संग्रह का अर्थ है कल पर अविश्वास, ईश्वर पर अश्रद्धा और भविष्य की अवज्ञा। जब पिछले कल हमें जीवित रहने के लिए जितना आवश्यक था, उतना मिल गया तो कल न मिलेगा; इसका कोई कारण नहीं। यदि जीवन सत्य है तो यह भी सत्य है कि जीवनोपयोगी पदार्थ अन्तिम साँस चलने तक मिलते रहेंगे। नियति ने उसकी उचित व्यवस्था पहले से ही कर रखी है। तृष्णा ऐसी ही अक्लमंदी है जो निर्वाह के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध रहने पर भी निरन्तर अतृप्तिजन्य उद्विग्नता में जलाती रहती है।
जिन्हें ईश्वर की उदारता पर विश्वास है वे उदार बनकर जीते हैं। बादलों का कोष चुका नहीं वे बार−बार खाली होते हैं, पर फिर भर जाते हैं। नदियाँ उदारता पूर्वक देती है और यह विश्वास करती है कि उनका प्रवाह चलता रहेगा। अक्षय जल स्रोत उनकी पूर्ति करते रहेंगे। वृक्ष प्रसन्नतापूर्वक देते हैं और सोचते हैं कि वे ठूँठ नहीं रह सकते। नियति का चक्र उन्हें हरा−भरा रखने की व्यवस्था करता ही रहेगा। कृपणता, संकीर्ण−चिन्तन का ही नाम है। ऐसे व्यक्ति कुछ संग्रह तो कर सकते हैं, पर साथ ही बढ़ती हुई तृष्णा के कारण उस सुख से वंचित ही रहते हैं जो उदार रहने पर उन्हें अनवरत रूप से मिलता रह सकता था।
खिलते हुए पुष्प हवा की झोली में अपना सौरभ भरते हैं−गायें दूध देने के बदले कोई प्रतिपादन नहीं माँगती। कैसा अच्छा होता कि उदारता को जीवित रखकर हम हँसते और हँसाते हुए जीवन के दिन पूरे करते।
मनुष्य की आन्तरिक शक्ति यों में विचार शक्ति का महत्वपूर्ण स्थान है। यह शक्ति मनुष्य में नवजीवन एवं सत् प्रेरणा का संचार करती है। विचार शून्य व्यक्ति मृत के सदृश हो जाता है। उसकी चेतनता समाप्त हो जाती है। विचार मनुष्य का प्राण है। जीवन दायिनी शक्ति है। विचारों से ही मनुष्य का व्यक्ति त्व मुखरित होता है।
जितने भी मनुष्यों ने महानता प्राप्त की है। उनके मन में उच्च आदर्शों की ओर बढ़ने की तीव्र इच्छा थी। उन्होंने समाज में श्रेष्ठ आदर्शों की स्थापना हेतु अपने विचारों को समेट कर एक ही दिशा में नियोजित किया और सफलता उपलब्ध की। हम भी उन्नतिशील जीवन की पुस्तकें पढ़ें। ज्ञानार्जन के द्वारा अपने विचारों का परिष्कार करें। परिष्कृत विचारों में जीवन को बदल देने वाली अमोघ शक्ति सूक्ष्म रूप में छुपी रहती है।
विचार परिवर्तन से मनुष्य लघु से विभु बन जाता है। विचारों में बड़ा जादू है। वह हमें उठा सकते हैं और गिरा भी देते हैं। दुःख एवं निराशा के घातक विचार मन में फटकने न दें। केवल हितकर विचारों को ही मन में रखें। आशा जनक विचारों में अद्भुत शक्ति होती है। आप अपने मन में यह विचार कर लीजिए कि “आपका भविष्य उज्ज्वल ही होगा” तो आप देखेंगे कि खुशहाली आपके पास फुदकती रहेगी और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उसका विलक्षण प्रभाव पड़ेगा।
मनुष्य के विचारों में ही सुख−दुख, नरक−स्वर्ग, अच्छा−बुरा आदि सब का निवास होता है। जिधर अपने विचारों को व्यक्ति मोड़ दे देता है वैसी ही प्रतिच्छाया उसे अपने आसपास के वातावरण में दिखाई देने लगती है। उसका कारण मनुष्य के अन्दर ही होता है बाहर नहीं। संसार में जो शान्ति और सुख आपको परिलक्षित होता है, वह हमारी अन्दर की सुख−शान्ति है। यदि संसार में हमें अशान्ति और दुःख जान पड़ता है तो कारण स्पष्ट है कि हमारा मन अशान्त और दुःख के विचारों का शिकार है। सुख दुःख और कुछ नहीं, मनुष्य के अन्दर उठने वाले विचारों की प्रतिक्रिया का फल होता है। हरा चश्मा लगाने से हमें सब जगह हरा−भरा दीखने लगता है। बसे ही व्यक्ति के अन्दर जिस तरह के विचारों का बाहुल्य है वैसा ही वह सब जगह देखेगा।
दृश्य और अदृश्य का ज्ञान विचारों से होता है। संसार में अच्छा या बुरा जो कुछ भी है। वह विचारों की ही देन है। संसार का वास्तविक ज्ञान उत्पन्न करने के लिए विचार शक्ति चाहिए और सुखी, सभ्य सुसंस्कृत समाज के लिए श्रेष्ठ विचार चाहिए। पानी के बुलबुलों की तरह प्रतिक्षण विचार मनुष्य के मस्तिष्क में उठते रहते हैं। प्रश्न उठता है कि क्या यही विचार मनुष्य जीवन की दिशा बदल सकते हैं? नहीं वरन् महान् उद्देश्य के लिए उत्पन्न हुए स्थिर एवं दृढ़ विचार ही अनुपम शक्ति सम्पन्न होते हैं। उनसे ही मनुष्य को नयी स्फूर्ति एवं नयी दिशा मिलती हैं।
एक विचारवान व्यक्ति हजारों−लाखों व्यक्ति यों का मार्ग दर्शन कर सकता है। साधन−हीन होते हुए भी विचार की सम्पदा से सम्पन्न व्यक्ति उन्नति एवं प्रगति करता रह सकता है। मनुष्य सोचता है कि व्यावहारिक जीवन में धन की आवश्यकता होती है। इससे मनुष्य खुश रह सकता है किन्तु धन होते हुए भी व्यक्ति के विचार विकृत हैं तो वह सुखी नहीं रह सकता है। सुख एवं शान्ति की चाह हो तो श्रेष्ठ विचारों की पूँजी अपने पास एकत्रित करनी चाहिए। सुख शान्ति न तो संसार की किसी वस्तु में है न व्यक्ति में उसका निवास तो मनुष्य के अन्तःकरण में है धन−दौलत से हम क्षणिक सुख प्राप्त कर सकते हैं अनन्त आनन्द की चाह है तो हमें श्रेष्ठ विचारों की उपासना करनी होगी और उन्हें अपनी आदत में लाना पड़ेगा।
विचार रूपी साँचे में ढलकर ही व्यक्ति के व्यक्ति त्व का सर्वतोमुखी विकास होता है। व्यक्ति का कैसा व्यक्ति त्व है यह उसके विचारों से ही पता चल जाता है। मनुष्य के अन्दर भले−बुरे दोनों तरह के विचार होते हैं। जब मनुष्य निराशामय एवं अन्धकारमय विचारों के जाल में फँस जाता है तो उसकी सुख−शान्ति विलीन हो जाती है। उसे दुनिया नारकीय लगने लगती है। यह विचार मनुष्य की सुख एवं शान्ति के शत्रु होते हैं। इन विचारों से छुटकारा पाने का साधन कहीं अन्यत्र नहीं मनुष्य के अन्दर ही विद्यमान होता है। बुरे विचारों को दूर कर दिव्य विचारों को धारण करना प्रारम्भ कर देने से मनुष्य का जीवन उत्कृष्ट बन जाता है।
मनुष्य का आदर्श ही उसके जीवन को वास्तविक जीवन बनाता है। जीवन को ऊँचा उठाने के लिए आदर्श विचारों का संग्रह आवश्यक है। मनुष्य के अन्तरंग से निकली हुई विचारों की पावन ज्योति ही उसका पथ आलोकित करती है। यूँ तो व्यक्ति के मन में अनेक विचार उठते और विलीन होते रहते हैं किन्तु आदर्श विचार ही मनुष्य को आशक्त बनाते हैं। जीवन की दिशा बदल देने में सक्षम होते हैं।
अपने आदर्श तक पहुँचने के लिए व्यक्ति को अपने सारे विचारे उसी उद्देश्य की पूर्ति में लगा देने चाहिए क्योंकि बिखरे रहकर भी विचारों का महत्व समाप्त हो जाता है, जिस प्रकार झाडू की अलग−अलग सींकें व्यर्थ हैं उसका कोई उपयोग नहीं है उसी प्रकार विचारों का बिखराव भी अपना कुछ स्थान नहीं रखता है। लक्ष्य की ओर मन, वाणी और कर्म का समन्वय करके बढ़ना चाहिए तभी सफलता हाथ लगती है।
मनुष्य प्रत्येक कार्य विचारों से प्रेरित होकर करता है। हवाई जहाज आकाश में उड़ता है और कुतुबनुमा की सुई से उसे यह पता लगता है कि उसे किस दिशा में चलना है और वह सैकड़ों मील लम्बा रास्ता पार कर जाता है। विचार कुतुबनुमा की सुई के सदृश है। वह मनुष्य को इंगित करते हैं कि तुम्हें किस दिशा में चलना चाहिए। मनुष्य को ज्ञान और विचार की सम्पदा देकर भगवान ने भेजा है। विचार न होते हुए रीछ, बंदरिया की तरह धूम रहा होता। संसार में जो सुन्दरता दिखाई देती है वह मनुष्य के विचारों का परिणाम है। विचारों का उपयोग निस्संदेह अतुल्य है।
विचारों को जिस दिशा में लगा दिया जाता है उसी ओर प्रगति होने लगती है और सफलता का मार्ग प्रशस्त हो जाता है। इन्हीं विचारों को यदि ईर्ष्या, द्वेष, शत्रुता, निराशा आदि में लगाया जाय तो विचार शक्ति का अपव्यय होता है और उसका अहितकर परिणाम मनुष्य को भोगना पड़ता है।
सैन्ट फ्रैन्सिस लम्बी बीमारी से उठे तो गिरजाघर में प्रार्थना करने के लिए पहुँचे। वहाँ उन्होंने ईसा को शूली पर चढ़ते समय पहनाये गये काँटों के ताज सहित चित्र को ध्यान पूर्वक देखा। देखते−देखते उन्हें ऐसा लगा मानो वह चित्र बोल रहा है और कह रहा है—”तू जा और मेरे घर की मरम्मत कर जिसे तू अपनी आँखों बर्बाद होते हुए देख रहा है।
उस समय तो फ्रैन्सिस गहराई में नहीं उतर सके और गिरजाघर के टूटे−फूटे भाग की मरम्मत कराने के प्रबन्ध में जुट गये। पर पीछे उन्हें ध्यान आया कि इतनी छोटी बात के लिए ईसा की आत्मा क्या निर्देश देती है उसके पीछे कोई रहस्यमय और सार गर्भित संदेश होना चाहिए। यह संसार ही परमात्मा का घर है, उसी की मरम्मत करने के लिए उस दिव्य संदेश का उद्देश्य हो सकता है। सैन्ट फ्रैन्सिस ने शेष सारा जीवन उसी काम में लगा दिया।
मनुष्य क्या है? इस प्रश्न का उत्तर विज्ञान के पास बहुत ही साधारण है, उसे सही मान लेने पर मानवी सत्ता अत्यन्त तुच्छ और उपहासास्पद बन जाती है। रसायन शास्त्रियों की दृष्टि में मानव शरीर अनेक रासायनिक यौगिकों का सम्मिश्रण है। यह यौगिक प्रायः 15 तत्वों से बने हैं, ये हर दिन खर्च होते हैं और नये आधारों से प्राप्त होते हैं। इस प्रकार आय−व्यय का सन्तुलन बना रहता है।
केमिस्ट्री आफ मेटिरियल्स के अनुसार शरीर को 100 इकाई का मान कर उसमें तत्वों का प्रतिशत अनुपात इस प्रकार बताया गया है। (1) आक्सीजन, 65 प्रतिशत, वायु और जल से प्राप्त (2) हाइड्रोजन 10 प्रतिशत पानी से प्राप्त इस प्रकार 75 प्रतिशत जीवन साधन वायु और जल से प्राप्त हो जाते हैं। भोजन से कुल मिला कर 25 प्रतिशत आवश्यकताएँ पूरी होती है। इनका विवरण इस प्रकार है (3) कार्बन 18 प्रतिशत (4) नाइट्रोजन 3 प्रतिशत (5) कैल्शियम 2 प्रतिशत (6) फास्फोरस 1 प्रतिशत (7) पोटेशियम 0.35, (8) सल्फर 0.25, (9) सोडियम 0.15, (10) क्लोरीन 0.15, (11) मैग्नेशियम 0.5 (12) लोहा 0.4 (13) आयोडीन, फ्रलेरिन, सिलीक्रम तीनों मिला कर 0.46 प्रतिशत कुल योग 100।
उपयुक्त तत्वों और योगिकों की आवश्यकता पूरी करने के लिए (1) प्रोटीन (2) कारबोहाइड्रेट अन्न (3) फैट−चिकनाई (4) विटामिन (5) साल्टस−लवण (6) मिनिरल−खनिज (7) जल की जरूरत पड़ती है। यह पदार्थ किसी को मिलते रहें तो समझना चाहिए उसकी आवश्यकता पूर्ण हो गई। इससे आगे जीवन निर्वाह के लिए और कुछ करना नहीं है।
आर्थिक विश्लेषण के अनुसार मनुष्य का मूल्य और भी कम है। दस गैलन पानी, सात साबुन की टिकी बन सकें इतनी चर्बी, 900 पेन्सिलें बन सकने जितना कार्बन, दस डिब्बी माचिस बन सकने जितना फास्फोरस, एक छोटी सी कील बन सकने जितना लोहा—एक कुत्ते के जुएँ मर सकने जितना गन्धक—एक मुरगी का दरबा पोत सकने जितना चूना—22 सेर बर्फ पिघला सकने जितनी गर्मी—तीन गुब्बारे उड़ाने के काम का हाइड्रोजन—तथा ऐसी ही कुछ और स्वल्प मूल्य की वस्तुएँ इस शरीर में हैं जिनकी बाजारू कीमत अधिक से अधिक पाँच रुपया हो सकती है। उसकी “फेस वैल्यू” बाजारू कीमत नहीं के बराबर है। वस्तुतः कीमती तो उसका यथार्थ मूल्य—इट्रिंसिक वैल्यू—ही है। सों नोट की फेस वैल्यू दो चार पैसे और उसकी इट्रिंसिक वैल्यू—छपे रुपये के बराबर होती है, पर मनुष्य के बारे में यह बात उलटी है उसका दृश्य मूल्य कुछ नहीं—वास्तविक, आन्तरिक, चेतनात्मक मूल्य ही सब कुछ है।
जीवन क्या है? इसकी व्याख्या करते हुए रसायन शास्त्र हमें क्रोमोसोम−जीन—न्यूक्लियोटाइड−आक्सीराइवो न्यूक्लिक एसिड जैसे वृक्ष पादपों से घिरे सघन वन में ले जाकर खड़ा कर देता है, पर यह नहीं बताता कि वह मूल सत्ता क्या है? जो विभिन्न स्तर के डी. एन. ए. बनाती है और उन्हें एक दूसरे से नहीं बदलने देती। न पक्षी पशु बन पाता है और न पशु मनुष्य। यद्यपि उनके मध्य रसायन पदार्थों की संरचना में कोई विशेष एवं मौलिक भेद नहीं है। प्राणी को नये प्राणी को जन्म देने की शक्ति कहाँ से उत्पन्न होती है और व्यष्टि एवं समष्टि का क्रमबद्ध संचालन किसकी प्रेरणा से, किसके नियन्त्रण में हो रहा है। इस प्रश्न का उत्तर देने में विज्ञान अपनी असमर्थता व्यक्त करता है। इन रसायनों की अनेकानेक उलट पुलट करने पर भी जीवन नहीं बन सका। उसका विकास जीवन की मूल इकाई को हाथ में लेकर ही सम्भव हो पाया है।
जीवाणु विज्ञानी कहते हैं जिस प्रकार पदार्थ परमाणुओं का समुच्चय है, उसी प्रकार शरीर जीवाणुओं का सहकार मण्डल है। पर वे जीवाणु तो जादुई गति से जन्मते−बदलते और मरते हैं। इस परिवर्तन का प्रभाव जीव की रीति नीति बदलने के रूप में क्यों दृष्टि गोचर नहीं होता, इसका उत्तर जीव विज्ञानियों के पास भी नहीं है।
जीव शास्त्र के अनुसार प्रौढ़ावस्था के मनुष्य शरीर में प्रायः 60 खरब कोशिकाएँ होती है। इनमें से प्रति सेकेंड लगभग 5 करोड़ मर जाती है ओर उतनी ही नई उत्पन्न होती हैं। जब तक उत्पन्न होने का क्रम बढ़ा−चढ़ा और मरने का क्रम हलका रहता है तब तक शरीर विकसित होता है जब दोनों क्रम समान रहते हैं तो स्थिरता रहती है और जब नष्ट होने की गति तीव्र तथा उत्पन्न होने की मन्द हो तो फिर वृद्धता आ घेरती है और उसकी ओर अधिक बढ़ोतरी अशक्त ता, रुग्णता को बढ़ाते−बढ़ाते मृत्यु के दरवाजे पर पहुँचा देती है।
परमाणु विज्ञान के अनुसार जड़−परमाणु विशेष स्थिति में जीवन जैसा आचरण करता है और पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी रीति−नीति अक्षुण्ण बनाये रहता है।
परमाणुओं की संघटना से जड़ चेतन पदार्थों की रचना मानी जाती है, परमाणुओं को पदार्थ की सबसे छोटी दृश्यमान इकाई माना जाता है; पर अब विकसित विज्ञान ने इससे आगे के तथ्यों का रहस्योद्घाटन किया है। वस्तुतः इस विश्व में शक्ति की सत्ता ही ओत प्रोत हो रही है। उस शक्ति महासागर में हिलोरें उठती रहती है उन्हें तरंगों का स्वरूप मिलता है। इन तरंगों की विभिन्न आवृत्तियाँ—फ्रीक्वेंसी होती हैं। तरंगों की हलचलें, प्रकाश एवं शब्द उत्पन्न करती हैं। वे दोनों परस्पर उलझते−सुलझते विविध विधि अणु परमाणुओं के रूप में, बादलों की बनती बिखरती आकृतियों के रूप में सामने आते हैं। वस्तुतः परमाणुओं को ‘कण’ का नाम दिया जाना गलत है उन्हें शक्ति तरंग भर कहा जाना चाहिए। उनका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है किन्तु भ्रम ऐसा ही होता है कि अणु स्वतंत्र सत्ताधारी है।
डा. एच. एस. बर ने अपने साथियों सहित प्राणियों की जिस जैविक विद्युत के शास्त्र की संरचना की है, उसमें प्राणिज विद्युत का आधार एवं क्रिया कलाप भौतिक बिजली से भिन्न है। वे प्राणिज विद्युत में इच्छा और बुद्धि का संमिश्रण भी मानते हैं भले ही वह कितना ही झीना क्यों न हो। इसी प्रवाह के कारण प्राणिज विद्युत अपने−अपने क्षेत्र में विशेष परिस्थितियों एवं साधनों की संरचना करती है। प्राण चुम्बकत्व पदार्थ में से अपने उपयोगी भाग को खींचता है—उसे अपने ढाँचे में ढालता है और इस योग्य बनाता है कि चेतना के स्वर में अपना ताल बजा सके। किस प्राणी के डिम्ब से किस आकृति−प्रकृति का जीव उत्पन्न हो इसका निर्धारण−मात्र रासायनिक संरचना के आधार पर नहीं हो जाता वरन् यह निर्धारित रज और शुक्र कीटों के भीतर भरी हुई चेतना के द्वारा होता है। उसी चुम्बकत्व से भ्रूण में विशिष्ठ स्तर के प्राणियों की आकृति एवं प्रकृति ढलना शुरू हो जाती है। यदि ऐसा न होता तो संसार में पाये जाने वाले समस्त प्राणी प्रायः एक ही जैसी आकृति−प्रकृति के उत्पन्न होते क्योंकि अणुओं का स्तर प्रायः एक ही प्रकार का है। उनमें जो रासायनिक अन्तर है उसके आधार पर कोटि−कोटि वर्ग के प्राणी उत्पन्न होने और उनकी वंश परम्परा चलते रहने की गुंजाइश नहीं है। अधिक से अधिक इतना ही हो सकता था कि कुछ थोड़ी सी—कुछ थोड़े से अन्तर की जीव−जातियाँ इस संसार में दिखाई पड़ती। वंश परम्परा और जीवविज्ञान अपनी विशिष्ठ भूमिका है।
अणु विज्ञान के आचार्य नोबेल पुरस्कार विजेता डा. हैरल्ड सी. उरे का कथन है कि अकार्बनिक पदार्थों के कार्बनिक पदार्थ में बदल जाने का कारण एमीनो एसिड है। इस रसायन के परमाणुओं का निर्माण कार्बन, आक्सीजन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन के विशिष्ठ संयोग से हुआ है। इस विचित्र संयोग के कारण बना यह रसायन, जड़ को चेतन में बदलने की भूमिका प्रस्तुत करता है।
डा. हैरल्ड के अनुसार पृथ्वी का आदिम वायु मण्डल अमोनिया, मीथम हाइड्रोजन से भरा था उसमें आक्सीजन की मात्रा कम थी। जब स्थिति बदली और आक्सीजन की वृद्धि हुई तो एमीनो एसिड उत्पन्न हुआ और जड़ पदार्थों के चेतन बनने की हलचलें आरम्भ कर दीं।
यह व्याख्याएँ नितान्त अधूरी है। इनसे केवल जीव की प्राण प्रक्रिया का विद्युतीय हलचलों का विवरण मिलता है, पर मूल प्रश्न का उत्तर इनसे नहीं मिलता। पदार्थ की एक नियत निर्धारित गति होती है मानवी चेतना में जो रुचि, इच्छा, आकाँक्षा, भावना की भिन्नता पाई जाती है और पल−पल पर बदलती रहती है, भावुकता के उभार उसे चित्र विचित्र अनुभूतियों का रसास्वादन कराते हैं, यह सब क्या है? इसका उत्तर परमाणु शास्त्र दे नहीं पा रहा है।
ऊर्जा विज्ञान जीवन को शक्ति समुच्चय बताता है। ध्वनि, प्रकाश चुम्बक की तरह हैं, ताप भी एक प्रचण्ड शक्ति है। प्राण उस ताप का ही एक विशिष्ठ परिपाक है। शरीर में जो गर्मी पाई जाती है वही जीवन है। ठंडा होते ही प्राण मर जाता है। अस्तु ताप की एक विचित्र प्रक्रिया को जीवन धारा कहा जा सकता है। शरीर के विभिन्न क्रिया−कलापों के पीछे ऊर्जा विज्ञान नियम स्थानों पर—नियत धातुओं में नियत प्रकार की ऊर्जा को ही कारण मानते हैं।
उनके कथनानुसार स्वस्थ मनुष्य का सामान्य तापमान 36.6॰ अंश शताँश होता है। रक्त में शर्करा 0.1 प्रतिशत रहती है और सामान्य रक्तचाप 100-140 मिलीमीटर (मक्युर कालम) तक होता है।
भीतरी तापमान 36.6॰ रहता है किन्तु बाहरी त्वचा की गर्मी 33 अंश से अधिक नहीं होती। यदि बाहरी तापमान 33 से नीचे न गिरे और 45 से अधिक न बढ़े तो भीतरी तापमान की स्वाभाविक स्थिति से शरीर का सामान्य क्रिया−कलाप ठीक प्रकार चलता रहता है।
शरीर की माँसपेशियाँ आवश्यक ऊष्मा पैदा करती रहती है। शरीर 24 घंटे में 160 से 180 लाख कैलोरी ऊष्मा बाहर फेंकता है। बिजली का सामान्य घरेलू हीटर भी प्रायः इतनी ही गर्मी पैदा करता है। रक्त की गर्मी शरीर की ऊष्मा का संतुलन बनाये रहती है। जब गर्मी की मात्रा बढ़ जाती है तो रक्त तेजी से शरीर में दौड़ने लगता है और आवश्यक गर्मी बाहर फेंक देता है। किन्तु जब सर्दी होती है तो वह शरीर से ही ऊष्मा का संचय करने लगता है।
प्रातः काल का तापमान प्रायः 36.॰ पाया जाता है जबकि सायंकाल का 37.5॰ तक का पहुँचता है। दिन की अपेक्षा रात को तापमान कुछ घटा हुआ रहता है।
रीढ़ की हड्डी के ऊपर मस्तिष्क के नीचे शरीर का ताप नियंत्रक केन्द्र है। वहाँ से शरीर की आवश्यकतानुसार ताप को न्यूनाधिक किया जाता है। यदि इस केन्द्र को कृत्रिम रूप से उलटा प्रभावित कर दिया जाय तो घोर गर्मी में भी सर्दी की कँपकँपी छूटेगी और घोर, सर्दी में भी जेठ की दुपहरी जलती अनुभव होगी।
इन अधूरे उत्तरों से परिष्कृत मानवी चेतना का कोई निरूपण नहीं हो सकता। जीवन वस्तुतः अनन्त जीवन का एक अंश है। चेतना के समुद्र में उठती हुई लहर के रूप में उसे देखा, समझा जा सकता है। शरीर का विश्लेषण भौतिक विज्ञान के आधार पर ही सकता है क्योंकि वह भौतिक तत्वों से बना है। चेतना पदार्थ से उत्पन्न होती है उस प्रतिपादन को सिद्ध करने में कितनी ही माथा पच्ची की जाय, एक स्थान पर विज्ञान की प्रत्येक धाराको निरुतर होना पड़ता है चेतना एक स्वतंत्र विज्ञान है जिसे आत्म विज्ञान अथवा ब्रह्म विज्ञान का नाम दिया जा सकता है। अध्यात्म के तत्व ज्ञान के सहारे ही जीव सत्ताकी व्याख्या हो सकती है और उसके स्वरूप तथा प्रयोजन को समझा जा सकता है।
‘स्वर्ग’ के सम्बन्ध में पौराणिक मान्यता यह है कि पुण्यात्मा व्यक्ति मरने के बाद सुख−सुविधा भरे जिस लोक में जाते हैं उसे स्वर्ग कहते हैं। दार्शनिक लोग स्वर्ग को उदात्त दृष्टिकोण मानते हैं और कहते हैं चिन्तन की इस विशेष शैली को अपनाकर मनुष्य अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी अविच्छिन्न सुख−शान्ति का रसास्वादन करता रहता है।
इतिहास और भूगोल की दृष्टि से स्वर्ग कोई ऐसा स्थान विशेष होना चाहिए जहाँ लोगों का आना−जाना बिना किसी विशेष कठिनाई के होता रहता हो। जहाँ भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों का बाहुल्य रहता हो। दशरथ, अर्जुन, नारद आदि के ऐसे कितने ही कथानक है जिनमें स्वर्ग जाना और वापिस आना उसी प्रकार बताया गया है जैसे हम सामान्य स्थानों पर बिना अधिक कठिनाई उठाये जाते रहते हैं। पाण्डवों के स्वर्गारोहण की तुक इस प्रकार बैठती है कि वे जीवन के अन्तिम दिनों उसी शान्तिमय क्षेत्र में निवास करने के लिए चले गये थे।
लगता है—हिमालय के जिस भू−भाग को इन दिनों ‘उत्तराखण्ड’ कहते हैं उससे थोड़ा और अधिक बड़ा तथा ऊँचा क्षेत्र उन दिनों स्वर्ग कहलाता था। उसमें देव प्रकृति के लोग रहते थे। लोक−कल्याण की विविध−विधि योजनाएँ और व्यवस्थाएँ वहीं से बनती थीं। वह पूरा क्षेत्र एक प्रकार से मानव−कल्याण के विविध उत्पादनों की प्रयोगशाला थी। ऋषि और देव पुरुष वहीं के शान्त वातावरण में इस प्रकार के अभिनव उत्पादन करते थे जिनसे समस्त विश्व लाभान्वित हो सके।
स्वर्ग का जिस प्रकार पौराणिक वर्णन उपलब्ध है उससे यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है। सुमेरु पर्वत पर देवता रहते थे। सुमेरु शृंखला, बद्रीनाथ और गंगोत्री के मध्यवर्ती क्षेत्र में अभी भी विद्यमान है। स्वर्ग से दूध की गंगा उतर कर शिवजी की जटाओं में आई और फिर धरती पर बही। इस अलंकारिक वर्णन की इस प्रकार संगति बैठती है कि गोमुख से ऊपर हिमाच्छादित शिवलिंग चोटी है उस पर पिघलती हुई बर्फ दूध की धारा जैसी दीखती है। नीचे उतर कर वह कुछ दूर चट्टानों में समा जाती है और फिर गोमुख पर प्रकट होती है। इस दृश्य को गंगावतरण के पौराणिक अलंकार में पूरी तरह दृश्यमान हुआ पाया जाता है। नन्दन वन स्वर्ग में था। गोमुख से ऊपर चढ़कर सुरभित पुष्पों से भरी मखमल के कालीन की तरह बिछी भूमि को भी अभी भी नन्दन वन कहा जाता है। कैलाश और मानसरोवर का जिस प्रकार वर्णन है उसकी तुक तिब्बत में चले गये कैलाश के साथ नहीं बैठती। शिवजी की जटाओं से गंगा का निकलना तभी ठीक बैठता है जब नन्दन वन के समीप की शिवलिंग चोटी को कैलाश और उसके निकटवर्ती सरोवर को मानसरोवर माना जाय। पाण्डवों ने अन्त समय स्वर्ग के लिए प्रयाण किया था। वह स्वर्गारोहण पर्वत अभी भी वसोधारा पठार के आगे विद्यमान है। व्यास जी ने जहाँ महाभारत लिखा था वह व्यास गुफा वहीं है उन्हीं के पास लिपिकार गणेश रहते थे। गणेश गुफा भी व्यास गुफा के समीप ही है। यह स्वर्ग क्षेत्र उस प्रदेश में था जिसे बद्रीनाथ और गंगोत्री का मध्यवर्ती भाग कह सकते हैं। यही हिमालय का हृदय है। दिव्यदर्शियों का कथन है कि ब्रह्माण्ड की सघन अध्यात्म चेतना का धरती पर विशिष्ठ अवतरण इसी क्षेत्र में होता है। भौतिक शक्ति यों के धरती पर अवतरण का केन्द्रबिन्दु विज्ञान जगत में ध्रुव प्रदेश को माना जाता है। अध्यात्म जगत में वैसी ही मान्यता इस हिमालय के हृदय के सम्बन्ध में है। यह स्वर्ग क्षेत्र ब्रह्माण्ड−व्यापी दिव्य−चेतनाओं का अवतरण केन्द्र है जहाँ शोध करते हुए, तप करते हुए, महामनीषी अपने को देव शक्ति यों से सुसज्जित करते थे। अभी भी उस क्षेत्र में स्थूल और सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य सत्ताओं के अस्तित्व पाये जाते हैं। वे अपने क्रिया−कलाप से समस्त भूमण्डल को प्रभावित करती हैं।
इन्द्र देवता की सहायता के लिए दशरथ जी अपना रथ लेकर गये थे। पहिया गड़बड़ाने लगा तो कैकेयी ने अपनी उँगली लगाकर उस विपत्ति का समाधान किया था। ठीक उसी प्रकार का एक और वर्णन यह मिलता है कि अर्जुन इन्द्र की सहायता करने गये थे, प्रसन्न होकर इन्द्र ने अर्जुन को रूपसी, उर्वशी का उपहार दिया था जिसे उसने अस्वीकार कर दिया था। जहाँ मनुष्यों का आवागमन सम्भव हो सके ऐसा स्वर्ग धरती पर ही हो सकता है। इन्द्र और चन्द्र देवताओं का गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या से छल करना धरती पर ही सम्भव है। दधीचि ने अपनी अस्थियाँ याचक देवताओं को प्रदान की थीं। आदि−आदि अगणित उपाख्यान ऐसे हैं जिसमें देवताओं और मनुष्यों के पारस्परिक घनिष्ठ सहयोग की चर्चा है। इन पर विवेचनात्मक दृष्टि से विचार करें तो उसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि स्वर्ग कहीं भूमि पर ही होना चाहिए और देवता, मनुष्यों का कोई वर्ग विशेष ही होना चाहिए। इसका समाधान उत्तराखण्ड को देव भूमि मान लेने से ही हो सकता है। देवर्षि नारद का बार−बार विष्णुलोक में जाना और वहाँ के अधिपति विष्णु से साँसारिक समस्याओं पर विचार विनिमय करना तभी सही सिद्ध होगा जब हमें उस पुण्य भूमि को स्वर्ग के रूप में मान्यता दें। उस क्षेत्र में अभी भी भ्रमण करके ऐसे अनेकानेक प्रमाण उपलब्ध किये जा सकते हैं जिनके आधार पर पौराणिक स्वर्ग की संगति इस क्षेत्र के साथ बिठाई जा सके।
देव वर्ग के लोग इस पुण्य भूमि के दिव्य वातावरण में निवास करते थे और धर्म−तन्त्र की उपलब्धियों से समस्त विश्व को लाभान्वित बनाने की विविध−विधि योजनाएँ बनाते थे; तैयारियाँ करते थे और साधन जुटाते थे। इन कष्टसाध्य महाप्रयासों का नाम ही तप था। तपस्वी देवता एक प्रकार के अध्यात्म विज्ञान के शोधकर्ता और विभूति उत्पादक कहे जा सकते हैं। यह क्षेत्र ऐसी वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं से भरा पड़ा था जिनमें शरीर यन्त्र और मनः तन्त्र के भीतर छिपे हुए शक्ति शाली रहस्यों का अधिकाधिक अनावरण सम्भव हो सके। शास्त्रों का सृजन, योगाभ्यास की उपलब्धियाँ अध्यात्म दर्शन का विकास, स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा, शास्त्र, रसायन, शिल्पकला आदि की भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियाँ इसी क्षेत्र से निकल कर आती थीं और उनसे लाभान्वित होने वाले उसे स्वर्ग निवासी देवताओं का वरदान कहकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते थे। देवार्चन हर मनुष्य का कर्त्तव्य था ताकि उसे क्षेत्र में किसी प्रकार का अभाव अनुभव न हो। गीता में यज्ञ से देवताओं की पुष्टि की बात कही गई है, इसे सर्वसाधारण द्वारा देव प्रयोजनों के लिए विविध−विधि अनुदान प्रस्तुत करना ही समझा जाना चाहिए। यज्ञ का सीधा अर्थ दान एवं त्याग, बलिदान है। देव प्रयोजनों के लिए श्रम, समय, मन, धन आदि से सहयोग करते रहना है। यह उन दिनों सर्वसाधारण का नित्यकर्म था। समय−समय पर अग्निहोत्र भी इसी प्रवृत्ति को प्रोत्साहित करने वाले प्रतीक पूजन के रूप में किये जाते थे। यज्ञ से पूजित देवता मनुष्यों पर सुख−शान्ति बरसाते हैं और यज्ञ न करने वाले विपत्ति में फँसते हैं इस गीता वचन में सामान्य प्रजाजनों को देव वर्ग को, देव कर्म को, समुचित सहयोग प्रदान करते रहने की अनिवार्य आवश्यकता का उद्बोधन कराता है। यह देवता और कोई नहीं−उस समय स्वर्ग क्षेत्र में निवास करके धर्म प्रेरणा के—भावनात्मक परिष्कार के विविध−विधि आधारों का निर्माण करने वाले महामानव ही थे। समस्त धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण करने के लिए उनका महा प्रयास, जन साधारण को देव वन्दन एवं देव पूजन के लिए अनायास ही नतमस्तक बनाता था।
गंगा−यमुना का दुआवा आर्यावर्त कहलाता था। भौतिक समृद्धियों के विविध प्रयोगों को सुविस्तृत बनाने के लिए हमारे पूर्वजों का एक महत्वपूर्ण वर्ग इस क्षेत्र में रहता था। यह भूखण्ड कृषि पशु−पालन आदि की दृष्टि से बहुत उपयुक्त था। जलवायु की उत्तमता असंदिग्ध थी। शासकीय प्रयोग यहीं होते थे। चक्रवर्ती शासन के सूत्र इसी क्षेत्र से चलते थे। अश्वमेध यज्ञों में से अधिकाँश इसी क्षेत्र में हुए हैं। बनारस और प्रयाग में गंगातट पर ऐसे घाट अभी भी विद्यमान हैं जहाँ कई−कई—दस−दस अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न हुए हैं। अश्वमेधों की आवश्यकता बिखरे हुए गणतन्त्र को एकता, व्यवस्था, मर्यादा एवं नियन्त्रण के सुदृढ़ सूत्र में आबद्ध करने के लिए ही पड़ती थी। विश्रृंखलता और विकृतियों के निराकरण के लिए ऐसे विशालकाय सम्मेलन करने ही पड़ते थे।
आर्यावर्त राजतन्त्र का विश्व−व्यापी सूत्र संचालन करता था। सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी राजा इन्हीं प्रयासों में निरत थे। सूर्यवंश में राम जैसे और चन्द्रवंश में कृष्ण जैसे अनेकानेक महाप्रतापी अवतारी पुरुष जन्में है। दुष्यन्त पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नामकरण भारत हुआ। देव और असुरों के युद्धों से पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है। यह इन नर−नाहरों द्वारा देश−देशान्तरों में असुरता उत्पन्न करने वाले तत्वों का उन्मूलन करने वाले युद्ध प्रयासों का ही अलंकारिक वर्णन है। उन्हें दुर्दान्त दुष्टता के साथ समय−समय पर असाधारण संघर्ष करने पड़े। परशुराम के कुल्हाड़े का चमत्कार वन्य प्रदेशों की दुर्गम झाड़−झंखाड़ों से—हिंस्र वन्य पशुओं से मुक्त करने के रूप में ही समझा जा सकता है।
ऐसे ही विविध−विधि प्रयास करके आदिमकालीन कुसंस्कारी मनुष्यों तथा पशुओं को क्रम व्यवस्था में आबद्ध करने को उन दिनों धर्म युद्ध कहा जाता था। सम्पत्ति उपार्जन और व्यवस्था स्थापन के विविध प्रयोग एवं प्रयास आर्यावर्त में होते थे और फिर यहाँ से उनका विस्तार समस्त विश्व के व्यापक क्षेत्र में किया जाता था। स्वर्ग और धरती की पारस्परिक घनिष्ठता इसी क्षेत्र में देखी जाती थी। उत्तराखण्ड के समुन्नत क्षेत्र का देव निवास स्वर्गलोक और नीचे उतर कर समीपवर्ती क्षेत्र में बिखरा हुआ भू−लोक पारस्परिक घनिष्ठ सहयोग बनाये हुए था। उनके आदान−प्रदान से सर्वतोमुखी प्रगति का पथ−प्रशस्त होता था और ऐसे आधार विनिर्मित होते थे जिनसे भारत की भौगोलिक सीमाओं के अन्दर विकसित होने वाली प्रगति और समृद्धि का अधिकाधिक विस्तार विश्व के दूरवर्ती क्षेत्रों को भी उपलब्ध होता रहे।
ऊपर की पंक्ति यों में केवल प्रयोगशाला क्षेत्र की चर्चा हुई है। भारत का प्रयोगशाला क्षेत्र ज्ञान की दृष्टि से उत्तराखण्ड वाला स्वर्गलोक और विज्ञान की दृष्टि से आर्यावर्त का भू−लोक कहा जा सकता है। इसे मस्तिष्क और हृदय की उपमा दी जा सकती है, पर उसे समस्त शरीर नहीं कहा जा सकता। भारत का समग्र शरीर तो समस्त संसार में व्याप्त था, पर यदि उसके उद्गम केन्द्र—मर्मस्थल को देखा जाय तो वह उत्तराखण्ड का स्वर्ग और आर्यावर्त का अपवर्ग ही ठहरता है। यहीं से आध्यात्मिक और भौतिक प्रगति का विश्व−व्यापी सूत्र संचालन होता था। ऐसा इतिहास और भूगोल के जानकारों का एक विचारणीय मत है।
रामकृष्ण परमहंस से उनके एक शिष्य गिरीशचन्द्र ने पूछा—मुझे किस प्रकार जीवनयापन करना चाहिए?
