आत्मा की परमात्मा से पुकार

“मैं पतंगे की तरह हूँ। इष्टदेव दीपक की तरह। अनन्त प्रेम के कारण द्वैत को समाप्त कर अद्वैत की उपलब्धि के लिए− प्रियतम के साथ एकात्म होता हूँ। जिस प्रकार पतंगा दीपक पर आत्म−समर्पण करता है, अपनी सत्ता को मिटाकर प्रकाश पुञ्ज में लीन होता है। उसी प्रकार मैं अपना अस्तित्व, अहंकार को मिटाकर ब्रह्म में−गायत्री तप तत्त्व में विलीन होता हूँ।”

“दीपक की ज्योति एक यज्ञ है और मैं उसका हविष्य। अपना अस्तित्व इस यज्ञाग्नि में होम कर मैं स्वयं परम−पवित्र तेज पुञ्ज हो रहा हूँ।”

“अपनी अहंता, ममता और द्विधा मिटा देने के बाद मैं आत्मा की परिधि से उठकर परमात्म सत्ता के रूप में विकसित होता हूँ और उसी स्तर की व्यापकता, मैं धारण करता हूँ।”

“मैं अपनी समस्त श्रद्धा प्रभु को समर्पण करता हूँ। बदले में वे उतना ज्ञान, विवेक, प्रकाश एवं आनन्द मेरे कण−कण में भर देते हैं। मुझे अपने समान बना लेते हैं। वैसी ही रीति−नीति अपनाने की प्रेरणा एवं तत्परता प्रदान करते हैं।”

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संकल्प के साथ शक्ति भी आवश्यक

संकल्प को सफलता की जननी कहा गया है। यह इच्छा शक्ति का ही सघन रूप है। इच्छा−आकाँक्षा ही घनीभूत होकर व्यक्ति को कर्ममार्ग पर अग्रसर करती है और उसे अपने अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रेरित करती है। किसी भाप से चलने वाली रेलगाड़ी को पटरी पर दौड़ाने के लिए भाप आवश्यक है। यद्यपि उसके साथ चालक की इच्छा, आकाँक्षा और नियन्त्रण दक्षता भी आवश्यक है। चालक की कुशलता और दक्षता को इच्छा शक्ति का प्रतिरूप कहें तो अकेले रेलगाड़ी और चालक का होना ही पर्याप्त नहीं है। उसके लिए वाष्प से उत्पन्न की गई शक्ति जिसके कारण कि रेल के पहियों में गति आती है−का होना भी अति आवश्यक है।

यह सच है कि संकल्प के अभाव में शक्ति का कोई महत्व और मूल्य नहीं है उसी प्रकार यह भी सच है कि शक्ति के अभाव में संकल्प भी पूरे नहीं होते। केवल संकल्प करते रहने वाला निरुद्यमी व्यक्ति उस आलसी व्यक्ति की तरह कहा जायगा जो अपने पास गिरे हुए आम को उठाकर मुँह में भी रखने की कोशिश नहीं करता और इच्छामात्र से आम का स्वाद ले लेने की आकाँक्षा करता है।

संकल्प के साथ शक्ति को संयुक्त करना एक कला है और इसमें बहुत थोड़े लोग ही पारंगत हो पाते हैं। इसका कारण है परिश्रम और प्रयासों के प्रति निरपेक्ष बने रहना। बहुत से लोग मानस शास्त्र के सिद्धान्त पढ़−पढ़कर यही विश्वास करने लगते हैं कि− हम जो कुछ भी चाहते हैं वह हार्दिक आकाँक्षा होने पर हमें स्वतः ही प्राप्त हो जायगा। जबकि सचाई यह है कि केवल वे ही इच्छायें पूरी होती हैं, जिनके साथ सशक्त प्रयास भी जुड़े हों। यहाँ शक्ति का अर्थ उद्देश्य के प्रति दृढ़ निष्ठा, उसे पूरा करने के लिए आवश्यक प्रयास, मार्ग में आने वाली कठिनाइयों और बाधाओं से कभी भी शक्ति नहीं बन पाते। उनके अनुसार मन के लड्डू भले ही तोड़े जाते रहें।

उत्साह में उस स्तर की अभिवृद्धि के लिए क्या किया जाना चाहिए? और इस स्तर की अभिवृद्धि का क्या मापदण्ड है। लक्ष्य के प्रति ईमानदारी, भविष्य के प्रति आशापूर्ण दृष्टिकोण और मार्ग में आने वाली सभी कठिनाइयों से जूझने का साहस। संक्षेप में उद्यम, आशा और साहस−ये तीन ही वे प्राथमिक कसौटियाँ हैं जिनके आधार पर अपने उत्साह को परखा जा सकता है और संकल्प के साथ शक्ति को संयुक्त किया जा सकता है।

निष्कर्षतः सफलता की प्राप्ति के लिए दृढ़ संकल्प के साथ उद्यम, आशा और साहस का होना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। अन्यथा खयाली पुलाव के अतिरिक्त और कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।

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शब्द शक्ति का परिष्कृत उपयोग मंत्र साधना में

शब्द केवल जानकारी ही नहीं और भी बहुत कुछ देता है। खाद और पानी के बाद अब पौधों के लिये मधुर ध्वनि प्रवाह भी एक उपयोगी खुराक मानी जाने लगी। यूगोस्लेविया में फसल को सुविकसित बनाने के लिये खेतों पर अमुक स्तर की वाद्य लहरियाँ ध्वनि विस्तार यन्त्रों से प्रवाहित की गई और उसका परिणाम उत्साहवर्धक पाया गया। हालैण्ड के पशु पालकों ने गायें दुहते समय संगीत बजाने का क्रम चलाया और अधिक दूध पाया। निद्रा उत्तेजना और विकास की विविध प्रक्रियाएँ वृक्ष और वनस्पतियों पर देखी गईं।

पशुओं की श्रमशीलता, प्रजनन शक्ति, बलिष्ठता एवं दूध देने की क्षमता को संगीत ने बढ़ाया। मक्का पर संगीत के कतिपय प्रयोग करके उनकी वृद्धि से सफलता प्राप्त करने की दृष्टि से एक अमेरिकी कृषक जार्जस्मिथ ने अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की।

मन्त्र विद्या में दो तत्वों का समावेश है। 1. शब्द शक्ति का सूक्ष्म चेतना विज्ञान के आधार पर उपयोग 2. व्यक्ति की आन्तरिक पवित्रता एवं भावोल्लास से उत्पन्न दिव्य क्षमता का समन्वय। इन दोनों के मिलन से एक तीसरी ऐसी अद्भुत शक्ति उत्पन्न होती है जो कितने ही बड़े भौतिक साधनों से उपलब्ध नहीं हो सकती।

मन्त्रों में अक्षरों के क्रम का तथा उनके उच्चारण की विशेष विधि−व्यवस्था का ही अधिक महत्व है। कण्ठ, तालु, दाँत, होठ, मूर्धा आदि जिन स्थानों से शब्दोच्चारण होता है उनका सीधा सम्बन्ध मानव−शरीर के सूक्ष्म संस्थानों से है। षट्चक्र, उपात्मक एवं दिव्य वादियों, ग्रन्थियों का सूक्ष्म शरीर संस्थान अपने आप में अद्भुत है। इन दिव्य अंगों के साथ हमारे मुख यन्त्र के तार जुड़े हुए हैं। जिस प्रकार टाइपराइटर की चाबियाँ दबाते चलने से ऊपर अक्षर टाइप होते चलते हैं, ठीक इसी प्रकार मुख के उच्चारण किये हुए विशेष वैज्ञानिक प्रक्रिया के साथ विनिर्मित मन्त्र गुम्फन का सीधा प्रभाव उपरोक्त संस्थानों पर पड़ता है और वहाँ तत्काल एक अतिरिक्त शक्ति तरंगों का प्रवाह चल पड़ता है। यह प्रवाह मन्त्र विज्ञानी को स्वयं लाभान्वित करता है। उसकी प्रसुप्त क्षमताओं को जगाता है। भीतर गूँजते हुए वे मन्त्र कम्पन यही काम करते हैं और जब वे बाहर निकलते हैं तो वातावरण को प्रभावित करते हैं। सूक्ष्म जगत में अभीष्ट परिस्थितियों की संभावनाओं का सृजन करते हैं और यदि किसी व्यक्ति विशेष को प्रभावित करना है तो उस पर भी असर डालते हैं। मन्त्र विद्या इन तीनों प्रयोजनों को पूरा करती है।

राडार हमारे शरीर में भी विद्यमान है और वह भी यन्त्रों द्वारा बने हुए राडार की तरह काम करता है। उसे जागृत, सशक्त और सक्रिय बनाने के लिये मन्त्र विद्या का उपयोग किया जाता है। शब्द विद्या के तथ्यों को ध्यान में रखते हुए मन्त्रों के अक्षरों का चयन होता है। मन्त्र रचना कविता या शिक्षा नहीं है। शिक्षा भी उनमें ही सकती है पर वह गौण है। कविता की दृष्टि से भी मन्त्रों का महत्व गौण है। प्रसिद्ध गायत्री मन्त्र में 23 ही अक्षर हैं। जबकि छन्द शास्त्र के अनुसार उसमें 24 होने चाहिये। इस दृष्टि से उसे साहित्य कसौटी पर दोषयुक्त भी ठहराया जा सकता है। स्थिर शक्ति तत्व का जहाँ तक सम्बन्ध है वह सौ टंच खरा है। उनकी सामर्थ्य का कोई पारावार नहीं।

साधारणतया ध्वनि चारों दिशाओं में फैलती है पर मन्त्रों में शब्द इस प्रकार गुंथित होते हैं कि उसकी ध्वनि तरंगें विशेष प्रकार की हो जाती हैं। गायत्री मन्त्र की ध्वनि तरंगें तार के छल्ले जैसी ऊपर उठती हैं और यह सूक्ष्म अन्तराल के परमाणुओं के माध्यम से सूर्य तक पहुँचती हैं और जब यही ध्वनि सूर्य के अन्तराल में प्रति ध्वनित होकर लौटती हैं तो अपने साथ प्रकाश अणुओं की (गर्मी, प्रकाश व विद्युत सहित) फीज जप करने वाले के शरीर में उतारती चली जाती हैं। साधक उन अणुओं से शरीर ही नहीं मन और आत्मा की शक्तियों का विकास करता चला जाता है और कई बार वह लाभ प्राप्त करता है जो साँसारिक प्रयत्नों द्वारा कभी भी संभव न हो सके।

शब्द की शक्ति पर जितना गहरा चिन्तन किया जाय उतनी ही उसकी गरिमा और विलक्षणता स्पष्ट होती चली जाती है। बादलों की गरज से ऊँची इमारतें फट जाती हैं। आज की याँत्रिक सभ्यता जितना शोर उत्पन्न कर रही हैं उसके दुष्परिणामों से मानवजाति को पूरी न हो सकने वाली क्षति उठानी पड़ेगी। इस तथ्य से समस्त संसार चिन्तित है। अतिस्वन और जेट विमान आकाश में जितनी आवाज करते हैं उससे उत्पन्न होने वाली हानिकारक प्रतिक्रिया को सर्वत्र समझा जा रहा है और इन विशालकाय द्रुतगामी वायुयानों को कोलाहल रहित बनाने का प्रयत्न किया जा रहा है।

शब्द की सामर्थ्य सभी भौतिक शक्तियों से बढ़कर सूक्ष्म और विभेदन क्षमता वाली है। इस बात की निश्चित जानकारी होने के बाद ही मन्त्र विद्या का विकास भारतीय तत्वदर्शियों ने किया। यों हम जो कुछ बोलते हैं उसका प्रभाव व्यक्तिगत और समष्टिगत रूप से सारे ब्रह्माण्ड पर पड़ता है, तालाब के जल में फेंके गये कंपन की लहरें भी दूर तक जाती हैं, उसी प्रकार हमारे मुख से निकाला हुआ प्रत्येक शब्द आकाश के सूक्ष्म परमाणुओं में कंपन उत्पन्न करता है, उस कम्पन से लोगों में अदृश्य प्रेरणाएँ जागृत होती हैं, हमारे मस्तिष्क में विचार न जाने कहाँ से आते हैं, हम समझ नहीं पाते, पर मन्त्र विद जानते हैं कि मस्तिष्क में विचारों की उपज कोई आकस्मिक घटना नहीं वरन् शक्ति के परतों में आदिकाल से एकत्रित सूक्ष्म कंपन है, जो मस्तिष्क के ज्ञानकोषों से टकराकर विचार के रूप में प्रकट हो उठते हैं, तथापि अपने मस्तिष्क में एक तरह के विचारों की लगातार धारा को पकड़ने या प्रवाहित करने की क्षमता है।

एक ही धारा में मनोगति के द्वारा एक सौ विचारधारा निरन्तर प्रवाहित करके सारे ब्रह्माण्ड के विचार जगत में क्रान्ति उत्पन्न की जा सकती है, उसके लिए यह आवश्यक नहीं कि उन विचारों को वाणी या सम्भाषण के द्वारा व्यक्त ही किया जाये।

‘उच्चारण’ और ‘स्वर’ में यही अन्तर है कि उच्चारण कंठ, होठ, जीभ, तालु, दाँतों की संचालन प्रक्रिया से निकलता है और वह विचारों का आदान−प्रदान कर सकने भर में समर्थ होता है। पर स्वर अन्तःकरण से निकलता है। उसमें व्यक्तित्व, दृष्टिकोण और भाव समुच्चय भी ओत−प्रोत रहता है। इसलिये मन्त्र को स्वर कहा गया है। वेद पाठ में उदात्त अनुदात्त स्वरित की उच्चारण प्रक्रिया का शुद्ध होना ही इसी ओर संकेत करता है। साधना क्षेत्र में स्वर का अर्थ वाक्शक्ति के माध्यम से किये जाने वाले सशक्त जप अनुष्ठान से ही है।

मन्त्र की जो कुछ महिमा है उसका आधार वाणी को ‘वाक्’ के रूप में परिणत कर देना है। इसके लिए मन−वचन और कर्म में ऐसी उत्कृष्टता का समन्वय करना पड़ता है कि वाणी को दग्ध करने वाला कोई कारण शेष न रह जाय। इतना करने के उपरान्त उसके द्वारा जपा हुआ मन्त्र सहज ही सिद्ध होता है और उच्चारण किया हुआ शब्द असंदिग्ध रूप से सफल होता है। यदि वाणी दूषित, कलुषित, दग्ध स्थिति में पड़ी रहे तो उसके द्वारा जप किये हुए मन्त्र भी जल जायेंगे और बहुत संख्या में बहुत समय तक जप−स्तवन, पाठ आदि करते रहते पर भी अभीष्ट फल न मिलेगा।

परिष्कृत जिह्वा में वह शक्ति रहती है जिसके बल पर किसी भी भाषा का−कोई भी मन्त्र प्रचण्ड और प्रभावशाली हो उठता है। उसके द्वारा उच्चारित शब्द मनुष्यों के अन्तस्तल के असीम अन्तरिक्ष को प्रभावित किये बिना नहीं रहता। ऐसी परिष्कृत वाणी−वाक्−को अध्यात्म का प्राण कह सकते हैं। उसे साधक कामधेनु एवं तपस्वी का ब्रह्मास्त्र कहने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। इसी की परिमार्जित जिह्वा को ‘‘सरस्वती’’ कहते हैं। साधना क्षेत्र में प्रवेश करने वाले व्यक्ति को उस मन्त्रशक्ति की- दीक्षा की- महत्ता समझनी चाहिए। मन्त्र की माता उसे ही मानना चाहिये, सिद्धियों का उद्गम स्थल, भगवान को द्रवित एवं प्रभावित कर सकने का माध्यम उसे ही मानना चाहिए।

मन्त्र सिद्धि में चार तथ्य सम्मिश्रित रूप से काम करते हैं- (1) ध्वनि विज्ञान के आधार पर विनिर्मित शब्द शृंखला का चयन और उसका विधिवत उच्चारण (2) साधक की संयम द्वारा निग्रहीत प्राण शक्ति और मानसिक एकाग्रता का संयुक्त समावेश (3) उपासना प्रयोग में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ उपकरणों की भौतिक किन्तु सूक्ष्म शक्ति (4) भावना-प्रवाह, श्रद्धा, विश्वास एवं उच्चस्तरीय लक्ष्य दृष्टिकोण। इन चारों का जहाँ जितने अंश में समावेश होगा वहाँ उतने ही अनुपात से मन्त्र शक्ति का प्रतिफल एवं चमत्कार दिखाई पड़ेगा। इन तथ्यों की जहाँ उपेक्षा की जा रही होगी जल्दी-जल्दी वरदान पाने की धक लग रही होगी वहाँ निराशा एवं असफलता ही हाथ लगेगी।

ईथर तत्व के परमाणु अत्यन्त सूक्ष्म और अति संवेदनशील है। वे एक सैकिंड में 34 अरब तक कम्पन उत्पन्न कर सकते हैं। जब यह कम्पन चरम सीमा पर पहुँचते हैं तो उनसे एक अखण्ड प्रकाश की किरणें निकलने लगती हैं।

इन किरणों में अद्भुत गतिशीलता होती है, वे एक सैकिण्ड में प्रायः एक करोड़ मील चल लेती है। वायु के कम्पन नष्ट हो जाते हैं, पर ईथर के कम्पनों का कभी नाश नहीं होता। वे सदा अमर रहते हैं। जैसे-जैसे वे पुराने होते जाते हैं वैसे-वैसे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की सतह पर जाकर स्थिर हो जाते हैं। जहाँ वे बलिष्ठ होने पर अपने समान धर्मी अन्य कम्पनों को अपनी ओर खींचते हैं अथवा दुर्बल होने पर दूसरों की ओर खिंच जाते हैं। इस प्रकार जीर्ण होने पर भी एक नई चेतना को संघ शक्ति के आधार पर जन्म देते हैं और ऐसे चुम्बकत्व का सृजन करते हैं जो उन शब्दों के साथ जुड़ी हुई चेतनाओं से मनुष्यों को प्रभावित कर सकें। यहाँ भी सहधर्मिता का नियम लागू होता है। जिन मनुष्यों के मस्तिष्क की स्थिति उन प्राचीन किन्तु संगठित शब्द कम्पन शक्ति से मिलती-जुलती होगी। असमानता की स्थिति में कोई विचार या शब्द प्रभाव किसी को प्रभावित नहीं कर सकता केवल अपनी उपस्थिति का परिचय दे सकता है।

यों शरीर भी एक छोटा किन्तु पूरा विश्व है। इसमें सभी तीर्थों के बीज पीठ विद्यमान हैं। इनमें से कोई एक अथवा एक साथ अनेक पीठों को जागृत एवं प्रखर बनाया जा सकता है। कोई-कोई व्यक्तित्व मूर्तिमान शक्ति पीठ होते हैं। यही सिद्ध पुरुष मानवी चेतना में घुसा हुआ विजातीय तत्व है उसे निकालने, हटाने में थोड़ा-सा ही प्रबल प्रयत्न सफल हो सकता है। साधना इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए है। साधना समर में यदि आत्म-तत्व बाजी ले गया तो फिर पौराणिक समुद्र मंथन में प्राप्त 14 रत्नों से भी अधिक मूल्य की अगणित दैवी सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं। उन्हें पाकर मनुष्य आप्त काम हो जाता है फिर और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। साधनाकाल दैवी आसुरी संघर्षों की, तुमुल युद्ध की- अवधि है। इसमें पूरे कौशल, चातुर्य एवं साहस को प्रयोग करना पड़ता है। यह युद्ध उपेक्षा पूर्व- ज्यों-त्यों करके- ढीले-पोले मन से बेगार भुगतने की तरह नहीं लड़ा जा सकता है। उसमें पूरे मनोयोग एवं प्रबल पराक्रम की आवश्यकता पड़ती है।

साधना जब साधक का सर्वप्रिय विषय बन जाय- उसमें निरत रहने को स्वयमेव मन चले- उन क्षणों को घटाने की नहीं बढ़ाने की ललक रहे- उपासना से उठने पर शरीर में स्फूर्ति और मन में सरसता लगे तो समझना चाहिए कि परिपक्वता आ गई और इसका श्रेयस्कर सत्परिणाम अत्यन्त सन्निकट है। आरम्भ में यह स्थिति नकली रूप में बनानी पड़ती है। थोड़े समय में वह स्थिति स्वाभाविक बन जाती है। बलपूर्वक मार-धाड़ और धड़ पकड़ द्वारा बलात्कार पूर्वक उच्चस्तरीय मनःस्थिति बनाने के काल को ही साधना काल कहते हैं, जब वह स्थिति सहज बनी रहने लगे तो समझना चाहिए कि सिद्धावस्था प्राप्त हो गई।

आत्मा का परमात्मा सत्ता के साथ घनिष्ठ- एकाकार-तादात्म्य तन्मय होने की स्थिति को साधना की प्रखरता कहते हैं। जब दोनों का सघन मिलन होता है तो आत्म-विभोर स्थिति को समाधि कहा जाता है। आवश्यक नहीं कि उस स्थिति में योगनिद्रा अथवा मूर्छा ही आवे। ज्ञान साधना में स्थिति प्रज्ञ की- कर्म साधना में अनासक्त कर्त्तव्य-परायण की- भक्ति साधना में व्यापक स्नेह सौजन्य की- स्थिति प्राप्त होती है। इससे मूर्छा तो नहीं आती पर आत्म-ज्ञान का आलोक एवं सन्तोष समाधान का अनवरत अनुभव होता है। साधक अपने को भगवान में और भगवान को अपने में एकाकार देखता है। दोनों की इच्छाएँ एवं क्रियाएँ एक ही स्तर की होती हैं।

इन्द्रिय संयम और मानसिक एकाग्रता की दोनों धारायें मिलकर मानवी विद्युत शक्ति का निर्माण करती है। बिजली ठण्डे और गरम दो तारों के द्वारा प्रवाहित होती है। इसी प्रकार शरीर और मन की शक्तियों को वासना और तृष्णा में बिखरने न देने से वह सामर्थ्य जमा होती है जिसे प्राण शक्ति अथवा ओजस कहा जाता है। योगशास्त्र में साधना क्षेत्र के छात्रों को यह नियम बरतने का शारीरिक और मानसिक संयम बरतने की प्राथमिक तैयारी करने के लिए कहा गया है। यदि इन दोनों बड़े छेदों में होकर मानवी विद्युत नष्ट होती रहे तो फिर मन्त्र रूपी इंजन को चलाने के लिए तेल, कोयला, ईंधन- कहाँ से आयेगा। मात्र शब्दोच्चारण का नाम ही तो मन्त्र साधना नहीं है।

उपार्जन काल में सात्विक आहार-विहार, ब्रह्मचर्य, मौन, एकान्त सेवन, परिमार्जित दिनचर्या, मनन-चिंतन द्वारा साधना को सींचा जाता है। उसके उपरान्त उसे सस्ती प्रशंसा लूटने के लिए दिखाये जाने वाले चमत्कारों से बचाया जाता है। सिद्धियों को लोभ, मोह के उथले प्रयोजन पूरे करने में भी खर्च किया जा सकता है और अपने को तथा दूसरों को आत्म-कल्याण की दिशा में प्रेरित करने के लिए भी उसका उपयोग हो सकता है। स्वल्प श्रम में अधिक भौतिक सफलतायें पाना कर्म विज्ञान के विपरीत है। उसके लिए यदि मन्त्र शक्ति का प्रयोग किया जायगा तो यह देर तक टिक न सकेगी और उसी खिलवाड़ में नष्ट हो जायगी। हाँ यदि आत्म-कल्याण के लिए उसका प्रयोग होगा तो उससे उसमें और भी तीव्रता आयेगी जैसे कि चाकू को पत्थर पर रगड़ने से उसकी धार तेज होती है और जंग छूटकर चमक आती है।

मन्त्र सिद्ध के लिए साधक के शरीर को पोषण देने वाली उसका रक्त और ओजस बनाने वाली वस्तुओं का विशेष महत्व है। आहार से शरीर और विहार से मन परिपुष्ट होता है। पदार्थों में परसंचालित शक्ति है जिसे स्वसंचालित शक्ति के सहारे गतिशील किया जा सकता है। कोयला, तेल और पानी में भाप बनाने की शक्ति है, पर वह आग एवं प्रयोक्ता की स्वसंचालित शक्ति के सहारे ही प्रकट हो सकती है। पदार्थों की शक्ति को भी साधना काल में प्रयोग किया जाता है। अनेक विधि निषेध एवं वस्तु प्रयोग इसी दृष्टि से बने हैं। किस मन्त्र की सिद्धि के लिए किन पदार्थों से हवन किया जाय। आहार में क्या वस्तुएँ अयुक्त की जायँ। पूजा के उपकरणों में किस स्तर को प्रधानता दी जाय। आदि की विधियाँ- परसंचालित शक्ति को स्वसंचालित शक्ति का साथ देने के लिए उभारने के लिए है। इंजन में भाप बनाने और उसे पहिये घुमाने में लगाने की प्रक्रिया इसी प्रकार सम्पन्न होती है।

हृदय को शिव और जिह्वा को शक्ति कहते हैं। हृदय प्राण और जिह्वा को रयि है। हृदय को अग्नि, जिह्वा को सोम कहते हैं। दोनों का समन्वय धन और ऋण विद्युत धाराओं के मिलने से जो शक्ति प्रवाह उत्पन्न करता है, वही मन्त्र के चमत्कार रूप में देखा जा सकता है।

वाणी से उपासना करना पर्याप्त नहीं, उसे ‘वाक्’ बनाकर ही इस योग्य बनाया जा सकता है कि अध्यात्म पथ पर बढ़ते हुए साधक को कुछ कहने लायक सफलता मिल सके। आयुर्वेद में सोना, चाँदी, ताँबा, राँगा, अभ्रक, पारद आदि की भस्म बनाकर उनके सेवन का विधान है। विषों का भी बड़ा लाभ बताया गया है पर वह सम्भव तभी होता है जब उन विषों को विधान पूर्वक शुद्ध किया जाय। वाणी एक मूल पदार्थ है। शोधित होने पर वह अमृत बन जाती है और विकृत होने पर विष का काम करती है। शोधित वाणी को ही ‘वाक्’ कहा गया है।

मन्त्र की शक्ति का विकास जप से होता है। जितनी अधिक घिसाई-पिसाई की जाती है उतनी ही पदार्थ की शक्ति उभरती है। ढेले को तोड़ते-तोड़ते उसे अणु की स्थिति में ले जाया जाय तो वह अणु- ढेले की तुलना में अत्यधिक सामर्थ्यवान होगा। घोटने और पीसने की प्रक्रिया बहुत समय चलते रहने पर ही आयुर्वेदिक दवायें गुणकारी होती है। बार-बार घिसने से गर्मी पैदा होती है। बार-बार रगड़ने से चमक उत्पन्न होती है। इस तथ्य को हर कोई जानता है। मन्त्र की शक्ति उसके क्रमबद्ध रूप से बहुत समय तक जप करने से उभरती है। अनुष्ठान एवं पुरश्चरण विज्ञान का यही रहस्य है।

मन्त्र का प्रत्यक्ष रूप ध्वनि है। ध्वनि भी क्रमबद्ध-लयबद्ध और वृत्ताकार एक क्रम से निरन्तर एक ही शब्द विन्यास का उच्चारण किया जाता रहे तो उसका एक गति चक्र बन जाता है। तब शब्द तरंगें सीधी चलने की अपेक्षा वृत्ताकार घूमने लगती हैं। रस्सी में पत्थर का टुकड़ा बाँधकर उसे तेजी से चारों ओर घुमाया जाय तो उसके दो परिणाम होंगे एक यह कि वह एक गोल घेरा जैसा दीखेगा। रस्सी और ढेले का एक स्थानीय स्वरूप बदलकर गतिशील चक्र के रूप में बदल जाना एक दृश्य चमत्कार है। दूसरा परिणाम यह होगा कि उस वृत्ताकार घुमाव से एक असाधारण शक्ति उत्पन्न होगी। इस तेज घूमते हुए पत्थर के छोटे टुकड़े से किसी पर प्रहार किया जाय तो उसकी जान ले सकता है। इसी प्रकार यदि उसे फेंक दिया जाय तो तीर की तरह सनसनाता हुआ बहुत दूर निकल जायगा। मन्त्र जप से यही होता है। कुछ शब्दों को एक रस, एक स्वर, एक लय के अनुसार बार-बार दुहराते रहने से उत्पन्न हुई ध्वनि तरंगें- सीधी या साधारण नहीं रह जातीं। वृत्ताकार उनका घुमाया जाना अन्तरंग पिण्ड में तथा बहिरंग ब्रह्माण्ड में एक असाधारण शक्ति प्रवाह उत्पन्न करता है। उसके फल-स्वरूप उत्पन्न हुए परिणामों को मन्त्र का चमत्कार कहा जा सकता है।


रात्रि की निस्तब्धता (kahani)

रात्रि की निस्तब्धता को चीरते हुए एक सन्त अपने प्रवास पर शान्तिपूर्वक चले जा रहे थे कि रास्ते में एक कुत्ता मिला और उन्हें देखकर बेतरह भौंकने लगा।

विचार मग्न साधु रुके और उस कुत्ते से बोले- ‘‘मूर्ख अकारण ही क्यों भौंकता है? तेरे इस भौंकने से सोने वाले जागते हैं- पथिकों की यात्रा अवरुद्ध होती है और तू तिरस्कार का भाजन बनता है।’’

कुत्ता सन्त के आक्षेप से सहमत न हो सका। उसने नम्रता पूर्वक उत्तर दिया- ‘‘देव! मेरा प्रयोजन उससे भिन्न है जैसा कि आप सोचते हैं। रात में भौंकने से गृहस्वामी जागरूक रहते हैं और चोरों से उनकी क्षति नहीं होती। राह में इसलिए पड़ा रहता हूँ कि किसी सन्त का इधर से निकलना हो तो उनकी चरण रज में लोटकर मेरा उद्धार हो जाय, साधुओं की विचित्र वेश-भूषा को देखकर मैं अधिक क्रोध पूर्वक इसलिए चिल्लाता हूँ कि आप लोग विचित्र वेश बनाकर अपनी श्रेष्ठता की विज्ञप्ति करने की अपेक्षा यदि साधारण नागरिक बनकर रहते और साधु आचरण का परिचय देते तो क्या बुरा था?

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भावना आनन्द और प्रवीण्य

स्वामी विवेकानन्द एक निर्माणाधीन मन्दिर के पास से गुजर रहे थे। घटना उस समय की है जब अन्तर्राष्ट्रीय जगत में वे न तो इतनी प्रखरता से उभरे थे और न ही उन्होंने विश्व को भारत की आध्यात्मिक सुधा वितरित करने के लिए आवश्यक तपोबल अर्जित किया था। रामकृष्ण परमहंस के बाद परिव्रज्या ही उनकी चर्या थी।

मन्दिर के सामने से गुजरते समय उनके मन में न जाने क्या स्फुरणा हुई कि उन्होंने निर्मित हो रहे मन्दिर के सीमा क्षेत्र में प्रवेश किया। ढेरों मजदूर, राज, कारीगर, मिस्त्री और बढ़ई वहाँ काम कर रहे थे। न जाने क्या सोच कर एक ओर बैठे काम कर रहे मजदूर के पास जाकर उन्होंने पूछा- ‘भाई क्या कर रहे हो’

‘देखते नहीं हो। पत्थर तोड़ रहा हूँ’- मजदूर ने कहा। यद्यपि स्वामीजी ने बड़ी विनम्रता से वह प्रश्न किया था और उनकी वाणी में माधुर्य भी था परन्तु इतना तिक्त प्रत्युत्तर पाकर उन्हें लगा कि काम करने वाला तेजमिजाज है। यही नहीं वह किसी बात को ले कर दुखी है। तभी तो सीधी-सादी बात का इतना कड़वा उत्तर उसने दिया।

स्वामीजी कुछ और आगे बढ़े- दूसरे मजदूर के पास जाकर भी वही प्रश्न किया।

मजदूर ने जो उत्तर दिया वह पहले वाले जैसा तो नहीं था पर यह अवश्य लगता था कि उसे काम करने में कोई आनन्द नहीं आ रहा है। उसने कहा था- भैया! पेट के लिए यह काम कर रहा हूँ।

उसकी वाणी में विवशता की बोझिलता और अनुत्साह का फीकापन था। इन दोनों मजदूरों की चर्चा को बाद में किसी प्रसंग पर चर्चा करते हुए कहा था- ‘‘पहले वाले मजदूर के उत्तर में और दूसरे मजदूर के उत्तर में मुझे एक विशेष अन्तर दिखाई दिया। एक जहाँ जबरदस्ती लादी गयी मजदूरी की तरह काम कर रहा था तो दूसरा स्वतः की विवशता के कारण पत्थर तोड़ रहा था। परन्तु पहले की अपेक्षा दूसरा कम दुःखी, कम निराश और कम उद्विग्न दिखाई दे रहा था।

स्वामीजी एक और कार्यकर्मी के पास गये। वह बड़े उत्साह, शक्ति और सुघड़ता से पत्थर तोड़ रहा था। स्वामीजी ने उससे भी पूछा- ‘भाई यहाँ क्या हो रहा है और तुम क्या कर रहे हो?’

मजदूर ने बिना हाथ रोके स्वामीजी की ओर देखा। उसकी आँखों में आह्लाद की एक चमक और आनन्द की दीप्ति नाच रही थी। उसी भाव को व्यक्त करते हुए उसने धैर्य पूर्वक उत्तर दिया- ‘यहाँ भगवान का मन्दिर बन रहा है और मैं भी भगवान के मन्दिर को तैयार करने के लिए श्रम कर रहा हूँ।’

स्वामीजी ने एक प्रसंग में इस उत्तर देने वाले को अध्यात्म योगी के नाम से सम्बोधित करते हुए कहा- मैं अन्तिम व्यक्ति से बात-चीत करते हुए बड़ा प्रभावित हुआ और आनन्दित भी। हालांकि पहले दो भी वही काम कर रहे थे जो तीसरा कर रहा था, पर तीसरे व्यक्ति के उत्तर में एक गरिमा थी, एक आनन्द था, एक प्रवीणता थी। और उन सबका कारण था उस व्यक्ति की आध्यात्मिक भावना, जो उसे तीनों विशेषताओं से आप्लावित कर रही थी।’

वस्तुतः काम कोई भी हो लेकिन उसे करते समय कर्ता का जो दृष्टिकोण रहता है। वही उस कार्य को श्रेष्ठ और उत्कृष्ट बनाता है। सामान्य परिणाम और लाभ तो उसे मिलते ही हैं पर उत्कृष्ट भावनाओं के प्रसाद स्वरूप जो कुछ मिलता है, वह उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधनाओं के समतुल्य ही है कार्य के समय उत्कृष्ट दृष्टिकोण रखने वाले ही कर्मयोगी हैं और उन्हें ही कर्मयोग की सिद्धि होती है। कितना व्यावहारिक है अध्यात्म जो कार्य के अनन्त गुणा प्रसाद परिणाम उपस्थित करता है।

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गायत्री गान से सबका सब प्रकार कल्याण

शब्द का साधारण प्रभाव जानकारी देने तक सीमित रहता है। पैरों की चाप सुनकर अमुक प्राणी के आगमन का पता चल जाता है। बादलों की गड़-गड़ाहट, पत्तों की खड़-खड़ाहट, हवा की सन-सनाहट सुनकर बिना देखे भी मौसम का अनुमान लगा लिया जाता है। मुख की आवाज सुनकर यह पता चलता है कि यह शब्द किस प्राणी का है और वह कहाँ है? बात-चीत से घटनाओं, परिस्थितियों एवं समस्याओं की जानकारी मिलती है। सामान्यतया शब्दोच्चार जानकारी के आदान-प्रदान में प्रयुक्त होता है। स्कूलों में, कारखानों में, यात्राओं में, व्यवसाय में, कुटुम्ब में, मित्रों में प्रायः इसी प्रकार का वार्तालाप होता पाया जाता है।

शब्द की एक विशेष स्थिति है, जिसमें जानकारी के आदान-प्रदान की मस्तिष्कीय आवश्यकता तो कम पूरी होती है, पर उसमें अन्तरात्मा की भाव सम्वेदनाएँ पर्याप्त मात्रा में जुड़ी रहती हैं। ऐसे शब्दों को ‘गान’ कहते हैं। स्थूल शरीर हलचलें करता है और आवाज निकालता है। सूक्ष्म शरीर शब्द द्वारा जानकारियों का आदान-प्रदान करता है। कारण शरीर की सत्ता भाव परक है। जब अन्तःकरण बोलता है तो उसमें भावनाएँ भरी रहती हैं। ‘गान’ का यही स्वरूप है।

‘गान’ का प्रत्यक्ष स्वरूप गीत है। शब्दों को लयबद्ध करके गाया या गुन-गुनाया जाना- उसमें भावनात्मक मस्ती का जुड़ा रहना ‘गान’ है। इसे और भी अधिक सुसंस्कृत किया जाता है तो ताल स्वर आदि का समावेश हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसे छन्द नाम दे दिया जाता है। काव्य या कविता इसी लयबद्ध भाव प्रवाह को कहते हैं। उसे जब वाद्य यन्त्रों के साथ मिला दिया जात है तो संगीत बन जाता है।

वेदों की ऋचाएँ छन्द कही जाती हैं। मन्त्रों की शक्ति में शब्द गुंथन का असाधारण महत्व है। गायत्री मन्त्र को ही लें। उसका शब्दार्थ बहुत सामान्य-सा है। तेजरूप भगवान से सद्बुद्धि की याचना भर उसमें की गई है। इस अर्थ की बोधक अनेक कविताएँ प्रायः सभी भाषाओं में मौजूद हैं अथवा बन सकती हैं। इनका प्रभाव वह नहीं हो सकता जो गायत्री मन्त्र का है। कारण कि उन कविताओं शब्द विज्ञान और भाव विज्ञान का उतना अद्भुत समन्वय सम्भव नहीं है। सूक्ष्मदर्शी तत्व-वेत्ताओं की विशेष मनःस्थिति में ही ऐसे दिव्य अवतरण सम्भव होते हैं। इसलिए वेद मन्त्रों की संरचना को ‘अपौरुषेय’ कहा गया है।

गायत्री वह जो गाई जाने पर अपना चमत्कार प्रस्तुत करे। इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करने वाले अनेकों प्रमाण मौजूद हैं। यहाँ गायन का अथ संगीत से नहीं, वरन् यह है कि भावनापूर्वक- भावभरी मनःस्थिति में उसका उपासना क्रम चलना चाहिए। साधक के अन्तस् में मस्ती छाई रहनी चाहिए और बेगार भुगतने की तोता रटन्त की तरह नहीं, भाव तरंगों में लहराते हुए उसे गाया, गुन-गुनाया जाना चाहिए। जिह्वा का शब्दोच्चार मात्र तो बकवास कहलाता है। अन्य प्राणी, छोटे बच्चे अथवा अविकसित मस्तिष्क वाले प्रायः बेसिलसिले की बकझक करते रहते हैं। वाणी की प्रौढ़ता, सुविज्ञ मस्तिष्क की ज्ञान सम्पदा जुड़ जाने से बनती है। वह प्रखर भी होती है और प्रभावशाली है। इस उच्चारण से बोलने वाले का भी लाभ होता है और सुनने वाले का भी। इसके बाद दिव्य वाणी है जिसमें परिष्कृत व्यक्तित्व के साथ जुड़ी रहने वाली उच्चस्तरीय भाव सम्वेदना का समावेश होता है। ऋचाओं का यही स्तर है। उनकी विशेषता साम गान को निखरती है। उपासना प्रक्रिया में भी मन्त्रोच्चार के साथ श्रद्धा भरी अनन्य तन्मयता का समावेश होना चाहिए। ऐसा समावेश जिसमें क्रमबद्ध, लयबद्ध, स्वरबद्ध गुन-गुनाहट तो हो ही साथ ही इष्ट के साथ एकाकार होने की आकुलता भी हो। इसी को भक्ति भावना कहते हैं। मन्त्रों का वास्तविक लाभ इसी ‘गान’ मनःस्थिति में मिलता है।

‘गायत्री’ शब्द के अनेक अर्थ हैं। ‘गय’ प्राण को भी कहते हैं ‘गीत’ भी। गीता में भगवान ने ‘‘गायत्रीच्छन्दसामहम्’’ वाक्य में गायत्री छन्द को अपना रूप बताया है। यहाँ छन्द से तात्पर्य ‘गीत’ से है। यह मनोरंजन के लिए नहीं। दिव्य तन्मयता की भाव भरी लहरों में लहराने के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला ‘नाद-ब्रह्म’ है। यह ‘गान’ गायनकर्त्ता को ऐसी भाव भूमिका में उड़ा ले जाता है तो सर्वतोमुखी कल्याण का अनुदान दे सके। गाने वाले का त्राण करने वाली मन्त्र शक्ति को गायत्री कहा गया है। प्राण का त्राण करने वाली भी उसका एक अर्थ है जिस पर अन्यत्र चर्चा होगी यहाँ तो उसके उस स्वरूप पर विचार करना है जिसमें उसे ‘गाने वाला’ का त्राण करने वाली कहा गया है।

बसन्तः प्राणायनो गायत्री बासन्ती।

-यजु. 13।25

गायत्री वह है जो बसन्त में गाई जाती है और गाने वाले की रक्षा करती है।

गायन्ति त्वागायत्रिणोऽर्चन्त्यर्कमर्किणः।

-ऋग्वेद 1।10।1

गायत्री का गान करने वाले तेरे ही गुण गाते हैं। तेज के उपासक उसी से सूर्य की उपासना करते हैं।

यद्गायत्रे अधिगायत्र महितम्।

-ऋग्वेद 1।164।23

जिसका गायन करते हैं, उसे गायत्री कहते हैं।

यद् गायत तद् गायत्री।

-शत.

जिसे गाते हैं वह गायत्री।

गायन्तं त्रायतं इति गायत्री।

-गोपथ.

