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मनोविज्ञानी शिण्डलर का कथन है- लोग आयु की दृष्टि से तो बड़े हो जाते हैं, पर चिन्तन की दृष्टि से बालक जैसे अविकसित ही बने रहते हैं। पड़ौसियों का ढर्रा अपनाकर गतिविधियाँ बनती हैं और यह यथार्थता, दूरदर्शिता तथा उपयोगिता की परख करना आवश्यक मान लिया जाता है। यह अपरिपक्वता ही मानव जीवन की आन्तरिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है।
बुद्धिमता का अर्थ है-सुलझे हुए विचार, स्पष्ट दृष्टिकोण और उत्तरदायित्व समझने एवं निबाहने की परिपक्वता। परिस्थितियों के साथ ताल-मेल बिठाना- उनमें से किससे कितना लाभ उठाया जा सकता है, किन्हें किस प्रकार बदला, सुधारा जाना चाहिए और किन्हें किस सीमा तक सहन किया जाना चाहिए- यह सब निष्कर्ष दूरदर्शिता, विवेकशीलता के आधार पर ही निकाले जा सकते हैं।
विचारों की प्रौढ़ता, दृष्टिकोण की परिपक्वता ही मानव जीवन की वह विशेषता है जिसे उपलब्ध करने पर व्यक्तित्व प्रतिभाशाली बनता है और बड़ी सफलताएं प्राप्त कर सकने की सम्भावना सुनिश्चित होती है। ओछे मनुष्य वे नहीं जो वजन, लम्बाई या आयु की दृष्टि से छोटे हैं। जिनकी विचारणा तथा आकाँक्षा उथली और बचकानी है, जो गये गुजरे लोगों की तरह सोचते और घटिया आकांक्षाएं पूरी करने के लिए ओछे हथकंडे अपनाते हैं, उन्हें कोई चतुर भले ही कह ले, पर वस्तुतः वे व्यक्तित्व की दृष्टि से बौने, अपंग, अविकसित लोगों की श्रेणी में ही माने जा सकेंगे।
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आत्म विश्वास बिना पंखों के आसमान पर उड़ने का नाम नहीं है। उसमें अपनी सामर्थ्य तौलनी पड़ती है, अनुभव, योग्यता और साधनों का मूल्याँकन करना पड़ता है और समीक्षापूर्वक इस नतीजे पर पहुँचना पड़ता है कि आज की स्थिति में किस हद तक साहस किया जा सकता है और कितनी ऊँची छलाँग लगाई जा सकती है। जो वस्तुस्थिति की उपेक्षा करके हवाई महल चुनते है, उन्हें शेखचिल्ली की तरह उपहासास्पद बनना पड़ता है।
शेख चिल्ली की वह कहानी बहुश्रुत है जिसमें एक मजूर ने तेल ढोने की मजूरी से मिलने वाले पैसों से मुर्गी, बकरी, भैंस खरीद कर मालदार बनने, अमीर औरत से शादी करने, बच्चा होने और बच्चे को झिड़की लगाने का सपना देखा था और उतावली में बच्चे को झिड़की देने के आवेश में घड़ा फोड़ बैठा था और रंगीन सपना गंवाकर मालिक द्वारा पीटा धमकाया गया था। हममें से अनेकों इसी मार्ग पर चलते हैं। इच्छा और सफलता के बीच जो लम्बी मंजिल पार करनी पड़ती है उसे भूल जाते हैं। हथेली पर सरसों जमाने का जादू चाहते हैं और अन्ततः उपहासास्पद बनते हैं।
आत्म-विश्वास, श्रम, साहस का, प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण स्थान माना गया है, पर वह वास्तविकता पर आधारित होना चाहिए। नशेबाजों की तरह आवेशग्रस्त स्थिति में कुछ भी पाने और कुछ भी बनने के लिए आतुर सपने देखना व्यर्थ है। बेतुकी छलाँगें लगाने वाले अपने हाथ-पैर तोड़ लेते हैं। योग्यता, परिस्थिति, साधन, अनुभव आदि का ताल-मेल बिठाते हुए जो निर्णय किये जाते हैं और नपे-तुले कदम बढ़ाये जाते हैं वे ही सफल होते हैं।
अपने साथ पक्षपात करने की दूषित दृष्टि अपना लेने पर अपने को निर्दोष घोषित करने को जी करता है और कठिनाइयों एवं असफलताओं का दोषी दूसरों को ठहराया जाता है। उस आत्म-प्रवंचना से अपना जी हलका किया सकता है, पर सफलता का लक्ष्य प्राप्त करने में कोई सहायता नहीं मिलती। जिन कारणों से प्रगति का पथ अवरुद्ध बना रहता है और दूसरों का सहयोग नहीं मिलता उनमें अपने गुण, कर्म, स्वभाव की त्रुटियाँ ही प्रमुख होती हैं। अभीष्ट पुरुषार्थ न जुटा सकना, तनिक सी कठिनाई में हिम्मत हार बैठना, एक रास्ता रुक जाने पर दूसरा न तलाशना, साथियों पर झल्लाना, मित्रों को शत्रु बनाने वाली कटुता का परिचय देना, जैसे व्यक्तिगत दोष ही सबसे बड़ा बाधा बनकर सामने आते हैं।
विपरीत परिस्थितियों, साधनों की कमी, साथियों का असहयोग, प्रतिरोध आदि मिलकर किसी की प्रगति में जितनी बाधा पहुँचा सकते हैं, उन सबसे बड़ी कठिनाई अपने व्यक्तित्व की दुर्बलता है। लोग उसकी उपेक्षा करते रहते हैं। अपने साथ पक्षपात और दूसरों के साथ कड़ाई की नीति आमतौर से अपनाई जाती रहती है। दूसरों के दोष ढूंढ़ने, उनकी कटु समीक्षा करने में जो उत्साह रहता है वही रीति यदि अपने साथ अपनाई जाती रहे तो वे कारण समझ में आ जायेंगे, जिनने व्यक्तित्व को दुर्बल बना रखा है और उस दुर्बलता के कोंतर में अनेक ऐसी अवाँछनीयताओं ने अड्डा आ जमाया है जिनके कारण पग-पग पर ठोकरें लगती हैं और प्रगति की दिशा में बढ़ सकना कठिन पड़ता है।
चापलूसों की प्रशंसा शत्रु की निन्दा से अधिक हानिकारक है। शत्रु निन्दा करके हमें हमारी त्रुटियों की याद दिलाते हैं और उन्हें सुधारने का प्रकारान्तर से प्रकाश देते हैं जबकि खुश करने के फेर में पड़े हुए लोग जान या अनजान में हमें त्रुटि रहित बताते और मिथ्या अहंकार बढ़ाते हैं। हमें स्वयं ही अपना निष्पक्ष समीक्षक होना चाहिए और आलस्य, प्रमाद, कटुता, अपव्यय, असंयम, अधीरता, भीरुता आदि दुर्गुणों का जितना अंश पाया जा सके उसे ढूंढ़ना चाहिए और उसके निराकरण की तैयारी करनी चाहिए।अपना सर्वतोमुखी निर्माण प्रगति की तीन चौथाई मंजिल पूरी करने का साधन जुटा देता है। लम्बी-चौड़ी उड़ाने उड़ने- महत्वाकांक्षाओं के रंग-बिरंगे सपने देखने की अपेक्षा यह अच्छा है कि आगे बढ़ने की सामर्थ्य एकत्रित करें। ऐसी कितनी ही योग्यताएं हैं जो मनुष्य को आगे बढ़ाती और ऊंचा उठाती है। इन योग्यताओं में सबसे बड़ी है- आत्म-निरीक्षण कर सकने और आत्म-सुधार के लिए साहस जुटाने की प्रवृत्ति। संसार के सफल व्यक्तियों को यह सामर्थ्य अनिवार्य रूप से जुटानी पड़ी है।
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जड़ें जमीन में भीतर होती हैं वे दीखती नहीं, पर पेड़ दीखता है क्योंकि वह ऊपर है और प्रत्यक्ष भी। जीवन का बहिरंग स्वरूप ही समझ में आता है, उसके साथ जुड़ी हुई स्वास्थ्य, सौन्दर्य, शिक्षा, कला, कुशलता, प्रतिभा आदि का परिचय मिलता है। वैभव एवं पद से भी स्तर का पता चलता है। इतना सब होते हुए भी व्यक्ति की जड़ें उसके अन्तः क्षेत्र में ही रहती हैं। पेड़ कितना विस्तृत, सुदृढ़ एवं दीर्घजीवी होता है यह इस बात पर निर्भर है कि उसकी जड़े कितनी मोटी, मजबूत और गहरी हैं। पोषण तो जड़ों से ही मिलता है। वे पतली और उथली होगी तो पेड़ छोटा ही रहेगा, कम फल-फूल देगा, पल्लवों की हरियाली छितरी और रूखी रहेगी साथ ही उसका जीवन काल भी स्वल्प रहेगा। इसके विपरीत बरगद जैसे पेड़ों की जड़े गहरी होती हैं। जो नई शाखाओं से नई जड़ें निकालते और जमीन में उन्हें प्रवेश करके नई खुराक प्राप्त करते हैं, वे फैलते, बढ़ते चले जाते हैं और दीर्घजीवी रहते हैं।
वृक्षों का बुढ़ापा उनकी जड़ों से आरम्भ होता है। आदमी जराजीर्ण तब होता है जब भीतरी नस-नाड़ियाँ कठोर और कमजोर होती चली जाती हैं। चेहरे की झुर्री, बालों की सफेदी, इन्द्रिय शक्ति में क्षीणता जैसे बाह्य लक्षण तो मीटर को देखकर मशीन की भीतरी स्थिति का पता लगाने की तरह है। वस्तुतः मनुष्य भीतर से खोखला और क्षीण होता चलता है। वृद्धावस्था के बाहरी लक्षण उस खोखलेपन का परिचय मात्र देते हैं। यदि भीतरी अवयव सुदृढ़ हों तो मनुष्य चिरकाल तक अपनी बलिष्ठता, प्रतिभा और सक्रियता अक्षुण्ण बनाये रह सकता है।
चतुर माली देख-भाल तो पत्र-पल्लवों की ओर भी रखता है, पर बगीचे को हरा-भरा और फला-फूलों देखने के लिए उसका अधिक प्रयास जड़ों की स्थिति सुधारने पर ही केन्द्रित रहता है। निराई, गुड़ाई, खाद, पानी आदि की विधि-व्यवस्था बनाने से ही उसकी बुद्धि का अधिकाँश भाग लगा रहता है। इसी प्रयोजन में उसकी शक्ति लगती है। साधनों का उपयोग भी इसी प्रयास में नियोजित रहता है। वह जानता है कि जड़ों की आवश्यकता यदि ठीक पूरी तरह पूरी हो सकी तो उद्यान की हरितमा अपने आप ही बनी रहेगी। फल-फूल यथा-समय और उत्साह-वर्धक मात्रा में उत्पन्न होते रहेंगे। इसके लिए उसे न तो चिन्ता करनी होती है और न चेष्टा। “जो तू सीचें मूल को फूलै फलै अघाय” की उक्ति पर उसका पूर्ण विश्वास होता है। जड़ों को दीमक तथा दूसरे हानिकारक कीड़ों से बचाने की उसकी सुरक्षा दृष्टि भी निरन्तर पैनी रहती है।
जीवन का सफल, समुन्नत एवं परिष्कृत रूप अनायास ही विनिर्मित नहीं होता। बाहरी अनुग्रह से किसी को कुछ मिल भी जाय तो वह विजातीय द्रव्य की तरह न तो रुचता है और न पचता है। पौधे के ऊपर पानी छिड़कते रहा जाय किन्तु जड़ें, सूखने लगें तो फिर उनकी रक्षा नहीं हो सकती। देवता, मन्त्र, सिद्धपुरुष आदि समर्थ सत्ताओं द्वारा जब भी जिसे भी कोई वरदान मिले हैं तब-तब उसके पीछे साधक की व्यक्तिगत उत्कृष्टता ही शक्तिशाली चुम्बक का काम करती रही है। मात्र पूजा प्रार्थना से प्रसन्न होकर कोई देवता किसी पर अनुग्रह बरसा दें ऐसा कभी देखा नहीं गया। वे साधक के व्यक्तित्व को परखते हैं और उसकी पात्रता प्रमाणिकता को परख कर उसी अनुपात से अनुदान प्रदान करते हैं।
देव अनुग्रह की बात जाने दे तो भी प्रगति की किसी भी दिशा में बढ़ने और सफलता पाने की बात मनुष्य के व्यक्तित्व के साथ ही अविच्छिन्न रूप से जुड़ी होती है। शक्ति का उद्गम स्रोत भीतर है। वही जब सक्षम होती है तो बाह्य जीवन में अनेकानेक विशेषताएँ और विभूतियाँ उत्पन्न करती हैं। गुण, कर्म, स्वभाव का स्तर बढ़ता है। इसी अभिवृद्धि की प्रतिक्रिया अनेकानेक सफलताओं और सम्पदाओं के रूप में दृष्टिगोचर होती है। मनुष्य जो कुछ प्राप्त करता है वह उसके व्यक्तित्व की कीमत अथवा प्रतिक्रिया भर होती है। ओछे व्यक्ति दूसरों की दृष्टि में घृणास्पद एवं उपेक्षणीय रहते हैं, अस्तु उन्हें न तो किसी का सच्चा सहयोग मिल पाता है और न हार्दिक सम्मान। इस अभाव के कारण वे एकाकी असहाय उपेक्षित स्थिति में पड़े रहते हैं और मात्र निजी पुरुषार्थ के बल पर नगण्य जितनी सुख-सामग्री एवं प्रगति उपलब्ध कर पाते हैं। इसके विपरीत सद्गुणों के आधार पर जिनने दूसरों का हृदय जीता है उन्हें यथोचित सहयोग मिलता रहता है। फलतः अपने साथ अनेकों की सामर्थ्य जुड़ जाने से वे पग-पग पर सफलताएँ प्राप्त, करते और प्रगति पथ पर आगे बढ़ते चले जाते हैं।
अन्तरंग जितना ही निर्मल, निष्पाप होगा, अन्तर्द्वन्द्वों के कारण नष्ट होने वाली मेधा उसी परिमाण में बची रह सकेगी और उस निर्द्वन्द्व निश्चिन्त मनः स्थिति में अनेकानेक प्रतिभाएँ उभरती रहेंगी। प्रसुप्त दिव्य क्षमताओं के जागरण का सुयोग बनेगा। यही है वह सार तत्व जिसके आधार पर प्रतिभा दिन-दिन तीक्ष्ण बनती जाती है और उसके फलस्वरूप जो भी लक्ष्य हों उसमें द्रुतगति से सफलता का पथ-प्रशस्त होता जाता है।
साँसारिक सफलताओं का पर्वत और व्यक्तिगत उत्कृष्टता का तिल यदि तराजू पर रखकर तोले जाये तो तो दोनों में से वह तिल ही भारी बैठेगा क्योंकि ज्यों-त्यों करके मिलीं उपलब्धियाँ बचेगी नहीं। छोटा बालक या रोगी पेट की कमजोरी के कारण गरिष्ठ पकवान हजम नहीं कर सकते। फलतः वे उनके लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं। कुपात्रों के हाथ लगी सफलता या सम्पदा देर तक ठहरती नहीं। वह बेतुके उद्धत प्रयोजनों में खर्च हो जाती है अथवा कोई धूर्त छल-बल से एवं आक्रमण से अपहरण कर लेता है। देखा गया है कि कुपात्र वैभववानों की सम्पदा उनमें अनेकानेक दुर्व्यसन बढ़ाती है, अहंकारी बनाती है और उद्धत कर्म करने के लिए प्रेरित करती है। कुमार्गगमन की प्रतिक्रिया स्पष्ट है। आज नहीं तो कल उसका दुष्परिणाम भुगतना ही पड़ता है। तब वह वैभव वस्तुतः घाटे का सौदा ही सिद्ध होता है। ऐसी स्थिति में मूर्ख और दरिद्र उस सुसम्पन्न की तुलना में भाग्यवान प्रतीत होते हैं जो पात्रता न होने पर भी विभूतियाँ अनायास ही प्राप्त कर लेने के कारण दुर्गतिग्रस्त हुए और बेतरह मारे गये।
प्रगति समृद्धि की पगडण्डी कोई नहीं- केवल एक ही राजमार्ग है कि अपने व्यक्तित्व को समग्र रूप से सुविकसित किया जाय। ‘धूर्तता से सफलता’ का भौंड़ा खेल सदा से असफल होता रहा है और जब तक ईश्वर की विधि-व्यवस्था इस संसार में कायम है तब तक यह क्रम बना रहेगा कि धूर्तता कुछ दिन का चमत्कार दिखाकर अन्ततः औंधे मुंह गिरे और अपनी दुष्टता का असहनीय दण्ड भुगते। अनादिकाल से चले आ रहे इतिहास चक्र का यदि गम्भीरतापूर्वक अध्ययन किया जाय तो प्रतीत होगा कि काठ की हाँडी एक बार तो चूल्हे पर चढ़ जाती है, पर दूसरी बार उसे उस प्रकार का अवसर फिर नहीं मिलता। छल, छद्म का आश्रय लेकर भी कई व्यक्ति कुछ समय के लिए कई सफलताएँ पाते और सम्पत्ति संग्रह करते देखे गये है, पर उन्हें वैसे अवसर बार-बार नहीं मिलते। आरम्भ में जो लोग वस्तुस्थिति नहीं समझ सके थे उनकी जानकारी में भी यह तथ्य आ जाता है तब वे भविष्य के खतरे को समझते हुए स्वयंमेव सतर्क हो जाते हैं और बच निकलने का प्रयत्न करते हैं। अनाचारियों के गठबन्धन होते और टूटते रहते हैं। डाकुओं के गिरोह उन्हीं में फूट पड़ जाने के कारण पकड़े जाते हैं। अनैतिकता के आधार पर खड़ी हुई मैत्री बालू की दीवार की तरह ढह जाती है। स्थिर और सघन आत्मीयता के लिए आदर्शवादिता के आधार पर मैत्री को पनपना चाहिए। अन्यथा जिस दृष्टता का- दुष्ट लोग मिल-जुलकर दूसरों के विरुद्ध प्रयोग करते थे, उसी हथियार का आपस में भी सहज प्रयोग कर सकते हैं। आमतौर से होता भी यही है। कुचक्र रचने में समवेत होने वाले घटक अन्ततः वापस में ही टकरा जाते हैं। दुरभिसंधियां वे दूसरों के विरुद्ध ही नहीं रचते परस्पर एक दूसरे पर भी उसका प्रयोग करते है। ऐसे ही अनेक कारण हैं जिनके फलस्वरूप अब तक कोई भी कुचक्रों के आधार पर स्थिर सम्पदा एवं महत्वपूर्ण सफलता का अधिकारी नहीं बन सका। यदि ऐसा न हो तो अपनी बौद्धिक प्रखरता और व्यवहार कुशलता के कारण दुष्ट-दुरात्माओं ने न जाने कितनी सफलताएँ प्राप्त कर ली होतीं और वे न जाने कितने ऊँचे उन्नति के सिंहासन पर विराजमान होते।
साँसारिक उन्नति का स्थिर, सुदृढ़ और सुनिश्चित आधार- व्यक्तित्व का सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनना पुरुषार्थ पर अवलम्बित है। इस मार्ग पर चलने का दुहरा लाभ है। साँसारिक सफलताएँ, समृद्धियाँ, प्रतिष्ठाएं जैसे गौरवास्पद अवसर तो उससे मिलते ही हैं साथ ही अनवरत अभ्यास से अपनी अन्तः विभूतियों को निरन्तर जागृत एवं समुन्नत बनाते चलने का ऐसा लाभ भी है जिसकी तुलना में भौतिक सफलताओं का सारा वैभव तुच्छ पड़ जाता है। सर्वविदित है कि विभूतिवान व्यक्ति कहीं भी, कभी भी, किसी भी स्थिति में रहते हुए भी अपनी विशेषताओं के कारण प्रतिकूल वातावरण को अनुकूलता में बदल रहा होगा। जीवन का सबसे बड़ा आनन्द ‘आत्म-सन्तोष’ उसके चरणों पर लोट रहा होगा। चरित्र-दान और उदार प्रकृति के मनुष्य ही महामानवों की पंक्ति में बैठते और इतिहास प्रसिद्ध बनते हैं, अजर-अमर देवताओं की श्रेणी में उन्हीं की गणना होती है। उनके सम्पर्क और प्रभाव परिचय में आने वाले व्यक्ति प्रकाश प्राप्त करते और ऊँचे उठते हैं। चन्दन वृक्ष की समीपता से उस क्षेत्र में उगे झाड़-झंखाड़ों का सुगन्धित हो जाना तो किम्वदन्ती के रूप में प्रचलित है, पर सज्जनों के सम्पर्क में आने वालों ने किस प्रकार अपने जीवन बदले और किस तरह ऊँचे चढ़े इसके उदाहरण पग-पग पर मिल सकते हैं। जिस पर सारा सम्पर्क क्षेत्र श्रद्धा के भाव भरे पुष्प अनवरत रूप से बरसाता हो उसे स्वर्गलोक का निवासी देवता नहीं तो और क्या कहा जायगा? ऐसी देवोपम मनःस्थिति के लोगों के साथ कुटिलतापूर्वक बढ़ा-चढ़ा वैभव कमा लेने की सम्पन्न परिस्थिति वालों से तुलना की जाय तो प्रतीत होगा कि एक कल्प-वृक्ष के नीचे आनन्द ले रहा है और दूसरा इत्र के खौलते कढ़ाव में उबल रहा है।
तात्विक दृष्टि से मनुष्य की मूलसत्ता उसकी अन्तः चेतना-आत्मा ही है। शरीर उसका कलेवर है। परिवार उसका आवरण है। वैभव उसका शृंगार है। शृंगार, आवरण एवं कलेवर जैसे उपकरण तो सुसज्जापूर्ण हों, पर अन्तः चेतना विकृतियों और निकृष्टताओं के कारण रुग्ण कुरूप बन रही हो तो समझना चाहिए कि आँखों से दीख पड़ने वाला चकमक वैभव पूर्णतया खोखला है। निष्प्राण लाश को कितना ही पुष्प हारों से सजाया जाये, उसमें शांति नहीं आ सकती। मृत शरीर को सड़न से नहीं बचाया जा सकता। अन्तरात्मा विकृतियों के दबाव से मूर्छाग्रस्त पड़ा हो तो फिर जीवन में प्रफुल्लता का दर्शन न हो सकेगा। खीज, झूंझल, अशान्ति, उद्विग्नता, निराशा जैसी विभिन्न धातुओं की बनी गरम सलाखों से क्षण-क्षण में झुलसने- भुनने जैसी पीड़ा का कभी अन्त न हो सकेगा। आन्तरिक विकृतियों का दण्ड इससे कम है ही नहीं। गम गलत करने के लिए शराबखानों और चकलों का चक्कर काटने पर भी कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। बेहोशी की दवा खा लेने से कष्ट का अनुभव होना भर घटता है। प्राण घातक रोग तो तब भी अपने स्थान पर बना ही रहता और अपनी विनाश लीला तो यथावत चलता ही रहता है।
मोटी बुद्धि तो वासना, तृष्णा की पूर्ति को ही सब कुछ मानती रहती है। पशु-प्रवृत्ति का समाधान पेट और प्रजनन की समस्या का समाधान हो जाने भर से हो जाता है। नर-वानरों के लिए लोभ, मोह के कच्चे अमरूद पर्याप्त है। किन्तु भगवान् ने यदि गहराई तक उतर सकने वाली विवेक बुद्धि दी हो तो उसका प्रथम निरीक्षण यही होगा कि आखिर हम हैं क्या? और हमारी क्षमताओं का आधार क्या है? प्रगति की बात सोचने और उपलब्धियों का आनन्द उठाने की योजना बनाने से पूर्व सोचना यह होगा कि प्रगति आखिर होती किस आधार पर है? और प्रगति का रसास्वादन कर सकने वाली सत्ता है कौन ? यह प्रश्न अनभ्यस्त है। प्रायः कभी भी इन पर गम्भीरता से विचार नहीं किया गया होता। कहने को तो तथाकथित अध्यात्म की चर्चा आये दिन होती रहती है। जीभ से बहुत कुछ बोला और कान से बहुत कुछ सुना जाता है। स्वाध्याय, सत्संग, कथा-कीर्तन, भजन-पूजन आदि की लकीर तो पिटती रहती है, पर यह सब आखिर हो किस लिए रहा है उसका ध्यान ही नहीं आता। पूजा-परक, धार्मिक कर्मकाण्डों की चमत्कारी फलश्रुतियों ने बुद्धि पर ऐसा आच्छादन लपेट दिया होता है। कि इस घिसे को घिसते रहने से ही आत्मिक और भौतिक क्षेत्र में सस्ती ऋद्धि-सिद्धियों की अपेक्षा की जाने लगती है। स्पष्ट है कि उस मृग-मरीचिका में किसी के पल्ले कुछ नहीं पड़ता। मात्र कर्मकाण्डों से आत्मोत्कर्ष का एक भी आधार खड़ा नहीं होता।
तत्व-दर्शन का अवलम्बन लेकर जब आत्म-चेतना की मूलसत्ता और उसके विकास विस्तार के सम्बन्ध में गम्भीर विचार करते हैं, तो प्रतीत होता है कि परिस्थितियों का वृक्ष-मनःस्थिति की जड़ों के सहारे पोषण प्राप्त करता और फैलता-फूलता-फलता दिखाई पड़ता है। मनःस्थिति भी स्वतन्त्र नहीं उसका प्रेरणा स्रोत अन्तःकरण का अभिलाषा केन्द्र है। आकाँक्षाएँ उठती हैं- तो उसके साधन जुटाने के लिए बुद्धि दौड़ती है- बुद्धि दौड़ती है तो साधन जुटते और अवसर मिलते हैं। शरीर और मन का संयोग सफलताओं का सृजन करता है। यही है वह चक्र जिस पर आरुढ़ होकर लोग ऊँचे उठते और नीचे गिरते हैं।
बात तो जरा-सी है, पर है अत्यन्त महत्वपूर्ण और रहस्यमय। ब्रह्म-विद्या का- अध्यात्म विज्ञान का विशाल-काय सरंजाम इस छोटे से तथ्य को हृदयंगम करने के लिए खड़ा किया गया है। भौतिकवाद और अध्यात्मवाद प्रतिद्वन्द्वी इस अर्थ में हैं कि एकाकी मान्यता में साधन सामग्री की विपुलता के आधार पर तृप्ति मिलने की बात कही जाती है और दूसरा प्रतिपादन आन्तरिक विभूतियों के आधार पर वैभव उपलब्ध होने के तथ्य को प्रमुखता देता है। यों दोनों ही मान्यताएँ आत्मिक और भौतिक प्रगति के समन्वय की अनिवार्यता स्वीकार करती हैं। कसौटी पर भौतिकवादी प्रमुखता गलत सिद्ध हुई है क्योंकि दुर्गुणी सम्पत्तिवानों के प्रसन्नता नहीं उद्विग्नता ही पल्ले बँधती देखी जाती है, इसके विपरीत सद्भाव, सम्पन्न, सज्जनता के रहते स्वल्प साधनों में भी आनन्द और उल्लास भरा जीवन जिया जा सकना स्पष्टतः सम्भव दीखता है। संसार के प्रायः सभी मानव इस तथ्य की साक्षी में प्रस्तुत किये जा सकते हैं।
आत्म-सत्ता को सुविकसित एवं सुसंस्कृत बनाने का तथ्य यदि समझा जा सके तो उस प्रयास के फलस्वरूप निश्चित रूप से सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खुल सकता है। इस प्रयोजन के लिए चार प्रयास करने पड़ते हैं- (1) आत्म-समीक्षा (2) आत्म-सुधार (3) आत्म-निर्माण (4) आत्म-विकास। अपने क्रिया-कलापों में, गतिविधियों में आलस्य, प्रमाद, व्यसन, दुष्ट आदतों के रूप में जो अनेकानेक दुष्प्रवृत्तियाँ घुसी बैठी है उन्हें देखना, समझना, आत्म-समीक्षा है। निदान जाने बिना चिकित्सा कैसी? अवगति के क्या-क्या कारण शरीरों में घुसे बैठे हैं इसका कठोर आत्म-समीक्षा के आधार पर ही पता लगाया जा सकता है। आमतौर से दूसरों के दोष ढूंढ़ने का ही अभ्यास हर किसी को होता है। आत्म-निरीक्षण तो अति कठिन है। क्योंकि अपने साथ पक्षपात करने की आदत आरम्भ से ही बनी होती है। दूसरा कोई वस्तुस्थिति समझता, नहीं। हम स्वयं ही अपनी वास्तविक स्थिति समझ सकते हैं किन्तु आत्म-निरीक्षण की आदत न होने से सब कुछ अच्छा ही अच्छा लगता है। बुराई तो दूसरों में दीखती है, अपने में तो जो कुछ भी है वह अच्छा ही अच्छा लगता है। कोई दूसरा समीक्षा करे तो उस पर क्रोध आता है, द्वेश उभरता है। ऐसी दशा में आत्म-निरीक्षण का कठिन कार्य स्वयं ही अपने भीतर एक समीक्षक मार्ग-दर्शक गुरु का विकास करना होता है, उसी के संरक्षण से आत्म-चिन्तन का अभ्यास किया जाता है। वह क्षमता विकसित हो जाती है तो प्रतीत होता है कि आत्मसत्ता को दुर्बल बनाने वाली और प्रगति की सम्भावनाओं को कुण्ठित करने वाली विकृतियों अपने ऊपर किस हद तक कब्जा जमाये हुए हैं।
इतना बन पड़ने पर आत्मोत्कर्ष का दूसरा चरण यह होता है कि प्रस्तुत कषाय-कल्मषों से लड़ने के लिए महाभारत खड़ा कर दिया जाए। देवासुर संग्राम की कथा, उपकथाओं से पुराण साहित्य भरा पड़ा है। उनमें अन्तःक्षेत्र में होने वाली दैवी और आसुरी तत्वों के बीच होने वाली दुःखद किन्तु अनिवार्य टक्कर का अलंकारिक वर्णन है। साधना को ‘समर’ कहा गया है। भगवान के चौबीसों अवतार स्वयं संघर्षरत रहे हैं और अपने अनुचरों को उसी युद्ध क्षेत्र में घसीट ले गये हैं। लंका काण्ड में रीछ, बानरों की सेना को अड़ा देने के पीछे भगवान का यही प्रयोजन रहा है कि असुरता को निरस्त करने में देवत्व को संघर्षरत होना चाहिए। साधनों की दृष्टि से कौन बड़ा है- अधिकार कितना जमा लिया इसकी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। सत्य देखने में दुर्बल लगता हो तो भी अन्ततः विजय उसी की होती है। सत्य में हजार हाथी के बराबर बल होता है। इस प्रतिपादन में यही कहा गया है कि अन्तरंग अथवा बहिरंग जीवन में अवांछनीयता ने कितनी ही गहराई तक जड़ जमाली हो तो भी उन्हें उखाड़ा जा सकता है। आत्मिक प्रगति का प्रथम चरण आन्तरिक दोष, दुर्गुणों को तीखी दृष्टि से ढूंढ़ निकालना और दूसरा चरण जो अनुचित है उसके उन्मूलन में साहसपूर्वक जुट जाना है।
तीसरे चरण में सद्भावनाओं को स्वभाव में तथा सत्प्रवृत्तियों को व्यवहार में उतारना है। यह कार्य एक दिन में- कल्पना मात्र से यकायक नहीं हो जाता है, वरन् उठने से लेकर सोने तक के पूरे समय को कर्म तथा विचार की दृष्टि से पूरी तरह इस प्रकार सुनियोजित रखना है, जिसमें शरीर एवं मस्तिष्क में कहीं भी अनौचित्य को प्रश्रय मिलने की गुंजाइश न रहे। हर क्रिया को कर्मयोग स्तर की और हर विचारणा को ज्ञानयोग स्तर की बनने का अवसर मिले। इसके लिए सतर्कतापूर्वक प्रयत्न करना होता है। सज्जनोचित गुणों में से अपना कौन-सा कम है, प्रखर व्यक्तित्व का निर्माण करने के लिए हमें अपने में किन विशेषताओं की अभिवृद्धि करनी है, यह सोच लिया तो उनके अभ्यास में उतरने के अवसर अपने सामान्य जीवन-क्रम में ही मिलते रह सकते हैं। निर्वाह की दृष्टि से यदि नैतिक आजीविका का कार्य-पद्धति अपनाई गई है तो गृहस्थ को योग-साधना स्तर पर निबाहा जा सकता है। परिवार सदुद्देश्यों की प्रयोगशाला बन सकता है। तपोवन में घर बना लेना सरल है, पर घर को तपोवन में बदलने के लिए कुशलता की आवश्यकता पड़ती है जिसकी चर्चा करते हुए गीताकार ने ‘‘योग कर्मषु कौशलम्’’ कर्म-कौशल को योग के नाम से पुकारा है।
आत्मोत्कर्ष का चौथा चरण है- आत्म विकास। अहंता को-स्वार्थपरता को अधिकाधिक सुविस्तृत करते जाना ही आत्म-विकास की प्रक्रिया है। संकीर्ण मनुष्य अपने शरीर को ही सब कुछ मानता है। अपने स्वार्थ के सामने स्त्री-बच्चों तक के हित का ध्यान नहीं रखता। परिवार के लोगों से लाभ तो उठाना चाहता है, पर उनके लिए त्याग करने का अवसर आता है तो कन्नी काटने लगता है। स्वार्थी मनुष्य अपने थोड़े से लाभ के लिए दूसरों का बड़े से बड़ा अहित कर सकता है। जीभ के स्वाद के लिए दूसरे प्राणियों का प्राण हरण कर लेना उसके बांये हाथ का खेल होता है। क्रूर-क्रम करने वाले मूलतः निकृष्ट स्तर के स्वार्थी ही होते हैं। आत्म-विकास में इस प्रकार की संकीर्णता को छोड़ना पड़ता है और उदार आत्मियता की प्रवृत्ति अपनानी पड़ती है। अपनी सुविधाएं बांट देने और दूसरों के दुःख बंटा लेने को जी मचलता रहता है। थोड़े-से परिजनों तक सीमित रहने वाले मोह को परिष्कृत करके निस्वार्थ प्रेम में परिणत करना होता है। सभी अपने लगते हैं और प्रत्येक पिछड़े को ऊँचा उठाने के लिए करुणा उमड़ती है। ऐसे व्यक्तियों को लोक कल्याण के लिए अपना आपा समर्पित करना पड़ता है। देश, धर्म, समाज, संस्कृति के प्रति-सदुद्देश्यों के प्रति उन्हें इतनी प्रगाढ़ निष्ठा होती है कि श्रम, समय, चिन्तन एवं साधनों की अपनी सम्पदा उसी निमित्त नियोजित करने से कम में चैन नहीं पड़ता। विलासिता, संग्रह और तृष्णा के उभार शांत हो जात हैं और पेट भरने, तन ढ़कने जैसे स्वल्प निर्वाह आवश्यकताओं की पूर्ति के उपरान्त फिर कोई अनावश्यक तृष्णा, ऐषणा पास भी नहीं फटकने पाती। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की ब्राह्मण परम्परा उसके रोम-रोम में बस जाती है। फलतः स्वार्थ में नियोजित साधनों का उपयोग परमार्थ में होने लगता है। विराट् ब्रह्म और विशाल विश्व की एकता का भान होने पर फिर सत्कर्मों द्वारा ईश्वर की पूजा करते हुए ही जीवन का प्रत्येक क्षण व्यतीत होता है। वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता जब परिपक्व निष्ठा का रूप धारण कर लती है तो फिर मनुष्य किसी परिवार विशेष की सम्पदा न रहकर विश्व नागरिक बन जाता है और अपनी सामर्थ्यों का उपयोग मोहग्रस्तों की तरह नहीं विवेकशील महामानवों की तरह करता है। लोक-सेवा ही उसका व्रत और जन-कल्याण ही उसका लक्ष्य होता है। साधु और ब्राह्मणों की यही रीति-नीति रही है। आत्म-विकास की कक्षा में पहुंचे हुए व्यक्ति इसी स्तर का जीवनयापन करते हैं। सेवा, करुणा, उदारता जैसी दैवी विभूतियां उनके मन, वचन, कर्म में झलकती, छलकती, दृष्टिगोचर होती है।
कहा जा चुका है कि आत्मोत्कर्ष के चार चरण हैं- आत्म-समीक्षा, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास। इन चारों के लिए क्रमिक किन्तु अनवरत प्रयास करना होता है। हर घड़ी सतर्क और संघर्षरत रहना पड़ता है। पशु-प्रवृत्तियां सहज ही हार नहीं मानतीं। वे सत्प्रयत्नों को बार-बार असफल बनाने के लिए उभरती हैं। सुधार के प्रयास करते रहने पर भी कुसंस्कारों के उभार जब-तब आवेश बनकर ऊपर आ जाते हैं और व्रत नियम के प्रयास को तोड़-मरोड़ कर रख देते हैं। इस प्रकार के अवसर आते रहने पर अधीर लोग हिम्मत हार बैठते हैं। व्रत टूटते, संयम निभता नहीं, जो सुधार चाहा था वह हो नहीं सका, यह देखकर सोच लिया जाता है कि- ‘‘यह मार्ग अति कठिन है। इस पर कोई योगी तपस्वी ही चल सकते हैं। सामान्यजनों का यह काम नहीं, अस्तु पुराने ढर्रे को ही अपनाये रहा जाय, सुधार का प्रयत्न छोड़ दिया जाय।’’ इस प्रकार की अधीरता से बचना चाहिए और सोचना चाहिए कि असंख्य जन्मों की संग्रहीत पशु-प्रवृत्तियां यदि पूरी तरह छूटने में थोड़ा समय लेती हैं तो कोई हर्ज नहीं। हिम्मत न हारी जाय और प्रयत्न जारी रखा जाय। पत्थर पर रस्सी की रगड़ से निशान बन सकता है तो अपने स्वभाव में सतोगुणी सुधार परिवर्तन क्यों नहीं हो सकता?
बच्चा धीरे-धीरे चलना सीखता है। वह बार-बार गिरता, उठता है। छात्रों से आये दिन भूलें होती हैं और अध्यापक उन्हें बार-बार सुधारते हैं। कपड़ा मैला होता है और उसे रोज धोया जाता है, कोई हताश नहीं होता कि बार-बार सुधार करने पर भी फिर गड़बड़ी क्यों हो जाती है? यह संघर्ष समयसाध्य और श्रमसाध्य है। बन्दूक का निशाना लगाने से लेकर साइकिल सवारी सीखने तक के अभ्यास और शिल्प-कला आदि की कुशलता थोड़ा समय ले जाती है। आरम्भ में भूलें भी होती हैं और उन्हें सुधारना भी पड़ता है। यही बात आत्म निर्माण जैसा सेतुबंध बनाने में भी लागू होती है। संचित कुसंस्कार यदि बार-बार उभरें तो उन्हें दबाने के प्रयास में शिथिलता नहीं आने देनी चाहिए और न मन छोटा करना चाहिए। अन्ततः विजय प्राप्त करके रहने का संकल्प देर-सवेर में आत्मोत्कर्ष का लक्ष्य भी पूरा कर ही देता है।
पुरुषार्थ किसी भी क्षेत्र में किया जाय अपना परिणाम उत्पन्न करके ही रहता है। पूरी प्रत्यक्ष एवं मनचाही सफलता न भी मिले तो भी पुरुषार्थ कभी निष्फल नहीं जाता। उससे जो क्रिया कुशलता बढ़ती है वह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। संसार के समस्त पुरुषार्थों में आत्म-निर्माण की दिशा में किया गया प्रयास सर्वोपरि बुद्धिमत्ता का परिचायक है। उससे जीवन की जड़ें मजबूत होती हैं। यह सुदृढ़ता समूचे व्यक्तित्व को निखारती है। मानवी प्रखरता का दिव्य चुम्बकत्व शक्तिशाली बनता है। उसकी बढ़ती हुई सामर्थ्य भौतिक जगत् से समृद्धि को- प्राणि जगत् से सद्भावना को और दिव्य-लोक से ईश्वरीय अनुकम्पा को इतनी अधिक मात्रा में खींच लाती है कि आत्म-निर्माण की साधना में निरत मनुष्य जीवन को हर दृष्टि से सार्थक बनाता है।
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पिछली शताब्दियों में बुद्धिवाद का- प्रत्यक्षवाद का बहुत जोर रहा है। विज्ञान का विकास इसी खोज और जिज्ञासा के लिए उत्पन्न हुई, आकुलता का परिणाम है। शास्त्र वचनों को जब कुछ माने बैठे रहने और परम्परागत मान्यताओं को जकड़े बैठे रहने की वृत्ति शिथिल न की गई होती, नये सिरे से सारी परख करने के लिए अविश्वासी मन लेकर न चला गया होता तो निश्चय ही हम दस हजार वर्ष पूर्व की दुनिया में रह रहे होते। तब परम्परागत यथास्थिति बनाये रहने का ही आग्रह होता- सुधार, विकास, परिवर्तन के चिह्न बहुत मंद गति से उभरते हैं। ऐसी दशा में प्रगति चक्र इतनी तेजी से न घूमता जिसने लाखों वर्षों में सम्भव न हो सकने वाली प्रगति यात्रा को तीन शताब्दियों में मूर्तिमान करके दिखा दिया।
इस बुद्धिवाद ने चिर-प्रचलित ‘ईश्वर के अस्तित्व’ विषय पर भी प्रत्यक्षवादी आधार पर खोज की। पर प्रयोगशाला में उसकी सत्ता सिद्ध न हो सकी। इन्द्रिय शक्ति ने भी इस सन्दर्भ में कुछ नहीं किया। मस्तिष्क भी प्रमाण न खोज सका और यान्त्रिकी, भौतिकी ने भी अपनी हार स्वीकार कर ली। ऐसी दशा में स्वाभाविक ही था कि बुद्धिवाद ईश्वर के अस्तित्व को अस्वीकार करता। प्रकृति की क्रम व्यवस्था सुसम्बद्ध और सुनियोजित है ऐसा तो माना गया, पर उसे स्वसंचालित कहकर सन्तोष कर लिया गया। इसके लिए किसी सृष्टा का हाथ हो सकता है, इससे शोधकर्त्ताओं ने इनकार कर दिया। नास्तिकवाद की प्रचण्ड लहर इसी वैज्ञानिक इनकारों से उत्पन्न हुई और आंधी-तूफान की तरह बौद्धिक जगत पर अपना अधिकार जमाती चली गई। पिछले दिनों ईश्वर की अस्वीकृति का प्रतिपादन प्रगतिशीलता का चिह्न बनकर रहता रहा है। नीत्से जैसे अनेक दार्शनिकों ने मान्यताओं और तर्कों का परिशोधन करने वाले तत्व-दर्शन को एक नई दिशा दीं जिससे आस्तिकता की मान्यताओं को निरर्थक ही नहीं हानिकारक सिद्ध करने का भी एड़ी–चोटी प्रयत्न किया गया है।
पिछली तीन शताब्दियों में नास्तिकता के प्रतिपादन को आंधी-तूफान की तरह विकसित और व्यापक होने का अवसर मिला है। साम्यवादी शासन सत्ता ने प्रस्तुत अनास्था की जड़ें और भी अधिक गहरी जमाईं, पर लगता है वह उन्माद ठंडा पड़ने लग गया है। विज्ञान को नये सिरे से अपने निर्णय पर विचार करने के लिए पीछे लौटना पड़ रहा है। जड़-पदार्थ अपने आप नियमित हल-चलें करते रह सकते हैं, यह आग्रह किसी समय पूरे जोश खरोश से किया गया है, पर अब पुरातन पंथियों की तरह तथाकथित प्रगतिशीलों को भी यह सोचना पड़ रहा है कि सृष्टि संतुलन के नि रहस्यों का- इकॉलाजी विज्ञान के आधार पर प्रतिपादन होता चला जा रहा है- यह बात पूरी तरह गले नहीं उतरती। सृष्टा कोई नहीं- उसकी कुछ भी आवश्यकता नहीं- यह बात आवेश में तो कही जा सकती है, पर गहराई से उतरते ही संदेह उत्पन्न होता है कि इतनी क्रमबद्ध- परस्पर पूरक और सोद्देश्य गतिविधियां किसी चेतना के बिना नियन्त्रण किये ही किस प्रकार चलती रह सकती है?
