“अन्तःकरण की पुकार अनसुनी न करें”

जब मनुष्य अकेला होता है, उसके पास और आस-पास भी जब कोई नहीं होता, तब कोई पाप करने में उसे जो भय लगता है, एक शंका रहती है, वह किसके कारण होती है ? उसे बार-बार ऐसा क्यों लगता है कि उसके पाप को देख रहा है ? क्यों उसका शरीर पूरे उत्साह से उस पाप कर्म में उत्साहित नहीं रहता ? और क्यों बाद में भी वह एक अपराधी की तरह मलीन रहता है ? क्या कभी कोई इस पर विचार करता है कि जब उसके पाप को देखने वाला कोई मौजूद नहीं तब उसे भय किसका है, वह किससे डर रहा है ? कौन उसे ऐसा करने को निःशब्द रोकता और टोकता रहता है ? कौन उसके मन, प्राण और शरीर में कम्पन उत्पन्न कर देता है ?

निःसन्देह यह उसका अपना अन्तःकरण है, जो उसे उस पाप से हटाने के प्रयत्न में विविध प्रकार की शंकाओं, सन्देहों व कल्पनादि भयद्योतक अनुभवों से वैसा न करने के लिए संकेत करता रहता है। जो मनुष्य अपने इस अन्तःकरण के संकेतों की उपेक्षा नहीं करता है, वह पाप कर्म से बच जाता है और जो मनुष्य उसकी अवहेलना करके वैसा करता है, उसका अन्तःकरण एक न एक दिन उसकी गवाही देकर उसे दंड का भागी बनाता है। यह हो सकता है कि किसी का पाप कर्म दुनिया से छिपा रहे किन्तु उसके अपने अन्तःकरण से कदापि नहीं छिप सकता। वह उसकी एक-एक क्रिया और विचार का सबसे प्रबल और सच्चा साक्षी होता है। जब किसी कारणवश मनुष्य को अपने पाप का दण्ड किसी ओर से नहीं मिल पाता तो समय आने पर उसका अन्तःकरण उसे स्वयं दण्डित करता है। हमारे लिए उचित यही है कि अन्तःकरण में विद्यमान परमात्मा की आवाज सुनें और उसका अनुसरण करें।

-महर्षि रमण

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सुख और संतोष का अन्तर

सुकरात से किसी ने पूछा- आप एक असंतुष्ट सुकरात होना पसन्द करेंगे या सन्तुष्ट सुअर। ‘सुकरात ने कहा-मुझे असन्तुष्ट सुकरात रहना पसन्द है। क्योंकि मैं अपने असन्तोष को और उसके कारण को जानता तो हूँ। सुअर सुखी रहते हुए भी सन्तोष की महत्ता तक के बारे में कुछ नहीं समझता। इस उत्तर में सुकरात का प्रतिपादन यह है कि बुद्धिमत्ता सबसे बड़ी उपलब्धि है। उसे किसी भी कीमत पर नहीं गँवाया जाना चाहिए और उसे किसी भी कीमत पर कमाने, बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए।

आत्मिक प्रगति सुख की दिशा में नहीं-संतोष की दिशा में होती है। शरीर सुविधा चाहता है और इन्द्रिय तृप्ति में मोद मनाता है। मस्तिष्क भी शरीर का ही एक भाग है। मस्तिष्क चेतना को मन कहा गया है। और ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया है। मन की प्रधान दिशा अहंता है। आत्म-विज्ञापन, लोक-सम्मान एवं वस्तुओं के आधिपत्य से मन को अपने अहंकार की तृप्ति का अवसर मिलता है। इसी लालसा को तृष्णा कहते हैं। संक्षेप में शरीरगत इन्द्रिय उत्तेजनाओं को वासना और मनोगत अहंता की ललक को तृष्णा कहते हैं। भौतिक जीवन की यही सीमा है। परिस्थितियों, व्यक्तियों और वस्तुओं की सहायता से इन दोनों आवेशों को तृप्त करने का प्रयत्न ऐसा ही है। जैसा आग पर ईंधन डालना। ईंधन डालने से तत्काल तो लगता है कि आग बुझ गई या धीमी पड़ गई पर उस प्रोत्साहन के कारण कुछ ही क्षण में वह अधिक उद्दीप्त हो उठती है और प्रचंड दीखती है। जितना ईंधन डाला जायगा आग की लपटें उतनी ही तीव्र होंगी। इन्द्रिय लिप्साएँ और लालसाएँ, मनोकामनाएँ किसी भी सीमा तक पहुंचकर शान्त नहीं होती, वरन् उपभोग की सामर्थ्य न होने पर भी उनकी ललक निरन्तर बढ़ती ही रहती है।

संतोष आन्तरिक और आत्मिक होता है। यह आदर्शवादी कर्तृत्व-निष्ठा के अतिरिक्त और किसी माध्यम से उपलब्ध नहीं हो सकता। उत्कृष्ट चिन्तन और आचरण के पीछे कर्तव्य-पालन की आस्था काम करती है। इस आस्था को व्यवहार में परिणत होने को जितना ही अवसर मिलता है उतना ही सन्तोष होता है, मानवतावादी सज्जनोचित अनुकरणीय चरित्र-निष्ठा जिस अनुपात से फलवती होती है उसी अनुपात से सन्तोष मिलेगा।

आत्मिक असन्तोष अधिक चरित्र-निष्ठा और समाज-निष्ठा की प्रेरणा देता है। और उस आकाँक्षा की पूर्ति के लिए मनुष्य अधिकाधिक पवित्र और परिष्कृत बनता चला जाता है। इस प्रगति का चरम लक्ष्य पूर्णता की प्राप्ति ईश्वर की उपलब्धि है। उस स्तर के जितने निकट पहुँचते जाते हैं उतना ही आन्तरिक सन्तोष बढ़ता है और लक्ष्य प्राप्ति की स्थिति तक पहुँचते-पहुँचते वह स्वर्ग, मुक्ति एवं परमगति की वह सम्वेदना बन जाता है। जिसका रसास्वादन करने के लिए यह मनुष्य जन्म मिला है। इस प्रकार आत्मिक असंतोष पूर्णता की प्राप्ति में सहायक सिद्ध होता है और उसे भक्ति की आकुलता के नाम से उत्पन्न करना आवश्यक ठहराया गया है।

भौतिक असन्तोष एक प्रकार से मद्यपान की तरह है। उसकी उग्रता मनुष्य को इतना अधीर बना देती है कि उचित - अनुचित का भेद किये बिना वह कुछ भी करने पर उतारू हो जाता है। इस आवेश में जीवन-लक्ष्य की पूर्णतया विस्मृति हो जाती है। ऐषणाओं की ललक मनुष्य को एक प्रकार से मदान्ध बना देती है। होती तो उससे भी प्रगति है, पर वह परिणामतः अवगति से भी महँगी पड़ती है। अस्तु भौतिक असन्तोष को हेय और आत्मिक असन्तोष को सराहनीय माना गया है। सुख पाने के लालच में सन्तोष को गँवा बैठना अदूरदर्शितापूर्ण है। यही था सुकरात के कथन का प्रयोजन। अन्य तत्व ज्ञानी मनीषियों की मान्यता भी ऐसी हो रही है।

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ईश्वर का मनुहार बनाम आत्म-परिष्कार

भगवान व्यक्ति नहीं शक्ति है। पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। वह अनादि काल से है और अनन्त काल तक चलती रहेगी। मनुष्य उसे पहचाने और उसका ध्यान रखते हुए उछले, गिरे, उठे और चले तो उसके कार्य ठीक रहेंगे। उसकी सत्ता को ध्यान में रखे बिना हलचल करेगा तो चोट खायेगा। नदी की प्रचंड धारा में जो भी पड़ेगा बहेगा और निर्धारित नियमों के अनुसार तैरेगा या डूबेगा। किनारे पर बैठकर स्नान करने में, तैरना सीखकर पार जाने में नदी अपने लिए कोई अवरोध खड़ा नहीं करती। नाव चलाकर परिवहन का लाभ भी उस नदी प्रवाह से लिया जा सकता है, पर लोहे की नाव बनाकर अथवा छेद वाली लकड़ी की नाव में बैठकर चला जायेगा तो फिर डूबना निश्चित है। भगवान की गुरुत्वाकर्षण अथवा नदी प्रवाह से तुलना की जा सकती है। हमें उससे लाभ उठाना हो तो अनुकूलता, प्रतिकूलता के नियमों को समझने और तदनुकूल आचरण करने की बात सोचनी चाहिए।

बिजली हमारे लिए कितनी उपयोगी है। बिजली घर से सम्बन्ध जोड़कर अपने घर के पंखे, बल्ब, हीटर, कूलर, रेडियो आदि यन्त्र चलाये जा सकते है और उनसे तरह-तरह के लाभ पाये जा सकते हैं। खुले तार छूने में प्राण संकट उत्पन्न होगा। भगवान की विद्युत शक्ति से तुलना की जा सकती है।

भगवान दयालु हैं, उदार हैं, भक्त वत्सल हैं, दीनबन्धु हैं, दाता हैं, यह सब कुछ ठीक है। यदि ऐसा न होता तो इतना बहुमूल्य शरीर यन्त्र मुफ्त से ही हमें क्यों दिया? जीवन निर्वाह के इतने उपयुक्त साधन क्यों जुटाये? प्रगति के पथ पर चलते हुए अपने पुरुषार्थ से भी अधिक परिस्थितियों की अनुकूलता का सहारा क्यों मिलता है? उसकी उदारता और दयालुता में सन्देह करने की कोई बात नहीं है। किन्तु यह मान्यता तब तक अधूरी ही बनी रहेगी जब तक उसके “रुद्र” नाम को भी ध्यान में न रखा जाय। रुद्र का अर्थ होता है भयंकर। वस्तुतः वह उतना ही भयंकर भी है जितना दयालु।

बिजली, गुरुत्वाकर्षण, नदी प्रवाह, आग आदि का सदुपयोग इन देवताओं से वरदान दिलाता है और हमारे क्रिया-कलापों में इनसे अतिशय सहायता मिलती है, पर जहाँ दुरुपयोग आरम्भ हुआ वहीं ये सभी निर्दयता पर उतारू हो जाते हैं। और मर्यादा उल्लंघन की धृष्टता के लिए तिल मिला देने वाला दण्ड़ देते है। थोड़ी सी चूक भी उन्हें सहन नहीं। जितनी बड़ी शक्ति-उतनी ही कठोर उसकी व्यवस्था। बैटरी छू कर मामूली झटका भर लगेगा, पर जहाँ प्रचंड विद्युत धारा बह रही होगी वहाँ जरा से एक सैकिण्ड के स्पर्श से ही इधर का उधर फैसला हो जाएगा। ईश्वर प्रचंड शक्ति है। उसकी सृष्टि व्यवस्था मर्यादा के रूप में अपना काम चला रही है। सूर्य, चन्द्र, आकाश, बादल, समुद्र, धरती सभी उसकी नियम व्यवस्था के अनुरूप चलते हैं जब कभी अचरज दीखते है वे भी मनमानी नहीं, विज्ञान के उन नियमों के आधार पर होता है जिन्हें हम साधारणतया अनुभव नहीं करते।

मनुष्य को भी ईश्वरीय नियमों का पालन करना चाहिए। इस अनुशासन को हम भूलते हैं। जो सामने नहीं दीखता, उसकी चीजें चुराने का प्रायः दुस्साहस किया जाता रहा है। ईश्वर को भुलाने का अर्थ है उसकी उस व्यवस्था का विस्मरण जिसकी अनुकूलता रखकर हम अपना जीवन-क्रम, सुख-शान्ति और प्रगति की दिशा में ठीक प्रकार चलाते रह सकते हैं। साथ ही उसका अतिक्रमण करके भयंकर विपत्ति में फंसते और दुःख उठाते हैं चूँकि ईश्वर दीखता नहीं, मोटी बुद्धि उसकी सर्वव्यापकता की कठोर व्यवस्था को देख नहीं पाती इसलिए अवज्ञा का दुःसाहस करती रहती है। उपासना का अर्थ है-उस अदृश्य सत्ता के अस्तित्व और विधान की अनुभूति और तदनुसार मर्यादा पालन के लिए अपनी मनोभूमि का प्रशिक्षण।

बिजली के बड़े यन्त्र जहाँ लगे रहते हैं वहाँ “440 वोल्ट खतरा लिखा रहता है और वही एक मृत मुण्ड का चित्र मौत का स्मरण दिलाने कि लिए लगाया रहता है।” यह बोर्ड ऐसे खतरनाक स्थानों पर टाँगने का कानून है। इस बोर्ड को देखने से यह तथ्य मन को सचेत करते हैं और बिजली के खतरे की विस्मृति से उत्पन्न होने वाली विभीषिका का खतरा कम करते हैं। ठीक इसी प्रकार मंदिर, देवालयों में-घरों में रखे ईश्वर के चित्र प्रतीकों से हमारी ईश्वरीय शक्ति के सम्बन्ध में विस्मृति दूर करते हैं और अप्रत्यक्ष सत्ता की प्रत्यक्ष से भी बढ़ी-चढ़ी शक्ति का आभास कराते हैं।

प्रार्थना के शब्दों में प्रायः ऐसी भाषा का प्रयोग होता रहा है जिसे लगता है-वह याचना है। याचना की बात उसी सीमा तक ठीक है जब वह उचित मूल्य चुकाने के साथ की जाय। हथेली पर पैसे रखकर टिकट बाबू से टिकट माँगे तो ठीक है। यदि मुफ्त में ही रेल टिकट की याचना करें तो उसकी पूर्ति होना कठिन है। ऐसे तो रेलवे प्रशासन ही ठप्प हो जायेगा। मुफ्तखोरों को उदारतापूर्वक टिकटें बंटने लगे तो फिर रेल चलाने में जो खर्चा पड़ता है वहाँ से आवेगा? ईश्वर से प्रार्थना की जाय और मनोकामनाएँ पूरी हो जाय यदि ये बात इतनी सस्ती और इतनी वास्तविक रही होती तो निश्चय ही पूजा प्रार्थना से अधिक बढ़िया उद्योग इस संसार में और कोई दिखाई न पड़ता। फिर हर समझदार आदमी दूसरे सब काम छोड़कर अभीष्ट प्रयोजनों के लिए “अमुक विधान से-अमुक देवता की अमुक पूजा पत्री” करने में ही अपनी सारी गतिविधियाँ केन्द्रित कर देते। ऐसी दशा में पुरुषार्थ, पराक्रम, क्षमता विकास, सतर्कता, प्रामाणिकता, प्रतिद्वंदिता जैसे वे तथ्य ही समाप्त हो जाते जो मानवी व्यक्तित्व को विकसित करने के आधारभूत कारण रहे हैं।

प्रार्थना जिस ईश्वर से की जाती है वह वस्तुतः अपना ही अन्तरात्मा है। ईश्वर अर्थात् विश्व-व्यापी सृष्टि व्यवस्था। हमें परमेश्वर को जानना चाहिए। ब्रह्म विद्या का विचार साहित्य इसलिए सृजा गया है कि मनुष्य की प्रत्यक्षदर्शी आँखें विवेक का तीसरा नेत्र खोलें और परोक्ष में विद्यमान प्रचण्ड परमेश्वर और उसके विधान का साक्षात्कार कर सकने में समर्थ बनें। ज्ञानयोग इसी का नाम है। गीता, उपनिषदों आदि के पाठ, परायण, प्रवचन आदि के सहारे मनः चिन्तन के आधार पर ज्ञानयोग की साधना की जाती है और ब्रह्म दर्शन का लाभ मिलता है। पूजा, उपासना का विधि-विधान भक्तियोग के अन्तर्गत आता है। भक्ति ईश्वर की की जाती है। इसलिए सर्वत्र “ईश्वर भक्ति” शब्द ही प्रयोग में आता है। अपनी भुलक्कड़ चेतना को झकझोरने और उसे विकासोन्मुख बनाकर मनोकामना पूर्ति का वरदान दे सकने योग्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसी अनुनय-विनय का नाम ईश्वर प्रार्थना है।

ज्ञान और भक्ति का समन्वय कर्म में होता है। ज्ञान यदि सच्चा है तो उसे व्यवहार में उतरना चाहिए। इसी प्रकार भक्ति यदि सच्ची है तो उसकी मादकता शरीर के अवयवों पर छाई देखनी चाहिए। ज्ञानयोग के लिए रची गई ब्रह्म-विद्या और भक्तियोग के लिए सृजे गये पूजा विधान का समन्वय कर्म में होता है। कल्पना की उड़ाने कुछ काम नहीं देती। प्रयोजन तो कर्म से पूरा होता है। किसी के व्यक्तित्व की तौल उसके कर्मों को देखकर की जाती है। ज्ञानयोग और भक्तियोग किस का किस स्तर का है? इसकी वास्तविकता परखने की एक ही कसौटी है-प्रखर और परिष्कृत कर्म। गीता में इसी कर्मयोग का प्रतिपादन हुआ है साथ ही यह भी कहा गया है कि कर्तव्य कर्म-अनायास ही नहीं बन पड़ते। इस कल्प वृक्ष का परिपुष्ट और फलित होना उस खाद, पानी के बिना सम्भव नहीं हो सकता जिसे ज्ञानयोग और भक्तियोग कहते हैं।

प्रार्थना को, दिशा-निर्देश एवं उद्देश्य का उद्घोष कह सकते हैं। उपासना का वास्तविक स्वरूप तो जप, ध्यान जैसे मानसिक अभ्यासों में और योग, तप जैसे शारीरिक पुरुषार्थों के साथ जुड़ा रहता है। जप, ध्यान को व्यायाम और योग, तप को आहार की संज्ञा दी जाती है। ईश्वर का मनुहार वस्तुतः प्रकारान्तर से आत्म-परिष्कार का ही एक मनोवैज्ञानिक स्वरूप समझा जाय तो इससे हम वस्तुस्थिति को समझने में अधिक अच्छी तरह समर्थ हो सकते हैं।

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स्वस्तिक सार्वभौम संस्कृति का प्रतीक चिन्ह

ऋग्वेद की एक ऋचा में स्वस्तिक को सूर्य का प्रतीक माना गया है और उसकी चार भुजाओं को चार दिशाओं की उपमा दी गई है। सूर्य को समस्त देव शक्तियों का केन्द्र और भूतल तथा अन्तरिक्ष में जीवन दाता माना गया है। स्वस्तिक को सूर्य की प्रतिमा मान कर इन्हीं विशेषताओं के प्रति श्रद्धाभिव्यक्ति जागृत करने का उपक्रम किया जाता है।

पुराणों में स्वस्तिक को विष्णु का सुदर्शन चक्र माना गया है। उसमें शक्ति, प्रगति, प्रेरणा और शोभा का समन्वय है। इन्हीं चारों के समन्वय से यह जीवन और संसार समृद्ध बनता है। विष्णु की चार भुजाओं की संगति भी कहीं-कहीं सुदर्शन चक्र के साथ बिठाई गई है।

गणेश की प्रतिमा की स्वस्तिक चिन्ह के साथ संगति बैठ जाती है। गणपति की सूँड़, हाथ, पैर, सिर आदि को इस तरह चित्रित किया जा सकता है जिसमें स्वस्तिक की चार भुजाओं का ठीक तरह समन्वय हो जाय। ‘ॐ’ को स्वस्तिक रूप में लिखा जा सकता है। लिपि विज्ञान के आरम्भिक काल में गोलाई के अक्षर नहीं रेखा आधार पर उनकी रचना हुई थी। ॐ को लिपिबद्ध करने के आरम्भिक प्रयास में उसका स्वरूप स्वस्तिक जैसा बना था। ईश्वर के नामों में सर्वोपरि मान्यता ‘ॐ’ की है। उसको उच्चारण से जब लिपि लेखन में उतारा गया तो सहज ही उसकी आकृति स्वस्तिक जैसी बन गई।

आर्य, धर्म और उसकी शाखा-प्रशाखाओं में स्वस्तिक का समान रूप से सम्मान है। बौद्ध, जैन, सिख धर्मों में उसकी समान मान्यता है। योरोप और अमेरिका की प्राचीन सभ्यता में स्वस्तिक का प्रयोग होते रहने के प्रमाण मिलते हैं। आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड के मावरी आदि वासी स्वस्तिक को अभी भी मंगल प्रतीक की तरह प्रयुक्त करते हैं। साइप्रस की खुदाई में जो मूर्तियाँ मिली हैं उन पर स्वस्तिक अंकित है। ऐसे ही प्रमाण मिश्र, यूनान आदि की खुदाई में उपलब्ध हुए हैं। जापानी लोग स्वस्तिक को ‘मन जी’ कहते हैं और धर्म प्रतीकों में उसका समावेश करते हैं।

यास्क ने ‘स्वस्तिक’ को अविनाशी ब्रह्म की संज्ञा दी है। अमर कोश में उसे पुण्य, मंगल, क्षेम एवं आशीर्वाद के अर्थ में लिया है। निरुक्ति है- “स्वस्ति क्षेमं कायति कथयति इति स्वस्तिकः। स्वस्तिक अर्थात्-कुशल एवं कल्याण, संस्कृत में ‘सु-अस्’ धातु से स्वस्तिक शब्द बनता है। सु अर्थात् सुन्दर श्रेयस्कर अस् अर्थात् उपस्थिति अस्तित्व।

स्वस्ति वाचन के प्रथम मन्त्र में लगता है- स्वस्ति का ही निरूपण हुआ है। उसकी चार भुजाओं को ईश्वर की चार दिव्य सत्ताओं का प्रतीक माना गया है। ‘‘स्वस्तिक न इन्द्रो वृद्ध श्रवाः” में कीर्तिवान इन्द्र को- ‘‘स्वस्ति न: पूषा विश्व वेदाः सर्वज्ञ पूषा को -ࡡ‘‘स्वस्तिनस्तार्क्ष्यों अरिष्ट नेमिः” में अरिष्ट निवारक तार्क्ष्य को और “स्वस्ति नो बृहस्पति र्दधातु” में सर्वतोमुखी समृद्धि दाता बृहस्पति को कल्याण में योगदान देने के लिए आमन्त्रित किया गया है।

सिद्धान्त सार ग्रन्थ में उसे विश्व ब्रह्माण्ड का प्रतीक चित्र माना है। उसके मध्य भाग को विष्णु की कमल नाभि और रेखाओं को ब्रह्माजी के चार मुख, चार हाथ और चार वेदों के रूप में निरूपित किया गया है।

अन्य ग्रन्थों में चार युग-चार वर्ण-चार आश्रम एवं धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चार प्रतिफल प्राप्त करने वाली समाज व्यवस्था एवं वैयक्तिक आस्था को जीवन रखने वाले संकेतों को स्वास्तिक में ओत-प्रात बताया गया है।

हम स्वास्तिक का महत्व समझें और उसे समुचित श्रद्धा मान्यता प्रदान करते हुए अभीष्ट प्रेरणा ग्रहण करें- यही उचित है।

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आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व ज्ञान संगत भी और विज्ञान संगत भी

इन दिनों प्रामाणिकता का आधार प्रत्यक्षवाद माना जाने लगा है। ‘जो प्रत्यक्ष वही प्रामाणिक की मान्यता दिन-दिन जोर पकड़ती है। विज्ञान के बढ़ते हुए चरण ज्ञान क्षेत्र में और तथ्य की कसौटी को मान्यता देते हैं। उनका कहना है-पुरातन मान्यताओं में से कितनी ही अधूरी और अप्रमाणिक सिद्ध हुई हैं, उन्हें बदलना और सुधारना पड़ा है। ऐसी दशा में जो कुछ कहा और माना जाता रहा है उस सब का नये सिरे से पर्यवेक्षण किया जाना चाहिए। अब यही बात जोर पकड़ती जा रही है कि श्रद्धा को भावुकता भर माना जाय और महत्वपूर्ण विषयों को प्रत्यक्षवादी तर्क, तथ्यों द्वारा परखने के बाद ही स्वीकार किया जाय।

इस संदर्भ में ईश्वर और आत्मा की मान्यता भी एक विषय है जिस पर नया प्रकाश पड़ने की आवश्यकता है। इस दिशा में भी खोजबीन हुई और इतनी मंजिल पार कर ली गई है कि प्राणियों में पाई जाने वाली चेतना का अपना निजी अस्तित्व है वह रासायनिक पदार्थों के मिलन से जन्मती और बिछुड़न से मर जाती हो ऐसी बात नहीं है। उसका स्वतन्त्र अस्तित्व है। यह रासायनिक पदार्थों और परमाणुओं को अपनी इच्छानुसार खींचती बदलती एवं प्रयुक्त करती है। इस प्राणि चेतना का अपना आकर्षण और प्रभाव है। अपनी आकाँक्षा, अभ्यास , प्रकृति एवं आवश्यकतानुसार वह शरीर धारण करती है उस शरीर में आवश्यक हेर-फेर करती है। शरीर को ही नहीं वातावरण को भी वह प्रभावित करती है।

वृक्षों की सघनता वर्षा के बादलों को आकर्षित करती है यह सर्वविदित है। पेड़ कट जाने पर वर्षा घट जाती है। उद्यानों की अभिवृद्धि से मौसम बदलता और बादल खिंचते चले आते हैं। यह वृक्षों में रहने वाली चेतना का आकर्षण एवं प्रभाव है। सृष्टि के इतिहास से अनेकानेक परिवर्तनों की लम्बी शृंखला और उनके पीछे तत्कालीन प्राणियों की आकाँक्षाओं का दबाव भारी काम करता रहा है। अपने-अपने शरीरों की स्थिति में तथा अपनी इन्द्रिय चेतना में भी उनने भारी परिवर्तन कर लिए हैं

प्राणि जगत की चेतना अनुभवों का लाभ उठाते हुए, ठोकरों से शिक्षा लेते हुए, भूलों को सुधारते हुए प्रगति के प्रस्तुत स्तर तक पहुँच पाई है। आदिमकाल के ‘डाइनासोरों’ जैसे विशालकाय प्राणी पूँछ, दाँत और पीठ पर आक्रमणकारी शस्त्र साधनों से सुसज्जित थे। तब शायद संघर्ष और विजय का मत्स्य न्याय ही उपयुक्त समझा गया होगा, पर वह प्रयोग सफल न रहा। एक दूसरे की चमड़ी उधेड़ने और अण्डे निगलने की नीति सार्थक सिद्ध नहीं हुई कायिक दृष्टि से विशाल और सामर्थ्य की दृष्टि से सबल होते हुए भी आदिमकाल के पशु-पक्षी अपनी हिंसक आदतों के दुष्परिणाम भुगतते हुए अपना अस्तित्व ही गँवा बैठे।

पीछे नया अध्याय प्रारम्भ हुआ और नीति बदली। प्राणियों की ममता बच्चों के प्रति बढ़ी और उन्होंने अण्डों को घोंसलों में सेने की अपेक्षा पेट में ही पकाने का निश्चय किया इतना ही नहीं उन्हें शरीर रस निचोड़कर दूध भी पिलाया। यह प्रकृति परिवर्तन की एक महाक्रान्ति थी। हिंसा की निरर्थकता समझी गई और स्नेह सहयोग भरे अनुदान का आदान-प्रदान क्रम चल पड़ा।

माँसाहारी प्राणियों की मूल चेतना ने अपने शारीरिक अवयव अपनी आवश्यकतानुसार उपलब्ध एवं विकसित किये हैं। पेड़ों की छाया में तथा घास की झाड़ियों में अपने को छिपाये रहने की जितनी आवश्यकता समझी उनकी चमड़ी का रंग तथा दाग धब्बे उसी प्रकार के उत्पन्न हो गये। शाकाहारियों को दाँत-आँत की जैसी स्थिति आवश्यक थी उसी के अनुरूप उनने अपने कलेवरों को प्राप्त कर लिया। घोर शीत में आहार प्राप्त कर सकने की कठिनाई देखकर हिम प्रदेश के रीछों ने उन दिनों गहरी निद्रा में पड़े रहने की आदत बना ली। देशकाल के अनुरूप विभिन्न प्राणियों ने जहाँ अपने को बदला है वहाँ ऐसे प्रमाण भी उपलब्ध हुए हैं। कि अमुक क्षेत्र में बहुसंख्यक प्रबल चेतना सम्पन्न प्राणियों ने अपनी आवश्यकता के अनुरूप व्यवस्था बदलवा लेने के लिए प्रकृति को सहमत कर लिया।

यह बहुत पुराने जमाने की गई-गुजरी बात हो गई जब प्राणी को रासायनिक पदार्थों का समूह और उसकी चेतना को जीवाणुओं की सम्मिलित स्फुरणा मात्र कहा गया था और उसे चलता-फिरता पौधा घोषित किया गया था। शरीर के साथ ही जीवन का आदि और मरण के साथ अन्त होने की बात भी कभी-कभी विज्ञान क्षेत्र से उठी थी पर अब उस मान्यता में लगभग आमूल-चूल परिवर्तन कर लिया गया। मरणोत्तर जीवन के प्रमाण इतने अधिक मिले हैं कि उन्हें झुठलाया जा सकना सम्भव नहीं रहा। पुनर्जन्म की घटनाएँ आये दिन सामने आती हैं। ऐसे बालक जन्मते रहते हैं जो पूर्व जन्म की अपनी स्थिति के आधार पर प्रामाणिक सिद्ध कर सके। प्रेतात्माएँ कैसी होती हैं-कहाँ रहती और क्या करती हैं इस सम्बन्ध में अभी बहुत जानना शेष है, पर उनके अस्तित्व को अब अप्रामाणिक ठहरा देना सम्भव नहीं। इस संदर्भ में भी इतने अधिक प्रमाण मिलते रहते हैं कि इन्हें अन्धविश्वास या भ्रान्ति समुच्चय कह देने से काम नहीं चल सकता।

परमाणुवादी पदार्थ विज्ञान ने आत्मा के स्वतन्त्र अस्तित्व को स्वीकार किया है और यह प्रयत्न किया है कि उस अस्तित्व की संगति किसी प्रकार प्रकृति की विज्ञान सम्मत व्याख्या के साथ ही बैठ जाय।

आत्म-सत्ता के अस्तित्व संदर्भ में अधिक सुबोध प्रकाश टामस एडिसन ने डाला है। फोनोग्राफ रोशनी के बल्ब आदि के आविष्कार कर्ता इस प्रख्यात विज्ञानी का कथन है कि “प्राणी की सत्ता उच्चस्तरीय विद्युत कण गुच्छकों के रूप में रहती है। मरने के बाद भी यह गुच्छक विधिवत नहीं होते और परस्पर सघन सम्बद्ध बने रहते हैं। यह गुच्छक बिखरते नहीं वरन् मरने के उपरान्त अनन्त आकाश में भ्रमण करने के उपरान्त पुनः जीवन चक्र में प्रवेश करते और नया जन्म धारण करते हैं। यह गुच्छक मधुमक्खियों के झुण्ड की तरह हैं। पुराना छत्ता वे एक साथ छोड़ती और नया छत्ता एक साथ बनाती हैं। इसी प्रकार उच्चस्तरीय विद्युत कणों के गुच्छक अपने साथ स्थूल शरीर की साधन सामग्री और अपनी आस्थाओं और संवेदनाओं को साथ लेकर जन्मते-मरते रहने पर भी अमर बने रहते हैं।”

क्वांटम के थ्योरी के परिपूरक सिद्धान्त ने यह सिद्ध किया है कि जड़ और चेतना की सत्ता एक दूसरे से भिन्न स्तर की दिखते हुए भी वस्तुतः उनके बीच सघन तादात्म्य मौजूद। ‘पदार्थ’ एक स्थिति में ठोस रहता है पर दूसरी स्थिति में वह अपदार्थ बन जाता है। इस प्रकार जड़ चेतन में और चेतन जड़ में परिणत हो सकता है। मन की सत्ता शरीर रूप में पदार्थ रूप में प्रकट हो सकती है और अमुक स्थिति में पहुँच कर पदार्थ भी बन सकती है।

विज्ञानी हाइसन वर्ग का प्रतिपादन है कि अन्तरिक्ष में अमुक स्थिति पर पहुँचने पर परमाणु पदार्थ न रहकर अपदार्थ में-ऊर्जा में परिणत हो जाते हैं। पदार्थ सत्ता परिधि काल और रूप में ढाँचे में बंधी है मनः सत्ता में अनुभूतियाँ, स्मृतियाँ, विचार और बिम्ब के रूप में व्याख्या होती है। इतना अन्तर रहते हुए भी उन दोनों के बीच अत्यधिक घनिष्ठता है यहाँ तक कि वे दोनों एक दूसरे को प्रभावित ही नहीं करते वरन् परस्पर रूपांतरित भी होते रहते हैं।

इस तथ्य को नोबुल पुरस्कार विजेता यूजोन विगना ने और भी अधिक स्पष्ट किया है वे कहते हैं कि यह जान लेना ही पर्याप्त नहीं कि वस्तुओं की हलचलों से चेतना ही प्रभावित होती है वस्तु स्थिति यह है कि चेतना से पदार्थ भी प्रभावित होता है।

रूस के इलेक्ट्रॉनिक विज्ञानी सेमयोन किर्लियान ने एक ऐसी फोटोग्राफी का आविष्कार किया है जो मनुष्य के इर्द-गिर्द होने वाली उसकी विद्युतीय हलचलों के छायाँकन करती है। इससे प्रतीत होता है कि स्थूल शरीर के साथ-साथ किसी सूक्ष्म शरीर की सत्ता विद्यमान है और वह ऐसे अविज्ञात पदार्थों से बनी है जो इलेक्ट्रॉन से बने ठोस पदार्थ की अपेक्षा भिन्न भी है और अधिक गतिशील भी।

विज्ञान-विश्लेषण के अनुसार मनुष्य विद्युत आवेगों से सम्पन्न एक विशेष प्राणी है। वह अदृश्य ऊर्जाओं के समुद्र में तैरता है । हर मनुष्य में अपने स्तर के कुछ विशेष चुम्बकीय प्रवाह उठते रहते हैं और वे अपने सजातीय ऊर्जा तत्वों को इस निखिल आकाश में से खींच कार अपने में धारण करते रहते है। साथ ही मनुष्य अपनी इन चुम्बकीय विशेषताओं को अन्तरिक्ष में बखेरता भी रहता है। उसका यह ग्रहण और प्रक्षेपण क्रिया-कलाप निरन्तर चलता रहता है। अदृश्य ऊर्जाओं से वह प्रभावित होता है और उनमें अपना योगदान सम्मिलित करता है। इसी आकर्षण-विकर्षण में मृत आत्माओं के साथ संपर्क स्थापित करना और आदान-प्रदान का क्रम चल पड़ना भी सम्भव हो सकता है।

ख्याति नामा वैज्ञानिक यू0ई0 वर्नार्ड का कथन है कि अभी मनः तत्व के बारे में हमारी जानकारी बहुत स्वल्प है पर वह दिन दूर नहीं जब चेतना के उन रहस्यों का उद्घाटन होगा जो उपलब्ध भौतिक शक्तियों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। निकट भविष्य में यह सम्भव हो सकेगा कि मनः तत्व की शक्ति से पदार्थों का गठन, विगठन एवं रूपांतरण हो सके। इसी प्रकार यह भी सम्भावना है कि संकल्प शक्ति के सहारे मनुष्य अपने शरीर में अभीष्ट परिवर्तन प्रस्तुत कर सके।

मनुष्य के सम्बन्ध में अध्यात्म की वैज्ञानिक व्याख्या यह है कि ⲵ‘थ्री डाइमेन्शंस ऑफ स्पेस’ और वन डाइमेन्शन आवट्यून के समन्वय से यह अद्भुत निर्माण सम्भव हुआ है। इन में जो अनुपात है वही मनुष्य की वर्तमान स्थिति का आधार है यदि इस अनुपात में थोड़ा सा हेर-फेर सम्भव हो सके तो स्थिति में इतना अन्तर हो सकता है। कि आज का सामान्य मनुष्य कल अनेक कसौटियों पर असामान्य सिद्ध हो सके।

प्राणियों को चेतना का स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार कर लेने और उसका प्रभाव पदार्थों पर पड़ने के वैज्ञानिक निष्कर्ष उस बचपन से छुटकारा पा लिया जिसमें आत्मा का अस्तित्व ही अस्वीकार कर दिया गया था और प्राणियों के जन्म-मरण को रासायनिक पदार्थों की एक विशेष हलचल ठहराया गया था। अब प्राणि सत्ता को चेतना घटक के रूप में जाना माना जा रहा है। आत्मा का स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार करने से अब वैज्ञानिक आना-कानी, बहाने बाजी मात्र कही जा सकती है। वह दिन दूर नहीं जब इस संदर्भ में आड़े आ रहा असमंजस भी समाप्त होकर रहेगा।

अब दूसरा प्रश्न है परमात्म सत्ता का-उसे विज्ञान ने ब्रह्माण्डीय चेतना के रूप में स्वीकार किया है। आत्मा को अर्ध चेतन और अर्ध जड़ के रूप में ही अभी विज्ञान ने मान्यता दी है। इसी अनुपात से परमात्मा को भी अर्ध ब्रह्मा और अर्ध प्रकृति के रूप में स्वीकारा है। काम इतने से भी चल सकता है। अध्यात्मवाद को यह स्थिति भी स्वीकार है। अर्धनारी नटेश्वर की प्रतिमाओं में इस मान्यता की स्वीकृति है। ब्रह्म और प्रकृति का युग्म ब्रह्म विद्या के तत्वदर्शन ने स्वीकार किया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश अपनी-अपनी पत्नियों को साथ लेकर ही चलते हैं। अन्य देवताओं में से भी कदाचित ही कोई कुमार या विधुर हो। प्रकृति और परमात्मा के समन्वय से जीवात्मा की उत्पत्ति हुई है ऐसे प्रतिपादन ब्रह्मविद्या की अनेक व्याख्याओं में उपलब्ध हैं।

विज्ञान अपनी भाषा में परब्रह्म को-परमात्मा को-‘ब्रह्माण्डीय चेतना’ के रूप में स्वीकार करने लगा है और उसका घनिष्ठ सम्बन्ध जीव चेतना के साथ जोड़ने में उसे अब संकोच नहीं रह गया है। यह मान्यता जीव और ब्रह्म को अंश और अंशी के रूप में मानने की वेदान्त व्याख्या से बहुत भिन्न नहीं है।

अब विज्ञान वेत्ताओं ने एक ब्रह्मांडीय ऊर्जा का अस्तित्व स्वीकार किया है। इससे पूर्व पृथ्वी पर चल रही भौतिकी को ही पदार्थ विज्ञान की सीमा माना जाता था; पर अब एक ऐसी व्यापक सूक्ष्म सत्ता का अनुभव किया गया है जो अनेक ग्रह-नक्षत्रों के बीच ताल-मेल बिठाती है। पृथ्वी पर ‘इकॉलाजी’ का सिद्धान्त प्रकृति की एक विशेष व्यवस्था के रूप में अनुभव कर लिया गया है। वनस्पति, प्राणी, भूमि, वर्षा, रासायनिक पदार्थ आदि के बीच एक संतुलन काम कर रहा है और वे सब एक दूसरे के पूरक बन कर रह रहे हैं। जड़ समझी जाने वाली प्रकृति की यह अति दूरदर्शिता पूर्ण चेतन व्यवस्था उन भौतिक विज्ञानियों के लिए सिर दर्द थी जो पदार्थ के ऊपर किसी ईश्वर जैसी चेतना का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते। अब ब्रह्माण्डीय ऊर्जा उससे बड़ी बात है ग्रह पिंडों के बीच एक दूसरे के साथ आदान-प्रदान की-सहयोग संतुलन की जो ‘इकॉलाजी’ से भी अधिक बुद्धिमत्ता पूर्ण व्यवस्था दृष्टिगोचर हो रही है उसे क्या कहा जाय?

