आत्म साधना मानव संस्कृति का उच्चतम शिखर

वन्य पशुओं और जंगली झाड़ियों की तरह मनुष्य की सत्ता भी अनगढ़ होती है। उसे प्रयत्नपूर्वक सुगठित एवं परिष्कृत करने के लिए तत्त्वदर्शियों न जिस प्रक्रिया को अपनाया, उसे संस्कृति कहा जाता है। क्रमशः सभ्यता की लम्बी मंजिल पर चलते हुए ही मनुष्य उस स्तर पर पहुँचता है, जिससे मानवता गौरवान्वित होती है। यह सुन्दर संसार, व्यवस्थित समाज और व्यक्तित्वों के सुविकसित साधन सम्पन्न होने जैसे सभी वरदान इस संस्कृति साधना की देन हैं।

मनुष्य का व्यक्तित्व भी अपने आप में एक छोटा विश्व है। उसकी भीतरी और बाहरी सत्ता में इतना कुछ विद्यमान है जिसके सहारे आज का दयनीय दुर्दशाग्रस्त जीव कल सर्व समर्थ ब्रह्म बन सके। पर वह दिव्य वैभव प्रसुप्त पड़ा है। उसे कैसे जगाया और कैसे प्रयोग किया जाय, यह ऐसा विज्ञान है जिसे जानने पर विश्व की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धियाँ करतलगत होती हैं।

आत्म-साधना, संस्कृति के उच्च सोपान पर पहुँचने का उच्च शिखर है, उस पर खड़ा होने वाला जो देखता, अनुभव करता और देता है, उसे निस्संकोच अनुपम और अद्भुत कहा जा सकता है।


जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ

ब्रह्म सूक्ष्म और प्रकृति स्थूल है। जीव सूक्ष्म और काया स्थूल है। चिन्तन को सूक्ष्म और क्रिया को स्थूल कहा जा सकता है। इस युग्म समन्वय से ही यौगिकों, रासायनिक पदार्थों, तत्वों एवं निर्जीव अणुओं से बने पदार्थों की शोभा-सुषमा दृष्टिगोचर होती। भौतिकी अत्यन्त कुरूप, कर्कश और निष्ठुर है, उसे जीवन्त बनाने का भार तो कला ही वहन करती है।

शरीर क्या? मल-मूत्र से भरा और हाड़-मांस से बना घिनौना किन्तु किन्तु चलता-फिरता पुतला। जीव क्या है- आपाधापी में निरत, दूसरों को नोंच खाने की कुटिलता में संलग्न- चेतना स्फुल्लिंग। जीवन क्या है- एक लदा हुआ भार जिसे कष्ट और खीज के साथ ज्यों-त्यों करके वहन करना पड़ता है। बुलबुले की तरह एक क्षण उठना और दूसरे क्षण समाप्त हो जाना यही है जीवन की विडम्बना; जिसे असन्तोष और उद्वेग की आग में जलते-बलते गले में बाँधे फिरना पड़ता है। स्थूल तक ही सीमित रहना हो तो इसी का नाम जीवन है पेट और प्रजनन ही इसका लक्ष्य है। लिप्सा और लोलुपता की खाज खुजाते रहना ही यहाँ प्रिय प्रसंग है। आत्म-रक्षा, अहंता, मुक्ति की आतुरता, स्वामित्व की तृष्णा यही हैं वे सब मूल प्रवृत्तियाँ जिनसे बँधा हुआ प्राणी कीट-मरकट की तरह नाचता देखा जाता है। स्थूल जीवन को यदि देखना, परखना हो तो इन प्रपंचना प्रवंचना के अतिरिक्त यहाँ और कुछ दिखाई नहीं पड़ता। भूल-भुलैयों की उलझनें इतनी पेचीदा होती हैं कि उन्हें सुलझाने का जितना प्रयत्न किया जाता है उलटे उतनी ही कसती चली जाती है। रोते जन्म लेता है और रुलाते हुए विदा होता है- यही है वह सब जिसे हम जीवन के नाम से पुकारते हैं।

वस्तुतः जीवन इतना तुच्छ, जटिल और घिनौना है नहीं। उसकी यथार्थता का मूल्यांकन करने के लिए थोड़ा गहराई में प्रवेश करना पड़ेगा। समुद्र की ऊपरी सतह पर तो कूड़ा-करकट, झागफेन, काई शैवाल लहरों की उठक-पटक के अतिरिक्त और कुछ नहीं पाया जा सकता। रत्न राशि तो समुद्र तल में पड़ी होती है। उसे पाने के लिए गहराई में उतरने वाले गोताखोरों जैसा कौशल और साहस सँजोना पड़ता है।

चेतना का स्थूल क्षेत्र पदार्थ- परिस्थिति और आतुरता भरी हलचलों में देखा जा सकता है। यह पशु जीवन है और प्रत्येक प्राणी को समान रूप से उपलब्ध है। जिसे जिस स्तर की काया मिली है वह उतने में ही अपने ढंग से रोता-गाता, गुजर कर लेता है। मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं है। क्रिया में दौड़-धूप की उत्तेजना भर है, नशे में भी उत्तेजना होती है और कई लोग उसे भी आनन्द और सन्तोष का माध्यम बना लेते हैं। समझना एक बात है और यथार्थता दूसरी। कुछ को कुछ भी समझा जा सकता है, पर उस भ्रान्ति से बनता तो कुछ नहीं। स्थिति तो स्थिति ही रहती है। आनन्द सूक्ष्म में है। क्रिया से नहीं विचारणा से हमारा समाधान होता है और भावना की गहराई में उतरने से आनन्द का निर्झर फूट पड़ता है। यदि समाधान- तृप्ति एवं सन्तोष अभीष्ट हो तो क्रियाशील रहते हुए भी हमें ज्ञानवान बनना पड़ेगा। ज्ञान का आश्रय लिए बिना, दिग्भ्रान्त स्थिति में आशंका और उद्विग्नता ही छाई रहेगी। शान्ति तो समाधान में है; वह समाधान सद्ज्ञान का आश्रय लिए बिना अन्य किसी आधार पर हो नहीं सकता।

क्रिया स्थूल है और ज्ञान सूक्ष्म। क्रिया तक सीमित न रहकर, तत्व चिन्तन की गहराई में उतरने के प्रयत्न में, हमें चैन और सन्तोष मिलता है। एक परत इससे भी गहरी है- जिसे अन्तरात्मा कहते हैं। यहाँ आस्थाएँ रहती हैं। अपने सम्बन्ध में, प्रिय और अप्रिय के, उचित और अनुचित के, आदतों और प्रचलनों के, पक्ष और सिद्धान्तों के सम्बन्ध में अनेकानेक मान्यताएँ; इसी केन्द्र में गहराई तक जड़ें जमाये बैठी रहती हैं। व्यक्तित्व का समूचा ढाँचा, यहीं विनिर्मित होता है। मस्तिष्क और शरीर को तो व्यर्थ ही दोष या श्रेय दिया जाता है। वे दोनों ही वफादार सेवक की तरह हर आत्मा की ड्यूटी ठीक तरह बजाते रहते हैं। उनमें अवज्ञा करने की कोई शक्ति नहीं। आस्थाएँ ही प्रेरणा देती हैं और उसी पैट्रोल से धकेले जाने पर जीवन स्कूटर के दोनों पहिये- चिन्तन और कर्तृत्व सरपट दौड़ने लगते हैं। व्यक्तित्व क्या है- आस्था। मनुष्य क्या है- श्रद्धा। चेष्टाएँ क्या हैं- आकांक्षा की प्रतिध्वनि। गुण, कर्म स्वभाव अपने आप ने बनते हैं न बिगड़ते हैं। आस्थाएँ ही आदतें बनकर परिपक्व हो जाती हैं तो उन्हें स्वभाव कहते हैं। अभ्यासों को ही गुण कहते हैं। कर्म आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए शरीर और मन को संयुक्त रूप से जो श्रम करना पड़ता है, उसी को कर्म कहते हैं। इन तथ्यों को समझ लेने के उपरान्त यह स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्तित्व के स्तर और उसकी प्रतिक्रिया के रूप में आने वाले सुख-दुःखों की अनुभूति होती रहती है। प्रसन्नता और उद्विग्नता को यों परिस्थितियों के उतार-चढ़ावों से जोड़ा जाता है, पर वस्तुतः वे मनःस्थिति के सुसंस्कृत और अनगढ़ होने के कारण सामान्य जीवन में नित्य ही आती रहने वाली घटनाओं से ही उत्पन्न अनुभूतियाँ भर होती हैं। कोई घटना न अपने आप में महत्वपूर्ण है और न महत्व हीन। यहाँ सब कुछ अपने ढर्रे पर लुढ़क रहा है। सर्दी-गर्मी की तरह भाव और अभाव का, जन्म-मरण और हानि-लाभ का क्रम चलता रहता है। हमारे चिन्तन का स्तर ही उनमें कभी प्रसन्नता अनुभव करता और कभी उद्विग्न हो उठता है। अनुभूतियों में परिस्थितियाँ नहीं, मनःस्थिति की भूमिका ही काम करती है।

जीवन के सफेद और काले पक्ष को समझ लेने के उपरान्त, सहज ही यह प्रश्न उठता है कि- क्या ऐसा सम्भव नहीं है कि परिस्थितियों के ढाँचे में ढले- लोक-प्रवाह में बहते हुए, संग्रहीत कुसंस्कारों से प्रेरित, वर्तमान अनगढ़ जीवन को; अपनी इच्छानुसार- अपने स्तर का फिर से गढ़ा जाय और प्रस्तुत निकृष्टता को उत्कृष्टता में बदल दिया? उत्तर ‘ना’ और ‘हाँ’ दोनों में दिया जा सकता है। ‘ना’ उस परिस्थिति में जब आन्तरिक परिवर्तन की उत्कट आकांक्षा का अभाव हो और उसके लिए आवश्यक साहस जुटाने की उमंगें उठती न हों। दूसरों की कृपा सहायता के बलबूते उज्ज्वल भविष्य के सपने तो देखे जा सकते हैं, पर वे पूरे कदाचित ही कभी किसी के होते हैं। बाहरी, दैवी और संसारी सहायताएँ मिलती तो हैं, पर उन्हें पाने के लिए पात्रता की अग्नि-परिक्षा में गुजरते हुए अपनी प्रामाणिकता का परिचय देना पड़ता है। उतना झंझट सिर पर उठाने का मन न हो- सहज ही कुछ इधर-उधर की ‘हथफेरी’ करके भौतिक सम्पदाएँ, आत्मिक विभूतियाँ पाने के लिए जी ललचाता भर हो तो कहा जा सकता है कि व्यक्तित्व को महामानवों के स्तर पर गठित करना और उसके फलस्वरूप उच्चस्तरीय सिद्धियाँ प्राप्त कर सकना एक प्रकार से असम्भव ही है। उत्तर नकारात्मक समझा जा सकता है।

‘हाँ’ उस स्थिति में कहा जा सकता है जबकि साधक में यह विश्वास उभरा हो कि वह अपना स्वामी आप है- अपने भाग्य का निर्माण कर सकना उसके अपने हाथ की बात है। दूसरों पर न सही अपने शरीर और मन पर तो अपना अधिकार है ही और उसका अधिकार का उपयोग करने में किसी प्रकार का कोई व्यवधान या हस्तक्षेप कहीं से भी नहीं हो सकता। मन की दुर्बलता ही है जो ललचाती, भ्रमाती और गिराती है। तनकर खड़ा हो जाने पर भीतरी और बाहरी सभी दबाव समाप्त हो जाते हैं और अभीष्ट दिशा में निर्भयता एवं निश्चिन्तता के साथ बढ़ा जा सकता है। समुद्र की गहराई में उतर कर मोती ढूँढ़ने में विशिष्ट प्रकार के साधन एवं प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। जीवन समुद्र की गहराई में उतर कर एक से एक बहुमूल्य रत्न ढूँढ़ लाना सरल है। इसमें किसी बाहरी साधन या उपकरण की जरूरत नहीं- मात्र प्रचंड संकल्प शक्ति चाहिए। प्रचंड का तात्पर्य है धैर्य और साहस का उतनी मात्रा में समन्वय जिससे संकल्प के डगमगाते रहने की बाल बुद्धि उभर आने की आशंका न हो। स्थिर बुद्धि से सतत् प्रयत्न करते रहने और फल प्राप्ति में देर होते देखकर अधीर न होने की- वरन् दूने उत्साह से प्रयत्न करने की सजीवता जहाँ भी होगी वहाँ सफलता पैर चूमने के लिए सामने हाथ जोड़े- वहाँ सिर झुकाये खड़ी होगी। ऐसे मनस्वी व्यक्ति अपने को, अपने वातावरण को यहाँ तक कि; अपने प्रभाव क्षेत्र को काया-कल्प की तरह बदल सकने में सफल हो सकते हैं। जीवन परिष्कार की भविष्यवाणी करते हुए ऐसे ही लोगों की सफल सम्भावना को ‘हाँ’ कहकर आश्वस्त किया जा सकता है।

आत्मोत्कर्ष की आकांक्षा बहुत लोग करते हैं, पर उसके लिए न तो सही मार्ग जानते हैं और न उस पर चलने के लिए अभीष्ट सामर्थ्य एवं साधन जुटा पाते हैं। दिग्भ्रान्त प्रयासों का प्रतिफल क्या हो सकता है? भटकाव में भ्रमित लोग लक्ष्य तक किस प्रकार पहुँच सकते हैं? आज की यही सबसे बड़ी कठिनाई है कि आत्म-विज्ञान का न तो सही स्वरूप स्पष्ट रह गया है और न उसका क्रिया पक्ष- साधन विधान ही निर्भ्रान्त है। इस उलझन में एक सत्यान्वेषी जिज्ञासु को निराशा ही हाथ लगती हैं।

हमें यहाँ अध्यात्म के मौलिक सिद्धान्तों को समझना होगा। व्यक्ति के व्यक्तित्व में से अनगढ़ तत्वों को निकाल बाहर करना और उसके स्थान पर उस प्रकाश को प्रतिष्ठापित करना है जिसके आलोक में जीवन को सच्चे अर्थों में विकसित एवं परिष्कृत बनाया जा सके। इसके लिए मान्यता और क्रिया क्षेत्र में क्रान्तिकारी परिवर्तन प्रस्तुत करने पड़ते हैं। वे क्या हों, किस प्रकार हों, इसका शिक्षण थ्योरी और प्रेक्टिस के दोनों ही अवलम्बन साथ-साथ लेकर चलना होता है। थ्योरी का तात्पर्य है वह सद्ज्ञान, वह आस्था विश्वास जो जीवन को उच्चस्तरीय लक्ष्य की ओर बढ़ चलने के लिए सहमत कर सके। इसे आत्मज्ञान, ब्रह्म-ज्ञान, तत्वज्ञान और सद्ज्ञान के नामों से जाना समझा जाता है- योग इसी को कहते हैं। ब्रह्म विद्या का तत्त्वदर्शन यही है। प्रेक्टिस- का तात्पर्य है वे साधन विधान जो हमारी क्रियाशीलता को दिशा देते हैं और बताते हैं कि जीवनयापन की रीति-नीति क्या होनी चाहिए और गतिविधियाँ किस क्रम से निर्धारित की जानी चाहिए? साधनात्मक क्रिया कृत्यों का यह उद्देश्य समझ लिया जाय तो फिर किसी को भी न तो अनावश्यक आशा बाँधनी पड़ेगी और न अवांछनीय रूप से निराश होना पड़ेगा।

यह तथ्य हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि जीवन का परम श्रेयस्कर और शान्तिदायक उत्कर्ष आस्थाओं के परिष्कार- चिन्तन के निखार एवं गतिविधियों के सुधार पर निर्भर है। जीवन इन्हीं तीन धाराओं में प्रवाहित होता है। शक्ति के स्रोत इन्हीं में भरे पड़े हैं और अद्भुत उपलब्धियाँ उन्हीं में से उद्भूत होती हैं। इन्हें किस आधार पर सुधारा, सँभाला जाय इसकी एक विशिष्ट पद्धति है जिसे साधना कहते हैं। साधना का अर्थ है अपने अन्तरंग और बहिरंग को उच्चस्तर तक उठा ले चलना। इसे जीवन का अभिनव निर्माण एवं व्यक्तित्व का काया-कल्प भी कह सकते हैं। बोलचाल की भाषा में इसे योगाभ्यास तपश्चर्या कहते हैं।

चेतना का उच्चस्तरीय प्रशिक्षण देने को योग समझा जाय। क्रिया-कलाप में सुव्यवस्था का आरोपण तप माना जाय। इसके लिए कई तरह के प्रयोगात्मक अभ्यास करने पड़ते हैं। पहलवान बनने के लिए अखाड़े में जाकर छोटी-छोटी कसरतों का सिलसिला शुरू करना पड़ता है। कसरतों की खिलवाड़ और दंगल में कुश्ती पछाड़ कर यशस्वी होना दो अलग स्थितियाँ हैं, पर दोनों का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। बीज का बोने का शुभारम्भ कालान्तर में विशाल वृक्ष बनकर सामने आता है। पूजा-उपासना और स्वाध्याय मनन जैसे उपचार बीजारोपण की तरह हैं जो खाद पानी, निराई, गुड़ाई, रखवाली आदि की चिरकाल तक अपेक्षा करते हैं और समयानुसार कल्प-वृक्ष बनकर मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाते हैं। आन्तरिक दृष्टि से आनन्द विभोर और बहिरंग दृष्टि से श्रद्धा का पात्र बना हुआ भूदेव यह अनुभव करता है कि आत्म-विज्ञान ही जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ और संसार का सबसे बड़ा लाभ है।


साधना का विज्ञान और स्वरूप

ब्रह्म विद्या के- अध्यात्म विज्ञान के दो भाग हैं- एक आस्था पक्ष दूसरा क्रिया पक्ष। आस्था पक्ष में चिन्तन क्षेत्र को प्रभावित करने वाले समस्त ज्ञान विस्तार को सम्मिलित किया गया है। वेद शास्त्र, उपनिषद्, दर्शन, नीतिशास्त्र आदि इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए रचे गये हैं। पाठ, स्वाध्याय, सत्संग, चिंतन, मनन का- कथा प्रवचनों का- माहात्म्य इसी आधार पर बताया गया है कि उस प्रक्रिया के सहारे मानवी चिन्तन का परिष्कार होता रहे। अवांछनीय पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कार छुड़ाने में, यह ज्ञान साधना साबुन का काम करती है। विकृत मनोवृत्तियों से छुटकारा मिलता है और विवेक युक्त दूर दर्शिता का पथ-प्रशस्त होता है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतंभरा इसी परिष्कृत चिन्तन का नाम है। ‘ज्ञानामुक्ति’, ‘नहिं ज्ञानेन सदृश पवित्र मिह विद्यते’ जैसी उक्तियों में सद्ज्ञान को अध्यात्म का प्राण माना गया है। वेदान्त दर्शन को तो विशुद्ध रूप से ज्ञान साधना ही कहा जा सकता है।

इसी सद्ज्ञान संवर्धन की बहुमुखी प्रक्रिया को अध्यात्म विज्ञान में ‘‘योग’’ नाम दिया गया है। योग का अर्थ है जोड़ देना। किस को किस से जोड़ देना- आत्मा को परमात्मा से। यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि, परमात्मा कोई व्यक्ति नहीं; वरन् शक्ति है। उत्कृष्ट आदर्शवादी आस्थाओं, आकांक्षाओं के रूप में ही उसकी अनुभूति, अपने विचार संस्थान में, की जा सकती है। आत्म साक्षात्कार का- ब्रह्म साक्षात्कार का अर्थ यही है कि अपनी आस्थाएँ परिष्कृत स्तर की देवोपम दीखने लगें। संकीर्ण स्वार्थपरता, अहंकारिता, विलासिता, एवं अनुदारिता जैसी दुष्प्रवृत्तियों के भव-बन्धनों से छुटकारा मिल जाय। परिष्कृत चिन्तन की परम सुखद प्रतिक्रिया को ध्यान में रखते हुए उसे ‘स्वर्ग’ कहा गया है। ललक और लिप्सा निकृष्टता एवं कुसंस्कारी आदतों के भव-बन्धनों को तोड़ फेंकने की स्थिति ‘मुक्ति’ कहलाती है। स्वर्ग किसी ग्रह नक्षत्र पर बसा हुआ गाँव नहीं है और न मुक्ति से किसी लोक विशेष में जाकर भगवान जी के साथ रंग रेलियाँ करने का मजा मिलता है। यह तो अलंकारिक आख्यायिकाएँ हैं। तथ्य इतना भर है कि, परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाने वाला स्वर्गीय सुख सन्तोष पाता है और आत्मीयता के विस्तार के साथ संबद्ध, सेवा उदारता की नीति अपनाने वाले को लोभ-मोह की जकड़न से छुटकारा मिल जाता है। विवेकवान मनस्वी लोग- लोक प्रवाह की परवाह न करके स्वतन्त्र चिन्तन की नीति अपनाते हैं और जीवन मुक्ति का आनन्द लेते हैं।

योग का उद्देश्य ‘चित्त वृत्तियों’ का संशोधन है। महर्षि पातंजलि की योग परिभाषा यही है। पशु-प्रवृत्तियों को देव आस्थाओं में बदल देने वाले मानसिक उपचार का नाम योग है। यह विशुद्ध रूप से चिन्तन परक होता है। योगीजन इन्हीं प्रयत्नों में तल्लीन रहते हैं और अपने संग्रहीत कुसंस्कारों को उच्चस्तरीय आस्थाओं में परिणत करने के लिए भावनात्मक पुरुषार्थ करते रहते हैं। निष्कृष्टता जितने अंश में उत्कृष्टता के साथ जुड़ जाती है उतने ही अंशों में आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति हो चली; ऐसा माना जाता है।

अध्यात्म विज्ञान का दूसरा पक्ष क्रिया परक है- इसे ‘तप’ कहते हैं। आत्म निर्माण इसका एक चरण है और लोक कल्याण दूसरा इन दोनों के लिए जो भी प्रयत्न करने पड़ते हैं; उनमें अभ्यस्त पशु-प्रवृत्तियों को चोट पहुँचती है। स्वार्थ साधनों में कमी आती है- और परमार्थ प्रयोजनों की सेवा साधना करते हुए कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। स्वार्थ सुविधा में कटौती करके ही परमार्थ की दिशा में कुछ किया जा सकता है। प्रत्यक्षतः यह सांसारिक दृष्टि से घाटे का सौदा है और अभ्यस्त प्रवृत्ति से विपरीत पड़ने के कारण कष्ट, भय भी अनुभव होता है, इन कठिनाइयों को पार करने के लिए शरीर की तितीक्षा का, मन की सादगी का तथा इस मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का, सामना करने योग्य आन्तरिक साहसिकता का सहारा लेना पड़ता है। अपने आपे को इसी ढाँचे में ढालने के लिए, जितने भी प्रयास किये जाते हैं; वे सब ‘तप’ की श्रेणी में गिने जाते हैं।

आज योग के नाम पर आसन, प्राणायाम, नेति, धेति बन्ध, मुद्रा आदि व्यायामों को ही योग माना जाने लगा है और व्रत, स्नान, मौन आदि कष्ट साध्य अभ्यासों का तप मान कर सन्तोष कर लिया जाता है। यह भुला दिया गया है कि साधन किसी साध्य की प्राप्ति के लिए किया जाता है। उपासनात्मक कर्मकाण्डों का उद्देश्य- भावनात्मक स्तर को प्रयत्नपूर्वक ऊँचा उठाना है। यदि आस्थाओं का स्तर बदला जा सके और मात्र चित्र-विचित्र शारीरिक क्रियाएँ करते रहा जाय; तो इतने भर का प्रभाव शरीर तक ही सीमित रह जायगा। चेतना का वह परिष्कार न हो सकेगा जो; तपश्चर्या का मूल भूत उद्देश्य है।

आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए योग और तप के दोनों कदम बढ़ाते हुए, लेफ्ट राइट की परेड करते हुए; गतिशील होना पड़ता है। ज्ञान और विज्ञान की दोनों धाराएँ, गंगा यमुना की तरह जब मिलती हैं; तब प्रभु प्राप्ति का संगम- सुअवसर हाथ में आता है। भिन्न-भिन्न परम्पराओं में अपनी ज्ञान साधना और कर्मकाण्ड प्रक्रिया को कई तरह से निर्धारित किया है; पर सभी का मूल प्रयोजन समान है। समस्त संसार में प्रचलित अध्यात्म के ज्ञान पक्ष को योग और क्रिया पक्ष को तप की ही संज्ञा दी जा सकती है। गायत्री को योग और यज्ञ को तप के अर्थ में ही प्रयुक्त साधन के रूप में देखा समझा जाना चाहिए।

योग दर्शन को चार भागों में विभाजित किया जा सकता है- (1) आत्मज्ञान (2) ब्रह्मज्ञान (3) तत्व ज्ञान (4) सद्ज्ञान।

आत्मज्ञान वह है- जिसमें जीव का, जीवन का, अन्त:चेतना के उत्थान पतन का निरूपण किया जात है और आत्म चिन्तन, आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास का सूक्ष्मदर्शी प्रकाश युक्त मार्ग दर्शन किया जाता है। दूसरे शब्दों में इसे जीवात्मा की विवेचना भी कह सकते हैं।

ब्रह्मज्ञान वह है- जिसमें परमात्मा की सम्पूर्ण सत्ता को व्याख्या को तो अचिंत्य नेति-नेति कह कर बौद्धिक असमर्थता प्रकट कर दी गई है; पर मनुष्य जीवन के साथ परमात्म सत्ता का जितना ताल मेल बैठता है उस पर; कई दृष्टियों से प्रकाश डाला जाता है। आत्मा के साथ परमात्मा का मिलन निस्संदेह लोहे और पारस के सम्पर्क से सोना बन जाने वाली किंवदंती सच्चे अर्थों में सार्थक देखी जा सकती है। अमृत और कल्पवृक्ष के लाभ माहात्म्य का जो अलंकारिक वर्णन मिलता है उसे परमात्मा के सान्निध्य से मिलने वाली भौतिक तथा आत्मिक उपलब्धियों को देखते हुए अक्षरशः सही माना जा सकता है। सिद्धियों का- चमत्कारी अलौकिकताओं का जो विवरण साधना ग्रन्थों में मिलता है; उसे परमात्म सत्ता के साथ जीवात्मा के सान्निध्य सम्पर्क की सुनिश्चित प्रतिक्रिया कहा जा सकता है। ईश्वर प्राप्ति को जीवन लक्ष्य की पूर्ति- पूर्णता में परिणिति-परम पुरुषार्थ, परम लाभ आदि नामों से पुकारा जाता है। आत्मा को परमात्मा की उच्च स्थिति में विकसित कर लेने वाले व्यक्ति, निस्संदेह नर रूप में नारायण कहे जा सकते हैं। उनकी विशेषताओं और विभूतियों का वारापार नहीं रहता।

आस्था का तीसरा पक्ष है- सद्ज्ञान। इसे विचार विज्ञान कह सकते हैं। विचारों की प्रचण्ड शक्ति और उनकी प्रतिक्रियाओं से बहुत कम लोग परिचित होते हैं। तथ्य यह है कि हाड़-मांस के पुतले में जितना चेतन चमत्कार देखा जाता है; वह सब विचार वैभव का ही परिणाम है। व्यक्तित्व की उत्कृष्टता, निकृष्टता- मनुष्य की प्रतिभा, वरिष्ठता और सर्वतोमुखी दुर्बलता का मूल्यांकन किसी के विचारों का स्तर देख कर ही किया जा सकता है। सफलता और असफलता के कारण से साधनों का, परिस्थितियों का नहीं, संकल्प शक्ति और व्यवस्था बुद्धि का ही प्रमुख महत्व रहता है। लोग गलत ढंग से सोचते हैं और गलत विचारों को अपनाते हैं। फलतः जीवन का स्वरूप और भविष्य दोनों ही अन्धकार से ढक जाते हैं। मस्तिष्क को जिस तरह सोचने की आदत है, उसका गुण-दोष के आधार पर विवेचन करते हुए मात्र औचित्य को अपनाने की साहसिकता को मनस्विता कहते हैं। मनस्वी लोग ही जीवन का सच्चा आनन्द लेते हैं और दूसरों के श्रद्धा भाजन बनते हैं। स्वाध्याय और सत्संग द्वारा श्रेष्ठ विचारकों से सम्पर्क साधा जाता है और चिन्तन मनन द्वारा आन्तरिक उत्कृष्टता को उभार कर उच्चस्तरीय निष्ठाओं पर आरूढ़ हुआ जाता है। दर्शन शास्त्र इसी काट छांट के लिए बना है। तत्वदर्शन के अन्तर्गत यों अन्य कई विषय भी आते हैं, पर उसका मूल प्रयोजन विचारणा का स्तर परिष्कृत करना ही माना गया है।

चौथा पक्ष सद्ज्ञान है। सद्ज्ञान का तात्पर्य है- नीति शास्त्र, व्यवहार कौशल, शिष्टाचार, सदाचार कर्तव्यपालन, उत्तरदायित्वों का निर्वाह। धर्म इसी को कहते हैं।मनुष्य सामाजिक प्राणी है उसे एकाकी नहीं, सह जीवन जीना पड़ता है। सहकारिता के बिना- पारस्परिक आदान-प्रदान के बिना न स्थिरता रह सकती है न प्रगति संभव हो सकती है। हमें परस्पर मिलजुल कर ही रहना होता है और सामाजिकता के नियमों का पालन करते हुए, नागरिक उत्तरदायित्वों को निवाहते हुए; सज्जनता का जीवन जीना पड़ता है। इस क्षेत्र में जहाँ जितनी उच्छृंखलता बरती जा रही होगी; वहाँ उतनी ही अशान्ति फैलेगी और विपन्नता उत्पन्न होगी। अपने आपके प्रति स्वजन सम्बंधियों के प्रति एवं सर्वसाधारण के प्रति हमारी रीति-नीति व्यवहार पद्धति क्या हो? उसकी सही और शालीनता युक्त गतिविधि अपनाने को लोक व्यवहार एवं सद्ज्ञान कहा जाता है।

अध्यात्म का योग पक्ष इन चारों ज्ञान प्रक्रियाओं के परिष्कार एवं समन्वय के आधार पर विनिर्मित होता है। इस पक्ष के पारंगतों को मनीषी, ऋषि, तत्वज्ञानी ब्रह्मवेत्ता, दृष्टा आत्मदर्शी आदि नामों से संबोधित किया जाता है। वे अपने में परमात्मा का दर्शन करते हैं। वह सब कुछ प्राप्त करते हैं जो इस संसार में पाने योग्य है।

अध्यात्म का क्रिया पक्ष जिसे तप कहते हैं- तीन भागों में विभक्त है (1) आत्म निग्रह के लिए की गई तितीक्षा, वासना और तृष्णा का निग्रह-नियन्त्रण। (2) परमार्थ प्रयोजनों के लिए सेवा साधना में त्याग बलिदान में उत्साह और अभ्यास (3) साधनात्मक कर्मकाण्डों के माध्यम आत्म शिक्षण की प्रसुप्त शक्तियों के जागरण की प्रक्रिया।

आत्मनिग्रह में अस्वाद व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य, मौन, ऋतु प्रवाह का सहन, सादगी, मितव्ययिता, दिनचर्या निर्धारण और उसका कड़ाई से पालन। जैसी शरीर और मन की पुरानी अवांछनीय आदतों पर रोक-थाम के बरती हुई कड़ाई तप के- साधनों के तितीक्षा वर्ग में आती है।


Quotation

न तस्य रोगो न जरा न मृत्यु:।

प्राप्तस्थ योगाग्निमय शरीरम्।।

श्वेता. 2।12

शरीर के योगाग्निमय होने पर उसे कोई रोग नहीं होता, बुढ़ापा नहीं आता, मृत्यु भी नहीं होती।

दान, पुण्य, सेवा, सहायता, सामूहिक सत्कर्मों में सहयोग, लोक कल्याण की प्रवृत्तियों में रस लेना और उसके लिए समय, श्रम एवं धन का एक अंश नियमित रूप से लगाना। अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने में लगने वाली चोटों को सहने के लिए साहस एकत्रित करना। उदारता के कारण अपनी सुविधाओं में कमी के लिए तैयार रहना। इसमें अप्रतिष्ठा एवं संबंधियों के स्वार्थों में कमी आने से उनकी नाराजगी सहने को प्रस्तुत रहना। लोक प्रवाह से विपरीत चलने के कारण उपहार, अपमान, विरोध एवं प्रहार की संभावना मान कर चलना और उनका धैर्य पूर्वक सामना करना। इस प्रकार की कष्ट सहिष्णुता तप साधना का दूसरा चरण है।

तीसरे तप वर्ग में विभिन्न प्रकार के साधनात्मक कर्मकाण्ड आते हैं। जप ध्यान, प्राणायाम, देवपूजा, संध्या, अनुष्ठान, पुरश्चरण आदि अनेकों सम्प्रदायों में प्रचलित अनेकों विधिविधान इसी उपासना वर्ग में आते हैं।

योग साधना के चार और तप साधना के तीन कुल मिलाकर अध्यात्म के सात सोपान हैं। इन्हीं को सप्तलोक- सप्तऋषि- सप्तमहाव्रत कहा गया है। सप्त-द्वीप, सप्त-समुद्र, सप्त-शिखर, सप्त-रत्न, सप्त-धातु, सप्त-सरोवर, सप्त-शिखर, स्वर सप्तक, सप्तसूर्य किरणें, सप्ताह आदि की संगति इन्हीं सात सोपानों से मिलती है। विभिन्न अलंकारों के साथ इन्हीं सात तथ्यों को मनीषियों ने विभिन्न प्रतिपादनों के साथ निरूपित किया है और जन मानस में विभिन्न प्रतिपादनों के साथ प्रतिष्ठापित करने का प्रयास किया है। अध्यात्म के ज्ञान पक्ष और विज्ञान पक्ष को समझने के लिए जो अनेकानेक शास्त्र पढ़ने को और विद्वानों के प्रवचन प्रतिपादन सुनने को मिलते हैं, उनमें इन सात महा तथ्यों के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यदि उन्हें सही रीति से समझा और अपनाया जा सके तो मनुष्य में देवत्व का अवतरण हो सकना सुनिश्चित है।

विज्ञान पक्ष की साधना में तपश्चर्या को केन्द्र मान कर चलने वाले विधि-विधानों का उद्देश्य है- प्रसुप्ति से निवृत्ति- मूर्छना से मुक्ति। इसके लिए गर्मी उत्पन्न करनी पड़ती है। गर्मी पाकर प्रसुप्ति से मुक्ति मिलती है। सूर्योदय की बेला निकट आने पर प्राणियों की निद्रा टूटती है और वे जागते उठते एवं कार्यरत होते हैं। रात्रि में कलियाँ सिकुड़ी पड़ी रहती हैं; पर जैसे ही सूर्य निकलता है वे हँसने खिलने लगती हैं। मानवी सत्ता के अन्तर्गत बहुत कुछ है। अत्युक्ति न समझी जाय तो यह भी कहा जा सकता है कि सब कुछ है। किन्तु है वह मूर्छित। इस मूर्छना के जगाने के लिए धूप, आग, बिजली आदि से उत्पन्न बाहरी गर्मी से काम नहीं चलता। उसका प्रभाव भौतिक जगत में ही अपनी हल-चल उत्पन्न करके रह जाता है। चेतना पर चढ़ी हुई मूर्छना को हटाने के लिए तप करना पड़ता है। उसके लिए भीतरी गर्मी की आवश्यकता पड़ती है। इसे कैसे उगाया और बढ़ाया जा सकता है, इसे विज्ञान को अध्यात्म की भाषा में तप कहते हैं।

तप की स्थूल प्रक्रिया सांकेतिक विधि वह है जिससे शरीर की स्वाभाविक सुख सुविधा को- वासना को रोका जाता है और मन की स्वाभाविक चंचलता को- अहंता और लोलुपता को प्रतिबन्धित किया जात है। मनोनिग्रह इसी का नाम है। निरोध से शक्ति उत्पन्न होती है। खुले मुँह की पतीली में खौलता हुआ पानी भाप बनकर ऊपर उड़ता रहता है और उसके तिरोहित होने में कोई अचंभे जैसी बात मालूम नहीं पड़ती, पर जब उसी को कड़े ढक्कन में बन्द कर दिया जाय तो फैली हुई भाप उस बर्तन को फाड़ कर भयंकर विस्फोट कर सकती है। स्टोव और प्रेशर कुकर फटने से दुर्घटनाएँ इसी निरोध का परिणाम होती हैं। इन्द्रियनिग्रह और मनोनिग्रह का माहात्म्य इसी आधार पर बताया जाता है। ब्रह्मचर्य की महत्ता का रहस्य यही है कि ‘ओजस’ को निम्नगामी अध:पतन से रोक कर ऊर्ध्वगामी बनाया जाता है। उस शक्ति को गन्दी नाली में बिखेरने की अपेक्षा मस्तिष्कीय चेतना में किया जाता है तो ब्रह्मलोक जगमगाने लगता है। यह निरोध का चमत्कार है।

तप साधना का दूसरा पक्ष है- मंथन। समुद्र मंथन की वह पौराणिक आख्यायिका सर्वविदित है जिसमें देव-दानवों ने मिल कर समुद्र मथा था और चौदह बहुमूल्य रत्न पाये थे। जीवन एक समुद्र है। इसमें इतनी रत्न राशि भरी पड़ी हैं जिनकी संख्या सीमित नहीं की जा सकती। सिद्धियों और रिद्धियों की गणना अमुक संख्या में की जाती रहती है, पर वह बालकों की अपनी अनुभूति भर है जिसने जितना खोजा पाया उसने उतना बताया। समुद्र बहुत विस्तृत है। बच्चे उसमें कितना घुस सके और कितना पा सके इतने भर से यह अनुमान लगाना उचित नहीं कि समुद्र की समग्र सम्पदा इतनी स्वल्प ही है।

देव-दानवों ने समुद्र मथ कर कुछ ही समय में चौदह बहुमूल्य रत्न पाये थे। यह मंथन यदि अधिक समय तक- अधिक गहराई तक जारी रखा जा सके, तो उस आधार पर मिलती रहने वाली उपलब्धियों का कोई अन्त नहीं मिल सकता।

यह मंथन प्रक्रिया ही तप साधना के अन्तर्गत किये जाने वाले सरल संक्षिप्त कर्मकाण्डों द्वारा आरम्भ होती है और इस आधार पर स्थूल से सूक्ष्म, सूक्ष्म से कारण और कारण से अनन्त में- प्रवेश करती चली जाती है। आरम्भ के छात्रों को जो कृत्य बताये जाते हैं वे उपहासास्पद लगते हैं और यह समझ में नहीं आता कि इतनी स्वल्प सी शारीरिक, मानसिक हलचलों से इतनी बड़ी उपलब्धियाँ किस प्रकार करतल गत हो सकती हैं। यहाँ इतना ही समाधान प्रस्तुत किया जा सकता है कि उपासनात्मक कर्मकाण्ड दिशा निर्देश है। दिशा सही होने और पहिया लुढ़कने लगने पर उसके परिणाम दूरगामी होना आश्चर्यजनक नहीं है।

रेल गाड़ी के चलने खड़े होने में झंडी और सिगनल की बड़ी भूमिका होती है। उनके हरे होने से गाड़ी चलती है और लाल होने से रुक जाती है। निस्संदेह झंडी या बत्ती के रंगों को इतनी शक्ति नहीं है कि वे रेल को रोक या धकेल सकें, फिर भी उनके द्वारा मिलने वाले दिशा निर्देश का अपना महत्व है। इस प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाय तो गाड़ियाँ या तो खड़ी रहेंगी अथवा आपस में टकरा कर नष्ट होंगी।

जंक्शन पर बराबर-बराबर कितनी ही गाड़ियाँ खड़ी रहती हैं। इनमें से किस को किधर जाना है इसका निर्धारण एक छोटा सी ‘लीवर’ करता है। पटरियों में से किसे किस के साथ मिला दिया जाय यह निर्णय और कार्य तनिक सा है और उसे छोटा सा खलासी बड़ी आसानी से पूरा कर देता है। देखने सुनने में बात जरासी हुई, पर उसकी प्रतिक्रिया दूरगामी होती है। कुछ ही घण्टे बाद तलाश करने पर पता चलता है कि एक गाड़ी उत्तर को घूमी और दूसरी दक्षिण को। इस थोड़ी ही अवधि में दोनों के बीच सैकड़ों हजारों मील का फासला बन गया। जीवन के चौराहे पर से जिस भी दिशा में मोड़ दिया जाय वह अपने क्रम से चल पड़ता है और भिन्न दिशा में चलने वालों की तुलना में असाधारण रूप से भिन्न दिखाई पड़ता है। अनर्थ मूलक प्रवृत्ति में निरत और निरर्थक भटकाव में संलग्न लोगों की तुलना में परमार्थ परायण की प्रगति कितनी अधिक उत्साहवर्धक होती है इसे ऐतिहासिक महामानवों को मिली विभूतियों का पर्यवेक्षण करके आसानी से जाना जा सकता है। उपासनात्मक कर्मकाण्डों में से प्रत्येक जीवन धारा की दिशा मोड़ने में सहायक होता है। रेल की पटरियाँ सरल और सस्ती होती हैं, पर उनके बिना बहुमूल्य और जटिल इंजन अनेक डिब्बों सहित दौड़ते चले जाने में समर्थ नहीं हो सकता। उपासनात्मक कर्मकाण्डों की रेल पटरी से उपमा दी जा सकती है।

उपासनात्मक कर्मकाण्डों में प्रधानतः तीन हैं। (1) जप (2) ध्यान (3) प्राणायाम। इन्हीं के अन्तर्गत अन्यान्य अनेकों उपचारों की गणना होती है। इनका स्थानीय महत्व भी है। जिन अंग उपांगों के द्वारा यह हलचलें की जाती हैं उनके साथ जुड़े हुए सूक्ष्म शक्ति संस्थान भी झंकृत होने लगते हैं और उस जागरण का विशेष लाभ मिलता है। इन क्रिया-कृत्यों में मन:स्थिति को एक विशेष दिशा में विशेष स्तर पर नियोजित किये रहा पड़ता है, उस एकाग्रता, तन्मयता एवं विशिष्टता की संयुक्त प्रतिक्रिया अनोखे ढंग की होती है। उससे स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों में सन्निहित दिव्य संस्थानों में जो हलचलें उत्पन्न होती हैं उनके प्रभावी परिणाम जब सामने आते हैं तो उन्हें साधना की चमत्कारी सिद्धि के रूप में देखा जाता है।


Quotation

ध्यानेन सदृशं नास्ति शोधनं पापकर्मणाम्।

अग्नि पुराण-21

ध्यान के बराबर आत्म शोधन का और कोई उपाय नहीं है।

हम अपने भूलोक के बारे में ही कुछ जानते हैं। अपने लोक की मोटी उपलब्धियों पर हमारी जीवनचर्या निर्भर है। भोजन, वस्त्र, निवास, विश्राम, उपार्जन, उपभोग, विनोद, सुरक्षा, चिकित्सा, यातायात जैसी दैनिक आवश्यकताएँ इन्हीं सामान्य उपलब्धियों के आधार पर मिलती हैं। उन्हीं के सहारे जीवन धारण किये रहना संभव होता है। इससे आगे की गहराई में वैज्ञानिक, विद्वान कलाकार, तत्त्वदर्शी उतरते हैं और वे अन्यान्य उच्चस्तरीय विभूतियाँ प्राप्त करके अपने व्यक्तित्व और क्षेत्र को चमत्कृत करते हैं।

इससे आगे के लोक और भी हैं। अध्यात्म क्षेत्र में उनके नाम भू, भुवः, स्वः, तपः, महः, जनः, सत्यम् कहे गये हैं। यह आकाश का विभाजन या किन्हीं ग्रह नक्षत्रों का वर्णन नहीं- लोकों का विवरण है। लोक का अर्थ है- चेतना के स्तर। काम काजी श्रमिक और सूक्ष्म दर्शी वैज्ञानिक की चेतना का अन्तर और प्रतिफल हम रोज ही देखते हैं। इससे आगे की गहराई में उतर कर- ऊँचाई में उड़कर यदि अन्य चेतना लोकों में प्रवेश किया जा कसे तो प्रतीत होगा कि जो प्रत्यक्ष में स्थूल भू लोक में देखा पाया जाता है, इससे कहीं अधिक उच्चस्तरीय भूमिका में विद्यमान अन्य लोकों में भरा पड़ा है। उन्हीं के साथ संपर्क बनाने में बरती गई तत्परता को योग साधना एवं तपश्चर्या कहा जाता है।

इन्हीं दिव्य उपलब्धियों के लिए साधना क्षेत्र में प्रवेश करना पड़ता है। साधना कोई जादू चमत्कार नहीं वरन् विशुद्ध विज्ञान है। इसमें देवी-देवताओं को प्रसन्न करके अमुक वरदान पाने की बात सोची और कही जाती है इस बालबोध में भी कुछ हर्ज नहीं, पर तथ्य दूसरा ही है। मानवी सत्ता के कण-कण में जो भरा है वह दिव्य है- अद्भुत है और अनन्त है। उसी को प्राप्त करने के लिए आकांक्षा, साहसिकता, सक्रियता और तत्परता को जुटा देना साधना है। साधना यदि सही दिशा में इसी प्रक्रिया को अपनाते हुए की जा सके तो उसकी सिद्धि सुनिश्चित है।


साधना- अपने आपे को साधना

विश्रृंखलित-अव्यवस्थित, अस्त-व्यस्त स्थिति में भी कुछ न कुछ उत्पादन-विकास तो होता है, पर वह किस गति से- कि क्रम से और किस दिशा में चलेगा यह नहीं कहा जा सकता। कँटीले झाड़-झंखाड़ जंगलों में उगते हैं और बेढंगी रीति से छितराते हुए उस क्षेत्र की भूमि को कंटकाकीर्ण बना देते हैं। इसके विपरीत माली की देख-रेख में सुनियोजित ढंग से लगाये गये पौधे सुरम्य उद्यान बनकर फलते-फूलते हैं। पौधों को क्रमबद्ध रूप से लगाने और उनको निरन्तर सँभालने वाली माली की सजग कर्त्तव्य-निष्ठा उस की साधना है जिसका प्रतिफल उसे सम्मान तथा अर्थ लोभ के रूप में- पौधों का हरे-भरे, फले-फूले सौन्दर्य के रूप में तथा सर्व साधारण को छाया, सुगन्ध, फल, सुषमा आदि के रूप में उपलब्ध होता है। माली की उद्यान साधना सर्वतोमुखी सत्परिणाम ही प्रस्तुत करती है।

मानवी व्यक्तित्व एक प्रकार का उद्यान है। उसके साथ अनेकों आत्मिक और भौतिक विशेषताएँ जुड़ी हुई हैं। उनमें से यदि कुछ को क्रमबद्ध, व्यवस्थित और विकसित बनाया जा सके तो उनके स्वादिष्ट फल खाते-खाते गहरी तृप्ति का आनन्द मिलता है। पर यदि चित्तगत वृत्तियों और शरीरगत प्रवृत्तियों को ऐसे ही अनियन्त्रित छोड़ दिया जाय तो वे भोंड़े, गँवारू एवं उद्धत स्तर पर बढ़ती हैं और दिशा विहीन उच्छृंखलता के कारण जंगली झाड़ियों की तरह उस समूचे क्षेत्र को अगम्य एवं कंटकाकीर्ण बना देती हैं।

जीवन कल्प-वृक्ष की तरह असंख्य सत्परिणामों से भरा-पूरा है। पर उसका लाभ मिलता तभी है जब उसे ठीक तरह साधा, सँभाला जाय। इस क्षेत्र की सुव्यवस्था के लिए की गई चेष्टा को साधना कहते हैं। कितने ही देवी-देवताओं की साधना की जाती है और उससे कतिपय वरदान पाने की बात पर विश्वास किया जाता है। इस मान्यता के पीछे सत्य और तथ्य इतना ही है कि इस मार्ग पर चलते हुए अन्तःक्षेत्र की श्रद्धा को विकसित किया जाता है। आदतों को नियन्त्रित किया जाता है। चिन्तन प्रवाह को दिशा विशेष में नियोजित रखा जाता है और सात्विक जीवन के नियमोपनियमों का तत्परता पूर्वक पालन किया जात है। इन सबका मिला-जुला परिणाम व्यक्तित्व पर चढ़ी हुई दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण करने तथा सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाने में सहायक सिद्ध होता है। सुसंस्कारों का अभिवर्धन प्रत्यक्षतः दैवी वरदान है। उसके मूल्य पर हर व्यक्ति अभीष्ट प्रयोजन की दिशा में अग्रसर को सकता है और उत्साहवर्धक सत्परिणाम प्राप्त कर सकता है।

साधना आत्मिक क्षेत्र में भी होती है और भौतिक क्षेत्र में भी। कदम जिस भी दिशा में बढ़ते हैं प्रगति उसी ओर होती है। अपनी सतर्कता पूर्ण सुव्यवस्था जिस भी मार्ग पर गतिशील कर दी जाय उसी में एक के बाद एक सफलता के मील पत्थर मिलते चले जायेंगे।

साधना का महत्व किसान जानता है। पूरे वर्ष अपने खेत की मिट्टी के साथ अनवरत गति से लिपटा रहता है और फसल को स्वेद कणों से नित्य ही सींचता रहता है। सर्दी−गर्मी की परवाह नहीं—जुकाम−खाँसी की चिन्ता नहीं। शरीर की तरह ही खेत उसका कर्म क्षेत्र होता है। एक−एक पौधे पर नजर रहती है। खाद−पानी, निराई, गुड़ाई से लेकर रखवाली तक के अनेकों कार्य करने से पूर्व वह उनकी आवश्यकता समझता है और किसी के निर्देश से नहीं अपनी गति से ही निर्णय करता है कि कब, क्या और कैसे किया जाना चाहिए। किसी के दबाव से नहीं—अपनी इच्छा और प्रेरणा से ही उसे खेत की, उसे संभालने वाले बैलों की, हल, कुदाल आदि संबंधी उपकरणों की व्यवस्था जुटाये रहने की सूझ−बूझ सहज ही उठती और स्वसंचालित रूप से गतिशील होती रहती है। यह सब होता है बिना थके, बिना ऊबे, बिना अधीर हुए। आज का श्रम कल ही फलप्रद होना चाहिए इसका आग्रह उसे तनिक भी नहीं होता। फसल अपने समय पर पकेगी—तब तक उसे धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा ही करनी होगी यह जानने के कारण अनाज की ढेरी कोठे में भरने की आतुरता भी उसे नहीं होती। इतने मन अनाज निश्चित रूप से होना ही चाहिए, इसके लंबे−चौड़े मनसूबे बाँधना भी उसे अनावश्यक प्रतीत होता है। मनोयोग पूर्वक सतत् श्रम की साधना चलती ही रहती है, विघ्न अवरोध न आते हों सो बात भी नहीं—उनसे भी जैसे बनता है निपटता रहता है, पर उपेक्षा कभी भी खेत की नहीं होती। उसकी आवश्यकता पूरी किये बिना चैन ही नहीं पड़ता। समयानुसार फसल पकती भी है। अनाज भी पैदा होता है। उसे ईश्वर को धन्यवाद देता हुआ घर ले जाता है। कितने मन अनाज पैदा होना है यह कभी सोचा ही नहीं तो फिर असन्तोष का कोई कारण भी नहीं। जो मिला उसे ईश्वरीय उपहार समझा गया। यही है किसान की साधना जिसे वह होश संभालने के दिन से लेकर मरणपर्यन्त सतत् निष्ठा के साथ चलाता ही रहता है। न विश्राम, न थकान, न ऊब, न अन्यमनस्कता। साधना कैसे की जाती है और साधक को कैसा होना चाहिए यह किसान से सीखा जा सकता है।

अपनी जन्म−जात ईश्वर प्रदत्त अनेकानेक अद्भुत किन्तु प्रसुप्त विशेषताओं और विभूतियों को जागृत करना भी अध्यात्म साधनाओं का लक्ष्य है। उसमें लगता भर ऐसा है मानो बाहर के किसी देवी−देवता को प्रसन्न करने के लिए अनुनय विनय की, भेंट उपहार की, गिड़गिड़ाहट भरी दीनता की, अभिव्यक्ति की जा रही है और साधक उसी का ताना−बाना बुनता है। पर वस्तुतः ऐसा कुछ होता नहीं। देवी−देवताओं को अपने निजी कार्य उत्तरदायित्व और झंझट भी तो कम नहीं होंगे। हमारी ही तरह वे भी अपने निजी गोरख−धन्धे में लगे होंगे। जब हमें अपने थोड़े से सगे−संबंधियों की सहायता ठीक तरह करते नहीं बन पड़ती तो असंख्य भक्त उपासकों की चित्र−विचित्र मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए दौड़े−दौड़े फिरना उनके लिए भी कठिन ही पड़ेगा और वे सम्भवतः उतना कर भी न पायेंगे जितनी कि अपेक्षा की जाती है।

साधना का क्षेत्र अन्तःजगत है। अपने ही भीतर इतने खजाने दबे पड़े हैं कि उन्हें उखाड़ लेने पर ही कुबेर जितना सुसंपन्न बना जा सकता है। फिर किसी बाहर वाले से माँगने जाँचने की दीनता दिखाकर आत्म−सम्मान क्यों गँवाया जाय? भीतरी विशिष्ट क्षमताओं को ही तत्वदर्शियों ने देवी−देवता माना है और बाह्योपचारों के माध्यम से अन्तः संस्थान के भांडागार को करतलगत करने का विधि−विधान बताया है। शारीरिक बल वृद्धि के लिए डम्बल, मुद्गर उठाने घुमाने जैसे कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं। बल इन उपकरणों में कहाँ होता है? वह तो शरीर की मांस पेशियों से ही उभरता है। उस उभार में व्यायामशाला के साधन−प्रसाधन सहायता भर करते हैं। उनसे मिलना कुछ नहीं। जो मिलना है वह भीतर से ही मिलना है। ठीक यही बात आत्म−साधना के संबंध में भी कही जा सकती है। इस सन्दर्भ में प्रयुक्त होने वाले देवी−देवता एवं विधि−विधान अपनी जेब से कुछ नहीं देते। साधक की निष्ठा भर पकाते हैं उसे कार्य−पद्धति भर सिखाते हैं। इतने का अभ्यस्त बनना ही साधनात्मक कर्मकाण्डों का प्रयोजन है। इतने भर से बात बन जाती है और राह मिल जाती है। साधक अपनी मूर्छना जगाकर उज्ज्वल भविष्य की असीम सम्भावनाएं स्वयं जगा लेता है।

