क्षुद्रता अपनाने से मात्र हानि ही हानि है।

‘अपनेपन’ को छोटा करते-करते क्षुद्रता इतनी बढ़ जाती है कि मात्र विलास तक ही मनुष्य की सत्ता सीमाबद्ध रह जाती है। इतने भर के लिए वह अपने पेट को, इन्द्रियों को, स्वास्थ्य तथा दीर्घजीवन तक को तोड़कर रख देता है। क्षुद्रताग्रस्त विचारों की भरमार से मस्तिष्क श्मशान की तरह मनोविकारों की जलती चिताओं से भरा रहता है। आनन्द और उल्लास के भाव भरे सुमन जिस उद्यान में खिले रह सकते हैं और सम्बद्ध वातावरण को सुरम्य बनाये रह सकते हैं, उस नन्दनवन में पतझड़ की स्थिति उत्पन्न करने में क्षुद्रता का हिमपात ही प्रधान कारण होता है।

क्षुद्रता न पत्नी को विकसित होने देती है, न बच्चों को सुसंस्कृत, वयोवृद्धों को सम्मान दे और उनका दुलार पाने में न तो वस्तुएँ कम पड़ती हैं और न अवकाश की कमी रहती है। ओछेपन और उपेक्षा भरे बर्ताव के कारण ही छोटों और बड़ों के बीच खाई बनी रहती है। वयस्कों में पारस्परिक सद्भाव और सहयोग न बन पाता है और न बढ़ पाता है। परिवार की इस विपन्न स्थिति में क्षुद्रता का बढ़ा हुआ स्वरूप ही प्रधान कारण पाया जाता है।

हर व्यक्ति अपने सम्पर्क क्षेत्र में सम्मान और विश्वास का पात्र बनकर भाव भरा सहयोग प्राप्त कर सकता है। उदारमना लोगों के लिए यह सारा संसार उदार है। सज्जनता की प्रतिक्रिया सज्जनोचित सहायता के रूप में वापस लौट आती है। सहृदय व्यक्ति सेवा की नीति अपनाकर जो खोते हैं उससे अनेक गुना प्राप्त कर लेते हैं। क्षुद्रता देखने भर में लाभदायक प्रतीत होती है और उसे स्वार्थ सधने लगता है, पर वस्तुतः उसकी हानि अपार है। उसे अपनाकर मनुष्य न केवल छोटा और बौना रह जाता है, वरन् हानि, विपत्ति तथा प्रताड़ना का भी भाजन बनता है।

-संत बास्वानी


निष्काम सेवा बुद्धि सर्वोपरि साधन

प्रथम धर्म-चक्र प्रवर्तन में कुछ जिज्ञासुओं को जीवन की सही दिशा में अभिप्रेरित कर तथागत ने आत्म-कल्याण के लिए सभी मुमुक्षु जनों को आह्वान किया, और हजारों लोग ‘धर्मं शरणं गच्छामि’ की प्रतिज्ञा कर आगे आये। इस आह्वान को घर-घर पहुँचाने के लिए जो उत्साही जन कृतसंकल्प हुए उन्होंने समस्त पारिवारिक और साँसारिक दायित्वों से उपराम हो कर स्वयं को लोक कल्याण के लिए समर्पित करने को आत्मदान किया।

इन्हीं लोक-सेवी उत्साही और संकीर्ण स्वार्थों से ऊपर उठ कर लोक मंगल का कार्य करने के लिए उद्धत मनस्वी साहसियों का एक संगठन बना- भिक्षु संघ और संघ के सदस्य भिक्षु कहे जाने लगे।

एक-एक भिक्षु का तथागत को ध्यान था और यह भी कि कौन-कैसा है। एक बार उन्हें किसी भिक्षु का समाचार नहीं मिला और न ही वह दिखाई दिया। अपने समीप खड़े भिक्षु भदन्त आनन्द से उन्होंने पूछा कि अमुक भिक्षु कहाँ है तो भदन्त-आनन्द ने उत्तर दिया-वह अतिसार से पीड़ित है।’

सुनते ही तथागत बोले—‘चलो उसे देख आयें।’

भदन्त आनन्द और कुछ अन्य भिक्षु भी बुद्ध के साथ हो लिए। बुद्ध ने देखा रुग्ण भिक्षु अपनी कुटिया में अकेला बेसुध पड़ा है। किसी के द्वारा परिचर्या न किये जाने के कारण वह कुटिया में ही मल-मूत्र से लिपटा सना पड़ा था। भगवान ने उसे देख कर कहा- ‘भाई तुम्हें क्या कष्ट है।’

‘मुझे अतिसार है भगवन्’-भिक्षु ने कहा।

“क्या? कोई भी तुम्हारी परिचर्या को नहीं आया?’

‘नहीं आया भगवन्।’

‘तो भिक्षु ऐसा क्यों हुआ कि भिक्खुभाल तुम्हारी देखभाल नहीं करते?’

‘भगवन् वे सब योग साधनाओं में निरत रहते हैं मैंने यही सुना है। इसलिए उन्हें मेरी चिन्ता नहीं है, यह भी वे लोग कहते हैं।

अपने पास खड़े भिक्षुओं से कुछ न कहते हुए तथागत ने भदन्त आनन्द से कहा-‘जाओ आनन्द, जल ले आओ। हम इस भाई की सेवा करेंगे।’

‘हाँ भगवान्!’ आनन्द ने कहा और जल लेने को चल दिया। जब जल कलश आ पहुँचा तो भगवान् ने स्वयं जल डाला और अपने ही हाथों से भिक्षु का सारा शरीर धोया। तथागत को स्वयं परिचर्या करते देख वहाँ खड़े भिक्षुगण भी परिचर्या में हाथ बँटाने लगे। तथागत ने किसी से कुछ कहा नहीं।

संध्या होने को थी। साँध्यकालीन प्रार्थना के लिए सभी भिक्षुगण एकत्र हो रहे थे। परिचर्या के उपरान्त तथागत बैठक में पहुँचे और उन्होंने बिना किसी भूमिका के भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए कहा- ‘भाइयो, क्या हममें से कोई एक भिक्खु रोगी है।

‘हाँ भगवन्, है तो!

‘उसे क्या कष्ट है।’

‘भगवन् उस भाई को अतिसार है।’

‘उसकी देख-भाल कौन कर रहा है?’

‘कोई नहीं।’

‘क्यों?’

सब चुप थे। थोड़ी देर सन्नाटा छाया रहा फिर बुद्ध ही बोले-‘‘मैं जानता हूँ। तुम सब को अपने आत्म-कल्याण की चिन्ता है, पर याद रखो योग साधनाओं से वह सम्भव है या नहीं यह तो मुझे ज्ञान नहीं, पर जो सच्चे हृदय से दुःखी जनों की सेवा निष्काम भाव से करते हैं उनकी स्वर्ग मुक्ति आत्म-कल्याण सर्वथा अक्षुण्ण है, उसे कोई भी उससे विचलित नहीं कर सकता।


उसकी अनुकम्पा एवं उपलब्धि

ईश्वर वह चेतना शक्ति है जो ब्रह्माण्डों के भीतर और बाहर जो कुछ है उस सब में संव्याप्त है। उसके अगणित क्रिया-कलापों में एक कार्य इस प्रकृति का संचालन भी है। प्रकृति के अन्तर्गत जड़ पदार्थ और चेतना के कलेवर शरीर इन दोनों को सम्मिलित कर सकते हैं। प्रकृति और पुरुष का युग्म इसी दृष्टि से निरूपित हुआ है। जड़ और चेतन का सम्मिश्रण ही अपना यह विश्व है। इस विश्व की परिधि में ही हमारी इच्छाएँ, भाव-सम्वेदनाएँ विचारणाएँ एवं गतिविधियाँ सीमित हैं। मस्तिष्क का निर्माण जिन तत्वों से हुआ है उसके लिए इतना ही सम्भव है कि इस ज्ञात एवं अविज्ञात विश्व-ब्रह्माण्ड की परिधि में ही सोचे, निष्कर्ष निकाले और जो कुछ सम्भव हो वह उसकी परिधि में रहकर करे।

ईश्वर की कल्पना भी इसी सीमा में सम्भव हो सकती है। जो ब्रह्म विस्तार इस छोटी परिधि से भी बहुत आगे है। सृष्टि संचालन ही परमेश्वर का काम नहीं है- चूँकि हमारा वास्ता उसके साथ इसी सीमा तक है, अस्तु अपनी मान्यता यही हो सकती है कि वह इसी क्रिया प्रक्रिया में निरत रहता होगा। जब कि यह कार्य उसके लिए उतना ही स्वल्प है जितना हमारे लिए क्रीड़ा विनोद के क्रिया-कलाप। सृष्टि व्यवस्था का बहुत थोड़ा ज्ञान अब तक मनुष्य को मिल पाया है। विज्ञान अनुसंधान के आधार पर प्रकृति के थोड़े से रहस्यों का उद्घाटन अभी सम्भव हो सका है। जो जानना शेष है उसकी तुलना में उपलब्ध जानकारियाँ नगण्य हैं। अणु ऊर्जा अपने समय की बड़ी उपलब्धि मानी जाती है, पर मूर्धन्य विज्ञानवेत्ताओं का कथन है कि सूक्ष्मता की जितनी गहरी परतों में प्रवेश किया जायगा उतनी ही अधिक प्रखरता का रहस्य विदित होता जायगा। ढेले की तुलना में अणु शक्ति का चमत्कार अत्यधिक है। ठीक इसी प्रकार समूचे अणु-पिण्ड की तुलना में उसका मध्यवर्ती, नाभिक,न्यूक्लियस असंख्य गुनी शक्ति छिपाये बैठा है। अणु को सौर मण्डल कहा जाए तो उसका मध्यवर्ती नाभिक सूर्य कहा जायगा। सौर मण्डल के सभी ग्रह-उपग्रहों को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से सूर्य से ही अनुदान मिलते हैं और उसी आधार पर सौर मण्डल का वर्तमान ढाँचा इस रूप में चल रहा है। यदि सूर्य नष्ट हो जायगा तो फिर सौर मण्डल का सीराजा ही बिखर जायगा। तब यह पता भी न चलेगा कि प्रस्तुत ग्रह-उपग्रह अन्तरिक्ष में न जाने कहाँ विलीन हो जायेंगे और उनका न जाने क्या अन्त होगा। अणु का मध्यवर्ती नाभिक कितना शक्तिशाली है और उसकी क्षमता कैसे अणु परिवार का संचालन कर रही है, इस बारीकी पर विचार करने मात्र से विज्ञानी मस्तिष्क चकित रह जाता है। कौन कहे न्यूक्लियस के भीतर भी और कोई शक्ति परिवार काम कर रहा हो और फिर उसके भीतर भी कोई और जादूगरी बसी हुई हो। प्रतिविश्व-ऐन्टीयुनिवर्स-प्रतिकण ऐन्टीएटम- की चर्चा इन दिनों जोरों पर है। कहा जाता है कि अपनी दुनिया के ठीक पिछवाड़े बिलकुल उससे सटी हुई एक और जादुई दुनिया है। उस अविज्ञात की सामर्थ्य इतनी अधिक कूती जाती है जितनी कि शरीर की तुलना में आत्मा की। प्रतिकण और प्रतिविश्व के रहस्यों का पता चल जाए और उस पर किसी प्रकार अधिकार हो जाए तो फिर समझना चाहिए कि अभी प्राणि जगत का अधिपति कहलाने वाला मनुष्य तभी सच्चे अर्थों में सृष्टि का अधिपति कहलाने का दावा कर सकेगा।

यह तो सूक्ष्मता की चर्चा हुई। स्थूलता की-विस्तार की बात तो सोचते भी नहीं बनती। आँखों से दीखने वाले तार अपनी पृथ्वी से करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर हैं। प्रकाश एक सैकिंड में एक लाख छियासी हजार मील की चाल से चलता है। इस हिसाब से एक वर्ष में जितनी दूरी पार कर ली जाए वह एक प्रकाश वर्ष हुआ। कल्पना की जाए कि करोड़ों प्रकाश वर्ष में कितने मीलों की दूरी बनेगी। फिर यह तो दृश्य मात्र तारकों की बात है। अत्यधिक दूरी के कारण जो तारे आँखों से नहीं दिख पड़ते उनकी दूरी की बात सोच सकना कल्पना शक्ति से बाहर की बात हो जाती है। अपनी निहारिका में ही एक अरब सूर्य आँके गये हैं। उसमें से कितने ही सूर्य अपने सूर्य से हजारों गुने बड़े हैं। अपनी निहारिका जैसी अरबों निहारिकाएँ इस निखिल ब्रह्माण्ड में विद्यमान हैं। इस समस्त विस्तार की बात सोच सकना अपने लिए कितना कठिन पड़ेगा, यह महज ही समझा जा सकता है।

अणु की सूक्ष्मता और ब्रह्माण्ड की स्थूलता की गहराई, ऊँचाई का अनुमान करके हम चकित रह जाते हैं। अपनी पृथ्वी के प्रकृति रहस्यों का भी अभी नगण्य-सा विवरण हमें ज्ञात हो सका है, फिर अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों की आणविक एवं रासायनिक संरचना से लेकर वहाँ की ऋतुओं, परिस्थितियों तक से हम कैसे जानकार हो सकते हैं। इन ग्रहों की संरचना एवं परिस्थितियाँ एक दूसरे से इतनी अधिक भिन्न हैं कि प्रत्येक ग्रह की एक स्वतन्त्र भौतिकी तैयार करनी होगी। हमें थोड़े से वैज्ञानिक रहस्य ढूंढ़ने और उपयोग में लाने के लिए लाखों वर्ष लगाने पड़े हैं फिर अगणित ग्रह-नक्षत्रों की-उनके मध्यवर्ती आकाश की स्थिति जानने के लिए जितना समय, श्रम एवं साधन चाहिएं उन्हें जुटाया जा सकना अपने लिए कैसे सम्भव हो सकता है।

यह सृष्टि की सूक्ष्मता और स्थूलता की चर्चा हुई। इसके भीतर जो चेतना काम कर रही है। उसकी दिशा धाराएँ तो और भी विचित्र हैं। प्राणियों की आकृति-प्रकृति की विचित्रता देखते ही बनती है। प्रत्येक की अभिरुचि एवं जीवनयापन पद्धति ऐसी है जिसका एक दूसरे के साथ कोई ताल-मेल नहीं बैठता। मछली का चिन्तन, रुझान, आहार, निर्वाह, प्रजनन, पुरुषार्थ समाज आदि का लेखा-जोखा तैयार किया जाए तो वह नृतत्व विज्ञान से किसी भी प्रकार कम न बैठेगा। फिर संसार भर में मछलियों की भी करोड़ों जातियाँ-उपजातियाँ हैं और उनमें परस्पर भारी मित्रता पाई जाती है। इन सबका भी पृथक-पृथक शरीर शास्त्र, मनोविज्ञान, निर्यात विधान एवं उत्कर्ष-अपकर्ष का अपने-अपने ढंग का विधिविधान है। यदि मछलियों की तरह ज्ञान और साधन मिले होते तो उनने अपनी जातियों-उपजातियों का उतना बड़ा ज्ञान भण्डार विनिर्मित किया होता जिसे मानव विज्ञान से आगे न सही पीछे तो किसी भी प्रकार नहीं कहा जा सकता था। बात अकेली मछली की नहीं है। करोड़ों प्रकार के जल-जन्तु हैं उनकी जीवनयापन प्रक्रिया एक दूसरे से अत्यधिक भिन्न है। जलचरों से आगे बढ़ा जाय तो थलचरों और नभचरों की दुनिया सामने आती है। कृमि-कीटकों से लेकर हाथी तक के थलचर मच्छर से लेकर गरुड़ तक के नभचरों की आकृति-प्रकृति भिन्नता भी देखते ही बनती है। उसके आचार-विचार व्यवहार,स्वभाव एक दूसरे से अत्यधिक भिन्न हैं। व्याघ्र और शशक की प्रकृति की तुलना की जाए तो उसके बीच बहुत थोड़ा सामंजस्य बैठेगा। अन्यथा उनकी निर्वाह पद्धति में लगभग प्रतिकूलता ही दृष्टिगोचर होगी। इन असंख्य प्राणियों की जीवन-पद्धति के पीछे जो चेतना तत्व काम करता है उसकी रीति-नीति कितनी भिन्नता अपने में संजोये हुए है यह देखकर जड़ प्रकृति की विचित्रता पर जितना आश्चर्य होता था। चैतन्य में भी कहीं अधिक हैरानी होती है। कहना न होगा कि सर्वव्यापी ईश्वरीय सत्ता के ही यह क्रिया कौतुक हैं।

सूक्ष्म जीवों की दुनिया और भी विचित्र है। आँखों से न दीख पड़ने वाले प्राणी हवा में -पानी में तैरते हैं। मिट्टी में बिखरे पड़े हैं और शरीर के भीतर जीवाणुओं के रूप में विद्यमान हैं। जीवाणु एवं विषाणु विज्ञान क्षेत्र की खोज को कहीं से कहीं घसीटे लिये जा रहे हैं। शरीर शास्त्री, चिकित्सा-शास्त्री हैरान हैं कि इन शूरवीरों की अजेय सेना को वशवर्ती करने के लिए क्या उपाय किया जाय? मलेरिया का मच्छर अरबों, खरबों की डी0डी0टी0 खाकर भी अजर-अमर सिद्ध हो रहा है तो रोगाणुओं, विषाणुओं जैसे सूक्ष्म सत्ताधारी सूक्ष्म जीवों का सामना क्यों कर हो सकेगा? सशस्त्र सेनाओं को परास्त करने के उपाय सोचे और साधन जुटाये जा सकते है, पर इन जीवाणुओं से निपटने का रास्ता ढूंढ़ने में बुद्धि हतप्रभ होकर बैठ जाती है। इन सूक्ष्म जीवों की अपनी दुनिया है। यदि उनमें से भी कोई अपनी जाति का इतिहास एवं क्रिया-कलाप प्रस्तुत कर सके तो प्रतीत होगा कि मनुष्यों की दुनिया उनकी तुलना में कितनी छोटी और कितनी पिछड़ी हुई है।

अभी रासायनिक पदार्थों का, योगिकों का, अणुओं का, तत्वों का विज्ञान अपनी जगह पर अलग ही समस्याओं और विवेचनाओं का ताना-बाना लिये खड़ा है। सृष्टि के किसी भी क्षेत्र में नजर दौड़ाई जाए उधर ही शोध के लिए सुविस्तृत क्षेत्र खड़ा हुआ मिलेगा। मनुष्य को प्रस्तुत जानकारियों पर गर्व हो सकता है, पर जो जानने को शेष पड़ा है वह उतना बड़ा है कि समग्र जानकारी मिल सकने की बात असम्भव ही लगती है। मनुष्य की तुच्छता का- उसकी उपलब्धियों का नगण्यता का तब बोध होता है। जब थोड़े से मोटे-मोटे आधारों से आगे बढ़कर गहराई में उतरा जाता है या ऊँचाई पर चढ़ा जाता है।

ऊपर की पंक्तियां प्रकृति के जड़ पदार्थों और जीव कलेवरों के सम्बन्ध में थोड़ी सी झाँकी कराती हैं और बताती हैं कि यह प्रसार विस्तार कितना अधिक है और उसे समझ सकने में मानवी बुद्धि कितनी स्वल्प है। सृष्टि वैभव को भी अकल्पनीय,अनिर्वचनीय एवं अगम्य ही कहा जा सकता है। फिर परमेश्वर के स्वरूप, उद्देश्य एवं क्रिया-कलाप को समझ सकने की बात कैसे बने, जो इस सूक्ष्म, स्थूल, चल, स्थिर प्रकृति से भीतर ही नहीं बाहर भी है और यह सारा बालू का महल उसने क्रीड़ा विनोद के लिए रच कर खड़ा कर लिया है।

परब्रह्म को अचिन्त्य अगोचर, अगम्य कहा गया है। उसकी व्याख्या, विवेचना में तत्ववेत्ताओं ने कुछ चर्चा तो की है, पर साथ ही नेति-नेति कह कर अपने ज्ञान परिधि की स्वल्पता भी स्वीकार कर ली है। वस्तुतः समग्र ब्रह्म का विवेचन बुद्धि विज्ञान एवं साधनों के माध्यम से संभव हो ही नहीं सकता। तब प्रश्न उत्पन्न होता है कि ईश्वर प्राप्ति की- ईश्वर दर्शन की- जो चर्चाएँ होती रहती हैं वे क्या हैं? यहाँ इतना ही कहा जा सकता है कि जीव और ब्रह्म की मिलन पृष्ठभूमि के रूप में जिस ईश्वर की विवेचना होती है उसी का साक्षात्कार एवं अनुभव सम्भव है।

आकाश और धरती जहाँ मिलते हैं उसे अन्तरिक्ष कहते हैं। अन्तरिक्ष का सुहावना दृश्य सूर्योदय और सूर्यास्त के समय प्रातः साँय देखा जा सकता है। दो रंगों के मिलने से एक तीसरा रंग बनता है। भूमि और बीज के समन्वय की प्रतिक्रिया अंकुर के रूप में फूटती है। पति-पत्नी का मिलन अभिनव उल्लास के रूप में प्रकट होता है और प्रतिफल सन्तान के रूप में सामने आता है। जीव और ब्रह्म के मिलन की प्रतिक्रिया को ईश्वर कह सकते हैं। गैस और गैस मिल कर पानी के रूप में परिणत हो जाती है। शरीर और प्राण का मिलन जीवन के रूप में दृष्टिगोचर होता है आग और जल के मिलने से भाप बनती है। नैगेटिव और पौजिटिव धाराएँ मिलने पर शक्तिशाली विद्युत प्रवाह गतिशील होता है। हम उसी ईश्वर से परिचित होते हैं जो आत्मा से परमात्मा के मिलन की प्रतिक्रिया के रूप में अनुभव की जाती है।

वेदान्त दर्शन में ईश्वर के रूप-स्वरूप की जितने तात्विक स्वरूप की विवेचना की गयी है उतनी अन्यत्र कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती। ‘तत्वमसि’, ‘अयमात्मा ब्रह्म’, शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम् सोऽहम्, आदि सूत्रों में यह रहस्योद्घाटन किया गया है कि यह आत्मा ही ब्रह्म है। यहाँ आत्मा से तात्पर्य पवित्र और परिष्कृत चेतना से है। स्थिति प्रज्ञ-आदि शब्दों में व्यक्तित्व के उस उच्चस्तर का संकेत है जिसे देवात्मा एवं परमात्मा भी कहा जाता है। इसी स्थिति को उपलब्ध कर लेना आत्म-साक्षात्कार ईश्वर प्राप्ति आदि के नाम से निरूपित किया गया है। बन्धन, मुक्ति या जीवन-मुक्ति इसी स्थिति को कहते हैं।

आत्मा चिनगारी है और परमात्मा ज्वाला। ज्वाला की समस्त सम्भावनाएं चिनगारी में विद्यमान हैं। अवसर मिले तो वह सहज ही अपना प्रचण्ड रूप धारण करके लघु से महान् बन सकती है। अवसर न मिले तो बीज चिरकाल तक उसी क्षुद्र स्थिति में पड़ा रह सकता है, किन्तु यदि परिस्थिति बन जाए तो वही बीज विशाल वृक्ष के रूप में विकसित हुआ दृष्टिगोचर हो सकता है। छोटे से शुक्राणु में एक पूर्ण मनुष्य अपने साथ अगणित वंश परम्पराएँ और विशेषताएँ छिपाये रहता है। अवसर न मिले तो वह उसी स्थिति में बना रह सकता है। किन्तु यदि उसे गर्भ से रूप में विकसित होने की परिस्थिति मिल जाय तो एक समर्थ मनुष्य का रूप धारण करने में उसे कोई कठिनाई न होगी। अणु की संरचना सौर-मण्डल के समतुल्य है। अन्तर मात्र आकार विस्तार का है। जीव ईश्वर का अंश है। अंश में अंशी के समस्त गुण पाये जाते हैं। सोने के बड़े और छोटे कण में विस्तार भर का अन्तर है। तात्विक विश्लेषण में उनके बीच कोई भेद नहीं किया जा सकता।

उपासना और साधना के छैनी हथौड़े से जीवन के अनगढ़ रूप को कलात्मक देव प्रतिमा के रूप में परिणत किया जाता है। अध्यात्म शब्द का तात्पर्य ही आत्मा का दर्शन एवं विज्ञान है। इस सन्दर्भ के सारे क्रिया-कलापों का निर्माण निर्धारण मात्र एक ही प्रयोजन के लिए किया गया है कि व्यक्तित्व को-चेतन की उच्चतम-परिष्कृत-सुविकसित-सुसंस्कृत स्थिति में पहुँचा दिया। इस लक्ष्य की उपलब्धि का नाम ही ईश्वर प्राप्ति है। आत्म साक्षत्कार एवं ईश्वर दर्शन इन दोनों का अर्थ एक ही है। आत्मा में परमात्मा की झाँकी अथवा परमात्मा में आत्मा की सत्ता का विस्तार। द्वैत को मिटा कर अद्वैत की प्राप्ति मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। इसकी पूर्ति के लिए या तो ईश्वर को मनुष्य स्तर का बनना पड़ेगा या मनुष्य को ईश्वर तुल्य बनने का प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ेगा।

अध्यात्म क्षेत्र की भ्रान्तियाँ भी कम नहीं हैं। बाल बुद्धि के लोग आत्मा पर चढ़े कषाय-कल्मषों को काटने के लिए जो संघर्ष करना पड़ता है। उस झंझट से कतराते हैं और सस्ती पगडण्डी ढूंढ़ते हैं। वे सोचते हैं पूजा पत्री के सस्ते क्रिया-कृत्यों से ईश्वर को लुभाया, फुसलाया जा सकता है और उसे मनुष्य स्तर का बनने के लिए सहमत किया जा सकता है। वे सोचते हैं हम जिस घटिया स्तर पर हैं उसी पर बने रहेंगे। प्रस्तुत दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप में कोई हेर-फेर न करना पड़ेगा। “ईश्वर को अनुकूल बनाने के लिए इतना ही काफी है कि पण्डितों की बताई पूजा-पत्री का उपचार पूरा कर दिया जायं। इसके बाद ईश्वर मनुष्य का आज्ञानुवर्ती बन जाता है और उचित-अनुचित जो भी मनोकामनाएँ की जायं उन्हें पूरी करने के लिए तत्पर खड़ा रहता है। आमतौर से उपासना क्षेत्र में यही भ्रान्ति सिर से पैर तक छाई हुई है।” मनोकामना पूर्ति के लिए पूजा-पत्री का सिद्धान्त तथाकथित भक्तजनों के मन में गहराई तक घुसा बैठा है। वे उपासना की सार्थकता तभी मानते हैं जब उनके मनोरथ पूरे होते चलें। इसमें कमी पड़े तो वे देवता मन्त्र,पूजा,सभी को भरपेट गालियाँ देते देखे जाते हैं। कैसी विचित्र विडंबना है कि छोटा सा गन्दा नाला गंगा को अपने चंगुल में जकड़े और यह हिम्मत न जुटाये कि अपने को समर्पित करके गंगाजल कहलाये।

परब्रह्म एक ऐसी चेतना है जो ब्राह्मण के भीतर और बाहर एक नियम व्यवस्था के रूप में ओत-प्रोत हो रही है। उसके सारे क्रिया-कलाप एक सुनियोजित विधि-विधान के अनुसार गतिशील हो रहे हैं। उन नियमों का पालन करने वाले अपनी बुद्धिमत्ता अथवा ईश्वर की अनुकम्पा का लाभ उठाते हैं। भगवान को बिजली से उपमा दी जा सकती है। बिजली का ठीक उपयोग करने पर उससे अनेक प्रकार के यन्त्र चलाये और लाभ उठाये जा सकते हैं। पर निर्धारित नियमों का उल्लंघन किया जाय तो बिजली उन्हीं भक्त सेवकों की जान ले लेती है। जिनने उसे घर बुलाने में ढेरों पैसा, मनोयोग एवं समय लगाया था। उपासना ईश्वर को रिझाने के लिए नहीं, आत्म-परिष्कार के लिए की जाती है। छोटी मोटर में कम पावर रहती है और थोड़ा काम होता है। बड़ी मोटर लगा देने से अधिक पावर मिलने लगती है और ज्यादा लाभ मिलता है। बिजली घर में तो प्रचण्ड विद्युत भण्डार भरा पड़ा है। उससे गिड़गिड़ा कर अधिक शक्ति देने की प्रार्थना तब तक निरर्थक ही जाती रहेगी जब तक घर का फिटिंग मीटर,मोटर आदि का स्तर ऊँचा न उठाया जाय। प्रार्थना के सत्परिणामों की बहुत चर्चा होती रहती है। भगवत् कृपा के अनेक चमत्कारों का वर्णन सुनने को मिलता रहता है। उस सत्य के पीछे यह तथ्य अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ मिलेगा कि भक्त ने पूजा उपासना के प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न की और उस श्रद्धा ने उसके चिन्तन एवं कर्तृत्व को देवोपम बना दिया। जहाँ यह शर्त पूरी की गई है वहीं निश्चित रूप से ईश्वरीय अनुकम्पा की वर्षा भी हुई है, पर जहाँ फुसलाने का धूर्तता को भक्ति का नाम दिया गया है वहाँ निराशा ही हाथ लगी है।

ईश्वर का सृष्टि विस्तार अकल्पनीय है। उसमें निवास करने वाले प्राणियों की संख्या का निर्धारण भी असम्भव है। पृथ्वी पर रहने वाले जलचर, थलचर, नभचर, दृश्य अदृश्य प्राणियों की संख्या कुल मिलाकर इतनी बड़ी है कि उनके अंक लिखते-लिखते इस धरती को कागज बना लेने से भी काम न चलेगा। इतने प्राणियों के जीवनक्रम में व्यक्तिगत हस्तक्षेप करते रहना- अलग-अलग नीति निर्धारित करना और फिर उसे प्रार्थना उपेक्षा के कारण बदलते रहना ईश्वर के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता। ऐसा करने से तो उस पर व्यक्तिवादी राग द्वेष का आक्षेप लगेगा और सृष्टि संतुलन को कोई आधार ही न रहेगा। ईश्वर ने नियम मर्यादा के बन्धनों में क्रिया की प्रतिक्रिया के रूप में अपनी सारी व्यवस्था बना दी है और उसी चक्र में भ्रमण करते हुए, जीवधारी अपने पुरुषार्थ और प्रमाद का भला-बुरा परिणाम भुगतते रहते हैं। ईश्वर दृष्टा और साथी की तरह यह सब देखता रहता है। उसकी जैसी महान् सत्ता के लिए यही उचित है और यही शोभनीय। पूजा करने वालों के प्रति राग और न करने वालों के प्रति उपेक्षा अथवा द्वेष की नीति यदि उसने अपनाई होती तो निश्चय ही इस संसार में भ्रष्टाचार एवं अव्यवस्था का कोई अन्त ही न रहता। जो लोग इस दृष्टि से पूजा उपासना करते हैं कि उसके फलस्वरूप ईश्वर को फुसला कर उससे मनोवाँछाएँ पूरी करा ली जायेंगी। वे भारी भूल करते हैं। पूजा को कर्म व्यवस्था का प्रतिद्वन्दी नहीं बनाया जा सकता भगवान के अनुकूल हम बनें यह समझ में आने वाली बात है, पर उलटा उसी को कठपुतली बना कर मर्जी मुताबिक नचाने की बात सोचना बचकानी ढिठाई के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हमें ईश्वर से व्यक्तिगत राग-द्वेष की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए वरन् उसकी विधि-व्यवस्था के अनुरूप बन कर अधिकाधिक लाभान्वित होने के राजमार्ग पर चलना चाहिए।

भगवान को इष्टदेव बना कर उसे प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। इष्ट का अर्थ है लक्ष्य। हम भगवान के समतुल्य बनें। उसी की जैसी उदारता व्यापकता व्यवस्था, उत्कृष्टता, तत्परता अपनाएं, यही हमारी रीति-नीति होनी चाहिए। इस दिशा में जितना मनोयोगपूर्वक आगे बढ़ा जायगा उसी अनुपात से ईश्वरीय सम्पर्क का आनन्द और अनुग्रह का लाभ मिलेगा। वस्तुतः अध्यात्म साधना का एकमात्र उद्देश्य आत्मसत्ता को क्रमशः अधिकाधिक पवित्र और परिष्कृत बनाते जाना है। यही सुनिश्चित ईश्वर की प्राप्ति और साथ ही उस मार्ग पर चलने वालों को जो विभूतियाँ मिलती रही हैं, उन्हें उपलब्ध करने का राजमार्ग है।


विशेष व्यक्ति (kahani)

अमेरिकी नागरिक एल्फ्रेड लैजविन आँखों से उसी प्रकार साँस छोड़ सकता था जैसे कि नाक या मुँह से छोड़ी जाती है। उसने अनेक प्रदर्शनों में नाक और मुँह बन्द कराये और आँखों द्वारा साँस का आवागमन जारी रखा। आंखों से तेज साँस छोड़ कर मोमबत्ती बुझा देने के प्रदर्शन से उसने बहुत ख्याति प्राप्त की।

इटली की गेजेटा ग्रास परौनी नामक लड़की का शरीर रबड़ की गेंद की तरह हलका था। उसे बीस फुट ऊँचे से गिराया गया तो चोट लगने की तो बात ही क्या फुटबाल की तरह कई बार उछली और हँसती-खेलती रही।

इंग्लैण्ड में माँट गुमरी नामक जन्मान्ध व्यक्ति पोस्टमैन के पद पर नियुक्त हुआ और उसने पूरे पैंतीस वर्ष नौकरी की। इस बीच एक भी घटना ऐसी नहीं हुई कि उसने किसी का पत्र किसी को बाँट दिया है। चिट्ठियों के कोने पर वह छेद उभार कर ऐसी पहचान कर लेता था कि पढ़ न सकने पर भी पत्रों को यथास्थान पहुँचा सके।


हम प्रगति पथ पर आगे ही बढ़ते चलें।

चेतना को जीवन कहते हैं। जीवन का प्रथम चरण जड़ पदार्थों में- खनिजों में देखा जा सकता है। स्तब्ध दीखते हुए भी उनके अन्तः क्षेत्र में आणविक गतिविधियाँ तत्परतापूर्वक चल रही हैं। जड़ पदार्थ उत्पन्न होते बढ़ते और मरते हैं। जीवधारियों में यह प्रक्रिया द्रुत गति से होती है और जड़ पदार्थों में मन्द गति से। पत्थर नया है या पुराना यह आसानी से जाना जा सकता है। उनका शैशव, यौवन एवं जरत्व समझने में जानकारों को कोई कठिनाई नहीं पड़ती। जन्म और मृत्यु का क्रम पदार्थों का भी चलता रहता है, जीवधारियों की तरह वे भी जन्मते और मरते हैं। आत्मा की अमरता की तरह पदार्थ के अन्तः स्थिति- अणुसत्ता और उसकी सक्रियता भी अजर-अमर है।

विकास क्रम समस्त ब्रह्माण्ड के प्रत्येक क्षेत्र में गतिशील हो रहा है। जीव भी उसी प्रक्रिया से अछूता नहीं है जीवन का भी क्रमिक विकास हुआ है। यह तम, रज और सत तीन रूपों में है और क्रमशः एक-एक मंजिल ऊपर तो है,तम का अर्थ है जड़ता। जड़ सृष्टि को इसी वर्ग में गिनते हैं। जड़ पदार्थों में भी जीवन तो है, पर वह प्रसुप्त स्थिति में पड़ा है। इससे कुछ ऊँची और अच्छी स्थिति सूक्ष्म जीवाणुओं की है। वे मिट्टी में मिले रहते हैं हवा और पानी में गतिशील हैं। शरीर में जीवाणुओं की भरमार है। चूँकि इनमें इन्द्रियाँ और मस्तिष्क नहीं है। इसलिए उन्हें भी जड़ गिना जाना है। उससे थोड़ी और अच्छी स्थिति वृक्ष वनस्पतियों की है। यों उन्हें भी जड़ कहा गया है। फिर भी उनमें जीवन प्रत्यक्ष लहलहा रहा है यह सारा प्रसार विस्तार जड़ जगत का है। पानी जड़ है पर उसमें ओत-प्रोत जीवन से विज्ञान क्षेत्र भली प्रकार परिचित है। पंचतत्वों में से प्रत्येक में अपने-अपने ढंग की हलचल और चेतना विद्यमान है। इसे तमस स्थिति में पड़ा हुआ अविकसित जीवन कह सकते हैं।

इससे अगली स्थिति ‘रजस्’ की है। जीवन के इस वर्ग में इन्द्रिय चेतनायुक्त चल फिर सकने वाले प्राणी आते हैं। जलचर, थलचर, नभचर वर्ग के असंख्यों जीवधारी इस श्रेणी में गिने जाने हैं। कीट पतंग, पशु-पक्षी, उद्विज, श्वेदन, अंडज-जरायुज-प्राणी इसी स्तर के हैं। इससे उच्च वर्ग के प्राणी हैं जिन्हें सूक्ष्म जीवों की तरह अदृश्य कह सकते हैं। इनमें पितरों, देवताओं, जीवनमुक्तों, देवदूतों की गणना होती है। वे कभी शरीर धारण करते हैं। कभी अशरीरी रहते हैं। अशरीरी रह कर वे अपनी सूक्ष्म शक्ति से अधिक व्यापक क्षेत्र में अधिक महत्वपूर्ण कार्य कर सकते हैं। अधिक सत्पात्रों को अधिक उपयोगी एवं अधिक मात्रा में प्रेरणाएं दे सकते हैं। किन्तु जब जन-साधारण को प्रत्यक्ष मार्ग दर्शन करते हुए उन्हें साथ लेकर चलना होता है और कोई परम्परा स्थापित करनी होती है तो शरीर धारण करके अवतारी देवदूतों की तरह काम करते हैं। वे कर्मफल भोगने के लिए विवश होकर जन्म मरण के चक्र में घूमने वाले प्राणियों की तरह शरीर धारण नहीं करते वरन् समय की आवश्यकता पूरी करने के लिए व्यक्ति और समाज को ऊँचा उठाने के विशेष प्रयोजन से जन्म लेते हैं और अपना उद्देश्य पूरा करके पुनः वापस लौट जाते हैं।

तथ्य को और भी स्पष्ट रूप में समझना हो तो संक्षेप में उसे इस प्रकार जानना चाहिए कि पदार्थ की रचना तो पंच तत्वों, परमाणुओं एवं रासायनिक योगिकों की सहायता से हुई है। ऊर्जा विविध स्वरूप से उन्हें कई प्रकार की हलचलों के लिए प्रेरित कर रही है। चेतना के सम्बन्ध में बात दूसरी है। वह तम, रज और सत इन तीनों भागों में विभक्त है। अथवा तीन स्थितियों में रह रही है। चेतना की प्रथम स्थिति है ‘तम’-जिसे जड़ निर्जीव कहा जाता है। जिसमें खनिज, वनस्पति एवं सूक्ष्म जीवी आते हैं। बोध के अविकसित स्थिति में होने के कारण ही उन्हें जड़ वर्ग का ठहराया गया है। चेतना की दूसरी स्थिति है ‘रज’ अर्थात् विकसित जागरुकता। मन प्रधान प्रेरणा। उपलब्धियों के लिए आतुर सक्रियता। उसे अहंता संचय और उपभोग के तीन रूपों में काम करते हुए देखा जा सकता है। शास्त्रकारों ने इसे अहंकार, तृष्णा और वासना में निरूपित किया है। विकसित कहे जाने वाले प्राणियों के विविध क्रिया कलापों के प्रेरणा स्त्रोत यही तीन हैं। इन्हें मनोवैज्ञानिकों ने जीव की मूल-भूत प्रवृत्ति कहा है और उनका न्यूनाधिक विभाजनों के साथ वर्णन किया है। इस स्तर के प्राणियों को शास्त्रकार जीवित कहते हैं। इनका चिन्तन और कर्तव्य रजस् स्तर का कहा जाता है।

इससे ऊँचे सत तत्व में विकसित चेतना है। इसे शरीरधारी और अशरीरी दोनों रूपों में देखा जा सकता है। आत्मशोधन में एवं ब्रह्मवर्चस् की साधना में संलग्न ब्राह्मण और इससे आगे परिपक्व स्थिति में पहुँचे हुए साधु कहलाते हैं। ब्राह्मण परिवार बना कर रहते हैं और ज्ञान संवर्धन को सेवा में संलग्न रहते हैं। साधु पके फल की तरह परिवार भर के उत्तराधिकारों से छुटकारा पाकर विश्व नागरिकों में सम्मिलित हो जाते हैं। उनका अपनापन असीम हो जाता है। व्यापक लोकहित को महत्व देते हैं और ऊँचा उठाने वाली प्रेरणाएँ देने की पुण्य-प्रक्रिया में संलग्न रहते हैं। उनकी गति-विधियाँ बादलों जैसी परिव्राजक स्तर की रहती हैं। इन्हें महात्मा कह सकते हैं। महामानव, सन्त, सुधारक, शहीद, तत्वदर्शी, युगदृष्टा, मनीषी आदि विशेषणों से इन शरीरधारी देवताओं को पहचाना जाता है। इन्हें भूसुर अर्थात् पृथ्वी के देवता भी कहते हैं।

