जाय। श्वेतसार युक्त पदार्थों से बचा जाय। भूख से कम खाया जाय। शारीरिक श्रम की न्यूनाधिकता को सन्तुलित किया जाय। विश्राम पूरा लिया जाय। इन्द्रिय संयम बरता जाय और मस्तिष्क को चिन्ताओं के तनावों से -मनोविकारों से मुक्त रखकर हँसता हँसाता, हलका-फुलका जीवन जिया जाय। आशा और उत्साह को बनाये रखें, प्रकृति के अनुकूल जीवनयापन करें मो हर रोग से से छुटकारा पाया जा सकता है। इन उपायों के साथ शरीर शास्त्रियों द्वारा बताये उपचार भी किये जायें और आवश्यक सतर्कता बरती जाय तो रोग मुक्ति और भी सरल हो जाती है।
खजूर का पेड़ बहुत ऊँचा होता है; पर उसकी छाया में शीतलता पाने का अवसर किसी को नहीं मिलता। ऐसी उन्नति किस काम की जिसका लाभ स्वयं ही उठाता रहे अन्य किसी को उससे सुविधा प्राप्त करने का अवसर ही न मिले।
सुना है भूमिगत खजाने पर उसका मालिक सर्प बनकर जा बैठता है। रखवाली करता रहता है कि कहीं कोई व्यक्ति आकर उसे उखाड़ कर ले जाने और लाभ उठाने में सफल न हो जाय।
किस के पास कितना वैभव है इसकी कोई महत्ता नहीं। जहाँ तक व्यक्तिगत उपभोग का सम्बन्ध है- एक बहुत छोटी मात्रा में ही सम्पत्ति को काम में लाया जा सकता है। थोड़े से आहार से पेट भर जाता है और थोड़ा सा कपड़ा पहना जा सकता है, जीवन की मूल आवश्यकताएँ और उपभोग की क्षमताएं नगण्य हैं। एक सीमा तक ही वस्तुओं का प्रयोग हो सकता है। इसके बाद तो वह लोभ, मोह की सनक पूरी करने के लिए किसी भण्डार में ही जमा पड़ी रहती हैं। बुद्धिमत्ता इस उपार्जन के श्रेष्ठतम सदुपयोग में है। लालच और कृपणता से ग्रसित होकर यदि संपत्ति का संग्रह भर करते चलें तो उससे कुछ बनेगा नहीं। यदि सदुपयोग करने की दूरदर्शिता अपने में नहीं है तो फिर उसका दुरुपयोग होना ही निश्चित है। मरने के बाद कुटुम्बियों और सम्बन्धियों में किस प्रकार उस हराम के पैसे को पाने के लिए ईर्ष्या, द्वेष भड़कता है यह देखते ही बनता है। जिनके हाथ वह मुफ्त का पैसा लगता है वे किस तरह उसे व्यसन, व्यभिचार में फूंकते उड़ाते हैं वह सहज ही सर्वत्र देखा जा सकता है।
बुद्धिमता कमाने में नहीं खर्च करने में है। भाग्य को भी धनी बना सकते हैं। चोर, उचक्के भी अनीति पर उतारू होकर बहुत कुछ कमा लेते हैं। धनी होना गौरव की बात नहीं। दूरदर्शी विवेकशीलता की परख इसमें है कि उपार्जन का उपभोग किस प्रकार किया गया। यदि उसे संग्रह भर किया जाता रहा और उससे लाभ लेने का अवसर मात्र थोड़े से वंशजों को ही दिया गया तो इसे जरूरतमन्दों अथवा सत्कार्यों को उस लाभ से वंचित रखना ही कहा जायगा।
हमारी योग्यता, क्षमता एवं उपार्जन की सफलता का श्रेय समस्त समाज की है जिसकी सहायता से हमारा व्यक्तित्व उभरा और सफलताएँ प्राप्त कर सकने का अवसर मिला। दूसरे प्राणी तो एकाकी जीवन भी जी सकते हैं पर मनुष्य के लिए तो उतना भी सम्भव नहीं। जन्म से लेकर मरण तक हर कार्य और हर क्षेत्र में उसे दूसरों की सहायता पर निर्भर रहना पड़ता है। इस अनुदान का प्रतिदान चुकाये जाने का यही एक मात्र उपाय है कि हम अपनी नितान्त आवश्यकताएँ पूरी करने के उपरान्त जो कुछ बच जाय उसे उस समाज के उत्कर्ष में खर्च करें, जिसने हमें कमाने योग्य बनाने में अनवरत योगदान दिया है।
सराहनीय उसी का दृष्टिकोण है जिसने उपार्जित सम्पदा का सदुपयोग किस प्रकार होना चाहिए इस प्रश्न पर गम्भीरता पूर्वक विचार किया और अपनी उपलब्धियों से संसार में श्रेष्ठ परंपराएं स्थापित करने का प्रयोजन पूरा किया। जिसने मोह वश किसी व्यक्ति विशेष को लाभान्वित करने की बात सोचने की अपेक्षा यह सोचा कि किस प्रकार समाज की अधिक उन्नति के लिए अपने उपार्जन का सदुपयोग हो सकता है। हमें न तो खजूर बनना चाहिए और न सर्प। न शरीर पोषण तक सीमित रहना चाहिए और न सन्तान को अमीर बनाने के ताने-बाने बुनने चाहिए। उचित कर्त्तव्यों का पालन करने के उपरान्त जो कुछ भी श्रम, समय, ज्ञान, प्रभाव, धन, वैभव आदि बचता है उसे लोक मंगल के लिए वापिस करना ही दूरदर्शिता पूर्ण कार्य है।
उन दिनों संसार भर में यह सर्वविदित था कि भारत स्वर्ण सम्पदाओं का स्वामी है। यहाँ साक्षात् लक्ष्मी का निवास है। भारत पारस मणि की तरह है। उनके साथ जिनका भी संपर्क होता था, वे अपनी लोह दरिद्रता को खोकर स्वर्ण सम्पदाओं के अधिपति बन जाते थे। यह मान्यता अकारण न थी। भारत से व्यापारी लोग जल मार्गों और थल मार्गों से देश-देशान्तरों में जाते थे और वहाँ के लोगों को उन वस्तुओं से लाभान्वित करते थे जिन्हें पाना उनके लिये किसी बड़े सौभाग्योदय से कम न था। लोग प्रतीक्षा लगाये बैठे रहते थे कि कब भारतीय व्यापारी इधर आवें और कब हमें दैवी वरदानों जैसे उपयोगी पदार्थों से लाभान्वित करें। उनका यह सोचना सही ही था जो इतनी दूर जाकर इतनी उपयोगी वस्तुएँ यहाँ तक पहुँचाते हैं, उनका अपना देश न जाने कितना सुसम्पन्न होगा।
इस प्रश्न पर सर्वत्र चर्चा होती रहती थी कि भूमि की दृष्टि से प्रकृति सम्पदाओं की दृष्टि में अन्य देश भी भार जैसे ही हैं-मनुष्यों की बनावट भी अन्य भूखण्डों में एक जैसी ही है फिर इसी देश के निवासी कैसे इतने सुसम्पन्न हैं कि स्वर्ग जैसी सुख-सुविधाओं से भरा-पूरा जीवन जीते हैं। और अपनी विभूतियों के अनुदान संसार भर में बिखेरते फिरते हैं। इस प्रश्न का कोई भौतिक समाधान न था। गहराई में जो उतरा उसने एक ही उत्तर पाया कि भारत के निवासियों का चिन्तन, दृष्टिकोण अतिमानवों जैसा है। वे अपने सुविकसित सद्गुणों के कारण सामान्य परिस्थितियों में भी असामान्य उपार्जन कर लेते हैं। जो कमाते हैं उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करना जानते हैं। फलतः उतने में ही वे लोग स्वयं भरपूर सुविधा साधनों से भरे लदे रहते हैं। साथ ही अपनी सहज उदारता से अपनी विभूतियों को बादलों की तरह अन्यत्र बिखेरते हुए, अपने कर्तव्य के सत्परिणाम देखते हुए, मुदित रहते हैं, प्रमुदित करते हैं।
