पू. गुरुदेव के जल-उपवास का कारण और हमारा कर्त्तव्य

इस साधना के निम्न उद्देश्य हैं।

(1) आगामी सत्र प्रशिक्षण साधना परक होंगे। उनमें आत्मबल वृद्धि की विशेष साधनाओं एवं प्रेरणाओं की प्रमुखता रहेगी। इसके लिए ब्रह्मवर्चस्, आरण्यक की योजना प्रकाशित की जा चुकी है। वह प्रशिक्षण आश्रम बनने की प्रतीक्षा न करके, फिलहाल शान्तिकुंज के ही आधे भाग में आरम्भ किया गया है, और अक्टूबर से दस-दस दिवसीय नये सत्र इस योजना के अन्तर्गत प्रारम्भ हो रहे हैं। इस अभिनव उत्तरदायित्व का निर्वाह करने के लिए अभीष्ट आत्म शक्ति का सम्पादन इसका एक कारण है।

(2) गुरुदेव सोचते हैं कि उनका जीवन काल स्वल्प रह गया है। इसी बीच उन्हें निम्न पाँच कार्यों की जीवन्त पृष्ठभूमि खड़ी करनी है-(1) विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय की सुव्यवस्थित आधारशिला खड़ी करना (2) यज्ञ विज्ञान के माध्यम से मनोविकारों के निराकरण की प्रखर चिकित्सा पद्धति के लिए शोध और निष्कर्षों का प्रस्तुतीकरण (3) प्रचलित सभी प्रमुख धर्मों को मानवी एकता के लक्ष्य पर केन्द्रित करने के लिए दार्शनिक एवं व्यावहारिक तथ्यों का निर्धारण (4) महिला जागृति अभियान में व्यापक प्रखरता उत्पन्न करना (5) जन-मानस के परिष्कार में धर्ममंच द्वारा लोकशिक्षण प्रक्रिया का अधिक सक्षम योगदान सम्भव बनाना।

इन पाँचों कार्यों को वे अपने कन्धों पर डाले गये विशेष उत्तरदायित्व मानते हैं। इन्हें पूरा कर सकने की क्षमता उत्पन्न करने के लिए प्रस्तुत तप-साधना द्वारा विशिष्ट शक्ति प्राप्त करना चाहते हैं।

(3) युग-निर्माण परिवार की विशिष्ट आत्माएँ नवयुग अवतरण में विशेष योगदान देने के लिए भेजी गई थीं, पर वे नर-वानरों की तरह लोभ, मोह में ग्रसित सामान्य जीवन जी रही हैं। उन्हें विशिष्ट कर्तव्यों का बोध कराने एवं धरती पर स्वर्ग के अवतरण तथा मनुष्य में देवत्व के उदय के महान प्रयोजन में अधिक तत्परतापूर्वक लगने की अभिनव चेतना उत्पन्न करना।

(4) यों युग-निर्माण परिवार के अधिकाँश परिजन अपनी प्रामाणिकता का कीर्तिमान स्थापित किये हुए हैं, पर जब-तब उनमें से एकाध की दुःखद अप्रामाणिकता भी सामने आती रहती है। अपने से सम्बद्ध परिवार का स्तर इस योग्य बनाये रखना वे अपना उत्तरदायित्व समझते हैं, जिसके आधार पर नव-निर्माण की भूमिका निभा सकने में समर्थ हो सकें। जब कभी परिजनों की अप्रामाणिकता सामने आती है तो वे बहुत दुःखी हो उठते हैं। इन्हीं दिनों एकाध घटना ऐसी ही उनके सामने आई, जिससे वे अत्यन्त दुःखित एवं क्षुब्ध हुए हैं। उस अन्तर्व्यथा के निराकरण के लिए, बदले का प्रायश्चित स्वयं ही करने के लिए उतारू हो गए हैं।

उपरोक्त चार उद्देश्य प्रस्तुत 15 दिवसीय अथवा 24 दिवसीय जल-उपवास सहित अन्य कठोर साधना प्रक्रिया के हैं। इस सन्दर्भ में हर परिजन को गम्भीरतापूर्वक यह विचार करना चाहिए कि उपवास के प्रथम तीन उद्देश्यों को पूरा कर सकने में उनका क्या और किस प्रकार सहयोग हो सकता है? साथ ही चौथे आधार में जिस दुष्ट दुर्बुद्धी के प्रति गुरुदेव का आक्रोश है उसे अपने बीच कभी भी प्रवेश करने का अवसर न मिलने पाये इसके लिए तीक्ष्णतम प्रतिरोध की नीति अपनाई जानी चाहिए।

हम क्या करें?

गुरुदेव की वर्तमान अति कठिन तपश्चर्या के महान् उद्देश्यों को जितना सराहा जाय, उसकी उज्ज्वल प्रतिक्रिया के प्रति जितना अधिक आशावान् रहा जाय, उतना ही कम है। इस दृष्टि से इस तप द्वारा गुरुदेव की आत्मशक्ति की ऊर्जा में प्रचण्डता आने, परिजनों के आदर्शवादी कीर्तिमान स्थापित होने, मिशन की सृजनात्मक प्रवृत्तियों में प्रखरता आने और विश्वमानव के उज्ज्वल भविष्य की ओर अग्रसर होने जैसे असंख्य लाभ हैं। उसकी महत्ता और प्रतिक्रिया पर जितना विचार किया जाता है उतनी ही नवीन आशा का संचार होता है।

इतने पर भी यह निश्चित है कि सत्तर के लगभग आयु जा पहुँचने के करण, प्रकृति विधान के अनुसार, आजीवन अत्यधिक श्रम करने और आहार में सुविधाओं की उपेक्षा करते रहने के कारण उनका शरीर काफी जीर्ण हो गया है। तप के जल-उपवास वाले अंश को ही प्रकट किया गया है, उसके साथ-साथ जो अन्य कष्टसाध्य साधनाएँ जुड़ी हुई हैं वे अविदित ही रहने दी गई हैं। इस तप का प्रभाव उनके शरीर पर कितना पड़ेगा? उसे वे किस प्रकार सह पावेंगे? इस बात पर जब विचार किया जाता है तो भारी चिन्ता एवं बेचैनी उत्पन्न होती है।

इस असमंजस भरी विषम बेला में हम लोग हतप्रभ और किंकर्त्तव्यविमूढ़ जैसी स्थिति में जा पहुँचे हैं। एक दर्शक भी रहना नहीं चाहते और कुछ करते बन पड़े ऐसा दीखता नहीं। ऐसी दशा में कम से कम आत्म-सन्तोष के लिए गुरुदेव के तप उद्देश्य के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने के लिए और सहयोगी आश्वासन प्रकट करने के लिए हमें इस अवधि में अपना न्यूनतम कर्त्तव्य कर ही लेना चाहिए।

इस संदर्भ में ऐसा कुछ किया जाना चाहिए।

1-हममें से प्रत्येक को एक माला अतिरिक्त गायत्री जप प्रतिदिन इस तप साधना की सफलता के लिए विशेष रूप से करते रहना चाहिए।

2-अक्टूबर महीने में हर सप्ताह में किसी दिन समर्थ लोग उपवास करें। इन उपवासों को प्रवाही पदार्थ लेकर पूरा किया जाना चाहिए। दूध, छाछ, चाय, शाकों का सूप, फलों का रस जैसी पतली चीजें लेनी चाहिएं। मात्र जल-उपवास तो गुरुदेव अकेले ही करेंगे अन्य किसी को वैसा न करने के लिए उनका स्पष्ट निर्देश है। उसका उल्लंघन करने का हठ किसी को नहीं करना चाहिए।

3-जहाँ सामूहिक उपासना का कार्यक्रम सम्भव हो सके वहाँ उसके लिए प्रयत्न किया जाय। प्रातः सूर्योदय से लेकर सायं सूर्य अस्त तक का अखण्ड गायत्री जप रखा जा सकता है। इसके लिए प्रति सप्ताह कोई एक दिन नियत किया जा सकता है। स्थान नियत निर्धारित रहे और योजनानुसार सम्मिलित होने वाले व्यक्ति नियत समय पर वहाँ पहुँच जाया करें।

4-सायंकाल का सुविधाजनक समय, एक दो घण्टे का ऐसा रखा जाय जिससे उपवास के दिनों सभी लोग सामूहिक जप एवं कीर्तन में सम्मिलित हो सकें। वह कार्यक्रम दैनिक चले या साप्ताहिक, यह स्थानीय परिस्थितियों को देखकर ही निर्धारित किया जाय।

5-जहाँ सम्भव हो वहाँ रात्रि में विचार गोष्ठी चले और उसमें इस तप के उद्देश्यों एवं उसकी पूर्ति के उपायों पर प्रकाश डाला जाय। ऐसी गोष्ठियाँ साप्ताहिक तो चलनी ही चाहिएं। दैनिक हो सकें तो और भी अच्छा।

6- अन्तिम आयोजन 29 अक्टूबर को रखा जाय। उस दिन हवन रखा जाय और बन पड़े तो बड़े विशेष आयोजन वैसे ही रखे जावें जैसे कि अक्सर बसन्त पंचमी को रखे जाते हैं।

7-जहाँ सामूहिक प्रयत्न न हो सके वहाँ इन प्रक्रियाओं को व्यक्तिगत रूप से अथवा निजी परिवार के सहयोग से मनाया जा सकता है।

8-चूँकि निर्णय अकस्मात ही हुआ है। उसकी सूचना परिजनों को पत्रिकाओं के सहयोग से तब पता चलेगी जब अधिकाँश तप पूरा होने को आयेगा, इसलिए जिन्हें यह सूचना मिले उनका कर्त्तव्य है कि अपने क्षेत्र के परिजनों को इस सूचना से अवगत कराने के लिए स्वयं दौरा करें और व्यक्तिगत एवं सामूहिक उपासना का क्रम जहाँ बन सकता हो उसके लिए प्रयत्न करें। इसके लिए अपने प्रभाव का पूरा उपयोग करें।

9-इस सन्दर्भ में जहाँ जो प्रयास चलें उनकी सूचना मथुरा एवं हरिद्वार दोनों जगह पहुँचा दी जाय। आशा है सभी आत्मीय जन इस अति विषम बेला में अपने कर्त्तव्यों का इतना तो पालन करेंगे ही जितना कि ऊपर की पंक्तियों में बतलाया गया है।

इस उपवास क्रम में शान्तिकुंज के सभी सत्र यथावत् चलेंगे। शिक्षार्थियों के अतिरिक्त इन दिनों शान्तिकुंज में केवल वही व्यक्ति आवें जो उपरोक्त विषयों के सन्दर्भ में कुछ परामर्श देने या लेने की आवश्यकता अनुभव करते हों मात्र दर्शनार्थियों की भीड़ इन दिनों नहीं लगनी चाहिए। सम्भवतः उन दिनों कुछ भाव भरे परिजन अपने को रोक न सकेंगे और मिलने आने के लिए आतुर हो उठेंगे। ऐसे परिजनों से निवेदन है कि वे अनावश्यक भीड़ तथा साथ लेकर न चलें और एक दिन से अधिक समय शान्ति कुँज में न ठहरें।

भगवती देवी शर्मा

पो0 शान्तिकुंज, हरिद्वार

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प्रगति के आधार-उत्कृष्ट विचार

प्राचीन ऋषि-मुनि आरण्यक जीवन अपनाकर कन्द, मूल, फल खाकर भी सन्तुष्ट और सुखी जीवन बिताते थे और धरती पर स्वर्गीय अनुभूति में मग्न रहते थे। एक ओर आज का मानव है जो पर्याप्त सुख-सुविधा, समृद्धि, ऐश्वर्य, वैज्ञानिक साधनों से युक्त जीवन बिताकर भी अधिक क्लेश, अशान्ति, दुख, उद्विग्नता से परेशान है। यह सब मनुष्य के विचार चिंतन का ही परिणाम है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक स्वयट अपने प्रत्येक जन्म-दिन में काले और भद्दे कपड़े पहनकर शोक मनाया करते थे। वह कहते थे-‘‘अच्छा होता यह जीवन मुझे न मिलता, मैं दुनिया में न आता” इसके ठीक विपरीत अन्धे कवि मिल्टन कहा करते थे। “भगवान का शुक्रिया है जिसने मुझे जीने का अमूल्य वरदान दिया।” नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने अन्तिम दिनों में कहा था-‘‘अफसोस है मैंने जीवन का एक भी सप्ताह सुख-शान्तिपूर्वक नहीं बिताया।” जब कि उसे समृद्धि, ऐश्वर्य, सम्पत्ति, यश आदि की कोई कमी नहीं रही थी। सिकन्दर महान भी अपने अन्तिम जीवन में पश्चाताप करता हुआ ही मरा। जीवन में सुख शान्ति, प्रसन्नता अथवा दुःख क्लेश, अशान्ति, पश्चाताप आदि का आधार मनुष्य के अपने विचार हैं, अन्य कोई नहीं।

विचारों में अपार शक्ति है। जो सदैव कर्म की प्रेरणा देती है। वह अच्छे कर्मों में लग जाय तो अच्छे और बुरे मार्ग की ओर प्रवृत्त हो जाय तो बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं। कोई व्यक्ति भले ही किसी गुफा में जाकर विचार करे और विचार करते-करते ही वह मर जाय तो वे विचार कुछ संयम उपरान्त गुफा की दीवारों का विच्छेद कर बाहर निकल पड़ेंगे और सर्वत्र फैल जायेंगे। वे विचार तब सबको प्रभावित करेंगे।”

-स्वामी विवेकानन्द

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चेतना का पदार्थ जगत पर नियंत्रण

डॉ0 भगवानदास ने अपनी पुस्तक-‘‘दि एसैन्शियल यूनिट ऑफ आल रिलीजन्स” में कुछ विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिकों के उन वक्तव्यों का संग्रह किया है, जिसमें मन (माइण्ड) पदार्थ (मैटर) से श्रेष्ठ तथा उसकी नियामक सत्ता को स्वीकार किया गया है। उन वक्तव्यों का हिन्दी अनुवाद निम्नाँकित है-

(1) विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक सर ऑलिवर लाँज-‘‘वह समय निश्चित रूप से आएगा, जब विज्ञान द्वारा अज्ञात (मन) के ये भाग खोजे जावेंगे और कुछ ऐसी भी व्यक्ति हैं जो सोचते हैं कि वह समय बहुत समीप आ गया है जब ऐसा होने की आशा की जा सके। जितना हमने सोचा था, विश्व उससे अधिक आध्यात्मिक सत्ता है। वास्तविक तथ्य यह है कि हम भौतिक जगत को शासित करने वाले आध्यात्मिक जगत में निवास करते हैं। यह आध्यात्मिक जगत उस महान और नित्य विद्यमान वास्तविकता की रचना करता है जिसकी शक्तियों का अनुभव करना हमने प्रारम्भ ही किया है। वे शक्तियाँ सचमुच खतरनाक भी हो सकती थीं यदि ढाढ़स बँधाने के लिए हमें यह आश्वासन नहीं दिया गया होता कि वे समस्त प्रचण्ड ऊर्जाएँ उस कल्याणकारी पितृ-सत्ता द्वारा नियन्त्रित हैं जिसका नाम ‘प्रेम’ है।

