धर्म की पहुँच अन्तःकरण में अवस्थित आस्थाओं तक है। इस मर्मस्थल को स्पर्श करने की क्षमता धर्म के अतिरिक्त और किसी स्तर के तत्व ज्ञान में नहीं है। मनुष्य को उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व में नियोजित रखने के लिए ही धर्म और अध्यात्म की संरचना हुई थी। तत्वदर्शियों का वह प्रयोग इतिहास के पृष्ठों को स्वर्ण अक्षरों में लिखता रहा तो अब उसका वैसा ही उपयोग क्यों नहीं हो सकता? इसका उत्तर तर्क से नहीं प्रयोग परीक्षण से किया गया। तथ्य सामने है। षोडश संस्कारों के माध्यम से व्यक्ति और परिवार-निर्माण की- पर्व, त्यौहारों के आयोजनों से सामाजिक उत्कर्ष की- कथा, सत्संगों के माध्यम से जन-मानस परिष्कार की-गायत्री यज्ञों के माध्यम से लोक-प्रवाह को उलटने की जो चेष्टा की गई उससे आशातीत परिणाम निकले। इस प्रयोजन के लिए किया गया साहित्य सृजन, संगठन, प्रचार अभियान अपना लक्ष्य पूरा करने में सार्थक सिद्ध हुआ है यह घोषित करते हुए हमें तनिक भी संकोच नहीं है। प्रयोग की सार्थकता सिद्ध करके उसके विस्तार का उत्तरदायित्व दूसरों पर सौंपते हैं। विश्वास किया जाना चाहिए कि हिन्दू समाज के क्षेत्र में प्रयोग किया गया ‘धर्म मंच से लोक-शिक्षण’ का क्रिया-कलाप अगले दिनों और भी द्रुतगति से आगे बढ़ेगा और हर कसौटी पर अपनी सार्थकता सिद्ध करेगा।
जो प्रयोग हिन्दू समाज में हुआ है वही अन्य धर्मों में भी किया जाना अपेक्षित है। धर्म कलेवर जहाँ का तहाँ रहे। परम्पराओं, मान्यताओं को उन धर्मों के अनुयायी यथावत अपनाये रहें पर धर्म तत्व की उस आत्मा को समझें जो उत्कृष्ट चिन्तन, आदर्श कर्तृत्व पर आधारित है। चरित्र-निष्ठा और समाज-निष्ठा जिसका लक्ष्य है। एकता और समता जिसका स्वभाव है। धर्म की यह आत्मा सार्वभौम एवं सर्वजनीन है। इसमें मौलिक एकता है। सभी धर्मों को वह एक लक्ष्य पर पहुँचाती और एक केन्द्र पर केन्द्रित करती है। आज धर्मों के शरीरों में यह आत्मा मूर्छित पड़ी है उसी को जगाना अपना अगला चरण है। धर्मों का समन्वय होने का दिन अभी दूर है, पर वे सब मिलकर एक दिशा में तो आज भी चल सकते हैं। प्रयत्न इसी का है।
जिस प्रकार हिन्दू साहित्य का सार जनता के सामने प्रस्तुत करके उसकी आत्मा से जन-साधारण को परिचित कराया गया है, उसी प्रकार ईसाई, मुस्लिम एवं बौद्ध धर्म ग्रन्थों का सार भी सर्व साधारण के सामने प्रस्तुत किया जाना है यह समझाया जाना है कि उनके बीच बाह्य भिन्नता रहते हुए भी आन्तरिक एकता कितनी सघन है। अगले दिनों इसी तथ्य पर हमारा अध्ययन, मंथन, चिन्तन एवं प्रस्तुतीकरण प्रयास आरम्भ होना है। संसार की तीन चौथाई जनता इन्हीं तीन धर्मों पर केन्द्रित है। विभिन्न धर्मों के धार्मिक कर्मकाण्डों के पीछे कितनी वैयक्तिक एवं सामाजिक स्थिति को प्रखर बनाने की कितनी प्रेरणा विद्यमान है। उन धर्मों के कथा, पुराण किस प्रकार नैतिक एवं सामाजिक शिक्षा प्रस्तुत करके मानवी गरिमा एवं एकता को परिपुष्ट करते हैं। इस तथ्य से सर्व साधारण को परिचित कराया ही जाना चाहिए।
अपना प्रयत्न किसी धर्म की समीक्षा या तुलना करना नहीं। किसी को छोटा किसी को बड़ा सिद्ध करना नहीं और न परस्पर विद्वेष के बीज बोना है। प्रयत्न यह है कि उदात्त चिन्तन और आदर्शवादी क्रिया-कलाप की प्रेरणाओं का संकलन किया जाय और उससे न केवल उन धर्मों के धर्मावलम्बियों को वरन् मात्र को उससे परिचित कराया जाय। इससे विभेद की दीवारें झीनी होंगी एवं सर्व धर्म सद्भाव का क्षेत्र विस्तृत होगा।
अखण्ड ज्योति के पाठकों में से जिन्हें उपरोक्त तीन धर्मों में से किसी में अधिक गहरी रुचि एवं जानकारी हो उनका परामर्श इन पंक्तियों द्वारा सादर आमन्त्रित किया जाता है। इस संदर्भ में परामर्श शान्ति कुँज, सप्त सरोवर, हरिद्वार के पते पर भेजे जायें।
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ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
वर्ष-39 सम्पादक - श्रीराम शर्मा आचार्य अंक-6
साधनों के माध्यम से सुख पाने की प्रचलित मान्यता ने मनुष्य को इस दिशा में उत्तेजित किया है कि वह अधिक मूल्यवान और अधिक मात्रा में पदार्थों का संग्रह करके सुखी बने और सुसम्पन्न कहलाये। इसी मान्यता से प्रेरित और प्रभावित व्यक्ति अपनी समूची शक्ति धन उपार्जन में लगाते और प्रयत्न में सफल होते हैं। प्रायः प्रत्येक व्यक्ति अपने निर्वाह की मौलिक आवश्यकता से कम नहीं कुछ अधिक ही कमा लेता है।
देखते हैं कि इतनी सफलता प्राप्त कर लेने पर भी मनुष्य सुखी नहीं रह पाता। अत्यधिक उपार्जन नई विकृतियाँ और नई समस्याएँ साथ लेकर आता है और कई बार तो अशान्ति की दृष्टि से वह निर्धनता से भी महंगा पड़ता है। कारण उपार्जन में दोष होना नहीं वरन् तत्व दृष्टि के अभाव में है। न जाने क्यों इस तथ्य की उपेक्षा की जाती है कि सुख पदार्थों की प्रचुरता में नहीं, परिष्कृत दृष्टिकोण और सद्गुण सम्पन्न व्यक्तित्व में सन्निहित है। उसी के अभाव में धनी और निर्धन समान रूप से दुखी बने रहते हैं।
जितना श्रम सम्पन्नता के लिए किया जाता है उसका आधा, चौथाई भी यदि सुसंस्कारिता और सज्जनता उत्पन्न करने और बढ़ाने में किया जा सके तो देखा जायगा कि सन्तोष और उल्लास की अनुभूतियों से अन्तःकरण भर गया। वस्तुओं से नहीं उनके प्रति रखे गये दृष्टिकोण और दूरदर्शिता पूर्ण उपभोग से सुख मिलता है। उपार्जनकर्ताओं को सोचना होगा कि यदि वे सचमुच सुखी बनना चाहते हैं तो उन्हें सम्पत्ति की तरह सज्जनता के अभिवर्धन में भी दत्त-चित्त होना चाहिए।
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एक लड़की को रात में अक्सर शेर का सपना आता था, जब भी वह ऐसा देखती डर के मारे बेतरह रोने-चिल्लाने लगती। सपने वाला दृश्य दिन में भी उसे याद रहता फलतः वह दुबली होती जा रही थी। पिता उसे एक कुशल चिकित्सक के पास ले गया। चिकित्सक ने पूरी बात ध्यान से सुनी और लड़की से बोला-बच्ची, ठीक तुम्हारी तरह वही शेर मेरे सपने में भी आता है। पर मैंने उससे दोस्ती कर ली है। वह काटने वाला शेर नहीं, सिर्फ खेलने-खिलाने की आदत का है और जिन्हें वह प्यार करता है उन्हीं के सपने में आता है। तुम उससे दोस्ती करलो-फिर देखना वह कितना भला है रात भर तुम्हें हँसाता-खिलाता रहेगा और दूसरे दिन नये-नये उपहार लेकर तुम्हें खुश करने के लिए आयेगा। मेरे साथ उसका व्यवहार अब तक इसी प्रकार का रहता है। मैं उसकी दोस्ती से बहुत खुश हूँ।
लड़की ने डॉक्टर की बात पर भरोसा कर लिया। शेर का सपना तो उसके बाद भी आता रहा, पर अभिभावकों ने देखा कि अब सोते हुए उसकी मुखाकृति हँसती मुसकाती प्रतीत होती है। पूछने पर वह लड़की शेर के साथ खेलने में जो आनन्द आता है उसे बहुत उत्साहपूर्वक सुनाती और कहती डॉक्टर की तरह मैं भी शेर की दोस्ती से बहुत खुश हूँ।
कठिनाइयाँ सपने के शेरों की तरह हैं यदि उन्हें शत्रु न मानकर मित्र मान लिया जाय तो उन्हें पुरुषार्थ एवं साहस को विकसित करने वाले सहायक साधन अनुभव किया जा सकता है। संसार में जितने भी मनस्वी महामानव हुए हैं उनमें से प्रत्येक ने कठिनाइयों की अग्नि परीक्षा में प्रवेश करके अपने प्रखर व्यक्तित्व का परिचय दिया है। तीखी तलवारें शान के पत्थर से बार-बार रगड़ी जाती हैं। हीरे पर चमक तभी आती है जब उसके पहलू काटे छाँटे जाते हैं। सोने की डली गले में धारण करने योग्य अलंकरण बनने से पहले गलाई, पिघलाई जाती है। ऐतिहासिक महापुरुषों की गौरव गरिमा का इतिहास इस आधार पर लिखा गया है कि उन्होंने उच्च आदर्शों के प्रति अपनी गहरी निष्ठा का प्रमाण पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करते हुए दिया है। यदि उन्हें किसी भी कठिनाई का सामना न करना पड़ा होता और सरल जीवन जीते रहने का सुअवसर ही पल्ले बँधा रहा होता तो उनकी गरिमा पर कोई विश्वास न करता। बिना परीक्षा दिये कोई स्नातक नहीं बन सकता है और बिना पदवी के उच्च पद पर नियुक्ति नहीं हो सकती। यह दुनिया किसी को उच्च स्थान और सम्मान देने से पूर्व यह परखना चाहती है कि वह आदर्श रक्षा के मार्ग में आने वाली कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने खरेपन का प्रमाण किस सीमा तक दे सकता है। आपत्तियाँ डरावनी तो होती हैं, पर यदि उनसे खेलने की आदत डाल ली जाय तो वे सपने के शेर की तरह शत्रु न रहकर भला खिलौना बन जाती हैं।
शत्रुओं से घिरे एक नगर की प्रजा अपना माल असबाब पीठ पर लादे हुए जान बचाकर भाग रही थी। सभी घबराये और दुखी स्थिति में थे; पर उन्हीं में से एक खाली हाथ चलने वाला व्यक्ति सिर ऊँचा किये अकड़ कर चल रहा था। लोगों ने उससे पूछा तेरे पास तो कुछ भी नहीं है, इतनी गरीबी के होते फिर अकड़ किस बात की? दार्शनिक वायस ने कहा- ‘मेरे साथ जन्म भर की संग्रहीत पूँजी है और उसके आधार पर अगले ही दिनों फिर अच्छा भविष्य सामने आ खड़ा होने का विश्वास है। वह पूँजी है अच्छी परिस्थितियाँ फिर बना लेने की हिम्मत। इस पूँजी के रहते मुझे दुखी होने और नीचा सिर करने की आवश्यकता ही क्या है।’
अरस्तू कहते थे-लोग डरने, घबराने में जितनी शक्ति नष्ट करते हैं उसकी आधी भी यदि प्रस्तुत कठिनाइयों से निपटने का उपाय सोचने के लिए लगायें तो आधा संकट तो अपने आप ही टल सकता है।
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महाभारत में कहा है- ‘धर्म ही सत्पुरुषों का हित है, धर्म ही सत्पुरुषों का आश्रय है और चराचर तीनों लोक धर्म से ही चलते हैं।’
हिन्दू-धर्म-शास्त्रों में धर्म का बड़ा महत्व है, धर्महीन मनुष्य को शास्त्रकारों ने पशु बतलाया है। ‘धर्म’ शब्द का अर्थ धारण करना या पालन करना होता है। जो संसार के समस्त जीवों के कल्याण का हेतु हो, उसे ही धर्म समझना चाहिए, इसी बात को लक्ष्य में रखते हुए निर्मलात्मा त्रिकालज्ञ ऋषियों ने धर्म की व्यवस्था की है।
धर्म चार प्रकार के माने गये हैं- वर्ण धर्म, आश्रम धर्म, सामान्य धर्म और साधन धर्म। ब्राह्मणादि वर्णों के पालन करने योग्य भिन्न-भिन्न धर्म, वर्ण धर्म और ब्रह्मचर्यादि आश्रमों के पालन करने योग्य धर्म ‘आश्रम धर्म’ कहलाते हैं। ‘सामान्य धर्म’ उसे कहते हैं जिसका मनुष्य मात्र पालन कर सकते हैं। उसी का नाम ‘मानव धर्म’ है। आत्मज्ञान के प्रतिबन्धक प्रत्ययों की निवृत्ति के लिए जो निष्काम कर्मों का अनुष्ठान होता है वह ‘साधन धर्म’ कहलाता है। इन चारों धर्मों के यथा योग्य आचरण से ही हिन्दू धर्म-शास्त्रों के अनुसार मनुष्य पूर्णता को प्राप्त कर सकता है। इनमें से सामान्य धर्म विशेष महत्व रखता है, क्योंकि उसका पालन हर समय और सभी कर सकते हैं। परन्तु वर्णाश्रम धर्म का पालन अपने-अपने स्थान और समय पर ही किया जा सकता है। ब्राह्मण शूद्र का या शूद्र ब्राह्मण का धर्म स्वीकार नहीं कर सकता, इसी प्रकार गृहस्थ संन्यासी का या संन्यासी गृहस्थ का धर्म नहीं पालन कर सकता, परन्तु सामान्य धर्म के पालन का अधिकार प्रत्येक नर-नारी को है, चाहे वह किसी भी वर्ण या आश्रम का हो। इसका तात्पर्य यह नहीं कि सामान्य धर्म के पालन करने वाले को वर्णाश्रम धर्म की आवश्यकता ही नहीं है। आवश्यकता सबकी है। अतएव किसी का भी त्याग न कर सबका समुच्चय करके यथाविधि योग्यतानुसार प्रत्येक धर्म का पालन करना चाहिए।
शास्त्रकारों में से किसी ने सामान्य धर्म के लक्षण आठ, किसी ने दस, किसी ने बारह, किसी ने पन्द्रह, सोलह या इससे भी अधिक बतलाये हैं। श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कन्ध में इस धर्म के तीस लक्षण बतलाये हैं और वे बड़े ही महत्व के हैं। भगवान मनु के बतलाये धर्म के दस लक्षण हैं- धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रिय-निग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध।
सत्य बात तो यह है कि यही मनुष्य जाति का स्वाभाविक धर्म है। मनुष्य में मनुष्यत्व का विकास इन्हीं धर्मों के आचरण से हो सकता है।
धर्म और ईश्वर का विरोध करने वाले लोग कहते हैं कि धर्म को मानने की क्या आवश्यकता है? धर्म को मानने वाले लोग धर्म का यही तो लाभ बताते हैं कि उससे हमारे अन्दर सत्य, न्याय, दया, तप, त्याग और उपकार आदि चरित्र सम्बन्धी सद्गुण उत्पन्न होते हैं। हम इन चरित्र सम्बन्धी सद्गुणों को अपने भीतर धर्म के बिना भी उत्पन्न कर सकते हैं। अनेक नास्तिक लोगों में ये सद्गुण प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। हम अपने व्यवहार में इन सद्गुणों को चरितार्थ करते रहेंगे। हमें धर्म को मानकर आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक और कर्मफल आदि के जंजाल में पड़ने की क्या आवश्यकता है?
धर्म विरोधियों का यह कथन ऊपर से सुनने में रोचक प्रतीत होता है। गहराई में विचार करने पर पता लगता है कि धर्म को माने बिना आत्मा-परमात्मा की सत्ता और लोक-परलोक तथा कर्मफल के सिद्धान्त को माने बिना चरित्र सम्बन्धी सद्गुण खड़े नहीं रह सकते। हमारी नैतिकता आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक तथा कर्मफल के सिद्धान्त पर टिकी हुई है।
यदि हम नास्तिक लोगों की बात मानकर भौतिकवादी बन जायें और मानने लग पड़ें कि आत्मा नाम की कोई सत्ता नहीं है। जिसे हम आत्मा कहते हैं वह तो जड़ पदार्थों के संयोग का परिणाम है तो हमारी नैतिकता ठहर न सकेगी।
जब हमारा केवल यही जन्म है और इसी में हम जो कर लें और जो सुख भोगना चाहें भोग लें तो हम में बुरे कर्मों से बचने की प्रवृत्ति न होगी। तब हमारे अन्दर यह प्रवृत्ति जाग उठेगी कि यह थोड़ा-सा जो समय हमारे पास है जिसमें हम जो सुख भोगना चाहें भोग सकते हैं। इसलिए जैसे भी हो सके हमें अपने जीवन को सुखी बनाकर रखना चाहिए। इस प्रवृत्ति के वशीभूत होकर हम अपने जीवन को सुखी बनाने के लिए बुरे कर्म करने से भी नहीं चूकेंगे। बुरे कर्मों का दण्ड देने वाला परमात्मा तो कोई है नहीं जिसका हमें भय रहे। अगला जन्म भी कोई नहीं जिसमें हमें अपने बुरे कर्मों का फल भोगना पड़े तो हमें बुरे कर्मों से बचकर सच्चरित्र बनने की प्रेरणा क्यों होगी?
आत्मा-परमात्मा की सत्ता, पुनर्जन्म और कर्मफल सिद्धान्त को न मानकर केवल यही एक जन्म मानने की अवस्था में तो हमारा उद्देश्य केवल अपने इस वर्तमान जीवन को सुखी बनाना रह जायगा। तब हमें अपने जीवन को सुखी बनाने के लिए झूठ, फरेब, धोखाधड़ी और अन्याय, अत्याचार का भी सहारा लेना पड़े तो ले लेना चाहिए। इस प्रकार के दुराचरणों से हमें क्यों रुकना चाहिये? भौतिकवादी नास्तिकों के पास इस प्रकार के प्रश्नों का कोई समाधान नहीं है।
फिर एक बात और यहाँ विचारणीय है, वह यह कि आत्मा और परमात्मा को न मानने की अवस्था में अच्छे और बुरे का भेद कैसे किया जायगा? हमारे किसी कर्म को अच्छा या बुरा कहकर उसकी अच्छाई और बुराई का निर्णय करने वाला कोई परमात्मा या आत्मा तो है नहीं, भौतिकवादी नास्तिकों के मत में परमात्मा की सत्ता तो बिलकुल नहीं है, आत्मा की भी वास्तविक सत्ता नहीं। उनकी दृष्टि में आत्मा भी जड़ है। जिस आत्मा की कोई पृथक सत्ता नहीं है जो हमारे शरीर के प्राकृतिक जड़ पदार्थों का ही एक गुण मात्र है और जड़ है वह आत्मा हमारे कर्मों की अच्छाई-बुराई का निर्णय किस प्रकार करेगा? इस प्रकार हमारे कर्मों की अच्छाई-बुराई का निर्णय करने वाली कोई सत्ता न होने से हमारे कोई भी कर्म अच्छे या बुरे नहीं रहेंगे। हमारे सभी कर्म एक जैसे ही हो जायेंगे। हम जैसा चाहें कर लें। हम किसी के किसी भी कर्म को दुराचरण या अनैतिक और सदाचरण या नैतिक न कह सकेंगे।
धर्म ही मनुष्य का आधार है, धर्म ही जीवन है और धर्म ही मरने पर साथ जाता है। मनु महाराज कहते हैं- पिता, माता, पुत्र, स्त्री और जाति वाले ये परलोक में सहायता नहीं करते, केवल एक धर्म ही सहायक होता है। प्राणी अकेला ही उत्पन्न होता है, अकेला ही मरता है और अकेला ही पुण्य-पाप का भोग करता है, भाई-बन्धु तो मेरे शरीर को काठ और मिट्टी के ढेले की तरह पृथ्वी पर छोड़कर वापस लौट आते हैं, केवल धर्म ही प्राणी के पीछे-पीछे जाता है। अतएव परलोक की सहायता के लिए प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा धर्म संचय करें, क्योंकि मनुष्य धर्म की सहायता से कठिन नरकादि से तर जाता है।
जिस दिन संसार से धर्म को सर्वथा मिटा दिया जाएगा, जिस दिन लोग आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक को मानना सर्वथा छोड़ देंगे, जिस दिन कर्मफल सिद्धान्त में लोगों की आस्था न रहेगी, जिस दिन परमात्मा की भक्ति द्वारा परमात्मा के गुणों को अपने भीतर धारण करने वाले धर्मात्मा लोग सर्वथा उत्पन्न होने बन्द हो जायेंगे, उस दिन संसार से सच्चरित्रता उठ जायगी। आज लोगों में जो सच्चरित्रता दिखाई देती है उसका मूल कारण धर्म ही है।
नास्तिक लोगों में भी जो कुछ सच्चरित्रता दिखाई पड़ती है उसका मूल स्रोत भी धर्म ही है। धर्म द्वारा सिखाये गये परम्परा से चले आ रहे सच्चरित्रता के तत्वों को नास्तिक लोगों ने स्वीकार किया है। इसी आधार पर उनका समुदाय, सम्प्रदाय जीवित रह सकने में समर्थ हो रहा है वस्तुतः धर्म तत्व इतना सार्वभौम सर्वकालीन और शाश्वत है कि उसे छोड़ देने से नास्तिक आस्तिक किसी का भी काम नहीं चल सकता।
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अपने इस युग को प्रगति का युग माना जाता है। कहा जाता है कि जो जानकारियाँ एवं सुविधाएँ पूर्वजों को प्राप्त थीं, उनकी तुलना में अपनी उपलब्धियाँ कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी हैं। यह दावा इस हद तक ही सही है कि निस्सन्देह बढ़ोतरी हुई है, पर प्रगति किस दिशा में हुई है यह विचारणीय है। बढ़ना उत्थान की दिशा में भी हो सकता है और पतन की ओर भी। साधनों की मात्रा बढ़ाने में नहीं वरन् उनका सदुपयोग कर सकने वाली बुद्धिमत्ता के बढ़ने पर ही यह कहा जा सकता है कि-प्रगति हुई। यदि बढ़े हुए साधन विनाश-विग्रह और पतन के लिए प्रयुक्त किये जा रहे हैं तो यही कहना पड़ेगा कि इस उन्नति की तुलना में वह अभावग्रस्तता अच्छी थी जिसमें मनुष्य स्नेह, सद्भाव और चैन सन्तोष के साथ रहने देता था।
वर्तमान प्रगति किस दिशा में हुई है उससे हमने क्या पाया है? मानसिक, शारीरिक और सामाजिक सुख-शान्ति के बढ़ने में-मानवी मूल्यों को बढ़ाने में उससे कितना योगदान मिला है। यह विचारने योग्य बात है।
योरोप का सबसे प्रगतिशील व्यवसायी देश है- पश्चिमी जर्मनी और इस महाद्वीप का सबसे अधिक सम्पन्न देश है फ्राँस। इन दोनों देशों की प्रजा बहुत सुसम्पन्न और साधनों से भरपूर है।
इस समृद्धि का उपयोग क्या हो सकता है यह उन्हें विदित नहीं। व्यक्तिगत विलासिता के अतिरिक्त और भी हो सकता है यह सोचने की उन्हें फुरसत नहीं है। विलासिता की मस्ती ही उन्हें जीवन की उपलब्धि प्रतीत होती है। अकेले पैरिस नगर में 1500 क्लब ऐसे हैं जिनमें युवा नर-नारी निर्वसन होकर नृत्य करते और राग-रंग में लीन रहते हैं। नशेबाजी आकाश चूमने लगी है। प॰ जर्मनी में 4 लाख पुरुष और 2 लाख स्त्रियाँ ऐसी हैं जो अहर्निशि नशे में चूर पड़े रहते हैं। फ्रांस में एक लाख आबादी पीछे हर साल 10 व्यक्ति नशे की अधिकता से दुर्घटनाग्रस्त होकर बेमौत मरते हैं। अमेरिका में नशेबाजी के कारण मरने वालों की वार्षिक संख्या 3,50,000 पहुँच चुकी है।
अस्त-व्यस्त, अनिश्चित आशंकाग्रस्त एवं एकाकी जीवन का तनाव इतना भारी पड़ रहा है कि लोग नींद की गोली खाये बिना मस्तिष्कीय उत्तेजना से पीछा छुड़ा ही नहीं पाते। यह नींद की गोलियाँ दैनिक आहार में शामिल हो गई हैं। दिन-दिन बढ़ता तनाव-नशीली गोलियों का घटता प्रभाव-अधिक मात्रा में सेवन करने के लिए विवश करता है उस समय तो लगता है कि अनिद्रा की व्यथा से छुटकारा पाने का अस्त्र हाथ लग गया किन्तु शरीर के सूक्ष्म संस्थानों में यह विषाक्तता इतनी गहराई तक घुस जाती है कि उनमें विविध प्रकार की व्याधियाँ उठ खड़ी होती हैं। सन्तानोत्पादन पर तो नशेबाजी का और भी बुरा प्रभाव पड़ता है। अमेरिका में हर वर्ष ढाई लाख बच्चे विकलाँग पैदा होते हैं। पिछले वर्ष ऐसे बच्चों की संख्या डेढ़ करोड़ से ऊपर निकल गई थी। इंग्लैंड में हर 40 नवजात शिशुओं में एक विकलाँग या अर्ध विक्षिप्त उत्पन्न होता है। हाँगकाँग में 87 के पीछे एक- स्पेन में 75 पीछे एक-आस्ट्रेलिया में 56 पीछे एक बच्चा विकलाँग पैदा होता है इसका एक कारण नशेबाजी की नर एवं नारियों की बढ़ती हुई आदतें रात को नींद की गोली लेना ही माना गया है। भारत इस सम्बन्ध में भी पिछड़ा हुआ है क्योंकि यहाँ शराब खोरी इतनी नहीं बढ़ी है इसलिए यहाँ 116 पीछे एक बच्चा ही विकलाँग पैदा होता है।
पारिवारिक भ्रष्टता का बच्चों पर कितना बुरा असर पड़ता है इसका अनुमान इस एक ही जानकारी से लग जाता है कि 18 वर्ष की आयु तक पहुँचने से पूर्व ही हर छह में से एक अमेरिकी लड़के को किसी कड़े अपराध में जेल की हवा खा लेनी पड़ती है।
अनियन्त्रित और अविवेकपूर्ण कामुकता का दुष्परिणाम अनेकानेक समस्याएँ लेकर सामने आ रहा है। उससे स्वास्थ्य क्षीण हो रहे हैं, मानसिक सन्तुलन बिगड़ रहे हैं, अर्थ संकट उत्पन्न हो रहे हैं, स्नेह-सौजन्य घट रहे हैं-सबसे बड़ी बात यह हो रही है जनसंख्या दावानल की तरह सर्वभक्षी समस्या बनकर सामने आ रही है। कामुकता वृद्धि की दिशा में सिनेमा, साहित्य चित्र, संगीत आदि कला के सभी क्षेत्र एक जुट होकर पिल पड़े हैं, फलस्वरूप मनुष्य प्रत्येक दृष्टि से संकटग्रस्त होता चला जा रहा है। प्रगति के नाम पर उसे अवगति की हाथ लग रही है।
यदि यह क्रम यथावत चलता रहे तो अब से 500 वर्ष बाद वह पृथ्वी के थल क्षेत्र में हर वर्ग फुट पर एक आदमी को निर्वाह करना पड़ेगा। अर्थात् बोरी में आलू भरने की तरह ठूँस-ठूँसकर भरने पर भी इन जीवित मृतकों के लिए स्थान उपलब्ध न हो सकेगा। जब इतने ठसाठस आदमी भरे होंगे तो अन्य पशु-पक्षिओं, पेड़-पौधों के लिए जगह ही कहाँ बचेगी? वे मनुष्य कुछ हलचल भी नहीं कर सकेंगे। अपने स्थान पर हटने से पूर्व दूसरे को हटाकर नहीं मार कर जगह साफ करनी पड़ेगी। अन्यथा एक दूसरे से सटा हुआ आदमी लकड़ी के लट्ठों की तरह अड़ा खड़ा होगा। उसे सोने, नहाने, खाने, मल-मूत्र त्यागने के लिए भी जगह न होगी। व्यापार, शिक्षा, यातायात आदि की बात तो अलग रही। आदमी जरा भी अपने स्थान से हटना चाहे तो उसे पहला काम साथी को मारना होगा। पर समस्या का हल इससे भी न होगा, उस मरे हुए को फिर कहाँ पटका जाय यह प्रश्न सामने खड़ा होगा। यदि वे आदमी जीवित हुए तो उनके अन्न, जल की- मल-मूत्र त्याग की- स्थान व्यवस्था ही असम्भव हो जायगी।
भारत में हर महीने 10 लाख नये बच्चे पैदा होते हैं। दुनिया में अन्यत्र वार्षिक जन्म दर दो प्रतिशत बढ़ रही है, पर भारत अन्य किसी मामले में न सही बच्चे पैदा करने में सबसे अग्रणी है। उसकी दर पिछली दशाब्दियों में तीन प्रतिशत थी, अब साढ़े तीन प्रतिशत हो गई है और एक दो वर्ष में चार प्रतिशत हो जाने की आशा है। अर्थात् भारत अब यह कहने की स्थिति में पहुँच गया है कि दुनिया को चुनौती देकर कह सके कि वह किसी भी देश से इस क्षेत्र में दूनी प्रगति कर रहा है।
सुरक्षा और शान्ति के साधन बढ़ाने के स्थान पर मृत्यु को अति सरल और अति निकट बना देने वाले साधनों का विकास, आविष्कार तेजी से हो रहा है। लाठी, फरसे से होने वाली मार-काट की तुलना में यह निश्चय ही प्रगति कही जा सकती है, पर इस विकास ने व्यापक विनाश को कितना सस्ता और सरल बनाकर रख दिया है यह विचारणीय है। कोई एक सिरफिरा आदमी एक मिनट में इस सुन्दर संसार को भस्मीभूत करके रख सकता है जबकि ‘पिछड़ेपन’ के दिनों में ऐसे सर्वभक्षी संकट की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी।
इन्हीं दिनों अमेरिका ने एक नये किस्म का मिसाइल चलाने वाला विमान बनाया है। इसका नाम है- बी. 1 इसमें अणु बमों से लैस मिसाइलें जमा दी जाती हैं और उन्हें आकाश से ही चलाकर लक्ष्यवेध किया जाता है। अब तक ऐसी मिसाइलें जमीन पर से ही चलाई जा सकती थीं। शत्रु पक्ष जासूसी द्वारा यह पता रखता था कि प्रतिपक्षी ने कहाँ-कहाँ इन्हें चलाने के अड्डे बना रखे हैं। उन्हें नष्ट करने के लिए निशाना साधने की सुविधा कम्प्यूटरों द्वारा प्राप्त हो जाती थी। अणु शस्त्र फेंकने और शत्रुपक्ष की मार से बचने के लिए इसी आधार पर अब तक युद्ध नीति बनाई गई थी।
पर अब बी.-1 ने नई समस्या उत्पन्न की है। मिसाइलें उस पर लदी होंगी। उनमें अणु बम फिट किये गये होंगे। आकाश से ही निशाने पर गोले दागे जायेंगे। यह बम वर्षक इतना ऊपर उड़ रहा होगा कि वहाँ तक तोपों के गोले नहीं पहुँच सकेंगे। राकेटों से तोड़ने की बात सोची जाय तो वह भी कठिन है क्योंकि उस बम वर्षक के चालक यान को सीधी दिशा में और एक जैसी चाल में नहीं उड़ायेंगे। आकाश में उलटी-पुलटी चाल पर जमीन से फेंके जाने वाले गोले असफल रहेंगे। बम वर्षक बिना जोखिम उठाये अपना काम कर सकेगा।
इस बी0-1 जेट बम वर्षक को कैलिफोर्निया के रासवेल इंटर नेशनल प्लान्ट से प्रथम बार उड़ाया गया। उसकी चाल 2400 किलो मीटर प्रति घण्टा थी। इसकी मार 9600 किलो मीटर तक पहुँचती है। उसका भार 1 लाख 15 हजार पौंड और मूल्य 50 करोड़ डालर है। लंबाई 144 फुट ऊँचाई 34 फुट और पंख 137 फुट के हैं।
आकाश द्वारा इतनी लम्बी मार को रोकने के लिए आत्म-रक्षा का कोई उपाय नहीं सूझ रहा है इसलिए रूसी और चीनी क्षेत्रों में नये सिरे से अपनी युद्ध नीति पर विचार करना पड़ रहा है। अब तक की सारी योजनाएँ रद्दी हो गईं। जमीन पर से राकेट द्वारा अणु बम फेंकने एवं रोकने की स्थिति में ही आक्रमण और बचाव की बात सोची गई थी। आकाश में उड़ने वाले यान जब आक्रमण करेंगे तब उनके स्थान का पता लगाना, उन्हें रोकना या नष्ट करना कैसे हो सकता है इसके लिए युद्ध नीति उसी तरह निर्धारित करनी पड़ेगी जैसे कि भाले, तलवार युग में बन्दूक का आविष्कार होने पर की गई थी। पिछले दिनों युद्ध का नशा कुछ ठंडा होता दीख रहा था, पर इस नये आविष्कार ने नई खलबली मचा दी है। स्पष्ट है कि कुछ ही दिनों से रूस भी इस साधन को बना रहा है तब सुरक्षा का प्रश्न अमेरिका के सामने भी उसी प्रकार आ खड़ा होगा जैसा कि आज रूस के सामने है।
मात्र जानकारियों और साधनों की अभिवृद्धि करके गर्व करने और गौरवान्वित होने का कोई कारण नहीं। प्रगति तो तब कही जायगी जब साधनों, जानकारियों और उपलब्धियों को सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त करने की समझदारी भी बढ़े। वस्तुतः प्रगति का मूल आधार सदाशयता की उस अभिवृद्धि के आधार पर ही आँका जा सकता है जिसके कारण मनुष्य स्वल्प साधनों में सुखी रह सकता है और दूसरों को सुखपूर्वक रहने दे सकता है।
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मनुष्यों का हाथ देख और जन्म-पत्र देखकर उसका भविष्य बताने वाले, रेखाओं और ग्रह-गणित का सहारा लेते हैं। इसमें परम्परागत मान्यताएँ आधार रहती हैं, भविष्यवक्ता की व्युत्पन्न मति का प्रयोग कम ही होता है। किन्तु संसार में ऐसे भी भविष्यवक्ता हैं जो बदलती हुई परिस्थितियों और घूमते हुए घटना-चक्र को ध्यान में रखते हुए अपनी इस दुनिया का भविष्य बताने का भी साहस करते हैं। उनका दावा है कि उनका अनुमान फलित ज्योतिषियों की तरह निराधार नहीं वरन् कम्प्यूटर द्वारा प्रस्तुत किये गये निष्कर्षों की तरह है। वे अपने प्रतिपादन उस प्रवाह को ध्यान में रखते हुए करते हैं जो प्रचण्ड धारा की तरह बह रहा है। नदी के उद्गम पर उत्पन्न हुआ जल का उभार देखकर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि नदी तट पर बसे हुए किस क्षेत्र में कितनी बाढ़ आवेगी। मानसून, आँधी-तूफान और टिड्डी दल के चल पड़ने पर मौसम विशेषज्ञ आगे के क्षेत्रों में सूचना भेज देते हैं कि कितनी देर में कितना बड़ा परिवर्तन उन्हें देखने को मिलेगा। विश्व के भविष्य कथन के सम्बन्ध में जो पूर्व सूचनाएँ दी गई हैं उनका आधार भी इसी स्तर का है।
इन भविष्य वक्ताओं में चार प्रमुख हैं-(1) एल्डुअस हक्सले (2) जूलवर्न (3) जार्ज आर्वेल (4) एच॰ जी॰ वेल्स। यह चारों ही विश्व विख्यात साहित्यकार, दार्शनिक और दूरगामी चिन्तन कर सकने वालों में मूर्धन्य गिने जाते हैं।
एल्डुअस हक्सले ने अपनी पुस्तक ‘व्रेव न्यू वर्ल्ड’ में लिखा है-संसार के सामने सबसे बड़े खतरे दो हैं-एक बढ़ती हुई जनसंख्या और सभ्यता का यन्त्रीकरण। जिस हिसाब से लोग बच्चे पैदा करते चले जा रहे हैं यदि उसमें कोई बहुत बड़ी रोकथाम न हुई तो अगले 100 वर्ष में ही, मनुष्य के निर्वाह का प्रश्न जटिल हो जायगा और इसके बाद तो लोग जीवित रहने को-अन्न, जल और हवा की-रोटी, कपड़ा और मकान की-प्राथमिक आवश्यकताएँ पूरी न हो सकने के कारण ही अभावग्रस्त परिस्थितियों में दम तोड़ने लगेंगे। सरकारी नियन्त्रण और औद्योगिक उत्पादन वितरण का ठीक तरह से निर्वाह सम्भव न होगा और सामाजिकता उच्छृंखलता में बदल जायगी। इतनी बड़ी भीड़ में और इतनी जटिल परिस्थितियों में आदर्शवादी मान्यताओं की रक्षा नहीं हो सकती। मनुष्य के बीच जंगल का कानून चल पड़ेगा और वन्य पशुओं की तरह बिना किसी रीति-नीति का जीवन जीना पड़ेगा।
सभ्यता का यन्त्रीकरण में इस प्रकार बताते हैं कि मनुष्य के चिन्तन पर यन्त्रों का इतना दबाव पड़ेगा कि वह स्वतन्त्र रीति से कुछ सोच ही न सकेगा और लगभग पराधीन हो जायगा। प्रेस प्रकाशन, रेडियो, टेलीविजन और फिल्में चलाने का अधिकार, सत्ता अथवा सम्पत्ति के आधार पर चन्द लोगों के हाथों चला जा रहा है। वे लोक-मानस पर अपनी मर्जी का दबाव आकर्षक पोटलियों में लपेट कर इस कदर डालते हैं कि आदमी उससे भिन्न प्रकार नहीं सोच सकते उसे हाथ-पाँवों की हरकत करने भर की आजादी रहती है सोचने की नहीं। फलतः वह बौद्धिक कठपुतली बनता जा रहा है। यह एक बड़ा खतरा है जिसमें जीवित मनुष्य सोचने की दिशा में उसी तरह पराधीन होंगे जैसे कि ग्रामोफोन की मशीन बोलने के लिए अपने मालिक की आज्ञानुवर्ती होती है।
हक्सले ने अपने एक अन्य ग्रन्थ “दि जीनियस एण्ड दि गार्डस” में यह संकेत दिया है कि प्रजा का स्तर उठाये बिना आजकल जो प्रजातन्त्र का छकड़ा चल रहा है उससे केवल निहित स्वार्थों का भला होगा। प्रजा जब अपना कर्त्तव्य और अधिकार समझ ही नहीं सकेगी तो उसका मत पत्र कोई भी झटक लेगा ऐसी दशा में वह उद्देश्य पूरा न हो सकेगा जिसके अनुसार प्रजा द्वारा प्रजा के लिए शासन करने और सबको न्याय मिलने की घोषणा की गई थी। प्रजातन्त्र क्रमशः एकाधिकारी शासन में बदलते जायेंगे। यह उनकी असफलता की स्पष्ट घोषणा होगी। किन्तु इससे भी कोई हल न निकलेगा। अधिनायकों की सनकें सामन्तवादी शासन काल में रहने वाली प्रजा की अधिक पराधीन परिस्थिति लाकर खड़ी कर देगी और लोग अपने को विवशता से घिरे, लाचार और असहाय प्राणी की तरह अनुभव करेंगे।
कुछ शताब्दियों बाद मनुष्य की आकृति में क्या कुछ परिवर्तन होगा? इस प्रश्न के उत्तर में प्रसिद्ध अँग्रेज विज्ञान लेखक एच॰ जी0 वेल्स का कहना है कि अगले दिनों मनुष्यों के सिर काफी बड़े होंगे। अमेरिका के शरीर विज्ञानी ओलैफ स्टेन ने लिखा है कि भविष्य में मनुष्य की आँतें इतनी जटिल न रहेंगी, वे सीधी-साधी और छोटी होंगी। रूसी नृतत्ववेत्ता अलेक्सान्देर वेल्याएव की मान्यता है कि भविष्य में स्त्रियों के सिर बड़े, बाल छोटे, दाँत थोड़े और होंठ पुरुषों जैसे रोम युक्त होंगे। उन्हें भूरी हलकी मूँछें भी कह सकेंगे। नाखूनों का कड़ापन चला जायगा, मात्र उस जगह उनके निशान भर रह जायेंगे।
लन्दन की रायल सोसाइटी आव आर्ट ने एक शताब्दी बाद संसार का स्वरूप क्या होगा इस विषय पर इंग्लैंड के दूरदर्शी विद्वानों का मत संग्रह किया है और उसके आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि निकट भविष्य में संसार की परिस्थितियाँ तेजी से बदलेंगी और वे उससे लगभग सर्वथा भिन्न होंगी जैसी कि आज हैं।
विज्ञान की प्रगति रुकने वाली नहीं है। उसे अधिकाधिक सुख-सुविधा के साधन प्रस्तुत करने के लिए प्रयुक्त किया जायगा फलतः वे उपाय हाथ लग जायेंगे तो कम खर्च में अधिक आराम दे सकते हैं। दूसरी ओर जनसंख्या की वृद्धि रुकेगी नहीं, धीमी करने के प्रयास करते-करते भी संख्या इतनी बढ़ जायगी कि धरती के साधन कम पड़ेंगे अस्तु जो उपलब्ध होगा उसका न्यूनतम भाग लेकर ही लोगों को सन्तोष करना पड़ेगा। विज्ञान और प्रजनन की घुड़दौड़ की पूँछ से बँधी हुई परिस्थितियाँ भी आगे बढ़ने के लिए विवश होंगी अतएव स्वभावतः उनका स्वरूप आज की अपेक्षा बहुत अधिक भिन्न हो जायगा।
सर्वेक्षण के अनुसार अब से सौ वर्ष बाद सन् 2100 के लगभग-घर-घर में चौका-चूल्हा जलने का वर्तमान झंझट उपहासास्पद पिछड़ापन गिना जायगा। प्लास्टिक के थैलों में बन्द स्टेण्डर्ड भोजन हर जगह मिलेगा। वे पैकिट पाँच औंस से भारी नहीं होंगे, पोषक पदार्थ आवश्यक मात्रा में मिले रहने से इतनी खुराक पूरी मानी जायगी। तब पेट भी अधिक बोझ उठाने, पचाने की स्थिति में नहीं होंगे, फिर वस्तुओं का वितरण भी तो जनसंख्या की आवश्यकताओं को पूरा करने का ध्यान रखते हुए करना पड़ेगा। इस दृष्टि से पाँच औंस की भोजन मात्रा पूर्ण एवं पर्याप्त मानी जायगी। उसे बड़ी फैक्ट्रियां पकावेंगी। थोड़े से कपड़ा मिल लाखों करोड़ों लोगों का तन ढक देते हैं फिर कोई कारण नहीं कि एक इलाके का एक भोजन मिल सैकड़ों मील के क्षेत्र में लोगों की खाद्य आवश्यकता पूरी न कर दे। घर-घर चूल्हा जलाने से जो गन्दगी, परेशानी और समय तथा स्थान की बर्बादी होती है उसका सर्व सम्मति से सफाया कर दिया जायगा। इससे ईंधन की समस्या हल होगी और चौके जो स्थान घेरते हैं, उसमें लाखों लोगों को रहने की जगह मिलेगी।
विवाह शादियों के नियम तो और भी सरल हो जायेंगे, पर बच्चे पैदा करने पर नियन्त्रण क्रमशः बढ़ते ही जायेंगे। इसके लिए लाइसेन्स प्राप्त करने होंगे। आज आतिशबाजी हर कोई नहीं बना सकता। उसके लिए योग्यता, इलाका, साधन, आवश्यकता आदि अनेक बातों का ध्यान रखकर ही लाइसेन्स दिये जाते हैं। बच्चा पैदा करने का लाइसेन्स देते समय भी ऐसे अनेकों प्रश्न पूछे जायेंगे और व्यक्ति तथा देश की स्थिति देखते हुए ही लाइसेन्स मिलेंगे। तमाखू, अफीम, भाँग, शराब आदि का उत्पादन करने की इच्छा अथवा क्षमता होने पर रोक इसलिए लगी हुई है कि वे अधिक तादाद में पैदा होंगी तो जनस्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ेगा। शहरों के घने इलाके में जानवर पालने की छूट नहीं मिलती। क्योंकि वे गन्दगी पैदा करते हैं। ठीक इसी तरह बच्चे पैदा होने से लेकर समझदार होने तक लगातार गन्दगी तथा अव्यवस्था फैलाते हैं। उन्हें जनने का ही नहीं पलने का भी नगरों से कुछ दूर प्रबन्ध किया जाया करेगा।
खाद्य पदार्थों में से दूध, घी ही नहीं माँस भी हटा दिया जायेगा क्योंकि जमीन जब मनुष्यों के लिए ही कम पड़ेगी तो जानवरों को उस पर कौन रहने देगा। जानवर न रहेंगे तो दूध, माँस की बात ही कहाँ बनेगी। जलाशयों में पाई जाने वाली मछलियों का चूर्ण ही तब खाद्य पदार्थों में मिलाकर माँसाहारी रुचि के लोगों को मिल सकेगा। अन्न खाने की आदत भी लोग छोड़ देंगे। तरह-तरह की घासें उगाई जायेंगी और उन्हीं से खाद्य पदार्थ बना लिये जायेंगे। जलाशयों पर काई उगाई जायेगी और वह भी खाने के काम आयेगी। चीनी, तेल आदि की आवश्यक मात्रा घास और पेड़ों से ही निकल आया करेगी। कपड़े सूत, ऊन या रेशम के नहीं बनेंगे। रासायनिक धागों का आजकल प्रचलन बढ़ रहा है आगे चलकर शरीर ढ़कने का काम पूरी तरह इन्हीं धागों से लिया जायेगा।
आकाश से जमीन का काम लिया जायेगा। कम से कम तिमंजली जमीन तो हो ही जायेगी। रिहाइशी मकान तो कई-कई मंजिल के होंगे ही। रेलगाड़ियाँ जमीन के नीचे-पैदल जमीन पर और मोटरें पुल बनाकर खड़ी की गई सड़कों पर दौड़ा करेंगी। तब तक हैलिकॉप्टर के अच्छे किस्म की उड़ान मोटरें भी बन जायेंगी और वे खुले आसमान में उड़ेंगी, वैसा चलना उन्हें भी निर्धारित रास्तों से ही पड़ेगा अन्यथा उनकी भी टक्करें और दुर्घटनाएँ होंगी। रेलें, बसें कई मंजिल की होंगी ताकि उनमें जमीन कम घिरे और आदमी अधिक बैठ सकें। स्कूल, फैक्टरी आदि सभी दुमंजिले होंगे।
कृषि के लिए खेत मकानों की ऊपरी मंजिल पर रहेंगे ताकि पूरी जमीन लोगों के रहने, कल-कारखानों और यातायात के लिए प्रयुक्त हो सके। खम्भे लगाकर अधर में कृषि फार्म बना लिए जायेंगे और हरियाली उसी पर टँगी रहा करेगी। बड़े पेड़ भी जानवरों की तरह ही संसार से समाप्त हो जाएंगे। छोटी झाड़ियों से ही फल, फूल आदि का काम चल जायेगा और घास की लुगदी से लकड़ी बन जायेगी। जलावन के लिए सिर्फ बिजली प्रयुक्त होगी फिर पेड़ों की जरूरत भी क्या है?