परा मनोविज्ञान की नवीनतम शोधें भी इसी निष्कर्ष पर पहुँची है मनुष्य चेतना ब्रह्माण्ड चेतना की अविच्छिन्न इकाई है। अस्तु प्राण सत्ता शरीर में सीमित रहते हुए भी असीम के साथ अपना सम्बन्ध बनाये हुए है। व्यष्टि और समष्टि की मूल सत्ता में इतनी सघन एकता है कि एक व्यक्ति समूची ब्रह्म चेतना का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

परमाणु सत्ता की सूक्ष्म प्रकृति का विश्लेषण करते हुए विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि दो इलेक्ट्रॉनों को पृथक दिशा में खदेड़ दिया जाय तो भी उनके बीच पूर्व संबंध बना रहता है वे कितनी ही दूर रहें एक दूसरे की स्थिति का परिचय अपने में दर्पण की तरह प्रतिबिम्बित करते रहते हैं। एक की स्थिति को देखकर दूसरे के बारे में बहुत कुछ पता मिल सकता है। एक को किसी प्रकार से प्रभावित किया जाय तो उसका दूसरा साथी भी अनायास ही प्रभावित हो जाता है। इस प्रतिपादन पर आइन्स्टाइन रोजेन पोटोल्स्की जैसे विश्व विख्यात विज्ञान-वेत्ताओं की मुहर है। इस सिद्धान्त से एक व्यापक सत्ता और उसके सदस्य रूप में छोटे घटकों की सिद्धि तथा पृथक रहते हुए भी एकता का तारतम्य बने होने की पुष्टि होती है।

विज्ञान की मान्यता के अनुसार पूर्ण को जानने के लिए उसका अंश जानने का और अंश के अस्तित्व को समझने के लिए उसके पूर्ण रूप को समझने की आवश्यकता पड़ती है इसके बिना यथार्थता को पूरी तरह समझा नहीं जा सकता । मूर्धन्य विज्ञान वेत्ता डॉ0 एफ0 केफ्रा ने अंश या अंशी के बीच अविच्छिन्न सम्बन्ध होने की बात का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया है और कहा है कि परमाणु का प्रत्येक घटक विश्व ब्रह्माण्ड का परिपूर्ण सदस्य है इस सदस्यता को किसी भी प्रकार निरस्त नहीं किया जा सकता। दोनों एक दूसरे के पूरक होकर ही आदिकाल से रहे हैं और अनन्त काल तक अपना सघन सम्बन्ध यथावत बनाये रहेंगे।

पिछली पीढ़ी के वैज्ञानिकों में से गेटे ने कहा था-ब्रह्माण्डीय चेतना का अस्तित्व सिद्ध कर सकने योग्य ठोस आधार मौजूद हैं रुडोल्फ स्टीनर ने अपने ग्रन्थ में गेटे के प्रतिपादन को और भी अच्छी तर सिद्ध करने के लिए आधार प्रस्तुत किये हैं।

जीव विज्ञानी टामस हक्सले ने ब्रह्माण्डीय चेतना के अस्तित्व और उसके कार्यक्षेत्र पर और भी अधिक प्रकाश डाला है वे उसे जीवाणुओं में अपने ढंग से और परमाणुओं में अपने ढंग से काम करती हुई बताते हैं और भारतीय दर्शन की परा और अपरा प्रकृति को ब्रह्मपत्नी के रूप में प्रस्तुत करने वाली मान्यता के समीप ही जा पहुँचते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने विस्तृत प्रकाश अपनी ‘हेवेन एण्ड हेल’ पुस्तक में डाला है।

परमाणु की इलेक्ट्रॉन प्रक्रिया को मात्र मन्त्रों से नहीं जाना जा सकता है। उसके अस्तित्व का दर्शन और निरूपण करने वाला एक ही यन्त्र है-मानवी मस्तिष्क। अन्य उपकरण तो इस संदर्भ में थोड़ी-सी सहायता मात्र करके रह जाते हैं। परमाणु की विवेचना नेत्र का नहीं गणित का विषय है। उसको हलचलों से उत्पन्न प्रतिक्रिया का आधार पर गणित करके यह पता लगाया जाता है कि परमाणु और उसके उदर में हलचल कर रहे घटकों का स्वरूप, स्तर एवं क्रिया-कलाप क्या होना चाहिए। विज्ञानी लुडविग ने इसे और भी अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है कि क्वांटम शास्त्र यन्त्रों पर नहीं वैज्ञानिकों की मानसिक चेतना पर अवलम्बित है।

विज्ञान को प्रामाणिकता की साक्षी के रूप में मान्यता मिलती रहती है, पर गहराई यह है कि विज्ञान का अस्तित्व ही जीव चेतना की ज्ञानधारा के द्वारा ही प्रकाश में आया है। सृष्टि के अन्तराल में सूक्ष्म हलचलें अनादिकाल से ही चलती रही हैं तब से अब तक वे अविज्ञात ही बनी रहीं, उन्हें जानना तथा प्रयोग में लाना जिन आविष्कारों और आविष्कारकों के द्वारा सम्भव हुआ है वह चमत्कार ज्ञान की परिष्कृत स्थिति का ही परिणाम है। अब प्रकृति के अन्तराल में छिपे हुए रहस्यों का बहुत कुछ उद्घाटन होना शेष है। जितना जाना जा चुका उससे कहीं अधिक जानने की मंजिल और पार करनी पड़ेगी। यह सब मानवी ज्ञान चेतना के सहारे ही सम्भव होगा।

विज्ञान के आधार पर चेतना को सिद्ध किया जाय या चेतना को विज्ञान की जननी माना जाय? आज हम इसी असमंजस भरे चौराहे पर खड़े हैं। यों विज्ञान द्वारा भी आत्मा और परमात्मा का अस्तित्व सिद्ध होने जा रहा है, पर अधिक बुद्धिमत्ता इसी में थी कि चेतना की सर्वव्यापी और सर्व समर्थ सत्ता को स्वीकार किया जाता और माना जाता कि पदार्थ और कुछ नहीं सूक्ष्म चेतना की सघन एवं दृश्यमान एक स्थिति मात्र है। वेदान्त चिरकाल से ‘सर्व खिल्विदं ब्रह्म’ का उद्घोष करता रहा है। अब विज्ञान की सर्वत्र ब्रह्माण्डीय चेतना की सत्ता जड़ और चेतन में संव्याप्त मानने की सहमति प्रकट कर रहा है। लगता है कल नहीं तो परसों आत्मा और परमात्मा की सत्ता व्यष्टि और समष्टि चेतना के रूप में संव्याप्त होने की स्वीकृति प्रदान करेगा। ज्ञान और विज्ञान की दोनों ही धाराएं आरम्भ में भले ही भिन्न एवं विपरीत दिखाई देती हों, पर आगे चलकर उन दोनों का समन्वय, एकीकरण होना सुनिश्चित है।

पौराणिक गाथा है कि महर्षि कश्यप की दो पत्नियाँ थीं-एक दिति दूसरी अदिति। दिति से दैत्य और अदिति से देव उत्पन्न हुए। दैत्य है- विज्ञान और देव है- अध्यात्म। दोनों आपस में लड़ेंगे तो कलह और विनाश के अतिरिक्त किसी के पल्ले कुछ न पड़ेगा। मिल-जुलकर समुद्र मन्थन करेंगे तो उनको श्रेय तथा समस्त विश्व को विविध-विधि लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा।

गंगा और यमुना हिमालय के एक ही क्षेत्र से निकलती है। दोनों का उद्गम केन्द्र एक है। आँखें दो है, पर दोनों की अनुभूतियों के आधार पर दृश्य बिम्ब का निर्धारण एक ही मस्तिष्क केन्द्र करता है। कुछ दूर अलग-अलग बहने के कारण वे आगे चलकर परस्पर मिल जाती हैं। नेत्रों की ज्योति पृथक-पृथक है, पर दृश्य पर दोनों का ही फोकस एक हो जाता है और वे दोनों अलग-अलग दृश्य न देख कर जो देखती हैं उसका निष्कर्ष एक ही होता है। अध्यात्म और विज्ञान को एक ही हिमालय की दो गंगा-यमुना एक ही मस्तिष्क में धंसी हुई दो आँखें कहा जाय तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी। वे एक दूसरे की प्रतिद्वन्दी या प्रतिपक्षी नहीं वरन् वस्तुतः परस्पर पूरक बन कर रह सकती हैं।


Quotation

जो सत्य को केवल बुद्धि से समझना चाहता है, वह अनेक बार असत्यों के इन्द्रजाल में फँस जाता है। सत्य सुन्दर है, किन्तु असत्य जब सत्य का रूप रखकर सम्मुख आता है तो और भी आकर्षक दीखता है। जो स्वभावतः सुन्दर होता है, वह सामान्यतः सुन्दर लगता है किन्तु जब किसी को रिझाने के लिए सजगता पूर्वक सोलह शृंगार किये जाते हैं, तब उसकी प्रतिक्रिया का तीव्र होना स्वाभाविक है। लोग उस सोद्देश्य रूप जाल में फँस ही जाते हैं। यही दशा सत्य और असत्य की भी है। सत्य मनुष्य के सम्मुख साधारण रूप में ही उपस्थित होता है, किन्तु असत्य छलने के मन्तव्य से अपने स्वरूप को नख से शिख तक सजा कर ही आता है।

केवल बुद्धि के बल पर सत्यासत्य की परख करने में प्रवंचना की शंका रहती है। सत्य बुद्धि से परखने की नहीं, जीवन में अनुभव करने की वस्तु है। जीवन में अनुभूत किया हुआ सत्य ही वास्तविक सत्य है, शेष असत्य भी हो सकते हैं।

-जे. कृष्णमूर्ति

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प्रगति भौतिक ही नहीं आत्मिक भी होनी चाहिए

प्रगति की पुकार सर्वत्र है। विकास की आकाँक्षा सर्वत्र उभरती हुई दिखाई पड़ती है और उसके लिए प्रयत्न पुरुषार्थ भी द्रुतगति से हो रहे हैं। यह उचित भी है और आवश्यक भी। भौतिक साधनों की अभिवृद्धि से मनुष्य को अपने निर्वाह प्रयोजनों में सुविधा मिलती है। इससे कई तरह की कठिनाइयों का निराकरण होता है, सुखी जीवन जी सकने के कई साधन हाथ में आते हैं। इससे व्यक्तित्वों की उन्नति में सहायता मिलती है। इन तर्कों से किसी का मतभेद नहीं है। भौतिक उन्नति को सर्वतोमुखी प्रगति का एक अंग मानने में किसी को आपत्ति नहीं इन प्रयासों का तो समर्थन ही किया जा सकता है। किन्तु उसे ही समग्र प्रगति नहीं कहा जा सकता।

यहाँ इस तथ्य की ओर ध्यान आकर्षित किया जा रहा है कि आर्थिक प्रगति को आँशिक ही माना जाय और यह ध्यान में रखा जाय कि व्यक्तित्व की स्थिति भी ऊँची उठाई जानी चाहिए और उन तथ्यों को भी महत्व दिया जाना चाहिए जो मनुष्य को मानवीय विशेषताओं से सुसम्पन्न बनाते हैं। अच्छी मोटर होना उचित है, पर उसका ड्राइवर भी कुशल होना चाहिए अन्यथा मोटर की सवारी पैदल चलने से भी अधिक महँगी पड़ेगी। चोर, डाकू, ठग, उचक्के कितना अधिक कमाते हैं, पर उसका लाभ वे न स्वयं उठा पाते हैं और न परिवार वालों को दे पाते हैं। उनका निष्कृष्ट व्यक्तित्व मात्र अपराधी प्रवृत्तियां अपनाकर अनीति उपार्जन की दिशा में ही नहीं बढ़ता वरन् जो पाया, कमाया है उसे व्यसन अनाचार में लगाकर अपनी शारीरिक, मानसिक स्थिति को और भी अधिक बुरी बना लेता है। इसके विपरीत अपरिग्रही सन्त सज्जन स्वल्प साधनों में भी वैसा आनन्द भरा जीवन जीते हैं जैसा तथाकथित भाग्यवानों को स्वप्न में भी उपलब्ध नहीं होता।

‘प्रगति’ शब्द के अन्तर्गत यदि व्यक्तित्व के विकास को भी भौतिक उन्नति जितना ही महत्व मिल सका होता तो निश्चय ही स्वल्प साधन रहते हुए भी उनके सदुपयोग से अपेक्षाकृत कहीं अधिक लाभ उठा लिया गया होता और प्राचीन भारत की तरह सामान्य परिस्थितियों में भी उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँच सकना सम्भव हो सका होता। आर्थिक उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचे हुए अमेरिका जैसे देशों का स्वरूप सामने है। वहाँ व्यक्तित्वों को उच्चस्तरीय बनाने पर भी यदि ध्यान दिया गया होता तो स्थिति दूसरी ही होती। उतने ही साधनों से न केवल वे स्वयं स्पर्द्धा योग्य स्थिति में रहते वरन् उन्हीं साधनों से समस्त संसार को अधिक सुखी बनाने में कहीं अधिक सफल होते।

हमें सोचना होगा कि भौतिक सामग्री कितनी ही उपयोगी क्यों न हो उसका उपयोगकर्ता तो मनुष्य ही है। उपार्जन की कुशलता की तरह ही उपयोग में भी दूरदर्शिता का समावेश होना चाहिए। धन, बल, विद्या, चातुर्य आदि अनेक सम्पदाएँ प्रचुर मात्रा में उपार्जित कर लेने पर भी यदि उनका उपयोग ठीक से न आया तो उससे लाभ के स्थान पर उलटी हानि हो सकती है। सुसम्पन्न लोग जब कुमार्गगामी बनते और अनर्थ पर उतरते हैं तो अपनी तथा पूरे समाज की भयंकर क्षति करते हैं इसके विपरीत साधनहीनों की कुमार्गगामिता भी सीमित क्षेत्र में-सीमित मात्रा में हानि पहुँचाकर ही रह जाती है।

मनुष्य का आंतरिक स्तर उठाया जाना संसार की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उसे भौतिक उन्नति से अधिक नहीं तो उसके समक्ष तो माना जाना चाहिए और उससे कम प्रयत्न नहीं किये जाने चाहिए जितने कि आर्थिक वैज्ञानिक, शारीरिक आदि क्षेत्रों में विकास के लिए किए जा रहे हैं।

व्यक्तित्व का विकास मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसी आधार पर गई-गुजरी स्थिति में रहने वाले नर-कीटकों और नर-पशुओं को महानात्मा-देवात्मा और परमात्मा स्तर तक विकसित होने का अवसर मिलता है। सम्पत्तियों का उपार्जन सफलताओं का सम्पादन एवं उपलब्धियों का सदुपयोग भी विकसित व्यक्तित्व पर ही पूरी तरह अवलम्बित रहता है। ओछे स्तर के व्यक्ति गुण, कर्म, स्वभाव की निकृष्टता के कारण धन, बल, ज्ञान, यश आदि से वंचित रहते हैं साधन और अवसर रहने पर भी वे उनका उपयोग नहीं कर पाते, फलतः दरिद्रता, दुर्बलता एवं खिन्नता ही उन्हें अहर्निशि घेरे रहती है। दूसरों की सहायता भी ऐसे लोगों के लिए कुछ अधिक सहायक सिद्ध नहीं होती। सहायता का प्रभाव जहाँ समाप्त हुआ वहीं वे अपनी गई गुजरी स्थिति में पुनः जा पड़ते हैं। व्यक्तित्व का पिछड़ापन ही असंख्य अभावों और संकटों का फल है। विकसित व्यक्तित्व के लोग जटिल परिस्थितियों से जूझकर भी अपने लिए प्रगति का मार्ग बना लेते हैं और जो उपलब्ध है उसी का श्रेष्ठतम सदुपयोग करते हुए आगे बढ़ते चले जाते हैं।

संसार के प्रगतिशील महामानवों के जीवनों को गम्भीरतापूर्वक पढ़ने पर यह तथ्य सर्वत्र उभरा हुआ दिखाई पड़ेगा कि मनुष्य को ऊँचा उठाने में परिस्थितियाँ नहीं मन:स्थितियाँ ही प्रधान कारण रही हैं। समझा यह जाता है कि परिस्थितियों से मनःस्थिति बनती हैं। लोग घटनाक्रम के कारण खिन्न, प्रसन्न अथवा पतित, उन्नत होते हैं। किन्तु यथार्थता इसके सर्वथा विपरीत है। वस्तुस्थिति यह है कि मनःस्थिति के फलस्वरूप परिस्थिति बनती एवं प्रभाव करती हैं एक ही विपन्न परिस्थिति के दो मनुष्यों में एक टूटकर नष्ट हो जाता है जबकि दूसरा उसी में दूने साहस का परिचय देकर अपनी प्रखरता का परिचय देता है।

व्यक्तित्व को समुन्नत बनाना- संसार की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उससे स्वयं प्रभावित होता है और अन्य लोगों को समस्त समाज को प्रभावित करता है। समाज और कुछ नहीं-व्यक्तियों के मन की गुँथी हुई माला भर है। कड़ियों का समूह ही जंजीर है। व्यक्तियों का समूह ही समाज है। समाज की परिस्थितियाँ उसी प्रकार की बनेगी जैसी कि उसके सदस्यों घटकों के व्यक्तित्व होंगे। यह विचार सही नहीं है कि सम्पत्ति बढ़ जाने से मनुष्य का स्तर ऊँचा उठता है। और प्रगतिशील परिस्थितियाँ बनती चली जाती हैं यह तथ्य आँशिक रूप से ही सत्य है। भौतिक जीवन में अधिक सुविधा साधन मिलें यह बहुत अच्छी बात है उससे विकास क्रम में सहायता मिलती है, पर यह यथार्थता भी भुला देने योग्य नहीं है कि घटिया व्यक्तित्व एक तो प्रगति कर ही नहीं सकेंगे यदि कर भी लेंगे तो उपलब्ध साधनों का दुरुपयोग करके उलटे और विपत्ति के दल-दल में फंसेंगे। दुर्गुणी व्यक्ति पूर्वजों की सम्पत्ति और अपनी कमाई को कैसे सत्यानाशी कामों में खर्च करते हैं इसके असंख्य प्रमाण आये दिन आँखों के सामने उपस्थित होते रहते हैं। इसके विपरीत यह भी सत्य है कि व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति अपने प्रबल पुरुषार्थ से आवश्यक साधन सरलतापूर्वक उपार्जित कर लेते हैं, यदि कारणवश अधिक न कमाया जा सका तो भी जो हाथ में है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करके दुर्गुणी साधन सम्पन्न लोगों की तुलना में कहीं अधिक अच्छी तरह गुजर कर लेते हैं।

प्राचीन भारत की उच्चस्तरीय परिस्थितियों और आज की समस्याग्रस्त उद्विग्नता की तुलना करते हैं तो आश्चर्य होता है कि यह विडंबना किस कारण आ उपस्थित हुई। प्राचीन काल में सुविधा साधन आज की अपेक्षा कहीं कम थे। रेल, मोटर, सड़क, पुल, जलयान, वायुयान, तार जैसे यातायात और संचार साधन उन दिनों कहाँ थे? बिजली, भाप, तेल और कोयले से शक्ति उत्पन्न करके लाभान्वित होने की स्थिति कहाँ थी? विज्ञान का, शिक्षा का, चिकित्सा का इतना विकास कहाँ हुआ था? शासन तंत्र और सैन्य शक्ति की इतनी उन्नति कब थी? दैनिक जीवन में जितने अधिक सुविधा साधन आज उपलब्ध हैं उतने की उन दिनों कोई कल्पना भी नहीं करता होगा। इतने पर भी हम समस्याओं और संकटों के जाल-जंजाल में बेतरह फंसे पड़े हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से मनुष्य जाति अपनी पिछली पीढ़ियों की तुलना में क्रमशः नीचे की ओर ही गिर रही है। दुर्बलता और रुग्णता को पकड़ शरीरों में गहरी घुसती जा रही है पारस्परिक सद्भाव, स्नेह, सहयोग में बेतरह कमी हुई है। एक दूसरे को सहायता देकर ऊँचा उठाने के स्थान पर शोषण की बात सोचने में संलग्न है। संसार भर में अपराधी प्रवृत्तियाँ बढ़ रही हैं और सामाजिकता की जड़ें खोखली होती चली जा रही हैं। कर्तव्य की उपेक्षा और अधिकारों की माँग का हर क्षेत्र में बोलबाला है। फलतः अनेकानेक संघर्ष खड़े हो रहे हैं और समस्याएं उठ रही हैं एक का समाधान नहीं हो पाता कि दूसरी दो नई और उठ खड़ी होती हैं। लोगों की मनःस्थिति कुत्साओं और कुण्ठाओं से ग्रसित होती चली जा रही है। फलतः सुविधा के साधन दिन-दिन बढ़ते जाने पर भी मनुष्य टूटा, हारा, थका, निराश और उद्विग्न दिखाई पड़ता है। खिन्न मनःस्थिति में गम गलत करने के लिए लोग व्यसन, व्यभिचार जैसे क्षुद्र प्रयोजनों का आश्रय लेने पर उतारू हो रहे हैं।

एक क्षण के लिए हमें रुक कर इस तथ्य पर गम्भीर विचार करना चाहिए कि प्राचीनकाल में स्वल्प साधनों के बीच भी क्यों समुन्नत स्थिति बनी हुई थी और आज प्रचुर साधनों के होते हुए भी हम इस प्रकार दयनीय स्थिति में गिरते जा रहे हैं। कारण केवल एक ही उभर कर आता है कि ‘प्रगति’ हर दिशा में हुई, पर व्यक्तित्व के विकास को उपेक्षित ही रहने दिया गया और वहाँ अवाँछनीय तत्वों का अड्डा जम गया। इस स्थिति को बदला जाना चाहिए और व्यक्तित्व को तीनों परतों को परिष्कृत करने के लिए नये सिरे से, नये उत्साह से प्रयत्न आरम्भ करना चाहिए। इन प्रयत्नों को नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति का नाम दिया जाना अधिक उपयुक्त होगा।

भौतिक प्रगति की आवश्यकता को समझा गया है ओर उसके लिए प्रयास भी हो रहे हैं। यह एक पक्ष है। ध्यान दूसरे पक्ष पर भी जाना चाहिए। आत्मिक प्रगति को भी उतना ही महत्व मिलना चाहिए और सामूहिक तथा वैयक्तिक स्तर पर इस दिशा में भी प्रबल प्रयास किये जाने चाहिए, सच तो यह है कि महत्व चेतना का है पदार्थ का उपयोग तो चेतना ही करती है, अस्तु प्रश्न उत्पादन का ही नहीं उपभोग का भी है। परिष्कृत व्यक्ति ही वस्तुओं का सही उपयोग कर सकता है ओर उससे लाभान्वित हो सकता है। निकृष्ट व्यक्तित्व तो बढ़ी हुई समृद्धि का दुरुपयोग ही कर सकता है और उससे लाभ के स्थान पर हानि ही उठा सकता है।

भौतिक प्रगति के लिए भरपूर प्रयत्न किये जाने उचित हैं। उस दिशा में समुचित ध्यान देना आवश्यक है, पर भुला यह भी न दिया जाय कि आत्मिक प्रगति के लिए किये गये प्रयासों के बिना उदात्त दृष्टिकोण, प्रखर चरित्र और उपयोगी गतिविधियोँ का विकास न हो सकेगा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हम भौतिक और आत्मिक प्रगति की दिशा में समान रूप से प्रयास करें तो उज्ज्वल भविष्य की सम्भावना सुनिश्चित हो सकती है।


तिजोरी में बन्द हीरे (kahani)

तिजोरी में बन्द हीरे और पन्ने गर्व अनुभव कर रहे थे कि हमारी कितनी कीमत और कितनी चाह है। श्रीमन्तों के यहाँ ही हम जाते हैं और जहाँ रहते हैं वहाँ संगीन लिए पहरेदार रखवाली के लिए खड़े रहते है इतने भाग्यशाली हैं-हम लोग।

यह चर्चा उस श्रीमन्त के पिछवाड़े एक विधवा की झोंपड़ी में रखी चक्की तक पहुँची। उसने नम्रतापूर्वक उस रत्न समूह से पूछा-‘क्या आप लोग मेरी तरह किसी गरीब के गुजारे का साधन भी बन सकते हैं? क्या आपका अस्तित्व किसी को स्वस्थ श्रम जीवी बनने की प्रेरणा भी देता है?’

रत्न जब अपनी और चक्की की उपयोगिता की तुलना करने लगे तो उनकी गर्वोक्तियाँ मौन हो गईं।

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चेतना की प्रगति का महत्व समझा जाय।

सृष्टि में जीवन का इतिहास जल पर छाई हुई ‘काई’ तथा जल-थल पर विभिन्न आकृतियों में पाई जाने वाली घास से आरम्भ होता है। उसी ने प्रगति करते हुए इच्छा, ज्ञान और कर्म की विशेषताओं से युक्त जीवधारी का रूप ग्रहण किया है और फिर अमीबा से लेकर मनुष्य तक असंख्य वर्ग के प्राणधारी उत्पन्न होते और क्रमश: आगे बढ़ते चले गये हैं।

अपने युग में मनुष्य ने अपनी सफलताओं पर गर्वोन्मत्त होकर प्राणी पर लगे हुए प्रकृति के अंकुश की अवहेलना आरम्भ करके स्वेच्छाचार अपनाने की उद्धतता दिखाई है। फलतः उसे पत्थर से सिर टकराने पर चोट लगने की तरह कई प्रकार की आपत्तियों का सामना करना पड़ा और उलझनों में जकड़ना पड़ा है। यह सामयिक उद्दण्डता और प्रताड़ना की एक झलक कही जा सकती है ओर उसे अस्थायी माना जा सकता है भूलें सुधारते-सुधारते ही मनुष्य आगे बढ़ा है। मानवोचित शालीनता की अवज्ञा करने पर किस प्रकार का प्रतिफल भुगतना पड़ता है-नियति की पाठशाला में यह पाठ इन दिनों पढ़ना पड़ रहा है और उलटी राह चलना कितना महंगा पड़ता है, यह समय की प्रयोगशाला में भली प्रकार सीखा जा रहा है। भविष्य आशाजनक है। ठोकर खाकर सम्भलने-भूलों को सुधारने और भटकाव को बदलने में मनुष्य कुशल रहा है। अपने समय में भी वह कुशलता प्रखर हो रही है। युग-परिवर्तन के लिए चल रहा प्रचण्ड अभियान इसी सुधार प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण प्रमाण है। हमें मरना नहीं जीना अभीष्ट है। हमें पतन नहीं उत्थान चाहिए। अस्तु सृष्टि के आदि से लेकर अब तक सुधार प्रक्रिया का चलता आ रहा क्रम अब भी जारी है और भविष्य में भी जारी रहेगा। ये सुनिश्चित है कि अपने समय में जो दुष्प्रवृत्तियाँ और दुर्भावनाएँ हर दृष्टि से घातक सिद्ध हो रही हैं उन्हें अगले दिनों बदल ही लिया जायगा। युग-परिवर्तन अभियान की सफलता का श्रेय किन्हीं पर भी क्यों न बरस पड़े? असल में वह मानवी सत्ता की चिर अभ्यस्त प्रक्रिया ही है जिसके अनुसार भूल सुधारों का क्रम अनवरत गति से होता चलता आया है और भविष्य में इसी प्रकार चलता रहेगा।

यह तो सामयिक प्रसंग और भूल सुधार के सनातन क्रम का उल्लेख मात्र है। यहाँ चर्चा उस प्रगति क्रम की होनी है जो सृष्टि के आदि काल से चलता आ रहा है और जिसने शिक्षा, चिकित्सा, उत्पादन, व्यवसाय, विज्ञान, समाज, शासन आदि के अनेकानेक सुविधा साधनों का पथ-प्रशस्त किया है। इस विकास-क्रम में जीवात्मा के चरण आगे ही आगे बढ़े हैं। भविष्य में और भी द्रुतगति से बढ़ेंगे क्योंकि अतीत में जितने साधन थे अब उसकी तुलना में असंख्य गुने अधिक बढ़ गये हैं। बैलगाड़ी की तुलना में मोटर अपेक्षाकृत अधिक जल्दी लम्बा सफर पूरा करा देती है। आज के मनुष्य को अधिक साधन उपलब्ध हैं अस्तु उसकी प्रगति यात्रा भी अधिक तेजी से बढ़ेगी-यह भी निश्चित है।

विज्ञान, अर्थ-व्यवस्था, शिक्षा, चिकित्सा, अन्तरिक्ष, पाताल के क्षेत्रों में नित नये आविष्कारों से यह स्पष्ट है कि मनुष्य के हाथ में वे साधन लग रहे हैं जो भूतकाल में उपलब्ध नहीं हैं। इसका उपयोग भौतिक शक्ति और सम्पन्नता प्राप्त करने के लिए हो रहा है। अधिपति अपने साधनों का मनमाना उपयोग करते रहे हैं। अब भी वह हो रहा है। पर अगले दिनों जन-चेतना के दबाव से उनका उपयोग सर्वजनीन स्तर पर होने लगेगा। समाजवाद जैसी प्रवृत्तियां इसके लिए प्रयत्नशील भर हैं। अगले दिनों भौतिक साधनों की वृद्धि होगी और एकाधिकार को लोकहित के लिए विकेन्द्रित करने के लिए भी प्रयत्न होंगे। इन दिनों अभिनव उपलब्धियों का उपयोग निहित स्वार्थों के लिए होता देखकर चिन्ता होनी स्वाभाविक है, पर तत्वदर्शी निश्चित हैं कि अवाँछनीयता देर तक स्थिर न रह सकेगी। विवेक का सूर्य उगेगा और सद्भावना के वातावरण में सत्प्रवृत्तियाँ पनपती दिखाई देंगी और भौतिक क्षेत्र में भी मनुष्य अन्ततः क्रमिक प्रगति करते-करते स्वर्गीय सुख-सुविधाओं का लाभ प्राप्त करेगा। उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएं मूर्तिमान करने के लिए यदि प्रबुद्ध वर्ग सच्चे मन से प्रयत्न करे तो वह बिना कठिनाई और बिना देरी के निकट आ सकता है। यदि इस दिशा में मूर्धन्य व्यक्ति अपना कर्त्तव्य नहीं भी निबाहें तो भी देर-सवेर में स्थिति आ ही जायगी, जिससे अपूर्णता से पूर्णता की ओर चलने का-जड़ चेतन पर लागू होने वाला प्रगति क्रम सनातन धर्म सही सिद्ध हो सके। प्रश्न केवल देरी-जल्दी और कठिनाई-सरलता का है। युग पुरुषों की भूमिका इसी क्रम में सरलता उत्पन्न करती है अन्यथा उसे किसी प्रकार तो सृष्टि अन्तराल में काम कर रही प्रगति चेतना अपने ढंग से भी पूरी कर लेती है। विश्व मानव का समष्टि विवेक अनादि काल से प्रगति के पथ की ओर इस सृष्टि को धकेलता चला आया है और तब तक वह क्रम चलता ही रहेगा जब तक कि एक को बहुत में बखेरने वाला सृष्टा-बहुत को एक में समेट नहीं लेता।

यह बहिरंग प्रगति के संदर्भ में पर्यवेक्षण हुआ। अब चेतना की अन्तरंग स्थिति के सम्बन्ध में दृष्टिपात करने की आवश्यकता है। वास्तविक प्रगति तो चेतना की ही होती है। उसका स्तर जितना विकसित होता है उसी अनुपात में भौतिक पदार्थों का अधिक मात्रा में अधिक उच्चस्तरीय उत्पादन एवं उपभोग सम्भव होता है। नर-पशु दाम्पत्य-जीवन में मात्र यौन उत्तेजना के कुछ क्षणों का ही थोड़ा-सा लाभ पाते हैं, पर भावुक सम्वेदना-सौन्दर्य दृष्टि-कलात्मक सहयोग का समावेश हो जाने से उस मिलन की सरसता अत्यधिक उच्च स्तर की बन जाती है। इस अन्तर में जननेन्द्रियों की नहीं, अन्तः विकास की गरिमा ही काम करती है। इसके रहते पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन करते हुए भी उस काम-क्रीड़ा का आनन्द लिया जा सकता है जिसमें सामान्य रूप से घिनौनी काम लिप्सा भी मोक्ष, धर्म, अर्थ की तरह ही सरस और सुखद बन जाती है। यह चेतना के विकास का प्रमाण है। चेतना की प्रगति सत्यं शिवं सुन्दरं के रूप में दृष्टिगोचर होती है। उससे शत्-चित आनंद की दिव्य अनुभूतियाँ सम्भव होती हैं और स्वल्प साधनों से भी स्वर्गीय आनन्द को अपनी इसी धरती पर प्राप्त कर सकना सम्भव होता है।

दृश्यमान आकर्षण को तो चमड़े की आँख से भी देखा, जाना जा सकता है उसे तो अर्ध विक्षिप्त तक परखने ओर अपनाने में कुशल होते हैं। इन्द्रिय अपने-अपने विषय में प्रशिक्षित और अभ्यस्त होती हैं वे रुचिकर और अरुचिकर का भेद सहज ही बता देती हैं। सुन्दर और असुन्दर खिलौने और कपड़े तो छोटे बच्चे भी जानते हैं तथा ललचाते हैं। चेतना की सौन्दर्य दृष्टि इससे गहरी होती है उसकी परख की कसौटी भिन्न स्तर की रहती है। अन्तरंग की पवित्रता और शालीनता के आधार पर जो श्रद्धासिक्त पुलकन उठती है उसमें सौन्दर्य का वह तत्व रहता है जिसके लिए अध्यात्म में ‘सुन्दरम्’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। यह परख आँखों से आगे की है। इसमें स्थिति को नहीं स्तर को प्रधानता मिलती है। इसलिए विकसित चेतना ही इस सुन्दरम् को दृश्य के पीछे अदृश्य को ढूँढ़ पाने में समर्थ होती है। आँखें तो इस सम्बन्ध में धोखा ही धोखा खाती हैं। उनके द्वारा तो नकली और असली हीरे तक के और वेश्या तथा साध्वी तक के बीच किसे प्रधानता दी जाय यह निर्णय भी करते नहीं बनता।

शिवं-कल्याण कहाँ है? किसमें है? सत्यं-का आधार क्या हो सकता है? इसका निर्णय करने में भोंथरी चेतना प्रायः असमर्थ रहती है। श्रेय और प्रेय के बीच का चुनाव करने का जब अवसर आता है तो पिछड़ी हुई चेतना आमतौर से ‘प्रेय’ को ही चुनती है। लोग उपभोग के लिए आतुर है। उपयोग की बात कौन सोचता है? आज का अभी लाभ प्राप्त करने के लिए आमतौर से लोग भविष्य को अन्धकारमय बनाने और भयंकर दुष्परिणाम सहने की भूल करते रहते हैं। उतनी दूरदर्शी विवेक दृष्टि कितनों में होती है कि बीज बोकर वृक्ष के फलने तक उसे सींचने, सम्भालने का माली जैसा धैर्य धारण किये रह सकें। शहद पर टूट पड़ने और पंख लिपट जाने पर तड़प कर प्राण देने वाली मक्खी का उदाहरण ही आम लोगों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। बड़प्पन छोड़कर महानता अपनाने के लिए किसका जी करता है। मद्य छोड़कर पय-पान करने में किसे अभिरुचि है? यह अन्त: चेतना का पिछड़ापन ही है जिसमें उपयोगिता की अपेक्षा और आकर्षण की प्रतिष्ठा की नीति अपनाई जाती रहती है। शिवं की व्याख्या वासना और तृष्णा के अतिरिक्त और कुछ कहाँ होती है? सत्य में अहंता का पोषण ही आधार माना जाता है यही कारण है कि आन्तरिक बौनापन बे हिसाब बढ़ रहा है। विशाल अंतःकरण और उदात्त दृष्टिकोण वाले ‘देव मानव’ निरन्तर घटते चले जा रहे हैं। हिम मानव कहे जाने वाले ‘दैत्य’ अब खोज और चर्चा के विषय बन कर रह गये हैं। उन्हें प्रत्यक्ष देख पाना अति कठिन है लगता है कुछ समय में देव मानवों का वंश भी घटता मिटता चला जायेगा। धन वैभव बढ़ा किन्तु ब्रह्मवर्चस् खो गया तो उसे सौभाग्य नहीं दुर्भाग्य ही कहा जा सकेगा।

इन दिनों बुद्धि वैभव की चमत्कारी प्रगति प्रत्यक्ष है। विज्ञान से लेकर शिक्षा तक के सभी क्षेत्रों में जो उन्नति हो रही है उससे कौन अपरिचित है? शक्ति और साधनों के नये-नये स्रोत हाथ में आ रहे हैं प्रकृति की रहस्यमय परतों पर से एक के बाद एक पर्दा उठता चला जा रहा है और उसके आधार पर मनुष्य का दर्जा सृष्टि शिरोमणि से ऊँचा उठ कर प्रकृति प्रशासक एवं अधिपति का बनता जा रहा है बौद्धिक क्षेत्र की प्रगति में अपने युग ने जो प्रगति की है उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा ही की जा सकती है, पर यहाँ इतना और भी ध्यान रखना होगा कि यह चेतना की प्रगति नहीं है। चेतना और बुद्धि का अन्तर समझा जाना चाहिए। बुद्धि का केन्द्र मस्तिष्क शरीर का एक अवयव मात्र है। शरीर पंच भौतिक है मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया है किसी के पैरों ने दौड़ने की-हाथों में वजन उठाने की जीभ से बातें बनाने की कुशलता बढ़ जाय तो उसे शरीर की उन्नति ही कहा जायगा। चेतना की परतें बुद्धि से उतनी ही गहरी हैं-जितनी कि शरीर की तुलना में आत्मा की। किसी बलिष्ठ का चमत्कार दंगल में कुश्ती जीतने के रूप में देखा जा सकता है, पर यह आवश्यक नहीं कि वह भक्ति भावना-सहृदयता और उत्कृष्ट आदर्शवादिता की दृष्टि से भी बढ़ा-चढ़ा है। भावना का क्षेत्र चेतना का है और वह शरीर के साथ जुड़ी होने पर भी अस्तित्व की दृष्टि से उससे भिन्न है किसी रुग्ण व्यक्ति की भी सद्भावना अत्यन्त उच्चस्तर की हो सकती है इन उदाहरणों से शरीर और आत्मा की स्थिति भिन्नता पर प्रकाश पड़ता है। बुद्धि वैभव को भी एक प्रकार से भौतिक प्रगति के अंतर्गत ही गिना जा सकता है। स्पष्ट है कि उसके कारण साँसारिक उपलब्धियां ही हस्तगत हुई हैं। यदि बुद्धि ने चेतना को विकसित करके भी अपना पराक्रम दिखाया तो साधनों के उपभोग की उपेक्षा करके उनके उपयोग की बात सोची गई होती। तब प्रस्तुत साधन सामग्री के सहारे ही इस संसार या प्रत्येक प्राणी आनन्द और उल्लास का रसास्वादन करते हुए क्रीड़ा-कल्लोल मग्न रहा होता और अपनी इसी धरती पर सतयुगी-स्वर्गीय-परिस्थितियाँ बिखरी हुई दृष्टिगोचर होतीं। तब एक ने दूसरे को काटने-गिराने की बात सर्वथा त्याग दी होती और स्नेह, सहयोग की उदार नीति अपना कर ऊँचा उठाने-आगे बढ़ाने में योगदान दिया होता। जो शक्ति इन दिनों काटने-गिराने में लगी हुई है, वही यदि सृजन एवं उत्कर्ष में लगी होती तो खाई खोदने के साधन दीवार चुनने में लगने पर जिस तरह चमत्कारी प्रतिफल उत्पन्न होता है उसी प्रकार पतन के प्रयास उत्थान में संलग्न होकर ऐसे परिणाम उत्पन्न करते-जिनकी कल्पना करने मात्र से आँखें चमकने लगतीं।

चेतना का उत्कर्ष समूचे व्यक्तित्व को प्रभावित करता है उसके प्रभाव से भावना-विचारणा और क्रिया की दिशाधारा उच्चस्तरीय बनती है। फलतः व्यक्ति का त्रिविधि पुरुषार्थ उसके स्तर को उस दिशा में विकसित करता है जिसे भूसुर अथवा नर देव कहा जाय। देवताओं के व्यक्तित्व और कर्तृत्व की गुण गरिमा से पुराण साहित्य भरा पड़ा है। इसमें से यदि रोचक-भयानक अलंकारिता को हटा दिया जाय तो इतना स्पष्ट हो जाता है देव-मानव किस प्रकार अपनी महानता के कारण परम श्रद्धास्पद बनते हैं और किस प्रकार असंख्यों को अपने कन्धों पर बिठा कर पार लगाने का श्रेय प्राप्त करते हैं। उनकी ऊर्जा अपने समय और सम्पर्क क्षेत्र को ही प्रभावित नहीं करती वरन् इतिहास के पृष्ठों पर अमर रह कर चिरकाल तक अपने प्रेरणाप्रद प्रकाश का लाभ संसार को देती रहती है।