माना कि यान्त्रिकी और भौतिकी के साथ-साथ बौद्धिकी भी प्रत्यक्षवादी उपकरणों के आधार पर ईश्वर के अस्तित्व को प्रमाणित नहीं कर पा रही है, पर न मानने भर से भी तो समाधान नहीं होता। सृष्टि के संचालन क्रम में इतनी अधिक सुसम्बद्धता का होना अनायास ही चल रहा है तो यह अनायास ही सृष्टा होनी चाहिए। कर्ता के बिना कर्म और प्रेरणा के बिना हलचल, नियंत्रण के बिना व्यवस्था क्यों कर बनी? स्वसंचालित यंत्रों पर भी तो आखिर संचालक नियुक्त रहते हैं। फिर सृष्टि से विशाल संयन्त्र किस प्रकार बिना किसी बुद्धिमान सत्ता का आधार लिये- क्यों कर चलता रह सकता है? यह प्रश्न पिछड़े कहे जाने वालों से लेकर प्रगतिशीलों तक को समान रूप से संक्षोभ उत्पन्न करता है। प्रमाण रहित को क्यों मानें? तर्क उचित है। पर न मानने की बात तो और भी अधिक भारी पड़ती है। निगलने का बहुत प्रयत्न करने पर भी वह गले में ही अटकी रह जाती है।
अणु से लेकर सौर-मण्डलों तक का, प्रत्येक छोटा-बड़ा घटक अपने नियत कर्त्तव्य उत्तरदायित्व को तत्परतापूर्वक निर्वाह करने में संलग्न है। उनके बीच सघन सहयोग काम कर रहा है। नीति-शास्त्र और समाज-शास्त्र के जो सिद्धान्त मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक सिखाये जाते हैं उन्हें जड़ कहे जाने वाले पदार्थ अधिक अच्छी तरह समझे और अपनाये हुए है, इस तथ्य को जितना स्पष्ट अब अनुभव किया जा रहा है उतना पहले कभी नहीं किया गया था। ऐसी दशा में बुद्धि को सृष्टा के अस्तित्व को अस्वीकृत करने वाली पूर्व घोषणा पर पुनर्विचार करना पड़ रहा है।
एक के बाद एक प्रमाण इस स्तर के मिल रहे हैं जिनसे इस ब्रह्मांड में एक व्यापक चेतन तत्व का समुद्र भरा हुआ सिद्ध होता है। जैसे शब्द, ताप, ध्वनि प्रवाह, ईथर के महासागर में दौड़ लगाते हैं। ठीक इसी प्रकार चेतना का भी अपना प्रभाव और क्षेत्र है। विचार और भावना तत्व किसी भौतिक शक्ति से कम समर्थ नहीं है। उनकी प्रतिक्रिया मनःस्थिति पर ही नहीं परिस्थिति पर भी समान रूप से होती है। सृष्टि सन्तुलन का नियन्त्रण समष्टि मन करता है। यह नवीनतम वैज्ञानिक शोधों का परिणाम है। इसे प्रकारान्तर से ब्रह्म सत्ता की स्वीकृति ही कह सकते हैं।
विज्ञान ने जड़ के अन्तराल में समाई हुई एक ऐसी शक्ति को स्वीकार किया है जो व्यापक भी है और बुद्धिमान भी। यह प्राकृतिक है या अध्यात्मिक इस प्रश्न पर विचार करने का अभी समय नहीं आया, पर ‘ब्रह्मांडीय चेतना’ का अस्तित्व अब विज्ञान क्षेत्र में मान्यता प्राप्त करता चला जा रहा है। इस सर्वव्यापी चेतना ने सृष्टि की हलचलों के साथ स्नेह, सौन्दर्य एवं आनन्द की अनुभूति जुड़ी रह सके और जीवधारी इस प्रवास यात्रा का समुचित आनन्द ले सके ऐसी व्यवस्था भी जोड़कर रखी हुई है। उत्पादन, अभिवर्धन, ढलान और परिवर्तन का चक्र अपनी धुरी पर घूमता है। ग्रह-नक्षत्रों से लेकर अणु-परमाणु तक के छोटे-बड़े सृष्टि घटक अपने निर्धारित गतिचक्र में तत्परतापूर्वक भ्रमण करते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया सुनिश्चित है। पेण्डुलम की तरह यहाँ आगे बढ़ना और पीछे हटना भी होता रहता है। लगता है किसी बुद्धि रहित ने अनगढ़ सृष्टि नहीं रची है, वरन् उसके पीछे सुव्यवस्था के ऐसे तार कस दिये हैं कि गड़बड़ी होते-होते स्वयमेव सँभल जाती है।
आइन्स्टाइन जैसे विचारशील व्यक्ति इसीलिए उस अदृश्य सत्ता की अनुभूति कर कह उठते हैं- “पदार्थ की सूक्ष्मतर सत्ता तक पहुँचकर मेरी कल्पना- शक्ति एवं अनुभव शक्ति इस विश्वास को जन्म देती है कि वहाँ विचार एवं परिवर्तन करने वाली कोई चेतन-सत्ता पहले से ही विद्यमान है। मैंने तो बस उस चेतन-सत्ता के साथ एकाकारिता की स्थिति प्राप्त कर ही इस सूक्ष्मतर सत्ता का बोध प्राप्त किया है। अब मुझे विश्वास होने लगा है कि यह चेतन-सत्ता अदृश्य जगत की सूक्ष्म, किन्तु महान शक्तिशाली सत्ता है।”
जीवन की सृजनात्मक प्रक्रिया के प्रारम्भ होने की तो विज्ञान यह व्याख्या कर सकता है कि “एमीनो एसिड प्रोटीन” नामक पदार्थ ने सहसा अपने पड़ौसी तत्वों को अपनी ओर आकर्षित करना और पचाना प्रारम्भ कर दिया, लेकिन ऐसा क्यों और कब हुआ, इसका उत्तर विज्ञान नहीं दे पाया है? प्रोटोन, न्यूट्रोन, इलेक्ट्रोन अथवा इनसे भी सूक्ष्म, प्रकृति का कोई तत्व, जिसके साथ उसे गतिशील करने वाली शक्ति अदृश्य रूप से घुली हुई है, परस्पर सम्बद्ध और अंतर्निविष्ट है। अस्तित्व चाहे वह ईश्वर का हो, प्रकृति का अथवा बुद्धि का, पूर्णतः अविभाज्य है। इसका प्रत्येक अंश सूक्ष्म है, अदृश्य है और इन्द्रियानुभूति से परे है। इसका प्रत्येक अंश दूसरे को प्रभावित कर रहा है और प्रत्येक दूसरे अंश से प्रभावित हो रहा है।
जड़ के अन्तराल में काम करने वाली चेतना को पिछली शताब्दियों की तुलना में अब अधिक अच्छी तरह से समझ सकने के लिए साधन बने और आधार खड़े हुए हैं। शरीर में काम करने वाले जीवाणुओं की संरचना और क्रिया-पद्धति को समझने का प्रयत्न करने पर प्रतीत होता है कि इनके भीतर मात्र गति ही नहीं बुद्धिमता एवं इच्छाशक्ति ही काम कर रही है।
शरीर का प्रत्येक जीवाणु स्वतन्त्र चिन्तन की भी क्षमता रखता है। लेकिन सम्पूर्ण शरीर के निर्माण के लिए शरीरस्थ सभी जीवाणु मिलकर कार्य करते हैं। इनका नेतृत्व करता है ‘सुपरईगो’ या अहं-तत्व। वही सबका संचालक निर्देशक है। वह कमाण्डर है, लेकिन फौज के प्रत्येक जवान में, शरीरस्थ हर एक जीवाणु में स्वतन्त्र विचार-शक्ति भी है। उन्हें मालूम है कि हमारे लक्ष्य की प्राप्ति तभी सम्भव है, जब हम नेता का, कमांडर का अहं-तत्व का निर्देश पूरी तरह मानें। यह बोध उन्हें समर्पण की प्रेरणा देता है। समर्पण की दिव्य भावना से निरन्तर क्रियाशील प्रत्येक जीवाणु –‘अहं’ की आज्ञा का ही अनुसरण करते हैं। इस ‘मैं’ का सुख ही, सभी जीवाणुओं का सुख और उसका दुःख, सबका दुःख बन जाता है। ‘मैं’ की, विचार-विद्युत शरीर के सभी जीवाणुओं में तीव्रतम वेग से कौंध जाती है। ‘मैं’ का उल्लास, उत्साह उन्हें स्फूर्ति, उमंग और ओज से भर देता है और ‘मैं’ की हताशा-निराशा उन्हें पीत-मुख, श्लथ-तन, उदास और निष्क्रिय बना जाती है। मानो हर जीवाणु एक छोटा स्टेशन है जो अपने मुख्य स्टेशन ‘अहं-तत्व’ से जुड़ा है।
मस्तिष्क के जीवाणु अन्य देहांगों के जीवाणुओं से अधिक प्राण शक्ति सम्पन्न होते हैं। उनमें सुदीर्घ अनुभवों की स्मृतियाँ संचित होती हैं अतः वे सभी जीवाणुओं के नेता होते हैं। किन्तु देह के सभी जीवाणु परस्पर एक-दूसरे से सम्बद्ध होते हैं। तीव्र क्षुधा-ज्वाला से दग्ध एक व्यक्ति सुस्वादु व्यंजनों के थाल के सामने बैठकर पहला ग्रास तोड़ता है कि तभी उसके किसी परम आत्मीय की मृत्यु की सूचना स्वरूप टेलीग्राम उसे मिलता है। तार पढ़ते ही उस व्यक्ति का हृदय जैसे निष्प्राण हो जाता है। शरीर के सभी अंगों में ऐंठन-सी मच जाती है। लगता है जैसे पूरे शरीर की ज्योति अत्यन्त मन्द हो चली है। भूख का कहीं अता-पता नहीं। जीभ सूख जाती है। मस्तिष्क में एक स्तब्धता-सी छाने लगती है। अब विचार करें कि क्षुधा को शान्त करने की तीव्र प्रेरणा देने वाले जीवाणुओं का वह जोश कहाँ खो गया? वे भी मन मस्तिष्क के घनीभूत विवाद से समरस हो गए और अपनी प्रचण्ड आकाँक्षा तक भुला बैठे।
इसमें दो निष्कर्ष हमारे समाने आते हैं। पहला यह कि अपनी अन्तश्चेतना ही शरीर के समस्त जीवाणुओं पर प्रभाव डालती है। अतः इन जीवाणुओं को पुष्ट, प्रसन्न, प्रफुल्ल और प्रगतिशील रखने के लिए चित्त में स्फूर्ति और उल्लास का सातत्य आवश्यक है। मन की दरिद्रता, दैन्य या दुराशा देह भर में जीवाणुओं के क्षोभ व क्षीणता का कारण बनती है। अपने शरीर के अंगों और जीवाणुओं पर सदा सन्देह मत कीजिए। अन्यथा वे सचमुच ही संदिग्ध व संकीर्ण बुद्धि के, शिथिल और सिमटे हुए से अर्थात् अल्प प्राण हो जाएंगे। अपने आप पर विश्वास करें। यह आत्म-विश्वास उन्हें अदम्य स्फूर्ति, उल्लास और आवेग देगा। वे प्रस्तुत बाधाओं को चीरते हुए, शरीर को स्वस्थ, प्रसन्न रखने के लिए सदा सक्रिय रहेंगे।
शरीर का कोई भी अंग काटकर शरीर से अलग कर लिया जाए और फिर उसे किसी विषैले रसायन या घातक औषधि के समीप रखा जाए तो उस कटे अंग के अणुओं में एक तीव्र हलचल मच उठेगी और वे अपनी शक्ति भर उससे दूर जाने की कोशिश करेंगे। इस प्रयास में वह कटा हुआ अंग उक्त घातक औषधि या जहरीले रसायन से तनिक-सा दूर स्वतः ही सरक सकता है। इसी तरह, यदि कोई लाभदायक औषधि या पुष्टिकर रसायन के पास ऐसा कटा हुआ अंग रखा जाए तो उसके अणु ऐसी औषधि या रसायन के निकट खिंचने की चेष्टा करेंगे। इससे स्पष्ट है कि शरीरस्थ अणुओं में भी विचार-शक्ति है।
रक्त की एक बूँद में हजारों कोशिकाएँ होती हैं। एक सेल में प्रोटोप्लाज्म भरा होता है, जिसमें कार्बन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, हाइड्रोजन, सल्फर, कैल्शियम, पोटेशियम, मैग्नीशियम, लोहा, फास्फोरस, क्लोरीन और सोडियम ये 12 तत्व होते हैं।
छोटी-छोटी लाल रक्त-कोशिकाओं में हीमोग्लोबीन भरा रहता है। श्वेत रक्त कोशिकाओं में आत्म-रक्षा और प्रतिशोध क्षमता का विवेक होता है, उन्हें अचेतन कैसे कहा जाए? इस तरह ये प्रत्येक कोशिकाएं भी वस्तुतः एक स्वतन्त्र जीवधारी हैं तथा शरीर इन अनेक चेतन घटकों का संगठित समूह कहा जा सकता है।
सामान्यतः मस्तिष्क को बुद्धि का एकमात्र स्थान माना जाता है। किन्तु बुद्धि वस्तुतः एक वैद्युतिक ऊर्जा है। वह सम्पूर्ण शरीर में परिव्याप्त है। मस्तिष्क उसका मुख्यालय है। किन्तु यह मुख्यालय भी मात्र शरीर की दृष्टि से ही। क्योंकि स्वयं मस्तिष्क विश्व की चेतना, ऊर्मियों से प्रतिपल प्रभावित होता है।
धातुओं, पाषाण आदि में भी प्रसुप्त चेतना पाई गई है। जड़-पदार्थों को भी अति न्यून जीवनी शक्ति सम्पन्न प्राणी कहा जा सकता है। प्रत्येक जड़-पदार्थ में चेतन की इस झाँकी को उसकी विकास-आकाँक्षा कहा जा सकता है। ऐसा परिलक्षित होता है कि सभी जड़ तत्व चेतना का स्तर अधिकाधिक विकसित करने का निरन्तर प्रयास कर रहे हैं। धातुओं में जंग लगना, पानी की सतह पर काई उत्पन्न होना, जल-जन्तुओं का उद्भव, वनस्पति में जीव-जन्तुओं का उत्पन्न होना, मिट्टी से उर्वरक जीवाणुओं का पाया जाना, पत्थर से शिलाजीत जैसे पदार्थों का निकलना यह बताता है कि इनमें भी जीवन मौजूद है और वह क्रमशः शैशव, यौवन, वृद्धता एवं मृत्यु की धुरी पर अपनी निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार भ्रमण कर रहे है।
वृक्ष वनस्पतियों का जीवन-क्रम भी अन्य प्राणियों जैसा ही है। उन्हें स्थिर एवं पिछड़े कहा जाना तो ठीक हो सकता है, पर यह सोचना गलत है कि उनमें अनुभूतियों एवं संवेदनाओं का सर्वथा अभाव है। भारत के मूर्धन्य वैज्ञानिक जगदीश बोस ने यह सिद्ध किया था कि पौधे भी सोचते, इच्छा करते और परिस्थितियों से प्रभावित होकर सुख-दुःख मानते हैं। संगीत और शोर का जो भला-बुरा प्रभाव वनस्पतियों पर पड़ता है उसने भी यही सिद्ध किया है कि उनमें भी संवेदना मौजूद है। स्तर न्यूनाधिक हो सकता है, पर वैज्ञानिकों की भाषा में नया नामकरण मिली ‘ब्रह्मांडीय चेतना’ का-पुरातन अध्यात्म की भाषा में पुकारी जाने वाली-ब्रह्म-सत्ता का अभाव कहीं नहीं है। ऐसे व्यापक और प्रत्यक्ष तत्व को-बुद्धिवाद तथा प्रत्यक्षवाद भी स्वीकार करने ही जा रहा है। देर केवल इतनी ही है कि उस पर मुहर कल लगनी है या परसों।
विश्व विख्यात अमरीकी वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने “सापेक्षवाद का सिद्धान्त” पुस्तक लिखी जिसमें विश्व व्यवहार की दार्शनिक स्थिति पर प्रकाश डाला था। पुस्तक ने लोगों को चिन्तन की सर्वथा नई दिशा दी।
पुस्तक की लोकप्रियता से ईर्ष्यालु जर्मनी के एक सौ प्रोफेसरों ने मिलकर पुस्तक लिखी जिसमें सापेक्षवाद के सिद्धान्त का विरोध किया गया था।
आइन्स्टीन के मित्र उनके पास आये और जर्मनी-प्रोफेसरों द्वारा लिखी जा रही पुस्तक पर चिन्ता व्यक्त की। इस पर आइन्स्टीन बोले भाई इसमें चिन्ता की क्या बात है, इससे तो मेरे सिद्धान्त की पुष्टि ही होगी।
सौ कैसे? विस्मित मित्र ने जिज्ञासा प्रकट की- इस पर आइन्स्टीन ने कहा- “यदि मेरा सिद्धान्त सचमुच गलत होता तो उसके खण्डन के लिए एक आदमी पर्याप्त होता, इतना तो कोई भी समझ सकता है कि सौ-सौ आदमी जिस बात के विरोध में खड़े हैं आखिर उस तथ्य में भी दम होना चाहिए।
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व्यक्ति की निजी चेतना का अस्तित्व, बल, वैभव, सौन्दर्य सब कुछ है पर स्मरण रखा जाय यह अनुदान ब्रह्म चेतना का है। यहाँ ब्रह्म चेतना ओर ब्रह्मांडीय चेतना में जो थोड़ा सा अन्तर है उसे भी समझ लेना चाहिए। ब्रह्म चेतना वह है जिसे विशुद्ध चेतना कहा जा सकता है। आत्माओं का परमात्मा है। इसी को विराट् ब्रह्म या विश्व मानव कहते हैं। ब्रह्मांडीय चेतना से तात्पर्य प्रकृति के अन्तराल में सन्निहित भौतिक सामर्थ्य है। यही पिण्ड और ब्रह्मांड की विभिन्न हलचलों का स्रोत है, एनर्जी-फोर्स-पावर-ऊर्जा आदि नामों से उसे पुकारते हैं। विज्ञानियों का शोध-क्षेत्र यही है, वे इसी समुद्र में गोते लगा कर कई प्रकार के रत्न ढूंढ़ते और आविष्कार करते हैं।
शरीर ही नहीं मस्तिष्क भी इसी ब्रह्माण्डीय चेतना के प्रभाव क्षेत्र में आता है। ऋतुओं का प्रभाव शरीर पर पड़ता है और परिस्थितियों से मस्तिष्क प्रभावित होता है। शरीर के छोटे घटक जीवाणु अपनी प्रकृति के अनुरूप काम करते हैं। नस, नाड़ियाँ एवं हृदय वृक्क, यकृत आदि अवयव अपनी गतिविधियाँ चलाने में निरत रहते हैं। यह हलचलें अचेतन मन से संचालित होती हैं। आकुंचन-प्रकुँचन, श्वास-प्रश्वास, निमेष-उन्मेष, आदि उसी की क्षमता एवं प्रेरणा से गतिशील रहते हैं। चेतन मन का प्रभाव इन्द्रिय चेतना में देखा जा सकता है। कल्पना, इच्छा, निर्णय आदि उसी को करने पड़ते हैं। प्रत्येक इकाई अपने आप में स्वतन्त्र है और अपनी शक्ति तथा सत्ता का प्रत्यक्ष परिचय देती है, फिर भी गम्भीर दृष्टि से देखने पर उसे सुविस्तृत शृंखला की एक कड़ी ही माना जा सकता है। समुद्र की हर लहर स्वतन्त्र है। उसके आकार, बल एवं क्रिया-कलाप का मूल्याँकन स्वतन्त्र रूप से किया जा सकता है। किन्तु वस्तुतः वह विशाल समुद्र का अविच्छिन्न अंग है। उसकी स्वतन्त्रता सागर की परतन्त्रता में जुड़ी हुई है। लहर को सागर से पृथक कर दिया जाय तो उसकी सुन्दर और सुव्यवस्थित उछल-कूद का अन्त ही हो जायेगा। तब वह अपने अस्तित्व को उस तरह अनन्त काल तक अक्षुण्ण बनाये न रह सकेगी जैसे कि सम्बद्ध स्थिति में था। पृथक होने पर हवा और गर्मी के मामूली से दबाव भर से उसकी सत्ता समाप्त हो जायेगी। उसकी स्वतन्त्रता सत्य है, पर यह स्वतन्त्रता सागर की परतन्त्रता के साथ ही सार्थक भी है और सम्भव भी।
चेतना में बीज रूप से अपनी निजी शक्ति भी असीम है। पिण्ड को ब्रह्मांड का प्रतीक माना जा सकता है। सौर-मण्डल की सारी गतिविधियाँ ठीक इसी क्रम में परमाणु घटक के अन्तराल में चलती हुई देखी जा सकती हैं। ‘अणोरणीयान् महतो महीयान्’ की उभयपक्षीय सत्ता आकृति में तो लघु और विभु की तरह देखी जा सकती है, पर उसकी प्रकृति में कोई अन्तर नहीं। अणु विस्फोट में अधिकाँश शक्ति तो अन्तरिक्ष में ही विलीन हो जाती है जो प्रभाव एवं परिचय में आती है, वह अति स्वल्प है। अणु को एक छोटा-किन्तु उन्हीं विशेषताओं से सम्पन्न पूर्ण सूर्य माना जा सकता है। बीज में वृक्ष की और शुक्राणु में पूर्ण पुरुष का समग्र अस्तित्व मौजूद है। इन कणों को विकास का अवसर मिले तो वे अपना सुविस्तृत एवं सक्षम परिचय प्रस्तुत कर सकते हैं। ठीक इसी प्रकार जीव चेतना को अवसर मिले तो वह अपने विराट् एवं विभु रूप का परिचय दे सकता है।
तनिक गहराई में प्रवेश करके देखें तो जड़ चेतन का प्रत्येक घटक-अपने से ऊँचे घटकों के साथ सम्बद्ध होकर उससे पोषण प्राप्त करता दृष्टिगोचर होगा। बच्चा माँ का आंचल पकड़ता है-माता पति का आश्रय पाती है-पति फैक्ट्री में काम करके आजीविका पाता है-फैक्ट्री शेयर होल्डरों की पूंजी से बनी है- शेयर होल्डरों ने वह सम्पदा किसी अन्य साधन से कमाई और उस साधन का स्रोत कहीं अन्यत्र है। इस प्रकार प्रत्येक घटक आगे एवं ऊँचे आधारों का अवलम्बन ग्रहण करके अपना काम चला रहा है। उपलब्धियों का अनुदान जितना बढ़ा-चढ़ा होता है उतना ही वह घटक बलिष्ठ होता चला जाता है।
इसी तरह व्यष्टि-चेतना स्वतन्त्र तो है, पर समष्टि-चेतना के अंश के ही रूप में। व्यष्टि-चेतना के विकास का लक्षण एक ही है- समष्टि-चेतना के साथ तादात्म्यता की प्रखर अनुभूति की दिशा में आगे बढ़ना।
जिस प्रकार मन के दो भाग चेतन और अचेतन कहे जाते हैं। उसी प्रकार ब्रह्माण्डीय चेतना का एक पक्ष वह है जिसे स्थूल प्रकृति कहते हैं और जो वैज्ञानिक पर्यवेक्षण के क्षेत्र में आ गई है। सूक्ष्म प्रकृति वह है जो अभी तक मनुष्य के लिए प्रत्यक्ष नहीं है किन्तु अपने अस्तित्व का परिचय समय-समय पर देती रहती है। यन्त्रों की पकड़ में यह क्षेत्र अभी नहीं आया है, पर मस्तिष्कीय उपकरण उसके साथ यदा-कदा सम्बन्ध बना लेते हैं और वहाँ जो कुछ विद्यमान है बच रहा है उसके देखने-समझने में समर्थ हो जाते हैं। ऐसे ही असामान्य अनुभवों को अतीन्द्रिय अद्भुत चमत्कार एवं ऋद्धि-सिद्धि आदि नामों से पुकारा जाता है।
संसार में विभिन्न हलचलें होती है। इनका स्थूल स्वरूप और सूक्ष्म कारण होती हैं। दृश्य शरीर स्थूल है। प्रत्यक्षतः वही समस्त हलचलें करता दीखता है। प्रेरक सत्ता मन है, पर वह दीखता नहीं। ठीक इसी प्रकार पदार्थों के स्वरूप और उनकी जिन हलचलों को इन्द्रिय शक्ति अथवा उपकरणों के सहारे प्रत्यक्ष किया जा सकता है उन्हें स्थूल कह सकते हैं। नितान्त प्रेरक एवं सशक्त होते हुए भी प्रकृति का जो अंश प्रत्यक्ष नहीं हो उसे सूक्ष्म कहते हैं। समष्टि मन तत्व को सूक्ष्म कह सकते हैं। तथा प्रकृति के वे प्रवाह जिनमें घटनाओं की भूत-कालीन, वर्तमान की तथा भावी सम्भावनाओं की छायाएँ काम करती है। ब्रह्माण्डीय चेतना के- प्रकृति क्षेत्र के अन्तर्गत आती हैं।
कारखाने में लगी मोटर चलती तो स्वयं ही है। उसी की बिजली उसे चलाती है, पर वस्तुतः वह दूरवर्ती किसी बड़े बिजली घर से तारों द्वारा सम्बद्ध होती है। बड़ा बिजली घर ही इस छोटी मोटर को आवश्यक मात्रा में शक्ति प्रदान करता है और उसी के सहारे वह अपनी गतिविधियों को संचालित कर सकने में समर्थ होती है। व्यक्ति की स्थूल सत्ता- शरीर और मन में काम करने वाली वे हलचलें जिन्हें जीवन यात्रा के लिए अभीष्ट कहा जा सकता है, भौतिक प्रकृति के अन्तराल में काम करने वाली ब्रह्माण्डीय चेतना का अनुदान समझी जा सकती हैं।
ओ मर्त्य ! तुम जीवन से खेलो। खतरों की तलाश करो अगर वह न मिले तो उसे जन्म दो। अथाह में झाँको। डरो और हंसो।
ओ मर्त्य! जीवन से खेलो। अपने आप से खेलो। अपनी कामनाओं से खेलो। तर्क बुद्धि के शिखर पर चढ़ जाओ। फिर उसकी हँसी के साथ तुम भी हँसो। ऊँचाई-निचाई तुम्हारे लिए विनोद बन जायेगी। जीवन तुम्हारे लिए खेल बन जाएगा।
-जेकब क्लात्स्किन (यहूदी-विचारक)
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शरीरगत भली-बुरी विशेषताओं के लिए अब मनः-स्थिति को ही प्रधानतया उत्तरदायी ठहराया जाता है। भौतिक जीवन की सफलताओं के लिए भी उसी को आधारभूत माना जाता है। यही सामान्य दीखते हुए भी असामान्य निष्कर्ष है। पिछले दिनों परिस्थितियों एवं साधनों को मनुष्य की प्रगति अवगति का कारण माना जाता था। उत्थान-पतन का निमित्त दूसरों के सहकार एवं अपकार को समझा जाता था। कई बार शारीरिक स्थिति को ही सफलता-असफलता का श्रेयाधिकारी ठहराया जाता था। अब वैसी स्थिति नहीं रही। मनः शास्त्रियों द्वारा यह स्वीकार किया गया है कि व्यक्तित्व के प्रायः सभी क्षेत्र मानसिक स्थिति से प्रभावित होते हैं। अस्तु यदि किसी को अपनी गई-गुजरी स्थिति सुधारनी है और महत्वपूर्ण प्रगति करनी है तो मुरझाये पेड़ के पत्ते धोने की अपेक्षा उसकी जड़ में पानी लगाना चाहिए। अस्त-व्यस्त मनः स्थिति को सुव्यवस्थित बनाना चाहिए।
बुद्धि के केन्द्र चेतन मस्तिष्क को प्रशिक्षित करने के लिए स्कूल, कालेजों एवं अन्य ज्ञान संस्थानों का प्रबन्ध है पर अब जाना यह गया है कि बुद्धिमत्ता से अधिक महत्वपूर्ण है-आदतें। आदतों के सही होने पर स्वल्प बुद्धि से भी व्यवस्थित रीति-नीति अपनाकर उन्नति के उच्च-शिखर पर पहुँचा जा सकता है। इसके विपरीत तीक्ष्ण बुद्धि व्यक्ति भी बुरी आदतों का शिकार बनकर समय और शक्तियों का अपव्यय करता है और घाटा उठाता तथा असफल रहता है। अब नई शोध का विषय है-अतीन्द्रिय विज्ञान। जिसे पाश्चात्य देशों में परा-मनोविज्ञान कहा जाता है। इन अनुसंधानों में ऐसी घटनाओं की प्रमाणिकता जाँची जाती है जो प्रकृति के सामान्य घटनाक्रम एवं मनुष्य के साधारण साधनों से भिन्न प्रकार की होती है। मानवी चेतना पर अवतरित होने वाली अद्भुत जानकारियों का स्रोत कहाँ है? वे किस आधार पर घटित होती हैं? वे अनायास ही-व्यक्ति विशेष पर ही घटित होती हैं, या प्रयत्नपूर्वक वैसी स्थिति पैदा की जा सकती है? यह ऐसे ही अनेक प्रश्नों की श्रृंखलाएं सामने प्रस्तुत हैं, जिनके समाधान खोजने के लिए परामनोविज्ञान क्षेत्र के अनुसंधानकर्ता प्रयत्नशील है।
इस प्रयास में अभी बहुत थोड़े ही निष्कर्ष निकल सके हैं। जो जानना बाकी है उसके देखते हुए सफलताओं को नगण्य ही कहा जा सकता है। फिर भी कुछ निष्कर्ष ऐसे हैं जिनके आधार पर अतीन्द्रिय क्षमता के कारणों पर थोड़ा प्रकाश पड़ता है। यह माना गया है कि मस्तिष्क का अचेतन क्षेत्र शरीर संचालन की गति-विधियों का सूत्रधार तो है, पर उसकी सामर्थ्य उतने तक ही सीमित नहीं है। मन की दोनों परतों को जितनी मात्रा में विकसित होने का अवसर मिलता है उतना ही वे व्यक्तित्व को अधिकाधिक प्रतिभा सम्पन्न बनाती हैं और सफलताओं के नये-नये द्वार खोलती हैं। व्यक्तित्व के समग्र विकास में शरीरगत समर्थता की तुलना में मानसिक बलिष्ठता की भूमिका असंख्य गुनी बढ़ी-चढ़ी होती है, मनोबल सम्पन्न मनुष्य दुर्बल और रुग्ण होते हुए भी अपनी प्रखरता बनाये रह सकता है और उसी स्थिति में ऐसा कुछ करता या कराता रह सकता है जिसे आश्चर्यजनक एवं सराहनीय कहा जा सके। इसके विपरीत शरीर से बलिष्ठ एवं सुगठित होते हुए भी मनोबल की दृष्टि से गये-गुजरे लोग सुविधा साधनों के रहते हुए भी गई-गुजरी स्थिति में दिन काटते, पग-पग पर असफल होते और उपहासास्पद बनते देखे जाते हैं। दैनिक जीवन की अधिकाँश सफलताएँ प्रायः विकसित मनःस्थिति की ही प्रतिक्रिया होती है। आदतें और कुछ नहीं अन्तर्मन की वर्तमान दृढ़ता ही उनका निर्माण करती है। इसी को व्यक्तित्व कहते हैं। प्रगति और अवगति इसी पृष्ठभूमि पर निर्धारित रहता है।
कुछ समय पूर्व बीमारियों के कारण रोग कीटाणुओं के आक्रमण संग्रहित विजातीय द्रव्य एवं अमुक अवयवों की टूट-फूट आदि माने जाते थे और इन्हीं को निरस्त करने लिए चिकित्सकों द्वारा उपाय उपचार किये जाते थे। अब गहराई तक जाने पर यह निष्कर्ष निकला है कि यह कारण गौण और अचिन्त्य चिन्तन की मानसिक विकृतियाँ प्रधान कारण है। अब मनोविकारों को न केवल मस्तिष्कीय रोगों का वरन् शारीरिक रोगों का भी सर्वोपरि कारण माना जा रहा है। यह पाया गया है कि मनोबल सम्पन्न, साहसी और सन्तुलित व्यक्ति सामान्य अथवा घटिया शारीरिक स्थिति में निरोगी की तरह काम करता और प्रसन्नचित रहता है। जबकि अस्त-व्यस्त मनः स्थिति वाला अकारण ही गिरी-मरी स्थिति में पड़ा रहता है। कितने ही दर्द एवं रोग ऐसे होते हैं जिनकी जड़ शरीर में नहीं मन में होती है। शरीर की जाँच-पड़ताल करके डॉक्टर कहता है इसमें कोई रोग नहीं है, पर रोगी अपने को रुग्ण एवं पीड़ाग्रस्त अनुभव करता है। ऐसी बीमारियाँ विशुद्ध मानसिक रोग होने पर भी उतनी ही कष्टकारक होती हैं, जितनी कि वास्तविक रुग्णता ।
आँखों की चमक, चेहरे का आकर्षण, होठों पर नाचती मुस्कराहट, वाणी में प्रभाव जैसे व्यक्तित्व को मनोरम बनाने वाली विशेषताएं शारीरिक गठन पर नहीं मानसिक उत्साह पर निर्भर रहती हैं। रंग रूप की दृष्टि से सुन्दर दीखने वाले व्यक्ति भी मानसिक अस्त-व्यस्त होने पर उपेक्षणीय एवं उपहासास्पद बने रहते हैं। प्रथम दर्शन में जो आकर्षण प्रभाव उत्पन्न हुआ था वह सम्पर्क में आने और व्यक्तित्व का परिचय मिलने के साथ ही समाप्त हो जाता है। इसके विपरीत काले, कुरूप मनुष्य भी आँतरिक उत्साह के कारण बड़े तेजस्व एवं आकर्षक प्रतीत होते है, उनकी कल्पना, सूझ-बूझ, वाणी, आकाँक्षा, स्फूर्ति, साहसिकता एवं उमंग देखकर हर किसी को सम्पर्क में आने की इच्छा होती है। ऐसे लोगों के सान्निध्य में हर कोई प्रसन्नता अनुभव करता है। आरोग्य से लेकर आकर्षण तक शरीर की सभी विशेषताएँ मनोबल पर निर्भर रहती हैं सक्रियता से लेकर सफलता तक का सारा क्षेत्र मनःस्थिति से ही प्रभावित पाया जाता है।
मनोबल भी यान्त्रिक विद्युत की तरह ही एक प्रभावशाली तत्व है। उसका प्रभाव मनुष्यों एवं दूसरे प्राणियों पर होते हुए आये दिन देखा जाता है। एक प्रतिभाशाली व्यक्ति अपने समीपवर्ती लोगों को किस प्रकार अपना अनुचर बनाता है उसका प्रमाण सर्वत्र उपलब्ध होता है। अन्य प्राणियों को प्रभावित करने में भी कुछ मनस्वी लोग असाधारण रूप से सफल होते हैं। सरकस में पशुओं के शिक्षक क्रूर प्रकृति के हिंस्र प्राणियों को भी दुलार फटकार के सहारे प्रशिक्षित करते और उन्हें कठपुतली की तरह नचाते हुए देखे जाते है। महावत का कहना हाथी मानता है और मनस्वी घुड़सवार के पीठ पर पहुँचते ही अड़ियल घोड़ा भी सीधा हो जाता है। कितने ही लोग भिन्न प्रकृति के प्राणियों की जन्म-जात द्वेष बुद्धि को स्नेह सहयोग के बदल देते है। ऋषियों के आश्रमों में सिंह और गाय में साथ रहने की बात प्रसिद्ध है। अभी भी कइयों ने कुत्ते बिल्ली इस प्रकार पाले होते हैं कि वे सहोदर भाई-बहिन की तरह रहते हैं। इटली का एक किसान अपनी मुर्गियों के फार्म की रखवाली पालतू बिल्लियों से कराता था। कुत्ते और मनुष्यों की मित्रता एवं वफादारी के जो अनेक प्रसंग सुने जाते हैं, उसमें पालने वालों का मानसिक प्रभाव ही प्रधान रूप में काम करता है। पूरे परिवार में किसी व्यक्ति विशेष के साथ अतिरिक्त लगाव रखने वाले पालतू पशु वस्तुतः किसी की मनःस्थिति से प्रभावित हुए होते हैं।
ज्ञान सम्पदा का अपना महत्व है। बौद्धिक तीक्ष्णता के लाभ और चमत्कार सर्वविदित हैं, पर यदि आदतों का मूल्याँकन किया जा सके तो प्रतीत होगा कि उनका वजन मस्तिष्कीय तीक्ष्णता की सम्मिलित उपलब्धियों की तुलना में भी भारी पड़ता है। बुरी आदतें क्षति पहुँचाती हैं, उसकी भरपाई अन्य विशेषताओं से नहीं हो सकती आलस्य को ही लें, वह देखने में छोटी सी बुराई है, पर उसकी प्रतिक्रिया हर काम को अधूरा अस्त-व्यस्त और अनकिया हुआ पड़ा रहने के रूप में सामने आती है। फलतः सुयोग्य और साधन सम्पन्न व्यक्ति भी अपनी अकर्मण्यता कारण पग-पग पर असफल होते रहते हैं। ऐसी बहुमूल्य प्रतिभाएं जो बहुत कुछ कर सकती थीं और अपनी विशेषताओं के कारण चमत्कार उत्पन्न कर सकती थीं वे आलस्य और प्रमाद की दल-दल में फंसे रहने के कारण अपंग असमर्थों जैसी दयनीय स्थिति में पड़ी रहीं इसके विपरीत कर्मनिष्ठ, श्रमशील नियमित और व्यवस्थित लोग स्वल्प बुद्धि एवं स्वल्प साधनों की सहायता से ही अभीष्ट प्रयोजनों में तत्परता पूर्वक लगे रहने के कारण उन्नति के उच्च शिखर तक जा पहुँचे। कटु स्वभाव, अधीरता, चटोरापन, नशेबाजी, फिजूलखर्ची जैसी छोटी दीखने वाली आदतें धीरे-धीरे जितनी हानि पहुँचा देती हैं उतनी भयंकर दुर्घटनाएं एवं आकस्मिक विपत्तियाँ भी नहीं कर सकतीं। संसार के महामानव परिस्थितिवश यशस्वी नहीं हुए और न साधन उन सफलताओं के कारण बने हैं। उस प्रखर मनस्विता ने ही उन्हें आगे बढ़ाया है जो आदतों के रूप में चिन्तन तथा क्रिया-पद्धति को उच्चस्तरीय बनाये रही।
स्मरण रहे आदतों का सीधा सम्बन्ध अचेतन मन से है। उनका आरम्भ भले ही भले-बुरे चिन्तन से अथवा अनुकरण से होता है, पर जब वे जड़े जमा लेती हैं तो फिर उन्हें उखाड़ना कठिन हो जाता है। नशेबाजी के सम्बन्ध में प्रायः यही होता है। दुष्परिणामों को देखते, समझते हुए भी नशेबाज अपनी आदत के सामने एक प्रकार से विवश हो जाता है और छोड़ने की कल्पना, जल्पना, करते रहने पर भी कुछ बन नहीं पड़ता। आर्थिक, शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक एवं समाज सम्मान की अपार क्षति सहन करते हुए वह दम तो तोड़ देता है, पर उस आदत से पिण्ड छुड़ाने में अपने को असमर्थ पाता है। यही बात अन्यान्य भली-बुरी आदतों के बारे में भी कही जा सकती है। हलकी-फुलकी हो तो बात अलग है अन्यथा स्वभाव का अंग बन जाने वाली- गहरी जड़े जमा लेने वाली आदतें व्यक्तित्व का अंग बन जाती और प्रगति अवगति का महत्वपूर्ण कारण सिद्ध होती है।
आदतों का केन्द्र अचेतन मन है। उस क्षेत्र को यों सामान्य दृष्टि से उपेक्षित माना जाता है, पर वस्तुतः उसकी गरिमा बुद्धि संस्थान से भी अधिक बढ़ी-चढ़ी है। विचार तो आदमी क्षणभर में बदल सकता है, पर स्वभाव को बनाना या बदलना उतना सरल नहीं है। चिन्तन का ढर्रा, इच्छाओं का रुझाना, विश्वासों का गठन, अभ्यास का पुनरावर्तन जैसे तत्व ही मिल कर स्वभाव का सृजन करते हैं और उसी को व्यक्तित्व के साथ में प्रस्फुटित होते देखते हैं। इस प्रकार अचेतन मन ही वस्तुतः सारे जीवन पर छाया हुआ मिलता है। आदतें तो अचेतन मन में रहती हैं, पर उन्हें पूरी करने के लिए योजना बनाना-व्यवस्था करना एवं समर्थन में तर्क गढ़ना-प्रमाण ढूंढ़ना चेतन मन का काम है। समझने की सुविधा के लिए चेतन-अचेतन का विभाजन है वस्तुतः वह एक ही मनः तत्व की दुहरी क्रिया पद्धति है। एक ही व्यक्ति विद्वान और पहलवान-चित्रकार और साहित्यकार-वक्ता और नर्तक हो सकता है। देखने में यह क्रियाएं एक दूसरे से असंबद्ध लगती हैं, पर पेड़ में फूल और फल आने की तरह यह दुहरी प्रक्रिया आसानी से चलती रह सकती है। मन वस्तुतः एक है। उसे स्थूल शरीर की सूक्ष्म संचालक शक्ति कह सकते हैं और समझने की सुविधा के लिए बिजली तथा मशीन के सहयोग से चलने वाली फैक्टरी का उदाहरण दे सकते हैं। शरीर को मशीन और मन को बिजली कहा जाए, तो यह उदाहरण ठीक ही होगा।
मन के दो भाग हैं एक अचेतन, दूसरा चेतन। अचेतन का काम आकुंचन-प्रकुँचन, श्वास, प्रश्वास, निमेष-उन्मेष, पाचन-विसर्जन, रक्ताभिषरण, क्षुधा-पिपासा, निद्रा-जागृति जैसी व्यवस्थाएं जुटाते रहना होता है। तरह-तरह की आदतें तथा आस्थाएं भी उसी में जड़े जमाये बैठी रहती हैं और अविज्ञात रूप से जीवन-क्रम का परोक्ष संचालन करती रहती है। चेतन का काम इच्छा, ज्ञान और क्रिया का धारण तथा उनके सहारे आवश्यक व्यवस्थाएं बनाते एवं जुटाते रहना होता है। अध्यात्म की भाषा में चेतन को बुद्धि और सचेतन को चित्त कहते हैं। इन्हीं दोनों के सहारे जड़ पदार्थों से बना पंचभौतिक शरीर चैतन्य सत्ता की तरह काम करता दीखता है।
यों शरीर यात्रा के लिए भी प्राणि चेतना को बहुत कुछ उपलब्धियाँ ब्रह्मांड चेतना से ही मिलती हैं किन्तु जब आत्मिक प्रगति की-चेतना की परिष्कृति एवं प्रखरता की बात आती है तब तो उस ब्रह्माण्ड शक्ति सागर का-ब्रह्म सम्बन्ध का- अधिक सघन सम्बन्ध चल पड़ता है। सामान्य शरीर यात्रा प्रकृति की स्वसंचालित विधि-व्यवस्था के सहारे ही चलती रहती है। उसके लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण, समाज सम्पर्क एवं स्कूली अध्ययन से काम चल जाता है, पर आत्मिक प्रगति की-चेतनात्मक प्रखरता की आवश्यकता अतिरिक्त रूप से साधना प्रयास करने पर ही सम्भव होती है। योगाभ्यास एवं तपश्चर्या की सारी विधि-व्यवस्था इसी प्रयोजन के लिए विनिर्मित हुई हैं। कभी-कभी ऐसे अपवाद भी देखे जाते हैं कि बिना किसी साधना के चेतना का असाधारण विकास पाया गया है, पर वह अनायास दीखते हुए भी वस्तुतः पूर्व जन्मों की संग्रहीत सम्पदा होती है। कुछ बालक जन्म से ही कुशाग्र बुद्धि होते हैं। कम आयु में भी उनकी प्रतिभा कई विषयों में वयस्कों जैसी विकसित होती है। कुछ बालक छोटी उम्र में गायक, वादक, वक्ता आदि विशेषताओं से सम्पन्न होते हैं। उन्हें कुछ विशेष शिक्षण भी नहीं मिला होता, पर लगता है, अपने विषय में पारंगत हैं। यह उनके पूर्वजन्मों के संचित संस्कार होते हैं जो अवसर पाते ही अपने आप उगते और बढ़ते मालूम होते हैं। वस्तुतः उनकी जड़े पहले से ही विद्यमान होती है।
अचेतन का परिष्कार ही अध्यात्म भाषा में आत्म-निर्माण, आत्म-साक्षात्कार, आत्म-बोध, आत्मोद्धार आदि नामों से पुकारा जाता है। सुसंस्कृत और अधःपतित मनुष्य में स्थूल दृष्टि से कोई बड़ा अन्तर नहीं होता उनके शारीरिक अवयव एवं ज्ञान कौशल आदि में बहुत कुछ समानता रहते हुए भी प्रकृति में जमीन आसमान जितना अन्तर पाया जाता है। इन्हीं कारणों से उन्हें निन्दा-प्रशंसा का- सफलता-असफलता का भागी बनना पड़ता है।
अध्यात्म विज्ञान की यदि तात्विक समीक्षा की जाय तो प्रतीत होगा कि यह सारी प्रतिष्ठापना और घेराबन्दी अचेतन की पशु प्रवृत्तियों से ऊंचा उठा कर मानवता की उच्चस्तरीय संस्कारिता में बदलने के लिए ही खड़ी की गई है। तत्व दर्शन के आधार पर जिस दृष्टिकोण को आस्थाओं के रूप में हृदयंगम किये जाने पर जोर दिया गया है वे अचेतन की दिशाधारा को परिष्कृत करने का उद्देश्य लेकर ही प्रतिष्ठापित की गई है।
वायुयान यदि किसी स्थान से सीधी रेखा में उड़ता चला जाय तो वह वापिस अपने स्थान पर आ जायेगा। क्योंकि पृथ्वी गोल है, पर यह वायुयान उड़ाने के प्रयास अब तक ध्रुवीय क्षेत्रों के ऊपर से उड़ाने का प्रयत्न नहीं किया गया। इतना ही नहीं इन दिनों राकेट और उपग्रहों को पृथ्वी के चारों और भ्रमण के लिए भेजा गया है उन्हें भी ध्रुव क्षेत्र से ऊपर से नहीं उड़ने दिया गया है उनकी दूसरी ही दिशाएं, कक्षाएँ निर्धारित की गई है। क्योंकि इस बात का पूरा भय है कि ध्रुव प्रदेश के ऊपर उड़ने वाले यान अपनी यात्रा सुरक्षित रूप से जारी नहीं रख सकते, वे बीच में ही कहीं गुम हो जायेंगे।
यदि हम सीधी राह पर चलें तो यात्रा का अन्त वहीं होगा जहाँ से आरम्भ हुआ है सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों के दो पहियों की गाड़ी लम्बी यात्रा करने के उपरान्त अपने उद्गम केन्द्र पर जा पहुँचती है। हम ईश्वर से निकलते है अस्तु यदि सीधी और सही दिशा में रहे तो ईश्वर प्राप्ति के लक्ष्य तक सरलतापूर्वक पहुँच सकते हैं। पर यदि जोखिम में डालने वाली दुष्प्रवृत्तियों के जाल में फंस जायें तो नष्ट और गुम होने के अतिरिक्त और क्या हाथ लगेगा?