अशरीरी देवताओं की सत्ता आँखों से तो नहीं दीखती पर वे सूक्ष्म एवं कारण शरीर धारण करके सृष्टि संतुलन को बनाये रहने के लिए अतिमहत्वपूर्ण काम करती रहती हैं। भौतिक सुविधाएँ बढ़ाने में वैज्ञानिकों इंजीनियरों, उद्योगपतियों, शासकों, शिल्पियों उत्पादकों, श्रमिकों कलाकारों एवं दूसरे अनेकों का अपने-अपने ढंग का योगदान होता है। ठीक इसी प्रकार सूक्ष्म जगत की सुव्यवस्था बनाये रहने और प्रगति के आधार खड़े करने में इन अशरीरी सूक्ष्म शरीर धारी देवताओं का भारी योगदान होता है। कई उपयोगी आन्दोलन एवं क्रियाकलाप जब तब बड़े उत्साहपूर्वक चलते दीखते हैं। उनमें साधन जुटाने, सहयोग मिलने एवं सफलता रहने की चमत्कारी प्रगति को देखकर उसके संयोजक तक आश्चर्यचकित रह जाते हैं। वस्तुतः ऐसे अवसरों पर दैवी शक्तियों के सहयोग को सम्मिलित देखा जा सकता है।

स्थूल जगत की तरह सूक्ष्म जगत में भी तम और सत की स्थिति रहती है। वहाँ भी आसुरी और दैवी सत्ता ताने-बाने की तरह, जीवन-मरण की तरह, रात दिन की तरह, धूप-छाँह की तरह काम करती है। अपनी दुनिया में सुख-दुख, पाप-पुण्य की परस्पर विरोधी गति-विधियाँ चलती हैं। सूक्ष्म जगत में भी दैवी और आसुरी सतोगुणी और तमोगुणी तत्व काम करते हैं। वहाँ भी देवासुर संग्राम मचा रहता है। अशरीरी आत्माओं में भी दुष्ट प्रवृत्ति पायी जाती है। वे भी देवताओं की तरह ही अपने स्वभाव के अनुरूप काम करती हैं और दुष्ट संभावनाएँ साकार करने में लगी रहती हैं। दुष्कर्मों में भी कई बार बढ़ी-चढ़ी सफलता मिल जाती है। इनमें अशरीरी आसुरी तत्वों का योगदान रहता है। साधना विज्ञान में दैवी और आसुरी दोनों प्रकार के विधान हैं दैवी स्तर की उपासना दक्षिण मार्गी कहलाती है उससे साधक में सत तत्वों की वृद्धि होती है और देव अनुग्रह उपलब्ध होता है। इसके प्रतिपक्षी तन्त्रोक्त वाम मार्ग द्वारा आसुरी शक्तियों से भी संपर्क साधा जा सकता है। उनके सहयोग से मारण, मोहन उच्चाटन, वशीकरण जैसे क्रूर कर्म किये जा सकते हैं।

चेतना का उच्च स्तर अशरीरी किन्तु सुविकसित होता है, उसमें देव और असुर दोनों प्रकृति के हो सकते हैं। यह उभय-पक्षी स्थिति तो रज और तम में भी होती है। रजस् स्तर के प्राणियों में गाय जैसे दयालु और व्याघ्र जैसे हिंसक पशु मौजूद हैं। हंस और काक का भेद इसी प्रकार का है। सर्प और नेवला की भिन्नता स्पष्ट है। जीवन रक्षा के प्रहरी श्वेत रक्त कण भी अपना काम करते हैं। जड़ पदार्थ में प्राण घातक विषों की भी कमी नहीं और अमृतोपम औषधियाँ भी प्रचुर परिमाण में मौजूद हैं। अग्नि जैसे दाहक और हिम जैसे शीतल पदार्थों में परस्पर विरोधी प्रकृति काम करती पाई जाती है। चेतना के तम,रज और सत् स्तरों में से प्रत्येक को शुभ-अशुभ के दो-दो भागों में बाँटा जाय तो स्पष्ट ही वे छह की संख्या में हो जाते हैं।

जहाँ लगे हाथों अद्वैत, द्वैत और त्रैत का अन्तर भी समझ लेना चाहिए। सृष्टि के मूल में एक ही तत्व है चेतना। वैज्ञानिक विकास के साथ अब प्रकृति की नई परतें खुली हैं और किसी समय जो पदार्थ की मूल भूत इकाई परमाणु समझी जाती थी अब वह मान्यता वापिस ले ली गयी है। परमाणु भी अनेक घटकों का सम्मिश्रित पिण्ड बन गया है। उन घटकों का शवच्छेद करने पर वे स्वयं समाप्त हो जाते हैं और उनके मूल में ऊर्जा रह जाती है। इसे ‘क्वान्टा’ कहते हैं। अब पदार्थ की मूल इकाई परमाणु नहीं है। वरन् प्रकृतिगत हलचलों के लिए उत्तरदायी व्यापक ऊर्जा है, अब यही प्रकृति है और इसी का नाम क्वान्टा है।

क्वान्टा अचेतन है या चेतन? इस प्रश्न का समाधान अब वैज्ञानिक क्षेत्र ही इस तरह करने जा रहे हैं। जिस तरह अध्यात्म द्वारा प्रतिपादित किया जाता रहा है। ‘इकॉलाजी’ के सिद्धांतानुसार प्रकृति की-पदार्थों की समस्त हलचलें एक दूसरे की पूरक हैं। पारस्परिक हित साधन सहयोग और संतुलन की रीति-नीति ठीक उसी प्रकार चल रही है मानो किसी सुव्यवस्थित शासन ने अपनी प्रजा को बिना टकराये स्नेह सहयोगपूर्वक रहने का विधान बना रखा हो। गृहपति अपने परिवार की व्यवस्था करता है। जीवात्मा अपने शरीर के अवयवों और जीवाणुओं को घड़ी के कलपुर्जों की तरह सहयोगी बनाये हुए हैं। मनुष्य की गन्दी साँस को वनस्पति खाती है और वनस्पतियों द्वारा ठण्डी सांस को मनुष्य पाते हैं। भूमि की उर्वरता पौधों को उगाती है और पौधे सूख कर खाद बनते और भूमि को उर्वरता लौटाते हैं। समुद्र, बादल, वर्षा, नदी और फिर समुद्र के क्रम से जल-राशि का भ्रमण चक्र चलता रहता है। ग्रह-नक्षत्र आपस में टकराते नहीं वरन् अपनी-अपनी कक्षाओं में शांतिपूर्वक भ्रमण करते हैं। वे एक दूसरे के साथ छेड़खानी नहीं करते वरन् स्नेह सहयोग भरा आदान-प्रदान करते हैं। दुर्बल प्राणियों का प्रजनन अधिक और समर्थों का स्वल्प होना प्रकृति की विवेकशीलता का द्योतक है। जब भी अवाँछनीय परिस्थिति बढ़ती है तो उनकी विरोधी प्रतिक्रिया होती और उस तूफान द्वारा फिर ये वातावरण स्वच्छ हो जाता है। अवतारों का दृश्य अदृश्य, अवतरण इसी सृष्टि संतुलन के लिए होता रहता है। ‘इकॉलाजी’ विज्ञान की जितनी गहरी परतें खुलती जा रही हैं। उसी अनुपात में यह स्पष्ट होता जाता है कि प्रकृति अन्धी नहीं वरन् अत्यन्त दूरदर्शी, विवेकशील एवं क्रिया-कुशलता में सुसम्पन्न है। इसका अर्थ हुआ प्रकृति को चेतना युक्त होने की मान्यता मिलना। विश्वास किया जाना चाहिए कि अगले दिनों ‘क्वाटना’ भी मर जायगा और इसके स्थान पर सृष्टि का उद्गम स्त्रोत ‘चेतना प्रवाह’ घोषित कर दिया जाएगा। विभिन्न पदार्थ और प्राणी उसी चेतना समुद्र की लहरें ठहराये जायेंगे और सर्वत्र एक ही परमेश्वर संव्याप्त होने की बात स्वीकार की जायगी। हमें धैर्य रखना चाहिए और विश्वास करना चाहिए कि शोध में निरत विज्ञान भी अध्यात्म के स्वर में स्वर मिला कर एक ही तथ्य का प्रतिपादन कर रहा होगा-‘ईशावास्य मिदं- सर्वे यत्किंचित् जगत्यां जगत् यहाँ सर्वत्र ईश्वर संव्याप्त हैं। ‘सर्वे खलु इंदं ब्रह्म’ का वेदान्त उद्घोष अगले ही दिनों विज्ञान की कसौटी पर भी सत्य और तथ्य सिद्ध होकर रहेगा।

वैज्ञानिकों की दृष्टि से परमाणुओं का अन्धड़ तूफान ही यह संसार है। रेगिस्तान में आँधी आने पर यहाँ का रेत वहाँ उड़कर जा पहुंचता है और रेत के टीले इधर से उधर जमते रहते हैं। बालों की कई तरह की आकृतियाँ बनती बिगड़ती रहती हैं। इसी प्रकार परमाणुओं के अन्धड़ में तरह-तरह के पदार्थ-प्राणियों के शरीर बनते-बिगड़ते रहते हैं। मूलसत्ता अणु प्रवाह है। प्राणियों की मस्तिष्कीय संरचना एवं परमाणुओं की भगदड़ का सम्मिलित स्वरूप ही यह संसार है जिसमें हम रहते और तरह-तरह के अनुभव करते हैं। हर प्राणी की दुनिया उसके चेतना स्तर के अनुरूप एक दूसरे से सर्वथा भिन्न है। मेंढक इस संसार को जिस दृष्टि से देखता है। जैसे सोचता अनुभव करता है-इन्द्रियों की सहायता से उपभोग सामग्री तथा परिस्थिति में से जिस प्रकार की अनुभूति पाता है, वह मनुष्य की अनुभूतियों से सर्वथा भिन्न प्रकार की है। दोनों के बीच जमीन आसमान जितना अन्तर हो सकता है। ऐसी दशा में संसार का वास्तविक रूप क्या हो सकता है? यह निर्णय कर सकना सर्वथा असम्भव है। एक ही खाद्य पदार्थ का विभिन्न प्राणी विभिन्न प्रकार का स्वाद लेते हैं तो किसी पदार्थ का मूल स्वाद कैसे घोषित किया जाय? जब एक ही दृश्य से अनेकों प्रकार के निष्कर्ष निकाले जाते हैं तो उनकी वास्तविकता किस आधार पर निरूपित की जाय? इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए वेदान्त में इस संसार को माया मिथ्या- स्वप्न आदि नामों से पुकारा है। रज्जु-सर्प की उपमा देते हुए इन्हें भ्रान्ति कहा है। इस अर्थ के पीछे सृष्टि की यथार्थता का दिग्दर्शन है। जो दीख रहा है उसे झुठलाने की चुनौती नहीं है और न निर्धारित कर्तव्यों से भाग खड़े होने का उपदेश है। सिनेमा के पर्दे पर होने वाले घुड़दौड़ सत्य भी है और असत्य भी। सत्य इसलिए कि हम प्रत्यक्ष देखते हैं और दृश्य का आनन्द लेते हैं। असत्य इसलिए कि वहाँ न तो घोड़े हैं और न दौड़ हो रही है। मस्तिष्क की रचना आँखों की निरीक्षण शक्ति फिल्म पर खिंचे फोटो और दिखाने की मशीन का द्रुत धावन आदि की प्रक्रियाओं से मिलकर सिनेमा एक प्रत्यक्ष सत्य बना हुआ है। इतने पर भी उसे वैज्ञानिक एवं दार्शनिक दृष्टि से भ्रान्ति दर्शन ही ठहराया जायगा। वेदान्त ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या कहता है तब उसका तात्विक प्रतिपादन क्या है? इसका यत्किंचित् आभास ऊपर की पंक्तियों से प्राप्त किया जा सकता है। यह अद्वैत का प्रतिपादन है।

ब्रह्म को सत् कहा गया है, प्रकृति उसकी स्फुरणा है। एक को चेतन दूसरे को जड़ कहा जाता है। दोनों के मिलन से पदार्थ में हल-चल और प्राणियों में चिन्तन चलता है। सृष्टि के मूलतत्व ब्रह्म को सत् कहा गया है और उसके आवरण, उपकरण को प्रकृति एवं तमस् कहते हैं। इस प्रकार प्रकृति और पुरुष की दो सत्ताएँ बनती हैं और इन्हें एवं तम की तात्विक स्थिति कह सकते हैं। यह द्वैत कहलाया। वस्तुतः इस संसार में जड़ चेतना-प्रकृति पुरुष-प्रकाश अन्धकार-सर्दी-गर्मी-जल-थल की तरह दो ही बड़े तथ्य हैं। अकेला ब्रह्म होता तो वह अपने आप तक ही सीमित रहता। अकेली प्रकृति होती तो सब कुछ निस्तब्ध नीरस, निष्प्राण होने के कारण अविकसित एवं भयावह स्थिति में बना रहता। चमत्कार तो मिलन से हुआ है। दो के मिलने से तीसरी वस्तु बनती है। इसे हर कोई जानता है। दिन और रात की मिलन बेला को संध्या काल कहते हैं। नीला और पीला रंग मिलाकर हरा बनता है। दो गैसें मिलने से पानी बन जाता है। आग और पानी के मिलने से भाप बनती है। जड़ ओर चेतन का मिलन ही ‘जीव’ है। त्रैतवाद में ईश्वर प्रकृति और जीव की तीन सत्ताएँ मानी गयी है। जीव एक सम्मिश्रण है। मुक्त की स्थिति में माया हट जाती है और जीव अपने शुद्ध स्वरूप परमेश्वर में जा सकता है इस प्रकार उसकी दिशा स्थिति का अन्त हो जाता है। माचिस में आग लगती है तो लौ उठती है। तीली समाप्त हो जाती है और व्यापक अग्नि तत्व में जा मिलती है। जड़ और चेतन के सम्मिश्रण से बँधी हुई एक अहंता ग्रन्थि को जीवन कहते हैं। अहम् का तात्पर्य जड़ शरीर एवं भौतिक साधनों सहित चेतना की आत्म मान्यता होती है। इसी जकड़न को भव बन्धन कहते हैं। आत्मा और प्रकृति की भिन्नता की अनुभूति यदि अन्तःकरण को हो सके तो ‘आत्म-ज्ञान’ का, ब्रह्मज्ञान का उद्देश्य पूरा हो जायगा। इसी अनुभूति को भूमा, ऋतम्भरा प्रज्ञा, तुरियावस्था समाधि, ईश्वर प्राप्ति-जीवन मुक्ति आदि के नाम से जाना जाता है।

प्रकृति और पुरुष तम और सत् ही दो तत्व इस संसार में हैं। दोनों के मिलन से जो जड़ पदार्थों में हलचल और चेतना में चिन्तन चलता है उसे रज कहते हैं। सक्रियता मिलन की ही प्रतिक्रिया है। बिजली के दो तार अलग रहें तो निष्क्रियता रहेगी, पर जब वे मिलेंगे तो चिनगारियाँ छूटेंगी और विद्युत प्रवाह बह निकलेगा। रजस् मिलन की प्रतिक्रिया भर है उसका स्वतन्त्र अस्तित्व कुछ नहीं।

त्रैत द्वैत और अद्वैत का दर्शनशास्त्र समझ लेने से हमारी आध्यात्मिक गुत्थियाँ खुलती हैं और वस्तुस्थिति समझने एवं सत्य तक पहुँचने में सुविधा होती है। ईश्वर जीव प्रकृति है। यदि सम्मिश्रण को महत्वहीन समझ कर विश्लेषण पृथक्करण पर उतारू हो जाए तो फिर प्रकृति और पुरुष का द्वैत सिद्धान्त ही पर्याप्त प्रतीत होता है। यदि और भी गहराई तक उतरा जाए तो इस विश्व में एकमात्र चेतना का ही अस्तित्व है। वही कृत विकृत होकर ऊर्जा प्रकृति परमाणु पदार्थ में विकसित होते-होते दृश्य संसार बन जाती है। इस प्रकार अपने-अपने स्तर पर यह तीनों ही सिद्धान्त सही हैं और उन्हें स्थिति के अनुसार अपने अपने स्थान पर ठीक माना जा सकता है। यही बात सत्,रज,तम तीनों तत्वों के सम्बन्ध में है। सत् को चेतना और तम को पदार्थ कह सकते हैं। रज का कोई मौलिक अस्तित्व नहीं। वह दोनों के मिश्रण से बना एक कृत्रिम तत्व है। संध्या काल का स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं वह दिन और रात्रि के मिलन की सम्मिश्रण अवधि है। उसे मान्यता दी भी जा सकती है। और नहीं भी। रज एक स्थिति में स्वीकारा जा सकता है, पर दूसरी में उसे अस्वीकार करने में भी अनौचित्य नहीं है।

प्रगति का क्रम नीचे से ऊपर की ओर है। तम से रज, रज से सत् और जीवन बढ़ता है। यही उचित है और यही शोभनीय। जीव इसी क्रम को अपनाये रहे तो उसकी प्रशंसा है। निम्न योनियों में से प्रगति करते-करते जीव को मनुष्य स्थिति में आने का सौभाग्य मिल गया तो अब प्रतिष्ठा इसी में है कि आगे बढ़ा जाये तो जीवात्मा भर न रह कर महात्मा, देवात्मा और अन्ततः परमात्मा बनने का चरम लक्ष्य प्राप्त किया जाए।

मनुष्य प्रकृति में भी गुणकर्म, स्वभाव का स्तर जड़ता जागरुकता एवं उत्कृष्टता प्रधान रहता है। यह तम, रज और सत की स्थिति है। आत्म-विश्लेषण से यह जाना जा सकता है कि हमारी अन्तः स्थिति पाशविक है, मानवी है या दैवी उत्कर्ष की दिशा में बढ़ रही है, प्रशंसनीय विवेकशीलता इसी में है कि हम निम्न स्थिति में न पड़े रहें वरन् उत्कर्ष के लिए प्रबल पुरुषार्थ करें और चरम लक्ष्य तक प्रगति से बढ़ चलने का कीर्तिमान स्थापित करें।


सिंह, सियार और गधा (kahani)

सिंह, सियार और गधा तीनों ने शिकार खेलने का एक सिण्डीकेट बनाया और निश्चय किया कि जो कमाई होगी उसे तीनों मिलकर बाँट लिया करेंगे।

एक दिन सिंह ने एक मोटा हिरन धर दबोचा। फैसले के अनुसार तीनों सदस्य इकट्ठे हुए। गधा पंच बनाया गया था। सो उसने शिकार के तीन भाग किये और सिंह से कहा-जो एक भाग आपको पसन्द हो सो ले लीजिये।

इस पर सिंह कुढ़ गया। शिकार मैंने किया और मिलेगा एक तिहाई ही। यह गधा तो पूरा गधा है सिंह गधे पर भी टूट पड़ा और उसका भी कचूमर निकाल कर रख दिया।

अब दो शिकार सामने पड़े थे। बँटवारा करने के लिए अब की बार पंच सियार को बनाया गया।

सियार ने दोनों लाशें सिंह के हवाले कर दीं और कहा मेरा पेट छोटा-सा है और पुरुषार्थ भी कम है। सो जो आप से बचेगा उतने से ही काम चला लूँगा।

सिंह बहुत प्रसन्न हुआ। उसने पूछा-भला तुमने इतनी बुद्धिमानी कहाँ से पाई? सियार बोला-गधे के व्यवहार ने मुझे यह पाठ पढ़ाया। दूसरों की गलती से नसीहत लेने लायक अकल हर समझदार में होनी चाहिए, सो हे वनराज! मैंने उसी राह पर चलना अपने लिए उपयुक्त समझा है।


आत्मोत्कर्ष की दिशा में चलने के लिये दो चरण

शरीर से कोई महत्वपूर्ण काम लेना हो तो उसके लिए- उसे प्रयत्नपूर्वक साधना पड़ता है। कृषि, व्यवसाय शिल्प, कला आदि के जो भी कार्य शरीर से कराने हैं। उनके लिए, उसे अभ्यस्त एवं क्रिया-कुशल बनाने के लिए आवश्यक ट्रेनिंग देनी पड़ती है। लुहार, सुनार, दर्जी बुनकर, मूर्तिकार आदि काम करने वाले शिल्पों को बहुत समय तक सीखते हैं, तब उनके हाथ उपयुक्त प्रयोजन के लिए ठीक प्रकार सधते हैं। गायक, चित्रकार, अभिनेता, पहलवान आदि को अपने-अपने कार्यों को ठीक तरह कर सकने की देर तक शिक्षा प्राप्त करनी पड़ती है। अस्तु शरीर को अभीष्ट कार्यों के लिए प्रशिक्षित करने की आवश्यकता सर्वत्र समझी जाती है और उसके लिए साधन जुटाये भी जाते हैं।

शिक्षा का दूसरा क्षेत्र है मस्तिष्क। मस्तिष्क का ही शरीर पर नियन्त्रण है। जीवन की समस्त दिशा धाराओं को प्रवाह देना मस्तिष्क का ही काम है। “बुद्धिर्यस्य बलं तस्य निबुद्धिस्य कुतोवलम्” सूक्ति में सच ही कहा है जिसमें बुद्धि है, उसी में बल है बुद्धिहीन तो सदा दुर्बल ही रहता है। प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या? हाथी को गधे जैसा लदते और सिंह तथा बन्दर को समान रूप से नाचते देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि दुर्बल काम मनुष्य अपने बुद्धिबल से किस प्रकार सृष्टि के समस्त प्राणियों पर शासन कर रहे हैं। इस प्रशासन के अन्तर्गत वे जीव भी आते हैं जो शारीरिक प्रतियोगिता में मनुष्य को हजार बार पछाड़ सकते हैं।

मस्तिष्कीय शिक्षण के लिए ज्ञान और अनुभव सम्पादित करना पड़ता है। जानकारी और अभ्यास की इसके लिए आवश्यकता होती है। इसका बहुत कुछ प्रयोजन स्कूली शिक्षा, साहित्य, सत्संग, मनन, चिन्तन आदि के सहारे पूरा होता है। मस्तिष्कीय क्षमता विकास की उपयोगिता भी सर्वविदित है। इसीलिए अपनी-अपनी परिस्थिति के अनुसार स्कूली अथवा दूसरी प्रकार की शिक्षा पद्धति अपनाई जाती है और जानकारी, समझदारी बढ़ाने के लिए यथासम्भव प्रयत्न किया जाता है शिक्षा का दूसरा चरण जानकारी की कमी को पूरा करना है। इससे विचार शक्ति बढ़ती है, बुद्धि तीक्ष्ण होती है और व्यवहार कुशलता आती है। बौद्धिक विकास के लिए शिक्षा परक जो भी उपाय किये जाते हैं, वे सभी सराहनीय हैं। शारीरिक कुशलता की ही तरह मस्तिष्कीय विकास भी आवश्यक है। अस्तु शिक्षा के इन दोनों क्षेत्रों में अधिकाधिक समावेश करने के प्रयत्नों की प्रशंसा ही की जायगी।

शिक्षा का प्रवेश प्रायः शरीर एवं मस्तिष्क तक ही सीमित रहता है, अन्तःकरण का स्तर बदलने में तथाकथित ज्ञान सम्पादन की कोई विशेष उपयोगिता सिद्ध नहीं होती। यदि मस्तिष्कीय शिक्षण से आस्थाएँ बदली जा सकतीं तो हर राजनेता सच्चे अर्थों में देश भक्त होता-हर सरकारी कर्मचारी लोक-सेवा में उसी निष्ठापूर्वक संलग्न रहता जैसा कि उसे ट्रेनिंग की पाठ्य पुस्तकों में पढ़ाया गया था तब धर्मोपदेशक नीति और सदाचार का ही आदर्श प्रस्तुत करते दिखाई पड़ते। साधु-सन्तों में से हर एक को ब्रह्मवेत्ता ऋषि रूप में पाया जाता। पर सब वैसा नहीं होता। छद्म मत्सर और आडम्बर को आदर्शवाद की वकालत करने वालों में ही जब भरमार पाई जाती है तो लगता है बौद्धिक शिक्षा शरीर और मस्तिष्क को विकसित करने में कितनी ही उपयोगी क्यों न सिद्ध होती हो, अन्तः करण को उत्कृष्टता की ओर उठाने में उसका नगण्य सा ही योगदान रहता है।

तब प्रश्न उत्पन्न होता है कि व्यक्तित्व को सब अर्थों में सुसंस्कृत और समुन्नत बनाने के लिए क्या किया जाए? इसके उत्तर में एक ही तथ्य सामने आता है। आस्थाओं के सहारे आस्थाओं को उभारा जाय। जंगली हाथी पकड़ने में प्रशिक्षित हाथियों का उपयोग होता है। कांटे से काँटा निकालने और विष से विष को मारने की कहावत प्रसिद्ध है। लोहे को लोहे से काटा जाता है। डूबे को पानी में से निकालने के लिए स्वयं डुबकी लगानी पड़ती है। अन्त:करण के आस्था क्षेत्र को कुसंस्कारों से मुक्त करने के लिए सदुद्देश्यपूर्ण आस्थाओं की नये सिरे से प्रतिष्ठापना करनी पड़ती है।

जीवन के मध्य केन्द्र-मस्तिष्क को अन्तःकरण कहते हैं। उसी की स्थिति व्यक्ति को महान बनाती है और उसी के आधार पर निकृष्टता के गर्त में गिरना पड़ता है। समुन्नत और पतित व्यक्तियों में एक जैसे साधन रहते हुए भी अन्तर क्यों आया? इसका कारण ढूंढ़ना हो तो उसकी आस्थाओं में अन्तर रहना ही प्रधान निमित्त परिलक्षित होगा। धन वैभव की दृष्टि से व्यवहार, कुशलता अवसर, साधन, सहयोग आदि का महत्व हो सकता है, पर व्यक्तित्व के उत्थान पतन की बात तो पूरी तरह व्यक्ति के अन्तःकरण की स्थिति पर ही टिकी हुई है। गीताकार ने व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए ठीक ही कहा है- “श्रद्धामयोऽयं पुरुष योगच्छ्रध: स एव स” अर्थात् यह मनुष्य श्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा है वस्तुतः वह ठीक वही है। तात्पर्य स्पष्ट है। मनुष्य का स्वास्थ्य,ज्ञान,धन,पद उसका मूलस्वरूप नहीं, वह तो आवरण शृंगार मात्र है जिनकी कभी भी उलट-पुलट हो सकती है। स्थायित्व तो अन्तःकरण में भावास्थित आस्थाओं- विश्वासों आकांक्षाओं पर निर्भर है। वे जिस स्तर की होंगी, मनुष्य उसी के अनुरूप ढलेगा और अन्ततः उसी के अनुरूप उठने, गिरने का आधार बनेगा।

यहाँ समझने योग्य तथ्य इतना ही है कि आवरणों को सब कुछ न मानकर व्यक्ति की मूलसत्ता प्राण चेतना को ऊँचा उठाने की बात सामने हो तो फिर अन्तःकरण को परिष्कृत करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं अब प्रश्न यह उठता है कि यह किया किस प्रकार जाय? उसके दो ही उपाय हैं- 1 आत्म-विश्लेषण के द्वारा स्व सत्ता की स्थिति तथा दिशा का सही बोध कराने वाली आस्थाओं की गहन अन्तराल में प्राण-प्रतिष्ठा की जाय (2) साधनाओं के क्रिया कलाप द्वारा वंचित कुसंस्कारों को उखाड़ने और उत्कृष्ट आस्थाओं जमा सकने में समर्थ प्राणशक्ति को प्रखर बनाया जाय।

प्रथम उपाय के लिए ब्रह्मविद्या का- तत्वदर्शन का- अवगाहन करना होता है। अध्यात्म विज्ञान का ज्ञान-भाग इसी के लिए विनिर्मित हुआ है। आत्मबोध के लिए उच्चस्तरीय स्वाध्याय-सत्संग मनःचिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। आत्म-चिन्तन और आत्म मन्थन पर विचार शक्ति को केन्द्रित करना होता है। भगवान बुद्ध और आत्मज्ञानियों को अपनी साधना का केन्द्र बिन्दु इसी को मान कर चलना पड़ा था। अध्यात्म की भाषा में इसे योग कहते हैं। योग का अर्थ है जोड़ना। यह चिन्तन पर प्रक्रिया है। आत्मा को परमात्मा से -जीव को ब्रह्म से -सामान्य के असामान्य से सम्बद्ध करने के लिए चिन्तन का उपयोग भी करना पड़ता है और भावनाओं का भी। ब्रह्म विद्या का विशालकाय-कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। योग क्रियापरक नहीं विचारपरक है। उसकी परिधि में आत्मा और परमात्मा के बीच जुड़े हुए असंख्य सूत्रों का विविध आधारों पर गहन चिन्तन करना पड़ता है। दर्शनशास्त्र की रचना इसीलिए हुई है। इसी परिधि में भावनाओं को उच्चस्तरीय प्रगति की दिशा में उभारना भी आता है। इसे भक्ति कहते हैं। प्रेम का निकृष्ट स्वरूप तो मोह और वासना के स्वरूप जैसा घटिया और घिनौना हो जाता है, पर उसकी ऊँची स्थिति आत्मीयता की संवेदनाओं को अधिकाधिक व्यापक बनाने के रूप में होती है। ‘रमो वैस’ सूत्र में सत्य ही कहा गया है। कि -प्रेम ही परमेश्वर है। इससे बढ़कर सरलता अन्यत्र कहीं है ही नहीं। जिस पदार्थ या प्राणी पर आत्मीयता बखेर दी जाती है उसी में सुन्दरता एवं सरलता की अनुभूति होने लगती है। त्याग, बलिदान, सेवा, उदारता जैसी सत्यप्रवृत्तियों का उभार तभी आता है, जब उच्चस्तरीय ‘प्रेम’ का अन्तराल में उदय होने लगे। प्रेम तत्व की संवेदनाएँ जागृत करने के लिए ‘ईश्वर भक्ति’ के रूप में भावनाएँ उभारनी पड़ती हैं। इसके लिए पूजा, अर्चा, कीर्तन, ध्यान, लीलाओं का श्रवण, दर्शन आदि उपायों को अवलम्बन करना पड़ता है। अर्जुन को विराट् ब्रह्म के रूप में ईश्वर की झाँकी जिस दिव्य दृष्टि से हुई थी उसी को अपनाने से सियाराममय सब जग जानी की श्रद्धा उभरती है और स्वार्थ संकीर्णता से ऊँचे उठ कर लोक-मण्डल की दिशा में चल पड़ने की उमंग क्रियान्वित होती है।

तप आत्मोत्कर्ष का दूसरा चरण है। चेतना के साथ जो तीन कलेवर लिपटे हैं वे सामान्यतया जीवन निर्वाह के आवश्यक क्रिया-कलाप पूरे करने भर के लिए मालूम पड़ते हैं, पर वस्तुतः उनके अन्तराल में शक्तियों और सिद्धियों के अजस्र भाण्डागार छिपे पड़े हैं। इस रत्न राशि को खोज निकालने और उखाड़-उभार कर ऊपर ले आने की वैज्ञानिक पद्धति का नाम तप है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की मोटी गति-विधियां सर्वविदित है। स्थूल शरीर रक्त माँस का बना- क्रिया-कलाप के उपयुक्त और जीवन धारण की आवश्यक कार्य पद्धति पूरी करने के लिए बना है। सूक्ष्म शरीर से मन और बुद्धि के विविध कार्य सम्पन्न होते है। कारण शरीर भावनाओं का केन्द्र है- इच्छाएँ, प्रेरणाएँ, उमंगें, संवेदनाएं इसी में भरी रहती हैं। इन तीनों शरीरों की मिलीजुली गतिविधियों को जीवन का स्वरूप कहते हैं। यह सामान्य बात हुई। असामान्य को देखा खोजा जाय तो प्रतीत होगा कि शरीर की ओजस्विता-मस्तिष्क की मनस्विता और अन्तःकरण की तेजस्विता की सामर्थ्य कितनी महान है। यह चेतनात्मक ऊर्जाएँ जिसमें जितनी मात्रा में बढ़ी-चढ़ी होती हैं वह उतना ही प्रभावी, पराक्रमी, समुन्नत एवं अभिवंदनीय बनता चला जाता है। यही वह वैयक्तिक चुम्बक है जिसके सहारे सिद्धियाँ सफलताएँ, विभूतियाँ अनायास ही खिंचती चली आती हैं। सामान्य परिस्थितियों में जन्मे और गये-गुजरे साधनों से काम चलाने वाले व्यक्ति भी जब पग-पग पर आने वाले अवरोधों, अभावों, संकटों और संघर्षों का सामना करते हुए दुस्साहसी शूरवीरों की तरह प्रगति पथ पर एक-एक सीढ़ी पार करते हुए सफलता के उच्चशिखर पर जा पहुँचते हैं तो उस चमत्कार के पीछे यही चुम्बकत्व काम कर रहा होता है। इतिहास में ऐसे अनेकों महामानवों की यशगाथाएँ भरी पड़ी हैं। जो परिस्थितियों की दृष्टि से गई-गुजरी स्थिति में रहते हुए भी प्रखर मनःस्थिति के कारण आश्चर्यजनक सफलताएँ प्राप्त कर सकें। उन्हें ऊँचा उठाने और आगे बढ़ाने में कौन शक्ति काम कर रही है, इसकी खोज-बीन करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि उनके व्यक्तित्व की प्रखरता ही शक्तिपुंज बनी रही है और उसी ने स्वल्प साधनों के सहारे महानतम प्रयोजन सिद्ध किये।

यह वैयक्तिक चुम्बक हर व्यक्ति के भीतर न्यूनाधिक मात्रा में मौजूद है। वह आत्मा का गुण है। आत्मा की अविच्छिन्न ऊर्जा तीनों शरीरों में तेजस्, मनस् एवं ओजस् के रूप में झाँकती और काम करती देखी जा सकती हैं। जन्मजात रूप से हर व्यक्ति इस क्षमता को अपने साथ लेकर आता है। पर वह प्रमुख स्थिति में रहता है। जिनके पास पूर्व संग्रह है उनमें आरम्भ से ही इनकी अधिकता रहती है। जिनके पास ऐसा संचय नहीं है वे प्रयत्नपूर्वक उसे उभार सकते हैं। तप का प्रयोजन यही है कि व्यक्तित्व रूपी समुद्र में मन्थन क्रिया के द्वारा पौराणिक कथानक की तरह चौदह रत्नों जैसे सिद्धियाँ प्राप्त करने के मार्ग पर चलने का सरंजाम जुटाया जाय।

तप का स्वरूप है तपाना गरम करना। आग पर गरम करने से सामान्य वस्तुओं की भी उपयोगिता बढ़ाई जा सकती है फिर व्यक्तित्व की प्रखरता उससे क्यों न बढ़ें? कच्चे अन्न को चूल्हे पर पका कर मिष्ठान, पकवान बनते हैं। ईंटों को भट्टे में लगाने से वे टिकाऊ बन जाती हैं। धातुओं को शुद्ध और सुदृढ़ बनाने के लिए उन्हें भट्टी में डाला जाता है। पानी को गरम करने पर जो भाप बनती हैं। उसकी सामर्थ्य से रेल गाड़ियां दौड़ती हैं। भस्में और रसायनें अग्नि संस्कारों से बनती हैं। बारूद में ताप पहुँचते ही भयंकर विस्फोट होता है। गर्मी से अण्डे पकते हैं। कृमि-कीटकों को मानने के लिए आग जलाई जाती है। प्रकाश और शक्ति का वैभव प्रकारान्तर से ताप की ही प्रतिक्रिया है। बिजली क्या है? ताप का ही एक रूप है। शरीर में तभी तक जीवन है जब तक उसका तापमान नियत मात्रा में बना रहे, उसके गिरने पर निष्क्रियता बढ़ती जाएगी और प्राणान्त होकर रहेगा। जितनी मशीनें चलती हैं वे सभी अपने-अपने स्तर के ईंधन माँगती हैं। तेल, कोयला, भाप, गैस आदि तरह-तरह के ईंधन ही अग्नि संयोग से वह शक्ति उत्पन्न करते हैं। जिससे मशीनें काम कर सकें और कारखाने चल सकें। शरीरों को यही ईंधन आहार के माध्यम से मिलता है। गतिशीलता बनाये रहने के लिए गर्मी आवश्यक है। पृथ्वी के पदार्थ और प्राणी अपनी हलचलें जारी रखने के लिए आवश्यक ऊर्जा सूर्य से प्राप्त करते हैं।

व्यक्तित्व के अनेकानेक घटकों एवं परतों को आवश्यक ताप पहुँचा कर उन्हें उत्तेजित किया जाता है। और जो अद्भुत क्षमताएँ कण-कण में दबी पड़ी हैं उन्हें जागृत बनाकर सामान्य मनुष्यों देव दानव, स्तर तक पहुँचाने में सफल बना जाता है। सफलताएँ किसी के ऊपर आसमान से नहीं बरसतीं, उन्हें पुरुषार्थ का मूल्य चुका कर खरीदा जाता है। पुरुषार्थ को सही दिशा में, सही मात्रा में उत्पन्न एवं नियोजित कर सकने की कुशलता तपश्चर्या के आधार पर उत्पन्न की जाती है। इसलिए प्रत्येक प्रगतिशील व्यक्ति को तप करने के लिए कटिबद्ध होना पड़ता है। भौतिक प्रयोजनों के लिए भौतिक स्तर का और आत्मिक प्रगति के लिए इस प्रकार का तप करना पड़ता है। साधना विधानों की संरचना इसी निमित्त की गई है। प्रत्येक साधक को तप पुरुषार्थ करने पड़ते हैं और उसी के फलस्वरूप अनुदानों, वरदानों के महत्वपूर्ण प्रतिफल प्राप्त होते हैं।

मान्यता है कि देवी-देवताओं की मनुहार मंत्र-तन्त्रों के आधार पर करने से वे प्रसन्न हो जाते हैं और साधनारत व्यक्ति उसके मनोवाँछित वरदान प्रदान करते हैं। इस मान्यता का एक अन्धा पक्ष है दूसरा उजाला। अन्धा यह है कि देवी-देवताओं के लिए उनके मुँह में लार टपकती रही हो और प्रशंसा सुनने एवं सस्ते भेंट उपहार पाने भर से वे किसी पर लट्टू होकर ऐसे वरदान देते हों जो भारी उच्चस्तरीय पात्रता सम्पन्न व्यक्तियों को ही मिल सकते हैं। यदि यह मान्यता सही हो, तो फिर देवी-देवताओं को रिझाना ही लाटरी लगाने की तरह अत्यन्त लाभप्रद व्यवसाय है। साधना विज्ञान में छाई हुई इस मूढ़ मान्यता का कोई आधार नहीं है। न इसके पीछे कोई तर्क है और न आधार।

उजला पहलू यह है कि मानवी अन्तराल में एक से एक अद्भुत क्षमता केन्द्र प्रसुप्त स्थिति में पड़े हैं। यही देवी-देवता हैं। इन्हें साधना पुरुषार्थ में उसी प्रकार बलिष्ठ बनाया जा सकता है जैसे व्यायाम से माँसपेशियों को और अध्ययन से मस्तिष्कीय ज्ञानकोषों को। कारण शरीर का व्यायाम भी तप साधन है। इससे देव संस्थानों को जागृत होने का अवसर मिलता है। देवताओं की सुषुप्ति और जागृति के रोचक कथानक पुराण साहित्य में भरे पड़े हैं। आषाढ़ सुदी एकादशी देवशयनी मानी जाती है और पूरे चार महीने गहरी निद्रा का आनन्द लेकर कार्तिक सुदी एकादशी को देव उठनी(देवोत्थान) पर्व मनाया जाता है। विष्णु भगवान शेषनाग पर निरन्तर शयन ही करते रहते हैं उनकी यह निद्रा भंग न होने पाये इसलिए लक्ष्मी जी पैर दबाती और नारद जी चँवर ठुलाते रहते हैं। शरीर में कुण्डलिनी महाशक्ति सदा सोती ही रहती है बड़े प्रयत्नपूर्वक कुण्डलिनी जागरण होता है षट्चक्र तथा दूसरे शक्ति संस्थान मूर्छाग्रस्त ही रहते हैं। वेधन क्रिया द्वारा उनके स्फुरण उत्पन्न की जाती है। इन समस्त प्रतिपादनों के पीछे एक ही रहस्य है कि अणु-ऊर्जा की तरह इस समस्त विश्व के जड़ चेतन में क्षमता तो अजस्र मात्रा में भरी पड़ी है, पर उसका उपयोग तभी हो सकता है तब जागरण के लिए प्रबल पुरुषार्थ किया जाए। इसी प्रयास को तप साधना कहते हैं। तप से अपने ही अन्तस् के प्रसुप्त को जागृत किया जाता है और उसके फलस्वरूप दिव्य अनुदानों-वरदानों का प्रतिफल मिलता है। यही देवाराधन का उजाला पक्ष है। इस मान्यता के पीछे तर्क भी हैं और तथ्य भी। साधना में सिद्धि मिलने वाली मान्यता इस आधार पर पूर्णतया प्रामाणिक मानी जा सकती है।

संक्षेप में चेतना के भावपक्ष को उच्चस्तरीय उत्कृष्टता के साथ एकात्म कर देने को ‘योग’ कहते हैं। यह आस्थाओं एवं आकाँक्षाओं का परिष्कार है। योगी की मनोभूमि इसी प्रकार की होती है। वह शरीरगत तथा मनोगत वासनाओं, तृष्णाओं की उपेक्षा करता है। उन्हें तुच्छ नगण्य मानता है। तीनों ऐषणाओं से उसे सहज विरति हो जाती है। उसे कण-कण में परमेश्वर दिखाई पड़ता है। हर किसी से प्रेम करने को जी करता है। इस प्रेम में दुलार और सुधार का सन्तुलित और समुचित समन्वय दूरदर्शी विवेक के आधार पर किया गया होता है। योगी की संकीर्ण स्वार्थपरता मिट जाती है। विश्व नागरिक अपने को मानता है वसुधैव कुटुम्बकम् की दृष्टि रहती है और प्राणिमात्र के साथ आत्मीयता का सूत्र जुड़ जाता है। विचारणा में उत्कृष्टता और क्रिया पद्धति में आदर्शवादिता का अधिकाधिक समन्वय होता चलता है। व्यष्टि, समष्टि और प्रकृति के गतिचक्र को समझ लेने के कारण उसे किसी भी प्रिय-अप्रिय स्थिति में असन्तुलन ग्रसित नहीं होना पड़ता है। कमलपयवत् स्थिति बनी रहती है। खिलाड़ी की तरह- रंग-मंच पर अभिनय करने वाले नट की तरह वह अपने प्रयास तो पूरे करता है, पर हार−जीत का मान–अपमान का बोझा नहीं ओढ़ता। जब खेल ही खेलना है तो हर स्थिति में विनोद ही विनोद की मन स्थिति क्यों न रखी जाए? योगी इसी तरह सोचने का अभ्यास कर लेता है।