भारत भूमि इन्हीं तथ्यों की सफल प्रयोगशाला रही है। यहाँ उच्च मानवीय सद्गुणों को सर्वोपरि उपलब्धि माना जाता रहा और इसके लिए अथक परिश्रम एवं बड़े से बड़ा कष्ट सहन किया जाता रहा। फलतः व्यक्तित्व निखरा और साथ ही अजल वैभव उसी प्रकार समवेत होता रहा जिस प्रकार खिले हुए कमल पुष्प पर भ्रमर समूह बना बुलाये ही मंडराता रहता है। इस सचाई को कोई भी परख सकता है कि आलस्य और प्रसाद ही मनुष्य को दरिद्री बनाते हैं। व्यसन ओर अपव्यय को अपनाकर ही कंगाली का शिकार रहना पड़ता है। सुसंतुलित और सुव्यवस्थित गतिविधियाँ अपनाने वाले अभीष्ट उपार्जन सहज ही इतनी मात्रा में कर सकते हैं, जिसे सन्तोषजनक कहा जा सके। फिर उसे अपव्यय से बचाकर जो उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग की बात सोचता रहेगा वह सच्चे अर्थों में धनी बन जायगा और उस वैभव से न केवल स्वयं सन्तुष्ट, प्रमुदित रहेगा वरन् उसी का एक अंश समीपवर्ती क्षेत्र में बखेर कर चन्दन वृक्ष की तरह दूसरों को भी अपनी ही तरह समुन्नत बना सकता है। भारतवासी इसी नीति को अपनाते थे और उन्हें संसार भर में लक्ष्मी का वरद पुत्र माना जाता था। सरस्वती की उन पर असीम कृपा थी। उनकी समर्थता-शक्ति दुर्गा जिधर भी कदम बढ़ाती थी उधर ही अवरोध व्यवधान के असुरों का पराभव होता चला जाता था। यही थे वे रहस्य जिनके कारण भारतवासियों ने अपने देश की गौरव गरिमा बढ़ाई और अन्यत्र भी सुख-शांति अनुदान असीम मात्रा में बखेरा।
आज उस प्राचीन इतिहास के पृष्ठों को उलटने की आवश्यकता इसलिए पड़ी कि प्रस्तुत दरिद्रता और विपन्नता के कारण चारों ओर दम घोंटने वाला वातावरण बन गया है। मनुष्य अपने व्यक्तिगत जीवन में अपनी ही आदतों द्वारा इस कदर सताया जा रहा है कि परित्राण का कोई रास्ता नहीं दीखता और आत्महत्या करने को जी चाहता है। परिस्थितियों का दोष दूसरों के ऊपर डाल कर कुछ समय आत्म-प्रवंचना द्वारा मन हलका तो किया जा सकता है पर उससे कुछ काम नहीं बनता। अपने ही दुर्गुण, दुर्भाव, दुष्कर्म इतनी जलन उत्पन्न करते हैं मानो श्मशान में जलते हुए शव की तरह अपना अन्तरंग सन्तुलन भस्मीभूत होने जा रहा हो। व्यक्ति अपने आप से घोर असन्तुष्ट है। दुर्भाग्य पर हर घड़ी उसे खीजना ही पड़ता है। नशे पीकर अथवा व्यभिचार जैसे व्यसनों का आश्रय लेकर किसी कदर गम गलत करने का अत्यन्त बोझिल प्रयत्न तो करता है पर काम उससे भी नहीं बनता। त्रास बढ़ता है-घटता नहीं। यही है आज के व्यक्तिगत जीवन की दुर्दशा का दयनीय चित्र।
किसी समय के यह सुख-शान्ति के सतयुगी वातावरण में आनन्द से रहने वाला और समस्त विश्व को प्रकाश भरे अनुदान प्रदान करने वाला यह भारत आज ठीक उलटी स्थिति में जा गिरा है। रोग-शोक से, कष्ट-कलह से, अभाव, दारिद्रय से, असन्तोष, विद्वेष से,, आशंका अविश्वास से, आज मानवी कष्टों की मात्रा दिन-दिन बढ़ रही है। अपराधी मनोवृत्ति इस प्रकार पनप रही है कि स्वजन और मित्रों से भी हर घड़ी भयभीत रहना पड़ता है। चिन्तन के उच्च-स्तरीय आधार टूट चुके। निकृष्ट आकाँक्षाएँ निकृष्ट परिस्थितियों का सृजन कर रही हैं। प्रगति की बात सोचने वाला मनुष्य दिन-दिन सर्वतोमुखी पतन के गर्त में गिरता जाता है। विलासी खिलौनों से खेलने की थोड़ी सुविधा बढ़ जाने पर भी सर्वत्र घुटन, आशंका और निराशा की घटाएँ ही घुमड़ रही हैं। लगता है यह संसार कुछ समय में ऐसा बन जायगा जिसमें शांति से रह सकने की स्थिति किसी को भी उपलब्ध न हो सकेगी।
इन विषम और विपन्न परिस्थितियों में विश्व मानव के सम्मुख एक ही प्रश्न प्रस्तुत है कि विगत शताब्दियों से प्रगति की दिशा में आतुर आकाँक्षा के साथ बढ़ते हुए विनाश के जिस सर्प को गले लपेट लिया गया है उसे छुड़ाया कैसे जाय? सुख-शान्ति और सन्तोष की भूतकालीन परिस्थितियों की और पीछे कैसे लोटा जाय? सुविधा साधनों की प्रचुर अभिवृद्धि होने पर भी सर्वनाश के गर्त में गिरने की विडम्बना को कैसे निरस्त किया जाय? इन सब प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि मनुष्य के चिन्तन में उत्कृष्टता और कर्तव्य में आदर्शवादिता का समुचित समावेश कर सकने बाल अध्यात्म धर्म को पुनर्जीवित किया जाय? जन-मानस के भावनात्मक परिष्कार का प्रबन्ध किया जाय? विविध आकार-प्रकार की प्रस्तुत अगणित समस्याओं का एक ही समाधान है-भावनात्मक उत्कर्ष। दूसरे शब्दों में इस उसे अध्यात्म धर्म का पुनरुत्थान भी कह सकते हैं जिसे इस देश के नागरिकों ने कभी अपने अन्तःकरण के गहन मर्मस्थलों में कूट-कूट कर भरा था, जिसे अपनी गौरव गरिमा का आधार बनाया और जिसे संसार भर में बिखेर कर मानव जाति को अजस्र सुख-शान्ति का अनुदान प्रदान किया था।
न केवल भारत के वरन् समस्त विश्व के समस्त मानव जाति के हित में इस नितान्त महत्वपूर्ण तथ्य को समझा जाना चाहिए कि हम जीवन और मरण के चौराहे पर खड़े हैं। परिस्थितियाँ इतनी तेजी से गतिशील है कि फैसला इधर या उधर किसी पक्ष में तुरन्त होना है ठहरो और देखो कि मंद गति से चलने की- समय आने और प्रतीक्षा करने की गुंजाइश अब है नहीं। जो कुछ चल रहा है उसे यथावत् चलने देना हो तो आँशिक क्षति के लिए, सर्वभक्षी महाविनाश की तैयारियाँ करनी चाहिएँ और इसी दृष्टि से सोचना चाहिए कि अब सर्वनाश बिलकुल निकट आ गया है।