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जीवन के विस्तृत अध्ययन के बाद ऋषियों ने यह तत्व-दर्शन खोजा और प्रतिपादित किया कि व्यष्टि का समष्टि से संयोग हुए बिना शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती। वैयक्तिक चेतना का विराट विश्व में विस्तीर्ण एकरस चेतना में मिलने पर ही मनुष्य की अशान्ति का अन्त हो सकता है। इस लक्ष्य के लिए निर्दिष्ट समस्त पद्धतियाँ योग का अंग हैं। क्योंकि योग का अर्थ ही है व्यष्टि का समष्टि से तादात्म्य, लघु का विभु, अणु का महत, जीव का परमात्मा से पूरी तरह जुड़ जाना, एकरस हो जाना।
कहने में यह सरल लगता है, पर है अत्यन्त कठिन। कठोपनिषद् में यमाचार्य और नचिकेता के संवाद में इस मार्ग की दुरुहता का संकेत है। वाजिश्रवा के पुत्र नचिकेता की ब्रह्म-जिज्ञासा देख, यमाचार्य ने पहले उन्हें बार-बार समझाया-
“देवैरमापि विचिकित्सितं पुरा, न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः । अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व, मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम्॥
-कठो0 1। 21
नचिकेता ! इस (ब्रह्म के स्वरूप) के सम्बन्ध में तो देवता भी सन्देह ग्रस्त हैं। योग-विज्ञान अत्यन्त सूक्ष्म है। वह शीघ्र समझ में नहीं आता। तुम कठिनाई में मत पड़ो। कोई अन्य वरदान माँग लो।
जब आत्मजयी नचिकेता अटल और दृढ़ रहा तथा समस्त ऐहिक भोगों, साँसारिक सुखों के प्रति गहरी अनासक्ति व्यक्त की, तभी यमाचार्य सन्तुष्ट हुए और उन्होंने कहा भी-‘‘जो दृढ़ निश्चयी है, जिसमें कठिनाइयों से जूझ सकने का साहस है, वही योगी हो सकता है।”
योग-मार्ग की कठिनाइयाँ इसलिए अनंतगुनी बढ़ जाती हैं कि यहाँ अपने से ही संघर्ष करना होता है और अपनी अभ्यस्त इच्छाओं, प्रवृत्तियों को मारना पड़ता है। यह काम बिना समझे-बूझे होने पर अनर्थकारी ही हो सकता है या फिर हताशा और असफलता मिलती है। अतः इस योग-मार्ग में प्रवेश के पूर्व ही उसका तत्वज्ञान समझ लेना अनिवार्य है। यही कारण है कि चपल बाल बुद्धि वाले लोगों को योग-पथ पर चलने की अनुमति नहीं मिलती। निष्ठावान साधकों को ही इस कठिन योग-मार्ग पर आरुढ़ होने की आज्ञा दी जाती है।
महर्षि पतंजलि ने कहा है -
“योगश्चित्तवृत्ति निरोधः।” (योगदर्शन पाद 1 सूत्र 2)
चित्त-वृत्तियों को रोकना ही योग है। यदि मनुष्य मन में निरन्तर उठने वाली बहुरंगी कामनाओं, वासनाओं को रोककर, उनका प्रयोग इन्द्रियों की इच्छा से नहीं, अपनी इच्छा से इस प्रकार कर सकने की सामर्थ्य विकसित कर ले जिस तरह सारथी रथ में जुते घोड़ों का करता है, तो वह व्यक्ति अपनी शक्तियों को ऊर्ध्वगामी बनाकर परमात्मा की प्राप्ति में समर्थ हो सकता है।
चित्त-वृत्तियों को सामान्यतः तो समझा भी नहीं जा सकता। योग-दर्शन के पाद 1 सूत्र 6 के अनुसार -
‘प्रमाण विपर्यय विकल्प निद्रा स्मृतयः।”
अर्थात्-प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा और स्मृति ये पाँच चित्त-वृत्तियों वशवर्ती करना योगी के लिए परमावश्यक है।
प्रमाण वृत्ति को वशवर्ती करने का अर्थ सामान्यतः यह है कि प्रत्यक्ष सुख की-सी अनुभूति कराने वाली चित्त-वृत्तियों को नियंत्रित किया जाए। यों प्रमाण वृत्ति के सूक्ष्म भेदोपभेदों का विश्लेषण जटिल व दुरूह विषय हो जायेगा। अतः उस विस्तार में अभी हम नहीं जाते।
कान मधुर ध्वनि सुनने के इच्छुक रहते हैं, यह श्रोता को प्रत्यक्ष सुख की सी अनुभूति हुई। जहाँ कहीं भी मधुर शब्द सुनाई पड़ते हैं, संगीत या सुन्दर वाद्य हो रहा होता मन उधर की चल पड़ता है।
आँखें रूप पसन्द करती हैं। वस्तुओं का सौन्दर्य हो, स्थान का अथवा नर-नारियों के शरीर का। आँखें सौन्दर्य देखते ही रम जाना चाहती हैं। जीभ रस की प्यासी रहती है। नासिका सुगन्ध को पसन्द करती है। यह इन्द्रियाँ अपने-अपने सुखों की प्रचण्ड कामना करती हैं। व्यक्ति जितना हो इन सुखों में रमण करता है, शरीर उतना ही दुर्बल और निस्तेज होता जाता है। साथ ही मन भी क्षीण तथा आत्मा निष्प्रभ होता चलता है। इसीलिए प्रत्यक्ष सुखानुभूतिपरक प्रतीत होने वाली इन चित्त-वृत्तियों को नियन्त्रित करना आवश्यक है।
इन आकर्षणों से मन को विरत करने मात्र से ही इन्द्रियाँ शान्त न हो जाएंगी। दबित वासनाएँ निश्चय ही अधिक वेग से उठती हैं। फ्रायड की यह बात सही है। किन्तु उतना ही सही एडलर ओर युग का, सबलीमेशन का, उदात्तीकरण का सिद्धान्त भी सही है।
कामनाओं को अन्तर्वर्ती बना लेने पर प्रत्यक्ष पदार्थों में प्रतीयमान सुख मन और आत्मा में विद्यमान दिखने लगेगा। अभी हम थोड़े-से रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्दों, ध्वनियों के आकर्षण में अपनी शक्ति गंवाकर बेचैन हो सकते हैं। पर अपने अन्तर्जगत में तो सभी विषय-वासनाओं की तृप्ति का अनन्त भण्डार मौजूद है। उस अनन्त सुख की प्राप्ति के लिए यदि हम क्षणिक वासनाओं को वशवर्ती कर उनकी सुखानुभूति से वंचित होते हैं, तो यह घाटे का नहीं, लाभ का ही सौदा है।
दूसरी वृत्ति है विपर्यय या अज्ञानता। जिसे हम मृग-तृष्णा के उदाहरण से समझ सकते हैं। मरुभूमि में दूर से चमकते, सिकता-कणों को देखकर जल का मिथ्या बोध होता है। रुपये-पैसे, सोने-चाँदी, स्त्री-पुत्रों आदि के प्रति हमारी आसक्ति भी ऐसे ही मिथ्या-बोध पर आधारित है। उनके प्रति हमारे अन्दर मात्र आसक्ति होती है, कोई तात्विक व्याख्या नहीं। हमें जो वस्तु प्रिय लगी, उसी के पीछे लग गये। प्रिय क्यों लगी ? इसके विचार का हमारे पास समय नहीं। यह प्रियता-बोध अक्सर अभ्यासवश या अनुकरणवश होता है। उसका आत्महित से कोई सम्बन्ध भी है या नहीं, यह जानने की हमें फुरसत ही नहीं। यही विपर्यय या मिथ्याज्ञान है। योगी को विपर्यय-वृत्ति से विरत होना ही पड़ेगा। उसे संसार के प्रत्येक पदार्थ का वैज्ञानिक स्वरूप समझकर उसकी ग्रहणीयता पर शान्त चित्त से विचार करना जरूरी है। अपनी मनोमान्यता मात्र के अनुसार चलते रहना नहीं।
निद्रा वृत्ति का सम्बन्ध आहार-विहार से है। योगारुढ़ को संयमित आहार-विहार करना आवश्यक है। बुरे आहार करने पर नींद अधिक आती है या जागते हुए भी आलस्य घेरे रहता है। योगाभ्यासी को अपनी तामसिक वृत्तियों में नियंत्रण कर निद्रा में कमी करनी चाहिए।
पांचवीं वृत्ति है स्मृति। ऊपर कहे हुए सुखों की स्मृति, उनका बार-बाद याद करना भी मन को विषय-सुखों की ओर आकर्षित करता है। ऐसे मानसिक चिन्तन से वस्तुतः बहुत अधिक शक्ति बर्बाद होती है। मधुर स्वप्नों का बार-बार स्मरण भी इसी में शामिल है।
इन सभी चित्त-वृत्तियों पर नियन्त्रण करते हुए अपने लक्ष्य-पथ पर चलते रहने पर ही योगी अन्ततः सफल होता है।
योग में शारीरिक, मानसिक, व्यायामों, साधनात्मक कर्मकाण्डों का भी महत्वपूर्ण स्थान है, पर तभी जब उनका उद्देश्य चिन्तन के स्वरूप को ऊँचा उठाने की दिशा में अग्रसर होता है। योग का बहिरंग रूप इन व्यायामों, कर्मकाण्डों के रूप में सामने आना आपत्तिजनक नहीं। किन्तु यह है योग का कलेवर ही, यह स्मरण रखा जाना और कराया जाना चाहिए। प्राण है- उपनिषद् प्रतिपादित वह अध्यात्म-दर्शन जो उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की प्रेरणा देता था तथा जिसे प्राचीनकाल में ब्रह्म-विद्या कहा जाता था।
चिन्तन स्तर की अन्तरंग उमंगें ही बहिरंग जीवन पर छायी रहती हैं। उनसे ही दिशा-निर्धारण और परिस्थिति-निर्माण होता है। भावना का यह मर्मस्थल परिष्कृत सन्तुलित बने, यही योग एवं अध्यात्म शिक्षा का लक्ष्य हो सकता है।
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जिन दिनों नेपोलियन बोनापार्ट इंग्लैण्ड पर आक्रमण की योजनाएँ बना रहा था, एक इंजीनियर राबर्ट फुल्टन ने उसके समीप पहुँचकर वाष्प-चालित जलयानों की अपनी योजना के बारे में बताया और समझाया कि इसके द्वारा शत्रु के जहाजों को किस तरह काबू में किया जा सकता है, पर नेपोलियन इससे झल्ला उठा। भाप के द्वारा हवा का रुख और पानी की धार काटते हुए जहाज चलाने की बात को उसने शुद्ध बकवास साबित किया और कहा-जनाब! ‘ऐसी सनकों को सुनने का समय मेरे पास नहीं।’
इंजीनियर चुपचाप लौट गया। बाद में जलयान बने, चले, पर तब भी कुछ प्रसिद्ध बुद्धिमान लोगों को इसमें अधिक सम्भावनाएँ नहीं दिखती थीं। रायल सोसाइटी, डबलिन में अपने भाषण में प्रो0 लाडेस्कर जैसे व्यक्ति ने कहा था-‘‘ये जलयान निश्चय ही मनोरंजक हैं, पर इनके द्वारा अटलाँटिक सागर को पार करने की आकाँक्षा बचकानी उछल-कूद मात्र है।” सभी जानते हैं कि आज यह आकाँक्षा कितनी सही और सार्थक सिद्ध हुई है। जलयानों का आज परिवहन और शत्रु से समर में भरपूर और महत्वपूर्ण उपयोग सर्वविदित है।
इसी तरह रोम के प्रमुख सैन्य इंजीनियर जूलियस फोन्टिनस ने कहा था- “युद्ध-उपकरणों की आगे खोज जारी रखना अनावश्यक है। क्योंकि इस सम्बन्ध के सभी आविष्कार चरम-सीमा पर पहुँच चुके हैं।” सभी जानते हैं कि आज के अणु-आयुधों की दृष्टि में रोम के उस जमाने के युद्ध-उपकरण बच्चों के खिलौने जैसे रह गये हैं।
सन् 1899 में अमरीकी आविष्कार पेटेंट विभाग के महानिदेशक ने तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति मैकबिल्ले को परामर्श दिया था कि यह विभाग अब तो बन्द कर दिया जाए। क्योंकि आगे कुछ और आविष्कार होने की गुँजाइश ही कहाँ बची है? सारे आविष्कार तो हो चुके। महानिदेशक के इस कथन के बाद 75 वर्षों में हुए असंख्य आविष्कारों ने उनके अनुमान को सर्वथा हास्यास्पद बना दिया।
49 वर्ष बाद नील आर्मस्ट्रांग व उनके साथी कैंप केनेडी अन्तरिक्षयान में सवार हो चन्द्र तल पर पहुँचे। तब न्यूयार्क टाइम्स ने स्वर्गीय यराबर्ट गोगार्ड से अपनी 49 वर्ष पूर्व की टिप्पणी के लिए क्षमा माँगी। क्योंकि गोगार्ड का प्रतिपादन सही था और न्यूयार्क टाइम्स का उक्त टिप्पणीकार गलत सिद्ध हुआ था।
अतः बुद्धिमान से बुद्धिमान माने जाने वाले व्यक्ति भी किन्हीं बातों को असम्भव माने-बताएँ, तो भी यह जरूरी नहीं कि वे बातें असम्भव ही हों। अपनी सम्पूर्ण बुद्धिमत्ता के साथ भी वे एक सर्वथा अभिनव तथ्य को समझ सकने में असमर्थ रह सकते हैं, जबकि उसी समय कोई अंतर्दृष्टि सम्पन्न व्यक्ति उसे सहज ही देख-जान रहा होता है।
मार्कोनी ने जब रेडियो आविष्कार किया, तो उसके द्वारा अटलांटिक पार भी सन्देश भेजने की सम्भावना को अन्य वैज्ञानिकों ने अति दुष्कर बताया और कहा कि यह तभी सम्भव है, जब हम एक ऐसा विशाल रेडियो स्टेशन खड़ा कर सकें, जितना बड़ा अमेरिका द्वीप है।
टैंक बनाने की योजना जब सर्वप्रथम सामने आई तो इंग्लैण्ड के सेनापति ने कहा- “वीर घुड़सवारों का काम लोहे की गाड़ियां अंजाम देंगी। कैसी वाहियात बकवास है! भला यह भी कभी सम्भव है।”
पहला हवाई जहाज जब बना, उड़ा तो अखबारों ने उसकी खबर को ‘गप्प’ माना। फिर जब सबके सामने एकाधिक बार प्रदर्शन किया गया, तो ‘पापुलर साइन्स’ पत्र ने छापा-‘‘यह हवाई जहाज छुट-पुट काम तो कर सकता है, पर किसी बड़े प्रयोजन की पूर्ति इससे होती नहीं दिखती।
वायुयानों का जब प्रयोग और प्रचलन बढ़ा तो उनकी गति के बारे में अनेक सीमाएँ आँकी गईं। वैज्ञानिकों ने भी माना कि शब्द की गति यानी 660 मील प्रति घण्टा से अधिक की रफ्तार हवाई जहाजों की सम्भव नहीं, पर प्रगति रुकी नहीं। 550 मील प्रति घण्टा की चाल वाले बोइंग 707 आये, 600 मील वाला बी0सी0 10 आया, 670 मी. ‘चाल वाला’ ग्लैमरस ग्लेनिस आया। 1500 मील प्रति घण्टे के वेग से उड़ने वाले ‘कन्कर्ड’ बन रहे हैं। 25 हजार मील प्रति घण्टे की चाल से अन्तरिक्षयान उड़ रहे हैं और अब तो 6 लाख मील प्रति घण्टे चलने वाले अन्तरिक्षयानों की बाबत भी तेजी से सोचा और किया जा रहा है।
खगोलविद् मानते थे कि भू-मध्य रेखा को कभी कोई पार न कर सकेगा। क्योंकि सूर्य की सीधी किरणों से वहाँ का समुद्र जल भी धधक रहा होगा। लेकिन पुर्तगाल के हेनरी ने भू-मध्य रेखा को पारकर इस मान्यता को असत्य सिद्ध कर दिया।
रूसो ने जब प्रजातन्त्र के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया तो लोगों ने बुरी तरह उसे बेवकूफ बनाया। शासन राजा करता है प्रजा पर- न कि प्रजा शासन करेगी राजा पर। जनता द्वारा, जनता के लिए, जनता पर शासन किये जाने का तर्क उन दिनों किसी के गले नहीं उतरा था, पर समय ने बताया कि वह प्रतिपादन कितना सही और कितना उपयोगी था। आज आधी से अधिक दुनिया में प्रजातन्त्र सिद्धान्त अनुरूप शासन चल रहा है। साम्यवाद के प्रवर्तक कार्ल मार्क्स को यह कहकर मूर्ख ठहराया गया था कि प्रकृति ने जब हाथ की पाँचों उँगलियाँ एक जैसी नहीं बनाई तो मनुष्यों की आर्थिक स्थिति एक जैसी कैसे हो सकती है? पर आज तो एक तिहाई दुनिया पर साम्यवादी पद्धति से शासन हो रहा है
चिन्तन और युगीन प्रवृत्तियों-अन्तर्धाराओं के क्षेत्र में भी यही बात है। मर्यादाओं का मर्दन, नीति के आवरण तले नीचता का नर्तन, आत्म-प्रवंचना और पर पीड़न को ही बुद्धि कौशल समझने का प्रचलन, क्रान्ति की अहर्निशि रट लगाने वालों के चित्त में केन्द्रीभूत भ्रान्तियाँ, समाज-सुधार की संकल्प-घोषणाओं के तले अपनी लोलुपता की तुष्टि के लिए कुर्सी का विकल्प ढूँढ़ते हुए थके हारे लोगों की एकत्रित सड़न और इन सबके बीच एक अनन्त सी यातना में पिस रही मानवता का क्रन्दन ऐसे वातावरण में नये युग के अभिनन्दन की बात यदि कौतुक-कल्पना और ढाढ़स बँधाने जैसी चेष्टा मात्र प्रतीत हो, तो अचरज नहीं। लेकिन यह सत्य है कि नया युग बढ़ता हुआ चला आ रहा है। मनुष्य को अस्वाभाविक रूप से अपनाई गई अपनी समस्त दुष्प्रवृत्तियों से मुक्त होना होगा, भले वह आज उन्हें स्वाभाविक और अनिवार्य मान रहा हो। उसे अपनी चिन्तन की प्रक्रिया बदलनी होगी और क्रिया-पद्धति में आमूल परिवर्तन लाना होगा। आज परिस्थितियाँ ही ऐसी लगती हैं कि वे मानो अनिवार्यतः वर्तमान में चल रही क्रियाओं को जन्म दे रही हैं। मात्र विचार परिवर्तन से ये परिस्थितियाँ क्योंकर बदलेंगी? ऐसा लग सकता है। बिना परिस्थिति की विवशता के कोई व्यक्ति सचाई के कठिन रास्ते पर क्योंकर चलेगा? लेकिन शीघ्र ही वह समय आ रहा है, जब सभी यह मानने को बाध्य होंगे कि मनुष्य जीवन की सर्वश्रेष्ठ शक्ति विचार है और सही विचार व्यक्ति-जीवन एवं समाज-जीवन के सम्पूर्ण ढाँचे को ही नया स्वरूप देने में समर्थ हो सकता है।
अब तक अनेक धर्म -सम्प्रदाय बने, योग और अध्यात्म में गहन साधनाएँ, आविष्कार और अनुभूतियाँ की जा चुकीं। लेकिन ‘इदमित्थं’ नहीं कहा जा सकता है। अभी उस क्षेत्र में प्रगति की प्रचण्ड सम्भावनाएँ शेष हैं।
समस्त विश्व का एक धर्म, एक आचार, एक राष्ट्र, एक भाषा, एक लक्ष्य-ये आज सम्भव लग सकते हैं, पर कल इन्हें सत्य होना ही है। मनुष्य में देवत्व का उदय, धरती पर स्वर्ग का अवतरण और वसुधैव कुटुम्बकम् की धारणा का सर्वत्र सुदृढ़ होना सुनिश्चित है, सन्निकट है।
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सोऽहम्-साधना भावोत्कर्ष एवं शक्ति-अवतरण की प्रक्रिया है। इसे अजपा गायत्री जाप भी कहते हैं। प्राण निरन्तर उसका बीज रूप में जप करता रहता है। श्वास लेते समय ‘सो’ ध्वनि का और छोड़ते समय ‘हम’ ध्वनि का अन्तःभूमिका में अनुभव करना होता है।
वायु जब छोटे छिद्र से होकर वेगपूर्वक निकलती है तो घर्षण के कारण ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता है। बाँसुरी से स्वर लहरियाँ इसी तरह निकलती हैं। जंगलों में घने बाँसों के बीच से अक्सर बाँसुरी जैसी ध्वनियाँ निकलती सुनाई देती हैं। इसका कारण बाँसों में कीड़ों द्वारा किए गये छेदों में वायु की वेगपूर्वक टकराहट से उत्पन्न स्वर प्रवाह ही है। वृक्षों को झकझोर कर बहने वाली हवा से भी इसीलिए कभी-कभी सनसनाहट सुनाई पड़ती है। नासिका छिद्र भी बाँसुरी के छेदों जैसे ही है। साधारण श्वास-प्रश्वास के समय भी इनमें वायु गुजरते समय ध्वनि उत्पन्न होती है, पर वह धीमी बहुत होती है। प्राणयोग की साधना में गहरे श्वास-प्रश्वास के कारण यह ध्वनि प्रवाह तीव्रतर हो जाता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि खुले कानों से भी ये ध्वनि-प्रवाह सुने जा सकते हैं। उन्हें तो कर्णेन्द्रियों की सूक्ष्म चेतना में ही अनुभव किया जाता है।
श्वास क्रिया पर चित्त को एकाग्र कर ‘सो’ के साथ परमात्म चेतना के अन्तःप्रवेश की अनुभूति तथा ‘हम’ के साथ जीव-भाव की काय-कलेश्वर से विसर्जन की अनुभूति करनी चाहिए। इसमें प्रत्येक श्वास-प्रश्वास में परमात्मा सत्ता का अपने शरीर और मन पर अधिकाधिक आधिपत्य होते चलने की धारणा बलवती होती जाती है। यह भाव-चेतना जागृत होने पर शरीर और मन से लोभ-मोह, वासना-तृष्णा के आधिपत्य की समाप्ति तथा उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व की, ब्रह्म-सत्ता की प्रतिष्ठापना की अनुभूति गहरी होती जाती है। अनुभूति की गहनता ही परिणामकारी होगी। अन्यथा यह सब उथली कल्पनाओं की मनोरंजक क्रीड़ा ही सिद्ध होगी। सार्थकता उन्हीं विचारों-संकल्पों की है, जो क्रिया रूप में परिणत हैं। अन्यथा सब मनमोदक मात्र है। शेखचिल्लीपन से कोई उपलब्धि सम्भव नहीं है।
शरीर-मन से अवाँछनीय इन्द्रिय लिप्साओं का निष्कासन और दिव्य चेतना के शासन की प्रक्रिया ही सोऽहम् साधना को सार्थक बनाती है। चिन्तन जीवन-प्रवाह बन जाए, तभी वह चिन्तन है। अन्यथा मानसिक रति-विनोद ही कहा जाएगा।
यों सोऽहम् साधना का चमत्कारी परिणाम भी अतुल है। यह प्राणयोग की विशिष्ट साधना है। दस प्रधान और चौवन गौण, कुल चौंसठ प्राणायामों का विधि-विधान साधना विज्ञान के अन्तर्गत है। इनके विविध लाभ हैं। इन सभी प्राणायामों में सोऽहम् साधना रूपी प्राणयोग सर्वोपरि है। यह अजपा गायत्री जप प्राणयोग के अनेक साधना-विधानों में सर्वोच्च है। इस एक के ही द्वारा सभी प्राणायामों का लाभ प्राप्त हो सकता है।
षट्चक्र वेधन में प्राणतत्व का ही उपयोग होता है। नासिका द्वारा प्राण-तत्व खींचे जाने पर आज्ञाचक्र तक तो एक ही ढंग से कार्य चलता है, पर पीछे उसके भावपरक तथा शक्तिपरक ये दो भाग हो जाते हैं। भावपरक हिस्से में फेफड़े में पहुँचा हुआ प्राण शरीर के समस्त अंग-प्रत्यंगों में समाविष्ट होकर सत् का संस्थापन और असत का विस्थापन करता है। शक्तिपरक प्राणधारा आज्ञाचक्र से पिछले मस्तिष्क को स्पर्श करती है। मेरुदण्ड से निकल जाती है, जहाँ ब्रह्मनाड़ी का महानद है। इसी ब्रह्म-नद में इड़ा-पिंगला दो विद्युतधाराएँ प्रवाहित हैं, जो मूलाधार चक्र तक जाकर सुषुम्ना-सम्मिलन के बाद लौट आती हैं। मेरुदण्ड स्थित ब्रह्मनाड़ी के इस महानद में ही षट्चक्र भँवर की तरह स्थित है। इन्हीं षटचक्रों में लोक-लोकान्तरों से सम्बन्ध जोड़ने वाली रहस्यमय कुंजियाँ सुरक्षित रखी हुई हैं। जो जितने रत्न-भण्डारों से सम्बन्ध स्थापित कर ले, वह उतना ही महान।
कुण्डलिनी शक्ति भौतिक एवं आत्मिक शक्तियों की आधारपीठ है। उसका जागरण षट्चक्र बेधन द्वारा ही सम्भव है। चक्रवेधन प्राणतत्व पर आधिपत्य के बिना सम्भव नहीं। प्राणतत्व के नियन्त्रण में सहायक प्राणायामों में सोऽहम् का प्राण योग सर्वश्रेष्ठ व सहज है।
सोऽहम् साधना द्वारा एक अन्य लाभ है। दिव्य गन्धों की अनुभूति । गन्ध वायु तत्व की तन्मात्रा है। इन तन्मात्रा द्वारा देवतत्वों की अनुभूति का माध्यम है। नासिका सोऽहम् साधना, गन्ध तन्मात्रा को विकसित करती है, परिणामस्वरूप दिकगन्धों की अनायास अनुभूति समय-समय पर होती रहती है। इन गन्धों को कुतूहल या मनोविनोद की दृष्टि से नहीं लेना चाहिए। अपितु इनमें सन्निहित विभूतियों का उपयोग कर दिव्य शक्तियों की प्राप्ति का प्रयास किया जाना चाहिए। उपासना स्थल में धूपबत्ती जलाकर, गुलदस्ता सजाकर, चन्दन, कपूर आदि के लेपन या इत्र -गुलाबजल के छिड़काव द्वारा सुगन्ध पैदा की जाती है और उपासना अवधि में उसी की अनुभूति को सहज बनाया जाता है। यह अनुभूति गहरी होती चले, तो साधना स्थल से बाहर निकलने पर, बिना किसी गन्ध-उपकरण के भी दिकगन्ध आती रहेगी। ऐसी दिकगन्ध, एकाग्रता की अभिरुचि का चिन्ह है। विभिन्न पशु-पक्षियों, कीड़े-मकोड़ों में घ्राण-शक्ति का महत्व सर्वविदित है। उसी के सहारे वे रास्ता ढूँढ़ते शत्रु को भाँपते और सुरक्षा का प्रबन्ध करते, प्रणय-सहचर को आमंत्रित करते, भोजन की खोज करते तथा मौसम की जानकारी प्राप्त करते हैं। इसी घ्राण-शक्ति के आधार पर प्रशिक्षित कुत्ते अपराधियों को ढूँढ़ निकालते हैं। मनुष्य अपनी घ्राण-शक्ति को विकसित कर अतीन्द्रिय संकेतों तथा अविज्ञात गतिविधियों को समझ सकते हैं। दिव्य-शक्तियों से सम्बन्ध का भी गन्धानुभूति एक महत्वपूर्ण माध्यम है। सोऽहम् साधना इसी शक्ति को विकसित करती है।
सोऽहम् साधना का एक अन्य विशिष्ट पक्ष स्वर साधना का है। शरीर और मन की स्थिति में ऋण एवं धन विद्युत आवेशों की घट-बढ़, इड़ा तथा पिंगला, नाड़ी के माध्यम से चलने वाले चन्द्र-सूर्य स्वर के प्रभाव अनुसार होती रहती है। स्वर स्थिति का सही ज्ञान अपनी अन्तः-क्षमता की दशा को जानने में सहायक होता है और तब किस समय कौन सा काम हाथ में लेना अधिक उचित होगा, यह निर्णय लेना भी सरल हो जाता है। सामान्यतः अविज्ञात जानकारियाँ भी स्वरयोग के द्वारा अधिक अच्छी तरह समझी जा सकती हैं।
स्वरयोग अपने आप में एक स्वतन्त्र शास्त्र है। उसकी साधना के अनेक अभ्यास हैं, पर सोऽहम् साधना उनमें सर्वाधिक सरल व सफल है। इस प्राणयोग द्वारा षट्चक्र वेधन सरल होता है। पंचकोशों के अनावरण हेतु अपेक्षित प्रखर प्राण-शक्ति भी इसी प्राणयोग के द्वारा सहज प्राप्त होती है।
यौवन कोई अवधि नहीं वरन् एक मानसिक स्थिति है। उसकी परख रक्त के उभार के आधार पर नहीं इच्छा, कल्पना एवं भावना के आधार पर ही की जानी चाहिए। जीवन की प्रौढ़ता अन्त: स्रोतों की ताजगी के साथ जुड़ी हुई रहती है। एक अवधि बीत जाने पर चमड़ी पर झुर्रियां तो पड़ेंगी ही पर इससे क्या? बुढ़ापा तो जब आवेगा जब मन अपने को हारा, थका, निराश और निढाल अनुभव करेगा। आदमी तब तक जवान रहता है जब तक उसमें उत्साह, साहस और निष्ठा बनी रहती है। बुढ़ापा और कुछ नहीं आशा का परित्याग- उज्ज्वल भविष्य के प्रति संदेह और अपने आप पर अविश्वास का ही दूसरा नाम है। जब जीवन में अनन्त सुन्दरता, महानता, सामर्थ्य और प्रकाशपूर्ण सम्भावना की ओर से मन सकोड़ लिया जायेगा तो वृद्धता की काली छाया ग्रसित कर लेगी भले ही ऐसा व्यक्ति आयु की दृष्टि से नवयुवक ही क्यों न हो?