आत्म−चेतना की जागृति ही साधना विज्ञान का लक्ष्य है। इसके लिए अपने चिन्तन एवं कर्तव्य का बिखराव रोककर अभीष्ट प्रयोजन के केन्द्र बिन्दु पर केन्द्रीभूत करना पड़ता है। इसके लिए अपनी गति विधियाँ लगभग उसी स्तर की रखनी पड़ती हैं जैसे कि भौतिक क्षेत्र में सफलताएँ पाने वाले लोगों को अपनानी होती हैं।

किसान का उदाहरण ऊपर दिया गया है इन्हीं गतिविधियों को प्रत्येक महत्वपूर्ण सफलताएं पाने वाला व्यक्ति अपनाता है। विद्वान को विद्या की प्राप्ति चुटकी बजाने भर से—किसी जादू मन्त्र से नहीं हो जाती। इसके लिए उसे पाँच वर्ष की आयु से अध्ययन साधना का शुभारम्भ करना पड़ता है और स्कूल के घण्टे तथा घर पर अभ्यास का समय मिलाकर प्रतिदिन लगभग छह घण्टे का मानसिक श्रम करना पड़ता है। इस श्रम में जितनी एकाग्रता, अभिरुचि तथा तन्मयता होती है, उसी अनुपात से प्रगति होती है। परीक्षा में अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण होना इसी मनोयोग तथा उत्साहपूर्ण परिश्रम पर अवलम्बित रहता है। विद्वान समझा जाने वाला व्यक्ति बालकपन से आरम्भ किये अध्ययन क्रम को स्नातक बन जाने पर भी समाप्त करके चुप नहीं बैठा है, वरन् अपनी रुचि के विषयों को पढ़ने के लिए अनेकानेक ग्रन्थों को घण्टों तक पढ़ते रहने का स्वभाव बनाये रहा है। आज वह विद्वान समझे जाने पर भी अध्ययन से विरत नहीं हुआ है। उसकी रुचि घटी नहीं है। इस ज्ञान साधना से यों उसे धन भी मिलता है और सम्मान भी। पर इससे बड़ी उपलब्धि है उसका आत्म−सन्तोष। ‘स्वान्तः सुखाय’ उद्देश्य को ध्यान में रखकर वह भले−बुरे दिनों में—हारी−बीमारी में भी—अन्तः प्रेरणा से किसी न किसी प्रकार पढ़ने के लिए समय निकालता रहता है। इसके बिना उसे अन्तःतृप्ति ही नहीं मिलती। आत्म−साधक की मनःस्थिति भी यही होनी चाहिए। उसे सिद्धि के लिए लालायित रहकर अपनी तन्मयता में व्यवधान उत्पन्न नहीं करना चाहिए वरन् साधना को किसी अध्ययन प्रिय की तरह ‘स्वान्तः सुखाय’ ही अपनाना चाहिए। परिणाम तो हर भले−बुरे कर्म का होता है फिर कोई कारण नहीं कि आत्म−साधना जैसे महान प्रयोजन में संलग्न होने का कोई प्रतिफल उपलब्ध न हो।

व्यायामशाला में नित नये उत्साह के साथ जूझते रहने वाले पहलवान की मनःस्थिति और गतिविधि का यदि गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया जाय तो आत्म साधना के विद्यार्थी को विदित हो सकता है कि उसे आखिर करना क्या पड़ेगा? पहलवान मात्र कसरत करके ही निश्चित नहीं हो जाता वरन् पौष्टिक भोजन की, संयम ब्रह्मचर्य की, तेल मालिश की, उपयुक्त दिनचर्या की, प्रसन्नता निश्चिन्तता की भी व्यवस्था करता है। यदि उन सब बातों की उपेक्षा की जाय और मात्र दंड बैठकों को ही जादू की छड़ी मान लिया जाय तो सफलता दूर की चीज ही बनी रहेगी। एकाकी कसरत से कुछ भला न हो सकेगा। उपासनात्मक विधि−विधान की अपनी महत्ता है, पर उतने भर से ही काम नहीं चलता। चिन्तन और कर्तृत्व की रीति−नीति भी लक्ष्य के अनुरूप ही ढालनी पड़ेगी।

गायक और वादक एक दिन में अपने विषय में पारंगत नहीं हो जाते, उन्हें स्तर की, नाद की साधना नित्य निरन्तर करनी पड़ती है। ‘रियाज’ न किया जाय तो गायक का स्वर छितराने लगता है और वादक की उँगलियाँ जकड़−मकड़ दिखाने लगती हैं। संगीत सम्मेलन तो यदा−कदा ही होते हैं, पर वहाँ पहुँचने पर सफलता का श्रेय देने वाली स्वर साधना को नित्य ही अपनाये रहना पड़ता है। गीत सुनने वालों ने कितनी प्रशंसा की और कितनी धन राशि दी यह बात गौण रहती है। संगीत साधक, आत्म−तुष्टि की नित्य मिलने वाली प्रसन्नता को ही पर्याप्त मानता है और बाहर से कुछ भी न मिले तो भी वह एकान्त जंगल की किसी कुटिया में रहकर भी आजीवन बिना ऊबे संगीत साधना करता रह सकता है। आत्म−साधक की मनः−स्थिति इतनी तो होनी ही चाहिए।

नर्तक, अभिनेता अपना अभ्यास जारी रखते हैं। शिल्पी और कलाकार जानते हैं कि उन्हें अपने प्रयोजन के लिए नित्य नियमित अभ्यास करना चाहिए। फौजी सैनिकों को अनिवार्य रूप से ‘परेड’ करनी पड़ती है। अभ्यास छूट जाने पर न तो गोली का निशाना ठीक बैठता है और न मोर्चे पर लड़ने के लिए जिस कौशल की आवश्यकता पड़ती है वह हाथ रहता है। किसी विशेष प्रयोजन के लिए नियत संख्या तथा नियत अवधि की साधना से किसी पूजा प्रयोजन का संकल्प लेने वाला समाधान हो सकता है पर आत्म−साधक को इतने भर से सन्तोष नहीं मिलता। वह जानता है कि प्यास बुझाने के लिए रोज ही कुँए से पानी खींचना पड़ता है और सफाई रखने के लिए रोज ही कमरे को बुहारना पड़ता है। मानवी सत्ता की स्थिति भी ऐसी ही है, उसकी हीरों भरी खदान को हर दिन खोदना, कुरेदना चाहिए। तभी नित्य नये उपहार मिलने सम्भव होंगे। शरीर को स्नान कराना , दाँत माँजना , कपड़े धोना नित्य कर्म है। उसकी उपेक्षा नहीं हो सकती। संसार का विक्षोभ भरा वातावरण हर किसी की अन्तःचेतना को प्रभावित करता है। उसकी नित्य सफाई न की जाय तो क्रमशः गन्दगी बढ़ती ही चली जायगी और अन्ततः कोई बड़ी विपत्ति खड़ी करेगी।

शरीर को जीवित और सुसंचालित रखने के लिए दो कार्य आवश्यक हैं एक भोजन, दूसरा भय त्याग। इनमें से एक की भी उपेक्षा नहीं हो सकती। भोजन न किया जाय तो पोषण के लिए नितान्त आवश्यक रस रक्त की नई उत्पत्ति न होना और पुराने संचित रक्त की पूँजी समाप्त होते ही काया दुर्बल होकर मृत्यु के मुख में चली जायगी। इसी प्रकार मल त्याग न करने पर नित्य उत्पन्न होते रहने वाले विष जमा होते और बढ़ते चले जायेंगे और उनका विस्फोट अनेक उपद्रवों के रूप में प्रकट होकर कष्टकारक मृत्यु का आधार बनेगा। पञ्च भौतिक शरीर की तरह सूक्ष्म शरीर की दिव्य−चेतना की भी कुछ आवश्यकताएँ हैं। उसे भी भूख लगती है। उस पर भी मैल चढ़ते हैं और सफाई की आवश्यकता पड़ती है, इन दोनों प्रयोजनों को पूरी करने वाली प्रक्रिया साधन कही जाती है। उससे सत्प्रवृत्तियों को जगाकर वह सब उगाया, पकाया जा सकता है जिससे आत्मा की भूख बुझती है और जीवन भूमि में हरी−भरी फसल लहलहाती है। साधना से उन मलीनताओं का—मनोविकारों का निष्कासन होता है जो प्रगति के हर क्षेत्र में चट्टान बनकर अड़े रहते हैं और पग−पग पर व्यवधान उत्पन्न करते हैं।

साबुन और पानी से कपड़ा धोया जाता है और धूप में सुखा देने पर वह भकाभक दीखने लगता है। उसे पहनने वाला स्वयं गौरवान्वित होता है और देखने वालों को उस सुरुचि पर प्रसन्नता होती है। साधन में प्रयुक्त होने वाली आत्म−शोधन और आत्म−निर्माण की उभय−पक्षीय प्रक्रिया अन्तःक्षेत्र में धँसे−फँसे कुसंस्कारों को उखाड़ कर उनकी जगह आम्र वृक्ष लगती है। कँटीली झाड़ियों से पिण्ड छुड़ाने और स्वादिष्ट फल सम्पदा से लाभान्वित होने का दुहरा लाभ मिलता है। संसार में जितने भी चमत्कारी देवता जाने माने गये हैं, उन सबसे बढ़कर आत्म देव है। उसकी साधना प्रत्यक्ष है। नकद धर्म की तरह उसकी उपासना कभी भी—किसी की भी—निष्फल नहीं जाती। यदि उद्देश्य समझते हुए सही दृष्टिकोण अपनाया जा सके और विधिवत् साधना की जा सके तो जीवन साधना को अमृत, पारस और कल्प−वृक्ष की कामधेनु की सार्थक उपमा दी जा सकती है।

सधाने से सामान्य स्तर के प्राणी आश्चर्यजनक कार्य करके दिखाते हैं। बन गये मनुष्य को पास भी नहीं आने देतीं ओर खेतों को उजाड़ कर रख जाती हैं, पर जब वे पालतू हो जाती हैं तो दूध, बछड़े गोबर आदि बहुत कुछ देती हैं। स्वयं सुखी रहती है और उसके पालने वाले भी लाभान्वित होते हैं यही बात अन्य वन्य पशुओं के बारे में लागू होती है। जंगली घोड़े, कुत्ते, सुअर, हाथी आदि स्वयं भूखे मरते, कष्ट उठाते और अनिश्चित जीवन जीते हैं। फालतू बन जाने पर वे स्वयं निश्चिन्ततापूर्वक रहते हैं और अपने पालने वालों को लाभ पहुँचाते हैं। अपने भीतर शरीर तथा मन− क्षेत्र में एक से एक बढ़कर शक्तिशाली धाराएँ प्रवाहित होती हैं। वे निरुद्देश्य और अनियन्त्रित स्थिति में रहकर वन्य पशुओं जैसी असंगत बनी रहती हैं। फलतः विकृत होकर वे सड़ी दुर्गन्ध की तरह अपने समूचे प्रभाव क्षेत्र को विषैला बना देती हैं। आग जहाँ भी रहती है वहीं जलाती है, तेजाब की बोतल जहाँ भी फैलती है वहीं गलाती है। विकृत प्रवृत्तियाँ छितराई हुई आग और फूटी तेजाब की बोतल की तरह हैं, उनसे केवल विनाश ही सम्भव होता है। यह दोनों ही वस्तुएँ यदि सुनियोजित रखी जा सकें तो उनसे उपयोगी लाभ मिलते हैं और वे इतने बढ़े−बढ़े होते हैं कि सामान्य दीखने वाला मनुष्य पग−पग पर अपनी असामान्य स्थिति का परिचय देता है। साधना जीवन के बहिरंग और अन्तरंग क्षेत्रों में सुसंस्कारित सुव्यवस्था उत्पन्न करने का नाम है। इसे समझ पाने और कर पाने का प्रतिफल, जंगली जानवरों को पकड़ कर पालतू बनाने की कला में प्रवीण व्यवसाइयों जैसा ही प्राप्त होता।

सरकस के जानवर कितने आश्चर्यजनक करतब दिखाते हैं। देखने वाले बाग−बाग हो उठते हैं। इन बंधे जानवरों को प्रशंसा मिलती है—प्रतिष्ठा होती है और अच्छी खुराक मिलती है। सधाने वाले और सिखाने वालों को अच्छा वेतन मिलता है और सरकस के मालिकों को उन्हीं जानवरों के सहारे धनवान बनने का अवसर मिलता है जो उच्छृंखल होने की स्थिति में स्वयं असन्तुष्ट रहते और दूसरों को रुष्ट करते थे।

घरेलू उपयोग में आने वाले जानवर भी बिना सिखाये, सधाये अपना काम ठीक तरह कहाँ कर पाते हैं। बछड़ा युवा हो जाने पर भी अपनी मर्जी से हल, गाड़ी आदि में चल नहीं पाता। घोड़े की पीठ पर सवारी करना, उसे दुरकी चाल चलाना सहज ही संभव नहीं होता। ऊँटगाड़ी, ताँगा, बैलगाड़ी में जुतने वाले पशु अपने आप चलने नहीं लग जाते उन्हें कठिनाई से प्यार, फटकार के सहारे—धीरे−धीरे बहुत दिन में इस योग्य बनाया जाता है कि अपना काम ठीक तरह अंजाम देने लगें। साधना इसी का नाम है। इन्द्रियों के समूह को—मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय को वन्य पशुओं से समकक्ष गिना जा सकता है। अपने स्वाभाविक रूप में यह सारा ही चेतना परिवार उच्छृंखल होता है। जन्म−जन्मान्तरों के पाशविक कुसंस्कारों की मोटी परत उस पर जमा होती है। उसे उतारने के लिए जिस खराद का उपयोग किया जाता है उसे साधना कह सकते हैं। पशुता को परिष्कृत करके उसे मनुष्यता के—देवत्व के रूप में विकसित करना, अनगढ़ पत्थर को कलात्मक प्रतिमा के रूप में गढ़ देने के सदृश एक विशिष्ट कौशल है। इस प्रवीणता में पारंगत होने का नाम ही आत्म−साधना है। पशुओं को प्रशिक्षित करने और पत्थर से मूर्तियाँ बनाने की तरह कार्य कुछ कठिन तो है—पर है ऐसा जिसमें लाभ ही लाभ भरा पड़ा है।

कठपुतली नचाने वाले, हाथ की सफाई से बाजीगरी के कौतुक दिखाने वाले, बन्दर और रीछ का तमाशा करने वाले, जादूगर जैसे लगते हैं और उन्हें चमत्कारी समझा जाता है। यह चमत्कार और कुछ नहीं किसी विशेष दिशा में तन्मयतापूर्वक धैर्य और उत्साह के साथ लगे रहने का प्रतिफल मात्र है। ऐसा चमत्कार कौतूहल प्रदर्शन से लेकर किसी भी साधारण असाधारण कार्य में आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त करने के रूप में कभी भी, कहीं भी देखा जा सकता है। अपनी ईश्वर प्रदत्त विशेषताओं को उभारने और महत्वपूर्ण प्रयोजन में नियुक्त करने का नाम साधना है। साधना का परिणाम सिद्धि के रूप में सामने आता है। यह नितान्त स्वाभाविक और सुनिश्चित है। यदि अपने आपे को साधा जाय−व्यक्तित्व को खरादा जाय तो वह सब कुछ प्रचुर परिमाण में अपने ही घर पाया जा सकता है, जिसकी तलाश में जहाँ-तहाँ मारे−मारे फिरना और मृग−तृष्णा की तरह निराश भटकना पड़ता है।


जीवात्मा के तीन शरीर और उनकी साधना

मनुष्य के अस्तित्व को तीन हिस्सों में बाँटा गया है—सूक्ष्म−स्थूल—कारण। यह तीन शरीर माने गये हैं। जिस प्रकार चमड़ी के नीचे माँस और माँस के भीतर रक्तवाही पतले तन्तु रहते हैं उसी प्रकार दृश्य सत्ता के रूप में हाड़ माँस का बना सब को दिखाई पड़ने वाला चलता−फिरता, खाता−सोता, स्थूल शरीर। क्रियाशीलता इसका प्रधान गुण है। इसके नीचे वह सत्ता है जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं। इसका कार्य समझ और केन्द्र मस्तिष्क है। शरीर विज्ञान में एनाटॉमी—फिजियोलॉजी—दो विभाजन हैं। मनःशास्त्र को साइकोलॉजी और पैरा साइकोलॉजी इन दो भागों में बाँटा गया है। मन के भी दो भाग हैं—एक सचेतन जो सोचने विचारने के काम आता है और दूसरा अचेतन जो स्वभाव एवं आदतों का केन्द्र है। रक्त संचार, श्वास−प्रश्वास, आकुँचन−प्रकुँचन, निमेष उन्मेष जैसी स्वसंचालित रहने वाली क्रियाएं इस अचेतन मन की प्रेरणा से ही संभव होती हैं। तीसरा कारण शरीर भावनाओं का—मान्यताओं एवं आकाँक्षाओं का केन्द्र है; इसे अन्तःकरण कहते हैं। इन्हीं में ‘स्व’ बनता है। जीवात्मा की मूल सत्ता का सीधा सम्बन्ध इसी ‘स्व’ से है। यह ‘स्व’ जिस स्तर का होता है उसी के अनुसार विचार तन्त्र और क्रिया तन्त्र काम करने लगते हैं। जीवन की सूत्र संचालक सत्ता यही है। कारण शरीर का स्थान हृदय माना गया है। रक्त फेंकने वाली और धड़कते रहने वाली थैली से यह केन्द्र भिन्न है। इसका स्थान दोनों ओर की पसलियों के मिलने वाले आमाशय के ऊपर वाले स्थान को माना गया है। साधना विज्ञान में हृदय गुफा में अंगुष्ठ प्रमाण प्रकाश ज्योति का ध्यान करने का विधान है। यहाँ जीवात्मा की ज्योति और उसका निवास ‘अहम्’ मान्यता के भाव केन्द्र में माना गया है। शरीर में इसका केन्द्र जिस “हृदय” में है। उसे अन्तःकरण नाम दिया गया है। ‘कारण शरीर’ के रूप में इसी की व्याख्या की जाती है।

यह तीनों शरीर एक से एक बढ़कर क्षमताएँ अपने भीतर दबाये बैठे हैं। इनमें अस्त−व्यस्तता एवं विकृति भर जाने से वे अपनी विलक्षण शक्ति गँवा बैठते हैं और उनके द्वारा जो लाभ मिलना चाहिए था, मिल नहीं पाता। इतना ही नहीं वे रुग्ण होकर उलटे त्रास देने लगते हैं। तब इन विभूतियों भरे शक्ति परिवार द्वारा जो हर्षोल्लास युक्त चमत्कारी उपलब्धियाँ मिल सकती थीं और सुर दुर्लभ कहलाने वाला मनुष्य जीवन सार्थक हो सकता था उसकी सम्भावना नष्ट हो जाती है। उलटे उस दुर्गति में पड़ना होता है, जिसमें आज कल अधिकाँश मनुष्य फँसे हुए हैं।

स्थूल शरीर यदि स्वस्थ है तो उसके द्वारा जो लाभ मिलते हैं उनकी थोड़ी बहुत जानकारी हम सभी को है। निरोग शरीर देखने में सुडौल सुन्दर लगता है—उसका आकर्षण खिले फूल की तरह सभी को मोहता ओर आकर्षित करता है। अधिक श्रम करना कठिन कामों को सहज निपटा कर स्वयं लाभान्वित होना और दूसरों पर छाप छोड़ना निरोगता की स्थिति में ही संभव होता है। इन्द्रियों के दुहरे काम हैं उनके माध्यम से क्रिया शक्ति कार्यान्वित होती है और बदले में धन, ज्ञान, अनुभव कौशल आदि उपलब्ध करती है। ज्ञानेन्द्रियों के अपने उपयोग आनन्द भी हैं। जीभ से स्वाद—कामेन्द्रिय से विषय सुख—नेत्रों से सौन्दर्यानुभूति कान से मधुर श्रवण—त्वचा से कोमल स्पर्श के आनन्द मिलते हैं। आहार की तृप्ति, गहरी निद्रा, स्फूर्ति एवं सक्रियता कितनी उपयोगी और सुखद है, इसे हर कोई जानता है। शरीर की विशेष साधना कर लेने पर लोग चमत्कारी पहलवान, खिलाड़ी, सरकस के जादूगर−दुस्साहस भरे कीर्तिमान स्थापित करने वाले वस्तुतः शरीर साधना के निष्णात ही कहे जा सकते हैं। यों मनोयोग का समन्वय भी उनकी सफलताओं में जुड़ा रहता है। अकेला पंचतत्वों का शरीर तो बिना चेतन मन की सहायता के हिल−डुल तक नहीं सकता। फिर बड़ी उपलब्धियाँ तो उसके लिए संभव कैसे हो सकती हैं। यह मनोयोग जो शरीर संचालन के काम आता है स्थूल शरीर का ही एक भाग माना गया है। इसी से मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय कहते हैं।

स्थूल शरीर की सक्षमता के फलस्वरूप ही संसार की अनेकानेक भौतिक, उपलब्धियाँ मिलती हैं। साँसारिक सुखद वस्तुओं को प्राप्त करने और व्यक्तियों को सहयोग देकर बदले में सहयोग पाने का आनन्द देने में शरीरगत सक्रियता ही प्रधान कारण होती है। कर्म की महिमा सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है कर्मफल से ही सुख−दुःख मिलते हैं। कर्म का स्थूल परिमाण−शरीरगत सक्रियता के साथ ही जुड़ता है। दण्ड, पुरस्कार इसी कर्मशीलता के आधार पर मिलते हैं। शरीर को सही स्थिति में रखना और उसे अमुक स्तर की सफलताएँ प्राप्त करने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण देकर उपयुक्त बनाना—इसी को शरीर साधना कहते हैं।

साधना विज्ञान का प्रथम चरण और शरीर के आरोग्य का रक्षण और उसकी सक्रियता को व्यवस्थित एवं परिष्कृत करने के लिए है। योग की यह प्रथम उपलब्धि है। स्वास्थ्य रक्षा के मोटे नियम सर्वविदित हैं। आहार विज्ञान के अन्तर्गत यह पढ़ाया जाता है कि भोजन में क्या वस्तुएं किस अनुपात से होनी चाहिएं। श्रम व्यायाम, दिनचर्या सफाई जैसी अनेक बातें स्वास्थ्य रक्षा के लिए आवश्यक बताई जाती हैं। बीमारी की हालत में दवादारु की व्यवस्था करने वाला एक पूरा शास्त्र बना हुआ है। यह स्थूल आरोग्य रक्षा विधान हुआ। सूक्ष्म आरोग्य विज्ञान इससे कहीं अधिक भीतर है। उसकी जड़ें बहुत गहरी हैं फलतः उसकी प्रतिक्रिया भी अधिक प्रखरता युक्त होती है।

आसन, प्राणायाम, नेति धेति, बस्ति, न्योली, वज्रोली, कपाल भाति उड्डियान बंध, जालंधर बंध, मूल बंध, मुद्राएँ, उपवास, तप तितीक्षा, चान्द्रायण, मौन, परिक्रमा आदि कितनी ही शारीरिक साधनाएँ स्वास्थ्य संवर्धन के उस गहन अन्तराल तक प्रवेश करती हैं जहाँ तक आहर विहार के सामान्य नियम पालने की प्रतिक्रिया नहीं पहुँचती। देखा गया है कि स्वास्थ्य रक्षा के सामान्य नियम ठीक तरह पालन करने वालों में से भी कई व्यक्ति दुर्बलता और रुग्णता से घिरे रहते हैं। इसका कारण नाड़ी देख कर नहीं जाना जा सकता। कोशिकाओं में तन्तुओं में, पाचक स्रावों में, विशिष्ट ग्रन्थियों में कुछ विलक्षण प्रकार की उलझनें ऐसी खड़ी हो जाती हैं जो शरीर शक्तियों द्वारा किये गये गम्भीर परीक्षणों की पकड़ में भी नहीं आती और अशक्तता एवं रुग्णता की उलझी हुई गुत्थी सुलझने में नहीं आती। इन प्रसंगों में योग विज्ञान के वे प्रयोग आश्चर्यजनक सत्परिणाम उपस्थित करते देखे गये हैं जिनकी विस्तृत व्याख्या विवेचना—प्रयोगशाला के स्तर पर तो नहीं की जा सकती, पर परिणामों की कसौटी पर यह जाना जा सकता है कि यह उपचार कितने अधिक सफल होते हैं।

पहलवानों में देखी जाने वाली बलिष्ठता, कलाकारों में पाई जाने वाली फुर्ती और सैनिकों जैसी चुस्ती ही मात्र आरोग्य की निशानी नहीं है। इसका सबसे महत्वपूर्ण अंश है जीवनी शक्ति की प्रचुरता जिसे जीवट भी कह सकते हैं। रक्त अशुद्ध होने या कोई भीतरी अवयव क्षीण हो जाने पर भी इस जीवट के आधार पर कोई रुग्ण दीखने वाला मनुष्य स्वस्थ लोगों की तुलना में अधिक सक्रिय रह सकता है और अधिक महत्वपूर्ण काम निपटा सकता है। इसे ‘जिजीविषा’ का नाम ही दिया जा सकता है। इसके सहारे मौत से जूझा जा सकता है और अस्वस्थता के भार से दबे होने पर भी प्रबल पुरुषार्थियों जैसे प्रखर कर्तृत्व संपन्न करते रहा जा सकता है। भीष्म के शरशैया पर पड़े रहने पर भी उत्तरायण सूर्य आने तक की प्रतीक्षा में जीवित रहना और आद्य शंकराचार्य के भयंकर फोड़े से संत्रस्त रहने पर भी आश्चर्यजनक सक्रियता का प्रमाण देना जैसे असंख्यों प्रमाण ऐसे मिलते हैं जिससे गान्धी जैसे दुर्बल और राजेन्द्र बाबू जैसे रुग्ण मनुष्यों ने पूर्ण स्वस्थ मनुष्यों से भी आगे बढ़कर ऐसे काम करके दिखाये जिन पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।

योग साधना का प्रतिफल आरोग्य के मूल संस्थानों तक पहुँचता और उस जीवट−जिजीविषा को जगाता है जिसे पाकर हर स्तर का शरीर ऐसे काम कर सकता है जो सामान्य लोगों को चमत्कार जैसे प्रतीत हों।

सूक्ष्म शरीर अर्थात् चिन्तन चेतना की दिव्य ज्योति। इसका मोटा लाभ मस्तिष्क की तीक्ष्णता, स्मरण शक्ति, दूर−दृष्टि, गहराई में जा पहुँचने वाला पर्यवेक्षक—सूझबूझ आदि के रूप में देखा जाता है। मन्दबुद्धि और तीक्ष्ण बुद्धि होने का फैसला इस आधार पर किया जाता है कि उसकी सूझ−बूझ एवं समझदारी किस स्तर की है। शारीरिक बलिष्ठता और सक्रियता के आधार पर मिलने वाले सुखों और लाभों की तरह मानसिक सक्षमता के सुखद प्रतिफल भी कम नहीं हैं। स्कूली पढ़ाई ऊँची श्रेणी में उत्तीर्ण करने वाले लोगों को अफसरी के ऊँचे पद मिलते हैं। वकील, डॉक्टर, साहित्यकार, वैज्ञानिक आदि बुद्धिजीवी वर्ग के लोग अकल की कमाई ही खाते हैं। व्यापारी, शिल्पी, कलाकार मात्र शारीरिक मेहनत के आधार पर उन्नतिशील नहीं बनते उनकी चिन्तन प्रक्रिया भी उन कार्यों में तन्मयतापूर्वक संलग्न रहती है। शरीर की सक्रियता और मन की तन्मयता का संयोग जहाँ जितनी अधिक मात्रा में हो रहा होगा वहाँ उसी अनुपात में एक से एक बढ़ी−चढ़ी सफलताएँ भी सामने प्रस्तुत होती चली जा रही होंगी।

बुद्धि वैभव का मूल्य समझा जाता है और ज्ञान प्राप्ति के लिए स्कूल, कालेजों के माध्यम से बहुत श्रम, समय एवं धन खर्च करके उसके लिए अथक प्रयत्न किया जाता है। स्वाध्याय संपर्क, परिभ्रमण, विचार विनिमय, अभ्यास आदि के अन्य उपाय भी ऐसे हैं जिनके सहारे ज्ञानवृद्धि का पथ प्रशस्त होता है। शरीर कौशल की तरह बुद्धि वैभव की भी अपनी उपलब्धियाँ हैं। अभिनव शोध कार्यों में—अन्वेषण पर्यवेक्षणों में—आवरणों के परत भेदकर वस्तुस्थिति समझने में सूक्ष्म बुद्धि ही काम करती है। यह उस अक्ल-मंदी से ऊपर की चीज है जो दैनिक कार्य−व्यवसायों में कई तरह की सफलताएँ प्रस्तुत करती है। यह किस प्रकार पाई या बढ़ाई जा सकती है इसका कोई बहिरंग आधार अभी बन नहीं पाया है। साधारण अक्लमंदी की दृष्टि से एक से एक चतुर और उस्ताद लोग हर जगह भरे पड़े हैं। पर गहराई में गोता मार कर मोती बीन लाने का सौभाग्य किन्हीं बिरलों को ही मिला होता है। यह कौशल जिनके भी हाथ लग जाता है वे सामान्य परिस्थितियों में जन्मने और सामान्य लोगों के बीच पलने पर भी विचित्र तरीकों से आगे बढ़ते हैं और आड़ी−टेड़ी पगडंडियाँ पार करते हुए कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं। उनके दूसरे साथी आश्चर्य करते रह जाते हैं कि बहुत समय तक एक सी स्थिति में रहने पर भी एक इतना आगे निकल गया और दूसरा जहाँ का तहाँ रह गया। इस अन्तर का एक ही कारण है।—प्रस्तुत परिस्थितियों से श्रेष्ठतम लाभ उठा लेने की संतुलित सूझबूझ का बाहुल्य। एक को सब कुछ सामान्य ही दीखता है, पर दूसरा उसी स्थिति या सामग्री में से बहुत कुछ असामान्य खोज निकालता है। खोजता ही नहीं अवसर का उपयोग भी करता है। प्रगति के चरण सदा इसी आधार पर बढ़ते हैं। सामान्य मनुष्य इसी आधार पर असामान्य बनते हैं और सफलता प्राप्त सम्मानित ऐतिहासिक व्यक्तियों की पंक्ति में जा बैठते हैं। कालिदास, वोपदेव, वरदराज जैसे आरम्भ में अति मूर्ख समझे जाने वाले लोगों के कालान्तर में व्युत्पन्न मति महा मनीषियों की श्रेणी में गिने जाने लगने के उदाहरण यही बताते हैं कि हर किसी में प्रसुप्त पड़ी चिन्तन चेतना की दिव्य ज्योति को यदि जाज्वल्यमान किया जा सके तो कोई भी व्यक्ति वर्तमान की तुलना में अपने भविष्य को निश्चित रूप से उज्ज्वल बना सकता है।


Quotation

संस्कार साक्षात्कारणात् पूर्व जाति ज्ञानम्॥

संस्कार का साक्षात करने से पूर्वजन्म का ज्ञान होता है।


मूर्छा से जागृति−आत्मिक प्रगति

शक्ति का प्रचण्ड स्रोत परमाणुओं का समूह मिट्टी धूल बन कर पैरों तले उपेक्षित स्थिति में पड़ा रहता है। एक बड़ा ढेला भी तुच्छ प्रतीत होता है और उसका बाजारू मूल्य छदाम जितना भी नहीं आँका जाता। किन्तु जब थोड़ी गहराई में उतर कर इस ढेले के सब से छोटे−आँखों से न देखे जा सकने जैसे तुच्छ−टुकड़े का विश्लेषण किया जाता है तो प्रतीत होता है कि वह न तो तुच्छ है और न निष्क्रिय। उसके भीतर प्रचण्ड हलचल हो रही है। वह एकाकी नहीं है वरन् इलेक्ट्रॉनों का एक समूह साथ लिये हुए है। परमाणु के ये अति तुच्छ घटक इलेक्ट्रॉन सौर मण्डल के ग्रहों की गति से अपनी कक्षा पर द्रुतगति से भ्रमण करते हैं। उसकी विनाश लीला विस्तृत क्षेत्र को मटिया−मेट करके रख देती है। आश्चर्य होता है कि मोटे तौर पर धूलि का एक नगण्य सा टुकड़ा जो नितान्त उपेक्षणीय प्रतीत होता था अपनी यथार्थ स्थिति में कितना महत्वपूर्ण एवं शक्तिशाली था।

प्रत्येक पदार्थ में अपनी असीम शक्ति भरी हुई है। जरा−सी बारूद विशालकाय चट्टानों को आसमान में उड़ा देती है। माचिस की एक तीली विस्तृत बन प्रदेश को जला कर खाक कर देने वाली दावानल का रूप बना लेती है। प्रेशर कुकर में कैद जरा सी भाप और स्टोव में बन्द तनिक सी हवा जब फटती है तो बन्दूक चलने जैसे उपद्रव खड़े कर देती है। मोटी दृष्टि से पदार्थों की सामर्थ्य का कुछ पता नहीं चलता क्योंकि वह प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती हैं। जब कभी उसे जागृत होने का अवसर मिलता है तब प्रतीत होता है कि इस विश्व में कहीं भी न तो निष्क्रियता है और न अशक्तता। मूर्छना का आवरण ही हर वस्तु को तुच्छ स्तर की बनाये हुए है। तनिक सी हलचल उत्पन्न कर देने पर वह आवरण हटता है और सर्वत्र अनन्त शक्ति का समुद्र लहलहाता दीखता है।

परमाणु से जीवाणु की सत्ता उतनी ही अधिक है जितनी कि एक ढेले की तुलना में जीवित प्राणी की। प्रकृति की जड़ समझी जाने वाली सत्ता का उपयोग करने की दिशा में प्रगति करते हुए ही विज्ञान के भयंकर शक्ति भण्डार हाथ लगा है। अन्तरिक्ष में अनन्त काल से भरा हुआ विद्युत प्रवाह पकड़ कर मनुष्य की सेवा में प्रस्तुत कर दिया गया है और उससे श्रम की बचत एवं रोशनी, पंखा, अंगीठी, तार, टेलीफोन, सिनेमा, रेडियो जैसी असंख्य सुविधाएँ प्राप्त हुई हैं, जड़ परमाणुओं की मूल सत्ता को जगाना और प्रयोग में लाना ही पदार्थ विज्ञान का एक मात्र काम है। उतने भर से मनुष्य की सुविधा एवं क्षमता में निरन्तर वृद्धि होती चली जाती है।

चेतन जीवाणु की शक्ति जड़ परमाणु की तुलना में असंख्य गुनी अधिक है। प्राणी की क्षमता अनिर्वचनीय है। चेतना वस्तुतः परब्रह्म का एक छोटा घटक है। इस अंश भाग में अपनी मूल सत्ता के समान ही सामर्थ्य है। परमात्मा और आत्मा में इतना ही अन्तर है कि एक विभु है दूसरा अणु; पर मूल सत्ता की दृष्टि से दोनों का गुण धर्म और सामर्थ्य सूत्र एक है। परमाणु अपने आप में एक सूर्य है। उसका छोटा परिवार भी सौर मण्डल के सदृश ही गतिशील है। अन्तर छोटे बड़े का है। इस छोटेपन को विशालता में विकसित होने की पूरी गुंजाइश है। प्रत्येक जीवाणु का नाभिक अपने भीतर एक समूची दुनिया छिपाये बैठा है। उसके उदर में हो रही हलचलों को यदि पूरी तरह देख सकें तो प्रतीत होगा कि एक जीवाणु एक समूचा संसार है और उसमें बीज रूप से वह सब कुछ विद्यमान है जो बाहर की दुनिया में इन्द्रियों अथवा उपकरणों की सहायता से देखा जाना जाता है।

असंख्य जीवाणुओं का समूह प्राणी का शरीर है। प्राणियों में भी मनुष्य की संरचना विशिष्ट है। उसका चेतन संसार और भी अद्भुत है। जड़ और चेतन की तुलना इस प्रकार की जा सकती है कि सशक्त रेल इंजन हवाई जहाज, स्वसंचालित यंत्र भी चेतन मनुष्य के नियंत्रण में ही अपना कार्य ठीक तरह कर पाते हैं। मानवी बुद्धि कौशल का प्रयोग न हो तो बहुमूल्य और अत्यन्त सामर्थ्यवान समझे जाने वाले यन्त्र भी जहाँ के तहाँ निष्क्रिय पड़े रहेंगे। जड़ के ऊपर चेतन का अनुशासन सर्वविदित है। इतने पर भी मनुष्य की सत्ता का बाजारू मूल्य तनिक सा है। कितने ही लोग दीन दयनीय स्थिति में पड़े हुए जिन्दगी की लाश बड़ी कठिनाई से रोते−धोते किसी प्रकार ढोते हैं। न उन्हें अपने आप पर संतोष होता है और न अन्य कोई उनसे संतुष्ट रहता है। यह सब व्यक्ति के गुण, कर्म, स्वभाव के साथ जुड़े हुए चेतना स्तर की गिरावट के कारण है। असहाय और अशक्त कोई मनुष्य−तन धारी हो नहीं सकता। दुर्गति तो मूर्छना कराती है। सोई हुई क्षमता का नाम ही दरिद्रता है। आलस्य और प्रमाद के कारण ही दुर्बलता के अनेक आकार−प्रकार सामने आते हैं। सतत जागरुकता और क्रमबद्ध सक्रियता जहाँ भी होगी वहीं मनुष्य तेजस्वी, ओजस्वी बन कर रह रहा होगा।

उपेक्षित मिट्टी के ढेले की तरह ही दीन−दुर्बल मनुष्य भी नगण्य समझा जाता है। शक्ति के भांडागार को इस मूर्छना ने ही अपरिचित स्थिति में ले जाकर पटक दिया है और तो और—परब्रह्म की भी वैसी ही दुर्गति हुई है। उसकी दिव्य शक्ति पत्ते−पत्ते में लहलहा रही है और प्राणी के भीतर आत्म−सत्ता बन कर ज्योतिर्मय हो रही है फिर भी ईश्वर दर्शन की हमारी प्यास ज्यों की त्यों है। भगवान कहीं दीख नहीं पड़ता। सुदूर तीर्थ स्थान की कष्टसाध्य यात्रा करके लोग भगवान का दर्शन करने के लिए जाते हैं और खाली हाथ लौट आते हैं। जिस−तिस विधि से किये जाने वाले विधि−विधान ज्यों−त्यों करके किये जाते रहते हैं फिर भी निराशा ही पल्ले बँधती है। ईश्वर पकड़ में आता नहीं केवल भटकाव ही हाथ लगता है। इसका कारण भी वही मूर्छना है। भगवान है तो सर्वत्र पर पड़ा मूर्छित स्थिति में है। उसे जगाया जा सके और प्रयोग में लाया जा सके तो निश्चित रूप से दैवी−सत्ता का सान्निध्य मिल सकता है और उसके सहयोग भर सहचरत्व से लाभान्वित हुआ जा सकता है।

सर्वत्र प्रश्न एक ही है—जो बहुमूल्य है वह आवरण के पीछे मूर्छित स्थिति में पड़ा है। संभवतः यह इसलिए है कि अविकसित स्तर के लोग उन उपलब्धियों को पाकर असंतुलित न हो बैठें और दुरुपयोग करके सर्वनाश न कर बैठें। जागरुक व्यक्ति ही शक्ति की महत्ता समझते हैं और उन्हीं के द्वारा सदुपयोग बन पड़ता है। अस्तु अपनी मूर्छा छोड़ने और सम्पर्क क्षेत्र की मूर्छना दूर करना ही प्रगति का प्रथम चरण माना जाता है। अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश करने वाले विद्यार्थी को अपना पाठ यहीं से आरम्भ करना होता है। आत्मबोध की प्रक्रिया अपनाकर अन्तरंग में छिपी गरिमा को जगाया जाता है और तत्वबोध से बाह्य जगत में फैले हुए पदार्थों और प्राणियों में सुव्यवस्थित संबंध साधा जाता है। आत्मज्ञानी उसे कहते हैं जो अपने आपे को सही तरीके से संभाल सके और सदुद्देश्य में नियोजित कर सके। तत्वज्ञानी उसे कहते हैं जो संसार की यथार्थता और प्राणियों की स्थिति विचित्रता को ठीक तरह पहचान सके। सही रीति का लोक व्यवहार इसी स्थिति में बन पड़ता है। लगता तो ऐसा है मानो आत्म−ज्ञानी लोक व्यवहार को भुला बैठा पर वस्तुतः वही सबसे अधिक क्रिया कुशल होता है। भेड़चाल के साथ पटरी न बिठाने के कारण उसे मूर्ख समझा तो जाता है, पर वस्तुतः वह वैसा होता नहीं।

सर्वत्र प्रसुप्त स्थिति की घोर तमिस्रा छाई हुई है। निस्तब्ध सन्नाटा छाया हुआ है। शक्ति के प्रचण्ड भांडागार का समुद्र ध्रुव प्रदेश जैसी हिमाच्छादित स्थिति में नितान्त निस्तब्ध बना हुआ है। परमाणु सत्ता—उपेक्षणी धूल बनकर रह रही है। प्राणों को जिन्दगी भारी पड़ रही है। मनुष्यों को दीन दयनीय असहाय स्थिति में अभावों और सन्तापों से दुर्दशाग्रस्त देखा जाता है। यहाँ तक सर्वव्यापी, सर्वसमर्थ परमेश्वर भी अपने विराट् विस्तार में मूर्छाग्रस्त होकर लंबी चादर ताने हुए सो रहा है। इस व्यापक निस्तब्धता में भटकने वाला जीवात्मा जिधर भी दृष्टि दौड़ाता है, उधर ही निराशा छाई दीखती है। कुछ पाने योग्य दीखता नहीं। जो दीखता है, वह भी हाथ नहीं लगता। ऐसी दशा में सिवाय ऊब और खीज के और क्या मिलना है? मिलता तो जागृति में है। ‘जागा पाता है और सोया खोता है’ यह कहावत सुनी तो बहुत बार है, पर उसका प्रभाव तनिक भी नहीं पड़ा। जागने की इच्छा कभी नहीं हुई। जो स्वयं सो रहा है वह अन्यों को किस तरह जगाये? बिना जगाये मूर्छाग्रस्त वातावरण में कौन क्या पाये? जागरण आवश्यक है। अपने जगने पर ही मूर्छितों को जगाना और जो जगे हुए हैं उन्हें पहचानना सम्भव होता है। अध्यात्मयोग इस महान जागरण का ही दूसरा नाम है। उपलब्धियाँ जागृतों को ही मिलती हैं। जो है उसे संभालना और जो नहीं है उसे पाना मात्र जागृति की स्थिति में ही सम्भव है। आत्म−साधना को दूसरे शब्दों में समग्र जागरण का अभिनव प्रयास ही कह सकते हैं। आत्मबोध का प्रथम और तत्वबोध का द्वितीय चरण जब क्रमिक गति से उठना आरम्भ होता है तो उस प्रयास से महान जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकना सम्भव हो जाता है। आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने वाला पथिक प्रत्येक कदम पर एक से एक बढ़ी−चढ़ी उपलब्धियाँ, ऋद्धि−सिद्धियाँ प्राप्त करता चला जाता है।


साधना के विविध स्तर एवं पक्ष

अध्यात्म साधना को ज्ञान और विज्ञान—इन दो पक्षों में विभाजित कर सकते हैं। ज्ञान पक्ष वह है जो पशु और मनुष्य के बीच का अंतर प्रस्तुत करता है और प्रेरणा देता है कि इस सुरदुर्लभ अवसर का उपयोग उसी प्रयोजन के लिए किया जाना चाहिए जिसके लिए वह मिला है। इसके लिए किस तरह सोचना और किस तरह की रीति−नीति अपनाना उचित है, इसे हृदयंगम कराना ज्ञान पक्ष का काम है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा, प्रवचन, पाठ, मनन, चिन्तन जैसी प्रक्रियाओं का सहारा इसी प्रयोजन के लिए लिया जाता है।

इसी पक्ष का दूसरा चरण यह है कि धर्म, सदाचार, संयम, कर्त्तव्य−पालन के उच्च सिद्धान्तों को अपनाकर आदर्शवादी जीवन जिया जाय। अवाँछनीय चिन्तन और कर्तृत्व में ही मनुष्य की अधिकाँश शक्तियों का अपव्यय होता रहता है, दुर्बुद्धिग्रस्त और दुष्कर्म निरत व्यक्ति अपना ओजस् नष्ट करते रहते हैं और उस प्राण शक्ति को गँवा बैठते हैं जो उच्चस्तरीय प्रगति के लिए उसी प्रकार आवश्यक है जैसे मोटर के लिए पैट्रोल। बिना तेल के मोटर कैसे चलेगी, बिना प्रखर प्राण शक्ति के आत्मिक प्रगति किस प्रकार सम्भव होगी। अस्तु न साधना द्वारा चिन्तन को उत्कृष्ट और कर्तृत्व को आदर्श बनाया जाता है। यह जमीन को जोतकर खाद, पानी लगाकर उर्वर बना लेने की तरह है। ऐसी ही परिष्कृत मनोभूमि पर उपासना का बीजारोपण किया जाता है। तभी बोई हुई फसल लहलहाती है। ऐसी ही उर्वरा भूमि पर लगाया गया उद्यान फलता−फूलता देखा जाता है।

साधना का दूसरा पक्ष उत्तरार्ध उपासना है। विविध−विधि शारीरिक और मानसिक क्रिया कृत्य इसी प्रयोजन के लिए पूरे किये जाते हैं। शरीर से व्रत, मौन, अस्वाद, ब्रह्मचर्य, तीर्थयात्रा, परिक्रमा, आसन, प्राणायाम, जप, कीर्तन, पाठ, बन्ध, मुद्राएँ, नीति, धोति वस्ति, न्योलि, वज्रोली, कपाल भाति जैसे क्रियाकृत्य किये जाते हैं। मानसिक साधनाओं में प्रायः सभी चिन्तन-परक होती हैं और उनमें कितने ही स्तर के ध्यान करने पड़ते हैं। नादयोग, बिन्दुयोग, लययोग, ऋजुयोग, प्राणयोग, हंसयोग, षट्चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण जैसे बिना किसी श्रम या उपकरण के लिये जाने वाले मात्र मनोयोग के सहारे संपन्न किये जाने वाले सभी कृत्य ध्यानयोग की श्रेणी में गिने जाते हैं। इसके साकार और निराकार दो वर्ग हैं। साकार में अमुक देवी−देवताओं के स्वरूप एवं सान्निध्य की भावना की जाती है। प्रकाश का—सूर्य का ध्यान भी साकार ध्यान में ही गिना जाता है। इसे कई लोग निराकार कहते हैं। उनकी परिभाषा के अनुसार मनुष्याकृति के भगवान ध्यान को साकार और सूर्य प्रकाश जैसे हाथ−पाँव रहित स्वरूप को निराकार कहा जाता है, पर बात ऐसी है नहीं। सूर्य प्रकाश की, षट्चक्रों की, कुण्डलिनी चक्र की, सहस्रार कमल की आकृतियाँ भी साकार ध्यान में ही गिनी जानी चाहिएँ।

आकार का अर्थ ही स्वरूप है। जहाँ किसी भी प्रकार की आकृति को ध्यान माध्यम बनाया जा रहा होगा वे सब साकार ध्यान गिने जायेंगे। निराकार वर्ग में वे ध्यान आते हैं जो शब्द, रस, गंध, स्पर्श इन चार तन्मात्राओं के सहारे संपन्न किये जाते हैं। सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय से कई प्रकार की दिव्य ध्वनियों को सुनना नादयोग कहलाता है। जीभ पर मिश्री, मिर्च आदि का स्पर्श कराकर कुल्ला कर लेते हैं और उसी स्वाद की अनुभूति करते रहते हैं। इसी प्रकार अमुक गंध को एक बार सूँघकर नासिका द्वारा पीछे भी उसकी कल्पना की जाती रहती है। किसी ठण्डे, गर्म या मृदुल कठोर स्पर्श को हाथों से छूकर उसे हटा दिया जाता है और उसके हट जाने पर भी स्पर्श का अनुभव करने पर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। कान, नासिका, जिह्वा एवं त्वचा की—शब्द, गंध, स्वाद एवं स्पर्श की अनुभूतियों को निराकार ध्यान कहा जा सकता है। रूप तन्मात्र नेत्र इन्द्रिय का विषय है इसकी अनुभूति में किसी न किसी आकार की जरूरत पड़ती है, चाहे वह मनुष्याकृति का हो अथवा अन्य किसी आकार का। इन पर ध्यान केन्द्रित करने को साकार उपासना कहा जायगा।

स्थूल शरीर से श्रम परक, सूक्ष्म, शरीर से चिन्तन परक उपासनाएं की जाती हैं। कारण शरीर से केवल भावना की पहुँच है। निष्ठा, आस्था, श्रद्धा का भाव भरा समन्वय ‘भक्ति’ कहलाता है। प्रेम संवेदना इसी को कहते हैं। यह स्थिति तर्क से ऊपर है। मन और बुद्धि का इसमें अधिक उपयोग नहीं हो सकता है। भावनाओं की उमंग भरी लहरें ही अन्तःकरण के मर्मस्थल का स्पर्श कर पाती हैं। मनुष्यों में भी दो प्रेमीजन जब मिलते हैं तो भाव−विभोर हो जाते हैं और आनन्दातिरेक का अनुभव करते हैं। भाव भरी पुलकन केवल विश्वस्त, परमप्रिय एवं आत्मीयों के मिलन पर ही उभरती है। इसलिए भगवान के प्रति अत्यंत उच्चस्तरीय मान्यताएँ एवं भावनाएँ रखकर पुलकन भरे मिलन को—एक−दूसरे में आत्मसात हो जाने की गहन आस्था की अनुभूति को भक्तियोग कहते हैं। लययोग इसी को कहा जाता है। आत्म−समर्पण तादात्म्य भी इसी का नाम है। जीवन मुक्ति का वर्णन करते हुए सालोक्य सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य के चार भेदों में इसी स्थिति का विवेचन किया गया है। द्वैत को मिटाकर अद्वैत की अनुभूति, नदी का समुद्र में विलय, अग्नि में आहुति द्रव्य, दीपक पर पतंगों का जलना जैसे उदाहरण देकर इसी भाव स्तर का स्वरूप समझाया जाता है। गोपियों को कृष्ण की वंशी ध्वनि पर थिरकने वाले रास नृत्य में इन्द्रिय समूह एवं चिन्तन धाराओं का परब्रह्म के उदात्त संकेतों का अनुगमन ही है। ‘मैं’ और ‘तू’ में से एक को मिटा देने की बात सूफी संत और भक्त योगी एक स्वर से कहते रहे हैं। मैं मिटता है तो तू रह जाता है। “मेरा मुझ में कुछ नहीं जो कुछ है सो तोर” की—“अपनी खुदी मिटा दे तेरा खुदा मिलेगा” की—अनुभूति भक्तियोग में होती है। इसी तथ्य को थोड़े से शब्दों की उलट−पुलट में दूसरी तरह भी कहा जा सकता है—‘अयमात्मा ब्रह्म—प्रज्ञानं ब्रह्म—तत्वमसि—सच्चिदानंदोऽहम्’—शिवोऽहम् की मान्यता में ‘तू’ मिट जाता है और मैं रह जाता है। दोनों ही स्थितियों में एकता, एकरूपता—एक सत्ता का प्रतिपादन है। भक्त और भगवान के एक बन जाने की बात है। अयमात्मा ब्रह्म का आत्मा—निकृष्ट नर−पशु नहीं होता वरन् उसकी क्रिया, विचारणा एवं आकाँशा ठीक वैसी ही होती है, जैसी परमेश्वर की। इससे नीची स्थिति में ‘शिवोऽहम्’ की बात कहाँ बनती है। परमात्मा स्तर पर पहुँचा हुआ आत्मा अपनी अहंता को पूरी तरह खो चुका होता है। उसके साथ जुड़े हुए संकीर्ण स्वार्थपरता के सारे बंधन भी समाप्त हो जाते हैं ऐसा मनुष्य लोभ, मोह के बंधन से विरक्त होकर वैरागी जीवन जीता है और उच्चस्तरीय प्रेरणाओं को ईश्वर के संकेत मानकर उनका अनुगमन करता है।

इसके लिए मात्र मस्तिष्क द्वारा संभव होने वाले ध्यान चिन्तन से काम नहीं चलता वरन् प्रियतम के साथ एकाकार होने के भावोन्माद को जगाना पड़ता है। मीरा, चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस आदि में यह उन्माद मुखरित हो उठा था। ऋषियों में तत्वदर्शी मनीषियों में यह सौम्य शाँत रस बनकर रचनात्मक प्रयोजनों में लगा रहता है। आवश्यकता पड़ने पर वह बुद्ध और गाँधी की तरह सामयिक समस्याओं के समाधान में अवतारी महामानवों की भूमिका भी सम्पन्न करता है।

इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए भक्ति का भावोन्माद उभारने वाले साधक भी देखे गये हैं दूसरे अत्यन्त शान्तिपूर्वक हिमालय में अपनी काया को गला कर हिम रूप बना देने जैसी अनुभूतियों से भी काम चला लेते हैं। तात्पर्य द्वैत को मिटा देने से है। आत्मा और परमात्मा की एकता की भावना जिस भी भाव−प्रक्रिया द्वारा संपन्न की जाय, वे सभी भक्तियोग के—लययोग के अन्तर्गत गिनी जाएंगी।

उपरोक्त तीनों प्रकार की साधनाएँ एक साथ चलती रहती हैं। आवश्यक नहीं कि एक के बाद दूसरी आरम्भ की जाय। एक ही कक्षा में गणित, इतिहास और साहित्य जैसे कई वर्ग चलते रहते हैं। कुछ में कइयों का सम्मिश्रण भी होता है, पोलो जैसे कई खेलों में शारीरिक स्फूर्ति और मानसिक सूझ−बूझ का समान रूप से समन्वय करना पड़ता है। भोजन में रोटी दाल, शाक की मिली−जुली व्यवस्था रहती है। शरीर यात्रा के लिए अन्न जल और वायु का सन्तुलन बनाना पड़ता है। जीवन−यात्रा में शिर, धड़ और पैर के तीनों ही अंग साथ−साथ काम करते रहते हैं। इसी प्रकार स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों का समन्वित साधना क्रम भी चलता है। साथ−साथ तीनों का समान रूप से विकास भी होता चलता है।

साधना का सबसे स्थूल रूप पार्थिव पूजा है जो मात्र उपकरणों से धन एवं पदार्थों से संपन्न हो जाता है। प्रतिमा पूजन यही प्रथम बाल कक्षा है। देव मन्दिरों में स्थापित प्रतिमाओं को वस्त्र, नैवेद्य आरती, पुष्पहार, धूप, दीप आदि से पूजा जाता है। सूर्य को अर्घ्य धन दान, ब्रह्मभोज, भोग प्रसाद जैसे कार्य पार्थिव पूजा में गिने जाते हैं, इनमें से कुछ तो हवन यज्ञ अपंग असमर्थों की सहायता, सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में दान पुण्य जैसे लोकोपयोगी भी होते हैं, शेष उपकरणों की सहायता से किये जाने वाले कर्मकाण्डों तक सीमित रहते हैं। उन्हें भी निरर्थक नहीं कहा जा सकता है। पदार्थों और चेष्टाओं की सहायता से उच्चस्तरीय चिन्तन को उभारना भी जीवन को दिशा देने की दृष्टि से आवश्यक है। यथा समय इन सभी प्रयोजनों के समन्वय की आवश्यकता पड़ी है और यदि वह सब उद्देश्यपूर्ण रीति से किया गया हो तो समुचित लाभ भी मिलता है।


Quotation

ब्रह्मै वास्मीति सद्वृत्या निरालंबतया स्थितीः। ध्यान शब्देन विख्याता परमानन्ददायिनी॥ निर्विकारतया वृत्या ब्रह्माकारतया पुनः। वृत्ति विस्मरणं सम्यक् समाधितान संज्ञकः॥

—अ॰ भू॰ 123-124

जप भी एक प्रकार की प्रतीक उपासना ही है, जप के लिए जो नाम अथवा मन्त्र लिया जाता है, इसलिए उसमें भी ब्रह्म दृष्टि रखकर जप करना चाहिए। जप करते−करते यदि शरीर में कम्प, रोमाँचादि होने लगे, तो समझना चाहिए कि मंत्र चेतन हो गया।


योग साधना से चरम लक्ष्य की प्राप्ति

आत्मिक प्रगति के दो साधनों में एक योग और दूसरा तप है। इन दोनों को साथ−साथ आहार के अन्न, जल की तरह प्रयुक्त करना पड़ता है। इनमें से पिछले लेख में योग−साधना में चित्त−वृत्तियों के निरोध और उन्हें आत्मा एवं परमात्मा के बीच सघनता के बंधन में बाँधने के लिए प्रयुक्त किये जाने की चर्चा की गई है अब उसी प्रसंग में यह जानना होगा कि यह आत्मा और परमात्मा आखिर है क्या? और उनकी सघनता एवं एकता, किसलिए आवश्यक है और किस प्रकार सम्भव है?