ऐसे व्यक्ति अपने आप में कितने संतुष्ट रहते है उनके अन्तःकरण में आनन्द और उल्लास की कैसी हिलोरे उठती रहती हैं इसका अनुभवी लोगों को शब्दों के सहारे परिचय कराया जा सकना कठिन है। इस प्रकार की मनःस्थिति का परिचय शास्त्रकारों ने अपनी आलंकारिक भाषा में देने का आधा-अधूरा प्रयत्न किया है। स्वर्ग, मुक्ति, भक्ति, सोमरस, अमृत, भूमा, प्रज्ञा, समाधि, आत्मसाक्षात्कार, ईश्वर दर्शन, ब्रह्मानन्द, परमानन्द जैसे शब्द किसी परिस्थिति या प्रत्यक्ष उपलब्धि की ओर इंगित करते दीखते हैं, पर वस्तुतः यह मनःस्थिति के हलके भारी स्तर भर हैं। जिन सात लोकों की विशद चर्चा शास्त्रकारों ने की वे इस अपने ब्रह्माण्ड में कहीं भी खोजे पाये जा नहीं सकते। वे चेतना की विकसित, अतिविकसित स्थिति के अन्तरों का आलंकारिक चित्रण मात्र है। यों भू सर्वेक्षण की दृष्टि से यह धरती एक ही प्रकार की है, पर दृष्टिकोण भिन्नता के आधार पर किये गये पर्यवेक्षण के आधार पर यह सिद्ध होता है कि हर व्यक्ति की दुनिया अलग है और वह उसकी अपनी गढ़ी हुई है। एक आततायी जिस दृष्टिकोण से संसार को देखता और अपने आचरण की संगति बिठाता है, उसकी तुलना में एक सन्त के दृष्टिकोण में जमीन आसमान जैसा अन्तर होता है। विराट विश्व को भगवान की साकार प्रतिमा की तरह देखने और सियाराम मय सब जग जानी की रीति-नीति अपनाने पर व्यक्ति और समाज के सम्बन्ध की प्रतिक्रिया अत्यन्त सरस और मधुर होती हैं। इसके विपरीत हिंस्र पशुओं जैसी क्रूरता के आवरण जिनकी दृष्टि और क्रिया के ऊपर छाये रहते हैं उनकी अन्तरंग दुष्टता और बहिरंग भ्रष्टता नारकीय दावानल की तरह धधकती है। ऐसे व्यक्ति को स्वयं तो उस आग में अहर्निशि जलना ही पड़ता है। नरक इसी मन: स्थिति का नाम है। स्वर्ग और नरक का चित्रण कलाकारों ने विस्तारपूर्वक कला कल्पना के सहारे किया है। यदि उस प्रतिपादन में से तथ्य ढूंढ़ने हों तो उतना ही निष्कर्ष निकलेगा कि चेतना का समुन्नत स्तर उर्ध्व गति के और अध: पारित स्तर अधोगति की प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करता है। उन्हीं अनुभूतियों को परिस्थिति के रूप में चित्रित करके प्रगति और अवगति का परिचय सर्व-साधारण को कराया गया है। आवश्यक नहीं कि मरण के उपरान्त ही इन लोकों में निवास किया जाए। जीवित रहते हुये भी-जन साधारण जैसी सामान्य परिस्थितियों में निर्वाह करते हुए भी-यह उभय पक्षीय रसास्वादन सम्भव हो सकता है। निकृष्टता अपनाने पर नरक की और उत्कृष्टता अपनाने पर स्वर्ग की अनुभूति कभी भी-किसी को भी-हो सकती है।

चेतना की प्रगति और अवगति का महत्व समझा ही नहीं गया अस्तु उस संबंध में सतर्कता बरतने और तत्परता अपनाने की आवश्यकता भी अनुभव नहीं की गई। यह दुर्भाग्य की बात है कि जिस तथ्य को सर्वोपरि स्थान मिलना चाहिए था-जिसे प्रमुखता की अग्रिम पंक्ति में रखा जाना चाहिए था; उसे अनावश्यक और महत्वहीन समझ कर उपेक्षा के गर्त में फेंक दिया गया। इस भूल का अविलम्ब परिमार्जन करने का यही समय है। साधन सम्पन्न परिस्थितियों में भी सामूहिक आत्महत्या की जो उतावली दृष्टिगोचर हो रही है उसके पीछे चेतना के स्तर का अध: पतन ही एकमात्र कारण है। स्थिति बदली जानी चाहिए। अपने को चैतन्य समझने वाले जड़ता से ऊँचा मानने वाले हर मनुष्य का कर्त्तव्य है कि ‘चित्त’ शक्ति की गरिमा समझें। उसके प्रसाद से मिल सकने वाले अजस्र अनुदानों का स्मरण करें और चेतना का स्तर सुविकसित करने के लिए उन आधारों को अपनायें जिन्हें हल्के शब्दों में संस्कृति और भारी शब्दों में आध्यात्मिकता कहा जाता है।


Quotation

अर्थी करोति दैन्यं लब्धार्थो गर्वपरितोषम्। नष्टधनश्च से शोकं सुखमास्ते निःस्पृहः पुरुष॥

धन को चाहने वाला मनुष्य दीनता करता है और जो धन प्राप्त कर लेता है वह घमण्ड करने लगता है और जिसका धन नष्ट हो जाता है वह शोक करता है किन्तु निस्प्रहजन सुखी रहता है।

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चमत्कारी सिद्धियाँ न उपयोगी हैं न आवश्यक

एक अंग्रेज पादरी अफ्रीका में धर्म प्रचार के लिए गया। जंगली लोगों ने उसे पकड़ लिया और वध करने की तैयारी करने लगे। पादरी को चतुरता सूझी उसने अपने को दैवी शक्ति सम्पन्न सिद्ध करने के लिए अपने नकली दाँतों के जोड़े मुँह से बाहर निकाले और पोपला मुँह दिखाया। इसके बाद फिर निकली दाँत मुँह में डाल कर नया ढंग का चेहरा बना लिया ऐसा उसने तीन बार किया। जंगली लोगों ने ऐसा अद्भुत हृदय कभी न देखा था, वे उसे देखकर सन्न रह गये। इतना ही नहीं पादरी ने अपने थैले से दर्पण निकाला और उन लोगों को दिखाया। सब ने एक-एक दैत्य आकृति उसमें देखी और अनुमान लगाया कि इसके हाथ में प्रेतात्माओं की शक्ति है। वे बहुत गिड़गिड़ाये और पादरी के गुलाम बनकर रहने लगे।

लगभग इसी घटना की पुनरावृत्ति धूर्त बाजीगर अपने को चमत्कारी सिद्ध पुरुष कहकर मूर्खों की हजामत उलटे उस्तरे से बनाते रहते हैं। इन दिनों एक बाबा बालों में बालू निकाल देने या ऐसे ही अन्य अजूबे दिखाने के लिए प्रसिद्ध है। उनकी पूजा इन करामाती कौतूहलों के नाम पर ही होती है और नये-नये भक्त इन्हीं किम्वदन्तियों से प्रभावित होकर बढ़ते चलते हैं। विचारणीय तथ्य यह है कि क्या अध्यात्म का प्रतिफल चमत्कार है।

भगवान बुद्ध ने अपने एक शिष्य का स्वर्ण कमण्डल तुड़वा कर नदी में प्रभावित करा दिया था और अपने समस्त शिष्यों को एकत्रित करके यह प्रतिबन्ध लगाया था कि उनमें से कभी कोई किसी प्रकार का आलौकिक चमत्कार न दिखाये। बात यह हुई कि एक राजा ने ऊँचा बांस गाढ़ कर उस पर स्वर्ण कमण्डल लटकाया था और घोषणा की थी जो उस पर चढ़कर कमण्डल उतारेगा वही सिद्ध पुरुष माना जायेगा और राजा उसी का शिष्य बनेगा। इस परीक्षा में कोई ज्ञानवान सफल न हुआ। एक नट कुछ ही समय पूर्ण भिक्षु मण्डली में सम्मिलित हुआ था उसे बाँस पर चढ़ने का अभ्यास था सो सहज ही चढ़ गया और कमण्डलु उतार लाया। उसे बहुत धन और सम्मान मिला। यह समाचार लेकर जब वह भगवान बुद्ध के पास आया और अपनी चतुरता की चर्चा करने लगा तो वे बहुत दुःखी हुए और उस सफलता की भर्त्सना करते हुये उपहार को नष्ट करा दिया। उनका कहना था कि यदि चमत्कार ही अध्यात्म की कसौटी बनने लगे तो फिर बाजीगरों की बन आवेगी और तपस्वी, ज्ञानवान और लोकसेवियों की कोई बात भी न पूछेगा।

सर्वसाधारण को समझना चाहिए कि अध्यात्म का चमत्कारों से कोई संबंध नहीं। इस मार्ग पर चलते हुए जो अतीन्द्रिय शक्ति विकसित होती है उसका प्रयोग किसी अति महत्वपूर्ण प्रयोजन के लिए कोई उच्चस्तरीय आत्माएँ ही कर सकती हैं। वैसे लोग जो चमत्कार प्रदर्शन में उत्साह दिखाते हैं, वस्तुतः सिद्ध पुरुष नहीं बाजीगर होते हैं। जिनके पास वस्तुतः वे हों भी तो वे भूलकर भी उन्हें प्रदर्शन में प्रयुक्त न करेंगे।

सिद्धियाँ अनावश्यक और अस्वाभाविक हैं। उनका सामान्य मनुष्य जीवन में कोई उपयोग नहीं, वरन् उलटी हानि है। इसलिए सच्चे आत्मवेत्ता न तो किसी को चमत्कार दिखाते हैं और न उसके लिए किसी को शिक्षा देते हैं। उत्कृष्टता चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की नीति अध्यात्म की सच्ची साधना है, जिनके पास यह आधार मौजूद है वे सामान्य स्थिति में रहते हुये भी देवोपम जीवन का आनंद ले सकते और उस आलोक से असंख्यों को लाभान्वित कर सकते हैं। यही सच्चे अर्थों में अध्यात्म का चमत्कार है।

आलौकिक सिद्धियाँ सर्वसाधारण के लिए उपयोगी नहीं होती इसलिए ईश्वरीय विधान के अनुसार उन्हें अविज्ञात एवं रहस्य के पदों में छिपा हुआ ही रहने दिया गया है। यदि वे सर्वविदित हो जायं या सर्वसुलभ हो जायें तो फिर सामान्य जीवन की क्रिया-प्रक्रिया ही अस्त-व्यस्त हो जायेगी।

मृत्यु का समय यदि पूर्वविदित हो तो मुद्दतों पहले से मनुष्य भयभीत, उदास और खिन्न रहने लगेगा। सामान्य क्रिया-कलापों के प्रति उदासीनता छा जायेगी और मानसिक असन्तुलन के कारण कुछ करते-धरते न बन पड़ेगा। जब अमुक समय से आगे-पीछे नहीं ही मरता है तो वह किसी से भी प्रतिशोध लेने के लिए आक्रमणकारी बन सकता है, निर्भय होकर कुछ भी कर गुजर सकता है फिर या तो मनुष्य आगा-पीछा न सोचने वाला दुर्दान्त बन जायेगा अथवा निरन्तर खिन्न, उदास रहकर बेबसी और वियोग के आँसू बहाता रहेगा। जीवित रहने का आनंद तभी तक है जबकि मृत्यु का समय ठीक से मालूम न हो। दीर्घजीवन के लिए किये गये प्रयास तभी हो सकते हैं जब मरण की तिथि अनिश्चित समझी जाए और मौत को आगे धकेल सकना सम्भव माना जाय। जो जल्दी मरने वाले होंगे उससे कोई विवाह करने को ही तैयार न होगा और उन्हें अविवाहित, उपेक्षित रहकर ही मरना पड़ेगा। जिसे जहाँ जिस प्रकार मरना है उसे उन परिस्थितियों से बचने की तरकीबें पहले से ही अपनाने का अवसर मिल जायेगा और फिर यदि मृत्यु का कोई विधान होता होगा तो उसे कार्यान्वित करना ईश्वर के लिये भी कठिन पड़ जायगा। सम्भवतः यही सब समझते हुए भगवान ने मनुष्य को मृत्यु ज्ञान से वंचित रखा है।

अदृश्य हो जाने की विद्या यदि कोई सीख ले तो वह बड़े से बड़े अपराध करते रहने पर भी पकड़ा न जा सकेगा। ऐसे व्यक्ति नर-नारी के मध्य होने वाले गुह्य आचरणों को देखते रहेंगे और फिर किसी को लज्जा बचा सकना सम्भव न रह जायेगा।

मानवी इन्द्रियों की क्षमता उतनी ही रखी गई है जिससे जीवन का आवश्यक क्रम भर ठीक तरह चलता रहे। प्रकाश किरणों का एक नियत स्तर ही आँखों की दिखाई पड़ता है अपनी आँखों की पकड़ से न्यून एवं अधिक स्तर के दृश्य भी इस संसार में मौजूद हैं। वे हमें दीखते नहीं। इससे काम के दृश्य देखने में सुविधा रहती है। यदि पानी, हवा, मिट्टी आदि में रेंगने वाले जीवाणु उतने ही स्पष्ट दीखने लगे जितने माइक्रोस्कोप से देखते हैं तो फिर आँखों के सामने एक अपार भीड़ से घिरी हुई भयंकर मेले जैसी दिखाई पड़ने लगेगी। तब काम और बेकाम के दृश्यों का इतना अन्धड़ सामने खड़ा होगा कि बेचारी आँखें हतप्रभ हो जायेंगी और मस्तिष्क के लिए उन दृश्यों को देखकर यह निष्कर्ष निकालना कठिन हो जायगा कि सामने क्या हो रहा है?

यही बात कानों के सम्बन्ध में है, हमारे कान एक सीमित स्तर की थोड़ी-सी ध्वनियाँ सुन पाते हैं किन्तु उनसे ऊँचे और नीचे कम्पनों की असंख्य ध्वनियाँ अपने चारों ओर मंडराती रहती हैं। यदि वे सभी सुनाई पड़ने लगें तो स्थिति लगभग उसी स्तर की हो जायगी जैसी कि किसी ट्राँजिस्टर पर संसार के सभी स्टेशन एक साथ बोलने लगने पर विचित्र प्रकार की न समझे जा सकने योग्य मिश्रित ध्वनि प्रवाह की चें-चें असमंजस में डाल देगी। अस्तु भगवान ने आँख, कान, नाक आदि इंद्रियों में उतनी ही शक्ति दी है जितनी से मनुष्य का आवश्यक कार्य सरलतापूर्वक चलता रहे। इससे न्यूनाधिक देने में मनुष्य को लाभ कम और हानि अधिक हो सकती है। अतीन्द्रिय क्षमता इसी कारण सर्वसुलभ नहीं हैं जो उसे बढ़ाने का प्रयत्न करेंगे वे उसमें कौतूहल वृद्धि भले ही कर लें, पर परिणामतः उससे हानि ही उठायेंगे।

जिन प्राणियों की निर्वाह प्रक्रिया में जिस विशेषता की आवश्यकता समझी गई है वह उसे परमात्मा ने उदारतापूर्वक दी है। कुत्ते में सूँघने, बन्दर में उछलने, घोड़े में दौड़ने, सिंह में पछाड़ने की विशेषताएँ उनके जीवन क्रम की सुविधा के अनुरूप हैं। मधुमक्खी, चींटी, दीमक, मकड़ी आदि में भी अनोखे गुण हैं। पक्षियों में उड़ने की विशेषता है यदि वैसी सर्पों को मिल जाय तो सर्वत्र प्राण संकट ही छा जायगा मनुष्य यदि आकाश में उड़ने लगे तो फिर सुरक्षा समस्या में ऐसी जटिलताएँ उत्पन्न हो जायेंगी जिनका समाधान ही न हो सके। यदि भगवान ने एक हाथ में उड़ने की विशेषता दी तो निश्चय है कि दूसरे हाथ से बुद्धि कौशल वापस ले लिया जायगा, ताकि किसी को अति बरतने और सृष्टि संकट उत्पन्न करने की छूट न मिले।

पूर्व जन्मों की स्मृति यदि सबको बनी रहे तो फिर हर व्यक्ति असन्तुष्ट दिखाई पड़े। पूर्व जन्मों के स्त्री-बच्चे याद आते रहने पर बच्चे इस जन्म के माता-पिता से रुखाई रखेंगे और पूर्व जन्मों के स्त्री, पुत्रों के पास जाने के लिए मचलते रहेंगे। पति पूर्वजन्म की पत्नी का कहाँ जन्म हुआ है यह पता लगाकर उससे संपर्क जोड़ेंगे और स्त्रियाँ प्रस्तुत की और से उदासीन रहकर पूर्व जन्म के पति को तलाश करती फिरेंगी। आधी कमाई इधर, आधी उधर-आधा मन और समय इधर, आधा उधर-बँट जाने से अव्यवस्था, उदासीनता एवं असन्तोष की स्थिति ही सर्वत्र संव्याप्त रहेगी। पूर्व जन्मों की स्मृति की घटनाएं इसलिए कौतूहल वर्धक और अच्छी लगती हैं कि ये कभी-कभी ही देखने-सुनने को मिलती हैं और एक हल्की-सी झलक दिखाकर लुप्त हो जाती हैं। यदि वे स्थायी तथ्य बन जाय और हर किसी को पूर्व जन्म याद रहने लगे तो पारिवारिक जीवन का वर्तमान क्रम सर्वथा उलट जायगा और उत्तरदायित्वों के बन्धन सर्वथा शिथिल हो जायेंगे।

यही बात अन्य सिद्धियों के सम्बन्ध में है। अणिमा, महिमा, लघिमा आदि सिद्धियों का वर्णन जहाँ तहाँ मिलता है वे किसी व्यक्ति विशेष के लिए विशेष स्थिति में कौतूहलवर्धक एवं उपयोगी हो सकती हैं, पर सर्वसाधारण के लिए उनका मिलना नये प्रकार के संकट उत्पन्न करने का कारण ही बन जायगा।

मन की गुप्त बातें या दूसरों के रहस्य जान लेने से तो चोरों की पौ बारह होने लगेगी। वे धनियों के धन का पता लगाकर ठीक स्थान पर घात लगाया करेंगे। मन की बातें दूसरे पर प्रकट होने लगें तो फिर पूछताछ करना ही निरर्थक हो जायगा। एक-दूसरे को बिना कुछ कहे पूछे ही प्रयोजन जानने और उत्तर देने का काम निपटा दिया करेंगे। तब सरकारी बजट, शासनाध्यक्षों को दिलाई जाने वाली गोपनीयता की शपथ का कोई मूल्य न रहेगा। तब गुप्तचर विभाग भी तोड़ देना पड़ेगा। झूठ-सच का पता लगाने के लिए जो इतने तरीके काम में लाये जाते हैं, वे भी व्यर्थ माने जायेंगे। युद्ध योजनाएँ पहले से ही प्रकट हो जाया करेंगी। ऐसी दशा में लोक-व्यवहार में जो बुद्धि कौशल प्रयुक्त करना पड़ता है उसकी कोई आवश्यकता न रहेगी। अधिकांश काम तो अपने आप ही समाप्त हो जायेंगे, जो शेष रहेंगे वे बड़ी आसानी से संकेत मात्र में निपट जाया करेंगे।

ज्योतिषी लोग आये दिन तेजी-मन्दी की भविष्य-वाणियाँ छापते रहते हैं। पर वास्तविकता यह है कि इस प्रकार के ज्ञान से मनुष्य को सर्वथा वंचित रखा गया है। मिथ्या डींग हाँकने पर कहीं किसी पर रोक नहीं, यदि यथार्थ में किसी एक व्यक्ति को भी ऐसा ज्ञात हो जाय तो वह एक सप्ताह में अरबपति ही नहीं विश्व के समस्त व्यापार का अधिपति और कुबेर भण्डारी बन सकता है। वह व्यक्ति दूसरों को यह रहस्य बताने की अपेक्षा स्वयं ही व्यापार करने लगेगा। मन्दी आने पर खरीदना और तेजी होने पर बेचने भर का धन्धा करने में वह कभी असफल हो ही नहीं सकता जिसे भावों की घट-बढ़ का सुनिश्चित ज्ञान है। ऐसी दशा में उसे साझीदारों की भी कोई कठिनाई न होगी और बात की बात में ऐसी व्यवस्था बन जायेगी जिनमें उसे करोड़पति, अरबपति बनने में देर न लगे।

यदि तेजी-मन्दी का वास्तविक ज्ञान लोगों को होने लगे तो फिर व्यापार क्षेत्र में घोर अव्यवस्था फैल जायगी और फिर एक प्रकार का गदर ही खड़ा हो जायगा। जो मन्दी होने वाली है उसे कोई खरीदेगा नहीं और जो महंगी जाने वाली है उसे बेचने के लिए कोई तैयार न होगा। ऐसी दशा में ग्राहकों को अपनी दैनिक आवश्यक वस्तुओं से भी वंचित रह जाना पड़ेगा।

लोगों को यदि अपने भाग्य का पता चल जाय तो कोई कुछ भी प्रयत्न, परिश्रम करने के लिए तैयार न होगा। जब हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, भाग्य लेख के अनुसार ही मिलता है तो प्रयत्न पुरुषार्थ की माथा-पच्ची करने से क्या लाभ ? जो होना है वह तो होगा ही। फिर रोग की चिकित्सा, शत्रुओं से सुरक्षा, उपार्जन के लिए दौड़-धूप, पढ़ने में सिर फोड़ी करने, मर्यादाएँ पालन करने, प्रगति के लिए प्रयत्न करने और सम्भावित कठिनाइयों से सतर्क रहने का भी कोई तुक नहीं है। ऐसी दशा में प्रगति और सुरक्षा की दृष्टि से किये जाने वाले प्रयत्न सर्वथा निरर्थक ही बन जायेंगे। ऐसी दशा में सर्वत्र निष्क्रिय अकर्मण्यता का ही साम्राज्य सर्वत्र छाया हुआ दिखाई पड़ेगा। तब ज्योतिषियों का धन्धा भी बन्द हो जायगा। क्योंकि उन्हें पता ही होगा कि कब कहाँ से कितना पैसा मिलने वाला है? जो मिलना भाग्यानुसार निश्चित है, वह तो घर बैठे भी आ जायगा फिर भविष्य कथन के झंझट में पड़ने से भी क्या लाभ?

मनुष्य की सम्भाषण और गायन विशेषता दूसरे प्राणियों की दृष्टि से एक देवोपम सिद्धि हो सकती है। दो पैरों से चलना और दो हाथों से अद्भुत क्रिया-प्रक्रियाएँ सम्पन्न करना भी अन्य प्राणियों के लिए किसी चमत्कारी सिद्धि से कम नहीं, पर अभ्यास में आ जाने के कारण मनुष्य को यह सब बातें बिलकुल सामान्य और स्वाभाविक लगती हैं। जिन दिनों अग्नि का आविष्कार हुआ था उन दिनों उसे देवता का अवतरण माना गया था और अत्यन्त श्रद्धापूर्वक पूजन का विधान चला था। पहली बार जिनने रेलगाड़ी देखी थी उन्होंने उसे साक्षात काली समझ कर भयभीत भाव से मनुहार किया था-इसी प्रकार टेलीफोन, रेडियो, टेलीविजन भी कम आश्चर्यजनक नहीं। विज्ञान से अपरिचित लोगों ने उन्हें जहाँ भी देखा अवाक् रह गये और इन अद्भुत उपकरणों में दैवी शक्ति होने का अनुमान लगाने लगे। पर अब तथ्यों का पता चल जाने पर सब वस्तुएं नितान्त सरल सामान्य बनकर रह गई हैं ।

जो जितना आवश्यक है वह उतना ही सुलभ है। हमारे जीवन के लिए हवा सबसे अधिक आवश्यक है वह सर्वत्र प्रचुर परिमाण में उपलब्ध है उससे आगे चलकर पानी का स्थान है। अन्न उसके बाद है, वह भी खेत-खेत में उपजता है और हर जगह सामान्य मूल्य पर प्राप्त किया जा सकता है। जो धातुएं जितनी अधिक आवश्यक हैं वे उतनी ही अधिक मात्रा में मिलती हैं। सोना, विष, रेडियम, यूरेनियम आदि की दैनिक जीवन में उपयोगिता न होने से वे कम मात्रा में कठिनाई से मिलते हैं। ईश्वर का यह विधान बहुत ही दूरदर्शितापूर्ण है जिन सिद्धियों की आवश्यकता है वे सामान्य प्रयास से ही मिल जाती है, पर अनावश्यक विशेषताओं से मनुष्य को वंचित रखा गया है। बाल-बुद्धि को असामान्य ही अद्भुत लगता है यदि सिद्धियाँ मनुष्य के हाथ में आ जायं तो सामान्य बन जाने पर उनकी ओर कोई आँख उठाकर भी न देखेगा। इतना ही नहीं उनके कारण उत्पन्न होने वाली अव्यवस्था को देखते हुए सम्भवतः उन पर कानूनी प्रतिबन्ध लगाने की भी आवश्यकता पड़ सकती है।


सेन्टपाल ने लिखा (kahani)

सेन्टपाल ने लिखा है-‘मैं दमिश्क के प्रधान पादरी से प्राधिकृत होकर चला तो मैंने दोपहर को मार्ग में एक अनन्त विस्तार वाले सूर्य जैसे प्रकाश को चमकते देखा। वह प्रकाश मुझे घेरे रहा और रास्ते भर मेरे साथ यात्रा करता रहा। जब मैं धरती पर बैठा तो मैंने एक आवाज सुनी-ऐ आत्मा, ऐ आत्मा, मुझे पीड़ा मत दे। काँटों को लात मारने से तेरा कुछ न बनेगा।’

मैंने पूछा-‘भगवन् आप इस प्रकार वचन बोलने वाले कौन है?’ उसने कहा मैं जीसस हूँ। वही जीसस जिसको तुम पीड़ा पहुँचाते हो।

सेन्टपाल ने उस संकेत को समझा और अपनी गतिविधियों में से विघातक तत्व को हटाकर सच्चे ईसानुयायी की तरह प्रेम और सेवा की रीति-नीति पर चलना आरम्भ कर दिया।

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कर्म में मनोयोग का समन्वय आवश्यक

“चरैवेति चरैवेति” -शतपथ

ब्राह्मण के इस सूत्र में चलते रहो चलते रहो-इस वाक्य में कर्म करते रहने की प्रेरणा भरी गई है। जीवन के पथ पर अहर्निशि अग्रसर होते रहना, विकास के सोपानों को पार करते रहना बिना कर्म के सम्भव नहीं है। कर्म में ही वह शक्ति निहित है जो मनुष्य को एक न एक दिन मंजिल तक पहुँचा देती है।

किंतु केवल कर्म करने से जीवन में निखार आ जावेगा, कठिन बात लगती है। कर्म के साथ मनोयोग उसी भाँति जोड़ना होगा जिस भाँति फूल के साथ उसकी सुगन्ध एक प्राण है। कर्म करते समय लगन, भावना तथा निष्ठा का सम्मिश्रण आवश्यक है। इससे कर्म करने में आत्म-विश्वास की शक्ति का उदय होगा। जो असीम आनन्द का प्रेरणा-स्रोत प्रवाहित कर देगा। इसीलिए कहा गया है- “हे कार्य! तुम्हीं मेरी कामना हो, तुम्हीं मेरी प्रसन्नता हो, तुम्हीं मेरा आनन्द हो।” इतने समर्पण भाव से कर्म के प्रति लगन, निष्ठा होगी तो फिर सफलता पैर क्यों न चूमेगी। क्योंकि मनुष्य का जीवन, एक आदर्श कर्म-विद्यालय है। किन्तु आलसी व्यक्तियों के हाथ निराशा ही लगती है। जिस जीवन में संघर्ष नहीं, टकराव नहीं वहाँ दिव्यता का आविर्भाव मृगतृष्णा है।

दूसरी ओर यदि मनुष्य अपनी कर्म करने की शक्ति को सूर्य की किरणों के समान विकसित कर लेवें तो वह अपने आप को बहुत ऊँचा उठा सकता है। कर्म की भावना पूर्ण पूजा ही परमात्मा की सच्ची उपासना है। मनोयोगपूर्वक किये गये कर्म करते समय लक्ष्य के हजारों मार्ग खुल जाते हैं। कर्म कैसा ही हो? उसमें सफलता तभी प्राप्त होती है जब उसमें भावना की सरसता हो। जीवन जीने का गुरु मन्त्र यही है।

काम छोटे-बड़े होने का महत्व नहीं, वरन् कार्य करने की पद्धतियाँ कर्म में पूर्ण सफलता दिलवाती हैं। ‘बाटा’ नामक मोची सड़क पर बैठकर जूते सीता-सीता बड़ी भारी कम्पनी का मालिक बना, वाशिंगटन साधारण व्यक्ति होते हुए अमेरिका का राष्ट्रपति बना, कालिदास मूर्ख से महान विद्वान बना, एडीसन झाडू लगाते-2 महान वैज्ञानिक बना ये सब के सब अपने सामने जो भी छोटे बड़े काम आये, उन्हें निष्ठापूर्वक करते रहे।

पूर्ण लगन पूर्वक किये गये काम से मनुष्य की सुषुप्त शक्तियों का उत्खनन होता है, कार्य करने की क्षमता एवं शक्ति का विकास होता है। बशर्ते कि प्रत्येक कार्य को खेल समझ कर कला समझकर, बोझ न समझकर तन्मयता के साथ किया जावे।

कार्य की सफलता के साथ व्यवस्था, सफाई, स्वच्छता का होना भी आवश्यक है। इससे सौन्दर्य, आकर्षण तथा उत्कृष्टता कर्म में उत्पन्न होती है। गन्दगी वातावरण को अशुद्ध बनाकर घृणा को जन्म देती है।

छोटे-मोटे रूप धारण करके कर्म सफलता के द्वार को खटखटाता है। किन्तु छोटा काम समझ कर उसके प्रति उपेक्षा रखते हैं। जिससे सफलता के एक सोपान से चूक जाते हैं, परन्तु प्रत्येक महान व्यक्ति अपने नन्हें-नन्हें कामों के पुँज से ही महान बना है। क्या छोटी-छोटी ईंटों के बिना विशाल भवन का निर्माण सम्भव है? यदि मनुष्य इच्छानुसार काम की प्रतीक्षा करता रहे तो अपना सम्पूर्ण जीवन यों ही खो बैठेगा। रुचिकर, अरुचिकर कामों की सूची बनाना इस बात का द्योतक है कि वह व्यक्ति आलसी है, प्रमादी है।

कर्म में धैर्य और निष्ठा का होना सफलता के लिए आवश्यक है। कर्म को धैर्य तथा निष्ठापूर्वक तब तक करते रहें जब तक सफलता रूपी फल हाथ न लगे। निराश होकर कर्म को बीच में ही न त्यागें।

जिस भाँति कलाकार को अपनी कला के बीच आनन्दानुभूति है उसी भाँति कर्मठ व्यक्ति अपने कर्म में आनन्दानुभूति लेना चाहता है, कर्म को व्यापार मानकर करने से आनन्द का अभाव बना रहता है। कर्म से प्यार करना सीख लें, उसकी इज्जत करना सीख लें।

“योगः कर्मेषु कौशलम्” गीता का यह वाक्य कार्य पद्धति की कुशलता पर जोर देता है। कुशलता-पूर्वक किये गये काम में कभी भी असफलता नहीं मिलेगी। छोटे से छोटा कार्य भी यदि कुशलतापूर्वक निर्वाह किया गया तो उस कार्य की सफलता किसी महान कार्य की शृंखला बन कर जीवन के महत मार्ग को खोल देने में समर्थ होती है।

किन्तु यह तभी सम्भव है जबकि मनुष्य काम टालने की वृत्ति, काम से जी चुराने की वृत्ति को छोड़ देवें। इन्हीं वृत्तियों के कारण मनुष्य सदैव अपनी हीनावस्था में पड़ा-पड़ा दूसरों को धिक्कारता रहता है। क्योंकि टाल-मटोल ही आलस्य और अकर्मण्य होने का प्रमाण है।

अधिकाँश मनुष्य की प्रवृत्ति अपने कार्य को नौकर पर, परिवार के छोटे सदस्यों पर छोड़ देने की होती है। किन्तु उस काम के प्रति हमारा जितना दर्द होगा, हमारी भावना, निष्ठा, तन्मयता होगी उतनी अन्य की नहीं होगी। ऐसी दशा में वह कर्म ठीक तरह से सम्पन्न नहीं होगा और अन्ततः असफलता ही हाथ लगेगी। कर्म में स्वावलम्बी रहने से कर्म का अनुभव, ज्ञानवर्धन, क्रियाशीलता का जागरण, प्रफुल्लता, नवउत्साह, नवशक्ति मिलती है। इससे शारीरिक तथा मानसिक शक्तियों का विकास भी होता है।

कर्म करते समय शारीरिक, मानसिक क्षमता का भी ध्यान रखना चाहिए। यदि क्षमता अधिक है तो एक ही समय में अनेक काम किये जा सकते हैं यदि सामान्य क्षमता है तो एक ही समय में एक काम लेकर उसे एकाग्रता से पूरा किया जावे। अन्यथा कोई भी काम पूरा नहीं हो पावेगा और जीवन का अमूल्य समय यों ही नष्ट हो जावेगा।

लगातार एक ही प्रकार का कार्य करते रहने से रुचि में कमी आती है। इसलिए दैनिक जीवन में छोटे-बड़े सभी कामों का क्रम रखा जावे और उनको करने में समान रुचि, आनन्द का पुट देने से रुचि में वृद्धि होगी और नवीन स्फूर्ति मिलती रहेगी।

नन्हें-नन्हें अणुओं का योग ही सम्पूर्ण शरीर है। इसी भाँति छोटे-छोटे कार्य की सफलतायें महान कार्यों की ओर अग्रसर करती हैं। यहाँ तक कि दैनिक कामों में भी सम्पूर्ण दिलचस्पी लेनी चाहिए। इससे व्यक्तित्व का परिष्कार होगा। घर की प्रत्येक व्यवस्था उसी लगन और निष्ठा के साथ पूरा करेंगे जिस भाँति बड़े काम को करने में लगते हैं तो एक दिन व्यक्ति पुरुषोत्तम बनेगा, इसमें सन्देह नहीं है। कई व्यक्ति ऐसे भी होते हैं खुद काम नहीं करते और दूसरे के कर्म की आलोचना करना अपना कर्त्तव्य समझ लेते हैं। यह उनका ओछापन है।

लोहे से काम नहीं लेने पर जिस भाँति जंग लग जाता है उसी भाँति शरीर से काम नहीं लेने पर भी वह निकम्मा, आलसी, प्रमादी बन जाता है। शरीर का महत्व कर्म से है। श्रम से मन चुराने वाले व्यक्ति पारस्परिक कलह, अनैतिक तत्व और दुराचार को जन्म देते हैं। कर्मशील व्यक्ति जीवन पर्यन्त तन्मयतापूर्वक कर्म किये चलता है। वह क्षण भर भी विश्राम नहीं लेता है।

क्योंकि सत्कर्मों को करते रहने से जीवन का सही उपयोग होता है। इससे स्वास्थ्य एवं आयु की अभिवृद्धि होती है वे मनुष्य ऊँचे उठते हैं। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जापान, जर्मनी की उन्नति का एक ही रहस्य है- राष्ट्रीय भावनाओं से ओत-प्रोत होकर कर्म में लगे रहना।

फिर श्रम मानसिक हो या शारीरिक। दोनों का समन्वित स्वरूप ही जीवन का संतुलित विकास है। मानसिक कर्म करने वाले को शारीरिक तथा शारीरिक श्रम करने वाले को मानसिक श्रम करना ही चाहिए। यह समन्वय जीवन को संतुलित बनाता है।

श्रम धरती का देवता है तथा कर्म मनुष्य का आभूषण है। तभी व्यक्ति का जीवन मुखरित होकर धरती पर स्वर्ग स्थापित कर सकने में समर्थ होता है।

“आरोहणमाक्रमणं जीवता-जीवताऽनम्” उन्नत होते रहना जीवन का स्वाभाविक धर्म है। चलते रहो, चलते रहो यही जीवन का प्राण है।

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स्वास्थ्य रक्षा प्रकृति के अनुसरण से ही सम्भव

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की मान्यता यह है कि शरीर में विजातीय द्रव्य एवं विषाणुओं की वृद्धि से रोग उत्पन्न होते हैं अस्तु इन्हें मारने के लिए- कीटाणु नाशक औषधियों का प्रयोग होना चाहिए। यहाँ यह बात भुला दी जाती है। कि इस विनाश कृत्य में शत्रु जीवाणुओं के साथ-साथ मित्र जीवाणु भी मरते हैं। सुरक्षा पंक्ति दुर्बल हो जाने से फिर आक्रामक तत्वों का खतरा और भी अधिक बढ़ जाता है। इतना ही नहीं मारक औषधियों के कारण जीवन तत्व की क्षीणता से विभिन्न स्रोतों से निरन्तर होते रहने वाले मल-विसर्जन की क्रिया धीमी पड़ जाती है और उनका भीतर जमे रहना स्वास्थ्य संकट का एक नया कारण बनता है।

चिकित्सा शास्त्रियों का दावा है कि उन्होंने सड़न-सेप्टिक- रोकने पर बहुत हद तक सफलता प्राप्त कर ली है और संक्रामक रोगों के कारण उत्पन्न होने वाली विपत्ति पर नियन्त्रण कर लिया है। यह निश्चय ही शुभ संवाद है। पर इस अप्रत्यक्ष संकट को भी आँखों से ओझल नहीं किया जा सकता कि जीवन-शक्ति घट जाने से जीवित रहने की जटिलता दिन-दिन बोझिल होती जा रही है। मनुष्य के पुरुषार्थ में घटोत्तरी हो रही है और उसे अपना निर्वाह असमर्थता और कष्ट पीड़ित असुखद स्थिति में रहकर करना पड़ रहा है। चिकित्सा और स्वास्थ्य संरक्षण की मदों में तथाकथित सुविकसित देशों को अपनी राष्ट्रीय आय का बहुत बड़ा अंश खर्च करना पड़ रहा है। फिर भी आवश्यकता को देखते हुए वह स्वल्प ही प्रतीत होती है। उसे बढ़ाने की आवश्यकता समझी जाती है फलतः बजट बढ़ता चलता है। क्रम यही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब समूची राष्ट्रीय आय स्वास्थ्य समस्या के समाधान में लाभ देने पर भी आवश्यकता की पूर्ति न हो सकेगी और संकट की विभीषिका चरम सीमा तक बढ़ती चली जायगी। समृद्ध देशों में संक्रामक रोगों पर नियन्त्रण होने के कारण पिछले दिनों जो मृत्यु संख्या घटी और दीर्घ जीवन की सम्भावना बढ़ी थी, अब उसमें जीवनी-शक्ति घटने की नई व्यथा ने नया अवरोध उत्पन्न कर दिया है। मृत्यु दर नये सिरे से बढ़ने लगी है और आयु घटने का डरावना नया संकट आँकड़ों ने सिद्ध किया है। मारक औषधियाँ अपने लक्ष्य में सफल हो गईं, पर पोषण के नाम पर जो बन रहा है और उपयोग हो रहा है वह निरर्थक ही सिद्ध हुआ है।

पौष्टिक आहार और चिकित्सा उपचार की कितनी ही समुन्नत व्यवस्था की जाय, आरोग्य समस्या की गुत्थी अनसुलझी ही बनी रहेगी। मूल प्रश्न है जीवनी शक्ति की सुरक्षा का। आहार-विहार का असमय अपनाने से वह रक्षा पंक्ति दुर्बल होती है जिसके सहारे हमारा पाचन तथा विसर्जन तन्त्र ठीक तरह से काम करता है और बलिष्ठता अक्षुण्य बनी रहती है। जिस कारखाने के कारीगर और व्यवस्थापक मूर्छित पड़े हों उसके लिए कच्चा माल ऊँचे स्तर का खरीद लेने पर भी क्या बनेगा ? पौष्टिक आहार की प्रशंसा तो तभी है जब उन्हें पचाने का तन्त्र अपने कार्य में समर्थ रह रहा हो। बिना पचा तो अमृत भी सड़ेगा और परिणाम में विष तुल्य सिद्ध होगा।

स्पष्ट है कि बीमारियों का आक्रमण जीवनी-शक्ति की दुर्बलता के कारण ही होता है, अन्यथा रक्त के श्वेत जीवाणु किसी भी बाहरी आक्रमण को रोकने और भीतर के विजातीय उत्पादन को सहज ही निरस्त कर डालने की स्थिति में होते हैं। रोगों की मारक औषधियों की तलाश आपत्ति धर्म हो सकता है, पर काम तो स्थिरता और सुरक्षा का प्रबन्ध करने से चलेगा। यह उद्देश्य आहार-विहार की प्रकृति प्रेरणा के अनुरूप बनाने के अतिरिक्त और किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता।

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सात लोक-सात शरीर

अध्यात्म शास्त्र में सात लोकों का वर्णन है। इन्हें भू-लोक, भुवः लोक, स्वः लोक, तपः लोक, महः लोक, जनः लोक और सत्य लोक कहा गया है। इन्हें किसी ग्रह नक्षत्र में अवस्थित अथवा अधर में लटका हुआ स्थान नहीं माना जाना चाहिए, वरन् स्थूलता से सूक्ष्मता की गहराई में प्रवेश करते हुए उपलब्ध होने वाली स्थिति भर माना जाना चाहिए।

मोटी दृष्टि से इस संसार में रेत, पत्थर, वृक्ष, वनस्पति, खनिज, प्राणी, जल आदि पदार्थ भरे पड़े हैं। आँख से यह भू-लोक ही दीखता है। इसके भीतर वह स्थिति है। जो आँखों से तो नहीं दीखती, पर सूक्ष्मदर्शी यन्त्र की सहायता से देखी, समझी जा सकती है, हवा में मिली हुई गैसें, जीवाणु आदि इसी श्रेणी में आते हैं। इससे भी गहरी अणु सत्ता है। उस विश्लेषण में उतरने पर इस संसार में विभिन्न प्रकार के परमाणुओं के अन्धड़ उड़ते और गुच्छक अदलते-बदलते भी दिखाई पड़े और नदी, पर्वत आदि का अस्तित्व बहुत मोटा, भोंड़ा और भ्रम-पूर्ण समझा जा सकेगा। अणु सत्ता का विश्लेषण करने पर उसके सूक्ष्म घटक कोई पदार्थ नहीं रह जाते केवल विद्युत स्फुल्लिंग पर दृष्टिगोचर होते हैं। उस स्थिति की व्याख्या की जाये तो संसार में ऊर्जा प्रवाह ही इस विश्व में एकमात्र विद्यमान सत्ता प्रतीत होगी। स्थूल से सूक्ष्म की और प्रवेश करते हुए हम कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं। फिर भी स्थान सम्बन्धी कोई परिवर्तन नहीं होता। अपने इसी स्थान में यह स्थूल से सूक्ष्म-सूक्ष्म से अति सूक्ष्म- अति सूक्ष्म से महा सूक्ष्म की स्थिति बनती चली जाती है।