(2) गणितज्ञ और खगोलविद् सर जेम्स जीन्स “यह जगत महान् “यन्त्र” के बजाय महान् “विचार” अधिक समझ पड़ता है। वस्तुओं की प्रतीतिक वस्तुनिष्ठता (बाह्य आकार आदि ) मन में उनके विद्यमान होने के कारण है। जगत की धारणा को हम विशुद्ध विचार का संसार मानते हैं। पदार्थ-राज्य में अब मन आकस्मिक घुसपैठिये के रूप में प्रतीत नहीं होता। अब हमारा यह अनुमान होता जा रहा है कि हमें पदार्थ राज्य के रचियता और शासक के रूप में उसकी जय जयकार करनी चाहिए। निश्चित रूप से वह वैयक्तिक मन नहीं है, वरन् वह मन है जिसमें हमारे वैयक्तिक मनों को उत्पन्न करने वाले परमाणु विचार के रूप में रहते हैं।”

एक अन्य स्थान पर वे लिखते हैं-‘‘सापेक्षवाद, निरन्तरता, न्यूनतम अवकाश, वक्र आकाश (कर्व्ड स्पेस), संभावना-तरंगें, अनिश्चितता तथा घटनाएं-ये सभी अवधारणाएँ हैं, जिनका हम चित्रण, कल्पना और वर्णन नहीं कर सकते।”

“जगत में पाये जाने वाले नियम तथा व्यवस्था माया या कल्पनावाद की भाषा में सबसे अधिक सरलता से वर्णित किये और समझाये जा सकते हैं। विज्ञान की अधिकतम जहाँ तक पहुँच है, उसमें से अधिकाँश या कदाचित सम्पूर्ण जो मानसिक नहीं है वह लुप्त हो गया है तथा कुछ भी नया जो मानसिक नहीं है, प्राप्त नहीं है। परिवर्तन की अन्तिम दिशा कदाचित् भौतिकवाद से और ‘मनुष्य के कार्य स्वतन्त्र नहीं हैं’ के, उस कठोर सिद्धान्त से भिन्न होगी जो उन्नीसवीं सदी की भौतिकी की विशिष्टता थी।

‘मिस्टीरियस यूनीवर्स’ में वे लिखते हैं-‘‘नया ज्ञान हमें जल्दबाजी में लिये गए अपने प्रथम अनुमान पर पुनः विचार करने के लिए बाध्य करता है। ठोस पदार्थ का अपने मूल भागों में विश्लेषण करने पर वह मन की रचना और मन की अभिव्यक्ति के रूप में जब से प्रतीत हुआ है, तब से मन और पदार्थ का पुराना द्वन्द्व लुप्त होने की सम्भावना हो चली है।

(3) प्रोफेसर सर ए0 एस0 एडिंगटन-‘‘कोई अज्ञात कर रहा है, हम नहीं जानते क्या कर रहा है-यह हमारे सिद्धान्त का सार है। आधुनिक भौतिकी ने पदार्थ की कल्पना को हटा दिया है। हमारे अनुभवों में मन पहला और सबसे सीधा तत्व है। मैं चेतना को मूल आधार मानता हूँ।”

(4) गणितज्ञ और सापेक्षवाद के विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्स्टीन-‘‘मैं परमात्मा में विश्वास करता हूँ, जो स्वयं को जगत की व्यवस्थित लय के रूप में अभिव्यक्त कर रहा है। मैं विश्वास करता हूँ कि ज्ञान सम्पूर्ण प्रकृति में अभिव्यक्त हुआ है। वैज्ञानिक कार्य का आधार यह विश्वास है कि जगत व्यवस्थित, बुद्धिगम्य विस्तृत सत्ता है तथा मात्र संयोग का परिणाम नहीं है।”

(5) भौतिकीविद् जे0 बी0 एस0 हाल्डेन-‘‘आँशिक एवं अपूर्ण ढंग से देखे जाने पर जो जगत एक अन्ध यान्त्रिक-रचना माना जाता है वह वास्तव में आध्यात्मिक जगत है। एकमात्र वास्तविक जगत आध्यात्मिक जगत ही है। सत्य यह है कि पदार्थ नहीं, बल नहीं, कोई भौतिक वस्तु नहीं वरन् मन, व्यक्तित्व ही जगत का केन्द्रीय तथ्य है।”

(6) भूगर्भ शास्त्री किर्टले एफ0 माथर-‘‘पदार्थ और ऊर्जा के विश्लेषण में परम सत्य तक हमारी अब तक की निकटतम पहुँच यह दर्शाती है कि मन ही सार्वभौमिक वास्तविकता है।”

(7) भौतिकीविद् रॉबर्ट ए0 मिलिकन-‘‘परमात्मा जगत को एकीकृत करने वाला कारण तत्व है। मनुष्य के मन के सम्मुख विकासवाद की अवधारणा के समान उन्नत अन्य कोई अवधारणा प्रस्तुत नहीं की गई है, जो अनन्त युगों से अवयवी पदार्थ में जीवन की श्वास भरते हुए तथा मनुष्य में आध्यात्मिक प्रकृति एवं उसकी समस्त ईश्वर समान शक्तियों के रूप में स्वयं को अभिव्यक्त करते हुए परमात्मा को पुनः प्रस्तुत करती है।

(8) “दि ग्रेट डिजाइन” पुस्तक में सर जे0 ए0 थॉमस-‘‘समस्त पशु जीवन के संसार में, (उनकी) कुछ अभिव्यक्तियाँ हममें उपस्थित मन से मिलती जुलती हैं। अमीबा (प्रथम जीव) तथा उससे ऊपर आन्तरिक जीवन की धारा बह रही है, जीवन की यह धारा पतले नाले के समान हो सकती है और कभी-कभी बलवान धारा भी होती है। इस (जीवन धारा) में अनुभव करना, कल्पना करना, आकाँक्षा करना और कभी-कभी विचार करना सम्मिलित है। उसमें अचेतन का समावेश है। पौधों में वह तन्द्रावस्था में है या घोर निद्रा में या कभी नहीं जागी है, कौन कह सकता है। पशुओं में मन की सर्वव्यापकता हममें उनके प्रति साथी की भावना भरती है। इमर्सन के इन शब्दों में हमें मन की क्रमशः बढ़ती हुई मुक्ति दिखाई देती है। वे लिखते हैं-

“मन की यह मुक्ति ही विकास का उद्देश्य है। किसी सतत् प्रक्रिया के अन्तर्गत प्रारम्भ में जो बीज रूप में उपस्थित नहीं था, वह अन्त में भी नहीं पाया जा सकता। अतः अपने ही मन से और उसकी दासत्व मुक्ति की कहानी से प्रारम्भ कर (मूल की ओर) पीछे लौटते हुए हम सर्वोच्च मन तक पहुँच जाते हैं। ‘जिसके बिना कुछ भी निर्मित नहीं था जो निर्मित किया गया था।’’ जीवन के ऐसे संसार में जो हमारी वैज्ञानिक अँगुलियों द्वारा नहीं घेरा-पकड़ा जा सकता, वस्तुओं के सामने खड़े होकर हम यह दुहराने के सिवा और क्या कर सकते हैं। (हे प्रभु !) मेरी आंखें खोल, ताकि मैं तेरे नियम के अन्तर्गत बनी आश्चर्यजनक वस्तुएँ देख सकूं।”


मंसूर वेदान्ती थे (kahani)

मंसूर वेदान्ती थे। वह ‘अहं ब्रह्मास्मि’ को अपनी भाषा में ‘अनल हक’ कहते थे। यही उनका उपासना मन्त्र था।

खलीफा ने इसे अपने मजहब के विरुद्ध माना और उस रट को न छोड़ने पर कोड़ों से पीटने और एक एक अंग काट-काटकर मारने का हुक्म दिया।

वे पिटते रहे और हर चोट पर जोरों से ‘अनल हक’ कहते रहे। हाथ पैर कट जाने के बाद जब जीभ काटने की तैयारी जल्लाद ने की तो उन्होंने अन्तिम प्रार्थना की और कहा कि “ऐ मेरे परमेश्वर जिन्होंने मुझे इतनी पीड़ा पहुँचाई है उन पर नाराज मत होना, क्योंकि इन्होंने तुझ तक पहुँचाने की मेरी मंजिल को कम ही किया है। अब शूली की ऊँचाई पर चढ़कर अधिक नजदीक से तेरे दर्शन कर सकूँ, इसी का प्रबन्ध तो यह लोग कर रहे हैं।’’

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आत्मा में परमात्मा का अवतरण

आत्मा की व्याख्या दार्शनिक अपने-अपने ढंग से करते रहे हैं। डेकार्ट कहते हैं-हर व्यक्ति अपने आत्मिक अस्तित्व का साक्षी स्वयं है। वह सोचता है-मैं सोचता हूँ मैं बोलता हूँ, मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ। अपने आपे की जो अनुभूति और समीक्षा कर सकता है वही आत्मा है। कान्ट का कथन है-आत्मा का अस्तित्व यदि प्रत्यक्षवाद के अनुसार प्रमाणित न हो सके तो वह विश्वास नैतिकता की रक्षा दृष्टि से भी नितान्त आवश्यक है।

अरस्तू शरीर को आत्मा को आकार मानते थे और आत्मा को मोम और शरीर का मोमबत्ती का उदाहरण देकर समझाते थे। सुकरात ने मरते समय अपने शिष्यों को आत्मा सम्बन्धी अपने विचारों को विस्तारपूर्वक दुहराया था। वे कहते थे। संवेदनाओं को धारण किये रहने वाली सत्ता को मोटे तौर से आत्मा समझा जा सकता है। दार्शनिक लुक्रेटियस का मत जैन धर्म की उन मान्यताओं से मिलता है जिसमें इस पृथ्वी के प्रत्येक कण में आत्मा का अस्तित्व माना गया है। वैसी ही मान्यता वेदान्त दर्शन की भी है। मेविलियम जेम्स का कथन है कि शरीरगत चेतना की नवीनतम व्याख्याएँ लगभग वहीं जा पहुँचती हैं जिसका प्रतिपादन आत्मवादी अपने ढंग से करते रहे हैं और उसका पृथक अस्तित्व मानते रहे हैं।

तत्वदर्शियों के अनुसार इस सृष्टि के सात लोक हैं। वे ऊपर नीचे नहीं हैं और न किसी नक्षत्र में अलग अलग बस्तियों की तरह बसे हुए हैं वरन् स्थूल से सूक्ष्म-सूक्ष्म से सूक्ष्मतर-सूक्ष्मतम-अति सूक्ष्म के स्तर पर अधिकाधिक अदृश्य होते चले गये हैं। वे परस्पर एक दूसरे में प्रविष्ट होकर रह रहे हैं। यह सूक्ष्मलोक जिन पदार्थों से बने हैं वे अपने सम्पर्क में आने वाले भौतिक पदार्थों से अधिक सूक्ष्म हैं इसलिए न यन्त्रों की पकड़ में आते हैं और न इन्द्रिय अनुभूतियों के सहारे जाने जा सकते हैं। इन्हें अनुभव करने का आधार विकसित आत्म चेतना ही हो सकती है।

मरणोत्तर जीवन पर प्रकाश डालने वाले ग्रंथों में सी0 डब्ल्यू0 लैड वीटर की ‘दि अदर साइड आफ डैथ’अधिक प्रख्यात है। उन्होंने भौतिक जगत के अन्तराल में विद्यमान सूक्ष्म लोक के अस्तित्व पर विस्तार-पूर्वक प्रकाश डाला है और कहा है कि उसमें आत्माएँ सूक्ष्म शरीर में उसी प्रकार निवास करती हैं जैसे कि हम लोग स्थूल शरीर से इस प्रत्यक्ष संसार में जीवनयापन करते हैं। मैडम क्यैवैटस्की-कर्चल आटक्रीट आदि ने भी इस संदर्भ में अपनी मान्यताओं का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है।

सात लोकों की तरह आत्मा के भी सात शरीर हैं। स्थूल शरीर को क्रिया लोक कह सकते हैं। सूक्ष्म शरीर को विचार लोक और कारण शरीर को भावना लोक। यह मोटी तीन परतें हैं पर यदि इनका बारीकी से विश्लेषण किया जाय तो वे तीन न रह कर सात हो जाती हैं। इनके विभिन्न नाम हैं। इनमें से प्रत्येक परत अधिक शक्तिशाली और अधिक संवेदनशील है। हम स्थूल से सूक्ष्म की परतों में जितना अधिक प्रवेश करते हैं उतना ही अधिक गहरी सशक्तता का समुद्र लहलहाता दीखता है।

चेतना के विकास का लक्षण यह है कि ससीम से आगे बढ़ कर असीम में प्रवेश करें। चिन्तन की दृष्टि से इसे आत्म-विस्तार कह सकते हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि तोड़ कर “आत्मवत् सर्व भूतेषु” की आत्मा बना लेने वालों का आचरण विश्व नागरिक जैसा होता है और वे परमार्थ प्रयोजनों को ही वास्तविक स्वार्थ साधन मानते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ओत-प्रोत होकर वे अपना क्रिया-कलाप इस स्तर का बनाते हैं जिसके आधार पर लोक मंगल के महान प्रयोजनों में अपनी क्षमता संलग्न रह सके। यह आत्म विकास या आत्म विस्तार हुआ। अध्यात्मवादी इसी दिशा में प्रयत्नशील रहते और आगे बढ़ते हैं।

बात जानने तक ही सीमित नहीं है। सूक्ष्म प्रकृति पर जितनी मात्रा में आधिपत्य होता जाता है उसी अनुपात से उसकी विचित्र शक्तियों का उपयोग करने का अधिकार भी मिल जाता है। जिस प्रकार स्थूल सम्पत्ति का लाभ किसी दूसरे को दिया जा सकता है उसी प्रकार सूक्ष्म जगत की विभूतियों से भी अपने प्रिय पात्रों को लाभान्वित किया जा सकता है। यह सामर्थ्य वरदान की शक्ति कहलाती है। इसी प्रकार कुपित स्थिति में अपनी मानसिक चेतना का प्रहार करके किसी की हानि भी की जा सकती है। इसे शाप की शक्ति कहते हैं। अभिशप्त व्यक्तियों अथवा पदार्थों की दुर्गति होने के कितने ही उदाहरण समय-समय पर मिलते रहते हैं।