जो गाने वाले का त्राण करे वह गायत्री।

त्रायन्ती गायतः सर्वान् गायत्रीत्यभिधीयते।

-अहि. बु. स. 3।16

सभी गान करने वालों की रक्षा करती है इसे गायत्री कहते हैं।

तमेत देव गायत्रं साम गायन्न त्रायत।

यद् गायन्न त्रायत तद् गायत्र स्य गायत्रत्वम्।।

-जै. व्रा. 3।38।4

जो गायत्री का गान करता है, गायत्री उसकी रक्षा करती है।

गायत्री प्रोच्यते तस्यात् गायन्तं त्रायते यतः।

गायनात् त्रायते यस्मात् गायत्री तेन कथ्यते।

गायन करने वाले का त्राण-उद्धार करती है इसलिए इस महा शक्ति को गायत्री कहते हैं।

गायन्तं त्रायते यस्माद् गायत्री तिस्मृता बुधै।

-भारद्वाज स्मृति 6।146

अर्थात्- ‘‘गायन करने वाले का त्राण करने वाली होने से यह गायत्री कहलाती है।’’

गातार त्रायते यस्माद् गायत्री ते न गीयते।

-स्कन्द पुराण काशी खण्ड

‘‘गाने वाले की रक्षा करती है, इसी से इसको गायत्री कहा जाता है’’

गायत्री प्रोच्यते तस्मात् गायंतं त्रायते यतः।

गायनात् त्रायते यस्मात् गायत्री तेन कथ्यते।

गायन करने वाले के प्राणों का उद्धार करती है। जिसका गान करने से उत्कर्ष होता है, उसे गायत्री कहते हैं।

गायतो मुखाद् उदपतदिति गायत्री

-निरक्त 7।12

सबसे प्रथम गान करते हुए परमेश्वर के मुख से जो गीत निकला वही गायत्री है।

सर्वेषामेव वेदानां गुह्योपषिदां तथा।

सार भूता तु गायत्री निर्गता ब्रह्मणो मखम्।

सब वेदों और गुह्य उपनिषदों का सार रूप ब्रह्माजी के मुख से गायत्री मन्त्र प्रकट हुआ।

मन्त्र छन्द की दो विशेषताएँ हैं एक तो उसमें साधक की अन्तरात्मा के गहन मर्मस्थल से निकलने वाली दिव्य सम्वेदनाएँ घुली रहती हैं दूसरे विशिष्ट शब्द गुंथन के आधार पर रचे हुए मन्त्र जब गुन-गुनाये जाते हैं तो उनसे अलौकिक ध्वनि तरंगें निसृत होती है। इस दुहरे समन्वय से शब्द की अणु विस्फोट स्तर जैसी प्रचण्ड शक्ति का उद्भव होता है। इसका प्रभाव साधक के समूचे व्यक्तित्व पर छा जाता है और समीपवर्ती वातावरण के विशेष रूप में तथा दूरवर्ती वातावरण को सामान्य रूप में प्रभावित करता चला जाता है। इसी मन्त्र साधना से व्यष्टि और समष्टि को समान रूप से लाभ मिलता है।

मन्त्रों में अक्षरों का गुँथन स्वर शास्त्र की विशिष्ट प्रक्रिया के साथ सम्पन्न हुआ है। उनके उच्चारण में जो ध्वनि तरंगें निकलती हैं वे न केवल साधनकर्त्ता को वरन् समस्त वातावरण को प्रभावित करती हैं। किसी विशेष प्रयोजन के लिए भी उनका प्रयोग हो सकता है। जिस चूल्हें में आग जलाई जाती है वह गरम होता है। उसके निकट बैठने वाला शीत कष्ट से मुक्त होता है। चूल्हे के समीपवर्ती वातावरण में गर्मी आती है और फिर उस आग पर दाल पकाने जैसा कोई काम लेना हो तो वह भी पूरा होता है। मन्त्रानुष्ठान को चूल्हा जलाने की उपमा दी जा सकती है जिससे कई प्रयोजन एक साथ सिद्ध होते हैं।

सर्प को संगीत शास्त्र का ज्ञान नहीं होता और न वह उस वादन के साथ गाये जा रहे गीत का भाव समझता है इस पर भी स्वर लहरी मात्र से वह तरंगित हो उठता है। बहेलियों द्वारा बजाये हुये मधुर वादन पर मोहित होकर हिरन खड़े हो जाते हैं और उस सरसता पर मुग्ध होकर अपने तन की सुधि−सुधि गँवा बैठने से पकड़े जाते हैं। छोटे बच्चे तथा अन्य प्राणी जिन्हें संगीत के रहस्यों की जानकारियाँ नहीं हैं वे भी उन मधुर ध्वनि तरंगों पर प्रसन्नता व्यक्त करते देखे जाते हैं। यह स्वर लहरी अपने आप में अतीव उल्लास भरी होती है और अपनी अदृश्य क्षमता से प्राणधारियों में अद्भुत हलचल उत्पन्न करती है। यह भौतिक वाद्य यन्त्रों और उनके द्वारा निसृत कानों द्वारा सुनी जा सकने वाली संगीत ध्वनियों की बात हुई। मानव शरीर रूपी वाद्य यन्त्र अपने ढंग का अद्भुत है इसमें षट्चक्र और सप्तम सहस्रार कमल सात स्वर दिव्य संगीत के आधार हैं। इस वीणा का मध्य भाग मेरुदंड, ऊर्ध्व भाग सिर और नीचे का हिस्सा नितम्ब क्षेत्र है। नासिका द्वारा पहुँचने वाली वायु, इड़ा, पिंगला के रूप में दो उँगलियों के सहारे इससे जो दिव्य ध्वनियाँ प्रवाहित करती हैं उनका संगीत यदि सुना जा सके तो प्रतीत होगा कि नाद ब्रह्म के श्रवण का ब्रह्मानन्द कितना दिव्य एवं कितना आह्लादकारी है। इससे न केवल साधक वरन् सृष्टि का कण−कण गुँजित और प्रतिध्वनित होता है।

गायत्री मन्त्र तारवाद्य से निनादित जो स्वर लहरी उत्पन्न करता है उसे एक शब्द में अलौकिक ही कह सकते हैं। मेरुदंड लगे कोटि−कोटि तार जब झंकृत होते हैं और चक्र संस्थानों में जब अनाहत नादों का गुँजन होता है तो उसे नादयोग के साधनकर्त्ता सुनते−सुनते मन्त्र मुग्ध बनकर रह जाते हैं।

संगीत वाद्य यन्त्रों में स्वर सप्तक एक व्यवस्थित क्रम शृंखला से लगाये जाते हैं और अमुक ध्वनि बजाने के लिए उँगलियों का संचालन एक विशेष क्रम से किया जाता है ठीक वही प्रक्रिया शरीर में लगे सूक्ष्म शक्ति स्रोतों की मूर्छना जगाकर प्रखरता उत्पन्न करने के लिए कार्यान्वित की जाती है। गायत्री मन्त्र में अक्षर इसी क्रम से जुड़े हैं कि उनका उच्चारण सूक्ष्म शक्तियों के जागरण में आवश्यक गतिशीलता उत्पन्न कर सकें। उसका उच्चारण क्रम भी अपने आप में ऐसा अद्भुत है कि उससे उत्पन्न गतिशीलता एक नहीं अनेक दिव्य उत्पादनों के रूप में परिलक्षित हो सकती है।

जानुदघ्नं चिन्वीत प्रथमं चिन्वानो गायत्रिय वेमं लोकमभ्यारोहति नाभिदघ्नं चिन्वीत।

−तैं॰ स॰ 5। 6। 8

गायत्री का उच्चारण मुख से लेकर नाभि पर्यन्त अपना प्रभाव विस्तीर्ण करता है।

एकः शब्दः सम्यग् ज्ञातः सुष्टु प्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग् भवति। (श्रुति)

“शब्द के अर्थ का सम्यक् ज्ञान होने और उसका उचित रीति से प्रयोग करने से स्वर्गलोक और समस्त मनोरथों की पूर्ति होती है।”

शतपथ ब्राह्मण की उक्ति है−

शब्दो वै ब्रह्म।

अर्थात्−शब्द निश्चित रूप से ब्रह्म है।

तीक्ष्णेषवो ब्राह्मणा हेतिमन्तो, यामस्यन्ति शरव्या न सा मृषा। अनुहाय तपसा मन्युना चोत, दूरादेव भिन्दन्त्येनम्॥

−अथर्व 5। 18। 9

जीभ जिसकी प्रत्यंचा है उच्चारण किया हुआ शब्द जिसका बाण है। संयम जिसका वाणाग्र है, तप से जिसे तीक्ष्ण किया गया है, आत्मबल जिसका धनुष है, ऐसा ब्राह्मण अपने मन्त्र बल से समस्त देवद्रोही तत्वों को बेध डालता है।

श्रीमद् भागवत के छूटे स्कन्द के सोलहवें अध्याय में आता है−

“शब्द ब्रह्म परब्रह्म मागेभ्या शाश्वती तनु”

अर्थात् ‘शब्द ब्रह्म’ और ‘परब्रह्म’ यह दोनों ही भगवान के नित्य और चिन्मय शरीर हैं।

ब्राह्मण ग्रन्थों में, समस्त लोकों में संव्याप्त और उसका निर्धारण नियन्त्रण करने वाली प्रकृति सत्ता को गायत्र कहा गया है−

“तमेत देव साम गायन्न त्रायत। यद् गायन्न त्रायत तद् गायत्रस्य गायत्र त्वम्।

जै॰ उ॰ 3। 38। 4

अर्थात्−समस्त लोकों में संव्याप्त साम गान को ऋषियों ने गायत्र्य कहा है।

वाणी का स्थान मुख है। इसलिए मुख को भी गायत्री कहा गया है।

मुखं गायत्री। −कौ0 11। 2

मुखमेव गायत्री। −ताण्ड0 7। 3। 7

मुख भी गायत्री ही है।

वाग्वै गायत्री, गायत्री वा इदं सर्वभूतम्।

−शत पथ

वाणी गायत्री है। सम्पूर्ण विश्व गायत्री से ओत−प्रोत है।

गायत्री की शब्द−शक्ति लय एवं ताल शक्ति से उत्पन्न ध्वनि प्रवाह के प्रभाव परिणाम को देखते हुए उसे वाक् देवी के नाम से पुकारा गया है। शब्द शक्ति की महिमा तथा गायत्री से निसृत ध्वनि प्रवाह की चर्चा शास्त्रों में इस प्रकार आती है।

गायत्री वा इद डडड सर्व भूतं यदिदं किचवाग्वे।

गायत्रा वाग्वा इद डडड सर्व भूतं गायत्री च त्रायत्रे च।

(छान्दोग्य−3)

“यह जो कुछ है, निश्चय ही गायत्री है। गायत्री ही समस्त जगत की सार और वाणी है। वाणी ही सारे संसार को गाती और बचाती है।”

गायत्री में सन्निहित शब्द शक्ति के साथ जो ब्रह्म वर्चस जुड़ा हुआ है उसका लाभ श्रद्धापूर्वक साधना करने वाला वाला सहज ही उठा लेता है।

गायत्री की ऐसी ही विशेषताओं को देखते हुए श्रद्धा भरा साधक स्तवन करता है।

सच्चिदानन्द रूपां तां गायत्री प्रतिपादिताम्। नमामि ह्रीं मंत्री देवी धियो यो नः प्रचोदयात॥

ततः परा-परा शक्तिः परमात्वे हि गीयसे। इच्छा शक्तिः क्रिया शक्ति र्ज्ञानशक्ति स्त्री शक्तिदा॥

त्वमेव ब्राह्मणोलोके अमर्त्यानुग्रह कारिणी। सप्तर्षि प्रिति जननी त्रिपदा वहु वर प्रदा॥

आदि शक्ते जगत्माता भक्तानुग्रह कारिणी। सर्वत्र कादिके अनन्तेश्ची संध्येतेनमो प्रस्तुते॥

त्वमेव संध्या गायत्री सावित्री च सरस्वती।

−गायत्री स्तोत्र

अर्थात्−गायत्री सत्चित्, आनन्द स्वरूपा, ह्रीं बीज वाली, सद्बुद्धि को प्रेरित करने वाली, पराशक्ति इच्छा शक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रिया शक्ति, शक्तिदात्री नारी है। ब्रह्मलोक निवासिनी, देव अनुग्रह करने वाली, सप्त ऋषियों की जननी, त्रिपदा, वरदायिनी, आदिशक्ति, विश्व माता, भक्तों पर अनुग्रह करने वाली, सर्वव्यापी, अनन्त और संध्या गायत्री ही है। वही सावित्री और सरस्वती भी है।

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साहस के बल पर मनुष्य बढ़ता और जीतता है।

हर किसी को विदित है कि कहने लायक सफलताएँ प्रबल पुरुषार्थ का मूल्य चुकाने पर ही मिलती हैं। उन अर्ध विक्षिप्तों के लिए न कहना ही उचित है जो तन्त्र-मन्त्र की−देवी−देवताओं की−वरदान आशीर्वाद की−सस्ती पगडण्डियाँ ढूंढ़कर जादू के जोर से बढ़े−चढ़े लाभ प्राप्त करने के सपने देखते रहते हैं और जब निराशा हाथ लगती है तो बहकी−बहकी बातें करते हैं। सच तो यह है कि महत्वपूर्ण सफलताएँ न तो भाग्य से मिलती हैं और न सस्ती पगडण्डियों के सहारे काल्पनिक उड़ाने उड़ने से, जो मिलता है, उसके लिए योजनाबद्ध अनवरत पुरुषार्थ करना पड़ता है। योग्यता बढ़ाना, साधना जुटाना और बिना थके बिना हिम्मत खोये अनवरत श्रम करने रहना यह तीन आधार ही सफलताओं के उद्गम स्रोत हैं।

पुरुषार्थ के दो अंग हैं− एक शारीरिक श्रम और दूसरा उत्साह भरा मनोयोग। बिजली के दो तार मिलकर करेन्ट उत्पन्न करते हैं। उनके अलग−अलग रहने पर शक्ति का संचार नहीं होता। अकेला श्रम तो मशीन भी करती है और पशु भी जुते रहते हैं। यह पुरुषार्थ कहाँ हुआ? जब उस श्रम के साथ पूरा उत्साह लगता है और कार्य को अधिक सुन्दर बनाने की बात प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाती है तो फिर मध्यम स्तर का मस्तिष्क भी चतुर लोगों के कान काटने लगता है। मनोयोग से कुशलता एवं प्रवीणता का पथ−प्रशस्त होता है जिस कार्य में जितनी तत्परता बरती जायगी और जितनी गहराई तक उसे अधिक अच्छा बनाने का उपाय सोचने में उतरा जायगा, उतना ही प्रगति का पथ−प्रशस्त होता जायगा। आरम्भ में सामान्य दीखने वाले व्यक्ति इसी आधार पर अपनी कुशलता बढ़ाते हुए असामान्य कहलाने की स्थिति में पहुँचे हैं।

आश्चर्य तब होता है जब श्रम करने के सर्वथा उपयुक्त शरीर और प्रतिभा सम्पन्न मस्तिष्क होते हुए भी लोग ऐसे ही निष्क्रिय बने रहते हैं और मन्द गति से अन्त−व्यस्त रीति से ज्यों−त्यों कुछ खट−पट भर करते हुए दिन गुजारते रहते हैं। बहुत कुछ पाने की बात सोचते तो हैं, पर उसका मूल्य न चुका पाने के कारण खाली हाथ ही रहते हैं, जिस−तिस पर दोषारोपण करते हुए किसी प्रकार आत्म प्रवंचना भर कर लेते हैं, पर उससे बनता कुछ नहीं। दूसरों की भर्त्सना और अपनी खोज की दुहरी मार से वे अशान्त, उद्विग्न और खोये−खोये से रहते हैं। नीरस, निरानन्द और असफलता से भरा कुरूप जीवन उन्हें भार−भूत लगता है। ज्यों−त्यों करके दिन गुजार लेना किसी के लिए भी सन्तोषजनक नहीं हो सकता।

शारीरिक, मानसिक क्षमताएँ और उपयुक्त साधन सहयोग होते हुए भी मनुष्य क्यों कुछ कर नहीं पाता, इसका कारण तलाश करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि साहस का अभाव शिथिलता का प्रमुख कारण है। भाप या तेल न रहने पर इञ्जन चलने बन्द हो जाते हैं, भले ही उनके कलपुर्जे सब प्रकार सही हों। जो काम मशीनों के चलने में तेल या बिजली की शक्ति काम करती हैं वही साहस के बल पर मानवी सत्ता काम करती है। पराक्रम दृश्य स्वरूप है और साहस उसका प्राण। प्राण के बिना शरीर की कोई उपयोगिता नहीं रह जाती। साहस के अभाव में शरीर और मस्तिष्क की भौतिक क्षमता कितनी ही बढ़ी−चढ़ी क्यों न हो उसका कोई उपयोग नहीं हो पाता। भीतर का उत्साह न जगे, किसी प्रक्रिया की पूरा करने के लिए इच्छा शक्ति−संकल्प शक्ति की आन्तरिक स्फुरणा का संचार न हो तो फिर शरीर मन में न तो उमंगें उठती हैं और न समर्थ सक्रियता का संचार होता है। अर्ध मृतक जैसी−अर्ध मूर्छित जैसी अन्त चेतना के बलबूते पर कोई कहने लायक पुरुषार्थ किसी से भी बन नहीं पड़ेगा।

शौर्य साहस शब्द का प्रयोग अक्सर युद्ध क्षेत्र में दिखाई गई वीरता के अर्थ में होता है। पर यह परिभाषा बहुत ही संकुचित है। वस्तुतः आलस्य प्रमाद जैसे रक्त को ठंडा करके रख देने वाले दोषों को हटाकर शारीरिक एवं मानसिक स्फूर्ति उत्पन्न करने वाली उमंग को साहस कहते हैं। इसका पहला निशाना अपनी उदासी एवं उपेक्षा वृत्ति को बनना पड़ता है। पीछे अन्यान्य दोष दुर्गुणों को ढूँढ़−ढूँढ़ कर उन्हें बुहारने और कूड़े के ढेर में फेंक देने के रूप में अगला कदम उठता है। निराशाजनक भविष्य की डरावनी कल्पनाएं, असफलता की आशंकाएँ, अपनी अयोग्यता और दुर्भाग्य ग्रस्त होने की मान्यताएँ ऐसी हैं जो भारी चट्टानें बनकर व्यक्तित्व को उभरने से रोकती हैं। इन कुकल्पनाओं की घटनाओं को हटाने में साहसिकता का प्रभंजन ही समर्थ होता है। आत्म विश्वास का धनी व्यक्ति ही अपने में अगणित विशेषताओं के बीज विद्यमान देखता है और उन्हें खाद पानी देकर परिपुष्ट, फूल−फलों से लदे वृक्ष के रूप में विकसित करता है। यह आत्म विश्वास सत्साहस का ही दूसरा नाम है।

काल्पनिक कठिनाइयों से जहाँ सामान्य व्यक्ति डरे सहमे रहते हैं और कुछ करने के लिए कदम बढ़ाने से पूर्व ही अनिष्ट की आशंका से भय−भीत होकर हिम्मत गँवा बैठते हैं, अपनी योग्यता, क्षमता एवं प्रखरता पर उन्हें विश्वास ही नहीं होता, समय पर अनुकूलता और उदार सहायता की भी उन्हें आशा नहीं बँधती। आत्म हीनता की ग्रन्थि से सारा मनः क्षेत्र बुरी तरह जकड़ा रहता है। किसी के सामने अपने विचार व्यक्त करते हुए−प्रयोजन रखते हुए तथा उचित सहयोग की माँग करते हुए उनका मुँह ही नहीं खुलता। मन की बात मन में ही दबी रहती है। लगता है कहने पर कोई झिड़क देगा, उपहास करेगा इसलिए चुप रहना ही अच्छा है। ऐसे लोग अन्याय सहते रहते हैं, पर अनीति के विरुद्ध आवाज उठाने की हिम्मत नहीं करते रोते कुसमुसाते सहते तो बहुत कुछ हैं, पर प्रतिकार के लिए कुछ कहने−करने में नानी मरती है। अपनी इस कायर दुर्बलता को वे कभी−कभी सज्जनता, सहनशीलता, आदि का नाम देने का प्रयत्न करते हैं। झूठा दब्बूपन आत्म प्रवंचना कर सकता है, पर कायरता और सज्जनता एक ही वस्तु है− यह किसी अन्य को नहीं समझा सकता।

पौराणिक कथाओं में टिटहरी की कहानी बहुचर्चित है जिसमें अपने अण्डे बहा ले जाने पर उन्हें वापस लेने का साहस किया था और चौंच से मिट्टी डाल−डाल कर समुद्र को पाटने का उपक्रम किया था। कहते हैं कि उस साहस से प्रभावित होकर अगस्त मुनि सहायता के लिए खड़े हुए थे और उनके प्रयत्न से टिटहरी को अण्डे वापस मिले थे। कहानी की सच्चाई पर संदेह किया जा सकता है, पर यह तथ्य सुनिश्चित है कि दृढ़ संकल्प वाले व्यक्ति जब व्यवस्थित योजना बनाने और उसकी पूर्ति के लिए समग्र तत्परतापूर्वक कार्य संलग्न होते हैं तो देर सवेर में सफलता मिलकर ही रहती है। पुरुषार्थी व्यक्ति जन सहयोग और देव अनुग्रह को बल पूर्वक आकर्षित करते हैं और उन्नति के उच्चशिखर तक पहुँच कर रहते हैं।

दुस्साहस तो उसे कहते हैं जिसमें नीति और मर्यादाओं का ध्यान न रखकर उद्दंडता अपना ली जाती है। दुस्साहस उसे भी कहते हैं जिसमें योग्यता साधन, अवसर, एवं परिस्थितियों का ध्यान न रखते हुए ऐसे ही ऊट−पटाँग काम आरम्भ कर दिये जाते हैं और जब वस्तुस्थिति का सामना करना पड़ता है तो साधन रहित छलाँगे लगाने वाले की टाँग जिस तरह टूटती है, उस तरह पछताना पड़ता है। साहस के नाम पर कई बार लोग दुस्साहस कर बैठते हैं और उस मूर्खता के कारण उपहासास्पद बनते हैं। प्रशंसा उस साहस की है जिसमें अपनी क्षमता को अतिवाद से बचाकर यथार्थ रूप से आँका जाता है। दूरदर्शिता−पूर्ण, संतुलित एवं व्यावहारिक कार्यक्रम निर्धारित किया जाता है। उसके भले−बुरे सभी पहलुओं पर विचार कर लिया जाता है− आवश्यकतानुसार सुधार संशोधन का प्रावधान रखा जाता है। जब आवश्यक समीक्षा विवेचना के उपरान्त कदम उठाने का निर्णय हो गया तो उस राह पर चल ही पड़ते हैं। परिस्थितिवश सरलता भी हो सकती है, अनुकूलता मिल सकती है और अभीष्ट सफलता आशा से कहीं पहले मिल सकती है। लक्ष्य से आगे बढ़ जाने के अवसर भी आ सकते हैं। किन्तु ऐसा भी हो सकता है कि कई प्रकार की अकल्पित कठिनाइयाँ सामने आ खड़ी हों और उनके सुलझाने में अप्रत्याशित प्रयास करना पड़े। ऐसी स्थिति में प्रगति क्रम धीमा रह सकता है और रास्ते में हेर−फेर करने की आवश्यकता पड़ सकती है। इन अड़चनों के रहते हुए भी यदि हिम्मत न टूटी और खेल जैसी हार−जीत को मनोरञ्जन क्रम भर मान रखा गया तो काम मले ही बिगड़ जाय पर साहस न टूटेगा। इस बार की असफलता के पीछे छिपी भूलों को अपनी अनुभव शृंखला में संजोकर रखा जा सकता है और अगले कार्यों में भूलों की पुनरावृत्ति न होने देने का विशेष ध्यान रखते हुए इतनी अच्छी सफलता पाई जा सकती है जो पिछली क्षति की सन्तोषजनक पूर्ति कर दे।

भीतर की भीरुता का प्रतिबिम्ब बाहरी दुनिया में डरावनी विभीषिकाएं बनकर सामने आ खड़ा होता है। रात के अँधेरे में झाड़ी भूत बनकर और रस्सी साँप बन कर डराती है। मरघट में खड़े हुए पीपल के पत्ते जब हवा में खड़−खड़ाते हैं तो लगता है डालियों पर भूत नाच रहे हैं। वास्तविक भूतों का अस्तित्व कदाचित ही कभी देखने में आता है 99 प्रतिशत उनकी सत्ता लोगों की भीरुता भरी कुकल्पनाओं पर ही टिकी रहती हैं। यह डरे हुए लोग उन काल्पनिक भूतों से भयंकर त्रास पाते हैं और कभी−कभी तो मृत्यु के मुख तक में चले जाते हैं। यह आत्म दुर्बलता का ही त्रास है। बहादुर लोग सोचते हैं जब शरीर धारी जीवित मनुष्य किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता तो यह शरीर साधन से रहित मरे हुए भूत यदि होते भी होंगे तो हमारा क्या बिगाड़ कर सकते हैं। मरघटों के नजदीक खेतों में किसान रात में भी रहते, फसल, रखाते और हल जोतते हैं, अपनी निर्भयता के कारण उनकी पूर्ण सुरक्षा रहती है और कभी भूतों से पाला नहीं पड़ता।

भीरुता एक रंगीन चश्मे की तरह है जिसे पहन लेने पर डरावना रंग ही चारों ओर छाया हुआ दीखता है। रास्ता चलते लोग डाकू, आक्रमणकारी लगते हैं और हर दिशा से विपत्ति के पहाड़ टूटते प्रतीत होते हैं। हर घड़ी यही लगता है कि अगले दिनों मुसीबत की घड़ी आने ही वाली हैं। घाटा, बीमारी, मृत्यु, मुकदमा, आक्रमण जैसी आशंकाएँ ही मस्तिष्क में घुमड़ती रहती हैं। इस प्रकार की असंतुलित मनः स्थिति में कुछ सोच सकना और भावी गतिविधियों का निर्धारण कर सकना भी सम्भव नहीं होता। ऐसे व्यक्ति बहुधा डरे−सहमे किसी कोने में दबे−छिपे अपने दिन काटते हैं और अपनी सहज प्रतिभा को सरलतापूर्वक मिल सकने वाला लाभ भी नहीं उठा पाते। इस प्रकार की छोटी−छोटी हानियाँ हर घड़ी उठाते−उठाते समूचे जीवन में भयजन्य क्षति इतनी बड़ी होती है जिसका लेखा−जोखा लेने पर प्रतीत होता है कि इसी दुर्बलता के कारण तीन चौथाई उज्ज्वल सम्भावनाएँ अकारण नष्ट हो गईं।

साहस सदा बाजी मारता है। अन्दर का शौर्य वाह्य जीवन में पराक्रम और पुरुषार्थ बनकर प्रकट होता है। कठिनाइयों के साथ दो−दो हाथ करने की खिलाड़ी जैसी उमंग, मनुष्य को खतरा उठाने और अपनी विशिष्टता प्रकट करने के लिए प्रेरित करती है साहसी लोग बड़े−बड़े काम कर गुजरते हैं। बड़े कदम उठाने में पहल तो उन्हें ही करनी पड़ती है, पर पीछे कहीं न कहीं से सहयोग भी मिलता है और साधन भी जुटते हैं। सफलताओं के ताले साहस की चाबी से खुलते हैं। दूसरे मनुष्य जब गई−गुजरी परिस्थितियों में रहते हुए अपना प्रगति क्रम जारी रखते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँच सके तो हम वैसा क्यों नहीं कर सकते? इस प्रश्न का अनुकूल उत्तर जिनका अन्तःकरण देता है वे आत्म विश्वास के धनी एकाकी आगे बढ़ते हैं और देखते हैं कि अनुकूलता उनके बांये और सफलताएँ दांये कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं।

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मनुष्य की प्राण ऊर्जा और उसका अभिवर्धन

मनुष्य एक हँसने, बोलने, सोचने और निर्णय निर्धारण करने वाला कल−कारखाना है। किसी भी कारखाने को चलाने के लिए ‘शक्ति’ की जरूरत पड़ती है। इसे तेल, भाप, कोयला, बिजली आदि के सहारे ताप रूप में प्राप्त किया जाता है। प्राणियों द्वारा धकेले जाने पर भी यह शक्ति प्राप्त होती है। शरीर का कार−खाना भी शक्ति चाहता है। इसके लिए उसे ईश्वर का दिया हुआ स्वसंचालित यन्त्र प्राप्त है’ अन्न, जल और वायु के ईंधन से यह भट्टी गरम भर होती है, इससे आगे का सब कुछ अपने आप चलता है। पेट में पाचक रासायनिक द्रव्य अन्न से नहीं अपने परम्परागत शक्ति स्रोतों से उत्पन्न होते हैं। आहार तो उन स्रोतों को धकेलने वाली गर्मी भर उत्पन्न करते हैं।

यों चेतना का केन्द्र मस्तिष्क माना गया है और उसका पोषक रक्त संस्थान हृदय कहा गया है। हृदय को सामग्री पेट से मिलती है। पेट को भरना मुँह का काम है। मुँह के लिए साधन हाथ जुटाते हैं। यह चक्र तो चलता ही है, पर असल में पूरा शरीर ही शक्ति भण्डार है। यह शक्ति असामान्य विद्युत स्तर की है। असामान्य इस अर्थ में है कि वह भौतिक बिजली की तरह अन्धी दौड़ नहीं लगाती वरन् सामने वाले को देखकर ही अपनी गतिविधियाँ फैलाती, सिकोड़ती है।

मानवी विद्युत हर व्यक्ति की अपनी विशिष्ट संपत्ति है। वह इसी के आधार पर ऐसे अनुदान देता है− ऐसे आदान−प्रदान करता है जो पैसे या किसी वस्तु के आधार पर उपलब्ध नहीं हो सकते। एक व्यक्ति से दूसरा प्रभाव ग्रहण करता है यह तथ्य सर्वविदित है। संगति की महिमा गाई गई है। कुसंग के दुष्परिणाम और सत्संग के सत्परिणामों को सिद्ध करने वाले उदाहरण हर जगह पाये जाते हैं। यह प्रभाव मात्र वार्तालाप व्यवहार, लोभ या दबाव से उतना नहीं पड़ता जितना मनुष्य के शरीर में रहने वाली बिजली के आदान−प्रदान से सम्भव होता है।

ताप और बिजली का गुण है कि जहाँ अनुकूलता होती है वह वहाँ अपना विस्तार करती और प्रभाव क्षेत्र बढ़ाती है। प्राणवान शक्तिशाली व्यक्तित्व अपने से दुर्बलों को प्रभावित करते हैं। यों दुर्बल भी अपनी न्यूनता के कारण समर्थों में सहज करुणा उत्पन्न करते हैं और उन्हें कुछ देने के लिए विवश करते हैं। बच्चे को देखकर माता की छाती से दूध उतरने लगता है− मन हुलसने लगता है इस प्रकार शक्तिवान अपने से दुर्बलों को अनुदान देकर घाटे में नहीं रहते। उदारताजन्य आत्म−सन्तोष से उनकी क्षतिपूर्ति भी हो जाती है। दूध पिलाने में माता को प्रत्यक्षतया घाटा ही है, पर वात्सल्यजन्य तृप्ति से उसकी भी भावनात्मक पूर्ति हो जाती है।

मनुष्य को एक अच्छा खासा चुम्बक कहें तो कुछ अत्युक्ति न होगी। चुम्बक का कार्य है आकर्षण। वह अपनी कला द्वारा अन्य लोहे के पदार्थों को आकर्षित करता है। उनको अपना जैसा बनाने का प्रयत्न करता है। एक और विशेषता चुम्बक की है। यह यदि टुकड़ों−टुकड़ों में भी विभक्त कर दिया जाये तो हर टुकड़े की वही विशेषता बनी रहेगी। एक टुकड़े को एक धागे में बाँधकर यदि अधर में लटकाया जाय तो इसके दोनों सिरे क्रमशः उत्तर−दक्षिण की तरफ ही रहेंगे। चाहे जैसी परिस्थिति आ जाय अपनी दिशा नहीं बदलेंगे। स्थिरता का सहज गुण चुम्बक में है। इसीलिए जलयानों या वायुयानों में ‘कम्पास’ के सहारे ही दिशा−ज्ञान का बोध होता है।

यह सारे लक्षण मनुष्य में भी पाये जाते हैं। यदि मन की प्रवृत्तियाँ सही ढंग से कार्य कर रही हों तो एक महान व्यक्ति बना जा सकता है। ठीक चुम्बक की तरह की सारी विशेषताएँ विकसित की जा सकती है। महान व्यक्तियों में इतना आकर्षण होता है कि वे जिस स्थान पर खड़े हो जाते हैं लोग अपने आप उनके चारों ओर एकत्रित हो जाते हैं।

चुम्बक की दूसरी विशेषता “एक रसता” की है। वह चाहे कितना विखंडित क्यों न हो जाय उसकी आकर्षण शक्ति कम नहीं होती। महान मनुष्य ऐसे ही होते हैं। वे बाह्य रूप से चाहे जितने छोटे हो जायें, परन्तु उनकी महानता में कोई अन्तर नहीं आता है। उनका व्यक्तित्व खण्डित नहीं होता है। वे अनेकों लोगों से एक साथ सम्बन्ध रखते हैं, परन्तु उनके व्यक्तित्व में अपने−पराये का−पक्षपात का कोई अन्तर नहीं आता। एक सूर्य अनेक घड़ों के जल में एक रूप ही दिखाई देता है।

चुम्बक की तीसरी विशेषता है दिशा के प्रति स्थिरता। इसके द्वारा सदैव ही उत्तर एवं दक्षिण दिशा का ज्ञान होता रहेगा, आप चाहे जहाँ चले जायें−आकाश में या समुद्र में कम्पास आपको दिशा ज्ञान अवश्य ही करायेगा। वही स्थिति विकसित व्यक्ति की भी होती है। यदि सद्प्रवृत्तियाँ जगा ली गई हैं, भावना एवं व्यक्तित्व का परिष्कार कर लिया गया है तथा उद्देश्य को गम्भीरता से गृहण करने की शक्ति पैदा कर ली गई है तो यह निश्चित है कि मनुष्य अपनी दिशा से कभी हिल नहीं सकता है। दूसरों को सही प्रेरणा प्रदान करने का काम भी तो चुम्बक के गुण की तरह ही है।

बड़ी से बड़ी विशेषताओं एवं महान गुणों से युक्त मनुष्य भी पतित क्रियाओं एवं विचारणाओं के अपनाने से गर्त में गिर जाता है और अपनी समस्त विशेषताएँ धीरे−धीरे खो देता है। ठीक इसी तरह जैसे चुम्बक को बार−बार पटकने तथा ऊपर−नीचे करने से उसकी आकर्षण शक्ति लुप्त हो जाती है, महान पुरुषों की भी पुण्य की पूँजी एवं प्रभाव उनके पतन के गर्त में गिरने में नष्ट हो जाते हैं।

धरती की चुम्बकीय शक्ति की तरह मनुष्य में भी एक सहज आकर्षण शक्ति विद्यमान है, उसका प्रयोग करके समर्थता एवं साधन सम्पन्नता प्राप्त की जा सकती है। मनुष्य यदि अपने चुम्बकत्व का प्रयोग करे तो उसे भी वैसे ही पुराण−वर्णित चमत्कार प्रस्तुत करने का अधिकार मिल सकता है। यदि तप, साधना के द्वारा आत्मबल को बढ़ा लिया जाय तो हम आज से हजारों वर्ष पहले घटित घटनाओं को भी यथार्थ रूप से आकाश मण्डल में सुन या देख सकते हैं। विज्ञान से तो अब यह सिद्ध ही हो चुका है कि जो भी ध्वनियाँ निसृत होती हैं वे कभी भी नष्ट नहीं होतीं।

अपनी इस पृथ्वी के चतुर्दिक् एक चुम्बक क्षेत्र व्याप्त है, उसी के सहारे वह समस्त ब्रह्माण्ड में फैली हुई तमाम आवश्यक विशेषताओं को इकट्ठी करती रहती है, यदि इस स्रोत से उसे यह अनुदान न प्राप्त होता तो उसका अक्षय भण्डार एक दिन अवश्य समाप्त हो जाता और साधन सम्पन्न कही जाने वाली धरती विपन्न एवं दीन−हीन की स्थिति में पहुँच जाती।

मनुष्य की अतीन्द्रिय क्षमता में वह चुम्बकत्व विद्यमान है, जिसके द्वारा वह असम्भाव्य कार्यों को भी कर सकता है। आँखों से न देख पाने वाले स्थानों की वर्तमान में घटित होने वाली घटनाओं का सचित्र वर्णन कर सकता है। एक स्थान से दूसरे स्थान को परस्पर संवाद आदान−प्रदान कर सकता है। इसके अतिरिक्त यदि हमने तप, साधना द्वारा प्रेरक क्षमता अर्जित कर ली है तो किसी दूसरे को प्रेरित कर लाभ पहुँचाया जा सकता है।

जड़ अणुओं की गति एक प्रकार की विद्युत उत्पन्न करती है, उसमें जब चेतन सत्ता का समावेश होता है तो जीवन का−जीवधारियों का आविर्भाव होता है। ध्रुवों के क्षेत्र में चुम्बकीय तूफान उठते रहते हैं, जिनका प्रकाश ‘अरोरा बोरीलिस’, तेजोवलय के रूप में छाया रहता है। इसे पृथ्वी के साथ अन्य ग्रहों की सूक्ष्म−हलचलों का मिलन स्पन्दन कह सकते हैं। यही है वह पृथ्वी का ग्रहों के साथ प्रणय−परिणय जिसके फलस्वरूप कुन्ती के पाँच पुत्रों की तरह पाँचकी विविध−विधि हलचलें जन्म लेती हैं और उनके क्रियाकलाप एक से एक बढ़कर अद्भुत और शक्तिशाली बने हुए सामने आते रहते हैं। समुद्र का खारा जल जब धातु विनिर्मित नौकाओं तथा जलयानों से टकराता है तो उससे विद्युत तरंगें उत्पन्न होती हैं। नौका विज्ञानी इस अनायास होते रहने वाले विद्युत उत्पादन से परिचित रहते हैं और उसकी हानिकारक लाभदायक प्रतिक्रिया से सतर्क रहते हैं।

ठीक इसी प्रकार शरीरगत जीवाणु भी ईथर एवं वायुमण्डल में भरे विद्युत प्रवाह से टकराते रहते हैं और विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। जीव कोषों में उन धातुओं तथा रसायनों की समुचित मात्रा रहती है जो आघातों से उत्तेजित होकर विद्युत प्रवाह उत्पन्न कर सकें। यही कारण है कि हर मनुष्य में गर्मी ही नहीं रहती वरन् विद्युत प्रवाह की अनेक स्तरों की धारायें बहती रहती हैं। इन्हें यन्त्रों द्वारा भी भली प्रकार रखा जाना जा सकता है।

मानवी चुम्बक अन्तरिक्ष से बरसने वाले अनेक भले−बुरे अनुदानों को अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुरूप स्वीकार−अस्वीकार करता है। वह जैसा कुछ स्वयं है उसी का चुम्बकत्व उसे इस विश्व ब्रह्माण्ड में अपनी जैसी सूक्ष्म धारा प्रवाह से अनायास ही संपन्न सज्जित करता रहता है।

डॉ. एच. एस. वर ने अपने साथियों सहित प्राणियों की जिस जैविक विद्युत के शास्त्र की संरचना की है उसमें प्राणिज विद्युत का आधार एवं क्रियाकलाप भौतिक बिजली से भिन्न हैं। वे प्राणिज विद्युत में इच्छा और बुद्धि का सम्मिश्रण भी मानते हैं भले ही वह कितना ही झीना क्यों न हो। इसी प्रवाह के कारण प्राणिज विद्युत अपने−अपने क्षेत्र में विशेष परिस्थितियों एवं साधनों की संरचना करती है। प्राण चुम्बकत्व पदार्थ में से अपने उपयोगी भाग को खींचता है− उसे अपने ढाँचे में ढालता है और इस योग्य बनाता है कि चेतना के स्वर में अपना ताल बजा सके। किस प्राणी के डिम्ब से किस आकृति−प्रकृति का जीव उत्पन्न हो इसका निर्धारण मात्र रासायनिक संरचना के आधार पर नहीं हो जाता वरन् यह निर्धारण रज और शुक्र कीटों के अन्दर भरी हुई चेतना के द्वारा होता है। इसी चुम्बकत्व से भ्रूण में विशिष्ट स्तर के प्राणियों की आकृति एवं प्रकृति ढलना शुरू हो जाती है। यदि ऐसा न होता तो संसार में पाये जाने वाले समस्त प्राणी प्रायः एक ही जैसी आकृति−प्रकृति के उत्पन्न होते क्योंकि अणुओं का स्तर प्रायः एक ही प्रकार का है। उनमें जो रासायनिक अन्तर है उसके आधार पर कोटि−कोटि वर्ग के प्राणी उत्पन्न होने और उनकी वंश परम्परा चलते रहने की गुंजाइश नहीं है अधिक से अधिक इतना हो सकता था कि कुछ थोड़ी सी−कुछ थोड़े से अन्तर की जीव जातियाँ इस संसार में दिखाई पड़तीं। वंश परम्परा और जीव−विज्ञान का जो स्वरूप सामने है उसमें प्राणि चुम्बकत्व की अपनी विशिष्ट भूमिका है।