प्रेस उद्योग नाम मात्र का रह जायेगा। रेडियो, टेलीविजन, टेलीफोन समाचार सुनाने तथा पत्र-व्यवहार का माध्यम बनेंगे। स्कूली पढ़ाई भी इन्हीं साधनों के सहारे हो जाया करेगी। महत्वपूर्ण तथ्यों वाली पुस्तकें ‘माइक्रो फिल्मों’ के रूप में उपलब्ध रहेंगी। पत्र-पत्रिकाएँ, पुस्तकें आज जितना कागज खराब करती हैं उसकी तब बिलकुल आवश्यकता न रहेगी। प्रमुख समस्या जीवनयापन के साधनों की होगी। रोटी, कपड़ा और मकान का प्रबन्ध ही जब कठिन हो जाएगा तो ‘प्रेस’ जैसे विलासी साधन को जीवित रखने के लिए कागज तथा दूसरे साधन कहाँ से जुटाये जा सकेंगे।
कारण, तर्क, आधार और तथ्यपूर्ण सम्भावनाओं के आधार पर विज्ञ व्यक्ति भविष्य के जो अनुमान लगाते हैं उनमें से अधिकाँश सत्य होते हैं। संसार की बड़ी-बड़ी योजनाएँ इसी आधार पर बनती और सफल होती हैं। निकट भविष्य में मानव जाति को किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा इसकी भविष्य वाणियाँ विश्व के मूर्धन्य विचारकों ने प्रामाणिक तथ्यों के आधार पर की हैं। इन्हें हम सहज ही झुठला नहीं सकते। फिर भी इतना तो सोचने को विवश होते ही हैं कि क्या उन कारणों को समय रहते रोका नहीं जा सकता, जिनके फलस्वरूप विकट विभीषिकाएँ कल-परसों सामने उपस्थित होंगी और महाविनाश की भूमिका प्रस्तुत करेंगी।
ख्यातिनामा पियानो वादक पादरेवस्की से भेंट करने के लिए एक संगीत अध्यापक अपने छात्रों समेत पहुँचे। कुशल क्षेम के बाद आगन्तुक ने प्रार्थना की कि छात्रों को उपदेश और आशीर्वाद के रूप में कुछ कहें। पादरेवस्की ने अपने पियानो पर रखी एक पुस्तक की ओर संकेत करते हुए कहा - “मैं अभी भी हर दिन इस पुस्तक के आधार पर चार घण्टे नित्य अभ्यास करता हूँ”। अध्यापक ने अपने छात्रों को पादरेवस्की का संकेत सूत्र समझाते हुए कहा- अपने काम के प्रति सतत जागरुकता और तत्परता ही किसी दिशा में सफल होने का रहस्य है।
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सामान्य दृष्टि से देखने पर मनुष्य अन्य जीवधारियों की तुलना में बुद्धिमान और साधन सम्पन्न दीखता है। इसे एक सुयोग, सौभाग्य ही कहना चाहिए कि प्रकृति प्रदत्त बुद्धि अनुदान को जहाँ अन्य जीवधारी परम्परागत स्तर पर ही बनाये रहे वहाँ मनुष्य ने उसका विकास करने की आवश्यकता समझी और क्रमशः प्रगति के पथ पर बढ़ते हुए वहाँ पहुँच गया जहाँ आज है। यह स्थिति आदिमकाल में नहीं थी। तब वह भी अन्य प्राणियों की तरह अपना निर्वाह करता था। सहयोग की प्रवृत्ति पनपी तो पारस्परिक आदान-प्रदान का द्वार खुल गया। प्रगति का चस्का लगा तो फिर वह रुका नहीं। सहयोग का महत्व और बुद्धि का लाभ समझ में आया तो वह मार्ग मिल गया जिसकी लम्बी मंजिल पूरी करते हुए उसके प्राणि जगत का अधिनायक और सृष्टि का मुकुट मणि बनने का अवसर प्राप्त कर लिया।
अभी प्रगति का एक छोटा चरण पूर्ण हुआ है। सहकारिता और सामूहिकता के महत्व को अधिक गम्भीरता से समझा जा रहा है और प्रयत्न किया जा रहा है कि मनुष्य व्यक्तिगत इकाई बनकर न रहे वरन् समष्टि का एक घटक भर अपने को अनुभव करे। उसकी समस्त क्षमताएँ समाज के लिए समर्पित रहें और समर्थ समाज व्यक्ति को उतना सुनिश्चित लाभ प्रदान करे जो एकाकी जीवन में किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता। इस मान्यता को समूहवाद या समाजवाद कह सकते हैं। इस दिशा में चिन्तन को चिरकाल से मोड़ा जाता रहा है। पशु प्रवृत्ति में एकाकीपन की प्रधानता रहती है। अन्य प्राणी इसीलिए पिछड़े रह गये कि वे सहयोग का महत्व न समझ सके। कई प्राणी झुण्ड बनाकर तो रहते हैं, पर एक दूसरे के लिए आदान-प्रदान बहुत ही स्वल्प मात्रा में करते हैं। जिन प्राणियों में जितना अधिक सहयोग है वे अपने को उतना ही सुरक्षित और सुखी अनुभव करते हैं। मनुष्य ने सहकारिता का महत्व अधिक गम्भीरता से समझा है और उसे विकसित करने पर जोर दिया है।
धर्म और अध्यात्म की आधार शिला इस बात पर रखी गई है कि व्यक्ति अपनी उपलब्धियों से समाज को अधिकाधिक लाभान्वित करे। निज के लिए कम से कम में निर्वाह की बात सोचे। संयम, तप, तितीक्षा, दान, पुण्य, दया, उदारता जैसे आदर्शों के पीछे तथ्य सन्निहित है कि मनुष्य निजी सुख-सुविधाओं की उपेक्षा करके दूसरों को अधिक समुन्नत बनाने के प्रयत्न में लगा रहे। स्वार्थ की निन्दा और परमार्थ की प्रशंसा इसी उद्देश्य से की गई है कि इस मान्यता को अपनाकर मनुष्य निजी सुख सुविधा जुटाने की अपेक्षा सामूहिक उत्कर्ष को प्रधानता दे सके।
धर्म के क्षेत्र में परमार्थ परायण और समाज-सेवियों की प्रशंसा की गई है। इस उद्देश्य में संलग्न साधु और ब्राह्मणों को धरती का देवता कहकर असाधारण सम्मान दिया जाता रहा है और पुण्य परमार्थ का फल स्वर्ग आदि बताया जाता रहा है। अब इस सामूहिकता की प्रवृत्ति को आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक स्तर पर मान्यता दी जा रही है। आर्थिक उन्नति के लिए सहकारी समितियों को प्रोत्साहन मिल रहा है। सामूहिक सुरक्षा एवं प्रगति के लिए संस्था संगठन खड़े हो रहे हैं। सरकार स्वयं एक सार्वजनिक संगठन है। अब सरकारी ढाँचे इस प्रकार बनाये जा रहे हैं जिनमें व्यक्तिवाद को निरुत्साहित करके समूहवाद को प्रधानता दी जाय। समाजवाद, साम्यवाद आदि इसी दिशा में बढ़ते हुए कदम हैं। आशा की जानी चाहिए कि मानवी प्रगति क्रमशः इसी दिशा में कदम बढ़ाती चलेगी और एक दिन वह होगा जब ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का आदर्श शास्त्रों में लिखा न रहेगा। धर्मोपदेश की तरह ही उसका प्रयोग न होता रहेगा, वरन् उसे पूर्ण व्यावहारिक मान्यता मिल जायगी। अगले दिनों सारी मनुष्य जाति एक भाषा, एक धर्म, एक संस्कृति, एक राष्ट्र की परिधि में बँध जायगी। व्यक्ति की समस्त क्षमताएँ समाज के लिए समर्पित होंगी और समाज अपने समस्त घटकों का समुचित पोषण करेगा। इसी सिद्धान्त को अपनाकर अपने शरीर का निर्वाह क्रम सुविधापूर्वक चल रहा है। समूची मानव जाति को इसी सिद्धान्त को अपनाने में अधिक लाभ होगा। सहकारिता का आदर्श जितनी मात्रा में अपना लिया जायगा उतनी ही सुख-शान्ति बढ़ेगी और प्रगति का आनन्द मिलेगा। संसार निश्चित रूप से इसी दिशा में बढ़ेगा।
मानवी प्रगति की दूसरी धारा है- बुद्धिमता। चिन्तन को ऊबड़-खाबड़ न रहने देकर उसे व्यवस्थित और परिष्कृत करके उपयोगी दिशा में लगाये जाने का नाम ही बुद्धिमानी है। आदिमकाल के चिन्तन को किस प्रकार व्यक्तियों तथा परिस्थितियों के साथ ताल-मेल बिठा सकने में सक्षम रखा जा सकता है। वह उपार्जन, उपभोग एवं सुरक्षात्मक प्रयोजनों में किस प्रकार प्रवीण हो सकता है ऐसी जानकारी देने की कला को शिक्षा कहते हैं। विद्यालयों तथा अन्य प्रकार के शिक्षणों से इस आवश्यकता को पूरा किया जाता है। मस्तिष्क के भीतर क्या भरा है? उसके कोष्ठक किस प्रकार जड़े जकड़े हैं। यह ज्ञान तो शवच्छेद की पद्धति विकसित होने के साथ ही मिल गया था। पीछे मस्तिष्कीय सूक्ष्मताओं के बारे में अनेकानेक बातें जानी गईं और एक स्वतन्त्र मनःशास्त्र बन गया जिसे मनोविज्ञान कहते हैं। इस अन्वेषण ने चेतन-अचेतन की कई परतें ढूंढ़ निकालीं और बताया कि मस्तिष्क की कार्य-पद्धति क्या है और उसे प्रशिक्षित परिष्कृत कैसे किया जा सकता है? मानसिक रोगों के स्वरूप एवं उनके निराकरण का विधान भी मोटे रूप में हाथ लग गया है।
स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश का युग अब अधिकाधिक प्रखर होता चला जा रहा है। पदार्थ की सूक्ष्म शक्ति ढूंढ़ निकाली गई है। ताप, प्रकाश, शब्द, भाप, बिजली, अणु, विकरण आदि के सम्बन्ध में बहुत कुछ जाना जा चुका है अब पदार्थ के अन्तर्गत काम करने वाले चेतन शब्द को जाना जायेगा। वैज्ञानिक कुछ समय पूर्व तक जड़ को विशुद्ध जड़ मानते थे, पर आइन्स्टीन प्रभृति मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने यह स्थापना की थी कि परमाणु की गतिशीलता के पीछे एक चेतना काम करती है और सन्तुलन बनाये रहने के लिए वही उत्तरदायी है। विश्वास किया जाना चाहिए कि यह स्थापना क्रमशः विकसित होगी और हर सारा-पसारा चेतन सत्ता का ही लीला कल्लोल समझा जाने लगेगा। “ईशा वास्य मिदं सर्वं यत्किंचित् जगत्वाँ जगत्” की ऋषि प्रगति मान्यता कल प्रयोगशालाओं में भी सिद्ध होकर रहेगी।
शरीर मोटे तौर से निर्वाह की गतिविधियाँ चालू रखने और इन्द्रिय सम्वेदनाओं को रसास्वादन कराने भर के लिए उपयोगी दीखता है, पर प्रगति के मार्ग पर चलते हुए इसे एक जीवन्त विद्युत संस्थान माना जायगा और इसके कलपुर्जों का उतना अद्भुत उपयोग होने लगेगा जितना वैज्ञानिकों की अद्यावधि उपलब्धियों के आधार पर सम्भव होता है। कई प्रकार के यन्त्र-आविष्कार हमारे भौतिक प्रयोजन पूरे करते हैं। प्रकृति की जिन शक्तियों को करतलगत करने के लिए यंत्रों की आवश्यकता पड़ती है वे सभी यान्त्रिक विशेषताएँ मानवी काया में विद्यमान हैं। अब तक उसे खाने-कमाने, सोने, भोगने भर के लिए प्रयुक्त किया जाता रहा है आगे उसका उपयोग श्रेष्ठतम बहुमुखी प्रयोजनों में प्रयुक्त हो सकने वाले महा यन्त्र के रूप में होने लगेगा। शारीरिक सूक्ष्म क्षमताओं को अतीन्द्रिय क्षमता कहते हैं। यह इन्द्रियातीत इसलिए कही जाती है कि सामान्य प्रचलन उनका कुछ है नहीं। इन उपलब्धियों को सुषुप्ति का जागरण भर कह सकते हैं।
मन मस्तिष्क यों सोचने-समझने, निर्णय लेने और कल्पना करने के लिए प्रयुक्त होता है और उसके कारण समझदारी की मात्रा बढ़ती है। समझदार अधिक कमा सकता है और अधिक सफल हो सकता है। यह मोटी बात हुई। मस्तिष्कीय चेतना विश्व चेतना का एक स्फुल्लिंग है। चिनगारी में दावानल की सारी विशेषताएँ और संभावनाएँ विद्यमान हैं, यह सूक्ष्म ज्ञान हुआ। व्यक्ति का मस्तिष्क विश्व मस्तिष्क के साथ जुड़ा होने के कारण प्रयत्नपूर्वक उस स्थिति में पहुँच सकता है जिसमें कि स्वयं विश्व मस्तिष्क की-विश्वात्मा की स्थिति है। इस स्तर पर पहुँचा हुआ मनुष्य देवता अथवा परमात्मा कहा जा सकता है। मस्तिष्कीय विकास की परिधि मात्र बुद्धिमता तक सीमित नहीं है। वरन् उस अलौकिक सामर्थ्य से भी सम्बन्धित है जिसके माध्यम से अति मानव स्तर के कार्य किये जा सकते हैं। इस क्षमता को ब्रह्म वर्चस नाम दिया जाता रहा है।
भूतकाल में तत्वदर्शी महामनीषियों द्वारा ब्रह्मविद्या के नाम से मानवी दिव्य क्षमता को समझने- विकसित करने एवं प्रयोग में लाने की पद्धति की स्थापना हुई थी। उसका एक पक्ष था दर्शन-अर्थात् योग। दूसरा पक्ष था विज्ञान-अर्थात् तप। दर्शन को साधना और तप को उपासना कहा गया है। प्राचीनकाल में इस दिशा में उत्साहवर्धक प्रगति हुई थी और इस विद्या के विशेषज्ञों ने अपनी उपलब्धियों को ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में सर्व साधारण के सामने रखा था। अपने शरीर और मस्तिष्क को एक अच्छी-खासी वैज्ञानिक प्रयोगशाला के रूप में परिणत करके उन्होंने इस तथ्य को प्रमाणित किया था कि “पूर्ण मदः पूर्ण मिदं” पूर्ण से उत्पन्न हुआ यह भी पूर्ण है। आवश्यकता केवल प्रसुप्ति को जागृति में परिणत करने भर की है। ‘साधना’ इसी प्रयत्न का नाम है। अपनी अविज्ञात अलौकिकताओं को विज्ञात एवं प्रत्यक्ष बनाने में सफलता प्राप्त होती है उसी का नाम सिद्धि है। यह कोई जादुई आकस्मिकता नहीं, वरन् पूर्णतः वैज्ञानिक एवं प्रामाणिक सूत्रों के साथ जुड़ी हुई विधि व्यवस्था है।
सहकारिता के उपयुक्त वातावरण बनाने के लिए व्यक्ति को अनुशासित रहना पड़ता और उदार बनना पड़ता है। अध्यात्म का दर्शन शास्त्र इसी आदर्शवादी कर्तृत्व की प्रेरणा देता रहा है। अगले दिनों इस प्रवृत्ति को अधिकाधिक उत्साह के साथ उभारना पड़ेगा। अध्यात्म दर्शन का जीवन-साधना पथ इसी आवश्यकता पूर्ति के लिए है।
बुद्धिमत्ता की चिन्तन प्रक्रिया लोक-व्यवहार से आगे बढ़ेगी और प्रत्याहार, धारणा, ध्यान समाधि की कक्षाएँ उत्तीर्ण करते हुए वह स्थिति पैदा करेगी जिसमें आत्मा अपने आपको विश्वास की दिव्य क्षमताओं से सुसम्पन्न अनुभव कर सके। आत्मा को परमात्मा का उत्तराधिकार पाने का अधिकार है। अधिकार पत्र पाने के लिए जिस क्षमता और प्रामाणिकता की आवश्यकता पड़ती है उसी की पूर्ति उपासना द्वारा सम्भव होती है।
प्रगति का प्रस्तुत कदम यह है कि हम स्थूल को वेधन करके सूक्ष्म की भूमिका में प्रवेश कर रहे हैं। पदार्थ, शरीर, मस्तिष्क सभी क्षेत्रों में अद्भुत सामर्थ्य इसी सूक्ष्मता में सन्निहित है। मनुष्य जाति की प्रगति का यात्रा क्रम अभी और द्रुतगामी बनाना पड़ेगा। भौतिक विज्ञानी जिस उत्साह से पदार्थ की शक्ति को करतलगत करते जा रहे हैं; अध्यात्म विज्ञानियों को उसी तत्परता के साथ चेतना की सूक्ष्म परतों के साथ अपना सम्बन्ध बनाना होगा। इस दिशा में जितना बढ़ा जा सकेगा उतनी ही उल्लास भरी परिस्थितियाँ सामने होंगी। मनुष्य में देवत्व का अवतरण जिस अनुपात से होगा उसी क्रम से धरती पर स्वर्ग की परिस्थितियाँ विनिर्मित होती चली जायेंगी।
उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में मानवी चेतना की सूक्ष्म सत्ता का विकास आवश्यक है। हमें यही करना है। दूसरों को इस दिशा में विश्वास और उत्साह मिल सके ऐसा वातावरण उत्पन्न करना है। अध्यात्म विज्ञान को सर्व साधारण के लिए सुलभ बनाया जाना चाहिए। अखण्ड-ज्योति इसी प्रयास में निरत है। साधना जयन्ती वर्ष में तो इसी दिशा में व्यापक वातावरण बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
आशा की जानी चाहिए कि अपने प्रयास मानवी प्रगति क्रम को तीव्र करने में-उसके एक अति महत्वपूर्ण पक्ष को उपेक्षा के गर्त से निकाल कर सर्वजनीन उपयोग की प्रक्रिया बनाने में उत्साहवर्धक सफलता मिलेगी। मानवी भविष्य को अधिक उज्ज्वल बनाने में -प्रगति क्रम को अधिक परिष्कृत करने में-अपने प्रयास निश्चित रूप से अपनी महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करेंगे।
हर साल एक बुरी आदत को जड़ से खोदकर फेंका जाय तो कुछ साल में बुरे से बुरा आदमी भला हो सकता है।
-फ्रैंकलिन
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शतपथ ब्राह्मण की एक गाथा में ‘श्री’ की उत्पत्ति का वर्णन है। वह प्रजापति के अन्तस् से आविर्भूत होती है। अपूर्व सौन्दर्य एवं ओजस् से सम्पन्न है। प्रजापति उनका अभिवन्दन करते हैं और बदले में उस आद्य देवी से सृजन क्षमता का वरदान प्राप्त करते हैं।
ऋग्वेद में श्री और लक्ष्मी को एक ही अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। तैत्तिरीय उपनिषद् में श्री का अन्न, जल, गोरस एवं वस्त्र जैसी समृद्धियाँ प्रदान करने वाली आद्य शक्ति के रूप में उल्लेख है। गृह-सूत्रों से उसे उत्पादन की उर्वरा शक्ति माना गया है। यजुर्वेद में ‘श्री’ और ‘लक्ष्मी’ को विष्णु की दो पत्नियाँ कहा गया है- “श्री श्चते लक्ष्मीश्चते सपत्न्यौ” श्री सूक्त में भी दोनों को भिन्न मानते हुए अभिन्न उद्देश्य पूरा कर सकने वाली बताया गया है-”श्रीश्र लक्ष्मीश्र”। इस निरूपण में श्री को तेजस्विता और लक्ष्मी को सम्पदा के अर्थ में लिया गया है।
शतपथ ब्राह्मण में श्री की फल श्रुति की चर्चा करते हुए कहा गया है वे जिन दिव्यात्माओं में निवास करती हैं वे ‘ज्योतिर्मय’ हो जाते हैं। अथर्ववेद में पृथ्वी के अर्थ में श्री का प्रयोग अधिक हुआ है। धरती माता मातृभूमि के प्रति श्रद्धा की अभिव्यक्ति करने के लिए श्री का उच्चारण एवं लेखन होने का इन ऋचाओं में संकेत है।
आरण्यकों में ‘श्री’ को सोम की प्रतिक्रिया अर्थात् आनन्दातिरेक कहा गया है। ब्राह्मण ग्रन्थों में उसकी चर्चा, शोभा, सुन्दरता के रूप में हुई है। ‘श्री’ सूक्त में इस महाशक्ति की जितनी विशेषताएँ बताई गई हैं उनमें सुन्दरता सर्वोपरि है। वाजसनेयी आरण्यक में श्री और लक्ष्मी की उत्पत्ति तो अलग-अलग कही गई है, पर पीछे दोनों के मिलकर एकात्म होने का कथानक है।
पौराणिक चित्रों में लक्ष्मी को कमलासन पर विराजमान हाथियों द्वारा स्वर्ण कलशों से अभिषिक्त किये जाने का चित्रण है। कमल अर्थात् सौन्दर्य, गज अर्थात् साहसिक धैर्य, स्वर्ण कलश अर्थात् वैभव, जल अर्थात् सन्तोष सन्तुलन। इन विशेषताओं के समन्वय को लक्ष्मी कह सकते हैं। ‘श्री’ शब्द में इसी स्थिति को अपनाने के लिए प्रोत्साहन है। पुराणों में ‘श्री’ की उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई बताई गई है। यहाँ प्रबल पुरुषार्थ का संकेत है। अनुर्वर खारे जलागार से भी पुरुषार्थी लोक वैभव वर्चस्व प्राप्त कर सकते हैं। इस तथ्य को लक्ष्मी जन्म के उपाख्यान को महामनीषियों ने निरूपित किया है। कल्प सूत्र की एक कथा में भगवान महावीर के किसी पूर्व जन्म में उनका माता त्रिशला होने का वर्णन है जिसने दिव्य स्वप्न में ‘श्री’ का दर्शन किया था। समयानुसार उस दिव्य दर्शन की प्रतिक्रिया अपनी गोदी में भगवान को खिला सकने के रूप में प्राप्त हुई।
सामगान में श्री के पर्याय दीप्ति, ज्योति, कीर्ति जैसे शब्दों को प्रस्तुत किया गया है।
‘श्री’ को भारतीय धर्म में इतना महत्व क्यों दिया गया है उस पर विचार करने से प्रतीत होता है कि व्यक्तित्व को आन्तरिक सौन्दर्य- व्यावहारिक तेजस्विता और भौतिक समृद्धि के प्रति आस्थावान और प्रयत्नशील रहने के लिए संकेत है। आत्मिक और भौतिक प्रगति के सन्तुलित समन्वय से ही व्यक्तित्व का सर्वतोमुखी विकास होता है। श्री को प्रत्येक व्यक्ति के नाम से पूर्व लगाने में इसी सद्भावना एवं शुभ-कामना की अभिव्यक्ति है कि श्रीवान् बनें-सर्वतोमुखी प्रगति की दिशा में अग्रसर हों।
उत्साहसम्पन्नदीर्घसूत्रं क्रियाविधिज्ञं व्यसनेष्वसक्तम्। शूर कृतज्ञं दृढसौहृदं च लक्ष्मीः स्वयं मार्गति वासहेतोः॥
उत्साह से सम्पन्न विलम्ब न करने वाले, काम की रीति जानने वाले, निर्व्यसन, शूर, कृतज्ञ और मित्रता को निभाने वाले को लक्ष्मी ढूंढ़ कर अपना निवास-स्थान बनाती है।
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रजनी पति चन्द्रमा कभी रात्रि की देवी चन्द्रमुखी का दीप्तिमान चेहरा भी माना जाता था। राम उसे खिलौना समझते थे और पाने के लिए मचलते थे। कृष्ण की चन्द्रमा पाने की बालहठ को शान्त करने के लिए पानी में उसकी छवि दिखाकर किसी प्रकार बहलाया। प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 कन्याएँ चन्द्रमा को ब्याह दीं। उसने उनमें से एक सर्वांग सुन्दरी रोहिणी को अपनाया और शेष 26 को उपेक्षित रखा है। दक्ष को समाचार मिला तो वे बहुत कुपित हुए और शाप देकर चन्द्रमा को नष्ट ही कर दिया। लड़कियों ने अपना वैधव्य दुःख दूर करने की पिता से प्रार्थना की। उनने उसे घटती-बढ़ती कलाओं वाला बनाकर और अमावस्या को पूर्ण नष्ट रहने की व्यवस्था कर दी, इस पर साँप भी न मरा और न लाठी भी टूटी वाली कहावत सध गई।
चन्द्रमा का दर्शन करने पर उपवास तोड़ने वाले कितने ही व्रत उपवास हैं। मुसलमानों की ईद तो चन्द्र दर्शन पर ही टिकी हुई है। कुकर्म में इन्द्र का साथ देने के कारण चन्द्रमा को भी शाप लगा और उसे कलंकी बनना पड़ा। स्यामंत मणि चुराये जाने के झंझट में भी चन्द्रमा पर ही दोष थोपा गया और उसके मत्थे अभी तक कालिमा चिपकी हुई है। कामदेव की पत्नी रति का निर्माण प्रजापति ने चन्द्रमा का ही एक भाग तोड़कर किया था। वही गड्ढा कालिमा जैसा दीखता है।
सौन्दर्यमयी कल्पनाओं से लदा चन्द्रमा कितना सुन्दर कितना कलात्मक और कितना दिव्य है। जब कि उसका भौतिक रूप सर्वथा अवाँछनीय और अनुपयुक्त है। न हवा, न पानी, न वनस्पति , न सह्य तापमान। संसार का स्थूल रूप भी ऐसा ही कर्कश है। उसकी सारी शोभा तो कल्पना और भावना की कलात्मक सम्वेदनाओं से सुसज्जित की जाती है। वैज्ञानिक प्रयोगशाला में ले जाकर खड़ा कर देने पर तो मनुष्य हाड़-माँस का पुतला और शोभायमान पदार्थ, मात्र अणु योगिकों का अन्धड़ मात्र बनकर रह जाता है न उसमें कहीं शोभा है और न सरसता।
चन्द्रमा में बड़े-बड़े क्रेटर 33000 के लगभग हैं। इनके अलावा छोटे खड्ड अगणित हैं। इसमें पाये जाने वाले पदार्थों को देखते हुए कुछ वैज्ञानिक ऐसी सम्भावना व्यक्त करते हैं चन्द्रमा कभी पूर्ण ग्रह रहा है। उस पर कभी कोई विकसित सभ्यता रही है। उसके निवासियों ने अणु युद्ध छेड़ा है फलतः वहाँ का समस्त वायुमण्डल और जल वैभव उड़कर अन्तरिक्ष में छितरा गया। गुरुत्वाकर्षण भी घट गया। फलतः पृथ्वी ने उसे अपनी कक्षा में घसीट लिया और वह परिक्रमा करने वाला नगण्य सा उपग्रह मात्र बनकर रह गया। उस पर लानत की तरह उल्काएँ बरसने लगीं, इसी से उसकी सतह खाड़-खड्डों से भर गई। वायुमण्डल बना रहता तो उल्काएँ उसमें प्रवेश न कर सकतीं और कम से कम सतह तो समतल बनी रहती।
मोटे रूप में- सरसरी दृष्टि से देखने पर चन्द्रमा की संरचना ऐसी प्रतीत होगी जिसे हम निरर्थक और उपहासास्पद कह सकते हैं, पर जब गहराई में प्रवेश करते हैं और सूक्ष्म दृष्टि से विश्लेषण करते हैं तो उस निरर्थकता के भीतर भी बहुमूल्य सार्थकता दृष्टिगोचर होती है। जीवन की तरह चन्द्रमा की ऊपरी सतह निराशाजनक है, पर बारीकी के साथ गहराई में प्रवेश करने पर न चन्द्रमा निस्सार है और न मानव जीवन दोनों के ही अन्तराल में बहुमूल्य सम्पदाएँ छिपी पड़ी हैं।
चन्द्रमा रसायनों और खनिजों की दृष्टि से बहुत सम्पन्न है। ‘साइन्स’ पत्रिका में प्रकाशित अन्वेषणकर्ताओं के अनुसार उसमें सिलीकॉन, टाइटेनियम, एल्युमीनियम, फैरस, मैग्नीशियम, कैल्शियम, सोडियम, पोटेशियम फास्फोरस आदि रसायनों का बाहुल्य है और खनिजों में ताँबा, लोहा, कोहेनाइट, स्कवेराइट, पोटाश फेल्सपार, क्वार्ट्ज, स्पाइनेट, रुटाइल, ट्राइलाइट, एपेटाइट, पायरोक्नीन, इल्मेनाइट, ओलोवाइन, ट्रिडिनाइट आदि प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं।
चन्द्र से लाई गई धूलि का विश्लेषण करके वैज्ञानिकों ने बताया है कि वह अपनी मिट्टी की अपेक्षा कहीं अधिक उपजाऊ है। उस पर फसलें जल्दी और ज्यादा उगेंगी। उस मिट्टी से उपजे पौधों में कीड़े लगने का भी डर नहीं है।
चन्द्रमा पूरी तरह मरा नहीं है। उसकी ऊपरी सतह ही निर्जीव हुई है। भीतरी परतों में अभी वैसी ही ऊष्मा और क्षमता मौजूद है जैसी कि पृथ्वी की भीतरी परतों में। इसका स्पष्ट प्रमाण यह है कि वहाँ अभी भी ज्वालामुखी फूटते हैं और अपने ढंग का लावा उगलते हैं।
चन्द्रमा समुद्र जल को प्रभावित करके जिस प्रकार ज्वार-भाटे उत्पन्न करता है, उसी तरह वह पृथ्वी की चमड़ी को भी खींचा है और वनस्पतियों को झकझोरता है। पूर्णिमा को पृथ्वी का फुलाव पौन इंच अधिक मोटा हो जाता है और उस दिन वनस्पतियों के बढ़ने तथा फूलने के सामान्य क्रम में काफी बढ़ोतरी रहती है।
मनुष्यों की शारीरिक, मानसिक स्थिति पर चन्द्रमा का प्रभाव पड़ता है। मस्तिष्क और रीढ़ उसके प्रभाव को अधिक खींचते हैं। पुरुषों में अमावस को स्त्रियों में पूर्णिमा को आवेश की मात्रा बढ़ी रहती है। इन्हीं दिनों उनके उन्माद अधिक उभरते देखे गये हैं।
कोई अपने सौन्दर्य को देख समझ नहीं पाता। हर किसी को दूर के ढोल सुहावने लगते हैं। हमें चन्द्रमा अमृत वर्षा करने वाला परम सौन्दर्य का मनोरम प्रतीक मालूम पड़ता है और अपनी धरती धूलि-मिट्टी की बनी बेकार और ऊबड़-खाबड़ लगती है। चन्द्रमा पर जाकर देखने वालों को वहाँ की स्थानीय स्थिति पूर्णतया कुरूप और अवाँछनीय प्रतीत होती है किन्तु उदय हुई पृथ्वी ऐसी लगती है मानो ब्रह्माण्ड की सबसे सुन्दर रंगीन और अत्यंत शोभा-सुसज्जा युक्त एकमात्र केवल वही है।
चन्द्रमा से सम्पूर्ण आकाश घना काला दीखता है। तारे बहुत ही चमकदार दीखते हैं। हमें चन्द्रमा जितना चमकदार दीखता है, चन्द्र तल में पृथ्वी उसकी तुलना में बीस गुनी अधिक चमकदार दिखाई पड़ती है। हमें चन्द्रमा जितना बड़ा दीखता है, उसकी तुलना में चन्द्रमा पर से देखने पर पृथ्वी चार गुनी अधिक बड़ी दीखती है। चन्द्रमा का एक दिन इतना बड़ा होता है जितने कि पृथ्वी के पन्द्रह दिन। दिन-रात को मिलाकर हमारा एक महीना पूरा हो जाता है।
हमें चन्द्रमा पर सिर्फ कुछ काले धब्बे दीखते हैं। पर चन्द्र तल पर महाद्वीपों के भूखण्ड, समुद्र, रेगिस्तान, पर्वत, हरियाली, नदियाँ, बादल, बर्फ, आँधी, तूफान आदि की स्थिति भली-भाँति देखी जा सकती है। स्थानीय विशेषताओं के अनुरूप कई प्रकार के रंगों का हल्का गहरा उभार भी दीखता है। पृथ्वी पूरे रंगीन चित्र जैसी गोलमटोल और हलचलों से भरी हुई दिखाई पड़ती है।
नोबेल पुरस्कार विजेता डॉ0 हेराल्ड सी0 उरे का कथन है कि सूर्य के विस्फोट से छितराये हुए पदार्थ से उसके ग्रह परिवार का निर्माण हुआ। उसी में से कुछ बचा हुआ पदार्थ पृथ्वी के इर्द-गिर्द घूमने लगा और वह चन्द्रमा बन गया। चन्द्रमा पृथ्वी का टुकड़ा नहीं वरन् सूर्य का बेटा है। डॉ0 उरे द्वारा चन्द्र सम्बन्धी शोध ग्रन्थ “औरिजन एण्ड हिस्ट्री आव मून” में उन्होंने यह सिद्ध किया है कि चन्द्रमा वस्तुतः पृथ्वी का जुड़वाँ भाई और एक स्वतन्त्र ग्रह है जो अपने छोटे अस्तित्व के कारण और परिस्थितियों के दबाव से पृथ्वी का परिक्रमाकारी भृत्य बन गया है।
छितराव में क्षुद्रता ही पल्ले पड़ती है और स्थिति दयनीय होकर रह जाती है। बड़ा ग्रह जब भरा-पूरा और एक था तो उसका स्थान सौर मण्डल में दूसरे नम्बर का था, पर जब वह टूट कर बिखर गया तो उसके अवशेष क्षुद्र ग्रहों की उपहासास्पद स्थिति में चक्कर काट रहे हैं और चन्द्रमा पृथ्वी का भृत्य होकर रह रहा है। यदि चन्द्रमा को स्वतन्त्र ग्रह भी माना जाय तो भी यह स्वीकार करना पड़ेगा कि हर किसी को अपनी सत्ता सुविकसित करनी चाहिए। पिछड़ेपन की स्थिति में पड़े रहना किसी न किसी की पराधीनता के चँगुल में जकड़े बिना नहीं रह सकता। पिछड़े अफ्रीकनों को गोरे अमेरिकी पकड़ ले गये थे और उन्हें शताब्दियों तक गुलाम बना कर रखा। चन्द्रमा भले ही सहोदर भाई रहा हो पर उसकी असमर्थ और तुच्छ स्थिति ने पृथ्वी को गुलाम बना कर रहने के लिए विवश बना दिया। यही तथ्य न केवल ग्रह उपग्रहों में वरन् मनुष्यों में पूरी तरह लागू होता है।
चन्द्रमा अपनी धुरी पर 27 सही एक बटा तीन दिन में एक चक्कर पूरा करता है। पृथ्वी की परिक्रमा करने में भी लगभग इतना ही समय लगता है। फलस्वरूप उसका 59 प्रतिशत एक ही ओर का भाग पृथ्वी पर से दिखाई पड़ता है। पृष्ठ भाग को हम कभी भी नहीं देख पाते। चन्द्रमा की परिक्रमा कक्षा अण्डाकार है अतएव उसकी न्यूनतम दूरी 356500 किलोमीटर और अधिकतम दूरी 406863 किलोमीटर हो जाती है। चन्द्रमा का अपना प्रकाश नहीं है वह या तो सूर्य की रोशनी से चमकता है या फिर पृथ्वी के प्रकाश से प्रकाशवान रहता है। तापमान दिन में 250 डिग्री फारेनहाइट और रात्रि में घट कर माइनस 172 डिग्री सेन्टीग्रेड तक पहुँच जाता है।
चन्द्र विजय क्या वस्तुतः उतनी ही आवश्यकता थी जितनी कि समझी गई है। इस सम्बन्ध में प्रतिपक्ष की अभिव्यक्तियाँ भी विचारणीय हैं। रूस के एक किसान ने उस देश के प्रमुख अखबार प्रावदा के नाम एक पत्र लिख कर पूछा था- अन्तरिक्षयान भेजने से मुझ जैसे सामान्य व्यक्ति को क्या लाभ? अगर यह स्पूतनिक न बनते तो सरकार कपड़े के दाम आधे कर सकती थी और इससे मुझे आधे ही मूल्य में एक ओवरकोट मिल सकता था जिसके बिना मुझे इस कड़ाके की ठंड में दिन काटने पड़ते हैं।
अमेरिकी किसान के सामने भले ही ओवरकोट की समस्या न हो पर यदि इतना खर्च न करना पड़ता तो वहाँ का उत्पादन भी सस्ता पड़ सकता था और उससे संसार को सस्ते मूल्य में वस्तुएँ मिलतीं तथा अमेरिका में उद्योग धन्धे बढ़ने से उस देश को आज जैसी बेकारी का सामना न करना पड़ता।
‘न्यू साइंटिस्ट’ के अनुसार अन्तरिक्ष में एक पौण्ड वजन फेंकने पर अमेरिकी लागत 50000 डालर है। रूसी लागत इससे अधिक है। अमेरिका अब तक इस मद में 100 अरब डालर से अधिक खर्च कर चुका। रूस को उससे भी अधिक करना पड़ा है।
परमाणु ऊर्जा समिति के अध्यक्ष-शेट हालीफील्ड ने चन्द्र यात्रा को ‘मून मेड नैस’ की संज्ञा दी थी और कहा था। ‘जब खाद्यान्न परीक्षण के लिए हमें 6 लाख डालर भारी पड़ रहे हैं, तो चन्द्रयान पर इतना खर्च करने की क्या जरूरत पड़ गई?’