ब्रह्म चेतना में प्रवेश करके हम उच्चस्तरीय अति-मानवी उत्कृष्ट भाव चिन्तन उपलब्ध कर सकते हैं। इस आधार पर मनुष्य को उन श्रद्धा सम्वेदनाओं का अनुदान मिलता है जिन्हें देव स्तर की कहा जाता है। इस अवतरण में व्यक्ति अधिकाधिक पवित्र एवं सुसंस्कृत बनता जाता है। आत्मीयता का विस्तार होने से संकीर्ण स्वार्थपरता झड़ने लगती है और उसके स्थान पर “सब को अपने में और अपने को सब में” देखने का दृष्टिकोण विकसित होता है। ऐसी स्थिति में दूसरों के दुःखों को बँटा लेने और अपने सुखों को बाँट देने की नीति अपनाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रह जाता। दया, करुणा, उदारता जैसी सद्भावनाओं का विस्तार होने, लोक-मंगल के प्रति अधिकाधिक रुचि बढ़ने, परमार्थ परायण सेवा सहकारिता चरितार्थ करने में रस लेने की प्रवृत्ति स्वयमेव बढ़ती चली जाती है। ऐसे व्यक्तियों में सहृदयता-सज्जनता-आदर्शवादी चरित्र निष्ठा भरती और बढ़ती चली जाती है। सत्प्रयोजनों को अपनाने में एकाकी बढ़ चलने का शौर्य साहस विकसित होता है। अनीति अपनाने वाली दुनिया का बहुमत एक ओर और उसकी नीति-निष्ठा एकाकी अपने स्थान पर अंगद के पैर की तरह अड़ी रह सकती है। अविवेक का अन्धकार उसे प्रभावित नहीं करता। कौन क्या कहता है उसे इसकी तनिक भी परवाह नहीं होती। ईमान और भगवान का अनुकूल रहना उसे अपने क्रिया-कलाप को अपनाने में पर्याप्त प्रतीत होता है, अन्य लोग समर्थन करते हैं या विरोध इसकी उसे रत्ती भर भी चिन्ता नहीं रहती। ब्रह्मपरायण व्यक्ति की आत्मचेतना में उच्चस्तरीय सद्भावनाएँ और सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ती और मरती चली जाती हैं। अति मानव में यही विशेषताएँ होती हैं। देवात्माओं में यही गुण पाये जाते हैं।

मनुष्य अन्य प्राणियों से ऊँचा अपनी शरीर रचना अथवा बुद्धिकौशल के कारण नहीं बना है। उसकी प्रगति का मूल कारण सहकारिता-सद्भावना एवं उदार चरित्र निष्ठा जैसी सद्भावनाओं में सन्निहित है। इन्हीं विशेषताओं के कारण उनके लिए परिवार समाज एवं शासन की संरचना करना सम्भव हुआ। सामूहिक प्रयत्नों का ही फल है कि शिक्षा, चिकित्सा, व्यवस्था, उत्पादन, व्यवसाय, विज्ञान जैसी उपलब्धियाँ सम्भव हो सकीं। पारस्परिक आदान-प्रदान की विशेषता ने पूर्वजों के अनुभवों से अगली पीढ़ियों को लाभान्वित किया है। उपार्जन का लाभ सबने मिल-जुल कर उठाया है। स्वार्थपरता, लिप्सा और उच्छृंखलता को नैतिक अनुशासन के सहारे कुचला और उदार सहकारिता को कष्ट सहकर भी स्वीकार किया है। मानवी प्रगति के यही आधार हैं। ऐसी ही उत्कृष्ट भाव संवेदनाओं को मानवता कहा जाता है।

शरीर, बल और बुद्धि कौशल की दृष्टि से अन्य प्राणी भी अपनी-अपनी स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप पर्याप्त सामर्थ्य सम्पन्न हैं। हाथी, ह्वेल, और सिंह की तुलना में मनुष्य का शरीर बल तुच्छ है। हिंस्र पशुओं की आक्रमण चतुरता और शाकाहारियों की आत्म रक्षण कुशलता के दाँव पेचों को देख कर लगता है उस क्षेत्र में उनका बुद्धि वैभव मनुष्य से पीछे नहीं आगे ही है। ऋतु प्रभावों एवं क्षुधा पिपासा जैसी शारीरिक आवश्यकताओं को सहन करने की तितीक्षा शक्ति अपेक्षाकृत पशुओं में अधिक है। बन्दर की तरह पेड़ पर चढ़ना-हिरन की तरह कुलाँचे भरना-पक्षियों की तरह आकाश में उड़ना, मनुष्य से कहाँ बन पड़ता है। चींटी, दीमक, मकड़ी, मधुमक्खी जैसे छोटे कीड़ों में ऐसी कितनी ही विशेषताएँ पाई जाती हैं। जो मनुष्य को शायद कभी भी उपलब्ध न हो सकेंगी। कितने ही पक्षी अपने नियत समय पर हजारों मील लम्बी यात्राओं पर निकलते हैं और बिना राह भूले अभीष्ट स्थानों पर प्रवास की अवधि पूरी करके अपने पूर्व स्थान पर वापिस आ जाते हैं। मनुष्य इन विशेषताओं की दृष्टि से काफी पीछे है। फिर अन्य प्राणी क्यों प्रगति पथ पर आगे न बढ़ सके और मनुष्य क्यों सृष्टि का मुकुट मणि बन गया? इस प्रश्न का एक ही उत्तर है-उसकी सद्भाव सम्पन्नता, आत्मिक उत्कृष्टता।

अध्यात्म विज्ञान का-ब्रह्म-विद्या का-एक मात्र लक्ष्य इस सद्भाव सम्पदा की मात्रा बढ़ाते चलना है। ईश्वर का अधिकाधिक सघन सम्पर्क इसी प्रयोजन के लिए अभीष्ट होता है। ईश्वर प्राप्ति के लिए की जाने वाली विविध साधनाएँ किस मात्रा में सफल हो रही हैं इसकी एकमात्र कसौटी यही है कि उस व्यक्ति के अन्तःकरण में निर्मलता एवं कोमल संवेदनाओं का परिमाण कितना बढ़ा, यदि भीतरी स्वार्थपरता और निष्ठुरता यथावत बनी रहे तो समझना चाहिए कि ईश्वर प्राप्ति के लिए किये जाने वाले साधनात्मक प्रयत्नों का कोई परिणाम नहीं निकला। मनुष्य की श्रेष्ठता का यदि आधार ढूंढ़ा जाय तो वह उसकी उन प्रदीप्त सद्भावनाओं में ही देखा जा सकता है जो अपनी प्रखरता के कारण सत्प्रवृत्तियों में परिणत हुए बिना रह नहीं सकतीं। ब्रह्म के असंख्य क्रिया कलाप हैं, पर जब परमात्म चेतना का आत्म चेतना के साथ सम्बन्ध होता है तो बिजली के दोनों तार छूने पर चिंगारियां निकलने की तरह उस श्रेष्ठता के ही लक्षण प्रकट होते हैं जिन्हें उत्कृष्ट आदर्शवादिता कहा जाता है। पशु और मनुष्य के बीच इसी विशेषता के अभिवर्धन का अन्तर होता है। इसे अतिरिक्त ईश्वरीय अनुग्रह या अनुदान कह सकते हैं।

बुद्धि कौशल ने सद्भावों को बढ़ाया या सद्भावों से बुद्धि कौशल बढ़ा इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ते समय बुद्धि चमत्कार का पक्ष लेने को जी करता है क्योंकि प्रत्यक्ष उपयोग उसी का अधिक होता है। सुविधा साधनों के उपार्जन अभिवर्धन में बुद्धि ही अग्रिम मोर्चे पर खड़ी दिखती है इसलिए उसको प्रमुखता दी जाय ऐसा जी करता है किन्तु अधिक गम्भीरता से चिन्तन करने पर तथ्य सर्वथा उलट जाते हैं। जितनी गहराई में उतरते हैं उतनी ही यह सचाई सामने आती है कि मनुष्य की मौलिक विशेषता सद्भावना है इसीलिए उस की इस प्रधान महत्ता को मनुष्यता का नाम दिया जाता रहा है।

सच्चे ब्रह्मपरायण व्यक्ति का सत्ता सन्त-सज्जन-परमार्थ परायण ब्राह्मण, आदर्श के मूर्तिमान प्रतीक ऋषि, युग साधना में निरत महामानव, लोक मंगल के लिए अपना सर्वस्व लुटा देने वाले भू सुर के रूप में अपनी प्रखर उत्कृष्टता का परिचय देती है। विडम्बना रचने वाले और भ्रम जंजालों में उलझे रहने वालों की बात दूसरी है, वे चित्र-विचित्र कर्मकाण्डों में स्तवन उपहारी से ईश्वर को प्रसन्न करने और उससे तरह-तरह की मनोकामनाएँ पूरी कराने के ताने-बाने रहते हैं। इन दिनों अन्य क्षेत्रों में फैले हुए बुद्धि विभ्रम की तरह अध्यात्म क्षेत्र में भी ऐसी ही विडम्बना चरम सीमा पर पहुँची हुई है और लोग ईश्वर को अपनी चालबाजियों में फुसला लेने के लिए नित नये जाल बुनते रहते हैं। इस बाल बुद्धि से किसे कितना प्रतिफल मिलता है इसे तो वे ही जानें, पर तथ्य यह है कि यथार्थवादी ईश्वर भक्ति का परिणाम एक ही है अन्तःकरण की सद्भाव सम्पदा का अधिकाधिक विस्तार और परिष्कार। यह वैभव जिन्हें भी प्राप्त होता है वे देव मानव होकर जीते हैं। अपने समीपवर्ती वातावरण को स्वर्ग तुल्य सुख शान्ति से घिरा-भरा बनाते हैं। स्वयं असीम आत्म सन्तोष और सघन जन सम्मान प्राप्त करते हैं। समस्त विश्व उनकी कृतियों का कृतज्ञ रहता है। जन-मानस को उनके द्वारा प्रबल प्रेरणा प्राप्त होती है और सामयिक विकृतियों के समाधान में वे आशातीत योगदान देते हैं। जीवन को सच्चे अर्थों में धन्य बनाने की यही सफल साधना है।

ऐसे व्यक्तियों की चेतना मल आवरण विक्षेपों से रहित होकर जो निर्मलता प्राप्त करती है उससे ब्रह्म चेतना की यथेच्छ मात्रा अपने में धारण कर लेना सम्भव हो जाता है। इस सम्पदा का परिचय देवात्माओं के ऐसे महान् कृत्यों द्वारा मिलता है जिन्हें सामान्य स्तर के व्यक्ति असामान्य, असम्भव और चमत्कारी मानते हैं। कभी-कभी वे भौतिक क्षेत्र में भी अपनी विशिष्टता के ऐसे परिचय देते हैं जिन्हें ऋद्धि-सिद्धि की विशिष्टता कहा जा सके।

अन्तरात्मा में बढ़ती हुई विवेकशीलता जब दूर-दर्शिता अपनाने और दृष्टिकोण के परिष्कृत करने में सफल होने लगे तो जानना चाहिए ब्रह्म चेतना का अवतरण हो रहा है और मनुष्य आत्मिक प्रगति की दिशा में निश्चित रूप से बढ़ रहा है। ऐसे व्यक्तियों की इच्छा, आकांक्षाएँ वासना, तृष्णा की क्षुद्रता से ऊपर उठती ही हैं। उन्हें लोभ मोह की कीचड़ में सड़ते रहने की दयनीय दुर्दशा असह्य हो उठती है। पेट और प्रजनन तक जीवन सम्पदा को नियोजित किये रहने में उन्हें घाटा ही घाटा दिखता है अस्तु वे अपनी गतिविधियों का नये सिरे से निर्धारण करते हैं। विश्वमानव की सेवा साधना में ही उन्हें जीवन सम्पदा की सार्थकता दिखती है अस्तु निर्वाह की आवश्यकताओं को सीमित करते हैं। सादगी से रहते हैं। मितव्ययिता बरतते हैं। परिवार के पिछले उत्तरदायित्वों के निर्वाह में ही जब कमी रह जाती है तो नये बच्चे-कच्चे पैदा करते जाने की मूर्खता तो उनसे बन ही नहीं पड़ती। भौतिक एषणाओं को निग्रहीत करने के उपरान्त ही इतनी कुछ सामर्थ्य बच सकती है जिसके सहारे आत्मिक प्रगति के लिए-ईश्वर प्राप्ति के लिए-अनिवार्य रूप से आवश्यक आदर्शवाद परमार्थ परायणता को अपनाया जाना सम्भव हो सके। सच्ची ईश्वर भक्ति इसी प्रकार किसी सच्चे भक्त पर अवतरित होती है और जीवन की दिशा धारा बदल डालने के रूप में अपने अस्तित्व का परिचय देती है।


भगवान बुद्ध से शिकायत की (kahani)

एक भिक्षु वेश्या के यहाँ ठहर गया। अन्य भिक्षुओं ने इस का बुरा माना और भगवान बुद्ध से शिकायत की।

तथागत मौन हो गये। फिर उनने कहा वह भिक्षु मेरा परखा हुआ है। वेश्या को ही पवित्र करेगा। स्वयं अपवित्र नहीं होगा।

शिष्यों का समाधान नहीं हुआ। वे इसी बात को दुहराते रहे-इससे परम्परा बिगड़ जायगी और हममें से अन्य लोग भी वैसा ही करने लगेंगे।

भगवान ने सहज मुस्कान में इतना ही कहा-अगर तुम में से कोई वहाँ ठहर जाता तो मुझे जरूर चिन्ता होती। जो सहज भाव से ठहरा है उसे करुणा ने ही रोका होगा। फिर भी यदि वह गिर जाता है तो यह भी ठीक ही है, उसके ऊपर से भिक्षु होने का आवरण उतर जायगा और अपनी सही स्थिति प्रकट करके छद्म से विरत हो जायगा। जो बदला जाने योग्य है वह बदल जायगा और जो बदल सकता है वह बदल देगा। वेश्या और भिक्षु में से कौन सुदृढ़ निकला यह परीक्षा हो जाना क्या बुरा है।

शिष्य-गण उदास होकर चले गये उनका समाधान न हुआ। रात भर इसी की चर्चा होती रही और वह मण्डली तर्क वितर्कों के ऊहापोह में डूबी रही।

सवेरा हुआ। भिक्षु लौटा तो उसके पीछे-पीछे नेत्रों में आँसू भरे वेश्या भी थी। दूसरे दिन उसने भी प्रव्रज्या गृहण कर ली और भिक्षुओं की पंक्ति में चीवर ओढ़े जा बैठी।

शंकालु शिष्यों का उचित समाधान हो गया फिर उन्हें तर्क वितर्क करने की आवश्यकता नहीं रही।

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सूक्ष्म-दृष्टि, मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि

मोटी दृष्टि से देखने पर यह संसार बेडौल मिट्टी पत्थर का ढेर मैदान भर प्रतीत होता है। वे सिलसिले उगती, सूखती वनस्पतियाँ, निरुद्देश्य विचरण करने वाले चित्र विचित्र प्रकृति के जीवधारी। यही है यह अपना संसार। इसमें झंझटों और विक्षोभों का ठिकाना नहीं, अभावों और संकटों का यह घटाटोप पग-पग पर सामने खड़ा दीखता है। मोटी दृष्टि से यहाँ जो दीखता है उसमें निरर्थकता और विसंगति ही समझ में आती है। नीरसता और कुरूपता का वातावरण ही बिखरा हुआ दृष्टिगोचर होता है।