कोशिकाओं की आन्तरिक संरचना में एक महत्वपूर्ण आधार हैं−माईटो, कोन्ड्रिया। इसे दूसरे शब्दों में कोशिका का पावर हाउस−विद्युत भण्डार कह सकते हैं। भोजन, रक्त, माँस, अस्थि आदि से आगे बढ़ते बढ़ते अन्ततः इसी संस्थान में जाकर ऊर्जा का रूप होता है। यह ऊर्जा ही कोशिका को सक्रिय रखती है और उनकी सामूहिक सक्रियता जीव संचालक के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इस ऊर्जा को लघुत्तम प्राणांश कह सकते हैं। काय−कलेवर में इसका एकत्रीकरण महाप्राण कहलाता है और उसी की ब्रह्माण्डव्यापी चेतना विश्व प्राण या विराट् प्राण के नाम से जानी जाती है। प्राणाँश की लघुत्तम ऊर्जा इकाई कोशिका के अन्तर्गत ठीक उसी रूप में विद्यमान है जिसमें कि विराट् प्राण गतिशील है। बिन्दु−सिन्धु जैसा अन्तर इन दोनों के बीच रहते हुए भी वस्तुतः वे दोनों अन्योन्याश्रित हैं। कोशिका के अन्तर्गत प्राणांश के घटक परस्पर संयुक्त न हों तो महाप्राण का अस्तित्व न बने। इसी प्रकार यदि विराट् प्राण की सत्ता न हो तो भोजन पाचन आदि का आधार न बने और वह लघु प्राण जैसी विद्युतधारा का संचार भी सम्भव न हो।

इसी मानवी विद्युत का ही यह प्रभाव है जो एक दूसरे को आकर्षित करता है। उभरती आयु में यह बिजली कार्य आकर्षण की भूमिका बनती है, पर यदि उसका सदुपयोग किया जाय तो बहुमुखी प्रतिभा, ओजस्विता, प्रभावशीलता के रूप में विकसित होकर कितने ही महत्वपूर्ण कार्य कर सकती है। ऊर्ध्वरेता, संयमी, ब्रह्मचारी लोग अपने ओजस् को मस्तिष्क में केन्द्रित करके उसे ब्रह्मवर्चस के रूप में परिणत करते हैं। विद्वान दार्शनिक, वैज्ञानिक, नेता, वक्ता, योद्धा, योगी, तपस्वी जैसी विशेषताओं से सम्पन्न व्यक्तियों के संबंध में यही कहा जा सकता है कि उन्होंने अपने ओजस् का प्राण तत्व का अभिवर्धन, नियन्त्रण एवं सदुपयोग किया है। यों यह शक्ति किन्हीं−किन्हीं में अनायास भी उभर पड़ती देखी गई है और उसके द्वारा उन्हें कुछ अद्भुत काम करते भी पाया गया है।

जर्मनी का अधिनायक हिटलर जब रुग्ण होता तो उसे सुयोग्य डाक्टरों की अपेक्षा एक ‘नीम हकीम’ क्रिस्टन का सहारा लेना पड़ता। उसकी उंगलियों में जादू था। दवादारु वह कम करता था, हाथ का स्पर्श करके दर्द को भगाने की उसको जादुई क्षमता प्राप्त थी। सन् 1898 में वह इस्टोनिया में जन्मा प्रथम विश्व युद्ध के बाद वह फिनलेण्ड नागरिक माना, पीछे उसने मालिश करके रोगोपचार करने की कला सीखी अपने कार्य में उसका कौशल इतना बढ़ा कि उसे जादुई चिकित्सक कहा जाने लगा। हिटलर ही नहीं, उसके जिगरी दोस्त हिमसर तक को उसने समय−समय पर अपनी चिकित्सा से चमत्कृत किया और भयंकर रुग्णता के पंजे से छुड़ाया। क्रिस्टन ने अपने परिचय और प्रभाव का उपयोग करके हिटलर के मृत्युपाश में जकड़े हुए लगभग एक लाख यहूदियों का छुटकारा कराया।

योग−साधना का उद्देश्य इस चेतना विद्युत शक्ति का अभिवर्धन करना भी है। इसे मनोबल, प्राणबल और आत्मबल भी कहते हैं। संकल्प शक्ति और इच्छा शक्ति के रूप में इसी के चमत्कार देखे जाते हैं।

अध्यात्म शास्त्र में प्राण−विद्या का एक स्वतन्त्र प्रकरण एवं विधान है इसके आधार पर साधनारत होकर मनुष्य इस प्राण विद्युत की इतनी अधिक मात्रा अपने में संग्रह कर सकता है कि उस आधार पर अपना ही नहीं अन्य अनेकों का भी उपकार, उद्धार कर सके।

योग−साधना इस मानवी विद्युत भण्डार को असाधारण रूप से उत्तेजित करती और उभारती है। यदि सही ढंग से साधना की जाय तो मनुष्य प्राणवान और ओजस्वी बनता है। उपार्जित प्राण विद्युत की ऊर्जा के सहारे स्वयं कितनी ही अद्भुत सफलताएँ प्राप्त करता है और दूसरों को सहारा देकर ऊँचा उठाता है।


शीत सहने की शक्ति (kahani)

मनुष्य की शीत सहने की शक्ति आमतौर से 25o सेन्टीग्रेड या 77o फारेनहाइट समझी जाती है। इससे अधिक ठण्डक में जीवन सम्भव नहीं हो सकता। जेमसक्यूरी ने एक पागल आदमी का इलाज करने के लिए उसे 45 मिनट तक 28o सेन्टीग्रेड तापमान पर रखा था। इसके बाद लारेन्स स्मिथ ने केन्सर का इलाज करने की शीत उपचार की−‘‘हाइपोथामिया’’ पद्धति का आविष्कार किया है। अमुक अंग को ठण्डक पहुँचाकर सुन्न करना और फिर उस स्थान का आपरेशन करना डॉ0 ड्रू ने सम्भव बनाया उन्होंने इस तरह के 90 सफल आपरेशन किये हैं।

गर्मी की उपयोगिता बहुत पहले समझ ली गई थी। अब शीतलता की शक्ति का पता चला है कि उसकी उपयोगिता भी कम नहीं। पुरुषार्थ और पराक्रम की गर्मी महत्वपूर्ण प्रयोजन प्रगति का पथ−प्रशस्त करने में कम योगदान नहीं करती। साथ ही यह भी जानना चाहिए कि अति सर्वत्र वर्जित है। गर्मी की अधिकता से विस्फोट होता है इसी प्रकार शीतलता की अति करने पर भी प्राणान्त का संकट उपस्थित होता है। हमें न अत्यधिक उग्र होना चाहिए और न इतना नम्र कि असन्तुलन से उत्पन्न होने वाले संकटों में ग्रसित होना पड़े।

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सर्वतोमुखी समर्थता की अधिष्ठात्री गायत्री महाशक्ति

इस विश्व में दो शक्तियाँ काम करती हैं− एक चेतन दूसरी जड़। पदार्थ देखने में ही स्थिर प्रतीत होते हैं पर वस्तुतः उनमें भी अद्भुत क्रियाशीलता विद्यमान है। पदार्थ की सबसे छोटी इकाई है− परमाणु। वह चर्मचक्षुओं से स्थिर स्तब्ध दिखाई पड़ता है, पर जब सशक्त सूक्ष्म दर्शक यन्त्रों से उनकी अन्तरंग स्थिति को देखा जाता है, तो प्रतीत होता है कि कितनी प्रचण्ड शक्ति और कितनी द्रुतगामी हलचल उनके भीतर काम कर रही है। अणु विश्लेषण−अणु विस्फोट के प्रयोगकर्त्ता जानते हैं कि पदार्थ का सबसे छोटा यह घटक भी अपने भीतर कितनी भयंकर क्षमता दबाये हुए है और वह क्षमता स्थिर न रहकर कितनी सक्रिय हलचलों में संलग्न है। अणु भट्टियों से उत्पन्न ताप द्वारा जो विशालकाय विद्युत उत्पादन योजनाएं चल रही हैं और अणु आयुधों द्वारा संसार भर का सर्वनाश करने की जो विभीषिका सामने खड़ी है, उसके मूल में परमाणु के अन्तराल में काम करने वाली प्रचण्ड सक्रियता ही मूल कारण है।

रेत, पर्वत, तालाब आदि को यों मोटी दृष्टि से स्थिर समझा जा सकता है, पर उनमें सृजन, अभिवर्धन और परिवर्तन का जो अनवरत क्रम चलता रहता है, उसे गम्भीरतापूर्वक देखने से प्रतीत होता है कि जीवधारी जिस प्रकार अपने विभिन्न प्रयोजनों में निरन्तर कुछ न कुछ सोचते और करते रहते हैं उसी प्रकार पदार्थ की दृश्य और अदृश्य गतिशीलता भी इस संसार को हलचल युक्त बनाये हुए है। अपनी पृथ्वी से लेकर असंख्य ग्रह−नक्षत्रों तक सभी ब्रह्माण्डीय पिण्ड द्रुतगति से अपनी धुरी और कक्षा पर भ्रमण कर रहे हैं और अपनी आकर्षण शक्ति के द्वारा एक दूसरे के साथ बँधे जकड़े हैं। इतना ही नहीं उनके अन्तः क्षेत्र में भी चित्र विचित्र गतिविधियाँ अत्यन्त तीव्रगति से चलती रहती हैं। पदार्थ के साथ यह सक्रियता अविच्छिन्न रूप से जुड़ी होने के कारण ही उसका अस्तित्व बना हुआ है। पदार्थ की संरचना प्रचण्ड क्रियाशीलता के साथ हुई है। इसी के कारण वस्तुएँ स्वयमेव−उपजती और बदलती रहती हैं। पदार्थ की इस क्रियाशीलता को अपरा प्रकृति कहा गया है।

परमाणु की तरह दूसरा घटक है−जीवाणु। जीवाणु का शरीर कलेवर तो रासायनिक पदार्थों से ही बना होता है, पर उसकी अन्तःचेतना मौलिक है जो पदार्थ की शक्ति से उत्पन्न नहीं होती, पर अपने प्रभाव से कलेवर को तथा समीपवर्ती वातावरण को प्रभावित करती है। इसे चेतना कहते हैं। चेतना के दो गुण हैं एक इच्छा एवं आस्था, दूसरी विवेचना एवं विचारणा है। इच्छा को भाव और विचारणा को बुद्धि कहते हैं। एक को अन्तरात्मा दूसरी को मस्तिष्क कह सकते हैं। मस्तिष्क जो सोचता है उसके मूल में आकाँक्षा, आस्था, विवेचना एवं विचारणा की सम्मिलित प्रेरणा ही काम करती है। इस जीव चेतना को परा प्रकृति कहते हैं।

परमाणु उसका सबसे छोटा घटक है, इसका संयुक्त रूप ब्रह्माणु अथवा ब्रह्माण्ड हैं। व्यष्टि और समष्टि के नाम से भी इस लघुता और विशालता को जाना जाता है। जीवाणु की चेतन सत्ता आत्मा कहलाती हैं और उसकी समष्टि विश्वात्मा परमाणु है। ब्रह्माण्ड में भरी क्रियाशीलता से परमाणु प्रभावित होता है। इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि परमाणुओं की संयुक्त चेतना ब्रह्माण्ड−व्यापी हलचलों का निर्माण करती है। इसी प्रकार चेतना के क्षेत्र में इसी तथ्य को परमात्मा द्वारा आत्मा को अनुदान मिलना अथवा आत्माओं की संयुक्त चेतना के रूप में परमात्मा का विनिर्मित होना कुछ भी कहा जा सकता है।

परमाणु का गहनतम विश्लेषण करने पर जाना गया है कि वह मूलतः ऋण और धन विद्युत प्रवाहों के मिलन के उत्पन्न होने वाली हलचल मात्र है। परिस्थिति के अनुसार यह हलचल ही दृश्य रूप धारण करती और पदार्थ के रूप में दृश्य होती चली जाती है। इसी प्रकार जीवात्मा भी यों स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर धारण किये अनेक प्रकार के साधन उपकरण संभाले दीखता है, उसकी अपनी अहंता और इच्छा भी है किन्तु मूलतः वह व्यापक चेतना का एक स्फुल्लिंग मात्र है। उसे विभिन्न प्रकार की क्षमताएँ विश्वात्मा के महा समुद्र में से ही मिलती हैं। मछली का शरीर, आहार, निर्वाह सब कुछ जलाशय पर ही अवलम्बित है इसी प्रकार जीव भी ब्रह्म पर आश्रित है। इतने पर भी विचित्रता यह है कि मछली तालाब को गन्दा कर सकती है और जीव ब्रह्म को प्रभावित कर सकता है।

गायत्री क्या है? इस ब्रह्माण्ड में संव्याप्त उस चेतना मानसरोवर को गायत्री कह सकते हैं जो प्राणियों में ज्ञान सम्वेदना और पदार्थों में सृजन परिवर्तन वाली क्रियाशीलता बनकर काम करती है। इसे ब्रह्म चेतना से उद्भूत माना गया है। ज्ञान से कर्म बना और दृश्य ने अपना दृश्य कलेवर धारण कर लिया। इस प्रकार यह विश्व मूलतः अद्वैत होते हुए भी द्वैत बन गया। ब्रह्म से प्रकृति बनी और फिर वे दोनों मिल−जुलकर सृष्टि का इतना विकास कर सके जैसा कि हमें दृष्टिगोचर होता है। इसी तथ्य को पुराणों में अनेकों अलंकारिक कथा, उपाख्यानों के रूप में बताया गया है।

ब्रह्माजी की दो पत्नियाँ थीं−एक गायत्री दूसरी सावित्री। ब्रह्म की दो क्षमताएँ हैं− एक परा प्रकृति चेतन सत्ता, दूसरी अपरा प्रकृति पदार्थ सत्ता। एक का धर्म ज्ञान दूसरी का कर्म है। एक अदृश्य है दूसरी दृश्य। एक सजीव है दूसरी निर्जीव। इतने पर भी उनका उद्गम स्रोत एक है। हिमालय के अन्तराल में से गंगा और यमुना दोनों ही धारा निकली हैं। ब्रह्म से ही परा और अपरा प्रकृति का उद्भव हुआ है।

गायत्री को मूलतः ब्राह्मी शक्ति कह सकते हैं। समुद्र की असंख्य लहरें पृथक् पृथक् दीखती हैं और उनकी आकृति−प्रकृति में भी भिन्नता रहती है। इतने पर भी समुद्र की सतह पर होने वाली हलचल ही इन लहरों का सृजन करने का मूलकारण हैं। गायत्री महा शक्ति के चेतन और जड़ विभाजन तो आरम्भिक हैं। आगे चलकर गंगा और यमुना में उठने वाली अनेकों लहरें, धाराएँ तथा भँवर आदि के रूप में उत्पन्न होने वाली हलचलों की तरह उस ब्रह्म शक्ति की भी अनेकानेक धाराएँ हैं। इन्हें विभिन्न नाम दिये गये हैं। गायत्री के भी अनेकों नाम, रूप हैं। गायत्री सहस्रनाम में उसके एक हजार नाम गिनाये गये हैं। इन्हें उस महान शक्ति सागर की लहरें, तरंगें कह सकते हैं। हर सहस्रनाम से तात्पर्य उस ब्राह्मी शक्ति के प्रकारों को अमुक गणना में सीमाबद्ध कर देना नहीं वरन् उसका तात्पर्य है−असंख्य। सहस्रनाम तो नमूने भर के लिए गिनाये गये हैं।

गायत्री ब्रह्म शक्ति के स्वरूप क्रिया−कलाप एवं उपयोग को शास्त्रों में अनेक उदाहरणों के साथ बताया गया है। कहीं तो उस शक्ति ने स्वयं ही अपने स्वरूप का परिचय दिया है और कहीं देवताओं ने अथवा ऋषियों ने स्तवन के रूप में उसके स्वरूप का गुण−गान सहित वर्णन किया है। इन वर्णनों के आधार पर यह जाना जा सकता है कि गायत्री शक्ति तत्व का इस संसार में कहाँ किस प्रकार उपयोग हो रहा है?

गायत्री परदेवतेति गाहिता ब्रह्मैव चिद्रूपिणी।

यह गायत्री सबसे परा देवता है−ऐसा कहा गया है। यह चित् स्वरूप वाली साक्षात् ब्रह्म ही है।

गायत्री तु तरं तत्वं गायत्री परमागतिः।

−वृद्ध पारासर 5। 4

गायत्री ही परम तत्व है। गायत्री ही परमगति है।

गायत्री सा महेशानी परब्रह्मात्मिका यता।

−रुद्र तन्त्र

यह गायत्री ही परब्रह्मात्मिका और महेश्वरी है।

गायत्री परदेवतेति गदिता ब्रह्मैव चिद्रूपिणी।

−गायत्री पुरश्चरण पद्धति

पर देवता, चित् रूपिणी एवं साक्षात् ब्रह्म गायत्री ही है।

तदक्षरं तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा च तस्याः प्रसृता परा सा।

−गुह्योपनिषद

वही अक्षर ब्रह्म है। वह तत्सवितुर्वरेण्यं प्रज्ञा है। सुविस्तृत परा शक्ति है।

या देवी सर्व भूतेषु शक्तिरुपेण संस्थिता। नमस्तत्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या। भुतेषु सततं तस्यै व्याप्तयै देव्यै नमो नमः।

−मार्कण्डेय पुराण

जो महाशक्ति सम्पूर्ण प्राणियों में शक्ति रूप विद्यमान है। इन्द्रियों की अधिष्ठात्री देवी है एवं पंच तत्वों की संचालिका है उसे बार−बार नमस्कार।

गायत्री वा इदœसर्वं भूतं यदिदं कि च बाग्वै गायत्री बाग्वा इदœसर्वं भूतं गायति च त्रायते च।

या वै सा गायत्रीयं वाव सा येयं पृथिव्यास्या−œहीदœसर्वं भूतं प्रतिष्ठितमेतामेव नातिशीयते।

−छान्दोग्य 3। 12। 12

गायत्री समस्त पंच भूतों में व्याप्त है। जो कुछ यहाँ है सो सब गायत्री ही है। वाणी ही गायत्री है। यह वाणी ही वर्णन और रक्षण करती है। यह पृथ्वी गायत्री है जिसमें सम्पूर्ण प्राणी रहते हैं।

सैषा चतुष्पदा षड्विधा गायत्री तदेतदृचा भ्यनूत्तम। तावानस्य महिमा ततों ज्यायाœश्च पूरुषाः। पादोऽस्य सर्वाभूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवीति।

−छान्दोग्य 3। 12। 5

यह गायत्री चार पद वाली और छह भेदों वाली है। इस गायत्री की अविच्छिन्न महिमा है। यह तीन पाद वाला परम पुरुष अमृत और प्रकाश बनकर आत्मा में स्थित हो। इसका एक पद सन्तोष विश्व है।

गायत्री की चेतनात्मक धारा सद्बुद्धि के−ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में काम करती है और जहाँ उसका निवास होता है वहाँ ब्राह्मणत्व एवं देवत्व का अनुदान बरसता चला जाता है, साथ ही आत्मबल के साथ जुड़ी हुई दिव्य विभूतियाँ भी उस व्यक्ति में बढ़ती चलीं जाती हैं। इस तथ्य का उल्लेख शास्त्रों में इस प्रकार हुआ है−

सर्वदा स्फुरसि सर्वहृदि वासयसि। नमस्ते परारुपे नमस्ते पश्यन्तीरुपे नमस्ते मध्यमारुपे नमस्ते वैखरीरुपेसर्व तत्त्वात्मिके सर्वविद्याऽऽत्मिके।

सर्वक्त्यात्मिके सर्वदेवात्मिके वशिष्ठेम मुनिनाऽऽराधिते विश्वामित्रेण मुनिनोपसेव्यमाने नमस्ते नमस्ते।

−अक्षिमालिकोपनिषद

हे महाशक्ति तुम सर्व विद्यमान हो, सर्वत्र स्फुरण करती हो, सभी हृदयों में तुम्हारा निवास है, परा पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी वाणियाँ तुम्हारे ही रूप हैं, तुम तत्व रूपिणी हो, सर्व विद्यामय हो, समस्त शक्तियों की अधिष्ठात्री हो, सब देवताओं की आराध्य हो। वशिष्ठ और विश्वामित्र ऋषियों ने तुम्हारी ही उपासना करके सिद्धि पाई। तुम्हें बार−बार नमस्कार है।

मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञान रूपिणीं। ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी॥

वह महाशक्ति मन्त्रों में मातृका रूप, शब्दों में ज्ञान रूप, ज्ञानियों में चिन्मयातीत और शून्य वादियों में शून्य रूप हैं।

ब्रह्माविद्यां जगद्धीत्रीं सर्वेषां जननीं तथा। यया सर्वमिद व्याप्तं त्रैलोक्यं सचराचरम्॥

त्वं भूमिः सर्वभूतानां प्राणः प्राणवतां तथा। धीः श्रीः काँतिः क्षमा शाँतिः श्रद्धाः मेधाः धृतिः स्मृतिः त्वमुद्गोथेऽर्धमात्राऽसि गायत्री व्याहृतिस्तथा। जया च विजया धात्री लज्जा कार्तिः स्पृहा दया।

−देवी भागवत

आप ही समस्त भूतों की भूमि और प्राणियों की प्राण हो। आप ही जगद्धात्री ब्रह्म विद्या हैं। धी, श्री, कान्ति, क्षमा, शान्ति, श्रद्धा, मेध, धृति स्मृति आप ही हैं। आप ही ओंकार के मस्तक पर विराजमान अर्ध बिन्दु हैं। गायत्री व्याहृति, जया, विजया, धात्री, लज्जा, कीर्ति, स्पृहा, और दया आप ही हैं।

गायत्री द्वारेण चोच्यते ब्रह्म ब्रह्मणः सर्व विक्षेप रहितस्य नेति नेतीत्यादिविशेष प्रतिषेध गम्यस्य दुर्वाध त्वात्। सत्स्वने केषु छन्दःसु गायत्र्या एव ब्रह्म ज्ञान द्वारतयोपादानं प्राधान्यात्। सोमा हरणात् इतरछन्दोऽक्षराहरणे नेतरछन्दो व्याप्त्या च सर्व सघन व्यापकत्वाच्च यज्ञे प्राधान्यं गायत्र्याः। गायत्री सारत्वाच्च ब्राह्मणस्य मातर−मिव हित्वा गुरुतरां गायत्रीं ततोऽन्यद् गुरुतरम् न प्रतिपद्यते यथोक्तं ब्रह्मापीति। तस्यामव्यन्त गौरवस्य प्रसिद्ध त्वात। अतो गायत्री मुखनैव ब्रह्मोच्यते।

-छान्दोग्य 3। 12। 1 शंकरभाष्य

अर्थात्−ब्रह्म का निरूपण गायत्री के द्वारा ही किया जाता है। ब्रह्म जाति गण रहित, नेति−नेति और निर्निवेष होने से जानने में बहुत ही कठिन दुर्विज्ञेय है। पर वह गायत्री द्वारा जाना जा सकता है। यों अनेक मन्त्र हैं, पर ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त कराने वाला प्रधान छन्द गायत्री ही है। सोमरस की प्रधानता, इतर छन्दों का सारतत्व एवं समस्त कर्मों के उपयुक्त होने के कारण यज्ञ कर्म में गायत्री की ही प्रधानता मानी गई है। ब्राह्मणत्व का सारतत्व गायत्री है। अर्थात् जिसमें यह गायत्री तत्व सन्निहित है वही सच्चा ब्राह्मण है। माता के सामान इस अनन्त महिमामयी गायत्री को छोड़कर अन्यत्र नहीं भटकना चाहिए। यही सर्वोत्तम सिद्धि मन्त्र है। स्फुट ब्रह्म का प्रतिपादन इसी में है। सर्वाधिक गुण गरिमा युक्त गायत्री का गौरव प्रसिद्ध है। ब्रह्म का निरूपण गायत्री द्वारा ही किया जाता है।

गायन्तित्वा गायत्रिणों ऽर्चन्त्यर्क मर्किणः। ब्रह्मणस्त्वा शतक्रता उदवंशमिव मेमिरे॥

−ऋग्वेद 1। 10। 1

हे माता गायत्री, मन्त्रवेत्ता तेरा ही गुण गान करते हैं। गायत्री मन्त्र द्वारा यजन करने वाले कर्मयोगी, याजक यज्ञ याग द्वारा सविता शक्ति सावित्री की ही अर्चना करते हैं। हे करुणामयी माँ, वेद वेत्ता विद्वान तेरे ही नाम की यश पताका लिये फिरते हैं।

देवी दात्री च भोक्त्री च देवी सर्व मिदंजगत्। देवी जयति सर्वत्र या देवी साहमेव च॥

सर्वात्मना हि सा देवी सर्व भूतेषु संस्थिता। गायत्री मोक्ष हेतुर्वैं मोक्ष स्थानम लक्षणम्॥

−ऋष्यसृंग

अर्थात्−‘‘गायत्री देवी देने वाली और भोगने वाली है यह समझ लेना चाहिए कि समस्त जगलडडडड गायत्रीमय ही है। सर्वत्र देवी की ही विजय होती है और जो गायत्री देवी है वही मैं हूँ। वहाँ देवी सबकी आत्मा है जो सब में निवास करती है। गायत्री मोक्ष का हेतु है और वही मोक्ष का लक्ष्य है।’’

ब्राह्मण्यशक्तिर्विप्रेषु देवशक्तिः सुरेषु सा। तपस्विनां तपस्या गृहिणां गृहदेवता।

मृक्तिशक्तिश्च मुक्तानामाशा सांसारिकस्य सा। मद्भक्तानां भक्ति शक्ति र्मयि भक्तिप्रदा सदा।

−ब्रह्मबैवर्त

वह ही विप्रों में ब्राह्मण्य शक्ति होती है और सुरीं में वही देवशक्ति है। तपस्वियों में वही तपस्या है और गृहियों में गृह देवता भी वही होती है। मुक्त जनों में वही मुक्त शक्ति होती है और साँसारिक पुरुष में वह ही आशा होती है और साँसारिक पुरुष में वह ही आशा होती हैं तथा मेरे भक्तों में वही भक्ति के रूप में रहा करती है जो मुझ में सदा भक्ति प्रदा होती है।

या देवी सर्वभूतेषु चैतन्येत्यभिधीयते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

जो शक्ति सब प्राणियों में चेतना रूप से विद्यमान है, उसे अनेक बार नमस्कार।

सं उतत्वः पश्यन्नददर्शवाचमुतत्तः शृवन्नशृणोत्येनाम् उतो त्वस्मैतन्वां विसस्रे जायेपत्यवउशतीसुवासाः

−सरस्वती रहस्योपनिषद्

हे भगवती वाक् तुम्हारी कृपा से ही सब लोग बोलते हैं। तुम्हारी कृपा से ही विचार करना संभव होता है। तुम्हें जानते हुए भी जान नहीं पाते। देखते हुए भी देख नहीं पाते। जिस पर तुम्हारी कृपा होती है वही तुम्हें समझ पाता है।

सच्चिदानन्दरुपाम् ता गायत्री प्रतिपादिताम्। नमामि ह्रींमयीं देवी धियो यो नः पचोदयात्॥

−देवी भागवत

ह्री शक्ति सम्पन्न, सच्चिदानन्द रूप में प्रतिपादित महिमामयी गायत्री माता को नमस्कार। वे हमारी बुद्धियों को सन्मार्ग पर प्रेरित करें।

पुरस्सरी में पुरुषार्थदात्री मित्रो भवित्री भजताभवित्री पवित्रयन्ती सुपदक्रमैर्गा सावित्री वेलार्चित ॐन्नमस्ते॥

“मेरे सम्मुख चलने वाली, पुरुषार्थ देने वाली, मित्र होने वाली, भक्तों का रक्षण करने वाली, सुन्दर चरणों के विन्यास से भूतल को और सुन्दर वचनों की रचनाओं से वाणी को पवित्र करने वाली, याज्ञिकों से त्रिकाल पूजित हे माता! प्रणव स्वरूप तुझको नमस्कार है।”

या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी जुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिर्व्य जायत। एतद्वैतत्।

-कठ॰ 2। 1। 7

अर्थात्−‘‘जो देवतामयी अदिति प्राण रूप से प्रकट होती है तथा जो बुद्धि रूप से गुहा (हृदय) में स्थिति है और सब भूतों (पंचभूतों) के साथ उत्पन्न हुई है, उसे देखो। निश्चय ही यही वह तत्व है।’’

नमस्ते देवि गायत्रि, सावित्रि त्रिपदेऽक्षरे। अजरे−अमरे मातस्त्राहि मां भवसागरात्। नमस्ते सूर्य संकाशे सूर्य सावित्रि केऽयले। ब्रह्मविद्ये महाविद्ये वेद मातर्नमोस्तुते। अननन्त कोटि ब्रह्माण्डव्यापिनि ब्रह्मचारिणि॥

नित्यानन्दे महामाये परेशानि नमोस्तुते। त्वं ब्रह्मा त्वं हरिः साक्षात् सद्रस्त्वं चेन्द्र देवता। भिन्नस्तं वरुणस्त्वं च त्वमग्निरश्विनौ भगः। पूषाऽर्यमा मरुत्वांश्च ऋषियोऽपि मुनीश्वरा। पितरों नागयक्षाश्च गन्धर्वाप्सर सां गणाः। रक्षो भूतपिशाचा त्वमेव परमेश्वरि॥

ऋग्यजुः सामवेदा श्व अथर्वांगिरसानि च। त्वमेव पंच भूतानि तत्वानि जगदीश्वरि। ब्राह्मी सरस्वती सन्ध्या तुरीयां त्वं महेश्वरी। त्वमेव सर्वशास्त्राणि त्वमेव सर्व संहिताः। पुराणि च तन्त्राणि महागममतानि च। तत्सद् ब्रह्म स्वस्पा त्वं किञ्चित्सद सदात्मिका परात्परेशी गायत्री नमस्ते मातरम्बिके। चन्द्रे कलात्मिके नित्ये कालरात्रि स्वघेस्वरे॥

स्वाहाकारे अग्निवक्त्रेत्वां नमानि जगदीश्वरि। नमो नमस्ते गायत्रि सावित्रि त्वांनमान्यहम्। सरस्वति नमस्तुभ्यं तुरीये ब्रह्म रूपिणि।

−वशिष्ठ संहिता

हे देवि गायत्री, सावित्री, त्रिपदे, अक्षरे, अजरे, अमरे आपको नमस्कार है। मेरी भवसागर से रक्षा करें। हे सूर्य सदृश्य तेजस्विनी, सविता की शक्ति सावित्री, निर्मल, आपको नमस्कार है। ब्रह्मविद्या, महाविद्या, वेदमाता, अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों में व्याप्त, ब्रह्म में विचरण करने वाली, नित्य आनन्द स्वरूप, महामाया आपको नमस्कार है। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश,चन्द्र, मित्र, वरुण, अग्नि, अश्विनी कुमार, भग, पूषा अर्यमा मरुत हैं। आप ही ऋषि, मुनि, पितरनाग यक्ष गन्धर्व अप्सरा गण, भूत, पिशाच आदि में व्याप्त हैं। आप ही चारों वेदों में तथा अंगिरस मन्त्र में संव्याप्त हैं। पंचभूत एवं तत्व आप ही हैं। ब्राह्मी, सरस्वती, संध्या, तुरीयावस्था, महेश्वरी, आप ही हैं। समस्त शास्त्र, संहिताएँ, पुराण, तन्त्र महागम, यत, सत−असत् एवं ब्रह्म स्वरूप परात्पर आप को नमस्कार है। माता, अम्बिका, चन्द्रकला, नित्य, कालरात्रि स्वधा, स्वाहा, अग्निमुख, हे गायत्री सावित्री आपको बारबार नमस्कार है।

यह दृश्य जगत् पदार्थमय है। इसमें जो सौन्दर्य, वैभव, उपभोग सुख दिखाई पड़ता है वह ब्रह्म की अपरा प्रकृति का अनुदान है। यह सब गायत्री मय है। सुविधा की दृष्टि से इसे सावित्री नाम दे दिया गया है ताकि पदार्थ क्षेत्र में उसके चमत्कारों को समझने में सुविधा रहे। गायत्री की स्थूल धारा सावित्री को जो जितनी मात्रा में धारणा करता है वह भौतिक क्षेत्र में उतना ही समृद्ध सम्पन्न बनता जाता है। इस विश्व में बिखरी हुई शोभा सम्पन्नता को उसी महाशक्ति का इंद्रियों से अनुभव किया जा सकने वाला स्वरूप कह सकते हैं। इसकी चर्चा इस प्रकार हुई है−

ईश्वरोऽहम् च सूत्रात्माविराडात्माऽहमस्मि च। ब्रह्माऽहम् विष्णुरुद्रौ च गौरी ब्राह्मी च वैष्णवी। सूर्योऽहम् तारकाश्चाहं तारकेशस्तथाऽम्यहम्। यच्च किंचित्कवचिद्वस्तु दृश्यते श्रूयतेऽपि वा। अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्याहम् सर्वदा स्थिता।।

अपश्यस्ते महादेव्या विराड्रूपं परात्परम्। द्यौर्मस्तकं भवेद्यस्य चन्द्रसूर्यौ च चक्षुषी॥

दिशः श्रोत्रे वचो वेदाः प्राणो वायुः प्रकीर्तितः। विश्वं हृदयमित्याहुः पृथ्वी जघन स्मृतम्। नभस्तल नाभिसरो ज्योतिश्चक्रमूरः स्थलम्। महर्लोकस्तु ग्रीवा स्याज्जन लोको मुख स्मृतम्। तपोलोको रराटिस्तु सत्यलोकादधः स्थितः। इन्द्रादयो बाहवः स्युः शब्दः श्रोत्रं महेशितुः। नासत्यदस्रौ नासे स्तो गन्धो घ्राणं स्मृतो वुधैः। मुखमग्नि समाख्यातो दिवारात्री च पक्ष्मणी। एतादृशं महारुपं ददृशः सुरपुंगवाः। ज्वालामालासहस्राढ्यं लेलिहानं च जिह्वया। सहस्रशीर्षनयनं सहस्रचरणं तथा। कोटि सूर्य प्रतोकाश विद्युत्काटिसमप्रभम्। भयकरं महाघोरं हृदक्ष्णोस्व्रासकारकम्।

−देवी भागवत

मैं ही अणु, मैं ही विक्षु हूँ। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, गौरी, ब्राह्मी, वैष्णवी मैं ही हूँ। सूर्य चन्द्र, तारागण मैं ही हूँ। जो कुछ भी दिखाई पड़ता है या सुना जाता है जो कुछ भीतर बाहर है। उस सब में मैं ही व्याप्त हूँ।

देवताओं ने उसका विराट् रूप देखा। उसका मस्तक−आकाश, सूर्य−चन्द्रमा−नेत्र, दिशायें, कान, वेद−वाणी, वायु−प्राण, विश्व−हृदय, पृथ्वी−जंघा, पाताल−नाभि, महःलोक ग्रीवा, जनःलोक−मुख, सत्यलोक−अधः, तपोलोक−ललाट, इन्द्र−बाहु, शब्द−कान, अश्विनी कुमार−नासिका, गन्ध−नासिका, दिन−रात पलकें देखी।

देवताओं ने भगवती के ऐसे विराट् रूप के दर्शन किये। उसके शरीर में से असंख्य ज्वालाएँ निकल रही थीं। उसके हजारों सिर, हजारों नेत्र, हजारों चरण थे। करोड़ों सूर्यों और बिजलियों जैसी दीप्ति निकल रही थी।

शक्तिवान के साथ शक्ति जुड़ी होती है। यह ब्रह्म शक्ति का समन्वय युग्म है। प्रत्येक शक्तिवान की सामर्थ्य को उसी संव्याप्त क्षमता का स्वरूप कहा जा सकता है। इसे पति−पत्नी के रूप में उदाहरणों सहित चित्रित किया गया है। समर्थों की सामर्थ्य के रूप में विशिष्टों की विशेषता के रूप में इस महाशक्ति के दर्शन स्थान−स्थान पर किये जा सकते हैं। इसका अलंकारिक वर्णन देवी भागवत में इस प्रकार हुआ है।

ईशानपत्नी सपंत्तिः पूजिता च सुरैर्नरैः। सर्वे लोका दरिद्राश्च विश्वेषु च यया बिना। पुण्यपत्नी प्रतिष्ठा सा पूजिता पुण्यदा सदा। सुकर्मपत्नी संसिद्धा कार्तिधन्यैश्च पूजिता। क्रिया तूद्योगपत्नी च पूजिता सर्व संमता। शान्तिलज्जा च भार्ये द्वे सुशीलस्य च पूजिते। ज्ञानस्य तिस्रो भार्याश्च बुद्धिर्मेधा धृतिस्तथा। कालाग्नी रुद्रपत्नी च निद्रा सा सिद्धयोगिनी। कालस्य तिस्रो भार्याश्च संध्या रात्रिर्दिनानि च। निद्रा कन्या च तन्द्रा सा प्रीतिकन्या सुखाप्रिये। नैराग्यस्य च द्वे भार्ये श्रद्धा भक्तिश्च पूजिते। अहिल्या गौतमस्त्री साऽप्यनसूयाऽत्रिकामिनी।

−देवी भागवत

ईशान पत्नी सम्पत्ति तुम्हीं हो। तुम्हारे बिना समस्त संसार दरिद्र हो जाता है। पुण्य की पत्नी प्रतिष्ठ तुम्हीं हो। सुकर्म की पत्नी कीर्ति के रूप में तुम्हीं को देखा जाता है। उद्योग की पत्नी क्रिया−शील की दो पत्नियाँ शान्ति और लज्जा तुम्हारी ही प्रतीक हैं। ज्ञान की तीन पत्नियाँ बुद्धि, मेधा और धृति तुम्हीं हो। धर्म की पत्नी−कान्ति, रुद्र, पत्नी तुम्हीं हो। काल की संध्या, रात्रि और दिन के रूप में तुम्हीं दृश्यमान हो। वैराग्य की दो पत्नियाँ श्रद्धा और भक्ति के रूप में तुम्हीं पूजी जाती हो। बृहस्पति की पत्नी तारा, वशिष्ठ की पत्नी अरुन्धती, गौतम की पत्नी अहिल्या, अत्रि पत्नी अनुसूया तुम्हीं हो।

संसार में जितने भी अभाव और कष्ट हैं जितनी भी आधिक व्याधियाँ हैं उन सब को शक्ति की न्यूनता का प्रतिफल ही समझा जाना चाहिए। आत्म शक्ति के अभाव में मनुष्य की विचारणा निकृष्ट बनती है और प्रतिभा के अभाव में सुख−साधनों से वंचित रहना पड़ता अस्तु शक्ति संचय के निरन्तर प्रयत्न करने चाहिए भौतिक समर्थता किस प्रकार प्राप्त होती है इसे सब जानते हैं पर आत्मिक तेजस्विता किस प्रकार पाई जा सकती है इसका मार्ग अध्यात्म विज्ञान में बताया गया है। गायत्री साधना उसी के लिए की जाती है। शक्ति के अभाव में दुर्बलता और दुर्गति होने की चर्चा इस प्रकार आती है।

अनुमानमिदं राजन्कर्त्तव्यं सर्वथा बुधैः। दृष्ट्वा रोगयुतान्दीनान्क्षुधितान्निर्धनाञ्छठान्॥

जनानार्तास्तथा मूर्खान्पीडितान्वैरिभिः सदा। दासानाज्ञाकरान्क्षुद्रान्विकलान्विह्वलानथ। अतृप्तान्भोजने भोगे सदार्तांनजितेंद्रियान्। तृष्णाधिकानशक्तांश्च सदाधिपरिपीडितान॥

−देवी भागवत

हे राजन् तुम कहीं पर लोगों को रोगी, दीन दरिद्र भूखे−प्यासे, शठ, आर्त, मूर्ख, पीड़ित, पराधीन, क्षुद्र, विकल, विह्वल, अतृप्त, असंतुष्ट, इन्द्रियों के दास, अशक्त और मनोविकारों से पीड़ित देखो तो समझना इन्होंने शक्ति का महत्व नहीं समझा और उसकी उपेक्षा अवहेलना की है।

गायत्री उपासना आत्म शक्ति अभिवर्धन का सरल किन्तु श्रेष्ठतम उपाय है। जो इसके लिए प्रयत्न करते हैं वे समर्थ, सफल और सार्थक जीवन जी कर धन्य बनते हैं।


गुत्थियों के समाधान (kahani)

नगर सेठ अपनी गुत्थियों के समाधान में सहायता प्राप्त करने के लिए मन्दिर में पहुँचे। देवता को प्रसन्न करने के लिए वे थाल भर कर मोती और नैवेद्य लाये थे।

मन्दिर छोटा था। उसमें एक भक्त पहले से ही घुसा बैठा था। झरोखे में से झाँककर सेठ ने देखा तो वह फटे कपड़े वाला, अस्थिपिंजर जैसा कोई दरिद्र व्यक्ति था, पर वह कृतज्ञता और प्रसन्नता भरे अश्रु बिन्दु देवता के चरणों पर चढ़ाता हुआ प्रार्थना कर रहा था और कह रहा था कि धन्य है आप का वरदान कि मैं सुख की नींद सोता हूँ और कोई मुझे से ईर्ष्या नहीं करता।

सेठ ने पूजा तो की पर यह प्रश्न उसके मन में उफनता ही रहा। मैं इतने समय से पूजा करता आ रहा हूँ, पर मेरे ईर्ष्यालु बढ़ते ही जा रहे हैं और मेरा सुख−चैन घटता ही जा रहा है। कहाँ मेरी बहुमूल्य पूजा सामग्री और कहाँ इस दरिद्र के अकिंचन से उपहार? क्यों मेरी उपेक्षा और क्यों दरिद्र पर अनुग्रह?

संदेह को लेकर सेठ प्रधान याजक के पास पहुँचे। याजक ने देवता से पूछकर तीसरे दिन उत्तर देने को कहा।

तीसरे दिन अपने असंतोष का समाधान प्राप्त करने के लिए सेठ सवेरे ही याजक के पास जा पहुँचे। उनने देवता का अभिमत सुनाया−आप देवता पर सेवक की तरह काम करने का दबाव डालते हैं और दरिद्र ने उन्हें स्वामी मानकर अपने हृदय में उन्हें स्थान दिया हुआ है। सो देवता ने सेवक बनने वाले की अपेक्षा हृदय में स्थान देने वाले को अपना सच्चा वरदान देने का निश्चय किया है।

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हँसता हँसाता जीवन क्यों न जीया जाय?