सात लोकों के स्थान का पता लगाने के लिए ऊपर नीचे झाँकने की आवश्यकता नहीं। वे एक शरीर के भीतर अव्यव-अवयवों के भीतर माँसपेशियाँ-माँस-पेशियों के भीतर ज्ञान तन्तुओं के भीतर मस्तिष्कीय विद्युत यह कई परतें तो हैं। पर इनके लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित करने की आवश्यकता नहीं है। वे एक के भीतर एक के क्रम से क्रमशः भीतर के भीतर -समाये, सजायें अनुभव किये जा सकते हैं। सात लोकों के सम्बन्ध में यही समझा जाना चाहिए कि अपने स्थूल लोक के भीतर ही उनकी सत्ता सूक्ष्मतर-सूक्ष्मतम और अति सूक्ष्म होती चली गई है। स्थान उन सबका वही है। जिनमें कि हम निवास करते हैं। ब्रह्मांड के भीतर ब्रह्मांड की सत्ता उसी प्रकार समझी जा सकती है जिस प्रकार परमाणु की मध्यवर्ती नाभिक के अन्तर्गत को खोलने पर उसके भीतर भी एक अति सूक्ष्म किन्तु अपने इस विश्वास ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करने वाला ब्रह्म बीज विद्यमान मिलता है।

जीव शरीर भी ब्रह्म शरीर का प्रतीक प्रतिनिधि है। उसके भीतर भी सात लोक हैं। इन्हें सात शरीर कहते है। मोटे तौर से इन्हें सप्त धातुएँ कहा जाता है। रस, रक्त, माँस, अस्थि, मज्जा, शुक्र धातुएँ शरीर में देखी जाती है। इनके स्थान अलग- अलग कोठों में नियत नहीं हैं, वरन् एक के भीतर एक समाये हुए हैं। चेतना शरीर भी इसी प्रकार से सात शरीरों से मिलाकर बना है। वे भी एक के भीतर एक के क्रम से अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं।

योग शास्त्र में इन्हें चक्रों का नाम दिया गया है। छह चक्र और सातवाँ सहस्रार कमल। छह चक्रों के नाम प्रसिद्ध हैं।-(1) मूलाधार चक्र (2) स्वाधिष्ठान चक्र (3) मणिपूर चक्र (4) अनाहत चक्र (5) विशुद्ध चक्र (6) आज्ञा चक्र। इनके उपरान्त सातवाँ सहस्रार चक्र। कहीं छह- कहीं सात की गणना से किसी भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। सातवाँ लोक सत्यलोक है। सत्य अर्थात् पूर्ण परमात्मा । इससे नीचे के लोक भी छह ही रह जाते हैं। शरीर में छह धातुएँ प्रसिद्ध हैं। सातवीं ओजस् तो आत्मा की ऊर्जा मात्र है। इसी प्रकार साधना में प्रयुक्त होने वाले चक्र तो छह ही हैं। सातवाँ सहस्रार कमल तो ब्रह्मलोक है। उससे तो लय होने की यह बात है। सात या छह के भेद -भाव को इस तरह समझा जा सकता है। कि अपने स्थान से अमुक देवालय सात मील है। बीच में छह मील के पत्थर और सातवाँ मील पत्थर - प्रत्यक्ष देवालय। गणना के हिसाब से छह गिने जायें या सात इससे वस्तुस्थिति में कोई अन्तर नहीं पड़ता।

ब्रह्मांड सत्ता में विद्यमान सुविस्तृत सात लोकों की चर्चा पीछे कभी करेंगे। यहाँ हमें मनुष्य सत्ता के भीतर विद्यमान सात लोकों की -सात शरीरों की चर्चा करना ही अभीष्ट है।

मनुष्य के सात शरीरों का वर्णन तत्ववेत्ताओं ने किया है वे इस प्रकार हैं-

(1) स्थूल शरीर-फिजिकल बाड़ी (2) सूक्ष्म शरीर इथरिक बॉडी (3) कारण शरीर-एस्ट्रल बॉडी (4)मानस शरीर-मेन्टल बॉडी (5) आत्मिक शरीर-स्प्रिचुअल बॉडी (6) देव शरीर -कॉस्मिक बॉडी (7) ब्रह्म शरीर-वाडीनैस बॉडी।

सप्त धातुओं का बना भौतिक शरीर प्रत्यक्ष है। इसे देखा, छुआ और इन्द्रिय सहित अनुभव किया जा सकता है। जन्मतः प्राणी इसी कलेवर को धारण किये होता है। उनमें प्रायः इन्द्रिय चेतना ही जागृत होती है। भूख, सर्दी-गर्मी जैसी शरीरगत अनुभूतियाँ ही सक्षम रहती हैं, पशु शरीर आजीवन इसी स्थिति में बने रहते हैं, पर मनुष्य के सातों शरीर क्रमशः विकसित होते चलते हैं। दो वर्ष का होते हुए उसका सूक्ष्म शरीर जागृत होने लगता है इसे मानव शरीर कहते हैं। इच्छाओं और सम्वेदनाओं के रूप में इसका विकास का परिचय मिलता है। मानापमान अपना-पराया, राग-द्वेष, सन्तोष-असन्तोष, मिलन-वियोग जैसे अनुभव भाव शरीर को होते हैं। यही सूक्ष्म शरीर है। बीज में से पूर्व प्रथम अंकुर निकलता है। पीछे उसका विकास दो-तीन पत्तों के रूप में होता है। स्थूल शरीर को अंकुर कहा जाय तो सूक्ष्म शरीर को उसका पत्तों के रूप में विकसित होना माना जा सकता है। फिजिकल बॉडी तो यथास्थान बनी रहती है, पर उसमें नई शाखा भाव शरीर एस्ट्रल बॉडी के रूप में विकसित होने लगती है। यों सातों शरीरों का अस्तित्व आत्मा के साथ-साथ ही रहता है, पर उनका विकास आयु और परिस्थितियों के आधार पर धीमे अथवा तीव्र गति से - स्वल्प, अधिक मात्रा में होता चलता है।

तीसरा कारण शरीर विचार तक, बुद्धि से सम्बन्धित है। इसका विकास, व्यावहारिक, सभ्यता और मान्यता परक संस्कृति के आधार पर होता है। यह किशोरावस्था में प्रवेश करते-करते आरम्भ होता है। और वयस्क स्थिति तक पहुँचते-पहुँचते अपने अस्तित्व का ठीक तरह परिचय देने लगता है। बालक-मताधिकार 18 वर्ष की आयु में मिलता है। अल्प वयस्कता इसी अवधि में पहुँचने पर पूरी होती है। बारह से लेकर अठारह वर्ष की आयु के कारण शरीर का काम चलाऊ विकास हो जाता है। यौन सम्वेदनाएँ भी इसी अवधि में जागृत होती हैं। सामान्य मनुष्य इतनी ही ऊँचाई तक बढ़ पाते हैं, फिजिकल -इथरिक और एस्ट्रल बॉडी के तीन वस्त्र पहनकर ही दरिद्र लोग दिन गुजार लेते हैं। धोती कुर्ता और जूता इतने से ही गरीबों को काम चलाना पड़ता है। अधिकाँश लोगों की जिन्दगी इसी सीमा में रहकर समाप्त हो जाती है। इसलिए मोटेतौर से तीन शरीर की ही चर्चा होती है। स्थूल , सूक्ष्म और कारण शरीरों की व्याख्या करके बात पूरी कर ली जाती है। प्रथम शरीर में शरीरगत अनुभूतियों का सुख-दुःख -दूसरे में भाव सम्वेदनाएँ और तीसरे में लोकाचार एवं यौनाचार की प्रौढ़ता विकसित होती है। और एक काम चलाऊ मनुष्य स्तर का ढाँचा बनकर खड़ा हो जाता है।

तीन शरीरों के बाद मनुष्य की विशिष्टताएँ आरम्भ होती हैं। मनस् शरीर में कलात्मक रसानुभूति होती है। कवित्व जगता है। कोमल सम्वेदनाएँ उभरती हैं। कलाकार, कवि, सम्वेदनाओं के भाव लोक में विचरण करने वाले भक्त-जन, दार्शनिक, करुणार्द्र, उदार, देश-भक्त इसी स्तर के विकसित होने पर बना जा सकता है। यह स्तर उभरे तो पर विकृत बन चले तो व्यसन और व्याभिचार जन्य क्रीड़ा कौतुकों में रस लेने लगता है। इसी स्तर के लोग कामुक एवं रसिक पाये जाते हैं। मनस् क्षेत्र के विकसित व्यक्ति असामान्य होते हैं। उनकी पहचान रसिकता की मनःस्थिति से होती है। सूरदास, तुलसीदास जैसे सन्त अपने आरम्भिक दिनों में कामुक थे। वही पैट्रोल जब दूसरी दिशा में गाड़ी दौड़ाने लगा तो सम्वेदनाएँ कुछ से कुछ करके दिखाने लगीं। महत्वकाँक्षाएँ इसी क्षेत्र में जागृत होती हैं। दूसरे शब्दों में उसे अहंकार भी कहा जा सकता है। महत्वाकांक्षी व्यक्ति ही भौतिक जीवन में तरह-तरह के महत्वपूर्ण प्रयास करते हैं। और असाधारण लोगों में अपनी गणना कराते हैं। इसे प्रतिभाशाली भी कह सकते हैं। प्रतिभागी लोगों का मनस् तत्व प्रबल होता है। उन्हें मनस्वी भी कहा जा सकता है। बाल्मीक, अँगुलिमाल, अशोक जैसे महत्वाकांक्षी विकृत मनःस्थिति में घोर आतंकवादी रहे थे, पर जब मुड़ गये तो श्रेष्ठ मार्ग में भी उन्हें चोटी की सफलता प्राप्त करने में देर नहीं लगी। इसे मेन्टल बॉडी की प्रखरता एवं चमत्कारिता कहा जा सकता है।

पाँचवाँ शरीर-आत्मिक शरीर स्प्रिचुअल बॉडी में अतीन्द्रिय शक्तियों का निवास होता है। अचेतन मन की गहरी परतें जिनमें दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं। इसी पाँचवें शरीर से सम्बन्धित हैं। मैस्मरेज्म, हिप्नोटिज्म, टेलीपैथी, क्लैरेहवाइंस जैसे प्रयोग इसी स्तर के विकसित होने पर होते हैं । कठोर तन्त्र साधनाएँ एवं उग्र तपश्चर्याएँ इसी शरीर को परिपुष्ट बनाने के लिए की जाती हैं। संक्षेप में इसे ‘दैत्य’ सत्ता कहा जा सकता है। सिद्धि और चमत्कारों की घटनाएँ- संकल्प शक्ति के बढ़े-चढ़े प्रयोग इसी स्तर के समर्थ होने पर सम्भव होते हैं। सामान्य सपने तो सभी देखते हैं। पर जब चेतना इस पाँचवे शरीर में जमी होती है तो किसी घटना का सन्देश देने वाले सपने भी दीख सकते हैं। उनमें भूत, भविष्य की जानकारियों तथा किन्हीं रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन भी होता है। भविष्यवक्ताओं, तान्त्रिकों एवं चमत्कारी सिद्धि पुरुषों की गणना पाँचवे शरीर की जागृति से ही सम्भव होती है। ऊँची मीनार पर बैठा हुआ मनुष्य जमीन पर खड़े मनुष्य की तुलना में अधिक दूर की स्थिति देख सकता है। जमीन पर खड़ा आदमी आँधी का अनुभव तब करेगा जब वह बिलकुल सामने आ जायगी। पर मीनार पर बैठा हुआ मनुष्य कई मील दूर जब आँधी होंगी तभी उसकी भविष्यवाणी कर सकता है। इतने मील दूर वर्षा हो रही है। अथवा अमुक स्थान पर इतने लोग इकट्ठे हैं। इसका वर्णन वह कर सकता जो ऊँचे पर खड़ा है और आँखों पर दूरबीन चढ़ाये है, नीचे खड़े व्यक्ति के लिए यह सिद्धि चमत्कार है, पर मीनार पर बैठे व्यक्ति के लिए यह दूरदर्शन नितान्त सरल और स्वाभाविक है।

छठे शरीर को देव शरीर कहते हैं-यही कॉस्मिक बाड़ी है। ऋषि , तपस्वी, योगी इसी स्तर पर पहुँचने पर बना जा सकता है। ब्राह्मणों और सन्तों को भू-देव-भू-सुर कहते हैं। यह नामकरण उनकी देव अन्तःस्थिति के आधार पर किया गया है। स्वर्ग और मुक्ति इसी स्थिति पर पहुँचने पर मिलने वाला मधुर फल है। सामान्य मनुष्य चर्म चक्षुओं से देखता है, पर देव शरीर में दिव्य चक्षु खुलते हैं और “सियाराम मय सब जग जानी” की -विराट ब्रह्म दर्शन की मनःस्थिति बन जाती है। कण-कण में ईश्वरीय सत्ता के दर्शन होते हैं और इस दिव्य उद्यान में सर्वत्र सुगन्ध ही महकती दिखाई पड़ती हैं। परिष्कृत दृष्टिकोण ही स्वर्ग है। स्वर्ग में देवता रहते हैं। देव शरीर में जागृत मनुष्यों के अन्दर उत्कृष्ट चिन्तन और बाहर आदर्श कर्तृत्व सक्रिय रहता है। तदनुसार भीतर शान्ति की मनःस्थिति और बाहर सुख भरी परिस्थिति भरी-पूरी दृष्टिगोचर होती है। स्वर्ग इसी स्थिति का नाम है। जो ऐसी भूमिका में निर्वाह करते हैं। उन्हें देवता कहने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। असुर मनुष्य और देव यह आकृति से तो एक जैसे ही होते हैं। अन्तर उनकी प्रकृति मात्र में होता है।

भौतिकवादी लोक मान्यताओं का ऐसे देव मानवों पर रत्ती भर भी प्रभाव नहीं पड़ता । वे निन्दा;स्तुति की, संयोग-वियोग की, हानि-लाभ की, मानापमान की लौकिक सम्वेदनाओं से बहुत ऊँचे उठ जाते हैं। लोक मान्यताओं को वे बाल-बुद्धि की दृष्टि से देखते हैं। लोभ और मोह के -वासना और तृष्णा के भव-बन्धन ही सामान्य मनुष्यों को बेतरह जकड़े रहते हैं। और इन्हीं धागों में बँधकर उन्हें कठपुतली जैसे भोंड़े नाच नाचने पड़ते हैं। छठवीं देव भूमिका में पहुंची हुई देव आत्माएँ मात्र आदर्श और कर्त्तव्य भर को पर्याप्त मानती हैं। आत्मा और परमात्मा को सन्तोष देना ही उन्हें पर्याप्त लगता है। वे अपनी गतिविधियाँ निर्धारित करते समय लोक मान्यताओं पर तनिक भी ध्यान नहीं देते वरन् उच्चस्तरीय चेतना से प्रकाश ग्रहण करते हैं। इन्हें भव-बन्धनों से मुक्त-जीवन मुक्त कहा जाता है। मुक्ति या मोक्ष प्राप्त कर लेना इसी स्थिति का नाम है। यह छोटे शरीर में --देव स्थिति में कॉस्मिक बॉडी में विकसित आत्माओं को उपलब्ध होता है।

सातवाँ ब्रह्म शरीर है। इसमें आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में अवस्थित होता है। सभी वे शरीर झड़ जाते हैं जो किसी न किसी प्रकार भौतिक जगत से सम्बन्धित थे। उनका आदान-प्रदान प्रत्यक्ष संसार से चलता है वे उससे प्रभावित होते और प्रभावित करते हैं। ब्रह्म शरीर का सीधा सम्बन्ध परमात्मा से होता है। अस्तु उसकी स्थिति लगभग ब्रह्म स्तर की हो जाती है। अवतार इसी स्तर पर पहुँची हुई आत्माएँ बनती हैं। लीला अवतरण में उनकी अपनी कोई इच्छा आकाँक्षा नहीं होती, वे ब्रह्मलोक में निवास करते हैं और जब ब्राह्मी चेतना किसी सृष्टि सन्तुलन के लिए भेजती है तो उस प्रयोजन को पूरा करके पुनः अपने लोक को वापस लौट जाते हैं। ऐसे अवतार समय-समय पर होते रहते हैं। भारत में पिछले दिनों उनकी संख्या 10 या 24 गिनी जाती है, पर वस्तुतः उनकी गणना करना कठिन है। संसार के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रयोजनों के लिए वे समय-समय पर विलक्षण व्यक्तित्व सहित उतरते हैं और अपना कार्य पूरा करके वापिस चले जाते हैं।

ऐसे ही स्तर पर पहुँचने की स्थिति ‘अहम् ब्रह्मोसि’ सच्चिदानन्दोऽहम्, शिवोऽहम् सोऽहम्, कहने की होती है। उस चरम लक्ष्य स्थल पर पहुँचने की स्थिति को चेतना क्षेत्र में बिजली की तरह कोंधाने के लिए इन वेदान्त मन्त्रों का जप, उच्चारण एवं चिन्तन, मनन किया जाता है।

पाँचवें शरीर तक स्त्री-पुरुष की मान्ताएँ रहती हैं और उन्हीं मान्यताओं के कारण विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण तथा अगले जन्म में उसी लिंग का शरीर बनने की प्रक्रिया चलती रहती है। उससे आगे के छठे और सातवें शरीर में विकसित होने पर यह भेदभाव चला जाता है। तब मात्र एक आत्मा की अनुभूति होती है। स्त्री और पुरुष का आकर्षण-विकर्षण समाप्त हो जाता है। सर्वत्र एक ही आत्मा की अनुभूति होती है। अपने आपकी अन्तः स्थिति लिंग भेद से ऊपर उठी होती है यद्यपि ज्ञानेन्द्रिय के चिन्ह शरीर में अपने स्थान पर यथावत् बने रहते हैं। यही बात साँसारिक स्थिति बदलने के कारण मन पर पड़ने वाली भली-बुरी प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में भी होती है। समुद्र में लहरें उठती, गिरती रहती हैं। नाविक उनके लिए हर्ष, शोक नहीं करता- मात्र समुद्री हलचलों का आनन्द लेता है। छठे शरीर में विकसित देवात्माएँ इस स्थिति से ऊपर उठ जाती हैं उनका चेतना स्तर गीता में कहे गये स्थिति प्रज्ञ की ज्ञानी की और उपनिषदों में वर्णित तत्वदर्शी की बन जाती है। उसके आत्म सुख से संसार के किसी परिवर्तन में विक्षेप नहीं पड़ता। लोकाचार के लिए उपयुक्त लीला प्रदर्शन भर के लिए उसका व्यवहार चलता रहता है। यह भी छठे शरीर तक की ही बात है। सातवें शरीर वाले भगवान संज्ञा से विभूषित होते हैं। उन्हें अवतारी भी कह सकते हैं। इन्हीं के लिए ब्रह्मात्मा, ब्रह्म पुरुष-शब्द प्रयुक्त होते हैं। उन्हें ब्रह्म साक्षात्कार-ब्रह्म निर्वाण प्राप्त भी कहा जा सकता है।

छठे शरीर में स्थित देव मानव स्थितिवश शाप और वरदान देते हैं, पर सातवें शरीर वाले के पास शुभेच्छा के अतिरिक्त और कुछ बचता ही नहीं। उनके लिए पराया एवं बैरी कोई रहता ही नहीं। दोष, अपराधों को वे बाल बुद्धि मानते हैं और द्वेष दण्ड के स्थान पर करुणा और सुधार की बात भर सोचते हैं।


Quotation

आशा नाम मनुष्याणां काचिदाश्चर्यश्रृंखला ।

यथा बद्धाः प्रधावन्ति मुक्तास्तिष्ठन्ति पगुवत्॥

मनुष्यों के लिए आशा नाम की यह कोई आश्चर्य शृंखला ही है जिस में बद्ध होने से मनुष्य इधर-उधर भागते फिरते हैं और इससे मुक्त होने पर पंगु के समान निश्चल रहते हैं।

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खाद्य मोर्चे पर हम सब मिलकर लड़ें

खाद्य मोर्चे पर सभी सम्बन्धित व्यक्तियों को समान साहस और समान त्याग, बलिदान के साथ लड़ने की आवश्यकता है। इस संकट को मिल-जुलकर ही पार किया जा सकता है।

उत्पादक कृषक वर्ग को चाहिए कि अधिक धन पैदा करने वाली फसलों का मोह छोड़कर अन्न, शाक उपजाने पर अपना ध्यान केन्द्रित करें। तमाखू, अफीम, चाय, काफी, सोंफ, जीरा, धनिया, गुलाब, हल्दी, जूट आदि कितनी ही वस्तुएं ऐसी हैं जो पैसा तो बहुत देती हैं, पर खाद्य समस्या के हल करने में उनका कोई योगदान नहीं है। इनमें उत्पादक का आर्थिक लाभ तो बढ़ता है, पर उतनी जमीन में अन्न उपजाने से देश की खाद्य समस्या सुलझाने में जो योगदान मिलना चाहिए था वह नहीं मिलता।

गेहूँ की ही फसल वर्ष में उत्पन्न होती है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि वर्ष में दो तीन फसलें देने वाले अनाज उत्पन्न किये जायँ। केवल वर्षा के दिनों में ही उगकर पक जाने वाले अनेकों धान्य हैं। मक्का, ज्वार, बाजरा, चना, मडुआ, काँगनी आदि धान्य तीन-चार महीने में ही पक कट जाते हैं। इसके बाद उसी खेत में चना, मटर, सरसों, अरहर, मूँग, उड़द आदि की दुहरी फसल भी उत्पन्न हो जाती है। गेहूँ की फसल के अतिरिक्त इन फसलों पर भी पूरा ध्यान दिया जाय।

शाकों की फसल वर्ष में दो तीन बार तक पैदा हो जाती है। आलू, शकरकन्द, प्याज, गाजर, मूली, चुकंदर, शलजम आदि वजनदार जड़ों वाले शाक तो न केवल तरकारी का वरन् भारी होने के कारण अन्न की भी बहुत हद तक पूर्ति करते हैं। इनके अतिरिक्त लौकी, कद्दू, टिंडे, बैंगन, टमाटर आदि की फसलें न केवल खाद्य में जीवन तत्वों की आवश्यकता पूरी करते हैं, वरन् अधिक वजन में उत्पन्न होने के कारण कम दाम में पेट का अधिक भाग घेरने और उत्पादक को अधिक पैसा देने वाले भी होते हैं। अस्तु शाकों का उत्पादन अधिकाधिक किया जाय खरबूजा, तरबूजा, ककड़ी, खीरा आदि बोये जायँ जो गरीबों के लिए फलों की भूमिका निभा सकें। घरों में, खाली जगहों में तथा टोकरियों, पेटियों में शाक-भाजी उत्पन्न करने का शौक घर-घर लगाया जाय शाक वाटिका लगाने की कला गृह-उद्योग के रूप में विकसित की जाय।

खाने की आदतों में सुधार किया जाय। चोकर सहित आटा, हाथ का कुटा चावल प्रयुक्त किया जाय। इससे प्रायः 5 प्रतिशत खाद्य पदार्थ अधिक प्रयोग करने के लिये मिलेगा। साथ ही पौष्टिक तत्व भी मिलेंगे। जिन शाकों को छिलके समेत पकाया, खाया जा सकता हो उन्हें बिना छीले ही पकाया, खाया जाय। दालें छिलके समेत साबुत ही पकाई जायँ।

भात का मांड नष्ट न होने दिया जाय। पकने की ऐसी विधि विकसित की जाय जिससे न पोषक तत्व नष्ट होने पावे और न पदार्थों की बरबादी होने पाये।

सप्ताह में एक दिन या एक न्जूनडडडड पूर्ण उपवास शाकाहार पर रहने का, स्वास्थ्य संवर्धक एवं अन्न बचाने वाला अभियान चलाया जाय।

गेहूँ, चावल जैसी वर्ष में एकबार उगने वाली और महंगी फसल की अपेक्षा जल्दी तथा अधिक उगने वाले अनाज खाने में लोगों की रुचि उत्पन्न की जाय।

विवाह शादियों में न्यूनतम व्यक्तियों के प्रीति-भोजों का प्रचलन रहे और खाद्य पदार्थों की संख्या सीमित कि जाय। इससे अन्न की बर्बादी रुकेंगी। झूठन छोड़ना एक राष्ट्रीय अपराध माना जाय।

अन्न तथा खाद्य पदार्थ रखने की ऐसी व्यवस्था रखी जाय जिससे चूहे, कीड़े उसे नष्ट न करें और सीलन सड़न से उसकी बर्बादी न हो।

अधिक अन्न उत्पादन के लिए किसानों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा हो। सहकारी समितियाँ उनके लिए अच्छे बीज, खाद, सिंचाई उपकरण आदि की व्यवस्था करें। उत्पादन बढ़ाने वाली जानकारियों से कृषक वर्ग को परिचित कराया जाय।

अन्न की जमाखोरी तथा मुनाफाखोरी पर सरकारी तथा सामाजिक प्रतिबन्ध लगाये जायँ। हम सब मिलजुलकर अधिक खाद्य उत्पादन का, विवेकपूर्वक उपयोग करने का, बर्बादी रोकने का, जमाखोरी, मुनाफाखोरी रोकने का ध्यान रखें तो वर्तमान खाद्य संकट से निपट सकना कठिन नहीं रहेगा, वरन् सरल बन जायेगा।

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साधना सिद्धि का मूल आधार श्रद्धा

अध्यात्म क्षेत्र में श्रद्धा की शक्ति ही सर्वोपरि है। जिस प्रकार शक्ति के आधार पर भौतिक हलचलें गतिशील होती हैं और उनके सहारे अभीष्ट उपलब्धियां हस्तगत होती हैं। उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में श्रद्धा ही मूल है। उसी की सघनता चमत्कार दिखाती है। श्रद्धा विहीन उपचार सर्वथा निष्प्राण रहते हैं और उनमें किया गया श्रम प्रायः निरर्थक चला जाता है। सामान्य लोक व्यवहार में भी दृढ़ता, श्रद्धा विश्वास के आधार पर ही आती है। आत्म-विश्वास के बल पर ही कोई बड़े कदम उठा सकना सम्भव होता है। शौर्य और साहस आत्म विश्वास के ही नाम हैं। आशा और उत्साह के मूल में आत्म-विश्वास ही काम आता है। परिवार में एक दूसरे को स्वजन, घनिष्ठ एवं आत्मीय होने की मान्यता ही उन्हें पारस्परिक स्नेह सहयोग के सुदृढ़ सूत्र में बाँधे रहती है। वह मात्र श्रद्धा ही है जिसके आधार पर परिवारों में स्नेह दुलार का अमृत बरसता है। और एक दूसरे के लिए बढ़े-बढ़े त्याग करने को तत्पर रहता है। श्रद्धा की कड़ी टूट जाये तो फिर परिवारों का विगठन सुनिश्चित है वे तनिक सी बातों पर अन्तः कलह के अखाड़े बनेंगे और देखते-देखते बिखर कर अस्त-व्यस्त हो जायेंगे।

कृषि, उद्योग, शिल्प, खेल आदि सब में अपने कार्य हम से सही होने का विश्वास रख कर ही चला जाता है। व्यवसायी एक दूसरे पर विश्वास करके लेन -देन करते है। बैंक बड़े-बड़े जोखिम उठाते हैं। उधार का आधार ही विश्वास है। कर्मचारियों के हाथ में व्यवसाय की लगाम रहती है। मोटर ड्राइवर की मुट्ठी में अपनी जान रहती है, रसोइया भी विष देकर आसानी से सारे घर को मृत्यु की गोद में सुला सकता है। पत्नी सारी सम्पत्ति लेकर गायब हो सकती है। यह आशंकाएं रहते हुए भी मनुष्य को विश्वास का ही सहारा लेना पड़ता है। अविश्वासी के लिए कोई कारोबार करना तो दूर आशंका व्यस्त जीवन की भयंकरता का बोझ सँभालना ही कठिन हो जायेगा और वह चैन से जीवित तक नहीं रह सकेगा। ऐसी स्थिति में कोई किसी पर अपने गुप्त भेद तक प्रकट न कर सकेगा और दुरावपूर्ण मनः स्थिति की घुटन में घुटता हुआ उद्विग्न विक्षिप्त स्तर की जिन्दगी जियेगा।

श्रद्धा और विश्वास के बिना भौतिक जीवन में भी गति नहीं, फिर आध्यात्म क्षेत्र का तो उसे प्राण ही कहा गया है। आदर्शवादिता में प्रत्यक्षतः हानि ही रहती है, पर उच्च स्तरीय माध्यताओं में श्रद्धा रखने के कारण ही मनुष्य त्याग-बलिदान का कष्ट सहन करने के लिए खुशी-खुशी तैयार होता है। ईश्वर और आत्मा का अस्तित्व तक प्रयोगशालाओं की कसौटी पर खरा सिद्ध नहीं होता। वह निश्चित रूप से श्रद्धा पर ही अवलम्बित है। मनुष्य का व्यक्तित्व जिसमें संस्कारों का-आदतों का गहरा पुट रहता है। वस्तुतः श्रद्धा की परिपक्वता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में भिन्न-भिन्न प्रकार की आदतें और मान्यतायें अत्यन्त गहराई तक घुसी रहती हैं। और वे उन्हें छोड़ने को सहज ही तैयार नहीं होते। यह संस्कार और कुछ नहीं चिरकाल तक सोचे गये माने गये और व्यवहार में लाये गये अभ्यासों का ही परिपाक है। तथ्यों की कसौटी पर इन संस्कारों में से अधिकाँश बेतुके और अन्ध विश्वास स्तर के होते हैं, पर मनुष्य उन्हें इतनी मजबूती से पकड़े होते हैं कि उसके लिए वे ही ‘सत्य’ बन जाते है। और सत्य और तथ्य कह कर वह उन पूर्वाग्रहों के प्रति अपनी कटुता का परिचय देता है। उनके लिए लड़ने-मरने तक को तैयार हो जाता है। यह मान्यता परक कटुता और कुछ नहीं मात्र श्रद्धा द्वारा रची गई खिलवाड़ मात्र है।

स्वभाव में सम्मिलित हुई गतिविधियाँ आदतें बन जाती हैं और वे जब नशेबाजी स्तर की बन कर अचेतन की गहराई में घुस जाती है। तो तर्क के आधार पर हानि-कारक सिद्ध कर देने पर भी वे छुड़ाये नहीं छूटतीं। छोड़ना चाहने वाला भी उन्हें छोड़ नहीं पाता। इसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण यह है कि श्रद्धा की शक्ति तर्क से भी असंख्य गुनी अधिक है। यों सारा लोक व्यवहार तर्क के आधार पर चलता है और बुद्धि बल के सहारे ही विभिन्न प्रयोजन पूरे होते हैं; पर जहाँ सिद्धान्तों का और स्वार्थों का प्रश्न आता है वहाँ पूर्व मान्यताएँ ही मस्तिष्क तन्त्र को पूरी तरह जकड़ कर बैठ जाती हैं और तर्क के सारे तीर एक ही तरकर में से निकल कर एक ही दिशा में उड़ते दिखाई पड़ते हैं। पक्षपाती समर्थन में बुद्धि कौशल कैसे-कैसे विचित्र तर्कों का प्रहार करता है इसे देख कर कई बार तो निष्पक्ष विचारक को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।

यहाँ श्रद्धा की शक्ति का संक्षिप्त सा आभास दिया है कि उसे मानव जीवन की सर्वोपरि सामर्थ्य के रूप में समझ सकने में सुविधा हो। देव लोक यही है। देवता इसी क्षेत्र में जन्मते, बढ़ते, परिपुष्ट होते और वरदान दे सकने के लिए सक्षम बनते हैं। उनका उदय एवं अस्त भी इसी श्रद्धा के अनन्त अन्तरिक्ष में होता रहता है। मन्त्र, देवता, गुरु, उपासना, साधन सिद्धि आदि का सारा आधार श्रद्धा की आधार शिला पर खड़ा है। सच तो यह है कि साधना का विशालकाय कलेवर इसलिए खड़ा किया गया है कि उन लौह श्रृंखलाओं में जकड़ कर श्रद्धा विश्वास रूपी महादैत्य को उपयोगी प्रयोजन उत्पन्न कर सकने के लिए प्रशिक्षित किया जा सके। श्रद्धा से व्यक्तित्व का निर्धारण होता है-श्रद्धा से अनेक क्रिया-कलापों का सूत्र संचालन और उन्हें सफलता के उच्चस्तर तक पहुँचा सकना सम्भव होता है। आत्मा का सब से विश्वस्त और सबसे घनिष्ठ सचिव श्रद्धा ही है। उसी के सहारे आत्मिक प्रगति से लेकर सिद्धि चमत्कार के वरदान पाने और आत्म साक्षात्कार से लेकर ईश्वर दर्शन तक के समस्त दिव्य उपहार प्राप्त होते हैं।

आत्मिक प्रगति का सर्वोपरि आधार ‘श्रद्धा’ को समझा जा सकता है। साधकों की सफलता-असफलता इसी पर निर्भर रहती है। अस्तु गुरुदीक्षा-शक्तिपात से लेकर अनेकों चित्र-विचित्र कष्टसाध्य तप साधना इसी प्रयोजन के लिए करायी जाती हैं आकर्षक महात्म्य इसीलिए सुनाये बताये जाते हैं कि साधक की श्रद्धा अधिकाधिक परिपुष्ट हो सके और अभीष्ट सत्परिणाम प्राप्त कर सकने का अधिकारी बन सके।

श्रद्धा की स्थापना और परिपुष्ट का चिरस्थायी और सर्वमान्य आधार यह है कि जिस तथ्य पर विश्वास जमाया जाना आवश्यक है, उसको यथार्थता और वैज्ञानिकता को सघन तथ्यों और तर्कों के आधार पर समझ सकने का अवसर दिया जाय। बुद्धि का सर्वतोमुखी समाधान हो सके तो श्रद्धा की स्थिरता सुनिश्चित मानी जा सकती है और उस अभीष्ट परिणामों की अधिकाधिक अपेक्षा रखी जा सकती है। जिस-तिस से सुन कर जल्दी-जल्दी कुछ सुन समझ कर यदि कोई श्रद्धा बनेगी तो उसकी जड़े उथली रहने के कारण तनिक से आघात में उखड़ जाने की आशंका बनी रहेगी। प्रायः होता भी ऐसा ही रहता है। अमुक व्यक्ति के कहने से भावावेश उमड़ा और तत्काल वह साधना आरम्भ कर दी। कुछ ही समय बाद किसी दूसरे ने उस विधान के दोष बता दिये और किसी नये प्रयोग के माहात्म्य सुना दिये बस इतने भर से मन शंका-शंकित हो गया और पिछला प्रयोग छोड़ कर नया मार्ग अपना लिया गया। इस परिवर्तन के बीच यह नई आशंका बनी रहती है कि पिछली साधना जिस प्रकार छोड़नी पड़ी थी उसी प्रकार यह भी न छोड़नी पड़े और उसमें भी कोई दोष वैसा ही न घुसा हो जैसा कि पहली वाली में निकल पड़ा था। कभी कोई चर्चा इस नई साधना के विपक्ष और किसी अन्य के पक्ष में सुनाई पड़ती है तो उसे भी छोड़ने न छोड़ने का असमंजस खड़ा हो जाता है संदिग्ध, शंका-शंकित मन लेकर साँसारिक प्रयोजन तक में कोई कहने लायक सफलता नहीं मिल सकती फिर अध्यात्म क्षेत्र तो पूरी तरह श्रद्धा की शक्ति पर ही आधारित और अवलम्बित है। यदि मूल तथ्य का अभाव रहा तो फिर ज्यों-त्यों करके कर्म-काण्डों की लकीर पीटते रहने से बात बनेगी नहीं। तब असफलताओं का कारण विधि-विधानों की होरा-फेरी में ढूंढ़ा जाने लगेगा और यह खोज की जाने लगेगी कि किसी क्रिया-कृत्य में कोई अन्तर तो नहीं रह गया जिससे असफलता मिली या उलटा परिणाम निकला।

वस्तुतः विधि-विधानों का महत्व साधना विज्ञान में एक चौथाई और श्रद्धा विश्वास का तीन चौथाई है। सघन श्रद्धा के रहते अटपटे विधि-विधान भी चमत्कारी परिणाम उपस्थित कर सकते हैं जब अविश्वासी संदिग्ध मनःस्थिति में पंडिताऊ ढंग से किये गये परिपूर्ण कर्म-काण्ड भी निष्प्राण होकर रह जाते हैं और उनका परिणाम निराशाजनक ही रहता है। अस्तु साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले प्रत्येक साधक में श्रद्धा तत्व की परिपक्वता का आधार खड़ा करना आवश्यक समझा जाना चाहिए।

इसके दो उपाय हैं एक तो यह कि शास्त्र वचन, गुरु वचन, परम्परा, अनुशासन को सब कुछ मानकर चला जाय और उसे ही वेद वाक्य पत्थर की लकीर मानकर पूर्ण सत्य होने का विश्वास कर लिया जाय और दूसरा यह कि उस तथ्य का गहरा अध्ययन किया जाय और वास्तविकता समझ कर किसी सुनिश्चित निष्कर्ष पर पहुँचा जाय। इन दो ही परिस्थितियों में यह सम्भव हो सकता है कि श्रद्धा की परिपक्वता उस स्तर तक जा पहुंचे जिसमें किये गये प्रयोग सफल होकर ही रहते हैं।

साधना क्षेत्र में प्रवेश करके आत्मिक प्रगति और उसके आधार पर मिलने वाली उपलब्धियों को श्रद्धा तत्व की गरिमा समझनी चाहिए और आप्त वचनों के सहारे तर्क तथ्यों का आश्रय लेकर अपने-आदर्शों और साधनों पर विश्वास भरी निष्ठा परिपक्व करनी चाहिए। साधना की सिद्धि श्रद्धा की प्रगाढ़ स्थिति में ही सम्भव हो सकती है यह मान कर चलने वालों को आत्मोत्कर्ष के क्षेत्र में असफल नहीं रहना पड़ता।


बगदाद के बादशाह (kahani)

बगदाद के बादशाह के पास कहीं से एक फल आ गया। देखने में ही वह भोंड़ा था। सो उसने उठा कर गुलाम को दे दिया। गुलाम बड़े चाव से खाने लगा।

बादशाह ने पूछा-‘इसका स्वाद कैसा है? गुलाम ने कहा- बहुत मीठा।’

बादशाह सोचने लगा मैंने बहुत तरह की चीजें जिन्दगी में खाई हैं फिर ऐसे स्वादिष्ट फल को चखने से क्यों चूकें? फल एक ही था और अनोखा। बादशाह से रहा नहीं गया। उसने गुलाम से कहा- इसी में से एक टुकड़ा काट मुझे दे दो। गुलाम पहले तो देने में बहुत आना-कानी करता रहा, पर जब मालिक की डाँट पड़ी तो देने के सिवाय और कोई चारा रहा ही नहीं।

बादशाह ने चखा तो वह बहुत कडुआ निकला। तुरन्त ही थूक दिया। साथ ही अचम्भे के साथ पूछा- यह तो बहुत कडुआ है तो मीठा क्यों कहा-स्वादिष्ट क्यों बताया?

गुलाम ने सिर झुका लिया और रुंधे कण्ठ से कहा-‘मालिक जब आप हर घड़ी मेरा इतना ख्याल रखते हैं और एक से एक बढ़िया चीजें खाने को देते हैं तो आपकी दी हुई एक कड़ुई चीज को सिर आंखों पर रखना मुझे क्यों बुरा लगेगा?

ईश्वर हमें असंख्य मधुर उपहार देता रहा है कभी कोई एक कड़ुई चीज दे दी-कठिन परिस्थिति सामने खड़ी कर दी तो उसे भी सिर आँखों पर धरते हुए सन्तोष क्यों न करो?

