व्यक्ति वाद नहीं, समाजवाद हमारा लक्ष्य हो(sandesh)

वह व्यक्ति जो समाज के उपकारों को भुलाकर अपने अस्तित्व एवं व्यक्तित्व को अलग रखते हैं अथवा समाज के साथ असहयोग करते हैं या समाज विरोधी आचरण करते हैं, वे मुख्य रूप से जीवन के नियमों, मूल सिद्धान्तों की ही उपेक्षा करते हैं। इस प्रकृति के कारण मनुष्य को सम्पूर्ण समाज का विरोध सहन करना पड़ता है और इससे उसके व्यक्तित्व का विकास बन्द हो जाता है। मनुष्य की शक्ति सीमित और अल्प है। समाज के साथ व्यक्तित्व का सामंजस्य एक आवश्यक नियम है। स्वार्थपरता की− मनोवृत्ति मनुष्य को आन्तरिक दृष्टि से भी दीन−हीन, एकाकी बना देती है।

शरीर के सभी अंगों के श्रम, सहयोग परस्पर योगदान में ही मानव जीवन का अस्तित्व निहित है। कदाचित विभिन्न अंग परस्पर विरोधी, एकाँगी, स्वार्थी आचरण करने लगे तो समस्त शरीर का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायगा। समाज में भी व्यक्ति गत भावशक्ति लालसा को रखकर किये जाने वाले कार्यों के लिए कोई स्थान नहीं है। व्यक्ति गत− उत्कृष्टता, शक्ति , समृद्धि, वैभव, ऐश्वर्य की लालसा सारे समाज के लिए हानिकारक और स्वयं में विष बनने का रास्ता है।”


दृढ़ इच्छा शक्ति एक चमत्कारी उपलब्धि

मानव जीवन में जो क्रियाशीलता है, उसका आधार है- शक्ति। शक्ति के बिना वह कोई भी कार्य करने में सफल नहीं हो सकता है। शक्ति की आवश्यकता सबको है और रहेगी। क्या बलवान और क्या निर्बल, सभी शक्ति प्राप्त करने की इच्छा एवं प्रयत्न करते हैं।

जब हम कोई कार्य करना चाहते हैं तो हमारे मन में एक इच्छा उत्पन्न होती है। उस इच्छा के अनुरूप हम अपनी इन्द्रियों की सहायता से उस कार्य को सम्पन्न करते हैं। मन का एक नाम इन्द्र भी है- वह इन्द्रियों का स्वामी है। इसलिये उसका नाम इन्द्र पड़ा। तो मन की वह इच्छा शक्ति ही मानव जीवन का आधार है। वही हमारी प्रवृत्तियों की नियामक, हमारे कर्मों की आधार, हमारी भाग्य-विधात्री देवी है।

मानव जीवन की सफलता-असफलता, उन्नति-अवनति आदि में इच्छा शक्ति की प्रक्रिया ही मुख्य है। प्रबल इच्छा शक्ति होने पर मनुष्य बड़े-बड़े एवं असम्भव कार्यों को पूरा कर लेते हैं। महाराणा प्रताप ने जंगल-जंगल भटककर मुगलों से लोहा लिया। नेपोलियन के सिपाही संसार में किस प्रकार तहलका मचा सके? सिकन्दर विश्व विजयी कैसे बना? क्रांतिकारियों ने एक से एक खतरनाक षड़यंत्रों को किस आधार पर कार्यान्वित किया? हंसते-हंसते फांसी के तख्तों पर झूल जाने की प्रेरणा व शक्ति उनमें कहां से आई? यह सब दृढ़ इच्छा शक्ति के ही परिणाम हैं।

संसार के समस्त श्रेष्ठ कार्यों के पीछे भी इच्छा-शक्ति का प्रवाह ही काम कर रहा है। दृढ़ इच्छा-शक्ति मानव जीवन की सम्पदा है, उसे जागृत करने का प्रयत्न करें। इच्छाशक्ति की सफलता में एक अन्य दैवी शक्ति भी क्रियाशील रहती है। वह है- निमार्ण शक्ति। इसके सहयोग से मनुष्य हर कार्य को बड़ी सफलता व श्रेष्ठता पूर्वक सम्पन्न करता जाता है। जीवन निर्माण की आधारभूत शक्ति यही है। भारत का प्राचीन आदर्श-ऋषि, मुनियों, संतों की माटी- इस देश में हमेशा से रचनात्मक शक्ति को सदैव दिशा एवं प्रेरणा प्रदान करती रही है, उन्हीं कार्यों की प्रशंसा की गई है।

इच्छाशक्ति, उद्देश्य एवं ईश्वर-विश्वास के आधार पर मनुष्य अपनी लक्ष्य-सिद्धि कर सकता है। अपने जीवन में सफलता चाहने वाले व्यक्ति इस त्रिशक्ति के आधार पर अपना कार्य आरम्भ करें तो प्रतिकूलताएं, कठिनाइयां जो कभी निराश एवं हताश कर देती थीं, हमें अपने मार्ग में आगे बढ़ने की प्रेरणा देंगी।

विज्ञान के आविष्कार, जीवट के कार्य, चांद की खोज, एवरेस्ट-विजय, ग्रह-नक्षत्रों के यात्रा कार्यक्रम आदि सभी दृढ़ इच्छा शक्ति, मनोबल के परिणाम हैं। दृढ़ प्रतिज्ञ होने के लिये भी इच्छा शक्ति की दृढ़ता का होना आवश्यक है। हरिश्चन्द्र सत्य पर अटल रहे, भीष्म पितामह बाण-शय्या पर छह मास तक सोये रहे, राजस्थान की वीर बालाएं जौहर करके मृत्यु की गोद में सो गईं, पर अपने सतीत्व पर आंच न आने दी। चाणक्य ने नन्दवंश का नाश कर दिया। शिवाजी ने विशाल औरंगजेबी सेना का लुक छिपकर भी मुकाबला किया, शहीदेआजम, भगतसिंह अपना नाम अमर कर गये। भारत के स्वतन्त्रता संग्राम में कई सेनानी शहीद हो गये। गांधीजी ने अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति से भारत को स्वतन्त्रता दिलाकर ही दम लिया।

दृढ़ इच्छाशक्ति वाला व्यक्ति अपने विचारों और संकल्पों में इतना प्रखर रहता है, कि विरोध, बाधा, प्रतिकूलताएं उसके सामने टिकने नहीं पातीं। ऐसे व्यक्ति सदैव प्रसन्न और शान्त रहते हैं। जीवन का सुख, स्वास्थ्य, सौन्दर्य, प्रसन्नता, शान्ति उनके साथ रहती है।


विज्ञान ईश्वर के अस्तित्व से इन्कार नहीं कर सकता

संसार की प्रत्येक वस्तु का कोई न कोई निर्माता होता है तभी वह बनती है। इतने बड़े विश्व का भी कोई न कोई निर्माता होना चाहिए। सृष्टि की विभिन्न वस्तुओं में से प्रत्येक में अपने-अपने नियम क्रम पाये जाते हैं। उन्हीं के आधार पर उनकी गतिविधियां संचालित होती हैं। यह नियम न होते तो सर्वत्र अस्त-व्यस्तता और अव्यवस्था दृष्टिगोचर होती। इन नियमों का निर्धारणकर्ता कोई न कोई होना चाहिए। जो भी शक्ति इस निर्माण एवं नियन्त्रण के लिए उत्तरदायी है वही ईश्वर है। वस्तुओं का उगना, बढ़ना जीर्ण होना, मरना और फिर उनका नवीन रूप धारण करना, यह परिवर्तन क्रम भी बड़ा विचित्र किन्तु विवेकपूर्ण है। इस प्रगति चक्र को घुमाने वाली कोई शक्ति होनी चाहिए। यह जड़ता का स्वसंचालित नियम नहीं हो सकता।

विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंच गया है कि संसार का मूल तत्व एक है। एक ही ऊर्जा अपनी विभिन्न चिनगारियों के रूप में, विभिन्न दिशाओं में, विभिन्न रंग-रूप में उछल-कूद कर रही है। यहां आतिशबाजी का तमाशा हो रहा है। कुशल शिल्पी बारूद को कई उपकरणों के साथ बनाकर कई प्रकार के बारूदी खिलौने बना देते हैं, उनमें से कोई आवाज करता है, कोई चिनगारियां उड़ाता है, कोई रंग-बिरंगी रोशनी करता है, कोई उड़ता-उछलता है। इन हलचलों की इस भिन्नता और विचित्रता के रहते इस संसार में दृश्यमान भिन्न-भिन्न आकृति-प्रकृति के पदार्थों के बारे में लागू होती है। उनके स्वरूप में और गुण, धर्म अलग हैं तो भी वे जिस सत्ता से उत्पन्न होते हैं वह व्यापक और एक है।

विज्ञान ने कभी यह नहीं कहा है कि- ‘ईश्वर नहीं है।’ उसने केवल इतना ही कहा- उसकी अनुसन्धान प्रक्रिया की पकड़ में ईश्वर जैसी कोई सत्ता नहीं आती। इन्द्रिय बोध के आधार पर सूक्ष्मदर्शी उपकरणों की सहायता से प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक अनुसन्धान चलते हैं। इस परिधि में जो कुछ आता है वही विज्ञान का प्रतिपाद्य विषय है। उसकी अपनी छोटी सीमा और मर्यादा है। उससे जितना कुछ ज्ञान पकड़ा पाया जाता है उसे ही प्रस्तुत करना उसका विषय है। इस मर्यादा में यदि ईश्वर नहीं आया है तो उसका अर्थ यह नहीं कि उसकी सत्ता है ही नहीं।

विज्ञान अपने शैशव से क्रमशः विकसित होता हुआ किशोरावस्था में प्रवेश कर रहा है अभी उसे प्रौढ़, वृद्ध एवं परिपक्व होने में बहुत समय लगेगा। उसे अभी तो आज की गलती कल सुधारने से ही फुरसत नहीं। बाल-बुद्धि आज जिस बात का जोर-शोर से प्रतिपादन करती है उसके आगे के तथ्य सामने आने पर पूर्व मान्यताएं बदलने की घोषणा करनी पड़ती है। यह स्थिति संभव है आगे न रहे जब विज्ञान अपनी किशोरावस्था पार करेगा और यौवन की प्रौढ़ता में प्रवेश करेगा तो उसे ऐसे आधार भी हाथ लग जायेंगे जो आज के भौंड़े उपकरणों की अपेक्षा प्रकृति की अधिक सूक्ष्मता की थाह ला सकें। तब सम्भवतः उन्हें पदार्थ की भौतिक शक्ति के अन्तराल में छिपी हुई चेतना की परतें भी दृष्टिगोचर होने लगेंगी। आज भी इसकी संभावना स्वीकार की जा रही है। इसलिए ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि न होने पर भी विज्ञान अन्यान्य अनेकों सम्भावनाओं की तरह ईश्वर की सम्भावना का भी खण्डन नहीं करता, वह केवल नम्र शब्दों में इतना ही कहता है अभी प्रयोगशालाओं ने अपनी पकड़ में ईश्वर को नहीं जकड़ पाया है। उसका खण्डन इसी सीमा तक है। विज्ञानी नास्तिकता दुराग्रही नहीं हैं। वह अपनी वर्तमान स्थिति का विवरण मात्र प्रस्तुत करती है।

ईश्वर की सत्ता को प्रामाणित करने के लिए यह आधार ही काफी है कि सृष्टि के प्रत्येक घटक को नियम और क्रम के बन्धन में बँधकर रहना पड़ रहा है। कभी−कभी भूकम्प, तूफान, उल्कापात, जैसी घटनाएँ− प्राणियों के पेट के विचित्र आकृति−प्रकृति की सन्तानों का होना जैसे व्यतिक्रम दीख पड़ते हैं, पर गहराई से विचार करने पर वे भी ऐसे नियम कानूनों के आधार पर होते हैं जिन्हें आमतौर से नहीं जानते वे अपन काम करते हैं और जब अवसर पाते हैं तो विलक्षण स्थिति उत्पन्न करते हैं।

‘दि मिस्टीरियस यूनीवर्स’ ग्रन्थ के लेखक सर जेम्स जीन्स ने अत्यन्त गम्भीरतापूर्वक यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि− “इस ब्रह्मांड का सृष्टा कोई विशुद्ध गणितज्ञ रहा होगा। उसने न केवल मानव प्राणी की वरन् अन्य सभी जड़ चेतन कहे जाने वाले प्राणियों और पदार्थों की संरचना में गणित की उच्चस्तरीय विद्या का पूरी तरह प्रयोग किया है। यदि इसमें कहीं कोई भूल रह जाती तो हर चीज बनने से पूर्व ही बिखर जाती। प्राणी जीवन धारण करने से पूर्व ही मर जाते और ग्रह−पिण्ड अपना पूर्ण रूप बनाने से पूर्व ही एक−दूसरे के साथ टकरा कर चूर−चूर हो जाते हैं। यह सृष्टा के गणित ज्ञान का चमत्कार ही है कि न केवल पृथ्वी वरन् समस्त ब्रह्मांड एक क्रमबद्ध प्रक्रिया के साथ गतिशील है।”

न्यूटन की खोजें किसी समय अत्यन्त सत्य मानी गई थीं, पर अब परिपुष्ट विज्ञान ने उन्हें क्षुद्र, असामयिक एवं व्यर्थ सिद्ध कर दिया है। गुरुत्वाकर्षण की खोज किसी समय एक अद्भुत उपलब्धि थी अब आइंस्टीन का नवीनतम सिद्धान्त प्रामाणिक माना गया है और गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त को बाल−विनोद ठहराया गया है। ‘आइंस्टीन के अनुसार देश, काल और एकीकरण की− स्पेश टाइम और काजेशन− के एकीकरण सिद्धान्त की एक वक्राकृति मात्र है जिसे हम पृथ्वी का घुमाव मानते हैं। यह इस वक्रता के दो उपाँशों का आनुपातिक सम्बन्ध भर है। इसी से पृथ्वी घूमती दीखती है और उसकी गतिशीलता को अनुभूति में एक कड़ी गुरुत्वाकर्षण की भी जुड़ जाती है। यह आकर्षण तथ्य नहीं वरन् हलचलों की एक भोंड़ी सी अनुभूति मात्र है।”

कोई चित्रकार यदि अन्य किसी ग्रह पर बैठकर पृथ्वी का रंगीन चित्र बनाये तो वह रंग बिरंगे दृश्यों का एक समतल दृश्य ही होगा। गोला भी बनाया तो वह केवल एक पक्षीय होगा। पूरा गोला इस तरह बनाया जाना असंभव है जो दोनों ओर की स्थिति को एक साथ दिखा सके। कल तक लम्बाई−चौड़ाई बताने वाले चित्र ही तैयार होते थे। − हराई का आभास उनसे यत्किंचित् ही होता था। अब ‘थ्री डाईमेंशनल’ स्थिति देखने की भी सुविधा बन चली है और गहराई को देख सकना भी सम्भव हो गया है। आगे चित्रकला के विकास में कई और डाईमेंशनल जुड़ेंगे, पर अभी तो वे सम्भव नहीं। इसलिए जो भी चित्र बने वे अधूरी दृश्य प्रक्रिया पर निर्भर है। अन्य ग्रह पर बैठकर बनाया गया पृथ्वी का चित्र यहाँ की हलचलों की सही जानकारी दे सके यह सम्भव नहीं। भले ही उस ग्रह के निवासी उस चित्र को कितना ही सर्वांगपूर्ण क्यों न मानें।

हमारे पूर्वज धरती को समतल मानते थे। पीछे पता चला कि वह गोल है। इसके बाद यह जाना गया कि वह घूमती भी है और परिक्रमा भी करती है। इसके उपराँत यह जाना गया कि वह अपने अधिष्ठाता के साथ अन्य भाइयों के साथ किसी महासूर्य की प्रक्रिया के लिए भी दौड़ी जा रही है और वह महासूर्य किसी अतिसूर्य की परिक्रमा में निरत है। अपने सौरमण्डल जैसे अन्य कितने ही सौरमंडल उस महासूर्य सहित अतिसूर्य की प्रदिक्षणा में निरत है। मालूम नहीं यह महा− अति और अत्यन्त अति का सिलसिला कहा जाकर समाप्त हो रहा होगा और पृथ्वी के भ्रमण की कितनी हलचलों का भाग्य उन अचिन्त्य− परिक्रमाओं के साथ जुड़ा होगा। कुछ दिन पूर्व यह भी पता लगा कि पृथ्वी लहकती और थिरकती भी है। सीधे−साधे ढंग से अपनी धुरी पर घूमती भर नहीं है वरन् वह कई प्रकार की कलाबाजियां भी दिखाती है। साँस लेती हुई फूलती और पिचकती भी है इससे उसकी भ्रमणशीलता में अन्तर आता है तदनुसार गुरुत्वाकर्षण भी घटता−बढ़ता है।

अपनी आकाश गंगा में हमारे सौरमण्डल जैसे लाखों सौरमण्डल हैं। इन सौरमण्डलों के अपने ग्रह−उपग्रह हैं। समूचे ब्रह्मांड में कितनी गंगाएं हैं? इन प्रश्न का उत्तर वैज्ञानिक अरबों में गिनते हैं। प्रत्येक आकाश गंगा कितने सौरमण्डल अपनी कमर के साथ रस्सी में बाँधे हैं और वे सौरमण्डल कितने ग्रहों को जकड़े बाँधे बैठे है और उन ग्रहों के साथ कितने उपग्रह चिपके हैं इस सारे पिण्ड परिवार की गणना की जाय तो हमारा अंक गणित झक मारेगा और उस गिनती की पूरी कल्पना तक कर सकना मनुष्य के क्षुद्र मस्तिष्क के लिए सम्भव न हो सकेगा। समस्त ब्रह्मांड में हमारी पृथ्वी जैसे क्षुद्र ग्रह कितने होंगे? और उनमें से कितनी ही- कितने चित्र विचित्र आकृति−प्रकृति के प्राणियों को अपनी गोदी में खिला रही होगी। वहाँ की आणविक− रासायनिक जैवीय परिस्थितियाँ एक दूसरे से कितनी अधिक भिन्न विपरीत होंगी यह सब कल्पना करना ही हमारे लिए अशक्य है। अभी तो अपनी पृथ्वी के वातावरण में जो हलचलें चल रही हैं उन्हीं की खोज अत्यन्त विस्मयजनक परदे उठाती चल रही हैं और उन्हीं की खोज अत्यन्त विस्मयजनक परदे उठाती चल रही है और उन्हीं उलझनों से हम हतप्रभ रह रहे हैं जब अन्य ग्रह तारकों में पृथ्वी से सर्वथा भिन्न प्रकार के वातावरण को ध्यान में रखते हुए हमारे विज्ञान में सर्वथा विचित्र अपरिचित विज्ञान का ककहरा पढ़ेंगे तो लगेगा कि इतने असीम ज्ञान−विज्ञान का क्षुद्र मानव मस्तिष्क द्वारा खोज पाया जाना तो दूर उसकी समूची कल्पना करना तथा अशक्य है।

विज्ञान अभी अपना बचपन भी पार नहीं कर पाया कि उसे अपने विषय की गहराई दिन−दिन अधिक दुरूह प्रतीत होती जा रही है। पदार्थ की सबसे छोटी इकाई इलेक्ट्रॉन घोषित तो कर दी गई है पर उसका किसी भी यन्त्र से अब तक प्रत्यक्षीकरण नहीं किया जा सका। न उसे आंखें से देखो गया है न चित्र से उतारा गया है। वह मात्र एक परिकल्पना है जिसे ‘रूप हीन’ कहकर पिण्ड छुड़ाया गया है। इस इकाई की गतिविधियाँ तो नोट करली गई हैं, पर वे क्यों होती हैं इन हलचलों के लिए उन्हें प्रेरणा एवं क्षमता कहाँ से मिलती हैं। खर्च होने वाली शक्ति की वे पूर्ति कहाँ से करती हैं इसका कोई उत्तर प्राप्त नहीं किया जा सका। अणु विज्ञान के मूर्धन्य मनीषी आइन्स्टीन और मैक्स प्लेक तक इस सम्बन्ध में चुप है और यह सोचते हैं कि भौतिक सत्ता के ऊपर कोई अभौतिक सत्ता छाई हुई है। यह अभौतिक सत्ता क्या हो सकती है और उसका उद्देश्य एवं क्रिया−कलाप क्या होना चाहिए यह खोज पाना अभी विज्ञान के लिए बहुत आगे की बात है।

परमाणु परिवार से लेकर सौरमण्डल और ब्रह्मांड संव्याप्त ग्रहपिण्ड परिकर के बारे में हम अभी इतना भी नहीं जानते जितना कि सारे शरीर की तुलना में एक बात। हम केवल पंचतत्वों से बने हुए स्थूल पदार्थों के बारे में ही थोड़ी बहुत जानकारी प्रयोगशालाओं के माध्यम से प्राप्त कर सके हैं। जीव सत्ता− मस्तिष्कीय सम्भावना, अचेतन मन की अतीन्द्रिय शक्ति के अगणित प्रमाण होते हुए भी अभी वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हो सकती है। असंख्य क्षेत्रों की जानकारियां अभी प्रारंभिक अवस्था को भी पार नहीं कर सकी हैं। ऐसी दशा में यदि ईश्वर जैसा अति सूक्ष्म तत्व प्रयोगशालाओं की पकड़ में नहीं आया तो यह नहीं कहा जाना चाहिए कि वह नहीं हैं। तत्वदर्शी दृष्टि से हम उसकी सत्ता महत्ता और व्यवस्था सहज ही सर्वत्र बिखरी देख सकते हैं और उस पर श्रद्धा भरा विश्वास कर सकते हैं।


महामना मालवीय (kahani)

महामना मालवीय किसी बहुत जरूरी काम से जा रहे थे। सड़क के किनारे उन्हें एक बीमार बुढ़िया कराहती हुई पड़ी दिखाई दी।

गाड़ी रुकवाई और बुढ़िया को अपनी गाड़ी में लादकर अस्पताल पहुँचाया।

साथी वकील ने पूछा− ऐसे छोटे काम के लिए आपको अपना बहुमूल्य समय यूँ  ही नहीं गवाना चाहिए था ? मालवीय जी ने गम्भीरतापूर्वक कहा− पीड़ितों की सहायता से बढ़कर और क्या महत्त्वपूर्ण या आवश्यक कार्य हो सकता है?


आत्म तत्व की अखंडता

कबीर दास से किसी ने पूर्णता की परिभाषा पूछी कबीर बोले− “लाली मेरे लाल की, जिसे देखूँ तित लाल। लाली देखन में गई, मैं भी हो गई लाल॥”

संत कवि तुलसीदास ने भी सियाराम मय सारे संसार को कहा है। हम स्वयं ब्रह्म के एक अंश हैं और पूर्ण हैं।

अग्नि का स्वरूप प्रकाश है। उसके ऊपर राख की परत जम जाने पर, उसका असली स्वरूप दिखलाई नहीं पड़ता। वह मात्र राख की ढेरी मालूम पड़ता है। लेकिन जैसे ही ऊपर का आवरण हटता है, वैसे ही प्रकाश पुञ्ज दिखाई पड़ते लगता है।

मनुष्य के ऊपर भी अहंकार, काम, क्रोध, मद, मत्सर का आवरण चढ़ा हुआ है। इस आवरण के कारण उसका असली स्वरूप प्रकट नहीं हो पाता। मनुष्य देवस्वरूप है, आनन्द−स्वरूप है अजर और अमर है। गीता में भी भगवान ने आत्मा को अविनाशी कहा है।

पूर्ण ब्रह्म परमेश्वर अपनी शक्तियों का अनन्त स्त्रोत हमेशा बहाते रहते हैं। अपूर्णता की स्थिति में पड़े हुए मानवों के लिए उनका वरदान और प्यार सदैव मिलता रहता है। पूर्ण ब्रह्म अपने पूर्ण मानव का सेचन करते रहते हैं।

सेचन−क्रिया द्वारा मनुष्य अपने पूर्ण पिता से अनुदान प्राप्त कर पूर्णता की ओर बढ़ता जाता है। उसकी परिणति पूर्ण में लीन हो जाने में है।

मनुष्य पूर्ण है और पूर्ण से उत्पन्न हुआ है। सारा ब्रह्मांड अणु के रूप में घूम रहा है। ब्रह्म का छोटा स्वरूप अणु सर्वत्र नजर आ रहा है। अणुओं के सम्मेलन से पदार्थ का स्वरूप बनता है। मानव शरीर भी अणुओं से निर्मित है। ब्रह्म अणुरूप में हैं और हमारा शरीर अणुओं का समूह है, इसलिये हम स्वयं प्रभुमय हो गये।

अध्यात्म हमें उसी महानता की ओर चलने का संकेत करता है। जब हमारे रोम−रोम में, नस−नस में, आँख−कान, मन और मस्तिष्क में तथा विचारों में ब्रह्म−सत्ता दिखाई देने लगे, तभी हम अध्यात्मवादी बन सकते हैं। निरहंकार होकर अपने कर्तव्यों का पालन करने से हममें अपार शक्तियाँ प्रकट हो जायेंगी।

पूर्णता की प्राप्ति अपने सहज−धर्म के पालन करने में हैं। मनुष्य−जन्म धारण करने के पहले ही स्व−धर्म की स्थापना हो गई रहती है। जन्म से पूर्व माता−पिता तथा समाज हमारे लिये तैयार रहता है। अतः माता−पिता ओर समाज के प्रति हमारा स्वधर्म पहले से तैयार है। इसके प्रति किया गया कर्त्तव्य हमें ब्रह्म के निकट पहुँचा देता है।

अनन्त ब्रह्म से निकले हुए मानव ने अपने को सीमाबद्ध कर लिया है, इसी से उस अनन्त सुख को प्राप्त नहीं करता। नदी का जल जब तक समुद्र में मिल जाने के लिए उतावला रहता है, तब तक उसमें गति और तेज रहता है। लेकिन जब वह झील या तालाब का रूप धारण कर लेता है तो उसकी गति रुक जाती है और उसमें सड़न पैदा हो जाती है। मनुष्य ने अपने को सीमित बन्धनों में बाँध लिया है जाति, देश, सम्प्रदाय के घेरे में घिरा मनुष्य पूर्ण ब्रह्म को पा नहीं सका। इन हीन−विचारों के कारण उसे अनेक प्रकार के कष्ट उठाने पड़ते हैं।

शरीर को प्रधानता न देकर इसमें बैठी हुई आत्मा को पहचानना आवश्यक है। आत्मा और परमात्मा में कोई भेद नहीं। परमात्मा का अंश होने से आत्मा भी उसी तरह शक्ति वान, तेजवान और सत्यवान हैं, जैसा परमात्मा है। इसलिये आत्मा की अमरता को हम सहज जान सकते हैं। माया−मोह− अज्ञान के कारण हम अपने को पहचान नहीं पाते। अतः पूर्णता की प्राप्ति से पूर्व आत्मबोध एवं आत्म−तत्त्व की अखण्डता को समझना आवश्यक है।


आध्यात्मिक क्षमताएं और उनकी उपलब्धि

मनुष्य यों देखने में एक दुर्बल−सा प्राणी मालूम पड़ता है, पर वह प्राणि विद्युत की दृष्टि से सृष्टा की अद्भुत एवं अनुपम संरचना है। विशेषतया उसका मस्तिष्क इतनी विलक्षणताओं का केन्द्र है जिसके आगे अद्यावधि आविष्कृत हुए समस्त मानवकृत यन्त्रों का एकत्रीकरण भी हलका पड़ेगा। उसमें अगणित चुम्बकीय केन्द्र हैं जो विविध−विधि रिसीवरों, ट्रान्सफार्मरों का कार्य सम्पादित करते हैं। ब्रह्मांड में असंख्य प्रकार के एक से एक रहस्यमय प्रवाह स्पन्दन गतिशील रहते हैं इनमें से मनुष्य को मात्र कुछेक ही लँगड़ी लूली जानकारी है। यह जानकारी का क्षेत्र जितना−जितना विस्तृत होता जाता है उससे असीम शक्ति की− असंख्य धाराओं की हलकी−फुलकी झाँकी मिलती है। कदाचित अबकी अपेक्षा मनुष्य के हाथ दूना चौगुना भी और लग गया तो वह सृष्टा की प्रतिद्वंदिता करने लगेगा। इतना होते हुए भी जो कुछ जानना और पाना शेष रह जायगा जिनकी कल्पना कर सकना भी कठिन है। ब्रह्मांड की भौतिक क्षमताएं और चेतनात्मक सम्भावनाएं इतनी अधिक हैं कि उन्हें अचिन्त्य, असीम, अनन्त, अनिर्वचनीय आदि कहकर ही सन्तोष किया जा सकता है।

सर्वविदित है कि पृथ्वी, सूर्य, चन्द्र एवं सौरमण्डल के अन्य ग्रहों से बहुत कुछ अनुदान प्राप्त करती हैं और उस उधार की पूँजी से अपनी दुकान चलाती है। सौरमण्डल से बाहर के ग्रह−नक्षत्र भी उसे बहुत कुछ देते हैं। वह हलका होने के कारण विनिर्मित यन्त्रों की पकड़ में नहीं आता तो भी वह स्वल्प या नगण्य नहीं है। कोई वस्तु हलकी होने के कारण उपहासास्पद नहीं बन जाती वरन् सच तो यह है कि सूक्ष्मता के अनुपात में शक्ति की गरिमा बढ़ती जाती है। होम्योपैथी विज्ञान ने इस संदर्भ में अच्छे गहरे और प्रामाणिक प्रयोग प्रस्तुत किये हैं। ब्रह्मांड में बिखरे पड़े कोटि−कोटि ग्रह−नक्षत्र अपनी−अपनी उपलब्धियाँ मिल बांटकर खाते हैं। तभी तो वे सब एक सूत्र में ‘मणिगण’ एवं पिरोये हुए हैं। यदि उनमें से प्रत्येक ने अपनी उपलब्धियों को अपने ही सीमित क्षेत्र में समेटकर सकोड़कर रखा होता तो ब्रह्मांड का सारा सीराजा बिखर जाता और यहाँ केवल धूलि के बादल इधर−उधर मारे−मारे फिरते दिखाई पड़ते। पृथ्वी की अगणित शक्ति केन्द्रों के छोटे बड़े उपहार मिलते रहते और वह उन खिलौनों से खेलती हुई अपना विनोद−प्रमोद स्थिर रखे रहती।

जिस प्रकार पृथ्वी अन्य ग्रहों से लेती है उसी प्रकार वह अपना उपार्जन ब्रह्मांड परिवार को बाँटती भी है। ‘दो और लो’ का विनिमय क्रम ही इस सृष्टि की धुरी बनकर काम कर रहा है। पृथ्वी और ब्रह्मांड के बीच जो आदान−प्रदान क्रम चल रहा है वह चेतना के घटाकाश− मनुष्य और महादाश− विश्व मानव के बीच भी चल रहा है। पिण्ड शब्द का प्रयोग ग्रह−नक्षत्रों की तरह मानव शरीर के लिए भी होता है। मनुष्य एक पिण्ड है उसका ब्रह्मांड व्यापी असंख्य चेतना पिण्डों के साथ वैसा ही सम्बन्ध है जैसा पृथ्वी का- सौरमण्डल से− देवयानी निहारिका से अथवा ब्रह्मांड केन्द्र महा ध्रुव अनन्त शेष से। मनुष्य की चेतना अपनी उपलब्धियाँ विश्व चेतना को प्रदान करती है और वहाँ से अपने लिए उपयोगी अनुदान प्राप्त करती है।

यों चेतना शरीर के कण−कण में बिखरी पड़ी है पर उसका उद्गम निर्झर मस्तिष्क से ही फूटता है। ध्रुवीय चुम्बक शक्ति की तरह मस्तिष्क में भी आकर्षक और विकर्षक केन्द्र हैं। वे ब्रह्मांड से बहुत कुछ ग्रहण करते और देते हैं। इन्हीं क्रिया केन्द्रों की रिसीवरों एवं ट्रान्सफार्मरों के रूप में व्याख्या की जाती है।

मनुष्य की स्वास्थ्य, चरित्र, संस्कार, शिक्षा आदि विशेषताएं मिलकर समग्र व्यक्तित्व का निर्माण करती है और उसी के आधार पर उसकी प्रतिभा निखरती है। प्रतिभा न केवल सामने आने वाले कामों की सफलता के लिए वरन् दूसरों का प्रभाव डालने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होती है। व्यक्तिगत जीवन में यह प्रतिभा धैर्य, साहस, सन्तुलन, विवेक, दूरदर्शिता एवं शालीनता के रूप में दृष्टिगोचर होती है सामाजिक जीवन में हव सम्बन्धित लोगों को प्रभावित करती है। उन पर छाप डालती है− एवं सहयोग, सद्भाव, सम्मान प्रदान करने के लिए आकर्षित करती है। प्रतिभा प्रयत्नपूर्वक बढ़ाई जा सकती है। इन प्रयत्नों में लौकिक गतिविधियाँ भी शामिल हैं और आध्यात्मिक साधनाएं भी। साधनारत मनुष्य अपनी संकल्प शक्ति और उपासनात्मक तपश्चर्याओं द्वारा अतीन्द्रिय शक्ति का उद्भव करते हैं। अन्तराल में प्रसुप्त पड़ी क्षमताओं को जगाया जाना और इस विशाल ब्रह्मांड में बिखरे हुए शक्ति शाली चेतन तत्वों को खींचकर अपने में धारण करना वह दोनों ही प्रयत्न अध्यात्म साधनाओं द्वारा किये जाते हैं। जिनमें यह उभयपक्षीय विशेषताएं बढ़ती हैं उन्हें कई दृष्टियों से चमत्कारी विशेषताओं से सुसम्पन्न पाया जाता है।

जिस प्रकार हृदयस्पंदन की गतिविधियों की जानकारी इलेक्ट्रो कार्डियोग्राम यन्त्र से होती है। उसी प्रकार मस्तिष्क विद्युत के आधार पर चलने वाली विचार तरंगों का अंकन इलेक्ट्रो ऐसेफैलो ग्राम यन्त्र से होता है। मन क्षेत्र से चिन्तन स्तर के अनुरूप कितनी ही प्रकार की अल्फाबीटा, डेल्टा आदि किरणें निकलती हैं। उनके आयाम और दैर्ध्य चिन्तन का− स्थिति का विवरण प्रस्तुत करते हैं।

किन्हीं−किन्हीं व्यक्ति यों की शारीरिक बनावट सामान्य होती है, देखने में उनका व्यक्तित्व सीधा सरल सा लगता है, पर उनमें विशिष्ट विद्युत शक्ति इतनी भरी होती है कि जो भी काम हाथ में लेते हैं उसे सँभालते चले जाते हैं जिनके भी संपर्क में आते हैं उन्हें प्रभावित किये बिना नहीं रहते।

किस व्यक्ति में कितनी अतिमानवी विद्युत शक्ति है उसका परिचय उसके चेहरे के इर्द−गिर्द और शरीर के चारों ओर बिखरे हुए तेजोवलय को देखकर जाना जा सकता है। यह तेजोवलय खुली आँखों से दिखाई नहीं पड़ता, पर उसे सूक्ष्मदर्शी दृष्टि से अनुभव किया जा सकता है। अब ऐसे यन्त्र भी बन गये हैं जो मानव शरीर में पाई जाने वाली विद्युत शक्ति और उसके एक सीमा तक निकलने वाले विकिरण का विवरण प्रस्तुत कर सकते हैं। देवी देवताओं के चेहरे पर एक प्रभामण्डल चित्रित किया जाता है यह विशिष्ठ मानवी विद्युत शक्ति धाराओं के साथ जुड़ा रहता है।

डॉ. चार्ल्स फारे ने अपने ग्रन्थ ‘एनल्स डिस साइन्सेज साइकिक्स’ नामक ग्रन्थ में अपने कुछ रोगियों के सिरोभाग पर छाये प्रभा मण्डल का विवरण दिया है और बताया है कि रोगों के कारण इस तेजोवलय में क्यों और क्या अन्तर उत्पन्न होते रहते हैं।

इटली में पिरानो अस्पताल में अन्नामोतारी नामक महिला के शरीर में डाक्टरों ने खुली आँखों से झिलमिलाता नील वर्ण प्रभा मण्डल देखा था। जब वह दीप्ति अधिक तीव्र होती थी तब महिला पसीने से लथपथ हो जाती थी, सांसें तेजी से चलती और दिल की धड़कन बढ़ जाती थी। उस महिला की इस विद्युत स्थिति को देखने के लिए विश्वभर के जीव विज्ञानी, भौतिक शास्त्री और पत्रकार पहुँचे थे।

‘फिजीकल फेनामेना आफ मिस्टिसिज्म’ ग्रन्थ के लेखक हरवर्ट थर्स्टन ने अपनी खोजों में ऐसे ईसाई सन्तों का विवरण छापा है जिनके चेहरे पर लम्बे उपवास के उपरान्त दीप्तिमान, तेजोवलय देखे गये। उन्होंने अन्नामीनारी का विवरण विशेष रूप से लिख जिनके शरीर में उपवास के उपरान्त सल्फाइडों की असाधारण वृद्धि हो गई थी। अल्ट्रावायलेट तरंगें अधिक बहने लगी थीं जिनका आभास दीप्तिमान चक्र के रूप में होता था। विद्वान थर्स्टन ने भी अपने विवरणों में ऐसे ही कई दीप्तिवान् सन्तों की चर्चा की है और उनकी विद्युतीय स्थिति में असामान्यता होने का उल्लेख किया है।

अमेरिकी वैज्ञानिक मनुष्य शरीर के चारों ओर बिखरे रहने वाले विशेषतया चेहरे के इर्द−गिर्द अधिक प्रखर पाये जाने वाले तेजोवलय के सम्बन्ध में अपनी शोधें बहुत पहले प्रकाशित कर चुके हैं। अब रूसी वैज्ञानिकों ने भी उस प्रभामण्डल के छाया−चित्र उतारने में असफलता प्राप्त कर ली है। ‘सोवियत यूनियन’ पत्र के 145 वे अंक में इन खोजों का विस्तृत विवरण छपा है। यह प्रभामण्डल सदा एक रस नहीं रहता उसमें उतार−चढ़ाव आते रहते हैं जिनसे विदित होता है कि व्यक्ति के भीतर क्या−क्या विद्युतीय हलचलें हो रही हैं। यदि इस प्रभामण्डल के बारे में अधिक जाना जा सके तो न केवल शारीरिक स्थिति के बारे में वरन् मस्तिष्कीय हलचलों के बारे में भी किसी व्यक्ति का पूरा गहरा और विस्तृत परिचय प्राप्त हो सकता है।

शरीर बल, बुद्धि बल, धन, बल, शस्त्र बल, सत्ता बल आदि कितनी ही सामर्थ्यों के लाभ सर्वविदित हैं। यदि आत्मबल की क्षमता एवं उपयोगिता का भी लोगों को पता रहा होता तो वे जानते कि यह उपलब्धि भी इन सबसे कम नहीं, वरन् कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। आत्म शक्ति न केवल व्यक्तित्व को तेजस्वी बनाती है वरन् वाह्य जगत में लोगों को प्रभावित करने उनका सहयोग सम्पादन करने में भी समर्थ रहती है। कठिन कामों को सरलता पूर्वक सम्पन्न करने की विशेषता जिनमें देखी जाती है उनकी प्रमुख विशेषता यही आन्तरिक प्रतिभा होती है जिन सर्वतोमुखी सफलताओं का आधार कह सकते हैं। हमारे प्रयत्न यदि उस क्षमता को प्राप्त करने की दिशा चल पड़ें तो सचमुच हम सच्चे अर्थों में सामर्थ्यवान कहे जा सकने योग्य बन सकते हैं।


गुलाब के पेड़ पर फूल और कांटे (kahani)

गुलाब के पेड़ पर फूल और काँटे पास−पास ही उगे हुए थे। दोनों मन ही मन अपने को सुखी और साथी को दुःखी मानते रहे।

एक दिन अवसर पाकर दोनों ने वार्तालाप आरम्भ कर दिया और मन की बात एक दूसरे से कहने लगे।

काँटे ने फूल से कहा− बन्धु तुम्हें अत्याचार पीड़ित जीवन−यापन करना पड़ता है। माली तुम्हें निर्दयतापूर्वक भरी जवानी में तोड़ ले जाता है। माला बनाने के लिए सुई में तुम्हारा कलेजा छेदता है। कैसी है यह विधि की विडम्बना।

फूल ने उत्तर देने से पहले अपने मन की शंका का निवारण करना उचित समझा उसने कहा− यशस्वी सुन्दर पौधे में जन्में होने पर भी तुम्हें काँटे का कलेवर मिला जिनने भी छुआ तुम्हें कोसा और लाँछित किया। कैसा दुर्भाग्यपूर्ण अपवाद है यह तो तुम्हारे पल्ले विधाता ने बाँध दिया है।

दोनों के एक दूसरे के सम्बन्ध में मूल्याँकन उनकी अपनी दृष्टि से सही थे, पर अपने बारे में जो उनने सोच रखा था वह आक्षेप से सर्वथा भिन्न था।

फूल ने दुर्भाग्य के आरोपण का प्रतिवाद करते हुए कहा− मैं अपने को भाग्यवान मानता हूँ। माली का कृतज्ञ हूँ। जिसने मेरे नगण्य से अस्तित्व को देवताओं और महामानवों के गले का हार बना दिया।

अब काँटों की बारी आई। उनने कहा− मैं किसी की डालियों में लगने नहीं जाता। दूसरों की विभूति हड़पने वाले जब तुम्हारे ऊपर हाथ डालते हैं तो मेरे माध्यम से अपने आक्रमण का प्रकृति प्रदत्त फल पाते हैं। फिर में अपने सहोदर भ्राता की जीवन रक्षा करने के कारण यदि बदनाम होता हूँ तो उसमें मुझे भाग्यवान ही माना जाना चाहिए।