किसी की आत्मा पर अनावश्यक भार लदा है या नहीं इसकी नाप−तौल इस आधार पर की जा सकती है कि वह कितना खिन्न, असन्तुष्ट रहता है अथवा हँसता−मुसकराता दिखाई पड़ता है। खीज, असन्तोष, रोष, उद्वेग से जलते−भुनते व्यक्ति को देखकर सहज ही यह कहा जा सकता है कि विकृत चिन्तन का शिकार है। इसकी जीवन नाव दृष्टि दोष के भँवर में फँसकर डूबने की तैयारी कर रही है। पटरी से उतरा हुआ इञ्जन जमीन में धँस जाता है, तब उसके लिए न आगे बढ़ना सम्भव होता है न पीछे हटना। कलपुर्जों की दृष्टि से उसकी बढ़ी−चढ़ी समर्थता तब निरर्थक सिद्ध होती है और वह अपने उद्धार के लिए क्रेन या जैक की सहायता चाहता है। रेलगाड़ी कीमती होती है। जैक की अपेक्षा इंजन अधिक शक्तिशाली भी होता है और अधिक मूल्यवान भी, पर वह बड़प्पन पटरी से उतर जाने की दशा में व्यर्थ है। चिन्तन की विकृति मनुष्य के चेहरे पर छाई खीज और मस्तिष्क में भरी उद्विग्नता के अनुपात से नापी, आँकी जा सकती है।

कठिनाइयों से रहित मनोवांछित परिस्थितियों और प्रियजनों से घिरा जीवन आज तक किसी का भी नहीं हुआ है। भविष्य में कोई सर्वांगपूर्ण सुविधा सम्पन्न मनुष्य इस संसार में जन्म ले सकेगा ऐसी आशा नहीं की जा सकती। भगवान के अवतार कहे जाने वाले राम, कृष्ण तक की जो दुर्दशा हुई वह सामान्य मनुष्य से अच्छी नहीं, वरन् बुरी ही रहीं। दूसरे अवतार, ऋषि, महापुरुष, ज्ञानी−विज्ञानी भी कठिनाइयों से घिरे और विपत्तियाँ सहन करते रहते हैं। महापुरुषों की महानता इसी आधार पर परखी जाती रही है कि उनने आदर्श और सुविधा में से किये चुना और अपनी चरित्र निष्ठा को कितनी कठिन कसौटियों पर कसे जाने के लिए कितनी प्रसन्नतापूर्वक प्रस्तुत किया।

धनी और दरिद्र−विद्वान और मूर्ख−पुण्यात्मा और पापी परिस्थिति वश अनुकूलता, प्रतिकूलता के झूले पर प्रकृति क्रम के अनुसार आगे पीछे झूलते रहते हैं। प्रारब्ध भोग, विधि−विधान, कर्मफल, समय चल आदि नाम कुछ भी दिया जाय लाभ−हानि, सुख−दुःख और यश−अपयश के अवसर हर किसी के जीवन में रात और दिन की तरह आते−जाते हैं। न उससे ज्ञानी बचते हैं न अज्ञानी। अनाचारी दुष्कर्मों के फलस्वरूप दण्ड भुगतते हैं और सदाचारी पुण्य−परमार्थ के लिए त्याग, बलिदान करते हुए सादगी, संयम और तपश्चर्या, जन्य कठिन परिस्थितियों में होकर गुजरते हैं। सुविधा−असुविधा की बहिरंग कसौटी पर कसने से कोई भी व्यक्ति अपने को सुखी नहीं कह सकता। पर दूसरी दृष्टि से देखने पर सुख सौभाग्य का उपभोग करने वाले इस संसार में कम नहीं हैं। इन सुखी लोगों में से प्रत्येक को विवेक दृष्टि प्राप्त होती है। वे अपने परिष्कृत दृष्टिकोण को हलके फुलके−हँसते खेलते स्वभाव में परिणत करते हैं और खिलाड़ी की स्प्रिट से प्रत्येक स्थिति में सन्तुलित रहने का प्रयत्न करते हैं।

ताश,शतरंज से लेकर−हाकी, पोलो या दूसरे विभिन्न खेलों के खिलाड़ी घड़ी−घड़ी में हारते−जीतते रहते हैं। कभी हार, कभी जीत की उलट−पुलट होती रहने से किंचित मुसकान या किंचित माथे पर सिकुड़न भर आती है, पर उससे उनके उत्साह में कोई फर्क नहीं पड़ता। हार में न वे रोते हैं और न जीत में उछलते हैं। नमक, शक्कर की तरह स्वाद बदलता रहता है, पर वह इतना हलका होता है कि मानसिक स्थिति पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता और विनोद का दुरंगा क्रम यथावत जारी रहता है। यदि हर काम को−हर बात को इसी दृष्टिकोण से देखा, समझा जाय और प्रतिकूलता−अनुकूलता को बहुत गम्भीरतापूर्वक न लिया जाय तो असन्तोष, उद्वेग से सहज ही बचा जा सकता है। उत्तेजना एवं किंकर्त्तव्यविमूढ़ता से बच निकलने वाला मस्तिष्क दूरदर्शी बना रह सकता है और प्रगति का पथ−प्रशस्त करने एवं प्रस्तुत कठिनाइयों से निपटने का रास्ता निकाल सकता है।

जिस प्रकार कठिनाई को वस्तुस्थिति की अपेक्षा अधिक बढ़ी−चढ़ी सोचने से उसका दबाव बढ़ जाता है और अनावश्यक परेशानी से मानसिक स्तर बे तरह गड़बड़ा जाता है, इसी तरह उसे वस्तुस्थिति की अपेक्षा कुछ हलकी गिना जाय तो जितनी चिन्ता होनी चाहिए उतनी न होगी। हलकी मनःस्थिति में एक तो चिन्ता के कारण होने वाली क्षति से बचाव हो जाता है और शान्त चित्त से उपयोगी गतिविधि का निर्धारण करना सरल हो जाता है। निश्चिन्तता, निर्भयता जैसे गुणों की इसलिए प्रशंसा की गई है कि वास्तविक कठिनाई आने पर उसका सामना कर सकने योग्य साहस और विवेक सुरक्षित बना रहता है। यदि संकट सिर पर आ ही जाय और उसे भुगतना ही पड़े तो भी हलकी मनःस्थिति वाला व्यक्ति उसे धैर्यपूर्वक सहन कर लेता है। वह सोचता है, जब अच्छे दिन नहीं रहे तो यह बुरे दिन भी बहुत समय तक क्यों टिकेंगे। समय बदलेगा, अच्छी स्थिति आवेगी और फिर नये सिरे से प्रयत्न करके प्रस्तुत हानि की क्षति पूर्ति कर लेंगे। अच्छे भविष्य की आशा करते हुए कठिन समय सरलतापूर्वक निकल जाता है जबकि अच्छा समय भी बुरे भविष्य की निराशाजनक कल्पनाएँ करते रहने पर भार रूप हो जाता है और सुखद वर्तमान का आनन्द लाभ ले सकना सम्भव नहीं रहता।

विपत्ति को टालने अथवा हलका करने का सबसे सस्ता और सबसे हलका नुस्खा यह है कि कठिनाई को हलकी माना जाय और उसके हल हो जाने पर विश्वास रखा जाय। सही एवं भरपूर प्रयत्न करना ऐसी ही मनःस्थिति में सम्भव हो सकता है। लड़खड़ाता हुआ चिन्तन तो और भी अधिक गहरे दलदल में फँसा देता है। उज्ज्वल भविष्य की आशा छोड़ दी जाय तो फिर चारों ओर अन्धकार ही अन्धकार दिखाई देगा और हलकी−सी कठिनाई को पार करना भी पहाड़ उठाने जैसा भारी मालूम पड़ेगा।

अनुकूल परिस्थितियाँ सामने आने पर ही प्रसन्नता अनुभव करने की आदत रही तो फिर जीवन में आनन्ददायक कुछ क्षण भी कदाचित ही मिल सकेंगे। कारण कि थोड़ा लाभ होते ही उससे बड़ी आकाँक्षा जग पड़ेगी और जो उपलब्ध हो सका है वह अपेक्षाकृत अपर्याप्त एवं असन्तोषजनक प्रतीत होगा। इच्छा की तुलना में उपलब्धि कम हो तो दुःख अनुभव होगा किन्तु यदि उपलब्धि से इच्छा कम हो तो सन्तोष ही नहीं आनन्द भी मिलेगा। उपलब्धियाँ उतनी मिल जायँ जितनी कि इच्छा हैं, यह कदाचित ही सम्भव होता है क्योंकि प्राप्तियाँ सीमित ही रहेंगी जबकि इच्छाएं क्षण भर बाद पहले की अपेक्षा बढ़कर कई गुनी हो सकती हैं। अस्तु इच्छा और तृप्ति का संतुलन कभी बनेगा ही नहीं। ऐसी दशा में यह तरीका सरल है कि उपलब्धियों की तुलना में इच्छा की सीमा घटा ली जाय और जो मिल सका है उसी में पूरा सन्तोष और आनन्द अनुभव किया जाय। दृष्टि पसारने पर ऐसे असंख्य व्यक्ति मिलेंगे जो अपनी तुलना में कहीं अधिक गई−गुजरी स्थिति में रहते हुए सन्तोष का जीवन जी रहे हैं। उन्हीं का अनुकरण करके हम भी अपनी प्रसन्नता को सदा सर्वदा−हर स्थिति में अक्षुण्ण बनाये रह सकते हैं।

उन्नति के लिए उत्साहपूर्वक प्रयास करना एक बात है और अपने आपको दीन दरिद्र अनुभव करना दूसरी। खिलाड़ी अधिक रन बनाने के लिए, पहलवान कुश्ती पछाड़ने के लिए, छात्र ऊँचा वज़ीफ़ा पाने के लिए प्रतियोगिता में उतरते हैं, प्रयत्न करते और विजय उपहार पाते हैं। पर इनके न मिलने तक अपने आपको दीन−दुःखी नहीं मानते रहते। उन्हें अपनी सामयिक स्थिति पर सन्तोष भी होता है और गर्व भी। फिर भी अधिक प्रसन्नता पाने−अधिक ऊँचे उठने के लिए प्रयत्न जारी रखते हैं। हमारे प्रयास प्रगति की दिशा में निरन्तर चलें, पर इसके लिए वर्तमान स्थिति को असन्तोष−जनक मानना और खिन्न रहना आवश्यक नहीं है।

हलकी−फुलकी, हर्षोल्लास एवं सन्तोष, आनन्द से जिन्दगी जीने की योजना बनानी चाहिए और इस मार्ग में जो−जो अवरोध हों उन्हें चुन−चुनकर मार्ग से हटाना चाहिए। विचार करने पर सबसे बड़ी−बड़ी अपने को अभावग्रस्त−कठिनाइयों से घिरा हुआ−विरोधी दुर्जनों के बीच रहता−भविष्य में विपत्ति की सम्भावनाओं से जकड़ा अनुभव करेंगे तो जी सदा खिन्न, उद्विग्न रहेगा। चिन्तन की इस निषेधात्मक धारा को विवेकपूर्ण पर्यवेक्षण से बहुत कुछ हलका किया जा सकता है। भविष्य में क्या होना है? किसी को पता नहीं, यदि यही बात हैं तो विपत्ति की आशंका करने की अपेक्षा उज्ज्वल सम्भावनाओं की कल्पना क्यों न की जाय और निराशा के स्थान पर आशा को क्यों न अपनाया जाय? साथियों के दोष ही दोष क्यों देखे जाय? उनमें जो गुण हैं उन्हें क्यों न समझें? उनके द्वारा जो क्षति हुई है उसी पर क्यों विचार करते रहें? जो सहयोग सद्भाव वे देते रहे हैं उन सुखद प्रसंगों का स्मरण क्यों न किया जाय? स्वजनों के दोष, दुर्गुणों को देखना, सुधारना उचित है, पर क्या वह कार्य डॉक्टर और रोगी की−वयस्क और बालक की भावना के साथ उदारतापूर्वक−बिना खोजे भी किया जा सकता है।

जो ईश्वर ने दिया है वह भी कम नहीं है। पशु−पक्षियों और दुःखी दरिद्रों की, रुग्ण अपंगों की तुलना में अभी भी अपनी स्थिति कही अच्छी हैं, इस पर मोद मनाया जा सकता है और अधिक प्राप्त करने के लिए उत्साह एवं आशा भरी मनःस्थिति से प्रयत्न जारी रखा जा सकता है। हमारा अधिकाँश मानसिक बोझ अवास्तविक और निराधार होता है। चिन्तन की विकृतियाँ ही हमें अशान्त बनाये रहती हैं। सन्तान न होने पर कितने ही व्यक्ति दुःखी रहते हैं जबकि उत्तरदायित्वों का बोझ हलका होने के कारण उन्हें सन्तान का भार वहन करने में बेतरह पिसते हुए लोगों की तुलना में अधिक प्रसन्न होना चाहिए था। इसी प्रकार अनेकों अनावश्यक महत्वाकाँक्षाएँ दुःखी बनाये रहती हैं। जिनके जीवन−क्रम का सामान्य निर्वाह क्रम रुकता नहीं। ऐसी अनावश्यक महत्वाकाँक्षाओं का− तृष्णाओं का बोझ आसानी से हलका किया जा सकता है और सादगी जीवन का आनन्द लिया जा सकता है। प्रस्तुत कठिनाइयों से लड़ा जाय, उन्हें हटाने के लिए पूरा कौशल प्रयुक्त किया जाय फिर भी यदि वे न हटें तो प्रारब्ध निपट जाने की बात सोची जा सकती है। अधिक सतर्कता बरतने−अधिक क्षमता जुटाने एवं अनुभव सम्पादित करने का अवसर भी उसे माना जा सकता है। दृढ़ता, साहसिकता, सन्तुलन आदि सद्गुणों की परीक्षा का अवसर भी उसे माना जा सकता है। अधिक विपत्तिग्रस्तों की तुलना में अपने को अधिक भाग्यशाली माना जा सकता है। कठिन समय में भी चिन्तन का परिष्कृत स्तर मन का भार हलका करने में बहुत सहायक सिद्ध हो सकता है। खोज करने पर प्रतीत होगा कि दुःखी मनःस्थिति का बहुत बड़ा कारण सही ढंग से सोच सकने में त्रुटि रहना ही था। उसे सुधार लेने पर अधिकाँश समस्याओं का हल मिल जाता है फिर भी जो रह जाय उसे हर किसी को कुछ न कुछ कमी, कठिनाई रहने के सामान्य क्रम को ऐसे ही हँसते−खेलते सहन किया जा सकता है।

इसी प्रकार अन्य अप्रिय प्रसंग हर किसी के जीवन में कभी न कभी घटित हुए ही होते हैं। यदि उन्हें ढूँढ़−ढूँढ़कर एकत्रित किया जाय और उन्हीं को स्मरण करते रहा जाय तो लगेगा कि सारी जिन्दगी दुःख, कष्ट सहते−सहते असफल बीत गई। इसके विपरीत यदि सुखद प्रसंगों को ढूँढ़ा जाय तो वे भी इतने अधिक दिखाई पड़ेंगे जिनके आधार पर सुखी जीवन जी लेने का गर्व किया जा सके। एक स्मृति दुःखी बनाती है और दूसरी के कारण होठों पर मुसकान दौड़ने लगती है। दोनों में से जिस का भी चुनाव करना हो प्रसन्नतापूर्वक किया जा सकता है।

हँसी−खुशी का हलका−फुलका जीवन शारीरिक, मानसिक,पारिवारिक, आर्थिक सभी पक्षों को प्रभावित करता है और सुखद सम्भावनाएँ विनिर्मित करने में भारी योगदान देता है। वह कठिन नहीं अति सरल है। चिन्तन में थोड़ा हेर−फेर करके हम खिन्न, उद्विग्न जीवन को हँसता−हँसाता बनाने में अभीष्ट सफलता प्राप्त कर सकते हैं।

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अवाँछनीयता की जड़ें काटनी पड़ेंगी।

पत्ता पीला पड़ा और झड़कर नीचे गिर पड़ा। देखने वालों ने उसे पत्ते का दोष और दुर्भाग्य बताया। पर जानने वालों ने जाना कि इस पतन को पूरे वृक्ष का परोक्ष समर्थन प्राप्त था। यदि वृक्ष के रसवाही तन्तु समर्थ रहे होते तो पत्ते के जोड़ ढीले न पड़ते और वह असमय इस प्रकार अपने परिवार से विमुख होकर धूल न चाट रहा होता। पर पूरे पेड़ में घुसी विकृति को दोष कौन दे, पत्ते को ही कोस देना पर्याप्त मान लिया गया।

मार्ग का एक पथिक ठोकर खाकर गिरा और दूसरों से उपहासास्पद बना। इस गिरने में वह असावधानी से चलने का दोषी ठहराया गया, पर द्रुतगामी पथिक ही कौन निर्दोष थे जो जल्दी मंजिल पार करने की धुन में रास्ते के पत्थर जहाँ के तहाँ पड़े छोड़ गये और उन्हें हटाने के लिए रुके नहीं।

कपड़े से गुलाबी ताना टूटता है तो दोष उसी को नहीं दिया जाता वरन् रुई की स्थिति, बुनाई की पूरी प्रक्रिया और मशीनरी की गहरी जाँच−पड़ताल करनी पड़ती है। पर मनुष्य समाज का विचित्र रिवाज है जो प्रत्येक दर्शक गुलाबी ताने को ही दोष देता चला आता है। ऐसा हुआ क्यों? खराबी कहाँ से उत्पन्न हुई यह कोई नहीं देखता।

बाह्याचरण में मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले पकड़े जाने पर घृणित ठहराये जाते हैं, पर उन पदासीनों को क्या कहा जाय जो दण्ड व्यवस्था तो करते हैं, पर अन्तःआचरण की दृष्टि से दण्डित लोगों की अपेक्षा अधिक गये गुजरे हैं। उस ठग की क्या समीक्षा की जाये जो दूसरों से ठगे जाने के उपरान्त ठगी का सरल धन्धा अपनाने के लिए अग्रसर हुआ? हत्यारों के लिए दंड व्यवस्था है फिर उनके लिए क्यों नहीं जो पग−पग पर आत्म−हनन करते हुए लम्बी जिन्दगी जी चुके।

खलील जिब्रान का यह कथन कितना सही है कि सारा मनुष्य समाज किसी उत्सव की शोभायात्रा की भीड़ की तरह एक साथ चल रहा है। चन्द लोगों का सम्पन्न बनना अन्य लोगों के लिए विपन्नता का पथ प्रशस्त करता है। तथाकथित मार्ग−दर्शक ही पथ भ्रष्ट करने के अधिक दोषी ठहराये जायेंगे।

अपराधों को रोका जाना चाहिए और अपराधियों को दण्ड दिया जाना चाहिए, इस उपचार से कोई असहमत नहीं, पर यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि अपराधों के विष वृक्ष की जड़ें काफी गहरी हैं। टहनी काटने से कुछ काम न बनेगा। कुल्हाड़ा तो उन जड़ों पर चलाया जाना चाहिए जो विषैले फलों को उत्पन्न करने के लिए वस्तुतः उत्तरदायी हैं।

चिन्तन के क्षेत्र में परिवर्तन किये जाने चाहिएं और प्रचलनों को बदलना चाहिए अन्यथा अपराधी दंड पाते रहेंगे और अपराध बढ़ते रहेंगे।

घर में घुसे चोर को भागते देखकर मकान मालिक चिल्लाया चोर पकड़ो−चोर पकड़ो वह भागा जा रहा है। चोर दूने जोर से−उन्हीं शब्दों को दुहराता हुआ दूसरों की तरफ इशारा करता गया और भीड़ में गायब हो गया। भीड़ असली चोर को पकड़ने के लिए इधर−उधर भगाती रही, पर वह किसी के हाथ न लगा और पकड़ने वाले भले मानसों की पंक्ति में सिर उठाये खड़ा−खड़ा चोर की निन्दा करता रहा।

ऐसी ही उपहासास्पद विडम्बना अपने पूरे समाज में चल रही है। दोष अमुक वर्ग या व्यक्ति को देने से और सीमित उपचार करने से काम न चलेगा। चिन्तन और प्रचलन का वह सारा ही ढाँचा बदलना पड़ेगा जो अवांछनीयताएँ उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी है।

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हमारा मस्तिष्क दिव्य शक्तियों का भण्डार

मानवी मस्तिष्क की छोटी सी थैली में इतना विशाल रत्न भण्डार भरा हुआ है कि उसका सदुपयोग कर सकने वाला देवोपम जीवन जी सकता है। बहुमूल्य वस्तुएँ हों पर उनका महत्व विदित न हो अथवा उपयोग न आता हो तो फिर उनका होना न होना बराबर है। वनवासी महिला को कीमती हीरा सड़क पर पड़ा मिल जाय तो वह उस सौभाग्य से कुछ लाभ नहीं ले सकती। बच्चे के हाथ देने पर उसे यह छोटा सा चमकदार पत्थर भर प्रतीत होगा और वह टुकड़ा जहाँ−तहाँ ठुकराया जाता भर रहेगा।

मस्तिष्क में सोचने की शक्ति रहती है, इसे हर कोई जानता है। अधिक जानकारी बढ़ाने के लिए पढ़ने, लिखने और सीखने−सिखाने का क्रम भी चलता है, उतने भर से भी पेट भरने और निर्वाह करने की सुविधा मिल जाती है। पर यदि इससे गहरा उतरा जा सके और चिन्तन को उत्कृष्टता के साथ जोड़ा जा सके तो सामान्य स्थिति का निर्धन व्यक्ति भी उस स्तर का बन सकता है जिसे सन्त, सज्जन एवं श्रद्धास्पद कहा जा सके।

प्रेरणा शक्ति मस्तिष्क में रहती है। चिन्तन की दिशा जिस ओर मुड़ती है उसी प्रकार की गतिविधियाँ विनिर्मित होने लगती हैं, कौन किस प्रकार का जीवन जी रहा है इसे देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उसकी चिन्तन धारा किस दिशा में बह रही है। जीवन का स्वरूप जो कुछ भी है, व्यक्ति के चिन्तन की प्रतिक्रिया भर है।

मस्तिष्क की गहराई में एक सीढ़ी और नीचे उतरा जाय तो प्रतीत होगा कि उससे मणि−मुक्त को का अजस्र भाण्डागार भरा पड़ा है। उसमें वह सब भी बहुत कुछ है, जिसे अद्भुत कह सकते हैं। यदि इन परतों को समझा जा सके और उनसे सम्बन्ध बनाकर उपयोग में लाया जा सके तो कोई भी व्यक्ति अपने को सामान्य स्थिति से ऊँचा उठाकर असामान्य बनने में सफलता प्राप्त कर सकता है।

मस्तिष्कीय संरचना पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि वह माँस−पिण्ड नहीं वरन् जीवन्त विद्युत भण्डार है। उसमें चल रही हलचलें ठीक वैसी ही हैं जैसी किसी शक्तिशाली बिजली घर की होती है।

खोपड़ी की हड्डी से बनी टोकरी में परमात्मा ने इतनी महत्वपूर्ण सामग्री संजोकर रखी है कि उसे जादू की पिटारी कहने में कोई अत्युक्ति नहीं होगी। शरीर के अन्य किसी भी अवयव की अपेक्षा उसमें सक्रियता, चेतना और संवेदनशीलता की इतनी अधिक मात्रा है कि उसे मानवीय सत्ता का केन्द्र बिन्दु कहा जा सकता है।

मस्तिष्क को दो भागों में विभक्त माना जा सकता है। वह जिसमें मन और बुद्धि काम करती है। सोचने, विचारने तर्क विश्लेषण और निर्णय करने की क्षमता इसी में है। दूसरा भाग वह है जिसमें आदतें संग्रहीत है और शरीर के क्रिया−कलापों का निर्देश निर्धारण किया जाता है। हमारी नाड़ियों में रक्त बहता है, हृदय धड़कता है, फेफड़े हैं श्वाँस−प्रश्वाँस क्रिया में संलग्न रहते हैं, माँस−पेशियाँ सिकुड़ती फैलती हैं, पलक झपकते−खुलते हैं, सोने−जागने का खाने−पीने और मलमूत्र त्याग का क्रम अपने ढर्रे पर अपने आप स्व संचालित ढंग से चलता रहता है, पर यह सब अनायास ही नहीं होता इसके पीछे वह निरन्तर सक्रिय मन नाम की शक्ति काम करती है जिसे अचेतन मस्तिष्क कहते हैं। इसे ढर्रे का मन कह सकते हैं। शरीर के यन्त्र अवयव अपना−अपना काम करते रहने योग्य कल−पुर्जों से बने हैं पर उनमें अपने आप संचालित रहने की क्षमता नहीं है, यह शक्ति उन्हें मस्तिष्क के इस अचेतन मन से मिलती है, विचारशील मस्तिष्क तो रात को सो जाता है, विश्राम ले लेता है नशा पीने या बेहोशी की दवा देने से मूर्छाग्रसित हो जाता है। उन्माद, आवेश आदि रोगों से ग्रसित भी वही होता रहता है। डॉक्टर इसी को निद्रित करके आपरेशन करते हैं। किसी अंग विशेष में सुन्न करने की सुई लगा कर भी इस बुद्धिमान मस्तिष्क तक सूचना पहुँचाने वाले ज्ञान तन्तु संज्ञा शून्य कर दिये जाते हैं फलतः पीड़ा का अनुभव नहीं होता और आपरेशन हो जाता है। पागलखानों में इस चेतन मस्तिष्क का ही इलाज होता है। अचेतन की एक छोटी परत ही मानसिक अस्पतालों की पकड़ में आयी है वे इसे प्रभावित करने में थोड़ा बहुत सफल होते जा रहे हैं। किन्तु उसका अधिकांश भाग प्रत्येक नियन्त्रण से बाहर है। पागल लोगों के शरीर की भूख, मल−त्याग, श्वाँस−प्रश्वाँस रक्त−संचार तथा पलक झपकना आदि क्रियायें अपने ढंग से होती हैं, मस्तिष्क की विकृति का शरीर के सामान्य क्रम संचालन पर बहुत कम असर पड़ता है।

मस्तिष्कीय क्रिया−कलाप जिन नर्व सैल्स् (तन्त्रिका कोशिकाओं) से मिलकर संचालित रहता है उनकी संख्या प्रायः दस अरब होती है। इन्हें आपस में जोड़ने वाले नर्व फाईबर (तन्त्रिका तन्तु) और उनके इन्सुलेशन खोपड़ी के भीतर खचाखच भरे हुए हैं। एक तन्त्रिका कोशिका का व्यास एक इंच के हजारवें भाग से भी कम है और उसका वजन एक औंस के साठ अरबवें भाग से अधिक नहीं है। तन्त्रिका तन्तुओं से होकर बिजली के जो इम्पल्स दौड़ते हैं वही ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से आवश्यक सूचनाएँ उस केन्द्र तक पहुंचाते हैं।

तन्त्रिका कोशाणु एक सफेद धागे तन्तु युक्त होता है यह तन्तु अन्यान्य न्यूरॉनों से जुड़ा होता है। इस प्रकार पूरा मस्तिष्क इन परस्पर जुड़े हुए धागों का एक तन्तु जाल बुना हुआ है। इन्हीं सूत्रों से वे परस्पर सम्बद्ध रहते हैं और अपने कार्यों एवं उत्तरदायित्वों का निर्वाह परस्पर मिल−जुलकर करते हैं।

मानवी मस्तिष्क के स्नायु कोश−नर्व सैल्स−लगभग 10 अरब की संख्या में हैं। संसार में इन दिनों मनुष्यों की आबादी चार अरब के करीब है। इस प्रकार समस्त संसार के मनुष्यों की तुलना में हमारे मस्तिष्क में बैठे हुए यह कोश ढाई गुने हैं। छोटे होते हुए भी इनकी क्षमता अपनी दक्षता के अनुरूप किसी परिपूर्ण मनुष्य से कम नहीं है। इस प्रकार मस्तिष्क रूपी संसार में संसार भर के मनुष्यों से कई गुनी आबादी बसी हुई हैं। मनुष्य लापरवाह और ढीले−पोले हो सकते हैं पर स्नायु कोश अपने क्रियाकलाप में तनिक भी शिथिलता नहीं बरतते।

इन दस अरब कोशों को अद्भुत विशेषताओं से सम्पन्न देव दानव कहा जा सकता है। इनमें से कुछ में तो माइक्रो फिल्मों की तरह न जाने कब−कब की स्मृतियाँ सुरक्षित रहती हैं। मोटेतौर पर जिन बातों को हम भूल चूके होते हैं वे भी वस्तुतः विस्मृत नहीं होतीं, वरन् एक कोने में छिपी पड़ी रहती हैं और जब अवसर पाती हैं वर्षा की घास की तरह उभरकर ऊपर आ जाती हैं। केनेडा के स्नायु विशेषज्ञ डॉ0 पैनफील्ड ने एक व्यक्ति का एक स्मृति कोश विद्युतधारा के स्पर्श से उत्तेजित किया। उसने बीस वर्ष पहले देखी हुई फिल्मों के कथानक और गाने ऐसे सुनाये मानों अभी−अभी देखकर आया हो।

मस्तिष्क की स्मरण रख सकने की अद्भुत क्षमता का परिचय जब तक मिलता रहता है। इससे उसकी स्थिति और सम्भावना का पता चलता है। किन्हीं−किन्हीं के मस्तिष्क की प्रखरता अनायास ही प्रकट हुई देखी गई है। किन्तु यह नहीं समझा जाना चाहिए कि वह विशेषताएँ उन्हीं तक सीमित थीं और वे ही कोई विलक्षण व्यक्ति थे। वस्तुतः यह सम्भावना हर किसी में समान रूप से विद्यमान है। किन्हीं लोगों में वह अनायास ही विकसित हुई होती है, पर अन्य लोग उसे प्रयत्नपूर्वक विकसित कर सकते हैं।

मस्तिष्क नियंत्रण प्रयोगों द्वारा डॉ0 जोजे डेलगाड़ो ने भी यह सिद्ध कर दिया कि मस्तिष्क के दस अरब न्यूरॉन्स के विस्तृत अध्ययन और नियन्त्रण से न केवल प्राणधारी की भूख, प्यास, कामवासना आदि पर नियन्त्रण प्राप्त किया जा सकता है वरन् किसी के मन की बात जान लेना, अज्ञात रूप से कोई बिना तार के तार की तरह संदेश और प्रेरणायें भेजकर कोई भी कार्य करा लेना भी संभव है। न्यूरॉन मस्तिष्क से शरीर और शरीर से मस्तिष्क में संदेश लाने, ले जाने वाले बहुत सूक्ष्म कोषों (सेल्स) को कहते हैं। इनमें से बहुत पतले श्वेत धागे से निकले होते हैं, इन धागों से ही इस कोषों का परस्पर सम्बन्ध और मस्तिष्क में जाल−सा बिछा हुआ है। यह कोष जहाँ शरीर के अंगों से सम्बन्ध रखते हैं वहाँ उन्हें ऊर्ध्वगामी बना लेने से प्रत्येक कोषाणु सृष्टि के दस अरब नक्षत्रों के प्रतिनिधि का काम कर सकते हैं, इस प्रकार मस्तिष्क को ग्रह नक्षत्रों का एक जगमगाता हुआ यन्त्र कह सकते हैं।

मस्तिष्क में इतनी जानकारियाँ भरी रहती हैं कि यदि किसी मानवकृत कंप्यूटर में उतना ज्ञान संग्रह किया जाय तो धरती के क्षेत्रफल जितने चुम्बकीय टेप की उसमें आवश्यकता पड़ेगी, किन्तु इसे उभारना उत्तेजित करना डी0 एन॰ ए॰ (डी0 आक्सीराइवो न्यूक्लिक एसिड, के यदि आर॰ एन॰ ए॰ (राइवोन्यू क्लिक एसिड) के एक इंजेक्शन से ही सम्भव हो सकता है। स्वीडन के गोडेनवर्ग यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक होलगर हाइडेन ने यह सिद्ध किया है कि मानवी मस्तिष्क की स्थिर पत्थर की लकीर नहीं है। उसकी क्षमता को रासायनिक पदार्थों की सहायता से घटाया−बढ़ाया और सुधारा−बिगाड़ा जा सकता है।

इसी प्रसुप्त क्षमता को विकसित करने के लिए योगाभ्यास की साधनाएँ प्रयुक्त होती हैं उनके कारण चिन्तन में उत्कृष्टता और प्रखरता उत्पन्न करने के दोनों प्रयोजन पूरे होते हैं।

मिशीवान विश्व विद्यालय के डॉ0 वर्नाड एग्रानोफ ने सुनहरी मछलियों पर यह प्रयोग किया कि उन्हें यदि भोजन के बाद प्यूरोनाइसिन नामक औषधि खिला दी जाय तो वे यह भूल जाती हैं कि वे भोजन कर चुकीं। कुछ कुत्तों को स्मृति नाशक दवा खिलाई गई तो वे अपने घर और मालिक को भी भूल गये, जिसे वे बहुत प्यार करते थे। यह प्रयोग अभी मनुष्यों पर एक सीमा तक ही सफल हुए हैं, दवा का असर रहने तक ही कारगर रहते हैं, पर सोचा यह भी जा रहा है कि किन्हीं प्रयोजनों की मृत्यु, अपमानजनक घटना, शत्रुता या भयंकर क्षति की चित्त को विक्षुब्ध करते रहने वाली दुःखद घटनाओं को स्थायी रूप से विस्मृत कराने के लिए मस्तिष्क के उस भाग को मूर्छित कर दिया जाय जहाँ वे जमकर बैठी हुई हों। इसी प्रकार मन्द बुद्धि लोगों के लिए स्मरण शक्ति बढ़ाने के उपाय औषधि जगत में खोजे जा रहे हैं यदि यह सफल हो सके तो छात्रों को पाठ याद करने के श्रम से छुटकारा मिल जायगा और वे एक बार पुस्तक पढ़कर ही परीक्षा भवन में पूरे उत्साह और विश्वास के साथ प्रवेश कर सकेंगे।

पोर्सन ग्रीक भाषा का अद्वितीय पण्डित था, उसने ग्रीक भाषा की सभी पुस्तकें और शेक्सपियर के नाटक मुख जबानी याद कर लिये थे। ब्रिटिश संग्रहालय के सहायक अधीक्षक रिचर्ड गार्नेट बारह वर्ष तक एक संग्रहालय के मुद्रित पुस्तक विभाग के अध्यक्ष थे, इस संग्रहालय में पुस्तकों की हजारों अलमारियां और उनमें करोड़ों की संख्या में पुस्तकें थीं। श्री गार्नेट अपनी कुर्सी पर बैठे−बैठे न केवल पुस्तक का ठिकाना बता देते थे, वरन् पुस्तक की भीतरी जानकारी भी देते थे।

इस छोटी सी कोठरी को एक प्रकार से बहुमूल्य रत्नों से भरी हुई तिजोरी कहा जा सकता है। इस पोटली में इतना कुछ भरा है जिसका सहज ही मूल्याँकन नहीं किया जा सकता। दुःख इसी बात का है कि बाहर के जड़ पदार्थों के सम्बन्ध में बहुत कुछ खोजा जाता है और उनका संग्रह तथा उपयोग−उपभोग करने की ललक लगी रहती है, पर अन्तर्जगत में दृष्टि डालकर यह नहीं देखा जाता कि अपने भीतर कितनी बहुमूल्य सम्पदा भरी पड़ी है। बाहर से जो कुछ जितने श्रम के जितने मनोयोग के मूल्य पर प्राप्त किया जा सकता है उससे कहीं कम प्रयत्न से अन्तर्जगत खोजा जा सकता है और कहीं अधिक पाया जा सकता है।

ऐलेक्ट्रिकल स्टीम्यूलेशन आफ ब्रेन (ई॰ एस॰ बी॰) पद्धति के अनुसार कई एशियन विश्वविद्यालयों ने आँशिक रूप से मस्तिष्क की धुलाई (ब्रेन वाशिंग) में सफलता प्राप्त कर ली है। अभी यह बन्दर, कुत्ते, बिल्ली, खरगोश, चूहे जैसे छोटे स्तर के जीवों पर ही प्रयोग किये गये हैं। आहार की रुचि, शत्रुता, मित्रता, भय, आक्रमण आदि के सामान्य स्वभाव को जिस प्रकार चरितार्थ किया जाना चाहिए उसे वे बिलकुल भूल जाते हैं और विचित्र प्रकार का आचरण करते हैं। बिल्ली के सामने चूहा छोड़ा गया तो वह आक्रमण करना तो दूर उससे डरकर एक कोने में जा छिपी। क्षणभर में एक दूसरे पर खूनी आक्रमण करना, एक आध मिनट बाद परस्पर लिपट कर प्यार करना यह परिवर्तन उस विद्युत क्रिया से होता है जो उनके मस्तिष्कीय कोषों के साथ संबद्ध रहती है। यही बात मनुष्यों पर भी लागू हो सकती हैं। मानव मस्तिष्क अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत होता है उसमें प्रतिरोधक शक्ति भी अधिक होती है इसलिए उसमें हेर−फेर करने के लिए प्रयास भी कुछ अधिक करने पड़ेंगे और पूर्ण सफलता प्राप्त करने में देरी भी लगेगी, पर जो सिद्धान्त स्पष्ट हो गये हैं, उनके आधार पर यह निश्चित हो गया है कि मनुष्य को भी जैसा चाहे सोचने मान्यता बनाने और गतिविधियाँ अपनाने के लिए विवश किया जा सकता है। निर्धारित रसायन तत्वों को पानी में घोलकर पिलाया जाता रहे तो किसी तानाशाह शासक की इच्छानुकूल समस्त प्रजा बन सकती है। फिर विचार−प्रसार की आवश्यकता न रहेगी वरन् अन्न, जल, औषधि आदि के माध्यम से कुछ रसायन भर लोगों के शरीर में पहुँचाने की आवश्यकता पड़ेगी, वे मस्तिष्क में पहुँच कर वैसा ही परिवर्तन कर देंगे जैसा वैज्ञानिकों या शासकों को अभीष्ट होगा, तब घोर अभाव−ग्रस्त स्थिति में भी जनता अपने को रामराज्य जैसी सुखद स्थिति में अनुभव करती रह सकती है। यदि लड़ाकू पीढ़ी बनानी हो तो उस देश का हर नागरिक दूसरे देशों पर आक्रमण करने के लिए आतुर हो सकता है।

वैज्ञानिकों की दृष्टि में हर विचार−हर आकांक्षा और हर अनुभूति एक विद्युत हलचल अथवा रासायनिक प्रक्रिया है। इस क्रिया−कलाप का इलेक्ट्रो एनिसोफेलो ग्राफ (ई. सी. जी.) यन्त्र द्वारा जाना जा सकता है और यह समझा जा सकता है कि मस्तिष्क में किस स्तर की विचारधारा प्रवाहित हो रही है।

यह चिन्तन का परिष्कार हुआ। मनोविकारों को धोया जा सकता है और मस्तिष्क की स्थिति ऐसी बन सकती है जिसमें मात्र देवत्व का ही साम्राज्य हो। यह प्रयत्न रासायनिक पदार्थों और विद्युत धाराओं के आधार पर भौतिक विज्ञानियों द्वारा किये जा रहे हैं। अध्यात्म विज्ञान द्वारा यह कार्य और भी अधिक ऊँचे एवं उपयोगी ढंग पर किया जाना सम्भव है।

कुछ वर्ष पूर्व इच्छा शक्ति के चमत्कारों का प्रत्यक्ष प्रदर्शन करने के लिए डॉ0 राल्फ एलेक्जेण्डर ने एक सार्वजनिक प्रदर्शन मैक्सिको नगर में किया था। इस प्रदर्शन में प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्रों के प्रतिनिधि और अन्यान्य वैज्ञानिक, तार्किक, बुद्धिजीवी तथा संभ्रांत नागरिक आमन्त्रित किये गये थे। प्रदर्शन यह था कि आकाश में छाये बादलों का किसी भी स्थान से−किसी भी दिशा में हटाया जा सकता है और उसे कैसी ही शक्ल दी जा सकती है। बादलों को बुलाया और भगाया जा सकता है।

नियत समय पर प्रदर्शन हुआ। उस समय आकाश में एक भी बादल नहीं था। पर प्रयोगकर्त्ता ने देखते−देखते घटाएँ बुला दीं और दर्शकों की माँग के अनुसार बादलों के टुकड़े अभीष्ट दिशाओं में बखेर देने और उनकी विचित्र शक्लें बना देने का सफल प्रदर्शन किया। इस अद्भुत प्रदर्शन की चर्चा उन दिनों अमेरिका के प्रायः सभी अखबारों में मोटे हैडिंग देकर छपी थी।

उपरोक्त प्रदर्शन पर टिप्पणी करते हुए एक प्रसिद्ध विज्ञानी एलेन एप्रागेट ने ‘साइकोलॉजी’ पत्रिका में एक विस्तृत लेख छापकर यह कहा गया कि मनुष्य की इच्छा शक्ति अपने ढंग की एक सामर्थ्यवान विद्युतधारा है उसके आधार पर प्रकृति की हलचलों को प्रभावित कर सकना पूर्णतया विधि सम्मत है। इसे जादू नहीं समझा जाना चाहिए।

यह हुई मस्तिष्क की प्रखरता। इसे यदि समझा जा सके और आन्तरिक अनैतिकता को समुन्नत किया जा सके तो उसका परिणाम वैसा ही हो सकता है, जैसा कि भूतकाल के योगी और तपस्वियों ने अपनी अलौकिकताएँ प्रकट करते हुए सिद्ध किया था।


Quotation

यदि तू मस्तिष्क को शान्त रख सकता है तो तू विश्व पर विजयी होगा।

−गुरुनानक देव

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अपने भाग्य−भविष्य का निर्माण हम स्वयं ही करते हैं।