इन परिस्थितियों में प्रकाश की एक ही किरण शेष रह जाती है कि उस विष वृक्ष की जड़ें काटी जायें, जिसने सर्वत्र विषाक्त वातावरण और नरक जैसी सड़ी दुर्गन्ध पैदा करके रख दी है। दुर्बुद्धि, दुर्भावना, दुरभिसन्धियाँ और दुष्प्रवृत्तियाँ ही वे जड़े है जिन्होंने मनुष्य जैसी दैवी विभूतियों से सम्पन्न, समुन्नत प्राणी को इस दयनीय दुर्दशा में उलझाया है। जिस कुल्हाड़ी से यह जड़ें कटेंगी उसे अध्यात्म धर्म कहा जा सकता है। भावनात्मक नव-निर्माण का पुण्य प्रयोजन लेकर हम चलें तो लोक मानस में संव्याप्त निकृष्ट आस्थाओं और आकांक्षाओं का उन्मूलन किया जा सकता है उसके स्थान पर सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों के कल्प वृक्ष बोये, उगाये जा सकते हैं। उसके लिए हम भारतवासियों को ही आगे आना पड़ेगा। सूर्य सदा पूर्व से ही उदय होता है। उदयाचल को ही सूर्योदय की भूमिका निर्वाह करने का श्रेय मिलता रहा है। ऊष्मा ब्राह्ममुहूर्त का सन्देश लेकर आती है और अपनी अरुणिमा बखेर कर प्राणि जगत में जागरण की चेतना फूंकती है तदनुसार सभी उठ खड़े होते हैं और उगते सूर्य का अभिवादन करते हैं। भारत ही उदयाचल है उसी को अनादि काल से जीवन-ज्योति के संचार का उत्तरदायित्व निबाहना पड़ा है। भारतीय धर्म और दर्शन ने ऊष्मा की लालिमा बनकर सदैव सर्वत्र जागरण की ज्योति जगाई है। विश्वमानव के सौभाग्य का सूर्य हर दिन-हर युग में यही से उगा है। उसी उदय का लाभ पाकर मानवता धन्य होती रही है। आज की सघन अँधियारी का निराकरण उसी सूर्योदय से होगा जिसकी सृजन कर्ती वह मानवी समस्या रही है-जिसे दूसरे शब्दों में भारतीय संस्कृति का नाम दिया जाता रहा है।
मानव जाति आज जीवन-मरण के झूले में झूल रही है उसे अगले ही दिनों या तो डूबना है या पार होना है। अधर में देर तक लटकी नहीं रह सकती। हम ऋषि रक्त के उत्तराधिकारी-मानवी गरिमा के प्रहरी यदि इन घड़ियों में अपने पवित्रतम कर्त्तव्य का, उत्तरदायित्व का निर्वाह न कर सके तो यह मात्र हमारे लिए निकृष्टतम भर्त्सना का ही प्रसंग न होगा वरन् अपने देश और समाज सहित समस्त मानव जाति के-विश्व वसुधा के विनाश का कलंक भी अपने ही हमें उत्तराधिकार में वे विभूतियाँ उपलब्ध हैं जो विश्व शान्ति की भूमिका का निर्वाह करने में सदैव खरी सिद्ध होती रही हैं। यह सब होते हुए भी यदि हम नर कीटकों की तरह पेट और प्रजनन के हेय प्रयोजनों में ही खपते मरते रहे और सुविस्तृत कर्तव्यों की और से विमुख ही बने रहे तो इसे इस युग की महत्ती दुर्घटना कहा जायगा। इस संकीर्णता को आदर्शों का देवत्व का पराभव ही माना जायगा।
हमें उन उत्तरदायित्वों को निबाहने के लिए तत्पर होना ही चाहिए जो इस आपत्ति काल में आपत्ति धर्म की तरह अनायास ही आकर हमारे कन्धों पर लद गये है। इसके बिना कोई गति नहीं, सामान्यकाल में सुविधा सम्पन्न जीवन जीने की बात समझ में आती है पर आपत्ति में तो बड़ी से बड़ी व्यक्तिगत असुविधा को सहन करते हुए उस सामूहिक सुरक्षा में संलग्न होना चाहिए जिस पर कि अपना और अपने परिवार का अस्तित्व संरक्षण भी निर्भर है। समय की-युग की-पुकार यही है, इसे अनसुना नहीं किया जाना चाहिए।
आज कर्तव्य निर्धारण की बेला में हमें आवश्यक प्रकाश और मार्ग दर्शन की आवश्यकता है। यह प्रयोजन इतिहास के पृष्ठ पलटने से सहज ही पूरा हो सकता है। हमारी अविच्छिन्न परम्परा एक ही रही है कि स्वयं को उन विभूतियों से सुसम्पन्न करना जो मनुष्य को देव स्तर तक ऊँचा उठा कर ले जाती हैं। साथ ही उन दिव्य सम्पदाओं को अपनी पहुँच, पकड़ में आ सकने वाले सुदूर क्षेत्रों तक उदारता पूर्वक बखेरना ताकि कहीं भी अज्ञान, अशक्ति और अभाव का अस्तित्व रहने न पावे। इस परम्परा का निर्वाह जिस महान संस्कृति के प्रकाश में हमें अनादि काल से मिलता रहा है; उसी के कुछ संस्मरण, उद्धरण यहाँ प्रस्तुत किये जा रहे हैं। इस प्रयोजन से-कि हम फिर अपने महान पूर्वजों से आवश्यक प्रेरणा ग्रहण कर सकें, उनके अनुकरण का साहस इकट्ठा कर सकें, अपनी गौरव गरिमा का संरक्षण करते हुए, विश्व मानव की महती सेवा साधना कर सकने में समर्थ हो सकें।
बचत का ध्यान न रखने से विश्व के बड़े-बड़े लोगों को घनघोर मुसीबतों का सामना करना पड़ा है। बड़ी-बड़ी जायदाद फिजूलखर्ची एवं विलासी जीवन में समाप्त हो गयी हैं। घर में एक व्यक्ति के फिजूलखर्ची होने से सारी जायदाद चौपट होती देखी गई है। अतीत काल में लखनऊ के करोड़पति, आज ताँगा हाँकते देखे गये हैं। अनुभवहीन लोग व्यापार में घाटा उठाते हैं एवं जीवन भर उस घाटे को पूरा करना पड़ता है। इनका जीवन मूलधन एवं ब्याज देने में ही व्यतीत हो जाता है। रूसी लेखक डास्टाएब्सकों ने पहले अनाप-सनाप खर्च किया फिर आजीवन लिखता रहा एवं कर्ज उतारता रहा। वह कर्ज के कारण अपनी बुनियादी आवश्यकताओं को भी कभी पूर्ण नहीं कर पाया। गोल्डस्मिथ मस्त दिमाग का लेखक था, उसने कितने ही धन्धे किये। वह ऋण लेता एवं अदायगी की बात तक नहीं सोचता था।
गोल्डस्मिथ के घर, एक पैसा माँगने वाला आया वह साथ में पुलिस भी लाया था। पैसा उसके पास था नहीं। एक मित्र को गोल्डस्मिथ ने लिखा, उस मित्र ने गोल्डस्मिथ की एक पुस्तक बेच कर कर्ज अदा किया। एक बार आदमी गलत आदत में पड़ जाता है तो जीवन भर उसकी आदत नहीं छूटती है, वे गलत आदतें उसको पछाड़ती ही रहती हैं।
जो आदमी अपने खर्चे बढ़ा लेता है एवं फिजूल खर्ची करता है, आमदनी के अनुसार खर्चे में कटौती नहीं करता उसे जिन्दगी भर भूखों मरना पड़ता है। इसके कारण बड़े-बड़े लोगों का भी कभी-कभी यही हाल होता है।
पान, सिगरेट, सिनेमा, दुर्व्यसन, व्यभिचार में फँसने वाले सदा दूसरों के आगे हाथ फैलाते रहते हैं उनके व्यसन कभी भी पूरे नहीं होते हैं। प्रसिद्ध लेखक लार्ड ने दुर्व्यसन में इतना पैसा खर्च किया कि उसे इतना ऋण लेना पड़ा जिसकी अदायगी जीवन पर्यन्त वह न कर सका।
ब्रिटेन के राजा चार्ल्स पर इतना ऋण हो गया था कि विवश होकर उसने अमेरिका का पेन्सिलवेनिया प्रान्त केवल 15000 पौण्ड में विलियर पेन के हाथ बेच दिया।
लिंकन के मरने के बाद उसकी खर्चीली पत्नी के पास इतने पैसे भी नहीं रहे कि वह अपना गुजारा भी ठीक तरह कर सके। लिंकन की कमीजों को बेच-बेच कर ही उसने कुछ समय बिताया।
अनेक लोग ऐसे हुए हैं जिनकी लाखों की सम्पत्ति कर्जे में ही स्वाहा हो गई। बिना बजट के अव्यवस्थित खर्च के कारण सूद दर सूद से बढ़े हुए कर्जे से छुटकारा पाये बिना ही ऐसे लोग परलोक सिधार जाते हैं। ऋण ग्रस्त व्यक्ति अपने घरेलू और सामाजिक जीवन में भी कभी सुख-शान्ति अनुभव नहीं कर पाते।
जो किसी का कर्जदार नहीं है प्रतिदिन कुछ बचत करता है एवं न कभी झूठ बोलता है वह निश्चित सुखी जीवन जीता है। अपनी जरूरतों को कम करते रहना चाहिए। कभी किसी के देनदार नहीं बनें।
