दुख और सुख-सहोदर सहचर

समझा जाता है कि सुख और दुख परस्पर विरोधी है। एक को दूसरा काटता है। सुखी और दुखी दो विपरीत स्थिति के व्यक्ति है। पर गहराई से विचार करने पर दूसरी ही बात सामने आती है। चिन्तन बताता है कि दुख नग्न सत्य है सुख तो उसका सुसज्जित करने वाला परिधान अलंकार मात्र है।

पुत्र प्राप्ति की मुसकान के पीछे माता की प्रसव पीड़ा झाँकती है। आज का गौरवान्वित कंठाभरण कल सुनार की भट्टी में तप रहा था और हथौड़ों की चोटें खा रहा था। आग पर पकाये बिना स्वादिष्ट भोजन बन सकना कैसे सम्भव हो सकता है।

धनी किसान, पदोन्नति श्रमिक और पुरस्कृत कलाकार के आज के सौभाग्य को सराहते हुए थोड़ा पीछे मुड़कर भी देखना होगा। उन उपलब्धियों के लिए उन्हें कितने समय तक कितने मनोयोग पूर्वक कितनी कठोर साधना करनी पड़ी है। पल्लवित वृक्ष का इतिहास वहाँ से आरम्भ होता है जहाँ एक बीज ने अपने अस्तित्व की बाजी लगाई थी। चिरन्तन एकाग्र अध्यवसाय के बिना कौन विज्ञ विद्वान बन सका है। सफल लोगों से पूछा जा सकता है कि उनने कितनी ठोकरें खाई और कितनी असफलताएं गले उतारी।

दुख बड़ा भाई है और सुख छोटा। दुख पहले पैदा हुआ सुख बाद में। दोनों चिरन्तन सहचर हैं उनकी एकता का कोई तोड़ नहीं सकता। दुख का स्वेच्छापूर्वक वरण किये बिना कोई सुख का सौभाग्य पा नहीं सकता।


प्रकाश भरा आनन्द हमारी ही मुट्ठी में है

सत्ता केवल प्रकाश की है। अन्धकार कोई पदार्थ नहीं। प्रकाश के अभाव का नाम ही अन्धकार है। प्रकाश की नाप-तोल और व्याख्या विवेचना हो सकती है। अन्धकार का कोई प्रमाण परिमाण नहीं। अभाव अपने आप में डरावना है इसलिए अन्धकार डरावना लगता है। अनिश्चित से अविज्ञात से डर लगता है। वस्तुस्थिति जब समझ ली जाती है तो डर चला जाता है। मौत इसलिए डरावनी है कि उनके उदर में चले जाने के उपरान्त क्या होता है, इसका निश्चय नहीं। यदि वस्तुस्थिति का सुनिश्चित ज्ञान रहा होता तो कोई भी उससे डरता नहीं। अपना घर छोड़कर बम्बई जाने की कल्पना हमें डराती नहीं, शरीर छोड़कर अन्यत्र जाने का भी डर निरस्त हो सकता था। यदि गन्तव्य स्थान के सम्बन्ध में समाधान कारक जानकारी रही होती। जो नहीं है वही अविज्ञात है और वही डरावना। इतना जान लेने के बार हमें ज्ञान का प्रकाश खोजना पड़ता है ताकि उस बहुमूल्य सत्ता से लाभान्वित हो सके और अभाव जन्य अन्धकार द्वारा पग-पग पर मिलने वाले वास से छुटकारा पा सके।

इस संसार में केवल श्रेष्ठ है। अश्रेष्ठ कुछ नहीं। मनुष्य श्रेष्ठ से बना है। उसकी पुनीत संरचना में अश्रेष्ठ का रंच मात्र दी उपयोग नहीं हुआ है। होता तो तभी न जब इस विश्व में कहीं अश्रेष्ठ की सत्त रही होती। अंधकार की तरह अश्रेष्ठ भी एक अभाव की अविज्ञात की अनिश्चय की स्थिति है। यद्यपि उसका कोई अस्तित्व नहीं तो भी अनस्तित्व की भयानक विभीषिका तो है ही।

श्रेष्ठ को जब अपना आहार नहीं मिलता तो वह भूख प्यास से व्याकुल होकर निकृष्ट बन जाता है। क्षुधा और तृषा की आतुरता में वह भटकता है तृप्ति के शुद्ध साधन मिलते नहीं तो वह खाने पीने लगा है। जो कृमि कीटकों के योग्य था मनुष्य के लिए अयोग्य। इस अयोग्य को गले से नीचे उतारने की स्थिति में जब भी जहाँ भी मनुष्य पाया जाता है तब उस पर निकृष्टता का दोषारोपण किया जाता है।

श्रेष्ठ और निकृष्ट के बीच की एक और भी स्थिति है भ्रमित। पतवार रहित चालक रहित नौका लहरों के इशारे पर निरुद्देश्य भ्रमण करती रहती है। वह डूबती तो नहीं पर कहाँ पहुंचेंगी इसका कुछ निश्चय नहीं। अंधड़ के साथ उड़ते तिनके नष्ट तो नहीं होते पर किस लक्ष्य तक पहुँच पावेंगे इसका क्या भरोसा।

श्रेष्ठ यह है कि जो अपनी आन्तरिक सम्पन्नता को समझता है और उससे उदारतापूर्वक दूसरों को झोली भरकर अपने को सन्तुष्ट एवं दूसरों को सुखी बनाता है। पका फल अपने में सन्तुष्ट एवं दूसरों को सुखी बनाता है। समीक्षकों का सम्मान पाता है और उपभोक्ताओं को सुख देता है। यह श्रेष्ठता है। मनुष्य की मूल सत्ता श्रेष्ठ है और उसका स्वभाव श्रेष्ठता से भरा पूरा है।

निरुद्देश्य घृणा का पात्र नहीं, दया का पात्र है। भटकाव ने उसे दिशा नहीं और वह पानी की लहरों के साथ हवा के झोंकों के साथ इधर-उधर भटकते रह कर बहुमूल्य अवसर से हाथ धो बैठा। तोतली बोली में बोलते बच्चे किसी का अनिष्ट तो नहीं करते लंगड़ाकर चलने वाले अपंग उलटे तो नहीं चलते। उनके साथ गति तो है। अगति का दोष उन पर नहीं मढ़ा जा सकता।

चिन्ताजनक निकृष्टता है क्योंकि उसमें विकृति भरती जा रही है। जहाँ अभाव होगा वहाँ डराएगा और डरा हुआ व्यक्ति हतप्रभ होकर कुछ भी करने पर उतारू हो जायेगा। भयभीत मनुष्य काँपता है। दीन वचन बोलता है और अनिश्चित दिशा में दौड़ता है। फलस्वरूप स्थिति उससे भी बुरी बन जाती है जो सम्भावित विपत्ति के सचमुच आधमकने पर हो सकती थी।

हम प्रकाश को देखें और समझे यही उचित है। अपने स्वरूप, बल और लक्ष्य को समझे यही बुद्धिमत्ता पूर्ण है। हमारी प्यास, श्रेष्ठ का सेवन करने से ही बुझेगी। आत्मा की प्यास श्रेष्ठता के शीतल निर्झर के तल तक पहुँचकर ही बुझ सकती है।

मानवी गौरव के नीचे गिर कर जिस महाशून्य में उतरते हैं। वही भयावह है, वही निकृष्ट है। यदि अपनी मूल सत्ता के गरिमा भरे अस्तित्व को समझना और उसके उपयुक्त रीति नीति अपनाना सम्भव हो सके तो समझना चाहिए कि अपने सुखद संसार का और समुन्नत भविष्य का निर्माण हो गया। इस निर्माण के विश्वकर्मा हम स्वयं ही है।


आस्तिकता मानवी प्रगति के लिए नितान्त आवश्यक

ईश्वर विश्वास लगभग उतना ही महत्वपूर्ण है जितना आत्म विश्वास। आत्म विश्वास का अर्थ है अपनी उत्कृष्टता, क्षमता, प्रतिभा एवं सक्रियता की उपस्थिति पर भरोसा करना। जिन्हें अपने अन्दर इन विभूतियों की झाँकी नहीं होती वे दीन-दुर्बल बने रहते हैं और असफल, असहायों की तरह जिन्दगी गुजारते हैं। जिन्हें अपनी प्रतिभा और क्षमता विश्वास होता है वे साहस भरे कदम बढ़ाते हैं और प्रगति की दिशा में द्रुतगति से अग्रसर होते चले जाते हैं। ईश्वर विश्वास आत्म विश्वास से भी ऊँची अन्तः निष्ठा है। एक उच्चस्तरीय सत्त का शासन अपने समेत समस्त विश्व पर बने होने की बात जब मन में जम जाती है तो मनुष्य आत्म नियन्त्रण की बात सोचता है और व्यवस्थित शासन के सुसंस्कृत नागरिक की भूमिका निभाने के लिए कटिबद्ध होता है। शासन की समाज की पकड़ से बच निकलने की सम्भावना देखकर ही आमतौर से उद्दंडता अपनाई जाती और अनाचार के लिए हिम्मत पड़ती है। सजग शासन और उसका कठोर नियन्त्रण होने की बात समझ में आ जाय तो फिर अवांछनीयतायें अपनाने के लिए हौसला ही नहीं होता, वरन् सब कुछ शान्तिपूर्वक चलता रहता है।

मनुष्य की मनुष्यता अस्त व्यस्त होने से केवल व्यक्तिगत हानि ही नहीं होती वरन् समाज की शान्ति सुव्यवस्था एवं प्रगति भी नष्ट हो जाती है। व्यक्तियों का समूह ही तो समाज बनेगा। समाज से व्यक्ति और व्यक्ति से समाज बनेगा। समाज से व्यक्ति और व्यक्ति से समाज का सम्बन्ध उतना ही अविच्छिन्न है जितना बीज से वृक्ष का बीज से दोनों अन्योन्याश्रित है। एक की स्थिति डगमगाने लगे तो दूसरे का अस्तित्व खतरे में पड़ जायेगा। ईश्वर विश्वास इन दोनों ही विपत्तियों में रक्षा करता है। सुनिश्चित सूक्ष्म सत्ता की ईश्वर विश्वास की मान्यता ही मनुष्य को सच्चे अर्थों में सदाचारी, सज्जन बनाया है। अन्य नियन्त्रणों को तो वह अपने बुद्धि कौशल से सहज ही झुठला सकता है। पुलिस, कचहरी तथा लोकनिन्दा के नियन्त्रणों से बच निकलने की अनेकों तरकीबें आदमी को मालूम है। सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान किन्तु निष्पक्ष न्यायकारी परमेश्वर का नियन्त्रण ही सर्वांगपूर्ण है। इस लोक से लेकर परलोक तक भौतिक सुखों से लेकर आत्मिक शांति तक का सारा क्षेत्र ईश्वर की व्यवस्था के अंतर्गत है। यह मानने वाला अपनी रीति नीति को सही बनाने के लिए विवश होता है। यह एक बहुत बड़ी बात है। व्यक्तित्व को परिष्कृत करने में यह आधार अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होता है। आस्तिकता की व्यापक प्रतिक्रिया सभ्य, सुसंस्कृत एवं समुन्नत समाज के रूप में प्रस्तुत होती है।

प्राचीन भारत के उज्ज्वल इतिहास की पृष्ठभूमि आस्तिकता के तत्वज्ञान द्वारा ही सम्पन्न हुई थी। उन दिनों सतयुग का धर्म राज्य का वातावरण था और हर व्यक्ति में देवत्व की सत्ता जगमगाती थी। वैयक्तिक एवं सामाजिक प्रगति की अनेकानेक उपलब्धियाँ ऐसे वातावरण में सहज ही उदीयमान रहती है। इसी प्रकाश में प्राचीन भारत की गौरव गरिमा का मूल्यांकन किया जा सकता है।

आज भी आस्तिकता का आवरण तो खड़ा है, पर वह तात्विक दृष्टि से खोखला ही नहीं विकृत भी हो गया है। फलतः उसका लाभ मिलने की अपेक्षा सड़ी दुर्गन्ध से हानि ही अधिक उठानी पड़ रही है। अब समझा जाने लगा है कि थोड़ी सी पूजा पत्री करके ईश्वर को वशवर्ती किया जा सकता है और उससे उचित अनुचित मनोकामनायें बिना प्रयत्न पुरुषार्थ के सहज ही पूरी करायी जा सकती है। इस मान्यता ने लोगों को पूजा पत्री के विधि विधान कर्मकाण्ड अपनाने के लिए तो आकर्षित किया, पर साथ ही उसे पक्षपाती और अन्धेरगर्दी बरतने वाला भी ठहरा दिया। पूजा से ही ईश्वर प्रसन्न हो सकता है तो फिर उसका अनुग्रह प्राप्त करने के लिए कठोर कर्तव्यों का पालन कौन करेगा? आत्म नियन्त्रण व्यक्तित्व का परिष्कार लोक मण्डल के लिए त्याग, बलिदान की योग साधना एवं तपश्चर्या अपनाने की आस्तिक परम्परा सदा से चली आ रही थी। इसे भी तथाकथित भक्ति भावना ने उखाड़ फेंका। जब गंगा स्नान, तीर्थ दर्शन जैसे सुलभ कर्मकाण्ड पाप के दण्ड प्रतिफल से छुटकारा दिला सकते हैं तो फिर पाप की खुली छूट का द्वार खुल गया। शासन और समाज की आँखों में धूल झोंकने की प्रवीणता लोगों ने पहले ही प्राप्त कर ली थी। एक ईश्वरीय नियन्त्रण की कठोर कर्मफल की मान्यता ही चरित्रनिष्ठा को बनाये रह सकती थी। वह आधार भी टूट गया तो समझना चाहिए। उच्छृंखलता के लिए पूरी तरह छूट मिल गई। आज की विकृत आस्तिकता अपने मूल प्रयोजन में भटक ही नहीं गई वरन् ठीक प्रतिकूल दिशा में चल पड़ी है। ऐसी दशा में तथा कथित भक्त लोगों को अपेक्षाकृत अधिक दंभी, दुराचारी एवं अकर्मण्य पाया जाता है तो इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं। यह भ्रष्ट तत्वदर्शन का प्रतिफल है, जिसने कर्म दुष्कर्म के साथ ईश्वरीय अनुग्रह विग्रह की पतंग काट दी और कर्मकाण्ड के जादू की छड़ी से ईश्वर को उल्लू बनाकर उससे चाहे जो उचित अनुचित करा लेने की बात भोली जनता के मन में बिठा दी। वस्तुतः यह आस्तिकता के साथ बलात्कार, व्यभिचार ही हुआ है और उसकी उपयोगिता नष्ट करके अनिष्टकारी मूढ मान्यतायें प्रतिष्ठापित कर दी गई है। इसका दुष्परिणाम भी सामने है। अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा आस्तिकता के क्षेत्र में भ्रष्टता एवं दरिद्रता का बोलबाला अधिक है। तद्नुसार वे अधिक मात्रा में दुखी रहते और दुख पाते देखे जा सकते हैं।

भ्रष्ट रीति नीति किसी भी क्षेत्र में अपनायी जाय विपत्ति उत्पन्न करेगी। आस्तिकता का क्षेत्र भी इसका अपवाद नहीं हो सकता था। अस्तु वर्तमान धर्म विडम्बना के आधार पर विशुद्ध तत्व दर्शन की उपेक्षा नहीं की जा सकती। ईश्वर विश्वास की उपयोगिता अपने स्थान पर सुदृढ़ है यदि उसका मूल स्वरूप बनाये रखा जाय तो निश्चित रूप से व्यक्ति और समाज को अधिकाधिक परिष्कृत सुसम्पन्न बनाने का महान लाभ मिलता रह सकता है। ईश्वरत्व मानव जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। आत्मा को परमात्मा अणु को विभु लघु को महान पुरुष को पुरुषोत्तम नर को नारायण बनाने के लिए बहम विद्या का सृजन हुआ है। उसकी चिन्तन प्रक्रिया एवं कर्म व्यवस्था के दोनों पक्ष मनुष्य को अधिकाधिक उदात्त एवं परिष्कृत बनने की प्रेरणा देते हैं।

ईश्वर की प्राप्ति अर्थात् ईश्वर जैसी सुविकसित मनःस्थिति। ईश्वर व्यापक है हमारी अन्तरात्मा का स्तर भी यही होना चाहिए। सब में अपने को और अपने में सबको देखा जाय। यही आत्म विकास है। इस मान्यता का व्यवहार रूप इसी प्रकार बनता है कि अपनी आत्मीयता का सर्वजनीन प्राणिमात्र में विस्तार हो। दूसरों के दुखों में अपने कष्ट जैसी संवेदना अनुभव हो और उन्हें बटाने के लिए आतुरता उमँगे तो समझना चाहिए कि आत्म विस्तार हो चला। अपने सुख−साधनों को श्रम, समय एवं चिन्तन को लोकोपयोगी प्रयोजनों में लगाने की आकाँक्षा हिलोरें लेने लगें तो समझना चाहिए आत्म विस्तार का आत्मविकास का, आत्म साक्षात्कार का लक्ष्य समीप आ गया।

साकार ईश्वर दर्शन विराट विश्व के विराट ब्रह्म के रूप में ही हो सकता है। कृष्ण ने अर्जुन और यशोदा को राम ने कौशल्या और काकभुसुंडि को को अपना विराट रूप दिखाया था अर्थात् यह अनुभूति करायी थी कि यह समस्त संसार ही भगवान का दृश्यमान रूप है। भगवान का दर्शन होने पर उनके सामने आ उपस्थित होने पर सेवा सद्व्यवहार की इच्छा उठेगी। लोक मण्डल के प्रयास एक प्रकार से ईश्वर पूजा ही है। शिवजी का प्राचीन प्रतीक गोलमटोल शिवलिंग के रूप में है। लिंग अर्थात् चिन्ह स्वरूप। भगवान का कल्याणकारी रूप देखना हो तो इसे भू-मण्डल के ग्लोब के रूप में देखा जाना चाहिए। और उसे अधिक सुन्दर समुन्नत बनाने के लिए घोर परिश्रम करते हुए तात्विक ईश्वर भक्ति का परिचय देना चाहिए। शालिग्राम की विष्णु प्रतिभा भी शिवलिंग जैसी गोलमटोल पत्थर की बनी होती है। शिव कहे या विष्णु नामों का ही अन्तर है। ईश्वरीय सत्ता तो एक है। देव मान्यता का आदि प्रतिपादन एक ही ईश्वर की अनेक विशेषताओं को अनेक अलंकारिक रूप में चित्रित करने की कला अभिव्यक्ति के रूप में हुआ था। पीछे लोगों ने उन्हें परस्पर आकृति प्रकृति की भिन्न-भिन्न सत्ताओं के रूप में मानना शुरू कर दिया है और निरर्थक बुद्धि भ्रम में उलझा दिया। तत्वतः परमेश्वर एक है। उसी को शिव विष्णु आदि कहते हैं। साकार उपासकों ने उसकी आदि प्रतिभा गोलमटोल शिवलिंग या शालिग्राम के रूप में इसीलिए की थी कि इस विराट विश्व को विराट ब्रह्म माना जाय और हर जड़ चेतन के साथ सद्व्यवहार की रीति नीति अपनाते हुए अपने चिन्तन तथा कर्तव्य को अधिकाधिक उदात्त बनाया जाय।

निराकार ब्रह्म को हमारी अंतःचेतना दिव्य चेतना के रूप में अनुभव करती है। इसे तीनों शरीरों के साथ स्पर्श करते हुए देखा जा सकता हे। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में से प्रत्येक के साथ दिव्य सम्वेदनाओं के रूप में ईश्वर की झाँकी कभी भी की जा सकती है कोई भी कर सकता है। स्थूल शरीर काया से सत्कर्मों के रूप में-सूक्ष्म शरीर चिन्तन से सद्विचारों के रूप में और कारण शरीर-अन्तः निष्ठा से-सद्भावनाओं के रूप में ईश्वर का दर्शन स्पर्श किया जा सकता है।

ईश्वर दर्शन के नाम पर देवी देवताओं या अवतारों की छाया प्रतिमाओं को देख सकने की ताक में लोग लगे रहते हैं और स्वप्न में अथवा अर्ध तन्द्रित अवस्था में उस तरह की कोई झाँकी मिल जाती है तो फल नहीं समाते। यह आत्म प्रवंचना सर्वथा निरर्थक है। ईश्वर का कोई रूप नहीं। सर्वव्यापी ईश्वर जैसी दिव्य सत्तायें आकृतिधारी नहीं हो सकतीं। जितनी भी आकृतियाँ ईश्वर की गढ़ी सोची गई है वे मनुष्य का अलंकारिक कल्पनायें भर है। प्रतिमा पूजन का विज्ञान तो इसी प्रकार खड़ा किया है जैसे छोटे बालकों को वर्णमाला सिखाते समय क-कबूतर, ख-खरगोश, ग-गाय, घ-घोड़ा आदि पढ़ाकर बालबोध कराया जाता है। ईश्वर की अनेकानेक विशेषताओं के प्रतीक प्रतिबिम्ब ही देवी देवताओं के रूप में तत्वदर्शियों ने प्रस्तुत किये है। इनका उपयोग अपनी अन्तःचेतना को प्रशिक्षित करने के लिए किया जा सकता है। श्रद्धा भक्ति बढ़ाने का अभ्यास इनके सहारे हो सकता है। मनोनिग्रह की दृष्टि से भी उसका उपयोग है। देव मन्दिर धर्म चेतना के उत्कर्ष एवं परिपोषण के केन्द्र रूप में होते थे होने चाहिए। इन निर्धारणों की कितनी ही उपयोगिताएँ है, जिन्हें ध्यान में रखते हुए निराकार परमेश्वर को देव प्रतिमाओं और देव मन्दिरों के रूप में जन सामान्य की सुविधा एवं लोक मंगल की दृष्टि से विनिर्मित किया गया था। आज तो लोग लकीर के फकीर बन गये है और तथ्य को भुलाकर दर्शन में उलझ गये है। दर्शन का वास्तविक अर्थ तत्व दर्शन फिलॉसफी है। लोगों ने उसका उथला अर्थ देखना भर कर लिया है। मूर्तियों को महात्माओं को देखने भर से पुण्य का मिलना मात्र मान लिया जाता है। जबकि चर्मचक्षुओं द्वारा देखना मात्र जानकारी बढ़ाने भर का प्रयोजन पूरा कर सकता है। इसी जंजाल में उलझे हुए व्यक्ति तथाकथित इष्ट देवों के दर्शन मिलने को आत्म साक्षात्कार की संज्ञा देते हैं। स्वप्न लोक की उड़ानों में कुछ सफलता मिली तो प्रसन्न होते हैं अन्यथा अपनी भक्ति को असफल मानते हैं। इन पिछड़ी मान्यताओं को अवास्तविक और दयनीय ही ठहराया जा सकता है। ईश्वर दर्शन आत्म साक्षात्कार के रूप में ही हो सकता है। आत्म साक्षात्कार का अर्थ है आत्मा को ईश्वरीय सत्ता के प्रतीक प्रतिनिधि के रूप में विस्तृत और परिष्कृत देखना। उसे कषाय कल्मष से छुड़ाने और अपनी मूल स्थिति तक पहुँचाने की दृष्टि से जो भावनात्मक एवं क्रियात्मक विधिविधान हैं उन्हें ही साधना कहते हैं। साधना सही हो तो तथ्य पूर्ण लक्ष्य के प्राप्त होने की सुनिश्चित सम्भावना है। जीवन की समूची विधि व्यवस्था को उच्चस्तरीय बनाने वाली जीवन साधना हमें आत्म देव का साक्षात्कार कराती है और उनके अजब अनुग्रह से चमत्कारी अनुदान से भरा पूरा बना देती है। सिद्धि इस को कहते हैं।

कर्मफल प्रायः तुरन्त नहीं मिलता। आहार-विहार के शरीर स्पर्शी क्रियाकृत्य की तात्कालिक अनुभूतियाँ करने में थोड़ा विलम्ब लगा लेते हैं। माली का बगीचा, किसान का खेत, विद्यार्थी का अध्ययन, परिपुष्टि-आकाँक्षा का व्यायाम, उद्योगी का व्यापार आरम्भ से हो फल नहीं देने लगते हैं। उसमें समय लग जाता है। दूरदर्शी इसे सृष्टि का विधान समझकर धैर्य रखते और उपयुक्त समय आने की प्रतीक्षा करते हैं। पर बाल बुद्धि के लोग इस विलम्ब को सहने नहीं कर पाते और अधीर होकर अनुपयुक्त सोचने लगते हैं। विशेषतया कर्मफल तत्काल न मिलने की स्थिति में ऐसी ही हैरानी होती है। बहुधा सत्कर्मों का तत्काल प्रतिफल देखने में नहीं आता और प्रारब्ध वश वे कष्ट भुगतने की स्थिति में ही पड़े रहते हैं। ऐसी दशा में यह भ्रम होता है कि प्रस्तुत कष्ट, सत्कर्मों का ही दुष्परिणाम है। इसी प्रकार कई दुष्कर्म करने वाले सुखी सम्पन्न एवं सफल पाये जाते हैं। इस स्थिति में भी भ्रम होता है कि कलियुग में दुष्कर्मों का फल सुख के रूप में और सत्कर्मों का फल दुख के रूप में होता है। इसलिए उपासना, साधना आदि सत्कर्मों से दूर रहकर अनीति की रीति अपनाये रहना ही ठीक है।

ऐसी भ्रान्तियों से बचने के लिए ईश्वर विश्वास की ढाल सबसे उपयुक्त है। उसके आधार परी देर सवेर में प्रत्येक भले-बुरे कर्म का उपयुक्त प्रतिफल मिलने के तथ्य पर पूरी तरह भरोसा रखा जा सकता है। स्वर्ग नरक की, पुनर्जन्म की, कर्मफल के उपयुक्त दण्ड पुरस्कार मिलने की, सत्कर्म परायण की, धर्मात्मा की, ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त होने की अनेकों मान्यतायें मनुष्य को विपरीत परिस्थिति में धैर्य देती और आशा बँधाती है। वैयक्तिक चरित्र निष्ठा और सामाजिक सुव्यवस्था बनाये रहने में ईश्वर विश्वास शासकीय एवं सामाजिक अंकुश से भी कही अधिक कारगर सिद्ध होता है। हममें से प्रत्येक को ईश्वर विश्वासी होना चाहिए और उस आस्था को साधना उपासना के खाद, पानी से निरन्तर सींचते हुए सर्वतोमुखी कल्याण के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए।


Quotation

विपन्न परिस्थितियों में दुर्बल मनः स्थिति के लोग हताश होकर अपनी प्रतिभा खो बैठते हैं। किन्तु जिनमें जीवट मौजूद है, वे विपन्नता की चोट खाकर तिलमिला उठते हैं और कुछ कर गुजरने के लिए उतारू हो जाते हैं। उपहासास्पद और उपेक्षित परिस्थितियों द्वारा अपने शौर्य, साहस की दी गई चुनौती को जिनने स्वीकार कर लिया उनने अपने जागृत पुरुषार्थ का चमत्कार किस प्रकार प्रस्तुत किया इसके अनेकानेक उदाहरण इतिहास के पृष्ठों पर भरे पड़े हैं।


प्रायश्चित द्वारा पुनर्जीवन

ईसामसीह यहूदी शमौन के यहाँ भोजन करने गये। यहूदी अमीर था। ईशु के शुभागमन पर अपने भाग्य को सराहने लगा। सोचा इसी बहाने महापुरुष के चरणों से अपना भवन पवित्र हो जायेगा। उसी नगर की प्रसिद्ध वैश्या पर भी ईशु के उपदेशों का गहरा प्रभाव पड़ चुका था। वह विगत जीवन की पापमय केंचुल को उतार कर नये मार्ग की खोज कर रही थी। ढूंढ़ने वाले को तो भगवान भी मिल जाते हैं। जब उसे पता चला कि ईशु शमौन के यहाँ भोजन करने गये है तो वह भी दर्शन की आकाँक्षा से उनके घर पर जा पहुँची।

वहाँ पहुँच मरियम ईसा के चरणों में बैठी और अपने आँसुओं के जल से ईसा के चरण धोये। अपनी केश राशि से उन्हें पोछा फिर उन्हें चूमने लगी।

ईसा टस से मस न हुए, पर शमौन को इस स्वच्छन्दता से घर में आना और ईसा का इस तरह सत्कार करना अच्छा न लगा। एक वैश्या का घर में आना भला कौन सद्गृहस्थ सहन करेगा? वे सोचने लगे यदि यह सर्वज्ञ होते तो इस दुराचारिणी से भला अपने अंगों का स्पर्श कराते?

ईसामसीह को वस्तुस्थिति समझते देर न लगी उन्होंने शमौन को पास बुलाकर शंका का निवारण करते हुए एक कहानी सुनायी- एक महाजन के दो कर्जदार थे। एक पर पाँच सौ दीनारों का कर्ज और दूसरे पर केवल पचास दीनारों। महाजन के पास दोनों व्यक्ति गये और अपनी असमर्थता प्रकट कर गिड़गिड़ाने लगे।

महाजन ने कहा-यदि आप इस स्थिति में नहीं है कि कर्ज पटा सकें तो आपको माफ किया। राशि में कम ज्यादा का फर्क जरूर था, पर माफी दोनों को बराबर दी गई। यदि हम ध्यान से देखें तो सबसे ज्यादा माफी पाँच सौ दीनार वाले कर्जदार को मिली। क्योंकि महाजन की दृष्टि में इसके प्रतिनिष्ठा और पात्रता पहले की अपेक्षा कही अधिक थी।

शमौन यही बात तो आज मरियम के सम्बन्ध में है। इसने अपने में जितनी पात्रता विकसित की है, उतनी यहाँ मैं तुममें से किसी में नहीं देख रहा हूँ। क्या तुम्हें नहीं मालूम कि यह अपने समूचे जीवन को ही बदलने की योजना बना चुकी है और तुम केवल एक समय भोजन करवाकर ही उसका पुण्य लूटना चाहते हो। इसलिए मैंने तुम्हें तुम्हारी निष्ठा के अनुसार दिया है और मरियम को उसकी निष्ठा और श्रद्धा के अनुसार।

उपस्थित सभी लोग एक स्वर में चिल्लाये ईसा। तुम मरियम को क्षमा कैसे कर सकते हो? यह तुम्हारा दुःसाहस है। दुष्टों को क्षमा करने का अधिकार तो केवल ईश्वर को है।

ईसा ने कहा मैंने आज तक नहीं सुना कि ईश्वर किसी को वैश्या या दुराचारी बनाता है। किसी भले घर की रमणी को वेश्यावृत्ति की ओर ले जाने तुम सब समाज के प्रतिनिधि हो। तुम्हें किसी कन्या को वैश्या बनाने का अधिकार किसने दिया? मरियम को अपने विगत जीवन के दुष्कृत्यों पर कितनी आत्म ग्लानि है। इस आत्म ग्लानि से अधिक पवित्र भला किसी सरिता का जल है।

ईसा ने मरियम के सिर पर आशीर्वाद का हाथ रखते हुए कहा देवि! तुम्हारी आत्म ग्लानि विश्वास की रक्षा करेगी और सारे कलुष तथा पापों को भस्म करके कंचन की तरह खरा बना देगी। प्रायश्चित के द्वारा हर व्यक्ति अपने विगत पाप कर्मों का शमन करके नव जीवन प्राप्त कर सकता है।


विलक्षण क्षमताओं से सम्पन्न हमारे कल पुर्जे

हमारी शरीर यात्रा जिस रथ पर सवार होकर चल रही है। उसके कल पुर्जे कितनी विशिष्टताएँ अपने अन्दर धारण किये हुए हैं। हम कितने समर्थ और कितने सक्रिय है इस पर हमने कभी विचार नहीं किया। बाहर को छोटी छोटी चीजों का देखकर चकित हो जाते हैं और उनका बढ़ा चढ़ा मूल्याँकन करते है पर अपनी ओर छोटे छोटे कलपुर्जों की महत्ता की ओर कभी ध्यान तक नहीं देते। यदि उस ओर भी कभी दृष्टिगत किया होता तो पता चलता कि अपने छोटे से छोटे अंग अवयव कितनी जादू की विशेषता और क्रियाशीलता अपने में धारण किये हुए है उन्हीं के सहयोग से हम अपना सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन जी रहे है।

शरीर पर दृष्टि डालने से सबसे पहले चमड़ी नजर आती है। मोटे तौर से वह ऐसी लगती है मानो शरीर पर कोई कागज चिपका हो बारीकी से देखने पर प्रतीत होता है कि उसमें भी पूरा कल कारखाना काम कर रहा है। एक वर्ग इंच त्वचा में प्रायः 72 फुट लम्बी तंत्रिकाओं की लम्बाई नापी जाय तो वे भी 12 फुट से कम न बैठेगी। यह रक्त वाहिनियाँ सर्दी में सिकुड़ती और गर्मी में फैलती रहती है ताकि तापमान का सन्तुलन ठीक बना रहे। चमड़ी की सतह पर प्रायः 2 लाख स्वेद ग्रन्थियाँ होती है जिनमें से पसीने के रूप में हानिकार पदार्थ बाहर निकलते रहते हैं। पसीना दीखता तो तब है जब वह बूँदों के रूप में बाहर आता है वैसे हर धीरे धीरे रिसता सदा ही रहता है।

त्वचा देखने में एक प्रतीत होती है पर उसके तीन विभाग किये जा सकते हैं (1) ऊपरी चमड़ी (2) भीतरी चमड़ी (3) हड्डी के ऊपर के ऊत। नीचे वाली तीसरी परत में रक्त वाहनियाँ तन्त्रिकाएँ और वसा के कण होते हैं। इन्हीं के द्वारा चमड़ी हड्डियों से चिपकी रहती है। आयु बढ़ने के साथ साथ जब यह वसा कण सूखने लगते हैं तो त्वचा पर झुर्रियाँ लटकने लगती है। भीतरी चमड़ी में तन्त्रिकाएँ रक्त वाहिनियाँ रोम कूप स्वेद ग्रन्थियाँ तथा तेल ग्रंथियां होती है। इन तन्त्रिकाओं को एक प्रकार से सम्वेदना वाहन टेलीफोन के तार कह सकते हैं वे त्वचा स्पर्श की अनुभूतियों को मस्तिष्क तक पहुँचाते हैं और वहाँ के निर्देश सन्देशों को अवयवों तक पहुँचाते हैं।

पसीने के साथ जो गन्दगी बाहर निकलती है, वह चमड़ी पर परत की तरह जमने लगती है यदि स्नान द्वारा उसे साफ न किया जाय तो उस परत से पसीना निकालने वाले छेद बन्द हो जाते हैं और दाद, खाज, जुएँ आदि कई तरह के विकार उठ खड़े होते हैं।

त्वचा के भीतर घुसे तो माँसपेशियों का ढाँचा खड़ा है। उन्हीं के आधार पर शरीर का हिलना जुलना मुड़ना चलना फिरना सम्भव हो रहा है। शरीर की सुन्दरता और सुडौलता बहुत करके माँस पेशियों को सन्तुलित स्थिति पर ही निर्भर रहती है। फैली पोली बेडौल सूखी पेशियों के कारण कही अक्सर शरीर कुरूप लगता है। प्रत्येक अवयव को उचित श्रम मिलने से वे ठीक रहती है अन्यथा निठल्लापन एवं अत्यधिक श्रम साधन उन्हें भोंड़ा निर्जीव और अशक्त बना देता है। श्रम सन्तुलन का ही दूसरा नाम व्यायाम है प्रत्येक अंग को यदि उचित श्रम का अवसर मिलता रहे तो वहाँ की माँसपेशियों सुदृढ़ सशक्त रहकर स्वास्थ्य और सौंदर्य को आदर्श बनाये रहेंगी।

शरीर का 50 प्रतिशत भाग माँसपेशियों के रूप में है। मोटे और पतले आदमी इन माँसपेशियों की बनावट एवं वजन के हिसाब से ही वैसे मालूम पड़ते हैं। प्रत्येक माँसपेशी अनेकों तन्तुओं से मिलकर बनी है। वे बाल के समान पतले होते हैं पर मजबूत इतने कि अपने वजन की तुलना में एक लाख गुना वजन उठा सके। इन पेशियों में एक चौथाई प्रोटीन और तीन चौथाई पानी होता है। इनमें जो बारीक रक्त नलिकाएँ फैली हुई है वे ही रक्त तथा दूसरे आवश्यक आहार पहुँचाती है। मस्तिष्क का सीधा नियंत्रण इन माँसपेशियों पर रहता है तभी हमारा शरीर मस्तिष्क की आज्ञानुसार विभिन्न प्रकार के क्रिया कलाप करने में सक्षम रहता है। कुछ माँसपेशियाँ ऐसी है जो अचेतन मन के आधीन है। पलक झपकता हृदय का धड़कना फेफड़ा का सिकुड़ना फैलना आहार का पचना मल विसर्जन रक्तसंचार आदि की क्रियाएँ अनवरत रूप से होती रहती है और हमें पता भी नहीं चलता कि कौन उनका नियंत्रण संचालन कर रहा है। वस्तुतः यह हमारे अचेतन मन का खेल है और अंग प्रत्यंगों को उनके नियत निर्धारित विषयों में संलग्न किये रहता है।

इन माँसपेशियों को विशेष प्रयोजनों के लिए सधाया सिखाया जा सकता है। सर्कस में काम करने वाले नट नर्तक अपने अंगों को इस प्रकार अभ्यस्त कर लेते हैं कि वे आश्चर्यजनक कार्य कर दिखाता है। चोट लगने पर हड्डियों को टूटने से बचाने का कार्य यह माँसपेशियाँ ही करती है। शरीर से मुड़ने तुड़ने उछलने कूदने जैसे विविध विधि काम करता हमारे लिए इन माँसपेशियाँ के कारण ही सम्भव होता है। मर्दों की पेशियाँ स्त्रियों की तुलना में अधिक कड़ी और मजबूत होती हैं ताकि वे अधिक परिश्रम के काम कर सके अन्य अंगों की अपेक्षा हाथों की पेशियाँ अधिक शक्तिशाली होती है।

शरीर के भीतर हृदय मस्तिष्क आमाशय आँतें आदि एक से एक महत्वपूर्ण कलपुर्जे लगे हैं। इनमें से सबसे छोटे पेशाब साफ करने जैसा गन्दा काम करने वाले अवयव गुर्दे जैसे छोटे से टुकड़े को देखे तो प्रतीत होता कि प्रकृति ने इस नगण्य से अंग को भी कितना सुव्यवस्थित और कितना सर्वांगपूर्ण बनाया है।

रंग में भूरे कत्थई आकार में मुट्ठी के बराबर देखने में सेम के बीज की तरह एक सिरा थोड़ा उभरा हुआ दूसरा थोड़ा दबा हुआ यही है गुर्दे का आकार वजन 150 ग्राम। वे दो होते हैं। मूत्र बनाना उनका मुख्य काम है।

रक्त में से अनावश्यक और मल युक्त जल को यह निरन्तर छाँट और बाहर निकालते रहते हैं। वे रीढ़ की हड्डी से सटे होते हैं। एक बाई ओर दूसरा दाई और दाया थोड़ा नीचे बांया थोड़ा ऊपर ताकि उनके सामान्य क्रिया कलाप में अड़चन उत्पन्न न हो। प्रत्येक गुर्दा लगभग 4 इंच लम्बा 2.5 इंच चौड़ा तथा 2 इंच मोटा होता है।

गुर्दे रक्त में घुले रहने वाले नमक पोटेशियम कैल्शियम मैग्नेशियम आदि पर कड़ी नजर रखते हैं। इनकी मात्रा जरा भी बढ़ जाय तो शरीर पर घातक प्रभाव डालती है। शरीर में जल की भी एक सीमित मात्रा ही चाहिए। रक्त में क्षारीय या अम्लीय अंश बढ़ने न पाये इसका ध्यान भी गुर्दों को रखना पड़ता है। छानते समय इन सब बातों को ये पूरा पूरा ध्यान रखते हैं।

गुर्दे एक प्रकार की छलनी है उनमें 10 लाख से भी ज्यादा नलिकाएँ होती है। इन सबको लम्बी कतार में रखा जाय तो 110 किलो मीटर लम्बी डोरी बन जाएगी। एक घण्टे में दोनों गुर्दे इतना रक्त छानते हैं जिसका वजन पूरे शरीर से दो गुना हो जाय। छाने हुए रक्त का उपयोगी अंश यह नलिकायें ही रोक लेती है। विटामिन अमीनो अम्ल हारमोन शकर जैसे उपयोगी तत्व रक्त को वापिस लौटा दिया जाते हैं। नमक ही सबसे ज्यादा अनावश्यक मात्रा में होता है। यदि यह रुकना शुरू हो जाये तो सारे शरीर पर सूजन चढ़ने लगेगी। गुर्दे इस अनावश्यक अंश को निरन्तर बाहर करते रहते हैं।

दोनों गुर्दों में परस्पर अति सघन सहयोग है। एक खराब हो जाय तो दूसरा उसका बोझ अपने ऊपर उठा लेता है और अकेला ही पूरी गाड़ी आजीवन खींचता रहता है।