तपस्वी की गति-विधियों में प्रखरता की ज्योति जगमगाती देखी जाती है। शरीर में आलस्य फटकने नहीं पता। नियमितता और समय व्यवस्था का सदा ध्यान रहता है। सक्रियता और स्फूर्ति के अंग-प्रत्यंग गेंद की तरह उछलते रहते हैं। मन को प्रमाद करने का अवसर नहीं मिलता। हर काम में मनोयोग का समावेश रहने से वे सभी दर्शनीय और प्रशंसनीय बन पड़ते हैं। मन और बुद्धि का आधा-अधूरा प्रयोग करने वाले दीर्घसूत्री ही भूलें करते और भटकते देखे जाते हैं। जिसने मानसिक जागरूकता बनाये रहने का अभ्यास कर लिया है, ऐसा मेधावान् हर बात पर गहराई से सोचता है, विवेकपूर्ण दूरदर्शी निर्णय करता है और जो हाथ में लिया है उसे सफल बना कर रहता है। शरीर और मन को सरकस के जानवरों की तरह सधा लेने पर वे कितने उपयोगी सिद्ध होते हैं। इसे तपस्वी रीति-नीति अपनाने वाले का जीवन विकास क्रम देखकर सहज ही समझा जा सकता है।

तपस्वी न्यूनतम समय और धन में निर्वाह की योजना बनाता है। फलतः उसे अपनी तृष्णा विलासिता पर खर्च होने वाली शक्तियों को बचाने और उन्हें महत्वपूर्ण परमार्थ प्रयोजनों में लगा सकने का अवसर मिल जाता है। महामानवों में से प्रत्येक को संकीर्ण स्वार्थपरता की जंजीरें तोड़नी पड़ी हैं। इसके लिए आवश्यक आत्मबल तपश्चर्या से ही उत्पन्न होता है। सेवा-धर्म अपनाये बिना न आज तक किसी को आत्म सन्तोष मिला है और न किसी की आत्मिक प्रगति हुई है। इस मार्ग पर चलना उदारता, सहृदयता और आत्मीयता से ओतप्रोत अन्तःकरणों के लिए ही संभव होता है। अन्तरात्मा में यह विशेषता तप साधना से ही उभरती है। अन्तः और बाह्य क्षेत्र में घुसी हुई अवाँछनीयताओं से संघर्ष करना- प्रतिपक्ष के आघात बिना उद्विग्न हुए सहते रहना यह शूर-वीरों और दुस्साहसियों का ही काम है। ऐसा दिव्य स्वभाव प्रायः पूत मनःस्थिति में ही उत्पन्न होता है। निकृष्टताओं को उत्कृष्टताओं के साथ जोड़ देने का प्रयोजन तभी पूरा होता है। जब तप में कष्टसाध्य परिस्थितियों से रस आने लगे और उस मार्ग पर चलने में अपना वास्तविक हित दृष्टि-गोचर होने लगे।

धातुओं के टुकड़े जोड़ने में ‘वैल्डिंग’ प्रक्रिया काम में लाई जाती है। तप को आत्मा और परमात्मा को एक सूत्र में जोड़ देने वाली बेल्डिंग पद्धति कह सकते हैं। खदान में से कच्चा लोहा निकलता है। तब उसमें मिट्टी का बहुत बड़ा भाग मिला रहता है। इसे बार-बार भट्टियों में डालकर शुद्ध किया जाता है। इसी क्रम के बार-बार चलने से उसे फौलाद स्टेनलैस स्टील- बनने का अवसर मिलता है। रसायन शास्त्री अभ्रक जैसी सामान्य वस्तु को बार-बार अग्नि संस्कार करके उसे रसायन बना देते हैं। धातुओं के जरण मरण की- विषों के संशोधन करने की-लगातार घोटने-पीसने की विधियाँ चिकित्सा क्षेत्र के रसायन शास्त्र में आती हैं। स्वभाव और संस्कारों की घुटाई पिसाई को तपश्चर्या कहा जा सकता है। एक में पदार्थ को कष्टसाध्य परिस्थिति में प्रवेश करके अपना महत्व बढ़ाना पड़ता है, दूसरे में व्यक्ति को स्वेच्छापूर्वक उच्चस्तरीय प्रयोजनों में अपने ऊपर नियन्त्रणों प्रतिबन्धों और सत्प्रयोजनों के लिए आवश्यक कठिनाइयाँ शिरोधार्य करनी होती हैं। तपस्या इसी को कहते हैं। रंगाई से पहल धुलाई आवश्यक होती है। धोबी कपड़े का मैल छुड़ाने के लिये उसे उबालने, साबुन में गलाने, पत्थर पर पीटने, धूप में सुखाने जैसे कई कठिन उपचार काम में लाता है। यदि ऐसा न किया जाय तो कपड़े की मलीनता दूर न होगी, वह धवल-उज्ज्वल दिखाई न पड़ेगा। रंग तो उस पर चढ़ेगा ही नहीं। व्यक्तित्व को निर्मल बनाने और उच्च संस्कारों से सुसम्पन्न करने की प्रक्रिया को धुलाई, रंगाई के समतुल्य माना जा सकता है। सोने को शोधने से लेकर आभूषण बनाने तक की प्रक्रिया में लगातार अग्नि सम्पर्क और हथौड़े की चोटें सहनी पड़ती हैं। इससे इन्कार करने पर उसे गले का आभूषण और मस्तक का अलंकार बनने का अवसर नहीं मिल सकता। अनगढ़ डेली को चित्राकर्षक अलंकार बना देने का श्रेय स्वर्णकार की उस कुशलता को मिलता है जिसके साथ असीम शुभकामना उज्ज्वल भविष्य की विवेकपूर्ण सम्भावना के साथ-साथ कष्ट सहन करने की विवशता भी जड़ी हुई है। प्राचीन काल में गुरुकुलों का कष्टसाध्य जीवन अमीर घर के बालकों को भी सहन करना पड़ता था। उनके अभिभावक जानने थे कि इससे कम में उनके प्राणप्रिय बालकों का भविष्य उज्ज्वल नहीं हो सकता। पहलवान को अखाड़े में-किसान को खेत में-विद्यार्थी को स्कूल में तप करना पड़ता है। यदि वे सुविधा और सरलता की बात सोचते रहें- मन की मौज को प्रधानता देते रहें तो फिर समझना चाहिए कि इनमें से एक को भी सफलता न मिल सकेगी और उनके मनोरथ किसी प्रकार पूरे न होंगे।

आत्मिक प्रगति के लिए तप मार्ग स्वीकार करने की आवश्यकता इसलिए है कि जन्म जन्मान्तरों के अन्तःकरण पर चढ़े हुए कुसंस्कारों को पशुप्रवृत्तियों का-मल आवरण विक्षेपों का समाधान संभव हो सके। आत्मशोधन की जितनी भी महिमा गाई जाय उतनी ही कम है। हठयोग में नाड़ी शोधन के छह कर्म प्रधान हैं। राजयोग में यम नियम की प्रमुखता है। गुण, कर्म, स्वभाव का परिशोधन प्रथम और आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारण ध्यान दूसरा चरण है। जीर्ण रोगियों को चिकित्सक लोकवमन, विरेचन, स्नेन, स्वेदन के पंचकर्मों द्वारा मलशोधन कर्म करते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा का तो आधार ही यह है वस्तिकर्म है और उपवास द्वारा मल-निष्कासन करने की बात को ही रोग-मुक्ति का प्रधान आधार मानते हैं। नये घर में प्रवेश करने से पूर्व उसकी धुलाई-पुताई कराई जाती है। तप द्वारा कुसंस्कारों का निराकरण करना इसलिए आवश्यक है कि उसके बिना वहाँ दैवी सुसंस्कारों का अवतरण सम्भव ही न हो सकेगा। मलत्याग द्वारा पेट खाली कर लेने के उपरान्त ही भूख लगती है और भोजन करने का लाभ मिलता है। गन्दी साँस छोड़ने के पश्चात् ही नाक में नई स्वच्छ साँस का प्रवेश होता है। पाप-प्रायश्चितों की चान्द्रायण व्रत आदि कितने ही कष्ट साध्य उपाय तपश्चर्या में सम्मिलित किये गये हैं। अपने गुप्त पापों को किसी विश्वस्त मार्गदर्शन के सम्मुख खोलकर रख सकने का साहस भी तपश्चर्या का ही एक अंग माना गया है।

कषाय-कल्मषों का दबाव अन्तः करण पर से हट जाने पर उसमें सन्निहित दिव्य शक्तियों का उभार अनायास ही होने लगता है। दर्पण स्वच्छ कर देने पर मुख साफ दीखने लगता है। स्वच्छ जल में ही प्रतिबिम्ब देखा जा सकता है। अंगारे पर चढ़ी हुई राख की परतें यदि हटा दी जाएं तो उस पर छाई हुई कालिमा एवं तेजहीनता दूर हो जायगी और अंगारा अपनी ऊष्मा एवं आभा सहित पूर्व स्थिति में आ जायगा। जंग छुड़ा देने पर लोहा भी चाँदी जैसा चमकने लगता है। यह कार्य तप साधना से ही सम्भव होता है।

मानवी व्यक्तित्व को विभूतियों की रत्न-राशि का भण्डार कहा जा सकता है। शरीर को साध लेने वाले कितने प्रतिभाशाली, बलिष्ठ, सुन्दर एवं दीर्घजीवी होते हैं।

यह सभी जानते हैं और यह किसी से भी छिपा नहीं है कि सशक्त स्फूर्तिवान शरीर वाले कितनी साँसारिक सफलताएँ प्राप्त करते हैं। कहना न होगा कि शरीरगत दिव्य क्षमताओं को विकसित कर सकना तप साधना द्वारा सम्भव हो सकता है। शरीर के अंग प्रत्यंगों पर उसकी गतिविधियों पर नियन्त्रण कर लेने से शारीरिक विद्युत का संचय और उपयोग सीख जाने से मनुष्य अपनी इतनी विशेषताएँ- असामान्यताएँ प्रदर्शित कर सकता है। जिन्हें देखकर लोग आश्चर्यचकित होने लगें।

मस्तिष्कीय शक्तियों की खोज बीन करने वाले वैज्ञानिक खोपड़ी में रखे हुए इस छोटे से किन्तु अत्यन्त रहस्यमय कम्प्यूटर की महत्ता और सम्भावना पर विचार करते-करते दंग रह जाते। साधारणतया मस्तिष्क सोचने समझने के काम आने वाला अवयव मात्र है, पर गम्भीरता से देखने पर पता चलता है कि दैनिक जीवन में तो मस्तिष्क का सात प्रतिशत भाग ही काम आता है। शेष 63 प्रतिशत चेतन-अचेतन की परतें इतनी चमत्कारी हैं कि उनकी सम्भावनाओं का कोई अन्त नहीं। इन दिनों मनुष्य की अतीन्द्रिय क्षमता के सम्बन्ध में पैरासाइकोलॉजी-न्यूरोलॉजी-मैटाफिजिक्स-ऑकल्ट साइन्स आदि के क्षेत्रों में गहरी खोजे हो रही हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि मानवी मस्तिष्क जादू का पिटारा है। उसमें भरे हुए रहस्य-घटकों को समझा उभारा जा सके तो अब तक हुई भौतिक प्रगति से असंख्यों गुने आधार हर व्यक्ति में भरे-पूरे पाये जा सकते हैं। त्रिकालदर्शी ऋषियों ने अपने भीतर असंख्य ऋषि-सिद्धियों के भण्डार तप साधना द्वारा जागृत किये थे। ध्यान, धारणा प्रत्याहार और समाधि यह चार साधनाएँ मस्तिष्कीय संस्थान के परिशोधन का उद्देश्य पूरा करती हैं।

अन्तःकरण-कारण शरीर-जीव और ईश्वर के मिलन संगम का केन्द्र है। तप साधना द्वारा अन्तरात्मा को परमात्मा स्तर तक पहुँचाया जा सकता है। और वह स्थिति पैदा की जा सकती है कि ईश्वर साक्षात्कार का आत्मसाक्षात्कार का परमानन्द लाभ लिया जा सके। ईश्वर ही इस सृष्टि का अधिपति और यदि गहन सम्पर्क सम्भव हो सके- आत्मीयता जुड़ सके- तो फिर पारस्परिक आदान-प्रदान में कोई कमी-कोताही नहीं रहती। व्यक्ति आत्म-समर्पण करके ईश्वर को अपना सब कुछ सौंपता है। साथ ही जो उसके पास है वह सब कुछ प्राप्त भी कर लेता है। यह उभयपक्षीय सौदा पटाने में अन्तरात्मा को तप प्रक्रिया द्वारा उच्चस्तरीय बनाया गया है। पार्वती ने शिव को पाया। भागीरथ ने गंगावतरण सम्भव किया-आगस्त्य ने समुद्र को सुखाया जैसे पौराणिक उपाख्यान तपश्चर्या के फलस्वरूप मिलने वाले देव वरदानों की ओर संकेत करते हैं। प्राचीनकाल की ऋषि परम्परा में तपश्चर्या ही वह अस्त्र था जिसके सहारे उन्हें इसी माँस पिण्ड में देवात्मा के अवतरण का सुयोग-सौभाग्य मिल सका।

चेतना का परिष्कार एवं उत्कर्ष मानव जीवन का सबसे बड़ा लाभ एवं पुरुषार्थ है। अपूर्णता से पिण्ड छुड़ाकर पूर्णता प्राप्त करना- भवबन्धनों को काट मुक्ति के अधिकारी बनना-आत्मा और परमात्मा की एकता सम्भव करना यही तो जीवन लक्ष्य है। यह प्रयोजन आत्म विकास से भी सम्भव होता है। पात्रता और प्रामाणिकता सिद्ध करके ही हम महत्वपूर्ण एवं स्थायी उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए योग तप का साहचर्य लिये बिना और उपाय नहीं। योग से चेतना को, चिन्तन को, आस्था-आकाँक्षा को, आत्मसत्ता को उस महानता के साथ जोड़ा जाता है जो सर्वसमर्थ और सर्वोपरि है। विषयानन्द की नगण्य सी अनुभूति से यह आभास मिल सकता है कि ब्रह्मानन्द कितना अधिक उल्लासपूर्ण हो सकता है। यह उपलब्धि योग साधना का ही प्रतिफल है। नाला गंगा में मिल कर गंगा बनता है-बूँद समुद्र में मिल कर समुद्र हो जाती है। स्त्री आत्म-समर्पण करके पति की प्राणबल्लभा बनती है। आत्मा ईश्वर में जुड़कर परमात्मा बनता है। योग का लक्ष्य है आत्मा को परमात्मा से जोड़ देना। यह भाव प्रक्रिया है इसमें करना कुछ नहीं पड़ता मात्र चिन्तन और भाव संवेदन से समुद्र में अधिकाधिक गहराई तक प्रवेश करते ही चला जाना पड़ता है।

तप में तीनों शरीर तपाने पड़ते हैं। उन पर चढ़े कल्मषों का निराकरण और दबे हुए शक्ति स्रोतों का जागरण यही है तपश्चर्या का उद्देश्य। हम योग और तप का महत्व समझें उनकी ओर कदम बढ़ाएं तो इसी जीवन में उतना कुछ प्राप्त कर सकते हैं जिस पर संसार भर के विलास-वैभव को निछावर किया जा सके।


आत्मिक प्रगति के लिये श्रद्धा का संवर्धन

व्यायाम प्रयोगों के द्वारा शरीरबल बढ़ता है-ज्ञान वृद्धि के लिए शिक्षा का सहारा लिया जाता है। धनी बनने के लिए उद्योग व्यवसाय अपनाने पड़ते हैं उनके लिए अभीष्ट उपकरणों का संग्रह एवं प्रयोग करना पड़ता है। ठीक इसी प्रकार श्रद्धा और विश्वास को विकसित करने के लिए देव प्रतिभाओं को, तीर्थ स्थलों को, पूजा प्रतीकों को माध्यम बनाना पड़ता है। उन पर आरोपित की गई श्रद्धा, प्रतिध्वनित और प्रतिफलित होकर साधक के पास वापस लौट आती है। गेंद को दीवार या धरती पर मारने से टकराने पर वह उसी स्थान को लौटती है। जहाँ से उसे फेंका गया था। शब्दबेधी बाणों के बारे में कहा जाता है कि वे लक्ष्य बेध करने के उपरान्त लौटकर फिर तरकश में आ घुसते थे। गुम्बज में की गई आवाज गूँजती है और उच्चरित स्थान से आ टकराती है। पृथ्वी गोल है। सीधी रेखा बनाकर यदि लगातार चलते रहा जाए तो चलने वाला लौटकर वहीं आ जायगा जहाँ से उसने चलना आरम्भ किया था। श्रद्धा को भी पूजा प्रतीकों पर फेंका जाता है। वे निर्जीव होने के कारण स्वयं तो कुछ नहीं कर सकते, पर प्रतिक्रिया को प्रयोगकर्ता के ऊपर निश्चित रूप से वापस लौटा देते हैं। गोबर से बने गणेश भी उतना ही चमत्कारी फल प्रदान कर सकते हैं जितना कि असली गणेश कुछ कर सकने में समर्थ हो सकते थे। एकलव्य ने मिट्टी द्वारा बनी द्रोणाचार्य की प्रतिमा से उतना लाभ प्राप्त कर लिया था, जितना कि असली द्रोणाचार्य से पाण्डवों को नहीं मिल सका। यह श्रद्धा की शक्ति का ही चमत्कार है। देवता का निवास काष्ठ पाषाण आदि में नहीं रहता। “भावो हि विद्यते देव तस्मात् भावो हि कारणम्” भावना में ही देवता का निवास रहता है, अस्तु देव दर्शन से होने वाले लाभों में भावना का स्तर ही प्रमुख कारण है। भाव रहित होकर देव प्रतिमाओं की समीक्षा की जाए तो वह धातु और पाषाण के सहारे प्रस्तुत की गयी कलाकृति के अतिरिक्त और कुछ भी न रह जायेगी।

श्रद्धा और विश्वास के अभिवर्धन में एक जीवित तत्व भी सहायक सिद्ध होता है और वह है-गुरु। आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में सदा से “गुरु धारणा” की महत्ता को समझा और स्वीकारा जाता रहा है। उसे “गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु …………” ‘‘अखण्ड मण्डलाकारं …………… तस्मै श्री गुरुवे नमः” “अज्ञान तिमिरान्धस्य …………’’ आदि का बढ़ा-चढ़ा माहात्म्य प्रस्तुत किया गया है। इसमें निहित स्वार्थों का भोले लोगों की भावुकता का शोषण करने की प्रवृत्ति भी काम करती रही है और उससे अनर्थ मूलक अन्ध-विश्वास भी बहुत फैला है। पर यह कहने और मानने में भी कोई अतिशयोक्ति नहीं कि श्रद्धा तत्व की अभिवृद्धि और विश्वास की परिपुष्टि में गुरु धारणा करने से अति महत्वपूर्ण प्रतिफल भी उपलब्ध होते हैं।

अध्यात्म दर्शन में सम्प्रदाय भेद से अगणित मान्यताएँ प्रचलित हैं। वे एक दूसरे से भिन्न ही नहीं प्रतिकूल एवं प्रतिपक्षी भी हैं। साधना विधानों के सम्बन्ध में भी यही बात है। ऐसी दशा में किसे अपनाया जाय किसे न अपनाया जाय-यह निर्णय कर सकना सामान्य बुद्धि के लिए अति कठिन होता है। संदिग्ध, शंकाशील और अनिश्चित मनःस्थिति में कोई बात न तो पूरी तरह गले उतरती है और न बताये मार्ग पर उत्साह के साथ चल सकना सम्भव होता है। आधे-अधूरे मन से प्रयोग परीक्षण की तरह किये गये साधन सदा निर्जीव होते हैं। उनका कोई कहने लायक परिणाम नहीं निकलता। इस असफलता से अविश्वास और भी पनपता है और अन्ततः निराशाग्रस्त होकर उस मार्ग से उदासीन होते-होते छोड़ देने की ही स्थिति आ पहुँचती है।

इस अनिश्चितता से बचने के लिए एक ऐसे प्रामाणिक अधिकारी की नियुक्ति आवश्यक होती है, जिसके निर्देश को स्वीकारणीय माना जा सके। फौजी अनुशासन में यही होता है। अफसर आज्ञा देता है और सैनिक उसका प्राणपण से पालन करता है। निर्देश के उचित-अनुचित होने का दायित्व अफसर पर रहता है। सैनिक के लिए इतना ही पर्याप्त है कि उसने आदेश का पूर्ण तत्परता के साथ पालन किया। साधना मार्ग में भी इसके अतिरिक्त और कोई गति नहीं। निज के समाधान के लिए किन्हीं सिद्धान्तों की उपयोगिता पर जितना कुछ तर्क विवाद अन्वेषण करना हो, उतना पूरी गहराई के साथ कर लेना चाहिए। इसी प्रकार इस मार्ग का पथ-‘प्रदर्शक चुनने से पूर्व उसके ज्ञान, अनुभव एवं चरित्र के सम्बन्ध में जितनी भी कुरेद बीन करनी सम्भव हो वह कर लेनी चाहिए। पर अन्ततः ऐसी स्थिति में पहुँचना ही चाहिए कि किसी के निर्णय और निर्देश को स्वीकार्य अनुशासन की तरह ग्रहण किया जाय और पूर्ण विश्वास के साथ निर्धारित गतिविधि अपनाते हुए आगे बढ़ चला जाय। इतना बन पड़े तो समझना चाहिए अनिश्चितता और आशंका की स्थिति का अन्त हो गया। अब विश्वासपूर्वक प्रयत्नशील रहकर अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त कर सकना सम्भव हो सकेगा।

सिद्धान्तों और कार्यक्रमों के सम्बन्ध में गुरु के अनुशासन को स्वीकार किया जाना चाहिए। इसके लिए एक ही व्यक्ति का निर्देश प्राप्त करना पर्याप्त है। अनेकों मार्गदर्शक नियत करने पर उनके भिन्न-भिन्न अनुभव और निर्देश साधक के मन में फिर अनिश्चितता उत्पन्न कर देंगे। इसलिए एक विषय का एक ही नियत निर्देशक होना चाहिए। कई चिकित्सकों की कई प्रकार की दवाएँ एक साथ खाने या उनके परामर्श से उलट-पुलट करते रहने से लाभ के स्थान पर हानि ही होती है। जीवन अनेक समस्या सूत्रों से बँधा हुआ है। उनकी विशिष्ट धाराओं के विशिष्ट मार्ग-दर्शक हो सकते हैं। मकान बनाने में इंजीनियर, इलाज में डॉक्टर, मुकदमे में वकील को गुरु मानकर चला जा सकता है। भिन्न प्रकार के कार्यों के लिए भिन्न गुरु हो सकते हैं। पर जहाँ तक आत्मिक प्रगति के विशिष्ट मार्ग का सम्बन्ध है वहाँ उस क्षेत्र के दक्ष व्यक्ति की ही सहायता लेनी चाहिए। गुरु एक हो या अनेक इस प्रश्न का एक ही उत्तर है-एक कार्य के लिए एक की ही नियुक्ति लाभदायक रहती है। इसमें निर्देश सम्बन्धी कोई भूल रहेगी तो उसका दोष या दण्ड निर्देशक के पल्ले बँधेगा। साधक के अशुद्ध विधि से साधना करने पर भी अपने विश्वास के अनुरूप निश्चित रूप से सत्परिणाम ही मिल जायगा।

श्रद्धा की प्रेरणा है श्रेष्ठता के प्रति प्रीति-घनिष्ठता तन्मयता एवं समर्पण की प्रवृत्ति। परमेश्वर के प्रति इसी भाव सम्वेदना को विकसित करने का नाम है-भक्ति। भक्त को भगवान के प्रति अनन्य प्रेम उत्पन्न करना पड़ता है और उसे इस स्तर का बनना पड़ता है कि सच्चे प्रेमी की तरह आत्मसात होने और आत्म-समर्पण के बिना चैन ही न पड़े। लौकिक जीवन में पत्नी को पति के प्रति इसी प्रकार से आत्म-समर्पण का अभ्यास करना पड़ता है। दीपक पतंग की उपमा इसी प्रसंग में दी जाती है। आम तौर से मनुष्यों के अन्तःकरण बड़े नीरस, शुष्क और कठोर होते है, उनमें दया,करुणा, ममता, श्रद्धा जैसी दिव्य भावनाओं का अभाव ही रहता है। दैनिक जीवन तो स्वार्थ संघर्षों से ही भरा रहता है। अभ्यस्त प्रक्रिया स्वभाव का अंग बने भी तो कैसे? भजन-पूजन करने वाले कर्मकाण्डों के तो अभ्यास बन जाते हैं, पर उनका भी हृदय खोलकर देखा जाय जो श्रद्धा तत्व की मात्रा नहीं के बराबर ही दीख पड़ती है। मशीन की तरह कर्मकाण्डों की चर्खी घुमाते रहने से बात बनती नहीं। उपासनात्मक क्रिया कृत्य तो आवरण मात्र हैं। उनमें प्राण संचार कर सकने की शक्ति तो श्रद्धा में ही सन्निहित है। यदि जीवन ही न रहा तो कठपुतली का तमाशा वह आनन्द नहीं देता जो जीवन अभिनय में देखा जाता है।

प्रतिमा के माध्यम से श्रद्धा उत्पन्न करने का आधार निर्दोष तो है, पर उसमें प्रत्युत्तर दे सकने की क्षमता न होने के कारण सब कुछ एकाँगी ही रह जाता है। अमुक आपत्ति काल में लड़कियाँ अपने विवाह आँवले, पीपल आदि वृक्षों के साथ करके भी अपने अभिभावकों को कन्या दान से निश्चिंत कराती रही हैं। इतने पर भी जीवित व्यक्ति के साथ विवाह करने पर उपलब्ध होने वाले आदान-प्रदान का लाभ उन्हें नहीं ही मिल सका होता। ‘गुरु’ रूप में जीवित प्रतिमा में श्रद्धा तत्व की प्राण-प्रतिष्ठा की जाती है और उसके सम्पर्क में अपनी दिव्य सम्वेदनाओं को अग्रगामी बनाया जाता है। इसमें आदान-प्रदान का प्रत्यक्ष सम्पर्क का क्रम चलता है और मार्ग-दर्शन की सुविधा रहती है। यदि गुरु दिव्यत्व से सम्पन्न है तो उसके सान्निध्य-अनुग्रह का प्रत्यक्ष प्रभाव भी उपलब्ध होता है। इससे व्यक्तित्व के विकास में अधिक सुविधा और सरलता रहती है।

माता-पिता के समान ही गुरु को माना गया है। इस त्रयी को ब्रह्मा, विष्णु, महेश की उपमा दी गयी है। हिन्दुत्व का प्रतीक यज्ञोपवीत के रूप में धारण किया जाता है। इस संस्कार के अवसर पर गुरु द्वारा गायत्री मंत्र लेने का विधान है। अध्यापक की सहायता बिना विद्या का व्यावहारिक स्वरूप हृदयंगम किया जाना कठिन पड़ता है यों जानने भर की बात तो पढ़ने या सुनने भर से भी बन जाती है। आत्मोत्कर्ष की साधना में तो गुरु वरण करने की आवश्यकता एक प्रकार से अनिवार्य ही मानी गई है। इस व्यवस्था में श्रद्धा तत्व के विकास में एक उपयोगी आधार खड़ा करना होता है। यदि इस चयन एवं नियुक्ति के लिए कोई उपयुक्त सत्पात्र मिल गया तो समझना चाहिए कि सफलता की आधी मंजिल पार हो गई। निष्णात अध्यापक एवं चिकित्सक का सम्पर्क सध जाने से शिक्षा की-चिकित्सा की सफलता प्रायः असंदिग्ध ही हो जाती है, यही बात साधना मार्ग के सम्बन्ध में भी है। प्रखर व्यक्तियों से घनिष्ठ सम्बन्ध रखने पर सामान्य व्यक्ति भी असामान्य बनते देखे गये हैं। फिर विधिवत श्रद्धासिक्त आत्मीयता के सूत्र में बाँधने वाली गुरु दीक्षा की प्रतिक्रिया उपयोगी परिणाम क्यों न उत्पन्न करेगी। उपासना के विधि-विधान का मार्ग दर्शन तो सरल है। उतनी आवश्यकता तो पुस्तकें भी पूरी कर देती हैं। जटिलता तो जीवन साधना में पड़ती है। आये दिन उतार-चढ़ाव और मोड़-तोड़ आते रहते हैं। उनके समाधान का दूरदर्शी निष्कर्ष अनगढ़ बुद्धि से नहीं निकल पाता, वह प्रायः भटकती और अनुपयुक्त निर्णय करती देखी गयी है। ऐसी दशा में यदि सत्परामर्श की समुचित व्यवस्था बन सके तो सर्वतोमुखी प्रगति के उपयोगी आधार खड़े होते चले जाते हैं। ऐसे ही अनेकों लाभ हैं। जिनको ध्यान में रखते हुए गुरु वरण करने की आवश्यकता का प्रतिपादन किया गया है। उपयुक्त व्यक्ति पर उपयुक्त मात्रा में सत् श्रद्धा का सूत्र स्थापित किया जाय तो कठिन यात्रा में जानकार और वफादार साथी की तरह लक्ष्य प्राप्ति में बहुत सरलता पड़ती है। इस सम्पर्क से एक पक्ष को वात्सल्य देने का और दूसरे को उसे पाने का लाभ मिलता है। गाय और बच्चा दोनों को ही असीम सन्तोष मिलता है। गुरु और शिष्य का यदि उभय-पक्षीय आदर्शवादी सम्बन्ध बन जाए तो फिर उस मिलन का लोभी गुरु लालची चेला की उक्ति चरितार्थ करना बेकार है। ‘एक न सुनहिं एक नहिं देखा’ वाला जोड़ा बनाना निरर्थक है। धन अपहरण करने और मुफ्त में सम्मान पाने के लोभी गुरु और कोई चमत्कार वरदान ऐसे ही चापलूसी से मुफ्त पाने में चतुर शिष्यों का प्रचलित लकीर पीटना व्यर्थ है। ऐसी विडंबना रचने की अपेक्षा निराकार परमेश्वर को-साकार सूर्य को अथवा वट पीपल को-देव प्रतिमा चित्र नारियल आदि को गुरु मानकर उससे भावनात्मक प्रेरणा प्राप्त करना और श्रद्धा तत्व को विकसित करना भी मन्द गति से सम्भव हो सकता है।


Quotation

मनुष्य क्या है? निश्चित रूप में पशु और देव को जोड़ने वाली एक मध्यवर्ती शृंखला। मनुष्य की शालीनता ही वह आधार है जिसके सहारे वह महानता के तथ्य को प्राप्त करता है।

-विलियम जेम्स


साधना से संकल्प-शक्ति की अभिवृद्धि

पानी का स्वभाव नीचे की ओर ढुलकना है। फैला देने पर वह बिना प्रयास के ही ढलान की दिशा में अपने आप बहने लगेगा। किन्तु यदि उसे ऊपर चढ़ाना हो तो बहुत सरंजाम इकट्ठे करने पड़ेंगे और बहुत श्रम जुटाना होगा। ढलान की ओर बिना श्रम के ही जिस तेजी से बहता है उतनी बात ऊपर चढ़ाने के प्रयास में बहुत प्रयत्न करने पर भी नहीं बन पड़ती। पतन और उत्थान की दिशा में प्रगति का क्रम भी पानी की ही तरह है। दुर्जनों का संग, दुष्कर्मों का उत्साह पतन का उपक्रम जिस तेजी और जिस उमंग के साथ चलता है। उत्थान प्रयासों में वैसी बात कहाँ बन पाती है? गड्ढे में-खंदक में कोई भी गिर सकता है, पर ऊपर चढ़ने और आकाश में उड़ने के लिए तो बहुत बल चाहिए और बहुत साधन। फिर भी प्रगति धीमे क्रम से ही होती है। उत्थान और पतन के सम्बन्ध में भी यही आकाश पाताल जैसा अन्तर पाया जाता है।

जीव लाखों योनियों में भ्रमण करते हुए क्रमिक प्रगति पर बढ़ते हुए मनुष्य शरीर पाने का अधिकारी बनता है। निम्न योनियों के लिए उपयुक्त प्रवृत्तियाँ मनुष्य के लिए निरर्थक एवं हानिकारक बन जाती हैं, अस्तु वे छूटती भी जाती हैं। सभ्यता एवं संस्कृति की रगड़ पड़ने से प्रतिगामी पशु-प्रवृत्तियों में से बहुत कुछ तो छूट जाती हैं। किन्तु फिर भी बहुत सी प्रमुख एवं जागृत स्थिति में बनी रहती हैं। इनकी जड़े अचेतन मन की गहरी परतों में घुसी होती है। चेतन की विवेकशील एवं सतर्कता के दबाव से वे प्रायः दबी ही रहती हैं, फिर भी उनका अस्तित्व पूर्णतया समाप्त नहीं हो जाता। जब भी उन्हें अवसर मिलता है, वर्षा में घास की सूखी जड़ें जिस प्रकार हरी हो जाती हैं उसी प्रकार प्रबल हो उठती हैं। कई बार तो उनकी प्रबलता इतनी उत्कट होती है कि सभ्यता के सारे आधारों को कुचल कर मन ऐसे कर्म करने लगता है जिन पर पीछे पश्चाताप ही करना पड़ता है। दृष्ट वृत्तियों में छल, क्रोध, कामुकता, लोभ जैसी कुछ अति प्रबल हैं। जब वे उभरती हैं। तो मनुष्य अनेकों अपराधी क्रूर-कर्म करता पाया जाता है। इनमें से मन्द है आलस्य और प्रमाद। पेट भर जाने पर निम्नकोटि के जीव ऐसे ही आलस में ऊँघते रहते हैं। मनुष्य पर भी शारीरिक निष्क्रियता और मानसिक दीर्घसूत्रता छाई रहती है। मनुष्यों में से जड़ प्रकृति वालों को यही स्थिति रहती है। वे कामनाएँ बहुत सी करते हैं, पर उन्हें पूरी करने के लिए जिस पुरुषार्थ की आवश्यकता है, उससे कन्नी काटते हैं। ऐसी दशा में दुर्भाग्य को रोते रहने के अतिरिक्त और कोई परिणाम निकल ही कैसे सकता है?

पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कार अन्तर्मन में जितने अधिक और गहरे छाये रहते हैं, उसी अनुपात में मानवोचित प्रगतिशील जीवन-क्रम अपनाने में पग-पग पर बाधा पड़ती है। आगे बढ़ने के सामान्य प्रयासों को प्रतिगामी कुसंस्कार टाँग पकड़ कर पीछे घसीट ले जाते हैं। यही गज-ग्राह संघर्ष-देवासुर संग्राम अन्तर्गत में चलता रहता है। पौराणिक कथा-गाथाओं के अनुसार इस लड़ाई में आमतौर से असुर जीतता है और देव हारता है। पानी के ढुलकने और ऊपर चढ़ने के उदाहरण से इस तथ्य को सहज ही समझा भी जा सकता है। हारे हुए देवताओं को फिर से जीतने का अवसर तभी मिला है जब उनकी सहायता के लिए कोई दिव्य शक्ति विशेष रूप से आगे आई है। ग्राह से गज को मुक्ति भी विष्णु भगवान ने आकर ही दिलायी थी। समुद्र मंथन को सफल बनाने में कच्छप अवतार की अदृश्य किन्तु अति महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। दुर्गा ने दुर्दान्त दैत्यों को मार कर देवताओं का संकट हरा था। भगवान ने प्रायः सभी अवतारों ने देवत्व को विजयी बनाने में अपनी विशेष सहायता प्रस्तुत की। इस तथ्य को प्रगतिशील जीवन में ईश्वरीय दिव्य सहायता की आवश्यकता अनुभव करने के रूप से समझा जाना चाहिए। पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कारों का असुर निरस्त करने में ईश्वर उपासना के उस स्तर की आवश्यकता पड़ती है। जिसे योग एवं तप के नाम से जाना जाता है। पूजा-पत्री उसी की बाल कक्षा है।

मनुष्य प्रकृति की एक विशेषता है कि उसे अभ्यस्त ढर्रे पर चलने में ही रुचि होती है। शरीर और मन के सारे कुल पुर्जे जिस ढाँचे में ढल जाते हैं, उसी पटरी पर वे लुढ़कते रहने में सुविधा अनुभव करते हैं। नई बात सोचना, नये कदम बढ़ाना, नई रीति-नीति अपनाना, भले ही उज्ज्वल भविष्य का परिचायक हो, पर उसके लिए हिम्मत ही नहीं पड़ती। विशेषतया आदर्शवादिता अपनाने में तो और भी अधिक कठिनाई पड़ती है, क्योंकि उस मार्ग पर अन्य लोग चलते दिखाई नहीं पड़ते। मेले की भीड़ में तो कोई भी साथ चल देता है, पर एकाकी राह बनाना, अकेले चल पड़ने का साहस जुटाना तो किन्हीं विरलों के लिए ही सम्भव होता है। यह सर्वविदित है कि महानता के पथ पर चलना आरम्भ में ही कठिन लगता है। थोड़ा अभ्यास करने पर इतना आत्म-सन्तोष मिलने लगता है कि प्रारम्भ में जो कठिनाईयाँ दीखती थीं, वे हँसी मजाक जैसी लगने लगती हैं। आरम्भ में बीज बोने की तरह कुछ त्याग तो अवश्य करना पड़ता है, पर अन्ततः फसल की इतनी राशि उत्पन्न होती है कि उसकी तुलना प्रतीत होता है। इस मार्ग पर पाना अधिक और खोना कम पड़ता है। किन्तु लोग उलटा समझते है, उनकी मान्यता है कि परमार्थ परायणों को खोना अधिक पड़ता है और पाते कम हैं। आदर्शवादी महापुरुषों के जीवनों पर दृष्टिपात करने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि उन्होंने घाटे का सौदा नहीं किया हो दूरदर्शिता की नीति अपनाकर वे उनसे कहीं अधिक नफे में रहे जो संकीर्ण स्वार्थपरता की कीचड़ में कुलबुलाते रहने वाले कृमि-कीटकों की तरह चाहते तो बहुत थे, पर प्राप्त कुछ भी न कर सके।

उत्कृष्टता का मार्ग साहसी, शूरवीरों का है। उस पर चलने के लिए जैसी ही प्रचण्ड संकल्प शक्ति चाहिए जैसी कि तीव्र जलधारा को चीरते हुए प्रवाह की उल्टी दिशा में चल सकने वाली मछली में होती है। हाथी प्रवाह की दिशा में लुढ़कते, बहते चले जाते हैं, पर मछली उसे चीरती, छरछराती उसे चुनौती देती है और उलटी दिशा में तैर सकने के प्रबल पुरुषार्थ का परिचय देती है। यही संकल्प शक्ति जिन मनुष्यों में होती है वे पेट और प्रजनन की कृमि-कीटकों जैसे ललक-लिप्साओं को चुनौती दे सकने और कुछ ऐसा कर गुजरने में समर्थ होते हैं, जिससे मानव जीवन को सार्थक बना सकना सम्भव हो सके। विपन्न परिस्थितियों में जन्मे, अभावग्रस्त, सहयोग विहीन, मन्दबुद्धि और दुर्बलकाय लोगों ने प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँच सकने- आश्चर्यचकित कर देने वाली सफलताएँ पाने के जो चमत्कार दिखाये हैं उनके पीछे एकमात्र संकल्पशक्ति ने ही काम किया है। इसी के आधार पर वे अपने कुसंस्कारों से जूझे हैं और व्यक्तित्व को इस प्रकार का बनाया है जैसा कि रसायनवेत्ता तुच्छ पारद का जारण-मारण करके उसे मकरध्वज जैसे शक्ति पुँज औषधि बना लेते हैं। यह संकल्प शक्ति ही वह चुम्बकत्व है जिसके सम्पर्क में आने वाला हर व्यक्ति प्रभावित होता है, लोहा मानता है और प्रखर प्रामाणिकता के आगे नत-मस्तक होकर भाव भरी श्रद्धा समर्पित ही नहीं करता, वरन् सच्चे मन से सहयोग भी प्रदान करता है। प्रतिकूलताएँ दुर्बल मनःस्थिति के लोगों को काल जैसी विकराल लगती हैं। आशा का दीपक बुझा देती हैं और भयभीत करके प्रयास त्यागने को विवश करती है। किन्तु संकल्प के धनी उनसे अठखेलियाँ करते हैं, आँखमिचौनी खेलते हैं और शर्त लगा कर प्रतिद्वन्द्विता खड़ी करते हैं। मनस्वी लोगों को प्रतिकूलताओं के साथ छेड़खानी किये बिना चैन ही नहीं पड़ता। कितने ही दुस्साहसी लोग दुर्गम यात्राओं पर निकल पड़ते हैं हिंसक पशुओं से भरे जंगलों में एकाकी भ्रमण करते हैं, खतरों को आमन्त्रण करते हैं और साहसिक शूरवीरता का कीर्तिमान स्थापित करते हैं। गुजारे के सुख साधन होते हुए भी उन्हें खतरों से खेले बिना चैन ही नहीं पड़ता। सृजन प्रयोजनों में जुट पड़ते हैं तो भागीरथ की तरह गंगा लाने और फरियाद की तरह नहर बनाने के चमत्कार कर दिखाते हैं।