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खेचरी मुद्रा का अभ्यास साधक को अन्तर्मुखी बनाता है। हठयोग-ग्रन्थों में तो इसके द्वारा प्राप्य अलौकिक अतीन्द्रिय शक्तियों का विस्तृत वर्णन है ही, इसकी सामान्य दैनिक साधना भी आनन्द और उल्लास की अनवरत अभिवृद्धि करती है।
शिथिल शरीर और रिक्त मन द्वारा ही खेचरी साधना का अधिकाधिक लाभ सम्भव है। शरीर को ढीला और मन को खाली करने के बाद जिह्वा को उलट का तालु से लगाना, धीरे-धीरे उसे सहलाना और उस आधार पर सोमरस पान की दिव्य अनुभूति करना-यही सामान्यतः खेचरी मुद्रा है। स्वर्णजयन्ती साधना वर्ष में दैनिक उपासना क्रम में की जाने वाली खेचरी साधना के लिए शिथिलीकरण और मन को रिक्त करने की अलग से प्रक्रिया की आवश्यकता नहीं। मन्त्र-जाप की उत्कृष्ट स्थिति में, जब चिन्तन एकाग्र और एकरस हो जाता है, जो शरीर-मन स्वयमेव उसी स्थिति में पहुँच जाते हैं।
खेचरी मुद्रा का दार्शनिक-पक्ष समझना आवश्यक है। परमात्मा का आत्मा के साथ निरन्तर मिलन-सम्पर्क चलता रहता है। इस संस्पर्श से दो अनुभूतियाँ होती हैं (1) अवर्ण्य आनन्द (2) उद्दाम उल्लास। खेचरी मुद्रा इसी संस्पर्श-अनुभूति और उसके परिणामस्वरूप आनन्द और उल्लास की चरम संवेदना की अनुभूति का माध्यम है। सामान्य स्थिति में मनुष्य को इन अनुभूतियों की प्रतीति नहीं हो पाती। यद्यपि भगवान मनुष्य को निरन्तर ही प्रेरणाएँ देते रहते हैं-(1) सहज आनन्द जिसका संसार के सुखद-पक्ष के मूल्याँकन और कर्मफल के वैज्ञानिक नियम की स्पष्ट अनुभूति के इस सन्तोष एवं प्रसन्नता के साथ अनुभव होता है कि हमारे आत्मिक उत्कर्ष का श्रेयस्कर परिणाम सुनिश्चित हैं। अतः हताशा या उदासी का कोई कारण नहीं है -दुनिया के लोग अपनी तीव्र उपेक्षा या प्रचण्ड विरोध कर रहे हों, तो भी। (2) उल्लास की भाव-भरी उमंगे, जो उत्कृष्ट चिन्तन तथा आदर्श कर्तृत्व के साहसिक जीवन के प्रति अदम्य उत्साह के कारण अनवरत उठती हों। इन दो प्रेरणाओं को भगवान पेंडुलम-गति से लगातार देते ही रहते हैं।
आनन्द का अर्थ व्यर्थ की, बहकी-बहकी डींगें मारना या भिन्न चेष्टाओं द्वारा हर्षातिरेक का प्रदर्शन नहीं। अपितु छोटे-मोटे अभावों-आघातों से अविचलित रहते हुए विश्व-ब्रह्माण्ड में ओत-प्रोत दिव्यसत्ता, चतुर्दिक् परिव्याप्त सदाशयता-समुद्र तथा सृष्टि की अनुपम उपलब्धि मानव-जीवन की प्राप्ति की पुलक भरी अनुभूति ही आनन्द है। दृष्टिकोण की यह परिपक्वता तथा रुचियों का परिष्कार मनःस्थिति को सदा उत्फुल्ल और सन्तुलित रखता है, इससे जो घटनाएँ दूसरों की उत्तेजना-उद्विग्नता या कुण्ठा-हताशा का कारण बनती हैं, उन्हें वह विनोद-कौतुक मात्र ही मान पाता है। अधिक कुछ मान पाना उसके लिए सम्भव ही नहीं।
यह जीवन-दृष्टि अनिवार्य है। बिना अन्तःकरण के ऐसे परिष्कार के यदि सन्तोष और प्रसन्नता का अभ्यास सध भी गया तो यह सन्तोष गतिहीनता को जन्म दे देगा। जड़ता की स्थिति तो तामसिक है। बिना इस जीवन दृष्टि के मात्र ईश्वर और उसकी स्वप्निल अनुभूतियों के अभ्यास से पुलकित प्रसन्न अध्यात्मवादी इसीलिए पलायनवादी, भाग्यवादी बन कर समाज में फैली बुराइयों और अपनी बुरी परिस्थितियों दोनों से समझौता कर लेते हैं तथा इस तरह निखट्टू, निकम्मे, आलसी और प्रमादी ही बन बैठते हैं। जिन्होंने अपनी प्रगति का द्वार ही बन्द कर लिया है, उनके आध्यात्मिक होने की सम्भावना भी समाप्त। मानवीय जीवन की गरिमा को न समझ कर वे ईश्वरीय अनुदान की उपेक्षा तथा अपमान ही करते हैं। भले ही इस धृष्टता तथा कर्त्तव्य-हीनता के बदले वे ईश्वरीय वरदान पाने का अनुमान लगाते रहें।
इसके विपरीत, जब मानवीय जीवन की महत्ता का स्मरण कर अपने महान कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों का बोध जागृत होगा, तो उस हेतु प्रचण्ड प्रयत्नों की ही प्रेरणा प्राप्त होगी। यही प्रखर उल्लास है। ईश्वर मात्र सन्तोश या प्रसन्नता नहीं देते, उनके दिये गये आनन्द में उल्लास भी अनिवार्य रूप से शामिल है। यह उल्लास जितना ही प्रखर और प्रौढ़ होगा, प्रतिकूल परिस्थितियों में व्यक्ति उतना ही प्राणवान और अप्रतिहत रहेगा। बड़े से बड़े अभावों-अवरोधों की भी चिन्ता न करते हुए ईश्वरीय सन्देश और विवेक-निर्देश के अनुरूप अपने कदम निश्चित करेगा और रुकेगा नहीं।
आनन्द और उल्लास की यह अनवरत प्रेरणा ही ईश्वर की वार्त्तालाप-विधि है। ये दो संकेत ही पर्याप्त हैं-जिस तरह कि टेलीग्राम की डैमी ‘गर’ तथा ‘गट्ट’ इन दो ध्वनियों के सहारे ही लम्बे-चौड़े संवादों की शृंखला बनाती रहती है, उसी तरह ये दो प्रेरणाएँ जीवन में अविच्छिन्न और अनवरत प्रवाहित रहें, इतनी ही ईश्वर की रुचि है। इन्हें अपने निजी जीवन में किस प्रकार कार्यान्वित करें यह निर्णय-निर्धारण मनुष्य का काम है और इसके लिए व्यक्तिगत चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। हिमालय पवित्र धाराओं का सृजन कर उन्हें समुद्र-मिलन की प्रेरणा देकर अपने कर्त्तव्य की पूर्ति मान लेता है और आजीवन प्राण-अनुदान ही देता रहता है। कहाँ घाट या पुल बनें, पानी का कहाँ क्या उपयोग हो इसकी हिमालय को चिन्ता नहीं। परमात्मा ने भी अपनी परिस्थितियों और क्षमताओं से तालमेल बिठाने की बुद्धि देकर मनुष्य को जिम्मेदारी दे दी है। इस जिम्मेदारी को निभाना मनुष्य का निजी कर्त्तव्य-कौशल है।
खेचरी मुद्रा का उद्देश्य आनन्द और उल्लास की इन्हीं चरम संवेदनाओं की सघन अनुभूति है। ताकि ब्रह्म और जीव के सम्बन्ध सूत्र सक्रिय व सुसंचालित रहें तथा आदान-प्रदान की इस प्रक्रिया में आये अवरोध दूर हों।
प्रकृति और पुरुष का संयोग-क्रम निरन्तर चलता रहता है। जिस तरह घड़ियाल पर हथोड़े की चोट से झनझनाहट-थरथराहट होती है, वैसी ही थरथराहट इस संयोग-सम्भोग क्रम से भी होती है। यह थरथराहट-झनझनाहट ॐकार ध्वनि की है। परा प्रकृति के अंतराल में यही ॐकार रूपी घात-प्रतिघात अविराम क्रियाशील हैं। इन्हीं से शक्ति उत्पन्न होती है और सृष्टि में विविध-विधि हलचलें जन्म लेती हैं।
खेचरी मुद्रा द्वारा जीव और ब्रह्म का संयोग क्रम भी झनझनाहट को जन्म देता है। इसके द्वारा व्यक्ति शक्ति के उत्स से जुड़ता है और बहुविध सक्रियता की शक्ति अर्जित करता है।
जिह्वा को तालु से लगाने तथा मन्दगति से लगातार सहलाने पर मधु मिठास की सी अनुभूति होती है। इसी मधु-मिठास को मादक सोमरस कहा गया है। यह मादकता आन्तरिक मस्ती की है । इसमें आनन्द और उल्लास-उत्साह दोनों की समाविष्ट हैं। स्वाद-अनुभूति को आध्यात्मिक दृष्टि से जोड़ा जाएगा, तभी खेचरी-साधना सार्थक होगी।
महकने वाले फूलों में गंध इसलिए होती है कि उसकी मोहक मस्ती से आकर्षित होकर उड़ने वाले कीड़े उस पर आकर बैठें और अपने परों, पैरों में लपेट कर नर और मादा पुष्पों का पराग एक दूसरे तक पहुंचाने के यान वाहन बनें। फूलों का फल बनने का अवसर इसी प्रत्यावर्तन द्वारा सम्भव होता है। यदि पुष्पों में गंध न हो तो पक्षी उन पर बैठने के लिए लालायित न हों। गंधों में भिन्नता न हो तो उन कीड़ों में एक के बाद दूसरे का रसास्वादन करने की इच्छा न हो। ऐसी दशा में पुष्पों का पराग वंध्या होकर ही रह जाय और उन्हें फलने के अवसर से वंचित ही रहना पड़े।
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भगवान ने मनुष्य को अज्ञ या अशक्त बनाकर नहीं भेजा है, उसे महान और सशक्त बना सकने वाली समस्त सम्भावनाओं के साथ सँजोया गया है। उसे अपने सभी पुत्र समान रूप से प्रिय हैं, इसलिए न किसी की उपेक्षा की है और न किसी के साथ पक्षपात बरता है। हर किसी को अवसर दिया है कि वह चाहे तो प्रगति के पथ पर निर्बाध गति से आगे बढ़ सकता है।
हमने अपनी गरिमा कितनी बढ़ाई यह प्रश्न दूसरा है और इस अनुपात से अग्रगामी बनने में देर भी लग सकती है, पर भगवान ने किसी भी स्थिति में बढ़ने के लिए आन्तरिक क्षमता में कोई कमी नहीं रखी है। उसने यह आरोप अपने ऊपर नहीं ओढ़ा है कि किसी को कम दिया किसी को अधिक। मूलतः हर व्यक्ति में लगभग एक जैसी ही क्षमता विद्यमान है। कौन उसका कितना और कैसा उपयोग करता है? यह दूसरी बात है।
भौतिक जगत में यह नियम काम करता है कि हर वस्तु को पृथ्वी की आकर्षण शक्ति अपनी ओर खींचती है। फलस्वरूप वह ऊपर से नीचे की ओर गिरता है। आत्मिक जगत में यह नियम है कि परमेश्वर हर आत्मा को ऊपर की ओर खींचता है। ऊपर उठने और आगे बढ़ने की प्रेरणा और सहायता हर किसी को निरंतर प्रदान की जाती है। कोई उसे अस्वीकार कर दे यह बात दूसरी है।
भौतिक और आत्मिक जगत के नीचे खींचने और ऊपर उठाने वाले नियम विपरीत तो हैं, पर उनमें यह क्षमता एक रूप से है कि वे हल्के-भारी का, वस्तु विशेष का, व्यक्ति विशेष का अन्तर किये बिना अवसर सभी को समान रूप से देते हैं। विलम्ब या असफलता के लिए प्रकृतिगत या ईश्वरगत सुविधाओं में न्यूनाधिकता इसका कारण नहीं है।
स्पष्ट है कि छोटे से छोटा तिनके से लेकर वृहदाकार पिण्ड ब्रह्माण्ड तक के प्रत्येक घटक को गुरुत्वाकर्षण की सुविधा समान रूप से प्राप्त है।
फिर प्रगति पथ पर अग्रसर होने में विलम्ब क्यों हो जाता है ? अवरोध क्या खड़ा हो जाता है? इसका उत्तर यह है कि अवरोध दूर करने के लिए आवश्यक क्षमता का विकास नहीं किया गया। सहयोग की तरह प्रकृति का एक नियम अवरोध भी है। वह हर किसी जड़-चेतन को टकराने की चुनौती देता है और क्षमता विस्तार की प्रेरणा। इन कसौटियों पर जो जितना खरा उतरता है उसे अपने लिए अग्रगमन का पथ उसी मात्रा में प्रशस्त हुआ मिलता है। भौतिक जगत में वायु का दबाव गति का अवरोध करता है और आत्मिक जगत में आन्तरिक दुर्बलता का। इन अवरोधों को हटा सकने वाली क्षमता विकसित करना ही तो जड़-चेतन का हर इकाई का कर्त्तव्य धर्म ठहराया गया है।
पदार्थ में अपनी मौलिक गतिशीलता है, पर उसे अवरोध रोकते और कुण्ठित करते हैं। चाबी की मोटर यदि एकबार चलाकर छोड़ दी जाय तो वह अपने मूलभूत नियम के अनुसार निरंतर चलती रहेगी, जैसे कि अन्तरिक्ष में ग्रह-उपग्रह अपनी कक्षा पर अनवरत रूप से घूमते रहते हैं। धरती पर वायु का घर्षण और जमीन का खुरदरापन उस स्वाभाविक चाल में बाधक बनता है। चाबी की खिलौना मोटर एकबार चला देने पर कुछ दूर चलकर रुक जाती है, इसका कारण हवा का घर्षण और जमीन का खुरदरापन है। चाबी की शक्ति ढीली पड़ती है यह अवरोध उस स्वाभाविक चाल को दबोच देता है और मोटर रुक जाती है। यदि इस खिलौना मोटर को किसी चिकनी सतह के और वायु रहित बक्से में एक बार चला दे तो वह बिना रुके चलती ही रहेगी।
व्यक्तियों अथवा वस्तुओं को हलचल अथवा प्रगति की ओर अग्रसर होते देखा जाता है , उससे यह प्रतीत होता है कि यह सब किसी बाहरी शक्ति से बलपूर्वक किया जा रहा है, पर वास्तविकता ऐसी नहीं है। हर वस्तु के अन्दर अपना केन्द्रीय बल है-गति उसी से उत्पन्न होती है। परमाणु में न्यूक्लियस-नाभिक-शक्ति का पुंज है और उसी के दबाव से उसके घटक काम करते हैं। सौर-मंडल में प्रेरणा का स्रोत सूर्य है। मनुष्य में उसका आत्मबल, मनोबल अथवा संकल्पबल ही प्रगति के समस्त साधन संजोता है।
वस्तुओं में प्रमुख बल-विकेन्द्रित बल और संकेन्द्रित बल भी काम करते हैं। एक रस्सी में पत्थर का टुकड़ा बाँधकर एक ही वृत पर घुमाया जाय तो वह घूमने की गति पकड़ लेगा। इस भ्रमण में दो बल काम करते हैं-एक तो वह जो रस्सी के माध्यम से केन्द्र से सम्बन्धित है। इसके अनुसार पत्थर अपने केन्द्र के साथ सम्बन्ध बनाये रहेगा। दूसरा बल वह है जो पत्थर को केन्द्र से दूर ले जाता है। केन्द्रीय बल त्वरणजनित है और विकेन्द्रित बल वस्तु को उसी अवस्था में घूमती रखने के लिए है।
प्रगति के पथ पर अवरोध उत्पन्न करने वाले तत्व अधिकतर तो स्वयं ही पैदा किये जाते हैं। गुरुत्वाकर्षण जहाँ बल देता है, वहाँ वायु घर्षण उसे अवरुद्ध करता है। इस प्रकार प्रकृति के अनुदान के सम्बन्ध में अधिक से अधिक यह कहा जा सकता है कि वह अपना जमा खर्च बराबर कर लेती है। यद्यपि यह बात भी आँशिक रूप से ही सत्य है। प्रेरक गुरुत्वाकर्षण की क्षमता अधिक है, वायु संघर्षण की कम।
बड़े अवरोधों में मनुष्य के दोष, दुर्गुण ही प्रधान कारण होते हैं। उन्हें भी मनुष्य बहुत श्रम, समय और मनोयोग लगाकर ही एकत्रित करता है। इस अवरोधी बल को यदि बड़ी मात्रा में एकत्रित एवं प्रयुक्त न किया जाय तो प्रगति के पथ पर अग्रसर होने का चक्र सहज गति से नहीं रुकता। एकबार अपनी धुरी और कक्षा पर घूम जाने के बाद ग्रह-नक्षत्र उस गति को अनन्त काल तक जारी रखे रहते हैं। लट्टू को घुमाकर देर तक उसे घूमता हुआ देखा जा सकता है। पर अग्रगमन में भारी व्यवधान उत्पन्न होता है वह विघातक-आसुरी क्षमता के रूप में क्रमशः उपार्जित ही किया गया होता है। पतनोन्मुख निम्नगामी प्रवृत्तियों से यदि उदासीन रहा जा सके तो भी सहज प्रगति क्रम का लाभ उठाया जा सकता है। पर दुर्भाग्य तो यह है कि उपार्जन विधायक गुणों का नहीं विनाशक तत्वों का किया जाता है। वे ही हमारी जीवन प्रगति में ब्रेक का काम करते हैं और कई बार तो उसे उलट भी देते हैं।
वस्तुओं की स्वाभाविक गति अपने आप नहीं रुकती उसे किसी बल द्वारा ही रोका जा सकता है। चलती हुई मोटर को रोकने के लिए उसी गति के समकक्ष ब्रेक का बल प्रयुक्त करना पड़ेगा तभी दोनों में मल्ल-युद्ध से गति को शून्य बनाया जा सकेगा।
बल प्रयोग में प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। गेंद को दीवार पर फेंक कर मारा जाय तो वह लौटकर उसी स्थान पर आने का प्रयत्न करेगी जहाँ से की फेंकी गई थी। चलती मोटर का ब्रेक यदि दौड़ती हुई चाल से अधिक बल का लगा दिया जाय तो मोटर उलट जायेगी। दीवार पर कसकर मुक्का मारें तो मात्र दीवार को ही चोट नहीं लगेगी, उसकी प्रतिक्रिया मुट्ठी पर भी होगी और वह भी अपने को आहत अनुभव करेगी। यह दुर्भाग्य हम आये दिन अपनी जीवन प्रगति में दुर्घटना के रूप में देखते और अनुभव करते रहते हैं।
न्यूटन ने प्रत्येक वस्तु को गतिशील सिद्ध किया है और कहा है –‘‘चाल कितनी ही मन्द क्यों न हो-पर वह होती अवश्य है। पूर्णतया अचल कोई पदार्थ नहीं है।” प्रकृति के गतिक्रम को न्यूटन ने (1) गति का मूलभूत नियम (2) बल तथा त्वरण के बीच का सम्बन्ध (3) क्रिया तथा प्रतिक्रिया की बराबरी के रूप में व्याख्या की है।
चेतन जगत में गतिशीलता की इतनी अधिक दिशाएँ हैं कि उन्हें अपनाकर मनुष्य दुर्गति से उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचने के लिए अग्रसर हो सकता है। अवरोध केवल आन्तरिक दुर्बलता का है यदि उसे हटाया या घटाया जा सके तो अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ने का लक्ष्य सहज और सरल ही प्रतीत होगा, उसे बिना विशेष कठिनाई के प्राप्त किया जा सकेगा।
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शरीर में काम करने वाली विद्युत शक्ति से ही दैनिक जीवन के विभिन्न क्रिया-कलाप पूरे होते हैं। इस संयंत्र के विभिन्न कलपुर्जे इसी शक्ति से प्रेरित होकर अपने-अपने काम करते हैं। इसकी अधिक मात्रा उत्पन्न की जा सके तो उसका लाभ दूसरों को भी दिया जा सकता है। धन-दान, रक्त-दान, अंग-दान आदि के द्वारा एक मनुष्य दूसरे को लाभान्वित कर सकता है। ठीक इसी प्रकार प्राण-दान भी सम्भव हो सकता है। अपनी जीवनी शक्ति का एक अंश दूसरों को देकर उनमें नव-जीवन का संचार अमुक मात्रा में किया जा सकता है। मैस्मरेज्म विद्या द्वारा शारीरिक और मानसिक चिकित्सा की जाती है और उसका लाभ औषधि उपचार से कम नहीं, वरन् अधिक ही मिलता है।
मनुष्य शरीर में रहने वाली विद्युत शक्ति का परिचय अब साधारण यन्त्र उपकरणों से जाँचा-परखा जा सकता है। वह एक अच्छा-खासा जनरेटर है। किसी-किसी में तो अनायास ही यह विद्युत प्रवाह बढ़ी-चढ़ी मात्रा में होता है। कई उसे प्रयत्नपूर्वक बढ़ा सकते हैं। बिजली से अनेकों प्रकार के प्रयोजन पूरे होते हैं । उसका उपयोग करके कई तरह के उपकरण क्रियाशील होते और लाभ उत्पन्न करते हैं। शरीरगत विद्युत से सम्पर्क क्षेत्र को किसी विशेष दिशा में उत्तेजित किया जा सकता है किन्हीं व्यक्तियों को प्रभावित करके उनके चिन्तन एवं चरित्र को मोड़ा जा सकता है। इतना ही नहीं उन्हें स्वास्थ्य, बल, ज्ञान, पराक्रम जैसी विभूतियों से लाभान्वित किया जा सकता है।
सूक्ष्म जगत में काम कर रही शक्तियाँ स्थूल पदार्थों को किस प्रकार प्रभावित करती है इसके उदाहरण आये दिन दीखते हैं। आकाश में उष्णता बढ़ते ही हमारे बर्तन गरम और ठण्डक का मौसम आते ही वे ठण्डे रहने लगते हैं। वर्षा ऋतु में हवा की नमी मात्र से घास-पात में हरियाली दौड़ जाती है। रेडियो और टेलीविजन के उपकरण अन्तरिक्ष में चल रहे सूक्ष्म प्रवाहों से प्रवाहित होते और अपने काम करते देखे जाते हैं। इसी सिद्धान्त के आधार पर मनोबल की शक्ति तरंगें आकाश में उड़ाई जा सकती हैं और उससे निकटवर्ती एवं दूरवर्ती व्यक्तियों तथा पदार्थों को प्रभावित किया जा सकता है।
मनुष्यों एवं प्राणियों की तरह ही मनोबल के द्वारा पदार्थों को भी प्रभावित किया जा सकता है। उन्हें हटाया, उठाया, हिलाया, गिराया जा सकता है। उनमें अन्य प्रकार की हलचलें एवं विशेषताएँ पैदा की जा सकती है। उनका स्वरूप तक बदला जा सकता है और गुण भी। आग और बिजली की सहायता से पदार्थों के आकार-प्रकार में परिवर्तन हो सकता है, ऐसा मनोबल के उपयोग से भी सम्भव है। कई चमत्कार, प्रदर्शनों में ऐसी घटनाएँ प्रयत्नपूर्वक प्रत्यक्ष की जाती है, जिनमें मनोबल ने जड़-पदार्थों में अस्वाभाविक हलचलें पैदा कर दीं अथवा उनके सामान्य क्रिया-कलाप को अवरुद्ध कर दिया। बिना प्रदर्शन के भी ऐसे घटना-क्रम सामान्य जीवन-क्रम में भी घटित होते रहते हैं, जिनमें व्यक्ति विशेष के सम्पर्क अथवा संकल्प के कारण वस्तुओं के स्वरूप एवं क्रिया-कलाप में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो गया। विद्युत प्रवाह की तरह ही यदि मनोबल को भी एक शक्ति धारा माना जा सके तो फिर उसके द्वारा सम्पन्न होने वाले क्रिया-कलापों को भी आश्चर्यजनक नहीं, वरन् सामान्य ही माना जायगा।
आग और गर्मी का अन्तर स्पष्ट है। आग प्रत्यक्ष है-स्थूल है। इसलिए उसे आँखों से देखा जा सकता है और इधर से उधर हटाया, जलाया, बुझाया जा सकता है। गर्मी सूक्ष्म है, व्यापक है। इसलिए उसे अनुभव तो किया जा सकता है, पर देखा नहीं जा सकता है । उसे हम पकड़ भी नहीं सकते और न धकेल सकते हैं। अधिक से अधिक कूलर आदि के द्वारा अपना कमरा ठण्डा रख सकते हैं, पर गर्मी की ऋतु ही बदल देना सम्भव नहीं। आग स्थूल है, इसलिए उसे जलाया भी जा सकता है और बुझाया भी। बिजली , भाप एवं ईंधन आदि के माध्यम से उत्पन्न होने वाली शक्ति का प्रत्यक्ष प्रयोग रोज ही होता है। इसलिए उसे हम सहज ही पहचानते हैं। मनोबल का सामान्य प्रयोग एक-दूसरे को प्रभावित करने भर से होता है, पर यदि उसे विकसित एवं व्यवस्थित स्थिति में किसी विशेष लक्ष्य के लिए प्रयुक्त किया जा सके तो प्रतीत होगा कि वह भी कितना शक्तिशाली है। उसके आधार पर व्यक्ति को ही नहीं पदार्थों और परिस्थितियों को भी प्रभावित किया जा सकता है।
एलेग्जेडिर राल्फ ने ‘द पावर आफ माइंड’ नामक पुस्तक में विभिन्न प्रमाण देते हुए लिखा है कि-‘‘प्रगाढ़ ध्यान-शक्ति द्वारा एकाग्र मानव-मन शरीर के बाहर स्थित सजीव एवं निर्जीव पदार्थों पर भी इच्छानुकूल प्रभाव डाल सकता है।” राल्फ का कहना है कि यह एक निर्विवाद तथ्य है कि इच्छा-शक्ति द्वारा स्थूल जगत पर नियंत्रण सम्भव है।
इलेक्ट्रानिक ब्रेन के निर्माण की प्रक्रिया में ज्ञात तथ्यों द्वारा वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि अवचेतन मन एक सशक्त कम्प्यूटर की तरह कार्य करता है और जिस तरह एक कम्प्यूटर की गई ‘फीडिंग’ के अनुसार ही क्रियाशील होता है, उसी तरह अवचेतन भी अपना आहार हमारे विचारों तथा संकल्पों से प्राप्त करता है। इस तरह अवचेतन की दिशा मनुष्य की इच्छाओं से ही प्रभावित होती है। स्पष्ट है कि इस विचेतन पर व्यक्ति प्रयास द्वारा पूर्ण नियन्त्रण पा सकता है और तब अभी अलौकिक लगने वाले काम कर सकता है।
व्यक्ति स्वयं अपना विद्युत-चुम्बकीय बल-क्षेत्र या गुरुत्वाकर्षण-क्षेत्र विकसित कर सकता है, ऐसा वैज्ञानिक मानने लगे हैं। पर उसका आधार एवं प्रक्रिया अभी तक वे नहीं जान पाये हैं। मनुष्य चलता-फिरता बिजली घर है। उसका भीतरी समस्त क्रिया-कलाप स्नायु जाल में निरन्तर बहते रहने वाले विद्युत प्रवाह से ही सम्पादित होता है। बाह्य जीवन में ज्ञानेन्द्रियों द्वारा जो विभिन्न प्रकार की हलचलें होती हैं उनमें खर्च होने वाली ऊर्जा वस्तुतः मानव विद्युत-शक्ति ही होती है। रक्त जैसे रासायनिक पदार्थ तो मात्र उसके दिमाग में ईंधन भर का काम देते हैं।
रूसी सेना की सार्जेण्ट नेल्या मिरवाइलोवा अपनी इच्छा-शक्ति से स्थिर रखे जड़-पात्रों को गतिशील कर देती है, चलती घड़ी को रोक सकती है और पुनः चला सकती है। उसके द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले इन चमत्कारों को वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा प्रामाणिक ठहराया जा चुका है।
शक्ति के बिजली, भाप, तेल जैसे साधनों में ही अब विचार-शक्ति को भी स्थान मिलने जा रहा है। अध्यात्म शास्त्र में तो आरम्भ से ही विचारों को ऐसा समर्थ तत्व माना है जो न केवल अपने उद्गमकर्ता को वरन् पूरे सम्पर्क क्षेत्र को भी प्रभावित करता है। इतना ही नहीं उससे दूरवर्ती एवं अपरिचित प्राणियों तथा पदार्थों तक को प्रभावित किया जा सकता है।
टेलीपैथी के एक प्रयोगकर्त्ता इंग्लैण्ड के ए0 एन0 क्रीरी ने बहुत समय तक यह प्रयोग चलाया कि बन्द कमरे में क्या हो रहा है, इसकी जानकारी प्राप्त की जाय। इस प्रयोग में एक महिला अधिक दिव्यदृष्टि सम्पन्न सिद्ध हुई।
क्रीरी ने अपने प्रयोगों की सचाई जाँचने के लिए अनेक प्रामाणिक व्यक्तियों से अनुरोध किया। जाँचने वालों में डबलिन विश्वविद्यालय के प्रो0 सर विलियम बेरट इंग्लैण्ड की सोसाइटी फॉर साइकिकल रिसर्च के प्रधान प्रो0 सिजविंग जैसे मूर्धन्य लोग थे। उन्होंने कई तरह से उलट-पलटकर इन प्रयोगों को देखा और उन प्रयोगों के पीछे निहित सच्चाई को स्वीकारा। इन प्रयोगों की जाँच का विवरण ‘विचार संप्रेषण समिति’ ने प्रकाशित किया है।
दूरवर्ती लोगों के मस्तिष्कों को प्रभावित करने और उनमें अभीष्ट परिवर्तन लाने की दिशा में आस्तिकों और नास्तिकों को समान रूप से सफलता मिली है। इन प्रयोगों में रूसी वैज्ञानिक भी योग-साधकों के पद-चिह्नों पर चल रहे हैं। लेनिन ग्राड विश्वविद्यालय के शरीर विज्ञानी प्रो0 लियोनिद वासिलयेव ने दूर संचार क्षमता का प्रयोग एक शोध कार्यों में निरत मण्डली पर किया। उसने अपने प्रयोगों द्वारा चालू शोध के प्रति धीरे-धीरे उदासीन होने और उसे छोड़कर अन्य शोध में लाने का प्रयोग चालू रखा और इसके सफल परिणाम पर सभी को आश्चर्य हुआ। लियोनिद ने अपना अभिप्राय गुप्त कागजों में नोट करके साथियों को बता दिया था कि वे अमुक शोध मंडली की मनःस्थिति में उच्चाटन उत्पन्न करके अन्य कार्य में रुचि बदल देंगे। कुछ समय में वस्तुतः वैसा ही परिवर्तन हो गया और उस मण्डली ने बड़ी सीमा तक पूरा किया गया अपना कार्य रद्द करके नया कार्य हाथ में ले लिया।
इतिहास, पुराणों की बात छोड़ दे तो भी प्रत्यक्ष दर्शियों की प्रामाणिक साक्षियों के आधार पर यह विश्वास किया जा सकता है कि विचार और शब्द के मिश्रण से बनने वाले मन्त्र प्रवाह का प्रयोग करके वातावरण तक में हेर-फेर करने की सफलता मिल सकती है।
अफ्रीकी जन-जातियों की तरह ही मलाया में भी मन्त्र विद्या के प्रयोग और चमत्कार बहुत प्रस्तुत होते रहते हैं। वहाँ के मान्त्रिक ऋतु परिवर्तन को भी प्रभावित करते देखे गये हैं।
एक और तीसरी घटना भी अंतर्राष्ट्रीय चर्चा का विषय बनी रही है। ‘दि इंटर आफ दि ड्रगन’ फिल्म का शूटिंग वहाँ चल रहा था जिस दिन प्रधान शूटिंग होना था उसी दिन वर्षा उमड़ पड़ी, इस अवसर पर भी अब्दुला विन उमर नाम के मान्त्रिक की सहायता ली गई और शूटिंग क्षेत्र पूरे समय वर्षा से बचा रहा।
‘द रायल एस्ट्रोनामिकल सोसाइटी’ के तत्कालीन अध्यक्ष तथा अन्य प्रमुख लोगों ने श्री डेनियल डगलस होम की विलक्षण कलाबाजियों का आँखों देखा विवरण लिखा है। प्रख्यात वैज्ञानिक, रेडियो मीटर के निर्माता, थीलियम व गोलियम के अन्वेषक सर विलियम क्रुक्स ने भी श्री डेनियल डगलस होम का बारीकी से अध्ययन कर उन्हें चालाकी से रहित पाया था।
इन करिश्मों में हवा में ऊँचे उठ जाना, हवा में चलना और तैरना, जलते हुए अंगारे हाथ में रखना, आदि है। सर विलियम क्रुक्स अपने समय के शीर्षस्थ रसायन शास्त्री थे। उन्होंने भली-भाँति निरीक्षण कर श्री डी0डी0 होम की हथेलियों की जाँच की, उनमें कुछ भी लगा नहीं था। हाथ मुलायम और नाजुक थे। फिर श्री क्रुक्स के देखते-देखते श्री डी0डी0 होम ने धधकती अँगीठी से सर्वाधिक लाल चमकदार कोयला उठाकर अपनी हथेली में रखा और रखे रहे। उनके हाथ में छाले , फफोले कुछ भी नहीं पड़े।
‘रिपोर्ट आफ द डायलेक्टिकल सोसायटीज कमेटी आफ स्प्रिचुअलिज्म’ में लार्ड अडारे ने भी श्री होम का विवरण दिया है। आपने बताया कि एक ‘सियान्स’ में वे आठ व्यक्तियों के साथ उपस्थित थे। श्री डी0डी0 होम ने दहकते अँगारे न केवल अपनी हथेलियों पर रखे, बल्कि उन्हें अन्य व्यक्तियों के भी हाथों में रखाया। सात ने तो तनिक भी जलन या तकलीफ के बिना उन्हें अपने हाथ में रखा। इनमें से 4 महिलाएँ थी। दो अन्य व्यक्ति उसे सहन नहीं कर सके। लार्ड अडारे ने ऐसे अन्य अनेक अनुभव भी लिखे हैं, जो श्री होम की अति मानसिक क्षमताओं तथा अदृश्य शक्तियों से उनके सम्बन्ध पर प्रकाश डालते हैं। इनमें अनेक व्यक्तियों की उपस्थिति में कमरे की सभी वस्तुओं का होम की इच्छा मात्र से थर-थराने लगना, किसी एक पदार्थ (जैसे टेबल या कुर्सी आदि) का हवा में चार-छह फुट ऊपर उठ जाना और होम की इच्छित समय तक वहाँ उनका लटके रहना, टेबल के उलटने-पलटने के बाद भी उस पर सामान्य रीति से रखा संगमरमर का पत्थर और कागज पेन्सिल का यथावत बने रहना आदि है।
सर विलियम क्रुक्स ने भी एक सुन्दर हाथ के सहसा प्रकट होने, होम के बटन में लगे फूल की पत्ती को उस हाथ द्वारा तोड़े जाने, किसी वस्तु के हिलने, उसके इर्द-गिर्द चमकीले बादल बनने और फिर उस बादल को स्पष्ट हाथ में परिवर्तित होने तथा उस हाथ को स्पर्श करने पर कभी बेहद सर्द, कभी उष्ण और जीवित लगने आदि के विवरण लिखे हैं।
विचारों की शक्ति का सामान्य जीवन में भी महत्वपूर्ण उपयोग होता रहता है। उन्हीं के आधार पर क्रिया-कलाप बनते हैं और तदनुरूप परिणाम सामने आते हैं। बहिरंग व्यक्तित्व वस्तुतः मनुष्य के अन्तरंग की प्रतिक्रिया भर ही होता है। विचारों से समीपवर्ती लोग सहयोगी विरोधी बनते हैं। निन्दा और प्रशंसा के आधारों की जड़े अन्तः क्षेत्र में ही गहराई तक धँसी होती हैं। सामान्य स्तर की विचार-शक्ति भी जीवन का क्रम बनाती है, तो फिर विशेष स्तर की विचार-शक्ति जो योगाभ्यास के साधना विज्ञान के आधार पर तैयार की जाती है, चमत्कारी परिणाम उत्पन्न कर सके तो इसे अबुद्धि सम्मत नहीं कहा जा सकता । मन्त्र शक्ति के प्रयोगों में जहाँ दंभ और बहकावे की भी भरमार रहती है वहाँ ऐसे प्रामाणिक प्रसंगों की भी कमी नहीं होती जिनके आधार पर इस अलौकिकता का आधार समझ में न आने पर भी उसे अविश्वस्त नहीं कहा जा सकता ।
कई बार ऐसा भी देखा गया है कि किन्हीं व्यक्तियों में वस्तुओं को विचार-शक्ति से प्रभावित करने की क्षमता अनायास ही पाई जाती है। उन्होंने कोई योगाभ्यास नहीं किया तो भी वे अदृश्य को देख सकने-अविज्ञात को जान सकने में समर्थ रहे। ऐसी विलक्षणता हर मनुष्य के अचेतन मन में मौजूद है। मानवी विद्युत सामान्यतया दैनिक क्रिया-कलापों में ही खर्च होती रहती है। पर यदि उसे बढ़ाया जा सके तो कितने ही विलक्षण कर्म भी हो सकते हैं। साधना से दिव्य क्षमता बढ़ती है और उससे कितने ही प्रकार के असामान्य कार्य कर सकना सम्भव होता है। यह आध्यात्मिक उपलब्धियाँ अगले जन्मों तक साथ चली जाती है। ऐसे लोग बिना साधना के भी पूर्व संचित सम्पदा के आधार पर चमत्कारी आचरण प्रस्तुत करते देखे गये हैं। ऐसे ही लोगों में एक नाम ‘यूरीगेलर’ का भी है।
अंग्रेजी भाषा की वैज्ञानिक पत्रिकाएँ ‘नेचर’ और ‘न्यू साइंटिस्ट’ विश्व विख्यात हैं। उनका सम्पादन और प्रकाशन विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों द्वारा होता है और उनमें प्रकाशित विवरणों को खोज युक्त एवं तथ्यपूर्ण माना जाता है। इन्हीं पत्रिकाओं में ‘यूरीगेलर’ के शरीर में पाई गई अतीन्द्रिय शक्ति के प्रामाणिक विवरण विस्तारपूर्वक छपे हैं।
उसने खुले मैदान में बिना किसी पर्दे या जादुई लाग लपेट के हर प्रकार के सन्देहों का निवारण का अवसर देते हुए अनेक प्रदर्शन किये हैं। किसी को किसी चालाकी की आशंका हो तो वह अवसर देता है कि तथ्य की किसी भी कसौटी पर जाँच लिया जाय। उसे जादूगरों जैसे करिश्मे दिखाने का न तो अभ्यास है न अनुभव। ‘सम्मोहन’ कला उसे नहीं आती। जो भी वह करता है स्पष्टतः प्रत्यक्ष होता है। स्टैनफोर्ड रिसर्च इन्स्टीट्यूट द्वारा आयोजित परीक्षण गोष्ठियों में मूर्धन्य वैज्ञानिकों के सम्मुख वह अपनी कड़ी परीक्षा में पूर्णतया सफल होता रहा है। जर्मनी और इंग्लैण्ड के प्रतिष्ठित पत्रकारों के सम्मुख उसने प्रदर्शनों को दिखाया गया है।
यूरीगेलर दूर तक अपनी चेतना को फेंक सकता है। वहाँ की स्थिति जान सकता है। इतना ही नहीं प्रमाण स्वरूप वहाँ की वस्तुओं को भी लाकर दिखा सकता है। उससे जब ब्राजील जाने और वहाँ की कोई वस्तु लाने के लिए कहा गया तो उसने वैसा ही किया और वहाँ का विवरण सुनाने के साथ-साथ ब्राजील में चलने वाले नोटों का एक बण्डल भी सामने लाकर रख दिया।
पूछने पर गैलर ने बताया है कि यह क्षमता उन्हें बिना किसी प्रयास के अनायास ही मिली है। इन प्रदर्शनों में उन्हें तन्त्र-मन्त्र आदि कुछ नहीं करना पड़ता। अदृश्य दर्शन के समय वे अपनी दृष्टि सीमित रखने के लिए एक साधारण-सा पर्दा खड़ा कर लेते हैं और उसी पर उतरते चित्रों को टेलीविजन की तरह देखते रहते हैं।
उसकी अदृश्य दर्शन की शक्ति भी अद्भुत है। उसकी माता को जुए का चस्का था। जब वह घर लौटती तो गैलर अपने आप ही बता देता कि वह कितना पैसा जीती या हारी है।
इसकी अतीन्द्रिय विशेषताओं का परीक्षण वैज्ञानिकों और अन्वेषकों की मण्डलियों के समक्ष कितनी ही बार हुआ है और वह निभ्रान्त सिद्ध हुआ है।
उपरोक्त घटना का उल्लेखक डॉ0 नन्डोर फोदोर ने अपने ग्रन्थ ‘बिटविन टू वर्ल्डस’ पुस्तक में किया है।
प्रत्यक्ष क्षमता और सम्पदा का प्रभाव सभी को विदित है, पर बहुत कम लोग यह जानते हैं कि विचारों की सामर्थ्य का मूल्य महत्व भी किसी से कम नहीं है। उसे बढ़ाने के लाभों को समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि साधना प्रयोजनों में लगने वाली शक्ति मनुष्य को सूक्ष्म विभूतियाँ और स्थूल सफलताओं से परिपूर्ण बना सकने में अत्यधिक सहायक सिद्ध होती है। अस्तु उस उपार्जन में संलग्न होना भी दूरदर्शी बुद्धिमत्ता का चिन्ह है।
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मरने के बाद क्या होता है ? इस प्रश्न के उत्तर में विभिन्न धर्मों में विभिन्न प्रकार की मान्यताएँ हैं। हिन्दू धर्म शास्त्रों में भी कितने ही प्रकार से परलोक की स्थिति और वहीं आत्माओं के निवास का वर्णन किया है। इन मतभिन्नताओं के कारण सामान्य मनुष्य का चित्त भ्रम में पड़ता है कि उन परस्पर विरोधी प्रतिपादनों में क्या सत्य है क्या असत्य?
