कलाकार के हाथ अनगढ़ वस्तुओं को पकड़ते हैं और अपने उपकरणों के सहारे उन्हें नयनाभिराम सुन्दरता से भरते और बहुमूल्य बनाते हैं। कुम्हार मिट्टी से सुन्दर खिलौने बनाते हैं- मूर्तिकार पत्थर के टुकड़े को देवता प्रतिमा में परिणत करता है। गायक बाँस के टुकड़े से वंशी की ध्वनी निनादित करता है। धातु का टुकड़ा स्वर्णकार के हथौड़े की चोट खाकर आकर्षक आभूषण बनता है। कागज, रंग और कलम से बहुमूल्य चित्र बनाने का चित्रकार का कर्तृत्व कितना चमत्कार उत्पन्न करता है इसे कोई भी देख सकता है।
जीवन एक अनगढ़ तत्व है। इसे दयनीय दुर्गति से ग्रसित स्थिति में ही अधिकांश व्यक्ति किसी प्रकार गुजारते हैं। उससे लाभ और आनन्द उठाना तो दूर उलटे भार की तरह ढोने में ही कमर टूटती और गरदन मुड़ती दिखाई देती है।
क्या वस्तुतः जीवन ऐसा ही है जिसे रोते-खीजते किसी प्रकार पूरा किया जाना है? इसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि अनाड़ी हाथों में पड़कर हीरा भी उपेक्षित होता है तो बहुमूल्य मनुष्य जीवन भी क्यों न भार बनकर लदा रहेगा। किन्तु यह भी स्पष्ट है कि यदि उसे कलाकार की प्रतिभा से सँभाला, सँजोया जाय तो निश्चय ही उसे देवोपम स्तर का- स्वर्गीय परिस्थितियों से भरा-पूरा जिया जा सकता है।
साधन जीवन जीने की कला है। उपासना भी इसी कला विज्ञान का एक पक्ष है। जो मानवी अस्तित्व की गरिमा समझ सका और उसे अनगढ़ स्थिति से निकाल कर सुसंस्कृत पद्धति से जी सका उसे सर्वोपरि कलाकार कह सकते हैं।
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मृत्यु से सब डरते हैं, पर इसलिए कि वह सचमुच ही डरावनी है। हमें सिर्फ अविज्ञात से डर लगता है, अपरिचित के सम्बन्ध में अनेकों आशंकाएँ रहती हैं। अनिश्चय ही- अविश्वस्त स्थिति ही डरावनी होती है। रात्रि के अन्धकार में डर लगता है, पर किसका ? चोर का नहीं, इस सुरक्षित स्थान तक उसकी कोई पहुँच नहीं। सर्प का -नहीं इस ऊँची अट्टालिका के संगमरमर से बने फर्श तक आ सकने का उसका कोई रास्ता नहीं। भूत का-नहीं वह तो भ्रम-मात्र है, उसके अस्तित्व पर कोई भरोसा नहीं। फिर वही प्रश्न-अँधेरा क्यों डरा रहा है ? सुनसान में सिहरन क्यों हो रही है ? निश्चय ही यह अनिश्चय की-स्थिति है जो अपरिचित से डरने के लिए बाध्य करती है। अपरिचित अर्थात् अज्ञात। सचमुच अज्ञान सबसे अधिक डरावना है। मौत अज्ञान की छाया मात्र है।
एक गड़रिया राजकीय सम्मान के लिए सिपाहियों द्वारा दरबार में उपस्थित किया गया। वह बेतरह काँप रहा था। भय था कि न जाने उसका क्या होगा, पर जब उसे सम्मानित किया गया और उपहार से लादा गया जब वह सोचने लगा मैं व्यर्थ ही थर-थर काँपता रहा और अपना रक्त सुखाता रहा।
डरावनी मृत्यु आखिर है क्या ? तनिक जानने की कोशिश करें कि वह तनिक सी विश्रान्ति भर है। अनवरत यात्रा करते-करते जब थककर चेतना चूर-चूर हो जाती है तब वह विश्राम चाहती है। नियति उसकी अभिलाषा पूर्ण करने की व्यवस्था बनाती है। थकान को नवीन स्फूर्ति में बदलने वाले कुछ विश्राम के क्षण वस्तुतः बड़े मधुर और सुखद होते हैं। क्या उन्हें दुखद दुर्भाग्य माना जाय ?
सूर्य हर दिन अस्त होता है, पर वह किसी भी दिन मरता नहीं। अस्त होते समय विदाई की ‘अलविदा’ मन भारी करती है, पर यह मानकर सन्तोष कर लिया जाता है कि कुछ ही समय बाद उल्लास भरे प्रभात का अभिनन्दन प्रस्तुत होगा।
पके फल को प्रकृति उस पेड़ से उतार लेती है। इसलिए कि उसका परिपुष्ट बीज अन्यत्र उगे और नये वृक्ष के रूप में स्वतन्त्र भूमिका सम्पादन करे। वृक्ष से अलग होते समय वियोग की, दुलहन के पतिगृह में प्रवेश करने की तैयारी नहीं है। क्या बिछुड़न की व्यथा में मिलन की सुखद संवेदना छिपी नहीं होती। इन विदाई के क्षणों को दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य ? मृत्यु को अभिशाप कहें या वरदान ? इस निर्णय पर पहुँचने के लिए गहरे चिन्तन की आवश्यकता पड़ेगी।
मरण के कन्धों पर बैठकर हम पड़ौस की हाट देखने भर जाते हैं और शाम तक घूम फिरकर फिर घर आ जाते हैं। मृत्यु के बाद भी हमें इसी नीले आसमान की चादर के नीचे रहना है। अपनी परिचित धूप और चाँदनी से कभी वियोग नहीं हो सकता। जो हवा चिरकाल से गति देती रही है उसका सान्निध्य पीछे भी मिलता रहेगा। दृश्य पदार्थ और सम्बन्धी अदृश्य बन जायेंगे इससे क्या हुआ। दृश्य भोजन उदरस्थ होकर अदृश्य ऊर्जा बन जाता है, इसमें घाटा क्या रहा ? सम्बन्धियों की सद्भावना और अपनी शुभेच्छा आदान-प्रदान जब बना ही रहने वाला है तो सम्बन्ध टूटा कहाँ ? इस परिवर्तन भरे विश्व में जीवन का स्वरूप भी तो बदलना चाहिए ज्वार भाटे की तरह जीवन और मरण के विशाल समुद्र में हम सब प्राणी क्रीड़ा कल्लोल कर रहे हैं। इस हास्य को रुदन क्यों मानें ?
श्मशान को देखकर कुड़कुड़ाओ मत। वह नव जीवन का उद्यान है। उसमें सोई आत्माएँ मधुर सपने सजा रही हैं ताकि विगत की अपेक्षा आगत को अधिक समुन्नत बना सकें। लोगों, डरो मत। यहाँ मरता कोई नहीं, सिर्फ बदलते भर हैं और परिवर्तन सदा से रुचिर माना जाता रहा है, रुचिर के आगमन पर रुदन क्यों ?
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अध्यात्म के सिद्धान्त व्यक्तिगत जीवन को अधिक पवित्र एवं शालीन बनाने की भूमिका सम्पादित करते हैं। उनसे सामाजिक सुव्यवस्था की आधार शिला भी रखी जाती है और सर्वजनीन प्रगति एवं सुख-शान्ति का पथ प्रशस्त होता है।
शरीर की नश्वरता, आत्मा की अमरता, कर्मफल का सुनिश्चित होना तथा परलोक पुनर्जन्म की सम्भावना यह चार सिद्धान्त ऐसे हैं जो किसी न किसी रूप में प्रायः अध्यात्म की सभी शाखाओं में प्रतिपादित किये गये हैं। यों कई धर्मों में पापों के क्षमा हो जाने और मरणोत्तर जीवन की स्थिति में भिन्न मान्यताएँ भी हैं, पर वे लोचलचक के रूप में ही हैं। इतनी कठोर नहीं कि उनसे उपरोक्त चार सिद्धान्त जड़-मूल से ही कट जाते हों। मरणोत्तर जीवन किसी न किसी रूप में बना रहता है। कर्म को भले ही नैतिक रूप में न मानकर साम्प्रदायिक विश्वासों की परिधि में लपेट लिया गया हो तो भी यह नहीं कहा गया कि कर्म का कोई फल नहीं मिलता। इस प्रकार छोटे मतभेदों के रहते हुए भी मूल सिद्धान्तों के प्रति प्रायः सहमति ही पाई जाती है।
वर्तमान जीवन में शुभ कर्म करने पर भले ही इस जन्म में उसका सुखद प्रतिफल न मिले पर मरणोत्तर जीवन में उसका मंगलमय परिणाम उपलब्ध हो जायेगा इस विश्वास के आधार पर लोग त्याग और बलिदान के बड़े-बड़े साहस पूर्ण कदम उठाते रहते हैं। इस जन्म में किये गये पापों के दण्ड से भले ही इस समय किसी चतुरता से बचाव कर लिया जाय पर आगे चलकर उसका दण्ड भुगतना ही पड़ेगा यह सोचकर मनुष्य दुष्कर्म करने से अपने हाथ रोक लेता है और कुमार्ग पर पैर बढ़ाने से डरता, झिझकता है। यदि इस मान्यता को हटा दिया जाय तो तत्काल शुभकर्म का सत्परिणाम न मिलने की स्थिति में कोई उसके लिए उत्साह प्रदर्शित न करेगा। इसी प्रकार पाप दण्ड से सामाजिक बचाव कर लेने की उपलब्ध तरकीबें ढूंढ़कर फिर कोई अनीति अपनाने पर मिलने वाले लाभों को छोड़ने की इच्छा न करेगा। ऐसी दशा में व्यक्ति और समाज में अनैतिक अवाँछनीय तत्वों की बाढ़ आ जायगी और मर्यादाओं के बाँध टूट जायेंगे। धार्मिक मान्यताओं का अंकुश रहने पर भी जब लोग दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाने में संकोच नहीं करते तो मानसिक नियन्त्रण न रहने की स्थिति में तो भयंकर स्वेच्छाचार फैल जायगा और उस उच्छृंखलता से समूची मनुष्य जाति का-समस्त संसार का भारी अहित होगा।
मरणोत्तर जीवन एवं पुनर्जन्म की मान्यता हमें चिन्तन के कितने ही उत्कृष्ट आधार प्रदान करती है। आज हम हिन्दू, भारतीय एवं पुरुष हैं। कल के जन्म में ईसाई, योरोपियन या स्त्री हो सकते हैं। ऐसी दशा में क्यों ऐसे कलह बीज बोयें, ऐसी अनैतिक परम्पराएँ प्रस्तुत करें जो अगले जन्म में अपने लिए ही विपत्ति खड़ी कर दें। आज का सत्ताधीश, कुलीन मनुष्य सोचता है कल प्रजाजन, अछूत, एवं पशु बनना पड़ सकता है उस स्थिति में उच्च स्थिति वालों का स्वेच्छाचार उनके लिए कितना कष्ट कारक होगा। इस तरह के विचार दूसरों की स्थिति में अपने को रखने और उदात्त दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देते हैं।
“मैटर” का विश्लेषण 92 तत्वों-ऐलीमेन्टस्-के आधार पर किया जाता है। तत्वों का भेद उनके पृथक-पृथक गुण, कर्म के आधार पर किया जाता है। इन तत्वों में चेतना गुण किसी के भीतर भी नहीं पाया जाता। ऐसी दशा में चेतना को एक स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रह जाता। भले ही वह अमुक शरीर में अमुक स्तर की हो पर है वह स्वतन्त्र ही। चेतना के स्तर का शरीर मिलना-अथवा शरीर के स्तर की चेतना उत्पन्न होना इस विवाद में प्रधान और गौण होने का ही मतभेद है। चेतना के स्वतन्त्र अस्तित्व की अस्वीकृति नहीं है।
मृतात्माओं की हलचलों के जो प्रामाणिक विवरण समय-समय पर मिलते रहते हैं और पिछले जन्मों की सही स्मृति के प्रमाण देने वाले घटनाक्रमों के प्रत्यक्ष परिचय अब इतनी अधिक संख्या में सामने आ गये हैं कि उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता। ऐसी दशा में पिछली पीढ़ी के वैज्ञानिकों की आत्मा का अस्तित्व न होने की बात सहज ही निरस्त हो जाती है।
मनोवैज्ञानिक विश्लेषण आत्मा के अस्तित्व को ही सिद्ध करते हैं। हमारा अस्तित्व मुक्ति में- मृत्यु के साथ- अथवा अन्य किसी स्थिति में किसी समय समाप्त हो जायगा इस कल्पना को कितना ही श्रम करने पर भी स्वीकार नहीं कर सकते । चेतना इस तथ्य को कभी भी स्वीकार न करेगी। यह स्वतः प्रमाण मनःशास्त्र के आधार पर इस स्तर के समझे जा सकते हैं कि जीव चेतना की स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार करने के लिए संतोषजनक माना जा सके।
पदार्थ विज्ञानी यह जानते हैं कि तत्वों के मूल-भूत गुण धर्म को नहीं बदला जा सकता है। उनके सम्मिश्रण से पदार्थों की शकल बदल सकती है। रंग को गन्ध में, गन्ध को स्वाद में, स्वाद को रूप में, रूप को स्पर्श में नहीं बदला जा सकता। हाँ वे अपने मूल रूप में बने रहकर अन्य प्रकार की शक्ल या स्थिति तो बना सकते हैं, पर रहेंगे सजातीय ही। दो प्रकार की गन्धें मिल कर तीसरे प्रकार की गन्ध बन सकती है- दो प्रकार के स्वाद मिलकर तीसरे प्रकार का स्वाद बन सकता है, पर वे रहेंगे गन्ध या स्वाद ही, वे रूप या रंग नहीं बन सकते। विभिन्न प्रकार के परमाणुओं में विभिन्न प्रकार की हलचलें तो हैं, पर उनमें चेतना का कहीं अता-पता नहीं मिलता।
मस्तिष्क को संवेदना का आधार तो माना जा सकता है, पर उसके कण स्वयं संवेदनशील नहीं है। यदि होते तो मरण के उपरान्त भी अनुभूतियाँ करते रहते। ध्वनि या प्रकाश के कम्पन जड़ हैं- मस्तिष्कीय अणु भी जड़ है। दोनों के मिलन में जो विभिन्न प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं उनमें पदार्थ को कारण नहीं माना जा सकता। चेतना की स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार किये बिना प्राणी के चेतना सिद्ध करने के लिए जितने तर्क पिछले दिनों प्रस्तुत किये जाते रहे हैं, वे अब सभी क्रमशः अपनी तेजस्विता खोते जा रहे हैं। अमुक रसायनों या परमाणुओं के मिलने से चेतना की उत्पत्ति होती है और उनके बिछुड़ने से समाप्ति। यह तर्क आरम्भ में बहुत आकर्षक प्रतीत हुआ था और नास्तिकतावाद में जीव को इसी रूप में बताया था, पर अब उनके अपने ही तर्क-अपने प्रतिपादन को स्वयं काट रहे हैं कि मूल-तत्व अपनी प्रकृति नहीं बदल सकता। विचार हीन परमाणु- संवेदनशील बन सकें ऐसा कोई आधार अभी तक नहीं खोजा जा सका है। जड़ के साथ चेतना घुली हुई हो तो उसके साथ-साथ जड़ में भी परिवर्तन हो सकते हैं। अभी इतना ही सिद्ध हो सका है। किसी परखनली में बिना चेतन जीवाणुओं की सहायता के साथ रासायनिक पदार्थों की सहायता से जीवन उत्पन्न कर सकना सम्भव नहीं हुआ है। परखनली के सहारे चल रहे सारे प्रयोग अभी इस दिशा में एक भी सफलता की किरण नहीं पा सके हैं कि रासायनिक संयोग से जीवन का निर्माण संभव किया जा सके।
लोह खंडों के घर्षण से बिजली पैदा होती है तो भी बिजली लोहा नहीं है। स्नायु संचालन से संवेदना उत्पन्न होती है किन्तु संवेदना स्नायु नहीं हो सकते। अमुक रासायनिक पदार्थों के संयोग से जीवन उत्पन्न होता है तो भी वे पदार्थ जीवित नहीं हैं। चेतना का अवतरण कर सकने के माध्यम मात्र हैं।
हर्ष, शोक, क्रोध, प्रेम, आशा, निराशा, सुख-दुःख, पाप, पुण्य आदि विभिन्न संवेदनाएँ किन परमाणुओं के मिलने से किस प्रकार उत्पन्न हो सकती हैं, इस संदर्भ में विज्ञान सर्वथा निरुत्तर है।
अपने बचपन के दिनों में विज्ञान का नया उत्साह आत्मा, ईश्वर और धर्म को अप्रामाणिक एवं अनावश्यक मानता था और इनके विरुद्ध जोर-शोर से गोला बारी करता था, पर अब स्थिति वैसी नहीं रही। न केवल प्रमाणों के आधार पर वरन् व्यक्ति और समाज के लिए उपयोगी होने की कसौटी पर भी अध्यात्म सिद्धान्तों को एक-एक कदम चलते हुए मान्यता ही दी जा रही है।
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मस्तिष्क के एक भाग प्रकाश दर्शन को लें तो प्रतीत होगा कि वही नेत्रों की सहायता से उन चित्रों को बनाता है जिन्हें हम दृश्य रूप में अनुभव करते हैं। वस्तुतः पदार्थों से निकलने वाली किरणें हमारे नेत्र गोलकों से टकराती भर हैं। यही है भौतिक रूप से दृश्य की अटपटी स्थिति। यदि मस्तिष्क का ‘प्रकाश दर्शन’ केन्द्र ठीक से काम न करे तो मात्र आँखों की सहायता से जो दीख पड़ता है उसका कोई सही स्वरूप बन नहीं सकेगा और देखते हुए भी अनदेखे जैसी स्थिति बनी रहेगी।
अभी तक माना जाता था कि कोई वस्तु देखनी हो तो प्रकाश और आंखें दो ही वस्तुएँ आवश्यक हैं। प्रकाश जब आंखों की रेटिना से टकराता है तो आँखों का तन्त्रिका तन्त्र (ज्ञानकोप) एक विशेष प्रकार की रासायनिक क्रिया करके सारी सूचनायें मस्तिष्क को देता है। मन एक तीसरी वस्तु है; जो प्रकाश और आँखों के क्रियाकलाप को अनुभव करता है और नई तरह की योजनायें, आदेश, अनुभूतियाँ तैयार करके शरीर के दूसरे अवयवों में विभक्त करता है अर्थात् मानसिक चेतना न हो तो प्रकाश और आँखों के होते हुए भी देखना सम्भव नहीं।
भगवान का दिया हुआ एक ऐसा ही यन्त्र मनुष्य के पास भी है जिसे दृष्टिवर्धन के आद्यावधि आविष्कारों की सम्मिलित उपलब्धियों से भी अधिक समर्थ और व्यापक कहा जा सकता है। न इसे खरीदना पड़ता है और न संचालन की कोई बड़ी शिक्षा लेनी पड़ती है। भू मध्य भाग में अवस्थित आज्ञाचक्र अपना तीसरा नेत्र आज्ञाचक्र है। इसे खोलने की साधना करने से वह अन्तर्ज्योति विकसित हो सकती है जिसके माध्यम से लोक लोकान्तरों की भू गर्भ की पंचभौतिक परिस्थितियों को देखा और समझा जा सके। इतना ही नहीं इस नेत्र में वह शक्ति भी है कि जीवित प्राणियों की मनःस्थिति, भावना, कल्पना, योजना, इच्छा, आस्था एवं प्रकृति को भी समझा जा सके। इस आज्ञाचक्र को विकसित करने की साधना हमें दृष्टि की प्रखरता और व्यापकता का अनुपम उपहार दे सकती है।
यों सामान्य नेत्र ही अपने आप में अद्भुत हैं। उनकी संरचना देखते हुए भी आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। फिर मस्तिष्क के वे संस्थान जिनमें प्रकाश दर्शन की रहस्यमय परतें सन्निहित हैं, का विवेचन अपने मोटे-झोटे शब्द ज्ञान और शरीर गठन प्रक्रिया की जानकारी के आधार पर कर ही कैसे सकते हैं।
संसार में अभी तक ऐसा फोटो कैमरा नहीं बना जो टैक्नीकलर, विस्ताविजन और थ्री डी0 के0 टेक्नोलॉजी युक्त हो। शत प्रतिशत साफ फोटो खींचता हो। जिसमें फोटोग्राफर की आवश्यकता न हो और फिल्म प्लेट आदि लगाने का झंझट न हो। ऐसा कैमरा बनना तो दूर किसी वैज्ञानिक के मस्तिष्क में इस तरह की सम्भावना की कल्पना भी अभी तक नहीं आई है। यदि कोई सोचने भी लगे तो इन सारी सुविधाओं से सम्पन्न किसी विशालकाय यन्त्र की ही कल्पना की जा सकती है। इतने उपकरण होते हुए भी उसका साइज 1 इंच छोटा हो उसे तो सर्वथा असम्भव ही कहना चाहिए। यान्त्रिक जगत में ऐसा फोटो यन्त्र भले ही न बना हो भले ही उसकी सम्भावना अशक्त मानी जाय पर ऐसा कैमरा अपने पास मौजूद है और उसका उपयोग जन्म काल से ही हम लोग कर रहे हैं। यह जादू जैसा फोटो यन्त्र है। ‘नेत्र’
मस्तिष्क के अग्रभाग में जकड़े हुए दो नेत्र सभी को दीखते हैं, पर उनके मध्यवर्ती अन्तराल में जो तीसरा नेत्र है उसकी जानकारी योगीजनों को ही थोड़ी बहुत मात्रा में मिली है।
दोनों भौहों के मध्य भाग में जो बाल रहित खाली स्थान है उसे भृकुटी कहते हैं उसके नीचे अस्थि आवरण के उपरान्त एक बेर की गुठली जैसी ग्रन्थि है। इसे ‘आज्ञाचक्र’ कहते हैं। शरीर शास्त्र की दृष्टि से उसका कार्य और प्रयोजन अभी पूरी तरह नहीं समझा जा सका, पर आत्मा विद्या के अन्वेषी उसके अति महत्वपूर्ण कार्य को बहुत पहले से ही जानते हैं। इसे तीसरा नेत्र या दिव्य नेत्र कहते हैं। दिव्य दृष्टि यहीं से निःसृत होती है।
प्रकाश की सहायता से हम वस्तुओं को देखते हैं। पर यह रहस्य किन्हीं-किन्हीं को ही विदित है कि हमारे भीतरी जीवाणुओं में भी प्रकाश विद्यमान है और उनसे निकलने वाली किरणें न केवल भीतर प्रकाश बनाये रहती हैं वरन् बाहर भी तेजस्विता का परिचय देती हैं। आँखों में अपना निज का प्रकाश है। आज्ञाचक्र का प्रकाश तो ऊर्जा रूप में भी विकसित हो सकता है और उससे टेलीविजन एवं संवाद प्रेषण जैसा कार्य भी लिया जा सकता है। इस ऊर्जा से अन्य व्यक्तियों अथवा वस्तुओं को भी प्रभावित किया जा सकता है।
प्रकाश किरणों को छवि रूप में पकड़ने की कला अब फोटोग्राफी टेलीविजन तक सीमित नहीं रही, अब वे आधार प्राप्त कर लिए गये हैं जिनसे तीन आयामों वाले त्रिविमीय चित्र देखे जा सकें। आमतौर से फोटोग्राफी लंबाई-चौड़ाई का बोध कराती है गहराई का तो उसमें आभास मात्र ही होता है। यदि गहराई को भी प्रतिबिम्बित किया जा सके तो फिर आँखों से देखे जाने वाले दृश्य और छाया अंकन में कोई भेद नहीं रहेगा। ऐसा दृश्य प्रचलन सम्भव हो सका तो फिल्में अपने वर्तमान अधूरे स्तर की फोटोग्राफी तक सीमित नहीं रहेंगी वरन् पर्दे पर रेल, मोटर, घोड़े मनुष्य आदि उसी तरह दौड़ते दिखाई पड़ेंगे मानो वो अपने यथार्थ स्वरूप में ही आँखों के आगे से गुजर रहे हैं। यदि सामने से अपनी ओर कोई रेल दौड़ती आ रही हो या शेर झपटता आ रहा हो तो बिल्कुल यह मालूम पड़ेगा कि वे अब अपने ऊपर ही चढ़ बैठने वाले हैं। ऐसी दशा में आरम्भिक अनभ्यास की स्थिति में सिनेमा दर्शक को भयभीत होकर अपनी सीट छोड़कर भागते ही बनेगा।
प्रकाश विज्ञानी एर्नेस्टएये और उनके सहयोगी शिष्य डी0 गैवर ने होलीग्राफ के एक नये सिद्धान्त का आविष्कार किया जिसके आधार पर- त्रिविमीय स्तर की छाया चित्रण आँखों से देखा जा सकेगा और भूत-कालीन दृश्यों को इन्हीं आँखों से इस प्रकार देखा जा सकेगा मानो वह घटना क्रम अभी-अभी ही बिलकुल सामने घटित हो रहा है।
भ्रूमध्य भाग में अवस्थित आज्ञाचक्र को तृतीय नेत्र कहा जाता है। शिव और पार्वती के चित्रों में उनका एक पौराणिक तीसरा नेत्र भी दिखाया जाता है। कथा के अनुसार शंकर भगवान् ने इसी नेत्र को खोलकर उसमें से निकलने वाली अग्नि से कामदेव को भस्म किया था। यह दिव्य दृष्टि का केन्द्र है। इससे टेलीविजन जैसा कार्य किया जा सकता है। दूर-दर्शन का दिव्य यन्त्र यहीं लगा हुआ है। महाभारत के सारे दृश्य संजय ने इसी के माध्यम से देखे और धृतराष्ट्र को सुनाये। चित्रलेखा द्वारा प्रद्युम्न प्रणय इस दिव्य दर्शन का ही परिणाम था।
सूक्ष्म और कारण शरीर की दिव्य दृष्टि की मर्यादा और क्षमता बहुत बड़ी-चढ़ी है। उसे समझने, विकसित करने और प्रयोग करने की क्षमता, योगाभ्यास से उपलब्ध होती है। पर स्थूल शरीर में भी यह शक्ति बहुत व्यापक है। आँखों से ही सब कुछ नहीं देखा जाता उसके अतिरिक्त अंगों में भी देखने समझने की क्षमता मौजूद है। मस्तिष्क, नेत्र गोलकों का फोटोग्राफी कैमरे जैसा प्रयोग करता है और पदार्थों के जो चित्र आँखों की पुतलियों के लेंस से खींचता है वे मस्तिष्क में जमा होते हैं। इनकी प्रतिक्रिया के आधार पर मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु जो निष्कर्ष निकालते हैं उसी का नाम ‘दर्शन’ है। आँख इस के लिए सबसे उपयुक्त माध्यम हैं। मस्तिष्क के रूप दर्शन केन्द्र के साथ नेत्र गोलकों के ज्ञान तन्तुओं का सीधा और समीपवर्ती सम्बन्ध है इसलिए आमतौर से हम नेत्रों से ही देखने का काम लेते हैं और मस्तिष्क उन्हीं के आधार पर अपनी निरीक्षण क्रिया को गतिशील देखता है। पर ऐसा नहीं समझना चाहिये कि दृष्टि शक्ति केवल नेत्रों तक ही सीमित है। अन्य अंगों के मस्तिष्क के साथ जुड़े हुए ज्ञानतन्तुओं को विकसित करके भी मस्तिष्क बहुत हद तक उस प्रयोजन की पूर्ति कर सकता है। समस्त विश्व का हर पदार्थ अपने साथ ताप और प्रकाश की विद्युत किरणें संजोये हुए है। वे कम्पन लहरियों के साथ इस निखिल विश्व में अपना प्रवाह फैलाती हैं। ईथर तत्व के द्वारा वे दूर-दूर तक जा पहुँचती हैं और यदि उन्हें ठीक तरह से पकड़ा जा सके तो जो दृश्य बहुत दूर पर अवस्थित हैं, जो घटनायें सुदूर क्षेत्रों में घटित हो रही हैं, उन्हें निकटवर्ती वस्तुओं की तरह देखा जा सकता है। इन दृश्यों को पकड़ने के लिए नेत्र उपयुक्त हैं। समीपवर्ती दृश्य वही दीखते हैं और दूरवर्ती दृश्य देखने के लिए तृतीय नेत्र को - भ्रूमध्य में अवस्थित आज्ञाचक्र को प्रयुक्त किया जा सकता है। इतने पर भी यह नहीं समझ लेना चाहिये कि रूप तत्व का सम्बन्ध नेत्रों से ही है। अग्नि तत्व की प्रधानता से ‘रूप’ कम्पन उत्पन्न होते हैं। शरीर में अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व नेत्र करते हैं, पर ऐसा नहीं मानना चाहिये कि अग्नि तत्व शरीर के अन्य अंगों में नहीं है। समस्त शरीर पंच तत्वों के गुम्फन से बना है। यदि किसी अन्य अंग का अग्नि तत्व अनायास ही विकसित हो जायेगा या साधनात्मक प्रयत्नों द्वारा विकसित कर लिया जाये तो नेत्रों की बहुत आवश्यकता उनके माध्यम से भी पूरी हो सकती है। इसी प्रकार अन्य ज्ञानेन्द्रियों के कार्य एक सीमा तक दूसरे अंग कर सकते हैं। स्वामी विवेकानन्द द्वारा प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत किये गये पवहारी बाबा प्रत्यक्षतः वायु ही ग्रहण करते थे, अन्न जल सेवन नहीं करते थे पर शरीर के अन्य अंगों द्वारा अदृश्य जगत से सूक्ष्म आहार बराबर मिलता रहता था। इसके बिना किसी के लिए भी जीवन धारण किये रहना असम्भव है।
इजवेस्तिया (रूस में छपने वाला समाचार पत्र) में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार निझनी तागिल (रूस) की रोजा नामक युवती पंक्तियों पर उंगली चलाकर मामूली प्रेस में छपी पुस्तकें पढ़ लेती हैं। कई समाचार पत्रों ने उसके प्रमाण सहित फोटो भी छापे हैं। आश्चर्य तो यह है कि पुस्तकों में बने हुये किसी भी फोटो को उँगलियाँ रखकर ही वह बता देती है कि यह फोटो महात्मा गाँधी की है अथवा इब्राहिम लिंकन की है। यदि वह जानती नहीं होती तो आकृति का वर्णन कर देती हैं, इसके इतनी बड़ी मूंछें हैं, ऐसे कान और अमुक पोशाक पहने हुए फोटो उतारी गई है।
साँप चुपचाप पड़ा होता है और अपने इस अवयव से यह जान लेता है कि किस दिशा में कहाँ पर शिकार है, बस उधर ही झपटकर उसे पकड़ लेता है।
इसी तरह के तन्तुओं से चिड़ियों और कबूतरों के मस्तिष्क भी सजे होते हैं, जिससे वे हजारों मील की यात्रा का ज्ञान रिकार्ड करके रखते हैं। दस वर्ष बाद भी उसकी सहायता से वे अपने मूल निवास को लौट सकते हैं। मेंढक की आँख और मस्तिष्क के बीच में इस तरह के ज्ञान तन्तु होते हैं, उन्हीं से वह अपने दुश्मनों की आक्रमण करने की इच्छा तक को पहचान लेता है (यह मनुष्य के आज्ञाचक्र भ्रूमध्य में भी एक ऐसी ही संवेदनशील शक्ति के होने का सबसे बड़ा प्रमाण है) और आक्रमण होने से प्रथम ही बच निकलता है।
इन जानकारियों के आधार पर वैज्ञानिकों ने रौजा की जाँच की। उन्होंने प्रकाश में से ‘इन्फ्रारेड किरणें निकाला हुआ प्रकाश और उसके साथ अक्षर एक कागज पर डाले तब भी रौजा ने उन्हें पढ़ दिया। बेशक वह इस स्थिति में आकृतियाँ नहीं पहचान पाई पर वैज्ञानिकों को यह मालूम पड़ गया कि आँखें ही नहीं, शरीर के अन्य अंगों में भी दृष्टि तत्व हो सकते हैं। रौजा के हाथों में प्रति एक मिलीमीटर ऐसे दस तत्व पाये भी गये वैज्ञानिकों ने बताया- यह असामान्य स्थिति है, हम कह नहीं सकते कि क्या शरीर में ऐसे तत्व और भी कहीं हैं या विकसित किये जा सकते हैं। हम इस बात को जानने की शोध अवश्य करेंगे कि प्रकाश को ग्रहण करने वाले तत्व उँगलियों में कैसे आ गये। यदि इस बात को ढूंढ़ निकाला गया तो ध्यान के रूप में प्रकाश कणों को आकर्षित करने और शरीर में अतीन्द्रिय ज्ञान (एक्ट्रा आर्डिनरी सेन्सपरएप्शन) की क्षमता उत्पन्न करने की भारतीय योग प्रणाली पूर्ण विज्ञान सम्मत हो जायेगी।
प्रो0 फोन्टान ने एक फ्राँसीसी नाविक का ऐसा ही उल्लेख किया है। वह अन्धा व्यक्ति उँगलियों से छूकर ऐसे विवरण बताता था जो साधारणतया आँखों के बिना नहीं बताये जा सकते। कनाडा की एक अन्धी लड़की हाथ की कुहनियों के माध्यम से ऐसा ही अदृश्य दर्शन कर सकने में समर्थ थी ऐसे प्रमाण मिले हैं।
फ्राँसीसी कवि जूल्स रोमेन्स की उन दिनों परोक्ष दृष्टि विज्ञान में बड़ी दिलचस्पी थी उसने अपने साहित्य में कार्यों के साथ साथ इस विषय में भी शोध की थी और बतलाया है कि त्वचा में अगणित “कीट नेत्र” विद्यमान हैं जो स्पर्श संवेदन के द्वारा निकटवर्ती वस्तु के बारे में निरन्तर जानकारी संग्रहीत करते रहते हैं। आँखों की तरह ये छोटे नेत्र वस्तुओं की आकृति भले ही स्पष्ट रूप से न जान सकें पर उनकी प्रकृति के सम्बन्ध में नेत्र गोलकों से भी अधिक ज्ञान प्राप्त करते हैं।
प्रसिद्ध जादूगर गोगिया पाशा और प्रो0 सरकार नेत्रों से कड़ी पट्टी बँधवाकर घनी आबादी की भीड़ भरी सड़कों पर मोटर साइकिल दौड़ाने के अपने करतब दिखा चुके हैं। इस प्रदर्शन में आँखों से देखने की कोई गुँजाइश तो नहीं रही है। इसलिए पट्टी बाँधने से लेकर उसकी जाँच करने तक का काम ऐसे कार्यों की जानकारी रखने वाले प्रामाणिक लोगों को सौंपा गया था। उन लोगों की मोटर साइकिलें मोड़ और बचाव की सही व्यवस्था बनाती हुई निर्धारित लक्ष्य पर ठीक प्रकार जा पहुँची तो दर्शकों को यह विश्वास करना पड़ा कि बिना आँखों की सहायता के भी दूसरे माध्यमों से देखने का कार्य किया जा सकना सम्भव है। स्वामी माधवानन्द जी ने राजस्थान में जल रहित प्रदेशों में कई जगह अपनी दृष्टि से जल स्रोतों की जानकारी दी थी और वहाँ कुआँ खोदने पर सचमुच यथा स्थान पानी निकला।
भूमिगत अदृश्य वस्तुओं को देख सकने की विद्या को रेण्डोमेन्सी कहते हैं। इस विज्ञान की परिधि में जमीन में दबे खनिज, रसायन, जल, तेल आदि सभी वस्तुओं को जाना जा सकता है। किन्तु यदि केवल जल तलाश तक ही वह सीमित हो तो उसे ‘वाटर डाउनिंग’ कहेंगे।
आयरलैण्ड के विकलो पहाड़ी क्षेत्र में दूर-दूर तक कहीं पानी का नाम निशान नहीं था। जमीन कड़ी, पथरीली थी। प्रो0 वेनेट ने खदान विशेषज्ञों के सामने अपना प्रयोग किया वे कई घन्टे उस क्षेत्र में घूमें, अन्ततः वे एक स्थान पर रुके और कहा - केवल 14 फुट गहराई पर यहाँ एक अच्छा जल स्रोत है। खुदाई आरम्भ हुई और पूर्व कथन बिलकुल सच निकला। 15 फुट जमीन खोदने पर पानी की एक जोरदार धारा वहाँ से उबल पड़ी।
अपने भीतर की प्रकाश सत्ता को यदि योगाभ्यास द्वारा विकसित किया जा सके तो उससे बाहरी पदार्थों को बिना आँखों के भी देखा जा सकता है। बल्ब अपने आप में प्रकाशित होता है तो उसके प्रकाश में अन्य वस्तुयें भी दिखाई पड़ती हैं। आकाश में जगमगाते तारे भी रात्रि के सघन अन्धकार को कम करते हैं और ऐसी स्थिति बनाये रहते हैं कि आसपास की चीजों को किसी सीमा तक देखा जा सके। हमारे आन्तरिक प्रकाश कण यदि कुछ अधिक जगमगाने लगें तो संसार में अन्यत्र घटित हो रही घटनाओं को देखा समझा जा सकता है। संजय ने धृतराष्ट्र को अपनी इसी विशेषता के कारण राजमहल में बैठकर - महाभारत का आँखों देखा घटनाक्रम सुनाया था। भौतिक विज्ञान में टेलीविजन प्रक्रिया के अनुसार अन्यत्र का घटनाक्रम किसी अन्य स्थान पर यथावत देखा जा सकता है। यह छविमान प्रकाश किरणों का छवि रूप में परिवर्तन करने और उनका यथावत अनुभव करना ही है। टेलीविजन से भी अधिक महत्वपूर्ण यंत्र हमारे आशाचक्र में मौजूद हैं और उनके सहारे वह सब कुछ देखा जा सकता है जो कहीं भी घटित हो रहा हो अथवा घटित हो चुका है। इस शक्ति को अधिक विकसित कर लेने पर भविष्य की झाँकी भी इसी प्रकार मिल सकती है जिस तरह कि यन्त्रों द्वारा निकट भविष्य में आँधी तूफान आने या मौसम बदलने सम्बन्धी जानकारी मिलती है।
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यह संसार क्या है ? किन पदार्थों से बना है ? उनके गुण, धर्म क्या हैं? आदि प्रश्नों का ऊहापोह विचार शक्ति के विकास क्रम के साथ ही होता चला आया है। इनका दार्शनिक प्रतिपादन कई प्रकार से होता है।
वेदान्त दर्शन ने सचेतन परब्रह्म को इस संसार का एकमात्र तत्व माना है। फ्राँसीसी दार्शनिक वेर्गसाँ ने विश्व को चेतन और अचेतन से ऊपर माना है। साँख्यकार ने उसे प्रकृति पुरुष के- जड़ और चेतन के- दो भागों में विभक्त किया है। योरोप का प्रख्यात दार्शनिक लाक भी भारतीय त्रैतवादियों की तरह ईश्वर, जीव और प्रकृति के तीन आधार मानता रहा है। चार्वाक और यूनानी दार्शनिक एम्पेदीकाल ने चार तत्व माने हैं- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु। अन्य भारतीयों के दर्शनों ने इनमें एक आकाश को और जोड़कर पाँच कर दिये। पंचभूत की मान्यता हम सब की जुबान पर चढ़ी रहती है। इस्लामी दार्शनिक अजीजद्दीन राजी ने भी तत्वों की संख्या, तो पाँच ही मानी है, पर वे हैं भिन्न- ईश्वर, जीव, प्रकृति, दिशा और काल। जैन दर्शन ने छह तत्व माने हैं-जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, काल, आकाश। वैशेषिक उन्हें नौ मानता है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश के अतिरिक्त उसने काल, दिशा, आत्मा और मन को भी तत्व में गिना है।