चन्द्र विजय के उपरान्त अन्य लोकों के जीतने के लिए आतुर मनुष्य को न जाने यह समझ कब आवेगी कि वह आत्म विजय एवं धर्म विजय की भी आवश्यकता अनुभव करें और उसके लिए कुछ प्रयत्न करने की दिशा में भी थोड़े से कदम बढ़ायें।
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ईंधन जलने, औद्योगिक कल-कारखानों से धुआँ निकलने और विभिन्न कारणों से वातावरण-प्रदूषण की आजकल बड़ी चर्चा है। सामान्य कारणों से उत्पन्न होने वाला प्रदूषण यों तो प्रकृति अपने आप ही शुद्ध करती है, पर उस शुद्धि चक्र में मानव निर्मित एक व्यवधान उत्पन्न हो गया है। इसके कई कारण गिनाये जाते हैं, जिनमें तीन प्रमुख हैं। पहला तो यह कि आजकल रेल, मोटरों और कल-कारखानों में ज्वलनशील ईंधन जलाया जाता है जैसे पेट्रोल, मोबिल ऑयल, डीजल ऑयल और मिट्टी का तेल। इन रासायनिक ईंधनों के जलने से कई तरह की गैसें निकलती हैं जो वायुमण्डल में घुलकर वातावरण को दूषित करती हैं।
दूसरा कारण रासायनिक मिश्रणों का उपयोग है। दवायें, कीटाणुनाशक रसायन, रासायनिक खाद जैसी वस्तुओं का इस्तेमाल तत्काल भले ही कोई लाभ दर्शाता हो पर वे उपभोग के बाद सम्पर्क में आने वाली वस्तुओं का प्रत्येक कण विषाक्त कर देती हैं। यह विषाक्तता भी अपना प्रभाव वातावरण पर डालती है।
तीसरा बड़ा कारण जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण है जनसंख्या की वृद्धि न्यूक्लियर रिएक्टर बढ़ी हुई जनसंख्या उनके द्वारा श्वास-प्रश्वास में छोड़ी गई कार्बन डाई-ऑक्साइड तथा परमाणु परीक्षणों के कारण वातावरण में उत्पन्न हुई हलचल पर्यावरण को दूषित करती है। इन कारणों के साथ और भी अनेक कारण हैं जो वातावरण को दूषित करते हैं। यह समस्या इतनी चिन्तनीय हो गई है कि वैज्ञानिकों के लिए कुछ समय बाद प्राणवायु कहाँ से मिलेगी-यह विकट पहेली बन गई है।
विशुद्ध प्राणवायु का अभाव ही एकमात्र हानि नहीं है। वातावरण प्रदूषण से होने वाली हानियों में से कई को तो अभी भी प्रत्यक्ष होते देखा जाने लगा है। एक छोटा-सा दुष्प्रभाव इस तथ्य के प्रकाश में देखा जा सकता है कि आजकल ‘सरदर्द’ की शिकायत बहुत बढ़ती जा रही है। दूसरे रोगों की औषधियाँ जितनी मात्रा में बिकती हैं- उन सबको मिलाकर भी उनसे भी ज्यादा सरदर्द मिटाने वाली गोलियों की बिक्री होती है। विज्ञान के शोधकर्ता सरदर्द की बढ़ती शिकायत के कारणों की खोज करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यह शिकायत मात्र वातावरण के दूषित होने से बढ़ी है। सामान्य रूप से यों भी समझा जा सकता है कि शहर में रहने वाले लोगों को जहाँ हर शाम सरदर्द मिटाने वाली गोलियाँ निगलनी पड़ती हैं वहीं ग्रामीण जनता को सरदर्द इतना नहीं सताता क्योंकि- नगरों में दिन भर ट्रक, बस और मोटरों की दौड़ में निकलने वाली गैसें परिवेश की ऑक्सीजन की दूषित कर डालती हैं और प्रत्येक नागरिक को आवश्यकतानुसार ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और वह दूषित वायु उसके फेफड़ों, मस्तिष्क तथा शरीर के अन्य अंगों को तनावग्रस्त बना देती है। एक विज्ञान शास्त्री के अनुसार- “परिवेश प्रदूषण प्रत्येक नागरिक की रक्त संचार प्रणाली पर अपना दुष्प्रभाव डालता है और उससे थका हुआ स्नायुमंडल अपनी व्यथा ‘सिरदर्द’ के संकेत सूचित करने लगता है।
परिवेश प्रदूषण केवल पृथ्वी पर ही होता हो ऐसी बात नहीं है। नदियों, तालाबों, झीलों और समुद्रों का पानी भी अशुद्ध होता जा रहा है। जलपोतों द्वारा समुद्र में विसर्जित किया हुआ गन्दा तेल, नदियों में बहाया गया कल-कारखानों से निकली व्यर्थ चीजें और गन्दगी नदियों और समुद्र के पानी को बड़े भीषण रूप में दूषित कर देती है और बड़े शहरों और महानगरों में लगे औद्योगिक प्रतिष्ठानों को तो अपनी गन्दगी बहाने का सर्वोत्तम स्थान पास बहने वाली नदियाँ ही दीख पड़ती हैं। उनकी गन्दगी नदियों के पानी को इस तरह खराब कर देती है कि वह पानी उपयोग में आने जैसा रह ही नहीं जाता। कुछ दूर बहकर गन्दगी पानी के साथ मिलकर बहुत कुछ वैसी ही हो जाती है जैसा कि नदी का जल रहता है और आगे नदी के किनारे पर बसने वाले गाँवों या नगरों के निवासी उसी जल का प्रयोग करते हैं।
समुद्रों की स्थिति भी ऐसी ही है। बम्बई, मद्रास, कलकत्ता जैसे महानगरों में लगे सैकड़ों बड़े-बड़े उद्योग ही अपनी गन्दगी समुद्र में फेंकते हैं और शहरों की गन्दगी भी उधर ही बहा दी जाती है। नदियों के किनारे बसे नगरों में भी शहर की गन्दगी बहा दी जाती है। इस प्रकार आधुनिक शताब्दी में रहने वाले मनुष्य को न साफ हवा मिल पाती है और न स्वच्छ पानी, अनाज और खाद्य पदार्थों की तो बात दूर है। वे भी दूषित हवा, पानी द्वारा ही तैयार होते हैं तो उनकी शुद्धता भी कल्पना मात्र है। स्पष्ट ही इस प्रदूषण का प्रभाव मनुष्य के स्वास्थ्य पर पड़ता है।
प्रदूषण जलवायु को भी असामान्य रूप से प्रभावित करता है। ऋतु वैज्ञानिकों का मत है कि इन दिनों मौसम में जो गम्भीर परिवर्तन अनुभव किये जा रहे हैं परिवेश का दूषण उसका एक बहुत बड़ा कारण है। जन सामान्य भी मौसम को अस्थायी और अनिश्चित अनुभव करता है। कब बारिश हो जाय कुछ ठीक पता नहीं। निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि गर्मी का मौसम गर्मी की तरह ही बीतेगा और यह भी निश्चित नहीं है कि वर्षा ऋतु में पानी गिरेगा ही। कभी गर्मी के दिन भी बारिश की तरह लगते हैं तो कभी वर्षा भी गर्मी की भाँति ही बीत जाती है, प्रकृति अपना चक्र बदल रही है। यह कहने की अपेक्षा यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि हम प्रकृति को अपनी नियति बदलने के लिए बाध्य कर रहे हैं।
शहरों का ही वातावरण दूषित हो रहा है और ग्रामीण परिवेश उससे बचा हो यह सोचना भी कल्पना है वातावरण का प्रभाव हर स्थान पर पड़ता है अणु परीक्षणों के लिए एकान्त और निर्जन स्थान चुने जाते हैं, पर वहाँ उत्पन्न हुई विकृतियाँ अन्य क्षेत्रों में भी बड़ी सरलता से संचरण कर जाती हैं और आजकल तो बढ़ता हुआ औद्योगीकरण ग्रामीण आबादी को भी अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। गाँव के लोग बड़ी तेजी से अपने गाँव छोड़कर शहरों में आ रहे हैं और इस प्रकार गाँवों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ता जा रहा है। श्री स्ट्राँग के मतानुसार तो ग्रामीण जनसंख्या जिस तेजी से शहरों की ओर भाग रही है वह विश्व स्तर की एक समस्या बनती जा रही है।
जल सम्पदा की सुरक्षा और शुद्धता बनाये रखने के लिए कहा गया है कि आवश्यक होने पर उनमें गन्दगी का विसर्जन किया जाय और जो गन्दगी छोड़ी जाय उसके नष्ट होने का भी उपाय किया जाय। इस दिशा में पहला कदम यह उठाने की आवश्यकता अनुभव की गई है कि मछलियों को पकड़ने पर रोक लगा दी जाय। स्मरणीय है मछलियाँ जल की गन्दगी को साफ करती हैं। कीटाणु और गन्दगी ही उनका मुख्य आहार हैं। ऐसी मछलियाँ भी होती हैं जो मनुष्य की आँख से न दिखाई देने वाले कीटाणुओं को भी खा जाती हैं। उनके विकास को भी जल प्रदूषण रोकने के प्रयासों का एक कार्यक्रम बनाया जा सकता है।
मिलों, कारखानों का दूषित जल तालाबों और नदियों में न बहाने का भी सुझाव दिया गया है। यदि बहाने की मजबूरी ही हो तो आधुनिक विज्ञान उनके दोषों को नष्ट कर न्यूनतम मात्रा कर देने में समर्थ है। नदियों और तालाबों के जल का समय-समय पर परीक्षण करते रहकर उसे हानिकारक सीमा तक न पहुँचने देने की सतर्कता भी बरती जा सकती है।
वातावरण में व्याप्त होने वाली दूषित वायु को सोखने के लिए वृक्ष-वनस्पति उगाये जा सकते हैं। विज्ञान के छात्र जानते हैं कि वृक्ष-वनस्पतियाँ कार्बन-डाई-ऑक्साइड गैस से जीते हैं और जिस प्रकार मनुष्य उच्छिष्ट वायु को प्रश्वास रूप में कार्बन -डाई ऑक्साइड गैस छोड़ते हैं, उसी प्रकार वृक्ष-वनस्पति उच्छ्वास के रूप में ओषजन छोड़ते हैं। प्राचीनकाल में आश्रम और धार्मिक संस्थान- उपासना गृह वन्य स्थलों में इसी कारण रखे जाते थे कि वहाँ ओषजन पर्याप्त मात्रा में मिलती है और ध्यान की एकाग्रता अधिक सम्भव हो जाती है। प्राकृतिक स्थानों पर रोगियों को रहने की आज भी सलाह दी जाती है।
मानते हैं कि वनस्पति सम्वर्धन और जल जन्तुओं की सुरक्षा ही वातावरण प्रदूषण का एकमात्र उपचार नहीं है। इसके लिए अन्य उपाय भी खोजे जाने चाहिएं और परिवेश को स्वच्छ, शुद्ध बनाने का प्रबन्ध करना चाहिए। जब तक हम उस स्थिति में पहुँचें कि परिवेश प्रदूषण की समस्या का हल खोजें - सम्भावित उपायों को तो काम में लाना ही चाहिए।
गेरावाल्डी ने अपने देश का स्वतन्त्रता संग्राम जिस कुशलता और बहादुरी से लड़ा उसकी चर्चा उन दिनों दूर देशों तक फैली हुई थी और उन्हें बहुत कुछ माना जाता था और बहुत बड़ा भी।
एक देश के सेनापति सैन्य संचालन सम्बन्धी कुछ महत्वपूर्ण परामर्श करने उनके पास पहुँचे। इन दिनों वे एक बहुत ही मामूली डेरे में रहते थे। साज-सज्जा के सामान का अभाव था। उसी सादगी के वातावरण में सारगर्भित वार्तालाप होता रहा।
अन्त में सेनापति को एक गोपनीय नक्शा दिखाकर स्थानीय परिस्थितियों के सम्बन्ध में पूछताछ करनी थी। पर कठिनाई यह थी कि लालटेन का कोई प्रबन्ध नहीं था। अस्तु नक्शे को देखना दिखाना सम्भव ही न हो सका।
गेरावाल्डी जैसे विश्व विख्यात व्यक्ति को इतनी सादगी, गरीबी और अभावग्रस्त स्थिति में देखकर सेनापति को आश्चर्य मिश्रित दुःख हुआ।
दूसरे दिन प्रकाश होने पर जब नक्शे के सम्बन्ध में परामर्श करने के लिए सेनापति आये तो उन्होंने बड़ी नम्रता और सम्मान के साथ पाँच हजार पौंड भेंट किये और कहा अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए मेरी यह नगण्य - सी भेंट स्वीकार करने का अनुग्रह करें।
गेरावाल्डी ने मुस्कराते हुए कहा-वस्तुतः मुझे कभी उन चीजों की आवश्यकता ही अनुभव नहीं हुई जिन्हें आप अभाव समझते हैं। इस पैसे की मुझे तनिक भी आवश्यकता नहीं है।
सेनापति का अत्याधिक आग्रह देखा और अस्वीकार करने पर उन्हें खिन्न पाया तो फैसला यहाँ समाप्त किया गया कि सेनापति पाँच पौण्ड वजन की मोमबत्तियाँ दे जायँ ताकि भविष्य में रात्रि के समय कोई परामर्श करने आवें तो उसके लिए सुविधा हो सके।
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मेरा मकान, मेरा बैल, मेरा खेत, मेरा जूता इस तरह मेरा सब कुछ है। इन जड़ पदार्थों से ऊपर उठ कर फिर आगे बढ़ें तब अपने कुटुंबों के बारे में भी मेरा बेटा, मेरा भाई, मेरा पिता, मेरी बहिन आदि के रूप में ‘मैं’ प्रयुक्त होता है। ये सम्बन्ध साँसारिक हैं। ‘मैं’ को स्वयं अपने आप को भी कहें तो ठीक नहीं है। क्योंकि शरीर का अंग स्वयं ‘मैं’ नहीं है। वह मैं फिर कहता है मेरा हाथ, मेरा पैर, मेरी नाक, मेरी जीभ, मेरा शरीर। तब प्रश्न अब जटिलता की ओर अग्रसर होता है। मैं क्या है? इसकी सूक्ष्मता पर ध्यान करने पर फिर ‘आत्मा’ ‘प्राण’ आते हैं। उनके साथ भी मेरी आत्मा, मेरा प्राण का ही उपयोग होता है। जब यह आत्मा भी स्वयं मैं नहीं है तब ‘मैं’ क्या है? यह मानव, शरीर, संसार आदि ‘मैं’ नहीं हैं। इन सबके अन्दर से बोलने वाली कोई सत्ता है। यही सिद्ध होता है। जो ‘मैं’ है। उस सर्वसत्ता ‘मैं’ के साथ सम्बन्धित तथा अटूट सम्बन्ध इस जगत का है। जो उस ‘मैं’ से अलग नहीं किया जा सकता।
‘मैं’ के साथ मेरा है। जो घमंड के साथ कहता है, कि मैंने ऐसा किया, ऐसा कर दूँगा। इस नश्वर शरीर को शोभा नहीं देता। इस शरीर का वास्तविक मालिक परमात्म सत्ता है। हम दुनिया को जानने की कोशिश करते हैं। उनके साथ सम्बन्ध कायम करने के लिए लालायित हैं। किन्तु स्वयं अपने को जानने में तथा अपने साथ ही सम्बन्ध के लिए कितने आलसी हैं। यही हमारा अज्ञान है।
इस अज्ञानता की कोठरी में पड़े हमें सारा संसार भी नहीं दीख पायेगा। आँखें स्वयं देखती नहीं हैं। वे उतनी सामर्थ्यवान नहीं है कि बिना प्रकाश की सहायता के दुनिया को देखें। प्रकाश का और आँखों का सम्बन्ध अटूट है। यदि प्रकाश न रहे तो सुन्दर आँखें भी बेकार हैं। अतः प्रकाश ही नजर है, दृष्टि है। उसी तरह हमें ज्ञान का प्रकाश चाहिए जो हमारी बुद्धि की नजर उठाये बिना ज्ञान की बुद्धि भी आँख के समान व्यर्थ है।
इस ज्ञान का नाम ही ‘मैं’ है। ‘मैं’ है वह परमात्म सत्ता। इस सत्ता को जानना ही आस्तिकता है। वह सत्ता सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान है। उसके पास अन्याय नहीं है न्याय है। अन्याय के लिए दण्ड देता है न्याय के लिए पुरस्कार। वह जालिम जल्लाद भी है हमें मृत्यु देता है। आत्म हत्यारा भी है। स्वयं अपने आपकी हत्या करता है। भगवान भाव के रूप में इस भौतिक शरीर में आता है। उसका कोई आकार नहीं है। यह सारा ब्रह्माण्ड ही उसका स्वरूप है। यह साकार ईश्वर है।
हम इस साकार ईश्वर के अंग हैं। यह सारा विश्व हमारा शरीर है। किन्तु हमें स्वयं को न जानने के फल-स्वरूप ही हम अपने शरीर से खिलवाड़ करते हैं। बुरा करते, अन्याय करते तथा हम स्वयं का ही नाश करते हैं। जिस तरह हमारे शरीर के प्रत्येक अंग झगड़ा करने लगें कि हम स्वतन्त्र हैं, हम सर्वोपरि हैं तथा एक दूसरे की सहायता करना छोड़ दें, तब इस शरीर की क्या गति होगी? उसी तरह आज हम अज्ञानता के अन्धकार में भटकते हुए अपने शरीर को भी अपना नहीं समझते तब यह संसार रूपी शरीर कब तक समझ पावेंगे?
शरीर सहयोग का एक पुतला है। यदि इसमें सहयोग न रहें तथा हाथ पैर , कान ,नाक ,पेट आदि अलग-अलग कर दें तब वह शरीर नहीं कहा जा सकता। शरीर को कायम रखने के लिए सहयोग एकता आवश्यक है। मनुष्य स्वयं एक अंग के समान अपूर्ण है। इस सारे विश्व का एक अंग है। अतः अपने आपको जानकर अपना स्वयं का ज्ञान होना आवश्यक है।
इस ‘मैं’ के साथ अन्तःस्थिति महान शक्ति काम करती है। जो अहंकार में आकार इस शक्ति का दुरुपयोग करता हैं। वह शक्ति स्वयं अपने आप का मान मर्दन कर अपनी शक्ति उस कुसंस्कारी से छीन लेती है। उस शक्ति के हटते ही हमारा शरीर जीवित रहते हुए भी निष्प्राण हो जाता है। तब उसका नाश अवश्य हो जाता है। जिस तरह से कौरव, रावण, कंस आदि को अहं आने पर उनकी शक्ति हट गई तथा नाश हो गया।
श्री कृष्ण ने अर्जुन को विराट रूप दर्शन में बताया था-कि यदि तू नहीं भी रहेगा तो भी यह युद्ध होगा। तू कौरवों को नहीं मारेगा तो भी अवश्य मरेंगे। वे तो पहिले ही मारे जा चुके हैं। केवल संसार को दिखाने के लिए तू एक निमित्तमात्र है। उनकी आत्मा की सत्ता मैंने अपने में खींच ली है। वे केवल शरीर से जीवित हैं जिसको शक्ति मार चुकी है फिर उन्हें कौन बचा सकता है। इस विश्व में युग परिवर्तन करता है वह केवल निमित्त होता है। काल शक्ति से प्रेरित होता है जिसमें काली शक्ति प्रवेश करती है वही यह सब कर सकता है। यह बताते हुए अर्जुन को कृष्ण ने अपने दर्शन में पहिले बता दिया कि महाभारत इसके पूर्व ही समाप्त हो चुका है। तब अर्जुन को ज्ञान प्राप्त होता है कि कुटुंबी भाइयों के मारने में मेरा दोष नहीं है। वे तो स्वयं ही मर चुके हैं।
कितने आश्चर्य की बात है कि इस संसार में सभी दूसरों को, संसार को जानते हैं। किन्तु अपने आप को नहीं जानते। व्यवहार रूप में भी देखिये दूसरों के दोष दुर्गुण दुराचार जल्दी देख सकते हैं। किन्तु अपने स्वयं के नहीं। जो दुनिया को जानता है वह विद्वान है। किन्तु जो अपने आप को जानता है वह ज्ञानी है-चेतन ज्ञान रूपी ईश्वर को जानता है वही ज्ञानी है, स्वयं को जानता है। किन्तु ज्ञानी कहीं भी नजर नहीं आता। इस कला विज्ञान सम्पन्न युग में मानव आज भी अपने बारे में असीम अज्ञान के कारण ही इस युग की अनेकानेक समस्याओं का सामना करता है। यदि हम स्वयं को जानने लगें जो सारी समस्यायें स्वयं नष्ट हो जायेंगी। हम अपने आपको, शरीर को, मन को, प्रवृत्ति को, आत्मा को, ईश्वर को नहीं जान पाये। जो स्वयं को जानने की पहली सीढ़ी है उसे छोड़ कर उछाल मारना चाहते हैं। यह प्रकृति के नियम का उल्लंघन है। इसी कारण सजा भुगतनी पड़ रही है। इस सजा के प्रतिफल हमारी सभ्यता, दर्शन, संस्कृति का पतन हो गया, हमारा पतन हो गया।
शरीर के अंग-प्रत्यंगों के समुच्चय से मानव बनता है। मानव जटिल ज्ञान है। उसी तरह प्रत्येक वस्तु से संसार बना है। यह शरीर जिन कोषाणुओं से बना है वह स्वयं एक ब्रह्माण्ड है। इस शरीर में अनेक ब्रह्माण्ड विद्यमान हैं। मानव मस्तिष्क प्रकृति की विलक्षण शक्ति की कृति है। किन्तु यह मस्तिष्क यह शरीर केवल शरीर नहीं है। यह विश्व है। इसका ज्ञान प्राप्त करने में ज्ञान की आवश्यकता है। मानव की मानसिक, बौद्धिक, नैतिक, कलात्मक, आध्यात्मिक क्रियाओं का माप असम्भव है। सृजनात्मक आनन्द के निर्माण, चेतना को शरीर से मुक्त, दूसरों के साथ, विश्व के साथ एकाकार आदि करने का महान अमापनीय कार्य है। यह कला ज्ञान ही हो सकता है। किन्तु इस ज्ञान के अभाव में ही मानव जीवन लुप्त सा हो गया है।
जिस तरह नारद को बानर का रूप देने पर भी वह स्वयं को न जानने पर स्वयं को अच्छा ही समझता था। दूसरों को बुरा। इसी अज्ञानता के कारण हँसने वालों को उनने श्राप दे दिया। किन्तु बाद में अपनी सूरत दर्पण में देखने के बाद आत्मबोध होने पर उन्हें पश्चाताप होता है। यदि इससे पूर्व वह स्वयं को जान लेता तो उसे इस दुःख के संसार में डूबना न पड़ता। अपना अहम् अंकुरित नहीं होने देता तब उसका वह क्षण इस वासना वृत्ति में समाप्त न होकर जीवन के उत्थान में लगा होता।
इस शरीर के निर्माण में इस विश्व का कितना सहयोग है। माँ बाप, अन्न-जल, पृथ्वी अग्नि, वायु आदि के सहयोग का अनुमान लगाना कठिन है इनके सहयोग से जी रहा, मानव परावलम्बी है। फिर भी स्वयं को स्वावलम्बी समझता है। इन अटूट सम्बन्धों से अपने को स्वतन्त्र मानता है। यहाँ स्पष्ट है कि मनुष्य ने स्वयं को नहीं पहिचान पाया है। यदि स्वयं को पहचानता तो वह विश्व के किसी भी कण से अपने को अलग न मानकर अपना अटूट सम्बन्ध कायम रखता। आज की उपस्थित छटपटाहट से बच कर शान्तिपूर्वक जीवन बिताता। यही ‘मैं’ है। ‘मैं’ को जानना आवश्यक है बिना ‘मैं’ को जाने हमारा जीवन सुखी एवं सार्थक नहीं हो सकता। हमारा ज्ञान पूर्ण नहीं हो सकता।
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“लगता है आपने तो पूर्ण-ज्ञान प्राप्त कर लिया है।” किसी व्यक्ति ने- ‘सर आइजक-न्यूटन’ से कहा।
“मेरे सामने ज्ञान का अथाह-समुद्र फैला पड़ा है, जिसके किनारे बैठकर कुछ ही घोंघे और सीपियाँ उठा पाया हूँ।” विज्ञान जगत के गणमान्य-मनीषी ने उत्तर दिया। उनकी निरभिमानता का कैसा सुन्दर उदाहरण है यह।
जीवन में उन्नति, समृद्धि व सफलता चाहने वाले व्यक्ति को घमण्ड से दूर रहना चाहिए। मनुष्य के वाँछित लक्ष्य की प्राप्ति के मार्ग में यह बड़ा बाधक तत्व है। अहंकारग्रस्त व्यक्ति का विकास रुक जाता है। उसकी प्रगति की सारी सम्भावनाएँ धूमिल पड़ जाती हैं। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर विद्वानों ने इसे हेय एवं त्याज्य बताया है।
समीपवर्ती अन्य व्यक्तियों से अपने आपको असाधारण विशिष्ट, उच्च-स्तर का मान लेने की मान्यता ही अहंकार है।
अहंकार अनेक दुर्गुणों का जनक है। अपनी बुद्धि, ज्ञान, कला-कौशल, रंग-रूप, सामर्थ्य शक्ति किन्हीं विशेषताओं का अहंकार मनुष्य के पतन का कारण बन जाता है। व्यक्ति के जीवन में अहंकार का संचरण होते ही उसकी क्रियाएँ एवं चेष्टाएँ बदल जाती हैं। वह नशाग्रस्त व्यक्ति की तरह असन्तुलित एवं अव्यवस्थित कार्य व्यवहार करने लगता है। उसमें विवेकशीलता, दूरदर्शिता का ह्रास होता जाता है।
किसी ने ठीक ही कहा है- “अभिमान वह विष-बेलि है, जो जीवन की हरियाली, सौन्दर्य, बुद्धि विस्तार, विकास को रोककर उसे शुष्क कर देती है।”
“अहंकार एक ऐसी विष-बुझी तलवार है, जो अपने तथा दूसरे के लिए घातक सिद्ध होती है।”
“अहंकार व्यक्ति को क्रूरता, शोषण, अनाचार की ओर प्रवृत्त करता है। फलतः व्यक्ति और समाज दोनों का अनिष्ट होता है।”
गणित और विज्ञान के प्रकाण्ड विद्वान न्यूटन महोदय की- गणित सम्बन्धी महत्वपूर्ण खोज एक पत्र में प्रकाशित हुई। इससे अनेक लोगों से प्रशस्ति-पत्र, धन्यवाद, ज्ञापन, अभिनन्दन उनके पास आने लगे। इस पर खेद व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा था- “अब मेरी प्रसिद्धि तो खूब बढ़ेगी, किन्तु विद्या जिसके लिए मैंने जीवन भर लगा दिया, उसका विकास रुक जायेगा।”
उपरोक्त कथन से ध्वनित होता है कि -प्रशंसा और प्रसिद्धि अभिमान के पोषक तत्व हैं। जिसे अपनी ही बड़ाई और ख्याति की बात सूझती है, वह प्रगति की दिशा में कदम कैसे बढ़ा सकता है? श्रम एवं साधना की महत्ता को वह भूल जाता है। इसी तथ्य को ध्यान में रखकर सफल-लेखक, कवि, वैज्ञानिक, कलाकार, दार्शनिक एवं महापुरुषों ने अपनी साधना की पूर्णता के पूर्व अपने क्रियाकलापों को गुप्त रखा, प्रशंसा और प्रसिद्धि से अपने को अछूता रखा और अहंकार के शिकंजे से कोसों दूर रहे।
विश्व विख्यात दार्शनिक कान्ट महोदय ने चालीस बियालीस वर्ष तक अपने सिद्धान्तों पर गम्भीर चिन्तन, मनन किया। इस विचार-मन्थन के परिणामस्वरूप जो निष्कर्ष निकले, उन्हें ही लोगों के समक्ष अपनी दार्शनिक मान्यता के रूप में प्रस्तुत किया। इसी से वे अभिमान रहित होकर अपने सिद्धान्तों का सही प्रतिपादन कर सकने में समर्थ हो सके। कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर ने प्रशंसा-प्रसिद्धि व अभिमान के लिए ‘गीतांजलि’ की रचना नहीं की वरन् विश्वात्मा-परमात्मा के प्रति उनने भाव-सुमन अर्पित किये। इसी तरह गौतम बुद्ध, रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण, महात्मा गाँधी आदि युग पुरुषों ने प्रशंसा, प्रसिद्धि की सदा उपेक्षा की और अभिमान के विष से अपने को सदा मुक्त रखा तभी जनता जनार्दन को सही मार्ग दिखाने में समर्थ हो सके।
विद्याभिमानी विद्यार्थी का अध्ययन क्रमशः कम हो जाता है और वह दूसरे छात्रों से पिछड़ जाता है। इसी प्रकार कला कौशल, धन सम्पदा, शक्ति-सामर्थ्य सभी क्षेत्रों में अहंकार एक अभिशाप ही सिद्ध होता है।
अभिमान की वृद्धि के साथ ही पतन का श्रीगणेश हो जाता है। अभिमान की पराकाष्ठा व्यक्ति को जड़-मूल से नष्ट कर देती है। इतिहास इस बात का साक्षी है। राक्षस-राज रावण ने अभिमान के वशीभूत होकर मानवता की मर्यादा लाँघकर हीन-कृत्य करने प्रारम्भ कर दिये। परिणामस्वरूप वह परिवार सहित नष्ट हो गया।
“अभिमान” और “स्वाभिमान” में आकाश-पाताल का अन्तर है। अभिमान का जन्म अपने संकीर्ण दृष्टिकोण के फलस्वरूप होता है। जबकि स्वाभिमान का उदय व्यक्ति के उदात्त एवं विशाल आत्मीयता पूर्ण दृष्टिकोण के कारण। जहाँ अभिमान व्यक्ति के ओछेपन की निशानी है, वहाँ स्वाभिमान उसकी उच्चता और महानता की। अपने देश, जाति, धर्म, आदर्श, मानवता की आन-बान और शान की रक्षा के लिए प्राणों की बाजी लगा देना स्वाभिमान का परिचायक है।
अभिमान भौतिक पदार्थों का होता है। धन, शिक्षा, रूप, बल, पद, आदि नश्वर सम्पदाओं एवं विशेषताओं पर इतराने वाले व्यक्ति अहंकारी कहे जायेंगे। स्वाभिमानी वे हैं, जो आदर्शों के पालन में दृढ़ता प्रकट करते हैं और मानवी गरिमा को- आदर्शवादी परम्पराओं को-समाज में जीवित रखने के लिए अपने सर्वस्व की बाजी लगा देते हैं। अहंकारी जहाँ अपना तनिक-सा अपमान भी सहन नहीं कर सकता है और चोट खाये सर्प की तरह दूसरों पर टूट पड़ता है वहाँ स्वाभिमानी व्यक्तिगत लाभ हानि का-मानापमान का ध्यान न करके अपनी अहंता आदर्शों के साथ जोड़कर रखता है और स्वस्थ परम्पराओं की रक्षा में ही अपनी सफलता एवं प्रशंसा मानता है। हमें अहंकारी नहीं स्वाभिमानी बनना चाहिए।
दार्शनिक वर्नेड रसेल भ्रमण पर गये हुए थे। जंगल में उन्होंने एक बहुत हारी, थकी, लँगड़ाती, कराहती लोमड़ी को देखा। लगता था वह किसी आपत्ति से बचने के लिए बेतरह घबराई हुई है।
थोड़ी देर में सामने से शिकारी आ पहुँचे। उन्होंने रसेल से पूछा-आपने इधर से लोमड़ी जाती देखी है।
रसेल ने कहा- ‘हाँ’ तो वह किधर गई? शिकारियों ने उत्सुकतापूर्वक पूछा।
रसेल ने उँगली का इशारा किया और ठीक उलटी दिशा बता दी। इस प्रकार शिकारी भटक गये और लोमड़ी की जान बच गई।
वर्नेड रसेल ने अपने इस संस्मरण का उल्लेख करते हुए अपने दर्शन ग्रन्थ में लिखा है-मैं नहीं मानता कि मैंने असत्य, व्यवहार किया। जिसमें मनुष्य का उद्देश्य ऊँचा हो वह व्यवहार में कुछ भी क्यों न हो, सत्य ही कहा जाना चाहिए। यदि मैं लोमड़ी के जाने की दिशा सही बता देता तो मेरी दृष्टि में वह सत्य दिखाई पड़ने वाला व्यवहार वस्तुतः असत्य ही होता।
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बहुमूल्य संपदाएं प्राप्त कर लेना उतना कठिन नहीं है जितना उनका संभाल सकना। बड़ी उपलब्धियाँ अपने साथ बड़े उत्तरदायित्व भी लाती हैं। जो उन्हें सँभाल सकते हैं, उनके लिए वे यश गौरव का माध्यम बनती हैं किन्तु यदि ठीक तरह उनकी सुरक्षा न की जा सकी, अभीष्ट प्रयोजन के लिए उनका प्रयोग न हो सका तो वे अपयश का कारण भी बनती हैं और अपना तथा दूसरों का विनाश भी कम नहीं करती। बड़ी विभूतियाँ उन्हीं के लिए सौभाग्य सिद्ध होती हैं जिनका व्यक्तित्व उनका सदुपयोग कर सकने योग्य विकसित हो चुका है। अपरिपक्व लोग कभी उन्हें प्राप्त कर लेते हैं तो अपनी असावधानी के कारण उस उपलब्धि को विनाशकारी दुर्घटना के रूप में ही परिणत कर देते हैं।
बड़ा पद, बड़ा वैभव, बड़ा अवसर प्राप्त कर लेना सरल है। वैसा संयोग वश भी हो सकता है, पर विभूतियों का सदुपयोग समर्थ व्यक्तित्व, बड़े परिश्रम और अध्यवसाय से ही बनता है। छोटी-छोटी सावधानियाँ बरतने पर ही ऐसे स्वभाव का निर्माण होता है जो जागरुकता की-उत्तरदायित्वों के निर्वाह की कसौटी पर खरा उतर सके। धन, विद्या, पद आदि प्राप्त कर लेने की तुलना में जागरुक एवं परिष्कृत व्यक्तित्व को विनिर्मित कर सकना अधिक कठिन है। वस्तुतः इसी में मनुष्य को अधिक श्रम करना पड़ता है और उसका वास्तविक मूल्याँकन भी इसी कसौटी पर होता है। जो इस परीक्षा में खरे उतरते हैं उन्हीं को संसार एक से एक बड़े उत्तरदायित्व सौंपता चला जाता है और वे क्रमशः ऊँचे उठते और आगे बढ़ते हुए उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँच कर महामानवों के ऐतिहासिक पद प्राप्त करते हैं।