इतने पर भी एक तथ्य नितान्त सत्य है कि मरने के बाद भी जीवात्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता वरन् वह किसी न किसी रूप में बना ही रहता है। मरने के बाद पुनर्जन्म के अनेकों प्रमाण इस आधार पर बने रहते हैं कि कितने ही बच्चे अपने पूर्व जन्म के स्थानों, सम्बन्धियों और घटनाक्रमों का ऐसा परिचय देते हैं जिन्हें यथार्थता की कसौटी पर कसने में वह विवरण सत्य ही सिद्ध होता है। अपने पूर्व जन्म से बहुत दूर किसी स्थान पर जन्में बच्चे का पूर्व जन्म के ऐसे विवरण बताने लगना, जो परीक्षा करने पर सही निकलें, इस बात का प्रमाण बताता है कि मरने के बाद पुनः जन्म भी होता है।
मरण और पुनर्जन्म के बीच के समय में जो समय रहता है उसमें जीवात्मा क्या करता है? कहाँ रहता है? आदि प्रश्नों के सम्बन्ध में भी विभिन्न प्रकार के उत्तर हैं, पर उनमें भी एक बात सही प्रतीत होती है कि उस अवधि में उसे अशरीरी किन्तु अपना मानवी अस्तित्व बनाये हुए रहना पड़ता है। जीवन मुक्त आत्माओं की बात दूसरी है। वे नाटक की तरह जीवन का खेल खेलती हैं और अभीष्ट उद्देश्य पूरा करने के उपरान्त पुनः अपने लोक को लौट जाती हैं। इन्हें वस्तुओं, स्मृतियों, घटनाओं एवं व्यक्तियों का न तो मोह होता है और न उनकी कोई छाप इन पर रहती है। किन्तु सामान्य आत्माओं के बारे में यह बात नहीं है। वे अपनी अतृप्त कामनाओं, विछोह, संवेदनाओं, राग-द्वेष की प्रतिक्रियाओं से उद्विग्न रहती हैं। फलतः मरने से पूर्व वाले जन्मकाल की स्मृति उन पर छाई रहती है और अपनी अतृप्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने के लिए ताना-बाना बुनते रहते हैं। पूर्ण शरीर न होने से वे कुछ अधिक तो नहीं कर सकते, पर सूक्ष्म शरीर से भी वे जिस-तिस को अपना परिचय देते हैं। इस स्तर की आत्माएँ भूत कहलाती हैं। वे दूसरों को डराती या दबाव देकर अपनी अतृप्त अभिलाषाएँ पूरी करने को सहायता करने के लिए बाधित करती हैं। भूतों के अनुभव प्रायः डरावने और हानिकारक ही होते हैं।
इसके विपरीत कुछ ऐसी उच्च आत्माएँ भी होती हैं जो मरण और जन्म के बीच की अवधि को प्रेत बन कर गुजारती हैं और अपने उच्च स्वभाव संस्कार के कारण दूसरों की यथासम्भव सहायता करती रहती हैं। इनमें मनुष्यों की अपेक्षा शक्ति अधिक होती है। सूक्ष्म जगत से सम्बन्ध होने के कारण उनकी जानकारियाँ भी अधिक होती हैं। उनका जिनसे सम्बन्ध हो जाता है उन्हें कई प्रकार की सहायताएँ पहुँचाती हैं । भविष्य ज्ञान होने से वे सम्बद्ध लोगों को सतर्क भी करती हैं तथा कई प्रकार की कठिनाईयों को दूर करने एवं सफलताओं के लिए सहायता करने का भी प्रयत्न करती हैं।
दिव्य प्रेतात्माओं से लगभग देव स्तर का सहयोग प्राप्त किया जा सकता है। उनकी समस्यायें स्वल्प होते हुए भी सूक्ष्म जगत से सम्बन्धित होने के कारण कितनी ही बातों में इतनी बढ़ी-चढ़ी होती है कि सम्बद्ध मनुष्य उस सहयोग से आशाजनक लाभ प्राप्त कर सकते है। प्रेतात्मा की सहायता से अनेक लाभ मिलते रहे हैं।
वैज्ञानिकों में मूर्धन्य सर विलियम क्रुक्स और सर आलिवर लाज मृतात्माओं से संपर्क स्थापित करने की खोजों को संसार भर में प्रामाणिक माना जाता है। वे लोग इस स्तर के नहीं थे जिन पर गप्पबाजी का आरोप लगाया जा सके।
सर आलीवर लाज ने स्वर्गीय आत्माओं के अस्तित्व एवं क्रिया-कलाप सम्बन्धी जानकारी के लिए एक सुव्यवस्थित शोध संस्थान स्थापित किया था। उसमें आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के सर अर्नेस्ट वैनेट जैसे मूर्धन्य मनीषी सम्मिलित थे। इन शोध कार्यों का प्रसारण ब्रिटेन के रेडियो प्रसारण -बी0 बी0 सी0 पर होता रहा है। सर लाज ने ब्रिटेन के अति प्रामाणिक लोगों के भूतों का अस्तित्व सिद्ध करने वाले अनुभवों का संग्रह एक पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराया था।
स्वीडन के शरीर शास्त्र, अर्थशास्त्र, खगोल विद्या, गणित में अठारहवीं सदी के माने हुए विद्वान एमेनुअल स्वेडनवर्ग ने परलोक विद्या पर गहरी खोज की थी और मृतात्माओं से सम्बन्ध स्थापित करने में सफलता प्राप्त की थी। एक बार हालैण्ड के मृत राजदूत की विधवा पत्नी अपने पति के द्वारा कहीं रखे गये दस्तावेजों के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने के लिए उनके पास उपस्थित हुई। स्वेडनवर्ग ने मृतात्मा से सम्बन्ध स्थापित करके वह गुप्त स्थान बता दिया जहाँ वे महत्वपूर्ण दस्तावेज रखे हुए थे।
थियोसॉफिकल सोसाइटी की जन्मदात्री मैडम ब्लैडवटस्की को चार वर्ष की आयु से ही देव आत्माओं का सहयोग सान्निध्य प्राप्त होने लगा था। वे अचानक आवेश में आकर ऐसी तथ्यपूर्ण बातें कहतीं जिन्हें कह सकना किन्हीं विशेषज्ञों के लिए ही सम्भव था। परिवार के लोग पहले तो उन्हें विक्षिप्त समझने लगे, पर जब उनके साथ देवात्माओं के प्रत्यक्ष सम्पर्क के प्रमाण देखने लगे तो उनकी विशेषता स्वीकार करनी पड़ी।
एक बार एक प्रेतात्मा ने उसके शरीर के कपड़े ही मजाक में बिस्तर के साथ सी दिये। दूसरे लोगों ने जब सिलाई उधेड़ी तभी वे उठ सकीं। एक बार कर्नल हैनरी आल्काट उनसे मिलने आये तो वे सिलाई की मशीन से तौलिये सी रहीं थी और कुर्सी पर से पैर पटक रहीं थीं। आल्काट ने पैर पीटने का कारण पूछा तो उनने कहा एक छोटा प्रेतात्मा बार-बार मेरे कपड़े खींचता है और कहता कि मुझे भी कुछ काम दे दो। कर्नल ने उसी मजाक में उत्तर दिया कि उसे कपड़े सीने का काम क्यों नहीं दे देतीं? ब्लैडवेटस्की ने कपड़े समेट कर अलमारी में रख दिये और उन से बातें करने लगी। बात समाप्त होने पर जब अलमारी खोली गई तो सभी बिना सिले कपड़े सिये हुए तैयार रखे थे।
मैडम ब्लैडवेटस्की के कथानुसार उनकी सहकारी मण्डली में सता-प्रेत थे, जो समय-समय पर उन्हें उपयोगी परामर्श और मुक्त हस्त सहायता करते थे। कर्नल आल्काट अमेरिका में अपने समय के अत्यन्त सम्मानित नागरिक और प्रसिद्ध वकील थे, उन्होंने मैडम से प्रभावित होकर उनके अध्यात्म कार्य में सदा भरपूर सहयोग दिया।
ब्लैडवेस्टकी एक बार अपने सम्बन्धियों से मिलने के लिए रूस गई। वहाँ उसके भाई के कान में भी उनकी दिव्य शक्ति की चर्चा पहुँची। उसने इतना ही कहा कि मैं मात्र बहिन होने के कारण उनकी बातों पर विश्वास नहीं कर सकता। मैडम ने अपने भाई को एक हलकी सी मेज उठाकर लाने के लिए कहा-वह ले आया। अब उन्होंने फिर कहा इसे जहाँ से लाये हो वहीं रख आओ भाई ने भर-पूर जोर लगाया पर वह इतनी भारी हो गई कि किसी प्रकार न उठ सकी। इस पर घर के अन्य लोग आग गए और वे सब मिल कर उठाने लगे इतने पर भी वह उठी नहीं। जब सब लोग थक कर हार गये तो मैडम ने मुस्करा कर उसे यथावत् कर दिया और मेज फिर पहले की तरह हल्की हो गई। उसे उठा कर आसानी से जहाँ का तहाँ रख दिया गया।
अमेरिका के एक दरिद्र व्यक्ति आर्थर एडवर्ड स्टिलबैल ने अपनी जिन्दगी 40 डालर प्रतिमास जैसी कुलीगीरी की छोटी-सी नौकरी से आरम्भ की और वह प्रेतात्माओं की सहायता से उच्च श्रेणी के यशस्वी धनवान विद्वानों की श्रेणी में सहज ही जा पहुँचा।
पन्द्रह वर्ष की आयु से ही उसके साथ छह प्रेतों व एक मण्डली जुड़ गई और जीवन भर उसका साथ देती रही। इन छह प्रेतों में तीन इंजीनियर, एक लेखक, एक कवि और एक अर्थविशेषज्ञ था। इनके साथ उसका मैत्री बिना किसी प्रयोग परिश्रम के अनायास ही हो गई और वे उसे निरन्तर उपयोगी मार्गदर्शन कराते रहे। प्रेतों ने उसकी लगी लगाई नौकरी छुड़वा दी और कहा चलो तुम्हें बड़ा आदमी बनावेंगे। प्रेतों ने उसे अपने रेल मार्ग बनाने-अपनी नहर खोदने-अपना बन्दरगाह बनाने के लिए कहा। बेचारा आर्थर स्तब्ध था कि नितान्त दरिद्रता की स्थिति में किस प्रकार करोड़ों, अरबों रुपयों से पूरी हो सकने वाली योजनाएँ कार्यान्वित कर सकने में सफल होगा, पर जब प्रेतों ने उसे सब कुछ ठीक करा देने का आश्वासन दिया तो उसने कठपुतली की तरह सारे काम करते रहने की सहमति दे दी और असम्भव दीखने वाले साधन जुटने लगे।
उसने साहित्य के तथा कविता के अति प्रसिद्ध तीस ग्रन्थ भी लिखे। जो साहित्य क्षेत्र में भली प्रकार सम्मानित हुए।
आर्थर से उसकी सफलताओं का जब भी रहस्य पूछा गया तो उसने अपने संरक्षक प्रेतों की चर्चा की और बताया प्रत्येक महत्वपूर्ण योजना, अर्थ साधनों की अर्थ व्यवस्था, कठिनाइयों की पूर्व सूचना, गतिविधियों में मोड़-तोड़ की सारी जानकारी और सहायता इन दिव्य सहायकों से ही मिलती रही है। उनकी अपनी योग्यता नगण्य है। साहित्य सृजन के सम्बन्ध में भी उसका यही कथन था कि वह कृतियाँ वस्तुतः उसके लेखक और कवि प्रेत सहायकों की ही हैं। उसने तो कलम कागज भर का उपयोग करके यह प्राप्त किया है।
चार्ल्स डिकेन्स अपने उपन्यास ‘मिस्ट्री आव एडविन हुड’ के बीस अध्याय लिखकर ही स्वर्गवासी हो गये थे। मृत्यु के दो वर्ष बाद उन्होंने थामस जेम्स को लिखने का माध्यम बनाने के लिए तैयार किया और उनकी कलम से अपना शेष कार्य स्वयं पूरा कराया।
श्रीमती जान कूपर का ‘टेल्का’ उपन्यास विशेष रूप से और अन्य सामान्य रूप से प्रख्यात हुए हैं। श्रीमती कूपर का कथन है इस लेखन में उन्हें किसी दिव्य आत्मा का मार्गदर्शन और सहयोग मिलता रहा है।
अमेरिका की श्रीमती रुथ मान्टगुमरी का कथन है कि उनका ‘ए वर्ल्ड बियोन्ड’ ग्रन्थ स्वर्गीय आर्थर फोर्ड की आत्मा ने बोल-बोल कर लिखाया है।
इंग्लैण्ड के सुप्रसिद्ध लेखक तोएल कोवर्ड ने अपनी प्रख्यात रचना ‘दि ब्लिथे स्प्रिट’ के सम्बन्ध में लिखा है कि यह लेखन उसने किसी अदृश्य साथी के सहयोग से लिखा है।
‘जान आफ आर्क’ ने अपने आत्म परिचय में यह जानकारी दी थी कि उन्हें विशिष्ट काम करने की प्रेरणा और शक्ति किसी अदृश्य आत्मा से मिलती है।
ब्रिटिश कस्बे गलोसेस्ट-शायर में रहने वाली छियालीस वर्षीय पैट्रिशिया मूलतः कनाडा की रहने वाली लेखिका है। उनका कहना है कि कई वर्ष पूर्व वे महान नाटककार जार्ज बर्नार्ड शा से आयरलैंड की किर्लानी झील के तट पर एक होटल के एक कमरे में मिली थीं और दोनों में प्यार हो गया। बर्नार्डशा अपनी मृत्यु के बाद भी प्रतिदिन रात में मेरे कमरे में आकर मुझसे मिलते हैं। मृत्यु उपरान्त पहली रात जब-जब शा की आत्मा आई, तो दोनों ने एक वर्णमाला तैयार कर ली। उसी के आधार पर दोनों में बाते होती हैं।
पेट्रीशिया जार्ज बर्नार्डशा को ‘बर्नी’ कहती है। उनके अनुसार बर्नी ने उन्हें एक अँगूठी विवाह की रस्म पर दी थी। यह ‘विवाह’ बर्नार्ड शा के बाद हुआ। वह अंगूठी पेट्रीशिया की हथेली पर हरदम चमचमाती रहती है। पेट्रीशिया के एक बच्चा भी है, जिसे वह शा का यानी अपने बर्नी का बताती है। हालाँकि जार्ज बर्नार्डशा की मृत्यु के 10 वर्ष बाद यह बच्चा हुआ है।
पेट्रीशिया के अनुसार वह इन दिनों जो कुछ भी साहित्य लिख रही है वह बर्नी की ही प्रेरणा से। उसके कमरे में जार्ज बर्नार्डशा की एक बड़ी-सी तस्वीर है। मकान में इस युग में भी कभी बिजली नहीं जलती। बारह कमरों वाले दो मंजिले मकान में सिर्फ दो-तीन कमरों में पुराने लैम्प टिमटिमाते हैं। शेष भाग घने अन्धकार में लिपटे रहते हैं एकान्त में वह अक्सर अदृश्य ‘बर्नी’ से बातें करने लगती हैं।
महान सन्त सुकरात के बारे में बताया जाता है कि प्रारम्भिक जीवन में उन्हें धर्म-कर्म एवं अदृश्य जीवन पर कतई विश्वास नहीं था। एक दिन उन्हें एक प्रेत मिला। उसने अतीन्द्रिय दर्शन की क्षमता उनमें विकसित करने हेतु भगवत् भजन का परामर्श दिया। शीघ्र ही सुकरात की यह क्षमता विकसित हो गई। प्रेत उन्हें आजीवन विशिष्ट मामलों में जानकारी व परामर्श देता रहा। इससे सुकरात सहस्रों व्यक्तियों का कल्याण करते। उन्होंने बताया तो यह तथ्य अपने साथियों को भी। पर साथी-सहयोगी प्रेत को देख नहीं सकते थे, अतः वे सुकरात के भविष्य कथन आदि को उन्हीं की चमत्कारिक शक्ति मानने लगे।
सुकरात का इस प्रेत से सतत सम्पर्क रहता था। उसी के द्वारा वे कई रहस्यपूर्ण बातें जान जाते थे तथा भविष्य की घटनाओं का पूर्वाभास पा जाते थे। ‘दि जेनियो सोक्रेटीज’ के अनुसार एक बार वे मार्ग में चलते-चलते सहसा रुक गए तथा उस सड़क पर आगे खतरे की सम्भावना बता दूसरी ओर चलने लगे। उनके जिन साथियों ने इस पर विश्वास न किया, वे उसी सड़क से गये और थोड़ी दूर पर जंगली सुअरों के आक्रमण से आहत हो गए।
प्लेटो ने भी अपनी थीसिस में एक ऐसी घटना लिखी है- भोजन करते समय सुकरात के पास बैठा एक युवक तिमार्कस सहसा उठकर जाने लगा, तो सुकरात ने रोककर कहा’-‘‘तुम्हें यहाँ से जाने पर खतरा है।” वह युवक न माना और जाकर साथियों के साथ एक षडयन्त्र में भागीदार बन गया जबकि पहले से उसे स्वयं भी इस षड़यन्त्र की कोई जानकारी नहीं थी। तिमार्कस ने उस षड़यन्त्र में शामिल होकर एक व्यक्ति की हत्या कर दी और प्राणदण्ड का भागी बना।
सुकरात पर जब मुकदमा चला और प्राणदण्ड दिया जाने लगा, उस समय उसके पास ऐसे प्रमाण थे और साधन थे, जिनसे प्राणदण्ड से छुटकारा सम्भव था। ऐथेंस की जेल से उसके मित्र एवं शिष्य भगा ले जाने हेतु भी पूर्ण तैयारी कर चुके थे। किन्तु सुकरात ने न्यायालय में स्वीकार किया- ‘अभी-अभी मेरा देवता, ‘डेमन’ मेरे कानों में कहकर गया है कि मृत्यु दण्ड मिलेगा, उससे डरने की कोई बात नहीं है, ऐसी मृत्यु मनुष्य के लिए श्रेयस्कर होती है।’
इंग्लैण्ड के राज घराने में प्रेतात्माओं की अनुभूतियों का संकलन डॉ0 लीज ने अपनी लिखी तीन पुस्तकों में विस्तृत रूप से किया है। उस समय पंचम जार्ज राज्य कार्य सम्हालते थे। उनकी बहिन ‘लुईस’ शीघ्र ही विधवा हो गई। लेकिल लुईस को अपने पति ‘ड्यूक आफ फिक’ से बहुत प्यार था। मरने के बाद भी स्नेह में अन्तर नहीं आया, अस्तु दिवंगत आत्मा ने लुईस से सम्पर्क बनाए रखा। किन्तु लुईस भी संसार से शीघ्र उठ गईं। बाद में उनके सचिव एलिजाबेथ गोर्डन ने लुईस और उनके पति की प्रेतात्मा के मिलन सम्भाषण आदि के सम्बन्ध में विस्तृत रूप से बतलाया।
इसी प्रकार एडवर्ड सप्तम की पत्नी महारानी एलेग्जेण्ड्रा को प्रेतात्माओं पर अधिक विश्वास था। बुलाई गई एक प्रेतात्मा सेयांस ने उन्हें आगाह किया “सम्राट एडवर्ड अब कुछ ही दिन जीवित रह सकेंगे।’’
महारानी विंडसर प्रसाद में रह रही थीं। सम्राट सम्बन्धी उन्हें समाचार मिला कि वे कुछ-कुछ अस्वस्थ हैं। फिर भी महारानी प्रेतात्मा के संदेश के अनुसार वहाँ पहुँची। एडवर्ड बेहोश थे। केवल रानी को देखकर वे परलोक वासी हो गये।
अलबर्ट अपनी सूक्ष्म अभिव्यक्ति डी0 ब्राउन के माध्यम से किया करते थे। प्रेतात्मा जो अधिकारी व्यक्ति होता है उसी के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। लीज ने ही ब्राउन को खोज निकाला था। लीज के इस उपकार का बदला चुकाने के लिए महारानी ने उसे बड़ा पद देना चाहा। किन्तु लीज ने यह कहकर इन्कार किया कि “आत्मिक जिम्मेदारियों का बोझ इतना अधिक होता है कि उसे वहन करते हुए लौकिक कार्यों को ठीक प्रकार नहीं किया जा सकता है। दोनों में से एक कार्य ही प्रमुख रह सकता है।” इस पर महारानी ने केवल सलाह लेना ही उचित समझा और राज्य पद लीज को नहीं दिया।
महारानी को अपने मृत पति की आत्मा से दिन पर दिन सहयोग एवं परामर्श लेने की अधिक आवश्यकता होती रही। इसके लिए ब्राउन के शरीर और अलबर्ट की आत्मा का समन्वय बहुत ही उपयुक्त रहा। किन्तु जान ब्राउन भी अधिक दिनों तक संसार में न रह सके। इसका आघात महारानी को बहुत पहुँचा। महारानी ने अपनी गहरी संवेदना ब्राउन की कब्र पर इस प्रकार अंकित करवाई है “मुझ वियोगिनी और व्यथिता के लिए-वरदान स्वरूप एक विलक्षण व्यक्ति की स्मृति में”। महारानी के निजी सचिव सर हेनरी पौन सोनवी ने ‘टाइम्स’ में महारानी की गहरी संवेदना भी अभिव्यक्त की है। इस आघात से महारानी बहुत दुर्बल भी हो गई थीं।
यदि सम्पर्क उचित माध्यम से किया जा सके तो मरणोपरान्त आत्माएँ उचित परामर्श, सहयोग, सान्निध्य देने में समर्थ रहती हैं। इसमें सन्देह नहीं है।
अमेरिका के प्रथम राष्ट्रपति अब्राहिम लिंकन अक्सर आत्मवादी कुमारी नैटीकोल बर्न को आदरपूर्वक ह्वाइट हाउस में आमन्त्रित किया करते थे और उससे रणनीति तथा दूसरे महत्वपूर्ण तथ्यों पर परामर्श किया करते थे। उस लड़की पर कई प्रेतात्माएँ छाई रहती थीं और वे इस स्तर की थीं कि किन्हीं रहस्यपूर्ण तथ्यों का उद्घाटन कर सकें। लिंकन ने कई बार अपनी कार्य पद्धति उन प्रेतात्माओं की सहायता से बनाई थी और कई ऐसी रहस्यपूर्ण बातों का पता लगाया जिन्हें खोज सकना जासूसी जाल द्वारा भी सम्भव न हो सका।
अदृश्य आत्माओं द्वारा स्थूल सहायताएँ भी पहुँचाई जा सकती हैं। द्वितीय महायुद्ध में ‘मोन्स’ की लड़ाई में ब्रिटिश सेना जर्मनों द्वारा बुरी तरह मारी-काटी गई और सिर्फ 500 ब्रिटिश सैनिक बच रहे। जर्मन सैनिक 10 हजार थे। इन पाँच सौ का भी नाम शेष कर देने की तैयारी थी। तभी एक ब्रिटिश सैनिक को इंग्लैण्ड के स्वर्गीय महान सेनानायक सेंट जार्ज की एक होटल में देखी तस्वीर याद आई। उसने सभी सैनिकों को उनका स्मरण कराया। भावना तथा आत्म-शक्ति से सभी ब्रिटिश सैनिकों ने सेन्ट जार्ज का स्मरण किया। एक बिजली सी कौंध गई। 500 सैनिकों के पीछे हजारों श्वेत वस्त्रधारी सैनिकों की आभा दृष्टिगोचर हुई और अगले क्षण दस हजार जर्मन सैनिक रणभूमि में मृत पड़े थे। बिना किसी अस्त्र-शस्त्र के, प्रहार के, निशान के। इस घटना ने पूरे इंग्लैंड व विश्व में तहलका मचा दिया था।
स्काटलैण्ड के राजा जेम्स चतुर्थ को उन्हीं का कोई पूर्वज, जो प्रेतयोनि में था, बार-बार दर्शन देता था। इंग्लैण्ड पर आक्रमण करते समय जेम्स चतुर्थ को वह प्रेत रक्तपात न करने की चेतावनी देता। पर जेम्स ने कभी सुना नहीं। एक बार पुनः जब वह युद्ध के लिए चला, तो प्रेत ने मना करते हुए कहा-‘इस युद्ध से तुम जीवित न लौट सकोगे।’ जेम्स माना नहीं और मारा गया।
नैपोलियन बोनापार्ट को भी उसकी मृत्यु होने की सूचना एक प्रेतात्मा ने दी थी जबकि वह सेंट हेलेना द्वीपों में था। उसके साथियों ने इसे व्यर्थ की बात समझकर टाल दिया। किन्तु नैपोलियन की मृत्यु प्रेतात्मा के कथनानुसार ही हुई।
एक दिन सन्ध्या समय फ्रांस के सम्राट हेनरी चतुर्थ बड़ी देर तक घूमते रहे। लौटते समय एक छाया जैसी आकृति उन पर मंडराने लगी। इससे हेनरी घबरा से गये और उससे प्रश्न किया कि तुम कौन हो? तत्काल ही उस छाया जैसी आकृति ने उत्तर दिया कि मैं प्रेतात्मा हूँ और यह बताने आया हूँ कि तुम्हारी मृत्यु किसी छाया षड़यन्त्र के द्वारा शीघ्र ही हो जावेगी। चाहो तो सुरक्षा की व्यवस्था कर लो।
इस घटना को हेनरी ने अपने दरबारियों को सुनाया। इस पर वे इसे दिवास्वप्न कहते हुए हँसने लगे। किन्तु कुछ दिनों बाद प्रेतात्मा के संकेतानुसार हेनरी की हत्या हो गई।
‘दि होल्ड्स’ लन्दन के सम्पादक मौरिस बारबानिल का कथन है कि “इस दृश्य विश्व से परे एक विलक्षण विश्व है। वहाँ मृत्यु के उपरान्त जीवन है।”
ब्रिटेन के अवकाश प्राप्त एयर मार्शल लार्ड डाडिंग भी मृतात्माओं से सम्पर्क के प्रयोग करते थे।
ब्रिटेन के सम्मानित नागरिक सर आर्थर कानन डायल ने अपने स्वर्गीय पुत्र डेनिस की आत्मा से सम्पर्क बना कर प्रेत लोक की स्थिति के बारे बहुत सी जानकारियाँ एकत्रित की थीं और उन से जन साधारण को परिचित कराया था।
‘विज्ञान और मानव विकास’ तथा ‘मैं आत्मा के अमरत्व में क्यों विश्वास करता हूँ’ नामक पुस्तकों में मरणोत्तर जीवन पर विस्तृत प्रकाश डाला है। सर विलियम क्रुक्स, सर एडवर्ड मार्सल, सर आर्थर कानन-डायल, डॉ0 मेयर्स, एलफ्रेड आदि अनेक वैज्ञानिक विद्वानों ने इस दिशा में विभिन्न खोजें की हैं व उनके निष्कर्ष विश्वभर में प्रकाशित हुए हैं, जो पुनर्जन्म के प्रचुर प्रमाण देते हैं, साथ ही दो जन्मों के बीच के अन्तराल में सूक्ष्म शरीर में ही प्रेतादि योनियों में रहने वाले व्यक्तियों से प्रत्यक्ष सम्पर्क कर उनके विवरण भी छापे हैं।
सन् 1893 में पादरी जे0एच0 बरोस ने सेन्टपाल, बुद्ध, सुकरात, जेरी टेलर, जान मिल्टन, रोजर, विलियस, लैसिंग, अब्राहिम लिंकन, टैनिसन, ह्विटियर और फिलिप्स क्रुक्स आदि की आत्माओं से सम्पर्क किया था।
थियोसॉफिकल सोसाइटी के सुविख्यात सन्त लेड विटर की पुस्तक है “स्प्रिचुअल हीलिंग” उसमें भी कहा गया है कि मृत्यु के उपरान्त जीव विचार-लोक में जीवित रहता है। यह पदार्थ-जगत उस विचार-जगत की छाया मात्र है।
श्री प्रो0 बी0 डी0 ऋषि इन्दौर में जज थे। धर्म-पत्नी सुभद्रादेवी की मृत्यु ने उनमें मृत-पत्नी से वार्ता की इच्छा जगाई तथा वे इसी खोज में लग गये। वे सफल हुए व पूरा जीवन परलोक विद्या के लिए ही समर्पित कर दिया। उन्होंने कई मृतात्माओं को बुलाकर अत्यन्त महत्वपूर्ण व्यक्तियों के समक्ष विभिन्न प्रमाणों सहित वार्तालाप किया-कराया था। मृतात्माएँ ऐसे तथ्य उद्घाटित करतीं, जो नितांत निजी होते।
प्रसिद्ध पत्रकार एवं शिक्षा-शास्त्री पं0 श्री नारायण चतुर्वेदी के पिता स्वर्गीय पं0 द्वारिका प्रसाद चतुर्वेदी भी मृतात्माएँ बुलाने के प्रयोग करते थे। एक मेज पर वे पंच पात्र व एक चमची रख देते। मृतात्मा के आते ही पंचपात्र स्वयं बज उठता।
प्रख्यात पत्रकार, इलाहाबाद से प्रकाशित अंग्रेजी ‘दैनिक लीडर’ के भूतपूर्व सम्पादक स्वर्गीय सर सी0 वाय0 चिन्तामणि राव का भी किसी अदृश्य आत्मा से सम्पर्क था।
सत्रहवीं सदी के पादरी जेरेन्सी टेलर ने अपनी स्मरण पुस्तक में प्रेतात्मा सम्बन्धी आँखों देखा वर्णन किया है। जब पादरी घोड़े पर सवार होकर बेलफास्ट से डिल्स गेटो जा रहे थे, कोई अपरिचित व्यक्ति अचानक ही उसके पीछे घोड़े पर बैठ गया उससे बैठने का कारण पूछने पर उसने अपना नाम-हैडक जेम्स बताते हुए कहा आप मेरी पत्नी तक संदेश पहुँचा देवें कि उसका नया पति शीघ्र ही उसकी हत्या करने वाला है। पादरी ने बताये गये पते पर संदेश दे दिया। किन्तु उसकी पत्नी ने विश्वास नहीं किया।
कुछ दिनों के बाद उस स्त्री की हत्या कर दी गई। यह मामला कैरिक फोरेन्स की अदालत में चला। पुलिस को शंका थी कि हत्या नये पति ने पत्नी की सम्पत्ति छीनने के लिए की है। उसकी साक्षी पादरी जेरेंसी टेलर ने प्रेतात्मा के शब्दों में दी।
किन्तु साक्षी अमान्य रही और मजिस्ट्रेट ने कहा कि यदि सत्य है तो प्रेतात्मा स्वयं आकर इसका प्रमाण दें। इस पर एकदम बिजली कड़की एक अदृश्य हाथ निकला और उसने अदालत की मेज पर तीन बार जोर-जोर से थपकी दी। इस पर अदालत ने दूसरे पति डेवीज को अपराधी घोषित करके उसे उचित दण्ड दिया।
दिव्य प्रेतात्मा से कभी-कभी किन्हीं-किन्हीं का सीधा सम्बन्ध उनके पूर्वजन्मों के स्नेह सद्भाव के आधार पर हो जाता है। कई बार वे उपयुक्त सत्पात्रों को अनायास ही सहज उदारता वश सहायता करने लगते हैं किन्तु ऐसा भी सम्भव है कि कोई व्यक्ति अपने आपको साधना द्वारा प्रेतात्माओं का कृपा पात्र बना ले और अपने साथ अदृश्य सहायकों का अनुग्रह जोड़ कर अपनी शक्ति को असामान्य बना ले एवं महत्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त करने का पथ प्रशस्त करे।
जिस पर विश्वास किया जाता है वे पदार्थ अथवा व्यक्ति उतने समर्थ नहीं होते जितना कि स्वयं अपना विश्वास फल दायक होता है।
“महाराज! आपके जीवन में कितनी शुचिता, दिव्यता है! क्या हमारा जीवन ऐसा ही निष्पाप नहीं हो सकता?” -सन्त एकनाथ से एक नागरिक ने पूछा।
“भाई मेरे ! मेरी बात तो छोड़ो। अभी तो मैं तुम्हारी ही चिन्ता कर रहा हूँ। सात दिन में तुम्हारी मृत्यु ही हो जाने वाली है।” सन्त ने कहा।
सज्जन सुध-बुध ही खो बैठे। भाग अपने घर। तुरन्त लेन-देन का हिसाब कर निपटाया जो अधूरे कामकाज, शीघ्र पूरे हो सकते थे, पूरे किये। शेष की भी समुचित व्यवस्था की। फिर अस्वस्थ हो गये और बिस्तर पर लेटना पड़ा। तब तक छह दिन बीत चले थे। सातवें दिन एकनाथ महाराज उनसे मिलने आये। अभिवादन आदि के बाद सन्त एकनाथ ने कुशल-क्षेम पूछी तो कह उठे- “बस, अब चला। आपकी दया बनी रहे, तो शुभ गति होगी।”
एकनाथ जी ने पूछा, “अच्छा, यह तो बताओ, इन छह दिनों में पाप कितने किए? “महाराज! पाप का तो विचार भी करने का अवकाश नहीं मिला।” वे बोले। सन्त एकनाथ मुस्करा उठे। बोले- “अब समझ गये, हमारा जीवन निष्पाप क्यों है? मरण का व्याघ्र सामने खड़ा हो, तो पाप का विचार कहाँ से आयेगा? पाप तो उस ओर से निश्चिंतता में ही होता है। मरण का निरन्तर स्मरण रहे तो पाप की ओर मन जा ही नहीं सकता।”
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गरम हवा के साथ उड़कर धूलि आसमान में छा जाती है, जाड़े के दिनों में वह धरती पर लुढ़कती है और वर्षा होते ही कीचड़ की तरह दिखाई पड़ती है। ऐसा इसलिए होता है कि वह हलकी, तुच्छ और नगण्य है भारी चट्टानों की स्थिति धूलि से भिन्न होती है, वे आँधी-तूफानों में भी यथास्थान बनी रहती हैं और वर्षा, गर्मी से उनकी स्थिति में कोई खास अन्तर नहीं आता। चट्टानों का गौरव, उनकी अविचल एवं भारी-भरकम होने के कारण ही है।
मनुष्य की गरिमा उसकी भारी-भरकम काया नहीं, वरन् उसकी सन्तुलित मनःस्थिति है। परिस्थितियाँ सदा एक जैसी नहीं रह सकतीं, उनका बदलना और पलटना नितान्त स्वाभाविक है सृष्टि के नियमानुसार संसार की हर वस्तु और हर परिस्थिति बदलती रहती है। यह परिवर्तन ही संसार में गतिशीलता का चक्र चला रहा है। स्थिरता का अर्थ जड़ता ही हो सकता है। यदि पृथ्वी का घूमना, हवा का चलना और रात-दिन का बदलना बन्द हो जाय तो यहाँ भयंकर निस्तब्धता छा जायेगी।
किसी को भी यह आशा नहीं करनी चाहिए कि कोई वस्तु, व्यक्ति तथा परिस्थिति सदा एक स्थिति में बने रह सकते हैं आज का बच्चा कल किशोर, परसों तरुण, अगले दिन अधेड़, फिर बूढ़ा और अन्ततः मृतक बनेगा ही, इस व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता । कोई व्यक्ति सदा एक जैसी स्थिति में रहना चाहे तो उसकी यह इच्छा कभी पूरी नहीं हो सकती। पौधे उगते, बढ़ते, परिपक्व होते और वृक्ष बनकर नष्ट हो जाते हैं। घर में कभी जन्म होता है, कभी मरण। दुकान में किसी दिन घाटा पड़ता है, किसी दिन लाभ होता है। ऋतुएँ बदलती हैं, अपना-अपना प्रभाव दिखाती हैं और फिर नई के आने के लिए स्थान खाली करके स्वयं चली जाती हैं। जो इस काल-चक्र की सुनिश्चितता को समझते हैं, वे पहले से ही यह समझ लेते हैं कि इन परिवर्तनों के लिए तैयार रहना चाहिए और जब अनुकूल स्थिति बदलकर प्रतिकूलता का अवसर सामने आये तो उसे अप्रत्याशित न समझकर सहज स्वाभाविक मानें और अपने चित्त को बेतरह असन्तुलित न करें। धैर्यवानों की-विवेकशीलों की मनःस्थिति ऐसी ही होती है। वे न तो अनुकूलता में हर्षोन्मत्त होते हैं और न प्रतिकूलता में सिर धुन-धुनकर रोते हैं। परिवर्तनों का प्रभाव तो हर किसी पर पड़ता है, पर वह विवेकवानों को उतना ही प्रभावित करते हैं जितना कि ऋतुओं का बदलाव। सर्दी की ऋतु में जो ढर्रा था, गर्मी आने पर अभ्यस्त प्रक्रिया बदलने की अड़चन तो पड़ती है, पर कुसमुस करके ढर्रा भी बदल लिया जाता है। दिनचर्या, कपड़े-लत्ते, सोना-जागना बहुत कुछ बदलना पड़ता है, पर इसे अनिवार्य मानकर बिना बहुत गड़बड़ाये सहज स्वभाव से सँभाल लिया जाता है।
समझदारी का तकाजा है कि संसार चक्र के बदलते क्रम के अनुरूप अपनी मनःस्थिति को तैयार रखें। लाभ, सुख, सफलता, प्रगति, वैभव, पद आदि मिलने पर अहंकार से ऐंठने की जरूरत नहीं है। कहा नहीं जा सकता वह स्थिति कब तक रहेगी। स्थिति कभी भी बदल और उलट सकती है, ऐसी दशा में रोने, झींकने, खीजने, निराश होने में शक्ति नष्ट करना व्यर्थ है। परिवर्तन के अनुरूप अपने को ढालने के, विपन्नता को सुधारने में, उपाय सोचने, हल निकालने और ताल-मेल बिठाने में यदि मस्तिष्क को लगाया जाय तो वह प्रयत्न रोने, सिर धुनने की अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर होगा।
दूरदर्शी लोग समझते हैं कि हर परिवार का यह स्वाभाविक क्रम है कि कुछ जन्मते रहेंगे, कुछ मरते रहेंगे। यह अनिवार्य और अपरिहार्य है। राजी से, बिना राजी से इन परिस्थितियों का सामना करना ही पड़ेगा। अस्तु बुद्धिमत्ता इसी में है कि हर्ष, शोक की प्रतिक्रिया को सीमित रखा जाय उसे इतना अनियन्त्रित न होने दिया जाय कि मस्तिष्क विक्षिप्त जैसा बन जाय और उलटे रास्ते अपनाकर हाथ के कामों को भी चौपट बनाते हुए दुहरी हानि खड़ी कर दे। यदि सन्तुलन बनो रहने का अभ्यास हो तो जो क्षति हुई उतने से ही बीतेगी। शोकाकुल विक्षिप्तता से रो-रोकर आँखें खराब कर लेना, आवश्यक कामों को अपने समझाने-बुझाने में उलझा लेना, आवश्यक कामों को अस्त-व्यस्त करके नई हानि उत्पन्न करना जैसे स्वनिर्मित संकटों से बचा जा सकता है। बुद्धिमान दैवी विपत्ति को ही पर्याप्त मानते हैं, अपनी ओर से नई विपत्तियाँ आमन्त्रित नहीं करते। धैर्यवानों की समझदारी ऐसे ही प्रसंगों पर परखी जाती है।
धन लाभ सदा होता रहे तो कोई भी व्यक्ति लखपति, करोड़पति बन सकता है। एक का लाभ दूसरे का घाटा, दूसरे का लाभ एक का घाटा, यहीं अनवरत क्रम इस संसार में अनादिकाल से चल रहा है यह सब बन्द हो जाय तो निर्धन, निर्धन ही बने रहेंगे और धनी, धनपति स्थायी हो जायेंगे। तब धनी को अपनी स्थिति नीरस लगेगी और निर्धनता की आशंका से उसे सतर्क रहने की आवश्यकता पड़ेगी। ऐसी स्थिति में वह सोने की शिला जैसा जड़ बन जायेगा। हानि और लाभ का चक्र यों बड़ा अटपटा और बेतुका लगता है, विचार बुद्धि से देखने पर प्रतीत होता है कि सृष्टि में सजीवता बनाये रहने के लिए वह कितना अधिक आवश्यक है। ईश्वर ने अपना यह विधान कितना समझ-सोचकर रखा है। जो वस्तुस्थिति को समझते हैं वे ज्वार-भाटों के साथ उछलते-गिरते नहीं, वरन् समुद्र तट पर बैठ कर उस प्रकृति कौशल का विनोद भरा आनन्द लूटते हैं।
संयोग-वियोग, हानि-लाभ, सुख-दुःख, जन्म-मरण, सफलता-असफलता जैसे परस्पर विरोधी अवसर दिन और रात की तरह आते और चले जाते हैं। इनने बड़े-बड़ों को प्रभावित किये बिना नहीं छोड़ा। राम का वनवास, सीताहरण, कृष्ण का गोपी विछोह, वंश नाश, व्याध बाण से मरण, पाण्डवों का अज्ञातवास, ईसा को शूली, सुकरात को विषपान, गाँधी को गोली, शंकराचार्य को भगंदर, राम-तीर्थ को जल समाधि जैसे घटना-क्रमों को देखते हुए लगता है कि धर्मात्मा और बुद्धिमान भी सदा सुखी ही नहीं बने रहते, उन्हें भी विपत्तियाँ घेरती, झकझोरती हैं। अन्तर इतना ही रहता है कि ओछे स्तर के मनुष्य तुच्छ धूलि का अनुकरण करते हैं, गर्मी आते ही आकाश छूते और चक्रवात के साथ घूमते हैं किन्तु वर्षा की बूँदें आते ही कीचड़ की तरह खाई-खड्डों में पड़े दुर्गति का रोना रोते हैं। भारी भरकम चट्टानें इन उतार-चढ़ावों को धैर्यपूर्वक सहती हैं और अपना संतुलन बनाये रहती हैं।
उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना उचित है। आज की अपेक्षा कल का दिन अधिक सुखद और अधिक साधन सम्पन्न हो इसके लिए उत्साहपूर्वक पूरा प्रयत्न किया जाना चाहिए अनावश्यक रूप से लम्बी-चौड़ी महत्वाकाँक्षाएँ गढ़ना और उनके तत्काल पूरी न होने पर बेतरह दुःखी होना व्यर्थ है। इच्छाओं के अनुरूप सफलताएँ मिल ही जायं यह आवश्यक नहीं, मनुष्य का एकाकी प्रयत्न ही सब कुछ नहीं होता, दूसरों का सहयोग और परिस्थितियों की अनुकूलता मिलकर ही अमुक सीमा में-अमुक अवधि में अभीष्ट सफलताएँ उत्पन्न होती हैं। इसके लिए धैर्य रखना और अनवरत गति से प्रयत्नरत रहना पड़ता है। जो इतना नहीं कर पाते-मनोरथों की पूर्ति के लिए अधीर आतुरता प्रकट करते हैं, विलम्ब लगने या आँशिक सफलता मिलने पर भाग्य को कोसते, दुःख पाते हैं, उन्हें प्रकृति चक्र से अपरिचित ही कहा जा सकता है।
बुद्धिमानी इसमें है कि जो उपलब्ध है उसका आनन्द लिया जाय और सन्तोष भरा सन्तुलन कायम रखा जाय। और आगे प्रगति करने के लिए प्रयास तो जारी रखें, पर वह सब कुछ खिलाड़ी की मनोभूमि रखकर किया जाना चाहिए। अच्छे खिलाड़ी रोज हारते-जीतते हैं, पर वे न तो सफलता पर उन्मत्त होते हैं और न असफलता पर सिर धुनते हैं। दोनों ही परिस्थितियों में वे खट्टे-मीठे विनोद का आनन्द लेते हैं। यही प्रौढ़ मनोभूमि है। जो ऐसी स्थिरता बनाये रहते हैं वे ही जीवन का आनन्द लेते हैं महत्वाकाँक्षाओं के लिए आतुर उद्विग्नता तो एक प्रकार की मानसिक रुग्णता है, जिससे ग्रसित मनुष्य सदा अशान्त, व्यथित, खिन्न और विक्षुब्ध ही पाये जाते हैं। इस प्रकार की मनोभूमि के लोग पाने का सुख लेने की अपेक्षा अतृप्ति का दुःख अधिक पाते हैं और हर हालत में अपनी ही क्षति करते हैं। इसी स्थिति को तृष्णा कहा गया है और उसे अबुद्धिमत्तापूर्ण ठहराया गया है।
सम्बद्ध व्यक्ति, साधन, पदार्थ एवं परिस्थितियाँ यह सब अनुकूल हों तो मनुष्य अपने आपको सुखी मानता है, पर वास्तविकता इससे सर्वथा भिन्न है। हर मनुष्य की वास्तविक दुनिया उसकी मान्यताओं और कल्पनाओं की बनी हुई है। कल्पनाओं का गठन जिस स्तर का होता है उसी स्तर की अनुभूतियाँ होती रहती हैं और उसी आधार पर चित्त प्रसन्न एवं उद्विग्न बना रहता है। बाहर के पदार्थ बहुत कम मात्रा में ही सुख-दुःख दे पाते हैं। सम्पन्नताएँ एवं विपन्नताएँ सापेक्ष हैं। किसी धनी के साथ तुलना करने पर लगता है हम घोर दरिद्र हैं और निर्धनों के साथ तुलना करने पर लगता है, हमें लाखों, करोड़ों की तुलना में कहीं अधिक मिला हुआ है। तुलना का माप-दण्ड ही हमें दरिद्र अथवा धनी होने का निश्चय कराता है और दुःखी रहने अथवा प्रसन्न रहने का अवसर देता है। इच्छित परिस्थिति पाना कठिन है, पर अपना तुलनात्मक मापदण्ड आसानी से बदला जा सकता है और हर स्थिति में जो प्रस्तुत है उसका सौभाग्य मानते हुए प्रसन्न रहा जा सकता है। यही तरीका सही और सरल है, इस दृष्टिकोण को अपनाकर हर, व्यक्ति हर समय हँसता-मुसकाता, सुखी, सन्तुष्ट रह सकता है। जो उपलब्ध है उसकी महत्ता को समझने का प्रयत्न करें तो ईश्वर को हजार धन्यवाद देने का जी करेगा कि जो लाखों, करोड़ों को नहीं मिल सका वह हमें मिला हुआ है। जो मिला नहीं है उसकी कमी का अन्त नहीं। पर्वत से तुलना करने पर चट्टान अपने आपको सदा दीन-दयाल ही मानेगी, पर यदि किसी ढेले की तुलना में अपना मूल्याँकन करेगी तो, प्रतीत होगा कि जो है उसे नगण्य नहीं समझा जा सकता। छोटी योनियों में जी रहें प्राणियों की तुलना में दरिद्र मनुष्य को भी इतना अधिक मिला है कि वह उनका लेखा-जोखा लेकर हर घड़ी अपना सौभाग्य सराहता रह सकता है।
व्यक्तियों और परिस्थितियों के सम्बन्ध में भी यही बात है। साथियों के दोष ढूंढ़ें तो लगेगा कि हमारे कुटुम्बी, मित्र, स्वजन सभी घटिया स्तर के हैं। त्रुटियाँ सब में हैं- सब में कुछ न कुछ अपूर्णता है। पूर्ण तो एक परमेश्वर है। यदि दोष दृष्टि अपनाये रहें, छिद्रान्वेषण करते रहें तो हर किसी को दुष्ट मानने और रुष्ट रहने की मनःस्थिति बनी रहेगी। इसके विपरीत यदि गुण देखने, ढूँढ़ने का स्वभाव हो तो हर व्यक्ति में ढेरों अच्छाइयाँ दिखाई पड़ेंगी। दोष-दर्शन का परिणाम यह है कि जिसे भी ध्यान से देखें वही अनुपयुक्त, हानिकारक और असन्तोषजनक लगेगा। ऐसी दशा में अपना जी जलता ही रहेगा। यदि सोचने का तरीका बदल लिया जाय और उसी व्यक्ति की अच्छाइयों, सहायताओं और समय-समय पर मिली सद्भावनाओं की सूची तैयार की जाय तो वही बहुत उपयोगी प्रतीत होगा और प्रिय लगने लगेगा। गुण, कर्म, स्वभाव की सभी कसौटियों पर खरे व्यक्ति ढूँढ़ जाय तो निराशा ही हाथ लगेगी और सारा संसार मात्र दोष, दुर्गुणों से पटा मिलेगा। गुण ग्राहकता की नीति से तो अपूर्णताएँ रहते हुए भी श्रेष्ठताओं की मात्रा इतनी मिल जायेगी जिस पर सन्तोष किया जा सके और प्रसन्न रहा जा सके। परिस्थितियों की उतनी महत्ता नहीं जितनी मनःस्थिति की। गई-गुजरी परिस्थितियों में भी लोग हँसते-हँसते जिन्दगी काट लेते हैं, इसके विपरीत हर दृष्टि से साधन सम्पन्न व्यक्ति भी रोते-कलपते, झल्लाते, खीजते पाये जाते हैं। हमें अच्छी परिस्थितियाँ पाने और अच्छे व्यक्तियों का साथ ढूँढ़ने का तो प्रयत्न करना ही चाहिए, पर यह नहीं भूल जाना चाहिए कि जब तक अपना दृष्टिकोण गुणग्राही न बनाया जायेगा, तब तक असन्तोष से पीछा छुड़ाना और प्रसन्न रहने का अवसर पाना असम्भव ही बना रहेगा। हमें सबसे अधिक ध्यान अपना मानसिक सन्तुलन एवं स्तर सही बनाने पर देना चाहिए, ताकि संसार का परिवर्तन चक्र एवं विविधतापूर्ण निर्माण उद्विग्न बनाने की अपेक्षा प्रसन्न प्रमुदित रहने का निमित्त बन सके।
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बुद्धि की दृष्टि से मनुष्य अन्य प्राणियों की तुलना में कहीं आगे है। यह विकास उसने सहकारिता के आधार पर पारस्परिक आदान-प्रदान की प्रवृत्ति पनपाकर सम्भव बनाया है। बुद्धि, वैभव से उसने परिवार, समाज, शासन की संगठना बनाई है। शिल्प, शिक्षा, कला, कृषि, व्यवसाय, वाहन जैसे सुविधा जुटाने वाले साधन खड़े किये हैं। विज्ञान बुद्धिबल की ही देन है। एक-एक सीढ़ी ऊँची चढ़ते हुए मनुष्य जाति उस स्थान पर पहुँच पाई है जहाँ उसे प्रकृति सम्पदा का स्वत्वाधिकारी माना जाता है।
इतने पर भी यह नहीं समझना चाहिए कि सृष्टि के अन्य प्राणी मात्र मरने तक का नीरस जीवन जीते हैं। उनके पास आनन्द एवं सुविधा सम्वर्धन के लिए कोई विशेष चेतना नहीं है। वास्तविकता यह है कि अपनी जीवनचर्या को सुखद और सरल बनाने के लिए उन्हें ऐसी दिव्य क्षमताएँ प्राप्त हैं, जिनसे मनुष्य एक प्रकार से वंचित ही है। जिस अनुपात से छोटे जीवों को विशेष क्षमताएँ प्रकृति ने प्रदान की हैं यदि वही सब मनुष्य को भी मिल सकी होती तो वह देव-दानवों की स्थिति में रह रहा होता। भगवान ने अपने न्याय वितरण में जहाँ मनुष्य को बुद्धि दी है वहाँ अन्य प्राणियों को भी बहुत कुछ दिया है जिसे देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।
पशु-पक्षियों की अपनी साँकेतिक भाषा है। उसके आधार पर वे एक दूसरे से विचार-विनिमय करते हैं। प्रेरणा देते और ग्रहण करते हैं। उनका बोलना, चह-चहाना निरर्थक नहीं होता, वरन् उसमें अभिव्यंजनाओं की अभिव्यक्ति भिन्न-भिन्न आवाजों के आधार पर होती है। इस प्रकार के उच्चारण से वे अपना जी हलका करते और साथियों को अपनी स्थिति से अवगत कराते हैं। इससे वे सचेत होते, लाभ उठाते और संकट से बच निकलने का उपाय खोजते हैं। मनुष्येत्तर प्राणियों की आवाज टेप करके उसे उनके साथियों को सुनाया गया तो पाया गया कि वे उससे प्रभावित होते हैं और आवाजों के अनुरूप अपनी हलचलें प्रस्तुत करते हैं।
वन-जातियों एवं शिकारियों का अनुभव है कि साधारण रीति से बिना छल, कपट का मनुष्य आसानी से वन-जातियों के बीच आ जा सकता है। इसमें उन्हें कोई विशेष उद्विग्नता नहीं होती। किन्तु यदि आखेट के उद्देश्य से दुरभिसंधि लेकर कोई उनके समीप पहुँचता है तो मनोभाव ताड़ने में उन्हें देर नहीं लगती। हड़बड़ाकर वे आत्म-रक्षा के लिए दूर भागने का प्रयत्न करते हैं। यहाँ तक कि मनुष्य द्वारा बन्दूक आदि कपड़ों में छिपाकर ले जाने से भी उन्हें संकट को पहचानने में देर नहीं लगती । मनुष्य में मनोभाव ताड़ने की यदि ऐसी क्षमता होती तो उसे अपने स्वजन, साथियों द्वारा बार-बार ठगे जाने की स्थिति क्यों आती?