गुलाब का पौधा इस विवाद को मनोयोगपूर्वक सुनता रहा, पर वह यह निर्णय न कर सका कि वे अभागे थे या भाग्यवान।


धन का उपार्जन और उपयोग नीतिपूर्वक हो

बुराई से केवल बुराई ही बढ़ती है। धन यदि बुरे माध्यम से कमाया गया है तो उसका खर्च भी उचित रीति से नहीं हो सकता। जिसने पसीना बहाकर गाढ़ी कमाई से पैसा कमाया है, उसे खर्च करते समय दर्द लगेगा और बार−बार सोचेगा कि इसे किस कार्य के लिए कितनी मात्रा में खर्च करना उचित है? सच बात तो यह है कि हराम की कमाई आडम्बर बनाने, ढोंग रचने और विलासिता के प्रसाधन जमा करने में ही खर्च होती है। इससे अनेक विपत्तियों और व्यथाओं का सामना करना पड़ता है। अनुचित कमाई अपना क्षणिक चमत्कार दिखाकर अन्ततः मनुष्य को अंधकार के गर्त में गिरा देती है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि राष्ट्र का आर्थिक, शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक पतन होता जा रहा है।

आर्थिक व्यभिचार को प्रोत्साहन देने में न केवल अर्थ− पिपासुओं का ही हाथ है वरन् उन अज्ञानियों का भी हाथ समझना चाहिए जो गुणों के स्थान पर धन को आदर देने की भूल करते हैं। आज जिसके पास अधिक धन−सम्पत्ति है, समाज के लोग उसको ही आदर ‘प्रतिष्ठा ‘ देने लगते हैं। वह यह देखना नहीं चाहते कि जो प्रचुर मात्रा में धन एकत्रित किया गया है वह किस मार्ग और उपाय से आया है। बेईमानी पूर्वक धन कमा लेने पर जब अवमानना के स्थान पर सम्मान ही होता है तो कोई वैसा करने में संकोच ही क्यों करे? इस आर्थिक व्यभिचार को कम करने का उपाय यह है कि− धन के स्थान पर गुणों का आदर किया जाय। ऐसे व्यक्तियों का नागरिक अभिनन्दन किया जाय जिन्होंने अपनी ईमानदारी तथा सदाचरण का प्रमाण दिया है, फिर चाहे वह धन के सम्बन्ध में दरिद्री ही क्यों न हो। भ्रष्टाचार से बने हुए धन कुबेर के मुकाबले में वह व्यक्ति जो अपनी छोटी−सी तनख्वाह में सन्तोषपूर्वक गुजर करता है और धन की लिप्सा में न तो किसी को धोखा देता है और न झूठ बोलता है, प्रशंसनीय ही है।

धन कमाने के लिए उचित प्रयत्न करना सराहनीय है। उपार्जन और उत्पादन के लिए प्रयत्नशील रहने से व्यक्ति और समाज की क्षमता बढ़ती है, राष्ट्र की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होती है। प्रगति का पथ−प्रशस्त करने वाले साधनों में एक महत्वपूर्ण वस्तु धन भी है। किन्तु “धन कमाना सरल है उसे खर्च करना कठिन है।” हमारी आर्थिक समस्याओं के पीछे कमाने का इतना दोष नहीं है जितना खर्च करने का। हम नहीं जानते कि हमें किस तरह से खर्च करना चाहिए। जहाँ खर्च नहीं करना चाहिए वहाँ हम पानी की तरह पैसा बहाते हैं और जहाँ खर्च करना चाहिए वहाँ हम रीते ही रह जाते हैं। अपव्यय और कंजूसी दोनों ही बहुत बड़े दोष हैं। बहुत से लोग जीवन भर कमाते ही मर जाते हैं किन्तु अपने और दूसरों के लिए आवश्यक खर्च भी नहीं करते। अपने बच्चों को योग्य बनाने, अपने स्वास्थ्य और रहन−सहन को, सामान्य स्तर पर बनाये रखने के लिए भी खर्च नहीं करते। वे या तो अपनी सन्तानों के लिए कमाते हैं या व्यर्थ नाम के लिए। सन्तानें उस धन का दुरुपयोग करती हैं, सन्तानों को धन नहीं, योग्यता देनी चाहिए। पैसा जहाँ रुकता है वहाँ सड़ता है।

बहुत से लोग नाम के लिए धन खर्च करते हैं वे धर्म या मानव के प्रति कर्त्तव्य भावना से प्रेरित नहीं होते। ऐसे खर्चे और ऐसे व्यक्ति भी प्रशंसा के पात्र नहीं हो सकते। यदि वही धन दीन, दुखियों की सहायता में, मानव मात्र की सेवा में, सद्गुणों के विकास में खर्च किया जाता तो समाज और राष्ट्र का कितना हित होता।


हे परम प्रभु हमें पवित्र बनादे

ओऽम् विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव। यद्भद्रं तत्र आसुव॥ अंक 5।82।5

हे सकल जगत के उत्पन्न करने वाले ईश्वर! तू हम सबों के पापों को दूर कर और कल्याणकारी विचार हैं, उन्हें हमें प्रदान कर। हे कृपानिधे हमारे अन्तःकरणों को पवित्र कर हमें शुद्ध बुद्ध और पवित्र बना।

ऋग्वेद की उपर्युक्त ऋचा में ऋषि ने परमात्मा से प्रार्थना की है। इसमें पहली माँग है कि हे परमपिता परमेश्वर पहले हमारे पापों को दूर कर दे। यह बात एक दम स्वाभाविक है कि यदि हम कोई चीज बाहर से कड़ी मेहनत के बाद कमा कर लाते हैं तो उसके रखने को पहले सोचते हैं। उसके लिए जगह बनाते हैं। किसान जब फसल काटता है तथा अन्न निकाल लेता है तब उस अन्न को जहाँ तहाँ जैसे−तैसे नहीं फेंकता। उसको रखने के लिए महीनों पूर्व एक बखार के लिए की सफाई करता है, कोठिला या अन्नागार बनाता है उसका नीम आदि की पत्ती जलाकर शोधन करता है। आजकल तो तरह−तरह की रासायनिक दवायें मिलने लगी हैं, अन्नागार या अन्न गोदाम को शोधने के लिए। इससे रखे जाने वाले अन्न में कीड़े−मकोड़े नहीं लगते। वर्षा का पानी नुकसान नहीं करता तथा जो कुछ रखा जाता है, उसे हम अपनी इच्छानुसार सुरक्षित रख पाते हैं। किन्तु यदि प्रमादवश उस गाढ़ी कमाई को जहाँ−जहाँ बिना सुरक्षा का ध्यान किये फेंक देंगे तो परिणाम भी तत्काल भुगतना पड़ेगा। अन्न में कीड़े लग सकते हैं या सीलन से दाने सड़ने−घुनने लगते हैं। अतः महीनों जिसे कमाने में अपनी मेहनत लगाई, थोड़ी−सी सतर्कता न बरतने के कारण हम उसे गँवा बैठते हैं।

हमारे ऋषियों का यह पहला ध्यान रहा है कि ईश्वर भजन और तप से जो कुछ भी विचार की या बुद्धि की ऊर्जा वरदान स्वरूप मिले उससे पहले हे प्रभो! हमारे संचित पापों को हमसे दूर कर दो। पाप तो हमारे मन की वृत्ति है। जो संस्कार स्वरूप हमारे अचेतन मन में दबी पड़ी है। तथा जैसे अवसर आता है वह अहंकार पर सवार होकर हमारी बुद्धि को भ्रमित कर देती है। जब बुद्धि भ्रमित हो जायेगी तो हम उस वृत्ति के अनुसार वैसे कर्म भी कर डालेंगे जो हमें स्वयं पसन्द नहीं। किन्तु लाचार हैं हम अपनी आदत से। अतः ऋषि इस पाप की वृत्ति से सजग हैं तथा सर्वशक्तिमान् से पहला वरदान माँगते हैं कि प्रभो पहले हमें पाप और उसकी वृत्ति से मुक्त करो। क्योंकि जब तक पाप और उसकी प्रवृत्ति बनी रहेगी तब तक न हमसे भक्ति होगी न सद् कर्म। पाप निवृत्ति के बाद ऋषि की प्रार्थना है कि कल्याणकारी विचार मन में जगें। विचार मन में उठे उस भाव को कहते हैं जिसका अनुगमन कर हमारी कामेन्द्रियाँ क्रिया स्वरूप करती हैं। यदि यह बुद्धि और विवेक सम्मत होगा तो कल्याणकारी होगा या नहीं किसी मानसिक आवेग से निकला होगा तो अकल्याणकारी होगा। ध्यान देने की बात है कि ऋषि ने मन्त्र दर्शन करते समय समष्टि का ध्यान पहले रखा तथा जो कुछ प्रार्थना की वह बहुवचन में यानी समग्र समाज का प्रतिनिधि होकर न कि केवल अपने लिए यह बात स्वाभाविक है कि जब सबका या पूरे समाज का कल्याण होगा तो हम उससे बरी नहीं रहेंगे। अतः वसुधैव कुटुम्ब की भावना अवश्य रही होगी। नहीं तो ऋषि कहते कि हे प्रभो केवल मुझमें ही अच्छे विचार जगें।

किन्तु इस तरह की एकाँगी प्रार्थना कर और वरदान पाकर क्या कोई सुखी रह सकता है? कदापि नहीं। यदि अथाह धन कमाते जायें महल, अटारी उठाते जायें। मुझमें तो अच्छे विचार प्रभु कृपा से जगें। किन्तु पड़ौसियों में पाप बढ़ता जाय तथा कुविचार उपजते जायं भक्त होने के बावजूद भी समाज के आचरण का भोग हमें भी भोगना ही पड़ेगा। पड़ौस के लोग हमारे धन से जलेंगे। हमारी आनन्द की स्थिति से जलन करेंगे और किसी दिन महल में डाका डाल मुझे बरबाद कर सकते हैं। किन्तु धन न बढ़ा तो क्या लेकिन पड़ौस के सभी लोगों के विचार अच्छे हो जायं, सबमें अच्छी बातें आ जायें तो हमारी गरीबी भी स्वर्ग ला देगी। हम सभी मिलकर आनन्दपूर्वक पूरा जीवन बिता सकेंगे।

यह उदात्त मनः स्थिति है मानव और पशु में भेद करती है। हमारा सारा सामाजिक ढाँचा ऋषि की केवल एक माँग पर अवस्थित है। यदि सद्विचार की भावना हमारे अन्दर से एकाएक गायब हो जाय यह सारा का सारा वैभव नष्ट हो जाय। कोई विकास भी नहीं होगा। जैसा हम पशुओं में देखते हैं कि वहाँ अपने सामूहिक स्वार्थ की बात नहीं होती सभी अपने पेट के पीछे पड़े रहते हैं। ऐसे चींटी और मधुमक्खी इसके अपवाद हैं। दूसरी ओर मानव है। जुलाहा कपड़ा बुनता है, तकनीकी में विकास करता है, सैनिक रक्षा करता है तथा समग्र राष्ट्र की रक्षा के लिए मरता जीता है, वैज्ञानिक रात−दिन एक कर अन्वेषण करते हैं तथा इसी प्रकार अन्य पेशा वाले दूसरों का काम करते रहते हैं। प्रत्यक्ष हम देखते हैं कि मानव समाज में हम एक दूसरे की सेवा करते हैं और परोक्षतः सबको आवश्यकतानुसार यथेष्ट सहायता मिल जाती है। इस प्रकार समाज की गाड़ी चल रही है। हमारा विकास दिन−प्रतिदिन हो रहा है। हमारी सुख−सुविधाएं बढ़ रही हैं। इस सारे विकास का एकमात्र कारण है कि हमारे मन में कल्याणकारी विचार हैं।

किन्तु जिस दिन मानव के हृदय से कल्याणकारी विचार उठ जायेंगे, हमारे मन में केवल कुत्सा, संकीर्णता और घृणा जगह बना लेगी तो विनाश होने से कोई बचा नहीं सकता। त्रेता में केवल रावण के कारण एक द्वीप की पूरी आबादी नष्ट हो गयी। द्वापर में दुर्योधन के अन्दर कुविचार उठने से महाभारत जैसा भयंकर युद्ध हुआ। तथा प्रथम और द्वितीय महायुद्ध कुविचारों के ही परिणाम थे। अतः हमारे ऋषियों को पता था कि कल्याणकारी विचार के बदले कोई और चीज माँगी गयी तो वह भी निरर्थक है क्योंकि उत्कृष्ट मनःस्थिति न होने पर प्रत्येक सम्पदा हमारे लिए विपत्ति का कारण बनेंगी। इसके विपरीत यदि सद्भावनाओं का बाहुल्य होगा तो समस्त उपयोगी सुख साधन स्वतः ही उपलब्ध होते चले जायेंगे। अतः केवल ऋषि ने एक ही माँग की कि प्रभो हम यानी पूरे समाज में कल्याणकारी विचार भर दो।

मुख्य पूँजी ऋषि ने माँगी कल्याणकारी विचार की। किन्तु इस विचार वरदान का तभी फल होगा जब पुनः इसको पाप ताप से बचाकर पवित्रता और विवेक से रक्षा की जाय। हम बड़ी मेहनत से किसी ऐसे दुर्लभ पेड़ का बीज अपने घर लाये हैं उसको अपने खेत में लगाकर उसका फल चखना चाहते हैं तो आवश्यक है कि उसके लिए उपयुक्त भूमि तैयार करें। फिर उसकी रक्षा की पूरी व्यवस्था करें। भूमि और रक्षा की पर्याप्त नहीं है, सिंचाई का भी प्रबन्ध करें। अन्त में ऋषि प्रभु से पुनः प्रार्थना करते हैं कि हमारी अन्तरात्मा पवित्र बनी रहे। जब अन्तःकरण शुद्ध रहेगा तो जो कल्याणकारी विचार वरदान स्वरूप मिला है उससे अच्छे कर्म फूटेंगे और जब सद्कर्म होंगे तो पूरे समाज को अच्छा परिणाम भी मिलेगा। जिससे सभी सुखी और प्रसन्न होंगे तो प्रभो हमें भी प्रसाद अवश्य मिलेगा। अतएव हे परमपिता परमेश्वर हमारे अन्तःकरणों को पवित्र कर हमें शुद्ध−बुद्ध और पवित्र बना।


अन्धा हाथ में लालटेन लेकर (kahani)

अन्धा हाथ में लालटेन लेकर सड़क पर चल रहा था, ताकि सामने से आने वाले उसे पहचान सकें और रास्ता छोड़ दें। पर एक राहगीर उससे टकरा ही गया। अन्धे ने झुँझला कर कहा− देखते नहीं मेरे हाथ में लालटेन है। तुम्हें क्या कुछ नहीं दीखता?

राहगीर ने सन्तुलित शब्दों में कहा− मित्र आपकी लालटेन तो बुझी हुई है। आप यह तो पता लगाते कि जिस लालटेन से दूसरों को प्रकाश देने चले हैं वह स्वयं भी प्रकाशित है या नहीं।


अध्यात्म का अभाव ही व्यक्तित्व को विकृत करता है।

आज की मानव संघर्षों से विचलित हो रहा है। उसका मानसिक सन्तुलन इतना बिगड़ रहा है कि उसकी परिणति आत्महत्या, आत्मप्रताड़ना दीनता, अपराध, पागलपन तथा हिंसा की घटनाएं में हो रही है। इन विभीषिकाओं की जड़ आत्म ज्ञान की कमी है। मनुष्य अपने को नहीं पहचानता। वह इनका कारण बाहर ढूँढ़ने का प्रयत्न करता है। बाहर की परिस्थितियों का प्रभाव मानव के मन पर पड़ता है। उसके अनुसार वह आचरण करता है। असफलता का कटु अनुभव अचेतन में जाता है जो उनके जीने की कला को प्रभावित करता रहता है। इन सब क्रियाओं का परिणाम हो वह सारा अप्रिय घटनाक्रम है जो आज के मनुष्य पर छा गया है और उसका सन्तुलन बिगाड़ रहा है।

जीवन बड़ा अमूल्य है। इसमें संसार का सौंदर्य भरा हुआ है। पर उसका आनन्द तभी मिल सकता है जब जीवन जीने की कला को समझें। इसके अभाव में हम जरा−जरा सी बातों पर विचलित होते रहेंगे। हरदम हम अपने विषय में सोचते रहेंगे। हरदम अपने विषय सोचना चिन्ता का कारण बनता है। नींद न आना, भूख न लगना, व्यर्थ में झुँझलाना आदि क्रियाएं मानसिक तनाव के लक्षण हैं। इससे मनुष्य खिन्नता और लाचारी का अनुभव करता है। मन ही मन कुढ़ता रहता है। हर स्वस्थ व्यक्ति मानसिक तनाव से रहित होता है।

मनुष्य केवल शरीर ही नहीं है। इससे परे उसका मन और आत्मा है जो मनुष्य के शरीर को व्यक्तित्व का अंग बनाते हैं। शरीर और व्यक्तित्व का सन्तुलन उसके जीवन के लक्ष्य पर है। मनुष्य के जीवन का लक्ष्य उसे स्पष्ट होना चाहिए।

मनुष्य को अपने जीवन को सार्थक, तथ्य−पूर्ण, लक्ष्य युक्त और सप्रयोजन समझना चाहिए। उसे इस बात की शिक्षा बचपन से ही मिलनी चाहिए कि सार्थक जीवन श्रेष्ठ कार्यों पर निर्भर करता है। इस अनुभूति से मानव अपने कार्यों में आनन्द लेता रहेगा। उसका मानसिक सन्तुलन ठीक रहेगा। उसे कार्य करने में आनन्द मिलेगा। लक्ष्य के अभाव में व्यक्ति उदासीन हो जायगा। उसका मानसिक विकृति का शिकार हो जायगा। वियना के मनो चिकित्सक डॉ. फैक्ल का मत है कि यदि मनुष्य ऐसा अनुभव करने लगे कि उसका जीवन निरर्थक हैं तो उसका मन स्वस्थ और सुखी नहीं रह सकता। उनके अनुसार मानसिक धरातल ही असन्तुलन का कारण है उनकी चिकित्सा प्रणाली अर्थ बोध की चिकित्सा या ‘लौगोथिरेपी’ है। डॉ. फेंकल का कहना है कि जिसे अपने जीवन और कार्य के अर्थ का बोध न हो वह व्यक्ति स्वस्थ नहीं है।

डॉ. फैक्ल के अनुसार आज के अधिकतर आदमी जीवन का अर्थ बोध नहीं जानता। वह नहीं जानता मैं क्यों जी रहा हूँ। मेरा जीना जीना भी है या नहीं। वह तो जीवन को ढो रहा है। जीवन उसके लिए आनन्द नहीं मजबूरी है। उसका चिन्तन आध्यात्मिक बन गया है। डॉ. फैंक्ल के अनुसार भोग तृप्ति तथा शक्ति संचय मानसिक स्थिरता नहीं प्रदान करते। मनुष्य के लिए जीवन के लक्ष्य और उनकी सिद्धि आवश्यक है। फैंक्ल की पद्धति के अनुसार मानसिक रोगी से प्रिय−अप्रिय सभी विषयों पर चर्चा करके उसे जीवन का अर्थ ढूँढ़ने की ओर चला देना आवश्यक है। ऐसा रोगी आने अस्तित्व को समझेगा तो उसका मन स्फूर्ति से भर जायगा। वह जीने की इच्छा करने लगेगा।

जैम्स लैग के अनुसार मनोचिकित्सक अपने रोगी को एक प्रकार से पागलपन ग्रस्त समझते हैं जिससे उसका आत्म−विश्वास समाप्त हो गया है पागलपन कठिन परिस्थितियों और समाज के अत्याचारों से बचने का एक छोटा अभिनय है। प्रारम्भ में मनुष्य झूठ−मूँठ का पागल बनता है फिर वह स्वभाव का रूप धारण कर लेता है। ऐसे व्यक्ति का आत्मा सोया हुआ है। उसको सहानुभूति तथा संवेदनशील स्पर्श से जगाना है। चिकित्सक को रोगी के साथ गहरे उतर कर रोगी के अन्दर सोये आत्मा तक पहुँचना है। रोगी में यह भाव आ जाय कि मैं चेतन तथा समर्थ हूँ। वह यह विश्वास करने लगे कि संसार की कोई कठिनाई ऐसी नहीं जिसका वह सफलता से सामना न कर सके। यह विश्वास आते ही उसका मानसिक सन्तुलन लौट आयेगा।

आज का समाज और शिक्षा प्रणाली व्यक्ति को स्वभाव तन्त्र चिन्तन नहीं करने देते। मानव में ‘हम’ और ‘वे’ का अन्तर समाज ने उत्पन्न कर दिया। जिसने व्यक्ति का विवेक और व्यक्तित्व नष्ट कर दिया। वह समूह का दास हो गया।

समाज में मनुष्य को स्वतन्त्र रूप में चिन्तन करने का अवसर नहीं दिया जाता। बँधी हुई व्यवस्था में व्यक्ति छटपटाता है। मनुष्य में उत्सुकता होती है, उसको जानने को मन बढ़ता है। रोके जाने पर विद्रोह करने की उसकी आतुरता बढ़ जाती है। मन को रोकना पर्याप्त नहीं, उसे दिशा मिलनी चाहिये, जिससे उसे आनन्द मिले। मन आकर्षण की ओर झुकेगा। उस ओर से रोकने के बदले उसकी दिशा में परिवर्तन करना आवश्यक है। उसके लिए अधिक आकर्षक क्षेत्र तैयार किया जाना चाहिए।

जीवन भर कार्य करते रहना मन पर काबू पाना है, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। कार्य का रूप जीवन के लक्ष्य से प्राप्त होता है। जीवन के लक्ष्य मनुष्य को आत्म−ज्ञान से प्राप्त होते हैं। यही अध्यात्म है। अपने को जानना उसके अनुसार आचरण करना ही अध्यात्म है। अधि+आत्म=आत्मा का अधिकार यही अध्यात्म है। आत्मा जो प्रत्येक मनुष्य के जीवन का आधार है। यह मनुष्य के जीवन का लक्ष्य बताती है। जीवन का लक्ष्य न जानना तथा उस पर आचरण न कर पाना, मनुष्य की चिन्ता का कारण बनता है। जिससे मनुष्य का मस्तिष्क सोचते−सोचते निष्क्रिय हो जाता है और चिड़चिड़ा हो जाता है। उसका आत्म−विश्वास समाप्त हो जाता है। विभिन्न प्रकार के रोगों से ग्रस्त हो जाता है।

शारीरिक रोगों का आधार भी मानसिक होता है। सिरदर्द, पेट दर्द, उल्टी जैसे रोगों का कारण तो अधिकतर मानसिक होता है। दूसरे के रोगों को देखकर जानकर भी रोगी अपने अन्दर ऐसे भाव ले आता है, मानो वही रोग उसे हो गया। इसका कारण बचपन से प्रारम्भ होता है। बचपन की क्रियाएं तुरन्त प्रभाव नहीं डालतीं। वे अचेतन में बैठ जाती हैं। शक्ति का आविर्भाव होने पर वे उभर कर चेतना स्तर पर आ जाती है। कभी−कभी ये पागलपन या असाध्य रोग का रूप धारण कर लेती है।

अपने प्रियजनों की मृत्यु से उसका अवचेतन प्रभावित हो जाता है, हृदय रोग इसकी प्रतिक्रिया में प्रकट होता है। आत्म−हत्या, मानसिक अस्वस्थता की चरम परिणति है। स्वस्थ व्यक्ति ऐसा पग नहीं उठा सकता। आत्म−रक्षा मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। इसलिए यदि किसी की जीने की इच्छा पर मरने की इच्छा विजय प्राप्त कर ले तो वह व्यक्ति मानसिक रूप से अत्यन्त अस्वस्थ हैं।

पागलपन का सामयिक दौरा, विषण्णता और स्नायु दुर्बलता है। ये सब मानसिक अस्वस्थता का परिणाम है। जिनका प्रारम्भ जीवन−लक्ष्य को न जानने तथा उन पर समाज या परिस्थितियों के दबाव से आचरण न करने के कारण होता है। अतः मानव की जीवन−लक्ष्य को जानना तथा समाज द्वारा उसकी स्वीकृति सुविधा मिलना आवश्यक है। यही अध्यात्म का मूल विषय है। इसको अच्छी प्रकार समझ कर ही मानव ठीक आचरण करेगा। कार्यरत रहेगा तथा अपने लक्ष्य को प्राप्त करके, होने वाली मनोविकृतियों से बच सकता है।


Quotation

जिस प्रकार बहता हुआ जल पत्थरों को चीरता हुआ, अपने स्त्रोत सागर में पहुँचता है उसी प्रकार साधक, कठिन परिस्थितियों में से गुजरता हुआ, लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है।


मनुष्य क्या था और क्या बनेगा?

मनुष्य क्या था? और क्या बन गया? क्या बनने जा रहा है? इन प्रश्नों का उत्तर प्राप्त करने के लिए चिरकाल से ऊहापोह चल रही है। आदि मानव मनु थे उनकी सन्तानें मानव कहलाई। स्वर्ग से आदम और हब्बा जमीन पर धकेल दिये गये और उन्होंने यहाँ आकर जो सन्तानें उत्पन्न की वे मनुष्य बन गई। ब्रह्मा ने सृष्टि उत्पन्न की और उसी समय सर्वश्रेष्ठ प्राणी के रूप में मनुष्य को सृजा। इन पौराणिक आख्यायिकाओं से अब बुद्धि का समाधान नहीं होता। विज्ञान इस संदर्भ में तर्क और प्रमाणों को आधार मानकर खोजे करता रहा और आगे भी इस प्रयास में संलग्न है।

आदि मानव कहाँ और कब पैदा हुआ− उसके सम्बन्ध में यह माना जाता है कि वह अब से दस लाख वर्ष पूर्व इस स्थिति में विकसित हो गया था कि उसे ‘मनुष्य’ नाम दिया जा सके। मिश्र, भारत, दक्षिण और मध्य अफ्रीका, चीन, जापान आदि देशों में जो खोपड़ियों तथा मानव प्रयोग के जो उपकरण मिले हैं उनसे प्रतीत होता है कि उन क्षेत्रों में मनुष्य का अस्तित्व मौजूद था। एक जगह उत्पन्न होकर उसकी पीढ़ियाँ दूर−दूर फैली या विभिन्न स्थानों में अपने−अपने क्रम से मनुष्य का विकास हुआ। इस प्रश्न के उत्तर में जो बातें कहीं गई हैं उनमें यही अधिक युक्ति संगत है कि वातावरण और परिस्थितियों ने धरती के विभिन्न भागों में जीवों के विकास को प्रोत्साहन दिया है, इसी क्रम से मनुष्य भी विभिन्न स्थानों में अपना स्वतन्त्र विकास करता रहता है, अपने पूर्वजों की तुलना में उसे अपेक्षाकृत अधिक उन्नति करते रहने का अवसर मिलता रहा है।

आदि मानव को “होमीनिड” नाम दिया गया है। यह अर्ध वानर और अर्ध मानव था। लगभग वन मानुष स्तर का। पूर्ण मानव− होमोसेपियंस और विकसित मानव− होमोडूरैक्स− क्रमशः बनते चले आये हैं। परिस्थितियों के अनुसार नस्लें सुधरती गई हैं। यह नस्लें भारत, चीन, अफ्रीका और योरोप के कुछ स्थानों पर विकसित हुई। डॉ. लेविस लीके ने अफ्रीका के ओल्डुवाई नामक 30 मील लम्बी और 300 फुट गहरी गुफा की खोज करके जो अवशेष पाये उससे न केवल मनुष्य की वरन् प्रागैतिहासिक काल के अन्य प्राणियों के इतिहास की प्रामाणिक शृंखला मिलती जुलती है।

चार्ल्स डार्विन ने अब से एक सौ वर्ष पहले यह कहा था कि आदि मानव अफ्रीका में जन्मा था। उनकी इस मान्यता का कारण उस क्षेत्र में मिले प्रागैतिहासिक काल की खोपड़ियाँ थी। पर अब अन्यत्र भी उसी प्रकार के प्रमाण मिल रहे हैं। डॉ. लुई लीके ने अन्यत्र भी वैसे अवशेष पाये हैं। मनुष्य का अति पूर्वज एन्प्रोपायड एप और उसका पीछे का विकसित वंशज ‘आस्टेलोपिथैसाइन’ माना जाता है यह दोनों कपि मानव थे। इसी वंश का क्रमिक विकास होता गया और उसकी न के वल आकृति वरन् प्रकृति भी बदलती और विकसित होती चली गई। समयानुसार वह काल आया जिसे पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार प्लीस्टोसीन अथवा मानव युग कहते हैं। यह दस लाख वर्ष पूर्व आरम्भ हुआ।

सबसे पुराना नर कंकाल जिसे नृतत्व विज्ञानियों ने ‘जिंजान थ्रोपस’ नाम दिया है। यह प्रमाणित करता है कि मनुष्य का अस्तित्व अब से 13 लाख वर्ष पूर्व ही मौजूद था।

पश्चिम जर्मनी में नियडर नदी के किनारे राइनलेण्ड क्षेत्र की एक गुफा में जो खोपड़ियाँ मिली हैं उनमें एक मनुष्य की भी है। हक्सले ने इसे भी आदि मानव की ठहराया है।

डच पुरातत्त्ववेत्ता ड्यूबोइस ने मध्य सुमात्रा में जो नर कंकाल प्राप्त किये थे वे भी आदि मानव के शारीरिक ढाँचे की बहुत कुछ जानकारी देते हैं। हालैंड के भू−गर्भ वेत्ता जीग्टर हार को जो खोपड़ियाँ मिलीं उनमें इस विकास शृंखला की पुष्टि होती है।

जावा में मिली अस्थियाँ, फ्राँस की ला शापेल ओ साँ की गुफा में मिले कंकाल, सहारा क्षेत्र में इवैन्सकार्पिन्स को मिली हड्डियां, इजराइल की तिवेरियास झील के निकट खुदाई में मिले अवशेष, टाँग (जोहन्सवर्ग) को डॉ. दार्स को मिली सामग्री, चीन को चाडकाडतिन गुफा में डॉ. ब्लैक को मिली अस्थियाँ, योरोप के विभिन्न स्थानों से मार्स्टन द्वारा संग्रह किये गये पुरातन प्रमाण यह बताते हैं कि मनुष्य अपने पूर्वजों की अपेक्षा क्रमिक विकास के पथ पर अग्रसर होता आया है। राकफेलर फाउंडेशन की सहायता से फ्राज वाइडन राइस ने मनुष्य विकास के पुरातन कालीन इतिहास सम्बन्धी जो व्यापक खोजें की हैं उनका विवरण डेन्टीशन ऑफ साइनाथ्रोपस− दि स्कूल आफ साइनान्थ्रोपस नामक तीन ग्रन्थों में प्रकाशित किया है इसमें उन्होंने मानवी विकास क्रम पर अधिक प्रामाणिक प्रकाश डाला है।

पुराने प्राणी शरीर की दृष्टि से विशालकाय थे और मस्तिष्क की दृष्टि से मंद बुद्धि। बुद्धि का उपयोग अधिक काम आया तो वह बढ़ती गई, शरीर से कम श्रम लिया गया तो वह छोटा होता गया। प्रकृति का सिद्धान्त है कि जिस तत्व की उपयोगिता समझी जायगी− आवश्यकता अनुभव की जायगी और उपयोग में लाई जायेगी वह बढ़ेगी, मजबूत होगी और उसकी उपेक्षा की जायेगी, वह निरर्थक पड़ी−पड़ी घटती चली जायगी। मानवी काया का भी यही हुआ। साधन बढ़ने से उसका विकास क्रम यहाँ आ पहुँचा जहाँ आज हम हैं। पुराना मनुष्य कैसा था इसकी एक झाँकी हिमालय पर पाये जाने वाले हिम मानव के रूप में अभी भी यदा−कदा सामने आती रहती है। हिम मानव का अस्तित्व अब संदिग्ध नहीं है उसके प्रमाण एक के बाद एक मिलते ही चले जाते हैं।

एवरेस्ट चोटी पर सफल चढ़ाई करने वाले एडमंडहेलरी के साथी शेरपा तेनसिंह के पिता का यह दावा था कि उन्होंने 16 हजार फीट की ऊँचाई पर चुरयो इलाके में बकरियाँ चराते समय हिम मानव को आँखों से और निकट से देखा है। उनके कथनानुसार इस प्राणी का सीमेन्ट जैसा रंग, लम्बी नाक, पंजे डेढ़ फुट, आंखें छोटी, बाल तीन से पाँच इंच तक के होते हैं। वह शाकाहारी भी हैं और माँसाहारी भी। लकड़ियाँ इकट्ठी करना और गड्ढों में पत्थर फेंकना उसका प्रधान मनोरंजन है। नेपाल, सिक्किम और भूटान के लोगों ने अपने−अपने क्षेत्रों में जिस तरह के हिम मानव देखे हैं उनकी आकृति में थोड़ा बहुत अन्तर पाया है तदनुसार उसकी चूटी, भीते और थेलमा जातियाँ बताई जाती हैं इसमें चूटी सबसे अधिक विशाल और बलवान होता है।

नेपाली इतिहासकार नरहरिनाथ ने अपने एक लेख में हिम मानव का आँखों देखा वर्णन छपाया था। उसके साथ ही उनने वे फोटो भी छपाये जो उन्होंने स्वयं खींचे थे। उनके कथनानुसार हिम मानव की ऊँचाई 11 फुट थी। छाती तीन फुट चौड़ी। वह मनुष्य से बहुत कुछ मिलता−जुलता है। शरीर पर बालों की अधिकता ही मानव और हिम मानव के बीच प्रधान अन्तर है। वह मनुष्य देखकर डरता नहीं वरन् उपेक्षापूर्वक दृष्टिपात करके अपने काम में लगा रहता है।

तिब्बती लामा छेभेद के मथ में एक अस्थिपंजर रखा हुआ है जिसकी विशेष पर्वों पर तान्त्रिक पूजा होती है। बताया जाता है कि यह किसी पवित्रात्मा हिम मानव का है जो उस लामा की समय−समय पर अदृश्य सहायता करता रहा। इस अस्थिपंजर की विशालता को देखते हुए उस क्षेत्र में हिम मानव के अस्तित्व की पुष्टि होती है।

विकास का क्रम अनवरत गति से अग्रगामी होता चला आया है। इसलिए हमारा मार्ग−दर्शन भूतकाल नहीं कर सकता। प्रगति के लिए हमें भविष्य की उज्ज्वल कल्पनाओं का सहारा लेना पड़ेगा भले ही वे अभी मूर्तिमान होकर हमारे सामने न आ पाई हों।

पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनुसार 35 करोड़ वर्ष पहले हमारे पूर्वज अमीबा और मछली जैसे छोटे जल−जन्तुओं के रूप में थे। 27 करोड़ वर्ष पहले वे धरती और पानी दोनों में रहने लायक बने। 20 करोड़ वर्ष पहले वे सरीसृप थे। 7 करोड़ वर्ष पहले वे स्तनपायी बने थे।

मनुष्य आकृति के प्राणी अब से 5 लाख वर्ष पूर्व बने। फिर भी वे आज के मनुष्य की आकृति एवं प्रकृति से बहुत भिन्न थे। वन मानुष जाति के बन्दरों में उन्हें रखा जा सकता है। ‘पेकिन’ जिसे आदि मानव कहा जाता है विचित्र आकृति का था। कनपटिया बहुत चौड़ी, भवों के नीचे की हड्डियाँ बेडौल उभरी हुई, ठोड़ी नदारद, उसका सही चित्र बनाया सके तो डरावना ओर घिनौना प्रतीत होगा। पुराने जमाने के ‘कायोट’ और आज के भेड़िये में असाधारण अन्तर था। यह अन्तर कई दृष्टियों से बढ़ा और घटा है। पुराने महागज और सरीसृप आज के हाथी और गिरगिट की तुलना में बहुत गुने बड़े थे। इसे विपरीत पुराने ज्ञानकौशल- उपकरण और साधनों में इस समय तक अत्यधिक विकास हुआ है। एक ओर घटोत्तरी दूसरी और बढ़ोतरी का अपना क्रम चलता रहा है। इन दोनों ही पहियों पर टिका प्रगति रथ इधर−उधर के झकझोरे खाता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा है।

‘प्रागैतिहासिक’ काल के ‘प्युमा’ और आज के विलाव में जितना अन्तर है। सम्भवतः आज से पाँच हजार वर्ष पश्चात के मनुष्य में उतना ही अन्तर होगा। बुद्धि और साधनों में जो असाधारण अभिवृद्धि हो रही है उसके माध्यम से प्रगति की दर अब कहीं अधिक तेज हो चली है। जो कार्य पिछले पाँच लाख वर्ष में हुआ है उतना ही रास्ता भविष्य में पाँच हजार वर्ष के भीतर नापा जा सकेगा। भावी 200 पीढ़ियों में हम उतना चल लेंगे जिसकी तुलना में पिछली 5 लाख वर्ष की प्रगति को तुच्छ ठहराया जा सके।

भविष्य में मनुष्य कैसा बनेगा? इसका उत्तर उसकी इच्छा और आवश्यकता को देखते हुए ही दिया जा सकता है। यदि चिन्तन का प्रवाह वर्तमान स्तर का ही बना रहा और पहल जीवशास्त्रियों के हाथ रही तो नये सिरे से जीवकोषों का ढालना आरम्भ करेंगे और ऐसा मनुष्य पैदा करेंगे जो अन्तर्ग्रही परिस्थितियों में भी अपना निर्वाह कर सके। वर्तमान मनुष्यों की शारीरिक और मानसिक स्थिति को विज्ञान के आधार पर ऐसे मोड़ दिये जा सकते हैं जो भावी परिस्थितियों के साथ सुविधापूर्वक ताल−मेल बिठाये रह सके। उसका शरीर ही नहीं मन भी बदला जा सके, अब इतनी शक्ति विज्ञान के हाथों आ गई है और वह उसका उपयोग समस्त मानव जाति के साथ सत्ताधीशों की सहायता से बलपूर्वक भी कर सकता है। वर्तमान स्तर के मनुष्यों को हटाकर उस स्थान पर नई जाति का मनुष्य भी बनाया जा सकता है।

ब्रिटेल के जीव शास्त्री जेम्स डेनियले ने न्यूयार्क में बी.बी.सी. को दी गई एक भेंट में कहा− कृत्रिम जीव कोष बनाने की सफलता प्राप्त करने के उपरान्त अब निकट भविष्य में यह सम्भव हो जायगा कि मनुष्य के डिजाइन किये हुए प्राणी उत्पन्न किये जा सकें। उनकी आकृति एवं प्रकृति लगभग वैसी ही होगी जैसी कि निर्माणकर्ता चाहेंगे। ऐसे मनुष्यों में ढालना सम्भव हो जायेगा जो अन्य ग्रहों के वातावरण में जीवनयापन कर सकें। जेम्स डेनियले ने एक प्रश्न के उत्तर में यह भी कहा कि अच्छा तो यह है कि हमारी खोजें नये प्राणी बनाने की दिशा में चलने की अपेक्षा वर्तमान प्राणियों या मनुष्यों की नस्ल सुधारने की ओर अधिक ध्यान दिया जाय।

वंश परम्परा में मात्र शरीर गत कोशिकाएं ही अपनी भौतिक विशेषताओं के साथ पीढ़ी दर पीढ़ी खिसकती हैं अथवा स्वभाव भी साथ चलता है, इसका प्रयोग कुछ समय पूर्व अमेरिका के वेलर विश्वविद्यालय में हुआ है। डॉ. ज्योजर्स अंगर ने अपनी प्रयोगशाला में कुछ चूहे पाले। उन्हें अंधेरे में बिजली के तारों के झटके का खतरा उत्पन्न करके उन्हें डराया गया और प्रकाश में रहने की आदत डाली गई। चूहे झटकों के डर से अंधेरे में नहीं जाते थे और प्रकाश में रहते थे। यह आदत उन्हें तीन पीढ़ियों में पूरी तरह अभ्यस्त हो गई।

इन चूहों के मस्तिष्क से स्मृति रसायन निकालकर उन्होंने अन्य साधारण चूहों के शरीर में प्रवेश किया फलस्वरूप वे चूहे भी अँधेरे में जाने से डरने वाले और प्रकाश पसन्द करने वाले बन गये। मस्तिष्क से निकाले गये इस रसायन का नाम ‘स्कोटाफोविन’ रखा गया। चूहों के बाद यह प्रयोग अन्य छोटे जीवों पर किया गया तो पाया गया कि स्वभाव की विशेषताएं भी रासायनिक प्रक्रिया में फेर बदल करने से सम्भव हो सकती हैं। एक प्राणी के मस्तिष्कीय तत्व दूसरे के शरीर में प्रवेश कराये जा सकते हैं और उसकी प्रकृति में अभीष्ट परिवर्तन लाया जा सकता है। वंश परम्परा में भी यह सिद्धान्त बहुत हद तक काम करता है।

चूहों का प्रयोग मनुष्यों पर हो सकता है। उसकी इच्छाएं आदतें और चेष्टाएं उस प्रकार की बनाई जा सकती हैं जो वैज्ञानिकों ओर सत्ताधीशों को पसन्द हों। कहना न होगा कि अब राज सत्ता और विज्ञान की सम्मिलित शक्ति इतनी अधिक बढ़ गई है कि उनकी संयुक्त शक्ति का सामना निरीह जन शक्ति अपनी बहुसंख्या के बावजूद कदाचित ही कर सके।

‘अमेरिकन रिपोर्टर’ पत्र के अनुसार व्रिसवेन के जीव विज्ञानियों ने कुत्ते की ऐसी जाति तैयार की है जो अपनी नस्ल में सबसे छोटी है। इन कुत्तों की ऊँचाई 7 सेन्टीमीटर− लम्बाई 25 सेन्टीमीटर और वजन सवा किलो है। से ओवरकोट की जेब में बिठाकर कहीं भी ले जाया जा सकता है इसलिए उसे पाकिट ऐडीशन अथवा मिनी कहा जाने लगा है।

