सौन्दर्य और शक्ति का स्रोत अन्तस् में

सौन्दर्य और शक्ति का भण्डार भीतर भरा है, बाहरी साधनों से तो मात्र उसकी सुव्यवस्था और सुसज्जा ही सम्भव हो सकती है। जीवन कोई बाहर से नहीं दे सकता वह तो आन्तरिक क्षमता पर ही निर्भर रहता है और जब वह जीवनी शक्ति खोखली हो जाती है और चुक जाती है तो कोई बाह्योपचार जीर्णता एवं मृत्यु को रोके रहने में सफल नहीं हो सकता है।

अध्यापक पढ़ा सकता है, पर मानसिक स्तर नहीं दे सकता। सुन्दरता को निखारने वाले शृंगार प्रसाधन तो बाजार में बहुत बिकते हैं, पर सौन्दर्य की मूल सत्ता तो भीतर ही रहती है। कलेवर की कुरूपता और अवयवों की अपंगता को दूसरों की सहायता से एक सीमा तक ही घटाया जा सकता है।

बीज की उत्पादन शक्ति मौलिक है। किसान उसे उगाने, बढ़ाने में अपने श्रम एवं कौशल का सफल उपयोग कर सकता है, पर गेहूँ के दाने से कपास उगा सकना उसके लिए कब सम्भव होता है। वर्षा के बादल कठोर चट्टानों को न तो गीला कर पाते हैं और न उन पर हरियाली उगा सकने में समर्थ होते हैं।

सौन्दर्य और शक्ति सम्पदा के अजस्र भण्डार अपने ही भीतर भरे हैं उन्हें पहचाना ढूँढ़ा और समेटा जा सकेगा तो कोई भी व्यक्ति अपनी दरिद्रता और कुरूपता से पीछा छुड़ा सकता है। बाहरी साधनों और व्यक्तियों की अनुकूलता के लिए जितना प्रयास किया जाता है उससे कहीं कम में मनुष्य असीम विभूतियों का अधिपति बन सकता है। यदि वह अन्तर को खोजे और उसे परिष्कृत करने की तत्परता बरते।

----***----


सौन्दर्य कहाँ खोजें- कहाँ पायें

सौन्दर्य आकर्षक है। इस लिए प्रिय लगता है। जो प्रिय है उसे पाने की इच्छा होती है। सौन्दर्य की खोज और प्राप्ति के लिए प्रायः हमारा अन्तस् रोता रहता है। न जाने कितने भले-बुरे मोड़ उसे इसी अतृप्ति को तृप्त करने के लिए लेने पड़ते हैं।

पाने से पहले खोजना जरूरी है। खोजने से पहले उसके रूप को समझा जाना चाहिए। इसलिए सौन्दर्य खोजियों से उनका अनुभव पूछ लिया जाय तो कठिन अनुसन्धान की अपेक्षा सरलता ही होगी।

कराहते पीड़ित से पूछा तो उसने सहानुभूति भरे आश्वासन में बताया। थके-हारे ने कहा- ‘शीतल, सुकोमल विश्रान्ति में उसने देखा है।’ कलाकार प्रकृति की- सुषमा का वर्णन करता चला गया और बोला सौन्दर्य देखना है तो उन्मुक्त गगन के झिलमिलाते तारों, धरती पर लहराते वन-उपवनों को देखो, नदी निर्झरों और गिरि-शृंगों को निहारो।

रातभर जगे पहरेदार ने छुट्टी का संदेश लेकर उदय होते हुए स्वर्णिम प्रभात का वर्णन उल्लासपूर्वक कर डाला। श्रमिक दिन भर संध्या के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था उसने कहा “प्रतीची सान्ध्य लालिमा से बढ़ कर इस संसार में अन्यत्र कहीं सौन्दर्य की अनुभूति नहीं हो सकती।”

सेनाध्यक्ष ने तलवारों की खनखनाहट और घोड़ों की चंचल पद टापों की मधुर स्मृतियाँ सुनाईं और युद्ध कौशल के दावपेचों में उभरती सुन्दरता का उत्साहपूर्वक वर्णन किया। वैज्ञानिक ने परमाणु परिवार की गति-विधियाँ और सम्भावनाओं का जिस ढंग से वर्ण किया उससे लगता था बाहरी दुनिया का सौन्दर्य बीज परमाणु सत्ता में छिपा पड़ा है। उद्गम स्थल उसने जान लिया अन्य दूसरे तो केवल उसकी प्रतिक्रिया को जानते हैं।

भिखारी अपने अन्न दाता के गुण-गान कर रहा था और कह रहा था- उससे सुन्दर तो भगवान भी नहीं है। भगवान जन्म देकर चला गया किंतु पालन तो आश्रय दाता कर रहा है। कामुक की व्याख्याएँ अलग थीं। वह रूप लावण्य के भेद-उपभेदों का आवेश पूर्वक वर्णन कर रहा था लगता था कि उसने क्रीड़ा कक्ष में संसार के सारे सौन्दर्य को संचित हो कर बैठे देखा है। स्वर साधक शर्त लगा कर कह रहा था यदि किसी को सौन्दर्य बोध हो तो देखे कि नादब्रह्म में अन्तःकरण को तरंगित करने की कितनी कोमल संवेदना भरी पड़ी है।

और लोग भी अपनी-अपनी कह रहे थे, शीत से ठिठुरा आग की- और ग्रीष्म से संतप्त हिम वर्षा की सराहना कर रहा था। दार्शनिक ने तत्व दर्शन की व्याख्या इस तरह की मनो भाव सौन्दर्य के अतिरिक्त और सब कुछ मिथ्यात्व ही इस संसार में भरा पड़ा है।

इन विवेचनाओं में किसी को सौन्दर्य बोध था, किसका गलत? इसका निष्कर्ष निकालने वाले तत्त्वदर्शी ने कहा- “यह सभी गलत थे और सभी सही। गलत इस अर्थ में कि उन्हें उन पदार्थों को सुन्दर कह डाला जिन्हें भिन्न परिस्थिति और मनःस्थिति के लोग अपने कटु अनुभवों के आधार पर घृणापूर्वक असुन्दर सिद्ध करने का दावा कर सकते हैं। सही इस अर्थ में कि जिस पर भी उन्होंने अपने आन्तरिक सौन्दर्य की किरणें फेंकी वही सौन्दर्य की आभा से जगमगाता दिखाई देने लगा।”

सौन्दर्य को वस्तुओं और व्यक्तियों में खोजते हुए भटकना व्यर्थ है। दूर से सुहावना पास से डरावना यही है इस संसार का क्रम उपक्रम। उत्कृष्ट दृष्टिकोण ही सुन्दर है उसकी प्रकाश परिधि में जो भी वस्तु आती है, सुन्दर लगने लगती है। कुरूपता से अरुचि हो तो उसका उन्मूलन कुरुचि को बुहार फेंकने के लिए करना चाहिए।

----***----


जीवात्मा परमात्मा सत्ता का प्रतिनिधि

ईश्वर और जीव में लघुता और महानता की दृष्टि से अकल्पनीय अंतर है। इतने पर वे भी अंश और अंशी के नाते वे सभी विशेषताएं जीव में विद्यमान हैं जो उसके उद्गम स्रोत ईश्वर में होती हैं। प्रश्न केवल विकसित और अविकसित स्थिति का है। अविकसित जीव तुच्छ है इस पर भी उसमें वे सभी संभावनाएं मौजूद हैं जिनसे उसका विकास सहज ही विराट रूप धारण कर सकता है। आग की छोटी सी चिनगारी मूलतः ब्रह्माण्ड व्यापी अग्नि तत्व का एक घटक है जिसे अवसर मिले तो प्रचण्ड दावानल बनकर सुदूर क्षेत्रों को अपनी लपेट में ले सकती है। यह चाहे तो अपना चिनगारी स्वरूप समाप्त करके विश्व व्यापी अग्नि तत्व में विलीन हो सकती है। जीव जब तक चाहे अपनी छोटी स्थिति में रहे- संकल्प करे महान बन जाय और उसको उत्कण्ठा हो तो अपने उद्गम में विलीन होकर पूर्ण ब्रह्म भी बन सकता है। तुच्छता से महानता में विकसित होने में प्रधान बाधा उसकी संकल्प शक्ति की ही तो है। उसी की अभिवृद्धि के लिए साधना का मार्ग अपनाया जाता है।

विराट और लघु की परमात्मा और आत्मा की प्रत्यक्ष तुलना सूर्य और परमाणु से कर सकते हैं। सूर्य का विस्तार और शक्ति भण्डार असीम है पर नगण्य सा दीखने वाला परमाणु भी तुच्छ नहीं है अपनी छोटी स्थिति में उसकी शक्ति भी उतनी ही है जितनी कि विस्तृत स्थिति में विशालकाय सूर्य की। ब्रह्म और जीव का अनुपात भी इसी प्रकार है।

सूर्य का व्यास पृथ्वी से 106 गुना बड़ा है। व्यास 865380 मील, परिधि 2700000 मील और उसका क्षेत्र 3393000 अरब वर्ग मील है। यदि वह पृथ्वी से 93000000 मील की दूरी पर न होकर कुल 1000000 मील दूर होता तो हमें आकाश में एकमात्र सूर्य ही सूर्य दिखाई देता है।

सूर्य की शक्ति का कोई वारापार नहीं। उसकी सतह का तापक्रम 600 डिग्री सेन्टीग्रेड है तो अंदर का अनुमानित ताप 15000000 डिग्री सेन्टीग्रेड। 12 हजार अरब टन कोयला जलाने से जितनी गर्मी पैदा हो सकती है उतनी सूर्य एक सेकिण्ड में निकाल देता है। अनुमान है कि सूर्य का प्रत्येक वर्ग इंच क्षेत्र 60 अश्वों की शक्ति (हार्स पावर) के बराबर शक्ति उत्सर्जित करता है उसके सम्पूर्ण 3393000000000000 वर्ग मील क्षेत्र में शक्ति का अनुमान करना हो तो इन गुणनखण्ड को हल करना चाहिए। 3393000000000000 x 1760 x 3 x 12 इतने हार्स पावर की शक्ति न होती तो यह जो इतनी विशाल पृथ्वी और विराट सौरजगत आँखों के सम्मुख प्रस्तुत है वह अंधकार के गर्त में बिना किसी अस्तित्व के डूबा पड़ा होता।

सूर्य और पृथ्वी की तुलना नहीं हो सकती। किन्तु अपने स्थान पर पृथ्वी और उस पर रहने वाले प्राणियों की सामर्थ्य को देखकर भी दाँतों तले उंगली दबानी पड़ती है और सोचना पड़ता है कि विश्व की प्रत्येक इकाई अपने आप में एक परिपूर्ण सूर्य है।

पृथ्वी के लोग भी इस तरह का विकास किया करते हैं। प्रतिवर्ष मनुष्य जाति 9000000000000000000 फुट पौंड ऊर्जा आकाश में भेजती रहती है जबकि हमारे जीवन को अपने समस्त ब्रह्माण्ड को गतिशील रखने के लिए सूर्य प्रति सैकिण्ड चार सौ सेक्टीलियन अर्थात् दस अरब इक्कीस करोड़ किलोवाट शक्ति अपने सारे मण्डल को बखेरता और गतिशील रखता है। परमाणु की इस महाशक्ति की सूर्य की महाशक्ति से उसी प्रकार तुलना की जा सकती है जिस प्रकार परमाणु की रचना से सौरमंडल की रचना की तुलना की जाती है। वस्तुतः परमाणु सूर्य और समस्त ब्रह्माण्ड के समान त्रिक है। जो परमाणु में है वही सौर मंडल में है जिस प्रकार परमाणु अपने नाभिक के बिना रह नहीं सकता प्रकृति और ब्रह्म की एकता का रहस्य भी यही है।

हाइड्रोजन परमाणु का एक इलेक्ट्रॉन अपने केन्द्र के चारों ओर एक सैकिण्ड में 6000 अरब चक्कर काटता है। परमाणु की रचना सौरमंडल के सदृश है उनके भीतर विद्युत कण भयंकर गति से घूमते हैं फिर भी उसके पेट में बड़ा सा आकाश भरा रहता है परमाणुओं के गर्भ में चल रही भ्रमणशीलता के कारण ही इस संसार में विभिन्न हलचलें हो रही हैं। यदि वे सब रुक जायं तो आधा इंच धातु का वजन तीस लाख टन हो जायेगा और सर्वत्र अकल्पनीय भार जड़ता भरा दिखाई पड़ेगा।

हाइड्रोजन संसार का सबसे हल्का तत्व है और वह सारे विश्व में व्याप्त है। उसके एक अणु का विस्फोट कर दिया जाय तो उसकी शक्ति संसार के किसी तत्व की तुलना में अधिक होगी। जो जितना हलका वह उतना ही आग्नेय, शक्तिशाली, सामर्थ्यवान और विश्वव्यापी यह कुछ अटपटा सा लगता है पर है ऐसा ही।

किसी गुब्बारे में 300 पौंड हवा भरी जा सकती है तो हाइड्रोजन उतने स्थान के लिए 100 पौंड की पर्याप्त होगा, उसी प्रकार जितने स्थान में एक औंस पानी या 2/3 औंस हाइड्रोजन रहेगा उतने स्थान को मनुष्य के सूक्ष्म शरीर के प्रकाश अणुओं का 1224 वाँ भाग ही घेर लेगा। यदि प्रयत्न किया जाय तो इन अणुओं की सूक्ष्मतम अवस्था में पहुँचकर विराट विश्वव्यापी आत्म चेतना के रूप में अपने आपको विकसित और परिपूर्ण बनाया जा सकता है।

सर्गे सर्गे पृथगरुपं सन्ति सर्गान्तराण्यपि। तेष्वप्यन्तः स्थसर्गोधाः कदलीदल पीठवत्॥

-योगवशिष्ठ 4।18।16-17

आकाशे परमाण्वन्तर्द्रव्यादेरणुकेऽपि च। जीवाणुर्यत्र तत्रेदं जगद्वेत्ति निजं वपुः॥

-योगवशिष्ठ 3।44।34-35

अर्थात्- ‘‘जिस प्रकार केले के तने के अंदर एक के बाद एक परतें निकलती चली आती हैं उसी प्रकार प्रत्येक सृष्टि के भीतर नाना प्रकार के सृष्टि क्रम विद्यमान हैं। इस प्रकार एक के अंदर अनेक सृष्टियों का क्रम चलता है। संसार में व्याप्त चेतना के प्रत्येक परमाणु में जिस प्रकार स्वप्न लोक विद्यमान है उसी प्रकार जगत में अनन्त द्रव्य के अनन्त परमाणुओं के भीतर अनेक प्रकार के जीव और उनके जगत विद्यमान हैं।’’

हमारे लिए वर्ष 365/1/4 दिन का होता है पर सूर्य के लिए वह अपनी एक हजार किरणों के घूमने भर का समय, सूर्य का प्रकाश हर क्षण पृथ्वी के आधे भाग पर पड़ता है अर्थात् सूर्य का एक सैकिण्ड पृथ्वी के निवासी के लिए 12 घन्टे। कीट-पतंगों के लिए तो उसे कल्प ही कहना चाहिए। सूर्य अरबों वर्ष से जी रहा है और करोड़ों वर्ष तक जियेगा पर इतनी अवधि में तो मनुष्यों की लाखों पीढ़ियां मर खप चुकीं, यदि सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर अब तक जितने लोग जन्म ले चुके उन सबके नाम लिखना सम्भव हो तो उसके लिए पृथ्वी के भार से कम कागज की आवश्यकता न पड़ेगी। सूर्य का एक जन्म इतना बड़ा है कि मनुष्य उसकी तुलना में अरबवें हिस्से की भी जिन्दगी नहीं ले पाया। ठीक यही बात मनुष्य की तुलना में कीट पतंगों की है। वायुमण्डल में ऐसे जीव हैं तो इतने सूक्ष्म हैं कि उनको इलेक्ट्रानिक सूक्ष्मदर्शी यंत्र से ही देखना संभव है उनमें एक ही कोश (सेल) होता है। उसमें केन्द्रक सूर्य का ही एक कण होता है अन्य तत्वों में कोई भी खनिज लवण या प्रोटीन कार्बोहाइड्रेट मिलेंगे। अर्थात् जीव चेतना और प्रकृति का समन्वय ही दृश्य जगत है।

मनुष्य में गर्मी अधिक है। 100 वर्ष का जीवन उसे प्राप्त है पर कीड़े मकोड़े शक्ति के एक अणु और शरीर के एक कोश से ही मनुष्य जैसी आयु भोग लेते हैं। मनुष्य जितने दिन में एक आयु भोगता है उतने में कीट पतंगों के कई कल्प हो जाते हैं। प्रसिद्ध रूसी वैज्ञानिक एन॰ एस॰ श्चेरविनोवस्की एक कृषि-विशेषज्ञ थे, जिन्होंने 50 वर्ष तक कीट पतंगों के जीवन का सूक्ष्म अध्ययन किया और उससे कृषि नाशक कीटाणुओं के सम्बन्ध में महत्वपूर्ण खोजें कीं। उन्हीं खोजों में भारतीय दर्शन को प्रमाणित करने वाले तथ्य भी प्रकाश में आये। वे लिखते हैं- टिड्डियों की सामूहिक वंशवृद्धि की अवधि सूर्य के एक चक्र अर्थात् 11 वर्ष से है अर्थात् 11 वर्ष में उनकी प्रलय और नई सृष्टि का एक क्रम पूरा हो जाता है। वीविल जो चुकन्दर कुतरने लगा कीड़ा होता है वह भी 11 वर्षीय चक्र से सम्बन्धित है, पर कुछ कीड़ों की सामूहिक वृद्धि 22 वर्ष, कुछ की 33 वर्ष है इस आधार पर उन्होंने लिखा है कि पृथ्वी का सारा जीवन ही सूर्य पर आधारित है। सिद्ध होता है कि नन्हें नन्हें जीवाणु (बैक्टीरिया) तथा विषाणु (वायरस) सभी का जीवन कोश (नाभिक या न्यूक्लियस) सूर्य का ही प्रकाश स्फुल्लिंग और चेतन परमाणु है, जबकि उसके कोशिका सार (साइटोप्लाज्म) में अन्य पार्थिव तत्व। जीवन चेतना सर्वत्र एक सी है, परिभ्रमण केवल मन की वासना के अनुसार चलता रहता है। नाभिक में भी नाभिक (न्यूक्लिओलस) होते हैं जिससे यह भी सिद्ध होता है कि जिस प्रकार कोशिका सार (साइटोप्लाज्म) का सूर्य नाभिक होता, नाभिक अग्नि तत्व होता है अग्नि या प्राण में ही मन होता है, उसी प्रकार मन की चेतना में ही विश्व चेतना या ईश्वरीय चेतना समासीन होनी चाहिए।

सूर्य की तुलना में परमाणु तुच्छ है किन्तु परमाणु के भीतर भी बड़ा संसार विद्यमान है जितना सूर्य के घेरे में उसका सौर परिवार। इस विश्व की सबसे छोटी इकाई क्या है? कुछ कहा नहीं जा सकता। परमाणु को कुछ समय पूर्व सबसे छोटी इकाई माना गया था, पर अब लगता है वह भी एक पूरा सौर परिवार है और उसके भीतर भी सूक्ष्मता की परतें एक के भीतर एक छिपी पड़ी हैं और वे भी इतनी भी अधिक हैं जितनी कि विराट की व्यापकता।

प्रसिद्ध डच व्यापारी एन्टानवान लीवेनहीक को जब भी अवकाश मिलता वह शीशों के कोने रगड़ रगड़ कर लेन्स बनाया करता उसने एक बार एक ऐसा लेन्स बनाया जो वस्तु को 270 गुना बड़ा करके दिखा सकता था। उसने पहली बार गंदे पानी और सड़े अन्न में हजारों जीवों की सृष्टि देखी। कौतूहलवश एक बार उसने वर्षा का शुद्ध जल एकत्र किया उसकी मंशा यह जानने की थी कि आया शुद्ध जल में भी कीटाणु होते हैं क्या? वह यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि उसमें भी जीवाणु उपस्थित थे। उसने अपनी पुत्री मारा को बुलाकर एक विलक्षण संसार दिखाया- यह जीवाणु जल में तैर ही नहीं रहे थे, वरन् तरह तरह की क्रीड़ाएं करते हुए दिखा रहे थे कि उनमें यह इच्छाएँ आकाँक्षाएँ मनुष्य के समान ही हैं भले ही मनुष्य जटिल कोश प्रणाली वाला जीव क्यों न हो पर चेतना के गुणों की दृष्टि से मनुष्य और उन छोटे जीवाणुओं में कोई अंतर नहीं था। यह जीवाणु हवा से पानी में आये थे।

इतना विशाल वट वृक्ष जिस बीज से अंकुरित, पुष्पित, पल्लवित और बड़ा हुआ है वह आधे सेण्टीमीटर व्यास से भी छोटा घटक रहा होगा। उस बीज की चेतना ने जब विस्तार करना प्रारम्भ किया तब तना, तने से डालें, डालों से पत्ते, फूल फल जड़ें आदि बढ़ते चले गये।

मनुष्य शरीर की आकृति और विकास प्रक्रिया भी ठीक ऐसी ही है। वीर्य के एक छोटे से छोटे कोष (स्पर्म) को स्त्री के प्रजनन कोष ने धारण किया था। पीछे वही कोष जिसमें मनुष्य या स्त्री या पुरुष के शरीर की सारी संभावनाएं आकृति प्रकृति रंग रूप ऊँचाई नाक नक्शा आदि सब कुछ विद्यमान था उसने जब बढ़ना प्रारम्भ किया तो वह अन्तरिक्ष की अनन्त शक्तियों को खींच खींचकर शरीर रूप में विकसित होता चला गया। एक सेण्टीमीटर स्थान में कई अरब कोष आ सकते थे जो उसी सूक्ष्मतम कोष से 5 फुट 6 इंच का मोटा शरीर दिखाई देने लगता है।

गर्भ के भीतर रहने तक तो यह लघुता याद रहती है किन्तु बाहर की हवा लगते ही जीवन का मूल भूत आधार भूल जाता है और मनुष्य अपने आपको स्थूल पदार्थों का पिंड मात्र मानकर मनुष्य जीवन जैसी बहुमूल्य ईश्वरीय विरासत को गँवा बैठता है। हम यदि छोटे से छोटे अणु में भी जीवन की अनुभूति कर सकें तो जन चेतना के प्रति हमारा दृष्टिकोण आज की अपेक्षा कुछ भिन्न ही होता है।

धरती पर जीवनोपयोगी परिस्थितियों का आधार जिन रासायनिक हलचलों और आणविक गतिविधियों पर निर्भर है, वे अन्तरिक्ष से आने वाली रेडियो तरंगों पर अवलम्बित हैं। शक्ति के स्रोत उन्हीं में हैं। विविध विधि हलचलों की अधिष्ठात्री इन्हीं को कहना चाहिए। हमारा परिवार हमारा शरीर, हमारा अस्तित्व सब कुछ प्रकारान्तर से इन रेडियो तरंगों पर निर्भर है, जिन्हें हम आत्मा की तरह जानते भले ही नहीं, पर निश्चित रूप से अवलम्बित उन्हीं पर है। जीवन लगता भर अपना है पर उसमें समाविष्ट प्राण इसी अदृश्य सत्ता पर निर्भर है जिन्हें विज्ञान की भाषा में रेडियो तरंग पुँज कहते हैं।

यह तरंगें कहाँ से आती हैं? क्या यह धरती की अपनी सम्पत्ति या उपज हैं? इस प्रश्न का उत्तर विज्ञान इस रूप से देता है कि धरती के पास जो जीवन सम्पदा है वह पूरी की पूरी उधार ली हुई है। सूर्य की ऊर्जा धरती पर एक सन्तुलित मात्रा में बिखरती है। रोशनी और गर्मी के रूप में उसे हम अनुभव करते हैं अप्रत्यक्ष रूप से उसमें जीवन तत्व भी सम्मिलित है। सूर्य यदि न हो, अधिक दूर या अधिक पास हो तो फिर पृथ्वी भी अन्य ग्रहों की तरह किसी प्राणधारी के निवास के लिए सर्वथा अनुपयुक्त बन जायगी। सूर्य की ऊर्जा को बहुत बड़ा श्रेय इस धरती को जीवन प्रदान करने का है।

लगता है सूर्य असीम शक्ति का भण्डार है पर वस्तुतः वह भी विराट ब्रह्माण्ड के महा संचालक ब्रह्म सूर्य का एक नगण्य सा घटक ही है। सूर्य अपनी शक्ति उसी प्रकार अपने सूत्र संचालक महा सूर्य से प्राप्त करता है जैसे कि अपनी पृथ्वी सौरमंडल के अधिष्ठाता अपने सूर्य से।

जीव और ईश्वर की दूरी ही उसकी शक्ति को दुर्बल बनाती है। यदि यह दूरी घटती जाय तो निश्चित रूप से सामर्थ्य बढ़ेगी और स्थिति यह न रहेगी जो आज कृमि कीटकों जैसी दिखाई पड़ रही है।

ध्यान-मन की एकाग्रता द्वारा अपनी प्राणमय चेतना (नाभिकीय चेतना) को सूर्य या किसी अन्य चेतना के साथ जोड़ देने से दो तत्वों का मिलन ऐसे ही हो जाता है जैसे दो दीपकों की लौ मिलकर एक हो जाती है। व्यक्ति अपनी अहंता भूलकर जब किसी अन्य अहंता से जोड़ लेता है तो उसकी अनुभूतियाँ और शक्तियाँ भी वैसी ही- इष्टदेव जैसी ही हो जाती हैं। ध्यान की परिपक्वता को एक प्रकार का संलग्न ही कहना चाहिए। वैज्ञानिक भी मानते हैं कि वह शक्ति विस्फोट की शक्ति से भी अधिक प्रखर होती है। आत्म चेतना की ब्राह्मी चेतना से मिलकर ब्रह्म साक्षात्कार इसी सिद्धान्त पर होता है।

----***----


आत्म निर्भर बने अपने आप उठें।

गीताकार ने “उद्धरेत् आत्मानात्मानाम्” की शिक्षा देते हुए यह स्पष्ट घोषणा की है कि अपना उद्धार अपने ही द्वारा सम्भव है। उसको कोई दूसरा करने वाला नहीं है। अपने उत्थान एवं पतन का उत्तरदायित्व अपने ऊपर ही है इसमें श्रेष्ठ पुरुषों का सहयोग और उनका सत्संग थोड़ी बहुत हमारी सहायता करें यह बात दूसरी है पर अपना कल्याण करने के लिए हमें स्वयं आगे बढ़ना होगा उनके उपदेश हमारा मार्ग प्रदर्शन तो कर सकते हैं पर मंजिल तो हमें स्वयं ही तय करनी चाहिए। लोक और परलोक का सुख दूसरों के कंधों पर बैठकर नहीं प्राप्त किया जा सकता है। तैरने की कला का ज्ञान होने पर भी मनुष्य तब तक तैरना नहीं सीख सकता है जब तक वह स्वयं पानी में घुसकर पैर न चलाये। मृत्यु का आलिंगन किये बिना स्वर्ग का सुख नहीं प्राप्त किया जा सकता है।

“मैं आत्मा हूँ चैतन्य स्वरूप हूँ।’- संसार का सारा ज्ञान मेरे अंदर समाया हुआ है, मेरे पास अनन्त शक्तियों का भण्डार भरा पड़ा है। केवल उनके जगाने भर की आवश्यकता है। ऐसा विचार मन में दृढ़ हो जाने पर मनुष्य जो कुछ चाहे कर सकता है वह जो चाहे बन सकता है। सन्त इमरसन का कथन है विश्वास करो कि तुम संसार के सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति हो। इस प्रकार की संकल्प शक्ति से मन में आत्म विश्वास पैदा होगा, आत्म निर्भरता बढ़ेगी और प्रगति के पथ पर बढ़ते चले जाओगे।

मैं संसार के बंधन में नहीं हूँ, वरन् यह संसार मेरी संकल्प शक्ति का विकास है। संसार जड़ है आत्मा चैतन्य स्वरूप है। अतः जड़ का चैतन्य को बाँधना सम्भव नहीं है, यदि कोई व्यक्ति यह समझता है कि संसार ने मुझे बाँध लिया है तो यह उसका भ्रम ही माना जायगा। महाराजा जनक के द्वारा आयोजित की गई एक धर्म सभा में जब इसी प्रकार पूछा गया था कि संसार ने हमें बाँध लिया है या हमने संसार को तो अष्टावक्र महाराज ने शामियाने के एक लट्ठे को पकड़कर चिल्लाना शुरू किया, “हे जनक! हे जनक! तेरे इस लट्ठे ने मुझे पकड़ लिया है मुझे इससे छुड़ाओ।” इसको सुनकर सारी सभा हँसने लगी तथा जनक जी भी मुस्कुराने लगे थे और उन्होंने कहा ‘महाराज यह शामियाने का लट्ठा जड़ है यह कैसे आपको बाँध सकता है?’ हाथ हटा लीजिए बस आप इससे मुक्त है” बस यही समस्या हमारे और संसार के बीच में है यदि हम आत्म विश्वास, आत्म निर्भरता, आत्मावलम्बन, आत्म चिंतन और आत्म निर्माण इन पाँच बातों को अपने जीवन में उतार लें तो कोई शक्ति हमें भाग्य बदलने की तो बात ही क्या, संसार बदलने से नहीं रोक सकती है। परावलंबी, पराधीन को न तो कभी इस लोक में सुख मिलता है और न परलोक में।

अपने उत्थान, पतन की जिम्मेदारी बाह्य परिस्थितियों पर न डालिए। बाह्य परिस्थितियाँ जीवन निर्माण में कुछ सहायता भले ही करें, पर उनका स्थान गौण है। असली शक्ति तो अपने पास ही है। शक्ति सम्राट तो हमीं हैं। विश्वास कीजिये कि परिस्थिति निर्माण की योग्यता आप में भरी हुई है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी आन्तरिक प्रतिभा के आधार पर ही अपने संसार का निर्माण करता है यदि बाह्य परिस्थितियों को ही सब कुछ मान लिया जाये तो दुखी और विपन्न परिस्थिति में उत्पन्न होने वाले बालक ईश्वर चन्द विद्यासागर, स्वामी रामतीर्थ, अब्राहीम लिंकन आदि साधारण व्यक्ति ही होते संसार के लोग उनका नाम भी न जानते। परन्तु वे परिस्थितियों से लड़े और उन्होंने उन पर विजय प्राप्त की। आदि कवि बाल्मीकि, कबीर, सूर, तुलसी आदि की बाह्य परिस्थितियां कोई अच्छी थोड़ी थी उनमें अचानक ही प्रतिभा का वह स्रोत फूट पड़ा जिनकी प्रशंसा करते हुए हम नहीं अघाते हैं। उस महाशक्ति का भण्डार तो उनके अंदर पहले से ही विद्यमान था केवल झकझोरने भर की आवश्यकता थी। साधारण सी घटनाओं ने उनकी प्रसुप्त चेतना शक्ति के द्वार खोल दिये और वे महापुरुष बन गये।

संसार तो दर्पण के समान है जहाँ अच्छी और बुरी प्रत्येक वस्तु हमें अपने मन के अनुकूल ही दिखाई पड़ती है। हमें जो दुनिया के दूसरे लोगों की अच्छाइयाँ या बुराइयाँ दिखाई पड़ रही हैं सब कुछ नहीं है वरन् वे तो अपने मन की भावनाओं की प्रतिच्छाया मात्र हैं। हमारी छिद्रान्वेषण और गुण ग्राहकता की प्रवृत्ति ही दूसरों की अच्छाइयों और बुराइयों को देखने का मुख्य कारण होती हैं। एक बार गुरु द्रोणाचार्य ने अपने शिष्य दुर्योधन और युधिष्ठिर दोनों को अच्छे और बुरे व्यक्ति ढूंढ़ लाने को कहा था। दिन भर इधर उधर भटकने पर भी दुर्योधन को कोई अच्छा व्यक्ति नहीं मिला और न युधिष्ठिर को कोई बुरा। दुर्योधन की दृष्टि में सब में कोई न कोई बुराई थी और युधिष्ठिर को दूसरों में अच्छाई या गुण ही गुण दिखाई दिये। अतः हमारे सामने जो कुछ भी अच्छी या बुरी परिस्थितियाँ आती हैं उनका मूल कारण हम स्वयं है। हमारा दृष्टि दोष ही उनको अनुकूल या प्रतिकूल समझने लगता है।

क्रोधी व्यक्ति को सारे संसार के लोग क्रोधी और चिड़चिड़े स्वभाव के दिखाई देते हैं। झगड़ालू और सनकी व्यक्तियों को अपने चारों ओर के सभी व्यक्ति सदैव लड़ते झगड़ते हुए दिखाई देते हैं। इसी प्रकार जो व्यक्ति निकम्मा और आलसी है उसे दुनिया में कोई काम ही करने को नहीं है। जो व्यक्ति शारीरिक रूप से अस्वस्थ है उसे सभी प्रकार के भोजन रुचिकर प्रतीत होते हैं। व्यभिचारी, लम्पट, चोर, झूठे, पागल, अन्यायी, अत्याचारी तथा बेईमान को भी अपनी दुनिया अलग बनाते हुए देखा जाता है। इसके अतिरिक्त ज्ञानी संत साधु उत्साही, साहसी, सेवाभावी, परोपकारी, आत्म विश्वासी लोगों की दुनिया ही अलग बस जाती है। जो संसार बुरे व्यक्तियों के लिए बुरा है वही अच्छे व्यक्तियों के लिए सद्गुण एवं सदाचार से भरा हुआ कर्मक्षेत्र बन जाता है संसार न तो किसी के लिए दुख का हेतु है और न किसी के लिए सुख का हेतु। वास्तव में वह तो कुछ है ही नहीं इसीलिए इसको असार-संसार कहा जाता है। अपनी मनःस्थिति ही संसार रूपी दर्पण में प्रतिबिंबित होने पर भिन्न भिन्न दिखाई पड़ती है।

सम्पूर्ण समस्याओं का निराकरण अपने पास ही है, हम दूसरों से जिस सहायता की अपेक्षा करते हैं उसकी पात्रता भी हमें अपने अंदर पैदा करनी चाहिए। आत्म निर्भरता तथा आत्मावलंबन का मार्ग छोड़ देने पर ही मनुष्य के अंदर दीनता की भावना उत्पन्न होने लगती है और वह बड़े दीन हीन वचन बोलने लगता है, ‘मैं क्या कर सकता हूँ? कोई मेरा साथ नहीं देता है ऐसी शिकायतें प्रायः वे लोग ही किया करते हैं जिनको अपने ऊपर विश्वास नहीं है। देवता, भाग्य, ग्रह, नक्षत्र, समय, काल, युग आदि को वे व्यर्थ ही कोसते हुए सुने जाते हैं।

भाग्य की रेखाएँ तो कर्म के आधार पर बनती और मिटती रहती हैं। भाग्य लिखते समय विधाता को सोचना पड़ता है कि अमुक व्यक्ति के भाग्य में क्या लिखा जाये? अपनी शक्तियों के सदुपयोग और दुरुपयोग के आधार पर भाग्य का लेखा जोखा तैयार होता है। यदि हमने अपने में सद्गुणों को अधिक जमा कर लिया है, तो भाग्य में भी उन्नति का लेख लिखा जायेगा और यदि दुर्गुणों को मूर्खताओं को बढ़ावा दिया गया है तो भाग्य की लिपि भी बदल जायेगी। यदि हमारे अंदर उत्साह, लगन, साहस, दृढ़ता, धैर्य, परिश्रम, कर्मठता आदि गुण विद्यमान हैं तो विश्वास मानिए कि हम अपने भाग्य की लिपि बदल डालेंगे। कल का किया गया कार्य ही तो आज का भाग्य बनता है। भाग्य पहले से लिखा हुआ नहीं होता है।

मनुष्य परमात्मा की सर्वोत्कृष्ट रचना है उसे इतनी क्षमता एवं योग्यता स्वभावतः ही प्राप्त हैं कि वह अपने लिए उपयोगी एवं अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण स्वयं कर ले। परमात्मा ने मनुष्य को दूसरे जीवों की तरह पराश्रित, अयोग्य, बुद्धिहीन एवं निर्बल नहीं बनाया है कि वह दूसरों की कृपा पर जीवित रहे। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। अपने लिए भली और बुरी परिस्थिति उत्पन्न करने का एकमात्र अधिकार केवल उसी को है। अतः हमें भूत प्रेत, देवी देवता, ग्रह नक्षत्र और भाग्य आदि का बहाना छोड़कर आत्म निर्भरता का पाठ सीखना चाहिए और अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए तभी हमारी आकाँक्षाएँ पूर्ण हो सकेंगी।