भूखे सिंह की आकृति देखकर ही आस-पास चरने वाले वन्य-पशु जान बचाकर भाग खड़े होते हैं इसके विपरीत जब उसका पेट भरा होता है तो आँखों से सिंह दिखाई पड़ते रहने पर भी जंगली पशु निर्भयतापूर्वक आस-पास ही चरते रहते हैं। इतनी ही नहीं भय होने पर वे भयाक्रान्त वाणी बोलकर अन्य साथियों को भी खतरे से सचेत कर देते हैं।
शिकार के समय अथवा अन्य किसी प्रतिद्वन्द्वी से उलझते समय सिंहनी अपने बच्चों को किसी सुरक्षित स्थान पर छिपा देती है। बच्चे भी वस्तुस्थिति समझ लेते हैं और दुम साधकर बिना हिले-जुले चुपचाप लुके रहते हैं। खतरा समाप्त होने का संकेत पाते ही वे दौड़कर उछलते-कूदते माँ के पास जा पहुँचते हैं। मात्र माँ की मनःस्थिति के सहारे परिस्थितियों को समझ लेना और अपनी बाल चंचलता को बुद्धिमत्तापूर्वक दबाये रहना इन शावकों की अनोखी समझदारी कही जा सकती है।
पक्षियों में एक तरह की अन्तर्दृष्टि भी होती है और गुप्त चेतावनी-व्यवस्था भी । मनुष्य अपने शत्रु-मित्र की पहचान में अक्सर भूलें करता है। पर पक्षियों में इस विषय में जन्म-जात क्षमता पाई गई है। एक वैज्ञानिक प्रयोग में एक कागज के एक ओर हंस का-सा और दूसरी ओर बाज जैसा आकार दिया गया तथा मुर्गी के नन्हें-नन्हें बच्चों के एक पिंजड़े के चारों तरफ इन नकली दो मुँहे पक्षी को घुमाया गया। यह देखा गया कि जब उन बच्चों के सामने हंस का आकार आता, तो वे सहज रहते, पर जब बाज जैसी आकृति दिखती, उनमें भय और खलबली दौड़ जाती। उन बच्चों को बाज के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई थी, न ही बाज उन्होंने कभी देखा था। तो भी वे शत्रु-मित्र की पहचान कर सके।
प्रख्यात पक्षी वैज्ञानिक डॉ0 ज्योफ्रेमैथ्यूस का कहना है कि पक्षियों के भीतर एक ‘जीव वैज्ञानिक समय व दिशा सूचक यन्त्र’ होता है, जिससे वे सूर्य और नक्षत्रों की स्थिति जानते हैं तथा सहस्रों मील लम्बी यात्राएँ करते व समुद्र को सही दिशा में उड़कर पार करते हैं।
यही भी देखा गया है कि पिंजड़े में बन्दी वे पक्षी, जिनकी लम्बी उड़ानों की ऋतुएँ निश्चित होती हैं, उस ऋतु के आगमन पर उदास हो जाते हैं। क्योंकि उन्हें उड़ने को नहीं मिलता।
सेलोमन व डाल्फिन मछली प्रजनन के समय अपने जन्म स्थल पर पहुँचती हैं। इसके लिए उन्हें सैंकड़ों मील की यात्रा करनी होती है।
ईल नामक सर्पमीन बिना रडार या कुतुबनुमा के ही यूरोप की नदियों से सागर तट तक निश्चित स्थानों पर हजारों मील चलकर पहुँच जाती है। मादा ईल यूरोप की मीठे पानी वाली नदियों में रहती हैं और नर ईल अतल समुद्र में। 8-10 वर्ष होने पर मादा ईलें जुलाई, अगस्त में योरप की इन नदियों में समुद्र की ओर कूच कर देती हैं। बिना किसी दिशा सूचक यन्त्र या घड़ी के ये निश्चित समय पर समुद्री मुहानों तक पहुँच जाती हैं, जहाँ नर ईल अपना भूरा कलेवर बदल कर रजतवर्णी आभा और सतरंगी आकाँक्षाओं के साथ प्रतीक्षा करते रहते हैं। जैसे ही मादा ईलें समुद्री मुहानों पर पहुँचती हैं और अपने-अपने प्रियतम को देखती हैं, उनकी गुलाबी भावनाएँ वेगवती हो उठती हैं और दोनों एक-दूसरे से लिपट जाते हैं तथा प्रणय केलि करते गहरे समुद्र में पहुँच जाते हैं। वहीं डुबकी लगाकर 3 सौ से 15 सौ मीटर तक की गहराई में मादा ईलें अण्डे देती हैं। उन पर नर ईल अपने शुक्राणु डालते जाते हैं। यही गर्भाधान की क्रिया है। पर प्रसव के बाद ही मादा और उसके साथ ही नर-ईल देह त्याग देते हैं। संभवतः कर्त्तव्य-सम्पादन की संतुष्टि उनको दीर्घ विश्राम को प्रेरणा देती है। नन्हें बच्चों का पालन प्रकृति करती है। बड़े होने पर ये बच्चे समुद्र की सतह पर आ जाते हैं। जीवाणु और घास खाते तथा धूप सेवन करते हैं एक वर्ष में वे तीन इंच लम्बे हो जाते हैं। मुहाने पर पहुँचते हैं। ईल-किशोरियों की देह समुद्री मुहाने पर पहुँचते ही गुलाबी हो उठती है।
बसन्त ऋतु में वे उन्हीं मीठे पानी वाली नदियों की ओर चल पड़ती है। नर-ईल वहीं रह जाते हैं। 8-10 वर्ष बाद यही मादा-ईल सहसा प्रणयाकाँक्षा से भरकर चल देती है समुद्री मुहाने की ओर।
विशालकाय ह्वेल मछलियाँ भी अनुकूल वातावरण की खोज में समुद्र में हजारों मील दूर तक चली जाती हैं और भटकती कदापि नहीं।
वैज्ञानिक अनुसन्धानों से पता चला है कि कीड़े-मकोड़े और छोटे जीव-जन्तु भिन्न-भिन्न भाँति के सन्देशों को सम्प्रेषित करने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार की अत्यन्त हलकी गन्ध प्रसारित करते हैं, जिसे मनुष्य नहीं सूँघ सकता, लेकिन सम्बद्ध जाति के कीड़े-मकोड़ों में उसकी सम्वेदनात्मक प्रतिक्रिया होती है।
उदाहरणार्थ- प्रत्येक वर्ग की चींटियों के नवजात शिशु (जो अण्डे से शिशु रूप ग्रहण करता है) में एक विशेष गन्ध होती है, जो सिर्फ उसी कुनबे की चींटियों में वात्सल्य भाव तथा मातृत्व की भावना जगाती है।
खोजों से ही पता चला है कि चींटियों समेत अनेक कीड़ों में कई-कई तरह के गन्ध-प्रसारण या गन्ध-रसायन अलग-अलग प्रभाग पैदा करते हैं। एक गन्ध ऐसी होती है, जिसके सहारे कीड़ों का दल अपने मुखिया का सही-सही अनुगमन करता है-रास्ते में भूलता-भटकता नहीं एक गंध ऐसी होती है, जिसे सूँघकर नर, मादा की गर्भ धारणा की सम्भावना को समझकर, उससे सहवास करता है। ये सभी गन्ध रसायन ‘फेरोमोन’ कहे जाते हैं।
एक ‘फेरोमोन’ ऐसा होता है, जिसके द्वारा मादा नर को आकर्षित करती है। एक अन्य फेरोमोन के द्वारा वह अपने वाँछित नर का दूसरी सभी मादाओं के प्रति आकर्षण कम करती है।
एक ‘फेरोमोन’ ऐसा होता है, जिसके द्वारा नर , अपनी प्रिय मादा से, दूसरे सभी नरों को दूर रखता है।
अमेरिका में कपास के ढोढे को कीड़े से बचाने के लिए फेरोमोन का उपयोग होता है। फसलों की कीड़ों से रक्षा के लिए भी इनके उपयोग की दिशा में काम चल रहा है। जिस वर्ग के कीड़ों को मारना हो, उनके लिए आकर्षित करने वाला फेरोमोन तैयार कर खेत से दूर तक पिंजड़े में उसे रख दिया जाय, तो उस वर्ग के समस्त कीड़े उस पिंजरे में खिंचे चले आयेंगे। फिर उनको मारा जा सकता है।
इससे कीटाणुनाशक दवाओं से होने वाली हानि नहीं हो पाएगी। क्योंकि कीटनाशक दवाएँ सिर्फ फसल को नुकसान करने वाले कीड़े ही नहीं मारती, अक्सर उपयोगी कीड़े भी मार डालती है। साथ ही ये कीटनाशक पानी के साथ बहकर नदी-नाले में पहुँचकर वहाँ जल जीवों को भी क्षति पहुँचाते हैं। फेरोमोन से ये सब नुकसान नहीं होते, बस मनचाहे कीड़ों को आकर्षित कर उनका काम तमाम किया जा सकता है।
यद्यपि कृत्रिम फेरोमोन का निर्माण है कठिन, पर उस दिशा में तेजी से कार्य जारी है।
ऋतु परिवर्तन की पूर्व सूचना देने वाले पक्षियों तथा कीड़ों से किसान लोग सहज ही यह जान लेते हैं कि निकट भविष्य में ऋतुओं सम्बन्धी क्या हेर-फेर होने जा रहा है। किसी मकान के गिरने की सम्भावना हो तो बिल्ली अपने बच्चों को वहाँ से पहले की उठा ले जाती है। भूकम्प आदि प्राकृतिक दुर्घटनाओं की पूर्व सूचना भी कई पशुओं की विचित्र हलचलें देखकर प्राप्त की जा सकती हैं। रात को कुत्ते अधिक रोते हों तो समझा जाता कि यहीं कही मरण का कुचक्र घूम रहा है। कुत्तों की घ्राण शक्ति इतनी सधी हुई होती है कि वे जिस मार्ग से बहुत दूर तक ले जाये गये थे उसी में उलटे पाँवों लौट आते हैं। यह कार्य वे उस रास्ते में पिछली बार छूटी हुई अपने ही पैरों की गन्ध सूँघकर सम्पन्न करते हैं कुत्तों द्वारा चोरी का पता लगाने की पुलिस व्यवस्था में उनकी घ्राण शक्ति का ही प्रयोग होता है।
तैरने वाले, घूमने वाले, उड़ने वाले प्राणियों की सामान्य हलचलें ऐसे ही बेसिलसिले की तथा अटपटी दिखाई पड़ती हैं, पर ध्यानपूर्वक देखा जाय तो मकड़ी, मधु-मक्खी, चींटी, दीमक जैसे तुच्छ प्राणियों की विलक्षण बुद्धि को देखकर चकित रह जाना पड़ता है, वे अपने साधन हीन और पिछड़े समझे जाने वाले जीवन-क्रम को सरल एवं आनन्दित बनाये रहते हैं। इससे स्पष्ट है कि भगवान ने हर प्राणी को उसकी स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप ऐसे साधन दिये हैं जिसमें किसी के साथ पक्षपात या अन्याय हुआ न कहा जा सके।
नार्वे की पहाड़ियों में एक चूहे जैसा छोटा जन्तु होता है ‘लेमिंग’। इनकी प्रजनन शक्ति बहुत तीव्र है। पहाड़ियों पर वे टिड्डी दलों की तरह छाये दीखते हैं और घास-पात साफ कर डालने पर भूखों मरने लगते हैं।
तब प्रकृति की कुछ विचित्र प्रेरणा होती है। वे झुण्ड के झुण्ड बनाकर समुद्र की ओर चल पड़ते हैं और उसी में डूबकर सामूहिक आत्म-हत्या करते हैं। अन्ततः प्रकृति उन्हें उतनी ही संख्या में बचने देती है जितनी कि उन पहाड़ियों पर जगह है। जनसंख्या की अंधाधुन्ध वृद्धि का परिणाम आत्म-हत्या हो सकता है, यह नियम जन्तु लेमिंग से भी मनुष्य सीख सकें तो कितना अच्छा हो।
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सहानुभूति मानवता का एक विशेष और आवश्यक अंग है। जिस व्यक्ति के अन्दर यह प्रचुर मात्रा में विद्यमान है वही उन्नति शिखर पर होगा। उसमें दैवी अनुभूतियों का समावेश रहता है। प्रायः कवियों और कलाकारों में सहानुभूति अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक पाई जाती है। वे अपनी रचनाओं एवं कृतियों द्वारा दूसरों के हृदय को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं।
जिसके हृदय में सच्ची सहानुभूति है, वह दूसरों को प्यार, आत्मीयता और ममता की आँखों से देखेगा, तो वे अपने ही दिखाई पड़ेंगे। अपने छोटे-से कुटुम्ब को देखकर हमें आनन्द होता है। यदि हम दूसरों को-बाहर वालों को भी उसी सहानुभूति की दृष्टि से देखने लगें, तो वे भी अपने ही प्रतीत होंगे। हम अपने कुटुम्बियों के जब अनेक दोष, दुर्गुण बरदाश्त करते हैं, उन्हें भुलाते, छिपाते और क्षमा करते हैं, तो फिर बाहर वालों के प्रति वैसा क्यों नहीं किया जा सकता? ऐसी सहानुभूति प्रदर्शित करने वाला व्यक्ति ही उच्चकोटि की श्रेणी में गिना जायगा।
सहानुभूति की भावात्मकता को व्यक्त करते हुए ‘ह्वीट मैन’ ने एक स्थान पर अंकित किया है- “मुझे किसी पीड़ित मनुष्य से यह पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि वह अपने में क्या अनुभव कर रहा है या उसे कैसा लग रहा है, बल्कि मैं स्वयं उसी की भाँति पीड़ित हो उठता हूँ और उसकी वेदना को अपने अन्दर अनुभव करने लगता हूँ।”
आजकल की सभ्यता में सहानुभूति दिखाने का दूसरा ही ढंग चल पड़ा है। लोग पीड़ित अथवा दुःखी मनुष्य के पास जाकर, उसकी वेदना, दुःख अथवा दर्द के विषय में पूछताछ करते हैं। वाणी द्वारा इस प्रकार पूछ लेना वास्तविक सहानुभूति नहीं कही जा सकती। सच्चे सहानुभावक को किसी का दुःख-दर्द पूछने की आवश्यकता नहीं होती, वरन् उसके हृदय से स्नेह का अजस्र स्रोत निकल कर चुपचाप पीड़ित को शान्ति एवं सांत्वना देने लगता है।
कृत्रिम सहानुभूति दिखाना दूसरे के प्रति एक कठोरता या निर्दयता का व्यवहार है। जो मनुष्य किसी के दुःख-दर्द को सच्ची सहानुभूति के रूप में न पूछकर केवल अपनी मौखिक हमदर्दी दिखाता है, तो निःसन्देह यह निश्चय कर लीजिये कि वह पीड़ित व्यक्ति की सद्भावना को ठगने में प्रयत्नशील है।
ऐसे कृत्रिम स्वभाव वाले अनुभावकों के प्रति विद्वान, “इमर्सन” ने एक स्थान पर लिखा है कि इन बाहरी लोगों से मैं यही अनुरोध करता हूँ कि- “वे जायें और अपने बच्चों से प्रेम करना सीखें, पत्नी से प्रेम का व्यवहार करें, आश्रितों तथा पड़ौसियों को अपनी विनम्रता से शीतल बनायें। अपने हृदय को स्वच्छ कर मानसिक गरिमा का भाव जगायें। अन्य लोगों के साथ बनावटी सहानुभूति दिखलाने की अपेक्षा अच्छा यही है कि व पहले अपने तथा अपनों के प्रति सहानुभूति का अभ्यास करे और मानवता के उत्तम तथा श्रेष्ठ गुणों को अपने हृदय में पूर्ण सच्चाई के साथ विकसित करने का प्रयत्न करें। कृत्रिम सहानुभूति न तो किसी को लाभ पहुँचा सकती और न समाज को विश्वास दिला सकती है।”
सच्ची सहानुभूति का प्रसार सीमित नहीं, वरन् विश्व-व्यापी है। उसकी करुणा, कोमलता तथा दया का प्रवाह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन, राष्ट्र, धर्म, काले-गोरे, ऊँच-नीच, निर्बल-सबल में किसी प्रकार का भेद-भाव नहीं मानती। सभी के लिये समान रूप से बहती है। उदार और श्रेष्ठ आत्माएँ तो शत्रु की विपत्ति से भी विचलित न होकर सहानुभूति के साथ सहायता करने के लिए उत्सुक हो उठती है। ऐसी ही सहानुभूति सराहनीय होती है।
ऐसी सहानुभूति, सराहनीय नहीं, जो केवल हृदय की भावुकता तक सीमित रहे। वह सजीव होते हुए भी जड़ रूप मानी जायगी। किसी की पीड़ा को देखकर अवाक् रह जाना और खड़े-खड़े आहें भरना सार्थक सहानुभूति नहीं। सार्थक सहानुभूति तभी समझी जा सकती है, जब दुःखियों का दुःख निवारण करने में यथासाध्य कुछ किया जावे। यही सराहनीय सहानुभूति का आशय या भाव है। ऐसे ही व्यक्ति किसी की चोट देखकर उसी प्रकार दुःखी हो जाते हैं, जिस प्रकार वह दुःखी तड़प रहा है। उसके कष्ट दूर करने के प्रयत्न में इस प्रकार तल्लीन हो जावें कि जिस प्रकार चोट का खाया व्यक्ति बिना बाहरी सहायता से आप से आप लग जाता है।
सहानुभूति, हमदर्दी अथवा प्रेम, मनुष्य का सर्वोत्तम गुण है। इसका विकास पाकर मनुष्य देवत्व के पद पर पहुँच सकता है। प्रेम अथवा सहानुभूति में वह शक्ति तथा ऊष्मा है कि कठोर हृदय को भी नम्रता के साँचे में ढाल देती है। उसकी शीतल और मनोरंजक लहरें दुःखी आत्माओं में प्रसन्नता की झलक ला देती हैं। इसी सहानुभूति और सम्वेदना के बल पर मनुष्य दूसरों को भी अपना बना लेता है। कठोर को कोमल, निर्दयी को दयावान, बना लेना सहानुभूति-हृदयी व्यक्ति को अधिक सरल तथा सुगम है।
कम बुद्धि रखने वाला सम्वेदनशील व्यक्ति दूसरों के बीच उस अधिक बुद्धि रखने वाले व्यक्ति की अपेक्षा अधिक सम्मान प्राप्त कर जाता है, जो असंवेदनशील अथवा सहानुभूति से रिक्त होते हैं। उन श्रेष्ठ पुरुषों की ओर जिनमें सहानुभूति की प्रधानता है, इस प्रकार खिंचते चले आते हैं, जिस प्रकार चन्द्रमा की किरणों की ओर समुद्र की तरंगें खिंचा करती हैं।
सहानुभूति ऐसा सरल गुण है, जो हर व्यक्ति आसानी से प्राप्त कर लेता है। यह गुण मनुष्य को प्रकृति की ओर से यों ही मिल जाता है और यदि एक बार इसकी कमी भी महसूस हो तो कोशिश करके विकसित भी किया जा सकता है।
यदि मनुष्य के अन्तःकरण में सहानुभूति का विचार एक बार भी जाग गया तो यही समझ लेना चाहिए कि आत्म-कल्याण का द्वार खुल गया। इसकी सत्यता पर प्रकाश डालते हुए प्रसिद्ध विद्वान बालजक ने एक जगह कहा है-‘‘सहानुभूति गरीबों तथा पीड़ितों के प्रति खींचती है। उनकी भूख तथा पीड़ा अनुभव होती है। सहानुभूति का आर्द्र-भाव-अनुभावक को तद्रूप बना देता है। दीन-दुःखी को देखकर वह उस समय तक स्वयं भी दीन-दुःखी बना रहता है, जब तक कि उसका दुःख-दर्द दूर करने के लिए कुछ कर नहीं लेता। किसी की सेवा, सहायता में किया हुआ अपना काम वह परमात्मा की उपासना में किया कर्त्तव्य ही मानता और ऐसा ही अनुभव करता है। प्राणी मात्र से इस प्रकार की एकात्मता, अध्यात्म योग की वह कोटि है, जो बड़े-बड़े जप, तप तथा साधना, उपवास से भी कठिनतापूर्वक पाई जा सकती है।”
सहानुभूति ही संसार की सबसे बड़ी विभूति है। यदि कोई किसी के प्रति सहयोग, त्याग तथा सहानुभूति न कर, सभी अपनी आपा-धापी में लगे रहें तो हर एक को अपना कुँआ खोदकर पानी पीना पड़ेगा और इस प्रकार सभी घाटे में रहेंगे।
पारिवारिक प्रगति में माता-पिता की सहानुभूति पर बच्चों की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक प्रगति अवलम्बित है। यदि माता-पिता, बालकों के लिए कष्ट न सहें, उनकी सुख-सुविधा का ध्यान न करें, उनके पौष्टिक भोजन, इतनी महंगी शिक्षा, बीमारी में चिकित्सा, विवाह-शादी की व्यवस्था एवं उचित आजीविका आदि समस्त सुविधाओं पर ध्यान न दें तो वह प्रगति नहीं कर सकते।
छोटा बालक तो सर्वथा असहाय होता है वह माता-पिता की सहानुभूति एवं सहायता के बिना जीवित भी नहीं रह सकता। उनका विकास माता-पिता की सहानुभूति और उदारता पर ही सर्वथा अवलम्बित है।
पीड़ा और पतन की दुःखदायी परिस्थितियों में जकड़े हुए मनुष्यों को स्नेह सहानुभूति की आवश्यकता है। यह विभूतियाँ जिसके पास होंगी वह मात्र भाव मुद्रा प्रदर्शित करके निष्क्रिय न रह जायेगा, वरन् सेवा और सहायता के लिए भी आगे बढ़ेगा। भविष्य की आशा दिलाने पर गिरे हुए व्यक्ति उठ खड़े होते हैं, इस तथ्य को जो जानता है वह निराश और विक्षुब्ध मनःस्थिति को आशा और उत्साह के प्रकाश से आलोकित करने का निरन्तर प्रयास करता रहता है।
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सामान्य जीवन में भी आत्मिक घनिष्ठता का बहुत महत्व और मूल्य है। उसके आधार पर छोटे-बड़े आदान-प्रदानों का क्रम चलता रहता है। परायेपन का भाव आने और स्नेह सहयोग का आधार झीना रहने पर अन्यमनस्कता बनी रहती है, पर जब घनिष्ठता का संचार होता है तो व्यक्तियों का न केवल सहयोग ही प्रखर होता है वरन् आन्तरिक एकता भी सघन होती चली जाती है। इसकी प्रतिक्रिया दोनों पक्षों के लिए हितकारक बनती है। व्यावहारिक जीवन में मित्रता के लाभों से सभी परिचित हैं।
सूक्ष्म जीवन में यह घनिष्ठता मरण काल का आभास आत्मीय जनों के सामने अदृश्य सूचना के रूप में जा पहुँचता है। कितने ही प्रसंग ऐसे हैं जिनमें एक मित्र या संबन्धी की मृत्यु होने पर उसकी सूचना द्वारा दूसरे पक्ष को जानकारी मिली है। कई बार तो यह सूचना स्वप्नों के माध्यम से मिलती है और कई बार ऐसे ही चौंका देने वाली विकलता के रूप में उभरती है। कई बार ऐसे आभास मिलते हैं कि मृतक की आत्मा स्वयं अपने मरण की सूचना देने और अन्तिम बार मिलने के उद्देश्य से सूक्ष्म शरीर में समीप आई है। ऐसे अनेकों प्रसंग हैं जिन्हें विश्वस्त एवं प्रामाणिक ही कहा जा सकता है।
स्वप्नों के सम्बन्ध में सोचा जाता है कि किसी पूर्व सम्भावना का दृश्य प्रत्यक्ष बन कर दीख सकता है, पर जब उस प्रकार की कोई कल्पना तक न हो तो उसे क्या कहा जाय ? अति वृद्ध, अशक्त बीमारी से ग्रसित युद्ध क्षेत्र में लड़ते हुए अथवा ऐसी किसी विपन्न स्थिति में पड़े हुए व्यक्ति के सम्बन्ध में उसकी मृत्यु संभावना का कल्पना क्षेत्र में स्थान हो सकता है और उस स्तर के स्वप्न दीख सकते हैं किन्तु जो पूर्ण स्वस्थ एवं भली चंगी स्थित में है उनके आकस्मिक निधन की सम्भावना किसी की कल्पना में होगी और कोई क्यों उस प्रकार के स्वप्न देखेगा।
आकस्मिक मृत्यु की सूचना बिना किसी संचार साधन के जब स्वजन सम्बन्धियों को मिलती है तो उससे आत्मा के अस्तित्व और सूक्ष्म जगत में घटित होने वाली हलचलों का तथ्य रूप से प्रमाण मिल जाता है। घनिष्ठता स्नेह सूत्र में बंधे हुए लोगों के साथ किसी विशेष उत्तेजना के समय विशेष रूप से प्रभावित करती है। इस तथ्य को हम मृत्यु की अदृश्य सूचनाओं का विश्लेषण करते हुए सहज की जान सकते हैं ऐसी घटनाएँ एक नहीं अनेक हैं और ऐसी हैं जिन्हें किंवदंती नहीं, प्रामाणिकता की कसौटी पर खरा मानने में कोई अड़चन नहीं पड़ती ।
ऐसी अनुभूतियाँ प्रायः स्वप्नावस्था अथवा अर्ध-निद्रा की स्थिति में होती हैं। गहरी नींद को सुषुप्ति कहते हैं। वह उतनी प्रगाढ़ होती है कि उसमें मस्तिष्कीय तन्तु प्रायः पूरी तरह निःचेष्ट हो जाते हैं। उस स्थिति में कोई स्वप्न नहीं आता। तन्द्रावस्था में अन्तर्मन सक्रिय रहता है और यदि उसमें सूक्ष्म जगत के साथ सम्पर्क बना सकने लायक संवेदना हुई तो रहस्यमय अदृश्य घटनाचक्रों को समझने और पकड़ने में समर्थ हो जाता है। कभी-कभी मृत्यु जैसी घटनाएँ अपने आप में इतनी प्रबल होती हैं कि वे सामान्य स्तर के व्यक्तियों को भी आत्मीयता का सूत्र जुड़ा रहने के कारण प्रभावित करती हैं और उन्हें उस प्रकार की सम्भावना का स्वप्न में आभास देती हैं।
नेपोलियन जिस दिन मरा, उसी दिन सैकड़ों मील दूर अपनी माँ से मिलने पहुँचा। माँ ने यही समझा कि वह सहसा मिलने आ गया है। मृत्यु की तब तक कोई सूचना मिलने का प्रश्न भी तो नहीं था। नेपोलियन माँ के पास पहुँच कर बोला- “माँ! अभी ही झंझटों से मुक्त हो पाया हूँ।” अन्य तीन व्यक्तियों ने भी उसे देखा। बाद में पता चला, नैपोलियन की उसी समय मृत्यु हुई थी।
कवि वायरन ने भी ऐसी अनेक अनुभूत घटनाओं का वर्णन किया है। उनमें से एक यह है-
“एक ब्रिटिश कैप्टिन किड गहरी नींद में सो रहे थे। सहसा उन्हें लगा-बिस्तर पर कोई भारी बोझ है। आँखें खोली तो देखा, सुदूर वेस्टइण्डीज में नौकरी कर रहा भाई बिस्तर पर बैठा है। उसका उस समय वहाँ होना असम्भव था। किड ने सोचा-सपना है और आँख मूँद ली। थोड़ी देर बाद फिर देखा- भाई अभी भी वहीं है। तब भाई की ओर हाथ बढ़ाया। उसका कोट पानी से तर था। हड़बड़ा कर वे उठे। कुछ देर में भाई गायब हो गया। बाद में पता चला उसी समय भाई की पानी में डूब जाने से वेस्टइण्डीज में ही मृत्यु हो गई थी।”
फिल्म-तारिका ओलिविया एक शाम को कुछ उदास थी। अपने एक मित्र के यहाँ से काम के बाद पैदल ही टहलती घर की ओर चल पड़ा। घर के पास वह पहुँची तो लगा-उसकी बाँह के नीचे कोई हाथ है और साथ का व्यक्ति धीरे-धीरे एक गीत गुनगुना रहा है। वह बेहद थकी थी। स्वर व स्पर्श परिचित था। अतः मान लिया कि उसका वह मित्र अभी ही बाहर से आया होगा। घर आने पर यह जानकर कि मैं अमुक जगह काम पर गई हूँ, वहाँ पहुँचा होगा। फिर वहाँ पता चला होगा कि मैं अभी-अभी पैदल ही घर चल दी हूँ तो राह में आ पकड़ा है। यह उसकी आदत थी। ओलिविया को स्वाभाविक ही खुशी हुई। वह चलती रही। फिर स्वयं भी उसके साथ गुनगुनाने लगी। जब घर के दरवाजे पर पहुँची तो उसने कहा-‘गुडनाइट’ और जाकर सो गई। सोचा-मित्र भी घर गया।
सुबह नाश्ते के समय अखबार पलट रही थी, तो अन्दर के पृष्ठ पर एक खबर छपी थी कि ओलिविया का वह मित्र एक दिन पूर्व दोपहर को मार डाला गया है।
कैप्टिन फ्रेडरिक प्रथम बर्मा युद्ध में एक जहाज में कमाँडर ऑफिसर के नाते ड्यूटी पर थे। एक रात सहसा उन्होंने एक व्यक्ति को अपने कैबिन में घुसते देखा। वे सतर्क हो गये और उस पर आक्रमण करना ही चाहते थे कि चाँदनी के प्रकाश में उन्होंने स्पष्ट पहचाना-उनका भाई। वे चौंक पड़े। भाई और पास आया। बोला- ‘फ्रेड, मैं तुम्हें यह बताने आया हूँ कि मैं मर चुका हूँ।’ फ्रेड सभी घटनाओं का ब्योरा लिखे रखते थे। अतः इस घटना का भी समय व विवरण लिख लिया। इंग्लैंड लौटे तो पता चला, उसी घटना वाले दिन, ठीक उसी समय उनके भाई की मृत्यु हुई थी।
क्वीन्स टाउन की श्रीमती काक्स का अनुभव भी दिलचस्प है । अब वे मायके में थीं, उनका भाई, जो कि नेवी में अफसर था और हाँगकाँग में तैनात था, अपने छोटे बच्चे को उन्हीं की देखभाल में छोड़ गया था। एक रात जब वे नित्य की भाँति उस भतीजे को कमरे में सुलाकर अपने कमरे में आईं, तो थोड़ी ही देर बाद वह बालक भाग आया और डरी-डरी आवाज में बताया आँटी ! मैंने अभी-अभी पिताजी को अपने बिस्तर के पास चलते हुए देखा। श्रीमती काक्स ने समझाया कि तूने सपना देखा होगा। बच्चा डरा था। अतः अपने कमरे में नहीं गया। वहीं सो गया। कुछ समय बाद श्रीमती काक्स भी लेट गई। लेटने के थोड़ी देर बाद उन्होंने देखा-उनके भाई अँगीठी के पास कुर्सी पर बैठे हैं। उनके चेहरे पर पीलापन है। वे चौंक पड़ीं। बाद में वह छाया गायब हो गई। कुछ दिनों बाद पता चला कि उक्त घटना के कुछ घण्टों पहले श्रीमती काक्स के भाई की हाँगकाँग में आकस्मिक मृत्यु हो गई थी।
रूसी बैले नर्तक श्री सर्जेडक्रेंस की घ्न्घ्न्डडडड में ऐडडडड ड्रामे हेतु रिहर्सल करके लौटे और भोजन के पश्चात थकान दूर करने बिस्तर पर लेट गये। रात के पहले चरण में ही सर्जे ने स्वप्न देखा कि जिस वृक्ष के नीचे क्रिसमस त्यौहार मनाया जा रहा है वहाँ एक नाटक मंच सजा है जिस पर ‘इन्फान्टा’ संगीत नाटिका दिखाई जाने वाली है। अचानक पेड़ पर से एक जलती हुए मोमबत्ती मंच पर गिरी और प्रोड्यूसर एडाल्फवास मंच के पीछे भागते नजर आये और उस स्थान पर सुन्दर सफेद फूलों का ढेर लगा हुआ है। इतना देख कर सर्जे की नींद भंग हो गई। और सचमुच ही वह आयोजन जिसके लिए सर्जे रिहर्सल करके लौटे थे क्रिसमस के दो दिन पूर्व ही हुआ और तैयारी के बीच में ही सूचना मिली कि संचालक मौत का शिकार हो गया है और सर्जे ने अपनी आँखों से पुनः स्वप्न वाले सफेद फूल मृतात्मा की श्रद्धाँजलि के रूप में देखे।
अमेरिका के उच्च सैनिक अधिकारी कर्नल गार्डिनर की पुत्री ‘जूलिमा’ और जल सेना के तत्कालीन सैक्रेटरी श्री थामस डब्ल्यू0 गिलमर की पत्नी ‘ऐनी’ दोनों ने 27 फरवरी 1844 को स्वप्न में अपने-अपने पतियों की मृत्यु को देखा तो दूसरे ही दिन 28 फरवरी को वाशिंगटन में होने वाले राष्ट्रीय उत्सव में जाने से अपने-अपने पतियों को रोका, पर वे गये ही और उत्सव में प्रदर्शन होने वाली दो तोपों के बैरेल में ही गोले फट जाने से उन दोनों की मृत्यु हो गई।
‘जूलिमा’ सौ मील दूर बैठे अपने पति की स्थिति से अवगत (स्वप्न) होने का दावा करतीं। एक स्वप्न में उनने अपने नवविवाहित पति प्रेसीडेन्ट-टेलर का पीला चेहरा देखा- तब वेरिचमान्ड में थे। स्वप्न में वे हाथ में टाई और कमीज लिये हुए कह उठे “मेरा सिर-थाम लो”। स्पप्न टूटा पर घबराई हुई जूलिमा सुबह ही रिचमाँड के लिए रवाना हो गई। और प्रेसीडेंट टेलर को सकुशल पाया, पर जहाँ वे ठहरे थे उस होटल में दुर्घटना के कारण एक मृत्यु का ठीक वही दृश्य था।
श्रद्धायुक्त, स्वच्छ, पवित्र मन वाले उपासक आत्म-चिन्तन करते हुए सार्थक स्वप्न देख मानव कल्याण का हेतु बन सकते हैं।
इंग्लैण्ड की एक 12 वर्षीय बालिका जेनी को भी सत्य सूचक स्वप्न आते थे। पहले तो उस पर कोई विश्वास न करता। किन्तु 29 जनवरी 1898 के दिन उसके पिता कप्तान स्प्रेइट एक जहाज पर कोयला लाद कर विदेश चल दिये। एक रात सहसा बालिका चीख पड़ी। कारण पूछने पर उसने बताया-पिताजी का जहाज डूब गया है, पर उन्हें एक अन्य जहाज से बचा लिया है। माँ ने डाँटकर जेनी को चुप कर दिया, पर 25 फरवरी को लौटकर स्प्रेइट ने जो कुछ बतलाया वह जेनी के स्वप्न के अनुसार पूरी तरह घटित हुआ था। सभी विस्मित रह गए।
वर्तमान के घटनाक्रमों का स्वप्न में दिखाई पड़ना इस आधार पर सही समझा जा सकता है कि सूक्ष्म जगत में हो रही हलचलें एक स्थान से दूसरे स्थान तक रेडियो तरंगों की तरह जा सकती हैं और बिना संचार साधनों के भी, उनका परिचय मिल सकता है, पर आश्चर्य तब होता है जब भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का बहुत समय पहले ही आभास मिल जाता है। ऐसे स्वप्नों की भी कमी नहीं जिनमें मृत्यु अथवा अन्य प्रकार के पूर्व संकेत स्वप्न में मिले हैं और वे सही सिद्ध होकर रहे हैं।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने रात को एक स्वप्न देखा कि उन्हें रोने की बहुत सी आवाजें सुनाई पड़ती हैं। वे बिस्तर से उठ कर व्हाइट हाउस के कमरों में चक्कर लगा कर इन रोने की आवाजों का कारण तलाश करते हैं। एक कमरे में वे एक लाश कफ़न से ढकी हुई देखते हैं और वहीं कुछ सिपाही खड़े पाते हैं। वहाँ बहुत से लोग रो रहे हैं। सपने में ही लिंकन एक सिपाही से पूछते हैं-कौन मरा ? सिपाही कहता है राष्ट्रपति लिंकन की हत्या गोली मार कर दी गई है। यह उन्हीं की लाश पड़ी है।
लिंकन ने सपना अपने परिचितों को सुनाया। चार दिन बाद ही वह स्वप्न सच हो गया। जब वे वाशिंगटन के फीर्ड थियेटर में नाटक देख रहे थे तो एक अभिनेता ने उनकी गोली मार कर हत्या कर दी।
अमेरिका के एक नागरिक एलन वेधन ने एक रात स्वप्न देखा कि तत्कालीन राष्ट्रपति राबर्ट कनैडी एक भीड़ के साथ किसी पार्टी में जा रहे हैं। रास्ते में विरोधी दल का एक सदस्य उन्हें गोली मार देता है और राष्ट्रपति की मृत्यु हो जाती है।
एलन ने अपना सपना ‘स्वप्न अनुसंधान संस्था’ के रजिस्टरों में नोट कर दिया और अनुरोध किया कि वे इस सपने की बात राष्ट्रपति तक पहुँचा दें। इसके एक सप्ताह बाद सचमुच वह सपना सत्य हो गया और राष्ट्रपति गोली से मारे गये।
एक दिन एक आस्थावान छात्र अपने नास्तिक प्रोफेसर फ्रान्ज मेमर के पास प्रातःकाल ही पहुँच गया और बोला सर! आज बहस करने नहीं प्रमाण लेकर आया हूँ। जेना विश्वविद्यालय के ये प्रोफेसर एवं छात्र प्रायः आस्तिकतावाद पर विवाद करते रहते पर बिना प्रमाण प्रोफेसर महोदय मानने को तैयार नहीं होते। छात्र ने कहना प्रारम्भ किया आज रात मैंने एक स्वप्न देखा है किन्तु आपको बताऊँगा नहीं। मात्र इतना बताता हूँ कि मेरी मृत्यु शीघ्र ही हो जायेगी। प्रसंग यहीं समाप्त हो गया। घटना घटित होने तक के क्षणों तक के लिए और हफ्ते भर बाद ही सोमवार को वह छात्र बीमार पड़ा और तीसरे दिन तक उसका काम ही हो गया। प्रोफेसर महोदय आतुर मन लिए अंत्येष्टि समाप्त होते ही छात्र के घर पहुँचे और उस दिन छात्र द्वारा मृत्यु के बाद बक्सा खोलकर देखने के लिए दिये संकेतानुसार बक्सा खोलकर उस दिन के स्वप्न का लिखित वृत्तांत पढ़ा। लिखा था-‘‘तारीख 17 दिन बृहस्पतिवार को प्रातःकाल पाँच बचे मेरी मृत्यु हो जायेगी। मुझे अमुक स्थान पर दफनाया जायेगा। जब मुझे दफनाया जा रहा होगा तब मेरे माता-पिता आयेंगे और मुझे एक बार फिर बाहर रखकर देखेंगे। इसके बाद मुझे दफना दिया जायेगा।” प्रोफेसर महोदय के आश्चर्य का ठिकाना न रहा लिखित विवरण अनुसार ही सारा नाटक आँखों से देख कर अन्ततोगत्वा उन्हें स्वीकार करना पड़ा उस सत्ता को जिसे हठ वश उपेक्षित किया जाता है।
एक रात हरफोर्ड के आर्क विशप की पत्नी ने स्वप्न देखा कि एक सुअर उनकी डाइनिंग टेबल पर भोजन कर रहा है। प्रातःकाल यह बात विशप से कही गई तो वे हँस कर रह गये। पर वास्तव में जब पत्नी-पति गिरजा घर से प्रार्थना करके लौटे तो देखा कि पड़ोसी का पालतू सुअर किसी प्रकार उनके घर घुस आया है और भोजन की टेबल पर सवार है। पति-पत्नी के लिए नौकर द्वारा लगाया गया नाश्ता उनके पहुँचने तक सुअर साफ कर चुका था।
एक दुर्घटना की पूर्व सूचना, दुर्घटना तथा दुर्घटना हो जाने के निश्चित समाचार लगातार एक ही स्वप्न का तीन बार आने के रूप में मैनचेस्टर की ही एक स्त्री का अनूठा अनुभव है। तीनों बार स्वप्न में उसने देखा कि उसकी लड़की की मृत्यु मोटर-दुर्घटना से हो गई है। और प्रातःकाल सचमुच ही समाचार आ गया कि उसकी लड़की मोटर दुर्घटना में समाप्त हो गई है। एक ही स्वप्न की तीन बार पुनरावृत्ति के द्वारा, पहले दुर्घटना के भविष्य की रचना, दूसरी बार दुर्घटना एवं तीसरी बार दुर्घटना हो चुकने के समाचार से अवगत कराया गया।
स्वयं डॉ0 फ्राइड ने अपनी पुस्तक ‘इंटर-प्रिटेशन आफ ड्रीम’ में एक अनूठी घटना से सम्बन्धित स्वप्न के सम्बन्ध में लिखा कि.........