परमात्मा को निखिल ब्रह्माण्ड−व्यापी चेतना कहा जा सकता है। चेतना की शक्ति असीम है। उन शक्तियों में प्रमुख है इच्छा। इच्छा से चिन्तन, चिन्तन से कर्म और कर्म से पदार्थ उत्पन्न होता है। इस तथ्य को जीवन के हर क्षेत्र में नित्य ही प्रयुक्त होते देखा जा सकता है। धन का लाभ सोचकर उसे कमाने की आकाँक्षा उठती है मस्तिष्क उसके लिए व्यवसाय ढूँढ़ता है, शरीर उसके लिए श्रम करता है, फलतः विभिन्न पदार्थों का उत्पादन एवं विनिमय आरम्भ हो जाता है। इसी तथ्य ने सृष्टि के आदि में ब्राह्मी चेतना में हलचल उत्पन्न की। इसे एक से बहुत बनकर क्रीड़ा−कल्लोल करने की इच्छा उत्पन्न हुई। उसी से सत्चित्, आनन्द की, सत्य शिव सुन्दर की, ब्रह्मा, विष्णु महेश की, सत रज तम की, त्रिविध चिन्तन धाराएँ उभरने लगीं। शाँत वातावरण में विक्षोभ उत्पन्न हुआ, चिन्तन हलचलों में बदला, कर्म का गठन हुआ और उस सूक्ष्म कर्म ने स्थूल पदार्थ का रूप धारण कर लिया।

स्थूल जगत की सबसे छोटी इकाई परमाणु है। उसके भीतर भी छोटे−छोटे इलेक्ट्रान घटक हैं। वे घटक गतिशील हैं। नदी प्रवाह में जिस तरह भ्रमर पड़ते हैं। शक्ति प्रवाह के यह भ्रमर—विद्युतीय अन्धड़ के यह चक्रवात हैं। वे अपनी मूल सत्ता, ब्रह्माण्डीय स्थिति अथवा सौर−मण्डलीय प्रक्रिया के अनुरूप गतिशील रहते हैं। यह गति ही उनका स्वरूप निर्धारण करती है और सघन होते−होते वे तत्वों के रूप में विकसित हो जाते हैं। इन्हीं के समूह, यौगिकों और रासायनिक पदार्थों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। उन्हीं के उत्पादन, विकास एवं परिवर्तन से प्रकृति की सूक्ष्म गतिविधियाँ तथा स्थूल हलचलें होती रहती हैं। प्रकृति प्रक्रिया इसी का नाम है। इसका अस्तित्व ब्रह्म चेतना की इच्छा शक्ति से प्रकाश में आया। परमाणु सत्ता से दृश्य जगत आरम्भ होता है, पर उससे पूर्व की स्थिति में वह विशुद्ध रूप से विद्युतीय आवेश भर होता है। इस आवेश को ब्रह्म और प्रकृति का संयुक्त अन्तराल कह सकते हैं।

विज्ञानवेत्ता अपने आरम्भिक प्रयोगों में इस विद्युतीय आवेश को अचेतन मानते थे। इसलिए उन्होंने जड़वाद की भौतिकी को ही सृष्टि का मूल आधार माना। पर वह मान्यता एक शताब्दी पूर्व की है। इस बीच बात बहुत आगे बढ़ गई। आज का आधुनिकतम विज्ञान यह सोचने को विवश हो गया है कि सृष्टि प्रवाह अनैच्छिक नहीं है। इसमें सन्तुलन की विचित्र चतुरता भरी पड़ी है। सन्तुलनवाद, इकोलॉजी—के सूक्ष्मदर्शी इसी निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि सृष्टि की जड़ और चेतन दोनों धाराएँ एक दूरदर्शी योजना का परिणाम हैं। प्रकृति के अंतराल में जो चित्र−विचित्र हलचलें चलती हैं वे न तो निरुद्देश्य हैं और न निरर्थक, अनगढ़। वरन् इनके पीछे वे चतुरतापूर्ण परिवेश काम कर रहे हैं जिनके बिना इस सुन्दर संसार का न तो कुछ स्वरूप ही बन सकता था और न उसमें कुछ क्रम ही रह सकता था।

प्रकृति को जड़ इस मानी में समझा जा सकता है कि उसके घटक हलचल निरत हैं, सम्वेदना प्रकट नहीं करते। चेतन इस अर्थ में कह सकते हैं कि उन हलचलों की पीछे अत्यंत दूरदर्शिता और अतीव बुद्धिमत्ता पूर्ण प्रेरणा काम कर रही है। बात को और भी स्पष्ट करने के लिए यों कहा जा सकता है कि वैज्ञानिक यन्त्रों और प्रयोगशालाओं की पकड़ में आने वाली प्रकृति जड़ है और तत्वदर्शन की सूक्ष्म बुद्धि से समझी जाने वाली प्रकृति की मूल प्रेरणा−चेतन है। इन्हें उपनिषद्कारों ने परा ओर अपरा प्रकृति के नाम से पहले ही दो भागों में बाँट दिया है ताकि सूक्ष्मदर्शी और प्रत्यक्षवादी अपने−अपने क्षेत्र में सन्तुष्ट रह सकें और अधिक समझदारी बढ़ चलने पर दोनों का समन्वय कर सकें।

आत्मा और परमात्मा का संबंध बताने के लिए प्रकृति की चर्चा अनिवार्य रूप से आवश्यक हो गई क्योंकि इसके बिना दोनों की पृथकता को समझाया जा सकना कठिन है और उनकी एकता के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों की आवश्यकता को गले उतारना कठिन है।

जीवात्मा ईश्वर का अंश है। समुद्र की लहरों और सूर्य की किरणों से उसकी तुलना की गई है। इस भिन्नता को घटाकाश और मठाकाश के रूप में भी समझाया जाता है। घटाकाश अर्थात् घड़े की भीतर की सीमित पोल और मठाकाश अर्थात् विशाल विश्व में फैली हुई पोल। घड़े के भीतर की पोल वस्तुतः ब्रह्माण्ड−व्यापी पोल का ही एक अंश है। घड़े की परिधि से आवृत्त हो जाने के कारण उसकी स्वतंत्र सत्ता दिखाई पड़ती है, पर तात्विक दृष्टि से वह कुछ है नहीं। घड़े के आवरण ने ही यह पृथक रूप से देखने और सोचने का झंझट खड़ा कर दिया है। शाँत समुद्र में लहरें नहीं उठतीं, पर विक्षुब्धता की स्थिति में वे अलग−सी लगती हैं और उछलती दिखाई पड़ती हैं। सूर्य के तेजस की विस्तृत परिधि ही उसके किरण विस्तार की सीमा है। सूर्य सत्ता का जहाँ तक जिस स्तर का विस्तार है वहाँ तक उसी स्तर की धूप का अस्तित्व दृष्टिगोचर होता है। इस प्रभा विस्तार की जो विभिन्न प्रकार की हलचलें हैं उन्हीं को किरणें कहते हैं। किरणों का सात रंगों में अथवा अल्ट्रावायलेट, अल्फावायलेट एक्स−लेसर आदि में अलग से जाना माना जा सकता है, पर यह विभाजन सूर्य से भिन्न किसी पृथक सत्ता का मान नहीं करता। ऐसे ही उदाहरणों से जीवन और ईश्वर की एकता भिन्नता समझी जा सकती है।

पानी में से असंख्य बुलबुले उठते, तैरते और फिर उसी में समा जाते हैं। विश्व−व्यापी अग्नि तत्व तीली या लकड़ी में प्रकट और प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है। आग बुझ जाने से वह उसी मूल सत्ता में लय हो जाता है। इन उदाहरणों में भी जीव और ईश्वर की पृथकता एवं एकता का अनुमान लगाया जा सकता है। एक बड़ा ढेला फूटकर रज−कण के रूप में बिखर जाता है। पानी ऊपर से गिरने पर जमीन से टक्कर खाता है और उसकी बूँदें अलग से छितराती हुई दीखती हैं। जीव और ईश्वर की पृथकता के संबंध में ऐसे ही उदाहरणों से वस्तुस्थिति समझी जा सकती है। सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्म ने ‘एकोऽहम् बहुस्याम’ की इच्छा की और उसने अपने आपको टुकड़ों में बखेर दिया यह बिखराव प्रकृति के साथ संयुक्त हुआ और इसके साथ घुलकर अहंता का आवरण अपने ऊपर लपेट बैठा। सूखी मिट्टी पर जब पानी पड़ता है तो वह गीली हो जाती है और उस पर काई तथा दूसरी वनस्पति जमने लगती हैं। आत्मा के अंत प्रकृति के साथ मिलकर आधे तीतर, आधे बटेर बन जाते हैं। कच्ची धातुएँ खदान से मिट्टी मिली स्थिति में निकलती हैं, पीछे उन्हें भट्टी में डालकर शुद्ध किया जाता है। जीव को मिट्टी मिला लोहा कहा जा सकता है। जिसमें प्रकृति और पुरुष दोनों का समन्वय है।

जीव की मूल सत्ता ईश्वरीय है। चेतना का समुद्र इस विश्व में एक ही है। उससे भिन्न या प्रतिपक्षी दूसरी कोई सत्ता देवी−देवताओं के या जीवों के रूप में कहीं नहीं है। तत्ववेत्ताओं ने जाना है—‘‘यहाँ केवल एक है दूसरा नहीं।’’ जीव की पृथकता प्रकृति के समन्वय से है। प्रकृति के तीन स्तर सत, रज, तम कहलाते हैं। इन्हीं तीनों की तीन परतें जीव के ऊपर चढ़ जाती हैं और वे तीन शरीर कहलाती हैं। स्थूल शरीर अर्थात् हाड़−माँस की जन्मने−मरने वाली काया। सूक्ष्म शरीर अर्थात् बुद्धि संस्थान, सुख−दुःख, प्रिय−अप्रिय, अपने−विराने का अन्तर करने वाला मस्तिष्कीय विचार विस्तार। कारण शरीर अर्थात् मान्यताओं एवं भावनाओं का समुच्चय—अन्तरात्मा। जिसे अन्तःकरण भी कहा गया है। इन तीन शरीरों की यों प्याज के छिलके—केले के तने या एक के ऊपर एक पहने हुए वस्त्रों से तुलना की जाती है, पर यह उपमा बहुत ही अधूरी है। कारण कि वह सब आवरण एक−दूसरे से पृथक हैं जबकि शरीर एक−दूसरे के साथ इस प्रकार घुले हुए हैं जैसे दूध में घी, सरसों में तेल। प्रयत्नपूर्वक इन्हें पृथक किया जा सकता है। मृत्यु के उपराँत स्थूल और सूक्ष्म शरीर का संबंध टूट जाता है। क्लोरोफार्म सुंघा देने या गहरी नींद आ जाने पर सूक्ष्म शरीर का चेतन भाग मूर्च्छित हो जाता है, अचेतन भर जागता रहता है। समाधि अवस्था में सूक्ष्म शरीर को कारण से अलग किया जा सकता है। मुक्ति अवस्था में कारण शरीर का आवरण भी छूट जाता है और बूँद समुद्र में समा जाने की तरह आत्मा का लय परमात्मा में हो जाता है। इस प्रकार यह तीनों ही आवरण हटाये तथा मिटाये जा सकते हैं, पर सामान्य स्थिति में वे परस्पर घुले−मिले ही रहते हैं।

जीव को इन आवरणों में लिपटे रहने से कई तरह के—कई स्तर के सुख मिलते हैं; इसलिए वह उन्हें छोड़ना नहीं चाहता फलतः ‘बद्ध’ अवस्था में बना रहता है। स्थूल शरीर में कई प्रकार के वासनात्मक सुख हैं। सूक्ष्म शरीर में कल्पना लोक के मनोरम स्वप्न, विनोद, मनोरंजन, सफलता, पद, सम्मान, वैभव आदि के बुद्धि−विलास के अनेकों साधन मौजूद हैं। कारण शरीर में ‘अहंता’ की गहरी परतें जमी हैं। ‘मैं’ अत्यन्त प्रिय है। इस ‘मैं’ की परिधि में जितना क्षेत्र आता है वह मेरा बन जाता है और जिस प्राणी या पदार्थ पर यह ‘मेरापन’ आलोकित होता है वह भी प्रिय लगने लगता है। आकाँक्षाओं की उमंग इसी केन्द्र से उठती है। मान्यताओं की आस्था और सम्वेदनाओं की पुलकन खट्टी−मीठी गुदगुदी तो है, पर वह मिलाकर है—मधु। जीवन में प्रिय−अप्रिय, प्रसंग आते जाते रहते हैं, पर कुल मिलाकर स्थिति ऐसी है जिसके कारण इन तीनों शरीर आवरणों को छोड़ने को मन नहीं करता। फलतः जीव सत्ता का ऐसा सघन अस्तित्व बन जाता है जिसे स्वतंत्र भी कहा जा सकता है।

दर्शन−शास्त्र के सभी पक्षों ने ईश्वर, जीव और प्रकृति इन तीनों का अस्तित्व तो माना है, पर उनके पारस्परिक संबंधों के बारे में अपने−अपने विचार भिन्न रूप से व्यक्त किये हैं। त्रैत, द्वैत और अद्वैत मान्यताओं में इसी प्रकार का मतभेद है। त्रैतवादी कहते हैं ईश्वर, जीव, प्रकृति की तीनों सत्ताएँ अनादि एवं स्वतंत्र हैं—उनका सह अस्तित्व भर है। द्वैतवादी, ब्रह्म और माया−पुरुष और प्रकृति की दो सत्ताएँ मानते हैं, उनकी दृष्टि में जीव का इन दोनों का समन्वय ऐसा ही है जैसा दिन और रात के मिलन से उत्पन्न हुआ संध्या काल। अद्वैत मत में एक ही ब्रह्म चेतना की सत्ता को जड़ और चेतन के रूप में माना गया है। प्रकृति ब्रह्म का विकार है और यहाँ जो कुछ दीख मास रहा है वह बुद्धि विपर्यय का ऐसा ही जादू है जैसा इन्द्र धनुष का अथवा स्वप्न संसार का दीखना। इस स्थिति को भ्रान्ति अथवा माया कहा गया है।

इन दार्शनिक मतभेदों के रहते हुए भी हम एक समन्वित तथ्य और सर्वमान्य निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं; वह यह कि जीवात्मा को प्रिय−अप्रिय की विक्षुब्ध अव्यवस्था−विवशता से उबरना चाहिए और ऐसी स्थिति में रहना चाहिए जहाँ आदतों की, संस्कारों की पराधीनता उसे अवांछनीय कर्तृत्व, अवांछनीय चिन्तन एवं अवाँछनीय सम्वेदनाओं का कष्ट देने में समर्थ न हो सके। समस्त विपन्नताओं की जड़ यह पराधीनता ही है। जीवन का आनन्द उठाने से इसी विवशता के कारण वंचित रहना पड़ता है। यही बन्धन मनुष्य को उच्चस्तर तक पहुँचा कर देवोपम आनन्द, उल्लास उपलब्ध करने के मार्ग में एकमात्र व्यवधान बने रहते हैं। इस स्थिति को बदल सकना यही मनुष्य का परम पुरुषार्थ है—इसी को ‘मुक्ति’ कहा गया है। मुक्ति प्राप्त करना ही जीवन का लक्ष्य माना गया है।

मुक्ति का अर्थ है—स्वाधीनता। पराधीनता के बंधनों को काट देना ही स्वाधीनता है। यह पराधीनता—मात्र चिर−संचित संस्कारों की है जो स्वभाव बनकर हमारे चिन्तन एवं कर्म को अपने ढर्रे पर चलाती है—अपनी लाठी से हाँकती है। शरीर को यह पराधीनता, वासना के बंधन में बाँधकर बेतरह घसीटती है, उसका स्वास्थ्य चौपट करती है, दीर्घजीवन से वंचित करती है और सत्कर्म निरत रहकर समृद्धियाँ, सफलताएँ प्राप्त करने के स्थान पर ऐसा कुछ करते रहने में लगता है जिसके कारण रुग्णता, निन्दा, असफलता, दरिद्रता, कुरूपता जैसी विपन्नताएँ ही आये दिन सामने खड़ी रहती हैं। विवेक कई बार सोचता है कि अपनी गतिविधियों में अमुक प्रकार का परिवर्तन करना चाहिए। किन्तु औचित्य समझते हुए भी वैसा कुछ बन नहीं पड़ता। आदतें इतनी जबरदस्त सिद्ध होती हैं कि उपयोगी सुधार के मनसूबे एक कोने में रखे रह जाते हैं और आदतें अपनी बेढंगी राह पर शरीर को घसीटती चली जाती हैं और वे काम कराती हैं जिनके लिए पीछे पश्चाताप ही करना शेष रह जाता है। यदि आदतें शरीर का संचालन न करें, विवेक के हाथ से नियन्त्रण, संचालन किया जाने लगे तो स्वास्थ्य, सौन्दर्य, दीर्घजीवन जैसी उपलब्धियाँ तो अति साधारण हैं। समर्थ काया से अभीष्ट प्रयोजनों में आश्चर्यजनक सफलताएँ देने वाले पराक्रम पुरुषार्थ का अभिनव स्रोत खोल सकता है और उसके फलस्वरूप जो जीवन लाभ मिल सकता है, उसकी कल्पना मात्र से आँखें चमकने लगती हैं। दुर्बल शरीर इन्द्रिय सुख की लिप्सा भर में लगा रहता है साधन उपस्थित होने पर भी वह उनका समुचित आनन्द नहीं ले सकता। भोजन का आनंद कड़ाके की भूख लगने वाले को ही मिल सकता है। रति क्रीड़ा एवं गहरी निद्रा का लाभ शरीर पर नियंत्रण रख सकने वाले ही भोगते हैं। आलस्य, प्रमाद को भगाकर—व्यवस्थित दिनचर्या बनाना और उस पर निष्ठापूर्वक आरुढ़ रहना—सफलताओं का प्रधान आधार माना गया है। शरीर भौतिक पदार्थों से बना है, भौतिक जगत से सीधा संबंध उसी का है। समर्थ शरीर ही भौतिक उपलब्धियों का केन्द्र होता है। शरीर पर विवेक का नियंत्रण जिस मात्रा में होता जाता है उसी अनुपात से भौतिक सफलताओं का पथ-प्रशस्त होता चला जाता है। यह स्थिति शरीर क्षेत्र की मुक्ति कही जा सकती है। इसका प्रतिफल है भौतिक सुख।

सूक्ष्म शरीर के क्षेत्र में हमारा चिन्तन उस ढर्रे में ढला हुआ होता है, जिसकी प्रतिक्रिया ही हमें अर्धविक्षिप्त स्तर का बनाये रहती है। कितने प्रकार की सनकें, कितने वहम, कितने भ्रम मस्तिष्क में लदे होते हैं यदि उन्हें ठीक तरह समझा जाय तो प्रतीत होगा कि विवेकवान व्यक्ति की तुलना में ‘चालू आदमी’ निस्संदेह अधपगला होता है। लोक−प्रवाह का संशोधन करने अवतारी आत्माएँ उतरती हैं उनके चले जाने के बाद फिर विकृतियाँ उभरने लगती हैं और समाजिक प्रचलनों में गन्दे नाले जैसी गन्दगी भरती चली जाती है। जन मान्यताएँ—लोगों के प्रचलित ढर्रे ही अपने को सुहावने लगते हैं। कुरीतियाँ, मूढ़ मान्यताएँ, अन्य विश्वासों के सहारे न जाने कितनी उपहासास्पद भ्राँतियाँ मस्तिष्क में जड़ जमाकर बैठ जाती हैं। लोगों में प्रचलित भ्रष्टाचार अपने को भी ललचा लेता है। विकृत चिन्तन के कारण मनुष्य न सोचने योग्य सोचता है और बाल बुद्धि की योजनाएँ बनाकर उनमें बहुमूल्य विचार शक्ति को नष्ट करता रहता है। चिन्ता, निराशा, खीज, आवेश, उत्तेजना, निष्ठुरता, घबराहट, कायरता, कृपणता, ईर्ष्या, द्वेष, आत्म-हीनता, उद्दण्डता जैसे अनेकों मानसिक रोग मस्तिष्क को घेरे रहते है और सौ रोगों से ग्रसित शरीर की जो दुर्गति होती है वैसा ही वे मनोविकार, विचार संस्थान को, सूक्ष्म शरीर को बनाये रहते हैं। यह मनोगत कुसंस्कारों की, चिन्तन विकृतियों की, पराधीनता है जिसके कारण हर दृष्टि से ‘अद्भुत’ विचारणा सर्वनाश के गर्त में गिरती और नष्ट होती रहती है।

यदि कुसंस्कारों के बन्धनों से मस्तिष्क को छुटकारा मिल सके तो प्रस्तुत चिन्तन तन्त्र का सुव्यवस्थित सदुपयोग करके कोई भी व्यक्ति विद्वान, वैज्ञानिक, कलाकार, दूरदर्शी, मनीषी बन सकता है। विचारणा को सन्मार्गगामी बना सकते वाले व्यक्ति—सामान्य साधनाओं के बल पर—सामान्य परिस्थितियों में रहते हुए—व्यक्तित्व को परिष्कृत ढाँचे में ढाल सकते हैं और महामानवों की श्रेणी में गिने जा सकने की स्थिति में सरलतापूर्वक जा पहुँचते हैं। ऐतिहासिक महापुरुषों के जीवन तत्त्व का विश्लेषण करने पर विशेषता एक ही दिखाई पड़ती है कि उन्होंने अपने चिन्तन तन्त्र को व्यवस्थित किया, अभ्यस्त विचार-पद्धति का नये सिरे से पर्यवेक्षण किया, अनौचित्य को साहसपूर्वक सुधारा और विवेक का आश्रय लेकर विचारणा को उच्चस्तरीय बनाया। लोक-प्रवाह के विपरीत आदर्शवादी मौलिकता अपनाई, फलस्वरूप उनका चिन्तनात्मक काया-कल्प हो गया। आरम्भ में ऐसे लोगों को मखौल बनता और विरोध होता है, पर जब वे अपनी निष्ठा का परिचय देते हैं तब दुनिया उनके चरणों में झुक जाती है और सिर आँखों पर बिठाकर भाव भरी श्रद्धाँजलि समर्पित करती है।

परिष्कृत सूक्ष्म शरीर—चिन्तन की उत्कृष्टता के कारण स्वयं हर घड़ी सदा सन्तुष्ट, उल्लसित एवं प्रफुल्लित बना रहता है। अवाँछनीय मानसिक भार से छुटकारा पाने के कारण उसकी सूझ-बूझ, दूरदर्शी तत्त्वदर्शी बन जाती है और उसका लाभ न केवल सम्पर्क क्षेत्र को वरन् समस्त संसार को मिलता है।

मस्तिष्क का कुल मिलाकर प्रायः सात प्रतिशत भाग काम में आता है, शेष 93 प्रतिशत प्रसुप्त स्थिति में पड़ा रहता है। उसे जागृत करना अपने भीतर की असंख्यों अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास कर लेना है। मस्तिष्क की तुलना का चमत्कारी सूक्ष्म यन्त्र इस संसार में और कोई नहीं है, इसे यदि प्रयत्नपूर्वक सक्षम बना लिया जाय तो कालिदास जैसे मन्द बुद्धि भी मूर्धन्य विद्वान बन सकते हैं। चमत्कारी सिद्धियों के नाम से कितने ही विशिष्ट कौशल कई सिद्ध पुरुषों में यदा−कदा देखे जाते हैं यह और कुछ नहीं जादू की पिटारी—मस्तिष्कीय चेतना की फुलझड़ियाँ मात्र हैं। इन्द्रिय शक्ति से—मनःशक्ति से हम परिचित हैं, इसलिए उसके द्वारा दैनिक जीवन में प्रस्तुत होते रहने वाले चमत्कारों को ‘सामान्य’ माना जाता है। अचेतन अविज्ञात है इसलिए उसकी जागृत अतीन्द्रिय शक्ति अद्भुत−अलौकिक रहती है, पर वस्तुतः चमत्कार जैसी कोई चीज इस संसार में है नहीं। जो कुछ है प्रकृति व्यवस्था के पूर्णतया अनुकूल ही है। चमत्कारी सिद्धियाँ भी प्रसुप्त अतीन्द्रिय क्षमता का ऐसा जागरण हैं जो आमतौर से देखा, सुना नहीं जाता। ऐसे तो नये आविष्कार भी कुछ दिन तक चमत्कार ही कहे जाते रहे हैं।

तीसरा कारण चेतना की आस्थाएँ सुधर जाने से मनुष्य महात्मा, देवात्मा एवं परमात्मा बन सकता है। यह वह ध्रुव केन्द्र हैं जहाँ आत्मा और परमात्मा का पारस्परिक पतला सा संबंध सूत्र जुड़ा हुआ है उसे तनिक सा और परिष्कृत कर दिया जाय तो ब्रह्म चेतना का—जीव चेतना विशिष्ट संबंध स्थापित कर सकता है और ऐसे आदान−प्रदान का पथ−प्रशस्त कर सकता है जिसके आधार पर नर में नारायण का अवतरण प्रत्यक्ष देखा जा सके। ऐसी स्थिति में पहुँची हुई आत्माओं की देव संज्ञा होती है देवताओं की अलौकिकता कथा पुराणों में भरी पड़ी है। उन्हें इन देव पुरुषों में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। हाँ, इतना अवश्य है कि वे उसका प्रदर्शन करके ईश्वरीय विधि−व्यवस्था में अकारण विक्षेप उत्पन्न नहीं करते।

अध्यात्म विज्ञान की पृष्ठभूमि को संक्षेप में इतना कुछ समझ लेने के उपराँत तत्व ज्ञान के एक जिज्ञासु को इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मनुष्य को मिली हुई तीन शरीरों के रूप में तीन विभूतियाँ प्राणि जगत की सबसे बड़ी ईश्वर प्रदत्त उपलब्धियाँ हैं।

दूध और पानी एक रस होने से घुल सकते हैं। लोहा और पानी का घुल सकना कठिन है। हम अपने भौतिकवादी स्तर से ऊँचे उठें और ईश्वरीय चेतना के अनुरूप अपनी क्रिया, विचारणा एवं आस्था को ढालें तो ईश्वर प्राप्ति का जीवन लक्ष्य पूरा हो सकता है। वियोग का अन्त योग में होना चाहिए—यही ईश्वर की इच्छा है। बच्चा दिन भर खेलकूद और पढ़ने−लिखने में संलग्न रहे, पर रात को घर लौट आये और एक ही बिस्तर पर सो जाये, ऐसी माता की इच्छा रहती है। परमात्मा भी अपने पुत्र आत्मा से ऐसी ही अपेक्षा करता है। उसकी इच्छा पूर्ण करने के लिए—अपना लक्ष्य पूरा करने के लिए हमें जो चेतनात्मक पुरुषार्थ करना पड़ता है, उसी का नाम योग है। योग साधना हमारे लिए सर्वोपरि श्रेय साधन है उसमें अपनी प्रवृत्तियों को तत्परतापूर्वक लगाया जा सके उसी में कल्याण है।


Quotation

यथेष्टं धारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम्। नादादिव्यक्तिरारोग्यं जायते नाडिशोधने॥

—गोरक्ष पं0 1।101

नाड़ी शोधन हो जाने पर अग्नि दीपन, आरोग्य, नाद का स्फुरण, प्राण धारण आदि की सामर्थ्य प्राप्त होती है।

आविर्भूत प्रकाशानाम नुपद्रुत चेतसाम्। अतीतानागतज्ञानं प्रत्यक्षान्त विशिष्यते।

—वाक्य प्रदीप

चित्त जब, सत् और तम से रहित होकर दीप्तिमान होता है और फिर रज को भी त्याग कर स्थिर हो जाता है, तो भूत और भविष्य की प्रत्येक बात स्पष्ट दिखाई देने लगती है।


चित्तवृत्ति निरोध का साधन, अभ्यास

यात्रा दोनों पैरों के सहारे की जाती है और गाड़ी दो पहियों के आधार पर लुढ़कती है। सामान्य प्रगति के लिए श्रम और मनोयोग के संयुक्त समन्वय की आवश्यकता पड़ती है। ठीक इसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए योग और तप यह दो माध्यम अपनाने पड़ते हैं। इनसे बच निकलने और सरल पगडंडियाँ ढूँढ़ने से आत्म प्रवञ्चना के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। सस्ते मोल में भगवत् प्राप्ति करा देने से लेकर समाधि लगा देने और कुण्डलिनी जगा देने जैसे प्रलोभन देने वालों की कमी नहीं, किन्तु स्पष्ट है कि उस प्रवंचना में भ्रम जंजाल के अतिरिक्त तथ्य कहीं रंचमात्र भी नहीं है। हमें अपनी रोटी आप खानी और आप पचानी पड़ती है। आत्मिक प्रगति के लक्ष्य तक पहुँचना देने वाली साधना भी अपने ही पाँवों के सहारे चलकर पूरी करनी पड़ती है और इसके लिए योग और तप जैसे दोनों ही आधार पूरी निष्ठा के साथ अपनाने पड़ते हैं।

योग का सामान्य अर्थ होता है—जोड़ना। आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देने की प्रक्रिया अध्यात्म भाषा में ‘योग’ कहलाती है। इसे आरम्भ करने के लिए जिन क्रिया−कलापों को अपनाना पड़ता है उन्हें ‘साधन’ कहते हैं। साधना अपने आप में एक छोटा उपकरण मात्र है। उसका महत्व इसलिए है कि वह ‘साध्य’ को प्राप्त कराने में सहायता करती है। कई लोग साधन को ही ‘साध्य’ समझ बैठते हैं और उन उपचारों को ही योग कहने लगते हैं जो साधना प्रयोजन में प्रयुक्त होते हैं।

योग−साधना में कई प्रकार के शारीरिक, मानसिक क्रिया कृत्य अपनाने पड़ते हैं। इनका उद्देश्य आत्म चेतना को परमात्मा चेतना से जोड़ने वाली मनःस्थिति उत्पन्न करना है। यह तथ्य ध्यान से रखकर चला जाय तो ही लक्ष्य की पूर्ति होनी संभव है। यदि चेतनात्मक परिष्कार के लिए प्रयत्न न किया जाय और मात्र उन क्रिया−कृत्यों को ही योगाभ्यास मान लिया जाय तो उस भ्रान्ति के कारण घोर परिश्रम करते रहने पर भी कोल्हू के बैल की तरह जहाँ के तहाँ बने रहना पड़ेगा।

शारीरिक श्रम में आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्रा, व्रत, मौन, नेति, धेति, वस्ति, न्यौलि, वज्रोली, कपाल भाति, भूमिशयन, सर्दी−गर्मी सहना, कीर्तन आदि कितने ही उपचार काम में लाये जाते हैं, इनका उद्देश्य स्वस्थता, समर्थता एवं पवित्रता उत्पन्न करना है। ताकि मल भारों से लदे व्यक्ति को आत्मिक प्रगति की लंबी मंजिल पार करने में सुविधा हो। इसी प्रकार मानसिक उपासनाओं में—जप, ध्यान, नाद, एकाग्रता, तन्मयता, स्वाध्याय, सत्संग आदि साधनों का आश्रय लिया जाता है ताकि चेतना को दिशा एवं प्रेरणा दी जा सके और उसे अपनी जीव ससीमता को ब्रह्म असीमता में घुला देने के लिए आवश्यक प्रकाश एवं प्रशिक्षण मिल सके।

लक्ष्य विहीन साधना मनोरंजक भटकाव ही कहा जा सकता है। शारीरिक और मानसिक क्रियाकृत्यों को योगाभ्यास के आधार साधन मानना ही पर्याप्त है। उन कृत्यों को ही जादुई मान बैठना और उनकी प्रवीणता मिल जाने मात्र से लक्ष्य पूरा हो जाना मान लिया जायगा तो वह विशुद्ध भ्रान्ति ही सिद्ध होगी। एक व्यक्ति दूसरे तक अपने मनोभाव पहुँचाने के लिए कागज कलम का प्रयोग करता है। यह उपकरण निश्चय ही बड़े महत्वपूर्ण हैं। इनके बिना विचारों का आदान−प्रदान करने में बड़ी कठिनाई पड़ेगी। फिर भी यह मात्र कागज कलम से पत्राचार का उद्देश्य पूरा नहीं होता । उसमें भावों की अभिव्यक्ति का तथ्य जुड़ा ही रहना चाहिए। यदि ऐसे ही कागज पर कलम घिसते रहा जाय और कुछ भी टेढ़ी−सीधी लकीरें बनाई जाती रहें तो उससे पत्र−व्यवहार द्वारा विचारों के आदान−प्रदान का उद्देश्य पूरा न हो सकेगा। लेखन क्रिया के साथ भावों की अभिव्यक्ति नितान्त आवश्यक है। योगाभ्यास में प्रयुक्त होने वाले उपचारों में मात्र शारीरिक, मानसिक हलचलों को ही सब कुछ मानकर सन्तुष्ट नहीं हो बैठना चाहिए। उत्कट प्रयत्न यह होना चाहिए कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ देने पर उपयुक्त भाव चेतना उत्पन्न की जा सके। महत्व तो इस ‘भाव उभार’ का ही है। वह उभरेगा तो गाड़ी आगे चलेगी अन्यथा तथाकथित योगाभ्यासों की हलचलें कुछ समय तक श्रम−साधना में जितनी कुछ जैसी कुछ अनुभूति दे सकती हैं, उसे देकर समाप्त हो जायेंगी। भाव−विहीन साधना से शरीर की स्वस्थता और मन की एकाग्रता भले ही कुछ सीमा तक बढ़ सके; आत्मिक प्रगति का लक्ष्य पूरा न हो सकेगा। इसके लिए भावनाएं तरंगित करनी पड़ेंगी। ‘भक्ति भावना’ शब्द का प्रयोग इसीलिए किया जाता है कि उसमें भावनाओं का तरंगित होना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इसके बिना सारे अभ्यास निष्प्राण ही बने रहेंगे। यही कारण है कि क्रियाकृत्यों को सब कुछ मानकर उन्हीं की प्रवीणता के लिए माथापच्ची करते रहने वाले व्यक्ति प्रायः निराश रहते और असफलता की शिकायत करते ही पाये जाते हैं।

योग को चित्त वृत्तियों का निरोध कहा गया है। चित्त की वृत्तियाँ ‘प्रेम’ को—वासना, तृष्णा, मोह, अहंता आदि भौतिक लिप्सा−लालसाओं की पूर्ति को ही सुखद मानती हैं, उन्हीं की इच्छा करती हैं और उन्हीं में निरत रहती हैं। पानी का स्वभाव नीचे की ओर गिरना है इस पतनोन्मुख प्रवृत्ति को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिए वैसा ही प्रयत्न करना पड़ता है जैसे कुँए से पानी खींचने अथवा तालाब का पानी टंकी में चढ़ाने के लिए। मन को ढीला छोड़ देने से वह जन्म जन्मांतरों के संग्रहीत एवं अभ्यस्त पशु−प्रवृत्तियों के अस्तबल में अपने आप घुस जायगा। घड़े से गिरते ही पानी नीचे की ओर बहने लगता है। चित्त का भी यही स्वभाव है। उसे उलटने का जो पुरुषार्थ करना पड़ता है उसी को ‘चित्त वृत्ति निरोध’ कहा जायगा। महर्षि पातञ्जलि ने इसी प्रयास को योग कहा है।

कई व्यक्ति चित्त वृत्तियों के निरोध की बात को नहीं समझते और मात्र ‘चित्त निरोध’ को ही योग मान लेते हैं। उनका तात्पर्य ‘एकाग्रता’ से होता है। एकाग्रता होना ही उनकी दृष्टि में योगाभ्यास की सफलता है और उसका न होना असफलता। यह भ्रम है। एकाग्रता एक चीज है और एक धारा दूसरी। एकाग्रता का अपना महत्व और अपना लाभ है—उसका औचित्य और उपयोग समझा जा सकता है, पर एकाग्रता को ही योग का—उपासना का आधार मान बैठना गलत है। एकाग्रता के भी स्तर हैं, मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म में भी एकाग्रता प्रयुक्त होती है और देव प्रतिमा के समक्ष होकर उसकी पूजा, आरती स्तुति आदि से भी एकाग्रता का पाठ पढ़ा जाता है। पीछे यह बढ़ते−बढ़ते उस स्थिति तक भी पहुँच सकती है जिसे तन्मयता, भाव समाधि, विचार शून्यता आदि का नाम दिया जा सके। यह अन्तिम और समय साध्य स्थिति है। लोग इसी को पहले दिन प्राप्त करना चाहते हैं। ‘मन लगे तो भजन करें’ की उनकी माँग रहती है। वस्तु स्थिति इससे बिलकुल उलटी है। अल्हड़ बछड़े और घोड़े पहले दिन से ही हल या ताँगा नहीं चलाने लगते। बहुत समय तक उनके साथ माथापच्ची करके काम का बनाया जाता है। ठीक यही बात मन के संबंध में भी है। उपासना कृत्यों में बिना मन लगे ही चिरकाल तक लगा रहना पड़ता है। पीछे वह अभ्यास स्वभाव में बदल जाता है और उसकी भी शौच, स्नान, भोजन शयन जैसे दैनिक आवश्यकता अनुभव होने लगती है।

‘काम में मन लगाना’ एक गुण है। यह प्रयोग दैनिक जीवन की प्रत्येक क्रिया में करते रहना चाहिए। श्रम और मनोयोग के सम्मिश्रण से होने वाले लाभों को जानना चाहिए और आलस्य प्रमाद से उत्पन्न होने वाली हानियाँ समझनी चाहिएँ, अपने काम को पूरी तत्परता, दिलचस्पी के साथ करने का अभ्यास डालें। यही स्वभाव ‘भजन में मन लगाने का भी आधार हो सकता है। जो लोग लापरवाही, उदासी एवं उपेक्षापूर्वक अपने काम करते हैं उनका भजन भी उसी प्रकार का होगा। भजन भी एक काम है और उसमें मन लगाना इस बात पर निर्भर है कि काम में मन लगाने की आदत है या नहीं। भजन में मन लगाने की पृष्ठ−भूमि विस्तृत है इसके लिए पूरी कार्य−पद्धति को ही नये ढाँचे में ढालना होगा और दिलचस्पी तथा तत्परतापूर्वक काम करने की आदत विकसित करनी पड़ेगी। इस दिशा में जितनी चेष्टा होगी उसी अनुपात से प्रत्येक कार्य में मन लगेगा—साथ ही भजन में भी। हर काम की उपेक्षा और उदासी से करने वाले लोग मात्र भजन में ही मन लगाने की अपेक्षा रखेंगे तो उन्हें निराश ही होना पड़ेगा।

एकाग्रता की स्थिति समय साध्य है, उसके लिए धैर्य और प्रयत्नपूर्वक बहुत समय तक अभ्यास करते रहने की आवश्यकता होगी। वह स्थिति न आये तो भी उतना हर्ज नहीं, जितना समझा जाता है। आत्मिक प्रगति के लिए मन की दिशा और धारा बदल देने की आवश्यकता है, उतने भर से ‘चित्त−वृत्ति निरोध’ की योग आवश्यकता पूरी होने लगती है।

‘प्रेय’ की लिप्सा ‘श्रेय’ की आकाँक्षा में बदली जानी चाहिए। पेट प्रजनन भर के लिए जीने में संलग्न पशुस्तरीय प्रवृत्ति को बदल कर आत्मा को परमात्मा स्तर तक विकसित करने की देव स्तरीय प्रवृत्ति में प्रवेश करना चाहिए। आकाँक्षाएँ बदल जाने से मन की विचारणा और शरीर की कार्य−पद्धति में काया−कल्प प्रस्तुत हो जायगा। प्रेय की निरर्थकता और श्रेय की सार्थकता में विश्वास बढ़ चले तो उसका प्रभाव कल्पना क्षेत्र तक सीमित न रहकर व्यावहारिक जीवन के हर क्षेत्र में प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने लगेगा।

जीवन का लक्ष्य समझा जाना चाहिए और प्रगति की दिशा अपनाई जानी चाहिए। निरुद्देश्य जीने से हवा के साथ−साथ उड़ते फिरने वाले पत्तों जैसी दुर्गति होती है। वे यत्र−तत्र−सर्वत्र भटकते भर हैं, पहुँचते कहीं नहीं—पाते कुछ नहीं। जीवन का सुनिश्चित लक्ष्य अपूर्णता को पूर्णता में विकसित करना—आत्मा को परमात्मा स्तर तक पहुँचाना ही है। उसे जितनी जल्दी समझा और अपनाया जा सके उतना ही उत्तम है। शरीर रक्षा और परिवार पोषण के लिए उपार्जन तथा व्यवस्था संबंधी कार्य भी किये जाने चाहिएं किन्तु उतने भर में सीमित न हो बैठा जाय। यह ध्यान पूरी गम्भीरतापूर्वक रखा जाना चाहिए कि सुरदुर्लभ मनुष्य शरीर किसी विशेष उद्देश्य के लिए मिला है और उसे पूरा करने में ही दूरदर्शी बुद्धिमत्ता है। अन्तःकरण में यह तथ्य निरन्तर जागृत बना रहे तो समझना चाहिए कि उपयुक्त जीवन दिशा मिल गई और उसके प्रकाश में सद्भावनाएँ अपनाये रहने तथा सत्प्रवृत्तियों में संलग्न रहने की धारा बह चलेगी। एक दिशा, एक लक्ष्य, एक आकांक्षा, एक प्रेरणा यदि निश्चित हो जाय तो फिर शरीर और मन को उसी ओर चल पड़ने की बात बन जाती है और धीरे−धीरे चलते रहने पर भी देर सवेर में मनुष्य वहाँ जा पहुँचता है जहाँ पहुँचा देख कर उसका साथी चमत्कार हुआ या देवता का वरदान मिला मानने लगता है।

आत्मा को परमात्मा से मिलाने वाली यही सड़क है। श्रेय की प्राप्ति को लक्ष्य मानकर चलने से चित्त वृत्तियों में पूर्व की अपेक्षा असाधारण परिवर्तन हो जाता है। निकृष्टता उत्कृष्टता की दिशा में उलट पड़ती है इसी ऊर्ध्व गमन को चित्तवृत्ति निरोध कहा जाता है पतनोन्मुख पशु−प्रवृत्तियाँ जब उत्थान की दिशा में देव प्रवृत्तियों का रूप बना लेती हैं तो उस स्थिति को योग स्थिति कह सकते हैं। गीता में योगी की गतिविधियों का स्वरूप बताते हुए कहा है कि—“जब लोग सोते रहते हैं तब वह जागता है।” “जब लोग सोते हैं तब योगी जागता है।” इस रहस्यवाद के पीछे यही तथ्य छिपा है कि लोक प्रवाह में पशु प्रवृत्तियों की ही प्रधानता है। संसार में भोगी लोगों का ही बाहुल्य है। उन्हीं की रीति, नीति, सलाह एवं परम्परा अपनाने से योगी का काम नहीं चल सकता। उसे अपने चिन्तन और कर्तृत्व का ढाँचा विवेक के सहारे खड़ा करना पड़ता है। यह लगभग लोक प्रचलन में बहुत करके विपरीत ही बैठता है। लोग उसे मूर्ख कहते हैं और वह लोगों को मूर्ख समझता है। स्वतंत्र चिन्तन और लोक प्रवाह में भारी अन्तर रहता है। इस रस्साकशी कुसंस्कारी चित्तवृत्तियां योगवाद का ही समर्थन करती हैं। इस प्रवाह को आत्मिक साहस के बल पर उलटने का नाम ‘चित्तवृत्ति निरोध’ है। यही योगी का प्रबल पुरुषार्थ माना जाता है।

एकाग्रता का अभ्यास क्रमशः होता है और वह समय साध्य है। इसलिए उसमें उतावली बरतने की—आतुरता प्रदर्शित करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं। निरन्तर जीवन लक्ष्य का ध्यान रखा जाय तो उस धारा प्रवाह को ‘एक दिशा’ कहा जा सकता है और उससे एकाग्रता का वास्तविक प्रयोजन पूरा हो सकता है।

ध्यान धारणा में एक बिन्दु पर मन एकाग्र करने की बात बहुत आगे की है। पहले तो साकार ध्यान में साकार की ध्यान प्रतिमाएँ बनानी पड़ती हैं। निराकारवादी भी सूर्य आदि का कोई न कोई रूप बनाते हैं अथवा नादयोग में विभिन्न शब्दों को सुनते हैं रूप या शब्द का ध्यान करने के माध्यम से एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है। पर विचारपूर्वक देखा जाय तो प्रतीत होगा कि उस ध्यान प्रक्रिया में भी बिखराव ही बिखराव भरा पड़ा है। इष्टदेव की प्रतीक छवि में उनके अंग−प्रत्यंग वस्त्र−आभूषण, आयुष, वाहन आदि का बड़ा आवरण रहता है और उस विस्तृत क्षेत्र में यहाँ से वहाँ उड़ते फिरने की मन को पूरी छूट रहती है। ईष्टदेव यदि शिव हैं तो ध्यान करते समय साधक को छूट है कि वह उनके शिर पर टंगे चन्द्रमा का, गंगा के उद्भव का, लिपटे हुए सर्पों का, कटिप्रदेश में पहने व्याघ्र चर्म का, गले की मुण्डमाला का, नंदी वाहन की छवि देखे और उस सीमित ध्यान क्षेत्र में कहीं ही दौड़ लगाता रहे। फिर यह एकाग्रता कहाँ हुई?

निराकारवादी प्रायः सूर्य किरणों का शरीर के रोम−रोम में प्रवेश करने का अथवा चित्र−विचित्र ध्वनियाँ सुनने का अभ्यास करते हैं। इसमें भी चिन्तन विस्तार का उतना ही क्षेत्र विद्यमान है जितना साकारवादी मान्यताओं में। जब मन को इतनी दौड़−धूप करने और इतने भिन्न प्रकार के अनुभव करने की छूट रही तो वह एकाग्रता कैसी बनी?