उत्तर में उन्हें बताया गया—अभी इधर (संसार) और उधर (भगवान) को देखते हुए चलो। दोनों में सन्तुलन बनाओ। आगे जब दोनों में से एक नष्ट हो जाय तब आगे की बात पर सोचना।
मानसिक स्थिति में विकृति आते ही शरीर का ढाँचा लड़खड़ाने लगता है। स्पष्टतः सारे शरीर पर मन का नियन्त्रण है। उसका एक अचेतन भाग रक्त −संचार, श्वास−प्रश्वास, आकुँचन−प्रकुँचन, निद्रा, पलक झपकना, पाचन, मल विसर्जन आदि स्वसंचालित क्रिया−कलापों पर नियन्त्रण करता है और दूसरा सचेतन भाग विभिन्न प्रकार के जीवन व्यवहारों के लिए दसों इन्द्रियों को—अंग−प्रत्यंगों को सक्रिय करता है। शरीर और मन का अविच्छिन्न सम्बन्ध है। इस तथ्य को जानते हैं उन्हें विदित है कि मन को असन्तुलित करने का अर्थ न केवल शोक−सन्तापों में डूबकर असन्तोष एवं उद्वेग की आग में जलना है वरन् अच्छे भले शरीर को भी रोगी बना डालना है। अगणित शारीरिक रोग मानसिक असन्तुलन के कारण ही उत्पन्न होते हैं। ऐसे ही रोगों में एक जुकाम भी है।
अनेकों कठिन बीमारियों के इलाज ढूँढ़ निकाले गये हैं, पर एक रोग आज भी ऐसा है जो अनेकों औषधियों के उपरान्त भी काबू में नहीं आ रहा है—वह है—जुकाम।
शरीर शास्त्रियों के अनुसार जुकाम के भी विषाणु होते हैं। पर उनकी प्रकृति अन्य सजातियों से सर्वथा भिन्न है। चेचक, पोलियो आदि का आक्रमण एक बार हो जाने के उपरान्त शरीर में उस रोग से लड़ने की शक्ति उत्पन्न होती है। फलतः नये आक्रमण का खतरा नहीं रहता, पर जुकाम के बारे में यह बात नहीं है। वह बार−बार और लगातार होता रहता है। एक बार जिस दवा से अच्छा हुआ था, दूसरी बार उससे अच्छा नहीं होता जबकि यह बात दूसरी बीमारियों पर लागू नहीं होती।
कनाडा के एक शरीर शास्त्री और मनोविज्ञानी डा.डानियलकापोन का मत है—”जुकाम उतना शारीरिक रोग नहीं जितना मानसिक है।” जब मनुष्य थका, हारा और निठाल होता है तो उसे अपनी असफलताएँ निकट दिखती है उस लाँछन से बचने के लिए वह जुकाम बुला लेता है ताकि दूसरे उसकी हार का दोष इस आपत्ति के सिर मढ़ते हुए उसे निर्दोष ठहरा सकें। यह रोग वस्तुतः अंतर्मन का अनुदान है जो व्यक्ति स्वल्प शारीरिक कष्ट देकर अपने को असफलता के लाँछन से बचाता है। ऐसा रोगी बहुत हद तक पराजय की आत्म−प्रताड़ना से बच जाता है। जुकाम की दैवी विपत्ति टूट पड़ने से वह हारा; उसकी योग्यता, हिम्मत एवं चेष्टा में कोई कमी नहीं थी। यह मान लेने पर मनुष्य को सान्त्वना की एक हलकी थपकी मिल जाती है। अन्तःचेतना इसी प्रयोजन के लिए जुकाम का ताना−बाना बुनती है।
कोपान ने अपनी मान्यता की पुष्टि में अनेकों प्रमाण प्रस्तुत किये हैं। खिलाड़ी लोग प्रतियोगिता के दिनों, विद्यार्थी परीक्षा के दिनों, प्रत्याशी चुनाव तिथि पर अक्सर जुकाम पीड़ित होते हैं। इनमें अधिकाँश ऐसे होते हैं जिन्हें अपनी सफलता पर सन्देह होता है और हार की विभीषिका दिल को कमजोर करती है।
जुकाम के विषाणु होते तो हैं और उनमें एक से दूसरे को छूत लगाने की भी क्षमता होती है, पर उतने कष्टकारक नहीं होते जितने कि मनुष्यों को पीड़ित करते हैं। चूहे, बन्दर आदि के शरीर में जुकाम के विषाणु प्रवेश कराये गये किन्तु उनके शरीर पर कोई असर नहीं हुआ।
जुकाम का कारण सर्दी है यह मानना भी ठीक नहीं। क्योंकि ध्रुव प्रदेश में कड़ाके की ठंड का सामना करते हुए पीढ़ियां बिता देने वाले एस्किमो लोगों में से किसी को कभी भी जुकाम नहीं होता। उस क्षेत्र में अन्वेषण के लिए जाने वाले खोजी दलों का भी यही कथन है कि जब वे ध्रुव प्रदेश में रहे तब तक उन्हें जुकाम नहीं हुआ। पर्यवेक्षणों का निष्कर्ष यह है कि शीत ऋतु में कम और गर्मी के दिनों में जुकाम का प्रकोप अधिक होता है।
जुकाम की कितनी ही दवाएँ आविष्कृत हुई, पर वे सभी अपने प्रयोजन में असफल रहीं। अफीम कुछ लाभ जरूर पहुँचाती है, पर उससे दूसरी प्रकार की नई उलझनें उठ खड़ी होती है जो मूल रोग से कम कष्ट कारक नहीं हैं।
जुकाम तो एक उदाहरण है जो देखने में शारीरिक लगता है, पर वस्तुतः है मनोरोग। यही बात अधिकांश शारीरिक रोगों के बारे में है। यदि हम मानसिक सन्तुलन संभालें तो सहज ही अनेकों शारीरिक रोगों से छुटकारा पा सकते हैं।
किसी का वैभव बड़प्पन देखकर उसकी गरिमा का मूल्यांकन करना अवास्तविक है। गरिमा उत्कृष्टता में छिपी रहती है क्योंकि सशक्त ता उसी के साथ जुड़ी रहती है। सूक्ष्म जगत में प्रवेश करने पर भौतिकता का कलेवर नहीं रहता, पर इसे शक्ति में कोई कमी नहीं आती वरन् वह आवरण का भार हलका हो जाने पर और भी अधिक क्षमता सम्पन्न बनती जाती है।
अध्यात्म सूक्ष्मता का विज्ञान है। उसमें पदार्थ के विस्तार की नहीं गुणों की तेजस्विता को महत्व दिया गया है। आन्तरिक उत्कृष्टताएँ आँखों से दृष्टिगोचर नहीं होतीं तो भी उनका प्रभाव कितना अधिक होता है इसे सहज ही जाता जा सकता है। विचारवान इसीलिए विस्तार की अपेक्षा सूक्ष्मताजन्य प्रखरता को ही महत्व देते हैं।
“अधिकस्य अधिकं फलम्” की उक्ति बहुत मोटी बातों में ही सही सिद्ध होती है। सूक्ष्म प्रयोजनों में स्वल्प का ही महत्व बढ़त जाता है। दृश्य जगत क्या है? पदार्थों का समुच्चय । पदार्थ क्या हैं, योगिकों, तत्वों और परमाणुओं का समन्वय। परमाणु क्या है— विद्युत बिन्दुओं का संगठन । इन विद्युत बिन्दुओं इलेक्ट्रान प्रोटीनों की भी गहराई अभी खोजी जा रही है। दृश्य जगत वस्तुतः उन विद्युत बिन्दुओं से आरम्भ होता है जो कहने−सुनने में सरल किन्तु देखने— अनुभव करने में अपने अत्यन्त छोटे कलेवर के कारण अति कठिन हैं।
हमारे शरीर के जीवाणु बहुत ही छोटे हैं। उनकी शोषण शक्ति भी उनके कलेवर के अनुरूप ही स्वल्प है। उनमें प्रवेश कर सकने वाले पदार्थ इतने छोटे होने चाहिए जो इन शरीरगत जीवाणुओं, कोशाओं के भवन में आसानी से प्रवेश पा सकें। आहार में प्राकृतिक रूप से हर जीवनोपयोगी पदार्थ बहुत ही छोटे अंशों में विद्यमान रहता है इसलिए वे पचकर शरीर में घुल−मिल जाते हैं। पर यदि उन्हें सघन रूप से लिया जाय तो उनके मोटे कण चूर्ण−विचूर्ण होने में बहुत समय और श्रम लेंगे और तब कहीं कठिनाई से थोड़ी मात्रा में हजम होंगे।यही कारण है कि शाक−भाजी ,अन्न, दूध में अत्यन्त स्वल्प मात्रा में मिले हुए क्षार और खनिज हमारे शरीर में घुल जाते हैं किन्तु उन्हीं पदार्थों को यदि गोलियों के रूप में खाया जाय तो उनका बहुत छोटा अंश ही शरीर को मिलेगा बाकी स्थूल होने के कारण बिना पचे ही मल मार्ग से निकल जायगा।
हाइड्रोजन परमाणु का एक इलेक्ट्रान अपने केन्द्र के चारों ओर एक सेकेंड में 6000 खरब चक्कर काटता है। परमाणु की रचना सौरमण्डल में सदृश है उनके भीतर विद्युत कण भयंकर गति से घूमते हैं फिर भी उसके पेट में बड़ा सा आकाश भरा रहता है। परमाणुओं के गर्भ में चल रही भ्रमण शीलता के कारण ही इस संसार में विभिन्न हलचलें हो रही हैं। यदि वे सब रुक जायँ तो आधा इञ्च धातु का वजन तीस लाख टन हो जायगा और सर्वत्र अकल्पनीय भार जड़ता भरी दिखाई पड़ेगी।
वजन की दृष्टि से कौन वस्तु भारी और कौन हलकी है, इस आधार पर उसकी गरिमा का मूल्याँकन नहीं हो सकता । चट्टान बहुत भारी है किन्तु उसका मूल्य हीरे के एक छोटे से टुकड़े की बराबर नहीं होता । सबसे हलका हाइड्रोजन अणु— अन्य भारी समझे जाने वाले अणुओं की तुलना में कम नहीं अधिक ही महत्व प्राप्त कर रहा है।
औषधि में सूक्ष्म मात्रा के महत्व प्रतिपादन कर्त्ता जर्मनी के चिकित्सा शास्त्री हैनिमौन ने जब अपने सिद्धान्त प्रकाशित किये तो तत्कालीन शरीर विज्ञानियों ने उसका विरोध किया और उपहास उड़ाया । सर जेम्स वाइ, सिम्पसन ने “होमियोपैथी इट्स टेनेन्टस् एण्ड टेन्डेन्सीज “पुस्तक लिखकर उस सूक्ष्मता के सिद्धान्त का उपहास उड़ाया और खण्डन किया। किन्तु यह उपहास बहुत दिन स्थिर न रहे सका । 50 वर्ष के अन्दर ही अनेक मूर्धन्य विज्ञानी इस सिद्धान्त के समर्थक बन गये। डा. जी. डबल्यू. वैलफोर ने सूक्ष्मता की शक्ति को अकल्पनीय और अद्भुत बताया। आरम्भिक दिनों चिकित्सा शास्त्रियों ने सूक्ष्मता की शक्ति पर अविश्वास किया था और उसका उपहास उड़ाया था, पीछे जब गहराई को खोजा गया तो पाया गया कि सूक्ष्मता की शक्ति को अप्रमाणिक नहीं ठहराया जा सकता ।
कार्लवान नागेली के चार ताँबे के पैसे उनकी बिना जानकारी में पानी के एक बर्तन में गिर पड़े , वह पानी सहज स्वभाव स्पाइरोगिरा के पौधों की जड़ में डाल दिया गया। पौधे कुछ ही घण्टे के भीतर मर गये। अकस्मात ऐसा क्या हो गया। इस खोज में उनके जड़ में डाले गये पानी की खोजबीन हुई और उसमें पड़े हुए ताँबे के पैसों की संगति मिलाई गई।पीछे गहरे अन्वेषण से पता चला कि ताँबे की इतनी स्वल्प मात्रा इतनी सशक्त होती है कि उनके द्वारा पौधों पर ऐसा अद्भुत प्रभाव पड़ सके ।
बड़े पदार्थ अणुओं का एक विशाल रूप होता है इसमें कलेवर भर का विस्तार होता हे प्रत्येक कण को अपना स्वतन्त्र अस्तित्व और प्रभाव प्रकट करने का अवसर नहीं मिलता । वे यदि अलग−अलग होकर अपनी मूल सत्ता को प्रकट कर सकने की स्थिति में होते हैं तो आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं।
आहार और चिकित्सा में सूक्ष्मता को महत्व मिलना चाहिए । इस तथ्य पर विज्ञानवेत्ता बहुत समय से प्रकाश डाल रहे हैं। सूक्ष्मता के विशेष शोधकर्ता डच विज्ञानी प्रो. डाँडर ने एकबार डार्विन को लिखा था— एट्रोपिन की एक ग्रेन का लाखवाँ हिस्सा भी आँखों पर प्रभाव डालता है। इस प्रकार का डार्विन ने स्वयं का अपना अनुभव प्रो.डाँडर ने को लिखा था। −अमोनिया की 1 ग्रेन का एक करोड़ चालीस लाखवाँ हिस्सा शरीर की ग्रन्थियों द्वारा ग्रहण करने पर आँत्र वाहक स्नायुओं में तेज झटका मारते हुए उन्होंने देखा है। इसी प्रकार नमक की एक ग्रेन का बारह करोड़वाँ भाग भी अपना आश्चर्यजनक काम करता है।
डा. ए. शिगर ने कामिक एसिड की एक ग्रेन का ढाई लाखवाँ हिस्सा जैसी स्वल्प मात्रा अपने गठिया में मरीजों को देकर आश्चर्यजनक लाभ देखा था।
चिकित्सा विज्ञान में औषधि की स्वल्प मात्रा की उपयोगिता को सिद्ध करने में डा. शुशलर ने बहुत परिश्रम किया हैं। उन्होंने अपने “टिशू रेमिडीज” प्रतिपादन में इसी बात पर जोर दिया है कि शरीर के सेल सूक्ष्म मात्रा में उपलब्ध लवणों को ही अपने भीतर शोषित कर सकते हैं।कारण यह है कि रुग्ण शरीर के तन्तु घनत्व की एक विशिष्ठ स्थिति में होते हैं कि वे रक्त के क्षारीय पदार्थों को सामान्य रूप से शोषित कर सकें। अपनी दुर्बलता के कारण वे अधिक सूक्ष्म मात्रा में — अलग−अलग किये गये कणों को ही सोख पाते हैँ। यदि उन पदार्थों के अणु अधिक सघन रूप से परस्पर जुड़े हों तो फिर कोशाओं के लिए उनका शोषण कठिन हो जायगा और उन्हें पोषण रहित स्थिति में ही गुजारा करना पड़ेगा।
एक पाव दूध में एक ग्रेन का छह लाखवाँ अंश जितना स्वल्प लोहा होता है। पर इतने से ही बच्चे के शरीर की लौह आवश्यकता पूरी हो जाती है।यदि इसी लोहे को गोली या सुई के रूप में दें तो उससे वैसा पोषण प्राप्त न हो सकेगा। शरीर में फ्लोरीन तो लोहे से भी कम है। उसकी आवश्यकता पूरी करने के लिए आहार या औषधि में उसी स्वल्प अनुपात से विरल अणुओं के रूप में वह तत्व होना चाहिए तभी कोशाओं की वह आवश्यकता पूरी हो सकेगी। लोहा या फ्लोरीन बड़ी मात्रा में देकर शरीर का हित नहीं अहित ही किया जा सकता है। वह बड़ी मात्रा में हजम न होकर अनावश्यक भार डालने के बाद मल द्वारों से बाहर निकल जायगी।
पानी में हजारवें भाग के रूप में घुला दालों का ग्लटिन हाइड्रोक्लोरिक एसिड आसानी से पच जाता है, पर जब वही अधिक मात्रा में होता है तो निरर्थक चला जाता है। बात को और भी अधिक स्पष्ट रूप से समझने के लिए यह स्मरण करना चाहिए कि एक क्यूबिक इंच के 1200000 वाँ भाग आकार का एक लाल रक्ताणु होता है। एक बूँद खून में इस तरह के प्रायः तीन लाख अणु होते हैं। वे ही खनिजों, क्षारों तथा अन्य रसायनों को अपने ऊपर लादे सारे शरीर में होते फिरते है इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है और खाद्य−पदार्थों में सूक्ष्मता के सिद्धान्त की उपयोगिता समझी जा सकती हैं।
मनुष्य की स्वयं की पूर्ण सत्ता बीज रूप में कितनी छोटी होती है यह जानने के लिए हमें शुक्राणु के आकार पर विचार करना होगा। गर्भाधान के समय उसका आकार एक क्यूबिक मिलीमीटर का दस लाखवाँ भाग मात्र होता है। उसी के भीतर शारीरिक और मानसिक दृष्टि से एक पूर्ण मानव उकडू−मुकडू बनकर बैठा रहता है। इस सारी दुनिया में प्रायः 5 ओंस रेडियम होने का अनुमान लगाया गया है; पर इतने से ही उसकी महत्वपूर्ण आवश्यकता अगले 25 हजार वर्ष तक मजे पूरी होती रहेगी।
मोटी बुद्धि विस्तार को देखकर ही प्रभावित होती हैं। उसे यह पता नहीं होता कि काया की विशालता का कोई मूल्य नहीं जीवन तो माप−तौल में न आ सकने वाली अकिंचन सी चेतना का है। वह चेतना ही इतने बड़े शरीर यन्त्र के अगणित कलपुर्जों का संचालन करती है और जब वह शिथिल पड़ जाती है तो शरीर लड़खड़ा जाता है और विलग हो जाने पर वही शरीर तत्काल सड़−गलकर नष्ट होने लग जाता है।
प्रकाश रश्मियों की लम्बाई एक इंच के सोलह से तीस लाखवें हिस्से के बराबर होती है। रेडियो पर सुने लाख छियासी हजार मील की होती है, वे एक सेकेंड में सारी धरती की सात परिक्रमा कर लेती हैं। शब्द और प्रकाश की तरंगों का आकार एवं प्रवाह इतना सूक्ष्म एवं गतिशील है कि उन्हें बिना सूक्ष्म यन्त्रों की सहायता के हमारी इंद्रियां अनुभव नहीं कर सकती हैं।
इस सूक्ष्मता की चरमसीमा तक पहुँचते हैं तो उपनिषद्कार की भाषा में हम विद्युत ब्रह्म की सीमाएँ छूने लगते हैं। परमाणु सत्ता के अंतर्गत काम करने वाले विद्युत बिन्दुओं की ओर ही यह संकेत है। बृहदारण्यक उपनिषद् का ऋषि 5।7।1 में कहता है—”विद्युद्धयेव ब्रह्म” यह विद्युत ब्रह्म है।
चर्म−चक्षुओं से दीख पड़ने वाले वैभव विस्तार का मूल्य बढ़ा−चढ़ाकर मानने की स्थूल बुद्धि प्रायः धोखा खाती है। गहराई से तलाश करने से पता चलता है कि महत्व विस्तार का नहीं उसमें सन्निहित सूक्ष्म क्षमता का है। मनुष्य के धन, बल, पद, ज्ञान आदि के आधार पर नहीं, उसकी आन्तरिक स्थिति को देखकर ही यह समझा जा सकता है कि वह कितना समर्थ और कितना मूल्यवान है।
भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में सूक्ष्म शक्ति की ही प्रखरता काम करती देखी जा सकती है। जीवन की गरिमा और सफलता उसके स्थूल वैभव में सन्निहित नहीं है जैसी कि आम लोगों द्वारा समझी जाती है। उसका वर्चस्व सूक्ष्म चिन्तन द्वारा किये गये आत्म निरीक्षण और आत्म निर्माण में सन्निहित है। सद्गुणों की सम्पदा वह स्वर्ण भण्डार है जिसके छोटे−छोटे टुकड़ों के बदले प्रचुर मात्रा में मनोरंजक सामग्री खरीदी जा सकती है।
उदाहरण के लिए शरीर संचालन को ही लेते हैं। लगता है हाथ, पैर, सिर आदि के सहारे ही जीवन यात्रा चल रही है। ऊपरी परत उखड़ने पर पता लगता है कि रक्त ,माँस, हड्डी आदि धातुएँ प्रधान हैं। पीछे हृदय, फेफड़े, आमाशय, गुर्दे आदि के कल पुर्जे परस्पर मिल−जुल कर जिस तरह काम कर रहे हैं, उस तालमेल को देखकर अचम्भा होता है। आगे चलकर कोटि−कोटि जीवाणुओं की विचित्र गति विधियाँ देखकर उसे जादू का महल मानना पड़ता है। कभी मस्तिष्क का नियन्त्रण प्रधान लगता है, कभी हृदय का रक्त संचालन। कभी प्रतीत होता है—इन दोनों सेनापतियों की कमान में काया के असंख्य कल पुर्जे अनुशासित सैनिकों की तरह अहिर्निशि अपनी ड्यूटी दे रहे हैं।
हमारे शरीर में दो प्रकार की ग्रन्थियों का जाल बिछा हुआ है। एक वे हैं जो विशेष अंगों को अपना विशेष काम करने की शक्ति देने के लिए अपने स्राव निर्धारित नलिकाओं द्वारा यथा स्थान पहुँचाती हैं। आमाशय, आंतें, जिगर, गुर्दे, फेफड़े आदि अवयव उन्हीं स्रावों से शक्ति पाकर अपने−अपने काम ठीक तरह चला पाते हैं। दूसरी तरह की ग्रन्थियाँ वे हैं जो किसी विशेष स्थान से सम्बन्धित न होकर समूचे रक्त में अपना प्रभाव उत्पन्न करती हैं। स्राव तो उनसे भी निकलते हैं, पर वे समीपस्थ बारीक रक्त नलिकाओं द्वारा समूचे शरीर में फैले जाते हैं। उन्हें नलिका रहित ग्रन्थियाँ अथवा एण्डोक्राइन ग्लैण्ड कहते हैं। इनका महत्व अपने शरीर में अनेक दृष्टियों से अत्यधिक है। इन्हें अन्तः स्रावी ग्रन्थियाँ भी कहते हैं।
यह दूसरे किस्म की ग्रन्थियाँ ही जीव में नर−नारी का भेद, उनका कद, स्वभाव, बुद्धि, सौंदर्य, पुरुषार्थ आदि शारीरिक और मानसिक स्थिति को न्यूनाधिक करने के लिये उत्तरदायी है। इन्हें एक प्रकार से व्यक्ति त्व की सूत्र संचालिका कह सकते हैं।
एण्डीक्राइन ग्रन्थियाँ शरीर के विभिन्न स्थानों में अवस्थित हैं और उनके कार्य भी भिन्न−भिन्न हैं। इतने पर भी वे एक दूसरे के साथ संबद्ध हैं और मिल−जुल कर जीवन की गति विधियों के संचालन में ताल−मेल बिठाती है। इन्हें संगीत मण्डली कह सकते हैं जिसके सभी सदस्य अलग−अलग बाजे बजाते हैं, फिर भी इनकी ध्वनि ताल एक होती है। यदि इनमें से कोई बाजा अथवा वादक अपनी गतिविधियाँ वेसुरी कर दे तो सारी मण्डली का मजा मिट्टी हो जाता है। इसी प्रकार यह ग्रन्थियाँ एक दूसरे की पूरक बन कर रहती हैं। इनमें से एक भी गड़बड़ाती हैं तो दूसरी अन्य भी डगमगाने लगती है।
हारमोन बनाने वाली ग्रन्थियों में पाँच प्रमुख हैं (1) पिट्यूटरी (2) थाइराइड (3) पैराथाइराइड (4) पेंक्रियाज (5) एड्रीनल। इन ग्रन्थियाँ के तीन प्रमुख कार्य हैं एक शरीर तंत्र का रख रखाव तथा उन्हें क्रिया शील बनाये रहना। दूसरा शरीर वृद्धि को सुनियोजित रखना। तीसरा नर एवं मादा प्रजनन तंत्र का सुचारु रूप से संचालन।
पिट्यूटरी सब अन्तः स्रावी ग्रन्थियों के मास्टर है। बादाम जैसी आकृति की यह ग्रन्थि आँखों के गड्ढों के पीछे—कनपटी के पास है। इसके अगले हिस्से में से छह और पिछले में से दो हारमोन उत्पन्न होते हैं। ये शरीर की वृद्धि के काम आते हैं। शकर, चर्बी, स्टार्च, पानी आदि की ठीक मात्रा शरीर में बनाये रहना इन्हीं का काम है।
पिट्यूटरी पीयूष ग्रन्थि—खोपड़ी के आधार में—मस्तिष्क के नीचे—एक छोटे से गड्ढे में स्थित है। यह एक छोटी सी नलिका द्वारा मस्तिष्क से जुड़ती है। यह आकार में छोटी, पर प्रभाव में बहुत प्रखर है। इसमें अधिक स्राव होने लगे तो मनुष्य असाधारण रूप से लम्बे और बेडौल हो जाते हैं। सिर में दर्द रहता है, तथा दूसरी शिकायतें पैदा होती हैं।
अन्तः स्रावी ग्रन्थियों में एक है’थाइराइड’। यह गर्दन में साँस की नली के सामने होती है। इसके स्राव शरीर को विकसित करते हैं और सक्रियता प्रदान करते हैं। इसके स्राव बढ़ जायं तो वजन घटता जायगा, हृदय की धड़कन तेज हो जायगी, हाथ काँपने लगेंगे, आंखें उभरती , बाहर निकलती सी दिखाई पड़ेगी, और भूख बहुत अधिक लगने लगेगी । इस ग्रन्थि में आयोडीन रसायन घट जाता है तो गलगण्ड −− फूलने का रोग हो जाता है। हिमालय की तराई में यह रोग अधिक पाया जाता है। यदि बचपन में ही इसका स्राव कम निकले तो, मस्तिष्क अविकसित रह जायगा और बच्चा अपंग स्थिति का रहा जायगा।
तीसरी ग्रन्थियाँ हैं पैराथाइराइड। ये चार के समूह में होती है। इनका स्थान थाइराइड ग्रन्थि के पीछे है। इनका मुख्य काम हड्डियों को मजबूत बनाना है। यदि इनके स्राव बढ़ जायं तो हड्डियाँ बालुई हो जायेंगी और तनिक से आघात से उनके टूटने या मुड़ने का खतरा बना रहेगा। गुर्दे की पथरी भी इसी गड़बड़ी से उत्पन्न होती हैं। स्त्रियों के प्रजनन केंद्रों की हड्डियाँ गड़बड़ा जाने से वे बिना आपरेशन के बच्चा नहीं जन पातीं।
पेट में— आमाशय के नीचे पेंक्रियाज ग्रन्थि है। इसका मुख्य काम भोजन पचाने वाले रस पैदा करना है। साथ ही वह इंसुलिन नामक विशेष हारमोन भी बनाती है। यह रक्त में शकर का अनुपात ठीक रखती है।
आमाशय में आइलेट्स आफ लैंगर हेन्स ग्रन्थियाँ होती हैं। इनके स्राव इन्सुलिन कहलाते हैं। इन्हीं के कारण खाये गये कार्बोहाइड्रेट जाति के खाद्य पदार्थ शर्करा रूप में परिणत होते हैं और उनके द्वारा उत्पन्न गर्मी का लाभ सारा शरीर उठाता है। इन यह ग्रन्थियाँ इन्सुलिन के उत्पादन में कमी आ जाती है तो शर्करा शरीर में पचती नहीं और पेशाब के साथ बाहर निकलने लगती है। इसी स्थिति को डायबिटीज −मधुमेह— कहते हैं। कभी −कभी इन ग्रन्थियों में ट्यूमर हो जाता है और अनावश्यक मात्रा में इन्सुलिन बनने लगता है। तब सिर में चक्कर आना, रक्त चाप की कमी, बेहोशी जैसी शिकायतें रहने लगती हैं।
(5) एड्रीनल ग्रन्थियाँ गुर्दे के ऊपर दो हिस्सों में बँटी हैं। कार्टेक्स से तीन प्रकार के स्राव निकलते हैं। (1) ग्लूको कार्टिकाइड (2) इलेक्ट्रो कोटिकाइड (3) सेक्स हारमोन । इनमें प्रथम का कार्य शरीर में कार्बोहाइड्रेटों तथा बसा का भण्डार जमा करना है और प्रोटीनों का सही विभाजन करना है। वही इस संचय का उपयोग आपत्ति कालीन स्थितियों में करता है। दूसरा स्राव शरीर में पानी को तथा ऐडियम क्लोराइड को रोकता है। यह रोक थाम न हो तो शरीर पाला मारे वृक्ष की तरह सूख जायगा।
भावनात्मक उद्वेगों से एड्रीनल असाधारण रूप से उत्तेजित हो जाती है और आपत्ति से लोहा ले सकने योग्य शारीरिक एवं मानसिक ऊर्जा उत्पन्न करती है। क्रोध, भय, हर्ष, रोमाँस जैसे अवसरों पर रोमाँच हो जाता है, साँस तेज हो जाती है, रक्त प्रवाह बढ़ जाता है, पसीना छूटता है, यह सब इसी हारमोन का चमत्कार है। जिसके कारण मनुष्य असाधारण रूप से साहस एवं पराक्रम कर पाता है यौन संस्थानों पर इसी का भारी प्रभाव छाया रहता है।
वृषण ग्रन्थि नर में होती है, उसी से उसका पौरुष जगता है और दाढ़ी,मूँछ आदि पुरुष आकृति को नारी से भिन्न करने वाले लक्षण प्रकट होते है। यदि ये ग्रन्थियाँ निकाल ली जायँ तो सिंह भी भीगी बिल्ली की तरह डरता, सहमता दिखाई पड़ेगा। सन्तानोत्पादन से लेकर साहसिक कार्य करने तक से वे वंचित रह जायेंगे। यह वृषण ग्रन्थियाँ मादा के गर्भाशय के दोनों छोरों पर दूसरे रूप में होती है इन्हें डिम्ब कोष कहते हैं। इनसे दो स्राव निकलते हैं (1) ईस्ट्रोजेन (2) प्रोजेस्ट्रान। स्त्रियोचित कोमलता और गर्भधारण की क्षमता इन्हीं स्रावों से सम्बन्धित है। इनमें गड़बड़ी हो तो नारी में नर के चिह्न प्रकट होने लगेंगे अथवा वह गर्भधारण करने के अयोग्य रह जायगी। मूत्राशय को नियंत्रित करने वाली हारमोन ग्रन्थि लड़खड़ा जाय तो हर घड़ी पेशाब रिसने लगे। स्त्रियों का मासिक धर्म कभी बन्द ही न हो, प्रसव के उपरान्त जननेन्द्रिय सिकुड़ कर पूर्ववत् बन ही न सके । स्तनों में दूध बनाने का कार्य प्रोलैक्टीन ए. और बी. स्रावों पर निर्भर रहता है, यदि वे संतुलित न हों तो बच्चों को माता को दूध ही न मिल सके। काम शक्ति की न्यूनता और अधिकता भी इन्हीं स्रावों से सम्बन्धित है। यदि पीयूष ग्रन्थि का स्राव बढ़ जाय तो मनुष्य दैत्याकार बढ़ता चला जायगा, उनमें कमी आ जाने पर बौना रहना पड़ता है। थाइराइड की गड़बड़ी से इतनी क्षुधा जागृत हो सकती है, जिसे तृप्त करना ही कठिन पड़ जाय। यों दिन भर में इसका स्राव 1 बटा 2800 ओंस जितनी नगण्य मात्रा में निकलता है पर उसमें भी तनिक सी कमी पड़ जाय तो समझना चाहिए कि जवानी में बुढ़ापा आ गया।
मस्तिष्क के मध्य में अवस्थित पिट्यूटरी ग्रन्थि अन्य सभी हारमोन ग्रन्थियों का नियंत्रण करती है। मस्तिष्क की तीक्ष्णता और सुकोमल भाव संवेदना से भी इसी का सीधा सम्बन्ध है। योग विज्ञान के अनुसार इसे आज्ञाचक्र कहा जाता है। शिव तथा दुर्गा को तीन नेत्र वाला चित्रित किया जाता है। यह आज्ञाचक्र की प्रखरता का ही संकेत है। दिव्य दृष्टि का अतीन्द्रिय चेतना का सम्बन्ध इसी शक्ति केन्द्र से है। ध्यान साधना में इसी स्थान में प्रकाश ज्योति की धारणा को महत्व दिया जाता है। क्षीरसागर में सोये शेषशायी विष्णु की ओर मानसरोवर स्थित कैलाश पर विराजमान शिव की कल्पना इस आज्ञाचक्र के रहस्योद्घाटन के रूप में ही की गई है। ग्रेमैटर—मस्तिष्कीय मज्जा क्षेत्र—क्षीर सागर या मानसरोवर कहा गया है। इसी के मध्य में से पिट्यूटरी ग्रन्थि का चेतन पक्ष आज्ञाचक्र अवस्थित है।
शिवजी ने तीसरा नेत्र खोल कर कामदेव को जला दिया था। इस उपाख्यान की संगति इस प्रकार बैठती है कि इस केन्द्र से कामोत्तेजना का सीधा सम्बन्ध है। बर्लिन मेडिकल कालेज में एक ऐसा 11 वर्षीय लड़का लाया गया जिसके यौन अंग पूर्ण विकसित जैसे विकसित हो गये थे और उसे इस दृष्टि से परिपक्व वयस्क घोषित कर दिया गया। उस लड़के की यही ग्रन्थि अधिक स्राव दे रही थी।
शरीर की असाधारण घट−बढ़ से इसी ग्रन्थि का सीधा सम्बन्ध है। संसार में सबसे ऊँचा 8 फुट 11 इंच ऊँचा राबर्ट वाडली और 25 इंच ऊँच बौना टामथम्ब अपनी विलक्षणता इसलिए प्रस्तुत कर सके कि उनकी पिट्यूटरी ग्रन्थि के स्रावों ने असाधारण रीति अपनाई थी।
हारमोन स्रावों पर कैसे नियंत्रण किया जाय, इसका कोई कारगर उपाय समझ में नहीं आया। एक प्राणी के हारमोन दूसरे प्राणी के शरीर में पहुँचाने की क्रिया बहुत थोड़ा लाभ पहुँचा सकी है और कई बार तो उसके उलटे परिणाम हुए है। उदाहरण के लिए सौंदर्य बढ़ाने के नाम पर, स्त्रियों के बढ़े हुए स्तन छोटे करने के लिए ‘रिड्युसिंग क्रीम’ का उपयोग चला और छोटों को बड़ा बनाने के लिए एस्ट्रोजन हारमोन शरीर में पहुँचाये गये। इससे तात्कालिक लाभ तो दिखाई पड़ा, पर कुछ दिन बाद दूसरी यौन विकृतियाँ खड़ी हो गई। इसी प्रयोग में फ्रेंच महिला की दाढ़ी−मूँछ उग आई और वह रहासहा सौंदर्य भी खो बैठी। नये प्रयोगों में उन स्थानों पर विद्युत संचार कराने के उपचार काम में लाये गये हैं, पर लगता है; वे संस्थान कहीं अन्यत्र से प्रेरणा लेते हैं और चिकित्सा उपकरणों से क्रुद्ध होकर कुछ नई कठिनाई खड़ी कर देते हैं।
हारमोन विज्ञान हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचाता है। शरीर संस्थान के विभिन्न अवयव कितने ही समर्थ सुविकसित दिखाई क्यों न पड़ते हों उनका उतना महत्व नहीं जितना नगण्य सी एक ग्रन्थि की विशेष के एक बूँद से भी कम मात्रा में निकलने वाले स्राव का। जीवन का बाहरी रूप कितना ही बढ़ा−चढ़ा क्यों न हो उसकी सम्पदाओं की उपलब्धि, स्थिरता और सफलता का सारा आधार आन्तरिक प्रवृत्तियों की धुरी पर गति शील हो रहा है। स्थूल पर अटकी पड़ी हमारी मोटी दृष्टि यदि सूक्ष्म की गहरी परतों के भीतर झाँक सके तो उसे हारमोन शोधकर्ताओं की तरह इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि चेतना का प्रकृति संस्थान ही शक्ति स्रोत है, उसी की श्रेष्ठता−निष्कृष्टता के आधार पर हम उत्थान, पतन की परिस्थितियाँ प्राप्त करते हैं।
पिछले तीस वर्षों में मनुष्य को विज्ञान के देवता ने तीन उपलब्धियाँ प्रदान की हैं। इनमें से एक है अणुविखण्डन। सन् 45 में एलमागाडो (न्यू मैक्सिको) में प्रथम अणुविगठन परीक्षण हुआ था। तब से अब तक उस दिशा में एक से एक बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त हो चुकी हैं। दूसरी उपलब्धि है—आनुवांशिकी की नई व्याख्याएँ। जीवकोष की गहराई में समान जीवकोषों के पुनर्जन्म के लिए निर्देश संहिता की खोज। जीव तत्व के इस उद्गम केन्द्र के पकड़ में आ जाने से अब प्राणियों की आकृति और प्रकृति में अभीष्ट परिवर्तन कर सकने का सूत्र हाथ लग गया है। तीसरी उपलब्धि है—अन्तर्ग्रही यात्रा के लिए अपनी पृथ्वी की पकड़ से आगे वाले अन्तरिक्ष में प्रवेश। इस दिशा में चन्द्रयात्रा पहला कदम था। सौरमण्डल की खोज−खबर लेने के लिए अभी निर्जीव गुप्तचरों के रूप में राकेट भेजे गये हैं निकट भविष्य में उनमें शरीरधारी जा सकेंगे। पीछे सौरमण्डल की परिधि पार करके अनन्त अन्तरिक्ष में—सुविस्तृत ब्रह्माण्ड में—स्वेच्छा भ्रमण सम्भव हो जायगा।
यों मनुष्य की दुर्बुद्धि ने इन उपलब्धियों के कारण संसार को भयभीत ही किया है और अनेकों आशंकाओं में डुबोया है, पर यह सम्भावना भी विद्यमान है कि यदि उनका सदुपयोग सम्भव हो सका तो मानवी शक्ति एवं सुविधाओं की सीमा न रहेगी।
