पदार्थ की तरह व्यक्ति भी मूलतः अनगढ़ होता है। उसे सँभालने, सजाने से उपयोगिता बढ़ती है और सौन्दर्य निखरता है। अनगढ़ मिट्टी पैरों के तले कुचलती रहती है, पर जब इसके परिश्रम करके बर्तन या खिलौने बनाये जाते हैं तो उस की विशेषता निखर कर आती है और उससे समुचित लाभ उठाया जाता है।
जंगली पौधे कुरूप झाड़ियाँ बनकर अस्त−व्यस्त फैले होते हैं, पर जब कुशल माली द्वारा उन्हें खाद, पानी दिया जाता है और निराया, गोड़ा छाँटा जाता है तो उन्हीं पौधों को सुरम्य उद्यान के रूप में देखा जाता है। कच्ची धातुओं की स्थिति उपहासास्पद होती है, पर जब उन्हें तपा−गलाकर शुद्ध किया जाता है और यन्त्र, उपकरण, आभूषणों का रूप दिया जाता है तो उनका सही मूल्याँकन होता है। मामूली से रासायनिक पदार्थ चिकित्सक के परिश्रम से बहुमूल्य औषधि बनते हैं।
व्यक्ति अपनी अनगढ़ स्थिति में नर−पशु से अधिक और कुछ नहीं। गये−गुजरे स्तर का मनुष्य कई बार तो पशुओं से भी अधिक घृणित और दुःखद परिस्थिति में डूबा पड़ा होता है। स्वयं कष्ट सहता और सम्बद्ध व्यक्तियों को दुःख देता है। भार बनकर जीता और भार हलका करने के लिए मृत्यु के मुख में चला जाता है। किन्तु उसे यदि सुविकसित, सुसंस्कृत बनाया जा सके तो लगता है कि वही ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति है।
साधना को दूसरे शब्दों में संस्कृति कह सकते हैं। शरीरगत, क्रियाशीलता, मनोगत, विचारणा और अन्तरात्मा देवत्व में परिणत किया जा सकता है, इसी विद्या का नाम साधना है। अपने आपकी साधना करके कोई भी सिद्ध पुरुष बन सकता है।
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स्वर्ण−जयन्ती साधना वर्ष में अखण्ड−ज्योति के प्रिय परिजनों को आत्मिक प्रगति के लिए−विशेष प्रयत्न करने का अनुरोध किया गया है। इस प्रयास के तीन पक्ष हैं− (1) उपासनात्मक विधि−विधान, जिसमें 45 मिनट नियमित जप ध्यान, हंसयोग तथा लययोग की प्रक्रिया सम्मिलित है। सोते और उठते समय का आत्मबोध चिन्तन और तत्वबोध मनन भी इसी से जुड़ा हुआ है। (2) जीवन के स्तर को परिष्कृत करने के लिए आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की प्रक्रिया (3) दिव्य−सत्ता केन्द्र से मिलने वाले विशिष्ट अनुदान जो साधकों की श्रद्धा एवं सम्वेदना के आधार पर ग्रहण किये जाते एवं फलित बनते हैं।
इस प्रक्रिया को यदि सही रीति से अपनाया जा सके तो यह विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि इस प्रक्रिया को अपनाने वाले एक वर्ष में ही अपने स्तर में उत्साहवर्धक परिवर्तन करेंगे।
जनवरी अंक में उपासना प्रक्रिया का प्रधान रूप से विवेचना एवं मार्ग−दर्शन किया जा चुका है। इस फरवरी अंक में जीवन−साधना की विचारणा एवं कार्य−पद्धति पर प्रकाश डाला गया है और उसे किस प्रकार कार्यान्वित किया जा सकता है, इसका व्यावहारिक परामर्श दिया गया है।
जीवन−साधना दर्शन एवं व्यवहार के चार आधार (1) आत्म−ज्ञान (2) ब्रह्म−ज्ञान (3)तत्व−ज्ञान (4) सद्ज्ञान। इन चारों के अन्तर्गत चारों वेदों में वर्णित ब्रह्म विद्या के समस्त ज्ञान−विज्ञान का समावेश हो जाता है।
प्रस्तुत अंक में इन्हीं चार विषयों को सरलतापूर्वक समझाने और उनका व्यावहारिक रूप बताने का प्रयत्न किया गया है। लेख इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए (1) आत्म−ज्ञान पर प्रकाश डालने वाले चार लेख हैं। प्रथम−आत्म−ज्ञान सबसे बड़ी उपलब्धि। द्वितीय−उत्थान−पतन से कुंजियां अपने हाथों में। तृतीय−सादगी आत्मिक प्रगति का प्रमुख आधार है। चतुर्थ- समय सम्पदा का उपयुक्त विभाजन। (2) ब्रह्मज्ञान दर्शन पर तीन लेख है। प्रथम− आस्तिकता का स्वरूप और आधार। द्वितीय−उपासना की आवश्यकता और प्रक्रिया। तृतीय−ईश्वर दत्त सम्पत्तियाँ और उनका सदुपयोग। (3) तत्वज्ञान के तीन लेख हैं। प्रथम−विकृत दृष्टिकोण ही नरक और परिष्कृत चिन्तन ही स्वर्ग है। द्वितीय−राग−द्वेष रहित सुसन्तुलित स्नेह, सद्भाव। तृतीय−महत्वाकाँक्षाओं की मोड़−जीवन का काया−कल्प (4) सद्ज्ञान के तीन लेख हैं। प्रथम −कर्मयोग की सर्वसुलभ साधना। द्वितीय−सफलता के लिए प्रखर कर्म और उसके लिए संकल्प बल चाहिए। तृतीय−अध्यात्म बनाम परमार्थ। इस प्रकार कुल 13 लेखों में जीवन−साधना के चारों विषयों का समावेश करके यथा सम्भव प्रयत्न किया गया है।
इसके बाद दो लेख नवरात्रि साधना सम्बन्धी हैं और दो लेख प्रशिक्षण सम्बन्धी। नवरात्रि सम्बन्धी दो लेखों में इस वर्ष चैत्र और अश्विन नवरात्रियों में 24 हजार गायत्री अनुष्ठान तपश्चर्या का महत्व और विधान बताया गया है, साथ ही अपेक्षा की गई है कि जिनमें साधनात्मक साहस हो वे अतिरिक्त समय निकाल कर और आत्म नियन्त्रण करके इस विशेष साधना का लाभ उठायें। इनका सम्पुट लग जाने से सामान्य साधना में वैसी ही सफलता मिलेगी, जैसे उपयुक्त समय पर वर्षा हो जाने से अच्छी फसल होने में विशेष सहायता मिलती है।
इस वर्ष हर निष्ठावान साधक को अपनी छोटी साधक मण्डली बनानी चाहिए और उसी प्रकार का प्रयोग आरम्भ करना चाहिए जैसे कि हम लोग किसी विशेष शक्ति के प्रतिनिधि बनकर प्रशिक्षण एवं अनुदान के माध्यम बनते हैं। शांति−कुंज के छोटे रूप में हजारों लाखों स्थान पर छोटी−छोटी सब श्रृंखलाएँ चलाने लगें तो ही यह समझा जा सकेगा कि इस वट−वृक्ष ने अपनी शाखा−प्रशाखाएँ बढ़ानी आरम्भ कर दीं और वह अक्षय वट की चिरस्थायी भूमिका निभा सकेगा।
शान्ति−कुँज के साधनासत्र हम लोगों की अनुपस्थिति में किस प्रकार चलेंगे कह नहीं सकते, पर जब तक उपस्थिति है तब तक यहाँ आकर कई तरह के प्राण अनुदान पाने की इच्छा हर परिजन की बनी ही रहनी चाहिए। जो आ सकें वे साधना सत्र अथवा वानप्रस्थ सत्रों में सम्मिलित होने का प्रयत्न करें। अपने घरों की महिलाओं और कन्याओं को भी इस शिक्षा से लाभान्वित होने दिया जाय। इसी की चर्चा अन्तिम दो लेखों में है। इस समूचे प्रशिक्षण को पूरे ध्यान और मननपूर्वक पढ़ा, समझा जायगा और प्रस्तुत प्रेरणाओं को अपनाया जायगा ऐसी अपेक्षा की गई है।
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आत्म ज्ञान सर्ग-
व्यक्ति स्वयं क्या है? जीवन का स्वरूप एवं लक्ष्य क्या है? जीवन के साथ जुड़ी हुई विभूतियों का सही उपयोग क्या है? इन प्रश्नों को उपेक्षा के गर्त में डाल देने से एक प्रकार की आत्म−विस्मृति छाई रहती है। अन्तःकरण मूर्च्छित स्थिति में जा पहुँचता है और जीवन नीति का गम्भीर निर्धारण हो नहीं पाता। इन्द्रियों की उत्तेजना ही प्रेरणा बनकर रह जाती है। प्रचलित ढर्रे का अनुकरण ही स्वभाव बन जाता है। अहंता की तृप्ति के इर्द−गिर्द ही तथाकथित प्रगति कामना चक्कर काटती रहती है। अन्य कीट−पतंगों की तरह नर−पशु भी पेट और प्रजनन के लिए किसी प्रकार जीवित रहता है मौत के दिन पूरे करता है। कटी पतंग और पेड़ से टूटे पत्ते हवा के झोंके के साथ दिशाविहीन स्थिति में जिधर−तिधर उड़ते और छितराते रहते हैं। हमारे जीवन भी इसी प्रकार जीने के लिए जीते रहते हैं। कोई उच्च उद्देश्य सामने न रहने और उस दिशा में कोई महत्वपूर्ण प्रयास न वन पड़ने पर जीवन का आनन्द मिल नहीं पाता। ऐसे ही रोते−कलपते, हारी−थकी जिन्दगी कट जाती है। बहुत बार तो अधिक सुख की आतुरता में नीति, मर्यादा, औचित्य और विवेक को भी उठाकर ताक में रख दिया जाता है और ऐसा मार्ग पकड़ा जाता है, जिसमें न केवल अपना वरन् सम्बद्ध व्यक्तियों और पूरे समाज का भी अहित होता है।
बाह्य−ज्ञान की तरह अन्तःज्ञान भी आवश्यक है। सुख−साधनों की अभिवृद्धि की तरह उपभोक्ता की विवेक दृष्टि का प्रखर होना भी आवश्यक है, अन्यथा सुख−साधनों का दुरुपयोग ही बन पड़ेगा और उससे विपन्नताएँ एवं समस्याएँ ही उत्पन्न होंगी। आत्म−ज्ञान की आवश्यकता भौतिक ज्ञान से भी अधिक है। अच्छी मोटर खरीदने के साथ−साथ अच्छे मोटर ड्राइवर की भी व्यवस्था करनी चाहिए अन्यथा पैदल चलने से भी अधिक कठिनाई अनाड़ी द्वारा चलाई जा रही मोटर में बैठने से उत्पन्न हो सकती है।
आत्म−ज्ञान की आवश्यकता यदि अनुभव की जा सके तो सबसे पहले यह विचार करना होगा कि हम हैं क्या ? और आखिर क्यों जी रहे हैं? इस तथ्य पर आत्मवेत्ता महामनीषियों ने अपने गम्भीर चिन्तन से जो निष्कर्ष निकाले हैं वे बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। उन्हें भारत को अपनाया था और उस आधार पर सर्वतोमुखी उत्कर्ष का लाभ उठाया था।
अणु क्या है? सुविस्तृत पदार्थ वैभव का एक छोटा सा घटक। आत्मा क्या है? परमात्मा सत्ता का एक छोटा−सा अंश। अणु की अपनी स्वतन्त्र सत्ता लगती भर है, पर जिस ऊर्जा आवेश के कारण उसका अस्तित्व बना है तथा क्रिया−कलाप चल रहा है, वह व्यापक ऊर्जा तत्व से भिन्न नहीं है। एक ही सूर्य की अनन्त किरणें दिग्−दिगन्त में फैली रहती हैं। एक ही समुद्र में अनेकानेक लहरें उठती रहती हैं। देखने में यह किरणें और लहरें स्वतन्त्र और एक दूसरे से भिन्न हैं। तो भी थोड़ी गम्भीर दृष्टि का उपयोग करने पर यह जाना जा सकता है कि यह भिन्नता कृत्रिम और एकता वास्तविक है। अलग−अलग बर्तनों के बीच रहने वाले आकाश में अपनी सीमा में बँधे होने के कारण अलग−अलग लगते हैं तो भी उनका अस्तित्व निखिल आकाशीय सत्ता से भिन्न नहीं है। पानी में अनेकों बुलबुले उठते और विलीन होते रहते हैं। बहती धारा में भँवर पड़ते हैं, दीखने में बुलबुले और भँवर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व प्रकट कर रहे होते हैं, पर यथार्थ में वे प्रवाहमान जलधारा की सामयिक हलचल मात्र हैं। जीवात्मा की सत्ता स्वतंत्र दीखती भर है, पर न केवल वह उसका अस्तित्व एवं स्वरूप भी व्यापक चेतना का एक अंश मात्र है
अध्यात्मवाद के इस एकता सिद्धान्त से यह निष्कर्ष निकलता है कि हम विश्व चेतना के एक अंश मात्र हैं। समष्टि ही आधारभूत सत्ता है, हम उसकी छोटी चिनगारी भर हैं। एकता को शाश्वत समझा जाय पृथकता को कृत्रिम। सब में अपने को और अपने को सब में समाया हुआ, देखा, समझा और माना जाय। सबके हित में अपना हित सोचा जाय। सबके दुःख में अपना दुःख माना जाय− सबके सुख में अपना सुख। सबका उत्थान अपना उत्थान, सबका पतन अपना पतन। यह मानकर चलने से सीमित परिधि में खुशी होने की क्षुद्रता घटती है और व्यापक क्षेत्र में सुख सम्वर्धन की योजना सामने आती है।
सीमा संकीर्णता को अवास्तविक मानने से व्यक्तिवाद पर अवलम्बित स्वार्थपरता घटती चली जाती है। अपने को बड़ी मशीन का एक छोटा पुर्जा भर समझने से यह बात ध्यान में रहती है कि उसकी निजी उपयोगिता भी पूरी मशीन का अंग बनकर रहने में ही है। अलग निकलकर अलग से−अलग बड़प्पन और सुखोपभोग की बात सोची जायगी तो यह पृथकता अपनाकर कुछ लाभ नहीं उठाया जा सकेगा। हानि ही होगी। घड़ी से अलग निकल कर एक पुर्जा बाजार में बिकने चला जाय तो उसे कोई दो कौड़ी का न पूछेगा और मिलने पर उपेक्षापूर्वक इधर−उधर पटक देगा, पर यदि वह पूरी घड़ी के साथ हो तो घड़ी को मिलने वाले सम्मान में वह भी समान रूप से भागीदार बना रहेगा। पृथकतावादी स्वार्थपरता पर अंकुश लगाने और समूहवादी गतिविधियाँ अपनाने में यह एकता का दर्शन बहुत काम करता है।
अपनापन ही प्यारा लगता है। यह आत्मीयता जिस पदार्थ अथवा प्राणी के साथ जुड़ जाती है, वही आत्मीय परमप्रिय लगने लगता है। अपनेपन का दायरा छोटा हो तो मात्र शरीर की−बहुत हुआ तो परिवार की सुख सुविधा सोची जाती रहेगी। वह थोड़ा −सा क्षेत्र ही अपना प्रतीत होगा और उतने तक ही प्रिय लगने की परिधि सीमित बनकर रह जायगी। यह क्षेत्र जितना अधिक बढ़ेगा, उतनी ही प्रियता की परिधि विस्तृत होती चली जायगी। सभी अपने लगेंगे तो अपना परिवार अत्यन्त सुविस्तृत बन जायगा। प्रिय पात्रों की मात्रा जितनी ही बढ़ती है उतना ही सुख सन्तोष मिलता है यदि व्यापक क्षेत्र में आत्मीयता विस्तृत करली जाय तो अपनेपन का प्रकाश बढ़ता जायगा और उस सारे क्षेत्र का वैभव परमप्रिय लगने लगेगा। उन्नति में−वृद्धि और विस्तार में हर किसी को गर्व गौरव अनुभव होता है। बड़े उत्तरदायित्व समझना ही बड़प्पन का चिन्ह है, यह अनुभूतियाँ उन्हें सहज ही मिल सकती हैं जो सीमा बन्धनों की तुच्छता को निरस्त करके समष्टि के साथ जुड़े हुए कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए कटिबद्ध होता है।
एकता का दूसरा निष्कर्ष यह निकलता है कि अंशी के सारे गुण सूक्ष्म रूप से अंश में विद्यमान रहते हैं अस्तु, परमात्मा की समस्त विशेषताएँ तथा सम्भावनाएँ आत्मा में विद्यमान और उन्हें विकसित करने के साधन जुटाकर उच्चतम स्तर का पहुँचाया जा सकता है। चिनगारी में वे सभी सम्भावनाएँ मौजूद रहती हैं जो दावानल में पाई जाती हैं। विशाल वृक्ष का सारा ढाँचा बीज के भीतर मौजूद है। प्राणी की आकृति और प्रकृति का अधिकाँश स्वरूप उस नन्हें से शुक्राणु में पूरी तरह मौजूद रहता है जो आँखों से दिखाई तक नहीं पड़ता। ब्रह्माण्ड के वह−नक्षत्र जिस नीति−रीति पर अपना क्रियाकलाप चला रहे हैं उसी का अनुकरण सौर−मण्डल करता है और उसी लकीर पर अणु−परमाणुओं के परिभ्रमण प्रयास चलते हैं। छोटे से परमाणु के भीतर एक पूरे सौर मण्डल का नक्शा देखा जा सकता है। एटम के भीतर काम कर रहे−इलेक्ट्रॉन, प्रोटान, न्यूट्रोन आदि की भ्रमण गतियाँ तथा कक्षाएँ लगभग वैसी ही हैं जैसी कि सौर मण्डल के ग्रह−उपग्रहों की।
इस तथ्य को समझ लेने के उपरान्त यह स्पष्ट हो जाता है कि जीव की मूलसत्ता−गुणों की दृष्टि से ईश्वर के समतुल्य ही है। इस सम्भावना को विकसित करना मनुष्य जीवन में ही सम्भव हो सकता है। अस्तु उच्च पद प्रदान करने में नियोजित की जाने वाली प्रतियोगिताओं की तरह ही अपना मनुष्य जीवन मिला हुआ है। परीक्षा में भाग लेने का अवसर जिन्हें मिला है वे अपनी प्रतिभा और पुरुषार्थ का परिचय देकर उत्तीर्ण होने का प्रमाण पत्र प्राप्त करते और प्रतियोगिता जीतकर उच्च पद प्राप्त करते हैं। ऐसा ही अवसर मनुष्य जीवन के रूप में भी मिला हुआ है। उसकी सार्थकता इसमें है कि अपने छोटे−से जीवात्मा स्तर को विकसित करके महात्मा−देवात्मा की कक्षाएँ पार करते हुए परम आत्मा−उत्कृष्टतम आत्मा बनने की पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करे। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श की उदात्त रीति−नीति अपनाने वाले ही इस महान् जीवन−लक्ष्य को प्राप्त करते देखे जाते हैं।
मनुष्य जीवन भगवान का प्राणी को दिया गया सबसे बहुमूल्य उपहार है। इससे अधिक महत्वपूर्ण चेतन संरचना उसके भण्डार में और कोई नहीं है। इसे अनुपम और अद्भुत कह सकते हैं। बोलना, सोचना, शिक्षा, कला, आजीविका−उपार्जन, भोजन निश्चिन्तता, वस्त्र, निवास, चिकित्सा, वाहन, परिवार, समाज, शासन, कृषि, पशु पालन, वैज्ञानिक उपकरण एवं अनेकानेक सुख−साधनों की सुविधा सृष्टि के अन्य किसी प्राणी को प्राप्त नहीं है। यहाँ वह प्रश्न उठता है कि सभी प्राणी ईश्वर के पुत्र हैं। एक समदर्शी पिता को अपनी सन्तानों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए और समान अनुदान देने चाहिए। फिर ऐसा क्यों हुआ कि मनुष्य को ही इतना अधिक दिया गया और अन्य प्राणी उससे वंचित रखे गये? यदि यह सब विभूतियाँ मात्र मौज मजा करने के लिए ही मनुष्य को मिली होतीं तो निश्चय ही इसे अन्याय और पक्षपात कहा जाता किन्तु परमात्मा न तो ऐसा है और न ऐसी नीति अपना सकता है जो उसके महान गौरव पर उँगली उठाने का अवसर देती हो। मनुष्य को अधिक विश्वस्त−अधिक प्रामाणिक और अधिक समझदार बड़ा पुत्र माना गया है और उसके हाथ में वे अतिरिक्त साधन सौंपे गये हैं, जिनके सहारे वह ईश्वर के इस सुरम्य उद्यान संसार को अधिक सुन्दर, अधिक सुविकसित, अधिक समुन्नत और अधिक सुसंस्कृत बना सके।
खजांची के पास ढेरों सरकारी रुपया रहता है, शस्त्र भाण्डागार का स्टोरकीपर सेना के हथियार और गोला−बारूद अपने ताले में रखता है, मिनिस्टरों को अनेकों सुविधा साधन एवं अधिकार मिले होते हैं। यह सब विशुद्ध रूप से अमानतें हैं। इन्हें निजी लाभ के लिए प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। खजांची, स्टोरकीपर, मिनिस्टर आदि यदि अपने अधिकार की वस्तुओं को निजी उपयोग में खर्च करने लगें तो यह उनका अपराध माना जायगा और दण्ड मिलेगा। ठीक इसी प्रकार मनुष्य को जो मिला है वह संसार को अधिक सुखी, समुन्नत बनाने के लिए मिली हुई धरोहर के रूप में है। उसमें से औसत नागरिक के स्तर का निर्वाह भर अपने उपयोग में लिया जा सकता है इसके अतिरिक्त समय, श्रम, ज्ञान एवं धन के, पद प्रभाव आदि के रूप में जो वैभव मिला है, उसका जितना अंश शेष रह जाता है उसे लोक−मंगल के लिए नियोजित किये रहना मनुष्य जीवन का दूसरा प्रयोजन है।
पूर्णता प्राप्ति की दिशा में अग्रसर होते हुए अनुकरणीय, आदर्श एवं पवित्रतम देव जीवन जिया जाय और शारीरिक, मानसिक एवं भौतिक उपलब्धियों में से न्यूनतम अंश अपने लिए लेकर शेष का परमार्थ प्रयोजनों में उपभोग किया जाय यही है ईश्वर प्रदत्त सुर−दुर्लभ मानव जीवन के अलभ्य अवसर का श्रेष्ठतम उपयोग। राजघरानों में यह प्रथा थी कि बड़े बेटे को राजगद्दी पर बिठाया जाता था और वह युवराज ही समयानुसार पिता के सारे उत्तरदायित्वों को वहन करता था। छोटे भाई−बहिनों की सुव्यवस्था का भार उसी के कन्धे पर रहता था समझा जाना चाहिए कि राजाधिराज परमेश्वर का ज्येष्ठ पुत्र−युवराज−मनुष्य है उसे अन्य जीवधारियों की तुलना में जितना कुछ अधिक मिला है वह सब विशेष उद्देश्य लिए है। उसे विलासिता, संग्रह, अहंकार के उद्धत प्रदर्शन एवं औलाद के लिए मुफ्त का धन छोड़ जाने जैसे हेय प्रयोजनों में खर्च नहीं किया जाना चाहिए। अमानत को- धरोहर को उसी प्रयोजन में लगाया जाना चाहिए जिसलिए वह मिली है।
शरीर और मन जीवन रूपी रथ के दो पहिये- दो घोड़े हैं। इन्हें काम करने के दो हाथ−आगे बढ़ने के दो पैरों से उपमा दी जा सकती है। अन्तःकरण की आस्था एवं आकाँक्षा के अनुरूप यह दोनों ही स्वामिभक्त सेवक से कार्य करने के लिए तत्पर रहते हैं। शरीर की स्वतन्त्र कोई सत्ता या इच्छा नहीं। वह जड़ है। इन्द्रियां भी जड़ पंचतत्वों से बनी हैं। अन्तःकरण में जैसी उमंगे उठती हैं, उसी दिशा में शरीर की क्रियाशीलता चल पड़ती है। इसी प्रकार मन भी अपनी मर्जी से कुछ नहीं करता। उसमें सोचने का गुण तो है, पर क्या सोचना चाहिए? वह निर्धारण करना अन्तःकरण का काम है। सज्जनों का चिन्तन एवं कर्त्तृत्व एक तरह का होता है और दुर्जनों का दूसरी तरह का। इसमें दोनों के शरीर और मन सर्वथा निर्दोष होते हैं। अन्तः प्रेरणा का निर्देश बजाते रहना भर उनका काम है। इसलिए शरीर को दुष्कर्म करने या मन को दुर्बुद्धिग्रस्त होने का जो दोष दिया जाता है वह अवास्तविक है। इन दोनों वाहनों को प्रेरणा एवं दिशा देने का काम अन्तःकरण रूपी सारथी का है।
शरीर में क्रिया, मन में विचारणा और अन्तरात्मा में भावना काम करती है। भावनाओं को ही श्रद्धा, आस्था, निष्ठा, मान्यता आदि के नाम से जाना जाता है। इन्हीं सबके समन्वय से आकाँक्षा उभरती है और फिर उसी की निर्देशित दिशा में शरीर और मन के सेवक काम करने के लिए कटिबद्ध हो जाते हैं।
आत्म−ज्ञान का अर्थ है अन्तरात्मा के गहन स्तर में वह अनुभूति एवं आस्था उत्पन्न करता रहे कि हम सत्, चित्त, आनन्द परमात्मा सत्ता के अविच्छिन्न अंग हैं। हमें पूर्णता प्राप्ति के लिए श्रेष्ठतम जीवन−क्रम अपनाना है और जो उपलब्ध है उसे लोकहित के लिए प्रयुक्त करना है। आत्म−ज्ञान की भूमिका में जगा हुआ जीवात्मा संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि को लाँघकर सब में अपने को और अपने में सबको देखता है, इसलिए उसके सामने व्यक्तिवादी, आपाधापी फटकने भी नहीं पाती, जो सोचता और करता है उसमें व्यापक लोकहित की−सदुद्देश्यों को कार्यान्वित करने की−भावना काम करती है। कहना न होगा कि आत्मबोध से लाभान्वित आत्माओं को प्रत्येक विचारणा और प्रत्येक क्रिया−पद्धति में मात्र आदर्शवादिता ही उभरती, छलकती दिखाई पड़ती है। ऐसे लोग अभावग्रस्त और संकटग्रस्त हो सकते हैं, पर अन्तःकरण में उन्हें असीम आनन्द और सन्तोष की अनुभूति हर घड़ी होती रहती है।
भगवान बुद्ध को जिस दिन आत्म−ज्ञान हुआ, उसी दिन से दिव्य मानव बन गये। जिस वट−वृक्ष के नीचे उन्हें आत्मबोध हुआ था उसकी टहनियाँ काट−काटकर उनके अनुयायी अपने−अपने क्षेत्रों में ले गये और वहाँ उसकी मूर्तिमान देवता के रूप में स्थापना की। इसका तात्पर्य है बुद्ध को सामान्य राजकुमार से भगवान बना देने का श्रेय उस आन्तरिक जागरण को ही दिया गया, जिसे आत्मबोध के रूप में पुकारते हैं। यह उपलब्धि जिसे भी मिल सकेगी वह उसी मार्ग पर चलने वाला और वैसा ही सत्परिणाम प्राप्त करने का अधिकारी माना जायगा।
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मनुष्य के कायिक और मानसिक संयंत्र में अद्भुत समताओं के एक से एक भण्डार भरे पड़े है। उनका सुव्यवस्थित सदुपयोग बन पड़े तो सामान्य समझा जाने वाला व्यक्ति भी ऐसी सफलताएँ प्राप्त कर सकता है जिन्हें चमत्कारी देव वरदानों की तरह गिना जाने लगे। दुर्भाग्य इसी बात का है कि मनुष्य बाहर की वस्तुओं का मूल्य और उपयोग तो जानता है, पर अपनी सामर्थ्य को उभारने तथा उसका सदुपयोग करने की जानकारी से प्रायः वंचित ही रहता है। पिछड़ी हुई दीन दयनीय परिस्थिति में पड़े रहने का प्रायः यही प्रधान कारण होता है।
अभीष्ट प्रगति के लिए साधन, परिस्थिति एवं सहयोग की भी आवश्यकता पड़ती है, पर उनका जुटाया जाना तथा जो उपलब्ध है उसे ठीक से काम में लाया जाना उन्हीं से बन पड़ता है जो अपने व्यक्तित्व को दिव्यवस्थित बनाने और अपनी क्षमताओं को परिष्कृत करने में सफल होते हैं। इतनी बात बने बिना सभी अनुकूलताएँ निरर्थक चली जाती हैं−कई बार तो सुविधा−साधनों का दुरुपयोग ही होता रहता है और उत्थान की अपेक्षा पतन का ही पथ−प्रशस्त होता है।
जितना ध्यान धन उपार्जन और वैभव प्रदर्शन का ताना−बाना बुनने पर दिया जाता है, उतना ही यदि आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म−परिष्कार की प्रक्रिया पर दिया जा सके तो निश्चय ही आत्म−विश्वास की मात्रा अनेकों गुनी बढ़ सकती है। प्रसुप्त शक्तियों को जगाने और बढ़ाने पर ध्यान केन्द्रित हो सके−अपने से लड़−झगड़कर शरीर और मन को आलस्य, प्रमाद त्यागने के लिए सहमत किया जा सके तो प्रतीत होगा कि किसी नये देव−दानव की सामर्थ्य अपने साथ जुड़ गई। बिखराव की बाल चंचलता यदि छोड़ी जा सके और निर्धारित लक्ष्य पर एकाग्र भाव से चला जा सके तो कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो सकते हैं।
आत्म−ज्ञान की सामान्य भूमिका में जागृत होने वाले सामान्य मनुष्य आत्म−विश्वासी, स्वावलम्बी और स्वाभिमानी पाये जाते हैं। अहंकारी होना एक बात है और आत्म−विश्वासी होना बिलकुल दूसरी। अहंकारी उद्धत होता है, दूसरों को अपने से तुच्छ समझता है, आत्म−प्रशंसा के लिए आतुर होने के कारण चापलूसों द्वारा ठगा जाता रहता है, मतभेद अथवा असहमति को सहन कर सकना उसके लिए संभव नहीं होता उसे बात−बात में आग−बबूला होते और दूसरों के साथ उद्धत व्यवहार करते देखा जा सकता है। आत्म−विश्वासी में इस प्रकार की एक भी विकृति नहीं होती। उसका आत्मबोध सिखाता है कि ईश्वर की तरह ही उसके पुत्र मनुष्य को भी शालीनता, सज्जनता, पवित्रता, सरलता, नम्रता, सहिष्णुता जैसी सत्प्रवृत्तियों का उत्तराधिकारी होना चाहिए। इतना ही नहीं आत्म−विश्वासी सोचता है कि किसी भी दिशा में बढ़ चलने की प्रचण्ड सामर्थ्य मानवी सत्ता में भरी पड़ी है, उसका उपयोग ठीक से न बन पड़ना ही पिछड़ापन है। मनोयोग और एकाग्र पुरुषार्थ का समन्वय हो सका तो फिर हाथ में लिए हुए कार्य उत्कृष्ट स्तर के बनते चले जाएंगे और क्रम का चलते रहना एक दिन उच्चस्तरीय सफलता प्रस्तुत किये बिना रहेगा नहीं। अहंकारी केवल उन्हीं कार्यों में रस लेता है जो सस्ती वाहवाही दिला सके। आत्म−विश्वासी, आत्म−गौरव को ध्यान में रखकर उनके आदर्शवादी प्रयत्नों को अपनाता है जिनसे आत्मा−परमात्मा और विश्वात्मा को सन्तोष मिल सके। इसी अन्तर को देखते हुए अहंकारी की निन्दा और आत्म−विश्वासी की प्रशंसा होती है। यों अन्तर बारीकी से ही पकड़ में आता है अन्यथा कई बार मोटी दृष्टि से देखने वालों को अहंकारी एवं आत्मा−विश्वासी एक जैसे दीखने लगते हैं।
उच्चस्तरीय आत्मबोध में मनुष्य अपने आपको ईश्वर का तेजस्वी अंश विश्वात्मा का घटक समझता है और सुर−दुर्लभ मानव जन्म का लक्ष्य पूरा करने वाले व्यक्तित्व को उत्कृष्ट बनाने वाले−लोक मंगल का प्रयोजन पूरा करने वाले कार्यों में ही हाथ डालता है। अन्य किसी भटकाव में उसका मन नहीं फिसलता। सामान्य स्तर का आत्म−विश्वास भी इसी आत्मबोध का प्रथम चरण है। इस प्रवेश द्वार में पैर रखते ही मनुष्य उत्थान और पतन के उत्तरदायित्वों को अपने कन्धे पर ओढ़ता है। दूसरों को दोष देने अथवा दूसरों से याचना करने की ओछी दृष्टि उसके पास नहीं फटकती। वह सोचता है संसार में शुभ अशुभ सभी कुछ है उसमें अपना चुम्बकत्व अनुकूल स्तर के व्यक्तियों तथा साधनों को एकत्रित करेगा। यदि अपना स्तर सुधार लिया जाय तो दूसरों के दोषों से अपनी हानि न्यूनतम मात्रा में ही होगी। इसी प्रकार अन्यों का सहकार तभी मिलेगा जब वे पात्रता की परख कर लेंगे। कुपात्रों और अप्रामाणिक व्यक्तियों को न तो कहने लायक संसार का सहयोग मिलता है और न देवी अनुग्रह। तथ्य को समझाते हुए वह अपने में वे विशेषताएँ उत्पन्न करने में संलग्न होता है, जिनके कारण सफलता खिंचती चली आती है, उन दुर्बलताओं से जूझता है जो अवरोधों और संकटों का प्रधान कारण बनी होती है।
आत्म−हीनता की ग्रन्थि से ग्रसित व्यक्ति अपनी दुर्बलताओं को समझने और उन्हें निरस्त करने का साहस नहीं जुटा पाते। गहराई में प्रवेश करके आत्म−निरीक्षण करना उनसे बन नहीं पड़ता, अस्तु सामने प्रस्तुत प्रतिकूलताओं का सारा दोष किन्हीं अन्य व्यक्तियों या परिस्थितियों पर थोपकर जी हलका करते हैं। कोई नहीं दीखता तो बेचारे ग्रह−नक्षत्रों को, भाग्य को, दैवी प्रकोप को, समय की विपरीतता को कोसने की आत्म प्रवंचना अपनाने लगते हैं। दूसरा काम उनका यह होता है कि अभीष्ट सफलताओं के लिए−जिस−तिस की कृपा प्राप्त करने के लिए उसके सामने दीनता भरी याचना करते फिरें। अपने पौरुष पर जिन्हें विश्वास नहीं उन्हीं को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में भिक्षावृत्ति का आश्रय लेते पाया जाता है। रोटी, पैसा आदि माँगने वाले समर्थ भिक्षुकों की निन्दा होती है यह जानते हुए भी कितने ही लोग सम्पन्न लोगों की चापलूसी अथवा देव−दानवों की पूजा−पत्री में कई प्रकार के अनुदान वरदान पाने की अपेक्षा करते रहते हैं। ऐसे लोगों का कितना मनोरथ पूरा होता है यह कहना कठिन है, पर यह निश्चित है कि इससे आत्म−गौरव और आत्म−विश्वास को भारी क्षति पहुँचती है। दीनताग्रस्त व्यक्ति यदि कहीं से कुछ प्राप्त कर भी ले तो परावलम्बन अपनाने के कारण अन्ततः घाटे में ही रहता है। प्रगति की अगणित संभावनाएं, आत्म−विश्वास के साथ जुड़ी होती हैं, यदि उस गरिमा को दुर्बल बना दिया गया तो फिर छुट−पुट उपलब्धियों का क्या मूल्य रह गया? सुविधाएँ आती और चली जाती हैं, पर जो भावनात्मक क्षति पहुँचती है उसकी तुलना में अनुदान, वरदान का लाभ तुच्छ ही बैठता है।
संसार में आदान−प्रदान का नियम तर्क संगत, नैतिक और व्यावहारिक है। पात्रता के अनुरूप सफलताएँ और उपलब्धियाँ मिलने का शाश्वत नियम अनादिकाल से चलता आ रहा है, हमें उतने से ही सन्तुष्ट रहना चाहिए। किसी से कुछ पाना हो तो उसका मूल्य चुकाने के लिए तत्पर रहना चाहिए। सेवा के बदले में यश पाया जाय तो हर्ज नहीं। ऐसे ही धक्केशाही के बल पर नेता बन बैठना अनुचित है। अपनी योग्यता, कुशलता और श्रमशीलता का स्तर बढ़ाते हुए धन उपार्जन का औचित्य है, पर यदि जेबकटी का धन्धा अपनाया जा रहा हो तो उसे उपार्जन नहीं कह सकते। इसी प्रकार व्यक्तित्व के परिष्कार एवं लोक−मंडल में निरत रहने की ऋषि भूमिका निबाहने वाले दैवी अनुग्रह के अधिकारी हो सकते हैं, पर मन्त्र−तन्त्र की तरकीबें भिड़ाकर जो दैवी शक्तियों की अनुकम्पा चाहते हैं, वे यथार्थता को समझते नहीं और सस्ते जादुई लाभ का सपना देखते हैं। यही बात सिद्ध पुरुषों का अनुग्रह, आशीर्वाद प्राप्त करने के सम्बन्ध में भी है। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द को, समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी को, चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को, गाँधी ने जवाहरलाल को अपना सच्चा आशीर्वाद दिया था, पर देने से पहले उन्होंने यह विश्वास भली प्रकार कर लिया था कि उनके अनुदान का उपयोग किसी कुपात्र द्वारा व्यक्तिगत स्वार्थ साधन के लिए तो नहीं किया जायगा। कहना न होगा कि परिष्कृत व्यक्तित्व से कम कीमत पर कभी किसी समर्थ सिद्ध पुरुष की वास्तविक अनुकम्पा मिल नहीं सकती।
इन तथ्यों पर जितना अधिक विचार किया जाय उतना ही यह निष्कर्ष निकलेगा कि अपनी भावनात्मक, बौद्धिक एवं क्रियापरक स्थिति को जितना प्रखर बनाया जा सकेगा उसी अनुपात से जन−साधारण का अथवा दैव शक्तियों का सहयोग मिलता चला जायगा। संसार में जितने भी ऐतिहासिक महामानव हुए हैं उनमें से प्रत्येक की प्रगति एवं महानता का विश्लेषण करने पर इसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि उनने अपने गुण, कर्म, स्वभाव में असाधारण उत्कृष्टताएँ उत्पन्न कीं और साथियों की तुलना में अपने को अधिक सत्पात्र सिद्ध करके विशिष्ट जन सहयोग एवं सम्मान प्राप्त कर सके। यही है उन सब की प्रगति का प्रधान रहस्य।
अपनी क्षमताओं का दुरुपयोग करके−दुष्प्रवृत्तियों से ग्रसित होकर ही हम अनेकानेक कठिनाइयों के शिकार बनते हैं। चटोरेपन, असंयम और अस्त−व्यस्त, रहन−सहन अपनाने पर ही पाचन तन्त्र और रक्त शुद्धि का सन्तुलन बिगड़ता है। यहीं से अनेकानेक शरीरगत रोगों का सिलसिला चल पड़ता है। सृष्टि के प्रकृति अनुगामी जीव−जन्तुओं की मृत्यु तो समयानुसार होती है, पर उन्हें बीमारियों की व्यथा नहीं भोगनी पड़ती। असंयम की कीमत पर रुग्णता खरीदी जाती है। यदि आहार−विहार की अस्त−व्यस्तता सुधार ली जाय तो खोया हुआ स्वास्थ्य पुनः वापस लौटाया जा सकता है। इस मोटी बात को मानने के लिए लोग तैयार नहीं होते, असंयम नहीं छोड़ते मात्र दवादारु के जादुई प्रयोगों से स्वस्थ रहने की अपेक्षा करते हैं। राजमार्ग को छोड़कर सस्ते में बड़े लाभ पाने के इच्छुक पगडंडियों में भटकते तो रहते हैं पर पाते कुछ नहीं।
चिन्तन का सही तरीका मालूम न होने से लोग जीवन समस्याओं पर उथले, ओछे और गलत ढंग से विचार करते हैं फलतः कठिनाइयों के समाधान तो मिलते नहीं उलटे चिन्तन की विकृति से ऐसी गतिविधियाँ बन पड़ती हैं जो विपत्ति को और अधिक बढ़ा देती हैं। चिन्ता, निराशा, उद्वेग, आवेश, भय, आशंका, सनक जैसे विकृत चिन्तन एवं काम−क्रोध, लोभ−मोह, मद−मत्सर जैसे दुर्गुण मिल कर किसी का भी मस्तिष्क अर्द्धविक्षिप्त जैसा बना सकते हैं, ऐसे व्यक्तियों का सोचना और करना प्रायः अनुपयुक्त ही होता है। फलतः उनके व्यवहार एवं प्रयासों की उलटी प्रतिक्रिया होती है। और झल्लाहट से ग्रसित व्यक्ति प्रायः इसी प्रकार के बड़बड़ाये मानसिक स्तर के होते हैं।
अच्छी मोटर भी अनाड़ी ड्राइवर के हाथ में जाकर दुर्घटना ग्रसित हो जाती है और उसमें बैठी सवारी को यात्रा को जल्दी और सुविधापूर्वक पूरी करने के स्थान पर उलटे चोट लगने का संकट सहना पड़ता है। शारीरिक मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक स्तर पर आये दिन जो संकट सामने खड़े रहते हैं, उनमें से संयोगवश तो कुछ अपवाद स्वरूप ही आते हैं अधिकाँश ऐसे होते हैं, जिन्हें दुर्बुद्धिजन्य ही पाया जायगा। यदि पारस्परिक सद्व्यवहार निर्वाह के सूत्र अभ्यास में रह सके होते तो प्रत्येक गृहस्थ में पारस्परिक स्नेह सद्भाव का स्वर्गीय वातावरण बना हुआ होता और सब लोग स्वल्प साधनों में भी प्रचुर आनन्द, उल्लास का लाभ ले रहे होते। यदि दोनों पक्ष सज्जन हो तब तो कहना ही क्या, पर यदि एक समझदार हों तो दूसरे नासमझ को निभा सकता है पारिवारिक स्नेह सौजन्य के निर्वाह में प्रायः शालीन सज्जनता का अभाव ही कलह बन कर खड़ा रहता है और उस आग में घर के हर सदस्य को जलना पड़ता है गरीबी या दूसरे कारण उतने विक्षोभकारी नहीं होते जितना कि उच्चस्तरीय दृष्टिकोण एवं व्यक्तित्व का अभाव।
सन्तानों के सम्बन्ध में आमतौर से लोगों को यही शिकायत रहती है कि उनके बालक कुसंस्कारी सिद्ध हो रहे हैं, उनके कारण समस्यायें उत्पन्न हो रही हैं। आयु वृद्धि के साथ बच्चे घर वालों की सहायता करने के स्थान पर उलटे संकट खड़े करते हैं। इसमें अन्य कारण कम और घरेलू वातावरण में भ्रष्ट परम्पराओं का घुसे होना मुख्य होता है। बच्चे उपदेश नहीं सुनते अनुकरण करते हैं, उनमें वातावरण के भीतर काम कर रही विचारणाओं और भावनाओं को पकड़ने की अद्भुत क्षमता होती है परिवार के लिए कितने ही सुविधा साधन एकत्रित कर दिये जाएं पर यदि कुसंस्कारी वातावरण भरा पड़ा है तो दुष्टता ही पनपेगी और उससे अन्ततः कौटुम्बिक विनाश के दृश्य ही सामने जाएंगे।
यही बात अर्थ सन्तुलन के सम्बन्ध में है। आलसी एवं अयोग्य व्यक्ति थोड़ा सा ही कमा पाते हैं जो कमाते हैं उसे भी अनुपयुक्त ढंग से खर्च करते हैं, फलतः दरिद्रता सदा ही घेरे रहती है। अधिक उपार्जन करने वाले भी दुर्बुद्धिग्रस्त होने के कारण प्राप्त धन का अपव्यय एवं दुरुपयोग करते हैं और सम्पत्ति का सुख पाने की अपेक्षा उलटे उससे विपत्ति खरीदते हैं।
कुशलता, कला, प्रतिभा, उच्च पद आदि पाने पर भी दुष्प्रवृत्ति ग्रस्त व्यक्ति उन विभूतियों का समुचित लाभ नहीं ले सकता वरन् अपना और दूसरों का विनाश ही अधिक करता है। स्पष्ट है कि आन्तरिक स्थिति गई−गुजरी हो तो साधन सुविधाओं की प्रचुरता भी सुख−शान्ति नहीं दे सकती, इसके विपरीत सद्गुणी व्यक्ति स्वल्प साधन होने पर भी उनके सदुपयोग से प्रगति का पथ-प्रशस्त करते चलते हैं।
शारीरिक असमर्थता के कारण व्यक्ति उतने दुःखी नहीं रहते जितने कि आन्तरिक दुर्बलताओं से ग्रस्त होने पर। कितने ही दुर्बल, रुग्ण एवं अपंग व्यक्ति आन्तरिक प्रखरता के कारण उतना कार्य कर सके जितना सशक्त शरीर वालों के लिए भी सम्भव नहीं। वस्तुतः अन्धे हैं; जिन्हें अज्ञान अविवेक ने घेर रखा है। अहंकारी और दीर्घसूत्री ही बहरे हैं जो अन्तःकरण की पुकार और इतिहास के निष्कर्षों पर कान नहीं धरते। गूँगे वे हैं जो कुण्ठा ग्रस्त हैं जो आन्तरिक अभिव्यक्तियों को व्यक्त नहीं कर सकते। दूसरों के सहारे जीने वाले परावलम्बी व्यक्ति मृतक कहे जा सकते हैं। जीवित तो अपने पैरों खड़े होते−अपने सहारे चलते हैं तथा दूसरों का बोझ भी अपने कन्धों पर उठा कर चलते हैं, जो अपने बोझ को आप न उठा सकें दूसरों का सहारा तकें उन्हें तात्विक दृष्टि से मृतक समझा जा सकता है। शरीरों का अन्तर कोई अन्तर नहीं−साधनों के न्यूनाधिक होने से भी कुछ बनता बिगड़ता नहीं। वास्तविक अन्तर तो मनःस्थिति का है। तुच्छता और महानता उसी पर अवलंबित रहती है।
कस्तूरी का हिरन सुगन्ध की तलाश में चारों ओर दौड़ता है, पर समाधान तभी होता है जब उसका केन्द्र अपनी ही नाभि में होने की बात समझ में आ जाती है। संसार में सौन्दर्य और देखने योग्य बहुत कुछ है, पर अपनी आँख की पुतली सही होने पर ही यह सारे दृश्य देखे जा सकते हैं। संसार में प्रेरक और आकर्षक शब्दों की कमी नहीं पर वे सुने तभी जा सकते हैं जब अपने कानों की झिल्ली सही हो। अपना मस्तिष्क खराब हो जाय तो फिर संसार में सब कुछ बेतुका और अटपटा ही लगेगा। यह तथ्य बताते हैं कि बाहर बहुत कुछ होते हुए भी उसका लाभ उसी को मिल सकता है, जिसकी अपनी गृहण शक्ति ठीक हो।
संसार में कौन व्यक्ति या पदार्थ प्रिय हैं, इसका कोई निर्णय नहीं हो सकता। अपनी आत्मीयता एवं रुचि जिस पर भी आरोपित हो जायगी वही प्रिय लगने लगेगा। टार्च की रोशनी जिस पर भी फेंकी जाती है वही चमकने लगती है। अपनापन जिस पर भी आरोपित कर दिया जाय वही प्रिय लगने लगेगा। इसे समेट लेने पर वही सब कुछ उपेक्षणीय लगने लगेगा।
घास खाकर गाय दूध बनाती है−घोड़ा लीद बनाता है−सुअर चर्बी उत्पन्न करता है। एक ही वस्तु कई तरह के परिणाम उत्पन्न करती है, यह उन प्राणियों की पाचन तन्त्र की स्थिति में भिन्नता के कारण ही होता है। बीमारियों के बारे में सोचा जाता है कि वे बाहर से आती हैं, पर वास्तविकता यह है कि वे भीतरी सड़न एवं गतिरोध के कारण ही पैदा होती और पनपती हैं। जीवनी शक्ति से भरे पूरे लोग छूत वाले विषाणुओं के सम्पर्क में रहते हुए भी निरोग बने रहते हैं।