बड़ा उत्तरदायित्व कन्धों पर ले लेने किन्तु उसे सँभाल सकने योग्य सजग व्यक्तित्व विकसित न करने पर कितनी विपत्ति आती है इसका एक उदाहरण फोर्ट स्टिकिन नामक जल पोत के भयंकर विस्फोट को प्रस्तुत किया जा सकता है। उसके अधिकारी अपने विषय में उच्च शिक्षा प्राप्त थे, सरकारी परीक्षाओं में अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण थे, पर सर्वतोमुखी जागरुकता और उत्तरदायित्वों के निर्वाह में राई-रत्ती भी ढील पोल न रहने देने का स्वभाव विकसित कर सकने में वे समर्थ न हो सके और जब बड़े पद का-बड़ी जिम्मेदारी का बोझ उनके सिर पर आया तो बुरी तरह असफल हो गये।
उन दिनों द्वितीय महायुद्ध का दौर चल रहा था। जल पोतों को डुबाना भी शत्रु पक्ष का एक कार्यक्रम था। जर्मनी के चार बमवर्षक जहाजों ने स्टिकिन को घेर लिया। डुबोने के प्रयत्न में ऊपर से जहाज गोले बरसाते रहे और नीचे से उस जल पोत से तोपें दागी जाती रहीं। बहुत देर घमासान के बाद जब वायुयानों को अपनी दाल गलती दिखाई न पड़ी तो वे भाग खड़े हुए। कप्तान को अपनी कुशलता और सूझ-बूझ पर गर्व था। अन्य नाविकों ने भी संतोष की साँस ली और ईश्वर को धन्यवाद दिया कि वे बच गये।
जहाज धीरे-धीरे अपनी गति से सफर करता हुआ अदन कराँची के बन्दरगाहों पर पहुँचा और वहाँ उसने माल उतारा तथा लादा। अब वह बम्बई के निकट था। 12 अप्रैल को उसे विक्टोरिया डाक पर खड़ा कर दिया गया। माल उतारने के लिए जिम्मेदार पोर्ट अधिकारी बुलाये गये और सामान धीरे-धीरे उतारा जाने लगा। बड़ी व्यवस्थाएँ सभी ठीक कर ली गईं पर छोटी बातों पर अक्सर ध्यान नहीं दिया जाता। जो बन्दूक धारी सिपाही सुरक्षा के लिए नियत किये गये थे उन्हीं में से कोई बीड़ी बाज था। उसने रात को चुपके से बीड़ी पियी और बचा हुआ टुकड़ा उधर ही कहीं फेंक दिया। धीरे-धीरे आग रात भर सुलगती रही और सवेरा होते-होते वह रुई और तेल के गोदामों में पहुँच गई। जब धुएँ की लपटें ऊँची उठने लगीं तब पता चला और घबराये हुए अधिकारियों ने फायर ब्रिगेड बुलाया। आग बुझाने वाली दर्जनों दमकलें काम कर रही थीं, पर आग पर काबू पाना सम्भव न हुआ। गोदाम की मोटी लौह दीवार काटे बिना मात्र दरवाजे से आग तक पानी पहुँचाना सम्भव नहीं हो सका।
स्थिति विस्फोटक होती गई तो अन्तिम क्षण यह फैसला किया गया कि जहाज के पेंदे में छेद करके उसे डुबो दिया जाय। यह सब सोचा ही जाता रहा। हड़बड़ाये हुए अधिकारी कुछ अन्तिम निर्णय न कर सके। खतरे का भोंपू बजा। जहाज पर काम करने वाले लोग भागने लगे, पर तब तक वज्रपात की घड़ी आ पहुँची। भयंकर विस्फोट हुआ और एक के बाद एक जमीन हिला देने वाले धड़ाके होते चले गए। सर्वनाश करके आग जब अपने आप बुझी तो अस्पताल घायलों से भर गये। सरकारी रिपोर्ट के अनुसार बन्दरगाह के 84 जहाजी, 64 आग बुझाने वाले मरे और 83 घायल हुए। जल पोत और सुरक्षा विभाग के लोगों के सहित 233 मरे और 476 घायल हुए। जनता के लोग इसके अतिरिक्त हैं। विस्फोट के कारण जो लोहे के टुकड़े सोने की छड़ें तथा दूसरे पदार्थ उड़-उड़ कर जहाँ-तहाँ गिरे। सरकारी अस्पतालों की रिपोर्ट के अनुसार लगभग ढाई हजार घायल भर्ती हुए जिनमें से 1376 तो कुछ ही घण्टों में मर गये। अस्पताल की परिधि और सरकारी सूचना के अतिरिक्त और जो लोग घायल हुए तथा मरे उनके सही आँकड़े अभी तक अविज्ञात हैं। स्वर्ण, राशि, अस्त्र-शस्त्र तथा दूसरा बहुमूल्य सामान कितनी कीमत का नष्ट हुआ और जहाज को कितनी क्षति पहुँची। बम्बई के नागरिकों को कितनी क्षति सहन करनी पड़ी इसका सही विवरण विदित नहीं पर इतना निश्चित है कि धन जन की बहुत बड़ी क्षति हुई। इस घटना को जलयानों के विस्फोट इतिहास में अभूतपूर्व माना जाता है।
यह सारी करामात है एक बीड़ी के टुकड़े को असावधानी के साथ जहाँ-तहाँ फेंक देने की। लापरवाही कितनी अधिक हानिकारक हो सकती है। इसकी एक झोंकी, इस विस्फोट घटना से लगता है ऐसी-ऐसी असंख्य हानियाँ समस्त संसार हर घड़ी उठाता रहता है; फिर भी असावधानी की हमारी आदत अभी भी जहाँ की तहाँ बनी हुई है और उसे हटाने की कोई बहुत बड़ी चेष्टा नहीं की जाती।
जलती बीड़ी फेंक देना एक छोटे कर्मचारी की छोटी लापरवाही हो सकती है, पर उसे रोकने के लिए उस अफसर को भी इतना सजग होना चाहिए कि कहीं किसी की गड़बड़ी करने की गुंजाइश न रहे। आमतौर से लोग अपने आपको सीमा तक कार्यरत रहना पर्याप्त मान लेते हैं और यह भूल जाते हैं कि जो उनके साथ जुड़े हुए हैं उन्हें भी कर्तव्यनिष्ठ बनाये रहने के लिए पूरा प्रयत्न करने की उन्हीं की जिम्मेदारी है। बहुमूल्य जल पोत पर लदी करोड़ों की सम्पदा का विनाश एक उदाहरण है लापरवाही और गैर जिम्मेदारी की वेदी पर न जाने ऐसे कितने विनाश अहर्निश होते रहते हैं।
एक क्रान्तिकारी के रूप में मुझे अनुभव हुआ कि शिक्षा पद्धति में आमूल परिवर्तन हुए बिना भारत में कोई क्रान्तिकारी परिवर्तन सम्भव नहीं।
अँग्रेजी की शिक्षा प्रणाली और शासन तन्त्र हमने ज्यों का त्यों अपनाकर कितनी भूल की- यह आने वाला इतिहास ही बतला सकेगा।
-काका कालेलकर
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युद्ध अभ्यास में आज प्रायः पौने दो करोड़ आदमी लगे हुए हैं। वे मारक अस्त्र-शस्त्रों के चलाने-मनुष्यों की हत्या करने और सम्पत्ति को नष्ट करने की कला में प्रवीणता प्राप्त कर रहे हैं। यही इनका कला-कौशल है। इनके व्यक्तित्व की सारी विशेषताएँ प्रायः इसी प्रयोजन के लिए समर्पित हैं। इसके अतिरिक्त कोई सात करोड़ आदमी शस्त्रास्त्र निर्माण और सेना सम्बन्धी अन्य आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए चलाये जा रहे उद्योगों में लगे हुए हैं। वे मूर्धन्य मस्तिष्क इनसे अलग हैं जो अपने बुद्धि कौशल से ऐसी शोधें करने, ऐसी विधियाँ निर्मित करने में लगे हुए हैं जिनकी सहायता से अधिक आसानी से अधिक विनाश सम्भव हो सके। धन-जन की अधिक हानि के लिए अधिक प्रभावशाली और अधिक सस्ते उपाय ढूँढ़ निकालना ही उनकी प्रतिभा की सफलता है।
संसार में 150 करोड़ से अधिक मनुष्य ऐसे हैं जिनकी आमदनी 500) रु0 वार्षिक से कम है। 40) रु0 मासिक से अपना निर्वाह करने वाली जनता में आधी ऐसी है जिनका औसत और भी गया-गुजरा है। उसे भरपेट रोटी और तन ढ़कने को कपड़ा जीवन में कभी कभी ही मिल पाता है। अधिकतर तो वे आधा पेट कुछ खाकर ही किसी प्रकार सोते हैं और फटे-चिथड़ों से अपनी लाज ढकते हैं।
इस दरिद्र जनता के लिए क्या कुछ नहीं किया जा सकता? क्या सचमुच ही समर्थ लोग इस दिशा में असमर्थ हैं? हिसाब लगाने वाले बताते हैं कि इस दिशा में सब न सही प्रगति और वर्चस्व का दावा करने वाले दो बड़े देश रूस और अमेरिका ही मिल-जुलकर कुछ काम करें तो बहुत कुछ हो सकता है। इन दो देशों की जितनी धन-शक्ति और जन-शक्ति युद्ध प्रयासों में लगी हुई है उसे हटा कर यदि पीड़ित मानवता को ऊँचा उठाने में लगा दिया जाय तो उन पौने दो करोड़ लोगों की आमदनी कुछ ही महीने के अन्दर ठीक दूनी हो सकती है। 500 रुपये वार्षिक के स्थान पर वे 1000 रुपये वार्षिक प्राप्त करने लगते हैं और अति दरिद्र स्थिति से ऊपर उठकर मनुष्य जीवन के लिए आवश्यक सुविधाओं का जीवन में पहली बार दर्शन कर सकते हैं।
मनुष्य में संहारक शक्ति भी है और सृजन शक्ति भी। ध्वंस भी कर सकता है और निर्माण भी। शक्ति को जिस भी दिशा में नियोजित कर दिया जाय-जिस भी कार्य में लगा दिया जाय उसे ही पूरा करती चली जायगी।
युद्धों और महायुद्धों में कितनी जनसंख्या और सम्पत्ति का विनाश होता है, यह दृश्य मुद्दतों से आँखें देखती रही हैं और कान सुनते रहे हैं। जिन नगरों, बाँधों और पुलों को अगणित मनुष्यों का स्वेद सरोवर लगाकर बनाया गया था और जिनमें प्रचुर साधन उपादान झोंके गये थे, वे जन-साधारण की आशा के केन्द्र थे। समझा जाता था कि इनकी छाया में अनेक व्यक्ति चिरकाल तक सुखद आश्रय प्राप्त करते हुए चैन के दिन गुजार सकेंगे, पर वह सारी आशा धूमिल हो गई। एक-एक टोकरी बारूद के कचरे से बनाये गये बम उन संस्थानों पर गिरे और देखते-देखते उन्हें धूलि में मिलाकर रख गये। इस प्रकार सृजन हारा और ध्वंस जीत गया।
गरमागरम लड़ाइयों में धड़ाके होते हैं, बारूद फटती है और लाशें छितराती फिरती हैं। मरने वालों के बाल बच्चे रुदन करते हैं। सम्पत्ति के भारी विनाश से उत्पन्न गरीबी, महंगाई, भुखमरी और बीमारी तरह-तरह की विपत्तियाँ ला खड़ी करती हैं और मनुष्य यह समझ पाते हैं कि युद्धोन्माद सस्ता है किन्तु युद्ध वस्तुतः महंगा है।
कहते हैं नशा पीने से सुस्ती दूर होती है और गम गलत होता है। फिर ऐसे काम ही क्यों किये जाएं जो सुस्ती और गम पैदा करें। भलमनसाहत का हलका-फुलका जीवन जिया जा सकता है और सुस्ती तथा गम उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों से बचा जा सकता है। यदि ध्वंस के स्थान पर सृजन को नियोजित किया जाय और नशे के स्थान पर दूध उद्योग खड़ा कर दिया जाय तो हर व्यक्ति को एक किलो दूध हर रोज मिलता रह सके ऐसी व्यवस्था हो सकती है। साथ ही खाद, गोबर और बछड़ों से अनुत्पादक जमीन उपजाऊ बनाकर खाद्य समस्या सदा सर्वदा के लिए हल की जा सकती है।
मानवी बुद्धि के ध्वंस और सृजन का यह एक छोटा सा उदाहरण है कि वह युद्ध एवं नशे के नाम पर कितनी बड़ी बर्बादी करता और अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारता है।
कामुक उत्तेजना भड़काने के लिए जितना साहित्य लिखा और छापा जा रहा है-जितनी तस्वीरें बिक रही हैं, जितने गीत वाद्य-अभिनय और फिल्म चल रहे हैं उन सबके बनाने, प्रचारित करने और उपयोग करने में जितनी धन-शक्ति और जन-शक्ति लगती है उसका लेखा-जोखा लिया जाय तो प्रतीत होगा कि यह उद्योग युद्ध और नशे की तुलना में किसी भी प्रकार कम नहीं है। उसके दुष्परिणाम उन दोनों के सम्मिलित उपद्रव की अपेक्षा कहीं बढ़कर हैं। इस भड़की हुई उत्तेजना से लोग अपना शारीरिक, मानसिक और नैतिक स्वास्थ्य किस बुरी तरह नष्ट करते हुए खोखले बनते जा रहे हैं उसके निष्कर्षों का मूल्याँकन करने पर प्रतीत होता है कि यह मंद गति से सम्पन्न होने वाली आत्म-हत्या है। उसके सामाजिक दुष्परिणाम कितने भयानक होते हैं- गृहस्थ जीवन की शालीनता किस प्रकार नष्ट होती है, और पीढ़ियां किस प्रकार कुसंस्कारी बनती जाती हैं, इसका विवेचन सहज ही नहीं हो सकता। प्रकृति की एक सामान्य-सी क्रीड़ा को जीवन की सर्वोपरि आवश्यकता के स्तर तक पहुँचा देना इसी बुद्धि चमत्कार का काम है जिसने कामुकता भड़काने के कुकृत्य को एक अच्छा खासा व्यवसाय बनाकर रख दिया है। तरह-तरह के शृंगार प्रसाधन इसी वर्ग में गिन लिए जाएं तब तो यह संसार का सर्व प्रथम उद्योग बन जायगा और प्रतीत होगा कि अन्न उत्पादन से भी अधिक शक्ति कामोत्तेजना भड़काने के लिए झोंक दी गई है।
क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि ध्वंस में लगी हुई मानवी क्षमता को मोड़ दिया जाय और उसे सृजन के लिए लगा दिया जाय? क्या विनाश इतना आकर्षक है कि उसका प्रलोभन हम छोड़ ही नहीं सकते? क्या विकास इतना निरर्थक है कि उसकी ओर कुछ सोचने और कुछ करने की आवश्यकता ही अनुभव न की जाय?
अपराधी, अनाचारी और आतताई भी आखिर दुस्साहस तो करते ही हैं, जोखिम उठाते और प्रबल पुरुषार्थ का परिचय देते हैं। क्या वही साहसिकता, सृजनात्मक कार्यों में लगाये जाने पर अधिक स्थिर, अधिक सम्मानास्पद आजीविका प्रदान नहीं कर सकती। शत्रुता निवाहने में जितने दाँव लगाने और हारने पड़ते हैं उतने ही यदि मित्रता के नाम पर गँवा दिये जाएं तो निश्चय ही शत्रुता मित्रता में परिणत हो सकती।
रूठने पर कई तरह के आत्म-नियंत्रण करने पड़ते हैं और कई तरह की सुविधाएँ छोड़नी पड़ती हैं। यदि उतना ही त्याग स्वेच्छापूर्वक कर लिया जाय और अपनी सुविधाएँ दूसरों को दे दी जाएं तो वे परिस्थितियाँ ही उत्पन्न न होंगी जिनके कारण रूठना पड़े। ध्वंस भी सस्ता नहीं है। उसका महँगापन सृजन में लगने वाली शक्ति की तुलना में कहीं अधिक है यदि यह समझा जा सके तो किसी की भी आँखें खुल सकती हैं और सृजन प्रयोजनों को अपनाने में बुद्धिमता प्रतीत हो सकती है।
व्यक्तिगत जीवन में भी हमारा यही हाल है। कुढ़ने, कोसने और कुड़कुड़ाने में न जाने कितना चिन्तन लगा रहता है। ईर्ष्या, द्वेष, निराशा, चिन्ता, भय, आशंका और आवेश के क्षणों में हमारा रक्त और मस्तिष्क भट्टी में पड़ी लकड़ियों की तरह जलता रहता है। दूसरों को नीचा दिखाने और बदला लेने में कितने उत्साहपूर्वक दिलचस्पी ली जाती है। आलस्य, प्रमाद और दुर्व्यसनों में कितना अपव्यय होता है। यदि इस सबको बचाया जा सके और क्रमबद्ध रूप से उन्हें रचनात्मक, सृजनात्मक प्रयोजनों में जुटाया जा सके तो इसका सत्परिणाम देखते ही बनेगा। सामान्य मनुष्य असामान्य बन जायगा और अवगति में पड़ा हुआ प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचा हुआ दिखाई देगा।
हमें कुछ नया पाने और कमाने का प्रयत्न करने से भी पहले यह सोचना चाहिए कि क्या ध्वंस में नियोजित शक्तियों को उलट कर सृजन में लगाया जा सकता है? क्या यह कार्य कुछ बहुत कठिन है? नहीं यह सरल है और विवेकपूर्ण भी। मनुष्य की चमत्कारी बुद्धि यदि एक बार ऐसी करवट ले सके और ध्वंस रुचि को सृजन प्रयोजन में लगा सके तो बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के इन्हीं वर्तमान साधनों से धरती पर स्वर्ग का अवतरण हो सकता है। आज के हम नर-पशु कल नर-नारायण की भूमिका निवाहते हुए दृष्टिगोचर हो सकते हैं।
उनकी प्रशंसा की जाती है जिनमें अपने विश्वासों पर अटल रहने का साहस रहा हो; पर कट्टरपंथी तथा धर्मांध लोग भी तो ऐसे ही आग्रही होते हैं। असल में इससे भी बड़ा प्रशंसनीय साहस है-अपने विश्वासों की निष्पक्ष आलोचना कर सकना और उनमें से जो गलत प्रतीत हों उन्हें छोड़ने के लिए तैयार हो जाना।
-सिडनी हैरिस
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महत्वाकाँक्षाओं का भड़काया जाना उचित है या अनुचित, लाभदायक है या हानिकारक, इस प्रश्न के दोनों पहलू हैं। एक में समर्थन और दूसरे में निषेध किया जाता रहा है।
समर्थन इस तर्क के आधार पर किया जाता है कि उससे इच्छा तीव्र होती है, उपलब्धियों के रंगीन सपने दीखते हैं, पाने के लिए उमंग उठती है, बुद्धि तीव्र होती है और प्रयत्नशीलता बढ़ जाती है। इससे मनुष्य का पुरुषार्थ, चिन्तन और अनुभव बढ़ता है। सक्रियता के फलस्वरूप उत्पादन बढ़ता है और उससे व्यक्ति तथा समाज को लाभ होता है।
निषेध इस आधार पर कि महत्वाकाँक्षाएँ व्यक्तिवादी अहंमन्यता को बढ़ाती हैं। मनुष्य प्रतिस्पर्धी बनता है। दूसरों से अधिक ऊँचा उठने और आगे बढ़ने की होड़ लगाता है। असन्तुष्ट रहता है अस्तु मानसिक संतुलन लड़खड़ाता रहता है और उद्विग्न आतुरता छाई रहती है। फलतः मस्तिष्क जीवन की- संसार की महत्वपूर्ण समस्याओं पर चिन्तन कर सकने में असमर्थ रहता है इच्छा शक्ति की तीव्रता का ही दूसरा नाम आतुरता है। वह धैर्य के बाँध तोड़ती है और जिस तरह भी हो सके प्रयोजन पूरे करने के लिए ललकती है। इसी मनः स्थिति में अपराधी प्रवृत्तियाँ पनपतीं हैं। जल्दी ही सफलता न मिलने पर निराशा छा जाती है और असफल रहने पर तो उसकी स्थिति छत से उठाकर खाई में पटक देने जैसी हो जाती है। उसे दुहरी चोट लगती है और इस स्थिति में अत्युत्साही व्यक्ति ही सब से अधिक निराश, खिन्न होते हैं। मनोबल से बुरी तरह वंचित हो जाते हैं।
इस पक्ष के समर्थक महत्वाकाँक्षाओं पर आक्षेप करते हुए कहते हैं कि अपने को अधिक साधन सम्पन्न और अधिक उपभोग करने में समर्थ बनाने की चेष्टा ने जहाँ मनुष्य की बुद्धिमता क्रियाशीलता और साधन सुविधा को बढ़ाया है वहाँ उसे अनैतिक कार्य करने दूसरों की क्षति पहुँचाने और समाज में विक्षोभ उत्पन्न करने वाले बीज भी बोये हैं।
दूसरे पक्ष का लाँछन यह है कि अहंभाव को उत्तेजित करने वाली इच्छाओं का दमन करने से मनुष्य आत्मग्लानि और निराशा में फँसता है। अपनी विशेषता उभारने में निष्क्रिय हो जाता है। निरुत्साही और नीरस मनः स्थिति में उसे निर्जीव जैसी जिन्दगी जीनी पड़ती है। इच्छा और कामना खो देने पर प्रगति के द्वार बन्द हो जाते हैं।
पक्ष, विपक्ष से ऊँचे उठ कर मनः शास्त्र के अनुसार विश्लेषण करने पर महत्वाकांक्षाएं भड़कने से उत्पन्न असन्तोष एक घातक मनोविकार के रूप में सामने आता है। फलतः व्यक्ति हर्षोल्लास की सहज सुलभ अनुभूति से वंचित रह जाता है सामान्य जीवन को यदि सरसता समस्वरता और संवेदनशीलता के सहारे जिया जाय तो उतने में भी प्रसन्नता, और प्रफुल्लता के पर्याप्त साधन रहते हैं किन्तु महत्वाकाँक्षाओं की आँधी उसे बहुत दूर उड़ा ले जाती है, भावी सफलता के रंगीन चित्र तो कभी कभी सामने आते हैं, पर वे जल्दी सफलता की इतनी तीखी आकुलता उत्पन्न कर देते हैं कि वर्तमान में घोर असन्तोष ही छाया रहता है। देरी होने और व्यवधान आने से भारी खीज उत्पन्न होती है और वह जिस-तिस पर उतर कर आवेश आक्रोश का रूप बनती है। इससे विद्वेष और अनाचार दोनों ही बढ़ते हैं।
मनोविकारों से शरीर को अगणित प्रकार की हानियाँ पहुँचती हैं यह असंदिग्ध है। नाड़ी संस्थान पर अवाँछनीय दबाव पड़ने से जीवन-यापन की सहज सामान्य प्रक्रिया अस्त व्यस्त होती है और उससे दुर्बलता, रुग्णता एवं अकाल मृत्यु की सम्भावनाएँ मूर्तिमान होकर सामने आती है। क्रोध, चिन्ता, भय, निराशा, शोक आदि की उत्तेजनाएँ सन्तुलित जीवन की जड़ें खोदने में कुल्हाड़ी का काम करती हैं।
असन्तुष्ट व्यक्ति खीजा और झल्लाया रहता है। फलतः उसकी सहज सुलभ समस्वरता न जाने कहाँ चली जाती है। भविष्य के सपने कभी पूरे हों- अभीष्ट सफलताएँ मिलें तो प्रसन्नता मिले इसी आशा में उलझा हुआ व्यक्ति संतोष मिलने की संभावना को कल्पना क्षेत्र तक संजोये रहता है। वह सपने भी स्थिर नहीं रहते व्यवधानों के ग्रहण आये दिन उनकी आभा को धूमिल करते रहते हैं। तृप्ति की स्थिति आने पर और नई विपत्ति भड़कती है कि जो कुछ मिला है वह स्वल्प दीखता है और उस उपलब्धि की अपेक्षा अनेक गुना पाने की उत्कंठा तत्काल उठ खड़ी होती है। फलतः प्राप्त सफलता को अपर्याप्त मान लेने से उस दीर्घकालीन प्रयत्न के फल का आनन्द लेने से भी वंचित रहना पड़ता है।
असंतुष्ट व्यक्तियों के समाज में कभी समता शान्ति और स्थिरता नहीं रह सकती। एक दूसरे की प्रतिस्पर्धा में लगा रहता है। यों स्वस्थ प्रतिस्पर्धा रचनात्मक दिशा में लगी रहे तो प्रगति की प्रेरणा भी बन सकती है पर वैसा होता नहीं। उसे सस्ता तरीका दूसरों को गिराना प्रतीत होता है। दो समानान्तर रेखाओं में से एक को बड़ा बनाना हो तो दो ही तरीके हैं या तो एक बढ़े अथवा दूसरी घटे। बढ़ना श्रम साध्य, साधन साध्य और समय साध्य हैं। घटाना, काटना, मिटाना सरल है अस्तु आमतौर से प्रतिस्पर्धा इसी दिशा में दौड़ती है। जिनकी तुलना में ऊँचा उठना है उन्हें छोटा, दुर्बल या असफल बनाकर भी अपनी स्थिति ऊँची रखी जा सकती है। अन्धों में काना सरदार होता है। दूसरों को अशक्त सिद्ध करके गौरव स्थापन करने की अहंमन्यता ने ही गुण्डागर्दी, उच्छृंखलता, आतंक, आक्रमण, आततायीपन, क्रूरता आदि दुष्प्रवृत्तियों को जन्म दिया है। दुष्टताएँ अभाव जन्य बहुत कम होती हैं अधिकतर तो उनके मूल में उद्धत अहंकार ही काम करता है।
प्रतिस्पर्धा में सभी सफल नहीं हो सकते। किन्हीं विरलों को ही सफलता मिलती है, शेष के पल्ले निराशा ही पड़ती है। उन सबको अनावश्यक और अवाँछनीय खिन्नता का सामना करना पड़ता है। वे हारे हुए व्यक्ति बेतरह टूटते हैं और आत्म-हीनता की ग्रन्थि में जकड़ कर सामान्य जीवन की सरस अनुभूतियाँ भी खो बैठते हैं। भड़का हुआ असंतोष किन्हीं मनस्वी व्यक्तियों को उन्नतिशील भी बना सकता है, जिनमें वैसी प्रतिभा नहीं है वे इस घुड़दौड़ में शामिल होकर अपनी टाँग ही तोड़ लेते हैं। इस प्रतिस्पर्धा में जुआ व्यवसाय की तरह लाभान्वित कोई-कोई ही होता है- शेष सभी खिलाड़ी घाटा उठाते और सिर धुनते हैं।
असन्तोषजन्य प्रतिस्पर्धा की तृप्ति व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं के बड़े सपने गढ़ने और उनकी पूर्ति में जुट पड़ने में सामाजिक दृष्टि से एक बड़ी हानि है- वैयक्तिक सुख साधन बढ़ाने की। उस ज्वर से पीड़ित व्यक्ति दूसरों को सुखी बनाने के लिए अपने साधनों को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हो सकता। उसे तो दूसरों से आगे बढ़ना है- ऊँचा उठना है- सफल साधन सम्पन्न होना है। इसके लिए सारी शक्ति झोंक देना भी कम पड़ता है। उतना कुछ बचता ही नहीं जो दूसरों के काम आ सके। अस्तु ऐसे व्यक्ति समाज सेवा के लिए कुछ कर नहीं सकते।
सस्ती वाहवाही लूटकर जन-सम्मान और जन-सहयोग आकर्षित करने और उससे लाभान्वित होकर महत्वाकांक्षाएं पूरी करने की दुरभि संधि ही उनकी लोक सेवा होती है। ख्याति पाने से कम में वे किसी की- किसी प्रकार की सेवा, सहायता नहीं कर सकते। उदारता और महत्वाकांक्षा में सहज वैर है।
यह स्थिति मानवी गरिमा को गिराती है- सामाजिक प्रगति की दृष्टि से यह एक बहुत बड़ी बाधा है। महत्वाकाँक्षी व्यक्ति अपने समाज को गिराते ही हैं उठाते नहीं। असन्तोष रचनात्मक हो तो सकता है, पर वैसा बन पड़ना न तो व्यावहारिक होता है न सम्भव। प्रतिस्पर्धा की दौड़ में अवाँछनीय आचरण ही बन पड़ते आमतौर से देखे जाते हैं।
विद्वान गोर्की ने अपनी आत्मालोचना करते हुए लिखा है- यदि 15 वर्ष की आयु से मुझे नया जीवन जीने का अवसर मिल जाय तो फिर उसे नये सिद्धान्तों- नये आदर्शों और नये उपक्रमों के साथ आरम्भ करूंगा। निश्चय ही उसकी धुरी असन्तोष पर आधारित न होगी और न उसमें वैसी महत्वाकाँक्षी का समावेश होगा जैसी कि आज आप लोगों में पाई जाती हैं।
यह असन्तोष व्यक्तिगत परिधि से बढ़कर एक छोटे समूह तक ही कठिनाई से ही विकसित हो पाता है। विश्व चेतना तक विकसित होने से पूर्व ही उसका अन्त हो जाता है। महत्वाकांक्षायें विकसित होकर किसी कुटुम्ब, वंश, जाति, सम्प्रदाय और अधिक से अधिक देश तक सीमित हो सकती है। तब भी उसकी प्रतिक्रिया व्यक्तिगत असन्तोष जैसी ही होती है। सिर्फ दायरा बढ़ता है। साम्प्रदायिक वैमनस्य, धर्मोन्माद, उद्धत राष्ट्रवाद, वंश प्रतिष्ठा के नाम पर थोड़े से लोगों ने किस प्रकार असंख्य जनता का शोषण उत्पीड़न किया है, इस अनाचार से इतिहास के रक्त रंजित पन्ने भरे पड़े हैं। हिटलरों, चंगेजखाओं, नादिरशाहों, सिकन्दरों, नैपोलियनों की महत्वाकांक्षाएं भले ही अपने देश जाति के पक्ष में विकसित हुई हों पर उनने दूसरों का रक्त पिया और अपनों को आसुरी अट्टहास करने का अवसर दिया। अन्ततः इसकी प्रतिक्रिया उभय- पक्षीय पतन और विनाश के रूप में ही सही सामने आई।
वर्ग विद्वेष उत्पन्न करने वाले अनैतिक तत्वों के मूल में चन्द व्यक्तियों की महत्वाकांक्षाएं ही उद्धत होती रही हैं। सवर्णों ने असवर्णों का, नर ने नारियों का, धनियों ने निर्धनों का, बुद्धिमानों ने अनजानों का किस तरह शोषण किया है और उसके फलस्वरूप दोनों ही पक्षों की अपार क्षति हुई है। शोषकों ने अपनी आत्मा गंवाई और शोषितों ने अपनी सुविधा। लाभ किसी को नहीं हुआ घाटा दोनों ने उठाया। जिनने महत्वाकांक्षाएं पूरी की उसने आत्म प्रताड़ना और विश्व चेतना की भर्त्सना भी कम नहीं सही है, सम्पन्नता का सुख वस्तुतः उन्हें बहुत महंगा पड़ा है। जो पाया उससे खोया अधिक है। दावानल भड़का कर उसी क्षेत्र में रहने वाला शान्तिपूर्वक रह नहीं सकता।
होना यह चाहिए कि महत्वाकांक्षाएं अहंमन्यता की संकीर्णता में सीमाबद्ध न रहें। मैं विकसित होकर हम बनें और उस हम को सर्वजनीन सुख शाँति की प्रगति और समृद्धि की लगन लगे। इस लक्ष्य को लेकर जो असन्तोष भड़केगा जो पुरुषार्थ पनपेगा उससे समाज में सत्प्रवृत्तियाँ पनपेंगी और व्यक्ति की सद्भावनाएं विकसित होंगी। परमार्थ परायण व्यक्ति का स्वार्थ भी सधता है। अपनी सेवा साधना के बदले जो लोक श्रद्धा संचय करता है उसकी प्रतिक्रिया सामान्य नहीं असामान्य होती है। समृद्धि भले ही कम पड़े, पर शान्ति प्रसन्नता और तुष्टि की सम्पदा इतनी अधिक बढ़ जाती है कि व्यक्ति हर घड़ी अपने को सुखी, समुन्नत और गौरवशाली अनुभव कर सके।
व्यक्तिगत- भौतिक महत्वाकाँक्षाओं से सन्तोष भड़कता है- सन्तुलन नष्ट होता है और प्रस्तुत उपलब्धियों से सरसता अनुभव करने का अवसर चला जाता है, आतुरता, अनीति अपनाने के लिए धकेलती है और अभीष्ट सफलता मिलने पर वह अपर्याप्त लगती है और असन्तोष के उस उद्वेग से पीछा नहीं छूटता जो व्यक्तित्व के प्रत्येक पक्ष को दीन दुर्बल बनाता चला जाता है। इस कुचक्र में जीवन सम्पदा नष्ट ही होती जाती है और क्षुब्ध उद्विग्न स्थिति में जलते-भुनते मृत्यु का वरण करना पड़ता है। भौतिक एवं व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं समाज को क्षति पहुँचा कर ही पूरी की जा सकती हैं और अपने आपको भी उद्विग्न रखकर ही उनके रंगीन सपने देखे जा सकते हैं। इस राह पर चलकर जो प्राप्त किया जाता है उससे कहीं अधिक हानि उठानी पड़ती है।
लोक मंगल की दिशा में जन-कल्याण के लिए यदि उन्हें मोड़ दिया जाय, सद्भावनाओं और सद्भावनाओं की सम्पदा मानव मात्र के लिए जुटाने में लग पड़ा जाय उसी स्तर की महत्वाकांक्षाएँ संजोली जाएं तो आत्म संतोष और लोक श्रद्धा का अजस्र अनुदान तत्काल मिलना प्रारम्भ हो जाएगा और प्रतीत होगा कि जीवन को सार्थक बनाने वाली सफलता हर घड़ी हाथ बाँधकर खड़ी है। व्यक्तिगत जीवन की सन्तुष्टि के लिए यही पर्याप्त है कि जो उपलब्ध है उन साधनों और व्यक्तियों के सरस सदुपयोग करें। शान्त चित से भौतिक प्रगति के लिए एक क्रीड़ा-विनोद की तरह लगे रहने में हर्ज नहीं। लक्ष्य आदर्शवादिता के साथ जुड़ा रहे प्रयत्न वैज्ञानिक और सामाजिक प्रगति के लिए होते रहें तो उस रचनात्मक उत्साह, नियोजन एवं पुरुषार्थ का सत्परिणाम मिल सकता है। यही है सन्तुष्ट और हर्षोल्लास भरा जीवन जी सकने का राजमार्ग।
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योगवशिष्ठ के अनुसार भगवान रामचन्द्र जी को संसार से तीव्र वैराग्य हुआ और वे विरक्त जीवन जीने की तैयारी करने लगे तो महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें समझाया- “राम तुम संसार का त्याग क्यों करते हो? संसार क्या ब्रह्म से भिन्न वस्तु है?”