गुर्दे प्रतिदिन प्रायः दो लीटर मूत्र बनाते हैं। उसमें नमक, फास्फेट सल्फेट, पोटेशियम, कैल्शियम मैग्नेशियम लोहा, वि एटाइबिन यूरिया, अमोनिया, यूरिक एसिड, हिप्यूरिक एसिड नाइट्रोजन आदि पदार्थ मिले रहते हैं। सामान्यता मूत्र का रंग हल्का पीलापन लिये होता है। यदि गहरा रंग हो तो उसमें कुछ गड़बड़ी समझी जानी चाहिए। कम पानी पीने से भी मूत्र का रंग गहरा और गाढ़ा हो सकता है। जाड़े के दिनों में पसीना कम निकलता है इसलिये पेशाब की मात्रा बढ़ जाती है।

आईये एक और छोटे पुर्जे पर नजर डालें। दाहिनी पसलियों के नीचे तनुपट से सटा हमारा जिगर है। मर्दों का जिगर सवा से डेढ़ किलोग्राम तक होता है। स्त्रियों का इससे कुछ हल्का रहता है। शरीर का एक चौथाई रक्त इस जिगर में ही भरा रहता है। इसलिए वह भूरे लाल रंग का दिखायी देता है। टटोलने से कठोर मालूम देता है।

जिगर की कोशाओं में विलक्षण विशेषता यह है कि वे अमर है। एकबार नष्ट हो जाने पर वे दुबारा बन जाती है। टूटी हुई या नष्ट हुई कोशायें पुनः उभर आती है। यदि जिगर का तीन चौथाई भाग नष्ट हो जाय तो शेष एक चौथाई से भी उसका काम चलता रहता है।

सन्तुलित आहार के क्रम में आवश्यक प्रोटीन न मिलने से जिगर कमजोर पड़ जाता है। कुपोषण के शिकार बच्चे और बड़े पाचन सम्बन्धी रोगों से ग्रस्त होकर असमय ही चल बसते हैं। उनके जिगर का उतना विकास नहीं हो पाता जितना होना चाहिए।

इन अवयवों में से जिस पर तनिक गहराई से विचार करें उसी में विशेषताओं का भण्डार भरा दिखता है। यहाँ तक कि बाल जैसी निर्जीव और बार-बार, खर-पतवार की तरह उखाड़ काटकर फेंक दी जाने वाली वस्तु भी अपने आप में अद्भुत है।

औसतन मनुष्य के सिर में 120000 बाल होते हैं। प्रत्येक बाल एक नन्हे गड्ढे से निकलता है जिसे रोम कूप कहते हैं। यह चमड़ी के शिरोवल्क के भीतर प्रायः एक तिहाई इंच गहरा घुसा होता है। इसी गहराई में बालों की जड़ को रक्त का पोषण प्राप्त होता है।

बालों की वृद्धि प्रतिमास तीन चौथाई इंच होती है। इसके बाद वह घटती जाती है। जब बाल दो वर्ष के हो जाते हैं तो उनकी गति प्रायः रुक जाती है। किसी के बाज तेजी से और किसी के धीमी गति से बढ़ते हैं। बालों की आयु डेढ़ वर्ष से लेकर छः वर्ष तक होती है। आयु पूरी करके बाल अपनी जड़ से टूट जाता है और उसके स्थान पर नया बाल उगता है।

यों बाल तिरछे निकलते हैं, पर उनके मूल में एक पेशी होती है जो कड़ाके के शीत या भय की अनुभूति में रोमाँच में बाल खड़े कर देती है। बिल्ली कभी-कभी अपने बाल सीधे खड़े कर लेती है।

बालों की जड़ों में पसीना निकालने वाले छिद्र भी होते हैं और उन्हें चिकनाई देने वाले छेद भी। बालों की कोमलता, चिकनाई और चमक रोमकूपों से निकलने वाली चिकनाई की मात्रा पर निर्भर है। वृद्धावस्था में रोमकूप कठोर होने लगते हैं, तो बालों का कालापन सफेदी में बदल जाता है। पेट की खराबी तथा दाँतों की खराबी बालों की अपेक्षाकृत जल्दी सफेद बना देती है।

मनुष्य शरीर का प्रत्येक अवयव इस बात का प्रमाण है कि प्रजापति ने उसे कितने मनोयोग और कला-कौशल के साथ बनाया है। उनमें जीवन यात्रा को सुसंचालित रखने की क्षमता तो स्पष्ट ही है। यदि उनकी सामान्य गतिविधियों को बिना विकृत किये जलने दे तो उतने भर से हमारा स्वास्थ्य सुन्दर, परिपुष्ट और चिरस्थायी रह सकता है। बीमारी तो अनुचित हस्तक्षेप और अनावश्यक तोड़ फोड़ के रूप में बरती जाने वाली उच्छृंखलता का दण्ड है।

अच्छी मोटर होने पर भी अनाड़ी ड्राइवर उसे तोड़-फोड़कर रख सकता है। ऐसी ही दुर्घटना अपने शरीर के साथ हुई है। अनाड़ी संचालकों ने उसे नष्ट भ्रष्ट करके रखा है। यदि हम अपनी उपलब्धियों को समझ सके होते और उनका सदुपयोग सुसंचालन करने में दूरदर्शिता का परिचय देते तो न केवल शरीर का वरन् मनः संस्थान के चमत्कारी केंद्रों का तथा भौतिक सम्पदाओं का भी ऐसा लाभ उठा सकते हैं जिनके आधार पर अपना यही आज का गया गुजरा जीवन देवोपम सुख-शान्ति से सम्पदाओं और विभूतियों से भरा पूरा दृष्टिगोचर होता।


अपने ब्रह्माण्ड का जन्म और मरण

फ्रीडमैन से लेकर आइन्स्टीन तक अब संसार के सभी प्रमुख अन्तरिक्ष विज्ञानी यह स्वीकार करते हैं कि ब्रह्मांड निरन्तर फैल रहा है। सभी खगोलीय पिण्ड एक दूसरे से दूर हटते जा रहे है। यह विलगाव जिस गति से बढ़ता जाता है उसी अनुपात से उनकी धावन क्रिया में तीव्रता आती जाती है। आकाश गंगायें पहले की अपेक्षा अब एक दूसरे से बहुत दूर चली गई है और यह फासला निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। आखिर यह फैलाव कब तक बढ़ता चलेगा? क्या कभी रुकेगा नहीं? क्या ब्रह्मांड पोल का कोई अन्त नहीं है? क्या नक्षत्रों की वर्तमान विलगाव प्रतिस्पर्धा अनन्त काल तक ऐसे ही चलती रहेगी?

इन प्रश्नों के उत्तर खोजते खोजते खगोलवेत्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि ग्रह नक्षत्रों की तरह यह शून्य भी गोल है। जिस तरह पृथ्वी पर सीधी रेखा बनाकर लगातार चलते ही रहा जाय तो चलने वाला अंततः वही जा पहुँचेगा जहाँ से उसने यात्रा आरम्भ की थी।

बच्चे धीरे ठुमकते हैं। वे उँगली पकड़ने पर चलते हैं जवानों की चाल तेज होती है और बूढ़े होने पर गति फिर मन्द हो जाती है और लाठी के सहारे किसी तरह थोड़ा बहुत चला जाता है। यह हाल इन ग्रह पिण्डों का होना है। वे आरम्भ में मन्द गति से नाचते, दौड़ते थे पीछे अब उनकी प्रौढ़ावस्था में चाल बढ़ गई है। वे एक दूसरे से दूर हटाने में अपनी तीव्र गति की भी प्रतिष्ठा एवं प्रतिस्पर्धा का प्रश्न बनाते जा रहे है। पर यह सब देर तक चलने वाला नहीं है। बुढ़ापा आने में बहुत विलम्ब नहीं। मात्र कुछ अरब खरब वर्ष लगेगा कि उनकी कमर झुक जायेगी और गरदन हिलने लगेगी तब वे लड़खड़ाते हुए गिरते पड़ते किसी प्रकार चलने की लकीर पीटेंगे और फिर थक कर बैठ जायेंगे। हो सकता है कि बैठने के साथ साथ ही मृत्यु क्रिया भी सम्पन्न हो जाय।

अन्तरिक्ष में फैली हुई आकाश गंगायें अब एक दूसरे से हजारों प्रकाश वर्ष की दूरी पर है। पर प्रारम्भ में ऐसा नहीं था। ब्रह्मांड का सारा पदार्थ एक ही जगह केन्द्रित था। तब एक ठोस सिल्ली जैसा था। फ्रीडमैन के अनुसार अब से कोई दस अरब वर्ष पहले आदिम संसार का पदार्थ घनत्व की चरम सीमा पर था। पीछे उसमें विघटन प्रारम्भ हुआ और पानी के बबूलों की तरह टूटे हुए काँच के टुकड़ों की तरह वह बंटता चला गया। उनकी रेंगने जैसी हलचल ने बीच में पोल पैदा की और पोल में प्रतिपदार्थ शैतान घुस बैठा, उसने हर टुकड़े को बहकाया और अलग रहने दूर जाने और अलग घर-परिवार बसाने के लिए रजामंद कर लिया। बस यही से ब्रह्मांडीय हलचलें आरम्भ हो गयी। तब से वह सिलसिला कभी घटा नहीं वरन् क्रमशः तेजी ही पकड़ता गया है। आरम्भ में घनीभूत बन्द ब्रह्मांड था। अब वह विरल और खुला ब्रह्मांड कहे जा सकने की स्थिति में है।

ब्रह्म अनादि और अनन्त हो सकता है। पर ब्रह्मांड के बारे में वैसा नहीं कहा जा सकता है। अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि पदार्थ प्रकृति अनादि अनन्त है। वह ब्रह्मा की तरह ही शाश्वत है। ब्रह्मांड का अर्थ यदि आकाशीय पिण्डों का समूह कहा जाय तो उसका आरम्भ भी भूतकाल में कभी अवश्य ही हुआ था और एक दिन उसका अन्त भी होगा। यद्यपि जन्म मरण की ठीक जन्म पत्री नहीं बन सकती तो भी इतना तो कहा ही जा सकता है कि वह अपने गणना साधनों की चुनौती देता हुआ किसी न किसी दिन जन्मा जरूर था और भले ही हम उसकी ठीक तिथि और घड़ी न बता सके तो भी उसका मरण निश्चित है।

सोवियत विज्ञान अकादमी के दो मूर्धन्य वैज्ञानिक यवगेची लिफशित्स और इजाक खालातनिकाव ने अमेरिकी वैज्ञानिकों की उस मान्यता का खण्डन किया है कि पदार्थ अपनी आदिम स्थिति में बहुत गर्म था और केवल न्यूट्रोनों का बना था। सोवियत वैज्ञानिकों ने अपने पक्ष समर्थ में अनेकों तर्क और प्रमाण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि आदिम पदार्थ ठंडा या और प्रोटानों इलेक्ट्रानों और न्यूट्रोनों से बना था। किसी पदार्थ का ठोस रहना तभी सम्भव है जब वह ठंडा हो। गर्मी स्वभावतः विरलता उत्पन्न करती है। ब्रह्मांड में हाइड्रोजन तत्व का बाहुल्य है। वह प्रारम्भ में जमे बादल की तरह था पीछे वह ओलों की तरह बरसने लगा और आकाशीय पिंड के रूप में विरल हो गया।

इन पिण्डों का मन मुटाव है। वे दुहरी चाल वाले रहे है और दुरंगी नीति अपना रहे है। एक ओर तो उनका अहंकार अलग अस्तित्व सिद्ध करने और स्थिरता में वर्चस्व सिद्ध करने में लगा हुआ है दूसरी और विवेक कहता है इस मूर्खता से क्या लाभ? संयुक्त रहने और मिल जुलकर रहने का अपना आनन्द है। जब अपना शैशव एक घर में हँसी खुशी से बीत रहा था तो अब फिर उसी तरह रहने में क्यों आपत्ति होनी चाहिए। महत्वाकांक्षाएं प्रगति प्रगति प्रगति की रट लगाये हुए है और लम्बी कुलाचें भरने के लिए विवश करती है। दूसरी ओर शान्ति स्नेह और सहयोग की ओर भी मन ललचाता है सो दोनों प्रवृत्तियाँ अपना अपना काम करती है। एक ओर तारक भाग रहे है साथ ही एक दूसरे को अपने प्रभाव में पकड़े जकड़े भी है। पृथकतावाद का बोलबाला है फिर भी हर आकाश गंगा ने हर महासूर्य ने अपना अच्छा खासा परिवार बसा रखा है और ढेरों पोते, परपोतों को लेकर एक एक गाँव मुहल्ला बसा लिया है।

यह कहना कठिन है कि आकाशीय पिंड दूर जा रहे है या वापिस लौट रहे है। अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है कि उनकी आधी दौड़ दूरी की दिशा में और आधी वापसी की दिशा में निर्धारित है। डर्वी के घोड़े एक गोल चक्कर में दौड़ते हैं और अन्त में वे वही आकर खड़े होते हैं जहाँ से चले थे। लगते हैं आकाशीय पिण्ड पहले से ही डर्वी के घोड़ों की तरह एक गोल चक्कर में दौड़ दिखाने और हम दर्शकों का कौतूहल बढ़ाने के लिए धमाचौकड़ी लगाये हुए है। वे एक दिन अपने पुराने अस्तबल में जा बंधेंगे।

नौजवानी का जोश आखिर ठण्डा तो होना ही है। खून की गर्मी सदा एक सी तो नहीं बनी रहती। महत्वकांक्षाओं का आवेश शराब के नशे की तरह सदा तो नहीं बना रहता। खुमारी उतरती है तो नये ढंग से सोचना पड़ता है। तब शान्ति के साथ रहने और चैन की साँस लेने को जी करता है। मनुष्यों की तरह इन ग्रहपिंडों का भी यही हश्र होना है। जब वे आधी मंजिल पार कर लेंगे और प्रौढ़ावस्था की ढलती उम्र आ जायेगी तो वे अपनी घुड़दौड़ हल्की करेंगे, लंगड़ाते लड़खड़ाते चलेंगे। ठण्डे होते जायेंगे और वह ठंडक जहाँ शीतल शान्तिदायक होगी वहाँ नीरस एवं नीरव भी। अकड़े जकड़े अंग बैठने सुस्ताने को विवश कर देखें तो यह बूढ़ा ब्रह्मांड थककर बैठ जायेगा और लम्बी चादर ओढ़कर चिरनिद्रा की गोद में चला जायगा।

पर विधाता भी कैसा विचित्र है। उसे न जाने बार-बार बनाने बिगाड़ने में क्या मजा आता है? नादान बच्चों की तरह वह बार-बार अपना भानमती का पिटारा खोलता है और खिलौने इधर उधर बखेर देता है। पीछे उन्हीं को समेट समाट कर फिर पिटारी बन्द कर लेता है। मकड़ी की प्रशंसा है कि अपने पेट में से जाला निकाल कर बुनती है और फिर उन्हीं धागों को समेट कर निगल जाती है। प्रजापति को मकड़ी तो नहीं कह सकते और भानमती का पिटारा बगल में दबाये फिरने वाला नादान बच्चा कहना ही उचित है। यह उनकी शान में गुस्ताख़ी की बात होगी। फिर भी लगता है हरकतें कुछ इसी किस्म की है अन्यथा बने को बिगाड़ना बिगड़े को बनाना भला यह भी कोई काम है?


मानवी प्रगति का एक मात्र आधार भाव भरा सहयोग

मनुष्य को बुद्धि प्रधान माना जाता है और कहा जाता है कि उसने अपने बुद्धि बल से ही अन्य प्राणियों की तुलना में इतनी अधिक उन्नति की है, जिससे सृष्टि का मुकुटमणि बन सकने का श्रेय उसे प्राप्त हो सका। इस मान्यता में यदि कुछ तथ्य है तो उसमें एक संशोधन यह और करना पड़ेगा कि बुद्धिमत्ता उसे सहकारिता के आधार पर ही उपलब्ध हुई है। क्या मनुष्य ने उन्नति अपनी मस्तिष्कीय विशेषता के कारण की है? मोटी बुद्धि ही इसे मान्यता का अन्ध समर्थन कर सकती है। सूक्ष्म चिन्तन का निष्कर्ष यही होता है कि कोई न कोई आत्मिक सद्गुण ही उसके मस्तिष्क समेत अनेक क्षमताओं को विकसित करने का आधार हो सकता है। महत्वपूर्ण प्रगति न तो शरीर की संरचना के आधार पर सम्भव होती है और न मस्तिष्कीय तीक्ष्णता पर अवलंबित रहती है। उसका प्रधान कारण अन्तःकरण के कुछ भावनात्मक तत्व ही होते हैं। उन निष्ठाओं की प्रेरणा से इच्छा शक्ति जगती है, सक्रियता एवं तत्परता उत्पन्न होती है। मस्तिष्क तथा शरीर के कलपुर्जे एकजुट होकर काम करते हैं और निष्ठा के अनुरूप दिशा में कदम तेजी से बढ़ाते चले जाते हैं। व्यक्ति सदा से इसी आधार पर ऊँचे उठते और नीचे गिरते रहे है।

मनुष्य की बुद्धिमत्ता, शारीरिक चेष्टा और प्रयत्न परायणता के मूल में जो अत्यन्त प्रेरक दिव्य प्रवृत्ति झाँकती है। उसे सहकारिता कह सकते हैं। वस्तुतः यही मानव प्राणी की सबसे बड़ी विशेषता है। अन्य प्राणियों में यह वृत्ति यत्किंचित् पायी तो जाती है पर प्रायः वह शरीर समीपता तक ही सीमित रहती है। मानसिक आदान-प्रदान कर सकने योग्य उनकी स्थिति नहीं है। कुछ पशु पक्षी, जोड़े बनाकर समूह में साथ-साथ रहने के अभ्यस्त तो होते हैं। इससे उन्हें सुरक्षा में सहायता मिलती है कुछ और छोटे-मोटे शारीरिक आदान प्रदान कर लेते हैं पर मानसिक और भावनात्मक आदान प्रदान उनसे बन नहीं पड़ता। सहकारिता वृत्ति का सीमित प्रयोग कर सकने के कारण ही अन्य प्राणी सृष्टि के आदि से लेकर अब तक जहाँ के तहाँ पड़े है, जबकि मनुष्य उस दिव्य प्रवृत्ति को अधिकाधिक विकसित करते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँच सकने में सफल हो गया।

दो जड़ पदार्थ अथवा अविकसित प्राणी मिलकर दो की संख्या ही बनाते हैं। दो बैल मिलकर एक ही अपेक्षा दूना वजन भी खींच सकते हैं। एक की अपेक्षा दो रुपये हो तो दूना सामान खरीदा जा सकता है, किन्तु भाव प्रधान मनुष्य प्राणी का जहाँ सघन सहयोग आरम्भ होगा वहाँ यह नियम बदल जायेगा और एक एक मिलकर ग्यारह की संख्या बन जायेगी। 1 और 1 के अंग नीचे ऊपर रहें उनका जोड़ 2 होगा किन्तु उन्हीं अंकों को बराबर लिख दें तो संख्या 11 बन जायेगी। अंकगणित का यही सिद्धान्त भाव प्रधान मनुष्य पर लागू होता है। दो बुद्धिमान चीते मिलकर वन की सुव्यवस्था बना तो सकते हैं। पर बना नहीं पाते, क्योंकि भावनात्मक सहयोग के अभाव में वे एक दूसरे को नीचा दिखाने का ताना बाना बुनने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं सकते। एक दूसरे से आत्मरक्षा करने और आक्रमण का अवसर ढूंढ़ने के अतिरिक्त और वे कुछ सोच ही नहीं सकते। यदि सिंहों में हाथियों में भावनात्मक एकता की सहकारिता की वृत्ति रही होती और मनुष्य उस दिव्य अनुदान से वंचित रहा होता, तो निश्चित ही वे बलिष्ठ प्राणी संसार का शासन कर रहे होते और मनुष्य उनकी कृपा पाने के लिए लालायित रहता हुआ किसी प्रकार जिन्दगी के दिन पूरे कर रहा होता।

मानवी विकास के इतिहास पर दृष्टि डालने से यह स्पष्ट है कि आदिम काल में यह भी अनगढ़ वानरों की तरह एक तुच्छ सा पशु मात्र था। उनकी बुद्धि कुछ पैनी तो थी, पर उतने तीखे मस्तिष्क तो अन्य अनेक प्राणियों के भी पाये जाते हैं। चमगादड़, कुत्ता, चींटी, मधुमक्खी, मकड़ी जैसे प्राणियों की इन्द्रिय शक्ति मनुष्य की तुलना में कही विकसित है और ऋतु परिवर्तन जैसी सूक्ष्म सम्भावनाओं को समझने की दृष्टि से कितने जीव मनुष्य से आगे है। पर वे कोई खास विकास न कर सके जबकि मनुष्य दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति करता चला जाता है। तथ्यों की गहराई में प्रवेश करते हुए मनुष्य को एक ही सर्वोपरि विशेषता उभर कर आती है- सहकारिता की प्रवृत्ति। एक दूसरे के प्रति आत्मीयता की, ममता की, सहायता की जो सद्भावनायें उमड़ती है। उसके समन्वय को सहकारिता कहते हैं उससे आदान प्रदान का परस्पर मिल जुलकर रहने का मिल बाँटकर खाने का व्यवहार अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है। यही है मानवी प्रगति का मूलमन्त्र। जहाँ भी इस प्रवृत्ति का जितना अधिक उपयोग हुआ है। जहाँ इसकी जितनी न्यूनता रही है वहाँ उतनी ही मात्रा में जड़ता छाई रही है। संसार के अनेक क्षेत्रों में मनुष्य अभी भी आदिम अवस्था में पड़े पाये जाते हैं। उनकी अवगति में भावनात्मक सहकारिता की न्यूनतम ही प्रधान अवरोध बनकर खड़ी दृष्टिगोचर होती है।

आदिम काल में मनुष्य भी बन्दरों की तरह ही ची-ची बोलता था। उसने अपने मुँह से निकलने वाले कई शब्दों को अलग किया और हर उच्चारण के साथ एक जानकारी जोड़ी। यह उसकी बुद्धिमत्ता कही जा सकती है। इसमें चार चाँद तब लगे जब उसने उच्चारण के साथ जुड़े हुए संकेतों की जानकारी दूसरे साथियों को कराई यहाँ से शब्द विज्ञान का प्रवाह चल पड़ा। पीढ़ियों तक सहस्राब्दियों तक इस दिशा में प्रगति होती रही और आज हम उच्चारण क्षमता का पूरा पूरा लाभ उठाते हैं। आरम्भिक लिपि भी आड़ी टेड़ी लकीरों के के साथ अमुक जानकारियाँ जोड़ने के रूप में आरम्भ हुई थी पीछे अक्षरों का स्वर व्यंजनों का अंग विद्या तथा रेखागणित का आविर्भाव हुआ और क्रमशः सर्वांगपूर्ण शिक्षा विज्ञान बनकर खड़ा हो गया। आज हमारी लेखनी और वाणी इतनी विकसित है कि उसके सहारे अति महत्वपूर्ण जानकारियों का विश्व के एक कोने से दूसरे कोने तक आदान प्रदान अति सरल हो गया है।

कृषि, पशुपालन, चिकित्सा, विज्ञान, शिक्षा, शिल्पकला, व्यवसाय, उद्योग, परिवार, समाज, शासन आदि ज्ञान-विज्ञान की अगणित उपलब्धियाँ हमारे सामने प्रस्तुत है और हम देवोपम साधन सम्पन्न का उपभोग कर रहे है। यह सारा वैभव चमत्कार सहकारिता की सत्प्रवृत्ति का है। एक आदमी दूसरे के साथ सघन आत्मीयता स्थापित न करना दूसरों के सुख-दुख में भागीदारी करने में उत्साह न रहता तो सहयोग की इच्छा ही न उठती और आदान प्रदान का सिलसिला न चलता। इस स्थिति में उस प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है जिनके कारण मनुष्य जीवन को सुरदुर्लभ अनुभूतियों से भरा पूरा माना जाता है। यथार्थता यह है कि सहयोग और उत्कर्ष एक दूसरे पर पूरी तरह निर्भर है। एक के बिना दूसरे की न आशा की जा सकती है और न सम्भावना ही बनती है।

एकाकी मनुष्य जीवित भर रह सकता है। उल्लास एवं उत्कर्ष के लिए उसे साथी ढूंढ़ने पड़ते हैं और समूह में रहने की व्यवस्था जुटानी पड़ती है। इसके अतिरिक्त स्नेह, सद्भावना आत्मीयता एवं घनिष्ठता के इतने गहरे पुट लगाने पड़ते हैं कि एक दूसरे के लिए सब कुछ निछावर कर देने के लिए तत्पर रहे। एक दूसरे के दुख को बँटाने और अपने सुख को दे डालने में प्रसन्नता अनुभव करें। ऐसी स्थिति जो जितनी अधिक और जितने अच्छे स्तर की बना सकता है वह उतना ही सुखी, समुन्नत एवं सुसंस्कृत पाया जाते हैं। अनेकानेक सद्गुण इसी सहयोग रूप कल्प वृक्ष के पत्र पल्लव समझे जा सकते हैं। जिनका जितना ध्यान इस प्रवृत्ति को विकसित करने वाले आधार खड़े करने की ओर है। वे अपनी अपने संपर्क परिकर की उतनी ही महत्वपूर्ण सेवा कर रहे होते हैं।

धर्म और अध्यात्म का सारा कलेवर वैयक्तिक और सामाजिक नैतिकता को अधिकाधिक परिष्कृत करने के लिए खड़ा किया गया है। नीति शास्त्र और समाजशास्त्र की मर्यादाओं में बँध कर ही वैयक्तिक और सामूहिक सुख शान्ति का प्रगति समृद्धि का पथ प्रशस्त होता है यह तथ्य सर्वमान्य है। आचार संहिता में व्यतिरेक पड़ते हैं तो सर्वत्र असुरक्षा, आशंका और आतंक का वातावरण छा जाता है इतना समझ लेने के बाद गहराई की एक सीढ़ी और उतरा जाय तो पता चलेगा कि यह सब कुछ मात्र सहयोग की वृत्ति को सुदृढ़ बनाने और उसके मार्ग में आने वाली बाधाओं को हटाने भर के लिए है। धर्मशास्त्र, आध्यात्मशास्त्र, आचारशास्त्र, समाजशास्त्र, दर्शन शास्त्र आदि मानवी चेतना की प्रभावित करने वाली सभी चिन्तन धारायें मिल जुलकर एक ही घेराबन्दी करती है कि मनुष्य पारस्परिक सहयोग की दिशा में अधिक उत्साह के साथ अग्रसर हो और इस मार्ग में जितने भी व्यवधान आते हैं, उन्हें हटाने के लिए पूरी तरह सचेष्ट रहें।

अनाचार और व्यभिचार की भरपूर भर्त्सना की जाती है और उन्हें दण्डनीय अपराध माना जाता है। आखिर ऐसा क्यों? व्यभिचार की क्रिया यदि मूलतः पाप है तो वही क्रिया अपनी पत्नी के साथ भी अपराध है। एक का धन दूसरा बिना उसकी इच्छा के लेना तो पाप हुआ। सरकार का टैक्स वसूल करना, संस्थाओं को दान, लड़कियों को दहेज, उपहार, उत्तराधिकार में सम्पत्ति विसर्जन भी कौन अपनी इच्छा से होता है। क्या यह हस्तान्तरण भी अपराध है। बारीकी से देखने पर ज्ञात होता है कि अपराध संहित में भी वे ही घटनाक्रम आते हैं जो दूसरी तरह हम सब भी नित्य के जीवन में करते रहते हैं। फिर उनके पास पुण्य होने का दण्डनीय क्षम्य ठहराये जाने का कारण क्या है। इस प्रश्न का उत्तर एक ही है मनुष्य की सहयोग प्रवृत्ति में बाधा डालने वाली गतिविधियों को रोका जाय और प्रोत्साहित करने वाली हलचलों को प्रोत्साहन दिया जाय। पाप और पुण्य का मूल निर्धारण महामनीषियों ने इसी कसौटी पर कसकर किया है और उसी की विवेचना में आचार समर्थक चिन्तन शास्त्र का विशालकाय कलेवर खड़ा किया है।

स्वार्थी, संकीर्ण, कंजूस, कृपण, अनुदार व्यक्तियों की निन्दा की जाती है। आखिर उनमें क्या बुराई की है। किसी का क्या बिगाड़ा छीना है। अपने लाभ की बात सोचना और अपनी वस्तु का आप उपभोग करना क्यों बुरा है। इस प्रश्न का उत्तर एक ही है एक दूसरे को सहयोग देने से हाथ सिकोड़ने लगेगा तो आत्मीयता की सहकारिता की भाव भरी सत्प्रवृत्ति को आघात लगेगा। समाज की प्रगति में बाधा पड़ेगी और वह स्वार्थी व्यक्ति दूसरों के स्नेह सहयोग से वंचित रहकर नीरस उपेक्षित एवं अविकसित जीवन जीने के लिए विवश होगा। व्यक्ति और समाज की प्रगति में स्वार्थपरता को हर दृष्टि से बाधक माना गया है। इसलिए उसे निन्दित ठहराया गया है। अपने मतलब से मतलब रखने वाले दूसरों का हित अनहित न देखने वाले व्यक्ति की निर्भय होकर दुष्कर्म करते हैं और अपराधों की बाढ़ बुलाकर सारे वातावरण को विषाक्त कर देते हैं।

मनुष्य जन्मजात रूप से बुद्धिमान नहीं होता। पशुओं के बच्चे बिना सिखाये माता के थन अपनी खुराक आप ढूंढ़ लेते हैं जबकि मनुष्य का बच्चा कई वर्ष का होने तक पेट भरने तक में पराश्रित रहता है। भेड़ियों की माँद में पाया गया तीन वर्षीय रामू बालक भेड़ियों की तरह ही चलता बोलता, खाता, सोता है। शिकारियों ने उसे पकड़ा और लखनऊ मेडिकल कॉलेज में उसे सुधार का उपक्रम हुआ तो भी वह मनुष्य सभ्यता को बहुत थोड़ा ही अपना सका। यदि जन्मजात बुद्धिमत्ता मनुष्य को मिली होती तो घने जंगलों में रहने वाले पिछड़े हुए आदिवासी अपनी सहज वृत्ति से अन्य लोगों की तरह सभ्य हो गये होते। वस्तुतः मनुष्य को बुद्धिमत्ता सहित जितनी भी उपलब्धियां मिली है उन सबकी जननी सहकर प्रवृत्ति ही है। हमें इस ईश्वरीय अनुदान को अधिकाधिक फलने फूलने का अवसर देना ही चाहिए। इसी प्रकार विश्व शान्ति और मानवी प्रगति पूर्णतया निर्भर है।


आनन्द प्राप्ति की दिशा और चेष्टा

आनन्द को पाना चाहते हो तो उसकी ओर कदम बढ़ाओ-लम्बी मंजिल पर एक एक डग भरते चलने से ही उसकी समीपता का लक्ष्य पूरा हो सकेगा।

इसके लिए किसी सघन कुँज में एकान्त साधना की आवश्यकता न पड़ेगी। कर्म को त्याग कर कल्पना लोक में विचारने से कुछ काम न चलेगा। सत्कर्मों में निरत रहकर श्वेद बिन्दुओं के साथ साथ आनन्द के मणिमुक्तकों का संचय किया जा सकेगा। प्रभु को भेंट करने योग्य ही सर्वोत्तम हार उपहार है जो सत्प्रयासों में बहने वाले श्वेद सीकरों से गूँथा गया है।

आनन्द की खोज बालकों के भविष्य चिन्तन जैसी काल्पनिकता के आधार पर नहीं हो सकती और न बूढ़ों की तरह उसे अतीत की स्मृतियों की चर्चा करते रहकर पाया जा सकता है।उसके लिए कर्मनिष्ठ तरुणों की तरह वर्तमान से जूझना पड़ेगा। आनन्द गहरे कुँए का जल है जिसे ऊपर लाने के लिए देर तक प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। मोती लाने वाले गहराई में उतरते और जोखिम उठाते हैं। आनन्द पाने के लिए गोताखोरों जैसा साहस और कुँआ खोदने वालों जैसा संकल्प होना चाहिए।

यदि सचमुच ही आनन्दित रहने की इच्छा हो तो फूलों से कुछ सीखो। वे स्वयं खिलते हैं और जो उधर से निकलता है उसके होठों को खिलाते हैं। अपना सौरभ उदारतापूर्वक वायुमण्डल में बखेरते हैं। यह नीति अपनाकर कोई भी भीतरी आत्म सन्तोष और बाहरी सम्मान का भाजन बन सकता है। मधुमक्षिकाएँ अनवरत श्रम करती है। वे उसका लाभ नहीं उठाती। उपभोग तो दूसरे ही करते हैं पर इस श्रम से संलग्न उनकी कर्मनिष्ठा सहज ही आनन्द का उपहार देती रहती है। यदि ऐसा न होता तो दूसरों द्वारा मधु निचोड़ लिये जाने के उपरान्त वे दूसरे दिन फिर क्यों उसी प्रयास में संलग्न होती। उद्देश्यपूर्ण सत्कर्मों की प्रतिक्रिया ही आनन्द के रूप में अनुभव की जाती है। जिन्हें सरसता की खोज है उन्हें इसी राह पर चलना पड़ेगा।

आनन्द का चिन्तन बुरा नहीं पर उसे बीज की तरह गलना और उगना चाहिए अन्यथा नयनाभिराम वटवृक्ष की छाया में बैठकर सरसता का आस्वादन सम्भव न हो सकेगा। ध्यान और योग की अपनी उपयोगिता है।पर उतने भर से सच्चिदानन्द का सान्निध्य सम्भव नहीं। भगवान का कोई स्थिर रूप नहीं वे सक्रियता के रूप में गतिशील हो रहे है। इस विश्व की शोभा स्वच्छता जिस दिव्य गतिशीलता पर निर्भर है। हम उसका अनुसरण करके ही प्रभु प्राप्ति के राजमार्ग पर चल सकते है। चिन्तन इसके लिए प्रेरणा देता है लक्ष्य तक पहुँचने के लिए चलना तो पैरों को ही पड़ेगा। भावनाओं में प्राणों की प्रतिष्ठापना कर्मनिष्ठा ही करती है। सत्कर्मों में निरत हुए बिना आनन्द की अनुभूति आज तक किसी को भी नहीं हो सकी है।

नीरसता क्या है? निष्क्रियता! उद्विग्नता क्या है? अनर्थ में अभिरुचि! हमारे जन्मजात आनंद अधिकार को इन दो ने छीना है। जीवन नीरस लगता है क्योंकि सत्प्रयोजन की दिशा में हम निष्क्रिय बने रहते हैं। हम उद्विग्न रहते हैं क्योंकि अकर्म और कुकर्म करके आत्मा को चिढ़ाते और बदले में चपत खाते हैं। यदि आनन्द अभीष्ट हो तो निरानन्द की दिशा में चल रही अपनी दिग्भ्रांत यात्रा का क्रम बदलना पड़ेगा। एक क्षण के लिए रुके और देखे कि जो चाहते हैं उसे पाने की दिशा और चेष्टा सही भी है कि नहीं। चिन्तन के फलस्वरूप आनन्द की प्राप्ति का जो माहात्म्य बताया गया है उसका आधार यही है कि वस्तु स्थिति को नये सिरे से समझे और जीवन नीति का नये सिरे से निर्धारण करें।


विक्षुब्ध आत्मा और उसके उपद्रव

अफ्रीका के नाइजीरिया देश में एक समय अंग्रेजों का उपनिवेश था। अब यों वहाँ आजादी है पर प्रभुत्व वहाँ स्थायी रूप से बसे हुए गोरों का ही है।

उस क्षेत्र के एक अंग्रेज फ्रेंक हाइब्स ने नाइजीरिया में आँखों देखा प्रेत विवरण प्रकाशित कराया था। वह अफसर किसी काम से ‘इंसुइंगु’ गया। वहाँ एक पुराना टूटा फूटा डाक बंगला था। उसने उसी में ठहरने का निश्चय किया। उस क्षेत्र के रहने वाले इसुओरगु कबीले के आदिवासी उसे समझाते रहे कि इस डाक बंगले में प्रेत रहते हैं इसलिए वह वहाँ न रहे। उन्हीं के घरों में ठहर जाय।

अफसर उनकी अन्ध मान्यताओं पर हंसता रहा और कहता रहा “उनके गन्दे घरों की अपेक्षा प्रेत के साथ खुले डाक बंगले में रहना अच्छा है” मजदूरों ने उस खंडहर की सफाई कर दी खाने ठहरने के साधन जुटा दिये पर रात को वहाँ रहने के लिए कोई तैयार न हुआ। निदान उसे अकेले ही उसमें रहकर रात बितानी पड़ी।

रात को बारह बजे तक वह सोता रहा किन्तु अर्धरात्रि होते ही किसी ने उसकी मच्छरदानी खींची। उठकर देखा तो कोई नजर नहीं आया किन्तु बदबू इतनी फैल रही थी वहाँ ठहरना मुश्किल हो गया। इतने में एक तेज हवा के झोंके ने बंगले की खिड़कियां जोरों से खड़काना शुरू कर दी और मेज पर रखी चाय की प्लेटें जमीन पर पटक दी। साथ ही किन्हीं भारी पैरों की आवाज उसे इस तरह सुनाई पड़ने लगी मानो कोई बड़ी आकृति का प्राणी इधर टहल रहा हो भरी पिस्तौल हाथ में लेकर हाइब्स बाहर निकला तो देखा कि अंधेरे में कोई छाया जैसी आकृति बरामदे में टहल रही है। अफसर ने आवाज दी पर कोई उत्तर न मिला तो उसने दो गोलियाँ दाग दी। पर इसका कोई प्रभाव उस आकृति पर न पड़ा। आकृति समीप बढ़ती आई और उसकी शकल आसानी से दीख पड़ने लगी। भयंकर चेहरा नाक बैठी हुई होठ खुले हुए गंजा सिर, स्थिर पुतली गड्ढों और झुर्रियों से भरे गाल वह बड़ा भयानक लग रहा था। अफसर मूर्तिवत् सुन्न खड़ा रहा। वह सोच न सका कि यह कौन है और क्या कर रहा है। धीरे धीरे आकृति पीछे हटी और खम्भे पर चढ़ने लगी। अफसर ने उसे निशाना बनाकर दो गोलियाँ और चलाई पर वह लगी किसी को नहीं। छाया भी गायब हो गई। डरा हुआ हाइब्स बेतहाशा भागा और कुछ दूर तक चीख के साथ बेहोश हो गया। आदिवासी यह जानने के लिए इर्द गिर्द ही घूम रहे थे कि देखें क्या घटना घटित होती हैं वे लोग चीख सुनकर दौड़े आये और अफसर को उठाकर अपनी चौपाल पर ले गये। जहाँ उसे कई घण्टे होश आया।

दूसरे दिन अफसर ने आदिवासियों को बुलाकर उनके परिचित प्रेत की बाबत पूछताछ की इसुओरगु लोगों ने बताया कि जिस जगह डाक बंगला बना है पहले उस जगह एक टीला था जिस पर जूजू देवता की पूजा होती थी और जानवरों तथा मनुष्यों की बलि दी जाती थी। अंग्रेज जब आये तो उन्होंने उस स्थान की अनगढ़ मूर्तियों को उठवाकर एक ओर फिंकवा दिया नरबलि बन्द करादी और डाक बंगला बनवा दिया। इस पर उस क्षेत्र का देव पुरोहित बहुत बिगड़ा और अंग्रेजों के चले जाने पर गाँव वालों की इकट्ठा करके बोला डाक बंगले को जला दो और वहाँ फिर से देवता की पूजा आरम्भ करो। भयभीत ग्रामवासी इसके लिए तैयार नहीं हुए। निराश पुरोहित क्रोध में उन्मत्त स्थिति में पागलों की तरह बड़बड़ाता और मंत्र पड़ता हुआ उस डाक बंगले के चारों ओर चक्कर लगता रहा और अन्त में एक रस्सी से उसी के बरामदे में फाँसी लगाकर मर गया तब से अब तक उसी पुरोहित का प्रेत डाक बंगले में रहता है। कोई उधर जाने की हिम्मत नहीं करता। इससे पहले भी कोई अंग्रेज अफसर आया है और उसमें ठहरा है तो उसे प्रेत ने रहने नहीं दिया है।

उस बंगले में ठहरने वाले यह अनुभव करते रहे है कि विचित्र प्रकार की दुर्गन्ध उस बंगले के कमरों से आती है। उस भीषण उष्ण क्षेत्र में जहाँ रात को भी लोग हाँफते रहते हैं। इस बंगले में कंपाने वाली ठण्डक रहती है। बाहर हवा बिलकुल ही बन्द क्यों न हो किन्तु भीतर आँधी तूफान उठते रहते हैं।