परमात्मा अपनी विशाल दुनिया का मालिक है, पर आत्मा को भी अपने सत्ता क्षेत्र में पूर्ण आधिपत्य प्राप्त है मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है अपनी दुर्बुद्धि से उसे बिगाड़ सकता है और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाकर बना भी सकता है। अपने कमरे में सूर्य की धूप एवं पवन देव अपनी मर्जी के बिना प्रवेश नहीं कर सकते। यदि दरवाजे खिड़कियाँ बन्द कर दिये जाएं तो प्रचण्ड धूप एवं तेज हवा का प्रवेश भी भीतर न हो सकेगा। केवल वही स्टेशन अपने रेडियो पर सुना जाता है जिस पर हम सुई लगाते हैं। अन्य स्टेशनों के ब्रॉडकास्ट हमारे कानों तक नहीं आ सकते भले ही वे कितने ही जोरदार प्रसारण चला रहे हों।
इतिहास के पृष्ठ ऐसे उदाहरणों से भरे पड़े हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि आन्तरिक प्रखरता के बस पर लोगों ने अभावग्रस्त एवं विपरीत परिस्थितियों को चीरते हुए प्रगति के पथ−प्रशस्त किये हैं और अनेकानेक अवरोधों को चीरते हुए उन्नति के उच्च तक पहुँचे हैं। इसके विपरीत हर प्रकार की सुविधाएँ होते हुए भी ऊपर उठने की बात तो दूर उलटे नीचे ही गिरते चले गये हैं।
एक साधक अपनी श्रद्धा के बल पर धातु और पत्थर से बनी प्रतिमाओं से चमत्कारी प्रतिक्रिया उत्पन्न कर लेता है, दूसरा अपनी अनास्था के कारण जीवन्त देव मानवों के अति समीप रहने पर भी कोई लाभ नहीं ले पाता। एकलव्य ने मिट्टी से बनी द्रोणाचार्य प्रतिमा से वह अनुदान प्राप्त कर लिया था जो पाण्डव सचमुच के द्रोणाचार्य से भी प्राप्त नहीं कर सके थे। मीरा के ‘गिरधर गुपाल’ और रामकृष्ण परमहंस की ‘काली’ में जो चमत्कारी शक्ति थी वह उनके श्रद्धारोपण से ही उत्पन्न हुई थी और उन्हीं के लिए फलप्रद सिद्ध होती रही। उन्हीं प्रतिमाओं से अन्य वैसा लाभ नहीं उठा सकते। यन्त्र−तन्त्रों की सिद्धि में विधि विधानों की इतनी भूमिका नहीं होती जितनी साधक के श्रद्धा विश्वास की। भूत−प्रेतों से लेकर देवी−देवताओं तक के जो परिचय सामने आते हैं उनमें व्यक्ति के अपने विश्वास ही फलित हुए पाये जाते हैं। अमुक चिकित्सा से लाभ होना अथवा अमुक चिकित्सक का सफल होना बहुत करके रोगी के विश्वास पर निर्भर रहता है।
विपुल वर्षा होने पर भी पत्थर की चट्टानें एक बूँद पानी भी नहीं सोख पातीं। इसके विपरीत रेगिस्तानी गर्मी में हरे रहने वाले पेड़−पौधे कहीं से भी अपने निर्वाह के लिए आवश्यक नमी उसी उष्ण वातावरण में से उपलब्ध करते रहते हैं। स्वाति की वर्षा से केवल वे ही सीपें लाभ उठा पाती हैं जिनके मुँह खुले होते हैं। सरकारी छात्रवृत्ति उन्हीं को मिलती है जो परिश्रमपूर्वक पढ़ते और अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होते हैं। बाहरी सहायता उपलब्ध होना न होना उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना कि व्यक्ति की निजी पात्रता एवं प्रखरता का होना।
आत्मबोध का तात्पर्य है अपने में सन्निहित शक्ति एवं सम्भावना से परिचित होना। आत्मिक प्रगति का अर्थ है आन्तरिक दोष दुर्गुणों को निरस्त करके सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को समुन्नत बनाने के उपक्रम में निरन्तर निरत रहना। इन सत्प्रयत्नों से मानवी और दैवी दोनों प्रकार की सहायताएँ अनायास ही उपलब्ध होती रहती हैं।
ब्रह्म−विद्या का सबसे महत्वपूर्ण निर्देश यह है कि अपने आपको जानो, अपने को समझो और अपने को सुधारो। ‘आत्मा वारे श्रोतव्य, ज्ञातव्य, निदिध्मसितव्य’ की उक्ति में यही उद्बोधन भरा पड़ा है। गीता कहती है− ‘‘अपना उद्धार आप करो’’ अपने आपको गिराओ मत। ‘उद्धरेत् आत्मनात्मनं−नात्मानं अवसादयेत्’ की सूक्ति में यही ब्रह्म वाक्य गूँजता है। मित्रों को ढूँढ़ने और शत्रुओं को भगाने के लिए अन्यत्र कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है वे अपने ही भीतर डेरा डाले बैठे हैं− ‘‘आत्मैव आत्मन बन्धु आत्मैव रिपुरात्मन’’ का गीता कथन अक्षरशः सत्य है। अपने पौरुष पुरुषार्थ से अपनी विवेकशीलता और दूरदर्शिता से ही प्रगति के द्वार खुलते हैं। अपनी ही अकर्मण्यता, अदूरदर्शिता और अनास्था ही हमें ले डूबती है अपने उत्थान परिष्कार की तथा पतन पराभव की कुंजियां अपने ही हाथों में हैं, दोनों में से चाहे जिसका द्वार स्वेच्छापूर्वक खोला जा सकता है। यह तथ्य समझ में आ सके तो प्रतीत होगा कि अपना आपा ही कल्प−वृक्ष है जिसकी जिस कामना से उपासना की जाय, उसी के अनुरूप वरदान मिलते चले जायेंगे। अन्य किसी देवता की उपासना भले ही निष्फल चली जाय, पर जीवन देवता की आत्म−निर्माण साधना निश्चित रूप से अभीष्ट सिद्धि देकर ही रहती है।
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जीवन−साधना का एक अति महत्वपूर्ण अंग है−सादगी। ‘‘सादा जीवन उच्च विचार’’ की उक्ति सोलह आने सत्य है। उच्च विचारों को जीवन−क्रम में स्थान मिल सके इसके लिए सादगी की नीति अपनाया जाना नितान्त आवश्यक है।
शेखीखोर, आडम्बरी, अपव्ययी, ठाट−बाट पसन्द व्यक्ति अपनी आवश्यकताएँ अत्यधिक बढ़ा लेते हैं। उन्हें पूरा करने के लिए ढेरों समय, ढेरों मनोयोग और ढेरों पैसा खर्च करना पड़ता है। कई बार तो यह भार अपनी स्थिति से बाहर हो जाता है, तब उसे पूरा करने के लिए अवाँछनीय अथवा अनैतिक कार्य करने पड़ते हैं। ठाट−बाट की जिन्दगी कितनी बोझिल होती है यह किसी से छिपा नहीं है। इस घोर महँगाई के जमाने में सीमित आय वाले अपना गुजारा ही ईमानदारी की कमाई से कर सकते हैं। विलासिता के साधन कितने महँगे होते हैं उसे कौन नहीं जानता? अमीरी की पहचान ही यह है कि जितने अधिक महंगे उपकरण सम्भव हों उन्हें उपयोग में लाया जाय। अधिक खर्चीले मनुष्य को ही अमीर माना जाता है और इन दिनों लोग अमीरी के प्रदर्शन में ही शान−शौकत, इज्जत समझते हैं। जैसे भी बन पड़े बिना नीति−अनीति का विचार किये−अधिक पैसा बटोरने में संलग्न रहते हैं ताकि ठाट−बाट बनाने और अमीरों जैसे खर्च कर सकने के साधन प्राप्त कर सकें।
कहना न होगा कि यह नीति शरीर, मन और धन की शक्ति को अधिकाधिक निचोड़ते रहने पर ही कार्यान्वित हो सकती है। बहुत करके तो उतना ईमानदारी से बन भी नहीं पड़ता, अस्तु प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बेईमानी का ही आश्रय लेना पड़ता है। फिर तृष्णा का कोई ठिकाना नहीं, अमीरी उपयोग की कोई सीमा नहीं, भौतिक महत्वाकाँक्षाओं का कहीं अन्त नहीं। जितना अधिक मिलता जाता है, उतनी ही हविश बढ़ती जाती है और बढ़ते−बढ़ते वह जलन का रूप धारण कर लेती है। उसमें झुलसते रहने वाला व्यक्ति हर समय अशान्त, उद्विग्न बना रहता है। इस स्थिति में उच्च आदर्शवादी चिन्तन कर सकना, योजना बनाना तथा कार्यान्वित कर सकना एक प्रकार से असम्भव ही हो जाता है।
अध्यात्म का एक अंग पूजा−पाठ भी है, पर उसे उतनी छोटी परिधि में सीमित नहीं किया जा सकता। वस्तुतः वह एक जीवन दर्शन है। उसके साथ अमीरी, विलासिता, महत्वाकाँक्षा प्राप्त करने जितना ही श्रम, समय एवं मनोयोग लगाना पड़ता है। यह तभी सम्भव है जब भौतिक आकर्षणों से उन्हें बचाया जा सके। अस्तु अध्यात्म जीवन में प्रवेश करने की एक अनिवार्य नीति सदा से यही चलती रही है कि उच्च विचारों के अध्यात्म मार्ग पर चलने वाला सर्वप्रथम यह निश्चय करे कि उसे सादगी की नीति अपनानी है और गुजारे भर के सादा जीवन में सन्तुष्ट रहना है। इसका अर्थ यह नहीं कि उसे पुरुषार्थ का परित्याग करके अकर्मण्य बनना होता है−अथवा दरिद्रता में सन्तोष करना पड़ता है। सच तो यह है कि अध्यात्मवादी को भौतिकवादियों से भी कहीं अधिक सजगता, सक्रियता एवं तत्परता बरतनी पड़ती है। उसका पुरुषार्थ और भी प्रचण्ड होता है। किन्तु यह सम्भव तभी होता है जब भौतिक महत्वाकाँक्षाओं से−अमीरी, ठाट−बाट और तृष्णा उद्विग्नता के जाल−जंजाल इतने बढ़े−चढ़े होते हैं कि उनकी पूर्ति में अपनी सारी शक्ति झोंक देने पर भी काम नहीं चलता। अनीति पर पूरी तरह उतारू हो जाने पर भी जो मिलता है वह भी उसी मिट्टी में जल जाता है, फिर भी कमी ही अनुभव होती है। इस विपन्न स्थिति में पड़े हुए अध्यात्म का जीवन−दर्शन अपनाने एवं तदनुरूप आचरण करने में सफल नहीं हो सकते।
हमें एक को प्रमुख और एक को गौण मानकर चलना होगा। यदि विलासिता, तृष्णा और अहंता की ही येन−केन प्रकारेण पूर्ति करनी है तो उसमें अध्यात्म का विडंबनापूर्ण राई−रत्ती स्थान इतना भर हो सकता है कि मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए जादू−मन्तर की तरह पूजा−पाठ करके देवी−देवताओं से मनोवाँछाएँ पूरी करने की मनौती मनाते रहा जाय। अभीष्ट मनोरथ पूरे न होने पर ऐसे ही लोभ पूजा−पाठ और भगवान के प्रति घोर अश्रद्धा व्यक्त करते भी देखे जाते हैं। सन्तों और सिद्ध पुरुषों के इर्द−गिर्द भी वे मनोकामना पूर्ति का वरदान पाने की दृष्टि से ही चक्कर कटाते और उन्हें प्रसाद पुष्प जैसे सस्ते उपहार देकर अपनी काम बना लेने की तरकीबें ढूँढ़ते रहते हैं। वस्तुतः उनकी पूजा−पत्री जैसी विडम्बनाएँ भी भौतिक उद्योगों की पूर्ति के लिए होती हैं। वास्तविक अध्यात्म का तो स्पर्श तक करने का साहस नहीं करते।
इसके विपरीत अध्यात्म−जीवन के क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को यह सोचना पड़ता है कि उसे आत्मिक प्रगति एवं जीवन−लक्ष्य की पूर्ति के लिए अधिक सोचना एवं अधिक करना पड़ेगा। शक्तियाँ सीमित हैं। उन्हें एक दिशा में लगाया जायगा तो दूसरी दिशा में स्वभावतः कमी पड़ेगी। तराजू का एक पलड़ा भारी होगा तो दूसरा ऊपर उठ जायगा। महत्वाकाँक्षाएँ जिस भी दिशा में बहेंगी उससे विपरीत दिशा में स्वभावतः न्यूनता पड़ेगी। अध्यात्म जीवन धारा में बहने वालों के लिए सम्भव नहीं कि वे अमीरी ठाट−बाट का उपयोग कर सकें। एक तो लक्ष्य संलग्नता के कारण उन्हें इतना अवकाश ही नहीं मिलता कि ठाट−बाट के महंगे साधन जुटाये जा सकें और भविष्य की रावण, हिरण्यकश्यप जैसी महत्वाकाँक्षी योजनाएँ पूरी की जा सकें। दूसरे आध्यात्मिक व्यक्तियों के सामने एक बात यह भी आती रहती है कि वे अपने आस−पास बिखरे पड़े, पीड़ा और पतन के करुणा भरे दृश्य देखकर पिघल पड़ते हैं और अपने पास जो कुछ है उसे दयार्द्र होकर दुखियारों के दुःख दूर करने में लगा देने के बिना चैन ही नहीं पड़ता। दूसरों का दुःख बँटा लेने और अपना सुख बाँट देने की कसौटियाँ ही तो अध्यात्म जीवन की वास्तविकता को खरा−खोटा सिद्ध करती हैं ऐसी दशा में वे जो पाते हैं उसमें से निर्वाह की न्यूनतम आवश्यकता भर के लिए अपने पास रखकर शेष सब कुछ परमार्थ−प्रयोजन में लगा देते हैं। इसके लिए उन्हें अपने साथ सख्ती बरत कर अपनी आवश्यकताओं में कटौती करके ही कुछ बचाना पड़ता है तभी तो ये पुण्य−प्रयोजनों का अपना कुछ श्रद्धा, अनुदान प्रस्तुत कर पाते हैं। स्वयं खर्चीली जिन्दगी जीने वालों के लिए परमार्थ में कुछ भी कर सकना सम्भव नहीं होता। वे मात्र कल्पना लोक के परमार्थ क्षेत्र में विचरण करने पर सन्तोष कर लेते हैं। कथा, भागवत पढ़ लेने या दूसरी कल्पना−उड़ानों से तीर्थयात्रा, पूजा−पत्री जैसे छुट−पुट क्रियाकृत्य ही उन्हें पर्याप्त लगते हैं और उतने भर से ही ईश्वरीय अनुग्रह बरस पड़ने की आशा लगाये बैठे रहते हैं। जबकि अध्यात्म वस्तुतः जीवन दर्शन और गतिविधियों के निर्धारण का एक विशिष्ट तरीका भर है।
अमीरी का ठाट−बाट भरा जीवन जीने और भविष्य में सम्पदा, विलासिता एवं महानता के लम्बे−चौड़े सपने पूरे करने में संलग्न व्यक्ति−अध्यात्म का आदर्शवादी चिन्तन एवं परमार्थ परायण जीवन−क्रम अपना नहीं सकता। दोनों में सन्तुलन करना हो तो इतना ही बन सकता है कि गरीब स्तर का आवश्यक निर्वाह प्राप्त करने की भौतिक आवश्यकता सीमित की जाय। कम समय, कम श्रम, कम मनोयोग और कम पैसों में सन्तोषपूर्वक गुजारा किया जाय और इसके बाद जो कुछ बचता है उसे आदर्शवादी रीति नीति अपनाने में प्रयुक्त करते रहा जाय ‘‘सादा जीवन−उच्च विचार’’ की ही रीति−नीति है। इसे अपनाने वाले को मितव्ययी, स्वल्प−सन्तोषी एवं ऐषणा रहित बनना पड़ता है। वह कम खर्चे में गुजारा चलता है, निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं तक सीमित रहता है और विलासी अपव्यय तीखी नजर से कटौती करके फैंक देता है। परिश्रमपूर्वक ईमानदारी के साथ जितना कमाया जा सकता है उसी परिधि में अपना बजट बनाता है और भविष्य के लिए आदर्शवादी सत्कर्म करने की इतनी अधिक योजनाएँ मस्तिष्क में भरी रहती हैं कि वित्तेषणा, पुत्रेषणा और लोकेषणा जैसी तुच्छ बाल−क्रीड़ाएँ अपनाने में अपनी महानता घटती दिखाई पड़ती है।
यह सोचना व्यर्थ है कि मितव्ययी सादा जीवन अपनाने वाला दरिद्र लगेगा और असम्मान का भाजन बनेगा। होता यह है कि अध्यात्म दृष्टिकोण के कारण सादगी अपनाने वाला व्यक्ति उस परिस्थिति में भी स्वच्छता और व्यवस्था के दो सद्गुण अपने छोटे−बड़े सभी कार्यों में पूरी तरह समाविष्ट किये रहता है। कपड़े सस्ते और कम होते हुए भी बहुत ही स्वच्छ करीने से सिले और ठीक ढंग से पहने हुए होते हैं। स्वच्छता, सतर्कता और सुरुचि का समन्वय एक अनोखा सौन्दर्य उत्पन्न करता है। यह वेश एवं परिधानों के साथ जुड़कर अपना विशिष्ट आकर्षण उत्पन्न करता है। गान्धी जी मोटे, सस्ते और थोड़े से कपड़े पहनते थे, पर उनकी स्वच्छता और पहने में बरती गई सतर्कता देखते ही बनती थी। आवश्यक नहीं कि बहुमूल्य वस्त्रालंकारों से ही किसी का बड़प्पन प्रकट होता हो। मध्यकाल की वह मान्यता जिसके अनुसार राजा, रईस बहुमूल्य चित्र−विचित्र वस्त्राभूषण पहनकर अपने बड़प्पन की घोषणा करते थे, पर अब समय बदल गया। विकसित दृष्टिकोण ने उन अमीरों की पोशाकों को रंगमंच के नटों के लिए सीमित कर दिया है। दूसरे भले आदमी वैसे वस्त्र धारण में अपना उपहास अनुभव करते हैं। अब खर्चीले ठाट−बाट बनाने वाले अपव्ययी दुर्गुणी, दुश्चरित्र और उचक्के माने जाते हैं। सामान्य बुद्धि सोचती है उद्धत आकर्षण के लिए लालायित व्यक्ति छिछोरा ही हो सकता है। बेकार बातों में अधिक खर्च करने वाला, उपयोगी कामों के लिए कुछ बचा न पाता होगा और पिछड़ी परिस्थितियों में रहता होगा। अथवा हराम की कमाई से यह पैसे की होली फूँकता है। यह सभी बातें व्यक्ति के चरित्र और व्यक्तित्व को घटिया सिद्ध करती हैं। अब ठाट−बाट बनाने में निमग्न रहने वालों को खतरनाक समझा जाता है और लोग उनसे बचने का प्रयत्न करते हैं।
कोई व्यक्ति अपने शरीर से अपना रक्त निकाल कर स्वयं ही बहा रहा हो अपनी कमाई के नोट इकट्ठे करके स्वयं ही जला रहा हो−तो तर्क की दृष्टि से किसी के उसे रोकने की क्या जरूरत होगी? पर विवेक इस प्रकार के आचरण करने वाले के प्रति घृणा और आक्रोश उत्पन्न करेगा और यदि सम्भव हुआ तो उसे रोकने का भी प्रयत्न करेगा। ठीक इसी प्रकार अपना धन ठाट−बाट अमीरी का स्वाँग तथा दूसरे प्रकार के अपव्यय को देख कर किसी व्यक्ति के ओछेपन की ही मान्यता बनावेगा और अधिक नहीं तो उसका सहयोग करने सहयोग देने से तो बचेगा ही। अवाँछनीय गतिविधियाँ अपनाने वाले का साथ भी खतरे से खाली नहीं होता।
बात पैसे तक सीमित नहीं है और न खर्चीले ठाट−बाट तक बात समाप्त होती है। समय, श्रम एवं चिन्तन भी सम्पत्ति है। वस्तुतः असली सम्पत्ति तो यही तीन हैं। इनका अपव्यय जहाँ हो रहा होगा वहाँ भी लाँछन ही लगेंगे। आलसी, प्रमादी, हरामखोर, कामचोर, दीर्घसूत्री, गैरजिम्मेदार, लापरवाह जैसी गलतियाँ भी लगभग चोर, डाकू, ठग, बेईमान जैसे अपराध वर्ग के समीप ही जा पहुँचती हैं उच्च विचार मात्र कल्पना लोक में विचरण करके समाप्त नहीं हो जाते हैं उन्हें भी दुर्बुद्धि की तरह ही कार्य रूप में परिणित होने की बेचैनी रहती है। इसका अवसर उन्हीं को मिलेगा, जो अपनी शक्ति एवं साधनों को सदुद्देश्य में संलग्न कर सकेंगे। स्पष्ट है कि यह सब उसी के लिए सम्भव होगा जो क्षमताओं को अपव्यय से बचा कर सुरक्षित रख सकेगा। बचत का ही दूसरा नाम सादगी है। धन, समय, श्रम और मनोयोग को अवाँछनीय दिशा में खर्च करने को ही विलासिता, अमीरी ठाट−वाट, फिजूल खर्ची आदि के नामों से जाना जाता है। ऐसे लोभ जीवनोद्देश्य को पूरा कर सकने वाले कार्यों को कर सकने के लिये खाली हाथ होते हैं। उनके पास जो कुछ था वह तो खर्चीले ठाट−बाट बनाने में ही कम पड़ता रहता है।
यों बचत तो कृपण और संग्रही भी करते रहते हैं, पर उन्हें तो और भी अभागा कहा जायगा। संग्रह किसी विशेष उद्देश्य के लिए किया जा रहा हो तो बात दूसरी है अन्यथा लोभ वश जोड़ते जाना और मोहवश उत्तराधिकारियों के लिए लम्बी−चौड़ी सम्पत्ति छोड़ जाने में लगा रहना और भी बुरा है। अपव्ययी कम से कम क्षणिक शौक−मौज तो कर लेते हैं, कृपण लोग वह भी नहीं कर पाते और उत्तराधिकारियों को व्यसनी अकर्मण्य बनाने वाला विषवृक्ष रोप कर और भी बड़ा अनर्थ खड़ा कर जाते हैं। यहाँ ऐसी बचत की भी निन्दा की जा रही है। प्रशंसा मात्र उस बचत की है जो सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए निजी आवश्यकताओं में कटौती करके एकत्रित की गई है। इसी नीति को अपनाने का ही दूसरा नाम सादगी है। यदि वह सदुद्देश्य की पूर्ति के लिए अपनाई गई है तो निश्चित रूप से वहाँ आदर्शवादिता का आध्यात्मिकता का दर्शन किया जा सकता है आत्मोत्कर्ष और लोक मंगल के दोनों ही प्रयोजन अत्यधिक महान हैं और उनमें वासना, तृष्णा की पूर्ति में खर्च होने वाली शक्ति से भी कहीं अधिक साधन लगाने पड़ते हैं। एक ओर से रोकथाम करके ही दूसरी आवश्यकता पूरी होती है। ब्रह्मचर्य रखने से ही बलिष्ठ बना जा सकता है। कामुकता में शक्ति नष्ट करते रहने वालों के लिए पहलवान बन सकना कठिन है। इसी प्रकार अपनी सामर्थ्यों को वासना, तृष्णा, संग्रह, अहंता की पूर्ति में समाप्त करते चले जाना भी वैसा ही अपव्यय है जिसके रहते आत्मिक प्रगति की सम्भावनाएँ पूरी हो सकना असम्भव है। यह हजार बार समझ लिया जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिए समूचे जीवनक्रम को उच्चस्तरीय बनाने की समग्र साधना करनी पड़ती है। मात्र पूजा−पत्री की थोड़ी सी ‘हथ फेरी’ कर लेने जैसे तुच्छ प्रयत्न से उतना बड़ा लाभ नहीं मिल सकता जिसके आधार पर तुच्छ से नर कीटक को−महात्मा, देवात्मा एवं परमात्मा बनने की परमसिद्धि प्राप्त होती है। सामान्य लोग अपना जीवन भार भी शाँति से नहीं ढो पाते जब कि देवात्माएँ अपनी नाव में बिठा कर असंख्यों का बेड़ा पार करती हैं। इतनी बड़ी सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए जो तप करना पड़ता है उसका प्रवेश द्वार सादगी अपनाने को ही समझा जाना चाहिए।
निजी आवश्यकताएँ कम करने में सस्ते और स्वल्प साधनों से गुजर करने में बचकाने लोगों के बीच अपनी ‘हेटी’ अनुभव हो सकती है। इस प्रकार की ‘हेटी’ में भी प्रसन्न, संतुष्ट और गौरवान्वित रह सकने की मनःस्थिति को आत्मिक प्रगति का उत्साहवर्धक चिन्ह माना जा सकता है। आमतौर से मनुष्य की इच्छा विलासी साधनों का उपयोग करके अधिक सुख सुविधा पाने की रहती है। इस मनः स्थिति को बदल कर स्वल्प सन्तोषी एवं आम लोगों की दृष्टि में गरीब जैसी प्रक्रिया अपना कर, रहने का साहस लोकोत्तर कहा जा सकता है। यह आत्मबल के अभ्युदय का ही चिन्ह है। लोक प्रवाह से उलट कर चलने में तीक्ष्णता उत्पन्न होती है। मछली की सामर्थ्य का मूल्याँकन इसी आधार पर होता है कि वह पानी की प्रवाह−धारा चीरकर उलटी दिशा में भी बह सकती है। आत्मिक जीवन और भौतिक जीवन में मौलिक अन्तर है। एक में आदर्शों की पूर्ति के लिए कष्ट सहने का उत्साह रहता है, दूसरे में तृष्णा, वासना की पूर्ति को मानते हुए आदर्शों को ताक में रख देने तक में भी संकोच नहीं होता। सादगी का व्रत धारण करना इस बात का चिन्ह है कि लोक−प्रवाह से असहमति प्रकट करते हुए स्वतन्त्र रीति−नीति अपनाने का साहस उत्पन्न हो गया। यह परिवर्तन उसी प्रकार का है जैसा जंक्शन पर रेल की पटरियों के ‘केंची कटने’ का छोटा−सा प्रयोग गाड़ियों के दौड़ने की दिशा ही बदल देता है। अस्तु सादगी का अवलम्बन छोटी−आरम्भिक किन्तु आत्मिक प्रगति का अतीव उत्साहवर्धक चरण माना जा सकता है और उसका परिणाम निकट भविष्य में ही परम श्रेयस्कर होना समझा जा सकता है।
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कोई महत्वपूर्ण कार्य आरम्भ करने के लिए प्रथम प्रयत्न उसके लिए आवश्यक साधन जुटाना होता है। आत्मिक प्रगति संसार की समस्त सफलताओं से अधिक बढ़कर है। उसके लिए बहुत बड़े पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है और जिन्दगी का नया ढाँचा बनाना पड़ता है। इसके लिए साहस और कौशल ही नहीं श्रम और साधन भी जुटाने पड़ते हैं। यदि उनकी व्यवस्था न बन सकेगी तो फिर वह ढाँचा भी खड़ा न हो सकेगा, जिसके आधार पर प्रगति के सुनहरे सपनों को साकार कर सकने की आशा की जा सके।
धन एक छोटा और भौतिक साधन है जो सब उपार्जन के अतिरिक्त दूसरों की सहायता अथवा लाटरी, उत्तराधिकार संचित वस्तुओं की महँगाई आदि से अनायास ही मिल सकता है, पर समय, श्रम एवं मनोयोग तो शरीर तथा मन के ही उत्पादन हैं। उन्हें सन्तुलित रूप से खर्च किया जाय तो ही भौतिक एवं आत्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति हो सकती है। आमतौर से होता यह है कि भौतिक लाभ ही मन पर छाये रहते हैं और उन्हीं के उपार्जन में अत्यधिक व्यस्तता रहती है। बात यहाँ तक बढ़ जाती है कि दस−बीस मिनट पूजा, उपासना का छोटा −सा प्रयोग भी फुरसत न मिलने की आड़ में समाप्त हो जाता है। मन भी उस प्रयोजन में नहीं लगता। इसमें मन का कोई दोष नहीं, उस पर जो भी प्राथमिकता छाई रहेगी उसी में उसकी रुचि एवं तत्परता रहेगी। यदि भौतिक लाभ ही एकमात्र लक्ष्य बने हुए हैं तो आत्मिक प्रयोजन जो लगभग विपरीत पड़ते हैं उनमें एकाग्रता कैसे बनेगी? दुहरा रोल कैसे प्रस्तुत किया जा सकेगा?
उपयुक्त यही है कि उभय−पक्षीय प्रगति की आवश्यकता को भली प्रकार हृदयंगम कर लिया जाय और प्रस्तुत साधनों को दोनों के लिए उचित रीति से विभाजित कर लिया जाय। पेट पालन और परिवार निर्वाह के लिए आजीविका उपार्जन आवश्यक है। इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती है। अस्तु इस प्रयोजन के लिए श्रम, समय और मन को उचित मात्रा में लगाया ही जाना चाहिए पर साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि सारी क्षमता इसी एक कार्य में झोंक देने पर दूसरे लक्ष्य के लिए कुछ बच न सकेगा और उधर कल्पना−जल्पना करते रहने के लिए कोई बड़ी उपलब्धि हाथ लग न सकेगी। यदि भौतिक लाभों के समतुल्य ही आत्मिक लाभों को भी सोचा जा सके तो ही मन इस प्रकार के साधन विभाजन की बात स्वीकार करेगा अन्यथा दस−बीस मिनट की उलटी−पुलटी पूजा−पत्री के अतिरिक्त और कुछ वैसा न बन पड़ेगा, जिससे आत्मिक प्रगति के साथ जुड़ी हुई चमत्कारी उपलब्धियाँ करतलगत हो सकें।
चार घण्टे आत्मिक प्रगति के लिए लगने वालों में सामान्यतया एक घंटा उपासना में लगना चाहिए। महात्मा गाँधी, बिनोवा, विवेकानन्द आदि असंख्य आत्मिक प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचे हुए व्यक्ति एक घण्टा भगवत् चिंतन में निरत रहकर समुचित सामर्थ्य प्राप्त करते रहे हैं। ठीक तरह बन पड़े तो इतना समय किसी भी दृष्टि से कम नहीं है। स्वर्ण−जयन्ती साधना वर्ष के उपलक्ष में चल रही 45 मिनट की प्रातःकालीन उपासना और प्रातः सायं का आत्मबोध, तत्वबोध, चिन्तन क्रम मिलाकर प्रायः एक घण्टा ही हो जाता है। इतनी उपासना, श्रद्धा एवं तत्परता मनोयोगपूर्वक निभती चली जाय तो समझना चाहिए कि आत्मिक प्रगति का सुनिश्चित आधार बन गया। आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में विशेष तप साधना का उपक्रम बन जाया करे तो उसका प्रभाव भी छह−छह महीने बने रहने का महत्वपूर्ण आधार बन जायगा।
स्वाध्याय में एक घण्टा लगना भी इतना ही महत्वपूर्ण है। महामानवों से सत्संग करके जीवन शोधन की प्रेरणा प्राप्त करना स्वाध्याय का उद्देश्य है। इसके लिए किन्हीं कथा−पुराणों या धर्मशास्त्रों की घुटाई करते रहना निरर्थक है। आज की समस्याओं का आज की परिस्थितियों में आज के दृष्टिकोण से जो सही समाधान प्रस्तुत कर सके ऐसे साहित्य का गम्भीरतापूर्वक पढ़ना स्वाध्याय है। इसी के साथ चिन्तन−मनन की यह विचारणा भी जुड़ी हुई है कि उन आदर्शों को अपने जीवन−क्रम में समाविष्ट करने की रूपरेखा किस प्रकार बन सकती है। सत्साहित्य पढ़ने का भी लाभ है। उनसे प्रकाश और दिशा मिलती है। पर सारा प्रयोजन इतने से ही पूरा नहीं हो जाता। सोचा यह भी जाना चाहिए कि महामानवों द्वारा प्रस्तुत परामर्शों को अपने जीवन−क्रम में किस हद तक और किस प्रकार उतारा जा सकता है। यह चिन्तन−मनन, स्वाध्याय को सर्वांगपूर्ण बनाता है। अन्य पठन मात्र से तो उपयोगी समयक्षेप ही बना पड़ा रहा जा सकेगा। एक घण्टा सत्साहित्य पढ़ने के लिए नियत रखा जाय। चिन्तन, मनन इसी के साथ−साथ भी चल सकता है और ऐसा भी हो सकता है कि पढ़ते समय प्रेरक तथ्यों को नोट करते रहा जाय और पीछे अवकाश के साथ यह मंथन किया जाय कि अपने लिए उस परामर्श में से कितना और किस प्रकार अपनाये जाने योग्य हो सकता है। जो सम्भव हो उसकी रूपरेखा बनाने के लिए कल्पना शक्ति दौड़ाई जानी चाहिए और आज की अपेक्षा कल अधिक आदर्शवादिता अपनाये जाने का ताना-बाना बुनना चाहिए।
एक घण्टा उपासना−एक घण्टे स्वाध्याय को मिला कर दो घण्टे का भाव परिष्कार साधना बनती है। दो घण्टे इस चिन्तन को कर्मरूप में परिणत करने के लिए लगने चाहिएं। लोक−मंगल के परमार्थ प्रयोजनों में यह समय लगना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन ही सब कुछ नहीं है−अपने लिए जिन्दा रहते वासना, तृष्णा की और मरने के बाद स्वर्ग मुक्ति की बात सोचते रहना स्वार्थ साधन ही कहा जायगा। मनुष्य जीवन ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति के लिए−इस संसार को अधिक सुन्दर, सुव्यवस्थित, सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए मिला है। यह प्रयोजन लोक−मंगल की श्रम−साधना में संलग्न होने से ही पूरा हो सकता है। देश, धर्म, समाज, संस्कृति के उत्कर्ष में अपना पसीना, समय एवं मनोयोग लगाना आत्मिक प्रगति की साधना का अविच्छिन्न अंग है। सेवा धर्म को अपनाये बिना किसी की भी आत्मा पवित्र नहीं हो सकती। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन करने वाला योगाभ्यास−लोकमंगल में योगदान देने के अतिरिक्त और दूसरा हो ही नहीं सकता। प्राचीन काल के ऋषि जीवन में जितना भजन, पूजन का स्थान रहता था उससे कई गुना समय, श्रम वे गुरुकुल संचालन, शास्त्र लेखन, चिकित्सा, धर्म प्रचार आदि प्रयोजनों के लिए लगाते थे। यह दुर्भाग्य ही है कि आज मात्र भजन, पूजन को ही साधना समझा जाने लगा है। यह व्यक्तिवादी संकीर्ण स्वार्थपरता की देन है कि अध्यात्मवाद की दुहाई देने वाले व्यक्ति भी व्यक्तिगत सम्पत्ति न सही चमत्कारी ऋद्धि−सिद्ध उपार्जन की छोटी सी परिधि में सीमाबद्ध बन कर रह जाएं।
प्राचीन काल के साधु, ब्राह्मण जीवन में निश्चित रूप से परमार्थ परायणता ही प्रमुख रहती थी। जप ध्यान जैसे आत्मिक व्यायामों में उनका जितना समय लगता था उससे अधिक समय वे लोकमंगल और उपयुक्त आहार −बिहार जुटाने में तत्पर रहते थे। भारतीय तत्वज्ञान का हर पृष्ठ यह सिखाता है कि भजन आत्मोत्कर्ष के लिए व्यायाम की आवश्यकता भर पूरी करता है। केवल व्यायाम करते रहने भर से कोई बलिष्ठ नहीं बन सकता। आहार−बिहार की सुविधा न जुटाई जाय और व्यायाम मात्र को सब कुछ मान कर उसी में निरन्तर जुटे रहा जाय तो बात कुछ न बनेगी। एकाँगी प्रयत्न बलिष्ठ बनने का उद्देश्य पूरा न कर सकेगा।
आध्यात्मिक जीवन में रुचि लेने वाले को लोक साधना को उतना ही महत्व देना चाहिए जितना उपासना एवं स्वाध्याय को। आत्मिक प्रगति के चार सूत्र प्रख्यात हैं (1) साधना (2) स्वाध्याय, (3) संयम और (4) सेवा। इन चारों को चारपाई के चार पाये की तरह कमरे के चार कोनों की तरह, चार दिशाओं की तरह परस्पर अविच्छिन्न माना जाना चाहिए। उपासना और स्वाध्याय की चर्चा ऊपर हो चुकी। संयम का अर्थ सादगी, मितव्ययिता होता है जिसे व्यक्तित्व के उत्कर्ष का योगाभ्यास कहा गया है। चौथा चरण सेवा साधना है। इसे अपनाये बिना सद्भावनाओं को सत्प्रवृत्तियों का रूप धारण करने का अवसर ही नहीं मिल पायेगा और परमार्थ चिन्तन के अंकुर खाद पानी के अभाव में मुरझाते सूखते चले जाएंगे। सेवा साधना से बच कर मात्र भजन, पूजन में निरत रहने वाले तथाकथित साधक इसी कारण छूंछ रहते हैं कि वे उदारता को चरितार्थ करने वाला सत्साहस जुटा नहीं पाते और व्यक्तिगत उपलब्धियों की संकीर्णता में ही घिर कर रह जाते हैं।
सेवा साधना के दो ही तरीके हो सकते हैं। (1) पीड़ा निवारण (2) पतन निवारण। दूसरे शब्दों में दुखियों की सहायता एवं उत्कर्ष की प्रेरणा कह सकते हैं। धन और श्रम से दुखियों की स्थूल एवं सामयिक सहायता बन पड़ती है। भूखे, प्यासे, नंगे, बीमार, आपत्तिग्रस्त लोगों की सहायता धन एवं श्रम के सहारे हो सकती है। जहाँ इसकी अनिवार्य आवश्यकता हो वहाँ वैसा करना चाहिए, पर साथ ही यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी समर्थ को मुफ्तखोरी की आदत डालने में उदारता का दुरुपयोग न होने पावे। धूर्त याचक और यश लोलुप अदूरदर्शी दानी दान−पुण्य की लकीर पीटते रहते हैं और परोक्ष रूप से मुफ्तखोरी की दुष्प्रवृत्ति का पोषण करके समर्थों को असमर्थ−स्वावलम्बियों को परावलम्बी−बनाने का पाप कमाते रहते हैं। कष्ट−पीड़ितों की सहायता करनी चाहिए पर वह उतनी ही मात्रा में होनी चाहिए जिसके सहारे वे अपने पैरों खड़े हो सकें और आकस्मिक विपत्ति से राहत पा सकें।
वस्तुतः लोक मंगल की साधना में प्रधान प्रयत्न पतन का निवारण ही हो सकता है। पतन का कारण दृष्टिकोण का दूषित होना−मनोविकारों की भरमार। दुर्बुद्धिग्रस्त दुष्प्रवृत्ति निरत ही अनेकानेक शोक−सन्तापों में कष्ट क्लेशों में, अभाव दारिद्रय में ग्रसित पाये जाते हैं। पत्ते सींचने से नहीं जड़ सींचने से काम बनता है काँटे तोड़ने से नहीं बबूल की जड़ काटने से आये दिन की चुभन दूर होती है। जन−मानस के परिष्कार पर ही प्राचीन काल के साधु, ब्राह्मणों का ध्यान केन्द्रित रहता था और वे उसी को मनुष्य की सर्वोपरि सहायता एवं ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा मानते थे। आज भी वे तथ्य जहाँ के तहाँ हैं। अपने युग की सबसे बड़ी समस्या व्यापक क्षेत्र में अधिकार जमाये बैठे अनाचार अज्ञान के असुर को निरस्त करने की है। इसके बिना हर दिशा में मुँह बाये खड़ी अनेकानेक विपत्तियों का निराकरण हो ही नहीं सकेगा।
अपने युग का सबसे बड़ा संकट है−व्यापक अज्ञान। चिन्तन के क्षेत्र में इतनी भ्रान्तियाँ इन दिनों घुस पड़ी हैं कि उनने ईश्वर के राजकुमार मनुष्य को नरक−कीट जैसी दयनीय स्थिति में पटक दिया है। परिष्कृत चिंतन के अभाव में अवाँछनीय मान्यताएँ हर क्षेत्र में घुस पड़ी हैं और उन्होंने ऐसी अगणित विपत्तियाँ तथा समस्याएँ उत्पन्न कर दी हैं जो न टाले टलती हैं न सुलझाये सुलझती हैं। चिन्तन की भ्रष्टता ने मनुष्य को अन्धा, अविवेकी, बहरा, अहंकारी, गूँगा कुण्ठाग्रस्त, मृतक, पराश्रित, दूसरों के लिए भार भूत बनाकर रख दिया है।
प्राचीन काल में रावण, कंस, हिरण्यकश्यप आदि असुरों ने एक सीमित क्षेत्र में−सीमित संख्या के लोगों को सताया था, पर इस अज्ञान असुर ने व्यापक क्षेत्र में अधिकाँश जनसंख्या को अपने चंगुल में कस लिया है। स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रवेश करके अज्ञान के असुर ने मनुष्य को असंयमी और रोगी बना दिया है। चरित्र क्षेत्र में अपराधी, पापी, मनः क्षेत्र में अशान्त, उद्विग्न−दाम्पत्य −जीवन में घृणा, द्वेष−सन्तान क्षेत्र में विष वृक्ष जैसे उत्पादन की सम्भावनाएँ विकसित कर दी हैं। पैसा व्यसन और अपव्यय में नष्ट हो रहा है। विद्या वृद्धि के साथ छल, प्रपंच की और धन वृद्धि के साथ तृष्णा, उद्धतता की प्रवृत्ति बढ़ रही है साधु, ब्राह्मण प्रतिगामिता का पोषण करने में लगे हुए हैं। भक्ति जैसी पवित्र साधना उन्माद बनकर रह गई है। यहाँ तक कि ईश्वर भी चापलूसी और रिश्वत उपहार के आधार पर कृपा करता बता दिया गया। पाप से डरने की और परमार्थ करने की अब तनिक भी आवश्यकता नहीं रही क्योंकि तनिक−तनिक से कर्मकाण्ड पाप नाश करने और अक्षय पुण्य पाने के लिए पर्याप्त बता दिये गये हैं। जीवन का मूल्य और उद्देश्य न समझ पाने के कारण लोग पशु और पिशाच का जीवन जी रहे हैं। यह सब जन−मानस में घुसे हुए अज्ञान असुर का ही प्रभाव है।
अपने युग के अगणित संकटों का और अन्धकार से आच्छादित भविष्य का एकमात्र कारण यह व्यापक अज्ञान ही है। हमें रीछ, वानरों की तरह इसी से जूझना है और मानवी आदर्शों की सीता को वापस लाना है। छुट−पुट पुण्य−परमार्थ के ध्यान बटाने की अपेक्षा इस आपत्ति काल में हमें अपनी समूची शक्ति इसी असुरता के उन्मूलन पर केन्द्रित करनी चाहिए। जन−मानस के परिष्कार को सर्वोपरि युग धर्म मानना चाहिए। विचार क्रान्ति के लिए आयोजित ज्ञान−यज्ञ में हमें अपनी बढ़−चढ़कर आहुति देनी चाहिए। इन दिनों इससे बढ़कर और कोई पुण्य−परमार्थ हो नहीं सकता। अपने युग की यही सबसे बड़ी लोक साधना है। इस पुण्य प्रयोजन के लिए आत्म−साधना की बात सोचने वाले प्रत्येक व्यक्ति को दो घण्टे नित्य समय देने की योजना बनानी ही चाहिए।
यथाहिकानकंखण्डमपद्रव्यवदग्निना। दग्धदोषोंद्वतीयेखण्डेन कैयंब्रजेन्नृप ॥38
नविशेषमवाप्नोतितद्वद्योगाग्निनायतिः। निर्दग्धदोषस्तेनैक्यप्रयातिब्रह्मणासह ॥39
यथाग्निरग्नौसंक्षिप्तःसमानत्वमुनव्रजेत्। तथाख्यस्तन्मयोभूतोनगृह्ये तविशेषतः ॥40
परेणब्रह्मणातद्वत्प्राप्यैक्यंदग्धकिल्विषः। योगीयातिपृथग्भावंनकदाचिन्महीपते ॥41
यथा जलंजलेनैक्यंनिक्षिप्तमुपगच्छति। तथात्मासाम्यममभ्येतियोगिनःपरमात्मनि ॥42
हे राजन् जिस प्रकार सोने को अग्नि में डालने से उसमें मिले हुए मलीनता तत्व जल जाते हैं उसी प्रकार योग की अग्नि में राग−द्वेष आदि दोष जलकर नष्ट हो जाते हैं। जैसे एक अग्नि को दूसरी अग्नि में डालने से दोनों मिलकर एक हो जाती हैं उसी प्रकार योग साधना से जीव और ब्रह्म की एकता हो जाती है। जिस प्रकार जल में जल डाल देने से वे परस्पर मुक्त होकर मिल जाते हैं। उसी प्रकार योगाभ्यास से आत्मा भी परमात्मा बन जाता है।
−मार्कण्डेय पुराण
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ब्रह्म ज्ञान सर्ग-
जीव को ईश्वर का अंश कहा गया है। यह अंश उतने परिमाण में प्रत्येक प्राणी में है, जिसमें वह अपनी सामान्य जीवन−यात्रा की गतिविधियाँ ठीक तरह चला सके। उदार पोषण, शरीर रक्षा, वंश वृद्धि, विश्राम, विनोद जैसे प्रयोजन परे करने के लिए कुछ करना और सोचना पड़ता है इसके अतिरिक्त शरीर और मन का ढाँचा खड़ा रखने के लिए भी ऊर्जा की जरूरत पड़ती है। प्राणधारी को इन प्रारम्भिक आवश्यकताओं को पूरा करने में क्रियाशीलता और कुशलता की आवश्यकता पड़ती है, इसे जुटाते रहने की सामर्थ्य दे सकने वाला ईश्वरीय अंश प्रत्येक प्राणी में मौजूद है। इतना अनुदान प्रायः सभी को समान रूप से मिलता है। जिसकी काया जिस स्तर की है उसकी आवश्यकता का स्वरूप भी उसी प्रकार का होता है−उन्हें जुटाने की क्षमता में बाह्य अन्तर देखा जा सकता है, पर तात्विक दृष्टि से सभी अपने ढंग से −अपने साधनों से अपनी आवश्यकताएँ पूरी करते हैं। यह क्षमता समान रूप से प्रत्येक प्राणी को प्राप्त होने से यह कहा जा सकता है कि सभी को समान रूप से समान स्तर का ईश्वरीय अनुग्रह प्राप्त है। सभी ईश्वर के समान अंश हैं। यह स्वल्प अंश शारीरिक और मानसिक आवश्यकताएँ उसी स्तर की पूरी कर पाता है जिससे निर्वाह का सामान्य क्रम पूरा होता रह सके।
इससे आगे की प्रगति करना जीवधारी के अपने निज के पुरुषार्थ पर निर्भर है। स्पष्ट है कि चेतनात्मक प्रगति ही भौतिक उन्नति के साधन एकत्रित करती है। इसे प्रयत्नपूर्वक बढ़ाया जा सकता है। साधना इसी का नाम है। साधना के दो स्तर हैं− एक स्थूल दूसरा सूक्ष्म। स्थूल साधना में व्यायाम, अध्ययन, अनुभव, शिल्प, कला, वाणिज्य आदि विषय आते हैं। सूक्ष्म साधना में अपने दृष्टिकोण, क्रिया−कलाप, गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत किया जाता है। प्रमुख शक्तियों को जगाया जाता है। स्थूल साधना में मस्तिष्कीय प्रशिक्षण तथा शरीर को अभ्यास कराने की क्रिया−पद्धति चलती है। सूक्ष्म साधना में आकाँक्षाओं, मान्यताओं एवं भावनाओं को उच्चस्तरीय बनाया जाता है।
