एक था यात्री, दूर देश की यात्रा पर निकला था वह। अभी एक योजन ही चला था कि एक नदी आ गई, किनारे पर नाव लगी थी। उसने कहा-यह नदी मेरा क्या करेगी? पाल उसने बाँधा नहीं डाँड उसने खोले नहीं, जाने कैसी जल्दी थी। मल्लाह को उसने पुकारा नहीं। बादल गरज रहे थे। लहरें तूफान उठा रही थी। फिर भी वह माना नहीं, नाव को लंगर से खोल दिया और आप भी उसमें सवार हो गया।
किनारा जैसे-तैसे निकल गया, पर नाव मझधार में आई वैसे ही भंवरों और उत्ताल तरंगों ने आ घेरा। नाव ऊपर तक उछली और यात्री समेत जल में समा गई।
एक दूसरा यात्री आया। किनारे लगी नाव टूटी-फूटी थी, डाँड कमजोर थे, पाल फटा हुआ था, तो भी उसने युक्ति से काम लिया। नाविक को बुलाया और कहा-मुझे उस पार तक पहुँचा दो। नाविक यात्री को लेकर चल पड़ा। लहरों ने संघर्ष किया, तूफान टकराये, हवा ने पूरी ताकत लगाकर नाव को भटकाने का प्रयत्न किया, पर नाविक एक-एक को सम्भालता हुआ यात्री को सकुशल दूसरे पार तक ले आया।
मनुष्य जीवन भी एक यात्रा है, जिसमें पग-पग पर कठिनाइयों के महासागर पार करने पड़ते हैं, जो नाव छोड़ने से पूर्व भगवान को अपना नाविक नियुक्त कर लेते हैं, भगवान उनकी यात्रा को सरल बना देते हैं, क्योंकि जीवन पथ की सभी कठिनाइयों के वही ज्ञाता और वही मनुष्य के सच्चे सहचर हैं। अपने अहंकार और अज्ञान में डूबे मनुष्यों की स्थिति तो उस पहले यात्री जैसी है जो नाव चलाना न जानने पर भी उसे तूफानों में छोड़ देता है और बीच में ही नष्ट हो जाता है।
-नानक
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प्रातःकाल-ब्रह्म मुहूर्त का समय था। प्राची दिशा में भगवान भास्कर का अरुणिम प्रकाश अपनी रक्तिम आभा बिखेर रहा था और सर्वथा निर्जन एकान्त में शान्त बह रही सरिता के तट पर आकर रुक गये थे-वैवस्वत मनु। उनका नित्य का नियम था कि वे इसी समय सरिता तट पर आकर स्नान, ध्यान करते और संध्या, पूजन तथा सूर्यार्घ्यदान के बाद वापस लौट जाते।
ऋषि ने अपने वल्कल नदी तट पर रखे और शौचादि से निवृत्त होने के लिए नदी से कुछ दूर एकान्त वन में चले गये।
उस समय पक्षियों का कलरव भी गूँजने लगा था। जैसे भगवान आदित्य के साथ जाग कर वे भी उनका साहचर्य निभा रहे थे। आश्रम में रहने वाले विद्यार्थी भी अपनी शय्या छोड़कर दिनचर्या का आरम्भ करने की ओर प्रवृत्त हो रहे थे। तब तक वैवस्वत मनु स्नान, ध्यान से निवृत्त होकर संध्योपासना के लिए बैठ चुके थे।
आवश्यक उपचार पूरे कर उन्होंने गायत्री जप आरम्भ किया। प्रातःकाल के उदित रवि की भाँति अपनी अन्तरात्मा में विश्वात्मा की जलती ज्योति का ध्यान किया और उस ज्योति में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के समस्त कषाय-कल्मषों को जलते हुए देखा। गायत्री जप पूरा होते ही वे उठ खड़े हुए-सूर्य भगवान को अर्घ्य देने के लिए।
कटि प्रदेश तक स्पर्श कर सके इतने गहरे पानी में प्रवेश किया और दोनों हाथों की अंजुलि में पानी भर कर पूर्व दिशा में उसे छोड़ा-मन्त्र पाठ करते हुए।
एक बार..... दो बार.....तीन बार इसी क्रिया को दोहराया। पर अन्तिम बार उन्होंने अपनी हथेली पर कोई जीव रेंगता हुआ अनुभव किया।
मनु ने शान्त चित्त से अर्घ्य दिया।
अर्घ्य देने के बाद उन्होंने अंजुलि में देखा। एक मीन शिशु हथेली पर रेंग रहा था। उनके मन में अचकचाहट होने लगी। वे उसे फेंके-फेंके इतने में ही मीन शिशु ने कहा-‘त्राहिमाम्-त्राहिमाम्।’
‘क्या बात है’-मनु ने पूछा।
आप मेरी रक्षा कीजिए। इस प्रकार आप मुझे पुनः जल में छोड़ देंगे तो मीन मत्स्य मुझे अपना आहार बना लेंगे। कृपा कर मुझ पर दया कीजिए।
आर्त विनय सुनकर ऋषि हृदय में करुणा जाग उठी और वे तट पर रखे जल भरे कटोरे में रखकर उसे आश्रम ले आये। न जाने क्यों शरणार्थी बनकर रक्षा की भीख माँगने वाले उस मीन शिशु के प्रति ऋषि के हृदय में उसके प्रति प्यार उमड़ने लगा और वे नित्य उसका जल बदलने लगे।
कालान्तर में वह मीन शिशु बड़ा तो ऋषि ने मीन शिशु को कटोरे में से हटाकर कुण्ड में स्थानान्तरित कर दिया। वह और बड़ा हुआ कुंड में उपलब्ध जल और उसमें मिलने वाले कीट तथा जीवाणु उसके लिए अपर्याप्त पड़ने लगे तो मनु ने मीन को स्थानान्तरित कर सरोवर में छोड़ दिया।
सरोवर में भी वे उसकी सुविधा-असुविधाओं का ध्यान रखते और न जाने क्यों सरोवर भी उसके लिए छोटा पड़ा तो महर्षि ने उसे फिर सागर में छोड़ दिया। जब वे उसे सागर में छोड़ कर आये तो मीन ने महर्षि के प्रति, कृतज्ञता व्यक्त की तथा ऋषि भी विस्मय विमुग्ध होकर अपने आश्रम लौटे।
कल्पान्त में जब प्रलय हुआ तो सारी सृष्टि जल मग्न हो गई। प्राणी भी अथाह जलराशि में डूबकर अपना प्राण विसर्जन करने लगे। मनु के आश्रम के चतुर्दिक् भी सागर लहरा रहा था। चूंकि आश्रम ऊंचाई पर था इसलिए पानी धीरे-धीरे चढ़ रहा था और ऋषि प्रफुल्ल चित्त से मरण की प्रतिज्ञा कर रहे थे। लेकिन तभी वह मीनवत्स जिसे ऋषि ने सागर में छोड़ा था और जो अब मत्स्य का रूप धारण कर चुका था, ऋषि के समीप आया और बोला-महाराज! आपने मेरी कभी रक्षा की है। इस संकट के समय में भी आपकी रक्षा के लिए आया हूँ। आइये और मेरी पीठ पर सवार होकर भविष्य में प्रभु का संकल्प पूरा करने के लिए अपना जीवन बचाइए।
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सामान्य मनुष्यों में न पाई जाने वाली आध्यात्मिक विशेषताओं को अतीन्द्रिय चेतना कहते हैं। प्रयत्न करने पर इन्हें हर कोई जगा सकता है मनुष्य की विदित क्षमता सीमित है किन्तु अविज्ञात सामर्थ्यों का कोई अन्त नहीं। शरीर साधारणतया अन्न, जल और वायु पर जीवित रहता है, पर यदि उसकी असाधारण क्षमताओं को जगाया जा सके तो अदृश्य जगत की वायवीय स्थिति में विद्यमान आहार सामग्री को आकर्षित करने से काम चल सकता है और जिस अन्न, जल और हवा के ऊपर सामान्य प्राणी जीवित रहते हैं उन्हें अनावश्यक सिद्ध किया जा सकता है।
स्वामी विवेकानन्द ने तत्कालीन एक महात्मा ‘‘पौहारी बाबा’’ का विवरण प्रकाशित किया था कि बिना वह अन्न, जल के मुद्दतों से जीवित हैं। उनकी घोषणा को जांचा गया और सही पाया गया था। समाधि लेकर कई हठ योगी गुफा में बन्द हो जाते हैं और लम्बी अवधि तक बिना अन्न, जल एवं हवा के जीवित रहते हैं। जिस स्थिति में बैठे थे उसी स्थिति में बने रहते हैं। मल मूत्र विसर्जन करने एवं सोने, उठने की उन्हें कुछ भी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। कितने ही हठयोगी रक्त संचार एवं हृदय की धड़कन बन्द करके भी जीवित रहने के प्रमाण विशेषज्ञों के परीक्षणों के साथ दे चुके हैं सामान्य मनुष्य जीवन से कई गुनी आयु वाले तथा असह्य शीत में निर्द्वन्द्व निवास करने वाले योगी अभी भी विद्यमान हैं।
योगशास्त्र में शरीर को असाधारण रूप में हलका या भारी बना लेने-अदृश्य हो जाने जैसी सिद्धियों का वर्णन है। यदा-कदा इनके प्रमाण भी मिल जाते हैं। सामान्य अभ्यास में नट, बाजीगर शरीर साधना के ऐसे कौतुक कौतूहल दिखाते हैं जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। यह अतिरिक्त वस्तुतः सामान्य ही होता है। मूर्छित स्थिति में ऐसी अगणित विशेषताएं मानवी काया में विद्यमान हैं जो दैनिक जीवन में दृष्टिगोचर न होने से असामान्य अथवा चमत्कारी दीखती हैं, पर वस्तुतः यहाँ चमत्कार कुछ भी नहीं है। जो कुछ हो रहा है, हो सकता है वह प्रकृति की नियत विधि-व्यवस्था के अन्तर्गत ही होता है।
परमाणु शक्ति कहीं आकाश से नहीं टपकती है, सृष्टि के आरम्भ से ही उस अदृश्य कण में वह विद्यमान थी। मूर्छित होने के कारण वह विदित नहीं होती थी। वैज्ञानिक उसे प्रयत्नपूर्वक जागृत क्षमता का परिचय देती है। समूचे शरीर के सम्बन्ध में यही बात है उसकी अतिरिक्त, असामान्य एवं विशिष्ट शक्तियों का कोई ठिकाना नहीं। जड़ परमाणु की शक्ति को देखकर चकित रह जाना पड़ता है फिर चेतन जीवाणु के भीतर कितनी क्षमता हो सकती है इसका अनुमान इसी गणित से लगाया जा सकता है कि जड़ की तुलना में चेतना को कितना अधिक महत्व दिया जा सकता है और समर्थ माना जा सकता है।
शरीर के उपरान्त मन का क्षेत्र आता है। मस्तिष्क उसका केन्द्र है और नाड़ी संस्थान के माध्यम से विस्तार सम्पूर्ण शरीर में देखा जा सकता है। ज्ञानेन्द्रियों में अपने-अपने स्तर की सरसता और अनुभूतियाँ होती हैं। कर्मेन्द्रियों में अपने अपने ढंग की कार्यक्षमता देखी जाती है। यह सब कुछ मन-मस्तिष्क का ही चमत्कार है। आँखों के माध्यम से मस्तिष्क ही दृश्य देखता और उनसे किसी प्रकार का निष्कर्ष निकालता है। मस्तिष्क यदि अस्त-व्यस्त हो तो आँखों के खुले रहने और घटनाक्रम सामने से गुजरने पर भी दृश्य का समुचित निष्कर्ष न निकाला जा सकेगा। सौन्दर्य बोध आँखों का काम नहीं, वरन् विकसित कलात्मक सम्वेदना की अनुभूति है। एक ही वस्तु को देखकर एक मनुष्य उसकी आकृति-प्रकृति मात्र को समझ पाता है। जबकि दूसरा भावुक या अन्वेषक उसमें से सौन्दर्य सम्वेदना अथवा अन्यान्य विशेषताएं अनुभव करता है। यह अन्तर आँखों की दृश्य शक्ति का नहीं वरन् मस्तिष्कीय चेतना की स्तर भिन्नता का है।
यही बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में है। उनकी सामान्य सम्वेदनाओं का अनुभव भी स्थानीय नहीं, मस्तिष्कीय होता है। ज्ञान तन्तुओं को सुन्न कर देने पर रसास्वादन तो दूर काट पीट तक का पता नहीं चलता। कर्मेन्द्रियों भी मस्तिष्क का आदेश पाने पर ही सक्रियता एवं शिथिलता प्रकट करती हैं। यह तथ्य अब दिन-दिन अधिक स्पष्ट होता जाता है कि शरीर पर मन का पूर्णतया शासन है। आरोग्य शास्त्र अब धीरे-धीरे निष्कर्ष पर पहुँचता जाता है कि मनोविकार ही शारीरिक दुर्बलता एवं रुग्णता के प्रधान कारण होते हैं। विषाणुओं से, वात-पित्त कफ से, अपच से, ऋतु प्रभाव से, आहार-विहार से जितना प्रभाव शरीर पर पड़ता है उन सब के सम्मिलित प्रभाव की अपेक्षा अकेला मनोबल कहीं अधिक प्रभावित करता है। नवीनतम ‘शोधों’ ने मानसिक सन्तुलन को- हँसती-हँसाती, हलकी-फुलकी जिन्दगी को-आरोग्य रक्षा का सबसे बड़ा कारण और आधार माना है। रोगियों में अधिकांश की मन स्थिति ही विकृत एवं डांवाडोल होती है। समर्थता प्रकट करने वालों में से कितने ही शारीरिक दृष्टि से दुर्बल होते हुए भी मनस्वी एवं ओजस्वी होने के कारण शूरवीरों जैसे पराक्रम दिखाते हैं।
शरीर और मन का अविच्छिन्न सम्बन्ध होने से आरोग्य, दीर्घजीवन, पुरुषार्थ, सौन्दर्य, प्रतिभा, स्फूर्ति जैसे अनेक लक्षणों से मानसिक स्थिति का परिचय मिलता है। मन गिरा, हारा होने पर शरीर का गठन सही होने पर भी उसमें निर्जीवता, निराशा, थकान, उदासी छाई दीखती है और आकर्षण न जाने कहाँ चला जाता है। इसके विपरीत काली कलूटी और गठन की दृष्टि से गई गुजरी आकृति होने पर भी भीतरी उत्साह उस काया को असाधारण रूप से तेजस्वी और आकर्षक बना देता है। मुर्दों की आकृति देखकर उनकी मन:स्थिति जानना कठिन है, पर जीवित व्यक्ति का चेहरा देखकर उसकी आन्तरिक स्थिति का बहुत कुछ परिचय सहज ही मिल जाता है। यह मन का शरीर के माध्यम से अपनी स्थिति प्रकट करने का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
शरीर को कठपुतली की तरह नचाने वाला मन उसका केन्द्र संस्थान मस्तिष्क अपने आप में कितना विचित्र और विलक्षण है यह उसके गठन और क्रिया कलाप को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। सामान्य बुद्धि वैभव का विकास विस्तार जीवन की अनेकानेक सफलताओं का द्वार खोलता है। उसमें त्रुटि रह जाने पर मनुष्य को पिछड़ी स्थिति में रहना पड़ता है। ऐसे ही लोग उपेक्षित एवं उपहासास्पद स्थिति में पड़े हुए गुजर करते हैं। जीवन की बहिरंग परिस्थितियों को मन स्थिति ही प्रभावित करती है। उसी की प्रतिक्रिया से व्यक्ति आकर्षित एवं उदासीन बनते हैं। सहयोग एवं असहयोग का सिलसिला भी इसी आधार पर चलता है। सफलताओं एवं असफलताओं के चक्र भी इसी धुरी पर घूमते हैं।
यह चर्चा शरीर पर-दैनिक जीवन पर पड़ने वाले मनःस्थिति के प्रभाव की है। आगे की बात और भी अधिक गम्भीर एवं महत्वपूर्ण है। प्रकट व्यक्तित्व और उसके व्यापक प्रभाव की आधारभूत सत्ता, मानसिक चेतना का अपना स्वरूप देखने, समझने का प्रयत्न किया जाता है तो आश्चर्य चरम सीमा तक पहुँच जाता है। छोटे से शरीर में कैद तनिक सी चेतना हर दृष्टि से नगण्य है। उसका प्रभाव और कार्य-क्षेत्र अपनी छोटी सी सत्ता तक सीमित दीखता है, पर अन्वेषण यह बताता है कि यह समष्टि मन तत्व के साथ भी अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है और चेतना के समुद्र में से जब जितना-जिस स्तर का- आदान-प्रदान चाहती है उतना निर्बाध रूप से उपलब्ध कर लेती है।
मस्तिष्कीय संरचना लगभग उसी स्तर की है जैसी कि पृथ्वी के ध्रुव प्रदेशों की। अन्तर्ग्रही आदान-प्रदान के लिए इन दोनों छोटे क्षेत्रों की असाधारण रूप से अद्भुत होती है। मस्तिष्क की स्थिति भी ऐसी है। उसके सामान्य दीखने वाले वसा कण-वस्तुतः अनौखे चुम्बकत्व से भरे पूरे हैं। उनकी विद्युतीय ऊर्जा यों थोड़ी बहुत तो इलेक्ट्रो कार्डियो फोन जैसे छोटे उपकरणों से भी जानी, नापी जा सकती है, पर वस्तुतः वह चेतना स्तर की होने के कारण यान्त्रिक पकड़ एवं परख से बहुत आगे की है। यन्त्रों में जीवात्मा-जीवन तथा उसके सम्वेदनात्मक उतार-चढ़ावों को जानने का कोई उपकरण निकल नहीं सका है और भविष्य में वैसी संभावना भी नहीं है। क्योंकि भौतिक यंत्र मात्र पंचभूत प्रकृति के बने जड़ शरीर की हलचलें भर नाप सकते हैं। चेतना का स्वरूप और सम्वेदनाओं का प्रभाव यन्त्रों की पकड़ में नहीं आता।
मस्तिष्क घटकों का चुम्बकत्व जीवाणु को जितना प्रभावित करता है उतना तो प्रत्यक्ष प्रयोग से जाना भी जाता है और उतने को भी ऐसा माना गया है जिसकी तुलना में यान्त्रिक विद्युत का स्तर बहुत ही घटिया बैठता है इसकी गहरी परतें तो दो ही प्रकार से जानी जा सकती हैं। एक तो उसी स्तर की विकसित चेतना, योग दृष्टि उसे परख सकती है। दूसरे उसकी क्रिया प्रतिक्रिया के चमत्कारी घटनाक्रमों को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि इस सामान्य के पीछे कुछ असामान्य काम कर रहा है।
इस विश्व के कण-कण में अजस्र शक्ति का भण्डार भरा पड़ा है। पर वह है प्रसुप्त स्थिति में। छोटे स्तर के प्राणी उसमें से बहुत ही स्वल्प मात्रा की जानकारी रखते हैं। शरीर यात्रा के लिए प्रकृत पदार्थ जिस प्रकार काम आते हैं वे उतना भर जानते हैं। विकसित मानवी चेतना ने अग्नि का उपयोग, कृषि, चिकित्सा आदि प्रयोजनों में काम आने वाले रहस्यों को प्रयत्नपूर्वक जाना और लाभ उठाया। अब तो विज्ञान की गगनचुम्बी प्रगति हो चुकी है और एक के बाद एक दैत्य उपकरण उसके हाथ में आ गये हैं। भविष्य में इससे भी अनेक गुनी शक्ति हाथ में आ सकती है। उन उपलब्धियों के पीछे तथ्य इतना ही है कि विकसित चेतना ने प्रकृत पदार्थों के पीछे प्रस्तुत स्थिति में पड़ी शक्ति को पहचाना और उसे जागृत करके अपना काम बनाया। जीवाणु सत्ता के बारे में भी यही बात है। शरीर में विद्यमान विभिन्न वर्गों के जीवाणुओं पर शोध हो रही है और टेस्ट ट्यूबों में मनचाही आकृति-प्रकृति के मनुष्यों के अभिनव सृजन का प्रयत्न चल रहा है। यह प्रसुप्ति के जागरण की चेष्टा भर है। मस्तिष्कीय क्षेत्र के प्रधान रूप से परिलक्षित होने वाली चेतना को जिन घटकों में काम करते देखा गया है वहाँ की खोज-बीन भी उसी उत्साहपूर्वक चल रही है। अतीन्द्रिय चेतना के चमत्कार प्रत्यक्ष होने लगे हैं और समझा जाने लगा है कि मस्तिष्क की स्थिति जीवनयापन के सामान्य क्रिया-कलाप पूरे करने जितनी सीमित नहीं है अपितु उसके पीछे एक से एक बड़ी अद्भुत सम्भावनाएँ झाँकती देखी जा सकती हैं।
साधारणतया परमाणु में भार, घनत्व, विस्फुटन, चुम्बकीय क्षेत्र आदि भौतिक परिचय देने वाले लक्षण होते हैं। पर अब किशोरावस्था में प्रवेश करते हुए विज्ञान की पकड़ में ऐसे सूक्ष्म विद्युतीय कण आ गये हैं जिनमें भौतिक परमाणु में पाया जाने वाला एक भी लक्षण नहीं है। फिर भी वे प्रकाश की गति से शरीरों के भीतर और पोले आकाश में निर्बाध भ्रमण करते रहते हैं वे भौतिक परमाणुओं को बेधकर आर-पार निकल जाते है। पदार्थ की कोई दीवार उन्हें रोक तो नहीं पाती, पर यदा-कदा उनमें टकराव उत्पन्न होते देखा गया है। इस टकराव के अवसर पर ही उनका अस्तित्व अनुभव में आता है। गणित शास्त्री एड्रियांड्राब्स आदि मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने इसी जाति के साइन्नोन कणों के अस्तित्व का प्रतिपादन किया है। यह सोचा जा रहा है कि सम्भवतः न्यूत्रिनी कणों के साथ साँठ-गाँठ करके अतीन्द्रिय चेतना उभारने का पथ प्रशस्त करते हैं।
अब न्यूत्रिनी कणों का प्रभाव मनुष्य की मस्तिष्कीय चेतना और तन्तु समूह पर क्या हो सकता है इसकी गहरी खोजे चल रही हैं। वैज्ञानिक एक्सेल फरसेफि का कथन है कि मानसिक चेतना पर वे जब प्रभाव डालते हैं और वहाँ एक नई जाति के ऊर्जा कणों का जन्म होता है जिन्हें माइन्जेन नया नाम दिया गया है। अनुमान है कि यदि इनका उद्भव और विकास मस्तिष्क में होने लगे तो मनुष्य का उपचेतन मन ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के साथ सम्बन्ध होकर अपनी ज्ञान परिधि और क्रिया शक्ति असीम कर सकता है। तब शरीर बन्धनों के कारण उसकी सीमित क्षमता के असीम बनने में कोई कठिनाई न रहेगी।
जीवन विज्ञानवेत्ता प्रो0 फ्रेंक ब्राउन की लम्बी शोधें इस निष्कर्ष पर पहुंची हैं कि जिस प्रकार हमारे ईद गिर्द हवा भरी है उसी प्रकार इस ब्रह्मांड व्यापी ऊर्जा समुद्र में सृष्टि का प्रत्येक प्राणी जीवन प्राप्त करता है। उस महान प्रसारण को प्रत्येक प्राणी एक छोटे रेडियो रिसीवर की तरह अपनी पात्रता के अनुरूप ग्रहण करता है और उसमें अपना उपार्जन सम्मिलित करता है। इस प्रकार हर प्राणी अथवा पदार्थ अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखते हुए एक ही संयुक्त सत्ता का अंश है। भिन्नता के बीच एकता के वेदान्त सिद्धान्त को अब क्रमशः विज्ञान के क्षेत्र में भी मान्यता मिलती चली जा रही है।
मनुष्यों में जो अन्य प्राणियों से स्तर दृष्टिगोचर होती है, जिसे शरीर संवेदना से आगे की चेतना कहा जा सकता है। यह आखिर है क्या? इस संबंध में शोधकर्त्ताओं ने कई निष्कर्ष निकाले हैं। न्यूयार्क विश्व विद्यालय के डॉ0 राबर्ट वेकर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं, ब्रह्मांड व्यापी विद्युत चुम्बकीय शक्ति को, विश्व के प्रत्येक पदार्थ को-जड़ चेतन को, अपने साथ जकड़े हुए है। विश्व की प्रत्येक इकाई उसी समष्टि की एक घटक है। अस्तु पृथकता के बीच सघन एकता विद्यमान है और प्राणियों में दृश्य-अदृश्य आदान-प्रदान होता है। जो क्रम आये दिन अनुभव में आता रहता है वह सामान्य और जो यदा-कदा दीख पड़ता है वह असामान्य, अतीन्द्रिय या चमत्कार कहा जाता है।
सृष्टि के रहस्यों की गहरी परतों के ऊपर चढ़े हुए आवरणों को उठाते हुए मनुष्य प्रकृति की अद्भुत क्षमताओं का अधिपति किस आधार पर बनता चला जाता है? उसने जल, थल और नभ पर आधिपत्य स्थापित करने में सफलता’ क्यों कर पाई? मानवी मस्तिष्क के विकास की सम्भावना किस आधार पर बन सकी जब कि अन्य प्राणियों के मस्तिष्क अपने क्षेत्र में मनुष्य से भी अधिक विशिष्ट स्तर के होने पर भी निर्वाह परिधि से आगे किसी विकास क्षेत्र में प्रवेश न कर सके? मानवी मस्तिष्क को प्रस्तुत उपलब्धियाँ कहाँ से क्यों कर प्राप्त हो सकीं? इस प्रश्न के सम्बन्ध में सामान्य से समाधान नहीं होता उसके पीछे कुछ असामान्य होने की बात सोचनी पड़ती है।
परा मनोविज्ञान अनुसंधान की दिशा में विधिवत प्रयत्न लगभग एक शताब्दी से चल रहे हैं। इसका श्रीगणेश लन्दन सोसाइटी फॉर साइकिकल रिसर्च के रूप में हुआ। इसके तीन वर्ष बाद वैसी ही शोध सभा अमेरिका में भी गठित हुई उसका नाम रखा गया-‘अमेरिकन’ सोसाइटी फॉर साइकिकल रिसर्च’ इंग्लैण्ड में हेनरी लिजविक सर कानन डायल, सर अलीवर लाज, सर विलियम क्रुक्स जैसे मनीषियों ने इन प्रयोगों में गहरी दिलचस्पी ली। अमेरिका में हुए शोध प्रयत्नों में पिछली पीढ़ी के मनीषियों में विलियम जेम्स, मैक्डागल का नाम अग्रिम पंक्ति में है। रूप के शरीर शास्त्री बी0 एम0 वेख्तेरेफ की खोजों ने पूरा मनोविज्ञान शोध को आगे बढ़ाने में भारी प्रयत्न किये हैं।
इन दिनों कितने ही विश्वविद्यालयों में परा मनोविज्ञान सम्बन्धी शोध कार्य बड़े उत्साहपूर्वक चल रहे हैं। कैलीफोर्निया की स्टैन फोर्ड युनिवर्सिटी, नीदरलैण्ड की ग्रोर्निंगन युनिवर्सिटी, हारवर्ड युनिवर्सिटी, शिकागो युनिवर्सिटी ड्यूक युनिवर्सिटी आदि में चल रहे शोध प्रयत्नों ने इस विज्ञान के नये अध्याय आरम्भ किये हैं और ऐसे प्रमाण एकत्रित किये हैं। जिनसे प्रतीत होता है कि मनुष्य में काम चलाऊ व्यवहार बुद्धि के अतिरिक्त और ऐसा भी बहुत कुछ है जिसे असामान्य और अद्भुत कहा जा सके। ऐसा क्यों होता है। अचेतन और उपचेतन मन की विलक्षण क्षमताओं का स्वरूप और कारण समझने में इन शोध प्रयत्नों से बहुत सहायता मिली है और भविष्य में अधिक जान सकने की सम्भावना का पथ प्रशस्त हुआ है।
‘फाउण्डेशन आफ रिर्चस आन दि नेचर आफ मेन’ से सम्बद्ध ‘इन्स्टीट्यूट फॉर पैरासाइकोलॉजी’ ने परा मनः शक्ति के सन्दर्भ में अति महत्वपूर्ण शोध सामग्री एकत्रित की है।
ड्यूक विश्वविद्यालय के डॉ0 जे0 वी0 राइन द्वारा लिखित पुस्तक फ्रंटियर्स आफ माइण्ड में मस्तिष्कीय विलक्षणता पर गम्भीर प्रकाश डाला गया है। इन को विकसित करने पर प्राप्त हो सकने वाले लाभों की और अंगुलि निर्देश किया है।
परा मनोविज्ञान कभी जादुई कौतूहल समझा जाता था पर अब उसे संसार भर में विशुद्ध विज्ञान का दर्जा मिल गया है और प्रायः सभी देशों में अपने-अपने स्तर के शोध संस्थान सरकारी और गैर-सरकारी स्तर पर यह तलाश कर रहे हैं कि रहस्य मानस के पीछे क्या सिद्धान्त और कौन तत्व काम करते हैं?