किन्तु यदि हमें सूक्ष्म दृष्टि-उपलब्ध हो तो फिर एक से एक अद्भुत एवं आकर्षक रहस्य एक के बाद एक उभरते चले आते हैं और उनका मूल्यांकन करते- करते इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि कण-कण में उपयोगिता, विलक्षणता, समर्थता एवं सुन्दरता के अजस्र भण्डार भरे और बिखरे पड़े हैं मिट्टी का रासायनिक विश्लेषण करते चलने पर उसमें एक से एक अधिक महत्वपूर्ण तत्व एवं यौगिक उपलब्ध होते हैं। निर्जीव मिट्टी में जीवाणुओं की एक अलग ही दुनिया बसी पड़ी है। रेत का हर कण अपने को असंख्य प्रकार की हलचलों का केन्द्र बनाकर गतिशील रह रहा है। तुच्छतम परमाणु के भीतर उसका एक निजी सौर-मण्डल अपनी परिपूर्णता एवं विलक्षणता का परिचय दे रहा है। अणु विस्फोट जैसे अवसरों पर हम अणु ऊर्जा की-इतनी छोटी झाँकी कर पाते हैं जो उसकी समग्र क्षमता का एक लाखवें अंश से भी कम मात्रा में प्रकट हो सका होता है।

जड़-पदार्थों की शृंखला पारस्परिक सहकार और अन्योन्याश्रय के धागे में कितनी मजबूती के साथ बँधी है इसे तत्वदर्शी भली प्रकार देख और समझ पाते हैं। उन्हें लगता है अपने आस-पास जो कुछ मौजूद है इसे तिलस्म अथवा जादू नगर से कम विचित्र नहीं समझा जा सकता। आत्मिक दृष्टि जिन्हें प्राप्त है, वे इस निर्जीव नीरस के भीतर यथार्थता, चेतनता और सुन्दरता की झाँकी करते हैं। उन्हें सृष्टि के कण-कण में सत्यं शिवं सुन्दरम् का आभास होता है। विशाल विश्व को जो विराट ब्रह्म के रूप में देखते हैं, वे भ्रमित नहीं हैं। दृष्टिकोण परिष्कृत हो तो अपना यही संसार सत्-चित् आनन्द से परिपूर्ण परमेश्वर का परम पवित्र प्रतीक विग्रह दृष्टिगोचर होता है। तब यही सरसता और सुन्दरता के अतिरिक्त और कुछ शेष ही नहीं रहता। भक्त की भावुकता में काल्पनिक आनन्द है, पर तत्वदर्शी के लिए तो इस प्रत्यक्ष उपस्थिति में अकल्पनीय महत्ता का अनुभव होता है। मातृ-भूमि के लिए-विश्व वसुधा के मन में जैसी तृप्ति एवं श्रद्धा की तरंगें उठती रहती हैं, मातृ-भूमि पर बलिदान होने वाले शहीदों और विश्व-मानव के लिए आत्मोत्सर्ग करने वालों की भावुकता को यदि कोई परख सके तो उसे प्रतीत होगा कि दिव्य सम्वेदनाओं की दुनिया कितनी भाव भरी है और उस पर सबसे प्रिय समझा जाने वाला आपा भी प्रसन्नतापूर्वक निछावर किया जा सकता है।

मोटी दृष्टि से यहाँ जो कुछ मौजूद है वह अनगढ़ निर्जीवता के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझा जा सकता। मानव प्राणी के लिए ईश्वर का एक ही दिव्य वरदान है-तत्व-दर्शन। गहराई तक उतरते जाने के लिए दृष्टि कौशल चाहिए-समुद्र की ऊपरी सतह पर तो कूड़ा- करकट ही तैरता-फिरता है, मोती पाने के लिए गहरी डुबकी लगाकर तली तक पहुँच सकने की प्रवीणता चाहिए। सागर का मूल्यांकन रत्नाकार के रूप में कर सकना गोताखोरों के भाग्य में ही बदा है। शेष लोगों के लिए तो अपेय खारी पानी की यह जल राशि ज्वार, भाटों के रूप में तटवर्तियों को निगल जाने की ही धमकी देती रहती है।

विद्यमान सम्पदा का मूल्यांकन और उसे उपलब्ध करने का साहस कर सकना सुसंस्कृत दृष्टिकोण के लिए ही सम्भव है। वे ही सहज उपलब्धियों का सदुपयोग कर सकने का प्रयास करते हैं और क्रमशः अधिकाधिक ऊँचाई पर चढ़ते-उठते जाते हैं। जीवन की सरसता का आनन्द ले सकना ऐसी ही लोगों के लिए सम्भव होता है।

स्थूल वैभव और सूक्ष्म सौन्दर्य की प्रचुरता हम किसी भी पदार्थ का गहरी दृष्टि से पर्यवेक्षण करने पर सहज ही कर सकते हैं। दूर जाने की जरूरत नहीं। सबसे समीपवर्ती पदार्थ अपने शरीर पर ही दृष्टि डालें और उसकी ऊपरी परत चमड़ी को निहारें तो स्थूल और सूक्ष्म के अन्तर को समझ सकना सम्भव हो सकता है। चमड़ी ऊपर से देखने में एक पूरे प्लास्टिक की थैली जैसी लगती है जिसके भीतर सड़ा-गला, कूड़ा -कबाड़ा मात्र भरा हुआ है। किन्तु उसी को यदि वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाय तो प्रतीत होगा कि इसमें झिल्ली की पतली परत में कितने बड़े कल-कारखाने जैसी हलचलें हो रही हैं।

हमारी त्वचा के तीन हिस्से हैं-(1) ऊपरी चमड़ी (2) भीतरी चमड़ी (3) हड्डी के ऊपर के ऊतक। ऊतकों वाली परत में रक्त-वाहिनियाँ, तन्त्रिकाएं और वसा के कण होते हैं।

एक वर्ग इंच त्वचा में लगभग 72 फुट लम्बाई वाला तन्त्रिका जाल बिछा रहता है और इतने ही स्थान की रक्त-वाहिनी नलिकाएं 12 फुट से अधिक ही लम्बी होती हैं। ये रक्त-वाहनियां शीत-ताप नियन्त्रक होती हैं। ठंड में सिकुड़ जाती हैं, गर्मी में फैल जाती हैं। सर्दी में सिकुड़ने से कम ताप खर्च होती है और शरीर का ताप सामान्य बना रहता है। गर्मी में फैलने पर ताप के अधिक व्यय से यही सन्तुलन बना रहता है वाहिनियों, तन्त्रिकाओं और वसा के कणों के ही कारण चमड़ी हड्डियों से चिपकी रहती है। आयु, वृद्धि के साथ-साथ जब वसा-कण सूखने लगते हैं, तो चमड़ी झुर्रीदार होती जाती है। भीतर चमड़ी में तन्त्रिकाओं, रक्त -वाहिनियों के साथ ही पसीने की ग्रन्थियाँ, स्निग्धता की ग्रन्थियाँ और रोमकूप होते हैं। तन्त्रिकाएं त्वचा स्पर्श से उठी अनुभूति तरंगें, टेलीफोन के तार की तरह मस्तिष्क तक पहुँचाती हैं और मस्तिष्कीय निर्देश-सन्देश विभिन्न अवयवों तक ले जाती हैं।

लगभग 2 लाख स्वेद ग्रन्थियाँ शरीर के हानिकारक पदार्थों को पसीने के रूप में निकालती रहती हैं। पसीना निरन्तर रिसता रहता है। भले वह दीखता बूँदों के रूप में बाहर आने पर ही है। पसीने के रूप में सतत रिसती गन्दगी की परत चमड़ी पर जमने लगती है। स्नान द्वारा उसकी सफाई जरूरी है। सफाई न होने पर स्वेद बहाने वाले छेद बन्द हो जाते हैं और यही दाद, खाज, जुएँ आदि विकारों का कारण बनता है।

चमड़ी के नीचे है माँस-पेशियाँ। माँस-पेशियाँ सुदृढ़ व सन्तुलित रहीं तो स्वास्थ्य और सौन्दर्य झलकता है। फैली, सूखी बेडौल हुईं तो शरीर कुरूप हो जाता है। अनावश्यक आराम अथवा अत्यधिक श्रम, दोनों ही माँस पेशियों को अशक्त और बेडौल बनाते हैं। शरीर के सभी अवयवों को समुचित श्रम का अवसर मिलने से वे सुडौल रहती हैं। श्रम-सन्तुलन ही व्यायाम है। माँस-पेशियों की बनावट और भार के आधार पर ही व्यक्ति पतला या मोटा दिखता है।

माँसपेशी बारीक तन्तुओं से मिलकर बनती हैं। ये बारीक तंतु अपने से एक लाख गुना भार उठाने में समर्थ होते हैं। माँसपेशियों में तीन चौथाई पानी और एक चौथाई प्रोटीन होता है ।

माँसपेशियाँ सीधे मस्तिष्क द्वारा नियंत्रित होती हैं। कुछ माँसपेशियों की गतिविधियाँ हमें अनायास ही चल रही दिखती हैं, स्वयं संचालित-सी। जैसे फेफड़ों का सिकुड़ना, फैलना, हृदय का धड़कना, रक्त का दौड़ना, पलकों का झपकना, भोजन का पचना और मल का बाहर निकलना आदि। ये क्रियाएँ अनायास नहीं होतीं, हमारे अचेतन मन के अधीन होती हैं। शेष माँसपेशियाँ सचेत मन के द्वारा नियन्त्रित -निर्देशित दिखती हैं।

माँसपेशियों को प्रशिक्षित अनुशासित किया जा सकता है। नृत्य, सर्कस आदि में यह प्रशिक्षण व अभ्यास ही काम आता है। उछलना, कूदना, मुड़ना आदि हरकत माँसपेशियों की लोच के कारण ही सम्भव होती है। इन्हीं लोचदार माँसपेशियों के कारण चोट लगने पर भी हमारी हड्डियाँ प्रायः बच जाती हैं। वरना वे चाहें जब टूट जाएँ। पुरुषों की पेशियाँ स्त्रियों से अधिक कड़ी व दृढ़ होती हैं। शरीर में हाथों की पेशियाँ अधिक सशक्त होती हैं।

यह तो चमड़ी और उसके साथ चिपके हुए पेशी संस्थान की बात हुई, इससे नीचे के अवयव कितनी विचित्र हलचलों में अहर्निश लगे रहते हैं। गुर्दे और जिगर के दो अवयवों पर शरीर शास्त्रानुमोदित आरम्भिक ज्ञान स्तर की दृष्टि डालकर भी इसकी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। अवयवों में सबसे छोटे पुर्जे हैं- दो गुर्दे। वे रीढ़ की हड्डी से सटे, भूरे-कत्थई आकार के-मुट्ठी के बराबर देखने में लगते हैं मानो सेम के बड़े बीज हों। वजन डेढ़ सौ ग्राम-मुख्य काम मूत्र-निर्माण। अर्थात् रक्त का अनावश्यक एवं गन्दगी भरा जल छाँट-छाँटकर अलग करना और बाहर निकालना। बाँई ओर का गुर्दा थोड़ा ऊपर होता है और दाँई ओर का नीचे, ताकि सामान्य क्रिया-कलाप में कोई कठिनाई न हो । प्रत्येक गुर्दा 4 इंच के करीब लम्बा, 2॥ इंच चौड़ा और दो इंच मोटा होता है। रक्त में घुले रहने वाले नमक, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम आदि की मात्रा बढ़े न क्योंकि इनके बढ़ने का शरीर पर गलत असर पड़ेगा, इसके लिए गुर्दे सदा सतर्क रहते हैं। ये रक्त में क्षारीय और अम्लीय अंश को भी सन्तुलित रखते हैं।

एक घण्टे में दोनों गुर्दे इतना रक्त छानते हैं कि वजन लेने पर उसका भार शरीर से दुगुना निकले। इस तरह गुर्दे छलनी का काम करते हैं। छाने हुए रक्त का उपयोगी अंश गुर्दों की नलिकाएं रोक लेती हैं। इन नलिकाओं की संख्या 10 लाख से अधिक होती है, यदि इन्हें लम्बाई में एक कतार में फैलाया जाय तो ये 110 किलोमीटर लम्बी निकलेंगी। नलिकाएं रक्त से छाने हुए विटामिन, शर्करा, हारमोन्स और अमीनो अम्ल तो रक्त को वापस दे देती हैं और नमक तथा अन्य विजातीय द्रव्यों को गुर्दे शरीर के बाहर कर देते हैं। अनावश्यक नमक यदि शरीर में ही रुक जाय, तो सूजन शुरू हो जाए। प्रतिदिन दो लीटर मूत्र बनाकर गुर्दे नमक, फास्फेट, सल्फेट, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम-लोहा, क्रिएटाइनिन, यूरिया, अमोनिया, यूरिक एसिड, हिप्यूरिक एसिड, नाइट्रोजन आदि की अनावश्यक मात्रा शरीर के बाहर धकेलते रहते हैं। मूत्र सामान्यतः हल्का पीला होता है। दोनों गुर्दों में परस्पर सहयोग का क्या कहना? एक खराब हो जाए तो दूसरा उसका भार स्वयं संभालकर पूरी तरह दायित्व का निर्वाह करता है।

इसी तरह का एक अन्य छोटा पुर्जा है-जिगर। स्त्रियों का जिगर पुरुषों से थोड़ा हल्का होता है। पुरुषों का जिगर सामान्यतः सवा से डेढ़ किलोग्राम रहता है। जिगर दाहिनी पसलियों के नीचे तनुपट से सटा रहता है और शरीर का एक चौथाई रक्त इसमें ही भरा होने से भूरे, लाल रंग का दिखता है तथा टटोलने में कठोर लगता है। इस जिगर की कोशिकाएँ विलक्षण हैं। एकबार नष्ट होने पर वे दुबारा बन जाती है। इसी से जिगर का तीन चौथाई हिस्सा नष्ट भी हो जाय तो शेष एक चौथाई से काम चल सकता है। कुपोषण के कारण जिगर का पर्याप्त विकास नहीं हो पाता और पाचन सम्बन्धी अनेक रोग हो जाते हैं। सन्तुलित आहार द्वारा इन्हें पर्याप्त प्रोटीन मिला तो ये स्वस्थ रहते हैं। प्रोटीन की कमी से कमजोर हो जाते हैं।