अणुविखण्डन का प्रधान रूप अणुबमों के रूप में ही सामने आया है और सर्वसाधारण के लिए अणु विज्ञान और अणुबम एक ही जाने जाते हैं और उससे इस सुन्दर पृथ्वी के सर्वनाश की सम्भावना ही सोची जाती है, पर यह एक पक्ष है समूचा प्रतिपादन नहीं। अणु शक्ति में प्रचुर विद्युत उत्पादन हो सकता है और उससे मानवी श्रम में बचत होने से वह अन्य साहित्य, कला आदि बौद्धिक प्रयोजनों के लिए अवकाश प्राप्त कर सकता है। उद्योग, चिकित्सा, मनोरंजन जैसे कितने ही प्रयोजन इस शक्ति से बहुत सस्ते मूल्य पर सरलता के साथ प्राप्त हो सकते हैं। इससे गरीबी एवं कड़ी मेहनत से छुटकारा मिल सकता है और अधिक सुख सुविधा भरा जीवन जिया जा सकता है।
परिष्कृत आनुवांशिकी में पीढ़ियों से चले आ रहे कुसंस्कारों से नई सन्तति को मुक्त किया जा सकेगा। शरीर में दुर्बलता, रुग्णता के अनेक बीज पीढ़ियों से चले आते हैं और स्वभाव में ऐसी प्रेरणाएँ भरी रहती है जो इच्छा के विपरित उसे अवाँछनीय स्थिति में डाले रखती है। सामान्य संकल्प बल एवं उपचार भी उन्हें पूरी तरह निरस्त नहीं कर सकते और प्रगति की आकाँक्षा किसी अज्ञात द्वारा पग−पग पर असफल की जाती रहती है। यद्यपि मूल कठिनाई अपने ही भीतर होती है, पर जब वह उलटने, बदलने में न आ सके तो उसे बाहरी भी कहा जा सकता है। भाग्य एवं विधि−विधान ऐसी ही विषम परिस्थिति को कहा जाता है। अब इस आनुवांशिकी की नवीनतम खोजों को फलितार्थ बनाने के प्रयत्न चल पड़े हैं और यह सम्भव दिखाई देने लगा है कि मनुष्य की प्रकृति ही नहीं आकृति भी बदली जा सकेगी। परिस्थितियों के साथ तालमेल कर चलने वाला सन्तुलित और परिष्कृत मनुष्य का निर्माण अगले दिनों सम्भव हो जायगा। उस प्रयास की सफलता को देव सृष्टि की अभिनव संरचना कहा जा सकेगा, वस्तुतः वह समय कितना सुन्दर और सुखद होगा इसकी कल्पना मात्र से मन में सिहरन उठती है।
पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण और हवा के कड़े कवच के अन्दर निर्वाह करने वाला मनुष्य गूलर के भुनगों की तरह है यह बात तब समझ में आती है जब पृथ्वी और चन्द्रमा के बीच अधर अन्तरिक्ष में हम यात्रा पर निकलते हैं। ब्रह्माण्डीय सम्पदा कितनी असीम है, उसका विस्तार कितना सुविस्तृत है और उसमें रहने वाले प्राणी कितने समुन्नत है, इसका प्रत्यक्ष परिचय जब मिलेगा और ससीम का असीम के साथ निर्वाध आदान−प्रदान सम्भव होगा तो आदमी अपने को सचमुच ही ‘बड़ा’ अनुभव करेगा। तब उसका बड़प्पन सचमुच ही गौरवास्पद होगा।
भार और वायु रहित स्थिति में रह सकने की स्थिति ढूँढ़ने के प्रयास में मनुष्य के हाथों ऐसी एक से एक अद्भुत उपलब्धियाँ लगी हैं जो अन्तरिक्ष खोज से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही लाभदायक सिद्ध होगी। अन्तरिक्ष में कहीं भी बस सकना सम्भव हो सकता है। पृथ्वी तक आने वाले अन्तरिक्षीय अनुदानों में से अभी बहुत स्वल्प अंश ही काम में आता है उसकी उपयोगी मात्रा को ग्रहण करना और अनुपयोगी को हटाकर मौसम इच्छानुकूल बनाये जा सकते हैं। भूकम्प, बाढ़, तूफान आदि दैवी प्रकोपों पर नियन्त्रण किया जा सकता है। समुद्र, बादल, हवा, गर्मी, सर्दी आदि को इच्छानुवर्ती बनाया जा सकता है। यह सबब प्राप्त कर सकने के उपरान्त मनुष्य कितना बलिष्ठ और सशक्त होगा; इसकी कल्पना करने मात्र से लगता है कि हम किसी जादुई युग में भ्रमण कर रहे हैं। यह कल्पना सदा जल्पनाएँ ही बनी रहें, ऐसी बात नहीं है। प्रगति के पिछले इतिहास के साथ भविष्य की सम्भावनाओं को जोड़ देने पर लगता हे यह असम्भव नहीं वरन् पूर्णतया सम्भव है आज की कल्पना कल मूर्तिमान बन सके इसकी सम्भावनाएँ अमान्य नहीं ठहराई जा सकतीं।
प्रकृति के प्रत्येक कक्ष में एक से एक बड़ी सम्पदाएँ भरी पड़ी हैं, यदि सीधे मार्ग पर चलकर उन्हें करतलगत किया जाय तो मनुष्य की भौतिक सम्पदा भी अतुलनीय बन सकती है,पर हो तो उलटा रहा है। विकास के नाम पर विनाश खोजा जा रहा है। यदि सीधी चाल चलें तो आकाश में घूमने वाले हिमपर्वतों तक को खोजा जा सकता है और उन्हें शुष्क उष्ण प्रदेशों कर सरसता और शीतलता का लाभ लिया जा सकता है।
आकाश से पानी बरसता है, छोटे−छोटे ओले भी बरसते हैं। पर कभी−कभी बर्फ की ऐसी चट्टानें भी बरसती देखी गई हैं जो तोप के गोले की तरह जहाँ भी गिरें वहाँ सफाया करके रखदें।
ब्रिटीशचेनल के समीप सामरसेट क्षेत्र में 10 नवम्बर 1950 में लैथम नामक किसान के खेत में 15 पौण्ड भारी बर्फ के गोले बरसे थे जिससे उसकी भेड़ें मर गई और जमीन में एक फुट गहरे गड्ढे हो गये थे।
लन्दन के पास वैंडस वार्य में 24 नवम्बर 1950 की ऐसी ही एक बड़ी चट्टान गिरी थी। अप्रैल सन् 1954 में कैलीफोर्निया के नापा स्थान पर एक−एक फुट के ओले पड़े थे। पेन्सिलवेनिया में रीडिंग नामक स्थान में एडविन ग्राफ नामक किसान के खेल में 50 पौण्ड भारी और दो फुट मोटी बर्फ की सिल्ली एक बड़े धमाके के साथ गिरी और जमीन में गड्ढा करती चली गई। पेन्सिलवेनिया गोर्वने तथा चेस्टर में भी ऐसे ही हिमखण्ड गिरे थे। 2 सितम्बर 1958 की रात को न्यूजर्सी में ग्रेस्टोन रोड पर भी ऐसा ही एक भयंकर गोला गिरा था जो छत में तीन फुट चौड़ा छेद बनाता हुआ एक घर में गिरा था और घर वाले मरते−मरते बचे थे।
आकाशीय स्थिति विशेषज्ञों द्वारा खोज करने पर पता चला है कि आकाश में हिमानी चट्टानें और पहाड़ियाँ इतनी अधिक मात्रा में विद्यमान है जोकि इधर से उबर ले जाने में इतनी आसान है कि उन्हें हलके चुम्बकीय थपेड़े देकर किसी भी क्षेत्र तक घसीट कर ले जाया जा सकता है और मनचाही मात्रा में धरती पर उतारा जा सकता है।
विज्ञान के साथ यदि सद्ज्ञान का समन्वय हो सके तो अपनी धरती पर इन्हीं पदार्थों, इन्हीं व्यक्ति यों और इन्हीं परिस्थितियों में स्वर्गीय वातावरण का सृजन हो सकता है।
मानसिक दोषों को स्वभाव भिन्नता या स्वभाव दुर्बलता मात्र छोटी बात समझ कर ऐसे ही उपेक्षा में डाल दिया जाता है; जबकि उन्हें अपच, रक्त चाप, जकड़न, थकान जैसे शारीरिक रोगों से भी अधिक घातक मानकर उनके कारण और निवारण की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए।
चिन्तन सही और संतुलित हो तो सामान्य स्तर का मस्तिष्क भी पग−पग पर सफलताएँ उत्पन्न करता है और सामान्य परिस्थितियों में रहने पर भी सुव्यवस्थित और सुखी जीवन जिया जा सकता है। इसके विपरित छोटी−छोटी मानसिक विकृतियाँ भी सुविकसित सुशिक्षित मस्तिष्क की क्षमताओं को चौपट करके रख देती हैं। उलझा व्यक्ति स्वयं सनकता रहता है और सम्बंधित लोगों को हैरान करता रहता है। विकृत चिन्तन का नाम ही नरक है। बाहर वालों को स्पष्ट न दीख पड़ने पर भी सनकी व्यक्ति अपने भीतर बेतरह जलते−कुढ़ते रहते हैं और अपनी बहुमूल्य बौद्धिक क्षमताएँ लाभदायक मार्ग पर नियोजित करने की अपेक्षा अपने और दूसरों के विनाश में नष्ट करते रहते हैं। उलटी चाल का परिणाम उलटा होना निश्चित है। ऊँचा उठने के साधन जुटाने की अपेक्षा यदि कोई नीचे गिरने पर उतारू बना रहे तो वही श्रम परिस्थितियों में जमीन आसमान जितना अन्तर उत्पन्न कर देगा।
हमें मानसिक रोगों की और उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उनसे अनजान नहीं रहना चाहिए और यह नहीं भूलना चाहिए कि विकृतियों की यही छोटी चिनगारियाँ जीवनरूपी सुरम्य उद्यान को भस्म कर डालने का कारण बनाती है। मनोविकारों के दुष्परिणामों को समझ सकने के उपरान्त ही उनसे बचने की तत्परता उत्पन्न हो सकती है।
अमेरिका के मानसिक रोग विज्ञानी राबर्ट डीराव ने अपने सुविस्तृत सर्वेक्षण के आधार पर लिखा है—केन्सर, हृदय रोग, क्षय इन तीनों रोगों से ग्रसित जितने व्यक्ति दुःख पाते हैं, उसकी सम्मिलित संख्या से भी अधिक इस देश में मानसिक विकृति से ग्रस्त पाये जाते हैं। इनमें से एक तिहाई ही इलाज के लिए जाते हैं, दो तिहाई तो अपनी स्थिति को समझ तक नहीं पाते और ऐसे ही अस्त−व्यस्त स्थिति में स्वयं दुख पाते और दूसरों को दुःख देते हुए भटकते रहते हैं। जीन माइनोल ने अपनी पुस्तक ‘दि फिलासफो आफ लोंगलाइफ पुस्तक में लिखा है—जल्दी मृत्यु का एक बहुत बड़ा कारण है−मृत्युभय। लोग बुढ़ापा आने के साथ−साथ अथवा छुटपुट बीमारियाँ उत्पन्न होते ही मृत्यु की आशंका से भयभीत रहने लगते हैं और वह डर उनके मस्तिष्क की बाहरी पर्तों में इस कदर धँसता जाता है कि देर तक जी सकना कठिन बन जाता है। वह डर ही सबसे बड़ा रोग है जो मृत्यु को अपेक्षाकृत जल्दी ही समीप लाकर खड़ा कर देता है।
अरब देश में कुछ शताब्दियों पूर्व एक प्रख्यात चिकित्सक हुआ है—हकीम इब्नसीना। उसने अपनी पुस्तक ‘कानून’ में अपने ऐसे अनेकों चिकित्सा अनुभवों का उल्लेख किया है कि अमुक प्रकार के मानसिक उभारों के कारण शरीर में अमुक प्रकार की विकृतियाँ या बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं। चिकित्सा−उपचार में उसने दवादारु के स्थान पर उनकी मनःस्थिति बदलने के उपाय बरते और असाध्य लगने वाले रोग आसानी से अच्छे हो गये।
‘इलिनोयस इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी’ द्वारा संग्रहित आंकड़े यह बताते हैं कि चिन्तातुर व्यक्तियों को जिस भयभीत स्थिति में रहते हुए अपनी शान्ति गँवानी पड़ती है, उसका वास्तविक अस्तित्व कम और काल्पनिक बवंडर अधिक होता है। जो आशंका, आतंक उन पर छाया रहता है, उसका मूर्तिमान रूप कदाचित ही कभी सामने आता है। अधिकतर तो वे बवंडर मस्तिष्क में उत्पन्न होते हैं, वहाँ मन्द अथवा द्रुत गति से घूमते रहते हैं और तब शान्त होते हैं, जब नये बवंडर उन्हें धकेल कर अपना कब्जा जमा लेते हैं। आत्म विश्वास का अभाव और कुकल्पनाएँ गढ़ने में उत्साह का मिला−जुला रूप ही मनुष्य को भयाक्रान्त एवं चिन्तातुर बनाने का प्रधान कारण है।
येल विश्व विद्यालय के मनोविज्ञान विभाग ने भयभीत मनःस्थिति का शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ने और स्वास्थ्य नष्ट होने की प्रतिक्रिया के अनेक तथ्य प्रस्तुत करते हुए प्रमाणित किया है—चिन्ता अथवा भय की स्थिति में पड़े हुए व्यक्ति यों के दिल की धड़कन बढ़ जाती है, बड़ी तेज चलने लगती है, गला सूखता है, पसीना छूटता है, कमजोरी अनुभव होती है और पेट बैठता−सा लगता है और सिर पर बोझ लदा सा अनुभव होता है, नींद घट जाती है और स्मरण शक्ति झीनी पड़ती चली जाती हैं।
चिन्ता सामान्य और भयभीतता बढ़ी हुई स्थिति है। वस्तुतः दोनों एक ही बीमारी के हलके भारी दो रूप हैं, उनका शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका विश्लेषण करते हुए आयोग ने बताया है कि सिर दर्द की स्थिति में जो शारीरिक संतुलन बिगड़ता है उसकी तुलना में चिन्ता में ड्योढ़ी और भयभीत स्थिति में दूनी गड़बड़ी उत्पन्न होती है। शरीर को इसी अनुपात में दबाव सहन करना पड़ता है।
आयोग ने एक आश्चर्यजनक तथ्य यह भी देखा है कि मानसिक रोगियों का इलाज करते−करते स्वयं मानसोपचारक भी चिन्तित रहने लगते हैं। अचेतन उन्हें भी बख्शता नहीं। दूसरों को उपदेश देने और इलाज करने के बावजूद वे स्वयं भी सामान्य कठिनाइयों में बेतरह उलझे पाये जाते हैं। आश्चर्य यह है कि अपनी जैसी स्थिति में दूसरे व्यक्ति को रोगी गिनते हैं और अपने को निरोग। यह छूत की बीमारी उन्हें अपने रोगियों से और वैसी ही बातों की उधेड़ बुन करते रहने के कारण लग गई होती है। आयोग का सुझाव है कि मानसोपचार का कार्य बहुत ही सुदृढ़ मनःस्थिति के ‘मस्त मौला’ लोगों को करना चाहिए।
चिन्तातुर व्यक्ति यों का पूर्व इतिहास खोजने पर यह निष्कर्ष निकला है कि वे दुराव रखने वाले और आडम्बर बनाने वाले, बहाने बाज एवं ढोंगी रहे होते हैं। छिपाव की वृत्ति अपने नये रूप में चिन्ता बन कर मस्तिष्क में जड़ जमाती है और बढ़ने पर भयाक्रान्त, आशंका ग्रस्त बना देती है, ऐसे मनुष्य पग−पग पर अपने ऊपर कोई बड़ा संकट अब तब आता देखते रहते हैं। यद्यपि उन आशंकाओं में एकाध का ही सामना किसी−किसी को करना पड़ता है।
साइको न्यूरोटिक की स्थिति वह है जिसमें कई विचारों का समन्वय करके तर्क और बुद्धि का ठीक तरह उपयोग नहीं हो पाता। कुछ एकांगी मान्यताएँ ही मस्तिष्क पर छाई रहती है और मनुष्य बिना सोच विचार किये उन्हें ही सच मानता और अपनाये रहता है। यह अविकसित मस्तिष्क का चिह्न है। इसे बाल बुद्धि कह सकते हैं। छोटे बच्चों में भी तर्क शक्ति विकसित नहीं होती, वे इच्छाओं, उत्साहों और भावनाओं में ही प्रेरित रहते हैं।
नशेबाजों और अपराधियों में भी इस रोग के लक्षण उभरे रहते हैं। वे अपनी आदतों के विरुद्ध सुनते तो बहुत कुछ हैं, पर अचेतन उनसे प्रभावित नहीं होता और जो आदत अपना ली गई है वह हर हालत में अपने ढर्रे पर चलती ही रहती है। अन्धविश्वासी तथा अति भावुक व्यक्ति भी आँशिक रूप में इसी व्यथा के चंगुल में फँसे होते हैं।
ऐक्जाइटी न्यूरोसिस—दुश्चिन्ता से अनेकानेक घिरे देखे पाये जा सकते हैं। चिन्ता वास्तविक है या अवास्तविक? निकट भविष्य में जिस आशंका की विभीषिका कल्पित की गई है वह आने वाली भी है या नहीं? इन दिनों जिस संकट में अपने को जकड़ा हुआ मान लिया गया है, वह अपनी मान्यता के अनुरूप भयंकर है भी या नहीं? यह सोचने को ऐसे लोगों को फुरसत ही नहीं होती। वे अपनी भयंकर कल्पना को निरन्तर सोचते और परिपुष्ट करते रहते हैं अस्तु वह इतनी प्रबल एवं प्रभावशाली बन जाती है कि अवास्तविक होते हुए भी वास्तविकता से भी अधिक त्रास देती है। वास्तविक संकट आने पर शायद उतना कष्ट न सहना पड़ता जितना उस अवास्तविक कल्पना कष्ट न सहना पड़ता जितना उस अवास्तविक कल्पना ने दे डाला, इस निष्कर्ष पर पहुँच सकना उनसे बन ही नहीं पड़ता।
‘आपसेसिव कम्पलसिव न्यूरोसिस’ में भीतर की घुटन बाहर फूट पड़ता है। दुश्चिन्ताएँ मस्तिष्क के भीतर तक सीमित नहीं रहतीं वरन् उस दीवार को फोड़ कर बाहर निकल पड़ती हैं और क्रिया के साथ सम्बद्ध होकर ऐसे आचरण प्रस्तुत करती हैं जो उपहासास्पद होते हैं और दयनीय भी। यों उसे ऐसा लगता है मानों चिन्ताएँ, पीड़ा एवं प्रताड़ना के रूप में उसे संत्रस्त कर रही हैं, अस्तु वह रोता, कलपता एवं सिर धुनता हुआ देखा जाता है। आँखों में से आँसू, सिर में दर्द, चेहरे पर छाई विषाद की गहरी रेखा देख कर देखने वाला यही कह सकता है, इसे बहुत कुछ सहना पड़ रहा है और किसी भारी संकट से होकर गुजरना पड़ रहा है। रोग का रोगी हर समय अपने इर्द−गिर्द अपवित्रता घिरी देखता है। आंतों में मल, कण्ठ में कफ, भरा रहने की शिकायत रहती है। हाथ, पैर, मुँह धोने और कुल्ला करने की बार−बार आवश्यकता पड़ती है। बर्तन, कपड़े, फर्श, बिस्तर, फर्नीचर आदि गन्दे लगते हैं, इसलिए इन्हें अनेक बार धोते रहने पर भी संतोष नहीं होता और वही क्रिया उलट−पुलट कर फिर करने को जी करता है। दूसरे पूछ सकते है कि यह सब बार−बार क्यों किया जा रहा है, इसलिये अचेतन मन उसका उत्तर देने के लिए कुछ न कुछ बहाना भी गढ़ लेता है। उससे उसे यह सन्तोष हो जाता है, यह क्रिया निरर्थक नहीं वरन् सार्थक की जा रही है।
हताश हुए मनुष्य अपना मानसिक संतुलन खो बैठते हैं और अवसाद ग्रस्त होकर सामान्य शरीर संचालन के क्रियाकलापों तक से वंचित हो जाते है। खाने, सोने और नित्य कर्म करने भर की याद तो रहती है, पर अन्य उत्तरदायित्वों और निर्धारित कर्त्तव्यों को एक प्रकार से भूल ही जाते हैं। याद दिलाने पर ही कुछ कर पाते हैं, अन्यथा खोये−खोये से, भूले−भाले से, जहाँ−तहाँ बैठे किसी स्वप्न लोक में विचरते रहते हैं। गहरी निराशा से ऐसी या इससे मिलती−जुलती स्थिति बन जाती है इसे मानसिक चिकित्सा के संदर्भ में एजीटेटेड डिप्रेसिक साकोसिस कहते हैं।
अपनी निजी उलझनों के सम्बन्ध में अत्यधिक उलझे रहना और उन्हीं पर उलट−पुलट कर विचार करते रहना एक ऐसा गलत क्रम है जिससे मनुष्य संकीर्णता ग्रस्त हो जाता है और उसे तरह−तरह के मनोविकार धर दबोचते हैं। इस स्थिति को न्यूरेस्थीसिया कहते हैं।
केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की पिछली वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार अपने देश में इस समय लगभग एक करोड़ मानसिक रोगी हैं। इनमें से कम से कम आठ लाख तो ऐसे हैं ही जिन्हें पागल खानों में स्थान मिलना ही चाहिए अन्यथा वे दूसरे लोगों की शान्ति भंग करते ही रहेंगे। ऐसे लोग जो मानसिक दृष्टि से छोटे बच्चों जैसी अविकसित स्थिति में रह कर गुजार रहे हैं लगभग 16 लाख हैं।
मनुष्य समाज में बढ़ रही मानसिक अक्षमता और विकार ग्रस्तता का प्रमुख कारण यह है हक हमारा थोड़ा बहुत ध्यान स्वास्थ्य की उपयोगिता समझने पर तो गया भी है, पर मानसिक स्वास्थ्य की बात एक प्रकार से विस्मृत ही कर दी गई है। मानसिक दृष्टि से अविकसित स्त्री, पुरुषों की सन्तानें पैतृक उत्तराधिकार के रूप में अदक्षता लेकर जन्मती हैं और फिर बच्चों के मानसिक परिष्कार की कोई व्यवस्था न होने से वे क्रमशः बढ़ती ही जाती है।
यह तथ्य जल्दी ही समझ लिया जाना चाहिए कि जीवन को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए स्वस्थ सक्षम शरीर चाहिए। यह उपलब्धि मस्तिष्क के संतुलित रहने पर ही सम्भव है। मानसिक स्वस्थता की और अधिक ध्यान देने की और उस क्षेत्र में जमी हुई विकृतियों को उखाड़ने की ओर हम जितने सक्रिय होंगे जीवन उतना ही सफल और सरस बन सकेगा।
मरण समय में विक्षुब्ध मनःस्थिति लेकर करने वाले अक्सर भूत−प्रेत की योनि भुगतते हैं, पर कई बार सद्भाव संपन्न आत्माएँ भी शान्ति और सुरक्षा के सदुद्देश्य लेकर अपने जीवन भर सम्बन्धित व्यक्ति यों को सहायता देते—परिस्थितियों को संभालते तथा प्रिय वस्तुओं की सुरक्षा के लिए अपने अस्तित्व का परिचय देते रहते हैं। ऐसी आत्माएं ‘पितर’ कहलाती हैं। पितृवत् स्नेह, दुलार और सहयोग देना भर उनका कार्य होता है। सुकरात को—विक्रमादित्य को ऐसी ही दिव्य आत्माओं का सहयोग प्राप्त बताया जाता है और वे उनके सहारे कई प्रकार की अदृश्य सुविधाएँ प्राप्त करते थे।
अमेरिका के राष्ट्रपति भवन में समय−समय पर जिन पितरों के अस्तित्व अनुभव में आते रहते हैं उनके आधार पर यह मान्यता बन गई है कि वहाँ पिछले कई राष्ट्रपतियों की प्रेतात्माएँ डेरा डाले पड़ी हैं। इनमें अधिक बार अपने अस्तित्व का परिचय देने वाली आत्मा अब्राहमलिंकन की है।
राष्ट्रपति टूमैन ने एक टेलीविजन वार्ता पर अपनी बेटी को बताया कि एक रात तीन बजे के करीब किसी ने जोर से दरवाजा खटखटाया। मैं उठा और दरवाजा खोला तो कोई तेज कदम बढ़ता हुआ दूसरी ओर चला गया। पीछा करने पर भी उसे पकड़ा न जा सका। उनकी पत्नी ने भी कई बार लिंकन का प्रेत खिड़की के पास खड़े होकर बरजीनियाँ की पहाड़ियों को देखते हुए पाया है।
लिंकन स्वयं प्रेतवाद पर बहुत विश्वास करते थे। इसके उन्हें कई अनुभव भी थे। उन्होंने अपनी मृत्यु पूर्वाभास का सपना अपने परिवार और मित्र मण्डली को कई बार सुना दिया था और वह अन्ततः सच होकर रहा। लिंकन ने एक दिन सपना देखा—वे राष्ट्रपति भवन में अपनी जगह सोये हुए हैं—पास के कमरे से रोने की आवाज आ रही है—वे उठकर जाते हैं−देखते हैं कि एक लाश सुसज्जित रूप से अन्तिष्ठ कर्म के लिए तैयार की जा रही है—उसका उपस्थित अफसर लोग शाही सत्कार के साथ वन्दन कर रहे हैं—लिंकन पूछते हैं—राष्ट्रपति भवन में यह कौन मर गया—एक अफसर जवाब देता है—यह राष्ट्रपति लिंकन हैं उनकी हत्या कर दी गई है। सपना उनकी निकट भविष्य में होने वाली मृत्यु सूचना का स्पष्ट आभास था।
राष्ट्रपति भवन में और भी कई आत्माओं के अस्तित्व पाये गये हैं। राष्ट्रपति एडम्स ने अपनी मृत पत्नी को बगल के कमरे में कपड़े सँभालते हुए देखा था।
राष्ट्रपति जैक्सन को अक्सर ठहाका मारकर हँसते हुए सुना जाता था। कई नौकर डरकर नौकरी छोड़ गये थे और कई संभ्रांत अतिथियों ने उस महल में प्रेतात्माओं द्वारा की गई छेड़खानी का विवरण बताकर अपना बिस्तर अन्यत्र ले जाने का प्रबन्ध किया था।
राष्ट्रपति मेडीसन की मृत पत्नी अपने हाथ के लगाये गये गुलाबों को बहुत प्यार करती थीं और उनके रख रखाव के बारे में मालियों को कई तरह के परामर्श देती थी।
प्रेतात्माएं क्या हो सकती हैं इस संदर्भ में कई तरह की विवेचनाएँ की जाती रहती हैं। नवीनतम वैज्ञानिक ऊहापोह में ‘एक्ट्रोप्लाज्म’ नामक तत्व के साथ जुड़ी हुई जीव चेतना के रूप में निरूपित किया गया है।
सर आर्थर कानन डायल ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘शर लाक होम्स’ में प्रेतलोक को एक अपनी जैसी दुनिया के रूप में ही प्रतिपादित किया है और कहा है कि जिस प्रकार हम शरीरधारियों की एक जीवनयापन पद्धति है वैसी ही अदृश्य प्राणी भी अपनी दुनिया में अपने ढंग से गुजारा करते हैं। उनमें से बहुत से हम दृश्य प्राणियों के साथ सम्बन्ध रखने के भी इच्छुक होते हैं।
मनोविकार बहुधा अपने को ही गलाते घुलाते रहते हैं; पर उनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जो आक्रामक स्तर के होते हैं और दूसरों को क्षति पहुँचाये बिना सन्तुष्ट नहीं होते हैं और दूसरों को क्षति पहुँचाये बिना सन्तुष्ट नहीं होते। चिंता, भय, निराशा जैसी प्रवृत्तियों में मनुष्य स्वयं ही घुटता रहता है और उस घुटन से अपनी आन्तरिक क्षमताओं को नष्ट भ्रष्ट करके दीन−दयनीय बनता चला जाता है। इसके विपरीत क्रोध, द्वेष, क्रूरता जैसे दोष आक्रामक होते हैं, उनका समाधान दूसरों को तिरस्कृत, पीड़ित, दंडित किये बिना होता ही नहीं। उद्धत अहंकार भी दूसरों को गिराकर तुलनात्मक दृष्टि से अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के ताने−बाने बुनता रहता है। ईर्ष्या, कुढ़न, जलन अक्सर उद्धत अहंकार की प्रतिक्रिया ही होती है, वे दूसरों को अपने आक्रोश का निशाना बनाती है। छुटपुट, लड़ाई झगड़ों से लेकर महायुद्ध तक इसी पृष्ठभूमि पर विकसित होते हैं।
अपने पक्ष के किसी भी प्रतिपादन को सही सिद्ध करना और दूसरे पक्ष पर अनेकानेक दोषारोपण करना दूषित यह एक प्रचार तन्त्र है। इसी से प्रेरित होकर युद्धोन्माद भड़कता है और घृणा, द्वेष के बीज फलते फूलते हैं।
लड़ाई की अवाँछनीयता और सहयोग की उपयोगिता सिद्धान्त रूप से हर किसी को समझाई जा सकती, पर विकृत ‘अह’ उसे कथन श्रवण तक ही सीमित रखता है और मान्यता, भावना एवं क्रिया की गहराई तक उसे उतरने नहीं देता। जो हम सोचते हैं वही उचित है—जो हम चाहते हैं वही आवश्यक है। जब ऐसी मान्यता जम गई हो तो फिर अपनी बात का अन्ध समर्थन और दूसरे पक्ष पर अनेकानेक दोषारोपण करने में तर्क बुद्धि जुट जाती है और तिल को ताड़ बनाकर ऐसी विभीषिकाएँ रच देती है जिनसे निपटने के लिए युद्ध के अतिरिक्त और कोई चारा ही दिखाई न पड़े। “हमारा नहीं दोष दूसरों का है” सिद्ध करने की जब पहले से ठान ठन गई हो तो सन्तुलित विचार विनिमय के लिए कोई गुंजाइश नहीं रहती—मात्र निर्णित विवाद हो सकता है। प्रतिष्ठा का प्रश्न बन कर सुदृढ़ पूर्वाग्रह किसी भी सफाई या तर्क से झुक नहीं सकता। यदि दलीलें अपने पक्ष में कम पड़ती होंगी तो भी वह हारने वाला नहीं है—सामने वालों को दुर्बुद्धि एवं दुर्भावनाग्रस्त बताकर डटा अपनी ही बात पर रहा जायगा। विवेक का उदय पक्षपात रहित स्थिति में ही हो सकता है। उद्धत अहंमन्यता के तूफान में न्यायोचित तथ्य का पता लगाने वाले विवेक के पैर टिक ही नहीं पाते।
सभी जानते हैं कि द्वितीय महायुद्ध में आस्ट्रिया ने सर्विया को और जर्मनी ने पोलैंड को नीचा दिखाने के लिए जो आक्रमण किये थे वे सत्ता−मद में चूर पक्ष की उद्धत कार्यवाहियाँ थीं। समस्या उतनी जटिल नहीं थी कि सद्भावनापूर्ण आपसी विचार विनिमय से सुलझाई न जा सकी होती। यही बात व्यक्ति गत और वर्गगत विद्वेष विग्रहों में होती है। मनुष्य का ‘अहं’ सीमा लाँघकर जब उद्धत हो जाता है तो उसमें दूसरे पक्ष की कठिनाइयाँ और दलीलों को समझने की इच्छा ही नहीं रहती। युद्ध ही उसे सरल उपाय सूझता है। यदि इसके विपरीत न्याय और समन्वय की—दूसरे पक्ष की दलील और कठिनाई समझकर समन्वयात्मक मार्ग निकालने की इच्छा रही होती तो वह हल निकल सकता था जो दोनों को अपेक्षाकृत कहीं अधिक सस्ता पड़ता।
लड़ाइयाँ छोटी हों या बड़ी उनके मूल में मनुष्य की यह मान्यता काम करती है कि अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए दूसरों के साथ बलप्रयोग करना उचित और आवश्यक है। एक ग्रीक कहावत है—’शान्ति चाहते हो तो युद्ध की तैयारी करो” सशक्त पक्ष अपने अहं को प्रतिष्ठित करने के लिए छोटों के साथ दमन की नीति अपनाता है। इसमें उसे तिहरा लाभ प्रतीत होता है अपने अहं की तुष्टि − आतंक से दूसरे लोगों का डरकर आत्म−समर्पण करना और दूसरे भौतिक लाभों का कमा लेना । अस्तु युद्ध के पक्ष में शक्तिशाली पक्ष बहुत से कारण बताकर अपने लोगों को उत्तेजित करके दूसरे पक्ष पर चढ़ दौड़ने की भूमिका विनिर्मित करता है।
एक विद्वान का कथन है −भूखे लोग भोजन माँगते है − थके लोग विश्राम चाहते है और जब पागलपन सवार होता है तो लोग लड़ने पर उतारू हो जाते हैं।
युद्ध कितने महँगे, कष्टकर, विनाशकारी एवं अगणित समस्याएं उत्पन्न करने वाले होते हैं यह अब अधिक अच्छी तरह समझा जाने लगा है। किसी जमाने में यह समझा जाता था कि शान्ति रक्षा एवं आत्म रक्षा के लिए युद्ध की तैयारी करना आवश्यक है, पर पदार्थ विज्ञान और मनोविज्ञान के गहन निष्कर्षों ने हमें इस नतीजे पर पहुँचाया है कि लड़ाई से कोई समस्या का हल नहीं होता। द्वेष प्रतिशोध का कुचक्र परस्पर आक्रमण के दावघातों का ताना बाना बुनता है, समयानुसार दोनोँ पक्ष एक दूसरे को अपनी−अपनी दुरभिसंधियों का निशाना बनाते हैं और उस शृंखला का अन्त तब होता है जब दोनों पक्ष लगभग अपनी क्षमता नष्ट कर चुके होते है विजेता और पराजित दोनों ही लगभग समान रूप से क्षतिग्रस्त होते हैं । इसलिए उनकी निरर्थकता है । अब विचार विनिमय, न्याय, तर्क, औचित्य आदि के आधार पर ऐसे निष्पक्ष व्यक्तियों द्वारा निर्णय कराने और उसे दोनों पक्षों द्वारा स्वीकार किये जाने को मान्यता देकर मतभेदों को दूर करने की बात ही उचित मानी जानी चाहिए ।
लड़ाई अब दिन ब दिन इतनी महंगी होती जा रही है कि उनका भार उठाना सामान्य स्तर के देशों या लोगों के लिए सम्भव नहीं रह गया है ।
जूलियर सीजर के समय लड़ाई में एक सैनिक मारने के लिए 75 सेन्ट खर्च पड़ता था । पीछे नेपोलियन के जमाने में वह बढ़कर में वह बढ़कर 21 डालर हो गया । दूसरे विश्व युद्ध में उसकी दर और बढ़ी और एक सैनिक मारने के लिए 50 हजार डालर खर्च करने पड़े। वियतनाम की लड़ाई में वह सात गुना बढ़ गया है। एक सैनिक मारने पर अमेरिका को 3,44,827 डालर खर्च करना पड़ा । दूसरे युद्ध में विश्व की अपार सम्पत्ति युद्ध में ही इतना धन लग गया जिससे उस छोटे से देश को जापान की बराबर समृद्ध और समुन्नत बनाया जा सकता था ।
इतना सब होते हुए भी राष्ट्रीय स्तर पर बड़े युद्ध होते है और व्यक्ति स्तर पर अथवा दलबन्दी के आधार पर छोटे लड़ाई−झगड़े। इनके पीछे कुछ व्यक्तियों की ‘युयुत्सा’ही काम कर रही होती है । वे तनिक से कारणों को लेकर युद्धोन्माद पैदा करते हैं और धन −जन की अपार हानि खड़ी कर देते हैं।
घरों में जरा जरा सी बात पर विग्रह खड़े होते हैं । पुरुषों द्वारा स्त्रियों पीटा जाना − स्त्रियों द्वारा बच्चों की पिटाई−पालतू पशुओं को धुन डालना, कीड़े−मकोड़ों को कुचल डालना,पक्षियों का अन्धाधुन्ध शिकार जैसे क्रूर कृत्य किसी को कोई बड़ा लाभ नहीं देते तो भी लोग उन्हें करते है और प्रसन्न होते हैं। यह क्रूरता एक मानसिक आवेश है जो धन लोभ के साथ मिलकर सामान्य लोगों को दुर्दान्त दस्यु बना देता है ।
हत्याओं और आत्म−हत्याओं को दौर अब क्रमशः बढ़ता ही जाता है। मृत्युदंडों, दुर्घटनाओं और युद्ध में जितने आदमी मरते हैं, उससे कहीं अधिक आत्महत्याओं और हत्याओं से मरते है। इनके कारण ढूंढ़ने पर आश्चर्य होता है कि इतनी छोटी बात के लिए इतना बड़ा कुकृत्य कैसे बन पड़ा । ऐसे कारण तो अक्सर आते रहते हैं −सम्भवतः उस हत्या करने वाले के जीवन में भी न्यूनाधिक मात्रा में आते रहे होंगे । पहले जब अवसर चुका दिये गये तो इसी बार क्या आफत आ गई उतना कुकृत्य बन पड़ा, जिसके लिए अनंत पश्चाताप ही हाथ रह गया?