दूसरों की सहायता से अपनी सुविधाएँ बढ़ती हैं और उनके असहयोग एवं आक्रमण से अपनी प्रगति का मार्ग अवरुद्ध होता है−विद्वेषी लोग विपत्ति खड़ी करते हैं और सहयोगी सुखद सम्भावनाएँ उत्पन्न करते हैं। यह तथ्य सर्वविदित है। सहयोगी हर किसी की इच्छा यही रहती है कि उसके सहयोगी बढ़ते रहें और विद्वेषी घटते जायँ। इस स्वाभाविक आकाँक्षा की पूर्ति का जो सही तरीका हैं उससे बहुत कम लोग परिचित होते हैं। यही बहुत बड़े दुर्भाग्य की बात है। अनुभव हीन प्रयास में भटकते हुए पैर कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं। और भटकाव के कारण उलटे उलझन में फँसते तथा कष्ट सहते हैं।

संसार का सुस्थिर सनातन शाश्वत नियम यह है कि व्यक्ति का स्तर अपने स्तर की ओर आकर्षित होता है और आकर्षित करता है। चुम्बक लोहे के टुकड़ों को अपनी और खींचता है और लौह चूर्ण चुम्बक की ओर दौड़ता है। चोरों के पास चोर, जुआरियों के पास जुआरी, नशेबाजों के पास नशेबाज ढूँढ़ते, टटोलते जा पहुँचते हैं और परस्पर घुल−मिलकर अपने ढंग का ताना−बाना बुनते हैं। ठीक यही बात साधु, सज्जन, सद्गुणी लोगों के सम्बन्ध में लागू होती है। उनके भी सत्संग जुड़ते और जमाते बनती हैं और सदुद्देश्य पूरा करने वाली योजनाओं को कार्यान्वित करने के प्रयास चलते हैं। उस समूह में भी सहयोगियों की संख्या बढ़ती ही जाती है। दूसरी ओर चोर दुराचारियों के गिरोह भी बढ़ते और मजबूत होते जाते हैं। यह समान स्तर के लोगों का समान स्तर वालों के साथ जुड़ते घुलते जाने के सिद्धान्त का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

धातुओं की खदानें क्रमशः बढ़ती ही जाती हैं इसका कारण यह है जहाँ जितनी धातु जमा होती है वहाँ उस स्तर का उतना ही चुम्बकत्व बढ़ता है और वह अपने सजातीय धातु कणों को दूर−दूर तक धूलि में पड़े बिखरे होने पर भी प्रभावित करता है, उस आकर्षण से वे खिंचते चले आते हैं और जहाँ धातु की खदान थी वहाँ इकट्ठे होते रहते हैं। खदानें इसी आधार पर दिन−दिन विस्तृत होती रहती हैं। यह सिद्धान्त मनुष्यों पर भी लागू होता है। उनका आन्तरिक चुम्बकत्व सजातियों को अपनी ओर खींचता रहता है और तरह−तरह के समूह बनते रहते हैं। अपने गुण, कर्म, स्वभाव के अनुरूप जिस स्तर का व्यक्तित्व विनिर्मित होता है उसी प्रकार के व्यक्ति घनिष्ठ बनते चले जाते हैं और फिर उनके संयोग में जो प्रतिक्रिया होनी चाहिए वह होती है। दुष्ट−दुर्जनों के मिलने पर एक प्रकार की हलचलें उत्पन्न होती हैं और स्नेही, सज्जनों का सद्भाव सम्पन्न आदान−प्रदान चल पड़ता है। देखने में यह दोनों परिस्थितियाँ एक दूसरे से भिन्न हैं और ईश्वरीय कोप अथवा अनुग्रह का परिचय देती है। तो भी वे एक ही क्रम व्यवस्था के कारण उत्पन्न हो रही होती हैं। अपना दूषित व्यक्तित्व दूसरे दुर्जनों को एकत्रित कर रहा होता है अथवा अपनी सज्जनता दूसरे सज्जनों को आमन्त्रित करने में जुटी होती है। एक स्थिति में विग्रह और अनाचार उत्पन्न होता है दूसरी में स्नेह, सहयोग की वर्षा होती है। यह भिन्नताएँ अपनी भीतरी स्थिति की ही प्रतिध्वनियाँ−प्रतिच्छाया हैं, मालूम ऐसी होती है मानो कहीं बाहर से वे अप्रत्याशित रूप से आ धमकी हैं।

हर मनुष्य के अन्दर कुछ न कुछ अच्छाई और कुछ न कुछ बुराई पाई जायगी। उनमें से जिस भी अंश का हम स्पर्श करेंगे वही अपने लिए फलप्रद बन जायगी। गाय दूध भी देती है और गोबर भी। अपनी रुचि जिसमें होगी वही खोजा जायगा और वही मिलेगा। बगीचे में फूल भी रहते हैं और गन्दगी भी। भौंरे फूलों का आनन्द लेते हैं गुबरीले कीड़ों को सारे उद्योग में गन्दगी के ही ढेर लगे मिलते हैं। अपनी रुचि के अनुरूप हम किसी भी व्यक्ति के दुर्गुणों के, सद्गुणों के सम्पर्क में आते हैं और उसी के सम्पर्क की प्रतिक्रिया अनुभव करते हैं। हरा चश्मा पहन लेने पर हमें वस्तु हरे रंग की दीखती है, पर उसे बदलकर लाल रंग का पहन लें तो सब कुछ लाल रंग का दिखाई पड़ने लगेगा। चश्मे की तरह ही दृष्टिकोण का प्रभाव होता है। सन्त, सज्जन इस संसार को विराट् ब्रह्म के रूप में देखते हैं और “सियाराम मय सब जग जानी” की भावना से लोक−मंगल में निरत रहते हैं। इसके विपरीत दोष दृष्टि भरी रहने से यह विश्व भवसागर दिखाई पड़ता है और सर्वत्र पाप अनाचार की असुरता, आधि−व्याधि की बहुलता ही दिखाई पड़ता है।

स्वर्ग किसी स्थान विशेष का नाम नहीं है। किसी लोक विशेष में वैसी इमारतें या परिस्थितियाँ नहीं हैं जैसी कि स्वर्ग का वर्णन करते हुए कथा−पुराणों में बताई गई हैं। न किसी ग्रह−नक्षत्र में वैसा नरक है जैसा यमदूतों द्वारा उत्पीड़न दिये जाने के कथा−विवरणों में बताया जाता है। इन दोनों का अस्तित्व इसी लोक में है और हर व्यक्ति के दाँये−बाँये साथ−साथ चलता है। जब चिन्तन की धारा उत्कृष्ट और क्रिया−प्रक्रिया आदर्श होती हैं तो अन्तःकरण में अपार संतोष और आनन्द भरा रहता है। कस्तूरी के हिरन को अपनी नाभि की महक से दशों दिशाएँ सुगन्धित दीखती हैं। यही स्वर्ग है। दर्पण में अपना ही प्रतिबिम्ब दीखता है। अपनी सज्जनता बाहर के लोगों की श्रद्धा, सहानुभूति एवं सहायक योगदान लेकर वापस लौटती है। ऐसे व्यक्ति घटिया व्यक्तियों, वस्तुओं तथा परिस्थितियों के बीच भी उल्लास भरा वातावरण विनिर्मित कर लेते हैं। यही स्वर्ग का सृजन हुआ। सन्त इन्फर्सन कहा करते थे−‘‘मुझे नरक में भेज दो मैं वहीं अपने लिए स्वर्ग बना लूँगा।’’ इस कथन में ठोस सत्य भरा हुआ है। सज्जन अपनी प्रखर उत्कृष्टता के सहारे सम्पर्क में आने वाले हर जड़ चेतन को अपने अनुरूप बहुत कुछ बदल लेते हैं, यदि अभीष्ट परिवर्तन न हो सके तो वे अपने व्यवहार को मैत्री, करुणा, उपेक्षा की त्रिविधि नीति अपनाकर कामचलाऊ ताल−मेल बिठा लेते हैं। सुविकसित लोगों के साथ मैत्री, दुःखियों के साथ करुणा और अवाँछनीय लोगों के साथ उपेक्षा का व्यवहार करते हुए टकराव बच सकता है और अपनी सौम्य प्रवृत्ति सुरक्षित रह सकती है।

ठीक इसी प्रकार नरक का सृजन है। दुर्बुद्धि वाले मनुष्य अपनी दूषित दृष्टि और दुष्प्रवृत्तियों के कारण अच्छे वातावरण के बीच भी विक्षोभ उत्पन्न करते हैं। तंग करने पर भोली गाय भी लात मारती है। अनुचित छेड़खानी करने पर सरल लोगों को भी क्रोध आता है और वे भी कठोरता बरतने पर उतारू हो जाते हैं।

अपने से अधिक सम्पन्न लोगों के साथ तुलना करने पर दरिद्रता लदी दीखेगी और दुर्भाग्य का दुःख होगा। इसके विपरीत यदि अपने से अभावग्रस्त लोगों अथवा कठिनाइयों से संत्रस्तों के साथ तुलना की जाय तो फिर अपनी स्थिति पर सन्तोष व्यक्त करते और ईश्वर को धन्यवाद देते ही बनेगा। दरिद्रता और सम्पन्नता स्वयं में कुछ भी नहीं। वे सापेक्ष हैं। ऊँची स्थिति से तुलना करते हुए हम दरिद्र बन जाते हैं और गिरी स्थिति के मुकाबले में सम्पन्न लगते हैं। इस तुलना मापदण्ड में थोड़ा हेर−फेर करके कोई भी दरिद्र अपने को सम्पन्न और कोई भी सम्पन्न अपने को दरिद्र अनुभव कर सकता है।

परिस्थितियाँ नहीं मनःस्थिति ही हमें नरक में डुबोती हैं और स्वर्ग के शिखर पर चढ़ाती हैं। नरक को नीचे पाताल में बताया गया है और स्वर्ग को ऊपर आसमान में। इसका तात्पर्य इतना ही है कि पतित और निष्कृष्ट व्यक्तित्व अपनी दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों के कारण दुःखद अनुभूतियों और परिस्थितियों से घिरा रहता है और यमदूतों द्वारा उत्पीड़न दिये जाने जैसी पीड़ा सहता है। यह यमदूत और कोई नहीं अपने ही कुविचार हैं। अपना आपा ही नरक है गया−गुजरा स्तर भीतर ही भीतर जलता है और बाहर से प्रतिकूलताएँ सहता है। यही यमदूतों का दण्ड प्रहार है।

ठीक इसी प्रकार स्वर्ग का सृजन भी मनुष्य के अपने हाथ में है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाकर कोई भी मनुष्य आन्तरिक प्रसन्नता और बाहर से सज्जनों का सद्भाव−सम्पन्न सहयोग पाकर यह अनुभव कर सकता है कि वह स्वर्गीय आनन्द का रसास्वादन कर रहा है। ऊर्ध्वगमन− ही स्वर्गारोहण है। पाण्डव इसी शान्त शीतलता की तलाश में हिमालय की चोटियों पर चढ़े थे। इस उपाख्यान में यह अलंकार व्यक्त किया गया है कि जितनी अधिक मात्रा में उत्कृष्टता अपनाई जायगी, अपनी स्थिति दूसरों की तुलना में उतनी ही ऊँची उठ जायगी और उतनी ही मात्रा में शान्त शीतलता का अनुभव होगा। स्वर्ग इसी प्रकार पाया जाता है।

दूसरे सहायता तो करते हैं पर वह उसी दिशा में होती है जिसमें कि अपना प्रवाह बहता है। यदि अपनी दिशा पतन की ओर चल रही है और दुर्गुणों, दुर्व्यसनों, में लिप्त है तो उसी प्रकृति के लोग अपने इर्द−गिर्द जमा होते चले जायेंगे और पतन की गति और भी तीव्र बनाने में पूरी−पूरी सहायता करेंगे। इसके विपरीत यदि अपनी यात्रा सदुद्देश्य की दिशा में सत्प्रवृत्तियाँ अपनाये हुए चल रही हैं तो उस स्तर के सहयोगियों की भी कभी न रहेगी। श्रेष्ठ सज्जन ऊँचा उठाने और आगे बढ़ाने का मार्ग−दर्शन एवं सहयोग देने के लिए भी कहीं न कहीं से मिल ही जायेंगे। इस प्रकार अपने प्रयास की सफलता और भी सरल हो जायगी। पतन और उत्थान में से किसी एक को चुनना अपना काम है। जैसा निश्चय होगा उसी के अनुरूप चुम्बकत्व उत्पन्न होगा और उसी स्तर के सहयोगियों को आमन्त्रित करके प्रगति क्रम में तीव्रता उत्पन्न कर लेगा।

दूसरों से सहयोग की अपेक्षा करने में कोई हर्ज नहीं, वह मिलता भी है और मिलना भी चाहिए। पर एक बात सदा ध्यान में रखकर चलना होगा कि अपने स्तर के अनुरूप ही यह बाहरी सहयोगी जुटाया जा सकेगा। रात भर भले ही पानी बरसता रहे, पर अपने को उसका उतना ही लाभ मिलेगा। जितना बड़ा बर्तन पास में हो। पात्रता से अधिक बाहरी सहायता मिलती भी कहाँ है? दरिद्र, भिखारियों को कौन सोने की मुहरें बाँटता है उनके पल्ले दो पाँच पैसे के सिक्के ही पड़ते हैं। इसके विपरीत महत्वपूर्ण कार्यों के लिए प्रभावशाली व्यक्ति, प्रयोजन की गरिमा समझाकर लाखों रुपया चन्दा इकट्ठा कर लेते हैं। जो दानी, घिनौने, भिखमंगे को उपेक्षापूर्वक दस पैसे का सिक्का फेंकता है, वही व्यक्ति दूसरे सत्पात्र को खुशी−खुशी सौ रुपये का नोट थमा देता है। इस अन्तर में दानी की उदारता को न्यूनाधिक के रूप में नहीं प्राप्तकर्त्ता की पात्रता को−घट−बढ़ को ध्यान में रखते हुए समझा जाना चाहिए।

परावलम्बन की−दूसरों की गुलामी की सर्वत्र निन्दा की गई है। स्वावलम्बन को−आत्म−निर्भरता को मनीषियों ने भरपूर सराहा है। स्वर्ग की भाँति मुक्ति को भी सर्वोच्च आध्यात्मिक सफलताओं में गिना गया है। मुक्ति का अर्थ है−बन्धन से−परावलंबन से छूटना और स्वावलम्बी बनना। इस दृष्टिकोण को अपनाते ही अनेक महान सत्यों का रहस्योद्घाटन होता है और मनुष्य को विश्वास हो जाता है कि अपनी भली−बुरी परिस्थितियों के लिए पूर्णतया हम स्वयं ही जिम्मेदार हैं। भगवान ने अपने भाग्य निर्माण का दायित्व पूरी तरह हमारे हाथ में सौंपा है। चिन्तन और कर्तृत्व के दोनों पैरों के सहारे से किसी भी दिशा में− कितनी ही लम्बी यात्रा भली प्रकार कर सकते हैं। दूसरे तो यत्किंचित् सहारा भर ही दे सकते हैं। उनके बलबूते कोई बड़ी योजना बनाना और उसके पूरा होने का स्वप्न देखना निरर्थक है।

यदि हम स्वास्थ्य, शिक्षा, सम्पन्नता, सम्मान, सफलता से वंचित रहते हैं तो इसके लिए दूसरों को दोष देना व्यर्थ है गहराई से उन कारणों को तलाश करना चाहिए जिनके द्वारा विपन्नता, विनिर्मित होती है। आलस्य, प्रमाद, उपेक्षा, उदासीनता, आवारागर्दी जैसे दुर्गुणों में लोग अपनी अधिकाँश शक्तियाँ नष्ट करते रहते हैं, महत्वपूर्ण कार्य करने के लिए उनका श्रम, समय, मनोयोग लगता ही नहीं, फिर वे सफलताएँ कैसे मिलें जो प्रगाढ़ पुरुषार्थ का मूल्य माँगती हैं। असफलताओं का दोष भाग्य, भगवान, ग्रह−दशा अथवा सम्बन्धित लोगों को देकर मात्र मन को बहलाने की आत्म प्रवंचना की जा सकती है− उसमें तथ्य तनिक भी नहीं हैं। संसार के प्रायः सभी सफल मनुष्य अपने पुरुषार्थ से आगे बढ़े हैं उन्होंने कठोर श्रम और तन्मय मनोयोग का महत्व समझा है। यही दो विशेषताएँ जादू की छड़ी जैसा काम करती हैं और घोर अभाव की−घोर विपन्नताओं की परिस्थितियों के बीच भी प्रगति का रास्ता बनाती हैं। सफल मनुष्यों में से प्रत्येक के जीवन पर गहरी दृष्टि डालने से यही तथ्य उभरता दिखाई पड़ेगा कि वे अपनी साहसिकता और श्रमशीलता के सहारे ही आगे बढ़े हैं। उठने वाले या गिरने वाले को उनकी दिशा में प्रोत्साहन देना संसार का काम है। बाहर की कोई शक्ति किसी को उठाती, गिराती नहीं। यह सब पूर्णतया अपनी स्थिति पर निर्भर है।

यह भ्रम जितनी जल्दी हटाया जा सके उतना ही अच्छा है कि कोई देव, दानव, मन्त्र−तन्त्र, गुरु, सिद्ध पुरुष, मित्र, स्वजन, धनी, विद्वान हमारी कठिनाइयाँ हल कर देंगे या हमें सम्पन्न बना देंगे। इस परावलम्बन से अपनी आत्मा कमजोर होती है और अन्तःकरण में छिपी प्रचण्ड आत्म−शक्ति को विकसित होने में भारी अड़चन पड़ती है। अस्तु परावलम्बी मनोवृत्ति को जितनी जल्दी छोड़ा जा सके−आत्म−निर्भरता को जितनी दृढ़ता से अपनाया जा सके उतना ही कल्याण है।

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औषधियों की गुलामी स्वीकार न करें।

अप्राकृतिक आहार−विहार अपनाकर ईश्वर प्रदत्त सुदृढ़ शरीर यन्त्र को बीमार करना− बीमारी के कारणों को दूर न करके जीवनी शक्ति को नष्ट करने वाली औषधियों पर निर्भर होना−ऐसा कुचक्र है जिससे रोगों की जड़ कटती नहीं वरन् और भी अधिक मजबूत होती है।

दवाओं के मारक गुण केवल बीमारी को ही नहीं मारते वरन् उनकी दुधारी तलवार जीवनी शक्ति पर भी चलती है जो हमारे आरोग्य और दीर्घजीवन की आधार शिला है।

अव्यवस्थित और अनुपयुक्त रहन−सहन अपनाने से शरीर में जो टूट−फूट होती है उसकी क्षतिपूर्ति का प्रायश्चित्य ही रोग कष्ट के रूप में दिखाई पड़ता है। ऐसे अवसरों पर उचित यही है कि शरीर पर अनावश्यक भार डालना बन्द करें, विश्वास करें और रुग्ण पाचन प्रणाली की थकान मिटाने के लिए उपवास जैसे तरीके अपनायें। इस सीधे मार्ग को छोड़कर तात्कालिक दर्द मिटाने की आवश्यकता पूरी करने के लिए तीव्र दवाओं के प्रयोग की धूम मचा दी जाती है। इससे तत्काल तो कुछ चैन पड़ता है पर वह क्षणिक राहत पीछे बहुत कष्टकारक सिद्ध होती है। रोग की विषाक्तता दवाओं की विषाक्तता के साथ मिलकर रोगी को एक प्रकार से सदा के लिए अपने चंगुल में फंसा लेती है।

इस वस्तुस्थिति को समझने का जिनने भी प्रयत्न किया है उन्होंने दवाओं की निर्भरता से बचने का−औचित्य समझाया है और कहा है−‘‘समयानुसार औषधियों का न्यूनतम उपयोग तो किया जा सकता है, पर उनका उन्मूलन करने के लिए उस भूल को सुधारना चाहिए जिसके कारण रोगों की उत्पत्ति होती है।’’

इंटर नेशनल फेडरेशन आफ हाइजिनिस्ट ने अब से 100 वर्ष पूर्व लिखे हुए डॉ0 रसल टी0 ट्राल के विचार प्रकाशित कराये हैं। लेखक महोदय अपने समय के अति प्रख्यात और प्रामाणिक डॉक्टर थे पर पीछे उन्हें औषधि चिकित्सा से अरुचि हो गई और रोगियों को केवल अपने आहार−विहार में परिवर्तन की शिक्षा देकर उनकी कष्ट निवृत्ति में महत्वपूर्ण सहायता देते रहे। उनने रोगियों को औषधियों का अन्ध भक्त बनाये जाने की तीव्र भर्त्सना की है और कहा है कि जो डॉक्टर लोग के कारण तलाशने और उससे छुटकारे का चिरस्थायी मार्ग नहीं बताता और मात्र औषधि देकर टाल देता है वह रोगी के प्रति अपने नैतिक कर्त्तव्य का पालन नहीं करता।

डॉ0 इरासम्स डार्विन ने लिखा है−‘‘मेरा विश्वास है कि निकट भविष्य में चिकित्सा जगत में एक क्राँति होने वाली है। चिकित्सक अगले दिनों दवाओं का उपयोग अनिवार्य स्थिति में ही करेंगे। उनका मुख्य काम रोगी की उन भूलों का पता लगाना होगा जिनके कारण कि उसे बीमार पड़ना पड़ा। चिकित्सक भूल को सुधारने भर का परामर्श दिया करेंगे और यह बताया करेंगे कि प्रकृति के अनुरूप चलने के अतिरिक्त स्वास्थ्य संकट के निवारण का और कोई उपाय नहीं है।

डॉ0 जे॰ एच॰ टिल्डन माने हुए ऐलोपैथ सर्जन थे। उन्होंने वृद्धावस्था में औषधि चिकित्सा छोड़कर रोगियों को मात्र स्वास्थ्य परामर्श देने का धन्धा बदल लिया था। वे कहते थे हम डॉक्टर लोग बीमारी की दवा तो देते हैं, पर उन बुरी आदतों से नहीं रोकते जो बीमारी के मूल में चट्टान की तरह अड़ी बैठी हैं। जब तक जड़ को न काटा जायगा पत्ते तोड़ने से कोई उपयुक्त समाधान नहीं निकलेगा।

डॉ0 मेलविल कीथ ने अपनी पुस्तक ‘रायल रोड टू हैल्थ’ पुस्तक में बताया है कि दवाओं पर अधिकाधिक निर्भर रहने की प्रवृत्ति लोगों को दिन−दिन जीवनी−शक्ति रहित बनाती जा रही है इसका परिणाम उन्हें अन्ततः चिरस्थायी रुग्णता के रूप में भुगतना पड़ेगा और समय से पूर्व ही मरने के लिए बाध्य होना पड़ेगा।

डॉ0 डबल्यू एन॰ ह्वाइट कहते हैं−‘‘चिकित्सा के नये आधार खड़े किये जाने चाहिए जिनमें रुग्णता के कारणों का निवारण करने का परामर्श एवं दबाव मुख्य होना चाहिए।’’

इंग्लैंड के सम्राट् सप्तम एडवर्ड के शाही चिकित्सा सर फ्रेडरिक ट्रेवर्स का परामर्श था कि जो डॉक्टर दवाओं की निरर्थकता को समझते हुए इलाज करता है असल में वही सच्चा डॉक्टर है।

प्रो0 ईवान्स के अनुसार डॉक्टर का अर्थ है−ज्ञानवान आचार्य। शारीरिक रोगों की कष्ट निवृत्ति के सम्बन्ध में उन्हें चाहिए कि रोगी को उन पापों से मुक्ति दिलाये जिनके कारण वह अब बीमार होकर आया है और भविष्य में फिर इसी प्रकार बीमार पड़ता रहेगा।

डॉ0 मेजान्डी, डॉ0 विलियम हार्वर्ट, डॉ0 फील्डिंग, डॉ0 विलियम ब्राउन आदि अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के चिकित्सा शास्त्री इस बात पर जोर देते हैं कि वर्तमान जादूगरी के आधार पर टिकी हुई चिकित्सा पद्धति में आमूल−चूल सुधार होना चाहिए और अनुभव किया जाना चाहिए कि सामयिक रोग पीड़ा को हटा देना ही चिकित्सा का उद्देश्य नहीं है। सच्चा इलाज वह है जो रोग मुक्त रहने की रीति−नीति को गले में उतार सके, जिसके कारण किसी को बीमार ही न होना पड़े और बीमार पड़ भी जाय तो डाक्टरों का सहारा न लेना पड़े।

प्रो0 एच॰ जी0 कॉक्स ने लिखा है−− “बीमारों की बुद्धिमानी इस बात में है कि वे कम से कम औषधियाँ सेवन करें।”

प्रो0 जे0 एन॰ कारसन का कथन है−− अच्छे होने वाले रोगियों के बारे में हम यह नहीं कह सकते कि वे दवाओं से ही अच्छे हुए हैं। वस्तुतः प्रकृति हर रोग के निवारण में तत्परतापूर्वक लगी रहती है और अधिकतर रोगी उसी की कृपा से अच्छे होते हैं। श्रेय मुफ्त में ही औषधियों को मिल जाता है।

योगी अरविंद तथा श्री माताजी के लेखों का एक संग्रह ‘ए प्रेक्टिकल गाइड टु इन्टीरिगल योग’ पुस्तक रूप में छपा है। उसमें एक स्थान पर श्री अरविन्द ने व्यक्त किया है−ऐलोपैथी के लिए मेरे मन में कोई स्थान नहीं है। डॉक्टर लोगों में आवश्यकता से अधिक मात्रा में औषधियाँ देने की प्रवृत्ति पाई जाती है। रोगों के मूल कारण पर ध्यान देकर रोगी को अपना आचरण सुधारने पर वे जोर नहीं देते। दवाओं के चमत्कारी गुणों का अन्ध−विश्वास उनके मन में भरा रहता है। यही उनकी चिकित्सा की मूलभूत त्रुटि है जिनके कारण उस इलाज से लाभ के स्थान पर हानि ही अधिक होती है। शरीर की निरोधात्मक जीवनी−शक्ति घटाने के कारण यह इलाज अन्ततः घाटे का सौदा ही सिद्ध होता है।

महात्मा गाँधी ने लिखा है−थोड़ी भी तबियत खराब होने पर हकीम, डाक्टरों के पास दौड़ने की हमारी आदत हो गई है। हम लोगों का ऐसा विश्वास है कि बिना औषधि प्रयोग के बीमारी अच्छी नहीं हो सकती। यह एक महान भूल है जिसके फलस्वरूप अनेकों नई विपत्तियाँ सामने आ खड़ी होती हैं। रोगों का उपचार तो होना चाहिए, पर उसमें औषधि प्रयोग व्यर्थ है। व्यर्थ ही नहीं कुछ अवस्थाओं में तो वह जीवन और स्वास्थ्य के लिए भयावह भी है।

लंका में आयुर्वेद अनुसन्धानशाला का उद्घाटन करते हुए भारत के प्रधान मन्त्री पं0 जवाहरलाल नेहरू ने कहा था−‘‘मैं बहुत समय से औषधि सेवन से बचता आया हूँ।’’ खासकर विषाक्त औषधियाँ तो लेता ही नहीं और मैं सलाह देता हूँ कि किसी को ऐसी औषधियाँ नहीं लेनी चाहिए। स्वास्थ्य खराब होने पर मैंने औषधियों का सेवन किया तो उनसे लाभ हुआ या नहीं मैं नहीं कह सकता। हो सकता है कि मैं बिना औषधि सेवन के भी अच्छा हो जाता परन्तु औषधि सेवन के पश्चात जो प्रतिक्रिया हुई वह निश्चित रूप से मुझे अच्छी नहीं लगी।

मुझे जीव नाशक−एन्टीबायोटिक औषधियाँ तो बिलकुल पसन्द नहीं। मैं यह तो नहीं कहता कि वे बीमारी से भी अधिक खराब होती है, पर बहुत कुछ वैसी ही होती हैं। आजकल जो चमत्कारिक औषधियों का रिवाज चल पड़ा है वह तो बड़ा ही भयंकर है। कुछ औषधियों ने लाभ अवश्य पहुँचाया है, पर उनका भी अन्धाधुन्ध प्रयोग समाज की अपार क्षति कर चुका है। मैं चाहता हूँ कि अवाँछनीय औषधि व्यवसाय को रोकने के लिए कुछ किया जाय। मुझे यह बिलकुल पसन्द नहीं कि मानव समाज की पीड़ाएँ धनोपार्जन का साधन बनाई जायँ।

डॉ0 जूल्स दुवोस ने अपनी पुस्तक ‘मिराज आफ हैल्थ’ में लिखा है− उतावली में कुछ भी दवा लेने की अपेक्षा यह अच्छा है कि प्रकृति द्वारा रोग निवारण की प्रतीक्षा में बहुत समय तक बिना औषधि सेवन के ही रहा जाय।

फार्नहम हास्पिटल, सारे इंग्लैंड के मूर्धन्य चिकित्सक डॉ0 जान टाड ने उस देश के प्रख्यात पत्र डेली एक्सप्रेस में एक लम्बा लेख छपाकर चिकित्सक वर्ग से अनुरोध किया था कि वे रोग कीटाणुओं का स्वरूप और उनके मारक रसायन निर्धारित करने के दायरे से आगे बढ़ें और दूरगामी दृष्टि अपनाकर यह देखें कि व्यक्ति क्यों रोगी पड़ा और उस कारण के निवारण के लिए उसे अपने ढर्रे में क्या परिवर्तन करना पड़ेगा? जब तक रोगी और चिकित्सक जीवनचर्या में परिवर्तन करने की आवश्यकता अनुभव न करेंगे तब तक रोगों के उन्मूलन की दिशा में कोई प्रगति न हो सकेगी।

एक और अनुभवी स्वास्थ्य शास्त्री डॉक्टर हेरकल कृत्सर का लेख “हैल्थ एण्ड फ्रीडम” पत्रिका में छपा था जिसमें उनने लिखा है−बीमारियाँ सिर्फ इस बात का प्रमाण हैं कि शरीर गत जीवनी−शक्ति विजातीय द्रव्य को बाहर निकालने में जुटी हुई हैं। यह खतरे की नहीं भविष्य में अच्छी स्थिति आने की सूचना है। खतरनाक तो वे आदत हैं जो विषाक्त तत्वों को शरीर में उत्पन्न और जमा करती हैं। ध्यान उस गहराई पर दिया जाना चाहिए अन्यथा सामयिक लीपा−पोती से कोई स्थिर समाधान न निकलेगा।

न्यूयार्क कालेज के प्रो0 अलेक्जेण्डर स्टीवन्स और इंग्लैंड के शरीर शास्त्री डॉ. जानमेसन्ट दोनों ही इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि वर्तमान चिकित्सा पद्धति तक सीमित रहकर केवल रोगों के रूप, स्थान एवं कष्ट में हेरा−फेरी की जा सकती है। रोगों के उन्मूलन में कोई सहायता नहीं मिल सकती है। मेडीकल प्रेक्टिस एण्ड क्राइम’ ग्रन्थ में अँधेरे में ढेले फेंकते रहने वाले औषधि विज्ञान को अपराधों की श्रेणी में रखने का प्रयत्न किया गया है।

हमें दवाओं का अन्ध−भक्त, अन्ध−विश्वासी नहीं बनना चाहिए। विशेषतया ऐलोपैथिक दवाएँ तत्काल चमत्कार दिखाकर पीछे रोगी के शरीर को सदा के लिए विषाक्त बना दे उस खतरे से तो बचना ही चाहिए। रोगों का मूल कारण आहार−विहार की असावधानी है, उसे जब तक नहीं सुधारा जायगा चिरस्थायी स्वास्थ्य की प्राप्ति हो ही नहीं सकेगी।


नेता लूथरकिंग (kahani)

अमेरिका के नीग्रो नेता लूथरकिंग की गोरों द्वारा हत्या कर डालने के पाप का प्रायश्चित्य इंग्लैंड के पादरी ने अनोखे ढंग से किया।

पादरी जैक एडरिल ने अपने गाँव आकर टेड के गिरजे में 10 काली जाति के बालकों को आमन्त्रित किया उनके पांव धोये और घुटने टेककर पाप के प्रायश्चित्य की प्रार्थना करते रहे।

पादरी ने कहा−हर गोरे का कर्त्तव्य है कि वह इस प्रकार की बर्बरता को अपना जातीय पाप समझे और उसके हटाने के लिए सच्चे मन से प्रयत्न करे।

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शक्ति का अजस्र स्रोत−आत्मविश्वास

स्वामी रामतीर्थ ने कहा था “कि धरती को हिलाने के लिए धरती से बाहर खड़े होने की आवश्यकता नहीं है, आवश्यकता है आत्मा को जानने की। आत्मशक्ति का ही दूसरा नाम आत्मविश्वास है। जिसका साक्षात्कार करके कोई भी आदमी धरती को हिला सकता है।” विवेकानन्द, बुद्ध, ईसा सुकरात और गाँधी ने इसी प्रचण्ड आत्मशक्ति का सहारा लेकर उन्नति की है। महात्मा गाँधी के विपक्ष में शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य था। भारतवासी सदियों की पराधीनता, अशिक्षा और जड़ता के मारे हुए थे। भारतवासियों के दुःख के आँसू गाँधी से देखे न गये और उन्होंने अपनी दृढ़ संकल्प शक्ति तथा आत्मविश्वास के सहारे वैभवशाली ब्रिटिश साम्राज्य को परास्त किया। स्वामी विवेकानन्द जब संन्यासी वेश धारण कर अमेरिका गये थे तो लोगों ने उनका मजाक बनाया था किन्तु बाद में उन्होंने अपने आत्म−विश्वास से−महिमा मण्डित व्यक्तित्व से−जो कुछ किया वह अद्वितीय है।

आत्म−विश्वास के आगे दुनिया की बड़ी से बड़ी शक्ति झुकती रही हैं और झुकती रहेगी। विश्वास होने से ही आत्मा और परमात्मा में एकता उत्पन्न होती है। जिससे हमारे अन्तःकरण में अनन्त शक्ति एवं ज्ञान का सूर्योदय होता है। आत्म−विश्वास वह अद्भुत शक्ति है जिसके सहारे मनुष्य हजारों विपत्तियों का सामना अकेला कर सकता है, अपनी मंजिल तक पहुँच सकता है।

मानव जाति की उन्नति का श्रेय ऐसे ही महापुरुषों को है जिनका आत्म−विश्वास असीम था। उन्होंने ऐसे रास्ते तय किये जिनमें असफलता ही दीख पड़ती थी, किन्तु फिर भी उन्होंने विश्वास न छोड़ा और सफलता उपलब्ध की। आत्म−विश्वास का जीवन में महत्वपूर्ण स्थान है। यह वह पदार्थ है, जिससे हमें निराशा में भी आशा की झलक दीखती है। दुःख में भी सुख का आभास होता है और इससे हम बड़े से बड़े कार्य सम्पन्न कर सकते हैं।

हमारी समस्त शारीरिक और मानसिक शक्तियों की बागडोर आत्म−विश्वास के हाथ में है। जब तक आत्म−विश्वास रूपी सेनापति आगे नहीं आता है तब तक अन्य सारी शक्तियाँ भी सुप्तावस्था में पड़ी रहती हैं। जैसे ही आत्म विश्वास जागृत होता है, अन्य शक्तियाँ भी उत्साहित होकर उठ खड़ी होती हैं और आत्म−विश्वास के सहारे चौगुना काम करने लगती हैं।

किसी भी कार्य की सफलता विश्वास पर टिकी रहती है। करो या मरो की भावना से ओत−प्रोत होकर हम किसी कार्य को प्रारम्भ करेंगे तो विजय श्री दौड़ी चली आयेगी। विश्वास के अभाव में ही दुनिया की बहुत सी श्रेष्ठतम् उपलब्धियों से हम वंचित रह जाते हैं। असफलताओं का कारण यह है कि लोग अपनी महत्ता को नहीं पहचान पाते हैं और अपने को अयोग्य समझते हैं। जब हम पहले ही अपने को अयोग्य, असमर्थ और अभागा समझेंगे तो फिर हम योग्य समर्थ और सौभाग्यशाली कैसे बन सकते हैं? बड़े−बड़े काम कर सकने में समर्थ होने वाले व्यक्ति भी अपनी पूरी शक्ति से अपरिचित होने के कारण उसका सदुपयोग नहीं कर पाते हैं, वास्तविकता यह है कि बहुत कम लोग अपनी शक्तियों का मूल्य समझ नहीं पाते हैं और उनका उपयोग करते हैं।

व्यक्ति जब अपने अन्दर छिपी हुई शक्तियों के स्रोत को जान लेता है तो वह भी देव तुल्य बन जाता है। ज्यों ही हमारे अन्दर विश्वास जागृत होता है आत्मा में छुपी हुई शक्तियाँ प्रस्फुटित हो उठती हैं। हमारे अन्दर से श्रेष्ठ विचार महत्वपूर्ण कार्य के रूप में परिणित हो जाते हैं इसके विपरीत अविश्वास करने से शक्ति के स्रोत सूख जाते हैं और हम दीन तथा दरिद्र बने रहते हैं। अपने ऊपर विश्वास करना ईश्वर पर विश्वास करना है। इस शक्ति से मनुष्य लघु से विराट् बन जाता है। क्षुद्र तो हम तभी बनते हैं जब अपने को क्षुद्र मान लेते हैं। मनुष्य अपने को जैसा समझ लेता है वैसा ही बन जाता है।

जो व्यक्ति अपने को मिट्टी का समझता है वह अवश्य कुचला जाता है। धूल पर सभी पाँव रखते हैं किन्तु अंगारों पर कोई पैर नहीं रखता है। जो व्यक्ति कठिन से कठिन कार्यों को भी अपने करने योग्य समझते हैं, अपनी शक्ति पर विश्वास करते हैं, वे अपने चारों ओर अपने अनुकूल परिस्थितियाँ ही उत्पन्न कर लेते हैं। जिस पल व्यक्ति दृढ़तापूर्वक किसी कार्य को सम्पन्न करने का निश्चय कर लेता है, तो समझना चाहिए आधा कार्य पहले ही पूर्ण हो गया। दुर्बल प्रकृति के व्यक्ति केवल स्वप्न ही देखते रहते हैं किन्तु सबल व्यक्ति अपने स्वप्नों को कार्य रूप में परिणित कर दिखाते हैं।

जहाँ शक्तिशाली दो हाथ आगे बढ़ते हैं वहाँ दस हाथ सहयोग करने के लिए भी आगे आ जाते हैं। कार्य की नींव आत्म−विश्वास है। हम इस नींव को विश्वास के जल से सीचेंगे तो अवश्य ही उच्च कार्य सम्पन्न करने में सफलता मिलेगी। दृढ़−निश्चयी मनुष्य सदा आगे ही बढ़ता है उसके कदम पीछे नहीं हटते हैं।

छोटे से बीज में विराट् शक्ति छुपी रहती है। यही बीज जब खेत में बोया जाता है तब उपयोगी खाद पानी प्राप्त कर बड़े वृक्ष के रूप में प्रस्फुटित होता है। उसी तरह से मनुष्य के अन्दर भी समस्त सम्भावनायें एवं शक्तियाँ बीज रूप में छुपी हुई हैं जो विवेक रूपी जल के अभिसिंचन तथा श्रेष्ठ विचारों की उर्वरा खाद को पाकर जागृत होती हैं। यदि व्यक्ति अपने अन्दर की अमूल्य शक्ति एवं सामर्थ्य को जान लेने में सक्षम हो तो वह गाँधी, अर्जुन, बुद्ध, सुकरात एवं विवेकानन्द हो सकता है।

मनुष्यों की संगठित शक्ति यदि श्रेष्ठ मार्ग पर चल पड़े तो विश्व की कायापलट भी हो सकती है। आश्चर्य होता है कि जिन कार्यों के लिए हम कभी आशा भी नहीं कर सकते वह कार्य जादू की तरह पूरे होते जाते हैं।

मनुष्य शक्ति का भण्डार है यह तो ठीक है किन्तु वह इससे लाभान्वित तभी हो सकता है जब वह उसका सही सदुपयोग करे। मनुष्य के पास बोलने की शक्ति है। यदि वह समय, परिस्थिति, एवं श्रेष्ठता का ध्यान रखते हुए बोलता है तो वह वाणी के सहारे दुनिया में बहुत कुछ कर सकता है किन्तु वाणी की शक्ति को ध्यान में रखे बिना अनर्गल, व्यर्थ की बकवास और बिना सोच विचार कर बोलना उसका दुरुपयोग ही है।

व्यक्ति आज अशक्त हो अन्धेरे में भटक रहा है। वह रास्ता ढूँढ़ रहा है किन्तु यदि हमें अपनी शक्तियों का ज्ञान हो जाए तो दुःख, भय, चिन्ता, आपत्ति, शोक, द्वेष आदि दुष्ट मनोविकार हमारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते हैं तथा हमारे जीवन पर इनका कोई प्रभाव न पड़ेगा, किन्तु खेद है कि हम अपनी शक्ति को भूलकर आसानी से इन दुष्टों के चंगुल में फँस जाते हैं। जिससे जीवन भार बन जाता है।

जीवन भार बन कर जीने के लिए नहीं है। उसे श्रेष्ठता पूर्ण ढंग से जीना चाहिए। यह तभी सम्भव है जब व्यक्ति पंगु विचारों को अपने मन में घर न करने दें क्योंकि इससे शक्ति का प्रवाह बन्द हो जाता है। भगवान ने मनुष्य को शक्तियाँ इसलिए प्रदान की हैं कि वह उनका सदुपयोग कर ऊँचा उठे और दूसरों को भी ऊँचा उठा सके, इसी में मनुष्य जीवन की सार्थकता है।

सफलता के बारे में हमारा विश्वास अधूरा नहीं होना चाहिए। उसमें कहीं दरार या छिद्र नहीं होने चाहिए। सफलता के बारे में तिल मात्र भी सन्देह हो तो समझना चाहिए कि प्रयत्न में शिथिलता है। शिथिलता होने से सफलता दूर चली जायगी। जब तक किसी कार्य में हम अपनी समस्त शक्तियाँ लगा नहीं पाते, मन एकाग्र नहीं करते तब तक वह कार्य पूर्ण नहीं हो सकता है। जितना कठिन कार्य है उसके लिए उतने ही दृढ़ विश्वास एवं निरन्तर प्रयत्न की आवश्यकता होती है। ईश्वरी सत्ता भी उन्हीं की सहायता करती है जो स्वयं प्रयत्नशील होते हैं।

सतत−परिश्रम, आत्मविश्वास एवं दृढ़ निश्चय के आगे कुछ भी असंभव नहीं है। इन्हीं गुणों के प्रकाश में संसार में प्राण फूँकने वाले कार्य सम्पन्न हुए। विद्वानों, शूरवीरों, महापुरुषों, धर्म प्रवर्तकों के ज्वलन्त उदाहरण हैं कि उन्होंने आत्म−विश्वास के आधार पर क्या नहीं कर दिखाया?