जीवन में आवश्यकताएँ अनन्त हैं यह हम मानते हैं। मनुष्य की कुछ आवश्यकताएँ तो ऐसी हैं जो कि बहुत ही आवश्यक हैं, कुछ बहुत ही साधारण सी हैं। कभी-कभी अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति भी हम लोग नहीं कर पाते हैं ऐसा समय आता है। इसलिए अपनी आर्थिक स्थिति को देखकर ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि अनिवार्य आवश्यकताओं की पूर्ति पहले ही फिर दूसरी आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकें।
पिछले दिनों धर्म और विज्ञान को विरोधी माना जाता है। दोनों के तर्क, प्रतिपादन और आधार एक दूसरे से भिन्न समझे जाते रहे हैं। एक को प्रत्यक्षवादी और दूसरे को परोक्षवादी कहकर उन्हें असंबद्ध कहा जाता रहा है। इसलिये दोनों की दिशा विपरीत मान ली गई और माना गया कि किसी धार्मिक के लिये विज्ञान को समझना एवं किसी वैज्ञानिक को धर्म के बारे में जानना आवश्यक नहीं।
इतने पर भी यह शाश्वत सत्य यथास्थान है, धर्म और विज्ञान जुड़वा भाई हैं। एक ही पर्वत से निकलने वाले दो महा निर्झर हैं। क्षेत्र भिन्नता की दृष्टि से उनका स्वरूप भिन्न है तो भी वे ही महा प्रयोजन की पूर्ति करते हैं। उनकी उपयोगिता मनुष्य के कंधों में जुड़ी हुई दो भुजाओं जैसी है। वे एक दूसरे के विरोधी नहीं वरन् पूरक है।
लंदन विश्व-विद्यालय के ऐस्ट्रो फिजिसिस्ट विज्ञानी हर्बर्ट ढिंगले का कथन है-धर्म और विज्ञान दोनों एक ही महा सत्य को दो दिशाओं से खोजना आरम्भ करते हैं और जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं वैसे-वैसे एक दूसरे को अधिकाधिक निकट पहुँचते हैं। विज्ञान जड़ जगत की संरचना और क्रिया-पद्धति का स्वरूप निर्धारित करता है और यह बताता है कि उसका अधिकाधिक उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है। धर्म चेतन जगत के रहस्यों का उद्घाटन करता है और सिखाता है कि विश्व की इस महती शक्ति का व्यक्ति और समाज के लिए श्रेष्ठतम उपयोग क्या हो सकता है। जड़ और चेतन के उभय-पक्षीय रहस्यों का उद्घाटन एवं उपयोग सीखने के लिए हमें धर्म और विज्ञान का समानान्तर उपयोग करते हुए आगे बढ़ना होगा।
आदिम काल में जड़ पदार्थों के सम्बन्ध में अनेकों भ्रान्त मान्यताएं गढ़ली गई थीं। प्रकृति की साधारण हलचलें देवताओं या भूत-प्रेतों की करतूतें समझी जाती थी। वर्षा, आँधी, तूफान, सर्दी, गर्मी, बाढ़, दुर्भिक्ष, रोग, हानि, दुर्घटना आदि के साथ किन्हीं अदृश्य आत्माओं का अभिशाप समझा जाता था और सफलताओं में उनका वरदान माना जाता था। देवताओं की अप्रसन्नता को प्रसन्नता में बदलने के लिए तरह-तरह विनय, अनुरोध, भेंट, उपहार प्रस्तुत किये जाते थे। विज्ञान ने उन सब मान्यताओं को झुठला दिया और बताया कि प्रकृति की शक्तियों को यन्त्र बन्धनों में बाँधकर वह सब किया जा सकता है जो मन्त्र तन्त्र से सम्भव नहीं था। जिन कारणों से संसार में अभाव दारिद्रय का बाहुल्य था- उनके निवारण कर सकने योग्य अनेकानेक साधन उपस्थित करके समृद्धि, प्रगति की ओर मनुष्य को बढ़ाया। इस दृष्टि से विज्ञान की मनुष्य जाति ऋणी है। उसे पाकर निश्चित रूप से सुख-सुविधाओं में वृद्धि हुई है। उसकी उपयोगिता के कारण विज्ञान के प्रति हर किसी का सम्मान है। वह सत्य के लिए ही नहीं सुख शान्ति के लिये भी हमारा पथ-प्रदर्शन करता है। दुरुपयोग की तो बात ही अलग है। गलत का प्रयोग करके तो अमृत भी विष बन सकता है। दृष्ट प्रयोजन के लिये यदि विज्ञान का प्रयोग किया जाय तो इसमें प्रयोक्ताओं की मूर्खता ही निन्दनीय ठहराई जायगी उससे विज्ञान की गरिमा नहीं घटेगी।
ठीक यही बात धर्म के सम्बन्ध में लागू होती है। आदिमकाल का मनुष्य एक दुर्बलकाय पशु मात्र था। उसके पास कोई आचार, व्यवहार, दर्शन, आदर्श नियम, विधान नहीं था। मत्स्य न्याय ही चलता था-सुविधा के साथ दूसरों का हनन करने में निकृष्ट स्तर के प्राणी संकोच नहीं करते, वैसा ही बर्ताव मनुष्यों का था। समझ की दृष्टि से थोड़ा विकसित होने के कारण वह अन्य पशुओं की तुलना में अधिक छली और दुष्ट था।
धर्म के उदय ने आचार, मर्यादा और कर्त्तव्य की जंजीरों में उन आदिमकालीन क्रूरताओं को जकड़ा और सभ्यता का सृजन करके मनुष्य को शालीनता एवं सामाजिकता का पाठ पढ़ाया। यह अत्यधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि है जिसे धरती की समस्त सम्पदा से भी बढ़ी चढ़ी माना जा सकता है। धर्म ने क्रमशः पशुता के-असुरता के -पर्तों को उखाड़ा है और मनुष्य को उस स्तर तक पहुँचाया है जिसमें वह बढ़ी-चढ़ी संपत्ति के आधार पर ही नहीं सुविकसित सभ्यता के आधार पर भी गर्व करने का -गौरवान्वित होने का अधिकारी है।
लोभ-लाभ की आकाँक्षा से अथवा द्वेष-क्रोध भरी प्रतिहिंसा से प्रेरित होकर क्रूर कर्म कर बैठने पर बहुत कुछ बन्धन धर्म ने लगाया है। उदार, दयालु, सहिष्णु, सरल एवं सहृदय बनने में भी धर्म का योगदान कम नहीं है। अपराध-निरोधक, सरकारी और गैर सरकारी जितने भी प्रतिबन्ध, प्रतिरोध हैं उन सबकी सम्मिलित शक्ति से भी कहीं बढ़ी-चढ़ी शक्ति धर्म की है जो मनुष्यता को शालीनता को सजीव बनाये रहती है और जिसके आधार पर आनन्द पर आनन्द, उल्लास के-स्नेह, सौहार्द्र के -आदर्श, के उत्कर्ष के अभिनव उदाहरण प्रस्तुत होते हैं। वस्तुतः विकास का सर्वोत्तम आधार इन्हीं उपलब्धियों को माना जा सकता है।
विज्ञान क्रमशः आगे बढ़ रहा है-धर्म भी अपने उस रूप से कहीं आगे बढ़ चला जिसे किसी समय आदर प्राप्त था, पर अब उसे अन्ध विश्वास का पोषक माना जाता है। विज्ञान के सम्बन्ध में भी यही बात है। पत्थरों को रगड़ जब आग पैदा की गई थी तब वह एक महती क्रान्ति थी। आग की उत्पत्ति ने उस समय मानव प्रगति में उतना ही बड़ा योगदान दिया था जितना कि इन दिनों बिजली द्वारा किया जा रहा है। आज की दृष्टि से पत्थर रगड़ कर चिनगारी तरह धर्म सम्बन्धी वे मान्यताएं जो अब दकियानूसी कहीं जा सकती हैं कभी अपने समय की महती आवश्यकता पूरी कर रही थी। उन दिनों का पिछड़ापन उन परम्पराओं ने ही हलका किया था जिन्हें आज हम उपहासास्पद मानते हैं।