प्राचीन काल में इन मान्यताओं का अपने-अपने समय और क्षेत्र में जोर-शोर से प्रतिपादन होता रहा है। उन पर विवाद, शास्त्रार्थ और खण्डन-मंडन भी होते रहे हैं। उनके भेद-उपभेद और सम्प्रदाय-उप सम्प्रदाय बनते रहे हैं। पर प्रगति क्रम पर बढ़ते हुए हमें जानकारियाँ एवं मान्यताएं भी बदलने के लिए विवश होना पड़ा है। विवेचन और विश्लेषण ने पिछली दार्शनिक पृष्ठभूमि में ऐसे परिवर्तन प्रस्तुत किये हैं जिन्हें मानने में भारी असमंजस होता है, पर किया क्या जाय, प्रस्तुत प्रत्यक्ष प्रमाणों के साथ जुड़े हुए तर्कों और प्रतिपादनों को अस्वीकार भी तो नहीं किया जा सकता है।
अब पंच तत्वों को ‘तत्व’ नहीं माना जाता, वे मूल तत्वों की अवस्था मात्र रह गये हैं। प्रत्येक पदार्थ ठोस, तरल एवं भाप के रूपों में बदला जा सकता है। अस्तु आकार को देखकर जो मान्यताएं स्थापित की गयी थीं वे अब परीक्षा की कसौटी पर गलत ठहरा दी गई हैं। ठोस धातुएं तक अत्यधिक तपाये जाने पर भाप बनकर आकाश में उड़ जाती हैं और अपना मूल स्वरूप समाप्त कर देती हैं, अग्नि आप में कोई वस्तु नहीं वह परमाणुओं के तीव्र गति से भ्रमण करने की प्रतिक्रिया भर है। पानी ऑक्सीजन और हाइड्रोजन नामक दो गैसों का सम्मिश्रण भर है। गैसें अपने आप में कुछ रासायनिक एवं आणविक तत्वों के मिलने से बनती हैं। इस प्रकार अब पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु कोई मूल तत्व नहीं रह गये हैं।
अब विश्व की मूल सत्ता ‘एनर्जी’ मानी गई है। इसके दो भाग- एक ऋण दूसरा धन। ऋण शक्ति और धन शक्ति प्रोटीन कही जाती है। प्रोटोन बड़ा और इलेक्ट्रॉन छोटा होता है । परमाणु इन्हीं दोनों के मिलने से बने हैं। किन्तु वे भी ठोस नहीं है। उनके बीच में बहुत सी पोल है। उस आकाश के मध्य एक नाभिक रहता है। जिनकी तुलना अपने सूर्य से कर सकते हैं। सौरमंडल में कई ग्रह हैं जो सूर्य की परिक्रमा करते हैं। ठीक उसी प्रकार ‘नाभिक’ में प्रोटोन होते हैं और उसके इर्द गिर्द इलेक्ट्रॉन परिक्रमा करते हैं। प्रत्येक परमाणु अपने आप में एक पूरा सौरमण्डल है। प्रत्येक परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की संख्या अलग-अलग होती है और उनके भ्रमण करने की कक्षा में अन्तर पाया जाता है। इसी भिन्नता के कारण जो भिन्न-भिन्न तत्व उत्पन्न होते हैं वे ही सृष्टि के बिखरे हुए पदार्थों के मूलभूत आधार होते हैं। साधारणतया परमाणु की सत्ता अभेद्य मानी जाती थी और उसमें दूसरा कोई परमाणु प्रवेश नहीं कर सकता ऐसा कहा जाता था, पर कुछ समय पूर्व परमाणु विस्फोट की विधि ढूँढ़ निकाली गई और उसे भी विकेन्द्रित कर दिया गया है। ऐसी दशा में परमाणु सत्ता भी पंच तत्वों की तरह ही शाश्वत नहीं रह गई है। तो भी जहाँ तक तत्वों को आधुनिक मान्यता है वह परमाणुओं की स्थिति भिन्नता के आधार पर ही मानी जाती है। यह मान्यता भविष्य में कब तक स्वीकार करने योग्य बनी रहेगी यह नहीं कहा जा सकता।
पिछले दिनों इन तत्वों की संख्या 92 थी अब एक-एक करके नई खोजों के कारण उसमें और वृद्धि होती चली जा रही है। अणु तोल लिया गया है तथा वह कितनी गर्मी पर पिघलता है यह भी जान लिया गया है। तथा कितने ताप पर भाप में बनकर उड़ जाता है यह भी पता चला लिया गया है। भार द्रवाँक, क्वथनाँक भी अणु विश्लेषण के साथ जाने जा सकते हैं। हाइड्रोजन, हीलियम, लिथियम, वेसीलियम आदि इनके नाम हैं। इनमें सबसे भारी यूरेनियम और सबसे हल्का हाइड्रोजन है।
एनर्जी का प्रत्यक्ष स्वरूप गर्मी है। गर्मी नापने के दो तरीके हैं- फारेनहाइट और सेन्टीग्रेड। शरीर की गर्मी नापने में फारेनहाइट और वस्तुओं का लेखा-जोखा लेने में सेन्टीग्रेड काम में आता है। सेन्टीग्रेड में बर्फ जमने की स्थिति को शून्य मानकर चलते हैं और पानी उबलने के ताप को 100 अंश कहते हैं। फारेनहाइट पद्धति के अनुसार 32 डिग्री पर बर्फ जमता है और 212 पर पानी उबलता है। दूसरे शब्दों में 100 सेन्टीग्रेड को 180 डिग्री फारेनहाइट मान सकते हैं। यों मोटे तौर पर गर्मी का आरम्भ बर्फ जमाने वाली स्थिति से होता है, पर वस्तुस्थिति इससे भी आगे है। बर्फ भी पूर्णतया ताप रहित नहीं है। उससे भी ठण्डी दूसरी चीज है। लिक्विड एयर, तरल वायु-इतनी ठण्डी होती है कि उसकी तुलना में बर्फ भी आग की तरह गरम है। गर्मी का पूरा अभाव 273 सेन्टीग्रेड शीत की दिशा में नीचे उतर जाने पर आता है। परमाणुओं की गर्मी नापने में इसी आत्यन्तिक शीत बिन्दु को अंक मानकर चला जाता है। उतना शीत आने पर परमाणु का भ्रमण रुक जाता है और वह स्थिर बनकर खड़ा हो जाता है।
यह आधुनिक मान्यतायें उन पुरानी मान्यताओं को झुठलाती हैं जो किसी समय अकाट्य समझी जाती थीं। इसमें गर्व करने की कोई बात नहीं कि हम ज्ञान क्षेत्र में पूर्वजों से आगे हैं। क्रमिक विकास की गति अपने रास्ते, अपने ढंग से चलती ही रहेगी। कुछ समय उपरान्त अपना समय भी दकियानूसों और अनाड़ियों का युग समझा जा सकता है। तब नई खोजें, नई मान्यताओं और नये साधनों को सामने ला सकती है। इस प्रवाह में किसी काल या तथ्य से बंधकर नहीं रहा जा सकता। हम पूर्ण सत्य की खोज में अपने साधनों से चल रहे हैं। बहुत कुछ चल चुके और बहुत कुछ चलना बाकी है। यहाँ दुराग्रह की गुँजाइश नहीं है। किसी मान्यता को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर नहीं चला जा सकता पूर्वजों की मान्यताएं ही शाश्वत थीं- वे जो सोचते थे वही सनातन था ऐसा आग्रह नहीं होना चाहिए। हमारी आज की मान्यताएं भी शाश्वत कहाँ हैं- उसमें कल परिवर्तन हो सकते हैं इसलिए पूर्ण सत्य का दावा करना तो सर्वथा निरर्थक है। अधिक वास्तविकता जानने के लिए, हमारा मस्तिष्क सदा खुला रहना चाहिए। आग्रह तो प्रगति के आधार को ही नष्ट करके रख देता है।
यों प्रत्येक परमाणु की सत्ता स्वतन्त्र है फिर भी ये सजातीय और विजातीय आकर्षणों से खिंचकर अणु गुच्छ बन जाते हैं। उन्हीं के कारण आँखों से दीख पड़ने वाले विविध पदार्थ बनते हैं। इस मिलन की ऐसी विचित्र प्रतिक्रियाएं भी होती हैं जिनसे मिलकर वे बने हैं। जैसे ऑक्सीजन और हाइड्रोजन दोनों ही जल उठने वाले तत्व हैं, पर उनके मिश्रण से पानी बनता है जो जलना तो दूर उलटे आग को बुझाने के काम आता है। क्लोरीन एक विषैली गैस है, पर सोडियम के साथ मिलकर वह नमक बन जाती है जिसे हम रोज ही खाते हैं।
जब आग के गोले की स्थिति से आगे चलकर पृथ्वी ठण्डी हुई तो फैले हुए हाइड्रोजन और ऑक्सीजन के परमाणु मिलकर जलाणु बने और बादल बरसने लगे। धरती समतल नहीं थी। गर्म से ठंडी होने के चक्र में उसमें विस्फोट होते रहे और कहीं छह मील तक गहरे समुद्र और कहीं साढ़े पाँच मील तक ऊंचे पहाड़ बन गये। जहाँ खड्ड थे वहाँ वर्षा का पानी भरता गया। आरम्भ में समुद्र खारी नहीं था। पर जब नदियाँ धरती का नमक अपने में घुलाकर समुद्र तक पहुँचाने लगीं तो वह क्रमशः अधिकाधिक खारी होता चला गया। समुद्र से बादल उठते हैं वे नमक साथ लेकर नहीं जाते इसलिये उसका खारी पानी कम होने का कोई रास्ता नहीं उलटे नदियों द्वारा जो 6224 घन मील पानी हर साल समुद्र में पहुँचता है वह ढेरों नया नमक और उसमें बढ़ा देता है इस तरह उसका खारापन बढ़ता ही जा रहा है।
पानी की ऐसी अनेक विशेषताएं हैं- जो अन्य पदार्थों में नहीं होती। सब चीजें ठंडी होने पर सिकुड़ती हैं और भारी हो जाती हैं, पर बर्फ उलटे हल्की हो जाती है और हिम पर्वत समुद्र में भली प्रकार तैरते रहते हैं। हवा में भी पानी घुला रहता है और प्रत्येक पदार्थ में न्यूनाधिक मात्रा में उसकी उपस्थिति पायी जाती है। प्राणियों के शरीर तो एक प्रकार से जल बहुल ही कहे जा सकते हैं। 45 से 80 प्रतिशत तक जलीय अंश उनमें रहता है। वनस्पतियों तथा शाक, फलों में उसका अनुपात 60 से 95 प्रतिशत तक पाया जाता है। इसलिये जीवधारियों के लिए भोजन में भी अधिक जल की आवश्यकता रहती है।
हवा अपनी पृथ्वी की बहुमूल्य सम्पदा है तो भी वह तत्व नहीं है। वह जमीन से लेकर 500 मील की ऊंचाई तक फैली हुई है। सूर्य की गर्मी को सीमित मात्रा में आने देने में उसी की भूमिका है। अन्तरिक्ष में भ्रमण करने वाली उल्काओं को वही जलाकर खाक करती है अन्यथा चन्द्रमा की तरह धरती पर भी आये दिन उन पत्थरों की बौछार होती रहती और निरन्तर बड़े-बड़े खड्ड बनते रहते।
अनेक तत्वों के मिलने से हवा बनती है। नाइट्रोजन 78 प्रतिशत ऑक्सीजन 21 प्रतिशत तथा थोड़ी-थोड़ी मात्रा में आर्गन, हीलियम, कार्बनडाई ऑक्साइड, क्रिप्टन, जीवन आदि के अंश मिले हुए हैं। हवा में पानी का अंश तथा धूलि कण भी मिले रहते हैं। एक इंच स्थान में 5 हजार से लेकर 40 हजार तक धूलि कण पाये जाते हैं इन्हीं की वजह से आकाश नीला दीखता है। यदि वे न होते तो चन्द्रमा तल की भाँति भूतल से भी आसमान काला दीखता। धूलि कणों के अतिरिक्त उसमें कीटाणु भी उड़ते रहते हैं। हवा का वजन भी है। साधारणतया एक वर्ग इंच जगह में हवा का वजन सोलह पौंड होता है। इस तरह हमारे शरीर पर हवा का बोझ लदा रहता है। उसे उठाये रहना शरीर के भीतर वाली हवा के कारण ही सम्भव होता है। जितना ही ऊपर उठते हैं उतनी ही हवा हलकी होती जाती है। संसार भर में जितना पानी है उससे हवा का वजन 1270 गुना अधिक है। पृथ्वी के कुल बोझ से हवा का बोझ 1270 गुना अधिक है।
भूतल पर नाइट्रोजन की मात्रा ऑक्सीजन की तुलना में चार गुनी है। ऊंचे चलने पर क्रमशः नाइट्रोजन बढ़ती और ऑक्सीजन घटती जाती है। 70 मील ऊंचाई तक पहुँचते-पहुँचते यह दोनों ही समाप्त हो जाती हैं और मात्र हाइड्रोजन बन जाता है। जमीन पर फैले बादल कुहरा कहलाते हैं। बिजली कड़काने वाले बादल सिर्फ 1 मील तक पाये जाते हैं। इसके बाद भी बादल होते हैं पर बहुत पतले। चार मील ऊपर जाने पर आँधी तूफान कुछ नहीं दीखते। इतनी सब विशेषताओं के रहते हुए भी हवा एक सम्मिश्रण मात्र है उसे तत्व नहीं कह सकते ।
अग्नि, जल, वायु और आकाश की चर्चा ऊपर हो चुकी है और यह बताया जा चुका है कि इनमें से एक भी पदार्थ उस स्तर का नहीं है जिसे ‘तत्व’ कहा जा सके। वे सभी तत्वों का मिश्रण एवं हलचलों का प्रतिफल हैं। पृथ्वी के बारे में यह बात और भी अधिक स्पष्ट है। मिट्टी का मोटा विश्लेषण करने पर उसमें ऑक्सीजन 49 प्रतिशत, सिलिकन 26 प्रतिशत, एल्युमिनियम 7, लोहा 4, कैल्शियम 3, सोडियम 2, पोटेशियम 2, मैग्नेशियम 2, हाइड्रोजन 1 तथा टाइटेनियम, क्लोरीन, कार्बन आदि 80 तत्व उसमें और भी मिले हुए हैं। कहीं की मिट्टी में किन्हीं पदार्थों की और कहीं किन्हीं की न्यूनाधिकता रहती है, पर समस्त पृथ्वी का मिला-जुला अनुपात प्रायः इसी स्तर का है। इन सम्मिश्रणों को देखते हुए पृथ्वी को भी तत्व कैसे कहा जा सकता है ?
हम बढ़ रहे हैं साथ ही बदल भी रहे हैं यह एक सुनिश्चित और ऐसा तथ्य है जो सभी को प्रभावित करता है। बच्चा छोटा है, किशोर बनता है, फिर युवक, फिर अधेड़ फिर वयोवृद्ध और अन्ततः वह पके फल की तरह डाली से टूटकर बीज बन जाता है और नये पौधे की तरह नया जन्म धारण करता है। चौरासी लाख योनियों का क्रम पूरा करते हुए प्राणी मनुष्य योनि में आता है और फिर क्रमशः महात्मा, देवात्मा, विश्वात्मा, परमात्मा की दिशा में बढ़ते-बढ़ते अपूर्णता से पीछा छुड़ाता हुआ पूर्णता का परम लक्ष्य प्राप्त कर लेता है। यह प्रगति यात्रा अनवरत गति से चल रही है। प्राणी इसी प्रवाह में अमीबा जैसे एक कोषीय पूर्वजों से बढ़ते विकसित होते होते वर्तमान स्थिति तक पहुँचे हैं। जल पदार्थों के भी विकास क्रम का इतिहास भी इसी प्रकार बनता बढ़ता चला आया है।
विचारों और मान्यताओं के बारे में यही बात है। सामाजिक परम्पराओं में भी इसी नियम का निर्वाह होता आया है। समय-समय पर स्मृतियाँ बदली हैं, दर्शन शास्त्र में परिवर्तन हुए हैं और प्रथा परम्पराओं में सुधार होता चला आया है। पूर्व मान्यताओं को तत्कालीन स्थिति के अनुरूप समझकर उनका समुचित आदर किया जा सकता है, पर यह नहीं मानना चाहिए कि भूतकाल में जो कहा, किया या माना जाता था वही शाश्वत सत्य है और उसमें परिवर्तन नहीं किया जाना चाहिए। पंच तत्वों के सम्बन्ध में भूतकालीन मान्यता तक में जब परिवर्तन करना पड़ रहा है तो फिर अन्यान्य मान्यताओं के सम्बन्ध में भी दुराग्रह नहीं बरता जाना चाहिए।
हम विवेक को प्रधान मानकर चलें। सत्य की शोध का अपने आपको एक विनम्र विद्यार्थी मानें। तर्क और प्रमाण का आश्रम लें। विवेक एवं औचित्य की कसौटी पर वस्तुस्थिति को परखें और जो न्याय युक्त, प्रामाणिक एवं तथ्य पूर्ण दिखाई पड़े उसी को स्वीकार करें। इसी राह पर चलते हुए तथ्य और सत्य तक पहुँचने का लक्ष्य अधिक सुगमता से प्राप्त किया जा सकता है। परम्पराओं के प्रति दुराग्रह बरतने से तो प्रगति पथ में व्यवधान ही उपस्थित होता है।
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पुनर्जन्म के सम्बन्ध में यों तो अनेकों घटनायें सामने आती हैं। अखबारों में छपती हैं। पूर्वजन्म की स्मृति आना और बोलना सीखते ही पिछले जन्म के घर, पत्नी-बच्चों, रिश्तेदारों के सम्बन्ध में बताने, उन्हें पहचानने और कोई राज की बात जिसे अकेला वही व्यक्ति या एकाध अन्य सदस्य और जानते थे बताने की घटनायें इतनी आम हो चुकी हैं कि कोई नयी चर्चा उठते ही उसी जैसी दो चार और घटनाओं की भी चर्चा होने लगती है।
इन घटनाओं के सम्बन्ध में जो विवरण प्राप्त हुए उनके आधार पर जाँच पड़ताल से जो तथ्य सामने आये उन्होंने पुनर्जन्म और परलोक के भारतीय सिद्धान्त की पुष्टि करते हुए यह भी प्रमाणित कर दिया कि मरने के बाद शरीर तो छूट जाता है पर मनुष्य की चेतना जीवित ही रहती है। लेकिन अभी कुछ समय पूर्व विश्व-विख्यात ब्रिटिश परा मनोवैज्ञानिक जे0 बर्नाड हटन ने कुछ ऐसी घटनाओं पर शोध किया जो यह सिद्ध करती हैं कि व्यक्ति ही नहीं घटनाओं का भी पुनर्जन्म होता है। इस विषय को उन्होंने अपनी पुस्तक ‘द अदर साइड आफ रियेलिटी’ (यथार्थ का दूसरा पक्ष) में प्रमाणों और तथ्यों के आधार पर प्रतिपादित किया।
हटन के साथ उनके एक मित्र जो सेना में कैप्टेन थे- शुलकौझ भी द्वीप पर छुट्टियाँ मनाने के लिए सपरिवार आये हुए थे। दोनों मित्रों ने आस-पास रहने का फैसला किया और एक ही स्थान पर बंगले किराये पर लिये। अभी छुट्टियां बीत भी न पायी थीं कि हटन को किसी आवश्यक कार्य से बाहर जाना पड़ा। श्रीमती हटन और उनके बच्चों के साथ कैप्टेन-शुलकौझ का परिवार भी श्री हटन को विदा करने स्टेशन तक गया। विदा कर लौटते हुए सब ने पूरे द्वीप का घूमते हुए चक्कर लगाकर अपने बंगलों पर वापस लौटने का निश्चय किया। इस प्रकार उन्हें छोटे से सिल्टद्वीप की चार मील की परिधि भर का चक्कर लगाना पड़ता अतएव वे स्टेशन से बंगलों के लिए पैदल ही रवाना हुए।
थोड़ी देर में कुछ मछुए पास के गाँव से आ गये और उन्होंने तोप द्वारा लाइफलाइन फेंकी ताकि उसे पकड़कर फंसे हुए मछुए अपनी रक्षा कर लें। लेकिन लाइफ लाइन नाव तक ही नहीं पहुँची। दुबारा लाइफ लाइन फेंकी गयी। इस बार पूरी सतर्कता रखी गयी थी। इसलिए लाइफ लाइन ठीक तक पहुँच गयी। नाव में बैठे मछुए उसे पकड़ें-पकड़ें इतने में ही एक लहर ऊंची उठी और उसने लाइफ लाइन को लपक लिया।
तोप की आवाज सुनकर पास की बस्ती से बहुत सारे लोग जिनमें स्त्रियाँ और बच्चे भी थे समुद्र के तट पर आ गये। अच्छी खासी भीड़ इकट्ठी हो गयी। कुछ स्त्रियाँ विलाप भी करने लगीं। सम्भवतः उस नाव में उनके पति, पुत्र या सम्बन्धी होंगे। दो बार लाइफ लाइन फेंकने की कोशिश बेकार तो तोप वाले मछेरों ने किनारे से एक नाव उतारी जिसमें चार-पाँच हृष्ट-पुष्ट और ताकतवर व्यक्ति बैठे थे, वे सफलता पूर्वक नाव को खेते हुए उस ओर ले गये जहाँ उनके साथी फंसे हुए थे।
लहरों से संघर्ष करते हुए वे अपने साथियों की ओर बढ़ने लगे। उस नाव के मछेरों ने भी लाइफ बोट उतार ली थी और वे ज्वार-क्षेत्र से बाहर आने की कोशिश करने लगे। किनारे से रवाना हुई नाव उन तक पहुँच ही गयी थी। तट पर खड़े कुछ मछेरों ने फिर लाइफ लाइन फेंकी पर वह भी लहरों की चपेट में आ गयी। जीवन और मृत्यु के इस संघर्ष को देखकर किनारे पर खड़े व्यक्ति परमात्मा से दया की प्रार्थना कर रहे थे। लाइफ बोट को सहारा देकर दुर्घटना में फंसे मछेरों को किनारे पर लाने की कोशिश की ही जा रही थी कि एक तेज लहर आयी जिसने आकाश की ऊंचाइयों को छूते हुए दोनों नावों और उनके सवार मछेरों को सागर की तलहटी में पहुँचा दिया।
इस दृश्य के समय बड़ा कारुणिक वातावरण बन गया था। स्वयं शुलकौझ, उनके साथी, बच्चों व अपनी तथा अपने मित्र की पत्नियों को कुछ समझ नहीं आ रहा था। एक दूसरे से आश्चर्य व्यक्त करते हुए उन्होंने आस-पास देखा तो न कोई भीड़ थी और न ही सागर में तूफान आया हुआ था। एकदम शाँत समुद्र भी जैसे उस घटना को झुठला रहा था।
घटना अविश्वसनीय लगती है। परन्तु सच है यह बात तब प्रमाणित हुई कैप्टन ने अपने घर जाकर द्वीप के पादरी से इसकी चर्चा की। पादरी ने और भी आश्चर्य में डाल दिया कि अब से पचास वर्ष पूर्व जब वह बच्चा ही, था सचमुच ही ऐसी घटना घट चुकी है। दिन यही था जिस दिन शुलकौझ ने यह दृश्य देखा था। यही नहीं पादरी ने उन लोगों के बयान भी दिखाये जो पहले इस घटना की पुनरावृत्ति को देख चुके थे। कैप्टन शुलकौझ ने उन बयानों को पढ़ा तो अनुभव हुआ कि जैसे अभी-अभी कोई व्यक्ति यह घटना देखकर आया है और अपने संस्मरण लिख रहा है।
उस समय बच्चे रहे बर्नार्ड-हटन इस अविश्वसनीय सचाई से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसी दिशा में खोज करना अपना लक्ष्य बना लिया और परा मनोविज्ञान के क्षेत्र में एक से एक अद्भुत प्रयोग किये तथा उनके निष्कर्षों से लोगों को अचम्भित कर दिया। क्योंकि आज का बुद्धिजीवी वर्ग इस प्रकार की बातों को बिना कुछ समझने का प्रयत्न किये तत्काल कपोल या गप्प करार दे देता है।
पश्चिमी देशों में मरणोत्तर जीवन की स्थिति पर शोध और प्रयोग के बड़े कार्य होने लगे हैं। सर ओलीवर लाज, सर विलियम वारेट, एफ0डब्ल्यू0एच0 मारेस, रिचार्ड होड़सन, मिसेज सिडपिक, सर आर्थरकानन डायल आदि परा मनोवैज्ञानिकों ने इस दिशा में गम्भीर खोजें की हैं और प्रामाणिक तथा तथ्यपूर्ण जानकारियाँ संग्रहीत कर अध्यात्म को भी विज्ञान की कसौटी पर कसा है।
उक्त प्रकार की घटना के ही समान प्रख्यात परा मनोवैज्ञानिक ए0पी0 सीनेट ने भी ऐसा ही एक चौंका देने वाला अनुभव लिखा है। सीनेट एक बार झील के किनारे चहलकदमी कर रहे थे एकाएक उन्हें लगा कि कोई युवती आत्मघात के उद्देश्य से झील में कूदने जा रही है। उन्होंने युवती को देखा और उसे पकड़ने के लिए दौड़े ताकि उसे आत्मघात से बचाया जा सके , पर इसके पहले ही लड़की पानी में कूद चुकी थी। छपाक् की आवाज हुई और सीनेट लोगों को उसे निकालने के लिए पुकारने लगे। लोग आये, उन्होंने झील में लड़की का मूर्छित शरीर या शव निकालने के लिए काफी देर तक डुबकियाँ लगायीं। बाद में पुलिस को रिपोर्ट की गई, पर यह जानकर आश्चर्य हुआ कि प्रति वर्ष इसी दिन और इसी समय आत्म-हत्या की रिर्पोट दर्ज करायी जाती है। पिछली पन्द्रह-सोलह साल की फाइलों में एक सी रिपोर्ट, आत्महत्या लड़की का एक सा हुलिया और एक से कपड़े बताये जाते हैं।
सीनेट ने यह क्रम कब से शुरू होता है- यह बताने का आग्रह किया तो पता चला कि सोलह साल पहले इसी हुलिया की लड़की ने आत्म हत्या की थी। उसके परिवार वालों ने इसके शव को ढूंढ़ा और निकाला था। इस प्रकार घटनाओं की पुनरावृत्ति का कारण बताते हुए ‘टेननीक्स आफ एस्ट्रल प्रोजेक्शन’ ‘सुप्रीम ऐडवेचर’ तथा ‘मोरल एस्ट्रल प्रोजेक्शन’ जैसी विश्व विख्यात पुस्तकों के लेखक रार्वट कूकल ने लिखा है कि- मृत्यु चाहे दुर्घटना से हुई हो या आत्मघात द्वारा। मरने वालों का सूक्ष्म शरीर (एस्ट्रल-बॉडी) तुरन्त यह अनुभव करने में असमर्थ होता है कि वह मर गया है। किसी तालाब में ढेला फेंकने के बाद जिस प्रकार बहुत देर तक तरंगें उठती रहती हैं उसी प्रकार मृतक व्यक्ति का सूक्ष्म शरीर भी उन घटनाओं की मूर्च्छा की दशा में पुनरावृत्ति करता है। ए0पी0 सीनेट द्वारा उल्लेखित इस घटना का यही कारण है।
रार्बट कूकल ने अपनी पुस्तकों में ऐसे बहुत से तथ्य संग्रहीत किये हैं कि जो उन्होंने मृतात्माओं से प्रत्यक्ष वार्तालाप सम्पर्क, खोज-बीन और प्रयोगों के आधार पर खोजे हैं। उनके निष्कर्ष भारतीय तत्वज्ञान को ही पुष्ट करते हैं जो यह मानता है कि मृत्यु केवल स्थूल शरीर की होती है। प्राणी के साथ उसका सूक्ष्म शरीर, इच्छाएं, वासनाएं, आकाँक्षाएं और भावनाएं साथ ही जुड़ी रहती हैं जो उसे पारलौकिक जीवन में ही नहीं दूसरे जन्मों में भी नियंत्रित और प्रभावित करती हैं। मोह और अतृप्त वासनाओं के सम्बन्ध में कूकल ने लिखा है- “जो लोग मोह के वशीभूत हैं तथा जिनके जीवन में अतृप्त वासनाएं घर किये रहती हैं उनकी एस्ट्रल बॉडी पूर्णरूप से- ईश्वर से मुक्त नहीं होती। उनके लिए सारा वातावरण धूमिल अन्धकार पूर्ण और भयावह रहता है।” इसे ही भारतीय धर्मशास्त्रों ने अपनी अलंकारिक भाषा में नरक कहा है।”
अन्त में जे0 बर्नार्ड हटन द्वारा देखी गई एक अनोखी घटना के पुनर्जन्म का भी स्पष्टीकरण किया है जिसका कारण बताते हुए उन्होंने लिखा है- “भय और आसक्ति समान रूप से मनुष्य के सूक्ष्म शरीर को प्रभावित करती है। आकस्मिक दुर्घटनाओं में तो इसलिए और भी ज्यादा कि बहुत काल तक मृत्यु का ही भान नहीं होता और अपने शरीर से बंधा हुआ उसका लगाव उसे पुनः पुनः संघर्षों की ओर धकेलता है।”
इस प्रकार की घटनाओं के पुनर्जन्म का पूर्ण स्पष्टीकरण तो गहन प्रवेश की क्षमता या इस दिशा में की जाने वाली खोजों द्वारा ही हो सकता है। बहरहाल वैज्ञानिकों के लिए यह गुत्थी आज भी उलझी हुई है कि उस घटना की प्रतिवर्ष उसी दिन किस प्रकार पुनरावृत्ति होती रही है।
जीवन है क्या ? इस रहस्य का उद्घाटन करने के लिए मर्मज्ञों की परिषद बुलाई गई और पूछा गया कि जिसने जीवन को जैसा पाया, वह अपनी मान्यता व्यक्त करे।
बादल बोला- जीवन एक घुटन भर है। चन्द्रमा ने कहा- आँखमिचौनी। पवन ने बताया-दिशा हीन निरुद्देश्य भटकन। समुद्र ने बताया-विशालता। बूँद बोली- जीवन पतन के अतिरिक्त और कुछ नहीं। अंकुर बोला- अभिनव अवतरण। सरोवर ने कहा- मर्यादा का बन्धन। नदी ने बताया- सतत प्रवाह।
बात बढ़ती ही गई। भाष्यकार बहुत थे। विवाद का अन्त न दीख पड़ा तो मृत्यु ने कहा-तुम सब मिलकर जितना जानते हो जीवन के बारे में उससे असंख्य गुना जानती हूँ मैं अपने उस जलपान के सम्बन्ध में।
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मानवी चेतना की रहस्यमय परतें यदि समझी जा सकें और समुन्नत की जा सकें तो निश्चित ही उसे अत्यन्त उत्कृष्ट कोटि की जीवन सफलता कहा जायगा। भौतिक विज्ञान स्थूल जगत में बिखरी हुई शक्ति को देखकर चकित है और उसमें बहुत कुछ करतलगत करने के लिए लालायित है।
सामान्य के भीतर जो असामान्य छिपा पड़ा है, उसे अब अधिक अच्छी तरह समझा जाने लगा है। उदाहरण के लिए सूर्य को ही लें, वह गर्मी ओर रोशनी देने वाला, रोज उगने और डूबने वाला छोटा सा अग्नि पिण्ड मात्र है, पर गम्भीरतापूर्वक पता लगाने से वह शक्ति का भाँडागार सिद्ध होता है।
बच्चे की आकृति-प्रकृति का सारा ढाँचा इन नगण्य से घटकों में छिपा पड़ा है यह कितने आश्चर्य की बात है। भले ही सिद्ध न किया जा सके पर अनेक प्रमाण अब इन तथ्यों की निरन्तर पुष्टि कर रहे हैं।
समीपवर्ती विचित्रताओं में सबसे बड़ा है मस्तिष्क की कोठरी में रखा हुआ सूक्ष्म शक्तियों और दिव्य क्षमताओं का भाण्डागार। पर कठिनाई यह है कि जिस प्रकार अपनी आँखों से अपनी आँखों को देख सकना कठिन है और अपने ही रक्त में चल रही हलचलों को जान पाना दुरूह है उसी प्रकार मस्तिष्क को समझना तो कठिन है ही, उससे भी कठिन यह है कि मानसिक चेतना पर नियंत्रण कैसे किया जाय। यदि वैसा सम्भव हो सके तो शक्ति का लगभग इतना ही बड़ा स्रोत हाथ लग सकता है जितना कि बाह्य जगत में दृश्यमान सूर्य में सन्निहित है।
पुस्तकीय शिक्षा, विचार विनिमय, दृश्य, चिन्तन आदि के सहारे जो ज्ञान वृद्धि होती है उससे मस्तिष्क का एक बहुत छोटा अंश ही विकसित हो पाता है। इसके सहारे उपार्जन-लोक, व्यवहार तथा निर्वाह के सामान्य प्रयोजन ही पूरे होते हैं। शक्ति का स्रोत तो अचेतन है। उसके ऊपर प्रभाव डालना अति कठिन है। यदि उस तक पहुँचा जा सके और अभीष्ट दिशा में बदला जा सके तो व्यक्तित्व का स्वरूप बदल सकता है। तब सामान्य को असामान्य के रूप में विकसित हुआ देखा जा सकता है।
अचेतन को प्रभावित करने की दिशा में कितने ही वैज्ञानिक प्रयोग हो रहे हैं और उनमें सफलताएं भी मिल रही हैं।
डॉ0 डेलगाडो ने अपने कथन को प्रमाणित करने के लिए कई सार्वजनिक प्रयोग करके भी दिखाये। अली नामक एक बन्दर को केला खाने के लिए दिया गया। जब वह केला खा रहा था, तब डॉ0 डेलगाडो ने ‘इलेक्ट्रोएसी फैलोग्राफ’ के द्वारा बन्दर के मस्तिष्क को सन्देश दिया कि केला खाने की अपेक्षा भूखा रहना चाहिए तो बन्दर ने भूखा होते हुए भी केला फेंक दिया। ‘इलेक्ट्रोएसी फैलोग्राफ’ एक ऐसा यन्त्र है, जिसमें विभिन्न क्रियाओं के समय मस्तिष्क में उठने वाली भाव तरंग को विद्युत शक्ति द्वारा तीव्र कर देते हैं तो मस्तिष्क के शेष सब भाव दब जाते हैं और वह एक ही भाव तीव्र हो उठने से मस्तिष्क केवल वही काम करने लगता है।
डॉ0 डेलगाडो ने इस बात को अत्यन्त खतरनाक प्रयोग द्वारा भी सिद्ध करके दिखाया। एक दिन उन्होंने इस प्रयोग की सार्वजनिक घोषणा कर दी। हजारों लोग एकत्रित हुए। सिर पर इलेक्ट्राड जड़े हुए दो खूँखार साँड लाये गये। इलेक्ट्राड एक प्रकार का एरियल है, जो रेडियो ट्रान्समीटर द्वारा छोड़ी गई तरंगों को पकड़ लेता है। जब दोनों साँड मैदान में आये तो उस समय की भयंकरता देखते ही बनती थी, लगता था दोनों साँड डेलगाडो का कचूमर निकाल देंगे, पर वे जैसे ही डेलगाडो के पास पहुँचे उन्होंने अपने यन्त्र से सन्देश भेजा कि युद्ध करने की अपेक्षा शाँत रहना अच्छा है, तो बस फुँसकारते हुए दोनों साँड ऐसे प्रेम से खड़े हो गये जैसे दो बकरियाँ खड़ी हों। उन्होंने कई ऐसे प्रयोग करके रोगियों को भी अच्छा किया।
टैक्सास विश्वविद्यालय के राबर्ट थाम्पसन और जेम्समैक कोनेल वैज्ञानिकों ने प्लेनेरिया नामक जीव पर परीक्षण करके यह सिद्ध किया कि विद्युत उपकरणों की सहायता से मस्तिष्कीय क्षमता को घटाया और बढ़ाया जा सकता है। कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय अमेरिका के इस सन्दर्भ में संलग्न विज्ञानी डॉ0 ओटो शिमल ने घोषणा की है कि अब हमारे हाथ में मानव मस्तिष्क को नियन्त्रित करने की शक्ति आ गई है, पर आशा की जानी चाहिए कि उसका प्रयोग अच्छाई के लिए ही होगा, किन्तु साथ ही इस खतरे को भी ध्यान में रखना होगा कि इस नव उपार्जित शक्ति का प्रयोग निजी महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति एवं राष्ट्रीय विस्तारवाद के लिए भी किया जा सकता है। यदि ऐसा किया गया तो यह आविष्कार संसार का सबसे अधिक विघातक अस्त्र सिद्ध होगा।
कुछ दिन अमरीकी प्रतिरक्षा विभाग के एक गधे पर यह प्रयोग किया गया था और उसे उपकरणों से प्रभावित करके अकेला छोड़ा गया था। उसे जिधर चलने और जो करने के लिए निर्देश किया उसने वही सब कर दिखाया।
योग का उद्देश्य बिना वैज्ञानिक उपकरणों के अन्तः चेतना को अभीष्ट स्तर पर परिवर्तित और विकसित करना है। यह इसलिए उपयुक्त है कि हर व्यक्ति अपने का उस दिशा में विकसित करना चाहेगा जिससे उपलब्ध क्षमता को अपने और दूसरों के कल्याण में लगाया जा सके। इसके विपरीत वैज्ञानिक साधनों में यह दूसरों के मस्तिष्क को प्रभावित करने का आधार अपना लिया गया तो जन साधारण को किसी महत्वाकाँक्षी सत्ताधारी की इच्छानुसार ढलना पड़ेगा और वे आत्मोत्कर्ष से वंचित रहकर किन्हीं दूसरों की कठपुतली मात्र बनकर रहेंगे।
विलक्षणताओं की दृष्टि से देखा जाय तो छोटे-छोटे जीव जन्तु भी असाधारण सूक्ष्म चेतना से सम्पन्न पाये जाते हैं और वे ऐसी होती है जिन्हें विलक्षण कहा जा सके।
कैरियन कीड़े की घ्राण शक्ति सबसे अधिक मानी जाती है। वह मीलों दूर के मुर्दा माँस का पता लगा लेता है और उड़ता फुदकता हुआ उस खाद्य भण्डार तक पहुँचकर तृप्तिपूर्वक भोजन करता है।
समुद्र में हल्के ज्वार-भाटे प्रतिदिन 50 मिनट के अन्तर से आते हैं। केकड़े का रंग परिवर्तन भी ठीक 50 मिनट के ही अन्तर से होता है।
कीड़ों के कान नहीं होते, यह कार्य वे अगली टाँगों के जोड़ों में रहने वाली ध्वनि शक्ति द्वारा पूरा कर सकते हैं। तितलियों के पंखों में श्रवण शक्ति पाई जाती है, झींगुर आदि जो आवाज करते हैं वह उनके मुँह से नहीं बल्कि टाँगों की रगड़ से उत्पन्न होती है। कीड़ों की अपनी विशेषता है, उनके फेफड़े नहीं होते पर वे साँस लेते हैं। वे सुन सकते हैं पर कान नहीं होते, वे सूँघते हैं पर नाक नहीं होती। दिल उनके भी होता है पर उसकी बनावट हमारे दिल से सर्वथा भिन्न प्रकार की होती है।
रगफर्ड जाति का कीड़ा सीधे माँ के द्वारा ही जन्मता है। बाप का कोई योगदान उसके जन्मने में नहीं होता। कुंवारी एफिड अपने बल-बूते पर बच्चे जनने लगती है। कुमारी व्रत निवाहते हुए भी वह जननी का पद प्राप्त कर लेती है।
नेस, सलामैसीना, आईस्टर, स्नेल (घोंघा) फ्रैसवाटर मसल (सम्बूक) साइलिस, चैटोगेस्टर स्लग (मन्थर) पाइनोगोनाड (समुद्री मकड़ी) आदि कृमियों में भी यह गुण होता है कि उनके शरीर का कोई अंग टूट जाने पर ही नहीं वरन् मार दिये जाने पर भी वह अंग या पूरा शरीर उसी प्रोटोप्लाज्म से फिर नया तैयार कर लेते हैं। केकड़ा तो इन सबसे विचित्र है। टैंक की सी आकृति वाले इस जीव की विशेषता यह है कि अपने किसी अंग को तुरन्त तैयार कर लेने की प्रकृति दत्त सामर्थ्य रखता है।