शरीर पंचतत्वों का बना है इसलिए उसके निर्वाह तथा प्रशिक्षण में भौतिक उपकरण काम आते हैं। मस्तिष्क में मन और बुद्धि की हलचलें होती हैं उन्हें अध्ययन, अनुभव एवं चिन्तन के आधार पर विकसित किया जाता है लोक−साधना में यही प्रक्रिया अपनाई जाती है। व्यक्ति अपनी क्रियाशीलता और बौद्धिक स्थिति में प्रवीणता उत्पन्न करते और भौतिक प्रगति का पथ−प्रशस्त करते हैं सूक्ष्म साधना में अन्तरात्मा का स्तर ऊँचा उठाना पड़ता है। इसके लिए परमात्म सत्ता के साथ सम्पर्क बनाना पड़ता है। भौतिक प्रगति के लिए भौतिक क्षमता और आत्मिक प्रगति के लिए आत्मिक क्षमता चाहिए। इसके लिए जो प्रयोग प्रयत्न करने पड़ते हैं− उन्हें अध्यात्म साधना कहते हैं। इसके लिए प्रधान अवलम्बन ईश्वर है। चेतना की उच्चस्तरीय सम्वेदना को ईश्वर कहते हैं। साधना प्रयोजनों में इसी के साथ सम्पर्क बनाना पड़ता है।
यों समस्त सृष्टि के उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन के अगणित क्रिया−कलापों में संलग्न ब्रह्माण्ड−व्यापी चेतना का विस्तार और स्वरूप इतना बड़ा है कि उसकी आंशिक जानकारी प्राप्त कर सकना भी सीमित मानवी बुद्धि के लिए सम्भव नहीं हो सकता। इसलिए परब्रह्म को अचिन्त्य, अनिर्वचनीय अगम्य आदि कहा गया है और उसके सन्दर्भ में की गई समस्त चर्चा, विवेचनाओं को ‘नेति−नेति’ कहकर अपूर्ण बताया गया है। किन्तु अन्तरात्मा के भावनात्मक स्तर को स्पर्श करने वाला ब्राह्मी अंश पहचाना, पकड़ा और अपनाया जा सकता है। उपास्य यही है। इष्टदेव इसी को कहते हैं। साधना अभ्यर्थना इसी की की जाती है। अनुग्रह और वरदान इसी से प्राप्त होते हैं। वस्तुतः इसे विश्वात्मा अथवा मानवी उत्कृष्टता की चरमावस्था कह सकते हैं। परब्रह्म की असंख्य हलचलों में से एक यह परमात्म सत्ता तरंग भी है, जिसके साथ सम्पर्क बनाकर मानवी अन्तरात्मा को अपने विकास का अवसर मिलता है। अस्तु, उपासना में आस्तिकता को−ईश्वर भक्ति को परमात्मा के साथ तादात्म्य स्थापित करने वाले प्रयोग प्रयोजनों को अनिवार्य माना गया है। उपासना साधना की पृष्ठभूमि इसी केन्द्र बिन्दु पर आधारित है।
हमारा उपास्य इष्टदेव परमेश्वर क्या है? इसकी विवेचना कई प्रकार से की जा सकती है। अन्तःकरण में उच्चस्तरीय भाव सम्वेदनाएँ उत्पन्न करने वाली व्यापक चेतना को निराकार ईश्वर कह सकते हैं। वह शरीर में सत्कर्म मन में सत् चिन्तन एवं अन्तरात्मा में सद्भाव बन कर दिव्य प्रेरणाएँ भरता है। अपने को अधिकाधिक परिष्कृत एवं उदार बनाने की आकाँक्षाएँ जगना इसी की प्रचुरता का प्रमाण है। इसमें दुहरा प्रवाह होता है। एक अवाँछनीयताओं से जूझना दूसरे उत्कृष्टताओं को बढ़ाना भगवान के अवतार का प्रयोजन है। जब भी जहाँ भी ईश्वर का अवतरण हुआ है, तब उसने धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का दुहरा प्रयत्न किया है। अवतारों की कथा−गाथाओं में यही क्रिया−कलाप उभरे दिखाई पड़ते हैं। गीता में यदा−यदा हि धर्मस्य..... वाले प्रसिद्ध श्लोकों में इसी की घोषणा है कि ईश्वर का अवतार इन्हीं दो प्रयोजनों के लिए होता है। न केवल संसार लीला के लिए वरन् व्यक्ति के अन्तःकरण में इन्हीं दो हलचलों को उभरते देखकर यह कहा जा सकता है कि यहाँ ईश्वर के अवतरण की प्रक्रिया चल रही है। संक्षेप में आदर्शवादी जीवन के लिए उठती हुई उत्कृष्ट अभिलाषा एवं प्रबल पुरुषार्थ परायणता को ईश्वर दर्शन के रूप में कहा समझा जा सकता है।
आँखें जड़ तत्वों से बनी हैं, उनकी क्षमता जड़−पदार्थों को देख सकने तक सीमित है। चेतना जड़ नहीं है। परमेश्वर जड़ तत्व न होने के कारण आँखों से नहीं देखा जा सकता। उसके स्वरूप की कल्पना भर की जा सकती है। यथार्थ में उसे किसी स्वरूप−प्रतीक की तरह देखा नहीं जा सकता। चेतना का गुण, देखना नहीं अनुभव करना है। आत्मिक चेतना उसे अनुभव तो कर सकती है, पर मूर्तिमान प्रतीक के रूप में देख नहीं सकती। देखना नेत्रों का गुण है और अनुभव करना चेतना का। जीव, नेत्र नहीं है, चेतना का अंश है। वह ईश्वरीय अनुभूति कर सकता है, उसे आकृतिवान देख नहीं सकता।
फिर भी मस्तिष्क की स्थिति ऐसी है कि उसे किसी तथ्य पर निष्ठापूर्वक केन्द्रित होने के लिए कुछ प्रमाण चाहिए। यह प्रमाण स्थूल रूप से दृश्य और श्रव्य होते हैं और सूक्ष्म रूप से तर्क और प्रमाण। मोटे तौर से किसी बात पर भरोसा तब होता है जब उसे देखा या सुना जाय। शरीर क्षेत्र में इन्द्रिय समूह का एक उद्देश्य रसास्वादन और दूसरा ज्ञान सम्वर्धन है। नेत्रों द्वारा अन्य सभी इन्द्रियों की तुलना में ज्ञान सम्वर्धन होता है इसलिए देखना सबसे आकर्षक और प्रिय विषय है। कहना न होगा कि सौन्दर्यानुभूति ही हमें सबसे अधिक आकर्षित करती है। ईश्वर दर्शन की इच्छा को भी इसी आधार पर मान्यता दी गई है और उसे प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष प्रतीकों के रूप में साकार अनुभव करने का प्रयत्न किया जाता रहा है।
ईश्वर की साकार उपासना के लिए प्रतीक पूजा-मूर्तिपूजा एक चिर−प्रचलित आधार है। इससे अपनी आस्तिकता को केन्द्रित एवं विकसित करने का आधार बनता है। पुस्तक के माध्यम से अध्ययन एवं मुगदर आदि व्यायाम उपकरणों के सहारे स्वास्थ सम्वर्धन की सुविधा होती है, इसी प्रकार प्रतीक पूजा से श्रद्धा संवर्धन का प्रयोजन पूरा होता है। यही कारण है कि साकारवादी ही नहीं निराकारवादी भी किसी प्रतीक में दिव्य सत्ता का समन्वय करके अपनी श्रद्धा का पोषण करते हैं। ईसाई धर्म में क्रूस, इस्लाम धर्म में काबा संगे असवद, पारसी और आर्यसमाजियों में अग्नि में दिव्यता का आरोपण किया गया है। अन्य निराकारवादी मत भी ध्यान में प्रकाश ज्योति जैसे प्रतीकों का सहारा लेते हैं। देव मानवों की प्रतीक प्रतिमाएँ समाधियाँ तथा अपने−अपने देश की राष्ट्रध्वजाएँ गहरे सम्मान का केन्द्र इसी आधार पर बनी होती हैं। मूर्तिपूजा के पीछे कोई अवाँछनीयताएं छिपी बैठी हों तो उन्हें निरस्त किया जाना चाहिए। शिर में जुएँ पड़ जाने पर मुँडन कराने या गरदन काटने की उतावली नहीं करनी चाहिए।
प्रतीक पूजा में पूर्ण मानव की कल्पना है। इसे जीवन लक्ष्य का स्वरूप कह सकते हैं। महत्वपूर्ण इमारत बनाने के लिए कागज पर नक्शे बनाना ही पर्याप्त नहीं होता, वरन् उसका छोटा नमूना मॉडल बनाकर तैयार करते हैं। उसे देखकर अनुपात क्रम ठीक करने में सुविधा होती है। भगवान राम, भगवान कृष्ण आदि के−पूर्ण मानव के अवतार के रूप में मान्यता दी गई है। इनके प्रतीकों को ध्यान में रखकर अपनी पूर्णावस्था का स्वरूप ध्यान में रखा जाना चाहिए और उसके लिए क्रमबद्ध योजना बनाई जानी चाहिए। अवतारों और देवताओं के साथ उनके चित्र−विचित्र, नैतिक−अनैतिक जीवन वृत्तान्त भी जोड़ दिये गये हैं। ध्यान विग्रह के लिए स्थापित ईश्वर प्रतीक के पीछे कोई चरित्र नहीं जोड़ा जाना चाहिए वरन् उसे समस्त सद्गुण सम्पन्न पूर्ण मानव का स्वरूप भर माना जाना चाहिए। यहाँ एक बात और भी ध्यान रखने की है कि ईश्वरीय प्रतिमाओं की आकृति में अन्तर तो रखा जा सकता है, पर उन्हें भिन्न−भिन्न नहीं मानना चाहिए। व्यापक ईश्वरीय सत्ता एक है। अलग−अलग देवी−देवताओं की उसके साथ साझेदारी नहीं है। सूक्ष्म−जगत अराजकता का केन्द्र नहीं और न वहाँ सामंतशाहों जैसी इलाकेदारी बंटी हुई है। अमुक का लोक या क्षेत्र यह है अमुक का यह हर देवता अपने−अपने पूजनकर्त्ता की रखवाली करता है। प्रायः ऐसी ही भ्रमग्रस्त मान्यता लोगों के मस्तिष्क में जमी होती है। देववाद की विश्रृंखलता इसी में फैली है। यथार्थता इतनी ही है− एक व्यापक ब्रह्म की विभिन्न दिव्य शक्तियों को देव संज्ञा दी गई है। सूर्य की सात किरणों को सविता देवता के रथ में जुड़े हुए सात घोड़ों के रूप में चित्रित किया जाता है। यह अलंकार है। वस्तुतः न तो सूर्य का कोई रथ है और न उसमें अपने घोड़ों जैसे प्राणी जुते हैं। देवी−देवताओं का पृथक-पृथक व्यक्तित्व मानना और अमुक पूजा−पाठ के आधार पर उन्हें फुसलाकर वशवर्ती कर लेना−उनसे मन चाहे वरदान पाने की अपेक्षा करना−भ्रान्त धारणा है। हमें ईश्वरीय प्रतीक प्रतिमाओं को पूर्ण मानव का लक्ष्य विग्रह एवं श्रद्धा अभिवर्धन को दिव्य उपकरण मानकर ही चलना चाहिए। सम्प्रदाय भेद से बनी अनेक प्रतिमाओं के बीच तात्विक एकता ही अनुभव करनी चाहिए।
साकार उपासना का उच्चस्तरीय दर्शन विराट् स्वरूप के रूप में देखा जा सकता है। यह समस्त विश्व−ब्रह्माण्ड ईश्वर की साकार प्रतिमा है, ऐसा मानकर चलने से लोक−मंगल की, जन सेवा की, विश्व−कल्याण की आकाँक्षा उभर कर आती है। रामायण की एक चौपाई में− ‘‘सियाराम भय सब जग जानी’’ की स्थापना है। ‘ईशावास्थ मिदं सर्व’ जैसी उक्तियाँ प्रत्येक अध्यात्म ग्रन्थ में पन्ने−पन्ने पर अंकित है। कितने ही उपाख्यानों में इस विराट् दर्शन की चर्चा है। अर्जुन ईश्वर दर्शन का आग्रह करता है तो भगवान कृष्ण कहते हैं कि ऐसा दर्शन चमड़े वाली आँखों से नहीं, दिव्य चक्षुओं से ज्ञान नेत्रों से ही सम्भव हो सकता है। उन्होंने विराट् रूप के दर्शन कराये। मिट्टी खाने के कारण ताड़ना देते समय यशोदा को भी कृष्ण के ऐसे ही विराट् रूप के दर्शन हुए थे। राम को पालने में झुलाते समय कौशल्या जी की दर्शन आकाँक्षा इसी प्रकार के दर्शन से तृप्त हुई थी। अन्य देव चरित्रों में भी उनके स्तवनों में विराट् स्वरूप की झाँकी कराई गई है। इस समस्त संसार को ईश्वर का रूप मानना यही प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है कि जड़ चेतन के प्रत्येक घटक के साथ हमें उच्चस्तरीय मान्यता रखनी चाहिए और उसके साथ श्रेष्ठतम सद्व्यवहार करना चाहिए।
देव पूजन की प्राचीन परम्परा शिव और विष्णु के प्रतीक विग्रहों से आरम्भ होती है। इन दोनों की ही प्रतिमाएँ गोल−मटोल पिण्ड के रूप में गढ़ी गई हैं। शिवलिंग और शालिग्राम की पाषाण प्रतिमाएँ अभी भी लगभग गोल गेंद जैसी आकृति की होती हैं। यह विश्व ब्रह्माण्ड का ही नक्शा है। पृथ्वी के गोल होने के कारण उसका विज्ञान ‘भूगोल’ कहलाता है। यह मान्यता लोकसेवा एवं समाज−निष्ठा की प्रेरणा देती है। समूहवाद, सहकारिता, समाजवाद, परमार्थपरायणता−लोकमंगल के लिए बलिदान के लिए भाव भरी उमंगे उत्पन्न करने में यह विराट ब्रह्म की श्रद्धा, भावना अतीव प्रेरणाप्रद सिद्ध होती है।
आत्मा का कषाय−कल्मषों से रहित आन्तरिक उत्कृष्टता से भरा पूरा स्वरूप ‘परमात्मा’ कहा जा सकता है खदान में से निकला कच्चा लोहा, मिट्टी मिला होता है। उसे भट्टी में तपाकर शुद्ध किया जाता है। यह शुद्ध लोहा ही फौलाद कहलाता है। मिट्टी मिले कच्चे लोहे और शुद्ध फौलाद में जो अन्तर है, वही आत्मा और परमात्मा के बीच समझा जा सकता है। जमीन से कच्चा पेट्रोलियम गाढ़ा और अनगढ़ निकलता है। पीछे उसे शुद्ध करके बढ़िया पैट्रोल, मिट्टी का तेल आदि बनाया जाता है। अनगढ़ पैट्रोलियम को जीव और शुद्ध पैट्रोल को ईश्वर कह सकते हैं। जीव ईश्वर बन सकता है और ईश्वर जीव के रूप में अवतार लेता है, इन दोनों कथनों में पूर्ण एकता है और इस तथ्य का प्रतिपादन है कि मल−आवरण, विक्षेप रहित, सद्भाव सम्पन्न, सत्कर्म परायण व्यक्ति में वे सभी विशेषताएँ हो सकती हैं जो ईश्वर में पाई जाती हैं। कोयले और हीरे की तात्विक संरचना में नाम मात्र का अन्तर है। दोनों का रासायनिक पदार्थ एक है, मात्र परमाणुओं के भीतरी संगठन में नगण्य-सा हेर-फेर होता है। जीव जब अपनी संकीर्ण स्वार्थपरता और अहंता के सीमा बन्धन तोड़कर अपने को विश्व सम्पदा मानता है तो भगवान बनने की राह पर चल पड़ता है। उसमें जितनी ही उत्कृष्टता बढ़ती है उतनी ही गहरी देव भूमिका में प्रवेश मिलता चला जाता है।
दूसरों की स्थिति में अपने को रखकर सोचा जा सके तो सहज ही पर-पीड़ा में हाथ बँटाने और अपनी उपलब्धियों से दूसरों को लाभान्वित करने को जी मचलता है। विराट् ब्रह्म का उपासक अपने को विश्व नागरिक मानता है और ईश्वरीय सृष्टि को अधिकाधिक सुविकसित बनाने में जीवन−लक्ष्य की पूर्ति अनुभव करता है। आस्तिकता की ‘विराट् दर्शन’ मान्यता भक्ति−दर्शन का सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादन है। इसे अपनाने वाला लोक−मंगल की परायणता को प्रत्यक्ष उपासना मानता है और सत्कर्म में संलग्न रहकर ‘कर्त्तव्य−पालन में ईश्वर पूजा’ की उक्ति को सार्थक बनाता है।
सर्वव्यापी, न्यायकारी, निष्पक्ष ईश्वर की प्रसन्नता सत्कर्मों पर आधारित है। कर्म के आधार पर ही वह भक्त और अभक्त की परख करता है। उसकी कसौटी पर देव मर्यादाओं का पालन करने वाला आस्तिक और उनका उल्लंघन करके दुष्प्रवृत्तियों में निरत व्यक्ति नास्तिक। भक्ति यदि असली है तो उसका प्रभाव मनुष्य के चिन्तन और कर्म पर छाया रहना चाहिए। उसे अनुभव करना चाहिए कि उसकी दृष्टि से कोई वस्तु छिपी नहीं। प्रत्यक्ष कर्म और अप्रत्यक्ष चिन्तन किसका किस स्तर का है? उसे वह भली-भाँति जानता है। इसी कसौटी पर वह किसी को खरा−खोटा−भक्त−अभक्त मानता है। इसी आधार पर उसका अनुग्रह एवं दोष मिलता है। आस्तिकता की यह मान्यता मनुष्य की सज्जनता और शालीनता बढ़ाती है। सामाजिक विरोध और राजकीय दंड से बचकर अनीति के मार्ग पर चलते रहने की चतुरता मनुष्य में मौजूद है। उसे दुष्कर्मों में लाभ दीखता है और पर्दे की आड़ में कुकर्म करता रहता है। यदि सच्ची आस्तिकता को अन्तरात्मा में स्थान मिल सके तो यह आत्मानुशासन की−आत्म−नियन्त्रण की रस्सी से बँधा रहकर मर्यादाएँ पाल सकता है।
आस्तिकता व्यक्ति और समाज की सुव्यवस्था एवं प्रगति की दृष्टि से नितान्त उपयोगी मान्यता है। उपासनारत होकर व्यक्ति अपना स्तर ऊँचा उठाता है और सर्वतोमुखी प्रगति का पथ−प्रशस्त करता है। आस्तिकता को परिपक्व करने में उपासना का असाधारण योगदान रहता है। इसी से तत्वदर्शियों ने उपासना को अत्यन्त आवश्यक नित्यकर्म माना है और उसे अपनाने पर होने वाले अनेकानेक लाभों का वर्णन किया है। वस्तुतः यह अवलम्बन ऐसा ही है− इसे अपनाकर हर व्यक्ति उज्ज्वल भविष्य की दिशा में अनवरत रूप से बढ़ते हुए पूर्णता का जीवन लक्ष्य पूरा कर सकता है।
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उपासना का अर्थ है समीपता। ईश्वर और जीव में यों समीपता ही है। जब भगवान कण−कण में संव्याप्त है तब मानवी काया एवं चेतना में भी वे समाये हुए क्यों नहीं होंगे। जो अपने में ओत−प्रोत ही है वह दूर कैसे? और जो दूर नहीं है उसकी समीपता का क्या अर्थ? इस असमंजस की विवेचना इस प्रकार होती है कि वह समीपता उथली है गहरी नहीं। माना कि शरीर में हलचलों के रूप में और मन में चिंतन के रूप में विश्वव्यापी चेतना ही काम कर रही है तो भी स्पष्ट है कि जीव की आस्थाएँ एवं आकाँक्षाएँ दिव्य सत्ता के अनुरूप नहीं है। उनमें निकृष्टता का आसुरी अंश ही भरा पड़ा है, मनुष्यता की सार्थकता तभी है जब उसका स्वरूप एवं स्तर भी उसी के अनुरूप ऊंचा उठ सके। निम्न योनियों के जीवनधारी पेट और प्रजनन के लिए जीते हैं। स्वार्थ सिद्धि ही उनकी नीति होती है। शरीरगत लाभ ही उनके प्रेरणा स्त्रोत होते हैं। दूसरों के साथ वे आत्मभाव बहुत थोड़ी मात्रा में मिला पाते हैं और परमार्थ परायणता के अंश नगण्य जितने ही देखे जाते हैं। यदि यही अन्तः स्थिति मनुष्य की भी बनी रहे तो समझना चाहिए कायिक विकास ही हुआ−चेतनात्मक नहीं। नर−कीट, नर−पशु उन्हें कहते हैं जो शरीर संरचना भर से मनुष्य है उनके दृष्टिकोण में पिछड़ी योनियों जैसी निकृष्ट स्वार्थपरता ही भरी पड़ी है। आयु की दृष्टि से प्रौढ़ हो जाने पर भी यदि सारा आचार−व्यवहार बच्चे जैसा ही बना रहे तो उस अविकसित स्थिति पर चिन्ता व्यक्त की जायगी। ठीक यही स्थिति उन मनुष्यों की है जो शरीर से तो इस सुरदुर्लभ काया में प्रवेश पा गये पर उनने अपने दृष्टिकोण में क्रिया−कलाप में वही पिछड़ा हुआ क्रिया−कलाप संजोये रखा।
इस दयनीय स्थिति से पीछा छुड़ाने के लिए ईश्वर की समीपता का, उपासना का, उपक्रम बनाना पड़ता है। शरीर ठण्ड से काँप रहा हो तो आग की समीपता से आवश्यक गर्मी प्राप्त की जाती है। आदर्शवादिता से रहित मानव जीवन घिनौना ही कहा जायगा। जो पशु के लिए क्षम्य है वही मनुष्य के लिए अक्षम्य। पशु निर्वस्त्र रहते, खुले में मलमूत्र त्यागते और रति कर्म करते हैं। मनुष्य वैसा करेगा तो भर्त्सना का पात्र बनेगा। शिश्नोदर परायणता निकृष्ट कृमि−कीटकों के लिए स्वाभाविक हो सकती है− मनुष्य के लिए तो वह स्थिति निन्दनीय ही मानी जायगी।
संगति का−समीपता का−प्रभाव सर्वविदित है। चन्दन के समीप उगे हुए झाड़−झंखाड़ सुगन्धित हो जाते हैं कोयले की और गन्धी की दुकान पर बैठने वाले कलोंच का धब्बा और सुगन्ध का छींटा साथ लेकर जाते हैं। दुष्टों की समीपता से दुर्गति और सज्जनों के सान्निध्य से सद्गुणों की वृद्धि और प्रगति की संभावना का साकार होना सर्वविदित है। ईश्वर उत्कृष्टताओं का भाण्डागार है। उसकी समीपता−उपासना से वैसी ही विशेषताओं का बढ़ना स्वाभाविक है। कीट भृंग का उदाहरण प्रसिद्ध है टिड्डे हरी घास में रहते हैं तो उनका शरीर हरा रहता है पर जब वे सूखी घास में रहने लगते हैं तो पीले पड़ जाते हैं। तितलियाँ फूलों के अनुरूप अपने रंग बदलती रहती हैं। समीपता के अनुरूप ढलने के अगणित उदाहरण सर्वत्र पाये जाते हैं। वातावरण की प्रभाव शक्ति को कौन नहीं जानता। व्यक्तियों का भला बुरा निर्माण करने में वातावरण की असाधारण भूमिका रहती है।
उपासना का क्रिया−कृत्य अन्तरंग और बहिरंग स्तर का ऐसा ‘माहौल’ बनना चाहिए जिससे व्यक्ति के भावनात्मक स्तर में उत्कृष्टता की अभिवृद्धि होती हो। बहिरंग वातावरण बनाने में पूजा उपासना में प्रयुक्त होने वाली प्रतीक प्रतिमा−उसका सज्जा शृंगार पूजा उपचार में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ उपकरण आदि का मिला जुला स्वरूप अपना काम करता है पूजा वेदी के समीप बैठने पर ऐसा लगना चाहिए मानो किन्हीं असाधारण दिव्य परिस्थितियों में जा पहुँचे। मन्दिर, देवालय पूजाग्रह, देवपीठ, आराधना कक्ष को बनाने में उपयुक्त वातावरण बनाने का तथ्य ही प्रधान रूप से काम करता है। वहाँ के सुसज्जा साधन सँजोने में इसी बात का ध्यान रखा जाता है कि उस स्थान में जाते ही मन अपने आपको पवित्रता की दिव्य परिस्थितियों से घिरा हुआ अनुभव करने लगे। सामान्य वातावरण से उपासना कक्ष का वातावरण भिन्न रखा जाता है और वहाँ की परिस्थितियां ऐसी बनाई जाती हैं जिनमें बैठने पर उत्कृष्टता की अनुभूति बढ़ने से सुविधा मिल सके।
उपासना का दूसरा आधार कर्मकांडों का क्रिया−कृत्य और तीसरा आधार भावना क्षेत्र में दिव्य उभार उत्पन्न करना होता है। यह दोनों ही आधार अपने आप में अति महत्वपूर्ण हैं। उनसे चेतना को बदलने एवं ढालने में असाधारण सहायता मिलती है।
कर्मकाण्ड वे कृत्य हैं जो शरीर के विभिन्न अवयवों की सहायता से−उपचार उपकरणों के द्वारा सम्पन्न किये जाते हैं। षोडशोपचार देव पूजन−आत्मशोधन के विभिन्न क्रिया−कृत्य इसी श्रेणी में आते हैं। मन पर छाप डालने में विचार और कर्म का समन्वय करना पड़ता है। चित्त पर स्थिर संस्कार डालने के लिए अभीष्ट विचारों के साथ-साथ उनके पूरक कृत्य होने ही चाहिएं अन्यथा कल्पना केवल जल्पना बन कर हवा में उड़ जाती है। विचारणा के साथ क्रिया का समन्वय न कर सकने पर भी जो लोग सफलताएँ चाहते हैं उन्हें शेख चिल्ली कह कर उपहासास्पद किया जाता है। हर क्षेत्र में विचार और कर्म का समन्वय ही प्रतिफल उत्पन्न करता है। उपासना में ईश्वरीय सान्निध्य की कल्पना ही नहीं अनुभूति भी अपेक्षित होती है। भावनिष्ठा को कार्यान्वित होते देख कर ही ऐसी मनःस्थिति बनती है। इसलिए यह सोचना होता है कि परमेश्वर प्रत्यक्ष ही, सचमुच ही सामने है और उनकी किसी जीवित व्यक्ति के उपस्थित होने पर की जाने जैसी अभ्यर्थना की जा रही है। आत्मशोधन और देवपूजन के दोनों की कृत्यों में इसी प्रकार का भाव समन्वय होता है। वह यदि बेगार भुगतने के उथले मन से किया गया है और जैसे−तैसे परम्परा गत लकीर पीटी गई हो−तो बात दूसरी है अन्यथा प्रयोजन के लिए यह प्रचलन हुआ है उसे ध्यान में रख कर चला जाय तो अन्तःक्षेत्र में अभीष्ट निष्ठा होगी और लगेगा कि निराकार परमेश्वर अपेक्षाकृत अधिक सघन− अधिक साकार बन कर सामने आया है।
उपासना का तीसरा प्रयोजन है मनःक्षेत्र पर ईश्वरीय सान्निध्य का चिन्तन घटाटोप की तरह छाये रहना। सामान्य जीवन में आत्म सत्ता शरीर रूप में ही काम करती है अस्तु अपना आपा शरीर मात्र ही अनुभव होने लगता है। शरीर से सम्बन्धित समस्याओं का विस्तार अत्यधिक है। उनके खट्टे मीठे स्वाद भी चित्र−विचित्र हैं और वे सभी बड़े आकर्षक हैं। यों प्रिय अप्रिय स्तर की परस्पर विरोधी अनुभूतियाँ सामने आती हैं, पर वे दोनों ही अपने−अपने ढंग के गहरे प्रभाव चेतना पर छोड़ती हैं। सफलताएँ अपने ढंग का प्रभाव डालती हैं असफलताएँ दूसरे ढंग का। लाभ में एक प्रकार का अनुभव होता है, हानि में दूसरे तरह का। एक स्थिति प्रिय लगती है। दूसरी अप्रिय। इतना होते हुए भी दोनों की स्थितियों की गहरी छाप पड़ती है। सफलता का हर्षोन्माद और असफलता का शोक सन्ताप दोनों ही अपने प्रभाव छोड़ते और चेतना को आवेशग्रस्त बनाते हैं। ज्वार−भाटे जैसे− यह आवेश अवसाद सामयिक अनुभूति बन कर ही समाप्त नहीं हो जाते वरन् पीछे भी बहुत समय तक उनकी उत्तेजित प्रतिक्रिया बनी रहती है। ऐसे क्षण बहुत ही कम आते हैं जिनमें चित्त शान्त सन्तुलित रहता हो और आत्म सत्ता के साथ जुड़ी हुई समस्याओं को हल करने की बात सूझ पड़ती हो। यही कारण है कि हम भौतिक आवश्यकता और समस्याओं को ही सब कुछ मान लेते हैं और उन्हीं के जाल जंजाल में उलझे जकड़े पड़े रहते हैं। आत्मिक जीवन का स्वरूप भी सामने नहीं आ पाता फिर उनका समाधान सूझे तो कैसे? स्पष्ट है कि आत्मिक समस्याओं का समाधान हुए बिना न तो भौतिक जीवन का रस लिया जा सकता है और न जीवन लक्ष्य को पूरा करने की बात बनती है।
आवश्यक है कि कुछ समय हमारे पास ऐसा हो जिसमें भौतिक जीवन को एक प्रकार से पूरी तरह ही भुला दिया जाय और उन क्षणों में केवल आत्मा का स्वरूप जीवन लक्ष्य एवं परमात्म सान्निध्य के अतिरिक्त और कुछ सूझ ही न पड़े। यही उपासना काल है। यह सही हुआ या गलत, इसकी पहचान इतनी ही है कि उन क्षणों में मनःक्षेत्र पर आत्मिक स्तर का चिन्तन छाया रहा या भौतिक स्तर का। यदि साँसारिक मनोकामनाओं की उथल−पुथल मची हुई है और इष्टदेव से तरह−तरह के भौतिक वरदान पाने की ललक उठ रही हो तो समझना चाहिए कि यह उपासना कृत्य भी विशुद्ध रूप से भौतिक है। इससे आत्मिक प्रगति जैसा कोई लाभ मिल नहीं सकेगा। यदि उतने समय शरीर रहित−भौतिक प्रभावों से मुक्त−ज्योतिर्मय आत्मा ही ध्यान में है और उसमें महाज्योति के साथ समन्वित हो जाने की दीप−पतंग जैसी आकाँक्षा उठ रही है, तो समझना चाहिए कि उपासना का सच्चा स्वरूप अपना लिया गया और उससे अभीष्ट उद्देश्य पूरा हो सकने की सम्भावना बन रही है।
उपासना के साँसारिक विचार न आयें इसका एक ही उपाय है कि उन क्षणों के लिए एक निर्धारित विचार पद्धति सामने रहे। वह भी दृश्य मुक्त−आकर्षक स्तर की ऐसी हो जो मन को अपने शिकंजे में पकड़े रहे। यों वैज्ञानिकों जैसे गहरे चिन्तन से भी हो सकता है, पर वैसे बहुत समय के अभ्यास और एकाग्र एकात्म स्तर मिल जाने पर ही सम्भव है। आरम्भ में दृश्य मुक्त चिन्तन मनःक्षेत्र पर छाया रहे ऐसा ही अभ्यास लेकर चलना चाहिए। ध्यान इसी को कहते हैं उपासना में ध्यान अनिवार्य है। यदि उसे छोड़ कर मात्र क्रिया−कृत्य ही किये जा रहे होंगे तो मन इधर−उधर भागता रहेगा और अधूरा शरीर कर्म ही पूजा−पाठ के नाम पर अपनी लंगड़ी−लूली गाड़ी घसीट रहा होगा।
ध्यान साकार और निराकार दो प्रकार के कहे गये हैं। एक में भगवान की अमुक मनुष्याकृति को मान कर चला जाता है दूसरे में प्रकाश पुंज की आस्था जमाई जाती है। तात्विक दृष्टि से यह दोनों ही साकार हैं। सूर्य जैसे बड़े और प्रकाश बिन्दु जैसे छोटे आकार का ध्यान रखना भी तो एक प्रकार का आकार ही है, अन्तर इतना ही तो हुआ कि उसकी मनुष्य जैसी आकृति नहीं है। ध्यान के लिए ईश्वर की परम लक्ष्य की−आकृति बनना आवश्यक है। यों नादयोग, स्पर्शयोग, गन्धयोग को आकृति रहित कहा जाता है, पर ऐसा सोचना अनुपयुक्त है। नादयोग में शंख, घण्टा, घड़ियाल, वीणा आदि की ध्वनियाँ सुनी जाती हैं, पर अनचाहे ही वे वाद्य यन्त्र कल्पना में आते रहते हैं जिनसे वे ध्वनियाँ निसृत होती है। इस प्रकार गन्ध ध्यान में मात्र गन्ध पर ही चिन्तन एकाग्र नहीं हो सकता जिस पुष्प की वह गन्ध है उसकी आकृति भी अनचाहे ही सामने आती रहेगी। ध्यान में आकृति से पीछा नहीं छूट सकता। मस्तिष्क की बनावट ही ऐसी है कि वह निराकार कहलाने वाले चिन्तन को भी आकृतियाँ बना कर ही आगे चलता है। वैज्ञानिक के गहरे चिन्तन को निराकार कहा जाता है, पर वस्तुतः वह भी जो सोचता है उसमें कल्पना क्षेत्र की एक पूरी प्रयोगशाला सामने रहती है और प्रयोगात्मक हलचलें आंधी−तूफान की तरह अपना काम कर रही होती हैं। अन्तर इतना ही होता है कि वह स्थूल प्रयोगशाला के उपकरण छोड़ कर वही सारा प्रयोग कृत्य काल्पनिक प्रयोगशाला में कर रहा होता है ध्यान में आकृति से पीछा छुड़ाना सम्भव नहीं हो सकता अस्तु किसी को साकार−निराकार के वितंडावाद में न पड़ कर ध्यान धारणा के सहारे आत्म चिन्तन का प्रयोजन पूरा करना चाहिए।
ईश्वर का आकृति समेत ध्यान करना अभीष्ट हो तो उन्हें नर या नारी को सुन्दरतम प्रतिमा के रूप में इष्टदेव मानना चाहिए और उनके पीछे कोई इतिहास न जोड़ कर उत्कृष्टतम सद्गुणों की पूर्ण प्रतिमा अनुभव करना चाहिए। इसे अन्य किसी देवता से भिन्न नहीं वरन् समन्वित सत्ता मानना चाहिए। एक ही ब्रह्म को अनेक रूपों में कहा गया है। यह उक्ति बहुदेववाद को तो मनाती है, पर उनकी पृथकता अस्वीकार करती है। शंकर, दुर्गा, हनुमान, गणेश, सूर्य, राम, कृष्ण, सरस्वती, लक्ष्मी, गायत्री आदि की कोई भी प्रिय आकृति साकार ध्यान के लिए चुनी जा सकती है, पर यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि यह अन्य किसी देव सत्ता से भिन्न है। एक ही मनुष्य के अनेक चित्र, पोज या सम्बोधन हो सकते हैं। ठीक इसी प्रकार विश्व में एक ही संव्याप्त चेतना के अनेक नाम रूप रखे जा सकते हैं, पर किसी आकृति को दूसरी आकृतियों से भिन्न नहीं माना जा सकता। इस भिन्नता की मान्यता ने बहुदेववाद के साथ अवाँछनीय विग्रह उत्पन्न किये हैं और भूल प्रयोजन को ही लड़खड़ा दिया है।
साकार उपासना में इष्टदेव के समीप अति समीप होने पर उनके साथ लिपट जाने −उच्चस्तरीय प्रेम के आदान−प्रदान की गहरी कल्पना करनी चाहिए। इसमें भगवान और जीव के बीच माता−पुत्र, पति−पत्नी, सखा−सहोदर, स्वामी, सेवक जैसा कोई भी सघन सम्बन्ध माना जा सकता है इससे आत्मीयता को अधिकाधिक घनिष्ठ बनाने में सहायता मिलती है। लोक व्यवहार में स्वजनों के बीच आदान-प्रदान उपहार और उपचार की तरह चलते हैं। मन, वचन कर्म से घनिष्ठता एवं प्रसन्नता व्यक्त की जाती है। भेंट उपहार से कई तरह की वस्तुएँ दी जाती हैं। नवमी भेंट उपहार में ऐसे ही आदान−प्रदान की वस्तुपरक अथवा क्रिया परक कल्पना की गई है। वस्तुतः यहाँ प्रतीकों को माध्यम बना कर भावनात्मक आदान−प्रदान की गहराई में जाया जाना चाहिए। भक्त और भगवान के बीच सघन आत्मीयता की अनुभूति उत्पन्न करने वाला आदान प्रदान चलना चाहिए। भक्त अपनी अहंता को क्रिया, विचारणा, भावना एवं सम्पत्ति को भगवान के चरणों पर अर्पित करते हुए सोचता है, यह सारा वैभव उसी दिव्यसत्ता की धरोहर है इसका उपयोग व्यक्तिगत वासना, तृष्णा के लिए− ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए किया जाता है। वह स्वयं तो मात्र खजांची −स्टोरकीपर भर है।
ध्यान का एकमात्र उद्देश्य भगवान और भक्त के बीच एकात्म भाव की स्थापना करना है, मात्र किसी आकृति का ध्यान चित्र देखते भर रहने से काम नहीं चलता। भक्त अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को क्रिया, विचारणा और भावना को ईश्वर अर्पण करके उसे मात्र दिव्य प्रयोजनों में नियोजित रखने का संकल्प सघन करता है। इसके साथ−साथ भौतिक धन सम्पत्ति तो अर्पित हो ही जाती है। समर्पण का तात्पर्य है व्यक्तिगत−भौतिक महत्वाकाँक्षाओं की समाप्ति और उसके स्थान पर ईश्वर इच्छा की−उच्च आदर्शों की अपने ऊपर नियन्त्रण करने वाली स्थापना। इसी मान्यता को अंतःकरण में यथार्थवादी निष्ठा के साथ स्थापित करने को आत्म समर्पण कहते हैं। ध्यान के द्वारा इसी निष्ठा को परिपक्व किया जाता है।
भक्त का समर्पण बदले में भगवान का अनुग्रह आश्वासन। इसी के तरह−तरह के लौकिक स्वरूप चित्र कल्पित किये जा सकते हैं। साकार ध्यान में अपनी रुचि की कल्पनाएँ करते रहने और उस दृश्यावली में डूबे रहने की पूरी छूट है। ध्यान की एकाग्रता इसी सीमा तक है कि उसमें भक्त और भगवान के बीच होने वाले आदान−प्रदान की कल्पनाएँ ही चलनी चाहिएं, भौतिक लाभ या प्रयोजन आड़े नहीं आने चाहिए। पूर्ण एकाग्रता जिन्हें शून्यावस्था, योगनिद्रा या समाधि कहते हैं, बहुत ऊँची स्थिति है। मन कहीं जाये ही नहीं एक बिन्दु पर केन्द्रित रहे ऐसा हो सकने को ही तुरीयावस्था या समाधि कहते हैं। यह आरम्भिक साधना में लगभग असंभव ही है, उसकी बात नहीं सोची जानी चाहिए। ध्यान साधना का व्यावहारिक रूप इतना ही है कि भक्त और भगवान के बीच उच्चस्तरीय आदान−प्रदान चलना चाहिए। भक्त अपनी समस्त आकाँक्षाओं और सम्पदाओं को ईश्वर के लिए समर्पित करता है और इसके बदले में वह सब कुछ पाता है जो ईश्वर स्वयं है। मनुष्य को स्पष्ट करने वाली ईश्वरीय सत्ता अपनी अनुभूति, आनन्द और उल्लास के रूप में छोड़ती है। भगवान से कुछ मिला या नहीं इसकी परख इस रूप में की जा सकती है कि उल्लास−आदर्शवादिता के प्रति उत्कंठा भरा उभार अन्तःकरण में उमगना आरम्भ हुआ या नहीं सद्भावना और सत्प्रवृत्ति अपनाने वाले को सहज ही मिलते रहने वाला आत्म−सन्तोष आनन्द अनुभव में आता है या नहीं। ईश्वर दर्शन के सम्बन्ध में यह भ्रान्त धारणा निरस्त की जानी चाहिए कि सपने में या जागृति में इष्टदेव की किसी आकृति की झाँकी मिलती है अथवा प्रकाश आदि दीखने जैसा कोई चित्र−विचित्र दृश्य दिखाई पड़ता है। यदि ऐसा किसी को होता हो तो उसे झाड़ी का भूत, रस्सी का साँप दीखने की तरह अपने संकल्पों की मानसिक प्रतिक्रिया भर समझना चाहिए। जब चेतना की कोई आकृति हो ही नहीं सकती तो फिर उसका निर्भ्रान्त दृश्य दिखाई ही कैसे दे सकता है? इस तथ्य को हजार बार हृदयंगम कर लिया जाना चाहिए कि ईश्वर का जीवन में समावेश आदर्शवादी आकाँक्षाएँ प्राणप्रिय प्रतीत होने लगने और तदनुरूप गतिविधियाँ अपनाने पर मिलने वाले आनंद उल्लास की अनुभूति का स्तर ही ईश्वर प्राप्ति का एकमात्र प्रमाण है।
निराकार ध्यान में प्रायः सर्वत्र सूर्य के प्रकाश को ही माध्यम बनाया जाता है। प्रभात काल के उदीयमान सूर्य का सविता देवता के प्रतीक रूप में दर्शन उसकी दिव्य किरणों का शरीर मन और अन्तरात्मा में प्रवेश −उस प्रवेश की सत्कर्म, सद्ज्ञान एवं सद्भाव के रूप में प्रतिक्रिया। इसी परिधि में निराकार ध्यान धारणा परिभ्रमण करती है। यज्ञाग्नि रूपी ईश्वर में आहुति द्रव्य की तरह जीव सत्ता का समर्पण, नाले का गंगा में, बूँद का समुद्र में सम्पादन−दीप ज्योति का सूर्य ज्योति में विलय−अर्घ्य जल का भाप बन कर व्यापक क्षेत्र में विस्तार −पतंगे का दीपक को समर्पण जैसे कितने ही दृश्य−चित्र कल्पना क्षेत्र में बनाये जा सकते हैं और उनके सहारे एकात्म भाव की अनुभूति का आनन्द लिया जा सकता है।
उपासना के क्रिया−कृत्य में (1) स्थापना सुसज्जा के आधार पर वातावरण का निर्माण (2) प्राणायाम, न्यास, पूजा, उपचार आदि क्रिया−कृत्यों द्वारा विचारणा की क्रिया रूप में परिणित (3) जप के साथ ध्यान का अवलम्बन और दिव्य सत्ता के साथ ऐसे सघन तादात्म्य की स्थापना जो चिन्तन क्षेत्र में उत्कृष्टता और क्रिया क्षेत्र में आदर्शवादिता अपनाने के लिए विवश कर सके। यही है उपासना का त्रिविधि स्वरूप। गायत्री मन्त्र में तीन व्याहृतियाँ इसीलिए हैं। आठ−आठ अक्षरों के तीन चरण होने के कारण इस महाशक्ति को त्रिपदा कहा गया है। उपासना के इन तीनों आधारों को अपना कर गायत्री मन्त्र के सहारे अथवा कोई और अवलम्बन अपना कर ईश्वर की साकार निराकार जो भी उपासना अपनाई जायगी निश्चित रूप से सफल होगी और अभीष्ट सत्परिणाम उत्पन्न करेगी।
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धन, मनुष्य उपार्जित सम्पदा है किन्तु शरीर का ठीक तरह उपयोग करते हुए श्रम और समय की सम्पदा हर किसी को प्रायः समान रूप से उपलब्ध है। इसी प्रकार मन, मस्तिष्क का चिन्तन प्रवाह भी ऐसा वैभव है जिसका मूल्याँकन करने पर प्रतीत होता है कि उसमें अद्भुत चमत्कार भरी सम्भावनाएँ सान्निहित हैं। शरीर और मस्तिष्क की क्षमताओं को परिष्कृत बनाना और सदुपयोग बन पड़ना यदि सम्भव हो सके तो अभीष्ट मार्ग पर चलते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचा जा सकता है।
आमतौर से लोग धन, बाहरी सहयोग एवं अनुकूल परिस्थितियों की अपेक्षा करते रहते हैं और सोचते हैं यदि यह सब इच्छित मात्रा में मिल सके तो उनका मनोरथ पूरा हो सकता है− सुख−सन्तोष मिल सकता है। लोग इन उपलब्धियों के लिए दूसरों का दरवाजा खट−खटाते हैं। पर इच्छानुरूप वह सब मिल ही जायगा, इसका कोई भरोसा नहीं। अस्तु प्रसन्नतादायक सफलता भी संदिग्ध ही बनी रहती है। प्रभावों, असफलताओं और विपन्नताओं का रोना रोते हुए भी आम आदमी देखे जाते हैं। आकाँक्षाएँ बनाने पर ऐसी खेदजनक स्थिति का सामने खड़े रहना स्वाभाविक ही है।
अध्यात्म दृष्टिकोण यह सिखाता है कि ईश्वर प्रदत्त अपने साधनों का सही और पूरा उपयोग आरम्भ किया जा सके तो अपनी क्षमताओं का विकास होगा- अधिक उपयोगी उपार्जन सम्भव होगा और उस आधार पर अभीष्ट सफलताएँ सरल बनती चली जाएंगी।
समय की कीमत पर ही लोगों ने भौतिक और आत्मिक उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। श्रम वह सिक्का है जिसे किसी भी दुकान पर भुनाया जा सकता है और मनचाही वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं। लोग समय और श्रम की कीमत नहीं समझते और यह अनुभव नहीं करते कि उन्हें सतर्कता और व्यवस्था के साथ किसी दिशा में लगाया जाय तो उसका परिणाम अभीष्ट सिद्धियाँ प्रदान करने की आश्चर्यजनक भूमिका निभा सकता है। हमारा अधिकाँश समय आलस्य, प्रमाद में व्यतीत होता है। अपने को व्यस्त कहने वाले व्यक्ति भी भगदड़ तो बहुत मचाते हैं , पर व्यवस्थापूर्वक अपने समय एवं श्रम का क्रमबद्ध विभाजन नहीं कर पाते और करते भी हैं तो ढीले−पोले स्वभाव के कारण उस पर आरुढ़ नहीं रहते। फलतः बहुत व्यस्तता प्रदर्शित करने पर भी समय का बहुत थोड़ा अंश ठीक तरह काम में आ पाता है। थोड़ी देर बहुत जोर−जोर की भगदड़ मचाना और जल्दी ही थकान का बहाना बनाकर औंधे मुँह लेट जाना, यही इन व्यस्त कहाने वालों की रीति−नीति होती है। इस प्रकार काम कुछ बनता नहीं। बहुत करने का बवंडर जैसा तूफान और कुछ ही समय में पानी का बबूला फूट जाने की तरह उस भगदड़ का अंत इसी नीति को अपनाने से काम कम होता है और थकान अधिक आती है
होना यह चाहिए कि प्रातःकाल उठने से लेकर सोने तक की दिनचर्या बनाई जाय। पुराना ढर्रा जो अब तक चलता रहा है उसी को दिनचर्या में फिट कर दिया जाय यह आवश्यक नहीं। कम महत्वपूर्ण कार्य− कम महत्व के व्यक्तियों से कराने और अधिक उपयोगी कार्य स्वयं करने की नीति अपनाई जाय तो प्रतीत होगा कि प्रचलित ढर्रे के कम महत्व के कामों की भरमार है और अधिक उपयोगी−अधिक लाभदायक कामों के लिए उस क्रम में गुंजाइश नहीं रखी गई। सोचना यह होगा कि क्या ऐसा है जो महत्वपूर्ण होते हुए भी अब तक नहीं बन पड़ता है और कौन से कार्य ऐसे हैं जिन्हें घर के दूसरे लोग अथवा सेवक लोग इशारा कर देने अथवा थोड़ा पैसा खर्च कर देने मात्र से कर सकते हैं। दिनचर्या का निर्धारण करते समय हमें नये दृष्टिकोण से सोचना चाहिए और क्या करना क्या नहीं इस बात पर बारीकी से ध्यान देना चाहिए।