विज्ञानी पालटिनिश का कथन है- विज्ञान और दर्शन तेजी से नजदीक दौड़ते चले आ रहे हैं ओर वह दिन दूर नहीं जब वे अपने बाहुपाश में एक दूसरे का कस लेंगे।
किसी समय की वैज्ञानिक मान्यताएं अब झुठलाई जा चुकीं। इससे विज्ञान का अपमान नहीं हुआ वरन् सचाई के अधिक नजदीक पहुँचने की उपलब्धि पर खुशियाँ मनाई गई। धर्म की पुरातन मान्यताओं में यदि युग के अनुरूप परिवर्तन करना पड़े तो इससे विकास क्रम की झाँकी ही की जानी चाहिए। बच्चे, मूंछें नहीं होतीं, पर वे बड़े होने पर निकलती है। इससे बचपन का कोई अपमान नहीं होता। धर्म परम्पराओं में यदि प्रगति का समावेश करके कुछ हेर-फेर किया जाय तो इससे किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। अनादिकाल से न केवल धर्म और और विज्ञान में वरन् संसार के हर प्रतिपादन में अनवरत परिवर्तन होते रहे हैं। आगे भी वह क्रम चलता रहेगा।
विज्ञान प्रत्यक्ष है वह यन्त्रों द्वारा- प्रयोगशालाओं में प्रमाणित किया जा सकता है। धर्म अप्रत्यक्ष तो है, पर अप्रामाणिक नहीं। अधर्मी व्यक्ति के उच्छृंखल जीवन और सुसंस्कृत व्यक्ति की- शालीनता के प्रति-क्रियाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो स्पष्ट हो जायगा कि धर्म की उपयोगिता प्रामाणिक है। वह व्यक्ति के अन्तरंग और बहिरंग जीवन के सर्वतोमुखी प्रगति के आधार प्रस्तुत करती है।
विद्वान एच॰ के0 शिलेंग ने अपनी पुस्तक ‘साइंस एण्ड रिलीजन’ में यह भविष्यवाणी की है कि अगली शताब्दी में धर्म को विज्ञान का और विज्ञान को धर्म का अविच्छिन्न अंग मान लिया जायगा। अस्तु विज्ञान और धर्म के समन्वय से ही उसकी उभय-पक्षीय प्रगति का सुसन्तुलित आधार बन सकेगा।
सन् 2000 के आने में अब समय नहीं है। मात्र 25 वर्ष शेष रह गये है। उसके आने के साथ ही संसार इक्कीसवीं सदी में प्रवेश करता है। विश्व के मूर्धन्य विचारक अभी से वह मानचित्र तैयार कर रहे हैं कि यह पच्चीस वर्ष पूरे होते-होते जिस नई सहस्राब्दी संसार प्रवेश करेगा उसका स्वरूप क्या होगा।
यों शताब्दियाँ ही अपना इतिहास प्रस्तुत करती रहती हैं, सहस्राब्दियों का लेखा-जोखा तो और भी अधिक विलक्षण है। सन् 1000 और 2000 के बीच में जो कुछ बीता है, उसे देखा जाय तो लगेगा कि प्रगति और परिवर्तनों की इतनी बड़ी धारा इस अवधि में बह गई जिसे सृष्टि के आदिकाल से लेकर अब तक के प्रवाह में अनुपम कहा जा सकता है। हजार वर्ष पूर्व का कोई व्यक्ति यदि जीवित अवस्था में कहीं रह रहा हो तो और उस समय की तथा अबकी परिस्थितियों की तुलना करें तो प्रतीत होगा कि वह किसी सपने के लोक में आ पहुँचा है। उन दिनों रेल, मोटर, तार, रेडियो, टेलीविजन, वायुयान, जलयान, बिजली, अन्तरिक्ष यात्रा, कल-कारखाने, कंप्यूटर, विशालकाय पुल, सड़कें, बैंक, डाकखाना, करेंसी, तिजोरी, आदि के साधन देखना तो दूर विश्वास करने योग्य कल्पना भी नहीं थी। पर आज तो इतना वैभव बिखरा पड़ा है कि हजार वर्ष पूर्व की स्थिति से आज की स्थिति की तुलना किसी भी तरह नहीं की जा सकती। ठीक इसी तरह अगली सहस्राब्दी के अन्त तक स्थिति क्या पहुँचेगी, आज हम उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते।विज्ञान और बुद्धिवाद जिस क्रम से विकसित हो रहा है उसे देखते हुए परिवर्तन का क्रम इतना तेज चलेगा कि सहस्राब्दियाँ-शताब्दियाँ तो दूर प्रत्येक दशाब्दी ही पिछली दशाब्दी की तुलना में आश्चर्यजनक गति से प्रगति के पथ पर आगे बढ़ गई होगी। अब से तीस वर्ष पहले अणुशक्ति का हलका-फुलका आभास भर था। अणु चालित बिजली घर, अणु आयुध तो पिछले ही दिनों सामने आये है और विकास अथवा विनाश के सबसे बड़े माध्यम बन गये हैं। दस वर्ष पहले अंतरिक्ष यात्रा एक कल्पना भर थी पर अब तो उसके माध्यम से मनुष्य जाति का भाग्य निर्धारण हो सकने की सम्भावना है।
सन् 2000 एक सहस्राब्दी का अन्त और दूसरी सहस्राब्दी का शुभारम्भ है। यह संध्याकाल गणना की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। आशा की गई है कि इसके आस-पास के कुछ वर्ष अत्यन्त महत्वपूर्ण होंगे। युगान्तरीय परिवर्तनों का अद्भुत स्वरूप सामने आवेगा। यों जो 25 वर्ष ही अगली सहस्राब्दी के स्वरूप की आधारशिला रखेंगे। इस अवधि में परिवर्तनों की गति इतनी तीव्र हो जायेगी कि उसमें विश्व को अनेकों नई-नई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा, जबकि पिछली विकट समस्याएं पिछड़ी हुई प्रतीत होंगी और वे अपने आप ही हल हो जायेंगी।
इक्कीसवीं सहस्राब्दी किस रूप में किन सुविधाओं और समस्याओं के साथ संसार के-मनुष्य जाति के सामने आ रही है उसका आभास प्राप्त करने के लिए संसार की कितनी ही साधन सम्पन्न मूर्धन्य संस्थाएं भारी अनुसंधान कर रही हैं। उनकी भविष्य कल्पना ज्योतिष के आधार पर नहीं प्रस्तुत प्रयासों और परिवर्तनों की प्रक्रिया का सही रूप में मूल्याँकन करते हुए विशुद्ध गणित और तर्क प्रमाणों के आधार पर की जा रही हैं। इंग्लैंड की समाज विज्ञान अनुसंधान परिषद के अन्तर्गत भावी तीस वर्ष समिति बनी है। फ्रांस में फ्यूचर विल्स संस्थान काम कर रहा है। अमेरिका में कला और विज्ञान एकेडेमी के अंतर्गत सन् 2000 आवेगा का कार्यक्रम इसी प्रयोजन के लिए बहुत दिलचस्पी के साथ चल रहा है। उनके सुविस्तृत कार्यालय संसार भर की साँख्यिकी की हर शाखा के साथ सम्बन्ध स्थापित करके किन्हीं निष्कर्षों तक पहुँचने का प्रयास कर रहे हैं। रूस, जापान, जर्मनी आदि में भी इस कार्य के लिए साधन सम्पन्न संस्थान काम कर रहे हैं।
परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष डा. ग्लेन टी. सी. वोर्ग ने भविष्य की विचित्र सम्भावनाओं पर कई भाषण दिये हैं। विज्ञान शास्त्री डा. इजाक एसिमोव का एक दिलचस्प लेख ‘न्यूयार्क पोस्ट’ में प्रकाशित हुआ था स्टैनल कुव्रिक और आर्थर सी. क्लार्क द्वारा संयुक्त रूप से प्रस्तुत ‘2001’ ए स्पेस ओडिसी संसार भर की चर्चा का विषय बना। ऐसे ही प्रस्तुतीकरण अनेक देशों में अपने-अपने ढंग से हुए हैं। इन लोगों ने जो कहा लिखा है वह अटकल–पच्चू कल्पनाओं के आधार पर नहीं वरन् तथ्य और कारण बताते हुए प्रस्तुत आंकड़ों को साक्षी देते हुए, सम्भावनाओं का निर्धारण किया गया है।