गुर्दे ओर जिगर की सामान्य हलचलें भी यों कम आश्चर्यजनक नहीं हैं, पर जब उनके सहयोग से चलने वाले शरीर सन्तुलन की बात सोचते हैं तो प्रतीत होता है उनका जीवन धारण में कितना अधिक महत्व है। समझने को तो हृदय और मस्तिष्क को जीवन का आधार कहा जाता है। किन्तु उसकी सत्यता को चुनौती दिये बिना यह कहा जा सकता है कि उपरोक्त दो पुर्जों में तनिक भी खराबी आ जाय तो दुर्बलता, रुग्णता तथा मरण की परिस्थिति आ धमकने में तनिक भी देर न लगेंगी। दोनों समूचे शरीर के आधार-भूत रक्त-संस्थान को स्वच्छ, स्वस्थ और सशक्त रखने की आधार-भूत भूमिका निवाहते हैं। पर सामान्यतया उनका क्रिया-कलाप कोई अधिक महत्वपूर्ण नहीं होता।

बाल सदा तिरछे निकलते हैं। पर कड़ाके की ठण्ड में या डर के मारे अथवा रोमाँच होने पर बाल खड़े हो जाते हैं। बालों की जड़ों में छेदों द्वारा चिकनाई पहुँचती है। रोमकूपों से जितनी स्निग्धता निकलेगी, बाल उतने ही कोमल और चिकने होंगे। पेट या दाँत खराब होने पर यह स्निग्धता नहीं निकल पाती और बाल उम्र से पहले सफेद होने लगते है। वृद्धावस्था में रोमकूप शुष्क होने लगते हैं, तब बालों की श्यामलता सफेदी में बदलने लगती है।

बालों का मूल्यांकन यों शोभा, शृंगार के निमित्त ही किया जाता है और उनकी साज-संभार में इसी तथ्य को प्रश्रय दिया जाता है कि चेहरे की सुन्दरता पर उनका क्या प्रभाव पड़ता है ? स्थूल दृष्टि से नीचे उतर कर उनके साथ जुड़े हुए वसा एवं प्रोटीन प्रक्रिया की परिस्थिति को समझा जा सके तो वे मीटरों की तरह मशीन की भीतरी स्थिति का परिचय देते पाये जायेंगे। इतनी ही नहीं उनके सहारे मस्तिष्कीय स्तर तथा भावनाओं के उभार का भी पता चल सकता है। पंच केश रखाने तथा उनका मुण्डन करा डालने की आध्यात्मिक परम्पराओं के पीछे मनःसंस्थान को अमुक दिशा में मोड़ने-मरोड़ने के लिए सारगर्भित प्रयत्न किया जाता है।

बात चमड़ी, माँसपेशी, गुर्दे, जिगर या बालों की विवेचना करने की नहीं, वरन् यह बताने की है कि मोटी दृष्टि से इनका कोई महत्व प्रतीत नहीं होता, पर उनकी कार्य-क्षमता और उपयोगिता कितनी अधिक है यह समझना तब सम्भव होता है जब उनके विकृत हो जाने पर उत्पन्न होने वाले विग्रहों की विभीषिका सामने आती है।

अवयवों की विवेचना तो बड़ी बात है उनकी सबसे छोटी इकाई –‘जीवाणु’ का यदि पर्यवेक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि जिस प्रकार जड़ ब्रह्माण्ड का प्रतिनिधित्व छोटा-सा परमाणु करता है ठीक उसी प्रकार चेतन जगत की समस्त हलचलें जीवाणु के भीतर मौजूद हैं। परमात्मा की प्रतीक प्रतिमा जीवात्मा है। समूचा मनुष्य अपने वंशजों की असंख्य परम्पराओं को समेटे हुए छोटे से शुक्राणु में बैठा रहता है। शुक्राणु भी बड़ी बात हुई उसके भीतर पाये जाने वाले अति सूक्ष्म गुण सूत्रों की स्थिति और भी अधिक चकित करने वाली है। उसमें व्यक्तित्व की असंख्य धाराओं का-स्तरों का ऐसा संगम है कि लगता है स्थूल जीव वृक्ष के मूल में इस बीज सत्ता का ही प्रभाव और कर्तृत्व परिलक्षित हो रहा है।

ब्रह्माण्ड कितना आश्चर्यजनक है उसकी विशालता को देखते-देखते बुद्धि चकित हो जाती है। “आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेनम्” की उक्ति में गीताकार ने विराट् को अति आश्चर्य माना है। काय-कलेवर की बात छोड़ दें तो ब्रह्माण्ड की प्रतिकृति ही पिण्डाणु-जीवाणु भी है। विश्व कितना घटिया और कितना बढ़िया है-कितना सरस और कितना नीरस है इसकी अनुभूति स्थूल और सूक्ष्म दृष्टि के अन्तर पर अवलम्बित है।

मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि सूक्ष्म दृष्टि है। उसी विकास के साथ-साथ मनुष्य की सत्ता क्षुद्र और महान बनती रहती है।


नशे में धुत्त (kahani)

नशे में धुत्त मल्लाह देर तक जोर-जोर से डाँड चलाता रहा, पर नाव किनारे से आगे तनिक भी न बढ़ सकी।

सवारियों ने इसे दैवी प्रकोप समझा और मनौती मनाने लगे।

एक विचारशील ने कारण खोज निकाला। नाव का रस्सा खूँटे में बंधा हुआ था। उसने रस्सा खुलवाया और नाव चलने लगी।

प्रगति की नाव अपनी संकीर्णता के रस्से से ही बंधी और रुकी पड़ी है।

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मनःस्थिति बदले तो परिस्थितियाँ सुधरें

कालाईल कहते थे-लोग जीना तो चाहते हैं, पर जीवन को प्यार नहीं करते।’ सचमुच ही हम जिन्दगी का बोझ ढोते हैं और जैसे-जैसे उसे काटते हुए मौत के दिन पूरे करते हैं। यदि जिन्दगी का महत्व समझ सकना उसका मूल्याँकन कर सकना सम्भव रहा होता तो लगता कि इस सुरदुर्लभ अवसर का उससे अधिक सुन्दर उपयोग किया जाना चाहिए जैसा कि आप लोग किसी तरह रोते खीजते-ज्यों-त्यों करके उसे गुजार लेते हैं। पेट और प्रजनन की कला में तो कीट-पतंगे और पशु-पक्षी भी प्रवीण होते हैं, यदि इसी धुरी पर मानव जीवन का चक्र भी लुढ़कता रहा तो समझना चाहिए सृष्टा का, इस अद्भुत कलाकृति पर किया गया असाधारण श्रम ऐसे ही निरर्थक चला गया। क्या रोटी कमाने और पेट भरते रहने से अधिक महत्व का काम मनुष्य के लिए दूसरा नहीं है? क्या प्रजनन कर्म से अधिक सुखद कोई दूसरा कृत्य नहीं हो सकता? क्या इन दोनों के समेटने संजोने से कोई-अधिक उपयोगी कार्य हमारे लिए सम्भव नहीं हो सकता ?

यह कुछ ऐसे मौलिक और महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनके समाधान को सर्वोपरि प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी, पर दुर्भाग्य इसी बात तक है कि ढर्रे के दिन गुजारते रहने में ही समय निकल जाता है और जीवन-ज्योति के बुझने का दिन सामने आ खड़ा होता है। विवेकशीलता जहाँ भी जीवित हो वहाँ यह उमंग उठनी चाहिए कि जीवन-सम्पदा का सद्व्यय इस प्रकार करेंगे जिससे सृष्टा का श्रम सार्थक हो सके। उत्कर्ष की महत्वाकाँक्षा जहाँ भी उभरती हो वहाँ उसे यह दिशा मिलनी चाहिए कि विलासिता और अहंमन्यता के साधन जुटाते रहने से नहीं आदर्शवादी महानता का परिचय देने से ही आत्म सन्तोष, जन-सम्मान एवं ईश्वरीय अनुग्रह का त्रिविधि वरदान मिल सकता है।

जहाँ अन्तरात्मा मूर्छित पड़ी है वहाँ दैवी उद्बोधन अनसुने ही होते रहेंगे। अर्द्धप्रसुप्त अन्तःकरण दिव्य-जीवन अपनाने का साहस नहीं जुटा सकता। उसे पशुप्रवृत्तियाँ उभरने ही न देंगी। कुसंस्कारों से पिण्ड न छूटे तो मानवी गरिमा को सार्थक बनाने के लिए अपनाया जाने वाला शौर्य क्यों कर उभरे? कैसी विडम्बना है कि बुद्धिमान होने का दावा करने वाला मनुष्य जीवन के सदुपयोग की आधार भूत समस्या की ओर तनिक भी ध्यान नहीं देता। लोक-व्यवहार और अर्थ उपार्जन जैसे सामान्य प्रयोजनों में वह जितनी तत्परता बरतता है उतना ही यदि आत्महित को ध्यान में रख कर भी सोचा गया होता तो निष्कर्ष कुछ दूसरे ही निकलते । तब हमारी रीति-नीति कुछ दूसरी ही होती। तब हमारी गतिविधियों का चक्र किसी दूसरी ही दिशा में प्रयाण कर रहा होता। विवेक ने यदि साथ दिया होता, तो निश्चय ही हम उससे भिन्न प्रकार का दृष्टिकोण अपनाते, जैसे कि आज अपनाये हुए हैं। आदर्शवादी जीवन जीने का-महानता के प्रगतिपथ पर चलने का हर किसी को अवसर मिल सकता है, यदि वासना-तृष्णा पर अंकुश रखा जाय और श्रेष्ठता अभिवर्धन की साध को जीवन्त-ज्योतिर्मय बनाया जाय। यह अतिसरल है व कठिन भी। सरल इन अर्थों में कि निर्वाह के साधन अति सरल हैं वे महानता के मार्ग पर चलते हुए भी सहज ही उपलब्ध होते रह सकते हैं और आदर्शवादिता के मार्ग पर विश्व के महामानवों की तरह चल सकते हैं। कठिन इसलिए कि पशु प्रवृत्तियों से पिण्ड छुड़ाना अति साहस का काम है। सम्पर्क क्षेत्र में तथा-कथित स्वजन-सम्बन्धी संकीर्ण स्वार्थपरता अपनाये रहने का ही दबाव डालते हैं क्योंकि उनकी क्षुद्रबुद्धि को हित इसी में दीखता है कि दूसरे अनेकों की तरह लोभ-मोह के पहियों पर लुढ़कती जिन्दगी जिया जाय। अपनी दुर्बलता और मित्र सम्बन्धियों की क्षुद्रता मिल कर ऐसा अभेद्य कवच तैयार करती है जिसे लाँघ सकना बिना दुस्साहस अपनाये व्यर्थ है कि पारमार्थिक जीवन में कष्ट अधिक है। सच तो यह है कि पाप-पंक में फंसे रहने पर पग-पग पर पल-पल पर जो आत्म प्रताड़ना तथा बाहरी व्यथा बाधाएं सहनी पड़ती हैं उसकी तुलना में दिव्य जीवन में आने वाली विपत्तियाँ नगण्य हैं। यदि कुछ हैं भी तो आदर्शों के लिए किये जाने वाले त्याग बलिदान के फलस्वरूप मिलने वाले आत्म सन्तोष, लोक-सम्मान एवं ईश्वरीय अनुग्रह की उपलब्धियों को देखते हुए अतीव नगण्य हैं। स्वार्थी जो कष्ट पाता है उसे ईश्वरीय दण्ड मानकर सभी प्रसन्न होते हैं किन्तु परमार्थी द्वारा झेले गये संकटों के प्रति समस्त विश्व की श्रद्धा उमड़ पड़ती है। यह सहानुभूति इतनी महान है कि झेलने वाला सोचता है कि ऐसी विपत्ति हर घड़ी बनी रहती तो कितना अच्छा होता। क्या सन्त, क्या असन्त प्रकृति क्रम से हर किसी को आये दिन सुख-दुःख के खट्टे-मीठे अनुभव प्राप्त करने पड़ते हैं। सुखों से प्रोत्साहन और दुःखों से प्रतिभा चमकाने वाला शौर्य साहस प्राप्त होता है। यह दोनों ही उपलब्धियाँ परस्पर विरोधी तो लगती हैं, पर हैं एक दूसरे की पूरक एवं मानवी प्रगति के लिए नितान्त आवश्यक। इन से राम, कृष्ण हनुमान, पाण्डव, बुद्ध जैसी दिव्य सत्ताएं अछूती न रहीं तो फिर सामान्य लोगों की तो बात ही क्या है। स्वार्थी ने कितना कमाया, कितना खोया, कितना सुख भोगा और कितना दुःख उठाया इसका लेखा-जोखा रखा जाय और उसकी तुलना में परमार्थी को भुगतने पड़े कष्टों की तालिका बनाई जाय तो प्रतीत होगा स्वार्थी ने साँसारिक दृष्टि से भी अत्यधिक क्षति उठाई और आत्मिक आनन्द भी खो बैठा, इसकी तुलना में परमार्थी पर आई विपत्तियाँ तो नितान्त स्वल्प ही गिनी जा सकती हैं।

एक समय ऐसा भी था जब मानवी दृष्टिकोण में महानता दूरदर्शिता और उदारता के उच्चस्तरीय तत्व समुचित मात्रा में समाविष्ट थे। तब घर-घर में महामानव उत्पन्न होते थे और अपना देश नर-रत्नों को खदान बना हुआ था। तब इस सम्पदा से यह देश भी स्वर्ग से प्रतिस्पर्धा करता था और इस दिव्य सम्पत्ति का समस्त विश्व में निर्यात करके विश्व कल्याण का उत्तरदायित्व वहन करता था। उन दिनों भौतिक परिस्थितियाँ तो आज की तुलना में कहीं अधिक पिछड़ी हुई थीं, विकसित तो विवेकशीलता थी। मानव जीवन का महत्व और सदुपयोग क्या हो सकता है, इस तत्व ज्ञान को हर कोई समझता था और तदनुरूप किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार जिया जाना चाहिए इसका उच्चस्तरीय निर्णय-निर्धारण करता था। उन दिनों मनःस्थिति का स्तर ही वह परिस्थिति थी जो निश्चित रूप से अब की अपेक्षा कहीं अधिक जटिल थी।

पूर्वकाल की अपेक्षा शिक्षा, सुविधा, सम्पत्ति की दृष्टि से आज हम कहीं आगे हैं। ऐसी दशा में हमारे दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप में उत्कृष्टता की मात्रा भी बढ़नी चाहिए थी, पर हुआ इसका ठीक उलटा है। हमारी संकीर्णता बढ़ी है और गरिमा गिरी है। अब मनुष्य की आकांक्षाएं विलासिता, अहमन्यता और संकीर्ण स्वार्थपरता के लिए अनेकानेक स्वरूपों के साथ जकड़ कर रह गई है। इससे आगे की बात सोच सकना आज के मनुष्य के लिए अति कठिन हो रहा है। लोगों की यह मान्यता बनती जा रही है कि आदर्शवादिता कहने सुनने की-लिखने पढ़ने की-गये युग की वस्तु है। उसे व्यावहारिक जीवन में उतारने की आवश्यकता नहीं है। उत्कृष्टता अभिवर्धन के लिए उच्चस्तरीय विचार-प्रक्रिया का-ब्रह्म विद्या का-अवगाहन आवश्यक था।