----***----


मंत्र विद्या का स्वरूप और उपयोग

स्वामी रामतीर्थ ने एक बार कहा था- ईश्वर बना जा सकता है उसे देखा या दिखाया नहीं जा सकता। सूक्ष्म तत्व के बारे में भी यही बात है। ईथर तत्व में शब्द प्रवाह के संचार को रेडियो यन्त्र अनुभव करा सकता है। पर “ईथर” को उसके असली रूप में देखा जा सकना सम्भव नहीं। गर्मी, सर्दी, सुख, दुःख की अनुभूति होती है उन्हें पदार्थों की तरह प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता है। मंत्र में उच्चारित शब्दावली मंत्र की मूल शक्ति नहीं वरन् उसको सजग करने का उपकरण है। किसी सोते को हाथ से झकझोर कर जगाया जा सकता है पर यह हाथ “जागृति” नहीं अधिक से अधिक उसे जागृति का निमित्त होने का श्रेय ही मिल सकता है। मंत्रोच्चार भी अंतरंग में और अन्तरिक्ष में भरी पड़ी अगणित चेतन शक्तियों में से कुछ को जागृत करने का एक निमित्त कारण भर है।

किस मंत्र से किस शक्ति को किस आधार पर जगाया जाय इसका संकेत हर मंत्र के साथ जुड़े हुए विनियोग में बताया जाता है। वैदिक और तान्त्रिक सभी मंत्रों का विनियोग होता है। आगम और निगम शास्त्रों में मंत्र विधान के साथ ही उसका उल्लेख रहता है। जप तो मूल मंत्र का ही किया जाता है पर उसे आरम्भ करते समय विनियोग को पढ़ लेना अथवा स्मरण कर लेना आवश्यक होता है। इससे मंत्र के स्वरूप और लक्ष्य के प्रति साधना काल में जागरुकता बनी रहती है और कदम सही दिशा में बढ़ता रहता है।

मंत्र विनियोग के पाँच अंग हैं 1-ऋषि 2-छंद 3-देवता 4-बीज 5- तत्व। इन्हीं से मिलकर मंत्र शक्ति सर्वांगपूर्ण बनती है। “ऋषि” तत्व का संकेत है- मार्गदर्शन गुरु ऐसा व्यक्ति जिसने उस मंत्र में पारंगतता प्राप्त की हो। सर्जरी, संगीत जैसे क्रियाकलाप अनुभवी शिक्षक ही सिखा सकता है। पुस्तकीय ज्ञान से नौकायन नहीं सीखा जा सकता, इसके लिए किसी मल्लाह का प्रत्यक्ष पथ प्रदर्शन चाहिए। चिकित्सा ग्रन्थ और औषधि भण्डार उपलब्ध रहने पर भी चिकित्सक की आवश्यकता रहती है। विभिन्न मनोभूमियों के कारण साधना पथिकों के मार्ग में भी कई प्रकार के उतार चढ़ाव आते हैं उस स्थिति में सही निर्देशन और उलझनों का समाधान केवल वही कर सकता है जो उस विषय में पारंगत हो। गुरु का यह कर्तव्य भी हो सकता है कि शिष्य को न केवल पग प्रदर्शन करे वरन् उसे अपनी शक्ति का अंश अनुदान देकर प्रगति पथ को सरल भी बनाये। अस्तु ऋषि का आश्रय मंत्र साधना की प्रथम सीढ़ी बताई गई है।

छन्द का अर्थ है-लय। काव्य में प्रयुक्त होने वाला पिंगल प्रक्रिया के आधार पर भी छन्दों का वर्गीकरण होता है, यहाँ उसका कोई प्रयोजन नहीं। मंत्र रचना को काव्य प्रक्रिया अनिवार्य नहीं है। हो भी तो उसके जानने न जानने से कुछ बनता बिगड़ता नहीं। यहाँ लय को ही छन्द समझा जाना चाहिए। किस स्वर में किस क्रम से किस उतार चढ़ाव के साथ मंत्रोच्चारण किया जाय यह एक स्वतन्त्र शास्त्र है। सितार में तार तो उतने ही होते हैं उंगलियाँ चलाने का क्रम भी हर वादन में चलता है पर बजाने वाले का कौशल तारों पर आघात करने के क्रम में हेर फेर करके विभिन्न राग रागनियों का ध्वनि प्रवाह उत्पन्न करता है। मानसिक, वाचिक, उपाँशु, उदात्त अनुदात्त, स्वरित ही नहीं मंत्रोच्चार के और भी भेद प्रभेद हैं। जिनके आधार पर उसी मंत्री द्वारा अनेक प्रकार की प्रतिक्रियायें उत्पन्न की जा सकती हैं।

ध्वनि तरंगों के कम्पन इस लय पर निर्भर हैं। साधना विज्ञान में इसे यति कहा जाता है। मंत्रों की एक यति सब के लिए उचित नहीं। व्यक्ति की स्थिति और उसकी आकाँक्षा को ध्यान में रखकर यति का लय का- निर्धारण करना पड़ता है। साधक को उचित है कि मंत्र साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व अपने लिए उपयुक्त छन्द की लय का निर्धारण कर ले।

विनियोग का तीसरा चरण है- देवता। देवता का अर्थ है-चेतना सागर में से अपने अभीष्ट शक्तिप्रवाह का चयन। आकाश में एक ही समय में अनेकों रेडियो स्टेशन बोलते रहते हैं हर एक की फ्रीक्वेन्सी अलग होती है। ऐसा न होता तो ब्रॉडकास्ट किये गये सभी शब्द मिलकर एक हो जाते। शब्द धाराओं की पृथकता और उनसे सम्बन्ध स्थापित करने के पृथक माध्यमों का उपयोग करके ही किसी रेडियो सेट के लिए यह सम्भव होता है कि अपनी पसन्द का रेडियो प्रोग्राम सुनें और अन्यत्र में चल रहे प्रोग्रामों को बोलने से रोक दें। निखिल ब्रह्माण्ड में ब्रह्म चेतना की अनेक धारायें समुद्री लहरों की तरह अपना पृथक अस्तित्व भी लेकर आती हैं। भूमि एक ही होने पर भी परतें अलग अलग तरह की निकलती हैं। समुद्रीय अगाध जल में पानी की परतें तथा असीम आकाश में वायु से लेकर किरणों तक की अनेक परतें होती हैं इसी प्रकार ब्रह्मचेतना के अनेक प्रयोजनों के लिए उद्भूत अनेक शक्ति तरंगें निखिल ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होती रहती हैं। उनके स्वरूप और प्रयोजनों को ध्यान में रखते हुए उन्हें देवता कहा जाता है।

साकार उपासना पक्ष देवताओं की अलंकारिक प्रतिमा भी बना लेता है और निराकार पक्ष प्रकाश किरणों के रूप में उसको पकड़ता है। सूर्य की सात रंग की किरणों में से हम जिसे चाहें उसे रंगीन शीशे के माध्यम से उपलब्ध कर सकते हैं। एक्सरे मशीन अल्ट्रा वायलेट उपकरण आकाश में से अपनी अभीष्ट किरणों को ही प्रयुक्त करते हैं। हंस दूध पीता है, पानी छोड़ देता है। इसी प्रकार किस मंत्र के लिए ब्रह्म चेतना की किस दिव्य तरंग का प्रयोग किया जाये उसके लिए क्रियायें इसी प्रयोजन के लिए होती हैं। निराकारी साधक ध्यान द्वारा उस शक्ति को अपने अंग प्रत्यंगों में तथा समीपवर्ती वातावरण में ओत प्रोत होने की भावना करते हैं। किसके लिए देव सम्पर्क का क्या तरीका ठीक रहेगा यह निश्चय करके ही मंत्र साधक को प्रगति पथ पर अग्रसर होना होता है। दबी हुई प्रसुप्त क्षमता को प्रखर करने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। यन्त्रों को चलाने के लिए ईंधन चाहिए। हाथ या पैर से चलने वाले यन्त्रों के लिए न सही उन्हें चलाने वाले हाथ पैरों को काम करते रहने के लिए ऊर्जा की जरूरत होती है। यह तापमान जुटाने पर ही यन्त्र काम करते हैं। मंत्रों की सफलता भी इसी ऊर्जा उत्पादन पर निर्भर है। साधना विधान का सारा कलेवर इसी आधार पर खड़ा किया गया है। आयुर्वेद में भी नाड़ी शोधन के लिए वमन, विरेचन, स्नेहन, स्वेदन, नस्व यह पंच कर्म शरीर शोधन के लिए हैं। मंत्र साधन में व्यक्तित्व के परिष्कार के अतिरिक्त पाँच आधार ऋषि, छन्द, देवता, बीज और तत्व हैं। जो इन सब साधनों को जुटाकर मंत्र साधन कर सके उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति होकर ही रहती है।

मंत्र योग साधना का एक ऐसा शब्द और विज्ञान है कि उसका उच्चारण करते ही किसी चमत्कारिक शक्ति का बोध होता है। ऐसी धारणा है कि प्राचीन काल के योगी, ऋषि और तत्वदर्शी महापुरुषों ने मंत्रबल से पृथ्वी, देवलोक और ब्रह्माण्ड की अनन्त शक्तियों पर विजय पाई थी। मंत्र शक्ति के प्रभाव से वे इतने समर्थ बन गये थे कि इच्छानुसार किसी भी पदार्थ का हस्तांतरण शक्ति को पदार्थ और पदार्थ को शक्ति में बदल देते थे। शाप और वरदान मंत्र का ही प्रभाव माना जाता है। एक क्षण में किसी का रोग अच्छा कर देना एक पल में करोड़ों मील दूर की बात जान लेना एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र की जानकारी और शरीर की 72 हजार नाड़ियों के एक एक जोड़ की जानकारी तक मंत्र की ही अलौकिक शक्ति थी। इसलिए भारतीय तत्वदर्शन में मंत्र शक्ति पर जितनी शोधें हुई हैं उतनी और किसी पर भी नहीं। मंत्रों के आविष्कार होने के कारण ही ऋषि मंत्र दृष्टा कहलाते थे। वेद और कुछ नहीं एक प्रकार के मंत्र विज्ञान हैं जिनमें विराट ब्रह्माण्ड की उन अलौकिक, सूक्ष्म और चेतन सत्ताओं और शक्तियों तक से संबंध स्थापित करने के गूढ़ रहस्य दिए हुए हैं, जिनके सम्बन्ध में विज्ञान अभी “क,ख,ग” भी नहीं जानता।

मंत्र का सीधा सम्बन्ध उच्चारण या ध्वनि से है। इसलिए इसे “ध्वनि विज्ञान” भी कह सकते हैं। अब तक इस दिशा में जो वैज्ञानिक अनुसंधान हुए और निष्कर्ष निकले हैं वह यह बताते हैं कि सामान्य भारतीय मंत्र शक्ति पर भले ही विश्वास न करें पर वैज्ञानिक अब उसी दिशा में अग्रसर हो रहे हैं। वह समय समीप ही है जब ध्वनि विज्ञान की उन्नति ऋषियों जैसे ही कौतूहल वर्द्धक कार्य करने लगेगी। उदाहरण के लिए “ट्रान्स्डूयसर” यंत्र से सूक्ष्म से सूक्ष्म आपरेशन किया जा सकता है। वह शब्द की कर्णातीत शक्ति का फल है। प्रसिद्ध भौतिक शास्त्री डॉ0 फ्रिस्टलाव ने ‘अलट्रासोनोरेटर’ नामक एक ऐसा यंत्र तैयार किया है जो दो रासायनिक द्रव्यों को थोड़ी देर में मिला सकता है। इस पद्धति में एक “खे” का उपयोग किया जाता है। कर्णातीत ध्वनि डॉ0 खे को प्रभावित करती है। खा इतनी तीव्रता से कम्पन करता है कि भारी मात्रा में भरा हुआ जल कड़ाही में खौलते पानी की तरह मन्थन करने लगता है।

मंत्रों में चार शक्तियाँ मानी गई है 1-प्रामाण्य शक्ति 2-फल प्रदान शक्ति 3-बहुलीकरण शक्ति 4-आयातयामता शक्ति। इसका विवेचन महर्षि जैमिनी ने पूर्व मीमाँसा में किया है। उनके कथानुसार मंत्रों की प्रामाण्य शक्ति वह है जिसके अनुसार शिक्षा सम्बोधन आदेश का समावेश रहता है। इसे शब्दार्थों से सम्बन्धित कह सकते हैं।

कुण्ड समिध, पात्र पीठ, आज्य चरु, हवि, पीठ आदि को अभिमन्त्रित करके उनके सूक्ष्म प्राणों को प्रखर करने का विधान मंत्रोच्चार कर्मकाण्ड न्यास ऋत्विजों का मनोयोग, ब्रह्मचर्य तप, आहार आदि विधि विधान से मंत्र की फल दायिनी शक्ति सजग होती है। सकाम कर्मों में मंत्र की यही शक्ति विभिन्न क्रिया कृत्यों के सहारे सजग होती है और अभीष्ट प्रयोजन दूर करती है।

तीसरी शक्ति है ‘बहुलीकरण’ अर्थात् थोड़े को बहुत बनाना। यज्ञ में होमा हुआ जरा सा पदार्थ वायुभूत होकर समस्त विश्व में फैल जाता है। पानी के ऊपर जरा सा तेल डाल देने से पानी की सारी सतह पर फैल जाता है। तनिक सा विष सारे शरीर में फैल जाता है। उसी प्रकार साधन का शरीर मंत्रोच्चार एवं साधन में काम आने वाले अंग जरा से होते हैं। पर उनके घर्षण से उत्पन्न शक्ति दियासलाई से निकलने वाली चिनगारी की तरह नगण्य होते हुए भी दावानल बन जाने की सामर्थ्य से ओत प्रोत रहती है। एक व्यक्ति की मंत्र साधना अनेक व्यक्तियों को तथा पदार्थों को परमाणु जीवाणुओं को प्रभावित करती है तो यह बहुलीकरण शक्ति ही काम कर रही होती है।

चौथी “आयातयामता” शक्ति किसी विशेष क्षमता सम्पन्न व्युतुत्पन्नमति, मेधावी सक्षम व्यक्ति द्वारा विशेष स्थान पर विशेष व्यक्ति की सहायता से विशेष उपकरणों के सहारे विशेष विधि विधान के साथ मंत्रोपासना करने पर विशेष शक्ति उत्पन्न होती है। विश्वामित्र और परशुराम ने गायत्री मंत्र की साधना विशेष प्रयोजन के लिए विशेष विधि विधानों के साथ की थी और उससे उन्होंने अभीष्ट परिणाम भी प्राप्त किये। दशरथ जी का पुत्रेष्टि यज्ञ वशिष्ठ जी पूरा न करा सके तब शृंगी ऋषि ने उसे सम्पन्न कराया यह शृंगी ऋषि की आयातयामता शक्ति ही थी।

कौत्स मुनि ने मंत्रों को अनर्थक माना है। अनर्थक का अर्थ यह है कि उसके अर्थ को नहीं ध्वनि प्रवाह को शब्द गुँथन को महत्व दिया जाना चाहिए। ह्रीं, श्रीं, क्लीं, ऐं आदि बीज मंत्रों के अर्थ से नहीं ध्वनि से ही प्रयोजन सिद्ध होता है। नैषध चरित्र के 13वें सर्ग में उसके लेखक ने इस रहस्य का और भी स्पष्ट उद्घाटन किया गया है। संगीत का शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य व जो असाधारण प्रभाव पड़ता है उससे समस्त विज्ञान जगत परिचित है। एक नियत गति से शीशे के गिलास के पास ध्वनि की तो वह टूट जायेगा। पुलों चलते हुए सैनिकों को कदम मिलाकर चलने की ध्वनि नहीं करने दी जाती। उस तालबद्ध ध्वनि से पुल गिर सकता है। इन्डेन में “स्टोन हैब्ज” के पुराने अवशेष मध्यम स्वर बजने पर काँपने लगते हैं। इसलिए वहाँ न केवल बजाना वरन् गाना भी निषिद्ध है क्योंकि तालबद्धता उन अवरोधों को गिरा सकती है। इसी ध्वनि विज्ञान के आधार पर मंत्रों की रचना हुई है। उनके अर्थों का उतना महत्व नहीं, इसी से कौत्स मुनि ने उन्हें “अनर्थक” बताया है।

शब्द शक्ति का स्फोट मंत्र शक्ति की रहस्यमय प्रक्रिया है। अणु विस्फोट से उत्पन्न होने वाली भयावह शक्ति की जानकारी हम सभी को है। शब्द की एक शक्ति सत्ता है। उसके कम्पन भी चिरन्तन घटकों के सम्मिश्रण से बनते हैं। इस शब्द कंपन घटकों का विस्फोट भी अणु विखण्डन की तरह ही हो सकता है। मंत्र योग साधना के उपचारों के पीछे लगभग वैसी ही विधि व्यवस्था रहती है। मंत्रों की शब्द रचना का गठन तत्वदर्शी मनीषी तथा दिव्यदृष्टा मनीषियों ने इस प्रकार किया है कि उसका उपात्मक, होमात्मक तथा दूसरे तप साधनों तथा कर्मकाण्डों के सहारे अभीष्ट स्फोट किया जा सके। वर्तमान बोलचाल में विस्फोट शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है लगभग उसी में संस्कृत में स्फोट का भी प्रयोग किया जाता है। मंत्राराधन वस्तुतः शब्द शक्ति का विस्फोट ही है।

शब्द स्फोट से ऐसी ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं जिन्हें कानों की श्रवण शक्ति से बाहर की कहा जा सकता है। शब्द आकाश का विषय है। इसलिए मान्त्रिक का कार्यक्षेत्र आकाश तत्व रहता है। योगी वायु उपासक है। उसे प्राण शक्ति का संचय वायु के माध्यम से करना पड़ता है। इस दृष्टि से मान्त्रिक को योगी से भी वरिष्ठ कहा जा सकता है। सच्चा मांत्रिक योगी से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही शक्तिशाली हो सकता है।

मन्त्राराधना में शब्द शक्ति का विस्फोट होता है विस्फोट में गुणन शक्ति है। मंत्र में सर्वप्रथम देवस्थापन की सघन निष्ठा उत्पन्न की जाती है। यह भाव चुम्बकत्व है। श्रद्धा शक्ति के उद्भव का प्रथम चरण है। इस आरम्भिक उपार्जन का शक्ति गुणन करती चली जाती है और छोटा सा बीज विशाल वृक्ष बन जाता है। विचार का चुम्बकत्व सर्वविदित है। इष्टदेव की- मंत्र अधिपति की शक्ति एवं विशेषताओं का स्तवन, पूजन के साथ स्मरण किया जाता है और अपने विश्वास में उसमें सर्वशक्ति सत्ता एवं अनुग्रह पर विश्वास जमाया जाता है। निर्धारित कर्मकाण्ड विधिविधान के द्वारा तथा तप साधना कष्टसाध्य तितीक्षा के द्वारा मंत्र की गुह्य शक्ति के करत लगत हो जाने का भरोसा दीर्घकालीन साधना द्वारा साधक के मन क्षेत्र में परिपक्व बनता है। यह सब निष्ठायें मिलकर मंत्र की भाव प्रक्रिया को परिपूर्ण कुम्बकत्व से परिपूर्ण कर देती है।

मंत्र से दो वृत्त बनते हैं एक को भाववृत्त और दूसरे को ध्वनि वृत्त कह सकते हैं। लगातार की गति अन्ततः एक गोलाई में घूमने लगती है। ग्रह नक्षत्रों का अपने अपने अयन वृत्त पर घूमने लगना इसी तथ्य से सम्भव हो सका है कि गति क्रमशः गोलाई में मुड़ती चली जाती है।

तंत्र तप में नियत शब्दों का निर्धारित क्रम से देर तक निरन्तर उच्चारण करना पड़ता है। जप यही तो है। इस गति प्रवाह के दो आधार हैं। एक भाव और दूसरा शब्द। मंत्र के अंतराल में सन्निहित भावना का नियत निर्धारित प्रवाह एक भाववृत्त बना लेता है। वह इतना प्रचण्ड होता है कि साधक के व्यक्तित्व को ही पकड़ और जकड़कर उसे अपनी ढलान में ढाल ले। उच्चारण से उत्पन्न ध्वनिवृत्त भी ऐसा ही प्रचण्ड होता है कि उसका स्फोट एक घेरा डालकर उच्चारणकर्ता को अपने घेरे में कस ले। भाववृत्त अंतरंग वृत्तियों को शब्दवृत्त बहिरंग प्रवृत्तियों पर इस प्रकार आच्छादित हो जाता है कि मनुष्य के अभीष्ट स्तर को मोड़ा मरोड़ा या ढाला जा सके।


दीनबन्धु ऐंड्रूज (kahani)

उन दिनों दीनबन्धु ऐंड्रूज शान्तिनिकेतन में रहते थे। एक दिन एक पादरी प्राध्यापक उनसे मिलने आये। वार्तालाप के बीच पादरी ने पूछा-क्या यहाँ कोई गिरजाघर है। ऐंड्रूज के मना करने पर उनने कहा- तब आपको रविवार की प्रार्थना करने में बड़ी कठिनाई पड़ती होगी। रविवार का दिन था। उस दिन विद्यार्थी वर्ग कुछ विशेष धर्म चर्चा करने आ गया। दीन बन्धु उसी ज्ञान विनोद में लगे रहे॥

जब पादरी चलने लगे तो ऐंड्रूज ने कहा- मेरी असली प्रार्थना सद्ज्ञान संवर्धन की सेवा साधना में लगे रहना ही है। रविवार की पूजा भी मैं इसी तरह पूरी कर लेता हूँ।

----***----


जीवन संग्राम में जूझें और विजय प्राप्त करें।

जीवन एक खुला संघर्ष है। जो अपनी विशिष्टता सिद्ध करता है, वह जीवित रहता है और जो पिछड़ता है सो नष्ट हो जाता है। माली अपने बगीचे में दो प्रकार की नीति अपनाता है। उपयोगी पौधों को खाद−पानी देता, निराई गुड़ाई और रखवाली करता है। उन्हीं के समीप उगे हुए अनुपयोगी खर पतवार को वही माली निर्दयता पूर्वक उखाड़ कर फेंक देता है। देखने में सभी पौधे हरे भरे दीखते हैं पर माली की आँखें उपयोगी अनुपयोगी की परख करती हैं और दुरंगी नीति अपनाकर एक को प्रश्रय देती है और दूसरे को निर्दयतापूर्वक उखाड़ देती है। इस संसार की संरचना इसी आधार पर हुई है। उपयोगी वस्तुएं इस संसार की शोभा बढ़ाती रहें और कूड़ा करकट गंदगी न उत्पन्न करने पायें इस दृष्टि से उसका मालिक परमेश्वर भी इस दुहरी नीति पर चलता है। एक ओर वह सुयोग्य व्यक्तित्वों का उदारतापूर्वक पोषण करता है दूसरी ओर सड़े गले जीवित मृतकों को कुरूपता न फैलाने देने का भी ध्यान रखता है और उन्हें हटाने, मिटाने में भी शिथिलता नहीं बरतता।

अपनी उपयोगिता प्रमाणित करने के लिए हर व्यक्ति को अपने पुरुषार्थ का परिचय देना पड़ता है। प्रामाणिकता सिद्ध किये बिना महत्वपूर्ण सफलताओं के क्षेत्र में किसी को भी प्रवेश नहीं मिलता। यहाँ आराम की जिन्दगी जीने की कोई गुंजाइश नहीं है। रुका हुआ पानी सड़ जाता है, पान के पत्तों की हेरा फेरी न हो और चैन से जहाँ से तहाँ बैठे रहें तो उनकी भी दुर्गति होगी। शरीर इसलिए जीवित है कि इसमें रक्त संचार, आकुँचन प्रकुँचन, श्वास प्रश्वास जैसी क्रियाशीलता निरन्तर जारी रहती है। आहार ग्रहण करना और मल विसर्जन यह दोनों क्रियाएं जब तक सन्तुलित हैं तभी तक जीवन बना रहेगा। शक्ति सम्पत्ति के उपयोगी तत्वों का उपार्जन और भीतरी बाहरी अवाँछनीयताओं का विसर्जन यह दोनों बातें परस्पर विरोधी लगती हैं पर हैं अन्योन्याश्रित। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं रहेगा। हमें आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उत्पादक पुरुषार्थ करना होता है और चारों ओर से सहज स्वभाव घिरती आने वाली प्रतिकूलताओं को निरस्त करने के लिए उनसे लोहा भी लेना पड़ता है। इन दुहरी गतिविधियों को अपनाये बिना किसी का किसी प्रकार गुजारा नहीं।

चैन की परिभाषा यदि बिना कठिनाई और बिना संघर्ष के अभीष्ट सुविधाओं को प्राप्त करना हो तो वह कल्पना तक ही सीमित रहेगा, व्यावहारिक जीवन में उसकी संभावना नहीं ही है। मौज करना अच्छा तो है पर तब कि उसके साधन इकट्ठे करने के लिए प्रबल पुरुषार्थ पूरा कर लिया हो। श्रम के बाद ही आराम का आनन्द मिलता है। भूख न लगे तो स्वादिष्ट भोजन का क्या महत्व? रात न होती तो कोई दिन का महत्व ही न समझ पाता। कपड़ा ताने बाने के दो दिशाओं में चलने वाले धागों से बुना जाता है। एक ही दिशा में चलने वाले धागे चलें तो कपड़ा तैयार होने की कोई सम्भावना नहीं। नमक और शक्कर के परस्पर विरोधी स्वाद मिलकर ही भोजन का आनन्द देते हैं। चैन का आनन्द केवल प्रबल पुरुषार्थी ही उठा सकता है अन्यथा मौज करने की आकाँक्षा निष्क्रिय रहने के लिए प्रेरित करेगी और उसे अपनाया तो उपयोगिता खोकर सड़न के गर्त में गिरना पड़ेगा। मौज की छुट्टी पानी हो तो मृत्यु की गोद में शान्तिपूर्वक सोने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं जीवित रहना है तो संघर्ष की नीति अपनानी पड़ेगी। जीवनोपयोगी उपार्जन और सुरक्षा संरक्षण के साधन यह दोनों ही प्रत्येक जीवन्त व्यक्ति के लिए नितान्त आवश्यक हैं। उनकी पूर्ति प्रबल पुरुषार्थ के बिना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है। जीवित रहने के लिए संघर्ष आवश्यक है, भले ही यह कष्ट कारक और अरुचिकर हो पर इससे बच निकलने का कोई भी मार्ग नहीं है।

किसी पर अनीतिपूर्वक आक्रमण नहीं ही किया जाना चाहिए। दूसरे के शोषण उत्पीड़न के लिए उद्दण्ड उच्छृंखलता का अहंकारी प्रदर्शन करने के लिए खड़े किये गये युद्ध संघर्ष, निश्चित रूप से निन्दनीय हैं, उन आसुरी कुकृत्यों की जितनी भर्त्सना की जाय उतनी ही कम है। पर साथ ही यह नहीं भूलना चाहिए कि यहाँ दुष्टता भी कम नहीं है। देवत्व जितनी ही असुरता भी इस संसार में भरी पड़ी है। इसलिए जहाँ सत्प्रवृत्तियों का पोषण करने की आवश्यकता है वहाँ दुष्प्रवृत्तियों से आत्म रक्षा के लिए जूझना भी अनिवार्य है। हम आक्रमण न बनें पर साथ ही आत्मरक्षा के लिए प्रखरता का परिचय देने में भी शिथिलता न बरतें।

अवाँछनीय तत्वों की इस संसार में कमी नहीं। उनसे जूझना इसलिए आवश्यक है कि हमारी प्रतिभा जागरुकता, सतर्कता, साहसिकता जैसी विभूतियों पर धार रखी जाती रहे और वे अपनी प्रखरता को जीवंत बनाये रह सकें। अखाड़े में डंबल, मुद्गर जैसे भारी उपकरण उठाने पटकने के लिए नहीं कुश्ती की उठक-पटक का क्रम न चले, डंड बैठक की कठोर प्रक्रिया न अपनाई जाय तो हमारे सहारे कोई बलिष्ठ पहलवान न बन सकेगा। कुम्हार की चोटें खाकर ही मामूली सी मिट्टी उपयोगी घड़ा बनती है। लुहार और ठठेरे दनादन घन बजाकर ही अनगढ़ धातुओं के बर्तन बनाते हैं। सुनार द्वारा सुन्दर आभूषण बनाने का श्रेय उसकी तपाने पीटने की कुशलता को ही दिया जाता है। छैनी हथौड़ी को चोट खाये बिना पत्थर से देव प्रतिमा कहाँ बनती है। धोबी द्वारा मैले कपड़ों को चमकते दमकते बना देने का चमत्कार पीटने की प्रक्रिया द्वारा ही सम्भव हो पाता है वैद्यों की कुटाई, घिसाई, पिसाई और जलाने तपाने की विधि व्यवस्था ही मामूली सी वनस्पतियों और धातुओं को बहुमूल्य रसायनों के रूप में परिणत करती है। जो इस प्रकृति रहस्य को समझते हैं वे जानते हैं कि प्रबल पुरुषार्थ का कठिनाइयों से जूझने का कितना महत्व है। आरम्भ में वह सब कष्टकर प्रतीत होता है, पर अग्नि परीक्षा में होकर गुजरे बिना प्रामाणिकता सिद्ध भी कहाँ होती है? और उसके बिना उपयुक्त स्थान एवं मान भी किसको मिलता है।

एकाँकी सज्जनता अधूरी है उसके साथ तेजस्विता भी जुड़ी रहनी चाहिए। भारत में बौद्ध धर्म तत्कालीन दुष्प्रवृत्तियों से जूझने के लिए प्रादुर्भूत हुआ था। पीछे लोगों ने उसे योग अहिंसा जैसी विधायक प्रवृत्तियों तक सीमित कर लिया। फलतः प्रखरता घटती गई। वस्तुस्थिति का पता पड़ौसी आततायियों को लगा तो वे चढ़ दौड़े और देखते देखते थोड़े से आक्रमणकारियों ने इतना बड़ा देश रौंद डाला। अपनी दुर्बलता ही थी जिसके कारण हमें नृशंस उत्पीड़न भरी गुलामी एक हजार वर्ष तक सहनी पड़ी। समय रहते सर्वांगपूर्ण नीति को अपनाये रखा गया होता तो इतिहास के पृष्ठों पर कलह कालिमा क्यों अंकित होती। एक हाथ में माला एक हाथ में भाला वाला गुरु गोविन्द सिंह का मंत्र मानवी तत्वज्ञान से परिपूर्ण है। समर्थ गुरु रामदास से लेकर चाणक्य वशिष्ठ आदि महामनीषियों की धर्मशिक्षा में सज्जनता और संघर्ष शीलता के लिए समान स्थान मिलता रहा है। द्रोणाचार्य परशुराम जैसी ब्रह्मज्ञानी शस्त्र और शास्त्र को समान रूप से महत्व देते रहे हैं। उस प्राचीन धर्म प्रक्रिया को सिक्ख धर्म के रूप में नया संस्करण बनाकर प्रस्तुत किया गया है। ब्राह्मण और क्षत्रिय धर्म का समन्वय ही तेजस्वी अध्यात्म का रूप प्रस्तुत करता है। महात्मा गाँधी हमें अभी कल परसों तेजस्वी अहिंसा का व्यावहारिक रूप सत्याग्रह तत्व ज्ञान के रूप में सिखाकर गये हैं, उन्होंने धर्मनिष्ठा और कायरता को एक जैसी लगने पर भी उन्हें परस्पर विरोधी बताया था और ब्रह्मज्ञान के साथ तेजस्विता अपनाने का भी पाठ पढ़ाया था।

संसार में फैली हुई अवाँछनीयताएँ हमारे शौर्य, साहस, पुरुषार्थ एवं कौशल को चुनौती देने के लिए हैं। रोग न रहे तो डॉक्टर की क्या उपयोगिता? पाप न हो तो धर्म प्रचारकों की क्या जरूरत? दरिद्र न होता हों तो दानी बनने का श्रेय किसे मिलेगा? संसार में फैली हुई बुराइयों को देखकर जिस तिस पर दोषारोपण करने मात्र से काम न चलेगा। उन्हें हटाने मिटाने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करते हुए हमें अनुकरणीय परम्पराओं की स्थापना करनी चाहिए। अनीति के अनौचित्य के निराकरण में प्रचण्ड प्रयत्न करने पड़ते हैं, कष्ट और आघात सहने पड़ते हैं, शौर्य साहस का परिचय देना पड़ता है। इस दृष्टि से उदात्त आत्माओं के लिए वे अवाँछनीयताएँ भी भावनात्मक प्रगति का आधार बनती हैं। फैली हुई कुरूपता और अवाँछनीयता से यदि हम डरने घबराने न लगें और उन्हें निरस्त करने के लिए अपनी प्रखरता की कसौटी पर चढ़ा दें तो उसका भी लाभ उठाया जा सकता है। विष से भी अमृत बना लेना रासायनिक कुशलता है। संसार में फैली हुई अवाँछनीयताओं को अपने लिए चुनौती माना जाय और लड़कर उन्हें परास्त करने का पुरुषार्थ जुटाया जाय तो उससे भी देव परम्पराओं को यशस्वी होने का अवसर मिल सकता है और साधारण में सृजनात्मक साहस बढ़ जाता है।

अनीति में- आतंकवादियों में प्रकृतितः कोई दम नहीं होता। चोर के पैर नहीं होते, मालिक के करवट बदलने और खाँस देने भर से वह भाग खड़ा होता है। गुण्डा तत्व तो इसलिए पनपते हैं कि सज्जनों में तेजस्विता और संगठित प्रतिरोध शक्ति का अभाव होता है। जटायु जैसी अनीति से संघर्ष करने की नीति यदि सज्जनता के साथ जुड़ जाय तो फिर देखते देखते उन आतंकवादियों का उन्मूलन हो जायगा जो मुट्ठी भर होते हुए भी सारे समाज को डराते और मनमानी करते रहते हैं। असल में गुण्डा तत्वों द्वारा समाज में फैले हुए अनाचार का असली दोषी इन तथाकथित सज्जनों को भी ठहराया जाना चाहिए क्योंकि उन्हीं की कायरता एवं उपेक्षा का खाद पानी पाकर यह अपराधी तत्व अल्प संख्यक होते हुए भी बहुसंख्यक शान्त जनता पर छाये रहते हैं। अपने ऊपर बीतने पर जिस प्रकार आक्रमणकारियों से निपटने की बात सूझती है वैसी ही जागरुकता यदि दूसरों पर बीतने पर रखी जाय तो इतने भर से अवाँछनीय आतंकवादिता को जड़ मूल से उखाड़ा जा सकता है।

प्रगति के लिए रचनात्मक, उत्पादक पुरुषार्थ की आवश्यकता है और आसुरी आक्रान्ताओं से निपटने के लिए प्रबल पराक्रम की । दोनों को मिलाकर जो तेजस्विता उभरती है उसी को शौर्य साहस कहते हैं। इसी विशेषता से सम्पन्न लोगों को मनस्वी, ओजस्वी, तेजस्वी प्रतिभावान कहते हैं। यह आन्तरिक विशेषता जिस भी दिशा में चल पड़े उसी में चमत्कार उत्पन्न करती है। यदि वह अनाचारी असुरता पर उतर जावे तो मनुष्य को दुर्दान्त दस्यु और नृशंस आतंकवादी बना देती है। यदि यह विशेषता संपत्तिवान बनने के लिए चल पड़े तो धनी, विद्वान, कलाकार, नेता, विजेता आदि बनाये बिना नहीं रहती। छोटी स्थिति में उत्पन्न हुए लोग कई बार आश्चर्यजनक भौतिक प्रगति करते और सुसम्पन्न बने देखे गये हैं यह इसी साहसिक प्रतिभा का चमत्कार है। यही प्रखरता यदि सन्मार्गगामी बन जाय तो एक से एक बढ़कर त्याग बलिदानों का- आदर्शवादी क्रियाकलाप का आधार विनिर्मित करती चली जाती है महामानवों की अन्तःस्फूर्ति सन्मार्ग का अवलम्बन करती है वे अविस्मरणीय, अभिनन्दनीय युग पुरुषों की पंक्ति में जा बैठते हैं। योगी, तपस्वी, सिद्ध पुरुष, तत्वज्ञानी इसी प्रकार के दुस्साहसी होते हैं।