फ्रेंक हाइब्स ने इन सब बातों की जानकारी विस्तारपूर्वक प्राप्त की और जब उसे डाक बंगले के भुतहे होने का विश्वास हो गया तो भविष्य में किसी अफसर पर संकट न आये यह ध्यान में रखते हुए उसमें सामने आग लगवादी और वह जलकर धराशायी हो गया। कितने आश्चर्य की बात है कि इस अग्निकाण्ड के साथ भविष्यवाणी भी सिद्ध हुई। पुरोहित जब आदिवासियों को डाक बंगला जलाने के लिए तैयार न कर सका तो इतना ही कहा अच्छा तुम मत जलाओ पर देखना एक दिन वह किसी न किसी के द्वारा जलकर ही नष्ट होगा। सचमुच उस डाक बंगले का अन्त वैसा ही हुआ।

भूत प्रेतों के अस्तित्व संबंधी प्रचलित कथा गाथाओं के संदर्भ में एक तथ्य सदा ही सामने आया है कि जिन व्यक्तियों को मरते समय अत्यधिक आवेश रहे है उन्होंने उसी मन स्थिति का परिचय अपने प्रेत कलेवर में दिया है। जैसे धन या मकान से अत्यधिक प्यार करने वाले मरते समय उन वस्तुओं से अत्यधिक मोह प्रकट करते हुए विलग हुए है तो उनका प्रेत उन्हीं स्थानों के इर्द गिर्द मंडराता रहता है। जमीन में गढ़े हुए धन की उन्होंने चौकीदारी की है और यदि किसी से उसे निकाला भोगा है तो उसको तरह तरह के त्रास दिये है। घृणा और रोष की स्थिति में मरने वाले अक्सर प्रतिपक्षी को कष्ट देते हैं। ऊपर की घटना वाला पुरोहित प्रेत टीला हटाने के कारण रुष्ट हुआ और उस आक्रोश में विक्षिप्त होकर आत्म हत्या कर बैठा। मरने के बाद भी वह रोष शान्त नहीं हुआ और उद्विग्न आत्मा उसी टीले की जगह बने डाक बंगले को अपनी प्रतिहिंसा का केन्द्र बनाये रहा। मिश्र के पिरामिडों में बलि दिये गये मनुष्यों के चीत्कार इतने उद्विग्न रहते हैं कि उन स्थानों को छेड़छाड़ करने वालों पर ही बरस पड़ते हैं और घातक हमले करते हैं। कब्रिस्तानों और मरघटों में इसी प्रकार के उपद्रव घटित होते रहते हैं।

आवश्यक नहीं कि आत्मा नया जन्म धारण करने तक ही प्रेत स्थिति में रहे। यह भी हो सकता है कि मूल जीवन अपना पुनर्जन्म ग्रहण कर ले और उसके उद्विग्न शरीर के निकले हुए प्राण परमाणु एक छाया पुरुष जैसी प्रतिकृति गढ़ ले और उच्छिष्ट चेतना अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाकर बैठ जाय और चिरकाल तक उसी प्रेत स्थिति में बनी रहे। तन्त्र साधना में उच्छ्रिष्ट भैरव छाया पुरुष आदि की साधना के विधान है यह दैत्य न तो देव होते हैं और न दानव। वे उसके शरीर के साथ जुड़े हुए तेजोवलय के आधार पर बनी हुई प्रतिमूर्ति होती है जो विविध प्रकार के क्रिया कलाप तो सम्पन्न नहीं कर सकती पर एक ही स्तर के कार्य ठीक तरह पूरे करती रहती। मरघटों में तान्त्रिक साधना करने का प्रयोजन ऐसे ही किसी चेतना उच्छिष्ट को वशवर्ती बना लेता होता है जो शरीर त्याग देने पर भी किसी विशेष कारण से उद्विग्न स्थिति में जीवन यापन करता है। प्रेत योनि विक्षोभ की स्थिति है। उसमें समूची आत्मा का अथवा उसके एक अंश की विक्षुब्ध स्थिति का परिचय मिलता है।

मरते समय तथा उसके उपरान्त मृत्यु स्थान पर धार्मिक वातावरण बनाने की उपयोगिता धर्मशास्त्रों में इसीलिए बताई गई है कि उससे दिवंगत आत्मा को यदि कोई विक्षोभ रहा हो तो उसका समाधान होने से सद्गति प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके।


Quotation

कितने दुर्भाग्य की बात है कि मनुष्यों में से अधिकाँश का-अधिकाँश समय अपने भविष्य को बिगाड़ने में लगता है। -जीनडीला ब्रुयर


सुख दुःख हमारी कल्पनाओं पर निर्भर है।

सुख और दुःख की अनुभूतियों का विश्लेषण करते हुए डाक्टर जौइस ने लिखा है यह अनुभूतियाँ किसी व्यक्ति विशेष वस्तु विशेष या परिस्थिति विशेष के साथ बंधी हुई नहीं है। एक को जिसमें सुख मिलता है दूसरे को उसके रहते हुए भी दुख ग्रसित देखा गया है। आज जो वस्तुस्थिति बहुत अच्छी लगती है कल वही बुरी लग सकती है। मान्यताओं के बदलने के कुछ कारण भी हो सकते हैं पर तथ्य यही है कि वहाँ सुख या दुख को जितना आरोपित किया जाएगा वहाँ उसको उसी स्तर की अनुभूति होने लगी। अभीष्ट आकाँक्षाओं की पूर्ति में सुख मिलता है और वे आकाँक्षाएँ मनुष्य की स्वनिर्मित होती है। अस्तु सुख या दुख भी उसी का स्वनिर्मित है।

दुख और सुख की एक छोटी परिधि ही ऐसी है जो हमारी सीमा के बाहर है। इसमें शारीरिक पीड़ाएं प्रकृति के प्रकोप आक्रान्ताओं के उत्पीड़न प्रियजनों के बिछोह जीवनयापन के अनिवार्य साधनों का अभाव जैसे थोड़े कारण ही गिने जा सकते हैं। वे सदा हर किसी पर नहीं छाये रहते। कभी कभी किसी किसी को ही ऐसी आपत्तियां सहनी पड़ती है। साधारणतया इस प्रकार के प्रसंग कम ही आते हैं। सरल सुगम जीवन जी सकने योग्य स्थिति प्रायः बनी ही रहती है। फिर भी अधिकाँश जन्य नहीं भावना जन्य है। इसमें विचारों की अस्त व्यस्तता ही मुख्य कारण होती है।

अभिलाषाओं के प्रति इतना आतुर होना कि उनकी अति शीघ्र पूर्ति न होने पर उद्विग्नता अनुभव होने लगे चिन्तन की ही भूल है। इच्छित परिस्थितियों का मिलना इतना सुगम नहीं है कि चाहने भर से अनुकूलताएँ उत्पन्न होती चली जाय। अनेक कारणों के मिलने और अभीष्ट साधन जुटाने से ही सफलता मिलती है उसमें भी प्रयत्न साधनों और परिस्थितियों का अनुपात ही होता है। अभिलाषाएँ गढ़ते समय यह ध्यान नहीं रखा जाता है कि साधनों और आकाँक्षाओं में तालमेल है या नहीं। यदि है तो उसके लिए कितने श्रम साधन जुटाने पड़ेंगे कितने अवरोधों से संघर्ष करना होगा और कितनी प्रतीक्षा के उपरान्त चाहना ही पूर्ति होगी। इस हाथ चाहा और उस हाथ पाया की जादुई कल्पना करने वाले अफसर अपने को दुखी और दुर्भाग्य ग्रस्त कहते रहते हैं।

अमुक सफलताओं के साथ सुखानुभूति का सम्बन्ध जोड़ लेना आकाश कुसुम तोड़ने के समान है। छोटी से छोटी सफलता के लिए निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता है कि बड़े से बड़े प्रयत्न एवं साधन होने पर भी वह उपलब्धि निश्चित रूप से मिल ही जाएगी। अनेक ऐसे छोटे बड़े कारण आते रहते हैं जो सारी योजना को ही उलट दे और सोची हुई व्यवस्था से सर्वथा विपरीत परिस्थितियाँ सामने लाकर खड़ी कर दे। मनुष्य अपने प्रयत्नों तक ही सीमित है परिस्थितियों पर उसका कोई काबू नहीं। सफलता में अकेला प्रयत्न ही काफी नहीं। परिस्थितियों का भी उसमें बड़ा भाग रहता है। किसान भरपूर परिश्रम करे तो भी पाला मार जाने टिड्डी आ जाने अतिवृष्टि होने जैसी दैवी प्रकोप फसल को नष्ट करके पुरुषार्थ का प्रतिफल नष्ट कर सकते हैं। ऐसी ही बाधाएँ या विपरीतताएँ कही भी कभी भी खड़ी हो सकती है और सुख के लिए जो तथ्य निश्चित किया था उसे मटियामेट कर सकती है।

सुख को अपने हाथ में रखने और उसे निरन्तर अनुभव करते रहने का सरल तरीका यह है कि अमुक सफलताओं की प्रतीक्षा किये बिना अपने प्रयत्न पुरुषार्थ की उत्कृष्टता को ही सुखानुभूति को केन्द्र मान लिया जाय। हमने अभीष्ट प्रयोजन के लिए सच्चे मन से समुचित प्रयत्न किया यह कर्मनिष्ठा अपने आप में एक गौरवास्पद उपलब्धि है। आलस्य और प्रमाद ही लज्जाजनक है। असावधानी और अस्त व्यस्तता ही निन्दनीय है यदि इन कलंकों से बचकर अपनी चेष्टा में कमी नहीं रखी गई है तो वह प्रयत्नशीलता ही इतनी आनन्ददायक हो सकती है कि उसके साथ गर्व और सन्तोष अनुभव किया जा सके।

जो परिस्थितियाँ उपलब्ध है उनमें बहुत कुछ ऐसी है जिसमें बहुत कुछ सुखानुभूति की जा सके। संसार में ऐसे मनुष्यों की कमी नहीं जो उन साधनों के लिए भी तरसते होंगे जो हमें मिले हुए है। यदि उन्हें हमारी स्थिति मिल गई होती तो कितने प्रसन्न होते। कभी इस दृष्टि से अपने साधनों पर विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि जो उपलब्ध है उस पर भी प्रसन्नता अनुभव की जा सकती है। यदि हम अपने से अधिक सुखी लोगों के साथ तुलना करके स्वयं को अभावग्रस्त स्थिति में न रखे और अभावग्रस्तों की तुलना में अपने का अधिक सुसम्पन्न समझे तो कोई कारण नहीं कि अपनी आज की परिस्थिति ही सन्तोषजनक एवं आनन्ददायक प्रतीत न होने लगे।

वस्तुओं की प्रचुरता एवं परिस्थितियों को ऊँचाई पर नहीं सुखानुभूति इस बात पर निर्भर है कि उनका उपयोग किस तरह किया जा सका। गहरी दिलचस्पी रखने पर छोटी या सस्ती वस्तुएँ भी बहुत सुखद बन जाती है। अपनी अशिक्षित या कुरूप पत्नी में जो थोड़े बहुत गुण है या विशेषताएँ है उन्हीं पर यदि ध्यान दिया जाय तो वह बहुत ही प्रिय लगने लगेगी। इसके विपरीत यदि सुयोग्य पत्नी के भी दोषों पर ध्यान दिया जाता रहेगा और उनके कारण अप्रसन्नता व्यक्त की जाती रहेगी ता वह सुख भी हाथ से निकल जायेगा जो अशिक्षित एवं कुरूप पत्नी के गुणों का चिन्तन करने वाले पति को मिलता है। पत्नी के रूप या गुण प्रसन्नता अप्रसन्नता के कारण समझे जाते हैं पर यह व्याख्या गलत है। वस्तुतः गुणों अथवा दोषों में से किस का किस मात्रा में चिन्तन किया जा रहा है उसी आधार पर वह प्रिय अप्रिय लगने लगेगी।

आमतौर से लोग अपने से विपरीत अथवा ऊँची स्थिति वालों को सुखी मानते हैं। अशिक्षित शिक्षितों को ग्रामीण शहरियें को किसान बाबुओं को निर्धन धनियों को सुखी मानते हैं। यदि उन लोगों से पूछा जाय ता बतायेंगे कि शिक्षित शहरी बाबू या धनी होने के कारण उन्हें जिन चिन्ताओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है उन्हें देखते हुए अशिक्षित ग्रामीण कृषक एवं निर्धन जीवन में कही अधिक सुविधा सरलता है। अविवाहित विवाहितों का सुखी मानते हैं और विवाहितों से पूछा जाय तो वे कहेंगे कि अविवाहित हम से कहीं अधिक सुखी सन्तुष्ट रहते होंगे। अपने अभावों की ही देखना और दूसरों के सुखी के साथ उनकी तुलना करना दुखी रहने का सस्ता नुस्खा है। इसके विपरीत अपने को जो उपलब्ध है उसका सदुपयोग करते रहा जाय और उसे आवश्यक सुख के लिए पर्याप्त माना जाय तो चेहरे पर सन्तोष भरी प्रसन्नता झलकती रहेगी।

आकाँक्षाओं का स्तर जिसने जितना बड़ा बना रखा होगा वह उतना ही दुखी रहेगा क्योंकि बड़ी सफलताएँ और बड़ी उपलब्धियाँ उतनी सरल नहीं है जितनी कि उन्हें गढ़ते समय सोचा गया था। व्यवधान एवं अवरोध तो छोटे से छोटे काम में लगते हैं फिर बड़े कामों का तो कहना ही क्या? प्रत्येक कठिनाई इच्छा पूर्ति में विलंब लगाती है और धूमिल करती है। इन चौराहों पर अति उत्सुक व्यक्ति उद्विग्न हो उठता है। देर लगने पर तो उसका जोश ठंडा होने लगता है और नशा उतरने पर शराबी की जो दुर्दशा होती है उसी तरह उसके भी हाथ पैर ठंडे होने लगते हैं।

अच्छा यह है कि छोटी सफलताओं के ऐसे लक्ष्य रखे जाय जो दो चार दिन में ही पूरे हो सकते हो सरल हो अपनी सामर्थ्य के अंतर्गत हो। ऐसे लक्ष्य निर्धारित करना जो जल्दी ही सरलतापूर्वक पूरे हो सकते हैं मनोबल बढ़ाने का ही अच्छा उपाय है। दूरगामी बहुत बड़ी योजनाएं बनाना और उनके लिए अधीर रहना अपने सिर पर अनावश्यक दुख लाद लेने के समान है। लम्बी और बड़ी योजनाएँ बनानी तो चाहिए पर उनके लिए आतुरता व्यक्त नहीं की जानी चाहिए। उस लम्बी मंजिल की छोटे छोटे टुकड़ों में बाँट लेना चाहिए और उन टुकड़ों में से एक एक पूरा करते चलना सफलता का चिह्न समझा जा सकता है। फिर यह जानकर चलना चाहिए कि यह अपने प्रयत्न की दिशा है देर सवेर में वहाँ तक पहुँच ही जायेंगे।

अधिकाँश दाम्पत्य जीवन इसलिए दुखी देखे गये है कि उन्होंने विवाह से पूर्व गृहस्थ बसने पर सम्भव होने वाले बहुत रंग बिरंगे चित्र मस्तिष्क में संजो रखे थे। कल्पना पर अंकुश नहीं वह किसी भी तरह गढ़ी जा सकती है पर दो मनुष्यों पर तालमेल किस हद तक किस प्रयोजन के लिए कितना बैठता है यह सब सुनिश्चित नहीं। समन्वय से जो भी स्वरूप बन जाय उसी से निर्वाह कर लेने की मन स्थिति वाले पति पत्नी अनेकों मतभेद रहने पर भी सन्तुष्ट रहते देखे है जबकि भावुक लोग राई रत्ती विषमता को ही पहाड़ मानकर झगड़ते उलझते हुए खीज में डूबे रहते हैं।

कुछ लोग संघर्ष की स्थिति आने पर बेतरह घबराते हैं जबकि कुछ लोग उलझने की मजेदारी का आनन्द लूटने के लिए कुछ न कुछ बखेड़े खड़े करते रहते हैं। इसके बिना उन्हें चैन ही नहीं पड़ता और नीरसता लगती है। संघर्ष घबराने वाला है या शूरता पर धार चढ़ाने वाला इसकी सीधी व्याख्या नहीं हो सकती। यह सब व्यक्तिगत मान्यताओं पर निर्भर है। कुछ लोग निठल्ले बैठे रहने में सुख अनुभव करे है जबकि दूसरों को एक क्षण भी बेकारी में गुजारना असह्य होता है। ठलुआ आदमी श्रमशील लोगों को दुर्भाग्यग्रस्त मानते हैं और श्रमनिष्ठ व्यक्ति इन आलसियों का दयनीय मानते हैं। दोनों में से कौन सही है यह पूछने पर दोनों ही अपनी अपनी मान्यता का समर्थन करेंगे

सुख दुख में अनिवार्य तथ्यों के कुछ थोड़े से तथ्यों को छोड़कर शेष सब कुछ काल्पनिक होता है। मनुष्य अपनी मान्यताओं और कल्पनाओं को विकृत बनाकर दुख दारिद्रय के दुर्भाग्य असन्तोष के विक्षोभ में जलता रहता है। यदि वह चाहे तो उस स्थिति से सहज की छुटकारा पा सकता है। भविष्य में संभावनाओं पर सुखानुभूति निर्भर रखने की अपेक्षा यह उपयुक्त है कि जो कुछ उपलब्ध है उसमें पूरी सरसता अनुभव करे और सदुपयोग करके अधिक से अधिक लाभान्वित होने का प्रयत्न करें।

अच्छे भविष्य की कल्पना करना-योजना बनाना और उसके लिए प्रयत्न करना उचित है और आवश्यक भी पर यह सब कुछ खेल विनोद की तरह होना चाहिए। भावी सफलताओं को इतना रंगीन आकर्षक एवं तुर्त फुर्त पूरी हो सकने वाली नहीं सोचा जाना चाहिए कि आतुरता में सामान्य जीवन की प्रसन्नता की भी बलि चढ़ा दी जाय।


शक्ति का बखान (kahani)

एक दिन चार तत्व आपस में झगड़ पड़े और अपनी अपनी शक्ति का बखान करते हुए बड़प्पन का दावा करने लगे।

पृथ्वी ने कहा-सबका बोझ मैं उठाती हूँ। सबका पेट मैं भरती हूँ। जल ने कहा संसार में मेरी ही दी हुई सरसता बिखरी पड़ी है। पवन बोला जीवन मेरा ही नाम है मेरे बिना हर किसी का दम घुट जाएगा। अग्नि ने कहा मेरे ताप के बिना इस संसार में शीत भरी निस्तब्धता के अतिरिक्त और क्या बच रहेगा?

आकाश अपना नील परिधान ओढ़े फिर भी चुप ही खड़ा रहा और सोचता रहा यह नादान लड़के यह क्यों नहीं देखते हैं कि वे चारों और ही मेरी अदृश्य गोद में बैठे हुए जीवन धारण कर सकने में समर्थ हो सके हैं।


नेत्रों की सुरक्षा इस प्रकार की जाय

नेत्रों को शरीर का सबसे उपयोगी अंग कह सकते हैं उनके बिना कितनी असुविधा होती है और प्रगति का पथ कितना अवरुद्ध रहता है इसे भुक्तभोगी ही जानते हैं।

नेत्रों की बनावट प्रकृति ने इतनी सावधानी से की है कि उनके जल्दी खराब होने की आशंका नहीं रहती। चोट गर्भकालीन दोष चेचक आदि की कोई दुर्घटना हो जाय तो बात दूसरी है अन्यथा यदि उनका दुरुपयोग न किया जाय तो वे आजीवन अपना काम ठीक तरह करते रह सकते हैं।

असावधानी और उपेक्षा बरतने से ही अक्सर समय से पूर्व आंखें खराब होती है। यदि उनके उपयोग में सतर्कता बरती जाय तो उन नेत्र रोगों से सहज ही बचा जा सकता है जो अधिकाँश लोगों को दृष्टि लाभ से वंचित करते चले आ रहे है।

धुँआ धूलि और धूप से आँखों को बचाया जाना चाहिए। बहुधा महिलाओं को भोजन बनाते समय गीली लकड़ियों अथवा पत्थर के कोयले के समीप बैठना पड़ता है। धुँआ किसी भी प्रकार का क्यों न हो आँखों को नुकसान पहुँचाये बिना न रहेगा। लकड़ी कोयला आदि खरीदने वालों को पूरी तरह परख कर ही यह वस्तुएँ लेनी चाहिए अन्यथा इस दिशा में बरती हुई थोड़ी सी भी भूल भोजन पकाने वाले की आँखों को लगातार खराब करती चली जायगी और उसे किसी दिन अंधे की स्थिति में पहुँचा देगी। चूल्हे या अंगीठी के समीप बैठने वालों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि धुँआ आंखों को प्रभावित न करने पावे। घुटन और धुएँ से भरे वातावरण में रहना भी आँखों पर बुरा असर ही डालता है।

चलती गाड़ी रेल बस आदि में पढ़ना नहीं चाहिए। हिलती हुई पुस्तक के अक्षरों पर दृष्टि जमाने में आँखों पर दूना श्रम पड़ता है। लेटे लेटे या करवट से पढ़ने पर भी पुतली अपने स्वाभाविक स्थान से इधर उधर हटी रहती है अस्तु उस स्थिति में भी दबाव अधिक पड़ता है और आँखों को हानि होती है। हिलती हुई रोशनी में प्रकाश कम ज्यादा होता रहता है और उसका आँखों पर बुरा असर पड़ता है। अधिक बारीक अक्षरों की पुस्तक पढ़ना भी हानिकारक है। लगातार बिना पलक झपकाये टकटकी लगाकर देखना आंखों की ज्योति को घटाता है। सिनेमा आदि आकर्षक दृश्यों को लोग प्रायः इसी प्रकार देखते हैं और हानि उठाते हैं।

आँधी लू एवं तेज हवायें जब धूलि उड़ा रही हो तो नेत्रों की रक्षा की विशेष सावधानी बरतनी चाहिए। हवा के रुख को बचाते हुए मुँह को थोड़ा टेढ़ा करके चलना चाहिए। दृष्टि नीचे कर लेनी चाहिए ताकि पलक झुके रहे और धूलि आँखों में न घुसे। ऐसी स्थिति में रंगीन चश्मा पहनना भी नेत्रों की धूलि में रक्षा करता है।

कड़ी धूप की चमक नेत्र पर बुरा असर डालती है। कड़ी धूप में शिर खुला नहीं रखना चाहिए। बालों का काला रंग धूप की गर्मी को विशेष रूप से खींचता है और शिर को गरम कर देता है। ऐसी दशा में शिर को ढक कर चलना ही उचित है। तेज धूप में रंगीन चश्मा पहना जा सकता है।

नेत्रों की ज्योति रक्षा के लिए आवश्यक है कि लगातार बहुत समय तक न पढ़ा जाय। बीच आँखों को विश्राम देने के लिए आंखें बन्द करके बैठ जाना चाहिए। रात को बहुत तेज रोशनी का उपयोग नहीं करना चाहिए और न इस तरह प्रकाश सीधा आँखों पर पड़े। सिनेमा देखते समय नीची सीट पर बैठकर और गरदन ऊपर उठाकर देखना आँखों के लिए हानिकारक है। ऐसे स्थान पर बैठना और इस तरह देखना चाहिए कि पर्दे पर पड़ने वाली रोशनी की चमक सीधी आँखों पर न पड़े।


शान्ति और प्रगति तरलता-सरलता पर निर्भर है।

भौतिक जगत में जल तत्व प्रधान है। यों कृषि उत्पादन निवास यातायात आदि की दृष्टि से थल ही महत्वपूर्ण दिखाई देता है पर थोड़ी गहराई से विचार करने पर प्रतीत होगा कि थल की जितनी महिमा है उससे कही अधिक जल की है। जल के अभाव में यह पृथ्वी लोहे जैसी कठोर और निर्जीव बनकर रह जायगी। चट्टानें मिट्टी ही तो है पर उनमें निवास अंश कम होता है। अतएव वे कृषि उत्पादन निवास आदि के किसी भी प्रयोजन में नहीं आती। थल की उपयोगिता जल के संयोग से ही बनी है।

प्राणियों के शरीर जिन रसायनों से बने है वे जलीय है इस धरती पर जल न होता तो यहाँ जीवन भी दिखाई न पड़ता। चन्द्रमा आदि जिन ग्रहों में जल नहीं है वहाँ निर्जीव नीरवता के अतिरिक्त और कुछ भी ऐसा नहीं है जिसकी उत्साह पूर्वक चर्चा की जा सके। धरती में जो वृक्ष वनस्पति पशु पक्षी कृमि कीटक और जलचर दिखाई पड़ते हैं उनकी हलचलों से यह दुनिया गतिशील दिखाई पड़ती है यह सब उस पानी का चमत्कार है जो नदी तालाबों में भी नहीं थल भूमि के कण कण में व्याप्त है। जल रहित थल की कल्पना की जाय तो उन जीव धारियों का अस्तित्व ही समाप्त हुआ दृष्टिगोचर होगा जो कल्पना कर सकने में समर्थ है।

स्थूल जगत में थल और जल का जो संयोग है वही सूक्ष्म जगत में वैभव और भावना का है। इन दोनों के संयोग से ही मनुष्य जीवन्त और रससिक्त दृष्टिगोचर होता है।

जीवन की उत्पत्ति पानी से हुई है। कृमि कीटकों से लेकर मनुष्य तक वनस्पति से लेकर जीवाणुओं तक की सारी जीवसृष्टि जल से ही जीवन ग्रहण करती है। बहुत दिन तक पानी को एक स्वतंत्र तत्व माना जाता रहा है। पर पीछे यह सिद्ध हो गया कि हाइड्रोजन के दो आक्सीजन का एक परमाणु मिलने से पानी बनता है। यह इस तरह जुड़ जाते हैं कि फिर उन्हें पृथक करना एक प्रकार के असंभव हो जाता है।

जल मात्र जलाशयों तक सीमित नहीं है वह थल में भी संव्याप्त है और अदृश्य आसमान में उड़ रहा है। भावनायें मात्र अन्तः करण में नहीं रहती वरन् मस्तिष्क में विचार पद्धति का और शरीर में क्रियाशक्ति का संचार करती है। मस्तिष्क जड़ है उसका स्वतंत्र चिन्तन कुछ भी नहीं। भावनाओं का प्रवाह ही अभीष्ट दिशा में मन बुद्धि चित्त अहंकार को धकेलता घसीटता है। शरीर जड़ पदार्थों का बना है उसमें जड़ता के गुण है। देह में जितनी भी जिस स्तर की भी सक्रियता है उसे चेतन की प्रेरणा ही समझा जाना चाहिए। जल की मानवी चेतना से तुलना करें तो उसे विचारणा और भावना का समन्वय कह सकते हैं। पानी भी तो हाइड्रोजन और आक्सीजन के संयोग से बनता रहे।

मनुष्य शरीर में 65 प्रतिशत पानी है। यह अनुपात स्थिर रहने पर ही वह स्वस्थ रह सकता है। अगर पाँच प्रतिशत भी कमी पड़ जाय तो चमड़ी सिकुड़ जायगी जीभ ऐंठने लगेगी और डरावने सपने आवेंगे। पन्द्रह प्रतिशत कमी पड़ जाय तो फिर मौत ही समझिए। पानी की मात्रा बढ़ जाने से सिर चकरायेगा उल्टियाँ होगी ठण्ड लगेगी और बेहोशी छा जायगी। मस्तिष्क का हाइपोथैलेमस केन्द्र पानी की मात्रा पर नियंत्रण रखता है। जरा सी कमी पड़ने पर प्यास लगती है और बढ़ोत्तरी होने पर पेशाब जाना पड़ता है।

शरीर में 47 प्रतिशत पानी पेय पदार्थों द्वारा और 29 प्रतिशत ठोस समझे जाने वाले आहार से पहुँचता है। 14 प्रतिशत शरीर स्वयं ही अपनी रासायनिक क्रियाओं द्वारा अपने आप बनाता रहता है। साधारणतया एक स्वस्थ शरीर में 50 सेर पानी रहता है। इसमें से 2 सेर पेशाब पसीना आदि से निकलता है और इतना ही खान पान के माध्यम से भीतर पहुँच जाता है।

पानी के निकास में साँस को 15 प्रतिशत पसीने की ग्रन्थियों को 22 प्रतिशत और शेष गुर्दों को करना पड़ता है। रक्त में 83 प्रतिशत और दाँतों के ऊपरी खोल में 2 प्रतिशत पानी होता है। सबसे अधिकता और न्यूनता वाले यही दो भाग है।

शरीर को पानी की सहायता से ही स्वस्थ रखा जा सकता है। भोजन का स्थान उससे कही बाद का है। घटिया भोजन के सहारे बहुत दिन तक काम चल सकता पर गन्दा जल तो कुछ ही समय में विपत्ति खड़ी कर देगा। धन वैभव के बिना स्वल्प साधनों के सहारे भी अपरिग्रही लोगों की तरह हंसता खेलता जीवन जिया जा सकता है? किन्तु विवेकयुक्त सरस मन स्थिति न होने पर केवल कर्कशता और उद्विग्नता ही हाथ लगेगा। अकेला वैभव व्यसन अहंकार और असंतोष ही उत्पन्न करेगा।

पानी की मात्रा का शरीर में संसार में संतुलन रहना चाहिए। अनावश्यक शेख चिल्ली जैसी बेपर की उड़ानें भी निरर्थक है पर दूरदर्शिता का सूक्ष्म दृष्टि का अभाव भी भयंकर है। इसके बिना हमारे अंग अवयव अपना नियत निर्धारित काम भी न कर सकेंगे।

शरीर में कई प्रकार के नमक उत्पन्न होते हैं उनका संतुलन सही बनाये रहने के लिए पानी की सीवर लाइन बराबर चलती रहती है यदि अनावश्यक मात्रा में नमक जमा हो जाय तो फिर शरीर का सारा ढाँचा ही लड़खड़ा जायगा।

मनुष्य शरीर के लिए जिस प्रकार जल की आवश्यकता है उसी प्रकार कृषि उद्योग कल कारखाने भी पानी के बल पर ही जीवित है। एक गैलन पेट्रोल तैयार करने में उसकी सफाई के लिए साठ गैलन पानी की आवश्यकता पड़ती है बड़े नगर बड़ी नदियों के किनारे ही बसे है। सभ्यताओं का विकास उन क्षेत्रों से आरम्भ हुआ जहाँ पानी का बाहुल्य था।

शरीर में लोक व्यवहार में परिस्थितियों के उतार चढ़ाव में अनेक प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न होती है। इनका मनः क्षेत्र पर विषाक्त प्रभाव पड़ता है। इसे धोकर साफ करना उत्कृष्ट स्तर के चिन्तन का ही काम है। जल का एक महत्वपूर्ण काम विविध विधि मलों को बहाने हटाने और उसके स्थान पर स्वच्छता उत्पन्न करना भी है। विवेक दृष्टि की तरलता पल पल पर उत्पन्न होने वाले विक्षोभों का समाधान करके हमें स्वच्छ संतुलन प्रदान करती है।

संसार का 97 प्रतिशत पानी खारे समुद्रों में भरा पड़ा है। शेष तीन प्रतिशत धरती में तीन मील गहराई तक जल स्रोतों के रूप में सात मील ऊपर तक भाप के रूप में और पर्वत शिखरों तथा ध्रुव प्रदेशों में बर्फ के रूप में बिखरा पड़ा है। धरती वाले जिस पानी का प्रयोग करते हैं या कर सकते हैं वह मात्र दशमलव छह प्रतिशत है।

आमतौर से मनुष्यों के मस्तिष्क दुर्भावना और चिन्तन से भरे रहते हैं। यह खारी जल निरर्थक ह। उसमें से सार्थकता उतने ही अंश की है जो भाप बर्फ अथवा नदी सरोवरों में मीठे जल की तरह बहता और भरा रहता है। कितने दुर्भाग्य की बात है कि उत्कृष्ट चिन्तन की सरलता मनुष्य जीवन में बहुत स्वल्प देखी जाती हैं यदि उसकी मात्रा बढ़ी चढ़ी होती तो यह संसार न जाने कितना सुखी सन्तुष्ट होता और कितनी अधिक प्रगति कर सकने में सफल हुआ होता।

बढ़ती हुई जनसंख्या और बढ़ते हुए कल कारखाने मल उत्पत्ति का मात्रा निरन्तर बढ़ा रहे है। इस कचरे को नदियों के सहारे बहाने की विधि ही काम में लाई जाती है। यही पानी पीछे पानी के काम आता है। योँ इसकी सफाई का भी कुछ इन्तजाम किया गया है ताकि गन्दा पानी पीकर आदमी बीमार न पड़े। शहरों में नलों का पानी यथा संभव छान कर और उसमें क्लोरीन मिला कर दिया जाता है फिर भी उसमें प्राकृतिक स्वच्छ जल की तुलना में भारी कमी रह जाती है। कारखानों में प्रयुक्त होने वाले रसायन कीटाणु नाश के लिए छिड़के गये घोल रासायनिक खाद भी कम विषैले नहीं होते, वे भी घूम फिर कर वर्षा के जल के साथ नदियों में पहुँचते हैं और पीने के पानी के साथ शरीर में जा पहुँचे है। नहाने धोने में प्रयुक्त होने वाले साबुन और डिटरजेंट रसायन भी क्रमशः अधिक खर्च होने लगे हैं और वे भी दैनिक प्रयोग में आने वाले पानी के साथ ही घुलते जाते हैं। अणु भट्ठियों की राख समुद्र में जाकर जल जीवों में होती हुई अथवा बादलों के साथ फिर मनुष्यों को प्रभावित करती है। इस प्रकार जो थोड़ा सा पानी प्राणियों के प्रयोग में आकर उनकी जीवन रक्षा करता है वह क्रमशः अधिक विषैला होता चला जा रहा है।

संसार के सामने यह खतरे की घण्टी है कि जल तत्व को विकृत न किया जाय। छोटे लाभों के लिए उस भूल पर कुठाराघात न किया जाय जिसके ऊपर स्थिरता और शान्ति का समूचा आधार टिका हुआ है। सुखोपभोग के लालच में उत्कृष्ट चिन्तन को नष्ट कर अपराधी प्रवृत्तियाँ को पनपाया जा रहा है इस लिप्सा में पाया कम और खोया अधिक जायगा। जल को दूषित करके हम अपना मरण अपने हाथों आमन्त्रित करते हैं विकृत विचारों को हृदयंगम करके भी व्यक्ति और समाज का सर्वनाश उत्पन्न होगा।

जलाशय अपने में मौसम की ठंडक और गर्मी सोख लेते हैं रात में जब ठंड बढ़ती है तो अपनी गर्मी और दिन में जब गर्मी बढ़ती है तब अपनी ठंड बखेरते हैं। इससे बड़े जलाशयों के समीपवर्ती क्षेत्रों में सह्य तापमान बना रहता है। इसके विपरीत जहाँ जलाशय नहीं होते वहाँ दिन में गर्मी और रात में सर्दी बढ़ी हुई रहती है। रेगिस्तानी इलाकों में दिन में 50 डिग्री सेन्टीग्रेड तक और रात को शून्य से नीचे तापमान पहुँच जाता है इसका कारण उस क्षेत्र में पानी का अभाव ही है।

पानी की एक विलक्षणता यह है कि वह जमने पर फैलता है जबकि अन्य सभी तरल पदार्थ जमने पर सिकुड़ते हैं अगर बर्फ पानी से अधिक भारी होती तो वह समुद्र की सतह पर तैरने की अपेक्षा तली में डूब जाती उस तक सूर्य की किरणें भी न पहुँच पाती और तली में जमी बर्फ सारे समुद्र को बर्फ बना डालती। ऐसी दशा में पृथ्वी की स्थिति आज जैसी न होती, यहाँ ठंड का साम्राज्य होता और बहुत कम प्राणी उसमें जीवित रह पाते।

ठंडा होने पर फैलने की यह उल्टी रति चार डिग्री सेन्टीग्रेड तापमान के शुरू होती है। बाद में वह नियम बदल जाता है और अन्य पदार्थों की तरह पानी भी गर्म होने पर फैलने तथा ठंडे होने पर सिकुड़ने का नियम पालन करने वाला है। यदि ऐसा न होता तो बादलों को उठना और भाप के इंजनों का काम करना संभव ही न हुआ होता।

आन्तरिक शान्ति मनुष्य के सद्गुणों के बर्फ जैसा ठोस और शीत बनाती है। उससे वह विस्तृत और महान बनता है। शान्ति का प्रभाव बाह्य जगत में निष्क्रियता हो सकता है पर अन्तः क्षेत्र में सन्तुलन रहने से व्यक्तित्व के विकास की अनेकानेक संभावनाएँ प्रशस्त होती है। शान्ति प्रेमी हलक होते हैं। बर्फ की तरह ऊपर रहते हैं और नीचे वालो की सुरक्षा में स्वयं ही गलते घुलते रहते हैं।

संत सज्जनों को क्रिया पद्धति पेट और प्रजनन के लिए जीवित रहने वाले नर पशुओं से ही ऊंची होती है। वे दुनियादारों की अपेक्षा भिन्न प्रकार की नीति अपनाते हैं। महामानवों की विशिष्टता पर ही इस संसार की सदाशयता टिकी हई है और विकसित होती है।

बड़ी सभ्यताएं विशाल नदियों के सहारे ही फली फूली है। सिन्धु नदी के समीप हड़प्पा ह्वांगहो के समीप चीनी सभ्यता नील के सहारे मिश्री सभ्यता दजला और फरात की गोद में मेसोपोटामिया सभ्यताएँ फली फूली है। गंगा जमुना ने आर्य सभ्यता को विकसित किया है। पानी के प्रयोग में जहाँ गफलत की गई वहाँ सभ्यताएँ भी उमड़ गई। अफ्रीका का लेप्टिस मेगना अब से हजार वर्ष पूर्व समृद्ध नगर और अच्छा बन्दरगाह था। पानी का प्रबन्ध करने में चूक हो जाने के कारण अब वहाँ सिर्फ खंडहर ही सिर धुन रहे है।

सद्भावनाओं के सज्जनोचित सत्प्रवृत्तियों के सहारे मनुष्य महान बनते हैं और समाज तथा राष्ट्र ऊँचे उठते हैं। जहाँ दुर्भावनाओं के विष वृक्ष उग्र समझना चाहिए कि दृष्ट असुरता का प्रसार संचित सभ्यता को मटियामेट करेगा। उत्थान पतन के इतिहास अपने अपने समय में बढ़ी घटी सद्भावनाओं का ही परिचय देते हैं धन वैभव की कमीवेशी से व्यक्ति गिरते उठते नहीं। उसका प्रधान कारण मनुष्यों की नैतिकता चरित्रनिष्ठा आदर्शवादिता में निष्कृष्टता एवं उत्कृष्टता की मात्रा का बढ़ना घटना ही होता है।


कल्पना नहीं तत्परता सफल होती है।

सफलताएँ अनायास ही उत्पन्न नहीं होती, उन्हें क्रियाशीलता की प्रतिक्रिया कह सकते हैं। यह क्रिया भी अकारण उत्पन्न नहीं होती, उसके पीछे इच्छा शक्ति की प्रबल प्रेरणा काम कर रही होती है। सरल शब्दों में कहें तो इच्छा से क्रिया-क्रिया से साधन और साधन से परिस्थिति का क्रम चल रहा दिखाई पड़ेगा।

बड़ी-बड़ी सफलताएँ चाहने के लिए न जाने कौन-कौन कितने-कितने सपने देखता रहता है। सोते में चित्र-विचित्र स्वप्नों की कथाएँ जगने पर कई लोग सुनाते हैं और जागृत अवस्था में अपने असफल अरमानों का संजोया हुआ श्मशान देखते दिखाते हैं। उन्हें दुख होता है कि इतनी मनोकामनाएँ उनने संजोई पर एक भी पूरी न हुई। इन दिवास्वप्न देखने वालों को-निशास्वप्न देखने वालों की पंक्ति में बिठाया जा सकता है। अन्तर इतना ही होता है कि सपने में राजा बनने और बाद में गद्दी छिन जाने का जागने पर उतना दुख नहीं होता, जितना कि अरमानों के महल खड़े करने वालों को उनके विस्मार हो जाने का होता है।

कल्पनाओं की उपयोगिता तो है, पर उससे दिशा मिलने मात्र का प्रयोजन सिद्ध होता है। सोचने भर से चाही वस्तु मिल जाना सम्भव नहीं। उसके लिए साधन जुटाने होते हैं और परिस्थितियाँ उत्पन्न करनी पड़ती हैं। इसके लिए प्रचण्ड पुरुषार्थ करने की आवश्यकता पड़ती है। बिना थके, बिना हारे चलते रहने और कठिनाइयों से पग-पग पर जूझने का साहस ही लम्बी मंजिल पूरी करा सकने में सफल होता है। उचित परिश्रम के मूल्य पर भी अनुकूलताएँ उत्पन्न होती हैं और उन्हीं के सहारे सफलताओं की सम्भावना दृष्टिगोचर होती है। यह अथक परिश्रम व साहस भरे संकल्पों पर निर्भर है। देर तक टिका रहने वाला और प्रतिकूलताओं से जूझने वाला साहस ही संकल्प कहलाता है। कल्पना से नहीं संकल्प शक्ति से मनोरथ पूरा करने की परिस्थितियाँ बढ़ती हैं।