“मेरे शहर में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के पुत्र का देहावसान हो गया। रात्रि में अंत्येष्टि सम्भव न होने से प्रातःकाल करने का निर्णय कर शव के चारों ओर मोमबत्ती जला एक पहरेदार छोड़ मृतक का पिता अपने कमरे में जा सोया। नींद लगे थोड़ा ही समय हुआ होगा कि स्वप्न में उनका लड़का उनके सामने खड़ा को कह रहा है कि क्या मेरी लाश यहीं जल जाने दोगे। यह स्वप्न देखते ही उसकी नींद टूटी और उसने झाँक कर देखा तो लाश वाले कमरे में प्रकाश हो रहा था। वह वहाँ पहुँचा तो देखा कि पहरेदार सो गया है और मोमबत्ती गिर जाने से कफ़न में आग लगने से लाश ही क्या विलम्ब हो जाता तो मकान ही जल जाता।
इस स्वप्न से फ्राइड का यह स्वीकार करना पड़ा कि स्वप्न जगत को दृश्य जगत एवं स्थूल वासनाजन्य कल्पनाओं तक सीमित करना भूल ही होगी। हाँ अक्षरशः सत्य निकलने वाले स्वप्नों की तह तक हम अवश्य ही नहीं पहुँच पाते।
भूतकाल में हुई घटनाओं के आभास भी कई बार स्वप्नों में मिलते हैं। इस संदर्भ में यह समझा जा सकता है कि जिस प्रकार मस्तिष्क में भूतकाल की स्मृतियाँ प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती हैं और जब कभी अवसर आता है, तब वे उभर कर सामने आ जाती हैं। इसी प्रकार सूक्ष्म जगत में भूतकाल की घटना अपना अस्तित्व बनाये विचरण करती रहती होंगी और जब जहाँ उनका सम्पर्क बनता होगा वहाँ स्वप्न अथवा आभास रूप में जिस-तिस को उनका अनुभव हो जाता होगा।
परा मनोविज्ञान की वर्तमान खोजों में इस प्रकार के हजारों प्रमाण बहुत छानबीन के बाद एकत्रित किये हैं और विशेषज्ञों ने तथ्यों का कारण समझ सकने में अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए भी इतना तो स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि जिन सूत्रों से इन घटनाओं का संकलन पूरी छानबीन के साथ किया गया है उनमें अतिशयोक्ति एवं किम्वदन्तियों का अंश कदाचित ही कहीं रहा होगा। अन्यथा वे विश्वस्त भी हैं और प्रामाणिक भी।
मैनचेस्टर की घटना है। एक पिता ने अपने दो पुत्रों को एक खण्डहर मकान में ले जाकर मार डाला और जलाकर हड्डियाँ गड्ढे में गाढ़ दीं और पुलिस मैनचेस्टर के इस दम्पत्ति के साथ संवेदना व्यक्त करते हुए लड़कों की खोज करती रही, पर पता न लग सका। एक रात चिंतित माता को स्वप्न आया जिसमें उसने देखा कि उसके पति महाशय अपने दोनों लड़कों को साथ लेकर एक खण्डहर मकान में घुसे और उनको मौत के घाट उतार दिया। यह निर्मम दृश्य देख माँ का हृदय चीत्कार कर उठा और नींद भंग हो गई। उसने स्वप्न का संदर्भ देते हुए पुलिस में रिपोर्ट की पर पुलिस बिना प्रमाण मानने को तैयार नहीं हुई। तब उसने कहा मैंने उस जगह स्वप्न में ‘चेस्टर सिटी’ लिखा देखा था। यदि मुझे चेस्टर सिटी ले जाया जा सके, तो मैं उस स्थल को बता सकती हूँ। पुलिस इस आधार पर उस महिला की मदद को तैयार हो गई। और चेस्टर सिटी पहुँच कर महिला ने पहिले कभी न देखे उस शहर के गली कूँचे पार करते हुए उस खण्डहर मकान में ले जाकर पुलिस को खड़ा कर दिया, जहाँ शव को जलाने के निशान मिले और गड्ढे में गाड़ी गई हड्डियाँ भी मिलीं।
स्वप्नों की दुनिया बच्चों की खिलवाड़। विसंगत कल्पनाओं का झुण्ड समुच्चय। चारपाई पर पड़े-पड़े बिना टिकट घण्टों देखा जाने वाला सिनेमा। अकारण कौतूहल और असमंजस में डालने वाली मृगमरीचिका। मस्तिष्क के मकड़े का अपने थूक से बुना-बनाया गया ताना-बाना। ऐसे ही और भी अनेक नाम इस असत् को सत् बनाकर दिखा देने वाले माया जंजाल के नाम दिये जा सकते हैं, पर वस्तुतः बात इतनी छोटी नहीं। उनके पीछे यह तथ्य और रहस्य सुनिश्चित रूप से छिपा हुआ है कि हमारे सूक्ष्म जीवन और भगवान के सूक्ष्म जगत की स्थिति को देख सकना स्वप्नों के झरोखों में बैठ कर सम्भव हो सकता है।
दैवमाश्वासनामात्र दुःखे पेलव बुद्धिषु। समाश्वासन वागेषा न दैवं परमार्थतः॥
भाग्य की कल्पना कम बुद्धि वाले मनुष्यों को दुःख के समय पर केवल सान्त्वना देने के लिए ही है। दुःखियों को आश्वासन मात्र देने वाली वाणी के अतिरिक्त वस्तुतः भाग्य कोई वस्तु नहीं है।
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ईश्वर की इस विशाल सृष्टि में मनुष्य को उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना माना जाता है, क्योंकि मनुष्य को कल्पना सँजोने को मन और निर्णय के लिए बुद्धि तथा श्रम करने हेतु शरीर प्रदान किया गया है। यह सुनिश्चित तथ्य है कि मन और मस्तिष्क के समन्वय सहित शरीर को जिस ओर कार्य करने के लगा दिया जायेगा, उस ओर चमत्कार हो जावेगा। संसार की प्रगति में मनोयोग का बड़ा गहरा हाथ रहा है। मनोयोगपूर्वक किये गये श्रम ने सदैव अच्छे परिणाम ही प्रस्तुत किये हैं। श्रम की सफलता में एक शर्त यह है कि वह किसी अन्य के द्वारा कठपुतली की भाँति संचालित न हो। अन्यमनस्क दशा में न किया गया हो, तभी श्रम की सार्थकता सम्पन्न होगी।
आदि युग से लेकर वर्तमान वैज्ञानिक युग तक के परिवर्तनों पर दृष्टिपात करें तो हम पायेंगे कि मनुष्य के मस्तिष्क ने इस कुरूप और बेडौल पृथ्वी को सजाने-सँवारने का कार्य बड़े ही सुरुचिपूर्ण ढंग से कर दिखाया है। कहाँ आदि युग का बर्बर, जंगली मनुष्य और कहाँ वर्तमान युग का सभ्य, सुशिक्षित मानव। निश्चय ही प्रगति के पथ पर मानव मस्तिष्क, मन की कल्पनाओं को लिए दौड़ता चला गया है और सम्पूर्ण धरा को दुल्हन की भाँति सजा डाला है, सँवार डाला है। विज्ञान के आविष्कारों ने मनुष्य के श्रम की महत्ता तथा उसमें मनोयोग के समन्वय की महत्ता को सिद्ध कर दिया है। यह समस्त प्रगति जहाँ श्रम के बिना असम्भव थी वहीं मनोयोग की महत्ता को भी नकारा नहीं जा सकता ।
यदि मनुष्य जाति का वह वर्ग जिसने अपने श्रम तथा बुद्धि से ये सभी साधन उपलब्ध कराये हैं, अकर्मण्यता का रुख अपना लें, श्रम से कन्नी काटने लगें, तो आज की हमारी सुविधाएँ थोड़े समय पश्चात् नष्ट हो जावेंगी। एशिया महाद्वीप का एक छोटा-सा शोषित देश जापान अपनी महत्वाकाँक्षाओं को दमित होते देख स्थिर न रह सका। उस देश के निवासियों ने अपनी भावनाओं को ऊँचा उठाया और वे अपनी शक्ति के साथ-साथ पूर्ण मनोयोगपूर्वक देश के विकास में लग गये तथा संसार के समक्ष अल्पकाल में ही प्रगति प्राप्त कर एक उदाहरण प्रस्तुत कर दिया। इस उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि जिसने अपना तन-मन लगा दिया वह तुलनात्मक रूप से अधिक लाभ उठा सका। जबकि जिसने श्रम से जी चुराया वह सौभाग्य के किनारों को छू भी न सका।
संसार में कुछ व्यक्ति विभिन्न क्षेत्रों में असाधारण उन्नति करते देखे जाते हैं। जन-सामान्य की धारणा उनके विषय में यह रहती है कि-‘‘वे दैवी शक्ति प्राप्त व्यक्ति हैं। ऐसी दैवी सम्पदा उसी व्यक्ति विशेष को नहीं, वरन् प्रत्येक जन को पर्याप्त मात्रा में प्राप्त हो सकती है। अन्तर है मात्र उसको विकास करने का। लगन का-निष्ठा का। ऐसा सोचने वाले लोग यदि स्वयं भी श्रम के साथ मनोयोग का समन्वय कर अपने उद्देश्य की प्राप्ति में संलग्न हो जावें तो सफलता उनके पैर चूमने लगेगी। जो लोग जीवन पर्यन्त श्रम की महत्ता को न समझ सकेंगे और आलस्य में ही अपना बहुमूल्य समय गँवाते रहेंगे उन्हें हर क्षेत्र में निराश और खाली हाथ ही रहना पड़ेगा। बगीचे का माली यदि पेड़-पौधों को वर्षा के सहारे छोड़ दे, उनकी सेवा-सुश्रूषा न करे तो उसे अपने हरे-भरे बगीचे से हाथ धोना ही पड़ेगा। हरा-भरा बगीचा माली के श्रम सीकरों का प्रतिबिम्ब ही होता हैं बगीचे में लहलहाते पौधे और स्मित हास्य से युक्त पुष्प माली के मनोयोग के परिचायक हैं। श्रम से कतराने वाले लोग अपने भाग्य को कोसा करते हैं। वास्तव में यह दुर्भाग्य उस व्यक्ति की अकर्मण्यता का ही है। उसी ने उसकी प्रगति को अवरुद्ध कर दिया है।
अवनतिग्रस्त व्यक्तियों के दुर्भाग्य की कहानी यह है कि वे अपने अमूल्य समय और अमूल्य श्रम की महत्ता को पहचान न सकें। ऐसे लोग देवताओं से कार्य सिद्धि की भीख माँगा करते हैं। ये लोग बिना परिश्रम के बड़े कार्य सिद्ध कर लेना चाहते हैं। ये लोग फल प्राप्ति के लिए जड़ को सींचना नहीं चाहते। आशीर्वाद वरदान चाहने वाले लोग इसी वर्ग में रखे जा सकते हैं ऐसे लोगों को जान लेना चाहिए कि मनोयोगपूर्वक किये गये श्रम से बढ़कर सिद्धि प्रदायक अन्य कोई देवता नहीं। यदि सफलता चाहते हो तो श्रम करना ही होगा।
मानव की बाहुओं में निवास करने वाला श्रम देव अत्यन्त शक्तिशाली तथा उदार है। वह कभी निरर्थक नहीं जाता। छोटे-से-छोटे साधन वाला व्यक्ति भी यदि अपनी उन्नति हेतु कोई निश्चित कार्यक्रम बनाकर अपनी सम्पूर्ण निष्ठा के साथ समय और श्रम की मात्रा बढ़ाता चले तो प्रगति सुनिश्चित है। जहाँ आलस्य है, प्रमाद है, वहाँ जीवन की रसमयी धारा विषाक्त हो जाती है। असफलताओं की ठोकरें मनुष्य की मानसिक स्थिति को तनावपूर्ण बना देती हैं। विवेक नष्ट हो जाता है। जीवन एक भार-सा प्रतीत होने लगता है। ठीक इसके विपरीत मनोयोगपूर्वक कर्म करने वाले व्यक्ति को अपना जीवन स्वर्ग से भी अधिक सुखमय प्रतीत होने लगता है। समय की महत्ता को न समझ कर श्रम से, मेहनत से जो कतराता है, वह स्वयं अपना ही शत्रु है। जिस व्यक्ति के मन प्राण में आलस रूपी जहर घुस गया उसका तो ईश्वर ही रक्षक है। उसने अपनी बर्बादी के साज-समान स्वयं इकट्ठे कर लिए। उसके ऊपर कथित साढ़े साती नहीं हमेशा-हमेशा का शनीचर चढ़ेगा और राहु का कुचक्र उसके मस्तक पर सदैव मंडराता रहेगा।
हमें यह जानना चाहिए कि सबसे बड़ा सिद्ध मन्त्र सुनिश्चित क्रम के संयम, श्रम और पुरुषार्थ का उपयोग ही है। इस मन्त्र को जिन्होंने जीवन में उतारा है उन्हें सफलता कभी दूर नहीं दिखाई दी और वे बड़ी सरलता से अपना उद्देश्य प्राप्त कर अग्रसर होते रहे।
हमें सुख-शान्ति, सन्तोष प्राप्त करना है तो खोजना होगा कि दूसरे सफल लोगों की सफलता का क्या रहस्य रहा है? क्या उनके शरीर की बनावट भिन्न थी? क्या उनकी परिस्थितियाँ भिन्न थीं? या हमारे और उनके दृष्टिकोण में अन्तर है। जहाँ तक शरीर का प्रश्न है परम-पिता परमेश्वर ने अपने सभी पुत्रों को समान अंग प्रदान किये हैं। परिस्थितियों के विषय में सोचें तो पायेंगे कि वे सफल व्यक्ति भी इसी समाज में रहते हैं जिसमें हम रह रहे हैं। मात्र हमारा और उनका सोचने का दृष्टिकोण भिन्न है। उन्होंने श्रम से जी चुराने की बात कभी नहीं सोची और हम श्रम से बचने के रास्ते ढूँढ़ने में ही अपना समय गुजार देते हैं। वे श्रम के साथ मनोयोग का समन्वय कर लेते हैं जबकि हममें लगन तथा निष्ठा का पूर्ण अभाव है। बस यही उनकी सफलता और सामान्यजन की असफलता का भेद है। ईश्वर ने हमें शरीर दिया है, मन दिया है। इतनी अनमोल वस्तुएँ हमें प्राप्त हैं। किन्तु इनका लाभ भी वे ही उठा सकते हैं जो सुव्यवस्थित क्रम से श्रम करते हुए अपने समय का एक पल भी नहीं गंवाते।
निष्ठा, लगन और दिलचस्पी से जो भी कार्य किया जावेगा उसकी सफलता निश्चित है। जिन लोगों को अपने कार्यों में सफलता की आकाँक्षा हो उन्हें यही पथ अपनाना चाहिए। गौरव और सफलता अर्जित करने वाले व्यक्ति इसी रास्ते आगे बढ़े हैं। हमें भी यदि सफलता का गौरव अर्जित करना है तो यही मार्ग अपनाना होगा, परिश्रमी बनना होगा, जीवन के प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना जानना होगा। हम जिस श्रम और मनोयोग से कार्य करेंगे उतनी ही सफलता निश्चित है।
मानस स्टर्न एक विशिष्ट प्रतिभा सम्पन्न चित्रकार के नाते विश्व में प्रख्यात हैं। वे सदैव अपने विद्यार्थियों से कहते-’मॉडल सामने रखकर चित्र बनाने का अभ्यास मत करो। इससे तुम्हारे भीतर का कलाकार जागृत न होगा, मात्र टैक्नीशियन ही जागृत होगा। मॉडल देखते हुए चित्र तो कोई भी अभ्यास से बना सकता है। कला का सृजन तकनीक द्वारा नहीं होता, दृष्टि द्वारा होता है। पहले आप ‘कला-दृष्टि’ जागृत-विकसित कीजिए। ‘देखना’ सीखिए, चित्र बनाने का अभ्यास बाद में कीजिए।
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यह ब्रह्माण्ड गोल है। सूर्य, पृथ्वी, चन्द्रमा आदि सभी ग्रहों-उपग्रहों की बनावट गोल है। घूमते अथवा लुढ़कते रहने वाली हर वस्तु गोल बन जाती है। पहिये गोल ही बन सकते हैं चौकोर नहीं। पहाड़ों से पत्थर के टुकड़े टूट कर नहीं प्रवाह से गिरते और धारा के दबाव से आगे-आगे लुढ़कते हैं फलतः वे गोल बन जाते हैं। अधिक छोटे टुकड़े बालू के कणों के रूप में दिखाई पड़ते हैं, होते वे भी गोल ही हैं। घूमने की प्रक्रिया गोलाई ही हो सकती है।
गोलाई और गति का सम्मिश्रण कर देने पर एक चक्र बन जाता है। पहिया घूमता है-आगे बढ़ता है और बढ़ता-बढ़ता अन्ततः अपने पुराने स्थान पर ही लौट आता है। यदि गति को अनवरत क्रम से जारी रखा जाय तो पदार्थ अपनी जगह पर वापिस लौट आता है और फिर वही आगे बढ़ने और पुराने स्थान पर लौटने का क्रम जारी रहता है। ग्रह-नक्षत्र इसी आधार पर अपनी कक्षाएँ बनाते और उनमें परिभ्रमण करते रहते हैं। परमाणु के अन्तर में काम करने वाले इलेक्ट्रोन आदि घटक अपनी धुरी पर कक्षा में ग्रह-नक्षत्रों की भाँति ही घूमते हैं।
यही बात शब्द कम्पनों के सम्बन्ध में भी है वे जिस उद्गम स्रोत से निस्तृत होते हैं वहाँ से निकल कर द्रुतगति से आगे-आगे भागते हैं, पर यह भागना अन्ततः गोलाई के चक्र की पकड़ में आ जाता है और फिर सुदूर अन्तरिक्ष की लम्बी यात्रा करते हुए अपने मूल स्थान पर लौट आता है। वहाँ से फिर आगे बढ़ता और फिर वापिस लौटता है। यदि हम नाक की सीध आगे ही बढ़ते चले जायं तो अन्त में उसी स्थान पर वापिस आ जायेंगे जहाँ से यात्रा आरम्भ की थी। शब्दों की यात्रा इसी चक्र गति से होती है। वे दूसरों को भी प्रभावित करते हैं, पर सबसे अधिक प्रभाव अपने ही ऊपर होता है क्योंकि उनका प्रत्येक यात्रा चक्र अपने मूल उद्गम को चिरकाल तक प्रभावित करता रहता है जबकि बाहरी व्यक्तियों एवं वस्तुओं को प्रभावित तो वह मुख्यतः एक बार ही करता है।
प्राचीन काल में शब्दबेधी बाण चलते थे, वे लक्ष्य से टकराते थे- लक्ष्यवेध करते थे और फिर लौटकर प्रयोक्ता के तरकस में ही आ घुसते थे। ऐसे अस्त्रों को किम्वदन्ती मानने की आवश्यकता नहीं है। उनका एक भोंड़ा रूप अभी भी अपने जमाने में मौजूद है और उसे आस्ट्रेलियाई आदिवासी प्रयोग करते हैं। उस अस्त्र का नाम है-‘बूमरेंग’। मन्त्राराधन में विशेष शब्द संरचना के आधार पर बने और विशेष मनःस्थिति में-विशेष विधि-विधान के साथ जिस शब्दावली को अनवरत रूप से दुहराया जाता है वह निखिल ब्रह्माण्ड में भ्रमण करते हुए मूल प्रयोक्ता के पास वापिस लौट आती है और उसके लिए अति महत्वपूर्ण सत्परिणाम उत्पन्न करती है।
मन्त्र विज्ञान के दो आधार हैं। एक आत्मिक दूसरा मौलिक इन दोनों के समन्वय से मन्त्र प्रक्रिया का आधार बनता है।
आत्मिक पक्ष वह है जिसमें साधक का चारित्रिक एवं भावनात्मक परिष्कार काम करता है उससे व्यक्तित्व की उत्कृष्टता निखरती है और शक्ति का ऐसा प्रचण्ड स्रोत अन्तः चेतना में प्रादुर्भूत होता है, जिसे किसी भी दिशा में किसी भी प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया जा सके। परिष्कृत व्यक्तित्व की पूँजी से ही आत्मिक क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की विभूतियाँ उपलब्ध होती हैं और उन्हीं को भौतिक कार्यों में लगा देने पर साँसारिक सफलताएं हाथ बाँध कर आगे आ खड़ी होती हैं। ओछे व्यक्तित्व पग-पग पर ठोकरें खाते और दीन-दरिद्रों की तरह निरन्तर असफलताओं का मुँह जोहते हैं। उन्हें न भौतिक उन्नति का अवसर मिलता है और न आत्मिक प्रगति की दिशा में आगे बढ़ सकना सम्भव होता है। नैपोलियन, सिकन्दर जैसे साँसारिक सफलताएँ पाने वाले मनस्वी लोगों के पास उनके व्यक्तित्व की प्रखरता ही होती है।
साधन क्षेत्र में अग्रसर होने वाले के लिए यह आवश्यक होता है कि वह अपने शारीरिक और मानसिक क्षेत्र में आवश्यक संयम बरत कर बिखराव में नष्ट होने वाली शक्तियों का संचय करते हुए सामर्थ्यवान बनें। दूसरा पक्ष व्यक्तित्व के विकास का यह है कि गुण, कर्म, स्वभाव को अधिकाधिक उच्चस्तरीय बनाते हुए स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर में अवस्थित विभिन्न दिव्य शक्तियों को सुविकसित एवं परिपुष्ट होने का अवसर प्रदान करें। संचय और संग्रह के उभय-पक्षीय कदम बढ़ाते हुए आत्मिक प्रगति के पथ पर चलने वाला पथिक क्रमशः समुन्नत व्यक्तित्व प्राप्त करता है और उस आधार पर ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग किसी भी दिशा में आशाजनक सफलता प्राप्त कर सकना सम्भव हो जाता है। मन्त्राराधन की सफलता का आत्मिक स्रोत एवं पक्ष भी यही है।
मन्त्र साधना का भौतिक पक्ष शब्द संरचना-स्वर विनियोग-उपचार विधान एवं उपकरणों का स्तर जैसी व्यवस्थाओं से सम्बन्धित है। इन सब का सही आधार बन जाने से आत्मिक प्रगति के उत्तरार्ध की पूर्ति होती है। उभय-पक्षीय समन्वय से आत्मिक प्रगति का वह आधार खड़ा होता है जो अन्तःचेतना का स्तर ऊँचा उठाकर भौतिक क्षेत्र में बहुमुखी सुलताएँडडडडड प्रस्तुत कर सके।
मात्र आत्मिक सन्तोष के लिए ज्ञान और भक्तियोग की साधनाओं से भी काम चल सकता है। ब्रह्म-विद्या के मान्य तत्वदर्शन को स्वाध्याय, सत्संग एवं मनः चिन्तन के आधार पर हृदयंगम किया जाता रहे तो आत्मबोध की स्थिति उत्पन्न हो सकती है और ज्ञान वैराग्य का प्रकाश अन्तरात्मा में परिलक्षित हो सकता है। वेदान्त साधनाओं की अहं-ब्रह्मादिकपरक-सोऽहम् शिवोऽहम् की उद्बोधक वृत्ति ज्ञानयोग का प्रयोजन पूरा कर सकती है। उसे आत्मबोध की स्थिति जागृत करने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।
भक्तियोग में प्रेम तत्व को विकसित करके आनन्द की अनुभूति का रसास्वादन है। अपने को जिसमें समर्पित किया जाता है या जिसको अपना बनाया जाता है उसमें सहज ही आकर्षण उत्पन्न हो जाता है और उस आकर्षण को आत्मसात् करते हुए आनन्द की अनुभूति होती है। दैनिक जीवन में यही चलता है। अपनी सम्पत्ति प्राण प्रिय लगती है। अपना शरीर, परिवार, यश, वैभव, वर्चस्व यह सब कुछ इसलिए प्यारा लगता है कि उसके साथ अपनेपन की भावना जुड़ जाती है। स्त्री, पुत्रों में यह भावना अधिक घनिष्ठ होती है तो वे प्यारे भी अधिक लगते हैं जिस वस्तु या व्यक्ति पर से यह आत्मभाव समेट लिया जाय वह उतना ही अरुचिकर, उपेक्षित बन जायगा। भले ही वह स्तर की दृष्टि से उत्तम ही क्यों न हो। इसके विपरीत जो वस्तु या व्यक्ति जितना अधिक अपनेपन की पकड़ में कसा जायेगा वह गुणहीन होने पर भी परमप्रिय लगता चला जायेगा। प्रिय में आनन्द होता है यह सभी जानते हैं। प्रिय क्या है उसका विश्लेषण करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि प्रिय-अप्रिय नाम के कोई तत्व इस संसार में नहीं मात्र अपनेपन और विरानेपन की ही वे दोनों प्रतिक्रियाएँ भर हैं।
ईश्वर महान् है-सद्गुण सम्पन्न-शक्ति का स्रोत और आत्मा का उद्गम केन्द्र है। उससे प्रेम करने लगे तो ईश्वर को इससे कोई लाभ हो या न हो अपने अन्तःकरण में प्रेम तत्व की अभिवृद्धि होती है। आग जहाँ रहती है उस स्थान की जगह गरम रहती है। प्रेम तत्व जहाँ रहेगा वहाँ अनायास ही आनन्द का निर्झर झरता रहेगा। ईश्वर के माध्यम से प्रेम तत्व को अन्तरात्मा में उसी प्रकार विकसित किया जाता है जिस प्रकार व्यायामशाला और उसमें उपस्थित विभिन्न उपकरणों की सहायता से शरीर की माँसपेशियां परिपुष्ट की जाती हैं। विकसित प्रेम तत्व अपने शरीर, मन, परिवार और समाज पर जब आलोकित होता है तब वे सभी प्रेम पात्र लगते और आनन्द प्रदान करते हैं। प्रेम में देना ही देना है-अन्तरात्मा जहाँ भी हुलसती है वहीं कुछ देने के लिए मचलती है। प्रेमी व्यक्ति अपने समूचे सम्पर्क क्षेत्र में कुछ अनुदान प्रस्तुत करते रहने की ही बात सोचता है। फलतः वह सदा सर्वदा सेवा सहायता के लिए प्रयत्नशील रहता है। कहना न होगा कि उदारता सदा अनेक गुनी श्रद्धा सद्भावना और सहायता लेकर वापिस लौटती है। ईश्वर के माध्यम से विकसित हुआ भक्तियोग किसी काल्पनिक प्रतिमा के इर्द-गिर्द ही नहीं घूमता रहता, वह वहाँ प्रयोगशाला में विकसित होकर समूचे जीवन क्षेत्र को आच्छादित करता है और हर घड़ी अन्तःकरण को आनन्द विभोर बनाये रहता है।
ज्ञानयोग और भक्तियोग बिना सामान्य क्रियाकाण्ड के सहारे, मात्र भाव संवेदना के सहारे विकसित होते रहते हैं। बाह्य साधनों की उनमें कम सहायता लेनी पड़ती है। यह सरलता रहते हुए भी यह दोनों ही क्षेत्र अपनेपन की छोटी सीमा तक ही सीमित रहते हैं। ज्ञानी और भक्त प्रायः अपने आप में ही खोये रहते हैं अस्तु उनके लाभ भी स्वर्ग मुक्ति, आत्मा-साक्षात्कार-ब्रह्म साक्षात्कार जैसी व्यक्तिगत परिधि में अपना प्रभाव उत्पन्न कर पाते हैं
कर्मयोग की महिमा अत्यधिक बताई गई है और उसे सर्वोपयोगी कहा गया है। कर्म अपने आपके लिए भी होते हैं, पर वे नित्यकर्म कहलाते हैं। दूसरों को साथ लेकर चलने वाले, दूसरों को प्रभावित करने वाले-सत्कर्म कर्मयोग की परिधि में गिने जाते हैं। गीता कर्मयोग का प्रधान ग्रन्थ है। अन्यत्र भी कर्मयोग की महिमा है। ज्ञानी और भक्त भी कर्मयोग के सहारे ही जीवन यात्रा सम्पन्न करते हैं। उसमें व्यक्ति और समान का उभय पक्षीय हित साधन होता है। उसके लिए एकान्त तलाश काने या एकाकी रहने की आवश्यकता नहीं होती। सामूहिकता का निर्वाह कर्मयोग में ही होता है। उससे व्यक्ति और समाज को समान रूप से लाभान्वित होने का अवसर मिलता है।
मन्त्राराधन कर्मयोग की ही प्रक्रिया है। उसकी क्रिया-प्रक्रिया में भौतिक और आत्मिक तत्व समान रूप से मिले हुए हैं। भावात्मक विकास की योगसाधना और चारित्रिक परिष्कार की तपश्चर्या व्यक्तित्व को निखारने के लिए है। यह विशुद्ध अध्यात्म पक्ष हुआ। दूसरा पक्ष भौतिक है, जिस के शब्द और स्वर दोनों ऐसे हैं जिन्हें पंच-तत्वों से बने शरीर अवयवों की प्रतिक्रिया कह सकते हैं। शब्द मूलतः पदार्थ है। उसे रेंगने, धकेलने और प्रभावी बनाने में आत्मशक्ति का उपयोग होता है, पर स्वतः शब्द तो भौतिक हलचलों से उत्पन्न, भौतिक उपकरणों से नापा तोला जा सकने वाला पदार्थ मात्र है। स्वर भी शब्द का ही एक प्रकार है। दोनों की गणना भौतिक विज्ञान की परिधि में ही की जाती है। पूजा उपचार में प्रयुक्त होने वाले पदार्थ स्पष्टतः भौतिक हैं। देव प्रतिमा-पूजा उपकरण एवं पदार्थ-चन्दन, धूप, अक्षत, जल, हवन सामग्री आदि की गणना इसी क्षेत्र से है। साधन का स्थान, आहार, वस्त्र आदि भी भौतिक पदार्थों से ही विनिर्मित हैं।
मन्त्राराधन में प्रयुक्त होने वाले साधनों में साधक की भावनात्मक स्थिति आध्यात्मिक और शारीरिक एवं उपचारात्मक सामग्री भौतिक है। अस्तु उसे समन्वित प्रक्रिया कह सकते हैं। इसे आधी अध्यात्मिक और आधी भौतिक कहा जाय तो समझने में सुविधा ही रहेगी। परिणाम की दृष्टि से भी वह दोनों ही क्षेत्रों को प्रभावित करती है। उससे साधक का आत्मबल बढ़ना सुनिश्चित है। साथ ही जो प्रखरता, प्रतिभा उत्पन्न होती है उसके लोक व्यवहार के क्षेत्र में बहुमुखी प्रगति की सम्भावनाएँ विकसित होती हैं। इस प्रकार व्यक्तिगत जीवन के अन्तरंग और बहिरंग दोनों क्षेत्रों को मन्त्राराधन की प्रक्रिया प्रभावित करती है।
मन्त्र-विज्ञान की प्रतिक्रिया व्यक्तियों के उलझने-सुलझने और प्रगति की सम्भावनाएँ बढ़ाने में सहायक होती है। उसके सहारे कई कष्ट पीड़ितों को सहारा दिया जा सकता है और लड़खड़ाने वालों को तन कर खड़ा होने योग्य बनाया जा सकता है। इसी प्रकार प्रकृति को, वस्तुओं को, परिस्थितियों को, वातावरण को प्रभावित करने की क्षमता भी इस उपचार में विद्यमान है। मन्त्र से उत्पन्न शक्ति से सूक्ष्म जगत की हलचलों को स्थूल जगत के लिए उपयोगी और अनुकूल बनाया जा सकता है।
इसी महत्ता को ध्यान में रखते हुए भौतिक प्रगति के लिए किये जाने वाले अनेकानेक प्रयत्न पुरुषार्थों की तरह आत्मिक प्रगति के लिए अति महत्वपूर्ण उपाय-उपचार मन्त्राराधन बताया गया है। यदि उसे सही व्यक्तियों द्वारा सही रीति से कार्यान्वित किया जा सके तो परिणाम वैसा हो सकता है, जिसके आधार पर उसे बुद्धिमत्तापूर्ण एवं अतीव श्रेयस्कर प्रक्रिया के रूप में स्वीकार कर सकना किसी के लिए भी कठिन न पड़े।
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अपनों से अपनी बात
(पू. गुरुदेव का अपने निराहार उपवास के सन्दर्भ में विशेष सन्देश)
यह अंक पाठकों के हाथ में पहुँचने तक हमारा 24 दिन का जल-उपवास तथा विशिष्ट तप-साधना का क्रम पूर्ण हो चुका होगा। जिन दिनों यह पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं उन दिनों वह चल रहा है। यह साधना विशुद्ध व्यक्तिगत एवं आध्यात्मिक है। इसके पीछे न तो कोई आग्रह था और न उत्तेजना उत्पन्न करना। यह शक्ति-सम्पादन एवं आत्म-शोधन के अभिप्राय से किया गया एवं विशुद्ध धर्मानुष्ठान कहा जा सकता है। तो भी उसके कुछ पक्ष ऐसे हैं जिनसे सर्वसाधारण को, विशेषतया अखण्ड-ज्योति के परिजनों को अवगत होना ही चाहिए। यह आवश्यकता न समझी गई होती तो सम्भवतः उसे गोपनीय और नितान्त व्यक्तिगत ही रखा गया होता, जैसी कि हमारी अन्यान्य कठिन तप-साधनाएँ समय-समय पर होती रहीं हैं और होती रहेंगी।
उपवास का दूसरा कारण शेष जीवन की अति स्वल्प अवधि में अत्यधिक महत्वपूर्ण उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिए आवश्यक शक्ति सम्पादित करना है। आयुष्य ने शरीर पर प्रभाव डाला है और वृद्धावस्था ने उस क्षमता का अपहरण कर लिया है जो युवावस्था में थी। इतने पर भी काम का दबाव पहले की अपेक्षा कई गुना बढ़ गया है। साथ ही समय की कमी और काम की विशालता को देखते हुए निपटाने की जल्दी भी है। विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय की ऐसी आधारशिला हमें खड़ी करनी है, जो अगले बुद्धिमानी युग में तर्क, तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर जन-मानस को आत्मा के स्वरूप और लक्ष्य के प्रति आस्थावान बनाये रह सके। दूसरा कार्य है यज्ञ विद्या का पुनर्जीवन और उसके आधार पर मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं का समाधान। तीसरा, कार्य है सभी प्रमुख धर्मों को एक दूसरे का पूरक सहगामी एवं एक ही लक्ष्य की दिशा में चलने वाले पथिकों की स्थिति में ला खड़ा करना। उनके संकीर्णतावादी तत्वों को मानवी एकता एवं गरिमा के लिए प्रयत्नरत बना देना। यह तीनों ही कार्य गहरे शोध प्रयासों की अपेक्षा करते हैं। मात्र प्रतिपादन ही नहीं उनका प्रचलन भी तो करना है। ऐसी दशा में कार्य भार और भी अधिक गुरुतर हो जाता है॥ कम समय में अधिक भारी काम निपटाने में कितनी अधिक शक्ति लगती है, कितना सन्तुलन बनाये रहना और कितने साधन जुटाना अभीष्ट होता है, इसे भुक्तभोगी ही जानते हैं। अपनी स्थिति भी ठीक ऐसी ही है।
इतनी महत्वपूर्ण क्षमताएँ तपश्चर्या के अतिरिक्त और किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सकतीं। भौतिक साधन तो मन से, बुद्धि से, प्रतिभा से, संगठन से भी जुटाये जा सकते हैं, पर आन्तरिक बल तो तप-साधना के बिना और किसी प्रकार मिलता नहीं है। भागीरथ का गंगावतरण, विश्वामित्र का नवयुग प्रवर्तन, पार्वती का शिव वरण, परशुराम का कुठार, अगस्त का समुद्र शोषण, ध्रुव का ब्रह्माण्ड केन्द्र पद, दधीचि का अस्थि वज्र, तपश्चर्या के ही परिणाम थे। सृष्टि सृजन के लिए ब्रह्माजी का कमल पुष्प पर-सम्वर्धन पोषण के लिए विष्णु का शेषासन पर सन्तुलन, परिवर्तन के लिए शिव की श्मशान साधना के पौराणिक उपाख्यान सर्वविदित हैं।
सप्त ऋषियों से लेकर अन्यान्य महामानवों ने आत्मिक शक्ति का अर्जन तप-साधना से ही किया था। शृंगी ऋषि ने दशरथ का पुत्र वरदान और परीक्षित को अकाट्य शाप देकर तप की शक्ति का परिचय दिया था। ऐसे असंख्यों पुराण उपाख्यान तप द्वारा उत्पन्न शक्ति का प्रतिपादन करते हैं। भगवान् बुद्ध योगी अरविन्द जैसे अनेकों तपस्वी अपने तपोबल से युग समस्याओं के समाधान में प्रत्यक्ष या परोक्ष योगदान देते रहे हैं। जिसके मार्ग-दर्शन में हमारा जीवन प्रवाह बहता आया है वह महामानव भी तप के आधार पर ही सिद्ध समर्थ बना है। उसने हमें आरम्भ से ही अपने अनुकरण का संकेत किया और जितनी सामर्थ्य देखी उतना उँगली पकड़ कर चलाया। 24 महापुराणों से लेकर बार-बार हिमालय की एकान्त साधनाओं का समय-समय पर विशिष्ट तपश्चर्याओं का सिलसिला किसी न किसी प्रकार-किसी न किसी रूप में चलता ही रहा है। आत्म-परिष्कार और लोक-कल्याण की दिशा में यदि कुछ बन पड़ा तो उसे बुद्धि का, साधनों का, परिस्थितियों का, सहयोग सम्पादन का नहीं, मात्र तप शक्ति का नगण्य-सा चमत्कार ही मानना चाहिए।
गत मास की 24 दिवसीय जल-उपवास सहित विशेष तप-साधना उसी जीवन नीति का एक छोटा-सा अवसर कहा जा सकता है। नये उत्तरदायित्वों के निर्वाह के लिए अभीष्ट शक्ति प्राप्त करने के लिए उसे सामयिक एवं सामान्य प्रयास ही समझा जाना चाहिए। उसमें न तो कोई आश्चर्य की बात है और न अनोखी, न अटपटी। आवश्यकतानुसार आगे भी ऐसे ही या उससे भी बड़े-छोटे फिर कभी कोई अनुष्ठान हों और उनकी जानकारी संयोगवश किन्हीं को मिल जाय तो इससे परिजनों में से किसी को भी असमंजस में नहीं पड़ना चाहिए, वरन् उसके सत्परिणामों की आशा भरी दृष्टि से अपेक्षा करनी चाहिए। मार्गदर्शक शक्ति, सदा से कठिन प्रसंगों में हमारी सहायता करती रही है और वही अभी भी आगे कभी जब तक अपना वरद्हस्त हमारे सिर पर रखे हैं तब तक किसी अकल्याणकारी अनिष्ट की आशंका नहीं की जानी चाहिए।
प्रस्तुत उपवास के उपरोक्त दो आधार ऐसे हैं जिनका उद्देश्य लोक-कल्याण होते हुए भी समझने की दृष्टि से उन्हें व्यक्तिगत भी कहा जा सकता है। क्योंकि उनका समाज पर प्रत्यक्ष कम और परोक्ष प्रभाव अधिक है। मूल्याँकन तो प्रत्यक्ष का ही किया जाता है, इसलिए परोक्ष को व्यक्तिगत कहने की परम्परा है। योग-साधनाएँ आमतौर से व्यक्तिगत समझी जाती हैं। यद्यपि उनका प्रभाव समष्टिगत भी होता है। जो हो यह गत उपवास का ऐसा पूर्वार्ध है जिसके सम्बन्ध में परिजनों को अधिक तो नहीं, पर इतना तो प्रभाव ग्रहण करना ही चाहिए कि आत्म-परिष्कार के लिए-आत्मबल सम्वर्धन के लिए अपनी सामर्थ्यानुसार तप-साधना की दिशा में उन्मुख रहने का प्रयत्न करना हर किसी के लिए श्रेयस्कर हो सकता है। प्रयास के अनुपात और स्तर के अनुरूप हर किसी को उस मार्ग पर चलने में न्यूनाधिक लाभ प्राप्त करने का सुअवसर मिल सकता है।
उपवास का तीसरा कारण विशुद्ध रूप से अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों से सम्बन्धित है। मनोरंजन के लिए इस पत्रिका को कदाचित ही कोई मंगाता हो। जो पढ़ते हैं वे अनुभव करते हैं कि यह उनके अपने विचार हैं अथवा उन्हीं के व्यक्तिगत पत्र के रूप में लिखे गये हैं। लेखकों और पाठकों के बीच कदाचित ही कभी कोई सघन सम्बन्ध बनता हो, पर हम लोगों की स्थिति भिन्न है। अखण्ड-ज्योति की पंक्तियाँ बुद्धि को नहीं, हृदय को छूती हैं और यह स्पर्श सघन आत्मीयता के रूप में विकसित होता चला जाता है। कारण स्पष्ट है, हम लोग चिर अतीत से परस्पर एक विशिष्ट शृंखला में बँधे चले आये हैं और स्थान की दृष्टि से दूर रहते हुए भी हम लोग अति निकटवर्ती जैसी मनःस्थिति में रहते हैं।
युग-परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर कुछ महत्वपूर्ण व्यक्ति अग्रिम भूमिका निभाते हैं, पर उनके पीछे एक दिव्य समुदाय पहले से ही किसी अदृश्य सूत्र शृंखला में बँधा आता है और उसी के समन्वित प्रयासों से महत्वपूर्ण परिवर्तन प्रस्तुत होते हैं। राम के साथ रीछ, वानरों की भूमिका रही। कृष्ण के गोवर्धन उठाने में गोप-बालकों का और महाभारत में पाण्डवों का योगदान रहा। बुद्ध की भिक्षु मण्डली में लाखों नर-नारी थे। गाँधी के सत्याग्रहियों की सेना का परिचय सभी को है। समय की महत्वपूर्ण भूमिका पूरी करने के लिए ऐसी ही सामूहिक शक्तियाँ अवतरित होती हैं, भले ही उसके नेतृत्व का श्रेय किसी को भी मिले।
अपना विशिष्ट समय है। इन्हीं क्षणों मानव जाति के भविष्य का भला या बुरा फैसला होने जा रहा है। या तो मनुष्य जाति को युद्ध विभीषिका, बढ़ती जनसंख्या एवं निकट स्तर की आपाधापी में उलझ कर सामूहिक आत्महत्या करनी पड़ेगी या फिर लोक-एकता, समता, ममता, शुचिता जैसे उच्च आदर्शों को अपनाकर मनुष्य में देवत्व के अवतरण और धरती पर स्वर्ग के वातावरण का आनन्द लेंगे। इन निर्णायक घड़ियों में विशिष्ट आत्माओं को विशिष्ट परिश्रम करना पड़ेगा- विशेष कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्व निभाना होगा। इतने बड़े कार्य अनायास ही नहीं हो जाते। उसके लिए जन-मानस का प्रखर मार्ग-दर्शन करने के लिए जागृत आत्माओं को वाणी से नहीं अपने अनुकरणीय आचरण प्रस्तुत करने होते हैं। अखण्ड-ज्योति परिजनों से ऐसी ही अपेक्षा की जा सकती है। उन्हें युग-परिवर्तन की इस विशिष्ट वेला में अपनी जीवन नीति इस प्रकार प्रस्तुत करनी चाहिए जो जनसामान्य के लिए अनुकरणीय बन सके।
हम बारीकी से इस सन्दर्भ में तीखी दृष्टि परिजनों पर डालते रहते हैं। कथनी नहीं करनी से ही किसी का मूल्याँकन होता है। इस दृष्टि से अपने परिजन हमारी अपेक्षा, आकाँक्षा के अनुरूप वजनदार नहीं बैठते तो वह हलकापन हमें अखरता है। पेट और प्रजनन में तो नर-कीटक भी लगे रहते हैं। लोभ और मोहग्रसित आपा-धापी में नर-पशुओं को भी प्रवृत्त देखा जा सकता है। वासना, तृष्णा से प्रेरित नर-वानरों के क्रीड़ा-कौतुक तो पिछड़े क्षेत्रों में भी देखे जा सकते हैं। हम भी उसी स्तर की इच्छा और क्रिया अपनायें रहें तो फिर विशिष्ट समय में विशेष उत्तरदायित्व निभाने के लिए भेजी गई विशेष-आत्माओं का अवतरण ही निरर्थक हो गया। यह कैसी कष्टकर स्थिति है।
परिजनों से हमारी अपेक्षा रही है कि वे वित्तेषणा, पुत्रेषणा, लोकेषणा के दल-दल से अपने को निकालें। सुविस्तृत परिवार पर जब इस दृष्टि से नजर डालते हैं तो सन्तोष स्वल्प और असन्तोष बड़े परिमाण में सामने आ खड़ा होता है। दूसरों की दृष्टि में युग-निर्माण परिवार के सदस्य नव-निर्माण की मूक साधना में अत्यन्त निष्ठापूर्वक संलग्न रहकर मानवी आदर्शों का अभिवर्धन करने वाले, रचनात्मक कार्यों में कीर्तिमान स्थापित करते हुए कहे जाते हैं। किसी हद तक यह मूल्याँकन सही भी है। पर इतने से हमें तो सन्तोष नहीं होता। हमें अधिक चाहिए। परिजनों की जीवन विद्या प्रकाशपूर्ण, अनुकरणीय और प्रेरणाप्रद बन सके, यही अपनी अपेक्षा है। इससे कम में युग की पुकार को पूरा कर सकने वाले प्रयास बन ही नहीं पड़ेंगे। ज्यों-ज्यों कुछ आधा-अधूरा, काना-कुबड़ा चलता भी रहा तो उतने से कितनी देर में-क्या कुछ बन पड़ेगा ?