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प्रगति तो हुई पर किस दिशा में

इन दिनों जीवन स्तर बढ़ाने का बहुत शोर है। सभ्यता और सम्पन्नता की व्याख्या अधिक बर्बादी के रूप में की जाती है। अधिक बर्बादी के लिए अधिक उपार्जन का लक्ष्य बना कर चलने पर जो मिलता है, उससे अधिक गुम जाता है। राजनैतिक दृष्टि से प्रायः सर्वत्र स्वतंत्रता की आकाँक्षाएँ पूर्ण हो रही हैं। अब दूसरों के गुलाम कहे जा सकने वाले देश बहुत थोड़े रह गये हैं, पर नये किस्म की गुलामी ने मनुष्य जाति को फिर से जकड़ना आरम्भ कर दिया है। विलासिता की आदतें संकीर्ण स्वार्थपरता और अहंमन्यता ने आदमी को बोना बना दिया है। उचित-अनुचित की विवेक बुद्धि क्रमशः घट रही है और चरित्र निष्ठा, समाज निष्ठा की जड़ें खोखली हो रही हैं। इस दृष्टि से समृद्ध देश-दरिद्रों की अपेक्षा कहीं अधिक निरस्त हैं। शराब, जुआ, यौन-लिप्सा ही नहीं रोग, अपराध, आक्रमण एवं आत्महत्याएँ भी गगनचुम्बी गति से आगे बढ़ रही हैं। मानसिक संतुलन की स्थिति भी विचित्र है। आधा चिन्तन अहंमन्यता के आवेश में और आधा आत्महीनता जन्य निराशा के अवसाद में नष्ट होता चला जाता है। दूरदर्शिता, विवेकशीलता, उदारता और आत्मसंयम जैसी विभूतियाँ क्षीण होती चली जा रही हैं। फलतः मनुष्य और मनुष्य के बीच का स्नेह, सहयोग, शिष्टाचार की विडम्बना बनता चला जा रहा है।

यह ठीक है कि गरीबी से उत्पन्न अभावों से क्षीणता उत्पन्न होती है और उससे स्थिरता को चोट पहुँचती है पर यह भी तो गलत नहीं है कि अमीरी के कारण बर्बादी की जिस उद्धतता का विस्तार होता है उसका अभिशाप पतन की परम्पराओं के नये घटाटोप उत्पन्न करता है। विकास चाहे आर्थिक हो-चाहे बौद्धिक उद्देश्य सहित होना चाहिए। उसका लाभ मात्र उत्पादकों को ही नहीं दूसरों को भी यथोचित मात्रा में मिल सके तभी उसकी सार्थकता है। अन्यथा असन्तुलित विकास प्रकारान्तर से विनाश के ही नये आधार खड़े करता रहेगा। यह हम थोड़े से देशों या व्यक्तियों के समृद्ध बन जाने पर उनके द्वारा किये गये क्रिया-कलापों तथा अपनाई नीतियों के आधार पर हम सहज ही देख सकते हैं।

अमेरिका की आबादी संसार भर की जनसंख्या में मात्र 14 प्रतिशत है, पर वह संसार भर के 60 प्रतिशत कच्चे माल का उपयोग करती है अन्य देश भी यदि ऐसे ही समृद्ध बन गये और उनकी आवश्यकताएँ भी इतनी ही बढ़ीं तो फिर उतने साधन कहाँ से जुटाये जा सकेंगे ? शीत युद्ध रचने पर भी कोई देश उतनी उपलब्धियाँ संग्रह न कर सकेगा, जितना कि उसने अपनी आवश्यकता अथवा बर्बादी का लक्ष्य बना कर रखा है।

पानी की स्वच्छता और मात्रा दोनों ही दृष्टि से घटोत्तरी हो रही है। विकास साधनों के लिए जल की आवश्यकता का बढ़ते जाना स्वाभाविक है। अमेरिका के आंकड़े यह हैं कि मानवी उपयोग में आने वाले जल का घरेलू प्रयोजन के लिए तो 9 प्रतिशत ही खर्च होता है शेष 91 प्रतिशत कल कारखानों एवं कृषि जैसे कार्यों में खप जाता है। पेय जल की समस्या जटिल होती जा रही है न्यूयार्क के इर्द−गिर्द के नहीं तालाब पीने लायक नहीं रह गये है इसलिए उस शहर के लिए 500 मील दूर से पानी लाना पड़ा है।

देहाती क्षेत्र छोड़ कर शहरों में जा बसने की प्रकृति तेजी से बढ़ रही है। फलस्वरूप एक और देहातों से प्रतिभाओं का पलायन होने से वहाँ अवाँछनीयता निरंकुश रीति से बढ़ रही है और प्रगति की दिशा में बढ़ना कठिन हो रहा है। दूसरी ओर शहरों की जनसंख्या बढ़ने से घिचपिच ने बढ़ती गन्दगी को हटाने की समस्या अति जटिल कर दी है। इस क्षेत्र का कूड़ा कचरा, मल-मूत्र कहाँ जाय ? जितनी तेजी से गन्दगी बढ़ती है उतनी तेजी से सफाई का संतुलन कैसे बिठाया जाय? स्वच्छता के लिए धनशक्ति और जन शक्ति की भारी आवश्यकता है। फिर उन सफाई साधनों और कर्मचारियों के लिए अतिरिक्त स्थान भी तो चाहिए।

बड़े शहरों से सरकारी आय बढ़ती है-उद्योग व्यवसाय में सहायता मिलती है-सुविधा साधनों का सरलीकरण होता है-इसलिए उनके विकास विस्तार का लोभ छोड़ते नहीं बनता। शहर न बढ़ें-और नये लोग इनमें जा-जा कर न घुसें ऐसा कोई प्रतिबन्ध लग सकना इन दिनों कठिन है। शहरों का आकर्षण उनकी आबादी को तेजी से बढ़ा रहा है। क्षेत्र विस्तार उतना नहीं होता जितनी घिचपिच बढ़ती है। कारखाने अपना प्रदूषण अलग ही बढ़ाते हैं। हवा में धुँआ और नदियों में कारखाने का गन्दा पानी पहुंचता है। फलतः जलाशयों का पानी क्रमशः अधिकाधिक अपेय होता चला जा रहा है।

अमेरिका जैसे साधन सम्पन्न देश में मात्र 15 प्रतिशत लोग अपनी जन्मभूमि में मरते हैं। शेष इधर से उधर यायावरों की तरह आजीवन भटकते और एक पेड़ से उस पेड़ पर घोंसले बनाते, उजाड़ते किसी प्रकार जीते-मरते हैं। यह सच है कि फुरसत नाम की चीज विदा हो चली, आदमी बहुत व्यस्त है। ज्यादा-ज्यादा समृद्ध जल्दी समृद्ध-ज्यादा उपभोग की आदतें इतनी गति पकड़ रही है कि उसकी पूर्ति के लिए समय, श्रम और चिन्तन के सारे साधन झोंक देने पर भी अभावों की पूर्ति होती नहीं दीखती। अत्यधिक व्यस्त बनते जाने पर भी जो पल्ले पड़ता है वह आकाँक्षाओं की तुलना में बहुत कम पड़ता है। फलतः मनुष्य को अतृप्तिजन्य खिन्नता के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। व्यस्तता से भी तो तुष्टि नहीं मिलती। तनाव और खीज के कारण जीवन सम्पदा की पूँजी बेतरह और असमय चुकती चली जाती है।

दार्शनिक रिचाई बी0 ग्रेग ने लिखा है-मानवी इतिहास में आन्तरिक अनिश्चित भरे ऐसे बुरे दिन पहले कभी नहीं आये थे जितने अपने समय में है। जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है, यातायात साधनों में तेजी आ रही है, सिक्के का फुलाब, विस्तार और विलासिता के उपकरण भी बढ़े हैं। इस प्रगति के होते हुए भी मनुष्य भीतर ही भीतर खोखला होता चला जा रहा है। संस्कृति के वे सूत्र जो मानवी अन्तःकरणों को परस्पर जोड़ते और आनन्द का अभिवर्धन करते हैं क्रमशः टूटते और बिखरते चले जा रहे हैं। इसे मानवी प्रगति का भयावह अवरोध ही कहा जा सकता है।

स्थायित्व न केवल बाह्य जीवनक्रम में से वह भीतर से भी पलायन करता दीखता है। कहा जाता है कि हम अपने इस औद्योगिक युग में प्रगति की और बढ़ रहे हैं। किन्तु यह प्रगति किस दिशा में हो रही है इसका लेखा-जोखा कोई ले नहीं रहा है। दौड़ तो जरूर हो रही है, पर यह भगदड़ किसे कहाँ पहुंचायेगी, उसे देखने-सोचने तक की फुरसत किसी को नहीं है। यह अन्धी दौड़ शायद स्थायित्व का विसर्जन करके अनिश्चित की सड़क पर गतिशील हो रही है।

संसार की विशेषतया तथाकथित प्रगतिवान देशों की स्थिति को देखते हैं तो लगता है कि लोग अपने पुराने मकानों को छोड़ कर बड़े शहरों की गगनचुम्बी अट्टालिकाओं में घोंसले बनाते चले जा रहे हैं, पर वहाँ भी वे कानूनी शासन के अंतर्गत रहते हुए भीतर ही भीतर अनिश्चित और असुरक्षित स्थिति में अपने को अनुभव करते हैं। किसी दैवी विपत्ति से पीड़ित व्यक्ति जिस तरह अपना घर बार छोड़ कर कहीं आश्रय पाने के लिए शरणार्थियों की तरह जा डेरा डालता है, उसी मन:स्थिति में लोगों को अनिश्चित स्थिति में रहना पड़ रहा है। यहाँ कौन अपना है ? किस स्थायित्व के आधार पर भविष्य की बात सोची जाय? जैसे प्रश्न अन्तरिक्ष में विलीन हो जाते हैं लौट कर कहीं से कोई उत्तर नहीं मिलता।

विलियम मोरिस कहते थे- ‘‘वृक्ष, वनस्पतियों को वायु प्रदूषण से और नदी, तालाबों को गन्दगी से भरते चले जाने का दुष्परिणाम हमें न सही तो हमारी पीढ़ियों को अवश्य भुगतना पड़ेगा। औद्योगिक प्रगति में विनोद को थियेटरों और शराब खानों में केन्द्रित किया है। इस घुड़दौड़ में जीवन और उसके आनंद को तो हम क्रमशः भूलते ही चले जा रहे हैं।”

ग्रेन ने लिखा है - “यदि आक्रमण, असुरक्षा और भ्रष्टता को निरस्त करना है तो मानवी चिन्तन की दिशाधारा में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता पड़ेगी। स्कूली शिक्षा से लेकर साहित्य कला और प्रचार तन्त्र के समस्त साधनों को ऐसे लोक शिक्षण में लगाना चाहिए जिसके आधार पर जीवन के उच्चस्तरीय मूल्यों को समझने और निर्वाह करने की प्रेरणा मिल सके। समाज का ऐसा पुनर्गठन होना चाहिए, जिसमें बड़े कुटुम्बों के रूप में लोग मिल−जुल कर रहें और हिल-मिलकर काम करने, बाँटकर खाने और स्नेह सूत्र में बंधकर पारस्परिक सहायता में संलग्न रह सकें।”

विकसित प्राणियों की चेतना ने अधिक बच्चे उत्पन्न करने का सिद्धान्त अस्वीकार कर दिया। हाथी समुन्नत स्तर का प्राणी है। वह प्रायः आठ वर्ष बाद बच्चा जनने की तैयारी करती है। इसके विपरीत जो प्राणी जितने क्षुद्र हैं, वे अपनी दुर्बलता-मूर्खता के कारण वंश नाश के संकट को समझते हैं और अधिक संख्या में बच्चे जल्दी-जल्दी जनते हैं। कुत्ते सुअर खरगोश, चूहे जैसे प्राणी अधिक बच्चे जनते हैं मछली, मक्खी, आदि के अण्डे-बच्चे अगणित होते हैं, पर उनमें से थोड़े से ही जीवित बच पाते हैं। प्राणी को विकसित स्थिति का परिचय उसकी प्रजनन प्रक्रिया स्वल्प और सीमित होना है। समझदारी और स्थिति सुदृढ़ होगी तो उसका प्रमाण प्रजनन की न्यूनता के रूप में सहज ही दृष्टिगोचर होगा।

शक्ति, रफ्तार, प्रसन्नता, साक्षरता और सम्पन्नता की वृद्धि को उपयोगिता से कोई इनकार नहीं कर सकता पर यह ध्यान रहे सज्जनता, शालीनता, उदारता और सहकारिता जैसी आत्मिक विभूतियों को बढ़ाये बिना सुविधा और सशक्तता के रहते हुए भी जीवन का आनन्द प्राप्त कर सकना और सुख शान्ति की परिस्थितियाँ बनाये रहना सम्भव न हो सकेगा। अर्थ-व्यवस्था, शासन-व्यवस्था और समाज व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने के साथ-साथ अध्यात्म आस्थाओं को भी परिष्कृत बनाया जाना चाहिए। अन्यथा याँत्रिक प्रगति पर अवलम्बित रह कर मनुष्य स्वयं एक यंत्र बन जायगा और अपनी मौलिक विशेषता गँवा बैठेगा।

हवा में धुँऐ तथा विकरण की विषाक्तता-पानी में गन्दगी की बढ़ोत्तरी-जमीन की उत्पादन शक्ति का असाधारण दोहन-वृक्ष और वनस्पतियों के लिए अभीष्ट भूमि का अपहरण-जैसे संकट उत्पन्न करके जिस प्रगति या समृद्धि का गर्व अनुभव किया जा रहा है, वह मनुष्य का जीवन एक भविष्य संकट में डाल कर ही स्थिर रखा जा सकता है। विज्ञान ने प्रकृति पर अधिकार करने की बढ़ी-चढ़ी क्षमता मनुष्य के हाथ में प्रदान की है, पर ज्ञान ने उनका उपयोग सदुद्देश्य के लिए करना न सिखाया तो बन्दर के हाथ पहुँची यह तलवार मात्र अनिष्ट ही उत्पन्न करके रहेगी।

कुरीतियों और अन्ध परम्पराओं से छुटकारा दिलाने का दावा आधुनिक बुद्धिवाद ने ठीक ही किया है। उसने भूत-पलीतों और ग्रह-नक्षत्रों की हुकूमत सचमुच ही निरस्त कर दी है, पर नशेबाजी, यौन स्वेच्छाचार एवं साधनों की बर्बादी के अपव्यय का नया चस्का लगा कर नये प्रकार की दुष्प्रवृत्तियों में फँसा दिया है मारक और मादक औषधियों के प्रति बढ़ती हुई श्रद्धा क्या भूत-पलीत पूजने से कुछ कम हानिकारक कही जा सकती है?

अपने जमाने में संसार की सबसे स्वस्थ जाति ‘हुज्जा’ लोगों की है। यह लोग मध्य एशिया के ऐसे क्षेत्र में रहते हैं जहाँ अभी आधुनिक सभ्यता का प्रवेश नहीं हुआ है। वे लोग जमीन में प्राकृतिक खाद देकर अन्न उपजाते हैं -कड़ी मेहनत करते हैं-और हंसते-हंसाते जीते हैं। बुरी लतों से वे बचे हैं फलतः प्रकृति का परिपूर्ण प्यार उन्हें मिलता है और निरोग दीर्घ जीवन का आनन्द लेते हैं।

हमें जीवन स्तर-‘‘स्टेण्डर्ड आफ लाइफ” बढ़ाने की अपेक्षा जीने का स्तर “स्टेण्डर्ड आफ लिविंग” बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। यह तथ्य जन मानस में गहराई तक प्रवेश कराया जाना चाहिए कि उत्पादन एवं उपयोग ही नहीं साधनों के सदुद्देश्य के लिए उपयोग की आवश्यकता है। आदर्शविहीन प्रगति तो अवगति से भी महंगी पड़ती है। विकृत व्यक्तित्व अपने लिए और समाज के लिए संकट ही उत्पन्न करते चले जायेंगे, साधनों की दृष्टि से वे भले ही कितने ही सुखी अथवा समृद्ध क्यों न हो।


Quotation

यथा वायुं समाश्चित्य वर्तन्ते सर्व जन्तवः। तथा गृहस्थमाश्रित्य वर्तन्ते सर्व आश्रमा:॥ यस्मत्त्रयोऽप्या श्रमिणों दानेनान्नेन चान्वहम् गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्माज्ज्येष्ठाश्रमो गृही !

जिस प्रकार सारे प्राणी वायु के आश्रित रहते हैं उसी प्रकार सारे आश्रम गृहस्थ के आश्रित रहते हैं। ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ और संन्यास तीनों आश्रमों को अन्नादि के दान से पालन करने वाला गृहस्थाश्रम ही सबसे श्रेष्ठ है।


रियोकन एक झोंपड़ी में रहते थे (kahani)

रियोकन एक झोंपड़ी में रहते थे। उनकी विद्या बुद्धि प्रख्यात थी, सो आये दिन विद्वान और बड़े लोग उनसे मिलने आते।

पड़ौस के गाँव में एक चोर रहता था। उसने सोचा जिसके पास इतने लोग आते हैं उसके पास जरूर कुछ माल-मत्ता होना चाहिए, सो वह एक रात चुपके से झोंपड़ी में घुस आया।

देर तक कुरेद-बीन करने के बाद भी जब उसके हाथ कुछ नहीं लगा तो निराश खाली हाथों वापिस लौटने लगा।

रियोकन चुपचाप पड़े यह सब देख रहे थे। खाली हाथ लौटते चोर को उन्होंने पुकारा और कहा दोस्त, थोड़ा रुको। खाली हाथ जाना मुझे सहन नहीं हो सकेगा सो लो मेरे यह पहनने के कपड़े लेते जाओ।

चोर बहुत गरीब था। वह ठिठक गया और कपड़े ले जाने के लिए सहमत हो गया। ठंड के दिनों ऊनी पजामा, जरसी का मिलना उसे बहुत भला लगा। बिना कुछ बोले वह चला तो गया पर उसकी आंखें कृतज्ञता से चमक रही थीं।

रियोकन का मन उन कृतज्ञता भरी आँखों ने मोह लिया। वे नंगे धड़ंगे बैठे ठंड में थर-थरा रहे थे, पर सोच यह रहे थे कि-काश, मैं उसे यह खूब सूरत चाँद भी दे सका होता।

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विश्व उपवन में हमारा जीवन पुष्प सा महके

प्रेम रूपी वाटिका में पुष्प खिलते हैं और सारे वातावरण को सुगन्ध से भर देते हैं। जीवन भी एक ऐसा ही पुष्प है, जिसके बिखर जाने से चारों ओर मादकता का वातावरण छा जाता है। जीवन के कुछ स्तम्भ हैं, जिनके आधार पर सारा जीवन टिका है, अगर ये स्तम्भ कमजोर हैं तो जीवन का कोई महत्व नहीं है।

ये आधार हैं दृढ़ संकल्प, आत्म-विश्वास, निश्चित उद्देश्य, अनुकूल वातावरण सही विचार इन्हीं शक्तियों पर जीवन का ढाँचा निर्भर होता है। अगर ये आधार हमारे अंदर हैं तो सही, परन्तु कमजोर है तो भी सफलता मिलना असम्भव है। जब हम किसी महापुरुष की जीवनी का अध्ययन करते हैं तो सबसे पहले इन्हीं बातों को देखते हैं कि वे कौन सी शक्तियाँ हैं जिन्होंने जीवन को पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया।

दृढ़ संकल्प में बड़ी अद्भुत शक्ति होती है जो मनुष्य के जीवन का काया पलट कर देती है। जिस व्यक्ति पर दृढ़ संकल्प का भूत सवार हो जाता है वह उन्नति के लगभग सभी द्वारा खोल लेता है। पैदा होने पर सब मनुष्य समान हैं। सभी के अंग लगभग समान ही हैं। फिर क्या कारण है कि एक तो राजा है, दूसरा भिखारी, एक गरीबी को पाल रहा है तो दूसरा हमेशा के लिये विदा कर रहा है।

एक व्यक्ति जिन्दगी भर भार बनकर जीता है तो दूसरा करोड़ों का भार अपने सिर पर लेता है इतना भारी अन्तर मनुष्य-मनुष्य में क्यों होता है? इतनी बड़ी विषमता का कारण है दृढ़ संकल्प की कमी जिसके कारण साधन सम्पन्न होते हुए भी कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर पाते हैं। भावुकतावश कार्य प्रारम्भ तो कर देते हैं परन्तु जहाँ थोड़ी सी कठिनाई आई कि कार्य को बीच में ही छोड़ देते हैं।

उदाहरण के लिए हम उस बढ़ई के लड़के से मिलेंगे जिसने खेल-खेल में जज की कुर्सी पाई थी। पिता के कहने पर उसने दृढ़ संकल्प किया था कि मैं इस कुर्सी पर बैठने के योग्य अपने को बनाकर ही रहूँगा, दृढ़-संकल्प ने सफलता के द्वार खोल दिये वही लड़का एक दिन जज बना।

जीवन में सफलता पाने के लिए आत्म-विश्वास उतना ही जरूरी है जितना जीने के लिए भोजन, कोई भी सफलता बिना आत्म-विश्वास के मिलना असम्भव है। आत्मविश्वास वह शक्ति है जो तूफानों को मोड़ सकती है, संघर्षों से जूझ सकती और पानी में भी अपना मार्ग खोज लेती है। जीवन के किसी भी पहलू का देखें तो आत्मविश्वास के बिना अधूरा ही दिखाई पड़ेगा। एक विद्यार्थी बड़ा अध्ययनशील है अपने कर्त्तव्यों के प्रति हमेशा सजग रहता है परन्तु परीक्षा हाल में प्रवेश करते ही अपना आत्म-विश्वास खो बैठता है, परिणाम स्वरूप वह परीक्षा में असफल हो जाता है। जबकि दूसरा विद्यार्थी कम अध्ययनशील होते हुए भी आत्म-विश्वास के बल पर अच्छे नम्बर ले आता है। कारण क्या था ? जिसके परिणाम स्वरूप पहला विद्यार्थी परीक्षा में फेल हो गया और दूसरा विद्यार्थी उत्तीर्ण हो गया। आत्म-विश्वासी दुनिया का सबसे बड़ा व्यक्ति माना जाता है। जिसकी एक आवाज पर करोड़ों व्यक्ति साथ हो जाते हैं। दूसरा व्यक्ति आत्मविश्वास के अभाव में घर से बाहर निकलने में भी शंका पैदा कर लेता है।

जो व्यक्ति जो कुछ बनने की इच्छा अपने हृदय में संजोये रहता है, बाहरी परिस्थितियाँ उसके चारों ओर उसी प्रकार की इकट्ठी होने लगती हैं। जिसने अपना उद्देश्य महान बनाया वह महान बनेगा, जिसने उद्देश्य में शंका, अविश्वास किया उसके पैर लड़खड़ायेंगे, उसे सफलता मिलना असम्भव है।

हर व्यक्ति अपनी कामनाओं को साकार रूप दे सकता है बशर्ते वह अपनी इच्छाओं के प्रति ईमानदार हो। इच्छाएँ अपने अनुरूप होनी चाहिएं, कल्पना के रंगीन महल बनाने की अपेक्षा अपनी टूटी-फूटी झोंपड़ी को महत्व देना चाहिए। लिंकन ने दासों को मुक्त करने की इच्छा की थी जिसे पूरा करने के लिए उन्होंने सारी शक्ति से कार्य किया और वे उद्देश्य में सफल हो गये। ये थी उनकी शक्तिशाली इच्छाशक्ति जिसने दासों को आजाद कराया।

जिज्ञासा सबसे बड़ा गुण है। महत्वाकाँक्षी होना अच्छा है परन्तु सही मार्ग खोजने के लिए, न कि बुराइयों को प्रोत्साहन देने के लिए। ज्ञान की भूख पूरी करने और सही ओर ले जाने से मनुष्य विद्वान बन जाता है। धर्म की इच्छा करने से मनुष्य देवता बन जाता है। हम चारों और सफलताएँ देखते हैं वे सब इच्छा शक्ति पर निर्भर रहती हैं।

हर व्यक्ति को स्वतन्त्र चिन्तन करने का अधिकार है, रुचि के अनुसार व अपना कार्य कर सकता है। जिसके लिए अनुकूल वातावरण की आवश्यकता है। लिंकन जब अपना खेत जोत रहे थे तो अचानक किसी अज्ञात शक्ति ने उन्हें पुकारा लिंकन यह काम तेरे योग्य नहीं है, आत्मा की आवाज को सुना, मनन किया और वहीं पर बैलों की जोड़ी को छोड़कर निकल पड़े, विकास का द्वार खटखटाने; जिसका नतीजा दासों को मुक्त करवाना था।

ऐसा आज तक नहीं हुआ है कि गलत वातावरण में रहकर कोई अपना विकास कर सका हो। जो व्यक्ति हमेशा निराशा के वातावरण में रहा हो उसे आशा के दीप दिखाना मुश्किल है। यदि आप अपने बच्चे को सफल नागरिक के रूप में देखने की अभिलाषा करते हैं तो असफलता और उत्साहहीनता के सभी विचारों की सब धाराओं को फाड़ दीजिये। जिन मनुष्यों ने संसार में सफलताएँ प्राप्त की हैं वे अनुकूल वातावरण से काफी प्रभावित रहे हैं।

जीवन में सफलता पाने के लिए श्रद्धा का बड़ा महत्व है। हमारी श्रद्धा प्रायः हमें बताती है कि जब आगे कोई रोशनी नहीं होती, तब हम अन्धेरे में ही सुरक्षित रहकर आगे बढ़ सकते हैं। श्रद्धा एक दैवी दर्शन है जो कभी हमें गलत दिशा में नहीं ले जा सकती है। केवल यह दृढ़ निश्चय होना चाहिए कि श्रद्धा ही हमें निश्चित लक्ष्य पर पहुँचा के रहेगी।

अगर हमें उत्कृष्ट जीवन व्यतीत करना है तो विचारों को सही दिशा में ले जाना होगा। विचारों में बहुत बड़ी शक्ति होती है। एक व्यक्ति अपने विचारों को सागर के समान विशाल बनाये रखता है, परिस्थितियाँ उसकी दासी बनकर चक्कर लगाया करती हैं, दूसरी और संकीर्ण विचारों वाला व्यक्ति जो अस्तित्वहीन, दिशाहीन, उदासी से घिरा हुआ समय के गाल में समा जाता है। अगर हमें भारत का भविष्य बनाना है तो आने वाली पीढ़ी को विचारों का चमत्कार बताना होगा।

विचारों की शक्ति एटमों से अधिक होती है। जीवन का महत्व क्या है? इसे जानना हो तो विचारों का संकलन करना होगा और उन्हें सही दिशा देनी होगी तभी हम भविष्य की सुनहरी कल्पना कर सकते हैं। विचारों के अभाव में कोई भी व्यक्ति महान नहीं बन सकता है।

इसलिए जीवनरूपी उपवन में दृढ़ संकल्प, आत्मविश्वास, निश्चित उद्देश्य, प्रेम परोपकार रूपी पुष्प खिलने चाहिएं, तभी जीवन सार्थक माना जावेगा। भार स्वरूप जीना कोई जीना नहीं है और ऐसे जीवन का कोई महत्व नहीं है।

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सभ्यता की उपेक्षा करना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना

मनुष्य मशीन नहीं है जिसे ईंधन, चिकनाई और सफाई की आवश्यकता पूरी करके सन्तुष्ट किया जा सके। रोटी, कपड़ा और मकान होने से ही उसका काम नहीं चल सकता। आहार, निद्रा का प्रबन्ध कर देने से जिन्दा तो रहा जा सकता है, पर जीवन को पल्लवित नहीं किया जा सकता है। इसके लिए कुछ और भी चाहिए। निर्वाह साधनों में उसे निश्चिन्तता का आश्वासन और आक्रान्ताओं से बचे रहने का संरक्षण चाहिए। उसे यश, सम्मान एवं वर्चस्व के प्रकटीकरण का अवसर चाहिए। सामाजिक शान्ति और सद्व्यवहार की उसे अपेक्षा है। कला ओर सौन्दर्य के स्पर्श से जो गुदगुदी उत्पन्न होती है-प्रेम सम्वेदनाओं से जो उल्लास उभरता है वह भी उसकी आन्तरिक आवश्यकताओं का एक अंग है। उत्पादन के लिए श्रम- न केवल शारीरिक व्यायाम की आवश्यकता पूरी करता है- बल्कि क्षुधा निवारण के साधन जुटाता है और बुद्धि की प्रखरता के अनेकों आधार खड़े करता है। ममत्व का विस्तार व्यक्तियों तथा वस्तुओं में करने से उसे आत्मविस्तार की अनुभूति होती है। इस प्रकार के अवसर न मिलें और किसी प्रकार गुजारा हो सके तो उसे बन्दी जीवन के अतिरिक्त और कुछ न कहा जा सकेगा। जीने को तो लोग एकान्त कारावासों में भी लम्बी उमर गुजार देते हैं। पर नीरस और निरानन्द, मूर्छित और एकाकी परिस्थितियों में रहने वाली चेतना ऊब, खीज और बेचैनी ही अनुभव करती रहेगी। भूखा पेट सारे शरीर को बेचैन करता है और भूखा अंतस् ऐसे विद्रोह पर उतारू हो जाता है जिसे आत्म-हत्या के समतुल्य स्थिति का आँका जा सके।

प्रगति की लम्बी मंजिल पार करते हुए मनुष्य ने जो बहुमूल्य उपलब्धि अर्जित की है उसे एक शब्द में ‘सभ्यता’ कहना उचित होगा। उसे प्राप्त करने में उसने समुचित मूल्य चुकाया है। प्राणधारी को सामान्य प्रवृत्तियाँ-इन्सटिन्क्ट्स-उसके साथ ही जन्म जात रूप में मिली थीं। उनके यथावत बनी रहने पर वह पशु वर्ग से ऊँचा नहीं उठ सकता। वे उसे सामाजिक सहयोग और चिन्तन के परिष्कार का अवसर ही नहीं मिलने दे सकती थीं। सभ्यता ही है जिसने उसे आदर्श अपनाने और मर्यादा पालन के लिए प्रोत्साहित किया। यही था वह सभ्यता का अवलम्बन जिसके सहारे आदिकाल में नर-वानर को आज के समुन्नत मानव के स्तर तक पहुँचने का श्रेय प्राप्त हुआ है।

भीतर के क्रोध उठने पर भी उसे पी जाना, यौन स्वेच्छाचार को दाम्पत्य मर्यादा में सीमाबद्ध करना, लाभदायक अवसर आने पर भी उन्हें नीति-अनीति का विश्लेषण करने के उपरान्त ही स्वीकार करना, अधिकारों का कर्तव्यों के पक्ष में त्याग करना, स्वयं भूखे रहकर दूसरों को खिला देना-जैसे अनेकों विशिष्ट आचरण सभ्यता की देन हैं। नर-वानर के लिए इतनी शालीनता प्रस्तुत कर सकना सम्भव न था। वह आत्म-निरीक्षण और आत्मनिर्माण की स्थिति में था ही नहीं। आदिम काल में नैसर्गिक प्रवृत्तियाँ ही उस पर छाई रहती थीं। सभ्यता ने उसे इतना विवेक और साहस दिया है कि उन जन्म-जात प्रवृत्तियों की न केवल समीक्षा ही कर सके वरन् उन्हें बदलने, सुधारने और परिष्कृत करने का साहस दिखा सके।

यह तो प्रवृत्ति परक नियन्त्रण और परिष्कार की बात हुई। सभ्यता के चिन्तन को सीमाबद्ध, क्रमबद्ध एवं दिशाबद्ध भी किया है। कल्पना शक्ति, संकल्प शक्ति, तुलनात्मक समीक्षा दृष्टि, दूरगामी परिणामों की अनुभूति, समाज-निष्ठा, चरित्र-निष्ठा जैसी विशेषताओं को अति मानस का विकास कह सकते हैं। विकास का यही वह केन्द्र बिन्दु है जहाँ से पशु और मनुष्य के बीच मौलिक अन्तर आरम्भ होता है। व्यक्तित्व की अनुभूति को ही आत्मा कहते हैं। निकृष्ट स्तर के जीव क्रिया तो बहुत करते हैं, पर अपने आपे के सम्बन्ध में निजी तौर से कुछ सोच नहीं पाते। प्रकृति प्रेरणा ही उनकी निजी इच्छा होती है। इसमें उनका अपना कोई हाथ नहीं होता। मनुष्य की स्थिति इससे भिन्न है वह शरीर के अतिरिक्त एक पृथक चेतना के रूप में न केवल आत्मानुभूति करता है, वरन् उसके विकसित करने में भी यत्नपूर्वक प्रयास करता है। दर्शनशास्त्र और आत्म-विद्या का विशालकाय कलेवर आत्म विश्लेषण एवं आत्मोत्कर्ष की दिशा-धारा निर्धारित करने के लिए ही विनिर्मित हुआ है। आग जलाने-पहिये का उपयोग जानने- नोकदार उपकरणों का प्रयोग समझने से मानवी प्रगति में असाधारण योगदान मिला समझा जाता है, पर वास्तविकता यह है कि वह श्रेय सभ्यता की कल्पना और उसका स्वरूप निर्धारित करने की सफलता को ही दिया जा सकता है। बोलना, लिखना और हँसना जैसे दिव्य अनुदान उसने सभ्यता की साधना करके ही प्राप्त किये हैं। कृषि, पशु पालन, वस्त्र, वाहन, वस्तु विनिमय, परिवार, शासन, शिक्षा, चिकित्सा, स्वच्छता जैसी उपलब्धियाँ शारीरिक अथवा पदार्थपरक नहीं-विशुद्ध रूप से सुविकसित चिन्तन की ही प्रतिक्रिया है। इन्हें सभ्यता की प्रगति के अतिरिक्त और कोई नाम नहीं दिया जा सकता।

शरीर निर्वाह एवं मनःतोष ही अब जीवनयापन के आधार नहीं रह गये हैं। व्यक्तित्व इन सबसे बड़ी इकाई बन चला है। अब ‘अहं’ का भी एक तथ्य है और उसकी तुष्टि के लिए इतना करना पड़ता है जितना शरीर और मन दोनों को सन्तोष देने के लिए किया जाता है। आत्मपरितोष के लिए विकृत रीति-नीति अपनाई गई या परिष्कृत आधार अपनाया गया यह आगे का प्रश्न है। बात वहाँ से आरम्भ होती है जहाँ शरीर और मन को भी पीछे धकेल कर-दोनों पर कष्टसाध्य अंकुश रखकर आत्म गौरव के लिए कुछ किया जाता है। यह आत्म सत्ता का परिचय है। इसी को आत्मा कहा गया है। शरीर शास्त्र, मनः शास्त्र का अपना विस्तार और अपना उपयोग है। आत्मःशास्त्र अपना वर्चस्व इन दोनों से ऊपर सिद्ध कर रहा है। कर्म और ज्ञान की क्षमता सर्वविदित है पर इच्छाएँ, भावनाएँ अपनी सामर्थ्य उन दोनों से ऊपर सिद्ध कर रही हैं। यह नैसर्गिक प्रवृत्तियों की प्रेरणा की ओर नहीं भाव सम्वेदनाओं की ओर इंगित किया जा रहा है। आत्मा का स्वरूप और कार्य क्षेत्र कितना अधिक बढ़ गया है इसे हम स्पष्ट देखते हैं अहं को विकृत अथवा परिष्कृत आधार पर पूरा करने के लिए जन साधारण को कितना कठिन प्रयास करना पड़ता है, इसे कौन नहीं जानता ? आत्म चेतना का स्वरूप निर्धारण करना और उसकी पूर्ति के नये आधार खड़े करना वस्तुतः प्रकृत प्रवृत्तियों के समानान्तर एक नया विज्ञान खड़ा कर देने के समान है। अविकसित जीवधारी इन उपलब्धियों से सर्वथा अपरिचित ही होते हैं। मानवी उपलब्धियों में भौतिक साधनों की लम्बी शृंखला सामने है, पर सभ्यता के विकास ने उसे जो ‘आत्मा’ दी है और उसका सुविस्तृत ढाँचा वरदान रूप में दिया उसने वस्तुतः मनुष्य को कृतकृत्य कर दिया है। किसी दिव्य लोक का निवासी बना दिया है। दुनिया यही है जिसमें कृमि-कीटक निवास निर्वाह करते हैं। पर मनुष्य कला, सम्वेदना, व्यवस्था, सम्पदा और वर्चस्व से भरे पूरे जिस लोक में रहता है वह अनोखा है। अविकसित जीवधारी भी यों इसी धरती पर रहते हैं पर उनके और मनुष्य के ‘लोक’ को भिन्न माना जाय तो इसमें अत्युक्ति जैसी कोई बात नहीं है।

शरीर और मन के सुविधा साधनों के उपार्जन, संग्रह एवं उपभोग में जो उत्साह रहता है उसी ने अपने युग में व्यस्तता के चक्र घुमाने में अतिशय तीव्रता उत्पन्न की है। पर यदि गम्भीरता से देखा जाय तो नैतिक एवं अनैतिक दुस्साहसों के पीछे ‘अहं’ की सामर्थ्य जितनी बढ़ी-चढ़ी है उतनी ही भयंकर उसकी विकृति भी है। इस तथ्य को तत्वदर्शियों ने भुलाया नहीं है और उन्होंने सोते साँप को जगाने के साथ-साथ उसके विषैले दाँतों को कीलित करने के लिए कीलन मन्त्र के भी आविष्कार में उपेक्षा नहीं बरती है।

चेतना की प्रौढ़ता-आत्मानुभूति के रूप में देखी जाती है उसका परितोष आत्म गौरव में होता है। विकृत चिन्तन उसका परितोष ध्वंस में देखता है। वह अपेक्षाकृत सरल है। एक बालक भी माचिस की तीली लेकर आग लगा सकता है और पूरे घर, गाँव को भस्म कर सकता है। आतंकवादी आये दिन ऐसे ही उत्पात करते रहते हैं। और ध्वंस के द्वारा अपनी विशिष्टता सिद्ध करते रहते हैं। आततायी अपराध प्रायः अभाव पूर्ति के लिए नहीं अपने वर्चस्व और कौशल द्वारा दूसरों को आतंकित कर देने के लिए होते हैं। किसी इमारत को गिरा देना स्वल्प श्रम से ही संभव हो सकता है उसे कोई मूर्ख भी कर सकता है, पर निर्माण अति कठिन है। उसके लिए भावना, सूझ-बूझ, योग्यता एवं साधन जुटाने की आवश्यकता पड़ती है। यह कठिन है। इसलिए सृजनात्मक गतिविधियाँ अपनाकर आत्म-गौरव का परिचय देना किसी-किसी से ही बन पड़ता है। आतंक-वाद अपनाकर ओछी सफलता प्राप्त करने के लालच पर अंकुश करना भी प्रखर आदर्शवादिता अपनाने वाले के लिए ही सम्भव हो सकता है। सभ्यता का लक्ष्य असुरता का-विकृतियों का अभिवर्धन नहीं, वरन् उस उत्कृष्टता का अनवरत अभिवर्धन है जिसे अपनाकर प्रगति की इतनी मंजिल पूरी हो सकी है।

आत्मानुभूति से लेकर आत्म गौरव तक का अनुदान देकर सभ्यता का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता वरन् वह अपूर्णता को पूर्णता में-अणु को विभु में परिणित करने के लिए अनवरत प्रयास के लिए सतत् संलग्न रही। उसने मनुष्य के सामने चरम उत्कृष्टता का लक्ष्य प्रस्तुत किया है। वह है - परमात्मा। परमात्मा का विश्वास - उसके अनुग्रह का उपार्जन - और अन्ततः उसी के समतुल्य बनने की उत्कण्ठा का उत्पादन। यही है ईश्वर भक्ति और उसकी प्राप्ति का वह चरम लक्ष्य जिसकी पूर्ति के लिए उपासना एवं साधनों के अनेकों विधि-विधान विनिर्मित हुए हैं।

सृष्टि संचालक सत्ता का निरूपण, ब्रह्म के रूप में किया गया है। उसकी मान्यता के सन्दर्भ में विज्ञानवादियों और आत्मवादियों में कोई मौलिक अन्तर नहीं है। सृष्टि सन्तुलन, इकॉलाजी सिद्धान्त सिद्ध करते हैं कि प्रकृति जड़ नहीं वरन् अत्यन्त-दूरदर्शी और सन्तुलन बनाये रहने में आश्चर्यजनक रीति से क्रिया कुशल है। उसका ब्रह्माण्डव्यापी कौशल इतना ही दूरदर्शितापूर्ण है जितना कि कोई बुद्धिमत्ता की चरम सीमा पर पहुँचा हुआ ‘अति मनुष्य’ हो सकता है। ‘परमाणु’ संरचना और उसकी गतिविधियों का अति सूक्ष्म निरीक्षण करने पर भी यही प्रतीत होता है कि विज्ञान के छात्रों द्वारा कही जाने वाली प्रकृति की जड़ता वस्तुतः विवेकशील चेतना के भी कान काटती है। अणु जगत में अन्धेरगर्दी नहीं चल रही है, वरन् आश्चर्यचकित करने वाली ऐसी सुव्यवस्था काम कर रही है जो उच्चस्तरीय विवेकशीलता के लिए ही सम्भव हो सकती है। “अणोरणीयां महता महीयान्” की स्थिति में सर्वत्र संव्याप्त विवेकशीलता को जड़ माने या चेतन इस विवाद में न पड़ा जाय तो उसका अस्तित्व आस्तिक और नास्तिक दोनों ही क्षेत्रों में समान रूप से मान्य हो सकता है। समष्टि ब्रह्मवर्चस् को स्वीकार करने में शाब्दिक लड़ाई भले ही हो, पर उस विवाद में तथ्य कुछ नहीं। ब्रह्म की सत्ता को सर्वमान्य घोषित किया जाय यह स्थिति दिन-दिन निकट ही आती चली जा रही है।

सभ्यता ने जो ‘परमात्मा’ मनुष्य जाति को दिया है वह ब्रह्म से सम्बद्ध भले ही कहा जाय, पर उसकी संरचना एक प्रकार के स्वतन्त्र कहने में भी कोई संकोच नहीं माना जाना चाहिए। प्राणि मात्र में संव्याप्त चेतना के साथ आत्मिक एकता-‘‘आत्मवत् सर्व भूतेषु” की मान्यता करुणा, ममता, सहकारिता, उदारता, सेवा जैसी परमार्थ प्रवृत्तियों को जगाती है। ईश्वरवाद का यह ऐसा अनुदान है जो विकृत अहं के द्वारा उत्पन्न होने वाले आततायी उत्पातों पर बहुत हद तक अंकुश लगाता है। पुनर्जन्म स्वर्ग-नरक, ईश्वरीय न्याय, कर्मफल की देर-सवेर में सुनिश्चितता जैसे सिद्धान्त ईश्वरवाद के अविच्छिन्न अंग है। ईश्वर का स्वरूप निर्धारण करते हुए उसे सर्वव्यापी, घट-घट वासी, सर्वदर्शी और साथ ही न्याय निष्ठ माना गया है। मनुष्य के ऊपर ईश्वरीय अनुशासन होने और उच्छृंखलता बरतने पर अदृश्य सत्ता द्वारा दंडित किये जाने की मान्यता ही आस्तिकता का मूलभूत सिद्धान्त है। सभ्यता ने इस प्रकार के ईश्वर का सृजन करके मनुष्य समाज का भारी उपकार किया है। अदृश्य अंकुश की मान्यता हटा देने पर विकृत अहं के उत्पातों का चरम सीमा तक जा पहुँचने का खतरा है। समाज व्यवस्था में अपराध की न्यूनतम सजा बोली हो तो बात दूसरी है अन्यथा सुधारवादी उदारता की न्याय व्यवस्था से दुष्टता की बहुत ही स्वल्प मात्रा में रोकथाम की जा सकती है। अदृश्य अंकुश की मान्यता का प्रतिफल शासकीय अपराध नियन्त्रण व्यवस्था से भी असंख्य गुना प्रयोजन पूरा करता है। इस मान्यता के रहते हुए भी जब सामाजिक सुव्यवस्था और शान्ति में इतना व्यवधान खड़ा है तब उसके सर्वथा अभाव में तो स्थिति एक प्रकार से असहाय ही हो जायगी।

भक्ति भावना में प्रेम तत्व की अभिवृद्धि मनोवैज्ञानिक साधना है। यह सद्भावना जितनी मात्रा में उपार्जित की जा सकेगी उतना ही मनुष्य सज्जन, सहृदय, उदार, सेवा भावी बनता चला जायगा और न केवल स्वयं आन्तरिक उल्लास का अनुभव करेगा वरन् सम्पर्क क्षेत्र में भी शालीनता की प्रभावी शक्ति से स्वर्गीय वातावरण उत्पन्न करेगा। तत्काल कर्मफल न मिलने से अधीर होकर लोग दुष्कर्म करने पर उतारू होते और सत्कर्मों में निराश होते देखे गये हैं। इस विलम्ब के कारण आस्तिक को अधीर नहीं होना पड़ता और सज्जनता की नीति शान्तिपूर्वक अपनाये रहता है।

ऐसे-ऐसे अगणित लाभ आस्तिकता के हैं। एकाकी आदर्शवादिता अपनाये रहने से ईश्वर विश्वास के कारण असाधारण साहस प्राप्त होता है। सर्वत्र परमेश्वर की सत्ता संव्याप्त है, इस मान्यता से चिन्तन को ‘सत्यं शिवं सुन्दरं’ की अनेकों कलात्मक भाव-सम्वेदना के रसास्वादन का अवसर मिलता है।

आज सभ्यता के प्रति अनास्था उत्पन्न हो रही है। अवज्ञा और उच्छृंखलता को शौर्य-साहस एवं प्रगतिशीलता का चिन्ह माना जाने लगा है। नैतिक मर्यादाएँ उपहासास्पद और सामाजिक मर्यादाएँ अव्यावहारिक कही जान लगी हैं। फलतः उद्धत आचरण और विकृत चिन्तन के प्रति रोष प्रकट करने के स्थान पर उन्हें सहन करने तथा कभी-कभी तो प्रोत्साहन करने तक की प्रवृत्ति देखी जाती है। यह सब थोड़ी ही मात्रा में क्यों न हो है भयंकर? छोटी चिनगारी भी कभी व्यापक विध्वंस खड़ा कर सकती है। सभ्यता के प्रति अनास्था बढ़ती गई और उस खतरे को न समझा गया तो इसकी प्रतिक्रिया वैसी ही होगी जैसी कि अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की।


इंग्लैण्ड का बादशाह (kahani)

इंग्लैण्ड का बादशाह जेम्स था। बादशाह को न धन की कमी थी और न यश की फिर भी वह लोगों को तुच्छ अहंकार वृत्ति का पोषण कर धन संचय में लगा हुआ था। अमीरों को धन के बदले उपाधियाँ बेचता था। सब जानते हैं कोरी उपाधियाँ मनुष्य को महान नहीं बना सकतीं। सद्गुण ही उसे महानता की ओर अग्रसर करते हैं। फिर भी कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो झूठी उपाधियाँ पाकर अपने अहं की तुष्टि करते हैं और दूसरे लोगों के सम्मान की अपेक्षा करते हैं।

एक बार सम्मान प्राप्ति की इच्छा से एक व्यक्ति उसके दरबार में आया। बादशाह को समझते देर न लगी उन्होंने पूछा-’आपको कौन सी उपाधि चाहिए ?”