समय का थोड़ा अंश भी बर्बाद न जाने पावे। आलस्य, प्रमाद में एक क्षण भी नष्ट न हो। शरीर के भीतरी अवयव अहिर्निश अपना काम करते रहते हैं उसी तरह हमारे समूचे व्यक्तित्व को मनोयोगपूर्वक क्रियाशील रहना चाहिए। सोना, सुस्ताना भी एक काम है उसे भी निर्धारित समय पर ही करना चाहिए। चाहे जब पैर फैलाकर बैठ जाना सुस्ताने का बहाना करना गलत है।
उठने से लेकर सोने तक की दिनचर्या बनाई जाय और उस पर मुस्तैदी के साथ आरुढ़ रहा जाय। आरम्भ में परेशानी दीखने पर भी कुछ ही दिन में वैसी आदत बन जाती है और फिर बेकारी अखरने लगती है। हर घड़ी काम में लगे रहने को ही जी करता है। काम, मात्र शारीरिक श्रम का ही नाम नहीं है, उसे अधिक अच्छा बनाने के लिए यह नितान्त आवश्यक है कि मन की संलग्नता भी उसमें पूरी तरह जुड़ी रहे। उत्साहपूर्वक तन्मयता के साथ−काम को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर पूरी सतर्कता के साथ किया जाय तो वह जल्दी भी निपट जायगा और स्तर की दृष्टि से भी बढ़िया रहेगा। बेगार टालने जैसा−अन्यमनस्क भाव से कोई काम किया जाय तो उसमें देर भी बहुत लगती है, स्तर घटिया रहता है। ऐसे कार्य प्रायः आधे अधूरे ही पड़े रहते हैं और उन पर जो थोड़ा बहुत श्रम किया गया था वह निरर्थक चला जाता है। उन्हीं कामों का अधिक सत्परिणाम प्राप्त होता है जो शारीरिक श्रम और मानसिक उत्साह का समान रूप से समावेश करते हुए किये जाते हैं।
श्रम और मनोयोग का समन्वय न रहने से हर काम घटिया रहता है और उससे भोंड़ापन टपकता है। अस्तु हमें न केवल एक क्षण बर्बाद न होने देने वाली दिनचर्या बनानी चाहिए, वरन् मन पर यह अनुशासन भी कायम करना चाहिए कि हाथ के नीचे आये काम में पूरी दिलचस्पी लें−उत्साह दिखायें और अधिक अच्छा बनाने के लिए क्या सोचा और क्या किया जा सकता है? इसका ताना−बाना बुनते रहें।
सफलता के लिए प्रयत्न तो पूरा करना चाहिए, पर साथ ही यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि पूरा परिश्रम करते हुए भी यह गारंटी नहीं हो सकती कि इच्छित समय में−इच्छित मात्रा में अभीष्ट सफलता मिल ही जायगी। मात्र मनुष्य का श्रम ही नहीं−परिस्थितियां भी सफलता में बहुत बड़ा कारण होती हैं। अस्तु अपने सही प्रयत्न को ही सन्तोष का पूर्ण आधार मानकर चलना चाहिए। अमुक कार्य हमने पूरी जिम्मेदारी, मेहनत और ईमानदारी से किया− इतनी बात ही अपने हाथ में है इसलिए इसी प्रयत्नशीलता पर सन्तोष एवं गर्व किया जाना चाहिए। जो व्यक्ति सफलता के लिए जितना अधिक आतुर होता है उसका उत्साह छोटा−सा अवरोध आने मात्र से समाप्त हो जाता है। ऐसी ओछी प्रकृति के मनुष्य देर तक कठिनाइयों का सामना करते हुए− प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँचने में समर्थ नहीं हो सकते। हर असफलता के बाद अधिक गहरा आत्म−निरीक्षण किया जाना चाहिए और अधिक दूरदर्शिता एवं अधिक तत्परतापूर्वक फिर उसी काम को आरम्भ करना चाहिए। महत्वपूर्ण कार्य−असाधारण श्रम मनोबोध एवं साधनों की अपेक्षा करते हैं। यदि उन्हें एक बार में वहीं जुटाया जा सका है तो कई किस्तों में −कई पड़ाव लेकर उसे पूरा करना चाहिए और हर असफलता के बाद पहले की अपेक्षा अधिक साहस भरा पुरुषार्थ करना चाहिए। जो लोग सुर्त−पुर्त मनोवाँछा पूरी होने के लिए आतुर रहते हैं और एकबार असफलता मिलते ही सिर धुनने लगते हैं ऐसे बाल-बुद्धि लोग कभी कोई महत्वपूर्ण कार्य सम्पादित नहीं कर सकते। कर्मयोगी वे हैं जो अपने प्रयत्नों की प्रखरता पर सन्तोष व्यक्त करते हैं− हर पड़ाव के बाद नया उत्साह प्रदर्शित करते हैं और सफलता मिलने में देर होती दीखने पर तनिक भी विचलित नहीं होते। कर्त्तव्य−निष्ठ व्यक्ति सदा इतना ही सोचते हैं कि काम को अधिक कुशलतापूर्वक करने में क्या सुधार किया जाना चाहिए? सफलता−असफलता को वे खिलाड़ियों के सामने आये दिन आने वाले उतार−चढ़ावों की तरह हलकी नजर से देखते हैं और उन्हें बहुत अधिक महत्व नहीं देते।
सामने प्रस्तुत काम को ही योगाभ्यास माना जाय और उसमें पूरा मनोयोग लगाने का प्रयत्न हर घड़ी करते रहा जाय तो मनोनिग्रह की एकाग्रता की साधना सहज ही होती चली जाती है। उपासना में मन लगना आवश्यक माना जाता है। भजन में मन न लगे तो निराशा होती है। उस बात में इतना और बढ़ा देना चाहिए कि हर उपयुक्त काम कर्मयोग है और उसमें श्रम ही नहीं पूरी तन्मयता का भी समावेश होना चाहिए। यदि हर काम में मन लगाने का अभ्यास हो जायगा तो भजन भी एक काम होने से उसमें भी मन लगेगा। जिनकी आदत आधे−अधूरे मन से− अन्यमनस्कता एवं उपेक्षापूर्वक काम करने की है उन्हें भजन में मन लगने की आशा नहीं करनी चाहिए। यदि हर काम में मन लगाने की आदत है तो किसी को वह शिकायत न करनी पड़ेगी कि भजन में मन नहीं लगता। अन्य काम तो उपेक्षापूर्वक अन्यमनस्क होकर किये जाते रहें किन्तु भजन में मन लग जाया करे ऐसी आशा दुराशा मात्र ही बनी रहेगी।
तीखी दृष्टि से आत्म−समीक्षा करने पर प्रतीत होता है कि अपने समय, श्रम और चिन्तन का बहुत−सा भाग निरर्थक कामों में खर्च होता रहता है। कुछ हलचलें तो ऐसी होती हैं जिन्हें निरर्थक कहा जा सकता है और कुछ ऐसी होती हैं जिनसे अनर्थ जुड़ा होता है। व्यसन, गप्पबाजी, आवारागर्दी, यारवाशी, मटरगश्ती, ताश, चौपड़ जैसे काम ऐसे ही हैं जिनसे किसी प्रकार का लाभ नहीं। इन्हें मनोरंजन भी नहीं कह सकते। स्वस्थ, मनोरंजन दूसरे होते हैं जो आनन्द, उल्लास और प्रेरणा उत्पन्न करते हैं। थोड़े समय का सुरुचिपूर्ण मनोरंजन उपयोगी माना जा सकता है, पर ढेरों समय ऐसी ही आवारागर्दी में बैठे−ठाले या साथियों को बेकारी में घसीटते रहने का सर्वथा अनुपयोगी कार्य मनोरंजन की श्रेणी में भी नहीं गिना जा सकता। इस निरर्थक ठगबाजी को समय, श्रम, चिन्तन और शक्ति की बर्बादी ही कहना चाहिए। बारीकी से देखा जाय कि कहीं अपना समय भी ऐसी निरर्थकता में नष्ट तो नहीं होता। यदि होता हो तो उसे तुरन्त रोका जाना चाहिए और उस उपयोगी बचत को किसी महत्वपूर्ण काम में लगाने की बात सोचनी चाहिए।
अनर्थ मूलक काम वे हैं जो तत्काल भले ही कुछ उत्साहवर्धक लगते हों, पर पीछे उनके दुष्परिणाम ही भुगतने पड़ते हैं। नशेबाजी, जुआ, जालसाजी, दुरभिसंधि, ठगी, चोरी, उठाईगीरी, गुण्डागर्दी जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ सस्ता और जल्दी लाभ पाने की आशा से की जाती हैं, पर परिणाम बिलकुल उलटा होता है। प्रतिष्ठा और विश्वसनीयता समाप्त होती जाती है। हर व्यक्ति घृणा की दृष्टि से देखता है और दण्ड मिलने की बात सोचता है। ऐसे लोगों के सच्चे मित्र रह ही नहीं जाते। निहित स्वार्थों के कारण जो चिपके रहते हैं, वे भी मतलब निकलने पर आँखें फेर लेते हैं और आड़े वक्त में कान आने से साफ मना कर देते हैं। सामाजिक घृणा, राजकीय दंड, सन्मित्रों का अभाव, ईश्वरीय विधान के अनुसार पाप कर्मों से होने वाली दुर्गति के अतिरिक्त सबसे बड़ी हानि यह है कि अपने अन्तरात्मा पर कलुष−कल्मषों के परत उतने अधिक चढ़ जाते हैं कि व्यक्ति आपके लिए ही एक समस्या बनकर रह जाता है। मनोविकार परिपुष्ट होते−होते ऐसी स्थिति उत्पन्न करते हैं जिनमें हर घड़ी विक्षोभ छाया रहे और खीज तथा तनाव की स्थिति बनी रहे। ऐसे व्यक्ति अनेकानेक मानसिक रोगों के साथ−साथ शारीरिक बीमारियों से भी ग्रसित बनते जाते हैं। परिवार और साथियों के साथ निरन्तर कलह बीज बोते और संकट खड़े करते रहते हैं। अनर्थमूलक गतिविधियाँ अपनाने वाला अपने और दूसरों के लिए मात्र विपत्ति ही उत्पन्न करता रहा है। उसके श्रम तथा मनोयोग विपत्ति भरे दुष्परिणाम ही सामने लाते हैं।
आवश्यकता इस बात की है अपनी गतिविधियों की तीखी समीक्षा की जाय और निरर्थक तथा अनर्थ मूलक जितनी भी गतिविधियाँ अपनी आदतों में सम्मिलित हो गई हों उन्हें एक ही झटके में काटकर फेंक दिया जाय और पूरी दिनचर्या इस प्रकार की बनाई जाय जिससे प्रत्येक क्रिया−कलाप को−प्रत्येक विचार तरंग को सार्थक व्यावहारिक एवं उपयोगी गतिविधियों के साथ जोड़ा जा सके। यदि ऐसा बन पड़े तो समझना चाहिए कि जीवन के काया−कल्प का अति महत्वपूर्ण अध्याय प्रारम्भ हो गया और इसका सत्परिणाम उज्ज्वल भविष्य के रूप में सामने आकर रहेगा।
पुरानी मान्यताओं की समीक्षा करने पर प्रतीत होगा कि अपने चिन्तन, क्रिया−कलाप एवं अभ्यास में कितनी ही ऐसी अवाँछनीयताएँ भर गई हैं जिन्हें छोड़ा जाना ही श्रेयस्कर है। बहुत बार उन्हें छोड़ने की सोचते हैं, पर पुरानी रुचि तथा आदत फिर उसी ढर्रे पर घसीट ले जाती है। अपने ऊपर अपना काबू न होना बड़ा विचित्र और बड़ा उपहासास्पद है, पर होता वैसा ही है। कई बुरे विचार, बुरे आचरण और बुरे स्वभाव रह रहकर अपने ऊपर हावी बने रहते हैं और सुधार की आकाँक्षा को मटियामेट बनाकर रख देते हैं।
ऐसा इसलिए होता है कि मस्तिष्क में एक पक्षीय विचार ही छाये रहते हैं उनके प्रतिपक्षी विचारों को उगाया, बढ़ाया गया नहीं होता। फलतः अवाँछनीय विचारों और आदतों को खुलकर खेलने का अवसर मिलता रहता है।
लाठी का जवाब लाठी से और घूँसे का घूँसे से दिया जाता है। विष को विष मारता है और लोहे को लोहे से काटा जाता है। कुविचारों को सद्विचारों से काटने के अतिरिक्त उनसे पीछा छुड़ाने का और कोई उपाय नहीं है। एकाँकी कामुकता के विचार ही निर्बाध रूप से मस्तिष्क पर छाये रहें और उनकी कुछ भी काट−छाँट−रोकथाम न हो तो उनका हट सकना कठिन है। उन्हें निरस्त करने का एक ही उपाय है कि ब्रह्मचर्य पालन से मिलने वाले शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक सत्परिणामों का विस्तारपूर्वक अध्ययन, मनन एवं चिन्तन किया जाय। साथ ही कामुकता से होने वाली क्षति के प्रत्येक पक्ष पर गम्भीरतापूर्वक सोचा जाय और उस प्रकार के प्रमाण, उदाहरणों की शृंखला मस्तिष्क के सामने मूर्तिमान की जाय। दोनों पक्षों की लाभ−हानि की तुलना की जाय और यह विचार किया जाय कि उनमें से क्या ग्राह्य और क्या अग्राह्य है? अन्तरात्मा का विवेक सही फैसला देगा और उस फैसले के आधार पर अवाँछनीय विचारों की जड़ें खोखली होंगी तथा उस स्थान पर सद्विचारों का वट−वृक्ष बढ़ने फैलने लगेगा।
आत्म−समीक्षा और अवाँछनीयताओं का निराकरण आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है समय, श्रम, चिन्तन की ईश्वर प्रदत्त सम्पत्ति को यदि निरर्थक, अनर्थ मूलक गतिविधियों से हटाया जा सके और उन्हें सार्थक सदुद्देश्यों के लिए प्रयुक्त किया जा सके तो समझना चाहिए कि महानता का जीवन जी सकने की सम्भावनाएँ मूर्तिमान होने में अब कोई बड़ी कठिनाई शेष नहीं रह गई है।
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तत्व ज्ञान सर्ग-
भगवान की बनाई दुनिया तो एक है, पर हर मनुष्य अपनी निजी दुनिया स्वयं ही बनाता है और उसी अपने मकड़ी के जाले में स्वयं चैन से रहता है अथवा स्वयं ही उलझ−उलझ कर मरता है। अपने श्रम का सदुपयोग करके आराम विश्राम देने वाला मकान भी खड़ा किया जा सकता है और दुरुपयोग करके ऐसा गड्ढा खोदा जा सकता है जिसमें गिरने का खतरा अपने और मित्र पड़ौसी सभी के लिए उत्पन्न हो जाय।
यह दुनिया जड़ पंचतत्वों की बनी हुई है। उसमें अपने गुण, धर्म तो हैं, पर कोई प्रतिक्रिया उत्पन्न करने की क्षमता नहीं। यह अपना−अपना दृष्टिकोण ही है, जिसके आधार पर हर व्यक्ति अपने संसार की अपने भाग्य भविष्य की संरचना स्वयं करता है। इस तथ्य को कोई विरले ही समझते हैं कि परिस्थितियों पर नहीं मनःस्थिति पर जीवन के उत्थान−पतन का−सुख−दुःख का− पूरा ढाँचा खड़ा हुआ है। यदि यह मोटी बात समझ में आ सकी होती तो हर व्यक्ति ने अपने सुखी जीवन के लिए भौतिक उपलब्धियों में श्रम करने के अतिरिक्त उन आन्तरिक आधारों को भी सही किया होता जिन पर प्रगति और अवगति की आधारशिला रखी होती है।
आमतौर से यही सोचा जाता है कि अमुक प्रकार की परिस्थितियाँ उत्पन्न हो जाएं− अमुक वस्तुएँ मिल जाएं अथवा अमुक व्यक्ति अनुकूल बन जाय तो अभीष्ट सुख साधन बन सकते हैं और आनन्दित जीवन जिया जा सकता है। यह चिन्तन सर्वथा एकांगी है। बाह्य साधन अथवा व्यक्ति सुविधा तो उत्पन्न करते हैं, पर उन सुविधाओं का उपयोग कैसे किया जाय यह सर्वथा अपने ही दृष्टिकोण एवं व्यक्तित्व पर अवलंबित है। प्रचुर मात्रा में धन मिल जाने भर से कोई सुखी नहीं बन सकता धन का उपयोग यदि व्यसनों में उद्धत अवाँछनीयताओं में किया जायगा तो उसका परिणाम उससे भी बुरा होगा जो निर्धन स्थिति में रहने से होता है। इसी प्रकार शारीरिक बल से जहाँ उपयोगी पुरुषार्थ करके उपयोगी सफलताएँ प्राप्त की जा सकती हैं यहाँ सर्वनाशी कुकर्मों का भी ठाठ रोपा जा सकता है अपने लिए तथा दूसरों के लिए संकट उत्पन्न किया जा सकता है। बुद्धिबल, रूप सौन्दर्य, चतुरता, भरा-पूरा परिवार, धन सम्पत्ति, उच्च पद आदि जिन बातों को सुख साधना माना जाता है, वे ही कुपात्रों के हाथों में पहुँचकर दुरुपयोग में प्रयुक्त होते हैं और सुख देने के स्थान पर दुःखदायी संकट उत्पन्न करते हैं।
साधनों के अनुकूलता एवं प्रचुरता की आवश्यकता समझी जा सकती है, पर यह भुला नहीं देना चाहिए कि वे दुधारी तलवारें आत्म रक्षा ही नहीं आत्म हत्या का साधन भी बन सकती हैं। साधारणतया सुविधा साधनों का उपार्जन पुरुषार्थ एवं संतुलित व्यक्ति पर अवलम्बित रहता है। सुयोग्य व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी कुशलता के सहारे प्रगति के साधन उत्पन्न अथवा एकत्रित कर लेते हैं। इसके विपरीत दुर्बुद्धिग्रस्त दुर्गुणी व्यक्ति उत्तराधिकार में अथवा अन्य किसी प्रकार अनायास मिली प्रचुर सम्पदा को भी नष्ट करके रख देते हैं। इतना ही नहीं ऐसे संकट भी उत्पन्न करते हैं, जिनका सामना अभाव ग्रस्तों को− तथाकथित पिछड़े लोगों को नहीं करना पड़ता।
व्यक्तित्व और साधनों के समन्वय से जो प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। उसी पर प्रगति एवं सुख−शान्ति निर्भर रहती है। मूलतः प्राणियों के शरीर तथा जड़ पदार्थों से बने साधन अपने आप में किसी प्रकार की संवेदना उत्पन्न नहीं कर सकते। जड़ होने के साथ−साथ वे संवेदना रहित भी हैं। नोटों की गड्डी अपने आप में रद्दी कागजों का पुलिंदा भर है। उसके द्वारा सत्कर्मों की उत्कण्ठा, बड़प्पन प्रदर्शन की आकाँक्षा, संग्रह की ललक, उद्धत उपभोगों की आतुरता, ईर्ष्या, अहमन्यता जैसी परस्पर विरोधी चित्र विचित्र प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। इन इच्छाओं के कार्य रूप में परिणत होने पर व्यक्ति एवं समाज के लिए उपयोगी एवं विनाशकारी परिणाम सामने आ सकते हैं। इतने पर भी नोटों की गड्डी निर्जीव की निर्जीव ही रहेगी। उपयोग करने वाले व्यक्ति के दृष्टिकोण पर ही यह निर्भर है कि उस सम्पत्ति का उपयोग किस प्रकार किस प्रयोजन के लिए किया जाता है।
ओछा व्यक्ति अपने गर्हित दृष्टिकोण के कारण उपयोगी व्यक्तियों एवं पदार्थों को भी इस स्थिति में धकेल देता है जिससे वे हानिकारक एवं दुःखदायी सिद्ध होते हैं। इसके विपरीत सद्गुणी, सद्भाव सम्पन्न एवं सुविकसित दृष्टिकोण का व्यक्ति स्वल्प एवं घटिया साधनों से भी बहुत कुछ कर दिखाता है। संसार का इतिहास ऐसे महामानवों की यश गाथाओं से भरा पड़ा है जिनने घोर कठिनाइयों में रहते हुए भी−घटिया लोगों का सहयोग मिलने पर भी बढ़े-चढ़े काम करके दिखाये। राम ने रीछ, वानरों का सहयोग और ईंट पत्थरों के साधन मात्र से लंका विजय जैसा कठिन कार्य कर दिखाया। गोवर्धन उठाने में कृष्ण ने ग्वाल दासों से इंजीनियरों का और लाठियों से क्रेनों का प्रयोजन पूरा कर लिया। इसके विपरीत रावण, कंस जरासंध आदि प्रचुर साधन सहायक होते हुए भी अपने लिए तथा दूसरों के लिए विनाश लीला रचने भरने में लगे रहे।
प्रयत्न और पुरुषार्थों के बल पर भौतिक उपलब्धियाँ उपार्जित किये जाने की बात सर्वविदित है, पर इस तथ्य को बिरले ही जानते हैं कि आस्थाओं एवं मान्यताओं के अनुरूप गुण, कर्म, स्वभाव का समन्वय व्यक्तित्व बनता है और यह व्यक्तित्व का स्तर ही संसार के पदार्थों एवं व्यक्तित्वों के साथ अनुकूल−प्रतिकूल ताल−मेल बिठाता है। इस ताल−मेल की प्रतिक्रिया ही उत्थान−पतन−सुख−दुःख के रूप में सम्मुख आती है। बाहरी प्रगति एवं परिस्थितियाँ दिखाई पड़ती हैं और उनका कारण , पुरुषार्थ अनुदान आदि बता कर समाधान कर लिया जाता है। इतनी गहराई में उतरना किसी−किसी के लिए ही सम्भव होता है कि बाह्य−जीवन की समस्त घटनाएँ, परिस्थितियाँ एवं उपलब्धियाँ व्यक्तित्व की आन्तरिक स्थिति के फलस्वरूप ही उत्पन्न होती हैं।
एक ही परिस्थिति को दो व्यक्ति दो प्रकार सोचते हैं और उसकी परस्पर विरोधी प्रतिक्रियाएँ अनुभव करते हैं। द्रोणाचार्य ने एक गाँव में दुर्योधन को वहाँ के सज्जनों की सूची बना कर जाने के लिए भेजा, उनने बहुत छानबीन के बाद सूचना दी कि यहाँ एक भी सज्जन नहीं रहता। सभी दुष्ट−दुराचारी भरे पड़े हैं। कुछ दिन बाद उसी गाँव में युधिष्ठिर को दुर्जनों की सूची बना कर लाने के लिए भेजा। उन्होंने भी हर व्यक्ति से सम्पर्क बनाया और गतिविधियों की खोज की। वे यह निष्कर्ष लेकर लौटे कि दोष रहित तो केवल परमात्मा है, पर इस गाँव के लोगों में औसत स्तर की सज्जनता मौजूद है। इनमें से पूर्ण दुर्जन एक भी नहीं है। प्राणियों के शरीर और पदार्थ यही तो संसार हैं। इस सृष्टि की समस्त संरचना सत और तम, देव और दैत्य के सम्मिश्रण से बनी है। रात और दिन की तरह यहाँ शुभ और अशुभ दोनों का अस्तित्व है। अन्धकार और प्रकाश से मिल कर रात्रि और दिन की रचना हुई है, उसी से काल चक्र घूमता है। ताने और बाने के उलटे सीधे धागों से कपड़ा बुना गया है। संसार में वाँछनीय और अवाँछनीय दोनों ही तत्व हैं उनमें से उचित को सदुपयोग के लिए और अनुचित को परिशोधन प्रयत्नों का अभ्यास करने के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। इस प्रकार दोनों ही अपने−अपने स्थान पर उपयोगी हैं। यह मानकर चला जाय तो दुष्टता खोजते फिरने पर उत्पन्न होने वाली खीज से बचा जा सकता है दुर्योधन और युधिष्ठिर के अपने−अपने दृष्टिकोण थे। उनने अपने−अपने चश्मे पहन रखे थे और अपने−अपने अनुरूप खोज करके अपने ढंग के निष्कर्ष निकाले थे।
गुबरीला और भौंरा एक ही बगीचे में प्रवेश करके दो तरह की वस्तुओं के साथ सम्पर्क बनाते और दो तरह के निष्कर्ष निकालते हैं। भौंरा फूलों पर मंडराता, सुगन्ध लाभ लेता और उस वातावरण पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए गुंजन गीत गाता है। उसी बगीचे में पौधों में लगाने के लिए दुर्गन्ध युक्त गोबर का खाद भी किसी कोने पर जमा रहता है। गुबरीला कीड़ा अपनी प्रकृति के अनुरूप उसी खाद के ढेर को तलाश कर लेता है और अपने दुर्भाग्य पर रोते हुए कहता है−संसार में बदबू ही बदबू भरी पड़ी है। पुष्पोद्यानों में भी दिये तले अँधेरा मौजूद है। बात गुबरीले कीड़े की भी सच ही है। यों झुठलाया भौंरे को भी नहीं जा सकता।
दुर्भाग्य−सौभाग्य, सुख−दुःख, उपयुक्त−अनुपयुक्त प्रिय−अप्रिय क्या है? इसकी परिभाषा नहीं हो सकती। क्योंकि यह सभी सापेक्ष हैं एक मध्यवृत्ति का मनुष्य किसी अमीर की तुलना में निर्धन और गरीब की तुलना में धनी है। एक लकीर छोटी है या बड़ी इसका फैसला करना सम्भव नहीं। बड़ी की तुलना में वह छोटी है और छोटी की तुलना में बड़ी। चोर को हत्यारे की तुलना में अच्छा और उठाईगीरे की तुलना में बुरा कहा जा सकता है। एक सामान्य नागरिक किसी अपराधी की तुलना में श्रेष्ठ और सन्त की तुलना में निकृष्ट है। कौन अभागा और कौन सौभाग्यवान है किसे सुखी और किसे दुःखी कहा जाय इसका निर्णय करने से पूर्व कोई तुलनात्मक मापदण्ड खड़ा करना होता है। व्यक्ति अपने को सुखी अनुभव करके प्रसन्न रहे अथवा दुःखी मान कर रोता कलपता रहे यह पूर्णतया उसकी मनःस्थिति पर निर्भर है। प्रश्न स्थिति का नहीं तुलना का है। मापदण्ड यदि बदला जा सके तो आज अपने को दुःखी, दरिद्र, पिछड़ा, अभागा मानने वाला व्यक्ति कल ही अपने को सुखी सौभाग्यवान अनुभव कर सकता है। तुलना का मापदण्ड न बदले तो तीनों लोकों का अधिपति और सर्व-साधन सम्पन्न व्यक्ति भी अपने को अभावग्रस्त, दीन−दुःखी अनुभव करते हुए चिन्ता और तृष्णा की आग में जलता रहेगा।
इस स्थिति को कोई बाहरी शक्ति या वस्तु नहीं बदल सकती। अभीष्ट वरदान मिल जाने पर−उससे अधिक की आकाँक्षा सामने आ खड़ी होगी और जो उपलब्ध है, वह स्वल्प प्रतीत होने लगेगा। फलतः दरिद्रता और दुर्भाग्य की दुःखदायी पीड़ा से कभी भी छुटकारा न मिल सकेगा। यदि सुखद परिस्थितियों की सचमुच ही अपेक्षा हो तो दृष्टिकोण बदलने का साहस करना चाहिए। तुलना में हेर−फेर करना चाहिए। एक क्षण पहले का अभागा व्यक्ति दूसरे ही क्षण अपने को सौभाग्यवान अनुभव कर सकता है।
एक गुलाब का फूल कह रहा था कि ईश्वर ने हमारे साथ अन्याय किया कि इतनी पतली और कँटीली बेल पर लगाया, हमारा स्वरूप किसी चन्दन जैसे बड़े वृक्ष की शोभा बढ़ाने योग्य था। दुर्भाग्य का रोना रोने वाले इस पुष्प के समीप उगे हुए दूसरे पुष्प ने कहा− मूर्ख, सोचने का तरीका बदल। पतली कंटीली बेल पर उगने के कारण छोटा सा फूल होना चाहिए था, तू कितना सौभाग्यवान है कि तुच्छ स्थिति से उत्पन्न होने पर भी इतना बड़ा सौभाग्य पा सका। दृष्टिकोण के आधार पर ही लोग अपने सम्बन्ध में मान्यता बनाते और दुःख से खीजते एवं सुख से मुसकराते पाये जाते हैं।
इस संसार की हर वस्तु गतिशील और परिवर्तनशील है। वहाँ एक परमाणु भी स्थिर नहीं। बदलाव इस दुनिया का अनिवार्य नियम है। जो आज जन्मा है, उसे कल मरना ही होगा। कोई हंसता है या रोता प्रकृति इसकी परवा किये बिना अपना क्रम जारी रखेगी। पैसा एक हाथ से दूसरे में जाता ही है। अन्यथा अर्थ चक्र का परिभ्रमण ही रुक जायगा। एक का लाभ ही दूसरे की हानि है। एक का मरण अन्यत्र जन्म बनता है। इस परिवर्तन चक्र को जो विनोद की तरह देखता है वह सुखी रहता है। जो स्थिरता की अपेक्षा करता है वह यौवन की विदाई पर, धन की हानि पर, सज्जनों के मरण पर, बेहिसाब रोता कलपता और सिर धुनता है। कोई व्यक्ति अपना सन्तुलन बनाये रहता है या बिगाड़ता है इसकी जिम्मेदारी उसकी खुद की है। समुद्र के किनारे खड़ा बालक ज्वार आने पर खुशी से उछले और भाटा आने पर सिर धुन−धुन कर रोये, यह उसकी मर्जी है। इसके लिए समुद्र को दोष नहीं दिया जा सकता। यदि बच्चे की इच्छानुसार समुद्र स्थिर हो जाय तो उसकी सफाई से लेकर अन्यान्य सभी क्रियाएँ समाप्त हो जायेंगी और फिर वह निकम्मी विकृतियों के भण्डार के सिवाय और कुछ भी न रह जायगा। समुद्र की हलचल रोकना सम्भव नहीं, यदि सन्तुलन बनाये रहना है तो बच्चे को ही यथार्थता समझनी या समझाई जानी चाहिए।
संसार में बुराई और भलाई का−हानि लाभ का प्रिय अप्रिय का अस्तित्व है और वह बना ही रहने वाला है; हमें किसी का भी प्रभाव अपने ऊपर ऐसा नहीं पड़ने देना चाहिए जो मानसिक सन्तुलन बिगाड़ कर सही चिन्तन में हमें अपंग−असमर्थ−बनाकर रख दे। लाभ का− सुविधा सम्पत्ति का उपयोग यह है कि सफलता देख कर उत्साह प्राप्त करें और उपलब्धियों का अधिकाधिक सदुपयोग करके उनसे अपने सम्पर्क क्षेत्र को लाभान्वित करें। हानि, विपत्ति या विकृति सामने आने पर उससे दूसरी प्रकार का लाभ लिया जाना चाहिए। सोचा जाना चाहिए कि अपनी भूलें या दुर्बलताएँ तो इस कठिनाई में कुछ कारण नहीं रही हैं? यदि रही हों तो उस प्रमाद को अविलम्ब हटा देने में तत्परता बरतनी चाहिए, ताकि वैसी दुर्घटना की पुनरावृत्ति भविष्य में न हो, ठोकर लगने का दण्ड भविष्य में अधिक सतर्कता बरतने की चेतावनी देता है। यदि एक ठोकर से एक कडुआ पाठ पढ़ा जाया करे तो उसे भविष्य में सत्परिणाम देने वाला सस्ता सौदा ही कहा जा सकता है।
जो हो रहा है सो ईश्वर की इच्छा से या भाग्यवश हो रहा है यह मानना हो तो इसमें इतना और जोड़ना चाहिए कि यह इच्छा ईश्वर को इसलिए करनी पड़ी कि हमारा शौर्य, साहस, पुरुषार्थ प्रखर हो एवं सतर्कता, दूरदर्शिता की मात्रा बढ़े। कठिनाई को देखकर डर जाना, रही सही हिम्मत भी खो बैठना−भाग्यवश यह सब हो रहा है, अपने करने से क्या बनेगा−समय आने पर ही मुसीबत दूर होगी, यह सोच कर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहना और दुःख सहते रहना यह सब तो विपत्ति को चिरस्थायी बनाने वाली कायरता है। यदि संकट के कारण मन इस प्रकार छोटा हो गया तो समझना चाहिए लगी हुई आग में अपनी ओर से ईंधन डाल कर उसे और भी अधिक प्रज्वलित किया जा रहा है।
ठण्ड लगने से शरीर में कँप−कँपी उठती है और रक्त प्रवाह तेज होकर भीतर से गर्मी उत्पन्न होती है। ठण्ड लगने पर जो शरीरगत प्रकृति प्रतिक्रिया होती है वही मनःक्षेत्र में भी होनी चाहिए। संकट उसकी कष्ट कारक प्रतिक्रिया−उससे जूझने की तत्परता−उससे भूल का परिमार्जन−परिवर्तन के लिए आवश्यक साधनों का संचय− फलतः संकट की समाप्ति। यही प्रतिक्रिया चक्र उचित है। इसी नीति का अनुसरण करने वाले आपत्तिग्रस्त मनुष्य तपे सोने की तरह निरन्तर निखरते चले जाते हैं। विपत्ति का प्रत्येक धक्का उन्हें अधिक साहसी पुरुषार्थी, बुद्धिमान और अनुभवी बनाता चला जाता है। इतिहास साक्षी है कि कठिनाइयों से जूझ−जूझ कर लोगों ने अपना मनोबल एवं कौशल बढ़ाया है, तदनुसार वे क्रमशः आगे बढ़ते हुए उन्नति के उच्चशिखर तक पहुँचे हैं। इस दृष्टि से कठिनाइयों को एक विचित्र प्रकार का सौभाग्य भी कह सकते हैं। पत्थर पर घिसे जाने से ही तो चाकू पर चमक आती है और धार तेज होती है।
पाप, अनाचार और विकृतियों को देखकर सन्तुलन खोने और बड़बड़ाने की जरूरत नहीं है। उन्हें सज्जनता के लिए चुनौती समझा जाना चाहिए और यह मानकर चलना चाहिए कि परिपक्व होने का यही एकमात्र तरीका है कि वह अनाचार को देख कर उभरे और अवाँछनीयता से टक्कर मार कर अपने वर्चस्व सिद्ध करे और गौरवान्वित बने।
यदि रावण का आतंक न होता तो राम को रीछ, वानरों को यशस्वी बनाने का अवसर ही न आता। सही परिस्थितियां रही होतीं तो ऋष्यमूक पर्वत के निवासी रीछ, वानर ऐसे ही दूसरे अन्य प्राणियों की तरह जन्मे और मर खप कर विस्मृति के गर्त में चले गये होते। रावण ने आतंक करके जहाँ अपने लिए पतन और अपयश का द्वारा खोला वहाँ प्रतिपक्षियों को गौरवान्वित करने वाली परिस्थितियाँ भी उत्पन्न कीं। महामानवों की परख इसी आधार पर होती है कि वे विपन्नताओं से कट−कट कर जूझते हुए प्रेरणाप्रद आदर्श जनसाधारण के सम्मुख उपस्थित करते हैं।
मरीज अपनी भूल के कारण स्वयं तो कष्ट उठाता है, पर डॉक्टर को आजीविका उपार्जन−कौशल वृद्धि सेवा का अवसर एवं यशस्वी बनाने वाली परिस्थितियाँ भी उत्पन्न करता है। हर विकृति के सम्बन्ध में इसी प्रकार सोचा जाना चाहिए कि उसके उत्पादनकर्ता कितने ही घिनौने क्यों न हों−इतना अच्छा तो वे भी करते हैं कि सज्जनता, सेवा−भावना, अनीति के प्रति आक्रोश एवं आदर्शों की रक्षा के लिए त्याग, बलिदान करने का अवसर उत्पन्न करते हैं। बाढ़, दुर्भिक्ष, अग्निकाण्ड, महामारी, भूकम्प जैसी दुर्घटनाओं से ग्रसित लोग निश्चय ही बहुत कष्ट उठाते हैं। पर उनका एक उत्तम पक्ष यह भी है कि सेवाभावी, सहृदय एवं उदार व्यक्तियों की करुणा जगती है और वे अपनी सज्जनता का परिचय देकर आत्म−कल्याण एवं श्रेष्ठ परम्परा स्थापित करने का सुखद अवसर प्राप्त करते हैं। सुधारकों और शहीदों की यश परम्परा ने संसार का जितना हित−साधन किया है, उतना अहित उन विकृतियों ने नहीं किया जिनसे जूझकर वे अमर हुए। दुष्टता की शक्ति जितनी हानि पहुँचाती है उसकी क्षति पूर्ति समय कर देता है, पर उनसे जूझने वाले महामानवों की प्रखरता अनन्त काल तक प्रकाश उत्पन्न करती रहती है। हरिश्चंद्र का नाटक देखकर बालक गाँधी इतना प्रभावित हुआ कि उसने दूसरा हरिश्चन्द्र बनकर ही दिखा दिया। जिन कारणों से विश्वामित्र को हरिश्चन्द्र की परीक्षा करनी पड़ी थी, वे कारण अब विस्मृति के गर्त में चले गये, पर उनकी यशस्विता अभी भी यथावत् प्रकाशवान हो रही है। यदि अवाँछनीयताएँ−सज्जनता को मोर्चे पर डट जाने के लिए उभार सकें तो कहना चाहिए कि ईश्वर ने उन्हें भी अकारण उत्पन्न नहीं किया। दुष्टता की दुर्गति का उदाहरण देखकर भी तो लोग सबक लेते हैं।
विपत्तियों से धैर्य, साहस और दूरदर्शिता का उदय होना−विकृतियों के प्रति रोष उत्पन्न होने से सज्जनता को प्रखर बनाना−दुष्टता की दुर्गति देखकर अन्यों का उस मार्ग पर चलने से विरत होना जैसे लाभों को सोचा जाय तो विपन्नताओं में भी सन्तुलन बनाये रखा जा सकता है और मनोबल गिराने की अपेक्षा उपयोगी प्रतिक्रिया का लाभ लिया जा सकता है। यदि सोचने का तरीका सही हो तो हर परिस्थिति में अनुकूलता सोची जा सकती है और सन्तुलन बनाये रखा जा सकता। मानसिक दुर्बलता ही विक्षोभ का प्रधान कारण होती है संकट की घड़ी में और भी अधिक जागरुकता का परिचय देते हैं। फौज का कप्तान घोर मारकाट की निर्णायक घड़ियों में सही निर्णय तभी ले पाता है, जब उसका मानसिक सन्तुलन सही बना रहे। घटना−क्रम को देखकर यदि वह आवेशग्रसित हो जाय तो एक प्रकार से मानसिक रोगियों की स्थिति में जा पहुँचेगा। अपना और सारी सेना का सर्वनाश करेगा। यही बात दैनिक जीवन में घटित होते रहने वाली सामान्य एवं असामान्य स्तर की घटनाओं के सम्बन्ध में लागू होती है। साहसी और धैर्यवान व्यक्ति घबराने और रोने−कलपने की कायरों जैसी दुर्बलता को पास भी नहीं फटकने देते वरन् दूने विवेक एवं पुरुषार्थ का सहारा लेकर अपने वर्चस्व का परिचय देते हैं।
स्वर्ग और नरक की चर्चा प्रायः होती रहती है पौराणिक उपाख्यानों में कोई लोक अथवा स्थान विशेष में सुखद परिस्थितियों वाले स्वर्ग का उल्लेख हुआ है वहाँ इन्द्रिय भोगों की प्रचुरता का आकर्षक वर्णन किया गया है। शरीर रहित मृतात्मा को इन्द्रिय भोगों का लाभ मिलना संदेहास्पद है। तथ्य यह है कि स्वर्ग परिष्कृत दृष्टिकोण का नाम है। यह अपनी उत्कृष्टता के कारण विपन्नताओं के बीच भी प्रसन्नता भरे वातावरण का सृजन कर लेता है।
सन्त इमर्सन कहा करते थे कि −मुझे नरक में भेज दो मैं वहीं स्वर्ग का सृजन कर लूँगा। युधिष्ठिर की कथा है कि वे कुछ समय के लिए नरक भेजे गये उनने अपनी सज्जनता के कारण वहाँ भी स्वर्ग जैसा वातावरण उत्पन्न कर लिया। शंकर जी भूत−प्रेतों के बीच रहकर स्वयं पतित नहीं हुए, वरन् उन पिछड़े हुए साथियों को ऊँचा उठाया। रामप्रसाद विस्मिल और सरदार भगतसिंह का वजन फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद और अधिक बढ़ गया। गंग कवि ने हाथी के पैरों तले कुचले जाने के मृत्युदण्ड को उस कल्पना के कारण सुखद बना लिया था, जिसके अनुसार उन्होंने खूनी हाथी को स्वर्ग में होने वाले गणेश देवता के रूप में अनुभव किया था। सन्तों ने स्वेच्छापूर्वक अपरिग्रह का व्रत लिया और गरीबों जैसा जीवनयापन करते हुए भी सम्पन्नों से भी अधिक सुखी मानसिक स्तर बनाये रखा। इसके विपरीत कितने ही धनीमानी लोग अपनी विकृत मनःस्थिति के कारण अनेकों कुकल्पनाओं से ग्रसित रहकर चिन्ता, उद्विग्नता की आग में जलते पाये जाते हैं।
अभावों की सूची बनाई जाय तो प्रतीत होगा कि हम संसार के सबसे अधिक दरिद्र व्यक्ति हैं। अपने साथ हुए दुर्व्यवहारों का संग्रह इकट्ठा किया जाय तो प्रतीत होगा कि सारा सम्पर्क क्षेत्र दुरात्माओं से भरा हुआ है। दूर−दूर तक फैली विकृतियों का लेखा−जोखा लिया जाय तो प्रतीत होगा कि संसार में सर्वत्र पाप ही पाप भरा पड़ा है। पर यदि इससे विपरीत स्तर की सूचियाँ बनाई जाएं− पिछड़े हुओं की तुलना में अपनी उपलब्धियों को आँका जाय तो प्रतीत होगा हमारी वर्तमान सम्पन्नता भी कम सन्तोषजनक नहीं है। अपने साथ हुए सद्व्यवहारों और उपकारों की सूची बनाई जाय तो प्रतीत होगा कि सम्बन्धियों में सज्जनता का ही बाहुल्य भरा पड़ा है। संसार में जो श्रेष्ठ गतिविधियां चल रही हैं उनका विवरण प्राप्त करने पर लगेगा कि इस दुनिया में श्रेष्ठता भी प्रौढ़ स्थिति में मौजूद है। अपने अभावों को सोचकर दूसरों से सहायता पाने के लिए जब हाथ पसारते हैं तो दीनता के भार से लदी लज्जास्पद अपनी स्थिति प्रतीत होती है किन्तु जब अपने पास श्रम, समय और विचारों की बहुलता देखते हुए उसी का एक अंश परमार्थ प्रयोजनों में लगाने की बात सूझती है तो प्रतीत होता है आज की स्थिति में भी शिर ऊँचा उठाकर चलने और उदार लोगों की पंक्ति में खड़ा हो सकने का गौरवास्पद अवसर आज भी सामने है।
मनुष्य क्या है? इसके उत्तर में एक ही शब्द कहा जा सकता है−विचारों का पुंज। अपने दृष्टिकोण के आधार पर ही जीवन का बाह्य स्वरूप बनता है और आन्तरिक स्तर का निर्माण होता है। सोचने के गलत ढंग का नाम ही दुःख है और सही चिन्तन को सुख कहा जा सकता है। उत्थान−पतन की दोनों धाराएँ अपनी ही मान्यताओं और रुचियों की चाल लेकर सीधी−उलटी दिशाओं में प्रवाहित होती हैं। उन्हीं के कारण देवत्व प्राप्त होता है और वे ही हमें दानव स्तर का बना देती हैं।
गीता की उक्ति है− ‘श्रद्धामयोयं पुरुष योयच्छद्धः स एव स’ अर्थात् यह मनुष्य श्रद्धा रूप है। जो जैसी श्रद्धा रखता है वह वैसा ही बन जाता है। अपनी आस्था, अपनी मान्यता, अपनी आकाँक्षा एवं अपनी दृष्टि ही अपने व्यक्तित्व का निर्माण करती है और उसी आधार पर उठने, गिरने की परिस्थितियाँ बनती हैं। विकृत दृष्टिकोण ही हमें नरक में धकेलता है और उसके परिष्कृत होने पर स्वर्ग हाथ बाँधकर सामने आ खड़ा होता है। यही है चिन्तन का महत्व और माहात्म्य।
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हमें दैनिक जीवन में अनेकों वस्तुओं और व्यक्तियों से काम पड़ता है और उनसे सम्बन्ध रखना होता है। सम्बन्ध होने पर कारणवश किसी के साथ घनिष्ठता जुड़ जाती है और किसी के प्रति उपेक्षा या अवज्ञा की दृष्टि बन जाती है। पदार्थों की ओर से कोई प्रतिक्रिया प्रदर्शित नहीं होती, वे उपयोग में लाने से न तो प्रसन्न होते हैं और न उपेक्षा करने की उन्हें शिकायत होती है इसलिए जड़−पदार्थों के प्रति जो महत्व जुड़ता है वह मात्र अपनी ही ओर से होने के कारण उतना अधिक प्रभावित नहीं करता−जितना चेतन प्राणियों, मनुष्यों, विशेषता मित्र तथा कुटुम्बियों का सम्बन्ध। इन सम्बन्धों से इच्छित प्रतिक्रिया उत्पन्न होने पर राग और अनिच्छित प्रतिक्रिया होने से द्वेष उत्पन्न होने लगता है। यह दोनों ही परिस्थितियां अन्ततः हानिकारक सिद्ध होती हैं।
व्यक्ति विशेष के प्रति बढ़ा हुआ राग−अनुराग−पक्षपात भरी स्थिति उत्पन्न करता है। उसके साथ लाड़−प्यार चलता है और इच्छा होती है कि उसे अधिक प्रसन्न अथवा सुखी बनाया जाय। इस प्रेरणा से दूसरों की तुलना में उसे अधिक सुविधा साधन−पदार्थ एवं दुलार देने का क्रम चल पड़ता है। यह सब औचित्य की सीमा में रहा होता−अन्यों की तुलना में लगभग समान रहा होता तो दर−गुजर होती रहती, पर एक के प्रति बढ़ा हुआ पक्षपात चुप नहीं बैठता, अनेकों प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न करता है। जिसे पक्षपातपूर्ण अनुदान दिये जा रहे हैं वह उन्हें देने वाले की विशेष अनुकम्पा नहीं अपना अधिकार मान लेता है। सोचता है प्रिय पात्र या पुत्र आदि निकट सम्बन्धी होने के कारण यह सब तो उसे मिलना ही चाहिए। माँगें बढ़ती जाती हैं− दबाव के आगे झुकने का क्रम चलता रहता है और बात यहाँ तक जा पहुँचती है कि अनुचित माँगें न मानने पर विद्रोह या आक्रमण के वार होने लगते हैं। यह स्थिति अनेक घरों में बाप−बेटे के बीच देखी जा सकती है। समर्थ बेटे भी बापों से एक के बाद दूसरी बढ़ी−चढ़ी मांगें करते हैं और उनकी इच्छानुकूल न बरता जाय तो शत्रुता का व्यवहार करने पर उतारू होते हैं। यह उस राग के विष वृक्ष के कडुए फल हैं जो उसके बचपन में आसक्ति, अंधता के नाम पर लगाया गया था।
ऐसे अनावश्यक लाड़−चाव से लदे रहने वाले बच्चे धीरे−धीरे अधिक अहंकारी, अधिक आलसी, अधिक अपव्ययी और अधिक पराश्रित बनते चले जाते हैं। जो दूसरों को नहीं मिल रहा है वह उन्हें मिला, इसका सीधा अर्थ वे यही निकालते हैं कि यह उनकी विशेषता अथवा भाग्यशाली होने का प्रतिफल है। अपने सुधार या सद्गुण सम्पादन की ओर प्रयत्न करने की उन्हें आवश्यकता अनुभव नहीं होती। सुधार कठिनाइयों को दूर करने के लिए किया जाता है और योग्यताएँ बढ़ाने का प्रयत्न इसलिए किया जाता है कि इसके सहारे अधिक प्रगति की जा सके। पर लाड़−प्यार के वातावरण में जब सुविधाओं की वर्षा ही हर घड़ी होती रहती है तो फिर यह सूझेगा ही कैसे कि भविष्य में अपने पैरों खड़ा होना पड़ेगा और उसके लिए सुविकसित व्यक्तित्व की आवश्यकता पड़ेगी। जब वैसी आवश्यकता ही प्रतीत नहीं होती तो फिर चेष्टा भी वैसी क्यों की जायगी?