अमेरिका में कुत्ते पालने के शौकीन बहुत हैं, पर वहाँ स्थान की कमी− उनके खाने आदि का खर्च− काम करने के लिए जाने के बाद सूने मकान में उसे रहने में कठिनाई आदि कठिनाइयों के कारण वह इच्छा उन्हें मन मसोस कर मारनी पड़ती है। अब इस मिनी कुत्ते से वह समस्या हल हो गई। उसे कम जगह में− कम खर्च में पाला जा सकेगा और कहीं भी साथ ले जाया जा सकेगा।

अन्न, वस्त्र और निवास की कमी का ध्यान रखते हुए मनुष्यों की भावी नस्ल छोटे कुत्ते की तरह ‘मिनी’ भी बनाई जा सकती है, जब बिजली आदि शक्तियाँ श्रम करने के लिए मौजूद हें तो फिर मानवी श्रम की क्यों और क्या आवश्यकता पड़नी चाहिए? यदि छोटे आकार के आदमी अधिक संख्या में धरती पर रह सकते हैं तो हिम मानवों जैसे दैत्यों को क्यों जगह घेरने और खुराक नष्ट करने दी जाय? यह तर्क भी समय संगत प्रतीत होता है।

समय ही बतायेगा कि प्रधानता भौतिकवाद की रहती है या अध्यात्मवाद की। इन दिनों दोनों पक्षों में रस्साकशी चल रही है। प्रबुद्ध अध्यात्म भी अब मनुष्य जाति को विनाश के सर्वभक्षी संकट में से निकालने के लिए अपना कर्त्तव्य पालन करने के लिए कटिबद्ध हो रहा है। भले ही उसकी विशालकाय प्रयोगशालाएं दृष्टिगोचर न हों पर निश्चेष्ट वह भी नहीं हैं। जबकि मानवी भाग्य एवं भविष्य का भला−बुरा निपटारा होने की घड़ी सामने है तो देव पक्ष की सत्ता भी निष्क्रिय नहीं बनी रह सकती है। मनुष्य के ईश्वर कृत सनातन रूप को अक्षुण्ण और परिष्कृत बनाये रखने के लिए अध्यात्म शक्तियाँ भी दृश्य या अदृश्य रूप से अपना काम कर रही हैं। अदृश्य जगत में बना हुआ देवासुर संग्राम अभी भी सूक्ष्मदर्शी आंखें देख सकती हैं।

यदि अध्यात्म शक्ति विजयी हुई तो मनुष्य ‘मिनी’ नहीं महान बनेगा। तीव्र परिवर्तनों की वर्तमान गति उसे महामानव− अति मानव भी बना सकती है। महर्षि अरविन्द निकट भविष्य में मनुष्य में ऐसे अवतरणों की सम्भावना देखते थे जो दिव्य शक्ति यों से सम्पन्न होगा जिसकी चेतना देव स्तर की होगी, जो इस धरती पर स्नेह और सौजन्य की अमृतधारा बहाने और स्वर्ग का वातावरण इसी अपने संसार में बना सकने में समर्थ होगा। यदि मानवी विवेक जग पड़ा, तो सम्भावना इसी प्रकार की अधिक है।


धर्म साधना (kahani)

धर्म के किसी विषय पर चर्चा करते हुए आश्रम के छात्रों में दो दल हो गये। विवाद इतना बढ़ा कि आवेश उबल पड़ा और हाथापाई हो गई।

गुरु आये। उन्होंने कहा− धर्म साधना को कोई भी पक्ष मुक्ति युक्त क्यों न हो किसी भी पक्ष में स्वभाव की विकृति के लिए कोई स्थान नहीं है। क्रोध और आवेशपूर्वक जो कुछ भी कहा जायगा वह सब धर्म होते हुए भी अधर्म बन जायगा।

छात्रों के तमतमाते हुए चेहरे ठण्डे हो गये।


मानवीय मस्तिष्क ऋद्धि−सिद्धियों का भाँडागार

खोपड़ी की हड्डी से बनी टोकरी में परमात्मा ने इतनी महत्वपूर्ण सामग्री संजोकर रखी है कि उसे जादू की पिटारी कहने में कोई अत्युक्ति नहीं होगी। शरीर के अन्य किसी भी अवयव की अपेक्षा उसमें सक्रियता, चेतना और संवेदनशीलता की इतनी अधिक मात्रा है कि उसे मानवीय सत्ता का केन्द्र बिन्दु कहा जा सकता है। रेलगाड़ी में जो महत्व इंजन का है वही अपने शरीर में मस्तिष्क का है। डिब्बों की टूट फूट हो जाने पर उन्हें सुधारने की या काटकर अलग कर देने की व्यवस्था आसानी से हो जाती है किन्तु यदि इंजन खराब हो जाय तो सुयोग्य इंजीनियर की देख−रेख में साधन सम्पन्न कारखाने में ही उसकी मरम्मत हो सकती है। जब तक मरम्मत न हो जाय तब तक रेलगाड़ी जहाँ की तहाँ खड़ी रहेगी उसकी थोड़ी दूर आगे बढ़ सकना भी सम्भव न होगा।

शरीर में मस्तिष्क का वही स्थान है जो किसी बड़े कारखानों की मशीनों को बिजली सप्लाई करने वाली शक्ति −शाली मोटर का। मोटर बन्द हो जाय या बिगड़ जाय तो फिर बिजली के अभाव में सारा कारखाना ही ठप्प हो जायगा। शरीर के अन्य कलपुर्जों में जो गतिशीलता दिखाई पड़ती है वह उनकी अपनी नहीं है। मस्तिष्क उन पर पूरी तरह नियन्त्रण रखता है। संचालन की प्रेरणा ही नहीं शक्ति भी वहीं से मिलती है।

मस्तिष्क दो भागों में विभक्त माना जा सकता है एक वह जिसमें मन और बुद्धि काम करती है। सोचने विचारने, तर्क विश्लेषण और निर्णय करने की क्षमता इसी में हैं। दूसरा भाग वह है जिसमें आदतें संग्रहित हैं और शरीर के क्रिया कलापों का निर्देश निर्धारण किया जाता है। हमारी नाड़ियों में रक्त बहता है, हृदय धड़कता है फेफड़े श्वास−प्रश्वास क्रिया में संलग्न रहते हैं, माँस पेशियाँ सिकुड़ती फैलती हैं, पलक झपकते खुलते हैं, सोने जागने का खाने−पीने और मल−मूत्र त्याग का क्रम अपने ढर्रे पर अपने आप स्वसंचालित ढंग से चलता रहता है। पर यह सब अनायास ही नहीं होता इसके पीछे वह निरन्तर सक्रिय मन नाम की शक्ति काम करती है जिसे अचेतन मस्तिष्क कहते हैं। इसके ढर्रे का मन कह सकते हैं। शरीर के यन्त्र अवयव अपना−अपना काम करते रहने योग्य कलपुर्जों से बने हैं पर उनमें अपने आप संचालित रहने की क्षमता नहीं है, यह शक्ति मस्तिष्क के इसी अचेतन मन से मिलती है। विचारशील मस्तिष्क तो रात में सो जाता है, विश्राम ले लेता है नशा पीने या बेहोशी की दवा लेने में मूर्छा ग्रसित हो जाता है। उन्माद आवेश आदि रोगों से ग्रसित भी वही होता रहता है। डाक्टर इसी को निद्रित करके आपरेशन करते हैं। किसी अंग विशेष में सुन्न करने की सुई लगाकर भी इस बुद्धिमान मस्तिष्क तक सूचना पहुँचाने वाले ज्ञान तन्तु संज्ञा शून्य कर दिये जाते हैं फलतः पीड़ा का अनुभव नहीं होता और आपरेशन हो जाता है। पागलखानों में इस चेतन मस्तिष्क का ही इलाज होता है अचेतन की एक छोटी परत ही मानसिक अस्पतालों की पकड़ में आयी है वे इसे प्रभावित करने में भी थोड़ा बहुत सफल होते जा रहे हैं। किन्तु उसका अधिकाँश भाग प्रत्येक नियन्त्रण से बाहर है। पागल लोगों के शरीर की भूख, मल−त्याग, श्वाँस−प्रश्वाँस, रक्त −संचार तथा पलक झपकना आदि क्रियायें अपने ढंग से होती रहती हैं, मस्तिष्क की विकृति का शरीर के सामान्य क्रम संचालन पर बहुत कम असर पड़ता है।

सोचने की सही पद्धति सिखाने के लिए ज्ञान, अनुभव तर्क एवं प्रशिक्षण का सहारा लिया जाता है वस्तुओं का स्वरूप एवं उपयोग, परिस्थितियों का कारण एवं परिवर्तन किस प्रकार होता है, हो सकता है इसकी जानकारी स्कूल कॉलेजों अथवा उस विषय के जानकारों से मिलती है। यह मस्तिष्कीय प्रशिक्षण शिक्षा एवं भावना को प्रभावित करता है। अपनी निजी संवेदनाओं की अनुभूतियों, आकांक्षाओं को प्रभावित करने वाले मानसिक क्षेत्र के उभार भावना कहलाते हैं और अपने से बाहर के व्यक्ति यों, पदार्थों एवं परिस्थितियों के संबंध में जानकारी प्राप्त करना विचार शक्ति का काम है। भावना को विश्वासों एवं सम्वेदनाओं को जिस शिक्षण प्रक्रिया से प्रभावित करते हैं उसे विद्या और जिससे विचार शक्ति निखरती है उसे शिक्षा कहते हैं।

मस्तिष्क अपने आप तो बहुत कुछ करता है पर उसका विचार पूर्वक नियन्त्रण एवं उपयोग करना बहुत कम लोगों को बहुत थोड़ी मात्रा में आता है। वैज्ञानिकों का कथन है कि मस्तिष्कीय चेतना पर 8 प्रतिशत नियन्त्रण प्राप्त कर सकना प्रगतिशील मनुष्य के लिए अभी तक सम्भव हो पाया है। उसकी 92 प्रतिशत शक्ति ऐसी है जिस पर नियन्त्रण कर सकना तो दूर उसकी ठीक तरह जानकारी भी प्राप्त नहीं की जा सकी है। मनुष्य की बुद्धिमता! साहसिकता, सूझ बूझ का बहुत प्रशंसा की जाती है। अनुशासित मनोभूमि किसी प्रकार प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व के रूप में विकसित होती है यह भी सर्वविदित है। इतने पर भी इतना ही माना जाता है कि यह उसकी खोपड़ी में रखी हुई जादुई पिटारी का एक नगण्य सा चमत्कार है। यदि उसे पूरी तरह जाना समझा जा सके तो अब की अपेक्षा वह हजारों गुनी अधिक विभूतियों से भरा पूरा हो जाता है।

लेकिन प्रगति का आधार इसी मस्तिष्कीय स्थिति पर निर्भर है। मूर्ख, मन्दबुद्धि और अनपढ़, अविकसित व्यक्ति या तो सुख साधन कमा ही नहीं पाते और यदि किसी प्रकार मिल भी जायें तो उनका समुचित सदुपयोग करके सुखी रह सकने की व्यवस्था बना नहीं पाते,वे वस्तुएं या परिस्थितियाँ उनके लिए जाल−जंजाल बन जाती हैं। उपयोग की सही विधि न मालूम होने पर प्रयोग गलत होते हैं और गलती का परिणाम विकृति एवं क्षति ही हो सकती है। सम्पदाएं भी अविकसित मनःस्थिति होने पर किसी को कोई सुख नहीं पहुँचा सकतीं। बारूद का खेल करने वाले जिस प्रकार क्षति ग्रस्त होते हैं उसी प्रकार साँसारिक वैभव पाने पर भी मन्द बुद्धि लोग लाभान्वित नहीं होते यों आमतौर से अच्छे सुविधा साधन मिलना ही उनके लिए कठिन पड़ता है। इसके विपरीत प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी अभीष्ट साधन उपलब्ध कर लेते हैं। सम्पदाएं पाते हैं, सुख भोगते हैं और गौरवान्वित होते हैं। यह सब मस्तिष्कीय प्रखरता का ही वरदान है।

सुखी, समुन्नत और सफल जीवन जीने के लिए कई तरह की परिस्थितियां अभीष्ट होती हैं। शरीर स्वस्थ रहे, घर के लोग अनुकूल बनें, मित्रों का सहयोग रहे, धन की कमी न पड़े, शिक्षा ऊँची हो, समाज में सम्मान मिले अभीष्ट मनोरथ पूरे होते रहें। हमारी आकाँक्षाओं की पूर्ति जिस हद तक होती है उसी सीमा तक सुख सन्तोष अनुभव होता है। इन सम्पदाओं को प्राप्त करने के लिए लोग अनेक प्रकार के प्रयत्न करते हैं। सो ठीक भी है। पर यह भुला दिया जाता है, कि संसार के समस्त साधनों को उपलब्ध करा सकने की क्षमता मस्तिष्क की परिष्कृत स्थिति पर निर्भर है। यदि उसमें कुछ गड़बड़ी होगी तो इनमें से एक भी साधन सन्तोषजनक मात्रा में न मिल सकेगा जो मिलेगा उसका अवाँछनीय दुरुपयोग बन पड़ने से उल्टी विपत्ति ही खड़ी होगी।

ताला चाभी से खुलता है, यदि हथौड़े, से पीटकर खोलने का प्रयत्न किया जायेगा तो वह टूट जायेगा। समुन्नत परिस्थितियाँ प्राप्त करने के लिए मस्तिष्कीय सुव्यवस्था का ध्यान दिया जाना चाहिए। समस्त सुखों और सफलताओं की चाभी इसी जादू की पिटारी में रखी है। इसमें जो कुछ भरा पड़ा है वह इतना अधिक है कि उसको समझने और सदुपयोग का साहस करने पर स्थिति इतनी प्रखर बन जाती है कि उसके रहते किसी भी क्षेत्र में असफल रहने की आशंका उत्पन्न नहीं होती। सुयोग्य एवं प्रतिभा सम्पन्न मनुष्य सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ तो अवश्य ही पाते हैं। इसे मानसिक स्तर के विकास का चमत्कार अनुदान ही कह सकते हैं।

जिस मस्तिष्क पर हमारा वर्तमान और भविष्य पूरी तरह निर्भर है उसके सम्बन्ध में लोग बहुत ही कम जानते हैं, बहुत ही कम ध्यान देते हैं। यह कितने आश्चर्य और दुख की बात है कि शरीर को परिपुष्टि बनाने के लिए कीमती भोजन जुटाया जाता है, सुन्दर बनने के लिए वस्त्राभूषण एवं शृंगार साधनों पर समय तथा धन लगाया जाता है इन्द्रिय तृप्ति के लिए खर्चीले और समय साध्य साधन जुटाये जाते हैं, अन्यान्य सफलताओं के लिए घनघोर प्रयत्न किए जाते हैं पर न जाने क्यों यह अनुभव नहीं किया जाता कि मानसिक प्रखरता के बिना सारे काम औंधे सीधे होंगे और उनके कठिन प्रयत्नों के फलस्वरूप जो सामग्री मिलेगी वह आनन्ददायक न होकर विपत्ति का कारण बनेगी।

मानवीय मस्तिष्क में जितनी किस्म का जितनी मात्रा में ज्ञान भरा रहता है उसकी तुलना में संसार के बड़े से बड़े पुस्तकालय को भी तुच्छ ठहराया जा सकता है। उलझे हुए प्रश्नों का न्यूनतम समय में उपयुक्त हल निकालने में संसार के किसी सशक्त कम्प्यूटर की तुलना उससे नहीं हो सकती। जरा से डिब्बे में भरी हुई यह गुलाबी रंग की कढ़ी इतनी विलक्षण है कि उसकी समानता किसी भी बहुमूल्य रासायनिक पदार्थ से नहीं की जा सकती। मस्तिष्कीय क्रिया−कलाप जिन (तन्त्रिका कोशिकाओं) से मिलकर संचालित रहता है उनकी संख्या प्रायः दस अरब होती है। इन्हें आपस में जोड़ने वाले नर्व फाइवर (तन्त्रिका तन्तु) और उनके इन्सुलेशन खोपड़ी के भीतर खचाखच भरे हुए हैं। एक तन्त्रिका कोशिका का व्यास एक इंच के हजारवें भाग से भी कम है। और उसका वजन एक ओंस के साठ अरबवें भाग से अधिक नहीं है। तन्त्रिका तन्तुओं से होकर बिजली के जो इम्पल्स दौड़ते हैं वही ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से आवश्यक सूचनाएं उस केन्द्र तक पहुँचाते हैं।

उपलब्ध सूचनायें दफ्तर में रिकार्ड बनकर जमा नहीं होती रहतीं वरन् उन पर तत्काल निर्णय करना होता है। इसके लिए सूचना कितने ही दफ्तरों, कितने ही अफसरों के सामने से गुजरती हुई, उनको परामर्श, निर्देश नोट कराती हुई सम्बद्ध अवयवों को सूचना देती है कि उन्हें इस संदर्भ में क्या करना है। आदेश ही नहीं आवश्यक साधन जुटाने की व्यवस्था भी इसी केन्द्रीय निर्देशालय से होती है। इन्द्रियों द्वारा उपलब्ध सूचनायें और विचारों की हलचलें हर क्षण मस्तिष्क को इतना अधिक कार्य व्यस्त रखती हैं कि इस सक्रियता पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। सिर पर इलेक्ट्रोड लगाकर भीतर चल रही हलचलों के जो चित्र इलेक्ट्रोएन्से−फेलोग्राम तैयार किये जाते हैं उन्हें विद्युतीय तूफान की तरह देखा जा सकता है।

बच्चों को मस्तिष्क की जानकारी टेलीफोन एक्सचेंज का उदाहरण देकर कराई जाती है। बड़ों को उसे समझाना हो तो यों कहना चाहिए कि यदि अपने टेलीफोन का सम्बन्ध संसार के समस्त टेलीफोनों से ही, अपनी बात समस्त टेलीफोनों पर सुनी जाय और उनके उत्तर एक साथ प्राप्त हों, सुने समझे जायें तो उस स्थिति की तुलना मस्तिष्कीय क्रिया−कलाप से की जा सकती है।

मानव निर्मित सर्वोत्तम कम्प्यूटर में अधिक से अधिक दस लाख इकाइयाँ होती हैं और प्रत्येक इकाई के पाँच, छः से अधिक संपर्क सूत्र नहीं होते। किन्तु मस्तिष्क में दस अरब कोशिकाएं हैं। उनमें से प्रत्येक के लाखों लाख संपर्क सूत्र हैं। साथ ही प्रत्येक में जैव रसायनों के सम्मिश्रण में भारी भिन्नता भी है। घटित होने वाली घटनायें और इन्द्रिय संस्थानों द्वारा प्राप्त सूचनाओं का निपटारा एक अलग और सामयिक कार्य है। इसके अतिरिक्त श्वासोच्छवास, निद्रा, जागरण, हृदय की धड़कन, रक्त संचार, पेशियों का आकुंचन, प्रकुंचन, शरीर कोशिकाओं का जीवन मरण आदि शरीर संचालन के इतने अधिक कार्य हैं जिन्हें बारीकी से देखने पर समस्त संसार की सरकारों की संयुक्त व्यवस्था में भी अधिक सुविस्तृत ठहराया जायगा।

शरीरगत आवश्यकताओं और इनकी पूर्ति की क्रिया व्यवस्था मस्तिष्क का जो छोटा−सा सम्भालता है उसे “हाइपोथैलेमस” कहते हैं भूख, प्यास, नींद, मल विसर्जन, पाचन आदि अनेकों क्रिया−कलाप इसी केन्द्र से संचालित एवं व्यवस्थित किये जाते हैं। मस्तिष्क के पिछले भाग में गुम्बदाकार अंग ‘सेरिबेलम’ इन हलचलों को परस्पर सम्बद्ध करने वाले असंख्य सूत्रों को शृंखलाबद्ध करता है।

चिन्तन का ज्ञान, स्मृति, बुद्धि, विवेचना एवं इच्छा आदि का कार्यभार सम्भालने वाला अत्यन्त विकसित भाग “सेरिब्रल कार्टेक्स” कहलाता है। मस्तिष्कीय द्रव्य से बनी हुई यह झुर्रीकार परत मस्तिष्क के अग्रभाग और पार्श्वों में लिपटी हुई है। इसकी मोटाई प्रायः एक मिली मीटर है। सूचनाओं का ग्रहण और निर्देशों का प्रसारण करने में इस पट्टी की महत्वपूर्ण भूमिका है।

तन्त्रिका कोषाणु एक सफेद धागे तन्तु युक्त होता है। यह तन्तु अन्यान्य न्यूरानों से जुड़ा होता है। इस प्रकार पूरा मस्तिष्क इन परस्पर जुड़े हुए धागों का एक तन्तु जाल बना हुआ है। इन्हीं सूत्रों से वे परस्पर सम्बद्ध रहते हैं और अपने कार्यों एवं उत्तरदायित्वों का निर्वाह परस्पर मिलजुल कर करते हैं।

प्रत्येक प्रौढ़ मस्तिष्क प्रायः 20 वाट विद्युत शक्ति से चलता है। कुछ कोषाणु विशेष रूप से इस बिजली को उत्पन्न करने का काम करते हैं और शेष उसका उपयोग करके अपना काम चलाते हैं वह एक सूक्ष्म डाइनुमा हैं। ग्लूकोस और ऑक्सीजन का रासायनिक ईंधन जलाकर उसकी ऊर्जा को वे बिजली में परिवर्तित करते हैं। काम चलाऊ मात्रा में वह कोशाणुओं की शक्ति प्रदान करती है और यदि उसकी अनावश्यक मात्रा बन गई है तो स्वयं ही विसर्जित हो जाती है। उसका चार्ज−डिस्चार्ज शारीरिक और मानसिक क्रियाओं के अनुसार घटता बढ़ता रहता है। इलेक्ट्रोऐन्सीफै लोग्राफ की सहायता से यह जाना जा सकता है कि इस बिजली का उत्पादन और उपयोग कहाँ किस मात्रा में हो रहा है। इसमें घट बढ़ हो जाने से मानसिक सन्तुलन बिगड़ने लगता है और यों भी कहा जा सकता है कि मानसिक सन्तुलन बिगड़ने से इन विद्युत धाराओं में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है।

सन् 1968 में यूनेस्को द्वारा अन्तर्राष्ट्रीय मस्तिष्क सम्मेलन आयोजित किया गया था और संसार के विचारशील लोगों का ध्यान मस्तिष्कीय सुरक्षा एवं प्रगति की ओर आकर्षित किया था। इंटरनेशनल सोसाइटी फौराब्यूरो केमिस्ट्री−ब्रेन एण्ड बिहेवियर सोसाइटी−ब्रेन रिसर्च ऐसोसिएशन जैसी संस्थाओं ने उस वर्ष मस्तिष्कीय गरिमा, सम्भावना, सुरक्षा एवं प्रगति के सम्बन्ध में अधिक उत्साहपूर्वक काम किया था और जो कार्य वैज्ञानिक क्षेत्रों में अब तक इस दिशा में हो चुका है उसका परिचय जनता को कराया था। इंटरनेशनल रिब्यू ऑफ ब्यूरो बायोलॉजी−ब्रेन रिसर्च− जनरल ऑफ ब्यूरोबायोलॉजी जैसी विज्ञान पत्रिकाओं ने भी अति महत्वपूर्ण लेख उस वर्ष प्रकाशित करके वैज्ञानिकों, सरकारों एवं विचारशील लोगों को यह सुझाव दिया था कि मस्तिष्कीय गरिमा को अधिक गम्भीरतापूर्वक अनुभव किया जाय, और उसे परिष्कृत करने की दिशा में अधिक काम किया जाय।

मानवीय मस्तिष्क तीन पौंड से भी कम वजन का− अख़रोट जैसी आकृति का- दो गोलार्धों में बंटा हुआ अनेक घुमावों वाला माँस पिण्ड है। एक को सेरब्रिम दूसरे को सेरबेलम कहते हैं। तान्त्रिकी कोशिकाओं से बना धूसर द्रव्य वाला यह पदार्थ सूक्ष्म दर्शक यन्त्र से देखने पर चित्र विचित्र कोशिकाओं का रेगिस्तान जैसा लगता है इसके सारे कलपुर्जे इस प्रकार तुड़े−मुड़े रखे हैं मानो वे आगे बढ़ना चाहते हों, पर खोपड़ी की हड्डी ने उन्हें रोक दिया हो और वे मुड़तुड़ कर गर्भस्थ बालक की तरह किसी प्रकार गुजारा कर रहे हों।

तीन महीने के भ्रूण का दिमाग मात्र पाँच ग्राम हो होता है छः महीने का होने तक वह सौ ग्राम हो जाता है, जन्मते समय 350 ग्राम का होता है। यह प्रौढ़ मनुष्य के मस्तिष्क का एक चौथाई है अन्ततः मस्तिष्क चौदह सो ग्राम तक जा पहुँचता है। इससे प्रगट है कि आरम्भिक जीवन में मस्तिष्कीय विकास कितनी तेजी से होता है और पीछे वह कितना धीमा पड़ जाता है। छः साल के बच्चे का दिमाग प्रौढ़ता की स्थिति का पंचानवे प्रतिशत होता है। बीस वर्ष की आयु तक विकास पूर्ण हो जाता है। पीछे तो वह परिपक्व और परिष्कृत भर होता रहता है।

पुरुष की तुलना में स्त्रियों का मस्तिष्क 100 ग्राम हल्का होता है।पर उसमें शारीरिक वजन का अनुपात भर मानना चाहिये। स्त्रियाँ पुरुषों की अपेक्षा वजन में हल्की होती हैं तद्नुरूप उनका मस्तिष्क भी हल्का होता है। वजन के आधार पर किसी को विकसित अथवा अविकसित नहीं ठहराया जा सकता। संसार के प्राणियों में सबसे भारी 7000 ग्राम का मस्तिष्क ह्वेल मछली का होता है इसके बाद 5000 ग्राम का हाथी का होता है क्या उन्हें 1400 ग्राम वाले मनुष्य से अधिक बुद्धिमान कहें? संसार भर में सबसे अधिक हल्की अपने नाटे कद के कारण जापान की महिलाएं होती हैं उनका वजन औसतन 50 ग्राम कम अर्थात् 1250 ग्राम होता है फिर भी वे संसार में कहीं की भी नारियों से कम बुद्धिमान नहीं होती हैं वे अपने समाज में पुरुषों से किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं होतीं।

कुछ समय पूर्व बम्बई के एक विद्वान वी.जे. रेले. ने एक पुस्तक लिखी थी− दी वैदिक गार्डस एस. फिगर्स ऑफ बायोलॉजी उसमें उसने सिद्ध किया था कि वेदों, में वर्णित आदित्य, वरुण, अग्नि, मरुत, मित्र, अश्नि, रुद्र आदि के स्थान विशेष में सन्निहित दिव्य शक्तियाँ हैं जिन्हें जागृत करके विशिष्ट क्षमता सम्पन्न बनाया जा सकता है।

ग्रान्ट मेडिकल कॉलेज के अतार भी प्राध्यापक वाई.जी. नाडगिर और एडगर जे टामस ने संयुक्त रूप से पुस्तक की भूमिका लिखते हुए कहा है कि वैदिक ऋषियों के शरीर शास्त्र सम्बन्धी गहन ज्ञान पर अचम्भा होता है कि उस साधन हीन समय में किस प्रकार उन्होंने इतनी गहरी जानकारियों प्राप्त की होंगी आँख की सीप में ऊपर के मस्तिष्क का भाग वृहत मस्तिष्क कहलाता है वही सेरिवेलम−ब्रह्म चेतना शक्ति का केन्द्र है इन्द्र और सविता यहीं निवास करते हैं नाक की सीध में सिर के पीछे वाला भाग− सेरिवेलम− अनुमस्तिष्क− रुद्र और शूषन देवता का कार्य क्षेत्र है मस्तिष्क का ऊपरी भाग−रोदसी मध्य भाग अन्तरिक्ष और निम्न भाग पृथ्वी बतलाया गया है। रोटनी से दिव्य चेतना का प्रवाह− अन्तरिक्ष में ग्रह नक्षत्रों वाला ब्रह्मांड और पृथ्वी में अपने लोक में काम कर रही भौतिक शक्ति यों का सूत्र सम्बन्ध जुड़ा रहता है। सप्त धार सोम, अग्नि, र्स्वगद्वार, अत्रि, द्रोण, कलश एवं अश्विनी शक्ति यों का सम्बन्ध रोटसी क्षेत्र है।

अग्नि से नीचे वाले भाग को स्वर्ग द्वार और उससे नीचे वाले भाग को द्रोण कलश कहा गया है। जहाँ से सप्तसरितायें− सात नदियाँ बहती हैं। द्रोण कलश में सोमरस भरा रहता है जिसके आधार पर स्नायु केन्द्रों को शक्ति प्राप्त होती है मेरुरज्जुओं के साथ बंधे हुए दो ग्रन्थि गुच्छक अश्विनीकुमार बताये गये हैं। मस्तिष्क की परिधि को घेरे हुये एक विशेष द्रव सम्पूर्ण मस्तिष्क को चेतना प्रदान करता है इसी को वरुण कहते हैं उसी केन्द्र में अग्नि देवता का ज्ञानकोष है। मस्तिष्क के पिछले भाग में अवस्थित “टेंपोलर लोब” प्राचीन काल का शंख पालि है। इसके नीचे की पीयूष ग्रन्थियाँ जिन्हें मेदुला भी कहते हैं। अश्वमेध यज्ञ की वेदी है। अश्वमेध अर्थात् इन्द्रिय परिष्कार इसके लिए पीयूष ग्रन्थि वाला क्षेत्र ही उत्तरदायी है।

कपाल की बाह्य परिधि को प्रभावित करने वाले वरुण देवता का स्वरूप और कार्य क्या है इसका वर्णन वेदों में इस प्रकार आता है:-

“वरुणस्य पाशा वितता महान्तः”

वरुण देवता के धागे सारे क्षेत्र में फैले हुये हैं।

यस्वश्वेतर विचक्षण तिस्त्रो भूमिरधिक्षितः त्रिरुत्रराणि पप्रुतः वरुणस्य ध्रुवं सदः स सप्तानाभि रज्जत॥

अर्थात् वरुण की विलक्षण रस प्रावाहिनी धारायें तीन दिशाओं में चलती हैं इनमें से उत्तर दिशा की तीन स्नायु केन्द्रों का संचालन करती हैं। सप्तस्नायु केन्द्रों से सम्पूर्ण देह और मन क्षेत्र का अनुशासन होता है।

अवुघ्ने राजा वरुणो वनस्य ऊर्ध्व स्तूपम ददते पूत रक्षः नीनी नास्थुरु परिवुघ्न एथाम्। अस्मे अर्न्तनिहिताः केतवाः स्युः।

अर्थात् अन्तरिक्ष से राजा वरुण देह रूपी अश्वत्थ के ऊपरी भाग को प्रकाश देता है नीचे फैली हुई शिरा शाखाओं को बाँधकर रखता है वरुण ही ज्ञान सम्वेदना वाली शिराओं का सूत्र संचालक है।

देवताओं की चमत्कारी शक्ति यों को साधना विज्ञान के अंतर्गत विस्तृत वर्णन किया गया है वस्तुतः वह अपने भीतर मस्तिष्कीय क्षेत्र में सन्निहित दिव्य शक्तियाँ हैं जिन्हें अनुकूल बनाकर वे सभी लाभ वरदान प्राप्त किये जा सकते हैं जो देव अनुग्रह से मिलने वाली ऋद्धि−सिद्धियों के रूप में कहे समझे जाते हैं।


अहंकारी और स्वार्थी मनुष्य (kahani)

मनुष्य अपने लिए ही इस सारी दुनिया की रचना हुई मानता है और उसका संसार में है उस पर अटल ही अधिकार जमाता है।

जीवों के दुनिया का अनुमान लगाने वाले गणितज्ञों का अनुमान है कि प्राणियों में 4/5 भाग कीड़े−मकोड़ों का है और शेष 1/5 में पशु पक्षियों और ठंडे जलचरों से लेकर मनुष्यों तक का है।

शेष जीवधारियों की आवश्यकता पूर्ति के लिए भी यह दुनिया बनी है इस पर अहंकारी और स्वार्थी मनुष्य कभी सोचता तक नहीं।


ताते यह चाकी भली

मगधाधिपति अशोक अपने विजय अभियान से लौटे ही थे। राजधानी में खुशियाँ मनाई जा रही थीं− विजयोत्सव सारे राज्य में चल रहा था। इस अभियान में सम्राट अशोक ने काफी सम्पत्ति और रत्न स्वर्ण हीरे जीते थे।

एक दिन की बात है। राजगृह के बौद्ध भिक्षु पाटलिपुत्र पहुँचे और वहाँ उनके प्रवचन आयोजित हुए। तपःपूत बौद्धभिक्षु की मोहक वाणी से आकर्षित हुए लोग समिति में खिंचे चले आते। दिन प्रतिदिन श्रावकों की संख्या बढ़ती ही चली जाती। पूरी पाटलिपुत्र नगरी महाभिक्षु से प्रभावित हुई और विजयोत्सव को भूल सी गयी। विजयोत्सव का उत्साह क्षीण होता जा रहा था और उसके स्थान पर लोगों की अभिरुचि एक बौद्ध− संन्यासी के प्रवचनों में उन्मुख हो गयी है। यह जानकर प्रभावित हुए अशोक भी।

ऐसा कौनसा जादू भरा है− भिक्षु की वाणी में जो जनता विजयोत्सव के राग−रंगों को भुलाकर नीरस धर्म और अध्यात्म के प्रवचन सुनने लगी है। अशोक के लिए तब धर्म का कोई विशेष अर्थ नहीं था। अवकाश का चिन्तन और अवकाश की चर्चा का विषय ही शायद उसकी मान्यता में धर्म था। तो महाभिक्षु की ख्याति और प्रभाव सुनकर उन्हें आश्चर्य भी हुआ और औत्सुक्य भी जागा।

एक दिन वे स्वयं महाभिक्षु का प्रवचन सुनने गये। सुनकर वे भी प्रभावित हुए ही, और तत्क्षण ही उन्होंने महाभिक्षु को भोजन के लिए आमन्त्रित किया। सम्भवतया अशोक महाभिक्षु की निष्ठाओं को परखना ही चाहते थे। प्रतिपादित त्याग, सादगी और आर्जव के आदर्श स्वयं भिक्षु के जीवन में कितने समाविष्ट हैं? अथवा कथनी का ही विषय है। निश्चित ही यह जानना सम्राट अशोक का अभिप्रेत था। स्वीकार आमन्त्रण के निर्वाह हेतु महाभिक्षु निश्चित समय पर राज भवन में आये। सम्राट अशोक ने उनका अभिनन्दन, अभ्यागमन किया और मधुर−मधुर पकवान् स्वयं के हाथों से परोसे। महाभिक्षु अशोक के अंतःकरण में चल रही भुञ्झाओं को भलीभाँति जान रहे थे सो उन्होंने इन्हें अनावश्यक कहते हुए साधारण भोजन ही ग्रहण किया।

भोजन के पश्चात् सम्राट ने महाभिक्षु को अपना सारा महल घुमाया और एक−एक मूल्यवान वस्तु का दर्पपूर्वक परिचय दिया। अन्त में वे विशाल रत्न भण्डार में ले गये और वहाँ सुरक्षित रत्नों को दर्शाते हुए कहा भिक्षुराज! ऐसे बहुमूल्य व विशाल रत्न भारत भर में दुर्लभ हैं।

भिक्षु ने कहा− तो राजन! इनसे ‘राज्यकोष का भारी’ आय होती होगी।

आय! अशोक ने कहा− ‘विपरीत इसके इनकी सुरक्षा पर राज्यकोष से व्यय करना पड़ता है।’

तो इन बहुमूल्य पत्थरों से भी मूल्यवान पत्थर मैंने तुम्हारे राज्य में देखा है। विश्वास न हो तो मेरे साथ चलो, वे जहाँ में उन्हें दिखा सकता हूँ।

अशोक भिक्षु के साथ चल पड़ा। महाभिक्षु उन्हें नगर की एक उपेक्षित बस्ती में ले गये और एक घर का द्वार खटखटाया थोड़ी देर बाद एक वृद्धा ने द्वार खोला।

महाभिक्षु अशोक के साथ घर के अन्दर चले गये और उन्होंने सम्राट को एक पत्थर की चक्की की ओर इंगित करते हुए कहा− ‘यह है।’

‘यह ! यह तो चक्की है, महाराज।’

‘हाँ चक्की है। परन्तु तुम्हारे रत्नों से श्रेष्ठ है क्योंकि रत्नों की सुरक्षा पर सहस्रों मुद्रायें खर्च करनी पड़ती हैं फिर भी उनसे प्रत्यक्षतः कोई लाभ नहीं और यह चक्की इस वृद्धा का इस इसके नेत्र हीन पति ओर दो बच्चों का पोषण करती है।’

अशोक निरुत्तर था। और कहते हैं इसके दूसरे ही दिन सम्राट ने सम्पूर्ण रत्न भण्डार दान कर दिया।


अन्तर्ग्रही आदान−प्रदान की तैयारी

अब तक जाने जा सके ब्रह्मांड का विस्तार 10 अरब प्रकाश वर्ष माना जाता है और उसे उतना ही, पुराना कहा जाता है। अपनी पृथ्वी जैसी स्थिति के ग्रह इस समस्त ब्रह्मांड में 100,000 अरब माने जाते हैं। इनमें से एक हजार पीछे एक ऐसा जरूर होगा जिनमें जीवन विकास के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मौजूद हों। उनमें से भी एक हजार पीछे एक ग्रह जरूर ऐसा होगा जिसमें मनुष्य जैसे समुन्नत प्राणियों का अस्तित्व हो। यदि यह कल्पना सही है तो कहा जा सकता है कि ब्रह्मांड में 10 करोड़ ग्रह ऐसे होने चाहिए जिनमें बुद्धिमान प्राणी निवास करते हों। पृथ्वी पर जिस प्रकार के अणु परमाणु पाये जाते हैं उन्हीं से मिलते जुलते अन्य ग्रहों में भी हैं। शीत ताप जहाँ भी मध्यवर्ती होगा वहाँ निश्चय ही प्राणियों की उत्पत्ति होने लगेंगे और क्रमशः अधिकाधिक विकसित होते चले जायेंगे।

आर्थर क्लार्क की “टू थाउजेन्ड वन ए स्पेस आँडिसी”− एच.सी. वेल्स की “दी वार आफ दी वर्ल्डस” क्लिफर्ड सिमैक की “ इमिग्रैन्ट”− फ्रेड होयल की “फिफ्रप्लैनेट”− एडगर राइसवरी की “ग्रीन मैंन फ्राममार्स” जैसी पस्तकों में प्रस्तुत प्रतिपादन से यह सहज ही विश्वास होता है कि अनंत ब्रह्मांड में अनेकों में समुन्नत जीवन का अस्तित्व अवश्य होगा। जियूलवर्ग एडगर एलन, जेम्स ओव्रिएन्स, कार्ल सागन आइजेक आसियोव आदि विद्वानों ने कल्पना और तर्कों के आधार पर ही अन्तर्ग्रही जीवन के सन्दर्भ में अनुमान लगाया है इन मनीषियों ने ठोस प्रमाण प्रस्तुत नहीं किये हैं तो भी जो सम्भावनायें और तथ्य प्रस्तुत किये हैं उपेक्षणीय नहीं हैं।

डॉ. फ्रेड होयल ने एक पुस्तक लिखी है “ऑफ मेन एन्ड गैलेक्सीज” उसमें उन्होंने बताया है कि अपनी आकाश गंगा में अन्तर्ग्रही सन्देशों के आदान प्रदान की कोई एक लाख रेडियो सञ्चार धारायें बहती हैं जिनसे कुछ महत्वपूर्ण ग्रह परस्पर कई तरह के आदान−प्रदान करते हैं। इस संचार व्यवस्था में धरती निवासी भी एक दिन भागीदार होकर रहेंगे।

रूस के नक्षत्र विज्ञानी एन.एस. ब्लारदेशेव ने बताया है कि “क्वासर सी.टी.एन. 102” में पृथ्वी पर जो रेडियो संकेत निरन्तर आ रहे हैं वे निश्चित रूप से किसी बुद्धिमान जाति के द्वारा प्रेषित हैं। उनमें पूर्ण नियमितता के साथ “धड़कन” भी। 100 दिनों के अन्तर से 10 वर्षों के अन्तर ठीक एक ही प्रक्रिया का बार−बार दुहराया जाना यह बताता है कि इस क्रमबद्धता के पीछे कोई सोद्देश्य प्रयास काम कर रहे हैं।

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय की मुलाई रेडियो एस्ट्रोनोमी आवजरवेटरी के अधिकारी मार्टिन रायल ने कि सी ग्रह के नियमित रूप से धरती पर आने वाले रेडियो सन्देश सुने हैं। यह निश्चित समय पर क्रमबद्ध शृंखला के साथ आते हैं। श्री रायल का कथन है कि वे “पर्ल्स” तारक से आते हैं और बताते हैं कि कोई विकसित सभ्यता के बुद्धिमान प्राणी पृथ्वी वालों के साथ संपर्क साधने में प्रयत्नशील हैं।

आर्मेनिया (रूस) की ब्यूरोकान एस्ट्रोफिजीकल आवजरवेटरी के दर्जनों मूर्धन्य खगोल विज्ञानी सन् 1971 से इस प्रयास में जुटे हैं कि अन्तर्ग्रही सन्देशों का आदान−प्रदान किसी प्रकार सम्भव हो सके। इसी प्रकार अमेरिका के ग्रीन बैंक नेशनल रेडियो आवजरवेटरी द्वारा भी ऐसे ही प्रयास चल रहे हैं। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के डॉ. लियोडमोज का यह विश्वास है कि हम भले ही लम्बी अन्तर्ग्रही यात्रायें न कर सकें पर समुन्नत सभ्यताओं वाले ग्रहों के साथ रेडियो संपर्क अवश्य स्थापित कर सकेंगे।