सामान्यतया साधनों की, सहयोग की, परिस्थितियों की दुहाई दी जाती है और भाग्य को श्रेय दिया जाता है। किन्तु वास्तविकता कुछ ओर ही है। संकल्प शक्ति की दिव्य विभूति जिसके पास है वह दूसरे ही ढंग से सोचता है। नेपोलियन के शब्दों में वह कहता है- ‘दुर्लघ्य आल्पस को हमारे लिए रास्ता देना होगा अन्यथा उसे पैरों तले कुचल दिया जायगा।’ इतिहास साक्षी है कि आल्पस हारा और नेपोलियन जीता। उसे रास्ता देना ही पड़ा। एकाकी कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाया था। एकाकी हनुमान ने समुद्र लाँघा था। एकाकी बुद्ध युग-क्रान्ति को सम्भव बना सके थे। एक एकाकी कहे जाने वाले लोगों के साथ उनका अत्यन्त सच्चा और सर्वसमर्थ वह मित्र कन्धे से कन्धा मिलाकर चल रहा था। जिसे संकल्प-बल कहते हैं। उसी क्षमता की कमी से मनुष्य हेय परिस्थितियों में पड़े-पड़े सड़ते रहते हैं और इसी की अभीष्ट मात्रा मिल जाने से सामान्य मनुष्य असामान्य महामानवों की भूमिका सम्पन्न करते हैं।

व्यक्तित्व को कुछ न कुछ बना देने में समर्थ, सहयोग, साधन और परिस्थितियों को आकर्षित कर सकने में सफल सिद्ध होने वाले इस संकल्प बल को किस प्रकार उपार्जित किया जाए। इस प्रश्न का यदि उत्तर प्राप्त करना हो तो व्यायामशाला में जाकर पहलवान और पाठशाला में जाकर विद्वान बनने वालों का उदाहरण सामने रखना होगा। आत्म-बल बढ़ाने के लिए साधना की प्रक्रिया अपनाई जाय तो उससे दुहरा लाभ है। संकल्प बल तो निश्चित रूप से बढ़ता है साथ ही उस अभिवर्धन को अन्तः क्षेत्र में प्रसुप्त पड़ी हुई दिव्य विभूतियों को उभारने का भी अवसर मिलता है। यदि केवल संकल्प बल ही बढ़ाना हो और वह भी मात्र भौतिक स्तर का रखना हो तो वह प्रयोजन साहसिक कार्य करते रहने और उत्साह अनुभव बढ़ाते चलते से भी सम्भव हो सकता है। पर यदि उत्कृष्टतावादी उस आत्मबल की आवश्यकता हो, जो जीवात्मा को क्रमशः महानात्मा, देवात्मा और परमात्मा बना सके- जीवन को सार्थक बना सकने वाले आधार खड़े कर सके तो फिर साधना मार्ग पर चलते हुए उस मनोबल को, संकल्प शक्ति को प्राप्त करना होगा जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘ब्रह्म वर्चस’ कहते हैं। चेतन सत्ता का यही सबसे बड़ा वैभव है, समस्त सिद्धियों का उद्गम स्त्रोत इसी को कहा गया है। भौतिक और आत्मिक सफलताओं को सुदूर क्षेत्र से घसीट कर चरणों में ला पटकने वाला प्रचण्ड चुम्बकत्व यही है। इसे ईश्वर का सर्वोपरि वरदान कहा जा सकता है। आत्मा के प्रबल पुरुषार्थ के फलस्वरूप मिल सकने वाला उपहार यही है। यह जिसके पास होगा वह मृत्यु को भी उत्तरायण तक ठहराने के लिए भीष्म पितामह की तरह आदेश दे सकेगा। अर्जुन की तरह बाण से भूमि को छेदकर जलधारा बहा सकने की सामर्थ्य उसमें होगी।

अन्तस् में सन्निहित क्षमताओं का विकृत स्वरूप ही असुर है और उनकी परिष्कृत स्थिति को देवता कहा जा सकता है। पेट में सड़ा हुआ अन्न विष बन जाता है और अनेकों रोग उत्पन्न करता है, यही असुरत्व हुआ। पचा हुआ अन्न रस, रक्त, शुक्र और ओजस् बनता है। यही देवत्व है। देवता की आराधना का अर्थ है अपनी प्रवृत्तियों और क्षमताओं का सधाया हुआ सुविकसित स्वरूप। असुरता से आक्रान्त होने का अर्थ है अपने चिन्तन एवं कर्तव्य में अवाँछनीयताओं की भरमार। साधना का उद्देश्य है- व्यक्ति का काया-कल्प, चेतना का परिमार्जन-परिष्कार इतना बन पड़े तो अपना आपा ही कल्प-वृक्ष बन जाता है और स्वर्गीय उपलब्धियों को सहज ही प्रस्तुत करता है। कितने ही साधकों को विभिन्न देवताओं द्वारा विभिन्न प्रकार के वरदान मिलने के कथानक कथा-गाथाओं में पढ़ने सुनने को मिलते हैं। यह वरदाता इष्टदेव अपना उच्चस्तरीय अंतस् ही है। जो कल्पना के अनुरूप वेष बनाकर सामने आ खड़ा होता है। दर्शन देता है और मनोकामनाएँ पूरी करता है। मीरा के गिरधर गोपाल, रामकृष्ण परमहंस की काली, एकलव्य के द्रोणाचार्य बाहर से नहीं आये थे, वरन् उन लोगों ने अपनी श्रद्धा को ही इन इष्टदेवों के रूप में परिपक्व किया था। श्रद्धासिक्त संकल्प ही आत्म-साक्षात्कार की -ईश्वर दर्शन की भूमिका बनाता है। स्वर्ग तक ले पहुँचने-मुक्ति प्रदान करने और सिद्ध पुरुष बना देने की शक्ति उसी में है। यदि देवाधिदेव प्रजापति कहा गया है। साक्षी, दृष्टि, निर्लिप्त, अचिन्तय परब्रह्म को मनुष्य रूप में मनुष्यों के साथ अठखेलियाँ करते और यथार्थ जैसे अस्तित्व का परिचय देते हुए देखा जाय तो समझना चाहिए कि यह साधक की अनन्य श्रद्धा का ही प्रतिफल है।

साधना का उद्देश्य पशु-प्रवृत्तियों के साथ देव-प्रवृत्तियों की टक्कर करना और पिछड़ेपन को उलट कर उस जगह प्रगतिशील की प्राण-प्रतिष्ठा करना है। इस प्रयास को आन्तरिक महाभारत, लंका-दहन, समुद्र-मंथन आदि पौराणिक गाथाओं के साथ जोड़ा जा सकता है। विश्वामित्र द्वारा नई सृष्टि बनाने-च्यवन ऋषि का काया-कल्प होने ओर उपाख्यानों की संगति भी साधना समर के साथ जोड़ी जा सकती है। निश्चित रूप से यही वह देवासुर संग्राम है, जिसे आत्मोत्कर्ष की विजय श्री का वरण करने वाले हर साधक को अनिवार्य रूप से लड़ना पड़ता है। भगवान का अंतरात्मा में अवतरित होने का आभास इसी से मिलता है कि उस धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में पांचजन्य बजा या नहीं, गाण्डीव खटका या नहीं, धर्म की संस्थापना और अधर्म के विनाश की दो हलचलें एक ही समुद्री हिलोर के ज्वार-भाटे जैसी दो विलग दीखने वाली किन्तु वस्तुतः अन्योन्याश्रित एकात्म गतिविधि ही समझी जानी चाहिए। साधना का उद्देश्य अन्तरात्मा में ब्रह्मसत्ता का अवतरण करना है। यह प्रयास किस मात्रा में सम्भव हो सका, इसकी परख यही हो सकती है कि पशु को देवता बनाने की गतिविधियाँ कितनी ज्वलंत हो रही हैं। अग्नि परीक्षा प्रक्रिया सीता जी की वापसी के समय हुई थी, आत्मा रूपी सीता को परमात्मा रूपी राम से मिलने के लिए इसी जाँच में होकर गुजरना पड़ता है। रावण रूपी पशुत्व का कोई प्रभाव तो शेष नहीं है,सम्भवतः यही जाँचने के लिए अग्नि परीक्षा का उपक्रम किया गया था। सोने को खरा-खोट घोषित करने से पूर्व भी अग्नि परीक्षा और कसौटी की रगड़ आवश्यक होती है। साधना की इन्हीं में से किसी के साथ तुलना की जा सकती है।

साधना को किसी समृद्ध देवता की चापलूसी करके कुछ इनाम पुरस्कार झपट लेने की तिकड़म नहीं समझा जाना चाहिए जैसा कि आजकल आमतौर से समझा जाता है। जन्त्र-मन्त्रों को जादू नहीं समझा जाना चाहिए जिनके सहारे सहज ही लम्बे-चौड़े लाभ और चमत्कार प्राप्त होने की इन दिनों बाल कल्पना की जाती रहती है। उपासना विशुद्ध विज्ञान है जिसमें आत्म-परिष्कार के लिए प्रबल प्रयत्न करना पड़ता है। यह जितना गम्भीर वास्तविक और प्रखर होता है उसी अनुपात से व्यक्तित्व निखरता है निखार के साथ ही भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों को ऋद्धि-सिद्धियाँ मिलती हैं।

साधना, मानवी प्रगति का अति महत्वपूर्ण आधार है। व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाने से बढ़कर जीवन की सार्थकता सिद्ध करने वाला और कोई उपाय नहीं। अंतस् में छिपी पड़ी प्रसुप्त विभूतियों को ढूंढ़ निकालने की तुलना में और कोई सम्पत्ति उपार्जन का लाभदायक व्यवसाय इस संसार में है नहीं। इसी मार्ग पर चलकर हम भौतिक और आत्मिक प्रगति के उभय प्रयोजन सिद्ध कर सकते हैं।


च्यांगत्सी सरोवर के तट पर बैठे (kahani)

दार्शनिक च्यांगत्सी सरोवर के तट पर बैठे जल-पुष्पों का सौन्दर्य देख रखे थे।

राजा ने उन्हें बुला लाने के लिए अपने मन्त्री को भेजा था। सो वे वहाँ पहुँचे। कहा-चलिए, राजदरबार में आपको पद-प्रतिष्ठा, धन-सुविधा प्राप्त होगी।

च्याँगत्सी ने मन्त्री से पूछा- “तुमने उस केकड़े की कथा नहीं सुनी, जिसे एक राजा की समाधि के साथ स्वर्ण-मंजूषा में रखकर दफनाया गया था,”

“सुनी तो है, श्रीमान! पर उस केकड़े को भला क्या लाभ हुआ? वह तो जल में ही आराम से रहता।” मंत्री ने कहा। पर अपने प्रश्न के सन्दर्भ में वह दार्शनिक द्वारा सुनाई गयी कथा की संगति नहीं बिठा पा रहा था।

मन्त्री के उत्तर देते ही च्याँगत्सी खिल-खिलाकर हँस पड़े। बोले-ओह! आप मुझे उस केकड़े से भी अधिक दुर्गति में डालना चाहते हैं।


साधना का उद्देश्य और स्वरूप समझा जाय!

पदार्थों के अनगढ़पन को दूर करके उन्हें सुव्यवस्थित बनाने का कार्य विज्ञान ने किया था। यदि यह प्रयास न किये गये होते तो मनुष्य आज भी बन्दरों जैसे जिन्दगी जी रहा होता और यह धरती उतनी ही असुन्दर रही होती जितनी कि सृष्टि के आरम्भिक दिनों में थी मनुष्य के आहार-बिहार को-रहन-सहन एवं रीति-नीति को सभ्यता एवं संस्कृति के अन्तर्गत सुव्यवस्थित बनाया गया है। शिक्षा, चिकित्सा, कला, शिल्प, उद्योग, विज्ञान, समाज, शासन की सुव्यवस्था ने मनुष्यों का सुव्यवस्थित रीति से रहने और सुनियोजित पद्धति से विकसित होने का अवसर दिया है। इन प्रयासों को भौतिक प्रगति की साधना कहा जा सकता है। यदि यह सब न बन पड़ा होता तो आदिमकाल के पिछड़ेपन से आगे बढ़ सकने का अवसर कदाचित अभी तक भी न आ पता।

आत्म-चेतना के स्वरूप, उद्देश्य और दिशा धारा के निर्धारण में अध्यात्म विज्ञान के तत्व दर्शन ने भारी योगदान दिया है। नर-कीटक एवं नर-पशु के स्तर के अनगढ़ मनःस्तर को-चिन्तन को नैतिक एवं उपयोगी मर्यादाओं में बाँधने का-आदर्शवादी उत्कृष्टता अपनाने के लिए उपयुक्त प्रशिक्षण ब्रह्मविद्या के अन्तर्गत किया गया है। उसी आधार पर यह सम्भव हो सका कि सामान्य स्तर का मनुष्य तनुधारी जीव अपनी प्रतिभा एवं प्रखरता को समुन्नत बनाते हुए महामानव कहलाने का अधिकारी बने। जीवात्मा से क्रमिक विकास करते हुए महात्मा- देवात्मा एवं परमात्मा के स्तर तक पहुँचे। आत्म-विज्ञान के अन्तर्गत चेतना को समुन्नत बनाने वाले सभी प्रयास आते हैं। उन्हें अध्यात्म साधना कहते हैं। संक्षेप में साधना भी इसी का नाम है। साधना के आधार पर मानवी चेतना मात्र जीवन निर्वाह भर के क्रिया-कलापों में उलझी न रहकर उस स्तर पर पहुँच सकती है। जहाँ से बाहर ब्रह्मसत्ता की प्रतीक प्रतिनिधि होने का दावा कर सके। उसी स्तर के अनुरूप अपने वर्चस्व का परिचय दे सके।

उपयोगिता की दृष्टि से जितना महत्व भौतिक प्रगति एवं व्यवस्था का है उससे अधिक महत्व आत्म-चेतना के परिष्कार का है। पदार्थ का उपयोग तो चेतना ही करती है। यदि इस मूलसत्ता का स्वरूप ही अनगढ़ एवं विकृत बना रहा तो फिर पदार्थों का बाहुल्य होते हुए भी उनका सदुपयोग न हो सकेगा और दुरुपयोग से तो अमृत भी विष बनते देखा गया है। चेतना कर स्तर ऊँचा हो तो आन्तरिक उत्कृष्टता के कारण अभावग्रस्त परिस्थितियों एवं प्रतिकूलताओं के बीच रहते हुए भी हँसता-हँसता हलका-फुलका जीवन जिया जा सकता है। इसके विपरीत अन्तः क्षेत्र में विकृतियाँ भरी रहीं- अनगढ़पन बना रहा तो फिर रावण जैसा वैभव होने पर भी नारकीय दुर्गति का वातावरण बनेगा। अस्तु विचारशीलों के भौतिक प्रगति के लिए किए गये साधना प्रयासों की तुलना में आत्मिक प्रगति के लिए किये जाने वाले पुरुषार्थ को असंख्य गुना महत्वपूर्ण बताया है।

ईश्वर का अविनाशी अंश होने के कारण जीव में अपने पिता की सभी विशेषताएँ विद्यमान हैं। छोटे शुक्राणु में समूचे मनुष्य का परिपूर्ण ढाँचा विद्यमान रहता है। परमाणु के घटकों में पूरे सौर-मण्डल स्तर की गतिविधियाँ काम कर रही होती हैं। बीज में समूचे वृक्ष का ढाँचा विद्यमान रहता है! इस अखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त भौतिक शक्तियों एवं आत्मिक विभूतियों का जो भाण्डागार भरा पड़ा है, वह बीज रूप में मानवी सत्ता के भीतर विद्यमान है। ब्रह्माण्ड का छोटा स्वरूप-पिण्ड मनुष्य कलेवर है। इसके गर्भ में ब्रह्म चेतना की सभी विशेषताएँ एवं क्षमताएँ प्रसुप्त स्थिति में मौजूद हैं। आत्म-साधना के द्वारा इस प्रसुप्ति को जागृति में बदला जा सकता है। सामान्य से असामान्य बन सकने की इस प्रक्रिया को आत्मा-साधना का एक अंग कहा जा सकता है। अतीन्द्रिय क्षमता का विकास-अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों का दिव्य वरदान इसी प्रक्रिया के अन्तर्गत आता है।

आत्म-साधना भारतीय विज्ञान की भौतिक विशेषता है, इसी आधार पर इस देश के तैंतीस कोटि नागरिक देव मानवों में गिने जाते थे और उनकी यह निवास स्थली भारत भूमि ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ मानी जाती थी। श्रेष्ठ व्यक्तियों का जहाँ निवास होगा, वहाँ उत्कृष्ट परिस्थितियाँ अनायास ही बनी रहेंगी। ऐसा ही यहाँ हुआ भी है। इतिहास साक्षी है कि भारतीय नागरिकों की समुन्नत आत्मिक स्थिति ने अपनी गौरव-गरिमा का लाभ स्वयं तो लिया है। साथ ही वे उन विभूतियों से समस्त संसार का पिछड़ापन दूर करने के लिए बादलों की तरह इस धरती के कोने-कोने में परिभ्रमण करते रहें। उन्होंने सर्वत्र प्रगति और संस्कृति की वर्षा की। भौतिक और आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक सरंजाम खड़े किये। दूसरों के जीवन विकास के साधन उपलब्ध कराये और स्वयं श्रेयाधिकारी बने। भारत को जगद्गुरु, चक्रवर्ती, समृद्धि का स्वामी और दैवी विभूतियों का अधिपति कहा जाता है। इसमें अत्युक्ति नहीं यथार्थता थी। जिस देश के नागरिकों के दृष्टिकोण में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता कूट-कूटकर भरी हो, उसका वातावरण स्वर्ग जैसा और आचरण देवताओं जैसा होना ही चाहिए। जहाँ ऐसी स्थिति होगी वहाँ से प्रभातकालीन सूर्य की तरह सर्वतोमुखी प्रगति और सुख-शान्ति का सूर्य उगेगा ही। उस आलोक में हर किसी का नवजीवन प्राप्त करना और श्रेय पथ पर चल पड़ना स्वाभाविक ही है। यह आध्यात्मिकता ही थी जिसे अपनाकर अपना देश उन्नति के उच्च शिखर पर पहुंचा और समूची मानव जाति को आगे बढ़ाने-ऊँचा उठाने का श्रेय प्राप्त किया।

अपनी-युग की सबसे बड़ी माँग यह है कि भौतिक प्रगति पर अध्यात्मिकता का अंकुश स्थापित हो। अन्यथा बढ़ा हुआ वैभव उद्दंड तक्षक की तरह अपने दूध पिलाने वाले को ही डस लेगा। सम्पदा और कुशलता का नाम तभी है जब उन्हें सदुद्देश्य के लिए नियोजित किया जा सके अन्यथा उनकी विकृति विनाश के सरंजाम ही रचेगी। विज्ञान की प्रगति ने सुख-साधनों की निश्चित रूप से वृद्धि की है। यह अभिवृद्धि जहाँ सुखद है, वहाँ निरंकुश बनते जाने के कारण एक भयावह समस्या भी है। सद्ज्ञान सम्वर्धन से ही इसका सन्तुलन बैठेगा। विज्ञान और तत्वज्ञान के सन्तुलित पहिये ही प्रगति रथ को सुनियोजित रूप से आगे बढ़ा सकने में समर्थ होंगे। यह प्रयोजन अध्यात्म विज्ञान के प्रति उसी स्तर की अभिरुचि उत्पन्न करने से सम्भव होगा जैसी कि इन दिनों भौतिक उपलब्धियों के लिए आकुलतापूर्वक संलग्न हो रही हैं।

व्यक्ति और समाज का हित इसी में है कि भौतिक दरिद्रता की भाँति ही आत्मिक क्षेत्र में धंसी संकीर्णता को भी मार भगाया जाय। इसके लिए उतने ही बढ़े-चढ़े प्रयास करने होंगे जैसे कि भौतिक प्रगति के लिए किये जा रहे हैं। खेद है कि इस असन्तुलन को दूर करने के लिए मूर्धन्य विभूतियों द्वारा वैसे प्रयत्न नहीं किये जा रहे हैं, जैसे कि आवश्यक थे। हमें इस अभाव की पूर्ति के लिए शक्ति भर प्रयत्न करने में संलग्न होकर युग की आवश्यकता पूरी करने में अपने कर्त्तव्य का पालन करना चाहिए।

आत्मिक प्रगति के दो आधार हैं- एक ज्ञान दूसरा विज्ञान। ज्ञान पक्ष में ब्रह्मविद्या के आधार पर उस उत्कृष्ट चिन्तन का समावेश है, जिसमें आत्मा का स्वरूप, लक्ष्य, कर्तव्य, तत्व-दर्शन के रूप में समझा जाता है और जीवन की सार्थकता के लिए उच्चस्तरीय मार्ग दर्शन मिलता है। अन्तः करण की आस्थाओं, आकांक्षाओं, अभिरुचियों, स्फुरणाओं, सम्वेदनाओं को परिष्कृत करने के लिए आवश्यक होता है वह ब्रह्मविद्या में सन्निहित सद्ज्ञान द्वारा ही सम्भव होता है। इसके लिए स्वाध्याय, सद्ज्ञान द्वारा ही सम्भव होता है। इसके लिए स्वाध्याय, सत्संग मनन, चिन्तन जैसे माध्यम अपनाये जाते हैं। कथा, प्रवचनों का सिलसिला इसी सन्दर्भ में चलता है। धर्म-शास्त्रों का- तत्व दर्शन का विशालकाय कलेवर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है।

आत्मिक प्रगति का दूसरा आधार है- साधना। साधना वह प्रक्रिया है जिसमें अमुक विधि-विधानों कर्मकाण्डों के साथ अमुक स्तर की भावनाओं का समावेश करके आन्तरिक अवसादों को दूर किया जाता है। चेतना पर छाई प्रसुप्ति को जागृति में परिवर्तित करना आत्म-साधना का उद्देश्य है। जीव लाखों पिछड़ी योनियों में परिभ्रमण करते हुए मनुष्य जन्म पाने का अधिकारी बना है। इस लम्बी यात्रा में जो पशु -प्रवृत्तियां अभ्यास में आती रही हैं उनकी छाप अभी भी छाई रहती है। मनुष्य की जो उच्च स्थिति है उसे देखते हुए वे पशु-प्रवृत्तियां अनावश्यक एवं अवाँछनीय बन जाती है। छोटे बच्चे नंग-धड़ंग फिर सकते हैं और कहीं भी मल-मूत्र का त्याग बिना संकोच के कर सकते हैं। पर प्रौढ़ावस्था में तो वैसा करना अनुपयुक्त ही माना जायगा। प्रौढ़ता के साथ जो मर्यादाएँ जुड़ी होती हैं, उन्हें पालन करना भी आवश्यक होता है। मनुष्य जन्म के अनुरूप आस्थाएँ विकसित करने के लिए पिछड़ी पशु-प्रवृत्तियों को उखाड़ना आवश्यक होता है। यह कार्य कठिन भी है और जटिल भी। समझने-समझाने भर से इतना बड़ा आन्तरिक परिवर्तन नहीं हो पाता जिसे पशुता के स्थान पर देवत्व की प्रतिष्ठापना का काया कल्प माना जाता है।

इन दिनों वातावरण में संकीर्ण ईर्ष्या-द्वेष का धुआँ बेतरह छाया हुआ है। इसकी कालिमा सर्वसाधारण के मन पर अनायास ही जमती चली जाती है। इसकी धुलाई, सफाई न की जाय तो वातावरण का प्रभाव अपनी छाप छोड़ेगा और व्यक्ति दिन-दिन निकृष्टता के बोझ से लदेगा। इसका परिमार्जन ‘साधना’ प्रक्रिया को अपना कर जिस प्रकार हो सकता है। वैसे अन्य किसी उपाय से सम्भव नहीं है। मानवी अवगति का एकमात्र कारण उसकी आन्तरिक दुर्बलता एवं विपन्नता ही होती है। यदि उस भार को हटाया जा सके तो मनुष्य गरिमा- महामानवों जैसे-नर देवताओं जैसी बनी रह सकती है। परिष्कृत मनःस्थिति में रहने वाले सहज ही समुन्नत परिस्थिति प्राप्त कर लेते हैं- वह तथ्य सर्वविदित है। साधना द्वारा व्यक्तित्व का परिशोधन करते हुए सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर असंदिग्ध रूप से बढ़ा जा सकता है।

मानवी सत्ता इतनी स्वल्प नहीं है जिससे कि शरीर यात्रा भर का प्रयोजन पूरा होता रह सके। निर्वाह के लिए- जितने पुरुषार्थ एवं मनोयोग की आवश्यकता है उतना ही अनुदान क्षुद्र प्राणियों को मिलता है, पर मनुष्य की स्थिति उससे भिन्न है। उसके अन्तराल में समुद्र गर्भ की तरह विभूतियों की बहुमूल्य रत्न, राशि भरी पड़ी है। उसे खोजा और पाया जा सके तो ऐसी उपलब्धियों का अधिकारी बना जा सकता है, जिन्हें असामान्य आलौकिक एवं चमत्कारी समझा जा सके। मनुष्यों में अधिकाँश नर कीटकों और नर-पशुओं की तरह हेय स्तर का जीवनयापन करते हैं, पर उनमें से कुछ ऐसे भी होते हैं जिन्हें देवोपम कहा जा सके, नर-नारायण कहकर भाव भरा अभिवन्दन किया जा सके। सज्जनता की दृष्टि से ही नहीं- आत्मबल की प्रखरता के कारण भी वे असामान्य होते हैं। स्वयं तरते हैं और दूसरों को अपनी नाव पर बिठाकर पार करते हैं।

परमाणु की क्षमता का पता चलने पर हमें आश्चर्यचकित रह जाना पड़ा है। अणु विस्फोट के समय जो ऊर्जा प्रादुर्भूत होती है, उसका हजारवाँ भाग ही अपने समीपवर्ती पदार्थों पर प्रभाव डालता है। शेष भाग तो विस्फोट और प्रभाव के नगण्य जितने मध्यकाल में ही अन्तरिक्ष विलीन हो जाता है। यदि विस्फोट की सारी ऊर्जा सुरक्षित रखी जा सके तो एक ही परमाणु समस्त संसार का विनाश करने के लिए पर्याप्त हो सकता है। जीव सत्ता के सम्बन्ध में भी यही बात है। आत्मा की मूल शक्ति परमात्मा के समतुल्य ही है। अन्तर केवल परिस्थितियों का है। चिनगारी में वे सभी गुण मौजूद हैं जो प्रचण्ड ज्वाला में होते हैं। चिंगारी को अवसर मिले तो वह दावानल के रूप में परिणत हो सकती है। आत्मा को अवसर मिले तो वह परमात्मा की भूमिका निभा सकने में पूर्ण समर्थ हो सकती है। ‘सोऽहम् शिवोऽहम् सच्चिदानंदोऽहम्’ तत्वमसि अयमात्मा ब्रह्म आदि सूत्रों में आत्मा की मूलसत्ता और स्थिति का संकेत किया गया है। ईश्वर में जो क्षमताएँ विशेषताएँ एवं विभूतियाँ हैं, वे सभी परिष्कृत स्तर के मनुष्य में प्रकट हो सकती हैं। अवतार महामानवों के शरीर मानवी आकृति-प्रकृति के थे, पर उनका चेतना स्तर उच्चकोटी का था। फलतः वे अपने युग की समस्याओं का समाधान करने वाले पुरुषार्थ कर सकने में सफल होते रहें। विभूतिवान महामानवों को महात्मा, देवात्मा आदि नामों से पुकार जाता है। उन्हें सिद्ध पुरुष भी कहते हैं। सामान्य लोगों की तुलना में न केवल उनकी प्रतिभा प्रखरता ही बढ़ी-चढ़ी होती है। वरन् अतीन्द्रिय कही जाने वाली अलौकिक समझी जाने वाली विभूतियों का भण्डार भी उनके पास भरा रहता है।

आध्यात्मिक सम्पदा ही जीवन के हर पक्ष में आलोक उत्पन्न करती दिखाई पड़ती है। उसकी ज्योति शरीर को ओजस्वी, मस्तिष्क को मनस्वी और अन्तःकरण को तेजस्वी बनाती है। इस आत्मबल का उपार्जन साधना उपचार से सम्भव होता है। संकल्प शक्ति का बिखराव रोकने-उसे प्रचण्ड बनाने और अभीष्ट प्रयोजन में नियोजित किये रहने की अन्ततः क्षमता विकसित करने के लिए ‘साधना’ को अतीव उपयोगी माना जाता है यों यह प्रयोजन मनोयोगपूर्वक सत्प्रयोजनों में संलग्न रहने से भी अनेकों मनस्वी लोगों की तरह पूरा किया जा सकता है, पर जितनी सरलता आत्म-साधनाओं के माध्यम से हो सकती है उतनी अन्य उपायों से सम्भव नहीं। फिर प्रश्न मात्र संकल्प शक्ति बढ़ाने का ही तो नहीं है उसके उत्कृष्ट बनाने की बात भी तो है। यह उत्कृष्टता तो उच्चस्तरीय आस्थाओं का समन्वय करने से ही सम्भव होती है। अध्यात्म साधना का तथ्यपूर्ण ढाँचा दूरदर्शी महामनीषियों ने अपने दीर्घकालीन अनुभवों के आधार पर इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया है।

आत्मिक प्रगति के लिए ज्ञान और विज्ञान के दोनों चरण उसी प्रकार उठाने पड़ते हैं, जिस प्रकार कि भौतिक प्रगति के लिए इन्हीं दो आधारों को अपनाया जाना आवश्यक होता है। आर्थिक तथा दूसरे सुविधा साधन भी तो भौतिक ज्ञान-विज्ञान का सहारा लेकर ही प्राप्त किये जाते हैं। आत्मिक प्रगति के लिए भी ब्रह्मविद्या पर आधारित तत्व ज्ञान हृदयंगम करना आवश्यक होता है। योग-साधना एवं तपश्चर्या की समन्वित साधना पद्धति का आश्रय लेकर अध्यात्म विज्ञान का उपयोग किया जाता है और उससे चित्-शक्ति के सम्वर्धन का अलौकिक लाभ मिलता है।

महत्व न समझा जाय और उपेक्षा की जाय तो बात दूसरी है अन्यथा यदि उसकी उपयोगिता समझने का प्रयत्न किया जाय तो लगेगा कि भौतिक उपलब्धियों के उपार्जन में जो लाभ सोचा जाता है और जो प्रयत्न किया जाता है उसकी तुलना में आत्मिक प्रगति के लिए किये जाने वाले प्रयासों एवं अनुदानों का महत्व किसी भी प्रकार कम नहीं है। वाहनों और साधनों की तुलना में उनके उपभोक्ता का मूल्य कम नहीं हो सकता। आत्मा ही तो विभिन्न सुविधा साधनों का उपयोग या उपभोग करती है, यदि वह मूलसत्ता ही गई-गुजरी स्थिति में पड़ी हो भी तो साधनों का सुखोपभोग कैसे सम्भव हो सकेगा? ज्वर पीड़ित होने पर जब मुँह कड़ुआ रहने लगता है और पेट में अपच भर जाता है तो कितना ही स्वादिष्ट भोजन क्यों न हो उससे किसी प्रकार की प्रसन्नता नहीं होती। आत्मिक स्थिति के हेय होने पर भौतिक सम्पदा दुरुपयोग में लगती और अनर्थ करती देखी गयी है। अस्तु विवेकशील सदा से यही कहते रहे हैं कि आत्मिक प्रगति का महत्व भौतिक सम्पदाओं से किसी भी प्रकार कम नहीं आँका जाय वरन् उस दिशा में भी समुचित ध्यान देने एवं प्रबल प्रयास करने का महत्व समझा जाय।

यदि आत्म साधना का सही स्वरूप और सही उद्देश्य समझा जा सके- यदि सही रीति-नीति अपनाकर आत्म साधना का पुरुषार्थ किया जा सके- तो उसका अभीष्ट परिणाम मिलना सुनिश्चित है। असफलता तो उन्हें मिलती है जो राजमार्ग छोड़कर पगडंडियों में भटकते हैं और स्वल्प प्रयत्न से बढ़े-चढ़े परिणाम तुर्त-फुर्त प्राप्त कर लेने की लाटरी पद्धति से अध्यात्म साधना की तुलना करते हैं। प्राचीन काल में जब साधना अपने वैज्ञानिक रूप में प्रयुक्त की जाती थी तो उसके सत्परिणाम भी प्रत्येक साधक को मिलते थे। यदि उसी प्राचीन परिपाटी को पुनः अपनाया जा सके तो इस महान् अवलम्बन का आश्रय लेकर मनुष्य में देवत्व का अवतरण और धरती पर स्वर्ग का वातावरण पुनः परिलक्षित हो सकता है।


परिजनों में से प्रत्येक को आमन्त्रण और आह्वान

हमारे साथ कुछ दूर तो कन्धे से कन्धा और कदम से कदम मिलाकर चल लें।

एक तथ्य-एक संकल्प-

किसान की फसल उगती है, हरियाली देती है, बढ़ती है, फूलती है और अन्तिम चरण में अनाज के बहुमूल्य दाने देकर सूख जाती है। बीज का इसी में गौरव है कि वह पलने का साहस करने की दूरदर्शिता अपनाये और उसी शौर्य के बलबूते विकासोन्मुखी रीति-नीति अपनाये। अन्त में एक के स्थान पर सैकड़ों दाने अपनी स्थानपूर्ति के लिए छोड़कर हँसते-हँसाते कालचक्र की गरिमा बढ़ाता हुआ विदा हो जाये। खेत में उगे पौधे हमें जीवन का मार्ग, स्वरूप, लक्ष्य सिखाते हैं और बताते हैं कि आरम्भ से लेकर अन्त तक अपनी गतिविधियाँ क्या होनी चाहिएं? हमें सन्तोष और परिजनों को गर्व करना चाहिए कि युग निर्माण का सन्देशवाहक प्रकाश इसी क्रम से गला, उगा, बढ़ा, फूला और अब फलित होकर एक उत्साहवर्धक परम्परा स्थापित करने के साथ-साथ अपने क्रिया-कलाप का एक अध्याय पूरा करने जा रहा है।

जीवन अमर है। मृत्यु तो मात्र छोटी-सी विश्रान्ति है। गति अमर है, ठहराव तो थकान उतरने भर के लिए है। सौन्दर्य चिरन्तन है, वृद्धता तो उसके नवीनीकरण की भूमिका भर है। संग्रहीत सम्पदा के आधार पर नये उत्साह और नये साधनों के साथ नया प्रयास किया जा सके। विराम का इतना ही उद्देश्य है। पुरातन वस्त्र जरा-जीर्ण हो जाने पर नया बनाने और पहनने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। बुझते दीपक की अन्तिम लौ जिस प्रकार अति प्रकाश के साथ चमकती है, भोर होने से पूर्व जिस प्रकार अंधियारी अधिक घनी होती है। उसी प्रकार हमारे प्रयासों का यह अन्तिम अध्याय अब अधिक प्रखर होने जा रहा है। अगले थोड़े से दिनों में हमें उतना काम करना है जिसकी तुलना में सत्तर वर्ष के पिछले समय की उपलब्धियों को भारी नहीं हलका ही ठहराया जा सके। इसी योजनाबद्ध प्रक्रिया को अपनाकर हम अपने नये प्रयासों में नई तैयारी के साथ जुट रहे हैं।

शोधकार्य में समर्थ-सहयोगियों से-

कुछ बड़े अनुसंधान और प्रतिपादन हमें अगले दिनों करने हैं। ये देखने में छोटे भले ही हों, पर उनकी प्रतिक्रिया विश्वव्यापी होगी और समस्त मानव जाति को प्रभावित करेगी। स्पष्ट है कि अब बुद्धि युग आ गया अगल दिनों तर्क की ही प्रतिष्ठा होगी। प्रमाण और प्रत्यक्ष के आधार पर ही किन्हीं तथ्यों को स्वीकार किया जा सकेगा। आप्त वचनों और शास्त्र प्रतिपादनों की बात परम्परागत मान्यताओं की दुहाई देकर जन-मानस में उतारी न जा सकेगी। स्थिति को समझना आवश्यक है। अस्तु अध्यात्म विज्ञान का प्राचीन स्वरूप इस नये आधार पर ही खड़ा किया जाना चाहिए।

संसार में दो ही सत्ताएँ काम करती हैं-एक जड़ दूसरी चेतन। एक प्रकृति, दूसरी पुरुष। एक माया दूसरी ब्रह्म। जड़, प्रकृति एवं माया की क्षमता को उभारने और उपयोग करने की विद्या भौतिक विज्ञान के विकास के सहारे उपलब्ध होती है, सो हो भी रही है। दूसरा पक्ष उससे भी प्रबल है। चेतना, आत्मा एवं परमात्मा की सामर्थ्य, जड़ में अधिक है। इसलिए भौतिक विज्ञान की तुलना में अध्यात्म विज्ञान की शक्ति और उपयोगिता भी बड़ी-चढ़ी है। भारत इस तथ्य को अपने गौरवमय अतीत में प्रत्यक्ष रूप से किस प्रकार सिद्ध करता रहा है, विश्व इतिहास इसका साक्षी है। अब नये परिवेश में उनका पुनः प्रत्यक्षीकरण होना चाहिए। अध्यात्म विज्ञान का ऐसा स्वरूप निखर कर आना चाहिए जो प्रत्यक्षवाद की-भौतिकवाद की कसौटी पर भी खरा सिद्ध हो सके। हमारा प्रयास इसी के लिए है- वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की शोध और प्रतिष्ठापना इसी उद्देश्य के लिए है। यह बहुत बड़ा काम है। इसके लिए बड़े साधन चाहिए और बड़े श्रम की जरूरत है। अब तक हमारे पास समय भी बहुत था और श्रम करने में शरीर और मन की क्षमता भी साथ देती थी। पर अब वह स्थिति नहीं रही। समय कम-साधन ढीले और काम का विस्तार बड़ा। इन कठिनाईयों के कारण अब सहयोगियों की अपेक्षा की जा रही है। इन दिनों हमें ऐसे साथियों की आवश्यकता पड़ रही है, जिनकी मानसिक क्षमता शोध कार्य के लिए उपयुक्त है। जिनके पास भावना और समय भी हो। इन पंक्तियों के माध्यम से हम उनका आह्वान करते हैं और अधिक न सही पाँच वर्ष हमारे कन्धे से कन्धा मिलाकर उपरोक्त शोधकार्य में सहयोग देने संलग्न रहने के लिए बुलाते हैं।

नौकर नहीं, मिशनरी चाहिए।

पैसा हो तो नौकर हर योग्यता के खरीदे और रखे जा सकते हैं अनेक क्षेत्रों में बड़ी-बड़ी शोधें इसी आधार पर चल रही हैं। अपने पास वैसे साधन कहाँ? शोध प्रयासों में वेतन देकर किसी को बुलाने की अपनी सामर्थ्य बिलकुल भी नहीं है। हो भी तो उसका उपयोग नहीं करेंगे। कारण कि हमारे साथियों की प्रथम कसौटी यही हो सकती है कि वे श्रद्धा और तप की सम्पदा लेकर आगे आएं। ब्राह्मण और सन्त की परम्परा को अपनाये हुए हों। इससे कम मनः स्थिति के लोग हमारे काम न आ सकेंगे। मात्र बुद्धि और श्रम से नहीं, अपना सारा काम उच्चस्तरीय भावना के आधार पर चलेगा। इसलिए शोध प्रयासों में सहयोग देने के लिए ऐसे सुयोग्य साथी ही चाहिएं, जिनको आर्थिक आवश्यकता न हो। भोजन, वस्त्र का प्रबन्ध तो हो भी सकता है, पर घर के लिए मनीआर्डर भेजते रहना सम्भव न होगा। आह्वान इसी स्तर के लोगों का किया जा सकता है, जिनकी शिक्षा उपयुक्त हो, चिन्तन में प्रखरता एवं पैनापन हो, वित्तेषणा एवं शोकेषणा का जो दमन कर लें। अपने विशाल परिवार में उपरोक्त स्थिति के जो व्यक्ति हों, वो अपनी मनःस्थिति ओर परिस्थिति का परिचय देते हुए पत्र-व्यवहार कर लें।

मानव जाति का भविष्य अध्यात्मवादी दृष्टिकोण अपनाने और उत्कृष्टता की प्रवृत्तियाँ स्वीकार करने में ही है। इसका प्राचीन तत्व-दर्शन युग के अनुरूप आधार भूमि पर खड़ा किया जाना है। अपने शोध प्रयास का लक्ष्य एवं स्वरूप यही है। ग्रन्थों की खरीद भी अपेक्षित होगी। शोधकर्ताओं के लिए स्थान निवास की आवश्यकता रहेगी और जो लोग अपने घर से न खा सकेंगे, उनके लिए भोजन, वस्त्र का भी प्रबंध करना होगा। इन कार्यों के लिए अर्थ सहयोग भी अपेक्षित होगा। जो लोग बौद्धिक दृष्टि से अथवा समय की दृष्टि से इस शोध प्रयास में सहयोग नहीं दे सकते, वे अर्थ सहयोग देकर भी इस युगान्तरीय चेतना उत्पन्न करने वाले प्रयास में अपना योगदान कर सकते हैं।