यहाँ पुत्र का उदाहरण दिया गया है। ऐसा ही पक्षपात पूर्ण व्यवहार परिवारों में अन्यत्र भी देखा जाता है और वह निश्चित रूप से रोष पूर्ण प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। भले ही अपनी दुर्बलता अथवा परिस्थितियों की कठोरता को देखकर चुप बैठे रहा जाय, पर मन पर पड़ने वाली छाप तो अपनी हलचल उत्पन्न करेगी ही। संयुक्त कुटुम्बों के बिखरने से प्रायः यह पक्षपात ही प्रधान रूप से दिलों में दरारें डालता है और अलग होकर रहने के निष्कर्ष पर पहुँचाता है। अक्सर कमाऊ लोग अपने लिए अपने स्त्री, बच्चों के लिए दूसरों की तुलना में अधिक सुविधा साधन देते हैं। यदि ऐसा किसी विशेष उपयोगिता तर्क या कारण से विवेकपूर्वक किया गया होता तो उसका औचित्य समझा जा सकता था, पर जब राग वश पक्षपात चलेगा तो लाभ लेने वाले को प्रसन्नता भले ही हो अन्य सब में द्वेष पैदा होगा। इस द्वेष की हानि उस लाभ से अधिक होगी जो अपने प्रिय पात्र को सुविधा देने पर मिलना थी।
राग−अपने को पक्षपाती और अविवेकी बनाता है जिस पर उसकी वर्षा होती है उसके विकास क्रम में विकृतियाँ भरता है और अन्य सम्बन्धियों के मन में द्वेष की आग जलाता है। बुरे उदाहरण परम्परा बनते हैं और वैसा ही करने के लिए अन्यों को उभारते हैं। अच्छाइयों को कठिनाई से ही सीखा जाता है, पर पड़ौसी की बुराई को उदाहरण मानकर वैसा ही करने की इच्छा बहुतों को होती है। ऐसा अमुक कर रहा है, हम क्यों न करें−ऐसा लाभ अमुक ने लिया हम क्यों न लें? ऐसे ही तर्क सामने रहते हैं। उन लोगों ने अमुक प्रकार की हानियाँ उठाईं इस तथ्य पर गहराई से विचार करने की किसी को इच्छा नहीं होती।
जिसके साथ जितना राग होगा उससे उतनी ही अधिक अपेक्षाएँ रहना स्वाभाविक है। वे जब पूरी नहीं होतीं तो निराशा भी उसी अनुपात से होती है। मोहग्रस्त व्यक्ति ही विछोह की स्थिति में अधिक शोकाकुल पाये जाते हैं। हर किसी को जीवन में अपने कई सम्पर्क क्षेत्रों में कइयों का जन्म और कइयों का मरण देखना पड़ता है। यह सृष्टि का स्वाभाविक क्रम है। अपने के सुख में भी दुःख होता हो तो, पर सृष्टि क्रम रुकता कहाँ है? रागग्रस्त जन्म के समय, हर्षोन्मत्त होकर धूमधाम मचाते और मरण के समय सोना, खाना छोड़कर सिर धुनते हुए बेमौत मरते देखे गये हैं। यह उनके प्रेम की घनिष्ठता नहीं−बढ़े हुए राग से उत्पन्न अविवेक की अथवा अनावश्यक भावुकता की कष्टकारक दुर्भाग्यपूर्ण प्रतिक्रिया मात्र है। ऐसे लोगों को बेचारे भर कहा जा सकता है। उनकी असन्तुलित मनःस्थिति को सराहा नहीं जा सकता।
ज्वार और भाटे की तरह भावनात्मक अतिवाद का एक सिरा राग और दूसरा द्वेष है। जिनके प्रति उपेक्षा या परायेपन का भाव मन में जम जाता है उनकी छोटी सी भूलें भी पहाड़ जितनी दिखाई पड़ती हैं। द्वेष उभरता है और क्रोध बनकर उस गलती करने वाले पर इतना बरसता है कि बेचारे की सारी अच्छाइयां मटियामेट कर दी जाती हैं और इतना अपमानित किया जाता है कि आगे के लिए कुछ करने की हिम्मत ही टूट जाती है।
राग की तरह द्वेष भी एक रंगा चश्मा है जिसे पहन लेने पर किसी रंग का पदार्थ अपने चश्मे के रंग में ही रंगा दीखता है। जो प्यारा उसके सौ खून माफ। जो कुप्यारा उसकी मामूली−सी भूलें भी जघन्य अपराध। इस प्रवृत्ति के बढ़ते रहने से अपने भीतर असन्तुलन और अविवेक बढ़ता है। छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति बढ़ चले तो कुछ को छोड़कर शेष हर व्यक्ति, हर पदार्थ और हर अवसर दोषयुक्त दिखाई पड़ेगा और उस पर अपना विद्वेष उभर−उभर कर बरसता रहेगा। खाई चौड़ी होगी और अवाँछनीय दोषारोपण एक दिन शत्रुता के रूप में सामने खड़ा होगा। सर्वविदित है कि मैत्री की और शत्रुता की कितनी भिन्न प्रतिक्रियाएँ होती हैं।
अपनी विवेकशीलता, दूरदर्शिता और नीतिनिष्ठा सही स्तर की बनी रहे इसके लिए निष्पक्ष न्यायाधीश जैसी सुसन्तुलित मनःस्थिति का बने रहना आवश्यक है। प्रिय पात्रों को अधिक अनुदान देना हो तो वह अधिक मात्रा में सद्गुण देने के रूप में ही किया जाना चाहिए। घनिष्ठता का यही सच्चा लाभ और मैत्री का यही सर्वोत्तम सत्परिणाम होना चाहिए। इसके लिए भीतर के प्यार को बाहर की रुखाई और कड़ाई के स्तर का बनाना पड़े तो उसे कुशलनीति सत्ता मानकर अपनाना ही चाहिए। तात्कालिक प्रसन्नता−अप्रसन्नता की बात को महत्वहीन मानकर दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। व्यायामशाला के उस्ताद अपने शागिर्दों को कड़ी कसरतें कराते हैं जिनमें अपना जितना अधिक प्रेम हो उनके साथ उतना ही अधिक यह प्रयत्न होना चाहिए कि उनके व्यक्तित्व में उतने ही अधिक सद्गुणों का समावेश हो। सरकस में जानवरों को सधाने वाले शिक्षक अन्ततः स्वयं भी प्रशंसित होते हैं और अपने सधाये पशु को भी अधिक उपयोगी बनाते हैं। चिकित्सकों की कड़ाई तथा कष्टकर चिकित्सा पद्धति रोगी के लिए हितकारक ही होती है। यह लोग सस्ती प्रिय पात्रता बरतें तो जिसका हित चाहते हैं उसका प्रकारान्तर से अहित ही करेंगे।
जिनमें दोष अधिक हैं वे वस्तुतः अविकसित बालक अथवा मानसिक दृष्टि से रुग्ण हैं। उनके साथ बालकों और रोगियों की तरह अधिक सहानुभूति, अधिक धैर्य और अधिक माथापच्ची की आवश्यकता होती है। अपना अहित कौन चाहता है? स्वयं बीमार कौन रहना चाहता है, पर जिन्हें अपने हित−अनहित और रोग के स्वरूप एवं समाधान का ज्ञान ही नहीं वे आखिर करें भी तो क्या? जीभ से कान को उपदेश सुना देना आसान है, पर मुद्दतों से अपनाये गये अभ्यास को उलट देने वाली प्रेरणा को अन्तःकरण की गहराई तक उतार लेना और तदनुरूप परिवर्तन प्रस्तुत करने लगना काफी कठिन है। यदि उपदेश मात्र से अभीष्ट परिवर्तन हो जाय तो यह दुनिया कब की स्वर्गलोक जैसी सुखद और सुन्दर बन गई होती। मनुष्य के भीतर धंसे हुए पशु को हटाकर उसके स्थान पर मानवी सद्गुणों की, देवत्व की स्थापना कर सकना काफी कठिन कार्य है। इसके लिए कितने धैर्य और कितने उतार−चढ़ाव अपनाने पड़ते हैं, यह किसी सरकस के पशु शिक्षक से पूछना चाहिए। उतना धैर्य, उतना सन्तुलन, उतना अथक प्रयत्न अपनाकर ही इन अधिक भूलें करने वालों को सुधारा जाना सम्भव है। विद्वेष भरी भर्त्सना और प्रताड़ना से तो केवल अनर्थ ही उत्पन्न होता है। जिसे सुधारने की इच्छा थी वह उलटा ढीठपन दिखाने और अवज्ञा करने पर उतारू दीखता है। सहानुभूति, स्नेह, सद्भाव और संतुलन को यथास्थान बनाये रहकर भूलें करने वाले को उनकी हानियाँ समझानी चाहिएं और सुधारने के बाद मिलने वाले लाभों का भी विस्तारपूर्वक बखान करना चाहिए। भूलों का कारण क्या है और उन्हें सुधारने का तरीका क्या है? इसे रचनात्मक ढंग से सत्परामर्श के रूप में बताया समझाया जा सके तो कोई कारण नहीं कि सुधार की प्रक्रिया आरम्भ न हो जाय। घर−परिवार के और मित्र, स्वजनों के बीच यह राग−द्वेष रहित दूरगामी सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली नीति अपनाई जानी चाहिए।
प्रेम सबसे किया जाय−मोह किसी से भी नहीं। प्रेम में सद्भावना और दूरदर्शिता का समावेश होता है। उसमें हित−अनहित की दृष्टि प्रधान रहती है। मोह अन्धा होता है, उसमें प्रियपात्र की तात्कालिक प्रसन्नता ही सब कुछ बनी होती है। उचित−अनुचित का कुछ ध्यान नहीं रहता। प्रियपात्र आँखों के सामने ही बना रहे भले ही इससे उसका भविष्य अन्धकारमय बनता हो मोहान्धता में यह दृष्टि रहती है। प्रेम में राजा दशरथ की तरह अपने बच्चों को विश्वामित्र के हवाले कर देने की निष्ठुरता भी धारण करनी पड़ती है।
जन्म का अन्त मरण में और मिलन का अन्त विछोह में होता ही है। प्रकृति के इस परिवर्तन चक्र को रोका नहीं जा सकता। मिलन के समय प्रत्यक्ष और वियोग के बाद अप्रत्यक्ष सद्भाव संजोये रखा जा सकता है। वियोग हो जाने पर क्रिया पात्र की आत्मा को शान्ति देने वाले ऐसे काम किये जा सकते हैं जिनसे उसके छोड़े हुए उत्तरदायित्वों को अपनी सामर्थ्यानुसार पूरा किया जा सके अथवा उसके यश एवं पुण्य में वृद्धि की जा सके। वियोग में शोकाकुल होकर अपना सन्तुलन बिगाड़ लेना तथा कंधे पर पड़े उत्तरदायित्वों को गड़बड़ा देना, उथली भावुकता भर है। ऐसी आवेशग्रस्त मनःस्थिति उच्चस्तरीय प्रेम−भावना की देन नहीं हो सकती।
स्थान, पदार्थ, वाहन, उपकरण आदि में अत्यधिक आसक्ति रहने पर उन्हें बदलने, बेचने या किसी को देने के लिए मन नहीं करता। फलतः वे परिवर्तनों का लाभ लेने से वंचित होकर अचल शिलाखण्ड की तरह एक निर्जीव ढर्रे में पड़े दिन काटते रहते हैं। यदि वर्तमान निवास स्थान से अधिक उपयुक्त अवसर अन्यत्र मिल सकता है तो कोई कारण नहीं कि उसे बदलने में आना कानी की जाय। इसी प्रकार वस्तुओं की हेराफेरी जरूरी हो तो उसके लिए भी असमंजस में पड़ने की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए।
संकीर्णता भरे पक्षपात का नाम ही राग-द्वेष है। सुविस्तृत क्षेत्र में अपनापन फैला देने में सभी अपने लगने लगते हैं। अपनों से प्रेम ही हो सकता है, द्वेष नहीं। अपनों का हित ही किया जा सकता है अहित नहीं। अपने विराने का भेद−भाव जितना घटता जाय उतनी ही निष्पक्षता बढ़ती जायगी और न्याय एवं विवेक युक्त व्यवहार ही बन पड़ेगा। यहाँ यह नहीं कहा जा रहा है कि संसार में सर्वत्र भलमनसाहत ही है और मात्र सेवा सहानुभूति का व्यवहार बिना भले−बुरे का ध्यान रखे किया जाना चाहिए। यह अनुचित भी है और अव्यावहारिक भी। दुष्टता से असहयोग और विरोध ही नहीं उससे संघर्ष भी किया जाना चाहिए। पशुता की ऐंठ को सीधा करने के लिए कठोरता बरतना भी नितान्त आवश्यक है, पर वह सब कुछ द्वेष−भावना से नहीं, सुधार के लिए बरती गई दूरदर्शिता के रूप में ही होना चाहिए। बिना घृणा और बिना द्वेष अपनाये जब डॉक्टर पैना चाकू मरीज के सड़े अवयव को काटने, तराशने में प्रयुक्त कर सकता है तो अनीति पर उतारू लोगों को सीधे मार्ग पर लाने के लिए आवश्यक कठोरता भी बरती जा सकती है। गाँधी जी ने सत्याग्रह आन्दोलन में इसी नीति का प्रयोग किया था और उसे सफल भी सिद्ध करके दिखाया। जब आवश्यकता पड़े तो आपत्ति धर्म के रूप में इस नीति का भी उपयोग किया जा सकता है।
हर हालत में हमारी मनःस्थिति कमल पत्रवत् निर्लिप्त होनी चाहिए। बिना राग और बिना द्वेष का स्नेह, सद्भाव भरा निष्पक्ष एवं विवेकयुक्त दृष्टिकोण अपनाया जा सकता है। इस आधार पर यदि वस्तुओं एवं व्यक्तियों से संतुलित सम्बन्ध रखे जा सकें तो उसमें अपना भी हित है और उनका भी जिनके साथ सम्बन्ध जुड़े हुए हैं।
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प्रगति की आकाँक्षा स्वाभाविक है। प्राणी अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ने में संलग्न है। इस क्रमिक विकास की मंजिल पर चलते हुए उससे प्राणिविद्या विशारदों के अनुसार अमीबा से उत्पन्न करते−करते सरीसृपों, कीट पतंगों, पशुओं की कक्षाएँ पार करते−करते मनुष्य स्तर प्राप्त किया है। अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार भी चौरासी लाख योनियों को पार करते-करते उसे मनुष्य शरीर मिला है। यह दोनों ही तथ्य यह सिद्ध करते हैं कि प्राणी प्रगति के पथ पर अनवरत गति से चल रहा है। उन्नति के साधन जुटाने का प्रधान कारण उसकी महत्वाकाँक्षा होती है। उसी की प्रेरणा से बुद्धि सोचती है−काया काम करती है और अनुभव के आधार पर संग्रहीत कुशलता विविध−विधि साधन जुटाती है। इस सब के समन्वय से सहयोग आकर्षित होता है और अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं। छोटे बड़े अवरोधों से जूझते−सीखते प्रगति के पथ पर चल रही यात्रा क्रमशः सफलता के निकट पहुँचती जाती है।
महत्वाकाँक्षा से रहित दो ही हो सकते हैं− मूढ़ मति अथवा स्थिति प्रज्ञ परम हंस। मूढ़ जड़ता के कारण और ब्रह्मवेत्ता, तत्वज्ञान प्राप्त होने के कारण साँसारिक महत्वाकाँक्षाओं से किसी कदर बचे रहते हैं और चैन सन्तोष के दिन स्वल्प साधनों से ही गुजार लेते हैं। किन्तु उनकी भी कुछ आत्मिक महत्वाकाँक्षाएँ तो बनी ही रहती हैं। सुख सम्मान से लेकर अपनी कल्पना के उज्ज्वल भविष्य की बात हर कोई सोचता है। भले ही योग्यता और क्रिया शीलता के अभाव में वैसी स्थिति प्राप्त न की जा सके।
छोटे स्तर के प्राणी शरीर सुख तक अपनी महत्वाकाँक्षाएँ सीमित रखते हैं। इन्द्रिय चेतना तक में सीमित जीव पेट और प्रजनन का−इन्द्रिय लिप्सा अथवा शारीरिक सुख−सुविधा भर की बात सोचता है उसी का ताना−बाना बुनता है। वह वैसे साधन मिलने पर सुखी और न मिलने पर दुःखी होता है। इससे ऊँचा स्तर, मनःचेतना की प्रधानता का है, इसमें अहंता प्रबल होती है। दूसरों की तुलना में अपने को बड़ा सिद्ध करने के लिए अनेकानेक योजनाएँ बनती हैं। यश पाने के लिए−अपनी वरिष्ठता सिद्ध करने के लिए लोग कितने ही प्रकार की प्रतिस्पर्धाओं में उतरते हैं, कितने ही प्रकार के प्रदर्शन करते हैं। अमीरों के ठाठ−वाट बनाते और अपनी ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हो ऐसी हरकतें करते हैं। ऊंचा पद पाने ऊँचे आसन पर बैठने की ललक पूरा करने में लोगों को भारी श्रम, मनोयोग एवं धन खर्च करना पड़ता है। उन सब की तब सार्थकता समझ ली जाती है जब लोगों की दृष्टि में अपने विशेष व्यक्ति समझे जाने की स्थिति बन जाती है। संसार की आधी हलचलें शरीर सुख के लिए और आधी बड़प्पन पाने की अभिलाषा से प्रेरित होती हैं प्रतिभा, योग्यता, अमीरी, पदवी आदि के सहारे ही लोग अपना बड़प्पन सिद्ध नहीं करते, वरन् गुण्डागर्दी जैसी आततायी आक्रमणकारी गतिविधियाँ अपनाने में भी यही वृत्ति विकृत बन कर काम करती है। डाकू भी बहुधा हीरो बनने की ललक से ग्रसित पाये जाते हैं। धन कमाने से बढ़ कर उनके मन में लोगों के लिए चर्चा का विषय बनने की इच्छा अधिक प्रबल रहती है। भूतोन्माद ग्रस्त लोगों में आधा कारण मानसिक विकृति का और आधा अद्भुतता की चर्चा का विषय बनने का पाया जाता है यथार्थ भूत तो कभी−कभी कहीं ही पाया जाता है शृंगारिकता और फैशन ठाठ−वाट, धर्माडम्बर, प्रीतिभोज, स्मारक निर्माण आदि के पीछे यह यश लोलुपता ही बहुत करके प्रबल पाई जाती है। तथाकथित तपस्वियों में से वास्तविक कम और चर्चा का विषय बनने के आकाँक्षी अधिक होते हैं। विविध प्रकार की प्रतियोगिताओं और प्रतिस्पर्धाओं के आयोजनों में प्रायः यही अभिलाषा काम कर रही होती है।
मनुष्य की स्थूल चेतना में प्रथम शरीर और द्वितीय मन आता है। पहले को स्थूल शरीर और दूसरे को सूक्ष्म शरीर कहते हैं। यह दोनों प्रधानतया भौतिक हैं इसलिए इनकी अभिलाषाएँ भी ऐसी हैं जो भौतिक पदार्थों की सहायता से तृप्त हो सकें। इन्द्रिय सुख प्रिय पदार्थों से ही मिलते हैं। काम वासना का सुख भी साथी की शारीरिक स्थिति की अपेक्षा करता है। शरीर भौतिक है। अन्य सभी इन्द्रियों के भोग तथा सुख साधन अनुकूल वस्तुओं अथवा परिस्थितियों पर निर्भर हैं। इस प्रकार के लाभों को वासना के नाम से पुकारा जाता है। मानसिक बड़प्पन की इच्छा तृष्णा कहलाती है। अहंकार की पूर्ति करने वाली सभी उपलब्धियाँ तृष्णा शब्द के अन्तर्गत आ जाती हैं। वासना से तात्पर्य काम वासना से नहीं वरन् उन सभी बातों से है जो शरीर के इन्द्रिय समूह की, विनोद मनोरंजन एवं आराम विश्राम के सुविधा साधनों के साथ जुड़ी रहती हैं। एक दूसरी परिभाषा के अनुसार इन्हीं को पुत्रेषणा, वित्तेषणा, लोकेषणा के नाम से कहा गया है। दूसरे शब्दों में इन्हें काम, लोभ एवं अहंकार को पूरा करने के लिए उत्पन्न व्यग्रता कह सकते हैं।
मानवी चेतना के यह दो परत भौतिक हैं। तीसरा उच्चस्तरीय है उसमें अध्यात्म की पृष्ठभूमि प्रधान है। कारण शरीर−भाव शरीर है। उस केन्द्र में उठने वाली आकाँक्षाएँ सद्भावपरक होती हैं। उन्हें उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता कह सकते हैं। व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय सद्गुण सम्पन्न बनाना और परमार्थ प्रयोजन के लिए उदारता भरी सेवा साधना में संलग्न रहना ही इस आकाँक्षा पूर्ति के दो मार्ग हैं। ईश्वर प्राप्ति−स्वर्ग, मुक्ति सिद्धि आदि को लक्ष्य मानकर जो साधना मार्ग अपनाना पड़ता है उनमें यही दो तथ्य प्रधान होते हैं। गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता अपनाकर जिया जाने वाला आदर्श जीवन आध्यात्मिक साधना का प्रथम चरण है और लोक मंगल के बढ़−चढ़ कर अनुदान प्रस्तुत करना दूसरा। इस प्रक्रिया को गतिशील एवं सुविधाजनक बनाने के लिए ही पूजा पाठ के अनेकानेक कर्मकाण्डों एवं विधि−विधानों का सृजन हुआ है।
दुर्भाग्य से आज सर्वत्र यही भ्रान्ति जड़ जमा कर बैठ गई है कि देवी देवताओं को पूजा−पाठ के द्वारा वशीभूत करके उन्हें मनोवाँछा पूरी करने के लिए बाधित किया जा सकता है। तीन चौथाई साधना उपचार इसी भ्रान्ति के इर्द−गिर्द चक्कर काटते हैं। किस तरकीब से किस देवता को कितनी जल्दी वश में किया जा सकता है लोग इसी के चित्र−विचित्र ताने−बाने बुनते रहते हैं। पर उससे बनता कुछ नहीं। देवता सद्गुणों को कहते हैं। वे अपने व्यक्तित्व में सोये हुए पड़े होते हैं। उन्हें जगाने की ‘स्वसंकेत’ पद्धति का नाम देव उपासना है।
अन्तःकरण की पवित्रता चरित्र निष्ठा के आधार पर और प्रखरता सेवा संलग्नता के आधार पर जो जितनी मात्रा में सम्पादित कर सकता है, वह उतना ही बड़ा ईश्वर भक्त होता है और उसमें उच्चस्तरीय विभूतियाँ उसी अनुपात से उभरती हैं। स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि अथवा ईश्वर प्राप्ति जैसी आध्यात्मिक सफलता प्रदान करने में आन्तरिक स्तर की उत्कृष्टता का विकास अनिवार्य रूप से आवश्यक है इसी स्तर की प्रवृत्तियों का जीवन क्रम में समावेश हो सके, साधना विधान की समस्त संरचना इसी एक प्रयोजन के लिए की गई है। जो इस तथ्य को समझेगा वही सही गतिविधियाँ अपनायेगा और अभीष्ट सफलता सुनिश्चित रूप से प्राप्त करके रहेगा।
जीवन का स्वरूप सद्भाव सम्पन्न बन सके और आत्मिक प्रगति का द्वार वस्तुतः खुल सके इस के लिए यह आवश्यक है कि आकाँक्षाओं का स्तर ऊँचा उठाया जाय। निम्न स्तर के भौतिकता प्रधान व्यक्ति मात्र वासना और तृष्णा की कामनाओं से ओत−प्रोत रहते हैं। इससे आगे की कोई बात उनसे सोचते ही नहीं बन पड़ती। तथा तथा−कथित पूजा−पाठ भी वे इन्हीं दो प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक मान कर ही अपनाते हैं। बात इस प्रकार बनेगी नहीं। इसी जीवन में देवत्व का अथवा ईश्वरीय स्तर का अवतरण करने के लिए उपयुक्त गतिविधियाँ अपना सकना सम्भव हो सके इसके लिए एकमात्र उपाय यह है कि आकाँक्षाओं का स्तर ऊँचा उठाया है। हमारी अन्तरात्मा जो चाहती होगी उसी के आधार पर मस्तिष्क की विचारणा और शरीर की क्रियाशीलता काम करेगी। अस्तु आवश्यक यह है कि चेतना पर शरीरगत वासना और मनोगत तृष्णा का भार हटाया जाय और उनकी पूर्ति के लिए निरन्तर जलती रहने वाली ललक के असीम विस्तार को समेट कर सीमित बनाया जाय। निर्वाह के लिए आवश्यक साधन जुटाने भर की बात सोची जाय। आवश्यक की व्याख्या है अपने देश के औसत आदमी का स्तर।
यदि मध्यमवृत्ति के गुजारे भर का उपार्जन पर्याप्त माना जाय तो धन लिप्सा के लिए लगने वाला श्रम पर्याप्त मात्रा में बच सकता है। इन्द्रिय लिप्सा सीमित हो तो असंयम में नष्ट होने वाली जीवनी शक्ति की बचत हो सकती है। अमीर या बड़े आदमी बनने की ख्याति लालसा काबू में रहे तो सामर्थ्य के अति महत्वपूर्ण भाग को मिथ्या विडंबनाओं में बर्बाद होते रहने से बचाया जा सकता है। इस बचत के बाद स्पष्टतः ढेरों क्रियाशक्ति और विचारशक्ति अपने सामने खड़ी मिलेगी। इसे आत्म−निर्माण एवं समाज−निर्माण के अति महत्वपूर्ण कार्य में लगा दिया जाय तो यह परिवर्तित जीवन द्रुतगति से आत्मिक प्रगति की ओर बढ़ने लगेगा। जीवन के ऊपर हुए स्तर ही महात्मा, देवता और परमात्मा कहलाते हैं। अलौकिकता की दृष्टि से यह तीनों स्तर एक से एक ऊँचे माने गये हैं। चिन्तन एवं कर्तृत्व का परिवर्तन निश्चित रूप से मनुष्य को आन्तरिक दृष्टि से ऊँचा उठाता और दिव्य विभूतियों से सुसज्जित बनाता है। आत्मिक प्रगति का यही यथार्थ मार्ग है। सन्तोषी सर्वदा सुखी की उक्ति में यही तथ्य स्पष्ट होता है कि निरर्थक और अनर्थमूलक वासना और तृष्णा के जंजाल से मनःस्थिति को मुक्त कर लेने वाले व्यक्ति अपने को असाधारण रूप से हलका और सन्तुष्ट अनुभव करता है। उसी स्थिति में किसी के पास समय, श्रम, मनोयोग एवं धन की इतनी मात्रा खाली बच सकती है जिसके सहारे वह स्वयं पर- कल्याण की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण प्रगति कर सके।
आमतौर से मनुष्य के मन पर धन संग्रह की आकाँक्षा छाई रहती है, इसका एक कारण तो बड़ा आदमी कहलाने और विलासिता का मजा लूटने की बात मन में रहती है, दूसरे कुटुम्ब पोषण की आवश्यकता को भली प्रकार पूरा करना। अभीष्ट मात्रा में धन उपार्जन कर सकना तो किसी−किसी के लिए ही सम्भव होता है, पर ललक सभी को उसी की लगी रहती है। सफलता भले ही न मिले, पर प्रयत्न दिन−रात इसी के लिए सिर फोड़ कर किये जाते हैं। यह दृष्टि साफ हो कि औसत भारतीय के स्तर का निर्वाह पर्याप्त है तो इस शरीर और मन पर लदा हुआ आधे से अधिक भार हलका हो सकता है।
यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि कुटुम्ब पालन के लिए पिछली पीढ़ी और समान पीढ़ी का ऋण भार चुकाया जा सके तो वह भी किसी को आत्म−सन्तोष एवं कर्त्तव्य पालन का आनन्द देने के लिए पर्याप्त है। नई पीढ़ी जो अभी अवतरित नहीं हुई है उसे बुलाने में भूल करने से तो पूर्व पीढ़ी और समान पीढ़ी की सहायता कर सकना भी कठिन हो जायगा। पिता, माता, दादी, ताऊ, ताई, चाचा, चाची आदि को अपने छोटे से आर्थिक तथा शारीरिक सहायता की अपेक्षा रहती है। उनकी सहायता करना हर दृष्टि से उचित है। इसी प्रकार भाई, बहिन, भतीजे, भानजे आदि के भी घर के कमाऊ लोगों से सहायता की आशा रहती है। घर परिवार में कई असहाय असमर्थ भी ऐसे होते हैं जिन्हें वस्तुतः सहायता की आवश्यकता होती है। इनके लिए कुछ करना उसी के लिए सम्भव है जिसकी अपनी सन्तानें न हों अथवा एकाध ही हो। उदार दूरदर्शियों को आरम्भ से ही यह ध्यान रखना चाहिए कि सहायता के लिए हाथ पसारे सामने खड़े लोगों के लिए ही जब अपना उपार्जन अपर्याप्त रहेगा तो फिर नई पीढ़ी को अकारण बुलाने के जंजाल में फंसने की क्या आवश्यकता है?