‘मैं सज्जन बनना चाहता हूँ।’

बादशाह चौंका। इस तरह की उपाधि लेने के लिए आज तक कोई व्यक्ति न आया या। वह कुछ क्षण सोचता रहा फिर पूछा-मैं आपको सर, ड्यूक और लार्ड जैसी उपाधियों से विभूषित कर सम्मान तो दिला सकता हूँ, पर सज्जन बनाना मेरे वश की बात नहीं। क्योंकि कोई मनुष्य उपाधि से नहीं- श्रेष्ठ कार्यों से ही सज्जन बनता है।’

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आशा जगाएँ प्रशंसा करें और प्रोत्साहन दें

प्रशंसा और प्रोत्साहन के आधार पर ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। अन्न और जल जिस प्रकार शारीरिक विकास के लिए आवश्यक है उसी प्रकार मानसिक विकास के लिए प्रशंसा और प्रोत्साहन की उपयोगिता मानी गई है। व्यक्ति अपने सम्बन्ध में जैसी निन्दा, प्रशंसा को क्षुद्र या महान होने की बातें सुनता रहता है, उसकी मान्यता अपने बारे में वैसी ही बन जाती हैं।

मनुष्य के अन्तः करण में अच्छी और बुरी वृत्तियाँ सोई पड़ी रहती हैं। बाह्य वातावरण से प्रभावित होकर उसके जीवन में धूप-छाँह की भाँति काली, सफेद छाया डालती रहती हैं। जिस वृत्ति को समाज में आश्रय मिल जाता है वह स्थिर रहती है जिसकी उपेक्षा होती है वह धीरे-धीरे विनष्ट होने लगती है। जिन बच्चों को आरम्भिक जीवन में नालायक, बेवकूफ, बदमाश आदि कहा जाता रहा है उनका व्यक्तित्व जीवन में कभी प्रभावशाली न बन सकेगा। जिन बच्चों को बचपन में स्नेह और सम्मान नहीं मिल पाता वे बड़े होने पर निकृष्ट प्रवृत्तियों से ग्रसित हो जाते हैं।

बच्चे हों या बड़े यह आवश्यकता सभी में समान रूप से बनी रहती है। हर किसी को अपनी प्रशंसा प्रिय है। जब दूसरे लोग हमारे किसी कार्य या गुण की प्रशंसा करते हैं तो हमारा मन प्रसन्नता से पुलकित हो उठता है। वे गुण धीरे-धीरे हमारे स्वभाव के अंग बन जाते हैं। जिन कार्यों को प्रोत्साहन मिलता है वैसे कार्य बार-बार करने की मन में प्रेरणा जागृति होती है।

प्रायः मनुष्य को अपने गुणों, अपनी शक्तियों व अपने महत्व का सही-सही ज्ञान नहीं होता। इसके मूल्याँकन के लिए दूसरों की सम्मति की आवश्यकता होती है। अतएव हम जहाँ कहीं भी अवसर मिले प्रशंसा करने और प्रोत्साहन देने से न चूकना चाहिए। अपने मित्र, स्वजन-सम्बन्धी, परिचित-अपरिचित जो भी व्यक्ति हमारे सम्पर्क में आवें उसके गुणों की प्रशंसा, सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करते रहना चाहिए। हर व्यक्ति में कुछ न कुछ गुण व अच्छाइयाँ विद्यमान रहती हैं। किसी व्यक्ति के हृदय में हम गुणों की राह से ही प्रवेश कर सकते हैं। जिसमें जो गुण दिखाई दें उसकी चर्चा, प्रशंसा उस व्यक्ति का प्रभाव उस पर पड़े बिना न रहेगा। किन्तु इस बात की सतर्कता बरतें हमारी प्रशंसा चापलूसी का रूप न धारण कर पाये।

जिस प्रकार दूसरों को अपना समय, धन या सलाह देकर उनका कुछ न कुछ भला किया जा सकता है, उसी प्रकार प्रशंसा और प्रोत्साहन देकर भी अनेकों की भलाई कर सकना सम्भव हो सकता है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि जिसको बार-बार जैसा कहा जाता रहे उसका अन्तर्मन धीरे-धीरे अपने को वैसा ही समझने लग जाता है। उसकी मनोभूमि उसी के अनुरूप ढलने लगती है।

जब कोई व्यक्ति दूसरों के मुँह से अपनी निन्दा, भर्त्सना और तुच्छता की बात सुनता है तो इन आलोचनाओं से उसका मन गिर जाता है। हीनता और निराशा की भावनाएँ उसके मनः प्रदेश पर अपना अधिकार जमा लेती हैं।

ऐसे पुरुष बिरले देखे जाते हैं जो-‘‘निन्दक नियरे राखिये आँगन कुटी छवाय”

कहने वाले कबीर के कथन की पुष्टि करते हुए अपना आत्म-विकास करने में संलग्न रहते हैं। साधारणतः लोक निन्दा, प्रशंसा से हतोत्साहित अथवा उत्साहित होकर अपने मन को घटाते-बढ़ाते रहते हैं।

सुधार की दृष्टि से कभी एकान्त में आत्मीयता के साथ मधुर शब्दों दुर्गुणों की चर्चा की जा सकती है। उस व्यक्ति को अपनी सद्भावना का विश्वास अवश्य करा दिया जाय। यदि कोई व्यक्ति यह मान ले कि अमुक व्यक्ति मुझ से घृणा करता है-तब उसकी सलाह का कोई मूल्य नहीं होगा। उल्टे उस व्यक्ति के हृदय में उसके प्रति शत्रुता का भाव उदय हो जायगा। अपने घनिष्ठ मित्रों के दोष-दुर्गुणों के लिए भी यही सावधानी अपेक्षित है। इस बात का भी हर समय ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी के व्यक्तित्व का निराशाजनक चित्रण न किया जाय।

प्रोत्साहन अपने आप में एक चमत्कार होता है। प्रशंसा और प्रोत्साहन से मनुष्य अपनी शक्ति और सामर्थ्य से कई गुना काम कर जाता है। प्रोत्साहन और प्रशंसा वह जादू की छड़ी है जिसको छूकर साधारण बन्दर महावीर बन जाता है। नास्तिक छात्र नरेन्द्र स्वामी विवेकानन्द हो जाता है। राम की प्रेरणा और प्रोत्साहन पाकर बन्दर और भालू जैसे तुच्छ जीव लंका विजय में समर्थ हुए, कृष्ण के प्रोत्साहन से साधारण ग्वाल-बालों ने गिरि गोवर्द्धन उठाने में सहयोग दिया। युग निर्माण योजना की कहानी भी इससे भिन्न नहीं। पूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीया माताजी के प्रशंसात्मक मधुर वचन एवं प्रोत्साहन भरे पत्र लोगों के प्राणों में अतुल भक्ति भर देते हैं। छोटे-छोटे से दीखने वाले साधारण लोग कितना कार्य कर डालते हैं कि देखने वाले आश्चर्यचकित हो जाते हैं।

भेड़ों के झुण्ड में पले हुए एक सिंह शावक की कथा प्रसिद्ध है जो अपने को भेड़ ही समझता था और घास खाता था। दूसरे सिंह द्वारा आत्मबोध कराने पर उसे ज्ञान हुआ था और वह पुनः अपने को सिंह समझने और वैसा ही आचरण करने में समर्थ हुआ था। हम सब इसी प्रकार की भेड़ें बने हुए हैं। जैसा हमने अपने को समझा है दूसरों ने जैसा कुछ हमें हमारा स्वरूप समझाया है वैसे ही हम बने और ढले हैं। करोड़ों अछूतों की दयनीय स्थिति का एकमात्र कारण यही है। मानव ने ही मानव को मानव नहीं समझा और उन पद-दलित मानवों ने अपने को सचमुच ही निम्नकोटि का जीव समझकर अपने को अछूत समझ लिया और उच्च वर्ण वालों के साथ उठने-बैठने और व्यवहार करने में संकोच करने लगे। एक बार उन्हें उनके सच्चे स्वरूप का बोध कराने की आवश्यकता है।

लोगों को दोष, दुर्गुणों और दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा दिलाने के अनेक उपाय हैं। सामाजिक एवं शासकीय दण्ड, दमन, दबाव, निन्दा, तिरस्कार आदि उपाय भी काम में लाये जाते हैं। कुछ समय के लिए कोई दुर्गुण दब भले ही जाय किन्तु अवसर पाकर पुनः प्रकट हो जाते हैं। कभी-कभी तो प्रतिहिंसा का रूप धारण कर लेते हैं। व्यक्ति के सुधार में दण्ड मार्ग से सच्ची सफलता नहीं मिल सकती। दोषों के उन्मूलन में गुणों के सम्वर्धन का प्रोत्साहन और प्रशंसा का मार्ग सर्वश्रेष्ठ है।

एक पौराणिक कथा है कि विश्वामित्र ने महर्षि वशिष्ठ के पुत्रों का वध कर डाला और छिपकर यह सुनने लगे कि देखें वशिष्ठ इस सम्बन्ध में क्या सोचते हैं? क्या कहते हैं? वशिष्ठ जी अपनी धर्म-पत्नी के शोक को शान्त करते हुए समझा रहे थे कि-विश्वामित्र बड़े तपस्वी हैं। यह दुष्कर्म तो वे किसी आवेश में कर बैठे हैं। हमें उनके प्रति बदले की भावना नहीं रखनी चाहिए। उनकी श्रेष्ठता कभी न कभी निखरेगी, उससे लोक का कल्याण होगा। राज्य को त्याग कर तपस्या में लीन होने वाले विश्वामित्र स्वभावतः दुष्ट नहीं हो सकते। यह अपराध तो उनसे भूल से ही हो गया होगा।” कुटिया में छिपे विश्वामित्र ने जब अपनी प्रशंसा सुनी तो उनका सारा कलुष धुल गया और वशिष्ठ के चरणों पर गिरकर अपनी भूल पर फूट-फूटकर रोने लगे। सुधार का यही सबसे प्रभावशाली तरीका है।

प्रशंसा और प्रोत्साहन का यह ढंग दूसरों की सत्प्रवृत्तियों को जागृत करने वाला तो है ही, इससे अपने आपको भी बड़ा लाभ है। यदि हम प्रशंसा और प्रोत्साहन करने का अपना स्वभाव बना लें तो हमारे शत्रुओं की संख्या तेजी से घटती चली जायगी और मित्रों की संख्या में कई गुनी वृद्धि होती चली जायगी। बिना एक पैसा खर्च किये दूसरों का भारी उपकार करने का यह गुण अपने में विकसित करके परमार्थ का पुण्य प्राप्त करते रह सकते हैं। जीवन विद्या के इस अत्यधिक महत्वपूर्ण तथ्य को हमें हृदयंगम कर ही लेना चाहिए।

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माँसाहार मानवता के प्रति अपराध

माँसाहार के पक्ष में जितनी दलीलें दी जाती हैं इस एक के अतिरिक्त और सभी थोथी हैं। जो दलील सही है वह यह कि मनुष्य के भीतर रहने वाले शैतान को अपनी निर्मम क्रूरता के साथ सहनृत्य करने का अवसर मिलता है। यदि पौष्टिक आहार की बात कही जाय तो माँस में पाया जाने वाला प्रोटीन, दालों की तुलना में कहीं घटिया है और उसके सहारे पशुओं के रोगों और उनकी आदतों को शरीर में प्रवेश कर जाने की पूरी-पूरी गुंजाइश है। शाकाहार की उत्कृष्टता स्पष्ट है। माँसाहारी जन्तु शाकाहारी जन्तुओं का ही शिकार करते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि माँसाहारी जीवों के शरीर में विषाक्तता कितनी बड़ी मात्रा में भरी रहती हैं। सिंह और भेड़िया एक दूसरे का माँस नहीं खाते और न बाज, चील, गिद्ध आपस में झपटते हैं, उनकी घात शाकाहारी पशु-पक्षियों पर ही रहती है। क्योंकि माँसाहारी की तुलना में शाकाहारी का शरीर कितना विशुद्ध रह सकता है, इस तथ्य को वे रक्त पायी प्राणी भी जानते हैं। मनुष्य की बुद्धि ही है जो इस सीधे-सीधे तर्क की अवहेलना करके माँसाहार का समर्थन करती है।

स्वाद की दृष्टि से देखा जाय तो भी कच्चे माँस का रूप, गन्ध और स्वाद ऐसे हैं जिसे सरल मानवी प्रकृति कभी स्वीकार नहीं कर सकती। कदाचित ही कोई नरभक्षी क्रूर-कर्मा कच्चे माँस को उदरस्थ करने का साहस कर सके। पकाने, भूनने में जो चिकनाई और मिर्च मसालों की भरमार की जाती है उसी को माँस का स्वाद गिन लिया जाता है। मसालों की भरमार और भूनने-तलने की विधि से तो घास और कंकड़ के भी साग, अचार बन सकते हैं इसमें मूल पदार्थ का स्वाद कहाँ रहा?

पशुओं को मार कर खाने से खाद्य पदार्थों की कमी दूर हो सकती है या अर्थव्यवस्था में बढ़ोतरी हो सकती है- अर्थ शास्त्रियों को इस तरह समझाना मानवी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता के साथ खिलवाड़ करना है। तथ्यों को झुठलाना भी। पशुओं के श्रम और उनके दूध, घी आदि से खाद्य पदार्थ जितनी मात्रा में उगाये जा सकते हैं उतने उनको नष्ट करके उन्हें फाड़-चीरकर खा जाना बिलकुल सोने के अण्डे देने वाली मुर्गी के सारे अण्डे एकबारगी निकाल लेने के लिए उसका पेट चीर डालने के समान ही मूर्खतापूर्ण है। उनके गोबर का सदुपयोग करके उतना खाद्य पदार्थ उगाया जा सकता है जो माँस की तुलना में भार और मूल्य दोनों ही दृष्टि से कहीं अधिक होगा। अर्थशास्त्र को जिन्हें मोड़ना-मरोड़ना नहीं है वे यह भ्रम उत्पन्न नहीं कर सकते कि पशुओं को मार-काटकर समाप्त कर देना उनके माँस को उदरस्थ करना खाद्य समस्या अथवा अर्थ समस्या का कारगर हल है। नकली चमड़े के उत्पादन की विधियाँ कार्यान्वित हो रही हैं इसलिए चमड़े की आवश्यकता के बहाने पशु वध के औचित्य का कोई कारण शेष नहीं रह जाता।

माँसाहार के पक्ष में दी जाने वाली सभी दलीलों का खोखलापन तर्क और तथ्य की कसौटी पर कसा जा सकता है और उस बकवास की व्यर्थता की थोड़ी सी बुद्धिमत्ता का प्रयोग करके सहज ही समझा जा सकता है। पर उस दलील का कोई जवाब नहीं कि मनुष्य के अंतरंग में किसी कौने में शैतान और पिशाच भी छिपा बैठा रहता है और उसकी तृप्ति क्रूर-कर्मों के बिना नहीं हो सकती पाप और अनाचार के लिए ही वह आतुर रहता है। फिर कानून एवं दण्ड की पकड़ से बचकर यदि नृशंसता का खेल खेलना सम्भव हो तो क्यों न खेला जाय ? प्राणियों के मरण चीत्कार को-व्याकुल तड़पन को देखते, बढ़ाने का मनोरंजन लाभ क्यों न लिया जाय ?

कैनेडियन थियोसोफिस्ट ने अपने देश में कछुए की पीठ से बने विभिन्न कलात्मक उपकरणों की वृद्धि की चर्चा करते हुए लिखा है- कछुओं की पीठ काट ली जाती है और फिर उन्हें मार्मिक वेदना सहते हुए नई पीठ उत्पन्न करने के लिए जीवित रहने दिया जाता है। इस प्रकार बार-बार उनके साथ नृशंस व्यवहार किया जाता रहता है। प्रायः 73000 पौंड से अधिक वजन के कच्छप उपकरण तो विदेशों को ही निर्यात किये जाते हैं। इस देश में होने वाली खपत तो और भी अधिक है।

विभिन्न प्रकार के शृंगार साधन बनाने के लिए आये दिन लाखों-करोड़ों प्राणियों को बलिवेदी पर चढ़ना पड़ता है। हाथी दाँत, रोएँदार खाल, मृग मद, लाख के खिलौने, मोम के पदार्थ, रेशम के वस्त्र, मोती-आभूषण उपयोग करने वाले यदि यह देख, समझ पाते कि उनकी इस विलासिता के लिए कितने प्राणियों को किस प्रकार करुण चीत्कार करते हुए अपने प्राण देने पड़ते हैं तो उन्हें अपने ऊपर घोर घृणा ही आ सकती थी। मछलियों को उबाल कर निकाले जाने वाला तेल हजारों टन नित्य इसलिए पिया जाता है कि इससे शरीर पुष्ट होगा, पर साथ ही उसके कारण उत्पन्न होने वाली आन्तरिक निकृष्टता और उसकी हानिकारक प्रतिक्रिया को भी सोचा जाता तो प्रतीत होता कि यह लाभदायक नहीं हानिकारक प्रयास है। औषधियों के नाम पर अब नये किस्म के बूचड़खाने खड़े हो रहे हैं। परीक्षण और अन्वेषण के नाम पर जिस प्रकार मूक प्राणियों की तिल-तिल करके हत्या की जाती है उसे मानवता के न्यायालय में कदाचित ही समर्थन मिल सके।

भूतकाल में सौन्दर्य प्रसाधन भी थे और औषधियाँ भी। तब न तो सौन्दर्य का अभाव खलता था और न सफल चिकित्सा क्रम में कोई बाधा पड़ती थी। अब प्राणियों के इस प्रकार उत्पीड़न से जो प्रसाधन उपलब्ध किये गये हैं उसके निर्माता कहते कुछ भी रहें तथ्य यही कहते रहेंगे कि इससे न तो मानवी स्वास्थ्य की सुरक्षा हुई है और न शोभा, सौन्दर्य का स्तर ऊँचा उठा है। इसके विपरीत हमें मानवी उत्कृष्टता की भयावह क्षति करने वाले गर्त में ही धंसते चले गये हैं और उसके दुष्परिणाम वर्तमान में ही नहीं भविष्य में भी भुगतने के लिए विवश होंगे।

अमेरिका के नेचुरल हाईजिनिक सोसाइटी के डॉक्टर शेल्टन ने रहस्योद्घाटन किया है कि पशु अंगों से बनाई जाने वाली दवाएँ तत्काल भले ही कुछ लाभ करती हों, पर पीछे लकवा, केन्सर, स्नायु, विघटन जैसे भयानक रोग उत्पन्न करने का कारण बनती हैं। घोड़े से बनाये गये सीरम का उपयोग करने वाले रोगी, बड़ी मात्रा में लकवे के शिकार हुए हैं।

लन्दन की वेजीटेरियन ऐसोसिएशन ने कुछ समय पूर्व एक हजार लड़कों को शाकाहार पर तथा उसी नगर की काउन्टी कोन्सिल ने एक हजार बच्चों को माँसाहार पर छह महीने तक रखा और यह परीक्षण किया कि इस आहार अन्तर का क्या प्रभाव पड़ता है ? स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दोनों वर्गों की बारीकी से परीक्षा की और पाया कि माँसाहारियों की तुलना में शाकाहारियों का स्वास्थ्य तथा वजन कहीं अधिक अच्छा रहा।

न्यूयार्क ट्रिब्यून के भूतपूर्व सम्पादक ‘हरेस ग्रीरेले’ ने अपने लम्बे अनुभव और प्रामाणिक अन्वेषण के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था कि माँसाहारी की तुलना में शाकाहारी दस वर्ष अधिक जी सकता है।

मार्क्स ओरेलियस - चार्ल्स ब्रेल्ड, क्लेजियस, एमर्सन, प्लुटार्क प्रभृति विचारकों ने मावन समाज में बढ़ रहे माँसाहार पर भी चिन्ता व्यक्त की है और आशा प्रकट की है कि इस प्रचलन का प्रभाव भावनात्मक उत्कृष्टता की जड़ें खोखली कर देगा। मनुष्य क्रमशः अधिक क्रूर, स्वार्थी और पतनोन्मुख होता चला जायगा। जिसका परिणाम व्यक्ति और समाज दोनों को घातक प्रतिफलों के रूप में भुगतना पड़ेगा।

दार्शनिक कालरिज कहते थे-‘जो प्राणियों से प्यार करता है उसे ही सच्चा प्रभु भक्त कहना चाहिए। भक्ति जिस अन्तःकरण में निवास करेगी वह प्रभु की प्रजा को सताने का क्रूर कर्म कर ही नहीं सकेगा।’

पाइथागोरस ने लिखा है-‘लोगों ने तुम्हारे भोजन के लिए बिना रक्त बहाये, उत्तम भोजनों की व्यवस्था मौजूद की है। फिर क्यों पाप-पूर्ण अखाद्य माँस के लिए ललचाते हो। वह मत खाओ जो तुम्हारे लिए सर्वथा अयोग्य है।

जार्ज बर्नार्डशा का कथन है-युद्धों की उत्पत्ति, अपराधों की वृद्धि, मनोविकार की बाढ़ आवेश और क्रूरता युक्त प्रकृति का प्रधान कारण बढ़ता हुआ माँसाहार ही है।

जे0 जे0 औसले लिखित ‘दी गास्पेल आफ होली ट्वैल्स’ पुस्तक में यह सिद्ध किया है कि ईसाई धर्म की आत्मा माँसाहार की अनुमति नहीं दे सकती। भले ही प्रचलित प्रथा के अनुसार उसका खण्डन न किया जाता हो।

सर कालिन कार्बेट की पुस्तक ‘दी रिंगिग रेडियन्स’ में माँसाहार से होने वाली भावनात्मक क्षति के अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह सिद्ध किया है कि माँसाहार की बुरी आदत को प्रश्रय देने वाले के लिए आन्तरिक उत्कृष्टता प्राप्त कर सकना कितना कठिन हो जाता है।

मारगरेट अस्पताल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ0 ओल्ड फील्ड का कथन है कि ‘माँस मनुष्य के लिए अप्राकृतिक खाद्य है। उसका बढ़ता हुआ उपयोग जन साधारण के लिए स्वास्थ्य संकट उत्पन्न कर रहा है। माँस भक्षण का दुष्परिणाम कालान्तर में साँघातिक रोगों का रूप धारण करता है।’

ऐनी बीसेन्ट ने कहा था-‘पशु हत्या से मानवी प्रकृति में क्रोध, आवेश, कामुकता, ईर्ष्या, प्रतिशोध जैसे अमानुषी उच्छृंखल तत्व बढ़ते हैं। माँसाहार से शरीर की ही नहीं मन की भी रुग्णता बढ़ती है। काटे गये पशुओं का चीत्कार मनुष्य जाति पर नाना प्रकार की विपत्तियाँ बनकर बरसता है।

चार्ल्स ब्रैन्ड ने संसार के महामानव की एक सूची तैयार की है और बताया है कि वे सभी शाकाहारी थे, माँसाहार को उन्होंने कभी स्वीकार नहीं किया। इन महामानवों में बुद्ध, कन्फ्यूशियस, जोरास्टर, मूसा, ईसा, इम्पीडोललस, पाइथागोरस, सुकरात, प्लेटो, होमर, पारफाइरियस, लुक्रेजियस, सिसरो, होरेस, यूरेपीडीज, स्पाइजेसिन, न्यूटन, लोवारडोदा, विन्सी, क्याडानों, सन्तफ्राँसिस, गैसेडी, लिट्टर मिल्टन, फ्रेंकलिन, सन्त पीयरे, वायरन, शैली, मिचलेट, दान्ते, वालटर, टॉलस्टाय, रेवलूज, फ्राँज, हार्टमान, बर्नार्डशा, कार्मन साइलावा, जैमेन हाफ, वाल्टेयर, रूसो, नित्से, वेगनर, शोपनहार, हुम्वोल्ट, लेवेनीज, लिग्ने, क्यूनियर, नित्से, ह्मूफलैण्ड, वेलासी, एडीशन, गोइथे आदि का सप्रमाण उल्लेख है।

मानवी महानता और करुणा का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। महान व्यक्ति करुणा से ओत-प्रोत होते हैं अथवा करुणा की प्रतिक्रिया महानता के रूप में परिणत होती है। जो भी हो करुणा और महानता एक ही तथ्य के दो पक्ष है जहाँ मानव आदर्शों को सामने रखेगा वहाँ माँसाहार के लिए कोई उत्साह न रह जायगा।


Quotation

जो मैं कहता हूँ वह परम्परागत है, ऐसा समझ उसे सच न मान लो। अपनी पूर्व परम्परा के अनुसार है, यह समझकर भी सच न मान लो, ऐसा होने वाला है, यह समझकर भी सच न मान लो। लौकिक न्याय समझ कर भी सच न मान लो। सुन्दर लगता है, इसलिए भी सच न मान लो। प्रसिद्ध साधु हूँ, यह समझ कर भी सच न मान लो। तुम्हें अपनी विवेक बुद्धि से मेरा उपदेश सच लगे, तो ही तुम इसे स्वीकार करो।

-भगवान बुद्ध

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शाकाहारी भोजन ही पूर्ण है।

किसी भयंकर रोग से ग्रसित होकर अधिकाँश रोगी जब किसी चिकित्सक के पास उपचार हेतु जाते हैं तो वे स्वास्थ्य लाभ तथा शक्ति संवर्द्धन हेतु माँस तथा अण्डा खाने के लिए परामर्श देते हैं। सामान्य बुद्धिजीवी वर्ग के मस्तिष्क में भी यह भ्राँति धारणा घर कर गई है कि स्वास्थ्य की रक्षा तथा शक्ति प्राप्त करने के लिए माँसाहार आवश्यक है, पर वास्तविकता इसके परे है।

शरीर विज्ञान के विशेषज्ञों का कहना है कि शरीर को शक्ति और स्फूर्ति उस खाद्य पदार्थ से प्राप्त होती है जिसे पाचन संस्थान ठीक से पचा लेता है। माँस का 75 प्रतिशत भाग हानिकारक तथा गंदा पानी होता है। यह शरीर को दूषित करता है। माँस गरिष्ठ पदार्थ है जो देर में ही नहीं पचता अपितु इसका कुछ भाग बिना पचा भी रह जाता है जो आंतों में चिपक कर सड़ने लगता है। शाकाहार की अपेक्षा माँसाहार को पचाने के लिए जिगर को कई गुना अधिक श्रम करना पड़ता है जिससे जिगर की कार्य क्षमता कुप्रभावित होती है। माँस में पाये जाने वाले फास्फोरस का विघटन करने के लिये जितने कैल्शियम की आवश्यकता पड़ती है उतना शरीर में नहीं होता अतः अलग से कैल्शियम के लिये विटामिन डी0 की आवश्यकता होती है।

माँस, शराब और चाय की तरह एक उत्तेजक पदार्थ है जिसके खाने के बाद एक प्रकार की स्फूर्ति अनुभव होती है, पर यह स्फूर्ति माँसाहार की नहीं वरन् पूर्व में किये गये सुपाच्य भोजन की होती है माँसाहार शरीर में आवश्यकता से अधिक ताप उत्पन्न करता है जिससे मनुष्य सुस्त तथा आलसी बन जाता है। उसकी बुद्धि की प्रखरता भी समाप्त हो जाती है अधिकतर व्यक्तियों को माँस खाने के बाद चाय, काफी या मदिरा जैसे किसी उत्तेजक पदार्थ की आवश्यकता अनुभव होती है।

प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सक जानकीशरण वर्मा ने माँसाहार की हानियों पर प्रकाश डालते हुए कहा है-‘‘माँस हानिकारक इसलिए है कि जानवर के शरीर के बहुत से टूटे-फूटे रेशे, खून के विकार और जहरीले पदार्थ उसमें रह जाते हैं। जिस समय जानवर मारे जाते हैं उस समय मरने के डर से भी उनके खून में जहर पैदा हो जाता है। इन सब बातों के फलस्वरूप आगे चलकर माँस खाने वालों के शरीर में बहुत तरह के विकार एकत्र हो जाते हैं। माँस का सूप जिसे डॉक्टर लोग बहुत अच्छा बताते हैं अनेक प्रकार के विषों से भरा होता है। उससे रोगी को पहले शक्ति सी मिलती सी प्रतीत होती है किन्तु पीछे विषों के संचय के कारण अनेक भयंकर रोग पल्ले पड़ जाते हैं। यूरोप और अमेरिका में भी माँसाहार का प्रचलन कम होता जा रहा है। वहाँ तो सफेद डबल रोटी और बिस्किट का रिवाज भी कम हो रहा है, पर विलायत की दुम हिन्दुस्तान में वहाँ की छोड़ी हुई चीजें भी बहुत दिनों तक जारी रहती हैं।’’

जर्मनी की होम्योपैथिक चिकित्सक एलिजाबेथ वेगेन माँस को विलासिता की वस्तु तथा जीवन के लिए अनुपयोगी मानती हैं। उन्होंने अपने रोगियों पर यह अनुभव करके देखा है कि जिन व्यक्तियों का जीवन सात्विक, पवित्र तथा स्वास्थ्यवर्द्धक है और जो माँसाहार से बचे हुए हैं उन पर होम्योपैथिक औषधियाँ शीघ्र और स्थायी प्रभाव डालती हैं। ऐसे व्यक्तियों पर संक्रामक रोग के कीटाणु भी शीघ्र आक्रमण नहीं कर पाते। माँसाहारी रोगी को शक्तिशाली औषधियाँ सेवन हेतु देनी पड़ती हैं फिर भी रोग घटने से स्थान पर बढ़ने लगता है। इसीलिए पश्चिमी देशों के अस्पताल स्थायी रोगों से पीड़ित रोगियों से भरे पड़े हैं।

भारत आगमन पर जब यहाँ की पाठ्य पुस्तकों में श्रीमती वेगेन ने माँस और मछली की उपयोगिता पढ़ी तो वे दंग रह गईं, उस समय उनके मुँह से यही निकला कि माँस के बिना भी जीवन को स्वस्थ, मितव्ययी और श्रेष्ठ बनाया जा सकता है। जिन देशों में कसाई घरों की संख्या अधिक है वहाँ युद्ध और अपराधों की संख्या में वृद्धि हो रही है। शाकाहार जीवन को स्वस्थ ही नहीं बनाता वरन् जीवधारियों की निर्मम हत्या के विरुद्ध स्वस्थ वातावरण निर्मित करता है।

योगशास्त्र और आयुर्वेद के सिद्धान्तों के आधार पर यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि शुद्ध, सात्विक, अन्न, फल, दूध और साग-सब्जी आदि से बना भोजन करने वाले तथा माँस, अधिक मसाले, उत्तेजक पदार्थ तथा चर्बीयुक्त भोजन करने वाले व्यक्तियों की शारीरिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षमताओं में अन्तर पाया जाता है। इसीलिये भोजन का सीधा सम्बन्ध शरीर से ही नहीं वरन् मन और मस्तिष्क से भी होता है। ‘जैसा खाये अन्न वैसा बने मन’ वाली कहावत गलत नहीं है। डॉ0 हेग ने ‘खाद्य पदार्थ और भोजन’ नामक रचना में लिखा है-‘माँस भक्षण करने वाला व्यक्ति सर्वतोभावेन अपने शरीर का विनाश करता है। बुद्धि के तमोगुणी हो जाने से विवेकाविवेक का ध्यान नहीं रहता; इसी से समाज के सत्व पदार्थ भक्षी व्यक्तियों के विचारों से इनका मेल नहीं हो पाता।’

विदेशों में अनेक चिकित्सक अपनी चिकित्सा पद्धति में शाकाहारी भोजन को स्थान देकर रोगियों का उपचार करने लगे हैं। वह रोगी को संतुलित शाकाहारी भोजन देकर उसके रोग को समूल नष्ट करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे चिकित्सकों में पश्चिम जर्मनी की महिला चिकित्सक गटुई स्मदिक का नाम विशेष उल्लेखनीय है। उन्होंने 22 रोगी बच्चों पर अपने प्रयोग किये। उन्हें विभिन्न प्रकार की बीमारियाँ थी वे सब शाकाहारी भोजन के सहारे स्वस्थ हो गये। एक बच्चा जो दमे का रोगी था चार दिन में ही इतना स्वस्थ हो गया कि उसे दौरे पड़ने बन्द हो गये। इस बीच किसी को सर्दी नहीं हुई। त्वचा भी सुन्दर और चिकनी हो गई।

अर्द्ध विकसित बच्चों के भोजन में जब हेर-फेर किया गया तो उनकी अस्थियों, दाँतों, बालों और माँस-पेशियों का विकास संतुलित ढंग से होने लगा। टी0 बी0 और मानसिक रोगियों तक ने शाकाहारी भोजन से लाभ उठाया। वृद्ध व्यक्तियों पर शाकाहारी भोजन के प्रयोग से जो परिणाम देखने को मिले वे आश्चर्यजनक थे। थोड़े ही दिनों में उनकी शारीरिक दुर्बलता दूर हो गई और उनकी नेत्र ज्योति में भी वृद्धि हुई। थोड़े ही समय में वे इतने स्वस्थ हो गये कि अपना दैनिक कार्य बिना किसी कष्ट के आसानी से कर सकते थे।

डॉ0 स्मदिक ने शाकाहारी भोजन में सभी प्रकार के पोषक तत्वों का पूरा-पूरा ध्यान रखा था। भोजन में दुग्ध, अन्न, ताजे फल, हरी सब्जी, सलाद आदि शाकाहारी वस्तुओं को सम्मिलित किया था। उन्होंने नाश्ते में सफेद शक्कर तथा मिठाइयों को कोई स्थान नहीं दिया था।

यदि हम आर्थिक दृष्टि से भी देखें तो पता चलेगा कि माँसाहार अधिक खर्चीला भोजन है। मिर्च, मसालों, तेल और घी का भी काफी खर्च इसके साथ जुड़ा हुआ है। लोगों का कहना है कि घर में जिस दिन माँस बनता है उस दिन सामान्य दिनों के अपेक्षा रोटियों की संख्या में वृद्धि हो जाती है। फिर हम माँसाहार द्वारा खाद्यान्न की समस्या को कैसे सुलझा सकते हैं ? अमेरिका की एक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार यह कहा जा सकता है कि माँस भक्षण करने वाले प्रति व्यक्ति पर जितना खर्च आता है उससे शाकाहार करने वाले कम से कम तीन व्यक्तियों का भोजन हो सकता है।

इस तरह यह कहा जा सकता है कि स्वस्थ, सुखी तथा निरोग जीवन व्यतीत करने के इच्छुक लोगों को पूर्ण शाकाहारी होना चाहिए। अलबर्ट स्वाइत्जर ने एक बार कहा था-‘जब तक मनुष्य दूसरे जीवों पर जीवित रहेंगे तब तक इस धरती पर शान्ति नहीं रहेगी।’

माँस की उत्पत्ति किसी, वनस्पति, वृक्ष या पत्थर के खान आदि से नहीं होती। इसका सीधा सम्बन्ध जीव की हत्या से है इसलिए महाभारतकार ने माँसाहारी को महापातकी बताया है-

‘न हि माँसं तृणात् काष्ठात् उपलाद्वापि जायते। हत्व जन्तुं ततोमाँसं तस्माद्वोषस्तु भक्षणे॥’


Quotation

शुभ कार्य करने में शीघ्रता करो, ऐसा न हो जुबान बन्द हो जाय, हिचकियाँ आने लगें और शक्ति जवाब दे जावे।