संसार की रीति-नीति बड़ी विचित्र है। यहाँ अंध मान्यताओं, भ्रष्ट परम्पराओं और अवाँछनीय गतिविधियों का बोलबाला है। अधिकाँश मनुष्यों का चिन्तन एवं कर्तृत्व औचित्य और विवेक की कसौटी पर कसने से खोटा सिद्ध होता है। दुर्बल मनःस्थिति के लोग उसी लकीर के फकीर बनते हैं जिस पर अंधी भेड़ों का बहुमत भटकता-भटकाता है। ओछे लोगों की सलाह ओछी ही हो सकती है। उनकी अभिरुचि एवं मान्यताओं में पिछड़ापन ही अधिक मात्रा में भरा रहता है। साहसी लोगों में अपनी मौलिकता होती है वे केवल आत्मा का, परमात्मा का, नीति का, विवेक का अनुशासन मानते हैं और यह नहीं देखते कि लोग क्या कहते और क्या करते हैं? वे अपनी राह आप बनाते हैं और वह औचित्य एवं आदर्शवाद पर आधारित होती है। उनमें अपना निज का साहस इतना होता है कि प्रतिगामी मान्यताएँ चाहे वे स्वजन सम्बन्धियों की- तथाकथित बड़े आदमियों की ही क्यों न हों, झुठला सकें। ऐसे लोग प्रायः व्यंग उपहास के निशाना बनते हैं पर उसमें उन्हें बालकों के साथ हँसने हँसाने जैसा विनोद ही प्राप्त होता है। उनकी मौलिकता कालान्तर में दूसरों को प्रभावित करती है और विरोधियों को अनुगामी बनाती है। औचित्य एवं साहस की सम्मिश्रित शक्ति अपार है। उसे अपनाकर मनुष्य भौतिक और आत्मिक प्रगति के अभीष्ट लक्ष्य पर अधिकाधिक दूरी तक बढ़ता चला जाता है।

----***----


स्थूल में ही न उलझे रहें, सूक्ष्म की शक्ति भी समझें।

स्थूल बुद्धि द्वारा विस्तार का महत्व समझा जाता है “जो जितना बड़ा सो उतना श्रेष्ठ” यही मान्यता जन साधारण की पाई जाती है। स्थूल के बाटों से स्थूल वजन ही तोला जा सकता है और जो भारी है, विस्तृत है बड़ा है उसी को महत्व मिल सकता है। पर सूक्ष्म दृष्टि बारीकी में उतरती है तो प्रतीत होता है कि जो महत्वपूर्ण है जो रहस्यमय है वह सूक्ष्म में सन्निहित है स्थूल तो उसका कलेवर मात्र है।

विस्तार की दृष्टि से पहाड़ ऊँचा है और रेगिस्तान विस्तृत है पर एक मधुर निर्झर की तुलना में उन दोनों का महत्व कम है। भौतिक वैभव को- ठाट बाट को देखकर स्थूल बुद्धि चकित और भ्रमित रह जाती है और बड़प्पन को मान देने लगती है पर जहाँ बारीकी को समझा देखा जाता होगा वहाँ गुणों को महत्व दिया जायगा। कृष्ण ने एक ओर अपनी सेना दूसरी ओर स्वयं को रखा था और दुर्योधन तथा अर्जुन से पूछा था कि उन दोनों में से वे अपनी पसन्दगी का एक पक्ष चुन लें। दुर्योधन ने सेना का विस्तार देखा और उसी को ले लिया। अर्जुन ने गुण का महत्व समझा और एकाकी कृष्ण को अपने पक्ष में लेकर संतोष कर लिया। सर्वविदित है कि सैन्य समूह की तुलना में अकेले कृष्ण का उत्कृष्ट व्यक्तित्व अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

स्थूल साधनों के लिए लालायित रहने वाले सभी हैं पर ऐसे विरले हैं जो सूक्ष्म की शक्ति को समझते हैं और गहराई तक प्रवेश करके उसे प्राप्त करने की चेष्टा करते हैं जिसके फलस्वरूप यह विस्तृत विस्तार गतिशील हो रहा है। भौतिक विज्ञान भी अध्यात्म विज्ञान की तरह ही अब इस निष्कर्ष पर पहुँच रहा है कि शक्ति का स्रोत सूक्ष्मता की परतों के साथ जुड़ा हुआ है। जितनी गहराई में उतरा जायगा, सूक्ष्म सत्ता को जितना खोदा कुरेदा जायगा उतना ही बड़ा शक्ति भण्डार हाथ लगता जायगा। एक बड़ी सी चट्टान का परमाणु की नगण्य सी इकाई के विस्फोट से उत्पन्न शक्ति की तुलना में कुछ भी महत्व नहीं है।

एक पाव दूध में एक ग्रेन का छह लाखवाँ अंश जितना लोहा होता है। पर इतने से ही बच्चे के शरीर की लौह आवश्यकता पूरी हो जाती है। पानी में हजारवें भाग के रूप में घुला दालों का ग्लटिन हाइड्रोक्लोरिक एसिड आसानी से पच जाता है। पर जब वही अधिक मात्रा में होता है तो निरर्थक चला जाता है।

हमारे शरीर के जीवाणु ही छोटे हैं। उनकी शोषण शक्ति भी उनके कलेवर के अनुरूप ही स्वल्प है। उनमें प्रवेश कर सकने वाले पदार्थ इतने छोटे होने चाहिए जो इन शरीरगत जीवाणुओं, कोशाओं के भवन में आसानी से प्रवेश पा सकें। आहार में प्राकृतिक रूप से हर जीवनोपयोगी पदार्थ बहुत ही छोटे अंशों में विद्यमान रहता है। इसलिए वे पचकर शरीर में घुल मिल जाते हैं। पर यदि उन्हें सघन रूप से लिया जाय तो उसके मोटे कण चूर्ण विचूर्ण होने में बहुत समय और श्रम लेंगे और तब कहीं कठिनाई से थोड़ी मात्रा में हजम होंगे। यही कारण है कि शाक सब्जी अन्न दूध में अत्यन्त स्वल्प मात्रा में मिले हुए क्षार और खनिज हमारे शरीर में घुल जाते हैं किन्तु उन्हीं पदार्थों को यदि गोलियों के रूप में खाया जाय तो उनका बहुत छोटा अंश ही शरीर को मिलेगा बाकी स्थूल होने के कारण बिना पचे ही मल मार्ग से निकल जायेगा।

होम्योपैथी के आविष्कारों को सूक्ष्म शक्ति की जानकारी जब मिली तो उन्होंने मानवी आरोग्य की समस्या का समाधान करने के लिए उसी का उपयोग कर डाला। उन्हें यह प्रेरणा पानी में घुले ताँबे के अत्यन्त स्वल्प अंश का प्रभाव देखकर मिली थी।

कार्लवान नागेली के चार ताँबे के पैसे उनकी बिना जानकारी में पानी के एक बर्तन में गिर पड़े, वह पानी सहज स्वभाव स्पाइरोगिरा के पौधों की जड़ों में डाल दिया गया। पौधे कुछ ही घन्टे के अंदर मर गये। अकस्मात ऐसा क्या हो गया? इस खोज में उनकी जड़ में डाले गये पानी की खोजबीन हुई और उसमें पड़े हुए ताँबे के पैसों की सौगात मिलाई गई। पीछे गहरे अन्वेषण से पता चला कि ताँबे की इतनी स्वल्प मात्रा इतनी सशक्त होती है कि उनके द्वारा पौधों पर ऐसा अद्भुत प्रभाव पड़ सकें।

छोटा बनने से वजन कम नहीं हो जाता। भारतीय दर्शन की मान्यता यह है कि परमाणु आकाश में अपने सदृश परमाणुओं के साथ घनीभूत हो जाता है तो उनकी शक्ति का पारावार नहीं रहता।

एक स्क्वायर इंच टुकड़े लकड़ी का वजन 1 छटांक से भी कम होता है पर उतना ही लोहा एक छटाँक से अधिक होगा। प्लैटिनम लोहे से भी अधिक वजनदार होता है क्योंकि उसके परमाणुओं में सघनता होती है। आकाश के कुछ सितारों के दृश्य 1 क्यूबिक इंच के हों तो भी उनका वजन 27 मन होगा एक तारे के इतने ही द्रव्य का वजन 16740 मन पाया गया। ज्येष्ठा तारे के बारे में कहा जाता है कि उसका नग अंगूठी में लगा दिया जाय तो उस अंगूठी का वजन 8 मन का होगा।

बड़प्पन के अहंकार से छोटा बनने की नम्रता का मूल्य कितना अधिक है इसे आध्यात्मवाद पर विश्वास करने वाले भली प्रकार जानते हैं। स्थूल वैभव विस्तार के लिए लालायित लोगों की तुलना में वे अधिक बुद्धिमान हैं जो अपनी सूक्ष्म शक्ति को समझते हैं और उसे विकसित करने की आत्म साधना में संलग्न रहते हैं।

लघुता की गतिशीलता विराट की गति से की जा सकती है। हीरा आदि ठोस पदार्थ दिखाई देते, स्थूल होते हैं उनके अणुओं (मालीक्यूल्स) की गति प्रति घन्टा 960 मील होती है। तरल पदार्थों के अणुओं का कम्पन ठोस पदार्थों से ड्यौढ़ा और दुगुना हो जाता है। दि मैकेनिज्म आफ नेचर (एण्ड्राड लिखित) में लिखा है-1 ओंस पानी में इतने परमाणु होते हैं कि संसार के सभी स्त्री पुरुष व बच्चे उन्हें गिने और एक सैकिंड में 5 की गति से गिने होते और दिन रात गिने तो गणना 40 वर्ष में पूरी हो जाती है। पर उस तरल को जब और भी सूक्ष्म छोटे छोटे टुकड़ों में गैस रूप में कर दिया जाता तो अणुओं की संख्या और गतिशीलता लक्ष लक्ष गुना अधिक हो जाती है। गैस के अणुओं के बीच की दूरी एक इंच के 30 लाखवें हिस्से से भी कम होती है फिर भी वह एक सैकिण्ड में 6 अरब बार परस्पर टकराते हैं। ठोस देखने में बड़ा लगता है पर उसकी गति स्थूल होती है। गैसें कई तो दिखाई भी नहीं देती पर इतनी क्रियाशील होती हैं कि उनके माध्यम से उनकी गतिशीलता के आधार पर लाखों मील दूर की बात को एक सैकिण्ड में जान लिया जाय। आगे इसी विज्ञान के विकास के द्वारा लाखों वर्ष पूर्व की घटनाओं का चित्रण चलचित्र की भाँति सम्भव हो जाये तो कुछ असम्भव नहीं। इसी को कहते हैं कि लघुता की महत्ता। प्रकाश का अणु आज तक पकड़ में नहीं आया, पर वह सारे संसार को प्रकाश गर्मी देता है। उसकी पहुँच इतनी विकट है कि वह एक सैकिण्ड में ही 186000 मील पहुँच जाता है। मनुष्य का उतावला मन यदि स्थूल से सूक्ष्म तथा उससे छोटा बनाया जा सके, बड़े होने के अहंकार से बचाकर उसे छोटा से छोटा बनाया जा सके तो उसमें एक सैकिंड के भी लाखवें हिस्से में सारे ब्रह्माण्ड का भ्रमण कर आने की क्षमता, सक्रियता विद्यमान प्रत्यक्ष देखी जा सकती है। सूक्ष्म बनाया हुआ मन ही त्रिकालदर्शी होता है। उल्लेखनीय है कि भारतीय दर्शन ने मन, आत्मा और परमात्मा को तत्व ही माना है।

अणु बम तथा हाइड्रोजन बम चार प्रकार की हानियाँ पहुंचाते हैं। (1) धमक (2) ताप (3) आरम्भिक न्यूक्लीय अभिक्रिया (4) रेडियो सक्रिय विकरण। औसत बम की धमक से 6 मील दूर के घेरे की वस्तुओं का पूर्ण विनाश 12 मील तक भयंकर क्षति और 25 मील तक आँशिक हानि होती है। ताप का प्रभाव 10 मील की परिधि में 95 प्रतिशत प्राणियों की तत्काल मृत्यु हो जाती है। 17 मील के घेरे में लोग भयंकर रूप से बीमार अथवा ऐसे अपंग हो जायेंगे जिनका जीना मरने से भी महँगा पड़ेगा। 30 राण्टेजन इकाई का रेडियो विकरण मनुष्य को घुला घुलाकर मारता है और उन्हें जल्दी ही मौत के मुँह में धकेल दिया है। छोटे जीव उस विकरण से और भी जल्दी मरते हैं।

यह ध्वंसात्मक परिचय हुआ। सृजन की सम्भावनाओं में कितनी ही बातें ऐसी स्वीकार कर ली गई हैं जो वैज्ञानिक प्रयासों से अगले ही दिनों साकार हो जायेंगी। सर्दी गर्मी वर्षा ऋतुओं में हेर फेर करना मानवीय इच्छा के अन्तर्गत आ जायगा। समुद्र की अथाह जल राशि से उसके खारापन को विलग करके मीठा पानी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध किया जा सकेगा। मरुस्थल तथा ऊबड़-खाबड़ पहाड़ी और अनुत्पादक भूमि को उपजाऊ बनाया जा सकेगा। समुद्र में वनस्पतियाँ उगाकर आहार की समस्या का समाधान सम्भव होगा मानुषी श्रम का बोझ बिजली सँभाल लेगी और लोग केवल मनोरंजन जैसा श्रम करके गुजर कर लिया करेंगे। संसार के एक कोने में रहने वाले मनुष्य का सम्पर्क दूसरे छोर पर रहने वाले के साथ क्षणभर में स्थापित हो सकेगा आदि-आदि।

मौसम को मनुष्य की आवश्यकता के अनुरूप बनाया जा सके, इसका आधार तो विदित हो गया है और इस सम्भावना को स्वीकार कर लिया गया है। प्रश्न खर्चे का है यदि उतने साधन उपकरण जुटाये जा सकें तो निस्सन्देह मौसम को इच्छानुकूल बना लेना मनुष्य के हाथ में होगा। दुनिया में सारी हवा को इच्छानुसार बहाया जा सकता है पर उसके लिए हर दिन इतनी शक्ति का प्रयोग करना होगा जितना दस लाख परमाणु बमों के विस्फोट से उत्पन्न होती है। वायुमण्डल में एक सेन्टीग्रेड तापमान बढ़ाना हो तो दो हजार परमाणु बम विस्फोट जितनी शक्ति चाहिए। मध्यम श्रेणी के तूफान को रोकने में मेगाटन अणु शक्ति खर्च करनी पड़ेगी।

सूर्य द्वारा प्रतिक्षण, ताप एवं प्रकाश के रूप में प्रचण्ड ऊर्जा प्रवाहित होती है। उसका बहुत बड़ा विकरण अंश पृथ्वी के ऊपर की विरल परतों द्वारा सोख लिया जाता है और उस संग्रहीत विकरण भण्डार में से छन छनकर जो ऊर्जा सघन वायुमण्डल में आती है उसी के आधार पर मौसम बदलता है। वायुमण्डल की सघन परत ऊपर की विरल परत से जब जितनी जिस प्रकार प्रभावित होगी ऋतु परिवर्तन का उतना ही स्वरूप सामने आवेगा। कहना न होगा कि सूर्य विकरण से संचित ऊर्जा विरल परत पर इतनी अधिक है कि यदि किसी प्रकार वह सघन परत को चीरकर ज्यों की त्यों नीचे उतर आये तो इस धरती को क्षण भर में भूनभान कर रख दे।

इस सूक्ष्मता की चरम सीमा तक पहुँचते हैं तो उपनिषद्कार की भाषा में हम विद्युत ब्रह्म की सीमाएँ छूने लगते हैं। परमाणु सत्ता के अन्तर्गत काम करने वाले विद्युत बिन्दुओं की ओर ही यह संकेत है। वृहदारण्यक उपनिषद् का ऋषि 4।7।1 में कहता है-

“विद्युद्धयेव” यह विद्युत ब्रह्म है।

अब इलेक्ट्रान के भीतर इलेक्ट्रान और नाभिक (न्यूकिलस) के भीतर अनेक नाभिकों (न्यूक्लिआई) की संख्या भी निकलती चली आ रही है। हमारे ऋषि ग्रन्थों में इन्हें “सर्गाणु” तथा “कर्षाणु” शब्दों से सम्बोधित किया गया है। विभिन्न तत्वों के परमाणुओं की इस सूक्ष्म शक्ति को देवियों की शक्ति कहा गया है।

वैभव विस्तार के लिए, यश परिचय बढ़ाने के लिए, कुटुम्ब परिवार के लिए- जितना सोचा और किया जाता है उतना ही यदि अपनी सूक्ष्म चेतना का मूल्याँकन करने और उसमें सन्निहित ब्राह्मी चेतना को उभारने का प्रयत्न किया जाय तो हम असीम सामर्थ्य के अधिपति हो सकते हैं और इतना पा सकते हैं जिसकी तुलना में चक्रवर्ती सम्राट बनने का सुख भी तुच्छ प्रतीत होने लगे।

----***----


तप द्वारा प्राणशक्ति का अभिवर्धन

मानवी विद्युत को अध्यात्म विज्ञान में ओजस, तेजस एवं ब्रह्मवर्चस कहा गया है। इसे विकसित करने की प्रक्रिया योग साधना एवं तपश्चर्या के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रह्मविद्या में इसी “चित्त शक्ति” के विकास पर जोर दिया गया है और कहा गया है कि मनुष्य शरीर में सन्निहित प्रकट और अप्रकट रहस्यमय शक्ति संस्थानों को जागृत करके मनुष्य देव स्तर की विशेषताओं से सम्पन्न हो सकता है। भौतिक जगत के विकास प्रयोजनों में बिजली का जो उपयोग है उससे कहीं अधिक उपयोगिता व्यक्तित्व के समग्र विकास में मानवी विद्युत की है। उसका स्वरूप, आधार और उपयोग जानने के लिए हमें विशेष उत्साहपूर्वक प्रयत्न करने चाहिएं।

इलेक्ट्रोऐन्सी फैलोग्राफ की सहायता से यह जाना जा सकता है कि इस बिजली का उत्पादन और उपभोग कहाँ किस मात्रा में हो रहा है। इसमें घट बढ़ हो जाने से मानसिक सन्तुलन बिगड़ने लगता है अथवा यों भी कहा जा सकता है कि मानसिक संतुलन बिगड़ने से इन विद्युत धाराओं में गड़बड़ी उत्पन्न हो जाती है।

इस मस्तिष्कीय बिजली की विशेषता यह है कि वह चेतन है जब कि भौतिक बिजली मात्र शक्ति प्रवाह बनकर काम करती है। मस्तिष्क के चेतन संस्थान प्रसुप्त स्थिति में निरर्थक जैसे लगते हैं, पर यदि इनकी क्षमता को जागृत कर लिया जाय और महत्वपूर्ण दिशा में नियोजित कर लिया जाय तो फिर निश्चित रूप से उनके द्वारा वे कार्य हो सकते हैं जिन्हें दैवी अनुग्रह या वरदान कहा जा सके।

मनः शास्त्री फ्लैमैरियन का कथन है कि मानवी विद्युत की एक गहरी परत ओजस् है इसकी समुचित मात्रा उपलब्ध हो तो मनुष्य सूक्ष्म अतीन्द्रिय शक्तियों से सम्पन्न हो सकता है। मानवीय विद्युत पर विशेष खोज करने वाले विक्टर ई॰ क्रोमर का कथन है-मनः शक्ति को घनीभूत करने की कला में प्रवीणता प्राप्त करके उसे किसी दिशा विशेष में प्रयुक्त किया जा सकता है। यह इतना बड़ा शक्ति स्रोत है कि मानवी व्यक्तित्व का कोई भी पक्ष उस प्रयोग से अधिक प्रखर और उज्ज्वल बनाया जा सके। यह प्रयोग यदि अपनी सूक्ष्म शक्तियाँ तलाश करने और उभारने पर केन्द्रित किया जा सके तो अतीन्द्रिय चेतना के क्षेत्र में आशाजनक सफलता मिल सकती है।

भौतिक जगत में अग्नि, भाप, गैस, तेल, बिजली, विस्फोट, लेसर आदि का जो महत्व है उससे कहीं अधिक उपयोगिता सजीव प्राणियों के लिए उस बिजली की है जो उनके शरीरों में पाई जाती है। मनुष्य में भी इस विद्युत शरीर का अजस्र भण्डार भरा पड़ा है।

शरीर की संचार प्रणाली का मूल आधार क्या है? इसका सूक्ष्मातिसूक्ष्म कारण ढूंढ़ने पर वे शरीर विज्ञानी इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि पेशियों में काम करने वाली स्थिति तक ऊर्जा “पोटेन्शियल” का तथा उसके साथ जुड़े रहने वाले आवेश-इन्टेन्सिटी-का जीवन संचार में बहुत बड़ा हाथ है। इन विद्युतधाराओं का वर्गीकरण तथा नामकरण-सीफेलीट्राइजेमिल न्यूरैलाजिया की व्याख्या चर्चा के साथ प्रस्तुत किया जाता है। ताप विद्युत संयोजन थर्मेलैश्कि कपलिंगक- के शोधकर्ता अब इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मानव शरीर का सारा क्रियाकलाप इसी विद्युतीय संचार के माध्यम से गतिशील रहता है।

पृथ्वी के इर्द गिर्द एक चुम्बकीय वातावरण फैला हुआ है। अकेला गुरुत्वाकर्षण कार्य ही नहीं उससे भी कितने ही प्रयोजन पूरे होते हैं। यह चुम्बकत्व आखिर आता कहाँ से है-उसका उद्गम स्रोत कहाँ है? यह पता लगाने वाले इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यह कोई बाहरी अनुदान नहीं वरन् पृथ्वी के गहन अन्तराल से निकलने वाला शक्ति प्रवाह है।

जैवसैलों का सूत्र विभाजन कार्य उसके मध्य बिन्दु में चलता है उसमें यही दिशा ज्ञान काम करता है। क्रोमोज़ोम की गति “सैल” के मध्यवर्ती ध्रुव की दिशा की ओर रहती है उसे दिशाज्ञान कैसे रहता है? इस प्रश्न का उत्तर भी यही रहता है कि पृथ्वी के चुम्बकीय प्रवाह को हमारे जीव सैल की आन्तरिक सत्ता अनुभव कर सकती है, उसी आधार पर अपनी गतिविधि का निर्धारण कर सकती है।

चुम्बक और विद्युत यों प्रत्यक्षतः दो पृथक-पृथक सत्ताएँ हैं पर वे परस्पर अविच्छिन्न रूप से सम्बद्ध है और समयानुसार एक धारा का दूसरी में परिवर्तन होता रहता है। यदि किसी “सरकिट” का चुम्बकीय क्षेत्र लगातार बदलते रहा जाय तो बिजली पैदा हो जाएगी। इसी प्रकार लोहे के टुकड़े पर लपेटे हुए तार में से विद्युतधारा प्रवाहित की जाय तो वह चुम्बकीय शक्ति सम्पन्न बन जायगी।

मनुष्य शरीर में बिजली काम करती है यह सर्व विदित है। इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफी तथा इलेक्ट्रो इनसिफैलोग्राफी के द्वारा इस तथ्य को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। हमारी रक्त नलिकाओं में लौह युक्त “हेमोग्लोबिन” भरा पड़ा है। उसी प्रकार हमारी जीव सत्ता सभी जीव कोषों को परस्पर सम्बद्ध किये रहती है और उनकी सम्मिश्रित चेतना से वे समस्त क्रियाकलाप चलते हैं जिन्हें हम जीव संचार व्यवस्था कहते हैं।

मानवी शरीर के शोध इतिहास में ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख है जिनसे यह सिद्ध होता है कि किन्हीं-किन्हीं शरीरों में इतनी अधिक बिजली होती है कि उसे दूसरे लोग भी आसानी से अनुभव कर सकें। यों हमारा नाड़ी संस्थान पूर्णतया विद्युतधारा से ही संचालित होता है। मस्तिष्क को जादुई बिजलीघर कह सकते हैं। जहाँ से शरीर के समस्त अंग प्रत्यंगों की गतिविधियों का नियन्त्रण एवं संचालन होता है। पर वह बिजली “जीव विद्युत” वर्ग की होती है और इस तरह अनुभव में नहीं आती जैसी कि बत्ती जलाने या मशीनें चलाने वाली बिजली। शरीर में काम करने वाली गर्मी से विभिन्न अवयवों की सक्रियता रहती है और वे अपना-अपना काम करते हैं। यह कायिक ऊष्मा वस्तुतः एक विशेष प्रकार की बिजली ही है। इसे मानवी विद्युत कह सकते हैं। इतने पर भी वह यान्त्रिक बिजली से भिन्न ही मानी जाएगी। वह अपना प्रभाव शरीर संचालन तक ही सीमित रखती है। इससे बाहर उसका प्रभाव अनुभव नहीं किया जाता किन्तु कुछ अपवाद ऐसे भी देखने में मिले हैं जिनमें शरीरगत ऊष्मा ने यान्त्रिक बिजली की भूमिका निभाई है और उस व्यक्ति को एक चलता फिरता बिजली घर सिद्ध किया है।

मनुष्य शरीर में भी यान्त्रिक बिजली की आश्चर्यजनक मात्रा हो सकती है, इसके कितने ही उदाहरण सर्वविदित हैं। कोलोराडी प्रान्त के लेडीवेली नगर में के0 डब्ल्यू0 पी0 जोन्स नाम का एक ऐसा व्यक्ति हुआ है जो जमीन पर चलकर यह बता देता था कि जिस भूमि पर वह चल रहा है उनके बीच किस धातु की-कितनी बड़ी खदान है उसे जमीन में दबी भिन्न धातुओं का प्रभाव अपने शरीर पर विभिन्न प्रकार के स्पन्दनों से होता था। अनुभव ने उसे यह सिखा दिया था कि किस धातु का स्पन्दन कैसा होता है? अपनी इस विशेषता का उसने भरपूर लाभ उठाया। कइयों को खदानें बताकर उनसे हिस्सा लिया और कुछ खदानें उसने अपने धन से खरीदी और चलाई। अमेरिका का यह बहुत धन सम्पन्न व्यक्ति इसी अपनी विशेषता के कारण बना था।

मनुष्येत्तर अन्य प्राणियों में भी यह विद्युत शक्ति पाई जाती है उनके शरीर में मस्तिष्क में ऐसे विशिष्ट अवयव पाये जाते हैं कि जिनमें शरीरगत विद्युत अपना काम करती है और वे आश्चर्यजनक जीवन पद्धति अपनाये रहते हैं। वैज्ञानिकों ने इसी अद्भुत संरचना को देख परखकर उसकी नकल के सहारे कुछ ऐसे आविष्कार किये हैं जो अपनी उपयोगिता के लिए प्रख्यात हैं।

मधुमक्खियों की नेत्र रचना देखकर विज्ञानवेत्ता पोलारायड ओरिसन्टेशन इण्डिकेटर नामक यन्त्र बनाने में समर्थ हुए है, यह ध्रुव प्रदेश में दिशा ज्ञान का सही माध्यम है। उस क्षेत्र में साधारण कुतुबनुमा अपनी उत्तर, दक्षिण दिशा बताने वाली विशेषता खो बैठते हैं तब इसी यन्त्र के सहारे उस क्षेत्र के यात्री अपना काम करते हैं।

कितने ही पक्षी ऋतु परिवर्तन के लिए झुण्ड बनाकर सहस्रों मील लम्बी उड़ानें भरते हैं। वे धरती के एक सिरे के दूसरे सिरे तक जा पहुँचते हैं। इनकी उड़ान प्रायः रात में होती है। उस समय प्रकाश जैसी कोई इस प्रकार की सुविधा भी नहीं मिलती जिससे वे यात्रा लक्ष्य की दिशा जान सकें। यह कार्य उनकी अन्तःचेतना पृथ्वी के इर्द गिर्द फैले हुए चुम्बकीय घेरे में चल रही हलचलों के आधार पर ही पूरा करती है। इस धारा के सहारे वे इस तरह उड़ते हैं मानो किसी सुनिश्चित सड़क पर चल रहे हों।

राजाओं, सेनापतियों के घोड़े, हाथी उनका इशारा समझते थे और सम्मान करते थे। बिगड़े हुए हाथी को राजा स्वयं जाकर सँभाल लेते थे। राणाप्रताप, नैपोलियन, झाँसी की रानी के घोड़े मालिकों के इशारे ही नहीं उनकी इच्छा को भी समझते थे और उनका पालन करते थे। वह उनके प्रभावशाली व्यक्तित्व का अल्प विकसित बुद्धि वाले घोड़े, हाथी आदि पशुओं पर हुआ प्रत्यक्ष प्रभाव ही था।

मस्तिष्क में से एक प्रकार की गंध सरीखी विशेष चेतन क्षमता निरन्तर उड़ती रहती है। समीप रहने वाले लोग उस विशेषता से प्रभावित होते हैं व्यक्तित्व जितना प्रभावशाली होगा-मस्तिष्क जितना विकसित होगा उसके सम्पर्क क्षेत्र को प्रभावित करने वाला चुम्बक भी उतना ही प्रभावशाली होगा। यदि तीव्र इच्छा और भावना के साथ इस शक्ति को किसी दूसरे की ओर प्रवाहित किया जाय तो उसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रह सकता। मनस्वी लोगों की समीपता से अल्प बुद्धि वालों का मस्तिष्कीय विकास होने लगता है भले ही वह मंदगति से क्यों न हो रहा हो।

भारत के अध्यात्मवेत्ता किसी समय इस दिशा में बहुत बड़ी खोज करने और सफलता प्राप्त करने में कृत कार्य हो चुके हैं। बुद्ध की प्रचण्ड विचारधारा ने अपनी विलासी एवं भौतिक महत्वाकांक्षी गतिविधियाँ छोड़कर उसको कष्टकर प्रयोजन को अपनाने के लिए खुशी खुशी कदम बढ़ाया जो प्रचण्ड मानसिक विद्युत से सुसम्पन्न बुद्ध को अभीष्ट था। भगवान राम ने रीछ−वानरों को ऐसे कार्य में जुट जाने के लिए भावावेश में संलग्न कर दिया जिससे किसी लाभ की आशा तो थी नहीं उलटे जीवन संकट स्पष्ट था। भगवान कृष्ण ने महाभारत की भूमिका रची और उसके लिए मनोभूमियाँ उत्तेजित कीं। पाण्डव उस तरह की आवश्यकता अनुभव नहीं कर रहे थे और न अर्जुन की उस संग्राम में रुचि थी तो भी अभीष्ट प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए मानसिक क्षमता के धनी कृष्ण ने उस तरह की उत्तेजनात्मक परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दीं। गोपियों के मन में सरस भावाभिव्यंजनाएँ उत्पन्न करने का सूत्र संचालन कृष्ण ही कर रहे थे।

ईसा मसीह, मुहम्मद, जरथुस्त्र आदि धार्मिक क्षेत्र के मनस्वी ही थे जिन्होंने लोगों को अभीष्ट पथ पर चलने के लिए विवश किया। उपदेशक लोग आकर्षक प्रवचन देते रहते हैं पर उनकी कला की प्रशंसा करने वाले भी उस उपदेश पर चलने को तैयार नहीं होते। इसमें उनके प्रतिवाद विषय का दोष नहीं उस मनोबल की कमी ही कारण है जिसके बिना सुनने वालों के मस्तिष्क में हलचल उत्पन्न किया जा सकना सम्भव न हो सका। नारद जी जैसे मनस्वी ही, अपने स्वल्प परामर्श से लोगों की जीवनधारा बदल सकते थे। बाल्मीकि, ध्रुव, प्रहलाद, सुकन्या आदि कितने ही आदर्शवादी उन्हीं की प्रेरणा भरी प्रकाश किरण पाकर आगे बढ़े थे।

समर्थ गुरु रामदास, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द गुरुगोविन्द सिंह, दयानन्द, कबीर आदि मनस्वी महामानवों ने अपने समय के लोगों को उपयोगी प्रेरणाएँ दी हैं और अभीष्ट पथ पर चलने के लिए साहस उत्पन्न किया है। गाँधी जी की प्रेरणा से स्वतन्त्रता संग्राम में अगणित व्यक्ति त्याग बलिदान करने के लिए किस उत्साह के साथ आगे आये यह पिछले ही दिनों की घटना है।

शक्ति इसी स्तर की प्रक्रिया है जिसमें मानुषी विद्युत से उत्पन्न व्यक्ति का तेजस् दूसरे अल्प तेजस् व्यक्तियों में प्रवेश करके उन्हें देखते देखते समर्थ बनाकर रख देती है। दीपक से दीपक जलने का- पारस स्पर्श से लोहा सोना होने का उदाहरण इसी प्रकार के संदर्भ में दिया जाता है।

इस ओजस ब्रह्म वर्चस आत्मबल का ही एक छोटा स्वरूप मानवी विद्युत है। व्यक्तित्व की प्रखरता होने पर यह प्राण शरीर बनकर निखरता, उभरता है। ऐसे व्यक्ति बाहर से प्रभावशाली भले ही दिखाई न पड़ें पर उनका आन्तरिक तेजस असाधारण होता है। इस शक्ति को धन, वैभव, विद्या, शरीर, बल, शस्त्र बल आदि भौतिक साधनों की तुलना में असंख्य गुना महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

इसी ओजस् धारा के अनेक शक्ति संस्थान सूक्ष्म शरीर में भरे पड़े हैं। वे यदि जागृत किये जा सकें तो अपने भीतर से ही देवता प्रकट होते देखे जा सकते हैं।

कुछ समय पूर्व बम्बई के एक विद्वान बी0 जे0 रेले ने एक पुस्तक लिखी थी- दी वैदिक गार्डस एस॰ फिगर्स ऑफ बायोलॉजी उसमें सिद्ध किया था कि वेदों में वर्णित आदित्य, वरुण, अग्नि, मरुत, मित्र, अश्नि, रुद्र आदि मस्तिष्क के स्थान विशेष में सन्निहित दिव्यशक्तियाँ हैं जिन्हें जागृत करके विशिष्ट क्षमता सम्पन्न बनाया जा सकता है।

ग्रान्ट मेडिकल कालेज के अतारभी प्राध्यापक बाई जी नाडगिर और एडगर जे टामस ने संयुक्त रूप में पुस्तक की भूमिका लिखते हुए कहा है कि वैदिक ऋषियों के शरीर शास्त्र सम्बन्धी गहन ज्ञान पर अचम्भा होता है कि उस साधनहीन समय में किस प्रकार उन्होंने इतनी गहरी जानकारियाँ प्राप्त की होंगी और आँख की सीप में ऊपर के मस्तिष्क का भाग बृहत् मस्तिष्क कहलाता है यही सेरिवेलम ब्रह्म चेतना शक्ति का केन्द्र है। इन्द्र और सविता यहीं निवास करते हैं। नाक की सीध में सिर के पीछे वाला भाग सेरिवेलन अनुमस्तिष्क रुद्र देवता का कार्य क्षेत्र है। मस्तिष्क का ऊपरी भाग रोटसी मध्य भाग अन्तरिक्ष और निम्न भाग पृथ्वी बतलाया गया है। रोटसी से दिव्य चेतना का प्रवाह-अन्तरिक्ष में ग्रह नक्षत्रों वाला ब्रह्माण्ड और पृथ्वी में अपने लोक में काम कर रही भौतिक शक्तियों का सूत्र सम्बन्ध जुड़ा रहता है। सप्तधार सोम, अग्नि, स्वर्ग, द्वार, द्रौण, कलश एवं अश्विनी शक्तियाँ का सम्बन्ध रोटसी क्षेत्र है।