वर्तमान परिस्थितियों में किसी सहृदय और दूरदर्शी व्यक्ति को सन्तानोत्पादन में उत्साह नहीं दिखाना चाहिए। यह अकारण अपने ऊपर आर्थिक तथा नैतिक जिम्मेदारियों का असाधारण भार लादना है। पत्नी के स्वास्थ्य का सत्यानाश करना है। परिवार के अन्य जरूरतमन्दों की सहायता मिलने का द्वार बन्द करना है। देश के ऊपर बढ़ती जनसंख्या का बोझ इतना लद रहा है कि सन्तुलन कायम रख सकना असम्भव हुआ जा रहा है। ऐसी दशा में वे लोग देशभक्त हैं जो सन्तानोत्पादन से हाथ खींचे रहते हैं। कोई जमाना रहा होगा जब सन्तान होना खुशी मनाने का कारण था। वंश और पिण्डदान मिलने की बात सोची जाती थी, आज इस तरह कोई, समझदार नहीं सोचेगा। आज तो जिसके ऊपर जितना सन्तान भार है उसे उतना ही अविवेकी और उतना ही अभागा कहा जा सकता है। बहुमूल्य मानव जीवन की उपलब्धियाँ आदर्शवादी कार्यों में नियोजित करके न जाने कितने महत्वपूर्ण कार्य सम्पादित किये जा सकते थे किन्तु वह सारी क्षमता बच्चे उत्पन्न करने, उनके भरण−पोषण, शिक्षा−दीक्षा, विवाह शादी एवं उपार्जन में लगाई जाय तो मनुष्य और कुछ काम कर सकना तो दूर- निर्वाह की चिन्ता से भी छुटकारा नहीं पर सकता।
प्राचीन काल में आध्यात्मिक प्रगति के इच्छुक साधु, ब्राह्मण, अविवाहित रहते थे। इसका कारण यह था कि वे नया परिवार बसाने के जंजाल में जितनी शक्ति नष्ट होती है उस बचा कर उच्च आदर्शों के लिए नियोजित कर सकें। आज भी हमारे चिन्तन में उन तथ्यों का स्थान रहना चाहिए। सन्तान बढ़ाना भार लादना माना जाता चाहिए, जिनके बिना किसी का कोई हर्ज नहीं होता वरन् अन्य महत्वपूर्ण कार्य करने में उसी अनुपात में बाधा उत्पन्न होती है।
जितनी सन्तानें हैं उन्हें सुयोग्य सुसंस्कारी बनाने भर की योजना मस्तिष्क में रहनी चाहिए। औलाद को सात पीढ़ी बैठे− बैठे खाने के लिए सम्पत्ति संचय करते रहना हर दृष्टि से अनुचित है। हर व्यक्ति को अपने पुरुषार्थ से उपार्जित आजीविका पर निर्वाह करना चाहिए। उत्तराधिकार में मिली दौलत को प्राचीन भारत में समर्थ बच्चे श्रद्धापूर्वक परमार्थ प्रयोजनों में दान कर देते थे− श्राद्ध इसी का नाम था। मात्र असहाय और असमर्थ ही पूर्वजों की छोड़ी सम्मति से गुजारा करते थे। सरकार मृत्यु कर सम्पत्ति कर आदि लगा कर इसी प्रकार की परिस्थितियां उत्पन्न कर रही है। विचारशील व्यक्ति को अपने उपार्जन का लाभ मात्र समर्थ सन्तान के लिए ही छोड़ कर नहीं जाना चाहिए वरन् उसे पीड़ा और पतन के निराकरण में भी प्रयुक्त होने देना चाहिए।
आत्म-साधना में आकाँक्षाओं का स्तर अत्यधिक महत्वपूर्ण है। इसी को परखते हुए किसी की आन्तरिक स्थिति का पता लगाया जा सकता है। जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने की जिन्हें वस्तुतः आकाँक्षा हो उन्हें उसका मूल्य चुकाने के लिए तैयार होना चाहिए।
पूजा−पाठ की छुट−पुट टन्ट−घन्ट को पर्याप्त न मानकर उन्हें अपने पूरे जीवन का स्वरूप ही बदलना चाहिए। इस परिवर्तन का आधार आकाँक्षाओं को उच्चस्तरीय बनाना है। पर सम्भव उसी के लिए हो सकेगा जो वासना, तृष्णा जैसी क्षुद्रताओं से ऊँचा उठकर आदर्शवादी क्रिया−कलाप अपनाने का साहस जुटाये और उसके लिए सन्तोष सादगी अपना कर वह बचत करे, जिसका उपयोग करने पर सच्चे अर्थों में आत्मिक प्रगति सम्भव हो सकती है। ऐसा जीवन साधनरत व्यक्ति ही उन लाभों को प्राप्त करता है। जिनका वर्णन साधना के दिव्य चमत्कारों के रूप में शास्त्रकारों ने विस्तारपूर्वक किया है।
भवंति नम्रस्तरवः फलोद्गमै। र्नवाम्बुभिर्भूरि विलन्विनो घनाः॥ अनुद्धताः सत्तुपुरुषाः समृद्धिभिः। स्वभाव एवैष परोपकारिणाम्॥70
जिस प्रकार फल होने पर वृक्ष नम्र हो जाते हैं नवीन जल भरने से मेघ झुक जाता है, वैसे ही सत्पुरुष लोग भी सम्पत्ति पाकर उद्धत नहीं होते बल्कि अधिक नम्र हो जाते हैं। साराँश यह कि परोपकारी जीवों का यह स्वभाव ही होता है।
पोदनार्थस्य पारत्र्यं कुर्यात्संचय मात्वान्। अर्धनचात्म भरणं नित्य नैमित्तिकान्वितम् ॥11
पादंचात्मार्थ मायस्य मूलभूतं विवद्धयेत्। एवमाचरतः पुत्र अर्थः साफल्यभृच्छति ॥12
−मार्कण्डेय पुराण
अपनी कमाई को खर्च करने के लिए उसके चार भाग करें। एक चौथाई धर्म कार्यों के लिए रखें। आधे में परिवार का गुजारा करें। एक चौथाई को व्यवसाय की वृद्धि में लगायें।
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सद् ज्ञान सर्ग-
कर्म आमतौर से वे माने जाते हैं जो शरीर से किये जाते हैं और आँखों से दिखाई पड़ते हैं। जिसके लिए समाज में निन्दा, प्रशंसा की−दंड, पुरस्कार की व्यवस्था है। पर वस्तुतः यह कर्म का सूक्ष्म रूप है। उसका सूक्ष्म रूप विचार है। चूँकि विचार दिखाई नहीं पड़ते इसलिए उनके सम्बन्ध में कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया भी उत्पन्न नहीं होती। दूसरे लोग दूसरों के भीतरी विचार समझ नहीं पाते इसलिए उनके आधार पर विनिर्मित बीज−व्यक्तित्व भी जाना नहीं जा सकता है। इससे इतनी ही हानि है कि अप्रकट विचारों के सम्बन्ध में एक−दूसरे का वास्तविक परिचय मिल न पाने के कारण सही धारण बना सकना कठिन होता है। इतने पर भी उस व्यक्ति की निजी लाभ−हानि तो लगभग उतनी ही होती है जितना प्रत्यक्ष कर्म करने पर।
जमीन में गढ़ा हुआ बीज भी दिखाई नहीं पड़ता और पौधे की जड़ें भी प्रत्यक्ष नहीं होती। इतने पर भी किसी पेड़ का स्वरूप और भविष्य इन अप्रत्यक्ष आधारों पर ही निर्धारित रहता है, जिन्हें बीज या जड़ें कहते हैं। विचारों की स्थिति ठीक ऐसी ही है। उन्हें बीज की जड़ की उपमा दी जा सकती है। दृश्य कर्म तो समयानुसार उन्हीं की परिपुष्ट स्थिति के रूप में सामने आते रहते हैं। अस्तु मानसिक पाप और पुण्य भी होते ही हैं। मनोविकारों के कारण व्यक्ति का समूचा जीवन−क्रम ही अस्त−व्यस्त हो जाता है निकृष्ट दुःखित स्तर की परिस्थितियाँ सामने आ खड़ी होती हैं। उच्च विचारों की प्रतिक्रिया ही किसी को सज्जन, श्रेष्ठ, समुन्नत, सुसंस्कृत बनाती है। उन्हीं के फलस्वरूप व्यक्ति महात्मा, देवात्मा और परमात्मा बनता है। दिशा निर्धारण विचार ही करते हैं और उन्हीं की प्रेरणा से शरीर एवं मन की हलचलें धीमी एवं तीव्र गति से चलकर कर्मफल का दृश्य रूप धारण करती हैं।
अध्यात्म का पूरा ढाँचा ही विचार विज्ञान पर खड़ा है। उसका सारा ढाँचा ही विचार परिशोधन को ध्यान में रखकर खड़ा किया गया है। पूजा, उपासना के क्रिया−काण्डों का महत्व उतना ही है कि वे अमुक स्तर के विचार उत्पन्न करने और उन्हें परिपक्व बनाने में महत्वपूर्ण साधन सिद्ध होते हैं। यदि विचार परिष्कार में उनसे कोई सहायता न मिले तो समझना चाहिए अन्य निरर्थक विडंबनाओं की तरह यहाँ भी लकीर ही पिट रही है। देवी−देवताओं को मन्त्र−तन्त्र द्वारा वश में करने की बात में इतना तथ्य है कि श्रद्धायुक्त विचार, मन्त्र का निष्ठा युक्त कर्म− तन्त्र−अपना प्रभाव जीवन प्रक्रिया पर अनिवार्य रूप से छोड़ते हैं और उनका सत्परिणाम साधन सिद्धि बनकर सामने आ खड़ा होता है।
राजयोग में यम−नियम, आचार−व्यवहार का− आसन प्राणायाम, शारीरिक, मानसिक, स्वास्थ्य का परिशोधन करते हैं। यह अष्टांग योग का आधा भाग हुआ। शेष चार प्रत्याहार धारणा, ध्यान और समाधि विशुद्ध रूप से चिन्तन क्षेत्र की हलचलें हैं। अन्तरात्मा का स्तर ऊँचा उठने से सहज ही देवत्व की मात्रा बढ़ती चली जाती है और उसी फलस्वरूप साधक में अनेकों अलौकिक विशेषताएँ जगमगाने लगती हैं। उपासना का कलेवर तो विधि−विधानों और कर्मकाण्डों से सँजोया जाता है, पर उसका प्राण संबद्ध विचारणाओं और भावनाओं में ही सन्निहित रहता है। भाव में ही देवता की स्थापना मानी गई है। उन्हीं के कारण पाषाण प्रतिमा में देवत्व का प्रकटीकरण होता है।
उपासना एक व्यायाम है। औषधि सेवन है। उसका समुचित लाभ ही इन सामयिक प्रयोगों को पूरे जीवन−क्रम के साथ जोड़ने से ही होता है। एक घण्टा व्यायाम करना पर्याप्त है उसके साथ आहार−विहार की सुव्यवस्था जुड़ी होने पर स्वास्थ संवर्धन होता चलेगा। एक समय दस रत्ती औषधि सेवन पर्याप्त है। अनुपात और परहेज का ठीक तरह ध्यान रखा जाय तो वह अपना गुण दिखायेगा। पर यदि व्यायाम को ही सब कुछ मानकर आहार−बिहार में उच्छृंखलता बरती जाय तो फिर अभीष्ट लाभ मिलना सम्भव नहीं। इसी प्रकार परहेज और अनुपान की उपेक्षा होती रहने पर औषधि का भी क्या परिणाम होता है? आध्यात्मिक प्रगति के लिए उपासनात्मक कर्मकाण्डों के साथ−साथ जीवन−साधना का क्रम भी चलना चाहिए। पूजा और पाठ का बीजारोपण, उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के रूप में अंकुरित और पल्लवित होना चाहिए।
साधक की विचारणा का स्तर नर−कीटकों, नर−पशुओं और नर−पिशाचों से ऊँचा उठा हुआ होना चाहिए। उसमें सरसता और सहृदयता का गहरा पुट रहना चाहिए। संयमी, सज्जनोचित और आदर्शवादी जीवन−क्रम जिन विचारों को अपनाने से बनता हो उन्हीं को मस्तिष्क में स्थान मिलना चाहिए। संग्रह की तृष्णा, इन्द्रिय भोग की वासना और अहंकारी महत्वाकाँक्षाओं के लौह−बन्धनों में जकड़ा हुआ प्राणी अपनी जीवन सम्पदा को पेट−प्रजनन जैसे तुच्छ प्रयोजनों में गँवाता रहता है। यदि महत्वाकाँक्षाएं बड़े आदमी बनने के केन्द्रबिन्दु से हटकर महामानव बनने की उत्कंठा बन सकें तो समझना चाहिए कि आत्मिक प्रगति का आधार बन गया। निर्वाह के लिए थोड़े से श्रम और मनोयोग से काम चल सकता है। परिवार छोटा रखा जाय और उसे औसत भारतीय के स्तर की सुविधा उपलब्ध कराने तक का अपना कर्त्तव्य सीमित मान लिया जाय तो फिर हर व्यक्ति के पास इतना समय, श्रम और धन बच सकता है, जिसके सहारे परमार्थ प्रयोजनों की पूर्ति के लिए बहुत कुछ किया जा सके। असमर्थता तो उनके लिए रहती है जो अमीरों जैसी खर्चीली जिन्दगी जीना चाहते हैं− बड़े आदमी कहलाने के लिए लालायित हैं और सम्बन्धियों के लिए धन कुबेर जितनी सुविधाएँ जुटाने की ललक सँजोए बैठे हैं। ऐसे लोगों के पास परमार्थ प्रयोजनों के लिए कुछ भी बचता नहीं। उपासना के लिए भी न समय बचता है न मन को उसमें रस आता है। इसमें न शरीर का दोष है न मन का। जो लक्ष्य स्थिर किया है उसी में तो इन दोनों वाहनों को लगना है। मन और शरीर स्वामिभक्त सेवक की तरह कर्त्तव्य−पालन में निरत रहते हैं। उन्हें आन्तरिक आकाँक्षाएँ ही प्रेरणा देती हैं यदि जीवन−लक्ष्य बड़प्पन और उपयोग है तो फिर आत्मिक प्रयोजनों में रुचिपूर्वक लग सकना उनके लिए सम्भव हो ही नहीं सकता। उपासना में शरीर को आलस्य लगने और मन में अरुचि रहने की शिकायत तब तक बनी ही रहेगी जब तक लौकिक महत्वाकाँक्षाएँ सारे चिन्तन क्षेत्र को पकड़−जकड़कर बैठी रहेंगी। ईश्वर प्राप्ति की आत्मिक प्रगति की महा यात्रा आरम्भ हुई तब माननी चाहिए जब उत्कृष्टता का जीवन−लक्ष्य निर्धारित कर लिया जाय। अन्यथा साँसारिक मनोकामनाओं की मनौती मनाने के लिए पूजा−पाठ की उपहासास्पद विडंबना तो सर्वत्र फैली पड़ी है ही।
अन्तरंग साधना मन−क्षेत्र में उत्कृष्टता स्थापित करने की है। यह प्रयोजन पुराने कुसंस्कारों से निरन्तर जूझते रहने और सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव में सम्मिलित करने से ही पूरा होता है। इसके लिए आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार आत्म−निर्माण और आत्म−विकास की चतुर्मुखी चेष्टा अमुक समय से ही नहीं, वरन् हर घड़ी अपनानी पड़ती है कुशल अध्यापक की तरह अपनी ही अन्तरात्मा को कठोर समीक्षक और अभिनव मार्ग−दर्शक की तरह नियुक्त करना पड़ता है। वह आत्म-मंथन कुछ दिन तो कठिन जान पड़ता है किन्तु कुछ ही समय में सब कुछ सरल और स्वाभाविक बन जाता है।
शरीर साधना में सबसे महत्वपूर्ण है− निरालस्यता का अभ्यास। आमतौर से लोग अपनी आधे से अधिक श्रम−शक्ति आलस्य में गँवाते हैं। सुस्ताने के नाम पर ढेरों समय नष्ट किया जाता है। मन में उत्साह न रहने रोते−खीजते किसी प्रकार मन्द गति के नाम की लकीर, बेगार भुगतने की तरह पीटी जाती है। आलस्य से शरीर और प्रमाद से आच्छादित मन जो भी काम कर है वह आधा, अधूरा, लँगड़ा, काना, कुबड़ा और फूहड़ होता है। मात्रा भी उसकी अति स्वल्प रहती है। उत्साही और स्फूर्तिवान व्यक्ति जितनी देर में जितना काम बहुत ही सुन्दर स्तर का कर लेता है, उसकी तुलना में आलस्य प्रमादग्रस्त व्यक्ति आधा चौथाई भी नहीं कर पाता। जो करता है वह भी ऐसा बेतुका होता है कि उससे तो न करना अधिक अच्छा रहता है।
जीवन साधना में सबसे प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण स्थान आलस्य और प्रमाद को निरस्त करने का है। इसके लिए यह आवश्यक है कि समय को बहुमूल्य सम्पदा समझा जाय और एक−एक क्षण का पूरा मूल्य वसूल करने के लिए श्रम संलग्न रहा जाय। प्रातःकाल उठते ही− अथवा रात्रि को सोते समय अगले दिन निपटाये जाने वाले कामों को ध्यान में रखते हुए दिनचर्या बना ली जाय और जब तक कोई अनिवार्य कारण न आ जाय तब तक उस दिनचर्या को मुस्तैदी और दिलचस्पी के साथ पूरा किया जाय। सुस्ताने का अवकाश भी रखा जा सकता है, पर उसके लिए बहुत सा समय गँवाने की आवश्यकता नहीं है। काम को खेल मनोरंजन मानकर किया जाय और उसी प्रयोजन में कार्य−पद्धति का थोड़ा−थोड़ा फेर बदल कर लिया जाय तो उस परिवर्तन से ही ऊब दूर हो जाती है वस्तुतः शरीर को सुस्ताने की उतनी आवश्यकता नहीं पड़ती, जितनी मन की ऊब उतारने की। शरीर के कल−पुर्जे तो सोते−जागते हर घड़ी काम करने के अभ्यस्त हैं। थकान मिटाने के लिए नियत समय पर नींद लेना और बीच−बीच में थोड़ा−थोड़ा विश्राम लेना−टहलने या खेलने जैसा कोई हलका काम अपना लेना पर्याप्त होता है।
साधारण स्थिति के मनुष्य को 8 घंटा आजीविका उपार्जन के लिए, 7 घंटा सोने, सुस्ताने के लिए, 5 घंटे नित्यकर्म तथा फुटकर निजी कामों के लिए खर्च करना पर्याप्त होना चाहिए। शेष 4 घंटे परमार्थ प्रयोजन में लगाने चाहिएं। उपासना स्वाध्याय का समय भी इसी में से काटना पड़े तो भी दो−तीन घंटे लोक−मंगल के कार्यों के लिए बच रहते हैं। अपने युग का सबसे भयंकर संकट विकृत चिन्तन के कारण ही उत्पन्न हुआ है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता सामाजिक, नैतिक और बौद्धिक क्रान्ति की है। इसके लिए अपना ज्ञान−यज्ञ अभियान युग−निर्माण आन्दोलन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। लोक सेवा के लिए इससे बढ़कर इन दिनों और कोई कदम नहीं हो सकता। हमारे श्रम, समय एवं मनोयोग को इसी परमार्थ−प्रयोजन में बिना इधर−उधर भटके संलग्न होना चाहिए। जिनके पास गुजारे के लिए दूसरे साधन मौजूद हैं उन्हें आजीविका उपार्जन वाले आठ घंटे भी इसी परमार्थ−प्रयोजन के लिए समर्पित कर देने चाहिएं। शरीर पर साधना की दृष्टि से नियमित दिनचर्या का बनना और उस पर कठोरतापूर्वक आरुढ़ रहना एक अत्यन्त महत्वपूर्ण कार्य है। कर्मयोग का इसे व्यावहारिक और सर्वप्रथम कदम कहा जा सकता है। निठल्लापन जड़ता का−तामसिकता का चिन्ह है। इसे सौभाग्य नहीं दुर्भाग्य माना जाना चाहिए। शरीर की क्रिया शक्ति और मस्तिष्क की कुशाग्रता को नष्ट करने में आलस्य, प्रमाद से बढ़कर और कोई शत्रु नहीं हो सकते।
अपने देश में श्रम से जी चुराने की कामचोरी, हरामखोरी की−आदत बेहिसाब बढ़ी हुई है। कठोर श्रम करने वाले श्रमजीवियों को अछूत कहा गया और निठल्लेपन में समय गुजारने वाले सवर्ण या बड़े आदमी कहलाये। बच्चे तनिक भी कमाऊ होते ही अधेड़ आदमी निठल्ले रहने को सौभाग्य मानते हैं और बेटे की बहू आते ही सास काम करने से हाथ खींचती है। माँ−बाप को कड़ा श्रम करते देखकर भी सयाने लड़के इधर−उधर छिपते फिरते हैं और उनके काम में हाथ नहीं बँटाते। बेकारी से उत्पादन घटता है और दरिद्रता बढ़ती है। व्यक्ति और समाज दोनों का ही निठल्लेपन में अकल्याण है। अस्तु इस जड़ तामसिकता की प्रवृत्ति को उखाड़ना जीवन साधना का प्रथम लक्ष्य होना चाहिए। इन मोर्चों को जीतने पर ही भौतिक और आत्मिक प्रगति का पथ−प्रशस्त हो सकता है। विरक्त होने का मतलब तृष्णा, वासना और अहंकारिता से अनुराग छोड़ना है। श्रम−निष्ठा और कर्त्तव्य परायणता तो साँस रहने तक छोड़ने की वस्तु नहीं है जवानी में कठोर और बुढ़ापे में हलके काम चुने जाएं यह दूसरी बात है, पर अपनी योग्यता एवं स्थिति के अनुरूप श्रम संलग्न हर किसी को रहना चाहिए और समय रूपी जीवन सम्पदा का एक कण भी निरर्थक नहीं गँवाना चाहिए।
कर्मयोग का दूसरा चरण यह है कि प्रत्येक क्रिया के पीछे स्वार्थ सिद्धि की नहीं−उत्तरदायित्वों के निर्वाह की कर्त्तव्य−पालन दृष्टि रहनी चाहिए। हम जो भी करते हैं वह ईश्वर के सौंपे शरीर को निर्वाह एवं श्रम देने के लिए, ईश्वर प्रदत्त मन को सुसंस्कृत बनाये रहने के लिए, ईश्वर के सौंपे परिवार उद्यान को कर्त्तव्य−निष्ठ माली की तरह सींचने, सँभालने के लिए, सामाजिक राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों को निभाने के लिए, जीवन−लक्ष्य को पूरा करने के लिए किया जा रहा है। यह दृष्टिकोण रखकर किये जाने वाली सामान्य काम भी जीवन साधना के अंग बन जाते हैं। कामों में विकृतियाँ तभी उभरती हैं जब उन्हें संकीर्ण स्वार्थ स्थिति के लिए किया जाता है। कर्त्तव्य−निष्ठ सैनिक की तरह यदि ईश्वर की सेना का अकिंचन सिपाही अपने को माना जाय और जिस तरह सैनिक राष्ट्रहित के लिए बड़े से बड़ा बलिदान करने और कड़े से कड़ा अनुशासन मानने के लिए तैयार रहता है, वैसी ही साधक की मनःस्थिति होनी चाहिए। इस चिन्तन को ध्यान में रखकर किये गये सभी काम कर्मयोग की श्रेणी में गिने जाएंगे ओर उनका परिणाम योगाभ्यास के लिए की गई तप साधना जैसा श्रेयस्कर ही होगा।
कर्त्तव्य−पालन अपने आप में इतना बड़ा काम है जिस पर हर किसी को गर्व एवं सन्तोष अनुभव होना चाहिए। हर काम पूरी तरह सोच−विचार कर दूरदर्शिता एवं परिपूर्ण कुशलता के साथ किया जाना चाहिए। इतने पर भी इतने समय में यह परिणाम उत्पन्न हो ही जायगा, इसका कुछ निश्चय नहीं। कारण कि साधन, सहयोग, सूझ−बूझ, परिस्थिति आदि अनेक तथ्यों से मिलकर सफलता उत्पन्न होती है। अपने हाथ में तो केवल मनोयोगपूर्वक श्रम करते रहना भर है। ऐसी दशा में अमुक कर्म का इतने समय में यह प्रतिफल मिल ही जायगा, इसका कुछ निश्चय नहीं रहता। सफलता में हर्षोन्माद और असफलता को गहरा शोक−सन्ताप मनाने में क्षण−क्षण में मानसिक सन्तुलन बिगड़ता है और उस उथल−पुथल में, जीवन धारा में उलट−पुलट उत्पन्न करने वाला व्यवधान उत्पन्न होता है। अस्तु कर्मयोग का एक निर्देश यह है कि विवेकयुक्त सत्कर्म पूरे मनोयोग के साथ करते रहना ही गर्व, सन्तोष एवं आनन्द का आधार मान लिया जाय। अभीष्ट परिणाम में यदि देर लगती है या आंशिक सफलता मिलती है तो उसे देखकर अधीर उद्विग्न न बना जाय। हर असफलता के बाद दूने उत्साह से श्रम किया जाय और पिछली बाद यदि कुछ त्रुटि रही हो तो उसके निराकरण का अधिक सतर्कतापूर्वक प्रयत्न किया जाय।
निन्दा, प्रशंसा के झंझट में न पड़ने की बात भी कर्मयोगी को ध्यान में रखनी पड़ती है। लोग कर्म का बाहरी स्वरूप देखते हैं कर्त्ता का उद्देश्य नहीं समझते। इसी प्रकार लोक−प्रचलन में स्वार्थ सिद्धि की ही प्रधानता है। स्वार्थियों से ही यह संसार भरा पड़ा है वे अपने स्तर के कार्यों को ही पसन्द करते और सराहते हैं। परमार्थ प्रयोजनों का प्रचलन न होने से वे अटपटे और मूर्खतापूर्ण समझे जाते हैं। इस लोक−प्रवाह में सत्पथ अपनाने वालों को प्रायः उपहासास्पद ही बनना पड़ता है। लोग अपने लाभ या रुचि के कामों की प्रशंसा करते हैं। इसमें कई बार खुशामद या चापलूसी द्वारा सस्ती मित्रता जोड़ने ओर उसकी आड़ में उल्लू सीधा करने की प्रवृत्ति भी रहती है। ऐसी दशा में दूसरों के मुँह से निकलने वाली निन्दा, प्रशंसा से अपने कामों के गलत−सही होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। कई बार तो ठीक उलटी बात देखी जाती है। सत्कर्मों का उपहास और दुष्कर्मों का समर्थन अब आम रिवाज जैसा हो गया है। ऐसी दशा में उलटी कसौटी से काम लेना पड़ता है। लोग मात्र दुष्कर्मों की ही निन्दा नहीं करते। सत्कर्मों का उपहास उड़ाने में भी नहीं चूकते। प्रशंसा सर्वदा सत्कर्मों की ही नहीं होती, दुष्ट-दुरात्मा भी हीरो बना दिये जाते हैं। कला का आकर्षण लोगों के मुख से सहज ही वाहवाही निकलवा ही लेता है जबकि अनेक बार उस कला की आड़ में सर्वनाशी विष घुला होता है।
इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए कर्मयोगी अपनी श्रमनिष्ठा और सन्मार्गगामिता को ही आत्म−तुष्टि और आत्म−प्रशंसा का आधार मान लेता है। उसे किसी के मुख से प्रशंसा का प्रमाण−पत्र पाने की आवश्यकता नहीं पड़ती न वह अवास्तविक निन्दा से उद्विग्न होता है उसका अपना आपा ही−अपना स्तर ही सन्तोष के लिए पर्याप्त आधार बना रहता है। इसी प्रकार उसे अभीष्ट परिणाम की उतावली नहीं होती। सत्कर्म की नीति अपनाना ही उसके लिए क्षण−क्षण में मिलने वाली सफलता जैसा उपहार होता है। कर्मयोगी किसी भी स्थिति में खिन्न−उद्विग्न नहीं पाया जाता। उसकी परिष्कृत जीवन नीति ही उसे हर घड़ी सन्तोष देती रहती है, फलतः उस आन्तरिक प्रसन्नता को चेहरे की मुस्कान रूप में हर घड़ी देखा जा सकता है।
कर्मयोग की एक दिशा ईमानदारी है। वह अपने हर काम को पूरी तत्परता, कुशलता और ईमानदारी के साथ करता है। अपने कामों का स्वरूप प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है तो कर्त्ता को हर घड़ी यह ध्यान रहता है कि अपनी कृतियों का स्तर गिरने न पाये। किये हुए कामों को देखकर कोई यह लाँछन न लगाए कि काम में बेईमानी या उपेक्षा बरती गई है। लाभ कम हो या अधिक अपनी प्रामाणिकता गिराकर कुछ भी नहीं किया जाना चाहिए। जिसमें किसी के साथ छल या विश्वासघात हुआ हो ऐसा कार्य निष्कृष्ट ही माना जायगा। नीति, मर्यादा, न्याय एवं औचित्य का उल्लंघन करके किये हुए काम भले ही आर्थिक लाभ देते हों या सुविधा उत्पन्न करते हों, निश्चित रूप से हेय हैं। कर्मयोगी को भी काम का प्रतिफल तो चाहिए वह उसके लिए प्रयत्न भी करता है किन्तु अनीति की कीमत पर खरीदे गये लाभ की अपेक्षा तो उसे हानि उठाना अधिक श्रेयस्कर लगता है।
शिष्टाचार का पालन और दूसरों के साथ सज्जनतापूर्ण सद्व्यवहार का ध्यान रखना कर्मयोग का आवश्यक अंग है। कटु व्यवहार, क्रोधावेश, दुर्वचन, तिरस्कार, अशिष्टता तो उनके साथ भी नहीं बरती जानी चाहिए जिनसे हमारा मतभेद है या विरोध है। विरोधियों और प्रतिद्वंद्वियों के साथ किस तरह निपटा जाय, इसके लिए जो भी तरीका अपनाना हो उसमें कटुवचन बोलने और दुर्व्यवहार करने की गुंजाइश नहीं है। न्यायाधीश किसी अपराधी को फांसी की सजा तो दे सकता है, पर उसका असम्मान नहीं कर सकता है। इससे तो अपराधी और न्यायाधीश दोनों एक ही स्तर के बन जाएंगे। सज्जनोचित शिष्टाचार का उल्लंघन किसी भी स्थिति में नहीं किया जाना चाहिए। क्योंकि इसमें अपराधी से भी बढ़कर दोषी वह हो जाता है अशिष्टता बरतता है।
नागरिकता के कर्त्तव्यों का पालन प्रत्येक समझदार व्यक्ति को करना चाहिए। सड़क पर बाँई ओर चलना, लाइन लगाकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करना, सार्वजनिक स्थानों को गन्दा करने या क्षति पहुँचाने का प्रयत्न न करना जैसे सार्वजनिक सुविधा के नियम हर किसी को पालन करने चाहिएं। मिलने के काम करके देने के समय का पूरी तरह ध्यान रखा जाना चाहिए। माँगी वस्तु का लौटाना या दिये वचन का पूरा करना मनुष्य की प्रामाणिकता का चिन्ह है। मोल−भाव, नाप-तौल तथा वस्तु के स्तर में गड़बड़ी न की जाय, रिश्वत, जमाखोरी, मुनाफा खोरी, करचोरी जैसे आर्थिक भ्रष्टाचारों से स्वयं दूर रहा जाय ओर दूसरों को रोका जाय। चोरी, डकैती, छल, हत्या जैसे नृशंस क्रूर−कर्मों की बात तो सोची नहीं जा सकती। प्रतिपक्षी से प्रतिशोध लेना हो तो उसका अन्तःकरण बदलने और चरित्र सुधारने की ही दृष्टि रखी जानी चाहिए। हिंसा−प्रतिहिंसा का−प्रतिशोध, प्रति प्रतिशोध का कुचक्र तो उस अवाँछनीयता को चक्रवृद्धि दर से बढ़ाता ही जाता है, जिसके निवारण के लिए आतंकवादी उपायों को अपनाया गया था।
नागरिकता, नैतिकता, नियमितता, शिष्टता, सज्जनता, दूरदर्शिता, कर्त्तव्य−परायणता जैसे आधार अपनाकर जो सत्कर्म किये जाते हैं उन्हें कर्मयोग की संज्ञा मिलती है। उपासना तो थोड़े समय तक होने से भी काम चल सकता है, पर साधना तो हर घड़ी चलती रहनी चाहिए। मन, वचन और कर्म का स्तर ऊंचा रखकर जो सोचा, बोला और किया जाता है, वह सब कुछ योगाभ्यास की तरह सत्परिणाम उत्पन्न करता है। कर्मयोग की साधना सर्वांगपूर्ण है। वह जीवन−लक्ष्य को प्राप्त करने और अगणित दिव्य सिद्धियों को प्रदान करने में सुनिश्चित रूप से सफल होती है।
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विचार बीज है और कर्म वृक्ष। कर्मों का आरम्भ विचारों से होता है और उन्हें पुरुषार्थ का खाद, पानी मिलते रहने से वे उपलब्धियों के फल−फूलों से लद जाते हैं। विचार यदि उत्कृष्ट हैं और कर्म आदर्श, तो फिर उनका प्रतिफल वैसा ही होना चाहिए जैसा स्वर्ग में रहने वाले देवताओं को उपलब्ध रहता है। यदि यह दोनों ही आधार लड़खड़ा रहे होंगे, तो अस्त−व्यस्त जीवन क्रम अपनाकर मनुष्य अवाँछनीय रीति−नीति अपनाता है और दुर्गति का भागी बनता है। विचारों और कर्मों के दोनों घोड़ों की लगाम यदि मजबूती से पकड़ कर रखी जाय और उन्हें सही सड़क पर सही रीति से चलाया जाय तो अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकना किसी के लिए भी कठिन न रह जाय। मानवी सत्ता इतनी सर्वांगपूर्ण है कि उसे असीम सम्भावनाओं का भाण्डागार कहा जा सकता है। कठिनाई एक ही है कि लोग न तो अपनी समर्थ सत्ता के सम्बन्ध में यथार्थ जानकारी रखते हैं और न अपने दो प्रचण्ड शक्ति साधनों का, शरीर और मन का उपयोग जानते हैं। यदि विचारों और कार्यों पर विवेकपूर्ण नियन्त्रण बना रहे तो प्रगति का उच्चस्तरीय क्रम चल पड़ेगा और देव मानवों जैसी उपलब्धियों को करतलगत किया जा सकेगा।
जीवनयापन की सर्वश्रेष्ठ नीति को कर्मयोग कहते हैं। अनियन्त्रित और अव्यवस्थित निरुद्देश्य−स्वेच्छाचारी नीति अपनाकर मनुष्य अस्त−व्यस्त फिरते और बहुमूल्य जीवन सम्पदा को नष्ट−भ्रष्ट करते हैं। यदि आत्मचर्या पर नियन्त्रण स्थापित किया जा सके तो उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं में तनिक भी सन्देह न रह जायगा।
आत्म−नियन्त्रण के लिए विचार और कर्म दोनों को योजनाबद्ध बनाना पड़ता है। आमतौर से मस्तिष्क वासना और तृष्णा की अनावश्यक, अवाँछनीय और असंबद्ध कल्पना जल्पनाओं में भटकते रह कर अपनी बहुमूल्य क्षमता को अकारण बर्बाद करता रहता है। मस्तिष्क को आदेश होना चाहिए कि वह केवल योजनाबद्ध निर्देशों का ही पालन करे और चिन्तन के लिए जो दिशा सौंपी गई है उसी की परिधि में अपना श्रम नियोजित रखे। निरर्थक सोचने में रंच मात्र भी दौड़−धूप न करे। अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति के लिए कितने साधन जुटाये जाने हैं− कितने अवरोधों को हल किया जाना है इसके लिए सोचने का सुविस्तृत क्षेत्र सामने पड़ा है फिर उसी में सोचने विचारने की बात को सीमित क्यों न रखा जाय? जो न तो आवश्यक है और न वर्तमान परिस्थितियों में सम्भव, ऐसी उड़ानें उड़ने से मस्तिष्क को रोका जाना चाहिए। वह रोक−थाम तभी हो सकती है जब चिन्तन के लिए निर्धारित क्षेत्र बना कर दिया जाय और उसके लिए आवश्यक साधन सामग्री प्रस्तुत की जाय।
जैसे बिगड़े हुए स्वास्थ को सुधारने की समस्या सामने है तो मस्तिष्क को इस संदर्भ के कारण और निवारण ढूँढ़ लाने का काम सौंपा जाना चाहिए। इसके लिए उसे पढ़ने−पूछने एवं सोचने के लिए साधन ढूँढ़ने और सम्पर्क बनाने की योजना बनाने के लिए कहना चाहिए। सौंपे गये काम का यदि महत्व और लाभ समझ लिया जाय तो मस्तिष्क सहज सी ही उस दिशा में जुट जायगा। मन न लगने का− उलट जाने का− एक ही कारण है कि उस कार्य के सम्पन्न होने का लाभ और न कर पाने की हानि को गहराई तक नहीं समझा गया। यदि स्वस्थ, परिपुष्ट समर्थ और दीर्घजीवी काया का आकर्षक कल्पना चित्र सामने खड़ा किया जा सके और इसके विपरीत वर्तमान क्रम से स्वास्थ गिरते जाने पर कुछ ही समय बाद जो दुर्गति होगी और उसका दुष्परिणाम सगे सम्बन्धियों को भुगतना पड़ेगा उसका भयावह चित्र सामने रखा जा सके तो अन्तःकरण प्रस्तुत स्वास्थ्य समस्या की गरिमा को समझेगा और उसे हल करने के लिए चिन्तन क्षेत्र में उपयोगी हलचलें आरम्भ हो जाएंगी।
मन की अव्यवस्थित भाग दौड़ का तात्पर्य एक ही है कि उसे कोई महत्वपूर्ण काम सुनिश्चित रूप से सौंपा ही नहीं गया। यदि सौंपा जाय तो वह अपनी अस्त−व्यस्तता छोड़ कर निर्धारित दिशा में ही कार्य संलग्न बना रहेगा। वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार, शिल्पी, व्यवसायी, कृषक आदि अपने मन को नियत निर्धारित काम में लगाये रहने का अभ्यास करते हैं फलतः उनका चिन्तनक्रम अस्तव्यस्तता में भ्रमण नहीं करता और बिना ननुनच किये अपने निर्धारित क्रम में जुटा रहता है।
आरम्भ में अनगढ़ मन को एकाग्र करना थोड़ा कठिन पड़ता है, पर यह कठिनाई तो हर नये काम में आती है हल में चलने के लिए नया बछड़ा सहज ही कहाँ रजामन्द हो जाता है। नये घोड़े ताँगे में जुतते समय कितनी गड़बड़ फैलाते हैं। यदि मालिक लोग इस असहमति से निराश होकर अपना प्रयास छोड़ दें तो फिर उनका बछड़ा पालना और घोड़े खरीदना ही व्यर्थ है। तब वे हल जोतने और ताँगा चलाने के लाभ से वंचित ही रहेंगे। हिम्मत के साथ देर तक डाँट−पुचकार कर लगे ही रहने पर सरकस के जानवर कैसे−कैसे करतब दिखाने लगते हैं फिर कोई कारण नहीं कि मन को निर्दिष्ट दिशा में ही अपनी चिन्तन प्रक्रिया केन्द्रित किये रहने के लिए अभ्यस्त न किया जा सके।
उथले विचार ऊपरी सतह पर घूमते रहते हैं और गोता मारकर कीमती मोती पाने में सफल नहीं होते। किसी भी विषय पर जितनी गम्भीरतापूर्वक उसके पक्ष प्रतिपक्ष का मन्थन करते हुए निष्कर्ष निकाला जायगा उतनी ही वस्तुस्थिति स्पष्ट रूप से सामने आवेगी। एकाँगी−एक−पक्षीय−विचार भावुकता कहलाते हैं। होना यह चाहिए कि पक्ष और विपक्ष के दोनों विचार काम करें−सरलता और कठिनाई की दोनों तस्वीरें सामने रखी जाएं और सोचा जाय कि अधिक अनुकूलता उत्पन्न करने के लिए तथा कठिनाइयों को हल करने के लिए क्या−क्या करना होगा और उसके लिए क्या साधन जुटाने होंगे? मात्र कठिनाइयों की बात सोच कर किसी प्रयास के लिए साहस ही न करना जितना अबुद्धिमत्ता पूर्ण है, उतना ही यह भी उपहासास्पद है कि अभीष्ट मनोरथ को चुटकी बजाते सफल होने की बालबुद्धि अपनाई जाय। ऐसे उतावले लोग आये दिन असफलता का मुँह देखते, दुर्भाग्य का रोना रोते पाये जाते हैं। हर छोटा−बड़ा काम आवश्यक मनोयोग, परिश्रम, साधन और समय की अपेक्षा रखता है। उन्हें जुटाने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। जिनमें इसके लिए धैर्य, साहस और संकल्प होगा वे ही कुछ कर सकने और पा सकने में सफल होंगे। योग्यता का अभाव और साधनों की कमी पूरी करने के लिए घनघोर प्रयास करने को ही सफलता की पद यात्रा कहते हैं। उछल कर क्षण मात्र में आकाश चूमने के आतुर लोगों ने कभी कुछ कहने लायक सफलता पाई हो ऐसा देखने, सुनने में नहीं आया।
कर्मयोग का प्रथम चरण है, अपने विचारतन्त्र को सही करना−असम्भव और असम्बद्ध कल्पनाओं में उड़ते फिरने की अस्त−व्यस्तता को निरस्त करना। भविष्य के सुनहरे सपने देखते रहने की अपेक्षा यही उचित है कि आज कि समस्याओं को −आज के साधनों से हल करने का ताल−मेल बिठाया जाय। कल जब अधिक अच्छी परिस्थितियाँ सामने होंगी तो कल उससे आगे की बात सोची जा सकती है। भूतकाल चला गया वह लौट नहीं सकता। इसलिए बीती ताहि बिसार दे की उक्ति को सही मानकर गढ़े मुर्दे उखाड़ने की बात भुला देने में ही बुद्धिमत्ता है। भूतकाल की समीक्षाओं का लाभ इतना ही है कि पिछले अनुभवों से लाभ उठा लिया जाय। बीती घटनाओं की बात सोच कर रंज करने और पछताने से वर्तमान भी नष्ट होता है। सबसे महत्वपूर्ण समय वर्तमान ही है। भविष्य की कल्पनाओं में उड़ना भी भूत चिन्तन की तरह की निरर्थक है। कहते हैं बुड्ढे भूतकाल की बातें सोचते और बच्चे भविष्य की कल्पनाओं में उलझे रहते हैं प्रौढ़ावस्था की बुद्धिमत्ता इसी में है कि वर्तमान को देखा समझा जाय और प्रस्तुत अवसर का अधिक से अधिक सदुपयोग करने में तत्पर हुआ जाय। हमारा चिन्तन यथार्थवादिता पर निर्भर होना चाहिए और भावी प्रगति के लिए आज जो किया जाना सम्भव है, उसी पर ध्यान केन्द्रित रहना चाहिए।
आवेशों से जितना बच सकना सम्भव हो उतने बचने का पूर्ण प्रयत्न किया जाय। थोड़ी सी सफलता पाकर लोग हर्षोन्माद और अहंकारग्रस्त होते देखे जाते हैं। थोड़ी सी कठिनाई या असफलता देख कर कई व्यक्ति बेतरह घबरा जाते हैं और चिन्ता, निराशा, भय, आशंका जैसी विकृतियों में फंस कर अपने चिन्तन तन्त्र को गड़बड़ा देते हैं फलतः उनकी कार्य शक्ति को भी काठमार जाता है। कहते हैं विपत्ति अकेली नहीं आती अपनी सहेलियों की पूरी सेना साथ लेकर चलती है। यह कथन इसलिए सही है कि उद्विग्न मस्तिष्क सही निष्कर्ष निकालने और सही कार्य पद्धति निर्धारित करने में असमर्थ बन जाता है। उसके निर्णय प्रायः गलत होते हैं गलत दिशा में उठे कदम गलत प्रतिफल उत्पन्न करेंगे ही। यही है विपत्ति के साथ चलने वाली सेना शृंखला। कोई हानि हो जाने या शोक उपस्थित हो जाने पर धैर्य से काम लिया जाना चाहिए और बदली हुई परिस्थितियों में क्या करना उपयुक्त है? यह सोचा जाना चाहिए। ऐसा निष्कर्ष वही निकाल सकेगा जिसका मस्तिष्क असंतुलन के आँधी तूफान से बचा होगा। एक हानि चुकी, दूसरी और अनेकों यदि जान−बूझ कर बुलाने की इच्छा न हो तो इसी में दूरदर्शिता है कि विपन्नता के बीच भी संतुलन बनाये रहने की बुद्धिमत्ता का परिचय दिया जाय।
पुराने अभ्यस्त कुविचारों और कुसंस्कारों को उखाड़ कर उनके स्थान पर प्रगतिशील उपयोगी विचारों की स्थापना का उपाय एक ही है− सद्विचारों की समर्थ सेना का मनःक्षेत्र की छावनी में भरती करना और युद्ध कला में प्रवीण बनाना। कुविचार इसीलिए स्वच्छन्द विचरण करते हैं कि उसका मुँह तोड़ने वाले सद्विचारों का संचय और पोषण किया नहीं गया होता। प्रतियोगिताएँ−प्रतिद्वंद्विताएं कभी−कभी मनःक्षेत्र में आयोजित की जानी चाहिएं और दोनों पक्षों के विचारों को अपनी−अपनी बहस छेड़ने का अवसर देना चाहिए। निर्णायक स्वयं रहें। दोनों की बात ध्यान से सुनें। एक पक्ष तात्कालिक लाभ के लिए दूरगामी भविष्य को अन्धकारमय बना देने पर जोर दे रहा होगा। दूसरा आज की कठिनाई सह कर उज्ज्वल भविष्य की फसल उगाने का समर्थन कर रहा होगा। दूरदर्शी न्याय निष्ठा आत्म−कल्याण के पक्ष में यही फैसला करेगी कि किसान, विद्यार्थी, शिल्पी, कलाकार की तरह आरम्भिक कठिनाई को सहन करते हुए उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण ही उचित है। इस प्रकार की टक्करों से बार−बार हारते रहने पर कुविचार और कुसंस्कार अपना पुराना अड्डा छोड़ कर चले जाते हैं और कहीं अन्यत्र डेरा डालते हैं।
चिन्तन क्षेत्र की असम्बद्धता को निरस्त किया जा सकेगा तो कर्मक्षेत्र में प्रगतिशील दिशा अपनायी जा सकना सरल है। यदि मस्तिष्क में विकृतियाँ जड़ जमाये बैठी होंगी, तो फिर उपयोगी कार्य पद्धति का निर्धारण देर तक टिक न सकेगा। विकृत विचार प्रक्रिया भीतर ही भीतर कोंच−नोंच करती रहेगी और जो प्रगतिशील कार्यक्रम निर्धारित किया था वह कुछ ही समय चल कर शिथिलता के, उपेक्षा के गर्त में गिरता है और समाप्त हो जाता है।
उत्कृष्ट कार्य पद्धति को अपनाने के लिए प्रचण्ड संकल्प शक्ति चाहिए, संकल्प और कुछ नहीं विचारों की साधनता, स्थिरता और परिपक्वता का ही समन्वित स्वरूप है। कल्पनाएँ नहीं संकल्प शक्ति सफल होती है। संकल्प अचानक ही न तो उठते हैं और न क्षण मात्र में समाप्त होते हैं, उनके पीछे चिन्तन,मंथन, अनुभव और कठिनाइयों के साथ जूझते हुए चिरकाल तक प्रयास जारी रखने का निश्चय जैसे अनेकों मानसिक उपक्रम जुड़े होते हैं।
जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए अभीष्ट प्रयोजनों में सफलता पाने के लिए प्रचण्ड स्तर की संकल्प शक्ति का निर्माण करना आवश्यक है। यह शारीरिक समर्थता एवं साधनों की प्रचुरता से भी बढ़ कर है। कर्मयोग के मार्ग पर चलने वाले सर्वप्रथम विचार बीज की उपयुक्तता पर ध्यान देते हैं ताकि सत्परिणामों की अच्छी फसल पाने का सुनिश्चित आधार बन सके।
यथा ह्येकेन चक्रेण न स्थस्य गतिभवेत। एवं पुरुषकारेण विनादैवं न सिद्धयति॥
−याज्ञ स्मृति 351
सिद्धान्त की बात है कि जिस प्रकार एक पहिये की गाड़ी नहीं चलती उसी प्रकार पुरुषार्थ के बिना केवल दैव के सहारे कर्मफल नहीं मिलता। अर्थात् दैव और पुरुषार्थ के सहारे कर्म फल बनता है।
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स्वार्थ और परमार्थ का अन्तर किसी काम का बाह्य स्वरूप देख कर नहीं वरन् कर्त्ता के दृष्टिकोण को समझ कर ही जाना जा सकता है। जो कार्य सीमित ‘स्व’ के लिए −सम्बद्ध सीमित परिवार के सीमित लाभ को ध्यान में रखकर किया जा रहा होगा−वह स्वार्थ है। जो कार्य सर्वजनीन हित की दृष्टि से किया जाय−वह परमार्थ है स्वार्थ को पाप का आधार और परमार्थ को पुण्य का कारण माना गया है। इसका कारण यह है कि स्वार्थांध व्यक्ति अपने सीमित लाभ में इतना निरत रहता है कि उसे सार्वजनिक हित की बात सूझती ही नहीं और बहुत करके निजी लाभ के लिए नीति मर्यादाओं को तोड़ने में लोकहित को चोट पहुँचाने में उसे कोई हिचक नहीं होती। इसके विपरीत परमार्थ परायण व्यक्ति सार्वजनिक हित को प्रधानता देता है और अपना निजी लाभ उसी हद तक स्वीकार करता है जितने में सामाजिक सुव्यवस्था को किसी प्रकार की हानि न होती हो। यह दृष्टिकोण का अन्तर ही है, जिसके कारण कार्य का स्तर उत्कृष्ट एवं निकृष्ट बनता है।
स्वार्थ दीखने वाले कार्य की परमार्थ जैसे पुण्य फलदायक हो सकते हैं और परमार्थ के आडम्बर में भी स्वार्थ सिद्धि की दुरभिसन्धि छिपी हो सकती है। वस्तुस्थिति क्या है इसका निर्णय कर्त्ता का दृष्टिकोण समझे बिना और किसी तरह नहीं हो सकता। स्वास्थ्य संवर्धन, शिक्षा प्राप्ति, धन उपार्जन यों देखने में स्वहित के कार्य मालूम पड़ते हैं, पर यदि वे इसलिए किये जा रहे हों कि उपलब्ध सामर्थ्य का उपयोग लोकहित के लिए किया जायगा तो फिर इन सब उपार्जनों को भी परमार्थ गिना जायगा। इसके विपरीत यदि कोई धार्मिक आडम्बर अथवा लोक सेवा का ढकोसला इसलिए रचा गया हो कि उसके कारण प्रमाणिकता की ख्याति बटोरने और उस आड़ में अधिक पैसा बटोरने का अवसर मिल जाय तो समझना चाहिए कि देखने में परमार्थ लगते हुए भी वे कार्य निकृष्ट स्तर के स्वार्थ साधन ही माने जाएंगे।
अनैतिक−अपराध वर्ग के हेय कुकर्मों को छोड़कर सामान्य कार्यों में से किसी को भला या बुरा नहीं कह सकते। परख के लिए कर्त्ता का दृष्टिकोण जानना पड़ेगा। उसी के आधार पर उस कर्म के परिणाम उत्पन्न होंगे। स्वार्थ के लिए पहलवान बनने वाला व्यक्ति कुश्ती लड़ने, दंगल जीतने, दूसरे को डराने−धमकाने अथवा अधिक उपार्जन करने जैसे कार्यों में उस बल का उपयोग करेगा। आन्तरिक संकीर्णता इससे आगे की कोई बात उसे सोचने ही न देगी। स्वार्थपरता का स्तर यदि अधिक उभरा रहा तो फिर चोरी डकैती गुण्डा−गर्दी जैसे दुष्कर्मों में उस बलिष्ठता का उपयोग होने लगेगा। इसके विपरीत यदि परमार्थ का दृष्टिकोण रख कर पहलवान बन गया है तो उस शारीरिक शक्ति से असमर्थों की सेवा−अनीति पीड़ितों की सुरक्षा−व्यायाम शिक्षा−शान्ति रक्षा की गारन्टी जैसी उपयोगी कार्यों की व्यवस्था बनती रहेगी। यही बात विद्या, धन आदि के सम्बन्ध में है। स्वार्थी विद्वान अपने ज्ञान की एक−एक बूँद बेचेगा। मुफ्त में किसी को इसका रत्ती भी लाभ न लेने देगा। बन पड़ा तो उसी चतुरता से कोई जाल खड़ा करके दूसरों को बहकाने और अपना उल्लू सीधा करने में भी हिचकेगा नहीं। विद्वान बनना अच्छा है या बुरा इसका फैसला करने से पूर्व यह देखना पड़ेगा कि विद्याध्ययन किस उद्देश्य को लेकर किया जा रहा है। प्राचीन काल में ब्राह्मण बालकों को धर्म शिक्षा प्राप्त करने के लिए धनी मानी लोग उनके खर्च के साधन जुटाते थे, क्योंकि इस ज्ञान प्राप्ति का लाभ सार्वजनिक हित साधन में होने वाला था। इसके विपरीत यदि कोई विनाशकारी साधन बनाने की शिक्षा ले रहा है तो समझना चाहिये कि अध्ययन भी दुष्कर्म के समान है।
धन उपार्जन को भला कहा जा सकता है न बुरा। यदि वह पैसा नशेबाजी, माँस व्यवसाय जैसे विनाशकारी साधन खड़े करने में लगेगा तो वह बुरा है और यदि उसी से लोकहित के श्रेष्ठ साधन खड़े किये जाने हैं, तो वह धन उपार्जन भी पुण्य है। यहाँ यही ध्यान रखने योग्य है कि कर्त्ता का दृष्टिकोण आरम्भ में ही विकसित हो जाता है−उपलब्धियों का प्रयोग तो उससे बहुत पीछे की प्रतिक्रिया मात्र है।
दृष्टिकोण जितना संकुचित होगा, उपार्जन का उपयोग उतने ही तुच्छ प्रयोजनों के लिए किया जायगा। स्वार्थी मनुष्य जो पैसा कमाता है उसे अपनी विलासिता में तथा परिवार के लोगों को ही अधिक सम्पन्न बनाने में खर्च करता है। समाज में कितनी अशिक्षा, बीमारी, बेकारी, गरीबी आदि कुप्रथाओं को कम करने में खर्च करते उससे बन नहीं पड़ेगा। किसी दबाव से, यश लिप्सा से किसी प्रकार अनखते हुए कुछ दे दिया जाय तो बात दूसरी है इसके विपरीत यदि परमार्थ प्रयोजन की दृष्टि रख कर धन कमाया गया है तो उसमें से नितान्त आवश्यक भाग परिवार निर्वाह के लिए रख कर स्वेच्छापूर्वक उस ईश्वरीय अमानत को सत्प्रयोजनों के लिए वापस लौटा देने में उत्साह उमगेगा।
परमार्थी मनुष्य सार्वजनिक हित के लिए स्वयं घाटा उठाने और कष्ट सहने को तैयार रहेगा। इसके विपरीत स्वार्थी को अपना स्वार्थ सर्वोपरि लगेगा और लोकहित की असीम क्षति होने में भी उसे कोई झिझक अनुभव न होगी। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए स्वार्थ की निन्दा और परमार्थ की प्रशंसा की जाती है।
स्वार्थी व्यक्ति अपने लिए ही सब कुछ सोचता और चाहता है। स्त्री बच्चों को ही वह स्वार्थ साधन के निमित्त देखता है और इसी से उनका भरण−पोषण करता है। पत्नी को शारीरिक सेवाओं का− संतोष से पिण्डदान अथवा कमाई का लाभ मिलने की आशा रहती है। बेटे को इसी लिए प्यार किया जाता है कि उसके विवाह में दहेज मिलेगा और बड़ा होने पर कमाई खिलायेगा। बेटी से घाटा दीखता है इसलिए हेय लगती है। स्त्री भी यदि कुरूप, रुग्ण, बन्ध्या आदि होने के कारण पसन्द न आई तो उसका त्याग करने में भी कोई संकोच न होगा। ऐसे लोग बेटी बेचने, बहिन का धन अपहरण करने जैसे कुकृत्यों में भी हिचकते नहीं। ऐसे ही लोग जीभ के स्वाद के लिए पशु−पक्षियों का नृशंस वध करते हुए खिन्न नहीं होते। अनैतिक आचरण एवं अपराध वर्ग के कुकर्म और कुछ नहीं मात्र स्वार्थपरता का उभरा हुआ रूप हैं।
संसार से महामानवों में से प्रत्येक परमार्थी रहा है उनने लोकहित को प्रधानता दी है। उसके लिए अपनी शक्तियों का अधिकाधिक भाग लगाया खपाया है। व्यक्तिगत सुख सुविधाओं को तिलांजलि देकर स्वयं कष्टसाध्य जीवन जीते हुए जिनने परमार्थ−प्रयोजनों में अपने आपको जिस मात्रा में संलग्न रखा है वे उतने ही अंशों में महामानव माने जाते रहे हैं और उनकी विरुदावली इतिहास के पृष्ठों पर अंकित की जाती रही है। साधु−ब्राह्मणों को पृथ्वी के देवता इसीलिए कहा जाता है कि वे निजी स्वार्थों को पैरों तले कुचल कर लोकहित की पुण्य प्रक्रिया अपनाये रहने का व्रत धारण करते हैं। देवमानवों की सदा से यही नीति रही है।
भारतीय धर्म की आश्रय, व्यवस्था में ब्रह्मचर्य और गृहस्थ निजी कार्यों के लिए और वानप्रस्थ, संन्यास परमार्थ प्रयोजनों के लिए है। आधा जीवन स्वार्थ के लिए, आधा परमार्थ के लिए विभक्त है निजी भाग स्वार्थ का है, वह भी संकीर्ण परिधि का नहीं है। विद्याध्ययन, माता−पिता की सेवा, लोकोपयोगी उपार्जन, गृहस्थ का परिष्कृत उद्यान के रूप में निर्माण इतने उत्तरदायित्वों से बँधा जीवन का पूर्वार्ध भी लोकोपयोगी स्वार्थ है उसमें भी उस निकृष्ट संकीर्णता के लिए कोई स्थान नहीं है जो लोभ, मोह के बन्धनों से बँधा होने के कारण भ्रष्ट परंपराओं को सृजन करता है।
स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से जितना आवश्यक है उतनी ही शरीर को सुविधा एवं सुसज्जा प्रदान की जाय। विलासिता की दृष्टि से शरीर पर किया गया खर्च भी स्वार्थ है। परिवार में सभी को सुयोग्य, सुसंस्कृत बनाने वाला वातावरण एवं प्रशिक्षण दिया है, पर उन्हें अमीर अकर्मण्य या विलासी बनने के लिए दौलत का अम्बार न छोड़ा जाय। आभूषणों की सज्जा में लगा हुआ धन यदि लोकहित के उपयोगी कामों में लग जाय तो क्या बुरा है?