जो सूचनायें अन्य ग्रहों से हमारे उपकरणों ने प्रस्तुत की हैं उनके आधार पर मोटा निष्कर्ष यह निकाला गया है कि अपने सौर मण्डल में पृथ्वी के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं जीवन की सम्भावना नहीं है। पर यह निष्क्रिय सही ही हो इसकी कोई गारन्टी नहीं। मौसम की खोज खबर लेने वाले उपग्रह अक्सर आकाश में उड़ते रहते हैं। उन्होंने पृथ्वी के जो चित्र भेजे हैं उनके आधार पर कई वैज्ञानिकों ने ठीक वैसे ही निष्कर्ष निकाले हैं और अन्तरिक्षवेत्ताओं को चुनौती दी है कि इन चित्रों का वैसा ही निष्कर्ष उन्हीं के आधारों पर निकालें जैसा कि अन्य ग्रहों के सम्बन्ध में निकाला गया है। इससे यही सिद्ध होगा कि पृथ्वी पर कोई जीवन नहीं है। वहाँ जीवित प्राणियों के रहने की कोई सम्भावना नहीं है। यह चुनौती प्रस्तुत करने वालों में कार्नेल विश्वविद्यालय के खगोलवेत्ता प्रो. कार्ल सागन अग्रणी हैं वे चुनौती देते हैं। कि इन उपग्रह प्रेषित चित्रों के आधार पर कोई यह साबित करे कि धरती पर भी जीवन हो सकता है। जिस तरह जीवन रहते हुए भी धरती के प्रस्तुत उपकरणों ने यही निर्जीवता दर्शाई है उसी तरह उनकी खोज खबर को इतना प्रमाणिक नहीं माना जा सकता कि सौर मण्डल में अन्यत्र कहीं जीवन की सम्भावना का स्पष्टतया खण्डन किया जा सके।

मंगल पर जो परिस्थितियाँ हैं उनमें धरती से भेजे हुए जीवन भी जी सकते हैं इस तथ्य का प्रतिपादन कैलीफोर्निया की एक्सरिसर्च लैबोरेटरी के डा. सीरल पोन्नमपेरुया तथा डॉ. हैरल्ड क्लीन ने किया है। उन्होंने “रिव्यू आफ बायोलॉजी” के अक्टूबर 1970 के अंक में एक तर्कपूर्ण लेख छपाया है जिसमें यह सिद्ध किया है कि पृथ्वी पर उन जटिल परिस्थितियों में जीवन−यापन करने वाले प्राणी मौजूद हैं जैसे कि मंगल ग्रह पर हैं। पृथ्वी पर 160 से लेकर 2050 तक तापमान में जीवित रहने वाले प्राणी मौजूद हैं जब कि मंगल ग्रह पर वह न्यूनतम 850 और अधिकतम 1120 ही आँका गया है। उबलते पानी और तीव्र ऐसिडो में भी प्राणी पाये गये हैं। मंगल पर अल्ट्रा वायलेट रेडिएशन, वायुमण्डलीय घनत्व तथा आक्सीजन के अभाव को देखते हुए जीवन के अस्तित्व से इनकार किया गया है पर इन तीनों ही परिस्थितियों में जीवन के फलने−फूलने की पूरी−पूरी गुँजाइश है। इस प्रतिपादन के पक्ष में सबसे मजबूत दलील यह है कि पृथ्वी पर अब से 4.6 अरब वर्ष पहले जीवन आरम्भ हुआ, उस समय तक यह अग्नि पिण्ड थोड़ा ही ठण्डा हो पाया था। उस समय सिर्फ अमोनिया, मीथस हाइड्रोजन और भाप के सघन बादल ही आकाश में छाये हुए थे। सूर्य की पराबैगनी किरणों की वर्षा से और ज्वालामुखी विस्फोटों की गर्मी से सर्वत्र बिखरे अणु टूट−टूट कर विभिन्न रूपों में परिणत हुए। उन्हीं से अमीनों अम्ल एवं कार्बनिक पदार्थ बने जिनसे जीवन का प्रादुर्भाव सम्भव हो सका। इन्हीं तत्वों का संयोजन डी.एन.ए. के रूप में सामने आया। प्रोटीन की रचना हुई और जीवित कोशिकाओं की हलचल उत्पन्न हुई। उसी का क्रमिक विकास विभिन्न जीव−जन्तुओं के रूप में सामने आया। यह पृथ्वी पर जीवन उद्भव का इतिहास अन्य ग्रहों पर भी दुहराया जा सकता है। शिकागो विश्वविद्यालय के जीव विज्ञानी स्टेनले विलर− फलोरिया विश्वविद्यालय के सिडनी फोक्स, ह्यू स्टन विश्वविद्यालय के जुआर जोरो इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि अन्य ग्रहों में इन दिनों जो परिस्थितियाँ हैं उनमें भी जीवन विकास की सम्भावना है भले ही पृथ्वी निवासियों से भिन्न प्रकार का ही क्यों न हो।

संसार के विभिन्न भागों में अन्तरिक्ष से टूटे हुए उल्का पिण्डों के जो अवशेष पाये गये हैं उनमें कार्बोनेशियस काड्राइट जैसे अमीनो अम्ल मिले हैं साथ ही प्राणियों के फासिलपिंजर भी उनमें देखे गये हैं। सन् 1970 में आस्ट्रेलिया में गिरी उल्का से 17 प्रकार के अमीनो अम्ल पाये गये थे। मैसाचुसेट्स इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी के एक प्रतिवेदन में शनि के तथा बृहस्पति के उपग्रहों में जीवन होने की सम्भावना की गई है।

जीवन के स्वरूप और आधार के बारे में हम पृथ्वी निवासियों की जो मान्यताएं हैं वे अपने लोक की स्थिति का अन्वेषण करके बनाई गई हैं। आवश्यक नहीं है कि अन्य लोगों में भी यही आधार काम करे या जीवन का सही स्वरूप हो। जिस तापमान में अपने यहाँ जीवन विकास होता है आवश्यक नहीं कि अन्य ग्रहों की स्थिति में भी उतना ही तापमान आवश्यक हो। अतिशीत और अतिउष्णता के मध्य भी जीवन की स्थिति अपनी पृथ्वी पर असम्भव मानी जाती है किन्तु अन्य तारकों में ऐसे जीव भी हो सकते हैं जो हमारी दृष्टि में असह्य वातावरण में भी भली प्रकार फल−फूल रहे हों।

अब धरती के विज्ञानी भी मानने लगे हैं कि अन्य परिस्थितियों में भी जीवन का विकास एवं परिपोषण हो सकता है। पृथ्वी पर कार्बन, ऑक्सीजन, कार्बन डाई आक्साइड और पानी की उपस्थित में ही जीवन पलता है सो ठीक है पर अब यह भी स्वीकार कर लिया गया है कि “सिल्किन” भी कुछ अन्य यौगिकों के साथ मिल कर जीवन का आधार हो सकता है। पानी की तरह द्रव अमोनिया, द्रव मीथेन हाइड्रोजन सल्फाइड भी काम दे सकते हैं। आक्सीजन की जरूरत गन्धक भी पूरी कर सकता है।

हम कई ग्रहों के बारे में यह जानते हैं कि वहाँ बहुत ठंडक अथवा गर्मी होनी चाहिये पर यह अनुभव सही नहीं है। पृथ्वी के इर्द−गिर्द हवा और धूप की मजबूत छतरी तनी हुई है वह पृथ्वी पर आने वाली सूर्य किरणों को रोक कर उपयुक्त गर्मी बनाये हुए है। इस छतरी की एक परत में अतिशीत की और एक परत में अति ताप की स्थिति है। यदि अन्य किसी ग्रह के निवासी पृथ्वी का पता लगता रहे हों और उनके हाथ इन दो परतों में से जो भी लगेगी उसी के आधार पर यह मान बैठेंगे कि इस लोक का तापमान इसी स्तर का है, जबकि वस्तु स्थिति इससे सर्वथा भिन्न प्रकार की होगी। धरती पर तापमान जीवन के उपयुक्त सह्य है। ठीक इसी प्रकार अन्य ग्रहों में वहाँ के निवासियों के लिए उपयुक्त तापमान किसी गैसीय छतरी में ढका छिपा हो सकता है। वहाँ की स्थिति के बारे में हमें बहुत ही कम जानकारी है ऐसी दशा में किसी उचित निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन है। इन परिस्थितियों में हम यह कल्पना कर बैठें कि अन्य ग्रहों में जीवन नहीं होगा, सर्वथा अनुचित है। सौर मण्डल भर की हमें थोड़ी जानकारी है। यदि इस छोटे क्षेत्र में जीवन नहीं भी हो तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि पृथ्वी ही एक मा सजीव है और अन्यत्र सर्वत्र निर्जीवता और निस्तब्धता का साम्राज्य है। कभी यह कहा जाता था कि अंतर्ग्रही उड़ान की गति अधिक से अधिक प्रकाश की गति हो सकती है। ब्रह्मांड विस्तार को ध्यान में रखते हुए इस मन्द गति से अन्य ग्रहों की खोज खबर ला सकना अति कठिन है। उतनी लम्बी उड़ान के लिए ईंधन में चलने से वे यान अत्यन्त भारी हो जायेंगे। फिर उतने लम्बे समय तक मनुष्य जीवित नहीं रह सकेंगे। उतने दिन तक खाने−पीने की सामग्री लेकर चलना भी सम्भव नहीं।

उस सभी कठिनाइयों का हल अब मिलता जाता है। लम्बी मंजिल पार करने के लिये अपने यानों को थोड़ी ही दूर उड़ाना पड़ेगा उसके बाद अभीष्ट ग्रह की आकर्षण शक्ति में जब प्रवेश पा लिया जायगा तो अपने यान को उड़ने की जरूरत न पड़ेगी। मंजिल स्वयं ही खिंचती हुई अपने पास चली आयेगी अर्थात् वे ग्रह स्वयं ही हमें खींचने लगेंगे। अपने यान के इंजन बन्द कर दिये जायेंगे किन्तु यात्रा क्रम मजे में चलता रहेगा। ऐसी दशा में अधिक ईंधन लेकर चलने की जरूरत न पड़ेगी। शीत निद्रा में सुला कर यात्री को दीर्घजीवी बनाया जा सकेगा और अन्न−जल तथा वायु की जितनी मात्रा यान में भरी जायगी उसी को बार−बार शुद्ध करके प्रयुक्त होने योग्य बनाया जाता रहेगा और उतनी ही सामग्री से मुद्दतों तक गुजर−बसर होती रहेगी। अतएव निकट भविष्य में उन सभी कठिनाइयों को सरल बना लिया जायगा जो इन दिनों अतीव कठिन और निराशाजनक प्रतीत होती हैं।

ब्रह्मांड शोध कार्य के उपयुक्त एक अति महत्वपूर्ण विज्ञान हाथ में आया है− रिलोटिविस्टक वेलेसिटी अर्थात् आपेक्षित तीव्र गति। इस प्रकार पर पाँच हजार वर्षों की यात्रा दस वर्ष में ही की जा सकेगी। इस विज्ञान का विवेचन करते हुए विज्ञानी डोनाल्ड ने उसे गुरुत्वाकर्षण का उल्लंघन कहा है। उड़न तश्तरियों का दूरवर्ती ग्रह नक्षत्रों से धरती पर आना−जाना इसी आधार पर सम्भव है।

पृथ्वी द्रुत गति से अपनी धुरी पर घूमती है और सूर्य की परिक्रमा करती हुई बिना पंख के उड़ती है इस गति के फल स्वरूप उसमें गुरुत्वाकर्षण पैदा होता है। धरती की चीजों को यह गुरुत्वाकर्षण ही बाँधे रहता है और हमें पता भी नहीं चलता कि हम सब भी घूम रहे हैं। यदि गुरुत्वाकर्षण न होता तो यह गति हमें उछाल कर ब्रह्मांड में ऐसा फेंक देती कि फिर कभी पता ठिकाना ही न मिल सके।

यदि किसी वस्तु का अपना गुरुत्वाकर्षण हो और उसका वेग पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को निरस्त कर सके तो फिर वह अनन्त ब्रह्मांड में कहीं भी सरलतापूर्वक आ जा सकता है। पृथ्वी से जो राकेट अन्तरिक्ष में फेंके जाते हैं। उनमें भारी मात्रा में ईंधन खर्च करने की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि गुरुत्वाकर्षण के दबाव से संघर्ष करते हुए वे ऊपर उठ सकें। यदि किसी यान में अपना गुरुत्वाकर्षण हो तो फिर उसकी गति अन्तरिक्षीय स्तर की होगी। तब दिल्ली से अमेरिका पहुँचने के लिए केवल पाँच मिनट पर्याप्त होंगे। अभी तो हर यान को अन्तरिक्ष में अपनी ही शक्ति से कि सी दिशा में आगे बढ़ना ही पड़ता है वह ठहर नहीं सकता। यदि ठहर जाय तो कोई न कोई ग्रह नक्षत्र उसे अपनी आकर्षण शक्ति से पकड़कर घसीट लेगा। ठहरना उसी यान के लिए सम्भव हो सकता है जिसमें अपना गुरुत्वाकर्षण हो। यदि ऐसा कोई यान हो तो उसे पृथ्वी की पकड़ से बाहर निकलने के लिए तो थोड़ा जोर लगाना पड़ेगा। पीछे स्वतन्त्र होकर जब वह कहीं ठहरेगा तो वहाँ कि सी ग्रह की आकर्षण शक्ति उसे अपनी ओर अपनी शक्ति से बुलाने लगेगी। इसका अर्थ यह हुआ कि उस यान को वहाँ तक चलना पड़ेगा, जहाँ ठहरने पर वह इच्छित ग्रह की ओर सीधा जाने लगे। बस वहाँ से वह मंजिल की ओर चलेगा। यह कहने की अपेक्षा यह कहना अधिक उपयुक्त होगा कि मंजिल उसकी ओर चलेगी। बस यात्रा तुर्त−फुर्त पूरी होगी। यह सफलता मिलने पर चन्द्रमा पर पहुँचने के लिए ‘साढ़े तीन घण्टे, शुक्र के लिए 36 घण्टे’ मंगल के लिए 48 घण्टे और बृहस्पति तक पहुँचने के लिए 6 दिन पर्याप्त होंगे। यह है विलोम गुरुत्वाकर्षण की शक्ति है, उसी का विकास करने में रिलेटिविस्टिक वैलोसिटी की गहरी शोध की जा रही है ऐलेग्जेण्डर सेवेरस्की और वर्क हार्ड हीम इस शोध के अग्रणी माने जाते हैं। विभिन्न देशों की अनुसन्धान शालाएं इस दिशा में अनेकानेक प्रयोग परीक्षण करने में संलग्न हैं।

लम्बे वर्षों में पूरी हो सकने वाली यात्रा के लिए यह तरीका ढूँढ़ निकाला गया है कि अन्तरिक्ष यान के रवाना होते ही “हाइवर नेशन” प्रक्रिया द्वारा यात्री को शीतल करके गहरी निद्रा में सुला दिया जाय और जब लक्ष्य स्थान निकट आवे तब स्वसंचालित प्रक्रिया उसे गर्मी पहुँचाकर जगा दे। ऐसा करने से उस यात्री पर समय का प्रभाव न पड़ेगा। वह जिस आयु का सोया था उसी आयु का शरीर लेकर जगेगा। लौटने पर भी इसी पद्धति को अपनाया जायेगा फलतः सैंकड़ों वर्षों की लम्बी अन्तरिक्षीय यात्रा कर लेने पर भी वह न तो बूढ़ा होगा और न मरेगा उसकी जवानी यथावत् बनी रहेगी।

मनुष्य द्वारा विसर्जित मल को कोई, फफूँदी अथवा खाने योग्य सब्जी के रूप में बदलना अब सरल हो गया है। त्यागे हुए मूत्र को शुद्ध करके पेय बना लिया गया है। छोड़ी हुई श्वाँस से विषैली वायु को प्राण वायु के रूप में पुनः बदल देने की विधि प्राप्त हो गई है। ऐसी दशा में अन्तरिक्षीय उड़ानों में अन्न, जल एवं वायु की व्यवस्था करने का भी झंझट टल गया है। ऐसी अन्तर्ग्रही भाषा तैयार करने की दिशा में काफी प्रगति हो चुकी है जिसके आधार पर रेडियो संचार द्वारा अपनी परिस्थितियाँ तथा जानकारियों की सूचना अन्य ग्रह निवासियों को चित्र बनाकर दिखाई बताई जा सकें।

ब्रह्मांडीय भाषा का स्वरूप, इस प्रश्न पर विचार करने के लिए विशेषज्ञों के दो अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन हो चुके हैं। इनका कहना है कि गणित सिद्धांतों के आधार पर ऐसी भाषा बन सकती है। गणित की आवश्यकता कि सी भी लोक के निवासियों को पड़ेगी ही और उसका क्रम वही 1,2,3,4,5 वाला सर्वत्र होगा। वृत्त की परिधि और उसके व्यास का अनुपात एक स्थिर संख्या होती है। इसी आधार पर ऐसी भाषा बन सकती है जिसे अन्य लोक के बुद्धिमान प्राणी समझ सकें। सन् 1961 में ड्रेक और औलिवर नामक− वैज्ञानिकों ने ऐसी भाषा की एक रूप रेखा भी तैयार की थी, यह रेडियो तरंगों पर आधारित है। हाइड्रोजन अणु से निकलने वाले विवरण को इकाई माना गया है। न तरंगों की लम्बाई पर 1261 रेडियो धड़कने भेजी जायेंगी। इस आधार पर किसी भी लोक वासियों के लिये चित्रों के आदान−प्रदान का सिलसिला चलेगा। पृथ्वी पर भी भाषा का विकास इसी चित्र प्रक्रिया के आधार पर हुआ है। अभी भी जहाँ भाषा का आधार न मिले वहाँ चित्र बनाकर कही पृथ्वी वासी विचारों का आदान−प्रदान करते हैं। ब्रह्मांडीय भाषा का सिलसिला भी इसी माध्यम से आरम्भ होगा।

अन्य लोगों के साथ रेडियो संपर्क बनाने के लिये 21 से.मी. हाइड्रोजन बैण्ड उपयुक्त समझा गया है। स्काटिश वैज्ञानिकों ने सूर्य के इर्द−गिर्द एक अन्तरिक्षयान घूमते देखा है। ऐसे एप्साइलौन वाटिस तारे के निवासियों द्वारा अपने सौर मण्डल की खोज खबर लेने के लिए भेजा हुआ माना गया है। वैज्ञानिक इस प्रयत्न में हैं कि उससे संपर्क बनाकर अंतर्ग्रही आदान−प्रदान की एक नई कड़ी जोड़ी जाय।

इस सम्भावनाओं और प्रयत्नों के देखते हुए यह आशा की जा सकती है कि निकट भविष्य में ब्रह्मांड में अवस्थित बुद्धिमान प्राणी परस्पर संपर्क स्थापित करेंगे और परस्पर आदान−प्रदान की व्यवस्था बनायेंगे। सम्भवतः वे अपने अनुभवों के आधार पर एक दूसरे को यह बतायें कि संकीर्ण स्वार्थपरता में नहीं− सबके विशाल विस्तार में ही बुद्धिमान प्राणियों की हित साधना सम्भव है।


भगवान की माया (kahani)

नारद ने विष्णु भगवान से कहा− आपकी माया की महिमा तो बहुत सुनी है, पर उसे कभी देखा नहीं। कृपा हो तो उसे प्रत्यक्ष दिखादें।

विष्णु भगवान ने सहमति दे दी और अवसर आने पर उनकी मनोकामना पूरी करने का वायदा कर दिया।

बहुत दिन उपरान्त भगवान नारद को लेकर वन बिहार को चल दिये। चलते−चलते वे थक कर बैठ गये और नारद से बोले− बहुत प्यास लगी है कहीं से पानी ला दीजिए।

नारद जी कमण्डलु लेकर चल दिये। पानी समीप में कहीं नहीं मिला। तो उन्हें बहुत दूर नदी तक जाना पड़ा।

कमण्डलु में पानी भर ही रहे थे कि नदी तट एक रूपसी उन्हें बैठी दिखाई दी। नारद जी उसके पास पहुँचे और परस्पर सम्भाषण में दोनों एक दूसरे के घनिष्ठ बन गये।

दोनों प्रणय सूत्र में बँधे और वहीं गृहस्थ बसा कर रहने लगे। देखते−देखते वर्षों बीत गये और रूपसी दो पुत्रों की माता बन गई।

इतने में वहाँ महामारी फैली। गाँव के गाँव उजाड़ होने लगे। नारद जी और उनकी पत्नी ने निश्चय किया, इस क्षेत्र में प्राण संकट का खतरा है सो हम लोगों को कहीं अन्यत्र चलना चाहिए। बात पक्की हो गयी। यात्रा के साधन साथ लेकर नारद परिवार सहित सुरक्षित नगर में जा बसने के लिए चल पड़े।

रास्ते में नदी मिली। नदी पर लकड़ी का पुल था। वे लोग जब पुल पार करने लगे तो दुर्भाग्यवश पुल अचानक टूट गया। बच्चों समेत पत्नी उस भयंकर नदी में बह गई। अकेले नारद ही तैर कर किसी प्रकार अपनी प्राण रक्षा कर सके।

संयोगवश वह नदी वही थी जिससे नारद प्यासे विष्णु भगवान के लिए जल लेने आये थे। प्यासे विष्णु नारद को ढूँढ़ते−ढूँढ़ते वहीं आ गये जहाँ नारद अपने स्त्री बच्चों के मृत्यु मुख में चले जाने के कारण शोकातुर होकर बिलख−बिलख कर रो रहे थे। विष्णु भगवान ने नारद से इतनी देर तक पानी लाने में विलम्ब करने का कारण पूछा− तो वे चौंक पड़े और सपना टूट गया।

भगवान ने कहा− नारद असंख्य आत्माएं मेरी प्यास बुझाने के लिए अपने उद्गम से चलती हैं, पर रास्ते के आकर्षणों में भटक कर कहीं से कहीं जा पहुँचती हैं। यही मेरी माया है जिसे भाग्यवान ही पार कर पाते हैं।


परिवर्तन अवश्यंभावी है उसके लिए तैयार रहें

कि सी समय पृथ्वी पर केवल दो ही महाद्वीप थे। उन्हीं से टूट−फूट कर आज के महाद्वीप और छोटे द्वीप बने हैं। ग्रह−नक्षत्र जिस तरह क्रमशः एक दूसरे से दूर होते जा रहे हैं, उसी प्रकार यह महाद्वीपों के अलगाव का अन्तर भी बढ़ रहा है। यह खिसकने की गति कितनी है? इस संबंध में अभी केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वे हर साल दो इंच आपस का फासला अधिक बढ़ा लेते हैं। कभी जहाँ सुखी धरती थी आज वहाँ समुद्र हिलोरें ले रहा है। और जहाँ समुद्र था वहाँ विशाल नगर बसे हुए हैं। किसी समय भारत भूमि सोमाली और पश्चिम आस्ट्रेलिया के साथ जुड़ी थी। इस मान्यता को क्रमशः अधिक बल मिलता जा रहा है। और पुष्टि में अधिक प्रमाण मिलते जा रहे हैं। ओहियो विश्वविद्यालय के खोजी दल को अंटार्टिका क्षेत्र में रोसआइसेल्फ के निकट ‘हिप्पोपोटमस’ जीव का अवशेष मिला है। यह लुप्तप्राय नस्ल प्रागैतिहासिक काल में दक्षिण अफ्रीका तथा एशिया में पायी जाती थी। इस समय जहाँ समुद्र है पुराने समय में वहाँ थल रहा है। अन्यथा यह थल का प्राणी सत्ताईस सौ मील तैर कर किस प्रकार इस क्षेत्र तक पहुँच सकता था पृथ्वी धीरे−धीरे ठंडी हो रही है साथ ही सिकुड़ भी रही है यह मान्यता अप्रामाणिक नहीं ठहराई जा सकती है।

प्राचीन काल में पृथ्वी के दो विराट् महाद्वीप थे एक गोंडवानालेंड दूसरा लाटेशिया। गोंडवाना लेंड में भारत, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, आस्ट्रेलिया तथा दक्षिणी ध्रुव प्रदेश थे, लाटेशिया में उत्तरी अमेरिका, ग्रीनलैंड, यूरोप और एशिया की भूमि थी। हिम प्रलय एवं समुद्री उथल पुथल ने थल को जल में जल को थल में बदल डाला और धीरे−धीरे पृथ्वी का मानचित्र ऐसा बना जैसा कि आज वह है। यह भी कब तक इस स्थिति में रहेगा कहा नहीं जा सकता है। क्योंकि महाद्वीप अभी भी चुप कहाँ बैठे हैं। वे अभी भी अलगाव की दिशा में बढ़ रहे हैं और उनके बीच की खाई चौड़ी होती जा रही है।

पृथ्वी अपने जन्म के समय तक गैस के रूप में ही थी। और उसका मूल रूप अभी भी अन्तः गर्भ में भरा है वह अक्सर उभर कर ऊपर उछलता रहता है। और भयंकर ज्वाला मुखी प्रगट होते रहते हैं। ज्वाला मुखी फटते हैं तो उनके साथ अधिकाँश गैसें, हाइड्रोजन, गन्धक कार्बन, आक्सीजन आदि तत्वों की होती हैं। उनमें भाप भी मिली होती है अस्तु धुएं के गुबार के रूप में आसमान में छितराती है और घोर अँधेरा छा जाता है। इनके साथ−साथ धूल, राख, बालू, पत्थर, गैस कीचड़ आदि भी रहती है और वे लावा बनकर बहती या टीले जमा कर देती हैं।

सन् 1946 में पैरीक्यूटिस ज्वालामुखी फटा था तो वह प्रतिदिन एक लाख टन लावा उगलता था कभी−कभी इनमें बहुमूल्य खनिज भी प्राप्त होते हैं। जापान के एक ज्वाला मुखी ने प्रचुर मात्रा में गन्धक उगला था। भारत के दक्षिण में जो पठारी क्षेत्र है। उसकी काली मिट्टी रुई की भारी उपज देती है। यह किसी ज्वाला मुखी की ही देन हैं।

संसार के साठ प्रतिशत ज्वालामुखी प्रशान्त महासागर में फूटे हैं। वहाँ के अधिकाँश द्वीप समूह इसी प्रकार जन्मे हैं। पृथ्वी पर आये दिन पर्वत श्रेणियाँ उगती हैं− झीलें बनती हैं− द्वीप उठते हैं। साथ ही पुराने सुरम्य स्थल खण्डहर हो जाते हैं, यह उथल−पुथल अनादिकाल से चल रही है। और न जाने कब तक चलती रहेगी।

इस संसार में जब कुछ परिवर्तनशील है मनुष्य जीवन भी। हमारी वर्तमान स्थिति देर तक रहने वाली नहीं है। मरण को विस्फोट हमारी धूल बखेर देगा और ऐसी परिस्थितियों में पहुँचा देगा जो आज से सर्वथा भिन्न होंगी। उस परिवर्तन के लिए हमें तैयार रहने की तैयारी करनी चाहिये।


देवत्व का वरण करें− असुरता का नहीं

हमारे भीतर देवता भी विद्यमान हैं और असुर भी। देवता अपनी प्रेरणाएं भरते हैं और असुर अपनी और खींचते हैं। दोनों के बीच निरन्तर रस्साकशी−चलती रहती है। अन्तःकरण को अपने अधिकार में करने के लिए दोनों ओर से प्रबल प्रयत्न चलते रहते हैं। अपने−अपने पक्ष की उपयोगिता और श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए दोनों ही ओर से आकर्षक तर्क उपस्थित किये जाते हैं और तथ्य प्रस्तुत किये जाते हैं।

असुरता की रीति−नीति अपना कर कितने ही लोग बहुत जल्दी धन सम्पत्ति तथा पद वैभव कमाने में सफल हो सकें, इसके उदाहरण प्रचुर परिमाण में अपने ही इर्द−गिर्द बिखरे पड़े होते हैं। असुर हमें उनके समीप ले पहुँचते हैं और बताते हैं यही तरीका अच्छा है और सरल है। इस मार्ग पर चलते हुए बहुत शीघ्र अधिक मात्रा में सुख साधन एकत्रित किये जा सकते हैं। बड़े आदमियों जैसे विविध विधि उपभोगों के रस चखे जा सकते हैं। जब इन तर्कों और तथ्यों की ओर मन खिंचता है तो लगता है कि नीति−अनीति के झंझट में पड़ने की अपेक्षा जैसे भी बने वैसे अधिक वैभव और उपभोग का लाभ उठाया जाना ही ठीक है। जब हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं तो समझना चाहिए कि अन्तर में रहने वाले असुर की विजय हो गई।

देवता दूसरे प्रकार के तर्क और तथ्य उपस्थित करते हैं। वे उन महामानवों का चरित्र चित्रण करते हैं जो मानव जाति का गौरव बढ़ाने की ऐतिहासिक भूमिका प्रस्तुत करते हैं। जिन्होंने प्रकाश स्तम्भ बनकर अनेकों का मार्गदर्शन किया। जिनके पद चिन्हों पर चलते हुए अगणित लोगों को ऊँचा उठने और आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। यह देव मानव भले ही भौतिक साधनों की दृष्टि से काम चलाऊ स्थिति में गुजर−बसर करते रहे हों पर उन्होंने लोक सम्मान, आत्म संतोष का जो लाभ पाया, वह इतना बड़ा था कि सम्पत्ति वालों के संसारव्यापी वैभव को उसके ऊपर निछावर किया जा सकता है। बड़प्पन का विस्तार कितना ही बड़ा क्यों न हो, वह मानवता के वजन की तुलना में सदा ही हलका पड़ेगा। शरीर को सुख भले ही वैभव से मिले, आत्मा को शान्ति तो शालीनता के अतिरिक्त और किसी तरह नहीं मिल सकती। सुख की तुलना में शान्ति की गरिमा को ही महत्व मिलना चाहिये। शरीरगत लिप्सा के लिए आत्मा को प्रताड़ित नहीं किया जाना चाहिये। इस प्रकार के तथ्य और तर्क देवता द्वारा अन्तःकरण के सम्मुख प्रस्तुत किये जाते हैं। उन से जो प्रभावित हो गया समझना चाहिये उस पर देवत्व की विजय हो गई।

असुर पक्ष की ओर से उन उदाहरणों की झड़ी लगा दी जाती है जिन में देव−पक्ष का अनुसरण करने वालों को सीमित अर्थ साधनों, में गरीबों के साथ गुजर करनी पड़ी− दुनियादारी की दृष्टि से मूर्ख बनना पड़ा और दुष्टों ने अपने मार्ग में बाधक मान कर उन्हें तरह−तरह से सताया। संयम और त्याग से प्रत्यक्षतः हानि भी हे और कष्ट भी। असुरता कहती है कि इस झंझट में पड़ने से लाभ ही क्या है? लोक श्रद्धा और आत्म संतोष के बदले यदि सम्पन्नता जन्य सुख सुविधा गँवानी पड़ी तो इसमें क्या क्या लाभ रहा? असुर पक्ष के यह तर्क काफी प्रभावी हैं और जिनका मन देव पक्ष की ओर झुक रहा था उन्हें निराश करने के लिए काफी वजनदार हैं।

देव पक्ष की ओर प्रतिपक्ष के जो दोष दिखाये जाते हैं वह भी कम वजनदार नहीं हैं। नीति पूर्वक सीमित धन ही कमाया जा सकता है फिर नीतिवान व्यक्ति अपने समीपवर्ती जरूरतमंदों के प्रति भी उदार रहता है, इस लिये वह जो कमाता है उसका अधिकाँश इस सहायता में ही चला जाता है। अतः देव जीवन का निर्वाह सादगी अपना कर ही हो सकता है। उच्च विचारों की रक्षा करने वाले अमीर नहीं हो सकते यह ठीक है, पर यह भी निश्चित है कि वैभव संग्रह करने और उसका विलासी उपभोग करने के लिये अन्तःकरण को तभी रजामन्द किया जा सकता है जब उसको निष्ठुरता और स्वार्थपरता की गहरी शराब पिलादी जाय। संसार की पीड़ाओं और पिछड़ेपन की आवश्यकताओं से जो आँख बन्द कर सकेगा उसी के लिये यह सम्भव होगा कि बड़े परिमाण में वैभव इकट्ठा करे और उससे अपने अहंकार की तृप्ति करे तथा परिवार के चन्द लोगों को उच्छृंखल वैभव विलास के साधन जुटायें। अनीति जन्य उपार्जन और निष्ठुर उपभोग की कलुषित गतिविधियाँ अपना कर किसी का अंतःकरण शान्ति नहीं पा सकता। उसकी आत्म प्रताड़ना उसके अन्तःकरण को इतनी भीषण पीड़ा पहुँचाती रहेगी कि वैभव का नशा कितना ही गहरा पीते रहने पर भी उस कसक से बचा न जा सकेगा। प्रचुर सम्पदा रहने पर शरीर भले ही कुछ सुविधा अनुभव करे पर आत्मा को उससे कुछ भी सन्तोष न मिल सकेगा।

वैभव के साथ जुड़े रहने वाले विविध−विधि दुर्व्यसनों और दुर्गुणों से कोई इनकार नहीं कर सकता। गुजर−बसर से अधिक धन जहाँ होगा वहाँ दुर्बुद्धि अवश्य उपजेगी फलतः दुष्प्रवृत्तियां भी पनपेंगी। इससे अपने तन का, मन का, व्यक्तित्व का तथा यश का सर्वनाश हो जायगा। आत्मिक पतन होगा और समाज में अस्वस्थ परम्पराओं का प्रचलन होने के साथ साथ ईर्ष्या−द्वेष का वातावरण बनेगा। असंतुलित उभार को गाँठ कहते हैं शरीर में जहाँ भी ऐसे अर्बुद उठते हैं वहाँ पीड़ा भी बढ़ती है और कुरूपता भी। उसका समाधान कष्टकर चीर−फाड़ ही करती है। दरिद्र देश में चन्द व्यक्ति यों को सम्पन्नता और विलासिता ऐसे उपद्रव उत्पन्न करती रहती है जिसमें वैभववान् तो मरता ही है अपने साथ अन्य असंख्यों को मरने के लिए विवश करता है। राजदण्ड, समाज दण्ड, और आत्म दण्ड की विविध प्रताड़नाएं उस पर बरसती ही रहती हैं। इन नारकीय यातनाओं के सहते हुए यदि उन्मादी लिप्सा, लालसा की तनिक सी पूर्ति कर ली भी गई तो उसमें क्या बुद्धिमानी रही।

देव पक्ष की यह दलीलें कम वजनदार नहीं। उन पर विचार किया जाय तो विवेक यह कहता है कि बहुमूल्य मानव जीवन को विलासी लक्ष्य में नियोजित करता अदूर दर्शिता पूर्ण है। जब उपभोग एक सीमित मात्रा में ही हो सकता है और संग्रह को दूसरों को हराम की कमाई खा कर नष्ट होने के लिए छोड़ना है तो उस दौड़ धूप में कष्ट साध्य परिश्रम करने और पाप की गठरी शिर पर लादने से क्या फायदा? जितना श्रम, समय और मनोयोग इस विलासी उन्माद में लगाया जाता है उससे आधा भी यदि आत्म कल्याण और लोक मंगल के प्रयोजन में लगा दिया जाय तो जीवन की सार्थकता का आधार बन सकता है।

दोनों पक्षों की बात सुनकर यदि निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह विवेक को विचारने का अवसर मिले तो वह लोभ और मोह की− वासना और तृष्णा की सड़ी कीचड़ में से निकलने वाली कुरूप दुर्गन्ध को भली प्रकार देख और सूँघ सकता है और इस निष्कर्ष पर पहुँच सकता है कि दूरदर्शिता उसी राह पर चलने में है जिस देव पर पुरुष और महामानव चलते रहे हैं। असुर पक्ष के समर्थन में खोना बहुत पड़ता है, और पाना तो नगण्य जितना ही होता है। इसके विपरीत देव पक्ष के अनुगमन में शरीर निर्वाह की व्यवस्था तो रहती है, साथ ही उन आत्मिक सम्पदाओं के संग्रह का अवसर मिलता है जो अन्तरंग में सन्तोष और बहिरंग में श्रेय सम्मान का गौरव निरन्तर प्रदान करती है। नरक से स्वर्ग श्रेष्ठ है और असुरता से देवत्व का पक्ष।

निर्णय अपने विवेक को ही करना पड़ता है। देवत्व और असुर पक्ष दोनों ही अपने भीतर विद्यमान हैं और दोनों तथ्य प्रस्तुत करते हैं। यह फैसला करना अपना काम है कि किसे स्वीकार करें और किसे अस्वीकार। अनिश्चित मति हवा के झोंकों की तरह कभी इधर चलती है और कभी उधर। कभी एक को महत्व देती है और कभी दूसरे को। कभी एक को पकड़ती कभी दूसरे को कभी पूर्व कभी पश्चिम चलने की निरर्थक विडम्बना में उलझे रहने की अपेक्षा वे बुद्धिमान हैं जो दोनों पक्षों में से एक का अवलम्बन करते हैं। निश्चय ही लाभ में वे रहते हैं जिन्होंने असुरता की उपेक्षा उसके देवत्व को अपना आधार, अवलम्बन स्वीकार किया।


मनुष्य सृष्टि का एक तुच्छ सा अल्प संख्यक प्राणी है।

यह संसार मनुष्यों के लिये ही नहीं बना है और न वही सृष्टि का मात्र अधिकारी है। इस पर अनेक प्राणियों का निवास निर्वाह है। यहाँ ऐसी परिस्थितियों का भी सृजन किया गया है जिसमें अन्य प्राणी भी अपनी आवश्यकता पूरी कर सके, भले ही मनुष्य को उस विधान के कारण अड़चन पड़ती हो।

मनुष्य की जन संख्या इस धरती पर मात्र 400 करोड़ के लगभग है। वह एक अल्प संख्यक प्राणी है। समस्त जाति रंग, देश, धर्म, भाषा, संस्कृति वाले मनुष्यों की यह संख्या कुल मिलाकर है, जब कि छोटे इलाके में ही दमक−चींटी−मक्खी−मच्छर जैसे कीड़े उससे भी हजारों गुनी संख्या में मौजूद पाये जायेंगे।

हाथी, गेंडा, सिंह जैसे विशालकाय प्राणी मनुष्यों से कम ही होंगे पर वन्य पशु और पालतू पशु भी मनुष्य की अपेक्षा कई गुने हैं। पक्षियों का तो कहना ही क्या? चिड़ियों की जातियाँ और संख्या मनुष्यों की अपेक्षा अभी भी सैंकड़ों गुनी अधिक है। मक्खी जैसे छोटे आकार के पक्षी तो मनुष्य से करोड़ों गुने अधिक हैं। उनकी तुलना में मनुष्य सर्वथा अल्प संख्यक हैं।

समस्त संसार पर मनुष्य का अधिकार है और होना चाहिये, यह मान्यता सृष्टि के विधान उद्देश्य को चुनौती देने के बराबर है। ऐसे उद्धत अहंकार पर अंकुश लगना चाहिये और माना यह जाना चाहिये कि परमात्मा के अगणित पुत्रों में से एक मनुष्य भी है। वह ज्येष्ठ है, श्रेष्ठ है। उसकी सार्थकता इसी में है कि वह अपनी उत्कृष्ट सज्जनता का परिचय दे। दूसरे प्राणियों को अपना छोटा भाई माने और हिल−मिल कर स्नेह सौजन्य के साथ रहने की बात सोचें।

मनुष्य का बड़प्पन उसकी मनुजता के साथ जुड़ी है। सहयोग और विवेक जैसी सत्प्रवृत्तियों को अपना कर ही वह श्रेय भाजन बना है अन्यथा छोटे−छोटे कीड़े−मकोड़ों में भी अपने−अपने परिवार की ऐसी विशेषताएं हैं जो अपने क्षेत्र में अनेक प्रकार से मनुष्य को भी चुनौती दे सकती हैं और उसे पिछड़ा हुआ सिद्ध कर सकती हैं।

मधु मक्खियों को ही जरा बारीकी से देखें तो उनकी बुद्धिमत्ता और क्रिया−कुशलता देखते ही बनती है। पहाड़ी मधु मक्खी देशी मक्खी की तुलना में कहीं बड़ी होती है। पहाड़ी मक्खी के छत्ते 7 फुट लम्बे और 4 फुट चौड़े पाये जाते हैं। इनमें वर्ष भर में 50 से लेकर 80 पौण्ड तक शहद प्राप्त किया जा सकता है। सबसे छोटी मधु मक्खी जिन्हें ‘लिटिल बीज’ कहा जाता है हथेली के बराबर ही छत्ता बना पाती हैं। उनसे वर्ष में एक पौण्ड शहद मिल जाय तो बहुत है।

बड़े छत्ते में प्रायः 20 हजार मक्खियाँ रहती हैं। वे सभी रानी का अनुशासन मानती हैं। जब रानी बूढ़ी हो जाती है तो अण्डे देना बन्द कर देती है तो उसे अपना सिंहासन खाली करना पड़ता है। उत्तराधिकारी का अभिषेक वह बूढ़ी रानी ही करती है। वह अपने सूतिका गृह को छोड़कर पहली बार बाहर निकलती है। और अपनी विशिष्ट परख के आधार पर वह निर्णय करती है कि इतने बड़े परिवार में कौन मक्खी निरन्तर अण्डे देते रह सकने योग्य है। प्रायः दस दिन में यह कार्य पूरा हो जाता है और नई रानी आकर उस आसन पर आ विराजती है।