महाभारत में कुरुक्षेत्र के मैदान में दोनों सेनाओं के बीच अर्जुन को भी वैराग्य भावना का उदय इसी प्रकार हुआ था। जब दोनों ओर अपने मित्र सम्बन्धी और पारिवारिकजनों को देखा तो मोह उत्पन्न हो गया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कर्मयोग की शिक्षा दी थी।
वेदान्त चिन्तन के नाम पर एक निराशा पूर्ण पलायनवादी दृष्टिकोण पल्लवित हो गया है- जगत मिथ्या है, माया का खेल मात्र है। यहाँ की हर वस्तु दुःख और बन्धन का कारण है। इससे छुटकारा पाकर भागो। वनों और पर्वतों में जाकर छिप जाओ। तभी ब्रह्म साक्षात्कार व मुक्ति प्राप्त हो सकेगी।
हमारा अध्यात्म हमारे मन हृदय और चेतना की वस्तु है। हमें अध्यात्म के सही रूप को समझने की आवश्यकता है। इसको प्राप्त करने का अर्थ यह नहीं कि इस संसार को त्याग कर एकान्तवासी हो जाय। जीवन को परिपूर्ण बनाने के लिए वस्तुओं की आवश्यकता होती है। हम उन सभी को उपभोग करेंगे किन्तु उन वस्तुओं की कामना और वासना नहीं रह जाएगी। आसक्ति त्याग ही संन्यास है। यद्यपि जीवन के वैभव हमारे अनुभव के एक अंश बनकर रहेंगे, पर भीतर से हम उनसे इतने मुक्त होंगे कि हमारी समग्र आन्तरिक भावना भगवान में समर्पित होगी।
जो प्रेय (प्रिय) है उसके प्रति अरुचि, घृणा का भाव उत्पन्न करने से ही श्रेय की प्राप्ति हो सकेगी? नहीं, जीवन की सार्थकता प्रेय को श्रेय प्राप्ति का साधन बनाने में है। जीवन के प्रति निषेधात्मक दृष्टिकोण अमानवीय है अव्यावहारिक है। जीवन के प्रति पलायनवादी दृष्टिकोण रखने वाले लोग समाज से अलग पड़ गये और अकर्मण्यता का शिकार बनकर समाज पर भार स्वरूप हो रहे हैं। 56 लाख साधु-संन्यासियों का समुदाय इसी गलत दृष्टिकोण का भयावह परिणाम है।
वेदान्त दर्शन के अनुसार “माया मात्र मिदं सर्वम् (यह सब माया है)- “ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या” (ब्रह्म सत्य है और जगत मिथ्या है) आदि-आदि उपनिषद् वाक्यों का तात्पर्य संसार और उसकी वस्तुओं की निन्दा करना अथवा उनका निषेध करना नहीं है। वे तो विश्व की आत्म रूपता बताना चाहते हैं। जगत की एकात्मकता का बोध ही वेदान्त का सार है।
‘सर्वभूत हितेरतः’ (सबके हित में रत रहना) वेदान्त का सिद्धान्त है। विश्व के साथ एकात्मकता का बोध एवं तादात्म्य की अनुभूति प्राप्त किये बिना ब्रह्म के साथ तादात्म्यता एकात्मकता की अनुभूति नहीं की जा सकती। इस स्थिति की प्राप्ति के बिना “सर्वभूत हितेरतः” का सिद्धान्त केवल ढोंग ही सिद्ध होगा। वेदान्त दर्शन तो कर्म का दर्शन है- इसमें कुण्ठा और गतिरोध को स्थान नहीं।
देश-काल परिस्थिति के परिप्रेक्ष्य में ही हमें किसी प्रवृत्ति पर विचार करना चाहिए। प्राचीन ऋषि-मुनियों के जीवन उस समय की परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त थे। वनों में एकान्त साधना ही उनका जीवन था। उस समय वन सम्पदा का बाहुल्य था- वहाँ अपने आश्रम बनाकर अपनी ज्ञान-साधना में लगे रहना उनके लिए सर्वथा उपयुक्त था। उनकी वेश-भूषा भी परिस्थिति-जन्य थी। प्रायः अधिकाँश ऋषियों के पत्नी और बच्चे थे। जगत व्यापार में लोक-व्यवहार करते हुए भी आत्मा की निर्मलता उनका लक्ष्य था। वायु में गंध मिली होती है। फिर भी वायु उससे निर्लिप्त रहती है- यही प्राचीन ऋषियों का जीवन था।
सांसारिक जीवन का उपभोग करते हुए भी मन से निर्लिप्त रहना ही सच्ची निवृत्ति है। संसार से अलग वन में गुफाओं के अन्दर रहते हुए भी मन के भीतर सांसारिक वासनाओं की सृष्टि होती रह सकती है।
निवृत्ति मार्ग को अधिक बल आचार्य शंकर से मिला। इस संदर्भ में हमें शंकर की समकालीन परिस्थितियों की समीक्षा करनी होगी। वेदान्त विद्या के परम आचार्य शंकर के कंधों पर सच्चे वैदिक धर्म के पुनरुद्धार का भार था। उस समय भारत में बौद्ध धर्म का बोल बाला था। शंकर को बौद्ध धर्म से लोहा लेना पड़ा। लोहे से ही लोहा काटा जाता है। भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं को जो प्रव्रज्या दी थी वह शंकर के मन को भी ठीक लगी। अतः उन्होंने ‘सर्व भूत हितेरतः’ सिद्धान्त के लिए समर्पित संन्यासी वर्ग के लिए काषाय और प्रव्रज्या दोनों को बौद्ध धर्म से ले लिया है। परन्तु उन्होंने बौद्धों के निराशापूर्ण क्षणभंगुरवाद का खण्डन किया और आत्मा के शाश्वत अजर-अमर स्वरूप का प्रतिपादन किया।
शंकर के बारे में यह कहना कि वे जगत को मिथ्या कहकर इससे भाग जाने का उपदेश करते थे, ठीक नहीं। शंकर तो जगत का ब्रह्म के साथ एकीभाव दिखाकर उसे सत्य रूप प्रदान करते थे। उनके दर्शन में जगत मिथ्या नहीं। उसे अनन्त आत्मा से अलग समझने की दृष्टि मिथ्या है। जीवन के प्रथम चरण में ही कर्म संघर्ष में उतर जाने वाले शंकर को हम पलायनवादी मार्ग की ओर प्रवृत्ति करने वाला किस प्रकार कह सकते हैं।
“अमृतस्यपुत्रा वयम्” (हम अमृत के पुत्र है) यही वेदान्त की आस्था है। जहाँ हम विश्व की समग्र सत्ता के इस मूल अमृत स्रोत के साथ स्वयं को जोड़ लेते हैं। वहाँ हम पलायनवादी नहीं कर्मवान होने की सतत प्रेरणा प्राप्त करते हैं। अन्तर केवल इतना है कि इस दिशा में किये गये कर्म के पीछे समष्टि के हित का भाव होगा स्वार्थ की भावना नहीं। वेदान्त आदमी को ऊपर उठाकर जीना सिखाता है।
वेदान्त के “माया मात्र मिदं सर्वम्” ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या” सूत्रों के वास्तविक भाव न समझने वाले लोग शब्दाडम्बर के जाल में उलझे हुए हैं। आध्यात्मिक मार्ग पर आरुढ़ हर अभीप्सु को निरन्तर सत्य के किसी मौलिक साक्षात्कार के लिए भी तत्पर रहना चाहिए। शब्दों के भीतर निहित सम्पन्नतर अर्थों का आकलन करना अभीष्ट है। जो शब्दों मात्र पर जीते हैं वे उसी तरह भूखे रह जायेंगे जैसे अपूर्ण पोषण से पीड़ित व्यक्ति भोजन करके भी भूखे रह जाते हैं।
आध्यात्मिक साहित्य में जिन सत्यों को प्रकाशित किया जाता है, वे चेतना में बोये हुए बीज होते हैं। यदि उन बीजों को सक्रिय और उर्वर चेतना में बोया जाता है तो वे फूटकर उग आते हैं और फल प्रदान करते हैं। पर यदि उन्हीं बीजों को सुप्त चेतना में आरोपित किया जाता है- एक ऐसी चेतना में जो अचेतन या मृत है जो बाह्य रूपों और क्रिया काण्डों का विगत काल के विचारों पर जीती है- तो वे बीज फूटेंगे नहीं, अंकुरित और परिपक्व नहीं होंगे।
वेदान्त के सुन्दर विचार बीज अनुर्वर मस्तिष्कों में ज्यों के त्यों निष्क्रिय रूप में पड़े हैं। लाखों लोग उन बीजों को धारण करने का दावा करते हुए भी निष्प्राणवत समाज के भार बने हुए हैं।
आज वेदान्त की नाव पर चढ़े हुए असंख्य लोग ज्ञान सागर में अपनी नाव चला रहे हैं। किन्तु भाँग पिये हुए प्रमादी लोगों की तरह उनकी नाव रस्सी से किनारे के खूँटे पर बँधी हुई निष्क्रिय है। वे समझ रहे हैं कि हम चल रहे हैं बढ़ रहे हैं। किन्तु सत्य है कि वे एक इंच भी टस से मस नहीं हो रहे हैं।
ज्ञान कर्म का सागर सतरण तो उनके लिए असम्भाव्य है ही, साँसारिक भोग वासना से दूर हटने में भी असमर्थ हैं, दिखावा करते हैं कि हम संसार से अलग हैं किन्तु वस्तुतः उनकी नाव साँसारिक वासना के खूँटे से बँधी हुई किनारे के पास ही हिल रही है। सही अर्थों में वे न पलायनवादी हैं न कर्मवादी, बल्कि घोर संसारी लोग हैं। कर्तव्य कर्म के उत्तरदायित्व से बचकर सभी साँसारिक भोगों का उपभोग कर रहे हैं। धर्म को तुच्छ व्यवसाय का रूप देकर भारतीय संस्कृति की उत्कृष्ट विचारधारा को गन्दा कर दिया है। इस जघन्य अपराध के लिए आने वाला युग इन निवृत्त मार्गियों को कभी क्षमा न करेगा।
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योग के दो पक्ष हैं, एक उत्कृष्ट-चिन्तन, उज्ज्वल-चरित्र और आदर्श-कर्तृत्व। दूसरा पक्ष है- मानवी काया और चेतना में छिपी रहस्यमय शक्तियों का जागरण और उसका चमत्कारी उपयोग। भूतकाल में दोनों ही पक्षों पर समान रूप से ध्यान दिया जाता था। अतएव योगदर्शन और योग साधन की समन्वयात्मक प्रक्रिया जन साधारण को आत्मिक और भौतिक क्षेत्र में सर्वतोमुखी उत्कर्ष की सम्भावनाएँ उत्पन्न करती थीं।
दुर्भाग्यवश योग के चमत्कार पक्ष को अधिक महत्व दिया गया और दार्शनिक उत्कृष्ट चिन्तन की उपेक्षा की जाने लगी। फलतः योग का स्वरूप धीरे−धीरे जादू जैसा बनने लगा उसे इच्छा शक्ति के चमत्कार क्षेत्र को कौतूहल भरी सफलताओं की परिधि में सीमित रहना पड़ा। योग सिद्धि और चमत्कार प्रदर्शन लगभग पारिभाषिक शब्द बन गये। इस स्तर की योग साधना भारत में वाम मार्ग कहलाई और पाश्चात्य देशों में उसे मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म, ऑकल्ट साइन्स, टेलीपैथी आदि नाम दिये गये। पाश्चात्य लोगों का योग संकल्पबल मनोबल और इच्छा शक्ति के अभिवर्धन तक सीमित रहा जबकि भारतीय वामाचार में अमुक देवी देवताओं की सहायता से साँसारिक सफलताओं को प्राप्त करने वाली बात भी सम्मिलित थी।
योग का वामाचार पक्ष यह मानता है कि सूक्ष्म जगत में अनेक दैवी-दानवी सत्ताएँ विद्यमान हैं। उन्हें अमुक विधि-विधान की साधना द्वारा वशवर्ती किया जा सकता है और उनसे इच्छानुसार लाभ प्राप्त करने में सहयोग लिया जा सकता है। योगिनी, कर्ण पिशाची, भक्षणी, भैरवी, बगलामुखी, छिन्नमस्ता, चामुण्डा, भद्रकाली आदि देवियाँ और भैरव, वेताल, वीरभद्र, महाकाल, चण्ड, रुद्र जैसे देवता वाम-मार्ग में विशेष रूप से उपास्य हैं। यह पद्धति योरोप में भी पहुँची उन्होंने विधि विधान में तो मद्य-मत्स्य-माँस, मुद्रा, मैथुन जैसी कौल प्रवृत्तियों को थोड़े हेर-फेर के साथ अपना लिया, पर अनेक आकृति−प्रकृति वाले तान्त्रिक देवी−देवताओं के स्थान पर एक महा असुर को ही प्रतिष्ठापित किया। ईसाई धर्म के अनुसार ईश्वर का प्रतिद्वन्द्वी महादानव का नाम ‘शैतान’ है। पश्चिमी वाम मार्ग में शैतान पूजा की प्रधानता है।
चिर अतीत में योग पर सर्वत्र बहुत विश्वास था। मध्य काल में वैज्ञानिक प्रतिपादनों के आधार पर नास्तिकवाद पनपा तो योग संदर्भ में भी उपेक्षा आई। अब एक से बढ़ बढ़कर आध्यात्मिक शक्तियों और उपलब्धियों के चमत्कार सामने आ रहे हैं इसलिए सहज ही योग साधना के प्रति भी विश्व व्यापी उत्साह का पुनर्जागरण हुआ है। इस विषय की चर्चा खूब है और साधना के भी उलटे सीधे प्रयोग नई उमंगों के साथ चल रहे हैं। इन दिनों वामाचार पाश्चात्य देशों में जिस तेजी से पनपा है उसे देखते हुए आश्चर्य होता है कि वहाँ भूतकाल में भारत में छाये हुए तंत्र युग को भी पीछे छोड़ देने वाला उत्साह उमड़ने लगा है।
इन दिनों वाममार्गी तन्त्र साधनाओं का प्रचलन अब पाश्चात्य देशों में तेजी के साथ हो रहा है। अमेरिका और इंग्लैंड में इस प्रकार के साधन-रत लोगों की संख्या दिन-दिन बढ़ती जा रही है। वहाँ उसे “शैतान सिद्धि” का नाम दिया जाता है। अघोरी तथा कापालिकों जैसी क्रियाएँ की जाती हैं और आशा की जाती है कि इस प्रकार वे भौतिक लाभ की चमत्कारी सिद्धियाँ सहज ही प्राप्त कर सकेंगे।
आदिम युग का इतिहास जादू-टोने और मन्त्र-तन्त्र की मान्यताओं से भरा पड़ा है। योग की अपेक्षा तन्त्र पुराना है।
तेरहवीं सदी से लेकर सोलहवीं सदी तक तन्त्र साधना का विस्तार विश्व-व्यापी उत्साह के साथ हुआ है। इस अवधि में वामाचार के अनेक सम्प्रदाय प्रकट हुए और अनेक ग्रन्थ रच गये। 17 वीं सदी में फ्राँस के शासक 14 वें लुई के जीवन वृत्तान्त में उसकी एक ऐसी प्रेमिका का विस्तृत वर्णन है जो काला जादू जानती थी और शासन सूत्र में अपने इशारों से भारी उलट-पुलट प्रस्तुत करती थी। काला जादू अभी भी पाश्चात्य देशों में ब्लैक मास के नाम से प्रसिद्ध है। इसी साधना का प्रधान उपचार यह है कि मनुष्य आकृति का क्रूस बनाकर उसे उलट दिया जाता है और उस पर एक युवती को नग्न करके लिटाया जाता है। फिर उसके अंगों को मद्य, माँस केक आदि के मधुपर्क से पूजा जाता है और नृत्य, वाद्य का कीर्तन जैसा अभिचार चलता है। यह सामान्य विधान हुआ। विशेष उपचार इसके अतिरिक्त है जिनमें ऐसे कृत्यों का आश्रय लिया जाता है जो सामान्य तथा अश्लील या असभ्य माने जाते हैं। अपने अघोरी कापालिक भी ऐसी ही वीभत्स रीति-नीति अपनाते रहते हैं।
शिकागो जैसे सुसंस्कृत समझे जाने वाले नगर की एक तिहाई जनता किसी न किसी प्रकार वामाचार पंथ के साथ अपने को सम्बद्ध कर चली है। इन लोगों में ऊँचे अधिकारी, विद्वान और सुसम्पन्न वर्ग से लेकर मध्य तथा छोटे वर्ग के लोग समान उत्साह के साथ सम्मिलित हो रहे हैं। अमेरिका के हर पुस्तक भण्डार में ढेरों पुस्तकें इस विषय में मिल जायेंगी। उनकी बिक्री भी खूब होती है। विलियम ब्लेटी की ‘दि एक्सारसिस्ट’ पुस्तक ने तो भारी लोकप्रियता प्राप्त की है। तन्त्र उपचार की पत्रिका ‘दि ऑकल्ट ट्रेड जनरल’ की ग्राहक संख्या अत्यन्त द्रुतगति से बढ़ी है। उसमें छपने वाले लेखों ने न केवल शैतान सिद्धि के प्रति जनता में आकर्षण उत्पन्न किया है बल्कि शैतान संस्कृति को मानव जीवन की सफलता के लिए आवश्यक बताना भी जारी रखा है। शैतान संस्कृति अब एक नई जीवन नीति के रूप में सामने आई है जिसमें उचित अनुचित के झंझट के ऊपर उठकर किसी भी तरह शक्ति का उपार्जन और उपभोग करने का पक्ष समर्थन किया गया है। इस संदर्भ में कितने ही विद्यालय खुले हैं और खुलते जा रहे हैं। पिछले दिनों इस आन्दोलन को अधिक अच्छी तरह समझाने के लिए तीन फिल्में बनी हैं (1) रोज मरीज वेवी (2) दि पजेशन ऑफ जील डेलने (3) दि अदर। यह तीनों फिल्में असाधारण रूप से सफल हुई हैं। इन्हें देखने के लिए सिनेमा घर में हफ्तों पहले रिजर्वेशन कराना पड़ता है।
फ्राँस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली आदि में शैतान संस्कृति के अनेकों केन्द्र खुले हैं। एक देश के निवासी दूसरे देश में चल रही गतिविधियों की जानकारी प्राप्त करके अधिक लाभ उठा सकें इस दृष्टि से वायुयान तीर्थयात्रा के लिए स्पेशल उड़ानें होती हैं। इसका आधा खर्च यात्रियों को देना पड़ता है। और आधा अमेरिका की शैतान सोसाइटी उठाती है। शैतान संस्कृति महाविद्यालय प्रायः सभी देशों में खुल चुके हैं। अकेले जर्मनी में वामाचारी सदस्यों की संख्या 30 लाख है। इस बढ़ते उत्साह से ईसाई धर्माचार्यों में भारी खलबली है। इंग्लैंड के रोमन कैथोलिक चर्च ने अपने अधीनस्थ पादरियों से कहा है कि वे इस बढ़ती हुई अधार्मिकता को रोकने के लिए पूरा पूरा प्रयत्न करें।
भारत में जब वामाचार के नाम पर योगदर्शन के मूल सिद्धान्तों के विपरीत आसुरी शक्तियों की साधना पनपी थी तो उसके दुष्परिणामों को ध्यान में रखते हुए विज्ञ मनीषियों ने उसे निरस्त किया था। भगवान बुद्ध जब जन्मे तब उन्होंने अपने चारों ओर हिंसावादी तन्त्राचार पनपता पाया उन्होंने उसके विरुद्ध क्रान्तिकारी प्रतिरोध प्रस्तुत किया। बुद्धदर्शन इसी प्रतिरोधात्मक विचार क्रान्ति का नाम है। भगवान महावीर जी उन्हीं दिनों जन्मे उन्होंने भी जैन दर्शन की अहिंसावादी आस्था की जड़ जमाई और असुरता समर्थक वाम मार्ग को उखाड़ा। इस संदर्भ में भगवान शंकराचार्य के प्रयत्न भी कम सराहनीय नहीं हैं।
योग विज्ञान का आविष्कार कर्ता होने वाले के नाते भारत का यह विशेष दायित्व है कि इस महाविद्या का उपयोग जब अवाँछनीय प्रयोजनों के लिए होने लगे तो उसके विरुद्ध कदम उठाये। भ्रान्तियों का निवारण करे और अनुपयुक्त योगसाधना के दुष्परिणामों के विरुद्ध उस मार्ग के पथिकों को सचेत करे। भारत में समय समय पर इस प्रकार की विकृतियों के उभार को निरस्त किया जाता रहा है तो क्यों नहीं हमें आगे बढ़कर विदेशों में फैलने वाली उस योग विकृति का निराकरण करना चाहिए।
योग एवं अध्यात्म का सही स्वरूप न समझने न समझाने की उपेक्षा ने ही इस अत्यन्त उपयोगी विज्ञान को ऐसी स्थिति में ला पटका है जिसमें तात्कालिक लाभ थोड़ा सा भले ही होता हो अन्ततः उसमें हानि ही हानि है। यह विश्व को समझना चाहिए कि योग साधना का वास्तविक लाभ तभी उठाया जा सकता है जब उसके साथ अध्यात्मवादी योग दर्शन भी जुड़ा हुआ हो। इस शिक्षण को विश्व व्यापी बनाने की आज भारत की विशेष जिम्मेदारी है- योग विज्ञान के आविष्कर्ता और प्रसारकर्ता होने के नाते।
यवक्रीत विद्यार्थियों की साधना और श्रम देखकर हतोत्साह हो गया। उसने तप द्वारा विद्या प्राप्ति का निश्चय किया। यह निश्चय कर वह सघन वन में सरिता तट पर कुटी बना तप करने लगा, उसके तपोबल से प्रसन्न हो इन्द्रदेव ने उसके सम्मुख प्रकट हो कहा- तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हो तुम्हें वरदान देने आया हूँ। तुम्हारी इस तपस्या का क्या प्रयोजन है?
“मुझे विद्या चाहिए। देवराज!”
“विद्या वन प्रान्तर की इस गहन साधना से नहीं पाई जा सकती। इसके लिए तो गुरु चरणों की शरण लेनी होगी और विनम्रता पूर्वक उनके निर्देशों का पालन करते हुए सतत अभ्यास करना होगा। तुम जिस मार्ग पर साधना कर रहे हो वह विद्या प्राप्ति की नहीं वरन् आत्मा पर आच्छादित राग द्वेष क्रोध लोभ आदि विकारों को उन्मूलित करने की है।”
कुछ क्षण पश्चात यवक्रीत ने देखा कि वही ब्राह्मण नदी के किनारे से मुट्ठी भर-भरकर रेत ले जा रहा है और नदी के प्रवाह में डाल रहा है। यवक्रीत ने ब्राह्मण के पास जाकर पूछा- ब्राह्मण श्रेष्ठ! तुम अपने मूल्यवान समय को इस प्रकार क्यों नष्ट कर रहे हो? तुम्हारा एक मुट्ठी रेत जल प्रवाह के साथ बहकर जाने कहाँ चला जाता है। नदी में रेत डालकर तुम करना क्या चाहते हो?”
“मैं उस पार जाने के लिए नदी पर पुल बनाना चाहता हूँ। इसीलिए मैं इतनी देर से रेत डालकर नदी को पाटने का प्रयास कर रहा हूँ।” यवक्रीत ब्राह्मण के उत्तर को सुनकर हँस पड़ा-क्या तुम्हें अपने प्रयत्नों पर पूरा विश्वास है कि नदी में एक-एक मुट्ठी रेत फेंक कर पुल का निर्माण किया जा सकता है।?”
ब्राह्मण ने अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट होकर कहा- यदि मैं नदी के प्रवाह में रेत डालकर पुल नहीं बना सकता तो याद रक्खो इस एकान्त तपस्या से तुम्हें भी विद्या की प्राप्ति नहीं हो सकती। तुम्हें अपने विद्वान पिता के पास जाकर अध्यवसायपूर्वक चिरकाल तक अध्ययन का श्रम करना चाहिए। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। तुम्हें शीघ्र ही विद्या की प्राप्ति होगी।
यवक्रीत को जीवन का दिशा मिल गई थी।
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हातिमताई की नीति- कथाओं में एक प्रसंग आता है कि कोई फकीर प्रतिदिन तीन रोटियाँ बनाता था। उन तीन रोटियों में से वह एक तो किसी भूखे आदमी को देता दूसरी खुद खाता और तीसरी नदी में डाल देता। हातिम ने फकीर को जब रोज ऐसे करते देखा तो पूछा-महात्मन् आप एक रोटी किसी भूखे को देते हैं यह बात समझ में आती है दूसरी रोटी स्वयं खाते हैं- न समझ में आये तो इसमें भी ऐसी कोई बात नहीं है, पर तीसरी रोटी नदी में डाल देते हो यही समझ आने लायक नहीं है। इसका क्या मतलब?
तो कहते हैं कि फकीर ने बताया कि- तीन रोटियों में से एक किसी भूखे को देना फर्ज है, अपने लिए तो हर कोई खाता है, पर फर्ज को पूरा करना कोई गुमान करने लायक बात नहीं है। मालिक की इस दुनिया में सभी कोई दूसरों की भलाई करते हैं। एक इंसान ही ऐसा है जो नेकी करने के बाद समझता है कि उसने मालिक को खरीद लिया। कर्तव्य- सहज धर्म पूरा करने के बाद जैसे हम उसे याद नहीं रखते इसी प्रकार नेकी भी करने के बाद भुला देना चाहिए और इसी बात को मैं याद करता हूँ। तीसरी रोटी दरिया में डाल कर इस प्रसंग में परोपकार करने के बाद उसे भूल जाने की दिशा दी गई है, जो आत्म विकास के लिए अनिवार्य आवश्यक कक्षा है।
आमतौर पर लोग दो बातें याद रखते हैं। पहली तो यह कि किसने हमारे प्रति बुरा किया था। किसी ने भलाई की थी- इस बात को बहुत कम कृतज्ञ पुरुष ही याद रख पाते हैं जबकि याद यही रखना चाहिए और दूसरी बात यह याद रखी जाती है कि हमने किस का उपकार किया है। उपकार तो लोग इस प्रकार याद रखते हैं कि उसका स्मरण किसी बड़ी घटना से भी ज्यादा आता रहता है। कोई व्यक्ति यदि दिन भर में दस रुपये कमाता है और उसमें से एक रुपया किसी पुण्य कार्य में लगा देता है तो नौ रुपये किस प्रकार खर्च किये थे और उस दिन का उपार्जन कितना अनीति पूर्ण था ये सब बातें विस्मृति के गर्त में चली जाती हैं और याद यही रहता है कि एक रुपया परोपकार में लगा था। यह नितान्त आत्म-घाती है कि व्यक्ति अपने कार्यों में से केवल दूसरों की भलाई के लिए हुआ व्यय तथा औरों द्वारा किया गया अनिष्ट ही स्मरण रखे।
विद्या, सम्पत्ति, शक्ति, अधिकार का अभिमान तो सभी बुरा समझते हैं और निन्दनीय मानते हैं। पर अनुचित और घातक पुण्य का अहंकार भी है। भौतिक संपदा के अहंकार की हानियाँ व्यक्ति को प्रत्यक्ष दिखाई देती है, पर पुण्य का, परमार्थ का अहंकार ऐसा है कि उसकी सूक्ष्म किन्तु अति संहारक हानियाँ व्यक्ति का अधःपतन भी कर डालती हैं और इस बात का पता भी नहीं चलता। अहंकार, अहंकार है वह ऐहिक विभूतियों का हो या दैविक विभूतियों का। क्योंकि अहंकार या अभिमान व्यक्ति के स्वात्म की परिधि को सीमित करता है, प्रतिबन्धित रखता है और व्यक्ति जब तक अहं की कारा से मुक्त नहीं होता तब तक उसे अपनी चेतना का उच्च आयाम अप्रत्यक्ष ही रहेगा।
इसीलिए विश्व के दार्शनिकों और ऋषि-मुनियों ने पुण्य कार्यों के अभिमान को भी परित्याज्य कहा है- गीता में बार-बार आये शब्द निरभिमानता का इतना सीमित अर्थ नहीं है। वहाँ सत्कार्यों के अभिमान की भी उपेक्षा की गई है। आत्म-विकास के इसी दर्शन को चार्ल्स लैम्ब ने अपने इन शब्दों में बाँधा है- मानव को चाहिए कि भलाई करे और उसे एकदम बिसार दे। इससे हृदय को महान सुख की प्राप्ति होती है। वस्तुतः अभिमान या दर्प व्यक्ति की चेतना पर एक भार उत्पन्न करता है जबकि वहाँ होना चाहिए प्रफुल्लता, उत्साह और हल्कापन। भारीपन और बोझिलता चेतना को अनुभूतियों के सागर की तलहटी में पहुँच देता है और पुण्य का- सत्कर्मों का दर्प तो जीवन नौका में ऐसा छिद्र उत्पन्न कर देता है कि उसके साथ उसमें बैठी अन्य विभूतियाँ जिनसे संसार का बहुत उपकार हो सकता है वे भी अकाल कवलित हो जाती हैं। क्योंकि दर्प प्रतिभा को कुण्ठित करता है और शक्तियों को कुन्द बनाता है।
जब किसी के प्रति कोई उपकार किया जाता है यदि उसे भुला दिया जाय तो हृदय को महान सुख इसलिए प्राप्त होता है कि उस हल्केपन से अन्य नई उपलब्धियों का द्वार खुलता है। बारहों मास फलने वाले किसी वृक्ष का फल जब तक टूट नहीं जाता तब तक उस स्थान पर कोई दूसरा फल नहीं लगता और जब टूट जाता है तथा वृक्ष यह भी भूल जाता है कि उसमें कोई फल लगा था अर्थात् वह स्थान पूर्ववत हो जाता है तब दूसरे फल की सम्भावना बनती है। यह क्षण निश्चित रूप से आह्लादपूर्ण ही होना चाहिए। हम भी जब किसी उपकार को विस्मरण में डाल देते हैं तो उस स्थान से पुनः दूसरा उपकार होने की संभावना बनती है और जन्म लेता है- एक अनूठा आनन्द।
‘अन्टु दिस लास्ट’ के लेखक रस्किन जिससे महात्मा गाँधी ने सर्वोदय की प्रेरणा प्राप्त की थी। ने अपने जीवन में कोई लाखों डालर कमाये। इस धनराशि की उन्होंने पाई-पाई परोपकार में खर्च कर डाली। उनकी पुण्य वृत्ति का परिचय देते हुए ‘एरीना’ पत्र में प्रकाशित हुआ था- निर्धन युवक युवतियों की, जो विद्याध्ययन में जैसे तैसे जुटे थे रस्किन ने आर्थिक सहायता की। श्रमिक स्त्री पुरुषों के लिए मकान बनवाये जो स्वास्थ्यप्रद होने के साथ-साथ सुविधाजनक भी थे। उन्होंने लन्दन के बाहर परती पड़ी जमीन को कृषि योग्य बनाने के लिए भी एक योजना बनाई तथा उसे क्रियान्वित किया। उस भूमि का विकास कर उन्होंने जमीन को उन भूमिहीन किसानों में बाँट दिया जो सामाजिक अत्याचार, शोषण या अपनी दुर्बलताओं के कारण दाने-दाने को मोहताज हो गये थे।
रस्किन निर्धन कलाकारों की सहायता करने में भी अति उदारता से काम लेते थे। एक बार उन्होंने किसी प्रसिद्ध कलाकार की सभी कृतियाँ खरीद लीं और लन्दन के एक पब्लिक स्कूल में लगा दीं। सन् 1877 ई॰ तक रस्किन ने लेखन द्वारा होने वाली समस्त आय और पैतृक उत्तराधिकार में मिली सम्पत्ति का पिचहत्तर प्रतिशत भाग लोकोपकारी कार्यों में खर्च कर दिया। तरुणाई में प्रवेश करते समय उनकी आर्थिक स्थिति कहीं और थी तथा सन 1877 में उसका चौथाई भाग भी उनके पास नहीं रहा, परन्तु मन इतने से भी नहीं भरा। अभी बहुत कुछ बाँट देने को उमड़ रहा था। रस्किन ने अपने लिए निश्चित किया कि 125 पौण्ड प्रतिमाह स्वयं पर खर्च करूंगा और शेष सब समाज को, निर्धन लोगों का जीवन स्तर ऊँचा उठाने के लिए समर्पित।
कुछेक लोकोपयोगी कार्य करने के बाद ही रस्किन चाहते तो अपना नाम संसार के महान सेवकों में लिखा सकते। परन्तु इस प्रकार वे बड़े आदमी भले ही बन जाते आत्मा तो तृषित ही रह जाती और रस्किन जीवन भर लुटाते रहे-बिना यह देखे कि कल क्या दिया था? यदि उनका ध्यान कल की सेवा का हिसाब लगाने में लग जाता तो बहुत सम्भव था मायावी मन-अब बस कहकर हाथ को पीछे खींच लेता।
परोपकार का आनन्द प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि व्यक्ति धनवान ही हो। निर्धन और अकिंचन परिस्थितियों में भी परोपकार का रस लिया जा सकता है। बस आवश्यक इतना भर है कि व्यक्ति निरहंकार और विनम्र होने की क्षमता रखता हो। इंग्लैण्ड के एक प्रख्यात व्यंग्य चित्रकार हो गये हैं ड्यू मौरियर। मौरियर अद्वितीय प्रतिभा सम्पन्न कलाकार थे, पर उनके जीवन काल में अन्य महामानवों की तरह उन्हें भी असफलता का ही मुँह देखना पड़ा। मुश्किल से वे अपने लिए दो समय का भोजन जुटा पाते थे, पर परमार्थ भावना उनमें कूट-कूटकर भरी थी और वे सदैव जरूरतमंदों की सहायता के लिए तत्पर रहते थे। एक दिन की घटना है- कड़कड़ाती शीत ऋतु थी। वे लन्दन के हैम्पस्टेड रोड से चले जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने देखा कि एक वृद्ध व्यक्ति सड़क के किनारे पर बैठा हुआ है। उसके पास न तो सर्दी से बचने के लिए कपड़े हैं और न उदर ज्वाला की शान्ति के लिए पैसे। मौरियर के मन में करुणा जागी और उन्होंने अपनी जेब सम्भाली। पर वह तो खाली थी।
ऐसी परिस्थिति में उनकी करुणा और भी जागृत हुई। तथा उन्होंने वृद्ध व्यक्ति को अपने साथ लिया। वे चाहते थे कि वृद्ध व्यक्ति की रुपये पैसों से कुछ सहायता कर दी जाय। पैसों का प्रबन्ध करने के लिए उन्होंने योजना भी मन ही मन बना डाली। होटल की पाकशाला में उन्होंने श्यामाफलक पर कुछ चित्र बनाये और नीचे लिख दिया दर्शकगण-शुल्क 50 पैसे रख दें। यहाँ भीड़ इकट्ठी हुई और सभी लोगों ने शुल्क रख दिया। मौरियर ने बिना यह जाने कि कितनी रकम है सबकी सब समेट कर वृद्ध व्यक्ति की झोली भर दी और चुपचाप होटल से चल दिये।
क्या मौरियर अपनी उपकारी वृत्ति का विज्ञापन यह कहकर नहीं दे सकते थे कि मैं एक वृद्ध व्यक्ति के लिए यह मनोविनोद प्रस्तुत कर रहा था। वे यह भी तो सोच सकते थे कि इस विज्ञापन से और अधिक संग्रह हो जायेगा। पर वृद्ध के भाग्य में जो मिलना लिखा है- वह मिल जायगा यही मानकर उन्होंने स्वयं को छुपाये रखा और निर्णय कर लिया कि इस प्रकार वृद्ध व्यक्ति की सहायता करनी है और वृद्ध को सौंप कर चुपके से खिसक जाना ही बेहतर समझा।
परोपकार एक ऐसे बीज की भाँति है जिसे यदि दर्प का कीड़ा न लगा हो तो नियति की भूमि पर गिरने के बाद कई गुना दानों को वह अपने कर्त्ता के लिए उत्पन्न करता है, किसान अपने खेत पर हल चलाता और बीज बोता है। उसके पास न तो इस बात का हिसाब रहता है कि खेत में बोये गये बीजों की संख्या कितनी थी और न इस बात का कि उसने किस-किस स्थान पर बीज बोये। लेकिन फिर भी खेत के सम्बन्ध में एक मोटा अनुमान लगाया जा सकता है कि उसमें कितनी फसल उत्पन्न होती है। एक व्यक्ति जो अपनी विभूतियों और शक्तियों को औरों के हित में लगाता है और न इस बात का कोई लेखा-जोखा रखता है कि उसने कितने उपकारी कार्य किये और न उन व्यक्तियों की गणना रखता है जो उपकृत होते हैं। वह इस लोकसेवा साधना से अनंत गुना परिणाम प्राप्त करता है।
उपकार करने और उसे भूल जाने की बात सिद्धान्ततः सत्य लगती है, पर उपकार की कसौटी क्या है? सिडनी स्मिथ उपकार का व्यावहारिक स्वरूप बताते हुए लिखते है- “हमें प्रतिदिन कम से कम एक व्यक्ति को अवश्य प्रसन्न करना चाहिए। यदि आप प्रतिदिन एक व्यक्ति को प्रसन्नता प्रदान करें तो दस वर्ष में आप तीन हजार छः सौ पचास व्यक्तियों को उल्लसित कर सकेंगे, जो कि एक छोटे कस्बे की आधी जनसंख्या के बराबर है। इस प्रकार आप मानवता के आनन्द कोष में एक महान योगदान देंगे।”
किसी को प्रसन्न कर देने का अर्थ उसे हँसा भर देना नहीं है। हँसाने का काम तो विदूषक भी बड़ी अच्छी तरह जानते हैं। उपकारी प्रफुल्लता का अर्थ है अपनी समस्याओं के कारण खिन्न और क्षुब्ध हुए व्यक्तियों का समाधान खोजना और उसे हल करने के लिए भरसक सहयोग करना। इस सेवा-साधना से लाभान्वित व्यक्ति का आभार और संसार में आनन्द वृद्धि का लाभ उपकारी को मिलेगा-- यह निश्चित है। पर उतना ही व्यर्थ है यह भी कि उसकी आशा की जाय। अध्यात्म की दृष्टि से समूचा विश्व ही एक शरीर है। शरीर के किसी अंग में या कि पैर के तलुओं में खुजली उठे तो हाथ दौड़कर तुरन्त उस स्थान को खुजलाते हैं। लेकिन उस समय वह आशा नहीं की जाती कि हाथ को उसके परिश्रम का प्रतिदान मिलेगा। समूचा विश्व जब एक शरीर है और एक दूसरे किसी अंग की सेवा करता है तो फिर यह आशा करना कौन-सी बुद्धिमानी की बात है कि उसका प्रतिदान मिलेगा और हाथ तो अपनी सेवा का कोई हिसाब नहीं रखता फिर अपने द्वारा किये हुए उपकारों का हिसाब रखने का ही क्या अर्थ है?