बच्चे भविष्य के मधुर सपने देखने में निरत रहते हैं। बूढ़ों को भूतकाल की स्मृतियों में उलझे रहना सुहाता है किन्तु तरुण को वर्तमान में जूझना पड़ता है। बच्चों को स्वप्नदर्शी कहते हैं, वे कल्पनाओं के आकाश में उड़ते हैं और परियों के साथ खेलते हैं। मनोरथ रचने वाले और सहज ही उनको सिद्ध सामने खड़े देखने वाले मानसिक दृष्टि से ऐसे बालक हैं जिनकी आयु भर बड़ी हुई है मनःस्थिति पूर्णतया बचकानी है। यहाँ सपनों का कोई मोल नहीं। संसार के बाजार में पुरुषार्थ का सिक्का चलता है। पुरुषार्थ से योग्यता भी बढ़ती है और साधन भी जुटते हैं। इन दुहरी उपलब्धियों के सहारे ही प्रगति के पथ पर दो पहियों की गाड़ी लुढ़कती है। स्वप्नों के पंख लगाकर सुनहरे आकाश में दौड़ तो कितनी ही लम्बी लगाई जा सकती है, पर पहुँचा कहीं नहीं जा सकता।

ऊँची उड़ाने उड़ने की अपेक्षा यह अच्छा है कि आज कि स्थिति का सही मूल्याँकन करें और उतनी बड़ी योजना बनायें जिसे आज के साधनों से आज पूरा कर सकना सम्भव है। कल के साधन बढ़े तो कल्पना को विस्तार करने में कुछ भी कठिनाई न होगी। मंजिल एक-एक कदम उठाते हुए पूरी की जाती है। लम्बी छलाँग आश्चर्य भर उत्पन्न करती है मंजिल तक नहीं पहुँचाती। कल्पना की समीक्षा करें और उन्हें आज की परिस्थिति के साथ चल सकने योग्य बनायें। गुण, दोषों का-सम्भव-असम्भव का भली प्रकार विचार करें। पक्ष-विपक्ष का ध्यान रखते हुए जो विवेकपूर्ण निर्णय किया जाय, उसे पूरा करने के लिए अटूट साहस और प्रबल पुरुषार्थ के लिए जुट पड़ा जाय-तो विश्वास किया जा सकता है कि सफलता का वृक्ष अपने समय पर अवश्य ही फूलेगा और फल देगा।


आत्म हीनता एक महा व्याधि

अपने आपको दूसरों से हेय या हीन मानने की मानसिक ग्रन्थि किसी सुयोग्य व्यक्ति को भी दयनीय पिछड़ेपन में जकड़े रहती है। वह अपनी योग्यता पर विश्वास नहीं करता। दूसरों को अपने से किसी न किसी बात में अधिक समर्थ देखता है और उसकी तुलना में अपने को गया-गुजरा समझ लेना है। झेंप इसी का नाम है। अनेकों दब्बू, झेंप, संकोची कहलाने वाले व्यक्ति कभी-कभी अपनी दुर्बलता को नम्रता, विनयशीलता, सज्जनता आदि के लबादे से ढक कर छिपाने का उपहासास्पद प्रयत्न भी करते देखे गये हैं। पर बात छिपती नहीं है। नम्र या सज्जन को दूसरों के सम्मान की रक्षा करते हुए अपने मन की बात मधुर शब्दों में रखते हुए तनिक भी कठिनाई अनुभव नहीं होती जबकि आत्म हीनता से, ग्रसित व्यक्ति से कुछ कहते ही नहीं बनता-उससे उचित के प्रति प्रतिपादन और अनुचित असहमत होने की बात कहते ही नहीं बनती। भीतर ही भीतर घुटता रहता है। बहुत साहस करने पर भी आधी अधूरी लंगड़ी लड़खड़ाती बातें ही मुँह से निकलती हैं। उसमें अस्पष्टता रहने के कारण दूसरे लोग उसका असली मन्तव्य तक नहीं समझ पाते और कुछ का कुछ अर्थ लगा कर उसी कथन को उलटे प्रहार का हथियार बनाते हैं। ऐसी दशा में वह डर कर इस नतीजे पर पहुँचता है कि कहने की अपेक्षा न कहना अधिक उपयुक्त है।

आत्महीनता मनुष्य की सारी बुद्धिमत्ता, योग्यता एवं प्रतिभा पर पानी फेर देती है। अपने को व्यक्त न कर सकने के कारण वह दूसरों की दृष्टि में असमर्थ, अयोग्य एवं मूर्ख सिद्ध होता है। जब उसकी क्षमता पर किसी को विश्वास ही नहीं तो फिर उसे कुछ उत्तरदायित्व सौंपने का बढ़ावा देने के लिए कोई क्यों तैयार होगा? उपेक्षा और अवमानना ही उसे मिलती है। इस व्यवहार से उसकी हीनता ग्रन्थि और भी अधिक कसती जकड़ती चली जाती है अन्ततः वह आत्म मान्यता की परिपक्वता से सचमुच ही बुद्धू एवं अयोग्य बन जाता है जब कि वस्तुतः उसमें किसी से कम प्रतिभा थी नहीं।

आत्महीनता की घुटन अपने लिए दूसरा रास्ता निकालती है दूसरों पर दुर्भावना आरोपण करने का। दूसरे उससे द्वेष रखते है-उसके साथ अन्याय पक्षपात करते हैं। यह मान्यता जड़ जमाती है और जिनसे भी उसका वास्ता पड़ता है, उन सब को अपने विद्वेषियों की श्रेणी में गिन लेता हे। दूसरे विद्वेष क्यों करते हैं? इसका कारण ढूँढ़ने में किसी की बुद्धि को कोई कठिनाई नहीं हो सकती। इसके लिए पिछले किसी भी सामान्य व्यवहार पर दुर्भावना पूर्ण आवरण चढ़ा कर इस तरह व्याख्या की जा सकती है मानो सामने वाले सचमुच ही विद्वेषी हैं। किसी भी निर्दोष व्यक्ति या सहज स्वाभाविक घटना को आशंका और संदेहों के रंग में रंग कर अपने इच्छित स्तर का देखा जा सकता है। मित्र या शत्रु के रूप में किसी भी उदासीन व्यक्ति को हम देख सकते हैं और वह सचमुच वैसा ही प्रतीत होगा। उसमें सामान्य वार्तालाप एवं क्रियाकलाप की दुर्भावनापूर्ण व्याख्या करना अति सरल है। यों किसी के प्रति अंधप्रेम हो तो उसे सर्वगुण सम्पन्न और अत्यन्त स्नेहसिक्त मान बैठना भी कठिन नहीं है पर ऐसा कम ही होता है। आत्महीनता की ग्रन्थि प्रायः द्वेष दुर्भावों का ही आरोपण अधिक लोगों पर करती है। कुचले हुए स्नेह सद्भावों को कभी किसी से थोड़ा आश्रय मिल जाय तो ऐसे व्यक्ति उस पर लट्टू भी हो जाते हैं और उस प्रेमावेश में अपना सब कुछ लुटा देने में भी नहीं चूकते। यह दोनों ही पक्ष हानिकारक हैं। इसमें अकारण शत्रुता-मित्रता का आरोपण होता है और सन्तुलित व्यवहार से परस्पर सहयोग का जो सही क्रम बन सकता था उसका स्वरूप ही नहीं बन पाता।

आत्महीनता का कभी-कभी उद्धत आचरण के रूप में विस्फोट होता है। उपेक्षा अवज्ञा सहते-सहते जब अन्तः चेतना ऊब जाती है तो ऐसे छद्मवेश बनाकर प्रकट होती है जिसके कारण दूसरों का ध्यान आकर्षित हो, सहानुभूति मिले अथवा वे आतंकग्रस्त होकर उसके महत्व को समझें। तोड़-फोड़, आक्रोश, रूठना, रोना अनशन जैसे विचित्र व्यवहार नगण्य से कारणों के बहाने प्रस्तुत करते हैं। कभी अति परिश्रम करते या अत्यन्त सद्भावना प्रकट करते हुए भी उन्हें देखा जा सकता है। भूत-प्रेत ऐसे ही लोगों को आते हैं। तरह-तरह के सपने सुनाने और दिव्य अनुभूतियाँ सुनाने में भी यही वर्ग अग्रणी रहता है। श्रृंगार और फैशन बनाता अथवा अत्यन्त अस्त-व्यस्त रहना यह दोनों ही हीनता की निशानियाँ हैं। दोनों ही स्थितियों में दूसरों की चर्चा करने का अवसर मिलता है। बात भली कही या बुरी-प्रशंसा हुई या निन्दा-मान बढ़ा या घटा हानि उठानी पड़ी या लाभ-इन सब से उतना वास्ता नहीं होता जितना कि अपनी चर्चा सुनकर अहं को थोड़ी राहत मिलने के संतोष से होता है। दान-पुण्य, तीर्थ-यात्रा, व्रत-मौन जैसे धर्म कृत्य भी ऐसे ही लोग अधिक करते हैं। धर्मात्मा के रूप में आत्म विज्ञापन करके दूसरों से प्रशंसा अर्जित करने का भाव इन लोगों में अत्यधिक उग्र होता है। वास्तविक धर्मबुद्धि से विवेकपूर्वक सत्प्रयोजन के लिए सत्पात्रों को दान देते कोई विरले ही देखे जाते हैं। अधिकतर तो पैसा कुपात्रों में ही लुटता है और वह भी वहाँ-जहाँ लोगों में उस पुण्य की चर्चा होने का अवसर मिले। आत्म विज्ञप्ति द्वारा थोड़ा संतोष पाने का भी यह तरीका किसी कदर अच्छा इसलिए है कि उसमें सदुद्देश्य की बात तो आगे रहती है पीछे दूरवर्ती परिणाम उसका कुछ भी होता रहे।

दूसरों के अनुचित व्यवहार ऐसे ही लोगों के साथ अधिक होते हैं। संकोची स्वभाव के कारण कहना, करना सब कुछ डरते-डरते होता है उसकी गति धीमी होती है क्रिया का परिणाम कम और समय अधिक लगता है। आशंकामय एवं असमंजस की स्थिति में ऐसा होना स्वाभाविक भी है। ऐसे लोगों के काम देर में थोड़े तो होते ही हैं जो होते हैं वे भी आधे अधूरे लंगड़े-कुबड़े होते हैं अस्तु उपहास होता है-डाँट पड़ती है और खीज में अप्रिय व्यवहार भी होता रहता है। स्पष्ट उसमें शाब्दिक अथवा दूसरी तरह की प्रताड़ना भरी रहती है। इसकी प्रतिक्रिया रोष के रूप में होनी स्वाभाविक है। पर उसके प्रतिकार में कुछ करते भी नहीं बनता। घुटन दूनी बढ़ती है यह रोष कभी-कभी विस्फोट बनकर भी फूटता है। कई स्त्रियाँ अपने छोटे बच्चों को बेतरह पीटती देखी जाती हैं इसे आत्महीनता जन्म घुटन का विस्फोट ही कहा जा सकता हे।

आत्महीनता से उत्पन्न दब्बूपन की अपनी बुराई है और उद्धत आचरण की अपनी। उद्धत आचरण में उद्धत चिन्तन भी शामिल है। इसमें दिवास्वप्न सबसे अधिक देखे जाते हैं विद्वान, वक्ता, लेखक, धनी, पहलवान, जादूगर, योगी, नेता, अभिनेता, महापुरुष आदि रचनात्मक और डाकू, हत्यारा, व्यभिचारी आतंक वादी, आदि बनने के विध्वंसात्मक स्वप्नों में ऐसे लोग उलझे रहते हैं। वैसा बन जाने में सफल होने पर जो आनन्द एवं गौरव मिल सकता है स्वप्नों का केन्द्र बिन्दु वहीं पर अड़ा रहता है। यह सब कैसे हो सकेगा? इसके लिए किस प्रकार की क्षमता परिस्थिति एवं साधन सामग्री जुटानी पड़ेगी इस तथ्य पर सोचने की आवश्यकता ही उन्हें प्रतीत नहीं होती। कल्पना और सफलता के दो ही सिर दीखते हैं, बीच की लम्बी यात्रा पर विचार करने की न तो उन्हें फुरसत होती है न आवश्यकता प्रतीत होती है। शेखचिल्ली की कहानी को सार्थक करने में आगे रहने वाले यह दिवास्वप्नदर्शी वस्तुतः आत्महीनता के शिकार होते हैं। इनके हवाई किले इतने बढ़े-चढ़े होते हैं कि कदाचित कोई यथार्थवादी उन्हें सुने तो हँसते-हँसते लोट-पोट हुए बिना न रहे। अभीष्ट की प्राप्ति के लिए जादुई उपाय गढ़ रखे होते हैं।

अपनी झूठी प्रशंसा करते हुए अपनी तीरंदाज़ी की कहानियाँ पढ़ने और सुनाने में उन्हें बहुत रस आता है। पर वे होती सब-बेसिर पैर की हैं कई बार ऐसे लोग अपने को बढ़ा-चढ़ा डाकू, तस्कर, ताँत्रिक, जादूगर, व्यभिचारी धोखेबाज, तक सिद्ध करने के प्रयत्न में ऐसी अनर्गल बातें कह बैठते हैं जो पीछे उन्हें अविश्वस्त, अनैतिक एवं अवाँछनीय सिद्ध करके विपत्ति में फँसा देती हैं। कई नवविवाहित लड़के लड़कियाँ अपने साथी से ऐसी ही व्यभिचारपरक शेखीखोरी मिथ्या प्रसंग गढ़कर सुनाने लगते हैं और परस्पर घोर अविश्वास के विष बीज बोलते हैं। इन कथनों में यथार्थता कम और अत्युक्ति अन्धाधुन्ध देखी गई है।

कुरूपता, दरिद्रता, मंदबुद्धि, जातिपांति, कोई शारीरिक कमी, प्रताड़ना, किसी अपराध में पकड़े जाना आदि कारणों से दूसरों की दृष्टि में उपहासास्पद होने की कल्पना करके कितने ही व्यक्ति आत्महीनता के शिकार हो जाते हैं। दूसरे लोग जब उपहास या अवमानना करते हैं तो उनकी अन्तःचेतना अपने को हेय या हीन मानती चली जाती है और निरन्तर की मान्यता धीरे-धीरे परिपक्व होकर व्यक्तित्व को सचमुच उसी स्तर का बना देती हैं। ऐसे लक्षण प्रकट होने लगते हैं- ऐसे विचार एवं कर्म छलने लगते हैं जो हेय स्तर के लोगों के होते हैं। लड़कियों को आरम्भ से ही लड़कों की तुलना में हेय-पराये घर का कूड़ा-आजीवन बन्धन ग्रस्त रहने की बात मन में बिठाई जाती रहती है अस्तु वे अपनी सहज स्थिति वैसी ही स्वीकार कर लेती हैं। वस्तुतः लड़के और लड़की की संरचना में कोई विशेष अन्तर नहीं है पर एक को उभरा हुआ और दूसरे का दबा हुआ व्यक्तित्व उन परिस्थितियों का ही परिणाम है जिसने लड़की को आत्महीनता की ग्रन्थि में जकड़ कर मजबूती के साथ बाँध दिया है।

अपने आपको पापी, अभिशप्त, दुर्भाग्यग्रस्त, गृहदशा पीड़ित मान लेने से भी व्यक्तित्व दब जाता है। दूसरों को जो उपलब्ध है वह हमें नहीं मिला, दूसरों की तुलना में हमारे सामने कठिनाइयाँ अधिक हैं, अपना भविष्य अमुक कारणों से अन्धकारमय है ऐसा सोचते रहने वाले एक प्रकार से अपना गौरव, पौरुष और साहस खो बैठते हैं। भीतर से टूटे और हारे हुए मनुष्य भविष्य निर्माण की दिशा में कुछ सोच भी नहीं पाते-करती पावेंगे ही कैसे? हिन्दू विधवाओं को आमतौर से इसी वर्ग में गिना जा सकता है।

अपने से ऊँची स्थिति के लोगों के साथ अपनी तुलना करते रहने से सहज ही अपने दुर्भाग्य पर दुख होता है। कदाचित यह तुलना अपने से छोटे लोगों के साथ की गई होती तो वर्तमान स्थिति को भी सौभाग्य शाली गिना जा सकता था। बड़ों की तुलना तक पहुँचने के लिए पुरुषार्थ जगता तो भी एक बात थी, पर यदि उससे अपने को दुर्भाग्यग्रस्त मान लिया गया है तब तो उस चिन्तन से अहित ही अहित है। उत्साह और विनोद की परिस्थितियाँ न मिलने पर-मित्रता, सहानुभूति, प्रशंसा और प्रोत्साहन न मिलने पर भी मन उदास होता है और थकान अनुभव करता चला जाता है। नीरस जिन्दगी कोल्हू के बैल की तरह चलने वाला ढर्रा मनुष्य की विकासोन्मुख प्रवृत्तियों को कुचल कर रख देता है। ऐसे मनुष्य रोते चीखते मौत के दिन पूरे करते रहते हैं, न उनमें आनन्द होता न उल्लास। भविष्य की अच्छी आशायें गवाँ कर फिर हाथ में रहता ही क्या हैं?

वियाना के मनोविज्ञानी डा0 एर्ल्फड एडलर ने उदास और हतप्रभ लोगों के विश्लेषण में अधिकतर ऐसे लोग पाये जो स्वार्थरत रहते रहे और आत्मचिंतन के निषेधात्मक पक्ष में ही उलझे रहे। अपने आप को स्वस्थ, सुसम्पन्न, विद्वान आदि बनने की बात सोचते रहने, स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धी आदि की व्यक्तिगत लालसाओं में संलग्न व्यक्ति उस सहज आनन्द से वंचित रह जाते हैं जो सामाजिक जीवन बिताने वाले एवं सामूहिक चिन्तन करने वाले लोगों को मिलता है दूसरों के सुख-दुख में भागीदार होना, उनकी कठिनाइयों को समझना एवं सहायता करना ऐसा गुण है जिसके कारण व्यक्ति लोक प्रिय बनता है। स्नेह, सम्मान एवं श्रद्धा सौजन्य अर्जित करने वाला व्यक्ति वैभव सम्पादित करने में संलग्न, संकीर्ण, स्वार्थपरायण व्यक्तियों की तुलना में कहीं अधिक प्रसन्न रहता है। उसका मनोबल अनायास ही बढ़ता जाता हैं

अदक्ष होना कोई प्रकृति प्रदत्त अभिशाप या अभाव नहीं है। हर मनुष्य का मस्तिष्क लगभग एक जैसे कणों, कोषों एवं तन्तुओं से बना है। मानवी मस्तिष्कों की संरचना में उतना अन्तर नहीं होता जितना कि बौद्धिक दृष्टि से उनमें दिखाई पड़ता है।

इस अन्तर का प्रधान कारण मस्तिष्कीय शक्तियों को अभीष्ट विचारों एवं निर्धारित कामों पर पूरी तरह केन्द्रित करने में शिथिलता बरतना ही कहा जा सकता है। लोग काम तो करते हैं, पर वह कोल्हू के बैल की तरह-जेल खाने के कैदी की तरह अथवा मशीनों ढर्रे जैसा होता है। उसमें गहरी दिलचस्पी नहीं ली जाती यदि ली गयी होती जो उत्साह उत्पन्न होता, रस आता और तन्मय-तत्परता बरती गई होती। फलतः वही कार्य जो घटिया स्तर का बनकर रह गया-किसी कुशल कलाकार की कारीगरी बनकर सामने आता। हर काम यह घोषणा करता है कि उसे किस दिलचस्पी एवं तत्परता के साथ किया गया है। बारीकी से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि कर्त्ता ने उसे बेगार की तरह टाला है-या प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर पूरी सावधानी से साथ सम्पन्न किया है।

हमारे विचार छितराये रहते हैं। कोई बात सोचने की जब आवश्यकता हो तो बहुत थोड़ी देर-समस्या के एक अंग पर आधे अधूरे मन से ध्यान देते हैं। इतने में ही मन अपनी सहज संरचना के आधार पर बहुमुखी दिशा में उड़ने लग जाता है। यदि पूरी दिलचस्पी के साथ प्रस्तुत समस्या पर विचार करने की आदत होती तो उसके प्रत्येक पहलू पर सोच विचार किया जाता। पक्ष और विपक्ष के तर्क एवं तथ्य सामने लाये जाते और गुण अवगुण की दृष्टि से पूरा मंथन किया जाता। कई तरह के विकल्पों को सोचा जाता। आगत कठिनाइयाँ एवं उनके समाधानों को समझा गया होता। और कई दृष्टियों से गहराई तक वस्तुस्थिति में जाने का प्रयत्न किया गया होता। इतना मंथन करने के बाद जो निष्कर्ष निकलता, निर्णय किया जाता, निश्चय ही वह बहुत महत्वपूर्ण होता और उस आधार पर कदम उठाना असफलता एवं पश्चाताप का कारण न बनता।

आधी अधूरी बात सोचना एक पक्ष को ही समग्र मान लेना, विकल्पों और व्यवधानों को समझना इस लिए संभव नहीं होता कि विचारों की एकाग्रता, समग्रता और गहराई अभ्यास में नहीं होती। सर्वांगपूर्ण कार्य की तरह समग्र चिन्तन भी आवश्यक है। इसके लिए मानसिक आलस्य को हटाकर वैज्ञानिकों जैसी गहराई में उतरने की आदत को अभ्यास में सम्मिलित करना होगा। शरीर के आलस्य से काम खराब होते हैं। मन का आलस्य प्रमाद कहलाता है। बात को गंभीरता से पूरी तरह न सोचना, अधूरे चिन्तन को ही पर्याप्त मान लेना, फूहड़ और अधूरे काम करने की अस्तव्यस्तता जैसी ही बुराई हैं।

प्रवीणता प्रकृति प्रदत्त गुण नहीं है। वह अभ्यास की उपलब्धि है। तन्मयतापूर्वक काम करने वालों के हाथ कुशल कलाकार जैसे प्रवीण होते जाते हैं और उनका स्तर सदा सराहा जाता है ठीक इसी प्रकार किसी विचार पर पूरी सावधानी के साथ ध्यान केन्द्रित करना और उसके हर पक्ष पर सतर्कता पूर्वक विचार करना तात्कालिक समस्या का तो सही समाधान निकलता ही है। साथ ही एक बड़ा लाभ यह प्रस्तुत करता है कि समग्र चिन्तन की आदत उसे बुद्धिमान बनाती चली जाती है। कुशाग्र बुद्धि, सूक्ष्म दृष्टि, वस्तुतः समग्र एवं सर्वतोमुखी चिन्तन की आदत की परिपक्वावस्था ही है। पूरा चिन्तन करने के अभ्यास को ही दूसरे शब्दों में दूरदर्शिता, प्रतिभा सम्पन्नता, कुशाग्र बुद्धि आदि नामों से पुकारा जा सकता है। पूरा काम और पूरा विचार करना उस सतर्कता का परिणाम है जो गहरी दिलचस्पी होने पर ही विकसित होती है। जिसे अपने कामों को पूरा मनोयोग लगाकर करने की आदत है, उसकी प्रगति और सफलता असंदिग्ध बनकर ही रहेगी।

आत्महीनता की ग्रन्थि से ग्रसित व्यक्ति अपने पर, अपनी योग्यताओं पर विश्वास करना छोड़ देता है। वह किसी कार्य को पूरा कर सकेगा इस पर विश्वास नहीं कर पाता। आत्मविश्वास का अभाव सफलता में सबसे बड़ी बाधा है। अपने आपको हेय एवं तुच्छ मानना प्रकारान्तर से अपने भविष्य को अन्धकारमय बना लेने का स्वनिर्मित प्रयत्न ही कहा जा सकता है।


विज्ञान और अध्यात्म साथ-साथ ही बढ़ेंगे

जीवन की दो दिशाएँ हैं-एक अन्तर्मुखी दूसरी बहिर्मुखी। बाह्य जीवन में अन्न, वस्त्र, निवास एवं अन्याय सुख-साधनों को प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है और अन्तः जीवन में अपनी वृत्तियों-प्रवृत्तियों का अन्वेषण करके उन्हें परिष्कृत किया जात है। अन्तर्मुखी जीवन की अध्यात्म के नाम से व्याख्या की जाती है और बहिर्मुखी प्रयोजनों को विज्ञान नाम से जाना जाता है।

यों भौतिकवाद और अध्यात्मवाद को अलग-अलग माना जाता है और उनके प्रयोग, प्रयोजन भिन्न-भिन्न रूप से प्रस्तुत किये जाते हैं, पर वस्तुतः वे दोनों एक दूसरे के साथ इतने घुले-मिले हैं कि एक को दूसरे से सर्वथा भिन्न कर देना उससे भी कठिन है जितना कि रक्त के जलीय एवं शुष्क अंशों को पृथक करके उन्हें अपने मूल रूप में बनाये रहना।

दोनों एक ही दिशा में चल रहे हैं-अज्ञान से छूटकर ज्ञान भूमिका में अधिकाधिक गहराई तक प्रवेश करते जाना दोनों का लक्ष्य है। दोनों सत्य की-परम सत्य की खोज में निरत हैं। कर्मक्षेत्र पृथक होते हुए भी वे एक ही उद्देश्य की पूर्ति में निरत हैं। दोनों सम्भवतः समकालीन भी हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार ईसा से कोई दो लाख वर्ष पहले मनुष्य ने वैज्ञानिक अनुसंधान आरम्भ कर दिये थे। समय का ज्ञान, वाणी के माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान, आग का उत्पादन-उपयोग, आखेट के दाव-पेंच, कृषि, पशु पालन, आच्छादन, भोजन सम्बन्धी सुविधाएँ, परिवार संरचना जैसे प्रयोग आरम्भ कर देने और उन्हें क्रमशः आगे बढ़ाते चलने के कारण ही शारीरिक दृष्टि से पिछड़ा हुआ होने पर भी वह अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक समर्थ बन सका। धरती की सम्पदा और प्राणियों पर अपना अधिकार जमा सकने में समर्थ हुआ।

विज्ञान अपने क्रम से विकसित होता चला गया। अब इसकी अनेकानेक धाराएँ होता है। इन्हें मोटेतौर से तीन भागों में विभक्त कर सकते हैं। (1) भौतिकी (2) रसायन (3) प्राणि विज्ञान। चाहें तो गणित की भी एक वर्ग में गिन सकते हैं।

अब हम विज्ञान की मोटी सतह पार करके बारीकी के क्षेत्र में चल रहे हैं। अब पदार्थ के ठोस, द्रव और वाष्प को तीन रूप में बताकर काम नहीं चल सकता। अब शब्द, प्रकाश, ऊर्जा आदि की व्याख्या को करने के लिए तत्वों और योगिकों को भी समझना समझाना पड़ता है। परमाणु की भीतरी संरचना और हलचलों को जानना होता है। अब पंचतत्व कहकर सृष्टि की सरल व्याख्या कर सकना अपर्याप्त है। अब तक 104 तत्व ढूंढ़े जा चुके हैं। इनमें से 20-21 तो अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। आक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, कार्बन, सिलीकॉन, क्लोरीन, ब्रोमीन, आयोडीन, कैल्शियम, मैग्नेशियम, सोडियम, फास्फोरस, लोहा चाँदी, ताँबा आदि उन प्रमुख तत्वों में से है जिनके आधार पर हमारे सुपरिचित पदार्थों की संरचना सम्भव हो सकी है। इन्हीं के संयोजन-वियोजन से पानी जैसी अनेक जीवनोपयोगी वस्तुएँ बनी है।

रसायनों का दो वर्गों में विभाजन किया जाय। मिट्टी, पत्थर, नमक, लोहा आदि निर्जीव और वनस्पति, माँस, खाद आदि सजीव। प्राणी जगत इसी वर्ग में आता है। प्रयोगशालाओं में सजीव तत्वों का संयोजन विघटन तो किया गया है किन्तु नये जीव का रासायनिक अभिक्रियाओं के सहारे नया उत्पादन सम्भव नहीं हो सका। सम्भवतः हो भी नहीं सकेगा। इस संदर्भ में विज्ञान पिछली शताब्दी में पूरी शक्ति के साथ माथापच्ची कर चुका है और अब किसी अज्ञात और संव्याप्त ‘लाइफ फोर्स’ की ऐसी उपस्थिति स्वीकार करने लगा है, जो पदार्थ की तात्विक परिधि से ऊपर की चीज है।

फिर भी उसे पदार्थ से सर्वथा भिन्न नहीं किया जा सकता। वह उससे संव्याप्त है और प्रयत्न करने पर पदार्थों के अमुक संयोग से-अमुक मात्रा में उत्पन्न की जा सकती है। इस प्रकार जड़-चेतन की मर्यादा एवं भिन्नता यथावत रहते हुए भी यह विचित्र संभावना बनी ही हुई है कि जड़ भी एक सीमा तक चेतना की सम्भावनाएँ अपने भीतर सँजोये हुए है। अमोनिया सायनेट का परीक्षण करते हुए जब उसके साथ रासायनिक सम्मिश्रण होने पर ‘यूरिया’ बन गया तो जड़ चेतन की दीवार बहुत झीनी पड़ गई। ‘यूरिया’ प्राणियों के मूत्र में पाया जाने वाला एक पदार्थ है जो खाद के काम आता है और उसे जैविक पदार्थों की श्रेणी में गिना जाता है।

तत्वों और योगिकों का सुविस्तृत ज्ञान प्राप्त करने के उपरांत भी कुछ गुत्थियां ऐसी हैं जो किसी प्रकार सुलझने में नहीं आतीं। उदाहरण के लिए चीनी में पाई जाने वाली मिठास को ही लेते हैं। चीनी का वैज्ञानिक विश्लेषण यह है कि उसके एक अणु में कार्बन के 12, हाइड्रोजन के 22 तथा आक्सीजन के 11 परमाणु होते हैं। इनमें एक भी मीठा नहीं है। इन्हीं तीनों पदार्थों के सम्मिश्रण में अणुओं की संख्या का थोड़ा-थोड़ा अन्तर कर देने से अन्य कई ऐसे पदार्थ बन जाते हैं। जिनके गुण, धर्म एक दूसरे से सर्वथा भिन्न रहेंगे। ऐसी दशा में चीनी में मिठास कहाँ से आई? यह गुत्थी बिना सुलझी ही रह जाती है।

इसका नया समाधान अन्तरिक्ष की स्थिति का परमाणुओं पर पड़ने वाले प्रभाव के रूप में खोजा गया है। यह अन्तरिक्ष की स्थिति एक नया सिरदर्द है। इसे भी ‘लाइफ फोर्स’ की तरह अनबूझ पहेली ही मान लिया गया है। अणु विश्लेषण तक पहुँच जाना भी विज्ञान की बड़ी सफलता है, पर अब उसे अधिकाधिक गहराई में प्रवेश करने पर ‘अन्तरिक्ष की विशिष्ट स्थिति’ और ‘लाइफ फोर्स’ की शोध में प्रवेश करते हुए भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है कारण कि उस क्षेत्र में यान्त्रिकी साथ नहीं दे रही है। ऐसे उपकरण बन नहीं पा रहे हैं जो इन दोनों महान अस्तित्वों के सम्बन्ध में जानकारी दे सकने में सहायक हो सकें।

रसायन-शास्त्र अब भटकते-भटकाते इस मान्यता पर पैर जमा सका है कि पदार्थ में कोई गुण नहीं है। अन्तरिक्ष में परमाणुओं की स्थिति ही उसमें पाये जाने वाले गुणों के लिए उत्तरदायी है। पदार्थ तो मात्र धारक एवं वाहक है। पदार्थ पर किसी गुण, धर्म का आरोपण व्यर्थ है। उसकी सारी विशेषताएँ अन्तरिक्ष की स्थिति का उन पर पड़ने वाले प्रभाव के ऊपर निर्भर है।

पुरानी मान्यता यह थी कि कोई पदार्थ नष्ट नहीं होता। उसका रूपांतरण होता रहता है जैसे प्रवाही जन ठंडक से बर्फ और गर्मी से भाप बन जाता है और सामान्य ताप में फिर प्रवाही दिखाई पड़ता है। उसकी स्थिति और उपस्थिति किसी न किसी रूप में बनी ही रहती है। यह पुरानी मान्यता अब निरस्त हो गई है। अणु विखण्डन, से उस फटने वाले अणु की सत्ता एक प्रकार से सदा-सर्वदा के लिए समाप्त हो जाती है भले ही उसके कारण अन्य हलचलें कितनी ही क्यों न होती हों।

इसी प्रकार ऊष्मा, प्रकाश, विद्युत, ध्वनि चुम्बकत्व आदि अनेक ऊर्जाएँ ज्ञात होने के उपरान्त उनके स्वतंत्र सत्तावान होने की जो मान्यता थी, वह भी अब लगभग समाप्त हो गई है। ऊर्जाएँ एक दूसरे से परिवर्तित हो सकने की बात पिछले दिनों सिद्ध हो गई। अब अणु जगत की मूल इकाई नहीं रहा वरन् वह श्रेय ऊर्जा प्रवाह को मिल गया है। अब यह जगत ऊर्जा का एक पुँजीभूत रूप भर रह गया है। उसे परमाणु समुच्चय कहना पिछड़ी हुई पुरातन व्याख्या कहा जायगा।

परमाणु संरचनाओं में इलेक्ट्रान और प्रोट्रान लगभग एक ही जाति के होते हैं। मात्र उनकी संख्या में थोड़ा सा अन्तर होता है उतने भर से नये तत्व बन जाते हैं। एक इलेक्ट्रान और एक प्रोट्रान के मिलन से हाइड्रोजन का परमाणु बनता है और यदि वे दो-दो हो जायं तो हीलियम का परमाणु बन जायगा। यह कैसा विचित्र संयोग है। इससे प्रतीत होता है पदार्थ की मूल सत्ता का अपना कोई मौलिक गुण नहीं है। संख्या, भेद और मिलन क्रम ही सब कुछ है।

लगता है यह सारा जगत ऊर्जा मात्र है। ऊर्जा के दो वर्ग हैं एक धन दूसरा ऋण, इन्हें परा और अपरा प्रकृति के नाम से तत्त्ववेत्ताओं ने कहा है। यह विश्व शक्ति रूप है उसकी स्फुरणा से विभिन्न हलचलें यहाँ होती रहती हैं।

विज्ञान हठीला नहीं है। उससे अपनी पिछली भूलें स्वीकार करने में तनिक भी आपत्ति नहीं हुई है। जब भी अधिक प्रखर प्रतिपादन सामने आये हैं तब उसने पिछली बहुचर्चित और बहुप्रचलित मान्यताओं को बिना अनुनय किये खुशी-खुशी बदल लिया है। ऐसा न होता तो विज्ञान भी एक सम्प्रदाय बन जाता और उसके उत्तराधिकारी अपने गुरुओं की यश-गाथाओं और उक्तियों को शाश्वत सत्य कहकर रूढ़िवादी अन्ध परम्पराओं के लिए आग्रह करते रहते, पर ऐसा हुआ नहीं है। होना भी नहीं चाहिए था।

किसी समय के देवज्ञ पृथ्वी को चपटी मानते थे। ज्योतिष की गणना में चन्द्रमा नवग्रहों की बिरादरी का एक पूर्ण ग्रह है। आँखें जो कुछ दिखाती हैं वह सब कुछ सही नहीं है। खुली आँख से लोहे की चद्दर पूरी तरह ठोस दिखाई पड़ती है, पर एक्सरे के चित्र बताते हैं कि उसमें स्पंज की तरह छेद हैं। अणु को पदार्थ की सबसे छोटी इकाई माना जाता रहा है, पर अब वह एक समूचा ब्रह्माण्ड है जिसमें अनेक सौर-मण्डल अपनी धुरी और कक्षा में भ्रमण करते हुए पाये गये हैं। उस्तरे की धार-सामान्यतया बिलकुल सीधी दिखाई पड़ती है, पर माइक्रोस्कोप बताता है उसमें तिरछी लहरियाँ भरी पड़ी हैं। चलचित्रों में तस्वीरें भागती, दौड़ती मालूम पड़ती हैं, पर वस्तुतः वह आँखों की भ्रम ग्रस्तता मात्र है। फिल्म अपनी चरखी पर इतनी तेजी से घूमती है कि आँखों की दृश्य शक्ति उन्हें उतनी तेजी से मस्तिष्क को आभास नहीं करा पाती, फलतः नेत्रगोलक और मस्तिष्क दोनों ही धोखा खाकर चलचित्रों में भगदड़ के दृश्य देखते हुए भ्रमग्रस्त बने रहते हैं।

जीवन संचालन अवयवों में ‘हार्ट’ बौर ‘ब्रेन’ का उल्लेख विशेष उत्साह के साथ किया जाता है, एक दूसरे से अविच्छिन्न रूप से संबद्ध और जीवन के लिए उत्तरदायी बताये जाते हैं। किन्तु देखा गया है कि हृदय के बन्द हो जाने पर कृत्रिम पंपिंग करके रक्त संचार जारी रखा जा सकता है और मस्तिष्क क्रियाशील रह सकता है। इसी प्रकार मस्तिष्क को मूर्च्छित कर दिने पर भी हृदय चालू रह सकता हे। दोनों के सहयोग का महत्व अवश्य है, पर इस संयोग पर ही जीवन निर्भर नहीं है। योगियों द्वारा ली जाने वाली समाधि में तो मस्तिष्क एवं हृदय दोनों ही लगभग अवरुद्ध स्थिति में पहुँच जाते हैं-सघन शीत से शरीर को जमा देने पर भी उसमें जीवन बना रहता है। अस्तु शरीर के अमुक अवयवों को जीवन के लिए उत्तरदायी ठहराने से भी काम नहीं चलता। भले ही वे अवयव कितने ही महत्वपूर्ण क्यों न हों।

वस्तुतः ‘ब्रेन’ और ‘माइण्ड’ में स्तरीय अन्तर है। ब्रेन को ‘मस्तिष्क’ कह सकते हैं और माइण्ड को ‘मानस’। मस्तिष्क शरीर का विकास क्रम के साथ जुड़ा होने के साथ-साथ वह आयु के साथ-साथ घटी और बढ़ी स्थिति में पहुँचता है। उसका विकास मेमोरी स्मरण शक्ति और एनवाइरनमेन्ट-इन्द्रियों की साँसारिक अनुभूति है। मानस भावना प्रधान है। उसे विवेक कहा जा सकता है। उसकी परिष्कृत स्थिति प्रज्ञा कहलाती है। उपनिषद्कार ने इस क्षेत्र की सुविकसित स्थिति को ऋतम्भरा, भूमा आदि नामों से सम्बोधन किया है। इसे कान्शसनेस अन्तःकरण कह सकते हैं। इन दोनों के समन्वय को ही चेतन सत्ता माना गया है।

मृत्यु के आघात से ब्रेन नष्ट हो जाता है किन्तु मानस बना रहता है, यही सूक्ष्म शरीर या प्राण है। मानस का कलेवर, आवरण एवं उपकरण मस्तिष्क है। उसे ऊपरी परत कह सकते हैं। सेल-कोशिका तथा उसका रासायनिक ढाँचा नष्ट होने से शरीर का क्रियाकलाप रुक जाता है किन्तु मानस नहीं मरता। हवा से पेड़-पौधे जीवित रहते हैं। वह उनमें जीवन संचार करती है किन्तु पौधों के मर जाने पर भी हवा जीवित रहती हे। ब्रेन को पौधा और माइण्ड की शृंखला इस मानस के साथ जुड़ी रहती है। परलोक और पुनर्जन्म के चक्र में यह मानस ही परिभ्रमण करता रहता है।

इसे प्राण अथवा जीव भी कह सकते हैं, यों जीव सत्ता की मूल स्थिति इससे भी कहीं अधिक गहरी है। यह मानस भी उसका एक वैसा ही कलेवर है जैसा कि मानस का मस्तिष्क।

मानस का निवास शरीर में कहाँ हो सकता है? क्या वह मस्तिष्क की परिधि में ही अवरुद्ध है? इसका उत्तर अध्यात्मवादी, सूक्ष्मदर्शी बताते हैं कि यदि अन्तःकरण का किसी शारीरिक केन्द्र से विशेष सम्बन्ध जोड़ना हो तो वह वेगस नर्व-सुषुम्ना-ही हो सकता है। यद्यपि वह दूध में घी की तरह सम्पूर्ण चेतना में-समस्त शरीर में-किसी न किसी रूप में संव्याप्त है। साइनो आरीक्युलर नोड-प्राण ऊर्जा-प्रत्येक कोशिका को जीवित रखती है। शारीरिक विश्लेषण करने पर उसे ओषजन और पोषक तत्वों का सम्मिश्रण कह सकते हैं। मेड्यूला और हाइपोथैल के बीच साइनोआरिक्युलर नोड-एस॰ ए॰ एन॰ का स्थान सुरक्षित है। इसका संचालन केन्द्र मूर्धा का वह स्थल है जो उन दोनों को परस्पर जोड़ता है। इसे सुषुम्ना कह सकते हैं। यहीं से मूलतः समस्त शरीर का संचालन कह सकते हैं। यहीं से मूलतः समस्त शरीर का संचालन और शासन होता है। मन के बदलते हुए भावों की हलचल यहीं से संचालित होती है। इस सुषुम्ना केन्द्र पर हारमोनों का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता। सच तो यह है कि इसी केन्द्र से विभिन्न हारमोन ग्रन्थियों को प्रेरणाएँ मिलती हैं और वे तद्नुरूप स्राव निसृत करते हैं। हारमोनों की सिम्पेथेटिक संवेदनशील स्फुरणाएँ इसी सुप्रारीनल शासन केन्द्र से उत्पन्न होती हैं। इसे जीवसत्ता का शरीरगत केन्द्रस्थल कहा जा सकता है।