वस्तुतः जिसे हम एकाग्रता कहते हैं वह सब चित्त की भाग दौड़ को असीम से रोककर एक सीमित क्षेत्र में प्रतिबन्धित करना है। मन बार−बार भागता है और उसे पकड़−पकड़ कर बार−बार निश्चित ध्यान परिधि में लाया जाता है। यही प्रयोग चलता रहता है पूर्ण एकाग्रता समाधि अवस्था है और वह पूर्णता तक जा पहुँचने पर ही मिलती है। उसके लिए किसी को भी अधीर नहीं होना चाहिए।

हजार बार इस तथ्य को समझ लेना चाहिए कि पूर्ण एकाग्रता साधना काल की आरम्भिक प्रक्रिया या आवश्यकता किसी भी दृष्टि से नहीं है। उसके लिए न तो लालायित होना चाहिए न खिन्न। प्रयत्न करते रहना भर पर्याप्त है। मीरा, सूर, चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस आदि भक्तजनों की भावस्थिति का सूक्ष्म अध्ययन करने पर स्पष्ट हो जाता है कि वे एकाग्रता नहीं तन्मयता प्राप्त कर सके और उसी में उनका लक्ष्य मिल गया। भक्त सम्प्रदाय में प्रणय, वियोग, अश्रुपात, समर्पण आलिंगन जैसे भावोन्मादों की घटाएँ ही उमड़ती रहती हैं। उस मनःस्थिति में एकाग्रता किसी भी प्रकार संभव नहीं। यदि एकाग्रता ही सर्वोपरि रही होती तो भक्तजनों पर हर घड़ी छाया रहने वाले भावोन्माद तथा उसके उभार में उठने वाले हास्य, रोदन, नृत्य, अवसाद आदि कि उद्विग्नता लक्ष्य प्राप्ति में बहुत बड़ी बाधा बन गई होती, पर ऐसा हुआ नहीं है।

यहाँ एकाग्रता का महत्व घटाया नहीं जा रहा है और न उसे त्याज्य या उपेक्षणीय कहा जा सकता है। एकाग्रता की उपयोगिता में किसी को संदेह नहीं होना चाहिए इतने पर भी सर्वसाधारण के मन में जमी हुई इस भ्रान्ति का निराकरण होना ही चाहिए कि—“सृजन में मन लगाना अर्थात् चित्त का एकाग्र होना आवश्यक है, वह है, तो भजन की सफलता—नहीं है तो असफलता” इस चिन्तन को हटाकर यों सोचना चाहिए कि ‘चित्त निरोध’ नहीं ‘चित्तवृत्तियों का निरोध’ आवश्यक है। एकाग्रता नहीं ‘एक दिशा’ अभीष्ट है। यदि ऐसा बन पड़े तो समझना चाहिए कि योग साधना की सही पृष्ठभूमि बन चली।

समूची ब्रह्म सत्ता को समझा जा सकना मनुष्य की छोटी बुद्धि के लिए असम्भव है। ब्रह्माण्ड बहुत बड़ा है; उसका विस्तार हमारी कल्पना शक्ति से बाहर है। अपनी पृथ्वी पर प्रकृति की जो कार्य पद्धति है, अन्य लोकों में उससे भिन्न है। पृथ्वी के प्राणधारियों की आकृति प्रकृति चिन्तन एवं जीवन यापन पद्धति में आकाश पाताल जैसा अंतर है। फिर अन्य लोकवासी चैतन्य प्राणियों की रीति−नीति के बारे में तो कहा ही क्या जा सकता है? समूचा ब्रह्म न तो हमारी समझ में भी आ सकता है और न उसे समझने की आवश्यकता है। मानवी चेतना के साथ ब्रह्म चेतना का जितना अंश संबंधित है उस भाग को ईश्वर या परमेश्वर कहते हैं। हमारे आनन्द एवं उत्थान में उसी की भूमिका रहती है। अस्तु साधना के लिए उसी छोटी−ब्रह्म परिधि के साथ हमारा सम्पर्क मिला लेना पर्याप्त माना गया है। उपासना का केन्द्र बिन्दु यह ईश्वर ही रहता है।

ब्रह्म एक है। अनेक रूपों में देवी−देवताओं की मान्यता से इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि वे एक दूसरे से पृथक एवं स्वतंत्र हैं। परमेश्वर असंख्य शक्तियों का भण्डार है। उसकी जिस क्षमता के साथ हमारा विशेष आकर्षण या लगाव होता है; उसी को प्रधान मानकर चलने से अभीष्ट शक्ति तत्व की अधिक मात्रा अपनी ओर आकर्षित करने का अवसर मिलता है। सूर्य की धूप में अल्ट्रावायलेट—अल्फावायलेट आदि अनेकों विशेष गुणों वाली क्षमताएँ सन्निहित रहती हैं। वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से शेष किरणों के समूह में से छाँट कर अपने लिए आवश्यक किरणों को ही पकड़ा और प्रयोग में लाया जा सकता है। ब्रह्म को सूर्य और उसी असंख्य किरणों को असंख्य देवता माना जा सकता है। जो अभीष्ट हो उस पर उपासना केन्द्रित की जा सकती है। सरस्वती विद्या की—लक्ष्मी समृद्धि की—दुर्गा बलिष्ठता की देवी हैं। गणेश बुद्धि के, हनुमान बल के, सूर्य तेज के, शिव कल्याण के, विष्णु वैभव के, ब्रह्म सद्ज्ञान के देवता हैं। अन्यान्य देवी देवताओं के संबंध में भी यही बात है। यह सब एक ही विराट् ब्रह्म के अवयव मात्र हैं। उसी में घुले हैं। अपनी श्रद्धा, संकल्प शक्ति और उपासना प्रक्रिया को एकत्रित करके साधना रत होने से उनका स्वतंत्र अस्तित्व भासने लगता है। ध्यान की सुविधा के लिए इन शक्ति तत्वों का मनुष्याकृति वाला शरीर भी कल्पित किया गया है। पूर्व मान्यताएँ और साधनात्मक निष्ठाएँ मिलकर उस प्रकार की प्रतिमा का स्वरूप वस्तुतः सामने ले आती हैं और वह ‘इष्टदेव’ साधक की सहायता के लिए प्रस्तुत दीखने लगता है। साधक का व्यक्तित्व और संकल्प इस भाव निर्मित इष्टदेव में प्राण फूँकता है। उस उपास्य में साधक के स्तर के अनुरूप ही शक्ति होती है। दुर्बल मनःस्थिति वाले साधक के इष्टदेव मात्र छाया जैसा आभास देकर तिरोहित हो जाते हैं। जब कि प्राणवान साधक का वही इष्टदेव प्रचण्ड सामर्थ्य का परिचय देता है।

आवश्यकतानुसार विशेष सूक्ष्म शक्ति उपार्जन करने के लिए अमुक देवी−देवताओं की उपासना की भी खण्ड साधना भी की जा सकती है, पर अपना अनुभव और परामर्श यह है कि समग्र ब्रह्म की साधना ही सर्वोत्तम है। आहार वही आदर्श माना जाता है जिसमें पोषण के सभी तत्व मौजूद हों। प्रोटीन कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो, अकेले उसी को खाना लाभदायक न रहेगा। अमुक देवता की उपासना अकेली प्रोटीन, अकेली कैल्शियम खाने की तरह है। आवश्यकता पड़ जाने पर चिकित्सा उपचार की तरह कोई विशेष तत्व अमुक मात्रा में लिया जाता है, इसी प्रकार विशेष प्रयोजन के लिए कोई देव−साधना उपयोगी हो सकती है, पर सर्वतोमुखी प्रगति के लिए—सर्वकालिक साधना समग्र ब्रह्म की ही होनी चाहिए।

कई तरह के देवी−देवताओं की—कई प्रकार की आकृतियों का संग्रह करने में ध्यान बँटता है और निष्ठा विकेन्द्रित होती है। पूजा−स्थली एवं ध्यान−प्रक्रिया में चित्र−विचित्र, साज−सज्जा इकट्ठी इसलिए की जाती है कि कई देवता कई तरह के वरदान देंगे और सभी से थोड़ा−थोड़ा संबंध बना रहने से पंचमेल स्वाद मिलेगा और कई तरह के लाभ होंगे। पर यह मान्यता उपासना क्षेत्र में उलटी बैठती है। ध्यान और निष्ठा को केन्द्रित रखना उपासना का महत्वपूर्ण आधार है। उसे बखेरना नहीं चाहिए। बहुत देवताओं के जंजाल में “सात मामाओं का भानजा भूखा रहता है” वाली कहावत चरितार्थ होती है। गायत्री उपासना की प्राचीन परिपाटी में प्रातःकाल हंसारुढ़ा ब्राह्मी−मध्याह्न को गरुड़ा रुढ़ा वैष्णवी—सायं वृषभारुढ़ा शांभवी की भिन्न आकृतियों का ध्यान बताया गया है। हमने एक ही रूप को पर्याप्त माना है और अपनी ही भाँति परामर्श मानने वालों को एक ही ध्यान के लिए अनुरोध किया है। सविता देवता के रूप में परब्रह्म की उपासना सर्वोत्तम है। ‘प्रकाश’ की साधना साकार और निराकारवादी दोनों ही पक्षों के लिए समाधान कारक है। सभी धर्म सम्प्रदायों ने किसी न किसी रूप में प्रकाश ध्यान की महत्ता स्वीकार की है। इसलिए उसे सार्वभौम भी कह सकते हैं। गायत्री मन्त्र का देवता सविता है। छवि स्थूल, विचारणा सूक्ष्म, भावना कारण इन तीनों का समन्वय करते हुए अपना उपास्य सद्ज्ञान रूपी सूर्य हो, उसकी किरणों में गायत्री मन्त्र की सदाशयता और अंतराल में अनन्य प्रेम से ओत−प्रोत मातृ सत्ता की झाँकी की जा सकती है। इस ध्यान में तीनों शरीरों की आवश्यकता पूरी कर सकने जैसे सभी तथ्य विद्यमान हैं। साकार, निराकार का भी इसमें समन्वय है। उच्चस्तरीय उपासना के लिए यही ध्यान प्रतिमा सर्वोत्तम समझी गई है। इस अंक में इसी दृष्टि से वह चित्र दिया गया है और अपेक्षा की गई है कि ध्यान तथा पूजन के लिए उच्च कक्षा के छात्रों को यही अपनाना चाहिए। सामान्य कक्षाओं के लिए हंसारूढ़ गायत्री माता की पुरानी छवि का उपयोग करते रहना ही ठीक है। गायत्री को विराट् ब्रह्म की प्रतीक प्रतिमा मानकर ही चलना चाहिए उसमें उन सभी देव शक्तियों का सन्तुलित समन्वय मौजूद है जो साधक की भौतिक एवं आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है।

यहाँ यह बात पूरी तरह ध्यान में रखने की है कि आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ा जाना ही योग का एकमात्र लक्ष्य है। इसके लिए चित्त−वृत्तियों का निरोध, दिशा परिवर्तन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। आखिर आत्मा और परमात्मा को मिलाने की भूमिका तो चित्त को ही सम्पादित करनी है वह अन्य दिशा में उलझा रहेगा तो लक्ष्य प्राप्ति मार्ग पर बढ़ चलना किसके सहारे संभव होगा? यदि चित्त की अस्त−व्यस्तता सुव्यवस्था में बदली जा सके तो समझना चाहिए कि वह प्रयोजन पूरा होने ही वाला है जिसके लिए विविध विधि साधनात्मक कर्मकाण्ड करने की आवश्यकता पड़ती है।


तप−साधना अतीव लाभदायक प्रक्रिया

आत्मिक प्रगति का पहला चरण योग और दूसरा तप है। योग भावात्मक और तप क्रिया परक है। एक को सूक्ष्म और दूसरे को स्थूल कह सकते हैं। एक चिन्तन परक—मान्यता प्रधान और दूसरा क्रिया परक—कर्म प्रधान है। मानवी सत्ता भी चेतन आत्मा और जड़ शरीर के समन्वय से बनी है। उन दोनों को ही परिष्कृत करना पड़ता है। भाव शुद्धि की तरह क्रिया शुद्धि भी आवश्यक है। भाव शुद्धि को योग तथा क्रिया शुद्धि को तप कहा जाता है।

मन, चेतन−आत्मा और जड़−शरीर का मध्यवर्ती है। इसे दोनों को सम्मिलित सत्ता कहा जाता है उसे चेतन होते हुए भी ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया है। इससे स्पष्ट है कि वह चेतन होते हुए भी जड़ की ओर आकर्षित बना रहता है। दोनों क्षेत्रों से संबंधित होने के कारण मन को ही चेतना और काया के परिष्कार की भूमिका निभानी पड़ती है, आखिर गिराने का कारण भी तो वही है।

मन की दो विशेषताएं सर्वविदित हैं—(1) चंचलता (2) सुख लिप्सा। उसे आवारा लड़कों की तरह मटरगश्ती में मजा आता है। बन्दरों की तरह डाली−डाली पर उछलते रहने और चिड़ियों की तरह जहाँ तहाँ फुदकते रहने में उसकी चंचलता को समाधान मिलता है। कल्पना के घोड़े पर सवार होकर वह आकाश−पाताल की सैर करता है। इस भटकाव में उसकी अधिकाँश शक्ति नष्ट हो जाती है। इसे रोककर उपयोगी लक्ष्य पर उसे केन्द्रित करने का प्रयास योगाभ्यास कहलाता है। योग के फलस्वरूप भौतिक जीवन में दरिद्रता का समृद्धि में लय हो जाता है। पिछड़ापन प्रगतिशीलता में परिणत हुआ दीखता है। विभिन्न प्रकार की साँसारिक सफलताएँ मन को लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित करने का ही सत्परिणाम हैं। उसी से प्रबल पुरुषार्थ बन पड़ता है। अभीष्ट साधन जुटते जाते हैं। और अनुकूल परिस्थितियाँ बनती जाती हैं।

आत्मिक क्षेत्र में मन को लगा देने से प्रसुप्त शक्ति संस्थानों के जागरण का वातावरण बनता है और दिव्य क्षमताएँ प्रकाश में आती हैं। यह आन्तरिक प्रगति सामान्य व्यक्ति को महामानव स्तर पर ले जाकर खड़ा कर देती है। यह सब मन के भटकाव को रोकने और उसे लक्ष्य केन्द्र पर नियोजित कर सकने का ही प्रतिफल है। चञ्चलता की वृत्ति से छुटकारा पाकर एकाग्रता के लिए—एक धारा में बहने के लिए सधाया हुआ मन कितने चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करता है इसे अनुभव द्वारा ही जाना जा सकता है। प्रगति का समूचा इतिहास तो इस तथ्य का साक्षी है ही।

मन की दूसरी प्रवृत्ति है—सुखोपभोग की लिप्सा। भौतिक सुख शरीर द्वारा वासना तृप्ति के रूप में भोगा जाता है। इन्द्रियाँ इसकी माध्यम हैं। शिश्नोदर परायणता में रुचि बनी रहती है। स्वाद और विषय सुख की कल्पनाएँ करने और साधन जुटाने के ताने−बाने बुनने में उसकी अधिकाँश शक्ति लगी रहती है। मधुर देखने, सुनने, सूँघने, छूने आदि की इन्द्रिय लिप्साएँ भी इसी विलास क्षेत्र में आती हैं। अहंकार की पूर्ति के लिए दूसरों को प्रभावित करने वाले कई तरह के ठाट−बाट बनाये जाते हैं। संग्रह और स्वामित्व के लिए भी अनेक प्रकार के प्रयत्न करने पड़ते हैं। ‘तृष्णा’ शब्द में इन सबका समावेश है। अहंता पर चोट पहुँचने से प्रतिशोध की उत्तेजना उत्पन्न होती है। यह क्रोध है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर यह छह आन्तरिक शत्रु माने गये हैं। संक्षेप में यह सारा विकार परिवार भौतिक सुख प्राप्त करने की मनःलिप्सा की अनेकों रंग रूपों में दीखने वाली प्रतिक्रियाएं मात्र हैं।

मन की इस पतनोन्मुख बहिर्मुखी—लिप्सा परायण प्रवृत्ति से जीवात्मा को असीम हानि उठानी पड़ती है। जीवन संपदा उन्हीं उलझनों में नष्ट−भ्रष्ट होती चली जाती है और इस सुरदुर्लभ अवसर का समुचित लाभ उठाने से वंचित रहना पड़ता है।

मन की इस प्रवृत्ति को उलट देने के लिए किये गये प्रयास ‘तप’ कहलाते हैं। सुखानुभूति तो आत्मा की आकाँक्षा भी है, पर वह मन के स्तर से बहुत ऊँची, बहुत भिन्न है। मन की तृप्ति वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति में होती है। इसमें उपभोग लक्ष्य है। आत्मा उच्चस्तरीय आदर्शों के पालन में जो आनन्द पाता है; उसे संतोष या शाँति कहते हैं। संक्षेप में मन को भौतिक सुख की आकाँक्षा रहती है और आत्मा को आत्मिक संतोष एवं शाँति की। सुख मन का विषय है और संतोष आत्मा का। रस्साकशी में एक को हारना दूसरे को जीतना पड़ता है। मन जीतता है तो आत्मा को असहाय बनकर अतृप्त स्थिति में पड़ा रहना होता है। आत्म जीतता है तो मन को कुचलना पड़ता है। आरम्भ में उद्धत मन को संयत बनाने में काफी संघर्ष करना पड़ता है। पीछे तो उसमें समझौता हो जाता है। वन्य पशु जब पालतू बन जाते हैं तो मालिक से झगड़ने की अपेक्षा उसी के साथ फिरने लगते हैं। यही स्थिति मन की होती है। साधना द्वारा मन को इसी तरह सधाया जाता है; जिस प्रकार सरकस वाले सिंह जैसे आक्रमणकारी जन्तु को स्वामिभक्त, आज्ञाकारी एवं उत्पादक बनाने में सफलता प्राप्त कर लेते हैं। सरकस के पशु शिक्षक उन जन्तुओं की अनगढ़ आदतों को छुड़ाने और नये प्रकार के अभ्यास डालने में भारी माथापच्ची करते हैं। उन्हें मार और प्यार की दुहरी भूमिका निभानी पड़ती है। तप साधना और कुछ नहीं। मन की चंचलता और सुख लिप्सा वाली अनगढ़ आदतों को छुड़ाने और उसे उपयोगी प्रवृत्तियों में संलग्न होने का अभ्यस्त बनाने के लिए ऐसे काम करने पड़ते हैं जिन्हें मोटेतौर से क्रूर कर्म की संज्ञा भी दी जा सकती है। तप का बाह्य स्वरूप कुछ ऐसा ही निष्ठुरतापूर्ण है, यद्यपि उसके पीछे आत्मोत्कर्षण का दूरगामी दुलार ही दुलार छलकता देखा जा सकता है।

सुख को गौण और सन्तोष को प्रधान मानकर चलना—मन को गौण और आत्मा को प्रधान मानना यही वह परिवर्तन है जिसके आधार पर किसी को तपस्वी कहा जा सकता है। तप में तितीक्षा का—शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक असुविधाओं का अभ्यास इसलिए करना पड़ता है कि मन की अनगढ़ कुसंस्कारिता को—चंचलता और लिप्सा को छुड़ाया जा सके। उसे पतनोन्मुखी, बहिरंग ललकों से विरत करके उच्चस्तरीय आध्यात्मिक आदर्शवादिता अपनाने के लिए सहमत करना ही तप साधना का एकमात्र उद्देश्य है। इसमें जो कड़ाई बरतनी पड़ती है उसे सुधार प्रयोजन के लिए कुछ क्षण के लिए बरती गई विवशता भर समझना जाना चाहिए। उसे प्रसव पीड़ा की उपमा दी जा सकती है। ऐसे तो सत्परिणाम प्राप्त करने के लिए मन मारना पड़ता है और अपने रूखे नीरस प्रयोजनों में तन्मय होना पड़ता है। मोटेतौर से इस साधना को अपने साथ बरती गई कठोरता ही कह सकते हैं। दूसरे शौक−मौज में निरत साथी इसे मूर्खता भी कह सकते हैं, पर वस्तुतः वह आरम्भ में बीज की तरह गलने के लिए और पीछे विशाल वृक्ष के रूप में विकसित करने वाली दूरगामी बुद्धिमत्ता ही है।

तपस्वी को आरम्भ में कष्ट सहना पड़ता है। उसकी शारीरिक सुख सुविधाओं में कटौती होती है, मानसिक हास−परिहास का अवसर भी छिनता है, औचित्य को रखकर उपार्जन और उदार उपयोग का ध्यान रखने से समृद्धि भी बढ़ नहीं पाती। इन तीनों क्षेत्रों में कमी पड़ने को मोटेतौर से मूर्खता कह सकते हैं, पर चूँकि उसके पीछे जो उज्ज्वल सम्भावनाएँ विद्यमान हैं, उन्हें थोड़ी लागत में तगड़ा मुनाफा कमाने जैसी बुद्धिमत्ता ही कहा जा सकता है।

तपाने से वस्तुएँ गरम होती हैं और उनका संशोधन होता है, दृढ़ता आती है तथा स्तर बढ़ता है। वस्तुओं की तरह ही व्यक्ति भी तप−साधना से परिष्कृत होता और सुदृढ़ बनता है।

कच्ची मिट्टी से बनी ईंटों द्वारा विनिर्मित मकान वर्षा में गलने लगता है, पर यदि इन्हीं ईंटों को आग में पका लिया जाय तो उनसे बनी इमारतें मुद्दतों चलती हैं। चूना और सीमेन्ट क्या है? कंकड़−पत्थरों का पका हुआ चूरा। यदि इन्हें कच्चा पीसकर इमारत में लगाया जाय तो काम नहीं चलेगा। पकाये जाने पर उनमें ईंटों को पकड़ लेने और भवन को चिरस्थायी बना देने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है। धातुएँ खदान में से मिट्टी मिली—कच्ची अवस्था में निकलती हैं। उन्हें भट्टी में तपाया जाता है तब लोहा, ताँबा आदि शुद्ध बनते और काम में आते हैं। लोहे को अधिक मजबूत बनाने के लिए उसे अधिक तपाया जाता है। काटने वाले शस्त्र तथा औजारों की ‘धार’ अधिक गर्मी देकर ही सुस्थिर बनाई जाती है।

आयुर्वेद के रसायनवेत्ता कई प्रकार की गुणकारी भस्में बनाते हैं। अभ्रक भस्म, वंग भस्म, प्रबाल भस्म, लौह भस्म आदि के गुण प्रख्यात हैं। यह उन साधारण सी वस्तुओं के तपाने, गरमाने का ही प्रतिफल है। पानी गरम करने से भाप बनती है और उससे रेल गाड़ी का इंजन जैसी भारी वस्तुएँ धकेली जाती हैं। बल्ब का जरा−सा ‘फिलामेंट’ जब गरम होता है तो रोशनी देता है। दीपक के बारे में भी यही बात है, गर्मी ही प्रकाश के रूप में परिवर्तित होती है, उसी को शक्ति के रूप में परिणत किया जाता है। व्यक्तित्व की सत्ता को तपाने से भी उसमें सर्वतोमुखी प्रखरता उत्पन्न होती है। प्राचीन काल में विद्यार्थियों को गुरुकुलों के कठोर वातावरण में रहकर पढ़ने के लिए भेजा जाता है कि वे कष्टसाध्य जीवनयापन करते हुए अपने शरीर को सुदृढ़ और मन को सहनशील बनाने की साधना में उत्तीर्ण होकर प्रखर प्रतिभा विकसित कर सकें।

कच्चे फलों को भूखे या अनाज की गर्मी में बंद रख कर पकाया जाता है। आम प्रायः इसी प्रकार पाल में पकता है और अपना खट्टापन हटाकर मीठा बनता है। दूध को गरम करने पर घी उपलब्ध होता है। सामान्य पानी को औषधि उपयोगी ‘डिल्सिल्ड वाटर’ बनाने के लिए उसे मिट्टी पर चढ़ाया जाता और भाप बनकर उड़ाया जाता है। तप−साधना द्वारा कष्टसाध्य परिस्थितियाँ उत्पन्न की जाती हैं और उन्हें सहन करने की तितीक्षा का सहारा लेकर अपने को परिष्कृत करना पड़ता है, सोने को आग में तपाकर ही विविध प्रकार के आभूषण बनते हैं। अन्य धातुओं से भी उपकरण तभी बनते हैं जब उन्हें आग में डालकर कोमल बनाया जाय। मनुष्य की जड़ता एवं कठोरता को सुकोमलता में बदलने और अमुक ढाँचे में ढालने के लिए तपश्चर्या की रीति−नीति अपनाना आवश्यक होता है। आरामतलबी और सुख−सुविधा के भरे वातावरण में पलने वाले लोग अविकसित स्थिति में पड़े रहते हैं उनकी विविध क्षमताएँ विकसित होने की बात बनती ही नहीं। उस्तरे पर धार रखने से ही उसमें पैनापन बढ़ता है और चमक दीखती है। उसे ऐसे ही एक कोने में पड़ा रहने दिया जाय तो धीरे−धीरे जंग चढ़ती जायगी और वह गलकर अपनी मौत मर जायगा। सुविधा के अभिलाषी लोग अपना पुरुषार्थ खोते चले जाते हैं। तीक्ष्णता की वृद्धि और रक्षा के लिए रगड़ आवश्यक है। फौज के सैनिकों को यदि नित्य ‘परेड’ करने और दौड़ लगाने का अवसर न मिले तो वे थोड़े ही दिनों में तोंद वाले सेठ बन जायेंगे तब उनके लिए लड़ सकना तो दूर अपनी काया का बोझ ढोना भी कठिन पड़ेगा।

इतिहास, पुराणों में ऐसे असंख्य आख्यान मौजूद हैं जिनसे प्रतीत होता है कि विशिष्ट शक्ति संपन्न लोगों को विभूतियाँ उपार्जन में तप−साधना का ही आश्रय लेना पड़ा था। भागीरथ द्वारा तप करके गंगा को धरती पर लाया जाना, पार्वती का शिव से विवाह संपन्न होना, ध्रुव का तप करके ब्रह्माण्ड का केन्द्र बनना, दधीचि की अस्थियों से वज्र बनना और उससे असुरों का मारा जाना, अगस्त्य का समुद्र शोषण, विश्वामित्र का नई सृष्टि का निर्माण, सात सामान्य मनुष्यों का सप्तऋषि बनना—जैसी अगणित कथाएँ तप की शक्ति का परिचय प्रस्तुत करती हैं।

भगवान् कृष्ण को सुसंतति प्राप्त करने के लिए रुक्मिणी सहित लंबी अवधि तक मात्र जंगली बेर खाकर उस स्थान पर तप करना पड़ा था, जहाँ आज कल बद्रीनाथ धाम है। दलीप ने रानी सहित वशिष्ठ की गौएँ चराने का दीर्घकालीन तप करके सुसंतति प्राप्त की थी। स्वयंभू मनु और शतरूपा रानी के तप ने उन्हें राम जैसा पुत्र दिया था और काश्यप् तथा अदिति के तप ने कृष्ण को गोदी में खिलाने का वरदान दिलाया था। इन प्रसंगों में यह प्रतिपादन है कि तप द्वारा मनुष्य भगवान का भी पिता बन सकता है।

आत्म−साधना में तपश्चर्या को प्रमुखता दी गई है। तप के कारण उसकी गर्मी से प्रसुप्त शक्तियों के जागरण की परिस्थितियाँ बनती हैं।


तप द्वारा दिव्य शक्तियों का जागरण

आत्मिक प्रगति की साधना में कई प्रकार के कठोर नियम पालन करने पड़ते हैं। व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य जैसी तितीक्षाओं से शरीर को इस योग्य बनाया जाता है कि वह कठिनाइयाँ सहने का अभ्यस्त तथा तज्जनित गर्मी से सुदृढ़ होने का अवसर प्राप्त कर सके।

उपवास के लाभ सर्वविदित हैं। पेट को विश्राम देने से उसमें जमा अपच दूर होता है और थकान दूर होने से पाचन क्रिया में तीव्रता आती है। प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति में रोग निवृत्ति का प्रधान उपाय उपवास को माना गया है। उदर शोधन के अतिरिक्त उपवास का विशेष लाभ यह है कि उससे मनोविकारों का शमन होने लगता है। जो शक्ति पालन में लगती है वह यदि बच सके तो उसका उपयोग मन के अपच को—विचार विकृति को दूर करने में लग सकता है। भारतीय धर्म में पुण्य पर्वों एवं शुभ अवसरों पर उपवास को बहुत महत्व दिया गया है। विवाह के दिन वर−वधू के उपवास करने की प्रथा है। दैनिक उपासना पूरी न हो जाने तक कुछ न खाने−पीने का नियम कई लोग पालते हैं—यह उपवास का ही छोटा रूप है। उपवास को तप माना गया है।

अन्न का मन से घना संबंध है। दैनिक जीवन में सतोगुणी आहार ही अपनाने की बात ध्यान में रखी जाय तो उसका प्रतिफल विचार शुद्धि के रूप में भी परिलक्षित होगा। नीति उपार्जित परिश्रम की कमाई ही खाई जाय। पकाने वाले तथा परोसने वाले व्यक्ति शारीरिक और मानसिक दृष्टि से पवित्र हों। खाते समय भगवान को मन ही मन भोग लगाने और उसे प्रसाद समझ कर औषधि रूप में ग्रहण करने की भावना रखी जाय। चटोरेपन की विलासिता से बच कर केवल आहार की सात्विकता भर से संतुष्ट रहा जाय। अन्न को देवता मानकर उसका सम्मान किया जाय और जूठन के रूप में उसकी अनावश्यक बर्बादी न की जाय। यह बातें सामान्य लगती हैं, पर आत्मिक प्रगति की दृष्टि से उनका बहुत महत्व है। “जैसा खाये अन्न—वैसा बने मन” वाली उक्ति बहुत ही सारगर्भित है। मन को सात्विक बनाना आत्मोत्कर्ष की दृष्टि से निताँत आवश्यक है। उसके लिए आहार शुद्धि को प्रथम चरण कहा जा सकता है। माँसाहार—नशेबाजी—अशुद्ध व्यक्ति और वातावरण में पकाया और परोसा गया मिर्च मसालों से भरा गरिष्ठ और उत्तेजक आहार मनः क्षेत्र में तमोगुण उत्पन्न करता है और उसका प्रभाव चित्त की अस्थिरता बनकर उपासना क्रम में भारी विघ्न उत्पन्न करता है।

पिप्पलाद ऋषि पीपल वृक्ष के फल खाकर निर्वाह करते थे। कणाद ऋषि शिलौञ्च वृत्ति से जंगली धान्य खा कर गुजारा करते थे। यह अन्न बुद्धि की प्रक्रिया है। हमें स्वयं लंबी अवधि तक मात्र जौ की रोटी और छाछ इन दो ही वस्तुओं पर रह कर पुरश्चरण क्रम चलाना पड़ा है। अभक्ष्य खाने से मन की विकृति का होना स्पष्ट है। शरशैया पर पड़े भीष्म पितामह जब धर्मोपदेश दे रहे थे तब द्रौपदी ने पूछा—देव! जब मुझे भरी सभा में निर्वस्त्र किया जा रहा था, तो आपने यही धर्मोपदेश कौरवों को क्यों नहीं दिये? उत्तर में भीष्म ने इतना ही कहा—उन दिनों मैं कुधान्य खा रहा था, अस्तु धर्मज्ञान रहते हुए भी उसे चरितार्थ करने का साहस सम्भव न हो सका।

आहार शुद्धि के लिए हम अपने खाद्य पदार्थों में सात्विक वस्तुएँ ही स्वीकार करें। दो बार से अधिक भोजन न करने का नियम बना लें। दूध, छाछ, रस, क्वाथ जैसे पेय पदार्थों के अतिरिक्त बीच−बीच में अन्य चीजें न लें। भूख से कम खायें। जल्दी न निगलें, चबा कर खायें। सप्ताह में एक दिन अथवा एक जून निराहार रहें अथवा फल शाक दूध आदि पर निर्वाह करें। साप्ताहिक उपवास की परम्परा चल पड़े तो देश की जटिल खाद्य समस्या का सहज समाधान निकल सकता है। साथ ही अपच का हल निकल आने से स्वास्थ्य संकट भी बहुत हद तक हल हो सकता है।

सप्ताह में एक दिन अस्वाद व्रत का पालन भी एक प्रकार का उपवास ही माना जा सकता है। नमक, मसाले, शकर जैसी वस्तुएँ मात्र स्वाद के लिए खाई जाती हैं। उपयोगी स्तर का—उपयुक्त मात्रा में नमक शकर आदि तो अन्न, शाक, फल, दूध आदि में सहज ही मिल जाता है। ऊपर से इन चीजों का लिया जाना स्वास्थ्य के लिए नहीं वरन् स्वाद के लिए ही प्रयुक्त होता है। स्वाद के लोभ में आहार की अधिक मात्रा उदरस्थ होती है और अपच उत्पन्न करके तरह−तरह के रोगों को जन्म देती है। स्वाद पर काबू पाना भी एक प्रकार का तप है। बिना नमक, शकर, मसाले आदि का भोजन सप्ताह में एक दिन भी किया जाता रहे तो इससे स्वादेन्द्रिय पर नियन्त्रण करने की तपश्चर्या चल पड़ेगी। गाँधी जी ने अपनी ‘सप्त महाव्रत’ पुस्तिका में ‘अस्वाद’ को प्रथम व्रत माना है और उसके फलस्वरूप ब्रह्मचर्य पालन तथा मनोनिग्रह में सफलता मिलने का प्रतिपादन किया है।

मनोनिग्रह तपश्चर्या में दूसरा व्रत ब्रह्मचर्य पालन है। स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से रतिक्रिया के अवसर न्यूनतम ही आने देने चाहिएं। बहुमूल्य जीवन रस को फुलझड़ी की तरह जलाने का अत्यन्त महंगा खिलवाड़ करने से बचना चाहिए। इससे अपनी और सहयोगी की हानि ही हानि है। क्षणिक विनोद की तुच्छता और शक्ति सञ्चय की महत्ता को समझते हुए इस दिशा में अधिकाधिक संयम बरता जाना ही दूरदर्शिता है। इस बचत का लाभ शारीरिक और मानसिक सुदृढ़ता के रूप में सामने आता है और आत्मिक प्रगति की दिशा में उस संचय से भारी सहायता मिलती है।

शारीरिक ब्रह्मचर्य से भी अधिक महत्व मानसिक कामुकता से बचने का है। शरीर क्षरण तो यदा−कदा ही होता है, पर कुदृष्टि एवं काम चिन्तन के फलस्वरूप मानसिक विकृति घड़ी−घड़ी उत्पन्न होती रहती है। काम सेवन से जिस प्रकार शारीरिक शक्ति घटती है उसी प्रकार काम चिन्तन से मनोबल एवं आत्मबल घटता है इससे आत्म−शक्ति में कमी पड़ती जाती है। ऐसी दुर्बल मनःस्थिति में वे आधार नहीं बन पाते जिनसे आत्मोत्कर्ष की दिशा में आशाजनक प्रगति संभव होती है। पुरुषों को नारियों के प्रति और नारियों को पुरुषों के प्रति पवित्र दृष्टि रखनी चाहिए। कामुक चिन्तन भी मानसिक व्यभिचार माना गया है और उससे होने वाली हानि को आत्मिक प्रगति के मार्ग में भारी व्यवधान माना गया है। मन को कामुक चिन्तन से बचाने के लिए उसके प्रति−पक्षी पवित्र भावों को अधिक समय तक मन में स्थान देना चाहिए। जितनी देर अशुद्ध चिन्तन के लिए मस्तिष्क को छूट दी जाती है, उतनी ही सुविधा यदि परिष्कृत चिन्तन के लिए दी जा सके तो उस परिष्कृत मनोभूमि से काम, क्रोध, लोभ, मोह, मत्सर, चिन्ता, निराशा, भय आदि का कोई कुविचार, मनोविकार पनप न सकेगा। सृजनात्मक शुभ चिन्तन के विचारों से मन को भरा पूरा रखने के लिए स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन का आश्रय लेकर मनोभूमि ऐसी प्रौढ़, परिपक्व बनाई जा सकती है जिसमें कुविचारों को पैर जमाने के लिए तनिक भी गुंजाइश न रहे।

हनुमान, भीष्म, शंकराचार्य, समर्थ विवेकानन्द आदि ब्रह्मचारियों के उज्ज्वल चरित्रों पर बार−बार विचार किया जाना चाहिए। शिवाजी ने एक अनिद्य सुन्दरी को उपभोग के लिए प्रस्तुत किये जाने पर इतना ही कहा था—“ऐसी सुन्दर मेरी माता होती तो मैं इतना सुन्दर होता”। अप्सरा उर्वशी ने अर्जुन से उसी जैसा पुत्र पाने के उद्देश्य से काम प्रस्ताव किया तो अर्जुन ने उत्तर दिया—“आप कुन्ती की तरह मेरी माता और मैं आपका सगे पुत्र की तरह बालक हूँ। इसी प्रकार तत्काल आपकी पुत्र प्राप्ति की मनोकामना पूर्ण हो जाती है।” ऐसी ही पवित्र दृष्टि रखने से आत्मबल सञ्चित होता है। इस मनोनिग्रह को तप की ही संज्ञा दी गई है। स्वादेन्द्रिय और कामेन्द्रिय की स्थूल और सूक्ष्म लिप्सा पर काबू पाया जा सके तो समझना चाहिए कि इन्द्रिय निग्रह का उद्देश्य पूरा हो गया। आँख, नाक, कान आदि की चित्त को चंचल बनाने में तनिक ही भूमिका रहती है। प्रधान तो यही दो स्वादेन्द्रियाँ हैं इनका उपभोग और चिन्तन रोकने के लिए जो प्रयत्न किये जाते है, उन सभी को तपश्चर्या का अंग माना गया है।

भूलों के लिए शारीरिक−मानसिक दण्ड, प्रताड़ना को प्रायश्चित कहते हैं। यह भी तप वर्ग में ही आती हैं। दैनिक भूलों को समझना और भविष्य में वैसा न होने देने की सतर्कता तीव्र करना—यदि नैतिक गलतियाँ हुई हैं तो उनके लिए भोजन में आँशिक कटौती, अमुक समय का मौन, नींद में कटौती, अतिरिक्त श्रम, उठक−बैठक जैसी प्रताड़ना, दण्ड व्यवस्था स्वयं की जा सकती है। पिछले जीवन में कोई बड़े अपराध बने हों तो उनके लिए चांद्रायण व्रत, दाढ़ी बढ़ाना, अमुक समय नंगे पैर रहना, पैदल तीर्थ यात्रा, धनदान जैसी किन्हीं विशेष प्रायश्चित्यों की व्यवस्था किसी उपयुक्त नीतिवेत्ता के परामर्श से करनी चाहिए। इससे मन पर चढ़े हुए पाप भार से निवृत्ति मिलती है।

स्थूल शरीर को तपाने वाली उपरोक्त कुछ कष्ट साध्य तप-तितीक्षाओं का उल्लेख किया गया है। सूक्ष्म शरीर मन को तपाने के लिए तृष्णा और वासना का लोभ और मोह का परित्याग करना पड़ता है। वैराग्य इसी का नाम है। सादा जीवन उच्च विचार का घनिष्ठ सम्बन्ध है। सूक्ष्म शरीर में उत्कृष्टता बनी रहे इसके लिए सादगी का नम्रता एवं मितव्ययिता का अपनाया जाना आवश्यक है। खर्चीली तड़क-भड़क और उद्धत ठाट−बाट से बचाया जाय और भोजन, वस्त्र, निवास आदि जीवन चर्या के प्रत्येक क्षेत्र और औसत नागरिक जैसी सादगी बरती जाय। खर्च उतना ही किया जाय जितना निर्वाह के लिए निताँत आवश्यक हो। आवश्यकताएँ और भौतिक महत्वाकांक्षाएँ घटाई जाएं ताकि उनमें लगने वाला समय श्रम और मनोयोग परमार्थ प्रयोजनों में लगाने के लिए बचाया जा सके।

संयम और सादगी की नीति अपना कर शक्तियों का संचय एवं अभिवर्धन करने के लिए प्रयत्नशील रहने में अपने साथ कठोरता बरतना (2) लोक मंगल के पुण्य प्रयोजनों में अपनी सामर्थ्य का बड़ा भाग लगाने के कारण स्वयं को कठिनाई में रहने की स्थिति का अभ्यास (3) स्वार्थरत लोगों जितना भौतिक लाभ उपार्जन करने में न्यूनता रह जाने पर भी संतोष (4) अनीति से संघर्ष करने में आसुरी तत्वों के आक्रमण से आघात। यह सब कारण ऐसे हैं कि जिनसे उच्चस्तरीय महा मानवोचित जीवन जीने वालों को आये दिन बास्ता पड़ता है। विलासी और महत्वाकांक्षी रीति−नीति अपनाने वालों का न्यायोचित उपार्जन अपनी बढ़ी−चढ़ी आवश्यकताएं भी पूरी नहीं कर पाता और फिर वे मानवता के महान् कर्तव्यों का पालन करने के लिए समय और साधन कहाँ से पायें? यह प्रयोजन अपने साथ मितव्ययिता कष्ट सहिष्णुता, मनोनिग्रह जैसी सख्ती बरते बिना और किसी प्रकार पूरे नहीं हो सकते।

अनीति पर उतारू लोगों को सिद्धान्तवादी सहन नहीं हो सकते वे देखते हैं कि प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप से वे उनके स्वेच्छाचार में बाधक हैं। नीति का समर्थन और अनीति का विरोध करना भी उनके स्वार्थों पर चोट पहुँचाता है। वे सोचते हैं, यह रोड़ा रास्ते से हटाकर निष्कंटक होना चाहिए। ऐसी दशा में अनीति पोषकों के आक्रमण का शिकार होना पड़ता है। फिर कई बार ऐसी विवशता आ जाती है कि अवाँछनीयताओं को चुपचाप सहने के लिए अपना अन्तरात्मा तैयार नहीं होता और अन्याय से जूझने में बड़ी से बड़ी हानि उठाने के लिए भी अपना शौर्य−साहस तन कर खड़ा हो जाता है। प्रसिद्ध है कि आक्रान्ता लोग संगठित हमला करते हैं, पर बचाव पक्ष के लोग अपनी भीरुता अथवा तथाकथित शांतिप्रियता के कारण मुँह छिपाये बैठे रहते हैं। चार गुण्डों का मुकाबला करने में चालीस सामान्य लोग हलके पड़ते हैं। ऐसी दशा में अन्याय विरोधी अकेला पड़ जाता है और उसे अपनी विरोधात्मक साहसिकता के कारण कई प्रकार के आघात सहने पड़ते हैं। इतिहास के पृष्ठों पर संतों सुधारकों और शहीदों को दुष्टों द्वारा तरह−तरह से सताये जाने के अगणित घटनाक्रम मिलते हैं। इनका दोष इतना ही था कि उनने अवाँछनीयताओं के साथ असहयोग, विरोध प्रकट किया था और उनका उन्मूलन करने का प्रयास कर रहे थे। विरोध न करने से अनीति को प्रोत्साहन मिलता है और वह सौ गुने उत्साह से विनाश पर उतारू होती है ऐसी दशा में प्रतिरोध अनिवार्य हो जाता है। तब जो इतना साहस दिखाएं वे चोट सहने को भी तैयार रहें। इसी की पूर्व तैयारी के लिए भी कष्ट सहिष्णुता का पूर्वाभ्यास करना पड़ता है।

सुविधा भरा जीवन आलसी बनाता है और प्रतिभा को प्रसुप्त स्थिति में धकेल देता है। संघर्षमय, कठिनाई भरे जीवन में अन्य असुविधाएँ कितनी ही क्यों न हों, इतना लाभ स्पष्ट है कि उससे मनुष्य की प्रखरता निखरती है। अमीरी के वातावरण में से कदाचित ही कभी कोई प्रतिभाएँ उभरती हैं। संसार भर के महामानवों के इतिहास में यह तथ्य स्पष्ट है कि वे या तो कठिनाइयों की परिस्थिति में जन्मे थे अथवा उनने जानबूझकर कठिनाइयों से भरा जीवन−क्रम अपनाया था। पत्थर पर रगड़ने से ही चाकू की धार तेज होती है मानवी प्रतिभा के तीक्ष्ण होने में भी यही तथ्य काम करता है।

गायत्री पुरश्चरणों के समय आमतौर से साधकों को भोजन संयम, अस्वाद, व्रत−उपवास, ब्रह्मचर्य पालन, अपने शरीर की सेवा—कपड़े धोना, हजामत बनाना आदि कार्य स्वयं करना, कोमल शैय्या त्याग कर भूमि या तख्त पर सोना, मारे हुए पशुओं का चमड़ा प्रयोग में न लाकर करुणा का परिचय देना, कुछ समय मौन रहना जैसी तितीक्षाएँ बरतने के लिए कहा जाता है। इस निर्देश के पीछे तथ्य इतना ही है कि कष्ट सहिष्णुता का अभ्यास करते हुए हर घड़ी यह विचार करते रहा जाय कि आदर्श जीवन जीने वाले के लिए स्वेच्छापूर्वक असुविधाएँ सहन करने में उत्साह एवं संतोष करने का स्वभाव परिपक्व करना आवश्यक है। अभ्यास रहने से, वैसा चिन्तन चलते रहने से अवसर आने पर वे अड़चनें अप्रत्याशित नहीं लगतीं और सोचा जाता है यह तो होना ही था, इसकी तैयारी तो पूर्वाभ्यास के रूप में देर से की जाती रही है।

तप तितीक्षा में शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक कठिनाई को स्वेच्छापूर्वक आमंत्रित किया जाता है। इसे देवता के प्रति भक्ति भाव प्रदर्शन का प्रमाण माना जाता है। वस्तुतः यह देवता और कोई नहीं ‘आत्म देव’ ही है। अपने आपको परिष्कृत करके देव के स्तर तक पहुँचाने के प्रयास ही वास्तविक साधनाएँ हैं। उसी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए साधन—विधान का ढाँचा खड़ा किया गया है। यह तथ्य समझ लेने पर ही साधक को तत्व ज्ञान उपलब्ध हो गया माना जायगा।


प्रतीक उपासना की आवश्यकता और उपयोगिता

आत्मा को परमात्मा से मिलाने वाली योग साधना के पथ पर अग्रसर होने की दिशा में प्रथम कक्षा साकार उपासना की है। उसमें आकृति सहित परमात्मा की कल्पना करनी पड़ती है। उसे उच्चस्तरीय श्रेष्ठताओं से सम्पन्न माना जाता है, समीप उपस्थित अनुभव किया जाता है, सघन श्रद्धा का आरोपण करते हैं, गहरी प्रेम भावना उमगाते हैं और उनके साथ घनिष्ठता बनाते हैं। इसी कृत्य के अंतर्गत आने वाले विविध उपचार भक्ति साधना कहे जाते हैं। ‘लय’ प्रक्रिया का यह प्रथम सोपान है। अचिन्त्य चिन्तन में असमर्थ—स्थूल भूमिका की मनःस्थिति के लिए यही कृत्य सरल पड़ता है और चेतना का स्तर आगे बढ़ाने में सहायता करता है। प्रतीक उपासना का सारा ढाँचा इसी प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुआ समझा जाना चाहिए।

परब्रह्म एक सर्वव्यापी चेतना शक्ति है। उसके साथ जितनी अधिक घनिष्ठता जुड़ती चली जाती है उसी अनुपात से जीवात्मा की उत्कृष्टता एवं क्षमता बढ़ती जाती है। चेतना को चेतना के साथ घनिष्ठता के बंधनों में बाँधने के लिए एक ही आधार है—सद्भाव भरी स्थिर आतुरता। इसी स्थिति को दूसरे शब्दों में प्रेम या भक्ति कहा गया है। लौकिक जीवन में भी इस प्रकार की आतुरता जिस पदार्थ, व्यक्ति या स्थिति के प्रति होती है उसके लिए समूचा व्यक्तित्व प्रयत्नरत हो जाता है और देर−सबेर में इष्ट प्रायः पूरा होकर ही रहता है। चेतना को चेतना से मिलाने के लिए भी यही भावभरी किन्तु स्थिर आतुरता अभीष्ट है। भक्ति भावना उत्पन्न करने के लिए ईश्वर का स्वरूप बनाने—उस पर श्रद्धा, आत्मीयता, समीपता एवं एकता आरोपित करने के प्रयास किये जाते हैं और वे अभीष्ट प्रयोजन पूरा भी करते हैं।

सार्वजनिक मन्दिरों में अथवा व्यक्तिगत पूजा कक्षों में—भगवान के विविध प्रतीकों की स्थापना करके उनका महामानव गुरुजनों जैसा स्वागत, सत्कार किया जाता है। पञ्चोपचार, षोडशोपचार के विधान उसी के लिए बनाये गये हैं। जितनी देर प्रतिमा सामने रहती है, उतने समय ईश्वर के सान्निध्य का अनुभव होता है—उसका बड़प्पन स्वीकारा जाता है और श्रद्धाभिव्यक्ति से उन्हें सम्मानित करने वाले शिष्टाचारों का प्रदर्शन किया जाता है। पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान, पुष्प, चंदन, धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य आरती, नमस्कार आदि के विविध कृत्य समीपता और श्रद्धा की अनुभूति को विकसित करने में सहायता करते हैं। निष्ठा की परिपक्वता के लिए कल्पित देव प्रतिमाओं को यथार्थ मानने की मनः स्थिति उत्पन्न की जाती है।

इससे आगे की सूक्ष्म प्रतीक पूजा यह है जिसमें आँखें बन्द करके अथवा अधखुली रखकर इष्टदेव की प्रतिमा का ध्यान किया जाता है और श्रद्धा, समीपता एवं एकता की वैसी ही भावना की जाती है, जैसी कि मूर्तिपूजा में स्थूल प्रतिमा की। अंतर इतना ही रहता है कि मूर्तिपूजा में प्रतीक उपकरणों की प्रत्यक्ष आवश्यकता पड़ती है और जबकि ध्यान में वह सारे कार्य मात्र कल्पना के सहारे ही पूरे हो जाते हैं। ध्यान में इष्टदेव को हँसता, मुसकाता और श्रद्धा समर्पण के अनुरूप प्रत्युत्तर देता हुआ सोचा जा सकता है। यह स्थिति अधिक उत्साहवर्धक होती है और एकाग्रता का लाभ भी अधिक देती है। इसलिए इस मानस पूजा को भावनाशील, कल्पनाशील साधकों के लिए प्रयुक्त होने वाली उपासना का अगला ऊँचा चरण माना गया है।

प्रतीक साधना की मूर्ति पूजा एवं इष्टदेव के साकार ध्यान में दो कक्षाएँ हैं। मूर्तिपूजा को प्राइमरी शिक्षा और इष्ट ध्यान को हाईस्कूल स्तर की पढ़ाई कह सकते हैं। इसके आगे की कालेज कक्षा है। उसे निराकार साधना कह सकते हैं। उसमें भगवान को मनुष्य रूप में कल्पित नहीं किया जाता और न व्यक्ति के लिए किये जाने वाले स्वागत, सत्कारों की आवश्यकता पड़ती है। यों चिर अभ्यास को बनाये रहने के लिए नित्य कर्म में उसे सम्मिलित रखे रहना भी आवश्यक है। इससे संग्रहीत श्रद्धा परिपुष्ट होती रहती है। उच्चस्तरीय स्थिति पर पहुँचे हुए साधक भी नित्य कर्म के प्रतीक पूजा को छोड़ते नहीं वरन् आस्था को परिपक्व करने के लिए उसे भी पूर्ववत् अपनाये रहते हैं।

निराकार उपासना में भी ध्यान का अवलंबन तो करना ही पड़ता है—उसके बिना तो सम्पत्ति की पूर्णता में पहुँचने पर भी गति नहीं; पर यह ध्यान अधिक परिष्कृत होता है। भगवान व्यक्ति नहीं शक्ति बन जाता है और उसे स्थान विशेष पर प्रतिष्ठित नहीं वरन् व्यापकता के सहित अनुभूति में उतारा जाता है। यों मूर्ति पूजक भी प्रतिमा को प्रतीक ही मानते हैं और भगवान को सर्वव्यापी ही मानते हैं ध्यान के लिए ही वे उनकी अवतारी प्रतिमाएँ गढ़ते हैं निराकार ध्यान में उससे आगे की ध्यान धारणा अपनानी पड़ती है।

विराट् ब्रह्म की प्रतिमा निराकार वर्ग की प्रथम कक्षा है और उच्चस्तरीय सद्भावनाओं की सम्वेदना दूसरी। प्रथम वर्ग में अनुभव करना होता है कि यह समस्त दृश्य संसार भगवान का विराट् शरीर है। गीता में अर्जुन को और माता यशोदा को भगवान कृष्ण ने अपना यही स्वरूप दिखाया था। कौशल्या को पालना सुलाते समय और काक भुशुंडी की शंका समाधान के लिए राम ने भी इसी प्रकार का दिव्य दर्शन कराया था। विश्व−ब्रह्माण्ड गोल है इसलिए शिवलिंग एवं शालिग्राम की पाषाण प्रतिमाएँ गोलमटोल−ग्लोब आकृति की बनाई जाती हैं।

चित्र अथवा मूर्ति के आधार पर की जाने वाली उपासना के समय मन में यह निष्ठा जमनी चाहिए कि जिस दिव्य सत्ता के साथ घनिष्ठता जोड़नी है वह उपासना स्थल पर असामान्य स्थिति में विद्यमान है। इसके लिए प्रतीक प्रतिमा की स्थापना अनिवार्य रूप से आवश्यक है। आद्य शक्ति गायत्री माता की अथवा अपने विश्वास के आधार पर कोई अन्य प्रतिमा—एक छोटे किन्तु सुसज्जित सिंहासन पर स्थापित रहनी चाहिए। जब भी पूजा करनी हो तब उसी के सामने बैठ कर करना चाहिए। जिस स्थान पर जो कार्य बहुत समय तक किया जाता रहता है वहाँ अनायास ही ऐसी विशेषता उत्पन्न हो जाती है जिससे प्रेरित होकर उन कार्यों की पुनरावृत्ति के लिए मन मचलने लगता है। चाहे जहाँ—चाहे जब बैठकर—भजन करने पर मन लगा लेना कठिन है, पर नियत स्थान पर, नियम समय पर, पूजा स्थल पर बैठते ही मन स्वभावतः उन अभ्यस्त क्रियाओं को स्वेच्छापूर्वक दुहराने लग जायगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए नियत स्थान पर पूजा कक्ष का स्थापित करना और नियत समय पर नियत विधि से उपासना कृत्य को क्रियान्वित करना ही उपयुक्त रहता है।

प्रतीक प्रतिमा में भगवान का विशेष अवतरण होता है या नहीं। इस प्रश्न का उत्तर पदार्थ विज्ञान की दृष्टि से नहीं भाव विज्ञान की दृष्टि से दिया जा सकता है। ‘मीटर’ लगाकर प्रतिमा में भगवान की उपस्थिति नापी जायगी तो उत्तर निराशाजनक ही मिलेगा। पर भाव विज्ञान के ज्ञाता समझते हैं कि मान्यताएँ रस्सी को साँप और झाड़ी को भूत बना देती हैं, पत्थर में चमत्कारी देवता और मन्त्र में जादू उत्पन्न कर देती हैं। प्रतिमा में ईश्वर की, विशेष शक्ति की, विशेष मात्रा में—उपस्थिति मानी जाय तो वैसी ही अनुभूति निश्चित रूप से होती है। उपासना का ध्यान अनिवार्य अंग है। जप के साथ उसका जुड़ा रहना निताँत आवश्यक है। अन्यथा मन यहाँ−वहाँ भागता रहेगा। ध्यान, शब्द, रूप, रस, गंध स्पर्श की पाँच तन्मात्राओं में से किसी न किसी का आश्रय लिये बिना सम्भव नहीं हो सकता। यह तन्मात्राएँ क्रमशः आकाश, अग्नि, जल, पृथ्वी और वायु इन जड़ यन्त्र तत्वों की है। जड़ का आश्रय लिये बिना अपनी अंत−चेतना के लिए निराकार को पकड़ना तो दूर उसे समझने में भी समर्थ नहीं हो सकतीं। मूर्तिपूजा का विरोध करने वाले भी प्रकारान्तर से किसी न किसी पदार्थ में देव भावना करते हैं। यज्ञाग्नि, संगे असवद, क्रूस, राष्ट्रध्वज, सूर्य, तस्वीरें, यह सभी एक प्रकार की मूर्तियाँ हैं। इनमें दिव्य भावना रखना एक प्रकार से मूर्ति पूजा ही हो जाता है। गाँधीजी की समाधि हो अथवा लेनिन का सुरक्षित शव, इनमें से किसी के प्रति भी श्रद्धावनत हो जाना प्रकारान्तर से मूर्ति पूजा ही है।

पूज्य गुरुजनों की तरह उनके प्रथम दर्शन पर सम्मान, शिष्टाचार प्रदर्शित किया जाता है। उपासना के समय प्रतीक में देव शक्ति का आह्वान करने के उपराँत उनका सम्मानोपचार किया जाना चाहिए। इससे भाव निष्ठा में और भी अधिक परिपक्वता उत्पन्न होने का अवसर मिलता है। इस प्रयोजन के लिए पञ्चोपचार पूजन की परम्परा प्रचलित है। पञ्चोपचार में (1) जल (2) चावल−नैवेद्य (3) पुष्प (4) धूप दीप (5) चन्दन−रोली को गिना जाता है। इन्हें एक तश्तरी में रखना चाहिए और क्रमशः एक−एक को पास में रखी दूसरी तश्तरी में श्रद्धा, सम्मान की अभिव्यक्ति के लिए छोड़ते जाना चाहिए। यही दो ईश्वरीय शक्तियाँ लीला कर रही हैं। प्रकृति का प्रतीक जल और पुरुष का प्रतीक अग्नि को माना गया है। यह भी एक प्रकार से चित्र स्थापना ही है।

उपचार के इन उपकरणों के पीछे जीवन के दिव्य निर्माण की प्रेरणा है। इस विश्व ब्रह्माण्ड को ईश्वर का विराट् रूप माना जाना चाहिए और लोक−मंगल की क्रिया−प्रक्रिया द्वारा उसकी यथार्थ पूजा में संलग्न रहा जाना चाहिए। यह इस दिशा में पहला चरण, अपने आपको अधिक पवित्र, संयत एवं आदर्श बनाकर ही बढ़ाया जा सकता है। आत्म−निर्माण और विश्व−निर्माण की उभय−पक्षीय जीवन साधना संपन्न करने के लिए किन आदर्शों को सामने रखा जाय इसी का दिशा निर्देश इस पंचोपचार पूजा में प्रयुक्त होने वाले पदार्थों के साथ जुड़ा हुआ है।

जल—शीतलता, शाँति, नम्रता, विनय, सज्जनता का प्रतीक है—सत्प्रयोजनों के लिए हमें समय लगाना एवं श्रम बिन्दुओं का समर्पण करना है। उसी से श्रेष्ठ सत्कर्म बन पड़ते हैं। पाद्य, अर्घ्य, आचमन, स्नान के लिए श्रम, मनोयोग, प्रभाव एवं धन इन चारों उपलब्धियों का यथासम्भव अधिकाधिक भाग ईश्वरीय प्रयोजन के लिए समर्पित करेंगे।