शुभ कार्यों को अपने हाथों से शीघ्र करो किसी और का मुँह देखना और पीछे की आशा करना झूठा है।

-महात्मा

दुःख-निवृत्ति का केवल एक ही मार्ग है। दुःख का अनुभव सब करते हैं, पर उसका वास्तविक कारण जानने की इच्छा किसी-किसी की ही होती है। दुखी होने से चिन्तित और निराश रहने से दुख की निवृत्ति नहीं हो सकती। वह तो तभी सम्भव है जब उसके मूल कारण को जानकर उसके निवारण का प्रयत्न किया जाय। यह संसार दुख रूप ही है। इसमें जितनी भी वस्तुयें है वे सब क्षणिक और अस्थिर हैं। क्षण-क्षण में उनका रूप बदलता है। जो वस्तु अभी प्रिय दिखती है, कुछ कारण उत्पन्न होने पर थोड़ी ही देर में यह अप्रिय बन जाती है। कामनाओं और वासनाओं का भी यही हाल है। एक तृप्त नहीं हो पाई कि दूसरी नई उपज पड़ी। तृष्णाओं का कहीं अन्त नहीं। वासनाओं की कोई सीमा नहीं, भोग से, संग्रह से उन्हें कौन शान्त कर पाया है। घी डाल कर किसने आग बुझाई है? बहिर्मुखी जीवन से मुख मोड़ कर अन्तर्मुखी दृष्टि अपनाए बिना आज तक किसी को शान्ति नहीं मिली। हमारे लिए भी इसके अतिरिक्त और कोई उपाय या मार्ग नहीं है।

भगवान बुद्ध

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अपनी हथौड़ी से अपने दाँत न तोड़ें

शक्कर को आहार विश्लेषण के अनुसार कार्बोहाइड्रेट वर्ग में गिना जाता है। शरीर में आवश्यक गर्मी बनाये रहने के लिए आहार में इस वर्ग की उपयोगिता को देखते हुए ही अन्न को भोजन का प्रधान भाग माना गया है। गेहूँ, चावल आदि में यही तत्व मुख्य रूप से होता है, अन्य तत्व तो उसमें स्वल्प मात्रा में ही विद्यमान रहते हैं। जिस तर्क के अनुसार अन्न को भक्ष्य ठहराया जाता है उसी के अनुसार मोटे तौर से शकर को आहार में सम्मिलित रखने की उपयोगिता कही जा सकती है।

किन्तु यहाँ शक्कर की संरचना अधिक विचारणीय है। जिसके अनुसार वह कार्बोहाइड्रेट वर्ग की होते हुए भी अपना विशेष प्रभाव छोड़ती और विशेष प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। वह पचने में कई अवयवों की स्वाभाविक क्षमता को चोट पहुँचाती है। बढ़ी हुई तनिक सी भी मात्रा दाँत, आमाशय और जिगर तीनों को क्षति पहुँचाती है और यदि यह क्रम अधिक दिन चलता रहे तो इन तीनों ही अवयवों को इतनी क्षति पहुँच जाती है जिसकी पूर्ति कर सकना उपचार प्रक्रिया से भी बाहर की बात हो जाती है।

अपने जमाने के रोग अभिशापों में अग्रणी है-‘दन्त क्षय’। दाँतों का सड़ना, गलना, टूटना, हिलना, खोखले होना, दर्द करना जैसी अनेकों खराबियाँ उत्पन्न होने से मुख की शोभा कहे जाने वाले दाँत न केवल अपना सौंदर्य खो बैठते हैं, वरन् आहार को चबाने के अपने प्रमुख उत्तरदायित्व से भी इनकार करने लगते हैं। इतना ही नहीं उनके उद्गम स्थल मसूड़ों तक में दाँत की खराबी से सड़न आरम्भ हो जाती है और वहाँ के सड़े हुए जख्म मवाद देते और दुर्गन्ध उत्पन्न करने लगते हैं। ‘पायेरिया’ से ग्रसित व्यक्ति पेट में मुँह का मवाद पहुंचते रहने के कारण पाचन तन्त्र की अपार क्षति सहते हैं। साथ ही मुँह से दुर्गंध आने के कारण दूसरे के सम्मुख मुँह खोलने, बातें करने से भी कतराने लगते हैं। दन्त-क्षय को छोटा रोग समझा जाने के कारण उसकी और अधिक ध्यान नहीं दिया जाता, फिर भी आँकड़ों से यह स्पष्ट है कि रोग का विस्तार तेजी से हो रहा है। सभ्य कहे जाने वाले देशों और परिवारों में इसका आक्रमण अधिक तेजी से होता है। दन्त विशेषज्ञों के अनुसार अगली पीढ़ी के लिए पोपले होने का खतरा बढ़ता चला जा रहा है। अनुवाँशिक प्रक्रिया के अनुसार यदि यह कठिनाई पैतृक बन गई और वंश परम्परा में घुल गई तब फिर अगली पीढ़ियाँ दाँत जैसे उपयोगी आधार से वंचित रहकर पाचन एवं वार्तालाप में असाधारण कठिनाई अनुभव करेंगी।

रूसी वैज्ञानिक प्रो0 ब्लादी मिररुद्की के अनुसार दन्त क्षय का प्रधान कारण शक्कर की अधिक मात्रा और उसका देर तक दांतों के साथ सम्बद्ध रहना ही होता है। स्वाद की दृष्टि से नमक और शक्कर ने हमारी जिव्हा को एक प्रकार से वशीभूत कर रखा है। फलतः मानवी आहार में यह चटोरापन धीरे-धीरे अपनी जड़ें अधिक गहरी जमाता चला जा रहा है। इन दिनों ऐसा आहार कम ही मिलेगा जिसमें ऊपर से इन दोनों चीजों को किसी न किसी रूप से मिलाया न गया हो? यहाँ तक की दूध जैसे प्रकृति प्रदत्त स्वाद से भी काम नहीं चलता। उसमें भी शक्कर ऊपर से मिलानी पड़ती है। दही में शक्कर नहीं तो नमक चाहिए। अब तो फलों की भी खैर नहीं उनके अद्भुत स्वाद प्रकृति के अनुपम उपहार कहे जा सकते हैं, पर उतने से सन्तोष नहीं होता और फलों को काटकर ऊपर से मसाला छिड़कने के बाद ही वे भी सभ्य लोगों के लिए गृहण योग्य बन पाते हैं।

शरीर को जिन खनिजों की जितनी मात्रा में आवश्यकता है उतनी मात्रा अन्न, दूध, फल, शाक आदि स्वाभाविक आहार में सम्मिलित है और वह सहज ही उपलब्ध होती रहती है। आहार शास्त्र की दृष्टि से देखा जाय तो नमक या शक्कर की ऊपर से ली जाने वाली मात्रा अनावश्यक ही नहीं अहितकर भी है। जिव्हा को विकृत न किया गया हो तो नमक का-शक्कर का सीमित और सन्तुलित स्वाद सामान्य आहार से ही मिलता रह सकता है। पाचन की सुविधा के साथ-साथ प्राकृतिक स्वाद का आनन्द लेने की यदि उपयोगिता समझी जा सके तो फिर जीभ के वर्तमान चटोरपन को छोड़ना ही श्रेयस्कर प्रतीत होगा।

दन्त क्षय के सन्दर्भ में उसका अधिक दोष शक्कर के लिए लपकते रहने वाले चटोरेपन को दिया जा सकता है। लोग अपने भोजन में शक्कर की अनावश्यक मात्रा भर लेते हैं। अति का सर्वत्र वर्जन किया गया है इस तथ्य को भूला देने से ही शक्कर का रूप विकृत हो जाता है और वह हानिकर परिणाम उत्पन्न करने लगती है। अन्यथा उसे खजूर, किशमिश, चीकू, आम, खरबूजा, गन्ना जैसे प्राकृतिक सम्मिश्रणों के साथ सीमित मात्रा में लिया जाता रहता तो कार्बोहाइड्रेट की पूर्ति में अपनी लाभ दायक भूमिका भी निभती रह सकती थी।

दाँतों की संरचना पर ध्यान देते हैं तो आश्चर्य होता है कि उस सुदृढ़ दुर्ग को आखिर किस गोलाबारी से नष्ट किया जाता है। दाँतों पर ‘एनामेल’ नामक जो आवरण चढ़ा होता है वह असाधारण रूप से टिकाऊ है। अब तो उतने ही मजबूत कुछ प्यास्टिक भी बन गये हैं, पर पुरातन काल में हीरा ही एकमात्र ऐसा पदार्थ था जिसकी तुलना दाँतों से पर चढ़े एनामेल आवरण से की जा सके। यही कारण है कि वह रासायनिक क्षरण एवं तापमान से होने वाले ऐसे परिवर्तनों को भी सहन कर लेता है जिन्हें ग्रेनाइट जैसा कठोर पत्थर भी सहन नहीं कर पाता। इतना होते हुए भी एक ऐसी विडम्बना उसके साथ जुड़ी हुई है कि ‘शक्कर’ जैसे सामान्य पदार्थ के आघात को वह सहन नहीं कर पाता और उसके साथ लड़ाई लड़ने का अवसर सामने आने पर अतीव दुर्बल सिद्ध होता है। शक्कर के सम्पर्क से दाँत जितनी बुरी तरह गलते हैं उतने और किसी पदार्थ से नहीं।

दन्त विज्ञानियों का बहुत दिन पहले अनुमान था कि अम्ल पदार्थों से दाँत गलते हैं। पर पीछे यह बात आँशिक रूप से सत्य सिद्धि हुई। मुख ग्रन्थियों से निकलते रहने वाले स्रावों में यह विशेषता है कि आहार की सामान्य अम्लता पर चढ़ दौड़ते हैं और उसे कुछ ही समय में निरापद बना लेते हैं। नींबू की अम्लता सर्वविदित है। पर वह मुँह में जाने के बाद इस तरह पटकी, पछाड़ी जाती है कि बात की बात में निरापद बन जाती है और फिर उसके मुँह में या पेट में रहने से किसी प्रकार की हानि नहीं होती। यही बात अन्य पदार्थों के सम्बन्ध में भी है।

शक्कर पर मुख के स्रावों का वैसा प्रभाव नहीं पड़ता। फलतः वह निरापद नहीं हो पाती। आमतौर से खाने के बाद मीठे पदार्थ भी पेट में चले जाते हैं किन्तु यदि पूरी तरह ब्रुस या कुल्ला नहीं किया गया है तो वे दाँतों के बीच रहने वाले खड्डों में धंसे हुए रह जाते हैं अथवा दांतों पर पतली परत के रूप में चिपक जाते हैं। बैक्टीरिया के प्रभाव से वे ‘पोलीमार’ नामक योगिकों के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। इस प्रकार बना हुआ सान्द्रित अम्ल मुख की लार से अनुकूल स्थिति में ढल नहीं पाता और अपनी हानिकारक प्रतिक्रिया दाँतों को नष्ट करने में लगा देता है।

शरीर विज्ञानी मुद्दतों से यह कहते रहे हैं कि ठीक तरह न पची हुई शक्कर आमाशय पेंक्रियाज और जिगर की कार्य पद्धति में भारी अड़ंगा खड़ा करती है। फलतः उपापचयात्मक क्रिया में भारी गड़बड़ी उत्पन्न होती है और शरीर का खनिज सन्तुलन बिगड़ जाता है। मधुमेह मोटापा एवं रुधिर वाहनियों की दुर्बलता में आमतौर से शक्कर खाने के विरुद्ध चेतावनी दी जाती रही है। अब दन्त क्षय को ध्यान में रखते हुए भी शक्कर के सम्बन्ध में सतर्कता बरतने की बात जोरों से कही जाने लगी है। शक्कर की अधिकता से विकृत हुआ खनिज सन्तुलन शरीर की अवरोधक शक्ति को घटा देता है फलतः हानिकारक प्रतिक्रियाओं का अवरोध हलका पड़ने लगता है। दन्त क्षय की सम्भावना उत्पन्न होने पर भी यह अवरोध दुर्बलता अपना सुधारात्मक प्रयोजन ठीक तरह पूरा नहीं कर पाती और वहाँ का क्षरण निर्बाध गति से चलता रहता है।

दांतों के खड्डों में अथवा परत रूप से चिपकी हुई शक्कर-बैक्टीरिया के सम्पर्क से पोलीमार, प्लैक्स का अम्लीय भाग दाँतों को कुतरना शुरू कर देता है और जिस तरह छोटा सा घुन मजबूत लकड़ी को खोखला कर देता है वैसा ही उपक्रम इस अम्लीय प्रतिक्रिया द्वारा चल पड़ता है। यहीं से दन्त-क्षय की नींव पड़ती है और बढ़ते-बढ़ते किसी समय यही चिनगारी ज्वाला की तरह फूट पड़ती है।

इस विपत्ति से बचने के लिए अच्छा यही है कि ऊपर से मिलाई जाने वाली शक्कर को अपनी आहार रुचि में से बहिष्कृत कर दिया जाय और आवश्यकतानुसार उसे मीठे पदार्थों के रूप में लिया जाय। यों सामान्य अन्न भी मुँह की लार और पेट के रसों के समन्वय से पेट में पहुँचते-पहुँचते शक्कर के रूप में परिणत हो जाता है। यह क्रिया मुँह से ही आरम्भ हो जाती है। देर तक रोटी का ग्रास मुँह में चबाया जाता रहे तो उसके स्वाद में मिठास का आविर्भाव हुआ सहज ही अनुभव किया जा सकता है। ऐसी दशा में बाहर से अतिरिक्त शक्कर लेने की शरीर को कोई विशेष आवश्यकता नहीं रह जाती है। यदि उसकी कमी अनुभव की जाय तो मीठे फल भी सस्ते दाम में मिल सकते हैं और उस आवश्यकता की पूर्ति कर सकते हैं। खजूर आदि में शक्कर के साथ-साथ अन्य ऐसे पदार्थ भी मिले रहते है जो उसे पचाने में सहायता करते हैं और वैसी गड़बड़ी उत्पन्न नहीं होने देते जैसी कि खालिस चीनी से उत्पन्न होती है।

तरह-तरह की मिठाइयाँ, टाफियाँ, लोलीपाप, लेमन ड्राप, मीठे बिस्किट आदि में जो लस रहता है वह दाँतों से, मसूड़ों से लिपट जाता है और वहाँ आराम से अड्डा जमाकर अपना कतरव्योंत करने में जुट पड़ता है। जिसका परिणाम समयानुसार दन्त-क्षय तथा मसूड़ों की विकृतियों के रूप में सामने आता है।

दांतों का स्थानीय उपचार आवश्यक तो है, पर पर्याप्त नहीं। उपचार रोगजन्य कष्ट उत्पन्न होने के उपरान्त आरम्भ होता है जबकि उतने समय तक तो विनाश की आधी मंजिल पूरी हो चुकी होती है। विनाश की गति मन्द हो तो हमें उसका पता भी नहीं चलता। उपद्रवों और आक्रमणों से जूझने की जो प्रक्रिया भीतर ही भीतर चलती रहती है उसका आभास प्राप्त करने का भी कोई साधन अपने पास नहीं है। पानी जब सिर से ऊपर निकल जाता है और बात असहाय हो जाती है तब पीड़ा उभर कर ऊपर आती है। अपने निजी साधन चुक जाने पर ही कोई भला आदमी बाहरी सहायता की पुकार करता है। शरीर की शालीनता जब देखती है कि अपनी निजी अवरोध शक्ति चुक गई तब वह ताप, सूजन, दर्द आदि के रूप में बाहरी सहायता की गुहार मचाती है और अपनी अन्तः व्यवस्था से काम न चल पाने की घोषणा करती है। दवादारु की बात तब कहीं सोची जाती है और उसी स्थिति में चिकित्सकों का दरवाजा खटखटाया जाता है। यह तो आधा घर जल जाने और आग की प्रचण्ड लहरें उठने लगने के उपरान्त फायर ब्रिगेड की दौड़-धूप जैसी बात हुई। बीमारी अच्छी भी हो जाय, आग बुझ भी जाय तो भी जो क्षति हो चुकी उसकी भरपाई कोई बीमा कम्पनी नहीं कर सकती।

अच्छा हो हम अपने हाथों, अपने पैरों पर कुल्हाड़ी चलाने की आदत छोड़ें और अपनी हथौड़ी से अपने हीरा-मोती जैसे सुदृढ़ और सुन्दर दांतों को न तोड़ें। इसके लिए शक्कर की अनावश्यक मात्रा उदरस्थ करने की आदत छोड़े। सफेद चीनी से तो परहेज करना आरम्भ कर ही दें। इससे तो गुड़ कही अच्छा है जिसमें खनिजों और लवणों का उपयोगी अंश तो शेष रह जाता है जबकि शक्कर में मिठास की छूँछ ही बाकी रहती है। उसे निचोड़े हुए नीबू के बचे खुचे छिलके के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता।

कार्बोहाइड्रेट की आवश्यकता पूरी करने के तर्क को लेकर अनावश्यक मात्रा में प्रयुक्त होने वाली सफेद चीनी की वकालत नहीं की जा सकती। फिर यदि उसे लेना ही हो-किसी प्रकार स्वाद का संयम नहीं ही बन पड़ रहा हो- तो उतना तो करना ही चाहिए कि प्रत्येक भोजन के बाद भली प्रकार कुल्ला करने की आदत डाली जाय। यह चिन्ह पूजा के लिए किये जाने वाले धर्म-कृत्यों की तरह नहीं, वरन् सफाई का प्रयोजन भली प्रकार कर सकने के लिए होना चाहिए। हर आहार के बाद-विशेषतया उस भोजन के बाद जिसमें मिठास सम्मिलित हो अनिवार्य रूप से भली प्रकार कुल्ला करने का नियम पालन किया जाना चाहिए। प्रातःकाल तो मुँह का स्वाद और गन्ध ठीक करने के लिए सभी लोग कुल्ला दाँतोन करते हैं, पर इतने से ही काम नहीं चल सकता। उठते समय की तरह ही रात को सोते समय भी कुल्ला करने की आदत डालनी चाहिए। दन्त क्षय में यह उपेक्षा भी बड़ी हानिकारक सिद्ध होती है कि रात्रि को सोते समय मुँह साफ करने की आवश्यकता न समझी जाय। रात को आहार के जो कण दांतों के इर्द-गिर्द जमा रह जाते हैं वस्तुतः उन्हीं को रात भर चुपचाप सड़ते रहने और अपनी विनाश लीला निश्चिन्त होकर चलाते रहने का अवसर मिलता है। रोगों के उपचार से पूर्व उनके उत्पन्न करने वाले कारणों को रोकना अधिक बुद्धिमत्ता पूर्ण है। ठीक यही नीति दन्त क्षय जैसे विनाशकारी रोग की रोकथाम के लिए प्रयुक्त की जानी चाहिए। शक्कर की लिप्सा घटाने और दांतों की समुचित सफाई करते रहने जैसी छोटी आदतें हमें दन्त क्षय जैसे भयंकर रोग से सहज ही त्राण दिला सकती हैं।

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समृद्धि ऐसे चरण चेरी बन गई

कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी यदि व्यक्ति अपना आत्म-विश्वास, साहस, सूझबूझ और आत्म-बल न छोड़े तो कोई कारण नहीं कि परिस्थितियों को हार न माननी पड़े। अर्थाभाव के कारण हजारों लाखों नहीं करोड़ों लोग दिन-रात चिन्ता और निराशा के थपेड़ों में अपनी जीवन नैया खेने का प्रयास करते हैं। परन्तु जो लोग इन अन्धड़ों में आशा और पुरुषार्थ की पतवार बाँध सके, उसने न केवल परिस्थितियों को परास्त कर दिखाया वरन् अपने ही समान अन्य व्यक्तियों के लिये भी एक अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया।

भले ही ऐसे व्यक्तियों की संख्या अँगुलियों पर गिनने योग्य हो पर है अवश्य और अंगुली पर गिनने लायक भी इसलिये कि अधिकाँश व्यक्ति निर्धनता और धनभाव के सामने इस प्रकार घुटने टेक देते हैं कि उन्हें कुछ करने की सूझ ही नहीं पड़ती। जो अपना संतुलन बनाये रखते हैं, वे कोई ऐसा मार्ग अवश्य निकाल लेते हैं, जिससे कि समृद्धि उनकी चरण चेरी बन जाये। दुनिया में लगभग सभी व्यक्ति सुबह-शाम चाय का व्यवहार करते हैं और चाय पीने वाले लिप्टन की चाय से भी परिचित हैं? पर यह जानने वाले लोग शायद कम ही होंगे कि लिप्टन कौन थे और पहले क्या करते थे? उनका परिचय उनके शब्दों में इस प्रकार है।

‘‘मैंने अपना जीवन एक स्टेशनरी की दुकान में काम करने वाले लड़के के रूप में आरम्भ किया। उस समय मुझे दस शिलिंग डालर रोज मिलते थे और इसी शुरुआत के बाद मैंने आगे बढ़ना शुरू किया तथा किफायतशारी के नियमों पर चल कर अपने व्यापार को संसार भर में बढ़ा सका हूँ जिन्दगी में मुझे फिजूल खर्ची से सख्त नफरत रही है। जो काम मैं खुद कर सकता था उसे मैंने दूसरों पर कभी नहीं छोड़ा। जो काम दो डालर में हो सकता था उसके लिये सवा दो डालर कभी खर्च नहीं किये और न मैंने कभी किसी प्रकार की व्यर्थ की जरूरतों को अपने पीछे लगाया।

दस शिलिंग प्रति सप्ताह से अपना जीवन आरम्भ करने वाले टौमस लिप्टन की आमदनी लाखों डालर प्रति सप्ताह तक बढ़ गयी। आज संसार भर में उनके छह हजार से अधिक कम्पनी एजेन्ट हैं और उनका व्यापार भी प्रायः विश्व के सभी देशों में फैला हुआ है।

परिस्थितियाँ तो शायद ही कभी किसी के लिये सहायक बनती हों। प्रायः तो लोग उनसे अपने विकास में बाधाएं ही अनुभव करते हैं, पर ऐसे पुरुषार्थी व्यक्ति भी हैं जो उनमें से भी आगे बढ़ने की राह निकाल लेते हैं। ऐसे ही एक व्यक्ति थे डेविडसन राकफैलर। जिन्हें अपना तथा अपनी माँ का पेट पालने के लिये एक पड़ौसी के मुर्गीखाने में सवा रुपये रोज पर काम करना पड़ा। कभी वे खेतों में आलू खोदने जाते तो कभी कोई मजदूरी खोजने। लेकिन उन्होंने नित्यप्रति की इस आमदनी से थोड़ा बचाना आरम्भ किया और बचत से अपना एक नया काम शुरू किया। और पचास वर्ष की आयु तक पहुँचने पर उनकी गणना संसार के अरब पतियों से की जाने लगी।

कंगाली से समृद्धि तक की यात्रा सफलतापूर्वक पूरी कर लेने का गुप्त रहस्य बताते हुए उन्होंने एक अवसर पर कहा था-मैं अपने पुरुषार्थ पर विश्वास करता हूँ। आरम्भ से ही अपनी माँ के गुर को अपनी गाँठ से बाँध कर सदैव बचत का ध्यान रखा और प्रतिदिन, प्रतिमाह, प्रतिवर्ष कितनी बचत हुई इसका ध्यान रखता रहा।

बचत ही नहीं मितव्ययिता भी समृद्धि के लिए आवश्यक है और उसके लिए व्यक्ति का संयमी होना अत्यावश्यक है –‘‘मैं शराब, तंबाकू, जुआ इत्यादि को महंगी और बेकार चीजें मानता हूँ। मुझे मिथ्याडम्बर से घृणा है। प्रदर्शन की आदत को मैं मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी समझता हूँ। मैंने कभी भूलकर भी शराब और तम्बाकू को हाथ नहीं लगाया और डालर का स्वामी होने के बावजूद भी किफायतशारी नहीं त्यागी। साधारण सी वस्तुओं में भी ठगे जाने के लिए मैं कभी राजी नहीं हुआ।”

पिछड़े, उपेक्षित और अविकसित लोगों को आगे बढ़ाने के लिए डेढ़ अरब रुपयों का दान देने वाले ऐंड्र्रयू के जीवनकार ने उनके जीवन चरित्र में लिखा है-‘‘वे लोग गरीब थे। खाने के लिए अन्न और पहनने के लिए कपड़ों का जुगाड़ तो किसी प्रकार हो जाता था किन्तु हारी बीमारी में डॉक्टर या वैद्य को दिखा लेने की भी उनकी हैसियत नहीं थीं एण्ड्रयू कार्नेगी का पिता एक गरीब जुलाहा था जो कपड़ा बुनकर जैसे-तैसे अपने परिवार का निर्वाह करता था। पहले वे लोग स्काटलैण्ड में रहते थे पर बाद में अमेरिका जाकर बस गये। पति की आय घर खर्च के लिए पूरी नहीं पड़ती इसलिये उसकी पत्नी एक दुकान में जूते सीने और कपड़े धोने का काम किया करती थी। इतने पर भी ऐण्ड्रयू कार्नेगी के पास कपड़े का एक जोड़ा रहता था जिसे माँ रात को सोने से पहले धोकर सुखाने के लिए रख देती।”

कार्नेगी को स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने का अधिक अवसर नहीं मिला। शीघ्र ही अपन निर्धन परिवार की सहायता के लिए उन्हें पीट्सवर्ग के तारघर में हरकारे की नौकरी करनी पड़ी जिसमें आये हुए टेलीग्रामों को बाँटने के लिए जाना पड़ता था। यहीं कार्नेगी की महत्वाकाँक्षा जगी कि किसी प्रकार तार बाबू बन जाये और उन्होंने अपने सोने का समय कम कर तार भेजने की विद्या का अभ्यास शुरू किया। एक दिन जिस टेलीग्राफ आफिस में वे नौकरी करते थे वहाँ तार बाबू छुट्टी पर गया हुआ था। कार्यालय में उस समय तो कोई ड्यूटी पर नहीं था अतः स्वयं कार्नेगी ने ही वह संदेश ले लिया और उस पते पर पहुँचे। अधिकारियों को जब कार्नेगी की इस कर्त्तव्य परायणता का पता चला तो उनकी पदोन्नति कर दी गयी।

कर्त्तव्यनिष्ठा, कार्य तत्परता और मेहनत तथा लगन के बल पर वे सफलताओं के सोपान चढ़ते गये और जब वे युवावस्था से गुजर रहे थे तब उनकी आय सोलह हजार रुपये मासिक थी। कार्नेगी ने केवल धन ही नहीं कमाया वरन् उसका उपयोग सार्वजनिक कार्यों में भी किया। उन्होंने डेढ़ अरब के लगभग सार्वजनिक पुस्तकालयों, शिक्षण संस्थाओं तथा अन्य लोकहित के कार्यों में दान दिये।

कई देशों में सम्पन्न और अमीर व्यक्ति जिस कम्पनी की कारें प्रयोग में लाते हैं वे कारें भी अपनी प्रतिष्ठा का चिन्ह समझी जाती हैं वे फोर्ड कम्पनी की हैं। इस कम्पनी के अधिष्ठाता, संचालक और सम्वर्धक हैं हेनीरी फोर्ड। बताया जाता है कि फोर्ड मोटर कम्पनी की गाड़ियाँ प्रति वर्ष लाखों की संख्या में बिकती हैं। जिस व्यक्ति द्वारा स्थापित संस्था का उत्पादन प्रतिष्ठा और वृद्धि का सूचक समझा जाता है वह व्यक्ति एक साधारण इन्सान का पुत्र था। हेनरी फोर्ड के पिता अपने निवास ग्राम में थोड़ी सी जमीन पर खेती किया करते थे और जो पैदा होता उससे ही अपने परिवार का भरण पोषण करते। चूंकि आय अधिक नहीं थी-निर्वाह भी मुश्किल से चल पाता था तो फोर्ड को उच्च शिक्षा प्राप्त करने का मौका कहाँ से मिलता। फिर भी पिता ने जैसे तैसे एक स्थानीय स्कूल में भर्ती करवाया और वे पन्द्रह वर्ष की आयु तक अध्ययन करते रहे।

हिन्दुस्तान में भी ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं है जो अपने प्रारम्भिक जीवन में अति निर्धन और अभावग्रस्त रहे तथा आगे चल कर परिश्रम, पुरुषार्थ व लगन के बल पर समृद्ध बने। उनमें से शापुरजी बरोचा का नाम उल्लेखनीय है। बरोचा जब छह वर्ष के थे तभी उनके पिता का निधन हो गया और उसके चार दिन बाद ही उनका बड़ा भाई भी चल बसा। माँ ने अपने पति का माल असबाब बेचकर किसी प्रकार दिन काटे और लोगों के कपड़े सी-सी कर बच्चों को पाला-पोसा। शापुरजी पढ़ने के साथ-साथ स्कूल के बाकी बचे समय में जो काम मिल जाता वह कर लेते और अपनी माँ की मदद पहुँचाया करते। कहते हैं घर से स्कूल तक और स्कूल से घर तक का रास्ता तय करने में जो समय मिलता उसी में शापुरजी ने अपना घरेलू अभ्यास किया। मैट्रिक पास करने के बाद उन्होंने रेलवे में नौकरी की और फिर बैंक में। बाद में वे स्वतन्त्र उद्योग के क्षेत्र में उतरे और वहाँ अपनी सूझ-बूझ, लगन और निष्ठा के बल पर सफल हुए। साहस प्रयत्न और पुरुषार्थ के बल पर उन्होंने दिन दूनी रात चौगुनी प्रगति कि और जो कुछ कमाया वह लोकोपयोगी कार्यों में खर्च करते रहे। पं0 गणेश शंकर विद्यार्थी के अनुसार शापुरजी ने लगभग साठ लाख रुपया जन-हित के कार्यों में खर्च किया।

इस प्रकार अभावग्रस्त दीन-हीन अवस्था से उठ कर समृद्धि और सम्पन्नता के उच्च शिखर तक पहुँचने वाले पुरुषार्थियों की संख्या कम नहीं है। कई तो ऐसे हैं जिनके पूर्व जीवन के सम्बन्ध में कुछ जाना नहीं जा सका। जो भी हो इन विभूतियों के जीवन और व्यक्तित्व में एक बात महत्वपूर्ण रूप से उल्लेखनीय है कि राक फेलर और हेनरी फोर्ड से लेकर शापुरजी बरोचा तक जितने भी समृद्ध इतिहास पुरुष हैं उन सबने अपनी आय का बहुत अंश जन सेवा के कार्यों में ही खर्च किया है। पुरुषार्थ और परिश्रम के साथ लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए यह भी आवश्यक है कि हम उसे अपनी ही सुख सुविधाओं और विलास वैभवों में खर्च करने की बात न सोचें वरन् उसका अधिकतम उपयोग जनहित में-सेवा कार्यों में करने का भाव रखें। फिर साधनों और सामग्रियों की न चिन्ता रहेगी और न उनके अभाव का क्षोभ।


उस्ताद अलाउद्दीन खाँ (kahani)

जिस भी कार्य में-जिस भी दिशा में प्रवीणता प्राप्त करनी हो उसका उत्साह एवं तत्परतापूर्वक दैनिक अभ्यास करना नितान्त आवश्यक है। किसी बात को सुन-समझ भर लेने से कोई काम नहीं बनता। प्रवीणता तब आती है जब उन कार्यों को दैनिक अभ्यास में प्रमुखता दी जाय और उसे लम्बे समय तक लगातार जारी रखा जाय।

उस्ताद अलाउद्दीन खाँ सितार बजाने का ‘रियाज’ बारह-बारह चौदह-चौदह घण्टे हर रोज करते थे। वे अपने उस्ताद के निर्देश की समय-समय पर चर्चा किया करते थे जिसमें कहा गया था कि- ‘जिस दिन रियाज न करो-उस दिन रोजा रखो।’

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अनियंत्रित प्रजनन-सर्वनाश का आह्वान

जनसंख्या वृद्धि की विभीषिका की और संसार के विचारशील लोगों का ध्यान विगत शताब्दी से ही आकर्षित हो गया था और उन्होंने इस खतरे की ओर विश्व नेताओं, सरकारों तथा सर्वसाधारण का ध्यान आकर्षित किया था। उनका कहना था कि समय रहते जनसंख्या वृद्धि की विभीषिका से निपटने का उपाय किया जाय अन्यथा समय निकल जाने पर कुछ करते धरते न बन पड़ेगा और केवल पश्चाताप ही हाथ रह जायगा।

इंग्लैण्ड के अर्थशास्त्री थामस माल्थस ने इस विषय में सप्रमाण बहुत कुछ कहा है। विगत शताब्दी में फ्रामप्लास, नार्म डायस्टेले, ऐने बेनेट, चार्ल थ्रेडली, मेरी स्टोप्स प्रभृति विचारकों ने जोरदार प्रमाणों के साथ जनसंख्या नियन्त्रण की आवश्यकता सिद्ध की और इंग्लैण्ड की ही नहीं समस्त संसार की जनता ने उन विचारों को ध्यानपूर्वक सुना और उस आवश्यकता को अनुभव किया।

वर्तमान शताब्दी के आरम्भ में अमेरिका में मार्डरेट सेगर अब्राह्म स्टोन ने इस आवश्यकता को भली भाँति सिद्ध किया। भारत की अपेक्षा पाँच गुनी भूमि और अत्यन्त स्वल्प जनसंख्या के कारण यों अमेरिका की आर्थिक समस्या वैसी नहीं थी जिसके आधार पर परिवार नियन्त्रण की बात सोचनी पड़े पर व्यक्तिगत, पारिवारिक और स्वयं शिशुओं के विकास पर इसका जो बुरा प्रभाव पड़ता है उसे देखते हुए यह भली-भाँति स्वीकार किया गया है कि अवाँछनीय गति से बढ़ता हुआ प्रजनन केवल संकट ही उत्पन्न कर सकता है।

विलियम गोडविन, सर वाल्टर रेले, प्रो0 फ्रीड, प्रो0 ग्वेर्डे, बिटरेणु प्रभूति कितने ही सांख्यिकी विज्ञों का माल्थस से उन उपायों के बारे में मतभेद है जिनके आधार पर संख्या नियन्त्रण किया जाना चाहिए पर वे सभी एक स्वर से इस बात का समर्थन करते हैं कि बढ़ती हुई जनसंख्या की समस्या इस युग की सबसे बड़ी समस्या है और यदि उसे हल न किया गया तो अपनी मूर्खता के दण्ड स्वरूप ही मनुष्य जाति को रोते-बिलखते अपनी ही आत्महत्या करने के लिए विवश होना पड़ेगा। अति उत्पादन और न्यायोचित वितरण से राहत मिलने की बात पर जोर देने वाले भी यह स्वीकार करते है कि यह उपाय सामयिक संकट हलका कर सकते हैं, पर जनसंख्या का बढ़ता हुआ क्रम यथावत चलने देना तो उन्हें भी स्वीकार नहीं।

बढ़ती हुई जनसंख्या का एक बड़ा दोष है कि प्राकृतिक सुविधा के अभाव में तथा खाद्य पदार्थों में जीवन घटते जाने के कारण पीढ़ियाँ दुर्बल होती चली जाती हैं वे रुग्ण रहती हैं और काम करने की क्षमता घटती चली जाती है। फलतः हर स्तर का उत्पादन घटता है। शारीरिक और मानसिक बलिष्ठता घटने पर कामों का स्तर तथा परिणाम घटेगा ही। भीमकाय स्वसंचालित यन्त्र जन-शक्ति की आवश्यकता तो पूरी कर सकते हैं, पर उनसे बेकारी बेहिसाब बढ़ती है जो और भी अधिक घातक है।

पशुओं को जीवित न रखा जा सकेगा ऐसी दशा में दूध या माँस की उपलब्धि भी असम्भव हो जायगी समुद्र पर भी जब धावा पूरे वेग से बोला जायगा बेचारे जल-जन्तु कब तक अपना अस्तित्व बनाये रख सकेंगे। उन्हें भी आधी-चौथाई शताब्दी के अन्दर अपने अस्तित्व खो बैठने के लिए विवश होना पड़ेगा। बढ़ता हुआ जल प्रदूषण अभी भी जल जन्तुओं को समाप्त करने में लगा हुआ है। कल-कारखानों का विषाक्त जल नदी नालों से लेकर समुद्री जल तक को विषैला किये दे रहा है जल जन्तु बेहिसाब मर रहे हैं। अगले दीनों औद्योगिक प्रगति के साथ कल-कारखाने बढ़ेंगे ही, जल प्रदूषण का निर्बाध क्रम चलेगा तब जल जन्तुओं पर गुजारा करने की बात भी मृग-मरीचिका बनकर ही रह जायगी।

इंग्लैण्ड के अर्थशास्त्री थामस राबर्ट ने विश्व जनसंख्या वृद्धि की समस्या का लगभग तीस वर्ष तक गहन अध्ययन किया और वे इस शोध के सन्दर्भ में विश्व के अनेक देशों में गये। उन्होंने अपने शोध प्रबन्धों में यह प्रतिपादित किया है कि-बढ़ती हुई जनसंख्या की स्वाभाविक गति यदि नियन्त्रित न की जाय तो खाद्य सामग्री के अभाव में बेमौत मरने की परिस्थिति उत्पन्न हो जायगी। पृथ्वी में जितने लोगों के भरण-पोषण की, आवास-प्रवास की जितनी क्षमता है अब वह पूर्ण हो गई। एक सीमा तक पहुँचने के बाद खाद्य उत्पादन में गतिरोध उत्पन्न हो जाता है। रासायनिक खादों एवं वैज्ञानिक उपकरणों का कितना ही उपयोग क्यों न किया जाय ? धरती की स्वाभाविक क्षमता में अत्यधिक वृद्धि नहीं हो सकती। बिल्ली को कितना ही दूध क्यों न पिलाया जाय वह एक सीमा तक ही मोटी होगी, हथिनी की ऊँचाई तक पहुँचने का स्वप्न वह कभी भी साकार न कर सकेगी। जनसंख्या की बढ़ोतरी “गुणोत्तर गति” से होती है। वह 1,2,4,8,16,32 के क्रम से बढ़ती है। जबकि खाद्य सामग्री को केवल “अंक गणित गति” से ही बढ़ाया जा सकता है वह 1,2,3,4,5 क्रम से ही बढ़ेगी। यदि 25 वर्षों तक दोनों की वृद्धि अपने ढंग ढर्रे से बढ़ती रहने दी जाय तो जनसंख्या दूनी हो जायगी जबकि खाद्योन्नति का परिणाम सवाया ही हो सकेगा। तीन-चौथाई जनसंख्या को या तो दूसरों के ग्रास छीनने पड़ेंगे या भूखा मरना पड़ेगा। भूतकाल में धरती की क्षमता बढ़ती हुई जनसंख्या का पोषण करने जितनी बनी रही, पर अब उसमें भावी सम्भावनाओं का सामना करने की क्षमता दीखती नहीं।

समुद्र से जल जीव, वनस्पतियाँ तथा पशु-पक्षियों का माँस प्राप्त करने के प्रयास भी एक सीमा तक ही उस आवश्यकता को पूरा कर सकेंगे। माँस के लिए पाले जाने वाले जानवरों के लिए चारा तो चाहिए ही। भूमि की सीमा जब लोगों के निवास-प्रवास की-अन्न की आवश्यकता ही पूरा नहीं कर पाती तो इस माँस या दूध के लिए पाले जाने वाले पशुओं के लिए निवास तथा चारे के लिए भूमि कहाँ से आवेगी? अर्थशास्त्री बताते हैं कि अगले दिनों पशुओं और मनुष्यों में प्रतिद्वंद्विता होगी। कौन जीवित रहे इस संघर्ष में पशु हार जायगा और भूमि को पशुओं के उपयोग से छीनकर मनुष्यों के लिए प्रयुक्त किया जायगा। अन्न का भूसा तथा घास, कागज, काष्ठ जैसी सभ्यता सामग्री बनाने में खप जायगा।

विवाहित जीवन का मूल प्रयोजन दो समान स्थिति के साथियों का मिलकर जीवनोद्देश्य की दिशा में ठीक तरह गतिशील होने की सुविधा प्राप्त करना है। भिन्न लिंग के सहयोगी प्रकृति प्रेरित आकर्षण की पूर्ति भी करते हैं और उसमें भावनात्मक तृप्ति भी मिलती है। अस्तु जब शारीरिक, मानसिक और आर्थिक सुविधा हो तब विवाह के लिए उपयुक्त साथी ढूँढ़ लिया जा सकता है किन्तु विवाह की सफलता प्रजनन के साथ नहीं जोड़ी जानी चाहिए। सन्तान रहित दाम्पत्य जीवन किसी भी प्रकार असुविधाजनक नहीं होता वरन् उससे प्रगति की दिशा में आगे बढ़ने की और अधिक सम्भावना रहती है। जो शक्ति नये बालकों को न्योत-बुलाने में और उसका भार वहन करने में खर्च की जाती है यदि उसे पति-पत्नी अपने विकास में खर्च करे तो निःसंदेह इससे वे लोग अपना और समाज का अधिक हित कर सकते हैं। सन्तान तभी उत्पन्न की जाय जब उसकी जिम्मेदारियाँ उठा सकने की पूर्व तैयारी भली प्रकार कर ली गई हो। जब तक ऐसी स्थिति न आये तब तक विवाहित युग्मों को भी सन्तानोत्पादन से बचना चाहिए।

विवाह योग्य युवकों के लिए भी यही उचित है कि जब वे शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ सन्तानोत्पादन के योग्य परिपुष्ट हो जायँ और आर्थिक दृष्टि से अपने पैरों पर खड़े हो जाने योग्य हो जायं तभी विवाह की स्वीकृति अभिभावकों को दें। यदि मोहवश समय से पूर्व विवाह के लिए दबाव डाला जा रहा है तो उसके लिए नम्रतापूर्वक किन्तु साथ ही अत्यन्त दृढ़ता के साथ इनकार ही कर देना चाहिए। इसमें न तो अवज्ञा की बात है और न अशिष्टता की। पेट भरा होने पर प्रियजनों के भोजन आग्रह से इनकार किया जा सकता है और उसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं होती तो फिर विवाह के सम्बन्ध में यदि कोई लड़का या लड़की अपनी स्थिति स्पष्ट कर दे तो अभिभावकों को उससे प्रसन्न ही होना चाहिए। बलात् किसी पर अवांछनीय विचार थोपना जितना अनैतिक है उसकी तुलना में इस प्रकार के दबाव से इनकार कर देना अपेक्षाकृत कम ही अनुचित माना जाना चाहिए।

जो लोग विवाह की आवश्यकता अनुभव करें उन्हें प्रसन्नतापूर्वक वैसा करना चाहिए। घर के लोगों को उनकी रुचि के अनुरूप साथी उपलब्ध कराने में सहायता करनी चाहिए, पर इसके लिए किसी को अपनी सन्तान पर दबाव नहीं डालना चाहिए। यह दबाव अनैतिक, अदूरदर्शिता पूर्ण, असामाजिक और अवाँछनीय है। कोई बालक कुमार्गगामी हो रहा हो तो उसे सुधारने के लिए दबाव देने का औचित्य है। पर यदि किसी लड़की या लड़के की इच्छा विवाह की नहीं है वह वैवाहिक उत्तरदायित्वों को निबाहने में उस समय अपने को असमर्थ पाता है तो उचित यही है कि उसकी अपनी इच्छा को जीवनयापन करने की रीति-नीति को मान्यता दी जाय और उसे अपने ढंग से अपना मार्ग चुनने दिया जाय। विवाह कौन कब किस उम्र या स्थिति में करे, इसके सम्बन्ध में हर किसी को स्वतन्त्रता होनी चाहिए। गलत साथी के चुनाव का खतरा टाला जाना चाहिए, पर अविवाहित रहने की यदि किसी बालक की इच्छा है तो अभिभावकों के लिए यह उचित है कि उस सन्दर्भ में किसी प्रकार का दबाव न डालें। कारण कि इसमें अनौचित्य जैसी कोई बात नहीं है, वरन् सच पूछा जाय तो इस प्रकार का निर्णय वैयक्तिक एवं सामाजिक सुविधाजनक ही है।

अपने समाज में रूढ़िवादी अभिभावक इस बात के लिए अत्यधिक उत्सुक पाये जाते हैं कि वे अपने बालकों का विवाह जितनी जल्दी हो सके निपटा कर निश्चिंत हो जायँ। इसमें वे धन और श्रम भी बहुत खर्च करते हैं। यदि वह धन या श्रम उन बालकों की शारीरिक, मानसिक उन्नति के लिए खर्च किया जाय तो विवाह की अपेक्षा उन्हें हजार गुना अधिक लाभान्वित किया जा सकता है यह सूझ-बूझ न जाने क्यों अपने समाज में उठती ही नहीं है ?