जीवन और अध्यात्म के नियम बड़े सीधे-साधे और व्यावहारिक हैं। उनमें जटिलता उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी है-मानवी दर्प बुद्धि। अतः चाहिए कि उससे पृथक रहकर ही मानवी चेतना का-आत्मिक परिधि का विकास किया जाय और सेवा-साधना का-उपकार भावना का यथार्थ आनन्द लिया जाय।
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महर्षि चरक का कथन है- “आरोग्यं भास्करादिच्छेत्” आरोग्य की कामना सूर्य भगवान की सहायता से पूरी करें। इस उक्ति में कितना अधिक तथ्य है अब विज्ञान के शोध निष्कर्ष दिन-दिन अधिक स्पष्ट और प्रामाणिक सिद्ध करते चले जा रहे हैं।
किसी समय सूर्य को रोशनी और गर्मी देने वाला एक अग्नि पिण्ड मात्र माना जाता था। अति प्राचीन काल में वह कोई चमत्कारी देवता था और पूजा उपासना करने वालों को प्रसन्न होकर वरदान देने वाला समझा जाता है। अब गहन अन्वेषण ने उसे पृथ्वी की जड़-चेतन सत्ता में विविध-विधि स्पन्दन उत्पन्न करने वाला शक्ति स्रोत माना जाता है और स्वीकार किया जाता है कि धरती पर जितना कुछ जीवन तत्व है-जितनी भी हलचल है उसका उद्गम केन्द्र सूर्य सत्ता में ही सन्निहित है।
ताप और प्रकाश तो सूर्य के स्थूल अनुदान हैं। वस्तुतः उसकी ऊर्जा ‘तेजस्’ रूप है। जिसे विज्ञान की भाषा में ‘सोलर एनर्जी’ कहते हैं। यही प्राणियों की ‘विटल ऐनर्जी’ उसका प्रभाव रेडियो एक्टिविटी के रूप में पहचाना जाने लगा है और समझा जाने लगा है कि विभिन्न शक्तियों की उपलब्धियाँ इसी केन्द्र से होती हैं। प्रगति के लिए जिन शक्ति अनुदानों की आवश्यकता पड़ेगी उन्हें सविता देवता के भण्डार से ही उपलब्ध करना पड़ेगा।
भारतीय तत्वदर्शियों ने सूर्य को सहस्र किरण वाला माना है और उनकी प्रधान एवं सुपरिचित किरणों को ‘सात रश्मि’ कहा है।
‘रवे रश्मि सहस्रं’ यत् परांग् मया समुदाहृतम्। तेषाँ श्रेष्ठाः पुनः सप्त रश्मियो गृह योन यः।
--वायु पुराण
अर्थात्- सूर्य की सहस्र रश्मियाँ हैं उनमें से सात प्रधान हैं। ऋग्वेद 10।139।1 कौशीतकी ब्राह्मण- शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में भी सात रश्मियों का वर्णन है। उनके नाम-(1) सुषुम्णः (2) हरिकेशः (3) विश्वकर्मा (4) संपहसु (5) अर्वावसु (6) विश्व श्रवः (7) स्वराट् गिनाये गये हैं। इन नामों में उन विशेषताओं एवं शक्तियों का संकेत है जो भौतिक जगत में प्रगति का और आत्मिक जगत में ब्रह्म तेजस् का पथ-प्रशस्त करती है। सात रंगों के रूप में हम उनका प्रत्यक्ष परिचय चर्म-चक्षुओं से भी प्राप्त करते हैं।
इंग्लैण्ड की शरीर विज्ञानी श्रीमती हैरियट चिक ने बताया है कि-सूर्य की धूप का सेवन मनुष्यों के लिए अन्न तथा दूध की तरह ही उपयोगी है, उनने रोगी और दुर्बलों को प्रातःकालीन धूप को नंगे बदन पर पड़ने देने की सलाह दी है और जिसने उस प्रयोग को नियमित रूप से चलाया है उन्हें आशातीत लाभ भी हुआ है।
जो बाबू लोग बन्द दफ्तरों में बैठे रहते हैं- जहाँ घरों के कैदखाने में ही जिन्दगी गुजारनी पड़ती है। धूप से वंचित रहने के कारण ही दुर्बल रहते हैं और आये दिन बीमारियों के शिकार बनते रहते हैं। यदि उन्हें खुली धूप में रहने का अवसर मिला होता तो निश्चय ही वे अस्वस्थता की दयनीय दुर्दशा से बच सकते थे। छोटे घरों की बनावट में खुली धूप और खुली हवा जाने की आर-पार जाने वाली खिड़कियाँ छोड़ी गई होतीं तो सन्दूकनुमा बने बिजली के पंखों और बत्तियों के सहारे रहने योग्य बने हुए विशाल भवनों की अपेक्षा वे कहीं अधिक स्वास्थ्यकर होते। जमीन के नीचे या ऊपर तहखाने नुमा घिरे हुए मकान बनाने की पद्धति भी उतनी ही दुर्भाग्यपूर्ण है जितनी कि आटे और शाकों के छिलके फेंक देने की। सूर्य किरणों को दैनिक जीवन से जितनी दूर रखा जायगा, अस्वस्थता हमें उतनी ही अधिक घेरेगी।
सूर्य की खुली किरणों से जो जितना दूर रहेगा उसे उसी अनुपात से अविकसित और दुर्बल रहना पड़ेगा। छाया वाली जगहों में वनस्पतियाँ प्रायः उगती और बढ़ती ही नहीं। इसका कारण उनका सूर्य किरणों से वंचित रहना ही है। बड़े पेड़ों के नीचे छोटे पौधे उगते नहीं उसका कारण केवल यही नहीं है कि पेड़ उन पौधों की खुराक खा जाते हैं। वास्तविक कारण यह है कि उन्हें छाया से ढके रहने के कारण धूप से वंचित रहना पड़ता है। बड़े पेड़ों की जड़ें गहरी होती हैं और वे अपनी खुराक गहराई में जाकर खींचती हैं जबकि छोटे पौधे या घास जमीन की ऊपरी उथली सतह पर ही अपनी जड़ें सीमित रखते हैं। इससे खुराक खींचने वाली बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी उनके विकसित न होने में सूर्य किरणों के प्राप्त न होने की कठिनाई।
अनाज के पकने में, फलों के उत्पादन में सूर्य किरणों का अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान रहता है। बीजों, फलों और शाकों के ऊपरी छिलके में महत्वपूर्ण खनिज, क्षार विटामिन और प्रोटीन पाये जाते हैं, यह अनुदान उन्हें सीधे सूर्य किरणों के संपर्क से मिलता है, फलों की ऊपरी सतह सीधी सूर्य संपर्क में रहती है और गूदा भीतर परतों में छिपा रहता है। इससे छिलके में सारतत्व अधिक और गूदे में न्यून मात्रा में रहना क्यों होता है? इसका रहस्य सहज ही समझा जा सकता है। छिलके में थोड़ा कड़ापन और कसैलापन देखकर लोग उसे फेंक देते हैं। आटे को छानकर भूसी फेंक देते हैं और शाक-भाजियों के- दालों के छिलके उतार देते हैं जबकि इसी भाग में उनकी वास्तविक पौष्टिकता छिपी रहती है। पाक विद्या में घुसी हुई यह मूर्खता अत्यन्त ही दुर्भाग्यपूर्ण है।
शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ0 सी0 डब्ल्यू0 सेलिली अपने अस्पताल में आने वाले रुग्ण बालकों के अभिभावकों को यह सलाह दिया करते थे कि वे बच्चों को आधा घण्टा सूर्य ताप का सेवन तो अवश्य ही कराया करें। यह औषधि उपचार से कम लाभदायक नहीं है।
डॉक्टर वारिन ने अपने प्रयोगों से बताया कि किस प्रकार सूर्य किरणों का उपभोग करके शरीर में फास्फेट, कैल्शियम, लौह, आयोडीन, फास्फोरस, उपयोगी खनिज एवं विटामिनों की पर्याप्त मात्रा बिना उस प्रकार का आहार लिए अथवा औषधि सेवन किये ही प्राप्त हो सकती है।
मानवी स्वास्थ्य का सूर्य सेवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। यह तथ्य पूर्ण प्रतिपादन चिरकाल से स्वीकार किया जाता रहा है कि- “जहाँ सूर्य किरणें पहुँचती हैं वहाँ चिकित्सक के जाने की जरूरत नहीं पड़ती।” सूर्य किरणों से इतनी शक्ति उपलब्ध की जाती है- की जा सकती है जो किसी भी पौष्टिक आहार की अपेक्षा अधिक बलवर्धक सिद्ध हो और किसी भी कीटाणु नाशक औषधि की तुलना में रोगों के निवारण में अधिक उपयोगी सिद्ध हो। भारतीय तत्व वेत्ता इस रहस्यमयी क्षमता को ‘प्राण तत्व’ कहकर पुकारते रहे हैं और उसे शारीरिक, मानसिक ही नहीं आध्यात्मिक प्रगति का आधार बताते रहे हैं। प्राण विद्या भारतीय अध्यात्म शास्त्र का एक अति महत्वपूर्ण अंग रहा है।
अमेरिका के सुप्रसिद्ध डॉक्टर वैविट ने सूर्य किरण चिकित्सा पर दीर्घकालीन शोध तथा प्रयोग करके यह निष्कर्ष निकाला है कि यह चिकित्सा पद्धति संसार की अन्य किसी उपचार प्रक्रिया से कम लाभदायक नहीं है। बल्कि वह अपनी सभी सहेलियों की तुलना में अधिक निर्दोष है। उसकी कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं होती जिससे रोगी को नई व्यथाओं में फँस जाने की शिकायत करनी पड़े।
डॉ0 वेविड ने अपने प्रयोगों का विवरण अपने ‘हैल्थ मेनुअली’ ग्रन्थ में प्रकाशित किया है। उनने एक पुस्तक ‘प्रिंसपिल्स आफ लाइट एण्ड कलर’ भी बहुत प्रसिद्ध हुई। उनका एक और भी ग्रन्थ है- ‘ह्यूमन कलचर एण्ड क्योर’ उसमें उन्होंने बताया है कि मनुष्य को जीवनी शक्ति सूर्य से प्राप्त होती है फिर वह रोग निवारण जैसा छोटा प्रयोजन क्यों पूरा नहीं कर सकता।
ऊर्जा विज्ञान के अध्येता विक्टर इनियुशिन ने कहा है हम सामान्य सूर्य किरणों के सीमित प्रभाव से ही परिचित हैं यदि उनमें से छानकर रंगीन किरणों का भी उपभोग करना जानें तो उससे कितने ही महत्वपूर्ण अतिरिक्त लाभ उठाये जा सकते हैं।
नोबेल पुरस्कार प्राप्तकर्त्ता जीव विज्ञानी अल्बर्ट जेन्ट जोजी ने प्राणियों की त्वचा के रंग द्वारा सोखी जाने वाली विभिन्न स्तर की सूर्य किरणों का उल्लेख किया है और बताया है कि उनकी विशेषताएं किस प्रकार इस रंग विज्ञान के आधार पर सूर्य देवता द्वारा अनुदान में मिलती हैं। इसी स्थापना को उसके अनुवर्ती विक्टर इनियुशिन ने अधिक खोज-बीन करके क्यूलर बायोलॉजी के रूप में सुव्यवस्थित किया था।
सूर्य की सात किरणों के अपने-अपने गुण एवं प्रभाव हैं। इन सात रंगों के मूल में तीन ही प्रधान हैं। लाल, नीला और पीला। इन्हीं के सम्मिश्रण से अन्य रंग बनते हैं। सूर्य किरणों पर भी यह बात लागू होती है। सप्त किरणों का उद्गम इन विविध रंग प्रवाहों को ही ठहराया जा सकता है। सूर्य किरण चिकित्सा में प्रधानतया इन तीन रंगों से और आवश्यकतानुसार उनके सम्मिश्रण से रुग्ण अवयवों को प्रभावित करने का प्रयत्न किया जाता है। लाल रंग गर्मी एवं उत्तेजना उत्पन्न करता है। इसके विपरीत नीला रंग शान्ति एवं शीतलता प्रदान करता है। पीले रंग को पाचक एवं शमन समाधानकारक कह सकते हैं। रोग के चिह्नों को देखकर यह समझा जा सकता है कि सर्दी की अधिकता या गर्मी की अधिकता से रुग्ण अवयव को कष्ट सहना पड़ रहा है अथवा अवरोध से, विकृति से पीड़ा उत्पन्न हुई है। इसी निदान के आधार पर उपरोक्त तीनों रंगों में से किसी विशेष का प्रयोग करने का निश्चय करना पड़ता है। यदि इनमें से किन्हीं के सम्मिश्रण जैसे लक्षण मालूम पड़ते हैं तो फिर उपचार के लिए मिश्रित रंगों का प्रयोग किया जाता है। सभी जानते हैं कि पीला नीला बनने से हरा- पीला लाल बनने से नारंगी- नीला लाल बनने से बैंगनी रंग बनता है। काला और सफेद रंग सूर्य किरण चिकित्सा में काम नहीं आता अस्तु उपचारकर्ता उपरोक्त तीन प्रधान और तीन मिश्रित कुल छह रंगों का प्रयोग करते हैं। मिश्रण की मात्रा में न्यूनाधिकता लाने से तो फिर सैंकड़ों, हजारों रंग बन सकते हैं। किस रोग के मूल में किस-किस प्रकार की विकृतियों का समावेश है और उनके उपचार में किस रंग का कितना न्यूनाधिक मिश्रण किया जाय, यह पूर्णतया चिकित्सक की सूझ-बूझ और दूरदर्शिता पर निर्भर रहता है। सही निर्णय पर पहुँचने के लिए कई बार तो उसे उलट पुलट कर प्रयोग करने पड़ते हैं और सही निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए कई परिवर्तन करने पड़ते हैं। निदान और उपचार यदि सही मिल जाएं तो यह निर्णय सही है कि किस रंग का प्रयोग किया जाना उपयुक्त है तो फिर रोग निवारण में सफलता मिलना बहुत ही सरल हो जाता है।
सविता देवता की भौतिक उपासना सूर्य सेवन से और आध्यात्मिक उपासना तेजस् का ध्यान करते हुए की जा सकती है। उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर आशाजनक प्रभाव पड़ता है।
सत्य और असत्य दो सहोदर भाई एक दिन चल पड़े नदी में स्नान के लिए। दोनों ने खूब स्नान किया। असत्य नदी से पहले बाहर आ गया और अपने भाई सत्य के कपड़े पहनने लगा। सत्य ने कहा भी ‘भाई! ऐसा क्यों करते हो?’ पर असत्य मौन रहा, कपड़े पहने और चलता बना।
सत्य स्नान कर बाहर आया तो कुछ देर खड़ा-खड़ा सोचता रहा, पर उसके सम्मुख बहुत बड़ी लाचारी थी। समाज में जाने के लिए कपड़ों का पहनना आवश्यक था। अतः इच्छा न होते हुए भी उसने असत्य के ही कपड़े पहने।
उसके बाद इन दोनों को देखकर बड़े-बड़े विवेकशीलों को धोखा होने लगा। जब वह सत्य और असत्य में भेद नहीं कर पाते तो असत्य को ही सत्य मानकर अपना लेते हैं और सत्य इस स्थिति को देखकर पछताता रहता है, रोता रहता है।
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लगता है विज्ञान सृजन से ऊब गया- विष्णु का कार्य आगे करते रहने का उत्साह ठण्डा पड़ गया, अब वह शिव के संहार स्वरूप में अधिक रुचि ले रहा है। सभ्यता और समृद्धि बढ़ती ही रहे इसकी क्या जरूरत है- क्यों न इनका नियन्त्रण किया जाए? जो कुछ बन चुका है उसे नष्ट क्यों न किया जाय? विनाश भी तो एक कार्य है। अमेरिका में जितना द्रुतगति से मोटरों का उत्पादन होता है- जिस उत्साह से फसलें उगाई जाती हैं, उसी आवेश में उन्हें नष्ट करने की बात सोची जाती है। कार को पूरी तरह बेकार होने की प्रतीक्षा वहाँ कोई नहीं करता। थोड़ी पुरानी होते ही उन्हें समुद्र में कचरे की तरह फेंक दिया जाता है। उसी प्रकार अतिरिक्त अन्न को वे लोग जानवरों को खिला देते हैं या जला देते हैं। यह इसलिए किया जाता है कि मोटरों के उत्पादन और खपत का क्रम यथावत चलता रहे और अनाज सस्ता न होने पाये। सरकार अनाज का पैसा किसानों को चुकाकर उसे कहीं न कहीं देश-विदेश में खपा देती है। अर्थ सन्तुलन की दृष्टि से यह बर्बादी भी वहाँ आवश्यक समझी कई है।
सम्भवतः मनुष्य जाति के बढ़ते विस्तार के अथवा प्रतिस्पर्धी देशों की सम्पत्ति के सम्बन्ध में भी यही सोचा जा रहा है कि उन्हें आगे बढ़ने न दिया जाय। इसके लिए विनाश की आवश्यकता पड़ेगी। परम्परागत अस्त्र-शस्त्रों से यह कार्य विलम्ब से होगा। जो काम करना है उसे तुर्त-फुर्त करने में विज्ञान अपनी क्षमता सिद्ध कर चुका है। फिर विनाश के लिए उसका प्रयोग क्यों न किया जाय? एटमबम-हाइड्रोजन बम जैसे विनाश साधन इसी दृष्टि से बने हैं। उनके प्रयोग से रेडियो विकिरण फैलने और प्राणियों के साथ-साथ सम्पत्ति भी नष्ट हो जाने जैसे खतरे जुड़े हुए हैं इसलिए ऐसे साधन तलाश किये गये हैं जिनसे प्रतिस्पर्धी देश की जनता का प्राणि सम्पदा का तो विनाश हो जाय किन्तु पराजित होने के उपरान्त विजेता को वहाँ की सम्पत्ति को हथियाने में किसी प्रकार की अड़चन न पड़े। इस प्रयोजन के लिए मारक गैसें एवं विषाणु (वायरस) बम अधिक उपयुक्त समझे गये हैं। उनका उत्पादन विज्ञान क्षेत्र में अग्रणी देश बड़े उत्साह से कर रहे हैं और आशा कर रहे हैं कि भावी महायुद्ध में आणविक अस्त्रों की अपेक्षा इनका प्रयोग अधिक सरल और अधिक लाभदायक सिद्ध होगा। सम्पत्ति उत्पन्न करने की अपेक्षा दूसरों की कमाई हथिया लेने का अपना मजा है विज्ञान की प्रगति का लाभ भी इस प्रयोजन के लिए क्यों न लिया जाय? इस पक्ष समर्थन का उत्साह जीवाणु बम बनाने के लिए अधिक उत्साह उत्पन्न कर रहा है।
जीवाणु अस्त्र वायुयान द्वारा किसी क्षेत्र में चुपके से गिराये जा सकते हैं। गिरने की आवाज, खटका कुछ नहीं होता। कैप्सूल फटकर हवा में अपना प्रभाव तेजी के साथ फैलाता है और वह प्रभाव उस क्षेत्र में रहने वाले मनुष्यों तथा पशु-पक्षियों को बीमार करता चला जाता है। बीमारियाँ इतनी भयंकर होती हैं कि दवादारु का उन पर कोई असर नहीं होता। कुछ ही समय में वे या तो अशक्त अपंग हो जाते हैं या मौत के मुँह में चले जाते हैं। अणुबम जहाँ तुर्त-फुर्त सफाया कर देता है वहाँ यह अस्त्र रोने-कलपने और तिल-तिल मरने, सिसकने की व्यवस्था बनाते हैं। अणु के आयुध जला-गलाकर मैदान साफ कर देते हैं, पर यह जीव आयुध गन्दगी, बदबू, सड़न और कुरूपता उत्पन्न करते हैं। इतना अन्तर होते हुए भी विज्ञान ने अब जीवाणु आयुधों को ही अधिक सस्ता और सरल समझा है, उन्हीं का अभिवर्धन अधिक उत्साह के साथ करने की ठान ठानी गई है।
वायरस जीवाणु, कवक, प्रोटोजोआ जैसे अदृश्य जीव इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त समझे गए हैं। वायरस वर्ग के विषाणु- इन्फ्लुएंजा, मक्खी-ज्वर, छोटी चेचक अच्छी तरह फैला सकते हैं। रिकेटीसई तथा वेड सोनी वर्ग से क्यूफीवर, राकी याउन्टस, स्क्रव टाइफस आदि का बैक्टीरिया वर्ग से ऐंथ्रेकान, कालेरा, प्लेग, टाइफ़ाइड आदि का-वकव वर्ग से कोक्सिडियो, माइकोसिन आदि का प्रोटोजोआ वर्ग से आँतों की एवं आमाशय की सूजन का फैलाव होता है। मौसम एवं जलवायु के अनुरूप अन्य प्रकार के ज्ञात-अज्ञात लक्षण वाले रोग फैला सकते हैं।
लगभग इसी स्तर की बीमारियाँ विषाणु आयुधों के प्रहार से कहीं भी फैलाई जा सकेंगी। सैनिक हो या नागरिक उन्हें पता भी न चल पायेगा कि कब उनके ऊपर आक्रमण हुआ। बहुसंख्यक लोग जब बिस्तरों पर पड़े कराह रहे होंगे और उनमें उठकर नित्यकर्म कर सकने जितनी शक्ति भी न रहेगी तभी पता चलेगा कि रातों-रात किसी शत्रु द्वारा उन्हें इस भयंकर त्रास वेदना की पकड़ में जकड़ लिया गया है।
100 किलोग्राम विष पाउडर से प्रायः 40 वर्ग मील को संकट पूर्ण स्थिति में फंसाया जा सकता है। हवा में वह गैस बनकर घुल जायगा और फिर उस क्षेत्र में साँस लेने वालों के लिए बच निकलने का कोई चारा न रहेगा।
सेना की छावनियाँ अस्पताल के रूप में परिणत हो जाएंगी। वे मुकाबला करने की स्थिति में ही नहीं रहेंगे। व्यापक आतंक से जनता का मनोबल टूट जायगा। शौर्य, साहस वाले देश-भक्त भी अपने को असमर्थ पाकर निराश बैठे होंगे। प्रतिरोध का जोश ही समाप्त हो जायगा। दीनता, निराशा और कायरता से ग्रसित देश अव्यवस्थाओं से घिरा होगा। सामान्य आवश्यकता के साधन भी जुटा सकना कठिन हो जायगा। बिजली, पानी, रेल, बस, दुकानें, अस्पताल सर्वत्र सन्नाटा छाया होगा। चिकित्सा साधन प्राप्त करना तो दूर मृत शरीरों की अंत्येष्टि का प्रबन्ध भी न हो सकने के कारण सड़न और बदबू की एक अतिरिक्त समस्या उत्पन्न हो जायगी।
ऐसी स्थिति में आक्राँता देश को भी सहज ही लाभ नहीं मिल जायगा। आक्रमण करके प्रति पक्षी को परास्त तो अवश्य कर दिया जायगा। पर उस क्षेत्र में प्रवेश करके आधिपत्य जमाना कठिन होगा। विषाणु तो उन पर भी आक्रमण करेंगे। हवा, पानी को शुद्ध करके-गन्दगी की सफाई करके- उस क्षेत्र में प्रवेश करने वालों को सुरक्षित बनाये रहने जैसी समस्याओं का समाधान कैसे किया जायगा इसका उत्तर अभी उनके पास भी नहीं है, जो विषाणु आक्रमण की योजना में बहुत आगे बढ़ चुके हैं और उन संहारक अस्त्रों के पहाड़ जमा कर चुके हैं।
अनुपयोगी को उपयोगी बनाकर उसका उपयोग सर्वतोमुखी सुख-शान्ति के लिए प्रयुक्त करना विज्ञान का लक्ष्य होना चाहिए। पथ-भ्रष्ट होने पर व्यक्ति हो या समाज-बुद्धि हो अथवा विज्ञान केवल संकट ही उत्पन्न करते हैं। गरिमा उपलब्धियों की नहीं सद्बुद्धि की है जिसके बिना चमत्कारी उपार्जन भी सर्वनाश का कारण बनता है जैसा कि रासायनिक अस्त्र हमारे सामने रोमाँचकारी संकट बनकर हमारे सामने खड़े हैं।
आज अणु शक्ति को हिंसा का सबसे समर्थ आधार माना जाता है। वह दिन दूर नहीं जब जागृत जन-शक्ति को प्रगति का सबसे बड़ा माध्यम समझा जायगा।
-विनोबा
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अपने देश में गाय की बहुत मान्यता है। हिन्दू धर्म में उसका देवोपम सम्मान है। इसका सामान्य कारण तो कृषि कर्म के लिए आवश्यक बछड़े तथा गोबर से उच्च स्तर का खाद मिलना माना जा सकता है, पर विशिष्ट कारण है उसके दूध की वह विशेषता, जो अन्य किसी पशु के दूध में नहीं पाई जाती। उसकी तुलना हम माता के दूध से कर सकते हैं।
गौ की महत्ता धर्म शास्त्रों और आयुर्वेद शास्त्रों में पग-पग पर भरी पड़ी है। उसे देवोपम पूज्य तो माना ही गया है साथ ही गो रस की उपयोगिता का भी महत्व कम नहीं बताया गया है। यथा-
गावः श्रेष्ठा पवित्राश्च पावना जगदुत्तमाः। ऋते दधिघृताभ्याँ च नेह यज्ञः प्रवर्तते॥
पयसा हविषा दध्ना शकृता मूत्रचमणा। अस्थिभिश्चोपकुर्वन्ति बालैः भृंगैश्च भारत॥
गोभिस्तुल्यं न पश्यामि धनं किचिदिहाच्युत। गावो लक्ष्म्याः सदा मूलं गोषु पाप्मा न विद्यते॥
मातरः सर्वभूतानाँ गावः सर्वसुखप्रदाः॥
-महाभारत
अर्थात्- गौएं सर्वश्रेष्ठ तथा पवित्र पूजा करने योग्य और संसार भर में सबसे उत्तम हैं, क्योंकि दही, घृत आदि गव्य के बिना संसार में कोई यज्ञ सम्पन्न नहीं हो सकता। हे अर्जुन! गौएं दूध से, घृत से, दही से, गोबर, मूत्र चर्म, हड्डियों, बालों तथा सींगों से भी हमारा भला करती है। हे पार्थ! मैं गोधन के समान संसार में और कोई धन नहीं देखता क्योंकि गौएं सदा लक्ष्मी की मूल हैं। इनमें पाप का निवास नहीं है, इसलिये ये प्राणीमात्र के लिए माता के समान समस्त सुख देने वाली हैं।
म दाग्निनां कृशानांच विशेषदतिसारिणाम्। उत्साहदीपनं वल्यं मधुर वातनाशनम्॥
-भा0 वि0
अर्थात्- गोदूध, मन्दाग्नि, कृश तथा अतिसार युक्त, रोगियों के लिए उत्साह, अग्नि बलवर्धक, दीपन, मधुर एवं वातनाशक है।
पथ्यं रसायनं बल्यं हृद्यं मेघ्यं गवाँ पयः। आयुष्यं पुस्त्वकृद्वातरक्तपित्तविकारनुत्॥164॥
-धनवन्तरीय निघण्टु, सुवर्णादि; षष्ठो वर्गः
गोदुग्ध पथ्य, सब रोगों या अवस्थाओं में सेवन करने योग्य, रसायन, बलकारक हृदय के लिए हितकारी, बुद्धि को बनाने वाला, आयुवर्धक, वीर्यवर्द्धक वातनाशक, और रक्तपित्त के विकारों को दूर करने वाला है।
स्वादुशीतं मृदु स्निग्धं बहलं श्लक्ष्णपिच्छिलम्। गुरू मन्दं प्रसन्नं च गव्यं दशगुणं पयः॥ 216॥
तदेवंगुणमेवौजः सामान्यादभिवर्धयेत्।प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुक्तं रसायनम्॥217॥
-चरक संहिता, सूत्र स्थान, अध्याय 27
“दूध-मधुर, शीतल, मृदु, स्निग्ध, बहल, श्लक्ष्ण, पच्छिल, गुरु, मन्द, प्रसन्न इन दश गुणों वाला गौदुग्ध है। ओज के भी ये ही दश गुण हैं इसलिए सामान्य होने से दूध ओज को बढ़ाता है। इसलिए जीवनीय वस्तुओं में दूध सबसे अधिक श्रेष्ठ गिना जाता है। वह रसायन है।”
“गोक्षीरमनभिष्यन्दि स्निग्धं गुरु रसायनम्। रक्तपित्तहरं शीतं मधुरं रसपाकयोः॥ जीवनयं तथा वातपित्तघ्नं परमं स्मृतम्॥
-सुश्रुतसंहिता, सूत्रस्थान अध्याय 45
‘गोदुग्ध’ दस्त को बाँधने वाला चिकना, भारी व रसायन है। रक्त-पित्त का शमन करने वाला शीतल, मधुर स्वादु और परिणाम में मधुर, जीवनवर्द्धक और वात-पित्त के विकारों को नष्ट करने वाला कहा गया है।”
दूध की उत्कृष्टता उसके चिकनाई भाग से मापने की आज भारी भ्रान्ति जन साधारण के मस्तिष्क में घुस पड़ी है। इसलिए चिकनाई प्रधान भैंस के दूध की ही सर्वत्र माँग है अस्तु भैंस का पालन बढ़ रहा है। गाय के दूध में चिकनाई कम होती है इसलिए लोग उसे पसंद नहीं करते। उसकी खपत नहीं होती तदनुसार गायों की उपेक्षा होती है और उनकी संख्या तथा स्थिति दिन-दिन घटती गिरती चली जा रही है।
हमें इस भ्रम को मस्तिष्क से निकाल देना चाहिए कि चिकनाई के लिए दूध का महत्व है। चिकनाई तो मूँगफली, तिल, सरसों, आदि से पर्याप्त मात्रा में मिलती है और सस्ती भी पड़ती है। प्रयोगात्मक दृष्टि से घी और तेल की चिकनाई में विशेष अन्तर नहीं है। दूध का वास्तविक लाभ तो उसमें पाये जाने वाले लवणों, खनिजों विटामिनों तथा दूसरे अति महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की दृष्टि से ही है। यही वे विशेषताएं हैं जिनका बाहुल्य होने के कारण गौदुग्ध को प्रधानता मिली है और उसका पालन धार्मिक और आर्थिक दृष्टि से अति महत्वपूर्ण माना गया है।
गौदुग्ध में जो पाचक एनजाइम पाये जाते हैं उनमें पेरिक्सिडेज, रिडक्टेज, लाइपेज, प्रोटिएज, लैक्टेज, फास्फेटेज, ओलिनेज, गैटालेज मुख्य हैं।
इनके अतिरिक्त खनिज तथा दूसरे उपयोगी अंश इतने हैं कि गाय का दूध मनुष्य के लिए पूर्ण भोजन का काम दे सकता है।
इन्हीं सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए चरक सुश्रुत, वागभट्ट, भाव प्रकाश आदि आयुर्वेद ग्रन्थों में गोदुग्ध की भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। महाभारत में यक्ष युधिष्ठिर संवाद में- यक्ष पूछता है “अमृतं किम्” अमृत क्या है तो युधिष्ठिर उत्तर देते हैं- ‘गवा मृतम्’ अर्थात् गोदुग्ध ही अमृत है। अन्य खाद्य पदार्थों के साथ तुलना करने पर गाय का दूध वस्तुतः अमृत ही सिद्ध होता है।
भैंस के दूध की तुलना में गाय का दूध कहीं अधिक उत्तम है। भैंस के दूध में चिकनाई का अंश अधिक रहने से वह गाढ़ा रहता है और जिन्हें चिकनाई स्वादिष्ट लगती है उन्हें वह पसन्द भी आता है, पर जो पोषक तत्व गाय के दूध में होते हैं उसकी तुलना में भैंस दूध में कहीं कम पाये जाते हैं। गाय के दूध की प्रोटीन अपेक्षाकृत सुपाच्य होती है। उसमें विटामिन ए0 बी0 और डी0 की मात्रा भी अधिक रहती है। शरीर में उत्पन्न होते रहने वाले टानिक्स और टोमस विषों के निवारण करने वाले जो एन्ज़ाइम गाय के दूध में हैं वे भैंस के दूध में नहीं हैं।
गौदुग्ध में ग्लासिन, एलनिन, वेलिन, ल्यूसिन, फेनाइलैलानिन, टाइरोसिन, सेरिन सिस्टिन, प्रोलिन, हाइड्राक्सी प्रोलिन, ग्लूमैटिक ऐसिड, हाइड्रोग्लूमैटिक एसिड, एस्पाटिथ एसिड, ट्रिप्टो फेन, आर्जिनिन, हिस्टिडिन, लाइसिन, मिथ योनाइन, डोडेकेमिनो एसिड, एमोनिया, फास्फोरस की इतनी मात्रा रहती है जितनी अन्य खाद्य पदार्थों में नहीं पाई जाती है।
विटामिनों में ए॰ ए-1 (कैरोटिन) डी0 ई॰ (टोकोकेराल) बी0-1 (थियामिन) बी-2 (रिवोफ्लेविन) बी0-3, बी0-4-विटामिन सी0 (एसकार्विक ऐसिड) पाये जाते हैं।
दूध में जो खनिज पाये जाते हैं उनमें कैल्शियम, फास्फोरस, लोहा, ताँबा, आयोडीन, मैग्नीज, फ्लोरीन, सिलिकॉन मुख्य हैं। विटामिनों में से ए0 बी0 सी0 डी0 ई0 तथा के वर्ग के क्षार न्यूनाधिक मात्रा में पाये जाते हैं। कार्बोहाइड्रेट जो दूध में पाये जाते हैं उनमें लैक्टोस मुख्य है। यह पाचन प्रणाली को ठीक रखने में बहुत सहायक होता है। दूध की आवश्यकता यों वयस्कों को भी है, पर बच्चों को तीन चार गिलास दूध मिल जाया करे तो आवश्यक पोषण की आवश्यकता बहुत अंशों में पूरी हो सकती है। उतने भर से हम अपनी 70 प्रतिशत कैल्शियम की- 25 प्रतिशत प्रोटीन की- 16 प्रतिशत विटामिनों की और 50 प्रतिशत रिवोफ्लाविन की आवश्यकता पूरी कर सकते हैं।
विश्व की कुल गाय भैंसों का एक चौथाई भाग भारत में है। पिछले सरकारी आँकड़ों के अनुसार देश भर में 17 करोड़ 60 लाख गायें तथा 5 करोड़ 30 लाख भैंसें हैं।
कोढ़ में खाज की तरह अपने देश में जो थोड़ा बहुत दूध उत्पन्न होता भी है उसे स्वाभाविक रूप में ग्रहण करने की अपेक्षा ऐसे बेतुके ढंग से प्रयुक्त किया जाता है कि उतने से भी जो लाभ मिलना चाहिए था वह भी नहीं मिल पाता।
अपने देश में दूध का प्रयोग इस प्रकार है :-
तरल दूध की खपत- 36.2 प्रतिशत
घी में परिवर्तित- 43.3 प्रतिशत
दही में परिवर्तित- 4.1 प्रतिशत
खोआ में परिवर्तित- 9.1 प्रतिशत
मक्खन और क्रीम में परिवर्तित- 6.9 प्रतिशत
आइसक्रीम में परिवर्तित- 0.6 प्रतिशत
घी, खोआ, आइसक्रीम, मक्खन द्वारा प्रयुक्त दूध में प्राकृत दूध के बहुत थोड़े अंश ही शेष रह जाते हैं। उनका अति महत्वपूर्ण भाग तो ऐसे ही जलाने भूनने में नष्ट हो जाता है। इन चारों मदों में 60 प्रतिशत दूध नष्ट हो जाता है। दूध और दही दोनों को मिलाकर वह खपत कुल 40 प्रतिशत ही शेष रह जाती है।
यों मोटे तौर पर दूध का रासायनिक विश्लेषण किया जाय तो उसमें प्रतिशत 87.6 जल, 12.4 खनिज और लवण, 3.3 प्रोटीन, 3.6 चिकनाई और 4.7 कार्बोहाइड्रेट पाये जाते हैं। पर यह सभी वस्तुएं होती असाधारण स्तर की हैं। जल वैसा नहीं है जैसा कुएं या नदियों का होता है उस जल को ऐसे स्तर का कहा जा सकता है जिसमें पोषण और विसर्जन की अद्भुत क्षमता विद्यमान है। दूध की प्रोटीन में अमीनो एसिड के तीन वर्ग पाये जाते हैं (1) लाइसिना, (2) ट्रिप्टोफेन (3) हिक्टिडाइन। इन तीनों का प्राणिज मूल्य बहुत है। दूसरी प्रोटीनें कठिनाई से पचती हैं पर दूध की प्रोटीन प्रायः 97 प्रतिशत सरलता पूर्वक पच जाती है। अन्य खाद्य पदार्थ थोड़े ही अंश में शरीर में घुल पाते हैं और उनका अधिकाँश भाग बिना पचा ही बाहर निकल जाता है, पर दूध का 76 प्रतिशत अंश शरीर सोख लेता है।
पशु दुग्ध पर लम्बा पर्यवेक्षण करने वाले अमेरिका के पशु विशेषज्ञ डॉ0 एस0ए॰ पीपल्स ने कहा है कि घासों में पाये जाने वाले विष अक्सर उन्हें खाने वाले पशुओं के दूध में पाये जाते हैं पर गाय में न जाने क्या विशेषता है कि किसी विषैली घास का असर उसके दूध में नहीं पहुँचता। कीड़े मारने के लिए छिड़की गई विषैली रसायनें प्रायः घास और फसल पर छिड़की जाती हैं। वे सभी रसायनें विषाक्त होती हैं। जो भी दुधारू पशु उन पौधों को खाता है उनके दूध में उन विषों का एक बड़ा अंश पाया जाता है, निश्चित रूप से वह पीने वालों मनुष्यों के लिए हानिकारक होती है, पर यह बात गाय के दूध में नहीं देखी जाती। वे विषैले पौधे खाकर भी सर्वथा निर्दोष दूध देती हैं।
गौवंश की रक्षा न की जा सकी तो बैलों के बिना खेती किस प्रकार होगी? बैल को हटाकर ट्रैक्टर के सहारे भारत का गरीब किसान अपनी छोटी जोतों की कृषि कर नहीं सकेगा। 70 लाख ट्रैक्टरों की आवश्यकता पड़ेगी। उन्हें जुटाने को धन कहाँ से आवेगा? फिर छोटी देहातों में उन्हें चलाने वाले ड्राइवर और सुधारने वाले कारीगर कारखाने कैसे उपलब्ध होंगे? फिर उन ट्रैक्टरों के लिए तेल कहाँ से आयेगा? वे ट्रैक्टर गोबर तो देंगे नहीं अस्तु खाद की आवश्यकता कैसे पूरी होगी?
इन सब तथ्यों को ध्यान में रखते हुए हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि कृषि, अर्थव्यवस्था स्वास्थ्य रक्षा एवं धार्मिक दृष्टि से गाय को संरक्षण मिलना ही चाहिए। उसके दूध को तो प्रमुखता मिलनी ही चाहिए।
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व्यक्तिगत और पारिवारिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए प्रयत्नशील रहना हर मनुष्य का कर्तव्य है। इसके लिए यथाशक्य सभी को समुचित प्रयत्न करना चाहिए; पर इसके साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस क्षेत्र की आवश्यकताएं अथवा महत्वाकाँक्षाएं इतनी अधिक न बढ़ जायं कि समाजगत उत्तरदायित्वों को पूरा करने की दिशा में समय, श्रम, मन तथा धन का कुछ भी अंश बच न सके। कई बार तो लोग अपना निजी भार इतना अधिक बढ़ा लेते हैं कि उसे नीतिपूर्वक वहन कर सकना सम्भव ही नहीं रहता। चोरी, चालाकी के द्वारा ही उसकी पूर्ति करनी पड़ती है। जिनकी विलासी आदतें बढ़ गई हैं, जिन्हें फिजूल खर्ची की लत पड़ गई है उनके लिए न्यायोपार्जित आजीविका प्रायः कम ही पड़ती है। उन्हें अवाँछनीय आधार अपनाकर उसकी पूर्ति करनी पड़ती है।
पारिवारिक कर्तव्य बताते हैं कि जो सदस्य अपने हाथ-पैर, नाक, कान की तरह संयुक्त कुटुम्ब के उत्तरदायित्व से बंधे हुए हैं, उन सब की आवश्यकताओं एवं सुविधाओं का उचित ध्यान रखा जाय। अक्सर कमाऊ लोग अपनी सुविधा के लिए मनमाना खर्च करते हैं और जो बचता है उसे घरवालों पर बहुत एहसान जताते हुए देते हैं। यह अनुचित है। कमाने का यह अर्थ नहीं कि उसी को खाने का अधिकार है। उपार्जन एक कर्तव्य है जो हर कमा सकने योग्य व्यक्ति को पूरी तत्परता के साथ करना चाहिए किन्तु उसमें से खर्च उतना ही करना चाहिए जो नितान्त आवश्यक है। सच तो यह है कि अधिक समझदारी और अधिक जिम्मेदारी का तकाजा यह है कि वह पारिवारिक एकता की रीढ़, श्रद्धा, सद्भावना को बनाये रखने के लिए अपने लिए अपेक्षाकृत कम खर्च करे। इससे सुविधा में कमी भले ही पड़े, पर घर भर का सहज सम्मान बरसेगा और उस उपलब्धि से पूरे परिवार पर भावनात्मक शासन कर सकना- अपने प्रभाव से उन्हें सुसंस्कृत बना सकना कहीं अधिक मात्रा में सम्भव हो जायगा।
मनुष्य जाति का सभ्य सदस्य होने के नाते हर व्यक्ति को अपने नागरिक कर्तव्यों का निर्वाह करना चाहिए। अपनी सुविधा और समाज की सुविधा का जहाँ भी तुलनात्मक प्रश्न उपस्थित होता हो, वहाँ समाज को प्रथम और अपने को गौण रखना चाहिए। अपने को थोड़ी असुविधा भले ही हो, पर सामाजिक सुव्यवस्था की परम्पराओं का उल्लंघन न होने पावे, यह तथ्य सदा सामने रहना चाहिए। अक्सर लोग सार्वजनिक स्थानों, वस्तुओं तथा साधनों को लावारिस मानकर उनका मनमाना उपयोग करते हैं और उन्हें दूसरों के लिए कुरुचि पूर्ण, अस्त-व्यस्त तथा अव्यवहारणीय बना देते हैं, यह असामाजिक आदत है। रेलगाड़ी के डिब्बे, प्लेटफार्म, सड़क, धर्मशाला आदि स्थानों का उपयोग करते समय लोग यह भूल जाते हैं कि वे उन्हें गंदा तो नहीं बना रहे हैं। उतनी जगह तो नहीं घेर रहे हैं जिससे दूसरों को असुविधा उत्पन्न हो। रास्ता चलते केले खाना और उनके छिलके सड़क पर डाल देना दूसरों के पैर फिसलने का-टाँग टूटने का- कारण बन सकता है इसे कोई बिरले ही समझते हैं। सड़क के बाँई ओर चलना-जहाँ भीड़ हो वहाँ लाइन बना लेना एक अच्छा नियम है, पर आमतौर से लोग मनमानी बरतते हैं और धक्का-मुक्की करते देखे जाते हैं। घर का कूड़ा सड़क पर पटक देना- बच्चों को गली की नाली पर टट्टी के लिए बिठा देना उन लोगों के लिए सुविधाजनक हो सकता है, पर दूसरों को इससे कितनी असुविधा होती है इसका विचार उन्हें कहाँ आता है?