उपभोग की प्रसन्नता तुच्छ स्तर के लोगों को होती है। उदात्त मनुष्य अपने साधनों को लोकहित में प्रयुक्त करते हैं। और निजी उपभोग की अपेक्षा परमार्थ प्रयोजनों में उनका सदुपयोग होते देख कर अधिक प्रसन्न एवं सन्तुष्ट होते हैं। व्यक्ति का गौरव इसी में है कि उसका दृष्टिकोण एवं क्रिया−कलाप अधिकाधिक परमार्थ परायण बने। समाज का हित इसी में है कि उसके सदस्यों में से अधिकाँश को परमार्थ रत होने का सम्मान प्राप्त हो। किसी देश, धर्म, समाज या संस्कृति की गरिमा इसी आधार पर आँकी जा सकती है कि उसके सदस्यों में परमार्थ परायणता के तत्व कितनी मात्रा में हैं और वे कितने उत्साहपूर्वक क्रियान्वित होते हैं।
समाजवाद और साम्यवाद के सिद्धान्तों में व्यक्तिवादी स्वार्थपरता की भर्त्सना की गई है और उस पर कठोर अंकुश लगाने की व्यवस्था रखी गई है। अध्यात्मवाद के सिद्धान्त भी जहाँ तक, भौतिक उपयोग से संबंध है, समाजवाद स्तर के ही हैं। जमाखोरी को समाज में पाप माना गया है और परिग्रह को अध्यात्म सिद्धान्तों के अनुसार निन्दनीय ठहराया गया है।
सौ हाथों से हम कमायें अवश्य, पर हजार हाथों से उसे बाँट देने का सत्साहस भी एकत्रित करें। दूसरों का दुःख बँटा लेने की और अपना सुख दूसरों में बाँट देने की प्रवृत्ति जिसमें जितनी प्रखर है उसे उसी स्तर का सुविकसित अध्यात्मवादी कहा जाना चाहिए। उपासना यदि उदारता से विकसित हो सके तो ही यह समझा जाना चाहिए कि रोपा गया पौधा बढ़ा, फला−फूला और अपने अस्तित्व को सार्थक बना सकने में समर्थ हुआ।
मोघमन्नं बिन्दते अप्रचेताः सत्यं व्रवीमि वध इत् स तस्य। नार्य मणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी॥
ऋ॰ 10।117।6
दुर्बुद्धि मनुष्य व्यर्थ ही भोग सामग्री को पाता है सच कहता हूँ कि वह भोग सामग्री उस मनुष्य के लिए मृत्यु रूप ही होती है। ऐसा दुर्बुद्धि न तो यज्ञ द्वारा अर्यमादि देवों की पुष्टि करता है और न ही अपने साथियों की पुष्टि करता है सचमुच वह अकेला भोग करने वाला मनुष्य केवल पाप को ही भोगने वाला होता है।
सर्गे−सर्गे पृथगरूपं सन्ति सगन्तिराण्यपि। तेष्वप्यतः स्थसर्गोधाः कदलीदल पीठवत्॥
−योग वशिष्ठ 4।18।16-17
आकाशे परमाष्वन्तर्द्र व्यादेररणुकेऽपिच। जीवाणुर्यत्रं तत्रेदं जगदेवत्ति निजं जपुः॥
−योग वशिष्ठ 3।44।34 5
अर्थात्− हे लीला। जिस प्रकार केले के तने के अन्दर एक के बाद एक परतें निकलती चली जाती हैं, उसी प्रकार प्रत्येक सृष्टि के भीतर नाना प्रकार के सृष्टि क्रम विद्यमान है। इस प्रकार एक के अन्दर अनेक सृष्टियों का क्रम चलता है। संसार में व्याप्त चेतना के प्रत्येक परमाणु में जिस प्रकार स्वप्नलोक विद्यमान है उसी प्रकार जगत में अनन्त द्रव्य के अनन्त परमाणुओं के भीतर अनेक प्रकार के जीव और उनके जगत विद्यमान हैं।
अंगुष्ठमात्रो रवितुल्य रुपः संकल्पाहंकार समन्वितो यः बुद्ध गुणेनात्म गुणेन चैव। आराग्र मात्रो ह्यपरोऽपि दृष्टः।। बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य च। भागो जीवः स विज्ञेयः स चानन्त्याय कल्पते॥
− श्वेता श्वतरोपनिषद। 5।89
अर्थात्− हे तात। यह अँगूठे जितना लघु होकर भी संकल्प विकल्प युक्त (अर्थात् सोचता विचारता है) तथा अपनी बुद्धि के गुण से और श्रेष्ठ कर्मों के गुण से सुई के अग्रभाग जैसे आकार वाला हो गया है। ऐसा सूर्य के समान तेजस्वी आत्मा भी ज्ञानियों ने देखा है। बाल के अग्रभाग के सौवें अंश से भी सौवें अंश परिमाण वाला भाग ही प्राणी का स्वरूप जानना चाहिए। यह सूक्ष्मातिसूक्ष्म परिमाण वाला आत्मा असीम गुणों वाला हो जाता है।
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नवरात्रि तपश्चर्या सर्ग-
सर्दी और गर्मी की ऋतु के मिलन काल को अश्विन और चैत्र की नवरात्रि कहा जाता है। रात्रि और दिन का मिलन प्रातःकालीन और सायंकालीन संध्या के नाम से प्रख्यात है। इस मिलन बेला का विशेष महत्व कालचक्र के अनुसार आँका गया है। प्राणायाम में रेचक और पूरक का अपना स्थान है, पर चमत्कार कुम्भक में ही देखे जाते हैं। मिलन की बेला हर क्षेत्र में उल्लास भरी होती है। मित्रों का मिलन, प्रणय मिलन, आकाँक्षाओं का सफलता के साथ मिलन, कितना सुखद होता है, उसी आधार पर यह अनुमान लगाया जाता है कि आत्मा और परमात्मा का मिलन कितना सुखदायक होना चाहिए। पुराने वर्ष की विदाई और नये वर्ष का आगमन वाला दिन नव−वर्षोत्सव के रूप में मनाया जाता है। कृष्ण−पक्ष और शुक्ल−पक्ष के परिवर्तन के दो दिन अमावस्या, पूर्णिमा पर्व के नाम से जाने जाते हैं और उस दिन विशेष धर्मोत्सवों की व्यवस्था की जाती है। अपने पर्व त्यौहारों में से अधिकाँश इसी संधि बेला में मनाये जाते हैं। दिवाली, होली, गुरुपूर्णिमा, श्रावणी, हरियाली अमावस्या, शुक्ल−पक्ष पर ही होते हैं। नवरात्रि की ऋतु संध्या का महत्व भी इसी प्रकार है। ऋतु परिवर्तन की बेला में कई तरह की सूक्ष्म हलचलें होती हैं। देखा गया है कि मलेरिया, दस्त, जुकाम, चेचक आदि का दौर आश्विन और चैत्र में आता है।
ऋतु परिवर्तन के इन दिनों में शरीर के भीतर अनायास ही ज्वार−भाटे जैसी हलचलें उत्पन्न होती हैं और जीवनी शक्ति प्रयत्नपूर्वक देह में जमी हुई विकृतियों को हटाने के लिए एक विशेष तूफान उत्पन्न करती हैं, इसी को वैद्य, हकीम लोग उभार काल कहते हैं। जुलाब देकर पेट की सफाई शरीर शोधन को वमन, विरेचन आदि पंचकर्म पुराने चिकित्सक इन्हीं दिनों कराते थे। काया−कल्प के विविध प्रयोग करने के लिए रोगियों को इसी अवसर की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी।
वर्षा के अन्त और सर्दी के आगमन पर गेहूँ, जौ, चना जैसी प्रधान फसलें बोने का ऋतुकाल आश्विन में आता है इन्हीं दिनों प्राणियों की गर्भ धारण स्थिति उभरती है। न केवल मनुष्यों में वरन् सृष्टि के समस्त प्राणियों में यही क्रम चलता है कि आधे गर्भाधान आश्विन और चैत्र के दूसरे पक्षों में होते हैं और शेष आधी प्रक्रिया पूरे वर्ष को मिलाकर पूरी होती है। यह शारीरिक और मानसिक स्थिति में विशेष परिवर्तन के चिन्ह हैं। महत्वपूर्ण वृक्षों के उद्यान भी प्रायः इन्हीं दिनों लगाये जाते हैं चैत्र की नवरात्रि आरम्भ होते ही विक्रमी सम्वत् बदलता है और उन नौ दिनों का अन्त होते ही राम जन्मोत्सव रामनवमी मनाई जाती है। इसके चार−पाँच दिन बाद ही चैत्री पूर्णिमा की हनुमान जयन्ती है। आश्विन अमावस्या को पित्र अमावस्या कहते हैं और उसके दूसरे दिन से ही नवरात्रि पर्व आरम्भ हो जाता है। इसके समाप्त होते−होते दुर्गा अष्टमी और विजयादशमी आ जाती है। उसके चार−पाँच दिन बाद ही शरदपूर्णिमा है। पर्वों की यह विशिष्ट शृंखला अकारण ही नहीं है। कालचक्र के सूक्ष्म ज्ञाताओं ने प्रकृति के अन्तराल में चल रहे विशेष उभारों को ध्यान में रखते हुए यह सोचा है कि उन दिनों की हुई आध्यात्मिक साधनाएँ भी विशेष रूप से सफल होती हैं। तदनुसार चैत्र और आश्विन के शुक्ल पक्ष आरम्भ होते ही नौ−नौ दिन के नवरात्रि पर्व मनाये जाते हैं।
तम और सत् दो ही गुण इस प्रकृति के हैं। तम अर्थात् जड़−सत् अर्थात् चेतन। दोनों अपनी स्थिति में पूर्ण हैं। पर इन दोनों का जब मिलन होता है तो एक नई हलचल उठ खड़ी होती है, जिसे रज कहते हैं। इच्छा आकाँक्षा, भोग, तृप्ति, अहंता, संग्रह, हर्ष, स्पर्धा आदि चित्त को उद्विग्न किये रहने वाले और विविध क्रिया−कृत्यों में जुटाये रहने वाले प्रवाह रज की ही प्रतिक्रियाएँ हैं। साधना की आवश्यकता इस रज के निविड़ बन्धनों से छुड़ाने के लिए ही की जाती हैं। तम से बना जड़ शरीर समय आने पर आसानी से मर जाता है और उसे जला, सड़ाकर देखते देखते समाप्त कर दिया जाता है। चेतन आत्मा ईश्वर अंश होने से निर्मल है। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार से बनी जड़−चेतन मिश्रित जीवन चेतना ही हर घड़ी अशान्त रहती है और कृत्य−कुकृत्य करने में जुटी रहती है। परिमार्जन इसी का करना पड़ता है। योगसाधना एवं तपश्चर्या का उद्देश्य जीव संध्या का परिमार्जन करने के अतिरिक्त और कुछ नहीं।
नारी का नारीत्व उसकी रज चेतना पर टिका हुआ है। रजस्वला होने के उपरान्त उसमें यौवन का उभार आरम्भ होता है। यह रज तत्व ही गर्भ धारण और सृष्टि विस्तार का आधार है। ‘रयि’ और ؉‘प्राण’ के बीच रहने वाला चुम्बकत्व ही नर−नारी के बीच कामुक आकर्षण का आधार बनता है। प्राणि वर्ग में पेट भरने के उपरान्त दूसरी हलचलें प्रजनन कर्म की प्रेरणा के फलस्वरूप ही विनिर्मित होती हैं। यह ‘रज’ तत्व का चमत्कार है। आखिर यह ‘रज’ है क्या? सत् और तम का सम्मिश्रण। इस मिश्रण में उत्पादन की अद्भुत शक्ति है। ऋतुमती मादा गर्भ धारण करती है। प्राणियों के ऋतु कालों में कालचक्र के अनुसार समय का अलग−अलग निर्धारण है। ऋतुएं वर्ष में दो बार ऋतुमती होती हैं। सर्दी−गर्मी प्रधानतया दो ही ऋतुएं हैं। दोनों के समय छह−छह महीने के हैं वर्षा इनके बीच−बीच में ही आँखमिचौनी खेलती रहती है। इन दिनों प्रधान ऋतुओं का ऋतुकाल नौ−नौ दिन का होता है। नवरात्रि इन्हीं दिनों को कहते हैं।
यों सारा ही समय भगवान का है और सभी दिन पवित्र हैं। शुभ कर्म करने का हर घड़ी शुभ मुहूर्त है और अशुभ कर्म के लिए काल राहु, दिशाशूल, योगिनी, विपरीत चन्द्रमा आदि के अनेकानेक बन्धन प्रतिरोध हैं। सामान्य या विशेष करने में कभी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। शुभ कर्म के लिए कभी कोई मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी कालचक्र की प्रतिक्रिया से लाभ उठाने में बुद्धिमत्ता ही है। बसन्त ऋतु में बसन्त पंचमी पड़ती है। उन दिनों उत्सव के साथ जुड़ी हुई भावनाओं के अनुरूप सूक्ष्म प्रवाह वातावरण में बह रहे होते हैं, अस्तु उनकी सहायता से यह पर्व मनाने के लिए उपयुक्त मनःस्थिति स्वतः ही बन जाती है।
नवरात्रि पर्व में विभिन्न उपासनाएँ चलती हैं। राम भक्त उन दिनों रामायण पारायण और कृष्ण भक्त गीता पारायण करते हैं। देवी उपासकों में दुर्गा पाठ के विभिन्न उपचार चलते हैं। इन दिनों व्रत, उपवास करते हैं।
तन्त्र विधान में सब साधन, कुमारी पूजन, कुण्डलिनी जागरण, चक्रबेधन आदि की साधना विशेष रूप से इन्हीं दिनों सम्पन्न की जाती है। मध्य काल में तन्त्र प्रयोजनों की मान्यता बहुत थी इसलिए देवी आराधना के विभिन्न उपचारों के लिए इन्हीं दिनों वैयक्तिक एवं सामूहिक रूप से विशेष क्रिया−कृत्य किये जाते थे। अभी भी जहाँ−जहाँ देवियों के मन्दिर हैं, वहाँ−वहाँ छोटे−बड़े तान्त्रिक आयोजन होते हैं। यों सतोगुणी साधनाओं के लिए भी यह समय अधिक उपयुक्त है, पर प्रचलन इन दिनों दुर्गा पूजा के नाम से ही चल पड़ा है। बंगाल, आसाम, उड़ीसा, मणिपुर, नेपाल, भूटान एवं गुजरात में दुर्गा पूजा के विशेष समारोह होते हैं। बंगाल में तो उन दिनों सरकारी छुट्टियाँ भी रहती हैं। इन प्रचलनों से यह तथ्य उभर कर सामने आता है कि प्राचीन काल में साधना की दृष्टि से नवरात्रियों को कालचक्र के अनुसार कितना अधिक महत्व दिया गया था और वह प्रथा किसी न किसी रूप में अभी भी भिन्न−भिन्न स्थानों में भिन्न−भिन्न प्रकार से चलती हुई पाई जाती है।
गायत्री महाशक्ति अध्यात्म जगत् में सर्वोपरि है। उसे भारतीय तत्वज्ञान और साधना विज्ञान की रीड़ कह सकते हैं। ज्ञान दृष्टि से देखा जाय तो स्पष्ट है कि इन्हीं चौबीस अक्षरों की व्याख्या से चारों वेद रचे गये। वेदमाता नाम से प्रख्यात इस महामन्त्र के सम्बन्ध में यही माना जाता है कि भारतीय धर्म और अध्यात्म का कल्प−वृक्ष जिस बीज के कारण , बढ़ा और सुविस्तृत हुआ वह गायत्री मन्त्र ही है। चारों वेद गायत्री के चार चरणों के चार व्याख्यान हैं ॐ भूर्भुवः स्वः यह शीर्ष है और तत्सवितुर्वरेण्यं−भर्गो देवस्य धीमहि−धियो योनः प्रचोदयात्−यह तीन चरण हैं। इन चारों को मिलाकर ही पूर्ण गायत्री मन्त्र बनता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार ब्रह्माजी ने अपने चार मुखों से चार वेदों के चार व्याख्यान किये। अर्थात् ब्रह्म−ईश्वर ने −ज्ञान की चार धाराएँ चेतना जगत में प्रवाहित करके मनुष्यों का मार्ग−दर्शन किया। इसी तथ्य की पुष्टि इस कथा से भी होती है कि सृष्टि के आदि में ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। वे कमल पुष्प पर बैठे असमंजस कर रहे थे कि हम क्या हैं? और क्यों हैं? आकाश से आकाशवाणी हुई कि तुम सृष्टिकर्त्ता हो। अपना कार्य पूरा करने के लिए शक्ति प्राप्त करो। शक्ति साधना के लिए गायत्री उपासना में संलग्न होना चाहिए। उसी समय आकाशवाणी ने ब्रह्माजी को गायत्री मन्त्र सुनाया। ब्रह्मा ने उसकी उपासना की। शक्ति पाई। सृष्टि रची और ज्ञान की धारा गायत्री और विज्ञान की धारा सावित्री को प्रवाहित करके जीवधारियों के लिए सुख−शांतिदायिनी गंगा−यमुना बहाई। गंगा और यमुना के मिलन−संगम पर तीर्थराज बना है। सर्दी−गर्मी की ऋतुओं के मिलने की तरह ही ज्ञान-विज्ञान की दो धाराओं का समन्वय गायत्री है।
गायत्री भारतीय धर्म का प्राण है। उसी को शिखा और सूत्र के रूप में धर्म प्रतीक की मान्यता मिली है। हिन्दू धर्मानुयायियों के सिर के सर्वोच्च शिखर पर समारोहपूर्वक मुण्डन संस्कार कराते हुए शिला रूपी ज्ञान ध्वजा की स्थापना की जाती है, इसे गायत्री स्वरूप माना गया है। हिन्दू धर्म का दूसरा प्रतीक चिन्ह है यज्ञोपवीत। यह भी गायत्री मन्त्र का ही प्रतीक है। गायत्री के तीन चरण−यज्ञोपवीत की तीन लड़ें। गायत्री के नौ शब्द यज्ञोपवीत के नौ धागे। गायत्री में तीन व्याहृतियाँ− यज्ञोपवीत में तीन गाँठे। गायत्री में ‘ॐ’- यज्ञोपवीत में बड़ी ब्रह्म ग्रन्थि। इस प्रकार गायत्री एक−एक प्रतीक प्रतिनिधि की स्थापना यज्ञोपवीत को कलेवर में जोड़कर उसे धारण करने का विधान बना है। उसमें सन्निहित उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व को अपनाये रहने का निर्देश हुआ है। कन्धे पर, हृदय पर, कलेजे पर, पीठ पर चारों ओर से काया के महत्वपूर्ण भाग को लपेटा जाता है। इसका अर्थ है। मानवता के उच्चस्तरीय आदर्शों का भार कन्धे पर वहन किया जायगा, हृदय में धारण किया जायगा, कलेजे में समा लिया जायगा, पीठ पर लादा जायगा। सद्ज्ञान की शिला शरीर किले के सर्वोच्च स्थान पर−शिर पर फहराती रहे और यज्ञीय जीवन जीने का−व्रत निबाहने को स्मरण दिलाते रहने वाला यज्ञोपवीत धारण किया जाय−वह प्रतीक प्रेरणा का उपयुक्त माध्यम है। इस देव स्थापना में शरीर को देव मन्दिर बनाया जाय और प्रयत्न किया जाय कि मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने वाली श्रेष्ठ गतिविधियाँ ही अपनाई जाती रहें। यही है−शिखा सूत्र धारण का प्रयोजन। दूसरे शब्दों में इन धर्मोपचारों का उद्देश्य जीवन को उच्चस्तरीय आदर्शों के अनुरूप जीने का प्रेरणाप्रद निर्देश कहा जा सकता है। वस्तुतः गायत्री मन्त्र में इसी स्तर का तत्वज्ञान भरा पड़ा है।
गायत्री का विज्ञान और भी अधिक महत्वपूर्ण है उसके शब्दों का गुँथन स्वर शास्त्र के अनुसार सूक्ष्म विज्ञान के रहस्यमय तथ्यों के आधार पर हुआ है। इसका जप ऐसे शब्द कंपन उत्पन्न करता है जो उपासक की सत्ता में उपयोगी हलचलें उत्पन्न करे−प्रसुप्त दिव्य शक्तियों को जगाये और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने की उमंग उत्पन्न करे। गायत्री जप के कम्पन साधक के शरीर से निसृत जाकर समस्त वातावरण में ऐसी हलचलें उत्पन्न करते हैं जिनके आधार पर संसार में सुख−शान्ति की परिस्थितियां उत्पन्न हो सकें।
भारतीय धर्म की उपासना में प्रातः सायं की जाने वाली ‘संध्या विधि’ मुख्य है। संख्या कृत्य यों सम्प्रदाय मद में कई प्रकार किये जाते हैं, पर उन सब में गायत्री का समावेश अनिवार्य रूप से होता है। गायत्री को साथ लिए बिना संध्या सम्पन्न नहीं हो सकती। गायत्री को गुरु मन्त्र कहा गया है। यज्ञोपवीत धारण करते समय गुरु मन्त्र देने का विधान है। देव मन्त्र कितने ही हैं। सम्प्रदाय भेद से कई प्रकार के मन्त्रों के उपासना विधान हैं पर जहाँ तक गुरु मन्त्र शब्द का सम्बन्ध है वह गायत्री के साथ ही जुड़ा हुआ है। कोई गुरु किसी अन्य मन्त्र की साधना सिखाये तो उसे गुरु का दिया मन्त्र तो कहा जा सकता है, पर जब भी गुरु मन्त्र शब्द को शास्त्रीय परंपरा के अनुसार प्रयुक्त किया जायगा तो उसका तात्पर्य गायत्री मन्त्र से ही होगा। इस्लाम धर्म में कलमा का −ईसाई धर्म में बपतिस्मा का जो अर्थ है वही हिन्दू धर्म में अनादि गुरु मंत्र गायत्री को प्राप्त है।
साधना की दृष्टि से गायत्री को सर्वांगपूर्ण एवं सर्व समर्थ कहा गया है। अमृत, पारस, कल्प−वृक्ष और कामधेनु के रूप में इसी महाशक्ति की चर्चा हुई है। पुराणों में ऐसे अनेकानेक कथा प्रसंग भरे पड़े हैं जिनमें गायत्री उपासना द्वारा भौतिक ऋद्धियाँ एवं आत्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने का उल्लेख है। साधना विज्ञान में गायत्री उपासना को सर्वोपरि माना जाता रहा है। उसके माहात्म्यों का वर्णन सर्वसिद्धिप्रद कहा गया है और लिखा है कि तराजू के एक पलड़े पर गायत्री को और दूसरे पर समस्त अन्य उपासनाओं को रखकर तोला जाय तो गायत्री ही भारी बैठती है। राम, कृष्ण आदि अवतारों की−देवताओं और ऋषियों की उपासना पद्धति गायत्री ही रही है। उसे सर्वसाधारण के लिए उपासना अनुशासन माना गया है और उसकी उपेक्षा करने वाली की कटु शब्दों में भर्त्सना हुई है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिए की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप से महत्व मिला है। गायत्री, गंगा, गीता, गौ और गोविन्द हिन्दू धर्म के पाँच प्रधान आधार माने गये हैं, इनमें गायत्री प्रथम है। बाल्मीक रामायण और श्रीमद्भागवत में एक−एक शब्द का सम्पुट लगा हुआ है। इन दोनों ग्रन्थों में वर्णित रामचरित्र और कृष्णचरित्र को गायत्री का कथा प्रसंगात्मक वर्णन बताया जाता है इन सब कथनोपकथनों का निष्कर्ष यही निकलता है कि गायत्री मन्त्र के लिए भारतीय धर्म में निर्विवाद रूप से सर्वोपरि मान्यता मिली है। उसमें जिन तथ्यों का समावेश है उन्हें देखते हुए निकट भविष्य में मानव जाति का सार्वभौम मन्त्र माने जाने की पूरी−पूरी सम्भावना है। देश धर्म, जाति समाज और भाषा की सीमाओं से ऊपर उसे सर्वजनीय उपासना कहा जा सकता है। जब कभी मानवी एकता से सूत्रों को चुना जाय तो आशा की जानी चाहिए गायत्री को महामन्त्र के रूप में स्वीकारा जायगा। हिन्दू धर्म के वर्तमान बिखराव को समेटकर उसके केन्द्रीकरण की एक रूपता की बात सोची जाय तो उपासना क्षेत्र में गायत्री को ही प्रमुखता देनी होगी।
हमारा निज का अनुभव एवं विश्वास भी गायत्री उपासना के साथ जुड़ा हुआ है। जीवन भर उसी के सम्बन्ध में चिन्तन−मनन किया गया है। साधना के नाम पर हमारे जीवन का जो भी बहुमूल्य समय लगा है उसका प्रत्येक क्षण गायत्री को आधार मानकर ही प्रयुक्त किया गया है। इस प्रयोग में जो अनुभव हुए हैं उनने व्यक्तिगत रूप से भी हमारी निष्ठा को क्रमशः अधिकाधिक परिपक्व ही किया है। ऐसी दशा में हमारा परामर्श भी अपने विश्वास एवं अनुभव के आधार पर ही हो सकता है। दैनिक सामान्य उपासना के लिए तथा विशेष शक्ति संचय के लिए गायत्री उपासना ही हमें सर्वश्रेष्ठ लगी है तदनुसार जिनने भी हमारा परामर्श एवं सहयोग माँगा है, उन्हीं के लिए कहा है। अन्य कोई मार्ग देखा ही नहीं तो उसका मार्ग−दर्शन किया भी कैसे जा सकता है।
स्वर्ण−जयन्ती साधना वर्ष के उपलक्ष में अखण्ड−ज्योति परिवार के जिन परिजनों ने एक वर्ष की गायत्री साधना आरम्भ की हो उनको हमारा एक परामर्श यह भी है कि यदि सम्भव हो तो वे इस वर्ष आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों में 9-9 दिन के गायत्री अनुष्ठान करने के लिए समय निकालने के लिए प्रयत्न करें। यह विशेष तपश्चर्या उनके लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होगी।
पूर्व तैयारी के रूप में इतना ही जानना पर्याप्त है कि उन 9 दिनों में हर दिन 45 मिनट के स्थान पर प्रायः 3 घण्टे समय लगाना होगा। यह प्रातःकाल एकबार में न मिलता हो तो दो घण्टे प्रातः और एक घण्टा रात्रि को भी हो सकता है। प्रातः सूर्योदय से दो घण्टे रात्रि जाने तक भी शेष साधना को निपटा लिया जाना चाहिए। समय लगाने के अतिरिक्त उपवास अथवा संयत स्वल्प एवं सात्विक भोजन का नियम अपनाना पड़ेगा। ब्रह्मचर्य उन नौ दिनों में अनिवार्य रूप से आवश्यक है। कुछ और भी छुट−पुट प्रतिबन्ध हैं जिनकी चर्चा अगले पृष्ठों पर अंकित है।
चैत की नवरात्रि 31 मार्च 76 बुधवार से आरम्भ होकर 8 अप्रैल गुरुवार तक चलेगी। आश्विन की 24 सितम्बर 76 शुक्रवार से आरम्भ होकर 2 अक्टूबर शनिवार तक चलेगी। यह विधान पूरे नौ दिन का होता है। नौ रात्रियाँ इस साधना में संलग्न रहते बीतनी चाहिएँ। तिथियों की घट−बढ़ अक्सर होती रहती है उनका कोई प्रभाव इन पूरे नौ दिनों पर नहीं पड़ता।
जिन्हें यह नवरात्रि विशेष साधना करनी हो, वे दोनों बार समय से पूर्व उसकी सूचना हरिद्वार भेज दें। ताकि उन दिनों साधक को सुरक्षात्मक, संरक्षण और उस क्रम में रहने वाली भूलों के दोष परिमार्जन का लाभ मिलता रहे। विशेष साधना के लिए विशेष मार्ग−दर्शन एवं विशेष संरक्षण मिल सके तो उससे सफलता की सम्भावना अधिक बढ़ जाती है। वैसे प्रत्येक शुभ कर्म का संरक्षण भगवान स्वयं ही करते हैं।
गायत्र्येव तपोयोगः साधनं ध्यान मुच्यते।
सिद्धिनां सामता मातानातः किंचिद् वृहत्तरम्॥
−स्कन्द पुराण
गायत्री ही तप है, गायत्री ही योग है, यही सबसे बड़ा साधन और ध्यान है। इससे बढ़कर सिद्धिदायक और कोई साधना नहीं है।
सावित्र्यास्तु परन्नास्ति।
− मनु॰ 2।83
गायत्री से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।
बसन्तः प्राणायनो गायत्री वासन्ती।
-यजु॰ 13।25
‘‘गायत्री वह है जो बसन्त में गाई जाय और गाने वाले की रक्षा करे।’’
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नवरात्रि साधना को दो भागों में बाँटा जा सकता है। एक उन दिनों की जाने वाली जप संख्या एवं विधान प्रक्रिया। दूसरे आहार−विहार सम्बन्धी प्रतिबन्धों की तपश्चर्या। दोनों को मिलाकर ही अनुष्ठान पुरश्चरणों की विशेष साधना सम्पन्न होती है।
जप संख्या के बारे में विधान यह है कि 9 दिनों में 24 हजार गायत्री मन्त्रों का जप पूरा होना चाहिए। चूँकि उसमें संख्या विधान मुख्य है इसलिए गणना के लिए माला का उपयोग आवश्यक है। सामान्य उपासना में घड़ी की सहायता से 45 मिनट का पता चल सकता है, पर जप में गति की न्यूनाधिकता रहने से संख्या की जानकारी बिना माला के नहीं हो सकती। वस्तु नवरात्रि साधना में गणना की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए माला का उपयोग आवश्यक माना गया है।
आज कल हर बात में नकलीपन की भरमार है मालाएँ भी बाजार में नकली लकड़ी की बिकती हैं अच्छा यह कि उस में छल कपट न हो जिस चीज की है उसी की जानी और बताई जाय। कुछ के बदले में कुछ मिलने का भ्रम न रहे। तुलसी, चन्दन और रुद्राक्ष की मालाएँ अधिक पवित्र मानी गई हैं। इनमें से प्रायः चन्दन की ही आसानी से असली मिल सकती है। गायत्री तप में तुलसी की माला को प्रधान माना गया है, पर वह अपने यहाँ बोई हुई सूखी लकड़ी की हो और अपने सामने बने तो ही कुछ विश्वास की बात हो सकती है। बाजार में अरहर की लकड़ी ही तुलसी के नाम पर हर दिन टनों की तादाद में बनती और बिकती देखी जाती है। हमें चन्दन की माला ही आसानी से मिल सकेगी यों उससे भी सस्ती लकड़ी पर चन्दन का सेन्ट चुपड़ कर धोखे बाजी खूब चलती है। सावधानी बरतने पर यह समस्या आसानी से हल हो सकती है और असली चन्दन की माला मिल सकती है।
एक दिन आरम्भिक प्रयोग के रूप में एक घण्टा जप करके यह देख लेना चाहिए कि अपनी जप गति कितनी है। साधारण तथा एक घण्टे में दस से लेकर बारह माला तक की जप संख्या ठीक मानी जाती है। किन्हीं की मन्द हो तो बढ़ानी चाहिए और तेज हो तो घटानी चाहिए। फिर भी अन्तर तो रहेगा ही। सब की चाल एक जैसी नहीं हो सकती। अनुष्ठान में 27 मालाएँ प्रति दिन जपनी पड़ती हैं। देखा जाय कि अपनी गति से इतना जप करने में कितना समय लगेगा। यह हिसाब लग जाने पर यह सोचना होगा कि प्रातः इतना समय मिलता है या नहीं। उसी अवधि में यह विधान पूरा हो सके प्रयत्न ऐसा ही करना चाहिए। पर यदि अन्य अनिवार्य कार्य करने हैं, तो समय का विभाजन प्रातः और सायं दो बार में किया जा सकता है। उन दिनों प्रायः 6 बजे सूर्योदय होता है। दो घण्टा पूर्व अर्थात् 4 बजे से जप आरम्भ किया जा सकता है सूर्योदय से तीन घण्टे बाद तक अर्थात् 9 बजे तक यह समाप्त हो जाना चाहिएं। इन पाँच घण्टों के भीतर ही अपने जप में जो 2॥−3 घण्टे लगेंगे वे पूरे हो जाने चाहिए। यदि प्रातः पर्याप्त समय न हो तो सायंकाल सूर्यास्त से 1 घण्टा पहले से लेकर 2 घण्टे बाद तक अर्थात् 5 से 8 तक के तीन घण्टों में सबेरे का शेष जप पूरा कर लेना चाहिए। प्रातः 9 बजे के बाद और रात्रि को 8 के बाद की नवरात्रि तपश्चर्या निषिद्ध है। यों सामान्य साधना तो कभी भी हो सकती है और मौन मानसिक जप में तो समय, स्थान, संख्या, स्नान आदि का भी बन्धन नहीं है। उसे किसी भी स्थिति में किया जा सकता है। पर अनुष्ठान के बारे में वैसा नहीं है। उसके लिए विशेष नियमों का कठोरतापूर्वक पालन करना पड़ता है।
उपासना की विधि सामान्य नियमों के अनुरूप ही है। आत्म शुद्धि और देव पूजन के बाद जप आरम्भ हो जाता है। आरम्भ में सोहम और अन्त में खेचरी मुद्रा का नियम इसमें भी निवाहना पड़ता है। अन्तर इतना ही पड़ता है कि नित्य आधा घण्टा जप करना पड़ता था, वह अब बढ़ कर प्रायः ढाई−तीन घण्टे हो जाता है। जप के साथ सविता देवता के प्रकाश का अपने में प्रवेश होते पूर्ववत् अनुभव किया जायगा। सूर्य अर्घ्य आदि अन्य सब बातें उसी प्रकार चलती हैं, जैसी दैनिक साधना में। हर दिन जो आधा घण्टा जप करना पड़ता था वह अलग से नहीं करना होता वरन् नहीं 27 मालाओं में सम्मिलित हो जाता है।
अगरबत्ती के स्थान पर यदि इन दिनों जप के तीन घण्टे घृतदीप जलाया जा सके तो अधिक उत्तम है। धृत का शुद्ध होना आवश्यक है। मिलावट के प्रचलित अन्धेर में यदि शुद्धता पर पूर्ण विश्वास हो तो ही बाहर से लिया जाय अन्यथा दूध लेकर अपने घर पर भी निकालना चाहिए। तीन घण्टे नित्य नौ दिन दीपक जले तो उसमें प्रायः दो ढाई सौ ग्राम घी लग जाता है। इतने घी का प्रबंध बने तो दीपक की बात सोचनी चाहिए अन्यथा अगरबत्ती, धूपबत्ती आदि से काम चलाना चाहिए। इनमें भी शुद्धता का ध्यान रखा जाय। सम्भव हो तो यह वस्तुएँ भी घर पर बना ली जाएं।
नवरात्रि अनुष्ठान नर−नारी कर सकते हैं। इसमें समय, स्थान एवं संख्या की नियमितता रखी जाती है इसलिए उस सतर्कता और अनुशासन के कारण शक्ति भी अधिक उत्पन्न होती है। किसी भी कार्य में ढील−पोल शिथिलता अनियमितता और अस्त−व्यस्तता बरती जाय उसी में उसी अनुपात से सफलता संदिग्ध होती चली जायगी। उपासना के सम्बन्ध में भी यह तथ्य काम करता है। उदास मन से ज्यों−त्यों− जब, तब वह बेगार भुगत दी जाय तो उसके सत्परिणाम भी स्वल्प ही होंगे, पर यदि उसमें चुस्ती, फुर्ती की व्यवस्था और तत्परता बरती जायगी तो लाभ कई गुना दिखाई पड़ेगा। अनुष्ठान में सामान्य जप की प्रक्रिया को अधिक कठोर और अधिक क्रमबद्ध कर दिया जाता है अस्तु उसकी सुखद प्रतिक्रिया भी अत्यधिक होती है।
प्रयत्न यह होना चाहिए कि पूरे नौ दिन यह विशेष जप संख्या ठीक प्रकार कार्यान्वित होती रहे। उसमें व्यवधान कम से कम पड़े। फिर भी कुछ आकस्मिक एवं अनिवार्य कारण ऐसे आ सकते हैं जिसमें व्यवस्था बिगड़ जाय और उपासना अधूरी छोड़नी पड़े। ऐसी दशा में यह किया जाना चाहिए कि बीच में जितने दिन बन्द रखना पड़े उसकी पूर्ति आगे चलकर कर ली जाय इस व्यवधान की क्षति पूर्ति के लिए एक दिन उपासना अधिक की जाय जैसे चार दिन अनुष्ठान चलाने के बाद किसी आकस्मिक कार्यवश बाहर जाना पड़ा। तब शेष पाँच दिन उस कार्य से वापस लौटने पर पूरे करने चाहिए। इसमें एक दिन व्यवधान का अधिक बढ़ा देना चाहिए अर्थात् पाँच दिन की अपेक्षा छह दिन में उस अनुष्ठान को पूर्ण माना जाय। स्त्रियों का मासिक धर्म यदि बीच में आ जाय तो चार दिन या शुद्ध न होने पर अधिक दिन तक रोका जाय और उसकी पूर्ति शुद्ध होने के बाद करनी जाय। एक दिन अधिक करना इस दशा में भी आवश्यक है।
अनुष्ठान में पालन करने के लिए दो नियम अनिवार्य हैं। शेष तीन ऐसे हैं जो यथा स्थिति एवं यथा सम्भव किये जा सकते हैं। इन पाँचों नियमों का पालन करना पंच तप कहलाता है, इनके पालन से अनुष्ठान की शक्ति असाधारण रूप से बढ़ जाती है।
इन दो दिन ब्रह्मचर्य पालन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। शरीर और मन में अनुष्ठान के कारण जो विशेष उभार आते हैं उनके कारण कामुकता की प्रवृत्ति उभरती है। इसे रोका न जाय तो दूध में उफान आने पर उसके पात्र से बाहर निकल जाने के कारण घाटा ही पड़ेगा। अस्तु मनःस्थिति इस सम्बन्ध में मजबूत बना लेनी चाहिए। अच्छा तो यह है कि रात्रि को विपरीत लिंग के साथ न सोया जाय। दिनचर्या में ऐसी व्यस्तता और ऐसी परिस्थिति रखी जाय जिससे न शारीरिक और न मानसिक कामुकता उभरने का अवसर आये। यदि मनोविकार उभरें भी तो हठपूर्वक उनका दमन करना चाहिए और वैसी परिस्थिति नहीं आने दी जाय। यदि वह नियम न सधा, ब्रह्मचर्य अखंडित हुआ तो वह अनुष्ठान ही अधूरा माना जाय। करना हो तो फिर नये सिरे से किया जाय। यहाँ यह स्पष्ट है कि स्वप्नदोष पर अपना कुछ नियन्त्रण न होने से उसका कोई दोष नहीं माना जाता। उसके प्रायश्चित्य में दस माला अधिक जप कर लेना चाहिए।
दूसरा अनिवार्य नियम है उपवास। जिनके लिए सम्भव हो वे नौ दिन फल, दूध पर रहें। ऐसे उपवासों में पेट पर दबाव घट जाने से प्रायः दस्त साफ नहीं हो पाता और पेट भारी रहने लगता है इसके लिए एनीमा अथवा त्रिफला−ईसबगोल की भूसी−कैस्टोफीन जैसे कोई हलके विरेचन लिए जा सकते हैं।
महंगाई अथवा दूसरे कारणों से जिनके लिए वह सम्भव न हो वे शाकाहार−छाछ आदि पर रह सकते हैं। अच्छा तो यही हैं कि एक बार भोजन और बीच−बीच में कुछ पेय पदार्थ ले लिए जायँ, पर वैसा न बन पड़े तो दो बार भी शाकाहार, दही आदि लिया जा सकता है।
जिनसे इतना भी न बन पड़े वे अन्नाहार पर भी रह सकते हैं, पर नमक और शकर छोड़कर अस्वाद व्रत का पालन उन्हें भी करना चाहिए। भोजन में अनेक वस्तुएँ न लेकर दो ही वस्तुएँ ली जाएं। जैसे−रोटी, दाल। रोटी−शाक, चावल−दाल, दलिया, दही आदि। खाद्य−पदार्थों की संख्या थाली में दो से अधिक नहीं दिखाई पड़नी चाहिए। यह अन्नाहार एक बार अथवा स्थिति के अनुरूप दो बार भी लिया जा सकता है। पेय पदार्थ कई बार लेने की छूट है। पर वे भी नमक, शक्कर रहित होने चाहिएं।
जिनसे उपवास और ब्रह्मचर्य न बन पड़े वे अपनी जप संख्या नवरात्रि में बढ़ा सकते हैं इसका भी अतिरिक्त लाभ है, पर इन दो अनिवार्य नियमों का पालन न कर सकने के कारण उसे अनुष्ठान की संज्ञा न दी जा सकेगी और अनुशासन साधना जितने सत्परिणाम की अपेक्षा भी नहीं रहेगी। फिर भी जितना कुछ विशेष साधन−नियम पालन इस नवरात्रि पर्व पर बन पड़े उत्तम ही है।
तीन सामान्य नियम हैं [1] कोमल शैया का त्याग [2] अपनी शारीरिक सेवाएँ अपने हाथों करना [3] हिंसा द्रव्यों का त्याग। इन नौ दिनों में भूमि या तख्त पर सोना तप तितीक्षा के कष्ट साध्य जीवन की एक प्रक्रिया है। इसका बन पड़ना कुछ विशेष कठिन नहीं है। चारपाई या पलंग छोड़कर जमीन पर या तख्त पर बिस्तर लगाकर सो जाना थोड़ा असुविधाजनक भले ही लगे, पर सोने का प्रयोजन भली प्रकार पूरा हो जाता है।
कपड़े धोना, हजामत बनाना, तेल मालिश, जूता, पालिश, जैसे छोटे−बड़े अनेक शारीरिक कार्यों के लिए दूसरों की सेवा लेनी पड़ती है। अच्छा हो कि यह सब कार्य भी जितने सम्भव हों अपने हाथ किये जायं। बाजार का बना कोई खाद्य पदार्थ न लिया जाय। अन्नाहार पर रहना है तो वह अपने हाथ का अथवा पत्नी, माता जैसे सीधे शरीर सम्बन्धियों के हाथ का ही बना लेना चाहिए नौकर की सहायता इसमें जितनी कम ली जाय उतना उत्तम है। रिक्शे, ताँगे की अपेक्षा यदि साइकिल, स्कूटर, बस, रेल आदि की सवारी से काम चल सके तो अच्छा है। कपड़े अपने हाथ से धोना− हजामत अपने हाथ बनाना कुछ बहुत कठिन नहीं है। प्रयत्न यही होना चाहिए कि जहाँ तक हो सके अपनी शरीर सेवा अपने हाथों ही सम्पन्न की जाय।
तीसरा नियम है हिंसा द्रव्यों का त्याग। इन दिनों 99 प्रतिशत चमड़ा पशुओं की हत्या करके ही प्राप्त किया जाता हैं। वे पशु माँस के लिए ही नहीं चमड़े की दृष्टि से भी मारे जाते हैं। माँस और चमड़े का उपयोग देखने में भिन्न लगता है, पर परिणाम की दृष्टि से दोनों ही हिंसा के आधार हैं। इसमें हत्या करने वाले की तरह उपयोग करने वाले को भी पाप लगता है। अस्तु चमड़े के जूते सदा के लिए छोड़ सकें तो उत्तम है अन्यथा अनुष्ठान, काल में तो उनका परित्याग करके रबड़, प्लास्टिक कपड़े आदि के जूते चप्पलों से काम चलाना चाहिए।