अपने युग की कठिनाइयाँ व्यथाएं, वेदनाएं समस्याएं विपत्तियाँ मात्र एक ही कारण उत्पन्न हुई हैं कि मानवी दृष्टिकोण से आदर्शवादी उत्कृष्टता का अंश क्रमश: घटता ही चला जाता है। व्यक्तिवादी संकीर्ण स्वार्थ-परता परिपुष्ट होती चली जाती है और आकाँक्षाओं का केन्द्र-बिन्दु लोभ-मोह के-वासना तृष्णा के इर्द-गिर्द घूमने लगा है। परिस्थिति बदलनी हो तो मनःस्थिति बदलनी होगी चिन्तन का प्रतिफल कर्म है और कर्म के वृक्ष पर परिणाम के फल-फूल लगा करते हैं। मनःस्थिति सुधरने के अतिरिक्त परिस्थिति बदलने का और कोई आधार हो ही नहीं सकता। नरक और स्वर्ग हम स्वयं ही तो सृजन करते हैं। भाग्य का निर्माता मनुष्य स्वयं ही तो है। चिन्तन को बदला जा सके तो प्रवृत्तियाँ उलटेंगी फलतः अंधकार को निरस्त करने वाला नवयुग का स्वर्णिम प्रभात उदय होते हुए हर किसी को दृष्टिगोचर होगा।

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साधना समर बनाम जीवन संग्राम

साधना को ‘समर’ कहा गया है। जीवन को ‘संग्राम’ माना गया है। महाभारत का ऐतिहासिक रूप जो भी रहा हो, वह हमारे जीवन-क्रम में अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। अंतर्द्वंद्व के रूप में वह समुद्र मंथन हर घड़ी सामने खड़ा रहता है। दैवी और आसुरी वृत्तियाँ अपनी-अपनी ओर जीव को घसीटने के लिए घोर प्रयास करती रहती हैं। जिसे जितना खाद, पानी मिलता है वे उसी अनुपात से बढ़ती हैं। जिसे जितना उपेक्षित एवं विभुक्षित रहना पड़ता है वह उतनी ही दुर्बल परास्त होती चली जाती हैं।

साधना के दो प्रयोजन हैं-एक संचित कुसंस्कारों का उन्मूलन-दूसरे सत्प्रवृत्तियों की सुदृढ़ संस्थापना। अवरोधों को हटाने और सहायक साधनों को बढ़ाने की हर प्रयोजन में आवश्यकता पड़ती है। आत्मिक प्रगति के लिए भी यही उभय-पक्षीय प्रयत्न करना पड़ता है।

भगवान के अवतार के यही दो प्रयोजन हैं-अधर्म का उन्मूलन ओर धर्म का संस्थापन। गीता में भगवान के अनेकों अवतारों के यही दो उद्देश्य-‘यदा-यदा हि धर्मस्य’ और ‘परित्राणाय साधूना’ वाले आश्वासनों में घोषित किये गए हैं। आत्म-चेतना का परिष्कार व्यक्ति में ईश्वर का अवतरण कहा जा सकता है। उसमें पुण्य प्रयोजनों को अपनाने की ही नहीं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन की भी उमंग समान रूप से काम कर रही होती है। कुसंस्कारों को काट फेंकना आत्मिक पुरुषार्थ में सर्वोपरि माना गया है। कुसंस्कार कितने प्रबल होते हैं, उनकी दुरुहता को महाभारत की एक उक्ति में बताया गया है-‘‘जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति- जानाम्य धर्म न च मे निवृत्ति” अर्थात् धर्म का स्वरूप मालूम तो है, पर उसमें प्रवृत्ति ही नहीं होती। इसी प्रकार अधर्म के दुष्परिणाम भी विदित हैं, पर उनसे छूटना भी बन नहीं पड़ता।

हल जोतना और बीज बोना परस्पर विरोधी प्रक्रिया है। जोतने में खोदने का अवाँछनीय को हटाना लक्ष्य है और बोने में कुछ डाला, रोपा और उगाया जाता है। भवन-निर्माण में नींव खोदने में गड्ढा किया जाता है और फिर उस पर चिनाई आरम्भ करके दीवार खड़ी की जाती है। यह दोनों कृत्य परस्पर विरोधी होते हुए भी एक दूसरे के पूरक हैं।

विचारों से विचार और कर्मों से कर्म काटे जाते हैं। पाप कर्मों से निवृत्ति के लिए एक ही उपाय है कि उनके प्रतिपक्षी पुण्य कर्म उतने ही प्रबल स्तर के आरम्भ कर दिये जायं। प्रायश्चित्यों की-पुण्य प्रयोजनों की प्रक्रिया अपनाने का महत्व शास्त्रकारों ने इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए बताया है। लोक-मंगल की-सत्प्रवृत्ति संवर्धन की गतिविधियाँ न अपनाई जायं तो संचित पाप कर्म कट नहीं सकेंगे। आग को बुझाने के लिए पानी की जरूरत पड़ती है। पाप कर्मों की विभीषिका जलती हुई आग के समान है। सत्कर्मों में प्रवृत्त होकर ही उन्हें शान्त किया जा सकता है। पूजा-पत्री के तथा सरल कर्मकाण्डों की लकीर पीट देने से पापों की निवृत्ति होने की बात सोचना व्यर्थ है। जितना भारी पाप था उतना ही वजनदार पुण्य होना चाहिए, तभी सन्तुलन बनेगा। सड़क पर गड्ढा खोदकर दूसरों को गिराने का जो उपक्रम किया गया है उस दुष्कर्म की निवृत्ति के लिए आवश्यक है कि जितना श्रम गड्ढा खोदने में किया गया है उतना ही मिट्टी ढोकर उसे पाटने में किया जाय। क्षति पूर्ति के लिए हर्जाने देने पड़ते हैं। मुख से क्षमा माँग लेने या पत्र पुष्प, दण्ड प्रणाम जैसी चिन्ह पूजा कर देने से किसी के साथ क्षति पूर्ति का समझौता नहीं होता। ऐसे प्रसंगों में अदालतें क्षति के समतुल्य ही उचित हर्जाना दिलाती हैं।

विचारों की काट विचारों से होती है। पतनोन्मुख प्रवृत्ति नीचे गिराने में पृथ्वी की आकर्षण शक्ति जैसा कार्य करती है। पानी गिरने पर नीचे की दिशा में सहज ही बहने लगता है। पर यदि उसे ऊँचा उठाना हो तो पम्प, रस्सी या अन्य प्रकार के साधन जुटाने की तथा ताकत लगाने की आवश्यकता पड़ती है। अनैतिक, कुविचार समीपवर्ती वातावरण में से उड़-उड़कर सहज ही मस्तिष्क पर छाते हैं और अपने आकर्षक प्रभाव से चिन्तन चेतना को जकड़ लेते हैं। इन्हें काटने के लिए विपरीत स्तर के सद्विचारों को पढ़ने, सुनने, सोचने, मनन करने एवं अपनाने के लिए प्रबल प्रयत्न करने की आवश्यकता होती है। यह कार्य विचार संघर्ष का महाभारत खड़ा किये बिना और किसी तरह सम्भव नहीं हो सकता।

पाण्डवों को तथा अन्य धर्म समर्थकों को प्राण हथेली पर रखकर लड़ना पड़ा था। लंका काण्ड में भी रीछ, बानरों ने राक्षसों के साथ कट-कटकर युद्ध किया था। इसका महाभारत और रामायण में विस्तारपूर्वक वर्णन हुआ है। वस्तुतः जीवन-साधना के प्रत्येक साधक को ऐसा ही अन्तःयुद्ध करना पड़ता है। गीता और रामायण पढ़ने-सुनने का लाभ तभी है जब इन महायुद्धों में लड़ने वाले वीर धर्म प्रेमियों की तरह हमारा भी उत्साह, उमंगें और वैसा ही पराक्रम करने के लिए शौर्य, साहस क्रियाशील हो चले ।

शरीर पर छाया हुआ आलस्य और मन पर छाया हुआ प्रमाद चन्द्र-सूर्य पर छाये हुए राहु केतु द्वारा लगे हुए ग्रहण की तरह हैं। इन अवाँछनीयताओं से पिण्ड छुड़ाया जाना चाहिए, शरीर में श्रमशीलता और मन में उत्साह भरी तत्परता का समावेश रहना चाहिए। इन्द्रियाँ कुमार्गगामी होकर वासनात्मक अनाचारों को जन्म देती हैं, कुकर्मों से शरीर दुर्बल एवं रुग्ण बनता है, वासना की पिशाचिनी ओजस् भी नष्ट करती है और तेजस् भी। व्यक्ति खोखला होता चला जाता है। मन पर छाई हुई तृष्णा और अहंता अटपटे, उद्धत और निरर्थक संचय एवं अपव्यय के ढकोसले खड़े करती है। उन्हीं विडम्बनाओं में बहुमूल्य जीवन सम्पदा समाप्त हो जाती है। इस सुर-दुर्लभ अलभ्य अवसर को गँवाते हुए मनुष्य ऐसे ही खाली हाथ चला जाता है। जीवनोद्देश्य पूरा करने के स्थान पर चिरकाल तक कष्ट देने वाली पापों की पोटली ही सिर पर लदी होती है।

चिन्तन और कर्तृत्व को यदि सँभाला, सुधारा न जाय तो पतन के गहरे गर्त में गिरने की गति निरन्तर तीव्र होती जाती है। भव-बन्धन निरन्तर कड़े होते जाते हैं। इस स्थिति से बचना हो तो अपने आपे के साथ प्रबल संघर्ष खड़ा करना होता है। अनायास ही इस दुर्गति से कोई छूट नहीं सकता।

उपार्जन क्षेत्र की पवित्रता स्थिर रखने के लिए लोभ से जूझना पड़ता है और सादगी एवं सचाई की नीति अपनानी पड़ती है। परिवार का सन्तुलन सही रखना हो तो मोह से बचते हुए कर्त्तव्य तक सीमित रहना होगा। परिवार के लोगों के प्रति असाधारण मोह ही उनका स्तर गिराने और अपने कर्त्तव्यच्युत होने का प्रधान कारण होता है। यदि परिजनों की उचित-अनुचित माँगों को, प्रसन्नता-अप्रसन्नता को महत्व न दिया जाय और विवेक दृष्टि रखते हुए उनके कल्याण एवं अपने कर्त्तव्य भर की बात सोची जाय तो प्रत्येक परिवार का स्तर ऊँचा रह सकता है और उसमें से नर-रत्नों के उत्पन्न होने का आधार बन सकता है। इसके लिए अपने मोह और उनके आग्रह की उपेक्षा करके औचित्य अपनाने का साहस जुटाना पड़ेगा। बहुत करके अपने साथ और कभी-कभी परिवार के लोगों के साथ भी झगड़ना पड़ेगा।

सम्पत्ति पर से स्वामित्व की मान्यता हटा ली जाय और उसे सार्वजनिक सम्पत्ति की तरह-दूरदर्शी ट्रस्टी की तरह मात्र उपयोगिता का ध्यान रखकर ही खर्च किया जाय तो प्रत्येक पैसा सदुपयोग में ही खर्च होगा और उससे सर्वतोमुखी कल्याण ही कल्याण उत्पन्न होगा। ऐसी मनःस्थिति में धन उपार्जन भी योगाभ्यास की ही तरह एक हितकारी कार्य बन जाता है। धन उपार्जन में जितना शारीरिक श्रम करना पड़ता है उतनी ही प्रखरता यदि उसके उपयोग में बरती जाय तो उत्पादक के सारे प्रयास लोक-साधना बनकर रहेंगे। अपनी लोभ, मोह-ग्रसित दूषित दृष्टि से लड़-झगड़कर ही ऐसी निर्मल मति उत्पन्न की जा सकती है।

परिवार के लोगों तथा अन्य स्वजन सम्बन्धियों, मित्र, सहचरों से एक आँख प्यार की एक आँख सुखार की रख कर ही चलना चाहिए। उचित को मानने और अनुचित को न मानने की गति अत्यन्त स्पष्ट रखनी चाहिए। उन्हें दुलार का उपहार भी सच्चे मन से दिया जाय तो नीति और आदर्शों के सम्बन्ध में किसी का भी दबाव स्वीकार न किया जाय। मित्रता की सार्थकता इसमें है कि स्वजनों को अधिक परिष्कृत बनाया जाय। इसके लिए अवाँछनीयताओं को बदलने के लिए परामर्श से काम न चले तो विरोध और असहयोग की नीति भी अपनाई जा सकती है। देखने में यह झंझट खड़ा करने जैसी बात है पर इसके बिना धर्म संकट से किसी दूरदर्शी का पीछा भी नहीं छूट सकता। सबका प्यारा बनने-सब की हाँ में हाँ मिलाने-सबको खुश करने की नीति अपनाने वाले वस्तुतः अपना और उन सबका अहित ही करते हैं जिन्हें प्रसन्न रखने की बात सोची गई थी।

माली को कठोर कर्त्तव्य निबाहने पड़ते हैं। वह पौधों को खाद, पानी देता है, रखवाली करता है और फलने-फूलने की स्थिति तक पहुँचाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करता है। इतने पर भी समय-समय पर काट-छाँट करने में भी चूकता नहीं। यदि वह मोहग्रस्त मनःस्थिति बना ले तो फिर पौधों के नीचे खर-पतवार को निराना-उखाड़ना और छितराई हुई टहनियों की काट-छाँट कर सकना भी उसके लिए सम्भव न होगा। यह मोहग्रस्तता उसे माली के पवित्र कर्त्तव्य से च्युत करेगी और उसके प्रिय उद्यान का विकास ही रुक जायगा। स्वजनों के प्रति माली जैसी दृष्टि रखकर अपने व्यवहार को दूरदर्शितापूर्ण बनाया जाना चाहिए।

समाज में अनेकों कुरीतियाँ, मूढ-मान्यताएँ, अंधपरंपराएं प्रचलित हैं। अनाचार और भ्रष्टाचार की कमी नहीं। उन्हें अस्वीकृत किया जाना चाहिए और जो लोग अपनाते हैं उनके साथ विरोध एवं असहयोग की नीति बरती जानी चाहिए। जहाँ आवश्यक हो वहाँ सीधे संघर्ष की नीति भी अपनाई जानी चाहिए और उसके लिए यदि जोखिम उठानी पड़े तो उन्हें भी शिरोधार्य करने का साहस जुटाना चाहिए।

सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन आधा भाग है-दुष्प्रवृत्तियों के निवारण का दूसरा पक्ष जुड़ जाने से ही बात पूरी बनती है। धर्म कर्मों में हमारी अधिकाधिक रुचि होनी चाहिए। पूजा-उपासना से लेकर दान-पुण्य तक के विविध प्रयोजन पूरे करने चाहिएं और सत्कर्मों में निरत रहना चाहिए किन्तु साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए यह एकाँगी क्रिया-कलाप सर्वथा अपर्याप्त है। उसके साथ अवाँछनीयताओं के उन्मूलन का साहस भरा प्रयोग अविच्छिन्न रूप से जुड़ा ही रहना चाहिए।

शक्ति की, सिद्धि की, देवी भगवती दुर्गा ने बताया था कि वे किसे वरण करेंगी। दुर्गा सप्त शती में उनके अभिमत का इस प्रकार उल्लेख है-

योमाँ जयति संग्रामे, यो में दर्पो व्यपोहृति। यो मे प्राति वलो लोके से मे भर्ता भविष्यति।।

अर्थात् जो मुझे संग्राम में जीत सके, मेरी चुनौती स्वीकार कर सके, जो अपने बल को मेरे बल के साथ तोल सके वही मेरा स्वामी बन सकेगा।

समृद्धि, सम्पत्ति, प्रगति एवं सफलता का आधार शक्ति है। शक्ति के मूल्य पर ही सिद्धियाँ मिलती हैं। उन्हीं के आधार पर साँसारिक सुख और आत्मिक सन्तोष की संभावनाएं बनती हैं। शक्ति संघर्ष से उत्पन्न होती है। अस्तु सहयोग और संघर्ष की-अभिवर्धन और उन्मूलन की उभय-पक्षीय रीति-नीति अपनाते हुए ही हमें जीवन सन्तुलन बनाना चाहिए। सफल वर्तमान और उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण इसी आधार पर हो सकता। अध्यात्म विज्ञान में इस समन्वय नीति को अपनाने के लिए ही निर्देश किया गया है।


मनुष्य ने पृथ्वी से शिकायत की (kahani)

मनुष्य ने पृथ्वी से शिकायत की-हम से इतना कठोर परिश्रम कराने के उपरान्त तब कहीं अन्न देती हो। यदि ऐसे ही अनाज उगा दिया करें तो आपको क्या घट जायेगा ?