अपने परिवार में बुद्धिमानों की, भावनाशीलों की, प्रतिभावानों की, साधना सम्पन्नों की कमी नहीं। पर देखते हैं कि उत्कृष्टता को व्यवहार में उतारने के लिए जिस साहस की आवश्यकता है उसे वे जुटा नहीं पाते। सोचते बहुत हैं, पर करने का समय आता है तो बगलें झाँकने लगते हैं। यदि ऐसा न होता तो अब तक अपने ही परिवार में से इतनी प्रतिभाएँ निकल पड़तीं जो कम से कम भारत भूमि को नर-रत्नों की खदान होने का श्रेय पुनः दिला देतीं। व्यस्तता, अभावग्रस्तता, उलझन, अड़चन आदि के बहाने उपहासास्पद हैं। वे उन्हीं कार्यों के लिए प्रयुक्त होते हैं जिन्हें निरर्थक समझा जाता है। जो महत्वपूर्ण समझा जाता है उसे सदा प्रमुखता मिलती है और समय, साधन, मनोयोग आदि जो कुछ पास है सब उसी में लग जाता है। यदि युग पुकार को-जीवनोद्देश्य को महत्व दिया गया होता तो किसी को भी वैसी बहाने-बाजी न करनी पड़ती जैसी कि असमर्थता सिद्ध करने के लिए आमतौर से कही या गढ़ी जाती है। इससे आत्म-प्रवंचना के अतिरिक्त और कुछ बनता नहीं। जिन्हें कुछ करने की उत्कट अभिलाषा होती है वे उसके लिए कठिनतम परिस्थितियों के बीच रहते हुए भी इतना कुछ कर सकते हैं जितना साधन सम्पन्नों से भी नहीं बन पड़ता।
दो-पाँच मालाएँ उलटी-पुलटी घुमाकर-समस्त संकट दूर होने से लेकर प्रचुर धन सम्पदा मिलने तक की ऋद्धि-सिद्धियों में कमी पड़ने की शिकायतें तो आये दिन सुनने को मिलती हैं, पर यह बताने कोई नहीं आता कि उपासना बीज को खाद, पानी देने वाली जीवन-साधना में कोई रुचि है या नहीं। साधना के अविच्छिन्न अंग स्वाध्याय, संयम और सेवा की ओर भी ध्यान दिया गया है या नहीं। शिष्य होने का दावा करते और जिह्वाग्र भाग से गुरुदेव कहते तो कितने ही सुने जाते हैं, पर अपने परिवार में प्रवेश करने की पहली और अनिवार्य शर्त न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान-यज्ञ के लिए निकालते रहने को कितने लोग पालन करते हैं, यह जाँचने पर भारी निराशा होती है। लगता है कर्मनिष्ठा का युग लद गया और वाचालता ने उसका स्थान हथिया लिया है। परिजनों ने यदि स्वार्थ परमार्थ का समन्वय किया होता तो निश्चय ही वे व्यक्तिगत लोभ, मोह के लिए जितनी भाग दौड़ करते और चिन्तित रहते हैं उतना ही उत्साह लोक-निर्माण के क्रिया-कलापों में भी प्रस्तुत करते। ढेरों समय आवारागर्दी और आलस्य में गुजर जाता है, उतना यदि नव-निर्माण प्रयोजनों में लग सका होता तो जीवन का स्वरूप ही दूसरा होता। विलासिता, फिजूलखर्ची और जमाखोरी में लगने वाले पैसे का उपयोग यदि रचनात्मक प्रवृत्तियों के परिपोषण में लग सका होता तो अपना छोटा-सा परिवार ही राष्ट्र की महती समस्याओं को सुलझा सकने के उपयुक्त साधन अपने घर से अपने ही हाथों जुटा सकते थे।
इन दिनों जन-मानस पर छाई हुई दुर्बुद्धि जीवन के हर क्षेत्र को बुरी तरह संकटापन्न बना रही है। स्वास्थ्य, सन्तुलन, परिवार, अर्थ-उपयोग, पारस्परिक सद्भाव, समाज, राष्ट्र, धर्म, अध्यात्म जैसे किसी भी क्षेत्र को उसने विकृतिग्रस्त बनाने से अछूता छोड़ा नहीं है। फलतः बाहर ठाठ-बाट बढ़ जाने पर भी सर्वत्र खोखलापन और अधःपतन ही दृष्टिगोचर हो रहा है। विश्व की विभिन्न समस्याओं की जड़ में यह विकृत बुद्धि ही काम कर रही है। हमें अपने युग के इसी असुर से लोहा लेना है। यह अदृश्य दानव भूतकाल के रावण, कंस, हिरण्यकश्यप, वृत्रासुर, महिषासुर आदि सभी से बढ़ा-चढ़ा है। उनने थोड़े से क्षेत्र को ही प्रभावित किया था, इसने मनुष्य जाति के अधिकाँश सदस्यों को जकड़ लिया है। बात भलमनसाहत की भी खूब चलती है, पर भीतर ही भीतर जो पकता है उसकी दुर्गन्ध से नाक सड़ने लगती है। यदि मनुष्य जाति के भविष्य को बचाना है तो अवाँछनीयता, अनैतिकता, मूढ़ता और दुष्टता से पग-पग पर लोहा लेना पड़ेगा। ज्ञान-यज्ञ का, विचार क्रान्ति अभियान का, युग-निर्माण योजना का, युगान्तर चेतना का अवतरण इसी प्रयोजन के लिए हुआ है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण प्रत्यक्ष देखने के लिए हमारे प्रयास चल रहें हैं। यह सार्वभौम और सर्वजनीन प्रयास है। उथली राजनीति वर्गगत, फलगत, क्षुद्र प्रयोजनों से हमारा दूर का भी नाता नहीं है। हमें दूरगामी और मानवी चेतना को परिष्कृत करने वाली सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों को बोना, उगाना और परिपुष्ट करना है। इसके लिए अनेकों प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं सुधारात्मक कार्य करने के लिए पड़े हैं। जो हो रहा है उससे अनेकों गुनी सामर्थ्य, साहस और साधन समेट कर आगे बढ़ चलने की आवश्यकता है और यह प्रयास हमीं अग्रदूतों को आगे बढ़कर अपने कन्धों पर उठाना चाहिए।
यह कार्य तभी सम्भव है जब हममें से प्रत्येक अपनी अन्यमनस्कता एवं उपेक्षा पर लज्जित हो और अनुकरणीय आदर्श उपस्थित करने का साहस समेटे। समय दिये बिना-आर्थिक अंशदान के लिए उत्साह सँजोये बिना यह कार्य और किसी तरह हो ही नहीं सकता। धर्म-मंच से लोक-शिक्षण प्रक्रिया के अन्तर्गत बीस सूत्री कार्यक्रम बताये जाते रहे हैं। अन्य सामयिक कार्यक्रमों के लिए पाक्षिक युग-निर्माण योजना में निर्देश एवं समाचार छपते रहते हैं। स्थानीय आवश्यकता एवं अपनी परिस्थिति को देखकर इनमें से कितने ही कार्य हाथ में लिये जा सकते हैं। यह पूछना व्यर्थ है कि आदेश दिया जाय कि हम क्या करें ? अपने घर से आरम्भ करके सार सम्पर्क क्षेत्रों में ज्ञान-घटों की स्थापना और उनका सुसंचालन, झोला पुस्तकालय, चल पुस्तकालय, जन्म-दिन, पर्व संस्कारों के आयोजन, तीर्थयात्रा, शाखा का वार्षिकोत्सव, महिला शाखा की स्थापना जैसे कितने ही कार्य ऐसे हैं जिन्हें आलस्य छोड़ने और थोड़ा उत्साह जुटा लेने से ही तत्काल आरम्भ किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त प्रौढ़ पाठशालाएँ, व्यायामशालाएँ, वृक्षारोपण, पुस्तकालय स्थापना जैसे अनेकों रचनात्मक और दहेज, मृत्युभोज, नशा, जाति और लिंग भेद के नाम पर चलने वाली असमानता, भिक्षा व्यवसाय, आर्थिक भ्रष्टाचार, अनाचार, प्रतिरोध जैसे अनेकों सुधारात्मक काम करने के लिए पड़े हैं। जिन्हें कभी भी कोई भी आरम्भ कर सकता है और अपने साथी जुटा कर इन्हें सफल अभियान का रूप दे सकता है।
प्रश्न कार्यक्रमों के अभाव का नहीं-अन्य लोग उपेक्षा बरतते या गड़बड़ी फैलाते हैं यह शिकायत गढ़ने का नहीं है। बात इतनी भर है कि हम अपना उत्साह जगायें, निष्ठावान बनें और अग्रिम पंक्ति में खड़े दिखाई दें। इंजन चलेगा तो डिब्बे लुढ़कने ही लगेंगे। हमें हर स्थिति का समाना करते हुए अपनी भूमिका इंजन जैसी ही निभानी चाहिए।
यह उपवास उन सब के विरुद्ध-प्यार भरी चेतावनी के साथ किया गया है जो जीवन्त और जागृत होते हुए भी सोने का उपक्रम कर रहे हैं। परिवार में अधिकाँश व्यक्ति ऐसे ही हैं जिनके पास समय, साधन, ज्ञान, प्रभाव, अवसर आदि सब कुछ हैं, पर युग की पुकार और जीवन लक्ष्य की पूर्ति के सम्बन्ध में मूक बधिर होकर बैठे हैं। दो-चार माला सटका लेना या आदर्शवादी बकझक करते रहने से कुछ काम नहीं चलेगा। बात तो श्रम , समय और साधनों के भाव भरे अनुदान प्रस्तुत करने से बनती है। परिजनों से हमें सदा अधिक उत्साहवर्धक सत्प्रयत्नों की सूचना पाने की लालसा रहती है, पर जब निराशा हाथ लगती है तो जी टूटने लगता है और अपने प्रभाव की-आत्मबल की न्यूनता पर खेद होता है। इस खेद को हलका करने के लिए प्रस्तुत उपवास को एक सार्वजनिक घोषणा समझा जा सकता है। उसे परिजनों में से प्रत्येक अपने लिए व्यक्तिगत उद्बोधन, अनुरोध, आग्रह के रूप में ले सकता है और एक झकझोरने वाली चुनौती अनुभव कर सकता है।
उपवास का चौथा चरण भी कम विचारणीय नहीं है। उसी की व्यथा ने हमें इतनी जल्दी अप्रत्याशित रूप में यह कठोर कदम उठाने के लिए विवश कर दिया। अपने हाथों और औजारों की अप्रमाणिकता हमें असह्य है। जिन साथियों की सहायता से हम नव-युग का सृजन करने चले हैं यदि वे ही खोटे सिक्के सिद्ध होंगे तो फिर उस कलात्मक-शिल्प की सुगढ़ता कैसे सम्भव होगी जिसके लिए हमारा सारा जीवन खप गया और रहे बचे क्षण भी उसी में समर्पित हो रहे हैं। यों अपना परिवार बहुत बड़ा है उसके लाखों सदस्य और करोड़ों समर्थक हैं। इतने लोगों में सभी दूध के धुले होंगे ऐसी कल्पना हम नहीं करते। जन-आन्दोलन जब लोकप्रिय होने लगते हैं तब उनमें निहित स्वार्थों की घुसपैठ तीव्र हो जाती है और वे जहाँ भी जगह पाते हैं वहीं छद्म वेश बनाकर जा विराजते हैं और तरह-तरह से घात लगाते हैं। ऐसा प्रायः सभी जन-आन्दोलनों में होता रहता है। रखवाली और सफाई की सतर्कता रखने से इन अवाँछनीय तत्वों को रोका और हटाया जाता है। यही अपने यहाँ भी होता है, होना चाहिए। अधिक कष्ट तो तब होता है जब शिल्पी के औजार हथियार ही टूटने लगते हैं। इन दिनों अपने ही साथियों में से एकाध ने ऐसी दुर्बुद्धि का परिचय दिया जिसकी स्वप्न में भी कल्पना न थी। इससे हमें गहरा आघात लगा। समझाने, उगलवानेडडडड और सुधारने का प्रयत्न निष्फल हुआ तो वह प्रायश्चित अपने ऊपर ओढ़ना पड़ा। इसके अतिरिक्त और कोई चारा शेष रह ही नहीं गया था। हारे हुए कप्तान का कोट-मार्शल होता है-भले ही भूल सैनिकों की रही हो। रेल मन्त्री स्व0 लालबहादुर शास्त्री ने एक रेल दुर्घटना को लेकर अपने पद से इस्तीफा दिया, श्री कृष्णा मेनन को नेफा घटना के सिलसिले में त्याग पत्र देना पड़ा था। अपने साथियों का प्रायश्चित हम करें और दण्ड भुगतें तो यह सर्वथा उचित ही है।
यह तो एक सामयिक प्रसंग हुआ, पर उसका प्रभाव पूरे परिवार और समाज पर चेतावनी के रूप में पड़ना चाहिए। प्रत्येक प्रबुद्ध व्यक्ति की विशेषता, युग-निर्माण परिवार के सदस्यों की दृष्टि अनौचित्य के प्रति अत्यन्त कड़ी रहनी चाहिए। जहाँ भी वह पनपे, सिर उठाये, वहीं उसके असहयोग एवं विरोध प्रदर्शन से लेकर दबाव देने तक की प्रक्रिया उठ खड़ी होनी चाहिए। अनौचित्य के प्रति हममें से प्रत्येक में प्रचण्ड रोष एवं आक्रोश भरा रहना चाहिए। इतनी जागरुकता के बिना दुष्प्रवृत्तियाँ रुक नहीं सकेंगी। छिपाने, समझौता कर लेने से सामयिक निन्दा से तो बचा जा सकता है, पर इससे सड़न का विष भीतर ही भीतर पनपता रहेगा और पूरे अंग को गला कर नष्ट कर देगा। कई व्यक्ति ऐसे प्रसंगों पर उदारता बरतने, भूल जाने और छिपा लेने की वकालत करते और अपने को अधिक सद्भाव सम्पन्न सिद्ध करते देखे गये हैं ऐसे लोगों को समझना चाहिए कि पाप को सहन करते रहने की नीति ने ही संसार में अधर्म को बढ़ाया है। इससे अनीति की रक्षा होती है और खाद-पानी पाकर उसे और भी अधिक परिपुष्ट होने का अवसर मिलता है। बात को गई गुजरी कर देना प्रकारान्तर से उसका समर्थन, परिपोषण और अभिवर्धन करने के समान है। इसमें हानि ही हानि है। पाप के प्रायश्चित में दो शर्तें अनिवार्य रूप से जुड़ी रहती हैं कि हुए अपराध पर सच्चे मन से खेद किया जाय। उन्हें कम से कम ऐसे प्रामाणिक व्यक्तियों के सामने पूरी तरह उगल ही दिया जाय जो उसे इस प्रकटीकरण का दुरुपयोग न करें। साथ ही अपराधी को भविष्य में वैसा न करने की प्रतिज्ञा बहकाने के लिए नहीं ईश्वर को साक्षी देकर सच्चे मन से ही करनी चाहिए। जितना हो सके उस पाप की क्षति-पूर्ति के लिए भी दण्ड रूप में प्रायश्चित करना चाहिए। इतना करने पर पाप का प्रायश्चित हो जाता है। गलती सुधर सकती है।
युग-निर्माण परिवार बढ़ेगा। उसमें अवाँछनीय घटनाएँ भी होती रहेंगी, इतने बड़े समुदाय में एक भी अपूर्ण, अपवित्र व्यक्ति न तो पैदा होगा और न प्रवेश कर सकेगा इसकी अपेक्षा नहीं की जा सकती, पर वह दृष्टि जीवन्त रहनी चाहिए कि श्रद्धा के साथ विवेक कायम रखा जाय। औचित्य का समर्थन करते हुए अनौचित्य की सम्भावना को नजर, अन्दाज न किया जाय। अति श्रद्धा और अति विश्वास भी इस जमाने में जोखिम भरा है। इसलिए नीति समर्थक और अनीति निरोधक दृष्टि सदा पैनी रखी जाय और सड़न पनपने से पहले ही उसकी रोकथाम कर दी जाय।
सड़े टमाटर को फेंक देने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। पके फोड़े का मवाद निकाल दिया जाना चाहिए। सड़े दाँत को उखाड़ने से ही दर्द बन्द होता है। अनौचित्य के प्रति यही नीति अपनाई जानी चाहिए। अनाचार के विरुद्ध हमारा रोष और आक्रोश प्रचण्ड रहना चाहिए और मित्र तथा सम्बन्धी होने पर भी उसके असहयोग एवं प्रतिरोध की गीता में कही गई भगवान की बताई नीति अपनानी चाहिए।
यदि यह दृष्टि जीवन्त रखी जा सके तो मिशन का भविष्य उज्ज्वल बना रहेगा और जन-मानस के परिष्कार का प्रधान हथियार सृजन शिल्पियों का चरित्र-अक्षुण्ण बना रह सकेगा। स्मरण रखा जाय हम चरित्र-निष्ठा और समाज निष्ठा का आन्दोलन करने चले हैं। यह लेखनी या वाणी से नहीं उपदेशकों की व्यक्तिगत चरित्र निष्ठा में से ही सम्भव होगा। उसमें कभी पड़ी तो बकझक, विडंबना भले ही होती रहें, लक्ष्य की दिशा में एक कदम भी बढ़ सकना सम्भव न होगा। हममें से अग्रिम पंक्ति में जो भी खड़े हों उन्हें अपने तथा अपने साथियों के सम्बन्ध में अत्यन्त पैनी दृष्टि रखनी चाहिए कि आदर्शवादी चरित्र-निष्ठा में कहीं कोई कमी तो नहीं आ रही है। यदि आ रही हो तो उसका तत्काल पूरे साहस के साथ उन्मूलन करना चाहिए। यही हमारी स्पष्ट नीति रहनी चाहिए। भविष्य के लिए यह मार्गदर्शन परिजनों के मन में अतीव गहराई के साथ जमा देने की दृष्टि से भी यह उपवास है।
कई शुभ चिन्तकों ने सुझाया कि उस उपवास में से प्रायश्चित वाला कारण हटा दिया जाय। इससे परिवार की निन्दा होगी और विरोधियों को आक्षेप का अवसर मिलेगा। उसका उत्तर उन्हें दिया गया कि सत्य जीवित रहना चाहिए। असत्य और दुराव का आश्रय लेकर ही यदि संगठन को जीवित रहना है, तो अच्छा है वह हमारे सामने ही मर जाय। हमें संस्था संगठन से मोह नहीं आदर्शों से प्यार है। विरोधी हमारी निन्दा करें इससे पहले हम अपनी निन्दा आप कर लें, अपनी सदाशयता और अधिक प्रबल प्रमाण दे सकती है और आपेक्ष करने वालों का मुँह बन्द कर सकते हैं। इसके विरुद्ध यदि गुप-चुप अनर्थ चलते रहे तो बात छिपती तो है नहीं, कानाफूसी के रूप में वह अधिक भयंकर तथा घातक सिद्ध होगी।
कई व्यक्तियों का आग्रह है, किसके विरुद्ध यह प्रायश्चित है यह बताया जाय ? इसका उत्तर भी यही दिया है कि वह व्यक्ति हम स्वयं ही हैं। शरीर का कोई अंग गलती करे तो उसका प्रतिफल जीवात्मा को ही भोगना पड़ता है। हमारे शरीर से जुड़े अवयव ही वे लोग हैं जिनके सहारे हम अपनी गाड़ी धकेलते हैं। उनकी प्रखरता बनाये रहना हमारे लिए सम्भव न हो सका तो यह दोष अपना ही हुआ। ऐसी दशा में वह दोष जिसके विरुद्ध यह उपवास था, अन्ततः हमीं है।
इस सन्दर्भ में अधिक आग्रह करने वालों से दूसरा उत्तर यह देते हैं कि हमारे बाद ‘आप स्वयं’ हैं। आप में अप्रामाणिकता के जितने अंश हैं, उसी अनुपात से उतनी ही मात्रा में यह उपवास आपके विरुद्ध भी है। आप अपने भीतर दृष्टि डालें और उनका परिमार्जन उसी तरह करें जिस तरह कि हम अपनी धुनाई, धुलाई करते हुए लम्बी जीवन यात्रा को मन्थर गति से पूरी करते चले आ रहे हैं। महत्व व्यक्ति का नहीं-नीति का है। हमने इस उपवास से परिवार के पूरे समुदाय को दिशा और चेतावनी दी है कि जो कार्य हम करने चले हैं उसे पूरा करने के लिए पवित्रता, चरित्र-निष्ठा और आदर्शवादिता की नीति को अत्यन्त दृढ़तापूर्वक अपनाया जाना आवश्यक है।
इस बहुद्देशीय उपवास में प्रथम तीन कारण ही मुख्य समझे जायँ। दो सीधे हमसे और हमारे भगवान् से सम्बन्ध रखते हैं। तीसरा समूचे परिवार में आदर्शवादी उत्साह उत्पन्न करने के लिए हैं। पाठक उसी पर सबसे अधिक ध्यान दें और आत्म-चिन्तन करके भविष्य के लिए ऐसी रीति-नीति निर्धारित करें जिससे आत्म-परिष्कार तथा लोक-निर्माण के दोनों तत्व उत्साहवर्धक मात्रा में जुड़े हुए हों। चौथा कारण ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों के विरुद्ध रोष-आक्रोश बनाये रहने और असहयोग प्रतिरोध संजोये रहने की चेतावनी के रूप में है। निर्माण के प्रति उत्साह और ध्वंस के प्रति आक्रोश के समन्वय से ही सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकना सम्भव हो सकता है। प्रस्तुत उपवास अपने उद्देश्य के लिए आवश्यक वातावरण बनाने और परिस्थितियाँ बनाने में सहायक सिद्ध होगा, ऐसी आशा सहज ही की जा सकती है।
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पू. गुरुदेव का विशेष लेख-
संसार में अवाँछनीयता कम और उत्कृष्टता अधिक है। तभी तो यह संसार अब तक जीवित है। यदि पाप अधिक और पुण्य स्वल्प रहा होता तो अब तक यह दुनिया श्मशान बन गई होती। यहाँ सत्य, शिव और सुन्दर इन तीनों में से एक का भी अस्तित्व जीवित न रहा होता। आग दुनिया में बहुत है, पर पानी से अधिक नहीं। इतने पर भी हम देखते हैं कि अनाचार घटता नहीं, बढ़ता ही जाता है। सरकारी प्रयत्न रोकथाम के लिए काफी बढ़ाये गये हैं, पर उनकी पकड़ में दुष्टता की पूँछ भर आती है। सारा कलेवर जो जहाँ का तहाँ जमा बैठा रहता और अपना विस्तार करने में संलग्न रहता है। आश्चर्य इस बात का है कि सज्जनता का स्पष्ट बहुमत होते हुए भी दुष्टता क्यों पनपती और फलती-फूलती चली जाती है? रोकथाम की सर्वजनीन आकाँक्षा क्यों फलवती नहीं होती? असुरता की शक्ति क्यों अजेय बनती जा रही है? देवत्व उसके आगे पराजित होता और हारता, झक मारता क्यों दिखाई देता है?
विचार करने पर स्पष्ट होता है कि पाप-शक्ति स्वल्प है। बलवान चोर घर में घुसे और घर मालिकों में से कुछ स्त्री, बच्चे जग पड़ें-कुत्ते भौंकने लगें तो उन्हें तत्काल उलटे पैरों भागना पड़ता है। स्पष्ट है पाप अत्यन्त दुर्बल होता है प्रकारान्तर से दुर्बलता ही निकृष्टता के रूप में परिणत होती है। सत्य में हजार हाथी के बराबर बल बताया गया हैं। परन्तु उसके हारने और असत्य के मजबूती से पैर जमाये रहने का कुछ तो कारण होना ही चाहिए। वह यह है कि जन-मानस में से उस रोष-आक्रोश का-शौर्य-साहस का अस्तित्व मिटा नहीं तो घट अवश्य गया है, जिसमें अनीति की चुनौती स्वीकार करने की तेजस्विता विद्यमान रहती है। इस कसौटी पर औसत आदमी बड़ा डरपोक, कायर, दब्बू, संकोची, पलायनवादी और कुछ-कुछ वैसा ही बन जाता है जैसा कि गीता का विवादग्रस्त अर्जुन था। उसमें रोष-आक्रोश उत्पन्न करने के लिए ही भगवान को गीता सुनानी पड़ी और अपने प्राण प्रिय मित्र को क्लीव, क्षुद्र, दुर्बल, अनार्य आदि एक से एक कड़वी गालियों की झड़ी लगाने की आवश्यकता अनुभव हुई।
अर्जुन समझौतावादी, संतोषी प्रकृति का और सज्जन दीखता है। वह क्षमा करने, सन्तोष रखने की नीति अपनाना चाहता है और भीख आदि के सहारे संतुष्ट रहना चाहता है। युद्ध का कटु प्रसंग उसे अच्छा नहीं लगा। आज हम सब की मनःस्थिति ऐसी ही हो गई है कि झगड़े में न पड़ने, किसी तरह झंझट काट लेने, अनाचार से निगाह चुरा लेने की बात में ही भलाई देखते हैं। यह भलाई दिखाने वाली सज्जनता का आवरण ओढ़े हुए क्षमाशीलता वस्तुतः परले सिरे की कायरता होती है। इससे अपने को झंझट में न पड़ने से बचाने के अतिरिक्त किसी से दुश्मनी मोल न लेने और बदनामी से बचने जैसे ऐसे तत्व भी मिले रहते हैं जिन्हें प्रकारान्तर से अनीति समर्थक और परिपोषक ही कहा जा सकता है।
दिन-दहाड़े सरे-बाजार गुण्डागर्दी होती रहती है और यह भले बनने वाले लोग चुपचाप उस तमाशे को देखते रहते हैं। गुण्डों की हिम्मत बढ़ती है और वे आये दिन दूने उत्साह से वैसी ही हरकतें करते हैं। यदि देखने वाली भीड़ ने जोर से एक साथ शोर ही मचा दिया होता तो सरे आम गुण्डागर्दी करने वालों के पैर उखड़ सकते थे और दुर्घटना बच सकती थी। अनाचार की घटनाएँ घटती हैं, पुलिस छानबीन करती है, पर प्रत्यक्षदर्शी भले मानुसों में से गवाही देने एक भी नहीं जाता। झंझट से बचने में ही जिन्हें खैर दीखती है वे अनाचार का सामना करने में जो थोड़ी बहुत कठिनाई उठानी पड़ती है, उसका झंझट क्यों मोल लें? इस भीरुता पर प्रत्यक्ष रूप से गुण्डागर्दी का लाँछन तो नहीं लगाया जा सकता, पर प्रत्यक्ष रूप से अनीति को खाद-पानी देने की जिम्मेदारी उसी की है। अपनी लड़की से कोई गुण्डा छेड़खानी करे तो लोग बदनामी के डर से उसे छिपाने की कोशिश करते हैं। इससे दुहरी हानि होती है। अगले दिनों लड़की को फिर कोई छेड़े तो वह बेचारी चुपचाप उसे सहन करती रहती है। जानती है अभिभावकों में सामना करने की हिम्मत तो है नहीं। छिपाने का ही उपदेश देंगे ऐसी दशा में उसे छिपाने की बात स्वयं ही करती रहे तो क्या हर्ज है? दूसरी ओर छेड़ने वालों का साहस सौ गुना हो जाता है वे चक्रवर्ती शासक की तरह मूँछें ऐंठते और ताल ठोकते फिरते हैं। मानो इन सज्जन कहलाने वाले कायरों को उन्होंने मक्खी-मच्छर की तरह अपना वशवर्ती बना लिया हो।
छोटे-बड़े प्रत्येक अनाचार के अवसर पर यही दृश्य देखने को मिलता है। विरोध, प्रतिरोध, असहयोग करने के लिए साहस दिखा सकने वाले ढूंढ़े नहीं मिलते वरन् क्षमा का उपदेश देने, गन्दगी पर मिट्टी डालने की बात कहने वाले लोगों की भीड़ सामने आ खड़ी होती है और रोकथाम के लिए जो कुछ किया जा सकता था वह सम्भव ही नहीं हो पाता। स्थिति कितनी दयनीय और कितनी विषम है। लगता है लोगों ने पाप को सुरक्षित रखने और उसे फलने-फूलने देने की ऐसी नीति अपना ली है जो बाहर से निर्दोष लगती है किन्तु वस्तुतः वही अनाचार को बढ़ावा देने में खाद पानी का काम करती है।
भगवान की अवतार प्रतिज्ञा में धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश का उभय-पक्षीय आश्वासन है। प्रत्येक अवतार के चरित्र में इन दोनों ही तत्वों का समावेश है। अधिक बारीकी से देखने पर प्रतीत होगा कि अवतारों ने धर्मोपदेश तो कम दिये हैं वरन् पाप से जूझने और उसे निरस्त करके छोड़ने की आक्रोश प्रक्रिया में ही अपना अधिक समय लगाया है। रामचरित्र में विश्वामित्र यज्ञ रक्षा से लेकर पंचवटी, दण्ड कारण्य आदि में जूझते हुए अन्ततः लंका युद्ध में जा डटने के ही प्रसंग भरे पड़े हैं। कृष्ण चरित्र में भी उनके जन्मकाल से ही असुरों से जूझने की महाभारत रचाने की और अन्ततः अपने ही वंश वालों को नष्ट होने देने की संरचना में समय बीता। भगवान परशुराम, भगवान नृसिंह, वाराह, भगवती, दुर्गा आदि के अवतार चरित्रों में अनीति से संघर्ष का ही प्रसंग बढ़ा-चढ़ा है। उनके साथी समर्थकों की सेना को धर्म स्थापना का-जप हवन का कितना समय मिला कह नहीं सकते पर स्पष्ट है कि भगवत् भक्तों ने ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए अपनी सामर्थ्य झोंक देने का आदर्श उपस्थित किया। रीछ-वानरों ने, ग्वाल-बालों ने पाण्डवों ने, प्रधानतया अनीति विरोधी तप साधना में ही अपना जीवन घुलाया था।
भगवान बुद्ध ने तत्कालीन अनाचारों के- मूढ़ मान्यताओं के विरुद्ध प्रचण्ड क्रान्ति खड़ी की थी, इसी संघर्ष से जूझने के लिए उन्होंने जीवधारी भिक्षुओं और श्रवणों की सेना खड़ी की थी। स्वार्थ के लिए तो सभी संघर्ष करते हैं, किन्तु परमार्थ के लिए लड़ना मात्र आदर्शवादी लोगों के लिए ही सम्भव होता है इसलिए बुद्ध शिक्षा में साधना और संघर्ष का समन्वय है। इसी आधार पर उनने अपने साधनों से सारे विश्व में नव-युग का शंख बजाया और नये जागरण का वातावरण बनाया। उनके न रहने पर अनुयायियों ने अहिंसा की पूजा-पाठ की सस्ती लकीर पीटते रहना तो जारी रखा किन्तु अनीति से लड़ने की कष्टसाध्य प्रक्रिया की ओर से मुँह मोड़ लिया। फलतः बौद्ध धर्म भारत-मध्य एशिया से चढ़ दौड़ने वाले डाकुओं द्वारा देखते-देखते पद-दलित कर दिया गया। शौर्य, साहस की तेजस्विता खो बैठने वालों की जो दुर्गति होती है, वही अपने देश की भी हुई। एकाँगी, सस्ती, धर्म मान्यताएं तो दीन-दुर्बलों को भी अपनी खाल बचाने के लिए अच्छी लगती हैं, पर वास्तविक धर्म में तो अनीति विरोधी संघर्ष ही जुड़ा हुआ है उसके लिए शौर्य, साहस न हो तो फिर मनुष्य बगलें झांकता है और उन सिद्धान्तों की दुहाई देता है जो मात्र उच्चस्तरीय विशिष्ट आत्माओं को विशेष आदर्श प्रस्तुत करने के लिए ही बनाये गये हैं। पानी में बहते बिच्छू के बार-बार काटने पर भी उसे बार-बार निकालने की कथा किसी विशेष सन्त की कीर्ति में चार चाँद लगा सकती है, पर सर्वसाधारण के लिए शेख सादी की वही उक्ति ठीक है जिसमें “बिच्छू पर दया करना बच्चों को मार डालने के समतुल्य” बताया गया है।
गुरु गोविन्दसिंह का अध्यात्म व्यावहारिक और जीवन्त था। उनने अपने शिष्यों के एक हाथ में माला और दूसरे में भाला थमाया। समर्थ गुरु रामदास ने अपने प्रौढ़ शिष्य शिवाजी को तलवार थमाई थी। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को ऐसे ही कार्यों में जुटाया। गांधी ने अपने अनुयायियों को प्रत्यक्ष मृत्यु से लड़ने का निर्देश दिया और कहा- ‘‘टूट जाना पर अनीति से लड़ने की हठ छोड़ना मत।’’
भगवान राम ने ऋषियों के अस्थि समूह के बने टीले देखे। उनकी आंखों में ‘‘नयन जल छाये’’ किन्तु वे आंसू कायरों, दुर्बलों और भावोन्मादियों के नहीं वीरों के थे। उनने भुजाएं उठाकर प्रतिज्ञा की कि जिनने यह दुष्कर्म किये हैं उन निश्चरों से इस पृथ्वी को रहित करके छोड़ेंगे। यदि अनाचार पीड़ित पर वस्तुतः दया आती हो और उससे सहानुभूति उपजी हो तो फिर उसका एक ही उपाय है कि उन अनीति के असुर से जूझा जाय तो इस विपत्ति का कारण है।
यज्ञ सन्दर्भ में एक श्रुति वचन प्रयोग होता है- ‘‘मन्यु रसि मन्यु मे दहि’’ हे भगवान् आप ‘मन्यु’ हैं हमें ‘मन्यु’ प्रदान करें। मन्यु का अर्थ है वह क्रोध जो अनाचार के विरोध में उमंगता है। निन्दित क्रोध वह है जो व्यक्तिगत कारणों से अहंकार की चोट लगने पर उभरता है और असंतुलन उत्पन्न करता है। किन्तु जिसमें लोक-हित विरोधी अनाचार को निरस्त करने का विवेकपूर्ण संकल्प जुड़ा होता है वह ‘मन्यु’ है। मन्यु में तेजस्विता, मनस्विता और ओजस्विता के तीनों तत्व मिले हुए हैं। अस्तु वह क्रोध के समतुल्य दीखने पर भी ईश्वरीय वरदान के तुल्य माना गया है और उसकी गणना उच्च आध्यात्मिक उपलब्धियों से की गई है।
राजा द्रुपद के अनाचारों से क्षुब्ध उनके सहपाठी, द्रौणाचार्य राज सभा में इसलिए गये कि अपनी बात मित्रता का परिचय देते हुए उसके शुभ-चिंतन की बात कहेंगे और कुमार्ग से पीछे हटाने का प्रयत्न करेंगे। पर हुआ ठीक उलटा। मदान्ध द्रुपद उनके उपदेश सुनने तक के लिए तैयार नहीं हुए और अपमानित करके उन्हें सभा भवन में से निकलवा दिया।
द्रौणाचार्य ने विवेक नहीं खोया। द्रुपद समझाने की सज्जनोचित रीति से नहीं मानते तो उन्हें दण्ड की दुर्जनों पर प्रयुक्त होने वाली प्रक्रिया का सहारा लेंगे। हर हालत में उन्हें सीधे रास्ते पर लाने का प्रयत्न जारी रखेंगे। इस निश्चय से साथ वे पाण्डवों को पढ़ाने लग गये। जब छात्र बड़े हुए और गुरु दक्षिणा देने की बात कही तो उनने एक ही उत्तर दिया कि- ‘‘द्रुपद के अहंकार को नीचे गिराना और उसे सुधारना है, इसलिए उसे पकड़ कर मुख बांधकर मेरे सामने ले आओ।’’ शिष्यों ने वही किया। द्रुपद पर आक्रमण हुआ। उन्हें हराया गया और रस्सों से जकड़ कर गुरु के सामने प्रस्तुत किया गया। द्रौणाचार्य ने कहा- ‘राजन् अहंकार और अनीति अभी भी छोड़ी जानी है या नहीं?’ द्रुपद रो पड़े उनने दोनों दुष्टताएं छोड़ दीं। साथ ही स्वयं भी बन्धन मुक्त हो गये। महाभारत की इस कथा में यह प्रेरणा है कि दुष्टता से उभरने पर मौन नहीं बैठे रहना चाहिए। मीठे उपाय सफल न हों तो कडुए भी अपनाये जा सकते हैं। हर हालत में अनाचार का तो अंत होना ही चाहिए।
वैयक्तिक पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि विभिन्न क्षेत्रों में छद्मवेशों से छिपे हुए भ्रष्टाचार का अंत तब तक नहीं हो सकता, जब तक उनके प्रति जन-आक्रोश न जगाया जाय। आज तो स्थिति यह हो गई है कि उचित-अनुचित का भेद तक करना, लोग भूलते जाते हैं और किसके साथ सहयोग करना, किसके साथ न करना इस विवेक को खो जाते हैं। जिसके साथ जिसकी मित्रता है, वह उसके पाप अनाचार का भी चित्र-विचित्र तर्कों से समर्थन करता है। नैतिक दृष्टि से यह अत्यन्त ही दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति है। मित्रता के प्रमुख लक्षणों में रामायण कार ने ‘‘कुपथ निवार सुपंथ चलावा’’ का सूत्र दिया है। सच्चा मित्र वह है जो मीठे, कडुए उपायों से उसकी अनैतिक प्रवृत्तियों को सुधारें, गलत मार्ग पर चलने से रोकें और सन्मार्ग की दिशा में प्रवृत्त करें, जो उसकी उपेक्षा बरतता है अथवा समर्थन, सहयोग करता है, वह प्रकारान्तर से अपने मित्र को अधिक भ्रष्ट करने में- अधिक पतित, निन्दित एवं दुःखों के गर्त में डुबाने के लिए प्रवृत्त है। ऐसा व्यक्ति मित्र होने का दावा करते हुए भी असल में उसका पक्का दुश्मन है। सुधार प्रक्रिया में यह समर्थन ही सबसे बड़ी बाधा है। ऐसे मित्र नामधारी, व्यक्ति अपने मित्र के साथ ही अपना भी लोक-परलोक बिगाड़ते हैं।
“चोर-चोर मौसेरे भाई” की उक्ति हर क्षेत्र में लागू होते देखते हैं। एक का पर्दाफाश होते ही-दूसरे अन्य मठकटे उसकी सहायता के लिए आ धमकते हैं। सोचते हैं संयुक्त मोर्चा बनाकर ही जन आक्रोश से बचा जा सकता है अन्यथा पाप के प्रति उभरा हुआ रोष आज एक साथी को दबोच रहा है तो कल दूसरे पर आ चढ़ेगा। इसलिए संयुक्त रूप से बचाव के उपाय करने चाहिए।
देखा गया है कि एक जेबकट पकड़ा जाय तो वह दो-चार चांटे पड़ते ही दहाड़ मारकर रोने-चिल्लाने लगता है मानो किसी ने उसकी गरदन काट ली हो। गिड़गिड़ाते, रोते-काँपते माफी माँगता है और दीनता की दुहाई देता है। इतने में अन्य साथी भले आदमियों के रूप में बीच-बिचाव करने आ पहुँचते हैं। वे तरह-तरह के ऐसे तर्क उपस्थित करते हैं मानो सज्जनता और साधुता के साक्षात् अवतार हैं। दस-बीस और भोले आदमी इकट्ठे होते हैं तो सज्जनतावादी तर्क उन्हें भी प्रभावित करते हैं और जेबकट को छुड़ा देते हैं। वह चाण्डाल चौकड़ी अपनी उस्ताद पर खूब प्रसन्न होती है और आपस में कहते हैं यह हथकण्डा कितना सस्ता और बढ़िया है कि पकड़े जाने पर बिना दण्ड भोगे इस तरकीब के सहारे सहज ही जान छुड़ाई जा सकती है। दुष्ट लोग आवश्यकतानुसार पकड़े जाने पर फिर इसी फार्मूले का उपयोग करते हैं और देखते हैं कि सज्जनता की आड़ में दुष्टता को पोषण देने का कैसा विचित्र और सरल हथकण्डा है।
करुणा और दया अच्छे गुण हैं, किन्तु उनका उपयोग हर जगह कल्याणकारी रूप में नहीं किया जा सकता। सीता छद्मवेशी रावण पर दया करके ही स्वयं विपत्ति में फंसी थी। बिना विवेक कुपात्र को भी दया-करुणा का लाभ पहुँचाना उन सत्प्रवृत्तियों को अपमानित करना है। ऐसा करना देवताओं के हथियार दुष्टों को सौंप देने जैसा मूर्खता और अनीति भरा कार्य है। यदि ‘पात्र-कुपात्र’ उचित-अनुचित का विवेक न किया गया तो दयालुता और उदारता का जो लाभ सत्प्रवृत्तियों को मिलना चाहिए वह न मिल सकेगा और दुष्ट प्रवृत्तियाँ अनायास ही उनका शोषण करने में सफल हो जावेंगी। अस्तु अनीति करने वाले के प्रति इस प्रकार की सम्वेदनाओं का प्रयोग नहीं किया जाना उचित है।
कहने का मतलब है, धर्म के प्रति जिसे जितना प्रेम हो वह अधर्म के प्रति उतना ही द्वेष रखे। जिसे ईश्वर भक्ति और आस्तिकता पर विश्वास हो वह ईश्वर विरोधी नास्तिकता के एकमात्र आधार अनाचार से बचे और बचावे। इसके बिना ईश्वर और शैतान को पाप और पुण्य को एक ही समझने की भूल होती रहेगी और भीतर तथा बाहर पनपता हुआ असुरत्व आत्मिक प्रगति की दिशा में एक कदम भी आगे न बढ़ने देगा।
अनीति को देखते हुए भी चुप बैठे रहना, उपेक्षा करना, आँखों पर पर्दा डाल लेना जीवित-मृतक का चिन्ह है। जो उसका समर्थन करते हैं, वे प्रकारान्तर से स्वयं ही दुष्कर्मकर्ता हैं। स्वयं न करना किन्तु दूसरों के दुष्ट कर्मों में सहायता, समर्थन, प्रोत्साहन, पथ-प्रदर्शन करना एक प्रकार से पाप करना है। इन दोनों ही तरीकों से दुष्टता का अभिवर्धन होता है।
मानवी साहसिकता और धर्मनिष्ठा का तकाजा है कि जहाँ भी अनीति पनपती देखें वहाँ उसके उन्मूलन का प्रयत्न करें। यह न सोचें कि जब अपने ऊपर सीधी विपत्ति आवेगी तब देखा जायेगा। आग अपने छप्पर में लगे तभी उसे बुझाया जाय, इसकी अपेक्षा यह अधिक उत्तम है कि जहाँ भी आग लगी है वहाँ बुझाने को आत्मरक्षा का अग्रिम मोर्चा मानकर तुरन्त विनाश से लड़ पड़ा जाय। यदि सीधे टकराने की सामर्थ्य अथवा स्थिति न हो तो कम से कम असहयोग एवं विरोध की दृष्टि से जितना कुछ बने पड़े उतना तो करना ही चाहिए। असुरता को निरस्त करने और देवत्व को बलिष्ठ बनाने के लिए हमें अपना अनीति विरोधी रुख तो अपनाये ही रखना चाहिए।
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लगा रहा है, पुकार कोई-नया सबेरा पुकारता है॥
अखण्ड दीपक की, ज्योति जागी,बना दिया है, प्रभात बागी,
न काम देगा खुमार कोई-नया उजेला, पुकारता है।
जगी तपस्या, अनीति भागी,मिटी रूढ़ियां, कुरीति भागी,
नये सृजन का शृंगार कोई-नया वितेरा, संवारता है।
नयी नहीं है, कथा पुरानी,सुनो समय की भविष्य वाणी,
किया न जिसने सुधार अपना,उसे न कोई, उबारता है।
गन्त को दे दिया बुलावा,बसन्त को दे दिया बुलावा,
लगा गगन तक किरण नरोनी, स्वर्ग, धरनि पर उतारता है।
दुःखी जनों में, सुहास उतरा। तपोवनों में, प्रकाश उतरा,
मनुष्यता का विकास सपना, भरे नयन से निहारता है।
-लाखनसिंह भदौरिया ‘सौमित्र’
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*समाप्त*