मनोव्याधियों की यज्ञ चिकित्सा-

बढ़ती हुई शरीर व्याधि के साथ-साथ मानसिक विकृतियों का भी इन दिनों उफान आ रहा है। पूर्ण स्वस्थ कहे जाने वाले शरीर कदाचित ही कहीं दिखाई पड़ेंगे। इस प्रकार मानसिक दृष्टि से सन्तुलित एवं विवेकवान व्यक्तियों को ढूंढ़ निकालना भी कठिन है। शरीर रोगों से जितना कष्ट उठाना पड़ता है, आज के मनुष्य को मनोरोगों से - मनोविकारों से उसकी अपेक्षा कम नहीं। वरन् अधिक ही दुःखी रहना पड़ता है। मानसिक आरोग्य की रक्षा एवं उपचार की आवश्यकता पूरी कर सकने में ‘यज्ञ-विज्ञान’ का विकसित स्वरूप निश्चित रूप से बहुत अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकता है। शरीर चिकित्सा शास्त्र ने निश्चित रूप से मानव जाति की महती सेवा की है। यदि मानसिक चिकित्सा के ऋषिप्रणीत आधार यज्ञ विज्ञान का परीक्षित और प्रामाणिक स्वरूप सामने आ सके तो यह एक बड़ी बात होगी। तब न केवल भारतीय धर्म के जनक ‘यज्ञ’ की प्रतिष्ठा उपयोगिता एवं गरिमा ही सर्व स्वीकार्य होगी, वरन् उसके आधार पर मानसिक रोगों से छुटकारा पाने वाला जन-समाज भी इस उपलब्धि को अपने युग का सर्वोपरि वरदान मानेगा। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की ही एक शोध शाखा यज्ञ अनुसंधान भी है। उसके लिए भी इन्हीं शोध-सहायकों में से कुछ को जुटा रहना पड़ेगा। ऋषिप्रणीत आधार पहले से ही मौजूद है, हमें तो युग के अनुरूप उनका स्वरूप भर निखारना है, इसलिए कार्य कठिन दीखते हुई भी सरल है। बड़ा होते हुए भी छोटा है। अपेक्षा की जा सकती है कि जिस अगली पंचवर्षीय योजना का हम श्री गणेश कर रहे हैं। उनका मूलभूत ढाँचा इसी अवधि में खड़ा किया जा सकेगा। यों अधिकाधिक विकास एवं परिष्कार के कार्य आगे भी चलते रहेंगे।

अधिक साधन सहयोग की अपेक्षा-

अगले दिनों किये जाने वाले कार्यों के लिए शान्ति कुँज का आश्रम छोटा पड़ता है। स्थान को बढ़ाने की आवश्यकता अनिवार्य हो गयी तो उसके लिए नया प्रयास आरम्भ कर दिया गया है। अभी एक छोटी जमीन मिल गई है। जहाँ सात ऋषि तप करते थे, उसी गंगा तट से बिलकुल सटी हुई यह जमीन है- प्रस्तुत उद्देश्य के लिए उपयुक्त समझी गई है। अभी साधन भी इतने ही थे। अब इन्हीं दिनों उसका निर्माण कार्य आरम्भ हो रहा है। एक छोटा कमरा बनाने की लागत प्रायः तीन हजार रुपये की बैठेगी। जिनकी आर्थिक स्थिति इस योग्य है उनसे अनुरोध किया जा रहा है कि वे इस निर्माण कार्य में यथाशक्ति अपना सहयोग उदारतापूर्वक दे दें, ताकि स्थान के अभाव में काम रुकने की कठिनाई का सामना न करना पड़े। आग्रह करने और दबाव डालने की अपनी परम्परा नहीं है। संकेत को दबाव मानना चाहिए। ‘ब्रह्म वर्चस आरण्यक’ नये आश्रम के निर्माण में अनावश्यक समय नष्ट न हो, उसकी बहुत समय तक प्रतीक्षा न करनी पड़े। शोध कर्ता के लिए विशालकाय पुस्तकालय, अध्ययन कक्ष आदि बन सके इसके लिए पैसा चाहिए। थोड़े साधनों वाले थोड़ा और अधिक साधनों वाले अधिक सहयोग देकर इस सामयिक आवश्यकता को पूरी कराने में उदार योगदान करें, ऐसी अपेक्षा की गई है। ब्रह्म वर्चस आरण्यक स्थान भर अलग है, उसका स्वामित्व वेदमाता गायत्री ट्रस्ट का ही है इसलिए आर्थिक सहायता भेजने का नाम पता पुराना ही है।

विशिष्ट तप-साधना शृंखला।

अगली पंच वर्षीय योजना में शोध प्रयास के अतिरिक्त दूसरा कार्य है- तप साधना एवं लोकसेवा की गरिमा समझने वालों का व्यावहारिक मार्ग-दर्शन। इसके लिए सत्र प्रशिक्षण प्रक्रिया में कुछ नये तत्वों का समावेश किया गया है। उपयुक्त प्रक्रिया अपनाने से हर काम सफल होता है। साधनों के सम्बन्ध में तो यह बात विशेष रूप से लागू होती है। व्यस्त लोगों के लिए थोड़ा-सा अवकाश लागू होती है। व्यस्त लोगों के लिए थोड़ा-सा अवकाश निकाल कर दस दस दिन के सत्रों में पिछले दिनों शांतिकुंज बुलाया जाता रहा है। अगल पाँच वर्ष तक भी यही क्रम चलेगा। किन्तु साधना प्रक्रिया में अन्तर रहेगा। जो पिछले दिनों सीखा गया है, उसे प्रकाश की और जो अगले दिनों मिलना है उसे प्रेरणा की संज्ञा दी गयी है। पिछले को पूर्वार्ध और अगले को उसका पूरक उत्तरार्ध माना जाना चाहिए। अगले दिनों चलने वाले दस दिवसीय सत्रों में प्रत्येक शिक्षार्थी को विशेष विधि से, विशेष नियम प्रतिबन्धों के साथ एक साधना अनुष्ठान करना होगा। इसे आत्म-शक्ति सम्वर्धक तपश्चर्या स्तर का प्रयास माना जाना चाहिए इसमें शिक्षण कम होगा और तप−साधना में अधिक तत्परतापूर्वक संलग्न रहना पड़ेगा। कहना न होगा कि अब तक कोई भी शिक्षार्थी शान्ति-कुंज के प्रशिक्षण सत्रों में आने के उपरान्त खाली हाथों नहीं गया है। उसे यह शिकायत नहीं रही है कि हमारा समय और किराया भाड़ा बेकार चला गया। आगे की प्रशिक्षण प्रक्रिया पिछलों की अपेक्षा उच्चस्तरीय होगी, वस्तु उसका लाभ भी अधिक ही होना चाहिए।

दस दिवसीय सत्र लगातार तो नहीं चल सकेंगे। इन्हें वानप्रस्थ सत्रों को अदलते-बदलते चलाया जाया करेगा। महिला सत्र-वानप्रस्थ सत्र के साथ-साथ ही चला करेंगे। दोनों ही एक-एक महीने के होते रहेंगे। कौन सत्र किस महीने चलेंगे इसकी घोषणा समय-समय पर पत्रिका द्वारा होती रहेगी। अगले छः महीने का कार्यक्रम निश्चित है।

दिसम्बर 76, जनवरी, मार्च एवं अप्रैल 77 इन चार महीनों में दस-दस दिवसीय साधना सत्र चलेंगे। पहला 1 से 10 तक दूसरा 11 से 20 तक तीसरा 21 से 30 तक हर महीने चला करेगा। बीच-बीच में होली आदि के अवसर पर एक दो सत्र स्थगित भी रहेंगे। वानप्रस्थ सत्र और महिला सत्र अगले दिनों तीन हैं। फरवरी, मई एवं जून 77।

इन सभी सत्रों में सम्मिलित होने वालों को अपना पूरा परिचय भेजते हुए, किस सत्र में सम्मिलित होना है इसकी पूर्व स्वीकृति माँगनी पड़ती है। अनायास बिना सूचना दिये इन सत्रों में कोई सम्मिलित नहीं हो सकता। बारह वर्ष से छोटे बच्चों को लेकर आने का नियम नहीं है। इसी प्रकार अशिक्षित वयोवृद्ध, अशक्त रोगी, पर्यटन के उद्देश्य से आने वाले लोग इन सत्रों में सम्मिलित होकर अव्यवस्था फैलाने न पायें इसकी रोकथाम रखी जाती है।

व्यस्त परिजनों से भी अपेक्षा की जायगी कि जो पिछले पाँच वर्षों में किसी सत्र में आ चुके हैं वे भी और जो नहीं आ पाये हैं वे भी इन सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। अखण्ड ज्योति के माध्यम से जो प्रकाश मिलता है उसे प्रेरणा के रूप में विकसित करने के लिए सान्निध्य की आवश्यकता है। दूरस्थ रहने और समीप पहुँचने पर क्या अन्तर होता है? स्वाध्याय और सत्संग के प्रभा में कितनी विशेषता होती है। इसका अनुभव इन सत्रों में सम्मिलित होने वाले सहज ही अनुभव कर सकते हैं।

दस दिवसीय सत्र उनके लिए हैं जो अत्यधिक कार्य व्यस्त है और निजी तथा पारिवारिक उत्तरदायित्वों के निर्वाह में ही पूरा समय लगाना पड़ता है। कुछ समय के लिए वे इन सत्रों में सम्मिलित होकर अपनी आन्तरिक थकान मिटाने और नवीन स्फूर्ति प्राप्त कर सकने में इतने थोड़े अवसर का भी महत्वपूर्ण लाभ उठाते रह सकते हैं। पर जिन्हें कुछ अधिक समय मिल सकता है, जिनके सिर का भार उतना बोझिल नहीं है उन्हें एक महीने के वानप्रस्थ सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करना चाहिए।

घर में वैरागी की तरह कैसे रहा जा सकता है? घर को तपोवन बना लेने की प्रक्रिया क्या है? स्वार्थ और परमार्थ का समन्वय कैसे हो सकता है? गृहस्थ जीवन के उत्तरदायित्व निबाहते हुए लोक-मंडल की साधना कैसे की जा सकती है? इसका व्यावहारिक मार्गदर्शन इन वानप्रस्थ सत्रों में मिलता है। एक महीने की अवधि में प्रयत्न यह भी किया जाता है कि शिक्षार्थी को भाषण कला का अनुभव, अभ्यास हो जाए और वह जन-मानस में नवजागरण का सन्देश पहुँचाने में अपनी वाक्-शक्ति का सफल उपयोग कर सके। एक महीने का समय इतना है कि उसमें कोई साधना तपश्चर्या भी ठीक ढंग से हो सकती है। दस दिन की साधना तो अति व्यस्त लोगों के लिए रखी गई है।

सृजन शिल्पियों का सृजन

वानप्रस्थ जीवन वस्तुतः भारतीय धर्म और संस्कृत का प्राण है। इसी परम्परा ने देश को एवं विश्व को उच्चस्तरीय लोक सेवी नर-रत्नों की सृजन सेना प्रदान की थी। साधु, ब्राह्मण और गृहस्थ की यह समन्वित परम्परा सरल भी है और हर दृष्टि से सफल भी। जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व हलके हो गये हैं, जो उपार्जन की जिम्मेदारी से मुक्त हैं, उन्हें वानप्रस्थ क्षेत्र में प्रवेश करने के सुअवसर की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। उनके लिए आध्यात्मिक ज्ञान अर्जन-तप साधन और लोकमंडल की विविध प्रक्रिया अपनानी चाहिए। इसी में ढलते जीवन का श्रेष्ठ सदुपयोग है।

ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में इस प्रकार की व्यवस्था की गई है कि वानप्रस्थ साधना के लिए एकाकी या अपनी पत्नी समेत अभीष्ट अवधि तक निवास कर सकें। ऐसे लोगों को अपने भोजन, वस्त्र आदि का निर्वाह व्यय तो स्वयं ही उठाना पड़ता। निवास तथा प्रशिक्षण की सुविधा आश्रम में मिल जायगी। अब तक स्थान की कमी के कारण इस प्रकार की इच्छा करने वालों को इनकार ही किया जाता रहा है, पर अब नया आश्रम बनने से नई सुविधा बढ़ गई है। हिमालय क्षेत्र, गंगा तट, सज्जनों का संग, आध्यात्मिक वातावरण, प्रखर मार्ग-दर्शन के पाँचों लाभ मिलने से आत्मिक प्रगति का पथ-प्रशस्त होने में संदेह नहीं रह पाता। शारीरिक दृष्टि से रोगी-स्वभाव की दृष्टि से कुसंस्कारी और दृष्टिकोण की दृष्टि से ओछे लोगों को तो नहीं रहने दिया जाता, पर सज्जनता और अनुशासनप्रियता जैसे सद्गुण जिनमें हैं अब उनके लिए शान्ति कुंज के नये आश्रम में निवास की सुविधा रहेगी। इस लाभ से लाभान्वित होने की जिनकी स्थिति हो उन्हें भी इन पंक्तियों द्वारा आमन्त्रित किया जा रहा है।

साधना इन दिनों तो एक खिलवाड़ मात्र बन गई है। उसे जादू विद्या जैसा कुछ खेल तमाशा सोच लिया गया है। असल में वह जीवनयापन का एक विशिष्ट विज्ञान है। जिसका आश्रय लेकर सामान्य स्थिति का मनुष्य महामानव बन सकता है और देवोपम गरिमा का अधिकारी बन सकता है। मनुष्य के अंतरंग में इतनी महत्वपूर्ण विभूतियाँ एवं विशेषताएँ छिपी हुई हैं। जिन्हें जागृत कर सकने पर वह लौकिक कहलाते हुए भी अलौकिक स्तर की भूमिकाएँ सम्पन्न कर सकता है। इन्द्रिय शक्ति से सभी परिचित हैं, पर प्रसुप्त अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का ज्ञान तथा भान कदाचित् ही किसी को होता है। साधना विज्ञान का आश्रय लेकर मनुष्य इसी जीवन में स्वर्गीय अनुभूतियों का आनन्द और उन्मुक्त जीवन का रसास्वादन कर सकता है, पर यह सम्भव उसी साधना द्वारा हो सकता है। जो तथ्यों पर आधारित हो। प्रयत्न ऐसी ही साधना सिखाने का है जो हमने प्रयत्नपूर्वक सीखी है और जिन सत्पात्रों को सिखलाने के लिए हमारा मन आकुल-व्याकुल हो रहा है। ऐसे सत्पात्रों की तलाश और परख के लिए ही विशेष रूप से इन साधना-सत्रों का आयोजन किया गया है।

धर्म मंच से लोक-शिक्षण की प्रक्रिया अपनाकर किस प्रकार जल-मानस का नव निर्माण किया जा सकता है। इसकी चर्चा समय-समय पर होती रही है। व्यक्ति, परिवार और समाज के भावनात्मक नवनिर्माण में इससे बढ़कर और कोई प्रक्रिया अपने देश में सफल नहीं हो सकती। देश ही क्यों विश्व भर के बारे में यही बात कही जा सकती है कि मानवीय अन्तःकरण के मर्मस्थल को स्पर्श करे और बदलने की जितनी क्षमता धर्मतन्त्र के सदुपयोग से सम्भव हो सकती है, उतनी और किसी प्रकार नहीं। अस्तु युग की पुकार पूरी करने के लिए ऐसे धर्म सेवियों धर्म प्रचारकों की आवश्यकता पड़ेंगी जो साधु, ब्राह्मण की प्राचीन परम्परा के आज की स्थिति के अनुरूप स्वयं को नये संस्करण के रूप में प्रस्तुत कर सकें। आज दयानंदों विवेकानन्दों, बुद्धों, रामदासों, गोविन्द सिंहों के नये संस्करणों की जितनी आवश्यकता है उतनी इससे पहले कभी नहीं रही। महामारी फैलने पर ही तो चिकित्सकों की ढूंढ़-खोज होती है। आग लगने पर ही तो पानी के बरतनों को तलाशने की हड़बड़ी मचती है। समय ने ऐसे कर्मचारी को पुकारा है जो अपने व्यक्तित्व को वासना-तृष्णा की कीचड़ में नर-कीटकों की तरह गलाने की अपेक्षा विश्व के भविष्य निर्माण में अपनी आहुति प्रस्तुत कर सकें।

ब्रह्म वर्चस आरण्यक के नये आश्रम में धर्मोपदेशकों एवं सृजन शिल्पियों की एक प्रखर सेना खड़ी की जा रही है, जो युग के अंधकार में अनाचार से जूझने में आत्मोत्सर्ग के आदर्श उपस्थित कर सके। ऐसे लोगों के लिए आवश्यक है कि उनके कन्धों पर परिवार निर्वाह का उत्तरदायित्व न हो। लोक मंगल के लिए धर्म क्षेत्र को अपनाने वालों की स्थिति ऐसी होनी चाहिए कि शरीर निर्वाह मात्र से उनका काम चल जाय। घर वालों को खर्चा भेजने की आवश्यकता न पड़े। आपत्ति धर्म के रूप में कभी -कभी कोई अपवाद ऐसे भी हो सकते हैं जिनमें लोक-सेवियों की घर गृहस्थी का भी भार सार्वजनिक संस्थानों को वहन करना पड़े, पर अच्छी बात यही है कि इस क्षेत्र में अविवाहित लोग अथवा पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त लोग ही प्रवेश करें। आर्थिक शुचिता का आदर्श अच्छी तरह निभा सकना उनके लिए सरल पड़ता है अन्यथा गृहस्थी के बढ़ते हुए खर्च अधिक धन की मांग करते हैं और फिर उनके लिए उचित अनुचित तरीके अपनाने पड़ते हैं। इसलिए अच्छा यही है कि धर्म सेवा के क्षेत्र में ऐसे ही लोग प्रवेश करें जिनकी आर्थिक आवश्यकताएं अपने शरीर निर्वाह तक सीमित हों।

सुयोग्य पति-पत्नी के जोड़े भी लोक-साधना के क्षेत्र में उतर सकते हैं और मिल जुल कर बहुत काम कर सकते हैं, पर यह सम्भव तभी है जब वे सन्तानोत्पादन के झंझट को सिर पर न ओढ़ें। बच्चे सदा अपनी माता को अपनी ही सेवा में जुटाये रहते हैं और बाप को भी उनके लिए अनेक साधन जुटाने में अपनी अधिकाँश व्यक्ति खर्च करनी पड़ती है। ऐसी दशा में उनके पास समय, श्रम, वृद्धि आदि का ऐसा कुछ बचता ही नहीं जिसे लोकमण्डल में लगा सकें। अस्तु सृजनशिल्पियों की नई पीढ़ी राष्ट्र को उठाने के अपने संकल्प के पीछे ऐसे ही लोगों को ढूंढ़ने और प्रशिक्षित करने का स्वप्न है। उनकी मनःस्थिति लोकेषणा-वित्तेषणा और पुत्रेषणा से बच सकने की हो और जो विशुद्ध अध्यात्म वृत्ति को अपना कर नव-युग के निर्माण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे सकें। जो लोग अपने को इस स्थिति में अनुभव करते हों, अपने में इस प्रकार की पात्रता देखते हों उन्हें भी इन पंक्तियों द्वारा आमन्त्रित किया जाता है। यदि उनके पास कुछ संचित पूँजी है तो उससे निर्वाह चलाये यदि नहीं हो तो उस स्थिति में मिशन की ओर से उनके लिए ब्राह्मण स्तर का निर्वाह जुटाने की व्यवस्था की जा सकती है। लोक-सेवी को न्यूनतम शरीर मात्रा जितने साधन समाज से प्राप्त करने का अधिकार भी है और औचित्य भी।

अगले पाँच वर्षों में ऐसे प्रखर लोक-सेवियों की एक साधु मण्डली खड़ी करने का-अपने उत्तराधिकारी परिवार के रूप में स्मृति चिन्ह छोड़ जाने का अपना मन है। अखण्ड-ज्योति परिवार बहुत बड़ा है। एक लाख से अधिक उनके परिजन हैं। इतने लोगों में से उपरोक्त स्तर से एक सौ व्यक्ति निकल सकते हैं। बुद्ध को भिक्षु, महावीर को श्रमण, गान्धी को सत्याग्रही बड़ी संख्या में मिल सके थे। हम अपने तुच्छ व्यक्तित्व को देखते हुए इतनी आशा और अपेक्षा तो कर ही सकते हैं कि एक सौ व्यक्तियों का ऐसा निजी परिवार बन सके जिसे हम लोक सेवा के क्षेत्र में अपने उत्तराधिकारी के रूप में छोड़ सकें। ब्रह्मवर्चस आरण्यक बनाने का आरम्भ करते हुए हमारे मस्तिष्क में यही सपने इन दिनों घूम रहे हैं। इसलिए यह पंक्तियाँ आह्वान आमन्त्रण के रूप में ही लिखी जा रही हैं और अपेक्षा की जा रही है कि जिनकी स्थिति जिस स्तर की होगी वे उस प्रकार के सहयोग देने के लिए अपनी तत्परता और उत्सुकता व्यक्त करेंगे।

शाखा संगठन जीवन्त बनें।

जहाँ इन दिनों शाखा संगठन चल रहे हैं, उनमें अगले दिनों अभिनव उत्साह का संचार होना चाहिए। जहाँ सच्ची लगन, प्रखर कर्मठता, भाव भरी उमंग और त्याग- बलिदान करने की उत्कण्ठा हो वह एकाकी व्यक्ति भी अपने स्थान एवं क्षेत्र में संगठन को जीवित रखे रह सकता है और गतिविधियों में प्राण फूँकता रह सकता है। निष्क्रियता की मनःस्थिति अर्धमृतक जैसी स्थिति है। उदासीनता, उपेक्षा और आलस्य मन में भरे रहें तो फिर जीवन के दृश्य कहाँ से, कैसे दिखाई पड़ सकते हैं? इन दिनों शाखा संगठनों में छाई हुई मूर्छना का एक ही कारण है कि उनमें दो-चार व्यक्ति भी प्राणवान दृष्टिगोचर नहीं होते। स्वयं सक्रिय तो होते नहीं दूसरों की नुक्ताचीनी करके अपने दोष को छिपाने की आत्म प्रवंचना करते रहते हैं। इस स्थिति के लिए कुछ करते रहने के व्रत लिये थे अब उन्हें अपनी वह प्रतिज्ञा नये सिर से स्मरण करनी चाहिए और सक्रियता के लिए आवश्यक प्रखरता जुटाने के लिए अपने आपको झकझोरना चाहिए। नव-चेतना की इस पुण्य बेला में अपने सभी सृजन-शिल्पी, सहचरों से हम इसी प्रकार की अपेक्षा कर रहे हैं।

युग-निर्माण योजना अभियान की सदस्यता के लिए अनिवार्य और प्राथमिक शर्त यह रखी गई थी कि समय और धन का न्यूनतम अंशदान दैनिक रूप से नित्य ही प्रस्तुत करते रहा जाय। यह न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा प्रतिदिन का रखा गया था। इस कसौटी पर मिशन के प्रति निष्ठा की वास्तविकता परखी जा सकती है। एक घण्टा समय ज्ञानयज्ञ के लिए नियमित रूप से लगाते रहने की बात में व्यक्ति की वास्तविकता सामने आ जाती है और जाना जा सकता है कि गहराई कितनी है। इसी प्रकार दस पैसा नित्य ज्ञानघट में डालने से ध्यान रहता है कि शरीर निर्वाह एवं परिवार पोषण की तरह समाज निर्माण का उत्तरदायित्व भी हमारे ऊपर है, जो ऐसा सोचेगा उसे दस पैसा नित्य देने में घोर निर्धनता रहते हुए भी कोई कठिनाई अनुभव न होगी। दस पैसा इन दिनों कितना कम होता है इसे हर कोई जानता है। यह एक तिहाई चाय कप की अथवा आधी रोटी की कीमत भर है। कोई दरिद्र व्यक्ति तक इतना खर्च कर सकता है। शर्त एक ही है कि लक्ष्य के प्रति निष्ठा होनी चाहिए। उसका अभाव हो तो फिर बहाने हजारों हैं। फुरसत न मिलने का -आर्थिक कठिनाई होने का बहाना बना कर युग-निर्माण अभियान की सदस्यता की शर्तों को पूरी न करने की बात इतना ही बताती है कि यह उद्देश्य के लिए निष्ठा की न्यूनता अथवा उपेक्षा रह रही है। अब नई स्फुरणा उत्पन्न होनी चाहिए और जहाँ भी संगठन जीवित हैं- आस्था और सक्रियता मिट नहीं गई है वहाँ तत्काल एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य की परम्परा चल पड़नी चाहिए और उसका बिना आलस्य-प्रमाद के अनवरत रूप से पालन होते रहना चाहिए।

जीवन का प्रमाण- सतत विकास

कहा जाता रहा है कि हममें से हर व्यक्ति एक से दस की योजना अपनाकर जन सम्पर्क बनाए और एक घण्टे का समय अपना साहित्य खरीदने में लगाया जाता रहे तो अपना घरेलू ज्ञान मन्दिर पुस्तकालय दिन दिन समृद्ध होता रह सकता है। इससे घर-परिवार के मुहल्ला-पड़ौसी के तथा सम्बन्ध परिचय के लोग लाभ उठाते रह सकते हैं। झोला पुस्तकालय योजना-विचार क्रान्ति अभियान को व्यापक बनाने के लिए जितनी समर्थ और सफल हो सकती है उसकी तुलना में और कोई प्रचार आधार खोजा नहीं जा सकता। यदि हम एक लाख व्यक्ति एक से दस तक विचार-विस्तार की योजना कार्यान्वित करने लगें और फिर उस सम्पर्क क्षेत्र में से नये कर्मठ लोक निकलने लगें तो अपने वर्तमान परिवार के इस छोटे से प्रयत्न का प्रभाव ही अत्यन्त प्रभावोत्पादक बन कर सामने आ सकता है।

शाखा संगठन को अपनी निष्क्रियता दूर करने के लिए सदस्यों के यहाँ ज्ञान-घटों की स्थापना और उनकी नियमित गतिशीलता पर पूरा ध्यान देना चाहिए। इस धन को शाखा के प्रचारात्मक क्रिया-कलापों के लिए-ज्ञान यज्ञ के लिए एकत्रित करके काम में लाया जा सकता है। जहाँ 20 ज्ञान-घट होंगे वहाँ लगभग 60) मासिक की आमदनी हो जायेगी। इतने धन से एक वार्षिकोत्सव हो सकता है। वर्ष में दो बार गुरुपूर्णिमा और गायत्री जयन्ती के स्थानीय आयोजन हो सकते हैं। सदस्यों के घरों पर उनके जन्म दिन मनाने के लिए यदि थोड़ा बहुत खर्च करना पड़े तो वह भी इसी में से पूरा हो सकता है। भविष्य में जीवित शाखाओं के वार्षिकोत्सव अनिवार्य रूप से करने चाहिएं। इसके लिए विशालकाय आयोजनों की आवश्यकता नहीं है। पाँच कुण्डी या नौ कुण्डी गायत्री यज्ञ सहित युग निर्माण सम्मेलन तीन दिन तक मितव्ययिता किन्तु सूझ-बूझ के साथ सम्पन्न किया जाय तो वह प्रायः पाँच सौ रुपये में आसानी से हो सकता है। इस अवसर पर सदस्यगण आपस में ही कुछ अधिक चन्दा कर लें तथा बाहर से भी इकट्ठा कर लें तो इतने से ही प्रचार उपकरण आसानी से खरीदे जा सकते हैं। (1) स्लाइड प्रोजेक्टर- लाउडस्पीकर, टेपरिकॉर्डर, यज्ञ उपकरण जैसी वस्तुएँ प्रायः तीन हजार के आस-पास मूल्य के यदि शाखा के पास हो तो उससे समीपवर्ती क्षेत्र में प्रचार कार्य भली प्रकार होता रह सकता है।

चल पुस्तकालय की धकेल गाड़ी बना लेने से उसके द्वारा साहित्य विक्रय तथा पढ़ाने का दुहरा प्रयोजन सिद्ध होता है। दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन एवं साइकिलों से अथवा पैदल ही तीर्थयात्रा की प्रचार टोलियाँ गाँव-गाँव में अलख जगाने जा सकती है। इसी प्रकार अन्यान्य प्रचारात्मक, रचनात्मक, सुधारात्मक कार्यक्रम चलते रह सकते हैं और धर्ममंच में लोक शिक्षण की आवश्यकता को सुचारु रूप से पूरा किया जाता रह सकता है।

जहाँ युग निर्माण शाखाएँ है वहाँ के सदस्यों को अपने घरों की महिलाओं को आगे धकेल कर महिला जागरण शाखाएँ संगठित कर देनी चाहिएं। उनके नियमित रूप से साप्ताहिक सत्संग चलने लगें तथा परिवारों में गोष्ठियों का सिलसिला बन पड़े तो समझना चाहिए, नव-निर्माण का एक नया और अति महत्वपूर्ण आधार खड़ा हो गया।

जहाँ भी शाखा संगठन हैं वहाँ इन थोड़े से कामों को तुरन्त हाथ में लिया जाना चाहिए और जहाँ भी सुस्ती फैल गई हो वहाँ नये सिरे से चेतना उत्पन्न की जानी चाहिए। धरती पर स्वर्ग के अवतरण और मनुष्य में देवत्व के उदय का स्वप्न साकार करने के लिए हमें संगठित रूप से प्रयास करने चाहिएं। इसलिए सुस्ती और काहिली का अविलम्ब अन्त करके उसके स्थान पर ज्वलन्त स्फूर्ति का वातावरण उत्पन्न करना चाहिए।

छल छद्म का उन्मूलन

इन दिनों जिस चेतना का संचार हम सब में होना चाहिए उसमें एक विशेष स्मरणीय तथ्य यह है कि भीतर और बाहर जहाँ भी छद्मवेशी अथवा प्रकट दुष्टता का सिर उठ रहा हो उसके उन्मूलन में हमारा रोष-आक्रोश जीवित रहना चाहिये। अनाचार का सहयोग समर्थन हम कदापि न करें, भले ही वह अपने निकटवर्ती अथवा संबंधी द्वारा ही क्यों न किया गया हो! दुष्टता को सहन करना उसे संरक्षण अथवा समर्थन देना प्रकारान्तर से उसका परिपोषण करने ओर बढ़ाने के समतुल्य ही निन्दनीय है। हममें से प्रत्येक को जहाँ धर्म स्थापना के लिए रचनात्मक कार्य करना है वहाँ अधर्म उन्मूलन की प्रखरता एवं तेजस्विता को भी अक्षुण्ण बनाये रहना है। यदि यह नीति न अपनाई गई तो एकांगी धर्म प्रचार मात्र निर्जीव खिलवाड़ बन कर रह जायगा उसमें शौर्य और साहस का वह पुट न रहेगा जिसके आधार पर धर्म को सशक्त और सजीव बनाये रहने की क्षमता बनी रहती है।

क्या हम सचमुच प्रेरणा पा सके?

विगत जल उपवास के माध्यम से हमने इन्हीं आवश्यकताओं अपेक्षाओं की ओर पूरे परिवार का ध्यान आकर्षित किया है। जिन्हें उससे सचमुच ही कुछ प्रेरणा मिली हो उनके लिए आवश्यक है कि इन तथ्यों की ओर भी ध्यान दें जो हमारे अन्तःकरण में इन दिनों हिलोरें से रहे हैं। हम चाहते हैं कि अखण्ड-ज्योति परिजनों में से प्रत्येक को यह उद्बोधन झकझोरे और उसे हमारे कन्धे से कन्धा मिला कर साथ देने और कदम से कदम मिला चल चलने की प्रेरणा दे। हम अपने मार्ग-दर्शक के साथ नहीं तो पीछे अवश्य चले हैं। हमारी अपेक्षा है कि परिवार के भावनाशील लोगों में इन्हीं दिनों कुछ ऐसी उमंगें उठें जिनके सहारे युग की महती आवश्यकताओं की पूर्ति में उनका कुछ करने लायक योगदान सम्भव हो सके। आवश्यक नहीं कि हर परिजन प्रत्येक विषय में सक्रिय हो, किन्तु अपनी रुचि एवं क्षमता के अनुसार हर व्यक्ति किसी न किसी धारा में कुछ उल्लेखनीय कार्य कर दिखाने के लिए कमर कस कर कार्यक्षेत्र में कूद पड़ने का साहस तो करे ही।


VigyapanSuchana

आमन्त्रण और आह्वान

उन उच्चशिक्षित, अध्ययनशील प्रबुद्ध लोगों को, जो वैज्ञानिक अध्यात्म के शोध कार्यों में हरिद्वार रह कर योगदान दे सकें।

उन उदारमना लोगों को जो ब्रह्म वर्चस् आरण्यक के निर्माण में आर्थिक सहयोग दे सकें।

उन अध्यात्म प्रेमी परिजनों को जो अपने व्यस्त समय में से दस दिन का समय निकाल कर दस दिन के साधना सत्रों में सम्मिलित हो सकें।

उन लोगों को जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व हलके हो गये हैं, जो एक महीने वानप्रस्थ सत्रों में रह कर आत्मिक प्रगति एवं लोक साधना की शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं।

उन महिलाओं को जो एक महीने का प्रशिक्षण प्राप्त कर अपने क्षेत्र में महिला जागरण की ज्योति जला सकने की इच्छुक हैं।

उन परिवार निवृत्त लोगों को, जो ब्रह्मवर्चस् आरण्यक के दिव्य वातावरण में रह कर शेष जीवन बिताना चाहते हैं।

उनके कर्मठ परिजनों को जो अपने क्षेत्र में शाखा संगठन चलाते हैं और उसमें जीवन संचार के लिए कुछ करने के इच्छुक हैं।

उन परिजनों में से प्रत्येक को, जो अपनी सद्भावना शुभेच्छा सहकारिता एवं परामर्श से हमें किसी प्रकार प्रोत्साहन देने के इच्छुक हैं।


ध्यान योग और उसकी पृष्ठभूमि

मानवी सत्ता को सुविस्तृत भूखण्ड की तरह समझा जा सकता है। इस धरती पर बहुत कुछ खोजने योग्य, जानने योग्य और पाने योग्य है। उस शोध प्रयास में जिसने जितना प्रयास किया है उसने उतना ही वैभव एवं वर्चस्व प्राप्त किया है। खनिज सम्पदा, वनस्पति सम्पदा वैज्ञानिक उपलब्धियाँ शोध प्रयासों के ही सत्परिणाम हैं। समुद्र किसी समय एक निरर्थक व्यवधान मात्र था। उसकी खोजें हुईं तो उस क्षेत्र से भी बहुत कुछ खोज निकाला गया। अन्तरिक्षीय खोज-बीन ने उस शून्य निस्तब्ध समझे जाने वाले क्षेत्र को शक्तियों और उपलब्धियों का केन्द्र सिद्ध किया है। आतुरतापूर्वक उसकी खोज में प्रचुर धनराशि इसीलिए बोई जा रही है कि इस खेत में जो बोया जा रहा है वह असंख्य गुना लाभ प्रस्तुत करेगा।

स्थूल जगत के थल, जल और नभ क्षेत्र में जो कुछ वैभव भरा पड़ा है। उससे असंख्य गुना वर्चस्व सूक्ष्म जगत में विद्यमान है। पर यह सूक्ष्म जगत इतना व्यापक है कि समूचा ब्रह्माण्ड उसकी परिधि में आता है। इतने विस्तृत क्षेत्र की खोज कैसे की जाय? इस प्रश्न का उत्तर हमें पिण्ड सत्ता में सन्निहित सूक्ष्म की खोज-बीन करने के रूप में तत्वदर्शियों ने दिया है। सौरमण्डल गतिविधियों का समूचा परिचय एक अणु का समग्र विश्लेषण करके प्राप्त किया जा सकता है। सूर्य बड़ा और अणु आकार में छोटा है, पर इससे क्या, एक ही क्रम व्यवस्था दोनों के भीतर समान रूप से काम कर रही है। अस्तु अणु विज्ञान की आरम्भिक स्थिति से उठ कर जब कभी हम उसका उच्चस्तरीय ज्ञान प्राप्त कर सकेंगे तो सूर्य-विज्ञान के सभी सूत्र अनायास ही करतलगत हो जायेंगे। परमाणु एक सौर मण्डल है और उसका ‘नाभिक’ सूर्य की तरह अपना प्रभाव विस्तार करता है।

अपने भीतर क्या है? यह देखने, खोजने के लिए अन्तर्मुखी होना पड़ता है। समुद्र तल में बिखरे-मोती समेटने के लिए गहरे पानी में उतरने की-गोताखोर स्तर की प्रवीणता प्राप्त करनी पड़ती है। इन्द्रियों की बनावट कुछ विचित्र है उनके छेद बाहर की ओर हैं इसलिए बहिरंग को ही देख पाती है और बिखरी हुई पदार्थ सम्पदा के सान्निध्य से जो रसानुभूति होती है उसी का लाभ ले पाती है। अन्तः क्षेत्र में जो अपार वर्चस्व भरा पड़ा है उसे जानने-खोजने के लिए न तो इन्द्रिय शक्ति काम देती है और न मस्तिष्क ही कुछ पुरुषार्थ दिखा पाता है। शरीर के भीतर क्या हो रहा है उसकी रक्त संचार प्रक्रिया, पाचन पद्धति, रोग विकृति, मस्तिष्कीय गतिविधि तक को हम जान नहीं पाते। अपनी शारीरिक स्थिति का पता लगाने के लिए ‘पैथालॉजी’ विशेषज्ञ से खोज-बीन कराते हैं।

मानसिक रुग्णता का पता लगाने के लिए ‘न्यूरोलॉजिस्ट’ का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। भावनात्मक और चारित्रिक विश्लेषण के लिए आत्मवेत्ता गुरुजनों के सामने अपना जी खोलकर रखना पड़ता है। यदि सामान्य साधनों से अपनी भीतरी सूक्ष्म स्थिति की जाँच करना सम्भव रहा होता तो गुत्थियों को समझने और सुलझाने में हम सहज ही सफल हो सकते थे। पर ईश्वर की लीला कितनी विचित्र है। उसने न केवल अपना विशाल ब्रह्माण्ड वरन् हमारे हिस्से का ‘पिण्ड’ भी रहस्य भरे गोरखधन्धों से जकड़ दिया है। पहेलियाँ सुलझाने जैसी परख प्रक्रिया हमारे सामने रच कर खड़ी कर दी है। ताकि अपनी बुद्धिमत्ता का परिचय देकर अविज्ञात को जानें और अनुपलब्ध को उपलब्ध करें।

योग साधना में ‘ध्यान’ का महत्व सर्वोपरि है। विश्व के कोने-कोने में प्रचलित अनेकानेक साधना-विधानों की ध्यान प्रक्रिया अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। उसके बिना आत्मिक प्रगति का एक चरण भी आगे नहीं बढ़ता। ध्यान के आधार और प्रकरण तो अनेक हैं, पर उसका मूल स्वरूप एक ही है कि हम अपनी बहिर्मुखी प्रवृत्ति को समेटने और अन्तर्मुखी बनाने का प्रयास करें। भीतर देखें और अन्तरंग को खोजें। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए विभिन्न स्तर की ध्यान-साधनाएँ विनिर्मित की गई हैं। नादयोग, बिन्दुयोग, लययोग यह तीनों ही ध्यान प्रधान हैं और उनमें अपनी मस्तिष्कीय चेतना को श्रद्धासिक्त बना कर अन्तरंग खोजने के लिए अन्तरंग में उतरना पड़ता है।

भक्तियोग का इतना ही लाभ है कि उसमें स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म को जानने, समझने का अवसर मिलता है और यह अनुभूति होती है कि प्रकृति, पदार्थों और प्राणधारियों से आगे भी कोई सूक्ष्म-लोक है और उसमें निवास करने वाली दिव्यसत्ताएँ व्यवहार सम्पर्क में आने वाले ज्ञात साधनों की अपेक्षा अधिक सामर्थ्यवान तथा अधिक उपयोगी हैं। स्थूल की तुलना से सूक्ष्म की गरिमा समझ ली जाए तो यह भी एक बहुत बड़ी बात है। इतने में भी आत्मिक प्रगति का एक अध्याय हृदयंगम करने का अवसर मिलता है। पर बात तो और भी आगे चलने की है। खोजना तो अन्तर को है। क्योंकि शक्तियों के स्रोत विराट् का निकटतम केन्द्रबिन्दु आत्मचेतना में ही सन्निहित है। ईश्वर समेत प्रत्यक्ष या परोक्ष लोक की दिव्यसत्ताओं का अवतरण प्रखर व्यक्तियों के अतिरिक्त अन्य कहीं भी नहीं हो सकता। आत्म-निर्माण के बिना आत्मिक प्रगति की गाड़ी एक कदम भी आगे नहीं बढ़ती।

फूल खिलता है तो उसकी विरुदावली गाने के लिए भौंरे आते हैं- मधुमक्खियाँ अनुदान पाने के लिए मनुहार करती हैं- तितलियाँ शृंगार सजाने आती हैं। हर कोई उसे ललचाई आँखें से देखता है। मुंदी कली पर इसमें से किसी की कृपा नहीं होती। जब फूल सूख जाता है तो भी इन प्रशंसा करने वाले और मित्रता दिखाने वालों में से हर कोई मुँह मोड़ लेता है। व्यक्तित्व की आन्तरिक गरिमा ही वह धुरी है जिसके इर्द-गिर्द भौतिक सफलताओं और दिव्य अनुदानों का प्रगतिचक्र परिभ्रमण करता रहता है गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए विवश करना भागीरथ जैसे तपस्वी के लिए ही सम्भव हो सकता है। ऐसे ही लोगों को समर्थ शक्तियों का सहयोग मिलता है। गंगावतरण के समय स्वर्ग से धरती पर गिरने के समय धरती में छेद हो जाने की कठिनाई का हल निकालने के लिए शिवजी ने अपनी जटाएँ फैला देने का सहयोग किया था। इस आयोजित सहयोग को भागीरथ की प्रखरता ही घसीट कर लाई थी। समुद्र पीकर अण्डे वापिस दिलाने का सहयोग महर्षि अगस्त्य ने अयाचित रूप से दिया था। इसके लिए वे टिटहरी के प्रबल पुरुषार्थ से प्रभावित होकर ही आगे आये थे। ऐसी पौराणिक एवं ऐतिहासिक गाथाओं के अगणित उदाहरण भूतकाल पर दृष्टि डालते ही सामने आ खड़े होते हैं। वर्तमान में भी हम अपने आस-पास नजर दौड़ाएं तो इन प्रत्यक्ष को प्रमाणों समेत आसानी से चरितार्थ होते हुए देख सकते हैं। आध्यात्मिक उपलब्धियों के सम्बन्ध में भी यही तथ्य है कि साधक की आन्तरिक उत्कृष्टता जिस प्रकार निखरती जाती है उसी अनुपात से ऋद्धि-सिद्धियों की वर्षा दिव्य-लोकों से होने लगती है। ओछे,दुष्ट और स्वार्थी प्रकृति के मनुष्य देवी-देवताओं की मनुहार और मन्त्र-तन्त्रों के चित्र-विचित्र कला कौतुक करने पर भी पूरी तरह खाली हाथ रहते हैं। दिव्य-शक्तियाँ कर्मकाण्डों को नहीं, साधक के स्तर को देखती हैं और कुछ देखने की उन्हें फुरसत ही नहीं होती।