पृथ्वी ने गम्भीर मुद्रा में कहा-‘‘मेरा तो कुछ घटेगा नहीं, वरन् गौरव ही बढ़ेगा। पर मुफ्त में बिना परिश्रम का अनाज खाकर तेरी प्रतिष्ठा चली जायगी-‘‘वत्स।”

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विकास प्राणी की इच्छित दिशा में ही होता है।

इन दिनों जीव-विज्ञानी विकासवाद के सिद्धान्त का बहुमत से समर्थन कर रहे हैं। यह मान्यता बहुचर्चित-बहुश्रुत होते-होते बहुमान्य भी हो गई है कि जीवन का आरम्भ अविकसित स्तर पर हुआ और वह क्रमशः आगे बढ़ता चला आया। आज-कल यही जाता है कि आदमी की आदि सत्ता अभिनन्दनीय नहीं है। उसका पूर्व इतिहास गौरवास्पद नहीं है। आज का मनुष्य अपने पूर्वजों से कहीं अधिक अच्छी स्थिति में हैं, यह मान्यता हमें अहंकारी ही नहीं बनाती वरन् पूर्वजों के प्रति अश्रद्धा, एवं उपहास के भाव भी पैदा करती है। ऐसी दशा में इतिहास का कोई मूल्य ही नहीं रह जाता। तब अविकसित लोगों के रचे हुए वेद, शास्त्र आज के विकसित लेखकों द्वारा लिखे गये अश्लील, जासूसी और तिलस्मी उपन्यास कहीं अधिक कला एवं कल्पना के आधार कहे जा सकते हैं।

यदि तथ्य ऐसे ही होते और उनके पीछे प्रमाण एवं तर्क का समुचित समावेश रहा होता तो जो कुछ कहा जा रहा है उसे सत्य की प्रतिष्ठा के नाम पर अपनाना ही समीचीन होता, भले ही उससे अतीत के प्रति उपहास बुद्धि ही क्यों न उपजती, भले ही पूर्वजों की क्षुद्रता पर व्यंग करना पड़ता और अपनी प्रगतिशीलता पर निस्संकोच गर्व करने का द्वार खुलता।

विकासवाद के सिद्धान्त का एक अंश ही ग्राह्य हो सकता है। जैसे बालक का शरीर और मस्तिष्क अविकसित होता है, समयानुसार उसकी सर्वतोमुखी प्रगति होती है और युवावस्था में पहुँचने पर वह प्रौढ़, प्रगल्भ परिपक्व बन जाता है। इतने पर भी उसकी मूल चेतना में शुक्राणु में ही वंश परम्परा की आश्चर्यजनक सम्भावनाएँ विद्यमान मानी जाती हैं। गेहूँ के बीज से गेहूँ उत्पन्न होता है। आम की आकृति और स्वाद का पूरा ढाँचा उस गुठली में भरा रहता है जिससे कि नया पौधा उगता है। इस वंशधर में अपने पूर्वजों के गुण ही विकसित होते पाये जायेंगे। विकास क्रम की यह परम्परा कहीं भी देखने में नहीं आती कि सरसों का बीज क्रमशः विकसित होते-होते कटहल जैसे फूल लगाने लगा हो। मूँग की बेल पर कद्दू जैसे स्वाद और आकार के फल लग सकना शायद कभी भी सम्भव न हो सकेगा।

प्रस्तुत विकासवाद के सिद्धान्त हमें यह सिखाना चाहते हैं कि जीव का मूल स्वरूप ही नहीं स्तर, स्वभाव और आधार भी विकसित, परिवर्तित होता आया है। एक कोषीय इन्द्रिय चेतना से रहित जीवनक्रम उलट-पुलट करते-करते मनुष्य जैसे विकसित प्राणियों की स्थिति में आ धमका है। इतना मान भी लिया जाय तो प्रश्न यह उत्पन्न होगा कि वर्तमान प्राणी जिस स्थिति में है वह कब तक बनी रहेगी ? विकास सिद्धान्त उनमें परिवर्तन करते-करते अन्ततः कहाँ पहुँचा देगा और प्रगति की अनन्त प्रक्रिया प्राणियों और पदार्थों को क्या स्वरूप प्रदान करेगी ?

विकासवादी व्याख्या के अनुसार ‘प्रोटोजोआ’ से मनुष्य क्रमशः विकसित हुआ। अमीना, स्पंज, हाइड्रस, फिर विभिन्न सीढ़ियाँ पार करता मछली, मेंढक, साँप, छिपकली, चिड़िया, घोड़े, हाथी, बंदर आदि विकसित होते-होते मनुष्य बना। जिस अंग का प्रयोग न किया जाए, वह जंग खा कर नष्ट हो जाता है। प्रयोग वाले अंग विकसित होते जाते हैं। यही है “थ्योरी आफ यूज एण्ड डिसयूज।” जीवों में अवशेष तथा विभिन्न प्राणियों की शारीरिक संरचना का तुलनात्मक अध्ययन कर विकासवादी क्रम निरूपण किया जाता है।

लेकिन यह विकासवादी व्याख्या बुद्धि संगत नहीं जान पड़ती। प्रकृति के परमाणुओं में भी ऐसी व्यवस्था नहीं कि एक बीज से दूसरे भिन्न बीज की या भिन्न बीज वाले पदार्थ की उत्पत्ति हो सके।

कार्नेल यूनीवर्सिटी के ‘सेल, फिजियोलॉजी ग्रोथ एण्ड डेवलपमेन्ट्स’ विभाग के निर्देशक श्री एफ0 सी0 स्टीवर्ड ने एक प्रयोग में एक गाजर काटी, उसमें असंख्य कोशिकाएँ थीं। प्रत्येक कोशिका में समान गुण थे। श्री स्टीवर्ड ने कुछ कोशिकाएँ निकालकर काँच की नलियों में रखीं और उनमें नारियल का पानी भर दिया। एक कोशिका के और टुकड़े नहीं किए जा सकते, पर नारियल का पानी पाते ही गाजर की कोशिकाएँ 1 से 2, 2 से 4, 4 से 8 के क्रम में बढ़ने लगीं और अन्त में प्रत्येक कोष एक स्वतंत्र गाजर का पौधा बन गया। इससे कोषों के भीतर अपनी जाति के नये कोषों को बना सकने की शक्ति का पता चलता है, पर नई जाति का कोष वे नहीं बना सकते।

सर्वप्रथम हमें विकासवादी सिद्धान्त की कुछ मुख्य स्थापनाओं का अवलोकन करना होगा। इसके अनुसार लगभग 10 लाख वर्ष पूर्व “आस्ट्रेलो पिथेकस’ नामक वनमानुष विकसित हुआ। जब पहला विशाल ग्लेशियर दक्षिण की ओर सरका तथा यूरेशिया और उत्तरी अमेरिका के बड़े हिस्से को ढंक लिया, उस समय यानी आज से 10 लाख वर्ष पहले यह ‘आस्ट्रेलो पिथेकस’ दक्षिण अफ्रीकी जंगलों में घूमता था और ‘जिन्जनथ्रोपस’ नामक वनमानुष उत्तरी अफ्रीका में। ‘आस्ट्रेलो पिथेकस’ चिम्पेंजी की तरह ही होता था, पर वह सीधा तनकर चलता था और वृक्षों पर कम, भूमि में अधिक रहता था। उसके दाँत आधुनिक मनुष्यों के दाँत जैसे थे। इसी ‘आस्ट्रेलो पिथेकस’ का विकास ‘पिथेकेन्थ्रोपाइन’ मनुष्यों के रूप में हुआ, जो अफ्रीका के साथ ही पीकिंग के आस-पास तथा जावा में भी रहते थे।

इसके बाद लगभग 60 हजार वर्ष पूर्व हुए ‘निएण्डरथल’ जो कि प्रारम्भिक मानव माने जाते हैं। इनमें बौद्धिक सामर्थ्य होने के प्रमाण मिले हैं। ये औजार बनाते थे, शिकार करते थे तथा अपने मृतकों को समारोह पूर्वक दफनाते थे। किन्तु अगले 50 हजार वर्षों में ये क्रमशः नष्ट हो गये और उनका स्थान ‘क्रो मैगनन’ मानव ने ले लिया आज से लगभग 10 हजार वर्ष पूर्व। ये वर्तमान मानव के पूर्व पुरुष माने जाते हैं।

अब यहाँ जड़ विकासवादी व्याख्या पर एक प्रश्न-चिन्ह लगता है-मनुष्य में अब कोई महत्वपूर्ण शारीरिक परिवर्तन क्यों नहीं हुए? क्या प्रकृति की विकास-प्रक्रिया रुक गई है?

दूसरा प्रश्न यह कि प्राणिशास्त्र के अनुसार जब प्रत्येक जीव में सामान्य से विकास में करोड़ों वर्ष लगते हैं, तब मनुष्य जैसे विलक्षण जीव के रूप में वनमानुष का सहसा विकास क्योंकर हुआ? क्योंकि वनमानुष से मनुष्य की मस्तिष्कीय संरचना तो भिन्न है ही, अन्य प्रमुख भिन्नताएँ भी हैं। शारीरिक संरचना भी बहुत भिन्न हैं। प्रकृति (स्वभाव) में अत्यधिक अन्तर है तथा यौन-आकांक्षाएं व प्रवृत्तियाँ तथा यौनावेगों का स्वरूप भी दोनों में सर्वतः भिन्न है।

विकासवादी सिद्धान्त के अनुसार 6 हजार वर्ष पूर्व सुमेरिया में गुफावासी आदिम मानव नीयोलिथिक रहता था। तब बुमेरियन सभ्यता इतनी विकसित क्यों थी? विकसित सुमेरियन सभ्यता के अनेकों प्रमाण मिले हैं। वहाँ नगर-जीवन, कृषि-विकास तथा कला क्षमताओं के प्रमाण मिले हैं।

हिन्दू सभ्यता और मयसभ्यता विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यताएँ मानी जाती हैं। दोनों सभ्यताओं में ऐसी गाथाएँ प्रचलित व लिपिबद्ध हैं जिनमें अन्तरिक्ष से आने वाले विमानों और देवताओं के विवरण हैं। यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है।

भू वेत्ताओं की कई खोजें भी विकासवाद की जड़वादी व्याख्या को असंगत ठहरा रही हैं। हाथी का ही आकार-प्रकार पहले क्रमशः बढ़ा और अब क्रमशः घट रहा है। पूर्वस्थिति में वापसी विकासवादी विश्लेषण के विरुद्ध है।

विश्व के विभिन्न हिस्सों में प्राप्त हाथियों के फासिल्स के आधार पर भू-वेत्ताओं ने निष्कर्ष निकाला है कि करोड़ों वर्ष पूर्व हाथी की उत्पत्ति हुई तथा उस समय वह कुत्ते के से आकार का होता था।

करोड़ों वर्ष पूर्व हाथी भारत में शिवालिक के जंगलों में विशाल संख्या में विचरते थे। शिवालिक घाटियों के भू-गर्भीय पाषाणों का अध्ययन विश्लेषण यह बतलाता है कि चार करोड़ वर्ष पहले ओलिंगोसीन युग से ही वहाँ हाथी थे। हाथी का आदिम विकास ‘मोरोथिरियम’ जीव रूप से हुआ। पहला हाथी ‘फियोमिय’ वर्ग का है, जो ‘मोराथिरियम’ का विकसित रूप कहा जाता है। ‘मोरोथिरियम’ गैंडे के से आकार के स्तनधारी जीव थे। ‘फियोमिय’ का आकार भी वैसा ही था। इसके बाद अगली पीढ़ी ‘टैटरा बेलोडान’ हाथियों की थी। फिर आये ‘मास्टाडान’ और तब ‘स्टेगोडान’। ‘स्टेगोडान’ का आकार-प्रकार ‘फियोमिय’ से बिलकुल भिन्न था। ‘फियोमिय’ तीन फुट ऊँचे थे। ‘टैटरा बेलोडान’ 5 फुट के, ‘मास्टाडान, 8-9 फुट ऊँचे और ‘स्टेगोडान’ की ऊँचाई 15 फुट थी। इस विशालकाय हाथी के नुकीले बाह्य दाँत 12 फीट लम्बे और 27 इंच व्यास के होते थे। अफ्रीका में उस समय जो हाथी थे, वे इनसे कुछ कम ऊँचे होते थे और उनके दाँत 23 इंच व्यास वाले तथा 10 फुट लम्बे होते थे। ‘स्टेगोडान’ के बाद शिवालिक के जंगलों में ‘अरकी डिस्कोडन प्लैनिफ्रानस’ नामक हाथी सत्ताधारी बना। इसकी खोपड़ी कुछ कम विकसित थी। हाथी का आकार भी धीर-धीरे घटने लगा। दाँतों की लम्बाई भी। अब 10 से 12 फुट ऊँचे हाथी होते हैं। इन दिनों भारतीय हाथियों की ऊँचाई लगभग 10-11 फुट और बाहरी दाँत की लम्बाई 8-9 फुट होती है। भू-तत्वशास्त्रियों के अनुसार हाथी की ऊँचाई फिर घटने लगी है। सम्भव है कि अगले 1-1॥ करोड़ वर्ष में वे फिर 3 फुट ऊँचे अर्थात् कुत्ते जैसे होने लगें।