आत्म चेतना के विकास को ऐसी सफलता कहा जा सकता है जो आन्तरिक उत्कृष्टता बढ़ जाने से हर घड़ी आनन्द की मनःस्थिति बनाये रह सकती है। इसके अतिरिक्त अचेतन की विकसित क्षमता इतनी प्रखर होती है कि जिसके सहारे देव जीवन जिया जा सके और दूसरों को सुखी समुन्नत बनाकर असीम आत्म संतोष देने वाला श्रेय पाया जा सके। मस्तिष्कीय उत्कर्ष एवं परिवर्तन के लिए भौतिक प्रयोगों की पराधीनता खतरनाक हो सकती है। इस दिशा में जो प्रयत्न हों वे योगाभ्यास स्तर के हों तभी मानवी प्रगति की अति महत्वपूर्ण आवश्यकता पूरी हो सकती है।
केन उपनिषद्, जैमिनीय ब्राह्मण का, तथा सामवेद के तलवकार ब्राह्मण के नौवें अध्याय में है। आरम्भ में केन शब्द का प्रयोग होने से उसका नाम केन उपनिषद् पड़ा।
‘केन शब्द का प्रयोग किसके द्वारा किससे क्यों कैसे ? कौन किसने आदि अर्थों से किया जा सकता है।
मानव जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न है, वह क्या है, क्यों है ? किसलिए है ? किसने उसे भेजा ? क्यों भेजा ? यह सब क्या है ? क्यों है ? किसका है ? अन्त में कहाँ जाना है? क्या सोचें? क्या करें? प्रस्तुत वस्तुओं का क्या प्रयोग करे ? सम्बन्धित व्यक्तियों से क्या सम्बन्ध रखे ? उपलब्धियों को कहाँ नियोजित करे, और बाधाओं से क्योंकर निपटे ? यदि इन प्रश्नों का महत्व समझा जा सके और उनका उत्तर ढूंढ़ते हुए आत्मिक प्रगति के पथ पर चला जा सके तो तत्वज्ञान की वह दिव्य उपलब्धि मिल सकती है जिसे केन उपनिषद् ने आत्मोपलब्धि से पुकारा और सराहा है।
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अक्सर हमारी अनुभूतियाँ वस्तुस्थिति से सर्वथा उलटी होती हैं। इन्द्रियाँ अपूर्ण ही नहीं कई बार तो वे भ्रामक सूचनायें देकर हमें ठगती भी हैं। उनके ऊपर निर्भर रहकर-प्रत्यक्षवाद को आधार मानकर शाश्वत सत्य को प्राप्त करना तो दूर, समझ सकना भी सम्भव नहीं होता।
उदाहरण के लिए प्रकाश को ही लें। प्रकाश क्या है। उसे विद्युत चुम्बकीय लहरों का बवंडर ही कहा जा सकता है। वह कितना मंद या तीव्र है यह तो उसकी मात्रा पर निर्भर करता है, पर उसकी चाल सदा एक सी रहती है। एक सैकिण्ड में वह एक लाख छियासी हजार मील की गति से दौड़ने वाला पदार्थ है। प्रकाश किरणों में सात रंग होते हैं। इन्हीं के सम्मिश्रण से हल्के भारी अनेकानेक रंगों का सृजन होता है।
यह बात कहने, सुनने और जानने मानने में विचित्र लगेगी कि संसार के किसी पदार्थ में कोई रंग नहीं है। हर वस्तु रंग रहित है। किन्तु यह विशेषता अवश्य है कि प्रकाश की किरणों में जो रंग है उनमें से किसी को स्वीकार करें किसी को लौटा दें। बस इसी कारण हमें विभिन्न वस्तुएं विभिन्न रंगों में दीखती हैं। पदार्थ जिस रंग की किरणों को अपने में सोखता नहीं वे उससे टकराकर वापिस लौटती हैं। वापसी में ये हमारी आँखों से टकराती हैं और हम उस टकराव को पदार्थ का अमुख रंग होने के रूप में अनुभव करते हैं। पौधे वस्तुतः हरे नहीं होते, उनका कोई रंग नहीं, हर पौधा सर्वथा बिना रंग का है, पर उसमें प्रकाश की हरी किरणें सोखने की शक्ति नहीं होती अस्तु वे उसमें प्रवेश नहीं कर पातीं। वापिस लौटते हुए हमारी आँखों को इस भ्रम में डाल जाती हैं कि पौधे हरे होते हैं। हम उसी छलावे को शाश्वत सत्य मानते रहते हैं और प्रसंग आने पर पूरा जोर लगाकर यह सिद्ध करते हैं कि पौधे निश्चित रूप से हरे होते हैं। कोई उससे भिन्न बात कहे तो हँसी उसी की बुद्धि पर आवेगी, भ्राँत और दुराग्रही उसी को कहेंगे। यह जानने और मानने का कोई मोटा आधार दिखाई नहीं पड़ता कि हमारी आँखें धोखा खा रही हैं- प्रकृति की जादूगरी, कलाबाजी हमें ही छल रही है। पेड़ का तो उदाहरण मात्र दिया गया। हर पदार्थ के बारे में हम रंगों के सम्बन्ध में ऐसे ही भ्रम जंजाल में जकड़े हुए हैं। जिन आँखों को प्रामाणिक मानते हैं, जिस मस्तिष्क की विवेचना पर विश्वास करते हैं यदि वही भ्रमग्रस्त होकर हमें झुठलाने लगे तो फिर हमारा ‘प्रत्यक्षवाद’ को तथ्य मानने का आग्रह बेतरह धूल धूसरित हो जाता है।
हमारी दृष्टि में काला रंग सबसे गहरा रंग है और सफेद रंग कोई रंग नहीं है। पर यथार्थता इस मान्यता से सर्वथा उलटी है। किसी रंग का न दीखना काला रंग है और सातों रंगों का सम्मिश्रण सफेद रंग। अंधेरा वस्तुतः ‘कुछ भी नहीं’ कहा जा सकता है जबकि वह घोर घना छाया दीखता है। उसके कारण कुछ भी सूझ न पाने की स्थिति आ जाती है। वैशेषिक दर्शन ने अँधेरे को कोई पदार्थ मानने से इनकार किया है जबकि दूसरे दार्शनिक उसे एक तत्व मानने का जोर-शोर से प्रतिपादन करते हैं। कालापन सभी प्रकाश किरणों को अपने भीतर सोख लेता है फलतः हमारे पल्ले कुछ नहीं पड़ता है और अंधेरे में ठोकर खाते हैं- घनी कालिमा छाई देखते हैं।
किसी भी रंग की किरणें सोख सकने में जो पदार्थ सर्वथा असमर्थ हैं वे ही हमें सफेद दीखते हैं। कारण यह है कि उनसे टकराकर तिरस्कृत प्रकाश तरंगें वापस लौटती हैं और उनके सात रंगों का सम्मिश्रण हमारी आँखों को सफेद रंग के रूप में दीखता है। कैसी विचित्र, कैसी असंगत और कैसी भ्रम जंजाल भरी विडम्बना है यह। जिसे न उगलते बनता है न पीते। न स्वीकार करने को मन होता है न अस्वीकार करने का साहस। अपने ही अपूर्ण उपकरणों पर क्षोभ व्यक्त करते हुए मन मसोस कर बैठना पड़ता है। वैज्ञानिक सिद्धियों को अस्वीकार कैसे किया जा सकता है। हलका, भारी, गहरा, उथला, कालापन भी एक पहेली है। अन्धकार कहीं या कभी बहुत गहरा होता है और कहीं या कभी उसमें हलकापन रहता है यह भी उतने अंशों में प्रकाश को सोखने न सोखने की क्षमता पर निर्भर रहता है। काले रंग में प्रकाश का सारा अंश सोख लेने की क्षमता का एक प्रमाण यह है कि वह धूप में अन्य पदार्थों की अपेक्षा अधिक मात्रा में और अधिक जल्दी गरम होता है।
अब एक नया प्रश्न उभरता है कि प्रकाश किरणों में रंग कहाँ से आता है ? इस स्थल पर उत्तर और भी विचित्र बन जाता है। प्रकाश लहरों की लम्बाई का अन्तर ही रंगों के रूप में दीखता है। रंग नाम की कोई चीज इस समस्त विश्व में कहीं कुछ है ही नहीं। उसका अस्तित्व सर्वथा भ्रामक है।
विद्युत चुम्बकीय तरंगें ही प्रकाश हैं। इन तरंगों की लम्बाई अलग-अलग होती है। अस्तु उनका अनुभव हमारा मस्तिष्क भिन्न-भिन्न अनुभूतियों के साथ करता है। यह अनुभूति भिन्नता ही रंगों के रूप में विदित होती है। सात रंग तथा उनसे मिलजुलकर बनने वाले अनेकानेक रंगों का वैज्ञानिक विश्लेषण प्रकाश तरंगों की लम्बाई का मस्तिष्कीय अनुभूति के रूप में ही किया जा सकता है। रंगों की अपनी तात्विक सत्ता कुछ भी नहीं है।
अगर हम विदित प्रकाश किरणों को यन्त्रों की अपेक्षा खुली आँखों से देख सकने में समर्थ हो सके होते तो जिस प्रकार एक सात रंगों का सप्तक हमें दीखता है उससे अतिरिक्त अन्यान्य ऐसे रंगों के जिनकी आज तो कल्पना कर सकना भी अपने लिए कठिन है 67 सप्तक और दीखते। 67 x 7 = 469 रंगों के सम्मिश्रण से कितने अधिक रंग बन जाते हैं इसका अनुमान इसी से लगाया जाता है कि विज्ञात सात रंगों से ही हजारों प्रकार के हल्के भारी रंग बने हुए दीखते हैं।
प्रातः काल का अरुणोदय और लाल रंग का सूर्य निकलना इस रंग भ्रम जंजाल की एक झलक है। सूर्य वस्तुतः सफेद ही होता है, पर सवेरे वह सिर पर नहीं पूर्व में तिरछी स्थिति में होता है। इसलिए उसकी किरणों को बहुत लम्बा वायुमंडल पार करना पड़ता है। इस मार्ग में बहुत अधिक धूलि कण आड़े आते हैं। वे कण लाल रंग नहीं सोख पाते अस्तु वे किरणें हम तक चली आती हैं और सवेरे का उगता हुआ सूर्य लाल रंग का दिखाई पड़ता है।
आँखें कितना अधिक धोखा खाती हैं और मस्तिष्क कितनी आसानी से बहक जाता है इसका एक उदाहरण रंगों की दुनिया में पहला पैर रखते ही विदित हो जाता है। अन्य विषयों में भी हमारी भ्रान्ति का ठिकाना नहीं । जीवन का स्वरूप,प्रयोजन और लक्ष्य एक प्रकार से पूरी तरह विस्मृत कर दिया है और जड़ पदार्थों पर अपनी ही मान्यता को बिखेर कर उन्हें प्रिय- अप्रिय के रूप में देखने की स्थिति को संसार से मिलने वाले सुख-दुःख को मान लिया है। आत्म-ज्ञान की सूक्ष्म दृष्टि यदि मिल सके तो पता लगेगा कि हम अज्ञान, माया और भ्रम के जिस जंजाल में फँसे हुए हैं उनसे निकले बिना सत्य के दर्शन नहीं हो सकते और सत्य के बिना सुख नहीं मिल सकता।
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मंत्र साधना केवल कुछ शब्दों के संग्रह को बार-बार दुहराते रहना भर नहीं है वरन् शब्द शक्ति का विज्ञान समस्त उपयोग है। उनमें मंत्र साधक को संयम, मनोनिग्रह और भाव संवर्धन के तीनों तत्व मिलाने पड़ते हैं तब कहीं शब्द शक्ति के चमत्कारी विकास का अवसर मिलता है। शरीर के विकास में अन्न, जल और वायु का पोषण चाहिए। उसी प्रकार शब्द को मंत्र शक्ति का रूप धारण करने के लिए साधक को त्रिविध परिष्कार की आवश्यकता पड़ती है। यों शब्द समुच्चय के रूप में बने हुए मंत्रों की अपनी निजी विशेषता भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।
मंत्र जप में शारीरिक और मानसिक स्थिति ऐसी बनानी पड़ती है जिसमें उच्चारित शब्द प्रवाह मात्र उच्चारण बनकर न रहा जाय। आवाज भर को दुहराने के लिए मुख यन्त्र का उपयोग किया जाता रहा तो उसका साधक पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव तो होगा, पर वह प्रवाह उत्पन्न न हो सकेगा जिसकी तुलना श्रवणातीत ध्वनियों से की जा सकती है।
शब्द विज्ञान के शोधकर्त्ताओं ने जाना है कि जो मुख से बोले और कानों से सुने जाते हैं मात्र उतनी ही सीमा तक ध्वनि विस्तार नहीं है वरन् ऐसी भी आवाजें इस संसार में प्रवाहित होती हैं जो कानों से तो नहीं सुनी जा सकती हैं पर प्रभाव की दृष्टि से अत्यन्त सामर्थ्यवान होती है।
कहने की आवश्यकता नहीं है कि “शब्द” या ध्वनियाँ हर व्यक्ति को प्रभावित करती हैं किसी बच्चे ने कभी शेर की दहाड़, हाथी की चिंघाड़ न सुनी हो और उसे एकाएक सुनने को मिल जाये तो वह घबरा जायेगा हालाँकि उसे यह पता नहीं होगा कि शेर हिंसक जीव है। कोयल की कूक से प्रसन्नता और कौवे की काँव-काँव से कर्कशता का स्वतः भान होता है। शब्द एक प्रकार का आलोड़न है जैसे कोई पानी को मथे और काई को दूर कर दे। उसी प्रकार शब्दों के कम्पन न केवल विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न करते हैं, वरन् यह कम्पन “संवहन” की शक्ति भी रखते हैं और काई के समान ही विजातीय द्रव्य को खींचकर बाहर भी निकाल सकते हैं। शरीर में कुछ ऐसी चक्र ग्रन्थियाँ, गुच्छक और उपत्यिकाएं होती हैं जो शब्दों की ध्वनियों को अपने-अपने ढंग से प्रभावित और प्रसारित करती हैं। भाव विज्ञान के ज्ञाता मन्त्रज्ञ इन स्वर लहरियों को ही रोग निवारक शक्ति के रूप में प्रयोग करते रहे हैं।
शब्द शक्ति को ताप में परिणत किया जा सकता है। शब्द जब मस्तिष्क के ज्ञान कोषों से टकराते हैं तो हमें कई प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त होती हैं। यदि उन्हें पकड़ कर ऊर्जा में परिणत किया जाय तो वे बिजली, ताप, प्रकाश, चुम्बकत्व के रूप कितने ही प्रकार का क्रिया-कलाप सम्पन्न कर सकने योग्य बन सकते हैं।
इलेक्ट्रोनिक्स के उच्च विज्ञानी ऐसा यन्त्र बनाने में सफल नहीं हो सके हैं जो श्रवण शक्ति की दृष्टि से कान के समान सम्वेदनशील हो। कानों की जो झिल्ली आवाज पकड़कर मस्तिष्क तक पहुँचाती है, उसकी मोटाई एक इंच के ढाई हजारवें हिस्से के बराबर है। फिर भी वह कोई चार लाख प्रकार के शब्द भेद पहचान सकती है और उनका अन्तर कर सकती है। अपनी गाय की या मोटर की आवाज को हम अलग से पहचान लेते हैं यद्यपि लगभग वैसी ही आवाज दूसरी गायों की या मोटरों की होती है, पर जो थोड़ा सा भी अन्तर उनमें रहता है, अपने कान के लिए उतने से ही अन्तर कर सकना और पहचान सकना सम्भव हो जाता है। कितनी दूर से किस दिशा से, किस मनुष्य की आवाज आ रही है, यह पहचानने में हमें कुछ कठिनाई नहीं होती। यह कान की सूक्ष्म संवेदनशीलता का ही चमत्कार है।
श्रवण शक्ति का बहुत कुछ सम्बन्ध मन की एकाग्रता से है। यदि किसी बात में दिलचस्पी कम हो तो पास में बहुत कुछ बकझक होते रहने पर भी अपने पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा। किन्तु यदि दिलचस्पी की बात हो तो फुसफुसाहट से भी मतलब की बातें आसानी से सुनी समझी जा सकती हैं। कहना न होगा कि मंत्र−साधना के साथ ध्यान प्रक्रिया इसीलिये जोड़ी गई कि उच्चारण के साथ-साथ मानसिक एकाग्रता बनी रहे और प्रयुक्त शब्द प्रवाह को सामर्थ्यवान बनने के लिए एकाग्रताजन्य ऊर्जा की सहायता मिलती रहे।
ऐसी ध्वनि तरंगें (साउण्ड-वैव्स) जिनको हम सुन नहीं सकते, आज वैज्ञानिक एवं व्यावसायिक जगत में क्रान्ति मचाये दे रही हैं। कर्णातीत ध्वनि (साउण्ड व्हिच कैन नाट बी हर्ड बाई इयर) पर नियन्त्रण करके अब चिकित्सा शल्यकीट और कीटाणुओं का संहार, धुँआ और कोहरा दूर करना, कपड़े, कम्बल और बहुमूल्य गलीचों को धोकर साफ करना, घड़ी आदि के पुर्जे चमकाना, साफ करना जैसे छोटे-मोटे काम ही नहीं धातुओं को क्षण भर में काट डालना, छेद डालना, गला देना, एक दूसरे में जोड़ देना आदि ऐसे काम होने लगे हैं, जिनको बड़ी-बड़ी मशीनें भी काफी समय में कर सकती हैं। ध्वनि की इस करामात पर आज सारा संसार आश्चर्य चकित है, लोग समझ नहीं पा रहे कि इतनी सूक्ष्म गतिविधि से इतने भारी कार्य कैसे सम्पन्न हो जाते हैं। विद्युत से भी अधिक तीक्ष्ण और सर्वव्यापी कर्णातीत नाद शक्ति की वैज्ञानिक बड़ी तत्परतापूर्वक शोध कर रहे हैं।
आज के विज्ञान की दृष्टि में भी स्थूल ध्वनि कोई महत्व नहीं रखती, क्योंकि सुन ली जाने वाली ध्वनि (औडिबल साउण्ड) की शक्ति बहुत थोड़ी होती है। यदि डेढ़ सौ वर्ष तक निरन्तर ऐसी ध्वनि उत्पन्न की जाय तो उससे केवल एक कप चाय गरम करा लेने ही जितनी शक्ति पैदा होगी। किन्तु श्वांस या विचार तरंगों के रूप में शब्द का जो मानसिक स्फोट होता है वह बड़ा शक्तिशाली होता है, यद्यपि वह ध्वनि सुनाई नहीं देती, पर वह इतनी प्रखर होती है कि अपनी एक ही तन्मात्रा से वह परमाणुओं का विखण्डन कर सकती है और उससे उतनी ऊर्जा पैदा कर सकती है, जिससे विश्व के किसी भूभाग यहाँ तक चन्द्रमा और सूर्य में भी क्रान्ति पैदा कर दी जा सकती है। इस शक्ति को मन्त्र विज्ञान से जाना जाता है और उसकी ब्रह्म शक्ति या कुण्डलिनी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठा की गई है।
“अल्ट्रा साउण्ड” उस ध्वनि को कहते हैं जो मनुष्य के कान से किसी भी स्थिति में न सुनी जा सके। अति सूक्ष्म कम्पनों को जब विद्युत आवेश प्रदान किया जाता है तो उसकी भेदन क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि सघन से सघन वस्तुओं के परमाणुओं का भी भेदन करके उसकी आन्तरिक रचना का स्पष्ट फोटोग्राफ प्रस्तुत कर देती है।
उदाहरण के लिए शिकागो की एक महिला की डॉ0 परीक्षा की गई, पर डॉ0 यह निश्चय नहीं कर पाये कि इसके पेट में ट्यूमर की गाँठ है अथवा गर्भ। एक्सरे पर एक्सरे खींचे गये, पर स्थिति का सही पता नहीं चल सका। तब अल्ट्रा साउण्ड का प्रयोग किया गया और यह साफ प्रकट हो गया कि महिला के पेट में गर्भ विकसित हो रहा है। भूटा अमेरिका में एक व्यक्ति से धोके में गोली चल गई। छर्रा एक छोटे बच्चे के आँख, में धंस गया, डाक्टरों ने पचासों प्रयत्न किये पर यह पता नहीं चल पाया कि कारतूस का टुकड़ा किस स्थान पर डट गया है।
ब्रह्माण्ड में चल रहे स्वर प्रवाह की तरह ही पिंडरूपी सितार भी अपने क्रम से झंकृत होते रहते हैं। मेरुदण्ड स्पष्टतः वीणा दण्ड है। सात धातुओं से सात तार उसमें जुड़े हैं। सप्त विधि अग्नियों का पाचन परिपाक चलते रहने से ही तो प्राण को पोषण मिलता है और जीवन को स्थिर रक्खा जाता है। यह अग्नियाँ सात धातुओं को पकाती हैं और परिपाक को तेजस में बदलती है।
(1) पेशियों का आकुँचन-प्रकुँचन (2) नाड़ियों का रक्ताभिषरण (3) फुफ्फसों का श्वाँस-प्रश्वाँस (4) हृदय की धड़कन (5) मस्तिष्कीय विद्युत का ऋण धन का आरोह-अवरोह (6) चित का विश्राम जागरण (7) कोशिकाओं का जन्म-मरण यह सात क्रिया-कलाप ही जीवन विद्या के मूलभूत आधार हैं। इन्हीं को सप्तऋषि, सप्तलोक, सप्तद्वीप, सप्तसागर, सप्तमेरु, सप्तशक्ति के नाम से पुकारते हैं। शब्द सूर्य के यही सप्त अश्व हैं-
कैलीफोर्निया अमेरिका में हुए एक प्रयोग में एक वैज्ञानिक ने एक सेकिण्ड में पाँच करोड़ से अधिक कम्पन वाली ध्वनि पैदा कर दी, उस क्षेत्र में रुई का टुकड़ा पड़ा था वह अकस्मात जल उठा वैज्ञानिकों के कपड़े इतने गर्म हो उठे कि यदि वे कुछ देर के लिए उस क्षेत्र से अलग नहीं हो जाते और ध्वनि का कम्पन थोड़ा और तीव्र हो जाता तो उनके शरीर के कपड़े भी जलने लगते।
श्रवणातीत ध्वनियों का अमुक स्तर अग्निकाण्ड उत्पन्न कर सकता है। यह एक प्रयोग है। उसे अन्य प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है। मन्त्र साधना में वाणी से ही सारा कार्य पूरा नहीं कर लिया जाता वरन् भीतरी अवयवों में से प्रत्येक द्वारा एक विशिष्ट ध्वनि प्रवाह उत्पन्न करना पड़ता है। उसकी क्षमता श्रवणातीत ध्वनियों के स्तर की होती है। शरीर के अवयवों से ध्वनि तरंगें निकलती हैं यह तथ्य वैज्ञानिक प्रयोगशाला में प्रमाणित हो चुका है।
न्यूजर्सी की टेलीफोन प्रयोगशाला में एक कमरा इस तरह बनाया गया कि उसमें कोई बाहरी आवाज तनिक भी प्रवेश न कर सके। इसमें प्रवेश करने पर कुछ ही समय में मनुष्य को सीटी बजने, रेल चलने, झरने गिरने, आग जलने, पानी बरसने के समय होने वाली आवाजों जैसी ध्वनियाँ सुनाई पड़ती थीं। इस प्रयोग को कितने ही मनुष्यों ने अनुभव किया, बात यह थी कि शरीर के भीतर जो विविध क्रिया-कलाप होते रहते हैं उनसे ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। वे इतनी हलकी होती हैं कि बाहर होते रहने वाले ध्वनि प्रवाह में वे एक प्रकार से खो जाती है। नक्कारखाने में तूती की आवाज की तरह यह भीतरी अवयवों की ध्वनियाँ कानों तक नहीं पहुँच पाती, पहुँचती है तो वायुमण्डल में चल रहे शब्द कम्पनों की तुलना में अपनी लघुता के कारण उनका स्वल्प अस्तित्व अनुभव न होता हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं, पर जब बाहर की आवाज रोक दी गई और केवल भीतर की ध्वनियों को मुखरित होने का अवसर मिला तो वे इतनी स्पष्ट सुनाई देने लगीं मानो वे अंग अपनी गतिविधियों की सूचना चिल्ला-चिल्लाकर दे रहे हों। कान जैसा कोई इलेक्ट्रानिक मनुष्य द्वारा बन सकना सम्भव नहीं। क्योंकि कान में ऐसी सम्वेदनशील झिल्ली लगाई गई है जिसकी मोटाई एक इंच का 2500 बिलियन (एक बिलियन बराबर दस लाख) है। इतनी हलकी साथ ही इतनी सम्वेदनशील ध्वनि ग्राहक वस्तु बन सकना मानवीय कर्तृत्व से बाहर की बात है। सुनने के प्रयोजन में कान लगभग 4 लाख प्रकार की आवाज पहचान सकते हैं और उनके भेद-प्रभेद का परिचय पा सकते हैं। सौ वाद्य यन्त्रों के समन्वय से बजने वाला आर्केस्ट्रा सुनकर उनसे निकलने वाली ध्वनियों का विश्लेषण प्रस्तुत करने वाले कान कितने ही संगीतज्ञों के देखे गये हैं। शतावधानी लोग सौ शब्द श्रृंखलाओं के क्रमबद्ध रूप से सुनने और उन्हें मस्तिष्क में धारण कर सकने में समर्थ होते हैं। कहते हैं कि पृथ्वीराज चौहान ने घन्टे पर पड़ी हुई चोट को सुनकर उसकी दूरी की सही स्थिति विदित कर ली थी।
योग-पद्धति में मन्त्र के उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि को शब्द शक्ति ही विद्युत प्रदान करती है जबकि मानवीय इच्छा शक्ति उस पर नियन्त्रण करके कोई भी कार्य कर सकने में समर्थ होती है। जप और ध्यान, नाद (शब्द या ध्वनि कम्पन) और बिन्दु साधना का सम्मिलित रूप है उससे सृष्टि के विराट् और अणु से अणु कण का भेदन भी सम्भव हो जाता है।
अब वायुयान, जलयान ही नहीं धरती के भीतर और ऊपर जो कुछ भी है उसे आँखों से देखने की जरूरत नहीं है वह सारी जानकारी ध्वनि कम्पनों के आधार पर ही जानी जा सकती है। पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, गर्मी इन सबको अब मात्र जड़ तत्व नहीं समझा जा रहा वरन् उनके साथ चलने वाले ध्वनि प्रवाहों की अभी तो हलचलें हो रही है। इतना ही जाना जा सकता है। यह शोध जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी वैसे ही वैसे हर तत्व एक बोलती बात करती ईकाई की तरह अपने इर्द-गिर्द छिपे रहस्यों का उद्घाटन करता दिखाई देगा।
घटनायें ध्वनि का रूप धारण करती हैं। ध्वनि और प्रकाश दो ऐसे आधार हैं जिनके आधार पर स्थूल को सूक्ष्म और सूक्ष्म को स्थूल में परिवर्तित किया जा रहा है। अन्तरिक्ष में विविध स्तर के ध्वनि कम्पन निरन्तर गतिशील रहते हैं यदि किसी को कर्णेन्द्रिय से अधिक उच्च स्तर की श्रवण शक्ति मिल जाय तो वह श्रवणातीत ध्वनियों को सुन समझ सकता है और भूत, तथा वर्तमान में घटित हुए दूरवर्ती अथवा समीपवर्ती घटनाओं को जान समझ सकता है। नादयोग के अभ्यासी इसी शक्ति को जगाते हैं और सूक्ष्म जगत में हो रही हलचलों के आधार पर भूत वर्तमान तथा भविष्य का वह ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं जो सर्व साधारण की पहुँच से बाहर होता है। ध्यान योग से यही प्रयोजन प्रकाश के रूप धारणाओं के माध्यम से पूरा किया जाता है।
जप के लिए जिह्वा से होने वाले शब्दोच्चारण को बैखरी वाणी कहते हैं। यह केवल जानकारी के आदान-प्रदान से प्रयुक्त होती है। इसे भाव सम्पन्न व्यक्ति ही बोलते हैं। जीभ और कान के माध्यम से नहीं वरन् हृदय से हृदय तक यह प्रवाह चलता है। भावनाशील व्यक्ति ही दूसरों की भावनायें उभार सकता है। यह बैखरी और मध्यमा वाणी मनुष्यों के बीच विचारों एवं भावों के बीच आदान-प्रदान का काम करती हैं।
इससे आगे दो और वाणियाँ हैं जिन्हें परा और पश्यन्ति कहते हैं। परा पिण्ड में और पश्यन्ति ब्रह्माण्ड क्षेत्र में काम करती है। आत्म-निर्माण का - अपने भीतर दबी हुई शक्तियों को उभारने का काम ‘परा’ करती है। ईश्वर से - देव शक्तियों से - समस्त विश्व से - लोक-लोकान्तरों से सम्बन्ध, सम्पर्क बनाने में पश्यन्ति वाणियों को दिव्य वाणी एवं देव वाणी कहा गया है। इस दिव्य वाणी को ‘वाक’ कहते हैं। ‘वाक’ शक्ति उत्पन्न करने वाले और उसके साथ मन्त्र साधना करने वाले साधक अपने लक्ष्य में सफल होकर ही रहते हैं।
बैखरी वाणी जब मन्त्र साधन द्वारा सूक्ष्म होती चलती है और ‘वाक’ बनती है तो तीनों लोकों पर उसका अधिकार होता चला जाता है। लोक लोकान्तर में जो कुछ विद्यमान है उससे सम्बन्धित होती है- प्रभावित करती, नियन्त्रण रखती है और संचालन करती है परिष्कृत परावाक्। जिह्वा से उच्चारित बकवास में प्रयुक्त होती रहने वाली प्रक्रिया जब उलट कर मंत्र साधना में लगती है तब वह शक्ति रूप होती है। शक्ति भी ऐसी जिसकी परिधि में वह सब कुछ आ जाता है जिसे अद्भुत एवं महान कह सकते हैं।
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आधुनिक मनोविज्ञान के जन्मदाता कहे जाने वाले फ्रायड ने मनुष्य की प्रत्येक क्रिया और इच्छा में यौन-भावना का आरोपण किया है। उन्हें माँ और बेटे के सम्बन्ध में भी यौनेच्छा का ही नर्तन दिखाई दिया। यही नहीं किसी भी प्रकार के स्वप्नों को उन्होंने यौन भावना का प्रतीक कहा और यह सिद्ध करने की चेष्टा की कि अतृप्त यौनाकाँक्षा किसी भी रूप में भले ही वह स्वप्न ही हो अपनी पूर्ति कर लेती है। फ्राइड प्रणीत मनोविज्ञान के प्रतिनिध ग्रन्थ ‘ए जनरल इन्ट्रोडक्शन टू साइको एनैलिसिस’ में उन्होंने ऐसे कई स्वप्नों का विवरण कर अपना सिद्धांत प्रतिपादित करने की खींच-तान की है। एक स्वप्न विवरण इस प्रकार है- “स्वप्नद्रष्टा यात्रा करने वाला था और उसका सामान एक गाड़ी में स्टेशन से लाया जा रहा था। उसमें एक दूसरे पर बहुत से सन्दूक लदे हुए थे और उनमें दो बड़े काले सन्दूक थे। उसने पहले दिलासा देते हुए किसी से कहा, “ देखो, वे सिर्फ स्टेशन तक जा रहे हैं।”
यह स्वप्न विशेष अर्थ के लिये नहीं दिखता, पर फ्रायड ने अपनी उक्त पुस्तक में इस स्वप्न की जो व्याख्या की है वह अदृष्टव्य है- “दो काले सन्दूक दो काली स्त्रियों के प्रतीक हैं।” फ्राइड के अनुयायी ही नहीं आधुनिक मनोविज्ञान के कई पण्डित भी स्वप्नों को अतृप्त वासना की प्रतीकात्मक तृप्ति ही बतलाते हैं।
भारतीय शास्त्र ग्रन्थ स्वप्नों के सम्बन्ध में जिस धारणा का प्रतिपादन करते हैं वह अतृप्त आकाँक्षाओं की पूर्ति के साथ अतीन्द्रिय शक्तियों के स्पन्दन, स्फुरण को भी पुष्ट करती है। पुराण ग्रन्थों में स्वप्नों को भविष्य दर्शन की भाषा कहकर कई स्थानों पर उनकी विशिष्ट व्याख्या की गई है। इस प्रकार की घटनाओं के कई विवरण भी मिलते हैं, जो स्वप्नों में प्रकट हुई अतीन्द्रिय चेतना का सिद्धांत पुष्ट करते हैं। भारत ही नहीं विदेशी इतिहासों में भी इस प्रकार की घटनाओं के विवरण मिलते हैं। ढाई हजार साल पहले मिश्र के राजा फैराओं ने एक अद्भुत स्वप्न देखा था जिसकी व्याख्या करते हुए एक यहूदी बन्दी ने सात वर्ष बाद मिश्र में एक भीषण अकाल पड़ने की भविष्यवाणी कर दी। क्लियोपैट्रा के प्रेमी सीजर और हैनरी तृतीय को अपनी हत्या का पूर्वाभास स्वप्न द्वारा ही हो गया था।
इन्हें पुरानी घटनायें कहकर गप्प भी माना जाता है। परन्तु इसी शताब्दी में स्वप्नों में अतीन्द्रिय चेतना के अनुभव के सैकड़ों प्रमाण मिले हैं जिनकी फ्रायडवादी कोई संगति नहीं बिठा पाये हैं। स्वप्नों में होने वाले भविष्य दर्शन के प्रति भारत ही नहीं विदेशों में भी कई लोग विश्वास करते हैं। कई बार तो सपने इतने आश्चर्यजनक रूप सत्य सिद्ध हुए कि सुनने वालों के साथ-साथ स्वप्न दृष्टा को भी हतप्रभ रह जाना पड़ा। अमेरिका की प्रसिद्ध रेडरीक सोने की खान का पता विनफील्ड स्कौट स्ट्रेटन को स्वप्न द्वारा लगा ही था। जब वे बेहद आर्थिक तंगी में थे तो एक रात उन्होंने सपना देखा कि बैटिल पर्वत के रेडरौक क्षेत्र में सोने की खुदाई हो रही है। पहली बार तो स्ट्रेटन ने कोई गौर नहीं किया पर बार-बार जब वह सपना दिखाई देने लगा तो उन्होंने अपने एक मित्र से चर्चा की । मित्र ने आरम्भ में हंसी उड़ाई, पर स्ट्रेटन को उस स्वप्न का इतना विश्वास हो गया था कि वे जबर्दस्ती अपने मित्र को वहाँ खींच कर ले गये तथा खुदाई करने लगे। कुछ ही गहरा खोदने पर उन्हें सोने का एक टुकड़ा दिखाई दिया। मित्र को अब विश्वास हो गया। उस सोने के टुकड़े को बेचकर दोनों ने वह जमीन खरीद ली और खुदाई द्वारा प्राप्त सोने से अरब पति हो गये।
स्वप्नों के माध्यम से सम्भावित खतरों का आभास भी हो जाता है। यदि उन्हें समझने की क्षमता हो तो सचमुच यह संयोग एक वरदान बन सकता है। लिंकन की हत्या का सपना उनकी पत्नी ने एक दिन पहले ही देखा था। इसी प्रकार फ्रांस के एक प्रोफेसर चार्ल्स लंदन में अपने मित्र के यहाँ कुछ दिनों के लिए ठहरे। एक रात उन्होंने स्वप्न देखा कि उनके मित्र की हत्या कर दी है। स्वप्न इतना स्पष्ट और प्रभावशाली था कि उन्होंने स्वप्न के हत्यारे का हुलिया भी हूबहू याद रहा। सुबह चार्ल्स ने अपने मित्र को इस स्वप्न के सम्बन्ध में बताया और उस व्यक्ति का हुलिया भी। हुलिया मित्र के माली से एकदम मिलता था जो दस वर्ष से उनके यहाँ नौकरी कर रहा था। चार्ल्स ने माली को निकाल देने की सिफारिश की उस समय तो उसे नहीं हटाया पर जब विदा हुए तो उसे हटाना पड़ा क्योंकि एक रात सचमुच उसने अपने मालिक पर शयन कक्ष में उसी प्रकार हमला बोल दिया जिस प्रकार का स्वप्न कि चार्ल्स ने देखा था।
अपने प्रिय परिजनों के लिए ही नहीं स्वयं के लिए भी सम्भावित खतरों का आभास स्वप्नों के माध्यम से मिलता देखा गया है। फरवरी 53 में एक रात कार्लीमेपल्स ने सपना देखा कि वह अगले दिन किसी दुर्घटना का शिकार हो गया है। इन सब बातों को ढकोसला मानने के कारण उसने कोई ध्यान नहीं दिया पर, सचमुच अगले दिन वह मोटर साइकिल समेत सड़क की रफ्ट पर फिसल गया, इस दुर्घटना में उसे प्राणान्तक चोटें आयीं।
ब्रिटेन की एक महिला ट्रटिन ने बार-बार यह सपना देखा कि कोई अजनबी उसके घर में घुस आया है और चीजों को उलट-पलट रहा है। ट्रटिन के सामने पड़ जाने पर उसे डरा-धमका कर अजनबी एक मोटी रकम माँगता है जिसे वह देने से इन्कार करती है। इस पर अजनबी उसे गोली मार देता है। कई रात तक यह सपना देखने के बाद उसे न जाने क्यों सपने की सच्चाई पर विश्वास हो गया और पुलिस से मदद माँगी। सपने के आधार पर पुलिस सहायता देने को तैयार नहीं हुई तो ट्रटिन ने अपनी निजी व्यवस्थायें कर ली और सम्भावित खतरे का मुकाबला करने की पूर्ण तैयारियाँ भी । एक दिन जब वह अपने मकान में अकेली थी पास वाले कमरे में किसी के चलने-फिरने की आहट सुनाई दी। चुपके से ट्रटिन ने झाँका, आगंतुक अजनबी था और कुछ तलाश कर रहा था। उसका हुलिया भी सपने में दिखाई देने वाले अजनबी की तरह था बस, ट्रटिन ने हल्ला-गुल्ला मचाकर पड़ोसियों को इकट्ठा कर लिया। सचमुच उसके पास एक रिवाल्वर भी मिला।
किन्हीं विशिष्ट व्यक्तियों के सम्बन्ध में भी स्वप्नों द्वारा पूर्व संकेत मिलने के उदाहरण सामने आये हैं। जिन व्यक्तियों के प्रति हम अपने हृदय में आन्तरिक सम्मान रखते हैं उनमें एक सूक्ष्म आत्मिक सम्बन्ध भी बन जाता है, भले ही उनके लिये हम अपरिचित हों। इंग्लैण्ड के एक सामान्य नागरिक जान विलियम्स को तत्कालीन वित्तमन्त्री पर्सीबल के प्रति इसी स्तर की आत्मिक घनिष्ठता थी। एक बार जॉन ने स्वप्न में देखा कि पार्लियामेण्ट में कुछ लोग पर्सीवल की हत्या कर रहे हैं। यह भी कि पर्सीवल सफेद ड्रेस में है और उनकी हत्या करने वालों का हुलिया भी अच्छी तरह दिखाई देता है।