यह आवेश ही है जो मनुष्य के सिर पर कभी कभी उन्माद की तरह हावी हो जाता है। उस समय उसे जो कुछ भी सूझ पड़े वह कर गुजरता है । आवेश का दबाव इतना असह्य हो जाता है कि यह उससे पीछा छुड़ाने के लिये हत्या−आत्म हत्या या और भी जो कुछ उसे सूझ पड़े वह कर गुजर सकता है वस्तुतः वह प्रयास अपने ऊपर तनाव से पीछा छुड़ाने के लिए किया गया भोंड़ा उपचार मात्र होता है जिसे न्याय संहिता एवं समाज व्यवस्था के अनुसार जघन्य अपराध ही गिना जायगा ।
अपराधों के मूल में इतने ठोस कारण नहीं होते जितने कि मानसिक आवेशों के, चारी, उठाईगीरी करने वाले निर्धन नहीं होते−मजबूरी में वैसा नहीं करते। वाले निर्धन नहीं होते −मजबूरी में वैसा नहीं करते। उनकी सामान्य स्थिति अन्य लोगों की तरह ही काम चलाऊ होती है चाहें तो वे प्रयत्न या पुरुषार्थ से सामान्य लोगों की तरह कुछ अधिक भी कमा या पा सकते है जिससे कोई तात्कालिक काम अड़ गया हो तो उसे पूरा किया जा सके । पर बात ऐसी कुछ भी नहीं होती। चोरी एक आदत है जिसका आरम्भ छोटे−छोटे कदमों से होता है और पीछे वह पक्की नशेबाजी की स्थिति में पहुँचकर मनुष्य चैन ही नहीं पड़ता। व्यभिचार का कारण भी उस तरह की सुविधा न होना नहीं वरन् एक विशेष कौतुक−कौतूहल का रसास्वादन होता है व्यभिचारियों में से सभी के दाम्पत्य जीवन असंतुष्ट नहीं होते। उनकी ललक ही वैसी कुछ उथल पुथल का ताना बाना बुनती रहती है और जब अवसर मिल जाता है तो उस तरह की घटना भी बना लेती है । पीछे भले ही उसके लिए पश्चात्ताप किया जाता रहे ।
मानसिक उद्विग्नता है तो मनोरोग ही, पर वह नशेबाजी की तरह अपने प्रकटीकरण का अवसर मिलने पर ही बढ़ती है अन्यथा खाद, पानी न मिलने पर जिस तरह पौधे सूख जाते है, उसी तरह वह भी घट या मिट जाती है ।
अपराधियों को दुष्ट, पापी समझा जाता है यह आरोप एक हदतक ही सही है अपराध करने की क्रमबद्ध योजना बनाना और उसके लिए बुद्धिमत्तापूर्ण ताना−बाना बुनना भी कम नहीं होता। इसमें आवेश नहीं−मनुष्य का भ्रष्ट जीवन दर्शन ही काम कर रहा होता है उसे नीति, निष्ठा, आदर्शवादिता एवं मानवी शालीनता पर विश्वास नहीं होता। अपने आपको हेय नीच, निकृष्ट, पतित स्थिति में रख लेने पर फिर संसार का कोई काम घृणित नहीं रह जाता । जिस प्रकार भी स्वार्थ सिद्ध हो वह सब कुछ उचित लगता है । बुद्धि को उचित अनुचित का ज्ञान न होता हो ऐसी बात नहीं है पर बुद्धि सदा से आस्थाओं की अनुगामिनी रही है विश्वासों के आधार पर जीवन की दिशा बनती है मूल में इच्छा शक्ति ही होती है जिस श्रद्धा,भगवान आस्थाएँ यदि निष्कृष्ट हैं तो मनुष्य की मानसिक और शारीरिक गतिविधियाँ उसी स्तर के प्रयत्नों में संलग्न रहेंगी। अपराधी की हरकतें हरकतें करते रहने वालों में से कितने ही अपना अन्तःकरण निकृष्ट रहने वालों के से कितने ही अपना अन्तःकरण निकृष्ट स्तर बना चुके है और वे उसी प्रकार का ताना बाना बुनते रहते है। उनकी अपराध शृंखला में नई नई कड़ियां जुड़ती जाती है।
किन्तु अधिकाँश अपराधी ऐसे नहीं होते वे मानसिक सन्तुलन की क्षमता गवा बैठते है विवेक और मनोबल की दुर्बलता बढ़ जाने के कारण आवेशों पर अंकुश रख सकना उनके हाथ में नहीं रहता और आवेश उन्माद में वे ऐसे कृत्य कर बैठते है जैसे दूसरों को करते देखकर वे स्वयं भी घोर घृणा कर सकते हैं ।
चोर वस्तुतः बहुत डरपोक होता है पकड़ने जाने की आशंका जब सामने होती है तो सामने पड़ने वाले के प्राणहरण करने में उसे आपत्ति नहीं होती । पकड़े जाने पर उत्पन्न होने वाले संकट का नय उसके ऊपर बुरी तरह हावी होता है इस स्थिति में वह प्रति रोधी की हत्या से लेकर बचने के प्रयास में छत से कूदकर अपनी हड्डी−पसली तोड़ लेने तक के जोखिम उठा सकता है । सामान्य बुद्धि से चोरी के प्रयास में पकड़े जाना कोई मारी विपत्ति नहीं है उसमें कुछ महीने की कैद मर हो सकता है । कानूनी दाव पेंचों से वह छूट भी सकता है । यह पकड़े जाने का संकट इतना छोटा ही उसके सामने रहा होता तो आक्रमण करके पकड़े जाने पर मृत्युदण्ड का जोखिम क्यों उठाता? भय भी क्रोध की तरह ही एक भयावह है, आवेश जिससे ग्रसित व्यक्ति किंकर्तव्य विमूढ़ बनकर समय पर जो कुछ भी सूझ पड़े वही कर गुजरता है। पीछे भले ही उसे अपनी मूर्खता पर पश्चाताप करना पड़े।
देवी−देवताओं पर बलि चढ़ाने वालों की मनोदशा भी बड़ी विचित्र होती है। वे पशु−पक्षियों को ही नहीं अपने बालकों तक की निर्मम बलि चढ़ा देते हैं। इसमें उन्हें न तो घृणित नृशंसता की अनुभूति होती है न अपने कुकृत्य पर पश्चाताप। उलटे उन्हें अपने को धर्मात्मा, पवित्रात्मा होने का अनुभव होता है। यह धर्मोन्माद का आवेश है जिसमें सामान्य मानवी सहृदयता की भी बलि चढ़ जाती है।
साधारणतया अपराधों पर चिन्ता प्रकट की जाती है और उनकी रोकथाम का प्रयत्न किया जाता है, पर यह भुला दिया जाता है कि उस अनौचित्य की जड़ें काफी गहरी हैं। मानसिक रोगों की स्थिति यह बढ़ती ही गई तो फिर रोकथाम के राजकीय प्रयत्नों से कोई बड़ा प्रयोजन सिद्ध न हो सकेगा।
न्यूरेस्थेनिया के मरीज सदा अपराधों की भाषा में सोचते हैं। वैसा ही कुछ कर गुजरने का उनका मन होता है जिससे किसी न किसी पर विपत्ति आये—कोई न कोई कष्ट उठाये—किसी न किसी का नुकसान हो। इससे उन्हें अपने बड़प्पन का—शक्तिमत्ता का गौरव पा सकने का आभास होता है।
दूसरों के प्रति दुर्भावना रखने की आदत आरम्भ में बहुत छोटी होती है। छिद्रान्वेषण, दोषारोपण, निन्दा में रस लेना, कल्पना को लोगों की बुराइयाँ ढूँढ़ने में लगाना, अनुमान के आधार पर जिस−तिस को दुष्ट−दुराचारी मान लेना और सामने न सही पीठ पीछे निन्दा करते रहना, विकृत मन के लोगों को बहुत आवश्यक प्रमाण ढूँढ़ने का भी प्रयत्न नहीं करते। अपनी विकृत कल्पना को ही अमुक व्यक्ति को दुष्ट मान लेने के लिए पर्याप्त मान लेते हैं। दुष्टता के प्रति रोष होना स्वाभाविक है। रोष से घृणा पैदा होती है और घृणास्पद को हानि पहुँचाने के लिए मन में ताना−बाना बुना जाने लगता है। यही आदत बढ़ते−बढ़ते इस स्तर तक जा पहुँचती है कि मानसिक हिंसा प्रत्यक्ष आक्रमण के रूप में परिणत हो जाय और क्रूर कर्मों में रस लेने की आदत बनकर मनुष्य के जीवन को निकृष्ट स्तर तक पहुँचा दे।
अनावश्यक दुर्भावनाओं को मन में स्थान देना, दूसरों के लिए अशुभ सोचते रहना, औरों के लिए उतना हानिकारक नहीं होता, जितना अपने लिए। उचित यही है कि हम सद्भाव सम्पन्न रहें। जिनमें वस्तुतः दोष, दुर्गुण हों उन्हें चारित्रिक रुग्णता से ग्रसित समझकर सुधार का भरसक प्रयत्न करें, पर उस द्वेष दुर्बुद्धि से बचे रहें जो अन्ततः अपने ही व्यक्ति त्व को आक्रमण असुरता से भर देती है और दूसरों का ही नहीं अपना भी सर्वनाश प्रस्तुत करती है।
जीव विकास की क्रमिक शृंखला पार करता हुआ मनुष्य शरीर में प्रवेश करता है। यों यह सुरदुर्लभ ईश्वरीय उपहार है। तो भी उसके साथ निकृष्ट योनियों के पिछले संस्कार जुड़े रहते हैं। इन्हें परिष्कृत करके इस देव योनि के उपयुक्त आदतें विनिर्मित करनी है। यही जीवन साधना है। यदि यह प्रयत्न न किया जाय तो पशु संस्कार बने रहेंगे और मनुष्य ऐसे कृत्य करता रहेगा जो उसकी संस्कृति के लिए कलंक पूर्ण है।
सिंह, व्याघ्र, सर्प, बिच्छू, बाज, गिद्ध को आक्रमण करने और दूसरों का विनाश करने में प्रसन्नता अनुभव करने की प्रवृत्ति असंस्कृत मनुष्यों में भी पाई जाती है। नर, मादा के बीच बिना माता, पुत्री, बहिन आदि का अन्तर किये अन्य प्राणियों में यौन स्वेच्छाचार चलता है। मानवी विवेक कुछ मर्यादा लगाता है, पर पशुओं और कीड़ों में वैसा कोई बन्धन नहीं होता। जिनके मानवी संस्कार उदय न हुए होंगे, उनमें भी ऐसा ही स्वेच्छाचार चल रहा होगा। कुत्तों को रोटी के टुकड़े फेंके जायें तो वे बिना साथी बच्चों का ध्यान रखे पहले अपना पेट भरेंगे। दुर्बलों को दुत्कार कर अपनी स्वार्थ सिद्धि करेंगे। नर पशु भी ऐसी ही स्वार्थपरता, क्रूरता, निर्दयता और स्वेच्छाचार का परिचय देते हैं। इन दुष्प्रवृत्तियों को रोकने के लिए धर्म, अध्यात्म, दर्शन, पुण्य, परमार्थ, संयम, नीति, मर्यादा, कर्त्तव्य आदि का निर्धारण हुआ है। यदि भाव परिष्कारों से उसे सुसंस्कृत न बनाया जाय तो उसकी पशुता यथावत् बनी रहेगी और पोषण पाकर अधिक विकृत विघातक बनती रहेगी। यह स्थिति उसे नर पशु और नर पिशाच स्तर का रखेगी और बुद्धिमत्ता का संयोग मिलने से वह रोमाञ्चकारी, अनाचार के दृश्य उपस्थित करेगी। आज हमारी प्रगति इसी दिशा में तेजी से हो भी रही हैं।
यूनेस्को द्वारा पैरिस में आयोजित एक आक्रामक प्रवृत्ति अन्वेषण गोष्ठी में कतिपय मनः शास्त्र वेत्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किये और इस बात पर चिन्ता प्रकट की कि मनुष्य जहाँ बुद्धि, सम्पत्ति और वैज्ञानिक उपलब्धियों की ओर बढ़ रहा है, वहाँ उसमें आक्रामक प्रवृत्ति भी बढ़ रही है, जो हत्या, आत्महत्या तथा दूसरे अपराधों के रूप में सामने आ रही हैं। लड़ाई, झगड़े आदि की घटनाएँ बढ़ रही है।
द्वेष, घृणा और मनोमालिन्य का बाजार गर्म है। साथ−साथ रहने वाले भी केवल शिष्टाचार का निर्वाह करते हैं। सहानुभूति, स्नेह, सेवा और करुणा के तत्व धीरे−धीरे घटते चल जा रहा है। अपने आप में सीमित रहने और अपनी सुविधा को ही महत्व देने वाली प्रवृत्ति इतनी अधिक बढ़ गई है कि दूसरे के दर्द में सहायता करना तो दूर उलटे उसमें रस लेते हुए परपीड़ा को अच्छा−खासा विनोद माना जाने लगा है। अब बड़े जानवर तो शिकार के लिए उतने नहीं मिलते, पर मछली और चिड़ियाँ मारने, पकड़ने की एक मनोरंजन मान लिया गया है। आर्थिक लाभ के लिए छोटे−बड़े शिकार करने की अपेक्षा उन लोगों की संख्या अधिक है जो सिर्फ एक खेल की तरह यह सब करते हैं। निशाना साधने का अभ्यास करने के लिए चिड़ियों को—फंसाने की कला में प्रवीणता पाने के लिए मछलियों को मारा जाता है।
मांसाहार के पीछे स्वाद की बात प्रधान नहीं होती क्योंकि वस्तुतः वह फल, मेवा, दूध, घी आदि की तुलना में कहीं अधिक घटिया होता है। गंध तो और भी अधिक घिनौनी होती है। सिद्ध हो चुका है कि माँस की तुलना में सोयाबीन में प्रोटीन अधिक मात्रा में है और अधिक निर्दोष है। विटामिन ए. गाजर जैसे सस्ते पदार्थों में पर्याप्त हैं। माँस दुष्पाच्य भी है, महंगा भी और पकाने में बहुत झंझट भरा भी। इतने पर भी माँसाहार की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इसका मनोवैज्ञानिक कारण लोगों में हिंसा के प्रति उत्साह और दूसरों को कष्ट देने में अपना पराक्रम दिखाने की छिपी इच्छा बलवती रहती है। किसी को उजाड़ने, बर्बाद करने और पीड़ा से चीत्कार करने का अपने आपको निमित्त बनाते हुए लोग अपने आपको साहसी, शूरवीर, पराक्रमी, विजेता, प्रगतिशील आदि न जाने क्या−क्या अनुभव करते हैं। आतंकवाद इसी आधार पर पनपता है। गुण्डागर्दी और दुष्टता की घटनाएँ इसी आधार पर होती है और इसी प्रवृत्ति से माँसाहार को बढ़ते हुए लोक उत्साह के साथ जुड़ा, हुआ देखा जा सकता है।
माँसाहार के पक्ष में जितनी भी दलीलें प्रस्तुत की जा सकती हैं, उन सबको काट देने के लिए एक ही तर्क बहुत बड़ा है कि उससे निरीह प्राणियों का अकारण विनाश होता है और उसके साधन जुटाने में मनुष्य की सर्वोपरि गरिमा संवेदना सहानुभूति को भारी आघात लगता है। निष्ठुरता—संवर्धन की यह क्रिया मनुष्य के स्वभाव का अंग बनती जाती हैं और फिर वह मनुष्य समाज में भी प्रयुक्त होती हैं। लोग परोक्ष रूप से एक दूसरे को जाल में फँसाते और परस्पर रक्त गत करते हैं। इस चपेट में अपना प्रिय परिवार भी आ जाता है। लोग अपने छोटे से स्वार्थों के लिए अपने आश्रितों, कुटुम्बियों, स्वजनों, मित्रों के हितों का किस प्रकार बलिदान करते रहते हैं इसके दुःखद दृश्य हम अपने चारों ओर बिखरे हुए पर्याप्त मात्रा में देख सकते हैं और यह अनुमान लगा सकते हैं कि निष्ठुरता किस कदर बढ़ती जा रही है। कहना न होगा कि यदि निष्ठुरता की जड़ मनः क्षेत्र में जम जायं तो मनुष्य निकृष्ट कोटि का स्वार्थी बन जायगा और फिर सहज ही आक्रामक बनने के लिए तत्पर रहेगा। स्नेह सौजन्य की घटती हुई संवेदनाएँ वस्तुतः मानवी जीवन का नीरस, कर्कश, कलह ग्रस्त और असुरक्षित बनाती है इसमें समस्त समाज के लिए—समस्त संसार के लिए भयंकर सम्भावनाओं के विष बीज छिपे हुए हैं।
क्रूर कर्मों में आनन्द लेने की वृत्ति को पैशाचिकता कहा जाता है और वह जब−तब ऐसे लोगों में भी उभरती रहती है जिन्हें सभ्य या सुशिक्षित कहा जाता है।
जर्मनी के विषाणु शोधकर्ता फिजराँफ को पुलिस ने पकड़ा और पाया कि वह छोटे बच्चों को चुरा कर उनको तड़फा−तड़फा कर मारने के कितने ही कुकृत्य कर चुक है। लोग आश्चर्य चकित रह गये जब उन्होंने यह सुना कि मानवतावादी विचारों का इतना अधिक समर्थन करने वाला व्यक्ति अकारण ऐसे क्रूर कर्म करने में संलग्न रहा है।
हिटलर के दाँये हाथ मार्शल गोरिंग की क्रूरता प्रसिद्ध थी। इन दोनों ने मिलकर शत्रु पक्ष की सेना का जितना संहार रचा था उससे दस गुने अधिक जर्मन नागरिक−अपने ही देश वासी गाजर मूली की तरह काट कर फेंक दिये थे। जिन कारणों से इतने मनुष्यों के प्राण हरण किये गये, वे इतने बड़े नहीं थे जिनके लिए मौत आवश्यक ही होती। थोड़ा डरा धमका देने से भी लोग चुप हो सकते या बदल सकते थे, पर इससे उन क्रूर कर्माओं की अहंता तृप्त कैसे होती। उनके सामने भिन्न मत वालों को मजा चखाने के लिए गोली ही एक मात्र शामक उपाय था।
सामान्य नागरिकों को जिस प्रकार तड़फा−तड़फा कर इन लोगों ने मारा, उससे वे हत्याएँ और भी अधिक वीभत्स हो जाती है। मारना ही ठहरा तो वह कार्य बन्दूक, बिजली आदि से सेकेंडों में पूरा हो सकता है, उसके लिए इतनी नृशंस पीड़ा देने की क्या जरूरत थी। पर नहीं, इससे कम में उनके भीतर का पिशाच तृप्त ही नहीं हो सका और लाखों हत्याएँ इस प्रकार इतनी प्रताड़नाओं के साथ की गई, जिन्हें लिखना इसलिए अनुपयुक्त है कि पढ़ने वाले भयाक्रान्त हो जायेंगे।
इतिहास में अनेक नृशंस शासक हुए हैं जिन्होंने निरीह लोगों का नृशंस रक्त पात करने में भरपूर मजा उठाया। वे लोग कसाई और जल्लाद की भूमिका निभाने में न जाने अपना क्या−क्या गौरव मानते रहे। मिस्र के पिरामिड, चीन की दीवार आदि बनाने में जितना चूना लगा होगा, उससे अधिक जीवित मनुष्यों की हड्डियाँ पिसी हैं। अमेरिका के गोरे अफ्रीकी कालों का न केवल शोषण करने में वरन् उनके शरीरों से रक्त की धाराएँ उछालने में भी फव्वारों का आनन्द लेते रहे हैं। मध्य काल में कैदियों को मजा देने के विधान तो कितने ही थे, पर वह भिन्नता वध करने के समय बरती जाने वाली क्रूरता के स्तर का ही मान कराते हैं। जिसमें कैदी के प्राण जल्दी निकल जायं, वह अधिक दयापूर्ण और अधिक हलकी सजा। जिससे जितनी देर तक जितना तड़फा−तड़फा कर, एक−एक अंग काटते हुए—अधिक चित्र−विचित्र प्रकार की चीत्कारें निकल बाते हुए प्राण हरण किया जाय वह कड़ी सजा मानी जाती थी। मध्यकालीन दण्ड विधान वस्तुतः सामन्तों के हलके भारी मनोरंजन के ही साधन थे। इस बहाने किसी न किसी बहाने विनोद स्थल पर कोई न कोई अभागे नर−नारी, बाल वृद्ध पकड़ कर खड़े कर ही दिये जाते थे। आखिर दैनिक विनोद का आधार भी तो जारी रखा ही जाना था इसलिए किसी न किसी को तो अपराधी बनाया ही जाता था। न जाँच पड़ताल का किसी को समय था और न अपराधी को सफाई देने की सुविधा थी। शासक का मुँह ही अदालत था, जो निकल गया सो ठीक।
क्रूरता में आनन्द लेने की वृत्ति ‘सैडिज्म’ कहलाती है। प्राचीन काल में सरकार, समाज जैसे तत्व विकसित नहीं हुए थे, इसलिए उसकी तृप्ति समर्थ लोग बिना किसी प्रतिरोध के करते रहते थे। सामन्त लोग अपने साथ डाकुओं के गिरोह बना कर रखते थे, और उन्हें लेकर किसी भी ठिकाने पर चढ़ाई कर देते थे। एक जगह संग्रहित सम्पदा तो इस चढ़ाई में हाथ लगती ही थी, उस देश की प्रजा को भी पूरी तरह खसोट लिया जाता था, इस भगदड़ में सैनिक और असैनिक अपने हाथ खून से चाहे जितने गहरे रंग लेने के लिए स्वतंत्र रहते थे। अब वैसी सुविधा नहीं रही। पुलिस, जेल, कचहरी, कानून आदि का सिलसिला चल पड़ा है और समाज भी उस तरह की नृशंसता सहन नहीं करता, दूसरे मनुष्यों ने सभ्यता की चादर भी ओढ़ ली है। तीसरे ऐसे कृत्यों से प्रतिक्रिया, प्रतिशोध, प्रतिरोध आदि का भी झंझट हैं, इसलिए सस्ते और सरल तरीके ढूँढ़ लिये गये है। अब शोषण के परोक्ष तरीके सैकड़ों निकल आये हैं। ठगी, जालसाजी, फुसलाना, फँसाना अब एक कला के रूप में विकसित हो गया है।
कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय में मानव विज्ञान के प्राध्यापक डा.शेर वुड वाँशवर्च को कथन है—आक्रमण एक छुतहा उन्माद है, जो एक की देखा−देखी दूसरे पर चढ़ता है। भीड़ में हिंसा फूट पड़े तो उस समूह के अन्य लोग भी अकारण गदर मचा देते हैं चाहे उसका परिणाम किसी के लिए कुछ भी क्यों न हो। विजय में उन्मत्त सेनाएँ पिछले दिनों किस कदर निरीह प्रजा का उत्पीड़न करती रही हैं, इसका इतिहास बहुत ही कालिमापूर्ण है। युद्धों में सेना—सेना से ही लड़ती हो, ऐसी बात नहीं। लड़ाकुओं को जन विनाश में भी मजा आता है उन्माद का नशा उतर जाने पर सोचते हैं—आक्रमण से किसी का कुछ भला नहीं होता यहाँ तक कि आक्रमणकारी स्वयं भी बहुत घाटे में रहता है।
कैलीफोर्निया के स्टेनफोर्ड विश्व विद्यालय में मनोविकार विभाग के अध्यक्ष डा. डेबिड हाम्बुर्ग का कथन है—आक्रमण को सर्वत्र क्रियान्वित होते देखा जा रहा है, इस पर भी उसकी उपयोगिता सिद्ध नहीं हो सकी। अपराधों की रोक थाम में दण्ड नीति को कानूनी समर्थन मिल सकता है, पर लोग एक दूसरे पर चढ़ दौड़ने की नीति अपनायें तो, उसकी क्रिया प्रतिक्रिया का कुचक्र अमुक व्यक्ति यों तक ही सीमित न रहेगा वरन् पूरी सामाजिक शान्ति को अपनी चपेट में ले लेगा।
हममें से हर मनुष्य का कर्तव्य हे कि क्रूरता, निष्ठुरता, निर्दयता की आक्रामक पशु प्रवृत्ति का शमन करने के लिए मानवी संस्कृति के सद्भावना पक्ष की समुन्नत करें अन्यथा बढ़ती हुई दुष्टता छूत की बीमारी की तरह फैल कर इस सुन्दर संसार को सर्वनाश करके रहेगी।
परिवर्तन प्रकृति का अटल नियम है। कोई वस्तु एक स्थिति में नहीं रह सकती। देर−सवेर से उसका परिवर्तन होता निश्चित है। प्राणी जन्म लेते है, बढ़ते हैं ओर अन्त में मृत्यु के ग्रास बन जाते है। सुदृढ़ इमारतें धराशायी होती हैं। विशाल वृक्ष ईंधन मात्र शेष रह जाते हैं। एक समय के सर्वशक्ति सम्पन्न व्यक्ति दूसरे समय धूलि चाटते और विस्मृति के गर्त में तिरस्कृत होते देखे जाते है।
अजर−अमर जैसी लगने वाली सत्ताएँ भी बदलती, मरती रहती है। सूरज और धरती तक इस चक्की में कितने डाले हैं। धरती को ही लें वह खण्ड प्रलय के आघातों से कई बार मरते−मरते बची है; किन्तु बकरे की माँ कब तक खैर मनायेगी। एक दिन तो अपने इस पूरे भूलोक का अस्तित्व ही महाकाल के पेट में सदा सर्वदा के लिए समा जायगा।
अन्तरिक्ष विज्ञानी एमिलियानी का कथन है—इन दिनों हम उष्ण युग में रह रहे हैं और तापमान बढ़ रहा है। यह तीन हजार वर्ष तक चलेगा। बढ़ी हुई गर्मी से ध्रुवों की बर्फ पिघलेगी और समुद्री बाढ़ से तटवर्ती क्षेत्रों की बुरी तरह बर्बादी होगी। इतना ही नहीं बची−कुची जमीन पर शीत प्रकोप का शिकंजा कसता चला जायगा और उस उथल−पुथल में आज के जीवधारियों के लिए फिर प्राण संकट आ खड़ा होगा।
सियामी विश्व−विद्यालय के भू−गर्भ विज्ञानी ‘सीजाके एमिलियानी’ ने समुद्र तल से तथा पर्वतों के उच्च शिखरों से प्राप्त चिर प्राचीन प्राणि कंकालों की शोध करके यह निष्कर्ष निकाला है कि पृथ्वी पर प्राणियों की सृष्टि होने के समय से लेकर अब तक 7 बार खण्ड प्रलय हो चुकी है। इनमें चार शीत प्रधान और तीन उष्णता प्रधान थीं। यह दोनों ही प्रायः एक−एक लाख वर्ष की होती रही हैं। इनमें विकसित प्रकोप ही होते रहे हैं केवल जीवाणुओं के रूप में जीवन शेष रहा है और फिर सह्य तापमान होने पर नये आकार−प्रकार के प्राणी विकसित होते रहे हैं। जीवाणु हर बार अवसर के अनुरूप नये रूप में विकसित होकर पिछली प्रलय से भिन्न स्तर के बनते रहे हैं।
पृथ्वी की आयु कितनी हो सकती है इस संदर्भ में कैलीफोर्निया के पुरातत्त्ववेत्ता जान एच. रेनाल्ड ने डकोट राज्य के रिचार्डटन नामक स्थान में मिली एक पुरानी उल्का के आधार पर यह सिद्ध किया है कि धरती की आयु लगभग पाँच अरब वर्ष है। इसी निष्कर्ष पर संसार के अन्य भू−गर्भ वेत्ता, प्राणिशास्त्री एवं पुराविद भी पहुँचे हैं। उसने अपने−अपने ढंग से जो अनुमान लगाये हैं उनसे थोड़े बहुत अन्तर के बाद लगभग इतनी ही आयु अपनी धरती की बैठती है।
पहले पृथ्वी दो ही गोलार्धों में बँटी थी। एक उत्तरी दूसरा दक्षिणी। पीछे धरती जैसे−जैसे अधिक ठण्डी होती गई और वातावरण बदलता गया समुद्रों ने करवटें लीं और धीरे−धीरे वह शकल बनती गई जो आजकल सामने है।
भूगोलवेत्ता ग्राहमडिप्थे का कथन है—धरती क्रमशः ठण्डी होती जा रही है और सूरज बूढ़ा। दोनों ही आधी उम्र पार कर चुके। अब वे उतने दिन और नहीं जी सकते जितने दिन कि जी लिये। अब वे ढलती आयु को पार करके मृत्यु के सुख में जाने की तैयारी कर रहे हैं।
मनुष्य को भी यदि यह विश्वास हो जाय कि उसे कल नहीं तो परसों निश्चित रूप से मरना है तो उसे वे अकर्म करने की इच्छा न रहे जिनमें वह दिन−रात लगा रहता है। संसार की हर वस्तु को बदलते, मरते देखकर हम अपने अन्त का अनुमान लगा सकें और उसकी शानदार तैयारी का उपक्रम बना सकें तो कितना अच्छा हो।
मनुष्य की सम्भावनाएँ असीम होते हुए भी उसे ससीमता अपने बन्धन में जकड़े रहती है और प्रकृति के रहस्यों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए आतुर होते हुए भी वह विशाल समुद्र में से कुछ सीपियाँ और घोंघे ही ढूँढ़ पाता है।
पिछले दो सौ वर्षों में विज्ञान के क्षेत्र में हम बहुत आगे बढ़े हैं। अन्तरिक्षीय खोजें अपने समय की विशेष उपलब्धियाँ हैं। इससे पूर्व अणु विस्फोट भी चकित कर चुका है। अब हम अद्यावधि प्राप्त जानकारियों से भी कहीं अधिक जिस विस्मयजनक क्षेत्र में विस्मयजनक उपलब्धियों के क्षेत्र में प्रवेश करने जा रहे हैं—वह है प्रति पदार्थ से बनी हमारे साथ−साथ रह रही एक समांतर दुनिया। इसका ज्ञान प्राप्त करके हम जानेंगे कि काया और छाया की तरह दो संसार न जाने कब से साथ−साथ जुड़े हुए हैं और एक दूसरे पर निर्भर रह रहे हैं।
अपनी परिचित अणु सत्ता से इस अपने विश्व में दीख पड़ने वाले पदार्थ बने है। उन्हीं के उपयोग से अपना काम चलता है। अब यह पता चला है कि अणु का प्रतिद्वन्द्वी एक और प्रति अणु है। पदार्थ के प्रतिद्वन्द्वी प्रति पदार्थ का भी अस्तित्व मौजूद है। इतना ही नहीं इनसे बनी हुई एक अनोखी प्रतिद्वन्द्वी दुनिया भी मौजूद है। अब तक हम इस सबसे परिचित नहीं रहे यह ठीक है, पर इससे क्या—स्थिति तो हमारी जानकारी होने न होने की परवा किये बिना यथावत् बनी ही हुई है।
एण्टीमैटर—एन्टीयुनिवर्स की चर्चा अब कोई कल्पना या सम्भावना नहीं रही वरन् एक ऐसी यथार्थता बन गई है जिस पर तेजी से खोज की जा रही है और यह पता लगाया जा रहा है कि इन दोनों प्रतिद्वन्द्वी संसारों के बीच आदान−प्रदान का दरवाजा किस तरह खुल सकता है।
इस दिशा में यदि थोड़ी और सफलता मिल गई तो पौराणिक उपाख्यानों में वर्णित देवलोक और असुर−लोक की गाथाओं को हम साकार देखेंगे और अनुभव करेंगे कि भगवान और शैतान की तरह चिरन्तन काल से दो प्रतिद्वन्द्वी संसार आपस में गुँथे हुए चले आ रहे हैं। उनके सामान्य सहकार को बढ़ाना सम्भव हो सके तो अपनी दुनिया इतनी बड़ी सामर्थ्य करतल गत कर लेगी जिसके सहारे मात्र पृथ्वी तो क्या ब्रह्माण्ड के विशाल क्षेत्र पर अधिकार कर लेना और बिखरी सम्पदाओं से लाभ उठा सकना उसके लिए सम्भव हो जायगा। फिर मनुष्य विश्व का मुकुटमणि नहीं—ब्रह्माण्ड का अधिनायक बनकर रहेगा।
इस सुखद सम्भावना के साथ साथ यह विभीषिका भी मौजूद है कि प्रति पदार्थ की सत्ता डायनामाइट बारूद और अणु विस्फोट से निकलने वाली ऊर्जा से भी अधिक खतरनाक है। इस क्षेत्र में एक भी चिनगारी गलत−सलत ढंग से पड़ गई तो फिर किसी की खैर नहीं। न पृथ्वी की—न सौरमण्डल की और न समूचे ब्रह्माण्ड की। उस विस्फोट से पूरे ब्रह्माण्ड का आधार ही बदल सकता है और प्रस्तुत जड़−चेतन की स्थिति में आमूल−चूल परिवर्तन हो सकता है। यदि विभीषिका सचमुच कभी साकार हुई तो उस महाक्रान्ति के बाद की स्थिति कल्पनातीत होगी। तब प्राणधारी भी अब की अपेक्षा सर्वथा भिन्न प्रकार के होंगे और उनकी आकृति एवं प्रकृति की हम लोगों के साथ कोई समानता न होगी। तब ज्ञान−विज्ञान के आधार भी उलट जायेंगे। अभी तो उस महाप्रलय का स्वरूप समझना ही कठिन पड़ रहा है फिर महाक्रान्ति के बाद होने वाले अभिनव सृजन और उसमें प्राणियों की स्थिति का स्वरूप किस प्रकार सोचा जा सकता है।
प्रति पदार्थ की खोज बड़ी सावधानी किन्तु तत्परता के साथ हो रही है। अन्तरिक्ष पर अधिकार करने के लोभ का संवरण न किया जा सका तो फिर ‘प्रति विश्व’ की सत्ता को जानने और उसके साथ तालमेल बिठाकर और भी बहुत कुछ पाने की सम्भावना को आँख से ओझल किया ही कैसे जा सकता है। ‘प्रति पदार्थ’ ‘प्रति विश्व’ आज के विज्ञान जगत का सर्वोपरि आकर्षण है। उसकी खोज में अत्यन्त गम्भीर प्रयास सावधानी के साथ किये जा रहे हैं।
पदार्थ के प्रति पक्षी “प्रति पदार्थ” की कल्पना तो सन् 1928 में ही सापेक्षवादी क्वांटम सिद्धान्त के अंतर्गत ही कर ली गई थी, पर तब उस सम्बन्ध में वैसे प्रत्यक्ष प्रयोग सम्भव न थे जैसे कि आज हो गये हैं। जिस प्रकार क्रिया की प्रतिक्रिया और ध्वनि की प्रतिध्वनि होती है उसी प्रकार ‘पदार्थ’ के साथ−साथ ‘प्रति पदार्थ’ भी काम करता है। इन उभयपक्षीय अस्तित्वों से ही विश्व में विविध प्रकार की गतिविधियाँ सम्भव हो रही हैं। यदि किसी डिब्बे में गोलियाँ खचा−खच भर दी जायँ तो फिर उनका हिलना डुलना भी सम्भव न हो सकेगा; इसी प्रकार यदि संसार में सर्वत्र परमाणु ही ठसे पड़े हों तो फिर उनका हिलना−डुलना ही बन्द हो जायगा और सर्वत्र निस्तब्ध नीरवता एवं स्थिरता दिखाई पड़ेगी। यह प्रति पदार्थ ही है जो अणुओं को अपनी हलचलें जारी रखने का अवसर दे रहा है।
रूस और अमेरिका के वैज्ञानिक इस प्रति पदार्थ को प्राप्त करने का जी तोड़ प्रयत्न कर रहे हैं। नाभिकीय कणों को तीन हजार करोड़ इलेक्ट्रान बाट की गर्मी देकर एक नया प्रति कण प्राप्त किया गया है—’ड्यूट्रान’ हाइड्रोजन और हीलियम के प्रतिकण प्राप्त करने की आशा अब बलवती होती जा रही है। पर अभी इस कठिनाई का हल नहीं निकला है कि उन्हें सुरक्षित कैसे रखा जाय। इनकी एक बुरी आदत यह है कि वे अकेले अपना अस्तित्व बनाये रहने में असमर्थ होते हैं। उत्पन्न होते ही अन्य कणों के साथ घुलते हैं और अपना अस्तित्व खो बैठते हैं। यदि इसे सुरक्षित रखा जा सकना सम्भव हो गया तो पदार्थ और प्रति−पदार्थ का घर्षण सम्भव हो जायगा और उसे प्रक्रिया से इतनी अधिक ऊर्जा प्राप्त की जा सकेगी कि संसार भर में सस्ती बिजली की कमी कहीं भी अनुभव न की जाय। तब जहाँ−तहाँ छोटे−छोटे सूर्य उगाये जा सकेंगे और उनसे आवश्यक ऊर्जा इच्छानुसार और सुविधानुसार ग्रहण करते रह सकना सम्भव हो जायगा।
अन्तरिक्ष से प्राप्त रेडियो, तरंग बताती हैं कि किसी क्षेत्र में प्रति द्रव्य बड़े परिमाण में उत्पन्न हो रहा है। यह उत्पत्ति कहाँ हो रही है इसके सम्बन्ध में विज्ञानी आल्फवेन का कथन है कि वह ‘साइग्लेस’ और ‘विर्गो’ निहारिकाओं में उबल रहा है और उससे नये−नये ऐसे ग्रह−नक्षत्रों का सृजन हो रहा है जो इस प्रति पदार्थ से ही बने हैं। वे उसका नाम चतुर्थ आयाम स्तर का प्लाज्मा बताते हैं और कहते हैं उसकी सामर्थ्य अपने लोक में पाये जाने वाली आणविक ऊर्जा से कहीं अधिक सशक्त है।
कैलीफोर्निया विश्व−विद्यालय में सन् 1970 में सबसे पहले “प्रतिकण” के अस्तित्व को कल्पना क्षेत्र से आगे बढ़कर प्रामाणिक स्तर पर खड़ा किया था। न्यूक्लियर इंटर एक्शन के दौरान ‘प्रतिकण’ का फोटो खींचा गया था। इसके लिए एक सेकेंड के पन्द्रह अरबवें भाग में फोटो खींच सकने वाला यन्त्र विशेष रूप से बनाया गया था और उस प्रमाणित प्रतिकण का नाम ‘सन्टी ओमेगा माइनस’ दिया गया था। तब से अब तक इन पाँच वर्षों में और भी कई प्रतिकण खोजे जा चुके हैं।
यह खोज तीन सिद्धान्तों के आधार पर सम्भव हुई है। (1) सापेक्षिकता सिद्धान्त द्वारा शक्ति के निगेटिव होने का प्रमाण प्रस्तुत करने से (2) क्वांटम मिकैनिक्स के समीकरण का हल प्रस्तुत करने से (3) वेवेमिकैनिक्स के इलेक्ट्रान के गुणों की अभिनव विवेचना करने से।
सन् 1928 में जब डिराक ने क्वान्टम मिकैनिक्स के समीकरण का हल करते हुए इनर्जी के निगेटिव रूप की नई व्याख्या कीं और प्रति इलेक्ट्रान, पाजिट्रान के अस्तित्व का प्रतिपादन किया तो तत्कालीन मूर्धन्य विज्ञानवेत्ताओं ने उनका उपहास उड़ाया पर पीछे खोज जारी रहे सन् 1932 में जब प्रति इलेक्ट्रान के फोटो खिंचकर सामने आये तो वह बात प्रामाणिक ठहरा दी गई। सर्वविदित है कि ट्राँजिस्टर का आविष्कार ‘होल’ और ‘इलेक्ट्रान’ प्रक्रिया के सहारे ही सम्भव हुआ है। इसमें ‘होल’ वस्तुतः प्रति इलेक्ट्रान का ही एक रूप है।
प्रति इलेक्ट्रान के सम्बन्ध में एक सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि उसका जीवन काल अत्यन्त स्वल्प है। वह जन्म लेते ही इलेक्ट्रान के साथ संयुक्त हो जाता है और उस विलय से ‘गामा विकरण’ उत्पन्न होता है।