रानी मक्खी जिन्दगी भर में केवल एक बार ही नर समागम करती है। उससे प्राप्त शुक्राणुओं को वह अपने पेट में विशिष्ट थैली में संग्रह कर लेती है। रानी का जीवन एक वर्ष से लेकर दो वर्ष तक होता है। वह प्रौढ़ होते ही प्रतिदिन प्रायः 1000 अंडे देने लगती है। उनका पालन पोषण दाइयाँ करती हैं। रानी के लिये तो अंडे देने भर का काम है। अण्डा तीन दिन के बाद ‘लार्वा’ के रूप में होता है, उसके हाथ−पैर−मुँह आदि कुछ नहीं होते। इन्हें दाई मक्खियाँ अपनी सिर की ग्रन्थियों से निकलने वाले दूध को पिलाकर पालती हैं। अण्डा तीन दिन लार्वा रहने के बाद ‘प्यूपा’ बन जाता है और उसमें से मक्खी निकल जाती है। यदि यह बच्चा मजूर जाति का है तो उसे छत्ते में रहने दिया जाता है अन्यथा दल द्वारा उसे अन्यत्र ही खदेड़ दिया जाता है।

छत्ते को छेड़ने वाले शत्रुओं पर उसके रक्षक प्राणघाती हमला करते हैं। उनका डंक टेढ़ा होता है, उसे वे आवेश के कारण शत्रु के शरीर में ठूँस तो देते हैं किन्तु वापिस निकाल नहीं पाते अस्तु वह टूट जाता है। जहाँ से डंक टूटता है वहाँ बड़ा घाव हो जाता है और उसे जान से हाथ धोना पड़ता है। डंक मारने का दुष्परिणाम जैसा मधुमक्खियों को भुगतना पड़ता है वैसा ही उनके द्वारा काटे हुए मनुष्यों को भी भुगतना पड़ता तो डर के मारे शायद ही कोई मनुष्य दुष्कर्म करने का साहस करता।

मक्खियाँ छत्ते का विस्तार करने में निरन्तर लगी रहती हैं ताकि बढ़ती हुई आबादी को आवास−निवास की कठिनाई उत्पन्न न हो। खोजी मक्खियाँ दूर−दूर जाकर यह पता लगाती हैं कि कहाँ पर इस समय शहद देने योग्य फूल खिले हैं वे अपनी रिपोर्ट नृत्य की भाषा में देती हैं। इस नृत्य को देखकर छत्ता के सदस्य समझ जाते हैं कि कल उन्हें किधर जाना है।

आस्ट्रेलिया के क्वीन्सलैण्ड के इलाके के राउन हाल का नाम है “कैक्टोब्लाटिस हाल” यह नाम करण किसी महापुरुष के नाम नहीं वरन् एक कीड़े के नाम पर किया गया है। जिसने उस देश की जमीन को बर्बाद होने से बचाया है।

उस क्षेत्र में “ओपुन्टिया” जाति की नागफणी की जाति अजर अमर बन कर फैली। उसने ढाई करोड़ एकड़ उपजाऊ जमीन पर अपना कब्जा कर लिया। खोदने−जलाने के सारे उपाय बेकार साबित हुए। यदि वही क्रम चलता रहता तो उस क्षेत्र की सारी जमीन नष्ट हो जाती। अतः उपरोक्त कीड़ा ढूँढ़ निकाला गया, उसे पाला और फैलाया गया। नागफणी की वृद्धि उसी ने रोकी। कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए उस कीड़े के नाम पर “कैक्टोब्लाटिस” बनाया गया। कैरियन कीड़े की घ्राण शक्ति सबसे अधिक मानी जाती है। वह मीलों दूर के मुर्दा माँस का पता लगा लेता है और उड़ता फुदकता हुआ उस खाद्य भण्डार तक पहुँच कर तृप्ति पूर्वक भोजन करता है।

चींटियों में एक जाति कृषि कार्य करती है और अपनी उसी कमाई पर गुजर करती है। वे हरी पत्तियों को तोड़कर अपने बिलों में दूर−दूर तक बिछा देती हैं। इन पत्तियों पर फफूँदी लगती रहती है। बस उसी पर वे महीनों गुजर करती रहती हैं। सूखे पत्तों को हटाना और नए जमा करना उनके दैनिक क्रम में सम्मिलित रहता है। इसलिये खाद्य की उन्हें कभी कमी नहीं पड़ती।

टरमाइड्स जाति का एक कीड़ा आथेपादा जमीन के अन्दर शहर बसा कर रहता है। वह चींटी, दीमक से भी अधिक बुद्धिमान है। इनके श्रम का वर्गीकरण बहुत ही सुनियोजित ढंग से होता है। वे लाखों की संख्या में इकट्ठे रहने पर कभी तनिक भी अव्यवस्था नहीं फैलाते इनका शासन एक रानी करती है। उसके बताये नियमों का पालन करना प्रत्येक सदस्य अपना धर्म कर्त्तव्य मानता है। उनमें से कुछ को कालोनी के निवासियों के लिये भोजन एकत्रित करना− कुछ को भवन निर्माण− कुछ टूट फूट की मरम्मत− किन्हीं को बच्चे पैदा करना आदि कार्य सौंपे गये होते हैं। वे सभी अपना काम पूरे मन से करते हैं।

दीमक लकड़ी खाती है पर वह अपने बल−बूते उसे पचा नहीं सकती। यह कार्य उसकी आँतों में घुस पैठ करने वाला अति सूक्ष्म जन्तु फलेंजीलेट करता है दीमक को पता रहता है कि उसकी आँतों में यह सूक्ष्म कीटक है या नहीं? जब वह देखती है कि वह कीड़ा नहीं है तो लकड़ी न खाकर अपनी भूख किसी और वस्तु से मिटाती है।

मधुमक्खियाँ, केकड़े, चींटियाँ आदि का समयानुसार प्रत्येक कार्य करना यह बताता है कि उनके पास कोई गुप्त इन्द्री होनी चाहिये। मधुमक्खियाँ अपने छत्ते से निकल कर शहद की तलाश में उड़ती हैं तो वह समय बिल्कुल सही रहता है। इसमें एक मिनट का भी आगा−पीछा नहीं होता।

समुद्री केकड़े अपने शरीर का रंग बदलने में गिरगिट से बहुत आगे हैं। दिन में कईबार रंग बदलते हैं। अनुमान था कि यह परिवर्तन सूर्य किरणों के प्रभाव से होता होगा, पर ऐसा कुछ नहीं था। उन्हें घोर अन्धेरे में जमीन के नीचे रक्खा गया तब भी उनकी ठीक समय अपने रंग के परिवर्तन की क्रिया यथावत जारी रही। समुद्र में हल्के ज्वार−भाटे प्रतिदिन 50 मिनट के अन्तर से आते हैं, केकड़े का रंग परिवर्तन भी ठीक 50 मिनट के ही अन्तर से होता है।

कीड़ों की आँख मनुष्य की तरह पूरे एक गोल में नहीं बनी होती उनके नेत्रों में हजारों लैंस लगे होते हैं, उनके द्वारा पृथक−पृथक बिम्ब उतरते हैं और उसका सम्मिलित अनुभव मस्तिष्क में होने पर वस्तु की रूप कल्पना कर पाते हैं। कीड़ों के कान नहीं होते है, यह कार्य वे अगली टाँगों के जोड़ो में रहने वाली ध्वनि ग्रहण शक्ति द्वारा पूरा कर सकते हैं। तितलियों के पंखों में श्रवण शक्ति पायी जाती है। झींगुर आदि जो आवाज करते हैं वह उनके मुँह से नहीं बल्कि टांगों की रगड़ से उत्पन्न होती है।

स्वादेन्द्रिय मनुष्य की अपेक्षा तितलियों में कहीं अधिक होती हैं। वे नमक और चीनी के स्वादों को मनुष्य की तुलना में 200 गुनी बारीकी से समझ सकती हैं।

अब से 20 करोड़ वर्ष पूर्व इस धरती पर यह पतंगे ही भरे पड़े थे अन्य प्राणियों की उत्पत्ति तो कहीं पीछे हुई हैं। अभी भी प्राणधारियों में 70 प्रतिशत यह कीड़े मकोड़े ही इस पृथ्वी पर रहते हैं। हिमाच्छादित गिरि सुरंग शिखरों से लेकर तवे की तरह जलते हुए रेगिस्तानों तक में पाये जाते हैं। उत्तरी ध्रुव की ठण्डक और उबलते झरनों के जल छिद्रों में रहने योग्य अपनी स्थिति बना लेते हैं।

कीड़ों की अपनी विशेषता है। उनके फेफड़े नहीं होते पर साँस लेते हैं। वे सुन सकते हैं पर कान नहीं होते, वे सूँघते हैं पर नाक नहीं होती। दिन उनके भी होता है पर उसकी बनावट हमारे दिल से सर्वथा भिन्न प्रकार की होती है।

साधारणतः कीड़े अण्डों द्वारा जन्मते हैं कीड़े ऐसे भी हैं जो सीधे बच्चे ही देते हैं। यद्यपि वे बच्चे आरम्भ में बहुत ही छोटे होते हैं। रगफर्ड जाति का कीड़ा सीधे माँ के द्वारा ही जन्मता है। बाप का कोई योगदान उसके जन्मने में नहीं होता। कुंवारी एफिड अपने बल−बूते पर बच्चे जनने लगती है। कुमारी व्रत निवाहते हुए भी वह जननी का पद प्राप्त कर लेती है।

प्राचीन काल के जीवावशेषों का अध्ययन करने से पता चलता है कि प्राणियों की उत्पत्ति युग में प्रायः सभी प्राणी बहुत विशाल काय होते थे। ड्रेगन फ्लाई का एक पंख ही ढाई फुट का होता था। अभी भी “वाकिंग स्टिक” नामक कीड़ा संसार का सबसे बड़ा कहा जाने योग्य माना जाता है। इसके पंख 15 इंच लम्बे होते हैं। हिन्दुस्तान में पाया जाने वाला सबसे बड़ी किस्म का टिड्डा “एटलस” है उसके पंख 12 इंच के होते हैं।

कीट पतंगों में से कुछ हमारे लिये हानिकारक भी हैं, पर इन में से अधिकाँश ऐसे हैं जो अन्न, वनस्पति आदि के उत्पादन में− उनके फलने−फूलने में, रोग फैलाने वाले कीड़ों का सफाया करने में बचत सहायक होते हैं। हमारे लिए आर्थिक दृष्टि से बहुत ही उपयोगी कहे जा सकते हैं। इनमें मधु−मक्खी, लाख का कीड़ा तितली, भौंरे, चींटी, सर्प, मकड़ी, छिपकली आदि की गणना की जा सकती है।

दृष्टिकोण की संकीर्णता से मनुष्य जाति भी अपनी नहीं रहती। देश,धर्म, जाति, वंश आदि के नाम पर बंट कर वह दूसरों के लिए आक्रमणकारी बनता है। चोर, डाक, ठग और दुष्ट मनुष्य होते हुए भी मनुष्य का घात करते हैं। गाँव−मुहल्ले में, घर−परिवार में कटा छनी मची रहती है। मनुष्य का अपनापन संकीर्ण व्यक्तिवाद तक ही सीमित रहता है। माता−पिता भाई−बहिन और पुत्री तक का शोषण किया जाता रहता है।

यदि ससीम से असीम बना जा सके और आत्मविस्तार की उदात्त दृष्टि अपनाई जा सके तो प्रतीत होगा कि यह सुन्दर संसार असंख्य जीव धारियों के लिये बना है। इन्हीं जीवों में से एक अल्प संख्यक प्राणी मनुष्य है। दूसरों के साथ हिल−मिल कर रहने और मिथ्या अहंकार से बचे रहने में ही उसकी वह बुद्धिमत्ता है जिसके कारण उसे बड़ा बनाया गया है।


अन्तर का परिष्कार सफल जीवन का आधार

वाह्य जगत की जानकारियों को अधिक मात्रा में प्राप्त करना उचित भी है और आवश्यक भी। पर सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि हम अपने निज के बारे में अधिकाधिक जानें। अपनी समस्त स्थिति को समझें और अपना हित साधन करने के लिये समुचित ध्यान दें और प्रयत्न करें।

जीवन की प्रगति और अवनति में बाह्य परिस्थितियों का नगण्य स्थान है प्रमुख भूमिका तो आन्तरिक स्थिति की ही होती है। अपना आपा यदि मलीन, निकृष्ट और अस्त−व्यस्त हो तो उसकी प्रतिक्रिया अगणित समस्याएं तथा विपत्तियाँ उत्पन्न करेंगी। मुँह से दुर्गन्ध आती हो तो पास आने वाले हर व्यक्ति को घृणा होती है और वह दूर हट कर बैठता है। जिसके चिन्तन और स्वभाव में दुर्गन्ध आ रही होगी उसका न तो कोई मित्र होगा और न कोई सहयोगी। शत्रुता और निन्दा का वातावरण ही उसे अपने चारों और घिरा हुआ दिखाई पड़ेगा। भीतर की स्थिति यदि सद्भाव सम्पन्न और शालीनता युक्त है तो उसका चुम्बकत्व सज्जनों का सहयोग अपने इर्द−गिर्द जमा कर देगा।

यह दुनिया दर्पण की तरह है, उसमें प्रायः अपना ही प्रतिबिंब दीखता है। जो जैसा होता है उसके मित्र एवं सहयोगी भी उसी स्तर के बढ़ते जाते हैं। परिस्थितियाँ एवं साधन भी उसी तरह के मिलते रहते हैं और व्यक्तित्व तथा वातावरण तदनुकूल ही ढल जाता है, जैसी कि भीतर की स्थिति होती है।

परिस्थितियाँ जैसी होंगी वैसी भली बुरी स्थिति हमें प्राप्त होंगी, यह सोचना गलत है। सही यह है कि जैसी कुछ अपनी भीतरी स्थिति होगी उसी के अनुरूप वाह्य स्थितियाँ बदलती चली जायेंगी। अपने आपको सुधारने का मतलब है अपनी उलझी समस्याओं को सुधारना और अपनी सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त करना। यह कठिन है कि बाहर के व्यक्ति यों को अथवा घटनाओं को अपनी इच्छानुकूल ढाल लें। उसकी अपेक्षा यह सरल है कि अपनी अन्तःस्थिति को बदल कर अभीष्ट वातावरण को अपने आप ही बदल जाने का द्वार खोल दें, बुद्धिमत्ता की यही रीति है।

दूसरों की सही समीक्षा कर सकना कठिन है पर अपने आप को आसानी से जाना जा सकता है। दूसरे को सुधारना कठिन है। पर अपने आप को तो आसानी से सुधार जा सकता है। दूसरों की सहायता बड़ी मात्रा में करना सम्भवतः उतना न बन पड़े जितना कि अपनी सहायता आप की जा सकती है। हम अपने को समझे, अपने को सुधारे और अपनी सेवा करने के लिये आप तत्पर हों तो निश्चित रूप से दूसरों की सेवा के लिये किये जाने वाले पुण्य परमार्थ का प्रथम किन्तु अत्यन्त महत्वपूर्ण कदम होगा। जो पाना चाहते हैं उसके लिये बाहरी दौड़−धूप करने से पहले अपने भीतर उपयुक्त पात्रता उत्पन्न करें व्यक्तित्व को जितना ही प्रखर−परिपक्व और समर्थ बनाया जायगा उतना ही अभीष्ट उपलब्धियों को प्राप्त करना सम्भव ही नहीं सरल भी होगा अपनी विशेषताएं ही बाहरी सहयोग को आकर्षित करती हैं। उपलब्धियों से लाभ उठा सकना भी उसी के लिए सम्भव है जो भीतर से मजबूत है अपनी दुर्बलताओं की अपेक्षा करते रहेंगे तो बाहरी उपलब्धियाँ पकड़ की सीमा से बाहर ही बनी रहेंगी। इसलिए अपना चुम्बकत्व प्रखर बनाने के लिए तत्पर होना चाहिये, अनेकों सफलताएं उसी के आधार पर खिंचती हुई चली आवेंगी।


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संभव असंभव से पूछता है, तुम्हारा निवास स्थान कहाँ है? उत्तर मिला, ‘निर्बल के स्वप्न में’

-रवीन्द्रनाथ टैगोर

अन्धकार प्रकाश की ओर चलता है पर अन्धापन मृत्यु की ओर

−सूक्ति


किसी का मनोबल न गिरायें साहस प्रदान करें

पौधे को खाद पानी से सींचा जाता है और व्यक्तित्व को− प्रोत्साहन से। आत्म गौरव का अनुभव किया जाना चाहिये और कराया जाना चाहिये। गलतियाँ बताना और सुधारना एक बात है और व्यक्तित्व हेय तथा हीन सिद्ध करना दूसरी। प्रायः लोग एक बड़ी भूल करते हैं कि गलती की भर्त्सना करते हुए, निराकरण की अपेक्षा रखते हुए ऐसे कदम उठाते हैं जिन्हें आक्रमण की संज्ञा दी जा सकती है। बच्चों के साथ बड़े कहे जाने वाले− अभिभावक लोग भी प्रायः ऐसी ही भूल जाने या अनजाने में करते रहते हैं जिससे उनके व्यक्तित्व को भारी आघात पहुँचता है।

किसी गलती को मूर्खता कहा जा सकता है और उसे सुधारने पर बुद्धिमान कहलाने का रास्ता बनाया जा सकता है। किन्तु किसी को मूर्ख, मन्दबुद्धि, असभ्य, बेशऊर आदि कहते रहने से अनायास ही बड़ों के उस निर्देश अनुदान को अन्तःचेतना स्वीकार करती चली जाती है और क्रमशः हीनता के परत इतने मजबूत हो जाते हैं कि बच्चा सचमुच ही मन्दबुद्धि, बेशऊर और मूर्ख बन जाता है। व्यक्तित्व की छुरी आत्म मान्यता है यदि अपने आपको अयोग्य, अभागा, अविकसित और पिछड़ा हुआ मान लिया जाय तो फिर समझना चाहिये कि उस मान्यता के इर्द−गिर्द ही जीवन चक्र घूमता रहेगा। दुर्भाग्यग्रस्तता की स्थिति से मरण पर्यन्त पीछा न छूट सकेगा।

लड़कियों और लड़कों की प्रतिभा में अन्तर किसी शारीरिक अथवा मानसिक बनावट के कारण नहीं वरन् उनके साथ होने वाले भेद−भाव पूर्ण व्यवहार के कारण होता है। बेटे को अधिक लाड़ प्यार और अधिक सुविधा साधन मिलते हैं और बेटी को डाट डपट, उपेक्षा, अवज्ञा मिलने से लड़की का अन्तःकरण यह स्वीकार करता चला जाता है कि वस्तुतः वह हेय और हीन है। इस हेय मान्यता के कारण वह आजीवन डरी, सहमी, सकुची और पिछड़ी स्थिति में रहती है। यह कुसंस्कार बहुत प्रयत्न करने पर भी निकलते नहीं− अधिक प्रयत्न किया जाय तो वे उद्धत प्रदर्शन या उच्छृंखल व्यवहार में फूट पड़ते हैं। महिलाओं का अधिक फैशन बनाना, सजधज दिखाना, उनकी आत्म हीनता का उद्धत प्रदर्शन है। कभी−कभी वे अधिक झगड़ालू बच्चों को पीटने वाली, रूठने वाली, आत्म−हत्या की धमकी देती देखी जाती हैं। उनके इस चण्डी रूप से उनका उच्छृंखल व्यवहार ही फूटता है। वस्तुतः यह आत्म हीनता का ही दूसरा रूप है। अत्यधिक संकोची बात−चीत से रो पड़ने वाली न हो तो पग−पग पर उफनने वाली सही, दो परस्पर विरोधी दिशाओं में एक ही प्रवाह फूटता है।

लड़कों के बारे में भी यही बात है। उन्हें आवश्यक लाड़ प्यार देकर या तो अहंमन्यता ग्रसित बना दिया जाता है या फिर मूर्ख− दुष्ट, अभागा, चोर आलसी कहकर उसके अन्तः में यह विश्वास जमा दिया जाता है कि वह हेय स्तर का है। सामान्य मनुष्य जैसा नहीं वरन् उससे गया गुजरा है। प्रभावशाली, बड़े कहलाने वाले लोग अपनी छाप छोटों पर छोड़ते ही रहते हैं। बालक, अपनी हीनता स्वीकार करता चला जाता है और बड़े होने पर या तो कायर, आलसी, चोर, मन्द बुद्धि रह जाता है या फिर दुष्ट दुर्गुणी बनकर उद्धत आप करता हुआ दृष्टिगोचर होता है।

प्रतिभा के विकास में मनुष्य का स्वाभिमानी, आत्मावलम्बी, तथा आत्म विश्वासी होना चाहिये और किसी के भी द्वारा थोपे गये आत्म हीनता के निर्देशों को अस्वीकार कर देना चाहिये। गलती ढूँढ़ने, पूँछने और सुधारने का प्रयत्न जारी रहना चाहिये। वस्तुतः यदि अधिक योग्य बनने का रचनात्मक प्रयास और उत्कर्ष का क्रमिक विकास दो महान् से महान् व्यक्तियों को भी इसी प्रकार अपनाना पड़ा है। प्रगति का अर्थ ही गलती सुधारने में तीव्रता उत्पन्न होना है। यह क्रम पूछने बताने से और भी अधिक सही होता है। पर वह रचनात्मक होना चाहिये।

मनुष्य का, मनुष्यता का मूल्य समझने वाले प्रत्येक विवेकवान् व्यक्ति का दृष्टिकोण यह होना चाहिये कि किसी के व्यक्तित्व पर आक्रमण न करे। बड़ा कुत्ता छोटे कुत्ते की गर्दन दाँतों से फफेड़ सकता है, पर ऐसा व्यवहार मनुष्य को मनुष्य के साथ तो नहीं ही करना चाहिये। व्यक्तित्व को छोटा, घटिया, गया बीता बताना उसके भविष्य को अन्धकारमय बताना उतना बुरा है जिसे उसके साथ किये गये किसी भी दुर्व्यवहार के समतुल्य माना जा सकता है। बलवान दुर्बल को पछाड़ कर उसका कचूमर निकाल सकते हैं, इसी प्रकार प्रभावशाली, शक्ति सम्पन्न व्यक्ति छोटे लोगों को हेय, हीन ठहरा कर उसके मनोबल को तोड़ सकते हैं। यह बुद्धि एवं प्रतिभा का आक्रमणात्मक दुरुपयोग है।

हमें रचनात्मक सुझाव देने चाहिये। यह काम बुरा हुआ इसकी उतनी अधिक व्याख्या करने की जरूरत नहीं है− जितनी कि सुधार के लिये जो किया जा सकता है उसका सुझाव देने की। सुझाव रचनात्मक होते हैं। उनसे दिशा मिलती है और लाभ होता है, किन्तु भर्त्सना से मन छोटा होता है। तिरस्कार के फलस्वरूप द्वेष−दुर्भाव की खाई चौड़ी होने के अतिरिक्त और कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। गलती से होने वाली हानि और सुधार का तरीका अपनाने का लाभ तुलनात्मक रीति से समझाया जा सकता है।

दूसरे के दबाव से, परिस्थितियों से, अपनी आत्मअवज्ञा से आत्महीनता की मनोवैज्ञानिक ग्रन्थि बनती है और उसके कारण व्यक्तित्व बहुत ही दीन और दुर्बल बन जाता है। ऐसे व्यक्ति दब्बू, संकोची, चापलूस हाँ में हाँ मिलाने वाले, असहमति को प्रकट न कर सकने वाले, भीतर ही भीतर खीझे−रूठे रहने वाले होते हैं। उनमें कोई बेगार ले सकता है, ठग सकता है, साहस के अभाव में वे यह तक प्रकट नहीं कर सकते कि उनसे जो कुछ कराया जा रहा है, जो वे कर रहे हैं उसमें उनकी स्वेच्छा नहीं है।

मनोविज्ञानी जे.सी. राबर्टस ने अपनी “दैनिक जीवन में मनोविज्ञान” विषय की पुस्तकों में इस बात पर बहुत जोर दिया है कि हर मनुष्य को अपने भीतर से साहस का उदय करना चाहिये। अपने आप को सब से बड़ा न सही− कम से कम सबसे अयोग्य मानना तो बन्द कर ही देना चाहिये। परमात्मा ने प्रत्येक व्यक्ति को दो लगभग समान स्तर की क्षमता प्रदान की हैं। सबके भीतर प्रगति के बीज छिपे पड़े हैं, और हर कोई अपनी सामर्थ्य को विकसित करने में समर्थ है। अन्तर इतना ही रहता है कि साहसी लोग अपने को पहचानते हैं− अपने ऊपर भरोसा करते हैं और अपनी श्रेष्ठता से साथियों को प्रभावित करके अपना सम्मान, सद्भाव एवं सहयोग सम्पादित करते हैं। इसके विपरीत दब्बू लोग यह छाप छोड़ते हैं कि इनसे किसी को कुछ मिलता तो है नहीं− उल्टे सदा भार और सिर दर्द सिद्ध होते रहेंगे। इसलिये इनसे तो बचना ही ठीक है। हर व्यक्ति एक दूसरे से कुछ चाहता है और इस आशा से मैत्री करता है कि उनके संपर्क में प्रसन्नता और प्रगति की सम्भावना बढ़ेगी। जो इस कसौटी पर खरे उतरते हैं उनके स्नेही, समर्थक और सहयोगी सहज में ही बढ़ते जाते हैं। इसी संचय से मनुष्य उन साधनों से सम्पन्न बनता है जो अन्तरंग बहिरंग प्रगति का पथ प्रशस्त करते हैं।

आत्म हीनता से ग्रसित व्यक्ति का मित्र वह है जो सदा उसके गुणों की चर्चा करें− प्रतिभा को निखारे− प्रशंसा करे और प्रोत्साहन प्रदान करे। साहस की अभिवृद्धि, धन सम्पत्ति, विद्या, रूप−सौंदर्य आदि सभी विभूतियों से बढ़ी−चढ़ी उपलब्धि है। साहस जीतता है, आत्मबल सबसे बड़ा बल है। आत्म विश्वास और हिम्मत के साथ जिस दिशा में भी बढ़ा जायगा, उसी में सफलता मिलती चली जायगी। यदि यह तथ्य समझ लिया जाय तो आत्म हीनता की निकृष्ट दरिद्रता से पीछा छुड़ाना हर किसी का प्रथम कर्त्तव्य प्रतीत होगा।


पिछड़ापन अज्ञान का ही प्रतिफल है।

अज्ञान के सघन अन्धकार से निकल कर मनुष्य ने जितना ज्ञान के क्षेत्र में पदार्पण किया है, उसी अनुपात में उसने भौतिक क्षेत्र में सुख साधन जुटाये हैं। और उसी क्रम से उसे आन्तरिक सन्तोष, शान्ति एवं हर्षोल्लास की प्राप्ति हुई है।

प्रगति वस्तुओं के बाहुल्य के, इन्द्रिय भोगों के अथवा प्रिय परिस्थितियों की उपलब्धि के साथ जुड़ी हुई नहीं है, वरन् ज्ञान के विस्तार से सम्बन्धित है। जिसका ज्ञान जितना सीमित है वह उतना ही पिछड़ा हुआ है। सम्भव है जिसकी ज्ञान सम्पदा बढ़ी−चढ़ी है, उसकी शक्ति और अशक्ति का लेखा जोखा भी ज्ञान सम्पदा की न्यूनाधिकता के साथ जुड़ा हुआ है।

मनुष्य का नैतिक, साँस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर उसकी सुसंस्कृत ज्ञान चेतना के साथ जुड़ा हुआ है। भौतिक शक्तियों के उपार्जन और उपभोग को भी मानसिक विकास से पृथक नहीं रखा जा सकता। आदिकाल से मनुष्य शारीरिक दृष्टि से अब की अपेक्षा अधिक बलिष्ठ रहा होगा, पर उसकी चेतना पशु स्तर से कुछ ही ऊँची होने के कारण सुविकसित लोगों की तुलना में गया गुजरा ही सिद्ध होता रहा है। अतीत के पिछड़ेपन पर जब एक दृष्टि डालते हैं तो प्रतीत होता है कि चिन्तन क्षेत्र में अज्ञान की स्थिति कितनी कष्टकर और कितनी लज्जास्पद परिस्थितियों में मनुष्य को डाले रही हैं।

अमेरिकन म्यूजियम आफ नेचुरल हिस्ट्री के पक्षी विभाग एसोसियेट क्यूरेटर द्वारा प्रकाशित विवरणों से पता चलता है कि न्यूगिरी के आदिम और आदिवासी किस तरह अपने में जा भटकने वाले लोगों को भुन−भुनकर खा जाते थे। उस क्षेत्र में पक्षियों की खोज में एक खोजी दल जा पहुँचा। पापुआन क्षेत्र के मियाओं बीले के बड़े दिगमी क्रूर कर्मों के लिये प्रसिद्ध है। इस क्षेत्र में किसी विशेष सुरक्षा व्यवस्था के बिना किसी को जाने देने की इजाजत नहीं है, पर यह खोजी दल किसी प्रकार उस क्षेत्र में जा ही पहुँचा और उसके सभी सदस्यों का रोमाँचकारी वध हो गया।

पादरी आइवोस्केफर उस क्षेत्र में 45 वर्ष से इन नर भक्षियों के बीच प्रभु ईसा का सन्देश सुनाने के लिये रहते थे। उन्होंने इन नर भक्षियों को अपने प्रेम एवं सेवा कार्यों से प्रभावित कर रखा था। शिक्षा चिकित्सा आदि उपायों में उन्होंने इस क्षेत्र के निवासियों का मन जीत लिया था। उन्हें वे पवित्र आत्मा समझते थे और किसी प्रकार की हानि पहुँचाने के स्थान पर सम्मान प्रदान करते थे।

आरम्भ में उस निष्ठावान, धर्मात्मा किन्तु क्रिया कुशल पादरी ने बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ इन लोगों के बीच अपना स्थान बनाया था। स्केफर ने अपनी पुस्तिका में लिखा है कि − पहली बार जब वे इस इलाके में अपने एक साथी के साथ गये तो उन्हें नर भक्षियों के द्वारा घेर लिया गया। उन देखने वालों ने शोर मचाकर 40-50 योद्धाओं को बुला लिया− वे भाले ले लेकर आ गये और हम लोगों को चारों ओर से घेरे में लेकर हर्ष नृत्य करने लगे। उन्हें दो मनुष्य का− उसमें भी गोरों को ताजा माँस खाने को मिलेगा। इस कार्य का श्रेय वे लेंगे इस खुशी में उन्मत्तों जैसा उछल कूद कर रहे थे। घेरे में आये शिकार अब भाग तो सकते नहीं थे।

इस सम्बन्ध में वे निश्चित होकर देवता के बलिदान के उद्देश्य से गीत गा रहे थे और हर्ष मना रहे थे।

पादरी ने एक युक्ति से काम लिया। उसने थैले से एक दर्पण निकाला और उसे आदिवासियों के सरदार के सामने कर दिया। उसने जैसे ही अपनी आकृति देखी वह डर गया। दर्पण उन लोगों के लिये सर्वथा नई वस्तु थी। एक−एक करके पादरी ने दर्पण सभी को दिखाया। वे सभी बहुत डरे और समझने लगे कि यह आदमी कोई जादूगर है इसे मारने से कोई विपत्ति आ सकती है। अस्तु वे अपने−अपने भाले फेंक कर उसके इर्द−गिर्द आशीर्वाद पाने के लिये सिर झुकाकर बैठ गये। पादरी ने एक और दूसरा चमत्कार प्रकट किया। उसके पोपले मुँह में दोनों जबड़े नकली दाँतों के लगे थे। उन बैठे हुए दर्शकों को सम्बोधित कर अब उसने एक नया जादू दिखाया। मुँह में से दाँतों की बत्तीसी निकाली, दाँत उन्हें दिखाये, पोपला मुँह दिखाया और फिर दाँतों को मुँह में ठूँस कर पहले जैसा मुँह बना लिया। आदिवासी इस चमत्कार को देखकर दंग रह गये और उन्होंने पूरा भरोसा कर लिया कि यह कोई जादुई पुरुष है। इतनी मान्यता बना देने से पादरी का काम बहुत सरल हो गया और निश्चिन्तता पूर्वक अपना काम उस क्षेत्र में करने लगे। काम चलाऊ टूटी−फूटी आदिवासी भाषा तो उन्होंने पहले ही सीख ली थी।

पादरी ने लिखा है कि न्यूगिनी के यह आदिवासी योद्धा, निर्दयी, क्रूर, कष्ट सहिष्णु और भारी अनुदार होते हैं। एक कबीले का अधिकार जिस क्षेत्र पर है, उसमें घुसकर यदि किसी दूसरे कबीले का कोई सदस्य भूल से या जान बूझकर कोई पेड़ काटले तो इतने से ही वे लोग आग बबूला हो जाते और रात को छिप कर उस पर हमला बोल देते। एक बार के हमले का जिक्र करते हुए उन्होंने लिखा है कि काँगना मल कबीले के लोगों ने अपने पड़ौसी कारारन कबीले की झोंपड़ियों पर चढ़ाई करके सोते हुए लोगों को पकड़ लिया और उनमें तीस के सिर काट कर ले आये। इस विजयोपहार में से एक सिर भेंट करने के लिये वे पादरी के पास भी आये थे।

कबीले का मुखिया तथा योद्धा बनने के लिए वे लोग पूरी तैयारी करते हैं। प्रायः 16 वर्ष की आयु में उसे इसकी परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिये एक जीवित मनुष्य का सिर काटना पड़ता है। अक्सर इस कार्य के लिये अपने ही कबीले की या किसी अन्य कबीले से खरीदी हुई औरत प्रयुक्त की जाती हैं। थोड़े पालतू पशु, चमड़ा, पक्षियों के पंख आदि देकर औरतें आसानी से खरीदी भी जा सकती है। वध उत्सव आगामी महिला को देव गृह में ले जाया जाता है, जहाँ वह नव योद्धा भाले, छेद−छेद कर उस स्त्री का काम तमाम कर देता है और फिर उसका सिर काट कर सरदार को भेंट करता है। इतना कर लेने पर उसकी गणना कबीले के योद्धा के रूप में होने लगती है। इन्हीं में से पीछे कोई मुखिया भी चुन लिया जाता है।

एक बार तो पादरी के यहाँ ठहरे हुए गोरों को धर लिया और प्रस्ताव किया कि दल की एक गोरी महिला उन्हें वध करने के लिये दे दी जाय इसके बदले बीस आदिवासी युवतियाँ उन्हें दे देंगे। इस धर्म संकट को भी बड़ी चतुरता पूर्वक ही टाला जा सका।

अतीत में अज्ञान ही पिछड़ी हुई परिस्थितियों से मनुष्य में रहा है। आज जिस स्थिति पर हम थोड़ा गर्व सन्तोष कर सकते हैं, वह ज्ञान साधन का ही प्रतिफल है। भविष्य में यदि अधिक सुख−शान्ति की, आनन्द उल्लास की परिस्थितियाँ अभीष्ट हों तो उसके लिये सद्ज्ञान सम्पदा की दिशा में हमारे प्रयास अधिकाधिक तीव्र होने चाहिये। जिन दिनों भारत का स्वर्णिम काल था उन दिनों यहाँ की ज्ञान सम्पदा ही मूर्धन्य स्तर पर पहुँची हुई थी। संसार को स्वर्ग और मनुष्य को देवोपम बताने के लिये, वर्तमान दुर्गति के दल−दल से निकलने के लिये ज्ञान साधना में अनवरत रूप से संलग्न रहने की आवश्यकता है। भूत और वर्तमान की तुलना करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि ज्ञान के बिना उज्ज्वल भविष्य का और कोई मार्ग नहीं।


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प्रकृति ने शरीर को इस प्रकार बनाया है कि उसे सावधानी बरतने पर सुदृढ़ सुरक्षित रखा जा सकता है। बीमार होने पर अपने ही प्रयत्न प्रायश्चित से उसे सुधारा जा सकता है इस राज मार्ग को छोड़ कर दूसरों का सहारा तकते और सहायता की ओर दौड़ते हैं और उन्हें निराश ही रहना पड़ता है। क्या शरीर, क्या मन, क्या जीवन। सर्वत्र स्वावलम्बन की ही प्रतिष्ठा है, पराये अनुदान पर कोई कब तक जीवित रह सकता है।


जीवनी शक्ति का अपव्यय− तनाव उत्पन्न करेगा अन्यथा थका देगा

सिर में दर्द, चक्कर आना, जी घबराना, अनिद्रा, बेचैनी, उत्तेजना जैसी शिकायतें तनाव के लक्षण हैं। लगता है भीतरी मस्तिष्क गरम हो रहा है और सिर की नसें चटक रहीं है। निद्रा, शान्ति और विश्राम के लिये मानसिक शिथिलता आवश्यक है, पर जब सिर तना हुआ हो तो थकान दूर करने वाली नींद कहाँ से आये? काम के दबाव से अथवा चिन्ताओं से उत्पन्न हुआ तनाव विश्राम से ही दूर हो सकता है। तनाव विश्राम की स्थिति उत्पन्न होने नहीं देता ऐसी दशा में स्थिति क्रमशः बिगड़ती ही जाती है।

मनः शास्त्रवेत्ता बताते हैं कि विचार परक आवेश और शरीर की उपार्जित शक्ति से अधिक का खर्च होना महत्वपूर्ण ग्रन्थि एड्रीनल पर दबाव डालता है फलतः एड्रीनेलिन नामक स्राव अनावश्यक मात्रा में उत्पन्न होकर शरीर में ऐसे आवेश उत्पन्न करता है जो विश्राम की स्थिति बनने ही नहीं देता।

पेट का अल्सर, आँतों की सूजन, बढ़ा हुआ रक्त चाप, धड़कना बढ़ना, मधुमेह जैसी बीमारियों के मूल में नाड़ियों का तनाव ही विशेष कारण होता है। इससे लकवा मार जाने और हृदय का दौरा पड़ने जैसे संकट खड़े हो सकते हैं।

बड़े शहरों के निवासी देहात में रहने वालों की अपेक्षा अधिक तनावग्रस्त पाये जाते हैं। समक्ष भोजन, नशेबाजी, शरीर में पोषक तत्वों का कम उत्पादन, अधिक श्रम, अत्यधिक मस्तिष्कीय काम, चिन्ताओं और विक्षोभों में डूबा हुआ मन, इन्द्रिय संयम का अतिक्रमण इन दिनों तनावपूर्ण मनःस्थिति उत्पन्न करने का प्रधान कारण है। संक्षिप्त में जीवनी शक्ति का उत्पादन कम और व्यय अधिक होने के शारीरिक और मानसिक कारण मिलकर मनुष्य को तनाव की स्थिति में धकेल देते हैं।

सितार के तारों को अधिक कड़ा कसते जायं तो वे टूट जायेंगे। मनःस्थिति पर अधिक तनाव डाला जाय तो उसकी प्रतिक्रिया स्वास्थ्य सन्तुलन को तोड़−मरोड़कर रख देगी।

न शरीर पर अधिक बोझ डालें और न मन पर अधिक दबाव पड़ने दें। अत्यधिक श्रम बुरा है। हाथ पैरों को− पेट को− दिमाग को यदि सामर्थ्य से अधिक श्रम करना पड़ेगा तो टूट−फूट हो जायगी। इसका अर्थ यह नहीं कि इसी बहाने आलस्य और प्रमाद अपनाकर आवश्यक श्रमशीलता से जी चुराने का बहाना ढूँढ़ लिया जाय। यहाँ निषेध ‘अत्यधिक’ और ‘असीम’ का किया जा रहा है। हानि उसी से हो सकती है। सहज श्रम तो शरीर और मन को बलिष्ठ बनाता है और विविध−विधि सफलताएं सामने लाकर खड़ी करता है।

जिस प्रकार लगातार अत्यधिक कठोर श्रम करने से माँस पेशियाँ टूटने लगती हैं और नाड़ियाँ दर्द करने लगती हैं उसी प्रकार अवाँछनीय मानसिक श्रम से मस्तिष्कीय समर्थता का कचूमर निकल जाता है। पढ़ने−लिखने सोचने विचारने में भी शक्ति एवं सीमा का ध्यान रखना चाहिए, पर सबसे बड़ी बात यह ध्यान में रखनी चाहिए कि उत्तेजनाएं एवं उद्विग्नताएं सबसे अधिक मानसिक शक्तियाँ नष्ट करती हैं। ईर्ष्या, भय, द्वेष, क्रोध, कुढ़न, दुश्चिन्ता, आशंका, निराशा, कुकल्पना आदि ऐसे उद्वेग हैं जो एक घण्टे में उतनी मानसिक शक्ति खा जाते हैं जितनी कि आठ घण्टे पढ़ने−लिखने एवं सोचने−विचारने में खर्च होती है। स्वार्थपरता, लिप्सा, तृष्णा, विलासिता, कृपणता, अनुदारता यों उत्तेजनात्मक तो नहीं है, पर उनके कारण मनःक्षेत्र एक बहुत छोटे दायरे में सिकुड़ कर रहा जाता है और आँतें तथा आमाशय के सिकुड़ जाने पर जिस प्रकार पेट विकार ग्रस्त हो जाता है उसी प्रकार लिप्सा ग्रस्त मस्तिष्क भी लगभग आवेश उत्पन्न करने वाले मनोविकारों से उत्पन्न विकृतियों की तरह रुग्ण रहने लगता है।