इस सपने का उल्लेख जॉन ने पार्लियामेन्ट के कुछ सदस्यों से किया। सुरक्षा अधिकारियों को भी इस सम्बन्ध में बताया, पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। लेकिन कुछ ही दिनों बाद पार्लियामेन्ट भवन में ही पर्सीवल की हत्या कर दी गयी। पर्सीवल ने उस समय सफेद रंग के कपड़े पहन रखे थे। इतना ही नहीं जब हत्यारों को गिरफ्तार किया तो जॉन ने बताया कि इन्हीं लोगों को वह स्वप्न में हत्या करते देखता रहा है। बाद में जॉन को स्वप्न के आधार पर हत्या का गवाह भी बनाया गया।
यह जानकर तो आश्चर्य होता है कि स्वप्नों के आधार पर अपराधियों की धरपकड़ भी की गयी है। रोम में की गयी एक हत्या का सुराग मृतक की पत्नी द्वारा देखे गये सपने के आधार पर मिला। बताया जाता है कि मृतक की पत्नी एमीलिया ने ही सर्वप्रथम पुलिस को यह सूचना दी कि उसके पति की हत्या की गयी है- जबकि उसे पति रूसो का शव एक दुर्घटनाग्रस्त क्षत-विक्षत कार में पाया गया था जिसके सम्बन्ध में यह मान लिया गया था कि रूसो की मृत्यु कार दुर्घटना के कारण हुई जब पोस्टमार्टम हुआ तो पता चला कि मृत्यु कार दुर्घटना से पहले ही हो चुकी है और मृत्यु का कारण दुर्घटना नहीं एक तीव्र जहर है जो शराब में मिलाकर पिलाया गया है।
एमीलिया ने स्वप्न में अपने पति का शव देखा था और उस पर बैठी हुई एक स्त्री भी जिसने हत्या की थी। इस स्त्री के सम्बन्ध में एमीलिया तो कुछ भी नहीं जानती पर वह उसके पति को फाँसने वाली एक चालाक औरत थी, जिसने एक लम्बी रकम ऐंठने के बाद रूसो की हत्या कर दी थी। लिसा और उसके सहयोगी भारि को गिरफ्तार कर लिया गया जिन्होंने अपना अपराध कबूल कर लिया। एमीलिया ने लिसा को देखते ही पहचान लिया और कहा यही है वह औरत जिसे मैंने स्वप्न में अपने पति के शव पर बैठा देखा है। मैं इस रात वाली इसकी कुटिल मुस्कान को तो जिन्दगी भर नहीं भूल सकूँगी।
लिसा के सहयोगी भारि ने एक विस्मय जनक बात कही कि जब वह और लिसा रूसो की लाश को खोह में छोड़कर बाहर आ रहे थे, तो उन्हें लगा था कि खोह में उन दोनों के अलावा कोई तीसरा व्यक्ति भी मौजूद है यह अनुभूति बहुत तीव्र थी मैंने लिसा को बार-बार बताया भी कि कोई हमारा पीछा कर रहा है। इस घटना में प्रेम सम्बन्धों की प्रगाढ़ता से व्यक्तियों के घनिष्ठ और सूक्ष्म आन्तरिक सम्पर्क सूत्रों की प्रतीती होती है, जिसे भारतीय ऋषियों ने हजारों वर्ष पूर्व सिद्ध कर दिखाया है।
अब इस प्रश्न का उत्तर आसानी से खोजा जा सकता है कि स्वप्न क्या केवल यौनेच्छाओं की प्रतीकात्मक तृप्ति का साधन है या और कुछ ? यह तो ठीक है कि व्यक्ति अतृप्त आकाँक्षाओं की पूर्ति स्वप्नों के माध्यम से भी करता है, पर उसमें केवल यौन जीवन का ही सम्बन्ध नहीं है। स्वप्नों के माध्यम से भविष्य के संकेत भी प्राप्त किये जा सकते हैं। इस विद्या में प्राचीन ऋषियों ने काफी प्रगति भी की है।
परन्तु यह नहीं कहा जा सकता है कि सभी स्वप्न अनागत के संकेत या पूर्व सूचक होते हैं। इस सम्बन्ध में जानकार व्यक्तियों का अभिमत है कि भविष्य की पूर्व सूचना देने वाले स्वप्न बहुत स्पष्ट, शृंखलाबद्ध और क्रमगत होते हैं। प्रायः हम सभी स्वप्न भूल जाया करते हैं, कुछेक दो-चार दिन तक याद भी रहते हैं, पर ऐसे स्वप्न पूरे व्यक्तित्व को झकझोर देने वाले, बहुत दिनों तक प्रभावित करने तथा आजीवन अविस्मरणीय रहते हैं। उपरोक्त घटनाओं से ये कुछ मोटे निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। अधिक गम्भीरता से तो साधना और प्रयोगों द्वारा ही समझा जा सकता है। सामान्य स्वप्नों के माध्यम से भविष्य को परखने की विद्या हमारे यहाँ स्वप्नों के शुभाशुभ निर्णय करने वाले विज्ञान के रूप में भी विकसित हुई है, पर उस सम्बन्ध में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता क्योंकि साहित्य और इतर सूत्रों द्वारा इस सम्बन्ध में जो भी जानकारियाँ उपलब्ध होती हैं वे तथ्यों पर आधारित हैं। लेकिन इतना निश्चित है कि जीवन में विविध दिशाओं से उस अविज्ञात तत्व का नियंत्रण मिलता रहता है जिसे चेतन कहते हैं। वह अपनी उपस्थिति का आभास किन्हीं न किन्हीं रूपों में कराता ही रहता है।
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प्रकृतिगत सम्पदाओं पर- सृष्टि के समस्त प्राणिओं पर आधिपत्य का दावा करने वाला इस सृष्टि में एक ही प्राणी है- मनुष्य। आदिम काल की इस ऊबड़-खाबड़ धरती को उसी ने आज की सर्वांग सुन्दर स्थिति तक लाने में अथक प्रयास किया है और सफलता पाई है। विज्ञान, व्यवसाय, शासन, संगठन, कृषि, पशु-पालन, शिल्प, शिक्षा कला, चिकित्सा आदि अनेक क्षेत्रों में मनुष्य द्वारा की गई प्रगति का इतिहास देखने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता और लगता है मानवी शक्ति का अन्त नहीं । शक्ति का सुनियोजित स्वरूप जहाँ कहीं दिखाई पड़ता है वह मनुष्य की कल्पना शक्ति एवं सृजन शक्ति का ही चमत्कार है। अपनी इन्हीं मौलिक विशेषताओं के कारण मानव प्राणी सृष्टि का मुकुट मणि बना है। देखने में मनुष्य की शारीरिक, मानसिक क्षमता स्वल्प भले ही प्रतीत होती है, पर जब उसकी प्रखरता देखते हैं तो यही मानना पड़ता है कि सर्व शक्तिमान परमात्मा के लगभग समकक्ष ही उसके पुत्र आत्मा की स्थिति है।
शक्ति के भले-बुरे दोनों ही उपयोग हैं। माचिस की तीली ठण्ड दूर करने, भोजन पकाने, उद्योग चलाने, प्रकाश देने जैसे अनेक उपयोगी कामों की भूमिका बना सकती है, पर उसी का अवाँछनीय उपयोग करें तो वह किसी सघन प्रदेश को दावानल बनकर भस्म सात कर सकती है, उससे गृह नगर, भण्डार, कारखानों में सन्निहित करोड़ों अरबों की पूँजी देखते-देखते स्वाहा हो सकती है। बिजली से कितने उपयोगी काम चलते हैं और वह हमारे दैनिक जीवन में कितनी अधिक सहायक होती है किन्तु यदि उसके खुले तारों को सैकिण्ड भर के लिए स्पर्श कर लिया जाय तो प्राण संकट उत्पन्न होने में देर न लगेगी। इसलिए आग, बिजली आदि को मर्यादाओं में बाँधकर रखा जाता है और उनका उपयोग अति सतर्कतापूर्वक किया जाता है अन्यथा इन उपयोगी शक्तियों के अमर्यादित होने पर उत्पन्न संकट की विभीषिकाओं का पारावार न रहेगा।
मनुष्य इस संसार की सर्वोच्च शक्ति है। उसकी रचनात्मक शक्ति पर जब विचार करते हैं, तो लगता है नैपोलियन की वह उक्ति बहुत अंशों में सार्थक है जिसमें वह कहा करता था कि- “असंभव शब्द मूर्खों के कोश में रहने योग्य है।” जब मनुष्य अपनी क्रिया शक्ति, ज्ञान शक्ति और इच्छा शक्ति को सुविकसित करके उपयुक्त प्रयोजन में समय तत्परता के साथ लगा देता है तो सचमुच ऐसी ही स्थिति बन जाती है जिसमें असम्भव को सम्भव बनाया जा सके। महर्षि व्यास की यह उक्ति अक्षरशः सत्य है कि- ‘मनुष्य से बढ़कर श्रेष्ठ इस विश्व में और कुछ नहीं है।’ इतने पर भी यह तथ्य जहाँ का तहाँ बना रहेगा कि यदि वह कुमार्ग पर चल पड़े तो फिर विनाशकारी दुष्परिणामों का भी अन्त नहीं। अस्तु यह आवश्यक समझा गया कि बिजली एवं आग की तरह उसे भी मर्यादित रखा जाय। कहना न होगा कि यह मर्यादाएं उसकी अन्तरात्मा द्वारा स्वेच्छया स्वीकृत होनी चाहिए। यों सामाजिक भर्त्सना एवं शासकीय दण्ड विधान भी उच्छृंखलता को एक सीमा तक, रोकने में सहायक होता है, पर वास्तविक नियन्त्रण तो स्वेच्छया स्वीकृति से ही सम्भव है। मनुष्य की चतुरता बाहरी प्रतिबन्धों को निरस्त करने में अनेकानेक तरकीबें ढूँढ़ लेती है और अपराधी लोग निर्भयतापूर्वक अपना धन्धा चलाते रहते हैं। विश्रृंखलित समाज में भी विरोध असहयोग एवं संघर्ष की उतनी क्षमता नहीं रही कि वह अवाँछनीयताओं को कठोरता पूर्वक रोक सके। मानवी सत्ता को उच्छृंखल न होने देने और सत्प्रयोजन में ही संलग्न रहने के लिए बाध्य करने वाली एक मर्यादा व्यवस्था तत्वदर्शी महामनीषियों ने बनाई है जिसे आचार संहिता, धर्माचरण, मर्यादा पालन, कर्त्तव्य-निष्ठा आदि नामों से जाना जाता है। वस्तुतः व्यक्ति और समाज को विनाश के गर्त में गिरने से बचाते हुए सर्वतोमुखी प्रगति के मार्ग पर अग्रसर करने वाली धुरी यही है। इसे विश्व शांति की रीढ़ भी कहा जा सकता है।
आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक मनुष्य को उसका जीवन दर्शन समझाया जाय और उसे औचित्य की मर्यादाएँ निवाहने के लिए कर्त्तव्य-पालन के प्रति निष्ठावान बनाया जाय। धार्मिकता, आध्यात्मिक एवं आध्यात्मिकता का सुविस्तृत तत्वज्ञान विशाल कलेवर के साथ इसलिए सृजा गया है कि मानवी चिन्तन की महत्व-पूर्ण धाराओं को कर्त्तव्य-निष्ठा के साथ सुनियोजित कर दिया जाय।
व्यक्ति अपनी शारीरिक, मानसिक, सम्पर्क जन्य तथा सम्पत्तिपरक सारी क्षमताओं को सदुद्देश्य में ही संलग्न रखे, उन्हें कुमार्गगामी न होने दे। इसी कर्तव्यनिष्ठा को गहराई तक अन्तःकरण में प्रतिष्ठापित करने के लिए स्वाध्याय, सत्संग, एवं धर्मकृत्यों का विशालकाय ढाँचा खड़ा किया है। धर्म कलेवर का प्राण तत्व ढूंढ़ना हो तो कर्त्तव्य-पालन ही मिलेगा।
कठपुतली के हाथ, पैर, कमर, गर्दन आदि कई स्थानों में धागे बँधे होते हैं, बाजीगर उन्हें अपनी उँगलियों में बाँधकर हिलाता-ढुलाता है और मजेदार तमाशा आरम्भ हो जाता है। बिना धागे की कठपुतली हाथ से पकड़ कर हिलाई, उछाली तो जा सकती है, पर उससे मजेदार तमाशे का आनन्द नहीं मिल सकता। मनुष्य जीवन की गरिमा तथा सफलता इसी कसौटी पर कसी जाती है कि उसने कर्त्तव्य पालन में कितनी निष्ठा रखी और मर्यादाओं का पालन कितने कठोर अनुशासन के साथ निवाहा। यही वे धागे हैं जो जीवन को निखारते, उभारते हैं। कठपुतली का नाच अधिक धागों के बन्धनों से बाजीगर की कला कौशल से शानदार बनता है। मनुष्य जीवन की प्रशंसा प्रतिष्ठा का आधार एक ही है कि मर्यादाओं के धागे कितने अधिक और कितने मजबूत रखे गये तथा उनका सुसंचालन किस मनोयोग के साथ किया गया। जिसने इन मर्यादाओं की कितनी उपेक्षा की- जो कर्त्तव्य-पालन की कितनी अवज्ञा करता रहा वह उतना ही निन्दनीय बना-उतना ही घृणित बना-उतना ही अप्रामाणिक माना गया और उतना ही असफल रहा है।
मनुष्यता और कर्त्तव्य-पालन दोनों एक ही तथ्य के दो नाम हैं। संस्कृति एवं सभ्यता के दोनों पहिये इसी धुरी के साथ सटे हुए हैं। नर-पशु वे हैं जिनके लिए अपनी आवश्यकताएँ किसी भी प्रकार पूरी करने में संकोच नहीं, जो उचित-अनुचित के झंझट में नहीं पड़ते और जैसे भी बने वैसे अपना उल्लू सीधा करते हैं। पशु प्रवृत्ति यही है। पशुओं को अपने-विराने का-नीति-अनीति का भेद नहीं होता। वे किसी का भी खेत चर सकते हैं। यह हमारा नहीं है-हमारे लिए नहीं है, यह सोचने की उनमें क्षमता नहीं होती। दूसरे को वस्तु का उपभोग करने की अनधिकार चेष्टा नहीं करनी चाहिए यह उन्हें नहीं मालूम इसलिए जहाँ भरी हरियाली दीखती है वहाँ जा पहुँचते हैं और उस अतिक्रमण के कारण डंडे खाते हैं। पशुओं को नियत समय पर नियत उत्तरदायित्व निभाने की प्रवृत्ति नहीं होती। वे स्वेच्छा से नहीं बलात् कराये जाने पर ही काम करते हैं। पत्नी पुत्री का भेद भी वे नहीं करते। कोई किसी से भी कामुकता की शान्ति कर लेता है। मनुष्य और पशु में यही अन्तर है कि वह उचित-अनुचित का भेद समझता है- मर्यादाओं का पालन करता है और उत्तरदायित्वों को निवाहता है। जो ऐसा नहीं करता उसे नर-पशु कहते हैं। मानवी गरिमा कठोर कर्त्तव्यों के साथ जुड़ी जकड़ी है। जो इसे नहीं जानता, मानता, नीति-अनीति बरतने में सोच विचार नहीं करता, जिसे उच्छृंखलता बरतने में लज्जा, संकोच का अनुभव नहीं होता समझना चाहिए कि उसकी आकृति मनुष्य जैसी भले ही हो प्रकृतितः वह पशु वर्ग में ही गिना जाने योग्य है।
मनुष्य अनेक क्षेत्रों में कठोर कर्त्तव्यों से बँधा है उसे अपने सभी उत्तरदायित्वों का निर्वाह करना चाहिए। शरीर किराये का मकान है बिना तोड़-फोड़ किये उसका उपयोग करना चाहिए अन्यथा उसके मालिक परमेश्वर का कोपभाजन बनना पड़ेगा और दण्ड में रोगों की व्यथा पीड़ा सहनी पड़ेगी। आहार-विहार में पूर्ण सतर्कता और सात्विकता बरतने की नीति अपनाये रखी जाय तो समझना चाहिए कि शरीर पर तो अधिकार मिला था उसके साथ जुड़े हुए कर्त्तव्य को भी निभा दिया गया। स्मरण रखना चाहिए केवल अधिकार और उसका उपभोग करने की बात ही नहीं सोचनी चाहिए वरन् कर्त्तव्य पालन को भी अधिकार का अविच्छिन्न सहचर मानकर चलना चाहिए। दोनों में से एक को प्रधान और दूसरे को गौण मानना हो तो कर्त्तव्य प्रथम और अधिकार द्वितीय है।
संयमशीलता, नियमितता और श्रमनिष्ठा को अपनाये रहने पर ही आरोग्य सुरक्षित रह सकता है। अद्भुत कला-कौशल के साथ गढ़ा गया यह शरीर मिला है, पर उसे स्वस्थ सुरक्षित रखने का उत्तरदायित्व भी साथ ही लादा गया है। इसी प्रकार अद्भुत प्रतिभाओं से भरा-पूरा मस्तिष्क देकर ईश्वर ने यह भी अपेक्षा की है कि उसे अवाँछनीय चिन्तन द्वारा विकृत नहीं किया जायगा- विद्याध्ययन, स्वाध्याय, सत्संग, चिन्तन, मनन जैसे माध्यम अपनाकर उसकी क्षमता को निरन्तर प्रखर बनाया जायगा। यह पोषण मिलते रहने पर मस्तिष्क की भूख बुझती रहेगी और उसे अधिक विकसित परिष्कृत होने का अवसर मिलता रहेगा। यदि इस ओर ध्यान न दिया जाय, प्रमादग्रस्त रहा जाय, मूढ़ मान्यताओं में जकड़े रखा जाय तो समझना चाहिए कि विलक्षण मनः शक्ति देने के साथ-साथ सन्निहित ईश्वरीय प्रयोजन को नष्ट कर दिया गया।
परिवार में स्त्री, पुत्र, भाई, बहिन, माता, पिता आदि होते हैं इन सभी के साथ अपने-अपने ढंग स्तर के कर्त्तव्य होते हैं और उन सभी का सन्तुलित पालन करना होता है। उपार्जित धन का, समय का, स्नेह का लाभ घर के सभी सदस्यों को उनकी आवश्यकतानुसार उचित मात्रा में मिलना चाहिए। न किसी के साथ पक्षपात हो न किसी की उपेक्षा की जाय, ऐसी न नीति अपनाने वाले परिवारों में स्नेह, सौजन्य स्थिर रहता है। जहाँ दुरंगी नीति चलेगी वहाँ भीतर ही भीतर विद्वेष पनपेगा और बिखराव उत्पन्न होगा। जिन्हें अपने परिवार को सौजन्य सूत्र में बाँधकर रखना है वे स्वयं अपनी कर्त्तव्य-निष्ठा में अन्तर नहीं आने देते और अन्य सभी सदस्यों को यही नीति अपनाने का मार्ग-दर्शन करते हैं। पक्षपात के लिए स्त्री पुत्र होने के नाते यदि किसी का दबाव पड़ता है तो उसे स्नेह, सौजन्य के साथ सारी ऊँच-नीच समझाते हैं, फिर भी यदि आग्रह बना ही रहे तो नाराजगी सहना स्वीकार करते हैं, पर अनीति अपनाने के लिए सहमत नहीं होते। प्रियजनों के सन्तोष और आग्रह के लिए उदार होना उचित है, पर वह इस सीमा तक नहीं होना चाहिए कि दूसरों के उचित अधिकारों का हनन करते हुए उसे पूरा करना पड़े।
देश, धर्म, समाज, संस्कृति के प्रति आत्मा और परमात्मा के प्रति भी प्रत्येक व्यक्ति कर्त्तव्यों की पवित्र शृंखला में बँधा हुआ है। मात्र शरीर पोषण, मनोविनोद और परिवार पालन का ही ध्यान रखा जाय, इतने भर के लिए ही सारी जीवन सम्पदा निचोड़ दी जाय तो यह संकीर्णता निन्दनीय ठहराई जायगी और स्वार्थपरता कही जायगी। कर्त्तव्य का दायरा जितने छोटे क्षेत्र तक सीमित कर लिया जाय उसी अनुपात से मनुष्य की क्षुद्रता नापी जायगी। उदात्त महामानव वे होते हैं जिनकी आत्मीयता का विस्तार अधिकाधिक व्यापक क्षेत्र में बिखरा होता है, जो दूसरों का दुःख देखकर अपने ऊपर आने वाले दुःख की तरह दुःखी होते हैं और उसके निवारण का वैसा ही प्रयत्न करते हैं जैसा अपने ऊपर विपत्ति आने पर किया जा सकता है। उदार व्यक्ति अपनी कमाई को बाँटकर खाते हैं। कोई मिठाई आदि बाहर से लाते हैं तो घर में सब को देते हैं। ठीक इसी प्रकार अपनी सुख सम्पदा, विद्या, वैभव आदि का लाभ स्वयं ही उठाते रहने की अपेक्षा उनका जी सबको बाँटकर खाने का होता है। यह उदार आत्मीयता जितनी व्यापक होगी मनुष्य उतना ही महान माना जायगा। आत्मा एकाकी है, अकेला आता और अकेला चला जाता है। पर जब वह विभूति सम्पन्न होता है तो विकास की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए वह महात्मा, देवात्मा, परमात्मा बन जाता है। यह व्यक्तित्व के स्तर हैं जिनमें मनुष्य को अपने लाभ की-स्वार्थ की परिधि अधिकाधिक विस्तृत करते हुए देश, समाज, संस्कृति, मनुष्य प्राणिमात्र तक विस्तृत करते हुए देश, समाज, संस्कृति, मनुष्य प्राणिमात्र तक विस्तृत करनी पड़ती है। सब अपने लगते हैं तो सबके दुःख मिटाने और सुख बढ़ाने के लिए प्रबल प्रयत्न किये बिना चैन नहीं पड़ता। यह कर्त्तव्य-निष्ठा का विस्तार है। हमारी अन्तः चेतना जितनी विकसित होगी कर्त्तव्य पालन का उत्तरदायित्व उतना ही व्यापक बनता चला जायगा।
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कीट नाशक उपायों में अब तक एक ही कारगर उपाय सोचा जा सका है कि विषैले रासायनिक घोल छिड़ककर जहाँ भी ये कीड़े हों वहाँ ही उन्हें मार डाला जाय। डी0डी0टी0 प्रभृति औषधियों का प्रयोग इसी दृष्टि से अति उत्साह पूर्वक हुआ है, पर उससे भी कुछ हल निकला नहीं। एक तो इन कीड़ों की बढ़वार इतनी व्यापक होती है कि उन्हें मारने के लिए लगभग इतने ही मूल्य की दवाएँ चाहिए जितना कि फसल का मूल्य होता है। उन्हें हर कोई न तो खरीद सकता है और न उसका सही प्रयोग जानता है। अवाँछनीय मात्रा में असावधानी से उनका प्रयोग किया जाय तो पौधों के नष्ट होने, और उनके फल, बीज खाने वालों में विषाक्तता बढ़ जाने का खतरा स्पष्ट रहता है।
इन दवाओं के मन्द उपयोग का भी जो दुष्परिणाम सामने आया है उसने विचारशील वर्ग को चिन्ता में डाल दिया है। कीट नाशक औषधियाँ छिड़कीं तो उनका प्रभाव पौधों पर ही नहीं अन्न, शाक, फल आदि पर भी रहता है और वे पेट में पहुँचकर स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करते हैं। गोदामों में अन्न को सुरक्षित रखने के लिए जो रसायन छिड़के जाते हैं वे घूम फिर कर खाने वालों के पेट में पहुँचते हैं और वह मन्द विष भी कालान्तर में विघातक परिणाम उत्पन्न करता है। छिड़काव से प्रभावित अखाद्य बनने लगता है। इस प्रकार वह कीट नाशक रासायनिक उपचार कीड़ों को मारने में भले ही असफल रहे, पर मनुष्यों पर अपना प्रभाव जरूर डालता है।
रेकल कार्सन ने अपनी पुस्तक साइलेन्ट स्प्रिंग में अमेरिकी जनता की शारीरिक स्थिति की चर्चा करते हुए लिखा है कि यहाँ हर मनुष्य के शरीर में डी0डी0टी0 एवं आर्गेनो क्लोरीन समूह के विषैले रसायनों की मात्रा बढ़ती ही जा रही है। अभी यह परिमाण दस लाख पीछे 12 भाग है, पर यह क्रमशः बढ़ता ही जायगा और फिर विविध विधि स्वास्थ्य संकट उत्पन्न करेगा। कीट नाशक दवाएँ बनाने वाले कारखानों के कर्मचारियों में तो यह मात्रा 648 भाग तक पहुँच गई है। ब्रिटेन के स्वास्थ्य विज्ञानी का चिन्तन है कि कीट नाशक रासायनिक प्रभाव से मानवी आहार को किस प्रकार बचाया जाय। यह चिन्ता एक देश की नहीं वरन् समस्त विश्व की समस्या है।
यहाँ एक और भी विचित्र समस्या है कि यह कीड़े जल्दी ही विषाक्त घोलों से अपनी रक्षा कर सकने योग्य क्षमता अपने में विकसित कर लेते हैं और उनकी नई पीढ़ियाँ ऐसी ढीठ उत्पन्न होती हैं जिन पर इन रसायनों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वे इन छिड़कावों को अँगूठा दिखाते हुए अपना विनाश कार्य प्रसन्नता पूर्वक करते रहते हैं।
खाद्यान्न सुरक्षित रखने के लिए रेडिएशन-विकिरण का प्रयोग किया जा रहा है। रासायनिक खादों की भर-मार है उनके आधार पर खेतों में अधिक अन्न उपजाने की बातें सोची गई हैं। कीड़ों से खाद्य पदार्थों का बचाव करने के लिए डी0डी0टी0, क्लोरेडेन, डेलड्रिन, एनड्रिन सरीखी औषधियों के छिड़काव का प्रचलन बढ़ रहा है। खेतों में भी कृमि नाशक घोल छिड़के जा रहे हैं। इन से तात्कालिक समाधान मिलता है, पर दूरगामी परिणामों की उपेक्षा करते रहें तो फिर जिस मानव प्राणी के लिए यह खाद्य बढ़ाने और सुरक्षित रखे जाने का प्रयत्न हो रहा है वह इस योग्य ही न रह जायगा कि कुछ खा या पचा सके, तो आज की सफलता को असफलता के कम दुर्भाग्यपूर्ण न माना जायेगा।
प्रो0 रेकल कार्सन ने अपनी पुस्तक ‘साइलेण्ट स्प्रिंग’ में यह रहस्योद्घाटन किया है कि अमेरिकी नागरिकों के शरीरों में उनके भाग का दस लाखवाँ भाग उन विषाक्त रसायनों से भर गया है जो कीट नाशक के नाम पर अन्न, शाक, फल आदि पर छिड़की जाती हैं। दूसरे जानवर इन विषाक्त औषधियों से छिड़की हुई घास और हरियाली खाते हैं, उसके विषाक्त तत्व पशुओं के दूध एवं माँस से होकर मनुष्य शरीरों में जा पहुँचते हैं। दोनों ही तरीकों में छिड़की हुई औषधियाँ मनुष्यों के शरीरों में अपना स्थान बनाती और बढ़ाती चलती हैं। उसका दुष्परिणाम भले ही आरम्भ में कम या हल्का हो, पर जैसे-जैसे यह मात्रा बढ़ेगी, हानिकारक परिणाम भी बढ़ते ही चले जायेंगे।
यही स्थिति इंग्लैण्ड की भी है। वहाँ के स्वास्थ्य विभाग ने खाद्य पदार्थों के माध्यम से लोगों के शरीरों में बढ़ते हुए विषाक्त तत्वों की बढ़ोत्तरी के विरुद्ध चेतावनी दी है।
कीटाणु रसायन ऐसे हैं कि उन्हें जहाँ भी छिड़क दिया जाय वहाँ भयंकर महामारी फैलेगी और लोग इठ-अकड़ कर मौत के मुँह में चले जायेंगे। अन्न जल के भण्डारों में इन रसायनों को थोड़ा सा मिलाकर उसे सेवन करने वालों का प्राण हरण किया जा सकता है। हवा में भी यह कीटाणु उड़ाये जा सकते हैं और साँस लेने वाले उन संहारक विषाणुओं से आक्रान्त होकर बेतरह रोते कराहते मृत्यु के मुख में जा सकते हैं।
फसल को कीड़ों से बचाने के लिए प्रयोग किये जाने वाले विषाक्त रसायनों के प्रयोग वाली रीति-नीति ही शरीर में रोग कीटाणुओं को नष्ट करने वाली औषधियों के रूप में कार्यान्वित की जा रही है, उनका उत्पादन और प्रयोग भी अति उत्साहपूर्वक हो रहा है, पर इसके जो दूरगामी, परिणाम-सामने आते हैं उनसे निराशा ही होती है और यह सोचने के लिए विवश होना पड़ता है कि विष प्रयोग के साथ उससे संरक्षण का भी कोई दूसरा उपाय सोचना चाहिए।
झुरिक के ‘मेडीकल न्यूज’ में डॉ0 वार्वली का एक-लेख छपाया है जिसमें उन्होंने औषधि विज्ञान की इस असफलता को स्वीकार किया है कि उपयोगी और शक्ति-शाली औषधियाँ भी अब मनुष्य शरीरों पर अपना असर क्रमशः कम ही करती हैं, इसका कारण वायुमण्डल में जहरीले रसायनों का भर जाना और उसमें निरन्तर साँस लेते रहने वाले मनुष्यों की जीवनी शक्ति का मूर्छित हो जाना है। मृतकों पर दवा क्या काम करेगी? अर्ध मृतकों पर भी उसकी कोई सन्तोषजनक प्रक्रिया नहीं होती। आज का हँसता चलता आदमी भी जीवन शक्ति की कसौटी पर अर्ध मूर्छित, अर्ध मृतक और विषाक्त रसायनों का भण्डार बनता जाता है, ऐसी दशा में औषधियों का प्रभाव उसके शरीर पर स्वल्प ही दिखाई पड़े यह स्वाभाविक ही है। अब सशक्त औषधियों का आविष्कार और चिकित्सकों का निदान उपचार एक प्रकार अशक्त और असफल होता चला जा रहा है।
इन दिनों रासायनिक उत्पादन तेजी से हो रहा है, प्रत्यक्ष और तात्कालिक लाभ की तुलना में यह नहीं सोचा जा रहा है कि इस प्रयास में जो विषाक्तता उत्पन्न होगी उसका दूरगामी परिणाम क्या होगा ? सिगरेट उत्पाद को ही लें-उसे पीने वालों को मजा आता है और उत्पादकों को लाभ मिलता है सो ठीक है, पर सिगरेटों के धुँए से लगभग 250 प्रकार के ऐसे विषैले तत्व वायुमण्डल में भरते जाते हैं जिनसे समस्त प्राणियों के लिए जीवन संकट उत्पन्न होता है। विभिन्न प्रकार के रासायनिक उत्पादन प्रायः दस हजार प्रकार के विषाक्त तत्वों को हवा में भरते चले जा रहे हैं। इनकी निरन्तर अभिवृद्धि का आगामी परिणाम क्या होगा, यदि यह विचार किया जाय तो लगेगा कि यह मौत की फुलझड़ी का खेल-खेला जा रहा है।
ब्रिटेन की चिकित्सा पत्रिका ‘लेन्सैट’ ने एल0 डी0 नामक दवा के तात्कालिक लाभ के फेर में पड़कर स्वास्थ्य संतुलन को चौपट बना लेने वालों के रोमांचक विवरण छापे हैं। यह दवा कुछ समय पूर्व कम्पन रोग के लिए निकाली गई थी और अपने कार्य के लिए रामबाण समझी जाती है। जिनके हाथ, पैर या गर्दन काँपने लगते थे वे इसका सेवन करते ही जादू जैसा लाभ देखते थे फलतः उसे मरीजों ने बड़ी आतुरता और उत्सुकता के साथ सेवन किया। देखते-देखते उस दवा की चर्चा घर-घर पहुँच गई और निर्माता के दरिद्र पार हो गये।
एक समय की यह रामबाण दवा दूसरे समय में अभिशाप सिद्ध हुई और उसके निर्माण एवं प्रयोग पर प्रतिबन्ध लगा।
कीड़े फसल को नुकसान पहुँचाते हैं- कीड़े शरीर को नुकसान पहुँचाते हैं यह अक्षरशः सही है। पर साथ ही यह भी सही है कि उनके निवारण का उपाय इन्हें विष देकर मारना नहीं है। कीड़ों को अकेले ही नहीं मारा जा सकता उनके साथ साथ मनुष्य भी मरेगा ऐसी दशा में फसल की सुरक्षा और रोगों की निवृत्ति के नाम पर बरता गया अति उत्साह, हमें कीड़ों से होने वाली हानि से भी अधिक महंगा पड़ेगा।
विष प्रयोग के तात्कालिक चमत्कारी प्रभाव की जादुई बाल-क्रीड़ा में उलझे रहने से काम न चलेगा। हमें फसल के पौधों में और मानवी शरीरों में उस जीवनी शक्ति का अभिवर्धन करना पड़ेगा जिसके कारण कीटकों को न आक्रमण करने की हिम्मत पड़े और न बढ़ने, विकसित होने की।
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भारतीय तत्व ज्ञान में चेतना की तीन परतें बताई गई हैं। इन्हीं को तीन शरीर आवरण कहते हैं- स्थूल शरीर- रक्त-माँस की चलती फिरती काया। सूक्ष्म शरीर- मस्तिष्क में अवस्थित चेतन और अचेतन की दो परतों वाला मनः संस्थान। कारण शरीर- भाव सम्वेदनाओं, मान्यताओं एवं आस्थाओं का समुच्चय। उसका स्थान शरीर का मध्य केन्द्र- सूर्य चक्र दिव्य हृदय माना गया है। यह तीनों ही शरीर क्रमशः एक से एक अधिक सशक्त और प्रभावशाली हैं। भावनाओं का विचारणा पर और अविचारणा का क्रियाशीलता पर आधिपत्य है। इस प्रकार मनुष्य की सर्वोपरि सत्ता भाव चेतना ही ठहरती है। व्यक्तित्व का बीज स्वरूप यही है। इसी की प्रेरणा से मन, बुद्धि और चित्त को काम करना पड़ता है। शरीर का संचालन मन करता है, पर मन को दिशा अन्तरात्मा से मिलती है। इसी को तत्वदर्शियों ने ‘अहम्’ कहा है। अँग्रेजी में इसी को ‘ईगो’ कहते हैं।
‘अहम्’ को विकसित परिष्कृत करने की प्रक्रिया को ‘आत्म-साधना’ कहते हैं। उसमें भावनाओं के विकास को आगे रखना होता है। भावनाओं में सर्वोपरि है- प्रेम। इसी के इर्द गिर्द दिव्य सम्वेदनाओं का सारा परिकर जुड़ा होता है।
कर्मयोग को- शरीर की आचार-संहिता, ज्ञानयोग को चिन्तन की उत्कृष्टता कह सकते हैं। भक्तियोग द्वारा प्रेम सम्वेदना को विकसित किया जाता है। दया, करुणा, मैत्री, उदारता, सेवा, सज्जनता, सहृदयता आदि अन्तःकरण की दिव्य विशेषताएं प्रेम विस्तार के साथ-साथ परिपुष्ट होती हैं। अस्तु योग की तीन धाराओं में क्रमशः कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग की साधना प्रक्रिया अपनाई जाती है।
प्रेम मानवी अन्तरात्मा का रस है। यह जहाँ से उद्भूत होता है वहाँ ऐसी उल्लास भरी आनन्दानुभूति होती है जिसकी तुलना सांसारिक किसी पदार्थ से नहीं की जा सकती। उसे अलौकिक रस के - नाम से सम्बोधित किया जाता है। इस निर्झर का जल जो भी पीता है असीम तृप्ति अनुभव करता है प्रेमी अन्तःकरण अपने से सम्बद्ध व्यक्तियों को अतिशय बल प्रदान करता है। वातावरण को परिष्कृत कर सकना भी इस भक्ति भावना के विकास विस्तार से सम्भव हो जाता है।
अन्न शरीर का आहार है- ज्ञान मस्तिष्क का। अन्तरात्मा की भूख प्रेम से बुझती है। अन्तराल को पोषण उसी सघन आत्मीयता से मिलता है जिसे सामान्य व्यवहार में प्रेम और अध्यात्म की शब्दावली में ‘भक्ति’ कहते हैं। भक्ति के सम्वर्धन का अभ्यास ईश्वर उपासना के माध्यम से किया जाता है पर वह उतने तक ही सीमित नहीं रहता। व्यायामशाला में शरीर को परिपुष्ट बनाया जाता है पर उस पुष्ट शरीर का उपयोग व्यायामशाला तक सीमित न रहकर विभिन्न प्रयोजनों के लिए होता है। जिस तालाब में तैरना सीखते हैं उसी में आजीवन तैरा जाये अन्य कहीं उस कला का उपयोग न हो, ऐसा कहाँ होता है। ईश्वर भक्ति की साधना से परिष्कृत अन्तः चेतना को अपनी सघन आत्मीयता एवं सहृदयता का परिचय पग-पग पर देना होता है। इससे प्रेमी तो धन्य होता ही है- प्रेम पात्र को भी अति महत्वपूर्ण लाभ मिलता है। गंगा स्वयं तो पवित्र होती ही है उसमें स्नान करने वाले भी पवित्र बनने लगते हैं।
प्रेम मानवी अन्तरात्मा की भूख है। इसका नियमित अभ्यास करने के लिए ही मित्र, प्रियजनों का परिवार बसाया, बढ़ाया जाता है। प्रेम का आदान-प्रदान दोनों ही पक्षों के कारण शरीर को बल प्रदान करता है। जहाँ प्रेम का आदान-प्रदान न हो सका वहाँ भौतिक सुख-साधनों का बाहुल्य होते हुए भी किसी को तृप्ति न मिल सकेगी। इस अभाव के कारण अन्तः भूमिका का तृषित और मूर्छित ही बनी रहती है।
कई छोटे बच्चे ऐसे मिले जिनमें बाल्यकाल से ही विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों का विकास आयु के अनुपात से कई गुना अधिक था। न्यूयार्क (अमेरिका) के डॉक्टर रेनी स्पिट्ज ने उनकी पारिवारिक परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त की तो मालूम हुआ कि उनमें से 99 प्रतिशत ऐसे थे जिन्हें अपनी माँ का प्रेम नहीं मिला था। या तो उनकी माँ का देहावसान हो चुका था या सामाजिक परिस्थितियों ने उन्हें माँ से अलग कर दिया था।
इस प्रारम्भिक अन्वेषण ने डॉ0 रेनी स्पिट्ज में प्रेम भावना के वैज्ञानिक विश्लेषण की प्रेरणा भर दी। उन्होंने दो भिन्न सुविधाओं वाले संस्थानों की स्थापना की। एक में वह बच्चे रखे गये जिन्हें थोड़ी-थोड़ी देर में माँ का वात्सल्य और दुलार प्राप्त होता था। वे जब भी चाहें, जब भी माँ को पुकारें उन्हें अविलम्ब वह स्नेह सुलभ किया जाता था और दूसरी ओर वह बच्चे रखे गये जिनके लिए बढ़िया से बढ़िया भोजन, वस्त्र, आवास, चिकित्सा, क्रीड़ा के बहुमूल्य साधन उपस्थित किये गये, पर मातृप्रेम के स्थान पर उन्हें एक संरक्षिका भर मिली थी जो दस-दस बारह-बारह बालकों का नियन्त्रण करती थी। प्रेम और दुलार इतने बच्चों को वह भी कृत्रिम वहाँ अकेली नर्स कहाँ से दे पाती ? हाँ कभी -कभी झिड़कियाँ उन बच्चों को अवश्य पिला देती। उन बच्चों का यही था जीवन क्रम!