प्रति पदार्थ एवं प्रति विश्व की खोज के आरम्भिक दिनों में केवल इलेक्ट्रान का प्रतिद्वन्द्वी, प्रति इलेक्ट्रान ही खोजा जा सकता था, पर यह सम्भावना तो ध्यान में बनी ही रही कि इसी प्रकार अन्य कणों के भी प्रति पक्षी, प्रतिद्वन्द्वी, प्रतिकण हो सकते हैं। सन् 1955 में इसका भी समाधान मिल गया। ‘वेवाट्रान’ नामक सूक्ष्मदर्शी यन्त्र की सहायता से न्यूट्रोन और प्रोटान के प्रतिपक्षी भी खोज लिये गये हैं। इससे सिद्धान्ततः प्रति पदार्थ और प्रतिविश्व के अस्तित्व का स्वीकार कर लिया गया है और यह आशा बँध गई है कि कभी न कभी मनुष्य इस महादैत्य को अपना वशवर्ती बनाकर ने केवल अपनी पृथ्वी का वरन् लोक−लोकान्तरों का अधिपति बन सकने का स्वप्न साकार कर सकेगा।
अभी तक पदार्थ के सम्बन्ध में हमारा अनुभव बहुत स्वल्प है। अभी अपने हाथ केवल खण्डन क्रिया फिशन—हाथ लगी है। यह कितनी कठिन और कितनी जटिल है इसे वे लोग जानते हैं जो परमाणु विस्फोट के साधन जुटाते हैं। उस कार्य में अत्यधिक ऊर्जा प्रयुक्त करनी पड़ती है। खण्डन से अधिक कठिन संश्लेषण—फ्यूजन है। इससे खण्डन की तुलना में कहीं अधिक शक्ति का प्रयोग के लिए जुटाना पड़ेगा। इससे भी बड़ी कठिनाई यह है कि संश्लेषण के लिए प्रयुक्त ऊर्जा और क्रिया से उत्पन्न प्रति ऊर्जा और प्रतिक्रिया इतनी सशक्त होगी जिसे नियन्त्रित रख सकना कम से कम आज की स्थिति में तो किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हैं। प्रति परमाणु के संश्लेषण में अनुमानतः दस लाख डिग्री ताप उत्पन्न होगा। यह कितना भयंकर होगा इसका अनुमान इस बात से लग सकता है कि पानी केवल 100 डिग्री गर्मी से ही उबलने और भाप बनकर उड़ने लगता है।
प्रति अणु की शक्ति अपने जाने−माने अणु की तुलना में सहस्रों गुनी अधिक होगी। यदि वह हाथ लग जाय तो केवल हीलियम गैस से भी हम नया सूर्य बना सकेंगे और उसका मनचाहा उपयोग कर सकेंगे।
प्रति पदार्थ में एक ओर बुरी आदत है कि वह जन्म लेते ही ‘पदार्थ’ में घुस पड़ता है और उसी में विलीन हो जाता है। यदि ‘प्रति परमाणु’ बन गया तो उसे वर्तमान परमाणु में घुस पड़ने से कैसे रोका जा सकेगा? यह एक और भी बड़ा सिरदर्द है। संयोग से नई चीज की उत्पत्ति का सिद्धान्त सर्वविदित है। प्रस्तुत परमाणुओं के साथ सम्भावित प्रति परमाणु जब संयुक्त होंगे तो न जाने किस नई शक्ति का उदय हो जाय। यदि वह सृजनात्मक न होकर ध्वंसात्मक हुई तो फिर अपनी पृथ्वी तो उससे माचिस की तीली की तरह खाक हो जायगी। पूरे सौरमण्डल और अपनी सम्पूर्ण आकाश गंगा का ही नक्शा बदल सकता है। तब जो कुछ आज दिखाई पड़ रहा है उससे सर्वथा भिन्न प्रकार के दृश्य सामने आ खड़े हो सकते हैं।,
प्रति पदार्थ का अस्तित्व अब असंदिग्ध रूप से जान और मान लिया गया है और इस बात पर वैज्ञानिक जगत में पूर्ण सहमति हो गई है कि इस ब्रह्माण्ड के अनेक क्षेत्र प्रति पदार्थ से बने हुए हैं और उनकी भौतिक स्थिति अपनी पृथ्वी की परिस्थितियों से सर्वथा भिन्न—लगभग उलटी है। जिस प्रकार अपनी दुनिया है ‘प्रति पदार्थ’ तनिक−सी झाँकी देकर लुप्त हो जाता है ठीक उसी प्रकार उन प्रति पदार्थ से बने लोकों में अपने क्षेत्र का पदार्थ हलकी−सी झलक दिखाकर वहाँ की संरचना में घुलता और समाप्त होता रहता होगा।
तन्त्र साधना में ‘छाया पुरुष’ साधना का विस्तृत विवरण मिलता है। यह छाया पुरुष क्या है? जीवित मनुष्य का एक सशक्त प्रतिबिम्ब। जिसे साधन प्रयोगों द्वारा अपने वशवर्ती बनाया जाता है और वह किसी भिन्न सत्ता वाले अदृश्य व्यक्ति की तरह आज्ञानुसार काम करता है। इसकी क्षमता साधनकर्त्ता की अपेक्षा कहीं अधिक होती है।
छाया पुरुष का अस्तित्व भले ही संदिग्ध हो, पर छाया विश्व और छाया पदार्थ की सिद्धि अब वैज्ञानिक जगत में मान्यता प्राप्त कर चुकी है और उसे पकड़ने, वशवर्ती करने के लिए प्रबल चेष्टा हो रही है।
दर्पण के सामने खड़े होने पर एक अपने ही जैसा मनुष्य दीखता है, पर वह होता है उलटा। जिधर हमारा दाहिना हाथ होता है उधर उसका बाँया हाथ। अन्य अंग भी उलटे होते हैं। फोटोग्राफी की प्लेट पर भी यही होता है। अपने काले बाल सफेद होते हैं और सफेद दाँत काले। इसे नेगेटिव प्लेट कहते हैं। इसे उलट कर फिर फोटो खींचा जाता है तब कहीं सीधी तस्वीर आती है। बिम्ब का प्रतिबिम्ब उलटा होता है। इसे मिररइमेज कहते हैं—काया और छाया का—छाया और प्रतिच्छाया का यही क्रम चलता है। विपरीतता के लिए अँग्रेजी में ‘एन्टी’ शब्द का प्रयोग होता है।
पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु है। इस परमाणु के भी कई अंग−प्रत्यंग हैं। इस परमाणु परिवार को ही पदार्थ का सूक्ष्मतम अंग माना जाता था, पर अब इसके साथ एक सहोदर भाई और जुड़ गया है वह है ‘प्रति पदार्थ’। पार्टिकल्स अब अकेले नहीं हैं उनके साथ—’एन्टी पार्टिकल्स’ की चर्चा भी जोरों पर है।
परमाणु कितना बड़ा होता है इसका मोटा अनुमान इस प्रकार लगा सकते हैं कि चीनी के एक दाने में लगभग एक हजार शंख परमाणु होंगे। जो ठोस नहीं है। उनके भीतर मध्य भाग में नाभिक होता है, नाभिक न्यूक्लियस—को केन्द्र मानकर उसके चारों ओर पार्टिकल्स उसी प्रकार चक्कर लगाते हैं जिस प्रकार सूर्य के इर्द−गिर्द उसके ग्रह−उपग्रह। नाभिक का निर्माण प्रोटान और न्यूट्रान कणों के संयोग से बना होता है उसके चारों ओर चक्कर लगाने वाले कण इलेक्ट्रान कहलाते हैं। इलेक्ट्रानों में विद्युत का ऋण आवेश और प्रोटानों में धन आवेश होता है। न्यूट्रानों पर कोई विद्युत आवेश नहीं होता। अब कुछ और कण भी खोज निकाले गये हैं और उन्हें मेसान, न्यूट्रीनो फोटान, सिगमा प्लस, सिगमामाइनस, सिगमाजीरो आदि नाम दिये गये हैं।
मोटे तौर से सभी परमाणु एक जैसे होते हैं, पर उनकी भीतरी रचना में प्रोटान, इलेक्ट्रान आदि की संख्या का जो अन्तर रहता है उसी आधार पर उनकी भिन्नता रहती है और भिन्न स्तर के परमाणुओं का समूह विभिन्न प्रकार के पदार्थों के अस्तित्व रूप से सामने आता है।
छाया पुरुष की साधना तान्त्रिक उपासना के क्षेत्र में बहुत समय से प्रचलित है। छाया लोक की चर्चा बहुत समय से कही सुनी जाती रही है अब यह सम्भावना प्रामाणिक स्तर पर स्वीकार की जा रही है कि एक दिव्यलोक हमारे साथ−साथ ही रह रहा है; उसमें ने केवल पदार्थ ही भरा है वरन् प्राणी भी निवास कर रहे हैं। वे प्राणी देव दानवों की कल्पना से मिलते−जुलते हो सकते हैं और जीवाणुओं, विषाणुओं जैसे भी। हम मनुष्यों से वे समर्थ अपरिचित उदासीन भी हो सकते हैं और सम्बद्ध सहचर बनकर हमारी परिस्थितियों के निर्माण में भारी योगदान करते हुए भी पाये जा सकते हैं। कहा नहीं जा सकता कि इस अविज्ञात संसार में भरा हुआ जड़ चेतन हमारे लिए संपर्क बढ़ाने योग्य है या अयोग्य। इन रहस्यों का उद्घाटन भविष्य में होगा। आज तो उसका स्वरूप समझने का प्रारम्भिक कदम ही उठाया जा सकना सम्भव है सो ही उठ भी रहा है।
प्रकृति के रहस्यों के पर्त जैसे−जैसे खुल रहे हैं वैसे वैसे मानव बुद्धि अधिकाधिक हतप्रभ होती जा रही है और अपनी असीमता की गर्वोक्ति पर पुनर्विचार कर रही है। खोज किसी भी सीमा तक बढ़ जाय—हाथ कुछ भी लग जाय तभी विराट् विश्व और मानव प्राणी की तुलनात्मक स्थिति देखते हुए ‘नेति−नेति’ की उक्ति ही दुहराई जाती रहेगी।
अमेरिका में बालक, किशोर और युवक विद्यार्थियों की अपेक्षा उन विद्यार्थियों की संख्या कहीं अधिक है, जो गृहस्थ जीवन में प्रवेश कर चुके हैं, कई−कई बच्चों के माँ−बाप हैं और जिन्हें आजीविका उपार्जन में व्यस्त रहना पड़ता है; फिर भी वे नियमित रूप से क्रमबद्ध शिक्षा प्राप्त करने में संलग्न हैं।
इन प्रौढ़ शिक्षार्थियों की संख्या इन दिनों 3 करोड़ है अर्थात् उस देश के प्रत्येक चार व्यक्ति यों में से एक प्रौढ़ शिक्षा प्राप्त कर रहा है। यह प्रौढ़ शिक्षा भारत जैसी नहीं है, जिसे निरक्षरों को साक्षर बनाने के रूप में जाना जाता है। यह लोग हाई स्कूल या कालेज की सामान्य कक्षाएं तो अपने विद्यार्थी काल में ही पूरा कर चुके होते हैं। प्रौढ़ावस्था में तो वे अपनी रुचि के विषयों की उच्च शिक्षा प्राप्त करने में संलग्न रहते हैं, यह पढ़ाई यों आजीविका उपार्जन में सहायक होती है, पर उसका लक्ष्य प्रथम रूप में ज्ञान पिपासा को भी उस देश में भूख प्यास, निद्रा, विनोद जैसी महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में ही गिना जाता है और उसकी पूर्ति के लिए प्रत्येक व्यक्ति प्रायः आजीवन प्रयत्नशील रहता है। यह एक शौक है—जिसमें विनोद और ज्ञान वृद्धि का दुहरा लाभ मिलता है। कुछ वर्ष पूर्व प्रौढ़ शिक्षार्थी ढाई करोड़ थे, पर अब वे 3 करोड़ हो गये हैं और आगे वह संख्या और भी अधिक बढ़ने की बात को ध्यान में रखते हुए शिक्षण संस्थाओं के विकास की योजना बनाई जा रही है, अकेले लौस एजेल्स नगर में प्रौढ़ वर्ग की रात्रि पाठशालाओं की उपस्थिति, सामान्य विद्यालयों के छात्रों की तुलना में ड्यौढ़ी थी।
शिकागो विश्व विद्यालय के निर्देशक यूजोन वैल्डन ने अपने एक प्रतिवेदन में कहा है—अमेरिकी नागरिक यह अनुभव करते हैं कि शिक्षण प्रक्रिया आजीवन चालू रहने योग्य एक प्रक्रिया है। यह कला, वाणिज्य और विज्ञान के क्षेत्र में तो इसलिए भी आवश्यक है कि नये अनुसंधानों के कारण पुराने तथ्य पिछड़ जाते हैं और नवीन शोधों से लाभ उठाने के लिए नये निष्कर्ष आवश्यक होते हैं। खेल, नृत्य, पर्यटन, संगीत, सामान्य ज्ञान के सम्बन्ध में भी सर्व साधारण को गहरी रुचि है। स्त्रियाँ दाम्पत्य जीवन के हास−विलास, वेश विन्यास, शिशु पालन, आदि विषयों के ऊंचे, अधिक ऊँचे कोर्स पूरे करती रहती हैं।
न्यू आलिर्यन्स (लुईजियैना) के अवकाश प्राप्त नाविक 81 वर्षीय लोकस टकरे ने दर्शन शास्त्र की आरम्भिक कक्षा में अपना नाम लिखाया है और अब वे छटी कक्षा में पढ़ रहे हैं। इस प्रकार के कदम उठाना भारत में आश्चर्य जनक माना जाता है क्योंकि यहाँ बड़ी उम्र में स्कूली शिक्षा प्राप्त करने का प्रचलन नहीं है, पर अमेरिका में ऐसी बात नहीं है। वहाँ यह एक बिलकुल सामान्य बात है। छोटी उम्र के लड़के भी खेल−कूद पसन्द करते हैं और बड़ी उम्र वालों को भी इसमें रुचि रखने पर कोई रोक नहीं है। ठीक उसी प्रकार क्या बड़ी उम्र क्या छोटी उम्र इसमें नियमित रूप से विद्या पढ़ने में कोई अन्तर नहीं आता।
अमेरिका में प्रौढ़ शिक्षा नाम नहीं दिया गया है वरन् उसके लिए ‘निरन्तर चालू रहने वाली शिक्षा’ कहकर पुकारा जाता है। सरकारी योजनाओं में उसका उल्लेख इसी नाम से रहता है। शिक्षा विभाग का यह एक बहुत बड़ा कार्य है। कम से कम 300 कालेजों और विश्व विद्यालयों में प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था है। इसके अंतर्गत छोटे−बड़े अनेक पाठ्य क्रम निर्धारित है। सेन्ट लुई विश्व विद्यालय द्वारा 80 पाठ्य क्रम चलाये जाते हैं, जिनमें एक ‘आज की दुनिया में मनुष्य और ईश्वर का ताल मेल’ जैसा विषय भी सम्मिलित है। वाशिंगटन विश्व विद्यालय, सेन्ट लुई—मिसूरी में उन लोगों की शिक्षा व्यवस्था भी है जो रोज कुआँ खोदते, रोज पानी पीते हैं। जिनकी आजीविका निश्चित नहीं अथवा क्रम है। वे अपनी प्रौढ़ शिक्षा के साथ−साथ मजदूरी भी प्राप्त कर लेते हैं और शिक्षा काल को स्वावलम्बी बन कर पूरा कर लेते हैं। फ्लोरिडा विश्व विद्यालय ने ऐसे पाठ्यक्रम अधिक अपनाये हैं जिनके सहारे मनुष्य अधिक विनोदी बन सके और हँतता−हँसाता रह सके। इनमें एक जादूगरी, संगीत, नृत्य, अभिनय, एवं विदूषक के पाठ्यक्रम भी सम्मिलित हैं।
कैलोग, मिशिगन, जोर्जिया, ओक्ला, हीमा, नेब्रास्का, न्यू हैम्पशर, इलिनीया, इण्डियाना विश्व विद्यालयों ने प्रौढ़ शिक्षा प्राप्त करने के लिए दूर−दूर से आने वालों के लिए छात्रावास भी बनाये हैं। इस कार्यक्रम के अंतर्गत जनता की बढ़ती हुई माँग पूरा करने के प्रति प्रायः प्रति वर्ष नये कम्यूनिटी कालेजों की स्थापना होते चलने का सिलसिला बँध गया है। सम्भवतः यह संख्या अगले दिनों और भी तेज करनी पड़ेगी।
वाल्टीमूर, मेरीलेण्ड के कम्यूनिटी कालेज ने अधिक आयु के लोगों को अधिक प्रोत्साहन देने की दृष्टि से यह नियम बनाया है कि 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को प्राथमिकता दी जायगी और उन्हें शिक्षा शुल्क न देना पड़ेगा। कुछ ऐसे भी स्कूल हैं जो केवल छुट्टियों के दिनों में ही खुलते हैं ताकि अधिक व्यस्त रहने वाले लोग उन्हीं सुविधा के दिनों में कुछ न कुछ सीख सकें। सरकार और व्यापारिक संस्थानों द्वारा यह परामर्श दिया जाता रहता है कि किस उद्योग में मन्दी आने से श्रमिकों की छटनी करनी पड़ेगी और किस धन्धे का विकास होने से उनमें नई भर्ती की जरूरत पड़ेगी। शिक्षित उद्योगों के श्रमिक समय से पूर्व शिक्षा प्राप्त करके नये उद्योगों के लिए उपयुक्त बन सकें और उनका स्थानान्तरण करके ही सुविधाजनक पग उठा लिये जायं इसके लिए उन क्षेत्रों में नये−नये पाठ्यक्रम चालू कर दिये जाते हैं। इससे छटनी और भर्ती का सहज संतुलन बन जाता है और किसी प्रकार की उखाड़−पखाड़ नहीं करनी पड़ती।
महत्वपूर्ण कार्यों में संलग्न लोगों को नवीनतम ज्ञान से लाभान्वित करने के लिए कुछ पाठ्यक्रम यथा क्रम चलाये जाते हैं। जैसे अमेरिकन ला इंस्टीट्यूट ने वकीलों को कानूनी दावपेचों सम्बन्धी उच्च न्यायालयों द्वारा दी गई टिप्पणियों और राज्य सरकारों द्वारा किये गये परिवर्तनों का सम्पूर्ण विवरण जल्दी से जल्दी पहुँचा दिया जाता है और किसी वकील को उसकी तलाश के लिए अलग से माथापच्ची नहीं करनी पड़ती। इसी प्रकार उस देश की मेडिकल एसोसिएशन ने अपने 1,40,000 सदस्यों को नवीन तथ्य शोध निष्कर्षों से अवगत करते रहने के लिए 67 क्षेत्रीय केन्द्र संस्थानों की स्थापना की है। कुछ विद्यालयों ने अपने पाठ्यक्रमों की फिल्में बना ली हैं और वे शिक्षार्थियों की बस्तियों में ले जाकर उन्हें दिखाते हैं ताकि छात्रों को विद्यालयों तक आने−जाने में समय और पैसा खर्च न करना पड़े।
सरकारी शिक्षा तंत्र, लोक सेवी संस्थाएं तथा व्यापारिक आधार पर चलाये गये प्रतिष्ठान, इन तीनों के सम्मिलित प्रयासों में ऐसा तालमेल रहता है कि हर क्षेत्र और हर वर्ग की आवश्यकता पूरी होती रहे और उनमें अनावश्यक प्रतिद्वंद्विता पैदा न होने पाये। 70 वर्षीय स्लिम ब्रण्डेज ने प्रौढ़ शिक्षा को अर्थ उपार्जन का माध्यम बनाया है और वे उसमें पूरी तरह सफल हुए हैं, इनके पाँच दर्जन पाठ्यक्रमों में वक्तृत्व कला से लेकर यौन शिक्षा तक की लोक रुचि की जानकारियाँ सम्मिलित हैं।
अपने निरक्षर, निर्धन और छोटी देहात में बिखरे हुए देश को यदि साक्षर और शिक्षित बनाना हो तो बालक विद्यालयों को ही पर्याप्त न मानकर इसी प्रकार से प्रौढ़ शिक्षा आन्दोलन के लिए नये साहस और उत्साह के साथ कटिबद्ध होना होगा। इसके लिए कहा तो सरकार से भी जाना चाहिए पर, जिनका सरकारी स्तर पर हो सके उनके अतिरिक्त हो, जनता स्तर पर भी इसे आरम्भ किया जा सकता है और लोक समर्थन जगाकर उसे बहुत हद तक सफल बनाया जा सकता है।
सोरठ राज्य के राजा वीरभद्र दान−पुण्य के लिए बड़े लोकप्रिय थे। द्वार पर आने वाला कोई भी याचक खाली हाथ न जाता था; पर उनका यह सारा दान, अनीति और अधर्म की कमाई से होता था।
सरकारी खजाने का कितना ही पैसा उसके ऐश और आराम पर खर्च हो रहा था। जनता कर भार से दबी जा रही थी। मौका देख पड़ौसी राजा ने सोरठ राज्य पर चढ़ाई कर दी। दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया गया। राजा वीरभद्र को रानी सहित बन्दी बना लिया गया; पर कुछ दिनों बाद वे दोनों शत्रु के बन्दीगृह से निकल भागे। प्राण रक्षा के लिए इधर−उधर घने जंगलों में भटकने लगे।
एक दिन परेशान होकर रानी ने कहा—”मैंने सुना है, कि सम्भरगढ़ का एक सेठ पुण्य खरीदने का कार्य करता है, आप तो जीवन भर दान देते रहे हैं यदि आप सम्भरगढ़ जाकर अपने पुण्य का एक अंश बेच दें तो उदरपूर्ति का साधन तो जुट ही सकता है।
राजा ने रानी का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, पर उसके सामने केवल एक ही समस्या थी कि रास्ते में कई दिन लगेंगे अतः भोजन की क्या व्यवस्था होगी? उस समय राजा एक गाँव में ठहरे हुए थे। अतः रानी गई और पड़ौसियों का आटा पीसकर मजूरी का थोड़ा आटा कमा लाई। आटा एक पोटली में बाँधकर राजा वीरभद्र सम्भरगढ़ की ओर चल पड़े। चलते−चलते शाम हो गई तो एक गाँव में ही ठहर गये। उन्होंने आस−पास वृक्षों से लकड़ी तोड़कर आग सुलगाई और चार मोटी−मोटी रोटियाँ सेंक ली। भगवान का भोग लगाकर ग्रास तोड़ने ही वाले थे कि एक भिखारी रोटी माँगता हुआ वहाँ आया और बुरी तरह गिड़गिड़ाने लगा। राजा को दया आ गई उसने अपने सामने से दो रोटियाँ उठाकर भिखारी को देदीं और शेष दो रोटियों से अपनी क्षुधा निवृत्ति की।
वहाँ से चलकर राजा सम्भरगढ़ पहुँच गया। सेठ के सामने पहुँचने पर उसने अपने आने का उद्देश्य स्पष्ट बता दिया। सेठ ने कहा—’आप जिन पुण्यों को बेचना चाहते हैं एक कागज पर लिखकर इस तराजू के पलड़े में रख दीजिये।’ राजा ने वैसा ही किया, पर तराजू ज्यों की त्यों रही। सेठ ने वस्तु स्थिति समझते हुए कहा—’मुझे ऐसा प्रतीत होता है; आपने अनीति और अधर्म की कमाई से दान दिया है।’
राजा बहुत लज्जित हुआ। वह पसीना−पसीना हो गया। अब उसके पास कहने के लिए शब्द ही कहाँ थे। अतः सेठ ने पुनः कहा—’मुझे आपकी परेशानियों पर पूरी सहानुभूति है आप किसी ऐसे पुण्य का स्मरण कर लें जो ईमानदारी से अर्जित कमाई द्वारा संचित किया गया हो।’ वह काफी देर सोचता रहा फिर उसे पिछले दिन की घटना याद आई जब उसने अपने हाथ से रोटी बनाकर भिखारी को खिलाई थी। भिखारी को रोटी दान में देने की बात एक कागज पर लिखकर उसने तराजू के पलड़े में रख दी।
दूसरे ही क्षण राजा ने देखा कि पलड़ा नीचे झुक गया है सेठ ने अनेक स्वर्ण मुद्रायें उसमें रखीं फिर भी काँटा बराबर न आ रहा था। उसे आश्चर्य हुआ कि छोटे से पुण्य के लिए सेठ को 5000) स्वर्ण मुद्राएँ रखनी पड़ीं तब कहीं काँटा बीचो−बीच आया। राजा मन ही मन पछता रहा था कि मैंने जीवन भर अनैतिक साधनों से धन कमाया और यश प्राप्ति की इच्छा से अभावग्रस्त लोगों को दान दिया। काश ईमानदारी और नैतिक साधनों से धन कमाकर दान दिया होता तो मेरे पास भी पुण्य की कमी न रहती और शायद दूसरे के आगे हाथ फैलाने की भी आवश्यकता न पड़ती।
हवा के बाद सबसे सस्ती और सर्वत्र उपलब्ध वस्तु पानी ही है। पानी चाहे जहाँ जितनी मात्रा में बिना मूल्य मिल सकता है।
पानी को दूसरे शब्दों में जीवन कह सकते हैं। प्राणी का महत्व कितना ही अधिक क्यों न हो वस्तुतः वह पानी का ही पुत्र है। शरीर में 85 प्रतिशत पानी और 15 प्रतिशत अन्य पदार्थ हैं। यदि पानी न होता तो यह धरती चन्द्रमा की तरह मृतक पिण्ड मात्र बनी रहती।
अपने सौरमण्डल में पृथ्वी को छोड़कर शुक्र और मंगल ग्रह ही ऐसे हैं जिनमें पानी का अस्तित्व मौजूद है। शेष ग्रह−उपग्रह इस सम्पदा की दृष्टि से निर्धन हैं। पृथ्वी को वनस्पति और प्राणियों से फला−फूला बनाने को श्रेय पानी को ही है जो अपने लोक में दो तिहाई की मात्रा में भरा पड़ा है। वैज्ञानिकों ने हिसाब लगाया है कि पृथ्वी पर साड़े बत्तीस करोड़ धन मील पानी होना चाहिए। जमीन के भीतर जो छिपा पड़ा है वह इससे अलग है। यदि उसे भी गिनना हो तो फिर 20 लाख धन मील पानी इसमें और जोड़ना पड़ेगा। अपने वायु मण्डल में भाप बादल बनकर प्रायः तीन हजार घन मील पानी इसमें और जोड़ना पड़ेगा। अपने वायुमण्डल में भाप बादल बनकर प्रायः तीन हजार घन मील की मात्रा में वह उड़ता−फिरता है। बादल बनकर समुद्र में प्रायः 1 लाख घन मील भाप उठती है, पर उसका 85 प्रतिशत समुद्रों पर ही बरस जाती है। धरती पर वर्षा करने के लिए प्रायः 15 प्रतिशत बादल ही आ पाते हैं।
पृथ्वी आरम्भ में आग को गोला थी वह ठण्डी हुई थी तो उसके भीतर की गैस पानी बनकर बरसने लगी। इसमें अमोनिया, कार्बनडाइ−आक्साइड, मीथेन गैस भी मिली हुई थीं। इन सबकी उलट−पुलट से प्रोटीन पैदा हुए और उनसे प्राणि जीवन का प्रादुर्भाव हुआ। इस प्रकार जीवन का जन्मदाता पानी को कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी कोई प्राणधारी यहाँ तक कि वृक्ष वनस्पति भी पानी के बिना जीवित नहीं रह सकते।
पानी आखिर है क्या? वैज्ञानिक विश्लेषण के अनुसार उसकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं। आक्सीजन का एक और हाइड्रोजन के दो परमाणु मिलने से पानी का एक अणु बनता है। यह एक सम्मिश्रण है स्वतन्त्र तत्व नहीं, जैसा कि कहा और समझा जाता है।
पानी अपेक्षाकृत देर में गर्म होता हैं। उसमें बड़ी मात्रा में गर्मी सोख लेने की क्षमता है। यही कारण है कि जिस बर्तन में पानी गर्म करते हैं वह भरे हुए पानी की अपेक्षा अधिक गर्म होता है। भाप आकाश में उड़कर जब ठण्डी होने लगती है तो अपनी गर्मी हवा को सौंप देती है। उससे उत्तेजित हुई हवा तूफान बन जाती है और भयंकर उपद्रव खड़े करती है।
झील, तालाब, नदी, समुद्र आदि बड़े जलाशय अपने समीपवर्ती वातावरण की गर्मी सोखते रहते हैं और जब वातावरण ठण्डा होने लगता है तो संग्रहित गर्मी को छोड़ने लगते हैं। यही कारण है कि बड़े जलाशयों के आस−पास प्रायः सर्दी−गर्मी समतुल्य बनी रहती है उसमें बहुत अधिक अन्तर नहीं पड़ता। इसके विपरीत जहाँ पानी की कमी है, वहाँ सर्दी−गर्मी के दोनों ही मौसम अपेक्षाकृत अधिक ठण्डे और अधिक गर्म होते हैं। इतना ही नहीं दिन में अधिक गर्मी और रात को अधिक सर्दी भी ऐसे ही इलाकों में पड़ती है। रेगिस्तानी क्षेत्र में दिन में 50 डिग्री सेन्टीग्रेड तक तापमान पहुँच जाता है और रात में शून्य से भी नीचे उतर आता है। पानी न होने के कारण चन्द्रमा पर भी ऐसा ही असन्तुलन है। यदि पानी में अधिक ताप सोखने की शक्ति न होती तो वह सूर्य की गर्मी से कब का उड़ गया होता और भूतल पर उसकी एक बूँद भी दिखाई न पड़ती।
पानी की अपनी यह विशेषता सबसे निराली है कि वह ठण्ड से जमने पर हलका हो जाता है और फैलता है। जबकि अन्य सभी पदार्थ सिकुड़ते हैं। यदि बर्फ पानी से भारी होती तो फिर ध्रुव प्रदेशों की सारी बर्फ समुद्र तली में चली जाती और संसार का नक्शा ही दूसरा होता। तब न बादलों का अस्तित्व होता और न भाप से चलने वाले रेलगाड़ी के इंजन ही बन पाते।
गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध ऊपर की ओर चढ़ दौड़ना पानी की एक और विशेषता है। मिट्टी की निचली परत भीगने पर ऊपर तक सीलन चढ़ आना। जड़ों द्वारा जमीन से खींचा हुआ पानी पेड़ों की ऊपरी सतह तक जा पहुँचना, शरीर में रक्त का नीचे से ऊपर तक दौड़ना इसी विशेषता के कारण सम्भव होता है। पानी में रिसने की शक्ति है और घुलने की। वह इतनी अधिक वस्तुओं को अपने में घुला सकता है जितना अन्य कोई द्रव पदार्थ नहीं। इसी प्रकार वह मिट्टी, पत्थर आदि की दीवारों में अपने लिए जगह बनाता हुआ बाहर निकल आता है और रिसने लगता है। अपने शरीर से पसीना टपकता हुआ हम प्रायः देखते ही हैं।
मनुष्य शरीर में 65 प्रतिशत पानी और 35 प्रतिशत अन्य ठोस पदार्थ हैं। यदि इसमें पाँच प्रतिशत भी कमी पड़ जाय तो शरीर जलने लगेगा और तरह−तरह के रोग उठ खड़े होंगे। पन्द्रह प्रतिशत कमी पड़ जाने पर जो जीवित रह सकना सम्भव ही न होगा। इसी प्रकार यदि मात्रा बढ़ जाय तो भी जीवन संकट खड़ा हो जायगा। शरीर में पानी का सही अनुपात बनाये रहने के लिए मस्तिष्क का हाइपोथैलेमस नामक केन्द्र निरन्तर सजग रहता है। एक−दो प्रतिशत की घट−बढ़ होते ही प्यास लगती है अथवा पेशाब की हाजत होती है।
औसतन मनुष्य के शरीर में प्रायः 100 पौण्ड पानी रहता है। इसमें से 5 पौण्ड पेशाब, पसीने आदि में बाहर निकलता है और इतना ही बाहर से पीना पड़ता है। शरीर का सबसे पतला भाग रक्त है, जिससे 83 प्रतिशत पानी रहता है और सबसे ठोस भाग दाँत हैं जिनमें 2 प्रतिशत ही रहता है।
संसार की सभी सभ्यताएँ बड़ी नदियों के सहारे विकसित हुई हैं। आर्य सभ्यता गंगा−यमुना के दुआवा में फली−फूली। सिन्धु और उसकी सहायक नदियों ने भारत के उत्तर पच्छिम भाग को सभ्यता का केन्द्र बनाया। प्रायः सभी बड़े शहर किन्हीं बड़ी नदियों के किनारे बसे हैं। कृषि, उद्योग, पशु−पालन, मत्स्योद्योग आदि महत्वपूर्ण निर्वाह साधन बिना पानी के सम्भव ही नहीं हो सकते। प्राचीन काल में दुर्भिक्षों के कारण ही अधिक मृत्यु होती थीं और उसका प्रधान कारण वर्षा में कमी हो जाना ही होता था।
पानी नम्रता, सरसता, शीतलता और तरलता का प्रतीक है। मानवी चेतना में यही तत्व सज्जनता और सहृदयता के रूप में भरा पड़ा है। इसके घट जाने पर मनुष्य, नरपशु और सूख जाने पर नारकीय आग में निरन्तर जलने और दूसरों को जलाने वाला प्रेत−पिशाच बनकर रह जाता है।
पदार्थ का भौतिक मूल्य क्या है? लोग उसे कितना कीमती समझते हैं इस आधार पर यथार्थता नहीं परखी जा सकती। किसी वस्तु का वास्तविक मूल्य उसकी उपयोगिता ही हो सकती है। प्रचलन के आधार पर सोना कीमती है, पर जिस धातु के बिना संसार का एक दिन भी काम नहीं चल सकता वह लोहा है। संसार में से सोना चला जाय तो हर्ज नहीं, पर लोहे के बिना तो सारा काम ही रुक जायगा। घी के बिना गुजर है, पर पानी के बिना नहीं। जिसकी जितनी उपयोगिता है वह उतना ही मूल्यवान् है। इस कसौटी पर पानी की गरिमा अत्यधिक है साथ ही उनकी भी जो विश्व की प्रगति में अपनी क्षमताओं को नियोजित करके महामानवों की भूमिका निभा रहे हैं।
मनुष्य को न तो अभागा बनाया गया है और न अपूर्ण। उसमें वे सभी क्षमताएँ बीज रूप से विद्यमान हैं जिनके आधार पर अभीष्ट भौतिक एवं आत्मिक सफलताएँ प्रचुर परिमाण में प्राप्त की जा सकती हैं। आवश्यकता उनके समझने और उपयोग करने की है। जिन्हें यह विश्वास है कि हम आत्म−निरीक्षण और आत्म−विकास का अवलम्बन करके अपनी आवश्यक क्षमताएँ विकसित कर सकते हैं उन्हें यही उचित प्रतीत होता है कि दूसरों के सामने सहायता के लिए गिड़गिड़ाने की अपेक्षा अपनी ही शक्ति , सामर्थ्य एवं प्रतिभा के विकास में जुटा जाय।
संसार के प्राँगण में अनेक व्यक्ति अपने प्रकार की बढ़ी−चढ़ी सफलताएँ प्राप्त करते हैं। इसके पीछे एकमात्र कारण यही होता है कि उन्होंने अपने साहस भर संकल्प को जागृत किया और अपने को इस योग्य बनाया कि अभीष्ट उपलब्धियों को प्राप्त कर सकना कठिन न रहे। जो लोग प्रगति के साधन बाहर ढूँढ़ते हैं—परिस्थितियों अथवा व्यक्ति यों के सहयोग अवरोध को अनावश्यक महत्व देते हैं—वे भूल जाते हैं कि बाहरी सहयोग यदाकदा ही क्वचित् उपयोगी सिद्ध होता है। उसे प्राप्त करके किसी समय—किसी प्रकार की एक छोटी सफलता भले ही प्राप्त कर ली जाय; निरन्तर प्रगति पथ पर बढ़ने के लिए हर समय आवश्यक सहायता अन्यत्र कहीं से नहीं मिल सकती। वह तो अपने भीतर से ही जगानी पड़ती है।
कितने ही मनुष्यों के पास प्रतिभा एवं क्षमता का अपार भंडार भरा होता है, पर वे उसे जानते नहीं और जानते हैं तो यह अनुभव नहीं करते कि यह विशेषताएँ कितनी अधिक मूल्यवान हैं। आमतौर से लोग साधनों को महत्व देते रहते हैं उन्हें ही प्रगति का आधार मानते हैं—इस तथ्य को कोई बिरले ही समझ पाते हैं कि अपना संकल्प बल और उसका गुण, कर्म, स्वभाव के परिष्कृत रूप में सामने आने वाला सदुपयोग कितना अधिक मूल्यवान है। यदि इस सचाई को समझा जा सके तो सबसे अधिक प्रयत्न इसी एक बिन्दु पर एकत्रित किया जाय कि अपनी साहसिकता, तत्परता एवं एकाग्रता को किस तरह अभीष्ट प्रयोजन के लिए जुटा दिया जाय। प्रगति के पथ पर चलने के लिए कई प्रकार के साधनों की जरूरत पड़ती है। इनमें से सबसे बड़ा साधन है, अपना मनोबल। अपने को समझने और सुधारने से बढ़कर और कुछ बुद्धिमत्ता इस संसार में नहीं है। अपनी बिखरी हुई शक्ति यों को यदि एकत्रित करने का अभ्यास कर लिया जाय और उन्हें किस काम में किस प्रकार लगाना यह निश्चय कर लिया जाय तो समझना चाहिए सफलता का अधिकाँश प्रयोजन पूरा कर सकने वाला आधार बन गया।
दूसरे लोग हमें एक सीमा तक ही सहारा दे सकते हैं। हर व्यक्ति की अपनी समस्याएँ हैं उन्हीं को सुलझाना कठिन पड़ता है फिर दूसरों की सहायता करने में कोई कितनी दिलचस्पी ले सकता है या सहयोग दे सकता है यह एक विचारणीय बात है। जब हमीं दूसरों से आशाएँ बाँधते हैं और अपनी गुत्थी आप नहीं सुलझा सके तो दूसरों से ही यह आशा कैसे रखी जा सकती है कि अन्य लोगों के पास इतना फालतू समय या साधन होगा कि हमारे लिए कुछ अधिक कर सकें।
हम जिन दूसरों से सहायता की आशा करते हैं उनके वर्चस्व को स्वीकार करते हैं। हमें स्वीकार करना चाहिए कि यदि अपना आपा विकसित और व्यवस्थित किया जा सके तो उसकी गरिमा उन सभी सहायकों की मिली−जुली सहायता से भी अनेक गुनी उच्च है जिनसे कुछ पाया है या पाने का स्वप्न देखा है।
प्रत्येक ग्रह नक्षत्र अपने आप में अकेला रहता और अपनी धुरी पर घूमता दिखाई पड़ता है; पर वस्तुतः वे एक−दूसरे के साथ उन जंजीरों में बँधे हैं जो आँखों से तो दिखाई नहीं पड़तीं, पर मजबूती उनकी आश्चर्य जनक है। मनुष्य भी अपने आप में अकेला दीखता है, पर वह परिवार और समाज के साथ इतनी मजबूत रस्सी से बँधा हुआ है जो तोड़ी नहीं जा सकती। यदि उसे तोड़ने को प्रयत्न किया जाय तो मानसिक सरसता से लेकर क्षुधा निवृत्ति तक के सारे सूत्र टूट जायेंगे और उस अनभ्यस्त स्थिति में पड़ कर वह अपने अस्तित्व का अन्त कर लेगा। यही बात ग्रह−नक्षत्रों के बारे में भी है वे एक−दूसरे को प्रभावित करते हैं। परस्पर स्नेह−सहयोग का आदान−प्रदान करते हैं। इसीलिए वे जीवित और गतिशील हैं। मनुष्यों की तरह ही ग्रह नक्षत्रों की भी एक सामाजिकता है। वे मिल जुल कर रहने और एक−दूसरे की सहायता करने के लिए सृष्टा के सुदृढ़ नियमों के आधार पर मनुष्यों की तरह ही सामूहिक जीवन जी रहे हैं। यद्यपि दीखते वे भी मनुष्यों की तरह अलग−अलग ही हैं।