दिव्यदर्शियों का कहना है कि सुषुम्ना-बेगस और मूर्धा-मेड्यूला हाइपोथैलेमस के बीच एक हाथ के अँगूठे के बराबर विस्तार वाला जो स्थान है वही उस अव्यक्त प्राण ऊर्जा का स्रोत केन्द्र है। आत्मा का उद्गम वही है यों वह समस्त मस्तिष्क में संव्याप्त है और वहाँ से सुविस्तृत होकर काया के कण-कण में गतिशील है।

कणोंपनिषद् में आता है-वह अंगुष्ठ मात्र परिणाम का आत्मा संपूर्ण शरीर में संव्याप्त है। उसी का शासन है। वह निर्धूम ज्योति की तरह दीप्तिमान है। वही इस शरीर रथ का सारथी हे।

शरीर विज्ञान, फिजियोलॉजी और मनोविज्ञान, साइकोलॉजी के अनुसार भी मन और अहम् का अन्तर स्पष्ट रूप से बताया गया है। इन्द्रिय सम्बन्धित निम्न स्तरीय स्नायु मंडल-लोअर नर्वस सिस्टम कहलाता है। इसी में इन्स्टिक्ट, रिफ्लेक्सएक्शन आदि सम्मिलित हैं। यह मन अथवा चित्त भाग हुआ। अहम्-अन्तःकरण इससे भिन्न है, बुद्धि एवं विवेक उसके गुण हैं। भावनाएँ इसी केन्द्र से उद्भूत होती हैं। ईगो-सुपर-ईगो-को इसी से सम्बन्धित माना जा सकता है।

विज्ञान आगे बढ़ रहा है और वह प्रकृति के रहस्यों पर से एक-एक करके चढ़े हुए आवरण उतारता जा रहा है। भौतिक जगत की रहस्यमयी उपलब्धियाँ उसे मिल रही हैं। शोध की यह प्रवृत्ति हमें सत्य के अधिकाधिक समीप पहुँचा रही है। इस दिशा में चलते हुए अध्यात्म उपेक्षित नहीं कर सकता क्योंकि विज्ञान की अपेक्षा सत्य के अधिक निकट है। अणुओं की चलसत्ता, अचल पदार्थों के रूप में दृष्टिगोचर होती है इसलिए उसे तो एकबार असत्य, भ्रामक और माया की कह सकते हैं, पर चेतना के लहलहाते हुए समुद्र को आँख से ओझल कैसे किया जाय? जिसकी लहरों का प्रतीक मनुष्य अपनी अद्भुत सत्ता का परिचय स्वयं ही दे रहा है। सत्य की शोध ने ही विज्ञान के क्षेत्र में सफलताएँ प्रस्तुत की हैं और उसी राह पर चलते हुए हम अध्यात्म की चमत्कारी शक्ति का भी दर्शन तथा अवगाहन करेंगे।

मनुष्य के व्यक्तित्व को परखने के लिए दो देवदूत आते हैं-एक का नाम है संकट दूसरे का वैभव। संकट हमारे धैर्य, पुरुषार्थ ओर साहस को जाँचता है। वैभव उदारता, नम्रता और संयम को खोजता है। जो दोनों परीक्षाओं में उत्तीर्ण हो गया वह महामानव बनकर रहेगा।


बीमारियों को हम निमन्त्रण देकर बुलाते हैं

शरीर की संरचना अद्भुत है। लगता है उसके निर्माता ने अपनी सारी कला इस छोटे से यंत्र में समेट कर रख दी है। इसके सदुपयोग के साथ सम्भावना जुड़ी हुई है कि उसे धारण करने वाला आत्मा इस उपकरण की सहायता से अनेकानेक प्रकार के भौतिक तथा आत्मिक लाभ उठाये और अपूर्णता को पीछे छोड़ते हुए पूर्णता के लक्ष्य तक सरलता पूर्वक पहुँच सके।

दुरुपयोग तो अमृत का भी बुरा होता है। आत्म रक्षा के काम आने वाले अस्त्र-शास्त्रों को भी यदि गलत ढंग से प्रयुक्त किया जायगा तो वे अपने ही हाथ-पैर काट देंगे। धन और बुद्धि का अवाँछनीय उपयोग करके लोग किस प्रकार पतन के गर्त में गिरते और कष्ट भुगतने हैं यह कहीं भी-कभी भी-प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

हमें आये दिन शारीरिक रोग सताते हैं और कराहते हुए विभिन्न स्तर के कष्ट सहने के लिए विवश करते हैं। यह रोग आखिर हैं क्या? ईश्वर ने जब इतना सुसम्पन्न शरीर दिया तो उसके साथ यह बीमारियों की व्यथा क्यों लगादी? जब इस प्रश्न पर विचार करते हैं तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि रोग केवल हमारी प्रतिकूल चलने की उद्दण्ड नीति का दुष्परिणाम है। उन्हें कुपथ गामिता का दण्ड भी कह सकते हैं। प्रकृति की अवज्ञा करते हुए हम चैन से नहीं बैठ सकते। नैतिक और सामाजिक अपराध करने वाले राज दण्ड पाते हैं प्रकृति की आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए स्वेच्छाचार बरतने का दुष्परिणाम हमें विविध विधि रोगों के रूप में भुगतना पड़ता है।

अस्वस्थता का दावानल जिस तूफानी गति से फैल रहा है उसके पीछे प्रकृति के साथ किया गया असंयम रूपी अनाचार ही मुख्य कारण है। द्रुत गति से बढ़ रहे रोगों में से दो चार पर भी दृष्टिपात करें तो प्रतीत होगा कि यह अभिवृद्धि अकारण नहीं है। शरीर के साथ बरती गई उपेक्षा एवं उद्दण्डता का प्रतिफल ही बढ़ती हुई बीमारी के रूप में सामने आ रहा है।

आमाशय और छोटी आँत के अग्रभाग-ग्रहणी के खोखले अवयवों में एक प्रकार का मखमली अस्तर है। इसमें अपच से उत्पन्न विषाक्तता के कारण छोटे-छोटे व्रण हो जाते हैं। इन्हें ‘गैस्ट्रिक अल्सर’ कहते हैं। गैस्टर का अर्थ है पेट। गैस्अर में होने वाले व्रण गैस्ट्रिक अल्सर कहलाते हैं। छोटी आँतों के अग्रभाग ग्रहणी के व्रणों को ड्यूडोनल अल्सर कहते हैं। यदि दोनों जगह व्रण हो तो उसे पेप्टिक अल्सर कहा जायगा।

आमाशय में दो महत्वपूर्ण पाचक रस स्रवित होते रहते हैं। (1) हाइड्रोक्लोरिक एसिड (2) पेप्सीन। यह रस काफी तेज हैं। भोजन को वे ही पचाते हैं। पर यह आश्चर्य ही समझना चाहिए कि वे आमाशय को नहीं पचा डालते। कारण यह है कि आमाशय और ग्रहणी की दीवारों पर एक मखमली अस्तर चढ़ा रहता है। जो पाचक रसों और आमाशय की दीवारों को आपस में घुलने मिलने नहीं देता। यदि किसी कारण यह अस्तर झीना पढ़ जाय तो वे एसिड आमाशय की दीवारों को खरोचेंगे और उसमें जख्म पैदा कर देंगे।

आमाशय के मखमली अस्तर में प्रायः 10 अरब अम्ल स्रावी कोशिकाएँ होती हैं। वे एक दिन रात में 2000 घन सेन्टीमीटर पाचक रसों का स्राव करती हैं। कुछ व्यक्तियों की यह कोशिकाएँ बढ़कर दूनी तक हो जाती हैं और अधिक रस स्रवित करती हैं ऐसे लोगों को पेप्टिक अल्सर हो जाता है।

पेट का बहुत सा काम मुँह को करना पड़ता है। सह्य तापमान-भोजन को छोटे टुकड़ों में तोड़ कर पेट में पच सकने योग्य बनाना-मिर्च मसाले आदि की अनुपयुक्तता दूर करना-मुँह द्वारा ठीक तरह चबाये जाने पर ही संभव होता है। पर कई लोग जल्दबाजी में बिना पूरा चबाये ही भोजन उदरस्थ करते रहते हूँ। इससे आमाशय को दूना काम करना पड़ता है, ऐसी दशा में कठोर भोजन उस मखमली अस्तर को छील देता है और अल्सर की शिकायत उठ खड़ी होती है।

धूम्रपान, बहुत गर्म चाय, काफी पीना, मदिरा पान, मानसिक उत्तेजना की स्थिति में भोजन करना, एस्पिरीन और कोर्टिकोस्टेराइड वर्ग की दवाओं का अधिक सेवन भी अल्सर का कारण बन जाता है।

पेट के ऊपरी भाग में दर्द, जलन, ऐंठन, कचोट, खट्टी डकारें, पेट खाली होते ही पेट में ऐंठन जैसी शिकायतें हों तो अल्सर की संभावना समझी जा सकती है। यह जख्म ग्रहणी का मार्ग छोटा कर सकते हैं ऐसी दशा में भोजन नीचे आँतों में नहीं खिसकता और उल्टियाँ होने लगती हैं। जख्म बड़े हो जाय और उनका प्रभाव रक्त वाहिनियों तक जा पहुँचे तो खून की उल्टियाँ भी होने लगती हैं।

कैंसर का प्रकोप द्रुतगति से बढ़ रहा है। वह गरीबी की अपेक्षा अमीरी में अधिक पनपता है, जहाँ सफाई, विश्राम तथा सुख सुविधा के अनेकों साधन मौजूद हैं। इन दिनों संसार भर में प्रायः जीन करोड़ व्यक्ति इस रुला-रुला कर मारने वाले दुष्ट रोग का त्रास सह रहे हैं। डा0 एलिस बारकर के अनुसार उनमें से आधे अर्थात् डेढ़ करोड़ केवल अमेरिका और इंग्लैंड में हैं।

कैंसर लैटिन भाषा का शब्द है। उसका अर्थ होता है-केकड़ा। यह जल जन्तु अपनी घिनौनी आकृति एवं प्रकृति के कारण सहज ही डरावना लगता है। अपने पैने पंजे जहाँ भी गढ़ा लेता है वहाँ मजबूती से जमा रहता है। जिन कोशिकाओं पर कैंसर के विषाणु छा जाते हैं, उन्हें इस प्रकार जकड़ते हैं कि हटने का नाम नहीं लेते। आरम्भ में थोड़ी सी सूजन, कसक और गाँठ से उसकी जड़ जमती है और फिर वह दिन-दिन अधिक कड़ी बड़ी और विकृत होती चली जाती है। दाह शोथ, दर्द, उभार जैसी अनेक विकृतियाँ उठती बढ़ती दिखाई देती हैं और न केवल पीड़ित अंग पर वरन् समस्त शरीर पर उसकी प्रतिक्रिया परिलक्षित होती है।

औषधियाँ, आपरेशन, रेडियम किरणें आदि विविध उपचार करने पर भी इस रोग से पिण्ड नहीं छूटता और अधिकाँश पीड़ित मृत्यु के मुख में ही चले जाते हैं। भारत में इस रोग का आक्रमण 70 प्रतिशत मुख के क्षेत्र में होता है। मुख, गला, जीभ आदि इसके शिकार में अधिक आते हैं, इसके बाद 22 प्रतिशत को छाती, फेफड़ा और पेट में होता है। कुल मिलाकर 8 प्रतिशत शरीर के अन्य अंगों में पाया जाता है। यह अनुपात प्रकट करता है कि किन अवयवों के साथ कितना अत्याचार हुआ है और किस प्रकार उनका सर्वनाश प्रस्तुत हुआ है। पीड़ितों में प्रायः दो तिहाई पुरुष और एक तिहाई स्त्रियाँ होती हैं, कारण कि पुरुष अपेक्षाकृत हर क्षेत्र में अधिक उद्दंडता का परिचय देते हैं। नशेबाजी का शौक भी उन्हीं को होता है। बढ़ता हुआ धूम्रपान इस दुष्ट रोग का प्रधान कारण है। 40 प्रतिशत रोगी अति धूम्रपान के फलस्वरूप ही कैंसर के शिकार बनते हैं। कैंसर सर्वेक्षण से उपलब्ध आँकड़े बताते हैं कि सिगरेट न पीने वालों की तुलना में पीने वाले कैंसर के दस गुने शिकार होते हैं। भारत में 150 करोड़ रुपया वार्षिक की तमाखू पीई जाती है। कैंसर रोगियों पर आने वाले चिकित्सा, परिचर्या खर्च तथा काम हर्ज होने की हानि इससे कम नहीं अधिक ही होनी चाहिए। चोरी की राशि से यदि जुर्माना अधिक होता हो तो उसे अनुचित नहीं कह सकते।

मधुमेह कितना घातक है यह हर कोई जानता है, पर इस जानकारी में इतनी और वृद्धि करने के लिए कोई तैयार नहीं कि यह जिव्हा के असंयम का ही परिणाम है। गरिष्ठ तले हुए-चट-पटे पदार्थ अत्यधिक मात्रा में खाते रहने से आमाशय की कुछ रस ग्रन्थियाँ एक प्रकार से सूख ही जाती हैं और उनमें इन्सुलिन जैसी उपयोगी रसायन बनना बन्द हो जाते हैं, यही है मधुमेह का मूल कारण।

बिना खाये खाली पेट की अवस्था में यदि रक्त में 100 मिली मीटर में 120 मिली ग्राम से ज्यादा शकर हो और पूरे भोजन के पश्चात शकर का अनुपात 100 मिली मीटर में 170 से अधिक हो तो उसे मधुमेह का रोगी माना जा सकता है।

जो कुछ हम खाते हैं, उससे ग्लूकोज बनता है। इस शकर को पकाकर उष्णता एवं शक्ति में परिणत करना इन्सुलिन एन्जाइम का काम है। भोजन का एक अंश ग्लायकोजेन बन जाता है जो पुट्ठों और जिगर में रहता है। उपवास के समय या शक्ति की आवश्यकता के समय शक्ति इसी भंडार से खर्च होती है लेकिन यदि श्रम से जी चुरा कर आलसी स्वभाव बना लिया गया है और अतिरिक्त शकर बच गई है तो वह चर्बी के रूप में शरीर में अपनी परतें जमा करती चली जाती है।

शरीर में शकर की मात्रा बढ़ने लगे तो रोगी को हमेशा भूख जैसी पेट की जलन महसूस होगी। प्यास अधिक लगेगी। बार-बार और जल्दी-जल्दी पेशाब जाना पड़ेगा। स्नायुओं और संधियों में दर्द, कमजोरी, वजन में कमी, जहाँ तहाँ-फोड़े या सूजन की शिकायत दिखाई पड़ेगी।

भोजन में रहने वाली शर्करा तथा स्टार्च दोनों ही पेट में पहुँच कर ग्लूकोज शर्करा के रूप में बदल जाते हैं। उससे शरीर को गर्मी, शक्ति और पोषण प्राप्त होता है। शर्करा रक्त में सम्मिश्रित होकर यह कार्य करती है और उसका कुछ भाग ‘ग्लाइकोजन’ नामक स्टार्च के रूप में जमा हो जाता है। किसी विशेष उछल-कूद या आकस्मिक विपत्ति का सामना करने के लिए जब अतिरिक्त शक्ति खर्च करनी पड़ती है तो उसकी आवश्यकता इसी भंडार से होती है। जिगर की कोशिकायें संग्रहित ग्लाइकोजन को ग्लूकोज शर्करा में बदल कर रक्त में सम्मिलित होने के लिए भेज देती है और उससे अतिरिक्त शक्ति खर्च की व्यवस्था बन जाती है।

मधुमेह के मरीजों के रक्त तथा मूत्र में शर्करा अनावश्यक मात्रा में भरी रहती है, पर शरीर को पोषण के लिए आवश्यक शर्करा नहीं मिलती और वह दिन-दिन दुबला होता जाता है। इसका कारण पेट की एक छोटी-सी ग्रन्थि अग्न्याशय में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाना है। आमाशय के पीछे दाँई ओर यह एक गुलाबी ग्रन्थि है। इसमें भोजन पचाने के लिए काम आने वाले ‘एन्जाइम’ नामक रासायनिक पदार्थ बनते हैं। इनमें से लाइपेज एन्जाइम चर्बी को, एमाइलोप्सन स्टार्च को और ट्रिप्सिन प्रोटीन को पचाता है। यह एन्ज़ाइम जब समुचित मात्रा में नहीं बनते तो पाचन तन्त्र द्वारा वह काम नहीं होता जिसके आधार पर शर्करा को शरीर पोषण के उपयुक्त बनने के अवसर मिल जाता। बिना पची शर्करा को गुर्दे यथावत छान नहीं पाते और वह रक्त तथा पेशाब में अनावश्यक रूप से मिल जाती है।

जननेन्द्रिय के ऊपर पड़ने वाला अवाँछनीय दबाव अनेक रोगों को जन्म देता है। स्त्रियों के कोमल अंग पुरुषों के अनाचार से अधिक उत्पीड़ित किये जाते हैं और वे अबलाएं अनेकों यौन रोगों, मूत्र रोगों तथा पेडू कमर की व्यथाओं से कराहती रहती हैं। इस अनाचार का प्रभाव गुर्दे पर पड़ता है और वे पथरी सरीखी कई बीमारियों से ग्रसित हो जाती है। भोजन की गरिष्ठता, उत्तेजकता और पानी पीने में कंजूसी भी गुर्दों की सामान्य स्थिति को लड़खड़ा देती हैं।

पथरी, मूत्राशय, गुर्दे, जिगर, पित्ताशय तथा यूरेटर मूत्र वाहिनी नलियों में पाई जाती है। पथरी अक्सर गोल, अण्डाकार या लम्बाकार पाई जाती हैं। दो-तीन पथरी पास-पास हों तो उनके तल चपटे हो जाते हैं। मूत्रवाहक नली में बनने वाली पथरी लम्बी होती है, वे जिस अवयव में ढलती है उसके साँचे के अनुरूप अपनी शकल बना लेती हैं। मूत्राशय या पित्ताशय के पत्थर गोल होते हैं। गुर्दे के अन्दर बनने वाले चपटे होते हैं पर पीछे उन्हें जिन परिस्थितियों में रहना पड़ता है, उसी की आकृति के ढल जाते हैं। कुछ तो बारहसिंगे के सींगों के आकार तक के देखे गये हैं, जिनका बिना आपरेशन के बाहर निकाला जाना किसी प्रकार संभव ही नहीं हो सकता। यह पत्थर सर्वदा चिकने ही नहीं होते वरन् खुरदरे, दानेदार और काँटेदार भी पाये जाते हैं, उनकी चुभन से दर्द होता है और खून निकलने लगता है।

मूत्र नलियों में वे कम संख्या में होते हैं अक्सर दो तीन। पित्ताशय में उनकी संख्या दर्जनों और कभी-कभी तो सैकड़ों तक देखी गई है। उनके आकार और कड़ेपन को देखने से प्रतीत होता है कि वे भिन्न-भिन्न समयों पर भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में और भिन्न-भिन्न कारणों से बने हैं।

पथरी आखिर है क्या? और किस चीज से बनती है। इसका विश्लेषण करने पर प्रतीत होता है यह शरीर के ही ऐसे मृत खंड है जो मल प्रवाह प्रक्रिया के साथ बाहर निकलने की अपेक्षा किसी कारणवश भीतर ही रुक कर रह गये। यह मृत जीवाणुओं का केन्द्र आरम्भ में छोटा-सा होता है पर पीछे उसके इर्द-गिर्द कैल्शियम-फास्फेट आदि जमा होने लगते हैं और उनका आकार बढ़ता चला जाता है। पता तब चलता है जब वे दर्द करने लगते हैं। गुर्दे की पथरी में मूत्र प्रक्रिया के गड़बड़ा जाने के अतिरिक्त एक कारण पैराथाइराइड ग्रन्थि का विकारग्रस्त होना भी है। उसके कारण जब पेशाब बनने, छनने या निकलने में रुकावट होती है तो तेज दर्द अनुभव होता है। गुर्दे की पथरी का कण असह्य दर्द उत्पन्न करता है। कमर, पेट का आगे का भाग तथा मूत्र नली में विकट वेदना होती है। जी मिचलाता है और उल्टी आती है। प्रकृति पेशाब को बाहर निकालना चाहती है और पथरी उसमें रुकावट डालती है इस खींच-घसीट में अक्सर रक्त नलिकाएं फट जाती हैं और पेशाब के साथ खून आने लगता है। बूँद-बूँद पेशाब आता है-जलन होती है ओर बार-बार पेशाब जाने की इच्छा बनी रहती है। यदि पथरी के कारण भीतर जख्म बन जाय और सूजन रहने लगे तो बुखार भी आने लग सकता है और उसका टेंपरेचर 103 से 104 तक हो सकता है।

यदि यह क्रम बहुत दिन चलता रहे तो गुर्दे गलने लगेंगे पर शरीर पर सूजन चढ़ आवेगी।

प्रकृति इन पत्थरों को स्वयं बाहर निकालती रहती है। यदि पानी पीने में कंजूसी नहीं की जाती तो वे छोटे होने की स्थिति में सहज ही बहकर निकल जाते हैं जब दर्द होता है तब तो प्रकृति उन्हें बलपूर्वक पकड़ कर बाहर धकेलने का विशेष प्रयत्न कर रही होती है यदि बहुत बड़े पत्थर नहीं हैं और शरीर की जीवनी शक्ति बहुत निर्बल नहीं हो गई है, तो बहुत बार वे इस दर्द के दौरान ही निकल जाते हैं। यह मान बैठना ठीक नहीं कि पथरी बिना आपरेशन के अच्छी हो ही नहीं सकती, अक्सर प्रत्येक बड़े दौरे के बार बहुत से पत्थर खुद ही निकल जाते हैं। दर्द बन्द होने का मतलब ही यह है कि उसे बड़ी अड़चन को या तो बाहर निकाल दिया गया या धकेल कर रास्ते से इधर-उधर खिसका दिया गया है।

स्मरण रखा जाना चाहिए कि बीमारियाँ अकारण नहीं आतीं। वे निमन्त्रण देने, अनुरोध करने और आने-जाने का पेशगी खर्चा जमा करने पर भी बड़े नाज-नखरे के साथ आती हैं और तभी तक ठहरती हैं जब तक उनके आवास-निवास की समुचित व्यवस्था बनी रहती है। यदि उन्हें विदा करना हो तो अपनी रीति-नीति बदलनी चाहिए। आहार विहार की विधि व्यवस्था में परिवर्तन करना चाहिए। वे अनायास ही बिना दवा-दारु के ही विदा हो जायेंगी।


पादरी केलाल्ड (kahani)

पादरी केलाल्ड उस दिन भोजन की मात्रा उतनी रखने की बात कह रहे थे कि जितना आसानी से पच सके इतना ही खाना चाहिए। धार्मिक जीवन के साथ संयम जुड़ा रहना चाहिए। पेटूपना अपना कर धन और जीवन की शक्ति का अपव्यय नहीं करना चाहिए।

बीच में से ही एक नवयुवक खड़ा हुआ और उसने प्रसिद्ध पहलवान ‘किंग काँग’ की भोजन सूची सुनाते हुए बताया कि अधिक खाने के कारण हो तो वह इतना बलवान है।

पादरी ने गम्भीर होकर पूछा-भला वह बलवान आदमी करता क्या है?

युवक ने बताया कि वह कुश्ती पछाड़ता है और बड़ों-बड़ों को धरती पर पटक देता है।

पादरी ने विश्वास के स्वरों में कहा-बच्चे! पेटू मनुष्य दूसरों को पछाड़ पटक ही सकता है। किसी को उठाने की बात उससे कहाँ बन पड़ती है?


आत्महत्या मानसिक विकृति की दुखद प्रतिक्रिया

मनुष्य की जिजीविषा साधारणतया अदम्य मानी जाती है हम जीवित रहना चाहते हैं और जीवन को प्यार करते हैं। उसकी सुरक्षा के लिए तरह-तरह के साधन जुटाते हैं। मरण से सबको भय लगता है। प्राण संकट की घड़ी आने पर पशु-पक्षी तक सब कुछ कर गुजरने पर उतारू हो जाते हैं। आत्म-रक्षा के प्रयत्नों में सृष्टि के प्रत्येक प्राणी को संलग्न देखा जा सकता है इससे प्रतीत होता है कि न केवल मनुष्य वरन् हर एक जीवधारी जीवन सम्पदा को सुरक्षित रखने के लिए अपनी सूझबूझ और स्थिति के अनुसार हर सम्भव उपाय करता है। जीवधारी को जीवन के साथ कितना अधिक प्यार है, इस तथ्य की झाँकी नजर पसार कर कहीं भी की जा सकती है।

जीवन जैसी बहुमूल्य सम्पदा जिस कारण निरर्थक ही नहीं असह्य बनती जा रही है वह है-मानसिक विक्षोभ। देखने में यही प्रतीत होता है कि अमुक घटनाओं या परिस्थितियों ने अमुक व्यक्ति को आत्महत्या करने के लिए विवश कर दिया, पर वास्तविकता कुछ दूसरी ही होती है। इन लोगों को जो स्थिति असह्य प्रतीत हुई और घबराकर यह अवाँछनीय कृत्य कर बैठे वह वस्तुतः उतनी अधिक जटिल नहीं थी। उन्हीं परिस्थितियों को असंख्य लोग सहन करते हैं और कुछ तो इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि उन्हें जीवन का एक सहज स्वाभाविक अंग मानकर सन्तोषपूर्वक दिन गुजारते हैं। यदि वे कठिनाइयाँ सचमुच ही इतनी असह्य होतीं तो फिर किसी के लिए भी उनमें रहना कितना कठिन होता।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की संग्रहित जानकारियों के अनुसार प्रत्येक एक लाख में से 34 व्यक्ति आत्महत्या करके मरते हैं। संसार के अन्य देशों की तुलना में इस संदर्भ में भारत सबसे आगे है। अकेली दिल्ली में एक वर्ष की गणना में 325 व्यक्तियों ने आत्महत्या की थी जबकि उस वर्ष हत्याएं केवल 60 ही हुईं। यह एक नगर की बात हुई। उसी साल राजस्थान में 873 व्यक्तियों ने आत्महत्या की थी। कोई-कोई अधिक संपन्न और अधिक विलासी नगर भी इसी क्षेत्र में भारत को चुनौती देते हैं।

क्लाड हाटन के अनुसार बीसवीं सदी में जितनी आत्महत्याएं हुई हैं इतनी संसार में इससे पूर्व कभी भी नहीं हुई। अमेरिका मनःशास्त्री डा0 विकवेयर इसका कारण आस्तिकता का अभाव मानते हैं और कहते हैं-”आज का आदमी सुखोपभोग के साधन पाने के लिए जितना आतुर है इतना ही मनोवाँछित स्थिति न पाने पर अत्यधिक विक्षुब्ध भी हो उठता है और उसी अधीरता भरी निराशा से खीजकर पूरा या अधूरा आत्मघात कर लेता है।”

आत्महत्या प्रवृत्ति पर गम्भीर शोध करने वाले विद्वान ओग्ल की गणना है कि संसार में प्रतिवर्ष लगभग साढ़े तीन लाख व्यक्ति आत्महत्या करते हैं। इसमें देश विशेष की परिस्थितियों के कारण अनुपात में बहुत भिन्नता पाई गई है, किसी देश में एक लाख आबादी पीछे हर वर्ष तीस व्यक्ति अपघात करते हैं, तो किसी देश में यह अंक तीन से भी कम रहते हैं। उनने अपने अध्ययन में कुछ और भी निष्कर्ष निकाले हैं-स्त्रियाँ एक तिहाई और पुरुष दो तिहाई अपघात करते हैं। 25 से 30 और 50 से 60 की आयु में ऐसे दुस्साहस अधिक बन पड़ते हैं। जाड़ों में कम और गर्मियों में अधिक ऐसे कृत्य होते हैं।

ओग्ल के अनुसार पिछले पचास वर्षों से समस्त संसार में आत्महत्या की दर प्रायः दूनी हो गई है। आस्ट्रिया, हंगरी, जर्मनी, जापान, अमेरिका और फ्राँस में तो यह और भी ऊंची निकल गई है।

फ्राँस की राजधानी पैरिस में एक वर्ष के केवल चार महीनों के अन्दर 1797 व्यक्तियों ने आत्मघात कर डाला जिनमें अधिकतर युवा महिलाएं थीं।

संसार भर में हर नये दिन प्रायः एक हजार व्यक्ति आत्महत्या द्वारा स्वेच्छा मृत्यु का वरण करते हैं बर्लिन आत्महत्या निरोधक केन्द्र के अध्यक्ष डा0 कलौजा टामस के अनुसार दरिद्र देशों की अपेक्षा सम्पन्न देशों में यह प्रवृत्ति अधिक पनपी है, इसका कारण उनका खिन्न मानस एवं असन्तोष भरा जीवन स्तर है।

मूर्ख, अपढ़, अज्ञानी या विपत्तिग्रस्त लोग ही आत्महत्या करते हों, सो बात नहीं। मानसिक विक्षोभ जब सिर पर सवार होता है तो बुद्धिमान समझे जाने वाले और करोड़ों से अधिक सुविधा सम्पन्न जीवन जीने वाले भी उस कुकृत्य को करने के लिए उतारू हो जाते हैं।

विद्वान गेटे आत्महत्या करना चाहता था। इसके लिए वह एक बढ़िया सा चाकू खरीद कर लाया और बहुत दिन तक उसे तकिये के नीचे खुला रखकर सोता रहा ताकि किसी दिन हिम्मत जुटा सके तो अपना काम तमाम करले, पर बहुत दिन बीत जाने पर भी उससे वैसा बन नहीं पड़ा। अन्ततः उस चाकू को उसने ऐसे ही फेंक दिया।

वायरन जिन दिनों चाइल्ड हैराल्ड के लेखन में व्यस्त थे उन दिनों उन पर आत्महत्या की सनक बहुत तेज थी, पर उन्हें अपनी सास का दुलारा याद आता रहा और वे अपने निर्णय से मुकर गये।

यूनान के महान् दार्शनिक डायोजिनीस अपने हाथों फाँसी लगाकर मरे थे। चीनी साहित्यकार ‘लाओसे’ भी अपनी मौत स्वयं बुलाकर लाये थे।

भावुक बुद्धिजीवी अक्सर इस प्रकार के दुस्साहस पूर्ण कार्य कर बैठते हैं। ‘मृच्छ कटिक’ के लेखक शूद्रक आग में जल मरे थे। ‘जानकी हरण’ महाकाव्य का लेखक सिंहल का राजा कुमारदास कालिदास की मृत्यु का शोक न सहकर चिता में जल गया था।

लैटिन कवि एम्पेदोक्लीज ने ज्वालामुखी में कूदकर आत्मघात किया था। लुकेशियस ने अपनी मृत्यु को अमर बनाने की दृष्टि से यह दुस्साहस किया। महाकवि चैटरटन ने दरिद्रता से पीछा छुड़ाने के लिए विष पीना उपयुक्त समझा। गोर्की ने अपनी सारी पूँजी खर्च करके पिस्तौल खरीदी और फिर उसी की गोली से अपने पेट को विदीर्ण कर डाला। यहूदी साहित्यकार स्टोफेनज्विग ने अपने अपघात का कारण बताते हुए पुर्जा छोड़ा-”अब संघर्षों से टकराने की मेरी शक्ति चुक गई है। अशक्त जीवन का अन्त कर लेना मुझे अधिक अच्छा जंचा।”

चित्रकार लाडवे ने अस्पताल की चारपाई पर ही अपने पेट में गोली मारली। पास की चारपाई पर पड़े मरीज ने हड़बड़ा कर कारण पूछा तो उसने इतना ही उत्तर दिया-’कुछ नहीं, जरा यों ही निशाना आजमा रहा था।’ एक दूसरा चित्रकार बानगाँग भी इसी प्रकार अपने ऊपर गोली दाग कर मरा। लोग दौड़कर आये और ‘यह सब क्या हुआ’-पूछा तो उसने पाइप से धुएं का आखिरी कश छोड़ते हुए कहा-”जरा चिड़ियों की शिकार कर रहा था।”

आत्महत्या का प्रयास करने वाले सदा कृतकार्य ही नहीं हो जाते बहुत करके वे बच भी जाते हैं। राबर्ट क्लाइव ने अपने जीवन में तीन बार आत्महत्या का प्रयत्न किया, पर पिस्तौल की गोली ठीक निशाने पर लगी ही नहीं।

बुद्धिमान कहे जाने वालों में से कितने ही मूर्धन्य व्यक्ति ऐसे हुए हैं जिनने तनिक-सी परेशानी से उद्विग्न होकर आत्महत्या करली। ऐसे लोगों में सेफो, डोमेस्थनीज, ब्रूटस, केसियस, क्लाइव, डेमोक्लीज, हनीवाल, बर्टन जैसे लोगों के नाम सर्वविदित हैं।

मनःशास्त्री राबिन्स का अध्ययन निष्कर्ष यह होता है कि आत्महत्या की चेष्टा में सफल और असफल लोगों में अधिकाँश का मानसिक ढाँचा अवास्तविकताओं से जकड़ा हुआ पाया गया। वे जिन्दगी के बारे में असामान्य ढंग से सोचते रहे-समस्याओं का असामान्य मूल्याँकन करते रहे और सर्वविदित सीधे-सीधे निष्कर्षों को अपनाने में असफल रहे। उनकी मानसिक विकृतियों ने ही उनके लिए मकड़ी बनकर ताना-बाना बुना और उस अपने ही जाल में उलझ कर वे बेमौत मर गये।

आत्महत्या के अनेक तरीके अपनाये जाते रहे हैं। पानी में डूबना, ऊँचे स्थान से नीचे गिरना, विष खाना, फाँसी लगाना और आत्मदाह करना इन उपायों में अधिक प्रचलित हैं। एक दुःख को हलका करने के लिए दूसरा उससे बड़ा दुःख मोल लेना भी एक उपाय सोचा जाता रहा है यद्यपि वह इच्छित लाभ प्राप्त करने में तनिक भी सहायक नहीं होता। अताई इलाज में एक उपचार यह भी था कि किसी के पेट में दर्द हो तो लोहे की गरम सलाख से उसकी छाती दाग दी जाय इससे जलने का कष्ट इतना बड़ा होता है कि रोगी पेट के दर्द की बात भूल जाता है। लगभग इसी स्तर का दुस्साहस यह है कि अमुक चिन्ता अथवा आपत्ति से छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या जैसी बड़ी आपत्ति को अपना लिया जाय।

जिस प्रकार शरीर में अनेक प्रकार के विकृत विषाणु प्रवेश करके विविध चिन्ह लक्षणों वाले रोग उत्पन्न करते हैं, उसी प्रकार मनःक्षेत्र में कई तरह की विकृतियाँ अपनी जड़ जमा लेती हैं और परिपूर्ण उन्माद न सही उससे मिलते-जुलते--उतने ही विघातक भयावह मानसिक रोग उत्पन्न करती हैं।

डिमेशिया प्रिकोक्स अर्थात् किशोरावस्था की हिंसात्मक सनक-डिमेंशिया पैरालिटिका अर्थात् आवेश का सामयिक दौरा-मैलन कोलिया अर्थात् विषाद रोग-न्यूरस्थेनिया अर्थात् स्नायुविक असन्तुलन जैसी कितनी ही विकृत मनःस्थितियाँ ऐसी हैं, जो विवेक को अस्त-व्यस्त करके रख देती हैं और समयानुसार जो भी उभार आता है उसी में मस्तिष्क इतनी तीव्रगति से बहता चला जाता है, जिसमें अपने को संभाल सकना कठिन पड़ता है।

आवश्यक नहीं कि ऐसे लोगों के लिए उत्तेजना का कोई वास्तविक या बड़ा कारण हो तभी वे आवेश ग्रस्त हों-तनिक-सी मामूली घटना उन्हें उद्विग्न एवं विक्षिप्त बना देने के लिए पर्याप्त होती है। जरा-सी बात पर वे आग-बबूला की तरह आवेशग्रस्त हो सकते हैं क्या करना चाहिए क्या नहीं- क्या कहना चाहिए क्या नहीं- क्या सोचना चाहिए क्या नहीं की विवेचना करना उनसे नहीं बन पड़ता। अन्धड़ चक्रवात की तरह तो भी विचार, जो भी प्रवाह जिस भी दिशा में चल पड़ा बस चलता ही चला जाता है। इन उभारों में अक्सर विगठनात्मक, हिंसात्मक, निषेधात्मक-तोड़-फोड़ परक होते हैं। विक्षिप्तता विनाश की दिशा में बढ़ाती है। सृजन के लिए-समाधान के लिए सन्तुलन की आवश्यकता होती है, वह जब हाथ में रहा ही नहीं ते फिर उचित-अनुचित का भेद कौन करे?