माँस, अण्डा जैसे हिंसा द्रव्यों का इन दिनों निरोध ही रहता है। आज−कल एलोपैथी दवाएँ भी ऐसी अनेक है जिनमें जीवित प्राणियों का सत मिलाया जाता है। इनसे बचना चाहिए। रेशम, कस्तूरी, मृगचर्म आदि प्रायः पूजा प्रयोजनों में उपयोग किया जाता है, ये पदार्थ हिंसा से प्राप्त होने के कारण अग्राह्य ही माने जाने चाहिए। शहद यदि वैज्ञानिक विधि से निकाला गया है तो ठीक अन्यथा अण्डे बच्चे निचोड़ डालने और छत्ता तोड़ फेंकने की पुरानी पद्धति से प्राप्त किया गया शहद भी त्याग समझा जाना चाहिए।
न केवल जप उपासना के लिए ही समय की पाबन्दी रहे वरन् इन दिनों पूरी दिनचर्या ही नियमबद्ध रहे। सोने, खाने नहाने आदि सभी कृत्यों में यथासम्भव अधिक से अधिक समय निर्धारण और उसका पक्का पालन करना आवश्यक समझा जाय। अनुशासित शरीर और मन की अपनी विशेषता होती है और उससे शक्ति उत्पादन से लेकर सफलता की दिशा में द्रुत गति से बढ़ने का लाभ मिलता है। अनुष्ठानों की सफलता में भी यही तथ्य काम करता है।
अनुष्ठान के दिनों में मनोविकारों और चरित्र दोषों पर कठोर दृष्टि रखी जाय और अवाँछनीय उभारों को निरस्त करने के लिए अधिकाधिक प्रयत्नशील रहा जाय। असत्य भाषण, क्रोध, छल, कटुवचन अशिष्ट आचरण, चोरी, चालाकी, जैसे अवाँछनीय आचरणों से बचा जाना चाहिए, ईर्ष्या, द्वेष, कामुकता, प्रतिशोध जैसी दुर्भावनाओं से मन को जितना बचाया जा सके उतना अच्छा है। जिनसे बन पड़े वे अवकाश लेकर ऐसे वातावरण में रह सकते हैं जहाँ इस प्रकार की अवाँछनीयताओं का असर ही न आय। जिनके लिए ऐसा सम्भव नहीं, वे सामान्य जीवन यापन करते हुए अधिक से अधिक सदाचरण अपनाने के लिए सचेष्ट बने रहें।
नौ दिन की साधना पूरी हो जाने पर दसवें दिन अनुष्ठान की पूर्णाहुति समझी जानी चाहिए इन दिनों (1) हवन (2) ब्रह्मदान (3) कन्याभोज के तीन उपचार पूरे करने चाहिएं।
संक्षिप्त गायत्री हवन पद्धति की प्रक्रिया बहुत ही सरल है। उन मन्त्रों को एवं विधानों को बताने वाली पुस्तिका गायत्री तपोभूमि मथुरा से मिलती है। पुराने उपासकों में से अधिकाँश उस कृत्य से परिचित हैं। अपनी जानकारी न हो तो किसी पुराने गायत्री उपासक की सहायता से 240 आहुतियों का हवन किया जा सकता है। जहाँ वैसे साधन न हों वहाँ घी और शकर मिलाकर गायत्री मन्त्र से उसकी आहुतियाँ दी जा सकती हैं। मिट्टी की छोटी चबूतरी बना कर पतली समिधाओं में अग्नि उच्चारण कर सकने वाले घर के अन्य लोगों को भी सम्मिलित किया जा सकता है। यदि चार व्यक्ति मिल कर हवन करें तो मिलकर 60 बार आहुति देने से ही 240 आहुतियाँ हो जायेंगी। जितने आहुति देने वाले हों उसी हिसाब से यह निर्धारण करना चाहिए। 240 से कम आहुतियाँ नहीं होनी चाहिएं, अधिक हो जाए तो ठीक है। जिनके लिए इतना भी सम्भव न हो वे शाँति−कुँज को लिख देंगे तो उनकी 240 आहुतियाँ यहाँ की यज्ञशाला में विधिवत् कर दी जायेंगी।
गायत्री आद्य शक्ति−मातृ शक्ति है। उसका प्रतिनिधित्व कन्या करती है। अस्तु अन्तिम दिन कम से कम एक और अधिक जितनी सुविधा हो कन्याओं को भोजन कराना चाहिए।
ब्रह्मदान में सत्साहित्य का वितरण आता है। जन−मानस का परिष्कार करने वाला सस्ता प्रचार साहित्य युग−निर्माण योजना मथुरा और शांति−कुंज हरिद्वार से मिलता है अपनी सामर्थ्य अनुसार कुछ पैसा इसे मँगाने और विचारशील लोगों में उसे वितरण करने का प्रयत्न करना चाहिए। लागत से कम मूल्य में बेचना भी वितरण के समान ही श्रेष्ठ है।
दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन−प्रेरक पोस्टरों का चिपकाया जाना जैसे प्रेरणाप्रद कृत्य ब्रह्मदान की संज्ञा में ही गिने जाते हैं।
अनुष्ठान करने वाले इसकी सूचना हरिद्वार भेज देंगे तो उनकी साधना का संरक्षण एवं परिमार्जन भी वहाँ से किया जाता रहेगा। जवाबी पत्र भेजने वालों को सफलता शुभ−कामना का उत्तर मिलेगा।
इह चेदिवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदोन्महत्ती विनष्टि। भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति॥
−के॰ उ॰ 2।5)
अर्थात्−यदि मनुष्य ने इसी जन्म में अपने सच्चे स्वरूप को जान लिया तब तो ठीक है यदि नहीं जान लेता है तो उसकी बहुत बड़ी हानि है क्योंकि जब तक उसे आत्मस्वरूप का ज्ञान वहीं होगा तब तक उसके दुःखों का अन्त नहीं होगा। इस प्रकार वह आजीवन दुःखी ही रहेगा।
नित्य शुद्ध विमुक्तैक मखण्डानन्दमद्वयम्। सत्यं ज्ञानमनन्तं यत्परं ब्रह्माहमेवतत्॥ एवं निरन्तराभ्यस्ता ब्रह्मै वास्मीति वासना। हरत्यविद्या विक्षेपान रोगानिव रसायनम्॥
−तत्वबोध 36.37
अर्थात्− जो तीनों कालों में रहने वाला कभी नाश नहीं होता, जिसका जो मल रहित और संसार से विरक्त एक और अखण्ड, अद्वितीय आनन्द रूप है वही ब्रह्म है किन्तु वही ईश्वरीय चेतना ‘मैं हूँ’ के अहंकार के भाव निरन्तर अभ्यास उत्पन्न होने वाले चित्त विक्षेप के कारण वास्तविक ज्ञान को नष्ट कर देती है। और ईश्वरीय चेतना जीव रूप में काम करती हुई वासनाओं की पूर्ति में कभी यह कभी वह शरीर धारण करती भ्रमण करने लगती है।
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिंगात्। एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वाँस्त-
स्यैष आत्मा विशते ब्रह्म धाम॥
मु॰ उ॰ 3।2।4
यह आत्मा निर्बलों द्वारा नहीं प्राप्त किया जा सकता है। और न तो प्रमाद या किये गये तप से ही प्राप्त किया जा सकता है। जो ज्ञानी साधक इनके विपरीत बल, अप्रमाद तथा सोद्देश्य किये गये तप के द्वारा यत्न करता है वही इस आत्मा का दर्शन कर पाता है।
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साधन अनुदान ओर प्रशिक्षण सर्ग-
साधना वर्ष के साधकों से चार अनुरोध
स्वर्ण−जयन्ती साधना वर्ष में अखण्ड−ज्योति के सभी सदस्यों से गायत्री महाशक्ति की संक्षिप्त, सरल किन्तु अति महत्वपूर्ण साधना करने के लिए, अनुरोध किया गया है। प्रसन्नता की बात है कि उसका महत्व समझा गया और परिजनों में से अधिकाँश ने इस साधन शृंखला की सदस्यता स्वीकार कर ली है। जिनकी सूचना मिली है उनके नाम नोट कर लिये गये हैं। उनका उपासना क्रम ठीक तरह चले इस पर आवश्यक ध्यान रखा जा रहा है और उन्हें प्रगति की दिशा में अग्रसर करने वाला आवश्यक सहयोग दिया जा रहा है। आशा की जानी चाहिए कि इस साधना उपक्रम से उतना लाभ उठाया जा सकेगा जितना कई वर्षों की−कई घण्टे की उपासना से ही सम्भव होता है। भूमि की उर्वरता और बीज की प्रखरता का महत्व तो है ही, पर साथ ही अनुभवी माली का सहयोग मिल जाय तो पौधे के सुविकसित होने की सम्भावना और भी अधिक सुनिश्चित रहती है। इस वर्ष के साधना−क्रम में सौभाग्य से ऐसा ही संयोग जुड़ गया है।
जिनने अपनी साधना आरम्भ नहीं की है, उन्हें बसन्त पर्व के बाद भी करने की छूट है। 5 फरवरी 76 से अपना साधना वर्ष आरम्भ हो गया। ठीक एक वर्ष में 77 के बसन्त पर इसकी पूर्णाहुति हो जायगी। बीच के महीनों से भी इस साधन शृंखला की सदस्यता अपनाई जा सकती है और जब भी अवसर मिले तब से भी इसमें सम्मिलित हुआ जा सकता है, पर उसकी समाप्ति हर हालत में 77 के बसन्त को ही करनी होगी। बीच में−देर से सम्मिलित होने वालों की साधना पूरे वर्ष न चलकर उतने समय कम चलेगी जितने कि वे देर में सम्मिलित हुए। तीन महीने पीछे सम्मिलित होने वाले मात्र 9 महीने में विशिष्ट सहयोग का लाभ उठा सकेंगे। पीछे उपक्रम को जारी तो आजीवन रखा जा सकता है, पर सूत्र सम्बद्धता का सिलसिला टूट जायगा।
पैंतालीस मिनट हर दिन की साधना का उपक्रम गत अंक में समझाया जा चुका है। इस अंक में यह अनुरोध है कि जिनकी निष्ठा, साधना में अधिक परिपक्व हो तथा जिन्हें सुविधा हो वे सन् 76 की दोनों नवरात्रियों की अनुष्ठान, तपश्चर्या में भी सम्मिलित होने का साहस करें। चैत्र की नवरात्रि 1 अप्रैल से और आश्विन की नवरात्रि 24 सितम्बर से आरम्भ होगी और पूरे 9-9 दिन चलेंगे। इसमें ढाई−तीन घण्टे जप तथा ब्रह्मचर्य उपवास आदि के नियम, पालन जिनके लिए सम्भव हों वे इस तपश्चर्या का भी लाभ उठायें। इसमें सम्मिलित होने वालों को अलग से सूचना देनी चाहिए ताकि उनकी इस अतिरिक्त साधना का−अतिरिक्त संरक्षण कर सकना सम्भव हो सके।
एक लाख साधकों को ही इस शृंखला में सम्मिलित किया जा सकेगा। यह संख्या पूरी होने पर अन्य लोग इच्छा और सुविधानुसार इस साधना क्रम को अपनायें तो प्रसन्नतापूर्वक अपनायें, पर उन्हें विशेष संरक्षण की सुविधा न मिल सकेगी। उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर आधी संख्या 5 फरवरी 76 के बसन्त पर्व पर ही पूरी हो चुकेगी। शेष आधी के पूरा होने में सम्भवतः चार महीने और लग सकते हैं। आगामी गायत्री जयन्ती 7 जून की है। उस दिन निश्चित रूप से साधन की शृंखला सदस्यता का प्रवेश बन्द कर दिया जायगा। जो आठ महीने भी सम्मिलित न रह सकेंगे, उन्हें विशिष्ट साधकों के स्तर का लाभ न मिल सकेगा। अस्तु यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि जिनने अभी प्रवेश प्राप्त नहीं किया है उन्हें इसी अवधि में अपना साधना−क्रम आरंभ कर देना है।
यहाँ एक विशेष बात ध्यान में आती है कि हमें पिछले 27 वर्ष से गायत्री उपासना का प्रचार और मार्ग−दर्शन करना पड़ रहा है। इस अवधि में कितने ही लोगों ने यह साधना−क्रम आरम्भ किया था और किसी न किसी रूप में हमारा सहयोग लिया था। इनमें से कुछ तो निष्ठापूर्वक हमारे कदम से कदम मिलाकर बढ़ते चले आये हैं और आत्मिक प्रगति की दृष्टि से आज वहाँ हैं जिस पर वे और हम दोनों ही सन्तोष व्यक्त कर सकते हैं। किन्तु कितने ही ऐसे भी रहे हैं जिनका उत्साह देर तक स्थिर न रह सका। कारणवश उनमें शिथिलता आई और वह प्रयास छूट गया। अच्छा होता वे गिरते−उठते किसी प्रकार उस क्रम को जारी रखे रहते और पूरा न सही अधूरा लाभ तो पा लेते।
विचार यह आया है कि इन लोगों को भी साधना वर्ष का लाभ लेने के लिए कहा जाय। इससे वे कम समय में अधिक उत्साह पा सकेंगे और भविष्य में अपना साधन क्रम बिना किसी बाहरी सहायता के अपने ही उपयोगी अनुभव के आधार पर जारी रख सकेंगे। अभी एक लाख की सदस्यता पूरी होने में थोड़ी गुंजाइश भी है और चार महीने का समय भी। इस बीच उन पिछड़े साधकों तक सूचना पहुँच सके तो निश्चित रूप से उनमें से अधिकाँश पुनः अपना उत्साह सजग करेंगे और इस अलभ्य अवसर का लाभ ले सकेंगे।
कठिनाई यह है कि ऐसे छूटे हुए साथी अखण्ड−ज्योति की सदस्यता भी खो बैठे होंगे। उन तक हमारा सन्देश इतनी जल्दी नहीं पहुँच सकेगा। एक दूसरे से चर्चा होने पर भी बात आगे बढ़ती है, पर यह सिलसिला दूर तक देर तक नहीं चलता। अस्तु अच्छा उपाय यही है कि जिन साधकों ने साधना वर्ष की सदस्यता स्वीकार की हो वे मिशन के सन्देश वाहक का एक अतिरिक्त उत्तरदायित्व भी उठायें और अपनी पहुँच के सम्पर्क क्षेत्र में यह तलाश करें कि ऐसे कौन लोग थे जिनका कभी गायत्री उपासना में उत्साह था, पर अब वह छूट गया। ऐसे लोगों तक स्वर्ण−जयन्ती वर्ष की−साधन शृंखला की जानकारी पहुँचाई जानी चाहिए। यह कार्य उन्हें जनवरी, फरवरी के अखण्ड−ज्योति अंकों का साराँश बताकर समझाई जा सकती है। इससे यदि उनका उत्साह जगे तो उनका मार्ग−दर्शन करने का कार्य प्रविष्ट सदस्यों द्वारा स्वयं ही उठाया जा सकता है। चूँकि वे पत्रिका नहीं पढ़ते इसलिए भविष्य में भी आवश्यक निर्देश उन तक पहुँच न सकेंगे। बीच−बीच में भी उपयोगी मार्ग−दर्शन तो चलता ही रहेगा। उसकी जानकारी भी इन लोगों को मिलती रहनी चाहिए। यह तभी सम्भव हो सकता है जब शृंखला में सम्मिलित लोग अपना एक छोटा सम्पर्क मण्डल बना लें और उन लोगों का व्यक्तिगत रूप से स्वयं−दर्शन करते रहें।
कितने ही अशिक्षित, स्वल्प शिक्षित, नेत्र दृष्टि से दुर्बल अथवा आर्थिक कारणों से पत्रिका न पढ़ पाते होंगे किन्तु उनकी अध्यात्म−निष्ठा सराहनीय स्तर की हो सकती है। ऐसे लोग इस अवसर का लाभ न ले सकें तो यह खेदजनक ही होगा। इन्हें लाभान्वित करने का एक ही तरीका है कि प्रस्तुत निष्ठावान सदस्य अपनी−अपनी एक छोटी मंडली बना लें और उसके मार्ग−दर्शन का उत्तरदायित्व स्वयं उठायें। साप्ताहिक गोष्ठियाँ बुलाने का सत्संग क्रम चलाया जा सकता है और मंडली के सदस्यों की जिज्ञासाओं का समाधान तथा आवश्यक मार्ग−दर्शन करते रहा जा सकता है। मण्डली में नये सदस्य भी सम्मिलित किये जा सकते हैं। इस प्रकार एक स्थानीय साधक मण्डली हर जगह चल सकती है।
यह लोग साधन शृंखला के एक लाख सीधे सदस्यों की गणना में तो नहीं गिने जायेंगे, पर उन्हें अनुसदस्य मान लिया जायगा और यदि उनकी सूची हरिद्वार पहुँचा दी गई होगी तो संरक्षण उनकी साधना का भी अतिरिक्त रूप से होता रहेगा।
यह स्वाभाविक भी है। सीधे सम्पर्क के लोगों को साधना, उपासना का तत्वज्ञान, स्वरूप, आधार और प्रयोग हर महीने विस्तारपूर्वक समझाया जा सकता है। पर अनुसदस्य तो केवल उपासना प्रक्रिया ही जान पायेंगे और इस सन्दर्भ का तत्वज्ञान उन तक छन−छनकर ही थोड़ा बहुत पहुँच पावेगा। स्कूल में नियमित रूप से पढ़ने वाले छात्रों में और घर पर ही अभ्यास करके परीक्षा देने वाले छात्रों में कुछ तो अन्तर रहता ही है। वह कमी तो यहाँ भी रहेगी फिर भी न कुछ से कुछ अच्छा की उक्ति के अनुसार यह स्थानीय साधना मंडलियाँ भी कुछ उपयोगी ही कार्य करेंगी और उतने से भी बहुतों का बहुत कल्याण होगा। अस्तु जहाँ भी−जिनके लिए भी जो सम्भव हो वह प्रयत्न उन्हें अपनी स्थिति और सुविधा के अनुसार आरम्भ कर देना चाहिए और स्थानीय साधना मंडली की व्यवस्था यथासम्भव जल्दी ही बना लेनी चाहिए।
स्वर्ण−जयन्ती वर्ष की साधक शृंखला का और स्थानीय साधना मण्डलियों का−क्रम हर हालत में गायत्री जयन्ती 7 जून 76 तक पूर्ण हो जाना है। इसके उपरान्त सम्बद्ध सूत्रों का सिलसिला नहीं चलेगा। अनुसदस्यों को भी मार्ग−दर्शन, संरक्षण के लिए अपनी सूची में इससे आगे सम्मिलित न किया जा सकेगा।
शांति−कुंज में चलने वाले सत्रों में कई प्रकार के प्रतिबन्ध थे। छोटे बच्चों वाली महिलाओं को उनमें प्रवेश नहीं मिलता था। बीड़ी, सिगरेट के आदी तथा दूसरी शारीरिक असमर्थताओं के कारण भी प्रतिबन्ध थे। किन्तु वह सभी लोग उन अनुदानों के अधिकारी थे जो आत्मिक दृष्टि से स्वस्थ होने के कारण उन्हें मिलने चाहिए थे। शांति−कुंज की अपनी कठिनाइयाँ और अपनी मर्यादाएँ हैं। उन्हें भी अनुचित और अनावश्यक नहीं कहा जा सकता। जो हो इन उभय पक्षीय कठिनाइयों ने नियमित निष्ठावान साधकों में से तीन−चौथाई को उस लाभ से वंचित रखा जो उन्हें मिलना चाहिए था, फिर इस वर्ष जो साधना का पुनर्जागरण हो रहा है उनके सदस्यों को सम्पर्क जन्य लाभ किस प्रकार मिल पावेगा?
यह विशेष व्यवस्था इसी वर्ष की है। अस्तु चैत्र की नवरात्रियों में इन सत्रों के लिए आमन्त्रण माँगे गये हैं। जहाँ आवश्यकता समझी जाय वहाँ के साधक 10 अप्रैल रामनवमी तक अपने आमन्त्रण पत्र भेज दें। इन पर विचार करके यह कार्यक्रम बनेगा कि एक प्रतिनिधि किन−किन सत्रों का संचालन करने के लिए किस रास्ते जाय और कितना चक्र पूरा करते हुए कितने समय में कब तक वापस लौटे। यह कार्यक्रम 30 अप्रैल से पूर्व ही निर्धारित करके 1 मई से स्थानीय सत्र श्रृंखलाएँ चालू कर दी जायेंगी। अगली 77 की बसन्त पंचमी से पहले ही यह शृंखला समाप्त कर दी जायगी। इस प्रकार आठ नौ महीनों में ही जितने चार दिवसीय सत्र जहाँ−जहाँ सम्भव होंगे वहाँ सम्पन्न कर दिये जायेंगे। सभी माँगों को पूरा कर सकने के लिए उतने प्रतिनिधि जुटाये नहीं जा सके तो कई स्थानों के लिए असमर्थता भी प्रकट की जा सकती है। जहाँ पहुँचने के मार्ग दुर्गम होंगे वहाँ पहुँचना भी शायद न हो सके। अस्तु यह नहीं कहा जा सकता कि सभी आमन्त्रणों पर सत्र व्यवस्था बन ही जायगी। फिर भी इसके लिए आमन्त्रण तो भेजे ही जा सकते हैं। भेजते समय रेलवे स्टेशन सड़क आदि का नक्शा तथा पहुँचने सम्बन्धी इतनी जानकारी एक अलग कागज पर देनी चाहिए जिसके सहारे अपरिचित प्रतिनिधि बिना कठिनाई के उस स्थान पर पहुँच सके। प्रतिनिधि को कुछ देने के लिए सत्र संयोजक बाधित नहीं है। मार्ग व्यय आदि की दृष्टि से कुछ देना बन पड़े तो मिशन के लिए कुछ दिया जा सकता है और उसकी रसीद प्राप्त की जा सकती है।
सत्रों में कार्यक्रम क्या रहेगा यह अलग से छपी सूचना द्वारा भेज दिया जायगा। अच्छा यह है कि चार दिन के लिए साधक पूरा अवकाश ले लें और अपनी शारीरिक, मानसिक गतिविधियों को पूरी तरह इस विशेष अनुदान का लाभ लेने में निरत रखें। पर जिन्हें अनिवार्य काम होंगे अवकाश सम्भव न होगा, उन्हें दस से चार के बीच छह घण्टे की अतिरिक्त छुट्टी भी दी जा सकेगी। रात्रि को एक जगह ही सब साधक रहें और सब का खान−पान एक जगह ही चले इसका प्रबन्ध होना चाहिए। साधना स्थल का वातावरण शांति−कुंज से मिलता जुलता बन सके इसके लिए उपयुक्त स्थान पहले से ही चुना जाना चाहिए और आवश्यक व्यवस्था बनाने में पहले से ही पूरा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।
नियमित साधकों के अतिरिक्त अन्य लोगों को भी प्रातःकाल तीन घण्टे की उपासना में तथा रात्रि के प्रवचनों में सम्मिलित किया जा सकेगा, फिर भी प्रतिबन्ध तो रहेंगे ही। हर किसी को इन विशेष आयोजनों में घुस पड़ने और अव्यवस्था फैलाने की छूट न रहेगी इसलिए साधना एवं प्रवचनों में सम्मिलित रहने के लिए सत्र संचालकों से विशेष अनुमति लेने की आवश्यकता रहा करेगी।
संक्षेप में स्वर्ण−जयन्ती साधना वर्ष में परिजनों से (1) 45 मिनट के उपासना क्रम में स्वयं सम्मिलित होने (2) दोनों नवरात्रियों की तपश्चर्या करने (3) अनुसाधक तलाश करके उनकी स्थानीय मण्डली चलाने एवं (4) चार दिवसीय सत्र व्यवस्था बनाने के चार कार्यों का अनुरोध किया गया है। इसके लिए आरम्भ के दो महीने कुछ अधिक सोचने, करने और तैयारी का ढाँचा बिठाये में लगेंगे। इसके बाद तो निश्चिन्ततापूर्वक शेष वर्ष की साधना प्रक्रिया में ही निरत रहना होगा। स्मरण रखने योग्य यह है कि 45 मिनट की उपासना एवं नवरात्रि आदि की तपश्चर्या पर जितना ध्यान दिया जाना है उतना ही जीवन साधना का आश्रय लेकर अपने गुण, कर्म, स्वभाव का दृष्टिकोण एवं क्रिया−कलाप का भी परिमार्जन, परिशोधन किया जाना है। जीवन साधना को−उर्वरा भूमि की और उपासना को बीजारोपण की उपमा दी जा सकती है, इसे बन्दूक और कारतूस का समन्वय भी कहा जा सकता है। उभय−पक्षीय व्यवस्था बन पड़ने पर ही आत्मिक प्रगति का रथ ठीक तरह अग्रसर होता है। दोनों पहिये समान आकार−प्रकार के और सही सुदृढ़ होने चाहिएं।
आशा की जानी चाहिए कि साधना वर्ष में प्रतिदिन 24 करोड़ गायत्री पुरश्चरण सम्पन्न होते चलने की- एक लाख संकल्प निष्ठ साधकों की तपश्चर्या का प्रभाव सूक्ष्म जगत के परिशोधन में अपनी असाधारण भूमिका सम्पन्न करेगा। इसमें सम्मिलित रहने वाले साधक इतने ही समय में की जा सकने वाली सामान्य साधनाओं की अपेक्षा अनेक गुने परिमाण में− अनेक गुना उच्चस्तरीय लाभ उठा सकेंगे।
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शांति−कुंज में चल रही सत्र शृंखला में इस वर्ष थोड़ा हेर−फेर करना पड़ा है। बसन्त पर्व से अपना नया वर्ष प्रारम्भ होता है और उस अवसर पर एक वर्ष की कार्य पद्धति निर्धारित होती है। यह अपनी पचास वर्षों की परम्परा है। बहुत लम्बे समय तक चलने वाली योजनाएँ भी बनी हैं, पर उनका सामयिक कार्यक्रम सदा एक वर्ष का ही बना है। सरकारी बजट अधिवेशन की तरह हमारी कार्य प्रक्रिया भी एक वर्ष के लिए ही बनती है। अगले वर्ष की परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं को देखते हुए जैसा कुछ हेर−फेर अभीष्ट होता है उसे उस तरह ठीक कर लिया जाता है।
शांति−कुंज की सत्र शृंखला में स्वर्ण जयन्ती साधना वर्ष की विशेष एवं व्यापक प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए यहाँ की शिक्षण प्रक्रिया में कमी करना आवश्यक हो गया और करना भी पड़ा है।
पिछले दो वर्षों से प्राण प्रत्यावर्तन सत्र−जीवन साधना सत्र और योगतप साधना सत्र लगातार चले हैं और इनमें दस हजार से अधिक संख्या में लोगों ने आकर प्रशिक्षण प्राप्त किया है। अब 76 बसन्त पर्व से आरम्भ हो कर 77 के बसन्त पर्व तक चलने वाले अपने अध्यात्म वर्ष में यह व्यवस्था सिकोड़ दी गई है। इस वर्ष दस−दस दिवसीय मात्र पाँच सत्र होंगे। इनमें आने वालों को, जीवन साधना और गायत्री उपासना का समन्वय रहेगा। शिक्षार्थियों को एक 24 हजार गायत्री पुरश्चरण इसी पुनीत भूमि में रहकर करना होगा। सोऽहम् साधना, खेचरी मुद्रा, जप, ध्यान, आत्मशोधन, देव सान्निध्य की सभी साधनाएँ साथ−साथ चलेंगी। इन प्रयोजनों को ठीक तरह पूरा कर सकने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन एवं सहयोग सभी शिक्षार्थियों को मिलेगा। पूरे दस−दस दिन के यह सत्र होंगे। इतने समय यहाँ रहना होगा अस्तु रास्ते के आने−जाने का समय ध्यान में रखते हुए ही आगन्तुकों को अवकाश लेना चाहिए। संक्षेप में इन्हें साधना सत्र कहा जा सकता है। उनमें पिछले प्राण प्रत्यावर्तन−जीवन साधना और योगतप के शिक्षण का सार तत्व और स्वर्ण जयन्ती वर्ष का विशेष अनुदान सम्मिलित है साधना में क्रिया−कृत्य से भी अधिक प्रभावी स्थान वातावरण एवं सान्निध्य का पड़ता है। यह विशेष उपलब्धियाँ शांति−कुंज में रह कर उपासना करने वालों को कितनी अधिक मात्रा में मिली हैं, इन्हें अनुभव के आधार पर ही जाना जा सकता है। इस वर्ष केवल पाँच साधना सत्र होंगे। प्रथम सत्र 1 फरवरी से 10 फरवरी तक का बसन्त पर्व के अवसर पर होगा जो यह अंक पहुँचने से पूर्व ही सम्पन्न हो चुका होगा। अब जिनमें सम्मिलित हुआ जा सकता है, वे केवल चार ही शेष हैं।
(1) 1 अप्रैल से 10 अप्रैल तक चैत्र की नवरात्रि की साधना। इसके मध्य में रामनवमी का पर्व भी आता है।
(2) 30 मई से 8 जून तक गायत्री जयन्ती के अवसर पर।
(3) 24 सितम्बर से 3 अक्टूबर तक आश्विन नवरात्रि के अवसर पर−इसमें विजया दशमी भी आ जाती है।
(4) 24 नवम्बर से 3 दिसम्बर तक गीता जयन्ती के अवसर पर।
(5) 77 के बसन्त पर्व पर होगा। इसकी रूपरेखा अभी निर्धारित नहीं की गई है। उसकी सूचना समयानुसार दी जायगी। इसलिए उसके लिए अभी आवेदन पत्र नहीं लिए जायेंगे।
इस वर्ष 90 प्रतिशत कटौती कर दी गई है केवल 10 प्रतिशत को ही सम्मिलित किया जाना है अस्तु समय से पूर्व स्थान सुनिश्चित करा लेने वाले ही इस अनुदान अवसर का लाभ उठा सकेंगे।
इस वर्ष फरवरी, मार्च, अप्रैल में कितने ही लोगों को सत्रों में सम्मिलित होने की स्वीकृति दी जा चुकी है। अब उसे निरस्त समझा जाय और यह माना जाय कि अब फिलहाल चैत्र नवरात्रि का और दूसरा गायत्री जयन्ती दो सत्र ही अगले छह महीनों में होने हैं। जिन्हें फरवरी, मार्च, अप्रैल में आने की स्वीकृति मिली है−वे फिर से अपना कार्यक्रम ठीक कर लें। या तो चैत्री नवरात्रि में या गायत्री जयन्ती पर आने की योजना बनायें और परिवर्तित विचार की सूचना देकर फिर से नई स्वीकृति प्राप्त करलें।
इस कटौती में वानप्रस्थ सत्रों का समय भी घटा दिया गया है। इस वर्ष डेढ़−डेढ़ दो−दो महीने के रामायण भागवत् सत्र नहीं होंगे वरन् उन्हें एक−एक महीने का ही कर दिया गया है। वह सत्र इस वर्ष केवल दो ही होंगे (1) 1 मई से 30 मई तक (2) 5 दिसम्बर से 4 जनवरी तक। इसी अवधि में रामायण भागवत के माध्यम से रामचरित्र, कृष्ण चरित्र द्वारा नव निर्माण की पूरी प्रक्रिया तथा धर्म से लोक शिक्षण की समग्र प्रक्रिया संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त गहराई के स्तर तक समझा दी जायगी।
तीन−तीन महीने के चलने वाले महिला सत्रों में भी कटौती की गई है और वह इस वर्ष केवल एक ही होगा−जुलाई, अगस्त, सितम्बर में। जिन महिलाओं को किसी अन्य सत्र में आने की स्वीकृति मिली थी अथवा जो पहले स्वीकृति प्राप्त करके भी कारणवश आ नहीं सकी थीं। वे अब इस 1 जुलाई से आरम्भ होने वाले तीन महीने के सत्र में सम्मिलित हो सकती हैं। जो न आ सकेंगी उन्हें एक वर्ष तक प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। आठवीं कक्षा जितनी योग्यता का होना इस सत्र के लिए आवेदन कर्त्तियों के लिए आवश्यक है।
कन्या शिक्षण एक वर्ष का यथावत् चलेगा। गतवर्ष की अपेक्षा इस वर्ष स्थान बढ़ा दिये गये हैं। नई इमारत बन जाने से अब कन्याएं 70 के स्थान पर 100 ली जा सकेंगी। शिल्प विभाग में इस वर्ष कितनी ही नई मशीनें मंगा कर नई शिल्प कक्षाएँ आरम्भ कर दी गई हैं। वस्त्र उद्योग इसमें विशेष है। कम परिश्रम में अधिक काम कर सकने वाली मशीनों की सहायता से यह घरेलू उद्योग हर जगह चल सकता है और अधिक व्यापक एवं अधिक लाभदायक हो सकता है। कपड़ों की सिलाई भी ऐसा ही गृह−उद्योग है जिसकी हर जगह आवश्यकता पड़ती है।
मशीनों की सहायता से एक दिन में दो तीन स्वेटर बुन लेने पर हर स्वेटर की बुनाई तीन चार रुपया मिल जाने से भी दस−बारह रुपया रोज कमाये जा सकते हैं। कढ़ाई की मशीनें कलात्मक सुसज्जा के साथ−साथ आजीविका का साधन भी बनती हैं। मोजे बुनने की मशीन- बालों में बाँधने के रिबिन फीते−कमर बन्द नाड़े, दरी, आसन आदि बुनने के उद्योग भी कम महत्व के नहीं है। फाउन्टेन पेन बनाने का उद्योग भी कम उपयोगी नहीं है। बिस्किट, डबलरोटी के अतिरिक्त अब लेमचूस, टॉफी बनाना भी सिखाया जाने लगा है। प्रेस उद्योग ने अपनी गति पकड़ ली है। उसे सीख कर सात आठ हजार की पूँजी से कहीं भी एक स्वतन्त्र प्रेस खड़ा किया जा सकता है और उस कुटीर उद्योग में अपने ही घर के पाँच छह व्यक्ति लग सकते हैं और सब को घर पर रह कर ही अच्छे उपार्जन का सम्मानपूर्ण आधार मिल सकता है। लड़कियों को दहेज देने की अपेक्षा यदि एक छोटा प्रेस दे दिया जाय तो तो वे किसी गरीब और कम शिक्षित लड़के के साथ निर्वाह करने पर भी शिक्षित वर पाने की अपेक्षा कहीं अधिक सुखी सम्मानित रह सकती हैं।
रबड़ की मुहरें बनाने का स्वतन्त्र उद्योग प्रेस से मिलता जुलता ही है। यह पांच छह सौ रुपये की लागत से भी आरम्भ हो सकता है और अच्छी आजीविका दे सकता है। तरह−तरह के खिलौने बनाने का उद्योग भी सब जगह चलने वाला, मनोरंजक एवं उपयोगी गृह−उद्योग है। यह सब भी एक वर्ष की शिक्षण प्रक्रिया में ही सम्मिलित है। साबुन बनाना, मोमबत्ती, सुगन्धित तेल, शरबत, तरह−तरह की स्याहियाँ आदि का रसायन विभाग भी अब गत वर्ष की अपेक्षा अधिक समृद्ध हुआ है।
यों एक वर्ष की कन्या शिक्षा का मूल उद्देश्य उन्हें सुगृहिणी और कुशल समाज−सेविका बनाना है और उसी को ध्यान में रखकर सारा ढाँचा खड़ा किया है, पर साथ ही यह भी ध्यान रखा गया है कि प्रत्येक शिक्षार्थी लड़की आजीविका उपार्जन की दृष्टि से अपने में स्वावलम्बन की परिपूर्ण योग्यता भी अनुभव कर सके और आवश्यकता पड़ने पर अपना ही नहीं अपने पूरे परिवार का निर्वाह उत्तरदायित्व भी अपने कन्धे पर ले सके। यह विभाग इसलिए भी आवश्यक था कि अगले दिनों हर महिला जागरण शाखा को अपने यहाँ प्रौढ़ महिला विद्यालय आरंभ करने हैं। इनमें साक्षरता, साहित्य की ही नहीं वरन्, गृह−उद्योग और संगीत की कक्षाएं भी अनिवार्य रूप से चलेंगी। सामान्य शिक्षाएँ तो हर जगह मिल जाती हैं, पर संगीत और गृह−उद्योग पढ़ाने के लिए अनुभवी अध्यापिकाओं का मिलना कठिन हो जाता है। यहाँ की प्रशिक्षित कन्याएँ अध्यापन की इस तीन दिशा वाली आवश्यकता को भली प्रकार पूरी कर सकती हैं। भाषण कला में प्रायः सभी लड़कियाँ प्रवीण हो जाती हैं वे महिला संगठन के आयोजन में तथा अन्य अवसरों पर धड़ल्ले के साथ अपने विचार व्यक्त कर सकती हैं। वक्तृत्व कला की शिक्षा दूसरों को देना भी उनके लिए कुछ कठिन नहीं पड़ता।
कोई महिला जागरण शाखा अपना प्रेस खड़ा करके कई शाखा सदस्याओं को आजीविका दे सकती है और उसकी आमदनी से रचनात्मक कार्यों में होने वाला खर्च भी जुटा सकती हैं। इस प्रकार शाखाएँ आर्थिक दृष्टि से अपने पैरों पर खड़ी हो सकती हैं। पूँजी जुटाया जाना उतना कठिन नहीं होता, जितना अनुभवी संचालिका मिलना। शांति−कुंज में एक वर्ष शिक्षा प्राप्त करने वाली लड़कियों से यह अपेक्षा की जा सकती है कि उनने जो कुछ यहाँ सीखा है उसके आधार पर ये किसी भी परिस्थिति में रहकर सुयोग्य गृह−लक्ष्मी सिद्ध हो सकती हैं और महिला जागरण अभियान में बढ़−चढ़कर योगदान दे सकती हैं। यहाँ की सामान्य शिक्षा में इन सभी तथ्यों का समावेश है जिसके व्यक्तित्व का सर्वतोमुखी विकास होता है और लोक−व्यवहार में प्रवीणता की दृष्टि से महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। आशा की जा सकती है कि यहाँ की प्रशिक्षित लड़कियाँ आवश्यकता पड़ने पर लोक नेतृत्व कर सकने में भली प्रकार सफल हो सकती हैं।
उपरोक्त उद्देश्यों को पूरा कर सकने वाली शिक्षा का अब तक कहीं भी प्रयत्न नहीं हुआ है। इसलिए इस कन्या−शिक्षण प्रक्रिया को अनोखी, अभूतपूर्ण और असाधारण कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी। इसे प्राप्त करने की इच्छुक कन्याओं की आयु, शिक्षा और प्रतिभा जितनी अच्छी ऊँची होगी, उतना ही इस प्रशिक्षण पर किया गया श्रम सार्थक हो सकेगा। यों न्यूनतम 15 वर्ष और न्यूनतम शिक्षा आठवीं कक्षा रखी गई है, पर इससे अधिक आयु और शिक्षा की छात्राओं को भी प्रवेश में प्राथमिकता दी जायगी। कम पढ़ी, कम आयु की, रुग्ण, मन्द बुद्धि लड़कियों को आशीर्वाद दिलाने के लिए यहाँ ठेल जाने का प्रयास किन्हीं को भी नहीं करना चाहिए। प्रतिभाशाली लड़कियाँ भेजने से ही प्रशिक्षण व्यवस्था की सार्थकता सिद्ध हो सकती है। इसलिए आवेदन−पत्र भेजने से पूर्व भेजने वालों को छात्राओं के स्तर पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिए और यदि वे हर दृष्टि से उपयुक्त जँचें तो ही भेजना चाहिए। शिक्षा का, निवास, बिजली फर्नीचर, शिक्षा उपकरण आदि का सारा खर्च शांति−कुंज उठाता है। भोजन का न्यूनतम खर्च ही अभिभावकों को देना पड़ता है। दो बार रोटी−दाल, चावल, साग और दो बार चाय का खर्च मात्र 65 मासिक है जो निश्चित रूप से असली लागत से कम से कम पाँच रुपया कम ही है।
एक वर्षीय कन्या शिक्षण सत्र इस वर्ष भी 1 जुलाई से आरम्भ होकर मई के अन्त तक 11 महीने चलेगा। तीन महीने महिला सत्र भी 1 जुलाई से ही आरम्भ होंगे। महिलाओं के लिए भी कम से कम आठवीं कक्षा तक पढ़ी होना आवश्यक है। स्वल्प शिक्षित, रुग्ण, मन्द बुद्धि एवं आलसी अनुशासन न मानने वाली महिलाएँ प्रशिक्षण में नहीं भेजी जानी चाहिए। महिलाओं और कन्याओं के आवेदन−पत्र भी अप्रैल के अन्त तक ही भेज कर स्वीकृतियाँ प्राप्त कर लेनी चाहिए। देर से चेतने वालों को गत वर्ष की तरह इस वर्ष भी सीमित स्थान पूरे हो जाने पर निराश ही होना पड़ सकता है।
महिला सत्र, कन्या प्रशिक्षण, साधना सत्र एवं वानप्रस्थ शिक्षा के चारों ही स्तर के शिक्षार्थी यदि अगले दो तीन महीने के भीतर ही अपने स्थान सुनिश्चित करा लें तो आगे की खटखट से शांति−कुंज में भी सुविधा रहेगी और शिक्षार्थियों को भी स्थान सुरक्षित करा लेने पर निश्चिन्तता अनुभव होगी। अस्तु जिन्हें भी अगले वर्ष किसी प्रशिक्षण में सम्मिलित होना हो उनके लिए समय रहते आवेदन कर देने और स्वीकृति प्राप्त कर लेने में ही सुविधा है।
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धरती कहती, अम्बर कहता, कहते साधु-संत विद्वान।
छोटा-बड़ा नहीं है कोई, नर-नारी सब एक समान।।
माता, बहिन, सुता, पत्नी का, जिस घर में होता सम्मान।
शान्ति- कुंज वह देवधाम वह, वहाँ वास करते भगवान।।
घृत के दीप वहाँ जलते हैं।
सुरभित भाव सुमन खिलते हैं।।
जहाँ प्रेम से पार्वती शिव-
समता-ममता से मिलते हैं।।
खुश होते हैं देख-देखकर, एक दूसरे का उत्थान।
जीवन की मंजिल में दोनों, गाते सृष्टि सृजन का गान।।
एक दूसरे के पूरक हैं, तन है एक दूसरा प्राण।
छोटा-बड़ा नहीं है कोई, नर-नारी सब एक समान।।
पुरुष सबल पौरुष गुणधारी।
नारी पूनम की उजियारी।।
दोनों करें साधना ऐसी-
झूम उठे जीवन फुलवारी।।
एक दूसरे से बढ़-चढ़कर, क्षमता प्रतिभा है अनमोल।
दोनों की गरिमा से बढ़ जाता जीवन का मोल।।
जीवन-रथ के दोनों पहिये, विजय हार बनते अम्लान।
छोटा-बड़ा नहीं है कोई, नर-नारी सब एक समान।।
बीते युग की छोड़ो बातें।
करो नहीं आपस में घाते।।
वाद-विवादों में न गँवाओ-
स्वर्णिम दिन चाँदी-सी रातें।।
एक दूसरे को देता है, साहस, बल, सहयोग।
दूर हटे जिससे सदियों का, विकृतियों का भीषण रोग।।
करना है दोनों को मिलकर, नवयुग का नूतन निर्माण।
छोटा-बड़ा नहीं है कोई, नर-नारी सब एक समान।।
-बाबूलाल जैन ‘‘जलज’’
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*समाप्त*