अक्षत—उपार्जित अन्न, धन, वैभव का प्रतीक है। अपनी कमाई को आप ही खाते रहने वाले अनुदार स्वार्थी को शास्त्रकारों ने ‘चोर’ कहा है। उपार्जन को अपने तथा परिवार के उपयोग भर में सीमित नहीं किया जाना चाहिए वरन् उसमें देश, धर्म, समाज, संस्कृति का भी भाग स्वीकार करना चाहिए। ईश्वर अर्थात् साकार रूप में विराट्−एवं निराकार रूप में सद्भाव, सदुद्देश्य। इनके लिए अपनी कमाई का एक बड़ा अंश नियमित रूप से निकाला जाय यह अक्षत समर्पण की प्रेरणा है।

पुष्प—अर्थात् खिलने−खिलाने की, हँसने हँसाने की, हलकी फुलकी जिन्दगी और सत्प्रवृत्ति। हम फूल जैसे कोमल रहें। भीतर और बाहर से सर्वांग सुन्दर बनें। इस विश्वोद्यान को शोभायमान बनाने वाला जीवन जियें। अपनी गरदन नुचवाने और मर्मभेदी सुई का छेदा जाना स्वीकार करके प्रभु के गले का हार बनने की आकाँक्षा रखें।

पूजा में पुष्प चढ़ाने का प्रचलन है। भगवान के चरणों पर, गले में, शिर पर तथा समस्त शरीर पर पुष्प अलंकार चढ़ाये जाते हैं। भगवान को पुष्प प्रिय है। इस संकेत में यही तथ्य है कि पुष्प जैसी हँसती हँसाती कोमलता भगवान को प्रिय है। अपना जीवन पुष्प ऐसा ही खिलना चाहिए; ताकि ईश्वर का परमप्रिय बन सके।

दीपक—स्नेह से, चिकनाई से भरा−पूरा—स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देने वाला—ऊपर को उठती हुई ज्योति दृष्टि । इन्हीं विशेषताओं के कारण दीपक को पूजा में स्थान मिला है। जिनके अन्तःकरण में असीम स्नेह, सद्भाव भरा है—जो परमार्थ के लिए बढ़−चढ़ कर त्याग, बलिदान कर सकते हैं, कष्ट सह सकते हैं। जिसकी दृष्टि , महत्वाकांक्षा, ऊर्ध्वगामी है। वे उत्कृष्ट आदर्शवादी है वे जीवन्त दीप ज्योति कहे जा सकते हैं। अपने को इसी मार्ग का पथिक बनाकर हम ईश्वर के निकटवर्ती और अनुकम्पा के अधिकारी बन सकते हैं। धूपबत्ती में अग्नि स्थापन भी प्रकाराँतर से दीपक की ही आवश्यकता पूर्ति करती है और यही उसकी भी प्रेरणा है।

चन्दन—वह वृक्ष जिसका कण−कण सुगंधित है और जो समीपवर्ती झाड़−झंखाड़ों को भी सुगन्धित करता है। अपनी शीतलता से साँप, बिच्छू जैसे विष दंश वालों तक को शान्ति प्रदान करता है। कहते हैं चन्दन वृक्ष पर लिपटे हुए सर्प, बिच्छू शाँति पाते हैं। उसकी छाया में बैठने वाले सुगंध भरी शीतलता प्राप्त करते हैं। उसकी लकड़ी काटने, बेचने वाले पत्थर पर घिसने वाले कष्टदायक लोग भी बदले में प्रतिशोध नहीं उपकार ही पाते हैं। नष्ट होते−होते भी चन्दन अपनी लकड़ी से भजन करने की माला, हवन−सामग्री का चन्दन चूरा दे जाता है। हमारी शक्ति, सामर्थ्य का उपयोग भी इसी प्रकार होना चाहिए।

चन्दन के अभाव में उसका प्रतीक रोली, पुष्प के अभाव में उसका प्रतीक चन्दन केशर में रंग चावल−दीपक की प्रतिनिधि अगरबत्ती काम में लाई जाती है। अक्षत और नैवेद्य (मेवा, मिष्ठान्न) भी एक ही प्रयोजन के लिए हैं। यह वस्तुएं अलग−अलग भी ली जा सकती हैं। इस प्रकार पञ्चोपचार की जगह अक्षत, नैवेद्य, धूप, दीप, चन्दन, रोली, जल, पुष्प, आठ भी हो सकते हैं। यहाँ संख्या की न्यूनाधिकता का अथवा मूल पदार्थ एवं प्रतीक भेद का विशेष महत्व नहीं है। आधार तो इन प्रतीकों के माध्यम से भावनाओं के परिष्कार की आवश्यकता अनुभव करना है।

इन पाँचों वस्तुओं में से जल, अक्षत, पुष्प, चन्दन तश्तरी में डाले जायं, नैवेद्य चौकी पर रखा जाय और उसे प्रमाद के रूप में उठा लिया जा सकता है। धूप, दीप, जहाँ के तहाँ रहने देने चाहिएं।

अभिवन्दन, नमस्कार, स्तवन, गुण−गान, यह सब भी देव पूजा वर्ग में ही आते हैं। इनमें भाषा, सम्प्रदाय क्षेत्र, प्रचलन आदि के आधार पर क्रियाकृत्य के विधि विधान में थोड़ा अंतर भी हो सकता है, पर मूल प्रयोजन सबका एक ही है। देव शक्ति को अपने चारों ओर सघनतापूर्वक घिरी−छाई अनुभव करना, उसके निकट बैठना, आत्म−समर्पण करना उसके प्रकाश−निर्देश को अन्तःकरण में धारण करके तदनुकूल जीवन ढालना यही है, देव स्थापन एवं आह्वान पूजन का प्रधान उद्देश्य। हमें देव आह्वान पूजन के आरम्भ और अंत में दो बार भगवान का ध्यान करते हुए नतमस्तक होकर, हाथ जोड़कर नमस्कार करना चाहिए। इस श्रद्धाभिव्यक्ति में परमेश्वर की इच्छा पूर्ति में संलग्न होने एवं अनुशासन मानने का भाव है।

इस संसार का सृजेता पोषक और परिवर्तनकारी एक ही परब्रह्म है। उसकी अगणित शक्तियाँ हैं। इन्हें एक ही शक्ति सागर की लहरें, एक सूर्य की अनेक किरणें कहा जा सकता है। किरणों के सात रंग यों अलग से भी देखे, जाने और प्रयोग में लाये जा सकते हैं, इतने पर भी सूर्य सत्ता से भिन्न उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।

ब्रह्म चेतना से ओत−प्रोत प्रज्ञा शक्ति को गणेश, समृद्धि शक्ति को लक्ष्मी, विद्या को सरस्वती, बलिष्ठता को, दुर्गा, सृजन शक्ति को ब्रह्मा, पोषण को विष्णु, परिवर्तन को शिव कहते हैं। इसी प्रकार अन्यान्य देवी देवताओं के संबंध में समझा जाना चाहिए। चिकित्सा एवं वैज्ञानिक आवश्यकतानुसार सूर्य की अमुक किरणों का उपयोग करते हैं। अल्ट्रावायलेट, अल्फावायलेट, एक्सरेज आदि को विभिन्न यंत्रों से पकड़ा और प्रयुक्त किया जाता है। देवी−देवता, परब्रह्म में सविता देवता की−भिन्न गुण, धर्म की किरणें कहा जा सकता है, पर साथ ही यह भी मानना होगा कि वे डाली में जुड़े हुए पत्तों की तरह एक ही महा शक्ति की स्फुरणाएँ मात्र हैं उनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है।

मनुष्य की आस्था अपनी श्रद्धा, विश्वास के सहारे कोई समर्थ दिव्य सत्ता का सृजन कर सकती है और उसकी हलचलें उतनी ही सामर्थ्यवान हो सकती हैं जितनी की इसकी श्रद्धा की गहराई। अनेक भक्तों की उनके उपास्य ने जो असाधारण सहायताएँ की हैं और चमत्कार दिखाये हैं इनमें देवताओं का स्वतंत्र अस्तित्व बल एवं उपासनात्मक विधि−विधानों का अंतर नहीं साधक के व्यक्तित्व की पवित्रता एवं उपास्य के प्रति गहन श्रद्धा को ही आधारभूत कारण मानना चाहिए। प्रतीक उपासना से इसी प्रयोजन की पूर्ति होती है।


देव पूजन से पूर्व आत्म−शुद्धि

देवालयों, तीर्थों एवं निजी पूजा ग्रहों में स्थापित देव प्रतिमा के आधार पर की गई पूजा, आराधना सर्वसुलभ एवं सामान्य मनोभूमि के लिए सर्वथा उपयुक्त है। यदि उसके पीछे जुड़ गई, भ्रान्तियों और अवाँछनीयताओं को हटा दिया जाय तो इस माध्यम को व्यक्ति एवं समाज के भावनात्मक एवं नैतिक स्तर को ऊँचा उठाने में बहुत ही सहायक सिद्ध पाया जायगा।

अमुक स्थान की प्रतिमा में अमुक प्रकार के चमत्कार हैं। जैसी मान्यताओं के पीछे यह बुद्धि काम करती है कि उस स्थान पर प्रतिष्ठित देवता अन्य देवताओं से भिन्न अस्तित्व का अथवा भिन्न सामर्थ्य का है। यह सोचना भ्रमपूर्ण है। सर्वत्र एक ही सत्ता संव्याप्त है। अलग−अलग स्थानों पर स्थापना में से विखण्डित नहीं किया जा सकता है। चमत्कार प्रतिमाओं में, विधि−विधानों में अथवा मंत्रों में नहीं होते। वह सब तो श्रद्धा की गहराई का प्रतिफल मात्र है। अनेक देववाद ने जन−मानस में बिखराव एवं विरोधाभास उत्पन्न कर दिया है और उस आधार पर परस्पर विरोधी अनेक सम्प्रदाय खड़े हो गये हैं। इसी प्रकार देवता अमुक प्रकार के उपहार या स्तवनों द्वारा प्रसन्न होते हैं यह मान्यता भी भ्रमपूर्ण है। इस भ्रान्ति की आड़ में पुजारियों ने भावुक लोगों से देवताओं के नाम पर लूट−खसोट का जाल फैलाया और अपना घर भरा है, तरह−तरह की भौतिक मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए अमुक प्रकार के प्रलोभन देकर देवताओं से अनुग्रह, वरदान प्राप्त किये जा सकते हैं, यह मान्यताएँ भी भ्रमपूर्ण हैं। ऐसी ही कई अवाँछनीयताएँ जुड़ जाने के कारण कई सुधारकों को मूर्तिपूजा का खण्डन करना पड़ा है। वस्तुतः उसमें खण्डन जैसी कोई बात है नहीं।

पुस्तक एक मूर्ति है। उसमें छपी हुई आड़ी−टेढ़ी लकीरों के रूप में अक्षर होते हैं। देखने में यह पुस्तक प्रतिमा सर्वथा जड़ है, उसमें चेतन नहीं खोजा जा सकता, पर उस पुस्तक के सहारे हमारे मनः क्षेत्र में मनीषियों द्वारा प्रतिपादित अत्यन्त महत्वपूर्ण विचार उत्पन्न होते और पनपते हैं। इस मानी में वह चेतन भी है। गीता की पुस्तक जड़ है, उसे झींगुर कीड़े, चूहे आसानी से काट सकते हैं। पर इतने भर से उस ज्ञान−प्रतिमा का मूल्य किसी भी प्रकार घट नहीं जाता। भगवान कृष्ण और अर्जुन के बीच हुआ दिव्य संवाद उसके पृष्ठों पर पढ़ा जा सकता है और वैसा ही लाभ लिया जा सकता है जैसा कि उस अवसर पर स्वयं उपस्थित रह सकने पर हो सकता था। पत्र व्यवहार में कितना महत्वपूर्ण आदान−प्रदान होता है, यह किसी से छिपा नहीं है। महत्वपूर्ण इकरारनामे और दस्तावेज जड़ कागज होता है, पर उनके आधार पर कितने बड़े फैसले होते हैं, इसे कौन नहीं जानता। चूँकि कागज पानी में गल सकता है इसलिए इस पर लिखे आलेखों का कोई महत्व नहीं, ऐसा सोचना उपहासास्पद है। हम अपने पूर्वजों, गुरुजनों अथवा मान्य प्रतीकों के प्रति असीम सम्मान रखते हैं और उनकी अवज्ञा पर दुःख मानते एवं रोष प्रकट करते हैं। भगवान जड़ तो नहीं है, पर वह जड़ पदार्थों में समाया हुआ न हो ऐसी भी कोई बात नहीं है। जब जड़ चेतन सभी में उसकी सत्ता विद्यमान है। तो प्रतिमा में उसकी उपस्थिति न होने की बात भी क्यों सोची जाय?

मानसिक ध्यान की सफलता के लिए मस्तिष्कीय विकास सामान्य स्तर की अपेक्षा से कुछ अधिक ऊँचा होना चाहिए। यदि उसे अध्ययन, चिन्तन, मनन आदि के द्वारा गहरा गोता मारने, कोमल संवेदनाओं को उभारने—किसी बात पर देर तक गम्भीर चिन्तन कर सकने योग्य विकसित न किया गया होगा तो समुचित ध्यान कर सकना सम्भव ही न हो सकेगा। अविकसित मानसिक स्तर के लोग इन्द्रिय सम्वेदना भर अनुभव करते हैं, वे कान या आँख की सहायता से देख या सुनकर कुछ सोच−समझ सकते हैं। कवियों, वैज्ञानिकों एवं दृष्टाओं जैसा सूक्ष्म चिन्तन उनके लिए सम्भव नहीं होता। अस्तु उन्हें उनकी स्थिति के अनुरूप दृश्य प्रतिमाओं के आधार पर परमात्मा की समीपता का उपासना उद्देश्य पूरा कराना होता है।

हर व्यक्ति नये क्षेत्र में प्रवेश करते समय बालक ही होता है चाहे वह अन्य विषयों में कितना ही सुयोग्य क्यों न हो? कोई अच्छा वकील अपने विषय का विशेषज्ञ हो सकता है, पर उसे नया शिल्प सीखते− समय बाल कक्षा के छात्र की तरह ही आरम्भ करना होगा। उपासना जिनका विषय नहीं रहा है वे अन्य विषयों के विद्वान होते हुए भी इस क्षेत्र में नौसिखियों की तरह ही प्रवेश करते हैं। अस्तु इन्हें ध्यान−प्रक्रिया का अभ्यास करने के लिए प्रतीक पूजा का आश्रय लेना सुविधाजनक ही रहता है। छतों पर सीमेंट, मिट्टी, लोहे का स्लैब ढालने के लिए उसके नीचे ‘सहारे’ खड़े करने होते हैं। छत कड़ी हो जाने पर ‘सहारे’ निकाल दिये जाते हैं और फिर वह अपने आप खड़ी रहती है, इतना ही नहीं अपने ऊपर वजन भी उठा लेती है। किन्तु आरम्भ में जबकि वह ढलाई गीली थी तो बिना सहारे के काम नहीं चल सकता था। प्रतीक पूजा की आरम्भिक अवस्था में आवश्यकता पड़ती ही है। निराकारवादी व्यक्ति रूप में न सही अन्य किसी प्रतीक को माध्यम बनाकर अपना काम चलाते हैं। नमाज पढ़ते समय काबा की तरफ मुँह किया जाता है। काबा अर्थात् ईश्वरीय शक्ति का विशेष प्रतिनिधित्व करने वाली इमारत है। दूसरे लोग सूर्य आदि के प्रकाश ज्योति को आधार बनाते हैं। कुण्डलिनी जागरण, चक्र वेधन आदि योगाभ्यासों में भी अमुक स्थानों को दिव्य शक्ति का केन्द्र मानकर वहाँ अपनी इच्छा शक्ति नियोजित करनी पड़ती है। यह भी ध्यान के ही रूप हैं और इनमें आकृति का सहारा लेना होता है। उपासना सन्दर्भ में जो विवाद चलता है, उसे साकार निराकार का रूप न देकर प्रतीक को व्यक्त आकृति का मानने न मानने की उलझन कहना ठीक है। पूर्ण निराकार का ध्यान तो नादयोग तथा दूसरी सम्वेदनाओं में भी नहीं हो सकता। शंख, घड़ियाल, बादल आदि की ध्वनियाँ सुनने का अभ्यास करते समय स्वभावतः उनके स्रोत की छवि मस्तिष्क में घूम जाती है। शंखनाद तो सुना जाय, पर शंख की आकृति ध्यान में आवे ही नहीं यह असम्भव है। गंध साधना में गुलाब पुष्प की सुगंध पर ध्यान एकाग्र करते हुए भी यह प्रश्न उपस्थिति होगा और उस सुगन्ध को पुष्प की आकृति से सर्वथा बचाते हुए ध्यान में लाया जा सकना सम्भव न होगा। इस विवाद को पूर्वाग्रहों से नहीं उपयोगिता की दृष्टि से ही हल किया जाना उचित है।

संसार में कई सम्प्रदाय साकारवादी और कई निराकारवादी है। अपना विचार व्यापक क्षेत्र में प्रयोग हो सकने वाली ऐसी साधन पद्धति का विकास करने का है जो आगे चलकर सार्वभौम, सर्वजनीन बन सके। इसलिए ध्यान प्रतीक में इन दोनों ही पक्षों का समन्वय करने की बात ध्यान में रखी गई है। निराकारवादी अन्तर्मुखी होकर ‘दिव्य−ज्योति’ के रूप में परमात्मसत्ता का दर्शन करते हैं। आमतौर से यह छोटा−बड़ा प्रकाश बिन्दु ही होता है। इसे सूर्य का प्रतीक मानते हैं। वस्तुतः यह ‘ज्ञान ज्योति’ है। मात्र चमक या गर्मी नहीं। अध्यात्म साधना में अग्निपिंड सूर्य की प्रतिमा भर माना गया है, उनकी मूल सत्ता ‘दिव्य ज्ञान’ कही गई है। निराकार ‘प्रज्ञा’ तत्व का साकार रूप ‘सविता’ है। सविता अर्थात् सद्ज्ञान को अन्तःकरण में आलोकित करने वाला प्रकाशवान परब्रह्म। ध्यान करते समय सूर्य पर एकाग्रता तो करनी चाहिए, पर साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यह ‘दिव्य आलोक’ का सद्ज्ञान रूपी प्रकाश का प्रतीक मात्र है। मात्र जड़ पिंड नहीं।

सूर्य पर ध्यान करते हुए यह अनुभूति विकसित की जाती है कि वह आलोक साधक के शरीर, मन और अन्तरात्मा में—स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में सक्रियता, सद्ज्ञान एवं सद्भाव बनकर प्रकाशवान हो रहा है। इन दोनों क्षेत्रों को आलोकित हुआ मानते हुए उत्तेजित, विकसित, परिष्कृत हुआ भी अनुभव किया जाता है। इस प्रकार सूर्य को न केवल आलोक दर्शन की दिव्य प्रक्रिया मात्र मानकर बात समाप्त कर दी जाती है, वरन् उसकी आभा से आत्म−सत्ता को पूरी तरह प्रकाशित एवं प्रभावित भी देखा जाता है। वस्तुतः यह ध्यान अपनी वर्तमान स्थिति को भविष्य में अधिक समुन्नत स्थिति में देखने की आस्था भर है। यह जितनी ही गहरी होगी, इसी अनुपात से साधन को लाभ मिलता चला जायगा।

साकार उपासना में नर और नारी की दोनों ही आकृतियों में परब्रह्म की प्रतिमा बनाई जाती रही है। दोनों में पवित्रता, कोमलता, उदारता, सेवा, समर्पण स्नेह, वात्सल्य जैसी दिव्य भावनाओं के आधार पर देखना हो तो नारी की गरिमा अधिक बैठती है। नारी दानी है और नर उपकृत। ईश्वर की प्रतिमा को किस रूप में माना जाय? इस दृष्टि से विवेक का सहज झुकाव नारी के पक्ष में जाता है। पुरुष की अपनी विशेषताएँ है—उनमें पुरुषार्थ, पराक्रम की प्रधानता है। यह गुण भौतिक सफलताओं में अधिक और आत्मिक प्रगति में कम काम आता है। अधिक अच्छा यही लगता है कि परब्रह्म को नारी रूप में—मातृ सत्ता का प्रतीक मानकर चला जाय।

नर ओर नारी की तुलना करना अपेक्षित नहीं, पर वरिष्ठता की दृष्टि से मातृ शक्ति को ही सदा से प्रथम स्थान मिला है। भगवान की वन्दना करते हुए ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’ जैसी उक्तियों में उन्हें प्रथम माता और पीछे पिता कहा गया है। बालक का प्रथम परिचय माता से ही होता है। उसी की उदारता का लाभ लेकर बच्चे का शरीर जीवन धारण करता और विकसित होता है, अस्तु उसके प्रति प्रथम श्रद्धा सुमन चढ़ाना उचित ही है। आत्मिक प्रगति के लिए यदि आकृति आवश्यक ही है तो उसे माता के रूप में मान्यता देकर क्यों न उन सब विभूतियों को आत्मिक क्षेत्र में भी उपलब्ध किया जाय तो स्थूल जीवन में जन्मदात्री जननी से मिलती है। नर का वर्चस्व बहुत समय से हर क्षेत्र पर छाया रहा है, इसलिए कई व्यक्ति भगवान को भी नर रूप का ही आग्रह करते हैं और नारी को उपास्य समझने में हेठी अनुभव करते हैं। यह पूर्वाग्रहों का प्रभाव हो सकता है, विवेक का पलड़ा नारी के पक्ष में सहज ही झुक जाता है।

गायत्री माता के रूप में परब्रह्म की स्थापना सर्वोपयोगी है। उसके सान्निध्य में माता की गोदी में खेलने वाले बालक को मिलने वाले वात्सल्य एवं पय−पान जैसे सूक्ष्म स्थूल लाभों की अनुभूति होती है। नारी के प्रति अचिन्त्य चिन्तन का जो प्रवाह इन दिनों चल पड़ा है उसे रोकने और भाव भरी दिव्य श्रद्धा की, प्रतिभा उसे मानने की जन चेतना उत्पन्न करने की दृष्टि से भी यह स्थापना अतीव उपयोगी है। मानवता की, सद्बुद्धि की, सत्प्रवृत्तियों की प्रतिमा भी उसे माना जा सकता है।

गायत्री माता का वाहन हंस माना गया है। हंस अर्थात् स्वच्छ धवल कलेवर, नीर−क्षीर विवेक का प्रति−निधि−मोती चुगने या लंघन करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ। यह गुण पक्षी हंस में नहीं होते−यह परिभाषा आध्यात्मिक हंस की है। संकेत यह है कि परमात्मा की दिव्य शक्ति को धारण करने के लिए साधक को अपनी उत्कृष्टता हंस स्तर की विकसित करनी चाहिए। उसे क्रियात्मक स्थूल जीवन में धर्म परायण, विचारात्मक, सूक्ष्म जीवन में विवेकवान और आस्थापरक अन्तः प्रवेश में—सद्भाव सम्पन्न होना चाहिए। व्यक्तित्व के इस समग्र परिष्कार के साथ ही ईश्वरीय दिव्य शक्ति के अवतरण की सम्भावना जुड़ी हुई है।

गायत्री माता के एक हाथ में पुस्तक, दूसरे में जल कमण्डल होने के पीछे भी सद्ज्ञान और शान्तिदायक सत्कार्यों की धारणा का संकेत है।

निराकार के प्रतीक सूर्य और साकार की प्रतीक मातृ सत्ता का समन्वित ध्यान सम्भव है। ‘सूर्य मंडल मध्यस्थ’ मानने की परम्परा अति प्राचीन है। सविता देवता का प्रतीक यह महामंत्र है। गायत्री का देवता सविता है। ध्यान के लिए सदा गायत्री को सूर्य समेत ही अपनाया जाता है। चेहरे पर तेजोवलय की भावना तो सभी देवताओं के साथ जुड़ी रहती है। गायत्री को सूर्य के मध्य में प्रतिष्ठापित किया गया है और उसे ‘तेजस्’ तत्व की ब्रह्म वर्चस् की—आत्मा माना गया है। अस्तु गायत्री को इष्टदेव मानकर चलने पर कई प्रकार के प्रचलित ध्यानों में सर्वोत्तम यही रहता है कि उसे सूर्य की आत्मा के—मध्यवर्ती नाभिक सत्ता के रूप में ध्यान किया जाय। ऐसे प्रयोजन के लिए एक चित्र इस अंक के आरम्भ में दिया गया है। इस प्रकाश को गायत्री शक्ति के साथ जुड़ा हुआ समझा जाय, इसलिए चित्र के साथ वे अक्षर भी दिये गये हैं जो महाशक्ति के साथ संयुक्त चिन्तन विस्तार को हृदयंगम करते हैं। ध्यान प्रक्रिया की दृष्टि से यह प्रतीक का पूजन और ध्यान की दोनों ही आवश्यकताएँ पूरी कर सकता है। पूजा की चौकी पर इसकी स्थापना करके पञ्चोपचार कृत्य किये जा सकते हैं। प्रातःकालीन सूर्य को उदयाचल से प्रकट होते हुए और साधक के रोम−रोम में अपनी प्रकाश किरणें प्रवेश करते हुए अनुभव किया जा सकता है। आगे चलकर इसी को भ्रू मध्य भाग में अवस्थित आज्ञाचक्र में प्रकाशवान भी देखा जा सकता है। आरम्भ में यही सरल पड़ता है कि उदयाचल पर प्रकट होते हुए अरुणाभ सूर्य को, गायत्री परब्रह्म की ध्यान प्रतिमा माना जाय और उसकी प्रकाश किरणें मस्तिष्क की विष्णु ग्रन्थि में, हृदय की ब्रह्म ग्रन्थि में नाभि की रुद्रग्रन्थि में विशेष रूप से प्रवेश करते हुए अनुभव किया जाय। ज्ञान केन्द्र मस्तिष्क, भाव केन्द्र हृदय और शक्ति केन्द्र नाभि को माना गया है। इन तीनों चेतना केन्द्रों को प्रखर बनाने के लिए दिव्य सूर्य की किरणें असामान्य मात्रा में प्रविष्ट होती हुई अनुभव करनी होती हैं। इस ध्यान धारणा के लिए भी इसी अंक में चित्र छपे हैं।

प्रतीक पूजा की संक्षिप्त किन्तु समग्र और सारभूत विधि पिछले लेख में बताई जा चुकी है। यहाँ यह कहा जा रहा है कि उपासना के लिए आसन पर बैठने के साथ आत्म शुद्धि का प्रथम कृत्य करना पड़ता है। इसके बाद देव आह्वान तथा देव पूजन की प्रक्रिया आरम्भ करनी चाहिए।

आत्म शुद्धि के छह कृत्य हैं। इनका उद्देश्य अपने में सर्वतोमुखी पवित्रता की भाव मान्यता को सघन बनाना है। हमारे कार्य, विचार और विश्वास तीनों ही आत्मिक प्रगति के मूलभूत आधार हैं। कपड़ा पहले धोया जाता है, फिर रगड़ा जाता है। धुलाई अर्थात् आत्म शुद्धि, रंगाई अर्थात् व्यक्तित्व में ब्रह्म चेतना का अवतरण। मैले कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता और दुष्ट एवं भ्रष्ट जीवन−क्रम अपनाये रहने वाला ईश्वर की उस विशेष अनुकम्पा का अधिकारी नहीं बन सकता है, जिसे ब्रह्मवर्चस की उपलब्धि कहते हैं और जिसके साथ देवोपम विशेषताओं के ऋद्धि−सिद्धि भरे भण्डार जुड़े हुए हैं।

राजयोग के पाँच नियम और पाँच संयमों का पालन प्रथम चरण है। आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि के शेष छह चरण पीछे के हैं। नाम जप में भी ‘नामापराध’ से बचने की सतर्कता बरतनी प्रथम शर्त है। साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वालों को अपने चरित्र और चिन्तन को उच्चस्तरीय बनाने के लिए प्रथम प्रयास के रूप में तत्परता बरतनी होती है। अन्यथा मात्र कर्मकाण्डों के सरल विधि−विधान अपनाने भर से देवत्व की उपलब्धि जैसे महान प्रयोजन की पूर्ति न हो सकेगी।

“देवता बनकर देव पूजन करना चाहिए” इस शास्त्र निर्देश का प्रयोजन यह है कि उपासना काल में अपने आपे को पवित्रता से ओत-प्रोत अनुभव करना चाहिए। सम्मिलन सजातीयों का ही होता है। पानी में घुलनशील पदार्थ ही घुल सकते हैं। लोहे जैसी भारी धातुओं का पानी में घुलना सम्भव नहीं। ईश्वर का सजातीय अपना व्यक्ति होगा तो उसमें दिव्य अवतरण की अपेक्षा की जा सकती है। अपने में देवत्व की स्थापना करके तब उपासना कृत्य आरम्भ करने की बात इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए कही गई है।

आत्म शुद्धि के लिए शिखाबन्धन, पवित्रीकरण, आचमन, प्राणायाम, न्यास यह पाँच कृत्य करने पड़ते हैं। इसके बाद सर्वप्रथम मातृभूमि का—पृथ्वी पूजन है। अदृश्य भगवान के प्रतीकाह्वान में भी पहले भगवान की साकार प्रतिमा—अपनी धरती का पूजन किया जाता है। विराट् ब्रह्म का प्रत्यक्ष शरीर यह संसार है, इसकी जड़ सम्पदा की सुविकसित और प्राणि सत्ता को सुसंस्कृत बनाने के लिए जो प्रयत्न किए जाते हैं वे सभी पृथ्वी पूजन में—मातृभूमि अर्चन में आ जाते हैं।

उपासना आरम्भ करते हुए आत्म शुद्धि के कृत्य किये जाएं, उस अवधि में अपने भीतर सर्वतोमुखी पवित्रता भरी होने की भावना रखें और उपासना काल समाप्त होने के पश्चात् भी शेष समय में उसी पवित्रता को बनाये रहने वाली गतिविधियाँ अपनाते रहने का ध्यान रखें। इसी प्रकार पृथ्वी पूजन का उपचार पूरा करते समय दिन में एकबार तो यह सोच ही लिया करें कि हमारा कर्तव्य पेट और परिवार तक ही सीमित नहीं वरन् देश, धर्म, समाज एवं पूजन प्रक्रिया पूरी कर लेने के उपरान्त भी शेष समय ऐसी रीति-नीति अपनायें जिसमें सार्वभौम, सद्भावना एवं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में अपना बढ़ा-चढ़ा योगदान प्रस्तुत होता रहे।


Quotation

अन्तःकरण मध्येतु ज्योतिरात्मा प्रवर्तते। लिंगदेह तुतं प्राहुर्योगिनस्तत्त्ववेदिनः॥ तत्प्रतीतौ भवेन्मुक्तिर्नान्यतो जन्मकोटिभिः। तदा लक्षणमात्मनो ज्योतीरूप प्रपश्यति॥ विधृम इव दीप्तार्च्चिरादित्य इवदीप्तिमान्। विद्युतोऽग्निरिवाकाशे पश्यन्त्यात्मानमात्मनि॥ नेत्रे पश्यति यज्जयोतिस्तारा रुपं प्रकाशकम्। स जीवः सर्व भूतानामात्मानं च समाहितः ॥ यदा प्रकाशते ह्यात्मा घटे दीपो ज्वलन्निव। ज्ञानमुत्पद्यते पुंसा क्षयात्पापस्य कर्मणः॥

-महायोग विज्ञान

अन्तःकरण में भी आत्म-ज्योति प्रकाशित है उसे लिंग देह या कारण शरीर कहते हैं। उसका अनुभव होने से ही मुक्ति होती है। अन्यथा नहीं । इसलिए इस आत्म-ज्योति का दर्शन करना चाहिए।

निर्धूम ज्योतिर्मय दीप्ति अथवा सूर्य, विद्युत् अथवा अग्नि की तरह हृदयाकाश में यह परम-ज्योति प्रकाशित हुई देखें, यही आत्म-ज्योति सम्पूर्ण प्राणियों में संव्याप्त है यह जब आत्मा में प्रकाशित होती है तो पाप कर्म क्षीण हो जाते हैं और तत्वज्ञान प्रकाशित होता है।


आत्मशोधन के षट् कर्म

आत्म शुद्धि के षट्कर्म प्रख्यात हैं। देव पूजन आरंभ करने से पूर्व इन उपचारों को सम्पन्न किया जाता है। (1) पवित्रीकरण अर्थात् काया की पवित्रता (2) तीन आचमन, मन, वचन और काया शुद्धि (3) प्राणायाम-प्राण सत्ता को प्रखर बनाना (4) न्यास-इन्द्रियों को वासना मुक्त करके ब्रह्मवर्चस् में संलग्न होने के लिए प्रस्तुतीकरण (5) शिखा बन्धन—शरीर के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित प्रज्ञा प्रतिमा के प्रति श्रद्धा अभिव्यक्ति। किसी श्रेष्ठ सत्ता को बुलाने और बिठाने से पूर्व उसके लिए उपयुक्त स्वच्छता उत्पन्न करना आवश्यक है। गुरुजनों, महामानवों को, राजनेताओं को घर बुलाना होता है तो उनके लिए आवश्यक सफाई करानी पड़ती है और स्वच्छ उपकरण एकत्रित करने पड़ते हैं। दिवाली पर लक्ष्मी के आगमन की सम्भावना देख कर लोग सबसे अधिक ध्यान घर की सफाई पर देते हैं ताकि स्वच्छ वातावरण में उनको प्रसन्नता मिले और वह ठहर सकें। सर्वविदित है कि गन्दे स्थान में ठहरना किसी को पसन्द नहीं—गन्दे लोगों के साथ सम्बन्ध रखने-उनके पास जाने तथा बुलाने में सामान्य लोगों को भी रुचि नहीं होती, फिर देव शक्तियाँ तो उसके लिए तैयार होंगी ही क्यों ? झूठे और मैले बर्तन में बहुमूल्य भोजन परोसने से भी खाने वाले को घृणा ही उत्पन्न होती है। साधक की पवित्रता एवं पात्रता का चुम्बकत्त्व ही देव शक्तियों के अनुग्रह को अपनी ओर आकर्षित करता है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए साधना विज्ञान के ज्ञाताओं ने सर्वप्रथम आत्मशोधन की ओर ध्यान देने का विधान बनाया है। प्रस्तुत कर्मकाण्डों के सहारे जीवन में परिष्कार की ओर अधिकाधिक तत्परता बरतने के लिए उत्साह उत्पन्न किया जाता है।

(1) पवित्रीकरण —शरीरगत पवित्रता के लिए ‘पवित्रीकरण’ है। चम्मच से बायें हाथ पर जल रखा जाय। दाहिने हाथ से ढककर पवित्री करण मन्त्र पढ़ा जाय । जल को समस्त शरीर पर छिड़का जाय और यह भावना की जाय कि इस मन्त्रपूत जल के साथ विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त पवित्रता तत्त्व की हमारे ऊपर वर्षा हो रही है और फुहारे के नीचे बैठ कर स्नान करने की तरह उस अमृत वर्षण का आनन्द लिया जा रहा है। पवित्रता शरीर के भीतर प्रवेश होकर समस्त चेतना को—भाव संस्थान को—पवित्र बनाती चली जा रही है।

(2) आचमन—तीन आचमन मन्त्र पढ़ते हुए तीन बार तीन चमची जल मुख में डाला जाये। तीन आचमनों का तात्पर्य काया—विचारणा और भावना इन तीन चेतना के केन्द्रों में शान्त, शीतल, सात्विकता का समावेश करना है। प्रथम आचमन काया में सच्चरित्रता, सात्विकता और वाणी में सदाशयता की स्थापना करने के लिए है। वाणी की विशेष पवित्रता इसलिए है कि उसके द्वारा उच्चरित जप प्रार्थना भगवान तक पहुँच सके। अनीति उपार्जित अन्न खाने वाली और असत्य, विक्षोभकारी वचन बोलने वाली वाणी का तेज नष्ट हो जाता है और उसके उच्चारण मन्त्र-शक्ति उत्पन्न नहीं कर सकते। इस तथ्य को स्मृति में जमाये रहने के लिए प्रथम आचमन है।

द्वितीय आचमन विचारणा में चिन्तन की शीतल सात्विकता स्थापित करने के लिए है। अशुद्धि, अपराधी, दुष्ट, दुर्बुद्धि के कारण यदि मस्तिष्क में अशान्ति के आँधी तूफान उठते रहेंगे तो उसमें मनस्विता एवं तेजस्विता उपयुक्त न हो सकेगी, बहुमूल्य विचारशक्ति ऐसे ही अवाँछनीय छिद्रों में होकर नष्ट होती रहेगी और खोखले मन क्षेत्र में—ब्रह्मलोक में—दिव्य सत्ता का अवतरण न हो सकेगा। मानसिक पवित्रता को साधना की सफलता के लिए नितान्त आवश्यक माना जाय इस मान्यता को सुदृढ़ बनाने की बात ध्यान में बनी रहे यह उद्देश्य दूसरे आचमन का है।

तीसरा आचमन भावशुद्धि के लिए है। जीवनोद्देश्य के प्रति उच्चस्तरीय निष्ठा और चिन्तन एवं कर्तृत्व की श्रेष्ठता बनाये रहने वाली आस्था ही भाव निष्ठा है। प्रपंच, प्रलोभनों के आकर्षणों में व्यस्त निरर्थक अनर्थ भरा पतनोन्मुख जीवन जीने वाले लोग आत्मबल सम्पादित नहीं कर पाते। आकाँक्षाओं का स्तर ऊँचा रहना ही भाव शुद्धि है। यह तथ्य सदा स्मरण बना रहे इसीलिए तीसरा आचमन किया जाता है।

(3) प्राणायाम—बाँये हाथ की हथेली पर दाहिने हाथ की कोहनी जमाई जाय। अंगूठे से दाहिने नथुने का छेद बन्द किया जाय। बाँये नथुने से धीरे-धीरे साँस खींची जाय। पूरी साँस फेफड़ों में भर कर कुछ समय रोकी जाये, रोकते समय अनामिका तथा तर्जनी से दोनों नथुने बन्द कर लिए जायं। इसके बाद दाहिने नथुने पर से अंगूठा हटाकर उसी छेद में होकर साँस धीरे-धीरे बाहर निकाली जाय। कुछ समय साँस को भीतर जाने से रोका जाय। यह एक प्राणायाम हुआ।

प्राणायाम के चार भाग हैं (1) साँस भीतर ले जाने की क्रिया को पूरक (2) भीतर रोकने को अन्तः कुम्भक (3) बाहर निकालने को रेचक (4) बाहर रोके रहने को बाह्य कुम्भक कहते हैं। प्राणायाम आरम्भ करने से पूर्व मन ही मन तीन बार गायत्री मन्त्र बोल लेना चाहिए। जब श्वास क्रिया आरम्भ की जाय तो साँस खींचते समय भावना करनी चाहिए कि निखिल आकाश में वायुतत्त्व के साथ घुला हुआ चेतन प्राणतत्व साँस के साथ हमारे भीतर प्रवेश करते हुए दिव्य शक्ति भर रहा है। रोकते समय भावना करनी चाहिए कि उस दिव्य शक्ति को शरीर के अवयवों, रक्तकणों एवं चेतना संस्थानों द्वारा सोखा और सदा सर्वदा के लिए भीतर धारण किया जा रहा है। साँस निकालते समय भावना करनी चाहिए कि सूक्ष्म, स्थूल और कारण शरीरों के मल, आवरण, विक्षेप, दोष, विकार बाहर निकले जा रहे हैं। बाहर साँस रोकने के समय भावना करनी चाहिए कि निकाले हुए विकारों को वापिस न लौटाने के लिए सदा सर्वदा के लिए द्वार बन्द कर दिया गया है। ऐसे-ऐसे तीन प्राणायामों की पुनरावृत्ति करनी चाहिए।

(4) न्यास—बाँये हाथ की हथेली पर एक चम्मच जल रखा जाये। दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियाँ इकट्ठी करके उन्हें उस जल में डुबाया जाय फिर गायत्री मन्त्र पढ़ते हुए उन्हें पहले बाँयी ओर फिर दाहिनी ओर क्रम से लगाया जाय (अ) मुख (आ) नासिका (इ) नेत्र (ई) कान (उ) भुजाएं (ऊ) जंघाएँ (ए) शेष जल का समस्त शरीर पर छिड़काव। जिन इन्द्रियों पर यह जल स्पर्श किया गया है वहाँ उनमें पवित्रता एवं प्रखरता भरी जा रही है। ऐसी भावना परिपक्व की जाय।

(5) शिखा बन्धन—गायत्री मन्त्र पढ़ते हुए शिखा में गाँठ लगाई जाय। यदि बाल उड़ गये हों या न रखाये गये हों तो उस स्थान पर पानी से भीगी उँगलियों का स्पर्श किया जाय। यह आध्यात्मिक झंडाभिवादान है। विवेकशीलता, आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की देवी गायत्री माता के प्रतीक प्रतिमा शिखा को माना गया है। शरीर में इसकी सर्वोच्च शिखर पर इसलिए प्रतिष्ठापना की जाती है कि इसमें समाविष्ट त्रिविधि प्रेरणाओं को सर्वोपरि महत्व का माना और श्रद्धापूर्वक अपनाया जाय।

(6) पृथ्वी पूजन—धरती माता—मातृ भूमि— को प्रत्यक्ष देवता मानकर उसका अभिसिंचन अभिवन्दन करने की भावना से उपलब्ध अनुदानों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए जल, अक्षत, पुष्प, चन्दन से पूजन किया जाय। मातृभूमि के लिए—विश्व वसुधा के लिए —समस्त जड़ चेतन जगत द्वारा मिले लाभों के प्रत्युपकार में बढ़-चढ़ कर त्याग बलिदान करने की भावनाएँ जगाना इस ‘पृथ्वी पूजन’ प्रक्रिया का उद्देश्य है।

भारतीय धर्म के प्रायः सभी सम्प्रदायों में उपासना आरम्भ करने से पूर्व थोड़े हेर-फेर के साथ प्रायः इन्हीं विधानों का निर्देश है। इन कृत्यों के साथ कई-कई तरह के मन्त्र भिन्न-भिन्न ग्रन्थों में लिखे हैं। भिन्नता को एकता की दिशा में ले जाने की उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए यही उचित समझा गया है कि सभी उपासना कृत्यों में एक मात्र गायत्री मन्त्र का ही उपयोग किया जाय। इसमें उपासना क्षेत्र में सार्वभौम एकता उत्पन्न होगी, जो आगे चलकर भाषा, संस्कृति, धर्म, शासन आदि सभी क्षेत्रों में एकता उत्पन्न करने की—दिशा में जन-मानस बनाने की—भूमिका भी प्रस्तुत करेगी। अशिक्षितों, अल्प शिक्षितों एवं बालकों के लिए अनेक विधानों के लिए अनेक मन्त्र याद करना कठिन है, इसलिए एक ही गायत्री मन्त्र याद करने की सरलता सोची गई है और देव पूजन तथा आत्मशोधन के सभी कृत्य इसी मन्त्रोच्चार से पूरे करने के लिए कहा गया है।

उपासना आरम्भ करने से पूर्व (1) पूजा प्रतीक के रूप में गायत्री माता का स्थापना चित्र जो इस अंक में लगा है इसे शीशे में मढ़ा लिया जाय। (2) जल कलश की छोटी लुटिया, ढक्कन समेत (3) अगरबत्ती स्टैंड (4) पंच पात्र आचमन आदि के लिए पानी का छोटा गिलास चमची समेत (5) छोटी तश्तरियाँ एक में चावल, नैवेद्य, चन्दन, पुष्प रखने के लिए—दूसरी पूजा के समय यह वस्तुएँ छोड़ने के लिए (6) एक डिब्बा चावल, नैवेद्य, रोली, अगरबत्ती, माचिस, आदि सामान संभाल कर रखने के लिए। इतना सामान संग्रह कर लेना पर्याप्त है।

उपासना आरम्भ करने से पूर्व नित्य कर्म से निवृत्त होना-शरीर, वस्त्र और स्नान उपकरणों की अधिकाधिक स्वच्छता के लिए तत्परता बरतना—आवश्यक है। स्नान और धुले वस्त्र बदलने से मन में पवित्रता का संचार होता है। चित्त प्रफुल्ल रहता है। आलस्यवश मलीनता को लादे रहने से मन भारी रहता है और उपासना से जी उचटता है। जँभाई आती है—ऊब लगती है और अधिक बैठना भारी पड़ता है। स्थान और पूजा उपकरणों की मलीनता से मन में अरुचि उत्पन्न होती है और उत्साह घटता है। अस्तु उपासना स्थल को—पूजा के पात्र उपकरण प्रतीक आदि को—स्वच्छ कर लेने की बात को महत्व ही दिया जाना चाहिए। अधिक ठंड, बीमारी, पानी का अभाव, स्थान की असुविधा जैसी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाने पर तो बिना स्नान के—हाथ मुँह धोकर भी पूजा पर बैठा जा सकता है, पर सामान्य स्थिति में आलस्यवश ऐसी उपेक्षा नहीं बरती जानी चाहिए। रुग्णता की अन्य विवशता की परिस्थितियों में—सफर में — मानसिक उपासना बिना कुछ क्रिया-कृत्य किये भी की जा सकती है।

पूजा की चौकी पर पीत वस्त्र बिछाया जाय और उस पर गायत्री माता का—मन्त्र का —चित्र स्थापित किया जाय। उसके आगे एक कोने पर छोटी लुटिया में ढका हुआ जल कलश और दूसरे कोने पर जलती अगरबत्ती को रखा जाय। जहाँ शुद्ध घी उपलब्ध है वहाँ घृत दीप भी जलाया जा सकता है, अन्यथा उसके अभाव में अगरबत्ती से भी काम चल सकता है।

आसन कुशाओं का या चटाई लेनी चाहिए। चौकी या पट्टा बिछाया जा सकता है। सूती या ऊनी आसन-इसी शर्त पर बिछाये जा सकते हैं कि उनके धोने या सुखाने का प्रबन्ध होता रहे। पशुओं के चमड़े आजकल वधकर्म द्वारा ही प्राप्त होते हैं इसलिए मृगचर्म आदि का प्रयोग नहीं करना चाहिए। पूजा स्थान में यथा सम्भव स्वच्छ वायु का आवागमन होना चाहिए। सीलन घुटन या घिच-पिच के वे स्थान जहाँ खाना-पीना, सोना, आना-जाना बना रहता है चित्त में विक्षेप उत्पन्न करते हैं। यथासम्भव एकान्त स्थान ही तलाश करना चाहिए। खुली छत पर या बरामदे में बैठना भी अच्छा है।

भारतीय धर्म में त्रिकाल संध्या का विधान है। प्रातः सूर्योदय के समय-साँय सूर्यास्त के समय—मध्याह्न 12 बजे यह मध्यवर्ती समय है। थोड़ा आगे पीछे होना हो तो वैसा भी हो सकता है। जिन्हें सुविधा हो वे त्रिकाल उपासना करें। अन्यथा प्रातः साँय दो बार से भी काम चल सकता है। अत्यन्त व्यस्त व्यक्तियों को भी प्रातःकाल नित्य कर्म से निवृत्त होकर एक बार तो उपासना करने के लिए समय निकाल ही लेना चाहिए। प्रयत्न यह करना चाहिए कि आधा घंटा से लेकर एक घंटे तक समय उपासना के लिए मिल सके। निस्सन्देह इस प्रयोजन में लगा हुआ समय हर दृष्टि से सार्थक होता है। उपासना से आत्मिक प्रगति, उसके फलस्वरूप व्यक्तित्व का समग्र विकास, उसके द्वारा सर्वतोमुखी समृद्धि की सम्भावना, यह चक्र ऐसा है, जिससे इस कृत्य में लगाया गया समय सार्थक ही सिद्ध होता है।

उपासना काल में हर घड़ी यही अनुभूति रहनी चाहिए कि हम भगवान के अति निकट बैठे हैं और साधक तथा साध्य के बीच सघन आदान-प्रदान हो रहा है। साधक अपने समग्र व्यक्तित्व को भगवान को होम रहा है और वे उसे अपने समतुल्य बनाने की अनुकम्पा प्रदान कर रहे हैं।

अस्वस्थता की दशा में, सफर में, विधिवत उपासना कृत्य करने की स्थिति न हो तो आत्म शुद्धि, देव पूजन तथा जप ध्यान आदि सारे कृत्य मानसिक उपासना के रूप में ध्यान प्रक्रिया के सहारे—उन कृत्यों को करने की कल्पना करने हुए भी किये जा सकते हैं। उपासना में नागा करने की अपेक्षा इस प्रकार की मानसिक पूजा कर लेना उत्तम है। इससे संकल्पित साधना प्रक्रिया को किसी न किसी रूप में अनवरत चलती हुई तो रखा ही जा सकता है।


जप द्वारा चेतना का उच्चस्तरीय शिक्षण

प्रतीक उपासना की पार्थिव पूजा के कितने ही कर्मकाण्डों का प्रचलन है। तीर्थयात्रा, देवदर्शन, स्तवन, पाठ, षोडशोपचार, परिक्रमा, अभिषेक शोभायात्रा, श्रद्धाँजलि, रात्रि-जागरण, कीर्तन आदि अनेकों विधियाँ विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों में अपने-अपने ढंग से विनिर्मित और प्रचलित है। इससे आगे का अगला स्तर वह है जिसमें उपकरणों का प्रयोग न्यूनतम होता है और अधिकाँश कृत्य मानसिक एवं भावनात्मक रूप से ही सम्पन्न करना पड़ता है। यों शारीरिक हलचलों, श्रम और प्रक्रियाओं का समन्वय उनमें भी रहता ही है।

उच्चस्तरीय साधना क्रम में मध्यवर्ती विधान के अन्तर्गत तीन कृत्य आते हैं । (1) जप (2) ध्यान (3) प्राणायाम। न केवल भारतीय परम्परा में वरन् समस्त विश्व के विभिन्न साधना प्रचलनों में भी किसी न किसी रूप में इन्हीं तीन का सहारा लिया गया है। प्रकार कई हो सकते हैं, पर उन्हें इन तीन वर्गों के ही अंग−प्रत्यंग के रूप में देखा जा सकता है।

साधना की अन्तिम स्थिति में शारीरिक या मानसिक कोई कृत्य करना शेष नहीं रहता। मात्र अनुभूति, संवेदना, भावना तथा संकल्प शक्ति के सहारे विचार रहित शून्यावस्था प्राप्त की जाती है। इसी को समाधि अथवा तुरियावस्था कहते हैं। ब्रह्मानन्द का —परमानन्द का अनुभव इसी स्थिति में होता है। इसे ईश्वर और जीव के मिलने की चरम अनुभूति कह सकते हैं। इस स्थान पर पहुँचने से ईश्वर प्राप्ति का जीवन लक्ष्य पूरा हो जाता है। यह स्तर समयानुसार आत्म-विकास का क्रम पूरा करते चलने से ही उपलब्ध होता है। उतावली में काम बनता नहीं बिगड़ता है। तुर्त-फुर्त ईश्वर दर्शन, समाधि स्थिति, कुण्डलिनी जागरण, शक्तिपात जैसी आतुरता से बालबुद्धि का परिचय भर दिया जा सकता है, प्रयोजन कुछ सिद्ध नहीं होता। शरीर को सत्कर्मों में और मन को सद्विचारों में ही अपनाये रहने से जीव सत्ता का उतना परिष्कार हो सकता है, जिससे वह स्थूल और सूक्ष्म शरीरों को समुन्नत बनाते हुए कारण शरीर के उत्कर्ष से संबद्ध दिव्य अनुभूतियाँ और दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त कर सके।

समयानुसार उस अन्तिम स्थिति की—कालेज पाठ्यक्रम की भी—शिक्षा उपलब्ध हो जाती है। ऐसी दिव्य सत्ताएँ इस संसार में मौजूद हैं जो पात्रता के तालाब को बादलों की तरह बरस कर सदा भरापूरा रखने को अयाचित सहायता प्रदान कर सकें। हमें शरीर के जड़ और मन के अर्ध चेतन स्तरों को परिष्कृत बनाने में ही अपना सारा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। साधना विज्ञान की दौड़ इन्हीं दो क्षेत्रों के विकास में सहायता करने वाले विधि-विधान बनाने में केन्द्रीभूत है। इतना बन पड़े तो अगली बात निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त दिव्य चेतना के प्रत्यक्ष मार्ग दर्शन पर छोड़ी जा सकती है। अपना आपा ही इतना ऊंचा उठ जाता है कि पृथ्वी की आकर्षण शक्ति से ऊपर निकल जाने के बाद राकेट जिस प्रकार अपनी यात्रा अपने बल-बूते चलाने लगते और अमुक कक्षा बनाकर भ्रमण करने लगते हैं, उसी प्रकार स्वयमेव आत्म साधना का शेष भाग पूरा हो सकता है।

आत्मोत्कर्ष की जिन कक्षाओं का सैद्धान्तिक और व्यावहारिक पाठ्यक्रम सीखने, सिखाने की आवश्यकता पड़ती है वे चिन्तन की उत्कृष्टता एवं कर्तृत्व की आदर्शवादिता के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। उनकी उपेक्षा करके मात्र कर्मकाण्डों के सहारे कोई बड़ी सफलता हाथ नहीं लग सकती। व्यक्तित्व को अमुक विधि-विधानों के सहारे ऊँचा उठाने की शिक्षा की किंडरगार्डन शिक्षण में प्रयुक्त होने वाले मनोरंजन उपकरणों से तुलना की जा सकती है, जो बच्चे के अविकसित मस्तिष्क में अमुक जानकारी को ठीक तरह जमाने में सहायता करती है। पहलवानी में सफलता पाने वाले डंबल, मुद्गर आदि उपकरणों का सहारा लेकर अपनी बल की वृद्धि करते हैं। ऊँचा चढ़ने के लिए लाठी की और जल्दी पहुँचने के लिए वाहन की जरूरत पड़ती है। यह उपकरण बहुत ही उपयोगी और आवश्यक हैं, पर यह ध्यान रखना चाहिए कि स्वतन्त्र रूप से कोई जादुई शक्ति से सम्पन्न नहीं है। स्वस्थ शरीर को बलिष्ठ बनाने में वे सहायता भर करते हैं। ठीक यही स्थिति उपासना क्षेत्र में फैले हुए अनेकानेक कर्मकाण्डों की है।