एक वर्ष बाद दोनों स्थानों के बच्चों का परीक्षण किया गया। उनकी कल्पना शक्ति की मनोवैज्ञानिक जाँच, शारीरिक विकास की माप, सामाजिकता के संस्कार, बुद्धि चातुर्य और स्मरण-शक्ति का परीक्षण किया गया।
जिस प्रकार दोनों की परिस्थितियों में पूर्ण विपरीतता थी परिणाम भी एक दूसरे से ठीक उलटे थे, जिन बच्चों को साधारण आहार दिया गया था- जिनके लिए खेलकूद, रहन-सहन के साधन भी उतने अच्छे नहीं दिये गये थे किन्तु माँ का प्रेम प्रचुर मात्रा में मिला था, पाया गया कि उन बच्चों की कल्पना शक्ति, स्मृति सामाजिक संबंधों के संस्कार, शारीरिक और बौद्धिक क्षमता का विकास 101.5 से बढ़कर एक वर्ष में 105 विकास दर बढ़ गया था। दूसरे संस्थान के बच्चों की, जिन्हें भौतिक सुख-सुविधाओं की तो भरमार थी पर प्यार के स्थान पर गहन शून्यता, विकास दर 124 से घटकर 72 रह गई थी। इन बच्चों को उसी अवस्था में एक वर्ष तक और रखा गया तो पाया कि वह औसत 72 से भी घटकर बहुत ही आश्चर्यजनक बिन्दु 42 तक उतर आया है।
पहली संस्था के बच्चों के शारीरिक विकास के साथ दीर्घ जीवन में भी वृद्धि हुई, क्योंकि देखा गया कि उस संस्थान में जो 236 बच्चे रखे गये थे, उनमें से इस दो वर्ष की अवधि में एक भी शिशु की मृत्यु नहीं हुई जबकि प्यार-विहीन बच्चों वाले संस्थान के 37 प्रतिशत शिशु काल के मुख में अकाल में ही समा गये।
डॉ0 फ्रीटस टालबोट एक बार जर्मनी गये। वहाँ उन्होंने ड्यूशेल्डोर्फ नगर का बच्चों का अस्पताल देखा। इस अस्पताल में उन्होंने एक वृद्ध स्त्री देखी जो देखने में आकर्षक भी नहीं थी किन्तु जितनी बार भी डॉ0 टालबोट ने इसे देखा उसकी मुखाकृति में एक विलक्षण शाँतिप्रद सौम्यता और मुस्कान उन्होंने देखी। हर समय उसकी बगल में कोई न कोई बच्चा दबा हुआ होता। टालबोट के मन में उस स्त्री को देखकर उसे जानने की अनायास जिज्ञासा उत्पन्न हो गई। उन्होंने अस्पताल के डाइरेक्टर से उस स्त्री का परिचय पूछा तो- डाइरेक्टर ने बताया वह तो अन्ना है श्रीमानजी! डाक्टरों की डॉक्टर। एक ही औषधि है उसके पास ‘प्रेम’ जिन बच्चों को हम असाध्य रोगी घोषित कर देते हैं, अन्ना उन्हें भी अच्छा कर देती है।
कवींस यूनिवर्सिटी, आन्टोरिया, (कनाडा) द्वारा “प्रेम का प्राणियों पर भौतिक प्रभाव” विषय पर एक नई खोज के परिणाम सामने आये हैं। इस विश्वविद्यालय के फार्माकोलौजी विभाग के प्राध्यापक डॉ0 एल्डन वायड ने बताया कि उनके विभाग की एक महिला कर्मचारी विभाग को संभालती है, उसे स्वभावतः चूहों से बहुत प्रेम है। वह उन्हें दुलार भरी दृष्टि से देखती है, उनकी सुविधाओं का ख्याल रखती है और यथा सम्भव अपने व्यवहार में प्रेम प्रदर्शन भी करती है। इसका प्रभाव चूहों पर आश्चर्यजनक हुआ है। महिला ने चूहों के नाम रख छोड़े हैं और वह जिसे पुकारती है वही आगे आता है। जैसे ही वह पिंजड़े के पास जाती है चूहे उसके पास इकट्ठे हो जाते हैं और एकटक देखते रहते हैं। जो भी वह खिलाती है खुशी-खुशी खा लेते हैं यद्यपि उनमें तरह तरह की औषधि मिली रहने से वह भोजन उनकी रुचि और प्रकृति के प्रतिकूल होता है कई बार कष्ट कर विधि से चूहों के शरीर में औषधियाँ पहुँचाई जाती हैं। अनुभव होने पर तो इसके लिए किसी चूहे को तैयार नहीं होना चाहिए, पर वह महिला जिस चूहे को चाहती है, खुशी - खुशी इस प्रयोग के लिए सहयोग देने के लिए तैयार कर लेती है।
श्रीमती डोरिस मुँडे- पचास वर्ष की वृद्धा शरीर से सामान्य व्यक्तियों की तरह साधारण, किन्तु असाधारण भावनाओं वाली श्रीमती डोरिस एटलस निकालकर देखती है वह स्थान किस देश, किस महाद्वीप में है। फिर ध्यान लगाकर बैठ जायेंगी और कुछ ही क्षणों में उनकी स्थिति समाधिस्थ योगी की सी हो जायेगी। शरीर कमरे में रखा हुआ होगा और भाव-शरीर उस सूखे वाले इलाके में। वह अपने हृदय की सम्पूर्ण एकाग्रता और तल्लीनता के साथ भावना करती है कि मेरी अजस्र प्राण शक्ति बादलों में घुल रही है। अब इन बादलों को लेकर मैं उस सूखे वाले क्षेत्र की ओर चल पड़ी। बादलों की क्या बिसात! जो मेरी आज्ञा न मानें, आगे-आगे मैं पीछे पीछे बादल। लो आ गया यह सूखा क्षेत्र। बादलों! यह देखो प्यासी धरती, प्यासे लोग, प्यासे जीव-जन्तु कितने दुखी हो रहे हैं संसार का सुख और शान्ति करुणा पर टिका है। हर सम्पन्न व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह अभावग्रस्त प्राणियों के उत्थान और उद्धार के लिए कुछ दे। तुम स्वार्थ क्यों बरतते हो, देने की कंजूसी मत करो अब बरसो! बरसो! बादलो अब तो तुम्हें बरसना ही पड़ेगा।
पानी बरसने लगता है। लोग खुशी से नाचने लगते हैं और उनकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता घुलाकर श्रीमती डोरिस की आत्म-चेतना वापस लौट आती है। दूसरे दिन अखबार में समाचार आता है उस स्थान में इतनी जलवृष्टि हुई कि सूखा समाप्त हो गया। यह समाचार पढ़कर श्रीमती डोरिस की प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता।
श्रीमती डोरिस का कहना है कि सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना के आगे बादल तो क्या भगवान को भी झुकना पड़ता है। उन्होंने “नाफिन” को बताया कि अपनी इस भावना शक्ति के द्वारा हमने लाल चीन, पेरु, अमरीका तथा भारत का सूखा दूर कराया है। कुछ दिन पूर्व बिहार और पाँच वर्ष पहले आस्ट्रेलिया में पड़े जबरदस्त अकाल को दूर करने में उन्होंने अपनी शक्ति का प्रयोग किया था और उन्हें सफलता मिली थी। यह समाचार 28 जुलाई की “नई दुनिया” और संसार के अन्य समाचार पत्रों में छपा था उससे लोगों को भावनाओं की शक्ति का पता चला।
शारीरिक और मानसिक रोगों की जड़ बहुधा मनुष्य के कारण शरीर में छिपी होती है। पापात्मा और कुकर्मी व्यक्ति अपनी ही आत्म प्रताड़ना से पिटकर मानसिक दृष्टि से विकृत और शारीरिक दृष्टि से रुग्ण बनते हैं। इनके अन्य उपचार जो भी हों उन्हें प्रायश्चित एवं पश्चाताप के लिए अवश्य कहा जाना चाहिये। सुधरी हुई अन्तःचेतना से जो हलकापन उत्पन्न होता है उसके कारण रोगों की जड़ें अपने आप कटती चली जाती हैं। यह आत्म चिकित्सा जितनी उपयोगी होती है उतना अन्य कोई उपचार नहीं होता।
डॉ0 होप ने कहा है, “पाप और बीमारी में कोई अन्तर नहीं है। सच्चा चिकित्सक रोगी को दवा देकर छुटकारा नहीं पा सकता, वरन् उसे रोगी की आन्तरिक विकृतियों को भी समझना देखना होगा। इसके बिना अधूरी चिकित्सा के आधार पर रुग्णता का उन्मूलन नहीं किया जा सकेगा।”
रोगी की चिकित्सा में औषधियाँ उतना काम नहीं करतीं जितनी कि चिकित्सक की सहानुभूति। मिठास और आत्मीयता भरे व्यवहार में नाममात्र की औषधि देकर भी कठिन रोगों को अच्छा किया जा सकता है। जबकि कर्कश और कठोर स्वभाव का चिकित्सक कीमती उपचार करते रहने पर भी उतना लाभ नहीं दे सकता। यह बात परिचायक और परिचर्या के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है।
अपने व्यक्तित्व को सीमित करने का नाम स्वार्थ और विकसित करने का नाम परमार्थ है। सीमित प्राण दुर्बल होता है पर जैसे- जैसे उसका अहम् विस्तृत होता जाता है वैसे ही आन्तरिक बलिष्ठता बढ़ती चली जाती है। प्राण शक्ति का विस्तार सुखदुःख की अपनी छोटी परिधि में केन्द्रित कर लेने से रुक जाता है, पर यदि उसे असीम बनाया जाये और स्वार्थ को परमार्थ में परिणत कर दिया जाये तो इसका प्रभाव यश, सम्मान, सहयोग के रूप में बाहर से तो मिलता ही है। भीतर की स्थिति भी द्रुतगति से परिष्कृत होती है और व्यक्तित्व प्रखर होता चला जाता है।
आपको मालूम है कि गंगा आदि नदियों का सम्बन्ध हमारे पूर्वजों ने क्यों स्वीकार किया है इसलिए कि वे दीर्घ बहती हैं। दीर्घत्व का अर्थ यह नहीं है ? कि वे लम्बी बहती हैं। दीर्घत्व का अर्थ यह है कि वे उद्गम स्थान से प्रवेश स्थान तक जल धारा को टूटने नहीं देतीं। अतः इन्हें गन्दे नाले भी गन्दे नहीं बना सकते हैं, अपितु वे इनमें मिलकर शुद्ध, पवित्र, स्वच्छ बन जाते हैं, कहाँ तक कहें वे नाले नाले नहीं रहे, गंगा आदि स्वच्छ, पवित्र, पापनाशक हो जाते हैं वैसे ही दीर्घ प्राणों में अदीर्घ अस्वच्छ निर्मल प्राण भी मिलकर सबल, आरोग्यवर्धक, शक्तिशाली हो जाते हैं अतः पूर्वोक्त नदियों के महत्व का कारण उनका दीर्घत्व ही है। वैसे ही प्राणों का महत्व भी दीर्घत्व ही है। अतः जो प्रायः चौदह सौ फुट के फुसफुसों में सर्वत्र दीर्घ गति करता है वह शरीर मात्र की सर्वत्र गन्दी नालियों में बहने वाले विस्फोटक वायु एवं मलीन रक्त को शुद्ध पवित्र बना अपना रूप बना लेता है।
विचारधारायें परिपुष्ट होकर व्यक्तित्व या प्रतिभा का रूप धारण करती हैं। तब मनुष्य उसी रंग में रंग जाता है, उसी ढांचे में ढल जाता है। प्राण शक्ति और विचार प्रक्रिया का समन्वित निर्माण तेजस् के रूप में होता है। उसे चेहरे के आसपास तेजोवलय के रूप में देखा जा सकता है, विशेषतया उन व्यक्तियों में जिन्हें तेजस्वी समझा जाता है। देवताओं की तस्वीरों में उनके चेहरे के इर्द-गिर्द सूर्य जैसी आभा का चित्रण किया जाता है, यह मात्र देवताओं में ही नहीं होता वरन् हर व्यक्ति में देखा जा सकता है। विशेषतया उन व्यक्तियों में जिन्हें तेजस्वी समझा जाता है। इस प्रभा मण्डल को अँग्रेजी में “औरा” कहते हैं, संस्कृत में ओजस्। शारीरिक स्वास्थ्य या सौन्दर्य से उसका सीधा सम्बन्ध नहीं है। चेहरे की बनावट या चमक अलग बात है, तेजस्विता उससे बिल्कुल भिन्न वस्तु है। विचार, भाव, संकल्प और लक्ष्य की समन्वित प्रखरता से इसका निर्माण होता है। व्यवहार में उसकी अनुभूति चुम्बकीय आकर्षण के रूप में देखी जा सकती है।
देखा गया है कि किन्हीं विशेष व्यक्तियों को देखते ही उनके प्रति हमारी सहज श्रद्धा, ममता और आत्मीयता जगती है, विश्वास होता है और प्रेम उमड़ता है। इच्छा होती है कि उनके सान्निध्य में रहा जाय। जब तक साथ रहते हैं उच्चस्तरीय विचार उठते हैं। यह सात्विक एवं उच्चस्तरीय तेजोवलय का प्रभाव है।
जो हो तेजोवलय एक सम्पदा है जो दूसरों पर प्रभाव या छाप छोड़ने के सन्दर्भ में बहुत काम करती है। यह किसी प्रयत्न या उपचार से उत्पन्न नहीं किया जा सकता, वह तो अन्तः स्थिति का दर्पण मात्र है। व्यक्तित्व को ढालने के लिए जो कुछ करना आवश्यक होता है उसे ही तेजोवलय की साधना कह सकते हैं। इस ओजस् तेजस्विता के सामने या सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति ही प्रभावित नहीं होते वरन् वातावरण भी विनिर्मित होता है। जहाँ सज्जन निवास करते हैं वहाँ बसन्त जैसी सुरभित प्रफुल्लता छाई हुई देखी जा सकती है और उस सुषमा से कितनों को कितनी प्रेरणा मिल रही है यह प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। यह सब प्राण शक्ति के विस्तृत होने का ही परिणाम है।
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पच्चीस तीस वर्ष की आयु में कई युवकों के बाल सफेद, चेहरा निस्तेज और गालों पर झुर्रियाँ देखी जा सकती हैं। उनकी आन्तरिक स्थिति भी अनुत्साह, विक्षोभ, निराशा और चिन्ताग्रस्त रहती है। कहा जाता है समय से पहले ही बुढ़ापा आ गया। यह तो कहावतों और लोकोक्तियों वाली बात हुई, पर वैज्ञानिकों ने सचमुच इस तथ्य को ढूंढ़ निकाला है कि आदमी अब समय से पहले ही बूढ़ा होने लगा है।
जब इस आधार पर अन्य वयस्क लोगों की जाँच की गयी तो पता चला कि वे भी उन सब दौरों से गुजर रहे हैं जिनसे उन्हें पच्चीस-तीस वर्ष बाद गुजरना चाहिये। इन परीक्षणों के आधार पर एक नये रोग का पता चला जिसे नाम दिया गया- प्रोजीरिया अर्थात् समय से पूर्व बुढ़ापा और अब पश्चिमी देशों में ये रोग सामान्य होता जा रहा है। उस बालक में समय से बहुत पूर्व ही बुढ़ापा आ गया पर अन्य लोग भी पच्चीस-तीस वर्ष की आयु के बाद शायद ही युवक रह पाये हों। प्रोजीरिया के लक्षण उनमें भी किसी न किसी रूप में अवश्य पाये जा रहे हैं। एल्विन टाफ्लर नामक एक पश्चिमी विद्वान ने इसी विषय पर गहन अनुसन्धान किया और उसके निष्कर्षों को लिपिबद्ध कर दिया। उक्त घटना को भविष्य का संकेत निरूपित करते हुए एल्विन टाफ्लर ने लिखा है कि यह घटना एक चमत्कार है जिसमें भविष्य की एक झलकी मिलती है टाफ्लर ने अपने ग्रन्थ में इसका कारण लिखते हुए यह भी बताया कि- “विकास की रफ्तार बहुत तेज हो गयी है और उसी गति से आज की दुनिया भी बदल रही है। इतनी तेजी से कि हमारी पीढ़ी को यह भी पता नहीं है कि हम कहाँ जा रहे हैं। नयी पीढ़ी का वर्तमान है केवल यौन सम्बन्धों में उन्मुक्तता, नशा और पोशाक। यहाँ तक कि कुछ ही समय में यह वर्तमान भी अपना आकर्षण खो बैठेगा। लोग इतना भर अनुभव करते हैं कि कुछ बदल रहा है लेकिन क्या बदल रहा है? बदल भी रहा है या नहीं - यह कोई नहीं जानता है। जान तो सकता है पर जानना कोई नहीं चाहता। कुछ शताब्दियों पूर्व आदमी की आयु सौ साल की थी, अब पचास साल से भी कम रह गयी है और भविष्य में सिर्फ बारह साल की ही रह जायेगी।”
यह बात कोई चौंका देने के उद्देश्य से नहीं कही गयी है। इस सम्भावित खतरे को दूर करने के लिए पश्चिम में कई वैज्ञानिक समितियाँ काम भी कर रही हैं और इस बात का प्रयत्न कर रही हैं कि जीवन मूल्यों में इतनी तीव्रता के साथ होने वाले परिवर्तनों को एक सम्मिलित रूप दिया जाय। इसके लिए वैज्ञानिक नयी योजनायें, नयी नीति और नयी शिक्षा पद्धतियों का भी निर्धारण करने के लिए प्रयत्नशील हैं।
एल्विन टाफ्लर के अनुसार हममें से प्रत्येक ने आठ सौवीं बार जीवन धारण किया है। यह विश्वास किया जाय कि हम हर बार मनुष्य रूप में ही जन्मे हैं तो, अगर हमने प्रत्येक जीवन औसतन रूप से 62 वर्ष तक जिया हो तो पिछले हजार वर्षों में- जबसे कि मनुष्य प्राणी अस्तित्व में आया तब से आठ सौ बार जन्म लिया है और इन आठ सौ जन्मों में से पूरी छह सौ पचास जिन्दगियाँ गुफाओं और गिरी कन्दराओं में व्यतीत की हैं। डेढ़ सौ जिन्दगियाँ मनुष्य की वर्तमान स्थिति तक पहुँचने वाली विकास सत्ता पर व्यतीत किये हैं और उनमें से भी हमें केवल सत्तर जीवन वर्षों के बारे में ही कुछ मालूम है अर्थात् पिछले ढाई हजार वर्षों के सम्बन्ध में कुछ ऐतिहासिक विवरण क्रमबद्ध रूप से उपलब्ध कर पाये हैं। इसमें भी पिछले सात सौ वर्षों में लिखने पढ़ने का प्रचार प्रसार हुआ और अभी करीब डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ही बिजली का प्रयोग करना सीखा।”
कहने का अर्थ यह है कि मनुष्य सभ्यता ने पचास हजार वर्षों में उतना विकास नहीं किया जितना कि पिछले ढाई हजार वर्षों में। ढाई हजार वर्षों से भी अधिक सभ्यता का विकास हुआ पिछले सात सौ वर्षों में और सात सौ वर्षों में भी निकटतम डेढ़ सौ वर्षों की अपेक्षा कम प्रगति हुई है। यह इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य ने समय को छोटा कर वर्षों को क्षणों में बाँध दिया है।
एल्विन टाफ्लर की दृष्टि में यह परिवर्तन ही नयी-नयी बीमारियों का जनक है। लेकिन परिवर्तन उतना ही उत्तरदायी नहीं है जितना कि मनुष्य का आज का कृत्रिम और अप्राकृतिक जीवन। परिवर्तन में कुछ अस्त-व्यस्ततायें स्वाभाविक हैं, पर उन्हें स्वाभाविक से अस्वाभाविक बनाने के लिए अस्वाभाविकतायें ही कारण हैं। आधुनिक सभ्यता के नाम से जानी समझी जाने वाली जीवन पद्धति ने कई ऐसी विकृतियों को जन्म दिया है जो मनुष्य के स्वास्थ्य और जीवन के लिए हानिकारक सिद्ध हुई हैं। प्रोजीरिया- समय से पहले वृद्धावस्था तो उनमें से एक है।
स्वयं एल्विन टाफ्लर ने इन विकृतियों के घातक बनने का कारण परिवर्तनों की अपेक्षा अन्धे होकर भागना ही अधिक माना है। वृद्धावस्था की भयंकरता का एक कारण मृत्यु का भय भी है। आज के समय में बदलते परिवेश ने व्यक्ति की स्वतन्त्र चेतना को तोड़ कर उसे एकाकी से असुरक्षित भी बना दिया है। होने वाले परिवर्तनों के साथ दौड़ने में आदमी इतना व्यस्त है कि उसे अपने आस-पास के लोगों का ध्यान ही नहीं रहता। न ही वह अनुभव कर पाता है कि उसके साथ कोई है भी। फलस्वरूप वह अपने को अकेला और भीड़ में असुरक्षित मानता है। असुरक्षा की भावना वृद्धावस्था की मित्र ही कही जानी चाहिये जो आत्म विश्वास के अभाव में उत्पन्न होती है। बच्चों को भी प्रौढ़ों की भाँति सोचने के लिए विवश होना पड़ता है। क्योंकि वे अपने माता-पिता से आवश्यक और अपेक्षित स्नेह संरक्षण प्राप्त नहीं कर पाते। इन सब कारणों से व्यक्ति युवक हो या बालक मृत्यु का भयावह चित्र देखता रहता है और वह भी समय से पहले ही उसे बूढ़ा बना देती है।
आज का समय औद्योगिक युग के नाम से जाना जाता है। मशीनी युग में आदमी का जीवन भी इतना याँत्रिक हो गया है कि वह सभी प्रवृत्तियों को विवेक की कसौटी पर कसे बिना ही अन्धाधुन्ध अपनाये जाता है। आधुनिक सभ्यता का अंग कही जाने वाली कितनी ही दुष्प्रवृत्तियाँ शरीर और स्वास्थ्य पर अपना घातक प्रभाव छोड़ती हैं- इस तथ्य को वैज्ञानिक भी स्वीकार कर चुके हैं। कैन्सर, यक्ष्मा, हृदय रोग, हिस्टीरिया जैसी राजरोग कही जाने वाली बीमारियाँ जो तेजी से बढ़ती जा रही हैं। इनके मूल में वातावरण बदलने के साथ-साथ व्यक्ति की आदतों, स्वभाव और प्रकृति में आया परिवर्तन भी है। इसका कारण बदलता समय कहा जाय या सभ्यता का तीव्र विकास। मूलतः व्यक्ति का असन्तुलित, दिशाहीन और अस्त-व्यस्त जीवन ही है। यदि सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य की भी यही गति रही तो मनुष्य का अन्त सन्निकट ही है। राज-रोगों के साथ प्रोजीरिया जैसी नयी-नयी बीमारियों का बढ़ना यही सिद्ध करता है।
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समुद्र अन्वेषी अँग्रेज कप्तान कुक वैज्ञानिकों का एक दल लेकर सन् 1768 में लम्बी समुद्र यात्रा पर निकला था। इसमें उसने इंग्लैण्ड से लेकर आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड तक के लम्बे क्षेत्र के प्रामाणिक नक्शे तैयार किये थे, साथ ही उस बहुमूल्य सम्पदा का पता लगाने का प्रयत्न किया जो समय-समय पर डूबे हुए जहाजों के कारण समुद्र तल में डूबी पड़ी है। एक तूफान में फँस जाने के कारण सन् 1770 में ग्रेट वैरियर रीफ के समीप उसने अपने जहाज पर लदी छह तोपें भी पानी में फेंक दी थीं। कप्तान कुक के द्वारा प्रस्तुत प्रतिवेदनों में से कुछ गुम हो गये हैं अस्तु उससे कामों का फिर से सर्वे करना पड़ रहा है। उसने जिस स्थान पर अपनी तोपें फेंकी थीं उसी के नजदीक बहुत सी सम्पत्ति समुद्र तल में होने का संकेत था अस्तु उस स्थान को ढूंढ़ने का प्रयास नये सिरे से करना पड़ा।
पिछले दो सौ वर्षों में एक के बाद एक खोजी दल दस बार उस क्षेत्र में गये पर उन तोपों के डुबाये जाने के स्थान का सही पता न लगा सके। अब फिलाडेल्फिया की प्रकृति विज्ञान एकेडमी के एक खोजी दल ने उस स्थान को ढूंढ़ निकाला है और छहों तोपें सुरक्षित रूप से प्राप्त कर ली गई हैं। अब अगला कदम उन स्थानों का पता लगाने का है जहाँ बड़ी धन राशि मिलने की संभावना है।
इस सन्दर्भ में मिन्स्क गवर्नर की खोज रिपोर्ट में नये तथ्यों पर प्रकाश डाला गया है। कुछ समय पूर्व नोवोग्रुदोक के एक सैनिक ने अपने बड़े अधिकारी को सूचना दी थी कि एलेग्जानुर रोमानोविच नामक एक ग्रामीण के पास प्राचीन वस्तुओं का बहुमूल्य संग्रह है। छापा मारने पर उसके पास सोने की कीमती छड़ें, जंजीरें और रत्न जड़ित अँगूठियाँ पाई गईं। ये वस्तुतः नैपोलियन द्वारा जमा किये खजाने की ही एक अंश थीं। शेष खजाना कहाँ गया इसकी पूछताछ उसी किसान से की गई तो पता चला कि उसके पूर्वजों के समय हुए बँटवारे का आधा भाग पड़ौस के गाँव में रहने वाले मुखा नामक व्यक्ति के बाप-दादों को मिला था। शायद उसके पास जमा हो। मुखा ने बताया कि महायुद्ध के समय जब गाँव खाली करना पड़ा था तो वह उन चीजों को एक लोहे के सन्दूक में बन्द करके जमीन में गाढ़ गया था पर जब लड़ाई बन्द होने पर वापस लौटा तब किसी ने उन सन्दूकों को ही गायब कर दिया था। उसका अनुमान है कि- इस धन की जानकारी केवल पैट्रिक को थी और इसे गायब करने में उसी का हाथ हो सकता है।
पैट्रिक के साथ पुलिस ने कड़ाई की तो उसने बात स्वीकार करली। साथ ही यह भी कहा उसे सुरक्षित रखने में झंझट की बात सोचकर एक पुलिस अफसर को सस्ते मूल्य में बेच दिया था और नगदी ले ली थी। वह पुलिस अफसर कहाँ है? यह ढूंढ़ा गया तो पता चला कि वह यहीं रूस छोड़कर वारसा में जा बसा है। अब वह ढूंढ़-खोज यहीं रुकी पड़ी है आगे का पता नहीं चल रहा है। यदि वह सारी दौलत मिल सके तो रूसी सरकार के दरिद्र पार हो सकते हैं।
एक तीसरा खजाना और भी इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। स्पेन का शासन अठारहवीं सदी के प्रथम चरण में अमेरिका के एक बड़े भाग पर था। उन उपनिवेशों से शोषित संपत्ति निरन्तर स्पेन भेजी जाती रही थी। 24 जुलाई 1715 को पन्द्रह बड़े जहाज अरबों रुपयों की सम्पत्ति लेकर हवाना बन्दरगाह से स्पेन के लिए रवाना हुये थे। उनमें 166 पेटियाँ सोने-चाँदी तथा रत्नों और मोतियों से भरी हुई थीं। एक सप्ताह की यात्रा ही वे कर पाये होंगे कि भयानक समुद्री तूफान ने उन्हें धर-दबोचा और प्रायः सभी जहाज गहरे पानी में डूब गये। हजारों यात्रियों और नाविकों के अतिरिक्त वह सम्पदा भी समुद्र के पेट में समा गई। मुट्ठी भर मल्लाह ही किसी प्रकार किनारे पर लगे- उन्हीं से दुर्घटना का विवरण विदित हो सका।
स्पेन के गोताखोर उस सम्पत्ति को निकालने का प्रयत्न करते रहे। एकबार कुछ कहने लायक धन निकाला भी गया पर उसे हमला करके समुद्री डाकू लूटकर ले गये। तब से खोजियों का उत्साह ढीला पड़ गया है, फिर भी लहरों के साथ बहकर आने वाले वे सिक्के जो तट की मिट्टी में सने हुए मिल जाते हैं अभी भी उस लालच को सजीव रखे रहते हैं और प्रयत्नों को मर-मरकर जीवित होने की प्रेरणा देते रहते हैं।
एक चौथी घटना और है- उन दिनों अमेरिका नया-नया ही बसा था। लगभग सारे ही योरोपियन देश वहाँ से दौलत लूट लाने के लिए धमाचौकड़ी मचाये हुये थे। उन्हीं में से एक दुस्साहसी का नाम था जान एवान मार्टिन। उसने सुन रखा था कि ब्राजील के सघन जंगलों में ढेरों सोने की खदानें बिखरी पड़ी हैं और लोग उन्हें खोद-खोदकर अनाप-शनाप दौलत बटोर रहे हैं। वह दुस्साहसी युवक भी यह लोभ संवरण न कर सका और उधर ही चल पड़ा। मार्टिन पिछले दस वर्षों से समुद्री सेना में काम कर चुका था, उसने बहुत देश देखे और तरह-तरह के अनुभव बटोरे थे। जिन्दगी मौत की लड़ाई से वह कितनी ही बार जूझा था। उससे वह डरा नहीं वरन् दूना दुस्साहसी हो गया। ब्राजील से सोना बटोरने का साहस उसने अपने संगृहीत जोखिम उठाने की आदत के अनुसार ही किया था।
गोरे लोग ब्राजील के दक्षिणी इलाके में ही खोज करने जाते थे। उत्तरी इलाके में जाने की उनकी हिम्मत नहीं पड़ती थी। यद्यपि सोना उधर ही अधिक था। कारण यह था कि उत्तरी इलाके में जो आदिवासी बसे हुये थे, वे बहुत ही खूँखार थे। उधर से गुजरने वालों को पग-पग पर उनके आक्रमण का सामना करना पड़ता था और अधिकतर मौत के शिकार ही बन जाते थे। इसलिए उस क्षेत्र में कोई विरले ही जा पाये थे। मार्टिन ने उसी इलाके में जाने का निश्चय किया। आदिवासियों की आदतों और उनसे बचने की तरकीबों का अध्ययन करने के बाद उसने यही फैसला किया कि वह उनसे आँखमिचौली खेलता हुआ अपना प्रयोजन पूरा करेगा। सो वह थोड़े से कुली साथ लेकर उत्तरी ब्राजील के सघन वनों में घुस ही पड़ा।
कई हफ्ते इधर उधर टक्करें खाते फिरने के बाद आखिर उसने वह क्षेत्र ढूंढ़ ही लिया जहाँ सोने की छोटी छोटी खदानें बिखरी पड़ी थीं। अपने छोटे से साधनों से वह सोना समेटना लगा और दो महीने के भीतर ही उसने प्रायः साठ पौंड सोना इकट्ठा कर लिया। अधिक इकट्ठा करते जाने की अपेक्षा उसने यह अच्छा समझा कि जो कमाया है उसे कहीं सुरक्षित स्थान तक पहुँचा दें और तब आगे की खोज करें।
पीठ पर साठ पौंड सोने के भारी थैले लादकर वह धीरे-धीरे चल पड़ा। रास्ते में यूरटोरी कोका के एक छोटे से होटल में उसे सुस्ताना पड़ा। इस होटल का मालिक ग्लवेज जाना-माना बदमाश था। दिखाने को तो वह कई जगह होटल, शराबखाने और जुआघर चलाता था, पर उसका असली काम सोने की खानें कुरेदने वालों का पता लगाना और उन पर हमला करके मौत के घाट उतार देना था। इस प्रकार उसने करोड़ों डालर की कमाई की थी और सैंकड़ों आदमी इस तरह खत्म किये थे कि उनकी लाश का पता भी न चले और लोग यह तक पता न लगा सकें कि आखिर उनका हुआ क्या ?