यह सारा ब्रह्माण्ड सामान्य भी है और असामान्य भी। आकाश की नीली छत में टिमटिमाते जुगनू उड़ रहे हैं और दो बड़े झाड़ फानूस उजाले बखेरने की ड्यूटी पूरी कर रहे है। इतनी छोटी सामान्य व्याख्या अन्तरिक्ष की कर देना बाल बुद्धि के लिए पर्याप्त है। असामान्य को जब खोजा जाता है तो ग्रह तारकों और नीहारिकाओं की आकृति-प्रकृति का विस्तार देखते हुए चकित रह जाना पड़ता है। उनकी दूरी-चाल, कक्षा और विस्तृति का विवरण सामने आता है तो सहसा उस पर विश्वास करने को जी नहीं करता। सौर मण्डल के सदस्यों का पारस्परिक आदान-प्रदान इतना महत्वपूर्ण है कि उसे देख कर लगता है जैसे एक ही शरीर के विभिन्न अवयव मिल जुल कर किसी काय व्यवस्था को पूरी करने में संलग्न हों।
सामान्य दृष्टि से मानवी शरीर और मस्तिष्क भी सामान्य है-उसे भौतिक विश्लेषण के अनुसार चलता-फिरता पौधा अथवा कोटि कोटि जीवधारियों की सैन्य शृंखला का एक नगण्य सा घटक कहा जा सकता है, पर जब उसके अन्तराल में प्रसुप्त क्षमता का थोड़ा सा परिचय मिलता है तो लगता है यह अद्भुत है-असामान्य है। यदि यह प्रसुप्ति जागृति में बदली जा सके तो बीज के वृक्ष बन जाने की तरह नर को नारायण स्तर की भूमिका निभा सकने की पूरी-पूरी सम्भावना विद्यमान है।
सर्व त्यागश्च निर्वाणं निर्वाणार्थीच में मनः त्यक्तव्यं चेन्मना सर्वं वरं सत्वेणु दीयलाम् ।।
मेरा मन मोक्ष चाहता है। मोक्ष क्या है? सर्वस्व का त्याग ही मोक्ष है। हे मन! यदि एक दिन यहाँ सब कुछ को छोड़कर ही चले जाना है तो जो कुछ भी तेरे पास है उसे अभी निम्न कल्याण के लिए क्यों नहीं दे दिया जाय? जिससे सहज ही में मोक्ष प्राप्त हो जावें।
इंग्लैण्ड के धन कुबेर मोटर उद्योग पति लार्डफील्ड अपनी कार प्रदर्शन के सिलसिले में एक छोटे कस्बे में गये तो वहाँ के एक पत्रकार ने उनसे भेट की। और इंग्लैण्ड के कार उद्योग पर एक छोटा लेख लिख देने का अनुरोध किया।
नफील्ड सहमत हो गये और उसने लेख लिख दिया। सम्पादन उतने बड़े लेख का पारिश्रमिक पन्द्रह पोण्ड देते थे सो लेख छपने पर उनने वह राशि चैक से भेज दी।
चैक प्राप्ति के धन्यवाद सहित नफील्ड के सेक्रेटरी ने सम्पादन को लिखा-‘लार्ड महोदय, इस चैक को पाकर इतने प्रसन्न दीखते हैं जितने वे पहले कभी दिखाई नहीं दिये। आपका चैक उनने भुनाया नहीं वरन् शीशे में मढ़ा कर रख लिया है और हर किसी को दिखाते हुए कहते हैं- अब मैंने लेखक कला सीखी और अपने निज की कुशलता बढ़ा कर इतने रुपये कमाये हैं। अब तक तो मैं दूसरों की योग्यता और मेहनत से ही धन कमाता रहा इसलिए इतना आनन्द भी पहले कभी अनुभव नहीं किया।
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मानवी प्रगति के अनेक प्रशंसनीय प्रयासों में पिछड़ापन बहुत ही अखरने वाला और अशोभनीय है कि शरीर और मन रूपी वाहनों-उपकरणों एवं सेवकों की गुलामी उस पर पूर्ववत् लदी रहे। क्षुद्र प्राणियों को ऊँचा उठा कर उसने भोजन, वस्त्र और निवास की सुव्यवस्था के लिए कला और विज्ञान के उच्च स्तरों तक अपनी पहुँच पहुँचाती है तो फिर यह दयनीय स्थिति क्यों रहे, जिसमें शरीर और मन की लिप्साएं ही उस पर अधिकार जमाये रहें और अपनी मनमर्जी से उसी प्रकार नचाती रहे जिस प्रकार कठपुतली को बाजीगर नचाता है।
अपनी सम्पत्ति-अपनी प्रजा और अपने उपकरण औजारों एवं हथियारों का उपयोग जब स्वयं ही ठीक प्रकार किया जाने लगे तो समझना चाहिए कि अल्पवयस्कता दूर हो गई और प्रौढ़ता आ गई। नाबालिगों को न वोट देने का अधिकार होता है न वे कहीं कोई उत्तरदायी पद प्राप्त कर सकते हैं-अपनी निज की सम्पत्ति भी बेच नहीं सकते और न उनके दिये गये वचनों का कोई कानूनी मूल्य माना जाता है। चेतनात्मक दृष्टि से अविकसित और अपरिपक्व व्यक्ति वे हैं जिन्हें अभी तक अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारी निबाहने का अनुभव अभ्यास नहीं हो पाया। बड़ी उम्र के भी ऐसे अविकसित और विक्षिप्त लोग होते हैं जो बच्चों की तरह सोचते और उन्हीं के जैसे आचरण करते हैं। इन्हें भी अप्रमाणित माना जाता है और नागरिक अधिकारों से वंचित रखा जाता है। जिस की क्रियाएँ-विचारणाएँ और आकाँक्षाएँ चेतना की प्रौढ़ता से प्रभावित एवं संचालित रहती हैं समझना चाहिए कि वे वयस्क हो चुके और अपनी प्रशासनिक कुशलता का परिचय दे रहे हैं। इनकी चेतना पर इन्द्रिय लिप्सा का अधिकार है-अहंकार प्रदर्शन के लिए जिनका मस्तिष्क उच्छृंखल आतुरता का बेरोक-टोक परिचय दे रहा है, समझना चाहिए यहाँ वन्य पशुओं को पूरी छूट मिली हुई है। हाथी को अंकुश के सहारे घोड़े को लगाम के सहारे-ऊँट को नकेल और बैल को रस्सी के सहारे सही रास्ते पर चलाया जाता है। यदि यह नियन्त्रण न हो तो इन पशुओं के पालनकर्ता भारी घाटा और भारी जोखिम उठावेंगे। ठीक इसी प्रकार अविकसित चेतना जब वासनाओं और तृष्णाओं को कुछ करते रहने की छूट दे देते हैं उन पर अंकुश रखने में असमर्थता प्रकट करती है तो समझना चाहिए कि यही दुर्गति के अतिरिक्त और कुछ होना नहीं है।
चेतना का स्तर जब भी विकसित होता है तो उसका प्रमाण आत्मानुशासन के रूप में दृष्टिगोचर होने लगता है। तब इन्द्रियों मचलना बन्द कर देती हैं और आज्ञाकारी सेवक की तरह शासन के निर्देशों का अक्षरशः पालन करने में अपनी तत्परता दिखाती हैं। शरीर की हर क्रिया अभीष्ट उद्देश्यों के लिए होती है और समय का उपयोग निर्धारित दिनचर्या के अनुरूप होने लगता है। शरीर में आलस्य और मन में प्रमाद छाया रहना चेतना की अर्ध मूर्छित स्थिति में ही सम्भव होता है यह अर्धमृतक स्थिति है। आलसी अपनी बहुमूल्य क्रियाशक्ति को ऐसे ही नष्ट करते रहते हैं और उसके सहारे जिस गगनचुम्बी प्रगति तक पहुँच सकना नितान्त सरल था उससे वंचित रह जाते हैं।
प्रमादी और भी अधिक घाटे में रहते हैं। शरीर कोल्हू के बैल की तरह चलता रहता है, पर वह सब बेगार भुगतने एवं भार ढोने की तरह होता है फलतः कर्म कोशल के उत्साह भरे आलोक की झाँकी नहीं मिलती। किसी कार्य को पूरे मनोयोग के उमंग और उत्साह के साथ न किया जाय तो उसमें विद्रूप अधूरापन ही परिलक्षित होता रहेगा। ऐसे कर्मों को कुकर्म तो नहीं, पर अकर्म अवश्य ही कहा जायगा। वे काने, कुबड़े, लंगड़े, लूले और कुरूप होते हैं उनसे कर्त्ता को श्रेय प्राप्त होना तो दूर उलटे उपहासास्पद बनना पड़ता है।
मस्तिष्क जब अशिक्षित, अनियन्त्रित और अविकसित होता है तब निरर्थक और भार-भूत संग्रह के लिए मचलता है यह उसकी बाल-क्रीड़ा तृष्णा के नाम से जानी जाती है। इस भौतिक संग्रह में बड़प्पन की मान्यता और अन्यान्य लोगों का ध्यान आकर्षित करके वाह-वाही लूटने की दृष्टि से ही तरह-तरह के ठाट-बाट बनाये और उद्धत प्रदर्शन किये जाते हैं। इतनी कठिनाई से-नीति-अनीति की परवाह किये बिना-इतने जोखिम उठाकर जो सम्पदा कमाई गई थी उसे इस तरह अपव्यय में होली की तरह फूँकने के सरंजाम किये जाते देखकर तथाकथित बुद्धिमत्ता को यथार्थता की कसौटी पर मूर्खता ही ठहरना पड़ता है। किन्तु अनपढ़ मन तो ऐसी ही बाल-क्रीड़ाओं में निरत रहते हुए प्रसन्न रहता है। उसकी अपनी समझ में इस निरर्थकता की बात आती नहीं। अविकसित चेतना में इतनी क्षमता होती नहीं कि मन पर अंकुश रखे उसे ऐषणाओं की निरर्थकता समझाये और उन से विचार शक्ति को मुक्ति दिला कर किसी ऐसी महत्वपूर्ण दिशा में अग्रसर करे जिस पर चलने से जीवनोद्देश्य की पूर्ति होती हो और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना बनती हो।
राग, द्वेष, ईर्ष्या, आवेश, चिन्ता, खीज, निराशा, अधीरता, दीनता-हीनता, दृष्टता, भ्रष्टता, लिप्सा, उद्विग्नता जैसे ज्वार-भाटे और आँधी-तूफान जिनके मस्तिष्क में उठते रहते हैं, उनकी मनःस्थिति नितान्त अस्थिर एवं अव्यवस्थित रहती है। ऐसे लोग अपने ही बुने मकड़ी के जाले में आप उलझे रहते हैं। समस्याओं और उलझनों के इतने बड़े पहाड़ गढ़ लेते है जिन्हें सुलझाना असम्भव ही बना रहता है। अधीरता देर तक किसी काम में दृढ़तापूर्वक जमे नहीं रहने देती, फलतः अनेक आरम्भ और हर प्रयास में असफलता का इतिहास जीवन पुस्तिका पृष्ठों पर लिखता जाता है। स्पष्ट है कि अनेकों कठिन परिस्थितियों में जूझने में उतनी शक्ति खर्च नहीं होती जितनी कि अकेली विकृत मनःस्थिति के गोरखधन्धे में उलझे रहने में नष्ट होती है। मस्तिष्क को यदि रचनात्मक चिन्तन और निर्धारित प्रयोजन को पूरा करने में नियोजित किया जा सके तो सही दिशा में धीरे-धीरे किन्तु अनवरत गति से चलने वाले कछुए की तरह बाजी मारी जा सकती है और अस्त-व्यस्त उछल-कूद करते फिरने वाले सामर्थ्यवान खरगोशों को प्रतिस्पर्धा में हराया जा सकता है।
उच्चस्तरीय आदर्शों को प्राप्त करने के लिए मन को नियोजित कर सकना और उसे बलपूर्वक अभीष्ट लक्ष्य में नियोजित किये रहना प्रौढ़ चेतना का ही काम है उसी में यह सामर्थ्य है कि इन्द्रियों को विलासी लिप्सा से विरत रहने को फौजी आदेश देने और उनका पालन कराने में सफल हो सके। आलस्य शरीर की जड़ता और प्रमाद मन की जड़ता है। इसे उलट कर चित शक्ति का अनुशासन स्थापित करना आन्तरिक प्रगल्भता के अतिरिक्त और किसी आधार पर सम्भव नहीं हो सकता।
शरीर और मन प्रकृत तत्वों से बने हैं उन्हें अपने सजातीय भौतिक पदार्थों का ही परिचय है और उनके संस्पर्श से जो लिप्सा संवेदना की अनुभूति होती है उतने भर का अनुभव है। अस्तु उनका दौड़-दौड़ कर पदार्थों एवं शरीरों में अपनी रुचि, उत्सुकता एवं ललक का परिचय देना स्वाभाविक है। मर्त्यलोक के निवासी भवबन्धनों से जकड़े हुए मायाग्रस्त जीवधारी के लिए इतना ही सम्भव है वह इस दल-दल में से अपने को निकालने की न आवश्यकता समझता है और न उसके लिए प्रयत्न ही करता है। ऊँची बात सोच सकना और महत्वपूर्ण निर्णय करना दूरदर्शिता और विवेकशीलता का उदय होने पर ही सम्भव है। यह दोनों विशेषताएं गर्मी और रोशनी की तरह हैं जो चेतना के सूर्योदय के साथ साथ ही प्रस्फुटित होती है। अध्यात्म शास्त्र का प्रतिपादन ब्रह्मलोक से होता है। यह ऊपर आकाश है। ईश्वर को उसका केन्द्र माना गया है और कहा गया है कि परमात्म सत्ता के साथ घनिष्ठता उत्पन्न करने वाली-आदान-प्रदान का द्वार खोलने वाली उपासना को अपनाने से ही चेतना की परतों पर दिव्य अवतरण सम्भव होता है।
यह ब्रह्मलोक क्या है? निश्चय ही यह कोई ग्रह-नक्षत्र या स्थान विशेष नहीं है। अपने ब्रह्मांड में ब्रह्मलोक नामक किसी क्षेत्र का परिचय अब तक न प्राप्त किया जा सका है और न भविष्य में वैसी आशा है। चेतना परतों को भौतिक क्षेत्र विशेष के रूप में अलंकारिक रूप से चित्रण करना तो कलाकारिता है, पर उस कल्पना की यथार्थता के साथ संगति बिठाना गलत है। ब्रह्मलोक आस्थाओं का एक सघन परत हैं जिसमें उच्चस्तरीय आकाँक्षाएं उमगती रहती है। उन हिलोरों को उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य के रूप में समुद्री लहरों जैसा परिचय देते देखा जा सकता है। ब्रह्मलोक में परमात्म सत्ता का साम्राज्य है। परमात्मा को देखना हो तो उसकी प्रतिमा विराट ब्रह्म के रूप में हर घड़ी दृश्यमान है। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों के द्वारा विश्व मानव की सेवा साधना की जा सकती है और उसका प्रतिफल महानात्मा के रूप में असीम श्रेय सहित प्राप्त किया जा सकता है। अपने भौतिक साधनों को जितने अधिक अनुपात से ब्रह्मार्पित किया जा सके उसी अनुपात से साकार उपासना का अधिक उच्चस्तरीय प्रतिफल प्राप्त किया जा सकता है। संसार के अवतारी महामानवों का उज्ज्वल यश और प्रकाश स्वयं धन्य बनता और दूसरों को धन्य बनाता है यह लोक साधना की तपश्चर्या का ही प्रतिफल है।
अगोचर, अचिन्त्य ब्रह्म निराकार है वह उच्चस्तरीय आदर्शवादी-अति मानवी उमंगों के रूप में अनुभव किया जाता है। आत्मभाव का विस्तार होने पर अपना आत्मा सब में समाया दीखता है फलतः दूसरों के दुःख अपने दुःख और दूसरों का सुख अपना सुख बन जाता है। तब विश्वहित में ही अपना हित सन्निहित दीखता है ईश्वर जितना उदार-जितना निर्मल है उसी स्तर पर जा पहुँचने की अदम्य उत्कंठा को ईश्वर भक्ति कहा गया है। उपासना प्रक्रिया का उद्देश्य इसी संवेदना को उभारना और परिपुष्ट करना है। भगवान को व्यक्ति विशेष मानकर उसे प्रशंसा और उपहार देकर प्रसन्न करने की बात तो मात्र अबोध बालक ही सोच सकते हैं। प्रौढ़ावस्था में यह स्थित उपहासास्पद मानी जाती है। विकसित दृष्टिकोण में ईश्वर प्राप्ति के प्रयासों में चेतना को अतिमानव स्तर पर विकसित करना ही एकमात्र लक्ष्य रह जाता है। इस प्रयास में सफल साधकों को देवात्मा कहते हैं परमात्मा का मिलन देवात्मा स्तर की पहुँची हुई पृष्ठभूमि पर ही सम्भव होता है। दूध और पानी सजातीय और समान कण भार के होने से परस्पर घुल मिल जाते हैं, पर तेल मिलता नहीं तैरता है। बालू मिला देने पर वह नीचे बैठ जाती है। गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से जिसने अपने मनःक्षेत्र को अति मानस और व्यक्तित्व को अति मानव स्तर पर विकसित कर लिया है वह ईश्वरीय चेतना के साथ सहज ही आदान-प्रदान करता रह सकता है। उस विकास क्रम के सर्वोच्च स्तर पर पहुँचने वाली चेतना ही परमात्मा बन जाती है। ऐसी स्थिति में न केवल उसकी वैयक्तिक संकीर्ण स्वार्थपरता का अन्त हो जाता है वरन् शक्ति और सामर्थ्य के क्षेत्र में उसकी स्वल्पता और क्षुद्रता का अन्त होकर रहता है। विशाल समुद्र में मिल जाने वाली बूँद अपनी तुच्छता खो बैठती है और बदले में सागर जैसी विशालता उपलब्ध करती है। उच्च भूमिका में विकसित भूमिका को भूमा, प्रज्ञा, तत्व दृष्टि से प्राप्त कर लेना ही उपासना का उद्देश्य है। इस सफलता का परिचय क्षुद्रता के परित्याग और महानता के वरदान की परख से जाना जा सकता है। जिसमें जितनी ईश्वरीय अन्तर्दृष्टि होगी उसका ब्रह्मवर्चस भी उतना ही प्रचण्ड होगा। फलतः उसकी सत्ता अपने समय के अति महत्वपूर्ण प्रयोजनों को सिद्ध कर रही होगी। अवतारों को इसी रूप में देखा जा सकता है। यह चित्शक्ति की-चेतना की प्रखरता और प्रचण्डता की ही उपलब्धि है।
श्री प्रफुल्लचन्द्र राय ने केवल आठ सौ रुपये की पूँजी से बंगाल केमिकल नामक औषधि निर्माण कारखाना प्रारम्भ किया था। उन्होंने संकल्प किया कि इस प्रतिष्ठान में बनी हुई कोई भी दवा विदेशी दवा से हलकी नहीं होगी। एक बार दवा बनाते समय कई सौ बोतलों का आसव कुछ बिगड़ा गया। कारखाने के एक कर्मचारी ने कहा-‘‘आसव थोड़ा ही बिगड़ा है। किसी को पता भी नहीं चलेगा। बाजार में आसानी से बिक जायगा। अन्यथा कम्पनी को बड़ा नुकसान होगा।’’ श्री राय ने दृढ़ता से जवाब दिया-‘‘ऐसी दवाओं से हानि होगी। जरा सी भी बदनामी अच्छी वस्तुओं के प्रसार में बाधक होती है। थोड़े रुपयों का नुकसान भविष्य में हमारी प्रतिष्ठा को बढ़ाने वाला होगा।’’ राय ने आसव को तत्काल फिंकवा दिया।
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इस विश्व का निर्माण जड़ और चेतन के समन्वय से हुआ। पंच तत्वों से विनिर्मित-अणु संगठनों की हलचलों से युक्त जड़ जगत का अस्तित्व विविध पदार्थों के रूप में हमें दृष्टिगोचर होता है। ऋतु प्रभाव उत्पत्ति, अभिवर्धन और परिवर्तन प्रस्तुत करने वाली ऊर्जा अनेकानेक स्तर की चित्र-विचित्र हलचलें उत्पन्न करती रहती है। गतिचक्र अपने विविध-विधि कौतुक-कौतुहल उत्पन्न करता रहता है। प्रकृति की क्षमता असीम है। उसके एक-एक कण में शक्ति का अजस्र भण्डार भरा पड़ा है। अणु विस्फोट से निकलने वाली ऊर्जा प्रायः शताँश ही अपना प्रभाव अन्य पदार्थों पर छोड़ पाता है। शेष तो विस्फोट से प्रतिक्रिया उत्पन्न करने की स्थिति उत्पन्न होने के बीच ही अन्तरिक्ष में तिरोहित हो जाता है। यदि अणु विस्फोट की समस्त ऊर्जा संग्रह की जा सके तो उसका प्रभाव अब जो परिलक्षित होता है उससे सौ गुना अधिक आँका जा सकेगा।
प्रकृति की स्थूल और सूक्ष्म परतों का वैज्ञानिक आधार पर अन्वेषण किया जाता रहता है। पृथ्वी से उपज, पानी से सिंचन, आग से गर्मी जैसी मोटी विज्ञान प्रक्रिया से लोग चिरकाल से परिचित हैं। पिछली शताब्दियों में शब्द प्रकाश आदि के अनेक आधार प्राप्त कर लिए गये हैं और उनके सहारे विभिन्न आविष्कारों का चमत्कारी प्रतिफल सामने आया है। इस आधार पर सुविधा साधनों की अतिशय वृद्धि हुई है। इस क्षेत्र में हम पूर्वजों से कहीं आगे हैं। निकट भविष्य में प्रकृति के रहस्यों की और भी गहरी परतें खुलने की सम्भावना है और अपेक्षा की जाती है कि अगली पीढ़ी अब की अपेक्षा प्रकृति सम्पदा में और भी अधिक लाभान्वित होने की स्थिति में होगी।
इस विश्व का दूसरा पक्ष है चेतना। चेतना का अर्थ है- ज्ञान, अनुभव, कल्पना, सम्वेदना, आस्था आदि के रूप में अपने अस्तित्व का परिचय देने वाली वह शक्ति जो जड़ को उपयोगी बनाती और उपभोग करती है। वनस्पति, कृमि-कीटक, पशु-पक्षी और मनुष्य ऊपर से तो प्रकृत पदार्थों से विनिर्मित काय आवरण ओढ़े होते हैं, उनके भीतर एक स्वतन्त्र चेतन रहता है। इसी की इच्छा आवश्यकता एवं प्रेरणा से काया को विभिन्न प्रकार के क्रिया-कलाप करने पड़ते हैं। परिवर्तन प्रवाह में पदार्थ को उत्पत्ति विसर्जन के चक्र में घूमना पड़ता है। अस्तु काया समयानुसार जराजीर्ण, रुग्ण एवं अशक्त होकर मर जाती है फिर भी चेतना का अस्तित्व किसी रूप में बना रहता है और वह फिर नये रूप में अपनी सत्ता का परिचय देती है।
जड़ पदार्थों की विचित्रता देखते ही बनती है। उनकी क्षमता और विविधता को बारीकी से देखा जाय तो सृजेता की कलाकारिता को देखकर आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है। पर जब चेतना की अविकसित परिस्थिति में दृष्टिगोचर होने वाली विशिष्टताओं पर दृष्टिपात करते हैं तो आश्चर्य का अन्त ही नहीं आता।
वैज्ञानिक आविष्कारों और उपकरणों ने सुविधा साधनों के पहाड़ खड़े कर दिये हैं। पर चेतना के निम्न स्तर और उच्चतम स्तर की तुलना की जाती है तो लगता है यहाँ अनुपात वैसा ही है जैसा कि अति लघु परमाणु और विशालकाय पर्वत के बीच पाया जाता है। जड़ पदार्थों की स्वनिर्मित हलचलें सीमित और अनियमित हैं। वर्षा, तूफान, भूकम्प आदि की हलचलें होती तो किसी क्रम व्यवस्था के आधार पर ही हैं, पर सूर्योदय की तरह उनमें समय एवं स्तर का कोई निश्चय नहीं, इसलिए उन्हें अनियमित कहा जाता है। उन्हें मूर्छित स्थिति से सक्षम स्तर तक लाने में-व्यवस्थित और उपयोगी बनाने में-चेतना का बड़ा हाथ रहता है।
जड़ पदार्थों के सहारे प्राणियों को जीवनयापन की सुविधा मिलती है यह सही है, पर सही यह भी है कि चेतना द्वारा ही अनगढ़ पदार्थ को सुन्दर, व्यवस्थित एवं उपयोगी बनाया जाता है। जड़ को प्रजा और चेतन को शासक कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी। आदिम काल की तुलना में संसार का नक्शा बहुत बदल गया है। तब खाड़-खड्डों से- झाड़-झंखाड़ों से जटिल स्थिति में रह रही इस धरती की आज की कलात्मक और सुव्यवस्थित दुनिया से तुलना की जाय तो जमीन-आसमान जितना अन्तर प्रतीत होगा। यह चेतना के ही कर्तृत्व का चमत्कार है। चेतना ने न केवल प्रकृति सम्पदा को ही सुन्दर व्यवस्थित बनाया है, वरन् आपको स्वयं अपने हाथों प्रगति के क्रमिक मार्ग पर चलते हुए इस स्थिति तक पहुँचाया है। आदिम काल का नर-वानर आज के सभ्य संस्कृत मानव की तुलना में कितना पिछड़ा था। यह सर्वविदित है। इस पिछड़ेपन को दूर करने में उसने असाधारण साहस, संयम, सूझ-बूझ और सृजनात्मक गतिविधियों का परिचय दिया है। इन प्रयासों को अध्यात्म क्षेत्र में आविष्कार कहा जा सकता है। भौतिक क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रगति का चक्र द्रुतगति से घूमा है। अग्नि का प्रज्ज्वलन-पहिये का परिभ्रमण-नोंक और धार वाले उपकरणों का उपयोग आज भले ही तुच्छ प्रतीत हो, पर किसी समय ऐसी ही उपलब्धियों ने मानवी प्रगति का द्वार खोला था। कृषि, पशु-पालन, शिक्षा, चिकित्सा परिवार-गठन और शासन तन्त्र आज सरल स्वाभाविक बन गये हैं, पर किसी समय उन उपलब्धियों ने ही मनुष्य के भाग्य का निर्माण किया था। उसे अपने अन्य वनचारी सहचरों से अधिक ऊँची स्थिति में बढ़ चलने और अधिपति बन बैठने का श्रेय इसी प्रगति को दिया जा सकता है। भौतिक उपलब्धियाँ प्रकारान्तर से चेतना की उभरती हुई स्थिति की प्रतिक्रिया ही कही जा सकती हैं।
वैज्ञानिक प्रगति भौतिक जगत में बहुत हुई है-मनुष्य का मस्तिष्क क्रिया-कौशल भी बहुत आगे बढ़ा है, पर उसका क्षेत्र वस्तु जगत से अधिक लाभान्वित होने के क्षेत्र में ही सीमाबद्ध होकर रह गया। चेतना की अपनी निज की स्थिति भी है और विकास के लिए वह क्षेत्र भी असीम विस्तार की सम्भावनाओं से भरा हुआ है। इस दिशा में अन्यमनस्कता दिखाने का परिणाम यह हुआ है कि आत्मिक प्रगति-चेतना की स्थिति एक प्रकार से रुक ही गई। जिस प्रकार कई प्रकार के यन्त्र-उपकरण भौतिक पदार्थों एवं क्षमताओं को उपयोगी स्थिति में प्रस्तुत करते हैं लगभग वैसा ही कार्य मनुष्य भी कर पाता है। अब मनुष्य यन्त्र मानव बनता जाता है। पदार्थ के लिए वह और उसके लिए पदार्थ-लगता है उसी कुचक्र में चेतना फँस गई है और उसने निजी सत्ता का स्तर बढ़ाने में अरुचि दिखानी आरम्भ कर दी है। जब कि असली लाभ इसी स्तर की अभिवृद्धि के साथ जुड़ा हुआ है।
कला, सौन्दर्य, सम्वेदना, शालीनता, करुणा, मैत्री और उत्कृष्टता के प्रति आस्था जैसी सद्भावनाओं की मात्रा बढ़ जाने से चेतना का स्तर उस स्थिति पर जा पहुँचता है जिसे देव मानव कहते हैं। उपभोक्ता को पशु और उद्धत को पिशाच कहते है। पदार्थ के साथ प्राणी जितना घनिष्ठ रहता है, उसी आधार पर उसकी जड़ता बढ़ जाती है और यन्त्र मानव जैसी स्थिति में उसे जीवनयापन करना पड़ता है। सुविधा उपभोग के साधन इस स्थिति में बने रहते हैं और इन्द्रिय तृप्ति से जो थोड़ा सा सुख मिल सकता है उतने तक ही सीमाबद्ध बनकर रह जाना पड़ता है। यदि चेतना का भाव पक्ष विकसित हो सके-दृष्टिकोण में उत्कृष्टता का समावेश हो सके तो स्थिति कुछ दूसरी ही होगी।
चेतना का स्तर ऊँचा रह सके तो उसका व्यक्तित्व ऐसी रीति-नीति अपनाता है जिससे उसकी सम्पदाएं एवं विभूतियाँ उत्कृष्ट एवं व्यापक प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त हो सकें अविकसित चेतना उसे कहा जायगा जो भावना एवं आकाँक्षा की दृष्टि से बौनी है जो संकीर्ण स्वार्थपरता का ताना-बाना बुनने में तो कुशलता का परिचय देती है, पर व्यापक आवश्यकता एवं उदार आत्मीयता भी मानवी गरिमा की बनी रहनी चाहिए, इस तथ्य को प्रायः भुला ही बैठती है।
साधन भले ही असीम हों, पर उनका उपयोग यदि सीमित क्षेत्र में होते रहने पर गुब्बारे में अनावश्यक हवा भर जाने की तरह दुष्परिणाम ही सामने आवेंगे। याँत्रिक मनुष्य इतना ही सोचता और इतना ही करता है। उसने जो पाया, कमाया है वह उसी के काम क्यों न आये? दूसरों को क्यों हिस्सा बँटाने दें? यह एक मोटा तर्क है जिसका औचित्य समझा जा सकता है। पर दूरगामी प्रतिक्रिया देखने पर इसमें कई हानियाँ दिखाई पड़ती हैं। एक तो यह कि समाज का एक बड़ा भाग अविकसित स्तर का होता है-बालक, वृद्ध, अशक्त, रुग्ण, दुर्घटनाग्रस्त, विपत्ति संत्रस्त, अपंग, असमर्थ लोगों की कमी नहीं। भावनात्मक पिछड़ापन तो इससे भी अधिक फैला पड़ा है; यदि इन लोगों को उदार, सहयोग न मिलेगा तो समाज का बहुत बड़ा भाग दयनीय स्थिति में पड़ा हुआ अपनी सड़न से सारे वातावरण को विकृत करेगा और उसकी प्रतिक्रिया उन स्वार्थ सिद्धि की वकालत करने वालों को भी चैन से न बैठने देगी।
दूसरे यह कि उदार और आदर्शवादी परम्पराएं ही पारस्परिक स्नेह, सद्भाव को बनाये रहती हैं। सद्भावनाएं और सत्प्रवृत्तियां ही व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व को मानवी महानता के अनुरूप बनाये रही हैं। सृजन और सहयोग का वातावरण इसी आधार पर बनता है। संकीर्ण दृष्टिकोण के लोग ही अपहरण और आक्रमण की नीति अपनाते हैं और उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया से सर्वत्र विषाक्त फैलती है।
महामानव ही किसी युग के समाज की वास्तविक सम्पदा होते हैं। उनकी उदारता एवं चरित्र निष्ठा से प्रभावित होकर लोग अनुकरण के लिए तैयार होते हैं। श्रेष्ठता का सन्तुलन उन्हीं के प्रयासों से बना रहता है। उत्कृष्ट एवं उदात्त सम्वेदनाओं को अपनाकर ही कोई महामानव बन पाता है। इसके बिना कितनी ही बुद्धिमत्ता एवं सम्पदा रहने पर भी मनुष्य स्वार्थपरायण ही बना रहता है। उसकी क्षमता निज के छोटे दायरे में ही अवरुद्ध बनी पड़ी रहती है और रुके हुए जोहड़ के सड़े पानी की तरह दुर्गन्ध फैलाती है। जिस व्यक्तित्व की प्रतिभा का लाभ असंख्यों को मिल सकता था यदि वह संकीर्णता से जकड़ी रहे और तृष्णा, अहंता की आग में समीपवर्ती लोगों को ईंधन बनाती रहे तो उसकी प्रतिक्रिया न केवल उस सारे क्षेत्र के लिए वरन् स्वयं उसके लिए भी भयावह होगी।
यह तो हुआ अविकसित स्तर की चेतना का सामाजिक और वैयक्तिक परिणाम। इससे भी बड़ी बात यह है कि चेतना का क्रमिक विकास होते रहना ही जीवात्मा का वास्तविक लाभ है। इन्द्रिय तृप्ति और तृष्णा पूर्ति का लाभ क्षणिक भी है और तुच्छ भी। बड़ी बात है आत्म-सन्तोष, आत्म-बल और आत्म-परिष्कार और उस स्थिति में जिसमें मनुष्य का आत्म गौरव विकसित होता है। उसी सम्पदा के सम्मुख सम्पर्क क्षेत्र के लोगों की भाव भरी श्रद्धा, नत मस्तक होती है। यह आनन्द कितना उच्चस्तरीय है उसका मूल्यांकन अनुभव द्वारा ही सम्भव हो सकता है।
अविकसित चेतना कृमि कीटकों में जिस स्तर की है वह हमें उपहासास्पद लगती है। ठीक उसी प्रकार सुविकसित अति मानवी के लिए-देवता के लिए- हमारी नर पशु जैसी स्थिति निराशाजनक है। दुर्बल काया और अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी महामानव अपनी गरिमा के सहारे स्वयं खिलते और दूसरों को खिलाते हैं। इसके विपरित क्षुद्र दृष्टिकोण रहने पर सुसंपन्न लोग भी कृपणता और तुच्छता की सड़ी कीचड़ में कुलबुलाते हुए स्वयं मरते तथा दूसरों को मारते हैं। सम्पत्ति की शक्ति से सभी परिचित हैं, पर विभूतिवानों की सामर्थ्य कितनी बढ़ी चढ़ी होती है इसका अनुभव कोई विरले ही करते हैं। विभूतिवान स्वयं उठते हैं और अपने साथ-साथ प्रबल प्रभंजन द्वारा धूलि कणों को आसमान तक पहुँचा देने की तरह असंख्यों को ऊँचा उठाते हैं। अपनी प्रतिभा से अन्धकार और अवसाद की गई गुजरी परिस्थितियों को आलोक और ऊर्जा देकर इस तरह बदलते हैं- जिसे युग परिवर्तन के रूप में देखा जा सके।
भौतिक क्षेत्र में चेतना का विकसित क्रिया कलाप आदिम काल से अद्यावधि हुई प्रगति का पर्यवेक्षण करते हुए देखा जाना जा सकता है। यदि आत्मिक क्षेत्र में अन्तरंग की विभूतियों को विकसित करने में यही तत्परता नियोजित की जा सके तो सामान्य समझे जाने वाले नर नारायण के गौरव वैभव से सुसम्पन्न हो सकते हैं।
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सम्राट वसुसेन को ज्योतिष से अगाध लगाव था। कई ज्योतिषी उनके दरबार में प्रश्रय पाते और अपनी विद्या का चमत्कार भावी घटनाओं का पूर्वाभास कर दिखाते। वसुसेन की इन चमत्कारों से फलित ज्योतिष में श्रद्धा बढ़ी। उन्हीं ज्योतिषियों में एक का कहना था कि सम्राट को कोई भी कार्य करने से पहले उसकी सफलता या असफलता को ज्योतिष के माध्यम से जान लेना चाहिए। अन्य ज्योतिषियों ने भी जब इसका समर्थन किया तो यह प्रस्ताव स्वीकृत कर लिया गया और भविष्य में कोई भी कार्य करने से पहले ग्रहों का रुख तथा रेखाओं की स्थिति का अध्ययन किया जाने लगा।
की गयी भविष्यवाणियाँ सच होतीं या न होती, पर इसका गुणा, भाग और जोड़, घटाव में इतना समय लगने लगा कि आवश्यक कार्यों में भी विलम्ब हो जाता। यहाँ तक कि शत्रु देशों द्वारा आक्रमण करने पर उनका मुकाबला करने में भी ज्योतिष का आधार खोजने के कारण देर हो जाती और तब तक शत्रु सेनायें काफी आगे बढ़ आतीं।
वसुसेन की ज्योतिष में इतनी प्रगाढ़ आस्था देखकर उसके अधीनस्थ तथा प्रजाजन भी इस वितण्डावाद में उलझने लगे। समय पर काम न करने, भाग्य और दैव पर आश्रित रहने तथा कार्यों में आवश्यक दायित्व का अनुभव करने की प्रवृत्ति का ह्रास होने लगा। इस स्थिति से राजा को बड़ी चिन्ता हुई और उन्होंने इसका कारण राज ज्योतिषी से पूछा। ज्योतिषी ने कहा-‘‘महाराज इस समय शनि की वक्र दृष्टि चल रही है। कुछ ही समय में सब ठीक-ठाक हो जाएगा।”
एक दिन की बात है वसुसेन अपने प्रमुख सलाहकार राज-ज्योतिषी भास्कर मुनि के साथ प्रातः भ्रमण को निकले। रास्ते में उन्हें एक किसान दिखाई दिया जो अपने सुन्दर बैलों की जोड़ी को हाँकते हुए कन्धे पर हल रखकर गीत गाता हुआ जा रहा था। ज्योतिषी ने भावानुसार उसे रोका-मित्र कहाँ जा रहे हो। जिस ओर तुम्हारा खेत पड़ता है उस ओर तो आज दिशा शूल है। जाने से हानि होने पर डर है।
‘यह दिशाशूल क्या है’- किसान जो सचमुच इस सम्बन्ध में कुछ नहीं जानता था पूछने लगा।
राजा वसुसेन और भास्कर मुनि दोनों ही आश्चर्यान्वित हो गये। उन्होंने दिशाशूल का अर्थ समझाया। तब किसान ने कहा-‘‘मैं तो हमेशा अपने काम पर जाता हूँ। परन्तु आपके अनुसार यदि प्रति सप्ताह दिशाशूल अलग-अलग होना चाहिए तो मुझे कभी का बर्बाद हो जाना चाहिए था।”
‘जरूर तुम्हारी किस्मत अच्छी है’-भास्कर मुनि ने कहा-‘जरा हमें हाथ दिखाना तो।’
किसान ने अपने दोनों हाथ ज्योतिषी के सामने कर दिये। लेकिन हाथ इस तरह सामने किये गये थे कि हथेली जमीन की ओर रहे। इस अनगढ़ता पर ज्योतिषी को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने डरते हुए किसान से कहा-‘मूर्ख! इतना भी नहीं जानता कि रेखाएँ हथेली की देखी जाती हैं। हाथ हथेली की ओर से दिखा।’
किसान हँस उठा-‘‘महाराज हथेली की रेखाएँ वे लोग दिखाते हैं जो किसी के सामने हाथ फैलाते हों। हथेली की कोई रेखा मेरे कभी आड़े नहीं आती। देखिए न जब मैं हल चलाता हूँ तो हथेली की सभी रेखाएँ छुप जाती है। फिर इन कामचोर, रेखाओं को देखने से क्या लाभ।’
वसुसेन की तो जैसे आंखें खुल गईं और उन्होंने तत्काल कहा-‘बिलकुल ठीक कह रहा है किसान ज्योतिषी जी। मनुष्य के भाग्य का निर्धारण उसकी रेखाएँ नहीं कर्म हाथ करता है। अब तक मैं भी गलती कर रहा था।’
उसी समय से वसुसेन ने फलित ज्योतिष का गोरखधन्धा छोड़ दिया।
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कूड़े को भी यदि यथास्थान सुरुचि पूर्ण ढंग से दाब-ढक कर रखा जाय तो वह बुरा न लगेगा इसके विपरीत यदि तस्वीरें, फूल, गुलदस्ते आदि सुन्दर वस्तुएं भी अस्त-व्यस्त क्रम से फैला दी जायं तो वे गन्दगी मात्र बनकर रह जायेंगी। चतुर माली अपने बगीचे में बाढ़ के लिए लगाई गई झाड़ियों को भी इस प्रकार काटते-छाँटते हैं कि वे नयनाभिराम लगने लगती हैं। इसके विपरीत यदि गुलाब के पौधों की डालियां भी छितरी-बिखरी रहें तो वे कुरूप झाड़ियों जैसी दिखाई पड़ेंगी। काला कलूटा मनुष्य भी यदि अपने बाल, वस्त्र, रहन-सहन को ठीक ढंग से रखता है तो वह सुन्दर प्रतीत होता है किन्तु यदि गोरा चट्टा प्राकृतिक बनावट का सुन्दर होते हुए भी नाक, आँख आदि में मल भरे हैं, बेतुके बाल और बेसिलसिले मैले कुचैले कपड़े पहने हैं तो उस व्यवस्थित काले-कलूटे मनुष्य की तुलना में कुरूप दिखाई देगा।
प्रकृति ने किस वस्तु को कैसी सुन्दर-असुन्दर बनाया है यह अपने हाथ की बात नहीं। किन्तु इतना मनुष्य के हाथ में भी है कि वह अपनी कला-कुशलता का- व्यवस्था का समावेश करके कुरूप लगने वाली वस्तुओं को भी सुन्दर बना दे और फूहड़पन के द्वारा सुन्दर वस्तुओं को भी कुरूप और कुरुचि पूर्ण बना दे। कुछ समय पूर्व जो जमीन खार-खड्डों वाली, ऊबड़-खाबड़, भद्दी-भोंड़ी दिखाई पड़ती थी आज वही सुन्दर उद्यान बनकर जीवन्त तस्वीर जैसी मनोरम दिखाई पड़ती है। हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर रही है। इस अद्भुत परिवर्तन का एकमात्र कारण मनुष्य की व्यवस्था बुद्धि है जिसके साथ श्रम को जोड़कर प्रयुक्त किया जाय तो कही भी सुन्दरता का सृजन किया जा सकता है। जहाँ इस कौशल का अभाव होगा वहाँ बहुमूल्य वस्तुएं भी कुरुचिपूर्ण गन्दगी बनकर कचरे की तरह जहाँ-तहाँ अशोभनीय स्थिति में पड़ी होगी। प्राकृतिक सौन्दर्य का कोई अस्तित्व नहीं ऐसा तो नहीं कहना चाहिए, पर व्यवहार को कसौटी पर कसा जाय तो प्रतीत होगा कि जितनी भी सुन्दरता अपने इर्द-गिर्द प्रस्तुत है उसमें से अधिकाँश को मनुष्य की कुशल व्यवस्था बुद्धि ने ही उत्पन्न किया है।
सौन्दर्य और व्यवस्था वस्तुतः एक ही प्रक्रिया के दो रूप हैं। कला को सौंदर्योत्पादक कहा जाता है। पर यह कला सुरुचिपूर्ण व्यवस्था बुद्धि के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। सामान्यतया चित्रकला, मूर्तिकला, साहित्य, कविता, गायन, वाद्य, नृत्य आदि के माध्यम से किसी कलाकार की कला का प्रकटीकरण होता है। यह तो कला का प्रतिफल हुआ, वह वस्तुतः है क्या, इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि यह पदार्थों को एवं क्षमताओं को व्यवस्थापूर्वक क्रमबद्ध कर देने भर की कुशलता है इसी को कला कहते हैं।
कागज का टुकड़ा, कई तरह के रंग, पतले से ब्रुश इतनी भर नगण्य सी सामग्री को कहाँ किस क्रम, कितनी कुशलता से कहाँ नियोजित किया जाय कि उसमें से अमुक छवि या अमुक भाव प्रकट होने लगें, इस प्रक्रिया को जिसने ठीक तरह संजो लिया उसे चित्रकार कहते हैं। बहुमूल्य चित्रों कीमत उनमें लगे कागज या रगों के आधार पर नहीं दी जाती वरन् उस व्यवस्था बुद्धि की प्रखरता को परखा जाता है जिसने तूलिका के सहारे निर्जीव कागज को जीवन्त कलाकृति के रूप में प्रस्तुत करके रख दिया है। यही बात मूर्तिकार के सम्बन्ध में है। एक पत्थर का टुकड़ा-छोटे छोटे छैनी, हथौड़ी रेती जैसे उपकरण बस उन्हीं नगण्य सी वस्तुओं के सहारे वह ऐसी बहुमूल्य प्रतिमा गढ़ देता है कि उसे देख-देखकर दर्शक का मन हुलसने लगता है। इस दर्शनीय प्रतिमा का मूल्याँकन पत्थर या श्रम के घण्टों का लेखा-जोखा लेकर नहीं हो सकता, गढ़ने वाले की तन्मयता एवं सौन्दर्य परख की सूक्ष्म क्षमता ही निर्जीव मूर्ति को सजीव बनाती है। जड़ पत्थर में से भावाभिव्यक्ति का जो निर्झर झरता है वह और कुछ नहीं मूर्तिकार का सम्वेदनात्मक सौन्दर्य ही है।