यह तथ्य जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है कि आत्म परिष्कार ही वह दूरदर्शिता भरा पुरुषार्थ है जिसके आधार पर भौतिक और आत्मिक प्रगति का उभय-पक्षीय द्वार खुलता है। इस एक ही अभाव के बने रहने पर सर्वत्र गुड़-गोबर होता रहता है।

आत्मिक प्रगति की दिशा में प्रथम चरण बढ़ाते हुए हमें अन्तर्मुखी बनना पड़ता है। कुछ समय के लिए बाहर की ओर से आँखें बन्द करके भीतर क्या है? यह देखना समझाना पड़ता है। ध्यान इसी प्रक्रिया का नाम है। उसका एकमात्र प्रयोजन भीतरी सत्ता को-उसके वैभव को समझना है। साथ ही वह परखना भी है कि इस क्षेत्र में भरी हुई विकृतियों के दलदल में प्रगति का रथ कैसी बुरी तरह फँसा और रुका पड़ा है। आन्तरिक दोष दुर्गुण ही बाह्य जीवन में शोक-सन्ताप बन कर प्रतिफलित होते हैं।

बोल -चाल की भाषा में किसी भूली हुई बात या खोई हुई वस्तु का स्मरण करने की मानसिक प्रक्रिया को ध्यान करना कहते हैं। अध्यात्म दर्शन में भी यही तथ्य सामने आता है हम अपने को अपने वर्चस्व को-लक्ष्य को पूरी तरह भूल बैठे हैं। मेले में ललचाई आँखों से भटकने वाले बच्चों जैसी हमारी मनोदशा है। न अभिभावकों का पता है न गन्तव्य स्थान का। भटकाव ने कुछ ऐसा जादू डाला है कि मेले की चमक-दमक ही सब कुछ दीखती है। ईश्वर ने मनुष्य जीवन जैसी अपनी बहुमूल्य कलाकृति जीवात्मा को निष्प्रयोजन नहीं सौंपी है। जो अन्य प्राणियों को नहीं दिया जा सका वह मनुष्य को मिला। इसमें पक्षपात नहीं वरन् विशिष्ट उद्देश्य सन्निहित है। अनुदान के साथ उत्तरदायित्व भी कन्धे पर आया है। यह बात एक प्रकार से हम भूल ही गये हैं और मौज-मजा लूटने के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। ध्यानयोग का तात्पर्य अपने मूलस्वरूप को-अपने कण-कण में समाये हुए प्रसुप्त वैभव को- लक्ष्य को समझने के लिए अन्तःक्षेत्र में प्रवेश करना है।

‘आत्मबोध’ जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। भगवान बुद्ध का जिस वट वृक्ष के नीचे ‘आत्मबोध’ हुआ उसे भी सौभाग्यवान माना गया और उसकी टहनियाँ भक्तजनों ने अपने-अपने देशों में ले जाकर उगाईं और उन बोधिवृक्षों को देव तुल्य मानकर पूजा संस्थान के रूप में प्रतिष्ठित किया। ब्रह्मविद्या में आत्मज्ञान की महिमा का सर्वोपरि बखान है। ‘आत्मावारे ज्ञातव्य।’ श्रुति वचन में मनुष्य को आत्मसत्ता के सम्बन्ध में अधिकाधिक जानने का निर्देश किया गया है। जानने के बाद ही उपयोग की बात बनती है। ध्यानयोग में अन्तर्मुखी होकर अपने सम्बन्ध में अधिक जानने, देखने, समझने का प्रयास किया जाता है। इसी उद्देश्य के लिए अनेक प्रकार के शब्द, रूप, रस, ग्रन्थ, स्पर्श के माध्यम से चेतना पर छाप-छोड़ने वाले ध्यानों का विधि-विधान तत्वदर्शियों ने बनाया है।

प्रत्यक्ष से- भौतिक से कुछ समय तक चित्त को पूरी तरह हटा लिया जाय और उतनी अवधि तक परोक्ष से अभौतिक से रिश्ता जोड़ लिया जाय तो समझना चाहिए कि ध्यान का उद्देश्य समझ लिया गया है। हम निरन्तर लोभ और मोह के जंजाल में जकड़े रहते हैं। भगवान का भजन पूजन करते हैं तो उसके फलस्वरूप धन वैभव की लिप्सा पूरी करने की ही ललक संजोये रहते हैं। आत्मा की बात तो कभी सूझ ही नहीं पड़ती। बहुत हुआ तो पूजा पत्री की थोड़ी सी टन्ट-घन्ट को ही लोक-परलोक सुधारने का अमोघ अस्त्र मान लिया। आत्मा की इस प्रकार तृष्णा वासना ही दलदल में फँसी हुई दुर्गति दयनीय ही कही जा सकती है। इससे छुटकारे के लिए उपाय सोचने एवं योजना बनाने की तैयारी ही ध्यान-धारणा की आधारशिला कही जा सकती है।

छान्दोग्य उपनिषद् में महर्षि सनत्कुमार नारद से कहते हैं-

‘येऽल्या क्लहिनः पिशुना उपवा दिनस्तेऽथ ये प्रभवो ध्याना पदांशा इवैव ते भवन्ति।’

अर्थात्- नीच प्रकृति के लोग कलह, बकवास, निन्दा और चुगली में अपनी सामर्थ्य का अपव्यय करते रहते हैं। किन्तु विवेकवान लोग ध्यान को अपनाकर लाभ उठाते हैं। अतः हे नारद! तुम ध्यान की उपासना में लग जाओ-

‘ध्यानमुपास्विति।’

ध्यान में दो वर्ग हैं-एक आत्मशोधन। दूसरा प्रभु समर्पण। आत्मशोधन में अपने आपको शरीर से, प्रवृत्तियों से ऊपर साथी, दृष्टा माना जाता है। आत्म-निरीक्षण आत्मचिन्तन आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास की सुनियोजित रीति-नीति का निर्धारण ध्यानयोग का एक महत्वपूर्ण विषय है।

‘रागोपहन्तिर्ध्यानम्।’

रागों का निराकरण ही ध्यान है। अपने को दोष दुर्गुणों से रहित मानना तथा उस पवित्र और उत्कृष्ट स्तर के अनुरूप बनने के प्रबल प्रयास हेतु प्रचण्ड संकल्प उभारना ध्यानयोग के ही अन्तर्गत आता है।

‘ध्यानम् निर्विषयं मनः।’ (साँख्य दर्शन)

मन का विषय, विकारों से रहित होना ही ध्यान है।

ध्यान का दूसरा वर्ग है- प्रभु परायणता।

‘रुयो ध्यान ब्रह्मत्युपास्ते, यावद् ध्यानस्य गतं तत्रास्य यथा कामाचारो भवति, यो ध्यानं ब्रह्मेत्युपास्तेऽस्ति।

-छांदोग्योपनिषद्

अर्थात्- जो यह मानकर उपासना करता है कि ‘ध्यान ही ब्रह्म है,’ उसके ध्यान की गति ब्रह्म जैसी ही विस्तृत हो जाती है।

इष्ट की तादात्म्यता आत्मा की पवित्रता और सूक्ष्मता को विकसित करते हुए उसे ब्रह्म-स्तर तक ही पहुँचा देती है।

प्रभु-परायणता-याने ईश्वर को आत्मसमर्पण। जीव और ब्रह्म की सत्ता का सान्निध्य एवं एकीकरण।

भगवान के किसी रूप का ध्यान करते हुए उससे अपनी सघन आत्मीयता का आरोपण साकार ध्यान-साधना कहा जाता है।

निराकार ध्यान साधना में सविता-देवता का -ज्योति पुँज का ध्यान किया जाता है। निराकारवादी साधना सम्प्रदाय, प्रकाश के ध्यान का निर्देश करते हैं। योग शास्त्र के नाटक एवं बिन्दुयोग के सुविस्तृत विधान इसी आधार पर बने हैं उपनिषदों में विशेष रूप से प्रकाश ध्यान पर ही जोर दिया है-

“युजानं प्रथमं मनस्तत्वाम सविता धियः। अग्ने ज्योतिर्निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत।”

अर्थात्- मन एवं प्राण को सविता-देवता की ज्योति में लगावे। अग्नि की ज्योति का अवलोकन करें। उसे सूक्ष्म शरीर के क्षेत्र में स्थापित करे।

बाइबिल ने परमेश्वर को ‘ज्योति’ माना है। गुरुग्रन्थ साहिब में उसे ‘चाँदना’ कहा है। हजरत मूसा को कोहेनूर पर ‘जलवा’ दिखाई दिया था। उपनिषद् उसे ही परम ज्योति कहते हैं। अध्यात्म-शास्त्र में इसे ही दिव्य आलोक, ‘डिवाइन लाइट’ कहा जाता है। सूर्य को इसी परमतेजस् की प्रतीक प्रतिमा माना जाता है।

भ्रूमध्य भाग में अवस्थित आज्ञाचक्र में प्रकाश- ज्योति की स्थापना आन्तरिक ध्यान है। बहिरंग ध्यान-धारणा में आकाशस्थ सूर्य की नेत्र बन्द करके धारणा की जाती है और यह भावना की जाती है कि भगवान सविता देवता की दिव्य किरणें शरीर और मन में सभी स्थानों में गहराई तक प्रवेश कर अक्षयतेज-ब्रह्मवर्चस् के द्वारा सम्पूर्ण व्यक्तित्व को परम तेजस्वी बना रही हैं।

भ्रूमध्य भाग में आज्ञाचक्र अवस्थित है। यही तीसरा नेत्र अथवा दिव्य नेत्र कहलाता है। शरीर-शास्त्रीय शब्दावली में इसे पिट्यूटरी ग्रन्थि कहते हैं। इसकी संरचना नेत्र के ही सूक्ष्म रूप की तरह है।

सूक्ष्म शरीर की दृष्टि से तो यह केन्द्र दिव्य नेत्र ही है। क्ष-किरणों द्वारा शरीर की भीतरी टूट-फूट अथवा किसी सन्दूक में सुरक्षित गहनों का चित्र खींचा जा सकता है। यह सूक्ष्म शरीरस्थ दिव्य नेत्र प्रदीप्त हो उठे, तो वे हलचलें दिखाई पड़ सकती हैं, जो गतिमान तो हैं, पर स्थूल दृष्टि से अदृश्य है। इन दिव्य नेत्रों में प्रचण्ड तेजस् भी होता है। शंकर द्वारा इन्हीं के द्वारा कामदेव को भस्मसात् कर देने की पुराण कथा प्रसिद्ध है। प्रदीप्त दिव्य नेत्रों द्वारा अपने मनोविकारों को उन्नति पथ के अवरोधों को उसी तरह भस्मीभूत किया जा सकता है। यह वस्तुतः विवेक एवं दूरदृष्टि का जागरण है। जहाँ यह सूक्ष्म, पैनी प्रखर और सशक्त अन्तर्दृष्टि जग पाये, तो सहज ही लोभ, मोह, वासना, तृष्णा अहंता जैसे मनोविकार और इनसे उत्पन्न नानाविधि शोक-सन्ताप, विप्लव-विक्षोभ, शमिति शिथिल किए जा सकते हैं।

बिन्दुयोग की साधना इस तृतीय नेत्र को प्रदीप्त करने की विधि है। इसमें साधक अपने हृदय, फुफ्फुस, आँतें, आमाशय, वृक्क आदि अंगों-प्रत्यंगों तथा मस्तिष्क में एक प्रखर ज्योति को प्रज्वलित अनुभव करता है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार सभी इस ज्योति से जगमगा रहे हैं। सत्ता का एक-एक अणु भ्रूमध्य केन्द्र से निकलने वाले प्रखर प्रकाश के दिव्य प्रवाह से आलोकित है और आलस्य, जड़ता, प्रमाद, अन्धकार इस अरुणोदय से दूर भाग गया है। अदम्य स्फूर्ति, अविकल उल्लास उद्याम सक्रियता तथा उत्कृष्ट आह्लाद से सम्पूर्ण सत्ता समुद्र भासित हो उठी है। उससे चेतना के प्रसुप्त केंद्रों में भी गति आ गई है और कतिपय दिव्य हलचलें उभर रही हैं।


पंच तन्मात्राओं की साधनायें तथा सिद्धियाँ

ध्यान का सर्वविदित प्रयोग ‘रूप’ परक है। पंचतत्वों में अग्नि प्रचण्ड और प्रमुख है। अग्नि तत्व की तन्मात्रा ‘रूप’ है। दृश्य उसी से बनते हैं। ‘रूप’ को आधार मान कर ध्यान करने की प्रक्रिया सरल है। नेत्र इन्द्रिय ज्ञान सम्पादन का अति संवेदनशील माध्यम है। इससे बढ़कर मस्तिष्क को प्रभावित करने की क्षमता अन्य किसी इन्द्रिय में नहीं है। इसी से ‘रूप’ को लौकिक जीवन में अत्यधिक महत्व मिला है। इसी के आधार पर पदार्थों और प्राणियों के बीच अन्तर करना सम्भव होता है। आत्मिक प्रगति के लिए की जाने वाली साधनाओं में भी ‘रूप’ को ही प्राथमिकता मिली है। दर्शन झाँकी के लिए धार्मिकजनों का कितना समय, श्रम और धन व्यय होता है, इसे सभी जानते हैं। देवालयों, तीर्थों, स्मारकों, सन्तों को देखने के लिए तीर्थयात्रियों के-पर्यटकों के झुण्ड प्रायः परिभ्रमण करते रहते हैं।

ध्यान में साकार और निराकार की दोनों ही पद्धति रूप परक हैं। साकार उपासना में इष्टदेव का और निराकार में प्रकाश का ध्यान किया जाता है। यह दोनों ही ‘रूप’ वर्ग में आते हैं। इतने पर भी यह नहीं समझ लेना चाहिए कि ध्यान केवल ‘रूप’ के माध्यम से ही हो सकता है। उसके लिए अन्य तन्मात्राएँ भी काम में लाई जा सकती हैं। रस, गन्ध और स्पर्श का प्रचलन कम और शब्द का व्यवहार अधिक होता है, तो भी ध्यान की सम्भावना सभी पाँच तत्वों को पाँचों तन्मात्राओं के आधार पर सम्भव होती है। पाँच तत्वों में से प्रत्येक की एक ‘तन्मात्रा’ है। अग्नि का रूप, जल का रस, वायु का स्पर्श, आकाश का शब्द और पृथ्वी की गन्ध है। अग्नि के बाद आकाश तत्व ही अधिक व्यापक और अधिक सशक्त है इसलिए उसकी तन्मात्रा ‘शब्द’ को साधना क्षेत्र में रूप के पश्चात् अधिकतर प्रयुक्त किया जाता है।

स्वरयोग, नादयोग, शब्दयोग इसी तन्मात्रा के अन्तर्गत आते हैं। पाठ, स्तवन, जप, कथा, प्रवचन, कीर्तन जैसे साधना उपक्रम ‘शब्द’ साधना कहे जा सकते हैं। नादयोग इन सब में अधिक गूढ और अधिक रहस्यमय है। नेत्रों के बाद दूसरी विशिष्ट संवेदनशील इन्द्रिय ‘कान’ है। बहरे मनुष्य गूँगे भी होते हैं। कारण है कि कान द्वारा शब्द ग्रहण करके मस्तिष्क तक न पहुँचा सकने की कठिनाई के कारण उच्चारण के ज्ञान तन्तुओं को प्रेरणा मिल ही नहीं पाती और वे बोलने में असमर्थ ही बने रहते हैं। ज्ञान सम्पादन नेत्रों के पश्चात कान से ही सम्भव होता है। समझा बुझा कर रास्ते पर लाने का कार्य प्रधानतया शब्द शक्ति से ही सम्भव होता है। रेडियो प्रसारणों को इसी दृष्टि से अत्यधिक महत्व मिल रहा है।

कर्णेंद्रिय की सूक्ष्म परतें दिव्य-लोकों के सन्देशों को उसी प्रकार सुन सकती हैं जिस प्रकार नेत्र गोलकों के मध्य में अवस्थित उसके केन्द्रीय उद्गम स्रोत-आज्ञा चक्र के माध्यम से ‘दिव्य-दर्शन’ सम्भव होता है। नाद योग के माध्यम से ‘दिव्य ध्वनियाँ’ सुनी जाती हैं और उस क्षमता के विकसित होने पर शरीर और मन की हलचलों का विवरण बताने वाले संकेत सुने जा सकते हैं। अपनी स्थिति को अधिक अच्छी तरह समझा जा सकता है। इतना ही नहीं दिव्य लोकों में जो अति महत्वपूर्ण शब्द संवादों का प्रवाह चल रहा है उसे सुनने की कला विदित हो जाने पर वह सब समझा जा सकता है जो सर्वसाधारण के लिए सर्वथा अविज्ञात है। कूटनीतियों की-गुप्तचर की साँकेतिक भाषा होती है और वे एक दूसरे तक अपनी बाते इस प्रकार पहुँचाते हैं कि किसी को गोपनीयता का पता न चलने पाये। दिव्य लोकों के भी ऐसे ही संकेत हैं। वे शब्द तरंगों के आधार पर सूक्ष्म जगत में हमारे इर्द-गिर्द ही भ्रमण करते हैं, पर रहस्यों की जानकारी न होने से हम उससे सर्वथा अपरिचित ही बने रहते हैं। नादयोग के अभ्यास से उस रहस्य पर से पर्दा उठता है और साधक का उतना सुनना समझना संभव होता है जो सामान्य मनुष्यों के लिए शक्य नहीं है।

नादयोग की साधना का शास्त्रीय योगाभ्यास प्रक्रिया में महत्वपूर्ण स्थान है। मध्यकालीन सन्त परम्परा में उसे और भी अधिक प्रधानता मिली है। नाथ सम्प्रदाय कबीर सम्प्रदाय, राधास्वामी मत, दादू मत आदि की साधनाओं के शब्द सुरत के नाम से नाद समाधि की सुविस्तृत फल श्रुति है। विज्ञान ने विश्वव्यापी शब्द शक्ति का मूल्याँकन किया है और उसके माध्यम से भौतिक एवं आत्मिक प्रगति की सम्भावनाओं का प्रतिपादन किया है।

मोटेतौर से ‘ध्वनि’ का तात्पर्य उस मोटे शब्द प्रवाह से लिया जाता है जो कानों से सुना जा सके, पर वैज्ञानिक पकड़ इससे कहीं आगे निकल गई है। यह बात भली प्रकार समझ ली गई है कि मनुष्य के कान बहुत ही भोंड़े हैं वे बहुत थोड़ी ध्वनियाँ सुन सकते हैं। उनसे अधिक तो कहीं कीड़े मकोड़ों और पशु-पक्षियों की श्रवण शक्ति अधिक तीव्र होती है। और वे अन्तरिक्ष में बहने वाली अधिक सूक्ष्म ध्वनियों को सुन सकते हैं, और इस अर्थ से मनुष्य की अपेक्षा कहीं अधिक समर्थ सिद्ध होते हैं।

संसार की मूल-सत्ता और स्थिति को पिछले दिनों विद्युत प्रवाह के रूप में समझा गया था अब उसे एक कदम और आगे बढ़ कर ‘ध्वनि’ प्रवाह की संज्ञा दी जाने लगी है। ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को समझने में अब उसका प्रकाश स्वरूप अपर्याप्त समझा जाने लगा है और प्रकाश की आत्मा को ध्वनि संज्ञा दी गयी है। ‘लेसर’ किरणें कुछ समय पूर्व तक प्रकाश किरणों में गिनी जाती थीं, पर अब उन्हें ‘शब्द’ वर्ग की स्वीकार किया गया है और ताप से भी अधिक शब्द की सामर्थ्य को आँका गया है।

कर्णातीत-अश्रव्य ध्वनियाँ- जानकारी देने की दृष्टि से भले ही महत्वहीन हों, पर उनका वैज्ञानिक महत्व अत्यधिक है। क्योंकि सामर्थ्य की दृष्टि से वे कानों से सुनी जा सकने वाली ध्वनियों की अपेक्षा कहीं अधिक शक्तिशाली होती है। अस्तु उनका प्रयोग कितने ही ऐसे कामों में किया जा सकता है जो सामान्य उपायों से पूरे नहीं हो पाते।

‘एचीव्स आफ फिजिकल मेडिसन एण्डरिहैबिलेशन’ में ऐसे वैज्ञानिक परीक्षणों के कितने ही विवरण छपे हैं जिनमें स्नायु-मण्डल की विकृतियों से कष्ट पाने वाले कितने ही रोगियों के उपचार अश्रव्य ध्वनियों के सहारे किये गये और वे औषधि उपचार एवं शल्यक्रिया की अपेक्षा कहीं अधिक सफल रहे।

न्यूयार्क के ‘माउण्ट सिनाई हास्पिटल में श्रवणातीत ध्वनियों का प्रयोग शल्यक्रिया की अपेक्षा अधिक सरल और सफल प्रमाणित हुआ है। पेरिस से ‘सालपेट्र हास्पिटल में श्रवणातीत ध्वनियों के आधार पर की गई चिकित्सा में अन्य उपचारों की तुलना में अधिक अच्छे परिणाम सामने आये हैं। संसार के अनेक महत्वपूर्ण शोध -संस्थानों में यह परीक्षण चल रहे हैं कि अश्रव्य ध्वनियों को चिकित्सा उपचार का महत्वपूर्ण अंग बनाने की पद्धति का सांगोपांग विकास कैसे किया गया?

विश्व-ब्रह्माण्ड में प्रवाहित सूक्ष्म ध्वनि तरंगों की जानकारी अब अपेक्षाकृत अधिक गहराई तक समझी जाने लगी है और उनके कई प्रकार के प्रयोग-उपयोग कार्यरूप में परिणत हो रहे हैं। यदि हम अपनी कर्णेंद्रिय सामर्थ्य को विकसित कर सकें तो बहुमूल्य यन्त्रों द्वारा इन श्रवणातीत ध्वनियों का ग्रहण प्रसारण किया जाता है उसी प्रकार अपने अति समर्थ तन्त्र से भी वैसे ही प्रयोजन पूरे किये जा सकते हैं तब भौतिक जगत के सूक्ष्म क्षेत्र पर अपना असाधारण अधिकार हो सकता है और जितनी सामर्थ्य इन दिनों हाथ में है उसकी तुलना में असंख्य गुनी शक्ति हाथ में आ सकती है। तब कान मात्र सुनने का प्रयोजन ही पूरा न करेंगे वह सूक्ष्म ध्वनियों को पकड़ने और उन्हें विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त करने में भी समर्थ बन जाएंगे।

नादयोग इसी विज्ञान का नाम है। उसके आधार पर श्रवणजीत ध्वनियों के अधिग्रहण का अभ्यास किया जाता है। सृष्टि के अन्तराल में असंख्य हलचलें ध्वनि के रूप में प्रवाहित हो रही हैं। ऊर्जा तरंगें ईथर से टकराती हुई आगे बढ़ती हैं और अपनी प्रतिक्रिया ध्वनि रूप में छोड़ती हैं। हवाई जहाज उड़ता है और अपनी गति दिशा तथा सत्ता का परिचय ध्वनि में बखेरता चलता है। ठीक इसी प्रकार प्रत्येक ऊर्जा कम्पन अपनी प्रतिक्रिया ध्वनि रूप में बखेरता है। इन्हें समझ सकना सम्भव हो तो प्रकृति की हाँडी में क्या पक रहा है, उसे ढक्कन खोल कर आसानी से जाना, समझा जा सकता है।

शरीर को शिथिल करके शांतचित्त से एकान्त स्थान में बैठक कर कानों के छेद तर्जनी अथवा अनामिका उँगलियों से बन्द कर लिये जाते हैं। इससे वायुमण्डल में सामान्य शब्दों का सुनाई देना बन्द हो जाता है। इस स्थिति में श्रवणातीत ध्वनियों में से कुछ का कुछ सुनाई पड़ना आरम्भ हो जाता है। प्रायः कई प्रकार के बाजों से मिलती-जुलती ध्वनियाँ नादयोग के साधकों को सुनाई पड़ती हैं। शंख, घड़ियाल, मृदंग, नफीरी, तुरही, ढोल, मजीरा बजने जैसी मिश्रित अथवा पृथक-पृथक प्रकार की आवाजें कान में पहुँचने का आभास होता है। बादल गरजने, झरने गिरने, आंधी तूफान आदि जैसी तीव्र और कर्कश, घुंघरू बजने पैरों के थिरकने की नृत्य जैसे मन्द और मधुर ध्वनि प्रवाह भी सुने जाते हैं।

इन शब्दों पर अधिक ध्यान देने से चित्त एकाग्र होता है और अधिक दत्त-चित्त होने के कारण ध्वनियाँ अधिक स्पष्ट एवं अधिक देर तक चलती रहने वाली प्रतीत होती हैं जब कि उथले और अस्थिर मन से सुनने पर वे आधी अधूरी अस्पष्ट और बार-बार उलटती बदलती रहती हैं।

शरीर विज्ञानियों का कथन है कि नाड़ियों में बहने वाला रक्त प्रवाह फेफड़ों से साँस का आवागमन, हृदय की धड़कन, माँस पेशियों का आकुंचन-प्रकुंचन आदि से उत्पन्न होने वाले घर्षण से जो आवाजें अन्तरंग क्षेत्र में उत्पन्न होती रहती हैं वे ही नादयोग के साधकों को बढ़े-चढ़े रूप से सुनाई पड़ती हैं और बाजे बजने जैसा आभास होता है। प्रकृति वेत्ताओं का कथन है- आकाश में बहने वाली हवा, पेड़-पत्तों तथा विभिन्न पदार्थों से टकरा कर तरह-तरह की आवाजें उत्पन्न करती है। तेज हवा चलने पर छेद वाली बाँसों के झुरमुट से वंशी या सीटी बजने जैसे ध्वनियाँ पड़ती हैं। नदियों की लहरें कल−कल ध्वनि उत्पन्न करती हैं। इन्हीं सब का दूरवर्ती मन्द प्रवाह नादयोग की साधना में अधिक स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ने लगता है।

मस्तिष्क अपने आप में अगणित हलचलों का केन्द्र है। उसमें वायु का आवागमन भी रहता है। हलचलें किसी भी स्तर की हों। वायुमण्डल के सम्पर्क से ध्वनि तरंगें उत्पन्न करती हैं। मस्तिष्क संस्थान भी अपनी गतिविधियों के कारण जो शब्द उत्पन्न करता है उन्हें नादयोग के उपक्रम से सुना जाना सम्भव है।

इसके ऊपर सूक्ष्म जगत में तथा लोकान्तरों में होने वाली हलचलों का नम्बर आता है। यदि कर्णेन्द्रिय की क्षमता विकसित कर ली जाय, तो उन्हें भी पकड़ा जा सकता है।

कौन ध्वनि किस क्षेत्र से आ रही है और वह किस परिस्थिति का कितना- किस प्रकार परिचय दे रही है यह जटिल विज्ञान है। उसके लिए साधक की शारीरिक मानसिक क्षमता अधिक संवेदनशील होनी चाहिए। शब्दकोष जैसे ध्वनि अर्थ तो नहीं निकलते पर ध्वनि के साथ जुड़ी हुई संवेदना को आत्म-चेतना द्वारा समझा जा सकता है। यह ध्वनियाँ भूतकाल के किसी घटनाक्रम की वर्तमान हलचलों की तथा भावी संभावनाओं से सम्बन्धित हो सकती हैं उनके पीछे अपने व्यक्तित्व का विश्लेषण झाँक रहा हो सकता है। विश्व की परिस्थितियों का वर्तमान वातावरण का ऊहापोह उनमें घुला हो सकता है। ऐसी -ऐसी अनेक सम्भावनाएँ नादयोग में सुने जाने वाली ध्वनियों में पहेली की तरह धँसी रहती हैं। उन्हें तत्ववेत्ता खोज निकालते हैं और उस बहुमूल्य जानकारी का लाभ स्वयं उठाते तथा दूसरों को उपलब्ध कराते हैं।

‘रूप’ तन्मात्रा से आकृति परक और ‘शब्द’ तन्मात्रा में ध्वनि परक अनुभूतियाँ होती हैं। उन आधारों में एकाग्रता की तथा सूक्ष्म जगत में प्रवेश करके अतीन्द्रिय विभूतियों की उपलब्धि होती है। ऐसा ही उपयोग अन्य तन्मात्राओं का भी हो सकता है।

गन्ध तन्मात्रा के सहारे ध्यान करने की विधि यह है कि कोई पुष्प, इत्र या तीव्र गन्ध का कोई अन्य पदार्थ लिया जाय, कुछ क्षण उसे सूँघ कर हटा दिया जाय कि उस वस्तु की गन्ध अभी भी आ रही है। इसे गन्ध त्राटक कह सकते हैं।

रस तन्मात्रा के सहारे ध्यान की विधि यह है कि जिह्वा पर कोई तीक्ष्ण स्वाद की वस्तु रखी जाय, उसे चखा जाए। पीछे उसे जीभ पर से हटा दिया जाय और बिना उस वस्तु के ही वह स्वाद जिह्वा को मिल सके, ऐसा भावनापरक ध्यान किया जाय। मिश्री की डली, काली मिर्च, नीबू, सेंधा नमक, नीम की पत्ती जैसे तीव्र स्वाद वाले पदार्थ इस प्रयोजन में अधिक उपयोगी होते हैं। मन्द स्वाद की वस्तुएँ तो विस्मृत हो जाती हैं, पर तीव्र स्वाद देर तक बने भी रहते हैं और स्मरण करने में सरल पड़ते हैं। वह ‘रस त्राटक’ कहा जायगा।

स्पर्शेन्द्रिय के माध्यम से किये जाने वाले ध्यान में सामान्य स्तर से अधिक ठण्डी या अधिक गर्म वस्तुओं का उपयोग किया जाता है। शरीर के किसी भाग से सहउष्णता का कोई धातु खण्ड स्पर्श कराया जाय और फिर हटा दिया जाय। तदुपरान्त उस वस्तु की तथा उसके स्पर्श की अनुभूति उस स्थान पर होती रहे, ऐसा प्रयास किया जाना चाहिए। बर्फ के स्पर्श से ठण्डक अनुभव हो सकती है। कोई मुलाकात या कठोर वस्तु भी त्वचा को प्रभावित कर सकती है। संसर्ग का अनुभव लेकर उस पदार्थ को हटा दिया जाय और कल्पना क्षेत्र में भी यह अनुभव होने दिया जाय कि वह पदार्थ अभी भी त्वचा का स्पर्श करके उसे पहले की ही तरह प्रभावित कर रहा है यह स्पर्श घातक हुआ।

स्पर्श, रस और गन्ध की चेतन सम्वेदनाएँ अब शिथिल पड़ गई हैं। यद्यपि अन्य प्राणियों में उन्हीं की प्रधानता है। गन्ध के सहारे से कृमि, कीटक और वन्य पशु अपने जीवन क्रम की अधिकाँश आवश्यकताएँ पूरी करते हैं, पर मनुष्यों द्वारा उसका उतना उपयोग न होने से निष्क्रिय होती चली गई है। रस और स्पर्श के सम्बन्ध में भी यही बात है। स्वादिष्ट वस्तुओं के स्वाद ले सकने की और स्पर्श के आधार पर मिलने वाली गुदगुदी का भी अब बहुत ही स्वल्प एवं थोड़ा अनुभव होता है, पर यदि इन अनुभूति केन्द्रों को-इन्द्रिय समुच्चय में सन्निहित तन्मात्राओं को जागृत-जीवित किया जा सके तो इन माध्यमों से स्थूल और सूक्ष्म जगत की अनन्त विभूतियों के अधिकारी बन कर हम मनुष्य जीवन का उच्चस्तरीय आनन्द ले सकते है।


पहाड़ी नदी उफान पर थी (kahani)

पहाड़ी नदी उफान पर थी। यात्री थोड़ी देर पशोपेश में रहा। इधर-उधर नजर दौड़ाई। नाव देख कर वह खिल उठा। उसने सुन रखा था कि नाव से नदी पार की जा सकती है। वह पेड़ से बँधे रस्से को खोलने लगा। पास खड़ा अन्य यात्री बोला- “भाई! ये क्या कर रहे हो? तुम्हें नाव चलाना आता है क्या? पहले यात्री ने उत्तर दिया- “इससे क्या? नाव है, तो नदी पार हो ही जायगी?”

“लेकिन यहाँ मल्लाह नहीं। डाँड-पतवार भी नहीं। पागल हो रहे हो क्या?” दूसरा यात्री कहता समझाता रहा।

पहला यात्री अपनी जिद पर अडिग था। नाव है तो नदी पार हो ही जायेगी।

रस्सा खोला नाव में बैठा। नाव बह पड़ी। थोड़ी ही दूर जाकर वह एक भँवर में पड़ गई। यात्री डूब मरा लोगों ने कहा- यह नाव अशुभ थी

राम -नाम की नाव के सहारे लोग ऐसे ही पार जाना चाहते हैं, साथ में उपयुक्त मार्ग दर्शन की, सत्प्रवृत्तियों-सद्गुणों के डाँड-पतवार की भी आवश्यकता है, यह भुलाकर। परिणाम स्पष्ट है।


हमारा चक्र संस्थान और उसकी सिद्धि सामर्थ्य!

शरीर मोटी दृष्टि से एक सजीव एवं चिन्तनशील माँस पिण्ड है। उसका क्रिया-कलाप पेट एवं प्रजनन पूर्ति की धुरी पर भ्रमण करता दीखता है। मन की लिप्सा, लोभ, मोह और अहंकार का खट-मिट्ठा रसास्वादन करने के लिए मचलती रहती है। महत्वाकाँक्षाओं में उछलता हुआ और निराशाओं से सिसकता जीवधारी ज्यों-त्यों करके मौत के दिन पूरे करता है। पदार्थ मिलते हैं और खिसक जाते हैं व्यक्ति जुड़ते हैं और बिछुड़ जाते हैं आशाओं और निराशाओं का –उपलब्धियों और असफलताओं का चक्र ऐसा है जिसका न आदि न अन्त। जीवधारी इसी कुम्हार के चाक पर गीली मिट्टी की तरह घूमता है और चक्की के पाटों में पिसकर अपने अस्तित्व को गँवाता, बदलता चला जाता है। उत्पन्न होने, बढ़ने और बदलने की काल गति का ही एक घटक मनुष्य भी है। अन्यथा पदार्थों की तरह उसकी भी उठक-पटक होती रहती है।

शरीर का रासायनिक विश्लेषण अति तुच्छ और नगण्य है। उसमें प्रयुक्त हुए पदार्थों का बाजारू मूल्य सामान्य पशु-पक्षियों से भी कम है। मनुष्य शरीर के रक्त माँस,अस्थि, चर्म को बाजार में बेचा जाय तब एक जीवित मुर्गे से भी कम दाम का बैठेगा। फिर भी मनुष्य की अपनी स्थिति है और अपनी गरिमा। यह उसकी चेतना का मूल्य है। यह चित् शक्ति- दृश्यमान शरीर में स्फूर्ति,बलिष्ठता एवं सुन्दरता के रूप में परिलक्षित होती है। सूक्ष्म शरीर में उसे ज्ञान-गरिमा, बौद्धिक प्रखरता एवं साहसिक मनस्विता के रूप के रूप में देखा जा सकता है। अन्तिम अति सूक्ष्म- कारण शरीर में इसी चेतना में आस्था, आकाँक्षा, स्नेह, सेवा उदारता, वरुणा जैसी दिव्य-विभूतियों का निवास रहता है।

इन तीनों शरीरों में जो चेतनात्मक ऊर्जा-चित्त-शक्ति काम करती है,उसे अन्तरिक्ष व्यापी ताप, शब्द विद्युत, ईथर आदि के प्रचण्ड शक्ति कम्पनों से भी अधिक क्षमता सम्पन्न माना जा सकता है। जड़ और चेतन के बीच जितना अनुपातिक अन्तर है, उतना ही विज्ञान परिचित भौतिक सामर्थ्यों और योगियों की जानी मानी आत्मिक क्षमता में। लेसर मृत्यु किरण, अणु ऊर्जा आदि के सम्बन्ध में रोमांचकारी चर्चाएँ सुनने को मिलती रहती हैं। आत्मिक शक्ति की सृजनात्मक शक्ति के बारे में उतनी ही गम्भीरतापूर्वक समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि उसका मूल्याँकन अनिर्वचनीय है।

शरीर का एक नगण्य-सा घटक शुक्राणु एक नया मनुष्य रच सकता है। अणु की सौर-मण्डल से तुलना की जाती है। पिण्ड को-व्यक्ति को ब्रह्मांड का प्रतीक प्रतिनिधि कहा जाता है। यह तथ्य भी है और सत्य भी। ऐसी दशा में मानवी सत्ता की तुलना उस चिनगारी से की जा सकती है जिसमें दावानल बनकर समस्त संसार को अपनी चपेट में ले सकने की क्षमता बीज रूप से विद्यमान है। अवसर मिले तो वह बीज विशाल वृक्ष की तरह सुविकसित हो सकता है और चिरकाल तक अपने जैसे असंख्यों बीज उत्पन्न करता रह सकता है।

ब्राह्मी शक्ति के उभय-पक्षीय प्रयोग हैं। उसके परिष्कृत होने पर मनुष्य महात्मा, देवात्मा और परमात्मा के स्तर पर पहुँच सकता है और इन तीनों समुन्नत चेतना वर्गों में जो दिव्य-विभूतियाँ पाई जाती हैं, उससे सुसम्पन्न बन सकता है। इसी शक्ति को यदि भौतिक प्रगति की दिशा में लगा दिया जाए तो व्यक्ति प्रखर प्रतिभावान बन सकता है, उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है और सम्भव दीखने वाले कार्यों को सम्भव बनाता हुआ पग-पग पर विजय श्री वरण कर सकता है। ओजस्वी, मनस्वी और तेजस्वी व्यक्तियों की गुण गरिमा से इतिहास के उज्ज्वल पृष्ठ आलोकित हो रहे हैं। ऐसे महामानवों की यश गाथाएँ उन्हें मिले साधनों एवं अवसरों के कारण नहीं, वरन् उनके अन्तरंग में उभरी हुई चित-शक्ति के ऊपर ही आधारित रही हैं।

चित-शक्ति को विकसित करने का विज्ञान ही योग एवं तप की संयुक्त प्रक्रिया बनकर विकसित हुआ है। स्थूल शरीर के अन्तराल में जो दो सूक्ष्म शरीर है उसकी मूर्छना जगाकर चेतना उत्पन्न कर देना-माया मलीनता से छुड़ाकर दिव्य परिष्कृत बना देना यही है। साधना का उद्देश्य, समझा जाता है कि भक्तजनों अथवा योगी तपस्वियों को कई तरह की जो ऋद्धि-सिद्धियाँ मिलती हैं, वे किसी देव-दानव के अनुदान, अनुग्रह का प्रतिफल हैं। पर वास्तविकता यह है कि जो कुछ अद्भुत असाधारण अतीन्द्रिय कहा जाता है। वह भीतर से ही उभरता है। आत्म-परिष्कार का ही दूसरा नाम ईश्वर साक्षात्कार है। यह तथ्य यदि समझा जा सके तो हम सत्य को समझने वाले कहे जा सकेंगे।

आत्म-साधना के अनेक प्रयोग हैं। अनेकानेक परम्पराओं में अगणित विधि-विधान बताये गये हैं। भारतीय साधना विज्ञान के अन्तर्गत 84 योग प्रधान हैं। उनकी शाखा उपशाखाएँ बढ़ते-बढ़ते हजारों तक पहुँचती हैं। फिर संसार के अन्यान्य क्षेत्रों में प्रचलित साधनाओं की गणना करना और उनका लेखा जोखा रखना तो और भी कठिन है। इन योग साधनाओं में चक्रवेधन की एक प्रक्रिया ऐसी है जिसका महत्व संसार भर के सभी योगाभ्यासियों ने स्वीकार किया है। षट्चक्र वेधन के स्वरूपों और विधि-विधानों में थोड़ा अन्तर- मतभेद रहते हुए भी उनके अस्तित्व और प्रभाव को सर्वत्र स्वीकारा गया है। कुण्डलिनी शक्ति जागरण की चर्चा साधना क्षेत्र में बहुधा होती रहती है। यह चक्र वेधन में मिलने वाली सफलता की अन्तिम परिणति है।

शरीर के नाड़ी संस्थान में-ज्ञान तन्तुओं में दौड़ने वाली विद्युत शक्ति से सभी परिचित हैं। टेलीफोन के तार तभी काम करते हैं जब उनके साथ बिजली का सम्बन्ध हो। इन्द्रियों के माध्यम से मिलने वाली ज्ञान सम्वेदनाएँ-मस्तिष्क में उठने वाली विचार एवं भाव तरंगें इसी विद्युत शक्ति का चमत्कार है। शरीर में विद्युत चुम्बकत्व से भरे आँधी-तूफान के ‘मुह’ बनते, बिगड़ते हैं। जीवन की दशा धारा इसी की प्रेरणा से विनिर्मित होती है। योगियों ने इस दिव्य चेतना प्रवाह के सम्बन्ध में बहुत कुछ जानने का प्रयास इसलिए किया है जिससे उसका सदुपयोग करके अधिक लाभ उठाना सम्भव हो सके।