मार्टिन की पीठ पर लदे हुए सोने को उसने भाँप लिया और अपनी पिस्तौल लेकर उसका पीछा करने लगा। ग्लवेज के बारे में मार्टिन ने सुन रखा था अब उसे अपनी मौत की जीती जागती छाया अब तब दबोचती हुई दिखाई देने लगी। अब क्या हो सकता है ? इस पर उसने बारीकी से सोचा और यह निर्णय दिया कि वह सामने वाली कातर यानी कबीले के - लोगों के गाँव में घुस पड़ेगा और उन्हें चकमा देकर किसी प्रकार अपनी जान बचायेगा। उसकी योजना फिट बैठी।
शिकार हाथ से जाता देखकर ग्लबेज ने गोली चलाई। गोली की आवाज सुनकर कबाइली लोगों का पूरा गाँव अपने हथियार लेकर आ डटा और चारों ओर से घेरकर उसका सिर काट दिया। इसी बीच अवसर पाकर मार्टिन भाग खड़ा हुआ। पर भागने के लिए आवश्यक था कि वह वजन हलका करे और सोने का मोह छोड़े निदान वह ऐसी झाड़ी में सोना छिपाकर अपने डेरे पर चल पड़ा जिसे ढूंढ़ सकना फिर कभी उसके लिए सम्भव नहीं हुआ। यद्यपि वह कई बार बड़ी तैयारी के साथ उस स्थान तक पहुँचने का प्रयत्न करता रहा।
इसके बाद भी मार्टिन ने कई प्रयत्न किये। कई बार कुछ पाया भी पर वह ऐसे ही किसी न किसी तरह हाथ से निकल जाता रहा। निढाल होकर वह अमेरिका छोड़कर आस्ट्रेलिया जा बसा और वहीं किसी तरह दिन काटने लगा।
उपरोक्त चार खजानों की चर्चा पढ़कर हममें से कोई भी यह सोच सकता है कि ऐसा ही कोई दवा, गढ़ा खजाना हमारे हाथ लग जाता तो कितना अच्छा होता। सचमुच इस धरती के गर्भ में दबे हुये ऐसे खजानों की संख्या हजारों लाखों की संख्या में होगी जिन्हें मनुष्य ने किसी प्रकार उपार्जित तो किया, पर वह उनका न तो उपयोग कर सका और न उपभोग। उसने उसे फिर कभी के लिए संग्रह किया और जरूरतमंदों की नजर से छिपाकर कहीं दबा छिपाकर रख दिया। जिस समय के लिए उसे संग्रह किया गया था, वह आया ही नहीं और वह सारी दौड़−धूप जमीन के नीचे दबी रह गई। अब वह किसी के काम नहीं आ रही है। इससे पूर्व वह कम से कम किसी के काम तो आ रही थी। अब उसका काम एक ही है कि हर किसी के मन में मुफ्तखोरी का लालच उत्पन्न करे। जैसा कि इस दिशा में सोचने वाले किसी भी व्यक्ति के मन में उठता है- उठ सकता है।
मनुष्य द्वारा संग्रहीत और छिपाये हुए खजानों की अपेक्षा प्रकृति के गर्भ में स्वाभाविक खजाना भी करोड़ों गुनी मात्रा में दबा पड़ा है। अन्न की वनस्पतियों के तथा विविध खनिज पदार्थों के रूप में हम उसे आदिकाल से प्राप्त कर रहे हैं और अन्त काल तक प्राप्त करते रहेंगे। पुरुषार्थी और अव्यवसायी इसे पहले भी प्राप्त करते रहे हैं और अब भी प्राप्त कर रहे हैं। प्रकृति का यह द्वार हर किसी के लिए खुला पड़ा है वह मुक्त हस्त से सबको अपना भण्डार लुटा रही है। बिना ईर्ष्या और लालच उत्पन्न किये इसे प्रत्येक पराक्रमी सरलतापूर्वक प्राप्त कर सकता है। अथक श्रम और सघन मनोयोग के उपकरण लेकर जहाँ भी खोदना आरम्भ किया जायेगा वहीं से सफलताओं के रत्न राशि सहज ही उपलब्ध होने लगेगी।
मनुष्य का अपना व्यक्तित्व भी किसी बड़े रत्न भण्डार से कम नहीं है। उसमें इच्छा शक्ति, बुद्धि शक्ति और क्रिया शक्ति के रूप में वे तिजोरियाँ भरी पड़ी हैं जिनकी तुलना संसार की समस्त सम्पदाओं के सम्मिलित रूप से भी नहीं की जा सकती। ‘पराई पत्तल का भात मीठा और घर की खीर बेतुकी’ लगने की बुरी आदत ही हमें दूसरों के कमाये छिपाये खजाने पाने के लिए ललचाती है जबकि उनसे कहीं अधिक बहुमूल्य राशि अपने में ही दबी हुई सड़ रही है।
मुफ्त का धन जिनने भी पाया उन्हें दूसरों की ईर्ष्या का भाजन तथा आक्रमण का शिकार होना पड़ा है। उसने अपने पीछे बुरी प्रेरणा और परम्परा छोड़ी है। हम भी यदि उसी मार्ग पर चलें तो उन्हीं दुखद परिणामों की पुनरावृत्ति होगी जो अब तक होती रही है। खजाना पाने का मन हो तो उसे व्यक्तित्व के समग्र निर्माण और उपलब्ध क्षमता के श्रेष्ठतम उपयोग के उपाय द्वारा ही ढूंढ़ने और पाने का निश्चय करना चाहिये। इस मार्ग पर चलते हुये इतनी बढ़ी-चढ़ी सफलताएँ मिल सकती हैं, जिसकी खजाना ढूंढ़ने वाले कल्पना भी नहीं कर सकते।
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एच॰ जी0 वेल्से ने लिखा है - “महान व्यक्तित्वों की प्रतिभा उनकी महत्वाकाँक्षाओं की खाई में गिरकर नष्ट होती रहे, इसे मानव जाति का दुखद दुर्भाग्य ही कहना चाहिये।
प्रतिभाएँ सदा ही उत्पन्न होती रहती हैं। सामान्य स्तर से कुछ ऊँचे स्तर वाले लोगों की कभी कमी नहीं रही, इस उद्यान में एक से एक सुन्दर और सुरभित फूल सदा ही उगते रहते हैं। प्रकृति ने इस प्रकार के उत्पादन में कभी कृपणता नहीं बरती। यदि यह उत्पादन उपयोगी प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त हो सका तो उनके स्वयं के लिए भी और समस्त संसार के लिए भी यह एक बड़ी सुन्दर और सुखद बात होती।
किन्तु इस विधि विडम्बना को क्या कहा जाय, जिसके अनुसार यह सुखद उत्पादन नरक जैसी सड़ांद में गिरकर न केवल नष्ट ही होता रहता है वरन् सड़न बढ़ने से संसार के वातावरण को और भी अधिक विषाक्त करता रहता है।
जिस दुर्घटना के कारण प्रतिभाएँ भ्रष्ट और नष्ट होती हैं वह है महत्वाकाँक्षा। महत्वाकाँक्षी व्यक्ति ही एक से एक बढ़कर उद्धत कर्म करते हैं और उनकी प्रतिक्रिया से सारा वातावरण विषाक्त बनता है। महत्वाकाँक्षा से मतलब है- व्यक्तिगत सुविधा साधनों का असीम अभिवर्धन करने की ललक और दूसरों पर अपने वर्चस्व की छाप छोड़ने की अहंमन्यता। बड़प्पन की आकाँक्षा बुरी नहीं है, पर जब वह संकीर्ण स्वार्थ परता की परिधि में घिरी रहती है तो उसकी तृप्ति वैभव और विलास के अधिकाधिक साधन संचय करने में ही दिखती है। तब उसे अधिक सम्पत्तिवान बनने की बात ही सूझती है। इसमें लाभ भी दिखता है। उपभोग के प्रचुर साधन मिलने तो प्रत्यक्ष ही हैं। दूसरा लाभ यह भी है कि अपनी सफलताओं से दूसरों को चमत्कृत करके उन पर प्रतिभावान एवं भाग्यवान होने की छाप भी छोड़ी जा सकती है। इससे अपनी अहंमन्यता की एक हद तक पूर्ति होती है।
महत्वाकाँक्षाएँ सीमित नहीं रह सकतीं। ईंधन प्राप्त होते रहने पर फैलने वाली आग की तरह उनकी लपटें फैलती भी हैं और ऊँची भी उठती हैं। अर्थात् अधिक साधन माँगती हैं और अधिक शीघ्रता चाहती हैं। यह असन्तोष क्रमशः प्रचण्ड होता जाता है और स्थिति अधीरता एवं आतुरता के समकक्ष बनती जाती है। जितनी जल्दी - जितनी सम्पन्नता मिल सकती है इसके लिए मन क्षेत्र में समुद्र मन्थन जैसा खड़ा हो जाता है। ललक आँधी-तूफान का रूप धारण कर लेती है। फलतः मर्यादाओं के औचित्य के - सारे बाँध टूट जाते हैं और यह नीति अपनानी पड़ती है कि जैसे बने वैसे अपना वैभव एवं वर्चस्व बढ़ाने में सारी शक्ति झोंक दी जाये।
मनुष्य की इच्छा शक्ति संसार की सर्वोपरि सामर्थ्य है वह जिधर भी गतिशील होती है उधर ही साधन जुटाती और सफलता पाती है। वैभव सम्पादन भी इसका अपवाद नहीं है। फिर जब नीति अनीति के बन्धन तोड़ दिये गये हों तो सफलता और भी अधिक सरल है। आज के वातावरण में राजदण्ड और समाज दण्ड से बच निकलना - अपराध निरोधक तत्वों को चूना लगाना बहुत ही सरल है। इस कला कौशल को कोई भी चतुर आदमी अपने पड़ोसियों से कानों-कान सीख लेता है और अधिक जल्दी- अधिक मात्रा में वैभव इकट्ठा करने का रास्ता तेजी से पार करने लगता है। महत्वाकाँक्षी व्यक्ति यदि सनकी अव्यावहारिक हो तब तो बात दूसरी है अन्यथा वह अपनी चाही दिशा में बहुत आगे तक बढ़ता चला जाता है।
महत्वाकाँक्षाएँ चूँकि नितान्त व्यक्तिगत होती हैं इसलिए उपलब्धियों का उपयोग भी वे उसी क्षेत्र में करने देती हैं। इन्द्रिय भोग, उद्धत प्रदर्शन एवं प्रचुर संग्रह यह तीन ही लक्ष्य सामने रहते हैं। दान-पुण्य कभी करने को जो आया तो उसका उद्देश्य भी मात्र भौतिक प्रतिदान एवं यश विस्तार भर रहता है। देवी देवताओं की पूजा-पत्री में प्रतिदान का प्रलोभन और प्याऊ धर्मशाला बनवाने आदि में यश लिप्सा के अतिरिक्त और कोई उद्देश्य नहीं रहता। परमार्थ का कीड़ा कुलबुलाया तो उसी परिधि में रेंग राँग कर ठण्डा हो जाता है।
संकल्प शक्ति पुरुषार्थ के लिए सहज ही प्रेरित करती है। इसलिए उनकी उपयोगिता सर्वत्र मानी गई है। इसकी सदा-सर्वदा भूरि-भूरि प्रशंसा की गई है। उसमें उत्कर्ष एवं उत्पादन के तत्व प्रचुर परिमाण में भरे पड़े हैं। इस लिए उसकी महत्ता से कभी किसी ने इन्कार नहीं किया है। गड़बड़ तब मचती है जब वह व्यक्तिगत स्वार्थ साधन के संकीर्ण क्षेत्र में सीमाबद्ध होकर बैठ जाती है। तब अधिक धन- अधिक धन- अधिक धन की रट लगाती है। आवश्यकता है या नहीं- है तो कितनी, किस काम के लिए यह प्रश्न उठते ही नहीं। शराबी और चाहिए- और चाहिए की रट लगाकर एक के बाद दूसरा जाम पीता जाता है और अधिक मदहोश होता जाता है। यही हालत महत्वाकाँक्षी व्यक्तियों की होती है, वे धन संग्रह के साथ-साथ अहंकार का उद्धत प्रदर्शन करने वाले अपव्ययी ठाठ-बाठ रोपते हैं। इससे तत्काल कुछ प्रसन्नता भी होती है और तृप्ति जैसी भी मिलती है। अपनों की सीमा में दो ही प्राणी आते हैं एक स्त्री दूसरा पुत्र। उनको भी अपनी ही तरह ‘सुखी’ अर्थात् साधन सम्पन्न बनाने की बात मन में रहती है। विवशता है। व्यक्ति उतने उपार्जन को अकेला तो उपभोग भी नहीं कर सकता। उसे किसी को तो देना ही पड़ेगा। ‘किसी’ की परिधि में अपने ही आते हैं और अपने स्त्री एवं पुत्र के अतिरिक्त कोई तीसरा पक्ष भी हो सकता है यह ‘भीतर वाला’ स्वीकार ही नहीं करता। यह भीतर वाला और कोई नहीं संकीर्ण स्वार्थपरता से घिरा जकड़ा निकृष्ट अन्तस् ही है। वह पूर्णतया स्वगत होता है। स्त्री पुत्र की बात तो उसे अत्यन्त विवश होकर भारी मन से सोचनी पड़ती है। यदि किसी को भी अपनी सम्पदा में साझीदार बनाये बिना उसकी सुरक्षा हो सकी होती, उपभोग बन पड़ा होता तो सम्भवतः यह महत्वाकाँक्षी व्यक्ति उन्हें भी लाभान्वित होने में साझीदार न बनाते। होता भी ऐसा ही है कृपण लोग उत्तराधिकारियों के लिए धन तो छोड़ते हैं पर उन्हें स्वास्थ्य एवं शिक्षा ज्ञान अनुभव आदि की वृद्धि के लिए कुछ खर्चे करने के लिए रजामन्द नहीं होते। इससे उनके ‘स्वजन प्रेम’ की कलई सहज ही खुल जाती है।
महत्वाकाँक्षा यदि संकीर्ण स्वार्थ परता से- व्यक्तिगत लिप्साओं से तनिक ऊँची रह सकें तो वे कितनी उपयोगी हो सकती, उसका चिन्तन करने मात्र से बड़ी प्रसन्नता होती है। यदि उनका विस्तार सद्भावनाओं के अभिवर्धन के लिए- सत्प्रवृत्तियों का पोषण करने के लिए सम्भव हो सके तो वह संकल्प शक्ति से उत्पन्न पुरुषार्थ उच्च कोटि की उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर सकता है यदि मैं का दायरा अत्यन्त छोटी ‘व्यक्तिवादी’ परिधि से आगे बढ़कर ‘हम’ की सीमा का स्पर्श कर सके तो बात कहाँ से कहाँ पहुँच जाय और प्रतिभा का चमत्कार आदर्शवादी परम्पराओं के निर्वाह में संलग्न दिखने लगे।
महामानवों के व्यक्तित्वों को यदि निकट से - गम्भीरता से देखा जाये और उनका तात्विक विश्लेषण किया जाये तो प्रतीत होता है कि उनमें साधारण लोगों से अधिक तनिक सी ही प्रतिभा अधिक थी। बाकी सब बातों में वे पूर्णतया मामूली आदमी थे। विशेषता के रूप में उन्हें थोड़ी सी चमक थोड़ी सी प्रतिभा मिली थी उसका उपयोग उतने नितान्त व्यक्तिवादी दल-दल से कुछ ऊपर उठकर करने की बात सोची और उधर ही रुचि लेने लगे। इस रुचि में उनका प्रचण्ड पुरुषार्थ जुड़ा और उसके आधार पर क्रमिक सफलताएँ मिलती चली गई फलतः गिरते पड़ते- चलते रुकते वे वहाँ-वहाँ जा पहुंचे जहाँ महानता के- महान उपलब्धियों के- अधिपति रूप में उन्हें विराजमान देखा गया और जन साधारण ने उनके चरणों पर श्रद्धा के शत-शत भाव पुष्प चढ़ाए।
महत्वाकाँक्षी, सुसम्पन्न और महानतानुरागी समुन्नत व्यक्तियों का तुलनात्मक अध्ययन विश्लेषण करने पर व्यक्तित्व, प्रयत्न, पुरुषार्थ, श्रम, साहस, कष्ट सहिष्णुता आदि की दृष्टि से कोई खास अन्तर नहीं दिखता। दोनों को लगभग समान प्रयत्न पुरुषार्थ करना पड़ा है। दोनों ने उत्साह एवं बुद्धि कौशल का प्रायः एक जैसा ही उपयोग किया है। कठिनाइयाँ दोनों ने ही एक जैसी उठाई हैं और सूझ-बूझ का भी वैसा ही परिचय दिया है। अन्तर राई-रत्ती भर का रहा है। एक ने ‘अपने’ को अत्यन्त छोटी परिधि में जकड़ बाँध लिया। मात्र शरीर को अपना समझा और वासना को शारीरिक और तृष्णा की मानसिक भूख को पूरा करना पर्याप्त माना। इससे आगे की बात सोचने में उनकी संकीर्णता ने इनकार कर दिया। मतलब की बात उन्होंने पेट और प्रजनन की पशुप्रवृत्तियों तक सीमाबद्ध करली। इससे आगे का कोई क्षेत्र न उनके लिए सोचने को खुला था और न पुरुषार्थ के लिए कहीं किसी दिशा में कदम बढ़ाने की गुंजाइश थी। कोल्हू के बैल की तरह उन्हें उसी सीमा में चक्कर काटने पड़े। तेल तो बहुत निकला, पर उन्हें खली ही मिली। माल मसाला दूसरों के हाथ लगा। श्रम अपने को करना पड़ा- समय अपना लगा- प्रतिभा अपनी प्रयुक्त हुई- पापों की गठरी अपने सिर पर लदी और अन्ततः खाली हाथों सिर पर घोर पश्चाताप साथ लेकर विदा हो गये। सुसम्पन्न प्रतिभाओं के जीवन का यही है लेखा-जोखा जिसे हम अपने इर्द-गिर्द असंख्य मनुष्यों के साथ जुड़ा हुआ देखते हैं।
सम्पन्नता उन्होंने संग्रह तो की, पर उपभोग का वह अवसर ही नहीं मिला जिसके लिए उस उपार्जन का ताना-बाना बुना गया था। लोगों ने वाह-वाही तो दी- चापलूसी भी की, पर सच्चे मन से श्रद्धा करने वाला हृदय से स्नेह सौजन्य देने वाला, एक भी नहीं मिला। समय आया तो सभी ने आँखें फेर लीं। उत्तराधिकारियों ने दुधारू गाय से बढ़कर उनका कभी कोई मूल्याँकन नहीं किया। शहद पाने के लिए वे छत्ते को तोड़-फोड़ की निष्ठुरता भी समय-समय पर बरतते ही रहे। परमार्थ की बात तो सोची भी नहीं गई थी सो वह बन भी नहीं पड़ा। आत्म प्रवंचना के लिए उल्टी पुल्टी माला घुमाने जैसी टन्ट-घन्ट ही पर्याप्त समझी गई। उससे कुछ बनने वाला था भी नहीं सो बना भी नहीं। परमार्थ के फलस्वरूप जो आत्मिक आनन्द एवं उल्लास मिलना चाहिये इसका दर्शन तो उन्हें कभी भी नहीं हो सका, यों देवी देवता मन्दिरों में और सपने में आये दिन देखने को मिलते रहे।
महत्वाकाँक्षी और महानतानुरागी में एक ही मौलिक अन्तर होता है। उदात्त व्यक्ति दूरदर्शी होते हैं, वे विवेक को अपनाते हैं और जीवन की गरिमा को समझते हैं। इस सुरदुर्लभ दिव्य अनुदान के साथ जुड़े हुए लक्ष्य एवं कर्तव्य का विचार करते हैं और अपनी दिशा आदर्शवादी उत्कृष्टता की निश्चित करते हैं। कदम बढ़ाने से पूर्व ही वे निश्चय कर लेते हैं कि पेट भरने और तन ढकने तक की महत्वाकाँक्षाएँ ही पर्याप्त हैं। निर्वाह के न्यूनतम साधनों से ही उन्हें गुजारा करना है। सम्पन्नता के सपनों में नहीं उलझना है। अपनी प्रभु प्रदत्त क्षमताओं को उन कार्यों के लिए प्रयुक्त करना है जिनसे मनुष्य जीवन की सार्थकता बन पड़ती हो। इस दृष्टिकोण ने उन्हें ऐसे अनेक कार्य प्रस्तुत कर दिये जिनमें व्यक्तिगत स्वार्थ तो पूरा नहीं होता था पर परमार्थ प्रयोजनों की सिद्धि भली प्रकार होती थी। वे उन कार्यों में उसी प्रकार उसी उत्साह से उसी तत्परता से जुट गये जिस प्रकार महत्वाकाँक्षी वैभव सम्पादन में संलग्न होते हैं।
एक ही समय पर एक ही गति से छूटने वाली दो रेल गाड़ियाँ दिशा भिन्नता के कारण चलते चलते इतनी दूर पहुँच जाती हैं जहाँ से उनके बीच का अन्तर आश्चर्यजनक नापा जा सकता है। महामानव अपने जीवन काल में उतने महत्वपूर्ण कार्य कर गुजरते हैं जिससे उनका अन्तरात्मा परमात्मा अजस्र आशीर्वाद की वर्षा करता रहता है। लोकश्रद्धा और ऐतिहासिक सम्मान तो उन्हें मुफ्त के उपहार की तरह मिल जाते हैं।
दोनों को कभी मिलाया जाय और उनकी दलील सुनी जाय तो वे अपनी रीति-नीति की बुद्धिमत्ता सिद्ध करेंगे। दोनों एक दूसरे को मूर्ख बतावेंगे। इनमें से वस्तुतः कौन मूर्ख है कौन बुद्धिमान- कौन घाटे में रहा और कौन लाभान्वित हुआ, इसका निर्णय वे स्वयं भी कर सकते हैं- पर आज के आवेश में नहीं इसके लिए मरण दिन की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। तभी नशा उतरेगा और तभी वस्तु-स्थिति समझ सकना सम्भव होगा, पर खेद इसी बात का है कि तब तक बहुत देर हो चुकी होगी और महत्वाकाँक्षी के लिए अपने चिन्तन को बदलने एवं कर्तव्य को उलटने की गुंजाइश न रह गई होगी।
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मनुष्य का यह दावा कि वह संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है और अपने बुद्धि बल से बड़े शक्तिशाली जानवरों को भी काबू में कर सकता है, अब तक तो सच सिद्ध होता आया था। यह बात और है कि वह इस बात का दावेदार अपने अहंकार के कारण करता रहा हो। अन्यथा देखा जाये तो उसे मच्छरों से पच्चीस साल तक लड़ने के बाद अपनी हार स्वीकार करनी पड़ी है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह स्वीकारोक्ति व्यक्त की है कि यह कहना गलत है, हमने मलेरिया उन्मूलन अभियान में सफलता प्राप्त करली है क्योंकि पच्चीस साल तक इस दिशा में किये गये प्रयासों के बावजूद भी मलेरिया को समाप्त नहीं किया जा सका है।
अकेला मलेरिया ही वह रोग नहीं है जो मच्छरों के कारण होता है। मलेरिया के अतिरिक्त फिलेरिया, डेंगू, फीलपाँव और मस्तिष्क शौथ तथा पीला बुखार तो अलग ही है जिनके उन्मूलन हेतु उस प्रकार का कोई अभियानात्मक प्रयास नहीं चला। देखा जाय तो मनुष्य की तुलना में मच्छर का अस्तित्व नगण्य ही है। मुश्किल से एक मिली मीटर लम्बाई का उसका शरीर और उसका जीवन मात्र तीस दिन। जबकि एक सामान्य मनुष्य का कद साढ़े पाँच फीट होता है अर्थात् हजारों गुना ज्यादा और मनुष्य की आयु भी कई गुना ज्यादा।
मलेरिया किसी समय में बड़ा भयानक रोग रहा है। इसके कारण लाखों लोग अकाल काल कवलित हो चुके हैं। जैसे-जैसे विज्ञान ने प्रगति की और स्वास्थ्य चिकित्सा के क्षेत्र में भी उसका ज्ञान बढ़ने लगा पता चला कि मलेरिया का कारण एक विशेष प्रकार के मच्छर द्वारा काटने से होता है। सर रोनाल्ड रोस ने अपने अनुसंधानों द्वारा यह तथ्य खोज निकाला कि - एनोफिलीज जाति की मादा मच्छर के काटने से मलेरिया होता है। मलेरिया के रोगाणु मच्छरों द्वारा ही मनुष्य शरीर में प्रवेश पाते हैं। इन ‘मलेरियल पैरासाइट’ की उत्पत्ति भी ‘एनौफीलीज मच्छर के पेट में होती है और वे अपने जीवन चक्र का एक अध्याय एनौफीलीज के उदर में ही पूरा कर लेते हैं। सोते या जागते समय मनुष्य को जब एनौफीलीज मच्छर काटता है तो वह रक्त चूसते समय ही इस ‘पैरासाइट्स’ को शरीर में उगल देता है।
रोग के कारण और रोगाणुओं के जीवन चक्र का अध्ययन कर लेने के बाद उसके उपचार की भी खोज हुई और कुनैन इसकी अचूक औषधि सिद्ध हुई और मलेरिया ग्रस्त रोगियों को इसी औषध का सेवन कराया जाने लगा। आमतौर पर जैसा कि होता है एलोपैथिक दवायें रोग पर तो अपना आक्रमण करती ही हैं, रोग के साथ-साथ शरीर के अन्य आवश्यक तत्वों को भी अपनी खुराक बनाती हैं। कुनैन मनुष्य के स्वास्थ्य को अन्य प्रकार से क्षति पहुँचाने के साथ साथ मस्तिष्क के लिए भी कुप्रभावकारी सिद्ध हुई है। पर उसका प्रयोग जारी है।
मलेरिया उन्मूलन अभियान का एक अंग यह कार्यक्रम भी बनाया गया कि उन स्थानों पर जहाँ मच्छर पैदा होते हैं उनके अस्तित्व की सम्भावना को ही निर्मूल कर दिया जाय। मच्छर प्रायः अन्धेरे स्थानों या रुके हुए पानी के गड्ढों पर अण्डे देता है। उन्हें खत्म करने के लिए डी0डी0टी0 की शोध हुई। यह दवा सफल होने लगी और गाँव-गाँव में मकानों से लेकर गड्ढों तक इनका छिड़काव किया जाने लगा। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद व्यापक रूप से इस दवाई का सफलतापूर्वक उपयोग किया जाने लगा, पर कालान्तर में ही पता चला कि मच्छरों की एक ऐसी नस्ल का विकास होने लगा जिन पर डी0डी0टी0 का कोई प्रभाव नहीं होता है। अन्य कीटनाशक दवाओं का निर्माण भी किया गया। मैलेथियान, मैथिल पैरेथियान, एथिल पैरेथियान, फैनथियान जैसी कीटनाशी दवाओं का उपयोग होने लगा, पर सबका परिणाम वही हुआ। मच्छर उन्हें खाकर मर तो जाते थे, पर बहुत से बचे भी रहते और उन बचे हुए मच्छरों की जो सन्तानें होतीं वे फिर कीटनाशी दवाओं के प्रभाव से मुक्त ही रहती। उनमें इन कीटनाशक दवाओं की प्रतिरोधी शक्ति का जन्म हो गया।
जब यह उपाय असफल होने लगे तो पर्यावरण के परिशोधन की ओर ध्यान केन्द्रित किया गया। रुके हुए पानी को तेजी से बहाने, अन्धेरे स्थानों पर सफाई करने और इसी प्रकार के परिवर्तन किये गये। पर मच्छरों ने भी जैसे हार न मानने की कसम खा रखी है। पाया गया कि मच्छरों ने गन्दे पानी में अण्डे देने की अपनी आदत को बदल लिया है और वे साफ पानी पर भी अण्डे देने लगी हैं। क्यूलेक्स तथा स्टिकेन्सी जाति के मच्छरों ने तो गन्दे पानी पर अण्डे देने के स्वभाव को जैसे भुला ही दिया है और धड़ल्ले के साथ साफ पानी, स्वच्छ स्थानों पर प्रजनन करने लगे हैं। कुछ मच्छर तो बहते हुए पानी पर भी अण्डे देते देखे गये हैं।
मलेरिया उन्मूलन अभियान में इस बात पर जोर दिया गया कि उन स्थानों पर रहना ही छोड़ दिया जाये जहाँ कि मच्छरों के आक्रमण की सम्भावना अधिक रहती है। लेकिन इस बात का पता लगते ही यह कार्यक्रम बदल दिया गया कि मच्छर नजदीकी लोगों को ही नहीं दूरस्थ लोगों को भी अपना शिकार बनाते हैं। इस सन्दर्भ में वैज्ञानिकों का मत है कि जंगल के घने अन्धेरे स्थानों पर रहते हुए भी उन्हें मनुष्य की बस्ती का आभास दूर से मिल जाता है। इसका कारण मनुष्य द्वारा श्वाँस-प्रश्वास क्रिया में उत्सर्जित कार्बनडाई-ऑक्साइड गैस है। कुछ मच्छर तो मनुष्य की उपस्थिति दो मील दूर से भी पता लगा लेते हैं। कारण उसके पसीने से निकलने वाली ‘एक्रीन’ और ‘एपोक्रीन’ गन्ध। सामान्यतः कुछ फीट दूर गुलाब के फूल की सुगन्ध भी मनुष्य नहीं पकड़ पाता। इस दृष्टि से मच्छर को आदमी से विशिष्ट शक्ति सम्पन्न ही कहना पड़ेगा और इतना ही नहीं मच्छरों में गजब की सामूहिक भावना भी देखी गई है। एक मच्छर को पता चलता है कि अमुक स्थान पर उसका पेय आहार उपलब्ध है तो वह परा ध्वनि संकेतों द्वारा अपने साथियों को भी आमन्त्रित कर लेता है।
मनुष्य ने मच्छरों को परास्त करने के लिए जैसे-जैसे नये उपाय खोजे, मच्छर भी उसी अनुसार अपना पैंतरा बदलने से नहीं चूके। यों प्रकट रूप में मलेरिया उन्मूलन की गतिविधियाँ पच्चीस-तीस वर्षों से देखने में आ रही हैं, पर इस दिशा में खोज लगभग सत्तर वर्ष से चली रही है। इतनी मोर्चाबन्दी के बावजूद भी मच्छर जैसे नगण्य कीड़े को काबू में न ला पाना मानव की हार नहीं तो क्या है? फिर मनुष्य किस अहंकार में अकड़ा घूमता है कि वह अजेय है।
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दुनिया में कितने ही लोग अच्छी स्थिति में देखे जाते हैं और कितने ही विषम परिस्थितियों के पाटों में पिसते हुए अपना जीवन पूरा कर डालते हैं। दीन-हीन और यथापूर्व स्थिति में रहने वाले अधिकाँश व्यक्ति जब अपने से ऊँची स्थिति वालों की ओर देखते हैं तो उन्हें यह कुढ़न होने लगती है कि भगवान का न्याय बड़ा विचित्र है। एक आदमी तो इतना ऊँचा, सम्पन्न या विद्वान जबकि उसके समान ही मुझे भी माँ-बाप ने जन्म दिया है, मेरे भी दो हाथ और दो पाँव हैं, नाक, कान और आँखें, मुँह हैं। फिर भी मुझमें और सामने वाले में एक और बीस का अन्तर है। इस कुढ़न का अन्त इस सन्तोष के साथ होता दिखाया है कि हमारा भाग्य ऐसा ही है। काश! हमारे भाग्य में ऐसी परिस्थितियाँ होती तो हम इससे भी अधिक और अच्छा, कुछ कर दिखा देते।
निराशमना व्यक्ति अपनी दुर्दशा का सारा दोष परिस्थितियों के मत्थे ही मढ़ देते हैं। उन्हें यह विचार ध्यान में ही नहीं आता कि परिस्थितियाँ उनकी अपनी ही पैदा की हुई हैं। जिन लोगों को आज ऊँची स्थिति में देख रहे हैं यदि उन्हें विरासत रूप में कुछ मिला न हो तो वे भी किसी दिन उनकी ही तरह थे और विरासत के रूप में यदि कुछ मिला है तो जिनसे विरासत में उन्हें मिला है उन्होंने भी कष्टप्रद, कठिन और बुरे दिन देखे थे। वैसी परिस्थितियों से उन्होंने अपने पुरुषार्थ को तराशा है, प्रतिभा को निखारा है तथा प्रयासों को तपाया है। संपन्न देश अमेरिका के धनाढ्यों में जिस व्यक्ति को सर्वाधिक ख्याति मिली है वह है- हेनरी फोर्ड। जिनके कारखाने में बनी कारें सबसे ज्यादा मजबूत और टिकाऊ मानी जाती हैं। फोर्ड परिवार की गणना विश्व के सर्वाधिक सम्पन्न धनपतियों में की जाती है। पर यह भी एक आश्चर्य का विषय है कि उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जिसमें प्रत्येक सदस्य को जीविका के लिए श्रम करना पड़ता था। उनके पिता एक छोटे से किसान थे। केवल इसलिए फोर्ड की उच्च शिक्षा रुक गयी थी। उनके पिता इसका खर्च वहन नहीं कर पा रहे थे। प्रयत्न, लगन और परिश्रम के बल पर उन परिस्थितियों में फोर्ड ने अपना व्यक्तित्व आप बनाया और असफलता की कई मंजिलें पार कर सफल हुए। जिनके कारखाने का छोटा से छोटा मजदूर भी बीस रुपये रोज कमाता है और उस फोर्ड ने जिन परिस्थितियों में जीवन गुजारा उसका अन्दाजा भी नहीं लगा सकते।
फोर्ड की इस सफलता का राज उनकी लगन समझी जाती है। किशोरावस्था में ही उन्होंने कार बनाने का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए जुट गये। उनकी लगन का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि साधना वर्षों में वे रात को मजदूरी करते और दिन में कार का काम करते थे। यह लगन जब पूरी हुई तो फोर्ड चमत्कृत हो उठे। जब उनकी कार ने पहली बार कुछ दूरी तय की तो उन्हें इस पर विश्वास ही नहीं हो सका।
सुई से लेकर रेल के इंजन तक- छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी वस्तुओं के निर्माता उद्योग समूह टाटा के संस्थापक और उसका सिंचन करने वाले जमशेद टाटा के सम्पन्न जीवन के सम्बन्ध में तो बहुतों को पता होगा। लेकिन यह लोग नहीं जानते हैं कि उनका जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था जिसकी जीविका का आधार पुरोहिताई ही था। निवसारी में जन्में और वहीं पले जमशेद जी को आवश्यक शिक्षा प्राप्ति के लिए भी अपने एक सजातीय सज्जन का सहयोग लेना पड़ा था। विद्यार्थी काल में वे एक ऐसी छत वाले कमरे में रहे जिसकी छत बारिश में हमेशा टपकती रहती। शिक्षा प्राप्त कर अपनी व्यवहार कुशलता के बल पर उन्होंने ऐसे साथी तैयार किये जिनके सहयोग से वे स्वयं कारोबार चलाने योग्य साधन जुटा सके। सर्वप्रथम उन्होंने एक कपड़े के कारखाने के में रूप उद्योग जगत में प्रवेश किया और परिश्रम, दृढ़ता तथा व्यवहार कुशलता के बल पर दिनों-दिन आगे बढ़ते गये।
लोग अक्सर किसी का सहयोग न होने की बात कहा करते हैं। सहयोग न तो घर बैठे मिलता है और न ही अनायास। उसके लिए व्यक्ति को उद्यमी होने के साथ-साथ व्यवहार कुशल भी होना चाहिए तभी अभिवाँछित सहयोग मिल सकता है और अभीष्ट परिस्थितियाँ बनायी जा सकती हैं तथा उस आधार पर आगे बढ़ा जा सकता है।
परिस्थितियों का निर्माण मनुष्य स्वयं करता है। न कि परिस्थितियाँ मनुष्य का निर्माण करती हैं। परिस्थितियों पर आश्रित रहने और उनके बदलने की प्रतीक्षा किये बिना यदि मनुष्य स्वयं उसी में रहते हुए उन्हें बदलने का प्रयास करे तो कोई आश्चर्य नहीं कि उसे असफल न होना पड़े। बहुमुखी प्रतिभा के धनी, पत्रकार, राजनीतिज्ञ, वैज्ञानिक, दार्शनिक और समाज सेवी महामानव बैंजामिन फ्रैंकलिन को अपने जीवन का आरम्भ प्रेस की एक छोटी सी नौकरी से करना पड़ा था। वे जब अपने भाई के प्रेस में नौकर हुए तो टाइप धोने, मशीन की सफाई करने, टाइप जमाने, उनकी पोटलियाँ बाँधने और झाड़ू लगाने का काम सौंपा गया। वे अपने पिता की पन्द्रहवीं सन्तान थे और उनके बाद दो छोटे भाई और जन्मे। उन्नीस व्यक्तियों के इस परिवार का निर्वाह साधन मोमबत्तियाँ और साबुन बनाना तथा बेचना था। इस व्यवसाय से इतना उपार्जन भी नहीं होता था कि दोनों समय भरपेट भोजन किया जा सके। अतः दस साल की उम्र में ही उन्हें परिवार की सहायता के लिए काम पर लग जाना पड़ा। कैसा स्कूल और कैसी शिक्षा। लेकिन प्रेस की यह छोटी सी नौकरी, जिसमें नाममात्र का ही वेतन मिलता और उसमें भी कितना ही जुर्माने के रूप में कट जाता। फ्रैंकलिन रुचि और मनोयोग पूर्वक करते रहे। अपने कार्य को अभिरुचि तथा लगन के साथ पूरा करने से फ्रैंकलिन के अन्तःकरण में यह प्रेरणा उठने लगी कि वे इस कार्य में दक्षता प्राप्त करें और उसी के माध्यम से अपने जीवन को ऊँचा उठायें। जिज्ञासा और मनोयोग दोनों ने मिलकर फ्रैंकलिन को सचमुच ही इस कार्य में दक्ष बना दिया। यही नहीं इसी जिज्ञासा के परिणाम स्वरूप फ्रैंकलिन ने अपनी वैज्ञानिक प्रतिभा को भी उभारा। जिस क्षेत्र में भी उन्होंने प्रवेश किया उसी से अपने मनोयोग और श्रम द्वारा अद्भुत निष्णातावस्था प्राप्त की। मनुष्य की परिस्थितियाँ कितनी ही विषम और प्रतिकूल क्यों न हों- यदि वह अपने कार्य को मनोयोग और अभिरुचि पूर्वक पूरा करता रहे तो वह उन्हीं स्थितियों में आगे बढ़ सकता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका में यों तो कितने ही राष्ट्रपति हो चुके हैं और लगभग सभी ने कोई न कोई उल्लेखनीय कार्य किया है, पर अब्राहिम लिंकन का नाम जितने आदर और सम्मान के साथ लिया जाता है वाशिंगटन को छोड़कर शायद ही किसी और ने जनता के दिलों में प्रवेश प्राप्त किया हो। अब्राहम लिंकन के पिता कुल्हाड़े और बन्दूक से अपना जीवन निर्वाह करते थे। कुल्हाड़े से वे लकड़ियाँ काट कर लाते और बन्दूक से जंगली जानवरों से अपनी रक्षा करते। लकड़ी से बनायी गयी एक कुटिया में ही वे निवास करते। अब्राहम लिंकन के पिता अपने बच्चों को पढ़ाने लिखाने योग्य सुविधा साधन भले ही उपलब्ध न करा सके हों, पर उन्होंने काम चलाऊ अक्षर ज्ञान और पढ़ने की अभिरुचि अवश्य जगा दी थी। यही कारण था कि लिंकन लैम्पपोस्ट के उजाले में, चूल्हों में जलने वाली आग की रोशनी में पढ़ते। दिया-बत्ती का प्रबन्ध भी प्रायः मुश्किल होता था और ऐसी परिस्थितियों में पढ़े-लिखे लिंकन जीवन में बार-बार असफल होने पर भी हिम्मत न हारे तथा अन्त में राष्ट्रपति बन ही गये।
अमेरिका में दूसरे दर्जे का जीवन बिताने वाली गोरे लोगों की दासता के चक्र में पिसने वाली मूल जाति नीग्रो में जन्म लेने वाले कॉर्बर को अपने जीवन में क्या-क्या पापड़ नहीं बेलने पड़े। वे ऐसे परिवार में जन्मे थे जिसका सारा जीवन ही उसके स्वामी के इशारों पर कठपुतली की तरह नाचता था। यहाँ तक कि उन लोगों को अपने बच्चों की ब्याह-शादी भी अपने मालिक की मर्जी के अनुरूप करने पड़ते। क्योंकि बच्चे उनकी सन्तान नहीं मालिक की सम्पत्ति होते थे। फिर भी आज्ञाकारिता, नियम निष्ठा और विनम्रता के बल पर जार्ज कॉर्बर ने अपने मालिक से कुछ सुविधायें हस्तगत कर लीं और उनका उपयोग अपने विकास में करने लगे। भविष्य के प्रति आशावान् और वर्तमान के प्रति उत्साहपूर्ण और जागरुक रहते हुए उन्होंने अपने जीवन को सँवारा तथा सफलता के उस शिखर पर जा पहुँचे जिसके कारण कि उन्हें वैज्ञानिक ऋषि कहा जाने लगा। अपने स्वामी से भले ही उन्होंने कुछ विशेष सुविधायें प्राप्त कर ली हों, पर बाहरी जीवन में तो उन्हें पग-पग पर गोरी चमड़ी वालों से उपेक्षा, तिरस्कार और दलन सहना पड़ा। लेकिन कठिनाईयों में भी वे हिम्मत न हारे और आगे ही आगे बढ़ते गये।
यदि देखा जाये तो वे परिस्थितियाँ जिन्हें हम अवरोधक मानते हैं, अवरोध उत्पन्न करने के स्थान पर हमारी सहायता ही करती हैं। कोई व्यक्ति भूख को भले ही समस्या माने और उसके लिए किये जाने वाले उपार्जन प्रयासों को उलझन। पर यदि भूख न होती तो क्या मनुष्य का सक्रिय सचेतन होना सम्भव था। कर्मशीलता और परिश्रम को कहाँ से उत्प्रेरणा मिलती और उसके अभाव में मनुष्य सभ्यता कहाँ बैलगाड़ी से उठकर वायुयान में बैठती। गरीबी और अभावग्रस्तता कइयों के लिए भले ही दुर्भाग्य हो, पर मनस्वी उसी में पुरुषार्थ और उद्यमशीलता की प्रेरणा प्राप्त करते हैं। साधन सम्पन्नता और अनुकूल परिस्थितियाँ कोई भी माँ के पेट से साथ लेकर नहीं आता। सौभाग्यवश कदाचित वे मिल भी जाती हैं तो मानसिक योग्यता और आन्तरिक क्षमताओं के अभाव में उनका उपयोग करना तो दूर रहा उल्टे दुरुपयोग होने लगता है और सब कुछ मिलने के बावजूद भी आदमी अन्त में कंगाल हो कर खड़ा रह जाता है।