साहित्यकार क्या है? शब्दकोष के जंगल में बिखरी हुई वनस्पतियों का तोरण, वन्दनवार, गुलदस्ते गजरे और पुष्प हारों के रूप में कलाकृति बनाकर प्रस्तुत करना ही है। लकड़ी की लेखनी को, भगवती, सरस्वती कौन बनाता है? साहित्यकार का भावाभिव्यक्ति कौशल। इसे शब्दों का सुरुचि पूर्ण गठन भी कह सकते हैं। वस्तुतः यह क्रमागत शब्द व्यवस्था ही साहित्यकार की कला है। कविता में यही तत्व छन्दबद्ध होकर प्रस्फुटित होता है। इसमें शब्दों को लयबद्ध, तालबद्ध, भावबद्ध करने में और भी अधिक प्रवीणता दिखानी पड़ती है।
संगीत क्या है? कण्ठ के ध्वनि प्रवाह को बहुरंगी फव्वारे की तरह मनोरम बनाना। कण्ठ से ध्वनि तो सभी के निकलती है, पर वह अस्त-व्यस्त होती है। गायक अपनी सूक्ष्म बुद्धि से उसे स्वरों में विभाजित करता है और फिर उसके उतार-चढ़ाव समाविष्ट करके मर्मस्पर्शी गीत अलापता है। वाद्य यन्त्र क्या हैं? अनगढ़ उपकरण वादक की उंगलियां, थपकियां उस पर एक विशिष्ट क्रम से थिरकती हैं और इतने भर से नस-नाड़ियों को झंकृत करने वाला संगीत बजने लगता है। अभिनय क्या है ? हाथ, पैर, उंगलियां, कमर, गरदन, कन्धे, नेत्र, मुख आदि सामान्य काय अवयवों का इस प्रकार स्पंदित होना जिसमें नर्तक की भाव मुद्रा उभरे और दर्शकों के मन मयूर को अपने साथ-साथ नाचने के लिए बाधित कर दे। दूसरे शब्दों में नृत्य अभिनय में प्रयुक्त होने वाले अवयवों की हलचलों को एक विशिष्ट भाव प्रवाह के अनुरूप गतिशील रहने की व्यवस्था। स्पष्ट है कि व्यवस्था का दूसरा नाम ही कला है। अपने विषय का निष्णात व्यवस्थापक ही उस क्षेत्र का कलाकार कहा जायगा।
व्यापार, उद्योग, कृषि, पशु-पालन, शिल्प आदि किसी का व्यवसाय क्यों न हो? व्यवस्था बुद्धि की अपेक्षा रहती है। कोई कार्य छोटा हो या बड़ा सफल तभी होगा जब उसे पूरी सतर्कता और मुस्तैदी से किया जायगा। लापरवाही और गैर जिम्मेदारी बरतने से लाभदायक काम भी हानिकारक बन जाते हैं। किसी कार्य में कुछ लोग सफल होते हैं और कुछ असफल। इसमें कभी-कभी तो परिस्थितियाँ भी कारण होती हैं, पर अधिकतर कार्य की सजग सुव्यवस्था का होना न होना ही सफलता-असफलता का प्रधान कारण होता है। जो बच्चे अनुत्तीर्ण होते हैं उनमें से मन्द बुद्धि बहुत थोड़े होते हैं अधिकाँश में लापरवाही ही भरी रहती है। समय पर पढ़ना, मनोयोग से पढ़ना उनसे बन नहीं पड़ता। मनमौजी घूमते हैं। जब जी आया पढ़े, जब मन में न हुआ न पढ़े। दौड़ में तेज दौड़ने वाले खरगोश को हराकर धीमे चलने वाला कछुआ बाजी जीत गया था, इसका एक ही कारण था खरगोश यहाँ बैठा, वहाँ सुस्ताया, यहाँ रुका, वहाँ उछला और उत्साहपूर्वक अनवरत चलता ही रहा और खरगोश से पहले नियत स्थान पर पहुँच गया। प्रकृति ने कछुए को मन्द और खरगोश को तेज गति प्रदान की है, पर उन लोगों ने अपनी समझ के अनुसार मन्दता को तेज जितनी लाभदायक बना लिया और तेजी को निरर्थक गंवा दिया।
किसके पास प्रकृति प्रदत्त, प्रतिभा कितनी है यह प्रश्न गौण है। मूल बात यह है कि वह जितनी भी है क्या उसका सदुपयोग करने पर ध्यान दिया गया है ? प्रयत्न करने पर, सतर्कता बरतने पर, उत्साहपूर्वक काम में रुचि लेने पर-सामान्य स्तर का मनुष्य भी क्रिया-कुशल बन सकता है और उसे निरन्तर विकसित करता रह सकता है। ऐसे उदाहरण सर्वत्र भरे पड़े हैं जिनमें मन्द मति समझे जाने वाले मनुष्यों ने निरन्तर सतर्कता बरतने की आदत परिपक्व करके अपने को प्रखर प्रतिभाशाली बनाया है। उनकी असावधानी की बुरी आदत जब सतर्कता, सुव्यवस्था और सुरुचि में बदली तो सारा व्यक्तित्व ही परिवर्तित हो गया आरम्भिक दिनों का बुद्धुपन न जाने कहाँ चला गया और उसके स्थान पर न जाने कौन समझदारी का मुकुट पहना गया? वस्तुतः यह किसी अन्य का अभिशाप वरदान नहीं है। अपनी निज की असावधानी और सतर्कता के ही प्रतिफल हैं जो दो मनुष्यों की प्रायः एक जैसी स्थिति होते हुए भी उनके व्यक्तित्व में जमीन आसमान जैसा अन्तर उत्पन्न हो जाता है।
अपनी व्यवस्था बुद्धि को विकसित करने में यदि तत्परता बरती जाय तो उसकी प्रतिभा चेहरे पर तत्काल दिखाई देने लगेगी। आलसी, अनुत्साही और लापरवाह मनुष्य के चेहरे पर मुर्दनी छाई रहती है, लगता है कब्रिस्तान में से खोदकर निकाला है। नीची आंखें, रोती सूरत, अनिश्चितता और आशंका व्यक्त करने वाली रेखाएं न हिलने वाले अचल होठ, अनुत्साहजन्य जड़ता को देखकर यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि उसे रोना कोसना आता हो तो आता हो, हंसना और हंसाना-खिलना और खिलाना इसके भाग्य में नहीं है। उदीयमान व्यक्तित्व सदा उमंग भरे रहते हैं। उनमें भरपूर उत्साह देखा जाता है। इस आन्तरिक तेजस्विता के कारण उनके हाथ पैर काम करने के लिए मचलते रहते हैं। निःचेष्ट बैठे-बैठे समय गंवाना उन्हें बहुत ही भारी पड़ता है।
स्पष्ट है कि जिसके भीतर उमंग भरी सजीवता होगी उनके शरीर का प्रत्येक अंग काम करने के लिए मचल रहा होगा भले ही वह अशक्त अथवा रुग्ण ही क्यों न हो ? ऐसे लोगों के मस्तिष्क की क्षमता दिन-दिन तीक्ष्ण होती जाती है। प्रमादी लोग किसी बात को उथली सतह तक ही सोच पाते हैं। मानसिक आलस्य, चिन्तन को बहुत छोटे दायरे तक ही सीमित रखता है जबकि आन्तरिक स्फूर्ति हर बात पर गहराई से सोचने और हर काम को अधिक सर्वांगपूर्ण अधिक कलात्मक बनाने का ताना-बाना बुनती रहती है। आन्तरिक स्थिति में जो अवसाद एवं उत्साह भरा रहता है उसी को चेहरे की तेजस्विता के रूप में देखा जा सकता है। इसके विपरीत जहाँ मानसिक आलस्य घिरा होगा वहाँ सोचने से लेकर करने तक की सभी स्थूल और सूक्ष्म क्रियाएं अतीव मन्द गति से चल रही होंगी। ऐसे लोग अपनी जन्म-जात प्रतिभा, क्षमता के सौ वें हिस्से का भी लाभ नहीं उठा पाते, उसे यों ही निरर्थक गवाँ देते हैं।
शरीर द्वारा काम को बहुत धीमी गति से, बेगार भुगतने की तरह, रो-झींक कर आधा-अधूरा करने- उसे बीच में ही अधूरा छोड़ देने का नाम आलस्य है- यह शरीरगत दोष है। मन द्वारा किसी बात पर बिना पूरा सोच विचार किये-बिना भावी कठिनाइयों एवं आवश्यकताओं का स्वरूप तथा समाधान सोचे-कुछ भी करने लग जाना प्रमाद है। प्रमादी लोग भी किसी प्रकार ठेल-ठाल करने पर कुछ करने तो लगते हैं, पर जैसे ही पीछे को ढकेल हलकी पड़ती है वैसे ही ठण्डे हो जाते हैं। जरा से किये काम को पहाड़ की बराबर बताते हैं और अड़चन उत्पन्न करने वाले एक तिनके का बखान पर्वत जितना करते हैं। कुछ बहाना मिला नहीं कि काम अधूरा छोड़कर चम्पत हुए। जब वह काम पिछड़ गया और कान खिंचे तो परिस्थितियों की उलटी-पुलटी व्याख्या करके अपने को निर्दोष सिद्ध करते हैं। पर इस आत्म प्रवंचना से सन्तोष किसी को नहीं होता। अपना ढीठपन अपनी अन्तरात्मा जानती है इसलिए मन कितनी ही बहाने बाजी क्यों न गढ़ ले अन्तःकरण का समाधान नहीं होता वह कोसता ही रहता है। दूसरे आदमियों पर भी उस बकवास का कोई असर नहीं पड़ता। मुस्तैदी, जिम्मेदारी से और ईमानदारी से किया हुआ काम अपनी गवाही आप देता है। भले ही असफल रहना पड़े, पर हर जानकार यही कहेगा करने वाला निर्दोष है। परिस्थितियों ने जिसके गले असफलता बाँध दी है उसके प्रति सबको सहज सहानुभूति होती है और कठिनाई से उबारने में सहायता देने के लिए हर किसी का मन करता है। यों सफलता असफलता का 90 प्रतिशत परिणाम कर्ता के तीखे श्रम और गहरे मनोयोग पर निर्भर रहता है।
चमत्कारी काया-कल्प के बारे में बहुत कुछ पढ़ने-सुनने को मिलता रहता है। बूढ़ों के जवान बनने-अपंगों के क्रियाशील होने और मुर्दों के जी पड़ने की कितनी ही किम्वदन्तियाँ सुनने को मिलती रहती हैं, उनमें से कम ही सही होती हैं, पर यह तथ्य निश्चित रूप से सत्य है कि जिसने अपने शरीर से आलस्य और मन से प्रमाद को मार भगाया, जिसने उत्साह से, पूरे परिश्रम से, पूरे मनोयोग से सोचने एवं काम करने की आदत डाली, उसकी तेजस्विता आंखों से, चेहरे से और शरीर के अंग प्रत्यंगों से चमकने लगी। उसके हाथ-पैर नर्तकों की तरह स्फूर्तिवान रहने लगे। मस्तिष्क की प्रखरता इस तेजी से बढ़ी कि वह साथियों को योजनों पीछे छोड़कर दूरदर्शी बुद्धिमानों की अग्रिम पंक्ति में जा बैठा। इस प्रखर प्रगतिशीलता का किसे कितना उपहार मिला है, इसकी परीक्षा एक ही बात से हो सकती है कि उसकी व्यवस्था बुद्धि कितनी सक्रिय एवं कितनी व्यावहारिक बन चुकी है।
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पुराणों में आधे से अधिक कथा प्रसंग देवासुर संग्राम के हैं। असुरों का देवताओं से तगड़े बैठना, आक्रमण करके देवताओं को हरा देना, उनकी विशेष सहायता प्राप्त करना, फिर नये सिरे से युद्ध आरम्भ करना, अन्तिम बार असुरों को परास्त करके फिर अपना पद प्राप्त करना इसी एक कथानक को अनेक नाम, रूप एवं घटनाओं के साथ भिन्न-भिन्न पुराणों में भिन्न-भिन्न ढंग से कहा गया है।
इस वर्णन के मूल में आसुरी और दैवी शक्तियों के संघर्ष की आलंकारिक चर्चा है। यह सर्वत्र दिखाई देता है। कोई क्षेत्र ऐसा बचा हुआ नहीं है जहाँ यह संघर्ष चलता न हो।
यह संसार सत और तम से मिल कर बना है। तम अर्थात् जड़, चेतन अर्थात् सत। जड़ यों निर्जीव दीखता भर है, पर उसका आकर्षण रहा होता तो चेतन को उसके प्रति रुचि ही क्या होती और क्यों होती? सत और तम का संयोग यथावत बना रहे। चेतन की सहायता से जड़ को अधिक सुव्यवस्थित विकसित होने का अवसर मिले और, जड़ के सम्पर्क से चेतन की सरस संवेदनाएं उपलब्ध होती रहें। इस दृष्टि से नियति ने दोनों को परस्पर जोड़ दिया है। प्राणी का शरीर जड़ पंच तत्वों से बना है और उसमें प्राण सत्ता चेतना रूप में विद्यमान है। यह जड़ चेतन का संयोग ही तो है जिसके कारण दोनों परस्पर मिल-जुल कर रहते और जीवन रथ को आगे चलाते हैं। दोनों को दोनों के प्रति आकर्षण और दोनों का दोनों से सहयोग। यह सहयोग की सौम्य अवस्था हुई।
प्रकृति की सुन्दरता और उपयोगिता सर्वविदित है। तारों से जगमगाता नील आकाश, सूर्य चन्द्र का उदय-अस्त, शीतल वायु, ऋतु परिवर्तन प्रातः सायंकाल की रंग-बिरंगी झाँकी, बादल, वर्षा, बिजली आदि के कारण अपना ऊर्ध्वलोक कितना सुन्दर प्रतीत होता है। धरती पर पर्वत, वन, नदी, सरोवर, समुद्र, हरीतिमा, पुष्प, उद्यान आदि कितने सुन्दर लगते हैं। पशु-पक्षियों की आकृति कितनी सुहावनी लगती है। धान्य, खनिज आदि की प्रकृति सम्पदा कितनी उपयोगी है। क्या धरती- क्या आकाश। सर्वत्र सुन्दरता और उपयोगिता प्रचुर परिणाम में भरी होने से ही प्राणी इस संसार में रहता और क्रीड़ा कल्लोल करता है। यदि यहाँ कुछ भी आकर्षण न होता तो सम्भवतः जीवधारी को जीवन से कुछ भी प्यार न रहा होता।
नियति की इच्छा है कि जड़-चेतन, परस्पर सहयोगपूर्वक रहे और एक दूसरे के लिए उपयोगी सिद्ध हों। नर ओर मादा के बीच काम आकर्षण की एक ऐसी सरस शृंखला जुड़ी हुई है जिसके कारण वे निकट आते और घनिष्ठता के सूत्र में बंधते हैं। यदि यह सरसता सूत्र न रहा होता तो नर और मादा के बीच न तो आकर्षण रहता और न सन्तानोत्पादन का अतीव झंझट भरा उत्तरदायित्व वहन करने के लिए कोई तैयार होता। जड़ और चेतन के बीच में सुन्दरता, उपयोगिता एवं स्पर्शजन्य सरसता के ऐसे ही सूत्र जुड़ें हुए हैं जैसे नर और मादा के बीच। नियति चक्र इसी तरह घूम रहा है जैसे ग्रह नक्षत्रों की पारस्परिक आकर्षक शक्ति से खिंचे बंधे समस्त आकाशीय पिण्ड अपनी अपनी कक्षाओं में परिभ्रमण कर रहे हैं।
सृष्टि की इस औचित्य प्रक्रिया से किसी को कोई शिकायत नहीं हो सकती। यदि सन्तुलन बना रहे तो गड़बड़ी का कोई कारण नहीं। अव्यवस्था तो असन्तुलन से फैलती है। प्राणी के दृष्टिकोण में जब विकृति आती है तो औचित्य एवं उपयोग का तथ्य भूल जाता है और अतिवाद की नीति अपनाने लगता है। संग्रह आधिपत्य और उपभोग के अन्तर्गत रखा जाय तो जड़ चेतन का पारस्परिक संयोग हर दृष्टि से हर किसी के लिए सुखद हो सकता है। अमर्यादित मात्रा में चाहने से साम्य वितरण में गड़बड़ी फैलती है। एक जगह अधिक संग्रह दूसरी जगह अभाव की स्थिति उत्पन्न करेगा। यह प्रक्रिया अवाँछनीय है। प्रकृति इसको संतुलित करने की प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। इसी का नाम देवासुर संग्राम है।
अनगढ़ मनुष्य प्रकृति के साधनों पर व्यक्तिगत रूप से अनावश्यक मात्रा में आधिपत्य जमाता है। परिग्रही, संग्रही, अमीर बन कर अपने अहंकार एवं बड़प्पन का आतंक दूसरों पर छोड़ना चाहता है। इस ललक का नाम तृष्णा है। अमीर बनने, बड़ा कहलाने में जहाँ अधिक सुविधा साधनों के उपभोग की सम्भावना बढ़ती है वहाँ अहंकार भी तुष्ट होता है, तृष्णा इसी स्थिति का नाम है, दूरदर्शिता से रहित व्यक्ति इसी तृष्णा में बेतरह बंधते हैं। और बेतुके ढंगों अनावश्यक, अनुपयोगी कामों में संलग्न रह कर जीवन सम्पदा को नष्ट करने वाली बाल-क्रीड़ाओं में लगे रहते हैं।
दूसरा आकर्षण शरीरगत है। शरीर में कुछ संवेदन अवयव ऐसे बने हैं जिन्हें प्रकृति की अमुक स्थिति के साथ सम्पर्क बनाने में विचित्र प्रकार की सरस संवेदना अनुभव होती है। जीभ को खट्टे, मीठे, नमकीन, चरपरे पदार्थ विशेष रूप से सुहाते हैं। जननेन्द्रिय को रति कर्म में असाधारण रस आता है। कान को अमुक प्रकार के शब्द, आँख को अमुक स्तर के दृश्य, नाक को अमुक प्रकार के गन्ध और त्वचा को अमुक स्तर के स्पर्श बहुत सुहाते हैं। अनगढ़ मनुष्य इनकी असीम मात्रा चाहता है और मर्यादाएं तोड़ कर शहद पर टूट पड़ने वाली मक्खी की तरह उसी में लिपट कर संकट ग्रस्त होता है।
सीमित, संतुलित और विवेकपूर्ण स्थिति में औचित्य का ध्यान रखते हुए इन्द्रिय सुखों का संतुलित उपभोग लाभदायक सिद्ध होता है और उत्साह बढ़ाता है। शरीर से बाहर की वस्तुओं का सम्पर्क भी अमुक प्रयोजन के लिए अमुक मात्रा में उत्पादन एवं उपभोग किया जा सकता है। किन्तु जब संतुलन बिगड़ता है और अतिवाद अपनाया जाता है तो उसकी हानिकारक प्रतिक्रिया के ध्यान में रखते हुए विज्ञ पुरुष उस असंतुलन की भर्त्सना करते हैं। वस्तुओं के अनावश्यक संग्रह को-तृष्णा और इन्द्रिय भोगों की लिप्सा को-वासना कहते हैं। इन दोनों से ही व्यक्ति और समाज की हानि होती है इसलिए उन्हें दूरदर्शियों ने हेय एवं निन्दनीय, अवाँछनीय एवं त्याज्य ठहराया है। वासना और तृष्णा के अतिवाद को अपना की विकृत हुआ स्तर व्यक्तिवाद कहलाता है। संकीर्ण स्वार्थपरता के रूप में उसे व्यवहृत होते देखा जाता है। इसी को असुरता कहा गया है। दैत्य दानव इसी दुष्प्रवृत्ति के प्रतीक प्रतिनिधि होते हैं।
अवांछनीयताओं से भरे वातावरण में रहने वाले इस अनीति को अपनाते हैं और फिर नशे की तरह उसके अभ्यस्त हो जाते हैं। पतनोन्मुखी प्रवृत्तियों का अपना आकर्षण और अपना दबाव है। पानी गिरते ही नीचे की ओर बहने लगता है। उसे किसी घेरे में बन्द करके रखा जाय तो ही शान्तिपूर्वक रोककर यथा स्थान रखा जा सकता है अन्यथा उसे फैलने, नीचे बहने में देर न लगेगी। यही हाल मानवी चेतना का है। अनेक योनियों में संग्रह किये निकृष्ट स्तर के कुसंस्कार बड़ी मात्रा में जुड़े रहते हैं। मनुष्य के लिए उपयुक्त उच्चस्तरीय चेतना उत्पन्न करने के लिए द्विजत्व जैसे विशिष्ट प्रयत्न करने पड़ते हैं। अन्यथा निम्न योनियों के संग्रहीत कुसंस्कार अवाँछनीय वातावरण में और भी अधिक फलने-फूलने लगते हैं और अनगढ़ मनुष्य चिन्तन एवं कर्तृत्व की दृष्टि से घटिया स्तर का रह जाता है। इस घटियापन को ही व्यक्तिवाद, संकीर्ण स्वार्थपरता, अनैतिकता, असुरता आदि नामों से पुकारते हैं। इस मन:स्थिति का मनुष्य अपने छोटे-छोटे स्वार्थों को सिद्ध करने के लिए दूसरों को बड़ी से बड़ी हानि पहुँचाने में नहीं चूकता। अनेकानेक नाम रूपों के अनाचार, भ्रष्टाचार, दुष्कर्म, अपराध करने में उसे कोई हिचक नहीं होती वरन् उन क्रूर कर्मों को करने पर अपने को दुस्साहसी, शूरवीर आतंकवादी आदि विशेषताओं से युक्त मान कर गौरवान्वित अनुभव करता है। इन्हीं प्रवृत्तियों को असुरता कहते हैं, इनमें जो जितना ग्रसित है उतने ही स्तर का असुर कहलाता है।
असुरता आक्रमणकारी और आतंकवादी होती वह अपने विस्तार के लिए प्रयत्न करती है और आग की तरह जो भी उसकी पकड़ में आता है उसे आकार विस्तार के लिए जकड़ लेती है। असुरता के अतिरिक्त जो बचता है-वह देव है। सत और तम के-जड़ और चेतन के समन्वय से ही संसार बना है। रजोगुण तो इन दोनों का वैसा ही समन्वय है जैसे रात्रि और दिन के समन्वय से बना संध्याकाल। वस्तुतः संध्याकाल का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं। रात और दिन ही प्रधान है। समन्वय से तीसरी चीज बन जाने की रासायनिक क्रिया से ही रजोगुण उत्पन्न हुआ है। उसकी कोई स्वतन्त्र दार्शनिक विवेचना नहीं हो सकती।
असुरता का आक्रमण देवत्व पर ही होता है। असुरता की वृद्धि के लिए देवत्व ही ईंधन हो सकता है। रात-दिन को खाकर विकसित होती है और दिन-रात को परास्त करके अपना वर्चस्व जमाता है। असुरता की वृद्धि देवत्व को उदरस्थ करने से ही सम्भव हो सकती है। यही असुरों को देवताओं पर आक्रमण करने पुराण वर्णित अलंकारिक कथा गाथाओं की पृष्ठभूमि है।
देवता आत्म रक्षा के लिए लड़ते तो हैं, पर वे उपयुक्त पोषण प्राप्त न कर सकने के कारण दुर्बल बने रहते हैं। प्राथमिक आक्रमण में वे हारते हैं। स्वभावतः देवत्व दुर्बल नहीं है। पर वह असुरता की तुलना में बहुधा दुर्बल पड़ता है। इसके दो कारण हैं असुरता के संस्कार जीव के साथ निम्न योनियों से जुड़े आते हैं और वर्तमान वातावरण में भी उन्हीं का बाहुल्य छाया होता है। दैनिक अभ्यास में भी वे ही प्रवृत्तियाँ काम आती हैं। अस्तु पर्याप्त खाद, पानी पाकर वे परिपुष्ट होती रहती हैं और अपनी क्षुधा बुझाने के लिए देवत्व पर, मानवी मर्यादाओं पर ही हमला बोलती हैं। आग को बढ़ने के लिए ईंधन तो चाहिए ही। इसके लिए उस दावानल को वन प्रदेश में उगी हुई सूखी गीली वनस्पति को ही अपनी लपेट में लेना पड़ता है। असुरता को बढ़ना है तो उसे देवत्व को ईंधन की तरह प्रयुक्त करना होता है। यही असुरता का देव सत्ता पर आक्रमण होता है।
देवत्व भी चुपचाप उदरस्थ नहीं हो जाता। आत्मरक्षा की लड़ाई उसे लड़नी पड़ती है। आदर्शवाद भी जीवित रहना चाहता है। अस्तु विरोध, विद्रोह तो वह भी करता है। कम से कम मनुष्य की अन्तः भूमिका में अन्तर्द्वन्द्व के रूप में तो उसका रोष-आक्रोश एवं संघर्ष दृष्टिगोचर होता ही है। असुरता के सम्मुख नितांत निष्क्रिय आत्मसमर्पण नहीं हो सकता। देवत्व हारता तो है, पर उसका प्रतिरोध किसी न किसी रूप में बना ही रहता है। आत्म चेतना के साथ जुड़े हुए मानवी आदर्श सर्वथा नष्ट नहीं हो सकते। यदि उन्हें भी जीवन प्रक्रिया में प्राचीन भारत जैसी उत्कृष्ट परिस्थितियों का पोषण मिला होता, तो उनकी बलिष्ठता असुरता से बढ़कर रही होती और हारने का कोई प्रश्न ही न उठता। खाद, पानी जिसे भी मिलेगा वही परिपुष्ट होगा। वातावरण एवं अभ्यास प्रयोग का अवसर जब असुरता को मिल रहा है तो परिपुष्ट उसे ही होना है। यदि वैसा ही पोषण देवत्व को मिला होता तो निश्चित रूप से सतयुगी, स्वर्गीय परिस्थितियाँ सामने रही होतीं और देवत्व की विजय पताका फहराती दिखाई पड़ती।
देवत्व का स्वरूप है व्यापकता। एक को बहुत में देखने की सद्भाव भरी सत्प्रवृत्ति। वासनात्मक अतिवाद के कारण होने वाली शारीरिक और मानसिक विनाश की अपरिमित क्षति देव चक्षुओं से स्पष्ट दीख पड़ती है। इसी प्रकार तृष्णाग्रस्त होकर अधिक संचय एवं उपभोग से अपनी अहंकारिता एवं विलासिता का बढ़ना और दूसरों का उस परिकर से वंचित रहना उसे काँटे की तरह चुभता है। देव मानस सोचता है कि अपने श्रम, समय, मनोयोग, प्रभाव, वर्चस्व एवं धन का लाभ यदि संकीर्ण स्वार्थपरता के क्षेत्र से बाहर तक जाने दिया जाये तो उससे कितने बड़े परिमाण में प्रयोजन पूरे हो सकते हैं। यह तुलनात्मक विचार करते ही देव मानव को यही सूझ सूझती है कि जीवन के साथ जुड़ी हुई उपलब्धियों का उपयोग, जीवनक्रम को आदर्श एवं अनुकरणीय बनाने में किया जाय। शरीर और परिवार के लिए सुविधाएँ संचित करते रहने की लोभ, मोहग्रसित क्षुद्रता से ऊपर उठा जाय और क्षमताओं तथा सम्पदाओं के रूप में जो कुछ उपलब्ध है व्यापक क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने के लिए लगाया जाय। देव मान्यता यही है। देवत्व इसी स्तर की गतिविधियाँ अपनाने के लिए उत्कंठित रहता है। ऐसे चिन्तन में ही उसे रस आता है और ऐसे कर्तृत्व में ही उसे सन्तोष मिलता है।
असुरत्व और देवत्व में निरन्तर संघर्ष इसलिए होता रहा है कि जीवन सम्पदा पर अधिकार जमाने के लिए दोनों की ही प्रबल चेष्टा रहती है। देवत्व की माँग यह है कि दिव्य जीवन जिया जाय। अपने आचरण अनुकरणीय रहें। असुरता तात्कालिक वासना और तृष्णा की तृप्ति चाहती है। अधिकाधिक इन्द्रिय उपभोग की वासनात्मक लिप्सा हर घड़ी छाई रहती है। उसी की उधेड़-बुन का ताना-बाना चलता रहता है। तरह-तरह के व्यंजन, काम-क्रीड़ा के प्रयोग एवं दृश्य, श्रव्य, स्पर्शजन्य विलास प्रयोजन कैसे पूरे हों इसके सपने सँजोये और घरौंदे बनाये जाते हैं। इससे थोड़ी फुरसत मिलती है तो धन कमाने-अमीरी का दर्प दिखाने वाले ठाट-बाट बढ़ाने के लिए प्रयत्न चल पड़ते हैं। जीवन सम्पदा इन्हीं लोभ और मोह के-वासना, तृष्णा के-प्रयोजनों में खर्च हो जाय यह असुरता की परिधि और प्रेरणा है।
देवत्व ऐसी क्षुद्रता की बालक्रीड़ा में सीमाबद्ध नहीं रहना चाहता, उसे बड़े प्रयोजन पूरे करने की आकांक्षा बेचैन किये रहती है। यही अन्तर्द्वन्द्व देवासुर संग्राम है, जो प्रत्येक विचार और प्रत्येक कार्य में अपने-अपने पक्ष समर्थन में निरत रहते हैं। भोजन करते समय यह खींच-तान देखी जा सकती है। एक और स्वादिष्ट किन्तु गरिष्ठ हानिकारक पदार्थ और दूसरी ओर कम स्वाद के किन्तु सात्विक पदार्थ सामने होते हैं। दोनों ही थाली में सामने रखे हैं किसे ग्रहण किया जाय? किसे छोड़ा जाय? इसमें भीतर ही भीतर अन्तर्द्वन्द्व चलता है। यही देवासुर संग्राम है। जिस पक्ष की प्रबलता होगी उसी की बात चलेगी। जो दुर्बल होगा वह कल्पना-जल्पना करता रह जायगा। थाली के मोर्चे पर देव जीते या दैत्य इसका निर्णय आसानी से किया जा सकता है।
धन उपार्जन में नीति-अनीति के-कर्म में श्रमशीलता और आलस्य-प्रमाद के, चिन्तन में विकारी एवं आदर्शवादी विचारों की, उपभोग में संयम-असंयम की, आचरण में आदर्शवादिता एवं भ्रष्टता की, दर्शन में आस्तिकता नास्तिकता की आकांक्षाएं हर घड़ी, हर क्षण मल्ल युद्ध करती हैं। यही देवासुर संग्राम है। परस्पर विरोधी दिशा में चल रही खींच-तान में से कब किसकी विजय हुई यह आत्म निरीक्षण यदि सतर्कतापूर्वक जारी रखा जाय तो स्पष्ट हो जायगा कि अन्तर्द्वन्द्व के महाभारत में किस पक्ष की सेना हारती और किसकी जीतती है ?
व्यक्तिगत जीवन की विचारणा एवं क्रियाशीलता के क्षेत्र से आगे बढ़कर परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व के व्यापक क्षेत्र में भी यह देवासुर संग्राम चलता है। गरम युद्ध और शीत युद्ध के मोर्चे हर क्षेत्र में गढ़े होते हैं। इन्हें मूक दर्शक की तरह तो कोई जीवित मृतक ही दीखते रह सकते हैं। जीवान्त चेतना को किसी का पक्षधर बनना पड़ता है। जो नीति का पोषण नहीं करता वह परोक्ष रूप से अनीति का समर्थक है। निष्क्रियता भी किसी न किसी पक्ष को सबल या दुर्बल बनाती है। नीति के पक्षधर अनीति से जूझते हैं। जोखिम भरा कठोर संघर्ष न कर सकें तो भी विरोध एवं असहयोग तो जारी ही रखते हैं। इतने से भी अनीति का मोर्चा कमजोर होता है। सत्प्रवृत्तियों का समर्थन एवं सहयोग करना प्रत्यक्षतः देव पक्ष को विजयी बनाने का योगदान है। इसी प्रकार असुरता को सहन करने, उसके विरोध में मुँह तक न खोलने से भी प्रकारान्तर से असुर पक्ष का समर्थन बन जाता है और दुष्प्रवृत्तियों को खुले खेलने की छूट मिल जाती है। इस प्रकार हर व्यक्ति अपने हर चिन्तन एवं कर्म में प्रकारान्तर से देवता एवं असुरों की सेना का सैनिक एवं समर्थक बनकर दोनों में से किसी न किसी को सफल एवं असफल बनाने का प्रयत्न कर रहा होता है। देवासुर संग्राम मल्लयुद्ध की तरह अथवा तीर-तलवारों से तो कभी-कभी ही देखने में आता है, पर वह सत्प्रवृत्तियों और दुष्प्रवृत्तियों में टकराव की तरह सर्वत्र होता रहता है। पुराणों में इसी सूक्ष्म स्थिति को विभिन्न कथानकों के रूप में चित्रित किया है। देवताओं और असुरों के नामों की तथा घटनाक्रमों की भिन्नता के रूप में व्यापक क्षेत्र में फैली हुई प्रवृत्तियों के बीच होते रहने वाले संघर्ष की ही चर्चा है।
लोक प्रवाह में आसुरी तत्वों का बाहुल्य रहने से बहुत मोर्चों पर दैत्य ही जीतता है। देवत्व दुर्बल पड़ता और हारता है, पर यह जीत-हार अस्वाभाविक है। आत्म चेतना का ईश्वरीय अंश मूलतः अति समर्थ है। सत में हजार हाथियों के बराबर बल बताया जाता रहा है। सामान्य विवेक सहज ही देवत्व का पक्षधर होता है। चोरों के झुण्ड से पूछा जाय कि चोरी अच्छी होती है या ईमानदारी तो उनमें से प्रत्येक ईमानदारी के पक्ष में ही अपना मत देगा। वह ईमानदार दुकान से सौदा खरीदता, ईमानदार नौकर तलाश करता है और ईमानदारी से ही व्यवहार करने कर इच्छुक रहता है। चोर होते हुए भी ईमानदारी का यह सरल समर्थन बताता है कि देव पक्ष कितना प्रबल है जो विपक्षी के मुंह से भी अपना समर्थन करा लेता है। व्यभिचारी भी अपनी पत्नी या बेटी को उस मार्ग पर नहीं चलने देना चाहता। अपने घर में सदाचारियों को ही प्रवेश देते हैं। स्वयं व्यभिचार रत व्यक्ति भी जब सदाचार का समर्थन करता है तो स्पष्ट हो जाता है कि शक्ति किसकी प्रबल है! सारा संसार व्यवहारतः असत्यवादी हो जाय तो भी बिना समर्थन का सत्य भी अपनी वरिष्ठता का विजय ध्वजा फहरा रहा होगा और असत्यवादियों के मुंह से भी सत्य की गरिमा गाई जा रही होगी। यह तथ्य बताते हैं कि देवत्व की मूल शक्ति कितनी प्रबल और प्रचण्ड है? अस्तु देवताओं की पराजय अस्थायी ही होती है, उसका निराकरण जल्दी ही हो जाता है। देवासुर संग्राम के कथानकों में असुरों की विजय कभी भी स्थायी नहीं हुई है, उन्हें फिर पराजित होना पड़ा है और देवताओं ने अपना पूर्व पद फिर से प्राप्त कर लिया है।
पराजय को विजय में परिणत करने का आधार इन कथानकों में ईश्वरीय विशिष्ट सहायता ही रही है। इसे हम सत्साहस के रूप में अवतरित हुआ देख सकते हैं। व्यक्ति के जीवन में जब देवत्व के पक्ष-समर्थन की अदम्य अभिलाषा जग पड़े और वह अवाँछनीयताओं से लड़-पड़ने का आक्रोश बन कर सत्प्रवृत्तियों को मूर्त रूप देने में जुट पड़े तो समझना चाहिए कि यह मनःस्थिति प्रत्यक्ष ही ईश्वरीय अवतरण में उभरे हुए प्रचण्ड आन्दोलन के सम्बन्ध में कही जा सकती है। अपने-अपने समय की विकृतियों का निराकरण करने का नेतृत्व श्रेय किन्हीं विशेष व्यक्तियों को ही मिलता है पर यथार्थता यह है कि लोकमानस में उठती हुई संतुलन की वृत्ति के रूप में अवतार सत्ता का दिव्य अवतरण होता है। किस समय, कहाँ किस प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न हुईं और उनका निवारण करने के लिए किस प्रकार की प्रतिक्रिया उभरी यह घटनाक्रम प्रायः नवीनता युक्त होता है। पिछले घटनाक्रम एक जैसे नहीं दुहराये जाते तो भी तथ्य एक ही रहता है। अधर्म का- अवांछनीयता का निराकरण और धर्म का औचित्य का-संस्थापन। रामायण काल और महाभारत काल की अनीति का स्वरूप और उनके निवारण का उपक्रम एक जैसा नहीं था घटनाएं भिन्न-भिन्न प्रकार से घटीं तो भी तथ्य यथास्थान रहे भगवान के अवतरण का स्वरूप सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप होता है। लोकमानस में अभीष्ट परिवर्तन के लिए भारी आवेश भरा होता है, उसी आधार का नेतृत्व प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति तथा घटनाक्रम दृश्यमान होते हैं। इन्हीं को अवतार की लीला कहा जा सकता है। श्रेय किन्हें मिला किन्हें नहीं इससे कुछ अन्तर नहीं आता है। लंका विजय का श्रेय राम, लक्ष्मण, अंगद, हनुमान या नल, नील में से किस को दिया जाय, इस पर विवाद करना व्यर्थ है। महाभारत की भूमिका में कृष्ण या अर्जुन में से किसे श्रेय मिले इस झंझट में पड़ने से कोई लाभ नहीं। नियति के उभार किसी को भी अपना वाहन बना सकते हैं। ईश्वर व्यक्ति नहीं शक्ति है वह दिव्य चेतना का उभार बन कर व्यष्टि अथवा समष्टि में अवतरित होता है। समय की विकृतियों का समाधान और सुकृतियों का अभिवर्धन करके संतुलन सही करना ही उसका लक्ष्य होता है। भगवान की अवतार लीलाएं इसी प्रयोजन के लिए उभरती, और लीला करती दिखाई पड़ती हैं।
देवताओं के ईश्वर के शरीर में जाने का तात्पर्य है अन्तर्जगत की दिव्य चेतना को आवेशपूर्वक अपनाया जाना। पिचकारी का भीतरी काग जितना कड़ा होता है उसमें जितनी पोल होती है उसी क्रम से उतनी ही मात्रा में खींचने की क्रिया आरम्भ होते ही पानी ऊपर खिंचता चला आता है। ईश्वर की शरण में जाने एवं उसका विशेष अनुग्रह पाने के लिए उसकी शरण में जाना आवश्यक माना गया है। शरण का तात्पर्य यह रोना-गाना नहीं है-प्रचण्ड उत्कण्ठा उभारना है। जीव चेतना का आन्तरिक चुम्बकत्व ही सूक्ष्म जगत की सत्ताओं को अपने भीतर धारण करता है। पिचकारी दूध भी खींच सकती है और विष भी। आन्तरिक आकर्षण से आसुरी तत्व भी अपने भीतर-भरते हैं और जब देवत्व की आवश्यकता होती है तो वह भी उसी प्रकार भीतर भरता आता है। ईश्वर साक्षी और दृष्टा है वह विश्व जीवन का क्रम भर चलाता है।
सामयिक उथल-पुथल लोगों के वैयक्तिक अथवा सामूहिक हलचलों के फलस्वरूप बनती बिगड़ती रहती है। ऊपर के दबाव से ज्वार-भाटे उठते रहते हैं समुद्र की मूलसत्ता शान्त है। परब्रह्म की स्थित सामयिक भली-बुरी उथल-पुथल से ऊपर है। इसे तो लोक चेतना ही अपने प्रवाह को आगे-पीछे करके बिगाड़ती-सुधारती है। भगवान का अवतार इसी चेतनात्मक उभार को ही कह सकते हैं, जो व्यक्ति के भीतर, भक्तों के मनःक्षेत्र में व्यक्तिगत रूप से आदर्शवादी उत्कण्ठा के रूप में प्रकट होता है और वही समष्टि क्षेत्र में लोकचेतना के रूप में आँधी-तूफान की तरह उभरता है और क्रान्तिकारी परिवर्तन करके अपने लीलाकृत्य को पूर्ण कर देता है।
आसुरी और देवी शक्तियों के संघर्ष में हमें किस का पक्षधर बनना है इसका निर्णय स्वयं ही करना पड़ता है। अदूरदर्शिता तात्कालिक लाभ भर देखती है और असुरता के आवेश में फँस कर नरक को आमन्त्रित करती है और सर्वनाश के गर्त में फँसती है। विवेकशीलता उज्ज्वल भविष्य को देख सकती है और उस फसल को उगाने के लिए धैर्यबद्ध किसान की तरह कष्ट साध्य श्रम करने में उत्साह बनाये रहती है। फलस्वरूप स्वर्ग सामने आ खड़ा होता है और जीवात्मा को-महात्मा-देवात्मा एवं परमात्मा बनने का अवसर मिलता है। देवत्व और असुरत्व की रस्साकशी में हमें किसी के पक्षधर बन सकते है। अनवरत चल रहे देवासुर संग्राम के हम मूक दर्शक नहीं रह सकते। इच्छा या अनिच्छा से किसी का समर्थन सहकार तो करना ही होता है। फैसला गम्भीरता और सजगता पूर्वक किया जाय इसी में बुद्धिमानी है।
असुरता के कुचक्र में फँस जाने पर यदि नारकीय पीड़ाएं अधिक दुःख दे रही हों और स्थिति असह्य बन रही हो तो भलाई इसी में है कि ईश्वर की शरण में जाय जाय अर्थात् औचित्य को अपनाने के लिए जिस आदर्शवादी दुस्साहस की आवश्यकता पड़ती है उसे आवेशपूर्वक अपनाया जाय और चल रहे अवांछनीय ढर्रे को बदलकर विवेक सम्मत रीति नीति अपनाने के लिए चिन्तन कर कर्तव्य में काया-कल्प जैसा क्राँतिकारी परिवर्तन किया जाय। यही है ईश्वर की तात्विक शरणागति। इस शरणागति नीति को अपनाने के बाद देवत्व निश्चित रूप से जीतता है और अपना खोया वर्चस्व पुनः प्राप्त करता है।
देवासुर संग्राम के पुराण वर्णित कथाक्रम ऐतिहासिक हैं या नहीं इस में माथा-पच्ची करना व्यर्थ है। उनमें यह शाश्वत तथ्य सुनिश्चित रूप से भरा पड़ा है कि दैवी और आसुरी प्रकृति के आकर्षण प्राणी को खींचते है। इनमें से देवत्व का पक्षधर बनने और ईश्वर की शरण में जाना ही श्रेयस्कर है।
बोधिसत्व उन दिनों बटेर की योनि में थे। एक दिन एक कौवा आया और स्वस्थ शरीर बटेर को देखकर बोला-तात्! आपके उत्तम स्वास्थ्य का कारण क्या है? बटेर शरीरधारी बोधिसत्व बोले-
अपिच्छा अप्प चिन्ताय अविदूल गमन च। लद्धा लद्धेन यापेन्तो थूलो तेनास्मि वासस। अपिच्छस्य ह पोसस्स अप्प चिन्तिसुखस्स च, सुसंगहित पमाणस्य कुत्तों सुख सुदानिय।
“हे कौवे! बार बार खाने की इच्छा नहीं करता। जहाँ हूँ वही प्रसन्न हूँ, जो मिल जाता है उसी से गुजारा कर लेता हूँ, इसी से स्वस्थ और मोटा हूँ। ऐसे ही आहार गुण वाले व्यक्ति जिन्हें भोजन की मात्रा का ठीक ठीक ज्ञान रहता है? स्वस्थ रहते हैं।
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विक्रमी सम्वत् के प्रवर्त्तक महाराजा विक्रमादित्य की राजसभा लगी हुई थी। उन्होंने अपने राज्य भर में वाममार्गी साधनाओं और आचारों पर प्रतिबन्ध लगा दिया था।उस दिन सभा में किसी आसुरी प्रवृत्ति के तान्त्रिक उपासक ने सभा में प्रवेश किया। लोगों की धारणा इस प्रकार बनी हुई थी कि नैतिक और सात्विक उपायों को छोड़कर शक्ति सम्वर्धन के लिए अन्य प्रयास करने वाले लोग राक्षस होते हैं। आगन्तुक की वेशभूषा भी कुछ इसी प्रकार की थी। उसने आते ही राजा का अभिवादन किया और अपना अभिप्राय व्यक्त करते हुए कहा-राजन मुझे एक विशेष साधना के लिए नर बलि की आवश्यकता है और मैं इसके लिए आपकी अनुमति प्राप्त करने आया हूँ।
सभासदों सहित सम्राट भी आश्चर्य में पड़ गये। अब तक किसी भी व्यक्ति ने इस प्रकार का आग्रह नहीं किया था। वामाचारी लोगों का जिस प्रकार दमन किया था उसी से लोगों में उन साधनाओं के प्रति-मद्य, माँस, मीन, मैथुन आदि उपचारों के प्रति भय से ही सही इतनी विरक्ति व्याप गई थी कि कोई उनका नाम तक नहीं लेता था और यह साधक तो उन प्रतिबन्धों के सृष्टा अधिष्ठाता के सामने खड़ा होकर ही कितने निःशंक भाव से अनुनय कर रहा था। सम्राट ने तुरन्त उत्तर दिया-‘‘किसी भी दशा में मैं नर बलि की अनुमति नहीं दे सकता ?”