अग्नि से नीचे वाले भाग को स्वर्ग द्वारा और उससे नीचे वाले भाग को द्रोण कलश कहा गया है। जहाँ से सप्त सरिताएं सात नदियाँ बहती हैं। द्रौण कलश में सोम रस भरा रहता है। जिसके आधार पर स्नायु केन्द्रों को शक्ति प्राप्त होती है। मेरुरज्जुओं के साथ बँधे हुए दो ग्रन्थि गुच्छक अश्विनीकुमार बताये गये हैं। मस्तिष्क की परिधि को घेरे हुए एक विशेष द्रव सम्पूर्ण मस्तिष्क को चेतना प्रदान करता है इसी को वरुण कहते हैं। इसी केन्द्र में अग्नि देवता का ज्ञानकोष है। मस्तिष्क के पिछले भाग में अवस्थित “टेपोलर लीव” प्राचीनकाल का शंख पालि है। इसके नीचे की पीयूष ग्रन्थियाँ जिन्हें मेदुला भी कहते हैं। अश्वमेध यज्ञ की वेदी है। अश्वमेध अर्थात् इन्द्रिय परिष्कार इसके लिए पीयूष ग्रन्थि वाला क्षेत्र ही उत्तरदायी है।

सुषुप्ति की जागृति में परिणित करने के लिए ही अपने आप को तपाना पड़ता है। तपश्चर्या के फलस्वरूप सिद्धियाँ मिलने के जो प्रमाण उदाहरण मिलते हैं। उनके पीछे आन्तरिक परिष्कार का लक्ष्य ही सन्निहित रहता है बाहर से कोई देवता हमारी सहायता करने के लिए दौड़ा नहीं आता वरन् तप साधना से उत्पन्न आन्तरिक प्रखरता ही देव शक्ति बनकर हमें आत्म सम्पदा से ओत प्रोत करती है। यह सम्पत्ति जिसके पास है उसे सुखी और समुन्नत रहने तथा दूसरों को महत्वपूर्ण अनुदान देते रहने का श्रेय मिलता है। कहा भी है :-

यदं दुष्करं यद दुरापं यद दुर्गं यच्च दुष्तरम्। सर्वं तत् तपसा साघ्यं, ततो हि दुरतिक्रमम्॥

तप से कोई सुख, कोई सिद्धि, कोई पद, भव वैभव दुर्लभ नहीं। ऋषि मुनियों ने जो अलौकिक सिद्धियाँ प्राप्त की थीं, उनके पीछे उनकी तपश्चर्या थी।

----***----


ईश्वर भक्ति और सेवा साधना की एकरूपता

इन दिनों लोग सेवा व भक्ति को भिन्न मानने लगे हैं। दरअसल भगवान के प्रति भक्ति और दूसरों के लिए सेवा का प्रयोग एक ही अर्थ में होना चाहिए। विद्वानों ने जन सेवा तथा परोपकार को ही भगवद्-भक्ति कहा है। इसका कारण यह है कि सभी के हृदय में निवास करने वाला प्रेम ही परमात्मा रूप है। इसके अलावा अपने यहाँ तो जड़−चेतनमय सारी सृष्टि को ही उसी एक का रूप मानते हैं। इस प्रकार हम जब सेवा करते हैं तो हाड़ माँस के बने किसी देह की नहीं अपितु उसकी आत्मा को तृप्त करते हैं और अपने भावमय परब्रह्म प्रेम को भी तृप्त करके परमात्मा की दुहरी उपासना द्वारा दुगुने पुण्य पाने की आनन्दानुभूति करते हैं।

सभी कर्म ऊपर उल्लिखित सेवा या भक्ति की कोटि में नहीं आ सकते। अतः सेवा के स्वरूप जानने का भी कम महत्व नहीं है। स्वामी या सरकार की सेवा अथवा अन्य लोभ लाभ आतंक दबाव आदि से सम्पन्न सेवा आदि को जिनसे अपना कोई निजी लौकिक स्वार्थ हो, वह सेवा नहीं मानी जा सकती, न ऐसा कर्म भगवान की भक्ति ही कहलायेगी। केवल हमारे वे निष्काम कर्म जो समाज को यथार्थतः आगे बढ़ाते हैं वही जनता जनार्दन की सेवा और परमात्मा की उपासना मूलक भगवद् भक्ति है। ऐसी समाज सेवा परमार्थ की दृष्टि से की जाती है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि परमार्थवादी दृष्टिकोण ही समाज सेवा व भगवद् भक्ति के स्वरूप का सही मापदण्ड है अतः एकमात्र निःस्वार्थ निर्मोह, निष्कपट और अहेतुक सेवा ही भक्ति की कोटि की मानी जाती है।

ऐसी सेवा का तीन श्रेणियों में वर्गीकरण किया जाता है- (1) प्रथम श्रेणी की सेवा से स्थायी सुख मिलता है।(2) द्वितीय श्रेणी की सेवा द्वारा दीर्घकालीन दुःख दूर किया जाता है। (3) तृतीय श्रेणी की सेवा यह है कि जिससे किसी की मानसिक आवश्यकता पूरी हो या तात्कालिक आपत्ति टल जाये। कोई विद्यार्थी किसी छात्रावास में रहते हुए एक कालेज में पढ़ रहा है। घर से समय पर मनीआर्डर नहीं मिल सका। नाम उसका कटने ही वाला है। ऐसे मौके पर कोई उसे फीस भर रुपये दे दे तो तत्काल यह आपत्ति टल जाये। उस चिन्तातुर छात्र की सामयिक आवश्यकता को पूरा कर देने वाले ने जो सेवा की वह तीसरी श्रेणी की कही जाती है।

जब आप सहानुभूति एवं सहृदयता से किसी शोकाकुल को सान्त्वना देते हैं, निराश को उत्साहित करते हैं, बिगड़ती हुई स्थिति संभाल देते हैं, निरपराध को बचा देते हैं, आपसी शत्रुता व वैमनस्य दूर करते हैं, अनाथ विधवा आदि को आश्रय दे सहारा बनते हैं तो दीर्घकाल तक कष्ट पाने से छुटकारा दिलाकर द्वितीय श्रेणी की सेवा का पुण्य लाभ करते हैं।

इन दोनों ही से बढ़कर प्रथम श्रेणी की सेवा है- ज्ञान दान। उसमें भी अज्ञान रूपी अंधकार में भटकती मानवता को पथ प्रदर्शित करने में अपने प्राणों की आहुति डालते हुए मारने वाले को भी कल्याण की कामना करने वाले संत महात्माओं की गणना सर्वोपरि होती है।

अब प्रश्न उठता है कि ऐसी जन सेवा तथा परोपकार कौन कर सकता है? जिसने मानव जीवन का चरम उद्देश्य समष्टि के लिए व्यष्टि का समर्पण और परामर्श को अंगीकार कर लिया, उसका व्यावहारिक जीवन स्वतः त्याग तपस्यामय समाज सेवा का बन जायेगा। कारण परमार्थवादी अपने को समाज से पृथक नहीं मान सकता। उसमें उत्कृष्ट सेवाओं का मूलाधार दया सहानुभूति, सम्वेदना, सहयोग, सामाजिकता आदि सद्गुण जोर पकड़ते हैं। ऐसे व्यक्ति को तुच्छ स्वार्थों में फंसे रहने से चैन नहीं मिलता। उसकी तड़पती आत्मा विश्वात्मा से तादात्म्य स्थापित करने के लिए अपने प्रेम प्रवाह को विशाल जगत सागर तक पहुँचायें बिना शान्त नहीं रह पाती। वह अपने शक्ति साधनों को दिव्य अनुदान मानकर उसके वापसी दीन दुःखी और निर्बल प्राणियों के हित सदुपयोग द्वारा करने लगता है। ऐसा विशिष्ट व्यक्ति पद, प्रतिष्ठा, प्रशंसा, अहंकार की स्पृहा का परित्याग कर देता है। वह जानता है कि भगवान अहंकारी की पूजा पुण्य भी पाकर प्रसन्न नहीं होता। अतः स्वयं सबसे विनम्र बनकर समाज की सेवा के माध्यम से परम प्रभु की प्रत्यक्ष उपासना कर पारमार्थिक सुख व आत्मिक संतोष पाना चाहता है।

सेवा के साथ प्रशंसा प्रदर्शन की कतई संगति नहीं बैठती। तभी तो गाँधी जी को एक संन्यासी से स्पष्ट कहना पड़ा था कि जनता की सच्ची सेवा करनी है तो गेरुआ वस्त्र उतार दे। अन्यथा जनता उन्हीं की सेवा, सम्मान करने लगेगी। इससे स्पष्ट है कि जो व्यक्ति जितना ही विनयी, निरभिमान निःस्पृह, दयालु और सम्वेदनशील होगा, वह उतना ही बड़ा और सफल जन सेवी होगा।

ऐसे परमार्थवादी की उदात्त सेवा का परिणाम भी बहुमुखी व सार्वभौम होता है। ऐसे समाज सेवी का सोचने और काम करने का आधार अत्यन्त उच्च स्तरीय होता है। अतः वह अपनी शक्ति, योग्यता और क्षमता के प्रयोग में कृपणता नहीं करता। फलतः सच्चे हृदय से की गई भावयुक्त जन सेवा का प्रभाव भी अन्तःकरण पर गहरा और चिरस्थायी, साथ ही व्यापक होता है।

स्वार्थी चाहे जितना धनवान, शक्तिशाली या विद्वान और प्रतिष्ठित क्यों न हो वह मानवता के मर्म को उतना नहीं छू पाता जितना एक सच्चा, संवेदनशील व्यक्तित्व। इसका प्रत्यक्ष दर्शन हम भगवान बुद्ध तथा महात्मा गाँधी जैसे महामानवों के क्रियाकलापों व गतिविधियों का अध्ययन व विश्लेषण कर सहज ही पा सकते हैं। जहाँ सामूहिकता और सहयोग के महत्व को जानने व जीवन में उस पुण्य परमार्थ को चरितार्थ करने वाले जन सेवी रहते हैं, उनका चाहे जो भी जीवन दर्शन क्यों न हो, उस समाज की बराबर उन्नति होते जाना स्वाभाविक है।

जब हम समाज की प्रगति की बात कहते हैं तो वहाँ व्यक्ति की प्रगति भी अन्तर्हित है। यद्यपि हर व्यक्ति के अपने मात्र उत्थान कर लेने से भी समाज की उन्नति संभव है। किन्तु इससे मानव के स्वार्थपरायण हो जाने की आशंका बनी रहती है तभी समाज की प्रगति के माध्यम से ही व्यक्ति के उत्कर्ष को इष्ट, महत्वपूर्ण एवं उच्चकोटि का लाभ माना जाता है।

व्यक्ति जब समाज सेवा की भावना से हर काम करता है तो उसको भी उचित लाभ स्वतः ही मिल जात है। इस भावना से काम करने पर बड़ी तीव्रता से उसका मानसिक विकास होता चलता है। सामाजिक दायित्व बोध से वह अपना महत्व समझने लगता है। इस स्थिति में उसके आलस्य, प्रमाद, बेईमानी, हरामखोरी आदि दुर्गुण दूर भाग जाते हैं। कर्तव्य भार वहन करने में बड़ा आनन्द आता है। वह हर काम को अधिक उत्साह, सावधानी एवं निपुणता से सम्पन्न करता है। इससे सफलता भी परमार्थवादी को निश्चय मिलती है। सामाजिक व राष्ट्रीय सुरक्षा विकास और शान्ति व्यवस्था आदि कार्यों में स्वेच्छापूर्वक अनुशासित रह हाथ बंटाने में उसे बड़ा आत्मिक सुख एवं संतोष प्राप्त होता है।

इस प्रकार न केवल लोक कल्याण प्रत्युत आत्म कल्याण की भी सुनिश्चित संभावनायें रहती हैं। जनता जनार्दन की सेवा भगवद् भक्ति का सुफल सार्वभौमिक अभ्युदय व निःश्रेयस की सिद्धि से इहलोक परलोक का सुधार होता ही है।

----***----


प्रज्ञा की देवी गायत्री और उसकी विभूतियाँ

तैत्तरीय सं0 1।5।6।4-4।1।11।1 मैत्रायणी सं0 -4।10।3-149।14

आरण्यकों में गायत्री का उल्लेख इन स्थानों पर है- तैत्तरीय आरण्यक 1।11।210।27।1 वृहदारण्यक 6।3।11।4।8 उपनिषदों में इस महामंत्र की चर्चा निम्न प्रकरणों में है। नारायण उपनिषद् 15-2 मैत्री उपनिषद् 6।7।34 जैमिनी 4।28।1 श्वेताश्वर उपनिषद् 4।18

इस निखिल ब्रह्माण्ड में ईश्वर की अनन्त शक्तियाँ बिखरी पड़ी हैं और उनमें से जिनकी आवश्यकता होती है उन्हें मनुष्य अपने प्रबल पुरुषार्थ द्वारा प्राप्त कर लेता है। विज्ञान द्वारा प्रकृति की अनेकों शक्तियों को मनुष्य ने अपने अधिकार में लिया है। विद्युत, ताप, प्रकाश, चुम्बक, शब्द, शक्ति जैसी प्रकृति की कितनी ही अदृश्य और अविज्ञात शक्तियों को उसने ढूंढ़ा और करतलगत किया है पर ब्रह्म की चेतनात्मक शक्तियाँ भी कितनी ही है उन्हें आत्मिक प्रयासों द्वारा करतलगत किया गया सकता है। मनुष्य का अपना चुम्बकत्व असाधारण है। वह उसी क्षमता के सहारे भौतिक जीवन में अनेकों को प्रभावित एवं आकर्षित करता है। उसी आधार पर वह साधन जुटाता, सम्पन्न बनता और सफलताएँ उपलब्ध करता है। इसी चुम्बक शक्ति के सहारे वह व्यापक ब्रह्म चेतना के महा समुद्र में से उपयोगी चेतन तत्वों को आकर्षित एवं करतलगत कर सकता है।

प्रज्ञा की अभीष्ट मात्रा विद्यमान हो तो फिर और कोई ऐसी कठिनाई शेष नहीं रह जाती जो नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनाने से वंचित रख सके श्रम और मनोयोग तो आत्मिक प्रगति में भी उतना ही लगाना पर्याप्त होता है जितना कि भौतिक समस्याएँ हल करने में आये दिन लगाना पड़ता है। महामानवों को उससे अधिक कष्ट नहीं सहने पड़ते जितने कि सामान्य जीवन में आये दिन हर किसी को सहने पड़ते हैं। लोभ और मोह की पूर्ति में जितना पुरुषार्थ और साहस करना पड़ता है उससे कम में ही उत्कृष्ट आदर्शवादी जीवन का निर्माण निर्धारण किया जा सकता है। मूल कठिनाई एक ही है। प्रज्ञा प्रखरता की। वह प्राप्त हो सके तो समझना चाहिए कि जीवन को सच्चे अर्थों में सार्थक बनाने वाली ऋषि सिद्धियों की उपलब्धियों से भर देने वाली संभावनाओं के प्राप्त कर सकने में अब कोई कठिनाई शेष नहीं रह गई।

गायत्री महाशक्ति को तत्व ज्ञानियों ने सर्वोपरि दिव्य क्षमता कहा है। उसका अत्यधिक माहात्म्य बताया है। गायत्री प्रज्ञा तत्व का ही दूसरा नाम है। इस दूरदर्शी विवेकशीलता एवं आत्मोत्कर्ष के लिए अभीष्ट बल प्रदान करने वाली साहसिकता भी कह सकते हैं। आत्मिक प्रगति के लिए किये जाने वाले अभीष्ट पुरुषार्थ में गायत्री उपासना को अग्रिणी माना गया है। यह विशुद्ध रूप से प्रज्ञा को प्राप्त करने की वैज्ञानिक पद्धति है।

‘प्रज्ञा’ शक्ति मनुष्य को आत्मिक दृष्टि से सुविकसित एवं सुसम्पन्न बनाती है। वह अपने जीवन स्तर को ऊँचा उठाकर महामानवों के उच्च स्तर तक पहुँचाता है और सामान्य जीवात्मा न रहकर महात्मा, देवात्मा एवं परमात्मा स्तर की क्रमिक प्रगति करता चला जाता है। जहाँ आत्मिक सम्पन्नता होगी वहाँ उसकी अनुचरी भौतिक समृद्धि की भी कमी न पड़ेगी। यह बात अलग है कि आत्मिक क्षमताओं का धनी व्यक्ति उन्हें उद्धत प्रदर्शन में खर्च न करके किसी महान प्रयोजन में लगाने के लिए नियोजित करता रहे और साँसारिक दृष्टि से निर्धनों जैसी स्थिति में बना रहे। इसमें दूसरों को दरिद्रता प्रतीत हो सकती है पर आत्मिक पूँजी का धनी अपने आप में सन्तुष्ट रहता है और अनुभव करता है कि वह सच्चे अर्थों में सुसम्पन्न है।

गायत्री उपासना उस ‘प्रज्ञा’ को आकर्षित करने और धारण करने की अनुभूत प्रक्रिया है जो परब्रह्म की विशिष्ट अनुकम्पा, दूरदर्शी-विवेकशीलता और सन्मार्ग अपना सकने की प्रखरता के रूप में साधक को प्राप्त होती है। इस अनुदान को पाकर वह स्वयं धन्य बनता है और समूचे वातावरण में मलय पवन का संचार करता है। उसके व्यक्तित्व से सारा सम्पर्क क्षेत्र प्रभावित होता है और सुखद सम्भावनाओं का प्रवाह चल पड़ता है।

गायत्री महाशक्ति का- उसकी उपासना का- उपलब्धियों का परिचय देते हुए तत्व दर्शियों ने बहुत कुछ कहा है। शास्त्र वचनों में इस तथ्य का उल्लेख स्थान स्थान पर हुआ है। उसमें से कुछ प्रसंग इस प्रकार हैं -

या देवी सर्वभूतेषू बुद्धि रूपेण संस्थिता। नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमस्तस्ये नमोनमः॥

जो देवी सब प्राणियों में बुद्धि रूप से अवस्थित है उसे बार बार नमस्कार है।

मेधासि देवि विदिता खिल शास्त्र साराः।

जिससे समस्त शास्त्रों के सार तत्व को जाना जाता है वह मेधा शक्ति आप ही हैं।

विद्या त्वमेव ननु बुद्धिमतां नराणां शक्तिस्त्मेव किल शक्तिमतां सदैव।

त्वं कीर्तिकांतिकमलामलतुष्टिरुपा। मुक्त्प्रिदा विरतिरेव मनुष्यलोके।

गायत्र्यसि प्रथमदेवकला त्वमेव। स्वाहा स्वधा भगवती सगुणाऽर्धमात्रा।

आम्नाय एव विहितो निगमो भवत्यै संजीवनाय सततं सुरपूर्वजानाम।

-देवी भागवत्

आप ही बुद्धिमानों में बुद्धि, बलवानों में शक्ति हैं। आप ही कमला, निर्मला, कीर्ति, कान्ति, तुष्टि और मुक्ति प्रदान करने वाली हैं।

वेद की प्रधान शक्ति गायत्री आप ही हैं। स्वाहा स्वधा, सगुण, अर्ध मात्रा आपको ही करते हैं। देवता और प्राणियों का निस्तार आप ही करती हैं। आपने ही वेद और तंत्र आगम और निगम रचे हैं।

सर्वस्य बुद्धि रूपेण जनस्य हृदि संस्थिते। स्वर्गापवर्गं दे देवि नारायणि नमोस्तुते।

बुद्धि रूप में सब प्राणियों के हृदय में विराजमान स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली हे भगवती आपको नमस्कार है।

स्मृतिस्त्वं घृतिस्त्वं त्वमेवासि बुद्धिः। जरापुष्टितुष्टी घृतिः कांतिशांती। सुविद्या सुलक्ष्मीर्गंति कीर्तिंमेधे। त्वमेवासि विश्वस्य बीजं पुराणम्। उषसीं चैव गायत्रीं सावित्री व सरस्वतीम्। वेदानां मातरम् पृथ्वीमजां चैव तु कौशिकीम्।

-देवी भागवत्

तुम्हीं स्मृति, धृति, बुद्धि, जरा, पुष्टि, तुष्टि, धृति, कान्ति, शान्ति, विद्या, लक्ष्मी, गति, कीर्ति, मेधा और विश्व बीज तुम्हीं हो। उषसी गायत्री, सावित्री, सरस्वती, पृथ्वी, अजा, कौशिकी उसे वेदमाता कहते हैं।

स्मृतिशक्ति र्ज्ञानशक्तिबुद्धिशक्तिस्वरुपिणी। प्रतिभा कल्पनाशक्तिर्या च तस्यै नमो नमः॥

-ब्रह्म वैवर्त

जो स्मृति शक्ति-ज्ञान शक्ति और बुद्धि शक्ति के स्वरूप वाली है और जो प्रतिभा और कल्पना शक्ति के रूप वाली है उस देवी के लिए मेरा बार बार प्रणाम है।

अह बुद्धिरहं श्रीश्च धृतिः कीर्ति स्मृतिस्तथा। श्रद्धा मेधा दया लज्जा क्षुधा तृष्णा तथा क्षमा॥

-देवी भागवत्

मैं ही (1) बुद्धि (2) सम्पत्ति (3) धृति (4) कीर्ति (5) स्मृति (6) श्रद्धा (7) मेधा (8) दया (9) लज्जा (10) क्षुधा (11) प्यास (12) क्षमा हूँ।

या श्रीः स्वयं सुकतिनां भवनेष्व लक्ष्मीः। पापात्मनाम् कृतधियाम् हृदयेष बुद्धिः॥ श्रद्धां सतां कुलजनं प्रभवस्य लज्जा। तां त्वां नताः स्म परिपालय देवि विश्वम्॥

“जो देवी सज्जनों के गृह में स्वयं लक्ष्मी के रूप में रहती है और कुबुद्धि वालों को सद्बुद्धि प्रदान करती है, जो सत्पुरुषों के हृदय में श्रद्धा और कुलीन जनों में लज्जा रूप में रहती है उस विश्व का पालन करने वाली देवी को मैं नमस्कार करता हूँ।

स्वस्ति श्रद्धति मेधा मधुमति मधुरासंशयः प्रज्ञक्रांति। र्विद्या बुद्धिर्बलं श्रीरतुलधनमति सौम्यवाक्यावतीश्च॥

वह स्वस्ति, श्रद्धा, अतिमेधा, मध्मती, मधुरा असंशया, प्रज्ञक्रान्ति, विद्या, बुद्धि, बल, श्री, अतुलधन वाली है और अत्यन्त सौम्य वचनों वाली है।

मेधा प्रज्ञा प्रतिष्ठा मृदुमधुरगिरा पूर्णविद्या प्रपूर्ण। प्राप्ताप्रत्यूषचिन्ता प्रणवपश्वशात् प्राणिनां नित्यकर्म॥

वह मेधा की प्रज्ञा-प्रतिष्ठा-मृदु और मधुर वाणी वाली- पूर्ण विद्या से प्रपूर्णा- प्राप्त प्रत्यूष काल में चिन्ता और प्रणव के परवशा तथा प्राणियों का नित्य कर्म स्वरूपा है।

‘प्रज्ञा’ तत्व का प्रधान कार्य मनुष्य में सत असत निरूपिणी बुद्धि का विकास परिष्कार करती है। इसके मिलने का प्रथम चमत्कार यह होता है कि मनुष्य वासना तृष्णा की पशु प्रवृत्तियों से ऊँचा उठकर मनुष्योचित कर्म धर्म को समझने और तदनुसार उत्कृष्टतावादी रीति नीति अपनाने के लिए अन्तः प्रेरणा प्राप्त करता है और साहसपूर्वक आदर्शवादी जीवन जीने की दिशा में चल ही पड़ता है। ऐसे व्यक्ति स्वभावतः दुष्कर्मों से विरत हो जाते हैं और उनके क्रिया कलाप में से फिर अवाँछनीयताएँ एक प्रकार से चली ही जाती हैं। इस परिवर्तन को धर्म स्थापना और अधर्म निवारण के रूप में देखा जा सकता है।

धर्मोन्नति मधर्मस्य नाशनं जनहृद् छ्रुचिम्। मागल्ये जगतो माता गायत्री कुसनात्सदा॥

धर्म की उन्नति, अधर्म का नाश, भक्तों के हृदय की पवित्रता तथा संसार का कल्याण गायत्री माता करें।

य एतां वेद गायत्रीं पुण्यां सर्व गुणान्विताम्। तत्वेन भरत श्रेष्ठस लोके न प्रणश्यति।

-महाभारत भीष्म पर्व 1।4।16

हे राजन्! जो इस सर्वगुण सम्पन्न परम पुनीत गायत्री के तत्व ज्ञान को समझकर उसकी उपासना करता है उसका संसार में कभी पतन नहीं होता।

गीता 7-10 में भगवान् कहते हैं -

बुद्धिर्बुद्धिमाता यास्मि।

अर्थात् बुद्धिमानों में बुद्धि मैं ही हूँ।

चाणक्य ने भगवान से प्रार्थना की है-

मा गातु बुद्धिर्मम।

अर्थात् भले ही मेरा सब कुछ चला जाय पर सद्बुद्धि बनी रहे।

मस्तिष्क को, सिर को गायत्री का केन्द्र संस्थान बताया गया है। इस प्रतिपादन का तात्पर्य गायत्री को दूसरे शब्दों में विवेक उक्ति बुद्धिमता ही ठहराया गया है। सिर उसी का तो स्थान है।

कहा भी है -

अस्याश्च बुद्धिर्महत्वं स्वेतर सकल कार्य व्यापकत्वाद् महैश्वर्याच्च मन्तव्यम्।

साँख्या दर्शन 2।13(विज्ञान भिक्षु भाष्य)

यह बुद्धि ही संसार के समस्त कार्यों में प्रकाशित है ही। इसी की बड़ी सामर्थ्य है।

मस्तिष्क की तीक्ष्णता-चतुरता, सूझ-बूझ स्मरण क्षमता व्युत्पन्न मति को आमतौर से बुद्धिमत्ता समझा जाता है। पर अध्यात्म के चर्चा प्रसंग में दूरदर्शी विवेकशीलता को ‘प्रज्ञा’ कहा जाता है। यही आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता है। गायत्री महाशक्ति का अवतरण इसी प्रज्ञा शक्ति के रूप में होता है और साधक को प्रत्यक्ष उपहार यही मिलता है कि वह अपनी चिन्तन क्षमता को निष्कृष्ट प्रयोजनों से विरत करके उस तरह सोचना आरम्भ करता है, जिससे जीवनचर्या का सारा ढांचा ही बदल जाय और मात्र आदर्शवादी गतिविधियों को कार्यान्वित करने की ही सम्भावना शेष रहे।

सद्बुद्धि से प्रेरित सुव्यवस्थित क्रिया पद्धति और उत्कृष्ट रीति-नीति अपनाने वाला निश्चित रूप से सर्वतोमुखी प्रगति के मार्ग पर बढ़ता चला जाता है। जिन ऐश्वर्यों को प्राप्त करने के लिए लोग लालायित रहते हैं वे प्रबल पुरुषार्थ के आधार पर ही पाये जा सकते हैं। देवता किसी को छप्पर फाड़कर अशर्फियों का घड़ा नहीं दे जाते। वे मात्र ऐसी सत्प्रेरणा उल्लसित करते हैं जिससे चिन्तन और कर्तव्य के दोनों ही क्षेत्र सद्ज्ञान एवं सत्कर्म से ओत प्रोत हो चलें। प्रबल पुरुषार्थ से तात्पर्य इसी क्षेत्र में आगे बढ़ने से है अन्यथा सामान्य पुरुषार्थ तो दुष्ट दुर्गुणी भी करते ही हैं। जहाँ सद्बुद्धि की प्रेरणा से सत्कर्म परायणता का प्रबल पुरुषार्थ जगेगा, वहां किसी को किसी वस्तु का- किसी बात का अभाव नहीं रहेगा।

न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपाल वत् य तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्धया संयोजयन्ति तम्।

ग्वाला जिस प्रकार लाठी लेकर पशुओं की रक्षा करते हैं उस तरह देवता किसी की रक्षा नहीं करते वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं उसकी बुद्धि को सन्मार्ग पर नियोजित कर देते हैं।

गायत्री का विकास शिरो भाग में बताया गया है कि देवताओं का निवास ब्रह्मरंध्र में मस्तक में बताया गया है। सैकड़ों दिव्य शक्तियों का केन्द्र होने के कारण उस केन्द्र को शत दल कमल कहते हैं। यह संख्या हजारों असंख्यों है। इसलिए उसे सहस्र दल कमल भी कहते हैं।

गायत्रं हि शिरः शिरो गायत्र्यः। अर्कवतीषु गायत्रीषु शिरो भवति॥

-ताण्डव ब्राह्मण

सूर्य के समान तेजस्वी गायत्री का स्थान शिर है। कलाषडडडडड और कल्मषों का निराकरण होने पर आत्मा के भीतर की दिव्य विशेषतायें सहज ही प्रकट होती और प्रखर होती हैं। अंगारे पर चढ़ी राख की परत को हटा देने पर उसकी धूमिल आभा पुनः प्रकट होती है और उसका वर्चस्व सहज ही दृष्टिगोचर होने लगता है। यह वह स्थिति है जिसमें कई प्रकार की दिव्य विशेषताओं का आभास मिलता है। दिव्य जीवन स्वभावतः रहस्यमय सिद्धियों का भण्डार होता है। वह अन्तःक्षेत्र में स्वर्ग और मुक्ति जैसा आनन्द उठाता है और अपने साथ साथ अनेकों को धन्य बनाता है। शंख स्मृति का वचन है-

अभीष्टं लोकमाप्नोति प्राप्नुयात्कामभीप्सितम। गायत्री वेदजननी गायत्री पापनाशिनी।। गायत्र्या परमं नास्ति दिवि चेह न पावनम। हस्तत्राणप्रदा देवी पततां नरकार्णवे।। तस्मात्तामभ्यसेन्नित्यं ब्राह्मणों नियतः शुचिः। गायत्रीजाप्यनिरतं हव्यकव्येषु भोजयेत्।।

तस्मिन्न तिष्ठते पापमब्बिन्दुरिव पुष्करे। जपे नैव तु संसिध्येद ब्राह्मणो नात्र संशयः।। कुर्यादन्यन्न वा कुर्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते। उपांशु स्याच्छतगुणः साहस्रो मानसः स्मृतः। नोच्चैर्जंप बुधः कुर्यात्सावित्र्यास्तु विशेषतः। सावित्रीजाप्यनिरतः स्वर्गमाप्नोति मानवः।

गायत्रीजप्यनिरतो मोक्षोपायं च विन्दति।। तस्मातसर्वप्रयत्नेन स्नातः प्रयतमानसः। गायीत्री तु जपेद्भक्त्या सर्वंपापप्रणाशिनीम्।

-शंख स्मृति 12।24 से 31

गायत्री का जप करने वाला अभीष्ट लोकों को प्राप्त होता है और उसकी अभीप्सित कामनायें पूर्ण होती हैं।

गायत्री वेद जननी है, पापों का नाश करने वाली है। इससे बड़ी पवित्र करने वाली शक्ति न इस लोक में है न स्वर्ग लोक में। नरक रूपी समुद्र में गिरे हुए को वह हाथ का सहारा देकर उबारती है। अतएव गायत्री की नित्य उपासना करनी चाहिए और हवन करना चाहिए। गायत्री जप करने वाला कमल पत्रवत् रहता है। इसके ऊपर पाप नहीं चढ़ सकता।

गायत्री जप से निःसंदेह समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। अन्य कोई साधना न भी करे तो भी ब्राह्मण गायत्री का आश्रय लेकर पार हो जाता है। इस उपासना से स्वर्ग भी मिलता है और मोक्ष भी अतएव नित्य नियमित रूप से गायत्री की भक्तिपूर्वक जप साधना करनी चाहिए।

गायत्री मंत्र में जिस प्रज्ञा को धियः शब्द से संबोधित किया है और अन्तः चेतना के कण कण में ओत प्रोत करने की घोषणा की है, उसी की शास्त्रकारों ने अन्यत्र ऋतम्भरा ‘प्रज्ञा’ भूमा आदि नामों से चर्चा की है। यह शब्द सामान्य व्यवहार बुद्धि के लिए प्रयुक्त नहीं होता। चतुरता, कुशलता एवं जानकारी की जो शिक्षा स्कूलों, कारखानों एवं बाजार में सीखने को मिलती है प्रज्ञा उससे सर्वथा भिन्न है। जिस विद्या के आधार पर आत्म बोध होता है जीवन का महत्व, स्वरूप, लक्ष्य एवं उपयोग विदित होता है। सत् असत् का- उचित अनुचित का- भेद कर सकने वाली नीर क्षीर विवेचनी वृत्ति विकसित होती है उसी को गायत्री कहा जा सकता है।

गायत्री उपासना के द्वारा प्रज्ञा शक्ति प्राप्त करने के साथ साथ साधक को वे सभी विशिष्ट क्षमताएँ प्राप्त होती हैं जिनका वर्णन विद्याविधा के अवगाहन तथा योग तप आदि के साधना विधान के साथ जुड़ा हुआ है। गायत्री उपासक की आत्मिक पूँजी निरन्तर बढ़ती चली जाती है और यदि धैर्य और साहस के साथ आत्म संशोधन करते हुए अपने मार्ग पर बढ़ता ही चले तो एक दिन नर से नारायण स्तर पर पहुँचा हुआ सिद्ध पुरुष बनकर रहता है। कहा भी है-

योगनिद्रा योगरुपा योगदात्री च योगिनाम्। सिद्धिस्वरुपा सिद्धानां सिद्धिदा सिद्धियोगिनी॥ विद्याविद्यावतांत्वंच बुद्धिर्बुद्धिमतांसताम्। मेधास्मृतिस्वरुपाचप्रतिभाप्रतिभावताम्। वन्द्या पूज्या स्तुतात्वंचब्रह्मदीनांच सर्वदा। ब्राह्मण्यरुपाविप्राणां तपस्याचतस्विनाम्।

-ब्रह्म वैवर्त पुराण

आप योग निद्रा योग रूपा योगदात्री हैं जो कि योगियों को योग प्रदान किया करती हैं। आप सिद्धों को सिद्धियों के देने वाली हैं। आप सिद्धिक्ष और सिद्धियों की योगिनी हैं।

आप विद्वानों की विद्या और बुद्धिमान सत्पुरुषों की बुद्धि हैं। जो प्रतिभा वाले पुरुष हैं उनकी मेधा स्मृति और प्रतिभा के स्वरूप वाली हैं।

आप ब्रह्मा आदि समस्त देवताओं द्वारा पूजित हैं ब्राह्मणों में ब्राह्मणत्व पर तपस्वियों में तप आप ही हैं। वृहदारण्यक उपनिषद् में गायत्री के ब्रह्म विद्या का- वेद विद्या का- परब्रह्म शक्ति का स्वरूप बताया गया है। कहा गया है कि इस महाशक्ति का आश्रय लेकर साधक ब्रह्म तेज का अधिकारी बनता है और सब कुछ प्राप्त कर लेता है जो इस संसार में पाने योग्य है।

तेजोऽसि शुक्रमस्यमृतयसि धामनायसि। प्रियं देवा नायना धृष्ट देव यजनयसि। गायत्र्स्येकपदी द्विपदी त्रिपदी चतुष्पद्यपदसि। नहि पद्यते नमस्ते तुरीयाय दर्शनाय पदाय परोरजसेऽसा वदो मा प्राप्त्।

वृ0 5।14।7

हे गायत्री, तुम तेज रूप हो, निर्मल प्रकाश रूप हो, अमृत एवं मोक्ष रूप हो, चित्तवृत्तियों का निरोध करने वाली हो, देवों की प्रिय आराध्य हो, देव पूजन सर्वोत्तम साधन है।

हे गायत्री! तुम इस विश्व ब्रह्माण्ड की स्वामिनी होने की एक पदी, वेद विद्या की आधारशिला होने द्विपदी, समस्त प्राण शक्ति का संचार करने से त्रिपदी और सूर्य मण्डल के अन्तर्गत परम तेजस्वी पुरुषों की आत्मा होने से चतुष्पदी हो। रज से परे हे भगवती श्रद्धालु साधक सदा तुम्हारी उपासना करते हैं।

भूलोकस्यास्य गायत्री कामधेनुर्मता बुधैः। लोक आश्रयणो नामुं सर्वं मेवाधि गच्छति।

(गायत्री मंजरी)

“विद्वानों ने गायत्री को भूलोक की कामधेनु माना है। उसका आश्रय लेकर हम सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं।

स्तुतामया वरदा वेदमाता। प्रचोदयन्तां पावमानी द्विजानाम। आणुः- प्राणं प्रजां पशुंकीर्ति- द्रविणं ब्रह्मवर्चस मह्यं दत्वा व्रजत ब्रह्मलोकम्।