विधुर और विधवाएं बाल-बच्चों वालों एवं विवाहितों की अपेक्षा इसलिए अधिक संख्या में बेमौत मरने हैं कि उनकी मनोभूमि स्नेह, सौजन्ययुक्त वातावरण से दूर, नीरस एवं घुटन भरी रह रही होती है।

मनोविज्ञानी कालमैन के अनुसार अशिक्षितों की अपेक्षा शिक्षित और ग्रामीणों की अपेक्षा शहरी लोग अधिक भावुक उलझनों में फंसते हैं और उद्विग्नताओं से बच निकलने का कोई मार्ग न देखकर अपना विनाश करने पर टूट पड़ते हैं।

जितने लोग आत्महत्या से मरते हैं। उससे दस गुने लोग वैसा करने की बात सोचते रहते हैं, पर साहस के अभाव में वैसा कर नहीं पाते। कुछ लोग न तो करते हैं और न करने का उनका इरादा ही होता है मात्र सम्बन्धियों को डरा-धमकाकर अपना उल्लू-सीधा करने के लिए उस तरह की बकवास करते रहते हैं।

समाज-शास्त्री विलियम के अध्ययन के अनुसार आस्ट्रेलिया का कभी कोई आदिवासी आत्महत्या नहीं करता।

फ्राँसीसी समाज विज्ञानी एमाइल दुर्खीम के अनुसार बच्चे कदाचित ही आत्महत्या करते हैं। किशारों में भी यह प्रवृत्ति कम ही पाई जाती है। उम्र के साथ-साथ यह मनोविकार बढ़ता है। प्रणय, परिक्षा मानहानि और व्यापार में असफल युवक अक्सर ऐसा दुस्साहस कर बैठते हैं। बूढ़े सबसे ज्यादा आत्महत्या करते हैं। वे जिन्दगी से ऊबे, थके और निराश होते हैं। अस्तु किसी भी छोटे कारण से विषादग्रस्त होकर अपनी जान गंवा देते हैं। उन्हें अपने चारों ओर अंधेरा बिखरा दीखता है, जिससे डरकर वे जिस एक अंधेरे कोने में जा घुसते हैं उसी का नाम आत्महत्या है।

आत्महत्या के मोटे एवं प्रत्यक्ष कारणों में गृहकलह, मानहानि, पश्चाताप, परिक्षा आदि प्रयोजनों में असफलता, भविष्य की निराशा, दरिद्रता, असाध्य रोग, दण्ड भय, असफल प्रेम, आदर्शवादी दुस्साहस आदि कारण गिनाये जा सकते हैं। किन्तु उसका वास्तविक कारण एक ही है मनःक्षेत्र की ऐसी दुर्बलता जो विपरीत परिस्थितियों का तनिक-सा दौर आते ही भड़क उठती है और बेकाबू होकर अनर्थ के गर्त में जा गिरती है। दुर्बल शरीर वाले व्यक्ति भी तनिक-सी ठोकर खाकर औंधे मुँह गिर पड़ते हैं। तनिक-सी सर्दी-गर्मी न सह सकने के कारण भयंकर रोगों से ग्रसित हो जाते हैं। मानसिक स्वास्थ्य को धीरे-धीरे बिगाड़ते हुए लोग उस स्थिति तक जा पहुँचते हैं जहाँ आत्महत्या दुर्घटना को अप्रत्याशित नहीं कहा जा सकता।

चिन्तन की सही पद्धति यदि समझी और समझाई गई होती तो स्थिति को सहन या सुधारने की अभीष्ट विधि-व्यवस्था अपनाने की आदत डाली गई होती और इन आत्महत्या करने वालों में से अधिकाँश के प्राण बच सकते थे क्योंकि वस्तुतः जीवन सम्पदा को कूड़े-करकट के ढेर में फेंक देने को विवश करने वाली कोई भी विपत्ति इस संसार में है ही नहीं।

‘मैलन कोलिया’ के रोग विषादग्रस्त रहते हैं वे दुखी, असन्तुष्ट एवं क्षुब्ध रहने के लिए कोई न कोई कारण अपने इर्द-गिर्द ही ढूंढ़ लेते हैं। किसी न किसी को अपने दुःखद चिन्तन का पात्र चुन लेते हैं। वस्तुतः वे व्यक्ति या वे परिस्थिति विक्षोभ कारक उतने नहीं होते जितना कि उन्हें गढ़ लिया गया है।

‘रैप्टस मेनेकलिक्स’ उस सनक का नाम है जिसमें मनुष्य दण्ड देने के लिए आतुर रहता है, पर वह इसके लिए अपने आपको ही चुनता है। आत्म-प्रताड़ना के लिए इसकी इच्छा निरन्तर उठती है। भोजन न करने, कपड़े न पहनने, सिर धुनने से लेकर आत्महत्या करने तक की चेष्टाएं वह करता है। कभी-कभी अपने उपयोग की आवश्यक वस्तुओं तक को तोड़-फोड़कर फेंक देता है। ऐसा करने से उसे अपने विक्षोभ का समाधान होने की बात सूझती है।

दूसरों के क्षोभ को शान्त करने के लिए स्वयं दुखी होने की स्थिति अपना लेना भी ऐसा ही विचित्र चिन्तन है जिसे अक्सर सहानुभूति एवं सहायता के लिए अपनाया जाता है। किसी स्वजन के कष्ट निवारक के लिए अपने आप की बलि किसी देवी-देवता पर चढ़ा देना अथवा विवाह योग्य कन्याओं का इसलिए आत्मघात कर बैठना कि इससे उनके अभिभावकों को अर्थ चिन्ता से छुटकारा मिल जायगा- ऐसे ही दुस्साहस भरे कदम हैं। इनमें आदर्शवाद, उदारता, सहानुभूति जैसे तत्वों का पुट तो होता है, पर यह स्मरण नहीं रहता कि इस कदम से अपना बहुमूल्य जीवन ही नष्ट नहीं होगा वरन् जिनके लिए यह सब किया जा रहा है उनकी कठिनाई, चिन्ता एवं विपत्ति और अधिक बढ़ जायगी।

प्राचीनकाल में आत्मघात को धार्मिक प्रशंसा प्रदान करने का भी कभी-कभी प्रचलन रहा है। इसके पीछे भारत की मूल संस्कृति नहीं वरन् सामयिक विचार विकृति ही झाँकती है। संन्यासियों की स्वाभाविक मृत्यु की अपेक्षा स्वेच्छा मरण की प्रशंसा की गई है। बौद्ध-धर्म और जैन-धर्म में ऐसे विधान भिक्षु जनों के लिए उनके धर्म-ग्रन्थों में मिलते हैं, भले ही वे पीछे जोड़े गये हैं। पाण्डवों का स्वर्गारोहण, मंडन मिश्र का तुषाग्नि संदाह, ज्ञानेश्वर की जीवित समाधि आदि अनेक ऐसी घटनाएं इतिहास के पृष्ठों पर अंकित हैं, जिन्हें सराहा ही जाता है। चित्तौड़ की रानियों का सामूहिक रूप से आत्मदाह और मृत पतियों के साथ अनेक पत्नियों का सती हो जाना ऐसे ही कृत्यों में गिना जाता है जिसके लिए उन्हें प्रशंसा योग्य ठहराया जाय।

इतिहास, पुराणों में ऐसे अनेकों घटना प्रसंग उपलब्ध हैं जिनमें कतिपय नर-नारियों ने धार्मिक प्रयोजनों के लिए अथवा दूसरों की तुलना में अपने को अधिक आदर्शवादी, अधिक साहसी सिद्ध करने के लिए आत्मघात किये हैं। पराजित एवं असफल लोगों द्वारा प्राण त्याग करके अपनी ग्लानि मिटाने की घटनाएं तो सदा ही होती रही हैं। उन्हें लोगों ने सराहा तो नहीं, पर सहानुभूति की दृष्टि से अवश्य देखा। मृतकों के लिए यह सहानुभूति चिन्तन भी प्रेरक बना। आत्मघात का साहस न कर सकने पर अपनी सन्तान की अथवा पशु-पक्षियों की बलि चढ़ा देने की प्रथा तो एक प्रकार से किसी काल में मान्यता प्राप्त धर्म कृत्य बन गई थी और कहीं-कहीं अभी तक उसका प्रचलन मौजूद है।

आत्महत्या को भी दूसरों की हत्या के समान ही गर्हित कर्म माना जा सकता है। प्राचीनकाल में इसे बहुत बुरा कहा जाता था और मरने के उपरान्त भी इस कुकृत्य करने वाले की भर्त्सना की जाती थी।

योरोप में उन दिनों आत्महत्या करने वालों के प्रति बहुत अनुदार दृष्टिकोण था। उनकी लाशें सड़कों के आस-पास कूड़े के ढेर में दबादी जाती थीं और भयंकर आकृतियाँ वहाँ खड़ी कर दी जाती थीं, ताकि उन मरने वालों की बदनामी हो। इन परिस्थितियों को बदलने में डेविसह्ययूम, वाल्टेयर, रूसो जैसे दार्शनिकों ने आवाज उठाई थी और कहा था, आदमी को जीने की तरह मरने की भी आजादी होनी चाहिए।

कुरान में दूसरों को हत्या करने से भी अधिक जघन्य पाप आत्महत्या को बताया है। यहूदी धर्म में भी ऐसा ही है, उसमें आत्महत्या करने वाले के लिए शोक मनाने और उसकी आत्मा को शान्ति देने के लिए प्रार्थना करने की भी मनाही है। ईसाई धर्म में भी इसे घृणित पातक बताया गया है। 11 वीं शताब्दी में इंग्लैंड में एक कानून बना था, जिसमें आत्महत्या करने वाले की सम्पत्ति जब्त करली जाती थी और उसके शव को किसी ईसाई कब्रिस्तान में धार्मिक विधि से दफनाया नहीं जा सकता था।

आत्महत्या का प्रयत्न करने वाले को रोगी माना जाय या अपराधी? इस प्रश्न के उत्तर में मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे लोगों का उचित स्थान जेलखाना नहीं, वरन् पागलखाना है। भारत सरकार की मानसिक स्वास्थ्य परामर्शदात्री समिति को तत्कालीन केन्द्रीय स्वास्थ्य मन्त्री डा0 सुशीलानैयर ने सुझाव दिया था कि आत्महत्या की चेष्टा एक मानसिक विकृति है इसलिए इस प्रकार का प्रयत्न करने वालों को अपराधी नहीं वरन् रुग्ण व्यक्ति माना जाना चाहिए। अब इंग्लैंड के कानूनों में भी इस संदर्भ में सुधार कर लिया गया है, उन्हें दण्डनीय नहीं माना जाता।

कलकत्ता के एक न्यायाधीश अदालत में आये हुए एक आत्महत्या का प्रयत्न करने वाली वृद्धा नागेश्वरी देवी को मात्र साँकेतिक दण्ड देते हुए रिहा कर दिया था। उन्होंने अपने फैसले में दफा 309 को अमाननीय और उपहासास्पद बताते हुए लिखा था- अगर हम किसी व्यक्ति को असह्य वेदनाओं से मुक्ति नहीं दिला सकते तो उसे ऐसी मौत मरने का अधिकार होना चाहिए जिसमें वह पीड़ा झेलने की अपेक्षा राहत पा सके।

समाज की अवाँछनीय परिस्थितियाँ मनुष्यों को विक्षुब्ध करती हैं। स्नेह, सौजन्य का अभाव, नैतिकता का गिरता हुआ स्तर, शोषण, उत्पीड़न, ठगी और विश्वासघात, गरीबी, बेकारी, हानि और बर्बादी जैसे कारण मनुष्य को दुःखी बनाते हैं। सामाजिक कुरीतियों के कुचक्र में कितने ही व्यक्ति पिसते हैं। इन प्रचलनों को बन्द करना सरकार और समाज का काम है। समाज की संरचना ऐसी होनी चाहिए जिसमें हर व्यक्ति को निर्वाह, प्रगति और सुरक्षा के समुचित साधन प्राप्त हों कोई किसी के साथ अनीति न बरत सके। इसके अतिरिक्त एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य यह भी होना चाहिए कि स्वास्थ्य रक्षा और अर्थ उपार्जन की तरह ही चिन्तन तन्त्र का सही उपयोग कर सकने की क्षमता भी सर्व साधारण में उत्पन्न की जाय, इसके लिए मानसिक प्रशिक्षण की एक समर्थ प्रक्रिया खड़ी की जानी चाहिए इसके बिना आत्महत्या जैसे संकट उत्पन्न करने वाले मनोरोगों का भड़कता हुआ दावानल रोका न जा सकेगा।


Quotation

एक बदचलन कही जाने वाली औरत कहीं जा रही थी। रास्ते में प्यासा कुत्ता छटपटाता हुआ मिला। उसका दिल पसीजा। अपनी धोती की रस्सी और जूते का लोटा बनाकर उसने कुएं से पानी खींचा और कुत्ते की प्यास बुझाई।

आवाज आई-’मुलायम दिल वाले बदचलन उनसे अच्छे हैं जो ईमान की बात करते हैं-पर भीतर से संग दिल हैं।’


टहलना एक अति उपयोगी और अति सरल व्यायाम

शारीरिक और मानसिक व्यायाम का जैसा अच्छा समन्वय प्रातःकाल के टहलने में होता है उतना और किसी में नहीं। दुर्बल-रुग्ण, बाल-वृद्ध, नर-नारी सभी इस सरल व्यायाम का लाभ उठा सकते हैं। जिनकी शारीरिक स्थिति कड़े व्यायाम करने की नहीं है जिन्हें गठिया, दमा, रक्त-चाप, हृदय रोग आदि की शिकायत रहती है, वे भी अपने निकटवर्ती खुले स्थानों में टहल कर ताजगी प्राप्त कर सकते हैं और आवश्यक शारीरिक श्रम की आवश्यकता किसी कदर पूरी कर सकते हैं।

प्रभातकालीन जलवायु में सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणों का- वायु दृष्टि से आक्सीजन का बाहुल्य रहता है। रात्रि का अन्त और दिन का आरम्भ एक ऐसा वातावरण उत्पन्न करता है जिसका संपर्क पौष्टिक भोजन से भी अधिक स्वास्थ्यवर्धक सिद्ध होता है।

यों श्रम की दृष्टि से टहलने में बहुत जोर नहीं पड़ता और व्यायाम की आवश्यकता उससे भली प्रकार पूरी हो सकेगी यह समझ में नहीं आता। तो भी हमें यह मानकर चलना चाहिए कि उठक-पटक वाली क्रियाओं का अपना महत्व कुछ भी हो- क्रमबद्ध, गतिबद्ध और व्यवस्थित क्रम से देर तक चलने वाली टहलने की क्रिया शरीर के अंग-प्रत्यंगों में से प्रत्येक को समान रूप से इतना प्रभावित करती है, जितना कि कड़े और कष्टसाध्य व्यायाम नहीं कर सकते।

सबसे बड़ी बात है टहलने के साथ जुड़ी हुई आरोग्य संवर्धक प्रयास की मान्यता। लुहार दिन भर हथौड़ा चलाता है, फिर भी थोड़ी देर व्यायाम करने वाले की तरह पुष्ट नहीं हो पाता इसका एकमात्र कारण यह है कि पहलवानी सीखने वाले व्यायामशाला में इसी भावना से भरे रहते हैं कि इस क्रिया के माध्यम से हम स्वास्थ्य संवर्धन कर रहे हैं। प्रयास और भावना का सम्मिश्रण पहलवान की शरीर पुष्टि के रूप में सामने आता है जबकि लुहार अधिक श्रम करने पर भी उतना लाभ नहीं उठा पाता, पोस्टमैन हर दिन डाक बाँटने के लिए मीलों घूमता है, पर टहलने वाले का एक घण्टे का प्रयास ही उसका स्वास्थ्य सुधार देता है इसका कारण टहलते समय आरोग्य वृद्धि की भावना के संकल्प का जुड़ा रहता है। टहलना दूसरों के साथ गपशप करते हुए बेसिलसिले चलने से लाभदायक नहीं होता। यह तो एक लकीर पीटने वाली सैर हुई। स्वास्थ्य संवर्धन के लिए टहला जाय तो उसमें शरीर को एक व्यवस्थित क्रम से और मन को आरोग्य संचय की मान्यता से भरा हुआ रखना चाहिए। प्रातःकाल टहलने की आदत को अपनी दिनचर्या में स्थान देने से कितने ही अशक्त और रुग्ण व्यक्ति अपने खोये हुए स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करने एवं समुन्नत में सफल हुए हैं।

गाँधी जी ने अपना टहलने का क्रम व्यस्त से व्यस्त परिस्थितियों में भी जारी रखने का प्रयत्न किया। संसार के श्रेष्ठतम व्यक्ति उनसे मिलने आते थे और अति महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा करते थे तो भी उन्होंने समय का व्यतिक्रम कभी नहीं होने दिया। नियत समय और नियत सीमा के भीतर ही वे चर्चा प्रसंगों को भली प्रकार पूरा कर लेते थे। टहलना यों एक साधारण बात समझी जाती है, पर गाँधी जी उसे दिनचर्या की नियमितता और स्वास्थ्य रक्षा की उपयोगिता के साथ जोड़ते थे और जहाँ तक सम्भव होता उसे अव्यवस्थित नहीं होने देते थे। यों सामान्यतया वे प्रार्थना से पूर्व टहलने जाते थे, पर यदि वह समय किसी आवश्यक काम में निकल गया तो फिर प्रार्थना के बाद जाते थे। दो मील सवेरे और दो मील शाम को टहलना उनकी नियमित दिनचर्या का अंग था। जिन्हें आवश्यक चर्चा करनी होती थी उन्हें वे अपने साथ टहलने में ले जाते थे।

कई बार ऐसे प्रसंग आते थे कि रात बीत जाती थी अथवा प्रातःकाल से ही किसी विशेष कार्य में जुटना पड़ता था, ऐसी दशा में रात गये अथवा सवेरा होने से पूर्व ही टहल लेते थे ताकि उस विशेष प्रसंग में अड़चन भी उत्पन्न न हो और टहलने की नियमित दिनचर्या में व्यवधान भी न पड़े। पानी बरसता तो वे उतने समय अपने बरामदे में टहल कर उस आवश्यकता को पूरा करते। एक दिन किसी ने पूछ- कभी-कभी तो आपका टहलना छूट भी जाता होगा?’ उन्होंने हंसते हुए उत्तर दिया- ‘मैं जिस दिन घूमना बन्द कर दूँगा उस दिन जीता कैसे रह सकूँगा?’ बापू बहुत तेज चाल से टहलने निकलते थे, कोई तंदुरुस्त आदमी ही उनका साथ कर सकता था।

महापंडित थोरो टहलने को अपने जीवन की प्रमुख आवश्यकता मानते थे और उस नियमितता में कभी बाधा नहीं पड़ने देते थे। उन्होंने टहलने की उपयोगिता के सम्बन्ध में एक लेख भी लिखा था-जिससे उस जमाने के लोगों ने बहुत प्रेरणा ग्रहण की। थोरो के मित्र एमर्सन जन्म से ही बहुत दुबले थे। उन्हें थारों ने टहलने के लिए प्रोत्साहित किया। फलतः वे स्वास्थ्य सुधार में आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त कर सके। डिकिन्स ने अति महत्वपूर्ण विचारों का सृजन घूमने के समय ही किया वे प्रातः जलपान करके घर से निकलते थे और प्रायः 20 मील घूमकर तीसरे प्रहर वापिस आते थे। जो विचार उठते उन्हें डायरी में लिखते रहते और फिर रात को निश्चिन्तता पूर्वक उन्हें लिपिबद्ध करते। वे कहते थे जो कुछ मैंने किया या पाया है वह टहलने रूपी कल्पवृक्ष के ही अनुदान हैं।

जर्मनी के एक पर्यटन प्रेमी कुर्लपीटर नामक व्यक्ति ने अपने जीवन का अधिकाँश समय पैदल घूमने में खर्च किया। यह शौक उन्हें 14 वर्ष की आयु में लगा और 64 वर्ष की उम्र तक पूरे 50 वर्ष अनवरत रूप से चलता रहा। इस अवधि में उनने प्रायः पूरा योरोप घूम डाला और शहर, देहात सभी कुछ देखा। वे कहते थे कि संसार इतना सुँदर है कि उसे जितना देखता हूँ उतना ही अधिक देखने की लालसा और अधिक तीव्र होती है। वे अपने गुजारे के लिए कुछ दैनिक व्यवहार की चीजें बनाते-बेचते रहते थे और उसी से अपना खर्च चला लेते थे। देखे गये दृश्यों एवं घटनाक्रमों का विवरण उन्होंने ऐसी सूक्ष्म दृष्टि के साथ वर्णन किया है कि पाठकों को एक सारगर्भित उपन्यास एवं पर्यटन का आनन्द आता है। उनकी यात्रा पुस्तकें जर्मनी ही नहीं योरोप भर में लोकप्रिय बनी हैं।

प्रो0 टिण्डाँल ने कितने प्रकार के कष्टों का सामना किया था। जब वे बहुत क्षुब्ध होते तो टहलने निकल जाते थे। उन्होंने कितनी ही महत्वपूर्ण खोजें भी की हैं उनकी मूल प्रेरणा उन्हें टहलने के समय ही मिली। प्रयोगशाला में तो उन्हें केवल प्रत्यक्ष रूप दिया और परखा जाता रहा। कार्लाइल 80 वर्ष की आयु के जब हो गये तो भी 5 मील तो वे टहल ही लेते थे। टालरटय एकबार तीन दिन की पदयात्रा पर निकले तो उनने उस धुन में 130 मील का सफर पूरा कर लिया।

अंग्रेजी के मान्य साहित्यकार सेम्यूअल जानसन टहलने के लिए बड़े शौकीन हैं। जब मौसम अनुकूल और मूड़ अच्छा हो तो वे तीस मील का सफर पूरा करके घर आते हैं। उपन्यास लेखक स्कोट और कोपकार चार्ल्सलेम्ब दोनों ही लंगड़े थे, पर उन्होंने टहलना कभी भी नहीं छोड़ा। ख्याति प्राप्त मनीषियों में विथोविन टर्नर, कोलरिग, विलियम कर्लिन, ब्रायन्ट ऐसे नाम हैं जो अपनी सफलताओं का श्रेय टहलने की उपयोगी आदत के साथ जोड़ते रहते थे।

स्वास्थ्य विज्ञानी बरबर मैकफेडन ने लिखा है-कोई व्यक्ति सामान्य शारीरिक श्रम अथवा विशिष्ट प्रकार का व्यायाम भले ही करता हो, पर उसे प्रतिदिन कम से कम दो घण्टा रोज नित्य ही टहलना चाहिए। उससे कम में शारीरिक श्रम की स्वाभाविक भूख बुझ नहीं सकती। दूसरे व्यायामों के साथ टहलने की तुलना नहीं करनी चाहिए, उसकी अपनी उपयोगिता है और अपनी विशेषता है जो नित्य टहलने की आदत नहीं डालेगा वह स्वस्थ नहीं रह सकेगा।

बेतुके ढंग से चलते रहने से काम नहीं चलेगा। टहलना एक कला है। एक नियमित प्रवाह, सरलता, क्रमबद्धता, तेजी, उत्साह और सतर्कता का सम्मिश्रण इसमें होना चाहिए और यह अनुभूति रहनी चाहिए कि विश्वव्यापी महाप्राण में-महासागर में से उपयोगी सत्य अधिग्रहण करने के लिए हम किसी साहसिक शोध यात्रा पर निकले हैं।

टहलने में सारा बदन सीधा रहना चाहिए। कंधे पीछे दबे हुए, सीना उभरा हुआ, सिर थोड़ा पीछे को निगाह एकदम सामने। शरीर को इतना कड़ा नहीं करना चाहिए कि तनाव बढ़े। चुस्ती रहनी चाहिए, पर साथ सरल स्वाभाविक मुलायमी भी माँसपेशियों की बनी रहनी चाहिए। कमर से लेकर सिर तक का हिस्सा कुछ आग की ओर तिरछापन लिए होना चाहिए। जैसा कि अक्सर दौड़ते वक्त रखना पड़ता है।

मुँह बन्द रखा जाय। साँस नाक से ही लेनी चाहिए। गहरी साँस लेने का अभ्यास करना चाहिए ताकि स्वच्छ वायु का प्रवेश शरीर में अधिकाधिक गहराई तक हो सके। अधूरी साँस से तो पूरे फेफड़ों को भी सक्रियता का लाभ नहीं मिलता। इसलिए उथली साँस लेने की आदत सामान्य समय में भी छोड़नी चाहिए। विशेषतया टहलने के समय तो इस बात का अधिक ध्यान ही रखना चाहिए कि गइराई तक पूरी साँस खींची जाय और पूरी ही बाहर निकाली जाय। यों जब भी टहला जा सके तभी अच्छा है, पर अधिक उपयुक्त समय वह है जो सूर्योदय से पहले ही आरम्भ कर दिया जाय और थोड़ा सूर्य निकलने तक पूरा कर लिया जाय। प्रातःकाल की वायु जितनी शुद्ध होती है जितनी शीतल और सौम्य होती है उतनी और किसी समय की नहीं। यदि जल्दी सोया जाय तो जल्दी उठा भी जा सकता है और नित्यकर्म से निवृत्त होकर घर से चल दिया जा सकता है, ऐसी दशा में सूर्योदय तक यह सुखद प्रयास पूरा भी हो सकता है।

टहलते समय शरीर पर कपड़े कम एवं हलके रखने चाहिए ताकि न केवल साँस के द्वारा ही स्वच्छ वायु प्राप्त हो वरन् रोमकूपों की समस्त त्वचा को भी उस उत्तम प्राप्त वायु का स्फूर्तिदायक स्पर्श प्राप्त होता रहे। घण्टे में तीन से चार मील तक की चाल पर्याप्त है। बीमार, कमजोर, बूढ़े, बालक या मोटे आदमी की बात अलग है। वे धीरे-धीरे चलें तो भी हर्ज नहीं। महिलाएं जिन्हें चलने का अभ्यास नहीं है, वे भी धीमी चाल से चल सकती हैं, पर उनका क्रम भी करीने का ही होना चाहिए।

नियमित और व्यवस्थित रीति से टहलना कितना उपयोगी है इसे कोई भी व्यक्ति स्वयं अनुभव करके देख सकता है।


मजाक का प्रयोग सुधार के लिए(kahani)

लेंग होल्त्स उन दिनों एक प्रोविजन स्टोर के मालिक थे। काम कम और आराम अधिक होने से उनकी चर्बी बढ़ती जा रही थी। उनके शुभचिन्तक उन्हें वजन बढ़ने के खतरे बताते और उसे घटाने की सलाह देते। पर वे यह स्वीकार नहीं करते थे कि उनका मोटापा बढ़ रहा है।

एक दिन वे कोट के बटन बन्द कर रहे थे, पर वे ठीक तरह बन्द नहीं हुए। कसे हुए कोट को पहनने में हाल्त्स को जो परेशानी हो रही थी उसे देखकर स्टोर की एक सेल्स गर्ल्स ईवा खिल-खिलाकर हंस पड़ी। उनने पहली बार अनुभव किया कि वे सचमुच मोटे होते जा रहे हैं। तब उन्होंने उपचार आरम्भ किया और तीस पौण्ड वजन घटाया। इससे उनका बिगड़ता जा रहा स्वास्थ्य संभल गया।

कई वर्ष बाद होल्त्स की धर्मपत्नी ने एक भोज में रहस्योद्घाटन करते हुए बताया कि किस प्रकार उसने कोट के बटन बड़ी होशियारी से पीछे हटा दिये थे और किस प्रकार मजाक का प्रयोग सुधार के लिए किया था। श्रीमती होल्त्स कुछ वर्ष पूर्व की सेल्स गर्ल ईवा ही बन गई थी।


बढ़ती हुई हिंसा वृत्ति उसका कारण और निवारण

बढ़ती हुई हिंसक प्रवृत्ति क्रमशः अधिकाधिक उग्र होती चली जा रही है और चिन्ता का विषय बन रही है। व्यक्तिगत लड़ाई-झगड़े अब मनोमालिन्य, बोलचाल बन्द होना, रूठना, भटकना, गाली-गलौज या मारपीट तक सीमित नहीं रहते वे सीधे हत्या के शिखर तक बढ़ दौड़ते हैं। शरीर को बुखार, खाँसी होने की तरह अब मस्तिष्कों पर ऐसे आवेश छाते देर नहीं लगती जो प्राणघातक आक्रमण के बिना शान्त नहीं होते।

पुलिस और न्यायालयों की रिपोर्ट के अनुसार संसार भर में हिंसा की आग तेजी से भड़क रही है और बहु सर्वभक्षी दावानल बनने की दिशा में बढ़ रही है। अब हिंसक घटनाएं इतनी अधिक होती हैं कि उन्हें आश्चर्यजनक एवं चिन्ताजनक न मानकर सामान्य मानव स्वभाव में गिना जाने लगेगा। हिंसक अपराध जितनी तेजी से बढ़ रहे हैं, उतनी प्रगति और किसी क्षेत्र में नहीं हो रही है।

किसी समय पशु-पक्षियों और कीट-पतंगों तक को जीव परिवार का सदस्य मानकर उनके साथ सहृदयता का व्यवहार करने की बात पर जोर दिया जाता और जहाँ तक सम्भव हो सके दूसरे प्राणियों को कष्ट न देने की बात पर ध्यान रखा जाता था। पर अब मनुष्य ही गाजर-मूली बनता जा रहा है, जिसे काटने में दूसरों को कोई हिचक नहीं होती वरन् अपने अहं एवं पौरुष की छाप छोड़ने का गर्व अनुभव होता है। कितनी ही हिंसाओं में प्रतिशोध के सूत्र तो बहुत ही स्वल्प होते हैं, अपनी आतंकवादी साहसिकता को चरितार्थ करने की अहमन्यता ही प्रधान काम कर रही होती है। व्यक्तिगत लड़ाई-झगड़े ज्यादा कहा-सुनी तक सीमित नहीं रहते वरन् देर-सवेर में किसी की जान लेकर ही शान्त हो पाते हैं। यह आवेशग्रस्तता सचमुच ही चिन्ता का विषय है, उसके कारण सामाजिक सद्भावना और सुस्थिरता की जड़ें ही हिल जायेंगी।

विचार विज्ञान के मूर्धन्य अन्वेषणकर्ता इस तथ्य का गहरा अध्ययन कर रहे हैं कि आखिर ऐसा हो क्यों रहा है? ब्रिटेन के दो समाज-शास्त्री क्लेअर रसेल और डब्ल्यू0 एम॰ रसेल संग्रहित आँकड़ों के आधार पर यह प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हैं कि संसार भर में हिंसा की आग बुरी तरह भड़क रही है। जनसंख्या वृद्धि से भी उसकी अनुपात गति तीव्र है। वैयक्तिक और सामूहिक जीवन में हिंसा का भरपूर प्रयोग किया जा रहा है।

छुटपुट कारणों से उत्पन्न हुए मन-मुटाव भी भयंकर हिंसा के रूप में उभरते हैं और उनकी चपेट में प्रतिद्वंद्वियों के निरीह बाल-बच्चे भी आ जाते हैं। धन के लालच में चोरी, ठगी की अपेक्षा ‘सफाया’ करके निश्चिन्ततापूर्वक लाभान्वित होना अधिक सरल ओर सुविधाजनक माना जाने लगा है। प्रायः इस स्तर की मनोवृत्ति न्यूनाधिक मात्रा में सर्वत्र बढ़ रही है।

हिंसा वृत्ति क्यों इतनी उग्र होती जा रही है? इस पर कई दृष्टि से विचार किया गया है। क्या सामाजिक परिस्थितियाँ इतनी विक्षोभकारी हैं कि उनका आघात न सहकर मनुष्य आक्रमणकारी बन बैठे? क्या आर्थिक कठिनाइयाँ इसके लिए प्रेरित करती हैं? क्या सामयिक घटनाक्रम इसके लिए उत्तरदायी होते हैं? क्या वंशानुक्रम से यह सब प्रभावित हो रहा है? क्या शारीरिक विकृतियाँ ऐसा करती हैं? क्या आहार-विहार और जलवायु में हो रहे परिवर्तन इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न करते हैं? आदि प्रश्नों पर गम्भीरता से विचार किया गया है और इन कारणों को भी अधिक रूप से दोषी ठहराया गया है। किंतु विश्लेषण ने प्रधानता दो कारणों को दी है (1) बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण उत्पन्न गन्दगी और भीड़-भाड़ (2) मन पर शासन करने और उसे सुसंस्कृत बनाने के प्रशिक्षण का अभाव।

छोटे जानवरों पर यह प्रयोग करके देखा गया है कि जब वे छिरछिरे, खुले और शान्त वातावरण में रहते थे तब उनकी प्रकृति बहुत शान्त थी, किन्तु जब उन्हें स्वजातियों के साथ भीड़-भाड़ में रखा गया तो वे उत्तेजित और थके माँदे रहने लगे और एक दूसरे पर आक्रमण करने के आदि हो गए। भीड़ के कारण मल, मूत्र, पसीना, तथा रद्दी चीजों की गंदगी बढ़ती है और शरीर से निकालने वाली ऊष्मा का अवाँछनीय प्रभाव पड़ता है। इस तनाव से उत्तेजित मनःस्थिति आक्रामक रूप धारण करती हैं। छोटे गाँवों की अपेक्षा कस्बों में और कस्बों की अपेक्षा बड़े शहरों में आक्रामक घटनाएं कही अधिक अनुपात में होती हैं। हत्याओं और आत्महत्याओं की संख्या सघन आबादी वाले क्षेत्रों में बढ़ी-चढ़ी पाई गई है।

पारिवारिक एवं सामाजिक वातावरण यदि संतोषजनक समाधान कारक बना रहे तो उसमें पलने वाले व्यक्ति शान्त प्रकृति के रहेंगे किन्तु यदि पारिवारिक कलह के कारण स्वयं को प्रताड़ित होना पड़े अथवा अनाचार के कारण रोष उभरता रहे तो वह बालकपन के दबे हुए विक्षोभ प्रौढ़ावस्था आने पर प्रबल बनते हैं और वे किसी का प्रतिशोध किसी से लेते हैं। देखा जाता है कि पति से पिटने पर पत्नी अपने बच्चों को मारती है। बाप की डाँट पड़ने पर बड़े लड़के अपने छोटे भाई-बहनों पर बरसते हैं। स्कूल में अध्यापकों से पिटने वाले बच्चे बड़े होकर जब स्वयं अध्यापक बनते हैं तो अपने छात्रों को मारते हैं। मन की यह कैसी अन्धता है कि दबी हुई परतों के उभरने पर, प्रतिशोध लेने पर यह भूल जाता है कि गलती किसकी थी और बदला किससे ले रहे हैं।

छात्रों के बढ़ते हुए उपद्रव प्रायः उनके पारिवारिक असन्तोष का प्रतिफल होते हैं। आवश्यक नहीं उन्हें ही मारा-पीटा गया हो। पिता का व्यवहार यदि माता के प्रति कटु कर्कश रहा है तो उसे बच्चे देखते, समझते तो हैं ही-रोष उन्हें भी आता है, पर कुछ कर नहीं सकते। अस्तु दवा हुआ असन्तोष चक्रवृद्धि ब्याज के साथ बढ़ता रहता है और बड़े होने पर वह आक्रोश बनकर जो भी सामने आता है उसी पर टूट पड़ता है। अनीति, उपेक्षा, अवज्ञा एवं अवाँछनीयता का दौर प्रायः घरों में रहता है। घर में कई सदस्य रहते हैं उनमें से कोई किसी के साथ अनीति बरतता है तो उससे अन्य लोगों के मन भी असन्तोष से भरते हैं। भाई का व्यवहार अपनी पत्नी के साथ सद्भावना पूर्ण है। भावज रोती-कलपती और दुःखी रहती है। भाई पसीजता नहीं, इस निष्ठुरता को रोकने में सफलता न मिले तो भी क्रुद्ध तो अन्य सदस्य रहेंगे ही, समाधान न मिलने पर वह कलह सम्भवतः समाप्त न हो सके, पर इस विग्रह का प्रभाव भाई-भावज तक सीमित नहीं रह सकता। घर के प्रायः सभी सहृदय व्यक्तियों का मन क्षुब्ध रहेगा। कहना न होगा कि रुष्ट असन्तुष्ट, मनोभूमि धीरे-धीरे विकृत होती चली जाती है और उसकी प्रतिक्रिया किसी अन्य अवसर पर हिंसक हो उठती है।

समाज में चल रहे अनाचार भी रोष उत्पन्न करते हैं। कुछ लोगों की दुष्टता के कारण उत्पन्न होने वाला आक्रोश अनेकों को भड़काता है। वह भड़क अंधेरे में छोड़े हुए तीर की तरह किसी को भी जा लगता है। पारिवारिक और सामाजिक क्षेत्रों में बढ़ती हुई अवाँछनीयता अपनी चपेट में असम्बद्ध लोगों को भी ले लेती है और वह चिनगारियाँ सूखे, गीले सभी को जलाती चली जाती है। बढ़ती हुई हिंसक प्रवृत्ति के भड़कने का एक बड़ा कारण पारस्परिक स्नेह, सहयोग का दुर्भिक्ष एक बहुत बड़ा कारण है। किसी जमाने में लोग हिल मिलकर रहते थे, एक दूसरे के दुःख-दर्द को समझते थे, सहिष्णुता और सहानुभूति का परिचय देते थे। इसका प्रभाव पूरे समाज पर पड़ता है और अधिकाँश लोग सज्जनता के अभ्यस्त रहने के कारण बड़े कारणों को भी उपेक्षा में डालकर शान्ति बनाये रहते थे, पर अब व्यक्तिगत स्वार्थपरता और अहमन्यता की बाढ़ ने पूरा वातावरण ही उद्विग्न कर दिया है फलतः सम्बद्ध घटकों में से अधिकाँश को आक्रोश का शिकार देखा जा सकता है। हिंसक उपद्रवों के मूल में यही उग्र उत्तेजना काम कर रही होती है।

बढ़ती हुई जनसंख्या के कारण वैयक्तिक, पारिवारिक सामाजिक और आर्थिक क्षेत्रों में जो कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं वे सर्वविदित हैं। प्रकारान्तर से उनका दुष्प्रभाव प्रजननकर्ताओं को ही नहीं दूसरों को भी भुगतना पड़ता है। इन विक्षोभों के बीच हिंसा को पनपने का पूरा अवसर मिलता है।

न्यू युनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया के मनोजीव विभाग ने मनुष्य समाज में उभरते हुए हिंसक आक्रोश का अध्ययन करने के लिए एक विशेष विभाग ही स्थापित किया है जिसमें मनोविज्ञानी, जीवविज्ञानी, समाजशास्त्री शरीर-शास्त्री, आनुवांशिकी विशेषज्ञ मिल-जुलकर आक्रोश समस्या पर विभिन्न दृष्टिकोणों से अध्ययन कर रहे हैं और उनका समाधान खोज रहे हैं।

वोस्टन में विशेषज्ञों की एक दूसरी टीम काम कर रही है। जिसमें दो न्यूरों सर्जन डा0 विलियम स्वीट और डा0 वर्नन एच मार्क एवं मनःशास्त्री डा0 फ्रेंक आर॰ अर्विन प्रमुख हैं। इन लोगों ने हत्याओं की घटनाओं का मूल कारण तलाश करने में वर्षों तक माथापच्ची की है और उनसे सम्बन्धित परिस्थितियों पर अनेक दृष्टियों से विश्लेषण किया है।

कैलीफोर्निया के अन्वेषणकर्ताओं और वोस्टन के शोध पैनल का निष्कर्ष एक स्थान पर पूरी तरह मिलता है कि आक्रमणकारी एक प्रकार के आवेश उन्माद में ग्रसित थे। हत्या करते समय उनकी मनःस्थिति इतनी क्षुब्ध थी कि वे कारण और निवारण के सम्बन्ध में सही बात सोचने ओर सही निष्कर्ष निकालने की अपनी क्षमता गंवा चुके थे। उसी स्थिति में उनसे हिंसा बन पड़ी। आवेश उतरने पर वे अपने कृत्य पर पछताये भी कम नहीं, पर तब तक घटनाक्रम बहुत बढ़ चुका था, गलती सुधर नहीं सकती ओर कानून की पकड़ उनके साथ कोई रिआयत कर नहीं सकती थी।

हत्यारे उन कुकृत्यों को करने से पूर्व कितनी ही बार छोटे-बड़े उद्धत कर चुके थे। आवेश ने उनके विवेक को कितनी ही बार दबोचा था और उन्होंने अवाँछनीय कृत्य किये थे। ऐसे लोग छोटे-छोटे कारणों पर अपने स्त्री-बच्चों को तथा पालतू पशुओं को क्रूरतापूर्वक पीट चुके थे। कई बार तो उनने अपना ही सिर पीट लिया था।

आवेशों पर नियन्त्रण करने की क्षमता आरम्भ से ही विकसित करनी पड़ती है। संस्कृति इसी का नाम है। शील, सदाचार, सौजन्य, सज्जनता, शिष्टाचार के अंतर्गत मनुष्य समाज के प्रत्येक सदस्य को आत्मनियन्त्रण सीखना पड़ता है। नागरिक और सामाजिक कर्तव्यों के - अंतर्गत मनुष्य को अपनी पशु प्रवृत्तियों पर अंकुश रखना और दूसरों के साथ अधिक उदार व्यवहार करने का अभ्यास डालना पड़ता है। मनुष्यता एवं धार्मिकता की शिक्षाओं के अंतर्गत ऐसी ही आदतें सिखाई जाती हैं ताकि उत्तेजनाओं के अवसर आने पर मनुष्य सही उपाय सोच सकने के लायक अपना विवेक सन्तुलन बनाये रह सके। नैतिकता एवं सज्जनता की मर्यादाओं पर आस्था रखने वाला व्यक्ति अपने आपको ऐसा सुसन्तुलित बनाता है कि प्रतिकूल परिस्थिति में भी मानसिक ज्वार-भाटों पर नियन्त्रण कर सकें। वह न तो भयभीत होकर हाथ-पांव ही ढीले कर बैठे और न उत्तेजित होकर कुछ भी कुकृत्य करने पर उतारू हो जाय।

खेद है कि अब ऐसी धार्मिक और साँस्कृतिक शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है और उपार्जन तथा उपभोग सम्बन्धी कुशलता को ही पर्याप्त मान लिया गया है। एक ओर विलासिता तथा स्वार्थपरता और अहमन्यता के त्रिदोष सन्निपात का आक्रमण दूसरी ओर आत्म-नियन्त्रण के साँस्कृतिक प्रशिक्षण की उपेक्षा इन दोनों की मिश्रित प्रतिक्रिया हिंसात्मक दुर्घटनाओं की गगनचुम्बी अभिवृद्धि के रूप में सामने आ रही है।

मस्तिष्कीय स्थिति का विश्लेषण करते हुए पाया गया है कि अनुमस्तिष्क प्रान्तस्थ, सेकेव्रत कोटेक्स- का निचला भाग हिंसक वृत्ति भड़काने का केन्द्र है। इस स्थान पर विद्युत प्रवाह बढ़ाकर और घटाकर प्रयोगशाला के प्राणियों को हिंसक एवं शान्त बनाने में सफलता प्राप्त की गई है यह मर्मस्थल यदि असंस्कृत बना रहे तो मनुष्य की प्रवृत्ति भी पशु स्तर की जंगली बनी रहेगी और स्वभाव में जंगलीपन भरा रहेगा। किन्तु यदि शारीरिक और मानसिक व्यायामों से जिस प्रकार स्वस्थता और विद्वता प्राप्त की जाती है उसी प्रकार मस्तिष्कीय नियन्त्रण का अभ्यास आरम्भ से ही किया जाता रहेगा तो व्यक्ति शालीन और संस्कृत बना रहेगा तब उसे रोष उत्पन्न करने वाले अवसरों पर भी संतुलित देख जा सकेगा। ऐसे लोग समाधान भी खोज निकालते हैं और अपने को तथा प्रतिपक्षी को अनावश्यक हानि से भी बचा लेते हैं।

बोस्टन की शोधों में हत्यारों को मानसिक दृष्टि से बहुत ही दुर्बल और कायर पाया गया। वे प्रतिपक्षी द्वारा किसे गये छोटे से अप्रिय कार्य को अपने लिए सर्वनाश करने वाला मान लेते हैं और उस काल्पनिक विभीषिका से भयभीत होकर आत्मरक्षा के लिए आक्रमण कर बैठते हैं। दोष और दंड का मूल्याँकन कर सकना और संतुलन बिठा सकना भी उनके लिए संभव नहीं रहता इसलिए आक्रमण के लिए बढ़े हुए हाथ कुकृत्य के अन्तिम चरण तक जा पहुँचते हैं और हत्या कर डालते हैं।