मैं निवेदन ही नहीं जिज्ञासा लेकर भी आया हूँ, महाराज! आपने मेरा निवेदन तो अस्वीकार कर दिया-जिसकी पहले ही सम्भावना थी, पर यह आशा तो है- ‘कि आप जिज्ञासा अवश्य शान्त करेंगे आगन्तुक ने कहा।
‘कहो’- विक्रम की अनुमति थी।
और अभ्यार्थी बोला-मैंने शास्त्रों और विद्वानों से पढ़ा तथा सुना है कि दुष्कर्म और पाप व्यक्ति का पतन करते हैं तथा वह ‘नष्ट’ हो जाता है। पर उस नष्ट होने वाले की क्या गति होती है-यह मेरा प्रश्न है। ‘नष्टो कान्याः गति?” कृपा कर इसका समाधान कीजिए।
विक्रमादित्य ने कालीदास की ओर देखा तथा कालीदास ने कहना शुरू किया-‘जब मैं गुरुकुल में पढ़ता था तब एक ब्राह्मण ने उसे दुत्कारते हुए कहा- ”तुम्हें लज्जा नहीं आती। तुम इतने हृष्ट-पुष्ट ब्राह्मण होते हुए भी प्रातः पूजन के समय भीख माँग रहे हो।’’
‘मैं जुआ खेलता हूँ’ मित्र और ‘रात जुआ खेलने में अपना सब कुछ हार बैठा, इसलिए इस समय भीख के लिए निकलना पड़ा।’ ब्राह्मण बोला।
‘‘छिः छिः! ब्राह्मण और जुआ। तब तो लज्जा की बात है।”
‘जी मैं जुआ खेलते-खेलते मदिरा पान भी करने लगा।’
‘हे भगवान ! तुम्हारा इतना पतन।’
‘मदिरा पान से वासना वृत्ति जागी और मैं ‘वेश्यावृत्ति’ भी करने लगा।’
‘जी हाँ! जुआ, मदिरापान और वेश्यावृत्ति से धन की आवश्यकता पड़ी। इतना धन मेरे पास था नहीं अतः मुझे चोरी भी करनी पड़ी।’
इतना कहकर वह ब्राह्मण चला गया। कुछ देर बाद आश्रम में गुरुदेव लौटे। उस समय सभी ऋषिकुमारों में उस विचित्र भिखारी की ही चर्चा थी। गुरुदेव ने न जाने कब उसका उदाहरण देते हुए कहा-’जो एकबार हीन प्रवृत्ति के मार्ग पर चला, उसे उस प्रवृत्ति के सन्ताप से मुक्त होने के लिए अनेकों बार कुमार्ग पर चलना पड़ता है, और कालीदास ने कहा- ‘यही है नष्ट हुए पुरुष की गति।’
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कामुक और लम्पट व्यक्ति अपने व्यक्तित्व की मूल भित्ति को ढहाते-जीवनी शक्ति का क्षरण तो करते ही हैं, समाज में भी उन्हें सम्मान और प्रतिष्ठा की दृष्टि से नहीं देखा जाता। बहुत सम्मानित और प्रतिष्ठित व्यक्तियों के चरित्र पर भी जब वासना का-लम्पटता का धुंआ उड़ता है तो वर्षों की मेहनत से अर्जित प्रतिष्ठा एक क्षण में गिर जाती है। अपने समाज की आज भी यह स्थिति है कि कामुकता और यौन उच्छृंखलता को आधुनिकता का अंग मानकर उसे मौखिक स्वीकृति भले ही दी जाती हो, पर इसकी वकालत करने वाले स्वयं अपनी मात, पत्नी, बहिन और पुत्री के सम्बन्ध में इस प्रकार के आक्षेप सहन नहीं करते। यौन-संयम या ब्रह्मचर्य जीवन के भव्य भवन की आधारशिला है तो यौन-शुचिता उस आधार भित्ति में लगा ईंट का एक पत्थर। पश्चिमी देशों में मुक्त यौनाचार को भले ही इतना अधिक हेय और निन्दनीय न माना जाता हो, पर परिवार के अस्तित्व का एक आधार अब भी इसे समझा जाता है। इस आधार के टूटने पर कितने ही दम्पत्तियों को तनाव, मन-मुटाव, कलह से लेकर विग्रह तक के दुष्परिणाम भोगने पड़ रहे हैं। अब वहाँ भी तीव्रता से यौन संयम के साथ यौन शुचिता की आवश्यकता अनुभव की जा रही है।
पीढ़ियों के अन्तर और सभ्यता के विकास के साथ इस प्रकार की विकृतियां भले ही फैली हों, पर किसी समय में यौन सम्बन्धों की पवित्रता और संयम को सारी पृथ्वी पर परिवार की, दाम्पत्य सम्बन्धों की और स्वस्थ सन्तति की सम्भावना की रीढ़ इसे समझा जाता था तथा इनके उल्लंघन पर किसी को नहीं बख्शा जाता था। मिश्र की क्लियोपेट्रा की कहानी सर्वविदित है। जिसने अपने भाई को उन्मुक्त जीवन में बाधा मानकर मौत के घाट उतार दिया। भाई की हत्या करने से उसके सामने राज्य का दूसरा कोई प्रतिद्वन्द्वी उत्तराधिकारी तो नहीं बना, पर मिश्र के दरबारी, सामन्त और सरदारों ने एक स्त्री को शासन की बागडोर सौंपने का विरोध किया। उस समय क्लियोपेट्रा का कोई बस न चला और उसे सीरीया जाना पड़ा। वहाँ उसने अपनी सुन्दरता के बल पर कितने ही प्रतिष्ठित व्यक्तियों को अपना समर्थक बनाया तथा उनके मातहतों की एक सेना बनाकर सिंहासन की लड़ाई लड़ी और बिना खून-खराबे के ही मिस्र की सत्ता हथिया ली। यहाँ तक कि दिग्विजयी रोमन सम्राट जूलिया सीजर को भी अपने रूप का दास बना लिया। पचास साल के वृद्ध सीजर और बीस वर्षीय क्लियोपेट्रा-दोनों की जोड़ी कही भी संगत नहीं थी। पर वासना और महत्वाकांक्षा की अन्धी दौड़-सीजर को भी लोकनिन्दा और जन रोष का शिकार होना पड़ा तथा क्लियोपेट्रा को तो सर्पदंश से आत्महत्या करनी पड़ी।
वर्षों तक क्लियोपेट्रा ने भले ही शासन किया हो, पर अन्त में मिस्र के सरदारों तथा वहाँ की जनता ने उसकी व्यभिचारी आदतों से रुष्ट होकर बगावत कर दी। साथ ही रोम का तत्कालीन सम्राट आक्टेवियस भी सेना लेकर चढ़ आया और क्लियोपेट्रा को बन्दी बनाकर अपने साथ ले गया। वहाँ बड़ी बुरी दशा में उसे आत्मघात करना पड़ा। अपने जीवन का दुखान्त समापन करने के बाद भी क्लियोपेट्रा को आज तक घृणा और निन्दा की दृष्टि से देखा जाता है।
फिलिस्तीन में अतिथि बनकर आयी इथोपिया की महारानी शीबा की कामवासना भड़काकर वहाँ के सम्राट सोलोमन ने क्षण भर की सन्तुष्टि भले ही प्राप्त कर ली हो, पर इसके लिए जीवन भर अपने सहयोगियों का रोष और विरोध सहना पड़ा। निस्सन्तान सोलोमन चाहता था कि शीबा के गर्भ से उत्पन्न हुआ पुत्र उसका उत्तराधिकारी बने, लेकिन जब उसने उत्तराधिकारी की घोषणा की तो अपने ही सामन्तों और सरदारों से जो वक्त आने पर सम्राट के लिए जान तक लड़ाने को तैयार थे-बगावत करने की धमकी सुननी पड़ी। सोलोमन का अन्त उस भूल या उन्माद के कारण बड़ी ही दुःखद परिस्थितियों में हुआ।
यौन शुचिता के सम्बन्ध में लोक मर्यादाएं और आवश्यक नियमों का परिपालन न केवल प्रतिष्ठा बनाये रखने की दृष्टि से आवश्यक है, वरन् व्यक्तित्व को समर्थ और विकसित बनाने के लिए भी आवश्यक है। आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी कहा जा सकता है। इस मामले में ढीले और कमजोर व्यक्तियों को हर कहीं अप्रमाणिक और अविश्वसनीय माना जाता था। उन्हें कोई गम्भीर दायित्व नहीं सौंपे जाते, क्योंकि अस्थिरता उनके भाव का एक अंग बन जाती है। स्त्री हो या पुरुष अनियंत्रित यौन भावना जिनमें भी होगी वे अस्थिर स्वभाव के होंगे ही। जहाँ उन्हें आकर्षक और मोहक व्यक्तित्व दिखाई दिया, सौंपे गये कार्यों का दायित्व अनुभव करने के स्थान पर उनके चित्त में प्रतिपक्षी को प्राप्त करने और भोगने की इच्छा उठने लगेंगे। उसी के सम्बन्ध में उठी कल्पनाओं की लहरों में वे बहने लगेगी। पश्चिमी देशों में इस ओर मुख्य रूप से ध्यान दिया जाता है। कर्तव्य निष्ठा और दायित्व भावना की परिपक्वता को सर्वप्रथम इसी कसौटी पर कसा जाने लगा है कि व्यक्ति मादक वातावरण और कामोद्दीपक बातों में कही उत्तेजित या अस्थिर तो नहीं हो जाता है। साथ ही औरों की इस कमजोरी से लाभ उठाने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। हाल ही का समाचार है किसी कम्पनी ने अपने उत्पादन की खपत के लिए सुन्दर प्रचारिकाओं को रखना आरम्भ किया और उसे इसमें सफलता भी मिली।
उच्छृंखल यौन भावना का अर्थ इतना भर ही नहीं है कि ऐसे वातावरण में रहकर या स्त्री-पुरुषों के सम्पर्क में आते ही व्यक्ति अपनी वासना को पूरा कर ले। सुन्दर युवतियों के चित्र देखने से लेकर राह चलती लड़कियों या स्त्रियों को विशेष रूप से देखने के पीछे भी यही भाव रहता है। सिनेमा से लेकर नायिका प्रधान उपन्यास, रोमांटिक कथा, कहानियाँ या युवतियों के चित्रों के साथ प्रचारित विज्ञापनों पर नजरें गड़ाने का लगाव व्यक्ति की अनियन्त्रित वासना का परिचय देता है। मानस शास्त्री इन कृत्यों को भी मैथुन मानते हैं। हमारे देश में तो आठ प्रकार के मैथुनों में से सात इसी प्रकार के माने गये हैं।
कामोद्दीपक आचरणों या बातों में किसी भी प्रकार का रुझान या रुचि रखना यही सिद्ध करता है कि इसके चित्त में अस्थिरता है और जरा भी इस प्रकार का वातावरण मिलने पर व्यक्ति के विचलित होने, गिर जाने की सम्भावना है। अवसर की दुर्लभता से व्यक्ति का चरित्रवान बने रहना कोई बड़ी बात नहीं है। अन्यथा आन्तरिक दृष्टि से तो वह मानसिक व्यभिचार की ओर प्रवृत्त रहता है। मनोविज्ञान के साधारण जानकार भी इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि व्यक्ति की भावनाएं उसके शरीर, स्वास्थ्य और क्रियाशक्ति को कितना प्रभावित करते हैं। जब मनोभूमि ही दूषित होगी तो कार्य और प्रवृत्तियाँ स्वस्थ कहाँ रह पाती हैं ? इन विकृतियों का यत्किंचित् समाज व्यवस्था और व्यवसाय तन्त्र भी जिम्मेदार है, पर एक प्रकार से व्यावसायिक प्रतिष्ठान भी मनुष्य की इस कमजोरी का लाभ उठाते हैं। विज्ञापनों में मॉडलिंग का व्यवसाय-इसी कमजोरी से लाभ उठाने का एक अंग है। सुन्दर लड़कियों और सजीले नव-युवकों के आकर्षक चित्रों के साथ साबुन, तेल से लेकर दवाओं तक के विज्ञापनों का यही उद्देश्य है। व्यक्ति का कामुक चित्त उन वस्तुओं की ओर नहीं उनके साथ छपे बनाये चित्रों की ओर ही आकृष्ट होता है और उस आकर्षण के साथ विज्ञापित वस्तुओं का परिचय प्राप्त करता है।
जो भी हो व्यक्ति स्वयं उत्तरदायी है उस सीमा तक जहाँ तक कि वह अपनी वासना-यौन भावना को अनियन्त्रित विस्तार देता है। आजकल तो इस विचारधारा का प्रचार कतिपय बुद्धिजीवियों द्वारा भी किया जाने लगा है कि मनुष्य को उन्मुक्त यौन जीवन की छूट मिलनी चाहिए। कहा जाता है कि इस प्रकार उसकी यौन कुण्ठाएं विसर्जित होंगी और वह अपना स्वस्थ विकास करने में समर्थ हो सकेगा। इस छूट के लिए न तो हमारे संस्कार अनुमति देते हैं और न ही नैतिकता। रति-क्रीड़ा को गोपनीय विषय माना जाता है साथ ही सामाजिक उत्तरदायित्व को पूरा, करने के लिए उसकी आवश्यक सीमित छूट दाम्पत्य जीवन में दी भी गई है। यौन शुचिता के आधार पर ही पति-पत्नी का प्रेम और विश्वास प्रगाढ़ बनता है। छुपकर किये जाने वाले अवांछनीय कुकर्म उस आधार को ही तोड़ देते हैं- तथा परिवार को एक सुदृढ़ संस्था न रहने देकर स्वार्थी सौदा बना देते हैं। कहना नहीं होगा इसका प्रभाव भावी सन्तानों पर भी पड़ता है। पश्चिम में बढ़ती अपराध प्रवृत्ति का मुख्य कारण औद्योगीकरण या व्यस्त तीव्र जीवन उतना नहीं है, जितना कि वहाँ के परिवारों की जर्जरावस्था। व्यावसायिक सन्धियों की भाँति स्थापित किये गये दाम्पत्य सम्बन्ध और उनसे जन्मी संतान अपने माता-पिता का प्रेम पाने के लिए बुरी तरह तरसती है और उसी प्रेम के अभाव में जन्म लेती है-उनमें अपराध प्रवृत्ति। जो पति-पत्नी आपस में ही स्वस्थ प्रेम भावना का विकास नहीं कर सके, जिनकी स्वयं की ही प्रेम पिपासा अतृप्त रही वे अपनी सन्तानों को क्या प्रेम दे सकेंगे। प्रेम की भूख और स्नेह की आकाँक्षा अधूरी और अतृप्त लिये घूमते बच्चे भावी जीवन में कुण्ठित विद्रोही नहीं बनेंगे तो क्या बनेंगे?
अपने देश में संस्कार और नैतिकता के स्थापित मूल्य प्रत्येक व्यक्ति के अन्तरंग में उच्छृंखल वासना को अवांछनीय अनुभव कराते हैं। चोरी छुपे यदि अनुचित सम्बन्ध बना भी लिए जायँ अथवा व्यक्ति मानसिक व्यभिचार में लिप्त रहे तो संस्कारगत जीवन मूल्यों को तोड़ने की एक अपराध भावना उनमें जन्म लेती है, जो उन्हें कभी भी स्थिर चित्त और एकाग्र नहीं होने देती। फलस्वरूप वे अपना कोई भी कार्य मनोयोगपूर्वक नहीं कर पाते। मनोयोग और एकाग्रता के अभाव में किये गये किसी भी कार्य की सफलता असंदिग्ध रहती है, मिलती भी है तो आधी अधूरी।
इन सबका परिणाम खंडित व्यक्तित्व के रूप में, निराश और हताश व्यक्ति के रूप में, चित्त की अस्थिरता और चंचलता के रूप में मिलता है। व्यक्तिगत दृष्टि से खंडित व्यक्तित्व और सामाजिक दृष्टि से अविश्वसनीयता तथा अप्रामाणिकता-यही तो मिलता है उद्वेलित वासना की उपलब्धि के तौर पर। अतः आवश्यक है कि जीवन में सफलता और समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए अपनी यौन भावना को नियन्त्रित किया जाय। यौन शक्ति का श्रेष्ठतम उपयोग तो उसे सृजनात्मक दिशा देना ही है। दीपक का तेल बाती से होता हुआ उसके सिरे पर पहुँच कर प्रकाश उत्पन्न करता है। यदि दीपक की पेंदी में छेद हो तेल की दिशा अधोमुखी हो तो न दिया जलेगा न तेल बचेगा। यौन शक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाना प्रयत्न और अभ्यास साध्य है। कालिदास ने प्रयत्न और अभ्यास से इसे सिद्ध कर जड़ बुद्धि से महाकवि बनने में सफलता प्राप्त की । पत्नी को एक क्षण के लिए छोड़ने को तैयार नहीं-तुलसी ने जब यह दिशा पकड़ी तो वे कामुक और लम्पट पुरुष से रामचरित्र मानस जैसे ग्रन्थ के प्रणेता और सन्त महापुरुष बन गये। गृहस्थ होते हुए भी यौन भावना को परिमार्जित और सृजनात्मक दिशा दे कर बोलते समय काँपने वाले मोहनदास अपनी आवाज से करोड़ों लोगों में प्राण फूँकने वाले महात्मा गाँधी हो गए। यौन भावना को ऊर्ध्वमुखी बनाकर संसार में आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करने वाली ज्ञात अज्ञात विभूतियों का विवरण इकट्ठा किया जाय तो उनकी संख्या हजारों में नहीं लाखों में हो सकती है। यदि इतना एकदम सम्भव न हो सके तो कम से कम उसे नियन्त्रित तो किया ही जा सकता है। सफलता का मतलब यश, कीर्ति ही नहीं है। उच्च गुणों से सुसज्जित आत्मबल, सम्पन्न, सुखी और सन्तुष्ट जीवन जिया जाय यही व्यक्तित्व की सफलता का राज है। अपनी शक्तियों को अनेक छिद्रों से न बहाकर उन्हें एकाग्र कर, शक्ति संचय कर जिस कार्य में भी जुटा जाय सफलता का राजमुकुट उसी क्षेत्र में प्रतीक्षा करते हुए मिलेगा। अन्यथा उद्धत कामुकता, लम्पटता और वासना की उष्णता समूचे व्यक्तित्व को ही गलाकर रख देती है, यह तो शत-प्रतिशत निश्चित दुष्परिणाम है।
स्वतन्त्रता के साथ स्वावलम्बन जुड़ा हुआ है। दोनों ही सिक्के के दो पहलू के समान हैं। स्वतन्त्र राष्ट्र कभी परावलम्बी नहीं होगा और परावलम्बी कभी स्वतन्त्र नहीं हो सकता क्योंकि परावलम्बन से परानुकृति आती है, परावलम्बन में हम अपने आपको पहिचान ही नहीं पाते।
-दीनदयाल उपाध्याय
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‘मनुष्य’ जाति का प्राणी है। प्रकृतितः वह शाकाहारी है। वनस्पति भोजी प्राणियों के दाँत चौड़े और आँतें लम्बी होती हैं, उन्हें आहार के पचाने में देर लगती है तथा सड़न का खतरा कम है, इसलिए लम्बी आँतों की आवश्यकता समझी गई और वैसा ही पेट बन गया। वनस्पति खाने के लिए-कुतरने चबाने के लिए जिस प्रकार के दाँत चाहिए वैसे चौड़े दाँत मनुष्य के हैं। माँसाहारियों की स्थिति भिन्न है। माँस चीरने-फाड़ने के लिए नुकीले दाँतों और पकड़ने कसने वाले होठों की आवश्यकता रहती है। माँस पेट में पहुँचने पर जल्दी सड़ता है-उसे जल्दी निकाल बाहर करना आवश्यक होता है, अस्तु हिंस्र प्राणियों की आंतें छोटी होती हैं। माँसाहारी और शाकाहारी प्राणियों की स्थिति में भिन्नता स्पष्ट है मनुष्य यदि अपनी शाकाहारी जाति छोड़कर माँसाहारी आदतें बदले तो प्रकृति उसके अवयवों को उसी आधार पर बदल देगी। तब हमारी आंतें छोटी हो जायेंगी और दाँत नुकीले। मल विसर्जन अब की अपेक्षा अधिक जल्दी-जल्दी करना पड़ेगा। इस परिवर्तन से वनस्पति पचाने वाले संस्थान से वंचित होना पड़ेगा यदि उभय पक्षी क्रम अपनाया गया तो दोनों में से एक भी स्तर स्थिर न रहेगा और स्थिति अधर में लटक जायगी वर्तमान नीति शाकाहार और माँसाहार को मिलाकर चलने की-प्रकृति के द्विपक्षीय वर्गीकरण में से एक को भी स्वीकार न करने से विचित्र बन जायगी। तब हमारा पेट न शाकाहार पचाने की स्थिति में रहेगा और न ठीक तरह से माँस ही हजम होगा। यदि परिवर्तन ही अभीष्ट हो तो शाकाहार छोड़कर माँसाहार को पूरी तरह अपना लिया जाय। चीते, भेड़िये, बाज, गिद्ध जैसे पशु पक्षी विशुद्ध माँसाहारी होने से अपनी शारीरिक स्थिति ठीक बनाये हुए हैं। बन्दर, गाय, घोड़े जैसे शाकाहारी प्राणी भी अपना अस्तित्व ठीक से बनाये रहेंगे। कुछ प्राणी ऐसे भी हैं जो आरम्भ से ही शाक और माँस पचाने की प्रकृति लेकर आये हैं उनकी संरचना मध्यवर्ती है। पर मनुष्य पर यह मध्यवर्ती कानून लागू नहीं होता। चीता घास पर रहेगा या गाय माँस खायेगी तो उसे अपने वर्तमान स्तर को समाप्त ही करना पड़ेगा। मनुष्य की दुमुँही नीति उसके लिए अन्ततः घातक ही सिद्ध होगी।
शाकाहारी प्राणी प्रातः उठते और संध्या होते ही विश्राम करने लगते हैं। माँसाहारी दिन में पड़े सुस्ताते रहते हैं और रात्रि होते ही अपने आहार की तलाश में निकलते हैं। दोनों ही जाति वाले अपने काम करने और विश्राम करने की मर्यादा पालन करते हैं, फलतः वे अपनी शारीरिक स्थिति सही बनाये रहते हैं। मनुष्य ने दिन को रात तो उतना नहीं बनाया, पर रात्रि को दिन बनाने की दिशा में अति बरतना आरम्भ कर दिया है। बहुत रात्रि बीत जाने तक जागना, तरह तरह के आवश्यक अनावश्यक कामों में उलझे रहना, आर्थिक अथवा मनोरंजन की दृष्टि से लाभदायक हो सकता है, पर स्वास्थ्य सन्तुलन पर उसका घातक प्रभाव पड़ना निश्चित है।
प्रकृति ने प्राणियों को सुविधा साधनों के अजस्र अनुदान दिये हैं। पर साथ ही मर्यादा पालन और अनुशासन बरतने के लिए उन्हें बाध्य भी किया है। उच्छृंखलता बरत कर तत्काल तो कुछ पाया भी जा सकता है, पर अन्ततः वह बहुत ही घाटे का सौदा सिद्ध हो सकता है। मनुष्य बुद्धिमान तो है, पर प्रकृति के नियमों को चुनौती देकर अपनी स्थिति सुदृढ़ बनाये रखने की सामर्थ्य उसमें नहीं है। परस्पर उच्छृंखलता बरतने की भी प्रतिक्रिया होती है फिर प्रकृति के अनुशासन को तोड़ना तो आग से खेलने की तरह है। रात्रि में देर तक जागने और तेज प्रकाश का आश्रय लेने पर हम नेत्रों की शक्ति ही नहीं गँवाते वरन् पूरे स्वास्थ्य सन्तुलन पर ही कुठाराघात करते हैं।
आहार-विहार की मर्यादाओं का पालन करने भर से हम आरोग्य और दीर्घजीवन का लाभ अति सरलतापूर्वक ले सकते हैं। विकृत आचरण अपनाकर उच्छृंखल बरतना यों सर्वत्र ही मूर्खतापूर्ण होता है, पर आहार-विहार के सम्बन्ध में अतिक्रमण की नीति अपनाना निश्चित रूप से आत्मघात का ही एक तरीका है।
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बढ़ती हुई आबादी अब बड़े शहरों की ओर भाग रही है। देखने में चुहल-चपाटा, मनोरंजन के साधन तथा सुविधा सामग्री गाँवों की अपेक्षा शहरों में अधिक हैं। वहाँ पैसा भी आसानी से और अधिक कमाया जा सकता है, उपभोग की आकर्षक वस्तुएं भी वहाँ अधिक मिल जाती हैं। ऐसी सुविधाओं का गाँवों में अभाव अनुभव किया जाता है। अस्तु शहरों की - उनके आस-पास के इलाकों की आबादी हर जगह तेजी से बढ़ रही है। छोटे गाँव कस्बे बन रहे हैं और कस्बे शहरों में परिणत हो चले हैं। शहरों में भरी हुई आबादी के निर्वाह, एवं यातायात के लिए स्वभावतः कितने ही छोटे-बड़े कारखाने बनते हैं। बड़े उद्योगों की स्थापना भी उसी क्षेत्र में अधिक होती है। इस घचापच से कितनी ही ऐसी व्यवस्थाएं चल पड़ती हैं जो हवा और पानी जैसे जीवन धारण के लिए आवश्यक तत्वों को विषाक्त करती है। कोलाहल भी कम घातक नहीं है। इन सब का सम्मिश्रित परिणाम मनुष्य जाति के सामने भयंकर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करता चला जा रहा है। स्थिति यही बनी रही तो दम घुटने से एवं विषाक्त अन्न जल के कारण दुर्बलता तथा रुग्णताजन्य विभीषिकाएं मनुष्य को अकाल मृत्यु के मुख में धकेल देंगी।
कल कारखाने-रेलवे इंजन-ताप बिजली घर-मोटरें-वायुयान इन की संख्या द्रुत गति से बढ़ती जा रही है। इनमें जलने वाले पेट्रोल, डीजल, कोयले से निकलने वाली कार्बन मोनोऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड जैसी भयंकर गैसें वायुमण्डल को दिन-दिन अधिक विषाक्त करती जा रही हैं। नगरों की बढ़ती हुई जनसंख्या, वाहनों की धमा चौकड़ी, कारखानों की रेल-पेल, घरों में ईंधन का अधिक खर्च, हरियाली की कमी आदि कारणों से हवा में हानिकारक तत्वों का परिमाण बढ़ता ही चला जा रहा है। धूलि एवं धुंऐ में इनका बाहुल्य रहता है। साँस के साथ वे शरीरों में प्रवेश करती हैं और उन्हें दुर्बल एवं रुग्ण बनाती चली जाती हैं।
कार्बन मोनोऑक्साइड गैस यदि हवा में सातसौवें भाग में होगी तो उसमें साँस लेने वाला मर जायेगा। यदि उसका लाखवाँ भाग होता तो उस क्षेत्र के प्राणी बीमार पड़ जायेंगे।
औद्योगिक शहरों के ऊपर छाई धुन्ध कभी भी देखी जा सकती है। उसमें कार्बन, सल्फेट, नाइट्रेट, सीसा, हाइड्रो-कार्बन के यौगिकों की भरमार रहती है। धूलि और धुँआ मिलकर एक ऐसी ‘स्माग’ चादर तानते हैं जिसके नीचे रहने वाले न केवल मनुष्यों का वरन् पेड़-पौधों का भी दम घुटने लगता है। उनका स्वाभाविक विकास बुरी तरह अवरुद्ध हो जाता है।
पानी के जहाज जिधर से निकलते हैं उधर ही समुद्र को गन्दा करते हैं। कुछ समय पूर्व टोरीकेन्यन नामक जलयान ने गलती से इतना तेल बखेर दिया कि इंग्लैण्ड की नौसेना को उसमें भारी तादाद में बारूद गिराकर आग लगानी पड़ी। तेल निथारने के लिए जो डिटरजेंट इस्तेमाल किया गया वह भी कम घातक सिद्ध नहीं हुआ। इस उपद्रव ने उस क्षेत्र का जल ही दूषित नहीं किया वरन् जलचरों का भी सफाया कर दिया।
फसल की रक्षा के लिए छिड़के गये कीट रसायन कितने कीड़ों को मारते हैं और कितना अनाज बचाते हैं यह अन्वेषण का विषय है, पर यह सही है कि उस छिड़काव क्षेत्र के पक्षी वहाँ के कीड़े-मकोड़ों अथवा दानों को खाने के बाद बेमौत मरते हैं। स्पष्ट है कि पक्षियों से बढ़कर फसल का रक्षक और कोई नहीं, छोटे-मोटे पक्षी उन कीड़ों का सफाया करने में निरन्तर लगे रहते हैं जो पौधों को क्षति पहुँचाते हैं। पक्षियों के मर जाने से इन कीड़ों को स्वच्छन्द वंशवृद्धि का अवसर मिलता है। फलतः विष छिड़काव से जितने कुछ कीड़े बचे रहते हैं वे ही कुछ समय में मृतकों की तुलना से कहीं अधिक बढ़कर हमारी बुद्धिमता को धूलि में मिला देते हैं।
नदियों के किनारे बसे हुए शहर तो उनके जल का लाभ उठाते हैं, पर नदियों को इन शहरों से गन्दगी ही प्राप्त होती है जिससे वे अपनी उपयोगिता खोती चली जाती हैं। बरौनी का तेल बहकर गंगा में जा पहुँचने और मुँगेर के पास पानी में आग लगने का समाचार अभी बहुत पुराना नहीं हुआ। ऑल इंडिया इन्स्टीट्यूट आफ हाइजीन एण्ड पब्लिक हेल्थ द्वारा किये गये सर्वेक्षण से दिल्ली और आगरा के बीच बहने वाला जमुना का पानी बहुत गन्दा पाया गया। बिहार की दहा और सोन नदियों में अब मछलियों का वंश नष्ट होता जा रहा है, गुजरात जिले की महिसागर नदी का पानी कुछ समय पूर्व हरा हो गया था। जिसे देख कर उस क्षेत्र के लोग बुरी तरह घबरा गये थे। गंगा, यमुना, काली, हुगली आदि नदियाँ कभी भीतरी और बाहरी पवित्रता प्रदान करने वाली मानी जाती थीं, अब वे गन्दगी को ढोने वाली निराशाजनक नहरें मात्र बनती जा रही हैं।
सर्वविदित है कि जलाशयों की भीतरी सफाई का सारा उत्तरदायित्व मछली जैसे छोटे जलचरों का है। वे अपनी खुराक उस गन्दगी को ही बनाते हैं जो पानी इधर-उधर से जमा होती है। मछलियाँ न हों तो पानी बहुत जल्दी सड़ जायेगा। कीटनाशक दवाएं वर्षा के साथ घुल कर नदियों में पहुँचती हैं और वहाँ जाकर मछलियों के प्राण लेती हैं। इन दूरवर्ती दुष्परिणामों को देखते हुए हेंगरी-स्वीडन और डेनमार्क आदि देशों ने डी0डी0टी0 पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। रूस में एल्ड्रिन और डाइल्ड्रिन पर रोक है। यह दवाएं फसल के कीड़े तो मारती हैं, पर दूसरे ऐसे उपद्रव खड़े करती हैं जो कीड़ों से भी अधिक हानिकारक होते हैं। जापान में माताओं के दूध में शिशुघाती जहरीला डाएल्ड्रिन पाया गया। निश्चित रूप से यह फसलों पर छिड़के जाने के बाद अन्न, शाक, फल अथवा पशु-पक्षियों के माँस द्वारा माताओं के पेट एवं दूध में पहुँचा था।
ऐल्फैल्फा, निकोटिन, मेटसिस स्टोक्स आदि रसायनों के बारे में यह अनुमान लगाया गया था कि वे शत्रु पक्षी कीटकों को मारती हैं और मित्र पक्ष को बचा लेती हैं, पर यह अनुमान गलत साबित हुआ। विनाश कार्य से शत्रु और मित्र पक्ष को लगभग समान क्षति पहुँची और वे सुरक्षात्मक परिणाम नहीं निकले जिनकी कि आशा की गई थी।
शहरों में सड़कों पर दौड़ने वाले द्रुतगामी वाहन, बिजली का प्रयोग, थोड़ी जगह में अधिक मात्रा में जलने वाली आग, घिचपिच में साँस और शरीरों की गर्मी, कल कारखाने आदि कारणों से तापमान ग्रामीण क्षेत्र की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ा रहता है। बिजली के पंखे तापमान नहीं गिराते केवल हवा हो इधर से उधर घुमाते हैं चुस्त एवं एक के ऊपर एक कपड़े लादने के फैशन ने शरीरों के इर्द-गिर्द की गर्मी और भी अधिक बढ़ा दी है। सड़कों और बसों की घमस से गर्मी बढ़ी-चढ़ी रहती है। पक्के मकान और पत्थर की सड़कों में तपन रहती ही है। इस बढ़े हुए तापमान में शहरों के निवासी अपनी स्वाभाविक शारीरिक क्षमता को गंवाते ही चले जाते हैं।
कोलाहल का अन्य प्राणियों पर क्या असर होता है इसका पता लगाने के लिए किये गये अनेक प्रयोगों में से एक कैलीफोर्निया की जीवन अनुसंधान संस्था द्वारा शार्क मछलियों पर किया गया था। संस्था के निर्देशक थियोब्राडन ने बताया कि पानी में लाउडस्पीकरों के द्वारा तेज आवाज दौड़ाई गई तो मछलियाँ उसे सुन कर आतंकित और विक्षिप्त हो उठीं। वे एक दूसरे को इसका कारण समझकर आपस में हमला करने लगी और जब ध्वनि उन्हें असह्य हो गयी तो चट्टानों से सिर पटक कर आत्महत्या कर बैठीं। ऐसे ही प्रयोग फ्राँसीसी कौलीनीशिया केरिगिरोजा एटौस में भी किये गये। उनका भी निष्कर्ष यही था कि जल जीव असाधारण कोलाहल के बीच सामान्य जीवन नहीं बिता सकते।
मोटरों की-कारखानों की- लाउडस्पीकरों की चिल्लियाँ शहर को ऐसे शोरगुल से भरती जा रही हैं जिसके परिणाम से, इण्डियन कोन्सिल आफ मेडीकल रिसर्च के कथनानुसार, लोग धीरे-धीरे बहरे होते चले जायेंगे। उनसे मानसिक, स्नायविक और हृदय सम्बन्धी रोग बढ़ सकते हैं।
अंग्रेज लेखिका श्रीमती एल्सपैथ हक्सले ने डी0डी0टी0 प्रभृति कीटनाशक विषाक्त औषधियों के प्रयोग के खतरे से जन-साधारण को सावधान किया है, उनका कथन है पौधों पर छिड़के हुए रसायन अन्न, शाक एवं माँस के माध्यम से अन्ततः मनुष्य के शरीर में जा पहुँचते हैं और ऐसी हानि की जड़ जमाते हैं जो आरम्भ में तो थोड़ी दीखती है पर पीछे भयानक सम्भावनाओं को जन्म दे सकती है। यह विषाक्त रसायन वर्षा के साथ घुलकर नदी तालाबों और कुँओं में पहुँचते हैं। तटवर्ती समुद्र के निकट यह जल पहुँचता है तो उस क्षेत्र की मछलियों में भी वह विष उत्पन्न हो जाता है। इन्हें खाने वाले लोग उस दुष्प्रभाव से बच नहीं सकते। श्रीमती हक्सले ने अपनी बात को प्रामाणिक सिद्ध करने के लिए पानी के, माँस के तथा अन्य प्रकार के सबूत संग्रह करके अपनी पुस्तकों में प्रकाशित किये हैं। वे एक कृषि फार्म चलाती हैं, पर कभी भी कीट-नाशक दवाओं का प्रयोग नहीं करतीं।
राष्ट्र संघ के तत्वाधान में वातावरण को जीवन योग्य बनाये रहने की समस्या पर विचार करने के लिए जो अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन स्टाक होम में हुआ था उसका सम्मिलित स्वर यही था-‘हमारे पास एक ही पृथ्वी है। इसे जीने लायक बनाये रखना चाहिए।’ सम्मेलन का सुझाव था प्राकृतिक भण्डारों का मितव्ययिता को पुनः काम के लायक बनाया जाय, बढ़ते हुए शोर को रोका जाय और वायु एवं जल के बढ़ते हुए प्रदूषण को रोका जाय।
जिस क्रम से हमारी तथाकथित ‘प्रगति’ प्राकृतिक सन्तुलन को बिगाड़ रही हैं, उसे दूर दृष्टि से देखा जाय तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि तात्कालिक लाभ में अन्धे होकर हम भविष्य को घोर अन्धकारमय बनाने के लिए आतुर हो रहे हैं।
मनुष्य की बुद्धिमत्ता शहरों की वृद्धि-साधनों की आबादी की वृद्धि में इस तरह अविवेकपूर्वक लगी हुई है कि इस तथाकथित प्रगति का अन्त रोमाँचकारी संकट को विषाक्त करके जो प्रगति खरीदी जा रही है वह कल कितनी महंगी पड़ेगी इसका अनुमान न जाने क्यों नहीं लगाया जा रहा है बुद्धिमान मानव जाने क्यों इतनी अदूरदर्शिता का परिचय दे रहा है।
सर्वनाशे समुत्पन्ने ह्यर्धं त्यजति पण्डितः। अर्द्धेंन कुरुते कार्य सर्वनाशों हि दुस्तरः॥
सर्वनाश होने का अवसर आ जाय तो बुद्धिमान पुरुष उसमें से आधा भाग स्वयं ही त्याग दिया करते हैं। ऐसे समय में ऐसा सभी को करना चाहिए क्योंकि अवशिष्ट आधे से कार्य किया जा सकता है। सबका नाश तो बड़ा दुस्तर है क्योंकि फिर कुछ भी साधन ही नहीं रहता है।
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खरगोश आस्ट्रेलिया में बहुतायत से पाया जाता है। खरगोश शीघ्र-प्रजनन प्राणी है, उसे कुछ ही समय में सारे आस्ट्रेलिया द्वीप में अधिकार जमा लेना चाहिए था। पर ऐसा न होना यह बताता है कि प्रकृति में एक ऐसी व्यवस्था भी है, जो जनसंख्या वृद्धि को बलपूर्वक रोकती रहती है, यदि वह ऐसा न करे तो पृथ्वी पर किसी प्रकार का अस्तित्व ही सम्भव न रहे।
यह व्यवस्था है विस्फोट की। जनसंख्या अनियन्त्रित होती है तो एक ही जाति के प्राणी लड़-भिड़कर स्वयं ही नष्ट हो जाते हैं। आस्ट्रेलिया के खरगोश इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं।
एक जोड़ी खरगोश जब 6 माह का होता है, तभी उसमें प्रजनन शक्ति आ जाती है। एक बार बच्चा देना आरम्भ करने के बाद वह हर तीसरे माह 6 बच्चे देता चला जाता है। इस तरह वर्ष में एक जोड़े से 24 बच्चे पैदा हो जाते हैं। इन चौबीस में से बारह बच्चे ऐसे होते हैं जो 6 माह बाद स्वयं भी बच्चे पैदा करने लगते हैं। 9वें महीने 36 और बारहवें महीने 72 और कुल मिलाकर एक जोड़े से एक वर्ष में 24+36+72=132 खरगोश पैदा हो जाते हैं। चक्रवृद्धि ब्याज की दर से यह संख्या बढ़ती रहती है। यदि एक खरगोश 5 वर्ष जीवित रहे तो इस अवधि में उसके परिवार की संख्या 132+144+288+576+1152+2304+4608+9216+18432+36864+73728+147556+295112=590112 हो जायेगी। यह एक जोड़े की पैदाइश होगी। बाबाजी कुल 5 वर्ष के ही होंगे यदि ऐसे बाबाओं की संख्या कुल बीस ही हो जाये तो वहीं खरगोशों की संख्या इस अवधि में 11802240 (एक करोड़ 18 लाख दो हजार दो सौ चालीस हो जाये)।
आस्ट्रेलिया का कुल क्षेत्रफल 30 लाख वर्ग मील है और वहाँ की जनसंख्या कुल 90 लाख है। यदि प्रकृति ने इन्हें अपने ही अनुपात से बढ़ने दिया होता तो आज आस्ट्रेलिया में एक भी तो आदमी न होता। हरियाली का एक भी तिनका न होता। दैवयोग से आस्ट्रेलिया में माँसभक्षी जीव भी नहीं पाये जाते, इसलिए इनके अस्तित्व को वहाँ कोई खतरा भी नहीं है। खरगोशों का वहाँ एकछत्र साम्राज्य होता।
तो भी वहाँ खरगोश कम क्यों हैं, यह जानने की उत्कंठा वैज्ञानिकों में पैदा हुई, जनसंख्या का अध्ययन किया। उन्होंने टेलेफोटोलेन्स (ऐसे कैमरे जो किसी स्थान पर लगा दिये जाते हैं, फोटो खींचने वाला पीछे चला आता है और दूर से ही फोटो लेता रहता है।) लगाकर बड़े-बड़े समूहों के चित्र लिए। सभी चित्र बड़े मजेदार थे और यह दिखा रहे थे कि उनमें जल और अन्न के सीमित कोर्ट को प्राप्त करने के लिए कितनी मार-पीट होती है। आपस में ही उनके लड़-झगड़कर नष्ट होते दिखाई देने वाले यह चित्र आज भी ‘आस्ट्रेलियन न्यूज एण्ड इन्फॉर्मेशन ब्यूरो’ के पास सुरक्षित हैं। एक चित्र जो ‘किनशिप आफ ऐनिमल एण्ड मैन’ पुस्तक, जिसके लेखक मार्गन हैं, ये पेज नम्बर 92 में छपा है। बड़ा ही कौतूहल वर्द्धक है वह। एक छोटे से गड्ढे में पानी पीने के लिए खरगोशों का समूह उमड़ पड़ा है। वे एक दूसरे के ऊपर चढ़कर सबसे पहले आगे पहुँचकर पानी प्राप्त करने की आपा-धापी में हैं। गड्ढा छोटा है पानी बहुत कम। सब आपस में झगड़ते हैं कितने ही युद्ध में मर जाते हैं, कितने ही प्यास और भूख से तड़पकर दम तोड़ देते हैं।
खरगोश ठहरा विवेकहीन प्राणी। पर आज का मनुष्य तो उससे भी गया गुजरा लगता है, जो देखता और समझता है कि पृथ्वी में आजीविका के साधन सीमित हैं तो भी वह जनसंख्या बढ़ाता ही चला जाता है। आगे संयम न बरता गया तो आस्ट्रेलियाई खरगोशों का सा मुशल-पर्व मनुष्यों में चल पड़े इसका कुछ ठिकाना नहीं।
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समाज व्यवस्था को लेकर विश्व में कई मतवादों का प्रणयन हुआ है। व्यक्तिवाद, समूहवाद, समष्टिवाद, अराजकतावाद, राजतन्त्र, प्रजातन्त्र, समाजवाद, साम्यवाद आदि अनेकानेक विचारधाराओं का उद्भव और प्रचार हुआ। उपायों और व्यवस्था नियमों की दृष्टि से ये सब भिन्न-भिन्न हैं, पर सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो इन सबका लक्ष्य एक ही रहा है कि समाज में व्यक्ति सुखी रहे, सब लोग समान रूप से समुन्नति करें तथा कोई किसी के अधिकारों का वंचन न करे भिन्न-भिन्न मार्गों से एक लक्ष्य तक पहुँचने की बात तो ठीक है, पर इन मार्गों को लेकर संसार में जो संघर्ष होते आये हैं, वे ही लक्ष्य तक पहुँचने में प्रमुख रूप से बाधक बन जाते हैं।
इन समस्त मतवादों से अलग रहते हुए भारतीय संस्कृति ने आदर्श समाज का जो स्वरूप रखा है वह हजारों साल पुराना होने के बाद भी आज भी इतना नवीन है कि विभिन्न मतवादों के बीच होते रहने वाले संघर्षों को देखकर आशा की दृष्टि वहीं जा कर टिकती है। वैदिक विचारधारा किसी समुदाय विशेष की हितकामना को ही प्रधानता न देते हुए विश्वभर के कल्याण की कामना करती है तथा एक दूसरे का परस्पर सहयोग द्वारा हित साधन का उपदेश देती है-
ज्याय रचन्तश्चित्तिनो मा वियौष्ट सराधयन्तः सुधुरा श्चरन्तः। अन्यो वल्गु वदन्त एत सूधी चीनान् वः संमनस स्वृणोभिः॥
- अथर्व 3।30।5
अर्थ-हे मनुष्यों! तुम लोग एक दूसरे से बड़े और गुणों में श्रेष्ठ होकर भी समान चित्त होकर समान कार्य का साधन करते हुए एक ही प्रकार के भार उठाते हुए अथवा समान रूप से एक ही केन्द्र में विचरण करते हुए कभी एक दूसरे से विलग न होना। परस्पर एक दूसरे के प्रति मधुरभाषी होकर एक दूसरे का सहयोग करो।
इस मन्त्र में सूत्र रूप में विश्वशान्ति के लिए आवश्यक सभी स्तर की सतर्कताओं और मर्यादाओं का समावेश हो गया है। कलह, लड़ाई-झगड़ा, अशान्ति और इन्हीं घटनाओं के बड़े आकार के युद्ध तभी उत्पन्न होते हैं जबकि एक दूसरे को एक दूसरे से हानि हो या हितों पर आघात पहुँच रहा हो। वेदों ने विभिन्न आचार मर्यादायें स्थापित कर एक दूसरे के लिए हितैषी बनने तथा उन्नति करने का निर्देश दिया-
प्रति पन्थाम पद्म महि स्वस्ति गामनेहसम्। येन विश्वाः परिद्विषो वृणामि विन्दतेवसु।
(यजु0 4।29)
अर्थ-हम लोग सुख-पूर्वक उत्तम लक्ष्य तक पहुँचाने वाले, उपद्रवों से रहित उस मार्ग पर चला करें जिससे मनुष्य सब दोषों को दूर करके नाना प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त करते।