सामाजिक सुविधा एवं व्यवस्था को कायम रखने के लिए अपने उचित अधिकार तक सीमित रहना पड़ता है कि कहीं उच्छृंखल आचरण न बन पड़े इसके लिए कठोर आत्म-नियन्त्रण करना पड़ता है। नागरिक कर्तव्यों का यही तकाजा है, शिष्टाचार की सारी मर्यादाएं ऐसी सीमा में आती हैं, जो उनका पालन करने में जितनी उपेक्षा, आनाकानी करता है वह उतना ही असभ्य माना जाता है।
जल ही मछली का जीवन है। जलाशय की स्थिति के ऊपर ही उसकी सुविधा जुड़ी हुई है। समाज एक तालाब है और व्यक्ति उसी में निर्वाह करने वाली मछली। उसे यह ध्यान रखना ही चाहिए कि कीचड़ में लोट-पोट कर पानी को गन्दा न करे अन्यथा उसका स्वयं का तथा दूसरी मछलियों का निर्वाह कठिन हो जायगा। मनुष्य को अन्य प्राणियों की तुलना में बोलने, सोचने, लिखने, पढ़ने, कृषि उद्योग चिकित्सा, शासन आदि की सुविधाएं प्राप्त हैं वह असंख्य मनुष्यों द्वारा उपार्जित क्रमिक विकास से एक दूसरे के लाभान्वित होते चलने का ही प्रतिफल है। यदि अनुदान की इस शृंखला का लाभ हमें न मिला होता तो निश्चय ही सघन वन प्रदेश में रहने वाले पशु स्तर के मनुष्यों में ही हमारी भी गणना हुई होती। हमें आज जो सुविधाएं उपलब्ध हैं वे सभी असंख्य लोगों के श्रम, सहयोग से ही बनती और मिलती हैं। हमें जो लाभ दूसरों से मिलता है वह दूसरों को हमें भी देना चाहिए और आदान-प्रदान की शृंखला को सजीव बनाये रहना चाहिए। एकाकी सुख सुविधा और प्रगति की बात सोचना एक असम्भव कल्पना है। मनुष्य समाज का विकास सामूहिकता के आधार पर हुआ है, प्रगति के इस मूलभूत आधार को बनाये रहना और बढ़ाते चलना हर मनुष्य का सामाजिक प्राणी होने के नाते-परम पवित्र कर्तव्य है। स्वार्थ की निन्दा और परमार्थ की प्रशंसा इसीलिए की गई है कि स्वार्थी व्यक्ति समाज सेवा के- लोकमंगल के- प्रसंगों में कृपणता बरतता है और व्यक्तिगत सुविधाएं संग्रह करने में मरता, खपता रहता है। परमार्थ को स्वर्ग, यश और सन्तोष देने वाला पुण्य माना गया है; क्योंकि उस नीति को अपनाकर मनुष्य अधिक उदार दूरदर्शी एवं लोकोपयोगी बनता है। यही आत्म-कल्याण का मार्ग है और उसी पर चलते हुए समाज कल्याण का महान प्रयोजन पूरा होता है। जिस प्रकार हमें व्यक्तिगत और पारिवारिक सुविधाओं का ध्यान रहता है, उसी प्रकार सामाजिक प्रगति एवं सुव्यवस्था का ध्यान रखना चाहिए। इसलिए जितनी अधिक मात्रा में लोकोपयोगी कार्य बन पड़ें- उनमें अपनी शक्ति सामर्थ्य का नियोजन हो सके उतना ही अधिक प्रयत्न करना चाहिए।
समाज में अव्यवस्था उत्पन्न करने वाले-भ्रष्ट परम्पराएं प्रचलित करने वाले अनाचार अपराधों से दूर रहना चाहिए और दूसरों को भी वैसा करने से रोकना चाहिए। सामाजिक सुव्यवस्था एक सार्वजनिक सम्पत्ति है उसे सुरक्षित रखने में मनुष्य समाज के हर सदस्य को प्राण-प्रण से प्रयत्न करना चाहिए। अपने को उच्छृंखल आचरण नहीं करने देना चाहिए और न दूसरों को वैसा करने की छूट देनी चाहिए। प्रयास यही होना चाहिए कि उदार सहयोग की परम्पराओं में प्रोत्साहन देने वाले लोकोपयोगी कार्य स्वयं करें और दूसरों को वैसा ही करने के लिए प्रोत्साहित करें। यह हमारे सामाजिक कर्तव्य हैं जिन्हें पालन करने के लिए सजग तत्परता बनाये रहनी चाहिए।
राष्ट्रीय कर्तव्यों में लोकतन्त्र की जनता के विशेष कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व हैं। राजतन्त्र एवं अधिनायकवाद में सारी सत्ता शासकों के हाथ में केन्द्रित रहती है इसलिए प्रजा की अपनी मर्जी से नहीं शासन की इच्छानुसार गतिविधियाँ अपनानी पड़ती हैं। उस विवशता में प्रजा को सोचने के लिए कुछ अधिक नहीं बचता और नियत ढर्रे के अतिरिक्त कुछ और करने की भी गुंजाइश नहीं रहती। प्रजातन्त्रीय शासन में प्रजाजनों को बोलने, सोचने, करने की बहुत कुछ सुविधा होती है और संविधान में व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की मान्यता दी हुई होती है। चिन्तन और कर्तृत्व की कोई भी धारा अपनाने की उसे सुविधा रहती है। इतना लाभ लेने वाली प्रजा के ऊपर कुछ विशेष कर्तव्य उत्तरदायित्व भी आते हैं। वे आत्म-नियन्त्रण के हैं। उपलब्ध अधिकारों का समाजद्रोही क्रिया-कलापों में उपयोग किसी भी प्रकार नहीं करना चाहिए। कानूनी प्रतिबन्धों से भी अधिक प्रजातन्त्र के प्रजाजनों को आत्म-नियन्त्रण बरतना चाहिए। हर व्यक्ति को एक पुलिस मैन होकर रहना चाहिए जिसका पवित्र कर्तव्य नैतिक और सामाजिक स्वस्थ परम्पराओं को अक्षुण्ण बनाये रहना है।
प्रजातन्त्र में शासन सत्ता प्रत्येक प्रजाजन के हाथ में सौंपी हुई होती है। वही राष्ट्र का वास्तविक स्वामी होता है। अपने इस अधिकार को वह अपने किसी प्रतिनिधि को हस्तान्तरित करता है और अपने स्थान पर उसे शासन की बागडोर संभालने का भार सौंपता है। यह पुनीत प्रक्रिया सामान्य समय में तो सिद्धान्त मान्यता तक ही सीमित रहती है; पर मतदान के समय वह मूर्त रूप धारण करती है। उस दिन उसका व्यवहार रूप सामने आता है। प्रजातन्त्र का उत्तरदायित्व समझने वाली प्रजा का कर्तव्य है कि अपने वोट को समूचे राष्ट्र की पवित्रतम धरोहर समझे उसके साथ समूचे देश का भविष्य बनता, बिगड़ता देखे और हजार बार सोच-समझने के बाद ही किसी के पक्ष में अपना वोट डाले। जाति-बिरादरी के नाम पर-निजी लोभ लाभ के आधार पर-किसी की खुशामद, चापलूसी प्रोपेगण्डा या बहकावे से पूरी तरह अपना बचाव करते हुए मात्र हर दृष्टि से खरे व्यक्तियों को ही वोट दें। अन्धाधुन्ध खर्च करने वालों से सावधान रहें क्योंकि जो समय देने- सेवा करने का आश्वासन देकर उस आर्थिक लाभ रहित उत्तरदायित्व को संभालने के लिए पैसा भी लुटा रहा है वह अवश्य ही कुछ दुरभिसंधि संजोये हुए होगा। इस अवसर पर रंगे सियारों से विशेष रूप से सावधान रहने की आवश्यकता है अन्यथा वोट का दुरुपयोग राष्ट्रघाती, आत्मघाती दुष्परिणाम उत्पन्न करेगा। प्रजातन्त्र के नागरिकों को जितने मौलिक अधिकार उपलब्ध हैं उससे भी भारी उनके कर्तव्य हैं। हर नागरिक को प्रशासकीय और प्रगतिशील व्यवस्था बनाने के दृष्टि से अपने आपको अघोषित राष्ट्राध्यक्ष मानकर चलना चाहिए। तभी प्रजातन्त्रीय परम्परा का वास्तविक लाभ किसी देश को मिल सकता है। उपलब्ध अधिकारों का दुरुपयोग होने लगे तो प्रजातन्त्र असफल और उलटा हानिकारक सिद्ध होगा।
ईश्वर प्रदत्त कर्तव्य इतने अधिक हैं कि उन्हीं को निभा लेना कम गौरव की बात नहीं हैं। नये उत्तरदायित्वों का भार अपने ऊपर जितना कम बढ़ाया जाय उतना ही उत्तम है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए, मस्तिष्क को सुविकसित करने के लिए, व्यक्ति को परिष्कृत करने के लिए, माता-पिता, भाई-बहनों की साज-संभाल, समाज और संस्कृति पर छाई हुई विकृतियों का निराकरण करने के लिए प्रत्येक विचारशील व्यक्ति को अपने ऊपर हजारों मन कर्तव्यों का बोझ लदा दिखाई पड़ेगा। विमूढ़ लोग जिन्हें पेट और प्रजनन के अतिरिक्त और कुछ दीखता-सूझता ही नहीं-अन्धी भेड़ों जैसी भीड़ जिस राह पर चल रही है उस पर लुढ़कते चलने के अतिरिक्त जिनके अन्तरंग में कोई प्रकाश उठता ही नहीं, उन नर-पामरों की चर्चा करना व्यर्थ है वे तो कीट-पतंगों की तरह रोते-कलपते, पिटते, पिसते किसी प्रकार मौत के दिन पूरे ही करेंगे।
तब लज्जा से शिर झुक जाता है जब अपना पेट पाल सकने में-अपने स्वास्थ्य को संभाले रहने में असमर्थ व्यक्ति भी विवाह, शादी करने पर मात्र कामकौतुक की दृष्टि से उतारू हो जाते हैं और बेचारी निरीह पत्नी को आजीवन दयनीय जीवन की विवशता में जकड़ते हैं। यह किसी निरीह आत्मा के साथ क्रूरता भरा व्यवहार है। जो लोग आर्थिक, शारीरिक और बौद्धिक दृष्टि से पिछड़े हुए हैं जिनके लिए अपना भार वहन करना भी कठिन पड़ रहा है, वे आये दिन बच्चे जनते चले जाते हैं तो लगता है कुत्ते और शूकरों से ऊँची इनकी विचारशीलता बढ़ नहीं सकी है। वे घृणित प्राणी अपने काम-कौतुक भर की बात सोचते हैं और यह नहीं देखते कि अविवेकपूर्ण रति-क्रिया जो बच्चे उत्पन्न करेगी उनका भविष्य क्या होगा और साज-संभाल करने में उनकी माता पर क्या बीतेगी? यदि इतना भर वे सोच पाते और दूरगामी दुष्परिणामों पर विचार करके वे सोचते तो आत्म-नियन्त्रण की बात सूझती। कम से कम मनुष्य तो ऐसा कर ही सकता है। विवाह करने और औलाद जनने से पूर्व हर नर-नारी को हजार बार विचार करना चाहिए कि क्या ऐसा करना नितान्त अनिवार्य है? यदि प्रस्तुत उत्तरदायित्वों को पूरा करने के अतिरिक्त फालतू शक्ति बचती हो तो नया बोझ सिर पर लादना और उस नये कोल्हू में जुतना उचित है। अन्यथा मानव जीवन के अलभ्य अवसर का समुचित लाभ उठाने के लिए-महत्वपूर्ण लक्ष्य प्रयोजनों में ही जुट पड़ना चाहिए और अपनी क्षमता को उस केन्द्र पर नियोजित करना चाहिए जिस पर व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति एवं सुख-शान्ति अवलम्बित है।
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संजीवनी विद्या के प्रख्यात उपदेशक ने एक स्थान पर लिखा है- ‘मैं एक ऐसे परिवार को जानता हूँ जिसकी आय पहले बहुत थोड़ी थी फिर भी वह सुख-शान्ति का जीवन व्यतीत करता था। एक बार उस परिवार को अचानक बिना परिश्रम का बहुत सारा धन मिल गया। होना तो यह चाहिए था कि इससे उनका जीवन और अधिक सुख-सुविधापूर्ण बन जाता, पर हुआ इसका उल्टा ही। उनका जीवन एकदम बदल गया और वे लोग ‘और’ ‘अधिक’ सुख-भोग की लालसा करने लगे। अब वे अधिक कीमती और भड़कीले, चटखदार कपड़े पहनने लगे, अपने से ज्यादा सम्पत्तिवानों से मेल-जोल बढ़ाने लगे तथा साथ ही साथ उनसे ईर्ष्या भी करने लगे, थोड़े दिनों बाद उस परिवार की सारी सम्पत्ति राजसी ठाट-बाटों में लग गई। कर्जे का बोझ बढ़ने लगा और उनके पास जो कुछ भी था वह सब स्वाहा हो गया। बाद में यह भी हुआ कि माँ ने अपनी लड़कियों के सम्बन्ध ऊँचे खानदानों में करने के लिए कपड़े वालों, दर्जियों, जौहरियों और दुकानदारों के बड़े-बड़े बिलों का भार बढ़ा लिया और मैंने सुना है कि अब उन बोझों से मुक्त होने के लिए उन लोगों के हाथ से उनका घर भी चला गया।
उपरोक्त उदाहरण किसी एकाध व्यक्ति से सम्बन्ध रखता हो, ऐसी बात नहीं है। आधे से अधिक धनाढ्य जिन्हें नव-धनाढ्य कहा जाता है, इस प्रकार की घटनाक्रमों का शिकार होते हैं। व्यक्ति चाहे गरीब हो या अमीर, कंगाल हो या सम्राट, मूर्ख हो या विद्वान एक ही उद्देश्य से कर्मशील रहता है और वह उद्देश्य है-सुख-शान्ति। सुख-शान्ति का ही समानार्थी शब्द है प्रसन्नता। सुख के सम्बन्ध में यह मान लेने का भ्रम भी रहता है कि कई लोग इस शब्द का अर्थ साधनों और सुविधाओं की बढ़ोतरी भी लगाते हैं; जब कि इसी शब्द के साथ जुड़ा हुआ शान्ति शब्द इसके अर्थ को स्पष्ट कर देता है- प्रसन्नता या आनन्द। प्रसन्नता का विचार उठते ही मन में एक ऐसा कल्पना चित्र बनता है जिसमें अपने आस-पास दुःखी या क्षुब्ध करने का कोई कारण न रहता हो।
संसार में साधन सम्पन्न और धनवान व्यक्तियों की कमी नहीं है, परन्तु उन्हें भी आह्लाद पूर्ण स्थिति में शायद ही कभी देखा जाता हो। कहा जाता है कि विपुल साधनों की बाढ़ व्यक्ति को उतना ही शंकालु और चिन्ताग्रस्त बनाती है; तो फिर क्या कारण है कि सुख-साधनों की प्रचुरता के बाद भी व्यक्ति का अन्तःकरण क्षुब्ध और चिन्तित ही बना रहता है। यही नहीं इसके विपरीत आकस्मिक प्राप्त हुई सम्पन्नता और भी अधिक संत्रासपूर्ण सिद्ध होती है।
यहाँ प्रसन्नता के स्वरूप को स्पष्ट समझ लेना आवश्यक है। प्रसिद्ध विचारक हैनरी ड्रुमैण्ड ने लिखा है- ‘संसार में आधे से अधिक लोग प्रसन्नता की खोज ठीक ढंग से नहीं करते। उनके विचार में प्रसन्नता दूसरों द्वारा दी गई सुख-सुविधाओं के उपयोग करने में है; जबकि सच्चाई यह है कि प्रसन्नता दूसरों को देने और उनका उपकार करने में ही है।’
प्रसन्नता की खोज में व्यस्त किन्तु प्रसन्नता से उतनी ही दूर व्यक्तियों के लिए एक विचारक के ये शब्द गुरु मन्त्र की तरह हैं-“प्रसन्नता तो मनुष्य की परछांई की तरह है। हम इसके पीछे जितने भागते हैं उतनी ही यह हमसे दूर हो जाती है और जैसे ही खड़े रहकर हम अपने आस-पास देखते हैं तो यह हमें अपने पैरों में ही खड़ी मिल जाती है।” वस्तुतः प्रसन्नता कोई बाहरी साधनों या परिस्थितियों द्वारा प्राप्त होने वाली चीज नहीं है। वह हमारे अन्तःकरण में ही है और हमें नित्य उपलब्ध है तथा अपनी मनःस्थिति को तदनुकूल बना लेने पर तत्काल उसके दर्शन होते हैं।
इस सम्बन्ध में ज्ञातव्य है कि प्रसन्नता की अनुभूति मन में ही होती है, जब कि सुख-सुविधाओं की पहुँच देह के बाह्य और भीतरी अंगों तक ही है। स्थूल वस्तुएं स्थूल वस्तुओं से सम्पर्क स्थापित कर लें- यह तो सम्भव है, परन्तु स्थूल चीजें सूक्ष्म तत्वों को प्रभावित कर सकें यह कैसे सम्भव है। उदाहरण के लिए प्रकाश को ही लिया जाय, दृष्ट वस्तुओं में प्रकाश सबसे सूक्ष्म है, हवा की गणना भी उस रूप में की जा सकती है। प्रकाश को बींधने या हवा को छेदने का काम किसी लोहे के भाले या बन्दूक की गोली से नहीं किया जा सकता। स्थूल दीवार उनका आना-जाना भले ही रोक दे, उनमें अवरोध जरूर उत्पन्न कर दे, परन्तु उनके स्वरूप को प्रभावित नहीं कर सकती। उसी प्रकार बाहरी सुख साधन प्रसन्नता या आह्लाद की अनुभूति में व्यवधान तो खड़े कर सकते हैं, परन्तु उसे अर्जित नहीं करा पाते।
आमतौर पर लोग प्रसन्नता को धन से खरीदी जाने वाली वस्तु मान बैठते हैं वे समझते हैं कि हमारे पास अधिक धन होगा, अधिक वस्तुएं होंगी और अधिक साधन होंगे तो हमें अधिकतम प्रसन्नता का आनन्द मिल सकता है। प्रसन्नता जबकि मनो जगत से सम्बन्धित उपलब्धि है और उसकी क्षुधा मनःस्थिति के स्तर पर ही तृप्त की जा सकती है तो परिस्थितियों का परिवर्तन उस क्षुधा को कैसे तृप्त कर सकता है। परिस्थितियों का परिवर्तन कुछ समय के लिए मादक द्रव्यों के सेवन की तरह थोड़ी बहुत मूर्च्छा जरूर ला दे और आनन्द का भ्रम भले ही उत्पन्न कर दे लेकिन उससे वास्तविक प्रयोजन की पूर्ति नहीं होती। प्यासा व्यक्ति यह सोचे कि सोड़ावाटर, आइसक्रीम, ठंडी चाय या कॉफी उसकी प्यास बुझा दे तो कुछ समय के लिए वह अपने को बहला भले ही ले, शीतल जल से जो तृषा तृप्ति हो सकती है वह इन महंगे साधनों द्वारा हो पाना असम्भव है। प्रसन्नता को भी प्यास की तरह समझा जा सकता है और उसे बुझाने में केवल उसी स्तर का जल आवश्यक है न कि सुख-साधनों का अम्बार।
मन के स्तर का शीतल जल है जीवन के प्रति सुलझा हुआ दृष्टिकोण। शरीर के लिए श्वास जितनी आवश्यक है उसी अनुपात में प्रकृति ने हवा का सागर जितना व्यापक लहराया है उतना ही व्यापक और सदा उपलब्ध है; प्रकृति की प्रेरणाओं का वह स्वस्थ दृष्टिकोण लेकिन कोई व्यक्ति नाक और मुँह बन्द कर दम घुटा जा रहा है चिल्लाये तो उसे क्या कहा जाय? प्रसन्नता हमारे लिए जितनी आवश्यक है उसकी पूर्ति के लिए स्वस्थ दृष्टिकोण भी हमारे चित्त में उतना ही सम्भव है। परन्तु कदम-कदम पर दुःखों का रोना रोने वाले व्यक्ति को भी नाक-मुँह बन्द कर हवा के मारे दम घुटा कहने वाले व्यक्ति की श्रेणी में रखा जा सकता है।
प्रसन्नता रूपी दैवी वरदान के लिए जो स्वयं प्राप्त होता है न तो अतिरिक्त प्रयासों की आवश्यकता पड़ती है और न ही सुख सुविधाओं के अम्बार लगाने की। स्वच्छ जल के लिए जिस प्रकार किसी काई जमे पानी को हाथों से थोड़ा हिलाना-डुलाना पड़ता है, उसी प्रकार अपने विचारों, अपनी मान्यताओं, आस्थाओं और विश्वासों में थोड़े फेर बदल की आवश्यकता रहती है। किन विचारों और मान्यताओं को निरस्त करना है तथा किस दृष्टिकोण का विकास आवश्यक है; यह तभी समझा जा सकता है जब हम अपने स्वभाव प्रसन्नता पर जमी काई को थोड़ा जान लें।
जो लोग परिस्थितियों और अभावों को लेकर अप्रसन्न-नाखुश हैं, खिन्न हैं उन्हें यह जानना चाहिए कि वे कौन सी बातें हैं जो हमारे स्वभाव को आवृत्त किये हुए हैं। संसार में अधिकाँश लोगों की अप्रसन्नता का कारण यह है- उनमें से कई दूसरों से ईर्ष्या और अपने पर असन्तोष करते हैं। ऐसी प्रवृत्ति तभी उत्पन्न होती है जब व्यक्ति यह समझ ले कि प्रसन्नता आन्तरिक अनुभूति है और उसे बाहरी साधनों से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इस भ्रम से जितनी जल्दी हो मुक्त हुआ जा सके कि प्रसन्नता भौतिक साधनों से खरीदी जा सकती है, उतना ही शीघ्र प्रसन्नता को आवृत्त भर रखने वाली हटाया जा सकता है। यह विचार रखने वाले उस अबोध बालक की तरह हैं जो एक टीले पर बनी झोंपड़ी में बैठकर दूर बने एक मकान को सुनहरा महल समझ रहा है और उसे देखने के लिए वहाँ तक दौड़ा गया। पास जाकर जब उसने देखा तो वहाँ न महल था और न सुनहरी चमक वरन् थी वैसी ही झोंपड़ी जैसी कि उसकी अपनी मडैया थी और उस स्थान से जब उसने अपनी झोंपड़ी को देखा तो सूर्य की किरणों से वह भी वैसी ही सुनहरी चमक रही थी।
प्रसन्नता की खोज में इसी प्रकार की मृग-तृष्णा के पीछे दौड़ने वाले लोगों को एक विचारक ने नासमझ रेगिस्तानी मृग कहा है और लिखा है- ‘हमें सदैव दूर के भवन ही बुलाते हैं। जीवन की सुन्दरता और प्रसन्नता हमें सदा उसी धरती पर दिखाई देती है जहाँ हम आज नहीं हैं।’ ठीक भी है-अभी पिछले वर्ष जब मनुष्य ने चन्द्रमा की यात्रा की और वहाँ से पृथ्वी की ओर देखा तो उन्हें पृथ्वी उससे भी कहीं अधिक आभामय दिखाई दी। वास्तविकता क्या है-यह कोई नहीं कह सकता, पर इतना सच है कि दूर के ढोल हमेशा सुहाने दिखाई देते हैं और हम उन्हें पाने के लिए दौड़ पड़ते हैं।
दूसरों से ईर्ष्या करने और अपने वर्तमान से असंतुष्ट रहने का कारण भी यही है। औरों के पास जब हम अपने से अधिक धन, सम्पत्ति देखते हैं, उन्हें अपने से अच्छी स्थिति में पाते हैं तो हम यह समझने लगते हैं कि यह व्यक्ति या परिवार हमसे अधिक सुखी है, शान्त है, जबकि वह भी अपने से अच्छी स्थिति वाले व्यक्ति को सुखी प्रसन्न अनुभव करता है और उस जैसा बनने की दौड़ लगाने लगता है। यह दौड़ तब तक चलती रहती है जब तक कि जीवन अभिनय का पटाक्षेप न हो जाए और यही नहीं जो लोग प्रसन्नता को आन्तरिक अनुभूति होने के सिद्धान्त का प्रयास करते हैं-वे भी यह दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहते। ऐसे व्यक्ति को क्या सम्बोधन दिया जाय?
इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि प्रचार किसी भी विचार का किया जाय, परन्तु जब तक वह आस्था के रूप में अन्तःकरण में गहराई तक पैठ न जाय तब तक उसके जीवन और व्यक्तित्व पर कोई प्रभाव नहीं होता।
आस्थाओं और मान्यताओं में, अपने दृष्टिकोण और रीति-नीति में जब तक इस आदर्श की प्रतिष्ठा न की जाय तब तक न तो दूसरों से ईर्ष्या करना बन्द हो सकता है और न अपने से असन्तोष रखने की प्रवृत्ति से छुटकारा मिलता है। ये दोनों वृत्तियाँ ही परस्पर पूरक हैं और विकृतियाँ हैं। इनका निष्कासन तभी सम्भव है जब हम यह मानने आचरण करने लगें कि-प्रसन्नता, शान्ति, आनन्द हमारा स्वभाव है, प्रभु की अनन्त अनुकम्पा का उपकार है, दैवीय वरदान है जो अनायास ही हमें प्राप्त है और केवल उस पर आवरण भर पड़ा है जिसे अनावृत्त करने से उसके दर्शन किये जा सकें।
प्रकृति ने हमारे लिए हवा, पानी की तरह ही हमें वे वस्तुएं सुलभ करा दी हैं जो हमें स्वास्थ्य, सौन्दर्य, शान्ति और आनन्द देते रहते हैं। अपने दृष्टिकोण को जरा बदल भर लें-परिष्कृत कर लें तो सूर्य का उगना, पेड़-पौधों का हवा में नाचना, चिड़ियों का चहकना और पक्षियों का कूकना, फलों का महकना और हवा का बहना हमें नित्य प्रसन्न रख सकता है।
अपने शरीर से अधिक बोझ लादे चींटियाँ गन्तव्य की ओर दौड़ी जा रही थीं। एक बरसाती कीड़े ने देखकर पूछा- ‘चींटी! तेरे इस परिश्रम पर मुझे बड़ा आश्चर्य है। तेरी माँद में अभी भी इतना अन्न है कि तू बैठी-बैठी जीवन भर खा सकी है, चैन की बंशी बजा सकती है। ऐसा लगता है तू भी धनिकों की तरह जोड़-जोड़कर रखना चाहती है।
‘नहीं भाई! ऐसा नहीं है। श्रम ही तो जीवन है। मैं अपने लिए ही जीवित नहीं हूँ। वरन् सोचती हूँ यदि मेरी सेवाओं से मेरे साथी लोग लाभान्वित हो सकें तो मेरा जीवन कितना धन्य हो जायेगा।
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जीव विज्ञान (बायोलॉजी) एक सुविस्तृत विज्ञान है। उसकी एक शाखा है ‘जेनेटिक्स’ जिसे जनन विज्ञान भी कह सकते हैं। उसकी भी एक उपशाखा है यूजेनिक्स जिसे हिन्दी में सुप्रजनन अथवा नस्ल सुधार कह सकते हैं।
यह माना जाता है कि मनुष्यों की वर्तमान पीढ़ी अपने पूर्वजों की तुलना में लम्बाई, मजबूती, निरोगता, दीर्घ जीवन आदि सभी दृष्टि से बढ़े-चढ़े थे और हम उनकी अपेक्षा कहीं अधिक दुर्बल एवं रुग्णताग्रस्त बन गये हैं। इस कमी को पूरा करके पूर्वजों की अथवा उससे भी अच्छी स्थिति में पहुँचने की अपनी इच्छा स्वाभाविक है। यूजेनिक्स के अन्तर्गत इसके लिए उपाय ढूँढ़े जा रहे हैं। इतना ही नहीं मानसिक संरचना एवं व्यक्तित्व की अनेक धाराओं में भी ऐसे सुधार किये जाने अपेक्षित हैं जिनके आधार पर मनुष्य को सुविकसित कहा जा सके।
यह सुविकसित स्थिति वह होनी चाहिए जो समय की माँग को पूरा कर सकने में समर्थ हो। सत्ताधीशों के इशारे पर नत-मस्तक होकर चल सके और उनकी इच्छित विशेषताओं से भरपूर हों। ऐसे सुविकसित मनुष्य कहाँ हैं? कैसे मिलें? अथवा किस प्रकार प्रशिक्षित किये जाएं? इन झंझटों में पड़ने की अपेक्षा अब यह उचित और सरल समझा जा रहा है कि अभीष्ट स्तर के मनुष्य पैदा करने की दिशा में ध्यान केन्द्रित किया जाय और सुधरे बीज से सुधरी फसल उगाने का सिद्धान्त मनुष्यों पर भी लागू किया जाय। यह प्रयोग वनस्पतियों वृक्षों, अनाजों पर पूर्णतया सफल रहा है। कलम लगा कर अथवा वर्णशंकर बनाकर वनस्पति जगत में ऐसी विध उपलब्ध कर ली गई है कि अधिक मात्रा में- अधिक बढ़िया- अधिक गुणकारी अनाज, फल एवं चारा उगाया जा सके। यह विध पशुओं पर भी सफल रही है। कृत्रिम गर्भाधान की पद्धति ने किसी भी जाति की मादा को किसी भी जाति के नर के साथ निषेचन करने के लिए बाध्य कर दिया है। सजातीय संयोग की प्रकृति प्रेरणा को उठा कर एक कोने पर रख दिया गया है। अब ऐसी पशु जातियाँ उत्पन्न की जा रही हैं जो अपने माता-पिता की प्रकृति एवं क्षमता से भिन्न होते हैं। घोड़ी, गधे के संयोग से खच्चर उत्पन्न करने की बात अब पुराने जमाने की हो गई। अब तो उनके जनन बीजों का ही इस तरह कतरव्योंत कर दिया जाता है कि अभीष्ट आकार प्रकार की, गुण स्वभाव की पशु पीढ़ियाँ उत्पन्न हो सकें। मनुष्य जाति पर भी वह प्रयोग किये जा सकते हैं और सफल हो सकते हैं इस विश्वास को लेकर जीव विज्ञानी अब इस प्रयत्न में जुट गये हैं कि मनुष्यों की सुविकसित फसल उगाई जाय। उसकी वंश परम्परा में जोड़-गाँठ और काट-छाँट कर देने से वैसी पीढ़ियाँ उत्पन्न करना सम्भव हो सकेगा जैसी कि हमारे कर्णधारों को अपेक्षित है।
मनुष्य की मानसिक स्थिति स्वभाव एवं प्रकृति में सुधारों की आवश्यकता अनुभव की जाती है। पर सबसे पहली आवश्यकता शारीरिक स्थिति को सुधारने की है। जल्दी थकान, दुर्बलता विपरीत परिस्थितियों को न सह सकने वाली अशक्तता, अनेकानेक छोटे-बड़े रोगों से ग्रसित रहना इन्द्रिय क्षमता में न्यूनता, स्वल्प श्रम कर सकने जैसा ढाँचा, अल्पायु, शीघ्र वृद्धावस्था आदि कितने ही ऐसे व्यवधान हैं जिनसे मनुष्यों की शारीरिक स्थिति क्रमशः दयनीय स्थिति तक पहुँचती जा रही है। दीन दुर्बल काया एक प्रकार से भार ही बनी रहती है, जीवन का आनन्द उठा सकने में वह साथ देती ही नहीं। जो अपने आपके लिए और अपने परिवार के लिए भार बना हुआ है वह समय की- समाज की- आवश्यकता क्या पूरी करेगा? कर्णधारों की महत्वाकाँक्षाओं को पूर्ण कर सकने की उसमें सामर्थ्य कहाँ होगी?
‘इन सब बातों पर विचार करते हुए मनुष्यों की उपयोगी फसल उगाने की बात वैज्ञानिक क्षेत्र में सोची गई है और इसके लिए शारीरिक स्थिति के सुधार को प्राथमिकता दी गई है। असह्य शीत, ताप वाले ऐसे प्रदेश अभी बहुत विस्तृत क्षेत्र में बिखरे पड़े हैं जिनमें मनुष्यों का अधिक संख्या में रह सकना सम्भव नहीं हो पाता। दलदलों की कीचड़ से भी ऐसी हवा उत्पन्न होती है जिसमें रहने पर बीमारियों से बचा नहीं जा सकता। दुर्गम पहाड़ों पर चढ़ने उतरने को भी असुविधाजनक समझा जाता है और वहाँ रहने वालों की संख्या दिन-दिन घटती जा रही है। सह्य और संतुलित परिस्थितियों में रहना ही अभी लोगों को पसन्द है। कष्टकर परिस्थितियों में रहना सुहाता नहीं। ऐसी दशा में एक बहुत बड़ा भू-भाग ऐसा पड़ा रहता है जिसके उपयोग का लाभ मनुष्यों को मिलता ही नहीं। परिस्थितियाँ बदलना कठिन है। पहाड़ों को समतल बनाना और शीत-ताप को संतुलित करना कठिन है। प्रकृति पर इतनी बड़ी विजय आसानी से मिलती नहीं दीखती। मिली भी तो उसमें देर लगेगी। जल्दी ही मनुष्यों की वाँछित फसल तैयार करने के लिए उसके जीव बीजों में सुधार करके ऐसी काया गठन के लोग उत्पन्न किये जा सकते हैं जो अब के लोगों को कष्टकर लगने वाले क्षेत्रों में प्रसन्नता पूर्वक रह सकें। उनकी शारीरिक स्थिति ऐसी हो जिस से आज की कठिनाई तनिक भी न अखरे और नई पीढ़ी के लोग वहाँ खुशी-खुशी निर्वाह करें। हिम प्रदेशों में रहने वाले मनुष्य और पशु वहीं चैन पाते हैं। गर्म प्रदेश में उन्हें ले आया जाय तो वे वहाँ हांफते जलते दम तोड़ देंगे। इसी प्रकार गर्म प्रदेश के लोग शीत क्षेत्र में ठंड से अकड़ कर मौत के मुँह में धंसते चले जायेंगे। पहाड़ी वन्य जन्तु वहाँ की चढ़ाई-उतराई को विनोद मात्र मानते हैं। यदि मनुष्यों की ऐसी फसलें उगाई जा सकें जो आज की विपन्न समझी जाने वाली परिस्थितियों में निर्वाह कर सकें तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। जीव विज्ञानी आशा करते हैं कि ऐसा सुधार परिवर्तन कष्ट साध्य तो है, पर असम्भव नहीं। अगली पीढ़ियों की शरीर रचना ऐसी हो सकती है जिससे प्रकृति अवरोधों से जूझते हुए भावी पीढ़ी के लोग प्रसन्नता पूर्वक निर्वाह कर सकें।
ठीक इसी प्रकार रोगों से पीछा छुड़ाना भी जीव बीजों में सुधार करने से सम्भव हो सकता है। यों अधिकतर बीमारियाँ आहार विहार की विकृति से उत्पन्न होती हैं। प्रतिकूलताएं भी कई बार बीमारी का कारण होती हैं, पर आधे से अधिक रोग वंश परम्परा से आते हैं। जीव बीजों के किसी कोने में वे छिपे बैठे रहते हैं और तनिक सा अवसर पाते ही वे उभर पड़ते हैं। दवादारु ने तात्कालिक लाभ भर होता है जीव बीजों में छिप कर बैठे हुए चोर इन दवाओं से मरते नहीं। नित-नये उपचार आविष्कार सामने आते हैं, पर उनसे किसी भी रोग का सुनिश्चित निवारण सम्भव नहीं होता। जीव बीजों को सुधारने या बदलने में कोई उपचार समर्थ हो तभी इन असाध्य या कष्ट साध्य बने हुए रोगों से पीछा छुड़ाने में सफलता मिल सकती है।
यही बात लम्बा या ठिगना कद बनाने में- चमड़ी का रंग गोरा काला बनाने में- श्रम सामर्थ्य में- दीर्घायुष्य में लागू होती है। आहार, व्यायाम की सहायता से इस वंश परम्परा को नहीं बदला जा सकता। उसे बदलने के लिए जीव बीजों का ही उपचार करना पड़ेगा। ऐसी ही अनेक शारीरिक समस्याओं का समाधान अब एक ही दिखाई पड़ता है कि जीव बीजों का उपचार शल्य प्रयोग एवं प्रत्यावर्तन करने की विधि ढूंढ़ निकाली जाय। विज्ञान इसे सम्भव मानता है। यद्यपि यह उपचार बहुत सूक्ष्म स्तर का होने के कारण कष्ट साध्य अवश्य है।
वर्तमान परिस्थितियों का मुकाबला करने में समर्थ-समय की माँग को पूरा कर सकने के उपयुक्त मनुष्य का निर्माण करने के लिए वैज्ञानिकों की दृष्टि में वंश विज्ञान की गहरी खोज करने के उपरान्त इस निष्कर्ष पर पहुँचा गया है कि नर नारी के प्रजनन तत्व में समर्थ जीव कणों का नये सिरे से उत्पादन एवं परिशोधन किया जाय। उनका पोषण नई परिस्थितियों में किया जाय और उसमें अभीष्ट स्तर की पीढ़ियाँ उत्पन्न की जाएं। गुण सूत्रों को विद्युत आवेशों से उत्तेजित करने की प्रक्रिया बहुत दिन पहले ही हाथ लग गई है। कन्या को जन्म देने वाले कणों की भिन्नता उनकी मूलभूत भिन्नता नहीं है। दोनों की मूल प्रकृति एक ही होती है मात्र विद्युत आवेशों का ऋण धन स्तर ही उनमें लिंग भेद पैदा कर देता है। यह विद्युत आवेश प्रयत्नपूर्वक बदला जा सकता है और भ्रूण स्थापना से पूर्व नर-नारी की आन्तरिक स्थिति ऐसी बनाई जा सकती है जिससे कन्या या पुत्र जो चाहे वही उत्पन्न हो। इसी प्रयत्न में एक कड़ी और जुड़ गई है कि कुछ समय के गर्भ को भी लिंग परिवर्तन के लिए बाध्य किया जा सकता है। गर्भ संस्थानों एवं प्रजनन केन्द्रों में अमुक स्तर के विद्युत आवेश को अमुक मात्रा में पहुँचाने से सम्भव हो जाता है।
बर्लिन के डॉ0 एफ न्यूमैन और डॉक्टर एम क्रेमर ने इस आश्चर्य को भी सरल बना दिया है। गर्भवती चुहियाओं को किप्रोटेकोन एसीटेट के इंजेक्शन लगाये गये। उनके पेट से जो चुहियाएं उत्पन्न हुईं सो तो ठीक पर जो चूहे उत्पन्न हुए उनकी यौन प्रक्रिया में मादा अवयव भी मौजूद थे। शल्य चिकित्सा से उन्हें पूरी मादा बना दिया गया।
इन डाक्टरों का कहना है प्रत्येक भ्रूण आरम्भ में मादा वर्ग का ही होता है। नर गुण सूत्र पीछे सक्रिय होते हैं। जब वे प्रबल हो उठते हैं तब उनके प्रयास से भ्रूण में टेस्टोस्टेरोन नामक नर हारमोन बनना आरम्भ होता है। यह प्रक्रिया चल पड़ने पर आरम्भिक भ्रूण की परिणित नर लिंग में होती है। गर्भ धारण करने के बाद भी पेट में एक वर्ग के गुण सूत्रों को मूर्छित रखने और दूसरे वर्ग को सक्रिय बनाने का कार्य हो सकता है। गर्भाधान के आरम्भिक दिनों में तो इस प्रकार का हेर-फेर और भी अधिक सरल संभव हो सकता है यह कठिन कार्य सम्पन्न कर सकने योग्य कुछ विशिष्ट विद्युत धाराएं विनिर्मित की गई हैं जो अन्य अवयवों में हानिकारक विक्षेप उत्पन्न करके केवल गुण सूत्रों में ही अभीष्ट हलचलें उत्पन्न करती हैं।
इसी विज्ञान का विकास अब इस प्रकार होने जा रहा है कि ‘जीन’ में जो वंश परम्परागत शारीरिक एवं मानसिक विकृतियाँ जुड़ी चली आ रही हैं उन्हें नष्ट कर दिया जाय और जो श्रेष्ठ अंश प्रसुप्त स्थिति में पड़े हैं उन्हें उभार दिया जाय। इस प्रकार की शल्य क्रिया विद्युत तरंगें ‘जीन’ के मर्मस्थलों तक पहुँचा कर की जा सकती हैं। इस विधि से सामान्य नर-नारी भी अपने शुक्र कीटों और डिम्बाणुओं को इस योग्य बना सकते हैं कि सुप्रजनन सम्भव हो सके।
इस प्रक्रिया में एक बड़ी त्रुटि यह है कि माता-पिता के गुण सूत्रों को प्रधानतया विकृति मुक्त ही किया जा सकता है। बहुत हुआ तो प्रसुप्त विशेषताओं को थोड़ी मात्रा में उभारा जा सकता है। इतने पर भी यह नहीं हो सकता कि मातृ पक्ष या पितृ पक्ष में जो विशेषताएं वंश परम्परा से रही ही नहीं उनका भी समावेश किया जा सके। घटाना-सुधारना सरल है पर समावेश तो कैसे किया जाय। गेहूं में जो तत्व नहीं हैं उन्हें भी यदि मिलाया जाना सम्भव हो तो फिर वही इतना पौष्टिक बन जाता है कि प्रोटीन, खनिज, चिकनाई विटामिन आदि अन्य किसी पदार्थ की आवश्यकता नहीं पड़ती। गेहूं के बीज को थोड़ा सुविकसित किया जा सकता है, पर उसमें उन तत्वों का समावेश करना कठिन है जो उसकी मूल प्रकृति में हैं ही नहीं। गुण सूत्र मनुष्यों की भूतकालीन स्थिति के प्रतीक प्रतिबिम्ब मात्र हैं जो कभी हुआ बीता ही नहीं वह संस्कार उनमें आ कहाँ से जायगा। यहाँ आकर गाड़ी फिर रुक जाती है। समुन्नत स्तर की पीढ़ियों में जिन विशेष क्षमताओं का समावेश किया जाना है विद्युत प्रवाह द्वारा ‘गुण सूत्रों’ में उथल-पुथल कर देने मात्र से भी वह सब सम्भव न हो सकेगा। फिर लक्ष्य कहाँ पूरा हुआ?