इंग्लैण्ड की ‘जाड्रल बैक रेडियो आवजरेटरी के डायरेक्टर ‘प्रो0 वर्चर्ड लावेल’ ने परिवर्तनों की वर्तमान गति की समीक्षा करते हुए लिखा है। पिछले दिनों प्रत्येक दशाब्दी पिछली दशाब्दी की तुलना में प्रायः दूनी गति से परिवर्तन प्रस्तुत करती रही है। दो को दूना चार, चार का आठ, आठ, का सोलह, सोलह का बत्तीस क्रम से यह तीव्रता क्रमशः इतनी गति पकड़ेगी कि कुछ समय उपरान्त कुछ ही वर्षों में इतने परिवर्तन हो जायेंगे मानो कितना ही युग आगे बढ़ा चला गया हो, इस आधार पर सन् 2000 के जो 25 वर्ष शेष हैं उन्हें भी कम महत्वपूर्ण नहीं माना जाना चाहिए। इसमें भी अणु युद्ध जैसी अप्रत्याशित घटनायें घटित हो सकती हैं और संसार का नकशा एकदम उलटा हो सकता है। इसी प्रकार कोई अन्य आविष्कार मनुष्य के हाथ में संसार के भविष्य निर्धारण की शक्ति दे सकते हैं। (1) जनसंख्या वृद्धि का प्रवाह (2) तकनीकी विकास (3) सामाजिक ढांचे में चल रहे परिवर्तन (4) संपत्ति उपार्जन की सुविधा और उस पर अधिकार (5) राष्ट्रों के बीच आपसी सम्बन्ध। इन पाँचों बातों पर संसार का भविष्य बहुत कुछ निर्भर रहेगा। इनमें जैसा प्रवाह इन दिनों रहा है उसके आधार पर निकट और सुदूर भविष्य की कल्पनाओं के भवन खड़े किये जा रहे हैं, पर इन या अन्य क्षेत्रों में ऐसे अप्रत्याशित परिवर्तन भी हो सकते हैं जिससे सोचे हुए आधार निरर्थक सिद्ध हों और कोई प्रचण्ड धारा नये स्वरूप में ही प्रवाहित होकर नया नक्शा बनाकर खड़ा कर दे।
हडसन इन्स्टीट्यूट अमेरिका के विज्ञानी हर्मन कान का कथन है कि परिवर्तनों की उस गति का समझना अति सूक्ष्म बुद्धि का काम है जो कल महत्वपूर्ण प्रस्तुतीकरण के रूप में आने के लिए बेतरह तिलमिला रही हैं। यदि उसका सही मूल्याँकन किया जा सके तो भविष्य को- सम्भावनाओं को बहुत कुछ सही रूप में जाना जा सकता है और उनके साथ तालमेल बिठाने के लिए समय रहते कदम उठाया जा सकता है। इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए भूतकालीन सूक्ष्म हलचलों और उनकी प्रतिक्रियाओं का लेखा-जोखा लेने से बहुत कुछ सीखा जा सकता है और भविष्य कल्पनाओं के सूत्रों को उपलब्ध किया जा सकता है।
भविष्य की सम्भावनाओं का स्वरूप प्रस्तुत करने के लिए अकेला भौतिक विज्ञान नहीं वरन् चिन्तन की प्रत्येक धारा का योगदान लिया जा रहा है। दर्शन, मनोविज्ञान, इतिहास, समाज शास्त्र, नीतिशास्त्र राजनीति, भू-भौतिकी आदि चिन्तन की अनेकों धाराओं का सम्मिलित प्रयास ही भविष्य सम्भावनाओं को सही रूप में प्रस्तुत कर सकता है। उपरोक्त प्रयत्नों में यह सभी धाराएं समन्वित रखी गई हैं।
मनुष्य जाति के सामने अगणित समस्यायें उत्पन्न करने वाला, विविध-विधि कष्ट-क्लेश देने वाला ही असुर है-अज्ञान। रावण, कंस, हिरण्यकश्यपु आदि असुरों ने थोड़े से आदमी मारे खाये थे पर अज्ञान के असुर ने समूची मानव जाति को अपनी दाढ़ों से चबा डाला और उदरस्थ कर लिया है। सर्वसुविधा सम्पन्न इस धरती के निवासियों को स्वर्गीय सुख-शान्ति का उपभोग करना चाहिए था। पर हो बिलकुल उल्टा रहा है-हर व्यक्ति खौलते कढ़ाव में तलने और अंगारों पर चलने से अधिक त्रासदायक क्षणों में मौत के दिन पूरे कर रहा है। जिन्दगी जिस सुरदुर्लभ ईश्वरीय वरदान की तरह हर्षोल्लास के साथ जियी जानी चाहिए थी, वह नारकीय यन्त्रणायें सहते हुए व्यतीत करनी पड़ रही है। उसकी लाश ढोना बहुत भारी पड़ रहा है।
यह स्थिति एक आदमी की नहीं लगभग सभी की है। समझा यह जाता रहा कि पैसा कम पड़ने से यह कष्ट सहने पड़ रहे हैं यदि मनचाही मात्रा में पैसा होता तो सुखी जीवन जिया जा सकता था। यह मान्यता थोड़े ही अंश में ही सही है। यह ठीक है कि अधिक पैसे शरीर को सुख-सुविधा देने वाले अधिक साधन खरीदे जा सकते हैं, पर इससे क्या प्रश्न तो उस मनः स्थिति का है जिसके आधार पर पैसे का उपयोग किया जाना था। उस क्षेत्र के विकृतियों का पुरा साम्राज्य है फलस्वरूप जो धन से खरीदा जाता है उसमें उपयोगी कम और हानिकारक अधिक होता है। इस संदर्भ में हम पैसे वालों की स्थिति का गहरा अन्वेषण विश्लेषण कर सकते हैं। गरीबों की बात कुछ समय के लिए पीछे करके उन अमीरों की स्थिति देखें जिन्हें आवश्यकता से अधिक पैसा मिला है। वे उसका करते क्या है?अपने और अपने परिवार के लिए स्वादिष्ट भोजनों की भरमार करके सब का पेट खराब करते हैं।श्रम से बचने और आरामतलबी का ठाठ-वाट जुटाने में शरीर की श्रम शक्ति गंवा देते हैं। गरीबों से अमीरों के स्वास्थ्य अधिक दुर्बल पाये जायेंगे वे अपेक्षाकृत अधिक रोगी रहते हैं और जल्दी मौत के मुँह में प्रवेश करते हैं।
यहाँ न तो धन की निन्दा की जा रही है और न दरिद्र की प्रशंसा। धन भी विद्या बल, शरीर बन आदि की तरह एक शक्ति है उसका सदुपयोग आता असुरता से लड़ने में हम अपने समस्त साधन झोंक दें है तो अपना-अपने परिवार और समाज का भारी हित साधन किया जा सकता है। पर दृष्टिकोण में छाया हुआ अज्ञान उस धन के सदुपयोग की दिशा सोचने ही नहीं देता। जितनी-इच्छाएँ-जितनी चेष्टाएं होती हैं वे सभी दूषित रहती हैं फलस्वरूप उपार्जित धन अपना, परिवार का, समाज का विविध प्रकार से सत्यानाश ही करता चला जाता है। धन से जो लाभ एवं सन्तोष मिलना चाहिए था उससे धनी वर्ग प्रायः वंचित ही रहता है। यहाँ हजार बार समझना चाहिए दोष धन का नहीं दूषित दृष्टिकोण का है जिसे दूसरे शब्दों में अज्ञान कहा जा सकता है।
विद्या बल की महत्ता और भी अधिक है। ऊँची शिक्षा की-बुद्धि कौशल की, कौन निंदा करेगा। शक्तियों में से किसी की भी निन्दा नहीं की जा सकती,