स्वस्ति पन्थामनु चरेम सूर्या चन्द्रमसिव। पुनर्ददसाधता जानता संमेमहि॥
ऋ॰ 5।51।15
अर्थ- हम लोग सूर्य और चन्द्रमा के समान सदा कल्याणमय मार्ग पर चलें और दानशील, अहिंसक तथा ज्ञानी लोगों की संगति करें।
तथा दुष्ट दुराचारी व्यक्तियों के पास तक न बैठने की हिदायत की गयी है-
मैतं पन्थामनुगा भीम एष येन पूर्व नेयथ तं व्रवीमि। तम एतत् पुरुष मा प्रत्दा भयं परस्तादभयं तो अर्थाक्।
- अथर्व 8।1।10
“हे पुरुष ! इस खोटे और टेढ़े मार्ग का अनुसरण मत कर। यह मार्ग बहुत भयंकर है। जिस मार्ग पर तू पहले कभी नहीं चला उस अधर्म मार्ग के सम्बन्ध में कहता हूँ कि वह अन्धकारपूर्ण है। अतः कुपथ को छोड़कर सुपथ में चल तथा कुमार्गगामियों के पास में बैठ भी मत।”
सदाचार परायण व्यक्तिगत जीवन के साथ आदर्श गार्हस्थ्य जीवन के उपदेष्टा वेद के ऋषि ने गृहस्थ ही नहीं सद्गृहस्थ बनने की भी शिक्षा दी है। इस तरह के अनेक मन्त्र वेदों में है। पाणिग्रहण संस्कार में कन्या का पिता वर से कहता है-
एषा ते राजन् कन्या वधूर्नि धूयतां यम। स मातुर्वध्यतां गृहेऽथो मातुरथो पितुः॥
- अथर्व 1।14।2
“हे ब्रह्मचारी! ज्ञान और ब्रह्मवर्चस् तेज से प्रकाशमान वर यह कन्या तेरी वधू रूप होकर गृहस्थ का आनन्द करे। वह कन्या नयी माता (सास), नये भाई (देवर) तथा नये पिता (ससुर) के गृहस्थ बन्धन में बँधे।”
दाम्पत्य-जीवन में सुख और सौजन्य के अवतरणार्थ यह भी आवश्यक समझा गया कि दाम्पत्य सम्बन्धों को स्निग्ध और मधुर बनाये रखने के लिए लड़की-लड़के एक दूसरे से सहमत हों-
यमगन् पतिकामा जनिकोऽहमागमम्। अश्वः कनिक्रदद् यथा भगेनाहं सहागमम्॥
(अथर्व 2।30।5)
अर्थ-यह इच्छित स्त्री पति कामना से मेरे पास आ गयी है। हम दोनों ने एक दूसरे को पसन्द किया है। मैं भी उसकी कामना करता हुआ उसे प्राप्त हो गया। मैं धन के साथ इसके पास आया हूँ। जैसे श्रेष्ठ अश्व अपनी मादा के पास जाता है।
व्यक्तिगत रूप से सदाचार पारिवारिक जीवन में स्नेह सद्भाव में भी महत्वपूर्ण निर्देश दिये हैं। भारतीय समाज की वर्ण व्यवस्था तो प्रसिद्ध है ही इस सम्बन्ध में मुख्य भ्राँति यह फैली है कि वर्ण व्यवस्था का आधार जन्म से समझा जाय अथवा कर्म से। वेद में इस तरह के अनेक प्रसंग आये हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि वर्ण व्यवस्था जन्म से नहीं कर्म और स्वभाव से ही निर्धारित की गयी थी। यजुर्वेद के 31 वें अध्याय में कहा गया है :-
ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद बाहू राजन्य कृतः। उरु तदस्य यद्वैश्यं पद्भायम् शूद्रोऽजायत॥
इस स्पष्टीकरण के बाद जन्म से वर्ण की मान्यता बेमानी हो जाती है। समाज व्यवस्था का आर्थिक आधार वेदों में कई स्थानों पर स्पष्ट किया गया है। इसे वेदों का दूसरा प्रमुख प्रकरण कहा जाता है। धनवानों को अपने व्यापार में लगाने का निर्देश देते हुए वेद कहते हैं-
इन्हमहं वणिजं चोदयामि स न एतु पुरएतानोऽस्तु नुदम्म राति परिपत्थिनं मृग स इशानों धनदाअस्तु मह्यं।
(अथर्व 3।15।1)
अर्थ- मैं इन्द्र की वाणिज्य कर्त्ता के भाव से स्तुति करता हूँ। वह इन्द्र यहाँ आगमन करें और वाणिज्य की हिंसा करने वाले शत्रु, मार्ग रोकने वाले दस्यु, तथा व्याघ्र आदि को नष्ट करते हुए अग्रसर हों। वे इन्द्र मुझे व्यापार से होने वाले लाभ के रूप में धन प्रदान करें।’
इस लाभ से सबकी उन्नति चाही गयी है-
इदं हव्यं सविदामौ जुपेथाँ, शनुं नो अस्तु चरित मुत्थितं च॥
‘‘तुम मेरी हवि (लाभ को सब लोगों में बाँट देने के रूप में यज्ञीय भावना) ग्रहण करो तथा मूलधन से बढ़ा हुआ लाभ का धन हम सब लोगों को सुखी, सम्पन्न और सन्तुष्ट करें।’’
समता मूलक समाज की रचना का लक्ष्य भी सर्वप्रथम वेदों में ही दिखाई देता है। कहा गया है-
समानी प्रया सह वोऽन्न भागः समाने यो क्त्रे सह वो युनज्मि। सम्यज्योऽग्नि सपर्यतारा नाभि मिवातिः॥
(अथर्व 3।30।6)
अर्थात्- तुम्हारा अन्न-पानी का उपभोग एक-सा हो। मैं तुम्हें प्रेम सूत्र के साथ-साथ बाँधता हूँ। जैसे पहिये के अरे नाभि के आश्रित होते हैं वैसे ही तुम सब एक ही सूत्र में आबद्ध रहो और ईश्वर की सेवा करो।
सध्रा चोनान वः समंसस्कृणो भ्यो कश्नुष्टी न्संवनेन सर्वांन्। देवा इवामृतं रक्षमाणाः सायंप्रातः सौमनसों वो अस्तु (7)
‘मैं तुम्हें समान मन वाले बनाकर एक से कार्य में प्रवृत्त करता हूँ। स्वर्ग में अमृत की एक मत से रक्षा करने वाले इन्द्रादि देवताओं के मन जैसे श्रेष्ठ रहते हैं वैसे ही प्रातः सायं तुम्हारा मन सुन्दर, श्रेष्ठ और एक रहे।’
अलग-अलग चौके, चूल्हे में होने वाले समय और श्रम के अपव्यय को रोकते हुए कहा गया है-
सहभक्षा-स्याम्।
अर्थ- हम सब एक साथ भोजन करने वाले हों। साथ ही समानाधिकार के सिद्धांत का भी समर्थन किया गया है-
समानो अध्वा प्रवदता मनुष्यदे।(ऋ॰ 2।13।1)
अर्थ-सब चलने वालों का मार्ग पर समान अधिकार है।
केवल व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए ही नियोजित करने वालों की भी निन्दा की गयी है-
मोद्यमन्नं विन्दते अप्रचेतः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य। नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी॥
-ऋ॰ 10।117।6
अर्थ- जो व्यक्ति न तो ईश्वर के मार्ग पर दान देता है, न अपने राष्ट्र की वृद्धि के लिए खर्च करता है और न अपने मित्रों का पालन-पोषण करता है, ऐसा व्यक्ति व्यर्थ ही धन का संचय करता है। केवल मात्र अपना ही पोषण करने वाला व्यक्ति पाप ही खाता है और निस्सन्देह वह अन्न और धन उसके अधःपतन का कारण बनता है।
इस प्रकार वेदों ने आदिकाल से ही समता मूलक समाज की रचना का आधार रख दिया है और वह भी मनुष्य के नैतिक विकास द्वारा। इन दिनों जब सर्वत्र साम्यवाद के आतंकवादी स्वरूप की निन्दा की जा रही है, विचारशील वर्ग उसे व्यर्थ बता रहा है व्यक्ति के नैतिक विकास द्वारा समानतावादी समाज की ओर ही विश्व हो उन्मुख होना पड़ेगा।
वाशिंगटन की एक बहुत ऊँची इमारत की तीसवीं मंजिल पर हार्नवे कंपनी का बड़ा दफ्तर था। उस दिन लिफ्ट खराब हो गई तो सीढ़ियों से चढ़कर ऊपर पहुँचने के अतिरिक्त कर्मचारियों के पास और कोई उपाय न रहा। तीस मंजिल चढ़ना समय साध्य भी और कष्ट साध्य भी। दो चढ़ते हुए व्यक्तियों ने एक-एक चुटकुला सुनाते चलने का निश्चय किया।
सब बड़े लोग सुनते जा रहे थे, एक छोटा चपरासी कुछ कहने के लिए जैसे ही मुँह खोलता वैसे ही बड़े लोग उसे डपट कर चुप कर देते। कई बार उसने कुछ सुनाना चाहा, पर उसे बोलने ही नहीं दिया गया।
उन्तीसवीं मंजिल तक पहुँचने पर जब सब के चुटकुले खत्म हो गये तो बड़े बाबू ने चपरासी से कहा-कह भाई, तू भी कह।
उसने कहा दफ्तर की चाबी लाना आप भूल ही गये हैं। आपने अपनी सेफ में से उसे निकाला ही कब था। मैं यही याद दिलाना चाहता था। आपको, फिर नीचे जाने और ऊपर आने का कष्ट सहना पड़ेगा।
छोटे समझे जाने वाले की बात सदा उपेक्षणीय ही नहीं होती। उनमें भी कई बार ऐसे सारगर्भित तत्व रहते हैं, जिनको अनसुना करके तथाकथित बड़े आदमियों को घाटे में ही रहना पड़ता है।
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महायोगी उत्तंक कहीं दूर देश का पर्यटन करने के लिए जा रहे थे। वहाँ तक पहुँचने के लिए मरुभूमि में से होकर गुजरना पड़ता था। पास में जितना जल लेकर चले थे वह अब समाप्त हो चुका था। मरुस्थली गर्मी, आग की भाँति जलती, धूप अँगारे बरसाती सूरज की किरणें - इन सबने उन्हें बेहाल कर दिया था। जैसा कि वे सोचकर चले थे उससे अधिक बार-बार पीना पड़ा। अतः मार्ग पूरा होने से पहले ही उनके पास का जल समाप्त हो गया।
बड़ी तेज प्यास लग रही थी। लगता था कि अब पानी नहीं मिला तो प्राण ही निकल जायेंगे और ऐसे समय में उन्हें भगवान कृष्ण की याद आई जिन्होंने उन्हें इच्छित वस्तु हर कहीं प्राप्त होने का वरदान दिया था।
इस वरदान की भी एक लम्बी कहानी है।
महाभारत समाप्त होने के बाद श्रीकृष्ण जब हस्तिनापुर से द्वारका लौट रहे थे तो मार्ग में योगसाधना रत उत्तंक दिखाई दिये। जब महाभारत की पृष्ठभूमि बन ही रही थी तभी उत्तंक ने संन्यास धारण कर लिया था। अतः कृष्ण भगवान का जब उनसे साक्षात् हुआ तो उत्तंक ने कौरवों और पाण्डवों के विग्रह का समाचार पूछा। श्रीकृष्ण ने आद्योपान्त सारा विवरण कह सुनाया।
निष्काम-साधना में संरत उत्तंक ने कहा-‘आपका दर्शन कर लेने के बाद भी और कौन-सा वरदान चाहिए?’
श्रीकृष्ण उन्हें आग्रहपूर्वक मनोवाँछित वर माँगने के लिए कहते रहे। अन्ततः उन्होंने कहा-‘मुझे कभी किसी चीज का अभाव अनुभव न हो।’
इसमें संशोधन करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा-‘भाव और अभाव की अनुभूति तो हर मानवी चेतना की प्रकृति है। हाँ, मैं आपको यह वरदान अवश्य देता हूँ कि आपको जब भी किसी वस्तु की आवश्यकता प्रतीत होगी तो वह आवश्यकता पूरी हो जायेगी।’
उत्तंक ने ‘जैसी आपकी इच्छा’ कहकर उसे स्वीकार कर लिया। इस बात को वर्षों बीत गये और आज वरदान के उपयोग का समय आया। तो महात्मा उत्तंक ने वासुदेव कृष्ण का स्मरण करते हुए जल की कामना की।’
तभी उन्हें एक चाण्डाल आता दिखाई दिया। वह उत्तंक के पास आकर रुका और बोला कि- ‘आप बड़े प्यासे दिखाई देते हैं महाराज, मेरे पास पर्याप्त जल है इसे ग्रहण कीजिए।’
तपस्वी उत्तंक के मन में ऊँच-नीच का विचार आया और वे सोचने लगे कि चाण्डाल के हाथ का जल लेने से तो अच्छा है प्यासे ही मर जाना। उधर चाण्डाल बार-बार आग्रह कर रहा था। उत्तंक ने उसे दुत्कार कर दूर भगा दिया।
चाण्डाल चला गया। तभी मन्दस्मित मुस्कान लिए श्रीकृष्ण प्रकट हुए। उत्तंक ने उन्हें उलाहना दिया। तब श्रीकृष्ण जी बोले-‘महात्मन्’ ! जिसे आप चाण्डाल समझ रहे थे वह स्वयं देवराज इन्द्र थे और मेरे आग्रह पर वे आपको अमृतपान कराने के लिए आये थे। पहले तो वे तैयार ही नहीं हो रहे थे, पर जब मैंने बार-बार आग्रह किया तो उन्होंने सशर्त मेरा आग्रह माना। वह शर्त यह थी कि यदि आपके हृदय में समता, निर्मल प्रेम, सब प्राणियों में भगवद्भाव हो तो ही आप अमृतपान के योग्य होंगे और इसी कारण वे चाण्डाल के वेश में आपकी समता बुद्धि परखने के लिए आये थे।’
इस ऊँच-नीच की विडम्बना के कारण अमृत से वंचित रह जाने पर उत्तंक को बड़ा पश्चाताप हुआ और वे पुनः तपस्या के लिए चल दिए।
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सुकरात आजीवन नैतिक आदर्शों के दृढ़ अनुयायी रहे और उनकी चरित्र-निष्ठा तथा सदाचार परायणता भी असंदिग्ध रही। परन्तु उनकी मृत्यु जबरन विष पिलाये जाने के कारण हुई। ईसा मसीह जीवन भर लोगों को नैतिकता और सदाचार का शिक्षण देते रहे। कई दुष्ट प्रकृति के लोगों को उन्होंने अनुचित मार्ग से हटाया और सत्कर्म में लगाने की सफलता प्राप्त की। इसे उनकी व्यापक करुणा और लोकमंगल की भावना ही कही जायेगी। परन्तु आजीवन श्रेष्ठ कर्मों में निरत रहते हुए भी उन्हें फाँसी पर लटकाया गया। शंकराचार्य 28-30 वर्ष की आयु में भगन्दर रोग के कारण काल कवलित हुए। रामकृष्ण परमहंस गले में कैंसर से मरे। विवेकानन्द की मृत्यु भी छोटी आयु में ही भयंकर रोग से ग्रस्त हो जाने के कारण हुई। श्रद्धानन्द और महात्मा गाँधी की मृत्यु गोली का शिकार बनकर हुई।
इन तथ्यों को देखकर सन्देह होने लगता है कि जब सुख-शाँति का जीवन सन्मार्ग पर चलते हुए ही व्यतीत किया जा सकता है तो जीवन भर सन्मार्ग पर चलते रहने के बावजूद भी समाज जिन्हें आदर्श पुरुष मानता है वे दुःखी और क्लान्त क्यों होते हैं ? भारतीय दर्शन इसके पीछे पूर्व जन्म के पापों को कारण रूप में देखता है।
पिछले जन्म के कर्म परिणाम इस जीवन में प्राप्त होने की बात को गलत सिद्ध करते हुए कहा गया है कि हम आग को छूते हैं तो तत्काल जलते हैं, पानी में कूदते हैं तो तत्काल डूबते हैं और शिकंजे में हाथ फँसाते हैं तो तुरन्त हमारा हाथ दब जाता है। ये भी कर्म हैं और इनका परिणाम तुरन्त ही मिल जाता है तो पिछले जन्मों का कर्मफल इस जीवन में मिलने की बात कहाँ तक सही सिद्ध होती है।
बात ठीक भी लगती है क्योंकि कर्मों का फल इस जन्म का अगले जन्म में मिलना हो तो उसका उद्देश्य यह होना चाहिए कि हम उससे कुछ सीखें और सीखने के लिए आवश्यक है कि हमारी समझ का कुछ विकास हो चुका हो। परन्तु बच्चा जो न कुछ जानता है और न ही किसी प्रौढ़ व्यक्ति की तरह कुछ अनुभव कर पाता है तो उसे इस तरह के कष्ट और यातनाएँ क्यों मिलती हैं ? इस जन्म की सत्प्रवृत्तियाँ पिछले जन्म के सुसंस्कारों से ही तो उद्भूत होती हैं। इसका अर्थ है कि अब जो व्यक्ति सदाचारी दिखाई देता है वह पिछले जन्मों में एकदम ही दुराचारी तो नहीं रहा होगा।
विपरीत इसके कि अच्छे लोग सुख पायें, बुरे और दुराचारी व्यक्तियों को उनकी अपेक्षा अधिक सुखी, साधन और सुविधा सम्पन्न देखा जाता है। चोर, डाकुओं और बेईमान भ्रष्टाचारियों को सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक सुखी पाया जाता है। इसका क्या कारण है?
अच्छे लोग दुःखी क्यों पाये जाते हैं? इस प्रश्न का उत्तर पाने से पूर्व उपरोक्त तर्कों पर विचार किया जाना आवश्यक है। जैसा कि कहा गया है आग छूने का प्रतिफल तुरन्त जल जाने के रूप में मिलता है, उसी प्रकार कर्मों का परिणाम भी तत्काल ही मिल जाना चाहिए। कर्म का फल तत्काल ही मिल तो जाता है परन्तु यह कोई जरूरी नहीं है कि वह तत्काल मिल ही जाय। आग छूने के बाद भी बहुत देर तक जलन और काफी समय तक घाव बना रहता है। यहाँ कर्म परिणाम अपना निरन्तर चलने वाला प्रभाव उत्पन्न करता है। कहीं बीज डालते ही कोई वह तुरन्त अंकुरित नहीं हो जाता न ही फल-फूल देने लगता है। चलने का परिणाम भी कदम उठाते ही मंजिल पर पहुँचने के रूप में तत्काल नहीं मिल जाता। विद्यार्थी पढ़ते समय अपने कार्य को भले ही नीरस और बेतुका समझे परन्तु अर्जित की गई शिक्षा समय पर ही अपने सत्परिणाम प्रस्तुत करती है। दण्ड-बैठक शुरू करते ही कोई हनुमान या भीम जैसा पहलवान नहीं बन जाता और काफी समय तक अपथ्य खाते रहने या अनुपयुक्त आहार करने के कारण शरीर भी कुछ दिनों बाद ही जर्जर होता है। आग छूकर तुरन्त जलने की बात अपनी जगह पर ठीक है और बीज बोने के बाद समय लेकर उसके अंकुरित होने तथा पुष्प पल्लव देने का भी अपना महत्व है।
जब यह कहा जाता है कि कर्मों का फल प्रकृति को उस समय देना चाहिए जबकि व्यक्ति उससे कुछ सीख ग्रहण करे या उससे सम्हले। यहाँ कुछ प्रकृति के नियमों को जान लेना चाहिए। प्रकृति अपने न्याय और नियमों में रत्ती भर भी रियायत नहीं करती। पागल हो या विद्वान किसी ऊँचाई से कोई भी गिरे तो चोट दोनों को ही बराबर लगती है। अनुभव दोनों को भले ही कम या ज्यादा हो सकता है। इस सम्बन्ध में बाइबल ने स्पष्ट करते हुए लिखा है-परमेश्वर प्रकृति के द्वारा किसी भी व्यक्ति का लिहाज नहीं करता। उसका सूर्य पापी और पुण्यात्मा दोनों के लिए तपता है, उसका बादल न्यायी और अन्यायी दोनों के लिए समान रूप से बरसता है। अर्थात् कारण और कार्य का सिद्धान्त बच्चे हों या बूढ़े दोनों पर समान रूप से लागू होता है। बुरे कार्यों का दण्ड मात्र इसी उद्देश्य से नहीं मिलता कि उससे कोई सीख ले। सीख ली जा सकती है इस बात का अपना महत्व है, परन्तु प्रकृति एक उचित और नियत अवधि में कार्यों के परिणाम प्रस्तुत करती है।
यही बात रोग, मृत्यु और कष्ट-कठिनाइयों के सम्बन्ध में भी लागू होती है कष्ट सन्त हो या असन्त दोनों को निसर्ग के नियम तोड़ने पर मिलते हैं। छूत की बीमारियों का प्रभाव अच्छे और बुरे सभी व्यक्तियों को मिलता है। स्वास्थ्य के नियमों को तोड़ने से अच्छा व्यक्ति भी उसी प्रकार बीमार हो जाता है-जिस प्रकार कि बुरा आदमी। ईसा, सुकरात और गाँधी को अपनी उपलब्धियों का मूल्य प्राण देकर चुकाना पड़ा। प्रकृति उचित मूल्य लेकर ही कुछ उपलब्धियाँ देती हैं और प्राणों के बलिदान का यही अर्थ है कि लोग यह जान सकें कि जिन आदर्शों के लिए वे नरपुँगव जीये वे जीवन की तुलना में भी अधिक मूल्यवान हैं। जन-सामान्य भले ही इसे घाटे का सौदा समझे, परन्तु जो समझ पाते हैं वे उन आदर्शों को प्राप्त करके ही रहते हैं।
अच्छे लोगों को अच्छे काम करते हुए भी दुःख पाने का एक कारण यह है कि उन्हें वे ही अवस्थाएँ रहने को मिलती हैं जो अन्य लोगों को प्राप्त हैं। जैसे वातावरण या मौसम का ही प्रभाव लें। शरीर की क्षमता अथवा अशक्तता के कारण उन्हें भी मौसम की वे ही प्रतिकूलताएँ सहनी पड़ती हैं, जो उसी स्थिति के बुरे व्यक्ति को सहनी पड़ती हैं। लेकिन इसमें दुःखानुभूति की मात्रा कम या ज्यादा हो सकती है। बुरे आदमी कष्ट-कठिनाइयों और विपत्तियों को रो-धोकर सहन करते हैं वे ही या उसी स्तर की कठिनाइयाँ अच्छे आदमी धैर्य और प्रसन्नतापूर्वक खुशी-खुशी उठा लेते हैं।
अन्य अवस्थाओं में असफलता का एक कारण उसके नियमों और तौर-तरीकों से अनभिज्ञता है। ईमानदारी बरतने वाला व्यक्ति भी असफल हो सकता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि ईमानदारी कोई गलत गुण है, वरन् सफलता के लिए ईमानदारी के साथ अन्य सद्गुणों की भी आवश्यकता है। जैसे परिश्रम, पुरुषार्थ और संगठित शक्तियाँ इन गुणों के कारण जहाँ बुरे लोग अपने गलत कार्यों में भी सफल हो जाते हैं वहीं अच्छे लोगों को आलस्य, सुस्ती, प्रमाद और विश्रृंखलताओं के कारण दुःखी क्लान्त तथा असफल हो जाना पड़ता है और विडम्बना यह बन जाती है कि ईमानदार लोग भूखे मरते हैं का फतवा देने लगते हैं। जबकि सचाई कुछ और ही होती है।
अच्छे लोगों को असफल, दुःखी या कष्ट झेलते समय हमें तुरन्त यह फैसला नहीं दे देना चाहिए कि अच्छाई का जमाना नहीं रहा। सफलता, सुख, स्वास्थ्य और सम्पन्नता आदि उपलब्धियाँ एक वैज्ञानिक रीति से काम करते हुए ही अर्जित की जा सकती हैं। इनमें चूक होते ही प्रकृति का न्याय दण्ड अनिवार्य रूप से मिलता है-जिसमें बुरे व्यक्ति भी दुःख पाते हैं और अच्छे भी।
यस्य न ज्ञायते वीर्यं न कुलं न विचेष्टितम्। न तेन संगति कुर्यादित्युवाच बृहस्पतिः॥
जिसका पराक्रम, कुल और चेष्टा न जानते हों उसके साथ संगति कभी नहीं करनी चाहिए ऐसा परम मनीषी बृहस्पति ने कहा है।
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समर्थ गुरु रामदास ने कहा-‘‘संसार भर में हमारे मित्र मौजूद हैं और सारे संसार में शत्रु भी। परन्तु उन्हें प्राप्त करने की कुंजी जिह्वा के कपाट में बन्द पड़ी है।’’ इस कथन का यही अर्थ है कि व्यक्ति का परिचय, संपर्क और प्रभाव क्षेत्र उसकी वाक्पटुता पर निर्भर है। जो लोग वार्तालाप में कुशल होते हैं वे हर जगह अपने मित्र खोज लेते हैं, अनजान लोगों को प्रथम मुलाकात में ही अपना बना लेते हैं और अपना प्रयोजन पूरा कर लेते हैं। महान कार्यों और बड़े उद्देश्यों के संसार क्षेत्र में उतरने वाले ईसा और बुद्ध से गाँधी और विवेकानन्द तक केवल इसी शक्ति के सहारे अपने अभियान में सफल हुए हैं। महान कार्यों के लिए ही नहीं बातचीत करने में चतुर और चालाक ठग जालसाज लोग भी अनजान, अपरिचितों से सम्पर्क साधकर उनके हृदय में अपना स्थान बनाकर अपना मतलब सिद्ध कर लेते हैं और चलते बनते हैं। हालाँकि उनकी करतूतें, औचित्य और न्याय की दृष्टि से अवाँछनीय तथा अपराधपूर्ण ही हैं। पर इतना तो मानना ही होगा कि वे अपनी इसी क्षमता का उपयोग कर इसमें सफल हो जाते हैं।
व्यावसायिक क्षेत्रों में भी जीभ की कमाई खाने वाले लोगों का एक स्वतन्त्र वर्ग है। वक्ता, गायक, प्रचारक से लेकर औद्योगिक व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के अभिकर्त्ता और प्रतिनिधि तक अपनी वाक्चातुरी के बल पर जिन व्यक्तियों से सम्पर्क साधते हैं उनसे अपनी बात मनवा लेते हैं। इस वर्ग में वाणी ही एक ऐसा साधन है जिसके बल पर नये से नया व्यक्ति बिना कोई अतिरिक्त पूँजी लगाये अपने व्यवसाय में सफल हो जाता है। व्यापारियों और दुकानदारों के यहाँ ऐसा प्रायः देखने में आता है कि ग्राहक उनके पास किसी वस्तु का नमूना देखने और भाव जानने के लिए जाता है और माल खरीदकर ही लौटता है।
जब वाक्-कौशल के बल पर व्यापारिक और व्यावसायिक क्षेत्र में सफल हो जाते हैं तो क्या कारण है कि कोई व्यक्ति ऐसी शिकायत करे कि मेरी बात कोई मानता ही नहीं, मेरा कोई मित्र नहीं, जिससे बात करता हूँ वही मेरा शत्रु बन जाता है। इस शिकायत का अधिकाँश कारण व्यक्ति का बातचीत करने का ढंग है। वह जिससे भी बात करता है कहीं न कहीं ऐसी भूल कर जाता है जो श्रोता के अन्तःकरण को चोट कर जाती है और वह उसके प्रति कोई अच्छी धारणा नहीं कर पाता।
मित्र बनाने में ही नहीं, कर्मक्षेत्र में सफल होने तथा अन्य व्यक्तियों का सहयोग प्राप्त करने के लिए व्यक्ति का व्यवहार-कुशल होना आवश्यक है और व्यवहार-कुशलता का प्राथमिक सोपान है व्यक्ति का वार्तालाप में कुशल होना। इस सम्बन्ध में विख्यात विचारक स्वेट मार्डेन ने कहा है-‘‘यदि आप अपनी बात साफ ढंग से नपे-तुले शब्दों में तथा सधी-बंधी आवाज में व्यक्त करके सुनने वाले को प्रभावित कर सकते हैं तो समझ लीजिए कि आपके पास एक ऐसा हथियार है जिससे सफलता आपकी चरणदासी बन सकती है।’’
श्रेष्ठ वाक्पटु होना, लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करना तथा उनसे सहयोग प्राप्त करने के लिए अपनी बात-चीत में प्रभावोत्पादकता उत्पन्न करना एक उपलब्धि है, जो इन्हीं प्रयोजनों के लिए अर्जित और विकसित की गई, अन्य उपलब्धियों से कहीं श्रेष्ठ है। वाक्चातुर्य के गुण से सम्पन्न, अपने सम्भाषण द्वारा सम्पर्क में आये जनों को प्रभावित करने वाली वाक्शक्ति से सम्पन्न वे व्यक्ति जो अपने मन्तव्य को रुचिकर ढंग से सामने वाले के सम्मुख स्पष्ट कर सकें-उन व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक सहयोग प्राप्त कर सकते हैं जो इन गुणों से रहित हों।
लेकिन देखा जाता है कि अधिकाँश व्यक्ति जिनमें पढ़े-लिखें और सुशिक्षित व्यक्ति भी हैं वह अपनी वाणी में प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाते जो कि एक अनपढ़ किन्तु चुस्त व्यक्ति कर लेता है। इस कारण उन्हें प्रायः सफलताओं के लिए भी ठोकरें खानी पड़ती हैं और अपने वांछित लक्ष्य की तुलना में आत्यन्तिक न्यून सफलता मिलती है। मानते हैं कि शिक्षा, योग्यता, प्रतिभा और ज्ञान का अपना महत्व और अपना स्थान है, पर व्यक्ति को व्यवहार क्षेत्र में सफल होने के लिए वाक्पटुता के अभाव में ये विशेषताएँ भी लूली-लँगड़ी सिद्ध होंगी। क्योंकि जिन व्यक्तियों को अपनी इस विशिष्टता से परिचित कराना है उनसे परिचय का माध्यम तो बातचीत ही है न और यह भी सच है कि इन गुणों से रहित व्यक्ति जो सम्भाषण को थोड़ा भी प्रभावशाली बना लेते हैं, उन्हीं क्षेत्रों में जिनमें कि उपरोक्त जन-कार्य करना चाहते हैं उनसे आगे निकल जाते हैं।
यहाँ कहने का आशय यह नहीं हैं कि सफलता की सारी सम्भावना केवल वाक्चातुरी पर ही निर्भर है। लेकिन कहा यह जा रहा है कि शिक्षा, योग्यता और प्रतिभा के साथ-साथ व्यक्ति का व्यवहार-कुशल होना भी आवश्यक है और व्यवहार-कुशलता के लिए वाक्पटुता अनिवार्यतः प्रथम है। वाक्पटुता क्यों आवश्यक है इसके लिए एक विद्वान की यह उक्ति उल्लेखनीय है-‘‘आप भले ही अच्छे गायक हों लेकिन हो सकता है कि आपको सारे संसार की यात्रा कर लेने के बाद भी अपनी कला का प्रदर्शन करने का अवसर न मिले। आप कहीं भी जायँ किसी भी समाज में रहें, जीवन और प्रतिभा के क्षेत्र में आपकी स्थिति कितनी भी अच्छी क्यों न रहे, फिर भी आपको अपनी कला के प्रदर्शन का अवसर बातचीत के द्वारा ही प्राप्त करना पड़ेगा।’’
वास्तव में हमारी उपलब्धियों और विशेषताओं की संख्या चाहे कितनी भी क्यों न हो लेकिन तब तक हम अपनी विभूतियों का परिचय किसी दूसरे व्यक्ति को नहीं दे सकते जब तक कि हमें भली-भाँति बातचीत करने की कला न आती हो। वस्तुतः बातचीत एक कला है अन्यथा बातें तो गूँगे-बहरों को छोड़कर सभी कोई करता और सुनता है। लेकिन कौन किसका किस प्रकार का प्रभाव ग्रहण करता है ? इसका आकलन किया जाय तो यही ज्ञात होगा कि कई लोगों की बातें ऊबा देने वाली या दूसरों का मन खट्टा कर देने वाली अथवा हृदय को चोट पहुँचाने वाली होती हैं। कई व्यक्तियों की बातें सुनकर ऐसा लगता है कि उसकी बात का न सिर है न पैर। न तो वह अपने शब्दों का प्रयोग समझ-बूझकर करता है जिससे कि श्रोता प्रभावित हो सके और न ही वह यह जानकर बातें करता है कि किस अवसर पर कैसी बात करना है ? क्योंकि उसे इस सम्बन्ध में कोई ज्ञान ही नहीं है, फलतः उसकी बातें बोरियत लाने वाली और अप्रासंगिक ही हो जाती हैं।
संभाषण में कुछ व्यक्ति इतने सतर्क और सावधान रहते हैं कि उन्हें सब कुछ ज्ञान रहता है। किस अवसर पर कैसी बात करनी चाहिए ? सामने वाला हमारी बातों में रुचि ले रहा है अथवा बोर हो रहा है? भाषा में कहीं उथले, दिखावटी और जबरदस्ती ठूँसी गई वाक्यावली तो नहीं आ रही है ? ऐसी ही अन्य आवश्यक बातों का ध्यान रखकर जो लोग बातें करते हैं उनकी बातें प्रभावोत्पादक हो जाती हैं।
वाक्चातुर्य न तो किताबें पढ़ने से आता है और न किसी के उपदेश सुनकर। अन्तरंग विषय होने से उसकी प्राप्ति स्वविवेक से ही होती है। फिर भी कुछ ऐसे सूत्र हैं जिनके आधार पर स्वविवेक को जागृत किया जा सकता है और अनुभव द्वारा वाक्पटुता अर्जित की जा सकती है। वाक्पटुता के लिए बेझिझक होकर बात करना, सोच-समझकर अपना पक्ष सन्तुलित ढंग से सामने वाले व्यक्ति के समक्ष रखना, भाषा में मधुरता, शालीनता और सौहार्द्रता का समावेश करना, वाक्यों और शब्दों का सही उच्चारण करना, अपनी बात संक्षिप्त और अर्थपूर्ण बनाना, दूसरों की बात भी उसी ध्यान से सुनना जैसी कि हम अपेक्षा रखते हैं दूसरे ध्यान से हमारी बात सुनें, उनकी रुचि का ध्यान रखना आदि कुछ ऐसी सावधानियाँ हैं जिनका समावेश हम अपने वार्तालाप में कर सकें तो व्यवहार-कुशलता प्राप्त करने की ओर अग्रसर हो जाते हैं।
वार्तालाप में जिन बातों का सर्वाधिक ध्यान रखना आवश्यक है-उनमें प्रथम है हमारी भाषा शिष्ट, मृदु और रोचक हो। शिष्ट भाषा का अर्थ है कि व्यक्ति ऐसे शब्दों का प्रयोग न करे जो अभद्र, गन्दे और भद्दे हों। उदाहरण के लिए कई व्यक्तियों की आदत रहती है कि वे एक बात में बार-बार अपशब्दों का प्रयोग करते हैं।
यह आदत उनके स्वभाव का अंग-सी बन जाती है। अनेक लोग जान-बूझकर अश्लील वाक्यों का भी प्रयोग कर जाते हैं। ऐसा करते हुए वे ये भले ही मानें कि जिनसे हम बात कर रहे हैं वह हँसेगा और माना कि श्रोता हँस भी ले। परन्तु इससे बातचीत में छिछलापन आ जाता है। अपशब्दों और अश्लील वाक्यों के अधिक प्रयोग से वार्तालाप के विषय की स्वाभाविक गम्भीरता समाप्त हो जाती है और उस विषय में छेड़ी गई चर्चा का अपेक्षित परिणाम नहीं होता। ‘शिष्टाचार’ और ‘सभ्याचरण’ का तकाजा तो यह है कि हँसी-मजाक भी अशालीन और अपभाषा में न की जाय। क्योंकि धीरे-धीरे यही प्रयोग आदत और स्वभाव बन जाते हैं। ऐसे लोगों की संगति न तो अच्छी कही जाती है और न उन्हें सभ्य समाज में अच्छी दृष्टि से देखा जाता है।
कदाचित यह आदत वाक्चातुर्य प्राप्त करने वाले नये अभ्यासियों को लग गई हो तो उन्हें तुरन्त इस पर नियन्त्रण और परिष्कार करना चाहिए। इस नियन्त्रण में दूसरा सूत्र महत्वपूर्ण सहायता देता है, जो सामान्य और इस आदत से मुक्त लोगों के लिए भी आवश्यक है। वह सूत्र है-सोच समझकर बोलना। जिन अवसरों पर हमें चुप रहना चाहिए, गम्भीर होना चाहिए अथवा अपनी बात नहीं छेड़ना चाहिए उन अवसरों पर इन मर्यादाओं का उल्लंघन हमें हास्यास्पद, निन्हा और ‘अपनी ही गाने वाले’ की हीन संज्ञा से युक्त बना देता है। प्रायः कई व्यक्तियों को जिस विषय में उनकी जानकारी नहीं होती, उस विषय पर भी बातूनी आदत से लाचार होकर बोलते रहते देखा जाता है। ऐसा प्रायः अपनी अल्पज्ञता को छुपाकर स्वयं को सर्वज्ञ सिद्ध करने के अहंकार से ही होता है। सुनने वालों में से भले ही कोई हमारे मिथ्यात्व को न पकड़ पाये, परन्तु जाने-अनजाने ऐसी बात निकल ही जाती है जिससे हमारी अज्ञानता व्यक्त होती है और विचारशील श्रोता उसे पकड़ लेते हैं। ऐसी स्थिति में कभी सच बात भी कही जाय तो कलई खुल जाने के बाद लोग हमें गप्पी ही समझने लगते हैं।
जीवन में कई ऐसे प्रसंग आते हैं जिनका तकाजा रहता है कि गम्भीर रहा जाय। जैसे कोई शोकाकुल हो या किसी का कोई सम्बन्धी मर गया हो। उसके पास शोक सम्वेदना व्यक्त करने के लिए जाते समय गम्भीरता एक आवश्यकता है और कोई व्यक्ति यदि अपनी खुशमिजाजी जताने के लिए अप्रासंगिक चर्चा छेड़ देते हैं तो उन्हें निन्दा ही मिलेगी। ऐसा ही अवसर वार्तालाप के समय भी आता है। जब दूसरा भागीदार अपनी बात कह रहा हो तो पहले भागीदार के लिए आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी हो जाता है कि वह पहले उसकी बात को ध्यानपूर्वक सुने और उसमें रुचि ले। इसके विपरीत बीच-बीच में अपनी गाने वालों को बातूनी और अपनी ही ढपली बजाते रहने वाला कहा जायगा। बाद में उससे वह व्यक्ति बात करने के लिए भी उत्सुक नहीं दिखाई देगा।
वाक्चातुर्य के लिए तीसरा प्रमुख सूत्र है-दूसरों की रुचि का ध्यान रखना। सम्पर्क में आने वाले सभी लोग एक-सी रुचि के नहीं होते। सबकी रुचियाँ भिन्न-भिन्न रहती हैं। कोई कला का शौकीन है तो कोई संगीत का, किसी को सामाजिक समस्याओं पर चर्चा अच्छी लगती है तो कोई अन्तर्राष्ट्रीय विषयों पर बातचीत करना पसन्द करता है। खाली समय में जब वाक्साधना की जा रही हो तब प्रति-पक्षी की रुचि का ध्यान आवश्यक है। जहाँ तक हो सके अपनी जानकारी के अनुसार उसी विषय की बात की जाय और उन विषयों में कोई जानकारी न हो तो धैर्यपूर्वक प्रश्न पूछकर अपना ज्ञान बढ़ाना भी एक अच्छा तरीका है। इससे एक अच्छे श्रोता बनने और ज्ञान का क्षेत्र व्यापक होने का दोहरा लाभ मिलेगा।
रुचि के सम्बन्ध में एक बात यह भी ध्यान देने योग्य है कि सामने वाला व्यक्ति हमारी बातों में रस ले रहा है या नहीं। यदि नहीं तो विषयान्तर कर देना ही ठीक है। बात-चीत को समाप्त ही करना हो अथवा सामने वाला अरुचि रखता हो तो सम्भव है वह किसी जल्दी में हो और यह भी अनुभव कर रहा हो तो वार्तालाप को सौहार्द्रतापूर्वक पूरा कर लिया जाय।
बातचीत के समय अपनी बात संक्षिप्त में या अवसर के अनुसार विस्तार करने के लिए भी सामयिक सूझ का ध्यान रखना चाहिए। जहाँ तक हो सके अपनी बात को संक्षिप्त और अर्थपूर्ण बनाएँ। इससे गलतियाँ होने की सम्भावना भी अधिक नहीं रहती और वार्तालाप की अर्थवत्ता भी बनी रहती है। कुशल बातचीत के लिए बातूनी होना आवश्यक नहीं है। वस्तुतः तो वाक्चातुरी और अधिक बोलने में कोई सम्बन्ध ही नहीं है। ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। वाक्चातुर्य जहाँ गुण है, वहीं वाचालता की गणना दोषों में की जाती है। अतः वाक्पटुता हासिल करने के लिए यह भ्रम मन से निकाल देना चाहिए कि वाक्पटु को बोलते रहना चाहिए।
पांचवीं और अन्तिम बात जो वाक्पटुता के लिए प्रधानतः आवश्यक है कि जिससे बात की जा रही हो उसके हृदय में सद्भाव, आत्मीयता को जागृत करना और कथनी द्वारा ही नहीं करनी द्वारा भी स्वयं को उसके अन्तःकरण में एक शुभ चिन्तक के रूप में प्रतिष्ठित करना। इसके लिए उसके व्यक्तित्व, परिवार और आर्थिक सामाजिक स्थिति को जानने का प्रयास किया जा सकता है। स्पष्ट है कि जब किसी से उसके निज के सम्बन्ध में, पत्नी और बच्चों के सम्बन्ध में उनके स्वास्थ्य, कुशलता और वर्तमान सुख-दुःखों के सम्बन्ध में प्रश्न किये जायँ तो वह खुलेगा ही और जब कोई व्यक्ति अपनी समस्याएँ कहने लगे तो एक मित्र की भाँति उचित परामर्श देना चाहिए। उचित परामर्श के लिए भावना जगत में स्वयं को उस स्थिति में होने का अभ्यास नब्बे प्रतिशत सही निष्कर्ष पर पहुँचने का मार्ग है। यदि उसके विचार अपने से कुछ अलग हों तो ही दस प्रतिशत उक्त उद्देश्य की पूर्ति में असफलता की सम्भावना है अन्यथा शत-प्रतिशत हम उसे अपना अन्तरंग मित्र बना लेंगे और उस पर अपना प्रभाव जमा लेंगे।
समाज में रहते हुए किसी भी व्यक्ति को किसी भी कार्य के लिए दूसरों का सहयोग और सम्पर्क अनिवार्य हो जाता है। कहना न होगा कि इसके अर्जन का प्रथम उपाय वार्तालाप है और जो व्यक्ति कुशल बातचीत करने वाला हो वह कभी निराश नहीं होता। आत्म-विकास के विषय में पाठकों का मार्ग-दर्शन करते हुए एक लेखक ने तो यहाँ तक लिखा है-‘‘क्या आप निर्धन हैं, निराश हैं? क्या आप समझते हैं कि जीवन में प्रगति का कोई अवसर आपको नहीं मिल सका? क्या आपकी महत्वाकाँक्षाएँ पूरी नहीं हुई? आप चिन्ता मत कीजिए। एक अच्छे बात-चीत करने वाले बन जाइये। बस आपके सपने शीघ्र ही पूरे हो जायेंगे।’’
कुछ दिन पूर्व उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के सदर अस्पताल में एक नौ वर्ष का बालक प्रस्तुत किया गया था। यह बसौढ़ी गाँव के मल्लाहों द्वारा सियारों की माँद से निकाला गया था। यह सियारों की बोली बोलता था और वही खाता था जो सियार खाते हैं। उसके नाखून तथा बाल बढ़े हुए थे और चौपायों की तरह चलता था।
इससे पूर्व लखनऊ के अस्पताल में एक रामू नामक भेड़िया बालक कई वर्ष तक भर्ती रह चुका है, यह भेड़ियों की माँद से खन्दौली (आगरा) के जंगलों में पाया गया था।
उपरोक्त सियार और भेड़िया बालकों के सम्बन्ध में यही विदित हुआ है कि इन्हें यह वन्य पशु छोटी आयु में उठा ले गये थे। वे इन अबोध शिशुओं के प्रति द्रवित हो गये और उसे खाने की बजाय अपने बच्चों की तरह पाल लिया।
यह घटनाएँ यह तथ्य सामने लाती हैं कि मनुष्य का विकास समुन्नत सामाजिक परिस्थितियों में ही हो सकता है। एकाकी प्रयत्न के बलबूते कोई जीवित भले ही रह ले, पर मानवोचित आहार-व्यवहार तक से परिचित नहीं हो सकता। सर्वसाधारण की प्रगति सामाजिक सहयोग एवं स्तर की मात्रा बढ़ने से ही हो सकती है इसके बिना तो हर किसी को भेड़िया अथवा सियारों से पाले बालकों की तरह पिछड़ी हुई स्थिति में ही पड़ा रहना होगा।
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कुछ वर्षों पूर्व ही रूस के एक विख्यात मनोवैज्ञानिक पावलाव ने जानवरों के भोजन पर कुछ प्रयोग किये और बड़े आश्चर्यजनक परिणामों पर पहुँचे। उन्होंने कुछ बिल्लियों पर प्रयोग किया। बिल्ली को भोजन दिया गया और वैज्ञानिक यन्त्रों द्वारा यह जानने की कोशिश की गयी कि भोजन करते समय तथा उसके बाद वह आहार कैसे पाचन संस्थान में पहुँचा और उस पर शरीर की क्या प्रतिक्रिया हुई। जैसे ही बिल्ली के पेट में भोजन पहुँचा पाचन संस्थान ने पचाने वाले रस छोड़े, तभी एक कुत्ते को भी उस कमरे में लाया गया। बिल्ली, कुत्ते को देखकर डर गयी और वह खाना छोड़कर अपनी जीवन रक्षा के लिए इधर-उधर ताकने लगी। फिर कुत्ते को बाहर निकाल दिया गया। बिल्ली भोजन तो करने लगी थी परन्तु उसके पाचन तन्त्र से जो एन्जाइम्स छूटने लगे थे वे बंद हो गये। यन्त्रों द्वारा पता चला कि कुत्ते के अन्दर आते ही पेट ने रस छोड़ना बन्द करा दिया था और यह स्थिति छह घण्टे बाद तक बनी रही थी। यह इसलिए हुआ कि कुत्ते के आते ही बिल्ली चिन्ता और भय में पड़ गयी थी तथा चिन्ता और भय के मनोवेगों का प्रभाव उसके पेट पर हुआ और पेट ने पाचक रस मिलाना बन्द कर दिया।