यदि सूर्य केवल पूरे 72 घण्टे पृथ्वी पर बिलकुल उदय न हो तो वह गहन अन्धकार में निमग्न हो जायगी, तब यहाँ हाथ को हाथ नहीं सूझेगा। सारी धरती पर तीन मीटर ऊँची बर्फ की पर्त जम जायगी और प्राणधारियों के जीवन का अन्त हो जायगा। सूर्य की अल्ट्रावायलेट किरणें ही शरीरधारियों की देह को प्राण धारण किये रहने योग्य बनाती हैं। उन्हीं से अन्न और वनस्पतियाँ उत्पन्न होती हैं, जो हमारे आहार का प्रधान अंग हैं। यदि यह किरणें पृथ्वी पर आना रुक जायँ, तो उत्पादन में पूर्ण अवरोध खड़ा हो जायगा और विकास क्रम जहाँ का तहाँ रुक जायगा। इतना ही नहीं जो विषाणु अन्तरिक्ष से आते हैं और पृथ्वी पर पनपते हैं वे अल्ट्रावायलेट किरणों के अभाव में द्रुत गति से निर्भयता पूर्वक बढ़ेंगे और हर किसी को रुग्ण बना कर छोड़ेंगे।
सर्व विदित हैं कि ग्यारह वर्ष पश्चात सूर्य में काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं; उनका प्रभाव पृथ्वी पर स्पष्ट रूप में दिखाई देता है। चुम्बकीय क्षेत्र लड़खड़ा जाता है—रेडियो संचार में भारी बाधा उत्पन्न होती है तथा मौसम में भारी उथल−पुथल होती हैं।
रूसी वैज्ञानिक चिजोव्स्की ने पिछले 400 वर्षों से संसार में फैली महामारियों का इतिहास तैयार किया और बताया है कि सूर्य के धब्बों की घट−बढ़ के साथ इस विपत्ति का सीधा सम्बन्ध है। जितने दिनों तक यह धब्बे गहरे या उथले रहते हैं, उसी अनुपात से पृथ्वी पर गहरा या हलका प्रकोप महामारियों का होता है।
विज्ञानी माइकेलसन के अनुसार अमावश्या, पूर्णिमा को पृथ्वी पर पड़ने वाले सूर्य−चन्द्र के प्रभावों से प्रभावित होकर न केवल समुद्र में ज्वार भाटे आते हैं वरन् पृथ्वी भी प्रायः नौ इंच फूलती−धसती है। संसार में विभिन्न समयों पर आये बड़े भूकम्पों का इतिहास यह बताता है कि प्रायः अमावस्या, पूर्णिमा के इर्द−गिर्द ही वे आते रहे हैं। डाक्टर बुड़ाई के अनुसार इन्हीं तिथियों में मृगी उन्माद और कामुक दुर्घटनाओं का दौर आता है। वे कहते हैं सूर्य, चन्द्र की स्थिति का न केवल मौसम पर वरन् मनुष्य शरीर में महत्वपूर्ण काम करने वाली पिट्यूटरी थाइराइड एड्रीनल आदि हारमोन स्रावी ग्रन्थियों पर भी प्रभाव पड़ता है और वे उत्तेजित होकर शरीर एवं मन की स्थिति में असाधारण प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करती हैं। दुर्घटना और अपराधों का दौर इन्हीं दिनों कहीं अधिक बढ़ जाता है।
ब्रिटेन के वैज्ञानिक आरनाल्ड मेयर और कोलिस्को के पर्यवेक्षणों ने यह सिद्ध किया है कि चन्द्रमा की स्थिति मनुष्यों को, प्राणधारियों को और वनस्पतियों को प्रभावित करती है। स्वीडन के वैज्ञानिक सेवेन्ट एहैनियस ने प्रायः दस हजार प्रमाण एकत्रित करके यह सिद्ध किया है कि समुद्र, मौसम, तापमान, विद्युत स्थिति जैसे प्राकृतिक क्षेत्र पर ही नहीं मनुष्य शरीर एवं मन पर भी उसका प्रभाव पड़ता है। स्त्रियों के मासिक धर्म पर चन्द्रमा की स्थिति का असंदिग्ध प्रभाव पड़ता है। सूर्य ग्रहण और चन्द्र ग्रहण को खुली आँखों से देखने के हानि सर्व विदित है। कारण यह है कि इन घड़ियों में उनका संतुलित क्रिया कलाप लड़खड़ा जाने से ऐसा ही निवारक प्रभाव उत्पन्न होता है जो आँख जैसे कोमल अंगों को विशेष रूप से क्षति ग्रस्त बना दे।
अमेरिकी खगोल वेत्ता जान हेलरी नेल्सन का कथन है कि न केवल सूर्य, चन्द्र का वरन् सौर मण्डल के अन्य ग्रहों का भी पृथ्वी पर प्रभाव पड़ता है और उस आधार पर मौसमी उथल−पुथल एवं प्राणियों की शारीरिक मानसिक स्थिति में उतार−चढ़ाव आते हैं। धूमकेतु जब उदय होते हैं तब भी पृथ्वी पर पड़ने वाला अन्तरिक्षीय प्रभाव अवरुद्ध होता है और उसके परिणाम स्वरूप प्राकृतिक—संतुलन बिगड़ने से तरह−तरह के उपद्रव खड़े होते हैं। शरीरगत रुग्णता और मानसिक आवेशग्रस्तता उन दिनों अधिक बढ़ी−चढ़ी देखी जा सकती है।
अमेरिका के समुद्र एवं मौसमी प्रशासन संगठन ने एक प्रतिवेदन प्रकाशित करके बताया कि सन् 1975 में 7 फरवरी, 19 जुलाई और 17 अगस्त के लगभग संसार के अनेक भागों में समुद्री तूफान आने तथा अन्य प्रकार की मौसम सम्बन्धी दुर्घटनाएँ घटित होने की आशंका है।
इन दिनों चन्द्रमा−पृथ्वी की निकटतम दूरी 18200 किलोमीटर पर होगी। इतना निकट वह पिछले 300 वर्षों में कुछ ही बार आया है। इन्हीं दिनों सूर्य भी प्रायः उसी देशान्तर पर भ्रमण कर रहा है जिस पर कि पृथ्वी और चन्द्रमा कर रहे हैं। फलतः वे दोनों सूर्य की परिक्रमा के निकटतम होने जा रहे हैं। ये तथ्य सूर्य की उन गतिविधियों में सहायक होंगे जो पृथ्वी के मौसम को प्रभावित करती हैं।
गतिशीलता का ही दूसरा नाम परिवर्तन है। यह हर वस्तु, व्यक्ति के लिए आवश्यक है। ग्रह नक्षत्र यों यथा स्थान जमे दीखते हैं। अपनी पृथ्वी का गोला उसके देश क्षेत्र यथा स्थान जड़वत् रहते दीखते हैं पर प्रकृति को यह असह्य है। स्थिर समुद्र, ज्वार भाटों की हलचल होने से ही सजीव है अन्यथा अब तक सड़ गल कर वह कब्र का विषाक्त हो गया होता, पृथ्वी समेत अन्य ग्रह भी न केवल धुरी और कक्षा पर घूमते हैं वरन् साँस लेते, फैलते−सिकुड़ते भी हैं। उनके भीतर रेंगने की क्रिया भी चलती रहती है। मनुष्य जीवन में भी सुख−दुख की, उत्थान−पतन की जन्म−मरण की, भली−बुरी परिस्थितियाँ आती जाती रहती हैं। एक स्थिति में सदा बने रहना न मनुष्य के लिये सम्भव है और न ग्रह नक्षत्रों के लिए।
संसार का भू सर्वेक्षण करने वाले अमेरिकी वैज्ञानिकों का कहना है कि अब से 10 करोड़ वर्ष पूर्व दक्षिणी ध्रुव उस क्षेत्र में था, जहाँ अब भारत है। महाद्वीपों के खिसकने की यह प्रक्रिया धीरे−धीरे चलती रहती है और जल को थल में तथा थल को जल में बदलती रहती हैं। दक्षिणी ध्रुव का गोडयानलेण्ड किसी समय बहुत विस्तृत था, अब वह सिकुड़ कर छोटा हो गया है। यूरोप और एशिया प्राचीन काल में एक ही महाद्वीप था। उनके बीच समुद्री अवरोधों की कोई बाधा न थी। हिमालय की पर्वत माला के बारे में उनका विचार है कि यह पहले भूमध्य सागर के गर्भ में डूबी हुई था, पीछे उभर का ऊपर आ गई। इसी प्रकार उस समय के विशालकाय पर्वत अब समुद्र तल में डूबे पड़े हैं।
साधारणतया यही समझा जाता है कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है और सूर्य की परिक्रमा करती है पर अब उसकी एक और गति भी खोज ली गई है। समुद्र की लहरों पर, जिस तरह जलयान झोंके खाता हुआ चलता है, उसी तरह धरती भी एक तरह के झोंके हिलोरें लेती हुई झूलती जैसी चलती है।
रूसी भूतत्व वेत्ता वी. रीवन ने इन झोंकों का क्रम तथा परिमाण ठीक तरह नापने में सफलता पाई है। उनका कहना यह भी है कि ध्रुव करीब 10 मीटर व्यासार्ध के साथ एक घेरे में चारों ओर घूमते हैं, वे अपनी प्रारम्भिक स्थिति में प्रायः 14 महीने बाद लौटते रहते हैं।
पृथ्वी का वातावरण दिन−दिन अधिक गरम होता जा रहा है। इस संदर्भ में पश्चिमी जर्मनी के परमाणु विज्ञानी डा. आटो हकलसे ने प्रकृति विज्ञानियों की काँफ्रेंस में अपना निबन्ध सुनाते हुए कहा—धरती पर से अब हिमि युग का अन्त होने जा रहा है और ग्रीष्म युग पदार्पण कर रहा है! ध्रुवीय क्षेत्रों में क्रमशः सूर्य की किरणें अधिक प्रखर होती जा रही हैं। इससे बर्फ पिघलने का सिलसिला तेजी से चल पड़ा है। यह तेजी थल का एक बड़ा भाग जल में डुबो देगी और उथले समुद्रों में से बहुत से द्वीप ऊपर उभर आयेंगे। बढ़े हुए जल का दबाव जहाँ एक क्षेत्र को दबोचेगा वहाँ उसकी प्रतिक्रिया दूसरे क्षेत्रों को उभारने में भी व्यक्त होगी। व्यक्ति , देश और समाज भी इसी तरह दबते उभरते रहते हैं। नियति हर किसी को मीठे−कडुए अनुभव लेने के लिए बाध्य करती है।
मंगल को भूमि पुत्र कहा जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी से मिलती−जुलती परिस्थितियाँ सौर मण्डल के मंगल ग्रह में ही हो सकती हैं। वहाँ कुछ वस्तुएँ ऐसी हैं जिनके बारे में यह कहा जाता है कि वे कभी न कभी पृथ्वी से अनुदान के रूप में वहाँ पहुँची हैं। स्वयमेव उस तरह के उपार्जन की क्षमता वहाँ के वातावरण में नहीं हैं। मनुष्य भी तो इसी प्रकार के आदान−प्रदान एक−दूसरे को देते हैं। कोई व्यक्ति अपने बल बूते उतना साधन सम्पन्न नहीं बन सकता जैसा कि वह होता है।
मंगल ग्रह पर यदि वनस्पति होगी तो उसके सम्बन्ध में धारणा है कि वह पृथ्वी पर पाई जाने वाली नागफनी से मिलती−जुलती होगी, हाँ उसका विस्तार पृथ्वी पर पाये जाने वाले सभी वृक्षों से अधिक होगा। अन्तरिक्ष वनस्पति विज्ञान के जन्म दाता गावरिल तिरबोज की इस मान्यता का नये खगोल वेत्ताओं ने समर्थन ही किया है। कजाकिस्तान की अन्तरिक्ष प्रयोगशाला के प्रवक्ता निकोलाई के अनुसार मंगल पर वही रासायनिक परिस्थितियाँ हैं जो पृथ्वी पर नागफनी उगने वाले क्षेत्रों में होती हैं। यह एक वनस्पति की बात हुई खोज क्रम आगे बतायेगा कि न केवल पृथ्वी और मंगल का वरन् अन्यान्य ग्रहों का भी आदान−प्रदान चिरकाल से चल रहा है और भविष्य में भी यह क्रम चलता रहेगा।
संसार के व्यक्ति यों को अन्तरिक्ष की स्थिति प्रायः अपनी जैसी ही दीखती है अपनी आँख पर जिस रंग का चश्मा चढ़ा हो वस्तुएँ उसी रंग की दीखने लगेंगी, भले ही वे वस्तुतः उस रंग की न हों।
समुद्र के किनारे खड़े होकर जब हम क्षितिज की ओर निगाह फेंकते हैं तो एक रेखा की तरह वह स्थान दीखता है जहाँ क्षितिज और समुद्र जल का मिलन होता है। यह मिलन रेखा कहाँ है इसे जानना हो तो समझना चाहिए कि वह सतह से उतनी ही ऊँची है जितनी कि हमारी आँखें खड़े होने की जगह से ऊँची हैं। यह दूरी चार किलोमीटर की होगी। इसी प्रकार हम जितने ऊँचे स्थान पर खड़े होकर देखेंगे क्षितिज की रेखा उतनी ही ऊँचाई पर तथा दूरी पर दिखाई देगी। यद्यपि पृथ्वी की गोलाई के आधार पर उस अनुपात में थोड़ा अन्तर तो आता ही है। मनुष्यों में भी थोड़ा बहुत भले−बुरे का अन्तर रहता है, पर वे विशेषतया उसी स्तर के दीखते हैं जैसी कि हमारी निज की स्थिति होती है।
जीवन की परम्पराएँ एक हैं। क्या जड़ और क्या चेतन, क्या व्यक्ति और क्या नक्षत्र सभी को नियति के सुदृढ़ नियमों में बँधकर रहना और चलना पड़ता हैं इस तथ्य को यदि ठीक तरह समझा जा सके तो हम परिवर्तनों से डरें नहीं वरन् उस गतिशीलता का आनंद लूटें। सुदृढ़ नियमों की जंजीर को समझलें तो फिर मर्यादा में रहने का महत्व समझें और उच्छृंखलता अपनाकर विपत्तियाँ मोल न लें।
कोई समय था जब मनुष्यों की स्मृति देर तक कायम रखने के लिए उनके मृत शरीर के साथ ताजमहल सरीखे भवन बनाये जाते थे और पिरामिड खड़े किये जाते थे।
अब युग बदल गया। इन दिनों सोचा जाता है कि कोई सत्कर्म किये जायं जिनसे किन्हीं को सहारा मिले और उनकी सुखी आत्मा से निकला हुआ आशीर्वाद मृतात्मा के काम आये। इन दृष्टिकोण को अपना कर लोग अपने पूर्वजों की शान्ति और सद्गति के लिए सत्प्रयोजनों के लिए कुछ उदार सहायता करते हैं। अधिक अच्छा यह है कि उत्तराधिकारियों से अपेक्षा किये बिना अपनी सद्गति के लिए स्वयं ही अपना श्राद्ध आप किया जाय। इस दृष्टि से नेत्र−दान सरीखी उदारता ऐसी है जिसमें अपना कुछ नहीं बिगड़ता किन्तु दूसरों को आशातीत लाभ मिल सकता है।
अमेरिका में अब तक एक लाख से अधिक व्यक्तियों ने अपना योगदान दिया है। उनकी वसीयतों के आधार पर उनके मरते ही आँखों का वह भाग निकाल लिया गया जिसे दूसरे ज्योति विहीन लोगों की आँखों में फिट करके उनकी अंधेरी दुनिया को फिर से प्रकाशवान बनाया जा सकना सम्भव हो सकता था।
अब इस दिशा में सभी विकसित देशों ने कदम बढ़ा लिये हैं और नेत्र बैंक स्थापित कर लिये हैं। उदार दानी नेत्र दे तो रहे हैं, पर इस दिशा में इतना उत्साह पैदा नहीं हो सका जितना होना चाहिए। संसार के लगभग 5 करोड़ अन्धे हैं, इनमें से अधिकाँश को दृष्टि मिल सकती थी, यदि लोगों ने थोड़ी और अधिक उदारता दिखाई होती।
अब से 200 वर्ष पूर्व ई. डारविन नामक शरीर विज्ञानी ने नेत्र प्रत्यारोपण की सम्भावना का प्रतिपादन किया था। तब से प्रयोग तो कई बार हुए पर उत्साहवर्धक सफलता 1887 में डा. आर्थर हिमले को मिली, जिन्होंने पहली बार खरगोश की आँख की पारदर्शक झिल्ली मनुष्य की आँख में आरोपित की और उसने गई हुई ज्योति को वापिस ला दिया।
नेत्र प्रत्यावर्तन में सबसे सरल कार्य पारदर्शी झिल्ली, स्वच्छ मण्डल, कार्निया का बदलना है। रोहे, मोतियाबिन्द आदि रोगों में यह ऊपरी परत धुँधली या खराब हो जाती है और दीखना बन्द हो जाता है। यदि वह झिल्ली हटा कर नई लगा दी जाय तो फिर से गई हुई ज्योति वापस लौट आयेगी।
झिल्ली, यदि मरने के बाद नेत्र दानी की वसीयत के अनुसार यथा सम्भव जल्दी ही निकाल ली जाती है तो उसे कुछ समय तक दूसरे की आँखों में लगाने के लिए सुरक्षित भी रखा जा सकता है। यों तत्काल प्राप्त झिल्ली अधिक उत्तम रहती है। कुछ समय पूर्व यह झिल्लियाँ केवल 48 घण्टे ही सुरक्षित रखी जा सकती थी; पर अब 70 से॰ शीताँश में रखने पर वे एक महीने तक काम में आ सकने योग्य रह सकती हैं।
यद्यपि अस्पतालों में सैकड़ों व्यक्ति रोज मरते हैं, पर कानून के अनुसार 48 घण्टे उस लाश के दावेदारों की प्रतीक्षा किये बिना उसका कोई अंग काटा नहीं जा सकता और इतना समय बीत जाने के बाद शरीर का कोई अंग प्रत्यारोपण के योग्य नहीं रह जाता। इसलिए लावारिस लाशों से नहीं यह प्रयोजन स्वेच्छा पूर्वक नेत्र दान देने से ही पूरा होता है।
लोगों को अपने धन से मोह हो तो बात समझ में आती है किन्तु मृत शरीर तो जलने, गलने वाला ही है, उससे मोह करने में क्या बुद्धिमानी है। यदि लोग उदारता पूर्वक अपने नेत्र आदि अवयव दान करने लगें तो इससे कितने ही अन्धों को नव जीवन मिल सकता है। अपने हाथों अपनी सद्गति के लिए की जाने वाली यह श्राद्ध प्रक्रिया सब प्रकार बुद्धिमत्ता पूर्ण है।
मनुष्य का मस्तिष्क अनन्त शक्तियों का भण्डार है, पर कठिनाई एक ही है कि वे बिखरी रहती हैं और एक स्थान पर केन्द्रित नहीं हो पाती; इसलिए उनका अभीष्ट लाभ नहीं मिलता। यदि उन्हें एकाग्र किया जा सके तो सामान्य स्तर का समझा जाने वाला मस्तिष्क भी तीक्ष्ण हो सकता है और आश्चर्यजनक कार्य कर सकता है।
सूर्य की बिखरी हुई किरणें यदि आतिशी काँच द्वारा एक छोटे केन्द्र पर एकत्रित की जा सकें तो दो इंच घेरे की धूप में ही अग्नि प्रकट हो सकती है और अवसर पाकर दावानल का रूप धारण कर सकती है। एकाग्रता की भी ऐसी ही शक्ति है, मस्तिष्क का बिखराव यदि एक बिन्दु पर इकट्ठा किया जा सके तो कोई भी व्यक्ति अपने सामान्य मस्तिष्क से अद्भुत प्रतिभा का परिचय दे सकता है।
वैज्ञानिक, दार्शनिक, योगी, गणितज्ञ तथा अन्य महत्वपूर्ण कार्य करने वाले एकाग्रता के अभ्यस्त होते हैं। यह अभ्यास उन्होंने किन्हीं विशेष साधना व्यायामों के सहारे पूरे किये हैं या दैनिक सामान्य कार्यों को ही दत्त चित्त होकर करते रहने से इस विशेषता का विकास कर लिया है, यह अलग बात है;पर इतना निश्चित है कि एकाग्रता का अभ्यास किये बिना कोई प्रतिभाशाली मस्तिष्क भी महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में समर्थ नहीं हो सकता। क्या आध्यात्मिक क्या भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा विकसित करने के लिए एकाग्रता का आश्रय लेना नितान्त आवश्यक है। अस्त−व्यस्त, चंचल और बिखरी हुई मनः स्थिति के व्यक्ति न किसी बात पर गहराई से विचार कर सकते हैं—न प्रयासों के बीच आने वाले उतार−चढ़ावों के पक्ष−विपक्ष को समझ सकते हैं। तन्मय होकर अभीष्ट प्रयोजन में जुट जाने की विशेषता भी उनमें नहीं होती अस्तु कोई कहने लायक सफलता भी किसी क्षेत्र में उनके पल्ले नहीं पड़ती।
भौतिक और आध्यात्मिक जगत में समान रूप से एकाग्रता को महत्व दिया जाता रहा है। योग की चित्त वृत्तियों के निरोध के रूप में महर्षि पातंजलि ने व्याख्या की है। योग साधना में प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि यह चार अंग विशुद्ध रूप से एकाग्रता की प्रगति के चार चरण हैं। भाव, चिन्तन और कर्तृत्व की तीन धाराएँ, जहाँ समन्वित होती हैं वहाँ मनुष्य तीर की तरह सनसनाता हुआ निकलता है और किसी भी लक्ष्य को बेध कर रख देता है। वैज्ञानिकों से लेकर तत्व दर्शियों तक की उपलब्धियों में मात्र एकाग्रता के अनुदान उपहार हैं।
हम अपने बिखराव को रोक कर नियत लक्ष्य की ओर द्रुतगति से बढ़ सकें, इसके लिए प्रत्येक कार्य को पूर्ण जागरुकता, अभिरुचि, तन्मयता और प्रसन्नता के साथ करने की आदत डालनी चाहिए। कर्म योग के व्याख्याकारों ने श्रेष्ठ कर्म को ईश्वर की पूजा कहा है। श्रेष्ठ का अर्थ है सदुद्देश्य पूर्ण और सुव्यवस्थित रीति से किया हुआ काम। यह एकाग्रता की अनवरत साधना ही होगी यदि हम जागने से लेकर सोने तक के प्रत्येक कार्य को ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए अपना श्रद्धा−सिक्त उपहार मानें और उसे लाभ−हानि के तराजू पर न तोल कर अपनी मानसिक एवं शारीरिक स्तर की समीक्षा करते हुए परखें। यदि कोई कार्य पूरी जिम्मेदारी और सद्भावना के साथ करने पर भी असफल रहता है तो इसके कर्त्ता को तनिक भी खिन्न होने की आवश्यकता नहीं। उसने अपना कर्तव्य पूरी तरह निबाहा इतना भर होना किसी के लिए गर्व और गौरव की बात है, भले ही उसे सफलता न मिले।
विज्ञानी ऐडीसन अपने किसी प्रयोग में असफल होने पर इतना ही कहते थे−मैंने एक और ऐसा अनुभव बढ़ा लिया, जिसके आधार पर भविष्य में असफलता से बच जा सकेगा।
आशावादी यदि दुर्घटना ग्रसित होगा तो ईश्वर को धन्यवाद देगा कि उसका जीवन बच गया, मात्र थोड़ी सी चोट लगी। इसके विपरीत निराशावादी थोड़ी सी चोट के लिए भी अपने आप को, ईश्वर को और भाग्य को कोसता दिखाई पड़ेगा। इस प्रकार परिष्कृत दृष्टिकोण रखने वाला व्यक्ति हानि और लाभ दोनों ही परिस्थितियों में प्रसन्न रह सकता है और अपने लक्ष्य में बिना विचलित हुए एकान्त निष्ठा बनाये रह सकता है।
एकाग्रता ईश्वरीय देन नहीं हैं और न वह वरदान की तरह किसी को प्राप्त होती है। उसे विशुद्ध रूप से एक ‘अच्छी आदत’ कहा जा सकता है जो अन्य आदतों की तरह चिरकाल तक नियमित रीति−नीति अपनाने के कारण स्वभाव का अंग बनती है और व्यक्तित्व के साथ घनिष्ठता पूर्वक जुड़ जाती हैं।
एकाग्रता के दो पक्ष हैं, अभीष्ट विचारों से भिन्न प्रकार के विचारों को मस्तिष्क से हटाना और इच्छित विचार धारा का मनः क्षेत्र में अनवरत रूप से प्रवाहित रहना। आरम्भ थोड़े समय से करना चाहिए। प्रयोग 15 मिनट से भी आरम्भ किया जा सकता है। लेखन, अध्ययन, ध्यान आदि जो भी प्रयोजन हो उसके आकर्षक पक्षों को सामने रखना चाहिए और पूर्ण उत्साह के साथ अभीष्ट विचारों में मन को गहराई तक डुबोना चाहिए। मन तब भागता है जब अभीष्ट प्रयोजन में गहरी दिलचस्पी नहीं होती और उसके लिए पूरे उत्साह के साथ तन्मय होने की आवश्यकता नहीं समझी जाती। बेगार भुगतने जैसी उदास मनः स्थिति में ही मन वे सिलसिले इधर−उधर भागता है यदि चिन्तन के विषय को उपयोगी, लाभदायक एवं आवश्यक मान लिया जाय तो मन उसमें जरूर लगेगा। इतने समय तक पूरी तन्मयता रखी ही जानी है यह संकल्प यदि पूरी दृढ़ता के साथ प्रयोग से पूर्व कई बार दुहरा लिया जाय और उसी उत्साह से चिन्तन में अपने आपको खो देने का प्रयत्न किया जाय तो जल्दी ही सफलता मिलने लगती हैं।
लगातार बहुत समय तक एक ही विचार में डूबे रहने की अपेक्षा यही अच्छा है कि बीच−बीच में विश्राम ले लें और चिन्तन की धारा में जो छोटे−मोटे मोड़ या विभाजन लाये जा सकते हों, उनमें तन्मयता को विभक्त कर लिया जाय। किसी विषय के कई पक्ष होते हैं। उनका पहले से ही वर्गीकरण कर लिया जाय और एकाग्र साधना के लिए जितना समय निर्धारित किया है उसे उन खण्डों के विभाजित क्रम के अनुसार काम में लाया जाय। स्वास्थ्य संवर्धन के प्रश्न पर विचार करना हो तो बिगड़ने के कारण, सुधार के लिए परिवर्तन—परिवर्तन के साधन आदि वर्गों में उसे बाँटा जा सकता है और निर्धारित क्रम से उन बातों पर विचार करते हुए, चिन्तन की शृंखला की जा सकती है।
मानसिक व्यायाम के रूप में एकाग्रता की साधना को ध्यान योग कहते हैं। इसके दो भाग हैं। एक वह जो आमतौर से पूजा प्रयोजनों में काम आता है। किसी देवी देवता के चित्र को आँखों से देखने और फिर नेत्र बन्द करके सुदूर आकाश में अथवा मस्तिष्क के मध्य में प्रतिष्ठित देखना। ऐसे देव चित्रों के साथ तेजोवलय जुड़ा हुआ होने की भावना की जाती है। निराकार उपासना वाले मात्र सूर्य का या दीपक की लौ जैसे प्रकाश बिन्दु का ध्यान करते हैं। इस आधार पर की गई साधना में चिन्तन के बिखराव को एकत्रित करने का अवसर मिलता है। इष्ट देव के वाहन, आयुध, अलंकार, उपकरण आदि की विविधता यह मन को एक सीमित क्षेत्र में चाहे जितनी दौड़ लगाते रहने का अवसर देती है। भाव निष्ठा जुड़ी होने से वह लाभ और भी अधिक बढ़ा−चढ़ा बन जाता है। उसके सत्परिणाम कई प्रकार की चमत्कारी अतीन्द्रिय सिद्धियों के रूप में दृष्टिगोचर होती है।
ध्यान योग का दूसरा पक्ष है किन्हीं विचारों में ऊहापोह में गहराई तक उतरते जाना। एकाग्रता में उभय पक्षीय पर्यवेक्षण की—समुद्र मंथन जैसे विचार मंथन की पूरी गुंजाइश है। वैज्ञानिक और तत्वदर्शी अपने लक्ष्य चिन्तन में निमग्न हो जाते हैं। इसका अर्थ मस्तिष्क को ठप्प करके किसी नियत बात को ही निरन्तर सोचते रहना नहीं वरन् यह है कि उस प्रसंग की सीमाओं में रह कर जितना अधिक विवेचन विश्लेषण किया जा सकता हो किया जाय। विषय की निर्धारित सीमा से बाहर न भागना ही ध्यान का प्रधान उद्देश्य है। यह सोचना मूर्खता पूर्ण है कि ध्यान में मस्तिष्क जड़ हो जाता है और किसी एक ही प्रतिमा अथवा विचार में डूबा रहता है। ऐसा मस्तिष्कीय संरचना को देखते हुए किसी सामान्य व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं हो सकता। अर्ध मूर्छित स्तर की तथा कथित सामान्य अवस्था में किसी के लिए ऐसा होना सम्भव होता होगा तो होता ही होगा; पर एकाग्रता को ध्यान साधना के साधकों को वैसा सम्भव नहीं होता।
प्रतिमा पर अथवा किसी विचार प्रक्रिया पर ध्यान एकाग्र करने के लिए नियत स्थान, नियत समय एवं नियत साधन प्रक्रिया अपनानी चाहिए। किसके लिए कौन समय, कैसा स्थान और क्या साधना विधान उपयुक्त रहेगा यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। यह व्यक्ति की मनः स्थिति और परिस्थिति पर निर्भर है उसमें भिन्नताएँ रह सकती हैं। अपने परिवार में गायत्री मंत्र के जप और प्रकाश ज्योति के ध्यान की परम्परा चल रही हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं कि अन्य कोई साधना सफल हो ही नहीं सकती। श्रद्धा और निष्ठा का समन्वय किसी भी प्रकार एवं विधान को सफलता के स्तर तक पहुँचा सकता है।
एकाग्रता में कई बार तो परिस्थितियाँ ही बाधक बन जाती हैं। बैठने का स्थान अथवा ढंग असुविधाजनक हो तो उस कठिनाई के कारण चित्त बार−बार उचटता रहेगा। मैले, कुचैले, दुर्गन्ध युक्त , सीलन, सड़न, अनुपयुक्त तापमान के स्थान प्रायः मन नहीं लगने देते। जहाँ बैठ कर एकाग्र चित्त से भजन अध्ययन आदि करना हो उसे अधिक से अधिक सुविधाजनक बनाया जाना चाहिए। कोलाहल, खटपट न हो, भगदड़ एवं हलचलों वाले दृश्य न दीखें, सर्दी−गर्मी, असह्य न हो, अस्वच्छता न छाई हो तो ऐसे शान्त और उपयुक्त स्थान में सहज ही मन को काम में लगाया जा सकेगा। शरीर को सहारे और आराम की बैठक मिलनी चाहिए। पैर, पीठ, गरदन आदि को तोड़ मरोड़ कर, उकडू−मुकडू बैठना शरीर पर दबाव डालता है और चित्त उचटता है। स्थान एवं बैठने के साधन एकाग्रता साधन के लिए नितान्त आवश्यक हैं।
स्थिति, समय, स्थान और प्रयोग काल का संतुलन एकाग्रता प्राप्त करने के महत्व पूर्ण साधन हैं। शरीर बैठने में असुविधा अनुभव न करे, स्थान, शान्त और स्वच्छ हो—प्रयोग का समय निर्धारित हो, जिस समय प्रयोग करना है वह घड़ी के अनुसार नियत−नियमित रहे तो मन जरूर लगेगा। जितने समय एकाग्र रहना और संकल्प भी निर्धारित हो तो उतने समय तक अभीष्ट प्रयोजन में संलग्न रहने की सूक्ष्म तैयारी अन्तःचेतना अपने आप कर लेगी और उतने समय बहुत ही कम विक्षेप होगा। पन्द्रह मिनट का प्रयोग धीरे−धीरे बढ़ाया जा सकता है। हर सप्ताह एक−दो मिनट भी बढ़ाते रहें तो साल भर में एक घण्टा तन्मय रहने की आदत पड़ सकती है। अभ्यास जितना पुराना होता जाता है, उतनी ही प्रखरता उसमें आती जाती है। कुछ समय उपरान्त वह एक स्वाभाविक आदत बन जाती है। वैज्ञानिक कलाकार, योगी तथा दूसरे बुद्धिजीवी प्रगाढ़ एकाग्रता में डूबे हुए अपने विषय का गहरा चिन्तन करते रहते हैं और बहुमूल्य मोती ढूँढ़ कर लाते हैं। चिन्तन के सत्परिणामों एवं सम्भावनाओं पर विचार करते रहने में दिलचस्पी बढ़ती है और उसके साथ सुदृढ़ संकल्प एवं नियमित प्रयत्न जुड़ जाने पर एकाग्रता सरल सम्भव होती है और क्रमशः अधिक लम्बी एवं गहरी बनती जाती है।
शारीरिक स्वस्थता के लिये किये जाने वाले व्यायाम, आसन, प्राणायाम आदि का जो महत्व है, वही मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन के लिए ध्यान साधना का है। यदि अपनी स्थिति के अनुसार कुछ समय इस प्रयोजन के लिए नियत रखें तो क्रमशः एकाग्रता की शक्ति बढ़ती जायगी और उसे प्रगति के किसी भी क्षेत्र में प्रयुक्त करके उत्साह वर्धक लाभ प्राप्त किया जा सकेगा।
मनुष्य शरीर के लिए जिन पोषक पदार्थों की आवश्यकता है, उनका सन्तुलित सम्मिश्रण गोदुग्ध में ही पाया जाया है। अनेक स्तर के उपयोगी खाद्य−पदार्थ ढूँढ़ने के स्थान पर यदि अकेला गोदुग्ध ही आवश्यक मात्रा में मिलता रहे तो स्वास्थ्य संरक्षण की समस्या सरलता पूर्वक हल हो सकती हैं।
पोषण विशेषज्ञों के अनुसार हर व्यक्ति को 10 ओंस दूध तो प्रतिदिन मिलना ही चाहिए, किंतु अपने देश में वह प्रति व्यक्ति पीछे 5 ओंस भी उपलब्ध नहीं होता। संसार में अन्यत्र इस सम्बन्ध में समुचित ध्यान दिया गया हैं। विकासवान देशों ने अपने यहाँ दूध का उत्पादन पर्याप्त बढ़ाया हैं। दुनिया के दो तिहाई देश जिनमें भारत भी सम्मिलित है बहुत कम दूध प्राप्त करते हैं। एक तिहाई आबादी के विकासवान देशों ने पिछड़े देशों की तुलना में कई गुना दूध उत्पादन बढ़ाया है। संसार में कुल 340 लाख मैट्रिक टन दूध प्रतिवर्ष उत्पन्न होता है। यदि इस संसार के हर मनुष्य को बराबर−बराबर बाँटा जा सके तो प्रति व्यक्ति पीछे वह आधा लीटर उपलब्ध हो जायगा। संसार के सभी देश अपने−अपने यहाँ दुग्ध का उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील हैं।
हर व्यक्ति पीछे प्रतिदिन दूध की खपत का औसत कुछ देशों में इस प्रकार है—कनाडा 57॥, फिनलैंड 55, न्यूजीलैंड 57।, आस्ट्रेलिया 45, ब्रिटेन 42॥, जर्मनी 35, दुर्भाग्य से भारत में प्रति व्यक्ति पीछे यह खपत मात्र 5 ओंस है। यही कारण है कि जहाँ न्यूजीलैंड की औसत आयु 67 वर्ष अमेरिका की 62 वर्ष, डेनमार्क की 56 वर्ष है वहाँ भारतवासी औसत आयु की दृष्टि से 27 वर्ष तक ही पिछड़े पड़े हैं।
गिरे हुए स्वास्थ्य की समस्या का समाधान करने के लिए मात्र चिकित्सा साधन बढ़ाने पर्याप्त न होंगे वरन् पोषक खाद्य−पदार्थों के उत्पादन एवं उपयोग के लिए आवश्यक साधन जुटाने होंगे। इसके लिए गौ पालन और दुग्ध उत्पादन को प्राथमिकता देनी पड़ेगी।
गाय के दूध में सम्मिश्रित नाइट्रोजन वर्ग के पदार्थों में लोक्टोक्रीम, क्रिएटिन, यूरिया, थियोसायनिक एसिड, ओरोटिक एसिड, हाइपोक्सेन्थीन, जेन्थीन, यूरिक एसिड, कोलिन, मेथिलग्वेनिडिन, ट्राइमेथिलेमिन, एमोनियम साल्टस आदि प्रमुख हैं।
फास्फरस वर्ग के पदार्थों में फ्रीफास्फेट लेसियिन, सिफेलिन, डाइमिनो मोनोफास्फेराइड आदि का बाहुल्य हैं। गोदुग्ध में 50 स्तर के पदार्थ लगभग 150 रूपों में मिले रहते हैं।
भैंस के दूध में उपरोक्त पदार्थों में से आधे भी नहीं है। चिकनाई की मात्रा अधिक रहने से वह गाढ़ा और स्वादिष्ट अवश्य लगता है, उसमें घी और खोया भी अधिक मिलता है; पर प्रोटीन, विटामिन और खनिज पदार्थों की वह मात्रा अतीव न्यून हैं जो गाय के दूध में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती है।
भारत में गौ वंश के नाश का सबसे बड़ा कारण हैं गाय के दूध को पतला देखकर उसे महत्वहीन मानना और भैंस के दूध की चिकनाई पर लट्टू रहना। हम गौ माता की जय बोलते हैं और भैंस माता का पूजन करते हैं। जब तब गोदुग्ध की महत्ता न समझी जायगी और उसे ही प्राथमिकता न मिलेगी तब तक दुबली उपेक्षित गायें आर्थिक दृष्टि से लाभदायक न रहने के कारण खुल्लमखुल्ला या लुके−छिपे छुरी के घाट ही उतरती रहेंगी। आवश्यकता इस बात की है कि गौ पालन को लाभदायक व्यवसाय बनाया जाय। इसके लिए गौरस को अपनाये जाने की बात जन मानस में उतारी जानी चाहिए। जिसकी माँग होती हैं उसका सम्वर्धन होता है। जब सर्वत्र गौ दुग्ध और गौ घृत ही माँगा जाय तो कोई कारण नहीं कि बड़े पैमाने पर गौ पालन का उद्योग आरम्भ न हो जाय और उसकी नस्ल समुन्नत न होने लगे। कहना न होगा कि सुविकसित नस्ल की गायें संसार भर में कहीं भी नहीं कटती फिर भारत में ही उसे कोई काटकर क्या करेगा। जब हाथी, ऊँट, घोड़े, खच्चर आदि माँस की दृष्टि से महँगे कटने के कारण कसाई के यहाँ नहीं जाते तो गौ वध की मूर्खता ही कोई कैसे करेगा?