‘‘द्विजों को प्रेरणा देने वाली पवित्र वेदमाता गायत्री की मैं स्तुति करता हूँ। अब मुझे आयु, बल, संतति, पशु, कीर्ति, धन, ब्रह्मवर्चस, अर्थात् वेद ज्ञान देकर ब्रह्मलोक पहुँचावें।’’

गायत्र्या सर्व संसिद्धिर्द्विजानां श्रुति संमता।

वेद वर्णित सारी सिद्धियाँ गायत्री उपासना से मिल सकती हैं।

यद्मत्स्पृशति हस्तेन यच्च पश्यति चक्षुषा। पूतं भवति तत् सर्वं गायत्र्या न परं विदुः॥

-गरुड़ पुराण

जिस-जिसका हाथ स्पर्श करता है और जो-जो नेत्र से देखता वह सभी पूत हो जाता है। गायत्री से परे अन्य कुछ भी नहीं है। यह गायत्री सर्वोपरि शिरोमणि मंत्र है।

“यतः साक्षात् सर्वदेवतात्मनः सर्वात्मद्योतकः सर्वात्म प्रतिपादकोऽयं गायत्री मंत्रः।’’

“इस प्रकार यह गायत्री मंत्र साक्षात् सर्व देवता स्वरूप सर्व शक्तिमान, सबको प्रकाश देने वाला और परमात्मा के सर्वात्म स्वरूप का ज्ञान करने वाला है।’’

ओजश्शक्ति बल प्रभाव सुषमा तेजस्सु वीर्यप्रभा। ज्ञानैश्वर्य महस्सहो जययशस्स्थैर्य प्रतिष्ठाश्रियः। विज्ञान प्रतिभा मतिस्मृतिधृति प्रज्ञाप्रथस्सु ज्वलाः। वर्णौस्त्वन्मानुगै स्त्रिरषभि रहो बर्ध्यन्त एवात्रमे।

“ओज, शक्ति, बल, महिमा, कान्ति, तेज, पराक्रम, प्रकाश, ज्ञान, ऐश्वर्य, विकास, सहनशक्ति, जय, कीर्ति, स्थिरता, प्रतिष्ठा, लक्ष्मी, विज्ञान, प्रतिभा, मति, स्मृति, धृति, प्रज्ञा, ख्याति, यह चौबीस गुण हे माता! तुम्हारे मंत्र में रहने वाले चौबीस वर्णों द्वारा मुझमें अभिवृद्धि पा रहे हैं।

देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरुपा पशवो वदन्ति। सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुतैतु॥

-देव्युपनिषद् 10

देवताओं द्वारा उत्पन्न की हुई जिस वाणी को सब बोलते हैं। जो कामधेनु के समान सुखदायक है। बल और धन देने वाली है। उसका हम स्तवन आराधन करते हैं।

यतः साक्षात् सर्व देवतात्मकः सर्वात्मद्योतकः सर्वात्मप्रतिपादकोऽयं गायत्री मंत्रः।

-संध्या भाष्य।

यह गायत्री मंत्र साक्षात् सर्व देवता स्वरूप, सर्व शक्तिमान, सर्वत्र प्रकाश करने वाला तथा सर्वत्र आत्मा को प्रखर बनाने वाला है।

गायन्ति त्वा गायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः। ब्रह्मणास्त्वा शतक्रिता उदवंशमिव येमिरे॥

मन्त्रवेत्ता मनीषी गायत्री का ही गान करते हैं। कर्मयोगी, याज्ञिक सविता की इस परम शक्ति गायत्री की ही उपासना करते हैं वेदवेत्ता विद्वान तेरी ही यश पताका उड़ाते फिरते हैं।


मनुस्मृति में गायत्री के उद्भव (kahani)

मनुस्मृति में गायत्री के उद्भव के सम्बन्ध में यह कथा पाई जाती है कि इस सृष्टि के कर्ता ब्रह्मा ने ऋक्, यजु और साम-इन तीन वेदों से क्रमशः ‘अ’ ‘उ’ ‘म’ तीन अक्षर निकाले और एकाक्षर ‘ओम्’ की रचना की। इसके साथ पृथ्वी, अन्तरिक्ष और स्वर्ग के प्रतीक स्वरूप भूः भुवः स्वः को उसमें सम्मिलित किया गया। तत्पश्चात् ब्रह्माजी ने ‘तत् सवितुः’ आदि से प्रारम्भ करके पवित्र गायत्री मंत्र के अन्य अक्षरों की रचना करते हुए तीन मात्राओं का दोहन किया।

इस मंत्र की उपासना से आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इन तीनों तापों से मुक्ति मिलती है। गायत्री की उपासना से अविद्या काम और कर्म इन तीन ग्रन्थियों का नाश होता है, और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष ये इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।

-स्वामी शिवानन्द

----***----


कलि का निवास

महाभारत युद्ध के बाद पाँडवों ने वर्षों तक राज्य किया और बाद में यथावसर वानप्रस्थ को चले गये। इसके बाद युवराज परीक्षित राज सिंहासन के अधिकारी बने और वे धर्मपूर्वक शासन करने लगे। वे शौर्य, पराक्रम, बल और ऐश्वर्य में अपने पूर्वजों के समान थे। उन्हीं दिनों परीक्षित ने सुना कि उनके साम्राज्य में कलियुग का प्रवेश हो गया है। इससे वे क्षुब्ध तो हुए-क्योंकि उन्होंने महर्षियों से सुन रखा था कि कलि का प्रभाव मनुष्य को धर्म और नीति के मार्ग से पदच्युत कर अधःपतित बनाने वाला है। लेकिन तत्क्षण ही उन्हें आशा भी बँधी कि उन्हें अपने शौर्य पराक्रम परखने का अवसर मिला है।

तुरन्त परीक्षित हाथ में धनुष-बाण लेकर अपने चुने हुए सैन्याधिकारियों के साथ कलियुग को खोजने और उससे युद्ध कर, उसे परास्त करने के लिए निकल पड़े। जहाँ-जहाँ भी उन्होंने पदार्पण किया, वहाँ-वहाँ उन्हें अपने पूर्वजों का सुयश सुनने को मिला और भगवान श्रीकृष्ण का यशोगान श्रवण किया-जिन्होंने गर्भ में ही परीक्षित की, अश्वत्थामा द्वारा उन्हें मारने के लिए फेंके गये ब्रह्मास्त्र से रक्षा की थी।

इन सब लोक चर्चाओं को सुनकर महाराज परीक्षित का हृदय भगवान के प्रति श्रद्धा और उनकी अचिन्त्य कृपा के प्रति कृतज्ञता से अवनत हो उठता था।

परीक्षित कलि को खोजते हुए गाँव-गाँव नगर-नगर व वन प्रान्तर में घूमते फिरे परन्तु उन्हें कलियुग का प्रभाव कहीं नहीं दिखायी दिया। एक स्थान पर उन्होंने देखा गाय और बैल कुछ बातें कर रहे थे। शिविर लगा हुआ था। गाय बैल का वार्तालाप सुनकर वे शिविर से बाहर आये। बैल के चारों पैरों में केवल एक ही ठीक था। शेष तीन टूटे हुए थे। गाय बैल से पूछ रही थी-वृषभ देव! आपके तीन पाँवों को क्या हुआ?

बैल ने कहा-कल्याणि! अब कलियुग का आगमन हो गया है। उसने आते ही मेरे तीनों पैर तोड़ डाले और मुझे लगता है कि अब चौथा भी अधिक समय तक सकुशल नहीं रह पायेगा।

‘क्यों आर्य?’

‘आखिर कलि ही तो ठहरा’- बैल ने कहा- ‘और आप भी तो अब कृश हो गई है।’

इतने में ही परीक्षित ने पूछा- मातु और देव आप सामान्य तो नहीं दिखायी देते। कृपा कर अपना परिचय दीजिए।

परिचय प्राप्त कर परीक्षित ने जाना कि गाय तो पृथ्वी है और वृषभ धर्म। धर्म के चारों चरण सत्य, शौच, करुणा और सेवा में से तीन पैर विक्षत हो गये हैं। पृथ्वी भी कृश और क्षीण है। अतः उन्होंने कलियुग का वास स्थान पूछा।

धर्म ने बताया कि कलि मन में रहता है और वहीं से मनुष्य को भ्रान्त करता है जिससे उसे धारण करने वाले धर्म की यह दशा हुई। परीक्षित ने कलि को खोजा और जब वह शिशु के रूप में मिला तो उसे मारने के लिए उद्यत हुए।

‘क्षमा करें आर्य’-कलि ने चीत्कार कर कहा ‘मैं आपकी शरण हूँ।’

‘शरणागत दया के आदर्श से अभिप्रेरित परीक्षित के हाथ जहाँ के तहाँ रुक गये, परन्तु उन्होंने कहा भी- ‘‘मैं तुम्हें इसी शर्त पर क्षमा कर सकता हूँ कि पृथ्वी पर से चले जाओ।’’

“कहाँ चला जाऊँ?” नियति ने मुझे पृथ्वी पर ही रहने के लिए आदेश दिया है। हाँ इतना कर सकता हूँ कि आप जिस स्थान के लिए कहें वहीं रहने लगूं और वहाँ से रंचमात्र भी इधर-उधर न होऊ-कलि ने कहा।

तब राजा परीक्षित ने कहा- ‘ठीक है तुम्हारे रहने के लिए द्यूत (छल) मद्यपान (व्यसन), परस्त्री संग (व्यभिचार) हिंसा और सुवर्ण (लोभ) जहां हो तुम वहीं रहो।

और कहते हैं कि तभी से कलि इन पाँचों स्थानों पर निवास करने लगा।

----***----


प्रसन्न रहें- प्रसन्न रखें।

अन्धकार का डरावनापन सर्वविदित है, उसमें भटकते हुए ठोकरें भी लगती हैं और कई प्रकार की अन्य हानियाँ उठानी पड़ती है। इतना सब होते हुए भी विचार करने में इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि अन्धकार नाम का कोई पदार्थ इस संसार में नहीं है। प्रकाश के अभाव को ही अन्धकार कहते हैं। प्रकाश की नाप-तौल है, उसकी तरंगें देखी, पकड़ी और प्रयोग में न लाई जा सकती हैं क्योंकि वह एक सत्ता सम्पन्न पदार्थ है। अन्धकार के सम्बन्ध में ऐसा कुछ नहीं हो सकता। उसे नापा-तोला, पकड़ा, समेटा नहीं जा सकता, क्योंकि उसका कोई अस्तित्व नहीं है। यदि प्रकाश की तरह अन्धकार भी कोई पदार्थ रहा होता तो उसका भी लेखा-जोखा रखना सम्भव हो जाता। इतना होते हुए भी आश्चर्य यह है कि अन्धकार को हम अनुभव करते और उससे प्रभावित होते हैं।

शरीर पीड़ा के साथ जुड़े हुए कष्टों का ही इस संसार में अस्तित्व है, उनकी मात्रा बहुत स्वल्प है। वे भी हमारी आहार-विहार सम्बन्धी भूलों के प्रतिफल हैं। प्रकृतितः उनका भी अस्तित्व बहुत स्वल्प है। अधिकाँश मनुष्य जिन दुःखों से दुःखी पाये जाते हैं उनमें से अधिकाँश मानसिक होते हैं। अनुपात की दृष्टि से मानव जीवन में 5 प्रतिशत शरीर पीड़ा जैसे वास्तविक कष्ट हैं और 95 प्रतिशत मानसिक, जिन्हें काल्पनिक भी कह सकते हैं। इनका अस्तित्व अन्धकार की तरह दीखता तो है, पर वस्तुतः वह है नहीं। प्रकाश के अभाव का नाम अन्धकार है और दूरदर्शी, विवेक बुद्धि के अभाव का नाम मानसिक कष्ट है। खीज, शोक, उद्वेग, असन्तोष, रोष इसी श्रेणी में गिने जा सकते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, आक्रोश, प्रतिशोध इसी श्रेणी में आते हैं। इन्हीं मनोविकारों की प्रतिच्छाया अनेक प्रकार के मानसिक कष्टों के रूप में विभीषिका बनकर सामने खड़ी रहती है और विभिन्न स्तर के त्रास देकर इसी जीवन में नारकीय यातनाओं का अनुभव करती है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि यह नारकीय उत्पीड़न उनका अपना ही गढ़ा बनाया हुआ है। इसमें दूसरे तो निमित्त बना भर लिये गये हैं। वस्तुतः यह अपनी ही उगाई फसल है जिसे मनःक्षेत्र में स्वयं ही बोया और स्वयं ही काटा जाता है। किसान अपनी मर्जी से फसल बोता है। मनुष्य भी सुख और दुःख के स्वर्ग और नरक के बीज बोता है और प्रयत्नपूर्वक उन्हें सींचता, काटता है। आश्चर्य इतना ही है कि वह अपने प्रयास को दूसरों की कृति समझकर उन्हें श्रेय या दोष देता रहता है।

सुख सब चाहते हैं, पर यह नहीं देखते कि बीज दुःख का बो रहे हैं। अपने बोये काँटे जब अपने पैर में लगते हैं तब भी सूझता इतना ही है कि दोष बबूल को धरती को या किसी अन्य को देकर मन बहलायें और आत्म प्रवंचना करके वस्तुस्थिति से आंखें मूंदे रहें। शुतुरमुर्ग शिकारी को देखकर बालू में मुँह गढ़ा लेता है और सोचता है कि जब मैं ही शिकारी को नहीं देख रहा तो वह भी मुझे क्योंकर देख पायेगा। उसकी यह उपहासास्पद विडम्बना बचाव का आधार नहीं बनती वरन् उल्टे सहज ही शिकारी की पकड़ में धकेल देती है। अपनी क्रिया और उसकी प्रतिक्रिया को समझते हुए दुःखों का कारण और निवारण ढूंढ़ने में संलग्न होने की आवश्यकता थी, पर होता उलटा है लोग दूसरों पर दोष मढ़ते हैं और अपने को निर्दोष समझते हैं। ऐसी दशा में स्वयं तो वस्तुस्थिति को समझा ही कैसे जा सकेगा? उलटे किसी आत्म-सुधारक को- सलाह देने वाले को कोप का भोजन बनना पड़ेगा।

जो हो, तथ्य अपने स्थान पर यथावत बने ही रहेंगे वे किसी के झूठलाने पर भी अपने स्थान पर अडिग रहेंगे। साधन सम्पन्न एवं अनुकूलताओं से भरे पूरे व्यक्ति भी विकृत चिन्तन के शिकार बनते और अहिर्निश दुःख दुर्भाग्य का रोना रोते और त्रास सहते हैं। इसके विपरीत जिनके सोचने की पद्धति सही है वे स्वल्प साधनों के- कठिन परिस्थितियों के और अनगढ़ लोगों के बीच रहते हुए भी ताल-मेल बिठा लेते हैं और हँसती-हँसती हल्की फुलकी जिन्दगी जी लेते हैं। समझा यह जाता है कि परिस्थितियाँ मनुष्य को प्रभावित करती और सुख-दुःख के आधार बनाती हैं। जबकि वस्तुस्थिति मनःस्थिति की प्रधानता सिद्ध करती है और बताती है कि चिन्तन का स्तर ही औंधे-सीधे दृश्य दिखाता है और वही रुलाने-हँसाने वाले सपने सामने ला खड़े करता है। यह स्वप्न भूमिका जहाँ से प्रादुर्भूत होती है उस केन्द्र को समझ पकड़ लिया जाय तो फिर खीज से सदा सर्वदा के लिए छुटकारा पाया जा सकता है और आनन्द, उल्लास का वातावरण अविच्छिन्न रूप से जीवन क्रम के साथ जुड़ा रह सकता है।

जो उपलब्ध है उसका लेखा-जोखा लिया जाय, उपयोगिता खोजने की गुणग्राही दृष्टि रखी जाय तो जी सदा हलका रहेगा। सफलता-असफलता दूसरों के हाथ की वस्तु समझकर कर्त्तव्य पालन पर अपने सन्तोष को केन्द्रीभूत रखा जाय तो प्रसन्न रहने का आधार मिल सकता है। भौतिक सम्पदा को अभाव रहने तक ललक जगाये रहने वाली और मिलते ही भार बन जाने वाली जादूगरी भर समझा जाय और सफलताओं का समग्र केन्द्र परिष्कृत गुण, कर्म, स्वभाव के रूप में उपलब्ध होने वाली विभूतियों को माना जाय तो महत्वाकाँक्षाओं का केन्द्र बदल जायेगा। ऐसी दशा में मनुष्य सम्पत्तिवान बनने की अपेक्षा विभूतिवान, आत्मवान् बनने का प्रयास करेगा। बड़ा आदमी बनने की महत्वाकाँक्षा का पूरा होना न होना परिस्थितियों पर निर्भर है, पर महामानव कोई भी स्वेच्छापूर्वक बन सकता है। अपने दोषों का निवारण और गुणों का सम्वर्धन पूर्णतया अपने हाथ में है। सम्पत्ति का बाहुल्य और स्थायित्व विभूतियों के साथ जुड़ा हुआ है। विभूतिवान बनने का प्रयत्न करने में दुहरा लाभ है। प्रसन्नता के सारे आधार मिल जाते हैं और व्यक्तित्व का वजन इतना बढ़ जाता है कि उससे आत्म-सन्तोष एवं लोक सम्मान प्रचुर मात्रा में प्राप्त हो सके।

बाहरी परिस्थितियाँ कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हों, विवेकवान मनुष्य को बहुत अधिक विचलित नहीं कर सकतीं। जिनने अपने को हानि पहुँचाई है उससे प्रतिशोध लेने की बात सामान्य लोगों के मन में उठती है। विवेकवान ऐसे प्रसंगों पर दूसरे ढंग से सोचता है। वह रोग को मारने और रोगी को बचाने की चिकित्सक बुद्धि से काम लेता है। प्रतिशोध लेने पर आक्रमणकारी जैसी दुष्टता बरतने पर अपना मन भी उसी स्तर का निकृष्ट बन जाता है। सुधार की दृष्टि से दूरदर्शिता पूर्ण प्रयोग करने में अमुक सीमा तक विरोध, असहयोग, संघर्ष जैसे अस्त्र काम में लाये जा सकते हैं। दण्ड की आवश्यकता हो तो वह अपनी प्रतिशोध भरी उत्तेजित मनःस्थिति में सम्भव नहीं हो सकता। अपराध और दण्ड का सन्तुलन मिलाने के लिए निष्पक्ष न्यायाधीश ही उपयुक्त हो सकता है। इन परिस्थितियों में सामाजिक भर्त्सना एवं राजकीय दण्ड से उसे उतना प्रताड़ित कराया जा सकता है, जितना कि उसके सुधार परिवर्तन के लिए आवश्यक है। अपने साथ बरती गई अनीति का स्वयं ही दण्ड देने पर उतारू हो जाना और मनमानी प्रताड़ना देने के लिए उठ पड़ना अनुचित है। चोर को पकड़कर मार डालने पर मारने वाला भी दण्डनीय बनेगा। किस चोरी में कितना दण्ड मिलना चाहिए यह निश्चित करना न्यायाधीश का काम है। कानून बहुत ही पवित्र प्रयोजन है। उसका प्रयोग उपयुक्त विचारशील व्यक्ति को ही सौंपना चाहिए। आवेशग्रस्त उसे हाथ में लेकर नया अनर्थ ही प्रस्तुत करेगा।

घर में चोरी, दुराचार की घटनायें हो जाने पर कई बार लोग प्राणघातक दण्ड देने पर उतारू हो जाते हैं ऐसे उद्दण्ड प्रतिशोध उन अपराधी लोगों के कृत्य से भी अधिक निन्दनीय हैं। सुधार के लिए सत्प्रयत्न करने में हर उचित कदम उठाया जाना चाहिए।

सन्तुलित और विकासवान अन्तःचेतना की परीक्षा यह है कि वह सन्तुष्ट, आशान्वित पायी जायेगी। इन दोनों विभूतियों की प्रत्यक्ष पहचान है होठों की मुस्कान। जिसके पास यह है समझना चाहिए कि उसके पास आकर्षक जादू मौजूद है देने के लिए बहुत कुछ संग्रहकर लिया है। क्रोध, आवेश का चिन्ह तमतमाया हुआ चेहरा, आक्रमण के लिए आतुरता और लाल-लाल आँखों के रूप में उभर कर आता है। भयभीत की आकृति पीली पड़ जाती है- शरीर काँपता, पसीना छूटना, साँस फूलना, रोमाँच होते और भगाने की राह ढूंढ़ते देखा जाता है। इसी प्रकार अन्य प्रकार की मनःस्थितियाँ अपनी उपस्थिति का प्रमाण देती हैं। शान्त, सौम्य, सज्जन मनुष्य भी उनकी मुख मुद्रा देखकर पहचाने जा सकते हैं। आन्तरिक सन्तोष और उत्साह की स्थिति चेहरे पर थिरकती मुस्कान के रूप में देखी जा सकती है। इस अभिव्यक्ति में हल्के फुल्के दृष्टिकोण का परिचय मिलता है और लगता है भीतर का आन्तरिक उल्लास अपनी सुगन्ध खिले हुए पुष्प की तरह बाहर फूटकर अपनी उपस्थिति का परिचय दे रहा है। हँसने और हँसाने की आदत हर दृष्टि से सराहनीय है उसकी जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही कम है। जिनने अपने ऊपर से चिन्ताओं का- अवाँछनीय मनोवृत्तियों का भार हल्का कर लिया होगा केवल उन्हें ही हँसता, मुसकाता देखा जा सकेगा।

अपने आप में प्रसन्न रहने की आदत एक अच्छी मानसिक साधना के रूप में भी आरम्भ की जा सकती है। एकान्त हो या काम करने का समय, हर घड़ी प्रसन्न मुद्रा में रहने का प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए दर्पण की सहायता ली जा सकती है। अपनी परीक्षा आप लेते रहना चाहिए कि भारी, दवा, पिसा, मरा, टूटा, हारा जीवन क्रम होने की चुगली करने वाला घटियापन कहीं चेहरे पर झाँक तो नहीं रहा है। उदासी, खीज, क्रोध, चिन्ता का एक भी चिन्ह कहीं दीख पड़े तो तुरन्त सजग हो जाना चाहिए और प्रयत्नपूर्वक उसे हटाकर मुस्कान की प्रतिष्ठापना करनी चाहिए। अभ्यास के रूप में यह क्रम जारी रखा जा सकता है। धीरे-धीरे वह आदत के रूप में विकसित होता चला जायेगा और व्यक्तित्व में चार चाँद लगा देगा। अपने को सुन्दर और आकर्षक बनाने का उपाय इससे अच्छा दूसरा और कोई नहीं हो सकता कि हँसने, मुसकाने का स्वभाव बना लिया जाय और उसे न केवल अनुकूलता की स्थिति में वरन् प्रतिकूलता में भी बनाये रखा जाय। यदि इतनी सिद्धि मिल जाय तो समझना चाहिए कि जीवन साधना का एक छोटा किन्तु अति महत्वपूर्ण सोपान मिल गया और आकर्षण शक्ति का दैवी वरदान हाथ लग गया।

घर या बाहर के किसी भी व्यक्ति से कभी भी मिलन हो-वार्ता का अवसर मिले तो मुसकराहट के रूप में उस मिलन की प्रसन्नता व्यक्त करनी चाहिए। इससे मिलने वाले व्यक्ति को लगता है हमारा स्वागत, सत्कार किया जा रहा है और आत्मीयता भरा सम्मान दिया जा रहा है। धन, उपहार या कोई भौतिक वस्तु न देने पर भी मिलने वाले को लगता है कि उसे आनन्ददायक भावनात्मक अनुदान मिल रहा है। इतने भर से उसकी बहुत कुछ तृप्ति होती है और स्नेह, सहयोग की आशा बँधती है। परायापन दूर करके अपनापन उत्पन्न करने का यह सहज किन्तु अति प्रभावशाली तरीका है। दूसरों को अपना बनाने का यह जादुई प्रयोग है। इसका अभ्यास करके कोई भी यह परीक्षा करता है कि उसके मित्र, सहयोगी, प्रशंसक कितनी तेजी से बढ़ते हैं और क्रमशः कितने घनिष्ठ होते हैं।

हर व्यक्ति इन दिनों कठिन परिस्थितियों और जटिल मनःस्थितियों में जकड़ा पड़ा है उसे सर्वत्र निराशा और परायेपन का ही दर्शन होता है। आशा, उत्साह, सन्तोष और हलकेपन की कहीं झाँकी ही नहीं मिलती। थका, हारा मनुष्य ऐसे वटवृक्ष की शीतल छाया में बैठना चाहता है, जो स्वयं सन्तुष्ट होने के कारण दूसरों को भी सन्तोष की शान्त शीतलता प्रदान कर सके। ऐसा व्यक्ति वही हो सकता है जो प्रसन्न चित्त एवं मुसकान भरी मुख मुद्रा साथ लिये हुए है। ऐसे परिष्कृत व्यक्तित्व को खिलते हुए ऐसे फूल की उपमा दी जा सकती है, जिसके ऊपर भौरों की प्रशंसा, मधुमक्खियों का रुझान और तितलियों का सहयोग अनवरत रूप से बरसता रहता है।

बुरी आदतें छोड़ने और अच्छी अपनाने का प्रयत्न करते रहना जीवन को सफल बनाने वाली साधना का महत्वपूर्ण सोपान है। इस दिशा में जिन्हें बढ़ना हो, उन्हें हँसने, मुस्कराने का अभ्यास आरम्भ करना चाहिए और उसे उस स्तर तक विकसित परिपक्व करना चाहिए जिसमें हर घड़ी अपनी मुख मुद्रा सहज स्वभाव बनी ही रहे। कहना न होगा कि इसके लिए मात्र अभ्यास ही पर्याप्त न होगा वरन् चिन्तन को हल्का फुलका रखने वाले दृष्टिकोण को भी अपनाने का प्रयास करना होगा। समग्र प्रसन्नता का मूल उद्गम वही तो है।

----***----


गायत्री से बढ़कर और कुछ नहीं

भारतीय धर्म के उपासना विज्ञान में गायत्री को सर्वोपरि माना गया है और सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसके कई कारण हैं। एक तो यह कि इस महामन्त्र के अक्षरों के बीज रूप में मानवी संस्कृति एवं आदर्शवादिता के सारे सिद्धान्त सन्निहित हैं। इसे विश्व का सबसे छोटा मात्र चौबीस अक्षरों का वह ग्रन्थ कह सकते हैं, जिसमें धर्म और अध्यात्म का समूचा तत्व ज्ञान सार रूप में समाविष्ट मिल सकता है। इन अक्षरों की व्याख्या करते हुए जो कुछ मानवी प्रगति एवं सुव्यवस्था के लिए आवश्यक है; यही प्रज्ञा का विवेकशीलता का मन्त्र है। कहना न होगा कि मनुष्य जीवन की समस्त समस्यायें दुर्बुद्धि के कारण उत्पन्न होती हैं। संसार पर आये दिन छाये रहने वाले संकट के बादल अशुभ चिन्तन के खारे समुद्र में ही उठते हैं। विवेक सर्वोपरि है। सद्बुद्धि से बढ़कर इस संसार में और कुछ नहीं है। यह तथ्य प्रज्ञा की देवी गायत्री को सर्वोपरि ठहराने में सन्निहित है।

समस्त विश्व को एकता के केन्द्र पर आज नहीं तो कल केन्द्रित होना ही पड़ेगा। भिन्नता के बीच एकता के सूत्र ढूंढ़ने पड़ेंगे अन्यथा लोग एक दूसरे से लड़ने में अपनी शक्ति नष्ट करते रहेंगे। सृजन के लिए जो लगना चाहिए वह यदि विवाद, भटकाव और संघर्ष में ही नष्ट होता रहे तो फिर शान्ति और समृद्धि को उपलब्ध करने के लिए जो आवश्यक है वह हाथ में रहेगा ही नहीं। भाषा, देश, आचार एवं तत्व दर्शन की ही तरह धर्म और अध्यात्म का भी केन्द्रीकरण होना चाहिए। उपासना के क्षेत्र में भी यही होना चाहिए। अनेकानेक धर्म सम्प्रदाय, मतमतान्तर एवं उपासना विधान भले ही कुछ समय तक अलग बने रहें, पर उनके बीच एकता का सूत्री तो जुड़ा ही रहना चाहिए और उसे सर्वजनीन श्रद्धा समर्थन मिलना चाहिए। मानवी एकता की सम्भावना ऐसे ही सर्वभौम सूत्रों को अपनाने से सम्भव हो सकती है। घर में अनेक सदस्य होते हैं। सभी का सम्मान एवं सहयोग मिलता है, पर गृहस्वामी का सब पर अनुशासन रहता है इसलिए वह सर्वोपरि है। विश्व में बिखरे हुए तत्व दर्शनों एवं साधना विधानों के परिवार में मूर्धन्य मन्त्र गायत्री मन्त्र को ठहराया जाए। यह भी एक कारण मनीषिओं का गायत्री मंत्र को सर्वोपरि ठहराने का रहा होगा।

शब्द विज्ञान, स्वर शास्त्र की सूक्ष्म धारायें गायत्री महामन्त्र में जिस उत्तमता के साथ मिली हुई है, वैसा संगम अन्य किसी मन्त्र में नहीं हुआ है। साधनारत योगियों और तपस्वियों ने अपने प्रयोग, परीक्षणों और अनुभवों के आधार पर जो तुलनात्मक उत्कृष्टता देखी है उसी से प्रभावित होकर उन्होंने इस महाशक्ति की सर्वोपरि स्थिति बतायी है। यह निष्कर्ष अभी भी जहाँ का तहाँ है। मात्र जप पूजन से तो नहीं, अभीष्ट साधन प्रक्रिया अपनाते हुए अभी भी कोई इस साधना को कर सके तो उसका निजी अनुभव शास्त्र प्रतिपादित इस सर्वश्रेष्ठता का समर्थन ही करेगा। इस सन्दर्भ में मिलने वाले शास्त्र वचनों में से कुछ इस प्रकार हैं-

गायत्री जप का मत समस्त शास्त्रों में पाया जाता है-

गायत्र्यां न परम् जप्यम् (पद्यपुराण सर्ग 53।58)

न गायत्र्याः परम जप्यम् (कूर्म पुराणउत्तरार्ध 14।58)

न गायत्र्याः परम् जाप्यम् (उशनः संहिता 3।54)

न गायत्र्याः समम् जाप्यम् (पद्मपुराण पाताल 94।50)

न गायत्री समो जपः (व्याघ्रपाद स्मृति 369)

गायत्री तु परम तत्वं गायत्री परमागतिः।

(पाराशर स्मृति 5।4)

अर्थात् ‘गायत्री ही परम तत्व और गायत्री ही परम गति है।”

गायत्र्या न परं मन्त्र न बीज प्रणवादिकम्।

गायत्र्या न परं जप्यं गायत्र्या न परं तपः। गायत्र्या न परं ध्यानं गायत्र्य न परं हुतम। हविष्यं घृत संयुक्तं गायत्री मंत्र पूर्वकम।

-विश्वामित्र कल्प

अर्थात्- गायत्री से बढ़कर अन्य कोई मंत्र, जप, ध्यान, तप कहीं नहीं है। गायत्री यज्ञ से बढ़कर और कोई यज्ञ नहीं है।

गायत्री परदेवतेति गहिता ब्रह्मैव चिद्रूपिणी।

-देव्युपनिषद।

अर्थात्- “गायत्री परादेवता कही गई है और वह चित स्वरूपा गायत्री साक्षात ब्रह्म ही है।”

‘महाभारत’ में भीष्म पितामह का वचन है कि “परां सिद्धिमवाप्नोति गायत्री मुत्तमां पठेत्”

जो मनुष्य सर्वश्रेष्ठ गायत्री का जप करता है वह परम सिद्धि को पाता है।

अष्टादशसु विद्यासु मीमाँसाति गरीयसी। ततोऽपि तर्क शास्त्राणि पुराण तेम्य एव च।

ततोऽपि धर्म शास्त्राणि तेम्यो गर्वी श्रुतिर्द्विज। ततोऽप्युपनिषच्छेष्ट्रा गायत्री च तातेऽधिका। दुर्लभा सर्व मन्त्रेषु गायत्री प्रणवान्विता।

-वृहत सन्ध्या भाष्य

अठारह प्रकार की विद्याओं में मीमाँसा (कर्मकाण्ड) श्रेष्ठ है। मीमाँसा से तर्क विवेक उत्तम है। न्याय से पुराणों की गरिमा अधिक है। पुराणों में धर्मशास्त्र और धर्मशास्त्रों में वेद की महिमा अधिक है। वेदों की व्याख्या करने वाली उपनिषदों की उपयोगिता और भी अधिक है। उपनिषदों से भी गायत्री श्रेष्ठ है समस्त मंत्रों में प्रणव युक्त गायत्री की महिमा सर्वोपरि है।

गायत्रीं यः परित्यज्य चान्यमन्त्र मुपासते। न साफल्यभवाप्नोति कल्प कोटिः शतैरपि।

-वृहत संध्या भाष्य

जो गायत्री त्याग कर अन्य मन्त्रों की उपासना करते हैं वे सौ कोटि कल्पों में भी अभीष्ट सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। गायत्री यः परित्यज्य चा्य मन्त्र मुपासते।

न साफल्य भवाप्नोति जन्म कोटिः शतैरपि।

-संध्या भाष्य

जो गायत्री मन्त्र को त्यागकर अन्य मंत्रों की उपासना करता है वह चिरकाल में भी सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।

जपतां जुह्यतां चैव नित्यं च प्रयतात्मनाम्। ऋषीणाँ परमं जप्यं गुह्य मेतन्नराधिप।

-महाभारत

नित्य जप करने के लिए-हवन करने के लिए ऋषियों का परम मंत्र गायत्री ही है।

गायत्री सर्व मन्त्राणां शिरोमणि तया स्थिता। विधानामपि तेनैतां साधयेत्सर्व सिद्धये। त्रिव्याहृति युतां देवीमोंकार युग सम्पुटाम्। उपास्य चतुरोवर्गान् साधयेद्यो न सोन्धकोः। देव्य द्विजत्व मासाद्य श्रेय सेव्य रतास्तुये। ते रत्नमभिवांच्छन्ति हित्वा चिन्तामणिं करात्।

-ब्रह्म वार्तिक

गायत्री सब मन्त्रों में तथा विद्याओं में शिरोमणि है। उससे सब इन्द्रियों की साधना होती है। जो व्यक्ति इस उपासना से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चारों पदार्थों को प्राप्त नहीं करते वे अन्ध बुद्धि वाले है। जो गायत्री जैसे मन्त्र के होते हुए भी अन्य मन्त्रों की उपासनाएँ करते हैं वे ऐसे ही मूर्ख हैं जैसे हाथ आई चिन्तामणि को फेंक कर छोटे छोटे रत्न कर्णों को ढूंढ़ने वाले मूर्ख।

गायत्री वेद जननी गायत्री लोक पावनी। न गायत्र्या परं जप्यमेतद्विज्ञाय मुच्यते॥

-कूर्म पुराण

“वेद जननी गायत्री इस संसार में सर्वाधिक पवित्र करने वाली है। विद्वानों का कथन है कि गायत्री से बढ़कर अन्य कोई जप नहीं है।

सावित्र्यास्तु परं नास्ति शोधनम् सर्व कर्मंणाम्

-अन्नि वृद्धा चस्तम्बौ

सब कर्मों को शुद्ध करने के लिए गायत्री से बढ़कर और कुछ नहीं है।

अष्टादशसु र्विद्यासु मीमांसातिगरीयसी। ततोऽपि तर्कशास्त्राणि पुराणं तेभ्य एवच॥

ततोऽपि धर्मशास्त्राणि तेभ्यो गुर्वी श्रुतिर्द्विज। ततोऽप्युपनिषच्छेष्ट्रा गायत्री च ततो धिका॥

-स्कन्दपुराण काशीखण्ड 9।49।50

अष्टादश विद्याओं में मीमाँसा शास्त्र, मीमाँसा से तर्क शास्त्र, तर्कशास्त्र से पुराण शास्त्र, पुराण से धर्म शास्त्र, धर्म शास्त्र से वेद, वेद से उपनिषद् और उपनिषद् से गायत्री का अधिक महत्व है।

कुर्यादन्यन्नवा कुर्यादनुष्टानादिकम् तथा। गायत्री मात्र निष्ठस्तु कृत्य कृत्यो भवेद्विजः॥