सभी प्रशंसनीय और उपयोगी हैं-शर्त एक ही है कि उनके उपयोग में विवेक से काम लिया जाय। बिजली, भाप, गैस, पैट्रोल अणु ऊर्जा आदि शक्तियाँ कितनी उपयोगी हैं, यह भी जानते हैं पर यदि इनमें किसी का भी दुरुपयोग किया जाय तो वे भयंकर परिणाम उत्पन्न करती हैं। साहित्यकार कैसे साहित्य लिख रहे हैं- कलाकार किन प्रवृत्तियों को उभार रहे हैं इसे अत्यन्त निराशापूर्वक देखा जा सकता है। दुनिया में एक से एक बुद्धिमान भरे पड़े हैं जिनमें से थोड़ी भी प्रतिभाएं यदि जन मानस को दिशा देने में लग गई होती तो दुनिया की स्थिति वैसी न होती, जैसी आज है।
शरीर बल से उपयोगी श्रम हो सकता था-कारखाने उपयोगी सृजन कर सकते हैं। पर हम देखते हैं कि शारीरिक क्षमता, आतंक और अनाचार उत्पन्न करने में लगी हुई हैं । अपराधों और अनाचारों में वे ही लोग अधिक लगे हैं। जिनके स्वास्थ्य अच्छे हैं। भगवान ने जिन्हें रूप दिया है वे उससे कला कोमलता का सृजन करने की अपेक्षा पतन और दुराचार को प्रोत्साहन दे रहे हैं। कल-कारखानों नशेबाजी से लेकर विलासिता के अनेकानेक साधन बनाने में लगे हुए हैं । मनुष्य द्वारा मनुष्य को मारे-काटे जाने के लिए जितनी युद्ध सामग्री बन रही हैं यदि उसे बदल कर सृजनात्मक उपकरण बनाये गये होते तो उतनी धन शक्ति का, जन शक्ति का, क्रिया-कौशल का न जाने संसार की सुख-शान्ति में कितना बड़ा योगदान मिला होता।
संसार में साधन कम नहीं हैं। अमेरिका, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, कनाडा आदि देशों में इतनी फालतू और बेकार जमीन पड़ी है कि उस पर भारत और चीन घने देशों की आबादी को बसा कर सबके लिए प्रचुर सुख-साधन जुटाये जा सकते हैं, जितना धन, जितना साधन संसार में है उसे मिल-बाँटकर खाया जाय तो हर मनुष्य बीमारी, बेकारी, अशिक्षाजन्य कठिनाइयों से मुक्ति पा सकता है। जो विज्ञानी मस्तिष्क अणु आयुध और विघातक गैसें और भी न जाने क्या-क्या बना रहे हैं वे समुद्र के खारे पानी को मीठा बनाने जैसे कार्यों में जुट जाय तो इस धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियाँ हँसती-खेलती दिखाई पड़े और हम सब नन्दन वन में रह रहे हों।
एक-दूसरे को गिराने में, शोषण और दोहन में हमारी जो दुरभिसन्धियाँ निरन्तर क्रियान्वित रहती हैं। यदि वे उलट जायें और परस्पर सहयोग प्रदान करने-ऊँचा उठाने में लग जायें तो उससे सभी को राहत मिले। घृणा, द्वेष, प्रतिशोध के स्थान पर स्नेह, सौजन्य बिखर पड़े और दुनिया कितनी सुन्दर, सुहावनी बन जाय, हर व्यक्ति के इर्द-गिर्द हर्षोल्लास का वातावरण बिखरा दिखाई पड़ने लगें।
स्वर्ग जैसी समस्त सम्भावनाओं के रहते हुए भी अपनी दुनिया नारकीय यातनाओं में जल-भुन रही है इसके ऊपर कारण तो पेड़ पर लगे अनेक पत्तों की तरह अलग-अलग दिखाई पड़ सकते हैं पर विचारवान देख सकते हैं कि यह विष वृक्ष जिन गहरी जड़ों के कारण फल-फूल रहा है, वह हर क्षेत्र में छाया हुआ अज्ञान, अनाचार ही है।आदमी का सोचने का तरीका यदि बदला जा सका होता तो उसका परिणाम उससे सर्वथा विपरीत होता, जो आज हमारे सामने है। हर उलझी समस्या का-हर विपत्ति और दुर्गति का एक ही कारण है भ्रष्ट चिन्तन और तज्जनित दुष्ट कर्तव्य। इसका मूल्योच्छेदन किये बिना अन्याय उपायों से सुधार की-प्रगति की बाल-क्रीड़ा ही होती रहेगी पर बनेगा कुछ नहीं।
पेड़ मुरझा रहा है तो पत्ते छिड़कने से नहीं जड़ सींचने से काम चलेगा। चेचक की हर फुन्सी पर अलग-अलग पट्टी नहीं बंध सकती रक्त शोधक दवा से ही उसकी जड़ कटेगी। मनुष्य और समाज के सामने आज अगणित समस्यायें हैं, पर वे उत्पन्न एक ही कारण से हुई हैं और उनका निवारण भी एक ही केन्द्र से सम्बद्ध है। ताले के हर पुर्जे की तोड़-फोड़ जरूरी नहीं। ताली घुमाने से वे सभी घूम जायेंगे और ताला खुल जायेगा। शरीर गत रुग्णता, मनोगत उद्विग्नता, आर्थिक क्षेत्र की तंगी, अपराधों का आतंक, क्लेश, विग्रह, अशिक्षा, बेकारी, पिछड़ापन, पीड़ा आदि जो कुछ जहाँ कहीं भी अशुभ दिखाई पड़े समझना चाहिए यह सारा दावानल अवांछनीय चिन्तन की चिनगारी का उत्पन्न किया परिवार है। अपनी निज की, अपने परिवार की, देश, समाज, विश्व-मानव की प्राणि मात्र की कुछ ठोस सेवा करने की इच्छा हो तो व्यापक रूप से मनःक्षेत्र में भरी हुई उस गन्दगी को साफ करना चाहिए। जिसकी सडांद से विभिन्न जातियों के विषाणु उत्पन्न होते और एक से एक भयंकर महामारियों का सृजन करते हैं। हर विषाणु को मारने की अपेक्षा-हर रोगी का अलग इलाज करने की योजना बनाने से पहले हमें स्वच्छता अभियान चलाना चाहिए ताकि महामारी के उद्गम स्रोत पर नियन्त्रण प्राप्त किया जा सके।
प्राचीन काल के रावण, कंस, महिषासुर, वृत्तासुर आदि की सता स्थानीय थी इसलिए उन्हें आसानी से मारा जा सका। इस युग का रावण सर्वव्यापक है। हर व्यक्ति की इच्छा, बुद्धि और क्रिया उसी से चंगुल में पूरी तरह जकड़ गई हैं। इससे लोहा लेना अपेक्षाकृत कठिन हैं फिर भी हिम्मत तो नहीं ही हारी जायेगी। हाथ पर हाथ धरे तो नहीं बैठेंगे। समुद्र से अण्डे वापस लेने के लिए टिटहरी जब अथक प्रयास कर सकती थी और अन्ततोगत्वा सफल हो सकती थी तो हमीं क्यों अपने को उससे कम साहसी और कम पुरुषार्थी सिद्ध करेंगे। इस धर्म युद्ध में हम पाँच हैं अतः सौ कौरवों की अठारह अक्षौहिणी सेना से लड़ेंगे। गाण्डीव और गदा को विश्राम नहीं लेने देंगे। एकाकी होते हुए परशुराम का कुल्हाड़ा अब चलेगा ही विराम, विश्राम के अवकाश की घड़ी बहुत चली गई।