देश की आर्थिक और आरोग्य समस्या का समाधान करने के लिए गौ रक्षा आवश्यक है, पर वह सम्भव तभी हो सकती है जब जन−साधारण को गौ दुग्ध का महत्व समझाया जाय और मात्र उसी के सेवन के लिए सहमत किया जाय।
बात तो कुछ अटपटी−सी लगती है कि मनुष्य की चेतन भावनाओं का चुम्बक जैसे अचेतन या जड़ पदार्थ से क्या सम्बन्ध? पर यह बात शत प्रतिशत सत्य है। चुम्बक का कार्य है आकर्षण। वह अपनी कला द्वारा अन्य लोहे के पदार्थों को आकर्षित करता है। उनको अपना जैसा बनाने का यत्न करता है। एक और विशेषता चुम्बक की है। यह यदि टुकड़ों−टुकड़ों में भी विभक्त कर दिया जाय तो हर टुकड़े की वही विशेषता बनी रहेगी। एक टुकड़े को एक धागे में बाँधकर यदि अधर में लटकाया जाय तो इसके दोनों सिरे क्रमशः उत्तर दक्षिण की तरफ ही रहेंगे। चाहे जैसी परिस्थिति आ जाय अपनी दिशा नहीं बदलेंगे। स्थिरता का सहज गुण चुम्बक में है। इसीलिए जलयानों या वायुयानों में ‘कंपास’ के सहारे ही दिशा ज्ञान का बोध होता है।
ऊपर बताये गये सारे के सारे लक्षण मनुष्य में भी पाये जाते हैं। यदि मन की प्रवृत्तियाँ सही ढंग से कार्य कर रही हों तो एक महान व्यक्ति बना जा सकता है। ठीक चुम्बक की तरह ही सारी विशेषतायें विकसित की जा सकती हैं। महान व्यक्तित्वों में कितना आकर्षण होता है कि वे जिस स्थान पर खड़े हो जाते हैं लोग अपने आप उनके चारों ओर एकत्रित हो जाते हैं। उनके क्रिया−कलाप, उनके आचरण−व्यवहार तथा उनके सद्गुण सहज ही साधारण कोटि के व्यक्तियों का मन मोह लेते हैं। एक लोकप्रिय नेता इसका सबसे सफल उदाहरण है। वह जहाँ—भी जाता है लोग उसका अनुगमन करते हैं।
चुम्बक की दूसरी विशेषता एकरसता की है। वह चाहे कितना विखंडित क्यों न हो जाय उसकी आकर्षण शक्ति कम नहीं होती। महान पुरुष ऐसे ही होते हैं। वे बाह्य रूप से चाहे जितने छोटे हो जायँ, परन्तु उनकी महानता में कोई अन्तर नहीं आता है। उनका व्यक्तित्व खंडित नहीं होता है। वे अनेकों लोगों से एक साथ सम्बन्ध रखते हैं, परन्तु उनके व्यक्तित्व में अपने−पराये का, पक्ष−पात को कोई अन्तर नहीं आता। एक सूर्य अनेक घड़ों के जल में एक रूप ही दिखाई देता है।
चुम्बक की तीसरी विशेषता है दिशा के प्रति स्थिरता। इसके द्वारा सदैव ही उत्तर एवं दक्षिण दिशा का ज्ञान होता रहेगा आप चाहे जहाँ चले जायं—आकाश में या समुद्र में कम्पास आपको दिशा ज्ञान अवश्य ही करायेगा। वही स्थिति विकसित व्यक्ति की भी होती है। यदि सद्प्रवृत्तियाँ जगा ली गयी है, भावना एवं व्यक्तित्व का परिष्कार कर लिया गया है तथा उद्देश्य को गम्भीरता से ग्रहण करने की शक्ति पैदा कर ली गई है तो यह निश्चित है, मनुष्य अपनी दिशा से कभी हिल नहीं सकता। वह दूसरों का भी मार्ग प्रशस्त करता है। दूसरों को सही प्रेरणा प्रदान करने का काम भी तो चुम्बक के गुण की तरह ही है। कहते हैं—अब्राहमलिंकन अपने समय के इतने पक्के थे कि जब वे सवेरे टहलने जाते थे तो लोग उन्हें देखकर ही घड़ियाँ मिला लेते थे। जिस समय उन्हें जिस स्थान से होकर गुजरना होता था ठीक उसी समय उस स्थान से वे गुजरते थे।
कहते हैं कि चुम्बक की ही तरह एक और पत्थर होता है जिसे पारस कहते हैं। यह लोहे से स्पर्श हो जाय तो लोहा सोना बन सकता है। चुम्बक के पास इतना मूल्यवान गुण तो नहीं है परन्तु वह अपने संपर्क में आने वाले हर लोहे के टुकड़े को अपना जैसा बना लेता है। इसी तरह महामानवों के संपर्क में आने वाला साधारण मनुष्य उसी की जैसी विशेषताओं को ग्रहण कर लेता है। धनी व्यक्ति पारस की तरह अपने धन−दान से याचक का दुःख तो दूर कर सकता है, परन्तु उसे अपना जैसा नहीं बना सकता है। ऐसा चुम्बकीय विकसित व्यक्तित्व ही कर सकता है।
बड़ी से बड़ी विशेषताओं एवं महान गुणों से युक्त मनुष्य भी पतित क्रियाओं एवं पतित विचारणाओं के अपनाने से गर्त में गिर जाता है और अपनी समस्त विशेषताएँ धीरे−धीरे खो देता है। ठीक इसी तरह जैसे चुम्बक को बार−बार पटकने तथा ऊपर−नीचे करने से उसकी आकर्षण शक्ति लुप्त हो जाती है, महान पुरुषों की भी पुण्य की पूँजी एवं प्रभाव उनके पतन के गर्त में गिरने से नष्ट हो जाते हैं।
अपनी इस पृथ्वी के चतुर्दिक् एक चुम्बक क्षेत्र व्याप्त है, उसी के सहारे वह समस्त ब्रह्माण्ड में फैली हुई तमाम आवश्यक विशेषताओं को इकट्ठी करती रहती है, यदि इस स्रोत से उसे यह अनुदान न प्राप्त होता तो उसका अक्षय भण्डार एक दिन अवश्य समाप्त हो जाता और साधन सम्पन्न कही जाने वाली धरती विपन्न एवं दीन−हीन की स्थिति में पहुँच जाती। परन्तु ऐसा इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि पृथ्वी के अन्दर फेट्स आक्साइड, मैगनेटाइड का विशाल भण्डार भरा पड़ा है। उसकी अन्तर्निहित सम्पत्ति की गन्ध उड़−उड़कर बाहर चतुर्दिक् में व्याप्त होती रहती है और अपनी आकर्षण शक्ति को यथावत बनाये रखती हैं।
यह बहुत ही आवश्यक है कि अन्दर की सम्पदा फूटकर बाहर निकले। यदि ऐसा न हो तो कभी भी अस्वास्थ्य का खतरा उत्पन्न हो सकता है। पेट में खराबी हो जाती है तो बदबू बनकर ही तो बाहर निकल पाती है। यदि कर्कश व्यक्ति हो तो वह वैसे ही बुरे एवं कर्ण कटु शब्द बोलेगा। इसके विपरीत मधुर भाषी व्यक्ति अपनी वाणी से ही अपनी सहज स्नेह ममता एवं सद्भावना युक्तता का परिचय दे देता है।
धरती की चुम्बकीय शक्ति की तरह मनुष्य में भी एक सहज आकर्षण शक्ति विद्यमान है उसका प्रयोग करके समर्थता एवं साधन सम्पन्नता प्राप्त की जा सकती है। मनुष्य यदि अपने चुम्बकत्व का प्रयोग करे तो उसे भी वैसे ही पुराण वर्णित चमत्कार प्रस्तुत करने का अधिकार मिल सकता है। यदि तप, साधना के द्वारा आत्मबल को बढ़ा लिया जाय तो हम आज से हजारों वर्ष पहले घटित घटनाओं को भी यथार्थ रूप में आकाश मण्डल में सुन या देख सकते हैं। विज्ञान से तो अब यह सिद्ध ही हो चुका है कि जो भी ध्वनियाँ निसृत होती हैं वे कभी भी नष्ट नहीं होतीं।
मनुष्य की अतीन्द्रिय क्षमता में वह चुम्बकत्व विद्यमान है जिसके द्वारा वह असम्भाव्य कार्यों को भी कर सकता है। आँखों से न देख पाने वाले स्थानों की वर्तमान में घटित होने वाली घटनाओं का सचित्र वर्णन कर सकता है। एक स्थान से दूसरे स्थान को परस्पर संवाद आदान−प्रदान कर सकता है। इसके अतिरिक्त यदि हमने तप, साधना द्वारा प्रेरक क्षमता अर्जित कर ली है तो किसी दूसरे को प्रेरित कर लाभ पहुँचाया जा सकता है।
हम यदि प्रयत्न करें तो जिस तरह हम धन एकत्रित करते हैं, सम्पदा एकत्रित करते हैं और बल एकत्रित करते हैं उसी तरह से मानवी चुम्बकत्व—तेजोवलय को इतना प्रचण्ड बना सकते हैं कि उसके प्रभाव से अपना और दूसरों का आशाजनक हित साधन किया जा सकता है। किन्तु साथ ही यह भी स्पष्ट है कि यह व्यक्तित्व दोष युक्त , विकृत, निकृष्ट स्तर का होगा तो उससे अपनी तथा दूसरों की हानि भी उसी अनुपात से होती रहेगी।
दिन भर काम करने के पश्चात् हमारे मन पर, शरीर पर थकावट का भार पड़ता है। इस भार को हल्का कर नई शक्ति पाने के लिए ही प्रभु ने रात को निद्रा की व्यवस्था की है। इस बात का ध्यान रखते हुए हमें अपने मन में क्रोध, ईर्ष्या एवं चिन्ता को स्थान नहीं देना चाहिए और मन को शान्त एवं प्रफुल्ल रखना चाहिए तभी हम ईश्वर की इस व्यवस्था का समुचित रूप से लाभ उठा सकते हैं।
मनुष्य शरीर के लिए निद्रा वरदान है इसका सबसे बड़ा महत्व यही है कि दिन भर के कठिन परिश्रम के पश्चात् निद्रा के माध्यम से हम अपने शरीर की खोई हुई शक्ति को पुनः संचित कर अगले दिन के कार्य के लिए तैयार रहते हैं। किन्तु यह तभी सम्भव हे जब हम चिन्ता रहित शान्त मन से सोचें अन्यथा चिन्तायें हमें कहीं चैन न लेने देंगी तब निद्रा हमारे लिए अभिशाप सिद्ध होगी।
शरीर को स्वस्थ एवं मन को प्रसन्न रखने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने मन को सब प्रकार की चिन्ताओं से दूर रखें और उसे शान्ति रूपी जल से निरन्तर स्नान कराते रहें जिससे हमारा मन निर्मल, प्रसन्नता व शान्ति से ओत-प्रोत हो जाये, तब निद्रा हमारे स्वास्थ्य और प्रसन्नता के लिए वरदान तुल्य होगी।
हमारे मन में सोते समय यह आशाप्रद विचार होने चाहिएँ कि हमारा जीवन सुखी एवं सम्पन्न हो। सोते समय हमें किसी महापुरुष के श्रेष्ठ कर्त्तव्यों एवं उज्ज्वल आदर्श को स्मरण करना चाहिए और ऐसा विचार करना चाहिए कि हम भी अपने जीवन में ऐसे ही श्रेष्ठ कार्य करेंगे। ऐसे प्रेरणादायक विचारों से मस्तिष्क को प्रकाशित रखना चाहिए। तथा इस तरह के विचारों के प्रभाव से हमारा जीवन भी उसी ओर अग्रसित होता है।
काम-काजी व्यक्ति की हर समय कुछ न कुछ सोचते रहने की आदत पड़ जाती है और यह आदत उन्हें रात में भी सोचने के लिए बाध्य कर देती है। इससे उनका सोना न सोना बराबर हो जाता है। उनकी शारीरिक एवं मानसिक शक्ति का ह्रास होता है।
मन को चिन्ता से दूर रखकर उच्च आदर्शों का अभ्यस्त बनाना एक प्रकार की कला है इसके लिए बड़े अभ्यास की आवश्यक ता है। सोने के समय हमें प्रसन्न एवं निश्चिन्त होना चाहिए मानो ईश्वरीय उल्लास हमारे रंग-रंग में छा गया हो। इससे हमें सुखद निद्रा आती है। इससे शरीर में नया बल एवं उत्साह बढ़ता है जिससे हम दैनिक कार्यों को अच्छी तरह से कर सकते हैं। चिन्ता और भय धीरे-धीरे आशा एवं सफलता के प्रकाश में धीमे पड़ते जायेंगे। उच्च विचारों के समावेश से जीवन एक नया सन्देश देने लगेगा। स्वास्थ्य की सुन्दरता हमें प्रगतिशील बनायेगी।
चिन्ताएँ मनुष्य को अपाहिज बना देती हैं। चिन्ता रूपी सुरसा व्यक्ति को खा जाती है। रात्रि में कभी-कभी हमें बड़े भयंकर स्वप्न दिखाई पड़ते हैं। यह सब हमारी चिन्ताओं का ही परिणाम होता है जो निद्रावस्था में हमें परिलक्षित होता है जो मिथ्या होते हैं। लेटने के बाद अगर कोई विचार मन में आता है तो वह श्रेष्ठ, उच्च, महान होना चाहिए। दुःखदायी अनुभवों का स्मरण न करें यह हमारे घोर शत्रु हैं। जीवन को प्रगतिशील एवं विकसित बनाने की शुभ आशाओं का चिन्तन कीजिए।
शारीरिक स्वास्थ्य को सही रखने के लिए आहार-बिहार का सन्तुलन आवश्यक है। नियत, नियमित दिनचर्या और सरल सात्विक रीति-नीति अपनाये बिना जन्म-जात रूप से मिला हुआ सुदृढ़ आरोग्य भी स्थिर नहीं रह सकता। ठीक इसी प्रकार चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत रखे बिना, मानसिक स्वास्थ्य का सही रह सकना सम्भव नहीं। विकृत दृष्टिकोण अपनाने से, तनिक-तनिक से सामान्य जीवन में अनायास ही आते रहने वाले अवरोध, पर्वत के समान कठिन मालूम पड़ते हैं। असहिष्णु व्यक्ति विचार भिन्नता सहन नहीं कर सकता।
किसी की आकृति किसी से नहीं मिलती इसी प्रकार एक प्रकृति के दो मनुष्य भी संसार में अभी तक नहीं बने हैं। कुछ न कुछ भिन्नता आकृति में भी रहेगी और प्रकृति में भी। पूर्ण मतैक्य परमहंसों में हो सकता है अथवा मृतकों में। सामान्य मनुष्यों में मतभेद और रुचि भेद बने ही रहते हैं। इस भिन्नता में एकता के सूत्र ढूँढ़ निकालना और मिल जुलकर निर्वाह करना मानवी प्रकृति की वह विशेषता है जिसे अपनाकर जिओ और जीने दो की स्थिति बन सकती है। अवाँछनीय मत भेदों को घटाने और हटाने के लिए क्रमिक चरण उठाये जा सकते हैं और धैर्य पूर्वक प्रयत्न जारी रखे जा सकते हैं। तत्काल समस्त भिन्नताएँ मिट जायं और दूसरे लोग—प्रिय जन हमारे पूर्ण अनुयायी, पूर्ण समर्थक बन जायँ इस अधीरता में मनुष्य पाता कुछ नहीं, खोता ही खोता है। अधीरता उद्विग्नता से खाई पटती नहीं, चौड़ी ही होती हैं।
मनुष्यों के साथ तालमेल न बिठा सकने की तरह ही व्यक्ति त्व की एक बड़ी दुर्बलता है, परिस्थितियों के साथ तालमेल न बिठा सकना, सदा सर्वदा सभी परिस्थितियाँ मन चाही ही बनी रहें, यह सोचना मूर्खतापूर्ण है। यह संसार हमारे लिए ही नहीं बना है और सारा घटना क्रम हमारी सुविधा के लिए नहीं धूम रहा है जब हमें जिधर जाना हो उसी के पीछे की हवा चलती रहे, यह नहीं हो सकता है। प्रतिकूल हवा से अनुकूल प्रयोजन सिद्ध करने के लिए हम अपनी नाव पर बुद्धिमत्तापूर्ण रीति से पाल बाँध सकते हैं और अपना काम चला सकते
लक्ष्य विहीन—जीवन कला उच्च सिद्धान्तों से अपरिचित व्यक्ति भी अनेक विसंगतियों और प्रकृतियों के शिकार बन जाते हैं। उलझा हुआ दृष्टिकोण न अपने साथ न्याय कर पाता हैं न दूसरों की स्थिति को समझ पाता है। अस्तु उसे सर्वत्र प्रतिकूलताएँ और अवाँछनीयताएं ही दृष्टिगोचर होती रहती हैं। कभी दूसरों पर झल्लाता है, कभी अपने ऊपर। खीज और उद्वेगों के आवेश चढ़े रहते हैं। बुखार में जिस प्रकार शरीर तपता है, उसी प्रकार उद्वेग से मस्तिष्कीय संतुलन बिगड़ जाता है। मानसिक गिरावट आई तो भय, आशंका, निराशा, चिन्ता जैसी हीन वृत्तियाँ धर दबोचती हैं और यदि आवेश आया तो क्रोध, प्रतिशोध, विनाश, विद्रोह के शोले धधकते रहते हैं। दोनों ही स्थितियों में मानसिक शान्ति नष्ट हो जाती है।
शरीर ने अब अपच, और थकान को पूरी तरह अपना लिया है। जिनके पेट ठीक काम करते हों जिन्हें हर घड़ी उत्साह रहता हो, ऐसे आदमी कठिनाई से ही उँगलियों पर गिनने जितने मिलेंगे। उसी प्रकार मस्तिष्कों पर अनिद्रा का आधिपत्य हो चला है। उलझा हुआ उद्विग्न मस्तिष्क न तो शान्त हो पाता है और न गहरी नींद के दर्शन होते हैं। आधी अधूरी ज्यों-त्यों झपकियाँ जैसी नींद कुछ देर के लिए आती है, अन्यथा सारी रात करवट बदलते निकल जाती है। सर्व विदित है कि गहरी नींद भी अन्न, जल और हवा की तरह जीवन की अति महत्वपूर्ण आवश्यकता है। नींद न आने से थकान दूर करने का अवसर नहीं मिलता और शक्ति यों का निरन्तर क्षरण होता चला जाता है। लगातार बहुत समय तक नींद न आने से मनुष्य पागल तक हो सकता है। अधूरी नींद के कारण मस्तिष्क की स्मरण शक्ति , तर्क शक्ति , निर्णय शक्ति जैसी उपयोगी क्षमताएँ क्रमशः नष्ट होती चली जाती हैं।
अनिद्रा का कष्ट अपने ढंग का है उससे फोड़ा उठने जैसा दर्द भले ही न होता हो, पर बेचैनी तो बुरी तरह छाई ही रहती है। इन दिनों उससे बचने का सहज तरीका नशा ढूँढ़ निकाला गया है। पुराने ढंग के नशे शराब, भाँग अफीम आदि है। नये ढंग के नशे नींद की गोलियों के रूप में उपलब्ध हैं। इन दोनों ही उपचारों की आवश्यकता द्रुतगति से बढ़ रही है।
केमिस्ट की दुकान पर जाकर पूछा जाय तो वह बतायेगा कि सबसे अधिक तादाद में बिकने वाली दवा नींद लाने वाली गोलियाँ हैं। सरकारी कर विभाग से पूछा जाय तो पता चलेगा कि नशे बाजी द्वारा मिलने वाला टैक्स आमदनी का बहुत बड़ा स्रोत है। इन वस्तुओं की बिक्री निरन्तर बढ़ती ही जाती है। उनका उत्पादन और उपयोग साल के आंकड़ों को लांघता हुआ हर साल बड़ी छलाँग लगा लेता है। तात्कालिक आवश्यकता तो किसी प्रकार पूरी हो जाती है, पर पीछे जाकर उनके जो दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं, वे ऐसे हैं जिनके आधार पर लाभ के स्थान पर उनसे उलटी अधिक हानि ही होती है।
नींद की गोलियों में वार्विचुरेट नामक रसायन का ही किसी न किसी रूप में सम्मिश्रण होता हे, अब से सत्तर वर्ष पूर्व वह ‘देकोनल’ नाम से बाजार में आई थी, पर उसके कितने ही प्रकार हैं। यह हलके प्रभाव की भी होती है और गहरे प्रभाव की भी। हलकी प्रायः तीन-चार घण्टे तक और गहरी सात-आठ घण्टे तक प्रभाव करती हैं। गोली खाने के बाद आधा घण्टे से लेकर एक घण्टे के भीतर असर दिखाई देने लगता है और पलक भारी हो जाते हैं।
वार्विचुरेट में एनासिन जैसा दर्द घटाने का गुण नहीं हैं। ये बेहोशी भर लाती हैं। यह रसायन रक्त में पहुँच कर ट्ररु सीरम उत्पन्न करता है। इससे स्नायु तन्तु प्रभावित होते हैं और उनका तनाव घटने से शान्ति जैसी मिलती हैं एवं नींद आ जाती है।
यह नींद एक किस्म का नशा होता है। लगातार सेवन करते रहने पर शराब जैसी आदत पड़ जाती है और फिर उन गोलियों के बिना काम नहीं चलता, लत पड़ने पर उनकी मात्रा भी बढ़ानी पड़ती है। थोड़ी मात्रा तो शरीर सहन कर लेता है, पर अधिक से विष उत्पन्न होने लगता है। अधिक मात्रा में उन्हें खा लेने पर जीवन संकट में पड़ जाता है। दस-बीस गोली खा लेने पर तो मृत्यु ही हो जाती है। उसके फलस्वरूप शरीर में विषैलापन बढ़ता जाता है।
इसी जाति के दूसरे रसायन भी हैं। जैसे-ब्रोमाइड। यह भी स्नायु तन्तुओं को प्रभावित करता है और नींद लाता है। इसकी अधिक मात्रा खा लेने पर उल्टी भर होने लगती है। मौत नहीं होती।
क्लोरल हाइड्रेट भी इसी तरह का रसायन है यह ईथल, अल्कोहल से बनता है और प्रायः 15 मिनट में नींद बुला देता है। उसकी भयंकरता तो शराब में मिलाकर पीने से बढ़ती है। सामान्य स्थिति में उतना खतरनाक नहीं होता।
पैरोल्डिहाइड का प्रभाव और भी तेज होता है। इसे बिस्तर पर पड़के बाद में ही लिया जाता है जिससे पीते ही नींद आने लगने के कारण गिर पड़ने का खतरा न रहे। अक्सर डाक्टर ही अपने हाथ से उसे पिलाते हैं। इसका प्रचलन कम ही है। इसे यदा-कदा ही विशेष आवश्यकता पड़ने पर प्रयुक्त किया जाता है। ग्लटिथिमाइड भी इसी किस्म का रसायन हैं। यह डाक्टर की सिफारिश पर ही खरीदा जा सकता है।
ईथेनोल, अल्कोहल नींद लाने के लिए प्राचीर औषधि है। शराब की विभिन्न किस्में इसी रसायन से बनी होती हैं। शराब पीने वाले अक्सर नींद का लाभ मिलने की बात भी कहते रहते हैं। ‘वाइन’ नसों का मुँह फैला देती है, जिससे रक्त संचार में सुविधा होने की बात भी कही जाती है, पर इन क्षणिक लाभों को मान भी लिया जाय तो भी उनकी हानियाँ इतनी अधिक हैं कि मद्यपान को त्याज्य ही ठहराना पड़ेगा।
अफीम, भाँग अब पुरानी पड़ गई, फैशन ने शराब को मान्यता दी है इसलिए आज उसे ही अपनाया जा रहा है। विचारों की धारा तोड़ कर अस्त-व्यस्त कर देने की विशेषता प्रायः सभी नशों में होती हैं, वही शराब में भी है। विचारों का ताँता टूट जाने से दिमाग को हलकापन लगता है और नशे की खुमारी से उत्पन्न गफलत नींद न होने पर भी किसी कदर काम चलाऊ स्थिति पैदा कर देती है। इसलिए दिमागी तनाव के मरीज अक्सर उसे लेते हैं। शराब की बिक्री के साथ जिनके स्वार्थ जुड़े हुए हैं, वे ताकत मिलने, गर्मी मिलने जैसी पेपर की उड़ाते रहते हैं और लोगों को इस ओर लुभाते हैं कि वे अपना पैसा खुले हाथों से शराब खानों में पहुँचायें।
शराब पीने वाले अक्सर यह कहते सुने जाते हैं कि इससे उन्हें गर्मी मिलती है। रक्त का दौरा तेज होता है और ताकत आती है, पर उनका यह कथन एक भ्रम मात्र है। शिराओं और कोशिकाओं में फैल जाने के कारण आरम्भ में शरीर में गर्मी जरूर पैदा होती है, किन्तु वह बहुत तेजी से निकल भी जाती है और अन्ततः तापमान पहले से भी कम हो जाता है। इसकी तुलना में गुड़ खाकर यदि गर्मी बढ़ाई जाय तो वह ज्यादा टिकाऊ रहेगी।
शराब पेट की भीतरी झिल्लियों में एक प्रकार की खाज पैदा करती है; जिससे मुँह और पेट के स्राव बढ़ जाते हैं और लगता है मानो भूख बढ़ गई है, पर यह भी एक भ्रम ही है। पाचन रस स्राव करने वाली झिल्लियाँ कठोर होती जाती हैं और शराबी का पाचन तंत्र लड़खड़ा जाता है, वह पहले की अपेक्षा कम ही भोजन पचा पाता है।
मौज-मस्ती, जवाँमर्दी, बहादुरी आदि मिलने की बात भी क्षणिक आवेश की तरह ही होती है। इस उत्तेजना का दुष्परिणाम मस्तिष्क के उस क्षेत्र को भुगतना पड़ता है जिनके साथ विवेक बुद्धि का सम्बन्ध है। शराबी की जो स्थिति बहादुरी या मस्ती प्रतीत होती है वस्तुतः वह उसकी बेवकूफी होती है, महत्वपूर्ण फैसले करने में यह बेवकूफी उसे सदा गलत निर्णय पर पहुँचाती है। वाहनों की दुर्घटना में मुख्य कारण शराब होती है। जल्दी और तेजी से वाहन चलाने की बहादुरी में वह यह भूल जाता है कि खतरा कहाँ है और उससे बचने के लिए क्या सतर्कता बरती जानी चाहिए।
शराब में धुत्त व्यक्ति एक प्रकार से बेशर्म बनता है, मर्यादा पालन, सामाजिक एवं नागरिक कर्त्तव्यों के प्रति उसकी उपेक्षा बढ़ जाती। यह निर्लज्जता बढ़ कर ढीठता का रूप धारण करती है और अन्ततः अपराधी प्रवृत्ति में परिणत हो जाती है। यौन उत्तेजना बढ़ने की बात भी इसलिए अहित कर है कि ऐसे लोग स्वाभाविक पौरुष खो बैठते हैं और नशे के बिना सामान्य स्तर की कामानुभूति से भी वंचित होते चले जाते हैं।
नशे की गोलियाँ हों या शराब, मूल समस्या का समाधान तनिक भी नहीं करतीं। मात्र क्षणिक भुलावे से थकान और अनिद्रा जन्य-जलन की अनुभूति मात्र बन्द कर देती हैं। ‘एस्प्रिन’ खाने पर सिर दर्द बन्द हो जाता है। कोकीन लोशन लगाने से जगह सुन्न हो जाती है और पीड़ा बन्द हुई लगती है। मर्फिया के इंजेक्शन कष्ट पीड़ित को राहत देते है। देते हैं। यह भुलावे वाले उपचार हैं। मूल कष्ट में इनसे कोई अन्तर नहीं आता वह यथा स्थान जहाँ का तहाँ बना रहता है। मद्यपान हो या निद्रा गोलियों का सेवन दोनों में से कोई भी मानसिक विक्षोभ का निराकरण नहीं करते। वरन् इन विषैले पदार्थों से रहा सहा स्वास्थ्य भी नष्ट हो जाता है।
अनिद्रा जन्य उद्वेग का समाधान करने के लिए हमें उसके मूल कारण को समझना पड़ेगा और जहाँ से गुत्थी उलझती है वहीं से उसे सुलझाना होगा। चिन्तन और चरित्र की विकृति का निराकरण करके ही गहरी निद्रा का आनन्द ले सकना और शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रहना सम्भव हो सकता है।
पृथ्वी उतनी ही संपत्ति उत्पन्न करती है जितनी उसके पुत्रों के निर्वाह के लिए नितान्त आवश्यक हैं। इस अनुदान को सभी लोग सहोदर भाइयों की तरह मिल बाँटकर खायें तो सबकी जीवन यात्रा सुखपूर्वक चलती रह सकती हैं और बचा हुआ समय मानवी जीवन के महान उद्देश्यों की पूर्ति में लग सकता हैं। सुख-शांति का वातावरण इसी नीति को अपनाये रहने में बना रह सकता है।
बुद्धि विपर्यय से ग्रस्त मनुष्य अमीर बनने का प्रयत्न करता है। इधर-उधर से समेट कर सम्पत्ति अपने नीचे जमा करता है इसके दो परिणाम होते हैं एक तो संग्रहकर्ता का परिवार अमीरी के अहंकार में उद्धत आचरण करने पर उतारू होता है विलासिता में डूबता है और अनेक व्यसनों तथा दोष, दुर्गुणों का शिकार होता है। दूसरी ओर निर्धनों का शोषण होता है और असमानता जन्य ईर्ष्या जगती है। ऊँची दीवार उठाने के लिए कहीं न कहीं गड्ढा करके ही मिट्टी निकालनी पड़ती है। दूसरों को गरीब बनाये बिना कोई अमीर नहीं बन सकता। कानूनी या गैर कानूनी तरीके अपनाकर उसे शोषण करने एवं निष्ठुरता अपनाने के मार्ग पर ही चलना पड़ेगा। अन्यथा धन संग्रह न हो सकेगा। अधिक उपार्जनकर्ता को अधिक उदार भी होना चाहिए और अपनी विशेष प्रतिभा का विशेष लाभ समाज को देना चाहिए। इस प्रकार अधिक उत्पादन का कौशल उसे सम्मान एवं सन्तोष देकर फिर उदार कार्यों द्वारा वितरित हो जाता है। लिप्सा और निष्ठुरता धारण किये बिना किसी के लिए भी अमीरी सम्भव नहीं।
तत्वदर्शियों ने ‘परिग्रह’ को सर्व प्रधान पाँच प्रमुख पातकों में से एक माना है और सौ हाथों से कमाने के साथ-साथ हजार हाथों से दान करने सत्कार्यों के लिए समाज को लौटा देने का—निर्देश किया है। किन्तु लालची मनुष्य धनी बनने की ललक में अमीरी जमा करता जाता है। निश्चित रूप से यह विश्व व्यवस्था के प्रति विद्रोह है। इस संग्रह—पाप का दुष्परिणाम न केवल संग्रहकर्ता को वरन् समस्त समाज को भुगतना पड़ता है।
अमीरी जहाँ भी संग्रहित हुई है वहीं विपत्ति आई है और उस सम्पदा का दुर्दशाग्रस्त दुखद अन्त हुआ है। संग्रहित खजाने जहाँ-तहाँ फिर भूमिसात् हुए है या समुद्र में डूबे हैं और उनके संग्रहकर्ता रोते-कलपते संसार से विदा हुए है।
इटली, फ्राँस और अल्जीरिया के बीच एक छोटा सा टापू है—कौरसिया। इस पर फ्राँस का आधिपत्य है। यहां की सभ्यता को इटली और फ्रांस का सम्मिश्रण कहा जा सकता है। इसी के समीप वास्तिया खाड़ी के उथले समुद्र में जर्मन सेनापति रोमेल द्वारा अफ्रीका से लूटा हुआ खजाना डूबा पड़ा है। इसकी कीमत सत्रह अरब डालर आँकी जाती है।
द्वितीय महायुद्ध में जर्मनी ने जब अफ्रीका पर हमला बोला तो वह पहली बार तो आँधी-तूफान की तरह बढ़ता चला गया और हजारों मील बढ़ता चला गया। किन्तु जब मित्र राष्ट्रों ने डटकर मुकाबला किया तो उसके पैर उखड़ गये। इस बीच उसने अपने अधिकृत क्षेत्र के सभी धनी लोगों को पकड़-पकड़कर उनके पास जो कुछ था सभी लूट लिया था। इस लूटे धन को वह बराबर जर्मनी भेजता रहा था। पर जब रोमेल को वापिस लौटना पड़ रहा था तब तो उसने लूट को अत्यन्त तीव्र कर दिया और जल्दी-जल्दी धन राशि इकट्ठी करके उसे अपने देश पहुँचाने में जुट गया। एक बड़ा स्टीमर भरकर रातों रात विपुल धन उसने जर्मनी भेजा। यह 17 सितम्बर 1943 की बात है। सब सामान लोहे के मजबूत बक्सों में बन्द कर दिया गया और तहखानों के ताले लगाकर सील कर दिया गया।
समुद्र में भी दोनों पक्ष के युद्ध-पोत और पनडुब्बियाँ चक्कर लगा रहे थे इसलिए इस स्टीमर को चक्करदार रास्ते से भेजा गया। रास्ते में जहाजी, कर्मचारियों की नीयत बिगड़ी और वे खजाने को लूट ले जाने पर आमादा हो गये। कप्तान के साथ हीलहज्जत के सिलसिले में स्टीमर खतरे में पड़ रहा था, दूसरी ओर विपक्ष की पनडुब्बियों को जर्मन नौका जाने का सुराग लग गया। उसे पकड़ने की मोर्चाबन्दी बन गई। ऐसी दशा में स्टीमर के कप्तान ने यही उचित समझा कि खजाना समुद्र में डुबो दिया जाय और कर्मचारियों से पूछताछ करने पर कुछ भेद न मिल सके इसलिए स्टीमर के कप्तान ने यही उचित समझा कि शत्रु पक्ष के हाथों पड़ने की अपेक्षा आत्म-हत्या कर लेना उपयुक्त है। अस्त जर्मनों ने अपने ही बमों से उसे उड़ा दिया और स्टीमर धज्जी-धज्जी होकर उड़ गया। पीछे यह पता भी लग गया कि इसी में रोमेल के भेजे हुए धन का बहुत बड़ा भाग भरा हुआ था।
तब से लेकर अब तक कितने ही बार उस खजाने को समुद्र से ढूँढ़ने और निकालने के प्रयत्न हुए हैं,पर यह प्रयास का दुखद अन्त हुआ है। गोताखोरी के लिए निकली हुई टीमें किसी न किसी दैवी विपत्ति में फँस कर अपने प्राण गँवाती रही है। सफलता का कोई सूत्र किसी के भी हाथ नहीं लगा। इन दुर्घटनाओं की शृंखला के पीछे अनुमान लगाया जाता है कि स्टीमर के जर्मन कप्तान का प्रेत उसकी चौकीदारी करता है और जो उसे निकालने का प्रयत्न करता है उसकी जान लेकर छोड़ता है।
न्यूयार्क के स्टैनले पब्केशन की पत्रिका ‘मैन्स लाइफ’ के सितम्बर 1966 के अंक में मारटिन ब्रैन्स्टन द्वारा बंगाल की खाड़ी से करोड़ों रुपये की भूमिगत रत्न राशि खोद निकालने का विस्तृत विवरण छपा है।
मार्टिन ने सुन रखा था कि बंगाल की खाड़ी में समुद्री डाका मारने वाले गिरोह का सरगना ‘बस्तुम’ था। उसने अपना एक मजबूत जहाजी बेड़ा बना रखा था और कितने ही डाका मारने की कला में प्रवीण डाक अपने गिरोह में भर्ती किये थे। दस वर्ष तक उसने उस क्षेत्र में पूरा आतंक फैला रखा था। व्यापारिक जहाज कहीं जाते तो यह समझकर लंगर खोलते कि उन्हें वस्तुम से आत्म-रक्षा करनी पड़ेगी। इस प्रयोजन के लिए वे अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित एवं कुशल तैराक योद्धा भी साथ लेकर चलते थे। तो भी जहाँ भी दाव लगता वह डाकू अपना आतंक प्रस्तुत कर देता और बहूमूल्य वस्तुएँ लूटकर ले जात। इस प्रकार उसने करोड़ों रुपये की सम्पत्ति जमा की। उसे रख कहाँ जाय? इस प्रश्न का समाधान उसे बंगाल की खाड़ी में छितराये हुए छोटे-छोटे द्वीपों में मिला। उसे अपनी योजनाएँ बनाने और जहाजों की मरम्मत, भोजन व्यवस्था, दवादारु आदि की जरूरत पड़ती इसलिए उसे अपना अड्डा अदल-बदल कर इन द्वीपों में ही रखना पड़ता था।
यह बात नौवीं सदी के अन्तिम वर्षों की है। उन दिनों उत्तर भारत में राजा भोज का शासन था। भोज के बेटे महेन्द्रपाल ने अपना राज्य बढ़ाया और उसे बंगाल की खाड़ी तक पहुँचा दिया। खाड़ी का बन्दरगाह विदेशों से व्यापार बढ़ाने का अच्छा साधन था। महेन्द्रपाल का पूरा ध्यान इस ओर था, पर डाकू वस्तुम के आतंक ने वह मार्ग एक प्रकार से अवरुद्ध ही कर रखा था। इसलिए यह आवश्यक हो गया कि समुद्र को डाकुओं के खतरे से मुक्त किया जाय। उड़ीसा के राजकुमार की सहायता से वस्तुम को किसी बड़े प्रलोभन का लालच देकर महेन्द्रपाल ने पकड़वा लिया इसके बाद उसके जहाज भी जब्त कर लिए गये और साथी डाकुओं को जेल में डाल दिया गया।
वस्तुम को तरह-तरह की यातनायें दी गई कि वह अपने अब तक के छिपे खजाने का भेद बताये। किन्तु वह भी ऐसी मिट्टी का बना था कि टस से मस नहीं हुआ और यन्त्रणाएँ सहते-सहते अपने प्राण गँवा बैठा।
तब से लेकर पिछले दिनों तक वस्तुम के खजाने की बहुतों ने खोज की पर किसी के हाथ कुछ न लगा। अँग्रेजी शासन काल में मारटिन व्रेन्स्टन ने उस खजाने की अति गम्भीरतापूर्वक खोज की। खाड़ी में छोटे-बड़े 81 द्वीप हैं। इनमें जो इस काम के थे कि उनमें डाकुओं के ठहरने की सुविधा हो सकती हैं उनकी संख्या 10−12 निकली। इनमें से भी अधिक उपयुक्त केवल एक निकला।
इसी की खोज करने का निश्चय किया गया। मारटिन अपने साथ कलकत्ते की एक नर्तकी लावी को अपना दुभाषिया लेकर वहाँ गया। उस द्वीप पर एक मुसलमान राजा राज्य करता था। काजी का उस पर असर था। काजी को मिलाकर मार्टिन ने खुदाई की स्वीकृति प्राप्त कर ली। खुदाई का उद्देश्य खजाना है वह तो नहीं बताया पर वहाँ कोई बड़ी खान निकलने की सम्भावना बताकर उन्हें सन्तुष्ट कर दिया।
खुदाई उन्होंने कई जगह की तो एक जगह उन्हें सचमुच ही सोने और रत्नों से भरा सन्दूक मिल गया जिसे किसी तरह छुपाकर अपनी नाव में पहुँचाने में सफल हो गये और उस द्वीप वालों के सहयोग की सराहना करते—अपने दुर्भाग्य पर रोना रोते वे लोग वापिस लौट आये। वे लोग 40 करोड़ डालर की सम्पत्ति में से सिर्फ कुछ लाख पा सके, पर पीछे आपसी फूट पड़ जाने से उपभोग करने के स्थान पर जान ही गँवा बैठे।
द्वितीय महायुद्ध के दिनों जब जापानियों ने अमेरिका के पर्ल हार्वर पर हमला किया तो सर्वत्र आतंक छा गया। जापान उन दिनों सचमुच इतना समर्थ बन चुका था कि यह अणुबम आड़े न आता तो वह अपने प्रभाव क्षेत्र में उसी प्रकार पैर फैला लेता जिस तरह कि योरोप में जर्मनी ने फैलाये थे।
प्रशान्त सागर के फिलीपाइन द्वीप समूहों में अमेरिका की प्रचुर सम्पत्ति जमा थी। यह कहीं जापानियों के हाथ न पड़ जाय इस आशंका से अमेरिका उसे नष्ट करने पर तुला हुआ था। लगभग एक करोड़ रुपये के सरकारी खजाने के नोट आग लगाकर नष्ट कर दिये गये। एक पनडुब्बी भर कर सोना, चाँदी तथा दूसरी चीजें अमेरिका भेजी जा चुकी थीं। फिर भी कई करोड़ के चाँदी के सिक्के जमा थे, उन्हें हटाने का अवसर भी निकल चुका था। अस्तु यही निश्चय किया गया कि उसे लोहे के बक्सों में बन्द करके समुद्र में डुबो दिया जाय। सैनिक फैसले के अनुसार 6 मई 1942 को फिलीपाइन की कवैली खाड़ी में उन सन्दूकों को डुबो दिया गया। इसके तुरन्त बाद जापानी सेना ने उस सारे क्षेत्र पर अपना कब्जा कर लिया।
खजाना डुबोने का सुराग जापानियों को लग गया। उन्होंने पकड़े हुए अमेरिकी गोताखोरों को लालच और भय दिखाकर इस बात के लिए रजामंद कर लिया कि डूबे हुए खजाने को निकालने में सहायता करें। उन्हें वैसा ही करना पड़ा कुछ सन्दूक ज्यों के त्यों निकाल भी लिये गये। पीछे अमेरिकी गोताखोरों ने सोचा यह अमेरिकी धन उन्हीं के देशवासियों के विरुद्ध गोला–बारूद बनाने में काम लाया जायगा। इसलिए कोई तरकीब निकालनी चाहिए। उन्होंने कुछ बक्से साबुत निकाल देने और कुछ के पेंदे ढीले करके सिक्के समुद्र में बिखर जाने का रास्ता निकाल लिया। कुछ खाली कुछ भरे बक्से निकलते रहे। जापानी भरे बक्सों पर प्रसन्न थे और खाली देखकर इसे पेटियों की कमजोरी से उत्पन्न दुर्भाग्य मानकर सन्तोष करते रहे। कहते हैं कि जितना धन निकाला गया उससे कई गुनी सम्पत्ति समुद्र की अथाह जल राशि में छितरा दी गई और अब उसे ढूँढ़ निकालने की कोई सम्भावना नहीं है।