पावलाव इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि इन दाहकारी मनोवेगों का कुप्रभाव मनुष्य के स्वास्थ्य और जीवन पर भी बड़ा बुरा पड़ता है। उसे यह जान कर बड़ा आश्चर्य हुआ कि जब बिल्ली पर यह गुजरती है तो फिर मनुष्य पर क्या होता होगा जो चौबीसों घण्टों चिन्ता, भय, क्लेश, ईर्ष्या, द्वेष और उतावली में डूबा रहता है। शरीर व्यवस्था का थोड़ा बहुत अन्तर भले ही हो परन्तु मनःस्थिति का भोजन पर अवश्य प्रभाव पड़ता है।
यह बात उस स्थिति के अनुभवों से स्वयं ही सिद्ध होती है जब मनुष्य भोजन करते समय बहुत ही चिन्ताकुल तथा दुखी हो। इन मनोभावों की प्रबलता में मनुष्य का जी ही नहीं होता भोजन करने का। मनोभावों की प्रबल दशा में शरीर की माँग ही नहीं होती कि वह भोजन करे। लेकिन थोड़े बहुत अन्तर से चौबीसों घण्टे यही बात रहती है कि हम जो भोजन करते हैं और जिस मनःस्थिति में रहते हुए करते हैं वह मनःस्थिति किये गये भोजन को पचाने में बाधक ही बनती है सहायक नहीं।
लम्बे समय से चली आ रही मनुष्य की स्थिति ने शायद पाचन व्यवस्था पर भार डाल दिया हो लेकिन यह बिल्कुल भी सम्भव नहीं है कि वह भोजन समुचित रूप से पच जाता हो। यही कारण है कि मनुष्य बार-बार बीमार पड़ता है और उसे बार-बार डॉक्टरों की आवश्यकता पड़ती है। क्योंकि भोजन जो एक प्रार्थनापूर्ण प्रक्रिया है। प्रभु का प्रसाद समझ कर ग्रहण किया गया आहार है। वह यदि गलत ढंग से लिया जा रहा है तो अपना वाँछनीय प्रभाव नहीं उत्पन्न कर सकता और परिणाम में लाभदायक होने की अपेक्षा हानिकारक ही ज्यादा सिद्ध होगा। दुनिया के लगभग सभी चिकित्सकों का यह मत कि बीमारियों का कारण गलत ढंग से किया गया भोजन ही है।
भारतीय धर्मशास्त्रों में मनीषियों ने इसी कारण बड़ा युक्तिपूर्ण नियम बनाया है कि- भोजन प्रसन्नतापूर्वक आनन्दित होकर, धीरे-धीरे भगवान का प्रसाद मानकर ही किया जाना चाहिए। यह एक ऐसी क्रिया है जिसे करते समय मनःस्थिति जितनी ही अधिक आनन्दपूर्ण और उल्लासपूर्ण होगी उतनी ही हितकर होगी। पर अधिकाँश मनुष्य तो हिंसक भोजन ही करते हैं। प्रख्यात दार्शनिक हार्नोव का कहना है कि-हिंसक भोज का एकमात्र अर्थ माँसाहारी भोजन करना नहीं है, हिंसक भोजन यह भी है कि कोई आदमी स्थिति में भोजन कर रहा है जबकि उसकी भावना भोजन के लिए तैयार नहीं है। वह क्रोध में है, चिन्ता में है और ईर्ष्या में है तो वह माँसाहार से भी ज्यादा हिंसक है। जब किसी और प्राणी का माँस लेकर भोजन किया जाता है तब वह तो हिंसक भोजन है ही, लेकिन जब चिन्ता और दुःख में उसका अपना ही माँस अन्दर जलता है तब वह जो भोजन कर रहा है वह और भी अधिक हिंसा है।
भोजन के सम्बन्ध में एक और आश्चर्यजनक बात एक प्रख्यात डॉक्टर केनेथवार ने कही है-‘‘लोग जो भोजन करते हैं उसमें से आधे भोजन से उनका पेट भरता है और आधे भोजन से डॉक्टरों की जेबें भरती हैं अगर वे आधा भोजन ही करें तो वे बीमार ही नहीं पड़ेंगे और न ही उन्हें कभी डाक्टरों के पास जाने की जरूरत पड़ेगी। पढ़ने, सुनने में यह बात आश्चर्य भरी है परन्तु है बिल्कुल सच। निरीक्षणात्मक दृष्टिकोण से यदि हम अपने द्वारा ग्रहण किये जाने वाले आहार के सम्बन्ध में सोचें तो आसानी से यह पता चल जायेगा कि जो भोजन हम कर रहे हैं और जितनी मात्रा में कर रहे हैं तथा जिस प्रकार का कर रहे हैं-वह हमारे स्वास्थ्य के लिए हितकारी कम और हानिकारक ही ज्यादा सिद्ध होगा।
यद्यपि कुछ लोग भोजन न मिलने से मरते हैं तो उनसे अधिक संख्या ऐसे लोगों की है जो अतिभोजन के कारण मरते हैं। वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि कोई भी व्यक्ति बिना भोजन किये तीन माह तक आसानी से जीवन चला सकता है। भारतीय तपस्वियों और योगियों ने तो आत्म-प्रयोगों द्वारा इस क्षेत्र में मनुष्य शरीर की सामर्थ्य और क्षमता को और भी अधिक उच्च सिद्ध किया है, परन्तु एक साधारण व्यक्ति विज्ञान की दृष्टि से तीन माह तक बिना किसी बाधा के बिना भोजन किये स्वस्थ और निरोग रह सकता है। लेकिन कोई व्यक्ति तीन माह तक नियमित रूप से अति भोजन करे तो किसी भी स्थिति में जीवित न बचेगा। सौभाग्य से यदि जिन्दा रह भी जाय तो मृत व्यक्ति की तरह ही रहेगा।
अति भोजन के साथ-साथ एक और दोष है हमारी आहार पद्धति में। हम जो भोजन करते हैं शरीर की आवश्यकता को दृष्टिगत रख कर नहीं करते। थाली में सजे विभिन्न पकवान, तीखे, चरपरे, खट्टे, मीठे, तेज जले-भुने खाद्य पदार्थ शरीर को स्वस्थ रखने की अपेक्षा हमें रुग्ण और बीमार ही बनाते हैं। हमारी भोजन की थाली में आधे से अधिक पदार्थ जहरीले होते हैं। हम जानते भी हैं कि इन पदार्थों का उपयोग शरीर व्यवस्था में किसी भी प्रकार सहायक नहीं है फिर भी उनका प्रयोग करते चलते हैं-महज स्वाद के कारण। महज स्वाद के कारण किया गया भोजन, उसके गुण-दोष को बिना ध्यान में रख कर किया गया भोजन मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए किसी भी प्रकार हितकारक नहीं हो सकता, वह जहर का ही काम करेगा और जहर भी ऐसा जो व्यक्ति के शरीर में धीरे-धीरे रमता है और बहुत दिनों बाद अपना घातक कुप्रभाव बताता है। बन्दूक की गोली या जहर की शीशी कुछ क्षणों में थोड़े से समय में ही जीवन का अन्त कर देती है। परन्तु स्वेच्छा से ग्रहण किया गया इस प्रकार का विष व्यक्ति की घुट-घुट कर हत्या करता है। उसे तड़पा-तड़पा कर मारता है। भोजन की यह दूषित प्रक्रिया मनुष्य शरीर को खोखला और कमजोर ही बनाती है। इस प्रक्रिया का एकदम विपरीत परिणाम होता है। भोजन जब कि स्वास्थ्य और शक्ति के लिए ही किया जाता है, रोग और बीमारी लाने लगे तो जीवन कैसे बच सकेगा। इसकी कोई सम्भावना ही नहीं है।
अतएव भोजन के सम्बन्ध में इन दो तीन मोटी-मोटी, साधारण किन्तु अति महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखा जाय तो शरीर और जीवन के लिए आहार का प्रयोजन भली-भाँति पूरा हो सकता है। कुछ ही समय तक इन आवश्यक बातों का ध्यान रखने से अनुभव किया जा सकता है कि हमारी वर्तमान भोजन प्रणाली कितनी दोषयुक्त और अस्वास्थ्यकारी है। पाश्चात्य देशों में इस दिशा में जो खोजें की गयी हैं, वे भी भारतीय धर्म दर्शन के भोजन सम्बन्धी सिद्धान्तों की ही पुष्टि और समर्थन करती हैं।
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स्वर्णिम अतीत से ही उपवास भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। विदेशों में भी विद्वानों ने इसे जाना और माना है तथा इस के महत्व को समझकर समुचित आदर दिया है। यूरोप में ईसा से 1500 वर्ष पूर्व ल्यूगीकोरनारो द्वारा आयु बढ़ाने के लिए उपवास किया गया। अरब में हकीम एबीसीना उपवास द्वारा चिकित्सा करता था। वर्तमान काल में सारे विश्व ने उपवास को न केवल चिकित्सा के रूप में स्वीकार कर लिया है, वरन् सभी धर्मों की धार्मिक पुस्तकों, वेदों, स्मृतियों, बाईबल, कुरान, महावीर चरितम, धम्पद में उपवास रखना मनुष्य का धार्मिक कर्त्तव्य बताया गया है।
उपवास की कोई संक्षिप्त परिभाषा दे सकना कठिन है क्योंकि भिन्न-भिन्न विद्वानों ने इसे भिन्न-भिन्न दृष्टिकोणों से देखा है, और इस पुनीत पद्धति का प्रयोग विभिन्न प्रयोजनों के लिए किया है। वर्नार्ड मेकफेडन का कहना है, ‘उपवास का अर्थ ठोस और तरल प्रत्येक प्रकार के भोजन का पूर्णतया त्याग करना है।’ चार्ल्स एननडेल के अनुसार ‘भोजन की सामान्य मात्रा को बन्द कर देना ही उपवास है।’ चरक ने कहा है-‘किसी भी प्रकार के भोजन का किंचित मात्र अंश शरीर में न पहुँचना लंघन है। उपवास उसी की उपशाखा है।’ इस प्रकार लगभग सभी विचारकों ने भोजन के त्याग को ही उपवास माना है।
जीव विज्ञान का विद्यार्थी जानता है कि मानव शरीर अत्यन्त सूक्ष्म कोषों से मिल कर बना है। परिश्रम से ये कोष टूटते हैं। इसीलिए व्यायाम से थकान मालूम होती है और भोजन के रस से आराम, निद्रा या उपवास के समय नये कोषों का निर्माण होता है। इसीलिए आराम के पश्चात् स्फूर्ति का अनुभव होता है।
शरीर में दो प्रकार की क्रियाएँ होती हैं। पाचन और निष्कासन। पाचन द्वारा रस बनता है जिससे नये कोष बनते हैं और शरीर का निर्माण होता है। पसीना, कफ, मल और मूत्र द्वारा टूटे हुए कोष निष्कासित किये जाते हैं। यह विजातीय द्रव्य हैं जिसका शरीर से बाहर निकल जाना स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त आवश्यक है, नहीं तो शरीर के अन्दर यह विष क्षुधा नाश, अजीर्ण, भारीपन, मलबन्ध, ज्वर, यकृत वृद्धि, अम्ल पित, आमवात, गठिया तथा नाना प्रकार के त्वचा रोग पैदा कर देता है। यदि हम निरन्तर खाते ही रहें और शरीर से पाचन का काम लेते रहें तो दिन भर कोष टूटते ही रहेंगे, उनके द्वारा विजातीय द्रव्य बनता रहेगा जिसको निस्सारक अंग बाहर नहीं निकाल सकेंगे और हम रोगी हो जाएंगे। इसीलिए भोजन से अवकाश या उपवास स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। एक बात और है कि सृष्टि के सहयोग के नियम के अनुसार जब शरीर का एक अंग रोगी हो जाता है तो शेष अंग उसकी सहायता में जुट जाते हैं। इसीलिए जब पाचन में गड़बड़ी होती है तो निष्कासन में बाधा पड़ती है और जब निष्कासन अंग रोगी हो जाते हैं तो पाचन अंग भी अपना कार्य ठीक से नहीं कर पाते। दोनों क्रियाओं में सन्तुलन के लिए उपवास आवश्यक है।
इस प्रकार उपवास के तीन आधारभूत सिद्धान्त हैं:-
1- बाह्य शक्तियों, साधनों और औषधियों की सहायता के बिना भी मानव शरीर स्वचिकित्स्य है।
2- तीव्र रोग में भोजन न लेना और पाचन के श्रम द्वारा कोषों को न टूटने देना बुद्धिमत्ता है।
3- किसी अंग विशेष की रोगावस्था में दूसरे अंगों को उसकी सहायता का अवसर देना चाहिए।
इतिहास बताता है कि केवल रोग निवारण और स्वास्थ्य रक्षण के लिए ही उपवास की आवश्यकता अनुभव नहीं की जाती रही है। वैदिक काल में व्रत के पूर्व और ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश के पूर्व संकल्प और संयम में दृढ़ता लाने के लिए उपवास की आवश्यकता माना गया था। स्मृतियों में पापों के प्रायश्चित के लिए उपवास करना बताया गया है। चरक और वाग्भट्ट ने रोगों की निवृत्ति के लिए और शल्य के पूर्व उपवास को आवश्यक बताया है। डॉ0 डेवी इन्हीं का समर्थन करते हुए कहते हैं - ‘रोगी को भूखा रखकर आप रोग को भूखा मार सकते हैं।’
सातवलेकर ने भारतीय दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करते हुए कहा है-‘पेट को आराम देने के लिए, विजातीय द्रव्य शरीर से बाहर निकालने के लिए, विषय विकारों की निवृत्ति के लिए, नैतिक और आध्यात्मिक प्रगति के लिए, नैसर्गिक बुद्धि के उदय के लिए, रोग निवारण के लिए, आत्म-विश्वास की प्राप्ति के लिए, प्रेम की विशालता की दिव्य अनुभूति के लिए, विराट के साथ आत्म-सामंजस्य आदि के लिए महत्वपूर्ण साधन उपवास ही है।’
वर्तमान समय में जबकि लोग खाने के रोग से पीड़ित हैं, सभ्यता और मलबन्ध का साथ हो गया है। असंयम का बोल-बाला है, दिन में कई बार खाना एक फैशन बन गया है, अप्राकृतिक, अखाद्य और गरिष्ठ वस्तुओं का प्रयोग बढ़ गया है, पाचन क्रिया अत्यधिक पाचन श्रम के कारण निर्बल हो गई है और मशीनों ने मानसिक श्रम बढ़ाकर स्वाभाविक शारीरिक श्रम बहुत कम करके सन्तुलन बिगाड़ दिया है, रोग पीड़ित मानवता के लिए उपवास एक आवश्यक आवश्यकता बन गया है।
इतना ही नहीं, महात्मा गाँधी ने उपवास का एक नवीन और अद्भुत प्रयोजन बताया है। वे कहते हैं-‘अपने निकट के आत्मीय को सुधारने उसे गलत काम करने से रोकने और उसमें पश्चात्ताप जागृत करने के लिए सत्याग्रही के अन्तिम अस्त्र के रूप में उपवास अचूक है क्योंकि उपवासकर्त्ता की आत्मपीड़ा अत्याचारी के अन्तर को स्पर्श करके उसका हृदय परिवर्तन कर देती है।’
इस प्रकार उपवास का उपयोग रोग निवारण से लेकर, भौतिक, नैतिक, आध्यात्मिक और संघर्षात्मक सिद्धियों तक के लिए किया जाता रहा है। परन्तु यह स्पष्ट रूप से जान लेना चाहिए कि उपवास स्वयं में कोई शारीरिक शक्ति बढ़ाने वाली क्रिया नहीं है। निम्नलिखित दशाओं में उपवास का निषेध भी किया गया है-
1 यदि पाचकाग्नि ठीक हो और यकृत, फेफड़े आदि ठीक काम कर रहे हों।
2 यदि रोगी क्षय या अन्य किसी ऐसे रोग से पीड़ित हो जिस में शरीर के कोष बड़ी मात्रा में नष्ट हो गये हों और जीवन शक्ति का ह्रास इस सीमा तक हो गया हो कि वह पुनर्निर्माण करने में असमर्थ हो।
3 शरीर की प्रकृति को बिना समझे नासमझी से उपवास करना खतरनाक हो जाता है।
उपवास एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसे सावधानी से करने से लाभ होता है और असावधानी से करने से इसके घातक परिणाम हो सकते हैं। इसकी विधि को चार अंशों में वर्णन किया जा सकता है-
(1) उपवास के पूर्व (2) उपवास के दिनों में (3) उपवास की समाप्ति-कब और कैसे (4) उपवास के पश्चात सावधानियाँ।
बहुत से लोग यह समझते हैं कि उपवास के दिन खाने की छुट्टी रहेगी। सम्भव है इससे शरीर कमजोर पड़ जाये। इसलिए उपवास के पूर्व वे ठूँस-ठूँस कर भोजन करते हैं, ऐसा विचार भ्रमात्मक और हानिकारक है। एक दो दिन के उपवास के पूर्व कोई विशेष सावधानी की आवश्यकता नहीं है। केवल हल्का और सुपाच्य भोजन ही ठीक है। परन्तु यदि लम्बा उपवास रखना हो तो उपवास के पूर्व दो या तीन दिन तक केवल फलों के रस पर रहना चाहिए, ताकि शरीर में मल न रहे। उपवास शरीर का नवीनीकरण कर सके जिस प्रकार बर्तन का मैल साफ करके उस पर कलई अच्छी तरह होती है और बर्तन चमकदार और नया-जैसा हो जाता है। पेट सम्बन्धी तथा समविकार सम्बन्धी पुरानी बीमारियों में लम्बे उपवास विशिष्ट रूप से आवश्यक होते हैं। एक सप्ताह का - दस दिन का - उपवास आसानी से किया जा सकता है।
उपवास के दिनों में रोगी को बन्द कमरे में लेटा नहीं रहना चाहिए। एनीमा से आँतों को और जल तथा धूप स्नान से त्वचा को साफ रखना चाहिए ताकि विजातीय और विषैला द्रव्य निस्सारक अंगों और त्वचा से बाहर निकल जाय। इसके अतिरिक्त भोजन के स्थान पर शुद्ध-वायु, शुद्ध जल, और सूरज की रोशनी से शरीर को शक्ति देनी चाहिए।
परन्तु उपवास की अवधि समाप्त होने का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण लक्षण सच्ची भूख का लगना है जबकि रोगी अपने को नियन्त्रण में रखना कठिन समझता है और कुछ भी खाने को अपनी प्रबल इच्छा प्रकट करता है।
इस प्रकार उपवास की अवधि समाप्त होने पर शरीर हल्का और फुर्तीला मालूम होता है। यही समय है जब रोगी के लिए भोजन की व्यवस्था करनी चाहिए।
उपवास का सबसे महत्वपूर्ण भाग उपवास के पश्चात उचित भोजन की व्यवस्था करना है। इसमें थोड़ी-सी असावधानी भी रोगी के लिए घातक हो सकती है। इस सम्बन्ध में एक प्रसिद्ध सूत्र है, जो तीन-तीन दिन करके दस दिन के लिए है। रस-दूध+पानी-दूध-हल्का भोजन। अर्थात् पहले तीन दिन सन्तरा, अंगूर या सेब का रस, चौथे, पाँचवें और छठे दिन हल्का भोजन जैसे दूध और डबलरोटी या सब्जी और रोटी का छिलका देना चाहिए और फिर क्रमशः सामान्य भोजन पर ले आना चाहिए। भोजन देने का यह क्रम निरापद है।
कुछ लोग पहले दिन तीन-चार बार रस, दूसरे दिन सन्तरा, अंगूर या अनार और तीसरे दिन हल्का भोजन देने लगते हैं।
वास्तव में भोजन देने का कोई भी क्रम पहले से निश्चित करना उचित नहीं है भोजन की वस्तु, मात्रा और समय खाने वाले के स्वास्थ्य और पाचक शक्ति पर निर्भर करती है। देखना केवल यह होगा कि भोजन व्यक्ति के लिए हो, व्यक्ति भोजन के लिए न हो जाय, क्योंकि डॉ0 डेवी के मतानुसार अधिक भोजन करने से मरने वालों की संख्या, भूख से मरने वालों की संख्या की अपेक्षा बहुत अधिक होती है।
कुछ भी हो उपवास का हमारे जीवन में निश्चित रूप से बड़ा महत्व है। सभी महापुरुषों ने इसे अपनाया है, सभी धर्मों ने इस की प्रेरणा दी है, पशु-पक्षी भी रोग की दशा में इसे अपनाते हैं और सभी अच्छे चिकित्सक इसके गुण गाते हैं। सात्विक भोजन का उपवास के साथ समावेश उपवास की उपयोगिता में वृद्धि निश्चित रूप से करेगा।
उस रात अल्लाह सपने में इब्राहीम के पास आये और बोले तेरी इबादत तो सही है, पर इसमें पूर्णता बलिदान के बिना कैसे आवेगी ?
मैं किसकी कुर्बानी करूं, मेरे पाक परवरदिगार ? इब्राहीम ने पूछा। उत्तर मिला-अपने प्यारे से प्यारे की।
इब्राहीम सोचने लगे मुझे सबसे ज्यादा प्यार तो अपने बेटे से है। क्या उसी की कुर्बानी करनी होगी? लड़का इस्माइल समझदार था सो उन्होंने उसी से सलाह लेना ठीक समझा और सपने का हाल सुनाया। बेटे ने कहा-मेरे प्यारे पिता अल्लाह के राह पर जो चीज दी गई, वह धन्य है। आप मेरी कुर्बानी खुशी-खुशी दे दें।
इब्राहीम बेटे को पवित्र वेदी के निकट ले गये और उसका सिर काटने पर उतारू हो गये।
आकाशवाणी ने कहा-सिर काटना कुर्बानी नहीं। बेटे को अल्लाह के काम में लगा दे। नष्ट करना नहीं-बलिदान का अर्थ है-नेकी की राह पर बलिवस्तु का समर्पण कर देना। तब से इब्राहीम के साथ उनका बेटा इस्माइल भी मिल्लत के लिए दिन-रात काम करने लगा।
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भारत और पाकिस्तान के बीच लड़े गये एक युद्ध में किसी अधेड़ महिला का पति मारा गया। भारतीय नारी के लिए वैधव्य मरण से भी अधिक दुःखदायी है। सो उस विदुषी को न केवल वैधव्य का दुःख ही सहना पड़ा, वरन् उस दुःख के भार से वह खिन्न, उदास रहने लगी और कुछ रोगों ने भी उसे आ घेरा। सहानुभूति व्यक्त करने के लिए भी जब कोई उसके पास जाता तो स्वजन, सम्बन्धी से लेकर परिचित और मित्रगण गम्भीरता से बात करते थे। उसकी जीवन-यात्रा भी अपने दिवंगत पति के पास पहुँचने के लिए मौत के निकट जाने लगी।
आखिर उसे न जाने क्या सूझी कि एक बार वह अपनी सहेलियों के साथ फोटोग्राफर के यहाँ फोटो खिंचवाने पहुँची। सब सहेलियों के चेहरे पर तो प्रफुल्लता थी और उनके बीच विधवा सैनिक पत्नी ऐसी लग रही थी जैसे खिले हुए फूलों के बीच एक मुरझाया पुष्प। फोटोग्राफर ने उक्त विधवा को सम्बोधित करते हुए कहा-‘मैडम, जरा आँखों पर चमक लाइये।’
महिला ने प्रयत्न तो किया, पर उसका मुख मण्डल उसी प्रकार म्लान बना रहा और बुझा-बुझापन दीखता रहा। फोटोग्राफर ने दुबारा कहा - ‘मैडम, जरा प्रसन्न दीखने की कोशिश कीजिए।’
सहेलियों में से एक स्त्री उठी और उसने फोटोग्राफर को अलग ले जाकर कुछ समझाया। फोटोग्राफर और वह स्त्री कुछ क्षणों के बाद यथास्थान आ गये। फोटोग्राफर अपना कैमरा ठीक करने लगा और कैमरा ठीक करते-करते ही उसने कोई ऐसी बात कही जिससे सभी स्त्रियाँ खिल-खिलाकर हँस उठीं। अब तो उस महिला से भी नहीं रुका जा सका और उसने भी अपनी सहेलियों का साथ दिया।
इसके उपहास प्रसंग से महिला में कुछ ऐसा प्रेरणा भाव आया कि उसने भी हँसना सीख लिया। फोटोग्राफर के यहाँ उसकी हँसी विधवा होने के बाद पहली हँसी थी। इसके बाद के अनुभवों का उल्लेख करते हुए उक्त महिला ने बताया है-‘जिस क्षण में हँसी उस क्षण मुझे ऐसा लगा कि मेरे हृदय पर छायी बोझिलता समाप्त हो गयी और मुझमें एक नई जीवनी-शक्ति का संचार होने लगा। इसके बाद हँसने के किसी भी अवसर पर मैंने अपने हृदय को मुक्त कर दिया और मैंने जी खोलकर हँसना अपना स्वभाव बना लिया। हमारे परिवार के लोग कहा करते हैं कि विधवा स्त्री को हँसना नहीं चाहिए, परन्तु हँसी के महत्व को मैं समझने लगी क्योंकि उसने मेरा नया कायाकल्प कर दिया था। न जाने क्यों धीरे-धीरे स्वास्थ्य सम्बन्धी वे शिकायतें जिनके कारण मैं स्वयं को मौत के मुँह में समझने लगी थी-वे भी दूर होने लगीं।
वस्तुतः हँसी-जो प्रफुल्लता की अभिव्यक्ति है अपने आप में एक चिकित्सा और एक टॉनिक है। संयुक्त राज्य अमेरिका के महानगर फ्राँसिस्को में घटी एक घटना जो पिछले दिनों ही समाचार पत्रों में छपी और वैज्ञानिकों, चिकित्सकों के लिए भी चर्चित रही इसी प्रकार की है। उक्त घटना के सन्दर्भ में प्रकाशित किया गया था कि-नगर की प्रख्यात, धनाढ्य महिला मिसेज एडवर्ड को हृदयवेधी पीड़ा की शिकायत थी। उसे इसी रोग के कारण अनिद्रा, अपच तथा साथ ही चिन्ता, शोक और उद्वेग के शारीरिक, मानसिक विकारों ने भी घेर लिया था। हृदय रोग की चिकित्सा के लिए वह बड़े-बड़े अस्पतालों में सिद्ध हस्त डॉक्टरों के पास गई तो उन्होंने महिला का स्वास्थ्य परीक्षण कर उसे सामान्य रूप से सही पाया। फिर क्या कारण था कि उसे हृत्शूल, अनिद्रा और अपच जैसी शिकायतें थीं। डॉक्टर इसका कोई निष्कर्ष नहीं निकाल पा रहे थे।
तभी उसे किसी ने मनोरोग चिकित्सक के पास जाने की सलाह दी। मनोचिकित्सक ने उसे प्रफुल्लचित रहने के लिए कहा और निर्देश दिया कि अचानक यह होना स्वाभाविक नहीं है इसलिए वह दिन में कम से कम तीन बार हँसने का नियम बना ले। भले हँसी का प्रसंग हो या न हो तो भी उसे तीन बार तो हँसना ही चाहिए।
महिला ने तीन बार हँसने के निर्देश का पालन किया। प्रातः मध्याह्न और साँध्याह्न वह हँसने का प्रयत्न करने लगी। धीरे-धीरे हँसी उसका स्वभाव बनने लगी। पति भी अपनी ओर से प्रयत्न करता कि वह हँसे। कोई विनोद प्रसंग न सूझ पड़ता तो वह यह कहकर खिल-खिला उठता कि आज तुमने अपना निर्धारित कोर्स (हँसी का) पूरा किया है या नहीं। कुछ ही दिनों में इस प्रारम्भिक प्रयास का चमत्कारी परिणाम दिखाई देने लगा और उसका स्वास्थ्य सुधरने लगा। कुछ ही महीने में वह इस स्थिति तक पहुँच गई कि न उसे हृत्शूल होता और न कोई पीड़ा। समय पर नींद भी आती और खुलकर भूख भी लगती।
क्या कारण है कि मुक्त हास्य असाध्य रोगों को भी ठीक कर देता है। अपनी प्रयोगशाला में लम्बे परीक्षण के बाद डॉ0 बटलर जिस निष्कर्ष पर पहुँचे वह उल्लेखनीय है। इस सम्बन्ध में लन्दन से प्रकाशित होने वाली चिकित्सा विज्ञान की महत्वपूर्ण पत्रिका ‘लैन्सेट’ में भी छपा था-मुक्त हास्य की प्रवृत्ति रोगियों और दुर्बलों के लिए चमत्कारी प्रभाव उत्पन्न करती है। रोगियों में वह फिर से प्राण फूँक देती है और दुर्बल के लिए जीवन की सम्भावना में वृद्धि करती है।
हँसी फेफड़ों और आमाशय को वक्षस्थल में सुदृढ़ता से संयुक्त रखने और उन्हें सशक्त बनाने में बड़ी सहायक होती है। क्योंकि इसका आरम्भ वहीं से होता है। हँसी यकृत, आमाशय और शरीर के अन्य भीतरी अवयवों को तीव्रता से आलोड़ित करती है। यह आलोड़न एवं मंथन चेतना को सुखानुभूति प्रदान करता है। घुड़सवारी से जितना लाभ शरीर को मिलता है उतना ही लाभ और व्यायाम हास्य से भी हो जाता है। पाचन-क्रिया के दौरान आमाशय की चेष्टा ठीक वैसी ही होती है, जैसी कि दही मथते समय। जब आप ठठाकर हँसते हैं तब उदर को वक्षस्थल से जोड़ने वाली पेशी नीचे को सरकती है और आमाशय पर अतिरिक्त दबाव डालकर उसे झकझोर-सी डालती है। प्रायः हँसते रहने से आमाशय नृत्य सा कर उठता है। जिससे पाचन-क्रिया में तेजी आ जाती है और आमाशय नृत्य-सा कर उठता है। इससे हृदय का स्पन्दन अपेक्षाकृत तीव्र हो उठता है और पूरे शरीर में रक्त-संचार तेजी से होने लगता है।
शरीर के आन्तरिक अवयवों पर हँसी के होने वाले प्रभाव जानने के लिए डॉ0 ग्रीन का निष्कर्ष भी ज्ञातव्य है। उन्होंने बताया है-‘मानव शरीर की सूक्ष्मातिसूक्ष्म रक्त शिराओं का कोई भी छोर ऐसा नहीं है जिसे अट्टहास झकझोर न दे और उस पर हँसी का प्रभाव न हो। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में कहें तो हँसी रक्त-संचार केन्द्रों को अनुप्रेरित करती है और उनकी मालिश कर रक्त वेग को तीव्र करती है। हँसी का प्रभाव श्वसन क्रिया पर भी पड़ता है। वह श्वसन तन्त्र को सतेज बनाती है जिससे सम्पूर्ण शरीर यन्त्र को ऊष्मा और क्रांति प्राप्त होती है।
चिकित्सा-वैज्ञानिकों का यह अध्ययन निष्कर्ष भी द्रष्टव्य है कि निरन्तर हँसते रहने वाले प्रफुल्ल चित्त लोग अन्य व्यक्तियों की अपेक्षा देर तक श्रम करने में समर्थ होते हैं। यह छाती को चौड़ा करती है, कम प्रयोग में आई हुई विषाक्त वायु को फुफ्फुस कोषों से निकाल बाहर करती है और उसमें सन्तुलन को, जो शरीर के सभी क्रिया-व्यापारों के सम्यक् रूप से सम्पन्न होने के फलस्वरूप उत्पन्न होता है स्थापित करने का प्रयास करती है। इसी को हम स्वास्थ्य कहते हैं जो हँसी के द्वारा बिना मूल्य प्राप्त होता है।
हास्य का होने वाला शरीर पर प्रभाव किसी भी चमत्कारी दवा से कम नहीं है। हँसने से पहले और हँसने के बाद की अपनी स्थिति का हम स्वयं अध्ययन करें तो यह आसानी से पता चल सकता है। छाती से लेकर पेट तक की माँस- पेशियों में जो सिकुड़न और शिथिलता होती है वह शायद ही अन्य किसी व्यायाम से अनुभव होता हो। हँसने के बाद मुखमण्डल आशक्त हो उठता है और मस्तिष्क ऐसा लगता है जैसे एक खिंचाव के बाद ढीला हुआ हो। खिल-खिलाकर हँसना, पेट और वक्ष का अच्छा व्यायाम है। कहा जाता है-हँसते-हँसते पेट में बल पड़ गये। वस्तुतः ऐसा होता भी है। अधिक हँसने से पेट में दर्द-सा होने लगता है। इसका कारण यह है कि पेट की माँस-पेशियों पर हँसी व्यायाम जैसा ही प्रभाव डालती है। अधिक व्यायाम की तरह अधिक हँसी भी दर्द और ऐंठन लायेगी ही। अतः हँसने में सन्तुलन तो रखना चाहिए, पर हँसने का अवसर भी हाथ से न जाने देना चाहिए।
ऊपर चिकित्सा शास्त्रियों के जो उदाहरण दिये गये हैं वे अपने स्वयं के अध्ययन से भी किसी न किसी रूप में अनुभव किये जा सकते हैं। जैसे कहा गया है कि हँसी शरीर की विषैली वायु को प्रश्वास के द्वारा बाहर निकाल देती है। हँसने के बाद शरीर में अनुभव होने वाले हल्केपन का यही कारण है।
हास्य का शारीरिक ही नहीं मानसिक प्रभाव भी है। अशुभ समाचार सुनकर शोकाकुल, चिन्तातुर, व्यग्र, उद्विग्न और क्रुद्ध व्यक्तियों को कभी हँसी नहीं आती। इसका कारण यह है कि ये मनोविकार सर्वप्रथम चित्त की प्रफुल्लता को अपना शिकार बनाते हैं और मानसिक क्रियाओं के साथ-साथ शरीर व्यवस्था को गड़बड़ा देते हैं। ऐसे व्यक्तियों को किसी प्रसंग वश हँसी आ जाय तो फिर न सन्ताप रहता है न शोक, न चिन्ता सताती है और न व्यग्रता। चमत्कारी ढंग से निरुद्वेग, शान्ति और निश्चित होकर विकारजन्य शारीरिक व मानसिक असन्तुलन को हँसी नष्ट कर देती है। यही कारण है कि सफलतम डाक्टरों ने मानस रोगों का उपचार हँसी बताया है। एक ऐसे ही प्रख्यात चिकित्सक का कहना था-वह सन्तुलन जो किसी निद्रा विहीन रात्रि, अशुभ समाचार या दुःख सन्ताप अथवा चिन्ता के कारण बिगड़ सकता है एक बार जी खोलकर हँस लेने से पूरी तरह पुनः स्थापित हो जाता है।
अमेरिका के एक मानसिक चिकित्सालय-‘बटलर मेण्टल हॉस्पिटल’ में तो पागल लोगों को हँसी द्वारा ठीक करने के सफल प्रयोग किये जा चुके हैं। जो लोग कोई अप्रिय घटना या भावनाओं को आघात पहुँचने से विक्षिप्त हो जाते हैं, प्रायः गम्भीर और उदास बने रहते हैं। हास्योपचार उनके लिए सफल चिकित्सा सिद्ध हुई है। उक्त अस्पताल के प्रबन्धक डॉक्टर रे तो मानसिक स्वास्थ्य के लिए हँसी को अनिवार्य आवश्यकता मानते हैं। उनका कथन है-‘मानसिक स्वास्थ्य के लिए तार्किक शक्ति के विकास की अपेक्षा हृदय से उठा हास अधिक वाँछनीय है।
मुख-मण्डल पर निरन्तर खेलती रहने वाली मुस्कान और हँसी का कोई अवसर न चूकना निरोग व्यक्तियों के लिए भी उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने और स्वस्थ रखने के लिए एक टॉनिक से अधिक ही प्रभावकारी रहता है। रोगी और हताश व्यक्तियों के लिए तो वह एक बिना मूल्य मिलने वाली अमूल्य औषध है ही।
जर्मन वैज्ञानिक हेडफील्ड ने अपनी पुस्तक ‘साइकोलॉजी एण्ड मारन’ नामक पुस्तक में एक ऐसे वकील का उद्धरण दिया है जिसके पैर में निरन्तर दर्द रहता था, पर चिकित्सकों के निदान में उसका न तो कोई चिन्ह-प्रतीत होता था न कारण। मनोविज्ञान विश्लेषण के अनुसार बहुत दिन पूर्व उनकी साइकिल की चपेट में आने से एक बच्चे का पैर टूट गया था। लोग उन्हें दण्ड देंगे या भर्त्सना देंगे इस डर से वे बच्चे को उठाने या सहायता करने के स्थान पर अपनी जान बचाने के लिए भाग निकले। पकड़े तो न गये, पर बच्चे का दुःख और लँगड़े होने के कारण उत्पन्न कठिनाइयों की बात उन्हें सदा दुःख देती रही और वह मानसिक पाप उनके लिए पैर का दर्द बनकर सामने आया। लँगड़े-लूलों की सेवा के लिए एक संस्था को बड़ा योगदान देने पर उनका कष्ट दूर हो गया।
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डर उसे लगता है जो अँधेरे में भटकता है। अनिश्चितता और आशंका का सम्मिश्रित स्वरूप ही भय है। जहाँ सुनिश्चितता हो-स्पष्टता हो-वहाँ भय लगने का कोई कारण नहीं।
भय के कारण ही मनुष्य उद्विग्न रहता है। अमुक व्यक्ति या अमुक परिस्थिति अथवा अमुक सम्भावना हमारी अमुक प्रकार की हानि करेगी-इस आशंका को बढ़े-चढ़े रूप में देखने से हमें एक भयानक संकट सामने खड़ा दीखता है। मस्तिष्क की संरचना विचित्र है। वह अन्तरंग की मान्यताओं की पुष्टि करने में एक के बाद एक तर्क प्रस्तुत करता चला जाता है। पहले जो आशंका या सम्भावना की कल्पना मात्र थी वह पीछे मस्तिष्क की कसरत द्वारा बढ़ा-चढ़ाकर इतने भयंकर रूप में गढ़ ली जाती है मानों वह यथार्थता ही हो। दूसरों की सामान्य गतिविधियाँ भी ऐसी लगती हैं मानों वे अपने अनर्थ के लिए जान-बूझकर की गई दुरभिसंधियाँ ही हों। कुकल्पनाएँ तिल को ताड़ बनाती चलती हैं और हमें विभीषिकाओं के ऐसे भयानक जंगल में ले जा कर अकेला छोड़ देती हैं जहाँ अनर्थ और संकट के भूत-पिशाच नृत्य कर रहे होते हैं।
कल्पना की- मान्यता की- शक्ति अद्भुत है। उसे निषेधात्मक दिशा में चलने दें तो फिर विपत्ति की घटाएँ ही इर्द-गिर्द घुमड़ती रहेंगी। भले ही वे कुकल्पनाएँ कभी भी साकार न बन सकें, पर डराते रहने के लिए तो उनका अवास्तविक अस्तित्व ही पर्याप्त है।
चिन्तन की दिशा मोड़ कर यदि मान्यताओं को शुभ सम्भावनाओं की दिशा में चलने के लिए प्रोत्साहित करें-विधेयात्मक चिन्तन का अभ्यास करें-तो प्रतीत होगा कि अपने लिए देवता लोग दिव्य वरदानों के उपहार लिए सामने खड़े हैं और आकाश से अब अपने ऊपर पुष्प वर्षा होने ही वाली है। उज्ज्वल भविष्य के प्रति यदि आशा और आस्था संजोई जाय तो मस्तिष्क उस सम्भावना के समर्थन में अनेकानेक तर्क कारण, उदाहरण प्रस्तुत करेगा और भावी घटनाक्रम का ऐसा सुनहरा चित्र उपस्थित करेगा मानों वह सब अगले ही दिनों मूर्तिमान होने जा रहा हो। इस सुखद पृष्ठभूमि के सहारे हमें सदा प्रमुदित रहने का अवसर मिलता रहेगा, भले ही वे सुखद कल्पनाएँ कभी भी वास्तविकता न बन सकें।
वस्तुतः घटनाएँ छोटी होती हैं और उनकी वास्तविक प्रक्रिया अत्यन्त तुच्छ और क्षणिक होती है। यह संसार ऐसे ही अपने ढर्रे पर चल रहा है। क्षति की पूर्ति दूसरे ही क्षण हो जाती है और हर चमक क्षणभर उपराँत भूतकाल के गर्त में विलीन हो जाती है। इसलिए कोई भी घटना न तो अपने वास्तविक रूप में अत्याधिक प्रभावशाली होती है और न कोई बहुत बड़ी प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। संसार चक्र बड़ी सरलता से अपनी धुरी पर घूमता रहता है। यहाँ कोई भी बात महत्वपूर्ण नहीं। न किसी उपलब्धि का बहुत बड़ा लाभ है और न किसी क्षति के कारण कहीं किसी पर वज्रपात होता है। महत्व केवल कल्पनाओं का है। वे ही हमें बेतरह डराती हैं अथवा उन्हीं का चक्र हमारी मनोभूमि को सुखद सम्भावनाओं के सपने दिखाकर आनन्द विभोर रखे रहता है।
विवाह होने पर पत्नी कितनी मनोरम मिलेगी-उसके साथ गृहस्थ जीवन कितना सुखद बीतेगा यह कल्पना विवाह के प्रति उत्सुकता और आकांक्षा में चमक उत्पन्न करेगी। जब तक विवाह न होगा मन बहुत ही उल्लसित रहेगा, पर विवाह होने के कुछ दिन उपरान्त ही प्रतीत होने लगेगा कि सामान्य रूप से एक ढर्रा चल पड़ा। सुनहरी कल्पनाएँ अपने लोक को चली गईं। हर किसी का गृहस्थ ऐसे ही एक ढर्रा बन कर रह जाता है। किन्तु यदि वे पति-पत्नी भविष्य में अधिक सुखद स्थिति की कल्पना गढ़ने लगें तो फिर नये सिरे से आनन्द की एक लहर मन में उठने लगेगी। पुत्र उत्पन्न होगा यह सुनहरी सपना जितना आकर्षक होता है उससे हजारवाँ भाग भी पुत्र प्राप्ति का परिणाम सुखद नहीं होता। बेटा इतनी समस्याएँ साथ लेकर आता है कि पूर्व कल्पना सर्वथा निरर्थक प्रतीत होती है। इतने पर भी यदि नये सिरे से यह सोचने लगें कि बड़ा होने पर यह हमारी अमुक प्रकार सेवा सहायता करेगा तो भरण-पोषण की कष्ट साध्य प्रक्रिया के रहते हुए भी शिशु पालन फिर एक सुखद क्रिया-कलाप बन जायेगा।
इन्द्रियाँ लिप्सा का अधिकाँश आनन्द उसकी पूर्व कल्पना तक सीमित रहता है। अमुक दिन अमुक दावत में अमुक प्रकार के व्यंजन मिलेंगे उनका कल्पित स्वाद जितना मधुर होता है उतना उन व्यंजनों के सामने आने पर नहीं रहता। रहता भी है तो वह कुछ ही क्षणों में भूख शान्त होने पर पूरी तरह समाप्त हो जाता है। यहाँ तक कि आग्रह करने पर भी यही बात है। रमणी की स्वप्निल कल्पनाएँ ही उत्तेजना प्रदान करती हैं, रमण की कल्पना ही उद्विग्न करती हैं। यौनकर्म तो कुछ ही क्षणों में निस्सार और थकान भरा अनुभव होने लगता है।
एम॰ ए॰ की डिग्री जब तक नहीं मिली है उन सपनों की तुलना यदि डिग्री को शीशे में मढ़कर कमरे में टाँग देने की मनःस्थिति के साथ करें तो प्रतीत होगा कि एक गहरा नशा उतर गया और कुछ ऐसा अद्भुत परिणाम सामने नहीं आया जैसा कि शिक्षण अवधि में वर्षों तक सोचते रहा गया था।
चुनाव जीतने के बाद प्रतीत होता है कि लोक सम्मान के आकाश में उड़ने की रंगीनी बेकार थी। एम॰ एल॰ ए॰ बन जाने और मामूली अध्यापक का पद पा जाने में कोई बहुत बड़ा अन्तर नहीं था। लोग अपने काम में व्यस्त हैं, अपनी समस्याओं में उलझे हैं, उन्हें इतनी फुरसत कहाँ है कि किसी के चुनाव जीतने पर उसे आकाश में उड़ने वाला देवता मानने और उसके गुण गाते रहने में ही लगे रहें। जीत का समाचार छपने के कुछ ही समय बाद सब कुछ विस्मृत हो जाता है और विजेता ऊँची गरदन करके चलता तो है, पर देखता है उसकी इस विजय में किसी को कोई दिलचस्पी नहीं है। जीत का सम्मान एक कल्पना मात्र था। काम निकालने के लिए तो लोग पत्थर के पास भी जाते हैं। छोटे चपरासी की भी खुशामद करते हैं, चुनाव जीते व्यक्ति के पास भी जा टकरायें तो उसमें क्या बड़ी बात हो गई?