छोटी−छोटी बैटरियाँ जल्दी समाप्त हो जाती हैं किन्तु जिन बत्तियों का सम्बन्ध पावर हाउस से होता है वह निरन्तर जलती रहती हैं। हम भी आत्म−विश्वास के साथ अकूत शक्ति के भण्डार परमात्मा से सम्बन्ध बनायें। विचारों को प्रशस्त करें। स्वार्थ से दूर रहें, दृष्टि का विस्तार करें। सद्गुणों को धारण करें। सद्गुणी होकर ही हम संसार में गौरव एवं सम्मान के पात्र बन सकते हैं।

गीता में लिखा है! ‘नात्मानमवसादयेत्’ (आत्मा का अपमान न करें) आप अपने अन्दर जिस तरह के विचार रखेंगे वैसा ही आपका आचार−व्यवहार बनेगा। जैसा व्यवहार होगा वैसी ही परिस्थितियाँ सामने आ खड़ी होंगी।

श्रेष्ठ पथ पर नियोजित व्यक्तियों की शक्तियाँ श्रेयस्कर परिणाम उपस्थित करती हैं। लोग उन्हें भाग्य का चमत्कार समझते हैं। पर वास्तव में वह व्यक्ति की दृढ़निष्ठा एवं आत्म−विश्वास का परिणाम ही होती हैं। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। अपने अन्दर शक्तियाँ सुप्तावस्था में पड़ी हुई हैं। उन्हें प्रयत्न पूर्वक जगाया जाय। जिस दिन मनुष्य इस तथ्य को समझ लेगा उस दिन वह अनन्त शक्ति का भण्डार बन जाएगा। सुख और सफलता का मूल यही आत्म विश्वास है।


राजा उदयन (kahani)

राजा उदयन की रानी ने बुद्ध संघ को पाँच सौ चादरे दान दीं। उन्हें ले जाने के लिए प्रधान भिक्षु आयुष्मान् आनन्द जब राजमहल पहुँचे तो राजा ने उनका समुचित सत्कार किया और भेंट के वस्त्र वाहन पर लादकर उनके साथ भिजवाने की व्यवस्था कर दी।

जब आयुष्मान् आनन्द चलने लगे तो राजा ने जिज्ञासा की निवृत्ति के लिए विनोद शब्दों में पूछा−भन्ते, इतनी चादरों का आप लोग क्या करेंगे?

उत्तर में आयुष्मान् ने कहा−जिन भिक्षुओं के चीवर फट गये हैं उनमें इनको वितरित करेंगे।

प्रश्नोत्तर का सिल−सिला आगे चल पड़ा। उदयन पूछते गये और आनन्द उत्तर देते गये। भिक्षु लोगों के फटे−पुराने चीवरों का क्या होगा? उनसे बिछौनों की चादर बनावेंगे। बिछौनों की जो फटी पुरानी चादरें उतरेंगी उनका क्या होगा? उनमें से छाँटकर तकियों के गिलाफ बनाये जायेंगे। फिर पुराने गिलाफों का क्या होगा? उनकी जोड़ गाँठ कर गद्दी का भराव और झाड़न का प्रयोजन पूरा किया जायगा। पुराने भराव और झाड़नों का क्या होगा? उन्हें गारे में कूटकर इमारतों पर किये जाने वाले पलस्तर में उपयोग कर लिया जायगा।

राजा उदयन को बुद्ध संघ की अर्थ नीति पर पूरा संतोष हो गया और उनने अपनी राज्य व्यवस्था में भी उसी स्तर की मितव्ययिता एवं वस्तुओं को रद्दी न जाने देने की आज्ञा जारी कर दी।

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गायत्री के 24 अक्षरों में सन्निहित दिव्य शक्तियाँ

गायत्री के तीन चरण हैं और 24 अक्षर। ॐकार और तीन व्याहृतियाँ मन्त्र भाग से पूर्व−शीर्ष रूप में प्रयुक्त होती हैं। इस मन्त्र गठन में अनेक विशेषताएँ और दिव्य संकेत सन्निहित हैं। अर्थ की दृष्टि से तो इस छन्द में भगवान के चार प्रधान गुणों का स्मरण है और सद्बुद्धि के अन्तःकरण में धारण करने तथा दिव्य प्रेरणा की प्रार्थना भर है। यह बाल−बोध के रूप में शब्दार्थ भर हुआ। इसमें थोड़ी−सी शिक्षाएँ भर दी गईं प्रतीत होती हैं। पर गहराई में उतरने से प्रतीत होता है कि बात इतनी मात्र ही नहीं है उसके जुड़े हुए अक्षरों में से प्रत्येक शक्ति रूप है और उनमें बहुत कुछ ऐसा रहस्यमय भण्डार भरा हुआ है जिसे पाकर मनुष्य धन्य बन सकता है।

यों गायत्री मन्त्र में सन्निहित शिक्षा भी सामान्य नहीं असामान्य है, यदि उसे जीवन में उतारा जा सके तो इसी लोक में−इसी जन्म में देवात्मा बनकर जिया जा सकता है। “भगवान सविता, वरेण्य, भर्ग, देव स्वरूप है उनकी यह विशेषताएँ हमें तेजस्विता, श्रेष्ठ, प्रखरता एवं देवत्व के रूप में अपनानी चाहिए। विवेकशीलता एवं आन्तरिक उत्कृष्टता उत्पन्न करने वाली प्रज्ञा अन्तःकरण में धारण करनी चाहिए और जीवन का समूचा ढाँचा उसी आलोक में खड़ा करना चाहिए। अन्तःचेतना को आदर्शवादी, उत्कृष्टता अपनाने के लिए बलपूर्वक आगे धकेलना चाहिए।” सार रूप में इतना ही गायत्री मन्त्र का शब्दार्थ एवं सार संकेत है। देखने में यह संकेत छोटा−सा और थोड़ा−सा लगता है, पर यदि उतने भर को भी व्यावहारिक जीवन में सम्मिलित किया जा सके तो सामान्य स्थिति का मनुष्य भी मात्र जीवात्मा न रहकर महानात्मा, देवात्मा और परमात्मा के स्तर तक पहुँच सकता है।

मन्त्रों में शिक्षा भी होती है और शक्ति भी। शिक्षा की दृष्टि से कितने ही वेद मन्त्र तथा अन्य भाषाओं में रचे गये पद्य भी गायत्री के समतुल्य हो सकते हैं, पर उनके दिव्य गठन में जो शक्ति स्रोत विद्यमान है वे अन्यत्र नहीं मिल सकते। शब्द को ब्रह्म कहा गया है। अर्थ को उसका कलेवर और प्रभाव को प्राण कहा जा सकता है। सामान्य बुद्धि केवल अर्थ समझ पाती है, पर सूक्ष्मदर्शी उसकी शक्ति को भी समझते हैं। नादब्रह्म का−शक्ति प्रभाव इस संसार पर कब, कैसा और कितना प्रभाव छोड़ता है− उसका उपयोग किस प्रकार किया जा सकता है उसी की सूक्ष्म जानकारी को मन्त्र विद्या कहते हैं। गायत्री के मन्त्रार्थ की तुलना में उसका शक्ति प्रवाह असंख्य गुना अधिक प्रभावोत्पादक है। इसी रहस्य के आधार पर उसे इतना अधिक महत्व दिया गया है और उपासना विज्ञान के आकाश में उसे ध्रुव तारे का स्थान मिला है।

‘योगी याज्ञवलक्य’ नामक ग्रन्थ में गायत्री के अक्षर का विवरण दूसरी तरह लिखा है−

कर्म्मेन्द्रियाणि पंचैव पंच बुद्धीन्द्रियाणि च। पंच पंचेन्द्रियार्थश्च भूतानाम चैव पंचकम॥ मनोबुद्धिस्तथात्याच अव्यक्तं च यदुत्तमम्।

चतुर्व्विंशत्यथैतानि गायत्र्या अक्षराणितु॥ प्रणवं पुरुषं बिद्धि सर्व्वगं पंचविंशकम्।

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (2) पाँच कर्मेन्द्रियाँ (3) पाँच तत्व (4) पाँच तन्मात्राएँ। शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श। यह बीस हुए। इनके अतिरिक्त अन्तःकरण चतुष्टय (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) यह चौबीस हो गये। परमात्म पुरुष इन सबसे ऊपर पच्चीसवाँ है।

कुलार्णव तन्त्र में आता है−

“तत्कारात यातकार पर्यन्त शब्द ब्रह्म स्वरूपिणी।”

अर्थात् तत्कार से लेकर ‘यात्’ तक गायत्री साक्षात् ब्रह्म स्वरुपिणी है।

चतुर्विंशतितत्त्वा सा यदा भवति शोभना गायत्रीं सवितुः शम्भोः गायत्रीं मदनात्मिकाम्। गायत्रीं विष्णुगायत्रीं गायत्रीं त्रिपदात्मनः। गायत्रीं दक्षिणामूर्त्ते गायत्रीं शम्भुयोषितः॥

गायत्री के चौबीस अक्षर, चौबीस तत्व हैं। गायत्री, सविता, शिव, विष्णु, दक्षिणामूर्ति, शम्भु शक्ति और काम बीज है।

पुरुषो वाव यज्ञतस्य यानि चतुर्विœशति−वर्षाणि तत्प्रातः सवनं चतुर्विœशत्यक्षरा गायत्री गायत्रं प्रातः सवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राण वाव वसव एते हीदœसर्वं वासयन्ति।

−छान्दोग्य 3। 16। 1

पुरुष ही यज्ञ है। उसका प्रातःकाल चौबीस वर्ष का हैं। गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षरों से ही इसका सम्बन्ध है।

चतुर्विंशतिरुद्दिष्टा गायत्री लोक सम्मता। य एतां वेद गायत्रीं पुण्यां सर्वगुणान्विताम्। तत्त्वेन भरतश्रेष्ठ स लोके न प्रणश्यति।

−महाभारत भीष्म 4। 15। 16

अर्थात्−‘‘यह चौबीस अक्षरों की गायत्री को सम्मत लोक में महान कल्याणकारी माना जाता है। हे युधिष्ठिर! जो कोई इसके तत्व को समझ लेता है उसका कभी नाश नहीं होता।”

गायत्री रहस्योपनिषद् में इस समस्त विश्व−ब्रह्माण्ड को, जड़−चेतन प्रकृति को, देव परिवार को, हलचलों एवं प्रवृत्तियों को गायत्री के अक्षरों में बीज रूप से ओत−प्रोत माना है, आत्मा की सीमित और परमात्मा की असीम शक्ति का ताल−मेल बिठाने वाली महाशक्ति के रूप में गायत्री मंत्र की विवेचना की है। कहा गया है−

ओऽम् भूरिति भुवो लोकः। भुव इत्यन्त−रिक्षलोकः। स्वरिति र्स्वमलोकः। मह इति महर्लोक। जन इति जनोलोकः। तप इति तपोलोकः। सत्यमिति सत्यलोकः। तदति ददसौ तेजोमयं तेजोऽग्निर्देंवता। सवितुरिति सविता सविता साचित्रमादित्यौ वै। वरेण्यमित्यत्र प्रजापतिः। भर्ग हत्यापो वै भर्गः। देवस्य इतीइन्द्रो देवो द्योतत इति स इन्द्रस्तस्मात् सर्वपुरुषो नात रुद्र। धीमहीयत्नन्तरात्मा। धिय इत्यन्तरात्मा परः य इति सदाशिवपुरुषः। नो इत्यास्माकं स्वधर्मे। प्रचोदयादिति प्रचोदितिकाम इमान् लोकाम् प्रत्याश्रयते यः परो धर्म इत्येषा गायत्री।

−गायत्री रहस्योपनिषद्

भू शब्द भू लोक का बोधक है। भुवः आकाश का, महः महलोक का, जनः जनलोक का, तप, तपलोक का, सत्यम्−सत्यलोक का बोधक है। तत्−तेजस्वी अग्नि का, सवितुः−सूर्य का, वरेण्य−प्रजाति का, भर्ग,−वरुण का, देवस्य−इन्द्र का, धीमहि−आत्मा का, धियः−परमात्मा का, यः−शिव का, नः−समष्टि आत्मा का, प्रचोदयात्−प्रेरक इच्छा शक्ति का बोधक है। यह गायत्री ही पर धर्म है। यही समस्त लोकों का प्रत्याश्रय कराती है।

देवी भागवत, पुराण में गायत्री के 24 अक्षरों के साथ 24 ऋषियों का, 24 छन्दों का, 24 देवताओं का, 24 शक्तियों का, 24 तत्वों का, 24 रंगों का वर्णन है। इस महामन्त्र के प्रत्येक अक्षर की एक बीज शक्ति है। उनमें से हर एक को स्वतन्त्र बीज मन्त्र कहा जा सकता है। बीज देखने में एक प्रतीत होता है, पर उसके अन्तराल में वह वृक्ष छिपा रहता है जिसके साथ तना, टहनियाँ, पल्लव, पत्ते, पुष्प, फल आदि का पूरा परिकर जुड़ा हुआ है। अक्षर बीज हैं। गायत्री के 24 बीजाक्षर उन तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं जिनके कारण ऋषि सत्ताएँ तथा देव सत्ताएँ प्रकट होती और अपने विशेष उत्तरदायित्व पूर्ण करती हैं। ‘छन्द’ एक विशेष प्रकार का ध्वनि प्रवाह है जिसका स्थूल रूप विभिन्न लयों में गाये जाने वाले गीतों के रूप में समझा जा सकता है। स्थूल संगीत और वादन के माध्यम से समझा जाता है, पर सूक्ष्म संगीत एक अक्षर मात्र से भी निसृत होता रहता है। ओंकार एक अक्षर है। पर उसके द्वारा निसृत ध्वनि प्रवाह में योगाभ्यास की समस्त सम्भावनाएँ विद्यमान हैं। ठीक इसी प्रकार गायत्री के 24 अक्षरों में से प्रत्येक का एक ध्वनि प्रवाह है जिसे छन्द कहा गया है।

देव सत्ताएँ परब्रह्म के चेतना समुद्र में उठने वाले अनेकानेक ज्वार−भाटे, भँवर अथवा तूफान समझे जा सकते हैं। यों वे महासमुद्र की जलराशि से भिन्न नहीं हैं तो भी उनका स्वरूप और प्रभाव स्वतन्त्र रूप से भी देखा जा सकता है और उनका अन्तर अनुभव किया जा सकता है। ज्वार की प्रत्येक लहर की ऊँचाई, लम्बाई, चौड़ाई तथा क्षमता में जो अन्तर रहता है वही उसकी विशिष्टता एवं आकृति−प्रकृति है। देव सत्ताओं की अपनी शक्ति भी इसी प्रकार है। हर शक्ति में थोड़ा−थोड़ा अन्तर रहता है अस्तु उनके नाम भी अलग−अलग गिनाये गये हैं।

जड़ प्रकृति के पाँच तत्व हैं। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश से यह सारा जड़ जगत बना है। यह स्थूल और आँख से देखे जाने वाले प्रत्यक्ष तत्व हैं। वैज्ञानिकों ने अपनी प्रयोगशालाओं में इनकी सूक्ष्मता का विश्लेषण करते हुए 103 के करीब तत्व ढूँढ़ निकाले हैं। यह वर्गीकरण आणविक एवं रासायनिक भिन्नता के आधार पर है। अपेक्षा की जाती है कि अगले कुछ ही दिनों में 5 तत्व और खोजे जाने वाले हैं। इस प्रकार 108 तत्वों की माला शृंखला से जप में प्रयुक्त होने वाली 108 दाने की माला के साथ संगति बैठ जायगी और सृष्टि के निर्माण, अभिवर्धन एवं परिवर्तन में काम कर रहे 108 तत्वों को स्मरण दिलाने के लिए जप की माला को तत्वों की माला का प्रतिनिधित्व करने वाली समझा जा सकेगा।

दिव्य तत्व इनसे भिन्न हैं। इनकी पूर्ण संख्या तो नहीं बताई जा सकती, पर यह कहा जा सकता है कि गायत्री के 24 अक्षरों के साथ 24 चेतन तत्वों का भी समावेश है। सूर्य की किरणों में विद्यमान सात रंग प्रसिद्ध हैं इन्हें उनके रथ में जुते हुए सात घोड़े भी अलंकार रूप से कहा जाता है। पर यह सात रंग तो मोटी जानकारी भर है। इनके परस्पर समन्वय से अन्य सहस्रों रंग बनते हैं। इसी प्रकार अदृश्य रंगों की भी बहुत बड़ी शृंखला है। दृश्य और अदृश्य दोनों ही प्रकार के रंगों की गणना की जाय तो वे इतने अधिक होंगे जो गिने न जा सकें। सविता देवता अध्यात्म क्षेत्र का ज्योति केन्द्र है। उसके भी असंख्य रंग हैं। इस वर्ण किरणों का प्रत्यक्ष नाम देना कठिन है। क्योंकि नाम के आधार पर पहचाने जाने वाले रंगों की संख्या तो कुछ दर्जन से अधिक नहीं हो सकती जबकि उनकी संख्या अगणित है। गायत्री मन्त्र का अधिष्ठाता सविता देवता कितने ही दिव्य रंग निसृत करता है। उनमें से 24 अक्षरों के अपने रंग वर्ण हैं इनकी जानकारी देने के लिए पुष्पों के नाम दिये गये हैं जिनकी समानता के आधार पर उन इन वर्णों का परिचय प्राप्त किया जा सके।

गायत्री मन्त्र के अक्षरों के साथ जुड़ी हुई उनकी इन्हीं विशेषताओं, भिन्नताओं एवं शक्तियों का परिचय देवी भागवत, पुराण में इस प्रकार दिया गया है−

अथातः श्रूयतां ब्रह्मन्वर्णऋष्यादिकांस्तथा। छंदांसि देवतास्तद्वत्क्रमात्तत्त्वानि चैव हि॥

वामदेवोऽत्रिर्वसिष्ठः शुक्रः कण्वः पराशरः। विश्वमित्रो महातेजाः कपिलः शौनको महान्॥

याज्ञवल्क्यो भरद्वाजो जमदग्निस्तपोनिधिः। गौतमो मुद्गलश्चेव वेदव्यासश्च लोमशः॥ अगस्त्यः कौशिको वत्सः पुलस्त्यो माँडुकस्तथा।

दुर्वासास्तपतां श्रेष्ठो नारदः कश्यपस्तथा॥ इत्येते ऋषयः प्रोक्ता वर्णानां क्रमशो मुने।

गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च बृहती पंक्तिरेव च॥ त्रिष्टुभं जगती चैव तथाऽतिजगती मता॥ शक्वर्यतिशक्वरी च धृतिश्चातिधृतिस्तथा॥ विराट् प्रतारपंक्तिश्च कृतिः प्रकृतिराकृतिः॥ विकृतिः संकृतिश्चैवाक्षरपंक्तिस्तथैव च॥ भूर्भुवः स्वरिति छंदस्तथा ज्योतिष्मती स्मृतम्। इत्येतानि च छंदाँसि कीर्तितानि महामुने॥ दैवतानि शृणु प्राज्ञ तेषामेवानुपूर्वशः। आग्नेयं प्रथमं प्रोक्तं प्राजापत्यं द्वितीयकाम्॥

तृतीयं च तथा सौम्यमीशानं च चतुर्थकम्। सावित्रं पञ्चमं प्रोक्तं षष्टमादित्यदैवतम्॥ बार्हस्पत्यं सप्तमं तु मैत्रावरुणामष्ठमम्। नवमं भगदैवत्यं दशमं चार्यमैश्वरम्॥ गणेशमेकादशकं त्वाष्ट्रं द्वादशकं स्मृतम्। पौष्णं त्र्योदशं प्रोक्तमैंद्राग्नं च चतुशम्॥

वायव्यं पंचदशकं वामदैव्यं च षोडशम्। मैत्रावरुणि दैवत्य प्रक्तं सप्तादशाक्षरम्॥ अष्टादशं वैश्वदेवमूनविंशंतिमातृकम्। वैष्णवं विशतितमं वसुदैवतमीरितम्॥ एकविंशतिसंख्याकं द्वाविंशं रुद्रदैवतम्। त्रयोविंशं च कौबेरेमाश्विनं तत्त्वसख्यकम्॥

चतुर्विंशतिर्णानाँ दैवतानां च संग्रहः। कथितः परमश्रेष्ठो महापापैकशोधनः॥ वर्णानां शक्तयः काश्च ताः शृणुष्व महामुने। वामदेवी प्रिया सत्या विश्वा भद्रविलासिनी॥ प्रभावती जया शान्ता कान्ता दुर्गा सरस्वती। विद्रु मा च विशालेशा व्यापिनी विमला तथा॥

तमोऽपहारिणी सूक्ष्माविश्वयोनिर्जया वशा। पद्मालया परा शोभा भद्रा चं त्रिपदा स्मृता॥

चतुर्विंशतिवर्णानां शक्तयः समुदाहृताः। अतः परम् वर्णवर्णान्व्याहरामि यथातथम्॥ चम्पका अतसीपुप्पसन्निभं विद्रु मम् तथा। स्फटिकारकं चैव पद्मपुष्पसमप्रभम्॥ तरुणादित्यसंकाश शंखकुन्देन्दुसन्निभम्। प्रवाल पद्मपत्राभम् पद्मरगसमप्रभम्॥ इन्द्रनीलमणिप्रख्य मौत्तिकम् कुम्कुमप्रभम्। अन्जानभम् च रक्तं व वैदूर्यं क्षौद्रसन्निभम्। हारिद्रम् कुन्ददुग्धाभम् रविकांतिसमप्रभम्। शुकपुच्छनिभम् तद्वच्छतपत्र निभम् तथा॥

केतकीपुष्पसंकाशं मल्लिकाकुसुमप्रभम्। करवीरश्च इत्येते क्रमेण परिकीर्तिताः॥ वर्णाः प्रोक्ताश्च वर्णानां महापापविधनाः। पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाश एव च॥ गन्धो रसश्च रूपम् च शब्दः स्पर्शस्तथैव च। उपस्थम् पायुपादम् च पाणी वागपि च क्रमात्॥ प्राणम् जिह्वा च चक्षुश्चत्वक्श्रोत्रम् च ततःपरं।

प्राणोऽपानस्तथा व्यानः समानश्च ततः परम्॥

तत्त्वान्येतानि वर्णानां क्रमशः कीर्तितानि तु।

−देवी भागवत

नारदजी ने पूछा− भगवत् गायत्री मन्त्र के चौबीस अक्षरों के ऋषि, छन्द, देवता कौन कौन हैं, यह बताकर मेरी जिज्ञासा का समाधान कीजिए।

नारायण ने कहा− हे! नारद, अकेला ही गायत्री अनुष्ठान इतना समर्थ है कि उसे कर लेने पर फिर और किसी मन्त्रानुष्ठान की आवश्यकता नहीं रहती।

गायत्री के 24 अक्षरों में से प्रत्येक में से प्रकाश की किरणें प्रस्फुटित होती हैं और उन प्रकाश की किरणों के रंग 24 प्रकार के हैं। सात रंगों के नाम तो प्रसिद्ध हैं। पर 24 रंगों के नाम विदित न होने में उनकी तुलना पुष्पों तथा पदार्थों के रंग से की गई है। नीचे 24 अक्षरों की प्रकाश किरणों के 24 रंग नीचे दिये पदार्थों तथा पुष्पों के रंग जैसे समझने चाहिए।

पद्म पुराण में ऐसा विधान है कि एक−एक अक्षर को पृथक−पृथक देव सत्ताएँ मानकर उनकी आकृति, प्रकृति, शक्ति, वर्ण, तत्व आदि समेत ध्यान किया जाय तो 24 देवताओं की 24 प्रकार की शक्तियों का अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। यह भिन्नताएँ वस्तुतः एक ही अभिन्न तत्व के पूरक घटक मात्र हैं। जिस प्रकार गायत्री मन्त्र में उसके 24 अक्षर गुंथे हुए हैं उसी प्रकार यह देव तत्व भी परस्पर विरोधी या स्वतन्त्र न होकर एक−एक करके समग्र शक्ति केन्द्र को सर्वांगपूर्ण बनाते हैं।

पद्म पुराण का कथन इस प्रकार है−

ज्ञात्वातु देवतास्तस्य वांगमय विदितम् भवेत्।

जप कालेतु संचिन्त्य तासु सायुज्यतां व्रजेत्।

इस श्लोक में यही संकेत है कि उपासना काल में अक्षरों की देव शक्तियों की ध्यान साधना करने में उनके साथ सायुज्यता प्राप्त होती है। साधक उसी स्तर का उन्हीं विशेषताओं से युक्त बनता जाता है।

बाल्मीकि रामायण में मूल श्लोक 24000 माने जाते हैं। यों पीछे से उसमें क्षेपक रूप में कतिपय श्लोक समय−समय पर जोड़े और निकाले जाते रहने के कारण यह संख्या घटती−बढ़ती भी रही है।

महाभारत का विशुद्ध स्वरूप प्राचीनकाल में भारत संहिता के नाम से प्रख्यात था। उसमें 24000 श्लोक थे। ‘चतुर्विंशंति साहस्रीं चक्रे भारतम् संहिताम्” में उसी तथ्य का उल्लेख है। दक्षिण भारत की प्राचीन प्रतियों में महाभारत के पर्वों की संख्या चौबीस है। महाभारत ही नहीं अडियार (मद्रास) से प्रकाशित भगवद्गीता में भी चौबीस अध्याय हैं यह 24 की संख्या गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों की प्रेरणा के साथ संगति आती है।

मद्रास के रामास्वामी शास्त्रुलु एण्ड सन्स, नामक प्रकाशक ने जो रामायण संस्करण प्रकाशित किया है उसमें एक गायत्री रामायण भी है, जिसमें 24 श्लोक हैं। इसमें प्रत्येक श्लोक उसी अक्षर क्रम से आरम्भ हुआ है जिसमें कि गायत्री मन्त्र के अक्षर जुड़े हुए हैं। यह वाल्मीकि रामायण के श्लोकों से संग्रहीत किये गये हैं।

श्रीमद्भागवत् पुराण गायत्री की व्याख्या स्वरूप ही रचा गया कहा गया है। उसमें भी प्रत्येक एक हजार श्लोक के पीछे गायत्री मन्त्र के एक अक्षर का सम्पुट लगाया गया भी माना जाता है। भगवत् गीता में भी ऐसे कितने ही श्लोक हैं जिनमें गायत्री मन्त्र के अक्षरों से ही प्रारम्भ हुआ है। इन्हें क्रमबद्ध जोड़ लेने से गायत्री गीता बन जाती है और उनसे गीता सार समझने का पूरा लाभ मिल जाता है। यों गायत्री गीता के स्वतन्त्र श्लोक भी प्रसिद्ध ही हैं।

गायत्री की व्याख्या स्वरूप भागवत रचे जाने का संकेत देने वाले कुछ उदाहरण मिलते हैं जो इस प्रकार हैं−

यत्राधिकृत्य गायत्रीं वर्ण्यन्ते धर्म विस्तरः।

वृत्रासुरवद्योपेतं तद् भागवतपुच्यते।

जिसमें गायत्री के माध्यम से धर्म का विस्तार पूर्वक वर्णन है। जिसमें वृत्तासुर वध का वृत्तान्त है। यह भागवत ही है।

“सत्यं परं धीमहि”− तं धीमहि इति गायत्र्याँ प्रारम्भेण गायत्र्याख्य ब्रह्म विद्या रूप भेत्पुराण निति।

-श्रीधरी टीका

व्यासजी ने गायत्री प्रतिपाद्य सत्यं परं धीमहि तत्व से ही भागवत् पुराण का प्रारम्भ किया। गायत्री के ही दो अक्षरों की व्याख्या में एक−एक स्कन्ध बनाकर 12 स्कन्द पूरे किये।

अर्थोऽयं ब्रह्म सूत्राणां भारतार्थ विनिर्णयः। गायत्री भाष्य रूपो सौ वेदार्थ परिवृंहणं॥

−गरुड़ पुराण

पुराण, ब्रह्म सूत्रों के अर्थ, महाभारत के निर्णय, वेदों के विवेचन यह सभी गायत्री महामन्त्र के भाष्य हैं।

प्रचोदिता येन पुरा सरस्वती वितन्वताजस्य सतीं स्मृति हृदि स्वलक्षणा प्रादुरभूत्किलास्यतः समे ऋषीणमृषभः प्रसीदतः॥ तेनब्रह्म हृदाय आदिकवये मुह्यन्तियत्सूरयः॥

श्रीमद्भागवत् के उपरोक्त श्लोक से यही आभास मिलता है कि उसकी रचना में गायत्री महामन्त्र का आलोक जुड़ा हुआ है।

देवी भागवत् पुराण का आरम्भ और अन्त गायत्री के ही प्रकाश में हुआ है। प्रारम्भ का श्लोक इस प्रकार है−

ॐ सर्व चैतन्य रूपांतामाद्यां विद्यां च धीमहि। बुद्धिर्योनः प्रचोदयात्।

−देवी भागवत्

जो आदि अन्त रहित, सर्व चैतन्य स्वरूप वाली, ब्रह्म विद्या स्वरूपिणी आदि शक्ति है। उसका हम ध्यान करते हैं यह हमारी बुद्धि के सन्मार्ग पर पूर्ण हुआ है।

महर्षि र्व्यासोऽपि श्रुतिविवरणेषु प्रतिपदं, महिम्नां गानेन स्वपरकुशलं साध्वकलयत्।

कविवाल्मीकिस्ते युग−युगलवर्णान् सुनिपुणः,

समादायानन्यं परिरचितवान् राचचरितम्॥

महर्षि व्यास ने भी श्रुतियों के विवरण करने में प्रत्येक पद की महिमाओं के गान के द्वारा बहुत ही अच्छा स्व पर कुशल वर्णन किया था। महाकवि बाल्मीकि ने आपके युग−युगल वर्णों को बड़ी से निपुणता के सहित लेकर अनुपम श्री राम के चरित्र की रचना की थी।

शारदा तिलक तन्त्र के इक्कीसवें पटल में गायत्री महाशक्ति का उल्लेख है। उसके भाष्य में अन्य आचार्यों द्वारा प्रतिपादित गायत्री मन्त्र के अक्षरों की अध्यात्मपरक व्याख्या का संकलन किया गया है, जो इस प्रकार है−

प्रणवस्य व्याहृतीनां गायत्रौयक्यमधोच्यते॥ तदद्वितोयैक व चनमनेनाऽखिलवस्तुनः। सृष्ट्यादिकारणं तेजोरूपमादित्यमण्डले॥ अभिध्वेयं परानन्दं परम् ब्रह्माऽभिधीयते।यत्तत्सवितुरितुरित्युक्तम् षष्ठ्येकवचनात्मकम्॥ धातोरिह विनिष्पन्नम् प्राणिप्रसववाचकात्। सर्वासां प्राणिजातीनामिति प्रसवितुः सदा। वरेण्यं वरणीयत्वात् सेवनीयतया तथा। भजनीयतया सर्वैः प्रार्थनीयतया स्मृतम्॥ पूर्वस्याऽष्टाक्षरस्यैवं व्याहृतिर्भू रितीरिता।

पापस्य भर्जनद्भगों भक्तस्निग्धतया तथा। देवस्य वृष्टिदानादिगुणयुक्तस्य नित्यशः। प्रभूतेन प्रकाशेन दीप्यमानस्य वै तथा॥ ध्यै चिन्तायामतो धातोर्निष्पन्नधीमहीत्यतः। निगमाद्येन देव्येन विद्यारुपेण चक्षुषा॥ दृश्यो हिरण्मयो देव आदित्यो नित्यसंस्थितः। हीनतारहितम् तेजो यस्य स्यात् स हिरण्मयः। यः सूक्ष्मः सोऽहमित्येवं चिन्तयामः सदैव तु।

द्वितीयाष्टाक्षरस्यैवं व्याहृतिर्भुव ईरिता॥

धियो बुद्धीर्मनोरस्य छान्दसत्वाद् य ईरितः। कृतश्च लिंगव्यत्यासः सूत्रात् सुप्तिंग्पुग्रहात्॥ यत्तत्तेजो निरूपमं सर्वदेवमयात्मकं। भजतां पापनाशस्य हेतुभूतमिहोच्यते॥ न इति प्रोक्त आदेशः षष्ठया बह्विति चास्मदः।

तस्मादस्माकमित्यर्थः प्रार्थनायां प्रचोदयात्॥

इस प्रतिपादन में परब्रह्म परमात्मा सविता की सूर्य मण्डल के रूप में आराधना का उल्लेख है और उसे परम आनन्ददायक, प्राणियों का उत्पादनकर्ता, वरणीय, सेवनीय, भजनीय, प्रार्थनीय बताया गया है पापों का नाश−स्नेह भक्ति का संचार देवत्व की वृष्टि, सद्गुणों का अनुदान, दिव्य प्रकाश की प्राप्ति−विद्या की उपलब्धि का संकेत है। सर्व देवमयी गायत्री उपासना से लोक और परलोक में मिल सकने वाली समस्त विभूतियों को गायत्री उपासना के माध्यम में प्राप्त होने का उल्लेख है।

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विचार मात्र कल्पना नहीं शक्ति के पुँज हैं।

प्रो0 एलीशाग्रे ने अपनी पुस्तक “मिराकल्स आफ नेचर’ में लिखा है−प्रकाश की तुलना में विचार विद्युत की प्रवाह गति कहीं अधिक है। अभी यन्त्रों के द्वारा उसे नापा और देखा नहीं जा सका तो भी यह एक तथ्य है कि विचार मात्र कल्पनाओं का उभार न होकर एक शक्तिशाली पदार्थ हैं। उसकी गति तथा क्षमता ज्ञात भौतिक शक्तियों में सबसे अधिक है।

लुइस क्राउन ने लिखा है− ताप, विद्युत आदि की ऊर्जा केवल भौतिक पदार्थों को ही नरम−गरम करती और उनमें परिवर्तित कर सकती है, पर विचार विद्युत न केवल व्यक्ति विशेष को वरन् समूचे वातावरण को ही आश्चर्यजनक मात्रा में परिवर्तित कर सकती है। चेतना को प्रभावित कर सकने वाली क्षमताओं में विचारों का ही प्रथम स्थान है वे अपने उद्गम स्थल को−विचारक को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं और फिर अपने समीपवर्ती क्षेत्र पर असर डालते हुए असीम दूरी तक बढ़ते चले जाते है। प्रेरक व्यक्तित्व की प्रतिभा के अनुरूप उनकी सामर्थ्य का स्तर रहता है। तदनुसार अन्यान्य व्यक्तियों और प्राणियों पर उनका प्रभाव पड़ता है।

विचारधारा को सही रखकर हम सुखी और समुन्नत जीवन जी सकते हैं। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रह सकते हैं। किन्तु यदि मस्तिष्कीय क्षेत्र को अवांछनीय कूड़े−करकट से भर लिया गया तो उसकी सड़ाँद से नस−तस विषाक्त हो जायगी। शरीर सन्तुलन गड़बड़ा जायगा और साधारण जीवन की दैनिक समस्याओं का सही हल ढूँढ़ सकना भी सम्भव न रहेगा।

जीवन एक सुनियोजित सुरुचिपूर्ण, सुरम्य वाद्य यन्त्र है। इसे बजाने की कला जिसे आती है वे उसकी स्वर लहरी का आनन्द स्वयं लेते हैं, अपनी कलाकारिता की छाप छोड़ते हैं और दूसरों पर उसका उत्साहवर्धक प्रभाव डालते हैं। किन्तु जिन्हें बजाना नहीं आता वे कर्ण कटु कर्कशता उत्पन्न करते हैं, स्वयं निन्दित होते हैं और उस बहुमूल्य साज को कुसमय ही तोड़−मरोड़कर रख देते हैं।

जीवन एक बहुमूल्य मोटर है जो इसे चलाना जानते हैं वे सुखपूर्वक लम्बी यात्रा करते हैं और अभीष्ट लक्ष्य तक जल्दी ही जा पहुँचते हैं परन्तु जिन्हें उसे चलाना नहीं आता वे अनाड़ी ड्राइवर किसी पेड़ से टकराकर−खड्ड में गिराकर उस कीमती मशीन का कचूमर निकाल देते हैं और अपने हाथ−पैर तोड़ लेते हैं। अस्वस्थ शरीर, उद्विग्न मन, पारिवारिक कलह, आर्थिक असन्तुलन, शत्रुओं के उपद्रव, लोकापवाद, अकाल मरण एवं असफलताजन्य शोक−सन्ताप इस बात के चिह्न हैं कि जीवन रूपी मोटर के कलपुर्जे किसी दुर्घटना में टूट−फूट गये हैं। अनाड़ी संचालक ही इस प्रकार की दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है अन्यथा जीवन, जीवधारी के लिए हर घड़ी आनन्द और उल्लास देते रहने वाला ईश्वरीय वरदान ही है। इसे अभिशाप में बदल देने का दोष उसके संचालक को ही दिया जा सकता है जिसने उसके रख−रखाव में और चलाने में सावधानी नहीं बरती।

शरीर के कलपुर्जे यों अपने आप अपना काम करते दिखाई पड़ते हैं पर गहराई में देखने पर प्रतीत होता है कि उनका संचालन प्राण चेतना द्वारा होता है। अव्यक्त मन, शरीर की समस्त गतिविधियों का संचालक और नियामक है। प्राण के शरीर से निकल जाने पर काया के समस्त अवयव एवं पदार्थ यथावत् बने रहने पर भी स्तब्ध हो जाते हैं और सड़ने लगते हैं। हाथ−पैर चलाने, सोचने, बोलने आदि की क्रियाएँ तो चेतन मन द्वारा संचालित होती हैं, पर रक्त−संचार, श्वास−प्रश्वास, आकुंचन−प्रकुंचन, याचना निस्सरण आदि काम अचेतन की प्रेरणा से अनायास होते दीखते हैं, पर उनके पीछे भी अव्यक्त मन की स्वसंचालित प्रक्रिया ही काम करती रहती है। एक शब्द में शरीर की स्थिति और प्रगति पर मन का पूर्ण नियन्त्रण रहे तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।

यों आहार−विहार का भी स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ता है और एक हदतक अन्न, जल, वायु, श्रम, विश्राम, आदि भी− स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं। पर सबसे अधिक प्रभाव मानसिक स्थिति का पड़ता है। उद्विग्न मनःस्थिति बनी रहने पर किसी सुसंयत रहन−सहन वाले व्यक्ति का भी निरोग रह सकना सम्भव नहीं, जबकि अस्त−व्यस्त, रीति−नीति अपनाये रहने पर भी प्रसन्न चित्त व्यक्ति अपने शरीर की कामचलाऊ स्थिति का बनाये रहते हैं। शरीर को निरोग और सुदृढ़ बनाये रहने में सबसे बड़ी भूमिका सन्तुलित, सन्तुष्ट एवं उल्लसित मनःस्थिति की होती है। बीमारी का और कोई कारण न होने पर भी मनोविकारग्रस्त व्यक्ति स्वयं ही अपने आरोग्य का हनन कर लेते हैं। तलवार का घाव खाकर शरीर अपनी क्षतिपूर्ति देर−सवेर में कर लेता है, पर मानसिक आघातों की पटक खाकर कोई कठिनाई से ही अपने पैरों आप खड़ा हो पाता है।

मनःक्षेत्र में उतार−चढ़ाव निरन्तर आते रहते हैं। वस्तु, व्यक्ति और परिस्थिति की दशा एक जैसी नहीं रहती है उनमें प्रकृति चक्र से परिवर्तन होते रहते हैं। इन परिवर्तनों का क्या प्रभाव ग्रहण करें? क्या न करें? घटना−क्रम पर किस दृष्टि से सोचें, किससे न सोचें जिन्हें यह सब नहीं आता वे अवाँछनीय निष्कर्ष निकालते हैं और अनुपयुक्त प्रभाव के दल−दल में जा फँसते हैं। ऐसे ही लोग तनिक−तनिक से उतार−चढ़ावों में अपना सन्तुलन गँवा बैठते हैं। बेतरह रोते−कलपते हैं−क्रोध आवेश में आकर मन्द अथवा उग्र स्तर की हत्या, आत्म−हत्या करने पर उतारू हो जाते हैं।

भाव−तरंगों को दो भागों में विभक्त कर सकते हैं− एक सृजनात्मक और दूसरी ध्वंसात्मक। सृजनात्मक भावनाओं में प्रसन्नताओं सन्तुष्टि, आशा, हिम्मत, करुणा, सहृदयता, सहानुभूति, सेवा आदि की गणना की जा सकती है। ध्वंसात्मक में क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, निराशा, खीज आदि को गिना जायगा। सृजनात्मक भावनाएँ शरीर पर उत्साहवर्धक प्रभाव डालती हैं। इसके विपरीत ध्वंसात्मक चिन्तन से उद्विग्न मस्तिष्क अपनी कार्य क्षमता गँवा बैठता है− किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो जाता है और उबरने की राह पाने में अपंग, असमर्थ बन जाता है। उस स्थिति में प्रायः उलटे विचार ही सामने आते हैं जिन्हें अपनाने पर नई उलझनें पैदा होती हैं और दल−दल में अधिक गहरे पाँव फँसते जाते हैं।

विपत्ति अकेली नहीं आती−वह अपने साथ कठिनाइयों का पूरा परिवार लेकर चलती है। इस मान्यता में बहुत कुछ तथ्य इस आधार पर रहता है कि अवांछनीय मनोदशा में बौखलाया हुआ मनुष्य भूल पर भूल करता जाता है, साथ ही नये−नये संकटों को आमन्त्रित करके अपने सिर पर लादता जाता है। शरीर पर तो इस उद्विग्न मनःस्थिति का दुष्प्रभाव पड़ना तो पूर्णतया निश्चित है।

प्रसन्नता की मनःस्थिति में हमारी आँखें चमकने लगती हैं, चेहरा गुलाबी हो जाता है, गालों पर पुलकन उभरी हुई दिखाई पड़ती है और समूचा चेहरा नये सौन्दर्य से सुसज्जित प्रतीत होता है। इस स्थिति का व्यक्ति सहज ही आकर्षक प्रतीत होता है। सुखानुभूति में जो तृप्ति और सन्तुष्टि होती है वह किसी भी व्यक्ति को प्रभावशाली बनाती है, उसकी ओर लोग सहज ही खिंचते चले जाते हैं।

इसके विपरीत क्रोध के आवेश में मनुष्य कांपता हुआ, हांफता हुआ चीखता हुआ− डरावना प्रतीत होता है। उसके होठ सूख जाते हैं और वाणी से ऐसे शब्द निकलते हैं जिनसे न कुछ लाभ होता है न प्रयोजन की सिद्धि। उलटे आरोप, अपमान का ऐसा विद्रूप वातावरण बन जाता है, जिससे क्रोध के मूलकारण की अपेक्षा कहीं अधिक क्षति उठानी पड़ती है। एक घण्टा क्रोध की स्थिति में रहने पर एक दिन के तेज बुखार में रहने से अधिक शक्ति नष्ट होती है। क्रोध के उफान में शरीर का स्वाभाविक संचालन बेतरह लड़खड़ा जाता है। पाचन, मल विसर्जन, निद्रा, भूख, प्यास आदि समस्त सहज नित्य कर्म अस्त−व्यस्त हो जाते हैं। रक्त में इतने विषैले तत्व घुल जाते हैं जितने कि हलके किस्म का विष खाने पर देखे जाते हैं।

ईर्ष्या, घृणा और प्रतिशोध की भावनाएँ क्रोध का मन्द किन्तु स्थिरता वाला रूप है। क्रोध ज्वार की तरह आता है और थक जाने पर भाटे की तरह उतर जाता है किन्तु प्रतिशोध उस आग की तरह है जो धधकती तो नहीं, पर सुलगती रहती है और धीरे−धीरे मोटे शहतीर को भी भस्मसात करके छोड़ती है। जिसके प्रति द्वेष−भाव मन में सँजोया गया था उसे कितनी हानि पहुँचाई जा सकी और उस हानि से उसका कितना अहित हुआ, यह रहता तो कठिन है, पर इतना निश्चित है कि दुर्भावनाएँ अपने में भरे रहने वाला व्यक्ति अपने आप का शारीरिक और मानसिक अहित बहुत बड़ी मात्रा में कर चुका होता है। तेजाब जहाँ रखा जाता है उस जगह को गलाता है− आग जहाँ रहती है उस स्थान को पहले जलाकर तब आगे बढ़ती है। घृणा एवं ईर्ष्या का प्रतिफल भी ऐसा ही होता है।

पागल कुत्ते के काटने से जो असर होता है वही विषैला प्रभाव किसी के क्रोध आवेश में भरकर काट लेने पर हो सकता है, कारण कि क्रोधान्ध मनुष्य की शारीरिक स्थिति लगभग पागल कुत्ते जैसी ही हो जाती है।

चिन्ता, भय, निराशा जैसे अवसाद जीवन रस के प्रवाह में असाधारण व्यवधान उपस्थित करते हैं। रक्त संचार में शिथिलता आ जाती है। माँस−पेशियों का सिकुड़ना, फैलना अपने स्वाभाविक क्रम की अपेक्षा धीरे होता है−पूरी साँस ग्रहण करना और छोड़ना भी नहीं बन पड़ता। अशक्तता बेतरह आ घेरती है। निराश व्यक्ति के चेहरे पर छाई हुई पीलेपन की मुर्दनी देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बहुत कुछ गँवा चुका है। कोषाणु अपनी गतिविधियाँ शिथिल कर देते हैं फलतः शरीर का हर कलपुर्जा अशक्त दिखाई पड़ता है, लगता है उससे दैनिक निर्वाह का क्रम कठिनाई से ही आगे चलाया जा रहा है। ऐसी दशा में किसी बड़े पुरुषार्थ की आशा ही क्या की जाय? और कठिनाई से पार निकलने के लिए जिन दुस्साहस भरे प्रयत्नों की आवश्यकता पड़ती है उनकी सम्भावना क्यों कर बन पड़े?