विज्ञान अपने ढंग से समुन्नत पीढ़ियों का लक्ष्य पूर्ण करने के लिए सोचने और उपाय ढूंढ़ने में संलग्न है। अध्यात्म इस समस्या का समाधान बहुत पहले ही बता चुका है। पति-पत्नी संतानोत्पादन के लिए दीर्घकालीन तप साधना करें जैसी कि स्वायंभु मनु और शतरूपा रानी ने इसी उद्देश्य के लिए तप करके दशरथ और कौशल्या का शरीर धारण करके भगवान राम जैसे परिष्कृत व्यक्तित्व को जन्म दिया था। भगवान कृष्ण अपनी पत्नी रुक्मिणी को लेकर संतानोत्पादन तप करने के लिए बद्रीनाथ स्थल में हिमालय साधना के लिए गये थे और बेर के फल खाकर वे दोनों दीर्घकालीन साधन करते रहे थे। इसके उपरान्त इन्हें प्रद्युम्न पुत्र प्राप्त हुआ था जो आकृति-प्रकृति में पूर्णतया अपने पिता जैसा ही था। पुराण ग्रन्थों को ध्यान पूर्वक पढ़ने से यह विदित होता है कि तपस्वी ऋषि अपनी पत्नियों समेत रहते थे और पुनीत आरण्यकों में ऐसी सन्तान उत्पन्न करते थे जो ऋषि परम्परा के अपेक्षाकृत और भी अच्छी तरह आगे बढ़ा सके। व्यास, वशिष्ठ, शुकदेव, परशुराम, शृंगी, अत्रि, भरद्वाज, याज्ञवलक्य आदि अधिकाँश ऋषि अपने ऋषि माता-पिताओं से ही उत्पन्न हुए थे। उनमें से भी अधिकाँश ने संतानोत्पादन किया।
वासनात्मक उद्देश्य के साथ जुड़ी हुई वर्तमान सन्तानोत्पादन प्रक्रिया अपने मूल प्रयोजन जैसी ही घिनौनी संतान उत्पन्न कर सकती है। यदि विशुद्ध लोक मंडल के लिए श्रेष्ठतम अनुदान प्रस्तुत करने की दृष्टि से उसे सम्पन्न किया जाए और उसके लिए दीर्घकालीन तप साधना द्वारा प्रजनन तत्व को परिष्कृत किया जाय तो वह उद्देश्य सहज ही पूरा हो सकता है जिसके लिए संसार का विचारशील वर्ग इतना व्यग्र है और औंधे सीधे उपायों की उलट-पुलट कर रहा है।
एक राजा को धातु उद्योग का विकास करने में बड़ा उत्साह था। उसने धातुकारों से कहा वे कलात्मक वस्तुएं बनायें यदि न बिकेंगी तो राज्यकोष में उन्हें खरीद लिया जायगा।
इस घोषणा से उत्साहित होकर अनेक धातु शिल्पी तरह-तरह की कलात्मक वस्तुएं बनाने लगे। एक शिल्पी ने नौ ग्रहों की नौ सुन्दर मूर्तियाँ बनाईं। इनमें से आठ को तो लोगों ने खरीद लिया पर शनि देवता को किसी ने नहीं खरीदा। भला अपने घर में दरिद्र और संकट के देवता को कौन स्थान देता।
शिल्पी राजदरबार में पहुँचा। उसने अपनी कठिनाई बताई। राजा भी एक बार शनि को खरीदने पर उत्पन्न होने वाले संकट से डरा, पर सोच-विचार के बाद में अपने वचन का पालन करने की दृष्टि से उसे खरीद ही लिया।
इसी रात राजा ने भयंकर सपना देखा। एक-एक करके धन, यश, बल, पराक्रम, सफलता के देवता आये और कहने लगे या तो शनि देवता को निकाल दो नहीं तो हम लोग चले जायेंगे।
राजा असमंजस में पड़ गया। वह शनि देव की स्थापना अपने संग्रहालय में विधिवत् करा चुका था। हटा देने पर वचन पालन की अवज्ञा होती थी। कुछ सोचने के बाद राजा ने उन सब को विदाई दे दी और कहा-मैं अपने दिये वचन की रक्षा करूंगा और कर्तव्य पालन से किसी भी कारण पीछे नहीं हटूँगा। आप लोग यदि जाना चाहें तो प्रसन्नता पूर्वक चले जाएं।
प्रातःकाल राजा उठा तो सारी परिस्थितियाँ बदली हुई थीं। धन, यश, बल, पराक्रम सभी कुछ तेजी से विदा होने लगा शनि देवता की स्थापना का दुष्परिणाम सामने था दरबारियों ने भी उसे हटाने के पक्ष में सलाह दी, पर राजा यही कहता रहा वचन का पालन और कर्त्तव्य का निर्वाह हर कीमत पर किया जाना चाहिए।
संकट बढ़ता ही गया और अपने अन्तिम चरण तक पहुँच गया। राजा वनवास जाने की तैयारी करने लगा। तभी एक रात्रि को वे सभी देवता पुनः उपस्थित हो गये और कहने लगे अब हम आपके यहाँ रहने के लिए वापिस आ गये। चिन्ता छोड़ें। जो कुछ गया है वह सब कुछ जल्दी ही वापिस आ जायगा।
राजा ने उस वापसी का कारण पूछा तो उन सब का सम्मिलित उत्तर एक ही था-कर्तव्य पालन की परीक्षा में उत्तीर्ण व्यक्ति के यहाँ हमें विवश होकर रहना ही पड़ता है।
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आज सारा विश्व भौतिकता के प्रवाह में बह रहा है। मनुष्य के बड़प्पन का मापदण्ड धन-ऐश्वर्य माना जा रहा है। ‘सर्व गुणाः कांचनमाश्रयन्ते’ की मान्यता ने लोगों के हृदय में स्थान बना लिया है। धनवान व्यक्ति को ही हर स्थान पर सम्मान पाते देखा जाता है। समाज के इस गलत दृष्टिकोण का दुष्परिणाम भयंकर रूप में हमारे सामने है। हर व्यक्ति की एकमात्र आकाँक्षा धन कमाने की है। मनुष्य अपनी ईमानदारी की कमाई से सन्तुष्ट नहीं है, कम से कम समय में अमीर बन जाने के उपाय सोचा जाता है। लोग जुआ खेलते हैं, चोरी-डकैती करते हैं रिश्वत, धोखा, बेईमानी, ठगी, काला बाजार, मिलावट, झूठ, फरेब शोषण आदि ऐसा कौन सा अनैतिक कार्य है जो मनुष्य धन कमाने के लिए न करता हो।
अन्यायोपार्जित धन विष के समान होता है। जो अनैतिक और गन्दे तरीकों से धन कमाते हैं, उनके चारों ओर विष ही विष है। बुराई से बुराई ही बढ़ती है। अनैतिक रीति से जोड़ी गई सम्पत्ति, विलासिता, फैशन परस्ती, नशेबाजी, कुटिल-कुटेवों, नाना विधि-आडम्बर बनाने आदि दुर्व्यसनों में व्यय होती है। पास की कमाई पाप कर्मों में ही खर्च होती है। विलास प्रसाधनों एवं दुर्व्यसनों की जिन्हें कुटेव पड़ जाती है वह उनके जीवन की एक आवश्यकता बन जाती है। उनकी ये अपराधी प्रवृत्तियाँ अनेक प्रकार का दुष्कर्म कराती हैं। ऐसे व्यक्ति के जीवन में सुख और शान्ति दुर्लभ हो जाती है। ये दुष्प्रवृत्तियां उसका सर्वनाश करके छोड़ती हैं।
पैसा जीवन के लिए एक साधन मात्र है, उससे रचनात्मक शक्ति है। उसकी उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। सदुद्देश्यों की पूर्ति में उसके द्वारा बहुत सहायता भी मिलती है। उचित रीति से कमाया हुआ और सत्कार्यों के लिए उचित मात्रा में व्यय किया हुआ धन ही मनुष्य को सुख, संतोष और आन्तरिक शान्ति प्रदान करता है। हमारे यहाँ अनैतिक साधनों को सदा हेय माना गया है। वेद का मत है--
न दुष्टुती मर्त्यो विन्दते वसु,न स्रेधन्तं रयिर्नशत। सुशक्रिरिन्मधवन तुभ्यमावते, देष्णं यत् पार्ये दिवि।।
-ऋग्वेद 7।32।21
अर्थात् धन,पद,श्री और समृद्धि की प्राप्ति न्याय पूर्ण आचरण से होती है। अधर्म से कमाया धन कमाने वाले के स्वास्थ्य, सन्तोष और सम्मान के लिए विनाशकारी होता है।
परिश्रम और ईमानदारी के साथ अधिक उपार्जन करना निन्दनीय नहीं। किन्तु उस धन का विलास, दुर्व्यसनों एवं निकृष्ट स्वार्थों में खर्च करना अथवा धन को रोक कर, दाब कर रख लेना दोनों कार्य अनुचित हैं।
कुछ लोगों में कंजूसी की दुष्प्रवृत्ति होती है। ईश्वर ने मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप ही साधन उत्पन्न किये हैं। एक स्थान पर धन का अधिक एकत्र हो जाना दूसरे स्थान पर अभाव उत्पन्न कर देगा। समतल भूमि पर एक स्थान को ऊँचा करने के लिए दूसरे स्थान पर गड्ढा करना पड़ता है। कुछ व्यक्ति सम्पत्ति साधनों को एकत्र करके बैठ जाएंगे अथवा आवश्यक से अधिक उपभोग करेंगे तो स्वाभाविक रूप से दूसरों को साधन रहित, निर्धनता का जीवन व्यतीत करना पड़ेगा।
धन का संचय एक सामाजिक अभिशाप है। चोर, डाकुओं की उत्पत्ति का भी यही मूलभूत कारण है। संग्रही व्यक्ति भले ही अमीर या पूँजी-पति के नाम से पुकारे जायँ वस्तुतः वे समाज के सामने एक बुरा उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। जहाँ पैसा रुकता है वहाँ सड़ता है, उसकी सड़ांध चारों ओर फैलती है। लक्ष्मी को चंचलता कहा गया है। जहाँ वह रुकी वहीं अनेक दुष्प्रवृत्तियों का सृजन कर डालेगी। जिस प्रकार बहता हुआ नीर सदैव निर्मल और पवित्र रहता है, तालाब या पोखर के रूप में रुके हुए जल में अनेकों विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं यही गति धन-सम्पत्ति की होती है।
ईमानदारी और परिश्रम द्वारा उपार्जित धन से मनुष्य सादगी से रहता हुआ सुख शान्ति का जीवनयापन कर सकता है। ऐसा कहा जाता है कि बिना शोषण का मार्ग अपनाये तथा बिना अनैतिक कमाई किये कोई व्यक्ति अमीर या पूँजीपति नहीं बन सकता। उपन्यास सम्राट् मुंशी प्रेमचन्द ने एक स्थान पर लिखा है--
“जब मैं किसी व्यक्ति को धन सम्पन्न देखता हूँ तो उसके सारे गुण मेरी दृष्टि से तिरोहित हो जाते हैं, वह मेरी नजरों से गिर जाता है। क्योंकि उसने एक ऐसी समाज व्यवस्था को अपना रखा है जो शोषण पर आधारित है।”
महात्मा ईशा ने भी एक स्थान पर कहा है--
“सुई के छेद से ऊँट निकल सकता है, किन्तु धनवान व्यक्ति को स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं मिल सकता।”
इसमें दो राय नहीं हो सकतीं- धन और ऐश्वर्य की लालसा में निमग्न व्यक्तियों को अनीति का मार्ग अपनाना ही पड़ता है। धन प्राप्ति की इस अन्धी घुड़दौड़ में हमारा नैतिक स्तर चकनाचूर हो रहा है। धन का संग्रह लोगों में असंतोष पैदा कर रहा है। साम्यवाद और समाजवाद का प्रभाव विश्व में बढ़ता जा रहा है। पूँजीपतियों ने अपने धन का उपयोग समय रहते लोक-कल्याण के लिए न किया तो अन्त में धन के साथ-साथ उनका विनाश भी सुनिश्चित है।
पापी का धन पाप कर्म में ही लगता है। पवित्र कार्यों में उसका उपयोग होना कठिन है। अपने नाम के लिए, यश प्रशंसा के लिए, धर्म का आडम्बर करते हुए तथा धर्म कार्यों में पैसा खर्च करते हुए कुछ अमीरों को अवश्य देखा जा सकता है। किन्तु इस धर्म निष्ठा के पीछे उनका कुत्सित स्वार्थ ही होता है।
हम स्वयं अनीति द्वारा धन उपार्जित न करें, साथ ही साथ दूसरों द्वारा अन्यायोपार्जित धन के उपभोग से भी बचें। लोभवश किसी की अनीति में सम्मिलित न हों। इस संबंध में महाभारत का एक प्रसंग है--
“महाभारत के युद्ध की समाप्ति के बाद शरशैया पर शयन करते हुए भीष्म-पितामह पाण्डवों को सदुपदेश दे रहे थे। तभी द्रौपदी ने पितामह से प्रश्न कर दिया-- “पूज्य पितामह आज आप बड़े ज्ञान-पूर्ण उपदेश कर रहे हैं, लेकिन जिस समय मेरा चीरहरण हो रहा था- कौरवों की सभा में उस समय आप भी विद्यमान थे। इस अन्याय के विरुद्ध आपने एक शब्द भी नहीं कहा था।” उस समय आपका यह ज्ञान कहाँ चला गया था?’ भीष्म-पितामह ने उत्तर दिया- ‘पुत्री ठीक कहती हो! उस समय मैं दुर्योधन की अनीति-उपार्जित कमाई का उपभोग कर रहा था, जिसके कारण मेरी बुद्धि भी नष्ट हो गई थी। दुर्योधन के धान्य द्वारा निर्मित रक्त का अब एक कण भी शरीर में शेष नहीं है। अतः अब मेरा मन पूर्ण पवित्र है और सदुपदेश करने की स्थिति में हूँ।’
सच्ची और स्थायी समृद्धि के लिए यह आवश्यक है कि नीति पूर्ण ईमानदारी के श्रम से अपनी जीविका उपार्जित करें। उसका भी पूरा-पूरा उपयोग अपने व अपने परिवार के स्वार्थ में ही न कर डालें, बल्कि उसका एक अंश लोक-कल्याण के कार्यों में भी अवश्य व्यय करते रहें। बिना दान के अर्जित सम्पत्ति का उपभोग करना भी पाप माना जाता है। साधारण नागरिक की तरह सादगी से जीवनयापन करते हुए शेष धन को परोपकार में व्यय करना धर्म है।
धन में पवित्रता का समावेश आवश्यक है। विष्णु भगवान की पत्नी देवी लक्ष्मी धन-शक्ति का प्रतीक मानी गई हैं। ‘रमन्तां पुण्या लक्ष्मीः’ पवित्रता से अर्जित सम्पत्ति ही स्थिर रहती है।
अनीति की कमाई, अनावश्यक व्यय, मनुष्य के घृणित एवं पतित होने के सबसे बड़े प्रमाण है। धर्मात्मा की परीक्षा यह है कि वह परिश्रम की कमाई पर संतोष करे, एक-एक पाई का सदुपयोग करते हुए शेष धन को लोक कल्याण के हेतु अर्जित करता रहे।
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अपनों से अपनी बात-
नव-युग का पुण्य प्रभात अब निकट है। अन्धकार की सघन निशा का अंत और प्रकाश का व्यापक विस्तार अगले ही क्षणों होने जा रहा है। बुझते दीपक की अन्तिम चमक की तरह-विकृतियाँ अपने अवमान काल में हिचकियाँ ले रही हैं। अरुणोदय से कुछ क्षण पूर्व भी अन्धकार अधिक गहरा होता है। हममें से किसी को निराश होने की आवश्यकता नहीं। मानव जाति का उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित है। आवश्यकता इस बात की है कि परिवर्तन की इस पुष्प वेला में- सेतुबन्ध में संलग्न रीछ, बानरों की तरह और गोवर्धन उठाने में लाठियों का सहारा देने वाले ग्वाल-बालों की तरह हम अपने कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों का अधिक निष्ठा और तत्परता के साथ पालन करने में संलग्न हों। समय की पुकार और युद्ध की गुहार हमें अनसुनी नहीं करनी चाहिए। अपने स्वल्प साधनों को लेकर ही नव-युग की आरती उतारने के लिए हमें अग्रिम पंक्ति में खड़ा होना चाहिए।
युग परिवर्तन के लिए जन-मानस का परिष्कार अनिवार्य रूप से आवश्यक है। बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में घुसी हुई प्रतिगामिता को निरस्त करना आवश्यक है ताकि भूमि की अच्छी जुताई हो जाने पर न्याय और विवेक के बीज बोना और सतयुग की फसल काटना संभव हो सके। अखण्ड-ज्योति का आलोक इसी प्रयास में संलग्न है। लक्ष्य की दिशा में हमारे सुनिश्चित कदम सुनियोजित क्रम से एक के बाद उठते चले जा रहे हैं।
साहित्य सृजन,संगठन,प्रचार एवं रचनात्मक कार्य-क्रमों का सूत्र संचालन युग-निर्माण योजना द्वारा हो रहा है। नव-युग सृजन शिल्पियों के प्रशिक्षण की आवश्यकता पूरी करने का कार्य करने में शान्ति-कुंज अपने ढंग से संलग्न है। उपनिषद् काल में जिस प्रयोजन के लिए आरण्यक गुरुकुल अपनी एकान्त प्रक्रिया में संलग्न रहते थे उसी उद्देश्य के लिए भगवती भागीरथी के तट पर-शिव स्वरूप हिमालय के अंचल तले-इस आश्रम का निर्माण किया गया था। प्रसन्नता की बात है कि विगत चार वर्षों से चल रही उसकी प्रशिक्षण प्रक्रिया आश्चर्यजनक रीति से सफल हुई है।
चरित्र-निष्ठा और समाज-निष्ठा की प्रखरता उत्पन्न करना शान्ति-कुंज के प्रशिक्षण का लक्ष्य है। शिक्षण शैली को अध्यात्म एवं धर्म के आधार पर खड़ी करना इसलिए आवश्यक था कि इसके बिना अन्तःकरण की गहराई में उच्चस्तरीय आस्थाओं का प्रतिष्ठापन अन्य किसी उपाय से सम्भव नहीं हो सकता।
प्रशिक्षण का शिक्षार्थियों पर पड़ने वाला प्रभाव उनके गुण,कर्म, स्वभाव में उत्साहवर्धक परिवर्तन उत्पन्न करता रहा है। यह शिक्षार्थी लौटकर अपने परिवर्तन परिष्कार का प्रभावोत्पादक परिचय देते रहे हैं। उससे अन्य लोगों की उत्कण्ठा इसका लाभ लेने के लिए सहज ही उमड़ती रही है। किसी शिक्षण की सार्थकता इसी आधार पर आँकी भी जा सकती है। शान्ति-कुंज का आरण्यक इस दृष्टि से खरा सिद्ध हुआ है और वहाँ आकर शिक्षा प्राप्त करने वालों की संख्या निरन्तर बढ़ती ही गई है। यह उचित भी था और आवश्यक भी। नव-युग के अवतरण का महान उद्देश्य पूरा कर सकने के लिए सृजन शिल्पियों की बड़ी संख्या और उच्चस्थिति की अनिवार्य आवश्यकता है। शान्ति-कुँज ने इसी दिशा में जो प्रयास किया है उससे यह आशा बँधती है कि इस युग की इस माँग को भी बहुत हद तक पूरा कर सकने का उपयुक्त आधार खड़ा हो गया है।
स्वल्प समय में-अधिक लोगों को लाभ मिल सके; इसके लिए सत्र शृंखला आरम्भ की गई। यद्यपि ऐसे प्रशिक्षण के लिए कई वर्ष के पाठ्यक्रम वाले सुनियोजित विद्यालयों की आवश्यकता है फिर भी “नौ मन तेल होने पर रानी का नाच होने” की प्रतीक्षा नहीं की जा सकती थी। अपने स्वल्प साधनों से ही जो सम्भव था आरम्भ कर दिया गया। अखण्ड-ज्योति परिवार के सभी परिजन स्वभावतः इस अभिनव प्रशिक्षण प्रक्रिया का लाभ लेना चाहते हैं, इस स्थान और व्यवस्था की न्यूनता को ध्यान में रखते हुए सीमित शिक्षार्थी बुलाने और उनके स्वल्प कालीन सत्र चलाकर अधिक लोगों को लाभ देने की नीति अपनाई गई। यही क्रम अब तक चल रहा है। प्रशिक्षण की उपयोगिता ने शिक्षार्थियों की संख्या में निरन्तर वृद्धि की है। बढ़ती हुई माँग को पूरा करने के लिए यथासम्भव स्थान एवं साधनों का भी विस्तार किया गया है। शान्ति-कुँज की जमीन का चप्पा-चप्पा उपयोग में ले लिया गया है। आरम्भ में जितने छात्र बुलाये जाते थे अब उससे प्रायः तीन-चार गुने शिक्षार्थी लाभ उठाने लगे हैं। गत वर्ष की तुलना में ही यह विस्तार प्रायः दूना हो गया है।
अगले वानप्रस्थ सत्रों में भाग लेने के इच्छुकों की संख्या भी इस वर्ष की तुलना में दूनी है।
परामर्श सत्र मार्च, अप्रैल, मई, जून इन चार महीनों के थे। वे अब पूरे होने जा रहे हैं। इनमें सम्मिलित होने के सभी आवेदनकर्त्ताओं को स्थान न दिया जा सका। स्थान सीमित होने से अधिक व्यक्तियों के निवास, भोजन एवं पाठ्य-क्रम चलाने की व्यवस्था बन नहीं सकती। जितना स्थान है उतनों को ही आने की स्वीकृति दी जाती है। यों मन तो अपना भी रहता है कि अधिक स्वजनों के साथ स्नेह सद्भाव के आदान-प्रदान का आनन्ददायक अवसर मिलता रहे। एक लाख परिजनों में से अधिकाँश की आन्तरिक उत्कंठा यह रहती है कि वर्ष में कम से कम एक बार तो किसी न किसी बहाने मिलना हो ही जाया करे। दोनों ओर की प्रगाढ़ आत्मीयता का समाधान और उस मिलन के सत्परिणामों का निश्चय, दिन-दिन यह दबाव बढ़ाता जा रहा है कि अधिक लोगों के लिए यह सुविधा सम्पन्न हो सके।
आवश्यकता एवं उपयोगिता यह कहती है कि स्थान एवं साधनों का विस्तार होना चाहिए ताकि युग की अति महत्वपूर्ण माँग को पूरा कर सकने में समर्थ इस आरण्यक शिक्षा-पद्धति का अधिक विस्तार सम्भव हो सके। यदि वैसा बन पड़े तो निश्चय ही हम सब मिलकर व्यक्ति, परिवार और समाज की अभिनव रचना में अधिक योगदान दे सकने में समर्थ हो सकेंगे।
जो कार्य दूसरों के हाथ में है उसकी प्रतीक्षा में बैठे रहने की अपेक्षा वर्तमान साधनों से अधिक से अधिक क्या हो सकता है-क्या किया जा सकता है यही विचार करना अपने लिए उपयुक्त था। सो इसके लिए समय में कटौती करने तथा वर्तमान स्थान में ही अधिक ठूँस-ठाँस करने की बात सोची गई है और अगले वर्ष का कार्यक्रम बना लिया गया है। अगले वर्ष से मतलब ईसवी, सन् अथवा विक्रमी सम्वत् से नहीं, वरन् वर्षा के अन्त से आरम्भ होने वाले और वर्षा शुरू होने पर बन्द हो जाने वाले प्रचार वर्ष से है। यह जुलाई से आरम्भ होकर जून में समाप्त होता है। सरकारी स्कूलों का शिक्षण क्रम भी प्रायः इसी समय से आरम्भ होता है।
(2) वानप्रस्थ सत्र फिलहाल सितम्बर में ही घोषित किया जा रहा है। आवश्यकतानुसार शीत ऋतु के किसी महीने में एक और की भी व्यवस्था की जा सकती है। यह एक-एक महीने के ही होंगे। (1) तुलसी कृत रामचरित मानस और बाल्मीक रामायण के आधार पर राम-कथा। (2) भागवत् और महाभारत के आधार पर कृष्ण-कथा। (3) यज्ञ, पर्व, संस्कार आदि कर्मकाण्डों का अभ्यास (4) लोकसेवी के लिए उपयुक्त दृष्टिकोण एवं आचरण के निर्धारण का मार्ग-दर्शन (5) सामयिक समस्याओं के स्वरूप एवं समाधान का विस्तृत ज्ञान (6) भाषण कला। यह छह विषय वानप्रस्थ शिक्षा में रहते हैं। अधिक श्रम कराते हुए एक महीने में ही यह पाठ्य-क्रम पूरा कराया जाता है।
(3) महिला सत्र अब तीन महीने के नहीं होंगे। परिवार निर्माण और महिला जागरण की क्षमता उत्पन्न करने वाले संक्षिप्त और विस्तृत पाठ्य-क्रम पुरुष शिक्षार्थियों के साथ-साथ ही चला करेंगे। वे अपने संरक्षकों के साथ-साथ आया करें और उन्हें के साथ लौट जाया करेंगी। मात्र शिक्षित महिलाओं को ही प्रवेश मिला करेगा। यदा कदा अशिक्षित महिलाएं भी अपने घर वालों के साथ किन्हीं शिविरों में आ जाया करती थीं, अब वह छूट बिलकुल बन्द कर दी गई है। ताकि पर्यटन, दर्शन आदि के उद्देश्य से आने वाली भीड़ को रोककर उस स्थान से उपयुक्त महिलाओं को कारगर शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल सके।
आगामी वर्ष पुरुषों के दस-दस दिवसीय साधना सत्र चलेंगे। शिक्षित महिलाएं भी उतने समय के लिए संक्षिप्त महिला प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए आ सकती हैं। वानप्रस्थ सत्र एक महीने के होंगे। उस अवधि में भी अलग से एक महीने के महिला सत्र चला करेंगे। दस दिन वाले तथा एक महीने वाले सत्रों में पाठ्य-क्रम तो स्वभावतः न्यूनाधिक रहेगा, पर विषय एक जैसे ही रहेंगे। आत्म-निर्माण, परिवार-निर्माण एवं समाज-निर्माण की दृष्टि से वे क्या और कैसे कर सकती हैं यह महिला प्रशिक्षण पाठ्य-क्रम का मूल आधार है। साथ-साथ उन्हें भाषण कला का अभ्यास भी कराया जायेगा ताकि घर और बाहर अपने विचार उपयुक्त अवसर पर ठीक तरह व्यक्त कर सकें।
(4) पुरुषों के सत्र दस-दस दिन के लगेंगे। इनमें प्रत्येक शिक्षार्थी को 24 सहस्र गायत्री पुरश्चरण, नित्य यज्ञ तथा अन्यान्य आध्यात्मिक साधनाएं कराई जायेंगी। गंगा तट, हिमालय की गोद आश्रम का प्राणवान वातावरण-दिव्य संरक्षण यह चारों ही अतिरिक्त आधार मिल जाने से घर पर की जाने वाली साधना की तुलना में अत्यधिक उच्चस्तर के सत्परिणाम मिल सकते हैं। आत्म निर्माण, परिवार-निर्माण और समाज-निर्माण की व्यावहारिक शिक्षा भी प्रेरणाप्रद प्रवचनों एवं परामर्शों के रूप में मिलती रहेगी। भाषण कला का अभ्यास कराना इस बार के सत्रों में विशेष रूप से जोड़ दिया गया है। साधना परामर्श के साथ प्रवचन कला के समन्वय से यह सत्र पूर्व सत्रों की अपेक्षा भी अधिक उपयोगी सिद्ध होंगे।
दस दिवसीय साधना सत्र प्रत्येक महीने तीन होंगे (1) पहली तारीख से दस तक (2) ग्यारह से बीस तक (3) इक्कीस से तीस तक। शारीरिक और मानसिक दृष्टि से स्वस्थ अनुशासन प्रिय और सज्जनोचित स्वभाव वाले लोगों को ही इनमें आने के लिए आवेदन करने चाहिएं। छपे हुए आवेदन पत्र-जवाबी लिफाफा भेजकर मँगा लेने चाहिएं और उन्हें भेजकर स्वीकृति प्राप्त होने के उपरान्त ही आने की तैयारी करनी चाहिए। बिना स्वीकृति आ पहुँचने वालों को प्रवेश न मिल सकेगा।
सितम्बर 76 में वानप्रस्थ सत्र होने के कारण उस महीने में दस दिवसीय सत्र बन्द रहेंगे। शेष महीनों में वे लगातार चलते रहेंगे। जुलाई और अगस्त में आने वालों को जल्दी ही स्वीकृतियाँ प्राप्त कर लेनी चाहिएं।
जिन्हें अपने उपयोगी साधना सत्रों में पहुँच सकना सम्भव हो सके उन्हें अपने लिए यथा सम्भव जल्दी ही स्थान सुरक्षित करा लेने चाहिएं।
कुछ कार्य अपने-अपने स्थानों पर कराते हुए जन-मानस परिष्कार के महान अभियान में अपने-अपने ढंग से योगदान करते रहने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। इस प्रकार के कार्यों में कुछ इस प्रकार हैं-
(1) अंशदान- प्रति दिन एक घण्टा समय और दस पैसा निकालने का न्यूनतम अंश दान हम में से प्रत्येक को करना चाहिए और उसे अपने परिवार की परिपक्व सदस्यता की शर्त मानना चाहिए। स्व उपार्जित सम्पदा का प्रतीक ‘पैसा’ है और ईश्वर प्रदत्त विभूति ‘समय’ है। इन दोनों का अधिकाधिक भाग परमार्थ प्रयोजन में लगाते रहने में ही इस सुरदुर्लभ मानव जीवन की सार्थकता है। अस्तु उस लक्ष्य का स्मरण बनाये रहने के लिए यह न्यूनतम अनुदान हममें से प्रत्येक को नियमित रूप से प्रस्तुत करना चाहिए। आन्तरिक वर्चस्व की अंश वृद्धि के साथ-साथ यह अनुदान भी स्वभावतः बढ़ता है। पर उसे दैनिक अनिवार्य कर्म कर्त्तव्यों में प्रमुखता देते हुए न्यूनतम राशि तो निकाली ही जाती रहनी चाहिए। यह राशि अपने संपर्क क्षेत्र में जन मानस के प्रसार कार्य के लिए ही खर्च की जानी चाहिए। अन्य किसी कार्य में उसका उपयोग नहीं होना चाहिए। शाखा संगठन इस समय और धन का उपयोग किस प्रकार किया जाय इसका मिल-जुल कर कार्यक्रम बना सकते हैं। इस सन्दर्भ में मई की अखण्ड-नीति के अपनों से अपनी बात स्तम्भ में विस्तार पूर्वक लिखा जा चुका है।
(2) तीर्थ यात्रा धर्म परम्परा के पुनर्जीवन में हमारे कुछ दिन हर साल लगाने ही चाहिएं। घर-घर गाँव गाँव नव-युग का सन्देश सुनाने के लिए हमें बादलों की तरह निकलना चाहिए और अपनी अमृत वर्षा से संस्कृति की हरीतिमा उत्पन्न करने के लिए प्रबल प्रयास करना चाहिए। इस सन्दर्भ में अप्रैल की अखण्ड-ज्योति के सम्पादकीय लेख में बहुत कुछ कहा जा चुका है। उस प्रयोजन में हममें से प्रत्येक को कुछ न कुछ करते ही रहना चाहिए। जन मानस के परिष्कार के लिए जन सम्पर्क अतीव आवश्यक है। इसी के लिए प्रबुद्ध लोगों को तीर्थ यात्रा की पुण्य प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। इस दिशा में दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन जैसे छोटे प्रेरणाप्रद कार्य तो कोई भी कर सकता है। साप्ताहिक छुट्टी का दिन अपने-अपने ढंग से लगाते रहने की योजना बनाई जा सके तो उतने से भी बहुत कुछ हो सकता है।
(3) महिला जागरण अभियान अपने समय का सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसके पीछे आधी जनसंख्या को प्रखर बनाने और उसके पुरुषार्थ से सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खोलने का उद्देश्य सन्निहित है। मानवी अधिकारों से वंचित नारी के साथ किये जाने वाले अनाचार का इसमें प्रायश्चित्त है। परिवारों में स्वर्गीय वातावरण करने तथा रत्न-रत्नों की खदान को पुनः प्रभावी परिणाम उत्पन्न कर सकने में समर्थ बनाने की दृष्टि से नारी जागरण नितान्त आवश्यक है। भावी युग अध्यात्म प्रधान होगा। उसका नेतृत्व ईश्वर प्रदत्त सेवा, समर्पण, उदारता संयम जैसे सद्गुणों से सम्पन्न नारी ही कर सकेगी। इन सभी दृष्टियों से नारी जागरण अपने युग की महती आवश्यकता है। इस दिशा में हम सबको उत्साह पूर्वक प्रयत्न करने चाहिएं।
अपने घरों की और सम्पर्क क्षेत्र की महिलाओं को आगे करके हमें स्थानीय महिला संगठन खड़े करने चाहिएं और उनके साप्ताहिक सत्संगों का सिलसिला जब तक ठीक तरह चल न पड़े तब तक उस प्रयास में पूरी-पूरी दिलचस्पी लेकर उसे अपने पैरों खड़ा करना चाहिए। घर-घर परिवार गोष्ठियाँ चल पड़ें इसके लिए जन्म दिनों, संस्कारों एवं कथा कीर्तनों का प्रचलन करना चाहिए, इन छोटे आयोजनों के सहारे महिला जागरण का प्रकाश घर-घर फैल सकता है। परिवारों में स्वर्गीय वातावरण उत्पन्न करने की हलचलें आरम्भ हो सकती हैं और सामूहिक प्रयास से नारी का पिछड़ापन दूर करने वाले अनेकानेक रचनात्मक प्रयास आरम्भ हो सकते हैं।
जहाँ कुछ अधिक उत्साह हो वहाँ अगले वर्ष एक महिला सम्मेलन आयोजित किया जाना चाहिए जिसमें शान्तिकुँज से देव कन्याओं का जत्था भेजा जा सके और उस पुण्य प्रयोजन के लिए उस क्षेत्र में उत्साह उभारा जा सके। अखण्ड ज्योति परिवार के सदस्यों की कन्याएं एक वर्षीय प्रशिक्षण में और महिलाएं दस दिवसीय अथवा एक महीने वाले सत्रों में पहुँच सकें ऐसा प्रयास होना चाहिए। यहाँ से प्रकाश लेकर लौटी हुई कन्याएँ एवं महिलाएं पुराने ढर्रे को बदल कर नये वातावरण का सृजन करने में संलग्न हो सकेंगी, ऐसी आशा सहज ही की जा सकती है।
यह खुली सचाई है कि अखण्ड ज्योति पत्रिका के माध्यम से ही युग-निर्माण परिवार का गठन, सूत्र संचालन और हलचलों का अभिवर्धन सम्भव हो सका है। महिला जागरण अभियान अपने प्रयासों में अति महत्वपूर्ण है। इसे देशव्यापी और विश्वव्यापी होना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि उस आन्दोलन का सूत्र संचालन करने वाली “महिला जागृति अभियान” मासिक पत्रिका की सदस्य संख्या बढ़ाई जाए। इसका प्रभाव क्षेत्र जितना बढ़ेगा उतनी ही अभियान को गति मिलेगी। शान्ति-कुँज हरिद्वार से निकलने वाली इस हिन्दी मासिक पत्रिका का वार्षिक मूल्य 6) है। 1 जुलाई से उसका नया वर्ष आरम्भ होता है। अखण्ड-ज्योति की तरह परिजन उसे भी महत्व दें और सदस्य बनें बनाएं तो निश्चय ही उस प्रयास की दूनी चौगुनी प्रगति अगले ही दिनों दृष्टि गोचर हो सकेगी।
(4) साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष में एक लाख साधकों को प्रकाश देने का संकल्प किया गया था वह संख्या पूरी हो चुकी अस्तु गायत्री जयन्ती 7 जून 76 से वह पंजीकरण बन्द कर दिया गया है। जो साधक बने हैं उनसे अपेक्षा की गई है कि अपने-अपने सम्पर्क क्षेत्र में उसी शृंखला के अन्तर्गत अनुसाधक बनायें। जहाँ बीस साधक हो सकें वहां उनका एक साधना मण्डल बना लें। एक कार्यवाहक चुन लें और प्रयत्न यह करें कि उसकी चार दिवसीय साधना सम्मेलन सम्भव हो सके। स्पष्ट है कि सम्मेलनों की उपयोगिता संगठन को सुदृढ़ बनाने और उत्साहवर्धक गतिविधियाँ उत्पन्न करने की दृष्टि से असंदिग्ध है, साधनों, मण्डलों और अपने-अपने क्षेत्र में उपासना, उपचार और साधना व्यवहार की उभय-पक्षीय प्रक्रिया आरम्भ करके प्रखर अध्यात्म का पुनर्निर्माण करने में कटिबद्ध होना चाहिए।
स्वर्ण-जयन्ती साधना शृंखला के सदस्यों को यह भी प्रयत्न करना चाहिए कि वे एक गायत्री पुरश्चरण शान्ति कुँज के अति प्रभावी वातावरण से सम्पन्न करने का अवसर प्राप्त करेंगे। दस दिवसीय सत्रों की व्यवस्था इसी दृष्टि से की गई है कि न केवल सान्निध्य, सम्पर्क, प्रकाश परामर्श का वरन् साधना द्वारा आत्मबलवर्धन का प्रत्यक्ष लाभ भी इस आधार पर प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके। भाषण कला की सारभूत शिक्षा प्राप्त करना भी इन सत्रों में बन पड़ता है यह इनका दुहरा लाभ है।
युग परिवर्तन जैसे महान् प्रयोजन के लिए बड़ी संख्या में चरित्रनिष्ठा, लोकनिष्ठा और क्रिया-कुशल सृजन शिल्पियों को ढालने और विकसित करने की नितान्त आवश्यकता है। शान्ति-कुँज का आरण्यक अपने स्वल्प साधनों के पिछले चार वर्षों से जो प्रशिक्षण योजना चला रहा है उसके विकास विस्तार की आवश्यकता को पूरा करना अब अनिवार्य हो गया है। उसके लिए नई जमीन, नई इमारत और नये साधन जुटाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। यह नये साधन जुटाने के लिए नये सिरे से-नया उत्साह जगाना और अधिक उदार सहयोग की अपेक्षा, अपने ही आत्मीयजनों से की जा सकती है। अन्यत्र तो किसे समय की माँग समझाई जाय और किसके आगे हाथ पसारा जाय। अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्य क्रमशः अपने को अधिक प्रखर स्तर के सृजन शिल्पी बनाते चलें। तभी वे अपने विशेष अवतरण का ईश्वरीय उद्देश्य पूरा कर सकेंगे। व्यक्तिगत भौतिक महत्वाकाँक्षाओं में कटौती किये बिना युग की पुकार को पूरा कर सकने के उपयुक्त अनुदान दे सकना सम्भव ही न हो सकेगा। हमें साहसपूर्वक अपनी कृपणता से जूझना चाहिए और युगीय उत्तरदायित्वों के निर्वाह में अपने चिन्तन कर्तृत्व एवं साधनों की भावभरी श्रद्धाँजलि प्रस्तुत करनी चाहिए।
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सृष्टि के हर अंग पर सम दृष्टि है पालक पिता की। हो रही अनुदान - वर्षा, है कमी बस पात्रता की ॥
रात-दिन सुरभित पवन जब एक-सा बहता रहा है, कर झरोखे बन्द तब भी कष्ट जो सहता रहा है,
कह रहा वह- ‘वायु हमको शुद्ध अब मिलती नहीं है, दे सके जो शान्ति, अब ऐसी हवा चलती नहीं है,
ठीक करलें शीघ्र ऐसी भूल अपनी मान्यता की। हो रही अनुदान-वर्षा, है कमी बस पात्रता की॥
सूर्य की किरणें चलीं जब विश्व का तम दूर करने, चेतना देकर नयी, आलस्य का अभिशाप हरने,
खिल उठे पंकज, कुमुद ने किन्तु अपना मुख छिपाया, अन्ध-कोटर-प्रेमियों को ज्योति का वैभव न भाया
जो छिपे उनके लिए क्या त्रुटि अरुण की दिव्यता की। हो रही अनुदान - वर्षा, है कमी बस पात्रता की ॥
हो चुकी जल-वृष्टि इतनी, भर गये सरिता-सरोवर, भर गये वे क्षेत्र, जिनमें थी ग्रहण-क्षमता कहीं पर,
प्यास निज सामर्थ्य के अनुसार जीवों ने बुझायी, पर अधोमुख पात्र में लघु बूँद भी आने न पायी,
पूर्ति कैसे हो सकेगी, इस अभागी रिक्तता की। हो रही अनुदान-वर्षा, है कमी बस पात्रता की ॥
चाहती है चिन्मयी माँ वक्ष का पीयूष देकर, पुष्ट कर दे लाड़लों को, प्राण में देवत्व भरकर,
किन्तु आकर्षक खिलौने छोड़ना शिशु को न भाता, बस इसी से जुड़ न पाता शक्ति से अक्षुण्ण नाता,
कामना के कण्टकों ने राह रोकी पूर्णता की। हो रही अनुदान-वर्षा, है कभी बस पात्रता की ॥
-डॉ. हरगोविन्द सिंह
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*समाप्त*