-गायत्री तन्त्र

अन्य उपासना करें न करें गायत्री मन्त्र की उपासना करने वाला द्विज कृतकृत्य हो जाता है।

सप्त कोटि महा मन्त्रा गायत्री नायकाः स्मृताः। आदिदेवमुपासन्ते गायत्री वेदमातरम्॥

-गायत्री कल्प

“करोड़ों मन्त्रों में सर्व प्रमुख मन्त्र गायत्री है जिसकी उपासना ब्रह्मा आदि देव भी करते हैं। यह गायत्री ही वेदों का मूल है।

इत्युक्त्वा च महादेवी मूलप्रकृतिरीश्वरी॥ अन्तर्धानं गता सद्यो भक्त्या देवैरभिष्टुता॥ ततःसर्वे स्वगर्व तु विहाय पदपंकजम्॥

सम्यगाराधयामासुर्भगवत्याः परात्परम्॥ त्रिसंध्यं सर्वदा सर्वे गायत्रीजपतत्पराः॥ यज्ञभागादिभिः सर्वे देवीं नित्यं सिषेविरे॥

न विष्णुपासना नित्या वेदेनोक्ता तु कुत्रचित्॥ न विष्णुदीक्षां नित्यास्ति शिवस्यापि तथैव च॥ गायत्र्युपासना नित्या सर्ववेदैः समीरिता॥

यया बिना त्वधः पातो ब्राह्मणस्याऽस्ति सर्वथा॥ तावता कृतकृत्यत्वं नान्यापेक्षा द्विजस्य हि॥

गायत्री मात्र निष्णातो द्विजो मोक्षमवाप्नुयात॥ कुर्यादन्यं न वा कुर्यादिति प्राह मनुः स्वयम॥

-देवी भागवत 12।8।84। से 91

व्यास जी बोले अपना निर्देश लेकर भगवती अन्तर्धान हो गई। पीछे सब देवता अभिमान और अज्ञान छोड़कर उसी परम शक्ति की उपासना में लग गये।

सब त्रिकाल संध्याराधना पूर्वक गायत्री मंत्र के जप में तत्पर रहने लगे। यज्ञ भाग देने लगे। विष्णु अथवा शिव की उपासना नित्य नहीं है गायत्री उपासना को वेदों ने नित्य कहा है। इस गायत्री से रहित विप्र का अधः पतन हो जाता है। किसी भी अन्य उपासना का उतना सत्परिणाम नहीं, जितना गायत्री का। केवल गायत्री उपासना से ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है भले ही कोई साधना न करें। मनु भगवान ने भी ऐसा ही कहा है।

अष्टादशसुविद्यासु मीमाँसातिगरीयसी। ततापितकशास्त्राणि पुराणे तेभ्य एव च॥ ततोपिधर्मशास्त्राणितेभ्यो गुर्वोश्रुतिर्द्विज॥ ततोप्युपनिषच्छेष्ट्रागायत्री चततोधिका॥ दुर्लभासर्वमन्त्रेषु गायत्री प्रणवान्विता। न गायत्र्याधिकं किन्चित्त्रयीषु परिगीयते। न गायत्रीसमो मन्त्रोनकाशीसदृशी पुरी।

-स्कन्द पुराण

अठारह विद्याओं में मीमाँसा विद्या अत्यन्त बड़ी है। इससे भी अधिक गुरु तर्क शास्त्र है। उनसे भी अधिक पुराण हैं और उनसे भी अधिक धर्म शास्त्र होते हैं और इनसे अधिक गुरु श्रुति है। हे द्विज! श्रुतियों से भी अधिक गुरु उपनिषद् हैं और इनसे भी परम श्रेष्ठ गायत्री होती है। इससे अधिक कोई भी नहीं है। प्रणव से समन्वित गायत्री सभी मंत्रों में दुर्लभ है। त्रयी में अर्थात् वेद त्रयी में गायत्री से अधिक कुछ भी नहीं परिणीत किया जाता है, गायत्री के समान कोई अन्य मन्त्र नहीं है और काशी के समान अन्य कोई भी पुरी नहीं है।

गायत्री वेद जननी गायत्री ब्राह्मणप्रसूः। गातारं त्रायतेयस्माद्गायत्री ते न गीयते॥

वाच्यवाचकसम्बन्धोगायत्र्याः सवितुर्द्धयो। वच्योसौ सविता साक्षाद्गायत्री वाचिका परा।

प्रभावेणैवगायत्र्याः क्षत्त्रियः कौशिकोवशी। राजर्षित्वंपरित्यज्यब्रह्मर्षिपदमीयिवान्।

सामर्थ्यं प्राप चात्युच्चेरन्यदभुवनसर्जने। किं किं न दद्याद्गायत्री सम्यगेवमुपासिता।

यह गायत्री वेदों की जननी है। गायत्री ब्राह्मणों की प्रसूत करने वाली है। क्योंकि जो गायन (जाप) करता है उसकी यह सुरक्षा (त्राण) किया करती है इसीलिए इसको गायत्री कहा जाता है। गायत्री और सविता इन दोनों का वाच्य वाचक सम्बन्ध होता है वाच्य तो भगवान सविता देव है और गायत्री साक्षात परा इनकी वाचिका होती है। इस गायत्री के प्रभाव से ही क्षत्रिय वंशी कौशिक (विश्वामित्र) राजर्षित्व का त्याग करके ब्रह्मर्षि के पद को प्राप्त हो गये हैं। दूसरा बहुत ऊँचा भुवन निर्माण करने की भी उन्होंने सामर्थ्य प्राप्त कर ली थी। भली भाँति से उपासना भी की हुई गायत्री देवी मनुष्य को क्या-क्या नहीं दे दिया करती है?

अन्यान्य मन्त्रों की तुलना में गायत्री की श्रेष्ठता बताई गई है और यह भी कहा गया है कि इस एक ही बीज उपासना को अपनाने से वेदाध्ययन का लाभ मिल जाता है। अन्य मन्त्रों की तुलना में गायत्री की विशेषता से इनकार नहीं किया जा सकता। इस प्रसंग में कुछ प्रमाण इस प्रकार मिलते हैं-

सर्वेषा जप सूक्तानामृचाञ्य यजुषां तथा। साम्नां चैकाक्षरा दीनां गायत्री परमो जपः।

-वृद्ध पाराशर स्मृति 4।4

वेदों के अनेक मन्त्र, जप, सूक्त ओंकार आदि अनेक उपासनाएँ हैं। उन सब में गायत्री मन्त्र परम श्रेष्ठ है।

अष्टादशसु विद्यासु मीमाँसातिगरीयसी। ततोऽपि तर्क शास्त्राणि पुराणं तेभ्य एव च॥ ततोऽपि धर्म शास्त्राणि तेभ्यो गुर्वी श्रुतिर्द्विज। ततोऽप्युनिषच्छेष्ट्रा गायत्री च ततोऽधिका॥

(स्कन्द पुराण, काशी खण्ड 1।49-50)

अर्थात्- “अठारह विद्याओं में मीमाँसा बहुत महत्वपूर्ण माना गया है। उससे अधिक तर्कशास्त्र तर्कशास्त्र से अधिक पुराण, पुराण से धर्मशास्त्र, धर्मशास्त्र से वेद वेद से उपनिषद् और उपनिषद् से गायत्री का महत्व अधिक है।

सर्वेंषां जप सूक्तानामृचान्च यजुषान्तथा। साम्नां चैकाक्षरादीनां गायत्री परमो जपः॥ तस्याश्चैव तु ओंकारों ब्रह्मणा या उपासितः। आभ्यान्तु परमं जप्यं त्रैलोक्येऽपि न विद्यते॥

(वृहत् पाराशर संहिता)

“सम्पूर्ण सूक्तों में ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेद में तथा प्राणवादि जितने हैं उन सब में गायत्री सर्वश्रेष्ठ कहा है। जिस ओंकार की उपासना ब्रह्माजी ने की थी वह भी उसी का अंग है। इन दोनों से बढ़कर जपने योग्य तीनों लोकों में और कुछ नहीं है।”

पुराणं संहिताशास्त्रं स्मृतिशास्त्रं तथैव च। गायत्र्याः परमेशानि सदृर्थं ब्रह्मसम्मितम्॥

हे पदमेशात्रि! पुराण-संहिता शास्त्र तथा स्मृति शास्त्र और गायत्री का सत अर्थ यह सब ब्रह्मास्मि है। 105॥

सांगश्च चतुरोवेदानधीत्यापि सवांग ययात्। सावित्रीं यो न जानाति वृथा तस्य परिश्रमः॥

-योगी याज्ञवलक्य

समस्त अंग उप अंगों समेत वेदों को पढ़ लेने पर भी जो गायत्री नहीं जानता उसका परिश्रम व्यर्थ ही गया समझना चाहिए।

गायत्री चैव वेदांश्च तुलया समतोलयत। वेदा एकत्र सांगास्तु गायत्री चैकतः स्मृता॥

(वृहद् योगी याज्ञ0 4-80)

अर्थात् “जब ब्रह्माजी ने तराजू के एक पलड़े में चारों वेदों को और दूसरे में गायत्री को रखकर तोला तो गायत्री चारों वेदों की अपेक्षा भारी सिद्ध हुईं।”

यहाँ माता और पुत्रों की तुलना में माता की गरिमा अधिक भारी सिद्ध करने का तात्पर्य है।

इन्हीं सब विशेषताओं को देखते हुए गायत्री को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चारों फल प्रदान करने वाली पाप, ताप, शोक, संताप, निवारिणी कहा गया है। उसे सर्वोपरि साधना बताया गया है।

स्कन्द पुराण में महर्षि व्यास का कथन है-

गायत्र्येव तपो योगः साधनं ध्यान मुच्यते। सिद्धिनां सामता माता नातः किंचिद् वृहत्तरम्॥

-स्कन्द पुराण

गायत्री ही तप है, गायत्री ही योग है, गायत्री ही सबसे बड़ा ध्यान और साधन है। इससे बढ़कर सिद्धिदायक साधन और कोई नहीं है।

भगवान मनु भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हुए कहते हैं-

सावित्र्यास्तु परान्नास्ति। -मनु 2।83

गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।

----***----


दिव्य प्रकाश का उन्नयन, साधना का उद्देश्य

अध्यात्म विज्ञान में स्थान स्थान पर प्रकाश की साधना और प्रकाश की याचना की चर्चा मिलती है। यह प्रकाश बल्ब बत्ती अथवा सूर्य चन्द्र आदि से निकलने वाला उजाला नहीं वरन् वह परम ज्योति है जो इस विश्व में चेतना का आलोक बनकर जगमगा रही है। गायत्री का उपास्य सविता देवता इसी परम ज्योति को कहते हैं। इसका अस्तित्व ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में प्रत्यक्ष और कण कण में संव्याप्त जीवन ज्योति के रूप में प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर भी देख सकता है। इसकी जितनी मात्रा जिसके भीतर विद्यमान हो समझना चाहिए कि उसमें उतना ही अधिक ईश्वरीय अंश आलोकित हो रहा है।

मस्तिष्क के मध्य भाग से प्रकाश कणों का एक फव्वारा सा फूटता रहता है। उसकी उछलती हुई तरंगें एक वृत बनाती हैं और फिर अपने मूल उद्गम में लौट जाती हैं। यह रेडियो प्रसारण और संग्रहण जैसी प्रक्रिया है ब्रह्मरंध्र से छूटने वाली ऊर्जा अपने भीतर छिपी हुई भाव स्थिति को विश्व ब्रह्माण्ड में ईथर कम्पनों द्वारा प्रवाहित करती रहती है इस प्रकार मनुष्य अपनी चेतना का परिचय और प्रभाव समस्त संसार में फेंकता रहता है। फुहारे की लौटती हुई धाराएँ अपने साथ विश्व व्यापी असीम ज्ञान की नवीनतम, घटनात्मक तथा भावात्मक जानकारियाँ लेकर लौटती हैं, यदि उन्हें ठीक तरह समझा जा सके, गृहण किया जा सके तो कोई भी व्यक्ति भूतकालीन और वर्तमान काल की अत्यन्त सुविस्तृत और महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त कर सकता है। व्यक्ति में प्रवाह ग्रहण करने की और प्रसारित करने की जो क्षमता है, उसका माध्यम यह ब्रह्मरंध्र अवस्थित ध्रुव संस्थान है। पृथ्वी पर अन्य ग्रहों का प्रचुर अनुदान आता है तथा उसकी विशेषताएँ अन्यत्र चली जाती हैं। यह आदान प्रदान का कार्य ध्रुव केंद्रों द्वारा सम्पन्न होता है। शरीर के भी दो ध्रुव है एक मस्तिष्क दूसरा जनन गह्वर। चेतनात्मक विकरण मस्तिष्क से और शक्ति परक ऊर्जा प्रवाह जन गह्वर से सम्बन्धित है। सूक्ष्म आदान प्रदान की अति महत्वपूर्ण प्रक्रिया इन्हीं केन्द्रों के माध्यम से संचालित होती है।

शारीरिक और मानसिक स्थिति के अनुरूप तेजोवलय की स्थिरता बनती है। यदि स्थिति बदलने लगे तो प्रकाश पुँज की स्थिति भी बदल जायगी। इतना ही नहीं समय समय पर मनुष्य के बदलते हुए स्वभाव तथा चिन्तन स्तर के अनुरूप उसमें सामयिक परिवर्तन होते रहते हैं। सूक्ष्मदर्शी उसकी भिन्नताओं को रंग बदलते हुए परिवर्तनों के रूप में देख सकते हैं। शान्ति और सज्जनता की मनःस्थिति हलके नीले रंग में देखी जायगी। विनोदी, कामुक, सत्तावान, वैभवशाली, विशुद्ध व्यवहार कुशल स्तर की मनोभूमि पीले रंग की होती है। क्रोधी, अहंकारी, क्रूर, निष्ठुर, स्वार्थी, हठी, और मूर्ख मनुष्य लाल वर्ण के तेजोवलय से घिरे रहते हैं। हरा रंग सृजनात्मक और कलात्मक प्रवृत्ति का द्योतक है। गहरा बैंगनी चंचलता और अस्थिर मति का प्रतीक है। धार्मिक, ईश्वर भक्त और सदाचारी व्यक्तियों की आभा केसरिया रंग की होती है। इसी प्रकार विभिन्न रंगों का मिश्रण मनुष्य के गुण, कर्म स्वभाव के परिवर्तनों के अनुसार बदलता रहता है। यह तेजोवलय सदा स्थिर नहीं रहता है। बदलती हुई मनोवृत्ति प्रकाश पुंज के रंगों में परिवर्तन कर देती है। यह रंग स्वतन्त्र रूप से कुछ नहीं। मनोभूमि में होने वाले परिवर्तन शरीर से निसृत होते रहने वाले ऊर्जा कम्पनों की घटती बढ़ती संख्या के आधार पर आँखों को अनुभव होते हैं। वैज्ञानिक इन्हें “फ्रीक्वेन्सी आव दी वेव्स” कहते हैं।

दिव्य दर्शन (क्लेयर वाइन्स) दिव्य अनुभव (साइकोमैन्ट्री) प्रभाव प्रेषण (टेलीपैथी) संकल्प प्रयोग (सजैशन) जैसे प्रयोग थोड़ी आत्म शक्ति विकसित होते ही आसानी से किये जा सकते हैं। इन विद्याओं पर पिछले दिनों से काफी शोध कार्य होता चला आ रहा है और उन प्रयासों के फलस्वरूप उपयोगी निष्कर्ष सामने आये हैं। परामनोविज्ञान, अतीन्द्रिय विज्ञान, मैटाफिजिक्स जैसी चेतनात्मक विद्यायें भी अब रेडियो विज्ञान तथा इलेक्ट्रॉनिक्स की ही तरह विकसित हो रही हैं। अचेतन मन की सामर्थ्य के सम्बन्ध में जैसे जैसे रहस्यमय जानकारियों के पर्त खुलते हैं वैसे वैसे यह स्पष्ट होता जाता है कि नर पशु लगने वाला मनुष्य वस्तुतः असीम और अनन्त क्षमताओं का भण्डार होता है। कठिनाई इतनी भर है कि उसकी अधिकाँश विकृतियाँ प्रसुप्त अविज्ञात स्थिति में पड़ी हैं।

प्रकाश रश्मियों की लम्बाई एक इंच के सोलह से तीस लाखवें हिस्से के बराबर होती है। रेडियो पर सुनी जाने वाली ध्वनि तरंगों की गति एक सैकिण्ड के एक लाख छियासी हजार मील की होती है वे एक सैकिण्ड में सारी धरती की सात परिक्रमा कर लेती हैं। शब्द और प्रकाश की तरंगों का आकार एवं प्रवाह इतना सूक्ष्म एवं गतिशील है कि इन्हें बिना सूक्ष्म यन्त्रों की सहायता से हमारी इन्द्रियाँ अनुभव नहीं कर सकती हैं।

डॉ0 जे0 सी0 ने ‘अणु और आत्मा’ ग्रन्थ में स्वीकार किया है कि मानव अणुओं की प्रकाश वाष्प न केवल मनुष्यों में वरन् अन्य जीवधारियों वृक्ष, वनस्पति औषधि आदि में भी होती है। यह प्रकाश अणु ही जीवधारी के यथार्थ शरीरों का निर्माण करते हैं खनिज पदार्थों से बना मनुष्य या जीवों का शरीर तो तभी तक स्थिर रहता है जब तक प्रकाश अणु शरीर में रहते हैं। इन प्रकाश अणुओं के हटते ही स्थूल शरीर बेकार हो जाता है फिर उसे जलाते या गाढ़ते ही बनता है। खुला छोड़ देने पर तो उसकी सड़ांद से उसके पास एक क्षण भी ठहरना कठिन हो जाता है।

स्वभाव, संस्कार, इच्छाएँ, क्रिया शक्ति यह सब इन प्रकाश अणुओं का ही खेल है। हम सब जानते हैं कि प्रकाश का एक अणु (फोटान) भी कई रंगों के अणुओं से मिलकर बना होता है। मनुष्य शरीर की प्रकाश आभा भी कई रंगों से बनी होती हैं डॉ0 जेस0 सी0 ट्रस्ट ने अनेक रोगियों अपराधियों तथा सामान्य व श्रेष्ठ व्यक्तियों का सूक्ष्म निरीक्षण करके बताया है कि जो मनुष्य जितना श्रेष्ठ और अच्छे गुणों वाला होता है उसके मानव अणु दिव्य तेज और आभा वाले होते हैं जबकि अपराधी और रोगी व्यक्तियों के प्रकाश अणु क्षीण और अंधकारपूर्ण होते हैं। उन्होंने बहुत से मनुष्यों के काले धब्बों को अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर उनके रोगी या अपराधी होने की बात को बताकर लोगों को स्वीकार करा दिया था कि सचमुच रोग और अपराधी वृत्तियाँ काले रंग के अणुओं की उपस्थिति का प्रतिफल होते हैं, मनुष्य अपने स्वभाव में चाहते हुए भी तब तक परिवर्तन नहीं कर सकता जब तक यह दूषित प्रकाश अणु अपने अंदर विद्यमान बने रहते हैं।

यही नहीं जन्म जन्मान्तरों तक खराब प्रकाश अणुओं की यह उपस्थिति मनुष्य से बलात् दुष्कर्म कराती रहती है इस तरह मनुष्य पतन के खड्डे में बार बार गिरता और अपनी आत्मा को दुःखी बनाता रहता है जब तक यह अणु नहीं बदलते, न निष्क्रिय होते तब तक मनुष्य किसी भी परिस्थिति में अपनी दशा नहीं सुधार पाता।

यह तो है कि अपने प्रकाश अणुओं में यदि तीव्रता है तो उससे दूसरों को आकस्मिक सहायता दी जा सकती है। रोग दूर किये जा सकते हैं। खराब विचार वालों को कुछ देर के लिए अच्छे सन्त स्वभाव में बदला जा सकता है। महर्षि नारद के सम्पर्क में आते ही डाकू बाल्मीकि के प्रकाश अणुओं में तीव्र झटका लगा और वह अपने आपको परिवर्तित कर डालने को विवश हुआ। भगवान बुद्ध के इन प्रकाश अणुओं से निकलने वाली विद्युत विस्तार सीमा में आते ही डाकू अंगुलिमाल की विचारधाराएं पलट गई थीं। ऋषियों के आश्रमों में गाय और शेर एक घाट पानी पी आते थे वह इन प्रकाश अणुओं की ही तीव्रता के कारण होता था। उस वातावरण से निकलते ही व्यक्तिगत प्रकाश अणु फिर बलवान हो उठने से लोग पुनः दुष्कर्म करने लगते हैं इसलिए किसी को आत्म शक्ति या अपना प्राण देने की अपेक्षा भारतीय आचार्यों ने एक पद्धति का प्रसार किया था जिसमें इन प्रकाश अणुओं का विकास कोई भी व्यक्ति इच्छानुसार कर सकता था। देव उपासना उसी का नाम है।

उपासना एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें हम अपने भीतर के काले मटमैले और पापाचरण को प्रोत्साहन देने वाले प्रकाश अणुओं को दिव्य, तेजस्वी, सदाचरण और शान्ति एवं प्रसन्नता की वृद्धि करने वाले मानव अणुओं में परिवर्तित करते हैं। विकास की इस प्रक्रिया में किसी नैसर्गिक तत्व पिण्ड या ग्रह नक्षत्र की साझेदारी होती है। उदाहरण के लिए जब हम गायत्री की उपासना करते हैं तो हमारे भीतर के दूषित प्रकाश अणुओं को हटाने और उसके स्थान पर दिव्य प्रकाश अणु भर देने का माध्यम ‘गायत्री’ का देवता सविता अर्थात् सूर्य होता है।

वर्ण रचना और प्रकाश की दृष्टि से यह मानव अणु भिन्न भिन्न स्वभाव के होते हैं। मनुष्य का जो कुछ भी स्वभाव आज दिखाई देता है वह इन्हीं अणुओं की उपस्थिति के कारण होता है यदि इस विज्ञान को समझा जा सके तो न केवल अपना जीवन शुद्ध, सात्विक, सफल, रोगमुक्त बनाया जा सकता है वरन् औरों को भी प्रभावित और इन लाभों से लाभान्वित किया जा सकता है। परलोक और सद्गति के आधार भी यह प्रकाश अणु या मानव अणु ही हैं।

वस्तुएं हम प्रकाश की सहायता से देख सकते हैं किन्तु साधारण प्रकाश कणों की सहायता से हम शरीर के कोष (सैल) को देखना चाहें तो वह इतने सूक्ष्म हैं कि उन्हें देख नहीं सकते। इलेक्ट्रॉनों को जब 50000 वोल्ट आवेश पर सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) में भेजा जाता है तो उनकी तरंग दैर्ध्य श्वेत प्रकाश कणों की तुलना में 1/100000 भाग सूक्ष्म होती है तब वह हाइड्रोजन के परमाणु का जितना व्यास होता है उसके भी 42.4वें हिस्से छोटे परमाणु में भी प्रवेश करके वहाँ की गतिविधियाँ दिखा सकती हैं। उदाहरण के लिए यदि मनुष्य की आँख एक इंच घेरे को देख सकती है उससे भी 500 अंश कम को प्रकाश सूक्ष्मदर्शी और 10000 अंश छोटे भाग को सूक्ष्मदर्शी। इसी से अनुमान लगा सकते हैं कि मनुष्य शरीर के कोश का चेतन भाग कितना सूक्ष्म होना चाहिए। इस तरह के सूक्ष्मदर्शी से जब कोश का निरीक्षण किया गया तो उसमें भी एक टिमटिमाता हुआ प्रकाश दिखाई दिया। चेतना का महत्त्व इस प्रकार प्रकाश की ही अति सूक्ष्म स्फुरणा है यह विज्ञान भी मानता है।

भारतीय योगियों ने ब्रह्मरन्ध्र स्थित जिन घटकों की खोज की है सहस्रार कमल उनसे बिल्कुल अलग सर्वप्रभुता सम्पन्न है, यह स्थान कनपटियों से दो दो इंच अंदर भृकुटि से लगभग ढाई या तीन इंच अंदर छोटे से पोले में प्रकाश पुँज के रूप में है। तत्त्वदर्शियों के अनुसार यह स्थान उलटे छाते या कटोरे के समान 17 प्रधान प्रकाश तत्वों से बना होता है। देखने में मर्करी लाइट के समान दिखाई देता है। छान्दोग्य उपनिषद् में सहस्रार प्राप्त कर लेने वाला योगी सम्पूर्ण भौतिक विज्ञान प्राप्त करने में समर्थ हो जाता है। यही वह शक्ति केन्द्र है जहाँ से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता है और विश्व में जो कुछ भी मानवकृत विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है उनका सम्पादन करता है।

आत्मा या चेतना जिन अणुओं से अपने को अभिव्यक्त करती है वह यह प्रकाश अणु ही है जबकि आत्मा स्वयं उससे भिन्न है। प्रकाश अणुओं का प्राण विधायक शक्ति अग्नि तेजस कहना चाहिए वह जितने शुद्ध दिव्य और तेजस्वी होंगे व्यक्ति उतना ही महा तेजस्वी, यशस्वी, वीर, साहसी और कलाकार होगा। महापुरुषों के तेजोवलय उसी बात के प्रतीक हैं जबकि निष्कृष्ट कोटि के व्यक्तियों में यह अणु अत्यन्त शिथिल मन्द और काले होते हैं। हमें चाहिए कि हम इन दूषित प्रकाश अणुओं को दिव्य अणुओं में बदलें और अपने को भी महापुरुषों की श्रेणी में ले जाने का यत्न करें।

गायत्री उपासना में सविता देवता का ध्यान करने की प्रक्रिया इसलिए की जाती है कि अंतर के कण-कण में संव्याप्त प्रकाश आभा को अधिक दीप्तिमान बनने का अवसर मिले। अपने ब्रह्मरंध्र में अवस्थित सहस्राँशु आदित्य सहस्रदल कमल को खिलाये और उसकी प्रत्येक पंखुड़ी में सन्निहित दिव्य कलाओं के उदय का लाभ साधक को मिले।

ब्रह्मविद्या का उद्गाता ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की प्रार्थना में इस दिव्य प्रकाश की याचना करता है। इसी की प्रत्येक जागृत आत्मा को आवश्यकता अनुभव होती है अस्तु गायत्री उपासक अपने जप प्रयोजन में इसी ज्योति को अन्तः भूमिका में अवतरण करने के लिए सविता देवता का ध्यान करता है।

----***----


जीभ को चटोरी बनाकर हम अपनी हानि ही करते हैं।

भोजन में विकृत स्वाद को जो अनावश्यक महत्व मिल गया है उसका दुष्परिणाम सामने यह आया कि हमारी उपयोगी भोजन चयन की क्षमता ही कुँठित हो गई। इस सृष्टि का प्रत्येक प्राणी अपने शरीर के लिए उपयोगी आहार की परीक्षा जीभ पर बैठे डॉक्टर की सहायता से करता है। मुँह की प्रयोगशाला में प्रवेश करते ही जीभ की नोंक पर बैठा डॉक्टर उसकी उपयोगिता अनुपयोगिता की घोषणा क्षणभर में कर देता है। प्राणी उसी आदेश को मानते हैं और जो हितकर हैं उसी को गृहण करते हैं। इसी प्रक्रिया को अपनाकर वे अपना पेट स्वस्थ रखते हैं और आवश्यक पोषण प्राप्त करते हैं।

मनुष्य ने बुद्धिमता की सनक में आहार परीक्षक को ही पथभ्रष्ट करने के उपाय रच डाले और उसके लिए यह कठिन बना दिया कि वह उपयोगी, अनुपयोगी का विश्लेषण कर सके। नमक, मसाले और चिकनाई और चीनी ऐसी रिश्वतें हैं जिनका अभ्यस्त बनने के बाद जीभ के लिए उचित फैसला कर सकना ही संभव नहीं रहता फलतः नितान्त हानिकारक और अनुपयोगी पदार्थ अनावश्यक मात्रा में पेट में जाने लगते हैं। ऐसी दशा में यदि हमारा स्वास्थ्य दिन दिन गिरता चला जाय तो आश्चर्य ही क्या है।

सृष्टि के सभी प्राणी अपना आहार उसके प्राकृतिक स्वरूप में ही ग्रहण करते हैं। पशुओं को घास, वृक्षा चारियों को फल, माँसाहारियों को माँस, सड़न भोजियों को सड़न अपने प्राकृतिक रूप में ही ग्राह्य होती है। उन्हें उसी में स्वाद आता है और उनका पेट उसी रूप में उसे पचा लेता है। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है। मनुष्य अपने खाद्य का चयन उसके स्वाभाविक रूप में ग्रहण करने की अपेक्षा उसे अनेकानेक अग्नि संस्कारों से विकृत बनाता है। जिन वस्तुओं का प्राकृतिक स्वाद उनके अनुकूल नहीं पड़ता वे स्पष्टतः उसके लिए हानिकारक होनी चाहिएं। कच्चे माँस का न तो स्वाद उसके अनुकूल पड़ता है और न गंध न स्वरूप। इससे जाहिर है कि वह उसके लिए किसी भी प्रकार ग्रहण करने योग्य नहीं फिर भी प्रकृति के विपरीत जिह्वा की अस्वीकृति को झुठलाने के लिए उसे तरह तरह से पकाने, भूनने की क्रियाएँ करके चिकनाई तथा मसालों की भरमार करके इस योग्य बनाया जाता है कि चटोरी बनाई गई जीभ उसे पेट में घुसने की इजाजत दे दे। मनुष्य बन्दर जाति का फलाहारी प्राणी है। उसके लिए उसी स्तर के पदार्थ उपयोगी हो सकते हैं जो कच्चे खाये जा सकें। कच्चे अन्न, स्वादिष्ट शाक तथा उपयोगी फल उसके लिए स्वाभाविक भोजन हैं। यदि यही आहार अपनाया जाय तो निस्संदेह नीरोग और दीर्घजीवी रहने में कोई कठिनाई उत्पन्न न होगी।

जीभ की आदत बिगाड़ने के लिए उसे नशीली, जहरीली चीजें खिला खिलाकर विकृत स्वभाव का बनाया जाता है। इन नशों में नमक मसाले और शक्कर चिकनाई प्रधान हैं। इनमें से एक भी वस्तु हमारे लिए आवश्यक नहीं है और न इनका स्वाद ही प्राकृतिक रूप से ग्राह्य है। नमक या मसाले आदि एक दो तोले भी हम खाना चाहें तो न खा सकेंगे। नमक जरा सा खाने पर उलटी होने लगेगी। मिर्च प्राकृतिक रूप से खाई जाय तो जीभ जलने लगेगी और नाक आँख आदि से पानी टपकने लगेगा। हींग, लौंग थोड़ी सी भी खाकर देखा जा सकता है कि उनकी कितनी भयंकर विकृति होती है। बालक की जीभ जब तक विकृत नहीं हो जाती तब तक वह उन्हें स्वीकार नहीं करता। घर में खाये जाने वाले मसाले युक्त आहार का तो वह धीरे धीरे बहुत समय में अभ्यस्त होता है तब कहीं उसकी जीभ नशेबाज बनती है। अफीम और शराब जैसी कड़ुई वस्तुओं को भी आदी लोग मजे मजे में पीते हैं पीते ही नहीं उनके न मिलने पर बेचैन भी होते हैं। ठीक वही हाल विकृत बनाई गई स्वादेन्द्रियों का भी होता है। वह नमक मसाले बिना भोजन को स्वादिष्ट ही नहीं मानती और उसके न मिलने पर दुःख अनुभव करती है।

वस्तुतः शरीर को जितना और जिस स्तर का नमक चाहिए वह प्रत्येक खाद्य पदार्थ में समुचित मात्रा में मौजूद है। अनाज, फल, शाक, मेवा आदि में बहुत ही बढ़िया स्तर का नमक मौजूद है और वह आसानी से शरीर में घुल जाता है। जो खनिज नमक हम खाते हैं वह अनावश्यक ही नहीं वरन् हानिकारक भी है। वह खनिज लवण है जिसे हमारा शरीर स्वीकार नहीं करता। पसीना पेशाब कफ आदि में जो अनावश्यक खारापन पाया जाता है वह वस्तुतः प्रकृति द्वारा उस नमक को बाहर धकेले जाने का ही प्रमाण है जिसे हमने विकृत स्वादवश शरीर में ठूँसा था।

हम यदि अपने भोजन में से नमक निकाल दें तो इसमें रत्ती भर भी हानि नहीं होने वाली है वरन् एक विजातीय द्रव्य को जबरदस्ती पेट पर लादने के दुष्परिणाम से बचत ही हो जायगी। इतना ही नहीं उपयोगी अनुपयोगी पदार्थों को उनके प्राकृतिक रूप में जानने ग्रहण करने की उपयोगी आदत का विकास भी हो जाएगा। स्वादवश जो पेट की आवश्यकता से कहीं अधिक भोजन खा जाते हैं उसका परिणाम पाचन यंत्र के रुग्ण एवं नष्ट होने के रूप में सामने आता है। पाचन तंत्र बिगड़ जाने से खाद्य वस्तुएँ ठीक तरह पच कर पोषण प्रदान करने की अपेक्षा पेट में सड़न पैदा करेगी और बीमारियाँ सामने आयेगी। इस प्रकार जिन नमक मसालों को हम से सुखद मानते हैं, पसंद करते हैं वे ही हमारे लिए भयंकर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करने वाले होते हैं। मिर्चें प्रत्यक्ष अखाद्य हैं। उन्हें शरीर में प्रवेश कराते समय जीभ से लेकर नाक आँख तक विद्रोह खड़ा करती हैं और जल स्राव करके उन्हें बहा देने का प्रयत्न करती हैं।

‘आर्कटिक की खोज में’ पुस्तक के लेखक जार्ज स्टीफेन्शन ने उत्तरी ध्रुव प्रदेश के निवासी एस्किमो लोगों में नमक के प्रति घृणा करने की बात लिखी है। विद्वान बाथौलाम्ये ने चीन के देहाती प्रदेशों के विवरण प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि वहाँ पिछले दिनों तक बिना नमक का ही भोजन करने का प्रचलन था।

जिन क्षेत्रों अथवा वर्गों में नमक नहीं खाया जाता वहाँ के निवासी उन लोगों की तुलना में अधिक स्वस्थ हैं जो नमक मिला भोजन करने के आदी हैं। मनुष्य शरीर के लिए जिन प्राकृतिक लवणों की आवश्यकता है वे उसे सामान्य खाद्य पदार्थों से ही सरलतापूर्वक एवं समुचित मात्रा में मिल जाते हैं। सोडियम मैग्नीशियम फलोरियम, कॉपर, कैल्शियम आदि लवण साग भाजियों में, फलों में एवं अन्न दूध में मौजूद हैं। फिर अलग से नमक खाने की आवश्यकता स्वाद के अतिरिक्त और किसी प्रयोजन के लिए नहीं रह जाती। यह स्वाद अन्ततः हमें बहुत महंगा पड़ता है। उसके कारण गुर्दे, हृदय, जिगर आमाशय आदि यंत्रों पर अनावश्यक दबाव पड़ता है और चर्म रोग रक्त विकार मस्तिष्कीय विकृतियाँ, स्नायविक तनाव आदि ऐसे कितने ही रोग उत्पन्न होते हैं जिन्हें नमकीन स्वाद पर नियंत्रण करके सहज ही बचा जा सकता था।

योग तत्व उपनिषद् में शाण्डिल्य ऋषि ने योग साधकों को नमक न खाने का उपदेश दिया है।

अमेरिका में नमक का प्रचलन घट रहा है। डॉक्टर ग्राहम सरीखे मनीषी लोगों को बिना नमक का अथवा न्यूनतम नमक का आहार लेने की सलाह देते हैं। उस देश के आदिवासी रैड इंडियन तो औषधि रूप में ही यदा कदा नमक का सेवन करते हैं।

अब तक यह मान्यता चली आती थी कि गर्मी के दिनों में माँस तथा पसीने के मार्ग से शरीर का नमक अधिक मात्रा में बाहर निकल जाता है उस कमी के कारण लू मारने का डर रहता है इसलिए गर्मी के दिनों में अधिक नमक खाना चाहिए। इस किम्वदन्ती को ठीक मानकर भारत की सेनाओं के भोजन में अपेक्षाकृत अधिक नमक प्रयोग कराया जाता था।