मानसिक वृत्तियों का अवाँछनीय उतार−चढ़ाव किसी को निस्तेज, अशक्त एवं रुग्ण बना सकता है। अवसादग्रस्त मनुष्य अपंग स्थिति में पड़ा हुआ उपहासास्पद बनकर रहेगा। यदि वह उत्तेजनाग्रस्त रहता है तो विक्षिप्त हो सकता है। मनः शास्त्री क्रेन्स डेल मोरे ने स्नायु शूल, अजीर्ण, गठिया, दमा, जुकाम, स्नायु दुर्बलता, गुल्म, हिस्टीरिया, पक्षाघात जैसे अनेक रोगों का कारण उद्विग्न मनःस्थिति को सिद्ध किया है और औषधि उपचार से निराश रोगियों को उनकी मनःस्थिति में परिवर्तन करके नव−जीवन प्रदान किया है। वे अपने दीर्घकालीन प्रयोग परीक्षाओं के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि तीन चौथाई शारीरिक बीमारियाँ रोगी की मानसिक अस्त−व्यस्तता के कारण उत्पन्न होती हैं। सही कारण न जानने और सही उपचार न ढूँढ़ने के कारण वे प्रायः अनेक चिकित्सकों की शरण में जाकर भी निराश रहते हैं। अच्छा होता कि कोई उनके मनः क्षेत्र को टटोलता और वहाँ बँधी हुई गाँठों को खोलकर उन्हें आरोग्य प्राप्त करने का सहज तरीका बताता।

धार्मिक जीवनयापन का स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत महत्व है क्योंकि उस प्रकार का विश्वास रखने वाले व्यक्ति सहज ही सद्भावनाओं को चरितार्थ करने के लिए अपने आपको अधिक प्रशिक्षित करते हैं तद्नुसार उन्हें प्रेम, दया, क्षमा, उदारता, संयम, सन्तोष आदि सृजनात्मक सद्भावनाओं का लाभ मिलता रहता है और अपेक्षाकृत कम बीमार पड़ते हैं।


Quotation

जो मेरे साथ अच्छा व्यवहार करता है उनके साथ मैं इसलिए सद्व्यवहार करता हूँ कि उनके ऋण से उऋण हो जाऊँ और जो दुर्व्यवहार करते हैं उनके साथ अच्छा व्यवहार इसलिए करता हूँ कि वे नेकी करना सीखें और भलाई के आनन्द को समझे।

−लाओत्से

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योग के प्रति विश्व आकर्षण और हमारा उत्तरदायित्व

भौतिकवाद के विकास, विस्तार की एकांगी प्रगति ने मानवी सुख शान्ति की जड़े हिलाकर रख दीं हैं। सर्वत्र यह गम्भीरतापूर्वक सोचा जा रहा है कि प्रगति को एकांगी रहने देने में खतरा ही खतरा है इसलिए उपेक्षित अध्यात्म को भी जीवन दर्शन की एक महत्वपूर्ण कड़ी मान कर चला जाय। चिन्तन की इस नई मोड़ ने संसार का ध्यान अध्यात्म की ओर आकर्षित किया है। चूँकि भारत योग एवं अध्यात्म के उत्पादन, उत्थान एवं परीक्षण प्रयोग का क्षेत्र रहा है इसलिए जब योग अध्यात्म की बात सोची जाती है तो उसे समझने के लिए भारत की ओर सहज ही सबका ध्यान चला जाता है। विदेशों में तब और भी अधिक प्रसन्नता होती है जब कोई भारतीय योग प्रचारक ‘योगी’ के रूप में वहाँ पहुँचता है। वे घर आये देवता से बहुत कुछ जानने, सीखने और पाने की आशा करते हैं। अस्तु योगविद्या के छात्रों और शिष्यों की सहज ही भीड़ लग जाती है। कम से कम उसे पास से देखने और समझने के लिए तो विचारशील वर्ग भी बड़े उत्साह के साथ आता है।

पिछले दिनों योग प्रचार के लिये गये हुए भारतीयों को विदेशों में इतनी सफलता मिली है जिसकी उन्होंने स्वयं भी आशा नहीं की थी। इन दिनों भारतीयों द्वारा चलाये जाने वाले योग शिक्षा केन्द्रों की संख्या सैकड़ों से बढ़कर हजारों तक पहुँच गई हैं। वे विभिन्न देशों में अपने−अपने ढ़ंग से अपना काम कर रहे हैं। इन सब के विवरण तो उपलब्ध नहीं हैं, पर जिनकी चर्चा पत्र, पत्रिकाओं में छपती रहती है उनके विवरणों पर थोड़ा सा दृष्टिपात करने से यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि उन्हें उत्साहवर्धक सफलता मिली है।

अमेरिका में स्वामी योगानन्द का सैल्फ रियलाइजेशन फैलोशिप बहुत समय से काम कर रहा है। लॉस ऐंजिलस के समीप माउण्ट वाशिंगटन पर इस का मुख्य केन्द्र है और शाखाएँ अमेरिका के बड़े शहरों और छोटे नगरों में फैली हुई हैं। हालीवुड के अभिनेताओं ने जब से योग साधना में दिलचस्पी लेनी शुरू की है तब से इस मिशन के प्रति जनता में उत्साह और भी अधिक बढ़ा है। स्वामी जी की ‘साइन्स आफ रिलीजन’−सोंगस आफ सोल−मैटाफिजिकल मेडीटेशन, कास्यिक चार्टस, ह्विस्पर्श फ्राम इटनिटी−पुस्तकें अमेरिका में बड़ी दिलचस्पी के साथ पढ़ी जाती हैं।

इस योग मिशन के सदस्यों की संख्या अब हजारों से बढ़कर लाखों तक जा पहुँची है। अमेरिकी नर−नारी योगाभ्यास को अपने दैनिक कार्यक्रम में सम्मिलित कर रहे हैं। कैलीफोर्निया के डियागो और पैसिफिक, पौलिसेड्स स्थानों में बने केन्द्र इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। इण्डिया सेन्टर का केफिटेरिया निरामिस भोजनगृह अमेरिका वासियों को शाकाहारी भोजन करने का आनन्द देता है और उसमें सदा भीड़ लगी रहती है। मिशन की अध्यक्षा कुमारी फ्रेराइट अमेरिका में दया माता के नाम से प्रख्यात है। योग शिक्षा का प्रधान उत्तरदायित्व प्रायः वे ही संभालती हैं।

महर्षि महेशयोगी का ट्राँसेडेन्टल मेडीटेशन योरोप, अमेरिका में खूब चला। यह साधना ‘टी0 एम0’ के नाम से बहु विख्यात है। अमेरिका के कई कालेजों ने उसे अपनाया है। शिक्षा मन्त्रालय ने स्कूलों में इसके प्रचार के लिए विशेष अनुदान स्वीकृत किया है। नशेबाजी की अपनी बुरी आदत से छुटकारा पाने में इस योग के सहारे बहुत सफलता मिल रही है। महेश योगी के ‘इंटरनेशनल मेडीटेशन सोसाइटी की भी शाखा प्रशाखाएँ बढ़ती ही जा रही हैं।

आरम्भ में ‘बीटल’ महेश योगी की ध्यान साधना से बहुत प्रभावित हुए थे। इससे उस ओर जनता का ध्यान भी तेजी से बढ़ा। ‘लान्स सेट’ पत्रिका के द्वारा भी उनका प्रचार बहुत हुआ। फिल्म कलाकार भी उस शिक्षा प्रक्रिया में सम्मिलित हुए हैं। अब तक तीन हजार से ऊपर अमरीकी उनकी दीक्षा ले चुके हैं। योग शिक्षा का पाठ्यक्रम तीन सप्ताह का है। सीखने वालों को इसकी फीस 600 डालर देनी पड़ती है।

दक्षिण भारत के एक स्वामी सच्चिदानन्द ने न्यूयार्क में योगशिक्षा सेन्टर खोला है। प्रति सप्ताह 13 कक्षाओं को योग शिक्षा देते हैं प्रत्येक कक्षा में 15 से 40 छात्र होते हैं।

न्यूयार्क में 94वीं स्ट्रीट पर स्वामी निखलानन्द ने भारतीय योग शिक्षा का एक केन्द्र स्थापित किया है। उसी नगर में इसकी 9 शाखायें हैं। अन्य कई देशों में उनके केन्द्र हैं।

महेश योगी की ध्यान साधना से अमेरिका के फिल्म कलाकार सिनावे और शर्लें मेवलेन बहुत प्रभावित हुए हैं और वे योग की अगली सीढ़ियां सीख रहे हैं।

कुछ समय पूर्व लन्दन में एक भारतीय तान्त्रिक कला प्रदर्शिनी लगाई गई थी। इसमें तन्त्र योग से सम्बन्धित साहित्य, चित्र तथा उपकरण सुसज्जित रूप में रखे गये थे। यों सर्वसाधारण ने उसे बहुत उत्साहपूर्वक देखा, पर विद्यार्थी और अध्यापक वर्ग की दिलचस्पी अधिक रही। रखी हुई सामग्री विवरण बताने वाला छोटा−सा सूची पत्र पाँच सिलिंग मूल्य का था, उसे न केवल दर्शकों ने वरन् इस सम्बन्ध में रुचि रखने वालों ने बड़ी संख्या में खरीदा। उसकी माँग प्रदर्शिनी समाप्त हो जाने के बाद भी आती रही।

जापान के विश्वमेले−एक्सपो 70 में भारत की ओर से योग प्रदर्शिनी लगाई गई। इस का संकलन विश्वायतन योगाश्रम की ओर से किया गया। दर्शकों ने योगासनों को देखने और समझने में बहुत उत्साह दिखाया।

ब्रह्मा कुमारी ईश्वरीय विद्यालय की ओर से योरोप, अमेरिका के 14 देशों में तथा आस्ट्रेलिया में योग चित्रों की प्रदर्शनी लगाने की व्यवस्था की थी जिसमें न केवल साधारण नागरिकों ने दिलचस्पी दिखाई वरन् उच्च कोटि के राजनेता पत्रकार तथा बुद्धिजीवी भी आयोजकों से बहुत बातें जानने पूछने आये।

पिछले दिनों दिल्ली में निरंकारी महात्मा सन्त कृपालु सिंह के विदेशी शिष्यों की धूम थी उनका एक बड़ा अंतर्राष्ट्रीय योग सम्मेलन हुआ था वालयोगेश्वर की गतिविधियाँ भारत में बहुत चर्चित हैं। विदेशों में भी उनकी धूम है। मुँगेर के स्वामी सत्यानन्द जी महाराज के शिष्यों की संख्या पाश्चात्य देशों में बढ़ ही रही है। ऋषिकेश,लक्ष्मण झूला के इर्द−गिर्द लगभग एक दर्जन बहुमूल्य आश्रम ऐसे ही हैं जिनका निर्माण विदेशों से आये धन द्वारा हुआ है। उनके संचालक योग प्रचार के लिए विदेशों में जाते हैं और आवश्यक अर्थ व्यवस्था जुटाते हैं। निस्संदेह इस प्रकार के योग प्रचारकों की संख्या अब सैकड़ों की गिनती को पार करके हजारों की सीमा तक पहुँच चुकी है। संसार के किसी भी देश में भारतीय योग शिक्षक पाये जा सकते हैं।

यह सफलता वस्तुतः प्रस्तुत योग शिक्षक की विशेषता नहीं, वरन् संसार में भौतिकवाद की अवाँछनीय अभिवृद्धि के कारण उत्पन्न हुई समस्याओं की विभिन्न प्रतिक्रिया है। हमें यह ध्यान रखना होगा कि समय की माँग और युग की पुकार ने वह आकर्षण उत्पन्न किया है जो कि देशों में परिलक्षित हो रहा है।

भौतिकता का आध्यात्मिकता के साथ ताल−मेल बिठाने वाली दार्शनिक और व्यावहारिक चिन्तन प्रक्रिया को प्रस्तुत करना, यही है वह उत्तरदायित्व जो विचारकाल अध्यात्मवेत्ताओं को निवाहना चाहिए। कारण जितना गहरा है समाधान भी उसी स्तर का होना चाहिए। यदि योग को उथले क्रिया काण्डों तक सीमित कर दिया गया तो निकट भविष्य में इस दिशा में उत्पन्न हुआ आकर्षण समाप्त हो जायगा और वह निराशा नास्तिकता से भी महंगी पड़ेगी। नास्तिकता में यह गुंजाइश थी कि आस्तिकता यदि सच निकली तो उसमें आशा की किरणें विद्यमान हैं पर यदि आस्तिकता को भी खोखली मान लिया गया तो फिर उससे उत्पन्न हुई अनास्था को मिटा सकना कठिन हो जायगा। योग प्रचारकों को इस खतरे का भी ध्यान रखना चाहिए और अपनी योगशिक्षा में उस दार्शनिकता का समन्वय करना चाहिए जो उद्विग्न लोक मानस को समुचित समाधान दे सके।

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कुण्डलिनी महाशक्ति एक दिव्य ऊर्जा

कुण्डलिनी शक्ति का एक नाम ‘जीवन अग्नि’ (फायर आफ लाइफ) भी है। जो कुछ भी चमक, तेजस्विता, आशा, उत्साह, उमंग, उल्लास, दिखाई पड़ता है, उसे उस अग्नि का ही प्रभाव कहा जा सकता है। शरीरों में बलिष्ठता, निरोगिता, स्फूर्ति, क्रियाशीलता के रूप में और मस्तिष्क में तीव्र बुद्धि, दूरदर्शिता, स्मरण शक्ति, सूझ−बूझ, कल्पना आदि विशेषताओं के रूप में यही परिलक्षित होती है। आत्म−विश्वास और उत्कर्ष की अभिलाषा के रूप में धैर्य और साहस रूप में इसी शक्ति का चमत्कार झाँकते हुए देखा जा सकता है। रोगों से लड़कर उन्हें परास्त करने और मृत्यु की सम्भावनाओं को हटाकर दीर्घजीवन का अवसर उत्पन्न करने वाली एक विशेष विद्युतधारा जो मन से प्रवाहित होकर समस्त शरीर को सुरक्षा की अमित सामर्थ्य प्रदान करती है, उसे कुण्डलिनी ही समझा जाना चाहिए। यह जीवन अग्नि इस समस्त विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है। जड़ पदार्थों में जब यह काम करती है तब उसे विद्युत कहते हैं, अध्यात्म भाषा में इसे अपरा प्रकृति कहा गया है। पदार्थों का उद्भव, अभिवर्धन एवं परिवर्तन इसी की प्रक्रिया से होता है। पदार्थ निर्जीव है, पर उसमें यह विविध−विधि दृश्य जगत की गतिविधियों का संचार करती है। इस प्रकार वे जड़ कहे जाने वाले पदार्थ भी एक तरह की चेतना, ज्ञान, बुद्धि, अनुभूति से रहित जीवन−तत्व से भरे हुए ही हैं। अपने ढंग का जीवन उनमें भी विद्यमान है।

जीवन अग्नि का दूसरा रूप है, परा प्रकृति। इसे प्राणियों की अनुभूति कह सकते हैं। बुद्धि, विवेक, इच्छा ज्ञान, भावना आदि इसी के अंग हैं। अचेतन मस्तिष्क को केन्द्र बनाकर यही परा प्रकृति उनकी शारीरिक, मानसिक, स्वाभाविक गतिविधियों का अविज्ञात रूप से संचालन करती रहती है। श्वास प्रश्वास, रक्ताभिषरण, निद्रा, जागरण, क्षुधा, मल−त्याग एवं देह के भीतरी अंग−प्रत्यंगों का संचालन उसी के द्वारा होता है। उसकी दूसरी क्रिया चेतन विज्ञात मस्तिष्क के द्वारा अन्तःकरण चतुष्टय के माध्यम से मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार बनकर दृश्यमान होती है। इसे व्यक्तिगत क्रिया−कलाप में जीवन अग्नि का ही कर्तृत्व कहना चाहिए।

कहा जा चुका है कि इस विश्व−ब्रह्माण्ड में संव्याप्त ‘जीवन−अग्नि’ ब्रह्म चेतना के दो स्वरूप हैं, एक परा दूसरा अपरा। अपरा प्रकृति पदार्थों में गतिशीलता, हलचल उत्पन्न करती है और परा प्रकृति प्राणधारियों में इच्छाओं और अनुभूतियों का संचार करती है।

सारे शरीर में विद्युतधारा का प्रवाह आगे बढ़ना तनिक पीछे हटना, फिर आगे बढ़ना इस क्रम से संचालित होता है। साधारणतया बिजली की यही गति हैं। किन्तु मूलाधार में अवस्थित त्रिकोण शक्ति बीज है जिसे सुमेरु पर्वत भी कहते हैं।

एक सर्पाकार विद्युत प्रवाह इस सुमेरु के आसपास लिपटा बैठा है। इसी को महासर्पिणी कुण्डलिनी कहते हैं। इसे विद्युत भ्रमर भी कह सकते हैं। तेज बहने वाली नदियों में कहीं−कहीं बड़े भंवर पड़ते हैं जहाँ भंवर पड़ते हैं वहाँ पानी की चाल सीधी अग्रगामी न होकर गोल गह्वर की गति में बदल जाती है। मनुष्य शरीर में सर्वत्र तो नाड़ी संस्थान के माध्यम से सामान्य गति से विद्युत प्रवाह बहता है पर उस मूलाधार−स्थित सुमेरु के समीप जाकर वह भंवर गह्वर की तरह−चक्राकार घूमती रहती है। इस स्थिति को सर्पिणी कहते हैं। कुण्डलिनी की आकृति, सर्प की सी आकृति मानी गई है।

नदी प्रवाह में भंवरों की शक्ति अद्भुत होती है। उनमें फँसकर बड़े−बड़े जहाज भी सँभल नहीं पाते और देखते−देखते डूब जाते हैं। साधारण नदी प्रवाह में जितनी शक्ति और गति रहती है उसमें 60 गुनी अधिक शक्ति भँवर में पाई जाती है। शरीरगत विद्युत प्रवाह में अन्यत्र पाई जाने वाली क्षमता की तुलना में कुण्डलिनी की शक्ति हजारों गुनी बड़ी है। उसका स्वरूप एवं विज्ञान यदि ठीक तरह समझा जा सके और उस विद्युत प्रवाह का प्रयोग उपयोग जाना जा सके तो निःसन्देह शक्ति सर्व सामर्थ्य सम्पन्न सिद्ध पुरुष बन सकता है।

कुण्डलिनी का मध्यवर्ती जागरण मनुष्य शरीर में एक अद्भुत प्रकार की तड़ित विद्युत उत्पन्न कर देता है।

वस्तुतः स्थूल कुण्डलिनी का महासर्पिणी स्वरूप मूलाधार से लेकर मेरुदण्ड समेत ब्रह्मरंध्र तक फैले हुए सर्पाकृति कलेवर में ही पूरी तरह देखा जा सकता है। ऊपर नीचे मुड़े हुए दो महान शक्तिशाली केन्द्र चक्र ही उसके आगे−पीछे वाले दो मुख हैं।

मेरुदण्ड पोला है, उसके भीतर जो कुछ है उसकी चर्चा शरीर शास्त्र के स्थूल प्रत्यक्ष दर्शन के आधार पर दूसरे ढंग से की जा सकती है। शल्य−क्रिया द्वारा जो देखा जा सकता है, वह रचना क्रम दूसरा है। इसमें सूक्ष्म प्रक्रिया के अन्तर्गत योगशास्त्र की दृष्टि से परिधि में सन्निहित दिव्य−शक्तियों की चर्चा करनी है। योगशास्त्र के अनुसार मेरुदण्ड में एक ब्रह्म−नाड़ी है और उसके अन्तर्गत इड़ा और पिंगला दो अन्तर्गत शिरायें गतिशील हैं। यह नाड़ियाँ रक्तवाहिनी शिरायें नहीं समझी जानी चाहिए। वस्तुतः ये विद्युत−धाराएँ हैं। जैसे बिजली के तार में ऊपर एक−एक रबड़ का खोल चढ़ा होता है और उसके भीतर जस्ते तथा ताँबे का ठण्डा गरम तार रहता है, उसी प्रकार इन नाड़ियों को समझा जाना चाहिए। ब्रह्म−नाड़ी रबड़ का खोल हुआ, उनके भीतर इड़ा और पिंगला ठण्डे−गरम तारों की तरह हैं। इनका स्थूल कलेवर या अस्तित्व नहीं है। शल्य−क्रिया द्वारा यह नाड़ियाँ नहीं देखी जा सकतीं। इस रचना क्रम को सूक्ष्म, विद्युतधाराओं की दिव्य रचना ही कहना चाहिए।

मस्तिष्क के भीतरी भाग में यों कतिपय ‘कोष्ठकों’ के अन्तर्गत भरा हुआ मज्जा भाग ही देखने को मिलेगा। खुर्दबीन से और कुछ नहीं देखा जा सकता, पर सभी जानते हैं उस दिव्य संस्थान के नगण्य से दीखने वाले घटकों के अन्तर्गत विलक्षण शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। मनुष्य का सारा व्यक्तित्व, सारा चिन्तन, सारा क्रियाकलाप और सारा शारीरिक, मानसिक अस्तित्व इन घटकों के ऊपर ही अवलम्बित रहता है। देखने में सभी का मस्तिष्क लगभग एक जैसा दीखेगा पर उसकी सूक्ष्म स्थिति में पृथ्वी, आकाश जैसा अन्तर दीखता है, उसके आधार पर व्यक्तियों का घटिया बढ़िया होना सहज आँका जा सकता है। यही सूक्ष्मता कुण्डलिनी के सम्बन्ध में व्यक्त की जा सकती है। मूलाधार, सहस्रार, ब्रह्म−नाड़ी, इड़ा पिंगला इन्हें शल्य−क्रिया द्वारा नहीं देखा जा सकता। यह सारी दिव्य रचना ऐसी सूक्ष्म है, जो देखी तो नहीं जा सकती पर उसका अस्तित्व प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।

मलद्वार और जननेन्द्रिय के बीच जो लगभग चार अंगुल जगह खाली पड़ी है, उसी के गह्वर में एक त्रिकोण परमाणु पाया जाता है। सारे शरीर में गोल कण हैं, यह एक ही तिकोना है। यहाँ एक प्रकार का शक्ति−भ्रमर है। शरीर में प्रवाहित होने वाली तथा मशीनों में संचारित बिजली की गति का क्रम यह है कि वह आगे बढ़ती है, फिर तनिक पीछे हटती है और फिर उसी क्रम से आगे बढ़ती पीछे हटती हुई अपनी अभीष्ट दिशा में दौड़ती चली जाती है। किन्तु मूलाधार स्थित त्रिकोण कण के शक्ति−भंवर में सन्निहित बिजली गोल घेरे में पेड़ से लिपटी हुई बेल की तरह घूमती हुई संचारित होती है। यह संचार क्रम प्रायः 3॥ लपेटों का है। आगे चलकर यह विद्युतधारा इस विलक्षण गति को छोड़कर सामान्य रीति से प्रवाहित होने लगती है।

यह प्रभाव निरन्तर मेरुदण्ड में होकर मस्तिष्क के उस मध्य बिन्दु तक दौड़ता रहता है, जिसे ब्रह्मरंध्र या सहस्रार कमल कहते हैं। इस शक्ति केन्द्र का मध्य अणु भी शरीर के अन्य अणुओं से भिन्न रचना का है। वह गोल न होकर चपटा है। उसके किनारे चिकने न होकर खुरदरे हैं−आरी के दाँतों से उस खुरदरेपन की तुलना की जा सकती है, योगियों का कहना है कि उन दाँतों की संख्या एक हजार है। अलंकारिक दृष्टि से इसे एक ऐसे कमल पुष्प की तरह चित्रित किया जाता है, जिसमें पंखुरियाँ खिली हुई हों। इस अलंकार के आधार पर ही इस अणु का नामकरण ‘सहस्रार−कमल’ किया गया है।

सहस्रार−कमल का पौराणिक वर्णन बहुत ही मनोरम एवं सारगर्भित है। कहा गया है कि क्षीर सागर में विष्णु भगवान सहस्र फन वाले शेष नाग पर शयन कर रहे हैं। उनके हाथ में शंख, चक्र, गदा, पद्म है। लक्ष्मी उनके पैर दबाती है। कुछ पार्षद उनके पास खड़े हैं। क्षीर सागर मस्तिष्क में भरा हुआ, भूरा चिकना पदार्थ ‘ग्रे मैटर’ है। हजार फन वाला सर्प यह चपटा, खुरदरा ब्रह्मरंध्र स्थित विशेष परमाणु है। मनुष्य शरीर में अवस्थित ब्रह्म−सत्ता का केन्द्र यही है। इसी से यहाँ विष्णु भगवान का निवास स्थान बताया गया है। यहाँ विष्णु सोते रहते हैं अर्थात् सर्वसाधारण में होता तो ईश्वर का अंश समान रूप से है, पर वह जागृत स्थिति में नहीं देखा जाता। आमतौर से लोग घृणित, हेय, पशु प्रवृत्तियों जैसा निम्न स्तर का जीवन−यापन करते हैं।

जिस प्रकार पृथ्वी में चेतना एवं क्रिया उत्तरी दक्षिणी ध्रुवों से प्राप्त होती है, उसी प्रकार मानव पिण्ड देह के भी दो ही अति सूक्ष्म शक्ति संस्थान हैं। उत्तरी ध्रुव है−ब्रह्मरंध्र मस्तिष्क सहस्रार−कमल। दक्षिणी ध्रुव है− सुषुम्ना संस्थान−कुण्डलिनी केन्द्र मूलाधार चक्र। पौराणिक कथा के अनुसार क्षीर सागर में सहस्रार फन वाले सर्प पर विष्णु भगवान शयन करते हैं। यह क्षीर सागर मस्तिष्क में भरा श्वेत सघन स्नेह सरोवर ही है। सहस्रार−कमल एक ऐसा परमाणु है जो अन्य कोषों की तरह गोल न होकर आरी के दाँतों की तरह कोण कलेवरों से आवेष्टित है। इन दाँतों को सर्प फन कहते हैं। चेतना का केन्द्रबिन्दु इसी ध्रुव कण में प्रतिष्ठित है। चेतन और अचेतन मस्तिष्कों के अगणित घटकों को जो इन्द्रिय जन्य एवं अतीन्द्रिय ज्ञान प्राप्त होता है, उसका आधार यही ध्रुव−विष्णु अथवा सहस्रार−कमल है। ध्यान से लेकर समाधि तक और आत्म−चिन्तन से लेकर भक्तियोग तक की सारी आध्यात्मिक साधनाएँ तथा मनोबल, आत्म−बल एवं संकल्प जन्य सिद्धियों का केन्द्रबिन्दु इसी स्थान पर है।

दूसरा दक्षिणी ध्रुव मूलाधार चक्र, सुचारु संस्थान, सुषुम्ना केन्द्र है। जो मल−मूत्र के−संस्थानों के बीचों बीच अवस्थित है। कुण्डलिनी, महासर्पिणी, प्रचण्ड क्रिया−शक्ति इसी स्थान पर सोई पड़ी है। उत्तरी ध्रुव का महा सर्प अपनी सहचरी सर्पिणी के बिना और दक्षिणी ध्रुव की महासर्पिणी अपने सहचर महासर्प के बिना निरानन्द मूर्च्छित जीवन व्यतीत करते हैं। मनुष्य शरीर विश्व की समस्त विशेषताओं का प्रतीक प्रतिबिम्ब होते हुए भी तुच्छ−सा जीवन व्यतीत करते हुए कीट−पतंगों की मौत मर जाता है। कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त नहीं कर पाता, इसका एकमात्र कारण यही है कि हमारे पिंड के, देह के दोनों ध्रुव मूर्च्छित पड़े हैं, यदि वे सजग हो गये होते तो ब्रह्माण्ड जैसी महान् चेतना अपने पिंड में भी परिलक्षित होती।

मूत्र स्थान यों एक प्रकार से घृणित एवं उपेक्षित स्थान है। पर तत्वतः उसकी सामर्थ्य मस्तिष्क में अवस्थित ब्रह्मरंध्र जितनी ही है। वह हमारी सक्रियता का केन्द्र है। यों नाक, कान आदि छिद्र भी मल विसर्जन के लिए प्रयुक्त होते हैं, पर उनको कोई ढकता नहीं। मूत्र यन्त्र को ढ़कने की अनादि एवं आदिम परिपाटी के पीछे वह सतर्कता है, जिसमें यह निर्देश है, कि इस संस्थान से जो अजस्र शक्ति प्रवाह बहता है, उसकी रक्षा की जानी चाहिए। शरीर के अन्य अंगों की तरह यों प्रजनन अवयव भी माँस मज्जा मात्र से ही बने हैं, पर उनके दर्शन मात्र से मन विचलित हो उठता है। अश्लील चित्र अथवा अश्लील चिन्तन जब मस्तिष्क में उथल−पुथल पैदा कर देता है, तब उन अवयवों का दर्शन यदि भावनात्मक हलचल को उच्छृंखल बनादे तो आश्चर्य ही क्या है? यहाँ यह रहस्य जान लेना ही चाहिए। मूत्र स्थान में बैठी हुई कुण्डलिनी शक्ति प्रसुप्त स्थिति में भी इतनी तीव्र है कि उसकी प्रचण्ड धाराएँ खुली प्रवाहित नहीं रहने दी जा सकतीं। उन्हें आवरण में रखने से उनका अपव्यय बचता है और अन्यों के मानसिक सन्तुलन को क्षति नहीं पहुँचती। छोटे बच्चों को भी कटिबन्ध इसलिए पहनाते हैं। ब्रह्मचारियों को धोती के अतिरिक्त लँगोट भी बांधे रहना पड़ता है। पहलवान भी ऐसा ही करते हैं। संन्यास और वानप्रस्थ में भी यही प्रक्रिया अपनानी पड़ती है।

मल−मूत्र स्थान के मध्य अवस्थिति मूलाधार चक्र का केन्द्र बिन्दु एक तिकोना कण है, जिसे ‘सुमेरु’ अथवा कूर्म कहते हैं। शरीर में समस्त जीवन कण गोल हैं, केवल दो ही ऐसे हैं जिनकी आकृति में अन्तर है, एक ब्रह्मरंध्र स्थित सहस्रार−कमल नाम से पुकारा जाने वाला आरों की नोकों जैसी आकृति का ब्रह्मरंध्र−उत्तरी ध्रुव। दूसरा मूलाधार में अवस्थित चपटा, बीच में ऊँचा उठा हुआ−पर्वत या कछुआ की आकृति वाला दक्षिणी ध्रुव। इन दोनों पर ही जीव की सारी आधारशिला रखी है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर के−अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोषों के− अन्तःकरण−चतुष्टय में सप्त प्राणों के मूलाधार यही दो ध्रुव हैं। इन्हीं की शक्ति और प्रवृत्ति से हमारा बाह्य और अन्तरंग जीवन−क्रम चलते रहने में समर्थ होता है।

उत्तरी ध्रुव सहस्रार−कमल में विक्षोभ उत्पन्न करने और उसकी शक्ति को अस्त−व्यस्त करने का दोष, लोभ, मोह, क्रोध, अहंकार जैसी दुष्प्रवृत्तियों का है। मस्तिष्क उन चिन्ताओं में दौड़ जाता है, तो उसे आत्म−चिन्तन के लिए− ब्रह्म शक्ति के संचय के लिए अवसर ही नहीं मिलता। इसी प्रकार दक्षिणी ध्रुव मूलाधार में भरी प्रचण्ड क्षमता को कार्य शक्ति में लगा दिया जाय तो मनुष्य पर्वत उठाने एवं समुद्र मथने जैसे कार्यों को कर सकता है। क्रिया−शक्ति मानव प्राणी में असीम है। किन्तु उसका क्षय कामुकता विषय−विकारों में होता रहता है। यदि इस प्रवाह को गलत दिशा से रोक कर सही दिशा में लगाया जा सके तो मनुष्य की कार्य−क्षमता साधारण न रहकर दैत्यों अथवा देवताओं जैसी हो सकती है।

पुराणों में समुद्र−मन्थन की कथा आती है। यह सारा चित्रण सूक्ष्म रूप से मानव शरीर में अवस्थित कुण्डलिनी शक्ति के प्रयोग−प्रयोजन का है। हमारा मूत्र संस्थान− खारी जल से भरा समुद्र है। उसे अगणित रत्नों का भाण्डागार कह सकते हैं। स्थूल और सूक्ष्म शक्तियों की सुविस्तृत रत्न राशि इसमें छिपी हुई है। प्रजापति के संकेत पर एकबार समुद्र मथा गया। देव और दानव इसका मन्थन करने जुट गये। असुर उसे अपनी ओर खींचते थे अर्थात् कामुकता की ओर घसीटते थे और देवता उसे रचनात्मक प्रयोजनों में नियोजित करने के लिए तत्पर थे। यह खींचतान दूध में से मक्खन निकालने वाली खिलौने की, मन्थन की क्रिया चित्रित की गई है।

समुद्र मन्थन उपाख्यान में यह भी वर्णन है कि भगवान ने कछुआ का रूप बनाकर आधार स्थापित किया, उनकी पीठ पर सुमेरु पर्वत ‘रई’ के स्थान पर अवस्थित हुआ। शेष नाग के साढ़े तीन फेरे उस पर्वत पर लगाये गये और उसके द्वारा मथन कार्य संपन्न हुआ। कच्छप और सुमेरु मूलाधार चक्र में अवस्थित वह शक्ति बीज हैं जो दूसरे कणों की तरह गोल न होकर चपटा है और जिसकी पीठ, नाभि ऊपर की ओर उभरी हुई है। इसके चारों ओर महासर्पिणी, कुण्डलिनी साढ़े तीन फेरे लपेटकर पड़ी हुई है। इसे जगाने का, कार्य मंथन का प्रकरण उद्दात्त वासना के उभार और दमन के रूप से होता है। देवता और असुर दोनों ही मनोभाव अपना−अपना जोर अजमाते हैं और मन्थन आरम्भ हो जाता है। कामुकता भड़काने और उसे रोकने का खेल ऐसा है जैसे सिंह को क्रुद्ध और उत्तेजित करने के उपरान्त उससे लड़ने का साहस करना। कृष्ण की रासलीला का अध्यात्म रहस्य कुछ इसी प्रकार का है। उस प्रकरण की गहराई में जाने और विवेचना करने का यह अवसर नहीं है अभी तो इतना ही समझ लेना पर्याप्त होगा कि कामुकता की उद्दीप्त स्थिति को प्रतिरोध द्वारा नियन्त्रित करने का पुरुषार्थ, समुद्र मन्थन से रत्न राशि निकालने का प्रयोजन पूरा करता है।

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अपनों से अपनी बात

आत्मोत्कर्ष की साधना के लिए अभीष्ट वातावरण

अखण्ड−ज्योति के गत अंक में ‘अपनों से अपनी बात’ स्तम्भ में यह आकाँक्षा व्यक्ति की गई थी कि परिवार के सभी परिजन क्रमशः सान्निध्य सम्पर्क का उभय−पक्षीय आदान−प्रदान का पथ प्रशस्त करें। साधना के लिए उपयुक्त वातावरण की भी अपेक्षा रहती है। साधक की आन्तरिक मनःस्थिति एवं बाह्य परिस्थिति का अपना प्रभाव होता है, उससे वातावरण बनता है और प्रवाह प्रभाव उत्पन्न होता है। आत्मोत्कर्ष के लिए की जाने वाली साधनाओं में तो उपयुक्त वातावरण की अत्यधिक आवश्यकता रहती है। वैज्ञानिक, साहित्यकार, कवि, कलाकार, शोधकर्त्ता, विद्यार्थी आदि बुद्धि कर्मियों के लिए एकाग्रता पूर्वक अपने काम करने पड़ते हैं इसके लिए उन्हें विक्षोभ रहित एकान्त चाहिए। ठीक इसी स्तर का अति महत्वपूर्ण कार्य आत्म−निर्माण एवं आत्म−परिष्कार का भी है। इसके लिए वातावरण की अनुकूलता चाहिए। विक्षोभकारी वातावरण में कर्मकाण्ड तो हो सकते हैं। एक निष्ठा नहीं निभ पाती। क्षण−क्षण में सामने आने वाली समस्याएँ, आवश्यकताएं एवं हलचलें एकाग्रता में विक्षेप उत्पन्न करती हैं और आधे−अधूरे मन से किये हुए साधनाकृत अभीष्ट प्रतिफल उत्पन्न कर सकने में सफल हो नहीं पाते। अस्तु यह आवश्यकता सदा से अनुभव की जाती रही है कि आत्मोत्कर्ष की− साधनाओं की क्रिया−प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए उपयुक्त वातावरण भी तलाश किया जाय।