युग परिवर्तन का-जन मानस के भावनात्मक नव-निर्माण की घड़ी निकट आ पहुँची। अरुणोदय का, ऊषा का आलोक प्राची के समीप न सही दूर दिखाई पड़ने लगा है। हम इस ब्राह्ममुहूर्त में आलस्य प्रमाद के गर्त में पड़े न रहेंगे, कमर बाँधकर आगे बढ़ेंगे और कर्तव्यों की पुकार को शिरोधार्य करते हुए शूरवीरों जैसा दुस्साहस जुटायेंगे। इसमें त्याग बलिदान का परिचय देना होगा। इसके बिना इतना बड़ा सर्वजित् यज्ञ सफल नहीं हो सकता। अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों ने प्राथमिक परीक्षायें कितनी ही पास कर ली हैं। प्रचारात्मक, रचनात्मक और संघर्षात्मक शतसूत्री योजना के आमंत्रण को प्रायः सभी ने स्वीकार किया है और न्यूनाधिक योगदान सभी का रहा है। यदि ऐसा न होता तो उज्ज्वल भविष्य की आशा किरणें हर किसी को आश्वस्त कर रही हैं उनका आलोक किस प्रकार दृष्टिगोचर हुआ होता। पर अब खोजने के लिए पंचवटी से लेकर रामेश्वर की यात्रा पूरी हो चुकी। रास्ता नापने का ठहरने और भोजन का प्रबन्ध जुटाने का छोटा काम पूरा हो गया। रीछ, बानर अब उस तट पर आ पहुँचे जहाँ से सेतु बन्ध बाँधा जाना है। जहाँ से सोने की बनी, दुर्दान्त असुरों की शस्त्र सज्जा से सजी लंका पर आक्रमण किया जाना है। संस्कृति की सीता को वापस लाने के लिए और कोई उपाय भी तो नहीं है। रावण को कुछ भी कर गुजरने-असंख्य सीताओं के अपहरण की छूट देकर ही हम अपनी सुख-सुविधायें बचा सकते हैं। अन्यथा ‘हतो वा प्राप्यसी’ स्वर्गं जीत्वावा भोक्ष्यसे मुहीम के दोनों हाथों में लड्डू देखते हुए करो या मरो की नीति अपनानी पड़ेगी। इसके अतिरिक्त और कोई विकल्प अब रह नहीं गया है।
रावण और कंस के समय में अनेक साधन सम्पन्न राजा, योद्धा, धनी, विद्वान, और कुशल, समर्थ व्यक्तियों का अभाव न था वे चाहते तो मिल-जुलकर असुरों के विरुद्ध मुहीम खड़ी कर सकते थे। मुगलकाल में अनेकों शस्त्र सज्जित सामन्त मौजूद थे, वे चाहते तो आक्रान्ताओं को मिल-जुलकर खदेड़ सकते थे। गान्धी जी के जमाने में 600 से अधिक रजवाड़े थे, उनके पास सैनिक भी थे और शस्त्र भी पर वे सभी साहस गवाँ चुके थे। त्याग-बलिदान की माँग पूरी करने की तेजस्विता उनमें रह नहीं गई थी। फलतः रावण से लड़ने के लिए रीछ, बानरों को, मुगलों से लड़ने कि लिए प्रताप, शिवाजी छापामारों को अंग्रेजों से लड़ने के लिये गाँधी के निहत्थे सत्याग्रहियों के उपहासास्पद और नगण्य समझे जाने वाले जत्थों को आगे आना पड़ा था। आज भी वही स्थिति है। सुयोग्य और समर्थ व्यक्तियों की कोई कमी नहीं। वे चाहें तो अज्ञान के असुर से जूझने के लिए उन साधनों को दे सकते हैं, जो उनके क्षुद्र स्वार्थों में लगे हुए हैं। पर ऐसा सम्भव नहीं। साधन सम्पन्न होने से क्या हुआ? सामर्थ्यवान होने से क्या बना? उनके हृदय बहुत ही छोटे और कृपण हैं। संग्रह और उपभोग से आगे की बात सोचना उनकी कृपण चेतना के लिए सम्भव नहीं है। आदर्श प्रस्तुत करने के लिए जिस दुस्साहस की आवश्यकता पड़ती है, उसे जुटाना इनके लिए कदाचित् ही सम्भव हो सके। मनुष्य जीवन का लक्ष्य और सफलता का रहस्य जिन्होंने माला घुमाने और कर्मकाण्डों की टन्ट-घन्ट तक सीमाबद्ध कर लिया हो; वे सस्ते में सब कुछ पा लेने की बात सोचते हैं। मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखने के लिए जो महँगी कीमत चुकानी पड़ती है, उसे वे क्योंकर जुटा पायेंगे, समर्थ और साधन सम्पन्न होने से क्या हुआ उनकी आन्तरिक कृपणता इतनी गहरी है कि उस साहस की अपेक्षा उनसे नहीं की जा सकती जो महामानवों की पंक्ति में बैठने वाले-मानवी गौरव को प्रतिष्ठा देने वाले आदर्शवादी लोगों को देनी पड़ती हैं।
इस सेतु बन्ध को हम रीछ, बानर ही मिलकर बाँधेंगे। इस गोवर्धन को उठाने में हम ग्वाल-बाल ही अपनी लाठी लगावेंगे। समुद्र को पाटने के लिए गिलहरी अपने बालों में रेत भर ले जाती थी और उसे पानी में छिड़कती थी-टिटहरी ने अण्डे वापस लेने के लिए समुद्र में चोंच-चोंच मिट्टी डालने का उपक्रम किया था। निस्सन्देह यह प्रयास बुद्धिमान समझे जाने वाले लोगों के लिए मूर्खता पूर्ण थे। पर जब बुद्धिमानी अपने स्थान पर जीवित है तो इस बेचारी आदर्शवादी मूर्खता को भी तो जिन्दा रहना ही चाहिए। हमें गर्व और गौरव के साथ इस दुस्साहस भरी ‘मूर्खता’ का परिचय देना चाहिए जिसमें हमें अपने पास जो कुछ है उसे युग देवता के चरणों पर समर्पित करना है। अज्ञान का असुर इससे कम में मरेगा नहीं। वृत्तासुर वध का एक ही उपाय था-दधीचि की अस्थियों का वज्र। उन महामुनि ने इस संदर्भ में कृपणता नहीं बरती। यों कष्ट तो सुई चुभने का भी होता है, अस्थि-दान में उन्हें पीड़ा तो हुई ही होगी पर आदर्शों की स्थापना के लिए इससे कम में कभी काम चला भी नहीं है। रीछ, बानर अपना जान बचाते तो लंका विजय सम्भव न थी। धर्म युद्ध में पाप मरता है पर मरता तब है जब धर्म वीरों के त्याग-बलिदान की पूरी परख कर लेता है। आज भी इतिहास की उसी पुनरावृत्ति के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।
यह हमारी वास्तविकता की परीक्षा बेला हैं। अज्ञान असुर के विरुद्ध लड़ने के लिए प्रचुर साधनों की आवश्यकता पड़ेगी। जन शक्ति, बुद्धि शक्ति, धन शक्ति जितनी भी जुटाई जा सके उतनी कम है। बाहर के लोग आपाधापी की दलदल में आकण्ठ मग्न हैं। इस युग पुकार को अखण्ड-ज्योति परिवार ही पूरा करेगा।
जिनको पारिवारिक उत्तरदायित्वों का न्यूनतम निर्वाह करने के लिए जितना समय लगाना अनिवार्य है वे उस कार्य में उतना ही लगावें और शेष समय अज्ञान के असुर से लड़ने के लिए लगावें। जिनके बच्चे बड़े हो चुके-जिनके घर में निर्वाह व्यवस्था करने वाले दूसरे लोग मौजूद हैं वे वह उत्तरदायित्व उन लोगोँ पर मिल-जुलकर पूरा करने की व्यवस्था बनायें। जिनने संतान के उत्तरदायित्व पूरे कर लिये वे पूरी तरह वानप्रस्थ में प्रवेश करें और परिव्राजक बनकर जन-जागरण का अलख जगायें। जगह-जगह छोटे-छोटे आश्रम बनाने की आवश्यकता नहीं है। इस समय तो हमें परिव्राजक बनकर भ्रमण करने के अतिरिक्त दूसरी बात सोचनी ही नहीं चाहिए। बूढ़े होने पर संन्यास लेने की कल्पना निरर्थक है जब शरीर अर्ध मृतक हो जाता है और दूसरों की सहायता के बिना दैनिक निर्वाह ही कठिन हो जाता है तो फिर सेवा साधना कौन करेगा। युग सैनिकों की भूमिका तो वे ही निभा सकते हैं जिनके शरीर में कड़क मौजूद है। जो शरीर और मन से समर्थ हैं। इस तरह भी भावनाशील एवं प्रबुद्ध जन-शक्ति की अधिक से अधिक मात्रा में आवश्यकता है। सड़े-गले, अध-पगले, हरामखोर और दुर्व्यसनी तो साधु-बाबाओं के अखाड़ों में वैसे ही बहुत भरे पड़े हैं युग देवता को तो वह प्रखर जन-शक्ति चाहिए जो अपना बोझ किसी पन न डाले वरन् दूसरों
*समाप्त*