कई व्यक्ति बिना किसी लड़ाई झगड़े अथवा बिना कारण के ही हत्या की योजना बनाते और उसे कर गुजरते हैं। इसमें प्रतिपक्षी का कोई दोष नहीं होता, केवल हत्यारे के भीतर एक ऐसी अदम्य ललक उठती है जिसे तृप्त करने के लिए हत्या ही एकमात्र उपाय रह जाता है। अस्तु वह व्यक्ति शान्त चित्त से योजनाबद्ध हत्या करता है और वैसा करके अपना जी हलका हुआ मानता है।

विकृत अहमन्यता भी कई बार हत्या अथवा उसके सजातीय क्रूर उत्पीड़न करके दूसरों को यंत्रणा देने में आनन्द लेती है। उसका उद्देश्य ख्याति प्राप्त करना-तथा अपना वर्चस्व सिद्ध करना ही प्रमुख होता है। श्रेष्ठता का परिचय देने के लिए आत्म परिष्कार ओर आदर्श कार्य करने की आवश्यकता पड़ती है, इसके लिए सद्गुणों की-परिष्कृत अध्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है। ओछे लोग उतना कर नहीं पाते और आतंक का उद्धत तरीका सरल देखते हैं। सृजन से उच्चस्तरीय यश प्राप्त होता है किन्तु ध्वंस से भी ख्याति पाई जा सकती है, भले ही वह निंद्य अथवा निकृष्ट ही क्यों न हो। असंस्कृत मनुष्य दूसरा मार्ग चुनते हैं और क्रूर कर्म अपनाकर अहंता को तुष्ट करते हैं।

उद्धत आचरण को कैसे रोका जाय? इस सम्बन्ध में रूसी समाज शास्त्रियों के अनुसार कठोर दण्ड देने की अपनाई गई पद्धति असफल हुई है। दंड से डरा हुआ व्यक्ति कुकृत्य से हाथ तो खींच लेता है, पर वह भय उसके मानसिक विकास में एक बड़ा अवरोध बन कर खड़ा हो जाता है। अस्तु सोवियत संघ के विचारक कठोर दंड की नीति को नरम करके अन्य सुधारात्मक प्रयोग करने पर जोर दे रहे हैं।

राकफेलर विश्वविद्यालय के डा0 रेनेडयूवो का मत है कि बड़े नगरों का विगठन करके छोटी देहात बसाने और बड़े कारखाने हटा कर छोटे गृह उद्योग लगाने से मानवी संतुलन की रक्षा की जा सकेगी।

मिशीजन विश्वविद्यालय के डा0 डोनाल्ड माइकेल का कथन है कि हिंसात्मक घटनाओं की अधिक चर्चा करने से उस स्तर की प्रवृत्तियां भड़कती हैं। युद्ध, मार-काट हत्या, एवं क्रूरता का विवरण प्रस्तुत करने वाली पुस्तकें, फिल्में तथा पत्रिकाएं रोकी जानी चाहिए। उनसे हिंस्रोन्माद फैलता है। हत्यारों को श्रेय मिले, नाम छपे ऐसा तो होना ही नहीं चाहिए। एक पापी पिशाच का मनुष्यता को लज्जित करने वाला क्रूर कृत्य कहकर ही ऐसी घटनाओं की संक्षिप्त चर्चा करना पर्याप्त होना चाहिए। उन्हें किसी भी सूरत में ‘हीरो’ नहीं बनने देना चाहिए।

इन सबसे बड़ी बात यह है कि आत्मानुशासन की शिक्षा एवं प्रेरणा हर व्यक्ति को मिले। मनोनिग्रह की-चित्तवृत्तियों के निरोध की आवश्यकता समझाई जाय, ताकि समय-समय पर उभरती रहने वाली अनेकों दुष्प्रवृत्तियों पर नियन्त्रण किया जा सके। काम-क्रोध, लोभ-मोह, मद, मत्सर के षडरिपु परिवार में ही वह एक क्रूर आवेश भी है, जो मनुष्य द्वारा मनुष्य का क्रूर उत्पीड़न करने के लिए भरता है।

माँसाहार के लिए तथा औषधियों के लिए की जाने वाली पशु-पक्षियों और प्राणियों की हत्या उपेक्षणीय नहीं है। उत्तेजक और तामसी आहार के जो नित-नये प्रचलन बढ़ रहे हैं उनका प्रभाव दुष्ट दुर्बुद्धि के रूप में होना स्वाभाविक है। हिंसा की विभीषिका से यदि मानवी शान्ति को नष्ट होने से बचाना है तो आहार की तामसिकता और पारस्परिक व्यवहार में बढ़ती संकीर्ण स्वार्थपरता की भी रोक-थाम करनी ही होगी।


परिवार संस्था का नव निर्माण नारी जागरण से ही होगा

व्यक्ति-निर्माण के लिए धर्म और अध्यात्म का विशाल तन्त्र दूरदर्शी मनीषियों ने चिरकाल पूर्व खड़ा किया था। वह प्रयास मानवी स्तर को देव स्तर तक पहुँचाने में पूरी तरह सफल रहा, इसके लिए अपना पुरातन इतिहास साक्षी है। आज उन क्षेत्रों में विकृतियाँ घुस पड़ी हैं। अवाँछनीयताओं की घुसपैठ से निहित स्वार्थों का पोषण और भोले भावुकों का शोषण हे रहा है तो भी यह आशा है कि आज नहीं तो कल इन तन्त्रों की सफाई होगी और न पहले की तरह अपनी उपयोगिता सिद्ध करने लगेंगे।

समाज-निर्माण का उत्तरदायित्व संभालने के लिए ही शासन तन्त्र की संरचना है। उसमें जो कमी रह जाती है उसे समाज सुधार संस्थाएं पूरा करती हैं। धर्म परम्पराएं भी इस प्रयोजन में सहायता करती हैं। इस क्षेत्र में अन्य रचनात्मक हलचलें भी चलती रहती हैं। छोटे-बड़े सम्मेलन प्रायः सामूहिकता और लोकहित का ही वातावरण उत्पन्न करते हैं। यों इन दिनों वह चेतना भी दिग्भ्रान्त ही हो रही है और अनीति को प्रश्रय दे रही है फिर भी इस क्षेत्र को संभालने के लिए कोई तन्त्र विद्यमान है और यह आशा बनी हुई है कि उसे सुधार देने पर सतयुगी परिस्थितियाँ फिर पैदा की जा सकती हैं।

व्यक्ति-निर्माण और समाज-निर्माण के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी है- परिवार-निर्माण। इसका दोनों के साथ ही अति घनिष्ठ और प्रभावकारी संपर्क है। व्यक्ति का वास्तविक निर्माण पारिवारिक वातावरण में ही होता है। बचपन के आरम्भिक संस्कार यहाँ से आरम्भ होते हैं, धीरे-धीरे परिपक्व होकर वे ही व्यक्तित्व का रूप धारण करते हैं। समाज की माला परिवारों के मोतियों से ही पिरोकर बनती है। परिवार छोटे हों या बड़े वस्तुतः वे अपने आप में एक पूरा समाज हैं। उसके संचालक को भी अपने क्षेत्र के राष्ट्रपति या प्रधान मन्त्री की भूमिका निभानी पड़ती है और सरकार को जिस प्रकार देश की विभिन्न समस्याओं को संभालना पड़ता है, उसी प्रकार परिवार के अनेक सदस्यों के बीच विचित्र भिन्नता के बीच तालमेल स्थापित करना पड़ता है। सरकार की तरह विभाग भले ही न बनें, मन्त्रिमंडल खड़े भले ही न किये जायं, पर समस्याएं परिवारों के सामने भी छोटे-बड़े रूप में बनी रहती हैं जो सरकारों को बड़े रूप में हल करनी पड़ती हैं।

दिन और रात का मिलन संध्याकाल कहलाता है। व्यक्ति और समाज मनुष्य जाति के यही तो बड़े घटक हैं, इन दोनों को आपस में जोड़ने वाली कड़ी का नाम परिवार है। दिन का अपना महत्व है और रात्रि का अपना। पर संध्या में दोनों का समन्वय रहने से उसका महत्व और भी अधिक है। प्रभातकाल की संध्या प्राणि मात्र में अभिनव, उल्लास उत्पन्न करती है और उस सुहाने वातावरण में पुलकित होकर अन्तरात्मा परमात्मा से मिलने की आकुलता व्यक्त करती है। उपासना क्षेत्र में उदीयमान संध्याकाल का बहुत महत्व है प्रायः सभी सम्प्रदायों ने उस पुण्य-बेला को धर्मकृत्यों में लगाने का निर्देश किया है। सायंकालीन संध्याकाल भी ऐसे ही सत्कर्मों में लगाने की परंपरा है। परिवार को संस्था को, व्यक्ति और समाज को मध्यवर्ती संध्या कहा जा सकता है।

परिवार का कलेवर छोटा होता है- चर्म-चक्षुओं की आदत यह है कि वस्तु के आकार के अनुरूप उसका महत्व माना जाय। परिवार छोटी संस्था है, इसलिए उसे उपेक्षणीय समझा जाता है। पर यदि गम्भीरता पूर्वक सोचा जाय तो प्रतीत होगा कि व्यक्ति और समाज की व्यवस्था एवं प्रगति की आधार भूमिका निभाने की पूरी जिम्मेदारी परिवार के स्तर पर ही निर्भर रहती है। अस्त-व्यस्त परिवारों में पले हुए लोगों का व्यक्तित्व कभी उच्चस्तर का नहीं हो सकता और न पिछड़े स्तर के लोग कभी प्रगतिशील, सुविकसित समाज की रचना कर सकते हैं। गरीबी एक बात है और संस्कृति दूसरी। गरीबी परिस्थितियों पर निर्भर है, पर संस्कृति को हर परिस्थिति में सुस्थिर रखा जा सकता है। पारिवारिक परम्पराएं यदि सद्भाव सम्पन्न हों, उनमें उच्चस्तरीय प्रचलन विद्यमान हो तो समूची मानवी जाति का-समस्त संसार का वातावरण सुख-शान्ति से भरा-पूरा रह सकता है और स्वल्प साधन रहते हुए भी स्वर्गीय परिस्थितियों का आनन्द उपलब्ध हो सकता है।

दुर्भाग्य यह रहा है कि व्यक्ति-निर्माण के लिए धर्म और समाज-निर्माण के लिए शासन जैसे समर्थ तन्त्र परिवार संस्था को सुविकसित बनाये रहने के लिए खड़ा नहीं किया गया है। उसकी समस्याओं को सुलझाने के लिए-उसका परिष्कृत ढांचा खड़ा करने के लिए सर्वांगपूर्ण आचार संहिता और विधि-व्यवस्था की आवश्यकता थी, पर वह व्यवस्था लोगों के ध्यान में नहीं आई। होम साइन्स ‘गृह-विज्ञान’ के नाम से लड़कियों को स्कूलों में पुस्तकें तो कितनी ही पढ़ाई जाती हैं, पर उनमें काम-काजी, साज-संभाल की ऊपरी जानकारियाँ भर होती हैं। परिवार के सदस्यों का भावना स्तर, चिन्तन, दृष्टिकोण किस प्रकार परिष्कृत किया जाय, उनमें गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता का विकास कैसे किया जाय ऐसे तथ्य नहीं ही दिखाई पड़ते हैं। सुसज्जित घर में रहने का आनन्द तो अच्छे होटलों में रहकर भी उठाया जा सकता है। अमीर लोग वैसी सुविधा उपयुक्त सामग्री खरीद कर, प्रशिक्षित नौकर रखकर भी उपलब्ध कर सकते हैं। परिवार का बाह्य अंग ही उस सुव्यवस्था और सुसज्जा को माना जा सकता है, जो गृह-विज्ञान की पुस्तकें लिखी मिलती हैं और स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं। यहाँ अभाव उस तन्त्र का बताया जा रहा है जो परिवार के वातावरण को सुसंस्कृत बनाता और जिसमें पले हुए लोग संस्कारवान बनकर निकलते। परस्पर सद्भाव बरतने और समाज में सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करने वाले कुशल माली सिद्ध होते।

आवश्यकता इस बात की है कि उपेक्षित परिवार संस्था को नये सिरे से गठित किया जाय और उसे अपनी द्विपक्षीय भूमिका का निर्वाह कर सकने की क्षमता से सम्पन्न बनाया जाय। इसके लिए कितने ही नये आधार खड़े करने होंगे और अवाँछनीय प्रचलनों से पीछा छुड़ाना पड़ेगा। मजबूत आधार वे ही हो सकते हैं जिनमें न्याय, नीति, औचित्य और विवेक को समुचित प्रश्रय दिया गया हो। परम्पराओं का महत्व इसलिए है कि वे स्वभाव का अंग बन जाती हैं। रुचि उस ढांचे में ढल जाती है और ढर्रा उसी पटरी पर लुढ़कने लगता है। मनःक्षेत्र में इन परम्पराओं की जड़ें इतनी गहरी जमी रहती हैं कि निष्पक्ष दृष्टि से अवाँछनीय सिद्ध होने पर भी पूर्वाग्रहों के पक्ष में प्रायः हठवादिता बनी रहती है और उनके पक्ष में विचित्र प्रकार के तर्क प्रस्तुत किये जाते रहते हैं। परिवर्तन के लिए रजामन्द करना तो और भी कठिन पड़ता है।

जो हो, अवाँछनीयताओं को निरस्त करके औचित्य का प्रतिष्ठान नितान्त आवश्यक है। यदि आत्महत्या के लिए कटिबद्ध मानव जाति को उज्ज्वल भविष्य के राजमार्ग पर घसीटता है तो कई महत्वपूर्ण कदम उठाने पड़ेंगे। व्यक्ति का नैतिक, बौद्धिक, चारित्रिक स्तर ऊँचा उठाना पड़ेगा और मानवी आदर्श एवं कर्तव्यों को अपनाने के लिए उसे राजी वे राजी से रजामन्द करना पड़ेगा। सामाजिक प्रचलनों में ऐसी मर्यादाएं प्रथाएं तथा धाराएं जोड़नी पड़ेंगी जो समूहगत अवाँछनीयताओं को निरस्त करके निष्पक्ष न्याय को व्यवहार में ला सकने की परिस्थितियाँ बना सकें।

व्यक्ति और समाज की स्थिति उच्चस्तरीय बनाने का व्यावहारिक उपाय एक ही है कि परिवारों का पुनर्गठन किया जाय। इस गठन में भारी उथल-पुथल करने की जरूरत नहीं है और न प्रचलित परम्पराओं को नष्ट करना ही अभीष्ट है। प्राचीन और नवीन को प्रचलन को, औचित्य को परस्पर मिला देने की सुधार प्रक्रिया अपनाकर भी अभीष्ट प्रयोजन पूरा किया जा सकता है। हमारे प्रयास इसी दिशा में हैं। परिवार संस्था की ओर लोकचेतना को आकर्षित करके जन-जन को यह समझाया जाता है कि परिवार छोटे होने पर भी वे उपेक्षणीय नहीं हैं। वे बहुत ही शक्तिशाली होते हैं और दूरगामी परिणाम उत्पन्न करते हैं। इसलिए उन्हें सुविकसित बनाने की दिशा में समुचित ध्यान दिया जाना चाहिए। अन्यथा व्यक्ति और समाज की दुर्दशा दूर न हो सकेगी और आज जो समस्याएं सर्वभक्षी विभीषिका बनकर रह रही हैं उनका, समाधान नहीं हो सकेगा।

युद्धों में रक्तपात को क्रूर-कर्म कठोर प्रकृति के बने पुरुष से भी सफलता पूर्वक सम्भव हो सकता है। नारी की करुणा इस दिशा में उसे बहुत आगे तक नहीं बढ़ने देती। यों प्रकारान्तर अथवा आपत्ति धर्म के अनुसार रूप वे भी युद्ध में प्रवृत्त होती देखी गई है। परिवार का भावनात्मक क्षेत्र पूरी तरह नारी के अधिकार क्षेत्र में आता है। यों उसकी आर्थिक तथा नियामक प्रखरता का भार प्रायः पुरुष को ही संभालना पड़ता है, पर जहाँ तक भावनात्मक बीजारोपण तथा उस फसल को उगाने, बढ़ाने और फली-फूली बनाने में नारी जो कर सकती है वह नर के लिए किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता। घर-परिवार नारी का प्रधान कार्य क्षेत्र है। नौकरी, व्यवसाय आदि करना पड़े तो भी घर संभालना उसी के जिम्मे रहता है। परिवार के छोटे-बड़े सदस्य बाहर कम और घर में अधिक समय तक रहते हैं। इस अवसर पर उन्हें तर-तरह की सुविधा एवं व्यवस्था का लाभ महिलाएं ही प्रदान करती हैं और प्रत्यक्ष, परोक्ष प्रभाव डालती हैं। धर्मोपदेश की तरह तो नहीं, पर प्रकारान्तर से वे समूचे परिवार को प्रभावित करती है। यदि उनका स्तर ऊँचा हो तो वे निर्धनता जैसी कठिनाइयों के रहते हुए भी घर को देव मन्दिर जैसा सुरुचिपूर्ण बना सकती हैं। और अपने आन्तरिक सौंदर्य से घर के हर सदस्य को मुग्ध करके कठपुतली की तरह नचा सकती है। आदतें सुधारना, बदलना और आरम्भ करना वस्तुतः घर की ढलाई भट्टी की सहायता से ही सम्भव हो सकता है। परिवार वह प्रयोगशाला है जिसमें किये गये अनुसंधानों का लाभ समूचे समाज को मिलता है। यह वह नर्सरी है जिसमें उगाये हुए पौधे जहाँ-तहाँ सुरम्य उद्यान बनकर विकसित होते हैं और अपनी सुरम्य हरियाली तथा सुषमा से मनोरम वातावरण उत्पन्न करते हैं।

परिवार संस्था का आरम्भ नारी के गृह प्रवेश के साथ होता है। एकाकी पुरुष दफ्तर में काम करके ओर सराय में सोकर भी गुजर कर सकता है, पर घोंसला बनाने और अण्डे-बच्चों को संभालने की बात नव-वधू के साथ ही जुड़ी आती है। सूक्तिकार की वह उक्ति अक्षरशः सही है जिसमें कहा गया है कि-”न गृह गृह मित्याहु गृहणी गृह मुच्यते” अर्थात् इमारत घर नहीं कहलाती वस्तुतः गृहणी, घरवाली-ही घर है। गृहलक्ष्मी के प्रवेश से ही टूटे पुराने घर झोंपड़े हास-उल्लास से भर जाते हैं और सृजन के बहुमुखी प्रयत्न एक निश्चित दिशा में चल पड़ते हैं। घर का आरम्भ ही नारी नहीं करती वरन् उसका विस्तार, पोषण, विकास भी वही करती है, अब उसमें इतना और

स्नेह छूट जाय तो भी सज्जनों के गुण नहीं पलटते हैं जैसे कमल की डण्डी के टूटने पर भी उसके तन्तु जुड़े ही रहते हैं।

जोड़ना है कि परिवार को सुसंस्कृत, परिष्कृत और समुन्नत बनाने का ईश्वर प्रदत्त उत्तरदायित्व भी वही संभाले। उसका भावनात्मक ढाँचा इस प्रयोजन को भली प्रकार पूरा कर सकने के लिए सर्वथा उपयुक्त बनाया गया है।

इस दिशा में पहला कदम यह होना चाहिए कि गृहलक्ष्मी को- गृहसंचालिका को इस योग्य बनाया जाय कि वह अपनी प्रतिभा को उपयुक्त उत्तरदायित्व निबाहने में सक्षम सिद्ध हो सके। महिला जागरण का उद्देश्य ऐसे इंजीनियर तैयार करना है जो नये समाज का-नया भवन बनाने में अपनी कुशलता सिद्ध कर सकें। नारी जागरण के अन्य प्रयोजन भी हैं, प्रतिफल भी, पर सबसे बड़ी उपलब्धि यही मिलनी है कि उस परिवार संस्था में नव-जीवन भरा जा सकेगा और उस क्षेत्र में उगे हुए नर-रत्न, व्यक्ति और समाज-निर्माण की समस्त समस्याओं का सहज समाधान कर सकेंगे।


वधू को गृहलक्ष्मी बनाया जाय

शास्त्रकारों ने वधू को पति कुल की दासी नहीं साम्राज्ञी कहा है। ऋग्वेद का एक मन्त्र है-

साम्राज्ञी श्वशुरम् भव, साम्राज्ञी श्वश्रूवाँ भव। ननान्दरि सम्राज्ञी भव, सम्राज्ञी अधि देवसु।

अर्थात्-ससुर, सास, ननद, देवर आदि पर शासन कर सकने वाली बनो।

इसी अभिप्राय को व्यक्त करने वाला अथर्ववेद का एक मन्त्र है-

यथा सिन्धुर्न दीनाँ साम्राज्यं सुसवे वृषा। साम्राज्ञोधि श्वसुरेषु सम्राज्ञयेतु देवृषु॥

अर्थात्-अमृत वर्षा करने वाला समुद्र जिस प्रकार नदियों के आश्रित रहता है उसी प्रकार तुम (वधू) पति गृह जाओ और वहाँ साम्राज्ञी बन कर रहो।

साम्राज्ञी बनने का मतलब यहाँ अधिकार जताने, अंकुश लगाने, हुकूमत चलाने या प्रताड़ना देने से नहीं वरन् कर्तव्य और प्रेम के आधार पर अपने सद्गुणों से सब का मन अपने वश में कर लेने से है। अधिकार के शासन में आये दिन विद्रोह खड़े होते रहते हैं और सत्ताधीशों को पदच्युत होते देर नहीं लगती, पर कर्तव्य पालन प्रेम, उदारता सेवा के आधार पर जमाये हुए शासन की नींव बहुत गहरी होती है। शासित स्वेच्छापूर्वक स्नेह बन्धनों में बंधे रहते हैं। उनसे छूटने की इच्छा करना तो दूर पकड़ में तनिक सी शिथिलता आते देख कर भी तिलमिलाने लगते हैं।

यह शासन ऐसा है जिसमें माता के आधिपत्य में रहने से बालक कभी इनकार नहीं करता। प्रताड़ना देने पर भी उसी से लिपटता है और उपेक्षा देख कर उदास हो जाता है। पति और पत्नी के बीच का शासन भी ऐसा ही है वह दासी और मालिक जैसा नहीं वरन् स्वेच्छा समर्पण पर आधारित होता है और उभयपक्षीय चलता है। पत्नी अपने को पति का आश्रित मानती है और पति का मन भी ठीक उसी तरह पत्नी का शासन स्वीकार करता है। इसमें आधिपत्य का आग्रह कोई नहीं करता वरन् दोनों ही एक दूसरे से शासित रहने के कारण एक दूसरे को स्वामी अनुभव करते हैं।

यहाँ भक्त और भगवान जैसी स्थिति होती है। अपने को सर्वतोभावेन ईश्वर के प्रति समर्पित करने वाला अनुभव करता है कि ईश्वर ने अपने को भक्त के लिए समर्पित कर दिया है। मीरा, सूर, नरसी, सुदामा आदि सच्चे भक्तों का सेवकत्व भगवान ने स्वीकार किया था, यह एक तथ्य है। दाम्पत्य जीवन में पत्नी अपने को दासी और पति को स्वामी घोषित करती है। घोषणा से न सही व्यवहार में पति भी ठीक उसी स्तर की मान्यता रखता है। ऐसा ही उभयपक्षीय सघन स्नेह-सौजन्य होने पर मित्रता निभती है और दाम्पत्य जीवन का चरम सुख उपलब्ध होता है।

मात्र पति की ही नहीं उस पूरे परिवार को वधू अपने सद्भाव बन्धनों में बाँध लेती है, ओर बदले में उन सब का सघन सौजन्य प्राप्त करती है। इस स्थिति में दोनों पक्ष एक दूसरे के वशवर्ती बन जाते हैं। वधू संलग्न रहती है। अपने सद्गुणों से सब को मोहित किये रहती है। फलस्वरूप अनायास ही अनपेक्षित शासनसत्ता उसके हाथ में आ जाती है। वह सब को अपनी उंगली के इशारे पर नचाती है। सब उसका कहना मानते हैं। यह सब किसी जादू या अधिकार के आधार पर नहीं वरन् स्नेह सौजन्य भरे सेवा भाव द्वारा संभव होता है। वधू को इसी प्रकार की शासनसत्ता ग्रहण करने और साम्राज्ञी पद की अधिकारिणी बनने के लिए कहा गया है।

ऐसी स्थिति प्राप्त करने के लिए सरस्वती जैसी उदात्त दूरदर्शिता अपनाने की आवश्यकता है। वधू को यही स्तर प्राप्त करने के लिए कहा गया है। अथर्ववेद की एक ऋचा है-

प्रतितिष्ठ विराडसि विष्णुरिदेह सरस्वति।

अर्थात्-हे पत्नी तू सरस्वती बन कर रह और इस घर की प्रतिष्ठा को विकसित कर।

घर की प्रतिष्ठा सुगृहिणी पर निर्भर है इस अभिप्राय को व्यक्त करने वाला शतपथ ब्राह्मण का एक सूत्र है-

गृहाः वै पत्न्ये प्रतिष्ठाः।

अथर्ववेद में पत्नी के स्तर के अनुरूप पूरे परिवार की सुबुद्धि का बढ़ना घटना निर्भर बताया गया है।

“यास्ते राके सुगतयः सुपेशसोयाभिर्दददसि”

ऋचा का भावार्थ यही है।

ससुर घर में रहते हुए वधू अपनी स्थिति एवं अनुभूति को इस प्रकार व्यक्त करती है-

अह केतुरह मूर्धादमुग्रा विवाचनी। भमेदनु क्रतु पतिः सहाना या उपाचरेत्

अर्थात्-मैं इस घर में मस्तक के समान प्रमुख हूँ। मैं अपने पति के विचारों को प्रभावित करती हूँ। मैं उनके साथ विचारों का आदान-प्रदान करती हूँ। वे मुझे मान देते हैं और सहयोग करते हैं। मेरी इच्छानुकूल व्यवहार करते हैं।

इस प्रकार का सर्वोच्च सम्मान का पद और अधिकार पाने के लिए नारी कोई राजकीय या सामाजिक व्यवस्था का सहारा नहीं लेती वरन् अपनी योग्यता, कुशलता, व्यवस्था और दूरदर्शिता जैसे सद्गुणों के आधार पर उस पूरे परिवार की समुचित सेवा साधना करके यह स्नेह ओर सम्मान भरा अनायास ही प्राप्त कर लेती है।

इस स्तर की वधू जिस घर में हो उसके सौभाग्य का सूर्योदय हुआ ही समझना चाहिए। उस घर में स्नेह, सौजन्य का, उल्लास-उत्साह का, समृद्धि, प्रगति का वातावरण बना रहता है। उसमें रहने वाला प्रत्येक व्यक्ति अपने आप को सुखी सन्तुष्ट अनुभव करता है।

ऐसी पत्नी तलाश करने पर कहीं बनी बनाई नहीं मिलती। वह बनाई जाती है। पूर्वजन्मों के कुछ संस्कार लेकर आने वाला नवजात शिशु जिस घर में जन्म लेता है वहाँ के संस्कारों के साथ अपने आपको घुलाता है। पिछले ओर नये संस्कारों के समन्वय से उसका व्यक्तित्व बनता है। ठीक इसी प्रकार पिता के घर से संस्कार लेकर आने वाली वधू ससुराल के वातावरण के साथ अपना समन्वय करती है और उसका नया व्यक्तित्व बनता है। इस नव-निर्माण में पति का सब से अधिक योगदान रहता है। वह पत्नी को पूर्ण विश्वास, आश्वासन, स्नेह एवं सहयोग प्रदान करे तो उसके स्वभाव एवं क्रिया-कलाप को उच्चस्तरीय ढाँचे में ढाल लेता सकता है। पितृ गृह से अच्छे स्वभाव की आई हुई लड़की भी पति गृह के अवाँछनीय वातावरण से खीज कर खिन्न, उदास एवं विद्रोही स्वभाव की बन सकती है। सुगृहिणी कदाचित ही बनी बनाई कहीं किसी को मिलती है। उसे गढ़ना और ढालना पड़ता है, इसके लिए पति को कुशल शिल्पी की भूमिका विशेष रूप से निबाहनी पड़ती है। यों इस प्रयास में सहयोग तो पूरे परिवार का अपेक्षित रहता है।

विवाह के पुण्यपर्व पर पति अपनी पत्नी को विकासोन्मुख स्नेह, सहयोग का आश्वासन देते हुए कहता है-

गृहणामि ते सौभ्गत्वाय हस्तं भया पत्या जरदष्ठिर्द्यथासः। भगोर्यमा सविता पुरन्धिमह्य त्वा दुर्गाह पन्था देवाः।

अर्थात्-भद्रे, इस पुण्य पर्व पर मैं देवताओं की साक्षी में तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लेता हूँ। आजीवन तुम्हारा सहयोगी बनकर रहूँगा। गृहस्थी के संचालन का उत्तरदायित्व तुम्हारे हाथ में सौंपता हूँ।

पति, पत्नी को भार नहीं मानता और न यह अहंकार करता है कि वह उसका पालन-पोषण करेगा। जन्म देने वाला ओर पालन करने वाला तो परमेश्वर है। मनुष्य तो एक दूसरे के साथ कर्तव्य और सहयोग भरा सद्व्यवहार कर सके तो इतना ही उसके लिए बहुत है। पति एक सुयोग्य आत्मा का सहयोग पाकर अपने आपको धन्य मानता है और उस उपलब्धि से

अपने को कृतकृत्य हुआ अनुभव करता है। वह कहता है-

अमोअमास्मि मात्वम् मात्वपास्ययोअहम्। समाहममास्तिम ऋक् त्वं द्योरह पृथ्वीत्वम्।

अर्थात्-तुम मूर्तिमान लक्ष्मी हो। मैं तुम्हारे बिना एकाकी, अपूर्ण और दरिद्र था। भद्रे, अब हमारा सम्मिलित जीवन साम और स्वर की तरह गूँजेगा और धरती तथा आकाश की तरह सुविस्तृत होगा।

ऐसे घनिष्ठ सहयोग का सच्चा आश्वासन ही विवाह की सफलता का आधार बनता है। उसी विश्वास के आधार पर पत्नी के अन्तःकरण की कली खिलती है और सुरभित पुष्प जैसे परिष्कृत व्यक्तित्व में परिणत होती है।

शास्त्रकार का कथन है-

तवेहि विवहाव है सहरेती दधाव है।

अर्थात्-दाम्पत्य जीवन में बंधी हुई आत्माएं कभी एक दूसरे से विलग नहीं।

मतभेद और असन्तोष उत्पन्न करने वाले कारण सहजीवन में आते ही रहते हैं। उन्हें विचार विनिमय से सुलझाया जाय और जो न सुलझ सके उन्हें सहिष्णुता पूर्वक सहन किया जाय? पर यह न सोचा जाय कि किन्हीं छोटे बड़े मतभेदों के कारण एक दूसरे का साथ छोड़ देंगे। दिये हुए विश्वास की रक्षा हर हालत में होनी चाहिए। मित्र के लक्षण ही यह हैं कि गुणों पर ध्यान दें और अवगुणों को सुधारते-सहन करते किसी प्रकार गाड़ी को आगे धकेलता रहे। पूर्ण गुणवान तो केवल परमात्मा है, मनुष्य में कुछ तो त्रुटियाँ रहती हैं। सर्वगुण सम्पन्न होने की अपेक्षा करना और तनिक से दोष को भी सहन न करना ऐसी भूल है जिसके कारण खाई उत्पन्न होती रहती है और दाम्पत्य जीवन निरानन्द बन जाता है।

विवाह की सफलता का आधार आत्मीयता की गहरी पुट ही हो सकती है। जहाँ दो शरीरों में एक आत्मा रहने की भावना होगी, वहाँ एक दूसरे के दोष दुर्गुणों को सुधारते-सहते उस स्नेह सौजन्य को सीचेंगे जिसके सहारे पारस्परिक विश्वास अटल रहता है और ममत्व निरन्तर सघन होता चला जाता है। इन्हीं भावनाओं की निरन्तर अभिवृद्धि के लिए विवाह के समय दोनों मिलकर भगवान से प्रार्थना करते हैं-

ते सन्तु जरदष्टयः सम्प्रियी रोगिष्ण सुमनस्य मानी।

अर्थात्-हम एक दूसरे को अत्यन्त सौंदर्य युक्त देखें। परस्पर भरपूर प्रेम बंधनों से बंधे रहें। हम एक दूसरे का मंगल ही चाहें।

सुगृहिणी किसी परिवार का सबसे बड़ा सौभाग्य है। उसी आधारशिला पर वे भव्य भवन खड़े होते हैं जिनमें निवास करते हुए परिवार का प्रत्येक सदस्य स्वर्गीय आनन्द का अनुभव करता है। वधू मात्र अपने पति की पत्नी ही नहीं होती वरन् वह पुत्रवधू, देवरानी, जिठानी, भावज, चाची आदि भी होती है और समयानुसार उसे मामी, नानी, सास, माता, दादी भी बनना पड़ता है। इन संबन्धों के माध्यम से वह सम्बन्धित अनेक व्यक्तियों को प्रभावित करती है। यह प्रभाव यदि उच्चकोटि का हो तो उसे उन सभी के चरित्र एवं व्यक्तित्वों को सुसंस्कृत बनने का अवसर मिलता। सुगृहिणी का भाव भरा मानसिक स्तर संपर्क क्षेत्र की परिधि में आने वाले हर किसी के व्यक्तित्व को सींचता है। और उसे सुविकसित बनाने के सहज अनुदान देता है।

खीज और खिन्नता ने जिसकी सक्रियता नष्ट की होगी वह गृहणी अपनी गति-विधियों से घर की आर्थिक स्थिति के इस प्रकार संभाले रहती है जिसमें स्वल्प आजीविका रहते हुए भी दरिद्रता का अनुभव न हो। सुरुचिपूर्ण दृष्टिकोण और स्फूर्ति उत्साह के समन्वय से घर की व्यवस्था और सुसज्जा देखने योग्य ही बनी रहती है। बच्चों से लेकर वृद्धों तक उससे सम्मान और सहयोग पाकर कृतकृत्य बने रहते हैं। पति के लिए तो दो शरीरों में दो मस्तिष्क और दो हृदयों की मिली-जुली शक्ति का असीम आनन्द और अनुपम लाभ प्राप्त करने का सौभाग्य मिलता है। पर यह सौभाग्य मिलता उन्हीं को है जो वधू को समुचित स्नेह, सम्मान एवं सहयोग देकर उसका हृदय जीतते हैं और उस स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं जहाँ पहुँचने पर कोई भी विचारशील लड़की गृहलक्ष्मी सिद्ध हो सकती है। ऐसी सुगृहिणी किसी को बनी बनाई नहीं मिलती वह प्रयत्न पूर्वक बनानी पड़ती है।


सिगरेट जिसने मार्कवाटर्स को कैंसर के द्वार तक पहुँचाया

‘आज मेरी स्थिति बहुत खराब है। ठीक तरह से साँस लेने में भी मुझे कष्ट होता है। पलंग पर से उतर कर शौचालय तक जाना भी मेरे लिए मुश्किल है। ऐसा लगता है कि मेरा समय अब बिलकुल निकट है। मेरे जीवन के श्वाँस शीघ्र ही पूरे होने वाले हैं। ईश्वर करे मुझ जैसी बुरी दशा आप में से किसी की न हो।’ इन शब्दों में कितनी आन्तरिक वेदना है? कितनी मर्म भेदी पीड़ा है? यह शब्द मृत्यु से एक दिन पूर्व मार्क वाटर्स ने अपने परिवार के सदस्यों, मित्रों तथा परिचितों से कहे थे।

मार्क वाटर्स की विवशता इस कथन से स्पष्ट झलक रही है, पर इस दुर्दशा तक पहुँचाने का श्रेय धूम्रपान की बुरी आदत की है।

मार्क की आयु जब 14 वर्ष से अधिक न थी- वह अपने पिता के कोट की जेब में से सिगरेट निकाल कर पीने लगा था। वह सोचता जब मेरे पिताजी अपने परिश्रम की गाढ़ी कमाई इस व्यसन पर खर्च करते हैं तब तो सिगरेट जरूर कोई अच्छी चीज होगी और उसने छिपे कश लगाने शुरू कर दिये।

सिगरेट पीने से प्रारम्भ में मार्क के हृदय में जलन होती थी, पर निरन्तर पीते रहने से इस कष्ट का अनुभव बाद को नहीं हुआ। पिता की आर्थिक स्थिति बिगड़ने लगी। सारे खर्चों में वह कटौती करने लगे। सिगरेट पीना कम कर दिया और अब कोट की जेब में सिगरेटें गिन कर रखी जाने लगीं। ऐसी स्थिति में सिगरेट चुराना बड़ा कठिन कार्य था। अतः वह अपने एक मित्र के साथ सड़क पर पड़ी हुई झूठी सिगरेटों को बीनकर एकत्रित करने लगा। उन सिगरेटों की तम्बाकू निकाल ली जाती और पतले कागज में उसे भरकर अपने हाथ से सिगरेट बनाई जाती।

संयोग से शिक्षा समाप्ति के बाद मार्क की नौकरी सिगरेट की कम्पनी में लगी। अब वह सिगरेट के और अधिक समीप आ गया था। यहाँ उसे किसी बात का डर नहीं था, न कोई देखने वाला था और न कुछ कहने वाला। अतः उसने दिन भर में दो पैकेट सिगरेट फूँकने शुरू कर दिये। इसी बीच उसकी नौकरी नौसेना में लग गई। अब उसके पास पैसा खूब था। ऐसी स्थिति में होना तो यह चाहिए था कि उस पैसे का सदुपयोग होता वह अपने तथा पत्नी के स्वास्थ्य का निर्माण में उसे खर्च करता। दूध, फल आदि पौष्टिक पदार्थों की मात्रा में वृद्धि करता, पर ऐसा न कर उसने दो पैकेट से बढ़ाकर 3 पैकेट सिगरेट पीनी शुरू कर दीं। नौसेना की सेवा से अवकाश प्राप्त कर एक समाचार पत्र में संवाददाता का कार्य करने लगा। वह अकेले ही अनेक घटनास्थलों पर जाता और रात-रात भर समाचार तैयार करता रहता। जाने कितनी सिगरेटों के ठूँठ मेज के नीचे पड़े दिखाई देते।

मार्क अपनी कार द्वारा किसी घटनास्थल को देखने जा रहे थे। रात्रि का समय था। वह स्वयं ही कार ड्राइव कर रहे थे। अचानक उनकी दाँयीं पसलियों में दर्द होने लगा। वह ऐसा अनुभव कर रहे थे-मानो उन्हें कोई सुई चुभा रहा हो। वह जैसे-तैसे अपने निवास पर लौट आये। उतरते समय उनके पैर लड़खड़ाने लगे। पलंग पर लेटे-लेटे उन्होंने एक के बाद दूसरी, दूसरी के बाद तीसरी, चौथी और अनेक सिगरेटें एक साथ पी डालीं। वह अच्छी तरह समझ गये थे कि पसलियों के दर्द का मुख्य कारण धूम्रपान है फिर भी सिगरेट पिये जा रहे थे। मार्क की स्थिति तो उस व्यक्ति की तरह थी जो मृत्यु को जानते हुए, रोज अनेक शव यात्राओं में सम्मिलित होते हुए भी मौत की ओर से बेखबर रहता है।

अधिक सिगरेट पीने से मार्क का स्वास्थ्य खराब होने लगा था। पाचन शक्ति इतनी खराब हो गई कि हर समय खट्टी डकारें आती थीं। फेफड़े कमजोर हो जाने से साँस लेने में कठिनाई अनुभव होती थी। पेट में दर्द होता रहता। कुछ दिनों के बाद सख्त जुकाम हो गया। मुँह से इतनी दुर्गन्ध आने लगी कि कोई पास बैठना पसन्द नहीं करता था।

ऐसी स्थिति में मार्क ने अपने निजी चिकित्सक से परामर्श लिया उन्होंने परीक्षण के बाद एक्सरे कराने की सलाह दी। एक्सरे की रिपोर्ट में डाक्टर ने बताया कि फेफड़े बिल्कुल कमजोर हो गये हैं। इलाज में सैकड़ों रुपया खर्च होने लगा। डाक्टर के परामर्श पर सिगरेट छोड़नी पड़ी और फिर एक भी सिगरेट नहीं छुई। पर प्रकृति अपने नियमों की अवहेलना करने वाले व्यक्तियों को क्षमा कब करती है, आज नहीं तो कुछ दिनों के बाद उसके दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं।