स्थूल शरीर को प्रभावित करने वाली तपश्चर्या और प्रतीक पूजा के साथ जुड़े हुए क्रिया-कृत्यों की चर्चा पिछले लेख में हो चुकी है। सूक्ष्म शरीर के संशोधन में जप, ध्यान और प्राणायाम इन तीन का प्रयोग करना पड़ता है। संप्रदाय भेद से कोई इनमें से एक को कोई दो को प्रधानता देते हैं। कहीं−कहीं अंतर भेद से इन तीनों का प्रचलन है। हमारी दृष्टि में अन्न, जल और वायु के त्रिविधि जीवन पोषणों की तरह मानसिक विकास में इन तीनों की ही आवश्यकता है और उन तीनों परतों का संशोधन करने के लिए कुर्ता, धोती और जूते की तरह इन तीनों की ही एक साथ आवश्यकता पड़ती है। यह समन्वित साधना गंगा, यमुना और सरस्वती का त्रिवेणी संगम बनकर अपने भीतर ही जीवन्त तीर्थराज उत्पन्न करती है।

जप द्वारा  उस परमेश्वर को पुकारना ही अध्यात्म ही है जिसे हम एक प्रकार से भूल ही चुके हैं। मणि विहीन सर्प जिस तरह अशक्त एवं हताश बना बैठा रहता है, उसी प्रकार हम परमात्मा से बिछुड़ कर अनाथ बालक की तरह डरे, सहमे बैठे हैं—अपने को असुरक्षित और आपत्तिग्रस्त स्थिति में अनुभव कर रहे हैं। लगता है हमारा कुछ बहुमूल्य खो गया है। जप की पुकार उसी को खोजने के लिए है। बिल्ली अपने बच्चों के इधर−उधर छिप जाने पर उन्हें ढूंढ़ने के लिए म्याऊँ−म्याऊँ करती फिरती है और उस पुकार के आधार पर उन्हें खोज निकालती है। कोई बालक खो जाने पर उसके ढूंढ़ने के लिए नाम और हुलिया की मुनादी कराई जाती है। रामनाम की रट इसी प्रयोजन के लिए है।

गज की एक टाँग ग्राह के मुँह में चली गई थी। गज पानी से बाहर निकलना चाहता था और ग्राह उसे भीतर घसीटता था। दोनों में से हारता भी कोई नहीं था। इस खींचतान में हाथी को भारी कष्ट हो रहा था। न मरते बनता था न जीते। निदान गज ने भगवान को पुकार लगाई। उनका नाम हजार बार लिया तब भगवान उसे बचाने आये थे। द्रौपदी ने भरी सभा में लाज जाते देखकर भगवान को पुकारा था और वे उसे आश्वस्त करने आये थे। अज्ञानाँधकार में भटकने वाले जीव की स्थिति गज से भी गई बीती है। गज की एक टाँग को एक मगर खा रहा था। यहाँ काम, क्रोध, मद, मत्सर रूपी चार ग्राह दोनों हाथ, दोनों पैर, सिर और धड़ इन छहों अवयवों को खाये जा रहे हैं।

द्रौपदी का तो शरीर ही निर्वस्त्र हो रहा था, पर आत्मा की शालीनता का आवरण उतरता जाने से उसका बहिरंग और अंतरंग दोनों ही लज्जास्पद बनते चले जा रहे हैं। ऐसी दशा में गज रूपी मन और आत्मा रूपी द्रौपदी का भगवान को पुकारना उचित ही है। जप में भगवत् नाम की रट पतन के गर्त में से हाथ पकड़ कर ऊपर उबारने के लिए ही लगाई जाती है।

सीता चोरी चली गई थीं। राम उन्हें ढूंढ़ने के लिए वृक्षों से, पक्षियों से, पर्वतों से पूछते फिरते थे कि आप लोगों ने कहीं सीता को देखा हो तो बताओ। वे ऐसे ही सीता−सीता की पुकार लगाते थे ताकि वे उधर कहीं हों तो मिल जायं। विछोह की वेदना उन्हें ऐसा करने के लिए विवश कर रही थी। मनुष्य अपनी आत्मा को खो बैठा है और सीता को गँवा कर वियोग विह्वल राम की तरह नाम की रट लगाता है। जप का एक उद्देश्य यह भी है।

परमात्मा की दिव्य चेतना के अभाव में मनुष्य नर−पशु, नर−कीटक मात्र बनकर रह जाता है। पञ्च तत्वों की काया में पेट और प्रजनन मात्र की दो आकाँक्षाएँ रहती हैं और वह उनकी पूर्ति के लिए वासना−तृष्णा में ग्रसित रह कर अचिन्त्य चिन्तन तथा अकर्म करने में निरत रहता है। आदर्शों को अपनाने के लिए न उसकी उत्कंठा जगती है और न चेष्टा होती है। सड़ी कीचड़ में कुलबुलाते रहने वाले घिनौने कीड़ों की तरह उसे कुत्साओं और कुण्ठाओं की शोक संतापों की प्रताड़नाएँ सहन करते हुए सुर−दुर्लभ अवसर को रोते कलपते गंवाना पड़ता है। इस अंधकार में भटकने से त्राण पाने के लिए आत्मा प्रकाश को पुकारती है। यह प्रकाश भगवान ही हो सकता है। उसे पाने की आतुरता में जिन शब्दों का उच्चारण होता है, उसे नाम−जप कह सकते हैं।

यह सोचना व्यर्थ है कि भगवान का मन इतना ओछा है कि वे अपना नाम लेने वाले से—चापलूसी भरे शब्दोच्चार करने वाले से प्रसन्न हो जाते हैं। उन्हें नाम लेने न लेने से कोई वास्ता नहीं। वह दिव्यसत्ता तो केवल इतना ही देखती है कि जो काम सौंपे गये थे वे पूरे किये गये या नहीं। वे अनुशासन और कर्तव्य पालन भर की अपेक्षा मनुष्य से करते हैं और इसी कसौटी पर कस कर दण्ड, पुरस्कार की व्यवस्था करते हैं। उनका रोष और प्रेम ठीक विद्युत शक्ति की तरह है। बिजली का विधिवत् उपयोग करने वाले उससे तरह−तरह के लाभ उठाते हैं। रोशनी, पंखा, रेडियो, हीटर जैसे अनेक प्रयोजन पूरे करते हैं, किन्तु जो उसके खुले तार छूने की उच्छृंखलता बरतते हैं वे रोष के भाजन बनते और अपने प्राण गंवा बैठते हैं। भगवान का एक नाम ‘रुद्र’ भी है। रुद्र अर्थात् भयंकर अनीति बरतने वालों को वे बिना दया माया प्रदर्शित किये कस कर दण्ड भी देते हैं। नाम−जप की चापलूसी से ईश्वर को फुसला लेने और जो लाभ सन्मार्ग पर चलने वालों को मिलता है वही पूजा−पत्री से पा लेने की बात सोचना मूर्खतापूर्ण है। ईश्वर को इतना मूर्ख और ओछा नहीं समझा जाना चाहिए कि नाम लेने भर से किसी को भक्त मान ले और निहाल कर दे। उसका अनुग्रह तो व्यक्तित्व को परिष्कृत करने और सन्मार्ग पर चलने से ही सम्भव हो सकता है।

शरीर पर नित्य मैल चढ़ता है और उसे साफ करने के लिए नित्य स्नान करना पड़ता है। कपड़े नित्य मैले होते हैं और उन्हें रोज ही धोना होता है। कमरे में झाड़ू लगाना, दाँत माँजना, वालों में कंघी करना नित्य का काम है। मन पर नित्य ही वातावरण में उड़ती फिरने वाली दुष्प्रवृत्तियों की छाप पड़ती है। उस मलिनता को धोने के लिए नित्य ही उपासना करनी पड़ती है। भगवत् स्मरण उपासना का प्रधान अंग है। नाम के आधार पर ही किसी सत्ता का बोध और स्मरण हमें होता है। ईश्वर को स्मृति पटल पर प्रतिष्ठापित करने के लिए उसके नाम का सहारा लेना पड़ता है। स्मरण के आह्वान—आह्वान से स्थापना और स्थापना से उपलब्धि का क्रम चल पड़ना मनोविज्ञान शास्त्र द्वारा समर्थित है।

चेतना को प्रशिक्षित करने के लिए मनोविज्ञान शास्त्र में चार आधार और स्तर बताये गये हैं। इनमें प्रथम है—शिक्षण—जिसे अँग्रेजी में ‘लर्निंग’ कहते हैं। स्कूल के बच्चों को इसी स्तर पर पढ़ाया जाता है। उन्हें तरह-तरह की जानकारियाँ दी जाती हैं उन जानकारियों को सुन लेने भर से काम नहीं चलता। विद्यार्थी उन्हें बार-बार दुहराते हैं। स्कूली पढ़ाई का सारा क्रम ही दुहराने-याद करने के सहारे खड़ा होता है। पहाड़े रटने पड़ते हैं। संस्कृत को तो रटन्त विद्या ही कहा जाता है। प्रकारान्तर से यह रटाई किसी न किसी प्रकार हर छात्र को करनी पड़ती है। स्मृति पटल पर किसी नई बात को जमाने के लिए बार-बार दुहराये जाने की क्रिया अपनाये बिना और कोई रास्ता नहीं।

एक बार याद कर लेने से कुछ बातें तो देर तक याद बनी रहती हैं, पर कुछ ऐसी हैं जो थोड़े दिन अभ्यास छोड़ देने से एक प्रकार से विस्मरण ही हो जाती हैं। स्कूली पढ़ाई छोड़ देने के उपरान्त यदि वे विषय काम में न आते रहें तो कुछ समय बाद विस्मृत हो जाते हैं। फौजी सिपाहियों को नित्य ही परेड करनी पड़ती है। पहलवान लोग बिना नागा अखाड़े में जाते और रोज ही दंड बैठक करते हैं। संगीतकारों के लिए नित्य का ‘रियाज’ आवश्यक हो जाता है। कुछ समय के लिए भी वे गाने बजाने का अभ्यास छोड़ दें तो उँगलियाँ लड़खड़ाने लगेंगी और ताल स्वरों में अड़चन उत्पन्न होने लगेगी।

शिक्षण की ‘लर्निंग’ भूमिका में पुनरावृत्ति का आश्रय लिया जाना आवश्यक है। जप द्वारा अनभ्यस्त ईश्वरीय चेतना को स्मृति पटल पर जमाने की आवश्यकता होती है ताकि उपयोगी प्रकाश की अन्तःकरण में प्रतिष्ठापना हो सके। कुँए की जगत में लगे पत्थर पर रस्सी की रगड़ बहुत समय तक पड़ते रहने से उसमें निशान बन जाते हैं। हमारी मनोभूमि भी इतनी ही कठोर है। एक बार कहने से बात समझ में तो आती है पर उसे स्वभाव की—अभ्यास की भूमिका तक उतारने के लिए बहुत समय तक दुहराने की आवश्यकता पड़ती है। पत्थर पर रस्सी की रगड़ बहुत समय तक पड़ते रहने से उसमें निशान बन जाते हैं। पत्थर पर रस्सी की रगड़ से निशान पड़ने की तरह ही हमारी कठोर मनोभूमि पर भगवत् संस्कारों का गहराई तक जम सकना संभव है।

शिक्षण की दूसरी परत है—‘रिटेन्शन’ अर्थात् प्रस्तुत जानकारी को स्वभाव का अंग बना लेना। तीसरी भूमिका है—‘री काल’ अर्थात् भूतकाल की किन्हीं विस्मृत स्थितियों को कुरेद बीनकर फिर से सजीव कर लेना। चौथी भूमिका है—‘रिकॉग्नीशन’ अर्थात् मान्यता प्रदान कर देना। निष्ठा आस्था—श्रद्धा एवं विश्वास में परिणत कर देना। उपासना में इन्हीं सब प्रयोजनों को पूरा करना पड़ता है। यह चारों ही परतें छेड़नी होती हैं। भगवान की समीपता अनुभव कराने वाली प्रतीक पूजा ‘रिटेन्शन’ है। ईश्वर के साथ आत्मा के अति प्राचीन संबंधों को भूल जाने के कारण ही जीवन में भटकाव होता है। पतंग उड़ाने वाले के हाथ से डोरी छूट जाती है तभी वह इधर−उधर छितराती फिरती है। बाजीगर की उंगलियों से बँधी कठपुतली के संबंध सूत्र टूट जायं तो फिर वे लकड़ी के टुकड़े नाच किस प्रकार दिखा सकेंगे। कनेक्शन तार टूट जाने पर बिजली के यंत्र अपना काम करना बंद कर देते हैं। ईश्वर और जीव का संबंध सनातन है पर वह माया में अत्यधिक प्रवृत्ति के कारण एक प्रकार से टूट ही गया है। इसे फिर से सोचने, सूत्र को नये सिरे से ढूंढ़ने और टूटे संबंधों को फिर से जोड़ने की प्रक्रिया ‘री काल’ है। जप द्वारा यह उद्देश्य भी पूरा होता है। चौथी भूमिका में ‘रिकॉग्नीशन’ में पहुँचने पर जीवात्मा की मान्यता अपने भीतर ईश्वरीय प्रकाश विद्यमान होने की बनती है और वह वेदान्त तत्वज्ञान की भाषा में ‘अयमात्मा ब्रह्म’—‘तत्वमसि’ सोहमस्मि—चिदानंदोऽहम्—शिवोऽहम् की निष्ठा जीवित करता है। यह शब्दोच्चार नहीं वरन् मान्यता का स्तर है। जिसमें पहुँचे हुए मनुष्य का गुण, कर्म, स्वभाव, दृष्टिकोण एवं क्रिया−कलाप ईश्वर जैसे स्तर का बन जाता है। उसकी स्थिति महात्मा, देवात्मा एवं परमात्मा जैसी देखी और अनुभव की जा सकती है।

आत्मिक प्रगति के लिए चिन्तन क्षेत्र की जुताई करनी पड़ती है, तभी उसमें उपयोगी फसल उगती है। खेत को बार−बार जोतने से ही उसकी उर्वरा शक्ति बढ़ती है। नाम जप को एक प्रकार से खेती की जुताई कह सकते हैं। प्रहलाद की कथा है कि वे स्कूल में प्रवेश पाने के उपराँत पट्टी पर केवल राम नाम ही लिखते हैं। आगे की बात पढ़ने के लिए कहे जाने पर भी राम नाम ही लिखते रहे और कहते रहे। इस एक को ही पढ़ लेने पर सारी पढ़ाई पूरी हो जाती है। युधिष्ठिर की कथा भी ऐसी ही है। अन्य छात्रों ने आगे के पाठ याद कर लिये, पर वे पहला पाठ ‘सत्यंवद’ ही रटते लिखते रहे। अध्यापक ने आगे के पाठ पढ़ने के लिए कहा तो उनका उत्तर यही था कि एक पाठ याद हो जाने पर दूसरा पढ़ना चाहिए। उनका तात्पर्य यह था कि सत्य के प्रति अगाध निष्ठा और व्यवहार में उतारने की परिपक्वता उत्पन्न हो जाने तक उसी क्षेत्र में अपने चिन्तन को जोते रहना चाहिए।

नाम जप में होने वाली पुनरावृत्ति के पीछे युधिष्ठिर और प्रहलाद द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया का संकेत है। भगवानमय जीवन बनाने की स्थिति आने तक नाम स्मरण करते रहा जाना चाहिए। अन्तरात्मा द्वारा एक मन और दश इन्द्रियों को पढ़ाने के लिए खोली गई पाठशाला को उपासना कृत्य समझा जा सकता है। उसमें नाम जप की रटाई कराई जाती है ताकि यह छात्र वर्णमाला, गिनती पहाड़े, भली प्रकार याद कर सकें। एक ही विधान को लगातार दुहराते रहने के पीछे यही बाल शिक्षण की प्रक्रिया काम करती है।

कपड़े को देर तक रंग भरी नाद में डुबोये रहने से उस पर पक्का रंग चढ़ जाता है। चन्दन वृक्ष के समीप हुए झाड़−झंखाड़ भी सुगन्धित हो जाते हैं। गुलाब के फूल जिस मिट्टी पर टूट−टूट कर गिरते रहते हैं वह भी सुगंधित हो जाती है सान्निध्य का लाभ सर्वविदित है। सत्संग और कुसंग के भले−बुरे परिणाम आये दिन सामने आते रहते हैं। उपासना कृत्य भगवान की समीपता है, उसका सत्परिणाम सामने आये बिना नहीं रह सकता। कीट भृंग का उदाहरण प्रख्यात है।

जप के लिए भारतीय धर्म में सर्वविदित और सर्वोपरि मंत्र गायत्री मंत्र का प्रतिपादन है। उसे गुरुमंत्र कहा गया है। अंत−चेतना को परिष्कृत करने में उसका जप बहुत ही सहायक सिद्ध होता है। वेदमाता उसे इसीलिए कहा गया है कि वेदों में सन्निहित ज्ञान विज्ञान का सारा वैभव बीज रूप से इन थोड़े से अक्षरों में ही सन्निहित है।

जप का भौतिक महत्व भी है। विज्ञान के आधार पर भी उसकी उपयोगिता समझी समझाई जा सकती है। शरीर और मन में अनेकानेक दिव्य क्षमताएँ चक्रों, ग्रन्थियों, भेद और उपत्यिकाओं के रूप में विद्यमान हैं उनमें ऐसी सामर्थ्य विद्यमान हैं जिन्हें जगाया जा सके तो व्यक्ति को अतीन्द्रिय एवं अलौकिक विशेषताएँ प्राप्त हो सकती हैं। साधना का परिणाम सिद्धि है। यह सिद्धियाँ भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता के रूप में जिन साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें जप को प्रथम स्थान दिया गया है।


Quotation

न तस्य मृत्युर्न जरा न व्याधिः। प्राप्तं हि योगाग्निमयं शरीरम्॥

अर्थ—अर्थात् जिसने योगाग्निमय शरीर प्राप्त कर लिया वह जरा मृत्यु और व्याधि के पाश से मुक्त हो जाता है।

नीवार शूकवत् शुक्र ज्योर्वितर्श्य वत्क्वचित्। चन्द्र वच्चाणुवत्सूक्ष्मं प्रादेश परिमाणवत्॥

खद्योतवच्च स्फटिकसदृशस्तारवत्क्वचित्। नीलज्योतिः क्वचित् रक्तज्योतिः शुभ्रद्युतिःक्चचित्॥

विविध ज्योतिरन्यत्र ज्योतिषां ज्योतिरेव सः। अभिव्यक्ति करा एवं आकारा ब्रह्मणि स्थिता॥

ज्योतिरेव पर ब्रह्म ज्योतिरेव परं सुखम्। ज्योतिरेव परा शान्तिर्ज्योतिरेव परं पदम्॥

—महायोग विज्ञान

यह आत्मा−ज्योति किसी को शुक्र के तारे के समान, किसी को सूर्य, चन्द्र, अग्नि अथवा अणु जैसी प्रतीत होती है। जुगनू, स्फटिक मणि अथवा मोती की तरह यह चमकती है। कभी नील ज्योति, कभी रक्त ज्योति, कभी श्वेत यह विभिन्न आकृतियों की दीखती है। यह सब अंतःकरण में विद्यमान ब्रह्म का अभ्यास कराती है। यह आत्म−ज्योति परब्रह्म है। यही परम सुख है। इसी से परम पद और परम शान्ति की प्राप्ति होती है।


शब्द की प्रचण्ड शक्ति और मंत्र साधना

मुख को अग्निचक्र कहा गया है। मोटे अर्थों में उसकी संगति जठराग्नि से मिलाई जा सकती है। मंदाग्नि, तीव्राग्नि का वर्णन मुँह से लेकर आमाशय अन्त्रि संस्थान तक विस्तृत क्षेत्र में फैली हुई पाचन ग्रन्थियों की निष्क्रियता−सक्रियता का परिचय देने के रूप में ही किया जाता है। मुँह चबाता है और पचाने का प्राथमिक कार्य अपने गह्वर में पूरा करता है। आगे चलकर आहार की पाचन क्रिया अन्यान्य रूपों में विकसित होती जाती हैं। अग्निचक्र की—मुख में अवस्थित ऊष्मा की—स्थूल चर्चा ही पाचन प्रक्रिया के रूप में की जा सकती है। वस्तुतः उस संस्थान को यज्ञाग्नि का दिव्य कुण्ड कह सकते हैं, जिससे पाचन का ही नहीं, वाक्−शक्ति का भी उद्भव होता है। वाणी की शक्ति का जीवन के उत्कर्ष−अपकर्ष में कितना अधिक योगदान है। इसकी जानकारी किसी गूँगे और ओजस्वी वक्ता की स्थिति की तुलना करके देखने से मिल सकती है। संभावना का आदान−प्रदान कितना प्रभावी है इसका इसलिए पता नहीं चलता कि वह ढर्रा सहज अभ्यास में चलता रहता है। और हम उससे कुछ विशेष निष्कर्ष नहीं निकाल पाते। यदि हम किसी मूक योनि के प्राणी रहे होते और बातचीत का आनन्द एवं लाभ लेने वाले मनुष्य की सुविधा का लेखा−जोखा लेते तो पता चलता कि यह कितनी बड़ी उपलब्धि है।

मुख का अग्निचक्र स्थूल रूप से पाचन का—सूक्ष्म रूप में उच्चारण का और कारण रूप से चेतनात्मक दिव्य प्रवाह उत्पन्न करने का कार्य करता है। उसके तीनों कार्य एक से एक बढ़ कर हैं। पाचन और उच्चारण की महत्ता सर्वविदित है। दिव्य प्रवाह संचार की बात कोई−कोई ही जानते हैं। जपयोग का सारा विज्ञान इसी रहस्यमयी सामर्थ्य के साथ संबद्ध है।

शब्दों का उच्चारण मात्र जानकारी ही नहीं देता वरन् उनके साथ अनेकानेक भाव अभिव्यंजनाएँ—संवेदनाएँ—प्रेरणाएँ एवं शक्तियाँ भी जुड़ी होती हैं। यदि ऐसा न होता तो वाणी में मित्रता एवं शत्रुता उत्पन्न करने की सामर्थ्य न होती। दूसरों को उठाने गिराने में उसका उपयोग न हो पाता। कटु शब्द सुनकर क्रोध का आवेश चढ़ आता है और न कहने योग्य कहने तथा न करने योग्य करने की स्थिति बन जाती है। चिन्ता का समाचार सुनकर भूख−प्यास और नींद चली जाती है। शोक संवाद सुनकर मनुष्य अर्धमूर्छित जैसा हो जाता है। तर्क तथ्य, उत्साह एवं भावुकता भरा शब्द प्रवाह देखते−देखते जन समूह का विचार बदल देता है और उस उत्तेजना से सम्मोहित असंख्य मनुष्य कुशल वक्ता का अनुसरण करने के लिए तैयार हो जाते हैं। द्रौपदी ने थोड़े से व्यंग−उपहास भरे अपमानजनक शब्द दुर्योधन से कह दिये थे। उनका भाव इतना गहरा उतरा कि अठारह अक्षौहिणी सेना का विनाश करने वाले महाभारत के रूप में उसकी भयानक प्रतिक्रिया सामने आई। इन तथ्यों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि वाणी का काम जानकारी देना भर नहीं है। शब्द प्रवाह के साथ−साथ उनके प्रभावोत्पादक चेतन तत्व भी जुड़े रहते हैं और वे ध्वनि कम्पनों के साथ घुले रह कर जहाँ भी टकराते हैं वहाँ चेतनात्मक हलचल उत्पन्न करते हैं। शब्द को पदार्थ विज्ञान की कसौटी पर भौतिक तरंग स्पन्दन भर कहा जा सकता है, पर उसकी चेतना को प्रभावित करने वाली−संवेदनात्मक क्षमता की भौतिक व्याख्या नहीं हो सकती। वह विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक है।

जपयोग में शब्द शक्ति के इसी आध्यात्मिक प्रभाव को छान कर काम में लाया जाता है। नींबू का रस निचोड़ कर उसका छिलका एक ओर रख दिया जाता है। दूध में से घी निकाल कर छाछ को महत्वहीन ठहरा दिया जाता है। जपयोग में ऐसा ही होता है। उसके द्वारा ऐसी चेतन शक्ति का उद्भव होता है। जो जपकर्त्ता के शरीर एवं मन में विचित्र प्रकार की हलचलें उत्पन्न करती है और अनन्त आकाश में उड़कर विशिष्ट व्यक्तियों को—विशेष परिस्थितियों को तथा समूचे वातावरण को प्रभावित करती है।

मंत्रों का चयन ध्वनि−विज्ञान को आधार मान कर किया गया है। अर्थ का समावेश गौण है। गायत्री मंत्र की सामर्थ्य अद्भुत है। पर उसका अर्थ अति सामान्य है। भगवान से सद्बुद्धि की कामना भर उसमें की गई है। इसी अर्थ प्रयोजन को व्यक्त करने वाले मंत्र श्लोक हजारों हैं। हिन्दी तथा अन्य भाषाओं में भी ऐसी कविताओं की कमी नहीं जिनमें परमात्मा से सद्बुद्धि की प्रार्थना की गई है। फिर उन सब कविताओं को गायत्री मंत्र के समकक्ष क्यों नहीं रखा जाता और उनका उच्चारण क्यों उतना फलप्रद नहीं होता? वस्तुतः मंत्र सृष्टाओं की दृष्टि में शब्दों का गुँथन ही महत्वपूर्ण रहा है। कितने ही बीज मंत्र ऐसे हैं जिनका खींचतान के ही कुछ अर्थ भले ही गढ़ा जाय पर वस्तुतः उनका कुछ अर्थ है नहीं। ह्रीं, श्री क्लीं, ऐ, हुं यं, फट् आदि शब्दों का क्या अर्थ हो सकता है, इस प्रश्न पर माथापच्ची करना बेकार है। उनका सृजन यह ध्यान में रखते हुए किया गया है कि उनका उच्चारण किस स्तर का शक्ति कंपन उत्पन्न करता है और उनका जपकर्त्ता, बाह्य वातावरण तथा अभीष्ट प्रयोजन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

मानसिक, वाचिक एवं उपाँशु जप में ध्वनियों के हलके भारी किये जाने की प्रक्रिया काम में लाई जाती है। वेद मंत्रों के अक्षरों के साथ−साथ उदात्त−अनुदात्त और स्वरित क्रम से उनका उच्चारण नीचे−ऊँचे तथा मध्यवर्ती उतार−चढ़ाव के साथ किया जाता है। उनके अस्वर उच्चारण की परम्परा है। यह सब विधान इसी दृष्टि से बनाने पड़े हैं कि उन मन्त्रों का जप अभीष्ट उद्देश्य पूरा कर सकने वाला शक्ति प्रवाह उत्पन्न कर सके।

मन्त्र जप की दुहरी प्रतिक्रिया होती है। एक भीतर, दूसरी बाहर। आग जहाँ जलती है उस स्थान को गरम करती है, साथ ही वायुमण्डल में ऊष्मा बिखेर कर अपने प्रभाव क्षेत्र को भी गर्मी देती है। जप का ध्वनि प्रवाह—समुद्र की गहराई में चलने वाली जल धाराओं की तरह तथा ऊपर आकाश में छितराई हुई उड़ने वाली हवा की परतों की तरह अपनी हलचलें उत्पन्न करता है। उनके कारण शरीर में यत्र−तत्र, सन्निहित अनेकों ‘चक्रों’ तथा ‘उपत्यिका’ ग्रन्थियों में विशिष्ट स्तर का शक्ति संचार होता है। लगातार एक नियमित क्रम से चलने वाली हलचलें ऐसा प्रवाह उत्पन्न करती हैं, जिन्हें रहस्यमय ही कहा जा सकता है। पुलों पर सैनिकों के पैरों को मिलाकर चलने से उत्पन्न क्रमबद्ध ध्वनि उत्पन्न न करने के लिए इसलिए मना किया जाता है कि इस साधारण-सी क्रिया से पुल तोड़ देने वाला असाधारण प्रभाव उत्पन्न हो सकता है।

जप लगातार करना पड़ता है और एक ही क्रम से इस प्रक्रिया के परिणामों को विज्ञान की प्रयोगशाला में अधिक अच्छी तरह समझा जा सकता है। एक टन भारी लोहे का गार्टर किसी छत के बीचों बची लटका दिया जाय और उस पर पाँच ग्राम भारी हलके से कार्क के लगातार आघात लगाने प्रारम्भ कर दिये जायं तो कुछ ही समय में वह सारा गार्डर काँपने लगेगा। यह लगातार—एक गति से—आघात क्रम से उत्पन्न होने वाली शक्ति का चमत्कार है। मन्त्र जप यदि विधिवत् किया गया है तो उसका परिणाम भी यही होता है। सूक्ष्म शरीर में—अवस्थित चक्रों और ग्रन्थियों को जप ध्वनि का अनवरत प्रभाव अपने ढंग से प्रभावित करता है और उत्पन्न हुई हलचल उनकी मूर्छना दूर करके जागृति का अभिनव दौर उत्पन्न करती है। ग्रन्थिभेदन तथा चक्र जागरण का सत्परिणाम जपकर्त्ता को प्राप्त होता है। जगे हुए यह दिव्य संस्थान साधक में आत्मबल का नया संचार करते हैं। उसे ऐसा कुछ अपने भीतर जगा, उगा प्रतीत होता है जो पहले नहीं था। इस नवीन उपलब्धि के नाम भी उसे प्रत्यक्ष ही दृष्टि गोचर होते हैं।

टाइप राइटर के उदाहरण से इस तथ्य को और भी अच्छी तरह समझा जा सकता है। उँगली से चाबियाँ दबाई जाती हैं और कागज पर तीलियाँ गिर कर अक्षर छापने लगती हैं। मुख में लगे उच्चारण में प्रयुक्त होने वाले कलपुर्जों को टाइप राइटर की कुञ्जियाँ कह सकते हैं। मन्त्रोच्चारण उँगली से उन्हें दबाना हुआ। यहाँ से उत्पन्न शक्ति प्रवाह नाड़ी तन्तुओं की तीलियों के सहारे सूक्ष्म चक्रों और दिव्य ग्रन्थियों तक पहुँचता है और उन्हें झकझोर कर जगाने, खड़ा करने में संलग्न होता है। अक्षरों का छपना वह उपलब्धि है जो इन जागृत चक्रों द्वारा रहस्यमयी सिद्धियों के रूप में साधक को मिलती है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि यदि जपयोग को विधिवत् साधा गया होगा तो उसका सत्परिणाम उत्पन्न होगा ही।

पुलों पर होकर गुजरती हुई सेना को पैर मिलाकर चलने पर, ध्वनि प्रवाह उत्पन्न करने की मनाही कर दी जाती है। पुलों पर से गुजरते समय वे बिखरे हुए—स्वच्छतापूर्ण कदम बढ़ाते हैं। कारण यह है कि लेफ्ट राइट के ठीक क्रम से तालबद्ध पैर पड़ने से जो एकीभूत शक्ति उत्पन्न होती है उसकी अद्भुत शक्ति के प्रहार से मजबूत पुलों में दरार पड़ सकती है और भारी नुकसान हो सकता है। मन्त्र जप के क्रमबद्ध उच्चारण से उसी प्रकार का तालक्रम उत्पन्न होता है। और उसके फलस्वरूप शरीर के अन्तः संस्थानों में विशिष्ट हलचल उत्पन्न होती है। यह हलचलें उन आलौकिक शक्तियों की मूर्छना दूर करती हैं जो जागृत होने पर सामान्य मनुष्य को असामान्य चमत्कारों से संपन्न सिद्ध कर सकती हैं।

हाथों को लगातार थोड़ी देर तक घिसा जाय तो वे गरम हो जाते हैं। रगड़ से गर्मी और बिजली पैदा होती है, यह नियम विज्ञान की प्रथम कक्षा में पढ़ने वाले छात्र भी जानते हैं। जप में अनवरत उच्चारक्रम एक प्रकार का घर्षण उत्पन्न करता है। पत्थर पर रस्सी की रगड़ पड़ने से घिसाव के निशान बन जाते हैं। श्वास के आवागमन तथा रक्त की भाग−दौड़ से शरीर में गर्मी उत्पन्न होती है और उसी पर जीवन अवलम्बित रहता है। डायनेमो में पहिया घूमने से बिजली उत्पन्न होने की बात सभी जानते हैं। जप में जो घर्षण प्रक्रिया गतिशील होती है, वह दौड़ लगाने पर शरीर के उत्तेजित हो जाने की तरह सूक्ष्म शरीर में उत्तेजना पैदा करती है और उस गर्मी से मूर्छित पड़ा अन्तर्जगत नये जागरण का अनुभव करता है। यह जागरण मात्र उत्तेजना नहीं होती उसके साथ−साथ दिव्य उपलब्धियों की सम्भावना भी जुड़ी रहती है।

ध्वनियाँ उतनी ही नहीं है जितनी कि कानों से सुनाई पड़ती हैं। कान तो एक निश्चित स्तर के ध्वनि कंपन को ही सुन पाते हैं। उनके पकड़ से ऊँचे और नीचे कम्पनों वाले भी असंख्य ध्यान प्रवाह होते हैं जिन्हें मनुष्य के कान तो सुन नहीं सकते, पर उनके प्रभावों को उपकरणों की सहायता से प्रत्यक्ष देखा जाना जा सकता है। इन्हें ‘सुपर सोनिक’ ध्वनि तरंगें कहते हैं।

मनुष्य की ग्रहण और धारण शक्ति सीमित है। वह अपनी दुबली−सी क्षमता के लिए उपयुक्त शब्द प्रवाह ही पकड़ सके, इसी स्तर की कानों की झिल्ली बनी है। किन्तु यह संसार तो शक्ति का अथाह समुद्र है और इसमें ज्वार−भाटे की तरह श्रवणातीत ध्वनियाँ गतिशील रहती हैं। अच्छा ही हुआ कि मनुष्य की ग्रहण शक्ति सीमित है और वह अपने लिए सीमित प्रवाह ही ले पाता है अन्यथा यदि श्रवणातीत ध्वनियाँ भी उसे प्रभावित कर सकतीं तो जीवन धारण ही सम्भव न हो पाता।

शब्द की गति साधारणतया बहुत धीमी है। वह मात्र कुछ सौ फुट प्रति सैकिण्ड चल पाती है। तोप चलने पर धुँआ पहले दीखता है और धड़ाके की आवाज पीछे सुनाई पड़ती है। जहाँ दृश्य और श्रव्य का समावेश है वहाँ हर जगह ऐसा ही होगा। दृश्य पहले दीखेगा और उस घटना के साथ जुड़ी हुई आवाज कान तक पीछे पहुँचेगी।

रेडियो प्रसारण में एक छोटी−सी आवाज को विश्व व्यापी बना देने और उसे 1 लाख 86 हजार मील प्रति सैकिण्ड की चाल से चलने योग्य बना देने में इलेक्ट्रोमैगनेटिक तरंगों का ही चमत्कार होता है। रेडियो विज्ञानी जानते हैं कि ‘इलेक्ट्रो मैगनेटिक वैव्स’ पर साउण्ड का सुपर कम्पोज रिकार्ड कर दिया जाता है और वे पलक मारते सारे संसार की परिक्रमा कर लेने जितनी शक्तिशाली बन जाती हैं।

इलेक्ट्रो मैगनेटिक तरंगों की शक्ति से ही अन्तरिक्ष में भेजे गये राकेटों की उड़ान को धरती पर से नियंत्रित करने, उन्हें दिशा और संकेत देने , याँत्रिक खराबी दूर करने का प्रयोजन पूरा किया जाता है। वे ‘लेसर’ स्तर की बनती हैं तो शक्ति का ठिकाना नहीं रहता। एक फुट मोटी लोहे की चद्दर में सूराख कर देना उनके बायें हाथ का खेल है। पतली वे इतनी होती हैं कि आँख की पुतली के लाखवें हिस्से में खराबी होने पर मात्र उतने ही टुकड़े का निर्धारित गहराई तक ही सीमित रहने वाला सफल आपरेशन कर देती हैं। अब इन किरणों का उपयोग चिकित्सा क्षेत्र में भी बहुत होने लगा है। केन्सर, आंत्रशोध, यकृत की विकृति, गुर्दे की सूजन, हृदय की जकड़न जैसी बीमारियों की चिकित्सा में इनका सफल उपयोग हो रहा है।

‘सुपर सोनिक’ तरंगों का जप प्रक्रिया के द्वारा उत्पादन और समन्वय होता है। जप के समय उच्चारण किये गये शब्द—आत्म−निष्ठा, श्रद्धा एवं संकल्प शक्ति का समन्वय होने से वही क्रिया संपन्न होती है, जो रेडियो स्टेशन पर बोले गये शब्द−विशिष्ट विद्युत् शक्ति के साथ मिलकर अत्यंत शक्तिशाली हो उठते हैं और पलक मारते समस्त भूमण्डल में अपना उद्देश्य प्रसारित कर देते हैं। जप प्रक्रिया में एक विशेषता यह है कि उससे न केवल समस्त संसार का वातावरण प्रभावित होता है, वरन् साधक का व्यक्तित्व भी झनझनाने, जगमगाने लगता है। जबकि रेडियो स्टेशन से प्रसारण तो होता है, पर कोई स्थानीय विलक्षणता दिखाई नहीं पड़ती। लेसर रेडियम किरणें फेंकने वाले यंत्रों में कोई निजी प्रभाव नहीं देखा जाता वे उन स्थानों को ही प्रभावित करते हैं जहाँ उनका आघात लगता है। जप−प्रक्रिया में साधक को और वातावरण को प्रभावित करने की वह दुहरी शक्ति है—जो नव वैज्ञानिकों के सामान्य यन्त्र उपकरणों में नहीं पाई जाती।


जप से परिपोषण शक्ति का उद्भव और उपयोग

जप में शब्दों की पुनरावृत्ति होते रहने से उच्चारण का एक चक्र−व्यूह—सर्किल बनता है। क्रमिक परिभ्रमण से शक्ति उत्पन्न होती है। पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। उस परिभ्रमण से आकर्षण शक्ति तथा भूलोक में सन्निहित अनेक स्तर की क्षमताएँ उत्पन्न होती हैं। यदि पृथ्वी का परिभ्रमण बन्द हो जाय तो उस पर घोर नीरवता, निर्जीवता एवं अशक्तता छा जायगी । शक्ति उत्पादन के लिए परिभ्रमण कितना आवश्यक है। इसे ‘डायनेमो’ के प्रयोगकर्त्ता जानते हैं। घुमाव बन्द होते ही बिजली बनना बन्द हो जाती है। स्थूल और सूक्ष्म शरीर में विशिष्ट स्तर के विद्युत् प्रवाह उत्पन्न करने के लिए विशिष्ट शब्दों का—विशिष्ट गति एवं विधि से उच्चारण करना पड़ता है। मन्त्र जप का सामान्य विज्ञान यही है।

जप में एक शब्दावली को एक क्रम और एक गति से बिना विश्राम दिये गतिशील रखा जाता है। साधारण वार्तालाप में अनेकों शब्द अनेक अभिव्यक्तियाँ लिये हुए अनेक रस और भावों सहित उच्चारित होते हैं। अस्तु इनमें न तो एकरूपता होती है न एक गति। कभी विराम, कभी प्रवाह, कभी आवेश व्यक्त होते रहते हैं, पारस्परिक वार्तालाप में प्रतिपादन का एक केन्द्र या एक स्तर नहीं होता। अतएव उससे वार्ताजन्य प्रभाव भर उत्पन्न होता है, कोई विशिष्ट शक्तिधारा प्रवाहित नहीं होती। जप की स्थिति इसमें सर्वथा भिन्न है। उसमें सीमित शब्दावली ही प्रयुक्त होती है और वही लगातार बोली जाती रहती है। रेखागणित के विद्यार्थी जानते हैं कि एक रेखा यदि लगातार सीधी खींची जाती रहे तो वह अन्ततः उसी केन्द्र से आकर जुड़ जायगी, जहाँ से आरम्भ हुई थी। प्रत्येक गतिशील पदार्थ गोल हो जाता है। पृथ्वी गोल है। ग्रह−नक्षत्र सभी गोल हैं। भौतिक जगत का छोटा घटक परमाणु और चेतन जगत का छोटा घटक जीवाणु दोनों ही गोल हैं। गोलाई पर चलते रहा जाय तो उसका अंत आरम्भ वाले स्थान पर ही होगा। ग्रह−नक्षत्रों की भ्रमण कक्षाएं इसी आधार पर सुनिश्चित रहती हैं। सीधी रेखा में हम पृथ्वी की परिक्रमा करने निकल पड़े तो—लौटकर वहीं आ जायेंगे, जहाँ से चले थे। इस सिद्धान्त के अनुसार मन्त्र−जप की परिणति एक गतिशील शब्द चक्र की स्थापना के रूप में होती है।

कहा जाता है कि बाल्मीक ऋषि ने उलटा मंत्र जपा था अर्थात् “राम−राम” के स्थान पर “मरा−मरा” कहा था। वस्तुतः यह सुनने समझने वालों का ही भ्रम रहा होगा। लगातार एक ही गतिक्रम से राम−राम कहते रहने पर उसकी गति गोल हो जायगी और उसे आसानी से मरा−मरा समझा जा सकेगा। इसी प्रकार मरा−मरा मन्त्र का संकल्प लेकर किया गया उच्चारण भी राम−राम प्रतीत होने लगेगा। असल में होता यह है कि एक शब्दावली को अनवरत गति से बोलने पर उसमें आदि अंत का भेद नहीं रहता, पूरी शब्दावली एक गोलाई में घूमने लगती है और शब्द−चक्र बनाती है। मन्त्र जप के विधान का निर्देश करते हुए “तैलधार वत्” सूत्र में कहा गया है कि जिस तरह तेल को एक गति से गिराने पर उसकी धारा बँध जाती है, उसी प्रकार मन्त्रोच्चारण का क्रम एक ही गति से चलाना चाहिए। न उसके प्रवाह क्रम में अन्तर आवे और न उच्चारण स्तर में। रुक−रुककर—कभी धीमे, कभी तीव्र कभी उच्च स्वर, कभी मन्द ऐसा जप में नहीं हो सकता । वेदमंत्रों के सस्वर उच्चारण की बात दूसरी है। वे छन्द हैं इसलिए पाठ करते समय उन्हें स्वरबद्ध अनुशासन का ध्यान रखते हुए गाया जाना अथवा पाठ करना उचित है। जप की व्यवस्था इससे सर्वथा भिन्न है। गायत्री, मृत्युंजय आदि वेद मंत्रों को भी जप करते समय स्वर रहित ही जपा जाता है, साथ ही धारा जैसी एक रस—एक सम गति बनाये रखी जाती है। इसमें कोई अंतर तो नहीं पड़ा इसकी जाँच−पड़ताल माला के आधार पर की गई गणना से होती है। गायत्री मन्त्र जप में साधारणतया एक घण्टे में 10-11 माला होती है। नित्य वही क्रम चला या नहीं, इसकी जाँच-पड़ताल घड़ी और माला के समन्वय से हो सकती है। प्रत्येक माला पूरी होने में समान समय लगना चाहिए तभी मन्त्र शक्ति का वैज्ञानिक आधार बन गया ऐसा समझा जा सकता है। भक्ति−विभोर होकर बिना गति का ध्यान रखे भी जप हो सकता है, पर वह भावनात्मक प्रक्रिया हुई उसका परिणाम भावना की शुद्धता और गहराई पर निर्भर है। ऐसे जप को शब्द−शक्ति के आधार पर उत्पन्न होने वाले मन्त्र−जप से भिन्न स्तर का समझा जाना चाहिए। ब्लडप्रेशर नापने की मशीन रोगी को बांह पर बाँधकर डॉक्टर घड़ी पर निगाह लगाये रहते हैं, हवा का दबाव बढ़ाते रहते हैं, कान में स्टेथिस्कोप से धड़कन गिनते रहते हैं, तभी वे समझ पाते हैं कि रक्त−चाप कितना है। घड़ी और माला गणना पर ध्यान लगाये रहकर नये साधक को अपने जप की गति को एक रस—एक सम बनाना पड़ता है। उतना बन पड़े तो समझना चाहिए कि शब्द गति का चक्र बन गया और उसके आधार पर मन्त्र विज्ञान के विशिष्ट परिणाम उत्पन्न होंगे। विशेष पुरश्चरणों में जप विद्या के निष्णात साधक इसीलिए बिठाये जाते हैं कि उनकी सही क्रम−प्रक्रिया, सही परिणाम उत्पन्न कर सके।

गति जब गोलाई में घूमने लगती है तो उससे उत्पन्न होने वाले चमत्कार हम अपने दैनिक जीवन में नित्य ही देखते रहते हैं। बच्चे छोटी ‘फिरकनी’ अथवा लट्टू जमीन पर घुमाने का खेल−खेलते हैं। एक बार होशियारी से घुमा देने पर यह खिलौने देर तक अपनी धुरी पर घूमते रहते हैं और गिरते नहीं। जबकि गति चमत्कार ही है कि एक बार का धक्का देर तक काम देता है और उत्पन्न गति प्रवाह को देर तक चलते रहने की स्थिति उत्पन्न करता है। जप के द्वारा उत्पन्न गति भी साधना काल के बहुत पश्चात् तक चलती रहती है और साधक की आत्मिक विशेषता को गतिशील एवं सुस्थिर बनाये रहती है।

मशीनों का बड़ा पहिया ‘फ्लाईह्वील’ एक बार घुमा देने पर मशीन के अन्य पुर्जों को न केवल गतिशील ही करता है, वरन् उनकी चाल को नियन्त्रित भी करता है। आरी का उपयोग हाथ से आगे पीछे की गति से करने पर भी लकड़ी कटती तो है, पर यदि गोलाई में घुमा दिया जाय तो वही आरी कई गुनी शक्तिशाली सिद्ध होगी और अधिक मात्रा में—अधिक जल्दी कटाई कर सकेगी। आरा मशीनें यही करती हैं। वे मोटे-मोटे लट्ठे और कठोर जड़ें आसानी से चीर−चाकर रख देती हैं जबकि आगे पीछे करने पर उसी आरी के लिए वही लकड़ी काटना काफी पड़ता है। यह सब गोलाई में घूमने वाले गति प्रवाह का चमत्कार है।

तेजी के साथ गोलाई का घुमाव “सैन्ट्री फ्यूगल फोर्स” उत्पन्न करता है। गोफन में कंकड़ रखकर घुमाने और उसे छोड़कर पक्षी भगाने का कार्य पकी फसल रखाने के लिए किसानों को बहुधा करना पड़ता है। ज्वार, बाजरा, मक्का जैसे खुले दाने की फसलों को अक्सर तोते, कौए खराब करने लगते हैं, तब यह गोफन घुमाकर कंकड़ फेंकने की प्रक्रिया रखवाली के काम आती है। यह घुमाव से उत्पन्न हुई शक्ति ही है जो कंकड़ को गोली जैसी गति के साथ दूर तक फेंकती है। वह कंकड़ इतनी तेजी पर होता है कि कोई पक्षी उसका निशाना बन जाने पर ढेर होकर ही रहता है।

देहाती मेलों में हवाई जहाज उड़ने अथवा घोड़े दौड़ाने का मजा देने वाले झूले आते हैं। बच्चे उन पर बैठकर मजा लेते हैं। यह झूले अक्सर इंजन या मोटर से चलते हैं। घुमाव पकड़ते ही नीचे लटकने वाले घोड़े या जहाज पंख फैलाने लगते हैं और चौड़े दायरे में घूमने लगते हैं। खड़े होने पर झूले का घेरा 30 फुट था तो तेजी से घूमने पर वह चाल के अनुपात से 70-80 फुट तक चला जाता है। फैलाव तो होता ही है और साथ ही बैठने की सीटें तिरछी हो जाने पर भी बच्चे गिरते नहीं। यहाँ तक कि तिरछेपन के कारण गिरने का डर भी उन्हें नहीं लगता और अनुभव करते हैं कि वे सीधे सड़क पर चल रहे हैं।

सरकसों में एक लकड़ी के घेरे पर मोटरसाइकिल घुमाने का खेल अक्सर देखा जाता है, इसे मौत का कुँआ कहते हैं। दर्शक चकित रह जाते हैं कि साइकिल सवार बिलकुल तिरछा घूम रहा है फिर भी गिरता नहीं।

लोटे में पानी भरा जाय, उसकी गरदन में रस्सी बाँधकर घुमाया जाय तो पानी उस लोटे में ही भरा रहेगा, गिरेगा नहीं।

घुमाव की शक्ति के यह आश्चर्यचकित करने वाले परिणाम साधारणतया देखने में आते रहते हैं। जप के माध्यम से गतिशील शब्द शक्ति का प्रतिफल भी वैसा ही होता है। झूले पर बैठे बच्चों को जिस तरह अधिक बड़े दायरे में तेजी से घूमने का और गिरने की आशंका होने पर भी न गिरने का आनन्द मिलता है, उसी प्रकार अंतः चेतना की सीमा परिधि छोटी सीमा से बढ़कर कहीं अधिक व्यापक क्षेत्र तक अपना विस्तार देखती है और दुर्भावनाओं एवं दुष्प्रवृत्तियों के कारण अधःपतन की जो आशंका रहती है, उसके बचाव की सहज सम्भावना बन जाती है। गोफन द्वारा फेंके गये कंकड़ की तरह साधक अभीष्ट लक्ष्य की ओर द्रुतगति से दौड़ता है और यदि फेंकने वाले के हाथ सधे हुए हैं तो वह ठीक निशाने पर भी जा लगता है। घुमाव की स्थिति में रहने पर तिरछा हो जाने पर भी लोटे का पानी नहीं फैलता। उसी प्रकार अपने भीतर भरे जीवन तत्व के संसार के अवाँछनीय आकर्षणों में गिर पड़ने का संकट घट जाता है। लोहा धीमे घुमाया गया हो तो बात दूसरी है, पर तेजी का घुमाव पानी को नहीं ही गिरते देता। जप के साथ जुड़ा विधान और भावना−स्तर यदि सही हो तो आन्तरिक दुष्प्रवृत्तियों से आये दिन जूझने और कदम−कदम पर असफल होने की कठिनाई दूर हो जाती है।

मौत के कुँए में मोटरसाइकिल घुमाने वाला सवार तिरछेपन और दौड़ने के लिए स्थान कम होने के कारण संकट उत्पन्न होने की आशंका से बचा रहता है। जप−साधना का साधक भी प्रगति के मार्ग में उत्पन्न होते रहने वाले अनेक अवरोधों पर विजय प्राप्त करता है और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी आगे बढ़ता चला जाता है।

औजारों से जो प्रयोजन सिद्ध होते हैं उनमें मात्र उन यन्त्रों, मशीनों, पुर्जों, उपकरणों का ही महत्व नहीं होता, उन्हें चलाने वाली शक्ति की भी अनिवार्य आवश्यकता रहती है। मशीनें स्वसंचालित या कितनी भी कीमती क्यों न हो, बिजली, भाप की—हाथ की या अन्य किसी प्रकार की शक्ति उन्हें चलाने के लिए चाहिए ही, इसका प्रबंध न हो सका तो बहुमूल्य मशीनों से सुसज्जित कारखाने में भी कुछ उत्पादन न हो सकेगा। जप आदि कर्मकाण्डों को औजार, उपकरण, मशीन आदि कहा जा सकता है। साधक का व्यक्तित्व उसका चरित्र, लक्ष्य, दृष्टिकोण एवं भावना स्तर मिलकर चेतनात्मक शक्ति के रूप में परिणत होता है और उसका बल पाकर शारीरिक हलचल मात्र दीखने वाले कर्मकाण्डों में दिव्य चेतना का संचार होता है। इसी समन्वय के आधार पर साधना को सिद्धि बनने का अवसर मिलता है।


आत्म जागरण के लिए ध्यान योग की आवश्यकता

मनुष्य जीवन ईश्वर का अनुपम उपहार है। इससे बड़ा अनुदान उसके पास ऐसा और कोई नहीं है जो प्राणी को दिया जा सके। इसकी विशेषताएं और सम्भावनाएँ इतनी अद्भुत हैं जिनका स्वरूप सामने आने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। यह उपहार ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक बनने की भूमिका निबाहने के लिए मिला है। जीवन अपने कषाय कल्मषों को धोकर ईश्वरीय सत्ता में विलीन होने की मुक्ति का अधिकारी बने यह मनुष्य जीवन का प्रथम उद्देश्य है। इसे पाने के लिए उसे हर दृष्टि से आदर्श बनना पड़ता है। दूसरों के लिए ऐसे ही लोग प्रकाश स्तम्भ बनते हैं। जीवन का दूसरा उद्देश्य है भगवान के इस विश्व उद्यान को अधिकाधिक सुविकसित, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने में सहायक सिद्ध होना—परमात्मा का हाथ बटाना। इन्हीं दो प्रयोजनों के लिए मनुष्य शरीर जैसा अनुपम उपहार प्राणी को दिया गया है। यह अमानत इसी विश्वास के आधार पर दी गई है कि उसका सही एवं समुचित उपयोग किया जायगा। यदि वैसा न करके इस अनुदान को व्यक्तिगत विलासिता एवं अहंकारिता की पूर्ति में लगा दिया जाता है तो यह ईश्वर के साथ एक प्रकार का विश्वासघात ही हुआ। इसे धरोहर का दुरुपयोग, अमानत में खयानत कहा जा सकता है।

हम अपने स्वरूप, ईश्वर के अनुग्रह—जीवन के महत्व एवं लक्ष्य की बात को एक प्रकार से पूरी तरह भुला बैठे हैं। न हमें अपनी सत्ता का ज्ञान है, न ईश्वर का ध्यान और न लक्ष्य का ज्ञान। अज्ञानान्धकार की भूल भुलैया में बेतरह भटक रहे हैं। यह भुलक्कड़पन विचित्र है। लोग वस्तुओं को तो अक्सर भूल जाते हैं, सुनी, पढ़ी बातों को भूल जाने की घटनाएं भी होती रहती हैं। कभी के परिचित भी विस्मृत होने से अपरिचित बन जाते हैं। पर ऐसा कदाचित ही होता है कि अपने आपे को ही भुला दिया जाय। हम अपने को शरीर मात्र मानते हैं। उसी के स्वार्थों को अपना स्वार्थ, उसी की आवश्यकताओं को अपनी आवश्यकता मानते हैं। शरीर और मन यह दोनों ही साधन जीवन रथ के दो पहिये मात्र हैं, पर घटित कुछ विलक्षण हुआ है। हम आत्मसत्ता को सर्वथा भुला बैठे हैं। यों शरीर और आत्मा की पृथकता की बात कही सुनी तो अक्सर जाती है। पर वैसा भान जीवन भर में कदाचित ही कभी होता हो। यदि होता भी है तो बहुत ही धुंधला। यदि वस्तुस्थिति समझ ली जाती है और जीव−सत्ता तथा उसके उपकरणों की पृथकता का स्वरूप चेतना में उभर जाता है तो आत्मकल्याण की बात प्रमुख बन जाती है और वाहनों के लिए उतना ही ध्यान दिया जाता है जितना कि उनके लिए आवश्यक था। आज तो ‘हम’ नंगे फिर रहे हैं और वाहनों को स्वर्ण आभूषणों से सजा रहे हैं। ‘हम’ भूखे मर रहे हैं और वाहनों को घी पिलाया जा रहा है। ‘हम’ से मतलब है आत्मा और वाहन का मतलब है शरीर और मन। स्वामी सेवकों की सेवकाई में लगा है और अपने उत्तरदायित्वों को सर्वदा भुला बैठा है यह विचित्र स्थिति है।