प्रति रक्षा अनुसंधान संस्था ने इस संबंध में गंभीर अध्ययन करके यह पाया कि वह किम्वदन्ती सर्वथा भ्रमपूर्ण थी। गर्मी के दिनों में भी मनुष्य को नमक की मात्रा बढ़ाने की कोई आवश्यकता नहीं संस्था के प्रधान अधिकारी डॉ0 कोठी के अनुसार अधिक नमक खाने से हाई ब्लड प्रेशर उत्पन्न होने का खतरा बढ़ता है।

फ्राँस के डॉक्टर क्वाइरोल्ड ने अनिद्रा ग्रसित रोगियों को नमक छोड़ने की सलाह देकर इस कष्टकारक व्यथा से छुटकारा दिलाया। उसका प्रतिपादन है कि खनिज लवण जिसे आमतौर से लोग स्वाद के लिए खाते हैं अनावश्यक ही नहीं हानिकारक भी हैं। शरीर में उसकी बढ़ी हुई मात्रा मस्तिष्क तन्तुओं को उत्तेजित करती है और उससे निद्रा में रुकावट उत्पन्न होती है। यदि नमक कम खाया जाय अथवा न खाया जाय तो उससे नींद न आने के कष्ट से बहुत कुछ बचा जा सकता है।

कितने ही पशु पक्षियों को नमक का सेवन बहुत हानिकारक सिद्ध होता है । मैना पक्षी को नमक युक्त भोजन दिया जाय तो वह बीमार पड़ जायगी। यही बात अनेक अन्य पशुओं तथा पक्षियों और चूहों पर लागू होती है।

कोलम्बिया नदी के किनारे पर बसे हुए रेड इण्डियन आदिवासी नमक बिलकुल नहीं खाते। ऐसा ही नमक न छूने का प्रचलन अल्जीरिया के आदिवासियों में है। सहारा रेगिस्तान में रहने वाले बद्दू कबीले के लोग भी नमक नहीं खाते। अफ्रीका प्रशान्त सागर के मध्य द्वीप, साइबेरिया आदि के आदिवासी भी नमक के स्वाद से अपरिचित हैं और तो और अपने पड़ौसी नेपाल का भी एक ऐसा वन्य प्रदेश है जहाँ के लोग नमक नहीं खाते।

सभी जानते हैं कि रक्तचाप के मरीज को यदि नमक का सेवन बन्द करा दिया जाय अथवा घटा दिया जाय तो उसे बहुत राहत मिलती है।

जोन्स होपकिन्स विश्वविद्यालय के तीन वैज्ञानिकों ने नमक पर संयुक्त शोध करके यह निष्कर्ष निकाला है कि नमक सचमुच ही उग्र रक्तचाप का एक बहुत बड़ा कारण है। इन अनुसंधान कर्त्ताओं के नाम हैं- डॉ0 लुई0 सी0 लेसाग्ना, नार्मा फालिस और लीवों ट्रेटियाल्ट। इस मण्डली का यह भी कहना है कि नमक के चटोरों की स्वाद अनुभव करने की शक्ति घटती चली जाती है फलतः अधिक मात्रा में नमक खाने पर ही उन्हें कुछ स्वाद आता है। यह मात्रा वृद्धि उनके रोग को बढ़ाने में और भी अधिक सहायक बनती है। मण्डली का एक निष्कर्ष यह भी है कि महिलाएँ, पुरुषों की तुलना में अधिक निठल्ली रहती हैं और अधिक चटोरी होती हैं। इसलिए रक्तचाप की शिकायत भी पुरुषों की तुलना में उन्हें ही अधिक होती है।

रक्तचाप जैसी बीमारियों में तो आधुनिक चिकित्सक भी नमक त्याग की सलाह देते हैं। हृदय रोगियों को भी उसे कम मात्रा में लेने को कहा जाता है। सूजन बढ़ाने वाली बीमारियों में भी नमक छोड़ने में जल्दी लाभ होता देखा गया है।

अस्वाद व्रत अध्यात्म साधनाओं का प्रथम सोपान माना गया है। व्रत उपवासों में, तप अनुष्ठानों में नमक त्याग एक आवश्यक नियम माना जाता है। योगी, तपस्वी, शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए उपयोगी कदम है। जीभ को चटोरी बनाने से कामेन्द्रिय तथा अन्य इन्द्रियाँ उत्तेजित होती हैं और अनेकों शारीरिक मानसिक विकास उत्पन्न करती हैं।

महात्मा गान्धी ने अपनी ‘सप्त महाव्रत’ पुस्तक में सबसे प्रथम व्रत ‘अस्वाद’ को ठहराया है और बताया है कि जीभ पर नियंत्रण करने पर अन्य इन्द्रियाँ भी काबू में आती हैं। ब्रह्मचर्य पालन का उन्होंने अस्वाद व्रत से सम्बन्ध मिलाया है और कहा है यदि इन्द्रिय निग्रह अभीष्ट हो तो प्रथम जिह्वा पर नियंत्रण स्थापित करना चाहिए। कहना न होगा कि स्वादों में नमक ने इन दिनों प्रधानता प्राप्त कर ली है। इस विकृति को निवृत्त करके ही हम स्वाभाविक भोजन की ओर, मिताहार की ओर कदम बढ़ा सकते हैं। यह उचित भी है और आवश्यक भी।


परमहंस अस्वस्थ हो गए (kahani)

एक बार स्वामी रामकृष्ण परमहंस अस्वस्थ हो गए। वे काशीपुर के बगीचे में विश्राम कर रहे थे। भक्तों के उपचार और सेवा सुश्रूषा के बावजूद भी उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं हो रहा था। रोग दिन-दिन बढ़ता जा रहा था। उनके अस्वस्थ होने का समाचार सुनकर अपने कुछ साथियों के साथ श्री शशधर तर्क चूड़ामणि उन्हें देखने आये।

कुछ औपचारिक वार्तालाप के बाद श्री शशधर तर्क चूड़ामणि ने स्वामी जी से कहा, “महाराज! शास्त्रों का कथन है कि शारीरिक व्याधियों को मनोबल के आधार पर मुहूर्त मात्र में दूर किया जा सकता है। एक बार स्वस्थ होने की इच्छा लेकर,यदि मन को व्याधि-ग्रस्त स्थान पर केन्द्रित कर दिया जाये जो रोग से तत्क्षण मुक्ति मिल सकती है। आप तो मनोजयी महापुरुष हैं। क्यों नहीं अपने मन को रोग स्थान पर केन्द्रित करके रोगमुक्त हो जाते।”

स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने बड़े क्लान्त-भाव से श्री शशधर तर्क चूड़ामणि से कहा, “पण्डित होकर भी आप मुझे उस मन को हाड़ माँस की इस जर्जर मठरी में केन्द्रित करने का परामर्श दे रहे हैं जो उस सच्चिदानन्द स्वरूप परमात्मा को समर्पित किया जा चुका है।” श्री शशधर तर्क चूड़ामणि निरुत्तर होकर स्वामी जी के चरणों में विनत हो गए।

----***----


गायत्री उपासना बनाम द्विजत्व-ब्राह्मणत्व

गायत्री उपासना मानव मात्र के लिए है। सद्बुद्धि की देवी-ऋतम्भरा प्रज्ञा की अधिष्ठात्री इस महाशक्ति की आराधना और अन्तःकरण में प्रतिष्ठापन करना, हर किसी के लिए आवश्यक है। यह तत्व जिसे भी प्राप्त होगा वह ऊँचा उठेगा। जहाँ तक अधिकार का प्रश्न है प्रत्येक सत्प्रयोजन को सम्पन्न करने-सन्मार्ग की दिशा में कदम बढ़ाने की छूट और सुविधा हर किसी को है। प्रतिबन्ध तो अवाँछनीय गतिविधियों पर ही लगाये जाते हैं। अथवा उन कार्यों से रोका जाता है जो करने की सामर्थ्य से बाहर होते हैं और क्षमता के अभाव में भारी वजन उठाने पर कठिनाई उत्पन्न होने की आशंका होती है। गायत्री उपासना में ऐसी कोई बात नहीं है। न तो उसमें कुछ अनैतिक है और न दुस्साध्य। उसका लक्ष्य सद्बुद्धि की शरण में जाना है। इसमें अधिकारी अनधिकारी का प्रश्न ही नहीं उठता।

सूर्य की धूप में, चन्द्रमा की चाँदनी में बैठने का मनुष्य को ही नहीं प्राणिमात्र को अधिकार है। गंगा स्नान पर किसी के लिए प्रतिबंध नहीं है। स्वच्छ वायु में साँस लेने, जल पीने और अन्न खाने से किसी को वंचित नहीं किया जाता। इसी प्रकार सत्य बोलने, उदारता बरतने संयम से रहने, कर्त्तव्य परायण रहने जैसे सत्प्रयोजनों के लिए किसी को रोका नहीं जाता वरन् प्रोत्साहित किया जाता है। ईश्वर का स्मरण भी ऐसा ही पवित्र कार्य है। जिसमें हानि की कोई आशंका नहीं है और न ऐसा कुछ है जिस पर विचार करके किसी को प्रभु प्रार्थना का अधिकारी किसी को अनाधिकारी ठहराया जा सके। गायत्री मंत्र के बारे में भी यही बात है। वह सार्वभौम-सर्वजनीन उपासना मंत्र है जिसे बिना धर्म, जाति, सम्प्रदाय, देश, वेशभूषा, लिंग आदि का भेदभाव किये मनुष्य मात्र द्वारा अपनाया जा सकता है।

यहाँ यह इसलिए कहा जा रहा है कि जहाँ तहाँ ऐसे प्रतिपादन मिलते हैं जिनमें द्विजत्व और ब्राह्मणत्व को गायत्री के साथ जोड़ा गया है। इस प्रतिपादन का तात्पर्य इतना ही है कि उत्कृष्टतावादी चिन्तन और आदर्शवादी कर्त्तव्य अपनाकर चलने वाले जीवन क्रम में ईश्वरीय उपासना की दिव्य उपलब्धियाँ अधिक अच्छी तरह हो सकती हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म। दूसरे जन्म से तात्पर्य है पशु प्रवृत्तियों से जकड़े हुए सामान्य प्राणि जीवन से ऊँचा उठकर मानवी उत्तरदायित्वों की विशिष्टता भरी भूमिका को अपनाया जाना। नर पशु की रीति नीति छोड़कर, देव जीवन की महानता अपनाया जाना। इसके लिए व्रत लेना पड़ता है कि वासना तृष्णा की क्षुद्रता में कृषि कीटकों की तरह निरत नहीं रहा जायगा वरन् मानवी उत्कृष्टता को जीवन क्रम से ओत प्रोत करते हुए उच्च स्तरीय सिद्धान्तों को अपनाकर चला जायगा। ऐसा व्रत शील जीवन क्रम ही द्विजत्व है। पशु प्रवृत्तियों का त्याग और देव परम्परा को धारण करने का व्रत लेना भारतीय परम्परा में एक अत्यंत आवश्यक एवं पवित्र कर्म है। इसलिए द्विजत्व का संस्कार समारोह पूर्वक किया जाता है। इसे यज्ञोपवीत संस्कार कहते हैं। इसका प्रतीक यज्ञोपवीत धारण है। ऐसे व्रतधारियों को द्विज संज्ञा दी गई है।

द्विज के लिए आदर्शवादी रीति नीति अपनाना और लोकोपयोगी कार्यों में निरत रहने की योजना बनाकर चलना आवश्यक होता है ऐसे कार्यों में तीन प्रमुख हैं-(1) अज्ञान का निवारण (2) अनीति का उन्मूलन (3) अभावों का समापन। व्यक्तिगत रुचि, योग्यता, परिस्थिति के अनुसार इनमें से कोई भी लक्ष्य चुन सकता है। संसार के समस्त कष्टों और संकटों के तीन ही कारण हैं। इन्हें जितना निरस्त किया जा सके उतनी ही सुख शान्ति स्थिर रह सकेगी और प्रगति की संभावना बढ़ेगी। अज्ञान का निवारण करने में प्रवृत्त वर्ग ब्राह्मण-अनीति से जूझने वालों को क्षत्रिय-अभाव दूर करने में जुटे हुए लोगों को वैश्य कहते हैं। जिनमें में इस प्रकार की आदर्शवादी आकाँक्षायें नहीं हैं जो अपनेपन की आपाधापी तक ही सीमित हैं, जिनकी उत्कृष्टता अपनाने में कोई रुचि नहीं है जो पेट प्रजनन में आगे की बातों में रुचि नहीं लेते, जिन्हें पशु प्रवृत्तियों में डूबे रहना ही पर्याप्त लगता है वह समस्त मनुष्य शूद्र हैं। यह भावनात्मक वर्गीकरण है। इसमें जाति वंश का कोई प्रश्न नहीं है। इसे विशुद्ध रूप से आचार प्रक्रिया या आदर्श पद्धति कहा जा सकता है। इस तथ्य को और भी स्पष्ट करना हो तो यों कह सकते हैं कि संकीर्ण स्वार्थपरता की पशु प्रवृत्तियों में संलग्न व्यक्ति शूद्र और उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व अपनाने वाले लोग द्विज हैं। इन वर्गों को स्थायित्व नहीं है। आज का स्वार्थी कल आदर्शवादी बन सकता है। इसी प्रकार आज का श्रेष्ठ व्यक्ति कल निकृष्ट भी बन सकता है। अस्तु शूद्र द्विज होते रहते हैं और द्विजों में से अगणित पतित होकर शूद्र वर्ग में चले जाते हैं। यह वर्ण भेद ही प्राचीन काल से वर्ण भेद कहा जाता है। जन्म जाति के आधार पर किसी को शूद्र या द्विज मानना निरर्थक है। सदाचारियों के बच्चे सदाचारी ही हों और दुराचारियों के यहाँ दुराचारी ही जन्मते रहें ऐसा कहाँ होता है। इसलिए अमुक वंश में जन्मे लोग शूद्र ही होते रहेंगे और अमुक परिवार की पीढ़ियां द्विज ही होती रहेंगी ऐसा नहीं कहा जा सकता।

द्विजत्व के साथ गायत्री उपासना को सोना और सुगंध मिलने की तरह अधिक सराहा गया है और उससे अधिक लाभ होने का तथ्य समझाया गया है। ईश्वर उपासना कोई भी कर सकता है पर अधिक लाभ उसी को होगा जो प्रभु समर्पित आदर्शवादी जीवन प्रक्रिया भी अपनाने का प्रयत्न करेगा। ईश्वर उपासना गाड़ी का एक पहिया है और आदर्शवादिता अपनाने वाली जीवन साधना दूसरा। इन दोनों के सम्मेलन से ही सर्वतोमुखी प्रगति का रथ अग्रसर होता है। मात्र पूजा पाठ कर लेने से भी यों तो कुछ लाभ होता ही है पर पूरा सत्परिणाम देखना हो तो पवित्र जीवन कम अपनाने की साधना के साथ ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। पवित्र जीवन उर्वरा भूमि है और भजन उपजाऊ बीज। दोनों की व्यवस्था पर समुचित ध्यान रखा जाना चाहिये। इसी प्रतिपादन को गायत्री और द्विजत्व का समन्वय करने की संगति बिठाकर किया गया है। तथ्य को समझा जाना चाहिए।यदि किसी का वंश या जाति का द्विज ठहराया जायगा और उसी परिवार में जन्में लोगों को उपासना का-गायत्री का-अधिकारी कहा जायगा तब तो निश्चित रूप से अर्थ का अनर्थ ही हो जायगा। दुर्भाग्य से पिछले दिनों ऐसी ही भूल होती रही है और अमुक जाति वंश के लोगों को इस पवित्र उपासना का अधिकारी अमुक को अनाधिकारी ठहराया जाता रहा है। जबकि वास्तविकता इससे सर्वथा भिन्न है। तत्वदर्शी-मानवतावादी-ऋषि इतने संकीर्ण हो ही नहीं सकते थे कि वे किसी अमुक जाति वंश को आत्मिक प्रगति के साधनों को अपनाने का अधिकारी ठहरायें और अन्यों को उससे वंचित कर दें। ऐसा पक्षपात तो बहुत ही ओछे स्तर के संकीर्ण बुद्धि, पक्षपाती और विद्वेषी लोग ही कर सकते हैं। भारतीय धर्मशास्त्रों और उनके प्रस्तुतकर्त्ता ऋषियों पर ऐसे आक्षेप लगने लगेंगे तो यह उस महान संस्कृति का अपमान ही होगा जिसके कारण समस्त विश्व ने इस देश वासियों को देव मानव माना था और जगद्गुरु कहकर अपना मस्तक नवाया था।

गायत्री उपासना का अधिकार हर किसी को है। मनुष्य मात्र बिना किसी भेद-भाव के उसे कर सकता है। इस सामान्य बुद्धि संगत तथ्य के समर्थन में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं तो भी इस संदर्भ में प्रमाण मिल ही जाते हैं।

सर्वेषां वा गायत्री मनु ब्रूयात्।

पारस्कर गृह सूत्र 2।3।10

गायत्री का उपदेश सबको करें-

चतुर्णामपि वर्णानाम् आश्रमस्य विशेषतः। करोति सततं शान्ति सावित्रीं उत्तमां पठन्।।

-महाभारत

“चारों वर्ण और चारों आश्रमों में रहने वाले कोई भी साधक जो इस उत्तम गायत्री मंत्र का जप करते हैं वे परम शान्ति को प्राप्त करते हैं।’

यथा कथं च जप्तैषा त्रिपदा परम पावनी सर्व काम प्रदा प्रोक्ता विधिनां किं पुनर्नृप।

-विष्णु धर्मोत्तर

हे राजन् जैसे बने वैसे जप करने पर भी परम पावनी गायत्री कल्याण करती है। फिर विधिपूर्वक उपासना करने के नाम का तो कहना ही क्या है?

अग्निदेव ने कहा है-

एवं सन्धा विधि कृत्वा गायत्रींच जयेत् स्मरेत्। गायेचिष्यान् यत स्त्रायेदभार्यां प्राणांस्तथैव च॥

अर्थात् “सन्ध्या विधि परिपूर्ण करने के पश्चात् गायत्री का स्मरण और जप करना। गायमान होने से अर्थात् उसकी उपासना-जप करने से वह गुरु, शिष्य, स्त्री और प्राणी सबका उद्धार करती है।

ब्राह्मण शब्द मात्र विद्वान अथवा कर्मकाण्ड परायण के लिए नहीं होता वरन् जिसका जीवन ब्रह्म परायण है, जो आत्म शोधन और परमार्थ प्रयोजन में निरत रहकर ब्रह्म तेज की अभिवृद्धि करता है ब्राह्मणत्व का पद उसी को मिलता है और वही पूजनीय गिना जाता है।

शास्त्राण्यधीत्यापि भवन्ति मूर्खा यस्तु क्रियावान्पुरुषः स विद्वान्। सुचिन्तितं चौषधमातुराणां। न नाममात्रेण करोत्यरोगम्॥

शास्त्र पढ़कर भी मूर्ख होते हैं, परन्तु जो क्रिया में चतुर हैं वही पण्डित है, जैसे अच्छे प्रकार से निर्णय करी औषध भी रोगियों को केवल नाम-मात्र से अच्छा नहीं कर देती है॥171॥

संध्या वंदन को नित्य कर्म माना गया है। उसकी आवश्यकता शौच, स्नान, भोजन, शयन जैसी दैनिक गतिविधियों की तरह समझी गई है और कहा गया है कि जिस प्रकार शरीर की स्वच्छता, सुविधा, पुष्टि के लिए साधन जुटाये जाते हैं उसी प्रकार अन्तःकरण पर आये दिन चढ़ने वाली मलीनता को स्वच्छ करने आत्मिक आवश्यकताओं को पूरा करने एवं ब्रह्मतेजस् को बढ़ाने के लिये नित्य ही ईश्वराधना नियत समय पर नियमित रूप से करनी चाहिए। संध्या वन्दन इसी प्रक्रिया का नाम है। इसे अपनाने के लिए शास्त्रों ने कठोर निर्देश दिये हैं और उपेक्षा करने वालों की कटु भर्त्सना की है। संध्या को नित्य कर्म ठहराते हुए स्थान स्थान पर द्विजत्व की धारणा के लिए भी संकेत किये गये हैं और कहा गया है कि संध्या तो करनी ही करनी चाहिए पर उसका समुचित लाभ लेना हो तो द्विजत्व की जीवन साधना को भी अपनाये रहना चाहिए। यदि इस ओर उपेक्षा बरती गई और मात्र पूजा प्रक्रिया को ही पर्याप्त मान लिया गया तो काम नहीं चलेगा। उसके साथ साथ उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की समन्वित प्रक्रिया-द्विजत्व का जुड़ा रहना भी आवश्यक है। संध्या का सामान्य निर्देश तो हर किसी के लिए है पर साथ ही यह भी बताया जाता रहा है कि उपासना का पूरा लाभ लेना हो तो द्विजत्व के नाम से जानी जाने वाली जीवन साधना को अपनाया जाना भी अनिवार्य रूप से आवश्यक समझना चाहिए।

सायं प्रातस्तु यः संध्यां सऋक्षां पर्युपासते। जप्त्वैव पावनीं देवीं सावित्री लोक मातरम्॥

-याज्ञवलक्य

प्रातःकाल तथा सायंकाल संध्योपासना और गायत्री जप जो ब्राह्मण करता है उसका सकल पाप नष्ट हो जाता है।

सायं प्रातश्च संध्यां यो ब्राह्मणोऽम्युपसेवते। प्रजपन् पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम्॥83॥ स तया पावितो देव्या ब्राह्मणों नष्टकिल्विषः।

-महा0 वन पर्व

जो ब्राह्मण प्रातः और सायं इन दोनों समय की संध्या और सबको पवित्र करने वाली वेदमाता गायत्री देवी के मन्त्र का जप करता है; वह ब्राह्मण उन्हीं गायत्री देवी की कृपा से परम, पवित्र और निष्पाप हो जाता है।

उद्यन्तमस्तं यन्त मादित्यममिध्यानम् कुर्वन् ब्राह्मणो विद्वान् सकलं मद्रमश्नुते।’

-तै0 आ॰ प्र0 2 अ॰ 2

उदय और अस्त होते हुए सूर्य की उपासना करने वाला विद्वान ब्राह्मण सब प्रकार के कल्याण को प्राप्त करता है।

सन्ध्यामुपासते ये तु नियतं संशितव्रताः। विधूतपापास्ते यान्ति ब्रह्मलोक मनामयम्॥

-यमस्मृति

जो लोग दृढ़प्रतिज्ञ होकर प्रतिदिन नियमपूर्वक सन्ध्या करते हैं, वे पापरहित होकर अनामय ब्रह्मपद को प्राप्त होते हैं।

उत्थायावश्यकं कृत्वा कृतशौचः सान्तहितः। पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत् स्वकाले चापरां चिरम्॥ ऋषयो दीर्घ सन्ध्यत्वा द्दीर्घ मायु खायु युः। प्रज्ञां यशश्च कीत्तिंच ब्रह्मवर्चस मैव च ॥

-स्कन्द पुराण

प्रातः शयन से उठकर आवश्यक मल-मूत्रादि का त्याग करके फिर शुद्ध तथा समाहित होकर पूर्व सन्ध्या को खड़े होकर जपे और अपने समुचित समय पर दूसरी संध्या की उपासना चिरकाल तक करनी चाहिए। ऋषि लोग दीर्घ काल तक सन्ध्या की उपासना करने ही के कारण लम्बी आयु की प्राप्ति किया करते थे और इसी के प्रभाव से वे प्रजा-यश-कीर्ति और ब्रह्मवर्चस को भी प्राप्त करते थे।

उदयास्तमयादूर्ध्वं यावत् स्याद् घटिकान्नयम्। तावत् सन्ध्यामुपासीत प्रायश्चितं ततः परम्॥

सूर्योदय तथा सूर्यास्त के बाद तीन घटिका तक सन्ध्योपासना का काल है। इसके बीत जाने पर प्रायश्चित करना होता है।

प्रातः सन्ध्यां सनक्षत्रां नोपास्ते यः प्रमादत्तः। गायत्र्यष्टशतं तस्य प्रायश्चितं विशुद्धये॥

प्रमादवश यथासमय सन्ध्योपासना न होने पर प्रायश्चित रूप से 108 बार गायत्री जप करना होता है।

सन्ध्याकाले त्वतिक्रान्ते स्थत्वाऽऽचम्य यथा विधि।

जपदेष्ठशतं देवीं ततः सन्ध्यां समाचरेत्॥

सन्ध्या समय अतिक्रान्त हो जाय, तो यथाविधि स्नान आचमन करके 108 बार गायत्री जप करने के बाद सन्ध्या करनी चाहिए।

सव्याहृर्तिं स प्रणवां गायत्री शिर सा सह। ये जपन्ति सदा तेषां न भयं विद्यते क्वचित्। यथा कथन्चिज्ज प्तैषा देवी परम पावनी। सर्व काम प्रदा प्रोक्ता विधिना किं पुनर्नृप।

-विष्णु धर्मोत्रा पुराण

व्याहृति प्रणव एवं शिरोमंत्र सहित गायत्री का जो जप करते हैं उन्हें किसी से भी डर नहीं रहता। परम पावनी गायत्री का जप किसी भी प्रकार किया जाय वह समस्त इष्ट कामनाओं को पूर्ण करता है। फिर यदि विधि पूर्वक किया जाय तब तो उसके सत्परिणाम का कहना ही क्या है।

या सन्ध्या सा तु गायत्री द्विधा भूत्वा प्रतिष्ठिता। सन्ध्या उपासिता येन विष्णुस्तेन उपासिताः॥ सच सूर्य समो विप्रस्तेजसा तपसा सदा। तत्पादपद्मरजसा सद्यः पूता वसुन्धरा॥ जीवन्मुक्तः स तेजस्वी सन्ध्यापूतो हि यो द्विजः॥

जो सन्ध्या है वही गायत्री है, एक ही द्विधा होकर प्रतिष्ठित है। सन्ध्या की उपासना करने पर विष्णु की ही उपासना होती है ऐसे उपासक तेज तथा तपोबल से सूर्य तुल्य होते हैं। उनके पाद रज स्पर्श से पृथ्वी पवित्र होती है और उनको जीवनमुक्त पदवी पर प्रतिष्ठा मिलती है।

उपास्ते सन्धिवेलायां निशाया दिवसस्य च। तामेव सन्ध्यां तसमात्तु प्रवदन्ति मनीषिणः॥

-महर्षिव्यास

दिवा रात्रि के सन्धि समय में जो उपासना की जाती है, उसको भी इसलिए मनीषियों ने संध्या कहा है।

ऋषयो दीर्घ सन्ध्यत्वादीर्घ मायु श्वाप्नुयुः। प्रज्ञां यशश्च कीर्तिश्च ब्रह्मवर्च समव च॥

दीर्घकाल तक सन्ध्या करके ऋषिगण दीर्घायु; प्रज्ञा, यश, कीर्ति और ब्रह्मतेज लाभ करते हैं।

गायत्री सर्व भंत्राणं शिरोमणितया स्थित्य। विद्या नामपि ते नैतां साधयेत्सर्व सिद्धये॥ त्रिव्याहृति युतां देवीऔंकार युग संपुटाम्। उपास्य चतुऐ वर्गान् साधयेद्योन सो अऽन्धधीः॥ देव्या द्विजत्वमासाद्य श्रेयसेऽन्यरतास्तु ये। ते रत्नमभिवांच्छन्ति हित्वा चिन्तामणि करात्॥

-वार्तिकसार

“गायत्री सब मंत्रों तथा विद्याओं में शिरोमणि है। इसलिए द्विजों को इसकी साधना करनी चाहिये। दो औंकारों द्वारा संपुट की गई और तीन व्याहृति वाली देवी गायत्री की उपासना करके जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- इन चारों वर्गों को नहीं साधता वह अंधी बुद्धि वाला है। गायत्री के द्वारा द्विजत्व को प्राप्त करके जो अन्य देवताओं की साधना करते हैं, वे वैसे ही हैं जैसे हाथ में आई चिन्तामणि को त्यागकर रत्नों की इच्छा करने वाले होते हैं।

----***----


लक्ष्यवेध का रहस्य

राजा द्रुपद की कन्या अपनी सामान्य गति से विकसित होती जा रही थी। बचपन, के शौर्य और वयःसन्धि की आयु को पार कर जब उसने युवावस्था में प्रवेश किया तो द्रुपद को उसके हाथ पीले करने की सूझी।

राजकुमारी द्रौपदी कोमलता, सौन्दर्य, बुद्धि, प्रतिभा और शिक्षा ज्ञान की अद्वितीय स्वामिनी थी। बाल्यकाल से ही उसे अपने माता पिता का स्नेह और दुलार भरा प्यार मिला था, भोगने के लिए अतुल राज-वैभव चारों ओर बिखरा था, शिक्षा के लिए अलग-अलग विषयों की एक से एक योग्य अधिकारी विद्वान रखे गये थे। स्वभावदत्त मेधा, अभ्यास सिद्ध निखार और शिक्षकों के प्रयत्न साध्य विद्यादान ने राजकुमारी को संगीत, कला, साहित्य, वेद, उपनिषद् और शास्त्रों के ज्ञान में निष्णात् कर दिया था।

द्वितीया के चाँद की भाँति जब उसके सभी गुण विशिष्टताओं और योग्यताओं के साथ रूप सौन्दर्य भी निखरने लगा तो राजा ने उसके लिए अगले आश्रम की चिन्ता की और योग्य वर के लिए अपने गणदूत को अन्य राज्यों में भेजा। राज्य सभा में आने वाले अन्य राज्यों के प्रतिनिधियों से भी उन्होंने उपयुक्त वर का ध्यान रखने का आग्रह किया।

पक्षान्तर में थोड़े बहुत अन्तर से भेजे गये सभी गणदूत लौट आये। उन्होंने अपनी अपनी दृष्टि से कई युवराजों के उपयुक्त होने की सूचना दी। राजा ने उनके लक्षणों और प्रवृत्तियों के सम्बन्ध में पूछा। आगत गणदूतों ने यथासम्भव उनका भी परिचय दिया। सुनकर द्रुपद की मुख मुद्रा पर ऐसे भाव तैर जाते जिन्हें देखकर लगता कि वे इन उत्तरों- लक्षणों से संतुष्ट नहीं हैं।

सभी गणदूतों द्वारा दिये गये विवरणों ने राजा को सत्पात्र जामाता की प्राप्ति का सन्तोष नहीं दिया। उन्होंने और भी कई स्थानों पर अपने दूत भिजवाये।

मासान्तरों से जब वे लौटे तो उनकी खोज से भी द्रुपद को सन्तोष नहीं हुआ। अब की बार राजा के कण्ठ से यह नैराश्य फूट ही पड़ा- ‘क्या मेरी बेटी’ अविवाहित ही रह जायगी?’

अविवाहित भले ही रह जाय, पर द्रुपद अपनी कन्या किसी ऐसे वर के हाथों नहीं सौंपना चाहते थे जो अयोग्य हो। द्रुपद ने अपनी चिन्ता राजगुरु के सम्मुख रखी। राजगुरु ने पूछा- ‘द्रुपद! तुम राजकुमारी के लिए कैसा वर चाहते हो जरा यह भी तो सुनूं।’

राजन् ने कहा- मैं ऐसे योग्य वर की तलाश में हूँ जो जीवन में विजयी बनकर जिये। जिसे परिस्थितियाँ विचलित न कर सकें और जो धैर्यपूर्वक लक्ष्य की ओर बढ़ता रहे।’

‘इन सब योग्यताओं की जननी है राजन्- एकाग्रता’- राजर्षि ने कहा- ‘और’ यदि एकाग्रता की परीक्षा ली जा सके तो सत्पात्र युवक खोजा जा सकता है।’

इस परीक्षा का प्रबन्ध भी राजर्षि को सौंपकर द्रुपद निश्चित हो गये।

कालान्तर में स्वयंवर का प्रबन्ध किया गया। दूर-दराज देशों तक इस स्वयंवर की सूचना और युवराजों को आमंत्रण पहुँचाया गया। निश्चित तिथि को स्वयंवर हुआ। घोषणा करते हुए कहा गया-जो भी युवराज ऊपर घूमती हुई मछली की परछांई देखकर उसकी आँख का निशाना लगाने में सफल होगा युवराज्ञी द्रौपदी, उसे वरमाला पहनायेगी।’

एक मंच पर इस प्रकार की व्यवस्था की गयी थी। एक-एक कर सभी युवराज आने लगे किन्तु कोई भी लक्ष्यवेध में सफल नहीं हुआ। अन्त में पाण्डुपुत्र अर्जुन आये। उन्होंने प्रत्यंचा चढ़ाई और उस पर शरसाधा।

विहित सतर्कताओं का पालन करते हुए अर्जुन ने शर सन्धान कर दिया। तीर निशाने पर बैठा था और उपस्थित सभी सभासद धन्य धन्य कहने लगे। द्रौपदी ने वरमाला उनके गले में डाल दी। उसी समय लक्ष्यवेध का रहस्य खोलते हुए अर्जुन ने कहा- मुझे केवल मछली की आँख ही दिखाई दे रही थी।

----***----


प्रगति पथ पर अपने ही पैरों चलना पड़ेगा।

प्रकृति ने प्राणी को अनेकानेक उपहार दिये हैं पर साथ ही उसकी निजी विवेक बुद्धि को परखने के लिए एक करारा व्यंग भी किया है कि उसकी ज्ञान चेतना प्रायः बहिर्मुखी रहती है। भीतर घुसकर अन्तः सत्ता को समझना और उसके सहारे प्रगति के उच्च स्तर पर जा पहुँचना बहुधा संभव ही नहीं हो पाता। आंखें बाहर के दृश्य देखती हैं पर उनकी निज की स्थिति क्या है यह जान ही नहीं पाती। जीभ बाहरी वस्तुओं के स्वाद चखती है पर उसके अपने जो बहुमूल्य स्राव हैं उनका रासायनिक परीक्षण कर सकना उसके लिए संभव नहीं होता। यही स्थिति कान, नाक, उपस्थ, त्वचा आदि इन्द्रियों की है वे बाह्य सम्पर्क से उत्पन्न अनुभूतियों का रसास्वादन करती हैं पर उन संवेदनाओं को मस्तिष्क तक पहुँचाने वाले ज्ञान तन्तुओं में चलने वाली विद्युत धारा के बारे में तनिक भी जानकारी नहीं होती। काम क्रीड़ा में रस तो आता है पर शरीर के अन्य अंगों के स्पर्श घर्षण में जो अनुभूति नहीं होती वह मात्र उपस्थ इन्द्रिय से ही क्यों होती है। उस क्षेत्र की संरचना में विचित्र विशेषताओं का समावेश है उस का आधार, कारण क्या है यह कुछ भी समझ में नहीं आता। हमारी बुद्धि संसार की अनेकानेक जानकारियों से सुसज्जित बनती है। विभिन्न विषयों का लोगों को असीम ज्ञान होता है। किसी किसी की अध्ययनशीलता और ज्ञान सम्पदा को देखकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। फिर भी उन्हें अपनी आत्म सत्ता के बारे में-उसके स्तर के सम्बन्ध में-अपने लक्ष्य के सम्बन्ध में नहीं के बराबर ज्ञान होता है। यदि पुस्तकीय ज्ञान रहा भी तो उस पर निष्ठा तनिक भी नहीं होती। यदि रही होती तो वे जीवन सम्पदा की भी उसी तरह सुरक्षा नहीं करते जिस प्रकार समय अथवा धन के सम्बन्ध में बरतते हैं।