बहुधा लोग शिक्षा और विद्वत्ता के सम्बन्ध में तो अधिक ही परिस्थितियों पर निर्भर करते हैं। सोचते हैं कि यदि अच्छे घर में जन्म न हो, पढ़ने -लिखने की सुविधाएँ न मिलें, उपयुक्त परिस्थितियाँ लभ्य न रहें तब तो आदमी कुछ कर ही नहीं सकता। जबकि सचाई यह है कि अन्य क्षेत्रों में परिस्थितियाँ भले ही कुछ सहायता कर जायें, विद्या और ज्ञान के सम्बन्ध में तो उनका जरा भी वश नहीं चलता। अनुकूल परिस्थितियां होते हुए भी कई धनवानों के बच्चे अनपढ़ और गँवार रह जाते हैं तथा परिस्थितियाँ व साधन न होते हुए भी कितने ही गरीब बच्चे विद्वान और ज्ञानी बन जाते हैं। इस सम्बन्ध में तो यह कहावत भी मशहूर है कि ‘लक्ष्मी और सरस्वती की कृपा कभी एक साथ नहीं होती।’ इस कहावत में सचाई का कितना अंश है यह विवादास्पद हो सकता है पर यह उतना ही सुनिश्चित और ठोस सत्य है कि गरीब व्यक्ति भले ही धनवान न बने, ज्ञानवान् तो बन ही सकता है। कालिदास, सूरदास, तुलसीदास से लेकर प्रेमचन्द, शरतचन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, रामचन्द्र शुक्ल, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकान्त त्रिपाठी, निराला, जगन्नाथ प्रसाद रत्नाकर आदि कितने ही विद्वान साहित्यकार हुए हैं, जिनकी पूर्व और उपरान्त आर्थिक स्थिति काफी शोचनीय और कम अच्छी रही है फिर भी उन्होंने निजी प्रयासों और तप−साधनाओं के बल पर जगत् को कुछ दे पाने में सफलता प्राप्त की। यदि शिक्षा और विद्या के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ अथवा सम्पन्नावस्था इतनी ही आवश्यक थी तो इन सब का उच्चकोटि के सृजनशील साहित्यकार हो पाना मुश्किल ही नहीं असम्भव भी था।
सफलता और उत्कर्ष आन्तरिक उपलब्धि है जब कि अच्छी स्थिति और अनुकूल परिस्थितियाँ बाहरी साधन, ठीक उसी प्रकार जैसे अन्न भण्डार के मालिक का आहार की दृष्टि से स्वस्थ और पोषक अन्न ग्रहण कर पाना कोई आवश्यक नहीं है। यदि पेट की कोई बीमारी हो तो लाखों मन अनाज भरा होने पर भी पावभर रोटी हजम कर पाना मुश्किल है और जिसे खुलकर भूख लगती है उसे उद्यम करने के लिए उठ खड़े होना ही पड़ेगा। आन्तरिक विशेषताओं की मनःस्थिति और क्षमताओं को यदि मोड़ा जाये, जगाया जाये तो लाख परिस्थितियाँ बाधक हों, सूरमा योद्धाओं की तरह विजय के गढ़ पर सफलता का ध्वज लहराने का अवसर आ कर ही रहेगा, मिलकर ही रहेगा। सफलता और जीवन में विजयाकाँक्षियों को चाहिए कि वे परिस्थितियों का रोना ही न रोते रहें अपनी मनःस्थिति का काया-कल्प कर आत्मोत्थान के पथ पर आरुढ़ हों।
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शरीर पर मन का नियन्त्रण है इस तथ्य को हम प्रतिक्षण देखते हैं। मस्तिष्क की इच्छा और प्रेरणा के अनुरूप प्रत्येक अंग अवयव काम करता है। प्रत्यक्ष रूप से दिखाई देने वाले क्रियाकलाप हमारी मानसिक प्रेरणाओं से ही प्रेरित होते हैं। जो कार्य स्वसंचालित दिखाई पड़ते हैं वे भी वस्तुतः हमारे अचेतन मन की क्षमता एवं प्रवीणता से संचालित होते हैं। श्वास-प्रश्वास, रक्ताभिषरण, आकुँचन-प्रकुँचन, निद्रा-जागृति, पाचन मल-विसर्जन जैसी स्वयमेव चलती प्रतीत होने वाली क्रियाएँ भी अचेतन मन के द्वारा गतिशील रहती हैं। शरीर को ऐसा घोड़ा मानना चाहिए जिसकी प्रत्यक्ष और परोक्ष नियन्त्रण सत्ता पूरी तरह मस्तिष्क के हाथ में है।
मस्तिष्क को स्वस्थ, संतुलित और हल्का-फुलका रखे बिना कोई व्यक्ति अपने शरीर को नीरोग एवं परिपुष्ट रख सकने में सफल नहीं हो सकता। मन पर उद्वेगों का तनाव छाया रहेगा तो शरीर का आहार-विहार ठीक रहने पर भी रोगों के आक्रमण होने लगेंगे और बढ़ती हुई दुर्बलता अकाल मृत्यु की ओर तेजी से घसीटती ले चलेगी। इसके विपरीत यदि हँसते-हँसाते शान्त संतुलित मनःस्थिति में जीवनयापन हो रहा होगा तो शरीरगत असुविधाओं के रहते हुए भी स्वास्थ्य अक्षुण्ण बना रहेगा।
शरीर की देखभाल रखने और उसे स्वस्थ, सुन्दर रखने के लिए खुराक, साज-सज्जा, सुविधा आदि का जितना ध्यान रखा जाता है, उतना ही ध्यान मस्तिष्क को उद्वेग रहित, सन्तुष्ट एवं प्रसन्न रखने का प्रयत्न किया जाये तो स्वास्थ्य रक्षा की तीन चौथाई समस्या हल हो सकती है।
परिस्थिति वश उद्विग्न रहने की बात अक्सर कही जाती है, पर वास्तविकता इससे सर्वथा भिन्न है। मानसिक कुसंस्कार के कारण चिन्तन की सही रीति-नीति से अपरिचित होने के कारण ही तरह-तरह के विक्षोभ हमें घेरते हैं। संसार में ऐसे व्यक्तियों की कमी नहीं जो अनेकों समस्याओं और कठिनाइयों से घिरे रहने पर भी अपनी मनःस्थिति को विक्षुब्ध नहीं होने देते और हँसते-हँसाते सामने प्रस्तुत उलझनों को सुलझाने के लिए धैर्य और साहस पूर्वक जुटे रहते हैं। इसके विपरीत ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो राई की बराबर कठिनाई को पहाड़ के बराबर मान लेते हैं और तिल को ताड़ के रूप में देखने की मानसिक दुर्बलता के कारण निरन्तर उद्विग्न बने रहते हैं।
चिन्ता, निराशा, खीज, झूँझल, आवेश, चिड़चिड़ापन, ईर्ष्या, द्वेष, आशंका जैसी विक्षोभकारी प्रवृत्तियां अकारण ही अपनाये रहने वालों की कमी नहीं। ऐसे लोग अपनी इस मानसिक रुग्णता के कारण शरीर को भी रोगी बना लेते हैं और असमय में ही अकाल मृत्यु के मुँह में जा घुसते हैं। धैर्य, साहस, विवेक और सन्तुलन के आधार पर हलका-फुलका जीवन सहज ही जिया जा सकता है और अपेक्षाकृत अधिक सरलतापूर्वक कठिनाइयों का समाधान किया जा सकता है। स्वास्थ्य संरक्षण की दृष्टि से तो मानसिक सन्तुलन की स्थिरता और प्रसन्न रहने की आदत नितान्त आवश्यक है।
कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के संरक्षण में चलने वाले ईथलपर्सी जेरोन्टालाजी सेन्टर के प्राध्यापक प्रो0 जोसफ ह्राचविक ने जीवन और मृत्यु सम्बन्धी अपने लम्बे शोध कार्य का निष्कर्ष यह निकाला है कि औसत आदमी थोड़ी भलमनसाहत से चले और सावधानी बरते तो आसानी से 100 वर्ष जीवित रहता है। अधिकाँश लोग समय से पहले अपनी ही गलतियों के कारण बेमौत मरते हैं।
जल्दी मरने के लिए विवश करने वाले उनने प्रमुख कारण तीन गिनाये हैं- (1) अखाद्य आहार का अनावश्यक मात्रा में खाते रहना (2) शारीरिक श्रम से जी चुराना और दिनचर्या अनियमित रखना (3) मस्तिष्क पर चिन्ताओं का तनाव लादे फिरना।
डा0 डब्ल्यू0 सी0 डालवीरिस के मेयोक्लीनिक में पन्द्रह हजार उदर रोगियों का न केवल उपचार वरन् गम्भीर अध्ययन भी किया गया। इस शोध का निष्कर्ष यह प्रकाशित किया गया कि 70 प्रतिशत रोगियों के पीछे यह व्यथा इसलिए पड़ी कि वे परिस्थितियों के साथ अपना तालमेल न बिठा सके, फलतः मानसिक उद्विग्नता ने उनके पेट को विषाक्त बनाकर रख दिया।
उद्योग क्षेत्रों के अमेरिका डाक्टरों के वार्षिक सम्मेलन में एक अनुभवी डा0 हेराल्ड सी0 ने अपने विश्लेषण का सार प्रस्तुत करते हुए कहा- व्यावसायियों में से 44 प्रतिशत रक्तचाप और उदर रोगों से पीड़ित पाये गये हैं। इसका कारण उनकी तनाव पूर्ण मनःस्थिति होती है। उन्होंने यह भी कहा-प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ वहन करने वालों में से आधे आदमी ढलती आयु तक पहुँचने से पहले ही स्नायु संस्थान के रोगी बन जाते हैं। इसका कारण उनका चिन्तित और उद्विग्न रहना है।
अब संसार में मूर्धन्य शरीर विज्ञानी इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि- अस्वस्थता की जड़े शारीरिक पदार्थों एवं अवयवों में ढूंढ़ते रहने से काम न चलेगा, अब मस्तिष्कीय स्थिति को निदान एवं उपचार में प्रमुखता दी जानी चाहिए क्योंकि आधी से अधिक रुग्णता पेट से रक्त से नहीं वरन् मस्तिष्क से उत्पन्न होती है। इस सन्दर्भ में ‘साइकोसोमेटिक’ नामक एक स्वतन्त्र शास्त्र को विकसित किया जा रहा है।
विख्यात चिकित्सक ओ॰ एफ॰ ग्रोवर बारह वर्ष तक उदर से पीड़ित रहे। बहुत उपचार करने के पश्चात भी जब निराशा हाथ लगी तो वे एक मनोविज्ञानवेता के पास गये। उसने बताया कि यदि आप चिन्ता मुक्त हंसता-हंसता जीवन जीने लगें तो प्रस्तुत व्यथा से छुटकारा पा सकते हैं। डॉ0 ग्रोवर ने मनोयोगपूर्वक अपने मस्तिष्क और स्वभाव में परिवर्तन करना आरम्भ किया और वे अन्ततः उसी उपचार से रोग मुक्त हो सके। इसके उपरान्त उन्होंने अपने रोगियों को भी वैसा ही परामर्श देना आरम्भ किया फलतः उपचार की सफलता आश्चर्यजनक परिणाम में बढ़ती चली गई। अपने अनुभवों का निचोड़ बताते हुए उनने लिखा है- “यदि रोगियों की मनःस्थिति को चिन्ता मुक्त एवं हलका-फुलका बनाया जा सके तो औषधि उपचार की सफलता कई गुनी अधिक बढ़ सकती है। वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि स्नायु दौर्बल्य, हृदय व्याधि, अनिद्रा, अजीर्ण, गठिया, रक्तचाप जैसे जटिल रोगों की जड़ वस्तुतः उद्विग्न मनः स्थिति में ही होती है। मन का शरीर पर असाधारण रूप से अधिकार है, इस तथ्य को हम जितनी अच्छी तरह और जितनी जल्दी समझ सकें उतना ही अच्छा है।’
नोबेल पुरस्कार विजेता एलेग्जी केरेल का कथन है कि संसार में जितने लोग शारीरिक विकृतियों से मरते हैं उससे कहीं अधिक की अकाल मृत्यु मनोविकारों के कारण होती है। रोगों की रोकथाम के लिए औषधि उपचार एवं शल्य चिकित्सा जैसे प्रयत्नों से ही काम न चलेगा मनुष्य को किस प्रकार चिन्ता मुक्त रहना चाहिए यह रहस्य भी उसके गले उतरना चाहिए।
संसार भर में उदर रोगों में अब ‘अल्सर’ के मरीजों की संख्या दस प्रतिशत तक पहुँच गई है। यह महाव्याधि खर्चीले उपचारों को भी अनूठा दिखाती हुई गहरी जड़े जमाये बैठी रहती है और टस से मस नहीं होती। जोसेफ एफ॰ मोन्टग्युमरी अल्सर के विशेषज्ञ माने जाते हैं उनने अपनी पुस्तक ‘नर्वस स्टमक ट्रबल’ नामक पुस्तक में लिखा है यह महाव्याधि आहार सम्बन्धी विकृतियों से उतनी नहीं होती जितनी कि चिन्ता, आशंका और भयाक्रान्त मनःस्थिति के कारण।
लम्बे समय तक स्नायु दौर्बल्य से ग्रसित रोगियों की मरणोत्तर पोस्टमार्टम प्रक्रिया द्वारा खोज-बीन की गई तो पता चला कि उनके स्नायु संस्थान साधारण मनुष्य जैसे निर्दोष थे जो कष्ट वे भुगत रहे थे वह मात्र मस्तिष्कीय विकृति की प्रतिक्रिया भर थी।
अब दार्शनिक प्लेटो की उस लताड़ को याद किये जाने लगा है जिसमें उनने चिकित्सकों को कहा था वे शरीर को ठोकने ,बजाने में न लगे रहें वरन् रोगियों के मस्तिष्क की ढूंढ़ खोज करना सीखें।
‘स्टौप वरी एण्ड गैटवैल’ नामक ग्रन्थ के लेखक एडवर्ड पोडोलन ने रक्तचाप, गठिया, जुकाम, मधुमेह, उदर विकार जैसे रोगों का मूलकारण उद्विग्नता को बताया है और कहा है भली चंगी शारीरिक स्थिति के लोग भी मानसिक सन्तुलन खोने पर इन या ऐसे ही अन्य रोगों से ग्रसित होते देखे गये हैं। दन्त चिकित्सकों के सम्मेलन में उस विज्ञान के विशेषज्ञ डॉ0 आइ0 एल0 मैकस्गोनिगल ने अपने अनुभव के आधार पर कहा था- दाँतों की जड़े हिला देने और मसूड़ों को सड़ा देने वाले कारण में मानसिक तनाव सबसे अग्रणी है।
विलियम जेम्स ने कहा है- “हमारे पापों को भगवान तो क्षमा कर सकता है, पर स्नायु संस्थान के लिए यह सम्भव नहीं कि हमारी मानसिक विकृतियों को सहन कर सकें।”
यूरोप और अमेरिका के सभ्यताभिमानी देशों में जिन पाँच प्रधान रोगों के कारण अधिक लोग मरते हैं उनमें ‘आत्म हत्या’ भी एक प्रधान रोग है। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि आत्म हत्या का प्रमुख कारण मानसिक उद्वेग ही होता है।
द्वितीय महायुद्ध में 3 लाख से कुछ अधिक व्यक्ति लड़ाई के मैदान में मरे थे, पर उन्हीं दिनों दस लाख से अधिक व्यक्ति हृदय रोग से आक्रान्त होकर मर गये। इसका कारण तलाश करने पर यही समझा गया कि युद्ध जन्य विभीषिका से उद्विग्न होकर लोग सन्तुलन खोने लगे और एक महाव्याधि के चंगुल में फंसकर अपनी जान गंवा बैठे।
प्रो0 एनाय हार्वन का कथन है कि- जितना ध्यान शारीरिक चिकित्सा पर दिया गया है, उतना यदि मानसिक अस्वस्थता के निवारण पर दिया जाता तो लोग अधिक नीरोग और सुखी रह सकते थे। मानसिक अस्वस्थता घेरे रहने पर शरीर संरक्षण के लिए किये गये प्रयास अधिक सफल नहीं हो सकते।
अपने को प्रगतिशील और द्रुतगामी समझने वाला मनुष्य कितनी ही बातों में सामान्य पशु-पक्षियों से भी गया बीता है। विशेषता तो उसकी भावना एवं विवेकशीलता की ही है, यदि वह भी न हो तो भौतिक दृष्टि से तो वह पिछड़ा हुआ ही माना जायेगा।
तेज दौड़ने की प्रतियोगिता में मनुष्य को फिसड्डी ही ठहराया जा सकता है। जल जीवों में सेलफिश नामक मछली 68 मील प्रति घण्टा की चाल से तैरती है। इसके बाद सोईफिश का नम्बर है उसकी चाल 60 मील है। ये मछलियाँ अपने गलफड़ों से पानी की तेज धार छोड़ती हैं। जिससे उन्हें धक्का लगता है और आगे बढ़ने में सहायता मिलती है। जेट वायुयानों का निर्माण इसी सिद्धांत पर हुआ है वे हवा को पीछे और नीचे धकेलने की विधि अपनाकर ही अपनी चाल बढ़ा सकने में सफल होते हैं।
नभचरों में फ्रिगेट मत्स्यभोजी पक्षी सौ मील प्रति घण्टा की चाल से उड़ता है। इससे भी अधिक चाल वेहरी और वेतसाई चिड़ियों की है वे कभी कभी डेढ़ सौ मील की चाल से भी उड़ती देखी गई हैं। हंस की गति तो 60 मील प्रति घण्टा से अधिक नहीं होती, पर वह 29 हजार फुट की ऊंचाई पर उड़ सकता है।
थलचरों में चीता अग्रणी है उसकी दौड़ 70 मील प्रति घण्टा तक होती है। अमेरिका का प्रोगहार्न और मंगोलिया का चौसिंगा हिरन 60 मील की गति से कुलांचे भरते हैं। पचास मील की चाल से तो घोड़े भी दौड़ लेते हैं। खरगोश और शिकारी कुत्तों की धावन गति 40 मील प्रति घण्टा है।
मनुष्य अधिक से अधिक 20 मील की चाल से दौड़ पाया है सो भी तब जब उसे सिर्फ 100 गज ही दौड़ना हो। इससे आगे तेज दौड़ना हो तब तो उसके फेफड़े ही फूल जायेंगे। इस चाल को तो नेवला भी चुनौती दे सकता है वह 22 मील की चाल से दौड़ता है।
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गायत्री उपासना को नित्य कर्म माना गया है। शरीर की भूख बुझाने जीवन-यापन के लिए उपयुक्त शक्ति संग्रह के लिए- आहार करना नित्य कर्म है। मल विसर्जन स्नान आदि की स्वच्छता भी नित्य कर्म है। इसी प्रकार आत्मा को भोजन देने- आत्मबल संचय करके उत्कर्ष की क्षमता प्राप्त करने के लिए उपासना भी नित्य कर्म है। कपड़े धोना, झाडू लगाना, स्नान, दन्तमंजन आदि स्वच्छता कर्मों की तरह ही मनः क्षेत्र पर आये दिन जमने वाले कषाय-कल्मषों का परिशोधन करना भी नित्य उपासना का एक प्रयोजन है। आहार और स्वच्छता की व्यवस्था न करने पर शरीर निर्वाह कठिन हो जाता है उसी प्रकार उपासना न करने पर आत्मा दिन-दिन दुर्बल होता है। आत्मिक क्षेत्र विकृतियों से भरा चला जाता है। अस्तु आजीविका उपार्जन-विश्राम आदि दैनिक कृत्यों की तरह उपासना को भी आध्यात्मिक नित्य कर्म माना गया है।
भारतीय संस्कृति में उपासना के लिए जो नित्य विधान है। उसे सन्ध्या कहते हैं। सन्ध्या, दिन और रात्रि के मिलन काल को कहते हैं। प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व का और सायं सूर्यास्त से पीछे का समय सन्ध्या काल माना गया है। इस समय सन्ध्या वन्दन कृत्य आवश्यक हैं। कहीं-कहीं प्रातः मध्याह्न और सायं त्रिकाल सन्ध्या का भी विधान है। अन्यथा दो बार सन्ध्या करने की परम्परा निवाहने पर तो बहुत जोर दिया गया है। इस कृत्य के निर्वाह की प्रशंसा की गई है जो इस दिशा में आलस बरतते हैं, उपेक्षा करते हैं उनकी शास्त्रकारों ने कटु भर्त्सना की है।
सन्ध्या के कई विधान प्रचलित हैं, पर उन सब में गायत्री उपासना अनिवार्य है। गायत्री के बिना किसी भी विधान के अनुसार सन्ध्या कृत्य पूर्ण नहीं हो सकता। जिन्हें अन्य विधान न आते हों वे केवल गायत्री जप करके भी सन्ध्या कृत्य पूर्ण कर सकते हैं।
सन्ध्या कृत्य के साथ गायत्री उपासना का शास्त्रीय निर्देश अनेक स्थानों पर मिलता है। यथा-
एतदक्षरमेतां जपन् व्याहृति पूर्वकाम। सन्ध्ययोर्वेदविद् विप्रो वेद पुण्येन मुच्यते॥
-मनु0 2।78
सन्ध्या करते हुए व्याहृति सहित गायत्री का जप करने से वेदाध्ययन का फल प्राप्त होता है।
आचार्यस्त्वस्य यां जातिं विधिवद् वेद परागः। उत्पादयति सावित्र्या सा सत्या साऽजराऽमरा॥
-मनु0
वेदों का ज्ञाता आचार्य सावित्री का उपदेश देकर जन्म देता है वही जाति सच्ची और अजर, अमर होती है।
पूर्वां सन्ध्यां जपंस्तिष्ठेत् सावित्रीमार्कदर्शनात्। पश्चिमां तु समासीनः सम्यगृक्षविभावनात्॥
-मनु 2।101
सूर्योदय से पूर्व प्रातः कालीन सन्ध्या में खड़े होकर और सायं कालीन सन्ध्या में जब तक सूर्य दीखे तब तक बैठकर जप करने से मन का निग्रह होता है।
संध्यासु चार्य्यदानं च गायत्री जपमेव च। सहस्रत्रितयं कुर्वन्सुरैः पूज्यो भवेन्मुने॥
-वशिष्ठ
“तीनों सन्ध्याओं में अर्घ्य देवे और प्रत्येक सन्ध्या में एक हजार गायत्री जप करे तो हे मुने! वह मनुष्य देवताओं द्वारा भी पूज्य हो जाता है।”
समस्तसप्ततन्तुभ्यो जपयज्ञ परः स्मृतः। हिंसान्ये प्रर्वतन्ते जपयज्ञो न हिंसया॥
ते सर्वे जप यज्ञश्च नाहति षोडशीकलां। जपने देवता नित्यं स्तूयमाना प्रसीदति॥
प्रसन्ना विपुलान् भोगान् दधान्मुक्तिन्च शाश्वतीम्। यक्ष राक्षस वैतालः भूतप्रेत पिशाचकः। जपाश्रयीं द्विजं दृष्टा दूरं ते यान्ति भीतितः॥
-भारद्वाज
जप यज्ञ अधिक श्रेष्ठ है। उसमें हिंसा आदि का दोष नहीं है।
जप द्वारा प्रसन्न हुए देवता प्रचुर योग साधन तथा अक्षय शक्ति प्रदान करते हैं।
जप करने वाले साधक को देखते ही यक्ष, राक्षस, बैताल, भूत-प्रेत, पिशाच आदि डरकर भाग जाते हैं।
जप की श्रेष्ठ साधना को निरन्तर श्रद्धापूर्वक अपनाना चाहिए।
एवं सन्ध्या विधि कृत्वा गायत्रीं च जपेद स्मरेत्। गायेचिष्यान् यत स्त्रायेदभार्यां प्राणांस्तथैव च।
-अग्नि पुराण
“सन्ध्या विधिपूर्ण करने के पश्चात गायत्री का जप और स्मरण करना चाहिये। गायमान होने से अर्थात् उपासना करने से वह गुरु, शिष्य, स्त्री, और प्राणी सब का उद्धार करती है”।
महाभारत में महर्षि मार्कण्डेय और राजा युधिष्ठिर के संवाद रूप गायत्री का विस्तृत माहात्म्य बताया गया है। उसके कुछ श्लोक इस प्रकार हैं-
क्न्तिच्छौचं भवेद्येन विप्रः शुद्धः सदा भवेत्। तदिच्छामि महा प्राज्ञ श्रोतुधर्माभृतांवर॥
हे धर्म धुरीण युधिष्ठिर मैं वह विधान सुनना चाहता हूँ जिस आचरण से ब्राह्मण का ब्राह्मणत्व परिष्कृत होता है।
युधिष्ठिर ने कहा-
सायं प्रातश्च सन्ध्यां ब्राह्मणोह्युप सेवते। प्रजपन पावनीं देवीं गायत्री वेदमातरम्। स तयापावितो देव्या ब्राह्मणो नष्ट किल्विष्यः। न सीदेत् प्रतिग्रह नो महीमपि सागरात्।
जो ब्राह्मण प्रातः सायं परमपावनी वेद माता गायत्री का जप सन्ध्योपासना सहित करता है। वह पाप प्रवृत्तियों से छुटकारा पाकर परम पवित्र हो जाता है और प्रतिग्रह पाप से बचा रहता है।
ध्यामाच्छान्तो जपेन्मन्त्रं जपाच्छान्तश्च चिन्तयेत्। जपध्यानादियुक्तस्य विष्णुः शीघ्रं प्रसीदति॥
जपिनं नोपसर्पन्ति व्याधयश्चाऽऽधयो ग्रहाः। भुक्तिर्मुंक्तिर्मृत्युजयो जपेन प्राप्नुयात्फलम्॥
-अग्नि पुराण
शाँत चित होकर मन्त्र का जप करना चाहिए। जप और ध्यान दोनों की संयुक्त साधना में भगवान की प्राप्ति जल्दी ही होती है।
जप करने वाले को शारीरिक व्याधियाँ और मानसिक व्यथाएं नहीं सताती। जप करने वाला भक्ति और मुक्ति दोनों ही प्राप्त करता है।
सामान्य उपासना की अपेक्षा अनुष्ठान पुरश्चरणों का विशेष महत्व एवं परिणाम बताया गया है। यह उचित ही है। उपासना में निर्धारित क्रिया-कृत्य कर लेना ही पर्याप्त माना जाता है, पर अनुष्ठान पुरश्चरणों में साधक को कितने ही प्रकार के प्रतिबन्ध उस अवधि में लगाने पड़ते हैं और तपस्वी जैसा जीवन जीना पड़ता है। (1) उपवास (2) ब्रह्मचर्य (3) भूमिशयन (4) अपनी शारीरिक सेवा अपने हाथों करना (5) चमड़े से निर्मित वस्तुओं का त्याग यह पाँच नियम स्थल आचरण में पालन किये जाने के हैं। शारीरिक, मानसिक और आर्थिक पापों से बचना सज्जनोचित रीति, नीति अपना कर उन दिनों उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व से भरा पूरा जीवन निर्वाह करना पड़ता है।
सामान्य रीति से बारूद जला देने पर थोड़ी सी रोशनी एवं आवाज होती है, पर यदि उसी बारूद को बंदूक की नली में बन्द करके चलाया जाय तो प्रचण्ड शक्ति उत्पन्न होती है। सामान्य प्रतिबन्ध रहित साधना और तपस्वी जीवन क्रम अपनाकर समग्र तादात्म्य की मनःस्थिति में अधिक समय तक की जाने वाली उपासना का निश्चित रूप से अधिक प्रतिफल होता है। आत्मबल संवृद्धि की दिशा में बढ़ने के लिए उपयुक्त प्रकाश प्राप्त करना इन अनुष्ठान पुरश्चरणों का प्रमुख प्रयोजन होता है। साधन की कठिनता के अनुरूप ही उनकी उपलब्धियाँ भी बढ़ी-चढ़ी होती हैं।
लक्ष द्वादश युक्तस्तु पूर्ण ब्राह्मण ईरितः। गायत्र्या लक्ष हीनं तु वेद कार्ये न योजयेत्।1।
चतुर्विंशति लक्षं वा गायत्री जप संयुतः। ब्राह्मणस्तु भवेत्पात्रं सम्पूर्ण फल योगदम्।2।
तस्माद्दानं जपे होमे पूजायां सर्व कर्माणि। दान कर्तुं तथा त्रातु पात्रं तु ब्राह्मणोर्हति।3।
-शिव पुराण
बारह लाख गायत्री जपने पर पूरा ब्राह्मण कहलाता है। जिसने एक लाख भी जप न किया हो उसे वेद कार्यों में सम्मिलित नहीं करना चाहिए।
जिस ब्राह्मण ने 24 लक्ष गायत्री जप कर लिया हो, वही सत्पात्र कहलाता है। उसी के फल की आशा की जा सकती है।
इस लिए दान, जप, होम, पूजा आदि कर्मों में केवल उपरोक्त प्रकार के सत्पात्र को ही लेना चाहिए।
सावित्री मप्यधीपित शुचौ देशे मितासनः। अहिंसो मन्दकोऽजल्यो मुच्यते सर्व किल्विषै।
-महा. शान्ति पर्व 35।37
“जो पवित्र स्थान में मिताहारी हो हिंसा का सर्वथा त्याग करके राग-द्वेष, मान-सम्मान आदि से शून्य हो मौन भाव से गायत्री का जप करता हो वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।”
चतुर्विंशति लक्षं वा गायत्री जप संयुतः।
ब्राह्मणस्तु भवेत पात्रं सम्पूर्ण फल योगदम्।
चौबीस लक्ष गायत्री जप करने वाला ब्राह्मण पूजा के योग्य है। उसके द्वारा किये हुए सभी धर्मकृत्य सुफल होते हैं।
लभतेऽभिमतां सिद्धिं चतुर्विंशति लक्षतः। जपतोऽयुतसख्याकैरधवा च सहस्रकैः॥
इस गायत्री महामन्त्र के चौबीस लाख का जप करने से मानव अपनी अभीष्ट सिद्धि को प्राप्त किया करता है। दस हजार की अथवा सहस्र की संख्या वाले जप से भी परम कल्याण का लाभ होता है।
लभतेऽभिमतां सिद्धि चतुर्विंशति लक्षतः। चतुर्विंशति लक्षं तु यज्ञ कल्प यतं यथा॥
-याज्ञवलक्य
24 लक्ष जप करने से सिद्धि प्राप्त होती है और यज्ञ कल्प फल प्राप्त होता है।
दिवा चैव जपं कुर्यात पौरश्चरणिको द्विजः। पत्रा वल्यां पलाशस्य मिताहारी भवेन्निशि॥
-ब्रह्म संहिता
“पुरश्चरण करने वाले साधक को दिन में जप करना चाहिए और सन्ध्या हो जाने पर पलाश की पत्तल में लघु आहार करना चाहिए।”
कुशैर्विनिर्मितायां तु शय्यायां वस्त्रमात्मनः। सद्यः प्रक्षालितं दत्वा एकाकी निर्भयः स्वयेत॥
-ब्रह्म0
“कुश से तैयार की हुई शय्या पर स्वयं ही धोया हुआ स्वच्छ वस्त्र बिछावें और उस पर रात्रि में निर्भय होकर शयन करें।
एवं प्रतिदिनं कुर्यात् संख्या यवन्न पूर्यंते। तदन्ते महतीं पूजां कुर्याद् विप्रांश्च तर्पयेत्॥
-ब्रह्म0
“इस प्रकार प्रतिदिन जप करते हुए चौबीस लाख की संख्या पूरी करनी चाहिए और अन्त में पूजा, होम करके विद्वानों को तृप्त करना चाहिए।”
गायत्र्याश्च पुरश्चर्या सर्व्रकाम प्रदायिनी। कथिता तव देवर्षे महापापविनाशिनी।
आदौ कुर्याद्व्रतं मन्त्री देहशोधनकारकम्। पुरश्चर्या ततः कुर्यात्समस्तफलभाग्भवेत्।
इति ते कथितंगुह्यं पुरश्चर्याविधानकम्।
-देवी भागवत्
गायत्री पुरश्चरण समस्त कामनाएं पूर्ण करने वाला है। इससे समस्त पाप भी दूर होते हैं। पुरश्चरण कर्ता को प्रथम देह शोधन करना चाहिए इसके पश्चात ही फल प्राप्त होता है, पुरश्चरण की सफलता का यही सार है।
अथातः श्रूयतां ब्रह्मन् गायत्र्याः पापनाशनम्। पुरश्चरणकं पुण्यं यथेष्टफलदायकम्॥
पर्वताग्रे नदीतीरे बिल्वमूले जलाशये। गोष्ठे देवालयेऽश्वत्थे उद्याने तुलसीवने॥
पुण्यक्षेत्रेगुरोः पार्श्वे चितैकाग्रयस्थलेऽपि च। पुरश्चरणकृत्मंत्री सिध्यत्येव न संशयः॥
यस्य कस्यापि मंत्रस्य पुरश्चरणमा रभेत्। व्याहृतित्रतसंयुक्तां गायत्रीं चायुतं जपेत॥
नृसिंहार्कवराहाणां ताँत्रिकं वैदिकं तथा। विना जप्त्वा तु गायत्रीं तत्सर्वं निष्फलं भवेत्॥
मंत्रं संशोध्य यत्नेन पुरश्चरणतप्परः। मंत्रशोधनपूर्वांगमात्मशोधनमुत्तमम्॥
आत्मतत्वशोधनाय त्रिलक्ष प्रजपेद्बुधः। अथवा चैकलक्ष तु श्रुतिप्रोक्तेन वर्त्मना॥
आत्मशुद्धिं विना कर्तुर्जपहोमादिकाः क्रिया। निष्फलास्तास्तु विज्ञेयाः कारणं श्रुतिचोदितम्॥
-देवी भागवत (पुरश्चरण प्रकरण)
हे ब्राह्मण! यथेष्ट फल देने वाली, पापी नाशक गायत्री के पुरश्चरण का विधान सुनो।
पर्वतीय प्रदेश में नदी, तीर, विल्व, मूल, जलाशय, गौ, गौष्ठ, देव मन्दिर, पीपल पेड़, उद्यान, तुलसी वन, पवित्र तीर्थ, गुरु के समीप, चित को एकाग्र रखने वाले, स्थान में पुरश्चरण करने से उपासक को निश्चित रूप से सफलता मिलती है।
भले ही नृसिंह, सूर्य, वाराह आदि किसी अन्य ताँत्रिक वैदिक मन्त्र का अनुष्ठान करना हो, पर उससे पूर्व दस सहस्र गायत्री जप तो अवश्य ही कर लें। यदि इतना न करेगा तो कोई भी मन्त्र सफल न होगा।
पुरश्चरण करने वाले को पहले- (1) मन्त्र शोधन (2) आत्म-शोधन करना चाहिए। गायत्री जप से मन्त्रों का शोधन होता है। आत्म शोधन के तीन लाख, न्यूनतम एक लाख गायत्री का जप करे। इसके उपरान्त ही किसी मन्त्र का पुरश्चरण जप, होम, तर्पण सफल हो सकता है।
विना न येन सिद्धः स्यान्मन्त्रो वर्षशतैरपि। तत् पुरश्चरणं नाम मन्त्रसिद्धार्थमात्मनः॥
-अगस्त
केवल मन्त्र जप से दीर्घकाल तक भी सिद्धि नहीं मिलती। सफलता पानी हो तो पुरश्चरण करना चाहिए।
गायत्री के 24 अक्षर हैं। प्रति अक्षर एक लाख के हिसाब से पूरे मन्त्र के 24 लाख जप को एक पूर्ण पुरश्चरण कहते हैं यह 6 घण्टा नित्य समय लगाने पर एक वर्ष में पूरा होता है। कम समय लगाना हो तो वह अवधि उसी अनुपात से आगे बढ़ जायेगी। मध्य अनुष्ठान सवा लाख जप का होता जो 40 दिन में पूरे करने का विधान है। सबसे छोटा 24 हजार जप का होता है जिसे 9 दिन में पूरा करना होता है।
सामान्यतः प्रतिदिन एक हजार जप का नियम बनाया जा सके तो उत्तम है। इसमें प्रायः एक घण्टा लग जाता है। न्यूनतम 10 बार भी हो सकता है यह दस उंगलियों पर गिनकर पूरा हो सकता है। थोड़ी अधिक सुविधा हो तो सौ प्रतिदिन अर्थात्- एक माला का जाप करना चाहिए।
विशेष परिस्थितियों में, विशेष प्रयोजनों के लिए दस हजार जप की विशिष्ट उपासना कर लेने का भी विधान है। इस दस हजार की संकल्पित साधना को अनुष्ठान तो नहीं कह सकते, पर सामान्य जप क्रमशः उनका विशेष महत्व है। इसे न्यूनतम तीन दिन में और अधिकतम दस दिन में पूरा करना चाहिए। उपवास, ब्रह्मचर्य यह दो नियम तो इसमें भी आवश्यक है। उपवास में फलाहार पर रहना कठिन हो तो एक अन्न और एक शाक पर निर्वाह करना भी सामान्य उपवास में गिना जा सकता है। इस सामान्य साधनाओं के सम्बन्ध में निर्देश इस प्रकार मिलते हैं-
सहस्र कृतस्त्वभ्यस्य वहिरेतत् त्रिकं द्विजः। महतोऽप्ये नसोमासात्व चे वाहिर्विमुच्यते॥
“जो द्विज ग्राम या नगर से बाहर जलाशय के समीप ओंकार, व्याहृति तथा गायत्री का जप एक हजार की संख्या में करे वह महा पाप से ऐसे छूट जाता जैसे साँप केंचुली से।”
सहस्रपरमांनित्यंशतमध्यांदशावराम्। सावित्रींवैजपेद्विद्वान्प्रांगमुखः प्रयतःस्थितः॥
एक सहस्र सावित्री का जाप सर्वश्रेष्ठ नैत्यिक जाप है- एक सौ मध्यम श्रेणी का है और कम से कम दस बार ही जाप करना अधम कोटि में आता है। विद्वान पुरुष को इस सावित्री का जाप पूर्वाभिमुख होकर प्रयत समवस्थित रहकर ही करना चाहिए।
सहस्र परमां देवि शत मध्यां दशावराम्। गायत्रीं यो जपोद्विप्रो न स पापेन लिप्यते॥
-अत्रिस्मृति
गायत्री का प्रतिदिन एक सहस्र जप करना अति उत्तम है। शत मन्त्र जप मध्यम है। दस मन्त्र स्वल्प है। अपनी सामर्थ्यानुसार दस, सौ या हजार बार गायत्री जप करना चाहिए। ऐसा करने वाला पापों में लिप्त नहीं होता।
गायत्र्याः शत सहस्रात् पूतो भवति मानवः। जप्त्वा सहस्रं गायत्र्याः शुद्धो ब्रह्मवधाद ऋते॥
-योगि याज्ञवलक्य
गायत्री का सौ या हजार बार जप करते रहने से मनुष्य पवित्र एवं ब्रह्मविद हो जाता है।
न न्यूनं नातिरिक्तं च जपं कुर्याद् दिने दिने। प्रारम्भ दिनमारभ्य समाप्ति दिवसावधि॥
-वशिष्ठ संहिता
“आरम्भ के दिन से लेकर समाप्ति तक गायत्री मन्त्र का एक बराबर जप करना चाहिए। कम या ज्यादा जप करना ठीक नहीं।”
दशसाहस्रमभ्यस्ता गायत्री शोधनी परा।
(लघु अत्रि संहिता)
“गायत्री का दश सहस्र जप अत्यन्त शुद्धि करने वाला होता है।”
सर्वेंषामेव पापानां संकरे समुपस्थिते। दशसाहस्रिकाभ्यासो गायत्र्याः शोधनम्परम्॥
(याज्ञ0 गा0 व्या0)
“ जब बहुत पाप आकर मिल जाये तो गायत्री का दस सहस्र जप करना परमशोधन करने वाला होता है।”
सामान्य गायत्री प्रातः सायं स्नानादि से निवृत्त होकर विधि-विधान के साथ करनी चाहिए। पर जिन्हें अधिक अवकाश है वे सुविधा के समय मानसिक जप कभी भी करते रह सकते हैं। इसी प्रकार अत्यधिक व्यस्त अथवा अव्यवस्थित दिनचर्या वाले व्यक्ति भी जब भी अवकाश मिले तभी उपासना कर सकते हैं। पर ऐसी असमय की अथवा अनियमित उपासना मुँह बन्द रखकर मानसिक जप के रूप में ही चलनी चाहिए। ऐसी उपासना रास्ता चलते-सोते या किसी अन्य काम को करते हुए भी की जा सकती है। मौन जप में किसी प्रकार का विधि विशेष प्रतिबन्ध नहीं है।
अथ हैतदन्तःश्रि। योऽय सन्धायौष्ठा उच्चः स्वरमाश्रावयति श्रीर्वै स्वरोऽन्तरत एव तच्छियन्धते। अत्रादो भवति॥
-शतपथ 11।4।2।11
जो मुँह बन्द करके स्वर साधना करता है उसकी श्री भीतर ही बनी रहती है। स्वर ही श्री है। जो उसे भीतर ही रखता है सो तृप्त हो जाता है- उसके अभाव पूर्ण हो जाते हैं।
यान पात्रे च याने च प्रवाशे राजवेश्मनि। परां सिद्धिमवाप्नोति सावित्रीं ह्युत्तमां पठन्॥
-अनुशासन पर्व 150।68
“जो जहाज में या किसी सवारी में बैठने पर विदेशों में या राजदरबार में जाने पर मन ही मन उत्तम गायत्री का जप करता है, वह परम सिद्धि को प्राप्त होता है।
अशुचिर्वा शुचिर्वापि गच्छन् तिष्ठन् स्वपन्नपि। मंत्रैक्शरणो विद्वान् मन सैव सदाभ्यसेत्। न दोषो मानसे जाप्ये सर्व देशोऽपि सर्वदा।
-शारदा तिलक
पवित्र हो अथवा अपवित्र, चलते-फिरते, बैठते-उठते, सोते-जागते एक ही मन्त्र की शरण लेकर उसका सदा मानसिक जप करता रहे। मानसिक जप में किसी समय या स्थान का दोष नहीं होता।
अशुचिर्वा शुचिर्वापि गच्छन् तिष्ठन् यथा तथा। गायत्री प्रजपेद्धीमान् जपात् पापान्निवर्तते॥
-गायत्री तन्त्र
अपवित्र हो अथवा पवित्र हो, चलता हो अथवा बैठा हो, जिस भी स्थिति में हो बुद्धिमान मनुष्य गायत्री का जप करता रहे। इस जप के द्वारा पापों से छुटकारा हो जाता है।
कुर्वन्नापि त्रुटीर्लोके बालको मातरम् प्रति। यथा भवति कश्चिन्न तस्यां अप्रीति भाजनः।
कुर्वन्नापित्रुटी भक्त कश्चित् गायत्र्युपासने। न तथा फल माप्नोति विपरीत कदाचन्॥
-गायत्री संहिता
जिस प्रकार संसार में माता के प्रति भूल करने पर कोई माता बालक से शत्रुता नहीं करती, उसी प्रकार उपासक से कोई भूल हो जाने पर भी गायत्री माता कुपित नहीं होती।
गायत्री और यज्ञ का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। गायत्री को भारतीय संस्कृति की जननी और यज्ञ को भारतीय धर्म का पिता कहा गया है। दोनों के संयोग से गायत्री यज्ञ का पुनीत धर्मानुष्ठान बनता है। अनुष्ठान पुरश्चरणों के अन्त में गायत्री यज्ञ आवश्यक है। पर्व त्यौहारों, संस्कारों में गायत्री यज्ञ की व्यवस्था करनी चाहिए। विशेष शुभारम्भों- हर्षोत्सवों में गायत्री यज्ञ की व्यवस्था विशेष रूप से रखी जानी चाहिए। गायत्री को सद्ज्ञान और यज्ञ को सत्कर्म का प्रेरक माना गया है। दोनों के समन्वय से अध्यात्म की सर्वांगपूर्ण पृष्ठभूमि बनती है।
होतव्या च यथशक्त्या सर्वकाम समृद्धि दा। सावित्री सारमात्रोऽपि वरं विप्रः सुयंत्रितः॥
अपनी शक्ति के अनुसार इस गायत्री मंत्र का हवन भी करना चाहिए। हवन से यह समस्त समृद्धियों को प्रदान करने वाली होती है। सावित्री के सार मात्र वाला भी विप्र श्रेष्ठ और सुयन्त्रित होता है।
वेदशास्त्रपुराणानामयेव सुनिश्चयः। गायत्र्या जप होमादि विधिः सर्वार्थ साधकाः।
“वेद, शास्त्र, पुराण आदि का यह निश्चित मत है कि गायत्री का जप, हवन आदि सर्वार्थ साधक होता है।”