वस्तुतः हम अपने आपे को खो बैठे हैं। उसी को खोजते हैं। ध्यान−साधना का उद्देश्य इस विस्मृति को स्मृति में बदलना है। कोई वस्तु खो जाती है तो ध्यान करते हैं कि उसे घर से लेकर चले थे तब कहाँ−कहाँ तक साथ थी और फिर कहाँ से खाली हाथ चले। पैसा घटता है तो ध्यान करते हैं कि कहीं रखा तो नहीं—किसी को दिया तो नहीं—कहीं गिरा तो नहीं। मस्तिष्क पर अधिक जोर देने से स्मृति पहले उभरती है और प्रायः याद आ जाती है कि वस्तु या पैसा कहाँ रहा होगा। भौतिक जीवन में हम प्रायः ध्यान के सहारे ही विस्मृति के कारण उत्पन्न होती रहने वाली कठिनाईयों से पीछा छुड़ाते हैं और जो गुम गया है, उसे प्राप्त करते हैं।

आध्यात्मिक ध्यान का उद्देश्य है, अपने स्वरूप और लक्ष्य की विस्मृति के कारण उत्पन्न वर्तमान विपन्नता से छुटकारा पाना। एक बच्चा घर से चला ननिहाल के लिए। रास्ते में मेला पड़ा और वह उसी में रम गया। वहाँ के दृश्यों में इतना रमा कि अपने घर तथा गन्तव्य को ही नहीं अपना नाम पता भी भूल गया।’ यह कथा बड़ी अटपटी लगती है, पर है सोलह आने सच और वह हम सब पर लागू होती है। अपना नाम पता, परिचय पत्र, टिकट आदि सब कुछ गंवा देने पर हम असमंजस भरी स्थिति में खड़े हैं कि आखिर हम हैं कौन—कहाँ से आये और कहाँ जाना था? स्थिति विचित्र है इसे न स्वीकार करते बनता है और न अस्वीकार करते। स्वीकार करना इसलिए कठिन है कि हम पागल नहीं, अच्छे खासे समझदार हैं। सारे कारोबार चलाते हैं फिर आत्म−विस्मृत कहाँ हुए? अस्वीकार करना भी कठिन है क्योंकि वस्तुतः हम ईश्वर के अंश हैं—महान मनुष्य जन्म के उपलब्ध कर्त्ता हैं तथा परमात्मा को प्राप्त करने तक घोर अशान्ति की स्थिति में पड़े रहने की बात को भी जानते हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट है जो होना चाहिए वह नहीं है और जो करना चाहिए था वह कर भी नहीं रहे हैं। यही अंतर्द्वंद्व उभर कर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में छाया रहता है और हमें निरन्तर घोर अशाँति अनुभव होती है।

जीवन का लक्ष्य पूर्णता प्राप्त करना है। यह पूर्णता—ईश्वरीय स्तर की ही हो सकती है। आत्मा को परमात्मा बनाने के लिए उस लक्ष्य पर ध्यान को एकाग्र करना आवश्यक है। महत्वपूर्ण इमारतें बनाने से पूर्व उनके नक्शे, छापे एवं मॉडल बनाये जाते हैं। इंजीनियर, कारीगर उसी को देख−देख कर अपना निर्माण कार्य चलाते हैं। भगवान का स्वरूप और गुण, कर्म, स्वभाव कैसा हो इसकी ध्यान प्रतिमा विनिर्मित की जाती है और फिर उसके साथ समीपता, एकता—तादात्म्यता स्थापित करते हुए उसी स्तर का बनाने के लिए प्रयत्न किया जाता है। ध्यान प्रक्रिया का यही स्वरूप है।

व्यक्तिगत जीवन में कितने ही व्याकुल विचलित कर देने वाले ऐसे प्रसंग आते हैं जो मनःस्थिति को उद्विग्न करके रख देते हैं इन आवेश ग्रस्त क्षणों में मनुष्य संतुलन खो बैठता है—न सोचने योग्य सोचता है—न कहने योग्य कहता है और न करने योग्य करता है। गलती आखिर गलती ही रहती है और उसके दुष्परिणाम भी निश्चित रूप से होते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि मुसीबत अकेली नहीं आती अपने साथ विपत्तियों का नया परिवार समेट कर लाती है। इस कथन में सचाई इसलिए है कि जिन कारणों से मानसिक संतुलन बिगड़ा था उनकी हानि तो प्रत्यक्ष ही थी। हानि न होती तो उद्वेग क्यों होता? अब उद्वेग के कारण जो असंगत चिन्तन कथन और क्रिया−कलाप आरम्भ हुआ उसने अन्यान्य कितनी ही नई समस्याएँ उत्पन्न करके रख दीं। कई बार तो उद्विग्नता शारीरिक, मानसिक अस्वस्थता उत्पन्न करने में भी आगे बढ़ जाती है और आत्म−हत्या अथवा दूसरों की हत्या कर डालने जैसे संकट उत्पन्न करती है।

असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए ध्यान एकाग्रता के कुशल−अभ्यास से बढ़कर और कोई अधिक उपयोगी उपाय हो नहीं सकता। कई बार मन क्रोध, शोक, कामुकता, प्रतिशोध, विक्षोभ जैसे उद्वेगों में बेतरह फँस जाता है और उस स्थिति में अपना या पराया कुछ भी अनर्थ हो सकता है। उद्विग्नताओं में घिरा हुआ मन कुछ समय में सनकी या विक्षिप्त स्तर का बन जाता है। सही निर्णय कर सकना और वस्तु स्थिति को समझ सकना। उसके बस से बाहर की बात हो जाती है। इन विक्षोभों से मस्तिष्क को कैसे उबारा जाय और कैसे उसे संतुलित स्थिति में रहने का अभ्यस्त कराया जाय, इसका समाधान ध्यान साधन के साथ जुड़ा हुआ है। मन को अमुक चिन्तन प्रवाह से हटाकर अमुक दिशा में नियोजित करने की प्रक्रिया ही ध्यान कहलाती है। इसका प्रारम्भ भटकाव के स्वेच्छाचार से मन को हटाकर एक नियम निर्धारित दिशा में लगाने के अभ्यास से आरंभ होता है। इष्टदेव पर अथवा अमुक स्थिति पर मन को नियोजित कर देने का अभ्यास ही तो ध्यान में करना पड़ता है। मन पर अंकुश पाने—उसका प्रवाह रोकने में—सफलता प्राप्त कर लेना ही ध्यान की सफलता है। यह स्थिति आने पर कामुकता शोक संतप्तता, क्रोधान्धता, आतुरता ललक, लिप्सा जैसे आवेशों पर काबू पाया जा सकता है। मस्तिष्क को इन उद्वेगों से रोक कर किसी उपयोगी चिन्तन में मोड़ा−मरोड़ा जा सकता है। कहते हैं कि अपने को वश में कर लेने वाला—सारे संसार को वश में कर लेता है। आत्म−नियंत्रण की यह स्थिति प्राप्त कर लेता है। आत्म−नियन्त्रण की यह स्थिति प्राप्त करने में ध्यान साधना से बढ़कर और कोई उपाय नहीं है। इसका लाभ आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से मिलता है। अभीष्ट प्रयोजनों में पूरी तन्मयता, तत्परता नियोजित करने से ही किसी कार्य का स्तर ऊँचा उठता है, सफलता का सही मार्ग मिलता है और बढ़ी−चढ़ी उपलब्धियाँ पाने का अवसर मिलता है। आत्मिक क्षेत्र में भी यही तन्मयता प्रसुप्त शक्तियों के जागरण से लेकर ईश्वर प्राप्ति तक का महत्वपूर्ण माध्यम बनती हैं।

यदि यह अभ्यास हो जाय तो असंतुलनजन्य उन सभी कठिनाइयों से बचा जा सकता है जो सामान्य मानव जीवन को अस्त−व्यस्त और नष्ट भ्रष्ट करके रख देती हैं। आलस्य, प्रमाद, चिन्ता, निराशा, भय, आशंका जैसे रक्त को ठंडा कर देने वाले और सशक्त मनुष्य को अपंग, असफल बना कर रख देने वाली अवसादग्रस्त मनःस्थिति को यदि बदला जा सके और उसे श्रम−निष्ठा, काम में दिलचस्पी, उत्साह, आशा, साहस, दृढ़ निश्चय जैसे स्तर तक पहुँचाया जा सके तो गतिविधियों में काया−कल्प जैसा परिवर्तन हो सकता है और पग−पग पर असफल होने वाला व्यक्ति एक के बाद दूसरी सफलता प्राप्त करते हुए उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है। इसी प्रकार सामान्य जीवन में आये दिन प्रस्तुत होने वाली दुःख, शोक, क्षोभ, विद्रोह, क्रोध, आवेश उत्पन्न करने वाली घटनाओं को धैर्यपूर्वक सहन किया जाय और मस्तिष्क को विक्षुब्ध न करके कठिनाइयों का हल सोचा जाय तो इतने भर आत्म−नियंत्रण से, उपस्थित नई कठिनाई का आधा समाधान निकल सकता है।

अवसाद की ‘लो ब्लड प्रेशर’ और आवेश की ‘हाई ब्लड प्रेशर’ से तुलना की जा सकती है। यह दोनों मानसिक रोग प्रायः आधी शक्ति नष्ट कर देते हैं। इनसे बचा जा सके तो जीवन संपदा का पूरा लाभ उठाया जा सकता है । इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए अपने में यह शक्ति होनी चाहिए कि आवेशों के प्रवाह को रोक कर मन को सन्तुलित रखा जा सके और उसे उपयोगी दिशा में सोचने के लिए बलपूर्वक नियोजित किया जा सके। ध्यान योग में इसी का अभ्यास करना पड़ता है। मन को अमुक प्रकार के चिन्तन से—स्वेच्छाचार से रोककर उसे अरुचिकर होते हुए भी अमुक ‘चिन्तन में बलपूर्वक लगाने के लिए कड़ाई बरतने का नाम ही तो ध्यानयोग है। इस दिशा में न्यूनाधिक जितनी सफलता मिलती चलेगी उतना ही भौतिक एवं आत्मिक प्रगति का द्वार खुलता जायगा।

कइयों को एक विचित्र मानसिक रोग होता है कि वे सोते−सोते उठकर चल देते हैं—अमुक काम करने लगते हैं और फिर उसे करने के बाद अपनी जगह पर वापस आकर सो जाते हैं । मनोरोग चिकित्सा में इस व्याधि का विस्तृत वर्णन और चिकित्सा विधान मौजूद है। अब यह रोग और भी अधिक बढ़ने लगा है। फ्रांस में तो ऐसी घटनाएँ पिछले ही दिनों इतनी हुई हैं जिनमें लोग घर से बाहर जाकर अपना नाम, पता, व्यवसाय एवं अब तक का सारा घटनाक्रम ही भूल गये और अजनबी व्यक्ति की तरह नये ढंग का जीवन आरम्भ करके गुजारा करने लगे। बहुत वर्षों बाद उन्हें अपनी पुरानी स्थिति का स्मरण आया तब वे उस नये जंजाल को छोड़−छाड़कर घर वापस लौटे। कभी−कभी कुछ विचित्र मनःस्थिति के लड़के घर से भाग खड़े होते हैं और कहीं जाकर गुजर करने लगते हैं। अपना नाम पता तो याद रहता है, पर घर वालों के साथ मधुर संबंधों का एक प्रकार से विस्मरण ही हो जाता है और वे नई जगह में, नये वातावरण में इतने घुल जाते हैं कि जहाँ से आये थे वहाँ वापिस जाने या चिट्ठी पत्री लिखने या समाचार देने तक की आवश्यकता नहीं समझते। इस स्थिति में रहते हुए उन्हें मुद्दतें बीत जाती हैं। घर वालों की याद उन्हें तनिक भी विचलित नहीं करती। वे ऐसी मनःस्थिति में रहते हैं मानो घर से कोई संबंध ही न हो। घर वाले ढूँढ़ते, रोते, कलपते रहते हैं पर उन्हें इसकी तनिक भी अनुभूति नहीं होती। यह भी स्नेह संबंधों का अर्ध विस्मरण ही है। जिन्हें ऐसी स्थिति प्राप्त है उन्हें भी एक प्रकार का भावनात्मक रोगी ही कह सकते हैं। स्नेह संबंध का रक्त बहाने वाली उनकी संवेदन शिराएं सूक्ष्म शरीर में एक प्रकार से सूख ही जाती हैं और वे प्रकारान्तर से मानसिक पक्षाघात पीड़ित कहे जा सकते हैं।

लगभग ऐसी ही मानसिक स्थिति कारण−शरीर के क्षेत्र में हम सबकी है। अपने मूल स्वरूप के बारे में, जीवन के महत्व और लक्ष्य के बारे में गम्भीरतापूर्वक सोच सकना बन ही नहीं पड़ता। बहिर्मुखी जीवन की शरीर यात्रा से संबंधित खेल−खिलवाड़ों में ही सारी चेतना जुड़ी रहती है। वासना, तृष्णा की पूर्ति के लिए ही नट−मरकट स्तर की उथली खिलवाड़ में उलझे रहना ही पर्याप्त लगता है। यह तो स्मरण ही नहीं आता कि हम हैं कौन और यहाँ क्या करने आये हैं? ईश्वर ने यह सुर−दुर्लभ अनुदान किस प्रयोजन के लिए दिया है?

ध्यानयोग का उद्देश्य अपनी मूलभूत स्थिति के बारे में अपने स्वरूप के बारे में सोच−विचार कर सकने योग्य स्मृति को वापिस लौटाना है। यदि किसी प्रकार वह वापिस लौट सके तो लंबा सपना देखकर डरे हुए व्यक्ति जैसी अन्तः स्थिति हुए बिना नहीं रह सकती। तब प्रतीत होगा कि मेले में खोये हुए बच्चे से—आत्म विस्मृत मानसिक रोगियों से—अपनी स्थिति भिन्न नहीं रही है। इस व्यथा से ग्रसित लोग स्वयं घाटे में रहते हैं और अपने संबंधियों को दुःखी करते हैं। हम आत्म−बोध को खोकर भेड़ों के झुण्ड में रहने वाले सिंह की तरह दयनीय स्तर का जीवन−यापन कर रहे हैं और अपनी माता—परमात्मा−सत्ता को कष्ट दे रहे हैं—रुष्ट कर रहे हैं।

विस्मरण का निवारण—आत्म बोध की भूमिका में जागरण—यही है ध्यानयोग का लक्ष्य। उसमें ईश्वर का स्मरण किया जाता है—अपने स्वरूप का भी अनुभव किया जाता है। जीव और ब्रह्म के मिलन की स्मृति फिर से ताजा की जाती है और यह अनुभव किया जाता है कि जिन दिव्य सत्ता से एक तरह संबंध विच्छेद कर रखा गया है, वही हमारी जननी और परम शुभ चिन्तक है। इतना ही नहीं वह कामधेनु की तरह इतनी सशक्त भी है कि उसका पयः पान करके देवोपम स्तर का लाभ ले सकें। कल्प−वृक्ष की छाया में बैठकर सब कुछ पाया जा सकता है, ईश्वरीय सत्ता से सम्पर्क, सान्निध्य, घनिष्ठता बना लेने के बाद भी ऐसा कुछ शेष नहीं रहता जिसे अभाव दारिद्रय अथवा शोक−संताप कहा जा सके। ध्यान−योग हमें इसी लक्ष्य की पूर्ति में सहायता करता है। स्पष्ट है कि आत्म−बोध से बढ़कर मानव जीवन का दूसरा लाभ नहीं हो सकता। भगवान बुद्ध को जिस वट-वृक्ष के नीचे आत्म-बोध हुआ है उसकी डालियाँ काट-काट कर संसार भर में इस आशा से बड़ी श्रद्धापूर्वक आरोपित की गई थीं कि उसके नीचे बैठ कर अन्य लोग भी आत्म-बोध का लाभ प्राप्त करेंगे और दूसरे बुद्ध बनेंगे। किसी स्थूल वृक्ष के नीचे बैठकर महान जागरण की स्थिति प्रात कर सकना कठिन है। पर ध्यानयोग के कल्प-वृक्ष की छाया में सच्चे मन से बैठने वाला व्यक्ति आत्म-बोध का लाभ ले सकता है और नर-पशु के स्तर से ऊँचा उठकर नर-नारायण के समकक्ष बन सकता है।

मन जंगली हाथी की तरह है, जिसे पकड़ने के लिए पालतू प्रशिक्षित हाथी भेजने पड़ते हैं। सधी हुई बुद्धि पालतू हाथी का काम करती है। ध्यान के रस्से में पकड़-जकड़ कर उसे काबू में लाती है और फिर उसे सत्प्रयोजनों में संलग्न हो सकने योग्य सुसंस्कृत बनाती है।

हरी घास में रहने वाले टिड्डे हरे रंग के होते हैं, पर यदि उन्हें सूखी घास में रहना पड़े तो कुछ समय बाद उसी रंग के हो जायेंगे। यह ध्यान साधना का चमत्कार है। जो वातावरण मस्तिष्क में छाया रहता है व्यक्तित्व उसी ढाँचे में ढलने लगता है। भगवत् चिन्तन से न केवल मन:स्थिति, वरन् सारी जीवन सत्ता ही उसी ढाँचे में ढलने लगती है।

पानी का स्वभाव नीचे गिरना है। उसे ऊँचा उठाना है तो पम्प, चरखी, ढेंकी आदि लगाने की व्यवस्था बनानी पड़ती है। निम्नगामी पतनोन्मुख प्रवृत्तियों में हमारी अधिकाँश शक्तियाँ नष्ट होती रहती हैं। उन्हें पर उठाने के लिए मस्तिष्क में दिव्य-प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने की ध्यान की प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। नीचे की मंजिल पर लगे हुए नल से पानी बहना बन्द हो जाता है तभी ऊपर की मंजिल के नल में पानी आता है। निम्नगामी प्रवृत्तियों से मन हट कर ब्रह्म लोक में- मस्तिष्क में- उन्हें केन्द्रित करने का कार्य ध्यान साधना से सम्पन्न होता है।


ध्यान योग से एकाग्रता की दिव्य शक्ति का उद्भव

शक्ति को उपलब्ध करना बड़ी बात नहीं, उसे बिखराव के निरर्थक एवं अपव्यय की अनर्थ मूलक बर्बादी से भी बचाया जाना चाहिए। शक्ति की उपलब्धि का लाभ तभी मिलता है जब उसे संग्रहित रखने और सत्प्रयोजन में लगाने की व्यवस्था बन पड़े।

धूप, गर्मी से ढेरों पानी समुद्र तालाबों में से भाप बनकर उड़ता रहता है, चूल्हों से कितनी ही भाप उत्पन्न होती और उड़ती है। उसका कोई उपयोग नहीं। किन्तु इंजन में थोड़ा-सा पानी भाप बनाया जाता है। उस भाप को हवा में उड़ जाने से बचाकर एक टंकी में एकत्रित किया जाता है और फिर उसका शक्ति प्रवाह एक छोटे छेद में होकर पिस्टन तक पहुँचा दिया जाता है। इतने मात्र से रेलगाड़ी का इंजन चलने लगता है। चलता ही नहीं दौड़ता भी है। उसकी दौड़ इतनी सामर्थ्ययुक्त होती है कि अपने साथ-साथ बहुत भारी लदी रेलगाड़ी के दर्जनों डिब्बे घसीटता चला जाता है।

सेरों बारूद यदि जमीन पर फैलाकर माचिस से जलाई जाय तो थोड़ी-सी चमक दिखाकर भक से जल जायगी। उसका कुछ भी उपयोगी परिणाम न निकलेगा न कोई आवाज होगी। किन्तु यदि उसे बन्दूक की छोटी-सी नली के भीतर कड़े खोल वाले कारतूस में बन्द कर दिया जाय और घोड़ा दबाकर नन्हीं-सी चिनगारी से स्पर्श कराया जाय तो वह एक तोले से भी कम वजन की बारूद गजब ढाती है। सनसनाती हुई एक दिशा विशेष की ओर प्रचण्ड गति से दौड़ती है। अपने साथ लोहे की गोली और छर्रों को भी घसीटती ले जाती है और जहाँ टकराती है, वहाँ सफाया उड़ा देती है। बिखरी हुई बारूद की निरर्थकता और उसकी संग्रहीत शक्ति को दिशा विशेष में प्रयुक्त किये जाने की सार्थकता में कितना अंतर होता है इसे सहज ही समझा जा सकता है।

सूर्य की किरणें सुविस्तृत क्षेत्र में बिखरी पड़ी रहती हैं। रोज ही सूर्य निकलता और अस्त होता है। धूप थोड़ी−सी गर्मी, रोशनी पैदा करने जितना ही काम कर पाती है। पर यदि उन किरणों के एक दो इंच के बिखराव को आतिशी−शीशे द्वारा एक केन्द्र पर केन्द्रित कर लिया जाय तो देखते−देखते आग जलने लगेगी और उसे किसी बड़े जंगल में डाल दिया जाय तो दावानल बनकर भयंकर विनाश लीला प्रस्तुत कर सकती है।

स्थूल शक्तियों की तरह− सूक्ष्म शक्तियों का लाभ भी उन्हें एकत्रित करके किसी दिशा विशेष में लगा देने से ही संभव हो सकता है। मस्तिष्क एक सशक्त बिजली घर है। इसमें निरन्तर प्रचण्ड विद्युत प्रवाह उत्पन्न होता है और उसके शक्तिशाली कंपन ऐसे ही अनन्त आकाश में उड़ते, बिखरते नष्ट होते रहते हैं। यदि इस प्रवाह को केन्द्रित करके किसी विशेष लक्ष्य पर नियोजित किया जा सके तो उसके आश्चर्यजनक परिणाम हो सकते हैं। एकाग्रता की चमत्कारी शक्ति कहीं भी देखी जा सकती है। सरकस में एक से बढ़कर एक आश्चर्यजनक खेल होते हैं। उनमें शारीरिक शक्ति का उपयोग कम और एकाग्रता का अधिक होता है। एक पहिये की साइकिल−एक तार पर चलना, एक झूले से दूसरे झूले पर उछल जाना, तश्तरियाँ तेजी से लगातार एक हाथ से उछालना और दूसरे से पकड़ना जैसे खेलों में एकाग्रतापूर्वक कुछ अंगों को सधा लेने का अभ्यास ही कौतूहल उत्पन्न करता है।

द्रौपदी स्वयंवर में चक्र पर चढ़ी हुई नकली मछली की तीर से आँख भर बेध देना विजेता होने की शर्त थी। द्रोणाचार्य उसका पूर्व अभ्यास अपने शिष्यों को करा रहे थे। निशाने पर तीर छोड़ने से पूर्व वे छात्रों से पूछते तुम्हें क्या दीखता है? शिष्यगण मछली के आस−पास का क्षेत्र तथा उसका पूरा शरीर दीखने की बात कहते। द्रोणाचार्य उनकी असफलता पहले से ही घोषित कर देते थे। जब अर्जुन की बारी आई तो उसने प्रश्न के उत्तर में कहा—मुझे मात्र मछली की आँख दीखती है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। गुरुदेव ने उसके सफल होने की पूर्व घोषणा कर दी और सचमुच वही स्वयंवर में मत्स्य बेध की शर्त पूरी करके द्रौपदी विवाह का अधिकारी बन सका।

एकाग्रता की शक्ति असाधारण है। भौतिक प्रयोजनों में उसका चमत्कारी उपयोग नित्य ही देखा जाता है। बहीखाता सही रखने और मीजान ठीक जोड़ने में एकाग्रता के अभ्यासी ही सफल होते हैं—अन्यथा सुशिक्षितों से भी पन्ने पर भूल होने और काट−फाँस करने की कठिनाई उत्पन्न होती रहती है। वैज्ञानिकों की यही विशेषता है कि वे अपने विषय में तन्मय हो जाते हैं और विचार समुद्र में गहरे गोते लगाकर नई−नई खोजों के रत्न ढूँढ़ लाते हैं।

लोकमान्य तिलक के जीवन का एक संस्मरण प्रसिद्ध है कि उनके अँगूठे का आपरेशन होना था। डॉक्टर ने दवा सुँघाकर बेहोश करने का प्रस्ताव रखा तो उनने कहा—‘मैं गीता के प्रगाढ़ अध्ययन में लगता हूँ आप बेखटके आपरेशन कर लो।’ डॉक्टर को तब बहुत आश्चर्य हुआ, जब उन्होंने बिना हिले−डुले शाँतिपूर्वक आपरेशन करा लिया। पूछने पर तिलक ने इतना ही कहा—तन्मयता इतनी प्रगाढ़ थी जिसमें आपरेशन की ओर ध्यान ही नहीं गया और दर्द भी नहीं हुआ।

कहते हैं कि भृंग नाम का उड़ने वाला कीड़ा−झींगुर पकड़ लाता है और उसके सामने निरन्तर गुँजन करता रहता है। उस गुँजन को सुनने और छवि देखते रहने में झींगुर की मनःस्थिति भृंग जैसी हो जाती है। वह अपने को भृंग रूप में बदल जाता है। कीट विज्ञानी इस किंवदंती पर सन्देह कर सकते हैं, पर यह तथ्य सुनिश्चित है कि एकाग्रतापूर्वक जिस भी व्यक्ति, वस्तु या परिस्थिति का देर तक चिन्तन करते रहा जाय, मनुष्य की सत्ता उसी ढाँचे में ढलने लगती है। रूप, यौवन पर ध्यान केन्द्रित रखने से वेश्याएँ ढलती आयु में भी सुन्दर बनी रहती हैं और विपत्ति एवं मृत्यु की बात सोचने वाले लोग भरी जवानी में बूढ़े होते और मौत के मुँह में घुसते देखे गये हैं। यह सब इच्छा या अनिच्छा से किसी केन्द्र बिन्दु पर अपने चिन्तन को केन्द्रित करने का परिणाम है।

झाड़ी का भूत और रस्सी का साँप दीखने लगने जैसी घटनाएँ आये दिन घटित होती रहती हैं। छोटी−सी बीमारी को बढ़ी−चढ़ी मान बैठने वाले उपयुक्त चिकित्सा होने पर भी अच्छे नहीं हो पाते और अपनी मान्यता के कारण दिन−दिन दुर्बल होते और मृत्यु के निकट पहुँचते चले जाते हैं। इसके विपरीत जिन्होंने अपने बड़े रोग को भी छोटा और जल्दी अच्छा होने वाला समझा है, वे भयानक बीमारियों से भी सरलतापूर्वक छूट जाते हैं। चिकित्सकों के बारे में भी यही विश्वास काम करता है। जिस पर विश्वास होता है उस चिकित्सक की झाड़−फूँक और राख−भभूत भी संजीवनी बूटी का काम करती है। इसके विपरीत जिस पर सन्देह हो उस सुयोग्य चिकित्सक की उपयोगी दवा भी काम नहीं करती। चिकित्सा का कम और विश्वास का—अधिक प्रभाव होता हुआ आये दिन देखा जाता है।

शक्ति का उत्पन्न करना या उपलब्ध करना ही पर्याप्त नहीं। आवश्यकता उसे सुरक्षित रखने और संग्रह करने की भी पड़ती है। यदि ऐसा न हो सके तो सूक्ष्म शक्तियों को उपलब्ध करने के प्रयत्न निरर्थक चले जायेंगे । स्थूल पदार्थों को गोदाम में जमा किया जा सकता है। कपड़े बक्सों में, जेवर, रुपया तिजोरी में और अनाज कोठे में भरा जा सकता है। पर सर्दी, गर्मी, नमी को कैद करके रखना असम्भव तो नहीं, पर कठिन एवं साधन साध्य अवश्य है। साधना विज्ञान में दिव्य−शक्ति के उत्पादन का महत्व बहुत है, उसके लिए विधि−विधान और कर्मकाण्ड भी बहुत है। पर इससे भी अधिक विस्तार उन साधनाओं का है जो प्रकृति प्रदत्त—सहज उपलब्ध शक्तियों को सुरक्षित रखने एवं केन्द्रीभूत करने के उद्देश्य से बनाई गई हैं।

वस्तुतः यह संग्रह ही अत्यधिक महत्वपूर्ण है। ईश्वर ने जितना हमें दिया है, वह इतना अधिक है कि उसी भण्डार से बैठे−बैठे खाते रहने पर भी पूरी जिन्दगी मजे में गुजर सकती है। मुख, आमाशय, आँत, जिगर आदि में पाये जाने वाले पाचन रस की अन्न, शाक जैसी तुच्छ−सी खाद्य सामग्री को रक्त, माँस, वीर्य एवं ओजस् शक्ति के रूप में परिणत करते हैं। अन्न को रक्त में बदला जाना सचमुच ही एक जादू है। इस जादू को पाचन रस प्रवाही ग्रन्थियों में भरा−पूरा पाया जाता है। वस्तुतः यही वह सम्पत्ति है जो कभी नहीं चुकती। इसी के बल पर मनुष्य जीवित रहता है। घास−फूस खाकर भी आदिवासियों की तरह सुदृढ़ दीर्घजीवी बना रहता है। यदि ये भीतरी रस विकृत हो जाएं तो फिर बाहर की बहुमूल्य खुराकें भी निरर्थक ही नहीं भारभूत कष्टकारक भी सिद्ध होती हैं।

उदाहरण के लिए ही यहाँ पाचन रसों की चर्चा की गई है। ऐसी−ऐसी असंख्य विशेषताएँ और क्षमताएँ मानवी सत्ता के कण−कण में भरी पड़ी हैं। दशों इन्द्रियाँ जादू की पिटारियाँ हैं। उन्हें रचनात्मक दिशा में नियोजित रखा जा सके, भटकाव से—बिखराव से बचाया जा सके तो अभीष्ट सफलता की दिशा में द्रुत गति से बढ़ा जा सकता है। मन ग्यारहवीं इन्द्रिय है। मस्तिष्कीय क्षमता का कोई अन्त नहीं। उसके विचार पक्ष और बुद्धि−पक्ष का ही थोड़ा−सा प्रयोग होता है शेष चित्त अहंकार वाला अचेतन समझा जाने वाला, किन्तु चेतन से लाखों गुना अधिक शक्तिशाली चित्त और अहंकार कहा जाने वाला भाग तो अविज्ञात स्थिति में निष्प्रयोजन ही पड़ा रहता है। अचेतन का अर्थ यहाँ उपेक्षित कहना ही उचित है। मन और बुद्धि वाले भाग का जितना उपयोग किया जाता है उतना ही चित्त, अहंकार का भी प्रयोग होने लगे तो मनुष्य दुनियादार बुद्धिमानों की तुलना असंख्य गुनी विचारशीलता, प्रज्ञा, भूमा, प्राप्त कर सकता है और मात्र समझदार न रहकर तत्व दृष्टा की स्थिति में पहुँच सकता है।

बिखराव को रोकने की—उपलब्ध शक्ति को संग्रहीत रखकर अभीष्ट प्रयोजन में प्रयुक्त कर सकने की कुशलता को आध्यात्मिक एकाग्रता कहते हैं। अध्यात्म शास्त्र में मनोनिग्रह अथवा चित्त निरोध इसी को कहते हैं। ‘मेडीटेशन’ की योग-प्रक्रिया में बहुत चर्चा होती है। इसे एकाग्र हो सकने की कुशलता भर ही समझना चाहिए। सुनने, समझने में यह सफलता नगण्य जैसी मालूम पड़ती है, पर वस्तुतः वह बहुत ही बड़ी बात है। इस प्रयोग में प्रवीण होने पर मनुष्य अपनी बिखरी चेतना को एकत्रित करके किसी एक कार्य में लगा देने पर जादू जैसी सफलताएँ—उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकता है।

बाँधों में पानी भरा रहता है। पर जब उसे एक छोटे छेद में होकर निकाला जाता है तो पानी के दबाव से वह धारा बड़ी तेजी से निकलती है। इस धारा में असाधारण शक्ति होती है, उसके प्रहार से अमुक मशीनों के पहिये घुमाये जाते हैं और उनके घूमते ही कई प्रकार के यन्त्र चलने लगते हैं। बड़े-बड़े बिजली घरों का निर्माण बँधे हुए जलाशय बाँधों पर ही होता है। इंजन या मोटर चलाकर बिजली पैदा करना महंगा होता है। पर बाँध के सहारे तो यह उत्पादन काफी सस्ता पड़ता है। छोटे-छोटे जल प्रपातों से भी पनचक्की जैसी उपयोगी मशीनें चल पड़ती हैं। यह जलधार की—झरनों की नहीं एकाग्रता की शक्ति है। फैले क्षेत्र को छोटा कर देने से सहज ही उसकी प्रखरता बढ़ जाती है।

एक मोटा लोहा लेकर उसे किसी कड़ी वस्तु में धँसाया जाय तो उसमें भारी कठिनाई पड़ेगी। किन्तु यदि उसकी नोंक पतली कर दी जाय तो साधारण दबाव से ही वह गहराई तक धँसता चला जायगा। मोटे तार और सुई की पतली नोंक का अन्तर सहज ही देखा जा सकता है। तार को कपड़े या कागज की तह में ठूँसना कठिन पड़ेगा किन्तु पतली नोंक वाली सुई सरलतापूर्वक प्रवेश करती चली जायगी। लकड़ी, पत्थर, लोहे जैसे कड़े पदार्थों में छेद करने के लिए नोंकदार बरमे ही काम देते हैं। नोक की इस चमत्कारी शक्ति का इतना ही रहस्य है कि बड़ी परिधि की अपेक्षा छोटी परिधि में जब दबाव केन्द्रित होता है तो उसकी शक्ति सहज ही बढ़ जाती है।

जमीन देखने में मिट्टी, धूलि की निरर्थक-सी वस्तु प्रतीत होती है, पर यह उसकी ऊपरी परत का ही मूल्याँकन है। उसे खोदने पर एक से एक बहुमूल्य वस्तुएं मिलती चली जाती हैं। थोड़ा खोदने पर पानी निकल आता है। उससे दैनिक उपयोग के सारे काम चलते हैं। पेड़ पौधों की सिंचाई तथा कल कारखाने चलते हैं। इससे गहरे उतरने पर अनेक रासायनिक पदार्थ, धातुएँ, रत्न, गैस, तेल जैसी बहुमूल्य वस्तुएं हाथ लगती हैं। स्मरण रखा जाना चाहिए कि यह गहरी खुदाई नोकदार बरमे ही कर सकते हैं। एकाग्रता को शक्तियों का एकीकरण कह सकते हैं। इससे अन्तःक्षेत्र में छिपी विभूतियाँ और बाह्य क्षेत्र में फैली हुई संपत्तियां प्रचुर परिमाण में उपलब्ध हो सकती हैं और सामान्य-सा जीवन असामान्य विशेषताओं और तज्जनित सफलताओं से भरा-पूरा दृष्टिगोचर हो सकता है। जिस प्रकार जमीन खोदने में एक से एक बढ़कर बहुमूल्य खनिज सम्पदाएँ निकलती हैं, उसी प्रकार एकाग्रता की शक्ति में व्यक्तित्व के साथ जुड़े हुए गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टताएँ और बल, बुद्धि, विद्या, मैत्री, कीर्ति, प्रतिभा जैसी विशेषताएँ प्रचुर परिमाण में उपलब्ध होती रह सकती हैं।

अक्सर लोगों को अपनी स्मरण शक्ति की कमी एवं बुद्धिमन्दता की शिकायत रहती है। इसका छोटा कारण तो मनःसंस्थान की संरचना में यत्किंचित् अन्तर का होना भी हो सकता, पर प्रधान कारण है अन्य-मनस्कता, अरुचि एवं उपेक्षा। बहुत करके वे ही बातें विस्मृत होती हैं जो महत्त्वहीन समझी जाती हैं और जिन्हें हलकी दृष्टि से देखा जाता है। जीवन में महत्त्वपूर्ण लगने वाली घटनाएँ कभी विस्मृत नहीं होतीं। विवाह के दिन का घटना-क्रम—कन्वोकेशन में उपाधि पत्र मिलने का सम्मान जैसे उत्साहपूर्वक अथवा किसी प्रियजन की मृत्यु, बड़ी चोरी, बड़ा घाटा, आक्रमण जैसे त्रासदायक घटना-क्रम मुद्दतों तक मस्तिष्क में घूमते रहते हैं और उन्हें कभी भी क्रमबद्ध रूप से सुनाया जा सकता है। यदि सचमुच ही स्मरण शक्ति कम रही होती तो वे विशेष घटनाएँ भी विस्मृत ही हो जातीं।

इतिहास में असंख्य लोगों के ऐसे विवरण हैं जो बड़ी आयु तक मन्द बुद्धि समझे जाते रहे किन्तु जब उन्होंने अपने व्यक्तित्व को विकसित करने की ओर ध्यान दिया, उत्तरदायित्वों को समझा—अपने को कसा और पूरा ध्यान देकर अध्ययन करना आरम्भ किया तो उनकी बौद्धिक न्यूनता सहज ही दूर हो गई। वे तीव्र बुद्धि माने गये और क्रिया कुशल भी। स्वास्थ्य, धन, प्रभाव, यश, वर्चस्व आदि के क्षेत्रों में भी यही होता रहा है। उपेक्षा जन्य आलस्य−प्रमाद के कारण ही पिछड़ापन उत्पन्न होता है, पर जब सजग सक्रियता का दौर आरम्भ होता है तो प्रगति का चक्र दस गुने वेग से घूमने लगता है। महत्वपूर्ण सफलताएँ केवल उन्हें मिलती हैं जिन्हें अपने कार्य में पूरी दिलचस्पी होती है और अभीष्ट प्रयोजन के लिए समग्र तत्परता समेट कर पिल पड़ने में आनन्द आता है। यह सब रुचि का केन्द्रीकरण और मानसिक क्षमता के एकत्रीकरण का ही चमत्कार है। इस प्रयोग से कोई भी मन्द बुद्धि, दुर्बल शरीर, उपेक्षित अभावग्रस्त मनुष्य अपना काया−कल्प कर सकता है।

एकाग्रता का एक चमत्कार मैस्मरेज्म, हिप्नोटिज्म भी है। प्रयोगकर्ता अपनी दृष्टि को एक बिन्दु पर एकत्रित करने का अभ्यास करता है। अपनी इच्छा शक्ति को समेट कर लक्ष्य केन्द्र में समाविष्ट करता है। फलस्वरूप जादुई शक्ति उत्पन्न होती है और उससे दूसरों को सम्मोहित करके उन्हें इच्छानुवर्ती बनाया जा सकता है। उनमें मानसिक परिवर्तन लाये जा सकते हैं तथा प्रखरता के नये बीज बोये जा सकते हैं। प्राण−विद्या के द्वारा शारीरिक, मानसिक चिकित्सा के अनेक कठिन कार्य पूरे किये जाते हैं। यह सब एकाग्रता का ही चमत्कार है।

ध्यान योग का उद्देश्य मस्तिष्कीय बिखराव को रोककर एक चिन्तन बिन्दु पर केन्द्रित कर सकने की प्रवीणता प्राप्त करना है। इस प्रयोग में जिसे जितनी सफलता मिलती जाती है उसकी अन्तःचेतना में उसी अनुपात से बेधक प्रचण्डता उत्पन्न होती जाती है। शब्दबेधी बाण की तरह लक्ष्यवेध कर सकना उसके लिए सरल हो जाता है। यदि अध्यात्म उसका लक्ष्य होगा तो उस क्षेत्र में आशाजनक प्रगति होगी और विभूतियों से—दिव्य ऋषि−सिद्धियों से उसका व्यक्तित्व भरा−पूरा दिखाई पड़ेगा। यह लक्ष्य भौतिक उन्नति है तो भी इस एकाग्रता का समुचित लाभ मिलेगा और अभीष्ट प्रयोजनों में आशाजनक सफलता मिलती चली जायगी। शक्ति का जब—जिस भी दिशा में प्रयोग किया जायगा उसी में सत्परिणाम प्रस्तुत होते चले जायेंगे।

एकाग्रता मस्तिष्क में उत्पन्न होते रहने वाली विचार तरंगों के निरर्थक बिखराव को निग्रहीत करना है। छोटे से बरसाती नाले का पानी रोककर बाँध बना लिए जाते हैं और उसके पीछे सुविस्तृत जलाशय बन जाता है। इस जलराशि से नहरें निकालकर दूर−दूर तक का क्षेत्र हरा−भरा बनाया जाता है। वही नाला जब उच्छृंखल रहता है तो किनारों को तोड़−फोड़कर इधर−उधर बहता है और उस बाढ़ से भारी बर्बादी होती है। मस्तिष्क में उत्पन्न होने वाली विचारधारा को किसी विशालकाय विद्युत् निर्माण कारखाने से कम नहीं आँका जाना चाहिए। बिजली घरों की शक्ति सीमित होती है और वे अपनी परिधि के छोटे से क्षेत्र को ही बिजली दे पाते हैं, पर मस्तिष्क के संबंध में ऐसी बात नहीं है। उसकी आज की क्षमता अगले दिनों अनेक गुनी हो सकती है और प्रभाव क्षेत्र, जो आज घर−परिवार तक सीमित है, वह कल विश्व−व्यापी बन सकता है। बिजली घर के तार निर्धारित वोल्टेज की क्षमता ही धारण किये रहने के लिए बाध्य हैं, पर मस्तिष्क की प्रचण्ड सत्ता परिस्थिति के अनुसार इतनी अधिक क्षमता संपन्न हो सकती है कि क्षेत्र, समाज की सीमा को पार करते हुए अपने प्रभाव से समस्त संसार को प्रभावित कर सके और वातावरण में बदल देने में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभा सके।

विज्ञानी, दार्शनिक, कलाकार, विद्वान, शिल्पी, साहित्यकार, व्यवस्थापक, संयोजक, नेता, जैसे महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों के निवाहने वाले व्यक्ति भी प्रायः सामान्य लोगों के जैसे ही होते हैं। न उनके शरीर में कोई अतिरिक्त कलपुर्जा होता है। अन्य लोगों से भिन्नता और श्रेष्ठता का जितना कुछ चमत्कार दीखता है वह उनकी उस आन्तरिक विशेषता का परिणाम है जिसका प्रथम चरण एकाग्रता और दूसरा लक्ष्य निष्ठा कहा जा सकता है। मस्तिष्कीय ऊर्जा हर किसी में प्रचुर परिमाण में होती है—यहाँ तक कि मन्द बुद्धि समझे जाने वाले लोगों में भी मूल प्रतिभा की कमी नहीं होती। अंतर प्रसुप्त और जागृत स्थिति के परिमाण का होता है। सोती हुई स्थिति में बुद्धिमान मनुष्य भी अर्धमृतक की स्थिति में पड़ा रहता है। किन्तु जागने पर अपना वर्चस्व सिद्ध करता है। यही बात मस्तिष्क के संबंध में है। परिस्थितिवश किन्हीं−किन्हीं के मस्तिष्कीय कण प्रसुप्त स्थिति में पड़े होते हैं और वे मन्द बुद्धि जैसे लगते हैं किन्तु यदि उन्हें प्रयत्नपूर्वक जागृत किया जाय तो वे न केवल प्रतिभाशाली लोगों की पंक्ति में जा बैठते हैं, वरन् कई बार तो उनसे भी आगे निकल जाते हैं।

विद्या के क्षेत्र में कालिदास, वरदराज जैसे असंख्य लोगों के उदाहरण ऐसे हैं जिनमें वे युवावस्था तक मन्द मति समझे जाते रहे और शिक्षा प्राप्त करने में असफल रहे। किन्तु अन्तःस्फुरणा के प्रचण्ड रूप में आते ही उनका मनःसंस्थान भी तिलमिला उठा और वे देखते−देखते विद्वानों की प्रथम पंक्ति में जा बैठे। बचपन में जिन्हें प्रतिभा शून्य मान लिया गया था ऐसे असंख्य लोग आगे चलकर अपने−अपने विषय में मूर्धन्य बने हैं ऐसे उदाहरण यदि संग्रह करने आरम्भ किये जाएं तो हर क्षेत्र में सहस्रों प्रमाण सरलतापूर्वक मिल सकते हैं। इससे इतना ही सिद्ध होता है कि मन्द बुद्धि होना जितना मस्तिष्कीय विकास की कमी पर निर्भर रहता है उससे अधिक इस बात पर अवलम्बित है कि एकाग्रता और आकाँक्षा का समन्वय करके किसी दिशा में बढ़ चलने की बात बनी या नहीं बनी।

कच्चे धागे मिलकर मजबूत रस्सी और कमजोर सींकें इकट्ठी होने से बुहारी बनने की बात सभी को मालूम है। बूँद−बूँद जोड़ने से घड़ा भरता है। यह उदाहरण मस्तिष्कीय बिखराव को रोककर विचार तरंगों को एक केन्द्र पर निग्रहीत करने पर लागू होता है। अस्त−व्यस्त, अनियन्त्रित, निरुद्देश्य चिन्तन से मानसिक पंक्ति की कितनी बर्बादी होती है और उन्हें एकाग्र करके दिशा विशेष में निरत कर देने पर कितने चमत्कार उत्पन्न होते हैं इस तथ्य को पग−पग पर परखा और सही पाया जा सकता है। हर काम में असफल रहने वाले लोगों में से अधिकाँश वे होते हैं जिन्हें किसी विषय का एकाग्र चिन्तन नहीं आता और जो किसी काम में मन लगाकर देर तक जुटे रहना नहीं जानते। ऐसे लोग बुद्धिमान, क्रिया कुशल एवं साधन सम्पन्न होते हुए भी मात्र चंचल तथा अस्थिर स्वभाव के कारण हर कार्य में असफल बनते हैं। लगातार एक काम पर सोचना और अभिरुचि को निर्धारित कार्य में नियोजित किये रहना जिनसे बन नहीं पड़ता, उनकी चित्र−विचित्र उछल−कूद तो बहुत होती है, पर सफलता के नाम पर पल्ले कुछ नहीं पड़ता।

एकाग्रता को विकसित करके समुद्र तल में गहरा गोता मारने वाले पनडुब्बों की तरह वैज्ञानिक, योगी, मनीषी, बहुमूल्य रत्नराशि खोजकर लाते हैं। समुद्र तल पर तैरते, फिरने वालों के हाथ कुछ नहीं पड़ता, पर जो गहरे उतरते हैं वे बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त करते हैं। उथला चिन्तन हवा में उड़ते रहने वाले तिनकों की तरह है और एकाग्रतापूर्वक चिन्तन को केन्द्रीभूत करके किसी विशेष प्रयोजन में लगा देना ऐसे शब्दबेधी बाण की तरह है जिसका सुनिश्चित परिणाम होकर ही रहता है।


Quotation

भयं क्रोधमथालस्यम् अतिस्वप्नातिजागरम्। अत्याहारमनाहारं नित्यं योगी विवर्जयेत्॥

अनेन विधिना सम्यक् नित्यमभ्यस्यते क्रमात्। स्वयमुत्पद्यते ज्ञानं त्रिभिर्मासैन संशयः॥

—अमृतनादोपनिषद 27−28

योग साधक भय, अधिक निद्रा, अधिक भोजन, अधिक जागरण, निराहार रहना और क्रोध करना छोड़ दे। नित्य नियमित रूप से साधनारत योगसाधक ही ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त करता है।

यद्दुस्तरं यद्दुरापं यद्दुर्गं यंच दुष्करम्। सर्वं तु तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥

—मनु0 11।238

जो दुस्तर, जो दुराव (कठिनता से प्राप्य है) है, जो दुर्गम है, जो दुष्कर है वह सब कुछ तप द्वारा सिद्ध किया जा सकता है क्योंकि तप से मनुष्य प्रत्येक कठिनता को पार कर सकता है।


प्राण योग—प्रचण्ड ऊर्जा का उत्पादन

शक्ति उत्पन्न करने का तरीका है—घर्षण। भौतिक जगत में इस प्रयोग से शक्तिशाली उपलब्धियां प्राप्त की जाती है। आत्मिक जगत में भी यही प्रक्रिया प्रयुक्त की जाती हैं। प्राणायाम साधना इस घर्षण प्रयोजन के लिए बहुत करके काम में लाई जाती है।

निर्जन सुनसान जंगलों में कई बार भयंकर आग लगती है और विस्तृत क्षेत्र के गीले सूखे पेड़ों को जला कर खाक कर देती है। यह मनुष्यों द्वारा उत्पन्न की गई या लगाई गई नहीं होती, क्योंकि जो क्षेत्र सर्वथा निर्जन है वहाँ वैसा होने की कोई सम्भावना नहीं होती। यह आग सूखे पेड़ों की टहनियों के तेज हवा के कारण हिलने और आपस में टकराने के कारण उत्पन्न होती है। इस कार्य में बाँस सबसे अग्रणी है। झुरमुट में बाँस एक दूसरे से सटकर उगे होते हैं। तेज हवा से उनका टकराना स्वाभाविक है। सूखे बाँस आपस में रगड़ खाकर पहले गरम होते हैं। फिर चिनगारियाँ निकालने लगते हैं। यह आग बढ़ती और फैलती चली जाती है और दावानल का रूप धारण कर लेती है।

चकमक पत्थर के दो टुकड़े आपस में टकराकर चिनगारियाँ उत्पन्न करने की कला ही आदि मानव ने सीखी थी। पीछे लोहे और पत्थर को टकराकर भी आग निकालने की तरकीब निकाल ली गई। यज्ञ कार्यों में लकड़ियाँ रगड़ कर—अरुणि−मंथन की क्रिया द्वारा अग्नि उत्पन्न की जाती थी। धूनी जलाकर अखण्ड अग्नि को सुरक्षित रखने का प्रचलन तो पीछे हुआ, आरम्भ में रगड़ से ही अग्नि उत्पन्न की गई। उस समय की साधन-हीन परिस्थितियों में यह अग्नि आविष्कार आज के रेडियो विज्ञान से भी बढ़कर महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ था और उसने मानवी प्रगति को सौ गुनी बढ़ा दिया था।

प्राणायाम में श्वास−प्रश्वास क्रिया को क्रमबद्ध—तालबद्ध—लयबद्ध बनाया जाता है और साँस लेने की साधारण−सी अनवरत प्रक्रिया की अव्यवस्था दूर करके उसे व्यवस्था के बन्धनों में बाँधा जाता है।

सामान्यतः श्वास का आवागमन फेफड़ों में तथा अन्य अवयवों में सिकुड़ने फैलने की हलचल उत्पन्न करता है। उसी से दिल धड़कता है—रक्त संचार होते हैं—माँस−पेशियों का आकुंचन−प्रकुँचन क्रम चलता है। जिस प्रकार पेंडुलम का हिलना घड़ी की गतिविधियों को स्वसंचालित रखने का आधार होता है उसी प्रकार श्वास−प्रश्वास क्रिया को एक प्रकार से शरीर की समस्त हलचलों का उद्गम केन्द्र कहा जा सकता है। कहावतों में अक्सर ऐसे प्रसंग आते हैं—’भगवान के यहाँ से जितने श्वास मिले हैं उतने दिन ही तो जीना है।’ ‘थोड़े से श्वास और शेष रहे हैं आदि। मृत्यु का मोटा ज्ञान श्वास चलना बंद हो जाने से ही किया जाता है। नाड़ी की धड़कन बंद होना श्वास बंद होने का ही लक्षण है।

साँस को जीवन कहा जाता है। तनिक गहराई से विचार करें कि हवा तो जड़ पंच−तत्वों में गिनी जाती है उसकी प्रतिक्रिया हलचल भी हो सकती है। तेज हवा से पत्ते हिलते हैं—धूलि कण, तिनके आदि उड़ते हैं, पर इससे जीवन तो उत्पन्न नहीं होता। हवा में जब स्वयं ही जीवन नहीं पाया जाता तो वह प्राणी को जीवन कहाँ से दे सकती है? यदि साँस लेने से जीवन का संबंध नहीं है तो उसे प्राण के अर्थ में क्यों प्रयुक्त किया जाता है और प्राण को जीवन का पर्यायवाची क्यों माना जाता है।

बात यह है कि हवा मोटे तौर से एक पदार्थ प्रतीत होता है पर उसकी भीतरी परतों में और भी महत्वपूर्ण वस्तुएँ विद्यमान हैं। दूध में घी दिखाई तो नहीं पड़ता पर वह उसमें रहता अवश्य है और अमुक विधि से उसे अलग निकाला भी जा सका है। वनस्पतियाँ मोटे तौर पर हरियाली भी लगती हैं पर प्रयोगशाला में उनका विश्लेषण करने पर प्रोटीन, नमक चूना, चिकनाई आदि कितने ही स्तर के पदार्थ ढूंढ़े और निकाले जाते हैं। शरीर मोटे तौर पर माँस चमड़े का दीखता है पर विश्लेषण से उसमें ढेरों प्रकार के रासायनिक पदार्थ मिलते हैं। इसी प्रकार साँस में प्रवेश करने वाली हवा मात्र स्पर्श तन्मात्रा वाली प्रकृति की हलचल नहीं है उसके भीतर कितने ही महत्वपूर्ण तत्व भरे पड़े हुए हैं, इसे विज्ञानवेत्ता भली प्रकार जानते हैं। विज्ञानियों का कथन है कि चेतना जड़ शरीर में रहने वाली चेतन आत्मा की तरह है। वायु रूपी शरीर के भीतर एक चेतन शक्ति भरी पड़ी है—उसी को प्राण कहा गया है। हवा, हवा से सूक्ष्म ईथर—ईथर से सूक्ष्म प्राण—प्राण से सूक्ष्म ब्रह्म—इस प्रकार की परतों की कल्पना की जा सकती है। ऐसी परतों की जो पूरी तरह आपस में गुंथे और मिले हुए हैं। माँस में रक्त घुला रहता है और वायु में प्राण। सामान्यतया वे एकत्रित हैं, पर विशेष प्रयत्न द्वारा उन्हें पृथक किया जा सकता है और जिस पदार्थ की आवश्यकता हो उसे हस्तगत किया जा सकता है। ठीक इसी प्रकार वायु तत्व में घुले हुए प्राण तत्व को अलग से खींचा जा सकता है और उसे अपने प्राण में सम्मिलित करके अधिक शक्तिशाली बनाया जा सकता है।