विवाह-शादियों में अनाप-शनाप पैसा खर्च करने वाले सोचते हैं कि हमारी धाक जमेगी और शान बढ़ेगी, पर वस्तुस्थिति यह है कि इस बेकार की बदतमीज़ी को गौर से देखने तक के लिए किसी का मन नहीं होता। चापलूस लोग तो मुँह देखकर किसी की भी बढ़ाई कर सकते हैं। इसी प्रकार सजधज बनाने वाले-ठाट-बाट रोपने वाले अपनी कष्ट उपार्जित कमाई को न जाने क्या-क्या सोचकर बेकार की चीजों में खर्च करते हैं, पर पीछे जब वे बारीकी से देखते हैं तो पता चलता है कि दर्शकों को इसमें तनिक भी रुचि नहीं है। कौतूहलवश रास्ता चलते कोई ऐसे ही तनिक आँखें उठा कर देख ले तो बात दूसरी है।
यह विधेयात्मक विचारों की बात हुई, निषेधात्मक विचारों के आधार पर गढ़ी गई कुकल्पनाओं की भयंकरता भी वस्तुतः अवास्तविक ही होती है। यदि आशंकित दुर्घटना घट भी जाय तो भी उससे कोई पहाड़ नहीं टूटता। परिवर्तन के समय कुछ अड़चन तो जरूर पड़ती है, पर कुछ ही समय बाद दूसरी स्थिति उसका स्थान ग्रहण कर लेती है और क्षति-पूर्ति का नया रास्ता निकल आता है। पिता के मर जाने पर सारा बोझ अपने कन्धे पर आ जायेगा और वह सँभाल न सकेगा-ऐसी कल्पना करके डरते रहने वाले पिता के मरने पर देखते हैं कि वैसी कोई आपत्ति खड़ी नहीं हुई। थोड़ी अड़चन के बाद ढर्रा नये ढंग से चलने लगा। पति-पत्नी, पुत्र, भाई आदि के मरने की बात सोचते ही कलेजा काँपता था और लगता था कि इस क्षति को सहन न किया जा सकेगा किन्तु उनके मरने के बाद भी कोई वज्रपात नहीं होता। थोड़ी हलचल और उथल-पुथल के बाद गाड़ी दूसरी पटरी पर चलती रहती है और उस अभाव को सहन करने अथवा दूसरे ढंग से उस पूरा करने को रास्ता निकल आता है।
प्रचलित मान्यता यह है कि पति-पत्नी के बीच दाम्पत्य प्रेम में किसी तीसरे को सम्मिलित नहीं होना चाहिए अन्यथा प्रेम बँट जायेगा और अनर्थ उपस्थित होगा। किन्तु उत्तर प्रदेश के देहरादून जिले में जौनसार बाबर इलाके में बहु-पति प्रथा का प्रचलन बहुत ही शान्ति पूर्वक चलता है। बड़े भाई का विवाह होता है, शेष सभी भाई उसी पत्नी का हिल-मिल कर उपभोग करते हैं। इसमें न स्त्री को आपत्ति होती है न पति को। परिवार न बंटने देने, संयुक्त कुटुम्ब बना रहने और अर्थव्यवस्था सही रहने की दृष्टि से वे लोग इस प्रचलन की गर्व पूर्वक उपयोगिता सिद्ध करते हैं। ठीक इसी तरह अफ्रीकी स्त्रियाँ अपने पतियों पर दबाव डालती हैं कि कई अन्य पत्नियाँ और लाई जायँ ताकि परिवार का काम मिलजुल कर अच्छी तरह चले और अर्थव्यवस्था सुधरे। जो पति वैसा नहीं कर पाते उन्हें छोड़ कर वे स्त्रियाँ उनके यहाँ चली जाती हैं जिनके यहाँ पहले से ही कई पत्नियाँ रह रही होती हैं। अकेलेपन की अपेक्षा वे इस तरह निर्वाह को कहीं अधिक सुविधाजनक मानती हैं।
यह सब कल्पनाओं को मोड़ने भर का खेल है। भविष्य की आशंका एवं सुखद संभावना का विचार करते हुए सुख और दुःख में अपना जीवन बीतता है। वास्तविकता तो नगण्य ही होती है और उसकी प्रतिक्रिया इतनी स्वल्प होती है जिसे तुच्छ अथवा उपेक्षणीय कहा जा सके। दूसरों को शत्रु मानते रहने की अपेक्षा यह कहीं अधिक लाभदायक है कि उन्हें मित्र मान कर चलें। भले ही इसमें कुछ हानि ही क्यों न उठानी पड़े।
निर्धन लोगों की कल्पना में धनी बनने की स्थिति बहुत सुखद होती है और वे इसके लिए बहुत प्रयत्न करते हैं, किन्तु जो धनी हैं वे इस स्थिति के साथ जुड़ी हुई समस्याओं में न उलझ कर अपना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य खो बैठते हैं। इतना ही नहीं साधु जीवन की महत्ता मन में जम जाय तो सारे सुविधा साधन छोड़कर अभावग्रस्त तपस्वी जीवन क्रम अपनाने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं। सन्तान के न होने पर दुःखी रहने वाले लोगों की कमी नहीं और ऐसे भी बहुत हैं जो सन्तान के दुर्व्यवहार से खिन्न होकर आत्महत्या तक कर बैठते हैं। सुख क्या है? दुःख क्या है ? इसका माप-दंड यही है कि हमारी कल्पना यदि सुखद सम्भावनाओं को साथ लेकर चलती रहे तो मनुष्य हर स्थिति में सुखी रहेगी और यदि उसकी कल्पनाएँ और आशंकाएँ दुर्घटनाओं के भयानक चित्र गढ़ने में लगी रहें तो उसके लिए हर घड़ी दुःखी बने रहने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं है।
सुख साधनों को बाहर तलाश करना भी उचित है और सुविधाजनक वस्तुएँ तथा परिस्थितियाँ प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करना भी आवश्यक है। पुरुषार्थ की सार्थकता के लिए प्रगतिशील होना चाहिए और इसलिए अधिक साधनों का उपार्जन करना चाहिए। किन्तु यह भूलना नहीं चाहिए कि सुख साधन कितनी ही बड़ी मात्रा में सम्पादित क्यों न कर लिए जाएं यदि चिन्तन की धारा निषेधात्मक रहेगी तो उसकी गढ़ी हुई विभीषिकाएँ हमें हर घड़ी नरक में डुबोये रहेंगी। व्यक्ति डरावने लगेंगे और आशंकाएँ शूल भौंकने जैसे कष्ट प्रदान करती रहेंगी। इस नरक से और कोई हमें बचा नहीं सकता क्योंकि यह अपने द्वारा ही विनिर्मित किया गया है। यदि चाहें तो हम स्वयं ही इस स्थिति से उबर सकते हैं और सामने खुले पड़े स्वर्ग द्वार में प्रवेश कर सकते हैं।
सुखद कल्पनाएँ, सुसम्भावनाएँ, उज्ज्वल भविष्य की रेखाएँ जोड़कर सुखद भविष्य का सुनहरा चित्र गढ़ा जा सकता है और मात्र उन आस्थाओं के आधार पर अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी प्रसन्न, प्रमुदित रहते हुए जिया जा सकता है। कुकल्पनाओं की भयंकरता भी कहाँ शत-प्रतिशत सही उतरती है। उन आशंकाओं में से अधिकाँश निर्मूल ही सिद्ध होती हैं। यदि सुकल्पनाएँ मूर्तिमान न हो सके, वे आकाश कुसुम बनकर ही रह जायँ तो भी लाभ उन्हीं के सँजोये रहने में है। जब चिन्तन की दिशा ही मानव जीवन की अनुभूतियों का आधार है तो फिर अँधेरे में भटकाने वाले चित्र गढ़ने की अपेक्षा उज्ज्वल आलोक का आह्वान करने के लिए ही अपने आपको तैयार क्यों न करें?
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आपके प्रति यदि कोई व्यक्ति अनुचित व्यवहार करे और निन्दा, आलोचना करे तो इसमें सभी दोष उसका ही नहीं है। आप स्वयं भी दोषी हैं। आप भी तो किसी की तनिक-सी भूल पर हँसते हैं, आप भी दूसरे की गलती और भूल पर व्यंग्य और आलोचना करते हैं। पहले अपनी गलती और भूलों को देखें और दूसरों के दोष ढूंढ़ने का प्रयत्न न करें। अगर किसी को अपनी बात मनवानी है तो भी अशिष्ट या कटु-व्यवहार का आश्रय लेना ठीक नहीं रहता। इससे दूसरे के आत्माभिमान को चोट लगती है, जिसकी प्रतिक्रिया भी कटु होती है। उसी बात को स्नेह और आत्मीयतापूर्वक कहें तो आपके सम्बन्ध भी अच्छे बने रहते हैं और आपकी बात मान ली जाती है।
हमें अपना दृष्टिकोण संघर्षमय न बनाकर रचनात्मक बनाना चाहिए। मनुष्य चाहे तो अपने स्वभाव को थोड़ा प्रयत्न करके आसानी से सुधार सकता है। दूसरों को दुर्बुद्धि, उजड्ड और विद्वेषी बताने की अपेक्षा अच्छा है कि आप स्वयं ही आपको मिलनसार बनायें। औरों में दोष देखने का प्रयत्न न करें, साथ ही अपनी उदारता, सहनशीलता और दूरदर्शिता जैसे सामाजिक गुणों का विकास करते रहें जब कभी कोई अशुभ परिस्थितियाँ और कठिनाइयाँ आवें तो पहले अपने दोषों को भी देख लिया करें।
सैद्धान्तिक जीवन के प्रति लोगों की भावनाएँ कितनी ही ऊँची क्यों न हों यदि व्यावहारिक जीवन शुद्ध और सतर्क नहीं है तो उससे मनुष्य को कोई आन्तरिक सन्तोष नहीं मिलेगा। व्यावहारिक आचरण व्यक्त होता है, इसलिए लोगों पर अधिक प्रभाव पड़ता है। किसी के अन्तःकरण में क्या छिपा है, इसे कोई नहीं जानता। बाह्य अभिव्यक्ति के आधार पर ही एक व्यक्ति दूसरे की भावनाओं का अन्दाज लगाता है। बुराई चाहे कितनी भी छोटी क्यों न दिखाई देती हो-परन्तु यह न भूल जाना चाहिए कि उसके परिणाम बहुत गम्भीर भी हो जाते हैं। शराब पीना एक साधारण सी बात हुई, परन्तु नशा चढ़ने पर मारपीट सम्बन्धी झगड़ों का कितना बड़ा झंझट खड़ा हो जाता है।
बच्चे द्वारा पैसे चुराने की बात पर ध्यान न देने पर, बड़े होने पर, वही बालक बड़ी-बड़ी चोरियाँ करने लगता है मामूली-सी कब्ज बढ़कर छोटी-बड़ी बीमारियों का रूप धारण कर लेती है। छोटा-सा फोड़ा घाव बन जाता है। मनुष्य जीवन बहुत बहुमूल्य है। जीवन की घड़ियाँ गिनी-चुनी हैं। इसका सच्चा सदुपयोग आत्म-विकास है। अपने आपको बुराइयों से बचाकर गुणवान बनाने का कल्याणकारी मार्ग अपनाना चाहिए। अच्छाइयों का एक-एक तिनका चुन-चुनकर जीवन-भवन का निर्माण होता है, पर बुराई का एक हल्का झोंका ही उसे मिटा डालने के लिए पर्याप्त होता है।
महत्वाकाँक्षी व्यक्ति अपने लिए विशेष लाभ भले ही प्राप्त कर लेते हों, पर जन-समाज के लिए वे संकट रूप ही बने रहते हैं। वित्तेषणा, पुत्रेषणा और लोकेषणा की तृष्णा, वासना की अहंता से-क्षुब्ध हुए मनुष्य उन पागलों का रूप धारण कर लेते हैं जो न स्वयं चैन से रहते हैं और न दूसरों को चैन से रहने देते हैं। तृष्णा तो हर सफलता के बाद आग में घी डालने की तरह बढ़ती जाती है। इसलिए जिन्हें निरन्तर लालसाओं, कामनाओं की आग में झुलसना हो, उन्हीं को अपनी मनोभूमि में जीवित चिता सँजो लेनी चाहिए।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण सन्तोष का दृष्टिकोण है। उसमें हर व्यक्ति को धैर्य और औचित्य के साथ-साथ प्रगति करने की छूट है, पर जन-साधारण के माध्यमिक स्तर से ऊपर बढ़ने का निषेध है। हमें अपनी प्रगति के साथ दूसरे की प्रगति का भी ध्यान रखना चाहिए। महात्मा बुद्ध जब मरने लगे, तब उनसे पूछा गया कि क्या आपको मृत्यु के बाद स्वर्ग या मुक्ति की प्राप्ति होगी? तो उन्होंने हँसकर कहा-‘जब तक एक भी व्यक्ति संसार के बन्धन में बँधा हुआ है तब तक मैं अपने व्यक्तिगत सुख की आकाँक्षा की कामना नहीं कर सकता। मैं बार-बार जन्म लूँगा और मनुष्य तथा हर प्राणी को अपने स्तर का बनाने के लिए सृष्टि के अन्त तक प्रयत्न करता रहूँगा।’ यही है आध्यात्मिक साम्यवाद।
व्यक्ति को क्षमता और प्रतिभा ईश्वर ने इसी उद्देश्य से दी है कि अपने से पिछड़े हुए लोगों को कम से कम अपने स्तर तक ऊपर उठाने का प्रयत्न करें। भारतीय संस्कृति का भी यही आदर्श है कि मनुष्य अपनी भौतिक सुख-सुविधाएँ बढ़ाने की अपेक्षा, अपनी सामर्थ्यानुसार दूसरों को सुखी बनाने का प्रयत्न करें। जिसने दौलत! दौलत!! दौलत!! की रट लगा रखी हो और जो इसी गोरखधन्धे में मकड़ी के जाले की तरह दिन-रात उलझा हुआ ताना-बाना बुनने में लगा हुआ हो, उसे इतनी फुरसत नहीं मिलेगी, जो अपने से गिरे हुए व्यक्तियों को उठाने की बात सोचे और आदर्शवादी जीवनयापन करते हुए अपने को संयमी और सीमित रखकर दूसरों को सुखी और सन्तुष्ट बनाने के लिए कोई साहसी कदम उठा सके।
असन्तोष भी सराहनीय हो सकता है, पर वह होगा तभी जब उसका उपयोग जाति-कल्याण, साधना, संयम, सेवा, ज्ञान-बुद्धि और परमार्थ जैसी दैवी-सम्पदाओं को बढ़ाने के लिए हो। आसुरी सम्पदाएँ बढ़ाने का असंतोष तो जितना ही बढ़ेगा-उतनी ही अशान्ति उत्पन्न करेगा। संघर्षों की जड़ यही है। अधिकारों के लिए सभी जागरुक हैं-कर्त्तव्यों की किसी को चिन्ता नहीं। जिन्हें हर घड़ी तृष्णा सताती रहती है, वे उद्विग्न प्रेत, पिशाच की तरह इस मरघट से उस मरघट में भटकते रहते हैं। ये अभागे अपनी ही हीनता के मारे मर रहे हैं, अपनी ही अतृप्ति से दुःखी बने हुए हैं। भला इनके द्वारा किसी दूसरे का क्या हित-साधन हो सकता है?
थोड़ा त्याग करके बहुत यश लूटने की लिप्सा लोगों में देखी जाती है। अखबारों में नाम और फोटो छपाने के लोभ में कई लोग सत्कर्मों का बहाना करते रहते हैं। यश मिलने की शर्त पर ही थोड़ी उदारता दिखाने वाले लोग बहुत होते हैं। परन्तु दया, करुणा, त्याग और परमार्थ की भावनाओं को चरितार्थ करने की महत्वकाँक्षाएं ही सच्ची और श्रेयस्कर महत्वाकाँक्षाएँ कही जा सकती हैं। दैवी सम्पदाएँ, सत्प्रवृत्तियाँ ही वह आध्यात्मिक विभूतियाँ हैं जिन्हें पाकर मनुष्य स्वयं भी आनन्द और सन्तोष लाभ करता है और अपने समीपवर्ती समाज के भी सुख-शान्ति का आनन्द देता है। व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं के पागलपन ने दुनिया का अनर्थ ही किया है पाप और विनाश को ही बढ़ाया है, इन्हें त्यागा ही जाना चाहिए।
संसार में कोई किसी को उतना परेशान नहीं करता जितना कि मनुष्य के अपने दुर्गुण और दुर्भावनाएँ। सबसे दुर्गुणी व्यक्ति दुर्व्यसनी होता है। दुर्व्यसन मनुष्य के शारीरिक तथा मानसिक दोनों प्रकार के स्वास्थ्यों का शत्रु होता है। शराब, जुआ, व्यभिचार ही नहीं बल्कि आलस्य, प्रमाद, पिशुनता आदि भी भयानक दुर्व्यसन ही हैं।
सद्गुणी व्यक्ति का सारा समाज आदर करता है। सहयोग, सौहार्द्र एवं सहानुभूति उसकी सम्पत्ति बन जाती है। वह सदैव स्वस्थ और सुखी रहता है।
मनुष्य कुसंस्कारों का गुलाम हो जाय, अपने स्वभाव में परिवर्तन न कर सके, यह बात ठीक नहीं जंचती। यह मनुष्य के संकल्प, बल और विचारों के दृष्टिकोण को समझकर कार्य करने पर निर्भर है। महर्षि वाल्मीकि, सन्त तुलसीदास, भिक्षु अंगुलिमाल, गणिका एवं अजामिल के प्रारम्भिक जीवन को देखकर आखिरी जीवन से तुलना करने तर यह स्पष्ट ही प्रतीत हो जाता है कि - दुर्गुण और पतित लोगों ने जब अपना दृष्टिकोण समझा और बदला तो वे क्या से क्या हो गये? चाहिए संकल्प बल की प्रबलता।
जब तक हम अपने गुण और दोष देखने में ईमानदार और सच्चा दृष्टिकोण नहीं अपनाते, संस्कार परिवर्तन में तभी तक परेशानी रहती है। मनुष्य आत्म-दुर्बल तभी तक रहता है, जब तक वह आत्म-विवेचन का सच्चा स्वरूप ग्रहण नहीं करता।
अतः जब कभी दुर्गुण और दुर्भाव उठें, उन्हें उस समय सत्कार्यों और सत्प्रवृत्तियों के मुकाबले तोलकर सद्कार्यों की ओर लग जाना चाहिए।
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किसके पास क्या वस्तु कितनी मात्रा में है, इसका कोई विशेष महत्व नहीं। महत्व इस बात का है कि जो उपलब्ध था उसका उपयोग किस प्रकार किया गया ? समझा जाता है कि यदि अभीष्ट वस्तुओं की पर्याप्त मात्रा होगी और प्रचुर साधन उपलब्ध होंगे तो अधिक सुखी रहने एवं अधिक उन्नति करने का अवसर मिलेगा। गहराई से विचार करने पर यह मान्यता सही सिद्ध नहीं होती। जिनके पास प्रचुर अर्थ साधन मौजूद हैं, उनमें से भी अधिकाँश शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से पिछड़े हुए-चिन्तित, खिन्न, उद्विग्न दिखाई पड़ते हैं। इसके विपरीत कितने ही स्वल्प आजीविका वाले व्यक्ति शरीर और मन की दृष्टि से कहीं अधिक विकसित होते हैं। परिवार प्रगति के लिए भी वे आवश्यक साधन जुटाये रहते हैं। इसका एकमात्र कारण है कि उनके द्वारा उपलब्ध साधनों का सतर्कतापूर्वक सदुपयोग किया जाता है, उसका छोटा अंश भी वे बर्बाद नहीं करते।
हमारी सम्पत्ति का अधिकाँश भाग अनर्थ में या व्यर्थ में नष्ट होता रहता है। सार्थक व्यय तो बहुत थोड़ी मात्रा में हो पाता है। शरीर यात्रा के लिए उपयुक्त भोजन ही यदि तलाश किया जाय तो वह सस्ता पड़ेगा और सुलभ रहेगा। असह्य ऋतु प्रवाह से शरीर की रक्षा करने के लिए थोड़े से कपड़ों की जरूरत पड़ती है। इसमें बहुत खर्च नहीं पड़ना चाहिए। जीभ के चटोरेपन को पूरा करने के लिए अन्ट-सन्ट व्यंजन बनाने में ही बहुत-सा पैसा खर्च होता है और समय लगता है। तरह-तरह की डिजाइन के कीमती कपड़े ही खर्चीले पड़ते हैं। सस्ते दाम के और सीधी-सीधी सिलाई के कपड़ों से शरीर सभ्य सुरक्षा का प्रयोजन पूरा कर सकते हैं। पर देखा जाता है कि बहुत से लोग इन्हीं बातों पर इतना पैसा खर्च करते हैं जिसका आधा भाग सहज ही बचाया जा सकता है। उस बचत को पारिवारिक शिक्षा, ज्ञान सम्पादन, आरोग्य वृद्धि जैसे कार्यों में यदि व्यवस्थापूर्वक लगाया गया होता तो दुहरा लाभ होता। एक तो जीभ का चटोरापन पेट को खराब करके अनेक बीमारियों का जनन न करता और दूसरे भड़कीली फैशन बनाने का बचकानापन अन्य कार्यों में अपव्ययों की आदत न डालता। स्पष्ट है कि अनावश्यक सज-धज मनुष्य को ओछा, उथला एवं बाल-बुद्धि का सिद्ध करती है। उसमें उद्धत अहंकार के मोटे प्रदर्शन का भाव प्रकट होता है।
चटोरेपन और उद्धत प्रदर्शन के पीछे एक अत्यन्त भयावह पतनोन्मुखी विभीषिका झाँकती है-वह है अव्यवस्था। धन किस कार्य में कितना खर्च किया जाय और किस प्रकार सन्तुलित बजट बनाया जाय इस समस्या का समाधान करने में दूरदर्शी विवेकशीलता की आवश्यकता पड़ती है। इसके सन्तुलित, सुस्थिर एवं विवेचनात्मक दृष्टिकोण चाहिए। लिप्साओं में आतुर लोगों के पास इस स्तर का विवेक नहीं होता, अस्तु वे आवश्यक और अनावश्यक का, उपयोगी-अनुपयोगी का, भेद भूल जाते हैं और बाल-बुद्धि जिधर भी घसीट ले जाती है उधर ही हवा में उड़ने वाले पत्तों की तरह बहते चले जाते हैं।
पैसे से भी अधिक महत्वपूर्ण सम्पत्ति है-समय। खोया हुआ पैसा फिर पाया जा सकता है, पर खोया हुआ समय फिर कभी लौटकर नहीं आता। जो क्षण एक बार गये वे सदा के लिए गये। धन मनुष्य कृत और समय ईश्वर प्रदत्त सम्पत्ति है। समय को यदि बर्बाद न किया जाय उसे योजनाबद्ध दिनचर्या के साथ पूरी तत्परता और सजगता के साथ खर्च किया जाय तो सामान्य मनुष्यों की अपेक्षा कई गुना अधिक और कई गुना ऊँचे स्तर का काम किया जा सकता है। संसार के महापुरुषों एवं प्रगतिशील मनुष्यों की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि उन्होंने अपनी एक-एक मिनट को हीरे-मोतियों से तोला है और पूरी सतर्कता के साथ उनका उपयोग किया है। खाली बैठना या मन्द गति से काम करना मोटी दृष्टि से अति सामान्य दोष मालूम देता है, पर गहराई से विचार करने पर प्रतीत होता है कि यही सबसे बड़ा आत्मघाती दोष है। जिसमें यह आलस्य और प्रमाद के दुर्गुण जितनी मात्रा में घुस गये होंगे उसकी प्रगति उतने ही अंश में समाप्त हो गई समझनी चाहिए। ढीला-पोला मनुष्य वस्तुतः अपंग अथवा मृत कहने योग्य ही होता है। नोटों की गड्डी में आग लगाना बौर समय को निरर्थक कामों में नष्ट करना दो प्रकार के दृश्य हो सकते हैं, पर दोनों के आत्मघाती परिणाम एक जैसे हैं। मन्द गति से, अस्त-व्यस्त ढंग से, मनमौजी रीति से समय को नष्ट करना अपने उज्ज्वल भविष्य को अन्धकारमय बनाने का प्रत्यक्ष प्रयास है।
वस्तुओं का सही और पूरा उपयोग किया गया या नहीं। यह प्रश्न व्यवस्था वृद्धि के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ा रहता है। हर पदार्थ से पूरा-पूरा लाभ उठा लिया जाय, उसका तनिक भी उपयोग सम्भावना की उपेक्षा न की जाय तो हर पदार्थ दूना लाभ दे सकता है, अथवा आधे मूल्य में खरीदा हुआ सिद्ध हो सकता है। चूल्हे में जलने वाली लकड़ी अक्सर बाहर तक जलती रहती है और तवा गरम करने अथवा रोटी सेंकने में तनिक भी सहायता नहीं करती। कुशल गृह-लक्ष्मी को इस बर्बादी का ध्यान रहता है वे चूल्हे से बाहर तक बढ़ती आ रही आग को पानी डाल-डालकर बुझाती रहती हैं, इस प्रकार बहुत-सी लकड़ी बर्बाद होने से बच जाती है। असावधान महिलाएँ भोजन बनाने के बाद चूल्हा ऐसे ही पड़ा रहने देती है और जो लकड़ी शेष रह गई थी वह ऐसे ही जल जाती है। कुशल गृहिणी अधजले लकड़ी के टुकड़े बुझाकर एक ओर रख देती है और कोयलों को बीनकर ठण्डा कर लेती है। यह कोयले अँगीठी में काम आते हैं और अधजली लकड़ी दूसरी बार काम में आ जाती है। गरम चूल्हे पर पानी चढ़ाया जा सकता है और उसमें जरा-सा सोडा डालकर अधिक मैले कपड़े भिगोये, धोये जा सकते हैं। इस प्रकार चूल्हें की गर्मी का भी उपयोग हो सकता है। चूल्हे के पिछले भाग में सुराख करके उसमें जाने वाली गर्मी से दूसरी पतीली पकाई जा सकती है। जलाऊ लकड़ी गीली हो तो उसे धूप में रखकर सुखाया जा सकता है। इससे उसमें कीड़े होंगे तो वे भी निकल जायेंगे। लकड़ी का प्रसंग एक सामान्य-सा उदाहरण है। इस व्यवस्था बुद्धि को घर के हर पदार्थ के साथ जोड़ा जा सकता है। टूटे-फटे कपड़े, टूटे-फूटे बर्तन, फर्नीचर आदि की मरम्मत में दिलचस्पी रखी जाय तो वे ही वस्तुएँ दूने समय तक उपयोग में आ सकती हैं। जबकि लापरवाह व्यक्ति जरा-सा पुरानापन या टूट-फूट देखकर उन वस्तुओं को ऐसे ही कूड़े की तरह फेंककर नष्ट कर देते हैं। आर्थिक दृष्टि से यह प्रत्यक्ष ही बहुत घाटा देते रहने वाली आदत है। एक-एक बूँद पानी रिसते रहने से घड़ा खाली हो जाता है। अनेक कामों में इस प्रकार की थोड़ी-थोड़ी बर्बादी होती रहे तो भी उन सबका मिला-जुला परिणाम बहुत भारी हो जाता है। देखने में तुच्छ प्रतीत होने वाली यह उपेक्षा की आदत अन्ततः बहुत हानिकारक सिद्ध होती है। यह अनावश्यक एवं अप्रत्यक्ष खर्च कई बार इतना बढ़ा-चढ़ा होता है कि घर की आधी कमाई प्रायः इसी सूराख में होकर बह जाती है। ऐसे परिवार सदा आर्थिक तंगी का-दरिद्रता का रोना रोते हुए मिलेंगे।
हर पदार्थ का सही और पूरा उपयोग करने की आदत मात्र से घर की आर्थिक स्थिति पर बहुत असर पड़ता है। जो लोग बहुत अमीर हैं उनके ऊपर असावधानी के कारण होने वाले अपव्यय का बहुत असर नहीं पड़ता, पर गरीब या मध्यवर्ती स्थिति के लोगों का तो कचूमर ही निकल जाता है। स्त्रियों को गृह-लक्ष्मी कहा गया है। यह शब्द उन्हीं के लिए सार्थक होता है जिनकी व्यवस्था बुद्धि सुविकसित है। जो समय, श्रम, मनोयोग एवं वस्तुओं का पूरा उपयोग करना जानती है, उनकी इस तत्परता का प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है। प्रत्यक्ष परामर्श देकर अथवा परोक्ष रूप से अनुकरण का आधार प्रस्तुत करके वे बच्चों को बड़ों को ऐसी ही आदत डाल सकती है। यह धन की समय की बर्बादी रोकना ही नहीं एक अत्यन्त महत्वपूर्ण गुण के अभ्यास में उतारना है जिसके आधार पर मनुष्य बड़े-बड़े उत्तरदायित्वों का सफलतापूर्वक निर्वाह कर सकता है। व्यवस्था बुद्धि को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सफलता प्रस्तुत करने वाली विभूति कह सकते हैं। जिसने इसे पा लिया समझना चाहिए कि उसे उज्ज्वल भविष्य का बहुत बड़ा आधार मिल गया।
समय का विभाजन, कार्य-पद्धति का निर्धारण, वस्तुओं का यथास्थान स्थापन व्यवस्था बुद्धि का सहज गुण है। जो साधन उपलब्ध हैं उनका अधिक से अधिक मात्रा में, अधिक से अधिक क्या उपयोग हो सकता है ? इसकी समूची कल्पना करते हुए एक सुव्यवस्थित क्रिया-कलाप बनाना जो जानता है वही व्यवस्थापक का गौरवपूर्ण पद पा सकता है। शासन सत्ता में गवर्नर का पद बहुत ऊँचा है। गवर्नर का अर्थ है-व्यवस्थापक जिसे व्यवस्था बनाना आता है समझना चाहिए कि इसे बहुत कुछ आता है। परिवार में कई व्यक्ति होते हैं उन सब में अपने-अपने ढंग की योग्यताएं, विशेषताएं, क्षमताएं होती हैं। उन्हें जंग न खा जाय अतः आवश्यक है हर व्यक्ति की योग्यताओं को सक्रिय रहने का अवसर मिलता रहे। अस्तु बाल-वृद्ध नर-नारी हर किसी को उनकी स्थिति और योग्यता के अनुरूप काम मिलता रहे-कोई अनावश्यक रूप से ठाली न बैठने पाये इसकी योजनाबद्ध व्यवस्था सोचनी और कार्यान्वित करनी चाहिए। इससे दुहरा लाभ है परिवार को उस श्रम के आधार पर अधिक प्रगतिशील होने का अवसर मिलेगा और कार्य संलग्न व्यक्तियों में श्रमशीलता का एक अत्यन्त उपयोगी गुण विकसित होगा।
कारखानों में कितने ही व्यक्ति काम करते हैं। उनके समय, श्रम एवं योग्यता को यथास्थान फिट करने की क्षमता जिस मैनेजर में होगी उसका कारखाना उतना ही सफल चलेगा। इसके विपरीत जो मनुष्यों की क्षमता को ठीक तरह नियोजित नहीं कर पाता वह लाभदायक उद्योग करते हुए भी घाटे में रहता है। ठेकेदार लोग जिन रेटों पर काम करते हुए भी नफे में रहते हैं, सरकारी कर्मचारी यदि उसी कार्य को सीधे स्वयं करावें तो घाटा होगा। कारण एक ही है ठेकेदार अपने मजदूरों को किस क्रम से कहाँ किस प्रकार, कितनी संख्या में लगाये यह ‘फेर बनाना’ जानता है।
जो बात धन, श्रम, समय के सम्बन्ध में लागू होती है वही बात काम के अनेक अंग-प्रत्यंगों को किस सिलसिले से किया जाय वह भी उतना ही महत्व रखती है। कुशल महिला रसोई का कार्य दो घण्टों में पूरा कर देती है किन्तु जिसे क्रम बनाना नहीं आता वह उसी काम में पाँच घण्टे नष्ट कर देती है। एक साथ कई काम चलते रह सकते हैं और उन पर पैनी निगाह रखते हुए सभी को अपने ढंग से सँभालते रहा जा सकता है इसके विपरीत मन्द गति महिला एक काम पूरा हो जाने पर दूसरा आरम्भ करती है और समय नष्ट होता चला जाता है। बाजार से सामान खरीदने जाना हो तो पहले से ही लिस्ट बनाकर किस बाजार से क्या-क्या लेना है? इसका सिलसिला बिठाया जा सकता है और एक ही दिन में पूरे सप्ताह की आवश्यक वस्तुएँ सिलसिले भार कम समय में खरीदी जा सकती हैं किन्तु यदि व्यवस्था बुद्धि नहीं है तो रोज एक-एक दो-दो चीजें याद आती जायेंगी और उन्हें खरीदने के लिए दौड़-धूप होती रहेगी। खरीदते समय भी यह ध्यान न रखा जाय कि बाजार में किस चीज को कहाँ से लिया जाना है तो फिर मकड़ी जिस तरह जाला बुनती है उसी तरह इधर से उधर भगदड़ होती रहेगी और ढेरों समय नष्ट होगा।
शतरंज के खेल में एक ही समय कई चालें सोचने और कई तरफ से अपनी गोटों के बचाव का सतर्कतापूर्वक ध्यान रखा जाय तो ही बाजी जीती जा सकती है। अपने काम में कब क्या आवश्यकता पड़ेगी, कब क्या कठिनाई आयेगी, किस समय क्या साधन जुटाने होंगे और किनका सहयोग लेना पड़ेगा, किसे क्या समझाना और किसे कितना धमकाना चाहिए इसकी संतुलित योजना से जो अनुभव भरी व्यवहार बुद्धि के सहारे ठीक तरह समझना और समाधान निकलता है वह अल्प शिक्षित होते हुए भी अपने प्रयोजन में सफल रहता है। स्थूल बुद्धि, दीर्घ सूत्री और प्रमादी बहुमुखी चिन्तन की आदत नहीं डालते अस्तु उनकी प्रतिभा अविकसित पड़ी रहती है फलतः उन्हें पग-पग पर असफलताओं का कष्ट एवं उपहास सहना पड़ता है। व्यवस्था बुद्धि हर कोई विकसित कर सकता है यदि वह अपने कामों के सम्बन्ध में बारीकी से सोचने और उनके प्रत्येक पक्ष पर गहराई के साथ ध्यान देने का प्रयत्न करे। अनुभवी लोगों का मार्ग-दर्शन परामर्श एवं सान्निध्य भी इस सन्दर्भ में बहुत सहायक सिद्ध होता है।
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अपनों से अपनी बात
स्पष्ट है कि जीवन का बहिरंग पक्ष भौतिक साधनों के सहारे सुविधा सम्पन्न बनता है, पर उसका एक पहलू अन्तरंग भी है। आस्थाओं से अभिरुचि उत्पन्न होती है और अभिरुचि के आधार पर बुद्धि तथा क्रिया शक्ति अपना-अपना काम करती हैं। संक्षेप में व्यक्तित्व और चरित्र का सारा ढाँचा अन्तःकरण के स्तर पर खड़ा होता है। यह स्तर भौतिक क्षेत्र में किसी भी प्रकार कम महत्वपूर्ण नहीं है। सम्पन्नता होते हुए भी मनुष्य आन्तरिक निकृष्टता के रहते स्वयं दुःख भोगते तथा दूसरों को दुःखी करते रहते हैं। इसके विपरीत गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता होने पर स्वल्प साधनों में सुखी रह सकना तथा आदर्शवादी रीति-नीति अपनाकर अपने समय तथा क्षेत्र को शालीनता की दिशा में अग्रसर कर सकना संभव हो सकता है। वस्तुतः किसी समाज या राष्ट्र की वास्तविक शक्ति और समृद्धि उसके नागरिकों के आन्तरिक स्तर पर निर्भर रहती है। चरित्रनिष्ठ, एवं पुरुषार्थी व्यक्ति स्वल्प साधनों में भी अपनी प्रखरता सिद्ध करते हैं, इसके विपरीत सम्पन्नता के रहते हुए भी व्यक्तित्व की निकृष्टता पग-पग पर उलझनों और संकटों के घटाटोप खड़े करती रहती है।