पूजा होमादिकं चैव यत्कृतं त्वदनुग्रहात्। तेन प्रीताभव त्वं भोः शुद्धे मे मानसं कुरु॥
“हे माता! तुम्हारी कृपा से मैंने जो पूजा, हवन आदि किये हैं, उनसे प्रसन्न होकर आप मेरे मन को शुद्ध करो।”
अहंतां सत्य पैशुन्ये कामंक्रोधं मदम् रुजम। हिसां नास्तिक्यम् अज्ञानम् अदयां दम्भकैतवे॥
ब्रीड़त्वम् अनृजुत्वं च दारिद्रयं शोक मत्सरौ। अक्षमां च अभिताहारं भयं निद्रां सुखेतरम्॥
अधैर्यं दुष्टसंचार नीच संगं त्वविधताम्। आसुरभावं इत्यष्टाविंशत्याहुतिभि र्हुवेत्॥
“अहंकार, असत्य, पिशुनता, काम, क्रोध, मद (घमण्ड), रोग, हिंसा, नास्तिक भाव, अज्ञान, अदया (क्रूरता), दम्भ, कैतव, लज्जा, कुटिलता, दरिद्रता, शोक, मत्सर, क्षमा हीनता, अधिक भोजन, भय, निद्रा, दुःख, अधैर्य, दुष्टता, नीच का संग, अविद्या, आसुरी भाव इन 28 दुर्गुणों की आहुति देनी है।”
गायत्री को अग्नि कहा गया है। अग्नि से ऊष्मा, प्रज्ज्वलनशीलता, सम्पर्क में आने वाले को आत्मवत् बना लेने की क्षमता जैसी अनेकों विशेषताएं है। यही गुण गायत्री में भी है। वह साधक को ब्रह्म तेजस् युक्त बनाती है और उसके कलाष-कल्मषों को जलाकर निर्मल प्रखरता प्रदान करती है। इसे सामान्य आग नहीं ब्रह्माग्नि, यज्ञाग्नि समझा जाना चाहिए।
तस्या अग्निदेव मुखम् यदि हवा अपि वह्विवाग्नावभ्यादधति, सर्व मेव तत्संदहति एवं œ हैवं विद्यद्यपि वह्विव पापं कुरुते सर्वमेव तत्सप्साय शुद्धः पूतोऽजरोऽमृतः सम्भवति।
-शतपथ 8।14।8
गायत्री का अग्नि मुख है। जैसे अग्नि विशाल काष्ट ढेर को जला डालती है उसी प्रकार गायत्री उपासक के पूर्वकृत पापों को नष्ट कर डालती है।
निः सरन्ति महामन्त्रा महाग्ने र्विस्फुलिंग वत्।
अर्थात्- “अग्नि की विशाल राशि से चिनगारियाँ निकलने की तरह समस्त मन्त्र वर्षा गायत्री से आविर्भूत होते हैं।”
गायत्री यज्ञः। गो0 पृ0।4।24
गायत्री यज्ञ रूप हैं।
चिदग्निकुण्ड सम्भूता देवकार्य समुद्यता॥
“ हे महादेवि! तुम देव कार्य की सिद्धि के लिए ज्ञान रूप अग्निकुण्ड से उत्पन्न होती हो।”
यो वा अत्राग्नि गायत्री
-श॰ ।8।2।15
यह दिव्य अग्नि गायत्री ही है।
गायत्री उपासना में निरत साधकों को छोटे या बड़े रूप में- दैनिक अथवा सामयिक यज्ञ आयोजनों के लिए यथासम्भव प्रयत्नशील रहना चाहिए। गायत्री जप और यज्ञ कृत्य के मिलने से सर्वांगपूर्ण साधना का लाभ मिलता है।
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उपासना के अतिरिक्त अंशदान भी
आत्मोत्कर्ष का लक्ष्य यह है कि आत्मा का हर दृष्टि से विकास विस्तार परमात्मा के समतुल्य हो। बूँद समुद्र से मिले। छोटा निर्झर गंगा में अपने आपको समर्पित करके अपनी लघुता को महानता में विकसित करे। ईश्वर व्यापक है- जीव सीमित। ईश्वर दिव्यता का समुद्र है- जीव पर मलीनता की परत भी है। उपासना एवं साधना का उद्देश्य यह है कि जीवन अपनी मलीनताओं से छुटकारा प्राप्त करने का प्रयत्न करे और अपने इष्टदेव की-भगवान की- समीपता समता प्राप्त करता हुआ आत्मिक प्रगति के पथ पर बढ़ता चला जाय। इस प्रगति का परिचय इसी कसौटी पर मिलता है कि व्यक्ति ने संकीर्ण स्वार्थपरता को किस सीमा तक छोड़ा और अपनी आत्मीयता का विस्तार कितनी परिधि तक फैलाया।
उपासना के दो आधार हैं- एक ईश्वर का स्वरूप निर्धारण दूसरा उसकी समीपता, अनुकम्पा प्राप्त करने का प्रयत्न। स्वरूप निर्धारण में प्रायः मनुष्य आकृति की किसी प्रतिमा को ध्यान पूजन का प्रतीक बनाया जाता है। यह प्रतीक प्रतिमाएं मनुष्यकृत हैं। उनके निर्माण का उद्देश्य ध्यान साधना के लिए आधार खड़ा करना भर है। भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम एवं भगवान कृष्ण को पूर्ण पुरुष कहा जाता है। उनकी वास्तविक प्रतिमा बना सकना कठिन है। क्योंकि उनके अवतरण काल में यथार्थ चित्रकला का कोई प्रमाणिक आधार उपलब्ध नहीं है। जो भी चित्र या प्रतिमा गढ़ी हैं वे मानवी कल्पना पर अवलम्बित हैं। यहीं कारण है कि अनेकानेक आकृतियां प्रतिमाएं बनती और बनाई जाती रहती हैं। राम की प्रतीक स्थापना में ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ बनने और कृष्ण प्रतिमा में पूर्ण पुरुष बनने का लक्ष्य है। इष्ट अर्थात् लक्ष्य। हमारी आत्मिक प्रगति किस स्तर की हो- उसका स्वरूप क्या हो इसका निर्धारण इष्टदेव की स्थापना के आधार पर होता है। शिव जैसा वैराग्य, गणेश जैसी बुद्धि, सरस्वती जैसा ज्ञान, लक्ष्मी जैसा वैभव, सूर्य जैसा तेज आदि जो भी पूर्णता का अन्तिम बिन्दु हो उसकी प्रतीक प्रतिमा स्थापित करके उपासना के ध्यान पक्ष को सहारा दिया जाता है। प्रतीकों की आवश्यकता इसी निमित्त होती है।
उपासना के अवसर पर प्रयुक्त होने वाले क्रिया-कलाप एवं उपचार भी आधार मात्र हैं। उनके सहारे चेतना को यह प्रशिक्षण दिया जाता है कि आत्मोत्कर्ष के अभिलाषी को अपने गुण, कर्म, स्वभाव में क्या परिवर्तन एवं परिष्कार करना चाहिए। संक्षेप में जीवन विकास का लक्ष्य और उस के लिए अपनाई जाने वाली रीति-नीति के सम्बन्ध में चेतना को अधिकाधिक परिचित एवं प्रशिक्षित करना ही समूचे उपासना विज्ञान का एकमात्र उद्देश्य है। आत्मिक प्रगति पूरी तरह उदात्त दृष्टिकोण और आदर्श क्रिया-कलाप के दोनों चरण बढ़ाते हुए- दोनों पहिये घुमाते हुए ही सम्भव होती है। ईश्वर भक्ति का उद्देश्य न इससे कम है और न अधिक।
अखण्ड ज्योति के परिजनों को हम आरम्भ से ही आस्तिकता की आवश्यकता और उपासना की उपयोगिता समझाते रहे हैं। हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण भाग उपासना के निमित्त ही समर्पित रहा है। इसके अतिरिक्त जो भी सम्पर्क में आया है उसे आस्तिकता अपनाने और उपासना में संलग्न होने का परामर्श देते रहे हैं। इसका सत्परिणाम भी सामने आया है। ईश्वर भक्ति का आश्रय लेकर जिन सत्परिणामों का लाभ मिला है, उस पर हमें सन्तोष है, साथ ही इस प्रेरणा द्वारा लाभान्वित होने वालों को देखकर भी यह विश्वास दिन-दिन बढ़ा है कि ईश्वर की समीपता के लिए किये गये प्रयत्न मनुष्य के लिए हर दृष्टि से श्रेयस्कर ही सिद्ध होते हैं।
अपनी आस्था के प्रति अधिक भाव भरी और अधिक प्रखर श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए इस वर्ष विशेष प्रयत्न किया गया है। यह हमारी साधना का स्वर्ण-जयंती वर्ष है। विगत पचास वर्षों से हम अपनी अगाध आस्था ईश्वर भक्ति के केन्द्र पर केन्द्रित किये रहे हैं। इस मार्ग पर चलते हुए जिन उपलब्धियों का दिव्य अनुदान मिलता रहा है उनने इस प्रयत्न के लिए विवश कर दिया है कि इस विशेष वर्ष में आस्तिकता के विस्तार का अधिक प्रयत्न किया जाय। तद्नुसार 45 मिनट की सामूहिक साधना का उपक्रम बना- सम्बद्ध परिजनों को उसमें सम्मिलित होने का आमन्त्रण दिया गया। प्रसन्नता की बात है कि अपने प्रस्तुत परिजनों में से एक लाख को सम्मिलित करने की सीमा लगभग पूरी होने को है। गायत्री जयन्ती 8 जून 76 को उसमें प्रवेश बन्द हो जायगा। इसके पश्चात प्रस्तुत साधक अपने क्षेत्र में अनुसाधक बनाते रहेंगे और स्थानीय साधना मण्डलों का गठन करके उनकी गतिविधियाँ वार्षिक सूत्रों आधार पर सजीव बनाये रहने के लिए प्रयत्न करते रहेंगे।
ईश्वर इतना विस्तृत है कि उसके समग्र स्वरूप एवं क्रिया-कलाप को न तो उपकरणों के माध्यम से प्रयोगशाला में प्रत्यक्ष किया जा सकता और न मानवी बुद्धि अपनी समीपता के कारण उस असीम की विवेचना कर सकती है। ‘अणोरणीयान् महती महीयान्’ की व्याख्या विवेचना तो नहीं, पर अन्तरात्मा के मर्मस्थल में अनुभूति हो सकती है। इस अनुभूति के दो आधार हैं- एक साकार दूसरा निराकार। साकार परमेश्वर यह विश्व ब्रह्मांड है। शिवलिंग और शालिग्राम की गोल-मटोल प्रतिमाएं इसी के प्रतीक रूप में गढ़ी गई हैं। भगवान राम ने कौशल्या और काकभुसुण्डि को- भगवान कृष्ण ने अर्जुन और यशोदा को-यही अपना विराट् रूप दिखाया था। साकार ईश्वर की उपासना लोक मण्डल के सत्प्रयोजनों में संलग्न रहकर की जा सकती है।
निराकार ईश्वर कोमल भाव सम्वेदनाओं और उत्कृष्ट विचारणाओं में परिलक्षित होता है। उन्हीं की प्रेरणा से आदर्श कर्तृत्व बन पड़ता है। अन्तरंग जीवन में निराकार ईश्वर की प्रतिष्ठापना करनी होती है और बहिरंग क्रिया-कलाप में विराट् विश्व कि लिए अपने साधनों को समर्पित करना होता है। इन्हीं दोनों तथ्यों को चेतना में अधिकतम गहराई तक उतारने के लिए पूजा उपचार के विधि-विधानों का आश्रय लिया जाता है। यह सब कैसे होता है? इस पर विस्तृत प्रकाश जनवरी, फरवरी के अंगों में परिजन पढ़ चुके हैं। हममें से प्रत्येक को उन तथ्यों पर बार-बार विचार करना चाहिए। सच्ची ईश्वर उपासना का आधार उसी माध्यम से खड़ा हो सकता है और ईश्वर भक्ति के जो लाभ माहात्म्य बताये गये हैं उन्हें जीवन शोधन के राजमार्ग पर चलते हुए ही पाया जा सकता है।
यदि साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष में उपासना उपचार में उत्साह उत्पन्न करने के साथ-साथ उसके पीछे प्राण चेतना की तरह काम करने वाले तथ्यों को भी हृदयंगम कराया जा सकता तो ही इस प्रबल प्रयत्न की सार्थकता समझी जा सकती है- जिसमें एक लाख भावनाशील परिजनों को आग्रहपूर्वक सम्मिलित किया गया है। उपासना की 45 मिनट वाली पूजा प्रक्रिया जिस उत्साह से की जा रही है उतने ही विश्वासपूर्वक उस तत्वज्ञान को, जीवन दर्शन को, परमलक्ष्य को अपनाया जाना चाहिए जिनसे इस सुरदुर्लभ मनुष्य की सार्थकता सिद्ध होती है। दर्शन की अपेक्षा करके मात्र उपचार ही अपनाया गया तो समझना चाहिए कि निष्प्राण शरीर की सेवा, सज्जा मात्र के लिए श्रम किया जा रहा है।
ईश्वर भक्ति किस स्तर की हो रही है- आत्मोत्कर्ष की दिशा में प्रगति किस क्रम से चल रही है इसकी परख जिस कसौटी पर हो सकती है- वह है- “अंश दान।” संकीर्ण स्वार्थ-परता को उदात्त परमार्थ परायणता में विकसित करना ही ईश्वर भक्ति का उद्देश्य है। इस उद्देश्य की कहाँ कितनी पूर्ति हो रही है- इसकी जाँच पड़ताल अंश दान में बढ़े-चढ़े उत्साह को देखकर ही जानी जा सकती है।
अंश दान का तात्पर्य है ईश्वर के प्रति अपनेपन का समर्पण। ईश्वर का मनुष्य के प्रत्यक्ष सम्पर्क में जो भाग आता है उसमें एक है-सद्भावना और दूसरा है लोक-साधना। दोनों के समन्वय है- “सद्भाव सम्वर्धन की लोक साधना” इस प्रयत्न में संलग्न रहकर ही मनुष्य अपनी पशु प्रवृत्तियों से छुटकारा पाता है और आत्म विस्तार के साथ जुड़े हुए देवत्व का अधिग्रहण करता है।
पूजा प्रक्रिया में कई प्रकार की वस्तुएं देवता को समर्पित करनी पड़ती हैं। धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प जल को पंचोपचार सामग्री माना गया है। इनमें उपलब्ध पाँच संपत्तियों को सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए उदारतापूर्वक अर्पण करना है। ईश्वर ने हर व्यक्ति को इतनी सम्पदाएं देकर भेजा है कि वह उनसे अपना काम चला सके और दूसरों को सहारा दे सके। उपयोग न जानकर कोई दरिद्र रहे तो बात दूसरी है, पर वस्तुतः कुछ अपंग असमर्थों को छोड़कर कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जिसे दरिद्र कहा जा सके। हर किसी के पास समय, श्रम, चिन्तन, प्रभाव की ईश्वर प्रदत्त विभूतियाँ मौजूद हैं। इनके सहारे धन, संपत्ति, विद्या, बलिष्ठता, कीर्ति और सुविधा रूपी पाँच संपत्तियां कमाई जाती हैं। इन विभूतियों और संपत्तियों से न्यूनाधिक मात्रा में हर व्यक्ति सम्पन्न है।
इस वैभव का एक अंश ईश्वरीय दिव्य प्रयोजन के लिए अर्पित करते रहने का नाम ‘अंश दान’ है। इसे और भी स्पष्ट रूप से समझना हो तो यों समझना चाहिए कि उच्च आदर्शों के प्रति अपनी आस्था और ईश्वर के प्रति सच्ची निष्ठा का प्रमाण परिचय देने के लिए अपने पास विभूतियों और संपत्तियों का जो संग्रह है उसका बढ़ा-चढ़ा अंश सदुद्देश्य के लिए अर्पित करते रहा जाना चाहिए। किसी आवेश, दबाव, अवसर या प्रयोजन के लिए व्यक्ति कई बार दान-पुण्य करते देखे जाते हैं, पर वह सामयिक होता है। उत्साह उबलता और ठण्डा होता रहता है। इतने भर से अन्तःकरण पर स्थिर संस्कार नहीं जमते। स्थिर संस्कार उत्पन्न करने के लिए प्रयोग निरन्तर चलते रहने चाहिए। व्यायाम, संगीत का निरन्तर जारी रखने में ही लाभ है। भोजन, निद्रा, स्वच्छता की नित्य आवश्यकता पड़ती है। स्वाध्याय और उपासना को भी नित्य कर्म में सम्मिलित रखा जाता है। ठीक इसी प्रकार अंश दान हमारा नित्य कर्म होना चाहिए। स्थूल संपत्ति के रूप में धन और सूक्ष्म संपत्ति के रूप में श्रम सद्भाव संवर्धन के लिए नित्य ही नियोजित किया जाना चाहिए। यही है अंश दान, जिसके आधार पर दृष्टिकोण की उदारता और अन्तःकरण में विकसित आत्म भाव का प्रमाण मिलता है।
परिजनों को हम आत्मिक प्रगति का-ईश्वर भक्ति का अनिवार्य अंग ‘अंश दान’ को आरम्भ से ही बताते रहे हैं। ज्ञान -यज्ञ के लिए-न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य नियमित रूप से लगाते रहने की बात पर हम उतना ही जोर देते रहे हैं जितना कि उपासनात्मक विधि-विधान पर। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि उपचारों को देवता से वरदान झटकने का जादू समझकर बाल बुद्धि उतने भर को ही सब कुछ मान बैठती है- अंश दान की बात वे उपेक्षा के गर्त में फेंक देती हैं। हमें यह देखकर निराशा होती है कि बीज बोने में तो बच्चे भारी दौड़-धूप करते हैं किन्तु अंकुर में खाद, पानी लगाने की आवश्यकता न समझते। यह तथ्य है कि भगवत् भक्ति के सारे विधि-विधान-परमार्थ प्रयोजनों के लिए अंश दान में कृपणता बरतने पर निष्प्राण और निरर्थक बनकर रह जाते हैं। मरुभूमि में बोया हुआ बीज खाद, पानी के अभाव में नष्ट ही हो जाता है। संकीर्ण स्वार्थपरता की अनुदार मनोभूमि में ईश्वर भक्ति का कल्पवृक्ष बोया तो कितनों ने ही है, पर उनमें से पल्लवित और फलित एक का भी न हुआ।
‘भज-सेवायाम्’ धातु से भजन शब्द बनता है, जिसका स्पष्ट अर्थ है- ‘सेवा साधना’। ‘सेवा-पूजा’ समानार्थक शब्द है और बोलचाल में साथ-साथ प्रयुक्त होते हैं। भक्ति भावना की आत्मीयता के विस्तार के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ माना गया है। इसमें अपनेपन की- सीमित परिधि को अधिकाधिक विस्तृत करने का स्पष्ट संकेत है। अपना सुख बाँट देने और दूसरों का दुःख बंटा लेने की उदारता जहाँ जिस सीमा तक उमंगती हो समझना चाहिए कि वहीं उसी सीमा तक सच्ची भक्ति भावना प्रवाहित हो रही है। लौकिक धन, वैभव और पारलौकिक स्वर्ग सिद्धि के लिए किये गये पूजा, उपचार उद्देश्य में स्वार्थ-परता भरी रहने के कारण ईश्वर को प्रभावित नहीं कर पाते। उनसे आत्मिक पवित्रता की वृद्धि होगी ही नहीं, ऐसी दशा में आत्मोत्कर्ष के फलस्वरूप मिल सकने वाली विभूतियों से पूजा परायण रहने पर भी सफलता की कोई प्रकाशवान किरण सामने नहीं आती।
आस्तिकता और उदारता एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं। आत्म-संयम द्वारा अपने लिए न्यूनतम उपयोग की बात सोचनी पड़ती है तभी परमार्थ के लिए उदार अनुदान दे सकना सम्भव होता है। इस सत्प्रवृत्ति को विकसित करने के लिए नित्य का अंश दान उतना ही आवश्यक माना जाना चाहिए जितना उपासना उपचार। अंश दान चाहे न्यूनतम ही क्यों न हो? पर वह नित्य और नियमित रूप से होना चाहिए। इससे संयम, परमार्थ, अनुदान, आत्म-विस्तार जैसी अनेकों सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने का अवसर मिलता है। इस ओर उपेक्षा बरतने पर कर्मकाण्डों का निर्जीव कलेवर ही हाथ रह जाता है। प्राणवान् सजीवता तो उदार सेवा साधना के सहारे ही विकसित होती है।
हमारा जीवन प्रयोग प्रत्यक्ष है। अगाध ईश्वर विश्वास और प्रगाढ़ श्रद्धा भक्ति ने हमें हर घड़ी कोंचा है कि जो कुछ पास में है उसका बढ़ा-चढ़ा अंश ईश्वर के लिए- सद्भाव संवर्धन की लोक-साधना के लिए-समर्पित किया जाय। इस दिशा में बढ़ते हुए प्रत्येक चरण ने हमें असीम आनन्द दिया है और अनुदान की मात्रा बढ़ाते चलने के लिए विवश किया और अन्ततः इस स्थिति तक पहुँचाया है कि अपनी जैसी कोई भी वस्तु शेष नहीं रह गई है। समय, श्रम, चिन्तन एवं कौशल का एक-एक कण लोक-साधना में निरत है। धन तो सबसे हलकी वस्तु होने के कारण उसकी एक-एक पाई पहले से ही समर्पित हो चुकी है। समर्पण की अध्यात्म दर्शन में असीम महिमा है। यह समर्पण-शरणागति- वाचालता तक सीमित नहीं रहनी चाहिए उसे यथार्थवादी होना चाहिए।
साधन पथ के सहचरों से हमने बार बार अनुरोध किया है कि वे उपासना का कल्पवृक्ष अवश्य बोयें किन्तु साथ ही अंश दान से उसके पोषण का प्रबन्ध भी करें। यही अनादि काल से होता है और यही अनन्त काल तक चलता रहेगा। अध्यात्म के सत्परिणाम देखने हो तो वृक्षारोपण के साथ साथ उसके लिए खाद पानी का प्रबन्ध भी किया जाना चाहिए।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष के साधकों ने जिस उत्साह से उपासनात्मक सरल प्रक्रिया अपनायी है उसी उत्साह से उन्हें कठिन परीक्षण के लिए भी साहस जुटाना चाहिए। अंशदान की बात न तो अनावश्यक है और न अपेक्षणीय। सच तो यह है कि अंशदान प्राण है और उपचार आवरण। उपासना की एक बार उपेक्षा की जा सकती है और अंश दान की अभिवृद्धि करते हुए जीवन लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है, पर मात्र मन्त्र तन्त्र तक सीमित कृपणता की परिधि में जकड़ी हुई उपासना कोई महत्वपूर्ण प्रतिफल प्रस्तुत न कर सकेगी। ईश्वर की अनुकम्पा भावना-स्तर की परख पर आधारित है, उसे मात्र टंट-घंट के सहारे आकर्षित नहीं किया जा सकता, इस तथ्य को जितनी अच्छी तरह, जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही अच्छा है। यहाँ उपासना की निरर्थकता नहीं बताई जा रही है। उसे कलेवर कहा जा रहा है और सेवा साधना को प्राण के रूप में प्रतिपादित किया जा रहा है। मनुष्य शरीर और प्राण दोनों का ही समन्वय है। इनमें से कोई भी अकेला होने पर अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति नहीं कर सकता । उपासना में हमें श्रद्धावान होना चाहिए साथ ही सेवा साधना की गरिमा के प्रति भी निष्ठा में त्रुटि नहीं आने देनी चाहिए।
मनुष्य की समग्र सुख शाँति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति का एकमात्र आधार अध्यात्म तत्व को माना गया है। जिसका व्यावहारिक स्वरूप, उत्कृष्ट, चिंतन एवं आदर्श कर्त्तव्य-सद्भाव एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन होता है। विचार क्रान्ति, ज्ञान, यज्ञ, भावनात्मक परिष्कार आदि नामों से इसी तत्वज्ञान की व्याख्या की जाती रही है- गायत्री और यज्ञ इसी आदर्श के प्रतीक प्रतिनिधि हैं। दृष्टिकोण से भरी हुई विकृतियाँ ही अगणित समस्याएं और विपत्तियां उत्पन्न करती हैं। परिष्कृत विवेकशीलता अपनाने पर समस्त संकटों का समाधान निकल सकता है अस्तु हमें पत्ते सींचने की अपेक्षा जड़ सींचने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए हमें सद्भाव संवर्धन एवं सत्प्रवृत्तियों के विकास को सर्वोपरि महत्व देना चाहिए। हमारा अंश दान इधर उधर बिखरने की अपेक्षा इसी मूल सिंचन पर केन्द्रित रहे तो ही अधिक श्रेयस्कर है। संपत्ति एवं सुविधा संवर्धन के प्रयास दूसरे लोग कर रहे हैं, हमें सद्भाव सम्पदा के उन्नयन में एकाग्र भाव से जुटे रहना चाहिए। हमारा अंशदान इस प्रयोजन के लिए लग सके तो एक महान लक्ष्य को पूरा कर सकने में यह परिवार अधिक सफल सिद्ध हो सकेगा।
“प्रतिदिन एक घण्टा समय और दस पैसा” ज्ञान यज्ञ के लिए देने और उसमें झोला पुस्तकालय चलाना जन सम्पर्क साधने और नवयुग की विचारधारा पढ़ाने सुनाने में इस अनुदान को लगाते रहने का अनुरोध हम चिर काल से करते रहे हैं। परिजनों से इसके लिए बार-बार अधिक आग्रह पूर्वक कहा है। उपेक्षा करने पर बुरा मनाया है कारण स्पष्ट है। हम उपासना को एक पक्ष और अंशदान को उसका पूरक दूसरा पक्ष मानते हैं इसलिए दोनों तथ्यों पर समान रूप से बल देते हैं। एकाँगी प्रयासों में असफलता ही हाथ लगती है। अस्तु हमें उपेक्षित पक्ष की वकालत इन पंक्तियों में अधिक जोर देकर करनी पड़ रही है और कहना पड़ रहा है कि ईश्वर भक्ति का रथ दोनों पहियों वाला होना चाहिए। हमारे प्रति व्यक्तिगत स्नेह सौजन्य प्रकट करना हो तो भी उसकी प्रामाणिकता हमारा अनुरोध आग्रह स्वीकार करने के रूप में यथार्थवादी होनी चाहिए।
जिस उत्साह से एक लाख परिजनों ने साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष की उपासना आरम्भ की है उसी श्रद्धा से अंशदान का उसमें प्राण संचार होना चाहिए। विदाई समारोह पर लोगों ने अपने-अपने यहाँ ‘ज्ञान घट’ स्थापित किये थे लगता है वह उत्साह पानी के बुलबुलों की तरह ठंडा पड़ गया। वे डिब्बे समझ गये और जहाँ-तहाँ छितरा दिये गये। प्रत्येक प्रतिमाएं टंगी रहें और भाव निष्ठा मर जाये तो यह दुर्भाग्य ही कहा जायेगा। उपासना संलग्न और बिना उपासना वाले सभी परिजनों से इस बार पुनः आग्रह है कि अंशदान को आत्मोत्कर्ष साधना का एक अनिवार्य अंग मानें और उसके लिए नित्य तकाजा करने वाले ज्ञान घटों को पुनः स्थापित कर दें, इस बार उनकी स्थापना इतनी निष्ठा से करें कि वे फिर उपेक्षा अवज्ञा के गर्त में न गिर पड़े।
बसन्त पर्व से एक लाख उपासकों के व्रत धारणा आरम्भ हुए हैं और वे गायत्री जयन्ती को पूर्ण हो जायेंगे। ज्ञानघटों की स्थापना का पर्व गायत्री जयन्ती से आरम्भ होकर पूर्णिमा तक पूर्ण हो जाना चाहिए। गायत्री जयन्ती 7 जून की और गुरु पूर्णिमा 11 जुलाई की। यह 35 दिन की अवधि इसके लिए रखी जानी चाहिए कि अखण्ड ज्योति के सभी परिजन अपने-अपने यहाँ अंशदान के प्रतीक ‘ज्ञानघट’ अपने यहाँ स्थापित कर लें और उनके प्रकाश में अपना एक घण्टा समय दान एवं दस पैसा अनुदान का क्रम अनवरत रूप से चलाते रहें। छपे हुए ज्ञान घट गायत्री तपोभूमि से मिल सकते हैं, पर उन्हें मंगाना कठिन हो तो बाजार से बच्चों की पैसा जमा करने वाली “गुल्लकें” खरीदी जा सकती हैं और उन पर ज्ञान घट लिखकर पूजा वेदी के निकट स्थापना की जा सकती है।
एक घण्टा समय नवयुग का सन्देश सुनाने के लिए जन सम्पर्क के लिए है। युग निर्माण साहित्य पढ़ाने एवं सुनाने के लिए अपने परिचय क्षेत्र में हर किसी को प्रयत्न करना चाहिए। चर्चायें एवं गोष्ठियों से भी यह प्रयोजन पूरा होता है। “एक से दस” का कार्यक्रम चलना ही चाहिए। परिजनों में प्रत्येक को यह प्रयत्न करना चाहिए कि वे अपने परिचय क्षेत्र में इस विचारधारा को व्यापक बनाने के लिए सम्पर्क साधते रहेंगे। प्रयत्न हर दिन समय निकालने का करना चाहिए यदि वह न बन पड़े तो सप्ताह में सात घण्टे-महीने में दस घण्टे तो किसी ने किसी प्रकार सुविधानुसार निकाल ही लेने चाहिए। इतना समय आगे पीछे करके ज्ञान यज्ञ के लिए लगाते ही रहना चाहिए।
अपने समय दान का-श्रमदान का यही सर्वोत्तम रूप है। यह तो न्यूनतम अनिवार्य पक्ष हुआ-इसके अतिरिक्त जिनके पास जितना अधिक समय हो वे अन्याय परमार्थ कार्यों में भी लगाते रह सकते हैं।
दस पैसा जमा करने की राशी पिछले दिनों सत्साहित्य खरीदते रहकर झोला पुस्तकालय की आवश्यकता पूरी करते रहने के लिए निर्धारित थी। पर अब उसका क्षेत्र बढ़ा दिया गया है। स्थानीय शाखा के माध्यम से सद्ज्ञान प्रसार के लिए आयोजित समारोह सम्मेलनों के लिए भी अब ये प्रयुक्त किया जा सकेगा। साहित्य जो कार्य करता है वही आयोजन सम्मेलनों से भी सम्भव हो जाता है। यह प्रयत्न संगठित रूप से हो तो और भी अच्छी तरह बन पड़ते हैं। अस्तु अब यह राशि एकत्रित कर स्थानीय समारोहों एवं प्रचार साधन खरीदने की आवश्यकता पूरी करने में प्रयुक्त की जा सकती है।
शाखा संगठन अनेक स्थानों पर बन गये हैं, पर वे साधनों के अभाव में निष्प्राण पड़े रहते हैं। इस स्थिति को समाप्त करने में ज्ञानघटों की अच्छी भूमिका हो सकती है। दो तीन प्रभावशाली व्यक्ति उठ खड़े हों, टोली बनाकर निकल पड़ें और साधना वर्ष को अंशदान आरम्भ करने का आग्रह स्थानीय परिजनों को समझायें तो बड़ी आसानी से 24 ज्ञान घट स्थापित करने में सफलता मिल सकती है। चौबीस अक्षर के गायत्री मंत्र का एक-एक अक्षर 24 ज्ञानघटों के रूप में साधना मन्दिर स्थापित होगा। साधना मण्डल इन दिनों स्थापित हो रहे हैं। उन्हें साधना मन्दिरों के रूप में विकसित एवं परिपुष्ट होना चाहिए।
दस पैसा प्रतिदिन से महीने में प्रायः तीन रुपये जमा होते हैं। 24 ज्ञानघटों से 70) के करीब की मासिक आय होती है। यह वर्ष में 840) के करीब हुई। कुछ लोग महीने में एक दिन को या न्यूनाधिक अनुदान भी दे सकते हैं। इसे 160) की अतिरिक्त आय मान लें तो अपने लोग ही वर्ष में एक हजार जमा कर सकते हैं। इतने भर से वर्ष में एक महिला सम्मेलन भली प्रकार होते रह सकते हैं और इतने से ही साप्ताहिक सत्संग-संस्कार, पर्व आयोजन एवं सप्ताह कथा आदि की व्यवस्था हर साल होती रह सकती है। कहना न होगा कि सम्मेलन आयोजनों का उत्साहवर्धक उपक्रम जहाँ भी चलता रहेगा वहाँ मिशन की जीवन्त हलचलें प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं सुधारक क्रिया-कलापों में निश्चित रूप से दृष्टिगोचर होती रह सकेंगी।
जहाँ एकाध परिजन ही हो वे अपने अंशदान को ‘एक से दस’ उद्देश्य की पूर्ति के लिए झोला पुस्तकालय चलाने तक सीमित रह सकते हैं। पर जहाँ संगठन है वहाँ संयुक्त प्रयास होना चाहिए। यह अंशदान साहित्य और सम्मेलन दो ही कार्यों में प्रयुक्त होना चाहिए। आयोजनों के अवसर पर सार्वजनिक चन्दा करके शाखा की प्रचार शक्ति बढ़ाने के लिए लाउडस्पीकर-स्लाइड प्रोजेक्टर-टेपरिकॉर्डर-आयोजन उपकरण आदि खरीदने में खर्च करने चाहिए। इमारतें बनाने की बात इतना सम्भव हो जाने के उपरान्त ही सोची जानी चाहिए। कई जगह संगठन प्रचार आदि की व्यवस्था बनाने से पहले ही भवन बनाने की उछाल लगाई जाने लगती है। विचारशीलता का तकाजा क्रमबद्ध प्रगति करने का है।
ऊपर की पंक्तियों में न्यूनतम की बात कही गई है और जो आरम्भिक चरण उपेक्षा के गर्त में गिरे पड़े रहे हैं उन्हें सुव्यवस्थित करने पर जोर दिया गया है। जहाँ जागरुकता, तत्परता एवं प्रगति पहले से ही विद्यमान हो वहाँ इससे आगे की बात चलनी चाहिए। कर्मठ कर्मयोगी को प्रतिदिन बीस घण्टे निजी कार्यों के लिए और चार घण्टे नित्य कार्यों के लिए देने चाहिए। ऐसे भावनाशील लोग 29 दिन की आमदनी में अपना निजी खर्च चला सकते हैं और एक दिन की आजीविका वही सरलता से लोक मंगल के लिए दे सकते हैं।
जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व जितने हलके हो चले उन्हें उसी अनुपात से वानप्रस्थ परम्परा के पुनर्जीवन के लिए अपना आदर्श प्रस्तुत करने के लिए आगे आना चाहिए। साधु और ब्राह्मण की पुण्य परम्परा का निर्वाह भावनाशील वानप्रस्थ ही कर सकते हैं। उन्हीं के भाव भरे अनुदानों से मनुष्य में देवत्व के उदय का और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का स्वप्न साकार बन सकेगा। अखण्ड-ज्योति परिजनों में से प्रत्येक की महत्वाकाँक्षा और भावी योजना यह होनी चाहिए कि वह अपने शरीर और परिवार तक ही सीमित न रहकर वानप्रस्थ ग्रहण करके यथार्थवादी आध्यात्मिकता का परिचय लक्ष्य निर्धारित करे तो देर-सवेर में अवसर भी मिल ही जाता है।
धर्ममंच से लोक शिक्षण की पुण्य प्रक्रिया ऐसी है जिसके आधार पर भारतीय संस्कृति के महान अतीत को पुनः वापिस लाया जा सकता है। कभी इस देश के 33 करोड़ निवासी संसार भर में 33 कोटि देवताओं के नाम से प्रसिद्ध थे। यह भारत-भूमि “स्वर्गादपि गरीयसी” कही जा सकती थी। उस गरिमा की स्थापना में साधु-ब्राह्मणों ने अपना सर्वस्व होमा था, हममें से जिन भावनाशील आत्माओं के पास जितना अवकाश हो उन्हें उसमें से अधिकतम अनुदान जन-मानस के पुण्य प्रयास में संलग्न युग-निर्माण अभियान के लिए समर्पित करना चाहिए। काम कितने ही पड़े हैं। गतमास तीर्थयात्रा की धर्म परम्परा के पुनर्जीवित अभियान के लिए अनुरोध किया गया था। इसे इन गर्मियों की छुट्टियों में आसानी से चलाया जा सकता है। गाँव-गाँव पैदल या साइकिल यात्रा करके दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन तो इतना सरल है कि उसे स्कूली विद्यार्थी तक खेल खेल में कर सकते हैं। आवश्यकता उन प्रतिभाशाली लोगों की है जो समय देकर इस प्रकार के कार्यों को सुनियोजित कर सकें। युग की ऐसी यह आवश्यकतायें अंशदान में समय एवं चिन्तन देकर ही पूरी की जा सकती हैं।
धन से ही वे साधन जुटते हैं जो लोक मानस में धंसी विकृतियों को उलटकर सत्प्रवृत्तियों की स्थापना कर सकें। व्यक्ति कितने ही लगनशील एवं सुयोग्य क्यों न हों पर साधन के बिना तो वे भी कुछ नहीं कर पाते हैं। गायत्री तपोभूमि और शाँति-कुंज आश्रमों के पास साधन जैसे-जैसे बढ़े हैं वैसे-वैसे ही वे अधिक परिमाण में अधिक महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में समर्थ हुए हैं युग परिवर्तन का कार्य कितना बड़ा करने को शेष है उसे पर्वत के समान ऊंचा और समुद्र जैसा विस्तृत कहा जा सकता है। इसके लिए साधन चाहिए। इन्हीं के अभाव में वे कार्य पड़े हैं जो मानव जाति के भविष्य को उज्ज्वल बनाने की महान भूमिका सम्पादन कर सकते हैं। लोगों का ध्यान सुख-सुविधा के साधनों में बढ़ने लगा है। चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत करने की बात किन्हीं विरलों की ही समझ में आती है। अस्तु मिशन को सफल बनाना हो तो युग लोलुप और दूसरे प्रकार के प्रत्यक्ष प्रतिफल चाहने वाले तथाकथित धनीमानियों के दरवाजे खटखटाने से भी कुछ नहीं बनेगा। इस अभाव की पूर्ति हम सबको अपनी रोटी में से कुछ दाने बचाकर पूर्ति करनी पड़ेगी। जिनके पास सम्पत्तिवान कहला सकने जितनी सम्पदा है उनसे कहना पड़ेगा कि उत्तराधिकार में वंशधरों को अमीर बनाने की बात सोचने की अपेक्षा यह अच्छा है कि मनुष्य के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए उसका सराहनीय उपयोग कर लिया जाय।
इन समस्त सम्भावनाओं के मूल में ‘अंशदान’ की प्रवृत्ति का अभिवर्धन ही काम दे सकेगा। यदा-कदा आवेश उभार में कुछ दे गुजरना एक बात है और अंशदान को नित्यकर्म के अध्यात्म कर्तव्य का अविच्छिन्न अंग बनाकर चलना दूसरी। जोश बुलबुले की तरह उठता और झाग की तरह बैठ जाता है उसमें न स्थायित्व है न स्थिरता। महत्वपूर्ण काम आवेश में नहीं स्थिर संकल्प से बनते हैं। अस्तु दान पुण्य के अहंकार भरे और उचित अनुचित का विचार न करके पात्र-कुपात्र को कुछ भी दे गुजरने वाले उपक्रम से कुछ नहीं बनेगा। जीवन तो स्थिर संकल्प में होता है उसी विशेषता के कारण अंशदान का इतना अधिक महत्व है।
आस्तिकता को रोम-रोम में बसा देने वाली उपासना अपने को पवित्र एवं परिष्कृत बनाने की जीवन साधना के साथ-साथ उदार आत्मविस्तार का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करने वाली अंशदान प्रतिज्ञा का समावेश करना प्रत्येक अध्यात्मवादी का पुनीत कर्तव्य है। अखण्ड ज्योति परिजनों से इसी त्रिवेणी में स्नान करके परम पद प्राप्त करने का अनुरोध है। अंशदान की प्रवृत्ति को प्रखर बनाने और उसे इसी गायत्री जयन्ती से गुरुपूर्णिमा के बीच कार्यरूप में परिणत कर देने के आग्रह सहित यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं।
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जिन्दगी जीना कला है और जीवन साधना है। जिन्दगी सोना नहीं है जिन्दगी तो जागना है॥
हर सृजन, पूजन, भजन, हर कर्म तप है अर्चना है। भाव में भगवान है तो, क्या नहीं आराधना है॥
हर पसीना अर्घ्य, निष्ठावान दिव्य उपासना है। जिन्दगी जीना कला है और जीवन साधना है॥
श्वास का प्रतिफल सफर है प्यास ही चलती डगर है। है कहाँ ठहराव राही, यह जगत पथ का नगर है॥
कारवाँ रुकता न कोई, राहियों को जानना है। जिन्दगी जीना कला है और जीवन साधना है॥
दृश्य तो बँधते न दृग से, रूप तो बिखरे पड़े हैं। दृश्य में उलझे बँटोही, बीच राहों में खड़े हैं॥
पाँव का अविराम चलना, लक्ष्य पार उतारना है। जिन्दगी जीना कला है और जीवन साधना है॥
यह समय बहती नदी है, हाथ से आती नहीं है। सामने ही भागती है, दूर भी जाती नहीं है॥
हर तृषातुर अंजली को तृप्ति की सम्भावना है। जिन्दगी जीना कला है और जीवन साधना है॥
-लाखन सिंह भदौरिया ‘सौमित्र’
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*समाप्त*