चित-शक्ति की शोध करते हुए पाया जाता है कि मस्तिष्क के मध्य बिन्दु में अवस्थित सहस्रार चक्र पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव की तरह है और जननेन्द्रिय के मूल में मूलाधार चक्र की स्थिति दक्षिणी ध्रुव जैसी है। ब्रह्मांड चेतना का व्यक्ति सत्ता के साथ सम्पर्क बनने और आदान प्रदान होने के माध्यम यही दो शरीर केन्द्र हैं। इसमें सन्निहित शक्ति हो ही जीवन संचार की धुरी कही जा सकती है। बुद्धि एवं श्रद्धा का केन्द्र ऊपर है और प्रफुल्लता एवं बलिष्ठता की धुरी नीचे है। जननेन्द्रिय मात्र काम-क्रीड़ा का आनन्द लेने एवं सन्तान उत्पन्न करने के काम ही नहीं आती उसके मूल में स्फूर्ति, कला साहसिकता, प्रफुल्लता जैसी अगणित क्षमताएँ भरी पड़ी हैं। इन्हें भौतिक प्रगति का आधार कहा जा सकता है। जिसकी वह शक्ति नष्ट हो जाए उसे क्लीव-नपुंसक कहकर चिढ़ाया जाता है। यहाँ यौनाचार की क्षमता का नहीं पौरुष का वर्णन है। मूलाधार चक्र को भौतिक शक्तियों का केन्द्र कहा गया है।

मस्तिष्क का सहस्रार केन्द्र ज्ञान, बुद्धि आदि आत्मिक सामर्थ्यों का उद्गम है। प्रत्याहार धारणा, ध्यान, समाधि जैसी साधनाएँ मस्तिष्कीय क्षेत्र में ही की जाती हैं। भौतिक शक्तियों के केन्द्र मूलाधार और आत्मिक शक्तियों के उद्गम सहस्रार के बीच एक कड़ी है, जिसे बोल-चाल की भाषा में मेरुदण्ड और अध्यात्म की परिभाषा में सुषुम्ना संस्थान कहते हैं। रीढ़ की हड्डी का क्या महत्व है? इसे शरीर-शास्त्र के विद्यार्थी भली प्रकार जानते हैं। इसके अन्तराल में प्रवाहित होने वाले विद्युत प्रवाह के साथ उच्चस्तरीय विभूतियाँ जुड़ी हुई हैं इसे तत्वदर्शी आत्मवेत्ता भली प्रकार जानते हैं। इस संस्थान में प्रचण्ड भगवान विद्युत धाराएँ बहती हैं। इसके दो स्वरूप हैं- एक ऋण, दूसरी धन-एक नेगेटिव दूसरी पाजेटिव। ऋण को इडा और धन को पिंगला कहते हैं। दोनों जब भी परस्पर मिलती हैं तो शक्तिधारा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है। इस मिलन प्रक्रिया को सुषुम्ना कहते हैं। इन्हें नाड़ियां भी कहा जाता है, पर यह शब्द प्रयोग ये किसी को ‘नस’ का अर्थ नहीं लेना चाहिए। नाड़ी शब्द का एक अर्थ ‘नस’ भी होता है पर यहाँ उस प्रकार की कोई बात नहीं है। यहाँ दो विद्युत धाराओं का संकेत है। मेरुदण्ड को चीरकर उसमें इडा, पिंगला, सुषुम्ना नाम की कोई उस तरह की नसें नहीं देखी जा सकती जैसा कि योग-शास्त्र में उनका विस्तारपूर्वक और मस्तिष्क रूपी दो अति महान शक्ति केन्द्रों के बीच निरन्तर दौड़ने वाले विद्युत प्रवाह को इडा, पिंगला और सुषुम्ना की संयुक्त, प्रक्रिया कह सकते हैं। अलंकार रूप में इसी को गंगा, जमुना और सरस्वती के मिलन से बनने वाली त्रिवेणी की उपमा दी गई है।

तीव्र प्रवाह की नदियों में प्रायः भँवर पड़ते रहते हैं। जब हवा तेज और गरम होती है तो ग्रीष्म ऋतु में चक्रवात उठते हैं। पानी में भंवर और हवा में चक्रवात की तरह सुषुम्ना संस्थान में प्रवाहित रहने वाली चित् शक्ति को अति प्रचण्ड प्रवाह मात्र विद्युतधारा माना गया है। उसमें भी भँवर पड़ते हैं। उन्हें शक्ति चक्र कहते हैं। योग-शास्त्र में इनकी गणना छह है। षट्चक्र नाम से सभी परिचित हैं। वस्तुतः यह छह नहीं सात हैं। सातवाँ सहस्रार है। उसे सबका अधिपति मानकर गणना से बाहर रखा गया है। यदि अलग ही रखना था तो उत्तरी ध्रुव सहस्रार की तरह दक्षिणी ध्रुव मूलाधार को भी अलग करना चाहिए था और पाँच की ही गणना रखकर उन्हें पाँच देवताओं का -पाँच कोषों का, गायत्री के पाँच मुखों का प्रतीत कहा जा सकता था। जो हो, हमें संख्या निर्धारण के वितंडावाद में उलझने की अपेक्षा वस्तुस्थिति को समझना चाहिए। षट्चक्र प्रसिद्ध है ही- सातवें हमें सहस्रार को भी गिन लेना चाहिए। इस प्रकार यह सात शक्ति चक्र-सात लोकों के, सात ऋषियों के, सप्त धातुओं के, सप्त द्वीपों के प्रतीक समझे जा सकते हैं।

मेरुदण्ड के षटचक्रों की भाँति शरीर में अन्यत्र भी कितने शक्ति स्रोत हैं। इन्हें ग्रन्थि उपत्यिका आदि कहते हैं। मस्तिष्क में विष्णु ग्रन्थि, हृदय में ब्रह्म ग्रन्थि और नाभि में रुद्र ग्रन्थि का स्थान है। यहाँ भी थोड़ा मतभेद है। हृदय स्थान विष्णु ग्रन्थि और मस्तिष्क में ब्रह्म ग्रन्थि भी कही गई है। हमें इन नाम भेदों में भी नहीं उलझना चाहिए और समझना चाहिए कि न केवल मेरुदण्ड में वरन् मस्तिष्क, हृदय एवं नाभि में ऐसे ही महत्वपूर्ण शक्ति चक्र हैं और उनका वेधन करने का विधान ग्रन्थि भेद के नाम से वर्णित है। यहाँ एक बात और ध्यान रखने की है- वेध शब्द का सामान्य अर्थ ‘छेद’ कर देना होता है। पर आध्यात्म की परिभाषा में उसे ‘जागरण’ अर्थ में प्रयोग किया गया है।

शरीर के पृष्ठ भाग के- सुषुम्ना संस्थान के षट्चक्रों की तरह काया के अग्र भाग में भी छह चक्र अवस्थिति हैं। उन्हें सूर्य-चक्र, अग्नि चक्र, अमृत-चक्र, प्रभंजन चक्र, तड़ित-चक्र, सोम चक्र कहा गया है।

पर्वतों में भरा जल जब एकत्रित होकर किसी स्थान विशेष से फूटता है तो उसे ‘झरना’ कहते हैं। झरनों के उद्गम स्थान पर जलधारा कितनी प्रचण्ड होती है। ऊपर से नीचे गिरने पर वहाँ कितना कोलाहल होता है। और कितनी उथल-पुथल मचती है उसे सभी जानते हैं। चक्र संस्थानों को भंवर, चक्रवात की ही तरह एक उपमा झरना फटने की भी दी जा सकती है। ज्वालामुखी के छेद अक्सर अग्नि, धुआँ या दूसरी चीजें उगलते रहते हैं। चक्रों से भी उसी प्रकार का प्रकटीकरण होता रहता है। समुद्री लहरों से असीम विद्युत शक्ति उपलब्ध करने की तैयारियाँ हो रही हैं। चक्र संस्थानों में उबलती शक्ति का उपयोग कर सकना जिनके लिए सम्भव होता है वे उसका ऐसा लाभ उठा सकते हैं। जिसे देव क्षमता कहकर सम्बोधित किया जा सके।

हारमोन ग्रन्थियों के सम्बन्ध में खोज करने वाले शरीर शास्त्री आश्चर्य चकित हैं कि इन नन्ही-सी- ग्रन्थियों से निकलने वाले रस मात्रा में कुछ ही बूँद होते हैं, पर शारीरिक और मानसिक स्थिति को कितना अधिक प्रभावित करते हैं। अण्डकोष, गुर्दे, जिगर, तिल्ली, पौरुष ग्रन्थियाँ आदि को बड़ी ग्रन्थियाँ ही कह सकते हैं। उनका क्रिया-कलाप स्थूल होने से सरलतापूर्वक समझा जा सकता है। हारमोन ग्रन्थियों का रहस्योद्घाटन इससे बहुत कठिन है और बहुत माथा-कच्ची करने के बाद भी ठीक तरह पकड़ में नहीं आ रहा है। सूक्ष्म ग्रन्थियाँ जिन्हें चक्र कहते हैं, इन्द्रियों एवं उपकरणों की पहुँच से बाहर हैं। उन्हें जागृत अन्तर्दृष्टि से ही देखा, समझा एवं प्रयोग में लाया जा सकता है। सूक्ष्म विज्ञान के आधार पर ही उनका अनुभव एवं उपयोग सम्भव होता है।

हठयोग साधना के अन्तर्गत आने वाले मेरुदण्ड के सुषुम्ना संस्थान में अवस्थित छह चक्रों के नाम हैं- (1) मूलाधार चक्र (2) स्वाधिष्ठान चक्र (3) मणिपुर चक्र (4) अनाहत चक्र (5) विशुद्ध चक्र (6) आज्ञाचक्र।

इनमें शरीर शास्त्रियों ने चार को नाड़ी गुच्छकों के रूप में मान्यता दे दी है। मूलाधार चक्र को- पौल्विक प्लैक्सस। मणिपुर चक्र को- सोलर प्लैक्सस। अनाहत चक्र को- कार्डियल प्लैक्सस और विशुद्ध चक्र को- फैरिजियल प्लैक्सस नाम से निश्चित कर दिया गया है। शेष दो के बारे में प्राचीन व्याख्या एवं नवीन वास्तविकता में थोड़ा अन्तर एवं मतभेद है। आशा की जानी चाहिए कि वह गुत्थी भी निकट भविष्य में सुलझ ही जायेगी।

चक्र संस्थान के जागरण के फलस्वरूप मिलने वाली षट्-सम्पत्तियों का वर्णन मिलता है। इन्हें आध्यात्मिक उपलब्धियाँ भी कह सकते हैं।

षट्-सम्पत्ति यह है (1) शम (2) दम (3) उपरति (4) तितीक्षा (5) श्रद्धा (6) समाधान।

शम- अर्थात् शान्ति उद्वेगों का शमन। दम- इन्द्रियों को दमन करने की क्षमता। उपरति- दुष्टता से घृणा। तितीक्षा- कष्टों को धैर्यपूर्वक सहना। श्रद्धा- सन्मार्ग में प्रगाढ़ निष्ठा, विश्वास और साधना का समन्वय। समाधान- संशयों और लालसाओं से छुटकारा।

यह गुण, कर्म, स्वभाव की विशेषताएँ हैं। उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व से मनुष्य ऊँचा उठता है। और ब्रह्म परायण व्यक्तियों को मिलने वाले आन्तरिक सन्तोष, उल्लास और बाह्य सम्मान, सहयोग का अधिकारी बनता है।

इसके अतिरिक्त आत्मिक प्रगति के भौतिक लाभ भी कितने ही हैं जिन्हें सिद्धियों के नाम से पुकारा गया है। आत्मिक सफलताओं के सम्पत्ति एवं विभूति दो नाम हैं। भौतिक प्रगति को समृद्धि एवं सिद्धि के नाम से सम्बोधित किया जाता है। दोनों के सम्मिलित परिणाम को अतीन्द्रिय क्षमता विकास के रूप में देखा जा सकता है।

श्री आद्य शंकराचार्य ने आठ सिद्धियाँ यह गिनाई हैं (1) जन्म सिद्धि (2) शब्द ज्ञान सिद्धि (3) शास्त्रज्ञान सिद्धि (4) आधिदैविक ताप सहन शक्ति (5) आध्यात्मिक ताप सहन शक्ति (6) आधिभौतिक ताप सहन शक्ति (7) विज्ञान सिद्धि (8) विद्या शक्ति।

जन्म सिद्धि का अर्थ है पूर्व जन्मों की स्थिति का आभास। पूर्व जन्मों के सम्बन्धों के प्रति सहज आकर्षण और उनके साथ अपने पूर्व सम्बन्धों की जानकारी।

शब्द सिद्धि का अर्थ है- शब्दों के साथ जुड़ी हुई भावना का आभास। शब्दों की शक्ति बड़ी सीमित है और उससे कुछ का कुछ- उलटा-सीधा-अप्रासंगिक अर्थ भी निकल सकता है। कहने वाले की भावना का सही अनुमान वही लगा सकता है जिनका अन्तः करण पवित्र हो।

शास्त्र सिद्धि का तात्पर्य है- शास्त्रकार की मूल भावना को समझना और यह जानना कि यह प्रतिपादन किस देश, काल, पत्र को ध्यान में रखकर किया गया है। कोई सिद्धान्त या प्रतिपादन सार्वभौम या सर्वकालीन नहीं होता। यह शास्त्र वचन किस प्रकार प्रयुक्त करना चाहिए। यह सूक्ष्म ज्ञान होना ही शब्द की सिद्धि है।

आधिदैविक ताप सहन शक्ति का अर्थ है- दैवी प्रकोप अथवा प्रारब्ध जन्म लोग के कारण आकस्मिक अनायास विपत्तियाँ उत्पन्न हो जाने, प्रियजनों के कारण विछोह आदि के अवसर उपस्थित हो जाने पर उन शोक सम्वेदनाओं को धैर्यपूर्वक सहन।

आध्यात्मिक ताप सहन शक्ति का तात्पर्य है- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मदमत्सर, ईर्ष्या आदि उद्वेगों को नियन्त्रण में रखना। इन्द्रियों के अमर्यादित योग को छूट न देना, मन को उच्छृंखल न होने देना। इस अवरोध से भीतर जो असन्तोष उत्पन्न होता है उसको हँसते हुए टाल देना।

आधिभौतिक ताप सहन शक्ति का अर्थ है- सर्दी गर्मी, भूख, प्यास, नींद, रोग, चोट आदि के शरीर कष्टों को समय पड़ने पर शक्तिपूर्वक सह लेना और चित को अशान्त उद्विग्न न होने देना।

विज्ञान शक्ति का अर्थ है-शुद्ध अन्तःकरण, निर्मल चरित्र, सन्तुलित मन, सौम्य स्वभाव और हँसमुख प्रकृति, निरालस्यता, स्फूर्तिवान और नियम-पालन की तत्परता, कर्त्तव्य पालन में प्रगाढ़ निष्ठा, उदार व्यवहार में सन्तोष।

विद्या शक्ति अर्थात्- आत्मा के स्वरूप, उद्देश्य तथा कर्तव्य पर भावना और विश्वास भरी निष्ठा, ईश्वर पर विश्वास, आत्मा को सर्वव्यापी समझकर सबको अपना ही समझना और आत्मीयता भरा व्यवहार करना, प्रेम भावनाओं के उभार, उद्वेग और आवेशों से निवृत्ति।

तिवादी या अति उच्चस्तरीय अपवाद रूप में कहीं कहीं, कभी कभी सुनी, देखी जाने वाली सिद्धियों में (1) अणिमा (2) महिमा (3) गरिमा (4) लघिमा (5) प्राप्ति (6) प्राकाम्य (7) ईशत्व (8) वशित्व का वर्णन मिलता है।

अणिमा अर्थात्- शरीर को अणु के समान सूक्ष्म बना लेना। महिमा अर्थात्- बहुत बड़ा कर लेना। गरिमा- बहुत भारीपन। लघिमा- बहुत हलकापन। प्राप्ति- दूरस्थ वस्तु की समीपता। प्राकाम्य- मनोरथों की पूर्ति। ईशत्व- स्वामित्व, अभीष्ट वस्तु व्यक्ति या परिस्थिति पर अधिकार। वशित्व- वशवर्ती बना लेना।

अष्ट सिद्धियों का दूसरा वर्णन एक और भी मिलता है (1) परकाया प्रवेश (2) जलादि में असंग (3) उत्क्रान्ति (4) ज्वलन (5) दिव्य श्रवण (6) आकाश गमन (7) प्रकाश आवरण क्षय (8) भूत जय।

इस प्रकार के चमत्कार इन दिनों देखे नहीं जाते। जो दिखते हैं उनमें छल की मात्रा ही प्रमुख होती है। ऐसी दशा में हमें अनुभव में न आने वाली सिद्धियों पर ध्यान देने की अपेक्षा इतना ही सोचना है कि चक्र वेधन जैसी योग-साधनाओं का आश्रय लेकर हम सहज ही अपनी आत्मिक और भौतिक सामर्थ्यों को जगा सकते हैं और उस दिशा में मिलने वाली सफलता का इतना लाभ ले सकते हैं, जितना सामान्य पुरुषार्थ से सम्भव नहीं हो सकता।


शिष्य ने गुरु से पूछा (kahani)

शिष्य ने गुरु से पूछा- “गुरुदेव ! शरीर के सर्वोत्तम अंग कौन से हैं?”

“वत्स! जिव्हा और हृदय।

“और सबसे अद्यम अंग ?” “यही दोनों”।

शिष्य आश्चर्य में पड़ गया। क्या एक ही वस्तु सर्वोत्तम और अहम दोनों ही हो सकती हैं? वह अपनी जिज्ञासा को न रोक सका। उसने पुनः पूछा-‘‘यह कैसे ?’’

गुरु ने समझाया- “जिह्वा सत्य और मधुर बोलती है। यह खाने योग्य वस्तुओं को ही अपने भोजन में स्थान देती है। परिश्रम की कमाई का सात्विक भोजन करती है। हृदय, ममता, प्रेम और सहानुभूति से परिपूर्ण रहता है। किसी के दुःख को देखकर सहायता पहुँचाने के ताने-बाने बुनता रहता है तो यह कहा जायेगा कि ये सर्वोत्तम अंग हैं और यदि किसी की जिह्वा असत्य और कटु भाषण करती है, खाद्य- अखाद्य का ध्यान किये बिना जो भी स्वादिष्ट पदार्थ मिल जाता है उसका भक्षण करती है, ऐसी जिह्वा अपने टोने से अपनी ही कब्र खोदती है और किसी का हृदय निर्दयता से भरा हुआ हो, प्रेम और ममता का स्रोत सूख गया हो, तब ये ही सर्वोत्तम माने-जाने वाले अंग सबसे अद्यम कोटि में आ जायेंगे।”


नवयुग आगमन की भविष्यवाणियाँ

अध्यात्मवाद का नकली आवरण ओढ़कर कई व्यक्ति भविष्य दर्शन का दंभ करते और ऐसे ही ‘अटकल पच्चू’ तीर-तुक्का लगाते देखे जाते हैं। संयोगवश कोई तुक्का निशाने पर लगे तो बात दूसरी है अन्यथा बाजारू भविष्यवक्ताओं की अटकलें प्रायः असत्य ही सिद्ध होती हैं। नकल की दुर्गति होना स्वाभाविक है। इतने पर भी ‘असल’ अपने स्थान पर यथावत् ही रहेगा। दिव्य दृष्टि के आधार पर कोई भविष्यवाणियाँ प्रायः समयानुसार सत्य ही सिद्ध होती हैं।

निकट भविष्य में नवयुग के आगमन सम्बन्धी कई महत्वपूर्ण भविष्यवाणियाँ पिछले दिनों होती रही हैं। उनके साथ युग-निर्माण योजना द्वारा देखे गये मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का जो स्वप्न देखा जाता रहा है उसके साकार होने की सम्भावना और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है।

विकसित अन्तःचेतना से सूक्ष्म जगत की भूतकालीन तथा भावी गतिविधियों को देख सकना सम्भव है। अतीन्द्रिय क्षमता को विकसित करके अदृश्य दर्शन कर सकना और अविज्ञात को जान सकना सम्भव हो सकता है। त्रिकालदर्शी ऋषियों को अपनी दिव्यदृष्टि से वे जानकारियाँ रहती थीं जिन्हें सर्वसाधारण के लिए समझ सकना संभव नहीं। वे इस ज्ञान का उपयोग खतरे से जनसाधारण को बचाने और अधिक सुविधाएं उत्पन्न करने के कल्याणकारी प्रयोजनों में ही करते थे। उतना ही अंश प्रकट करते थे जो प्रकट करने योग्य है। इतना संयम बरतने के कारण ही उनकी दिव्य क्षमता सुरक्षित रहती है। अन्यथा दुरुपयोग करने पर तो वह उपलब्धियाँ देखते-देखते नष्ट हो जाती हैं।

प्रख्यात अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न महिला जीन डिक्शन को तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति सजवेल्ट ने भेंट के लिए आमंत्रित किया था और वह भेंट नवम्बर सन् 1944 में मध्याह्न 11 बजे सम्पन्न हुई थी। राष्ट्रपति के सामने उन दिनों अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न दो थे। अपने शेष जीवन की अवधि मालूम करना और रूस के साथ चल रहे गठजोड़ का भविष्य जानना। उन्हें अपनी शारीरिक स्थिति तथा सरे आधार पर अपना जीवन-काल कुछ ही वर्षों में समाप्त हो जाने की आशंका थी। इस प्रकार युद्ध काल में हुआ रूस अमेरिका गठबन्धन किस ओर करवट लेता है इसके आधार पर उस देश की दूरगामी योजनाओं का निर्धारण होना था। जीनडिक्शन से वे प्रधानतया इन्हीं सम्भावनाओं के सम्बन्ध में भविष्य कथन जानने के उत्सुक थे।

भेंट में डिक्शन ने दो ऐसे उत्तर दिये जिन्हें सुनकर राष्ट्रपति तिलमिला गये। ऐसे अद्भुत भविष्य की उन्होंने कभी कल्पना तक नहीं की थी। वे अपना जीवन-काल कुछ वर्ष का होने की आशंका करते थे पर जब उन्होंने उस भविष्यवक्ता के मुँह से यह सुना कि वे छह महीने से अधिक नहीं जी सकते तो वे सन्न रह गये।

समय ने वह कथन सत्य सिद्ध कर दिया। उस बात को कहे पूरे छह महीने हो भी नहीं पाये थे कि वे 12 अप्रैल 1945 को ज्योर्जिया में स्वर्गवासी हो गये।

दूसरी भविष्यवाणी और भी अटपटी थी। डिक्शन ने कहा- ‘वर्तमान युद्ध समाप्त होते ही यह -बन्धन टूट जायगा। किन्तु कम्युनिस्ट चीन के विरुद्ध रूस और अमेरिका में फिर एकता हो जायगी।’

जीनडिक्शन जर्मनी के एक छोटे-से गाँव विसकीनसिन में जन्मी। उन दिनों यूरोप के लोग अपने नये उपनिवेश अमेरिका में बसकर लाभान्वित होने के लिए आतुर हो रहे थे। उनके पिता फ्रेंक पिनकई अपने छोटे-से परिवार को लेकर अमेरिका के कैलिफोर्निया में जाकर बस गये। लड़की जब दो वर्ष की थी तभी से वह अपनी तोतली बोली में भविष्यवाणी करने लगी थी। उसने अपनी माता के और पिता के स्वर्गवास होने की बात कही जो कुछ दिन बाद पत्र आने पर सही सिद्ध हो गई। एक दिन ऐसे ही वह अपनी माँ से बोली पिताजी ने आज चितकबरा कुत्ता खरीदा है और वे जब अगले सप्ताह घर जाएंगे तो साथ लाएंगे। सचमुच उसके पिता जब घर आये तो ठीक वैसे हुलिया का कुत्ता साथ था जैसा कि लड़की ने कई दिन पूर्व बिना किसी जानकारी के बताया था।

डिक्शन ने राष्ट्रपति केनैडी सम्बन्धी दो भविष्यवाणियां की थीं और वे अक्षरशः सही निकलीं। केनैडी की हत्या से 4 वर्ष पहले उन्होंने ‘पैरेड’ पत्रिका में इस सम्भावना की भविष्यवाणी छपा दी थी। किसी ने ध्यान नहीं दिया तो वे व्यक्तिगत रूप से यह सन्देश राष्ट्रपति तक पहुँचाने का प्रयत्न करती रहीं। टैक्सास के प्राणघातक दौरे से पूर्व उन्होंने उसे टाल देने के लिए जोरदार अनुरोध किया था। पर किसी ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया और होनी होकर रही। जिस दिन हत्या हुई है उस दिन वे अपनी दो सहेलियों के साथ होटल में भोजन करने गई थीं। पहला ग्रास तोड़ते ही वे सन्न रह गई और थाली एक ओर खिसकाकर खाना बन्द कर दिया। पूछने पर सहेलियों से उन्होंने इतना कहा अब राष्ट्रपति की हत्या होने में कुछ मिनट ही बाकी हैं, इस दुर्घटना का पूर्वाभास मुझे फिल्म देखने की तरह हो रहा है। सचमुच वैसा ही हुआ। आधा घन्टे बाद ही रेडियो पर दुर्घटना का समाचार आ गया।

उनकी ऐसी भविष्यवाणियों में कुछ अन्तर्राष्ट्रीय महत्व की हैं जो समय से बहुत पहले ऐसी परिस्थितियों में की गई थीं जिनकी कोई सम्भावना नहीं थी, फिर भी वे यथासमय घटित होकर ही रहीं। ऐसे पूर्व कथनों में (1) महात्मा गाँधी की हत्या (2) पं0 जवाहरलाल नेहरू के उत्तराधिकारी का नाम (3) भारत का विभाजन (4) रूस का प्रथम अन्तरिक्षयान छोड़ा जाना (5) आइजन हावर का चुनाव का परिणाम (6) ख्रुश्चेव का पतन (7) प्रख्यात अभिनेत्री मारिलियन मुनरो की आत्म-हत्या (8) सीनेटर केनैडी की हवाई दुर्घटना आदि। यह सभी बातें आरम्भ में अविश्वस्त समझी गईं, पर कालचक्र ने उन्हें सही सिद्ध करके दिखा दिया।

जिन भविष्यवाणियों की परख समयानुसार होनी है, उसमें चीन का बढ़ता हुआ आतंकवाद और उसकी लपेट में झुलसने वाले देशों की दुर्गति-तीसरा महायुद्ध जैसी अनेक बातों में सबसे महत्वपूर्ण है सन् 1980 से लेकर सन् 2000 के बीच युग-परिवर्तन के लक्षणों का अधिकाधिक प्रखर होते जाना। वे कहती हैं कि निकट भविष्य में से मनुष्य जाति की जीवन प्रणाली और शासन व्यवस्था बदल जायगी। विश्व में ऐसी गतिविधियाँ उभरेंगी जो चिरस्थायी सुख-शान्ति का आधार सिद्ध हो सकें ।

इन्हीं श्रीमती जीनडिक्शन की एक महत्वपूर्ण भविष्यवाणी है-‘‘एक महान आत्मा जन्म ले चुकी है। यह दुनिया में सम्प्रदायों की संकीर्णता मिटा देगी। एक ऐसे सार्वभौम विश्व-धर्म की स्थापना करेगी, जो विश्व के हर नागरिक को मान्य होगा।”

एक दूसरे, विश्व-विख्यात भविष्यवक्ता एन्डर्सन ने रुजवेल्ट की मई, 1945 में मृत्यु तथा किसी अमरीकी सेनापति के राष्ट्रपति बनने की भविष्यवाणी की। दोनों सच निकलीं। रुजवेल्ट सहसा रुग्ण हुए और चल बसे। मित्र देशों की सेना में अमेरिकी सेनापति आइजनहावर राष्ट्रपति बने।

इसी तरह उन्होंने एक प्रसिद्ध अमेरिकी अखबार ‘वाकर काउन्टी मैसेन्जर’ के सम्पादक को मई, 1945 में बतलाया कि-‘‘अगस्त को होने वाली एक भयंकर घटना जापान के साथ चल रहे युद्ध को बिलकुल अप्रत्याशित मोड़ देगी। 18 अगस्त तक युद्ध -विराम की घोषणा हो जायगी ।” सम्पादक ने उक्त घटना नोट तो करली, पर छापी नहीं ।

एंडर्सन की भविष्यवाणी सही मिली। 8 अगस्त को हिरोशिमा पर भयंकर बम-काण्ड हुआ, एक लाख से अधिक लोग निष्प्राण अथवा मृतप्राय हो गए। जापान लड़खड़ा गया और उसने आत्म -समर्पण कर दिया। 18 अगस्त को युद्ध -विराम घोषित हो गया।

एंडर्सन ने भविष्यवाणी की थी कि -1947 में एशिया का एक महत्वपूर्ण देश (भारत) अंग्रेजों के राज्य से निकल जाएगा। 1947 में भारत स्वतन्त्र हो गया।

जिन दिनों जर्मनी और रूस अभिन्न मित्र थे तथा द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था, एंडर्सन ने दोनों में शत्रुता हो जाने का भविष्य कथन किया था। उस समय किसी ने इस पर विश्वास न किया। बाद में, सभी जानते हैं कि मित्र राष्ट्रों की सेनाओं में रूसी और अमरीकी दोनों ही शामिल थे।

एण्डर्सन का कथन है- चीनी दुरभिसंधियों के फल-स्वरूप सन् 1980 के लगभग संसार में तीसरे महायुद्ध का आतंक फैलेगा। उससे धन-जन को हानि भी बहुत होगी, पर अन्ततः रूस और अमेरिका मिल-जुलकर उसका समाधान कर लेंगे और नये सिरे से राजनैतिक स्तर पर विश्व शान्ति के प्रयास आरम्भ होंगे। उनमें सफलता भी मिलेगी। उनके भविष्य कथन में यह बात भी सम्मिलित है कि भविष्य में राजनीति का महत्व घटेगा और अध्यात्मवादी रीति-नीति की गरिमा अधिक अच्छी तरह समझी जायगी। भारत से ऐसे प्रकाश का उदय होगा, जिसके फलस्वरूप संसार भर की विचारधारा को प्रभावित करना और उसे सन्मार्गगामी बना सकना सम्भव हो सके। वे कहते हैं इस प्रयोजन को पूरा करने के लिए भारत में एक दिव्य आत्मा बहुत काम करेगी उसका प्रभाव, परिणाम इसी शताब्दी के अंत तक सब के सामने प्रत्यक्ष रूप से परिलक्षित होगा।

प्रो0 कीरो विश्व-विख्यात भविष्यवक्ता थे। उनकी भविष्यवाणियां अक्सर अविश्वसनीय तथ्यों की उद्घोषणा करती थीं और जब वे पूर्ण सिद्ध होतीं, तो लोग विस्मित रह जाते। यहूदियों सम्बन्धी भविष्यवाणी भी ऐसी ही अविश्वसनीय लगती थी। पर हुआ क्या? दुनिया भर के यहूदी पैलेस्टाइन में जमा हुए। ईसाइयों ने सचमुच सहायता की और एक राष्ट्र-सिंह इजराइल खड़ा हो गया। बाज जैसे तेज झपट्टों से उसने जोर्डन की कमर तोड़ दी, मिस्र के सिनाई प्रान्त को दबोच लिया। अरब लोगों का अन्तर्कलह और जीर्ण-शीर्ण हो रही स्थिति सर्वविदित है। प्रो0 कीरो का कथन था- ‘‘अरबों की नील नदी यहूदियों का आदाब बजाएगी।’’ पूर्वार्ध तो सही सिद्ध हुआ।

स्मरणीय है कि जब इजराइल कल्पना में भी नहीं आया था, तब प्रो0 कीरो ने यह भविष्यवाणी की थी- ‘‘ईसाई कौमें यहूदियों को एकबार पुनः पैलेस्टाइन में बसाएँगी। अरब राष्ट्र और उनके इस्लामी बिरादर इससे भड़क उठेंगे। इंग्लैण्ड अमेरिका के विरुद्ध उत्तेजनापूर्ण नारे लगाएंगे। यहूदियों से भिड़ेंगे। लेकिन यहूदियों की शक्ति बढ़ती ही जायेगी। संख्या में कम होते हुए भी दैवी सहायता के कारण यहूदी चमत्कारिक विजय प्राप्त करेंगे और अरबों को पीछे धकेल कर एक बड़ा इलाका अपने अधिकार में कर लेंगे। 1970 के बाद एक जोरदार टक्कर होगी, अरब राष्ट्र इस युद्ध में तहस-नहस हो जाएगा।’’

प्रो0 कीरो की भारत की स्वतन्त्रता सम्बन्धी भविष्यवाणी जनवरी 1945 की अखण्ड-ज्योति में छपी थी। उस समय ब्रिटिश हुकूमत का दमन चक्र तेज था। भारत की स्वतन्त्रता की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। पर प्रो0 कीरो का कहना था- ‘‘भारतवर्ष का सूर्य ग्रह बलवान है और कुम्भ राशि पर है। उसका अभ्युदय संसार की कोई भी ताकत रोक नहीं सकती।’’ आजादी की बात तो अविश्वसनीय थी ही, पर देश विभाजन तो सर्वथा असम्भव बात ही लगती थी। लेकिन प्रो0 कीरो की जनवरी 1943 की अखण्ड-ज्योति में पृष्ठ 23 पर छपी भविष्यवाणी थी कि- ‘‘इंग्लैण्ड भारत को स्वतन्त्र कर देगा, पर मजहबी फिसाद से भारत तबाह हो जाएगा। यहाँ तक कि हिन्दू, बौद्ध और मुसलमानों में बराबर-बर विभक्त हो जायेगा।’’ सभी जानते हैं भारत के अनेक लंका, वर्मा, नेपाल, तिब्बत आदि बौद्ध मतावलम्बी राज्य उससे अलग हो गए और इधर पाकिस्तान का निर्माण हुआ। साम्प्रदायिक दंगों से मानवता कराह उठी। खून की नदियां बहीं और धन-जन की भयंकर क्षति हुई।

इन्हीं प्रो0 कीरो की भविष्यवाणी थी कि ‘‘भारत वर्ष में विशुद्ध आध्यात्मिक नीतियों वाले एक अति शक्तिशाली व्यक्ति के जन्म लेने का योग है। यह व्यक्ति पूरे देश को जागृत करेगा। उसकी आध्यात्मिक शक्ति विश्व की समस्त भौतिक शक्तियों से अधिक समर्थ होगी। बृहस्पति का योग ज्ञान-क्रान्ति का संकेतक है। इस ज्ञान-क्रान्ति का प्रभाव सम्पूर्ण विश्व में पड़ेगा।’’

प्रो0 कीरो की 1925 में लिखी पुस्तक ‘वर्ल्ड प्रीडिक्शन’ की अधिकांश भविष्यवाणियां अब तक निरन्तर सत्य सिद्ध हो रही है। आगामी वर्षों के बारे में उक्त पुस्तक के कतिपय भविष्य कथन यों हैं-

“सूर्य कुम्भ राशि पर प्रवेश कर गया है। यह तीव्रातितीव्र प्रभाव दिखलाएगा, क्योंकि उसके ग्रह यूरेनस और शनि हैं। इनका सम्बन्ध “नये युग के शुभारम्भ” से है। शनि विध्वंस करता है, यूरेनस के प्रभाव से पुराने नियम, कानून, आमूल चूल बदल जाते हैं। सूर्य कुम्भ पर आता है, तब बड़े आश्चर्यजनक परिवर्तन, हलचल और क्राँतियाँ उत्पन्न होती हैं। इसलिए उसे नये युग का निर्माता ग्रह कहा जाता है। इसके प्रभाव से स्त्रियाँ संसार में नये ही रूप में आती हैं।”

8-9-10 सितम्बर 1972 को कोरिया के “स्यूल” नामक नगर में विश्व के शीर्षस्थ 104 ज्योतिषियों ने विश्व ज्योतिर्विद् सम्मेलन में विश्व के वर्तमान व भावी घटनाचक्रों पर विचार किया। इन विख्यात भविष्यवक्ताओं में ऐसे लोग सम्मिलित थे, जिनकी 80 प्रतिशत भविष्यवाणियाँ निश्चित तौर पर सत्य सिद्ध होती रही हैं। इन्होंने अपने सम्मिलित प्रतिवेदन में भविष्य के बारे में कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। सिर्फ ऐसी ही घोषणाएं की गईं, जिन पर आम सहमति थी। विश्व ज्योतिर्विद् संस्था के अध्यक्ष श्री हसीरों असानों ने, जो कि कोरिया वासी विश्वविख्यात भविष्यदृष्टा हैं, इसे प्रसारित किया। ये भविष्यवाणियाँ उन दिनों दुनिया के तमाम प्रसिद्ध अखबारों में विस्तार से छपी थीं।

इसमें कहा गया था कि “आगामी पाँच वर्षों के भीतर एशिया में भारी उथल-पुथल होगी। एक ओर “विचारक्रान्ति” का अभ्युदय होगा, दूसरी ओर भयानक आतंक फैलेगा। तीन प्रलयंकर भूकम्प न केवल पूरे एशिया को हाहाकार से भर देंगे, बल्कि उनमें से दूसरे की भीषणता देखकर पूरी दुनिया सिहर उठेगी।

“उधर विचारक्रान्ति के निरन्तर विस्तार का विश्वव्यापी परिणाम होगा। सन् 2000 से पूर्व ही बौद्धिक क्रान्ति की यह लहर न केवल दक्षिण पंथी देशों में बल्कि वामपंथी कम्युनिस्ट देशों में भी फैल जाएगी। जो आध्यात्मिक चिंतन से उपजी विचार-क्रान्ति होगी, जो मत मतान्तरों, सम्प्रदायों, भाषाओं और सभ्यताओं के भेदभाव की जड़े खोद डालेगी और सम्पूर्ण विश्व में आध्यात्मिक समभाव तथा भ्रातृभाव की प्रतिष्ठा करेगी। ईश्वरीय सत्ता की सभी को अनुभूति होगी। नीति-सदाचार में निरत लोग ही समाज के निर्देशक, नियामक और शासक होंगे। विवाह-शादियों के मामले में लोग उदार-दृष्टिकोण अपनाएंगे। भौतिक मान्यताओं वाले व्यक्ति भी आध्यात्मिक मानदंडों की श्रेष्ठता मानने लगेंगे।

“व्यापार, धन, धान्य, कृषि, गौ, विद्या, विज्ञान तथा औद्योगिकी के क्षेत्रों में एशियाई प्रभुत्व भारत वर्ष में आ सकता है। महाशक्तियों की कूट चालों द्वारा विभक्त राष्ट्र पुनः संयुक्त होंगे जैसे जर्मनी, कोरिया, वियतनाम आदि। यहाँ राष्ट्रवादी स्वतन्त्र सरकारें होंगी।”

इस घोषणा में आगे कहा गया था कि एशिया के किसी देश में जन्मा एक महान सन्त विश्वव्यापी विराट परिवर्तनों के लिए निरन्तर क्रियाशील है। सतत गतिशील उसका यह प्रयास बीसवीं शताब्दी के अन्त तक पूरी तरह सफल होगा।

स्पेन के प्रख्यात पत्र ‘साइन्स वेस्ट मिनिस्टर’ पत्र में अब से 50 वर्ष पूर्व तत्कालीन भविष्यदर्शी जी0 वेजीलेटिन की एक भविष्यवाणी छपी थी, जिसमें संसार के अनेक पर्यवेक्षकों का कहना है कि सभी बातें एक-एक करके सही सिद्ध होती चली आ रही हैं ।

इसी भविष्य सूचना में एक यह है कि सन् 1930 से लेकर 2000 के मध्य एक दिव्य आत्मा संसार के पुनर्निर्माण का कार्य करेगी। उसके प्रयास चलेंगे तो मंद गति से, पर समयानुसार प्रचण्ड बनेंगे। उसमें संसार में आस्तिकता की पुनः स्थापना तथा विचार पद्धति में आदर्शवादी तत्वों के समावेश की संभावना व्यक्त की गई है।

डेनियल के अनुसार “सारे संसार का शासनसूत्र इस शताब्दी के अन्त तक एक स्थान से चलने लगेंगे। शहर थोड़े से ही होंगे। एक भाषा होगी व एक संस्कृति। संचार-साधन अति विकसित हो जाएँगे और लोग अपने मन की बात दूसरों तक बेतार के तार की तरह पहुँचा दिया करेंगे।

हंगरी की प्रसिद्ध महिला ज्योतिषी बोरिस्का सिल-विगर के अनुसार “सतयुग का प्रारम्भ नव-युवकों द्वारा होगा। वृद्ध लोग रूढ़िवादी मान्यताओं से चिपके रहेंगे तब भारतवर्ष में एक ऐसे संत का जन्म होगा जो सारी दुनिया में विचार क्रान्ति खड़ी कर देगा। उसके प्रभाव में सैकड़ों लोग आ जाएंगे । पर मूढ़ मान्यताओं वाले लोग अपने को न बदल पाएंगे। तब नई पीढ़ी उसके विचारों को आत्मसात कर आगे बढ़ेगी। नया युग आरम्भ होगा, लोग आशावादी होंगे। धर्म की स्थापना होगी।

विभिन्न व्यक्तियों की इन भविष्यवाणियों के साथ ही मिश्र की एक अति प्राचीन मीनार में अंकित भविष्यवाणी भी महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार इस्लामिक हिजरी सन् के हिसाब से चौदहवीं सदी (जो कि इन दिनों चालू है) में कयामत होगी (यानी भीषण संघर्ष और विनाश)। साथ ही यह भी लिखा है कि ‘‘शीघ्र ही ऐसा युग आ रहा है, जिसमें सत्य ही धर्म होगा, न्याय ही कानून होगा। दुनिया भर के लोग कुटुम्बियों की तरह रहेंगे, बैर-भाव नहीं होगा। चारों ओर अमन-चैन होगा।

सन् 1918 में महर्षि अरविन्द ने एक भविष्यवाणी की थी जिसमें भारत के स्वतन्त्र होने तथा काँग्रेस के सत्तारूढ़ होने की घोषणा थी। उसी में यह भी कहा गया था कि भारत विश्व के नव-निर्माण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत करेगा। इसी भूमि से उदय हुए आलोक से समस्त विश्व को नया मार्ग-दर्शन प्राप्त होगा।

पिछले दिनों हालैण्ड के दिव्यदर्शी गेरार्डक्राइसे अपनी चमत्कारी विशेषताओं के कारण उस देश की जनता और सरकार के लिए समान रूप से सम्मानास्पद बने हुए थे। उनके सहयोग से अनेकों ने अपनी कठिन गुत्थियों को सुलझाया था। अधिकारी लोग अपनी कठिन समस्याओं को हल करने में उनसे सहायता लेते थे। उच्चकोटि के राजनेता भी उनसे गम्भीर विषयों पर परामर्श करने के लिए आते थे।

एक दिन हालैण्ड के एक ‘वरिष्ठ कूट-नीतिज्ञ ने गेरार्ड क्राइसे से पूछा-‘संसार में बढ़ रही अवाँछनीय गतिविधियाँ इसी प्रकार बढ़ती रहेंगी या उनमें सुधार परिवर्तन भी होगा ?’