धर्म-तन्त्र की राज-तंत्र से तुलना की जाय तो एक को प्रखर व्यक्तित्व का और दूसरे को भौतिक सुसम्पन्नता का प्रतीक मानकर चलना होगा। ऐसी दशा में स्थूल दृष्टि से जितनी महत्ता राजतन्त्र को दी जायेगी उससे कम नहीं वरन् अधिक ही गरिमा सूक्ष्म दृष्टि के आधार पर धर्म-तन्त्र को देनी होगी। विवाद में न पड़ा जाय तो दोनों को एक समर्थ गाड़ी के दो पहिये और परस्पर पूरक एवं अविच्छिन्न कहा जा सकता है। ऐसी दशा में धर्म प्रयोजनों को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए जितना भौतिक प्रगति के साधनों को। अन्तःकरण की उत्कृष्टता ही व्यक्तियों की प्रखरता का प्रधान आधार और जन-मानस का परिष्कार ही राष्ट्रीय सामर्थ्य की पृष्ठभूमि स्वीकार करते ही बनता है।
दूरदर्शी महामनीषियों ने धर्म का माहात्म्य इसी आधार पर प्रतिपादित किया है। शास्त्रों और आप्त वचनों में धर्म की गरिमा उच्चस्तर से गाई गई है। धर्मात्मा को श्रेयाधिकारी और अधर्मी को हर दृष्टि से हेय ठहराया गया है। यहाँ धर्म का तात्पर्य अन्तःकरण से उत्कृष्टतावादी रुझान उत्पन्न करने वाली आस्थाओं से है। वस्तुतः इसे मानव जीवन की सर्व प्रमुख और सर्व प्रधान आवश्यकता ठहराया जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।
धर्म तत्व एक है। उसे सार्वभौम एवं सर्वजनीन कहा जा सकता है। देश, काल और पात्र की आवश्यकताओं को देखते हुए मूर्धन्य महामनीषियों ने उसकी विधा और प्रक्रिया का ढांचा खड़ा कर दिया है। परिस्थितियों के अनुरूप यह भिन्नता आवश्यक समझी गई और उसकी पूर्ति की गई। सम्प्रदायों के माध्यम से धर्म धारणाओं का प्रशिक्षण होने की प्रक्रिया का यदि तुलनात्मक अध्ययन किया जाए तो वे बाहरी दृष्टि से कितनी ही बातों में परस्पर विरोध लगते हैं और उनके शास्त्रों, कथाओं, कर्मकाण्डों एवं प्रचलनों में भारी अन्तर प्रतीत होता है। इतने पर भी उन मूलभूत उद्देश्य और आदर्शों में समग्र एकता विद्यमान है। भिन्न-भिन्न रंग के चश्मे पहन कर सूर्य भी अनेक रंगों का दृष्टिगोचर हो सकता है किन्तु इसमें उसके मूल स्वरूप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
पिछले दिनों धर्म के आवरण को सम्प्रदायों के रूप में देखने और उसी को सब कुछ मान बैठने की भूल होती रही है। धोती और पजामा पहनने वालों ने परस्पर एक दूसरे को शत्रु मान और अपने-अपने परिधान के प्रति इतनी कट्टरता बरती कि दूसरे को शत्रु मानने तथा दण्डित करने में भी कोताही नहीं की। इतिहास के पृष्ठों पर धर्म विग्रह के नाम पर बरती गई नृशंसता के अनेकों कलंकित पृष्ठ जुड़े हुए हैं। अभी भी यत्र-तत्र इसी आधार पर विग्रह और मनोमालिन्य के उत्पात उत्पन्न होते और जन-समाज को आतंकित करते देखे जाते हैं। साम्प्रदायिक उपद्रवों की घटनाएँ इस बुद्धिवादी युग में भी आये दिन खड़ी रहें तो इससे यही निष्कर्ष निकलता है कि धर्म के झिलके कहे जा सकने योग्य सम्प्रदायों के पीछे कट्टरता और विभेद की जड़ें कितनी गहरी चली गई हैं। आश्चर्य यह है कि धर्म की आत्मा जिसका एकमात्र स्वरूप मानवी एकता और आदर्शवादिता को उभारना भर है किस प्रकार अपने मूल लक्ष्य से भटक गई और किस प्रकार उस पर अवाँछनीय भ्रान्तियों ने अपना अधिकार कर लिया।
विचारशील वर्ग का काम है कि मानवी एकता और शालीनता का महत्व समझे और अन्तःकरणों में आदर्शवादी आस्थाएँ जागृत करने के प्रधान साधन धर्म तत्व को उसके मूल स्वरूप में जीवन्त रखने के लिए अपनी तत्परता प्रदर्शित करे। भौतिक प्रगति की तरह ही-आत्मिक प्रखरता को आवश्यक माना जाय तो राज-तन्त्र के समतुल्य ही धर्म-तन्त्र को भी महत्व देना होगा। राज-तन्त्र को सुव्यवस्थित रखने में जितनी जन-शक्ति और धन-शक्ति लगती है, उतनी ही धर्म-तन्त्र में भी नियोजित होनी चाहिए। राज-तन्त्र को स्वच्छ और समर्थ बनाने के लिए जिस प्रकार राजनैतिक पार्टियों में प्रतिद्वन्द्विता रहती है, उसी प्रकार धर्म-तन्त्र की उत्कृष्टता अक्षुण्ण रखने तथा उत्पन्न होने वाली विकृतियों का निराकरण करने वाले प्रयत्न भी अनवरत चलते रहने चाहिए। आवश्यक नहीं कि इसमें प्रतिद्वन्द्विता खड़ी की जाय और प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया जाय। यह पोषण और संशोधन कुशल बागवान की तरह पूर्ण सद्भावना के साथ किया जाता रह सकता है। इससे भी अच्छा है कि हर सम्प्रदाय अपने वर्ग में पाई जाने वाली विकृतियों का निराकरण करने का उत्तरदायित्व स्वयं वहन करे और उसकी श्रेष्ठताओं को उभारने तथा प्रशंसित करने की जिम्मेदारी अन्य सम्प्रदाय के लोग स्वयं उठायें। धर्म को स्वच्छ रखने का यही तरीका है। अपने वर्ग की अवाँछनीयताओं का भी दुराग्रह पूर्वक समर्थन करते रहा जाय और दूसरों की अच्छाइयों को भी उल्टी दृष्टि से देखा जाय तो फिर उससे विग्रह ही खड़े होंगे। ऐसी दशा में धर्म की सृजनात्मक शक्ति नष्ट हो जायेगी। और उसे ध्वंसक तत्वों की संज्ञा देकर ‘अफीम की गोली’ अथवा और कोई हेय नाम दिये जाने से रोका न जा सकेगा। आत्म-समीक्षा और परगुण ग्राहकता की नीति ही सदा से सराहनीय रही है। साम्प्रदायिक सद्भाव बनाये रहने की दृष्टि से भी उसी का अपनाया जाना उचित है। समय आ गया कि साम्प्रदायिक वैमनस्कों का विरोध अथवा विरोधाभासों का अन्त किया जाय और साम्प्रदायिक सद्भाव बढ़ाकर धर्म तत्व की उस आत्मा को जीवित रखा जाय जिसके लिए कि इतना विशालकाय ढाँचा खड़ा किया गया और उसके सिंचन परिपोषण में मनुष्य समाज की असीम सामर्थ्य का नियोजन हुआ है।
राज-तन्त्र और धर्म-तन्त्र की तुलनात्मक चर्चा इन पंक्तियों में बार-बार इस दृष्टि से की जा रही है कि राज-तन्त्र की उपलब्धियों को समझाने की तरह धर्म-तन्त्र की प्रखरता से उत्पन्न उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं को भी समझा जाय। भारत का प्राचीन गौरव इस बात का साक्षी है कि धर्म के प्रति आस्थाएँ परिपक्व करने से किस प्रकार कोई समाज सर्वतोमुखी उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है। आज इस दिशा में बढ़ती जाने वाली उपेक्षा एवं अनास्था का समाधान होना आवश्यक है।
धर्म क्षेत्र में विकृतियाँ भर जाने से खिन्न प्रबुद्ध वर्ग की अवज्ञा के रहते हुए भी अभी भी भारतीय जनसमाज में उस दिशा में कितना उत्साह है, इसे थोड़े से पर्यवेक्षण से सहज ही समझा जा सकता है। अपने देश में 60 लाख के करीब भिक्षा व्यवसायी हैं इनमें एक तिहाई अपंगता के कारण और दो तिहाई धर्म सेवा के नाम पर जनता से अपनी आजीविका अर्जित करते हैं। लोग खुशी-खुशी यह अर्थ भार वहन करते हैं । इतनी बड़ी जन-शक्ति का समय क्षेप और निर्वाह चलते देखकर यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि धर्म श्रद्धा अभी भी कितनी प्रौढ़ है। तीर्थयात्राओं, पर्व, स्नानों, देवालयों, धर्म-कृत्यों, उत्सव, आयोजनों पर खर्च होने वाला खर्च लगभग उतना ही जा पहुँचता है जितना सरकार को राजस्व से प्राप्त होता है। सरकार दबावपूर्वक अनेक कर्मचारियों की सहायता से टैक्स वसूल करती है जबकि धर्म प्रयोजनों में खर्च होने वाली उतनी ही राशि स्वेच्छापूर्वक ही श्रद्धापूर्वक भी समर्पित की जाती रहती है।
मन्दिर, घाट, धर्मशाला, स्मारक आदि प्राचीन एवं अर्वाचीन धर्म भवनों की इमारतों का मूल्याँकन किया जाय तो प्रतीत होगा कि सरकारी इमारतों में लगे हुए धन से वे किसी भी प्रकार कम नहीं बैठतीं। धर्म चर्चा, तीर्थयात्रा, पर्वोत्सव एवं पूजा-पाठ में लगने वाले जन-साधारण के समय का यदि लेखा-जोखा लिया जाय तो प्रतीत होगा कि थोड़ा-थोड़ा करके भी वह समय इतना हो जाता है जितना कि देश के समस्त अध्यापकों का सम्मिलित श्रम। तुलनात्मक दृष्टि से देखने पर धर्म-तन्त्र की क्षमता राज-तन्त्र के समकक्ष ही जा पहुँचती है।
यों संसार के अधिकाँश देशों की-विशेषतया भारत की जनता छोटे देहातों में रहती है। शिक्षा की दृष्टि से उसका पिछड़ापन स्पष्ट है। भारत की जनगणना की रिपोर्ट देखने से पता चलता है कि देश की प्रायः तीन चौथाई जनता अशिक्षित है एवं छोटे देहातों में निवास करती है। वस्तुतः यही देश का बहुमत है और इसी को असली भारत कहा जा सकता है। इस वर्ग की मनोभूमि का दार्शनिक पूर्व परिचय मात्र धर्मचर्चा से ही संबद्ध है। दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के अतिरिक्त वे धर्म कथाओं एवं प्रथाओं के आधार पर ही अपनी आस्थाओं की स्थिति बनाये हुए हैं। राजनीति, समाज-शास्त्र, अर्थ-शास्त्र, नीतिशास्त्र, विचार विज्ञान आदि से उनका सम्पर्क अत्यन्त स्वल्प है। प्रगति के लिए इस वर्ग को अनेकों स्तर के प्रशिक्षण देने की आवश्यकता सर्वत्र अनुभव की जाती है। पर यहाँ कठिनाई यह आती है कि व्यक्ति की पूर्व मनोभूमि के बिना किसी विषय को आरम्भ से ही सिखा सकना कठिन है। ‘असली भारत’ को प्रगतिशीलता की दिशा में प्रशिक्षित करने के लिए यही अधिक उपयुक्त रहेगा कि उसकी पूर्व परिचित धर्म पृष्ठभूमि के सहारे वह सब कुछ सिखाया-बताया जाय जो सामयिक समस्याओं के समाधान के लिए आवश्यक है। गाँधी जी की पैनी दृष्टि इस तथ्य से भली-भाँति अवगत थी। उन्होंने सत्य, अहिंसा, प्रार्थना, साधू वेष, रामराज्य, गौरक्षा, व्रत पालन आदि धार्मिक आधार अपनाकर भारतीय जन-मानस में स्वतन्त्रता आन्दोलन के प्रति दुहरी आस्था उत्पन्न की। राष्ट्रीय गौरव एवं उत्कर्ष की बात ने स्वराज्य के पक्ष में जितना वातावरण बनाया उतना ही योगदान धर्म प्रवृत्ति में भी उपलब्ध हुआ और सत्याग्रह अपनी चरम सीमा पर पहुँचने तथा सफल होने का श्रेय प्राप्त कर सका। वह तथ्य अभी भी ज्यों का त्यों है। स्वराज्य प्राप्ति के पश्चात् सर्वतोमुखी प्रगति के लिए जिस लोक-शिक्षण की आवश्यकता है उसका सम्बन्ध धार्मिक पृष्ठभूमि से जोड़ा जा सके तो प्रतीत होगा कि अभीष्ट की सिद्धि में कितना आश्चर्यजनक योगदान मिलता है।
ऊपर की पंक्तियों में विचारशील वर्ग का ध्यान इस तथ्य की ओर आकर्षित करने का प्रयत्न किया गया है कि धर्म-तन्त्र की क्षमता एवं सम्भावना कितनी बढ़ी-चढ़ी है। उपेक्षणीय धर्म तत्व नहीं, वरन् वह सम्प्रदायवाद है जो कलेवर की कट्टरता पर उलझ कर रह जाता है और अहंवादी संकीर्णता अपनाकर वैमनस्य के विष बीज बोता है। जन-मानस में सम्प्रदाय को ही धर्म की आत्मा को मानवी एकता एवं आदर्शवादिता के रूप को सर्व साधारण की जानकारी में उतारा जाना चाहिए। प्रथा प्रचलनों की भिन्नता को लेकर जो वितंडावाद खड़े होते हैं उन्हें कटुता एवं खण्डन से नहीं इस आधार पर समझाया जाना चाहिए उनका आरम्भ किन परिस्थितियों में किस प्रकार किया गया था और पीछे सामयिक विकृतियों का समावेश होते चलने के कारण कैसा विचित्र रूप बन गया ? इसमें कटुता एवं भर्त्सना के लिए भी गुंजाइश नहीं रहेगी और सुधार, संशोधन का प्रयोजन भी पूरा होता चलेगा। आज की स्थिति में इस प्रकार के कदम उठाये जाने नितान्त आवश्यक हैं।
अब वह विचार छोड़ ही दिया जाना चाहिए कि अन्य धर्म संप्रदायों को मिटाकर अपने धर्म को सार्वभौमिक बनाया जा सकता है। इस दिशा में चिरकाल से प्रयोग होते रहे हैं और असफलता ही हस्तगत हुई है। तलवार के जोर से विधर्मियों को अपने मत का बनाने के प्रयास में रक्त की नदियाँ बहाकर देख ली गई हैं। यूरोप की और भारत की भूमि को इस प्रयोग में रोमांचकारी रक्त स्नान करना पड़ा है। धरती के अन्य भागों में भी इस प्रकार की नृशंसताएँ कम नहीं बरती गई हैं। इतने पर भी अपना धर्म ही सब पर लाद देने में नगण्य-सी सफलता मिली उसकी तुलना में धर्म श्रद्धा के स्थान पर घृणा का वातावरण ही बन गया। इसके बाद लोभ देकर तथा प्रचार का बवंडर खड़ा करके भी स्वधर्म दीक्षा के पक्ष में लाभदायक वातावरण बनाने का नया दौर चला, पर उससे भी कुछ बात बनती दिखाई नहीं पड़ती। शुद्धि और तवलीग आन्दोलनों का प्रकारान्तर से उसी परीक्षण को अन्य प्रकार की हलचलों के सहारे अपने पक्ष में लाभदायक बनाने का था, पर उससे भी कुछ बना नहीं। सब धर्मों को मिलाकर एक नया धर्म बनाने के प्रयोग भी इन शताब्दियों में दर्जनों उत्साही मनीषियों ने किये हैं। सर्वधर्म समन्वय का नारा पुराना है और उसके लिए किये गये प्रयत्नों का इतिहास भी लम्बा है। यह प्रयोग भी एक प्रकार से असफल ही कहा जाय तो इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं है।
तथ्यों पर अधिक गम्भीरतापूर्वक ध्यान देने से यही उपयुक्त लगता है कि विभिन्न धर्मों को यथास्थान अवस्थित रहने दिया जाय, किन्तु उनकी दिशा धारा एक केन्द्र पर केन्द्रित कर दी जाय। सभी नदियाँ समुद्र में जा मिलती हैं उसी प्रकार सभी धर्मों को मानवी आदर्शों की पृष्ठभूमि बनाने में संलग्न रहना चाहिए और अन्त में इस लक्ष्य पर पहुंचना चाहिए कि वे नर-पशु को नर-देव बनाने वाली शालीनता को जन-मानस में प्रतिष्ठापित करने में योगदान देते हुए अपनी सार्थकता सिद्ध करेंगे। लक्ष्य एक रहने पर उनकी भिन्नताएँ एक ही उद्यान में उगे हुए विभिन्न रंग और गन्ध वाले पुष्पों की तरह शोभा की अभिवृद्धि ही करेंगे। संकट तो तब उत्पन्न होता है जब वे विग्रह और विद्वेष का बीज बोते हैं-अवाँछनीय मान्यताओं का पोषण करते हैं और निहित स्वार्थों को प्रश्रय देते हैं। यह विकृतियाँ हट जायं तो धार्मिकता के आदर्श मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रहने और सुविकसित करने में सहायक सिद्ध होने के कारण इस विश्व की सर्वोपरि उपयोगिता का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं। समय की माँग है कि धर्म तत्व की भर्त्सना करने के स्थान पर उसकी मूलभूत उपयोगिता को विकसित करने में विचारशील वर्ग द्वारा नये सिरे से प्रयत्न किया जाय।
विगत 27 वर्षों से यह प्रयोग हिन्दू-धर्म की प्रयोगशाला में युग-निर्माण योजना के अन्तर्गत होता रहा है। धर्म-तन्त्र से लोकशिक्षण की सुनियोजित रूपरेखा विनिर्मित हुई और उसके अन्तर्गत शास्त्र-वचनों, कथा-प्रसंगों, कर्मकाण्डों और प्रथा-प्रचलनों के चारों चरण इस प्रकार सँजोये गये कि उसे गम्भीरतापूर्वक देखने वाला यही कह सकता है कि ‘हिन्दू-धर्म’ मानव धर्म है। उसकी मान्यताएँ और प्रेरणाएँ विश्व मानव की- विश्व परिवार की- पृष्ठभूमि बनाती है। धर्म का प्रकाश उत्कृष्ट कर्तव्य एवं आदर्श कर्तव्य की प्रेरणा देता है। इस ढाँचे को देखकर अनास्थावादी भी मनोवैज्ञानिक और सामाजिक पृष्ठभूमि पर उसकी उपयोगिता निर्विवाद रूप से स्वीकार कर सकते हैं।
धर्म-तन्त्र से लोक -शिक्षण में चिर प्राचीन और चिर नवीन का अद्भुत सम्मिश्रण किया गया है। उसमें श्रद्धा और विवेक का समुचित समन्वय हुआ है। अतीत की गरिमा और वर्तमान की आवश्यकता का जिस कुशलता के साथ इस प्रयास में निर्वाह हुआ है उसे देखते हुए उसे विचारशील वर्ग द्वारा एक स्वर से सराहा गया है और व्यक्ति एवं समाज निर्माण की दृष्टि से उसे युग की आवश्यकता पूरी कर सकने वाले दूरदर्शी प्रयास के रूप में स्वीकारा गया है।
इस प्रयास के क्या परिणाम निकले- इस प्रयत्न की क्या प्रक्रिया हुई-यह हमारी आँखों के सामने स्पष्ट है। विज्ञापनबाजी से दूर रहने की और चुपचाप अपने काम में जुटे रहने की अपनी मूलभूत प्रकृति ने ढिंढोरा पीटने की आवश्यकता तो नहीं समझी, पर सदा पैनी दृष्टि से यह देखा कि इन प्रयासों से नये किस्म की अन्ध श्रद्धा तो नहीं पनप रही है? जन-मानस में चरित्र निष्ठा और समाज निष्ठा उभारने की आकाँक्षा कहीं निरर्थक कल्पना मात्र तो नहीं रह रही है।
पर्यवेक्षण ने इन प्रयासों की उपयोगिता सिद्ध की है और सत्परिणामों के सुखद निष्कर्ष सामने खड़े किये हैं। कोटि-कोटि मनुष्यों के चिन्तन की इससे दिशा धारा मिली है। दृष्टिकोण में औचित्य के समावेश की-आस्थाओं में सद्भावना की-क्रिया पद्धति में सत्प्रवृत्तियों की मात्रा आशातीत मात्रा में बढ़ी है। लगता है युग-परिवर्तन की परिकल्पना में इस प्रयास ने अपनी उपयोगिता पूरी तरह सिद्ध की है।
सत्ताईस वर्षों के प्रयोग परीक्षण के उपरान्त अब यह निष्कर्ष सामने आया है कि इस उपयोगी प्रयोग को हिन्दू धर्म की सीमा तक ही सीमित न रहने देकर उसका कार्यक्षेत्र आगे बढ़ाया जाय और अन्य धर्मावलम्बी जनता को भी इस प्रयास से लाभान्वित होने दिया जाय। मानवतावादी आदर्शों की मात्रा हर सम्प्रदाय में इतनी अधिक मौजूद है कि यदि उसे संकलित करने, उभारने और व्याख्या करने में सदुद्देश्य बरता जाय तो एकता-समता एवं शुचिता के तीनों आदर्शों का समर्थन मिल सकता है। वसुधैव कुटुम्बकम की परिस्थितियाँ उभारने में इस समर्थन से समुचित योगदान मिल सकता है।
इस आशंका पर भी भली प्रकार विचार कर लिया गया है कि अन्य धर्मावलम्बियों द्वारा अन्य धर्मों के सदुद्देश्यों का प्रयत्न भी कहीं अनुदारिता के लिए असह्य तो न बन जायेगा-कट्टरता कहीं सत्प्रयत्नों और सदुद्देश्यों को भी तो बुरा न मानने लगेगी। इस दुनिया में हो तो कुछ भी सकता है, पर जब अपना मन साफ है, तो उपयोगी प्रयोग को व्यापक बनाने में अनावश्यक संकोच न बरता जाय मन ने यही निश्चय किया है और अब उस दिशा में कदम बढ़ाये जा रहे हैं।
संसार में यों धर्म सम्प्रदाय तो अनेक हैं, पर प्रधान उनमें से चार ही हैं। संस्था की दृष्टि से ईसाई, मुसलिम, बौद्ध और हिन्दू धर्म ही प्रधान हैं। अन्य धर्मों के अनुयायी स्वल्प मात्रा में हैं। अस्तु उन्हें पीछे हाथ में लिया जा सकता है, प्रथम प्रयास के रूप में इन चारों को हाथ में लेने से काम चल सकता है। पीछे अन्यान्य सम्प्रदायों को भी मानवी एकता एवं उत्कृष्टता के लक्ष्य पर केन्द्रित करने के प्रयत्न अग्रसर किये जा सकते हैं। जिस आधार पर हिन्दू क्षेत्र के अन्तर्गत ‘धर्म तन्त्र से लोकशिक्षण’ की प्रक्रिया हाथ में ली गई है-वहीं अन्य धर्मों के क्षेत्र में भी अपनाई जायेगी। इस प्रयत्न के चार चरण हैं-
(1) शास्त्र वचनों का ऐसा संकलन जो मानवी आदर्शों के अनुरूप दृष्टिकोण तथा क्रियाकलाप अपनाने की प्रेरणा देता हो।
(2) ऐसे कथा-प्रसंगों, चरित्रों, संस्मरणों, घटनाक्रमों का संकलन जिनसे अभीष्ट दिशा में अग्रसर होने की प्रेरणा तथा शिक्षा मिलती हो।
(3) उन सम्प्रदायों द्वारा अपनाई गई प्रथा-परम्पराओं, मान्यताओं, रीति-रिवाजों की ऐसी व्याख्या जिनसे आदर्शवादिता अपनाने का प्रकाश मिलता हो।
(4) जन्म, मरण, विवाह पर्व, संस्कार, पूजा, अनुष्ठान आदि अवसरों पर अपनाये जाने वाले कर्मकाण्डों तथा मन्त्रों का इस प्रकार प्रस्तुतीकरण जिससे आत्म-शोधन, आत्म-परिष्कार, लोक मंगल, उदार-व्यवहार जैसे सदुद्देश्यों को प्रोत्साहन उपलब्ध हो सके।
धर्मतन्त्र से लोक-शिक्षण के अपने अब तक के प्रयत्नों में इसी आधार पर साहित्य सृजन एवं प्रचार-प्रसार के लिए प्रयत्न किये जाते रहे हैं। बहुत कुछ सोचा लिखा और किया गया है। इन प्रयत्नों का परीक्षण जहाँ भी हुआ है वहीं सद्भावनाएं उभरती और सत्प्रवृत्तियाँ पनपती देखी गई हैं। अस्तु निश्चित है कि यही प्रयोग यदि अन्य धर्मों के क्षेत्र में भी किया जायेगा तो उसके भी सत्परिणाम ही सामने आवेंगे। सभी धर्मों के अनुयायी मानवी आदर्शवादिता के महान लक्ष्य पर एकत्रित होकर पारस्परिक घनिष्ठता की स्नेह शृंखला में बंधते चले जायेंगे। जबकि पिछले दिनों वे विद्वेष और विलगाव के बीज बोने तथा प्रतिगामिता का समर्थन करने के लिए बदनाम होते रहे हैं।
अगले दिनों हमारे प्रयत्न उपरोक्त प्रयोजन के लिए आरम्भ कर दिये गये हैं। ईसाई, मुसलिम और बौद्ध धर्मों के साहित्य का भी उसी तत्परता एवं गम्भीरता से अध्ययन किया जा रहा है जैसा कि हिन्दू धर्म के आर्षग्रन्थों का किया गया था। उसने उद्देश्य से मिलते-जुलते ढंग से अन्य लोग भी सोचते और करते रहे हैं। उनके श्रम एवं प्रयास की जानकारियाँ संग्रह की जा रही हैं और जो साहित्य इस प्रयोजन के अनुरूप छपा है उसको खोजा और मंगाया जा रहा है। उपरोक्त तीनों धर्मों में से किसी की जिन्हें गहरी जानकारी रही है- जिन्होंने असामान्य रूप से अध्ययन किया है-उपयोगी निष्कर्ष निकालने में माथा-पच्ची की है-उनकी खोज की जा रही है और सम्पर्क साधा जा रहा है। पूछताछ-खोजबीन-पत्र व्यवहार का सिलसिला चल तो देर से रहा था, पर अब उसे और भी अधिक तीव्र कर दिया गया है। अखण्ड-ज्योति परिवार में तथा परिजनों के सम्पर्क क्षेत्र में जिन्हें इस प्रकार की जानकारियाँ हो सकती हैं उन्हें सम्पर्क में सबसे प्रथम लिया जा रहा है। स्पष्ट है कि इतने बड़े शोध कार्य के लिए अध्ययन, चिन्तन एवं परामर्श की सुविस्तृत आवश्यकता होगी। प्रतिपादन का ढाँचा खड़ा हो जाने पर उसका प्रकाशन कराना होगा । उसके प्रसार के लिए कार्यकर्त्ताओं का प्रशिक्षण किया जायेगा। यह प्रचार समान रूप से सभी धर्मों की जनता को एक स्थान पर एकत्रित किया जाता रहेगा और यह समझा जाया करेगा कि सभी धर्म अपनी-अपनी विशेषताएं तथा भिन्नताएं रखते हुए भी मूलतः मानवतावादी आदर्शों को प्रेरणा देने के लक्ष्य पर पूरी तरह केन्द्रित होते हैं। विश्वास है कि उससे विभेद की दीवारें एकता तथा उत्कृष्टता का सर्वतोमुखी समर्थन मिलने से गिरेंगी जिससे जनमानस के परिष्कार का प्रयोजन अधिक अच्छी तरह सम्पन्न हो सकेगा।
अखण्ड-ज्योति पाठकों की जानकारी में उपरोक्त प्रयोजन के लिए उपयुक्त साहित्य प्रयास तथा अध्ययनशीलों की जो जानकारी हो, उसे हरिद्वार भिजवा दें इससे हमारे इन दिनों चल रहे प्रयास में कुछ न कुछ सहायता ही मिलेगी। यों इस प्रयास को सफल एवं व्यापक बनाने की तैयारी तो हम में से प्रत्येक को अभी से करनी चाहिए।
सन् 1930 में मिस्र की एक भावनाशील महिला-शा देवी -रोम में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय महिला सम्मेलन, में भाग लेने गई। उन्होंने पहली बार देखा कि संसार की नारी कितनी आगे निकल गई किन्तु मिस्र की महिलाएं कितनी पिछड़ी पड़ी हैं। बुर्के ने उनके मानवोचित अधिकारों को किस प्रकार अवरुद्ध कर रखा है। एक ओर सम्मेलन के विविध-विध कार्यक्रम चलते रहे। दूसरी और शा देवी एक संकल्प गढ़ने और उसे पूरा करने की योजना बनाने में लगी रहीं। वे एक निश्चय के साथ वापिस लौटीं।
जब वे मिस्र वापस लौटीं तो बन्दरगाह पर कितने ही नर-नारी उनका स्वागत करने पहुँचे। जहाज की सीढ़ियों से उतरते-उतरते उन्होंने सब के सामने अपना बुर्का उतार कर समुद्र में फेंक दिया। इस ऐतिहासिक घटना ने मिस्र में महिला जागरण की एक नई आग लगा दी। लाखों बुर्के उतार कर फेंक दिये गये और उसके बाद उस देश के प्रबुद्ध वर्ग ने एक प्रकार से पर्दे के उस प्रचलन को अमान्य ठहरा दिया, जिसे किसी जमाने के लोग धार्मिक कट्टरता के साथ बेतरह जोड़े चिपकाये बैठे थे।
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इस वर्ष फिर महिला सम्मेलनों की योजना गत वर्षों की भाँति ही चलेगी। देव-कन्याओं के जत्थे 15 सितम्बर से भेजे जायेंगे और आयोजनों की शृंखला 15 जून तक चलती रहेगी। इन 9 महीनों में गत वर्ष से कम नहीं, वरन् अधिक ही आयोजनों की सम्भावना है।
गत वर्ष रुक-रुककर आयोजनों की माँगें आती रहीं और बीच-बीच में इधर-उधर से काट-छाँट करके जितना सम्भव था उतना पूर्ति के लिए प्रयत्न किया गया। फिर भी उलट - पुलट में - व्यवस्था में - भारी असमंजस उत्पन्न होता रहा। इस वर्ष वैसी पुनरावृत्ति न होने पावे इसलिए जहाँ भी इन आयोजनों की माँगें हों उन्हें इसी मास आमन्त्रित किया जा रहा है। अगले महीने पूरे वर्ष के लिए कार्यक्रम निर्धारित कर दिये जायेंगे और देव-कन्याओं की मोटरें यथासमय वहाँ जा पहुँचेंगी। बीच में माँग करने वालों को इस वर्ष कोई अवसर नहीं दिया जायेगा। पूरे वर्ष में जितने कार्यक्रम सम्भव होंगे उनकी स्वीकृति इन्हीं दिनों दे दी जावेगी, ताकि सम्मेलनों के प्रबन्धकर्त्ता समय रहते अपनी समुचित तैयारी कर सकें।
गत वर्ष के महिला सम्मेलनों ने जो नव-जागरण का कीर्तिमान स्थापित किया है उससे स्वभावतः पुराने स्थानों और नई शाखाओं का उत्साह इस वर्ष भी होना स्वाभाविक है। इन पंक्तियों द्वारा इतना ही अनुरोध किया जा रहा है कि जहाँ यह आयोजन होने हैं वहाँ के निमन्त्रण समय रहते-यथा सम्भव इसी महीने हरिद्वार पहुँच जाने चाहिए। इस वर्ष बीच के किसी महीने की माँग पर विचार कर सकना या काट-छाँट करके आग्रहों के लिए अवसर निकाल सकना सम्भव न होगा। देर में निमन्त्रण देने और स्वीकृति प्राप्त करने की गड़बड़ी में गत वर्ष जो अड़चन खड़ी होती रही है उसकी पुनरावृत्ति इस वर्ष नहीं की जाएगी।
पूरे देश में जहाँ भी महिला सम्मेलन होंगे उनका निर्धारण अगले ही महीने हो जायगा। अस्तु उचित यही है कि जहाँ देव-कन्याओं के जत्थे बुलाये जाने हैं वहाँ की शाखाएं अपना आमन्त्रण भेजते हुए इस बात का भी संकेत कर दें कि उन्हें किस महीने में सुविधा रहेगी। चूँकि कार्यक्रम एक क्रम-चक्र के आधार पर बनेंगे, इसलिए माँगे हुए महीने में ही तारीखें दिये जाने की बात तो नहीं कही जा सकती, पर यथासम्भव प्रयत्न यही किया जायेगा कि जहाँ जिस महीने में सुविधा है वहाँ उसी को ध्यान में रखते हुए प्रोग्रामों का निर्धारण किया जाय।
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औरों के हित जो मरता है,औरों के हित जो जीता है। उसका हर आँसू ‘‘रामायण’’ प्रत्येक कर्म ही ‘‘गीता’’ है॥
जो तृषित किसी को देख, सहज ही होता है आकुल-व्याकुल। जिसकी साँसों में पर -पीड़ा, भरती है अपना ताप अतुल॥
वह है ‘‘शकर’’ जो औरों की वेदना निरन्तर पीता है। उसका हर आँसू ‘‘रामायण’’ प्रत्येक कर्म ही ‘गीता’ है॥
जो सहज समर्पित जन-हित में होता है ‘‘स्वार्थ त्याग’’ करके। जिसके पग चलते रहते हैं, दुःख - दर्द मिटाने घर-घर के॥
वह है ‘‘दधीचि’’ जिसका जीवन जग-हित तप करके बीता है। उसका हर आँसू ‘‘रामायण’’ प्रत्येक कर्म ही ‘‘गीता’’ है॥
जिसका चरित्र, गंगाजल-सा है, स्वच्छ, विमल, पावन, उज्ज्वल। जिसके उर से सद्भावों की , धारा बहती कल-कल, छल-छल॥
वह है ‘’लक्ष्मण’’ जिसने पर-नारी को समझा ‘‘माँ सीता’’ है। उसका हर आँसू ‘‘रामायण’’ प्रत्येक कर्म ही ‘‘गीता’’ है॥
जिसका जीवन संघर्ष - बनी औरों की गहन समस्या है। तम में प्रकाश फैलाना ही, जिसकी आराध्य तपस्या है॥
जो प्यास बुझाता जन-जन की वह पनघट कभी न रीता है। उसका हर आँसू “रामायण” प्रत्येक कर्म ही “गीता” है॥
जिसने “जग के मंगल’’ को ही अपना जीवन व्रत मान लिया। “परिव्याप्त, विश्व के कण-कण में भगवान” तथ्य पहचान लिया॥
उस आत्मा का सौभाग्य अटल, वह ही “प्रभु की परिणीता”है। उसका हर आँसू “रामायण” प्रत्येक कर्म ही “गीता” है।
-माया वर्मा
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*समाप्त*