दीर्घ कालीन चिकित्सा के बाद स्वास्थ्य सुधरने लगा। दस पौंड वजन बढ़ गया। इससे मार्क को कुछ आन्तरिक शान्ति भी अनुभव होने लगी। कुछ दिनों के बाद मार्क को फिर उसी प्रकार की तकलीफें अनुभव होने लगीं उन्होंने अपने डाक्टर को घर पर ही बुलवाया। डाक्टर ने मरीज के अच्छी तरह देखने के बाद उनकी पत्नी को अलग ले जाते हुए कहा-”अब मार्क का समय निकट आता जा रहा है। एक वर्ष से अधिक जीवित रहना मुश्किल है। ‘इन्हें फेफड़े का कैंसर हो गया है जो बड़ा प्राण घातक रोग है, इस प्रकार के 100 रोगियों में बड़ी कठिनाई से 5 बच पाते हैं। यदि कोई व्यक्ति बीस वर्षों तक दो पैकेट सिगरेट रोजाना पीता रहे तो उसे कैंसर अवश्य हो जायेगा। कैंसर ही नहीं अनेक रोग उठ खड़े होते हैं। यही स्थिति मिस्टर मार्क की भी है। अतः मुझे अपने प्रयासों में कुछ सफलता मिलेगी इसका भरोसा नहीं होता।”

डाक्टर के चले जाने के बाद उनकी पत्नी सजल नेत्रों से, मौन पास के ही स्टूल पर आकर बैठ गई। मार्क भी चुप था वह क्या कहता। उसका शरीर साथ नहीं दे रहा था। क्या वह सिगरेट पीने से होने वाली हानियों से अपरिचित था? नहीं! नहीं!! वह अच्छी तरह जानता था, पर उसने ध्यान नहीं दिया। और इसकी इस उपेक्षा ने कैंसर के द्वार तक पहुँचाकर मृत्यु को समर्पित कर दिया।

ईश्वर न करे मार्क ने अपने अंतिम जीवन में शारीरिक और आर्थिक दृष्टि से जो तबाही उठाई वह किसी अन्य धूम्रपान करने वाले को भी उठानी पड़े।


तम्बाकू में पाये जाने वाले विषों (kahani)

भारत सरकार द्वारा प्रकाशित एक पत्रिका में तम्बाकू में पाये जाने वाले विषों का दिग्दर्शन कराया है। उसके अनुसार इस दुर्व्यसन की प्रतिक्रिया इस प्रकार है-

(1) निकोटीन-कैंसर उत्पन्न करने वाला। (2) कार्बन मोनोक्साइड-दिल की बीमारी, दमा, अन्धता उत्पन्न करने वाला (3) मार्श-शक्ति हीनता और नपुंसकता उत्पन्न करने वाला। (4) अमोनिया-पाचन शक्ति को मन्द और पित्ताशय को विकृत करने वाला। (5) कोलोडोन-स्नायु दुर्बलता और सिर दर्द उत्पन्न करने वाला। (6) पायरीडिन-अजीर्ण, आँतों में खुश्की। (7) कार्बोनिक एसिड-अनिद्रा, चिड़चिड़ापन, स्मरण शक्ति का ह्रास। (8) परफेरोल-दाँतों को पीले, मैले और कमजोर बनाने वाला। (9) एजालिन तथा सायनोजन-रक्त विकार उत्पन्न करने वाले। (10) फुरफुरल और प्रूसिक एसिड-उदासी, थकान, जड़ता पैदा करने वाले।

उपरोक्त विष प्रधान हैं। इनके अतिरिक्त भी तम्बाकू में अन्य कई विष थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पाये जाते हैं वे खाँसी, तपैदिक, गठिया, रक्त का पतलापन तथा भीतरी अवयवों में अकड़न अथवा सूजन उत्पन्न करते हैं, जिनके कारण उन्हें अपना सामान्य काम निपटाना कठिन हो जाता है।


समय का पालन एक महत्वपूर्ण आदत

समय का पालन एक बहुत बड़ा गुण है। नियत समय पर निर्धारित काम करने की आदत शरीर और मन का सन्तुलन बनाये रहती है और वे अपना काम ठीक तरह करते रहते हैं। इसके विपरीत यदि अस्त-व्यस्त जीवनचर्या रखी जाय, किसी काम का कोई निर्धारित समय न रहे तो इसका प्रभाव शरीर एवं मन की स्वस्थता एवं प्रगति पर बहुत बुरा पड़ता है।

प्राणी का अचेतन मन उसे नियत समय पर नियत काम करने की प्रेरणा देता है और उसके लिए आवश्यक सामर्थ्य भी विभिन्न अवयवों में उत्पन्न करता है। इस प्रकृति व्यवस्था का ठीक प्रकार उपयोग करके शरीर निर्वाह तथा लोक-व्यवहार में हम प्रकृति का अभीष्ट सहयोग प्राप्त कर सकते हैं। नियत समय पर निर्धारित काम करने की व्यवस्थित दिनचर्या अपनाने की आदत बनाकर हम समग्र स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं और हाथ में लिए हुए कामों को सहज ही सफल बना सकते हैं।

कीड़े-मकोड़े और पक्षियों में यह विशेषता पाई जाती है कि वे अपने भीतर की किसी अज्ञात घड़ी के मार्ग-दर्शन से अपनी गतिविधियाँ पूर्णतया व्यवस्थित रखते हैं। फलतः प्रकृति उनके नगण्य से शरीर और मन को अपना जीवनयापन बहुत ही सुविधापूर्वक करते रहने के साधन जुटाये रहती है। यदि ये प्राणी नियमितता की आदत छोड़ दे तो निश्चय ही उनका जीवनयापन नितान्त कठिन बन जायगा।

जीव-जन्तुओं की अपनी आदत के अनुसार विभिन्न समयों पर विभिन्न कार्य नियमित रूप से करते हुए देखा गया है। मुर्गा समय पर बाँग देता है, रात सियार नियत समय पर रोते हैं, पक्षी प्रातःकाल अपने निर्धारित क्रम से चहचहाते हैं, चमगादड़ रात को ही उड़ते हैं, उल्लू और बाज रात में ही अपने शिकार ढूंढ़ते हैं। प्राणियों की अनेकों महत्वपूर्ण आदतें नियत समय पर क्रियान्वित होती हैं।

इसका क्या कारण हो सकता है इस प्रश्न के उत्तर में पिछले दिनों यही कहा जाता रहा है कि यह प्रकृति के परिवर्तन का प्रभाव है। रात और दिन के बदलते हुए प्रभाव प्राणियों पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं और उसकी उत्तेजना से वे नियत समय पर नियत कार्य करने को प्रेरित होते हैं।

यह पिछला समाधान अब अमान्य ठहरा दिया गया है क्योंकि सूर्य की गतिशीलता के कारण उत्पन्न होने वाले प्रभावों से पूरी तरह बचाकर रखने पर भी प्राणी नियत समय पर, नियत कार्य करने के लिए तत्पर रहते देखे जाते हैं। तिलचट्टों को एक कृत्रिम वातावरण में रख गया। जहाँ प्रकाश, अन्धकार, शान्ति, कोलाहल, सर्दी-गर्मी की दृष्टि से सदा एक जैसी स्थिति रहती थी। समय के अन्तर को पहचानने का कोई साधन उस वातावरण में नहीं था। तो भी तिलचट्टों ने नियत समय पर अपनी नियत हरकतें आरम्भ कर दीं।

ऐसे ही वातावरण में चींटियाँ, दीमक, मधुमक्खियाँ तथा दूसरे कीड़ों को रखा गया, पर वे ठीक समयानुसार ही अपने सोने, जागने और काम करने का प्रयत्न उसी समय करते रहे जिस तरह कि सामान्य वातावरण में किया करते थे।

यदि एक मक्खी प्रातः 8 बजे शक्कर चाटने के लिए कुछ समय जाने की अभ्यस्त कराई जाय तो बाद में भी वह ठीक उसी समय बिना मिनट सेकेंडों का अन्तर किये उसी जगह पहुँचती रहेगी।

पिछले पचास वर्षा से वैज्ञानिकों द्वारा इस बात की खोज हो रही है कि प्राणियों के भीतर वह कौन-सी घड़ी है जो उन्हें नियत समय पर नियत कार्य करने के लिए प्रेरित करती है।

उस घड़ी के स्वरूप, कारण और स्थान का तो ठीक पता नहीं चल सका, पर इतना निश्चय अवश्य हो गया है कि प्राणियों की अन्तःचेतना में कोई ऐसी सम्वेदना शक्ति है जो प्रकृति में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी अनायास ही प्राप्त करती रहती है। स्थानीय आवरण डालने से भी उस सम्वेदना शक्ति पर पर्दा नहीं पड़ता। प्राणी समय सम्बन्धी ज्ञान के किसी भी भुलावे के भीतर झाँक कर वस्तुस्थिति की जानकारी प्राप्त कर लेते हैं। उनकी घड़ी नियत समय की जानकारी उन्हें यथावत देती रहती है।

इस घड़ी की दूसरी विशेषता यह है कि अभ्यस्त समय पर नियत कार्य करने की उत्तेजना देती है। इस घड़ी का निर्माण उसकी जन्मजात प्रकृति के सहारे होता है। अतः उन जीवों को इधर-उधर स्थानान्तरित करने पर बदला हुआ समय उन्हें प्रभावित नहीं करता।

प्राणियों की भीतरी घड़ी झुठलाने के लिए अनेक प्रकार के अभिनव प्रयोग किये गये। उन्हें बहुत दिन तक बेहोश रखा गया। शून्य तापमान में जमा दिया गया-एक्सरेज किरणों से मस्तिष्क को अस्त-व्यस्त बनाया गया। इतने पर भी जब वे प्राणी बहुत समय उपरान्त अपनी स्वाभाविक स्थिति में पहुँचे तो उन मध्यवर्ती परिवर्तनों को भुलाकर अपनी पुरानी आदत पर आ गये और उसी समय पर वही कार्य करने लगे जो उन्हें आरम्भ से ही अभ्यास में था।

कैम्ब्रिज विश्व विद्यालय के जीव-शास्त्री डाक्टर हार्कर का अनुमान था कि यह घड़ी सम्भवतः हारमोन ग्रन्थियों से निकलने वाले स्रावों से प्रभावित होती है। अस्तु उन्होंने प्रयोगशाला प्राणियों की हारमोन ग्रन्थियों को अलग करके देखा कि इसका क्या प्रभाव पड़ता है? इन ग्रन्थियों के न रहने से प्राणियों के शरीरों के अन्य प्रकार के नुकसान तो हुए पर समय पालन सम्बन्धी व्यवस्था यथाक्रम चलती रही।

डाक्टर हार्कर अन्ततः इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि शरीर के अनेक शारीरिक, मानसिक अवयव मिलकर अनेक शारीरिक, मानसिक अवयव मिलकर अनेक आदतों का सृजन करते हैं उन्हीं आदतों में समय का ज्ञान और उस समय नियत कार्य करने का उत्साह भी सम्मिलित है। एक उंगली कट जाने पर भी शेष उंगलियाँ मिल-जुलकर हाथ से होने वाले कार्य पूरे करती रहती हैं, ठीक उसी प्रकार कोई एकाध अवयव अशक्त या पृथक हो जाने पर भी शेष अवयवों को मिली भगत से समय पर नियत कार्य होते रहने का क्रम चलता रहता है।

समुद्र तट पर पाये जाने वाले कुछ केकड़े अक्सर अपना रंग बदलते रहते हैं। दिन चढ़ने के साथ-साथ वे गहरे चाकलेटी होते जाते हैं किन्तु दिन ढलने के उपरान्त उनमें हलका पीलापन उभरता दिखाई पड़ता है। इसके अतिरिक्त ज्वार-भाटों में चन्द्रमा के प्रभाव से जो हर रोज 50 मिनट का अन्तर पड़ता जाता है वही अन्तर केकड़ों की त्वचा के रंग में उतार-चढ़ाव के रूप में परिलक्षित होता है। इन केकड़ों को समुद्र तट से हटाकर बहुत दूर पर्वतीय क्षेत्र में रखा गया तो भी उनके रंग परिवर्तन क्रम में तनिक-सा भी अन्तर नहीं दीख पड़ा।

चींटियों की प्रणय केलि नियत निर्धारित मुहूर्त पर होती है। वर्ष में एक दिन ही एक समय ही उनका नियत रहता है। ठीक उसी घड़ी मुहूर्त में वे प्रणय केलि के लिए आतुरता अनुभव करती है और नर-मादाओं की बरातें सज-धजकर इसी उन्मादी प्रयोजन में संलग्न दीखती है। इनका पंचाँग कौन बनाता है, नियत मुहूर्त पर नियत स्वर से नफीरी कौन बजाता है? यह कैसे होता है? यह तथ्य समझ में न आने पर भी उनका निर्धारित क्रिया-कलाप बिना मिनट सेकेंडों के अन्तर के यथावत् चलता रहता है। अंग्रेजी कैलेंडर और हिन्दुस्तानी पंचाँग अपने ग्रह गणित में भूल-चूक करते रहते हैं, पर चींटियों को पंचाँग एवं मुहूर्त इतना सही होता है कि उन्हीं को प्रामाणिक मानकर अब ग्रह-गणित में संशोधन करने की बात सोची जा रही है। कई जाति की मछलियों में भी यही विशेषता पाई जाती है, वे गर्भ धारण करने के लिए नियत समय का ही नहीं नियत स्थान का भी ध्यान रखती है।

मनुष्य यदि इन छोटे प्राणियों से सभ्य पालन की नियमितता सीख सके तो इसमें उसकी भलाई ही भलाई है।


अपनों से अपनी बात

अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों को नव-जीवन उपलब्ध करने की दिशा में अग्रसर होना चाहिए। यह आग्रह और अनुरोध इन पृष्ठों पर विभिन्न प्रकार के तर्कों और तथ्यों के साथ किया जाता रहा है। इस अनवरत आग्रह के पीछे एक ही आकाँक्षा है कि हम सब ऐसा जीवन जीने का लाभ प्राप्त कर सकें जो हर्षोल्लास से, शान्ति और सन्तोष से, प्रसन्नता और प्रफुल्लता से, समृद्धि और प्रगति से भरा-पूरा हो।

मनुष्य जीवन की गरिमा को समझा नहीं जा सका तो उसे सबसे बड़ा दुर्भाग्य कहना चाहिए। सृष्टि के समस्त प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य को जो मिला है, उसे अतुलनीय ही कह सकते हैं। परम प्रभु ने अपने बड़े बेटे को जो उत्तराधिकार सौंपा है, उसका प्रत्येक

हम नव-जीवन उपलब्ध करें-मनुष्य जन्म सार्थक बनाये पक्ष अद्भुत है। सामान्य दृष्टि से तो हम भी पेट और प्रजनन में निरन्तर व्यस्त अगणित समस्याओं से उलझे और संकटों के दल-दल में फंसे नगण्य जीवधारी भर हैं। अन्य प्राणी निर्वाह और सुरक्षा भर की समस्याएं अपने पुरुषार्थ से हल करते और चैन के दिन गुजारते हैं। मनुष्य आन्तरिक उलझनों, महत्वाकाँक्षाओं, मनोविकारों और प्रतिकूल परिस्थितियों से इतना उद्विग्न रहता है कि दिन गुजारने भारी पड़ते हैं। जिन्दगी की लाश बड़ी कठिनाई से ही ढो सकना सम्भव हो पाता है। आश्चर्य होता है कि अन्य प्राणियों की तुलना में इतना अधिक साधन सम्पन्न मनुष्य इस सुअवसर से हर घड़ी उल्लसित रहने की अपेक्षा किस कदर शोक सन्तोष भरे नीरस और निरर्थक दिन गुजरता है।

यह दुर्भाग्य न तो ईश्वर प्रदत्त है और न परिस्थिति जन्य। यदि ऐसा होता तो हर किसी के पल्ले एक जैसी स्थिति बंधी होती। ईश्वर को अपने सभी पुत्र समान रूप से प्रिय हैं। उसने लगभग समान क्षमता और प्रतिभा हर किसी को देकर यह अवसर प्रदान किया है कि विवेक सम्मत दूरदर्शिता अपनाकर स्वयं सुखपूर्वक जिये और अपने संपर्क क्षेत्र पर आनन्द का अमृत बखेरता रहे। परिस्थितियाँ अपने क्रम से सर्दी-गर्मी की तरह चलती रहती हैं। उनसे लाभ या हानि उठाना अपना काम है। विश्व का घटनाक्रम हमारी इच्छानुकूल चले यह सम्भव नहीं। असंख्य प्राणियों की परस्पर विरोधी अगणित इच्छाएं होती हैं। सबको सन्तुष्ट कर सकने वाला परिस्थिति प्रवाह बन सकना किस प्रकार शक्य हो सकता है। आँधी और वर्षा अपने समय पर आती ही है। उनसे बचाव करना एवं लाभ उठाना अपनी बुद्धिमत्ता पर निर्भर है। मानव जीवन में पग-पग पर मिल सकने वाली प्रसन्नता, आशा, सफलता और तृप्ति के स्थान पर यदि उद्विग्नता, खिन्नता एवं निराशा हाथ लग रही हो, समझना चाहिए कहीं कोई भारी चूक हो रही है।

जीवन को नीरस और निरर्थक बना देने वाली चूक को अध्यात्म भाषा में अविद्या या माया कहा गया है। जिन्दगी किस दृष्टिकोण के साथ जियी जानी चाहिए-उसकी गतिविधियों का निर्धारण किस रीति-नीति से किया जाना चाहिए-आमतौर से हम सब इसी स्थान पर भूल करते हैं। फलतः उलझन भरी पगडंडियों में भटकते हुए ऐसे जाल-जंजाल में फंस जाते हैं, जिसमें कुढ़न और जलन के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। यदि इस चूक को सुधार लिया जाय तो हर स्थिति में प्रफुल्लित रहा जा सकता है और प्रगति का क्रम अनवरत गति से आगे बढ़ सकता है। बाह्य प्रतिकूलताएं उसमें बहुत अधिक बाधा नहीं पहुँचा सकतीं। अभाव और अवरोध कुछ झकझोरते तो हैं, पर उनमें इतनी सामर्थ्य नहीं कि मनुष्य जैसी प्रचण्ड सत्ता के जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के मार्ग को अवरुद्ध कर सकें।

अखण्ड-ज्योति अपने परिजनों को नव-जीवन उपलब्ध करने के लिए जब आग्रह करती है तो उसका तात्पर्य इतना भर होता है कि चिन्तन और कर्तृत्व में समाई हुई अवाँछनीयता को पहचानने का प्रयत्न किया जाय और उसे उखाड़ फेंकने के लिए साहस जुटाया जाय। अनुपयुक्त को अपने भीतर से ढूंढ़-ढूंढ़कर बाहर हटाते चलने और उस स्थान पर सत्प्रवृत्तियों का प्रतिष्ठित करने के लिए जिस शौर्य, साहस की आवश्यकता पड़ती है, अध्यात्म भाषा में उसी का नाम आत्मबल एवं ब्रह्मवर्चस् है। योग और तप की साधना इसी प्राप्ति के लिए की जाती है। जिसे जितनी मात्रा में यह दिव्य वरदान मिलता जाता है, वह अन्तरंग विभूतियों और बहिरंग सम्पत्तियों से उसी अनुपात में सुसम्पन्न बनता जाता है। ऋद्धि और सिद्धि उन्हीं आत्मिक और भौतिक सफलताओं का नाम है। एक को दुर्भाग्यग्रस्त और दूसरे को सौभाग्यशाली हम देखते हैं तो शारीरिक संरचना एवं ईश्वरीय अनुग्रह में कोई भेदभाव उसका कारण नहीं होता; इन उपलब्धियों में तो लगभग सभी लोग समान हैं। मनुष्य-मनुष्य के बीच पाये जाने वाले अन्तर में उनकी मनःस्थिति ही मुख्य कारण होती है। परिस्थिति तो मनःस्थिति की प्रतिक्रिया मात्र है।

साधनों की न्यूनाधिकता हो सकती है-शारीरिक क्षमता में भी थोड़ा अन्तर रह सकता है, पर आत्मसत्ता का ईश्वरीय अंश सब में समान है। इस परम ज्योति की स्वाभाविक पवित्रता और दिव्यता पर मलीनता का परत न चढ़ने दिया जाय तो मात्र आन्तरिक सुसम्पन्नता के आधार पर हर दृष्टि से सफल कहा जा सकने योग्य जीवन जिया जा सकता है। भौतिक सुविधाएं भौतिक प्रगति में सहायक होती हैं, पर आत्मिक सम्पत्ति की दृष्टि से प्रत्येक मनुष्य परिपूर्ण है। कठिनाई एक ही है कि चिन्तन की निकृष्टता और कर्तृत्व की भ्रष्टता के कारण अन्तःकरण कलुष-कषायों से लद जाता है और फिर भूल−भुलैया में-कंटकाकीर्ण कुपंथ में भटकने के कारण पग-पग पर ठोकरें खानी पड़ती हैं और चुभन सहनी पड़ती हैं।

जन-समाज का प्रचलित ढर्रा अपनाने का अन्धानुकरण बड़े घाटे का सौदा सिद्ध होता है। कोई समय था जब जन-समाज आदर्शवादी रीति-नीति अपनाकर सतयुगी वातावरण का सृजन करता था और तज्जनित स्वर्गीय आनन्द का लाभ हर किसी को मिलता था। तब भूदेवों और नर-नारायणों से यह धरती पटी रहती थी। जहाँ आन्तरिक विभूतियाँ होंगी वहाँ भौतिक सम्पत्तियाँ सहज ही प्रकाश के साथ रहने वाली छाया की तरह पीछे फिरेंगी। अपना भूतकालीन इतिहास साक्षी है कि मनुष्य अपनी गतिविधियों का उचित निर्धारण करके इसी धरती पर-इसी जीवन में संतोष और सम्मान भरा जीवन जी सकता है। आत्म-कल्याण के साथ-साथ अन्य असंख्यों को ऊँचा उठाने में योगदान कर सकता है। भटकाव, भ्रष्टता उत्पन्न करते हैं। भ्रष्टता, दुष्टता में परिणत होती है और विपत्तियों के पर्वत स्वेच्छापूर्वक अपने सिर पर लाद लाती है।

आज का सामाजिक प्रचलन विचित्र है। उसमें आदर्शवाद की मात्रा निरन्तर घटती और व्यक्तिवादी स्वार्थपरता बेहिसाब बढ़ती जा रही है। अब ऐसे आदर्श व्यक्ति और घटनाक्रम बहुत ही स्वल्प मात्रा में दीख पड़ते हैं, जिनकी रीति-नीति का अनुकरण करते हुए परिष्कृत जीवन जिया जा सके। जिधर में नजर पसार कर देखा जाय क्या अपने क्या बिराने उसी विचित्र रीति-नीति को अपनाये हुए मिलेंगे, जिनमें वासना, तृष्णा और अहंकारिता जैसे निकृष्ट तत्व ही लक्ष्य बनकर रह रहे हैं। लिप्सा की ललक ने लोगों की आँखें चौंधिया दी हैं, उन्हें तत्काल के आकर्षण ही प्रभावित करते हैं। दूरगामी परिणामों को सोच सकने की क्षमता ही समाप्त होती जा रही है, ऐसी दशा में तथाकथित सम्पन्नता तो दीखती है, पर साथ ही आन्तरिक खोखलापन और भी अधिक बढ़ा-चढ़ा रहता है। आज का समाज ऐसे ही लोगों से भरा है। वे स्वयं जल रहे हैं। उनका अनुकरण करने वालों की भी वैसी ही दुर्गति हो सकती है।

तथाकथित सम्पन्न और सफल लोगों का अनुकरण करके अधिक से अधिक इतना हो सकता है कि बाह्य आवरण का ढकोसला उन्हीं के जैसे अपनी गरदन पर भी लटक जाय, पर साथ ही यह भी निश्चित है कि उद्विग्नता की मात्रा भी उतनी ही लद जायगी। इस प्रगति से बिना प्रगति का निर्वाह मात्र तक सीमित जीवनचक्र कहीं अच्छा है। उन्नति तो भरपूर की जाय, पर आदर्श को गंवाकर नहीं।

नव-जीवन की दिशा में अग्रसर होने के लिए हमें उन लोगों का अनुकरण करने से मुँह मोड़ना पड़ेगा जो जीवन का स्वरूप लक्ष्य और उपयोग समझने में असमर्थ हैं और जो सम्पदा की मृग-तृष्णा में आत्मघाती गतिविधियाँ अपनाने पर उतारू हो रहे हैं। अन्धी भेड़ स्वयं गड्ढे में गिरती है और उसके पीछे चलने वाले झुण्ड की भी वैसी ही दुर्गति होती है। मानवोचित जीवन जीने और उनके सत्परिणाम उपलब्ध करने के लिए हमें लोगों के अनुकरण से लगभग सर्वथा भिन्न स्तर अपनाना पड़ेगा और अपनी रीति-नीति का निर्धारण करते समय आदर्शवादी परम्परा को ही महत्व देना होगा। इसके लिए स्वतन्त्र चिन्तन अपनाये जाने की आवश्यकता है। जीवन नीति निर्धारण के सम्बन्ध में अपना दृष्टिकोण क्या हो? क्रिया-कलाप किस दिशा में गतिशील हों? इन दो प्रश्नों पर मौलिक रूप से सोचना होगा और अपनी रीति-नीति ऐसे परिष्कृत चिन्तन के आधार पर निर्धारित करनी होगी जो मानव जीवन को सार्थक बनाने की मूलभूत समस्या का विवेकपूर्ण समाधान प्रस्तुत करती हो।

नव-जीवन का सूत्रपात इससे कम में नहीं हो सकता। आत्मिक प्रगति का यह प्रथम चरण है। जो जीवन के स्वरूप और सदुपयोग के प्रश्न पर गम्भीरतापूर्वक चिन्तन नहीं कर सकता, जिसे लोगों का अनुकरण करने में ही सन्तोष मिल जाता है, उसे सड़ी जिन्दगी ही जीनी पड़ेगी। विवेक का अनुरोध है कि आज की स्थिति में प्रत्येक जागृत आत्मा को जीवन समस्या पर नये सिरे से विचार करना चाहिए और (1) आत्मा (2) परमात्मा (3) आदर्शवादी परम्परा के तीन सलाहकारों से पूछकर नीति निर्धारण का साहस जुटाना चाहिए। लाख लोग एक पलड़े पर और उपरोक्त तीन परामर्शदाता दूसरे पलड़े पर रखे जायं तो इन तीन का परामर्श ही अधिक श्रेयस्कर सिद्ध होगा।

शरीर रक्षा, आजीविका उपार्जन, परिवार निर्वाह जैसे कार्यों में श्रम करना एवं समय लगाना उचित है। यह साँसारिक उत्तरदायित्व ऐसे हैं जिनका निर्वाह किये बिना गति नहीं। हर व्यक्ति को रोटी कमाने के लिए श्रम करना पड़ता है और करना चाहिए। परिवार के कई सदस्य ऐसे होते हैं-जिनके भरण-पोषण एवं विकास के लिए कमाऊ एवं बुद्धिमान लोगों की सहायता आवश्यक होती है उनके लिए अपने कर्तव्यों का पालन जागरूगतापूर्वक किया जाना चाहिए। परिवार के जो सदस्य उपार्जन की दृष्टि से स्वावलम्बी हो चुके उनके लिए सद्भाव एवं सत्परामर्श देते रहना भर पर्याप्त है। उपार्जन उनके लिए किया जाना चाहिए जो अभी स्वावलम्बी नहीं बने हैं और जिनके विकास के लिए कोई स्थिर आजीविका का प्रबन्ध नहीं है। परिवार पालन में साधनों के अतिरिक्त सबसे बड़ी आवश्यकता संस्कार विवेक एवं चरित्र देने की होती है। यह अनुदान तो आजीवन घर और बाहर के छोटे-बड़े हर सम्बद्ध व्यक्ति को देते ही रहना चाहिए। उपार्जन उन्हीं के लिए करना चाहिए जो अशक्त हैं। परिवार के सदस्य जैसे-जैसे उपार्जन की दृष्टि से स्वावलम्बी बनते जाते हैं वैसे-वैसे अभिभावकों की आर्थिक जिम्मेदारी सहज ही समाप्त हो जाती है।

धन उपार्जन और संतानोत्पादन यह दो आकर्षण इतने बड़े हैं कि मनुष्य का चिन्तन, समय, श्रम, ज्ञान, कौशल सब कुछ इन दो के इर्द-गिर्द ही मंडराता रहता है। व्यक्तित्व प्रायः कोल्हू का बैल बनकर इसी प्रयोजन में चक्कर काटता रहता है। कहते हैं कि तेल तिल में से निकलता है, पर जीवन का सारा रस जिस कोल्हू में पिलकर बूँद-बूँद निचुड़ जाता है, उन्हें लोभ और मोह के दो दबाव आधार ही कह सकते हैं। पैसा आवश्यक भी है और उपयोगी भी, पर शर्त एक ही है कि उसे विलासिता एवं जमाखोरी के लिए न रखा जाय। उसको उद्देश्यपूर्ण कार्यों में व्यय किया जाय। धन सौ हाथों से खर्च करते रहने की पूर्व तैयारी कर लेनी चाहिए। ठाट-बाट बढ़ाने के लिए, औलाद को मुफ्त की कमाई खाते रहने के लिए विलासी अपव्यय में उड़ाने के लिए कमाये गये पैसे में लगाया हुआ श्रम एवं कौशल न केवल व्यर्थ चला जाता है वरन् अनेकों दुष्परिणाम भी उत्पन्न करता है।

काम की आवश्यकता का जहाँ उच्चस्तरीय वर्णन है वहाँ उसे हँसने-हँसाने, विनोद क्रीड़ा, भाव सम्वेदना, उल्लास की कलाकारिता मात्र बताया गया है। यह आर्ष काम उपयोगी भी है और उत्साह वर्धक भी। यौनाचार पर इस वृत्ति को केन्द्रित कर देना उसका निकृष्टतम रूप हैं दाम्पत्य-जीवन में परस्पर सहयोग, स्नेह, सद्भाव के अनेक आधार है। यौनाचार का इस सहकारिता में न्यूनतम स्थान रहना चाहिए। इस दिशा में अधिक उत्साह का रहना अपने और अपने साथी के स्वास्थ्य की सुनिश्चित बर्बादी है। पति-पत्नी का सहयोग प्रगतिशील होना चाहिए, संयुक्त बर्बादी का संयुक्त सहयोग अवाँछनीय है। उच्च स्तरीय सहयोग के लिए निकृष्ट धरातल से ऊँचा ही उठना चाहिए। फिर संतानोत्पत्ति के सम्बन्ध में तो फूँक-फूँककर ही पैर रखना चाहिए। जनसंख्या की अवाँछनीय वृद्धि समूची मनुष्य जाति के विनाश का सर्व प्रधान संकट बनने जा रही है। अनचाहे अतिथियों को आमंत्रित करने की अपेक्षा यही अच्छा है कि जरूरत मंद वर्तमान संबंधियों की ही सहायता की जाय। जितना धन, समय, श्रम, संतान पर खर्च किया जाता है, उस बचाकर ऐसे कामों में लगाया जा सकता है, जिनसे आत्म-कल्याण और समाज कल्याण के महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं। इस उत्पादन के कौशल को अन्य ऐसे उपार्जनों में लगाया जाना चाहिए जिनकी अपने लिए और समाज के लिए आवश्यकता है।

गुण, कर्म, स्वभाव में उच्चस्तरीय तत्वों का समावेश करना नव-जीवन की दिशा में बढ़ने का द्वितीय चरण है। इसके लिए आत्म-चिन्तन की दैनिक आवश्यकता रहती है। दैनिक कार्यक्रम में शारीरिक और मानसिक गतिविधियों में आवश्यक उलट-फेर करना होता है। अपने आप से लड़ना और अपने आपको प्रशिक्षित करना, इस दुहरी कर्मनिष्ठा का नाम ही शास्त्रकारों ने योग और तप बताया है। इसके लिए अनेकानेक उपासनात्मक कर्मकाण्ड बताये हैं। ईश्वर भक्ति का प्रमुख प्रयोजन यही है। व्यक्तित्व का सर्वतोमुखी परिष्कार ही जीवन लक्ष्य है। अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ने के लिए इसी संशोधन और परिष्कार के मार्ग पर चलना पड़ता है। सद्भावनाएं और सत्प्रवृत्तियाँ ही व्यक्तित्व में देवत्व का समावेश होता चलेगा। उसी विकास क्रम से आन्तरिक महानता एवं भौतिक सफलता का पथ-प्रशस्त होता चला जायेगा।

सद्भावनाएं एवं सत्प्रवृत्तियाँ व्यक्तित्व के कल्पवृक्ष को खाद, पानी की तरह सींचने, बढ़ाने का काम करती हैं। पर वे केवल पढ़ने, सोचने तक सीमित नहीं हैं। इसके लिए कुछ सक्रिय उपचार करने पड़ते हैं। परमार्थ इन्हीं का नाम है। आत्मीयता का विकास, विस्तार करने के लिए आवश्यक है कि दूसरों के दुःखों को बँटाने और अपने सुखों को बाँटने की उदारता दिखाई जाय। संकीर्ण सीमा तक जब तक ‘अहम्’ अवरुद्ध रहेगा तब तक दैवी सम्पदाओं का जीवन में प्रवेश सम्भव न होगा। कृपणता और लिप्सा ही अनेकानेक पाप, अनाचारों को जन्म देती है। उदार व्यक्ति धन की दृष्टि से अभावग्रस्त रहने पर भी अपने समय, श्रम, मनोयोग, प्रभाव, परामर्श, स्नेह, सहयोग से दूसरों की सहायता करता रह सकता है। इससे संव्याप्त पीड़ा और पतन के निराकरण में बड़ी सहायता मिलती है। दूसरों की अपेक्षा स्वयं के लिए उदार व्यक्ति और भी अधिक सन्तोष सम्मान के बहुमूल्य उपहार प्राप्त करता है।इन तथ्यों पर ध्यान दिया जा सके तो हर व्यक्ति को महामानवों के महान् पथ पर चल पड़ने का अवसर मिल सकता है और एक-एक कदम बढ़ाते हुए जीवन लक्ष्य की पूर्णता तक पहुंचा जा सकता है। करने के लिए बहुत कुछ शेष है। शरीर रक्षा और कुटुम्ब पोषण भी आवश्यक है, पर उससे आगे और कुछ न किया जाय तो भी एक भारी अभाव बना रहेगा और उस कमी के कारण अन्तरात्मा में सदा ही कसक उठती रहेगी। भजन भी उपयोगी है, पर उस अकेले के बल-बूते किसी को शान्ति नहीं मिल सकती। ईश्वर अपना भजन कराने की नहीं मनुष्य से उच्चस्तरीय जीवनयापन की अपेक्षा करता है। उसे मात्र पूजा-पाठ अथवा उसी स्तर के अन्य कर्मकांडों से रिझाया नहीं जा सकता है। मनुष्य जीवन आदर्शवादी रीति-नीति अपनाकर सब के कल्याण के लिए मिला है। इस बहुमूल्य सम्पत्ति का उपयोग लक्ष्य की प्राप्ति के लिए भी किया जाना चाहिए। पेट और प्रजनन भर तक सीमित जीवनचर्या अपनाये रहने में मनुष्य जन्म की सार्थकता नहीं है।

जिस प्रकार व्यापार, व्यवहार की अनेकानेक समस्याओं पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाता है और दूरगामी परिणामों पर विचार करते हुए समाधान निकाला जाता है उसी प्रकार जीवन के स्वरूप, लक्ष्य और सदुपयोग के प्रश्न को सर्वोपरि समस्या मानकर उसका उपयुक्त समाधान खोजा जाना चाहिए। इस संदर्भ में गहराई तक उतरने पर दो ही उपाय सूझते हैं, अपनी अन्तरंग और बहिरंग गतिविधियों में उत्कृष्टता की मात्रा का अधिकाधिक समावेश किया जाय। प्रस्तुत दोष, दुर्गुणों से जूझा जाय, दृष्टिकोण को विवेक और दूरदर्शिता युक्त बनाया जाय। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से चिन्तन और कर्त्तव्य को संजोया जाय। इसके लिए अपने आपको नये सिरे से सुधारा और सजाना पड़ता है। बहुत कुछ भूलना और बहुत कुछ अपनाना पड़ता है इस दुहरे मोर्चे पर धैर्य और साहसपूर्वक अनवरत प्रयास करते रहने का नाम ही साधना है। जीवन-साधना ही वस्तुतः योग, तप, धर्म और अध्यात्म का केन्द्रबिंदु है। जीवन परिष्कार और आत्म साक्षात्कार में शब्दों का ही अन्तर है। उच्च स्तरीय रीति-नीति अपनाकर ही आत्मा की गति परमात्मा के समीप पहुँचने के लिए तीव्र हो सकती है।

नव-जीवन प्राप्त करने के लिए आत्म-परिष्कार के अतिरिक्त दूसरा चरण है-उदार व्यवहार। हमारी आकांक्षाएं संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अपना और अपने घर वालों का पेट पालते रहना आवश्यक तो है, पर उससे आगे कुछ सोचने की कुछ आवश्यकता ही न समझी जाय तो भी अनर्थ ही प्रस्तुत होगा। लोभ और मोह के कोल्हू में जुते रहने रहने भर से काम नहीं चलेगा। देश, धर्म, समाज और संस्कृति के प्रति अपने कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों का भी विचार किया जाना चाहिए। सच तो यह है कि आज की विषम परिस्थितियों में व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं को - लिप्सा, तृष्णा को कुछ समय के लिए एक कोने में उठाकर रख देना चाहिए और आपत्ति धर्म-पालन करते हुए लोक-निर्माण के लिए अपनी तत्परता नियोजित करनी चाहिए।

लोक-मानस का परिष्कार अपने युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। समुन्नत दृष्टिकोण के अभाव में प्रतिभाशाली और साधन सम्पन्न भी मात्र विनाश लीला रचने में लगे रहते हैं जबकि उत्कृष्ट चिन्तन बना रहने पर अभावग्रस्त व्यक्ति भी अपने कर्त्तव्य को महामानवों जैसा प्रस्तुत करता है। व्यक्ति और समाज के सामने आज अगणित शोक-सन्ताप खड़े हैं- गुत्थियां और समस्याएं हल होने में नहीं आतीं-कठिनाइयाँ और विपत्तियाँ बढ़ती ही जाती हैं। न बाहर चैन है और न भीतर सन्तोष। इस सद्भाव दुर्भिक्ष से निपटने के लिए हमें युद्ध स्तर प्रयत्न करने चाहिए।

यह सब जीवन-क्रम में उदारता का समुचित समावेश करने से ही सम्भव हो सकता है। स्वार्थ पर अंकुश लगाये बिना परमार्थ के लिए न साधन बनेंगे न समय निकलेगा। चिन्तन में समाविष्ट उदारता व्यस्त मनुष्य से भी परमार्थ प्रयोजनों के लिए ढेरों अवकाश निकलवा लेती है और साधन रहित दीखने वाला भी आश्चर्यचकित कर देने वाली श्रद्धाँजलियाँ प्रस्तुत कर सकता है। बड़प्पन की तृष्णा में जितनी घटोत्तरी होगी महानता उसी अनुपात से बढ़ती चली जायेगी।

हमें कृमि-कीटकों जैसा पेट और प्रजनन पर समर्पित घटिया जीवन नहीं जीना चाहिए। उत्कृष्टता और आदर्शवादिता को अपनाते हुए नव-जीवन प्राप्त करने के लिए अग्रसर होना चाहिए इसी में मनुष्य जन्म की सार्थकता है।


मानव नहीं देवता है जो.....

बाबूलाल जैन ‘जलज’


मानव नहीं देवता है जो (kavita)

सुर-दुर्लभ मानव तन पाकर, जो प्रभु के गुण गाये। सत्य-सरोवर में जिसका मन, शतदल सा खिल जाये।।

सुनकर करुण पुकार दीन की, तुरत दौड़कर जाते। अपनी बांहों को फैलाकर, हंसकर गले लगाते।।

पर सेवा जीवन-सुख समझे, आत्म-धर्म पहिचाने। मानव नहीं देवता है जो, पीर पराई जाने।।

जो विशाल वट-तरु सा सबको, शरण प्रेम से देता। बदले में पर कभी किसी से, कुछ न जन्म भर लेता।।

जो न रौंदता निज पापों से, पथ में बिखरे शूलों को। जो फैलाता अखिल-विश्व में, आत्म-ज्ञान के फूलों को।।

जिसे सुहाते नहीं जन्म भर, भौतिकवादी गाने। मानव नहीं देवता है जो, पीर पराई जाने।।

जिसका है विश्वास अलौकिक, अपने आप कमाई। जिसे सहचरी लगती, अपने जीवन की कठिनाई।।

कथनी के बदले करनी में, जिसे आत्म-सुख होता। सुनकर व्यथा-कथा दुखियों की, जो न चैन से सोता।।

जो न दुखाता हृदय किसी का, नहीं मारता ताने। मानव नहीं देवता है जो, पीर पराई जाने।।

जिसका अन्तःकरण न सोता, देह भले सो जाये। मिथ्या माया-जाल बिछाकर, कभी न मन भरमाये।।

लाभ-लोभ की कठिन ग्रन्थियों, जो न कभी भी पालें। सदाचार की लहरों में जो, लें उत्ताल उछालें।।

कर देता जो प्राण निछावर, विश्व-शान्ति-सुख पाने। मानव नहीं देवता है जो, पीर पराई जाने।।

*समाप्त*