सफल साधकों ने जहाँ उपयोगी विधि−विधान अपनायें हैं− उपयुक्त मार्ग−दर्शन प्राप्त किये हैं वहाँ उनने इसके लिए उपयुक्त वातावरण भी तलाश किया है। साधना विज्ञान के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो पता चलता है कि सफल साधकों में से अधिकाँश ने हिमालय में डेरा डाला और वहाँ अपना निर्माण कार्य सम्पन्न किया है। इसके कितने ही कारण रहे हैं। सामान्य धरातल से ऊँचे स्थानों का वायुमण्डल शीतल रहता है सर्वविदित है कि नीचे स्थानों में गर्मी भी अधिक रहती है और ऊपर से गिरने वाले अवाँछनीय रज−कण भी अधिक जमते हैं। इस धूलि के साथ धुँआ जैसे प्रदूषण और विक्षोभकारी विचार भी उतरते बरसते हैं। गर्मी में फैलाव की शक्ति रहती है। उसके सम्पर्क में जो भी आवेगा फैलेगा। नीचे और गरम स्थानों की अपेक्षा ऊँचे और शीतल स्थान न केवल स्वास्थ्य सम्वर्धन के लिए उपयुक्त माने जाते हैं वरन् उनमें मानसिक स्वास्थ्य सन्तुलन बढ़ाने की क्षमता भी रहती है। गर्मी के दिनों साधन सम्पन्न लोग ऐसे लाभ पाने के लिए नैनीताल, मंसूरी, काश्मीर आदि स्थानों में अपने रहने की व्यवस्था बनाते हैं।

साधना के लिए भी ऐसे स्थान तलाश किये जाते हैं। आत्मिक स्वास्थ्य सम्वर्धन के लिए भी उपयोगी वातावरण मिल सके तो उसका विशेष लाभ होता है। तपस्वी अपने लिए अमीरों जैसी व्यवस्था तो नहीं बना पाते, पर पर्वतों की गुफाओं में निवास करने, कंदमूल जुटाने, वल्कल वस्त्र पहनने जैसे निर्वाह के साधन ढूँढ़ लेते हैं। धूनी जलाकर शीत निवारण की−लौकी, नारियल आदि के बर्तनों की−घास की चटाई बनाने की जैसी सुविधाएँ वहाँ भी मिल जाती है। तप−साधना के इतिहास में हिमालय की ऊँचाई और गंगातट की पवित्रता का लाभ उठाने वाले साधकों की संख्या अत्यधिक है। ऐतिहासिक तीर्थ तो अन्यत्र भी हैं, पर आत्म−साधना के तीर्थों की संख्या जितनी इस क्षेत्र में है उतनी अन्यत्र कहीं नहीं।

जहाँ जिस स्तर के व्यक्ति रहते हैं− जहाँ जिस प्रकार की हलचलें होती रहती हैं वहाँ के सूक्ष्म संस्कार भी वैसे ही बन जाते हैं और वे बहुत समय तक अपना प्रभाव बनाये रहते हैं। तपस्वियों का प्राण उनके निवास स्थान के इर्द−गिर्द छाया रहता है। सिंह और गाय एक साथ ऋषि आश्रमों में प्रेमपूर्वक पालतू बन जाते थे। ऐसे वातावरण में सहज ही मानसिक विक्षोभ शान्त होते हैं और साधना के उपयुक्त मनःस्थिति स्वतः बन जाती है।

आज प्राचीन काल जैसे तपस्वी नहीं रहे और वह क्षेत्र भी उस स्तर का नहीं रहा। यहाँ भी औद्योगिक प्रवृत्तियाँ तेजी से बढ़ रही हैं तो भी वातावरण में वैसी भावनात्मक विशेषता अभी भी मिल सकती है जैसी अन्यत्र कदाचित ही कहीं देखने को मिले। अभी भी हिमालय के क्षेत्र में अपराधों की संख्या तुलनात्मक दृष्टि से नगण्य है। लोग बिना ताला बन्द किये मात्र साँकल लगा कर चले जाते हैं और कई−कई दिन बाद आने पर भी अपना सामान जहाँ का तहाँ पाते हैं। तीर्थ यात्रियों का बोझ ढोने वाले पहाड़ी कुली मीलों आगे चले जाते हैं, पर कभी किसी को अपना सामान कम होने की शिकायत नहीं करनी पड़ती। ठण्डा प्रदेश होने और नस्ल की विशेषता से इस क्षेत्र के नर−नारियों का रंग−रूप अन्यत्र की अपेक्षा आकर्षक है। मनचले परदेशी भी इस क्षेत्र में बहुत आते है। गरीबी भी बहुत हैं। इतना होते हुए भी व्यभिचार की घटनाएँ सुनने में नहीं आतीं। शान्त−शालीन कठोर, श्रम साध्य और सन्तोषी जीवन−क्रम का अद्भुत समन्वय यहाँ देखा जाता है। एक आश्चर्यजनक प्रथा इस क्षेत्र में पाई जाती है कि कई भाइयों की सम्मिलित एक पत्नी होती है किन्तु इस प्रसंग को लेकर कभी उनमें ईर्ष्या−द्वेष उत्पन्न नहीं होता। सहकारी दाम्पत्य−जीवन भी प्रेमपूर्वक निभ सकता है। इसका प्रमाण हिमालय के जौन सार बावर आदि क्षेत्रों में भ्रमण करके कोई भी देख सकता है। निर्धन और अशिक्षित सामान्य जन−जीवन में इतनी उत्कृष्टता अभी भी सन् 76 में भी देखी जा सकती है तो वहाँ प्राचीन काल में कितनी ऊँची स्थिति रही होगी और कभी भी इस क्षेत्र में उच्च स्तरीय लोगों का स्तर क्या हो सकता है? इसका अनुमान लगा सकना कुछ कठिन नहीं होना चाहिए, वातावरण की इस प्राकृतिक विशेषता और तपस्वियों की आत्मिक ऊर्जा से भरे वातावरण को देखते हुए यह स्थल यदि साधना के लिए उपयुक्त माना जाता रहा है तो यह मान्यता उचित ही थी।

पाण्डवों ने अपना अन्तिम काल इसी क्षेत्र में पूरा किया था। कृष्ण बद्रीनाथ में बारह वर्ष तप करते रहे थे। राम ने देव प्रयाग में, लक्ष्मण ने लक्ष्मण झूला में, भरत ने ऋषिकेश में और शत्रुघन ने मुनि की रेती में अपने तप कुटीर बनाये थे और जीवन का अन्तिम समय इसी क्षेत्र में पूर्ण किया था। सातों ऋषियों के आश्रम इसी क्षेत्र में थे। भागीरथ तप यही पूर्ण हुआ था। अब से इस वर्ष पूर्व अखण्ड−ज्योति में एक विवेचनात्मक लेख लिखा गया था जिसमें इन्द्र आदि देवताओं का निवास एवं स्वर्ग प्रदेश इसी क्षेत्र में होना सिद्ध किया गया था। कैलाश एवं सुमेरु पर्वत देवताओं के निवास स्थल थे। नन्दन बन इधर ही है। स्वर्ग चर्चा से सम्बन्धित अनेक प्रमाण इधर मिलते हैं। मध्य एशिया से आर्यों का भारत प्रवेश हिमालय मार्ग से होना और उनका तिब्बत से नीचे उतरकर डेरा डालना प्रायः इतिहासवेत्ताओं द्वारा कहा जाता है। यह मान्यता भी देव−मानवों की राजधानी इस क्षेत्र में होने की संगति बनती है। जो हो, यहाँ कहना इतना भर है कि प्राचीन काल में देवताओं, ऋषियों, तत्ववेत्ताओं और तपस्वी साधकों का यह स्थान कर्मक्षेत्र रहा है। उनके सूक्ष्म संस्कार अभी भी इस क्षेत्र में अतिरिक्त रूप से पाये जाते हैं और साधना के लिए अन्यत्र की अपेक्षा यहाँ अधिक अनुकूलता रहती है।

शान्ति−कुञ्ज के लिए हरिद्वार का सप्त सरोवर स्थान बहुत ही समझ−बूझकर चुना गया था। हरिद्वार हिमालय का प्रवेश द्वार है। शिव शान्ति सती का अवसान−पार्वती का जन्म और तप यहीं सम्पन्न हुआ था। सप्तपुरी प्रसिद्ध है। उनमें से एक मायापुरी−हरिद्वार भी है। गंगा की सात धाराओं के पुण्य क्षेत्र के बारे में इतिहास यह है कि सप्तऋषि यहाँ तप करते थे। गंगा अवतरित हुई तो उन्होंने ऋषि आश्रमों को बिना किसी प्रकार की क्षति पहुँचाये अपना रास्ता बना लिया और सात भागों में विभक्त होकर इस क्षेत्र से आगे चली गई। अभी भी धाराओं के विभाजन का अद्भुत दृश्य यहाँ विद्यमान है। शान्ति−कुञ्ज की भूमि जहाँ है वहाँ अब से एक सौ वर्ष पूर्व गंगा की धार बहती थी। भूमि को बचाने के लिए सरकारी बाँध बना, धारा का विस्तार सीमित हुआ और जिस भूमि पर शान्ति−कुञ्ज बना है वह क्षेत्र कृषि योग्य बना दिया गया प्रकारान्तर से इसी बात को यों भी कहा जा सकता है कि गंगावतरण के सतयुग काल से लेकर अब से सौ वर्ष पूर्व तक शान्ति−कुञ्ज की भूमि पर गंगा की धारा प्रवाहित होती रही है। अब भी यहाँ के कुँओं का पानी गंगा के पानी बढ़ने, उतरने के क्रम से नीचा−ऊँचा होता रहता है। बालू की एक हलकी−सी परत ही गंगा की कूल धारा और इस भूमि में थोड़ा−सा दृश्य अन्तर प्रस्तुत करती हैं। जलधारा तो सर्वथा एक ही है। गंगा की बालू और गोल पत्थरों से ही यह भूमि पटी पड़ी है। मूल धारा भी मात्र दो फर्लांग की दूरी पर है और आश्रम की भूमि से उसके दर्शन भली प्रकार किये जा सकते हैं। प्रवेश दिशा को छोड़कर तीनों ओर हिमालय के दिव्य दर्शन होते हैं। थोड़ा ऊंचे चढ़कर दूरबीन से देखा जाय तो हिमाच्छादित चोटियाँ आसानी से देखी जा सकती हैं।

गंगा का गर्भ, हिमालय का छत्र और सप्तऋषियों का तप−इन तीनों के समन्वय से यह स्थान अपने आप में श्रेष्ठ परम्पराओं से परिपूर्ण है। साधना की दृष्टि से जीवन्त एवं प्राणवान कहा जा सकता है। अपने प्रयत्न से भी यहाँ के वातावरण में कुछ और प्रखरता लाने का प्रयत्न किया गया है। पचास वर्ष से निरन्तर चलती आ रही अखण्ड−ज्योति की घृत दीप शिखा यहीं प्रतिष्ठापित है। गायत्री मन्दिर के निकट चलते रहने वाले जप, अनुष्ठानों का क्रम अनवरत है। नित्य गायत्री यज्ञ भी सुसंचालित है। यह तीनों ही कार्य इस वातावरण में दिव्यता की सूक्ष्म चेतना का संचार करते हैं। हम भी कुछ न कुछ अपना तप−साधना का क्रम चलाकर आश्रम के वातावरण में ऐसी विशेषता उत्पन्न करने का प्रयत्न करते हैं जिससे यहाँ के रहने वालों में अनायास ही प्रखरता उत्पन्न हो सके।

आत्मोत्कर्ष की साधना सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए अपना श्रम करना तो आवश्यक है ही− वातावरण का उपयुक्त होना भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। जन−कल्याण के लिए किये जाने वाले अपने प्रयासों के साथ हिमालय के अधिक एकान्त एवं गहन प्रदेश में विशेष तप−साधना का जुड़ा होना भी सर्वविदित है। इसका कारण विधि−विधान की भिन्नता नहीं, अधिक उपयोगी वातावरण का−अधिक प्रखर सान्निध्य का लाभ लेना ही था। उचित समझा गया कि अखण्ड−ज्योति के वे परिजन जो लेखों का पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं समझते एवं साधना क्षेत्र में कुछ साहस भरे विशिष्ट कदम बढ़ाना चाहते हैं उनके लिए अन्य आधार अपनाने की तरह यह भी आवश्यक है कि वातावरण एवं सान्निध्य की प्रखरता का लाभ उठाते हुए अपनी साधन प्रक्रिया सम्पन्न करें।

शांति−कुंज में हर वर्ष पाँच साधना सत्रों की व्यवस्था की गई है। उनको 24 हजार गायत्री अनुष्ठान द्वारा संपन्न किया जाता है। साथ ही विचार−पद्धति एवं जीवन−प्रक्रिया में काया−कल्प प्रस्तुत करने वाली प्रेरणाएँ भी उपलब्ध की जाती हैं। साधकों की अपनी तपश्चर्या का सत्परिणाम तो हर जगह मिल सकता है, पर यहाँ वातावरण और सान्निध्य के दो अतिरिक्त लाभ और भी हैं और जिससे सत्परिणामों में तीन गुनी वृद्धि हो सकती है। हिमालय क्षेत्र और गंगा तट की अपनी विशेषता है। शांति−कुंज के आश्रम में छाई रहने वाली अतिरिक्त प्राण ऊर्जा का सान्निध्य भी एक अतिरिक्त प्रभाव तेजस् से युक्त है। उसका महत्व भी कम नहीं माना जा सकता है। प्रभावी सान्निध्य और प्रत्यक्ष मार्गदर्शन का कोई लाभ न हो ऐसी बात नहीं है।

दस−दस दिवसीय सत्रों को विशेष पत्रों के साथ सम्बद्ध करके रखा गया है−? बसन्त पर्व भगवती सरस्वती के अवतरण का−हमारी गतिविधियों के शुभारम्भ का−−परा और अपरा प्रकृति के उल्लास का अवसर है। 2. चैत्र की नवरात्रि, नवीन सम्वत्सर, भगवान राम की जन्म जयंती। 3. जेष्ठ की गायत्री जयन्ती, भगवती गंगा का−− माता गायत्री का जन्म दिन है। 4. आश्विन की नवरात्रि, भगवती दुर्गा की जन्म जयन्ती तथा असुरता की लंका पर भगवान राम की विजय का पर्व है। 5. मार्गशीर्ष की गीता जयन्ती की भगवान कृष्ण का कर्मयोग सन्देश इस विश्व में गुँजित हुआ था। स्थान की दृष्टि से जो महत्व तीर्थ स्थानों का है वही महत्व काल की दृष्टि से पुण्य पर्वों का है। पाँचों साधना सत्रों को ऐसे समय पर रखा है जिससे काम चक्र के अनुसार सूक्ष्म जगत से अनायास ही दिव्य तत्वों की अनवरत वर्षा होती है। सत्रों का समय निर्धारित करते समय इस तथ्य को भी ध्यान में रखा गया है।

विशिष्ट साधकों को वर्ष में एकबार आने की भी सुविधा मिल सकती है। ऐसे लोग अपना स्थान अमुक सत्र में सुरक्षित करा सकते हैं। जेष्ठ की गायत्री जयन्ती पर किसी का स्थान सुरक्षित नहीं किया जायगा। गर्मी की छुट्टियों से कई नये लोगों को उस समय ही आने की सुविधा मिलती है। अस्तु उसे खुला रखा गया है। इसके अतिरिक्त सामान्य साधक अपनी पारी की प्रतीक्षा करेंगे जब स्थान खाली होता रहेगा क्रमशः उन्हें बुलाया जाता रहेगा।


Quotation

गरम लोहे पर पड़ने से जल की बूँद का नाम भी नहीं रहता, वही कमल के पत्ते पर पड़ने से मोती−सी हो जाती है और वही स्वाति नक्षत्र में सीप में पड़ने से मोती हो जाती है। अधम, मध्यम और उत्तम गुण प्रायः संसर्ग से ही होते हैं।

−भर्तृहरि

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अगले दिनों कुछ अति महत्वपूर्ण सूत्र−

साधना स्वर्ग जयन्ती वर्ष को मात्र हर्षोल्लास का−उपलब्धियों पर सन्तोष अनुभव करने का−वर्ष न माना जाय, वरन् इसका उपयोग इस तरह किया जाय, जिसमें अपने मिशन को− उससे सम्बद्ध परिजनों को−नव जीवन उपलब्ध हो सके और उसके सत्र संचालक अपनी सफलता अनुभव कर सकें।

विगत पचास वर्षों में घोर अन्धकार की स्थिति और साधनहीन परिस्थितियों में साहसिकता के साथ जो कदम उठते चले जाते हैं, उनकी सफलता न सही उससे जुड़ी हुई एकात्म निष्ठा और तत्परता पर हम सर्व गर्व कर सकते हैं। ‘हम सब’ इसलिए कि सामूहिक चेतना उत्पन्न करना सदा जनशक्ति के आधार पर ही सम्भव होता है। व्यक्ति विशेष को श्रेय, मात्र इस आधार पर मिल सकता है कि उसने अग्रिम पंक्ति में खड़े होने का साहस किया। अन्यथा व्यापक क्षेत्र को प्रभावित करने वाले अभियानों की सफलता जन सहयोग पर ही निर्भर रहती है। वह उपलब्ध न हो तो व्यक्ति विशेष के क्रियाकलाप अपने कर्त्ता को ही लाभ हानि पहुँचाने तक सीमित बने रहते हैं।

जन−मानस में परिष्कृत करने की, साँस्कृतिक पुनरुत्थान की, युग पुकार पूरी करने के लिए वातावरण गरम करना काफी ईंधन की अपेक्षा रखता है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न तो देखा जा सकता है, पर उसे मूर्तिमान बनाने के लिए आधार पर खड़े कर देना अत्यन्त दुःसह कार्य है। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण का क्षेत्र कितना व्यापक है और उसके साथ कितनी समस्याएँ तथा आवश्यकताएं जुड़ी हुई हैं। इसे जितनी गम्भीरता से सोचा जाय उतना ही कार्य का उत्तरदायित्व अधिकाधिक भारी प्रतीत होता जाता है। प्रगति पथ में चट्टानों की तरह अड़ी हुई अवाँछनीयताओं को उखाड़ने के लिए चालू ढर्रे में भारी परिवर्तन अपेक्षित है। बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति की इन दिनों उतनी ही आतुरता अभीष्ट है जितनी पिछली पीढ़ी ने राजनैतिक क्रान्ति करने और खोई स्वतन्त्रता को वापस लाने के लिए अनुभव की थी।

इतने व्यापक प्रयोजनों के लिए जिन साधनों की आवश्यकता है उनमें सर्वप्रथम जागृत और जीवन्त जनशक्ति को ही गिना जा सकता है। पिछले पचास वर्षों में अपना सबसे बड़ा उपार्जन यही है। अपना एक परिवार बना हैं। इसके नाम कभी गायत्री परिवार, कभी युग निर्माण परिवार, कभी अखण्ड−ज्योति परिवार दे दिया जाता है। तीनों नामों से एक ही ऐसे समूह का बोध होता है जो निजी जीवन में उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्त्व का अधिकाधिक समावेश करके व्यक्तित्व की प्रखरता उत्पन्न करने में तत्परतापूर्वक संलग्न है। साथ ही अपने समय की समस्याएं सुलझाने के लिए अपने अंशदान, योगदान देने के लिए अनुकरणीय परम्पराएँ प्रस्तुत करने के लिए तत्परता बरतने में भी पीछे नहीं रह रहा है। यही अपना परिवार है। संख्या की दृष्टि से सही गणना तो नहीं हो सकी, पर अनुमान है कि जिन्हें हम लोग परिजन कहते हैं, उन प्रखर व्यक्तित्वों की गणना एक लाख से कम नहीं है।

उपलब्धियों के पीछे सबसे बड़ी शक्ति उन परिजनों की ही लगी हैं, जिनने श्रेय के लिए नहीं कर्त्तव्य के लिए ही समान रूप से भागीदारी स्वीकार की है और जो हमारे कदम से कदम और कन्धे से कन्धा मिलाकर चले हैं। साधना स्वर्ण, जयन्ती वर्ष में यदि कुछ हर्षोल्लास की सन्तोष और गर्व की बात हो तो उसमें परिवार के प्रत्येक सदस्य को समान रूप से भागीदार माना जायगा।

वसन्त पर्व पर आमतौर से हर्षोल्लास व्यक्त करने वाले छोटे बड़े आयोजन होते हैं। उसमें पिछले वर्ष के प्रयासों की समीक्षा और भावी क्रिया−कलापों की तैयारी पर चिन्तन और मन्थन की सर्वत्र आवश्यकता समझी जाती है। परस्पर चर्चा इसी प्रसंग पर होती है और स्थिति के अनुरूप अगले कदम किस प्रकार उठें, इसका निर्धारण होता है। यही रीति−नीति मिशन के संचालकों की रही है और इसी का अनुसरण परिजनों एवं शाखा−संगठनों द्वारा किया जाता रहा है। इस बार स्वर्ण जयन्ती वर्ष रहा तो उत्साह की मात्रा भी बढ़ी हैं− आयोजन भी बढ़े हुए हैं और भावी प्रयासों के निश्चय व्यक्त करने वाले समाचार भी अधिक बड़े और अधिक संख्या में आये हैं। यह सन्तोष की बात है कि अपने आयोजनों के पीछे प्रदर्शन एवं विनोद का नहीं, वरन् युग देवता के चरणों पर अपने अनुदानों को अधिकाधिक मात्रा में समर्पित करना ही उद्देश्य रहता है। इस बार अधिक उत्साह उभरा तो पैरों में थिरकन भी अधिक दीख पड़ रही है। यह उचित ही समझा जाना चाहिए और स्वाभाविक ही कहा जाना चाहिए।

इन दिनों विचार उठ रहा है कि स्वर्ण जयन्ती को अधिक सार्थक और अधिक प्रखर बनाने के लिए जो हो रहा है उससे अधिक करने की व्यवस्था बनाई जाय। समय की आवश्यकता और युग की पुकार को ध्यान में रखकर हमारे प्रयासों में अधिक प्रखरता आनी चाहिए। ध्वंस सरल होता है, निर्माण कठिन। ध्वंस तो बालक भी कर सकता है और एक दियासलाई की तीली भी गजब ढा सकती है। प्रखरता की परीक्षा निर्माण खड़े करने में होती है। हम निर्माण पर विश्वास करते हैं और उसी दिशा में धीमी किन्तु साहस भरी गति से अनवरत यात्रा जारी रखे रहे हैं। साधना वर्ष में अपने निर्माण ऐसे होने चाहिए जिनकी तुलना उत्तुंग पर्वत शिखरों से की जा सके। इन दिनों अपने मन में यही विचार चल रहा है कि उभरे हुए उत्साह को ऐसी दिशा मिलनी चाहिए जिससे मिशन के लक्ष्य की निकट से निकटतम आने की सम्भावना साकार हो सके। व्यक्ति, परिवार एवं समाज निर्माण के−बौद्धिक, नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति के−अपने प्रयास इस वर्ष जितने प्रखर हो सके उतनी ही साधना वर्ष की सफलता एवं सार्थकता मानी जा सकती है।

परिजनों को 45 मिनट की विशेष साधना करने के लिए कहा गया है। हर स्थान पर साधना मण्डल खड़े करने और अध्यात्म मार्ग में रुचि रखने वालों को नया उत्साह देने के लिए कहा गया है। जहाँ साधना मण्डल हों वहाँ चार दिवसीय साधना सत्र का आयोजन किया जाय और उनमें प्राण−प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया अपनायी जाय। यह शान्ति−कुञ्ज में चल रही साधनात्मक एवं शिक्षणात्मक प्रक्रिया का अनुकरण है। भवन निर्माण न सही−प्रक्रिया की दृष्टि से तो सर्वत्र छोटे शान्ति−कुञ्ज चल सकते हैं यह महत्वपूर्ण प्रक्रिया का विकेन्द्रीकरण है इसके दूरगामी परिणाम होंगे। यों प्रस्तुत वर्ष में हर दिन 24 करोड़ गायत्री जप सम्पन्न होते चलने और उससे वातावरण में देवत्व की प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न होने की बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं।

प्रसन्नता की बात है कि यह घोषित निर्धारित प्रक्रिया इन दिनों अतीव भाव भरे उत्साह के साथ चल रही है। परिजनों में से अधिकाँश ने 45 मिनट वाली शक्ति संचार साधना आरम्भ कर दी है। जो कारणवश अभी नहीं कर सके हैं वे अगले ही दिनों शृंखला में जुड़ने की सूचना भेज चुके हैं। साधना एक लाख तक ही सीमित न रह जाय, वरन् क्षेत्र विस्तार के लिए पूर्ण प्रयत्न किया जाय यह उत्साह भी सर्वत्र उभरा है। अनुसाधक तेजी से बनते ओर बढ़ते जा रहे हैं। प्रगति को देखते हुए यही प्रतीत होता है कि साधना शृंखला की नई कड़ियाँ जुड़ने से उसकी लम्बाई निश्चित रूप से कई गुनी बढ़ जायगी। अनुमान है कि साधना मंडलों की स्थापना और वहाँ होने वाले साधना सत्रों की संख्या एक हजार से कम नहीं, वरन् अधिक ही होकर रहेगी। शान्ति−कुञ्ज के छोटे स्वरूप यदि इतने स्थानों पर इसी वर्ष खड़े हो जाते हैं तो निश्चय ही यह एक बहुत बड़ी बात होगी और भविष्य के लिए अति महत्वपूर्ण परम्परा चल पड़ने की सम्भावना प्रत्यक्ष होती देखी जा सकेगी।

यह साधना वर्ष−नव चेतना उत्पन्न करने, कार्य क्षेत्र बढ़ाने, सूक्ष्म वातावरण में देवत्व की ऊर्जा भरने जैसे कितने ही प्रयोजन पूरे कर सका तो ही उसकी सार्थकता सराही जा सकेगी। इन प्रयोजनों में अति महत्वपूर्ण कार्य यह होना चाहिए कि संस्कारवान आत्माएँ ऊर्ध्वगामी प्रगति के लिए अभीष्ट प्रेरणा एवं सामर्थ्य प्राप्त करें। पचास वर्ष पूर्व ऐसी ही घटना घटित हुई थी। प्रकाश की एक दिव्य धारा ने 25 वर्षीय बालक का कायाकल्प कर दिया था। उसका चिन्तन मरोड़ा और कर्तृत्व मोड़ा गया था। यह दिव्य अनुदान कितना सार्थक सिद्ध हुआ−इससे व्यक्ति और समाज ने कितना लाभ उठाया यह सर्वविदित है।

पचास वर्ष पूर्व के उसी बीजारोपण का प्रतिफल आज विशालकाय वट वृक्ष के रूप में सामने खड़ा है। ऐसा अवतरण एक व्यक्ति तक सीमित होकर नहीं रह जाना चाहिए, यह परम्परा आगे भी चलनी चाहिए। बिजली की तरह एक चमक कौंधे और फिर अन्धकार ज्यों का त्यों छा जाय तो उससे चकाचौंध भर उत्पन्न होगा, बात वैसी नहीं बनी जैसी अपेक्षित थी। काम तो सूर्य किरणों की अनवरत वर्षा से चलता है। दिव्य अवतरण हममें से अनेक व्यक्तियों में होना चाहिए। हजार आम्र उपवन लगा सकने में सफल एक हजारी किसान चर्चा का विषय बन सकता है−आदर्श प्रस्तुत कर सकता है, पर वसुधा को सुरम्य उद्यान बनाने के लिए असंख्यों हजारी किसानों की आवश्यकता पड़ेगी। साधना वर्ष की अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह हो सकती है कि दिव्य अवतरण से सम्पन्न अनेकों व्यक्तियों का उदय इस पुण्य बेला में हो सके। उनके मिले−जुले प्रयास ही रीछ, वानरों की सेना की भूमिका प्रस्तुत कर सकेंगे। समुद्र पर पुल बाँधने, अभेद्य समझी जाने वाली लंका को धराशायी करने और संस्कृति की सीता को वापस लाने जैसे असंभव कार्यों को संभव बनाना जिन व्यक्तित्वों द्वारा सम्भव हो सकता है, उन्हीं का बहुत संख्यक निर्माण इन दिनों होना चाहिए। यदि ऐसा हो सके तो निश्चय ही यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी− साधना वर्ष की।

यह कैसे सम्भव हो सकता है? किनके लिए संभव हो सकता है? इसके लिए किस साहस और प्रयास की आवश्यकता होगी? यह प्रश्न ऐसे हैं जिन पर लेख लिखकर प्रकाश डाला जाना संभव नहीं हो सकता व्यक्ति विशेष की परिस्थिति के अनुरूप हर किसी के पृथक परामर्श ही उपयुक्त हो सकते हैं। इस संदर्भ में महत्वपूर्ण व्यक्तियों से कुछ विशेष विचार−विनिमय की आवश्यकता अनुभव की गई है। अस्तु अगले ही दिनों कुछ परामर्श पत्रों की तात्कालिक व्यवस्था बनाई गयी है।

साधना वर्ष बसन्त से बसन्त तक का है 5 फरवरी 76 से आरम्भ होकर वह एक वर्ष में पूरा हो जायगा। इसके प्रथम चार महीनों में वे परामर्श और प्रयास पूरे हो जाने चाहिएं जिन्हें शेष आठ महीने फलित होने में ही निश्चिंतता पूर्वक लग सके। इस दृष्टि से शान्तिकुञ्ज में चल रही सत्र प्रक्रिया को अधिक विस्तृत और अधिक प्रखर बनाया गया है।

घोषित पाँच सत्रों में से बसन्त पर्व का दस दिवसीय सत्र यथासमय पूरा हो गया। साधना वर्ष के आरम्भिक चार महीनों में दो और होने शेष हैं। एक−चैत्र की नवरात्रि का− दूसरा जेष्ठ की गायत्री जयन्ती का। दोनों ही दस−दस दिवसीय हैं। दोनों में ही 24 हजार गायत्री अनुष्ठानों की तथा योग तप साधना विधानों का घोषित समन्वय यथावत् है। इनमें आने की जिन्हें स्वीकृति दी गयी है वह यथावत् है। उसमें कोई हेर−फेर नहीं है।

सत्रों के बीच में एक-एक दिन इसलिए खाली छोड़ा गया है कि आगन्तुकों को एक दिन पूर्व ही आना पड़ेगा। खाली करने वाले तो शिविर के अन्तिम दिन मध्याह्नोत्तर विदा हो सकेंगे। विदाई और आगमन की अस्त-व्यस्तता को ध्यान में रखते हुए एक दिन खाली रखना आवश्यक था।

इन पंक्तियों के द्वारा उन सभी भावनाशील परिजनों को इन आठ सत्रों में परामर्श- प्रयोजन के लिए पधारने के लिए आमन्त्रित किया जा रहा है जो बसन्त, चैत्र नवरात्रि या जेष्ठ जयन्ती के सत्रों में सम्मिलित नहीं हो सकेंगे। बसन्त पर्व समाप्त हुआ। चैत्र और जेष्ठ के सत्रों में आने वालों की संख्या लगभग पूर्ण हो गई है, अब उपरोक्त आठ सत्र ही शेष हैं जिनमें विशिष्ट परिजनों को आने के लिए आमन्त्रित किया जा रहा है।

आमन्त्रण का उद्देश्य परिजनों में दिव्य अवतरण की सम्भावना पर विचार करा और जिसके लिए जितना संभव हो उतने की उनके लिए व्यवस्था करना मात्र है। इसी सिलसिले में यह विचार कर लिया जायगा कि मिशन के घोषित उद्देश्यों को अग्रगामी बनाने के लिए इस वर्ष कहाँ क्या कुछ सम्भव हो सकता है?

यह अंक पाठकों के हाथों पहुँचने के पश्चात आठ सत्रों का समय बहुत ही कम रह जायगा। इसलिए अलग से पत्र व्यवहार की गुंजाइश न रहेगी। यह अंक ही आमन्त्रण समझा जाय और जिन्हें जिस सत्र में सुविधा पड़ती हो वे उसके लिए आवेदन पत्र भेजें। कोई भी किसी भी सत्र में आ सके ऐसा संभव नहीं हो सकता। शान्ति-कुंज में स्थान नितान्त सीमित है। उतने ही आगन्तुक यहाँ ठहर सकते हैं, जिनके लिए स्थान है, अस्तु अपनी सुविधा के कम से कम दो सत्रों की तारीखों के लिए आवेदन करना चाहिए ताकि स्थान संतुलन को ध्यान में रखते हुए स्वीकृति दी जा सके। देर से आवेदन पत्र भेजने पर सीमित स्थान पूरे हो जाने के कारण इन सत्रों में प्रवेश मिल सकना संभव न हो सकेगा। तब आश्विन नवरात्रि उसके पश्चात् के सत्रों की स्वीकृति देने के अतिरिक्त और कोई चारा शेष न रह जायगा। जल्दी आवेदन पत्र भेजने का सुझाव इसीलिए दिया गया है।

यहाँ यह अत्यन्त स्पष्ट है कि प्रायः सभी सत्र विशिष्ट परिजनों को महत्वपूर्ण परामर्श देने एवं प्रकाश देने के लिए दिये जा रहे हैं। इनके साथ तीर्थयात्रा का उद्देश्य न जोड़ा जाय और स्त्री, बच्चों, वृद्ध, पड़ौसी, दर्शनार्थी, आशीर्वादार्थी लोगों की भीड़ को साथ लेकर न चला जाय। इससे स्थान घिरने से उपयुक्त व्यक्तियों को लाभ लेने से वंचित रहना पड़ता है और अनगढ़ लोगों के कारण यहाँ घोर अव्यवस्था फैली है। शान्ति कुंज का उपयोग धर्मशाला की तरह करने के इच्छुकों को सदा से रोका जाता रहा है। अब इस संदर्भ में अत्यन्त कड़ाई बरती जायगी और अवांछनीय लोगों को उलटे पैरों वापस लौटा दिया जायगा। मिशन की कार्यकर्त्ती एवं विचारशील महिलाओं की बात दूसरी है, पर अन्य लोगों के लिए स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयत्न भी एक प्रकार से छल करना ही है। कष्ट पीड़ितों का- सहायता प्राप्त करने का मनोरथ रखना तो उचित है, पर इसके लिए एक अधिकारी व्यक्ति का स्थान रोकने की चेष्टा उन्हें नहीं करनी चाहिए। यहाँ उच्च उद्देश्य के लिए ही किसी को आना और ठहरना चाहिए। अन्य लोगों के लिए होटल धर्मशाला ही उचित स्थान है।

चैत्र से जेष्ठ तक की अवधि में होने वाले 8+2=10 सत्र विशेष महत्वपूर्ण हैं अपेक्षा यह की जायगी कि इस अवधि में प्रायः सभी प्रखरता सम्पन्न स्वजनों से परामर्श- विचार विनिमय एवं आदान-प्रदान कर लिया जाय। इसके लिए कुछ लोगों को अपने क्षेत्र के लोगों से संपर्क बनाने और जो इन सत्रों के लिए उपयुक्त हैं, उन्हें साथ लाने का काम भी सौंपा गया है।

आगामी दो दस दिवसीय और आठ पाँच दिवसीय सत्र विशिष्ट परिजनों में दिव्य अवतरण की, व्यक्तित्वों में काया-कल्प की और युग परिवर्तन की संभावना साकार करने में अति महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न कर सकेंगे ऐसा लगता है।

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अन्न को औषधि मानकर सेवन करें।

अन्न जीवन है, यह हमारे बाह्य कलेवर का प्राण है, इसके बिना यह कलेवर निर्जीव, निष्प्राण है। यह शरीर रूपी गाड़ी का पेट्रोल है, इसके बिना गाड़ी चल नहीं सकती, शरीर यात्रा ठप्प हो जाती है। प्राण में प्राणशक्ति न हो, पेट्रोल में मिक्स्चर हो, तो भी कलेवर ठीक काम नहीं करता, गाड़ी ठीक चलती नहीं, उसकी गति में वह बात आती नहीं। अतः आवश्यकता इस बात की है कि हमारा अन्न प्राणवान हो, हमारी पेट्रोल शुद्ध, स्वच्छ हो जो इस शरीर को प्राण दे सके इस गाड़ी को गति दे सके।

अन्न को संस्कार निर्माता कहा गया है। मानसिक संस्कारों के निर्माण में इसका विशेष योगदान रहता है। हमारा गुण, कर्म और स्वभाव वैसा ही बनता है जैसा हम अन्न खाते हैं। कहा भी गया है ‘‘जैसा खायें अन्न, वैसा बने मन।’’ कुधान्य अथवा अभक्ष्य, कुसंस्कार डालता है और पापवृत्तियों की ओर ले जाता है। यह हमारे आत्मबल को क्षीण कर हमारी प्रगति के मार्ग को अवरुद्ध करता है। इसके विपरीत शुद्ध सात्विक आहार, सुसंस्कार और सत्प्रवृत्तियों को जागृत करता है, इससे आत्मबल बढ़ता है और हमारी प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है। इसलिए यह आवश्यक है कि हमारा अन्न सात्विक, परिश्रम तथा ईमानदारी की कमाई का हो। ऐसा अन्न ही हमारे मन पर स्वच्छ एवं स्वस्थ संस्कार डालने में सफल होगा।

अन्न को हम देवता के रूप में मानते हैं अतः भोजन को हमें देव प्रसाद के रूप में ग्रहण करना चाहिए। प्रसाद ग्रहण करते समय यह कौन देखता है कि इसमें स्वाद है अथवा नहीं, यह मीठा है अथवा फीका, यह थोड़ा है अथवा अधिक। प्रसाद लेते समय तो हर कोई उसे श्रद्धा एवं भावना के साथ ग्रहण करता है, मस्तक से लगाता है और रुचि पूर्वक खाता है। इसी प्रकार भोजन की थाली सामने आते ही हमें नेत्र बन्द कर, भगवान का नाम लेकर, भोग लगाकर प्रसाद भावना से भोजन ग्रहण करना चाहिए। केवल स्वाद की कमी के कारण उस पर नाक-भौं न सकोड़ी जायें। इस प्रसाद भावना एवं श्रद्धा के साथ किया गया भोजन अपने साथ सूक्ष्म संस्कार लेकर हमारे शारीरिक, मानसिक और आत्मिक संस्थान में प्रवेश कर उसे तत्वतः प्रभावित करता है और हमें दृष्टि, तुष्टि, पुष्टि आदि विभिन्न लाभ प्रदान करता है। यदि भोजन के साथ प्रसाद भावना का समन्वय न किया जाये, तो वह उदर पूर्ति मात्र कर सकता है, उसका अन्य कोई सूक्ष्म प्रभाव न होगा। इसीलिए हिन्दू धर्म में भगवान को भोग लगाकर, भोजन को प्रसाद रूप में ही ग्रहण करने की परम्परा है। जो भगवान को समर्पण किये बिना खाता है, वह गीताकार की दृष्टि में ‘चोर’ है।

आयुर्वेद में आहार को क्षुधा रोग की औषधि माना गया है। औषधि में स्वाद क्या देखना? जो लोग दवा में गुण न देखकर उसका जायका पसन्द करते हैं, वे अस्वस्थता से छुटकारा नहीं पा सकते। भोजन में उसकी सात्विकता और पौष्टिकता ही विचारणीय है स्वाद तो उसमें उल्टा विघ्न उपस्थित करता है। स्वाद की दृष्टि रखकर नमकीन, चटपटे, मीठे, तले हुए, कुरमुरे, चिकने आदि जो पदार्थ खाये जाते हैं, वे पाचन क्रिया को बिगाड़कर, हमें नाना प्रकार के रोगों से ग्रस्त ही करते हैं।

स्वाद न देखने का अर्थ यह नहीं कि भोजन को अरुचिकर एवं अग्राह्य रूप में बनाकर खाया जाये। बुस गया है तो भी खाया जाये, दूध फट गया है, खटांध आ रही है तो भी पिया ही जाये, यह उचित नहीं। अरुचिकर चित्त में घृणा पैदा करने वाली, अखरने, खटकने वाली बात भोजन में न हो, यह तो देखना ही चाहिए। पर बात इतनी ही है कि केवल मीठे या मसाले के आधार पर, केवल स्वाद के आधार पर भोजन को महत्व न दिया जाये। ऐसी धार्मिक अभिरुचि बना लेने से एक लाभ यह भी है कि मनुष्य सीधे-सादे भोजन से संतुष्ट हो जाता है भोजन में मिर्च, मसाले अथवा मिठास के अभाव में न वह क्रुद्ध होता है और न खिन्न।

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सच्चा प्यार


सच्चा प्यार (kavita)

सच्चा प्यार हमेशा रहता मिटने को तैयार। प्रेम पात्र से यह न चाहता है कोई प्रतिकार।

इसका जन्म जहाँ होता वह आत्मा का उद्यान। इसीलिए तो जन्म−जन्म तक चलती यह पहचान॥

प्राणों को मृदु पुलक बाँटती इस की मंद बयार। प्रेम पात्र से यह न चाहता है कोई प्रतिकार॥

यह न माँगता कुछ भी प्रिय से देकर होता तुष्ट। सुखी रहे दूसरा इसी में यह होता सन्तुष्ट॥

यह न कभी भी भव्य भावना का करता व्यापार। प्रेम पात्र से यह न चाहता है कोई प्रतिकार॥

यह पराग−सा, गंध बाँटना ही है इसका ध्येय। यह बादल−सा, एक बूँद भी इसकी नहीं अदेय॥

यह रवि के सम खुद जलकर बाँटता सदा उजियार। प्रेम पात्र से यह न चाहता है कोई प्रतिकार॥

यह सुख का मृदु स्रोत यही मानस वीणा का तान। मधुर प्यार से ही उपजा जीवन का शाश्वत गान।

सच मानो, निष्कपट प्रेम ही जीवन का आधार। प्रेम पात्र से यह न चाहता है कोई प्रतिकार॥

जीने का साहस देता है, मंजिल का विश्वास। मिलने पर चिर तृप्ति, बिछड़ने पर देता चिर प्यास॥

देने ही देने का क्रम रखता है सच्चा प्यार। प्रेम पात्र से यह न चाहता है कोई प्रतिकार॥

जब होता यह मातृभूमि से, बनता तब बलिदान। बंधुता जब युग−पीड़ा से तब होता युग−निर्माण॥

और सदा निःस्वार्थ प्रेम से प्रभु होते साकार। प्रेम पात्र से यह न चाहता है कोई प्रतिकार॥

−माया वर्मा

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*समाप्त*