सामान्यतया साँस लेने से फेफड़ों में हवा पहुँचने और उससे रक्त को ऑक्सीजन मिलने तथा भीतर उत्पन्न हुई कार्बनडाई−ऑक्साइड को बाहर निकालने भर का—शरीर−यात्रा का—आवश्यक प्रयोजन पूरा होता है। इस श्वास−प्रश्वास क्रिया को विशेष ढंग से—विशेष क्रम से किया जाने लगे तो उससे भिन्न प्रकार की मंथन क्रिया आरम्भ हो जाती है। मंथन द्वारा दूध से घी निकलता है। रति क्रिया से वीर्यपात का आधार भी यह मंथन ही होता है। अनेक वैज्ञानिक प्रयोजनों में यह मंथन क्रिया की जाती है और उससे अणुओं का विकेन्द्रीकरण होने से छोटे रूप से अणु विस्फोट जैसी स्थिति उत्पन्न होती है और अनोखी उपलब्धियाँ मिलती हैं। दवाओं की घुटाई, पिसाई, घिसाई में भी प्रकारान्तर से यह मंथन क्रिया ही संपन्न होती है और सामान्य−सी जड़ी बूटियाँ चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करती हैं।

यही मंथन क्रिया हंस−योग की प्राण−प्रक्रिया में विशिष्ट स्तर पर होती है। उससे उत्पन्न ऊर्जा अपने कई तरह के भौतिक और आत्मिक प्रयोजन पूरे करती है। आदिम सभ्यता के विकास काल में चकमक पत्थर के टुकड़े आपस में टकराकर आग उत्पन्न की जाती थी। पीछे लोहे, पत्थर के टकराव से भी चिनगारियाँ उत्पन्न की जाने लगीं। अगर मंथन में—लकड़ियाँ आपस में रगड़ कर यज्ञ के लिए अग्नि उत्पन्न करना उस कर्म काण्ड का एक अंग रहा है। सूखे हुए बाँस अथवा अन्य कोई लकड़ियाँ तेज हवा के झोंकों से आपस में रगड़ने लगती हैं और उनसे उत्पन्न आग बढ़ते−बढ़ते दावानल बन कर बड़े−बड़े जंगलों को जलाकर खाक कर देती है। सीसे की छड़ एबोनाइट से घिसने पर बिजली उत्पन्न होने की बात साइन्स के छात्रों को स्कूली प्रयोगशाला में प्रत्यक्ष दिखाई जाती है। यह सब घर्षण के चमत्कार हैं। ऐसी ही ऊर्जा श्वास क्रिया को मंथन क्रम में चलाने पर उत्पन्न होती है और उससे शारीरिक सुनिश्चित एवं मानसिक तीक्ष्णता को प्रखर बनाने में महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है।

चलती रेस के पहियों में जब चिकनाई समाप्त हो जाती है अथवा अन्य किसी कारण से घिसाव पड़ने लगता है तो वही उत्पन्न होने वाली गर्मी धुरे तक को गला देती है और दुर्घटना की स्थिति बन जाती है। आकाश में कभी−कभी प्रचंड प्रकाश रेखा बनाते हुए तारे टूटते दिखाई पड़ते हैं यह तारे नहीं उल्का पिण्ड होते हैं। अन्तरिक्ष से छितराये हुए धातु पाषाण जैसे छोटे−छोटे टुकड़े कभी−कभी पृथ्वी के वायु−मण्डल में घुस पड़ते हैं और हमारे टकराने पर जल कर खाक हो जाते हैं, उसी जलने का तेज प्रकाश देखकर तारा टूटने का अनुमान लगाया जाता है। यह मात्र घर्षण क्रिया का चमत्कार है प्राणायाम में इसी प्रक्रिया को अपने ढंग से दुहराया जाता है और प्रकाश उत्पन्न करते देखा जाता है।

दही मंथन में ‘रई’ को रस्सी के दो छोर पकड़कर उलटा−सीधा घुमाया जाता है। रई घूमती है और उससे दूध में घुला हुआ घी उभर कर बाहर आ जाता है। बायें−दायें नासिका स्वरों से चलने वाले इड़ा पिंगला विद्युत प्रवाहों का अमुक विधि से मंथन करने पर दूध बिलोने जैसी हलचल उत्पन्न होती है उससे काया चेतना में भरा हुआ ओजस् उभर कर ऊपर आता है। इसको विधिवत् उत्पन्न और धारण किया जा सके तो साधक को मनस्वी, तेजस्वी और ओजस्वी बनने का अवसर मिलता है। इस उपलब्धि को जीवन साहस एवं प्रखरता के रूप में कार्यान्वित होते देखा जा सकता है।

कई व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से समर्थ और मानसिक दृष्टि से सुयोग्य होते हैं, पर साहस का अभाव होने से वे कोई महत्वपूर्ण कदम नहीं उठा पाते। शंका-कुशंकाओं से ग्रस्त रहने—आपत्तियों की—असफलताओं की सम्भावना उन्हें पग−पग पर डराती रहती है। थोड़ी−सी कठिनाई आने पर डरे घबराये दिखाई पड़ते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रगति के उपयुक्त अवसर सामने होने पर भी उन्हें गँवाते और गई−गुजरी स्थिति में आजीवन पड़े रहते हैं। इसके विपरीत साहसी व्यक्ति स्वास्थ्य, शिक्षा, साधन एवं उपयुक्त अवसर न होने पर भी दुस्साहस भरे कदम उठाते और आश्चर्यचकित करने वाली सफलताएँ प्राप्त करते देखे जाते हैं। ऐसे ही दुस्साहसी व्यक्ति इतिहास के पृष्ठों पर अपना नाम अमर करते देखे जाते हैं। किसी भी क्षेत्र की महत्वपूर्ण सफलताएं पाने के लिए ऐसी ही साहसिक मनोभूमि का होना आवश्यक है। इस आन्तरिक समर्थता को दूसरे शब्दों में ‘प्राण’ कहा जाता है। प्राणवान का अर्थ जीवित ही नहीं साहसी भी होता है। इस उपलब्धि को स्वास्थ्य और शिक्षा से भी बढ़कर माना जा सकता है। प्राणायाम के प्रयोग इस उपलब्धि से साधक को लाभान्वित करते हैं।

जीवन के हर क्षेत्र में पग−पग पर संघर्ष की आवश्यकता होती है। प्रस्तुत कठिनाइयों को चीरते हुए ही प्रगति सम्भव होती है। नाव पानी को चीरते हुए आगे बढ़ती है। मकान बनाने का कार्य नींव खोदने से आरंभ होता है। खेत को बोने से पहले उसे जोतना पड़ता है। अनेक योनियों में भ्रमण करते हुए जीव जिन पशु−प्रवृत्तियों का अभ्यस्त होता है, उन्हें घटाये−हटाये बिना मानवी गरिमा के अनुरूप गुण−कर्म स्वभाव उपार्जित नहीं किया जा सकता। आँतरिक अवाँछनीयताओं को हटाकर उस स्थान पर उत्कृष्टताओं की स्थापना करने के प्रयोग को साधना कहते हैं। यह साहसिकता के बिना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। बाहरी शत्रुओं से लड़ने के लिए जितना युद्ध कौशल चाहिए उतना ही शौर्य साहस अपने भीतर घुसे हुए काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद−मत्सर जैसे आत्म−शत्रुओं से लड़ने और परास्त करने के लिए आवश्यक होता है। दुर्बल मनः स्थिति के लोग अपनी भीतरी कमजोरियों को जानते हैं, उन्हें हटाना चाहते हैं, पर साहस के अभाव से उनके साथ लड़ने का पराक्रम प्रदर्शित नहीं कर सकते। फलतः आत्म−सुधार एवं आत्म−निर्माण का प्रयोजन पूरा कर सकना उनसे बन नहीं पड़ता। अपने को असहाय अनुभव करते हैं और थक कर प्रयत्न ही छोड़ बैठते हैं।

बाहरी युद्ध जीतने के भौतिक लाभ हैं किन्तु आंतरिक युद्ध में जीतने से तो विभूतियों का इतना बड़ा भण्डार हाथ लगता है जिसे पाकर मनुष्य जीवन सच्चे अर्थों में सार्थक माना जा सकता है। साधना को संग्राम कहा गया है। ‘साधना समर’ शब्द का अध्यात्म विज्ञान में बार−बार उल्लेख होता है। देवासुर संग्राम के अनेकानेक प्रसंग पौराणिक उपाख्यानों में आते हैं, यह अलंकारिक रूप मनुष्य जीवन के अंतरंग और बहिरंग क्षेत्रों में सदा होते रहने वाले संघर्षों का ही चित्रण है। दुर्गा सप्तशती और गीत की पृष्ठ भूमि इसी संघर्ष के आधार पर खड़ी है भगवती दुर्गा द्वारा असुरों का संहार और कृष्ण द्वारा अर्जुन के माध्यम से महाभारत का आयोजन प्रकारान्तर से इसी तथ्य की ओर इंगित करते हैं कि साधना समर के क्षेत्र में प्रवेश किये बिना उन अवरोधों से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता जो मनुष्य को दयनीय दुर्दशा में डाले रहने के लिए प्रधान रूप से उत्तरदायी हैं।

भगवान के अवतार के प्रसिद्ध प्रयोजन दो हैं (1) अधर्म का उन्मूलन (2) धर्म का संस्थापन। अनाचार को निरस्त करके ही सदाचार की स्थापना हो सकती है। अस्तु सिक्के के दो भागों की तरह उन्हें परस्पर पूरक एवं अविच्छिन्न भी कह सकते हैं। उद्यान को विकसित करने वाला माली जहाँ खाद-पानी लगाता है वहाँ निराई, गुड़ाई, छंटाई, रखवाली जैसी कड़ाई भी बरतता है। आत्मोत्कर्ष के लिए जहाँ सत्प्रवृत्तियों का विकसित किया जाना, पुण्य प्रयोजनों को अपनाना अभीष्ट है, उतना ही दुष्प्रवृत्तियों को उखाड़ फेंकने के लिए तत्परता बरतना भी आवश्यक है। भगवान के अवतार इस दुहरी क्रिया प्रक्रिया को सम्पन्न करने के लिए ही होते रहे हैं। व्यक्तिगत जीवन में भी प्रगति पथ पर बढ़ने वालों को इसी मार्ग का अवलंबन करना होता है। संक्षेप में इसे यों कह सकते हैं कि जिसके अन्तःकरण में भगवान की दिव्य ज्योति का अवतरण होगा, उसे अवाँछनीयताओं के विरुद्ध लोहा लेने के लिए पराक्रम प्रदर्शित करना होगा और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में जुटना होगा। यह दोनों ही प्रयोजन जिस आन्तरिक साहस द्वारा संपन्न होते हैं, उसी को ‘आत्म बल’ कहा गया है। साधना का एक उद्देश्य आत्मबल का उपार्जन भी है। प्राणायाम द्वारा उत्पन्न हुई आन्तरिक ऊर्जा इस उत्पादन में विशेष रूप से सहायक होती है। इन्द्रिय दमन, मनोनिग्रह, कुसंस्कारों का उन्मूलन, सत्प्रयोजन की दिशा में अनवरत प्रयाण, कठिनाइयों से संघर्ष, जन उपहास एवं विरोध का सहन जैसे महत्वपूर्ण कार्य बिना आन्तरिक साहस के अन्य किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सकते।

कुविचार मस्तिष्क पर छाये रहते हैं और शरीर को अकर्म करने की आदत पड़ी होती है; यदि पुराने अभ्यासों को काटा, उखाड़ा न जाय तो फिर उत्कर्ष के लिए आगे बढ़ चलना कैसे बन पड़ेगा। स्पष्ट है कि कुविचारों को सद्विचारों से ही निरस्त किया जा सकता है। काँटे से काँटा निकालने और विष से विष को मारने की उक्ति प्रसिद्ध है। मस्तिष्क में यदि कामुकता के विचार उठते रहते हैं, तो उनके काटने का एक ही उपाय है ब्रह्मचर्य के—पवित्र दृष्टिकोण के समर्थक विचारों को मस्तिष्क में जमा किया जाय। इस मार्ग पर चलने वाले हनुमान, भीष्म, शंकराचार्य, दयानन्द आदि महामानवों के चरित्रों का चिन्तन किया जाय, उस पक्ष के समर्थन वाले तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरणों को पर्याप्त मात्रा में स्वाध्याय, मनन आदि की सहायता से संग्रह किया जाय। उन पर बार−बार गहराई से विचार किया जाय। कामुकता तथा शालीनता के दोनों पक्षों को अपनी−अपनी बात के समर्थन का अवसर देकर यदि विवेक द्वारा निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह फैसला करने का अवसर दिया जाय तो पुराने अवाँछनीय चिन्तन अभ्यास को आसानी से काटा जा सकता है। शारीरिक दुष्प्रवृत्तियों के संबंध में भी यही बात है। नशा, व्यसन, आलस्य जैसे दुर्गुणों से निपटना, कठोर संकल्प एवं दृढ़ निश्चय से ही सम्भव हो सकता है। व्यक्तित्व का कायाकल्प कर सकने वाले व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में शूर−वीर कहे जाते हैं और उन्हीं को भौतिक जगत की प्रत्येक दिशा में बढ़ चलने का द्वार खुला मिलता है। इस जीवन−प्राण कहे जा सकने वाले चेतना−तत्व को प्राण कहते हैं। प्राणायाम इसी उपलब्धि की साधना है।

अण्डा तब फूटता है जब उसके भीतर के बच्चे की अन्तः चेतना उस परिधि को तोड़कर बाहर निकलने की चेष्टा करती है। प्रसव पीड़ा और प्रजनन की घड़ी तब आती है जब गर्भस्थ शिशु की चेष्टा उस बंधन को तोड़ कर मुक्ति पाने की आतुर चेष्टा में संलग्न होती है। इन शिशुओं के संकल्प गिरे−मरे हों तो वे भीतर ही सड़−गल कर नष्ट हो जायेंगे। प्रगति के लिए पराक्रम और अवाँछनीयताओं के विरुद्ध संघर्ष का शौर्य साहस अपना कर ही किसी को उत्कृष्ट स्तर तक बढ़ चलने का अवसर मिलता है। पराक्रम विहीन व्यक्ति को प्रतिपक्षी शक्तियाँ नष्ट-भ्रष्ट करके रख देती हैं। भगवान बुद्ध ने यों अपने समय के अनाचार से शूर वीरों की तरह लड़ाई लड़ी थी; पर पीछे उनके अनुयायियों ने बौद्ध धर्म का एक सरल पक्ष ही ध्यान में रखा —अहिंसा। यह भुला दिया गया कि आक्रमणकारी हिंसा की दुष्टता से लोहा लिये बिना अहिंसा की रक्षा नहीं हो सकती। हुआ भी यही। अहिंसा की आड़ में कायरता ने अड्डा जमा लिया। लोग जप तप का सरल आश्रय तो पकड़े रहे पर अनीति से जूझने की प्रखरता को व्यर्थ समझने की एकाकी दृष्टि अपनाते रहे। मध्य एशिया के लुटेरों ने इस दुर्बलता को समझा और वे भारत पर चढ़ दौड़े। शौर्य गँवा देने पर वे बहुसंख्यक और साधन−संपन्न होते हुए भी थोड़े−से लुटेरों का सामना न कर सके और पराधीनता के पाश में जकड़े गये। हमारी हजार वर्ष की गुलामी आक्रमणकारियों की वरिष्ठता का नहीं—हमारी आन्तरिक दुर्बलता का काला पृष्ठ है−जिसे एकाँगी अहिंसा वृत्ति को अपना कर भीरुता एवं कायरता के रूप में स्वभावगत बना लिया गया था। पराक्रम गँवा बैठा जाय तो मक्खी, मच्छर, खटमल, पिस्सू, चूहे एवं शरीर में घुसे अदृश्य रोग कीटाणु तक अपने अस्तित्व के लिए खतरा बनकर खड़े हो जायेंगे। चोर, उचक्के, गुण्डे, ठग, आततायी अपने ही इर्द−गिर्द भरे पड़े होते हैं और उन्हें जब दुर्बलता का पता चलता है तो अति उत्साहपूर्वक आक्रमण करने के लिए टूट पड़ते हैं। प्रगति के लिए न सही, आत्म−रक्षा तक का उद्देश्य बिना प्रचंड पराक्रम विकसित किये सम्भव नहीं हो सकता। पराक्रम प्राण का गुण है इसी को पुरुषार्थ भी कहते हैं। प्राणवान पुरुषार्थी को ही पुरुष कहा गया है। नर और पुरुष में अंतर है। पुरुष शब्द पुरुषार्थी नर और नारी दोनों के ही अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसलिए महापुरुष शब्द के अन्तर्गत महान नारियों की भी गणना होती है। यदि ऐसा न होता, तो महान नारियों की उपेक्षा भावना ही समझी जाती अन्यथा महापुरुष की तरह महा नारी का भी उल्लेख इतिहास पुराणों एवं शास्त्रों में रहा होता।

आत्म−बल इसी आँतरिक ऊर्जा का नाम है जो मनुष्य को भौतिक और आत्मिक क्षेत्र में पुरुषार्थ करने तथा आश्चर्यचकित करने वाली उपलब्धियाँ उपार्जित करने की आधार शिला सिद्ध होती है। इसी ऊर्जा को उपार्जित करना प्राणायाम करने का प्रधान उद्देश्य है। तालबद्ध, क्रमबद्ध—संकल्प युक्त विशेष विधान सहित श्वास क्रिया को प्राणायाम कहते हैं। किस स्तर का प्राण उपार्जित किया जाय इसके लिए भिन्न−भिन्न विधि−विधान हैं। प्राण, अपान, अमान, उदान, व्यान यह पाँच प्राण माने गये हैं। सूर्य की सात किरणों की तरह एक ही प्राण शक्ति के ये भेद उपभेद सन्निहित शक्ति के वर्गीकरण का ध्यान रखते हुए किये गये हैं। मस्तिका, भ्रामरी, उज्जायी, शीतला, सीत्कारी आदि अनेकों उनके विधि-विधान हैं। इनके उद्देश्य और प्रतिफल भी अनेक हैं। सूक्ष्मदर्शियों ने इन सब में ‘सोऽहम्’ साधना को सर्वोपरि महत्त्व की तथा सर्व-सुलभ स्तर की माना है। अन्य प्राणायामों के विधि-विधान में अन्तर पड़ने से हानि होने की संभावना भी है पर हंसयोग में —सोऽहम् प्राण साधना में वैसा कोई डर नहीं है। इसमें जप,ध्यान और प्राण इन तीनों ही आधारों का समन्वय है इसीलिए उसे गंगा-यमुना सरस्वती के संगम की तरह तीर्थराज तुल्य माना गया है उससे स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर की बलिष्ठता, बुद्धिमत्ता और सद्भाव सम्पन्नता के त्रिविध लाभ उपलब्ध होते हैं।


Quotation

तपोहि परमंश्रेयः सम्मोहमितरत्सुखम्।

वाल्मीकि (7। 84। 9)

तप (कष्टसहिष्णुता) ही परम कल्याण को करने वाला होता है। तप से रहित जो सुख है वह तो बुद्धि के सम्मोह को उत्पन्न करता है।

जिह्व प्रवेशसंभूतवह्निनोत्पादितः खलु। चन्द्रात्सवति यः सारःसा स्यादमरवारुणी। चुम्बतीयदि लम्बिकाग्रमनिशं जिह्वासरस्यन्दिनी, साक्षाराकट्वम्लदुग्ध सदृशीमध्वाज्व तुल्यतथा।

—गोरख

अर्थ—जिह्वा को उलटी करके गले में जहाँ कव्वा लटकता है वहाँ लगायें। ऐसा करने से मस्तिष्क में जो चन्द्रमा है उसका रस गर्मी से पिघल के जिह्वा पर आता है यही—अगर वारुणी या मोमन्स है। इसका स्वाद कभी नमकीन कभी कडुआ, खट्टा, चरपरा और कभी दूध जैसा, कभी मीठा शहद सा, धूत जैसी चिकना सा जान पड़ता है।


उच्चस्तरीय प्राणयोग सोऽहम् साधना

प्राणायाम के दो आधार हैं एक श्वास, प्रश्वास क्रिया का विशिष्ट विधि-विधान- कृत्य उपकर्म द्वारा मंथन। दूसरा प्रचंड संकल्प शक्ति द्वारा उत्पन्न चुम्बकत्व के सहारे प्राण-चेतना को खींचने और धारण करने का आकर्षण। मंथन और आकर्षण का द्विविधि समन्वय ही प्राणयोग का उद्देश्य पूरा करता है। इनमें से किसी एक को ही लेकर चला जाय तो ध्यानयोग का अभीष्ट उद्देश्य पूरा न हो सकेगा। गहरी साँस लेना- डीप ब्रीदिंग- फेफड़ों का व्यायाम भी है। इसकी कई विधियाँ शरीर शास्त्रियों ने ढूँढ़ निकाली हैं और उनका उपयोग स्वास्थ्य लाभ के लिए किया है। अमुक विधि से दौड़ने से- दंड-बैठक, सूर्य नमस्कार आदि क्रियाएँ करने से भी यह प्रयोजन एक सीमा तक हो जाता है और इससे फेफड़े मजबूत होने के साथ-साथ स्वास्थ्य सुधारने में सहायता मिलती है। इस श्वास-क्रिया की विविधता का साधन विज्ञान में चौंसठ प्रकार के विधानों में वर्णन है। भारत से बाहर इनके अतिरिक्त अन्य प्रकार की विधियों का प्रचलन है।

दूसरा पक्ष संकल्प है। जिसके निमित्त अमुक मंत्रों का उच्चारण, अमुक आकृतियों का- अमुक ध्वनियों का ध्यान जोड़ा जाता है। इस ध्यान में दिव्य चेतना-शक्ति के रूप में प्राण तत्व के शरीर में प्रवेश करने का आस्था विकसित की जाती है। आस्था का चुम्बकत्व संकल्प का आकर्षण मात्र कल्पना की उड़ान नहीं है। विचार विज्ञान के ज्ञाता समझते हैं कि संकल्प कितना सशक्त तत्व है। उसी आधार पर समूचा मन:संस्थान, मन-बुद्धि, चित्त अहंकार का अन्त:करण चतुष्टय काम करता है और उसी से शरीर की विविध-विधि क्रियाओं की हलचलें गतिशील होती है। शरीर और मन के संयोग से ही कर्म बनते हैं और उन्हीं के भले-बुरे परिणाम सुख-दुःख के- हानि-लाभ के रूप में सामने आते रहते हैं। संक्षेप में यहाँ जो कुछ भी बन बिगड़ रहा है वह संकल्प के अनुरूप ही अपना स्तर बनाते, बढ़ाते और बदलते हैं। समष्टि के संकल्प से ही इस विश्व के सृजन, अभिवर्धन एवं परिवर्तन का क्रम चल रहा है। असंतुलन को संतुलन में, बदलने की आवश्यकता जब ब्रह्म चेतना को होती है तब उसका संकल्प ही अवतार रूप में प्रकट होता है और अभीष्ट प्रयोजन पूरा करके चला जाता है।

योगाभ्यास में जिस श्रद्धा-विश्वास को आत्मिक प्रगति का आधार स्तम्भ माना गया है वह तथ्यतः भावभरा सुनिश्चित संकल्प भर ही है। साधनात्मक कर्मकाण्डों की शक्ति अधिक से अधिक एक चौथाई मानी जा सकती है। तीन चौथाई सफलता तो संकल्प की प्रखरता पर अवलम्बित रहती है। संकल्प शिथिल हो तो कई तरह के क्रिया-कृत्य करते रहने पर भी योग साधना के क्षेत्र में कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि अर्जित न की जा सकेगी।

प्राणायाम का प्राण यह संकल्प है। योग-कृत्य तो उसका कलेवर भर है। सफल प्राण-योग के लिए जहाँ निर्धारित विधि-विधान को तत्परतापूर्वक क्रियान्वित करना पड़ता है वहाँ संकल्प को भी प्रखर रखते हुए उस साधना को सर्वांगपूर्ण बनाना पड़ता है।

प्राणायामों के विधान एवं स्वरूप अनेक हैं। इनमें से हमें दो ही पर्याप्त जँचे हैं। एक वह जो आत्म-शुद्धि के षट्कर्मों में सामान्य रूप से किया जाता है- जो सर्व-सुलभ और बाल कक्षा के छात्रों तक के लिए सुविधाजनक हैं। उसमें श्वास पर नियंत्रण किया जाता है। धीरे-धीरे भरपूर साँस खींचना- जब तक रोका जा सके रोकना- धीरे-धीरे वायु को बाहर निकालना और फिर कुछ समय साँस को बाहर रोके रहना- बिना साँस लिये ही काम चलाना। वह प्राणायाम इतना भर है। उससे मनोनिग्रह की तरह श्वास निग्रह का एक बड़ा प्रयोजन पूरा होता है। मन के निग्रह का प्राण−निग्रह के साथ घनिष्ठ संबंध है। प्राण−निग्रह करने वाले के लिए—प्राणायाम साधक के लिए मनोनिग्रह सरल पड़ता है। उस प्राणायाम में प्राण तत्व का शरीर में प्रवेश, स्थापन, विकास, स्थिरीकरण हो रहा है, ऐसी भावना की जाती है और ध्यान किया जाता है कि जो भी विकृतियाँ तीनों शरीरों में थीं वे सभी साँस के साथ निकल कर बाहर जा रही हैं।

फेफड़े अपना कार्य संचालन करके सारे शरीर की गतिविधियों को आगे धकेलते रहने के लिए साँस द्वारा हवा खींचते हैं, यह प्रथम चरण हुआ। दूसरे चरण से रक्त कोष्ठ प्रविष्ट वायु में से केवल ऑक्सीजन तत्व खींचते हैं और अपनी खुराक पाते हैं। यह दो क्रियाएँ शारीरिक हैं और साधारण रीति से होती रहती हैं। तीसरा चरण विशिष्ट है। संकल्प शक्ति वायु के अन्तराल में घुले हुए प्राण को खींचती है। प्राण चेतन है, वह संकल्प चेतना द्वारा ही खींचा जा सकता है। प्राणायाम कर्त्ता का संकल्प, प्राण सत्ता के अस्तित्व उसके खींचे जाने तथा धारण किये जाने तथा तीनों शरीरों पर उसकी सुखद प्रतिक्रिया होने के संबंध में जितना सघन होगा उतना ही उसका चमत्कार उत्पन्न होगा। संकल्प रहित अथवा दुर्बल धुँधली भाव संवेदना का प्राणायाम श्वास व्यायाम भर बन कर रह जाता है और उसका लाभ श्वास संस्थान तक में मिलने तक सीमित रह जाता है। यदि प्राण−तत्व का चेतनात्मक लाभ उठाना हो तो उसके लिए श्वांस क्रिया से भी अधिक महत्वपूर्ण प्राणायाम के लिए नितान्त आवश्यक संकल्प बल को जगाया जाना चाहिए। यह निष्ठा परिपक्व की जानी चाहिए कि प्राण का आगमन, प्रवेश, कण−कण में उसका संस्थापन एवं शक्ति अनुदान सुनिश्चित तथ्य है इसमें संदेह के लिए कहीं कोई गुंजाइश नहीं है।

संध्यावन्दन के समय प्रयुक्त होने वाला प्राणायाम उपासना क्षेत्र में प्रवेश करने वालों प्रत्येक छात्र के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है। इसके बिना मनोनिग्रह में गड़बड़ी बनी रहेगी और प्रत्याहार धारणा एवं ध्यान के अगले चरण ठीक तरह से उठ सकना कठिन पड़ेगा।

उच्चस्तरीय प्राणायामों में ‘सोऽहम्’ साधना को सर्वोपरि माना गया है क्योंकि उसके साथ जो संकल्प जुड़ा हुआ है वह चेतना में उच्चतम स्तर तक उछाल देने में जीव और ब्रह्म का समन्वय करा देने में विशेष रूप से समर्थ है। इतनी—इस स्तर की—भाव संवेदना और किसी प्राणायाम में नहीं है। अस्तु उसे सामान्य प्राणायामों की पंक्ति में रखकर स्वतंत्र नाम दिये गये हैं। इसे “हंस योग” कहा गया है। हंस योग का महात्म्य, प्रयोग और परिणाम इतने विस्तारपूर्वक साधना शास्त्र में लिखा है कि वह उसे एक स्वतन्त्र योग शाखा मानने जैसी स्थिति बन जाती है।

‘सोऽहम् साधना को ‘अजपा जाप’ अथवा प्राण गायत्री भी कहा गया है। मान्यता है कि श्वास के शरीर में प्रवेश करते समय ‘स’ जैसी साँस रुकने के तनिक से विराम समय में “सो” जैसी—और बाहर निकलते समय ‘हम’ जैसी अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि होती रहती है। इसे श्वास क्रिया पर चिरकाल तक—ध्यान केन्द्रित करने की साधना द्वारा सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय द्वारा सुना जा सकता है। चूँकि ध्वनि सूक्ष्म है स्थूल नहीं—इसलिए उसे अपने छेद वाले कानों से नहीं—सूक्ष्म शरीर में रहने वाली सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय द्वारा—शब्द तन्मात्रा के रूप में ही सुना जा सकता है। कोई खुले कानों से इन शब्दों को सुनने का प्रयत्न करेगा तो उसे कभी भी सफलता न मिलेगी।

नादयोग में मात्र सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय द्वारा शंख, घड़ियाल, बादल, झरना, वीणा जैसे कितने ही दिव्य शब्द सुने जाते हैं। किन्तु हंस−योग में नासिका एवं कर्णेन्द्रिय की समन्वित सूक्ष्म शक्ति का दुहरा लाभ मिलता है।

‘सोऽहम्’ को अनाहत शब्द कहा गया है। आहत वे हैं, जो कहीं कोई चोट लगने से उत्पन्न होते हैं। अनाहत वे जो बिना किसी आघात के उत्पादन होते हैं। नादयोग में जो दिव्य ध्वनियां सुनी जाती हैं, उनके बारे में दो मान्यताएँ हैं। एक यह है कि प्रकृति के अंतराल सागर में पाँच तत्वों और सत, रज, तम यह तीन गुणों की जो उथल−पुथल मचती रहती है यह उनकी प्रतिक्रिया है। दूसरे यह माना जाता है कि शरीर के भीतर जो रक्त−संचार, आकुँचन−प्रकुँचन, श्वास−प्रश्वास जैसी क्रियाएँ अनवरत रूप से होती रहती हैं, यह शब्द उन हलचलों से उत्पन्न होते हैं। अस्तु यह आहत हैं। नादयोग को भी कई जगह अनाहत कहा गया है, पर आम मान्यता यही है कि वे आहत हैं। मुख से जो शब्द उत्पन्न होते हैं वे भी होठ, जीभ, कंठ, तालु आदि अवयवों की—माँस-पेशियों की उठक−पटक से उत्पन्न होते हैं; अस्तु जप भी आहत हैं। आहत से अनाहत का महत्व अधिक माना गया है। अनाहत ब्रह्म चेतना द्वारा निश्चित और आहत प्रकृतिगत हलचलों से उत्पन्न होते हैं अस्तु उनका महत्व भी ब्रह्म और प्रकृति की तुलना जैसी ही न्यूनाधिक है।

तत्वदर्शियों का मत है कि जीवात्मा के गहन अंतराल में उसकी आत्मबोध प्रज्ञा स्वयमेव जगी रहती है और उसी की स्फुरणा से ‘सोऽहम्’ का आत्म−बोध अजपा जाप बनकर स्वसंचालित बना रहता है। संस्कृत भाषा के स+अहम् शब्दों से मिलकर ‘सोऽहम्’ का आविर्भाव माना जाता है। यहाँ व्याकरण शास्त्र की संधि प्रक्रिया के झंझट में पड़ने की जरूरत नहीं है। जो सनातन ध्वनियाँ चल रही हैं वे व्याकरण शास्त्र के अनुकूल हैं या नहीं यह सोचना व्यर्थ है। देखना इतना भर है कि इन सनातन शब्द संचार का क्या बैठता है? ‘सो’ अर्थात् ‘वह’। ‘अहम्’ अर्थात् ‘मैं’। दोनों का मिला−जुला निष्कर्ष निकला—वह मैं हूँ। ‘वह’ अर्थात् परमात्मा—अहम् अर्थात् जीवात्मा। दोनों का समन्वय एकी भाव—‘सोऽहम्’। आत्मा और परमात्मा एक है, यह अद्वैत सिद्धान्त का समर्थन है। तत्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म−शिवोऽहम् सच्चिदानंदोऽहम्—शुद्धोसि, बुद्धोसि निरंजनोसि जैसे वाक्यों में इसी दर्शन का प्रतिपादन है। उनमें जीव और ब्रह्म की तात्विक एकता का प्रतिपादन है।

‘सोऽहम्’ उपासना के निमित्त किये गये प्राणायाम में इसी अविज्ञात तथ्य को प्रत्यक्ष करने का—प्रसुप्त जगाने का प्रयत्न किया जाता है। जीव अपने आपको शरीर मान बैठा है। उसी की सुविधा एवं प्रसन्नता की बात सोचता है, उसी के लाभ प्रयत्नों में संलग्न रहता है। काया के साथ जुड़े हुए व्यक्ति और पदार्थ ही उसे अपने लगते हैं और उसी सीमित संबंध क्षेत्र तक ममत्व को सीमित करके—अन्य सबको पराया समझता रहता है। ‘अपनों’ के लाभ के लिए ‘परायों’ को हानि पहुँचाने में उसे संकोच नहीं होता। यही है माया मग्न—भव−बंधनों में जकड़े हुए—मोहग्रस्त जीव की स्थिति। इसी में बंधे रहने के कारण उसे स्वार्थ के व्यर्थ के, अनर्थ के, कामों में संलग्न रहना पड़ता है। यही स्थिति प्राणी को अनेकानेक आधि−व्याधियों में उलझाती और शोक−संताप के गर्त में धकेलती है। इससे बचा, उभरा जाय, इसी समस्या को हल करने के लिए आत्म−ज्ञान एवं साधना विज्ञान का ढाँचा खड़ा किया गया है।

‘सोऽहम्’ को सद्ज्ञान, तत्वज्ञान, ब्रह्मज्ञान कहा गया है। इससे आत्मा को अपनी वास्तविक स्थिति समझने, अनुभव करने का संकेत है। “वह परमात्मा मैं ही हूँ” इस तत्वज्ञान में माया मुक्ति स्थिति की शर्त जुड़ी हुई है। नरकीट, नर−पशु और नर−पिशाच जैसी निकृष्ट परिस्थितियों में घिरी ‘अहंता’ के लिए इस पुनीत शब्द का प्रयोग नहीं हो सकता। ऐसे तो रावण, कंस, हिरण्यकश्यप जैसे अहंकारग्रस्त आततायी ही लोगों के मुख से अपने को ईश्वर कहलाने के लिए बाधित करते थे। अहंकार−उन्मत्त मनःस्थिति में वे अपने को वैसा समझते भी थे। पर इससे बना क्या, उनका अहंकार ही ले डूबा। ‘सोऽहम्’ साधना में पंचतत्वों और तीन गुणों से बने घिरे शरीर को ईश्वर मानने के लिए नहीं कहा गया है। ऐसी मान्यता तो उलटा अहंकार लगा देगी और उत्थान के स्थान पर पतन का नया कारण बनेगी। यह दिव्य संकेत आत्मा के शुद्ध स्वरूप का विवेचन है। वह वस्तुतः ईश्वर का अंश है। समुद्र और लहरों की, सूर्य और किरणों की, मठाकाश और घटाकाश की, ब्रह्माण्ड और पिण्ड की, आग और चिनगारी की उपमा देकर परमात्मा और आत्मा की एकता का प्रतिपादन करते हुए मनीषियों ने यही कहा है कि मल−आवरण, विक्षेपों से—कषाय−कल्मषों से मुक्त हुआ जीवन वस्तुतः ब्रह्म ही है। दोनों की एकता में व्यवधान मात्र अज्ञान का है, वह अज्ञान ही अहंता के रूप में विकसित होता है और संकीर्ण स्वार्थ−परता में निमग्न होकर व्यर्थ चिन्तन तथा अनर्थ कार्य में निरत रहकर अपनी दुर्गति अपने हाथों आप बनाता है। साधना का उद्देश्य मनःक्षेत्र में भरी कुण्ठाओं और शरीर क्षेत्र में अभ्यस्त कुत्साओं के निराकरण के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। सर्वतोमुखी निर्मलता का अभिवर्धन ही ईश्वर प्राप्ति की दिशा में बढ़ने वाला महान् प्रयास माना गया है। सोऽहम्−साधना की प्रतिक्रिया यही होनी चाहिए।

‘ईश्वर अंश जीव अविनाशी’ की उक्ति धर्मशास्त्रों में अनेक स्थानों पर लिखी पाई जाती है और अनेक धर्मोपदेशकों द्वारा आये दिन सुनी जाती है। उसे सामान्य बुद्धि जानती और मानती भी है। पर इतने भर से बनता कुछ नहीं। यह मान्यता अन्तःकरण के गहनतम स्तर की गहराई तक उतरनी चाहिए। गहन आस्था बनकर प्रतिष्ठापित होने वाली श्रद्धा ही— अन्तःप्रेरणा बनती है और उसी के धकेले हुए मस्तिष्क तथा शरीर रूपी सेवकों को कार्य संलग्न होना पड़ता है। ‘सोऽहम्’ तत्वज्ञान यदि अन्तरात्मा की प्रखर श्रद्धा रूप में विकसित हो सके तो उसका परिणाम सुनिश्चित रूप में दिव्य जीवन जैसा काया−कल्प बनकर सामने आना चाहिए। तब व्यक्ति को उसी स्तर पर सोचना होगा जिस पर ईश्वर सोचता है और वही करना होगा जो ईश्वर करता है। एकता की स्थिति में दोनों का स्वरूप भी एक हो जाता है। नाला जब गंगा में मिलता है और बूँद समुद्र में घुलती है तो दोनों का स्वरूप एवं स्तर एक हो जाता है। ब्रह्म भाव से जगा−हुआ जीव अपने चिन्तन और कर्म क्षेत्र में सुविकसित स्तर का देव मानव ही दृष्टिगोचर होता है।

कहा जा चुका है कि-प्राणायाम के दो आचार हैं। एक श्वास−क्रिया का विधिविधान—दूसरा संकल्प शक्ति का प्रखर प्रयोग। संकल्प शक्ति से भावनात्मक स्तर का—अंतःकरण की भाव चेतना का परिष्कार होता है। विधि−विधान से शरीर और मनःक्षेत्र में काम करने वाली कितनी ही अज्ञात विशेषताओं का जागरण सम्भव होता है। इन्हें व्यक्तित्व में कितनी ही विशेषताएँ और अलौकिकताएँ उत्पन्न करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। सामान्य प्राणायामों से भी स्वास्थ्य संवर्धन एवं मानसिक विकास के कितने ही विचित्र लाभ मिलते हैं। फिर ‘सोऽहम्’ साधना जैसी अति उच्चस्तरीय प्राण-प्रक्रिया के सम्बन्ध में तो कहना ही क्या? उसे यदि सही रीति से सम्पन्न किया जा सके तो आत्म-चेतना के महा समुद्र का मंथन करके वैसे ही रत्न प्राप्त किये जा सकते हैं जैसे कि पौराणिक गाथाओं में समुद्र मंथन के फलस्वरूप उपलब्ध हुए बताये गये हैं।


Quotation

ध्यायेद्योगी यदा मन्त्र गात्र कम्पोऽथ जायते।

—(यो0 शि0)

शरीर में कम्प और रोमाँच होने का कारण यह है कि उस मंत्र की शक्ति से साधक की प्राणशक्ति का उत्थान होने लगता है और उसके प्राण उठकर परमात्मा में लीन हो जाते हैं।

न च मूर्च्छा क्षुधा तृष्णा नैवालस्यं प्रजायते। न च रोगो जरा मृत्युर्देवदेहः स जायते॥

—घेरण्ड संहिता 3॥26

खेचरी मुद्रा की साधना करने वाले को मूर्च्छा भूख, प्यास, आलस्य, रोग, बुढ़ापा आदि नहीं सताते हैं, उसकी स्थिति देवोपम हो जाती है।

वाक्सिद्धिः कामचारित्वं दूरदृष्टिस्तथैव च। दूरश्रुतिः सूक्ष्मदृष्टिः परकायप्रवेशनम्॥ भूवन्त्येतानि सर्वाणि खेचरत्वं च योगिनाम्।

—शिव संहिता 3। 63

खेचरी साधना से वाक् सिद्धि, दूरदृष्टि, दूर श्रवण, सूक्ष्म दृष्टि, परकाया प्रवेश, आदि सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।


अपनों से अपनी बात: स्वर्ण−जयन्ती वर्ष की विशेष साधना


आत्मबोध चिंतन—तत्त्वबोध मनन

“हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत” की मान्यता लेकर जीवनक्रम बनाकर चला जाए तो वर्तमान स्तर से क्रमशः ऊँचे उठते चलना सरल पड़ेगा। मस्तिष्क और शरीर की हलचलें अन्तःकरण में जड़ जमाकर बैठने वाली आस्थाओं की प्रेरणा पर अवलंबित रहती हैं। आध्यात्मिक साधनाओं का उद्देश्य इस संस्थान को प्रभावित एवं परिष्कृत करना ही होता है। इस उद्देश्य की पूर्ति में वह साधना बहुत ही उपयोगी सिद्ध होती है, जिसमें उठते ही नए जन्म की और सोते ही नई मृत्यु की मान्यता को जीवंत बनाया जाता है।

प्रातः बिस्तर पर जब आँख खुलती है, तो कुछ समय आलस को दूर करके शय्या से नीचे उतरने में लग जाता है। प्रस्तुत उपासना के लिए यही सर्वोत्तम समय है। मुख से कुछ भी कहने की आवश्यकता नहीं, पर यह मान्यता−चित्र मस्तिष्क में अधिकाधिक स्पष्टता के साथ जमाना चाहिए कि “आज का एक दिन एक पूरे जीवन की तरह है। इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाना चाहिए। समय का एक भी क्षण न तो व्यर्थ गँवाया जाना चाहिए और न अनर्थ कार्यों में लगाना चाहिए।” सोचा जाना चाहिए कि “ईश्वर ने अन्य किसी जीवधारी को वे सुविधाएँ नहीं दीं, जो मनुष्य को प्राप्त हैं। यह पक्षपात या उपहार नहीं; वरन् विशुद्ध अमानत है। जिसे उत्कृष्ट आदर्शवादी रीति-नीति अपनाकर पूर्णता प्राप्त करने—स्वर्ग और मुक्ति का आनंद इसी जन्म में लेने के लिए दिया गया है। यह प्रयोजन तभी पूरा होता है, जब ईश्वर की इस सृष्टि को अधिक सुंदर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए उपलब्ध जीवन-संपदा का उपयोग किया जाए। उपयोग के लिए यह सुरदुर्लभ अवसर मिला है। यह योजनाबद्ध सदुपयोग करने में ईश्वर की प्रसन्नता और जीवन की सार्थकता है।”

मंत्रजाप की तरह इन शब्दों को दुहराने की जरूरत नहीं है, वरन अत्यंत गंभीरतापूर्वक इस तथ्य को हृदयंगम किया जाना चाहिए। कल्पना-चित्र सिनेमा फिल्म की तरह स्पष्ट उभरने चाहिए और उनके साथ इतनी गहरी आस्था का पुट देना चाहिए कि यह चिंतन वस्तुस्थिति बनकर मस्तिष्क को पूरी तरह आच्छादित कर ले।

शौच जाने की आवश्यकता अनुभव हो तो विलंब नहीं करना चाहिए और शय्या त्यागकर नित्यकर्म में लग जाना चाहिए। थोड़ी गुंजाइश हो तो उठने से लेकर सोने के समय तक की दिनचर्या इसी समय बना लेनी चाहिए। यों नित्यकर्म करते हुए भी दिन भर का समय विभाजन कर लेना कुछ कठिन नहीं है। फुरती और चुस्ती से काम निपटाए जाएँ तो कम समय में अधिक काम हो सकता है। सुस्ती और उदासी में ही समय का तो भारी अपव्यय होता है। योजनाबद्ध दिनचर्या बनाई जाए और उसका मुस्तैदी से पालन किया जाए, तो ढेरों समय बच सकता है। एक काम के साथ दो काम हो सकते हैं। जैसे आजीविका उपार्जन के बीच खाली समय में स्वाध्याय तथा मित्रों में परामर्श हो सकता है। परिवार-व्यवस्था में मनोरंजन का पुट रह सकता है। निद्रा, नित्यकर्म, आजीविका उपार्जन, स्वाध्याय, उपासना, परिवार-व्यवस्था, लोक-मंगल आदि कार्यों में, कौन, कब, किस प्रकार, कितना समय देगा, यह हर व्यक्ति की अपनी परिस्थिति पर निर्भर है, पर समन्वय इन सब बातों का रहना चाहिए। दृष्टिकोण यह रहना चाहिए कि आलस्य-प्रमाद में एक क्षण भी नष्ट न हो और सारी गतिविधियाँ इस प्रकार चलती रहें, जिनमें आत्मकल्याण, परिवार निर्माण एवं लोक-मंगल के तीनों तथ्यों का समुचित समावेश बना रहे। इन सारे क्रियाकलापों में आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाया जाए। दुष्प्रवृत्तियों को— दुर्भावनाओं को स्थान न मिलने दिया जाए। जहाँ भी जब भी गड़बड़ दिखाई पड़े, तब वहीं उसकी रोक-थाम की जाए और गिरते कदमों को संभाल लिया जाए। समय, श्रम, चिंतन एवं धन का तनिक-सा अंश भी अवांछनीय प्रयोजन में नष्ट न होने दिया जाए। इन चारों ही संपदाओं का एक-एक कण सदुपयोग में लगता रहे। इस तथ्य पर तीखी दृष्टि रखी जाए। भूलों को तत्काल सुधारते रहा जाए, तो उस दिन के, उस जीवन को संतोषजनक रीति से जिया जा सकता है।

जल्दी सोने और जल्दी उठने का नियम जीवन-साधना में रुचि रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को बनाना ही चाहिए। ब्रह्ममुहूर्त का समय अमृतोपम है। उस समय किया गया हर कार्य बहुत ही सफलतापूर्वक संपन्न होता है। अस्तु, जो भी अधिक महत्त्वपूर्ण कार्य प्रतीत होता हो, उसे उसी समय में करना चाहिए। सवेरे जल्दी उठना उन्हीं के लिए संभव है, जो रात्रि को जल्दी सोते हैं। इस मार्ग में जो अड़चने हों, उन्हें बुद्धिमतापूर्वक हल करना चाहिए। किंतु जल्दी सोने और जल्दी उठने की परंपरा तो अपने लिए ही नहीं, पूरे परिवार के लिए बना ही लेनी चाहिए।

रात्रि को सोते समय वैराग्य एवं संन्यास जैसी स्थिति बनानी चाहिए। बिस्तर पर जाते ही यह सोचना चाहिए कि निद्राकाल एक प्रकार की मृत्यु— विश्राम है। आज का नाटक समाप्त कल दूसरा खेल खेलना है। परिवार ईश्वर का उद्यान है। उसमें अपने को कर्तव्यनिष्ठ माली की भूमिका निभानी थी। शरीर, मन, ईश्वरीय प्रयोजनों को पूरा करने के लिए मिले जीवन-रथ के दो पहिये हैं। इन्हें सही राह पर चलाना था। धन, प्रभाव, पद यह विशुद्ध धरोहर है। उन्हें सत्प्रयोजनों में ही लगाना था। देखना चाहिए कि वैसा ही हुआ या नहीं? जहाँ गड़बड़ी हुई दिखाई दे, वहाँ पश्चात्ताप करना चाहिए और अगले दिन वैसी भूल न होने देने में कड़ी सतर्कता बरतने की अपने आपको चेतावनी देनी चाहिए।

संन्यासी अपना सब कुछ ईश्वर अर्पण करके परमार्थ-प्रयोजन में लगता है। सोते समय साधक की वैसी ही मनःस्थिति होनी चाहिए। मिली हुई अमानतें और सौंपी हुई जिम्मेदारियाँ आज ईमानदारी के साथ सँभाली गईं। यदि कल वे फिर मिलीं तो फिर उन्हें ईश्वरीय आदेश मानकर सँभाला जाएगा। अपना स्वामित्व किसी भी व्यक्ति या पदार्थ पर नहीं। यहाँ जो कुछ है सो सब ईश्वर का है। अपना तो केवल कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व भर है। उसे पूरी ईमानदारी और पूरी तत्परता से निवाहते भर रहना अपने लिए पर्याप्त है। परिणाम क्या होते हैं, क्या नहीं—यह परिस्थितियों पर निर्भर है। अस्तु, सफलता-असफलता की चिंता न करते हुए हमें आदर्शवादी कर्त्तव्यपरायणता अपनाए रहने मात्र में पूरा-पूरा संतोष अनुभव करना चाहिए।

सोते समय ईश्वर की अमानतें ईश्वर को सौंपने और स्वयं खाली हाथ प्रसन्नचित्त विदा होने की— निद्रादेवी की गोद में जाने की बात सोचनी चाहिए। हलके मन से शांतिपूर्वक गहरी नींद में सो जाना चाहिए। चिंता, आशंका, खीज, क्रोध जैसी किसी भी उद्विग्नता को मन पर लादकर नहीं सोना चाहिए। यह प्रयास शांत निद्रा लाने की दृष्टि से भी उपयोगी है। साथ ही आत्परिष्कार की दृष्टि से भी अतमहत्त्वपूर्ण है।

मृत्यु को भूलने से ही जीवन-संपदा को निरर्थक कामों में गँवाते रहने की चूक होती है; दुष्कर्म बन पड़ते हैं और वासना-तृष्णा-अहंता की क्षुद्रताओं में समय गुजरता है। यदि यह ध्यान बना रहेगा कि मृत्यु का निमंत्रण कभी भी सामने आ सकता है तो यह ध्यान बना रहेगा कि इस महान अवसर का सही उपयोग किया जाए और पूरा लाभ उठाया जाए। निद्रा की तुलना मृत्यु से करते रहने पर मौत का भय मन से निकल जाता है और अलभ्य अवसर के सदुपयोग की बात चित्त पर छाई रहती है।

प्रातः उठते समय नए दिन की मान्यता, जीवनोद्देश्य की स्पष्टता तथा सुव्यवस्थित दिनचर्या बनाने का कार्य संपन्न करना चाहिए। रात्रि को सोते समय मृत्यु का चिंतन, आत्मनिरीक्षण, पश्चात्ताप और कल के लिए सतर्कता—वैरागी एवं संन्यासी जैसी मालिकी त्यागने की हलकी-फुलकी मनःस्थिति लेकर शयन किया जाए। दिन भर हर घड़ी चुस्ती-फुरती, मुस्तैदी और दिलचस्पी के साथ प्रस्तुत कार्यों को निपटाया जाए। भीतर दुर्भावनाओं और बाहरी दुष्प्रवृत्तियों के उभरने का अवसर आते ही उनसे जूझ पड़ा जाए और निरस्त करके ही दम लिया जाए। यह है वह जीवन-साधना, जिसमें चौबीसों घंटे निमग्न रहकर और इसी जीवन में स्वर्ग जैसे उल्लास आनंद और मुक्ति जैसे आनंद का हर घड़ी अनुभव करते रहा जा सकता है।


पड़े रोशनी बनकर धरती पर प्रतिबिम्ब तुम्हारा!


सूर्य की तरह (kavita)

उगो सूर्य की तरह, गगन पर बन प्रकाश छा जाओ।

और अँधेरा इस जगती का, जलकर स्वयं- मिटाओ।।

मंद हवा बनकर बाँटो नव प्राण, थकी साँसों को।

फूलों-सी मुस्कान बनो, बिखरा दो उच्छश्वासों को।।

बन अषाढ़ के मेघ, भिगो दो, सूखी धरती का तन।

जिससे नव उल्लास जगे, भर उठे मोद से कण-कण।।

और साथ में कोई सुखकर संदेशा भी लाओ।

उगो सूर्य की तरह, गगन पर बन प्रकाश छा जाओ।।

बनो सुशीतल छाया तरु की, श्रांति पथिक की हर लो।

औरों को उल्लास बाँटकर, जीवन सार्थक कर लो।।

सरिता के सम बहो, प्राण भरने दाने-दाने में।

देने में जो खुशी- अरे! वह रखी कहाँ पाने में?

सतत् समर्पण द्वारा, सागर की बड़वाग्नि बुझाओ।

उगो सूर्य की तरह, गगन पर बन प्रकाश छा जाओ।।

पर्वत से, दृढ़ विश्वहितों के शुभ संकल्प करो तुम।

निर्झर बनकर प्यास बुझाने को अनवरत झरो तुम।।

राह दिखाओ सदा दूसरों को- बनकर ध्रुवतारा।

पड़े रोशनी बनकर धरती पर प्रतिबिम्ब तुम्हारा।।

बनो उषा की लाली- जन-जन के मन-कमल खिलाओ।

उगो सूर्य की तरह, गगन पर बन प्रकाश छा जाओ।।

हृदय बनाओ अपना- जैसा विस्तृत नील गगन है।

सहन शील बन जाओ- जैसा धरती का आँगन है।।

सागर बनकर रत्न राशि बाँटो श्रमशील मनुज को।

बनो ओस के कण-नम कर दो दिन की तपती रज को।।

शशि बन, निशि में भी पथिकों के हित प्रकाश फैलाओ।

उगो सूर्य की तरह, गगन पर बन प्रकाश छा जाओ।।

और अँधेरा इस जगती का, जलकर स्वयं- मिटाओ।।

-माया वर्मा


Kavita

*समाप्त*