हँसी−खुशी का सहज सामान्य का सहज सामान्य जीवन क्रम छोड़कर जटिलताएं उत्पन्न करने वाली मनःस्थिति में जा फँसना मानसिक तनाव उत्पन्न करने वाली− पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा− अनचाहा किन्तु दूरदर्शितापूर्ण प्रयास है। इस स्थिति में शरीर में मन्द विषों की उत्पत्ति आरम्भ हो जाती है। माँस पेशियों और नाड़ियों को सिकोड़ने वाला एक विषाक्त पदार्थ ‘एसिटिल कोलिन’ उन लोगों के शरीर में बनता है जो मानसिक उत्तेजनाओं से ग्रसित रहते हैं। यह विष शरीर के अन्य रासायनिक पदार्थों में सम्मिलित होकर लैक्टिक अम्ल बनाने लगता है। इससे शरीर में अकड़न, शिथिलता, रुक्षता जैसी शिकायतें बढ़ती हैं और सामान्य जीवन यात्रा में कई प्रकार की कठिनाईयाँ उत्पन्न होती हैं। इन्हीं परिस्थितियों में ‘तनाव’ भी बढ़ता है।

यों खाद्य पदार्थों में कैल्शियम की कमी होना भी पेशियों में तनाव, अनिद्रा, उत्तेजना, दिल एवं दिमाग की कमजोरी का एक कारण है। पर यदि शरीर ठीक है तो सामान्य शाक−भाजी एवं रोटी दाल के पच जाने पर भी उसकी कमी पूरी हो जाती है। भोजन स्तर में थोड़ा सुधार करने से भी काम चल जाता है, पर मानसिक दबाव से जो क्षति उत्पन्न होती है उसकी पूर्ति सहज ही नहीं हो सकती। दूध, दही, गाजर, मूली, आँवला जैसे कैल्शियम प्रधान खाद्य पदार्थ लेते रहने पर भी− इस अभाव की पूर्ति के लिये बनी औषधियाँ लेते रहने पर भी शरीर दुबला ही रहता है और थकान तथा उत्तेजना बनी रहती है। अशान्त मस्तिष्क सारे शरीर को चकमका कर रख देता है।

हर समय अपनी ही वर्तमान परेशानियों की बात सोचते रहना− भूतकाल की सफलताएं एवं दुखद घड़ियों का स्मरण करते रहना− भविष्य में कभी आ सकने वाली कष्टकर सम्भावनाओं के कल्पना चित्र गढ़ते रहना एक प्रकार से जान−बूझकर दुखी रहने की चेष्टा है। इस चिन्तन से क्या लाभ? जो कठिनाई आज है उसके सम्बन्ध में इतना सोचना ही पर्याप्त है कि उसे हटाने या घटाने के लिये इस समय अपने हाथ में क्या उपाय है और इस प्रयोजन के लिए निकट भविष्य में क्या साधन जुटाये जा सकते हैं।

लोगों का साथ निभाने की कला हमें अपनी चाहिए। आदमी मिट्टी के खिलौने नहीं है जो चाहे जब चाहे जहाँ हटाये बदले जा सकें। कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके साथ हमें इच्छा या अनिच्छा से रहना ही पड़ेगा। पड़ौस में जो लोग बसे हुए हैं उनका घर उजाड़ा नहीं जा सकता और न अपने खेत खलिहान का परित्याग कर किसी दूर देश में घोंसला रखा जा सकता है। पड़ौसी जैसे भी हैं आखिर रहना तो उन्हीं के साथ पड़ेगा। आवश्यक नहीं कि वे समझाने−बुझाने या अनुनय−विनय करने पर ही हमारी मर्जी के बन जायं। यहीं बात अपने कुटुम्बियों के सम्बन्ध में भी है। बूढ़े माता−पिता, जवान भाई−भावज, सयाने लड़की−लड़के, धर्म−पत्नी इनकी आदतें अपनी मर्जी के अनुरूप ही हों यह आवश्यक नहीं। जिस प्रकार हर मनुष्य की शकल में अन्तर होता है उसी प्रकार उसका व्यक्तित्व भी कितनी भली−बुरी विशेषताओं से जुड़ा होता है। कुछ इनमें से बदलती रहती है। अच्छे बुरे बन जाते हैं और बुरे अच्छे। अरुचि की स्थिति उत्पन्न होते ही उन्हें हटा दिया जाय− खुद हटा जायं या अपनी मर्जी का सुधार हो जाय यह तीनों ही बातें कठिन हैं। सरल यही है कि हमें जिन लोगों के साथ रहना पड़े, उनके साथ इस प्रकार निर्वाह करें कि बिना आये दिन का टकराव उत्पन्न किये समय गुजरता रहे और यथा सम्भव सहयोग की सम्भावनाएं बढ़ती रहें। ऐसा सहिष्णुता की नीति अपनाने से ही हो सकता है। हर किसी से लड़ते रहना या मरने मारने पर उतारू होना भी लाभदायक विकल्प नहीं है।

घुटन को डिब्बी में बन्द करके तकिये के नीचे दबाये रहना ठीक नहीं। एक बात सामने आई उस विचार किया और सिनेमा की फिल्म की तरह उसे दिमाग के पर्दे से हटा दिया। जब हम साँस को फेफड़े में नहीं रोके रह सकते, तो किसी विक्षोभ हो की मन में जमाकर, दबाकर क्यों बैठे रहें। नई साँस लेने के लिये पुरानी साँस बाहर निकलना आवश्यक है। भविष्य का निर्माण करने वाले विचारों को आमन्त्रित करने के लिए यह आवश्यक है कि जो बीत चुका उसकी कष्टकारक स्मृतियों के विस्मरण के गड्ढे में धकेल कर जी हलका करें।

खाली बैठे सिर अधिक गरम होता है। दुश्चिन्ताओं, और उद्वेगों से पिण्ड छुड़ाने का एक तरीका यह भी है कि ठालीपन दूर कीजिए और तुरन्त किसी काम में लग जाइये। बहुत से काम ऐसे हैं जो मस्तिष्क में गड़बड़ रहते हुए भी किये जा सकते हैं। झाड़ू लगाना, कपड़े धोना, चक्की पीसना जैसे काम अभ्यस्त हाथ ऐसा ही करते रह सकते हैं। तैरना, खेलना, किसी काम से अन्यत्र चले जाना जैसे छोटे परिवर्तन उत्तेजित मनः स्थिति को हलकी कर सकते।

मधुर मुस्कान चेहरे पर बनाये रहना-प्रकृति प्रदत्त सुन्दरता को अनेक गुना बड़ा लेने का सरल उपाय है। दार्शनिकों, वैज्ञानिकों, ध्यान मग्न योगियों या अहंकारियों जैसी गम्भीरता बनाये रहना अपने निज के लिए बहुत बोझिल सिद्ध होती है। दूसरे लोग इस प्रकार की प्रकृति वालों से बचने की कोशिश करते हैं। अत्यन्त आवश्यक काम होने पर ही नपी तुली आधी अधूरी बात करते हैं पास बैठने से कतराते हैं। ऐसे लोगों को अक्सर अधिक समय एकाकी व्यतीत करना पड़ता है। जिन्हें मजबूरी में पास रहना पड़े वे भी उन क्षणों को विपत्ति की घड़ी मानते हुए ज्यों-त्यों काटते हैं। ऐसे व्यक्ति न स्वयं हँसते हैं और न दूसरों को हँसता देखने से जो आनन्द मिलता है उसका अनुभव कर पाते हैं।

दूसरों पर विश्वास न करें-अपनी मर्जी पर किसी को अकारण अविश्वस्त मान बैठना और उसके सम्बन्ध में तरह-तरह की अनुपयुक्त कल्पनाएँ गढ़ना भी न्याय संगत कहाँ है? मित्र और शत्रु के बीच भी एक रेखा रहनी चाहिये। जिनसे हमारे गहरे सम्बन्ध नहीं हैं उन्हें मध्यवर्ती क्यों न मानें। उनके भले या बुरे होने के सम्बन्ध में आवश्यक प्रमाण न मिलने तक मान्यता बनाने की जल्दी क्यों करें?

कम बोलना और उपयोगी वार्तालाप ही करना तो उचित है, पर मुँह पर ताला लगाये डरपोक संकोची अथवा बुद्धू की तरह गुम-सुम बैठे रहना बुरा है। अपराधी की तरह डरते, काँपते, झिझकते रहने से अपनी प्रतिभा दबती है मुँह के रास्ते घुटन को निकाल बाहर करने का अवसर हाथ से चला जाता है। अपनी बात कहना दूसरे की सुनना यह सामाजिक गुण है। इससे वह घुटन नहीं जमती जो कहने योग्य बात को भी मुँह से न निकालने के कारण सड़ी गन्दगी की तरह जमा होती चली जाती है। वाणी में शिष्टता, नम्रता, मधुरता का समावेश होना एक बात है और बड़ों के सामने मुँह न खोलने की कमजोरी दूसरी। दोनों को एक नहीं मान बैठना चाहिए और मुँह पर ताला डाले रहने को विनम्रता या सज्जनता का चिन्ह नहीं मानना चाहिए। हँसते हुए और मन की बात कहते हुए बच्चे कब किस को अशिष्ट या उद्दण्ड लगते हैं। अपनी कहना और दूसरे की सुनना हर आयु और हर स्तर के व्यक्ति के साथ सरल एवं सुखद होना चाहिए।

तनाव की उत्तेजना जब स्नायु संस्थान को अति दुर्बल कर देती है तो फिर मनुष्य अपने आपको थका हुआ, अशक्त दुर्बल अनुभव करता है, उसे लगता है कि शक्ति भण्डार चुक गया और कुछ कर सकने लायक सामर्थ्य बची ही नहीं। न कुछ करते बनता है न सोचते। नस-नस में आलस्य छाया रहता है। काम आरम्भ करने को जी ही नहीं करता-किया भी जाय तो पूरा होने से पहले ही छूट जाता है। न शरीर-बल दिखाई पड़ता है न मनोबल लगता है शरीर एक खोखले ढोल की तरह निर्जीव हो गया है।

आवश्यक नहीं कि ऐसी स्थिति तनाव के बाद ही आवे। उत्तेजना उत्पन्न होने के स्थान पर धीरे से थकान भी आकर सवार हो सकती है। थकान दूर करने क लिए बहुत समय बिना कम पड़े रहने या कम काम करने से भी कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। शरीर जो गँवा चुका है, मन जिस कदर अशक्त हो चुका है उसकी क्षति पूर्ति किये बिना केवल काम न करना भी बेकार ही चला जाता है।

शरीर शास्त्री डा. ब्रूहा के अनुसार थकान का ही दूसरा नाम जराजीर्ण स्थिति अथवा वृद्धावस्था है। शरीर संचालन एवं आजीविका उत्पादन उत्तरदायित्वों का निर्वाह जैसे कार्यों में जितनी शक्ति खर्च होती है, यदि उतनी ही उपलब्ध होती रहे तो स्फूर्ति बनी रहेगी और शक्ति भण्डार क्षति ग्रस्त न होने से मृत्यु का दिन दूर रखा जा सकेगा। शरीर यात्रा के लिये जितना शक्ति नितान्त आवश्यक है उतनी ही खर्च हो और जो खर्च होना अनिवार्य है उसका उपार्जन ठीक तरह होता रह तो वह सन्तुलन बना रहेगा। इसके सहारे देर तक कार्य क्षमता बनी रह सकती है और थकते-थकते जराजीर्ण होकर जीवन दीपक बुझ जाने की अवधि लम्बी हो सकती है।

पोषण कैसे प्रदान किया जाय आमतौर से इसी प्रश्न पर विचार किया जाता है। जबकि अधिक ध्यान इस बात पर दिया जाना चाहिए कि क्षति को किस प्रकार रोका जाय। 30 वर्ष की आयु के व्यक्ति ने फेफड़ों का जितना आकार होता है 80 तक पहुँचते-पहुँचते उसका एक तिहाई भाग घिसकर समाप्त हो जाता है। पसलियों के कठोर हो जाने से साँस को पूरी मात्रा में ग्रहण कर सकना उनके लिये कठिन हो जाता है। यदि पसलियाँ उतनी कठोर न होतीं और जो हिस्सा गलकर समाप्त हो चुका है वह बचा लिया गया होता तो श्वाँस-प्रश्वास क्रिया ठीक चलती रहती। रक्त शुद्धि यथावत होती रहने से विषाक्तता की वह मात्रा न बढ़ती जिसने वृद्धावस्था की जराजीर्ण स्थिति और साथ ही कई प्रकार की रुग्णता उत्पन्न कर दी।

जीवन की सुरक्षा एवं स्थिरता में आहार का अत्यधिक महत्व है। यदि सुपाच्य, सुसन्तुलित और सही आहार उपयुक्त मात्रा में उपयुक्त रीति से किया जाय तो उसके द्वारा अभीष्ट पोषण प्राप्त हो सकता है। अन्यथा वह शक्ति देने की अपेक्षा प्रकृति प्रदत्त शक्ति भण्डार को नष्ट करने का ही कारण बनता रहता है। स्वाभाविक और सही भोजन के अभाव में शरीर दुर्बल होता जाता है और उसे जर्जरता जराजीर्ण स्थिति आकर घेर लेती है यह अनिवार्य विपत्ति नहीं है इससे थोड़ी सतर्कता बरतने पर सहज ही बचा जा सकता है।

तनाव एवं थकान को मिटाने के लिए सम्पूर्ण शरीर को ढीला करके पड़े रहना कारगर किन्तु सामयिक उपाय है। इसे शवासन, शिथिलासन या शिथिलीकरण मुद्रा करते हैं। आराम कुर्सी पर, पलंग पर शरीर को पूरी तरह ढीला करके चित्त पड़े रहना चाहिए। आँखें बन्द रखनी चाहिए। नीचे नीला जल नीला आसमान भर है कहीं कोई व्यक्ति या पदार्थ नहीं रहा प्रलय काल जैसा शून्य शान्ति स्थिति सर्वत्र छाई हुई है और उस वातावरण में हम अकेले जल पर पड़े कमल पत्र पर पड़े-सोते तैरते चले जा रहे हैं। यह कल्पना जितनी गहरी होगी उतना ही शिथिलासन अधिक कारगर होगा। शरीर के प्रत्येक अंग को पूरी छुट्टी देनी चाहिए। उसे तनिक भी कार्य नहीं करना पड़ रहा है, प्रत्येक माँस पेशी शिथिल एवं निष्क्रिय पड़ी है। गहरी सुषुप्ति अवस्था में जो स्थिति होती है वह बन गई है। मन में कोई विचार नहीं उठ रहा है वह योगनिद्रा की शून्यावस्था में प्रवेश करके परम शांति एवं गहन विश्रान्ति का अनुभव कर रहा है। मन में न कोई कामना न कोई चिन्ता। सर्वथा निश्चिन्त, निर्द्वंद्व एवं निर्भय अपनी स्थिति रह रही है। ऐसी कल्पनाएँ मन में यथार्थता के रूप में हृदयंगम की जायं।

यह स्थिति आरम्भ में अटपटी लगती है आधी अधूरी और थोड़ी देर के लिए ही बन पड़ती है। तनाव इसमें बार-बार विक्षेप डालता है। किन्तु अभ्यास को जारी रखा जाय। नित्य नियमित रूप से 15 मिनट उसे नियत समय पर करते रहा जाय तो एक दो महीने में इसकी आदत पड़ जाती है और आधा घण्टा तक उस स्थिति में भली प्रकार पड़े रह सकना सम्भव हो जाता है। अभ्यास की दृष्टि से प्रातःकाल अथवा रात्रि को सोते समय इसका प्रयोग करना चाहिए किन्तु पीछे जब भी तनाव अनुभव हो तभी आधा घण्टे का समय निकालकर शिथिलीकरण मुद्रा की स्थिति में पड़े रहना चाहिए। इसका लाभ तत्काल दिखाई पड़ेगा। बेचैनी एवं थकान दूर हुई प्रतीत होगी।

तनाव एवं थकान की स्थिति उत्पन्न होने देने से पूर्व ही अपना आहार-विहार एवं मानसिक स्तर ऐसा सुसंयत रखना चाहिए जिससे इस प्रकार की विपत्तियों का सामना ही न करना पड़े। शक्ति के उत्पादन और व्यय का संतुलन मिलाते हुए जीवनचर्या बनाई जाय-हँसती-हँसाती आदतें सँजोई जायं अनावश्यक चिन्ताओं का भार वहन किया जाय, तो तनाव से भी बचा जा सकता है और थकान से भी।


चिर यौवन और दीर्घ जीवन की अतृप्त आकाँक्षा

चिर-यौवन और दीर्घजीवन की मानवी आकाँक्षा स्वाभाविक है। हर कोई यह चाहता है कि उसकी शक्ति सम्पन्न एवं सक्रिय युवावस्था चिरकाल तक बनी रहे और इस सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन का आनन्द लम्बे समय तक प्राप्त होता रहे। इसके लिए सहज सरल उपाय आहार−विहार का संयम और मानसिक सन्तुलन ही समझा जाना चाहिए किन्तु वैज्ञानिक उत्साह उसे दूसरी तरह हल करने के लिए प्रयत्नशील हैं। संयम न बरतना पड़े-आत्म निग्रह का-व्यवस्था बंधनों में बंधने का झंझट न रहे और चिर-यौवन तथा दीर्घजीवन का आनन्द मिलता रहे उसके लिए कई देशों में कई प्रकार के वैज्ञानिक प्रयत्न चल रहे हैं।

इस दिशा में अधिक उत्साहवर्धन समाचार अमेरिका के हार्वर्ड विश्वविद्यालय के जीव-विज्ञान विभाग के अध्यक्ष प्रो.केरोल विलियम के शोध निष्कर्ष का है। सन् 1958 में उनने एक नये हारमोन की खोज की थी और उसका नाम तारुण्य हारमोन रखा था। यद्यपि वह मनुष्यों के लिए ठीक तरह प्रयुक्त हो सकने की स्थिति में परिष्कृत नहीं हो पाया है तो भी आधार ढूंढ़ जाने की बीत विश्वासपूर्वक स्वीकार करली गई है।

इससे पूर्व सन् 1926 में रूसी जीव-विज्ञानी सार्वे बोरोनोव बन्दरों की यौन ग्रन्थियाँ मनुष्य शरीर में लगा कर यौवन वापिस लौटान में अधिक सफलता प्राप्त कर चुके हैं। स्टाक होम की अन्तर्राष्ट्रीय शरीर विज्ञान काँग्रेस के अधिवेशन में जब उन्होंने अपना प्रतिपादन व्यक्त किया था तब उपस्थित सदस्यों में से किसी को भी इस पर विश्वास नहीं हुआ। किन्तु जब प्रयोग सामने आये तो यह स्वीकार करना पड़ा कि आज की आँशिक सफलता किसी दिन अभीष्ट परिणाम उपस्थित कर सकती है और मनुष्य चिर-यौवन का आनन्द ले सकता है।

सन् 1930 में एक और रूसी वैज्ञानिक अलेक्जेण्डर वोगोमोल्वेट्स ने एक नया यौवन रक्षक रसायन खोज निकाला था। इसका नाम उन्होंने ए.सी.एस. सीरम रखा था। यह हारमोनों का ही एक सम्मिश्रण था। प्रयोगों का आधार पर वे यह दावा करने लगे थे कि अगले दिनों मनुष्य की आयु को डेढ़ सौ वर्षों की अवधि तक बढ़ाया जा सकेगा।

डा. विलियम्स इस प्रयास में सन् 1958 में निरत हुए। यों पूर्ण सफलता तो उन्हें आजीवन नहीं मिली, पर जितना कुछ पता वे लगा सके वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं था। उनके शोधकार्य के उपलक्ष्य में अमेरिकन एकेडेमी आफ आर्टस एण्ड सान्सेज ने उन्हें पुरुष्कृत किया। ‘गगन हुम’ की फैलोशिप उन्हें मिली तथा इंग्लैंड की विगल्स वर्थ लैबोरेटरी के साधन सम्पन्न उपकरणों की सहायता से अधिक गहरी खोजें कर सकने का अवसर उन्हें प्राप्त हुआ। रोडिनियस कीट में तो तारुण्य द्रव उन्हें प्राप्त न हो सका किन्तु रेशम के कीड़े में वह उन्हें मिल गया। अपने जीवन काम में ही वे इस सीमा तक सफल हो गये थे कि एक रेशम के कीड़े के हारमोन दूसरे को लगाकर उसका बुढ़ापा रोक दें और जवानी की निर्धारित अवधि की अपेक्षा दूने समय तक तरुण बना रहने दें।

डा. विलियम्स के बाद कार्नेल विश्वविद्यालय के डा.हार्ड इनेडेरेमेन ने वह प्रयोग गाय, बैलों के शरीर पर किया जिसमें उत्साहवर्धक सफलता मिली। एक मनुष्य के शरीर में से तारुण्य हारमोन निकाल कर दूसरे के शरीर में लगाने से भी वही परिणाम हो सकता था किन्तु वह अनैतिक होता। पुराणों में राजा ययाति का वर्णन है जिसमें बेटे की जवानी लेकर पिता तरुण बना था। वह कार्य अभी भी अनैतिक माना जाता है। यह प्रचलन मनुष्यों में चल पड़े तो उसे दूसरी नर बलि प्रथा कहा जाता। ऐसी दशा में मनुष्यों पर उस प्रकार के प्रयोग नहीं हुए पर इतनी सफलता अवश्य मिल गई कि प्रसव के समय जच्चा बच्चा को जोड़े रहने वाला जो नाल कटता है उसमें कई महत्वपूर्ण रसायनों की सत्ता रहती है और उसे निचोड़कर किसी शरीर में पहुँचाने में तरुणाई को देर तक बनाये रह सकना सम्भव हो सकता है।

इन प्रयत्नों को देखते हुए मनुष्य के इस साहस की प्रशंसा ही करनी पड़ेगी कि मौत बुढ़ापे से बराबर परास्त होते रहने पर भी उसने पूरी तरह हार स्वीकार नहीं की है और इस आशा का परित्याग नहीं किया है कि कभी कहीं से अमृत पाकर अमर भी बन सकेगा। दीर्घजीवन से भी तो उसे सन्तोष नहीं। इस प्रचंड जिजीविषा के पीछे छिपी हुई अभिलाषा और चेष्टा को सराहा ही जा सकता है।

इन प्रयत्नों के साथ-साथ यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि अधिक दिन जीना या अधिक सशक्त बने रहने मात्र से मनुष्य की सुख-शान्ति में कोई योगदान नहीं मिलता। महत्ता तो जीवन घड़ियों के सदुपयोग की है। बहुत समय तक धुंआ देकर सुलगती हुई आग की अपेक्षा कुछ ही समय प्रज्ज्वलित होकर जलने वाली अग्नि का गौरव कर्तृत्व किसी भी प्रकार कम नहीं। महत्व समय की लम्बाई का नहीं क्षणों के सदुपयोग की उत्कृष्टता का है। यदि निरर्थक और निष्कृष्ट जीवन जिया गया तो उस भार को ढोने से क्या लाभ मिलेगा? कितने ही पेड़ और प्राणी दीर्घजीवी होते हैं, पर इससे उनकी महत्ता कुछ बढ़ा थोड़े ही जाती है।

दीर्घजीवी प्राणियों में कछुआ सबसे अधिक भाग्यवान है। उसे भगवान ने 350 वर्ष की उम्र दी है। इससे कुछ ही कम मगरमच्छ है वह भी 300 वर्ष जी लेता है। ह्वेल, हाथी, कौआ, हंस, उकाव और मनुष्य जैसे कुछ प्राणी 100 वर्ष आयु लेकर ही आये हैं। अन्य जीवों को इतना भी नहीं मिला है। वनराज कहा जाने वाला सिंह तक 40 वर्ष में ही विदाई ले लेता है। इससे नफे तो बतख और बगुले हैं जो 50 वर्ष तक जीवित रहते हैं।

भारत के दीर्घजीवी वृक्षों में अग्रणी हैं-‘चिनार’ जो काश्मीर में पाया जाता है। इसके हजारों वृक्ष ऐसे हैं जो 300 वर्ष से अधिक आयु के है। इन सब में पुराना है वेहारा गाँव का विशालकाय चिनार है, जिसकी आयु 600 वर्ष की है। इसका तना 58 फुट परिधि का है।

सशक्तता की बात सोचे तो मनुष्य की अपेक्षा अन्य जीवधारी कई दृष्टि से कहीं अधिक सशक्त हैं। अपने वजन के आनुपातिक दृष्टिकोण से मनुष्य की तुलना में पक्षी 72 गुने अधिक शक्तिशाली होते हैं। पर इस सशक्तता के कारण उनका गौरव किसी प्रकार बढ़ नहीं जाता।

प्रकृति के नियमों को तोड़ते हुए-सरल स्वाभाविक सात्विक जीवन-क्रम की उपेक्षा करते हुए मनुष्य चिरयौवन अथवा दीर्घजीवन का आनन्द ले सकें यह सम्भव जड़े निरन्तर खोदी जा रही है वह ऊपरी उपचार से देर तक खड़ा रखा जा सकेगा और सूखने मुरझाने से बचाया जा सकेगा यह आशा करने वालों को अन्ततः निराशा ही हाथ लगेगी।

जिन्दगी का समय भले ही कम हो-सशक्तता भले ही सामान्य स्तर की हो, पर यदि उपलब्ध समय का सदुद्देश्यों के लिए उपयोग किया जा सके तो कम समय और कम शक्ति से भी इतना अधिक लाभ लिया और दिया जा सकता है कि उस पर चिर-तारुण्य और दीर्घ जीवन को निछावर किया जा सके।


गोरी और काली चमड़ी (kahani)

गोरी और काली चमड़ी में से किसे सुन्दर माना जाय इस विवाद के संदर्भ में डा.राधाकृष्णन ने एकबार कहा था- एकबार ईश्वर ने तीन रोटी सेकीं। पहली रोटी कच्ची रह गई उससे गोरी चमड़ी के लोग बने। दूसरी कुछ अधिक जल गई उससे काले लोग पैदा हुए। तीसरी पर ईश्वर ने अधिक ध्यान दिया और सावधानी बरती और वह ठीक तरह सिक गई। उसी से हम भारतवासी जन्में हैं।


सर्वनाश उन्माद को हम मूक दर्शक बनकर न देखें

प्रगति का नशा आज हमारे मस्तिष्क पर ऐसा छाया हुआ है जिसके आवेश में यह देख सकना कठिन हो गया है कि विकास और विनाश में क्या अन्तर है? दूरदर्शिता से मानो हमने रिश्ता ही तोड़ दिया हो। आज का -अभी का-लाभ जिससे पूरा होता है-तात्कालिक समाधान जिससे भी मिलता हो वही किया जाना आज की नीति है। आज जो कदम उठाये जा रहे हैं उनका परिणाम कल क्या होगा यह सोचने की किसी को फुरसत नहीं। हो भी क्यों? जीव जगत को ईश्वरीय सत्ता से रहित और व्यक्ति को आत्मा से रहित माना जाने लगा है, तो फिर आदर्श की- विवेक की-भविष्य चिन्तन की परवाह भी क्यों की जाय? सभ्यता के बचने न बचने की चिन्ता क्यों हो? जब कृमिकीटकों से लेकर नर पशुओं की मूल सत्ता वृक्ष वनस्पति स्तर की जड़ मानी जाने लगी तो उसके नष्ट होने में दुख क्यों माना मनाया जाय। घास तो ढेरों कटती हैं-लकड़ी तो ढेरों जलती हैं- जब उसके कटने, जलने में दुख नहीं तो मनुष्यों का कतर-व्योंत कर डालने में, उन्हें जलाने-भूनने में संकोच की आवश्यकता क्या रही?

भौतिक विज्ञान ने एक हाथ जो हमें दिया है उस सबको भौतिक दर्शन ने दूसरे हाथ से वापिस छीन लिया है। मनुष्य को लक्ष्य रहित, आदर्श रहित, करुणा रहित, न्याय और नीति रहित बनाने का उत्तरदायित्व भौतिकवादी दर्शन का है जिसकी अभिवृद्धि वैज्ञानिक आविष्कारों की तरह ही उत्साहपूर्वक की जा रही है। यह तथाकथित प्रगति हमें विपत्ति के महान गर्त में धकेलने के लिए द्रुतगति से घसीटे लिये जा रही है। अधिक सुखी और अधिक सशक्त, अधिक सफल होने की धुन में हम आत्मघात की निरंकुशता ही हस्तगत कर रहे हैं।

कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो.मेकडानल्ड ने ‘हाउ टू रेक द एनवायरनमेंन्ट’ में बताया है कि आँधी, तूफान, भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि जैसे संकट वैज्ञानिक आक्रमणों द्वारा किसी भी देश के लिए उपस्थित किये जा सकेंगे और उस देश को लड़ाई लड़ सकने की क्षमता से वंचित किया जा सकेगा।

अब ‘वोटुलिनम टाक्सिन’ नामक महा जीव विष ढूंढ़ निकाला गया है इसकी 500 ग्राम मात्रा से सारी पृथ्वी, के जीवधारियों को नष्ट किया जा सकता है। ब्रिटेन के पत्रकार रोविनक्लार्क ने अपनी पुस्तक ‘द लायलेन्स वेपन्स’ में लिखा है अब सर्वनाश का अनुष्ठान बिना धूम धड़ाके के ही किया जा सकना पूर्ण सरल हो गया है। स्वीडन के समाज शास्त्री गन्नार मिरडिल ने भी यही आशंका व्यक्त की है कि जीवाणु विष से महामरण का उद्देश्य बिना अधिक शोर शराबे के ही पूरा किया जा सकेगा।

वाशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित अपने लेख में प्रख्यात अमेरिकी पत्रकार जैक एण्डरसन का एक लेख छपा है जिसमें उन्होंने कहा है कि उनके पास ऐसे गुप्त कागज पत्र हैं जो प्रकट करते हैं कि अमेरिका रक्षा विभाग के विशेषज्ञ ऐसी लेसर किरणें बनाने में संलग्न हैं जो लोगों को अन्धा कर देंगी। ये आयुध की ऐरीस्पेन प्रयोगशाला में तैयार किये जा रहे हैं।

7 नवम्बर 71 को प्रशाँत महासागर में अमचितका द्वीप के निकट अमेरिका का अणु परीक्षण हुआ। उसकी शक्ति हिरोशिमा वाले बम से 260 गुनी अधिक थी। विस्फोट से 40 मील दूर तक की इमारतें तीन मिनट काँपती हुई देखी गई। मानों कोई भयानक भूकम्प आया हो। विनाश का प्रयोजन अति द्रुतगति से-अचूक रूप से सम्पन्न करने के लिए अद्भुत किस्म के प्रक्षेपणास्त्रों का आविष्कार होता चला जा रहा है।

प्राचीन काल में पुराण वर्णित अग्निबाण थे या नहीं यह विवादास्पद है, पर मिसाइलों ने उस कल्पना को मूर्तिमान बना दिया है कि मनुष्य घर बैठे ही विपक्षी का घर द्वार जलाकर खाक कर दे। इनका आविष्कार जर्मनी ने द्वितीय महायुद्ध के समय किया गया था। उनका नाम बी-1 तथा बी-2 दिया गया था। सही निशाना लगाने की स्वसंचालित कम्प्यूटर पद्धति तब तक विकसित नहीं हुई थी इसलिए वो निर्धारित निशाने पर नहीं पड़ी और उतना नुकसान नहीं हुआ, पर अब तो उन्हें पूर्णतया ‘गाइडैड’ बना लिया गया है। वे निर्धारित लक्ष्य को बिना एक इंच अन्तर किये विस्मार कर सकती है। उनका संचालन कम्प्यूटर विभाग करता है। इन दूरमारकों में अणुबम जड़े होते हैं। जापान पर बम गिराने पुराने ढर्रे के विमान गये थे अब वैसा करने की कोई जरूरत नहीं रही। कन्ट्रोल रूम में बहुत दवा कर धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक निशाना साधा जा सकता है और अणुबम गिराकर उस क्षेत्र को पूरी तरह तबाह किया जा सकता है। ‘इंटर कान्टीनेन्टल बैलेस्टिक मिसाइल’ (आई.सी.बी.एम.) की मारक शक्ति 8000 मील तक की है। द्वितीय महायुद्ध में प्रयुक्त हुई मिसाइलें तो इनके सामने मक्खी, मच्छर जैसी ही थीं उनमें बारूदी बम रहते थे और दौड़ 300 मील तक की थी।

विकसित मिसाइलों में सोलह तक ‘बार हैड्स’ लगाये गये हैं। अर्थात् एक ही दौड़ में उनके चार खण्ड अलग एक ही क्षण में एक ही साथ चार नगरों को विस्मार कर सकते हैं।

आमतौर से इन प्रक्षेपणास्त्रों को भूमि में बने गहरे तहखानों में रखा जाता है वे ऐसी मजबूती के साथ बनाये गये हैं कि शत्रु का आक्रमण उन्हें नष्ट न कर सके। उनका स्थान इतना गुप्त रखा जाता है कि राष्ट्रपति अथवा एक दो अत्यन्त विश्वस्त अधिकारियों के अतिरिक्त किसी को पता न चल सके। फिर भी यह आशंका तो बनी ही रहती है कि किसी प्रकार भेद शत्रु के हाथों तक पहुँच सकता है और उन पर हमला किया जा सकता है। इसलिए अब अधिक सुरक्षित यह समझा गया है कि उन्हें पनडुब्बियों में लादकर रखा जाय और वे पनडुब्बियां अपना स्थान बदलती रहें। अमेरिका ने इस प्रयोजन के लिए पोलरिस और पोसाइडन दो किस्म की पनडुब्बियाँ समुद्र में उतारी हैं जिनमें 16 ऐसी सशक्त मिसाइलें रखी रहती हैं जो 2500 मील तक मार कर सकें और एक साथ ही 14 स्थानों के निशाने साध सकें।

रूस भी इस ओर उदासीन नहीं हैं। उसने एस.एस.-9 नाम की तीन ‘वार हैड्स’ वाली मिसाइलें बनाने में सफलता प्राप्त की है, पर वे अमेरिका जैसी सशक्त और विकसित नहीं हैं।

आक्रमण के लिए आने वाली मिसाइलों की काट भी ढूंढ़ ली गई है। मिसाइल साइड रैडार इतने सशक्त बनाये गये हैं कि वे 10-12 फुट लम्बी और 30 हजार मील प्रति घण्टे की चाल से दौड़ते आने वाले उस अग्नि बाण को फुर्ती से पहचान लेते हैं। खतरे का अलार्म बजाते हैं। साथ ही दो सेकेंडों के भीतर आसमान में ए.वी.एम. स्प्रिन्ट मिसाइल दाग दी जाती है वह क्षण भर में 1 लाभ फुट ऊपर जाकर आसमान में फटती है ओर इतनी गर्मी उत्पन्न करती है कि आक्रमणकारी आयुध उसमें जल-जलकर नष्ट हो जाय। इसी किस्म की स्पार्टन और रीएन्ट्री ह्वेकल मिसाइलें भी बनी हैं। रूस और अमेरिका दोनों ही इन्हें अधिक संख्या में बनाने के लिए व्यग्र है। इन्हीं दिनों इन मिसाइल तोड़क आयुधों में- मल्टीप्लाई इण्डेपेन्डेण्ट रीएन्ट्री ह्वेकिल मिनट मौन गेलोश-फ्रेक्शनल आरविट के नये नाम जुड़े हैं। इन्हें दिन रात आकाश में रक्षा छतरी की तरह वायुयानों में उड़ाया जाता रहता है ताकि समय आने पर उन्हें तत्काल रेडियो संकेतों से दागा जा सके।

स्क्रिप्ट इन्स्टीट्यूशन आफ ओशनोग्राफी के निर्देशक विलियम ए. नाइरेन वर्न ने अपने लेख ‘मिलिट राइज्ड ओशंस’ लेख में यह आशंका व्यक्त की है कि अगले दिनों भूमि हथियाने की तरह समुद्र क्षेत्र हथियाने की बड़े राष्ट्रों में प्रतिद्वन्दिता चल पड़ेगी और जल के भीतर रहने वाले ऐसे वाहनों का विकास होगा जो घातक आक्रमणकारी अस्त्रों से सुसज्जित रहें और स्थल की तरह ही जल को युद्ध स्थली बनावें।

भावी परमाणु युद्ध के महाविनाश के उपरान्त क्या फिर कभी मनुष्य का अस्तित्व प्रकाश में आ सकेगा, इस प्रश्न के उत्तर में वैज्ञानिक हाँ कहते हैं। उनका कथन है कि तब थलचर तो प्रायः सभी समाप्त हो जायेंगे पर जलचरों में जीवन का अस्तित्व बना रहेगा। समुद्र इतना बड़ा है कि तीन हजार तक अणु विस्फोटों को हजम कर जायगा। निस्सन्देह ऊपरी सतह के प्रायः सभी प्राणी मर जायेंगे। इस गहराई तक हवा का प्रभाव पहुँचता है और नदियों द्वारा पानी आता और बादलों द्वारा जाता रहता है। पर इसमें नीचे की गहराई में बिना रीढ़ वाले ऐसे कीड़े रहते हैं जो कभी भी ऊपर नहीं आते। रेडियो विकिरण का प्रभाव समुद्र जल में प्रवेश तो करेगा पर छह मील गहराई तक पहुँचते-पहुँचते खारी जल में घुल जायगा। यों मरे हुए जलचरों के अस्थि कंकाल में जो रेडियो सक्रियता होगी वह गहरी तली तक न पहुँच सकेगी फल स्वरूप वे जीव बच जायेंगे।

लाखों वर्षों में जब धरती और समुद्र की तह रेडियो सक्रियता से मुक्त होगी तो वे तली में रहने वाले कीड़े ऊपर उभर कर आवेंगे और जीवधारियों की नई सृष्टि उसी प्रकार आरम्भ करेंगे जिस प्रकार अब से करोड़ों वर्ष पूर्व एक कोशीय जीवों में बहुकोशीय जीवों का विकास-क्रम आरम्भ हुआ था और क्रमशः अधिक समर्थ और बुद्धिमान प्राणी बनते-बढ़ते चले आये थे। गहराई में जो रीढ़ वाले जलचर बच जायेंगे वे सृष्टि के नये विकास में और भी अधिक योगदान देंगे। इस क्रम शृंखला में समयानुसार मनुष्य भी विकसित होगा। तब वह आज के जैसे मनुष्यों की आकृति-प्रकृति का होगा या भिन्न प्रकार का यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता, पर इतना कहा जा सकता है उस स्थानापन्न मनुष्य की प्रौढ़ स्थिति कम से कम 30 करोड़ वर्ष में विकसित हो सकेगी।

महाविनाश के इस अनुष्ठान की सारी व्यवस्था चन्द सत्ता धारियों के हाथ में चली गई। उनमें से किसी की भी सकारण या अकारण सनक भूतल पर निवास करने वाले मनुष्यों का ही नहीं प्राणि जगत का भी सर्वनाश करके रख सकती है। ईश्वर की संरचना का श्रेष्ठतम उदाहरण कहला सकने वाला यह सुरम्य भूलोक देखते-देखते जल-भुनकर खाक हो सकता है अथवा भविष्य में प्राण धारियों की उपस्थिति के अयोग्य हो सकता है। प्रगति का अर्थ यदि यही है कि उससे चन्द मन्दोन्मतों को विश्व विनाश की छूट मिल जाय तो फिर यही उचित है कि समय रहते हम इस प्रगति को नमस्कार करके पीछे लौटने का प्रयत्न करें। भले ही हम पिछड़े लोग कह लायें पर कम से कम अन्य। प्राणियों की तरह अपनी जीवन सत्ता तो बनाये ही रह सकेंगे। यदि इस प्रगति युग में इतना बचा पायें तो भी कम संतोष एवं सौभाग्य की बात नहीं होगी।

क्या हम प्रगति के नाम पर चल रहे इस सर्वनाश के अनुष्ठान को मूक दर्शक बनकर देखते भर रहें? क्या इसे रोकने में हम कुछ नहीं कर सकते? एक बार जब व्यक्ति की निरीह स्थिति और सत्ता धारिणियों की अपरिमित शक्ति का विचार करते हैं तो हतप्रभ होकर बैठ जाना पड़ता है पर दूसरी ओर जब मनुष्य की मूल-भूत गरिमा पर विचार करते हैं तो उत्साह उठता है कि इस निरीह स्थिति में भी बहुत कुछ किया जा सकता है। हम विरोध की आवाज बुलन्द कर सकते हैं और साधन हीन होते हुए भी सुसम्पन्न सत्ताधारियों के विरुद्ध छापा मार युद्ध आरम्भ कर सकते हैं। जटायु ने रावण के मार्ग में अवरोध उत्पन्न करके जिस ‘छापा मार’ युद्ध का मार्ग दर्शन किया था वह आज भी विश्व विनाश की प्रस्तुत प्रगति के विरुद्ध भी आरम्भ किया जा सकता है।

रासायनिक और जीवाणु आयुधों का विरोध भी प्रबुद्ध जनता द्वारा होता रहा है, पर उसका कोई विशेष प्रभाव नहीं हुआ अमेरिका के जिन विश्व विद्यालयों में जीव विषय पर खोज हो रही है वहाँ के छात्र उस खोज का विरोध और बहिष्कार कर रहे हैं पेन्सिलवेनिया विश्व विद्यालय के फिजीकल बायो केमिस्ट्री विभाग के 11 प्रोफेसरों ने पदवी दान समारोह में गैस, मास्क पहन कर इन शोधों पर विरोध प्रदर्शन किया था 17 नोबेल पुरस्कार विजेता और विज्ञान अकादमी के 117 सदस्य इन प्रयोगों पर रोज प्रदर्शित कर चुके हैं।

विज्ञानी पत्रकार नाइर्जल कैल्डर द्वारा सम्पादित एक पुस्तक एलन द पेग्विन प्रेस से प्रकाशित हुई है- नाम है ‘अनलेस पीस कम्स’ इसमें संसार के प्रमुख 14 राजनीतिज्ञों, युद्ध विशारदों और वैज्ञानिकों ने एक-एक अध्याय लिखा है सभी लेख बहुत ही तथ्यपूर्ण तथा माननीय है। इसमें भावी युद्ध की विभीषिकाओं का विवेचन, निरूपण करते हुए निष्कर्ष निकाला गया है कि विज्ञान और युद्ध दोनों एक साथ जीवित नहीं रह सकते। दोनों में से एक को तो हर हालत में मरना ही पड़ेगा, भले ही यह फैसला तीसरे महायुद्ध के उपरान्त हो अथवा पहले।