विवेक की उच्च स्थिति में पहुँचकर हम अनुभव करते हैं कि जो आँखों से देखा और इन्द्रियों से अनुभव किया जाता है वह सब कुछ जड़ निर्जीव है। निर्जीव पदार्थों में न कोई चेतना होती है और न संवेदना। वे चेतन की इच्छानुसार भले या बुरे प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किये जा सकते हैं। उस प्रयोग में यदि कुछ सुख दुख होता है-प्रिय अप्रिय लगता है तो वह चेतन तत्व की अपनी निज की अनुभूति है। इसमें जड़ पदार्थों को न तो दुख के लिए दोष दिया जा सकता है और न सुख के लिए श्रेय। मान्यता का स्तर भिन्न हो तो वह अनुभूति भी बदल जायगी। जैसे हीरे के मूल्य से अपरिचित किसी आदिवासी को एक सेर गुड़ और हीरा सामने रखकर किसी एक को उठा लेने के लिए कहा जाय तो वह गुड़ उठा लेगा और हीरे की और मुँह करके भी न देखेगा। किसी छोटे बालक को हजार रुपये के नोट का बंडल अथवा खिलौने के पिटारे में से एक को लेने के लिए कहा जाय तो वह नोटों की उपेक्षा करके खिलौने चाव पूर्वक उठा लेगा। हीरे अथवा नोटों का मूल्य जिसे मालूम है वह उन्हें ही पसंद करेगा और गुड़ तथा खिलौनों को तुच्छ समझकर उपेक्षा करेगा। ठीक यही बात वहाँ लागू होती है जहाँ बाह्य जगत में बिखरे हुए धन सम्पत्ति समझे जाने वाले निर्जीव पदार्थों की तुलना आन्तरिक वृत्तियों एवं प्रवृत्तियों से की जाती है। निस्संदेह वृत्तियाँ ही प्रधान हैं। उन्हीं के स्तर पर वस्तुओं व्यक्तियों और परिस्थितियों का मूल्याँकन किया जाता है और तदनुरूप ही प्रिय अप्रिय का- लाभ हानि का, सुख दुख का अनुमान लगाया जाता है। दृष्टिकोण का स्तर बदलते ही मान्यताओं और अनुभूतियों में जमीन, आसमान जैसा अन्तर आ जाता है। एक व्यक्ति जिन पदार्थों एवं परिस्थितियों के लिए लालायित फिरता है, दूसरा उन्हें निरर्थक एवं अनर्थकारी मानकर ठोकर लगाते हुए संकोच नहीं करता है। वस्तुएँ दोनों के लिए एक जैसी हैं। उनकी स्थिति में कोई अन्तर नहीं आया पर एक ने उन्हें प्राण प्रिय माना दूसरे ने उन्हें घृणापूर्वक ठुकरा दिया यह अन्तःस्थिति की भिन्नता का ही चमत्कार है।

कितने ही लोग नशा, व्यभिचार, जुआ, व्यसन विनोद के प्रसंगों में अतीव आनन्द अनुभव करते हैं और उनके लिए जान देते हैं पर दूसरों के सामने इतने उपयोगी काम होते हैं कि इनकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते। यह भिन्नता आन्तरिक स्थिति के अन्तर पर निर्भर करती है। वस्तुतः सुख दुख के, उत्थान पतन के, समस्त आधार अपने भीतर ही निर्भर रहते हैं बाहर तो उनकी प्रतिक्रिया मात्र दृष्टिगोचर होती है। आँखों की पुतली का मूल्य सूर्य चन्द्रमा से-संसार के समस्त दृश्य पदार्थों से अधिक है। यदि पुतली का तिल खराब हो जाय तो समस्त संसार में अन्धकार हो जायगा। भगवान की दुनिया में दृश्य पदार्थ अपने स्थान पर बने रह सकते हैं पर मनुष्य की अपनी भी एक दुनिया है और उसके समस्त दृश्य आँख की पुतली पर आश्रित हैं। कान की झिल्ली खराब हो जाने पर संसार से समस्त स्वर शब्दों का अन्त हो जाता है। भगवान की दुनिया में शब्द स्वर बने रह सकते हैं पर इससे क्या। बहरापन छा जाने पर मनुष्य को अपनी दुनिया में तो निस्तब्धता ही हो जायगी। अपना दिमाग खराब हो जाने पर संसार में सर्वत्र अव्यवस्था दिखाई पड़ेगी। बुखार की जीभ को हर खाद्य पदार्थ कड़वा लगता है। पीलिया रोग में आँखें भी पीली हो जाती हैं और हर पदार्थ पीला दिखाई देने लगता है। इन तथ्यों से स्पष्ट है मनुष्य की भीतरी स्थिति ही प्रधान है उसी के आधार पर बाह्य जगत की सामान्य स्वाभाविक स्थिति हमें प्रिय अथवा अप्रिय लगती है और सुख दुख का अनुभव चक्र घूमता है। यदि ऐसा न होता तो धन कुबेर दिन रात चिन्ताओं की आग में जलते और निर्धन सन्त आनन्द का अनुदान बाँटते बखेरते सुख शान्ति के भण्डार से भरे पूरे दिखाई न पड़ते।

जितनी गंभीरतापूर्वक विचार किया जाता है उतना ही यह तथ्य स्पष्ट होता चला जाता है कि व्यक्तित्व की मौलिक विशेषताओं के बीज अन्तः जगत में दबे पड़े हैं; उनमें से जिन बीजों को विकसित होने का अवसर मिल जाता है वे सघन वृक्ष बनकर फूलते हैं और उन्हीं के अनुरूप बाह्य जीवन का स्वरूप दृष्टिगोचर होता है। दुष्प्रवृत्तियाँ उग कर खड़ी हो जायें तो कँटीले झाड़-झंखाड़ों से भरा हुआ उलझा और अनगढ़ कुरूप जीवन सामने आता है, अपने को त्रास देता है और दूसरों को सड़ी दुर्गन्ध जैसा घिनौना लगता है। यदि सत्प्रवृत्तियाँ पनप जायें तो सुसंस्कृत, समुन्नत और शोभा सौन्दर्य युक्त स्थिति बनती है। स्वर्णीय अनुभूतियों से अपना अन्तःकरण भरा रहता है और दूसरे जो भी सम्पर्क में आते हैं वे भी उस सुरम्य उद्यान का आनन्द लेते, मोद मनाते हैं।

जितना परिश्रम मनोयोग बाह्य जीवन से संबंधित व्यवसायों क्रियाकलापों में लगाया जाता है उससे सौवाँ हिस्सा भी यदि आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार आत्म निर्माण और विकास के चतुर्विधि आत्मोत्कर्ष की साधना में लगाया जाय तो अपने भीतर से ही एक ऐसे देव मानव का उद्भव हो सकता है जो सारे सम्पर्क क्षेत्र को दैवी विभूतियों से भरा पूरा बनादे। दुष्ट दुर्जन जहाँ रहते हैं वहाँ उत्पीड़न और आतंक का वातावरण उत्पन्न करते हैं। दीन, दुर्बल, अनाथ असहाय मूर्छित, अर्ध मृतक जहाँ रहते हैं वहाँ घिनौनी सड़न से, विकृतियों से दम घोंटने वाली गंदगी भरते हैं। इसके विपरीत देव मानव अपने उत्कृष्ट दृष्टिकोण से सुसंस्कृत व्यक्तित्व से-आदर्श क्रियाकलाप से ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं जिन पर स्वर्ण निछावर किया जा सकता है। वस्तुतः गुण, कर्म, स्वभाव की सम्पत्ति ही असली वैभव है उसी के सहारे आन्तरिक विभूतियाँ और भौतिक सम्पत्तियाँ उत्पन्न होतीं, बढ़ती और उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचती हैं।

प्रगतिशीलता न तो लम्बी चौड़ी बकवास पर निर्भर करती है और न बड़े साधन जुटाने पर उसकी संभावना सुनिश्चित होती है। खरे व्यक्तित्व ही अपनी शालीनता, चरित्र निष्ठा, सूझ-बूझ और सुव्यवस्था के आधार पर बड़े कामों का उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाते और उसे भली प्रकार पूरा करते हैं। दूसरे को अपनी मन मर्जी पर चलाना कठिन है। कोई अपना कहना न माने तो उसे विवश कैसे किया जा सकता है। शरीर पर तो बंधन लगा भी सकते हैं पर किसी के मन पर तो दूसरे का प्रतिबंध नहीं चल सकता। इसलिए व्यक्तियों के निर्माण का प्रयोग अपने आप से आरम्भ करना चाहिए। अपने शरीर और मन पर तो अपना नियंत्रण हो ही सकता है। कम से कम अपने को अवाँछनीय मार्ग से विरत करना और सन्मार्ग पर चलाना संभव हो ही सकता है। अपने दुर्गुणों पर यदि कड़ी दृष्टि रखी जाय और कड़ाई बरती जाये तो वे पराये घर में घुसे हुए चोर की तरह देर तक नहीं ठहर सकते, उन्हें भागना ही पड़ेगा। दुर्गुण विजातीय तत्व हैं। मानवी अन्तःकरण उनका अपना घर नहीं है। यह तो आत्मा की परमात्मा की देवभूमि है। यहाँ तो दैवी सत्प्रवृत्तियों का ही निवास हो सकता है। दुष्प्रवृत्तियां तो हमारी असावधानी का लाभ उठाकर अवैध कब्जा जमा लेती हैं। उन्हें दुत्कार दिया जाय तो पंखा झलते ही उड़ती दीखने वाली मक्खियों की तरह उन्हें पलायन करते हुए देखा जा सकता है।

दर्पण में दीखने वाली शक्ल अपने से पृथक दीखती है और उसकी गतिविधियाँ किसी अन्य की मालूम पड़ती हैं, पर वस्तुतः वह शक्ल और चेष्टा होती अपनी ही प्रतिच्छाया है। संसार एक दर्पण की तरह है इसमें अपनी ही शक्ल के सब लोग दीखते हैं। पुराने महल, मन्दिरों में कलात्मक ढंग से दर्पण के टुकड़े छत तथा सब दीवारों में जड़ने का रिवाज था। इस शीश महल कक्ष में प्रवेश करने वाले को अपनी ही शक्लें उन सभी टुकड़ों में दिखाई पड़ती थी। इससे यह कौतूहल होता था कि चारों ओर हजारों की संख्या में अपनी ही शक्लें दिखाई पड़ जा रही हैं। संसार को बड़ा काँच महल समझा जा सकता है उनमें अपनी ही प्रकृति के अनुरूप सब कुछ दिखाई पड़ता है। यदि अपनी प्रकृति बदल ली जाय तो बाह्य परिस्थितियों में आश्चर्यजनक रीति से परिवर्तन प्रस्तुत हुआ दिखाई पड़ेगा, हर व्यक्ति को सुधारना या इच्छानुकूल बनाना कठिन है- हर परिस्थिति हमारी मर्जी जैसी बनी रहे यह संभव नहीं। इस प्रकार के प्रयास करने में कितना ही श्रम कितना ही समय क्यों न लगाया जाय अपने को पूर्ण संतोष दे सकने जैसी स्थिति उत्पन्न न हो सकेगी। हाँ, अपने स्वभाव को, दृष्टिकोण को बदला जा सकता है। प्रस्तुत परिस्थितियाँ अनुकूल न होने पर भी उनके साथ तालमेल बिठाया जा सकता है। यही एक उपाय है जिसके आधार पर चैन से रहना और चैन से रहने देना संभव हो सकता है।

सूर्य अपने साथ सौरमंडल के ग्रह उपग्रहों को बाँधे रहता है और उन्हें साथ लेकर चलता है। मनुष्य एक सूर्य है जो अपने स्तर के अनुरूप वस्तु और व्यक्ति ही नहीं, परिस्थितियां भी बाँधे रहता है और साथ-साथ घसीट कर ले चलता है। अपने स्तर में परिवर्तन लाया जा सके तो कोई कारण नहीं कि परिस्थितियाँ बदलने न लगें।

आमतौर से लोग सुखद कल्पनाएँ करते रहते हैं- सुनहरे सपने देखते रहते हैं, इतने भर से कुछ काम नहीं चलता। सपने तो सपने ही हैं वे पूरे नहीं होते पर किसी बात के हर पक्ष पर विचार करने के उपरान्त अपनी स्थिति से तालमेल खाता हुआ यह सुनिश्चित संकल्प किया गया है और उसका मूल्य चुकाने के लिए साहस जुटाया है तो कोई कारण नहीं कि वह संकल्प अधूरा बना रहे। मनुष्य की आत्म शक्ति इतनी प्रचंड है कि यह मनुष्य उसे साथ लेकर-विवेक पूर्ण रीति-नीति अपनाकर अभीष्ट मार्ग पर चल पड़े और तनिक-तनिक सी कठिनाइयों को देखकर अधीर न हो तो उचित समय पर सफलता अवश्य ही मिलती है। अधीर; स्वल्प श्रम से बड़े लाभ पाने वाले, क्षमता से तालमेल न खाने वाली, योजनाएं बनाने वाले, श्रम से जी चुराने वाले और आवश्यक साधन जुटाने में उपेक्षा करने वाले प्रायः असफल रहते हैं। इन भूलों के प्रति आरंभ से ही सावधान रहा जाय, लक्ष्य के प्रति परिपूर्ण उत्साह और अथक परिश्रम जुटाये रखा जाय तो सामान्य मनुष्य भी असामान्य सफलताएँ प्राप्त करते हैं और उन्नति के उच्च शिखर तक जा पहुँचते हैं।

मनुष्य सर्वशक्तिमान परमात्मा का सामर्थ्यवान अंश है उसमें अपने पिता की समस्त क्षमताएँ सन्निहित हैं। उनको किस प्रकार जागृत, परिपक्व और प्रयुक्त किया जाय - इसी तत्वज्ञान का नाम अध्यात्म विज्ञान है। इस क्षेत्र में सदा एक ही प्रकाश संदेश विस्तृत होता है। अपने को जानो, अपनी क्षमता को विकसित करो- दृष्टिकोण और उपयुक्त क्रिया पद्धति अपनाओ, यदि इतना कर सके तो वे उपलब्धियाँ हाथ बाँधकर सामने खड़ी होंगी जो हर घड़ी अन्तःकरण को प्रसन्नता से ओतप्रोत रखे रहती हैं।

----***----


निर्बलता का पाप और प्रकृति का दण्ड

निर्बलता-चाहे किसी भी प्रकार की हो- शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या आत्मिक- के कारण प्रत्येक स्थिति और प्रयत्न का विपरीत परिणाम भी भोगना पड़ता है। निर्बल व्यक्ति अपने प्राकृतिक और जन्म सिद्ध अधिकारों से भी समुचित लाभ नहीं उठा सकता। प्रकृति की उस व्यवस्था का उस पर उलटा ही प्रभाव होता है और दुख तथा हानि ही उठानी पड़ती है। स्वास्थ्य खराब हो तो सामान्य आहार भी नहीं पचता, स्वादिष्ट व्यंजन भी अस्वस्थ व्यक्ति को अरुचिकर लगते हैं। ऐसे व्यक्ति के लिए मधुर गीतवाद्य, मनोरंजन, सुख-सुविधायें, धन दौलत सब कुछ व्यर्थ हैं। यहाँ तक कि वह चैन की नींद भी नहीं सो सकता। स्वास्थ्य खराब होने का कारण निर्बलता ही तो है। बलवान और पुष्ट शरीर में रोगाणु एक क्षण के लिए भी नहीं बचते। प्रविष्ट करते ही मनुष्य की जीवनी शक्ति उन्हें नष्ट कर डालती है।

संसार में जो भी श्रेष्ठ और सुन्दर है उसका रस साहित्य में संचित है। मधुरता, प्रेम और सौंदर्यानुभूति सब कुछ की प्रेरणा और बोध साहित्य के माध्यम से ही होता है। दुर्भाग्य से कोई व्यक्ति बौद्धिक निर्बलता का शिकार हो तो संसार के अतुल ज्ञान और आनंद के भण्डार का उसके लिए कोई मूल्य नहीं है। अन्धे व्यक्ति भी सुनकर और बहरे व्यक्ति भी पढ़कर साहित्य रस का आस्वादन कर लेते हैं परन्तु मन्दबुद्धि लोग तो समर्थ और स्वस्थ होते हुए भी उस रस-माधुरी से वंचित ही रह जाते हैं।

इसी प्रकार मानसिक निर्बलता के कारण व्यक्ति प्रकृति-ईश्वर द्वारा दिये गये उन अवसरों का कोई लाभ नहीं उठा पाते जो वस्तुतः उनके लाभ तथा आगे बढ़ने के लिए उपस्थित होते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों और कष्ट कठिनाइयों में मनोबल सम्पन्न व्यक्ति आगे बढ़ते हैं, ऊँचे उठते हैं। इसके विपरीत मानसिक रूप से निर्बल व्यक्ति उन परिस्थितियों में निराश और किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं।

आध्यात्मिक क्षेत्र में आत्मिक दृष्टि से निर्बल व्यक्तियों की भी कोई प्रगति नहीं होती। उनके लिए वह आनंद और शान्ति दुर्लभ ही नहीं असाध्य और अप्राप्य भी है जो जिसे आत्मबल सम्पन्न लोग प्राप्त कर जीवन को सफल बना लेते हैं।

प्रकृति की सभी शक्तियाँ मनुष्य के हित में ही काम करती हैं। उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं। आध्यात्मिक भाषा में इन्हीं शक्तियों को देवता कहा गया है। वेदों में वर्णित सूर्य, चन्द्र, वरुण, इन्द्रादि बहुत से देवताओं का उल्लेख है- जो वस्तुतः प्रकृति की ही विभिन्न शक्तियाँ हैं। जल, वायु, ऊष्मा, खुला आकाश जैसी देव-शक्तियाँ कभी किसी को हानि नहीं पहुँचाती। परन्तु निर्बलों के लिए वे भी असह्य और घातक बन जाती हैं। असावधानी, आलस्य या प्रमादवश लोग जीवन की सर्वोपरि अनिवार्य आवश्यकताओं की ओर कोई ध्यान नहीं देते। उनकी अपनी कमजोरियाँ ही पोषक शक्तियों का विपरीत प्रभाव ग्रहण करती हैं। कमजोर व्यक्ति के लिए दूध, मिश्री और भी अपच पैदा करते हैं। चाकू और सुई जैसे औजार मनुष्य के दैनिक जीवन में होने वाले कार्यों को सरल बनाने के लिए ही बने हैं। असावधानी या अन्य कारणों से किसी के हाथ पाँव छिद जाये तो उन औजारों का क्या दोष ? अपनी शक्ति और सामर्थ्य की उपेक्षा करने वाले निर्बल व्यक्ति भी इसी प्रकार की असावधानी के कारण प्राकृतिक शक्तियों से हानि उठाते हैं। इस हानि के लिए उन शक्तियों को कदापि दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

बलवानों के लिए सहायक सिद्ध होने वाले तत्व निर्बलों के लिए घातक बन जाते हैं। ऋतुओं का ही प्रभाव लें। सर्दी-शक्तिशाली के लिए स्वास्थ्य और बलवर्धक तथा सक्रियता बढ़ाने वाली होती है। नीरोग और स्वास्थ्य प्रेमी जन सर्दियों में तरह तरह से अपना आरोग्यवर्धन करते हैं। परन्तु कमजोरों के लिए तो यही सर्दी, जुकाम,ज्वर से लेकर निमोनिया और गठिया जैसे रोग उत्पन्न करने वाली बन जाती है। स्वस्थ व्यक्ति प्रातःकाल की सुहानी धूप में प्रकृति से जीवनी शक्ति कर्षित करता है परन्तु कमजोर को घर के भीतर बैठकर आग तापनी पड़ती है। धूप और हवा उसे अस्वस्थ बना देती है।

सम्मान और प्रतिष्ठा भी शक्तिशाली को ही मिलते हैं। कमजोर और क्षीण मना लोगों को हर कोई क्रूर दृष्टि से देखता है, शेर को उसके बल और स्फूर्ति के कारण ही जंगल का राजा कहा गया है। वन्य जन्तु तो उससे डरते ही हैं, मनुष्य भी सिंह का कम सम्मान नहीं करते। सामान्य व्यक्ति भी सिंह को पराक्रम और शक्ति का प्रतीक मानता है। राजा महाराजा तथा सरकार भी उसके चित्र को राज चिन्ह के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। इसके विपरीत ‘निर्बल’ बकरी और खरगोश को जंगली जानवरों से लेकर मनुष्य और देवता तक खा जाते हैं। उन्हें हर घड़ी अपने प्राण का भय बना ही रहता है। छोटे-छोटे पेड़ पौधे जो बारिश और सर्दी में उग आते हैं, बसंत के आते ही सूख कर नष्ट हो जाते हैं, जबकि उसी बसंत में बड़े वृक्ष लहलहाने लगते हैं, उनमें नयी कोपलें फूटने लगती हैं। अशक्त और निर्बल का अस्तित्व हर स्थान और स्थिति में असुरक्षित ही रहता है, उनके विकास में कोई भी सहयोगी नहीं बनता, ईश्वर तक भी उनकी घात लगाये बैठा रहता है। मृत्यु भी तो ऐसे ही तत्वों पर प्रथम अपना काल पाश फेंकती है।

उत्तम की रक्षा- प्रकृति के विकास का सिद्धान्त है। इसीलिए उसकी व्यवस्था में निर्बल और अशक्त लोगों को कदम कदम पर खतरे और हानियाँ उठानी पड़ती हैं। सफल, सुरक्षित और सुखी जीवन के लिए हमें बल-संवर्धन की आवश्यकता स्वीकार करनी ही पड़ेगी। इस आवश्यकता पूर्ति की ओर युवकों का ध्यान आकृष्ट कराते हुए स्वामी विवेकानन्द ने एक स्थान पर लिखा है- “सर्वप्रथम आपको बलवान बनना पड़ेगा। शक्ति संवर्धन ही उन्नति का एकमात्र मार्ग है। इसी प्रकार परमात्मा और आत्मा के अधिक निकट पहुँचा जा सकता है।”

कोई भी उद्देश्य हो -व्यक्तिगत या सार्वजनिक शक्ति और सामर्थ्य के द्वारा ही तो प्राप्त किया जा सकता है। किसी भी क्षेत्र में सफलता अचानक नहीं मिलती। उसके लिए निरन्तर प्रयत्न करते हुए अपनी शक्तियों को विकसित करना होता है। वस्तुतः सभी वस्तुएँ और उपलब्धियाँ प्राप्त है। उन्हें पाने के लिए पात्रत्व और सुरक्षा के लिए शक्ति का विकास ही चाहिए। इस पात्रता का विकास अनवरत श्रम साधना द्वारा ही किया जा सकता है। संसार में ज्ञान का अभाव नहीं है, अभाव है उस बौद्धिक सामर्थ्य का जिसके कारण हम उसे प्राप्त करने में अक्षम हैं। शिक्षा साधना द्वारा इसी सामर्थ्य और शक्ति का विकास करना होता है।

इसलिए सफलता के इच्छुक व्यक्तियों को इसी राजमार्ग का अवलम्बन लेकर अपनी पात्रता और सामर्थ्य का विकास करना चाहिए। शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आत्मिक निर्बलता को दूर कर अपने जन्मसिद्ध अधिकार को प्राप्त करने का प्रयास ही तो-शक्ति साधना है। इस साधना द्वारा अपनी कमजोरियों को दूर कर हमें अपने चतुर्दिक् फैली हुई आनन्द और सफलताओं के तत्वों का लाभ उठाना चाहिए।

निर्बलता- एक ऐसा अपराध है, पाप है- जो अन्य लोगों को भी पथभ्रष्ट करता है और विपत्तियों के गर्त में धकेल देता है। प्रकृति के विधान में निर्बलता का कठोर दण्ड लिखा है। समय रहते सावधान नहीं हुआ गया तो उसे भोगना ही पड़ेगा जिसके कारण हमारा अस्तित्व ही कुरूप और अस्त व्यस्त हो जायगा।


कट्टर पक्षपाती थे (kahani)

गान्धी जी अनुशासन और प्रामाणिकता के कट्टर पक्षपाती थे। वे चाहते थे कोई काम अप्रामाणिक न हो और कोई व्यक्ति अनुशासन हीनता न बरते।

स्वर्गीय गोखले के लेखों और भाषणों का अनुवाद गुजराती में करने का कार्य एक सज्जन को सौंपा गया, वह छपने भी लगा। उसकी भूमिका गान्धी जी को लिखनी थी। छपे फर्मे सामने आये और अनुवाद का स्तर देखा गया तो वह घटिया प्रतीत हुआ।

गाँधी जी ने कहा- अप्रामाणिक वस्तु जनता को दूं, यह मुझसे न हो सकेगा। उन्होंने सारे छपे हुए फर्मे जलवा डाले, उन्हें रद्दी में भी नहीं बेचने दिया गया।

----***----


महत्वाकांक्षा कुण्ठित तो नहीं है।

प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात के पास एक बार कोई व्यक्ति फटे पुराने कपड़े पहनकर आया। उसके शरीर पर तार-तार कपड़े थे फिर उसकी चाल-ढाल, बात करने के अन्दाज और मुखमुद्रा में एक दर्प टपकता था। सुकरात से आकर उसने कुछ अटपटे प्रश्न किये और कहा- ‘महात्मन्! मैं इसके उत्तर चाहता हूँ।’

प्रश्न करने और उत्तर पूछने के बाद उस व्यक्ति ने सुकरात की ओर इस प्रकार देखा जैसे कोई विद्वान अपनी तुलना में कम जानकार ज्ञानी से प्रश्न करता है। अन्तर्दृष्टि सम्पन्न सुकरात ने उस व्यक्ति के मनोगत भावों को जान लिया और पूछा- ‘मित्र तुम इन प्रश्नों का उत्तर किसलिए जानना चाहते हों।’

‘यह तो आप जानते ही होंगे। लोग आपके पास किस आशय से आते हैं- स्पष्ट था कि वह जिज्ञासा का समाधान करना व्यक्त कर रहा था, परन्तु अहंकार के मद में उन्मत्त व्यक्ति अपना मन्तव्य सीधे-सीधे व्यक्त करने से कतराता है। सुकरात जानते थे कि इस व्यक्ति को उत्तर देकर व्यर्थ के वाद-विवाद में उलझना पड़ेगा। अतः उन्होंने कहा- मित्र मेरे पास तो लोग जिज्ञासायें लेकर आते हैं और मैं उनका शक्तिभर समाधान करता हूँ पर तुम तो जिज्ञासा से नहीं आये हो, क्योंकि तुम्हारे फटे कपड़ों के प्रत्येक छिद्र में से दाम्भिकता झाँक रही है।”

वस्तुतः वह व्यक्ति दम्भी था और साथ ही साथ अल्पज्ञ भी। अल्पज्ञ व्यक्ति अपने सीमित ज्ञान को लेकर अपने सभी साथियों पर रौब गालिब करने का अवसर ढूंढ़ता रहता है। जहाँ तक ज्ञानार्जन का प्रश्न है, अपनी अल्पज्ञता का आभास और विशेष ज्ञान प्राप्ति का प्रयास एक उचित उपाय है। परन्तु कुण्ठित महत्वाकाँक्षी व्यक्ति अपने थोड़े से ज्ञान को लेकर ही ‘चुहिया को चिंदा मिल गया तो बजाज खाना खोल दिया’ वाली कहावत चरितार्थ करने लगते हैं। जबकि इस प्रकार के दम्भ और दर्प से न तो उसका कोई हित है और न उसके मित्र और सहयोगी ही, उससे प्रभावित होते हैं।

महत्वाकाँक्षा के कुण्ठाग्रस्त होने का कारण होता है सृजनात्मक दृष्टिकोण का अभाव। लगभग आठ नौ दशाब्दियों पूर्व जर्मनी के एक निर्धन परिवार में एक छोटा सा लड़का था, नाटे कद का और दुर्बल। घर के लोगों से लेकर ‘बाहर’ के हमजोलियों तक उसे चिढ़ाया करते, उसका मजाक बनाते रहते। यहाँ तक कि उसके माता पिता तक ने उसे प्रताड़ित किया और उसका बचपन इन कारणों से बड़ा घुटा-घुटा व्यतीत हुआ। वस्तुतः तो वह प्रतिभाशाली और महत्वाकाँक्षी था। मिलना तो चाहिए था उसे प्रोत्साहन और मार्गदर्शन जबकि मिली उपेक्षा और प्रताड़ना। फिर भी सोचता रहा कि मैं बड़ा आदमी बनूँगा। महान बनूँगा कोई मुझे छोटा न समझे। दीन हीन और नगण्य न माने। इसके लिए मैं प्रयत्न करूंगा...... प्रबल प्रयत्न करूंगा।

और उसने प्रयत्न साधना के लिए सैनिक क्षेत्र का चुनाव किया। उसके मन में बड़प्पन और विजयाकाँक्षा उत्तरोत्तर बढ़ती रही। उचित मार्गदर्शन न मिलने के कारण उसमें सृजनात्मक दृष्टिकोण का अभाव ही रहा फलतः उसकी दाम्भिकता भी बढ़ती रही और शक्ति भी। एक दिन यही व्यक्ति जर्मनी का प्रसिद्ध डिक्टेटर और दो-दो विश्व युद्धों का जनक हिटलर बना। उसके पास प्रतिभा थी, शक्ति थी और उनसे उसने सारे विश्व को चमत्कृत भी किया पर कुण्ठाग्रस्त विध्वंसात्मक महत्वाकाँक्षाओं के कारण वह विनाश की ओर ही अग्रसर हुई। वियना की गलियों में सिर पर गन्दगी की टोकरियाँ ढोने वाला यह साधारण मजदूर एक दिन बड़ी बुलंदगी के साथ कहने लगा- मेरा जन्म शासन करने के लिए हुआ है। अपनी कुण्ठाओं का प्रतिशोध पूरा करने के लिए उसने करीब नब्बे हजार निरपराध प्राणियों को यंत्रणा गृह में बन्द कर मृत्यु के मुँह में ‘बड़ी क्रूरता के साथ धकेल दिया।

नेपोलियन भी महत्वाकाँक्षी युवक था और उसने अपनी इस तृषा को तृप्त करने, यशः कीर्ति की पताका लहराने के लिए प्रथमतः लेखक बनने का प्रयास किया था। लेखक बनने के लिए उसने रूसो और ऐब्बो रेनाल की कृतियों का स्वाध्याय किया। फिर लिख डाली आनन फानन में एक पुस्तक- कर्सिका का इतिहास और उसे ऐल्बे रेनाल के पास भेज दिया।

पढ़ कर रेनाल ने लिखा- ‘और गहरी खोजकर दुबारा लिखने का प्रयत्न करो।’

बड़ी झुँझलाहट हुई नेपोलियन को। उसने दुबारा एक निबन्ध लिखा- फिर निराशा तीसरे प्रयास में भी असफलता। और इन तीन विफलताओं ने ही उसे तोड़कर रख दिया। अधीर व्यक्ति मिनटों में आम और घण्टों में जाम लगाना और उगाना चाहते हैं। साहित्य क्षेत्र में मिली प्रारम्भिक असफलताओं ने नेपोलियन की राह ही बदल दी और वह बन गया युद्धोन्मादी-विश्वविजय का स्वप्न द्रष्टा। द्वन्द्व युद्ध मारकाट, दमन, विरोधी शासकों का पतन और चीख पुकार ही उसका जीवन मार्ग बन गयी। न तो नैपोलियन अपने विजित प्रदेशों पर सदैव शासन कर सका। वह वीर था, योद्धा था, साहसी था यह ठीक है। ये गुण अनुकरणीय हैं परन्तु उसकी प्रवृत्ति विध्वंसात्मक थी। इसलिए जितने उसके प्रशंसक हैं उनसे भी कही ज्यादा उसके आलोचक मिलते हैं।

महत्वाकांक्षा कोई बुरी चीज नहीं। बुरी है उसकी विपरीत दिशा। इतिहास के कुछ गिने चुने व्यक्ति ही नहीं सर्वसाधारण में भी बड़प्पन की कुण्ठित इच्छा पूरी करने के लिए लोग ऊल-जलूल दावतें करते रहते हैं, महत्ता और सम्मान प्राप्त करने के लिए अनपढ़ और गंवार लोग जेवरों, कीमती कपड़ों में अपनी कमाई झोंकते दिखाई देते हैं। धनवान स्त्रियाँ अपने शरीर पर रौप्य और स्वर्णाभूषण लादे रहती हैं, युवक युवतियाँ अपने अभिभावकों की कमाई को तरह-तरह की पोशाकें बनाने और फैशन करने में उजाड़ते रहते हैं। आखिर इन सबका क्या अर्थ है और क्या उद्देश्य ? यही न कि हम औरों से अच्छे और ऊँचे दिखाई दें। और जब सभी लोग इस दौड़ में शामिल होते हैं तो बड़प्पन की क्या पहचान ?

मृत्यु भोज, ब्याह-शादियों और अन्य पारिवारिक आयोजनों में लोग अनाप-शनाप खर्च कर अपनी शान जताते हैं। इसमें भी कोई शान है। लाखों रुपये खर्च कर बड़ी धूमधाम से इनका आयोजन किया जाय परन्तु उनकी स्मृतियाँ चिरस्थायी नहीं रहतीं। लोग थोड़े ही दिनों में उन बातों को भूल जाते हैं। यदि दो-चार दिनों बाद ही उससे इक्कीस आयोजन कहीं हुआ तो उल्टी सारी शान मिट्टी में मिल जाती है। न भी हो तो अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च कर अपना बड़प्पन बघारना कोई बुद्धिमानी नहीं है। भला इतनी कीमत पर दो चार दिन के लिए चर्चित बन गये तो क्या बहादुरी है ? यह बात भी नहीं है कि लोग इस तथ्य से अनभिज्ञ हों। पर बड़प्पन का व्यामोह और कुण्ठाग्रस्त अहं किसी भी कीमत पर अपना अस्तित्व मिथ्या आधारों पर स्थापित करने के लिए प्रयत्न करता है।

इस प्रकार के बड़प्पन को हिटलर और मुसोलिनी से किसी भी रूप में कम नहीं कहा जा सकता। फर्क इतना है कि हिटलर और मुसोलिनी को व्यापक क्षेत्र मिला था और ऐसे व्यक्तियों को सीमित क्षेत्र मिलता है। हिटलर मुसोलिनी ने नरसंहार किया था तो ऐसे व्यक्ति धन संहार करते हैं। संहार और विध्वंस दोनों ही स्थानों पर हैं, अन्तर केवल सामर्थ्य और क्षेत्र का है।

तो महत्वाकाँक्षा की उचित कसौटी क्या है, स्पष्ट है सृजनात्मकता और उपयोगिता। सृजन का अर्थ ही उपयोगिता है। बड़ा ही बनना है तो सत्कार्यों में- पुण्य प्रवृत्तियों में अपनी शक्ति और सामर्थ्य का व्यय करना चाहिए। अर्जन करना है तो भले बुरे सभी तरीके अपना कर धनवान बनने की अपेक्षा गुणवान, परोपकारी और सेवा भावी बनना अधिक सहज है तथा अधिक लाभदायक भी। इस मार्ग से प्राप्त की गयी प्रशंसा और कीर्ति चिरस्थायी तथा अमर होती है। बुद्ध और महावीर से लेकर गाँधी, नेहरू, लिंकन, वाशिंगटन, लेनिन, पटेल आदि महामानवों ने इसी मार्ग का वरण किया है और प्रत्येक महत्वाकाँक्षी को करना भी चाहिए।

----***----


अपनों से अपनी बात


“परमार्थ-बल”


परमार्थ-बल (kavita)

होता है परमार्थ-प्रयोजन में कितना बल, खेतों में लहराती इन फसलों से पूछो।

कितना ऊँचा कर देता बलिदान मनोबल, इन बलिदानी बलखाती फसलों से पूछो॥1॥

इनकी नस-नस में कैसा उत्साह भरा है। और रगों में जाने कैसा रक्त चढ़ा है।

इनके अन्दर मचल रही भरपूर जवानी, सिर से कफन बाँधकर साहस तना-खड़ा है।

जनहिताय जीने की एक अजब मस्ती है। मरने वाली मस्ताती फसलों से पूछो॥2॥

कल ही तो इन सबके सिर कटने वाले हैं, तन भी बोटी-बोटी में बंटने वाले हैं।

मगर हौसले झूम रहे हैं इन फसलों के, बढ़े हौसले, क्या पीछे हटने वाले हैं।

जन-जन को जीवन देने के लिए मृत्यु से। हँसकर हाथ मिलाती इन फसलों से पूछो॥3॥

क्या हम? फसलों से भी हुये गये-बीते हैं, क्या हम? केवल ढाँचे है बिल्कुल रीते हैं।

मानव होकर भी भावों से शून्य हुये क्या, क्या अपने ही लिये सिर्फ पशुवत् जीते हैं।

पेट और प्रजनन ही है क्या धर्म मनुज का। ऋषि-दधीचि की उन हड्डी-पसली से पूछो॥4॥

जनहिताय जीने, का शिव-संकल्प करें हम, जन-जीवन को जीवन देने जियें-मरें हम।

सधता जाये प्रतिपल ही परमार्थ-प्रयोजन, ऐसे ही पावन-पथ पर निज चरण धरें हम॥

वरना! महाकाल तो सबको चट कर जाता। उसके मुँह में जाती पशु-नसलों से पूछो॥5॥

-मंगल विजय

----***---

*समाप्त*