उत्तर में गेरार्ड ने ध्यान मग्न होकर अपने दिव्य दर्शन की एक झाँकी कराई और कहा-‘‘मैं देख रहा हूँ कि पूर्व के अति प्राचीन देश (भारत) से प्रकाश फूट रहा है। उसका सूत्र संचालन कोई दिव्य आत्मा कर रही है। अगले दिनों लोग अपनी स्थिति पर फिर से विचार करेंगे और वापिस लौटेंगे। बीसवीं सदी के अन्त तक वह परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाएंगी जिनमें धर्म और ज्ञान के प्रति मनुष्य जाति फिर से अपनी गहरी आस्था व्यक्त कर सके।

ऐसे ही अन्य भविष्यवक्ताओं में पैरा सैल्सस, फादर वैल्टर वेन, जानऐसो आदि के नाम हैं जिन्होंने युग परिवर्तन की संभावनाओं को पूरी दृढ़ता के साथ व्यक्त किया है।

प्रख्यात साहित्यकार-संत रोम्या रोला ने भी कहा है-‘‘मुझे पूर्ण विश्वास है-भारतवर्ष एक बार फिर सम्पूर्ण विश्व को ज्ञान का आलोक देगा। पाश्चात्य सभ्यता की समाप्ति के साथ ही पूर्वी सभ्यता का उदय निश्चित भी है और निर्मल आत्मा की पूर्वानुभूती पर आधारित भी है।”

बुद्धिमान मनुष्य जाति समय-समय पर विपन्न परिस्थितियों से छुटकारा पाने और उलझनों को सुलझाने में सफलता प्राप्त करती रही है। वर्तमान की अगणित विपत्तियों के मूल में झाँकती हुई मानवी चिन्तन की विकृतियों के दुष्परिणाम प्रत्यक्ष हो रहे हैं। दूरदर्शी विवेक का दबाव कुमार्ग छोड़कर सन्मार्ग पर वापिस लौटने के लिए विवश करेगा। इसके बिना सर्वभक्षी विभीषिकाओं से छुटकारा पाने का कोई अन्य उपाय भी नहीं है। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का नव-युग आने ही वाला है । मनुष्य अपने चिन्तन और कर्तव्य का नये सिरे से निर्धारण करने ही वाला है। उज्ज्वल भविष्य का यही एकमात्र रास्ता है। भविष्यवक्ता देखते हैं कि अगले कुछ ही समय में अन्धकार का युग बीतेगा और उसके स्थान पर नव-युग का प्रकाश उदय होगा। यही है उपरोक्त भविष्यवादियों का निष्कर्ष।


उद्धत काम कौतुक की विनाश लीला

प्रकृति-पर्यवेक्षण से पता चलता है कि अल्पजीवी प्राणी अधिक कामुक होते हैं तथा वे सहवास भी अधिक करते हैं जबकि दीर्घजीवी प्राणियों में सहवास की आवृत्ति में एक बड़ा अन्तराल रहता है। वे वर्ष में एक निश्चित अवधि में ही यौन-जीवन जीते हैं। शेष समय में दाम्पत्य प्रेम तो उनमें गहरा रहता है पर यौन-क्षुधा नहीं होती। इसी तरह दुर्बल जीवों में अधिक सन्तति होती है, जबकि सशक्त प्राणियों में कम सन्तानें होती है।

छोटी छोटी मछलियाँ लाखों, करोड़ों की संख्या में अण्डे देती हैं। काड मछली चार लाख अंडों का प्रजनन करती है तो सनफिश तीन करोड़। जबकि विशालकाय ह्वेल तथा डाल्फिन अण्डे नहीं देती, उनके सीमित जीवित बच्चे पैदा होते हैं। शार्क मछली अपने ही पेट में अण्डे देती और फिर शिशु को जन्म देती है। मक्खियाँ भी बहुत अण्डे देती हैं और एक मक्खी की कुल उम्र 30 दिन होती है। मादा चमगादड़ वर्ष में सिर्फ एक बच्चा देती है।

वनराज सिंह व सिंहनी वर्ष में मात्र एक बार सहवास करते हैं, जबकि वे सदा साथ रहते हैं। एक प्रसव में सिंहनी कभी एक ही बच्चे को जन्म देती है। कभी 3-4, वह भी प्रति वर्ष नहीं। सामान्यतः दो वर्ष में एक बार।

हाथी भी वर्ष में एक बार ही समागम करता है और कई हाथी तो लम्बे अरसे तक सहवास नहीं कर पाते क्योंकि किसी भी समूह की कभी हथनियों का स्वामी सरदार हाथी ही होता है। हाथी की सन्तान भी कम होती हैं।

गाय, बैल, भैंस, घोड़े आदि सभी सशक्त प्राणियों में सन्तति-क्रम सीमित है। कम सन्तान जनने वाले हाथी और ह्वेल सौ-सौ वर्ष जीते हैं। शेर चालीस वर्ष, घोड़ा तीस, गाय पच्चीस, कुत्ता पन्द्रह, बकरे-बकरी पन्द्रह वर्ष जीते हैं। जबकि छोटी मछलियाँ और छोटे पशु अल्प अवधि तक जीते हैं। जो प्राणी जितने अधिक और जितनी जल्दी बच्चे उत्पन्न करता हो तो समझना चाहिए कि वह उतनी ही कम आयु प्राप्त कर सकेगा और उतना ही दुर्बल बनकर रहेगा।

नर-नारी प्रेम तथा एकनिष्ठता की प्रवृत्ति कई पशु-पक्षियों में देखी जाती है।

‘स्क्विड’ नामक एक रेंगने वाला कीड़ा सैकड़ों मादाओं में भी अपनी प्रियतमा को पहचान लेता है। दूसरों की ओर वह कभी भी नहीं देखता।

बत्तखों का दाम्पत्य-प्रेम अत्यन्त प्रखर होता है। थोड़े से क्षणों का भी विद्रोह वे सह नहीं पाते। साथी आँख से ओझल हुआ कि व्याकुलता से उसे खोजने लगते हैं।

योरोप में गोहों की कुछ जातियाँ हैं, जो जीवन में एक ही बार हम सफर चुनती हैं। विधवा या विधुर गोह, दूसरे गोह को देखकर उस पर आक्रमण कर बैठती है। प्यार कभी दुबारा नहीं करती।

कबूतर कट्टर पतिव्रती एवं पत्नीव्रती होते हैं।

कुछ मछलियाँ भी प्रेम-प्रसंग के बाद ही विवाह करती हैं। ऐसी मछलियाँ झीलों या शान्त गति वाली नदियों में ही पायी जाती हैं। ये मछलियाँ सदैव एकनिष्ठ होती हैं।

दाम्पत्ति जीवन का अर्थ है- स्नेह, सद्भावपूर्वक सहचरत्व का निर्वाह किया जाय। सद्भाव सम्पन्न प्राणियों में प्रायः यही प्रवृत्ति पाई जाती है। इस आधार को अपनाने पर उनका दाम्पत्ति-जीवन सुखी, सन्तुष्ट रहता है। किन्तु जहाँ काम लोलुपता ही प्रधान है वहाँ सघन-निष्ठा का अन्त हो जाता है और कुचक्र का दौर चल पड़ता है। बहुपत्नी प्रथा या बहुपति प्रथा दोनों ही समान रूप से अनावश्यक एवं अवांछनीय हैं। जहाँ कहीं यह दौर चल रहा होगा वहाँ कलह, संघर्ष एवं संकटग्रस्त वातावरण बना रहेगा। प्राणि जगत में इस बहुवादी लोलुपता की प्रतिक्रिया कुत्तों में, हिरनों में, हाथी, सील आदि में देखी जा सकती है।

बहु-पत्नीवाद का सर्वाधिक दुष्परिणाम ‘सील’ नामक मछली में देखने को मिलता है। ये उत्तरी ध्रुव के हिमानी क्षेत्र में होते हैं।

प्रजनन-ऋतु आने पर नर-सील मादाओं के लिए लड़ने लगते हैं। एक सशक्त नर सील 40-50 तक मादाओं का मालिक होता है पर उसकी विक्षुब्ध वासना अपरिमित होती है। नई मादाएँ देखकर वह मचल उठता है तथा पड़ौसी सील-समूह पर आक्रमण कर बैठता है। उस समूह के नर से उसे प्रचण्ड संघर्ष करना पड़ता है। मान लें कि वह इस संघर्ष में विजयी ही हो जाता है और अपनी पसन्द की मादा को लेकर थका, आहत, गर्वोद्धत अपने समूह में लौटता है तो उसे प्रायः निश्चय ही यही दृश्य दीखेगा कि उसके समूह की एक या दो-चार मादाएँ, कोई दूसरा नर-सील खींचे लिए जा रहा है। अब या तो मन मानकर अपहरण का यह आघात झेले अथवा उसी थकी माँदी दशा में द्वन्द्व-युद्ध के लिए ललकारें और तब परिणाम पता नहीं क्या हो?

इस प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप अधिकाँश नर-सील तीन माह की यह प्रजनन-ऋतु बीतने तक श्लथ, क्षत−विक्षत हो चुकते हैं और आहार जुटा पाने योग्य शक्ति भी उनमें शेष नहीं रहती। इसका कारण मादा के प्रति नर-पशु की निरन्तर यौन-जागरुकता की प्रवृत्ति है। इससे विपरीत सामूहिक सह-जीवन की प्रवृत्ति वाले पशुओं में तो मादा के प्रति कोई अनावश्यक आकर्षण नर रखते ही नहीं। मात्र प्रजनन-ऋतु में ही मादा विशेष के प्रति आकर्षित होते हैं। शेष समय वे मानो लिंगातीत साहचर्य की स्थिति में रहते हैं।

हाथी की शक्ति एवं बुद्धिमता सुविदित है। किन्तु इस विषमतावादी प्रवृत्ति से हाथियों के मुखिया को भी अपनी शक्ति व समय का अधिकाँश भाग अनावश्यक संघर्षों में खर्च करना होता है।

हाथी समूह में रहते हैं। समूह-नायक ही अपने समूह की सभी हथनियों का स्वामी होता है। समूह के अन्य किसी सदस्य द्वारा किसी भी हथिनी से तनिक-सी भी काम चेष्टा या प्रेम-प्रदर्शन करने पर, मुखिया यह देखते ही उस पर आक्रमण कर या तो भगा देता है या परास्त कर प्रताड़ित, अपमानित करता है।

कोई युवा शक्तिशाली हाथी कभी भी ऐसी उद्यत चेष्टा कर मुखिया को उत्तेजित कर देता है और युद्ध में उसे यदि परास्त कर देता है, तो फिर वही टोली की सभी हथनियों का स्वामी तथा टोली नायक बनता है। पराजित नायक बहुधा विक्षिप्त हो जाता है और खतरनाक भी हो उठता है।

“मरणं बिन्दुपातेन जीवनं बिन्दु धारणम्” सूत्र में कामुकता के अमर्यादित चरणों को मरण का प्रतीक माना गया है। उसमें सर्वनाश ही सन्निहित है। यह विचार सर्वथा असत्य है कि अति कामुकता बरतने वालों से उनकी सहधर्मिणी प्रभावित होती है वरन् सच तो यह है कि वह उलटी घृणा करने लगती है। ऐसी घृणा जहाँ पनपेगी वहाँ सद्भाव कहाँ रहेगा? जब मादा देखती है कि नर अपनी तृप्ति के लिए उसके शरीर का अनावश्यक दुरुपयोग किये जा रहा है तो वह पति-भक्ति अपनाने के स्थान पर उलटे आक्रमण कर बैठती है। ऐसे आक्रमणों से नर की दुर्गति ही होती है और ‘मरणं’ बिन्दुपातेन’ सूत्र के अनुसार उद्धत कामविकार मृत्यु का दूत बनकर सामने आ खड़ा होता है।

नर-बिच्छू अपनी प्रेयसी के साथ-साथ नृत्य करता है। घंटों। कभी तेजी से दोनों आगे बढ़ते हैं, कभी पीछे हटते हैं। थककर शिथिल होने पर दोनों साथ-साथ ही विश्राम करते हैं। लेकिन मादा बिच्छू कई बार उत्तेजना में नर को खा भी जाती है।

‘फ्राग-फिश’ का यौनाचरण भी ऐसा ही प्राणात्मक है। मादा फ्राग-फिश घूमती रहती है। श्रीमान नर अधिकाँश पुरुषों की ही तरह लम्पट और अधीर होते हैं। मादा के पास पहुँचते ही वे उत्तेजित हो उठते हैं, जबकि मादा को ऐसा कुछ भी नहीं होता। उत्तेजित नर मादा के मदक दिख रहे शरीर मास में तेजी से दाँत गड़ाता है। बस, फिर यह दाँत गड़ा ही रह जाता है। क्योंकि उस माँस से यह दाँत कभी निकल नहीं पाता। किसी केलि करते हैं नशा उतर जाने के बाद दाँत छुड़ाने की पूरी कोशिश करते हैं।-बार-बार। पर विफल मनोरथ ही रहते हैं। खाना-पीना बन्द। कितने दिन जीएंगे? अन्त में दम टूट जाता है।

प्राणि जगत में जिधर भी दृष्टि दौड़ाकर देखा जाय संयम का लाभ और वासनात्मक अतिक्रमण के कारण उत्पन्न होने वाले विनाश को भली प्रकार देखा जा सकता है। अच्छा होता मनुष्य भी इस विनाशलीला पर विचार करता और संयमशीलता अपनाने के लिए सहमत होता।


अपनों से अपनी बात- - इस वर्ष के बसन्त पर्व का विशेष उद्बोधन

बसन्त पर्व अपने मिशन की जन्म-जयन्ती है। जो अखण्ड-ज्योति का-उसके लक्ष्य एवं क्रिया-कलाप का महत्व समझते हैं, उनके लिए यह स्वाभाविक है कि इस पर्व की गरिमा समझें और उस अवसर पर अपनी भाव भरी अभिव्यंजना व्यक्त करें।

बसन्त पर्व यों ज्ञान और विज्ञान की देवी भगवती सरस्वती के अवतरण का दिन है। शिक्षा और विद्या की गरिमा को जन-जन के मन में प्रतिष्ठापित अभिवर्धित करने के लिए उस दिन सर्वत्र समारोह मनाये जाते हैं और विश्वास किया जाता है कि सरस्वती का अवतरण प्रकृति में बसन्ती बहार लाने के लिए ही नहीं, श्रद्धावान अन्तःकरणों में भी हर्षोल्लास भरा नव-जीवन संचार करता है। इसी आशा एवं अपेक्षा से विज्ञ जन बसन्त पर्व मनाते हैं और उस दिन संगीत साहित्य कला की भाव भरी झाँकी जन-साधारण के सामने प्रस्तुत करते हैं। पेड़-पौधे नई कोपलों से, नये पुष्पों से अपने को सजाते हैं, पक्षियों के चहकने, फुदकने में नवोत्साह देखा जाता है। मयूर कोकिल भ्रमर, तितली जैसे क्षुद्र प्राणियों का उल्लास अभिव्यक्ति देखते ही बनती है। प्राणि जगत के अन्तराल में एक उमंग उभरती है और वे उसका कोई अन्य उपयोग कर सकने में समर्थ न होने के कारण यौनाचार में उत्साह व्यक्त करके सन्तोष करते हैं। बसन्त पर्व को कलात्मक उल्लास से उभार कर सनातन मुहूर्त माना जाय तो इसमें कुछ अत्युक्ति न होगी।

अखण्ड-ज्योति की सूत्र संचालक सत्ता इस अवसर पर लगातार चिर-नवीन अनुदान प्रस्तुत करती रही है। मिशन के प्रायः सारे ही महत्वपूर्ण क्रिया-कलाप इसी शुभ मुहूर्त में आरम्भ होते रहे हैं। 24 वर्षीय तप-साधना से भरी-पूरी 24 गायत्री महापुराणों की शृंखला बसन्त पंचमी को ही आरम्भ हुई। अखण्ड घृत दीप ने उसी दिन दिव्य आलोक धारण किया। अखण्ड-ज्योति पत्रिका का प्रकाशन, गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास, युग-निर्माण योजना का आरम्भ बसन्त पंचमी को ही हुआ है। वेद,शास्त्र, पुराण आदि आर्ष ग्रन्थों के अनुवाद, सम्पादन के कार्य किसी न किसी वर्ष को बसन्त पंचमी में ही शुरू किये जाते रहे हैं। शान्ति कुँज की नींव उसी मुहूर्त में रखी गई और महिला जागृति अभियान का अंश उसी दिन फूँका गया और अनेकों प्रकट अप्रकट क्रिया-कलाप हैं, जिनका शुभारम्भ बसन्त पर्व के अवसर पर उठने वाली प्रकृतिगत ही नहीं आध्यात्मिक क्षेत्र में भी उठने वाली उमंगों के सहारे ही सम्पन्न किया जाता है। अस्तु अखण्ड-ज्योति मिशन का- उसके सूत्र संचालक का जन्म-दिन इसी अवसर पर मनाया जाता है। पिछले 40 वर्षों से लगातार इस त्यौहार को ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्य अपना विशेष उत्सव मानते आये हैं और उसे एक पुनीत परम्परा के रूप में हर्षोल्लास भरे आयोजनों की व्यवस्था बनाते रहे हैं। इस वर्ष यह पुनीत पर्व सोमवार ता0 24 जनवरी 77 को है। स्वभावतः परिजन अपने-अपने ढंग से उसे मनावेंगे ही। भीतर से उठने वाली उमंग को उभारने और उसे रचनात्मक दिशा देने की दृष्टि से इस प्रकार के हर्षोत्सवों का अपना महत्व होता है, उनकी मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं और उपयोगी वातावरण बनता है इसलिए इन आयोजनों के लिए प्रोत्साहन एवं मार्ग-दर्शन भी दिया जाता रहता है। इसलिए उनकी आवश्यकता भी है और उपयोगिता भी। बसन्त पर्व ‘अखण्ड-ज्योति’ परिवार के सदस्यों द्वारा छोटे बड़े रूप में जिस प्रकार मनाया जाता है कदाचित् ही अन्य किसी संगठन द्वारा उस उत्साह से मनाया जाता हो।

आमतौर से सामूहिक गायत्री जप, हवन, कीर्तन, संगीत, प्रवचन और दीपदान के कार्यक्रम चलते हैं एकत्रित जन-समूह का मिशन की प्रगति यात्रा का परिचय कराया जाता है और भावी योजनाओं का स्वरूप बताते हुए वर्तमान में क्या किया जाना चाहिए? इस पर प्रकाश डाला जाता है। इस वर्ष भी वह परम्परा निबाही जायेगी। जहाँ जैसे बन पड़ेंगे वैसे उत्सव, आयोजन होंगे पर यह तो एक दिन की बात हुई। यदि उसी दिन उमंग उठे और उसी दिन समाप्त हो जाए तो समझना चाहिए कि यह बाल-क्रीड़ा जैसी लकीर पिटने-घर घरौंदा बनाने, बिगाड़ने जैसी चिह्न पूजा हुई। इससे वह ठोस बात बनी नहीं जो इन पर्वों की प्रेरणा के फलस्वरूप बननी चाहिए।

बसन्त पर्व हमारा आध्यात्मिक जन्म-दिन है। उसी दिन ऐसा नया आलोक मिला था जिसके प्रकाश में लम्बी मंजिल पार करते हुए-उपयोगी सफलताओं का रसास्वादन करते करते यहाँ आ पहुँचे, जहाँ आज हैं। भविष्य में भी कुछ और महत्वपूर्ण बन पड़ा तो वह उसी प्रकाश का वरदान होगा जिसे ‘अखण्ड-ज्योति’ नाम देते रहें हैं और जो घृत दीपक में ही नहीं हमारी अन्तरात्मा के मर्मस्थल में अनवरत आलोक दे रही हैं। यदि ऐसी ही प्रेरणा परिजनों को मिले, यदि ऐसे ही प्रकाश स्फुल्लिंग उन्हें प्राप्त हों तो समझना चाहिए कि पर्व का महत्व और उस पर किया गया आयोजन सार्थक हो गया।

बसन्त पर्व यदि हम अपना सर्वश्रेष्ठ त्यौहार मानते हैं और उसे मिशन के जन्म दिन तथा बढ़ते हुए प्रगति चरणों का आधार मानते हैं तो वह दिन आने से पूर्व ही यह निश्चय किया जाना चाहिए कि बसन्त वर्षारम्भ के दिन से हम क्या कोई ऐसा कदम उठा सकते हैं जो जीवन-लक्ष्य को पूरा करने में सहायक सिद्ध हो और अपने प्राणप्रिय मिशन को अग्रगामी बनाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण अनुदान प्रस्तुत करा सके। यह कार्य वर्तमान दृष्टिकोण और क्रियाकलाप में कुछ उत्साहपूर्वक परिष्कार करने से ही सम्भव हो सकता है। उत्कृष्टता की ओर बढ़ने की कल्पनाएँ करते रहने से कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता, बात तो साहसिक कदम बढ़ाने से बनती है।

बसन्त पर्व पर परिजनों की मिशन के लिए एक श्रेष्ठ श्रद्धांजलि ‘अखण्ड-ज्योति’ पत्रिका की सदस्य संख्या बढ़ाने के रूप में दी जाती रही है। इस वर्ष वह उत्साह घटना नहीं बढ़ना ही चाहिए। साधना स्वर्ण जयंती वर्ष इसी बसन्त पर्व को समाप्त होगा। इसमें उपासना, भावना एवं शुभ-कामना के स्तर पर प्रायः सभी परिजन भागीदार बने हैं। इस वर्ष की पूर्णाहुति अखण्ड-ज्योति के सदस्यों की संख्या दुगनी कर देने के रूप में की जा सकती है। यह प्रकट तथ्य है कि मिशन का विस्तार पत्रिका के पृष्ठों पर लिपटे रहने वाले प्राण द्वारा ही सम्भव हुआ है। उसका सम्पर्क क्षेत्र बढ़ेगा तो अभीष्ट वातावरण बनने और समर्थ सहकर्मी मिलने की सम्भावना बढ़ेगी। जितने पाठक इन दिनों हैं उतने ही बने रहे तो समझना चाहिए कि मिशन का विस्तार जहाँ का तहाँ स्थिर होकर रह जायगा। यह भली भाँति स्मरण रखने योग्य तथ्य है कि मिशन को परिपक्व, परिपुष्ट करने के लिए अखण्ड -ज्योति की ग्राहक संख्या बढ़ाने के लिए प्रयत्न करना, बसन्त पर्व पर प्रस्तुत की गई सर्वोत्तम श्रद्धांजलि है- इसके लिए प्रयास आज से ही आरम्भ कर देने चाहिए और सहयोगियों की टोलियाँ बनाकर उसे पर्व दिन कर देने का संकल्प इसी प्रकार सम्भव हो सकेगा।

अगले वर्ष हमारे व्यक्तिगत जीवन में साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा इन चार आध्यात्मिक प्रगति के चार-उपचारों को अधिक प्रखर बनाने में जो उपेक्षा बरती जाती रही है उसका अब अन्त होना चाहिए। दैनिक जीवन में इन तथ्यों के लिए भाव भरा एवं सुनिश्चित स्थान रहना चाहिए। कौन, क्या, कैसे करे, यह तो व्यक्तिगत परिस्थितियों पर निर्भर है, अस्तु स्वयं निर्धारण करने और स्वयं कार्यक्रम बनाने की बात है। दूसरे परामर्श भर दे सकते हैं, पर करना तो स्वयं ही पड़ता है। अपनी मनः स्थिति और परिस्थिति के साथ उत्कृष्टता का ताल-मेल बिठाना अपना ही काम है। विज्ञ परिजन इन आधारों पर इस वर्ष की तुलना में अगले वर्ष अधिक कुछ करेंगे ऐसी आशा, अपेक्षा की जाती है।

हम सब के उत्साह अंशदान की नियमितता स्थिर करने और बढ़ाने की दिशा में जागृत होने चाहिए। युग निर्माण अभियान के प्रत्येक सहयोगी पर यह अनिवार्य शर्त लदी हुई है कि उसे एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य का न्यूनतम अनुदान ज्ञान यज्ञ के लिए देते रहना चाहिए। खेद है कि इस श्रद्धा परख की कसौटी की उपेक्षा की गई और एकाध माला जपकर देने का सस्ता नुस्खा ही सब कुछ मान लिया गया। अध्यात्म एक उत्कृष्ट जीवन-पद्धति का नाम है जिसमें देवत्व के एकमात्र प्रमाण देने की दिव्यता का प्रमाण प्रस्तुत करना पड़ता है। इसी का नाम अंशदान है। चूँकि अपने युग में सबसे बड़ा दुर्भाग्य सद्ज्ञान का है। किन्तु चिन्तन ने ही हर क्षेत्र में भयंकर विपत्तियाँ खड़ी की हैं और समस्याएँ उलझाई हैं। इनका उपचार-विचार क्रान्ति के अतिरिक्त दूसरा कुछ हो ही नहीं सकता। ज्ञान-यज्ञ के नाम पर जन-मानस के परिष्कार का पुण्य प्रयास इसी प्रयोजन के लिए चल रहा है। भजन-पूजन के समतुल्य ही जीवन-क्रम में आदर्शवाद के इस समन्वय को भी आवश्यक समझा जाना चाहिए। इस दिशा में बरती गई उपेक्षा बताती है कि अध्यात्म को व्यवहार में उतारने की आवश्यकता नहीं समझी गई और अमुक कर्मकाण्डों को ही ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त करने का सस्ता नुस्खा समझने की भूल अपना ली गई।

इस बसन्त पर्व से हम में से प्रत्येक के घर में ज्ञान घट स्थापित हो जाने चाहिए। वे मथुरा से मँगाये जा सकते हैं अथवा ऐसे ही सामान्य डिब्बा काम में लाया जा सकता है। न्यूनतम राशि दस पैसा उसमें नित्य नियमित रूप से डाली जाय। जहाँ अन्नघटों की स्थापना सुगम लगती है वहाँ उसे अपनाया जाय। नित्य सत्कर्म से स्वभाव का निर्माण होता है-संस्कार बनते हैं इसलिए प्रश्न पैसों का नहीं प्रवृत्ति को हर दिन प्रखर करते रहने का है। इस पैसे को सद्ज्ञान प्रचार के लिए संगठित रूप से खर्च करना अधिक लाभदायक सिद्ध होता है। दस ज्ञानघटों पर भी एक शाखा बन सकती है। उसी संग्रहीत राशि को मासिक बजट बनाकर अपने क्षेत्र में सद्ज्ञान प्रसार का कार्यक्रम बनाया जा सकता है और उसमें वह राशि लगाई जा सकती है।

एक घण्टा समय का उपयोग भी दैनिक रूप से ही होना चाहिए। अपने सम्पर्क क्षेत्र में दस व्यक्ति इसलिए चुन लिए जाएं कि उन तक अपना सत्साहित्य पहुँचाते और वापस लाते रहने का क्रम नियमित रूप से चालू रखा जायगा। घर में, पड़ोस में, सम्पर्क क्षेत्र में ऐसे विचारशील व्यक्ति ढूंढ़ने पर मिल ही सकते हैं जिनमें सद्विचारों के प्रति अभिरुचि हो। न हो तो इन प्रेरणाओं के सहारे मिलने वाले सत्परिणामों का माहात्म्य बताते रहने से उस प्रकार की ज्ञान पिपासा जगाई जा सकती है। जब चाय का प्रचार आरम्भ ही हुआ था तो उसका चस्का लगाने के लिए चाय प्रचारक तरह-तरह के आकर्षक उपाय काम में लाये थे। उसी का परिणाम है कि चाय के बिना महलों से लेकर झोंपड़ी तक का काम नहीं चलता। सद्ज्ञान के प्रति आकर्षण उत्पन्न करने का प्रयत्न ही नहीं किया गया, अन्यथा शिक्षित लोग प्रेरणाप्रद विचारों को पढ़ने और बिना पढ़े सुनने के लिए बेतरह लालायित पाये जाते। जन-मानस के परिष्कार का लक्ष्य जन-सम्पर्क बनाने और नवयुग की प्रेरणाएँ उनके गले उतारने के अतिरिक्त और कुछ है नहीं। इस प्रयत्न को जितना उपेक्षित रखा जायगा, मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ उतनी ही धूमिल बनी रहेंगी।

सद्ज्ञान प्रसार के लिए एक घण्टा समय और सत्साहित्य एवं अन्य प्रचार साधनों के लिए दस पैसा यदि कुछ ही निष्ठावान अपने क्षेत्र में खर्च करते रहें तो थोड़े से समय में वहाँ जन-जागृति के,रचनात्मक सत्प्रवृत्तियों के चिन्ह स्पष्ट रूप से उभरे हुए दिखाई देने लगेंगे।

टोली संगठन दस व्यक्तियों के हो सकते हैं। ‘एक से दस’ वाली प्रक्रिया यदि अपना ली जाय। सम्पर्क से प्रभावित व्यक्ति को स्वयं प्रचारक बनकर नये दस के साथ अपना स्वतन्त्र संपर्क बनाने और झोला पुस्तकालय चलाने के लिए सहमत किया जा सके तो समझना चाहिए कि नौ प्रचार पीढ़ियों में ही सारा देश मिशन के भावनात्मक प्रचार क्षेत्र के अन्तर्गत होगा। (1) एक से दस (2) दस से सौ (3) सौ से हजार (4) हजार से दस हजार (5) दस हजार से लाख (6) लाख से दस लाभ (7) दस लाख से एक करोड़ (8) एक करोड़ से दस करोड़ (9) दस करोड़ से एक अरब। अपने देश की आबादी मात्र 60 करोड़ है जिसमें बाल-वृद्ध, अपंग, रुग्ण, लोग घटा दिये जायं तो चालीस करोड़ से भी कम लोग ऐसे रह जायेंगे जो सद्विचारों को समझने, अपनाने की स्थिति में हैं। इस से दस की प्रचार प्रक्रिया को यदि अपना लिया जाय तो इस आधार पर कुछ ही समय में जन-मानस के परिष्कार का लक्ष्य अपने देश में तो पूरा हो ही सकता है। अखण्ड-ज्योति पाठकों में से प्रत्येक को नव-निर्माण के लिए अंशदान की श्रद्धा अभिव्यक्ति पूरी निष्ठा के साथ अपना लेनी चाहिए और संकल्पपूर्वक दैनिक जीवन का अविच्छिन्न अंग मानकर अनिवार्य नित्य कर्म की तरह जारी रखना चाहिए।

यों यह कार्य एक मनस्वी व्यक्ति पूर्णतया एकाकी प्रयत्न के आधार पर आरम्भ कर सकता है पर अधिक अच्छा यह है कि इसे टोलियाँ बनाकर किया जाय। कई उत्साही कार्यकर्ता जहाँ हों, वहाँ वे अपना-अपना कार्यक्षेत्र बाँट लें और एक दूसरे की टोली को टीम के आधार पर कार्यक्षेत्र विकसित, विस्तृत करते रहने में सहायता करें। एक टोली में कम से कम 10 और अधिक से अधिक 20 व्यक्ति रहें। उससे अधिक संख्या बढ़ने पर किसी उत्साही एवं प्रामाणिक सदस्य को प्रमुख बनाकर नई टोली बनायी जाय। ऐसी कई टोलियाँ जहाँ हैं वहाँ सहज ही शाखा संगठन बन जाता है और प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं सुधारात्मक कार्यक्रमों की शृंखला उत्साहपूर्वक सहज ही आगे बढ़ चलती है।

जहाँ शाखा संगठन बने हुए हैं वहाँ उन्हें हर साल वार्षिकोत्सव करने की परम्परा आरम्भ कर देनी चाहिए। जिस प्रकार कितनी ही जगह रामलीला का प्रचलन है। हर साल होती है। स्थानीय धार्मिक मेलों की भी जहाँ तहाँ परम्परा है, वह हर साल एक नियत व्यवस्था के अनुरूप सम्पन्न होते रहते हैं। ठीक इसी प्रकार जहाँ भी मिशन का ढाँचा वस्तुतः प्राणवान और जीवन्त हो वहाँ साल में एक बार वार्षिकोत्सव मनाने की परम्परा इसी साल से आरम्भ कर दी जानी चाहिए।

भविष्य में अपने उत्सव, आयोजन छोटे किन्तु ठोस कार्यक्रम बनाने और उन्हें कार्यान्वित करने की दृष्टि से संपन्न हुआ करेंगे। कोई बड़ा तमाशा खड़ा करके भीड़ कभी भी इकट्ठी की जा सकती है, पर उससे प्रदर्शन के अतिरिक्त और कोई बड़ा ठोस काम नहीं होता। भावी आयोजनों में भारतीय संस्कृति के माता-पिता-गायत्री यज्ञ तो जुड़े रहेंगे, पर उनका कलेवर सामान्य रहेगा। अब कुण्डों की संख्या अधिक होने के आधार पर आयोजन के बड़े या महत्वपूर्ण होने की बात मन से बिलकुल निकाल दी जानी चाहिए। पाँच कुण्ड या नौ कुण्डों के गायत्री यज्ञ पर्याप्त हैं। अब कुण्डों की संख्या घोषित करने की कहीं कोई आवश्यकता नहीं समझी जानी चाहिए। “गायत्री महायज्ञ एवं युग-निर्माण सम्मेलन” का उल्लेख करना ही पर्याप्त है।

जीवन्त शाखा संगठनों में प्रायः बीस ज्ञानघट आसानी से चालू रह सकते हैं। इसकी आमदनी 60) मासिक अर्थात् 720) वार्षिक होती है। किफायत का बजट बना कर चला जाय तो 500) में छोटा वार्षिक आयोजन हो सकता है शेष 220) समय-समय पर होते रहने वाले छोटे आयोजनों के लिए पर्याप्त हो सकते हैं। वर्ष में दो पर्व बसन्त पंचमी और गुरुपूर्णिमा के हर जीवन्त शाखा में मनाये ही जाने चाहिए। छह-छह महीने बाद पड़ने वाले यह आयोजन स्थानीय परिजनों की मूर्छना को झकझोरने के लिए अच्छे उद्बोधन का काम करेंगे। वार्षिकोत्सव सर्वसाधारण तक मिशन के प्रति अनुराग और उत्साह उत्पन्न करने का काम देगा। इस प्रकार वर्ष में तीन समारोह जहाँ होंगे वहाँ से यह शिकायत कभी सुनने को न मिलेगी कि संगठन शिथिल हो गया और गतिविधियाँ ठण्डी पड़ गईं।

एक घण्टा समय दान का उपयोग निरन्तर तो झोला पुस्तकालय चलाने और ‘एक से दस’ कार्यक्रम के अनुसार विचार, विस्तार के लिए जन-सम्पर्क बढ़ाने के लिए है, पर उससे अतिरिक्त समय, निकालकर अथवा उसी में कटौती करके पारिवारिक आयोजनों का -क्रम जारी रखना इनमें से जिन्हें आता हो वे अपना स्थान अभी से सुरक्षित करा लें।

अगले वर्ष कन्या प्रशिक्षण में वे लड़कियाँ ली जायेंगी। जिन्हें महिला जागरण के लिए कुछ करने की उमंग तथा परिवार वालों की सहमति है। जिन्हें लोकसेवा में कोई रुचि नहीं, मात्र संगीत या उद्योग सीखने की निजी दृष्टि ही जिनमें प्रधान है उन्हें भेजने से समय और शक्ति व्यर्थ नष्ट होती है। इसी प्रकार जो लड़कियाँ मानसिक दृष्टि से अविकसित हैं उन्हें ठेल देना भी उचित नहीं। लड़कियों के अभिभावकों को उनका भोजन व्यय उठाना पड़ता है और संस्था को इस प्रशिक्षण की सुविधा सामग्री जुटाने में प्रायः हर लड़की पर 100) मासिक खर्च करना पड़ता है। इसकी उपयोगिता तभी है जब प्रतिभाशाली लड़कियाँ आयें और जो सीखा है उसका लाभ अपने अपने यहाँ महिला जागृति की उमंग उत्पन्न करने में लगा सकें।

इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही अगली जुलाई से आरम्भ होने वाले कन्या प्रशिक्षण सत्र में छात्राओं को प्रवेश दिया जायेगा। अच्छा तो यह है कि स्थानीय शाखाएँ ही इस प्रकार का चुनाव करके भेजे ताकि प्रशिक्षण पर लगने वाली शक्ति का समुचित लाभ समाज को मिल सके।

यह बसन्त पर्व हममें प्रत्येक के अन्तःकरण में नव जीवन संचार की उमंगें उत्पन्न करे, ऐसी प्रार्थना और अपेक्षा की जा रही है। शीत ऋतु में वृक्षों के पत्ते गिर जाते हैं। और वे पतझड़ के कुरूप ठूँठ जैसे दिखाई पड़ते हैं। किन्तु जब बसन्त की उमंग प्रकृति के अन्तराल में उभरती है तो हर वृक्ष में नई कोपलें फूटती हैं, नए पत्ते निकलते हैं, नये फल उमंगते हैं और देखते देखते वे मधुर फलों से लद जाते हैं, पशु-पक्षियों से लेकर कीट-पतंगों तक में उभरती हुई उमंगें प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती हैं और वे उसकी अभिव्यक्ति अपने अपने ढंग की उत्साहवर्धक हलचलों के साथ प्रकट करते दिखाई पड़ते हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों के भाव भरे अन्तःकरणों में उत्कृष्टतावादी प्राण की मूर्छना जागनी चाहिए और नव-जीवन का आलोक जगना चाहिए तभी इस बार के बसन्त पर्व की सार्थकता है। ‘इस बार’ शब्द में विशेष उद्बोधन है। साधना स्वर्ण-जयंती वर्ष की इसी अवसर पर पूर्णाहुति है। 24 दिन के जल-उपवास में प्रत्येक प्राणवान परिजन से निरन्तर एक ही अनुरोध किया जाता रहा है कि वे युग संध्या की इस विशिष्ट बेला में वे अपने विशिष्ट अवतरण का महत्व समझें लोभ, मोह की पशु-प्रवृत्तियों से ऊँचे उठें। वासना−तृष्णा के बँधनों से उतने न जकड़े रहें जितने कि पिछले दिनों जकड़े रहे हैं। उन्हें ढीले करें। उपलब्ध मनुष्य जीवन के महत्व, स्वरूप एवं लक्ष्य को समझें। शरीर निर्वाह की तरह आत्मा की आवश्यकताओं को भी समझें और पूरी करने के लिए भी कुछ कदम उठावें।

यदि साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष के-उपवास उद्बोधन के सन्दर्भ में परिजनों ने यदि कुछ उभार अपने भीतर भी अनुभव किया हो तो उसे ऐसे ही-पानी के बुलबुले तरह ठण्डा न हो जाने दिया जाय, वरन् उपलब्ध चिनगारी की तरह उसे अधिकाधिक ज्वलन्त किया जाय। उठती हुई भावनाओं का, यथार्थता और सशक्तता मूल्याँकन कर्म की कसौटी पर ही होता है। जिन अंतःकरणों में इस बसन्त पर्व पर ऐसी हलचलें उठें, उनके सामने उपरोक्त न्यूनतम कार्यक्रम प्रस्तुत है। इसमें से जिससे जितना बन पड़े उसे कर-गुजरने का साहस संजोये और संकल्पपूर्वक वैसा कुछ करने में जुट जाय, जिससे बचे खुचे जीवन की सार्थकता सिद्ध हो सके।


हम निराट एकाकी


हम निराट एकाकी (kavita)

हम जग में, निराट एकाकी।

होने को संसार भरा है।

एकाकी पथ-परम्परा है॥

एकाकी घूमती धरा है।

जिसकी रचना है जग सारा॥

है वह भी विराट, एकाकी।हम जग में निराट एकाकी॥

एकाकीपन की बेचैनी।

लगा रही है, स्वर्ग-नसैनी॥

प्यासी सजग, दृष्टियां पैनी।

खोज रही हैं आकुलता में॥

अपना तृप्ति-घाट, एकाकी।

हम जग में निराट एकाकी॥

रवि एकाकी, शशि एकाकी।

जग एकाकी, नभ एकाकी॥

कण-कण यहां विवश एकाकी।

शत-शत, सरिताओं का उद्गम॥

देखा, शैल-राट एकाकी।

हम जग में निराट एकाकी॥

गति का जनक, चरण एकाकी।

देखे जनम-मरण एकाकी॥

उगती नयी किरण एकाकी।

किस की यहां प्रतीक्षा करना-

पथ के हाट-बाट, एकाकी।

हम जग में निराट एकाकी॥

हम जग में निराट एकाकी॥

*समाप्त*