विज्ञान की शोधें आणविक, रासायनिक तथा विषाणु आयुध जिस तेजी से बना रही हैं उसका विस्तार क्रमश होता ही चला जायगा। आज तो निर्माण महँगा है उसी के कल सस्ता होने का रास्ता निकल आयेगा। यह घातक अस्त्र अभी थोड़े देशों के पास हैं पर अगले दिनों वे प्रायः सभी के पास हो जायेंगे। गरीब देश भी सस्ते किस्म के घातक अस्त्र बना लेंगे उत्कृष्टता भले ही कम हो पर मरण पर्व तो वे भी रच सकेंगे। तब उन पर नियंत्रण कर सकना कठिन हो जायगा। कोई भी शिर फिरा आदमी किसी भी देश में नहीं निकलेगा ऐसा कोई गारन्टी नहीं। राजनीति और विज्ञान के क्षेत्र में घुसा हुआ एक ही सनकी व्यक्ति सारी दुनिया का सफाया करने के लिए काफी है।

कैल्डर की दूसरी पुस्तक है-”द वर्ल्ड इन 1984” इसमें अब से दस वर्ष पश्चात् विज्ञान कहाँ पहुँच चुकेगा और उसकी प्रतिक्रिया संसार के विभिन्न क्षेत्रों में क्या होगी उसका चित्रण किया गया है। वह समय ऐसा होगा अब गतिरोध चरम सीमा तक पहुँच चुकेगा और इधर या उधर दोनों में से एक निर्णय करना ही पड़ेगा। विज्ञान जीवित रहे या युद्ध इस समस्या को भविष्य के लिए अनिर्णीत नहीं छोड़ा जा सकेगा। तब जीवन और मरण दोनों एक दूसरे के साथ इतने नजदीक आकर गुंथ रहे होंगे कि उनमें से एक को विजित और दूसरे को पराजित होने का फैसला किये बिना दूसरा कोई रास्ता ही नहीं रह जायगा। युद्ध होता है तो वह मानवी सभ्यता ही नहीं रह जायगा। युद्ध होता है तो वह मानवी सभ्यता की धरती पर विद्यमान जीवन की, साथ ही विज्ञान की समस्त प्रगति की सदा सर्वदा के लिए अंत्येष्टि करनी होगी।

क्या सत्ता धारियों के पागलपन के विरुद्ध गरीब आदमी नहीं जूझ सकता? इस प्रश्न के उत्तर में कहा गया। है कि आयुधों के सन्मुख खड़ा होकर लड़ने की ताकत मनुष्य में नहीं रहेगी। पर एक नई शक्ति विकसित होगी वह है-छापा मार ताकत। गरीब आदमी की इस ताकत को कोई छीन न सकेगा और इस आधार पर उच्छृंखल अहंमन्यता को चुनौती दी जा सकेगी। कहा गया है कि ‘छापा मार’ आन्दोलन एक दर्शन के रूप में विकसित होगा और उसमें पीड़ित, प्रताड़ित और पददलित जनता अपने को सेना के रूप में विकसित करके लड़ना आरम्भ करेगी और अधिनायकों के प्रचार, संगठन और आक्रमण कारी तंत्रों को निरर्थक बना देगी।


आचार्य की उदारता (kahani)

गुरुकुल में एक अनगढ़ शिष्य आ गया, उसे चोरी करते कई बार पकड़ा गया। हर बार शिष्यों ने उसे आचार्य के सामने उपस्थित किया और कहा-इसे आश्रम से निकाल दें आचार्य ने आग्रह अनसुना कर दिया। अन्त में छात्र झल्ला गये और बोले यदि आप इस चोर को यहाँ से नहीं निकालते तो हम सब यहाँ से चले जायेंगे।

आचार्य ने छात्रों को बुलाया तुम सब विवेकशील हो उचित-अनुचित के परिणाम जानते हो। यह अनाड़ी है अपना भला-बुरा नहीं जानता। यदि इसे यहाँ से निकाल दूँ तो उसका भविष्य घोर अन्धकारमय बन जायगा और हम इतने विवेकशील एक अनाड़ी को न सुधार सके इस कलंक से आश्रम कलंकित होगा। सो तुम सब भले ही चले जाओ पर मैं उस अनाड़ी को पूरी तरह सुधारने तक यही रखूँगा। छात्र शान्त हो गये। साथ ही आचार्य की उदारता का ऐसा प्रभाव उस अनाड़ी पर पड़ा कि उसने सदा के लिए चोरी करना छोड़ दिया।


धन दान न सही, हमारे पास और भी बहुत कुछ देने योग्य है।

गरीबों के मन में अरमान यह रह जाते हैं कि वे धनियों की तरह कुछ दान कर सके होते तो पुण्य और यश के भागी बने होते। जहाँ तक धन दान का प्रश्न है यह बात सही भी हो सकती है, पर इसमें पश्चाताप की कोई बात नहीं है। धन हर मनुष्य के पास हो ही यह आवश्यक नहीं। न्यायपूर्वक श्रम उपार्जन स्वभावतः स्वल्प मात्रा में होता है, अस्तु उससे इस महँगाई के जमाने में गृहस्थी का खर्च चलाना ही कठिन पड़ता है। अपने देशवासियों की औसत आय इतनी कम है कि उसमें अधिकाँश जनता कठिनाई के साथ तन ढकने और पेट भरने जितने साधन ही जुटा पाती है। इसी दशा में छुटपुट किसी की सहायता समयानुसार होती रहे यह बात दूसरी है, पर सर्वसाधारण के लिए चन्द धनियों जैसा इस प्रकार का धन दान कर सकना कठिन है जिसके आधार पर किसी खड़े पुण्य या बड़े यश की आशा की जा सके।

इतने पर भी हर मनुष्य के पास ऐसा बहुत कुछ है जिसे वह घोर निर्धन होते हुए भरी परमार्थ प्रयोजन के लिए प्रयुक्त कर सकता है। अपना उज्ज्वल चरित्र विनिर्मित करना न केवल आत्म-कल्याण के लिए वरन् सामाजिक अनुदान की दृष्टि से भी अति महत्वपूर्ण है। चन्दन अपने व्यक्ति चन्दन का वृक्ष है जिससे अनेकों को प्रेरणा मिलती है और सदाचरण की रीति-नीति अपनाने का साहस मिलता है। चरित्रवान व्यक्ति अपना आदर्श उपस्थित करके कितनों को अनुगमन के लिए कितना साहस देता है इसका लेखा-जोखा नहीं रखा जा सकता, पर यह निश्चित है कि बहुत दान-पुण्य न कर सकने पर भी आचार निष्ठ व्यक्ति समाज को साधारण अनुदान प्रदान करता है।

मधुर भाषण, प्रशंसा भरा प्रोत्साहन, सत् परामर्श का कार्य किसी की भी वाणी यदि परिष्कृत हो तो निरन्तर कर सकती है। अपना सामान्य काम-काज करते हुए भी यह क्रम सहज ही चलता रह सकता है और मनुष्य सहज ही उच्चकोटि का पुण्य लाभ कर सकता है।

सद्व्यवहार, नम्र विनीत, सौम्य सरल स्वभाव अपने आप में किसी भी सम्पत्ति से बढ़े-चढ़े गुण है। स्नेह, सद्भाव और उदारता भरा व्यवहार समीपवर्ती लोगों का कितना प्रभावित करता है और कितनी राहत देता है इसे हम समझ ही नहीं पाते। सेवा और सहयोग की भावना रहे-दूसरों को ऊँचा उठाने के लिए यथासम्भव प्रयास किया जाता रहे तो इस प्रवृत्ति के फलस्वरूप बूँद-बूँद करके इतना पुण्य संचित हो सकता है जो बड़े-बड़े दानवीरों को भी पीछे छोड़कर अग्रगामी पंक्ति में खड़ा हो सके।

दान अकेले धन का ही नहीं होता। देने के असंख्य मार्ग है और उनमें से कोई भी धन दान से कम महत्व का नहीं है। अपने शरीर का दान किया जाता रह सकता है। लोक-मंगल के लिए समय और श्रम देकर हम कुछ कम परमार्थ संचय नहीं करते। दूसरों को मौत के मुँह में से बचाने के लिए कई स्वस्थ व्यक्ति अपना रक्त दान देते रहते हैं। यह सोचना सही नहीं है कि इससे दानी को कमजोरी आती है या आयु घटती है। प्रकृति उस कमी को कुछ ही समय में पूरा कर देती है और आरोग्य यथावत् बना रहता है।

मरने के बाद शरीर के अंग आमतौर से मिट्टी में, आग में, जल में जला-बहाकर नष्ट कर दिये जाते हैं। इससे मरने वाले का या दूसरों का कुछ लाभ नहीं होता। पर अब ऐसे तरीके निकल आये हैं जिनसे पूर्णतया घोषित मृत्यु हो जाने के कुछ घण्टे उपरान्त भी कुछ अंग निकाले जा सकते और उन्हें दूसरे जरूरत मन्द लोगों के लिए दान किया जा सकता है। नेत्र दान इसी श्रेणी में आता है जिसे देकर दानी को कोई घाटा नहीं पड़ता किन्तु ग्रहीता की जिन्दगी में नवीन उल्लास भर उठने की बात बन जाती है। क्या यह धन दान से कम स्तर का पुण्य परमार्थ है?

भारत में प्रायः 7 लाख अन्धे ऐसे हैं जिन्हें कार्निया के धब्बों ने अन्धा बना रखा है। इन लोगों को यदि किसी दूसरे की जीवित परतें मिल सकें तो इनकी अँधेरी दुनिया फिर रोशन हो कसती है।

तुरन्त मृत व्यक्ति के शरीर में जब तक सड़न प्रारम्भ न हुई हो यह कार्निया निकाला जा सकता है। यह परत पारदर्शी काँच के समान है जिसमें रक्त प्रवाह नहीं होता। इसलिए उसके बदलाव में ‘टिश्यू रिजेक्शन’ का खतरा नहीं रहता। यदि यह प्रत्यारोपण कुशल हाथों से किया जाय तो 80 प्रतिशत सफलता आसानी से मिल जाती है।

देश में नेत्र बैंकों की संख्या बहुत कम है, जहाँ है वहाँ नेत्र दानी नहीं मिलते। इस प्रकार अन्धों को मिल सकने वाली सम्भव सहायता का द्वार अवरुद्ध ही बना रहता है। वस्तुतः मृतक के लिए इसमें कोई कंजूसी करने की बात नहीं है कि मरने के बाद भी उसका अवयव जला गला भले ही दिया जाय, पर किसी के काम न आने पाये। मरने के बाद मृतात्मा के लिए उस आँख की कुछ भी उपयोगिता नहीं रह जाती जो किसी दूसरे के लिए नव जीवन संचार कर सकती है। यों जीवन व्यक्ति भी नेत्र दान कर सकते हैं, पर यहाँ चर्चा उतने दुस्साहस की नहीं हो रही है। बात इतनी भर है कि मरने वाले की या उसके परिवार की निरर्थक बनी हुई मृत काया से यदि दूसरों का भला होता है तो उसे देने में क्यों कंजूसी करनी चाहिए। यदि ऐसी समझदारी लोगों में उठ खड़ी हो और मरने के बाद अपने नेत्रों की वसीयत नेत्र बैंकों के नाम करने लगें तो निस्सन्देह इससे इन मृतकों को पुण्य और अन्धों को नव जीवन मिल सकता है।

आँख की काली पुतली के ऊपर सफेद धब्बे जम जाने से प्रायः दीखना बन्द हो जाता है और ऐसे लोगों की गणना अन्धों में की जाती है। यद्यपि भीतर से आँख का गोल स्वरूप हाता है और उसमें देखने की क्षमता रहती है पर इस सफेद धब्बे के व्यवधान के कारण अन्धता आ घेरती है।

आँख की पुतली काली दिखती है, इसका कारण गोले के भीतर एक काला पर्दा है। उसके ऊपर एक पारदर्शी पर्त पड़ी रहती है। इस पर्त को ‘कार्निया’ कहते हैं। इस पर कारणवश ऐसे धब्बे जम जाते हैं जो दवाओं से साफ नहीं हो पाते। तब उसका एकमात्र उपाय आपरेशन ही रह जाता है। कार्निया को हटा देने से भी उतना लाभ नहीं होता जितना कि किसी जीवित आँख की यह पारदर्शी परत इस स्थान पर लगा देने से होता है। एक व्यक्ति की आँख दूसरे को लगाई गई का समाचार सुनकर इतना ही समझना चाहिए कि एक की कार्निया परत दूसरे में फिट की गई है। किसी की आँख का पूरा गोला निकाल कर दूसरे के नेत्र गह्वर में फिट कर सकना सम्भव नहीं। क्योंकि आँख की जड़ों से जुड़े हुए तन्तु मस्तिष्क के साथ इतनी जटिल प्रक्रिया के साथ जुड़े हुए हैं कि उसे नई आँख लगा कर यथावत् फिट नहीं किया जा सकता। किसी की आंख किसी को लगाने का निश्चय करने से पूर्व डाक्टरों को यह देखना होता है कि रोगी की आँख में देखने की वह मूल क्षमता मौजूद है कि नहीं जिसके सहारे कार्निया परत बदल जाने पर दिखाई देना सम्भव हो सके। यदि वह मूल क्षमता नष्ट हो गई होती तो फिर ऊपरी परतें बदलने से कुछ लाभ नहीं होता।

मृतक घोषित किये जाने के उपरान्त आँख 2 से 6 घण्टे के बाद निकाल ली जानी चाहिए। देर हो जाने पर वह बेकार हो जाती है। वृद्ध की या जवान की आँख का कोई अन्तर नहीं होता, क्योंकि वह सिर्फ एक पारदर्शी काँच मात्र है। नेत्र बैंक पूरे गोले को ही निकालती है ताकि प्रत्यारोपण के साथ उसे अलग करके रोगी की आँख के अनुरूप काट-छाँट करके फिट किया जा सके। यों काम यह परत ही आती है, पर उसे सुरक्षित रखने के लिए निकालना पूरा ही गोला पड़ता है। निकाली हुई आँख को शुद्ध ग्लोसेरोल वेनसिलन और सोफरैनिग घोलों में भरकर ठण्डे रेफ्रिजरेटर में रख दिया जाता है और आवश्यकतानुसार उन्हें काम में लाया जाता है।

नेत्र दान के सम्बन्ध में इस अनुत्साह का एक बड़ा कारण वह भ्रम है जिसके कारण तरह-तरह की आशंकाएं सामने आती है। समझा जाता है कि मरने से बहुत पहले जीवित अवस्था में आंखें निकाल ली जाती होंगी- यदि मरने के बाद निकलतीं तो वे बेकार हो जाती पर बात ऐसी नहीं हैं। नेत्र आरोपण केवल ‘कार्निया’ की खराबी की स्थिति में ही किया जा सकता है अन्य रोगों में नहीं। कार्निया पुतली के ऊपर चढ़ी हुई एक झिल्ली है जो किसी वजह से खराब हो जाने पर दीखना बन्द हो जाता है। यह झिल्ली ही एक की आँख से निकाल कर दूसरे की आँख में फिट की जा सकती है। यह झिल्ली ऐसी है जैसे घड़ी की सुइयों की रक्षा के लिए काँच लगा रहता है। बदल-उदल इसी की होती है और यह ऐसा अंग है जो मरने के बाद छह घंटे तक खराब नहीं होता। पूर्ण मृत्यु की घोषणा होने के पश्चात ही इसे निकालने की कार्यवाही की जाती है। इसलिए किसी नेत्र दानी को यह डर करने की जरूरत नहीं होती कि उसके शरीर की जिन्दा स्थिति में ही फाड़-चीड़ की जायगी और उसे कष्ट सहना पड़ेगा।

इस प्रकार यह सोचना भी व्यर्थ है कि हमारे नेत्र पुराने हो गये या रोशनी घट गई इसलिए वे काम न आ सकेंगे। दृष्टि मन्दता या वृद्धता होने पर भी यह ‘कार्निया’ झिल्ली प्रायः निरोग ही रहती है और उसका उपयोग भी नई उम्र वाले की आँखों की तरह ही हो सकता है।

कुछ समय पूर्व इटली का एक महिला ने अपने अन्धे बच्चे के नेत्रों में पुनः ज्योति दिलाने के लिए अपने नेत्रों की वसीयत थी, चूँकि नेत्र मरने के बाद ही लिए जा सकते थे इसलिए उसने स्वेच्छा मरण का तरीका अपनाया और आत्म हत्या करली। इस सनसनी खेज समाचार ने जहाँ अन्य पक्षों पर विचार करने के लिए उत्तेजना दी, वहाँ यह भी सोचा गया कि अन्धों की आँखों में रोशनी लाने के लिए नेत्रवान किए हद तक संवेदनशील हो सकते हैं।

इस घटना के बाद श्री लंका के नेत्र कोष ने गहरा दुख व्यक्त किया और कहा कि जहाँ आवश्यकता हो वहाँ श्री लंका नेत्र कोष बैंक अपनी सामर्थ्यानुसार सहायता करने के लिए तत्पर है। यह प्रस्ताव उसे इटली सरकार के पास भी भेजा।

चूँकि श्री लंका के गवर्नर जनरल और प्रधान मन्त्री ने अपने नेत्र दान की वसीयत करके जनता में उत्साह उत्पन्न किया था इसलिए हजारों लोगों ने बनता में उत्साह उत्पन्न किया था इसलिए हजारों लोगों ने उनका अनुकरण किया और मृतकों के नेत्र से उस बैंक का भण्डार भरा पूरा हो गया।

इस प्रकार के प्रयास अन्यत्र भी होने चाहिए। विशेष तथा भारतवर्ष में। अपने देश में कोई 10 लाख अन्धे ऐसे हैं जिन्हें दूसरे लोग नेत्र दान करके नई ज्योति प्रदान कर सकते हैं। अपने देश में नेत्र दान लेने वाले और उन्हें संग्रह करने वाले 30 बैंक हैं। इनमें जो नेत्र दान संग्रह हुआ उसके आधार पर 4399 दृष्टि हीनों को रोशनी दी भी जा चुकी है, पर दानियों के अभाव में यह कार्य एक प्रकार से रुका ही पड़ा है। जनता में इसके लिए बहुत ही कम उत्साह है।

उदारता, सेवा और परमार्थ वृत्ति यदि अपने मन में हो तो निर्धन मनुष्य भी बहुत कुछ पुण्य संग्रह कर सकता है। निर्धनों को भी भगवान ने बहुत कुछ दे सकने योग्य बनाया है।


Quotation

मेरी जानकारी में ईश्वर इस धरती पर कठोर से कठोर काम लेने वाला स्वामी है। वह हमारी पूरी-पूरी परीक्षा करता है। जो उसके इम्तहान में पास होते हैं उनकी वह पूरी-पूरी सहायता भी करता है। परन्तु उसकी सहायता का स्वरूप हमारी इच्छा के अनुरूप नहीं, उसी की समझ के अनुरूप होता है। अन्धकार को चीरती हुई उसकी प्रकाश किरणें प्रत्येक सच्चे श्रद्धालु का सदा मार्गदर्शन करती है।

-महात्मा गाँधी


धन का संग्रह नहीं सदुपयोग किया जाय

सोना, चाँदी, रत्न आदि बहुमूल्य पदार्थों अथवा मुद्रा को धन के रूप में इसलिए स्वीकारा गया है कि श्रम एवं पदार्थों को चिरस्थायी नहीं रखा जा सकता था। वस्तुओं से वस्तुओं के विनिमय में कठिनाई पड़ती थी तथा तत्काल जिनकी आवश्यकता न हो उन पदार्थों को रोक रखने का झंझट खड़ा होता था। इन असुविधाओं का समाधान करने के लिए धन का प्रचलन हुआ। मूलतः उसका स्वरूप श्रम अथवा उत्पादित पदार्थों के रूप में ही है। दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैं कि धन का औचित्य उसके उपार्जनकर्ता की श्रमशीलता एवं कर्म कौशल के साथ ही जुटा होना चाहिए। उसे उत्पादनकर्ता के उचित उपार्जन का प्रतिनिधि ही समझा जाना चाहिए।

स्वर्ण आदि धातुओं अथवा मुद्राओं के रूप में धन का प्रचलन होने से जहाँ उपरोक्त सुविधाएँ हुई वहाँ एक अवाँछनीयता भी उत्पन्न हो गई कि चतुर लोग येन−केन प्रकारेण धन उपलब्ध करके उन सुविधाओं का उपयोग करने लगे जो केवल शारीरिक एवं मानसिक कठोर श्रम करके उपयोगी उत्पादन करने वालों को ही मिलनी उचित थी। हराम की कमाई इस दृष्टि से दण्डनीय अपराधों में गिनी जानी चाहिए थी, किन्तु दुर्भाग्यवश समाज पर अवाँछनीय व्यक्तियों का आधिपत्य हो जाने से हर व्यक्ति को उपलब्ध धन से भरपूर लाभ उठाने की छूट मिल गई और इस बात की उपेक्षा कर दी गई कि धन किस माध्यम से उपार्जित किया गया। होना यह चाहिए था कि श्रम उपार्जित करने पर ही किसी धन से कुछ खरीदा जा सकता है।

धन संग्रह के साथ श्रम उपार्जन का बन्धन न रहने से अगणित ऐसे अनैतिक मार्ग निकल पड़े जिनके सहारे अनैतिक तत्व अवाँछनीय धन एकत्रित करने के लिए स्वतंत्र हो गए। यहीं से भ्रष्टाचार आरम्भ होता है व्यसन और व्यभिचार की उद्धत अहंकार प्रदर्शन करने के लिए राजसी ठाठ-बाठ की छूट यहाँ से मिली। बढ़ती हुई असमानता ने अभावग्रस्त लोगों में लालच, ईर्ष्या एवं आक्रोश को जन्म दिया और उस पृष्ठ भूमि पर नाना प्रकार के अपराध एवं अवाँछनीय प्रचलन उठ खड़े हुए। उत्तराधिकार में सन्तान को बैठे-ठाले मुफ्त का माल मिलने लगा तो उससे न केवल सामाजिक विषमताएँ फैली वरन् अपव्यय के साथ जुड़े अनैतिक आचरणों की भी धूम मच गई। अस्त-व्यस्तता जन्य आज की अगणित समस्याओं की जड़ यही है और सामाजिक सुरक्षा, सुव्यवस्था स्थापित करनी हो तो उसके लिए श्रम उपार्जित धन के उपयोग की ही छूट रहनी चाहिए और हराम की कमाई के सभी स्त्रोत बन्द करने चाहिए। जुआ, सट्टा, लाटरी आदि इसी इसी अवाँछनीय वर्ग में आते हैं। चोरी, बेईमानी की तरह ही हराम की हर कमाई पर प्रतिबन्ध रहना चाहिए। उत्तराधिकारी में परिवार को उतना ही धन मिलना चाहिए जितना कमाने में असमर्थ लोगों के उचित भरण पोषण के लिए आवश्यक हो।

उचित यही है कि सम्पत्ति संग्रह की लालसा से जन साधारण को विरत किया जाय और श्रम उपार्जित सम्पदा से सामने पड़े कर्तव्यों की पूर्ति सही रीति से करते रहने की उदात्त दृष्टि विकसित की जाय। पूँजी द्वारा बड़े उत्पादन का जहाँ तक सम्बन्ध है वह काय सहकारी संस्थाओं के माध्यम से किया जाय और उसमें पूँजी लगाकर लोग उचित लाभाँश प्राप्त करें।

हर व्यक्ति का ध्यान वैयक्तिक योग्यता के बढ़ाने और कठोर श्रम करके न्यायोचित धन कमाने पर ही रहना चाहिए। कमाने से भी अधिक गहराई में यह देखा जाना चाहिए कि उपार्जन का श्रेष्ठतम सदुपयोग हुआ या नहीं। वैयक्तिक संग्रह तो हर दृष्टि से हानिकारक ही सिद्ध हो सकता है।


प्रदर्शन और उद्वेग से बचना ही बुद्धिमत्ता है।

कोई अपने मन में कितना ही बड़ा क्यों न हो उसके साधन कितने ही अधिक क्यों न हो, उसका वह बड़प्पन उसके अपने तक ही सीमित रहेगा। दूसरे अपने कामों में व्यस्त है। किसी का बड़प्पन नापने और उससे प्रभावित होने की किसी को फुरसत नहीं, इस तथ्य को यदि लोग समझ लें तो कम से कम प्रदर्शन और ठाठ बाठ के नाम पर जो धन, समय एवं चिन्तन नष्ट होता रहता है उसकी सहज ही बचत हो सकती है और उस क्षमता को शान-वान की, बड़प्पन प्रदर्शन की मूर्खता से बचाकर किसी उपयोगी काम में लगाया जा सकता है।

अपने सौरमण्डल के प्रायः सभी ग्रह दिखाई देते हैं। सूर्य को छोड़कर वे जरा-जरा से जुगनू जैसे दीखते हैं। यद्यपि वे पृथ्वी से भी बहुत बड़े हैं। उनका बड़प्पन देखने की न तो हमारी रुचि है और न आवश्यकता। वे अपनी जगह बड़े या छोटे जैसे भी हों वैसे बने रहें हम अपने कार्यों में व्यस्त है, अपनी समस्याओं में उलझे हैं उनके बड़प्पन को देखने, जानने पर भी हम क्यों और किसलिए प्रभावित होंगे?

बृहस्पति सौरमण्डल का सबसे बड़ा ग्रह है। इतना बड़ा कि सभी 8 ग्रह उस अकेले में ही समा जायं। वह पृथ्वी से 1300 गुना बड़ा है और उससे 60 करोड़ मील दूर है। इस दूरी की तुलना में बेचारा चन्द्रमा जो सिर्फ 2 लाख मील है बगल में बैठा हुआ प्रतीत होगा।

बृहस्पति की आकर्षण शक्ति इतनी है कि धरती पर रहने वाला कोई डेढ़ मन वजन का मनुष्य वहाँ जाकर 4 मन भारी हो जायगा। वह अपनी धुरी पर अत्यन्त द्रुतगति से घूमता है। यह चाल अन्य ग्रहों से अधिक है। वहाँ पाँच घण्टे का दिन और पाँच घण्टे की रात होती है। वहाँ पहले अन्तरिक्ष यात्री चन्द्रमा ‘सीरस’ पर सवारी गाँठेंगे और वहीं से खोजबीन आरम्भ करेंगे। जब आवश्यक जानकारियाँ प्राप्त हो जायेंगी तभी बृहस्पति पर उतरेंगे।

बृहस्पति का व्यास 88 हजार मील है। उस पर हजारों मील मोटी गैस के बादलों की परत छाई हुई है। सूर्य से 48 करोड़ 30 लाख मील दूर होने के कारण वहाँ गर्मी पहुँचाने वाली किरणें बहुत स्वल्प मात्रा में पहुँचती है इसलिए वह अत्यधिक ठंडा है। अन्य ग्रह सूर्य के समीप हैं। हमारी पृथ्वी मात्र सवा नौ करोड़ मील दूर है। मंगल 14॥। करोड़ मील शुक्र 6॥। करोड़ मील और बुध 3॥ करोड़ मील है। अत्यधिक दूरी होने के कारण सूर्य साम्राज्य में रहते हुए भी वह बहुत बातों में आत्म निर्भर है। उसे पूरा औपनिवेशिक स्वराज्य मिला हुआ है। कामनवेल्थ का वह सम्मानित सदस्य होते हुए भी अपने बलबूते पर ही अपना क्रिया-कलाप चलाता है।

गैस बादलों की मोटी परत के नीचे बृहस्पति पर बर्फ की मोटी परत जमी है। उस पर कभी-कभी 30 हजार मील लम्बे और 7 हजार मील चौड़े लाल धब्बे दिखाई पड़ते हैं। अनुमान यह है कि यह उसमें ज्वालामुखी फटते रहने और उनके लावा उगलने के कारण दिखाई पड़ते है।

बृहस्पति के अनेक छोटे-बड़े चन्द्रमा है। इनमें से अभी 12 ही देखे जाने जा सके हैं। इनके नाम कोलस्टा, जेनिमेंद्र, इव, योरोपा, एमस्यिया आदि हैं। सोचा जा रहा है कि जब सौरमण्डल की यात्रा पर निकला हुआ मनुष्य बृहस्पति की खोज पर जायगा तब पहले उसे इन्हीं में से किसी चन्द्रमा पर रुक कर अपनी खोज आरम्भ करनी होगी और वस्तुस्थिति का पता लगाने के बाद उस धरती पर पैर रखने की हिम्मत करनी होगी। शनि के 9, यूरेनस के 5 नेपच्यून के 2 चन्द्रमा है। 20 खरब 779 करोड़ मील की यात्रा का साधन जुटाकर जब सौरमण्डलीय यात्रा आरम्भ होगी तब यह चन्द्रमा ही मूल ग्रहों पर उतरने के प्रथम सोपान होंगे। उस यात्रा का सबसे अन्तिम ग्रह प्लूटो होगा, वह आकार में पृथ्वी के ही बराबर है, पर सूर्य से इतनी अधिक दूर है कि वहाँ से उसका प्रकाश टिमटिमाती मोमबत्ती जितना ही दिखाई देगा। हमारी पृथ्वी का जीवन प्राण सूर्य, प्लूटो को अपने अस्तित्व भर की जानकारी देने वाला एक छोटा-सा दीपक भर लगेगा।

ऊपर की पंक्तियों में बृहस्पति की विशालता की उपलब्ध जानकारी का थोड़ा-सा अंश दिया गया है। अभी और भी बहुत कुछ ऐसा जानना, बताना शेष है जो उस विशाल ग्रह के वैभव को प्रकट कर सके।

यदि हमारी ही तरह ओछी बुद्धि का बृहस्पति ग्रह होगा तो सोचता होगा सौरमण्डल के सारे ग्रह उसकी धाक मानेंगे और पृथ्वी आदि ग्रहों पर रहने वाले प्राणी निरन्तर उसका नमन बन्दर करेंगे, पर ऐसा होता कहाँ है। हमें किसी के बड़प्पन या छोटे होने से क्या लेना देना हमारी अपने छोटेपन या बड़प्पन की समस्याएं ही क्या कम सिर दर्द है जो दूसरों का लेखा-जोखा लेने में माथापच्ची करें।

कल्पना की जा सकती है कि जिस प्रकार बृहस्पति का बड़प्पन हमें थोड़ा कौतूहल भर देता है उसके वैभव से हम तनिक भी प्रभावित नहीं है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति धन वैभव का प्रदर्शन करने के लिए खर्चीला ठाठ-बाठ बनाये और सोचे कि देखने वाले उसकी शान-शौकत देखकर अवाक् रह जायेंगे तो इस प्रकार का सोचना सर्वथा ओछेपन और बचकानापन ही कहा जायेगा। लोग अपने कामों में व्यस्त है हमें अपने महत्वपूर्ण कार्यों में उस शक्ति को नियोजित करने में लगा रहना चाहिए जो खर्चीला और बेकार का आडंबर बनाने में अकारण नष्ट होती रहती है।

इसी प्रकार विपत्तियों की भावी सम्भावनाओं की कल्पना करके हमें उद्विग्न होने की आवश्यकता नहीं है। काली घटाएँ आती है- घुमड़ती, गरजती हैं और हवा के प्रवाह से इधर से उधर छितराती चली जाती हैं। बरसती तो कोई-कोई और कभी-कभी ही हैं। अस्तु भविष्य की अनिष्ट सम्भावनाओं का विचार करके मानसिक सन्तुलन डगमगाने की कोई जरूरत नहीं है। कुछ वर्ष अष्टग्रही योग आया था। दैवज्ञ उसके कारण संसार पर आने वाली भयंकर विपत्तियों की भविष्यवाणी करते थे, पर वैसा कुछ हुआ नहीं। अभी भी सन् 75 में ऐसी ही अंतर्ग्रही ही विभीषिका की भविष्यवाणी की जा रही है। जिस पर यदि गम्भीरता से विचार किया जाय तो भयभीत होने का कारण विद्यमान है, पर वैसा करने से कुछ बनेगा नहीं।

खगोलशास्त्री जान गौरविन और स्टीवन प्लेजमान की संयुक्त रूप से लिखित पुस्तक ‘बृहस्पति का प्रभाव’ में सन् 1982 में सौरमण्डल की एक विशेष स्थिति होने का है।

लेखक द्वय ख्यातिनामा विज्ञानी है। गौरविन प्रख्यात ब्रिटिश पत्रिका ‘नेचर’ के सम्पादक है और प्लेजमान है गोडार्ड अन्तरिक्ष केन्द्र के अनुसन्धानकर्ता। वे बाजारू ज्योतिषियों की गणना में नहीं आते। इन लोगों का कहना है- सन् 82 में यूरेनस, नेपच्यून, प्लूटो जैसे दूरवर्ती ग्रहों समेत सौरमण्डल के अन्य ग्रह सूर्य के इर्द-गिर्द अपेक्षाकृत अधिक निकट एकत्रित हो जायेंगे इससे सूर्य की चुम्बकीय गतिविधियां बहुत बढ़ जायेंगी। उसके धब्बों से विशाल तूफान उठेंगे और सुविस्तृत ज्वालाओं की लपटें फैलेंगी। इसका भयंकर प्रभाव पृथ्वी पर पड़ेगा। रेडियो संचार व्यवस्था टूट जायगी। उत्तरी गोलार्ध में प्रकाश बहुत चमकेगा। गर्मी बढ़ेगी और ऊपरी सतह की हवाओं के रुख में भारी गड़बड़ी पैदा होगी। संसार के कितने ही भागों में भूकम्प होंगे और तूफान आयेंगे।

जो हो- अष्टग्रही योग चला गया। चला सन् 75 भी जायगा। विभीषिकाएँ आती और चली जाती हैं। उस ओर अधिक ध्यान न देकर यदि हम अपने सामने प्रस्तुत कार्यों में ही लगे रहें तो चिन्ता, आशंका ओर उद्विग्नता से सहज ही बचे रह सकते हैं। डरने की अपेक्षा करने में लगे रहना अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण हैं।


Quotation

शान्ति तुल्य तपो नास्ति नसन्तोषात्पर सुखम्। न तृष्णायाः परोव्याधिर्नच धर्मो दया परः॥

इस संसार में शान्ति के समान कोई अन्य तप नहीं है, सन्तोष से बढ़कर कोई सुख नहीं है। तृष्णा से बड़ी कोई दूसरी व्याधि नहीं हैं और दया के समान कोई धर्म नहीं है।


प्रकृति प्रतिकूलता को अनुकूल कैसे बनाया जाय

मनुष्य अपने बुद्धि-बल और पुरुषार्थ के अनुरूप सदा से यह प्रयत्न करता रहा है कि उसे अधिक अच्छी परिस्थितियाँ, सुविधाएँ तथा सम्पदाएँ प्राप्त होती चलें। इसके लिए उसने प्रकृति के भौतिक स्तर का ही स्पर्श किया है और तद्नुरूप थोड़ा-बहुत लाभ पाया भी है।

उसे यह ध्यान नहीं रहा कि प्रकृति का एक अध्यात्म पक्ष भी है। उसमें विकृति आने से दैवी आपत्तियाँ टूटती हैं और किये हुए सारे प्रयत्न देखते-देखते मटियामेट हो जाते हैं। प्रकृति का सूक्ष्म स्तर तब बिगड़ता है जब मनुष्य कृत चेतनात्मक विक्षोभ से पराप्रकृति का अन्तराल विषाक्त हो जाता है।

सतयुग के रामराज्य के वर्णन में यह बताया गया है कि उन दिनों प्रकृति अत्यधिक अनुकूल थी, समय पर वर्षा होती थी- वृक्ष, वनस्पतियाँ प्रसन्न होकर फलते थे, मनुष्य दीर्घजीवी थे, दूध-दही की नदियाँ बहती थीं दैवी प्रकोपों से किसी को कोई कठिनाई नहीं उठानी पड़ती थी। अकाल मृत्यु से लेकर महामारियों तक का कहीं अता-पता भी नहीं मिलता था। यह इसलिए होता था कि मनुष्यों की सद्भावनाएँ और सत्प्रवृत्तियाँ उत्कृष्ट उच्चस्तर की बनी हुई थीं।

कलियुग में तरह-तरह की दैवी विपत्तियों और विकृतियों की सम्भावना का पुराणों में जो पूर्व कथन मिलता है उसका एकमात्र आधार यही है कि जब मनुष्यों का रुझान दुष्कर्मों की ओर होगा तो उसकी प्रतिक्रिया प्रकृति के सूक्ष्म अन्तराल को विषाक्त बनायेगी। फलस्वरूप मनुष्यों को उनका प्रतिफल विपत्तियों के रूप में भुगतना पड़ेगा। सम्पत्तियाँ एवं सुविधाएं भले ही बढ़ जायं पर उन्हें शारीरिक मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक, अन्तर्राष्ट्रीय हर क्षेत्र में घोर विपत्तियों का सामना करना पड़ेगा। इस संकट को बढ़ाने का प्रकृति का प्रकोप भी कम योगदान नहीं देगा। कलियुग के सविस्तार भयावह वर्णन की पौराणिक भविष्यवाणियाँ इसी आधार पर है। हम देखते हैं कि वह पूर्व कथन सही होता चला आ रहा है। जिस क्रम में हम दुष्ट और भ्रष्ट बनने पर उतारू हैं उसी क्रम से प्रकृति के हण्टरों की मार दिन-दिन अधिक तीव्र एवं अधिक निर्दय बनती चली जा रही है।

प्रकृति की मौसम की अनुकूलता, प्रतिकूलता हमारी आर्थिक और शारीरिक परिस्थितियों को अत्यधिक प्रभावित करती हैं। वर्षा के न्यून अथवा अधिक होने पर पाला पड़ने, अन्धड़ चलने, तूफान, भूकम्प जैसे उपद्रव खड़े होने से कृषि, पशु पालन तथा अन्याय उद्योग धन्धों पर जो प्रभाव पड़ता है उसे कौन नहीं जानता। मौसम की असह्य प्रतिकूलता से कितने ही बीमार पड़ते हैं, कितने ही दम तोड़ देते हैं। दुर्भिक्ष, महामारी एवं अप्रत्याशित विपत्तियाँ लेकर मौसम की प्रतिकूलता जब सामने आती है तो प्राणियों को अत्यधिक कष्ट होता है। वृक्ष वनस्पतियाँ नष्ट हो जाती हैं और सर्वत्र त्राहि-त्राहि सुनाई पड़ती है। इसके विपरीत यदि मौसम अनुकूल हो तो आर्थिक और शारीरिक खुशहाली बढ़ने का भरपूर लाभ मिलता है।

सन् 71 के अक्टूबर मास में उड़ीसा के समुद्र तट पर तूफान ने जो कहर ढाया उसकी याद करके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कटक के समीपवर्ती क्षेत्र में उसने 7 हजार व्यक्तियों की बलि देखते-देखते लेली थी। 6 हजार वर्ग मील में बसी 50 लाख की जनसंख्या को उसने दयनीय दुर्दशा के गर्त में झोंक दिया था। एक अरब रुपये की सम्पत्ति बर्बाद हो गई। सात लाख मकान नष्ट हो गये। इसके पीछे एक ओर साथी जुड़ा हुआ था, गनीमत इतनी हुई कि वह पश्चिम बंगाल की ओर मुड़ गया। अन्यथा वह दूसरा रहा सहा विनाश पूरा करके उसे सर्वनाश की स्थिति तक पहुँचा देता है।

मियानी (फ्लोरिडा) की नेशनल हरीकेन रिसर्च लैबोरेटरी के डायरेक्टर डा.सेसिले गेन्ट्री के उन प्रयासों पर प्रकाश डाला है जो समुद्री तूफानों पर किसी कदर नियन्त्रण प्राप्त कर सकने में सफल हुए हैं। बादलों पर सूखी बरफ का चूर्ण गिराकर उन्हें हलका और दुर्बल बना दिया गया। डा. सिम्पसन ने सिल्वर आयोडाइड छिड़क कर तूफान को हल्का किया। तूफानों का उठना रोकने तथा दिशा बदलने में तो सफलता नहीं मिली, पर ‘सीडिंग‘ उद्योग शृंखला का यह परिणाम जरूर निकला कि चक्रवातों का वेग 31 प्रतिशत तक घटाया जा सका। विरास और निम्बये उपग्रह इस संदर्भ में इन दिनों कई तरह की जाँच पड़ताल कर रहे हैं ताकि इन सत्यानाशी तूफानों की उच्छृंखलता पर किसी प्रकार नियन्त्रण स्थापित किया जा सके।

‘साइक्लोन्स हाउ टू गार्ड अगेन्स्ट दैम’ पुस्तक में दिये गये विवरणों से विदित होता है कि भारत को समय-समय पर इन समुद्री तूफानों से कितनी क्षति उठानी पड़ती है। 16 अक्टूबर 1942 को बंगाल की खाड़ी में 140 मील प्रति घण्टा की चाल से एक ऐसा तूफान आया था जिसने कलकत्ता नगर को झकझोर कर रख दिया। भयंकर वर्षा हुई। ज्वार की लहरों ने 250 वर्ग मील सूखी जमीन को पानी से भर दिया। पानी की ऊँचाई 16 फुट तक जा पहुँची थी। करीब 15 हजार मनुष्य और 60 हजार पशु मरे।

अतिवृष्टि, अनावृष्टि भूकम्प आदि आदि की बात छोड़ कर केवल आँधी, तूफान की एक विपत्ति पर ही विचार करें तो प्रतीत होगा कि इस शताब्दी में उससे अति भयावह हानि उठानी पड़ी है। प्रगति के नाम पर हुए उपार्जन का एक बड़ा भाग इन अन्धड़ चक्रवातों ने निर्दयतापूर्वक उदरस्थ कर लिया है।