व्यभिचार अविवाहितों में बढ़ता है विवाहितों में नहीं यह आशंका व्यर्थ है। व्यभिचार और सदाचार मानसिक स्थिति पर निर्भर है। विवाहित हो जाने पर इस कुकर्म पर कोई बन्धन नहीं बँधता वरन् अविवाहितों के व्यभिचारों की अपेक्षा वह और भी अधिक निरापद हो जाता है। यदि अन्वेषण किया जाय तो इस सन्दर्भ में अविवाहितों की अपेक्षा विवाहित ही अधिक दुराचरण अपनाये हुए पाये जायेंगे। मर्यादाओं का पालन यदि सीखा और सिखाया जाय तो अविवाहित रहना किसी भी दृष्टि से व्यक्ति और समाज के लिए अहितकर सिद्ध नहीं हो सकता। हर किसी का विवाह अवश्य ही होना चाहिए आजकल जो यह मूढ़ मान्यता प्रचलित है उसके पीछे विवेकशीलता नहीं वरन् रूढ़िवादिता की ही प्रधानता रहती है। अपने समाज में कन्याओं की किशोरावस्था में प्रवेश करते-करते कुहराम मच जाता है और हर कोई उनके विवाह की चिन्ता करने लगता है। लड़के बीस-पच्चीस वर्ष तक पढ़ते भी रह सकते हैं और अविवाहित भी रह सकते हैं, पर लड़कियों के लिए इतनी उम्र बहुत भारी पड़ती है। लड़की और लड़कों के बीच तर्क संगत नहीं, इसे रूढ़िवादी पूर्वाग्रह के ढर्रे पर लुढ़कने के अतिरिक्त और किसी दृष्टि से उचित नहीं ठहराया जा सकता। अविवाहित जीवन के खतरे अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर हमने अपने मस्तिष्क में जमा लिए है यदि विश्लेषण किया जाय तो वे आशंकाएं बहुत अंशों में निरर्थक और निर्मूल ही प्रतीत होंगी।


Quotation

हमें अन्तरिक्ष में उड़ने का शौक तो लगा है, पर पैरों तले की जमीन के नीचे क्या है यह देखना भूल ही गये हैं। समुद्र की तलहटी में इतने बहुमूल्य रत्न भरे पड़े हैं जिन्हें अब तक मनुष्य के हाथ लगे हीरे, पन्नों की अपेक्षा कई गुना कहा जा सकता है। पृथ्वी पर जितनी धातुएँ मौजूद हैं उससे हजारों गुनी मात्रा में वे समुद्र में दबी पड़ी हैं। समुद्री खाद्य पदार्थों का यदि उपयोग किया जा सके तो वे पृथ्वी की उपज से कम नहीं अधिक ही बैठेंगे। ऐसे सम्पत्ति भण्डार की उपेक्षा करके शून्य आकाश में विचरना और निर्जीव ग्रह-नक्षत्रों के चक्कर काटना वैज्ञानिकों का चिन्तन दोष है जिसे सुधार कर अपव्यय को उपयोगिता की दिशा में मोड़ा जा सकता है।

-स्काट कारपेन्टर

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अपनो से अपनी बात


तीर्थयात्रा प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाय

विचारशील लोगों को, साधु-ब्राह्मणों को, वानप्रस्थों, धर्म-प्रचारकों को पुण्य-परम्परा-तीर्थयात्रा को पुनर्जीवित करने के लिए आगे आना चाहिए। उन्हें अपने मानवी उत्तरदायित्वों को समझना चाहिए। जिन्हें ईश्वर ने सद्ज्ञान और सद्भाव की सम्पदा प्रदान की है उसे उन्हें अभावग्रस्त क्षेत्र में वितरित करने की उदारता आनी चाहिए। अपने उपार्जन का अपने ही लिए उपयोग करते रहने वाले स्वार्थी, अनुदार और कृपण कहे जाते हैं वह लाँछन, सद्भाव-सम्पन्न विज्ञजनों पर नहीं लगना चाहिए। ज्ञान वितरण का उद्देश्य लेकर उन्हें भी अपने देश के पिछड़े क्षेत्र में मानवी आदर्शवादिता और युग के अनुरूप प्रगतिशीलता वितरित करने के लिए आगे आना चाहिए। अगले दिनों तीर्थयात्रा मंडलियाँ इसी उद्देश्य के लिए निकलें। इस लिए विचारशील लोग अपनी टोलियाँ गठित करें।

इन टोलियों में मधुर कण्ठ ध्वनि के गायन को भी स्थान दिया जाय। कारण कि अपना कार्यक्षेत्र प्रधानतया छोटी देहातें बनाना है। शहरों में इतने अधिक सभा, सम्मेलन होते रहते हैं कि वहाँ बड़े आकर्षण होने पर ही लोक रुचि उत्पन्न हो सकती है। दूसरे उस क्षेत्र में पहले से ही उद्बोधनकर्ताओं की भरमार है। तीसरे उन लोगों को पत्र-पत्रिकाओं, पुस्तकों, लाइब्रेरियों का लाभ भी मिल जाता है, चौथे वे लोग अत्यधिक व्यस्त होने के कारण इस प्रयोजन में रुचि भी कम लेंगे। पाँचवे परस्पर विरोधी राजनैतिक तथा सामाजिक संस्थाओं की प्रति द्वंद्वता ने उन क्षेत्र की जनता को दिग्भ्रांत कर दिया है और वह सभी प्रचारकों को एक लाठी से हाँकती, अविश्वस्त ठहराती है, ऐसे ही अन्य अनेक कारण हैं; जिनसे हमें देहात को अपना कार्यक्षेत्र बनाना चाहिए।

अस्सी प्रतिशत भारत उसी इलाके में रहता है। यातायात की कठिनाई, निर्धनता, गैर जानकारी के कारण, नेताओं के स्वागत-सत्कार की कमी, स्वल्प उपस्थिति जैसे कारणों से उद्बोधनकर्ता उस क्षेत्र में पहुंचते नहीं हैं। देश में 70 प्रतिशत अशिक्षा अभी भी है। इसका अधिकाँश भाग देहातों में है। रूढ़िवादिता, मूढ़मान्यता, अन्ध-विश्वास, जैसी विकृतियाँ उन क्षेत्र में अभी भी उतनी ही भरी पड़ी हैं जितनी अब से तीन सौ वर्ष पूर्व थीं। प्रगतिशीलता का प्रकाश वहाँ अभी भी बहुत कम पहुँचा है। हमें इसी क्षेत्र को जगाने में जुटने का साहस समेटना चाहिए। कहना न होगा कि यह जनता समाज-शास्त्र, अर्थ-शास्त्र, राजनीति आदि को उतना नहीं समझती जितना कि परम्परागत धर्म परम्परा को। धर्म तन्त्र से लोक-शिक्षण का महत्व प्रधानतया इसी वर्ग के लोगों के लिए है। जाना हमें इसी क्षेत्र की जनता के पास है।

उनके बौद्धिक विकास को देखते हुए अपनी सेवा साधना में दो तथ्यों का समावेश करना ही होगा-एक तो यह कि जो कहना है उनमें धर्म कथाओं का पुट लगाते हुए कथन को श्रद्धा सिक्त बनाते चला जाय। दूसरे संगीत, सहगान, कीर्तन, भजन को प्रमुखता दी जाय। संगीत में स्वभावतः जन-साधारण की रुचि होती है-बाल-वृद्ध शिक्षित-अशिक्षित उसे चावपूर्वक सुनते हैं। बौद्धिक प्रभाव ग्रहण करने के साथ-साथ भावान्दोलन की विशेषता भी उसमें रहती है। अस्तु तीर्थयात्रा पर निकलने वाली प्रचार मंडलियों को जन-मानस में नवयुग के अनुरूप प्रगतिशीलता स्थापित करने के लिए प्रवचन शैली में धर्म-कथाओं का समावेश एवं सहगान कीर्तन की समन्वित शैली को अपना कर चलना चाहिए।

मण्डली में इतनी योग्यता होनी चाहिए कि वह इन प्रयोजनों को भली प्रकार पूरी कर सके। बेकार की भीड़ साथ ले चलने से तो अव्यवस्था ही फैलेगी और असुविधा ही रहेगी। प्रायः पाँच प्रचारकों की तीर्थयात्रा टोली रहे यही उपयुक्त है। इस प्रयास में अधिक लोग सहयोग देने को उत्सुक हों तो एक साथ ही बड़ी भीड़ लगाने की अपेक्षा उन्हें पाँच-पाँच की टोलियों में- कई क्षेत्रों में चल पड़ना चाहिए। यदि सुनने-सीखने की दृष्टि से ही कुछ लोग साथ चलना चाहें तो पाँच प्रचारक और पाँच साथी दस की मण्डली पर्याप्त समझी जानी चाहिए अन्यथा अधिक लोगों के एक साथ चलने और दैनिक व्यवस्था जुटाने में ही सिरदर्द खड़ा हो जायगा। ब्रज चौरासी कोस की भाद्रपद की यात्रा के समान पूरे साज-सरंजाम और दलबल समेत निकलना हो तो बात दूसरी है। ऐसी बड़ी पद-यात्राओं की व्यवस्था में खान-पान, तम्बु-डेरा, पानी, दूध, प्रवचन-पण्डाल आदि पूरा ठाट-बाट लेकर चलना होता है और उतने लोगों के स्नान, शौच, भोजन आदि का पहले से ही प्रबन्ध करना होता है। समान ढोने, उसे यथास्थान जमाने सुविधाएँ उत्पन्न करने के लिए वाहनों और कर्मचारियों की अतिरिक्त भीड़ साथ चले तो ही उतनी बड़ी व्यवस्था बन सकती है। यह बड़ी योजनाओं का अंग है वैसा प्रबन्ध कोई बड़े अनुभवी और साधन सम्पन्न लोग ही कर सकते हैं। हमें फिलहाल छोटी प्रचार टोलियों की बात ही सोचनी चाहिए और अभीष्ट उद्देश्य पूरा कर सकने में समर्थ व्यक्ति ही उन टोलियों के सदस्य होने चाहिएं।

तीर्थयात्रा को पदयात्रा ही समझा जाना चाहिए। प्रचारकों को गाँव-गाँव, झोंपड़े-झोंपड़े जाने का लक्ष्य रखकर चलना है तो वह कार्य द्रुतगामी वाहनों पर सवार होकर बढ़िया रास्तों से गुजरने पर सम्भव न हो सकेगा। उसमें पगडण्डियाँ ही लाँघनी होगी। ऐसी दशा में पदयात्रा की ही उपयोगिता बनती है। प्राचीन काल में भी पदयात्रा और तीर्थयात्रा पर्यायवाची शब्द थे। अभी भी वह परिभाषा यथावत रहनी चाहिए। नहाने-धोने के लिए वस्त्र, बिस्तर, दैनिक उपयोग के उपकरण, भोजन की सामग्री लाउडस्पीकर जैसे प्रचार साधन, दीवारों पर वाक्य लिखने के उपकरण जैसी वस्तुएँ यात्रा में स्वभावतः साथ चलेंगी ही। उन्हें कन्धे पर लादकर नहीं चला जा सकता। इसके लिए साइकिल का उपयोग भार वाहन के रूप में उपयोग करना अपेक्षाकृत अधिक सस्ता और सरल रहेगा। पर इसका कोई बन्धन नहीं है। जहाँ गधा, घोड़ा, बैलगाड़ी आदि की सुविधा हो सकती हो। भोजन बनाने आदि कार्यों के लिए स्वयंसेवक या कर्मचारी चल सकता हो तो उसमें भी हर्ज नहीं। बात खर्च बढ़ने भर की है। जहाँ जैसा प्रबन्ध बन पड़े वहाँ उसके लिए प्रसन्नतापूर्वक प्रबन्ध किया जा सकता है। सुविधा साधन बढ़ने से तो काम करने में सरलता ही पड़ती है।

तीर्थयात्रा धर्म परम्परा के पुनर्जीवन का लक्ष्य लेकर निकली हुई टोलियों के सामने निर्धारित लक्ष्य और कार्यक्रम रहेगा। वे निरुद्देश्य यत्र-तत्र भटकती हुई समय और धन का अपव्यय नहीं करेंगी। निश्चित है कि गाँव-गाँव, दीवार-दीवार पर नवयुग का सन्देश देने वाले प्रेरणाप्रद वाक्य लिखे जाने चाहिएं। बोलती दीवारों का सृजन करना चाहिए। हर गाँव में कीर्तन गान करते हुए मण्डलियों को गली कूँचों की परिक्रमा करनी चाहिए। पीले वस्त्रधारी-तीर्थयात्री शंख ध्वनि करते हुए-कीर्तन गाते हुए जब गाँव की परिक्रमा करेंगे तो स्वभावतः गाँव वासी उसके साथ चलेंगे। नारे लगाने और सहगान गाने में वे भी योग देंगे। परिक्रमा समाप्त होने पर टोली के सदस्य एक छोटा प्रवचन अपने भ्रमण प्रयोजन के सम्बन्ध में दें और शिक्षितों में प्रेमोपहार पुस्तिका का वितरण करें। इसके बाद अगले गांवों के लिए प्रयाण।

निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार मार्ग के गाँवों में परिक्रमा, दीवार लेखन करते हुए पड़ाव के लिए नियत गाँव में पहुँचा जाय। टोली स्वयं परिक्रमा करे और नियत सत्संग स्थल पर जन-साधारण को पहुँचने के लिए आमन्त्रित करें। प्रायः आठ से साड़े दस का समय ग्रामीणों को सुविधाजनक रहता है। भोजन से निवृत्त होकर वे आ सकते हैं और कथा, कीर्तन के माध्यम से नव-चेतना उपलब्ध करने का लाभ उठा सकते हैं। प्रातःकाल संक्षिप्त यज्ञ, प्रभावित लोगों को बुलाकर उन्हें कुछ काम सौंपना, संकल्प देना, जलपान से निवृत्त होना और अगले दिन के कार्यक्रम पर चल देना। यह टोलियों का कार्यक्रम है। कहीं अत्यधिक आग्रह हो तो बात दूसरी है अन्यथा भोजन व्यवस्था का भार स्वयं ही टोलियों को वहन करना चाहिए। पकाया एक बार ही जाय। दूसरे समय के लिए बना हुआ रखा रहे। सवेरे या शाम कब पकाने में सुविधा रहेगी, क्या रसोई बने, यह निर्धारित करना टोली सदस्यों की रुचि सुविधा एवं व्यवस्था पर निर्भर रहेगा।

गर्मियों के दिनों में छात्रों, अध्यापकों, किसानों तथा दूसरे अनेक वर्गों के लोगों को अवकाश रहता है। मई, जून के दो महीने इन टोलियों के लिए अतीव सुविधाजनक है। इन दिनों बिस्तर या भारी कपड़े लेकर चलने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। यह दो महीने तो हर क्षेत्र में तीर्थयात्रा के लिए अतीव उत्साहपूर्वक प्रयुक्त होने चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य महीनों में जब जहाँ जैसी व्यवस्था बन पड़े तब वहाँ उस प्रकार की योजना बना ली जानी चाहिए।

कर्मचारियों एवं दुकानदारों को साप्ताहिक अवकाश रहता है। वह पूरा दिन इस प्रयोजन के लिए लगा देने की बात बन सकती है। साल में 52 सप्ताह तथा प्रायः 13 त्यौहार इस प्रकार 65 दिन की छुट्टी तो रहती है। पाँच दिन काट दें तो प्रायः दो महीने इस कर्म के लिए लगाये जा सकते हैं। दूसरे वर्ग के लोग भी अपनी सुविधा के समय का अपने ढंग से उपयोग कर सकते हैं। जिनके पास पूरा समय है तो वे नई-नई टोलियों का गठन और नेतृत्व करते हुए दूरवर्ती क्षेत्रों में भी अपनी गतिविधियाँ सुविस्तृत कर सकते हैं।

जो दूर नहीं जा सकते, घर नहीं छोड़ सकते वे नित्य एक-दो घंटे समीपवर्ती गली-मुहल्लों, बाजारों, कारखानों में जन सम्पर्क के लिए निकल सकते हैं और झोला पुस्तकालयों की ढकेल गाड़ी-चल पुस्तकालयों की, सरल प्रक्रिया अपनाकर सत्साहित्य पढ़ने देने एवं वापिस लेने का कार्य कर सकते हैं। साप्ताहिक अवकाश का अधिकाँश समय इस पुण्य कार्य में लगा सकते है। कथा कहने के लिए साप्ताहिक, मासिक तथा एक-एक दिन एक-एक घर, मुहल्ले में कार्यक्रम बनायें जा सकते हैं। स्लाइड प्रोजेक्टर का प्रबन्ध हो सके तो प्रकाश चित्र दिखाते हुए हर रात्रि को एक मुहल्ले में लोकरंजन और लोकशिक्षण की दुहरी प्रचार प्रक्रिया चल सकती है। चित्र प्रदर्शनियाँ बन सकें तो उन्हें भी यत्र-तत्र दिखाया जा सकता है। कुछ साधन न हों तो ऐसे ही जनसम्पर्क के लिए वार्तालाप सामान्य प्रसंगों से आरम्भ करके किसी आदर्शवादी निष्कर्ष तक पहुँचने का उपक्रम अभ्यास में लाया जा सकता है। बच्चों में कहानियाँ कहने की अपनी एक विशेष शैली है जिसमें बाल, वृद्ध सभी समान रूप से रस ले सकते हैं। प्रचार के ऐसे ऐसे अनेकों साधन ढूँढ़े जा सकते हैं। तीर्थयात्रा की धर्म-परम्परा का आंशिक निर्वाह इन छोटे एवं स्थानीय कार्यक्रमों से भी हो सकता है। बड़े रूप में तो कुम्भ के मेले में जहाँ तहाँ से जाने वाली साधु मण्डलियों जैसा विशाल रूप भी बन सकता है। वे रास्ते में पड़ाव डालती हुई अपने दल-बल के साथ चलती हैं और ठहरती हैं वहाँ आकर्षण का केन्द्र बनती हैं। रूप-रेखा क्या रहे-योजना किस स्तर की बने यह निर्णय करना टोलियों की मनःस्थिति एवं परिस्थिति पर निर्भर है। किन्तु उन्हें किसी न किसी रूप में चल पड़ना तो सर्वत्र ही चाहिए। ‘अलख निरंजन’ की - घर-घर धर्म प्रेरणा की साधु परम्परा पुनर्जीवित होनी ही चाहिए। विज्ञ विचारशील लोगों को आगे बढ़ कर उसका शुभारम्भ एवं नेतृत्व करना ही चाहिए।

इस सन्दर्भ में एक बात सबसे अधिक महत्व की है कि जब देश का प्रत्येक देहाती क्षेत्र इस धर्म प्रचार योजना के अन्तर्गत लिया जाना हो तो तीर्थ स्थानों का भी अभिनव सृजन होना चाहिए। प्राचीन तीर्थों तक सीमित रहने से तो वह गतिविधियाँ अमुक क्षेत्रों तक ही सीमाबद्ध होकर रह जायेंगी। अति हर चीज की बुरी होती है अमुक क्षेत्र में ही तीर्थयात्री जाया करें तो उनका आकर्षण ही समाप्त हो जायगा दूसरे अन्य पिछड़े स्थान उस लाभ से वंचित ही बने रहेंगे। यों अपनी तीर्थयात्रा के लिए आवश्यक नहीं कि उनमें किन्हीं देवालयों का दर्शन या विराग जुड़ा ही रहे। सदुद्देश्य के लिए जिधर भी जाया जायगा उधर ही तीर्थ बन जायगा। फिर भी यदि तीर्थ स्थानों की बात भी प्रयोजन के साथ जुड़ी रह सके तो इससे सोने और सुगन्ध का दुहरा उद्देश्य पूरा होगा।

देवताओं-देवियों, अवतारों, ऋषियों, सन्तों, सिद्ध पुरुषों, राजाओं, रानियों, राजनेताओं, धनियों, विद्वानों और ऐतिहासिक महापुरुषों, कलाकारों आदि के स्मारक जगह-जगह बने हुए हैं। इन उच्च वर्ग की सत्ताओं ने प्रायः उनके वर्चस्व ने बलात् जन-सम्मान हथियाया है। वह वर्ग इस अधिकार से वंचित ही रह गया जो आर्थिक, बौद्धिक एवं परिस्थितियों के पिछड़ेपन के कारण आदर्शवादिता के उच्चस्तरीय प्रमाण प्रस्तुत करते हुए भी उपेक्षित एवं उपहासास्पद बना रहा। यों स्तर की दृष्टि से वे देवताओं से भी किसी प्रकार कम नहीं थे। आवश्यकता इस बात की है कि नये तीर्थों की स्थापना में उनकी यश गाथा को उभारने का दृष्टिकोण अपनाया जाय।

जब पुनर्जीवन ही अपना लक्ष्य है तो लगे हाथों नये तीर्थों की स्थापना की बात भी हाथ में लेकर चला जा सकता है। काम कठिन तो है, पर कठिन काम भी तो मनुष्य ही करते हैं। प्राचीन काल में भी तो मनीषियों ने तीर्थों की स्थापना के लिए प्रयास किया था। अकेले आद्य शंकराचार्य ने ही देश के चार कोनों पर, चार धामों की स्थापना की थी। मथुरा, वृन्दावन के अधिकाँश तीर्थों के स्थान चैतन्य महाप्रभु ने अपनी दिव्य दृष्टि से बताये थे और उन विस्मृत स्थानों पर उनके अनुयायियों ने स्मारक खड़े किये थे। अन्यत्र भी आगे-पीछे ऐसी ही परम्परा चलती रही है। अकेले हजारी किसान ने बिहार के हजारी बाग जिले में हजार आम के बगीचे लगाने में सफलता पाई थी; तो कोई कारण नहीं कि अपना भाव-भरा परिवार अपने संगठित प्रयत्नों के द्वारा अभिनव तीर्थों का सृजन न कर सके।

परम्परागत तीर्थ प्रायः पौराणिक देव गाथाओं से जुड़े हैं। कहीं-कही ऋषियों, महापुरुषों की स्मृति स्वरूप भी तीर्थ बने हैं। उनसे अतीत पर श्रद्धा एवं भक्ति भावना की स्फुरणा होती है, पर बहुत खींचतान करने पर भी वह प्रकाश नहीं मिलता जो दर्शकों को नव-युग के अनुरूप प्रेरणा दे सके। समय की माँग है कि उद्देश्य के अनुरूप आधार भी खड़े किये जायँ। प्रेरणा प्राप्त करने के लिए प्रेरणा स्रोत ढूँढ़े जायँ। इस दृष्टि से एक सुनियोजित योजना बनाकर देश के कोने-कोने में विशेषतया देहाती क्षेत्र में ऐसे तीर्थ स्थापित करने की तैयारी करनी चाहिए जो पदयात्रा टोलियों के लिए ही नहीं समीपवर्ती क्षेत्रों के लिए भी आदर्शवादी उत्साह का केन्द्र बन सकें।

होना यह चाहिए कि जिस क्षेत्र की जो प्रेरणाप्रद घटना-घटी हो-अथवा आदर्शवादी व्यक्तियों ने अपने पीछे जो अनुकरणीय गाथा छोड़ी हो वहाँ छोटे स्मारक बनाये जायँ। उन पर तीर्थयात्री श्रद्धांजलियां चढ़ाने जाया करें और स्थानीय लोग घटना का जयन्ती पर्व मनाते हुए एक प्रेरणाप्रद उत्सव आयोजन वर्ष में एक बार गठित किया करें। ऐसे आयोजनों से न केवल भावना की दृष्टि से वरन् मेलों-सम्मेलनों के माध्यम से होने वाले आर्थिक तथा भावनात्मक लाभ भी मिलते हैं। प्रचार के नये द्वार खुलते हैं। आदर्शवादी महामानव ही सच्चे देवता हैं। उत्कृष्टता का प्रतिपादन करने वाली घटनाओं की स्मृतियाँ सच्चे अर्थों में तीर्थ प्रयोजनों की पूर्ति करती हैं। अनुभव बताता है कि देव स्मारकों की तुलना में प्रेरणाप्रद व्यक्तित्वों एवं घटना-क्रमों की स्मृतियाँ भी कम श्रद्धाभाजन नहीं होती। सच तो यह है कि विचारशील लोगों का आकर्षण उनकी और अपेक्षाकृत और भी अधिक होता है।

तलाश करने पर ऐसे सत्पुरुषों एवं घटनाक्रमों का इतिहास हर क्षेत्र में मिल सकता है जिनकी स्मृति बना देने से उस क्षेत्र के लोगों को सदुद्देश्य की दिशा में सदा प्रकाश एवं उत्साह मिलता रह सकता है। यहाँ प्रगति-शीलता का ध्यान भी रखना होगा अन्यथा अविवेकपूर्वक स्थापित किये स्मारक उलटे हानिकारक सिद्ध होने लगेंगे। पतियों के साथ जल मरने वाली सतियों की स्मृतियाँ बना देने से उस क्षेत्र की स्त्रियोँ इसी प्रकार के आत्मघात की पुनरावृत्ति की अवाँछनीय प्रेरणा ले सकती हैं। इसी प्रकार मौनी बाबाओं की मठिया बना देने पर लोगों को वैसे ही अनगढ़ कृत्य कर गुजरने की सनक उठ सकती है। स्मारकों के पीछे चरित्र-निष्ठा, समाज-निष्ठा की आदर्शवादिता जुड़ी हो तभी उनकी कुछ उपयोगिता हो सकती है।

नये तीर्थों की स्थापना में विशालकाय इमारतों की आवश्यकता नहीं। निर्माण सामग्री का उपयोग हमें मानवी आवश्यकताओं की पूर्ति तक सीमित रहने देना चाहिए। नये तीर्थों को उद्यान, उपवनों के रूप में विकसित होना चाहिए। न्यूनतम एक वृक्ष को स्मारक बनाकर भी काम चलाया जा सकता है। भवन निर्माण की दृष्टि से इतना ही पर्याप्त है कि दस-दस फुट या न्यूनाधिक लम्बाई-चौड़ाई का चबूतरा किसी वृक्ष की छाया में अथवा खुले में-बना दिया जाय उस पर मध्य में दिवंगत आत्माओं के पत्थर पर खुदे चरण चिन्ह बने हों। सामने वाले भाग पर संगमरमर पर काले अक्षरों में स्मृति का विवरण लिखकर लगा दिया जाय। इतने में कोई बड़ी लागत नहीं आती। सस्ता बनाना हो तो श्रमदान नियोजित होना चाहिए और उस क्षेत्र के जन-जन का मुट्ठी-मुट्ठी सहयोग संग्रहीत किया जाना चाहिए। सस्ते चबूतरे दो-पाँच सौ में बन सकते हैं। महंगे पत्थर के बनाने हों तो कुछ हजार पर्याप्त हैं। आवश्यकता समझी जाय तो स्तम्भ भी खड़े किये जा सकते हैं। उनमें भी कोई लम्बी-चौड़ी लागत नहीं आने की यदि आवेगी भी तो जनता उसे खुशी-खुशी दे देंगी।

स्मारकों के लिए स्थान चुनते समय कुछ बातों की दूरदर्शितापूर्ण सावधानी रखनी चाहिए। वहाँ अधिक लोगों के जमा होने एवं समीप ही मेला लगने की गुंजाइश हो। पेड़ों की छाया तथा जलाशय का उपयुक्त प्रबन्ध हो ताकि वहाँ पहुंचने वाले लोग शान्ति से सुस्ता सकें और प्यास बुझाने तथा नहाने की आवश्यकता पूरी कर सकें। आने-जाने के लिए बैलगाड़ियाँ पहुँच सकने जितना चौड़ा रास्ता भी वहाँ तक होना चाहिए। कोई किसान अपने बाबा की स्मृति किसी खेत के कोने पर बना ले तो वहाँ तक बड़ी संख्या में जनता को पहुँचने और ठहरने आदि की सुविधा कहाँ होगी? स्थान की उपयुक्तता पर दूरदर्शी दृष्टि डाली जानी चाहिए और भविष्य में वहाँ बड़े आयोजन सम्भव हो सकें इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखना चाहिए। जल्दबाजी में अनुपयुक्त स्थान पर तीर्थ खड़ा कर देने में कुछ संकीर्णतावादियों का आग्रह हो सकता है वे घटना स्थल को ही महत्व देने का आग्रह कर सकते है, पर दूरदर्शी लोग ऐसी क्षुद्रता पर विचार नहीं करते। राम अयोध्या में और कृष्ण मथुरा में पैदा हुए थे, पर उनके स्मारक देश-विदेश में सर्वत्र फैले हुए हैं। इस दृष्टि से तीर्थ स्थापना से स्मारकों को थोड़े इधर-उधर करना पड़ता हो तो भी उसमें किसी प्रकार का संकोच नहीं किया जाना चाहिए।

छायादार वृक्षों को लगाने के लिए उपयुक्त जमीन प्राप्त करके वहाँ नये सिरे से बगीचा लगाने का विचार भी अच्छा है; पर उसके बढ़ने में कई वर्षों का समय लग जायगा। इसलिए अच्छा यह है कि जहाँ पहले से ही छायादार वृक्षों के बगीचे मौजूद हैं उन्हें दान से प्राप्त करने अथवा खरीदने का प्रयत्न किया जाय। स्वभावतः जहाँ बगीचा होगा वहाँ कुआँ भी रहा होगा। अन्यथा बगीचा लगाना ही कठिन होता। यदि कुआँ नहीं है तो वह बनना चाहिए। तीर्थ स्थापना में चबूतरा तो प्रतीक भर है। वस्तुतः सघन छाया और शुद्ध जल के साधनों का प्रबन्ध होने से पूरी बात बनती है। ऐसे स्थान में एक छोटा प्रचार केन्द्र बनाकर वहाँ कोई वानप्रस्थ रह सकते हैं और उस क्षेत्र में दूर-दूर तक अपना सेवा-क्षेत्र निर्धारित कर सकते हैं।

जिस घटना या व्यक्ति का यह तीर्थ स्मारक बन रहा हो उसका विवरण-आदर्श एवं प्रेरणा प्रकाश एक छोटी पुस्तिका के रूप में छपा होना चाहिए और उसका प्रचार उस सारे क्षेत्र में होना चाहिए। वस्तुतः यह तीर्थ स्थापन योजना आदर्शवादिता को सम्मान के उच्चस्तर पर प्रतिष्ठापित करने की नव-युग के अनुरूप प्रक्रिया है। अब तक लोक सम्मान-धनवानों, सत्ताधीशों, कलाकारों, विभूतिवानों के इर्द-गिर्द ही मँडलाता रहा है अब उसे आदर्शवादिता के प्रति समर्पित होने के लिए मोड़ा जायगा। अन्यथा सम्मान प्राप्ति की मानवी आकाँक्षा अपनी पूर्ति भौतिक साधनों में ही ढूँढ़ती रहेगी। आदर्शवादिता विकसित होने में सब से बड़ा अवरोध एक ही है कि उस मार्ग पर चलने वालों को आर्थिक दृष्टि से तो घाटा रहता ही है; लोक सम्मान का स्वाभाविक अधिकार भी दूसरे लोग ही हड़प जाते हैं। अब इस स्थिति का अन्त होना चाहिए। आदर्शवादी तत्वों का अन्वेषण किया जाना चाहिए और जो दिवंगत हो चुके हैं उनकी स्मृति बनाये रहने से उन आत्माओं को भी सन्तोष होगा कि जीवन काल में न सही मरणोत्तर उन्हें लोक मान्यता मिल गई। ऐसे जीवन वृत्तान्त उभरने चाहिएं जो जनसाधारण के लिए प्रेरणा केन्द्र बन सकें। जिनका अनुकरण करने की प्रवृत्ति उपलब्ध लोक-सम्मान को देखकर सहज ही विकसित हो सके। जन-मानस के परिष्कार में यह प्रक्रिया कितनी अधिक सहायक हो सकती है इसकी अभी तो कल्पना ही की जा सकती है। पर विश्वास यह है कि जब इस स्थापना का परिणाम सामने आवेगा तो व्यक्तियों को उत्कृष्टता की दिशा में उछालने की दृष्टि से अतीव आशाजनक सिद्ध होगा। इस प्रकार के असंख्य तीर्थ बनें और जीवन चरित्र छपें तो प्रतीत होगा कि अपना देश इन गई गुजरी परिस्थितियों में भी महामानवों की खदान बना रहा है। उसकी महान् परम्पराएँ अभी भी जीवन्त हैं। हमारे लिए यह सब भी कम गर्व-गौरव का प्रसंग नहीं है। इन प्रयासों से समूचे वातावरण में क्रान्तिकारी परिवर्तन होगा और लोक मान्यता में आदर्शवादिता की पुनः प्राण प्रतिष्ठापना होगी।

तीर्थयात्रा टोलियाँ गठित करना और उनके परिश्रम का कार्यक्रम बनाना सरल है। इस प्रयास में सामान्य प्रयत्नों से-सामान्य व्यक्तित्व भी भली प्रकार सफल हो सकते हैं। पर तीर्थ स्थापना का काम बड़ा है उसके लिए देशव्यापी सर्वे करना होगा। तीर्थयात्रा धर्म-परम्परा के निर्वाह में नये-नये तीर्थों की संगति बिठानी पड़ेगी कि मण्डलियाँ किस रास्ते कितना चलकर कहाँ विराम करेंगी ? ऐतिहासिक तथ्यों को मिलाकर ही यह प्रतिष्ठापनाएँ होंगी। अस्तु इसे एक सुविस्तृत योजना समझा जायगा और इसके लिए सर्वेक्षण के साथ-साथ यह भी सोचा जायगा कि कहाँ क्या कर सकना सम्भव हो सकता है?

राजा मान्धता की सहायता से आद्य शंकराचार्य के लिए चारों धामों की प्रतिष्ठापना कर सकना सम्भव हुआ था। बुद्ध के हर्ष वर्धन सरीखे अनुयायियों ने अनेकों बौद्ध विहारों की स्थापना की थी। अब वैसा एकाकी प्रयत्नों से सम्भव नहीं हो सकता। इसके लिए किन्हीं बड़े आयोगों की आवश्यकता पड़ेगी और उसका संचालन प्रतिभाशाली व्यक्तित्व ही सम्पन्न करेंगे। यों इसके लिए आर्थिक एवं श्रम सहयोग स्थानीय जनता का भी मिलेगा, पर उसकी रूपरेखा बनाने एवं साधन सामग्री जुटाने का कार्य तो क्रिया-कुशल हाथों से ही होना चाहिए। इन्दौर की रानी अहिल्याबाई ने मन्दिरों, घाटों का जीर्णोद्धार कराने में ख्याति प्राप्त की थी। आवश्यकता ऐसे व्यक्तित्वों की है जो उसी प्रकार भूमिका निभा सके। स्वयं आगे आयें और उस धर्म क्षेत्र के पुनरुत्थान की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण कार्य को सम्पन्न करने में अन्य अनेकों का भी सहयोग जुटा सकें। ऐसे व्यक्तित्व अपने परिवार में से ही उभर कर आयें इसकी अपेक्षा समय की आवश्यकता ने की है युग की इस चुनौती को भी हमें ही स्वीकार करना होगा।

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“एकाकी-साधना”


एकाकी-साधना (kavita)

चारों ओर तिमिर होता है, एकाकी जलती है बाती। ‘मैं क्यों जलूँ अकेली, ऐसा तुच्छ भाव मन में कब लाती॥

जलना अपना धर्म समझती, इसीलिए जलती रहती है। कोई नहीं जल रहा, इसकी चिन्ता उसे नहीं होती है॥

देखा-देखी करके जीना, उसने ऐसा सीखा ही कब। अपने ही बल पर जीती है, इस जीवन को जीना है जब॥

कौन जल रहा, कौन न जलता, इसकी उसे कहाँ है फुरसत ? वह तो निज कर्तव्य समझ, निरपेक्ष भाव से जलती जाती॥

उसकी जीवन-ज्योति न औरों के इंगित पर जलती-बुझती। देख दूसरों को न कभी वह जीवन-लक्ष्य सुनिश्चित करती॥

उसे नहीं भाता तिनकों-सा लहरों का पिछलग्गू होना। औरों की कायरता लख, भाता न उसे निज-साहस खोना॥

अपना लक्ष्य स्वयं निर्धारित करती है एकाग्र-भाव से, देख और को नहीं उफनती और न उदासीन हो पाती॥

दुनिया क्या करती है, इस पर दृष्टि रही तो जी न सकेंगे॥ अमृत की लालची भीड़ को देख, जहर हम पी न सकेंगे॥

हमको तो एकाकी शिव बन, विश्व-वेदना-विष पीना है। भोगी कीड़ों की भीड़ों में योगी बन शिव-सा जीना है॥

जो तपसी-सा जीवन जीते, वे ही जन-मंगल कर पाते, टकराती है अवरोधों से उनकी शिव-संकल्पी छाती॥

आओ ! एकाकी-दीपक सा जन-पथ पर अविलम्ब जलें हम। जन-पथ के घनघोर तिमिर को जितना भी हो सके हरें हम॥

चारों और देखकर तम को हम ही हिम्मत हार गये तो। जन-पथ नहीं प्रकाशित होगा, ज्योति पुत्र मन मार गये तो॥

कौन साथ चल रहा हमारे, इस चिन्ता से दूर रहें हम, हमको एकाकी जलना है, दीप-शिखा हमको सिखलाती॥

-मंगल विजय

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*समाप्त*