अमेरिका की बीहड़ भूमि पर जब गोरों ने अधिकार जमाया तो उन्हें लुप्तप्राय संस्कृति के अवशेषों के साथ-साथ उन लोगों के संचित स्वर्ण भण्डार भी जहाँ तहाँ जमीन में दबे हुए मिले। इसके अतिरिक्त वह भूमि वैसे भी स्वर्ण गर्भा रही है। अनेक स्थानों पर छोटी-बड़ी खदानें हैं जिनमें सोना पाया और निकाला जाता रहा है।
इस धन राशि को लूट-लूटकर गोरे लोगों ने अपने-अपने देशों को प्रचुर परिमाण में दौलत भेजी है। स्पेनी, फ्राँसीसी, इटालवी तथा अन्य देशों के गोरे भी अँग्रेजों के प्रतिद्वंद्वी रहे है और एक दूसरे की उपलब्धियों को लूट लेने में भी अपने हथकण्डे अजमाते रहे हैं। बेचारे आदिवासी रैड इण्डियनों को बड़ी संख्या में इसी लूट-खसोट के सिलसिले में अपनी जाने गँवानी पड़ी हैं।
सन् 1870 की बात है। कैलीफोर्निया के इंडियन वैल्स नामक कस्बे में एक ऐसे खूसट गोरे का दिन-दहाड़े कत्ल हुआ जिसने प्रचुर परिमाण में सोने और चाँदी के बक्से भर कर जमा किये थे, पर उन्हें वह किसी काम में खर्च नहीं करता था। लुटेरों ने उस पर हाथ साफ किया। पूछने पर जब उसने दौलत का पता नहीं दिया तो उसे काट डाला गया। पर दौलत लुटेरों के हाथ भी नहीं लगी वह जहाँ-तहाँ जमीन में ही गढ़ी रही।
प्रथम महायुद्ध के सात वर्ष बाद जमीन में युद्ध प्रयोजनों में बिखरी हुई धातुएँ ढूँढ़ने वाले विभाग का एक इंजीनियर अपने काम का एक उपयोगी यन्त्र बना चुका था। कुछ दिन उसका प्रयोग करने के बाद उस इंजीनियर के मन में यह विचार आया कि क्यों न वह इस यन्त्र की सहायता से अमेरिका में दबे हुए छिपे खजानों को ढूँढ़ निकाले। इस विचार से उसकी आँखें चमक गई और अपने उपकरण लेकर अमेरिका चल पड़ा। उसका नाम था—फ्रेंकफिश।
फ्रेंकफिश ने इण्डियन वेल्स में हुई एक धनी की हत्या और उसकी जमीन में दबी सम्पत्ति की चर्चा सुनी, तो अपना पहला प्रयोग वहीं करने का निश्चय किया। भाग्य ने साथ दिया और उसने वह खजाना ढूँढ़ ही निकाला। 6700 चाँदी के सिक्के, 3000 सोने की मुहरों के अतिरिक्त एक छोटे बक्से में हीरों के आभूषण भी उसे मिले।
जिस बुड्ढे की हत्या हुई थी वह उन स्पेनी डाकुओं में से एक था जिसके दल के पास 80 हजार स्वर्ण मुद्राएँ जमा हो गई थीं, किन्तु दल में फूट पड़ जाने के कारण कुछ तो आपस में ही लड़ मरकर हो गये थे और कुछ जितना हाथ पड़ा उतना लेकर भाग खड़े हुए थे। वह भी दौलत को छिपाने के चक्कर में ही सारी जिन्दगी गँवा बैठा। इसी के ताने-बाने दिन-रात बुनता रहा और अन्ततः उसी में उलझ कर मर गया।
उस खजाने को निकालते समय जो अनुभव हुए उसकी विस्तृत गाथा फ्रेंकफिश ने प्रकाशित कराई है और बताया है कि किस तरह उसे खजाने की रखवाली पर बैठी हुई मृतात्मा का डरावना चेहरा और आँखों से निकलता आक्रोश देखने को मिला। फिर भी वह बिना डरे अपने काम पर लगा ही रहा।
फ्रेंकफिश ने शेष जीवन में खुदाई का काग जारी रखा और कई खजाने तथा पुरातत्व की दृष्टि से मूल्यवान अवशेष ढूँढ़ निकाले। उन सबका उसने एक संग्रहालय बना दिया है और धन ऐसे कामों में लगा दिया है जिससे सार्वजनिक हित साधन हो सके। वह कहता रहा कि बिना परिश्रम का धन किसी के लिए भी उपयोग के लायक नहीं हो सकता।
फ्रेंकफिश अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान निकला। उसने खजाना डुबाने वाले और निकालने वालों में कुछ अन्तर प्रस्तुत किया है। उसने ख्याति प्राप्त करने में सन्तोष कर लिया है। और हराम की कमाई को हजम करने के लालच में अपनी आंतें न फाड़ लेने की बुद्धिमत्ता दिखाई। उसे जो मिला है उसे उसने अमेरिका के पुरातत्व विभाग को सौंप दिया है।
अधिक अमीर बनने—संग्रह करके सौ पीढ़ियों के लिए मौज उड़ाने की व्यवस्था करने वाले लोग पाते अन्त की उपरोक्त घटनाओं से समझा जा सकता है। छोटे रूप में तो यही प्रयास हममें से हर कोई करता रहता है। यही ललक जब तक छूटेगी नहीं तब तक विश्व व्यवस्था के प्रति किया गया विद्रोह—अनावश्यक धन संग्रह केवल विपत्ति ही उत्पन्न करता रहेगा।
आकाश अखण्ड−ज्योति परिवार को अपने जीवन−क्रम में व्यक्ति गत आवश्यकता पूर्ति के अतिरिक्त देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति के प्रति भी कर्त्तव्य−पालन को स्थान देना चाहिए। समय की यही माँग है।
अगल वर्ष के लिए हम लाग अपने सेवा कार्यों में महिला जागरण और जन-सम्पर्क कार्यक्रमों पर विशेष रूप से ध्यान केन्द्रित करे। इन प्रयोजनों में अपना योगदान देकर यह सिद्ध करें कि अखण्ड-ज्योति के पाठक मात्र अध्ययन में रुचि रखने वाले ही नहीं वरन् अपने समय की सबसे बड़ी आवश्यकता- व्यक्तित्वों को परिष्कृत करने और सृजनात्मक प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में भी दत्तचित्त रहने वाले लोकसेवियों की पंक्ति में भी खड़े हैं। अगले वर्ष के दो कार्यक्रम इस प्रकार हैं-
महिला जागरण अभियान:−
आधी जनसंख्या को मानवी अधिकार दिलाने और इस समाज की प्रगति में समुचित योगदान दे सकने योग्य बनाने की दिशा में चल रहें अपने अभिनव प्रयत्नों अधिकाधिक गतिशील बनाया जाय।
हम लोग चाहें तो अपने संपर्क क्षेत्र की महिलाओं के प्रगतिशील प्रयोजनों के लिए एक छोटे संगठन में आसानी से सम्बद्ध कर सकते है। उसमें सजीवता तब आवेगी जब साप्ताहिक सत्संगों को क्रम नियमित रूप चलने लगेगा और घर−घर में परिवार गोष्ठियों के लिए उत्साह उत्पन्न होगा।
महिला जागरण अभियान में अखण्ड−ज्योति परिवार के हर सदस्य को भाग लेना चाहिए और नारी उत्कर्ष के महान प्रयोजनों में अपना यथासम्भव योगदान प्रस्तुत करना चाहिए। क्या किया जाय और कैसे किया जाय? इस जिज्ञासा का समाधान समुचित विस्तार के साथ प्रस्तुत करने के लिए पिछले तीन महीने से “महिला जागृति अभियान” पत्रिका शान्ति−कुञ्ज, सप्त सरोवर हरिद्वार से निकल रही है। उसका पाठक बनना चाहिए। पत्रिका का वार्षिक चन्दा छह रुपया है।
सभी संगठित शाखाओं को सन् 76 में अपने वार्षिकोत्सव महिला सम्मेलन के रूप में करने चाहिए और सभी को अपने यहाँ प्रौढ़ पाठशालाएँ चलानी चाहिए; ताकि न केवल साक्षरता प्रसार का वरन् व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण के सभी पक्षों के प्रशिक्षण का विस्तार भी हो सके। इन पाठशालाओं का स्वरूप क्या हो और उन्हें कैसे चलाया जाय, तथा नारी जागरण की अनेकानेक रचनात्मक एवं सुधारात्मक गतिविधियों का संचालन किस प्रकार किया जाय इसका प्रशिक्षण करने के लिए तीन−तीन महीने के सत्र शान्ति−कुञ्ज में चलते हैं। अपने घरों की समझदार तथा कम से कम आठवें दर्जे की योग्यता रखने वाली 18 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं एवं लड़कियों को भेजना चाहिए। इससे उनकी व्यक्ति गत प्रतिभा एवं सृजनात्मक क्षमता का विकास होगा और वे समाज सेवा की दृष्टि से भी बहुत कुछ कर सकने में समर्थ हो सकेंगी। नारी जागरण का विशिष्ठ प्रयोजन पूरा कर सकने वाली प्रौढ़ महिला पाठशाला का संचालन तथा अध्यापन कर सकने की योग्यता इन सत्रों की छात्राओं में उत्पन्न हो जाती है। अपने परिवारों में से एक−एक महिला इस प्रशिक्षण में सम्मिलित हो सके, इसके लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। नारी जागरण अभियान को सफल बनाने के लिए इन प्रशिक्षित महिलाओं द्वारा ही सुयोग्य कार्यकर्ता की भूमिका सम्पन्न की जा सकेगी। उज्ज्वल भविष्य की आशा का बहुत बड़ा केन्द्र इस प्रशिक्षण व्यवस्था को समझा जाना चाहिए। सम्भव हो सका तो उसका प्रान्तीय एवं क्षेत्रीय विस्तार किया जायगा।
शाखाओं के वार्षिकोत्सव महिला सम्मेलनों के रूप में अगले वर्ष होने ही चाहिए। इससे स्थानीय जनता को मिशन की जानकारी, उपयोगिता समझने तथा उसमें भाग लेने की प्रेरणा मिलेगी। जन−मानस में उत्साह और उमंग उत्पन्न करने तथा सहयोग जुटाने में यह सम्मेलन निश्चित रूप से बहुत सफल रहेंगे। इन आयोजनों से जो वातावरण उत्पन्न होगा उससे न केवल नारी जागरण की दिशा में वरन् नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक परिष्कार की प्रत्येक धारा को तीव्र करने में भी इन सम्मेलनों से योगदान मिलेगा। इसलिए इनके लिए अभी से तैयारी की जानी चाहिए। जनवरी 76 से यह सम्मेलन शृंखला विधिवत चल पड़ेगी।
सम्मेलनों में शान्ति−कुञ्ज में संगीत, प्रवचन एवं मार्ग−दर्शन के लिए प्रशिक्षित प्रचारिकाओं का एक जत्था मिशन का प्रतिनिधित्व करने के लिए पहुँच सके इसके लिए व्यवस्था बनाई जा रही है। जत्थे में 4 प्रचारिकाएँ एवं 1 प्रबुद्ध संरक्षक इस प्रकार पाँच व्यक्ति रहेंगे। एक क्षेत्र के सभी सम्मेलनों को शृंखलाबद्ध किया जायगा और एक ही दौरे में उन सबको निपटा दिया जायगा। यह प्रयोजन अपनी सवारी होने पर ही पूरा हो सकता है। इसलिए फिलहाल डीजल से चलने वाली एक जीप गाड़ी का किसी प्रकार प्रबन्ध हुआ है अस्तु एक ही जत्था भेजने की बात बनी है। यदि कुछ और गाड़ियों का प्रबन्ध बन पड़ा तो अधिक जत्थे भी भेजे जा सकते हैं अधिक सम्मेलनों में शान्ति−कुञ्ज की प्रचारिकाएँ पहुँच सकती हैं। यदि ऐसा न हो सके तो भी अपने क्षेत्र की विचारशील सुयोग्य महिलाओं से भाषणों और गायनों का प्रबन्ध करना चाहिए। सम्मेलन हर हालत में होने ही चाहिए।
यह महिला जागरण सम्मेलन पाँच दिन के होने चाहिए और उनका कार्यक्रम इस प्रकार रखा जाना चाहिए—
प्रथम दिन−प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व प्रभात फेरी। तीसरे प्रहर लाल मशाल के प्रतीक चित्र की सजधज एवं गाजे−बाजे के साथ शोभायात्रा।
दूसरे, तीसरे और चौथे दिन—सूर्योदय से पूर्व प्रभात फेरी। प्रातःकाल पाँच कुण्डी गायत्री यज्ञ, जिसमें कन्याएँ आहुतियाँ देंगी और महिलाएँ पूर्णाहुति समेत अन्य कार्यक्रमों में भाग लेंगी। सारा कार्य महिलाओं द्वारा ही सम्पादित हुआ करेगा। बच्चों के नामकरण अन्नप्राशन, मुण्डन, विद्यारम्भ संस्कार भी साथ−साथ होते रहेंगे। तीसरे प्रहर 2 से 5 तक महिला गोष्ठी मात्र महिलाओं के लिए। रात्रि 7 से 10 तक खुला महिला सम्मेलन जिसमें नर−नारी सभी भाग ले सकेंगे।
पाँचवे दिन यज्ञ की पूर्णाहुति के समय देव दक्षिणा में कम से कम अपनी एक आदत में सम्मिलित एक दुर्गुण का त्याग एवं एक सद्गुण अपनाने का संकल्प। प्रसाद स्वरूप महिला जागरण सम्बन्धी सस्ते प्रचार साहित्य का वितरण।
दोपहर बाद जत्था दूसरे कार्यक्रम में भाग लेने के लिए रवाना हो जाय करेगा।
सम्मेलनों की तैयारी बड़े रूप में भी हो सकती है और छोटे रूप में भी। खर्च की दृष्टि से उसे न्यूनतम राशि में भी सम्पन्न किया जा सकता है। जीप का तेल, टूट−फूट, ड्राइवर आदि का कुल खर्च 150) हमारे सम्मेलन के जिम्मे पड़ेगा। 150) में यज्ञ माइक, बिछावन, रेशमी आदि की व्यवस्था भी बन सकती है। पाँच उत्साही कार्यकर्ता अपना समय देने और इतना खर्च जुटाने को तैयार हो जायँ तो हर जगह छोटे रूप में ऐसे सम्मेलन हो सकते हैं।
जहाँ मोटर रोड नहीं है वहाँ जत्थे भेजना तो कठिन पड़ेगा। वहाँ तो प्रवचनों एवं गायनों के लिए समीपवर्ती प्रबन्ध ही करना पड़ेगा। पक्की सड़कों के समीपवर्ती क्षेत्रों में शान्ति−कुञ्ज के जत्थे जा सकते हैं। इसके लिए उत्साही परिजनों को अपने समीपवर्ती क्षेत्र में सम्मेलनों की सम्भावनाएँ तलाश करनी चाहिएँ और उन सबका संयुक्त निमन्त्रण हरिद्वार भेजना चाहिए। जहाँ सम्मेलन हों उनके बीच का यातायात मार्ग तथा दूरी दिखाने वाले नक्शे बनाकर भी भेजे जायँ ताकि जिधर होकर वहाँ पहुँचना है वह सुविधा देखते हुए सम्मेलनों की तारीखें दी जा सकें। 15 नवम्बर तक ऐसे सभी निमंत्रण आ जाने चाहिएँ, उन पर विचार करके 30 नवम्बर को तारीखों के निश्चय की सूचना देदी जायगी; ताकि आयोजनकर्ता अपनी−अपनी तैयारी में जुट सकें। इस अवधि में जिनके सम्मेलन निमन्त्रण नहीं आवेंगे उनके लिए पीछे स्थान न दिया जा सकेगा। कार्यक्रमों की शृंखला निर्धारित हो जाने पर बीच में और ठूँसने से तो पूरे वर्ष के कार्यक्रमों में ही उलट−पुलट करनी पड़ेगी। जहाँ उत्साह हो वहाँ जल्दी ही इस सम्बन्ध में अपने निश्चय कर लेने चाहिएँ।
सन् 76 में प्रौढ़ पाठशालाएँ और सम्मेलनों का कार्यक्रम तो महिला शाखाओं को पूरा करना ही है। साथ ही उन रचनात्मक एवं सुधारात्मक प्रवृत्तियों को भी गतिशील बनाना है; जिनके ऊपर नारी उत्कर्ष की नींव रखी जानी है और उन्हें समूचे मनुष्य की पूर्ण भूमिका निभा सकने में समर्थ बनाया जाता है। आज तो नारी मानवी अधिकारों से वंचित, पीड़ित, प्रतिबंधित और अपने पालकों की कठपुतली मात्र बनकर रह रही है।
(2) जन−संपर्क—
मनुष्य जीवन के उत्थान−पतन का सार तत्व उसके चिन्तन एवं दृष्टिकोण पर अवलम्बित है। भौतिक और आत्मिक क्षेत्रों में इसी आधार पर प्रगति होती है और इसी कारण अवनति। संसार की सबसे बड़ी सेवा यही है कि आदमी में चिन्तन और क्रिया क्षेत्र में उच्चस्तरीय आदर्शवादिता का समावेश किया जाय। हमारा कार्य क्षेत्र यही है। धर्म और अध्यात्म की परिधि यही है। इस मर्मस्थल में उत्कृष्टता का समावेश हो सके तो शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक, राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों में संव्याप्त अनेकानेक उलझनों और कठिनाइयों का सहज समाधान मिल सकता है। अपनी गतिविधियों का निर्माण इसी मान्यता पर आधारित है।
अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति के लिए अखण्ड−ज्योति परिवार के परिजनों में पत्रिकाओं, पुस्तकों, शिविरों सत्रों, सम्मेलनों, चिट्ठियों तथा परामर्शों से यही प्रेरणा भरते रहे हैं कि उन्हें पेट और प्रजनन तक वासना और तृष्णा तक सीमित न रहकर अपने को अधिकाधिक सद्भाव सम्पन्न बनाया जाय—अपनी गतिविधियों में लोक−मंगल की सत्प्रवृत्तियों के लिए भी कुछ स्थान रखा गया। गुण, कर्म, स्वभाव में श्रेष्ठता का क्रमिक विकास करना यही अध्यात्म का तत्वदर्शन और लोकहित में संलग्नता को पुण्य, परमार्थ, तप आदि की धर्म धारणा और तप−साधना समझा जाना चाहिए। यही अपनी सदा से शिक्षा रही है। लोक−मंगल के अनेकानेक प्रयोजनों में भावनात्मक परिष्कार को−ज्ञान यज्ञ को—आदर्शवादी दृष्टिकोण को जन−जन के अन्तःकरण में प्रतिष्ठापित करना हम सर्वोपरि और सर्वप्रथम मानते रहे हैं और परिजनों से अनुरोध करते रहे हैं कि वे अपनी सेवा भावना को इस क्षेत्र में अधिकाधिक प्रयुक्त करते रहें।
अगले वर्ष हमें अपने प्रयत्न और भी तीव्र करने हैं। अभीष्ट प्रयोजनों के लिए जन−संपर्क बढ़ाना है। घर−घर अलख जगाने की प्रक्रिया को कई उपायों से तीव्र करना है जिसमें से तीन प्रमुख हैं—
(1) एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान यज्ञ के लिए नियमित रूप से निकालते रहने के व्रत का पूरी श्रद्धा और तत्परता के साथ पालन किया जाय। इकट्ठे किये गये पैसों का ज्ञान−यज्ञ साहित्य खरीदते रहा जाय और उसे अपने संपर्क क्षेत्र में पढ़ाने के लिए देने वापिस लेने में—सुनाने में—एक घण्टा समय लगाना चाहिए। हममें से प्रत्येक के पास मिशन का नया तथा पुराना ढेरों साहित्य है। उसे एक वर्ष कम से कम दस नये व्यक्ति यों से संपर्क बढ़ाकर नियमित रूप से पढ़ाने का संकल्प करना चाहिए और उसे बिना आलस्य किये बराबर निबाहना चाहिए। ‘एक से दस’ हमारा व्रत होना चाहिए। इस प्रकार हम आज के एक लाख व्यक्ति एक वर्ष में दस लाख—दस लाख के दस गुने एक करोड़—एक करोड़ के दस गुने दस करोड़—तीन चार वर्ष में ही हो सकते हैं। यह शृंखला हमें चलानी ही चाहिए और आत्म−निर्माण, परिवार निर्माण तथा समाज निर्माण में संलग्न प्रखर व्यक्तित्वों का सृजन पूरे उत्साह के साथ जारी रखना चाहिए।
जिन लोगों के साथ प्रचार साहित्य के माध्यम से संपर्क जुड़े उनके वैयक्तिक और सामाजिक स्तर को ध्यान पूर्वक समझने का प्रयत्न करना चाहिए और उन्हें ऐसा परामर्श, प्रकाश, मार्ग−दर्शन एवं सहयोग देना चाहिए जिससे वे भी अपनी ही तरह आदर्श युक्त गतिविधियाँ अपना सकें। इसमें समुचित सफलता मिल सके इसके लिए आवश्यक है कि हम लोग ऐसी रीति−नीति अपनायें जो दूसरों के लिए अनुकरणीय बन सके।
(2) कथा आयोजन
सीधे उपदेश देने की अपेक्षा धर्म−पुराणों की कथा कहकर हम अपने देश की देहातों में रहने वाली एवं अल्प−शिक्षित जनता को अधिक अच्छी तरह प्रगतिशील विचारधारा को समझने और स्वीकार करने के लिए अधिक अच्छी तरह तैयार कर सकते हैं। अपने देशवासियों को धर्म प्रिय मनोभूमि की प्रगतिशीलता की दिशा में अग्रसर करने के लिए धर्म कथाओं का माध्यम जितना उपयोगी हो सकता है उतना अन्य कोई नहीं। हमें प्रगतिशील कथा आयोजनों की व्यवस्था करनी चाहिए ताकि जगह−जगह आसानी से लोक−शिक्षण पूरा कर सकें।
शान्ति−कुञ्ज में गत एक साल से वानप्रस्थों के रामायण शिक्षा सत्र चल रहे हैं। जिनमें तुलसीकृत एवं बाल्मीकि, रामायण के माध्यम से व्यक्ति , परिवार एवं समाज की वर्तमान समस्याओं का प्रगतिशील समाधान प्रस्तुत करने की अतीव दूरदर्शितापूर्ण शैली सिखाई जाती है। अगले सत्रों में रामचरित्र की भाँति ही कृष्णचरित्र को भी माध्यम बनाया जा रहा है और भागवत, महाभारत तथा गीता के आधार पर कथाएँ कहने तथा प्रवचन करने की शिक्षा भी जोड़ दी गई है। गायत्री यज्ञों तथा संस्कारों पर्वों के कर्मकाण्ड आयोजनों का सहारा लेकर किस प्रकार नवयुग के अनुरूप जन−मानस ढाला जा सकता है; यह भी इन वानप्रस्थ सत्रों की शिक्षा का एक अंग है। जो यहाँ से शिक्षा प्राप्त करके जाते हैं वे धर्म मंच से लोकशिक्षण की प्रक्रिया पूरी कर सकने में भली प्रकार सफल सिद्ध होते हैं। अब ऐसे प्रशिक्षित वानप्रस्थों की संख्या इतनी हो गई है कि उन्हें देश के हर क्षेत्र में कथा चर्चा की माँग पूरी करने के लिए भेजा जा सकता है।
यह शिविर अभी भी चलते रहते हैं। दो−दो महीने का अब इनका शिक्षण कर दिया गया है। रामायण और गीता, भागवत की तीनों धाराएँ उसमें जोड़ दी गई हैं। जिन्हें समाज−सेवा में उत्साह और अवकाश है वे इन सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। अपनी निज की ज्ञान वृद्धि तथा लोक−मंगल के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य कर सकने की क्षमता इतने स्वल्प समय में हो सके ऐसा अनुपम प्रयोग अब तक अन्यत्र कहीं भी नहीं हुआ है।
कथा सप्ताह आयोजनों की व्यवस्था जगह−जगह की जानी चाहिए। जो लोग शिक्षण प्राप्त करके गये हैं वे अपने−अपने यहाँ—अपने−अपने समीपवर्ती क्षेत्र में एक सप्ताह के क्रमबद्ध आयोजन करने के लिए स्वयं प्रयास करें। जहाँ के लोग ऐसे आयोजनों के लिए उत्सुक हों वे युग−निर्माण योजना मथुरा से कथावाचक बुलाने के लिए पत्र व्यवहार कर लें।
साधारणतया यह कथा आयोजन एक सप्ताह के होंगे। प्रातःकाल प्रभात फेरी, सवेरे दो घण्टे कथा, तीसरे प्रहर जन−संपर्क, रात्रि में प्रवचन यह दैनिक कार्यक्रम चलेगा। अन्त के दो−तीन दिन पाँच कुण्डी गायत्री यज्ञ किया जाय और अन्तिम दिन कथा के अतिरिक्त यज्ञ की भी पूर्णाहुति हो। अपने यज्ञों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें सम्मिलित होने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने दोष, दुर्गुणों में से एक छोड़ना और एक सद्गुण व्रत संकल्प के रूप में आरम्भ करना पड़ता है। खाद्य−पदार्थों का एक दाना भी हवन नहीं होता मात्र वनस्पतियाँ ही होती जाती हैं। धृत का खर्च भी न्यूनतम प्रतीक मात्र ही रखा गया है जिससे परम्परा का निर्वाह तो हो जाय, पर आज की खाद्य समस्या पर तनिक भी भार न बढ़े। इन आयोजनों को बड़े रूप में करना हो तो खर्च अधिक भी पड़ सकता है। अन्यथा कथा व्यास का मार्ग व्यय और स्थानीय यज्ञ, माइक, पंडाल आदि का कुल खर्च मिलाकर ढाई−तीन सौ तक में काम चल सकता है। सप्ताह भर तक जहाँ यह कथा प्रसंग चलेंगे वहाँ जन−जागृति का अभिनव वातावरण उत्पन्न होना निश्चित है। उस वातावरण में ऐसी रचनात्मक और सुधारात्मक प्रवृत्तियों का अभिवर्धन हो सकती है जिनसे मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न साकार करने में समुचित सहायता मिल सके।
(3) प्रचार फेरी धर्म यात्रा
कथा सम्मेलनों से एक स्थान पर जनता को इकट्ठा करने और स्थानीय लोगों को प्रकाश देने भर की बात बनती है। पर इतने भर से जन−संपर्क का प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए घर−घर जाना और जन−जन से संपर्क बनाना आवश्यक है। इसके लिए परिव्राजक बनकर हमें घर−घर, गली−गली, गाँव−गाँव अलख जगाने की योजना बनाकर चलना चाहिए।
अपने नगर में सवेरे प्रभात फेरी लगाने का आयोजन सप्ताह में एक दिन—किसी पर्व विशेष पर तीन दिन—यज्ञ सम्मेलन आदि बड़े आयोजन के समय एक सप्ताह के लिए इन फेरियों की व्यवस्था बनाई जा सकती है। इससे प्रातःकाल के सौम्य वातावरण में सोते, जागते हर किसी के कान में नव−जीवन का सन्देश पहुँचेगा और इस पुण्य वेला में भावभरे मधुर गीतों का जो बीजारोपण होगा वह देर तक अन्तःकरणों को स्पंदित करता रहेगा। प्रभात फेरियों का यह क्रम जहाँ भी जब भी बन पड़े तभी उसके लिए व्यवस्था बना लेनी चाहिए।
किसी ऊँचे स्थान पर लाउडस्पीकर बाँधकर प्रातःकाल आधा घण्टा भावभरे गीत भी सुनाये जा सकते हैं। इसके लिए शान्ति−कुञ्ज की लड़कियों के दस गायनों के टेप बहुत ही उपयुक्त हैं, टेप रिकार्डर और लाउडस्पीकर के समन्वय से यह प्रसारण सुविधा पूर्वक हो सकता है। इसी प्रयोजन के लिए अपने ग्रामोफोन रिकार्ड भी उपयोगी हैं।
प्रचार फेरी की योजना यह है कि पीत वस्त्रधारी कार्यकर्त्ताओं का एक जत्था सवेरे घर से जलपान करके निकले, आवश्यकता हो तो मध्याह्न का भोजन साथ में ले ले और शाम तक घर लौटे। इसमें कम से कम पाँच और अधिक से अधिक दस व्यक्ति रहें। सभी के कंधे पर पीले झोले और सभी के हाथ में लाल मशाल के झण्डे रहने चाहिए। पैदल या साइकिलों से जैसी भी यात्रा सरल पड़े वैसा किया जा सकता है।
प्रचार फेरी की टोली सवेरे घर से चले। जाने और लौटने का रास्ता पहले से ही निर्धारित कर लिया जाय। जिन गाँवों का कार्यक्रम हो, उनमें प्रेरक गीत गाते हुए एकबार पूरे गाँव की फेरी लगाई जाय। स्टेन्सिल से दीवारों पर आदर्श वाक्य पोते जायं। मिशन का परिचय देने वाले पर्चे बाँटे जायं। बिगुल बजाकर लोगों की इकट्ठा किया जाय और पन्द्रह−बीस मिनट के संक्षिप्त भाषण में भावनात्मक नव−निर्माण की रूपरेखा समझाई जाय। बस यही कार्यक्रम हर गाँव का रहे। इस प्रकार औसतन छोटे−बड़े पाँच गाँवों में प्रतिदिन प्रचार हो सकता है। यदि यह सात दिन का कार्यक्रम बना है तो 35 गाँवों में जन−जागृति का अलख जगाया जा सकता है। इस संपर्क में जो लोग रुचि लेते दिखाई पड़े उन्हें घर बुलाने अथवा उनके घर जाने का सिलसिला आरम्भ किया जा सकता है। धर्म फेरी इससे बड़ी है। उसमें हर दिन रात को घर वापिस नहीं लौटा जाता वरन् एक गाँव में ठहरना पड़ता है और वहाँ कीर्तन, भजन एवं प्रवचन के माध्यम से स्थानीय जनता को उदीयमान नवयुग के स्वागत में क्या करना चाहिए इसका भावभरा परिचय देना चाहिए। दूसरे दिन फिर अगले चार−पाँच गाँवों में प्रचार करते हुए दूसरे पड़ाव पर जा ठहरना चाहिए। यह यात्राएँ सात दिन की या अधिक दिनों की हो सकती है। दिवाली, दशहरा की अथवा गर्मियों की छुट्टियों में छात्रों तथा दूसरे लोगों को इस कार्य के लिए आसानी से साथ लिया जा सकता है। जहाँ गायत्री यज्ञ तथा कथा, सप्ताह चल रहे हों वहाँ भी यह फेरियाँ साथ साथ चल सकती हैं।
हम लोग अपने छोटे से परिवार को निरन्तर बढ़ाते चलें इसके लिए जन−संपर्क का विस्तार नितान्त आवश्यक है। नये क्षेत्रों में प्रवेश—नये व्यक्ति यों से परिचय इसी आधार पर सम्भव होगा। अगले वर्ष प्रभात फेरियों, प्रचार फेरियों तथा संपर्क यात्रा फेरियों की व्यवस्था जहाँ जिस प्रकार बन सके अवश्य ही बनानी चाहिए। इसके लिए झोले, झण्डे एवं स्टेन्सिल, बैज आदि मथुरा या हरिद्वार से प्राप्त किये जा सकते हैं।
स्लाइड प्रोजेक्टरों से मुहल्ले−मुहल्ले के प्रदर्शन, आयोजन हर दिन किये जा सकते हैं। दिन भर काम करने के बाद रात को दो घण्टे का समय कोई भी भावनाशील व्यक्ति दे सकता है और अपने नगर में घर−घर लोकरंजन एवं लोकशिक्षण के इस सस्ते किन्तु प्रभावशाली माध्यम से नव−जागरण का प्रकाश पहुँचा सकता है।
जन−संपर्क के लिए, एक से दस—कथा आयोजन तथा प्रचार फेरियों के त्रिविधि कार्यक्रम बहुत ही प्रभावशाली सिद्ध हो सकते हैं। अखण्ड−ज्योति के पाठकों को महिला जागरण एवं जन−मानस का नव−निर्माण करने के लिए इन संपर्क कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने के लिए उत्साहपूर्वक प्रयत्न करना चाहिए।
दुनिया बनाने के बाद भगवान् ने मनुष्य बनाया। उसे स्वर्ग से धरती पर भेजा तो अनमना होने लगा। परमात्मा ने उसे सान्त्वना दी और दो बहुमूल्य उपहार दो घड़ों में भरकर उसके दोनों हाथों पर रख दिये और कहा—इनसे तुम्हें भीतर और बाहर आनन्द ही आनन्द मिलता रहेगा।
आश्चर्यचकित मनुष्य ने उन घड़ों के बारे में कुछ विशेष जानना चाहा और उनका उपयोग पूछा।
भगवान् ने कहा—दाहिने हाथ वाले घड़े में सत्य है बाँये में सुख। तुम सत्य के द्वारा सुख की रक्षा करना तुम्हें किसी बात की कमी न रहेगी।
प्रसन्न होकर मनुष्य चल दिया। लम्बे सफर में उसे एक जगह नींद आ गई और सुस्ताने के लिए गहरी नींद में सो गया।
शैतान को अच्छा अवसर मिला। उसने चुपके से दाहिने हाथ का घड़ा बाँये पर और बाँया दाहिने पर रख दिया और रफूचक्कर हो गया।
जागने पर मनुष्य चल पड़ा और धरती पर आ गया। यहाँ सुख उसके दाँये हाथ पर है और सत्य बाँये हाथ पर। सुख प्रधान है और सत्य गौण। सुख को सुरक्षित रखता है और सत्य की उतनी ही रक्षा करता है जिससे सुख में कमी न आने पावे।
भगवान् की मर्जी पूरी न हो सकी। मनुष्य शैतान के फेर में पड़ गया और वह बना, जैसा कि है। वह न रह सका जैसा कि उसे बनाया और भेजा गया था।
हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्ति गत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक−एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिये यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथ−प्रदर्शक करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।
गायत्री महाविज्ञान तीनों भाग मू. 18)
प्रथम भाग—गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियाँ का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिये लगाये जाने वाले बीज मन्त्रों का साधन−विधान, आत्म−साक्षात्कार एवं ऋद्धि−सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मू. 6)
द्वितीय भाग—गायत्री द्वारा वाममार्गीय तान्त्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री−स्मृति, गायत्री−संहिता, गायत्री−उपनिषद्, गायत्री−पारायण , गायत्री−हृदय, गायत्री−पञ्जर, सहस्रनाम आदि का संग्रह। मू. 6)
तृतीय भाग—गायत्री महामन्त्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों के साधना विषयक विधान। जप−योग, प्राण−योग, शब्द−योग, नाद−योग, हठयोग, कुण्डलिनी −योग, षट्चक्र वेधन की साधनायें तथा अन्नमय−कोष, मनोमय−कोष, प्राणमय−कोष को सिद्ध करने के रहस्य−मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 6)
गायत्री यज्ञ विधान दोनों भाग मू. 6)
प्रथम भाग—गायत्री यज्ञ का विधान, लाभ एवं महत्व का तर्क, प्रमाण, शास्त्रीय विधान के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन। मू. 3)
द्वितीय भाग— (सामूहिक गायत्री हवन) —गायत्री हवन करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया जलयात्रा, मण्डप−प्रवेश, वेदी−पूजन, कुशकण्डिका, अग्निस्थापन, आहुति मंत्र, पूर्णाहुति, वसोधारा, घृतावघ्राण, भस्मधारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि−विधान समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मू. 3)
3.गायत्री चित्रावली
विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता के ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तिरंगे चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मू. 3)
4.गायत्री मंत्रार्थ
अनेक ग्रन्थों में अनेक ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेकों प्रकार के कि ये हुए अर्थों का संग्रह। राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है। मू. 3)
5.गायत्री सम्बन्धी छोटा प्रचार साहित्य:−
1 छोटा गायत्री ट्रैक्ट साहित्य सैट—तिरंगे कवरों वाले 32−33 पृष्ठ के गायत्री ट्रैक्ट जिनमें गायत्री उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मूल्य 50 पैसा—15 पुस्तकों के सैट का मूल्य 7,50। ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं—
1.गायत्री का स्वरूप और रहस्य 2−गायत्री की गुप्त शक्ति 3−सर्वसुलभ गायत्री साधना 4− गायत्री शक्ति का स्रोत−सविता देवता 5−गायत्री और उसकी प्राण प्रक्रिया 6−गायत्री पञ्चमुखी और एकमुखी 7−गायत्री की पञ्चमुखी दैनिक साधना 8−गायत्री की विशेष साधना 9−गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति 10−गायत्री की असंख्य शक्तियाँ 11−गायत्री की सिद्धियाँ 12−गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप 13−स्त्रियों का गायत्री अधिकार 14−गायत्री और यज्ञोपवीत 15−गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।
2.संक्षिप्त गायत्री हवन—सामूहिक गायत्री हवन तथा पारिवारिक उत्सवों के अवसर पर किये जाने वाले एक घण्टे में पूरे होने वाले संक्षिप्त गायत्री हवन का विधान। मू. 40 पैसे।
3.दैनिक गायत्री साधना—नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। मू. 40 पैसे।
4.गायत्री चालीसा 10 पैसे।
5.युग−निर्माण का सत्संकल्प—मू. 5 पैसे।
(डा. हरगोविन्द सिंह)
नहीं मांगते राज्य, स्वर्ग-सुख, हमें मुक्ति की चाह नहीं। बस इतना कर दो, दुखियों में रहे कष्ट का दाह नहीं।।
जब पथ से विचलित हो जन-मन भूल जाय परमार्थ-प्रयोजन; खोजे अपना ही सुख-साधन, बढ़े असुरता का सम्मोहन;
तब हम प्रतिपल तिल-तिल जलकर बने ज्योति की रह कहीं। बस इतना कर दो, दुखियों में रहे कष्ट का दाह नहीं।।
पराधीनता की कुंठाएं जब मानव को विवश बनायें; मृग-मरीचिका-सी आशाएं असफल प्राणों को भटकायें;
तब उस जीवन के मरुथल में, हमें बना दो छांह कहीं। बस इतना कर दो, दुखियों में रहे कष्ट का दाह नहीं।।
तथाकथित सब धर्म-धुरंधर हों जब भाग्यवाद पर निर्भर, भूतल को भवसिन्धु बताकर दूर हटें झंझा से डरकर;
तब हम कर्णधार को लेकर, जूझें बनकर नाव कहीं। बस इतना कर दो, दुखियों में रहे कष्ट का दाह नहीं।।
जब तक सुलभ न स्वर्ग सभी को, शान्ति नहीं व्याकुल धरती को; जब तक चैन न हर प्राणी को कैसे रुचे आत्म-सुख जी को?
जन्म-जन्म के पुण्य हमारे, लुट जायें परवाह नहीं। बस इतना कर दो, दुखियों में रहे कष्ट का दाह नहीं।।
*समाप्त*