इस स्तर के अगणित अन्धड़ समुद्री क्षेत्र में इन दिनों आये दिन उठते रहते हैं और वे भारी विनाश उत्पन्न करते हैं। ये अन्धड़ प्रायः एक हजार से लेकर दो हजार किलो मीटर क्षेत्र का मौसम उद्विग्न कर देते हैं और अपने विकराल रूप से महाविनाश के लिए आगे बढ़ते हैं। कोई-कोई छोटे या बड़े भी होते हैं। हवा का वेग जब 60 किलोमीटर प्रति घण्टे से अधिक हो जाता है तो उसे तूफान कहते हैं। 85 किलोमीटर का वेग उग्र तूफान कहा जाता है। यह चक्रवात यदि समुद्र की परिधि में ही उठे और यहीं समाप्त हो जाय तो उससे उस क्षेत्र के जल जीवों एवं जलयानों को ही क्षति पहुँचती है, पर यदि वे थल क्षेत्र में घुस पड़ें तो फिर तटवर्ती क्षेत्रों में भयावह विनाश लीला प्रस्तुत करते हैं।

उष्ण कटिबन्ध में भूमध्य रेखा के उत्तर में जो हवाएँ चलती हैं उनका प्रवाह उत्तर पूर्व की ओर होता है और दक्षिण भाग का वायु प्रवाह दक्षिण पूर्व की ओर। इन दोनों के मध्य का जो शान्त क्षेत्र है उसमें चक्करदार हवा के चक्रवात उठते हैं। दक्षिण गोलार्ध में वे दक्षिणावर्त घूमते और उत्तरी गोलार्ध में वामावर्त।

हिन्द महासागर में अप्रैल, मई एवं नवम्बर, दिसम्बर के बीच उठने वाले चक्रवात विशेष रूप से प्रचण्ड होते हैं। वे साधारणतया प्रतिदिन 500 मील का सफर करते हैं और 150 किलोमीटर की पट्टी को प्रभावित करते चलते हैं। कुछ चक्रवात एक ही जगह डेरा डालकर बैठ जाते हैं, कुछ की चाल एक हजार मील प्रतिदिन की होती है।

विज्ञान इसके लिए प्रयत्नशील है कि इन आये दिन मनुष्य जाति को संत्रस्त करने वाले तूफानों के कारणों का पता लगाये और उनके निवारण का उपाय सोचे। इस दिशा में कुछ कार्य हुआ भी है और आशा दिलाई गई है कि इस प्रकृति असंतुलन पर भी भौतिक प्रयत्नों से विजय प्राप्त कर ली जायगी।

टेलीविजन और इन्फ्रारेड आवजर्वेशन सैट लाइट (टाइरोस) यन्त्र आकाश में उड़ाकर मौसम सम्बन्धी पूर्व जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न पिछले 13 वर्षों से किया जा रहा है। इन उपकरणों ने पिछले दिनों जो जानकारियाँ भेजी हैं उनसे यह आशा बंधी है कि निकट भविष्य में मौसम के परिवर्तनों की विशेषतया वर्षा एवं आँधी तूफानों की पूर्व जानकारी प्राप्त की जा सकेगी और उस आधार पर सम्भावित विपत्ति से बचने के लिए सुरक्षात्मक प्रयत्न कर सकना सम्भव हो सकेगा।

संसार का मौसम नियन्त्रण में रखने के लिए कुछ उपाय वैज्ञानिक जगत में विचाराधीन हैं। (1) आर्कटिक क्षेत्र की हिमि राशि पर कालिख पोत दी जाय ताकि इससे सौर ऊर्जा पर नियन्त्रण करके उत्तरी ध्रुव क्षेत्र को मानवोपयोगी बनाया जा सकेगा (2) समुद्र में जहाँ से अधिक बादल उठते हैं और अनावश्यक वर्षा करके बर्बादी प्रस्तुत करते हैं उन क्षेत्रों पर हेक्सडिकानोल जैसे रसायनों की परत जमा कर बादल बनना सीमित कर दिया जाय। ताकि अधिक वर्षा वाले क्षेत्र भी उपजाऊ हो सकें। (3) आर्कटिक क्षेत्र के नीचे धरती खोदकर उसमें 10 मेगाटन शक्ति के दस ऐसे हाइड्रोजन बम फोड़े जायं जो विषाक्त विकिरण से रहित हों। इससे 5 मील मोटा बर्फ का बादल आकाश में छितरा जायगा और पृथ्वी का मौसम अब की अपेक्षा थोड़ा और गर्म हो जायगा। (4) बेरिंग मुहाने पर 55 मील चौड़ा बाँध बनाकर आर्कटिक सागर के ठण्डे पानी को प्रशांत महासागर में मिलने से रोक दिया जाय।

सोचा जा रहा है कि यह योजनाएँ बड़ी तो हैं और खर्चीली भी, पर यदि मनुष्य को व्यापक पैमाने पर मौसम का नियन्त्रण करना है तो उतना बड़ा पुरुषार्थ भी करना ही होगा।

आखिर आँधी, तूफान आते क्यों हैं? उठते कहाँ से हैं? इनका उद्गम स्त्रोत कहाँ है? इन प्रश्नों का उत्तर विज्ञान ने अपने ढंग से प्रस्तुत किया है।

कहा गया है कि मौसम का निर्माण एवं परिवर्तन के चार प्रमुख आधार हैं-(1) सूर्य के द्वारा प्रेषित ऊर्जा का वातावरण पर पड़ने वाला प्रभाव (2) पृथ्वी के भ्रमण मार्ग में प्रस्तुत होते रहने वाले आधार (3) धरती से उठने वाले और सूर्य से गिरने वाले दबाव की प्रतिक्रिया (4) भूगर्भी एवं अन्तरिक्षीय प्रभावों से उत्पन्न विस्फोटीय उत्तेजना। इन चारों से मिलकर मौसम के उतार-चढ़ाव उत्पन्न होते हैं। सूर्य, वायु, पृथ्वी तथा अन्तरिक्ष की स्थिति के अनेकानेक ज्ञात-अविज्ञात कारण मिलकर मौसम का निर्माण करते हैं। कौन ऋतुएँ किन महीनों में होती हैं। वर्षा, सर्दी, गर्मी के दिन कब होते हैं यह मोटी जानकारी ही हमें प्राप्त है। किस अवधि में क्या घटना क्रम किस प्रकार घटित होगा इसे ठीक तरह से जान सकना अभी किसी के लिए भी सम्भव नहीं हुआ है।

पृथ्वी से 9 करोड़ 29 लाख मील दूर बैठा हुआ सूर्य पृथ्वी पर अपनी ऊर्जा का केवल दो अरबवाँ भाग भेजता है, पर वह भी प्रति मिनट 23 अरब हार्स पावन जितना होता है। यह ऊष्मा अत्यधिक प्रचण्ड है यदि वह सीधी धरती पर आती तो यहाँ सब कुछ जल भुन जाता। खैर इसी बात की है कि इस ताप का अधिकाँश भाग बादलों, समुद्री, ध्रुवीय हिमि शृंखलाओं और वायुमण्डल की विभिन्न परतों द्वारा सोख लिया जाता है। यह अवशोषण भी बहुत सन्तुलित है। सामान्य धरातल को जो सूर्य ताप प्राप्त होता है यदि उसमें 13 प्रतिशत और कमी किसी कारण हो जाय तो फिर सारी पृथ्वी एक मील ऊँची बर्फ की परत से ढक जायगी।

पच्छिम से पूर्व की ओर ध्वनि वेग से भी अधिक तेजी के साथ अण्डाकार कक्षा में परिक्रमा करती रहती है। उसकी धुरी 3॥ डिग्री झुकी हुई है। इससे सूर्य किरणों तिरछी पड़ती हैं इससे न केवल सौर ऊर्जा में वरन् जल प्रवाहों और हवाओं की संचरण प्रक्रियाओं में भी अन्तर पड़ता है। मौसम बदलते रहने का यह भी एक बड़ा कारण है।

पृथ्वी की गति को बदलना उनकी कक्षा में परिवर्तन लाना सूर्य को अमुक, अमुक मात्रा में ऊर्जा भेजने के लिए विवश करना आज के तथाकथित विकासमान विज्ञान को अति कठिन मालूम पड़ता है। इतनी ऊँची बात जाने भी दी जाय और ऐसा भर सोचा जाय कि मौसम की सामयिक परिस्थितियों की ही थोड़ी रोकथाम कर ली जाय तो वह भी इतना अधिक भारी प्रतीत हाता है कि बार-बार उतना कर सकना सम्भव ही न हो सकेगा।

यदि सारी दुनिया की हवा इच्छानुसार चलाई जाय तो इसके लिए प्रतिदिन दस लाख परमाणु बम फोड़ने से उत्पन्न हो सकने जितनी शक्ति जुटानी पड़ेगी। समस्त वायुमण्डल के तापक्रम में एक अंश सेन्टीग्रेड गर्मी और बढ़ानी हो तो डेढ़ हजार अणुबम फोड़ने होंगे। एक मामूली सा तूफान रोकना हो तो उसके लिए एक मेगाटन ऊर्जा की आवश्यकता पड़ेगी। इतनी ऊर्जा

जुटाकर प्रकृति से लड़ सकना और उसे वशवर्ती बना सकना विज्ञान के लिए कब और कैसे सम्भव हो सकेगा यह कोई नहीं कह सकता।

शरीर का स्वास्थ्य ठीक बनाये रखने के लिए मानसिक स्वास्थ्य को सुधारना आवश्यक है, इस तथ्य पर विज्ञान बहुत दिन बाद अब आकर पहुँचा है। इससे पूर्व शरीर और मानसिक स्वास्थ्य को पृथक-पृथक मानकर उनके सम्बन्ध में सोचा जाता रहा है। अब अनेक शोधों ने यह सत्य प्रकट कर दिया है कि शरीर को निरोग रखना हो तो मन की निरोगता संभालना आवश्यक है। बिलकुल यही तथ्य परा और अपरा प्रकृति के सम्बन्ध में लागू होता है। विज्ञान की पहुँच जिस स्थूल प्रकृति तक है वह सब कुछ नहीं है। उसके अन्तराल में सूक्ष्म प्रकृति काम करती है जो चेतना है। उनकी परिशुद्ध इस बात पर निर्भर है कि संसार में सद्भाव सम्पन्न वातावरण संव्याप्त हो। सतयुग में ऐसी ही स्थिति के फलस्वरूप स्थूल प्रकृति शान्त और सन्तुलित रहती थी और संसार में सुखद प्रकृति अनुकूलता बनी रहती है।

स्थूल प्रकृति को अनुकूल बनाने के लिए-मौसम को नियन्त्रण में रखने के लिए जितने खर्चे की जितने पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ेगी, उसका लाखवाँ भाग भी यदि सूक्ष्म प्रकृति को शान्त सन्तुलित रखने के लिए, सदाशयता पूर्ण वातावरण बनाने के प्रयत्न में लगाया जाय तो मनुष्य पारस्परिक सद्-व्यवहार करेगी। कलियुगी प्रचलन को यदि सतयुग की रीति-नीति में बदला जा सके तो मौसम ही नहीं वातावरण का हर भाग बदल जायगा और विक्षोभ के स्थान पर मंगलमय उल्लास बिखरा दिखाई पड़ेगा। संसार के मूर्धन्य व्यक्ति न जाने क्यों इस तथ्य पर ध्यान नहीं देते।


अपनी औकात के अनुसार खर्च (kahani)

यदि कोई अत्यन्त अनिवार्य आपत्ति ही सामने न खड़ी हो जाय तो कर्ज लेकर ऐश आराम के साधन जुटाना और बैठे ठाले गुलछर्रे उड़ाना एक भोंड़ी किस्म का पाप है। कर्ज लेने का आदी मनुष्य अपव्ययी ही नहीं अविवेकी और अविश्वस्त भी होता है। बच्चों को मितव्ययिता की शिक्षा आरम्भ से ही देना माता पिता का कर्तव्य है। फिजूल खर्च लड़कों की नादानी में अक्सर उनके बाप भी दोषी होते हैं जिन्होंने लाड़ प्यार के बहाने बच्चों की आदतें बिगाड़ ने में सहायता दी।

मिश्र के बादशाह फारुख को कर्ज खोरी से बहुत चिढ़ थी वे चाहते थे हर आदमी अपनी औकात के अनुसार गुजर-बसर करे और दूसरों के सामने उधार के लिए गिड़गिड़ा कर अपनी हेठी न कराएँ। उन्होंने एक ऐसा कानून बनाया था जिसके अनुसार कर्ज लेने वाले को महाजन के पास अपना बाप गिरवी रखना पड़ता है और जब तक कर्ज अदा न हो जाय बाप को महाजन के यहाँ गुलाम की तरह काम करना पड़ता था। इस जलालत से बचने के लिए हर बाप ने अपने बेटों को मितव्ययी बनाने का पूरा ध्यान रखना आरम्भ कर दिया था और बेटे भी बेइज्जती से बचने के लिए आरम्भ से ही अपनी औकात के अनुसार खर्च करना सीखे थे।


अपनों से अपनी बात - प्रगतिशील रामायण शिक्षा के लिए आमन्त्रण

15 मई से रामायण−प्रवचन का जो विशेष प्रशिक्षण क्रम शान्ति−कुँज में आरम्भ हुआ है उसे मात्र कथा वाचकों एवं प्रवचन कर्त्ताओं के उपयोग की बात नहीं वरन् सर्वसाधारण को पारिवारिक नव−निर्माण की आवश्यकता मानकर चलना चाहिए और उसका लाभ हर किसी को उठाना चाहिए।

घर, परिवार में नैतिक शिक्षा का समावेश आवश्यक है। इसके लिए नियमित प्रशिक्षण क्रम चलते रहना चाहिए। यह कार्य सूखे उपदेश आये दिन झाड़ते रहने से बात नहीं बनती। वे कभी−कभी ही अच्छे लगते हैं, पर नैतिक प्रशिक्षण तो नित्य कर्म में सम्मिलित रहने की आवश्यकता है। यह रुचिकर तभी हो सकता है जब उसका स्वरूप धार्मिकता से जुड़ा हो और रुचिकर रहे। यह दोनों ही आवश्यकताएं रामायण कथा से पूरी होती है। सूर्यास्त के बाद एक घण्टा रोज रामायण कथा होती रहे तो उसमें घर के सब लोग रुचिपूर्वक सम्मिलित रह सकते हैं, साथ ही पड़ौस के लोग भी उसे सुनने आ सकते हैं। कहना न होगा कि रामायण में वे सभी तत्व मौजूद हैं जो जनमानस को परिष्कृत करने की− व्यक्ति, परिवार और समाज के अभिनव निर्माण की− बौद्धिक नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति की− आवश्यकता पूरी कर सके। अब तक रामायण को नाम जप एवं भक्ति विडम्बना का आधार बना कर रखा जाता है और उसके सहारे परावलम्बन ही− दीनता, दासता की प्रतिगामी शिक्षा दी जाती रहती है। कथन श्रवण का पुण्य फल गाया जाता रहा है, पर अब उस महासागर में से प्रगतिशील मणिमुक्तक ढूँढ़ निकाले गये हैं और वे आधार प्रस्तुत कर दिये गये हैं जिनके सहारे जन−मानस के नव−निर्माण का प्रयोजन भली प्रकार पूरा किया जा सकता है।

रामायण सम्बन्धी प्रस्तुत शोधकार्य को अपने ढंग का अनोखा एवं अभूतपूर्व ही ही कहा जा सकता है। इस संदर्भ में कुछ पुस्तकें छाप दी गई है और कुछ लिखने, छापने का क्रम चल रहा है। आशा की जानी चाहिए कि वे प्रगतिशील प्रतिपादन कुछ ही दिन में सर्वसाधारण के लिए सुलभ हो जायेंगे और उनका समुचित उपयोग करके नव−निर्माण के लिए एक और नया आधार उपलब्ध कर लिया जायगा।

हममें से प्रत्येक को अपने घरों में− मुहल्ले, गाँव में रामायण कथा प्रसंग’ करने चाहिए। जहाँ सम्भव हो वहाँ विशिष्ठ समारोहों, आयोजनों के माध्यम से भी इस आधार पर लोक−शिक्षण के नये प्रयास आरम्भ करने चाहिये।

यह शिक्षा किस प्रकार की जाय? रामायण का अध्ययन कथा वाचन एवं प्रवचन क्रम किस प्रकार चले इसी विधिवत् शिक्षा करने के लिए पिछले वानप्रस्थ−सत्रों को अब नये रामायण शिक्षण क्रम के रूप में बदल दिया गया। समय डेढ़−डेढ़ महीन का रख दिया गया है। इस अवधि में जो शिक्षण दिया जायगा उसके आधार पर शिक्षार्थी रामायण का कुशल प्रवक्ता बन जायगा ऐसी आशा की जा सकती है। वह अपने घर, परिवार, मुहल्ले, गाँव में कथा प्रसंग आरम्भ कर सकेगा और आवश्यकतानुसार बड़े आयोजनों में भी अपनी भाषण शैली एवं प्रतिपादन प्रक्रिया से सुनने वालों में नवजीवन संचार कर सकेगा। अपने स्वयं के ज्ञान संवर्धन एवं अनेकानेक जिज्ञासाओं के समाधान की दृष्टि से तो यह नितान्त उपयोगी होगा ही।

इन सत्रों की एक विशेषता यह भी है कि चौपाई, दोहे एवं कीर्तन को वाद्य यन्त्रों के सहारे भी कह सकने का शिक्षण जोड़ दिया गया है। यों डेढ़ महीना संगीत शिक्षा की दृष्टि से बहुत ही कम समय है फिर भी यह प्रयत्न किया जायगा कि जिनका गला ठीक है और जिनमें संगीत सम्बन्धी थोड़ी बहुत भी पकड़ है वे हारमोनियम, तबला, ढोलक, ढपली, मजीरा, घुंघरू, चिमटा, इकतारा आदि वाद्य यन्त्रों के सहारे कथा वाचन को और भी अधिक आकर्षक बना सकने में सफल हो सकें।

रामायण कथाओं के अन्त में गायत्री यज्ञ भी होते हैं अस्तु उसकी शास्त्रीय विधि व्यवस्था सिखा देना भी इसी सत्र शिक्षा का एक अंग है।

राम चरित्र और कृष्ण चरित्र के माध्यम से धर्म और नीति के दोनों पहल जन−मानस में अत्यन्त सरलता और कुशलतापूर्वक प्रतिष्ठापित किये जा सकते हैं। जीवन दर्शन के यह दोनों ही पक्ष अपने आप में अति महत्वपूर्ण हैं। दोनोँ एक दूसरे के पूरक हैं। एक पक्षीय चिन्तन अपूर्ण और असन्तुलित रहता है। तत्वदर्शी महामनीषियों ने भगवान राम और भगवान कृष्ण के चरित्र को इन्हीं दोनों तत्वों के व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया है। यों उन दिव्य चरित्रों में क्षेपकों का भी दुखद सम्मिश्रण भी कम नहीं हुआ और उनकी प्रखरता धूमिल भी कम नहीं हुई है। तो भी उनके उज्ज्वल पक्ष इतने तेजस्वी हैं कि इतने से भी भारत की धर्म रुचि वाली विकसित जनता को बहुत कुछ सिखाया जा सकता है। संस्कृति के आकाश में चमकने वाले इन सूर्य चन्द्र के धवल चरित्र पर लगाये गये ग्रहण को हटाये जाने और यथार्थता सम्मुख रखकर डगमगाती लोकश्रद्धा को यथा स्थान रखना भी आवश्यक हो गया था।

रामायण पर अभी काम हो रहा है उसका विद्यालय क्रम चल पड़ा। अब कुछ ही समय पश्चात भागवत को भी हाथ में लिया जा रहा है और कृष्ण चरित्र को भी उसी प्रकार आज की युग समस्याओं को सुलझाने में प्रकाश स्तम्भ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। अपने शिक्षा क्रम में कुछ दिन बाद उसका भी समावेश हो जायेगा। राम चरित्र को, तुलसीकृत रामायण, बाल्मीक रामायण, अध्यात्म रामायण, विनय पत्रिका आदि के सहारे संकलित किया गया है। कृष्ण चरित्र यो भागवत प्रधान होगा पर उसमें महाभारत, गर्ग संहिता एवं विभिन्न पुराणों में बिखरी हुई सामग्री का भी समन्वय किया जायगा। अन्धश्रद्धावश लकीर पीटना नहीं वरन् समुद्र मंथन करके बहुमूल्य रत्नों को ढूँढ़ निकालना अपने प्रयत्नों का लक्ष्य रहा है। उसी आधार पर रामायण और भागवत को− राम चरित्र और कृष्ण चरित्र को लोक−निर्माण की उपयुक्त प्रेरणाएं दे सकने योग्य स्थिति में रखा जाना है। इसे उसी प्राचीन दृष्टिकोण का पुनरावर्तन कहना चाहिए जिसके आधार पर पूर्ववर्ती महामनीषियों ने इन चरित्रों की संरचना की थी।

लोक−शिक्षण की दृष्टि से यह दोनों ही कथाएं एक दूसरे की पूरक रहकर अपने युग को दिशा दे सकने वाली सिद्ध होगी। अभी रामायण को ही हाथ में लिया गया है और आशा की गई है कि अखण्ड−ज्योति परिवार के सभी प्रबुद्ध सदस्य, आत्म−निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के इस आधार में पूरी रुचि लेंगे और छह सप्ताह का समय किसी प्रकार निकाल कर इस प्रशिक्षण में सम्मिलित होने की तैयारी करेंगे। यों रामायणी कथा वाचक अच्छी खासी आजीविका भी कमा रहे हैं, पर अपना प्रयोजन इस प्रकार के व्यवसायी उत्पन्न करना वरन् इस महान तत्व दर्शन को− समझने समझाने में समर्थ युग उद्बोधक, लोकनायक उत्पन्न करना है। इसके लिए उपयुक्त क्षमता अपने में उत्पन्न करने के लिए इन शिक्षणों में सम्मिलित होना अतीव उपयोगी सिद्ध होगा। आवश्यक नहीं कि इस प्रकार के कथावाचक के लिए कहीं दूर जाना ही पड़े। घर, परिवार को− गाँव, मुहल्ले को अपना प्रचार क्षेत्र बनाकर व्यस्त से व्यस्त व्यक्ति भी लोक−शिक्षण की दिशा में बहुत कुछ योगदान दे सकता है। रामायण सत्र की शिक्षा प्राप्त कर लेने वाले ही अगली बार भागवत शिक्षा सत्रों में प्रवेश पा सकेंगे।

इस संदर्भ में जिन नर−नारियों की रुचि हो और उनकी शिक्षा इस कार्य के लिए समुचित हो, वे उपरोक्त प्रशिक्षण के लिए अपने नाम, पता, आयु, शिक्षा एवं शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य ठीक होने की जानकारी देते हुए आवेदन पत्र भेज सकते हैं। सत्र लगातार चलेंगे अभी फिलहाल में (1) 15 मई से 30 जून तक (2) 1 जुलाई 15 अगस्त तक और 16 अगस्त से 30 सितम्बर तक के तीन सत्रों की घोषणा की गई है। आवेदन इन्हीं सत्रों के लिए आने चाहिए, वैसे प्रयत्न यह है कि यह शिक्षण व्यवस्था स्थायी कर दी जाय।

महिला जागरण अभियान के लिए अधिक सक्रियता का आह्वान-

महिला जागरण अभियान की उपयोगिता और आवश्यकता अखण्ड−ज्योति परिजनों ने गम्भीरतापूर्वक समझी है और उस दिशा में उत्साहवर्धक प्रयास आरम्भ किये हैं, यह प्रसन्नता की बात है। आशा की जानी चाहिए कि अपना छोटा परिवार इस पुण्य प्रक्रिया को अपने छोटे क्षेत्र में इतना शक्तिशाली बना देगा जिसका प्रभाव अनायास ही व्यापक होता चला जाय।

महिला समस्या भारत में तो अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में है ही− तथाकथित प्रगतिशील देशों में भी उसका विकृति स्वरूप और भी अधिक भयावह है। यह एक अन्तर्राष्ट्रीय विश्व−व्यापी समस्या है जिसका समाधान किये बिना मनुष्य जाति का एक आधा अंग−अपंग बना पड़ा रहेगा और दूसरे अंग के लिए समुन्नत स्थिति में रह सकना सम्भव न रहने देगा। इस समस्या की उपेक्षा करना मानवी भविष्य को सदा सर्वदा के लिए अन्धकारमय बनाये रखने का समर्थन करना ही होगा। हममें से प्रत्येक को अपने युग की इस महती समस्या के समाधान में पूरी तत्परता के साथ योग देना चाहिए।

महिला जागरण अभियान को अगले दिनों जिस विश्व−व्यापी भूमिका का सम्पादन करना है, उसे देखते हुए परिजनों को कुछ अधिक सोचना और कुछ अधिक करना होगा। उपेक्षापूर्वक ज्यों−ज्यों करके चिन्ह पूजा जैसे हलके फुलके कदम बढ़ाने से इतनी बड़ी आवश्यकता की पूर्ति नहीं हो सकती। इसके लिए अधिक जीवट और अधिक हिम्मत जुटानी पड़ेगी। अधिक समय देना और अधिक श्रम करना पड़ेगा। अधिक त्याग करने और अधिक उदात्त बनने की आवश्यकता होगी। इसके लिए अपना प्रगतिशील परिवार भी तैयार न हो सकेगा तो फिर और किससे क्या आशा की जाय सकेगी और युग की विकृतियों से जूझने और समय की पुकार पूरा कर सकने वाले सृजनात्मक कदम बढ़ाने के लिए समय−समय पर अखण्ड−ज्योति परिवार के सदस्यों को ही पुकारा जाता रहा है और उन्हें ही अग्रिम मोर्चे पर खड़ा होने के लिए धकेला जाता रहा है। इस दिशा में− उत्साह वर्धक कूच जिस गति से होता रहा है, उस पर चाहें तो हम लोग संतोष ही नहीं गर्व भी कर सकते हैं। अब कुछ ही कदम उठाने बाकी थे सो उठा लिये गये हैं इन प्रयासों की सफलता को उस मंजिल तक पहुँचाया जाना चाहिए, जहाँ से इन प्रवृत्तियों को स्वसंचालित स्थिति द्वारा अपने ही बलबूते विश्व−व्यापी बनने का अवसर मिल जाय।

महिला जागरण अभियान का प्रथम लक्ष्य संगठन का ढाँचा खड़ा करना है। इसके बाद उन संगठनों को अपने−अपने यहाँ साप्ताहिक सत्संगों का क्रम नियमित रूप से चालू कर देना होगा। यहाँ इतनी सी बात बन पड़े, समझ लेना चाहिए वहाँ आशाजनक शुभारम्भ हो गया।

इस दिशा में अभी थोड़े ही परिजनों ने उत्साह दिखाया है। उतने से प्रसन्नता तो है, पर सन्तोष नहीं। सन्तोष तब होगा जब कुछ अपवाद ही असमर्थता व्यक्त करने वाले दिखाई दें। शेष सभी समर्थ परिजन इस प्रयास में अपना उत्साहवर्धक योगदान देते हुए दिखाई पड़े।

जहाँ जितनी अखण्ड−ज्योति पहुँचती है उसके सदस्यों में यह हलचल तत्काल आरम्भ होनी चाहिए कि सबसे पहले उन्हें ही अपने−अपने घरों की उत्साही महिलाओं को संगठन की सदस्या बनाकर संगठन का ढाँचा खड़ा करना है। शाखा कार्यालय का स्थान, कार्यवाहक का चुना, अपने−अपने पक्ष के कराने की खींच−तान करके अधिक सुविधा एवं अधिक पात्रता को ध्यान में रखकर करना चाहिए। आगे साप्ताहिक सत्संगों का क्रम चलना है। वे आरम्भ में एक नियत स्थान पर ही हों पीछे अदलते बदलते भी विभिन्न घर, परिवारों में किये जा सकते हैं। आरम्भ में सत्संग की परिस्थिति उत्पन्न करने का प्रशिक्षण करना होगा। इसके लिए कुछ दिनों ‘रिहर्सल’ कराये जायं। जो महिला अग्रणी हों उन्हें इकट्ठा करके आवश्यक प्रशिक्षण एवं मार्ग−दर्शन तब तक करते रहना पड़ेगा जब तक वे अपने पाँवों खड़ी होकर सत्संग का क्रम स्वयं ही चला सकने योग्य न बन जायं।

अखण्ड−ज्योति परिवार के सभी सदस्य अभियान के ‘सहायक सभ्य’ बने और अपने घरों की महिलाएं ‘सदस्य’। इसलिए दोनों ही प्रकार के प्रतिज्ञा पत्रों तथा प्रमाण पत्रों वाली 25-25 पृष्ठों की सदस्य पुस्तकें छाप दी गई हैं। इन्हें आवश्यकतानुसार मँगा लेना चाहिए और उन पर हस्ताक्षर कराते हुए प्रमाण पत्र देते हुए पुरुषों और स्त्रियों की सदस्यता नियमित बना लेनी चाहिए। पीछे शाखा स्थान और कार्यवाहक की नियुक्ति होनी है। इस कार्य के लिए कुछ उत्साही परिजन स्थापना की जिम्मेदारी आगे बढ़कर स्वयं संभालें। टोली बनाकर निकलें− परिवार के सभी सदस्यों का दरवाजा खटखटाएं और उन्हें इसमें सहयोग देने के लिए उनसे पूरा आग्रह करें। जहाँ इतना बन पड़ेगा वहाँ शाखा स्थापना का प्रथम चरण निश्चित रूप से पूरा होकर रहेगा।

महिलाओं पर सब कुछ छोड़ दिया जाय और पुरुष पृथक रहें और निश्चिन्त रहें तो गाड़ी तनिक भी आगे न बढ़ सकेगी। आज स्त्रियाँ इस स्थिति में नहीं हैं कि वह इस प्रकार के सार्वजनिक प्रचलन बिना पुरुषों की सहायता के अपने बलबूते चला सकें। ऐसी प्रगतिशील नारियाँ होंगी तो सही, पर उन्हें अपवाद ही कहना चाहिए। पर्दे की पीछे रहकर सूत्र संचालन पुरुष न करेंगे तो कहीं भी कुछ काम न बन सकेगा। अब तक युग−निर्माण शाखाओं तथा अन्य यज्ञ, सम्मेलन आदि कार्यक्रमों की जिस उत्साह से व्यवस्था जुटाई जाती रही है, उसी तत्परता से महिला जागरण संगठन का ढाँचा खड़ा करना होगा। अखण्ड−ज्योति परिवार का एक भी सदस्य ऐसा न बचे जिस पर लाँछन लगाया जाय कि अमुक ने अपने घर को− उत्साही नारियों को आगे बढ़ाने में उपेक्षा बरती− उत्साह नहीं दिखाया। संगठन का उदय अपने घरों से ही होना चाहिए। इसके बाद ही यह हो सकेगा कि पास−पड़ौस या प्रभाव क्षेत्र से भी खिंचकर महिलाएं उसमें सम्मिलित होती चली जायं। शाखा संगठन जब तक अपने आप साप्ताहिक सत्संगों की व्यवस्था भली प्रकार न चलाने लगें तब तब उसका सूत्र संचालन पैनी दृष्टि रखते हुए करते रहना चाहिए। उसके लिए आवश्यक परिस्थितियाँ बनाने और अभीष्ट साधन जुटाने का उत्तरदायित्व अपने ही कन्धों पर रखना चाहिए।

महिला जागरण अभियान के उद्देश्य, स्वरूप एवं कार्यक्रम को समझाने वाली 20 प्रचार पुस्तिकाओं का एक सैट छापा गया है। इस प्रचार सैट का मूल्य 2) है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि प्रत्येक ‘सभ्य’ और ‘सदस्य’ इसका एक एक सैट खरीद लें और जहाँ भी अपनी पहुँच हो वहाँ उसे पढ़ाने, सुनाने का उत्साहपूर्वक प्रयत्न करें। यह सैट पुरुषों के पढ़ने योग्य भी है और स्त्रियों के भी। अस्तु अपने प्रभाव क्षेत्र के पुरुषों और स्त्रियों में इसे अधिकाधिक प्रचारित किया जाना चाहिए। अभियान क्यों है− क्या है− इसे किस लक्ष्य तक पहुँचाना है इसकी जानकारी इस प्रचार सैट को अधिकाधिक व्यापक बनाने से ही सम्भव है। प्रभाव क्षेत्र, कार्यक्षेत्र बढ़ाने के लिए यह सैट हम सबके पास रहें और उसका पढ़ाना− सुनाना पूरे उत्साह के साथ जारी रहे। कुछ समय के लिए अपना झोला पुस्तकालय प्रधानतया इसी धुरी पर घूमना चाहिए और चेष्टा करनी चाहिए। उसे कम से कम बीस नर−नारियों को तो पढ़ा सुनाकर ही दम लिया जाय।

संगठन की आरम्भिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए कुछ वस्तुओं की अनिवार्य रूप से आवश्यकता होगी। इसके लिए पैसे की भी जरूरत पड़ेगी। इसमें 100) की राशि तो सहज ही लग सकती है। यह चन्दा भी अपने लोगों को ही आपस में मिल−जुलकर कर लेना चाहिए। साप्ताहिक हवन के उपकरण तथा आरम्भ करने की आवश्यकता पूर्ति का साहित्य आदि खरीदने ही चाहिए। (1) सभ्यों और सदस्यों की सदस्य पुस्तकें (2) चन्दा वसूल करने की रसीद बही (3) साइन बोर्ड (4) सीने पर लगाने के अभियान के बिल्ले (5) प्रचार सैट सदस्यों की संख्या के बराबर (6) साप्ताहिक सत्संग में काम आने वाली नई संक्षिप्त हवन विधि, सहगान, कीर्तन, रामायण, परायण, संस्कार−पद्धति, सत्यनारायण कथा जैसी छोटी−छोटी पुस्तकें अभी−अभी ही छपी हैं। इनकी भी सत्संगों के लिए आवश्यकता पड़ेगी।

यह सभी वस्तुएं बहुत सस्ती हैं साथ ही भारी भी। इन्हें डाक से मँगाने से बहुत अधिक खर्चा बैठता है, अस्तु किसी हरिद्वार आते−जाते के हाथों ही इन्हें मंगाना चाहिए। टीन का साइन बोर्ड और बिल्ले तो डाक से जा ही नहीं सकते। शाखा के कोष में कुछ पैसा होगा तो ही इन वस्तुओं काँ मँगाया जा सकना− साप्ताहिक सत्संग के उपकरण तथा निकट भविष्य में प्रौढ़ पाठशाला चलाने का उपक्रम बन सकेगा। अस्तु स्थापना के साथ−साथ ही अर्थ संग्रह भी पूरा करते चलना चाहिए।

संगठन का स्थानीय क्रिया−कलाप ठीक तरह चल सके इसका नेतृत्व कर सकने वाली एक कुशल महिला शान्ति−कुँज में प्रशिक्षण के लिए भेजनी चाहिए। इसके लिए तीन महीने का पिछला कार्यक्रम कम था। अब उसे छः महीने कर दिया है। कन्याओं का शिक्षण एक वर्ष रखा गया था, पर अब उसे भी घटा कर छः महीने कर दिया गया है। महिलाओं और कन्याओं का प्रशिक्षण अब छः−छः महीने का ही रहा करेगा। कन्याएं भी बहुत छोटी या बहुत पढ़ी नहीं ली जायेंगी। उन्हें कुछ अधिक समझदार होना चाहिए ताकि संगठन के संचालन में योगदान दे सकें। न्यूनतम शिक्षा आठवीं कक्षा की होनी चाहिए। कम पढ़ी लड़कियों तथा महिलाओं के पल्ले प्रस्तुत शिक्षण में से कुछ पड़ता नहीं है। व्यर्थ ही उनका और हमारा समय नष्ट होता है। इसलिए जिन्हें अभीष्ट प्रयोजन के उपयुक्त समझा जाय उन्हीं चैतन्य प्रकृति की कन्याओं एवं महिलाओं को हरिद्वार भेजा जाय।

मार्च के अंक में हरिद्वार की कन्या और महिला प्रशिक्षण योजना का विस्तृत विवरण छपा है। उनमें इतना संशोधन कर लिया जाय कि अब महिलाओं और कन्याओं का प्रशिक्षण काल छह-छह महीने ही रहेगा और दोनों का पाठ्यक्रम एक ही रहेगा। जहाँ भी शाखा संगठन स्थापित हों वहाँ कुछ प्रशिक्षण मार्गदर्शिका रह सकें इसके लिए हमें अपने घरों की लड़कियों तथा महिलाओं को भेजने की बात सोचनी चाहिये।

आरम्भिक सूत्र संचालन में पुरुषों की अधिक प्रखर भूमिका की आवश्यकता है, पर पीछे तो महिलाएं स्वयं ही अपने प्रयास की बागडोर संभालेंगी। इसलिये सार्वजनिक क्षेत्र में अधिक उत्साह में प्रवेश करने के लिये उन महिलाओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, जिनके ऊपर बच्चों का उत्तरदायित्व नहीं है या हलका है। अधिक बच्चों वाली गृहस्थी के बोझ से अधिक लदी हुई महिलाएं अधिक समय नहीं दे सकती। अधिक आवश्यकता उनकी है जिन पर उत्तरदायित्व नहीं अथवा कम है। ऐसी महिलाओं के समय का, क्षमता का, उत्साह का, लाभ पिछड़े हुए महिला समाज को ऊँचा उठाने में लगना चाहिए। नजर दौड़ाने पर अपने ही क्षेत्र में ऐसी कई अविवाहित, विधवा, परित्यक्त अथवा उत्तरदायित्वों से निवृत्त महिलाएं मिल सकती हैं। उनमें उत्साह पैदा किया जाय और दिशा दी जाय तो उनकी क्षमताओं का उपयोग नारी उत्कर्ष की युग पुकार पूरी करने में हो सकता है। जिस प्रकार पिछले दिनों लोक−मंगल के विविध प्रयासों में पुरुष बढ़−चढ़कर त्याग, बलिदान प्रस्तुत करते रहें अब उसी स्तर के सत्साहस दिखाने की महिलाओं को भी प्रेरणा मिलनी चाहिए और उन्हें भी अनुकरणीय आदर्श उपस्थिति करने चाहिए।

महिला जागरण मासिक पत्रिका 1 जुलाई से अपने ही युगान्तर चेतना प्रेस में शांतिकुंज से प्रकाशित होने जा रही है। उसके द्वारा अभियान का विश्व−व्यापी सूत्र संचालन होना है। उसे मँगाना शाखाओं के लिए तो अनिवार्य है ही− साथ ही जिन्हें भी इस अभियान में दिलचस्पी हो− जो उसे समझने और उसे सहयोग देने के इच्छुक हों उन्हें अपने लिये इस पत्रिका को मँगाना आवश्यक है जिन्हें सदस्य बनना हो वे अपने नाम इसी महीने भेज दें ताकि उतनी ही संख्या में पत्रिका छपाई जाय। वार्षिक चन्दा छह रुपया है। मार्च के अंक में बारह रुपया वार्षिक चन्दे की घोषणा की गयी थी, किन्तु परिजनों पर अधिक आर्थिक दबाव न पड़े इसलिए अब उसे घटाकर छह रुपया ही कर दिया गया है।

महिला जागरण अभियान अब तक के अपने प्रयास में सबसे बड़ा प्रयास है− अब तक उठाये गये कदमों में सबसे बड़ा कदम है− इसलिए उसमें अखण्ड−ज्योति परिवार के प्रत्येक सदस्य से अब तक के सहयोग की तुलना में सबसे अधिक सहयोग देने की अपेक्षा की गई है। इसी के आह्वान आमन्त्रण इन पंक्ति यों के साथ आग्रहपूर्वक भेजा जा रहा है।


आज विश्व में ऊंचा कर दो!

(बाबूलाल जैन “जलज”)


आज विश्व में ऊंचा कर दो!

(बाबूलाल जैन “जलज”)

आज विश्व में ऊंचा कर दो, भारत मां का भाल।अंधकार अज्ञान हटा दो, लेकर ज्ञान मशाल।।

खेतों में नव मेंड़ें बांधो।उच्च लक्ष्य जीवन का साधो।।दूर हटाओ आस-पास का–कूड़ा-कचरा-कीचड़-कांदो।।

स्नेह-दीप से जगमग कर दो; घर-आंगन चौपाल।आज विश्व में ऊंचा कर दो, भार मां का भाल।।

आंधी-पानी की गति मोड़ो।मानवता से नाता जोड़ो।।होंगे सफल मनोरथ पूरे–कल पर कोई काम न छोड़ो।।

पाटो खेत विषमताओं के, लेकर हाथ कुदाल।आज विश्व में ऊंचा कर दो, भारत मां का भाल।।

देश-भक्ति का करो न सौदा।रौंदो नहीं प्रेम का पौधा।।करो नहीं तैयार भूलकर–आत्म-शान्ति का कुटिल मसौदा।।

समता के आंगन में नाचो, दे देकर नव ताल।आज विश्व में ऊंचा कर दो, भारत मां का भाल।।

धरती अपनी अम्बर अपना।आज भगीरथ सा तप करना।।निज प्राणों की आहुति देकर–दिव्य देश का गौरव रखना।।

आज तुम्हारा मुंह निहारते, बड़े-बड़े दिग्पाल।आज विश्व में ऊंचा कर दो, भारत मां का भाल।।

लेकर अपना ज्ञान नगीना।ऊंचा मस्तक चौड़ा सीना।।आज धरा को स्वर्ग बना दो–बहा-बहाकर खून पसीना।।

जग जाहिर है पास तुम्हारे, सत्य अहिंसा ढाल।आज विश्व में ऊंचा कर दो, भारत मां का भाल।।

*समाप्त*