यहीं हमें एक अन्य पहलू से भी विचार करना होगा। विश्व में तीन हजार-लाख वर्षों में जो जीवन-चक्र चल रहा है, वह आरम्भिक 2500 लाख वर्षों में अति मन्द गति से चला-उसमें केवल आदि जीवन के लक्षण हैं, जैसे कुकुरमुत्ता, जीवाणु आदि। 5 करोड़ वर्ष पूर्व से जीवन की विकास गति अधिक तीव्र हुई तथा 1 करोड़ वर्ष पूर्व पशु व वनस्पति जगत में विभिन्न प्रकार के जीवन के प्रमाण मिले हैं। मनुष्य के पूर्वज, जो कुछ लाख वर्ष पूर्व ही दृष्टिगोचर हुए, वे भी 1 लाख वर्ष पूर्व तक गुफावासी और पाषाण के उपकरणों पर निर्भर थे। मनुष्य का मानसिक विकास तो विगत 10-12 हजार वर्षों में हुआ तथा बौद्धिक विकास का अधिकतम प्रकाशन पिछले दो हजार वर्षों में हुआ है।

वर्तमान विकासवाद की एकांगी मान्यताएँ अपनी ही विसंगतियों के कारण आप ही सन्देहों और आक्षेपों की केन्द्र बनती जा रही हैं। प्रस्तुत कर्त्ताओं के तर्क उन्हीं के प्रतिपादित तथ्यों को काट रहे हैं। एक ओर तो अमीबा को ह्वेल और विशाल आकार में परिणत होने की बात कही जाती है तो दूसरी ओर आदिम काल के महागजों को मकुने भैंसें जितनी ऊँचाई के हाथियों की स्थिति में लौट पड़ने और महा सरीसृपों को छोटी छिपकली मात्र रह जाने के प्रमाण प्रस्तुत किये जाते हैं। आकृति और प्रकृति के इतने अन्तर पूर्वजों और उनके वर्तमान वंशजों में होना गले नहीं उतरता जिसमें उनकी मूल सत्ता का कोई आधार ही शेष न रह जाय।

अगले दिनों विकासवाद को अपने प्रतिपादनों में कई नये तथ्यों का सुधार समावेश करना होगा। प्राणी निरन्तर बढ़ ही नहीं रहे वे घट भी रहे हैं। मनःस्थिति और परिस्थिति के अनुरूप वे उठ भी सकते हैं और गिर भी। परिवर्तन उत्थान की दिशा में ही नहीं पतन की दिशा में भी हो सकता है। चलना आगे की ओर ही नहीं दाँई-बाँई और उलटी-तिरछी दिशा में भी सम्भव हो सकता है। यात्रा आकाश की ओर भी हो सकती है और पाताल की गहराई में उतरने को भी अपने ढंग की ‘प्रगति’ का नाम दिया जा सकता है। प्रकृति ने अथवा ईश्वरीय विधिव्यवस्था ने प्राणी को न तो प्रगति के लिए विवश किया है और न पतन के गर्त में गिरने से रोका है। प्राणी की स्वतन्त्र इच्छा शक्ति ही प्रधान है, वह किधर भी बढ़ या हट सकता है। यह सिद्धान्त ही अगले दिनों सर्वमान्य बन सकेगा।

ईश्वर ने हर प्राणी को अपनी स्वतन्त्र सत्ता सृष्टि के आरम्भ में ही दी है। अमीबा अभी भी अमीबा है। मनु की सन्तान मानव ने अपनी लम्बी यात्रा में कई उतार-चढ़ाव तो देखे होंगे। साधनों ने उसके चिन्तन कर्तृत्व एवं जीवनयापन के क्रम प्रकरण में भी परिवर्तन किया होगा इतने पर भी उसकी मूल सत्ता-जिसे ईश्वर की सर्वोत्कृष्ट कला-कृति कहा जाता है आरम्भ से ही अपनी मौलिक विशेषताओं को साथ लेकर जन्मी होगी और उन्हें पूर्णता का जीवन-लक्ष्य प्राप्त करने तक अपने अन्तरंग में धारण ही किये रहेगी।

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गीता का प्रतिपाद्य-अनासक्त कर्मयोग

गीता अध्यात्म विद्या का महत्वपूर्ण ग्रन्थ है। सात सौ श्लोकों को अठारह अध्यायों में गूंथकर यह छोटा-सा ग्रन्थ भारतीय दर्शन का अनुपम प्रतिनिधित्व करता है। यह समस्त भारतीय ज्ञान, भारतीय दर्शन, वेद शास्त्र, उपनिषद् आदि जो कुछ भारतीय हैं और जिस पर हमें गर्व है और जिसे हम भारतीयता कहते हैं, को सही और सार रूप में प्रस्तुत करने वाली एक ही पुस्तक है।

महाभारत काल में, जब कि लोग भूल चुके थे वास्तविक ज्ञान को, जीवन के सही मार्ग और दर्शन को और उलझे हुए थे कर्मकाण्ड में ताकि कामनाओं की पूर्ति हो सके, स्वर्ग की प्राप्ति हो सके और आराम का जीवन, विलासिता का जीवन जिया जा सके, एक दिव्य प्रकाश के रूप में गीता का अवतरण हुआ, जिसने अर्जुन को मोह से छुड़ा कर कार्यरत किया और भूली हुई, भटकी हुई मानव जाति को सन्मार्ग का दर्शन कराया।

गीता में बताया गया है कि मानव जीवन का लक्ष्य कर्मकाण्ड में वर्णित सकाम कर्मों द्वारा कामनाओं की पूर्ति करना नहीं है। यह लक्ष्य कर्मों और उसके परिणामस्वरूप जन्म-मृत्यु के बन्धन में डालने वाला होने के साथ-साथ बहुत हेय है और इसकी उस लक्ष्य से कोई तुलना नहीं है जो निष्काम कर्म या अकर्म द्वारा प्राप्त होता है। उस लक्ष्य का नाम योग है। हाँ-योग। योग का अर्थ होता है मिलन, बूँद का सागर से मिलन, किरण का सूर्य से मिलन, मनुष्य की आत्मा का उस परमतत्व से मिलन जिसको ब्रह्म कहते हैं, जो इस सृष्टि का आदि और अन्त है।

वह दृश्य देखते ही बनता है, जब नदी सागर में विलीन होकर अपना अस्तित्व खो देती है। आत्मा और परमात्मा का मिलन भी ऐसा ही परम आनन्ददायक है जिस की तुलना किसी अन्य साँसारिक सुख से हो ही नहीं सकती, जिसको पाकर संसार के सारे सुख फीके पड़ जाते हैं, जिस को पाकर सदा के लिए दुःखों से निवृत्ति हो जाती है।

उस योग का सीधा और सरल उपाय गीता में बताया गया है-‘‘निष्काम कर्म’’ अर्थात् कर्म द्वारा साँसारिक उपलब्धियों की इच्छा न करके, कामना रहित, आशा रहित, राग रहित, अहंकार रहित और भय रहित होकर अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करना और फल परमात्मा को समर्पित कर देना। कर्म करने के लिए मनुष्य विवश है। कर्म-बन्धन से छूटने के लिए अपनी चिन्तन प्रणाली में परिवर्तन करने में वह स्वतन्त्र है। यही मनुष्य का कर्त्तव्य है।

अपने कर्त्तव्य पालन में सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी, लाभ-हानि, जीत-हार, यश-अपयश, जीवन-मरण, भूत-भविष्य की चिन्ता न करके-कर्त्तव्य कर्म में रत रहना निष्काम कर्मयोगी का ढंग है। यह द्वन्द्व तो संसार में बारी-बारी से आते हैं और जाते हैं। इनका प्रभाव क्षणिक और अस्थाई है तथा केवल नाशवान शरीर पर प्रभाव तक सीमित है। स्थाई तो केवल आत्मा है, जो अछेद्य है, अदाहन, अक्लेद्य और अशोष्य है। उस आत्मा का उत्थान और पतन ही वास्तविक उत्थान और पतन है। आत्मा का कल्याण योग में निहित है। उसी ओर मनुष्य स्वाभाविक गति से बढ़ रहा है यदि कामना, आशा, आसक्ति और अहंकार उसमें बाधा न डालें। अतः धर्म और अधर्म, अच्छाई और बुराई, ऊँच और नीच का विचार छोड़कर अपने स्वभाव के अनुसार निष्काम कर्म करना चाहिए।

गीता में यह भी बताया गया है कि स्वभाव के अनुसार ही मनुष्य चार प्रकार के होते हैं-ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य और शूद्र। इनके स्वभाव की व्याख्या भी की गई है। इन में छोटे-बड़े, ऊँच-नीच का प्रश्न ही नहीं उठता। यदि सभी लोग अपने-अपने स्वभाव के अनुसार कार्यरत रहें तो समाज की व्यवस्था स्वाभाविक और सुचारु रूप से चलते रहने में कोई सन्देह नहीं है।

कुछ विद्वानों के अनुसार इसमें कई योगों का, कई मार्गों का प्रतिपादन है जिनमें मुख्य हैं-कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग। परन्तु ऐसा भी नहीं है। युद्ध क्षेत्र में जब अर्जुन की बुद्धि अपने लिए मार्ग ढूँढ़ने में असफल रही तो दूसरे अध्याय में उन्होंने भगवान् श्रीकृष्ण से मार्गदर्शन की प्रार्थना की। दूसरे ही अध्याय में अर्जुन को मार्ग बताया गया। अर्जुन ने उसे ठीक से नहीं समझ पाया और तीसरे अध्याय के प्रारम्भ में ही प्रार्थना की कि मुझे भ्रम में मत डालिए। निश्चित रूप से मुझे एक ही मार्ग दिखाइये। ऐसी स्थिति में कई मार्ग बताना तर्क संगत नहीं है। गीता में आदि से अन्त तक एक ही मार्ग का प्रतिपादन है और वह है ‘‘निष्काम कर्मयोग’’ का। इसी निष्काम कर्मयोग के मार्ग पर दो तरह के लोग चलते हैं एक वे जो वर्णाश्रम के सिद्धान्तों के अनुसार जीवन बिताते हैं जैसे राजा जनक और दूसरे वे जो वर्णाश्रम के सिद्धान्तों को नहीं मानते जैसे स्वामी विवेकानन्द और शंकराचार्य। महात्मा गाँधी भी चालीस वर्ष की अवस्था तक प्रथम वर्ग में रहे परन्तु बाद में सत्य की शोध के लिए दूसरे वर्ग में आ गये।

वास्तव में प्रत्येक मनुष्य के, व्यक्तित्व के तीन पहलू होते हैं-कर्मात्मक, ज्ञानात्मक और भावात्मक। इसलिए एक ही व्यक्ति कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग का अनुसरण करता है। इन तीनों को अलग-अलग व्यक्तियों में विभाजित नहीं किया जा सकता। अर्जुन एक ही व्यक्ति थे। दूसरे अध्याय में उन्हें बताया गया कि निष्काम कर्मयोगी स्थितप्रज्ञ होता है और स्थितप्रज्ञ की पहचान उन्हें कराई गई। बारहवें अध्याय में उन्हें बताया गया कि निष्काम कर्मयोगी में आत्म-समर्पण की भावना होती है और भक्ति के लक्षण उन्हें बताये गए। तेरहवें अध्याय में उन्हें बताया गया कि निष्काम कर्मयोगी को प्रकृति-पुरुष का ज्ञान होता है और ज्ञान के लक्षण उन्हें बताये गए। चौदहवें अध्याय में उन्हें यह बताया गया कि निष्काम कर्मयोगी गुणातीत होता है और गुणातीत पुरुष के लक्षण उन्हें बताये गए। सोलहवें अध्याय में उन्हें बताया गया कि निष्काम कर्मयोगी दैवी सम्पदा सम्पन्न होता है और आसुरी सम्पदा ग्रहण नहीं करता, इसीलिए दैवी और आसुरी सम्पदा के गुण बताये गए। यद्यपि अलग-अलग अध्यायों में वर्णित होने के कारण अलग-अलग मार्गों और व्यक्तियों के लक्षण मालूम होते हैं, वास्तव में वे सब एक ही योगी के लक्षण हैं। निष्काम कर्मयोगी के लक्षण और अर्जुन को निष्काम कर्मयोगी बनने का उपदेश पूरी गीता में किया गया है।

इस प्रकार गीता के सभी अध्याय एक ही निष्काम कर्मयोग की माला में मोतियों की तरह पिरोये हुए हैं और गीता का प्रतिपाद्य विषय योग है जैसा कि प्रत्येक अध्याय के अन्त में लिखा है। उस योग अर्थात् आत्मा का परमात्मा से मिलन का उपाय निष्काम कर्म है। बार-बार योगी बनने और युद्ध करने के लिए ही गीता में कहा गया है। सकाम कर्म और आसुरी निषिद्ध कर्म की भर्त्सना की गई है।

वास्तव में गीता में एक ही योग है, एक ही मार्ग है, एक ही ज्ञान है, एक ही भक्ति है और विश्व को देखने का एक ही दृष्टिकोण है। निष्काम कर्मयोगी का वही मार्ग, वही ज्ञान, वही भक्ति और वही दृष्टिकोण होता है। उसी मार्ग का अनुसरण करने के लिए मानव मात्र का आवाहन किया गया है। वह मार्ग सबके लिए खुला है। कोई पापी या दुराचारी ही क्यों न हो इस मार्ग का अनुसरण करके पवित्रात्मा हो जाता है।

गीता एक ऐसे समाज की कल्पना करती है जिसमें प्रत्येक मानव को स्वतन्त्रता और समानता का अधिकार है। मनुष्य और मनुष्य के बीच धर्म, जाति, वर्ण, लिंग और धन की दीवारें नहीं हैं। प्रत्येक मानव अपने स्वभाव के अनुसार अनासक्त और निष्काम होकर मानव जाति की सेवा में लगा रहना अपना कर्त्तव्य समझता है तथा अकर्मण्यता, आलस्य और असुरता को त्याज्य मानता है। उसकी अपनी कामनाएँ और आवश्यकताएँ नहीं हैं। समाज की प्रगति और सम्पन्नता ही उसकी प्रगति और सम्पन्नता है। इस प्रकार के समाज का निर्माण करना प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य है। इन्हीं तथ्यों पर प्रकाश डालना और उन्हें अपनाने के लिए जनसाधारण को प्रोत्साहित करना यही ही गीता का उद्देश्य है। इसी को गीता का प्रतिपाद्य अनासक्त कर्मयोग कह सकते हैं।

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वरदान और अभिशाप की पृष्ठभूमि

दिव्यात्माओं के वरदान से सामान्य मनुष्य भी निहाल होते देखे गये हैं। पुराणों में ऐसी असंख्य कथा-गाथाएँ भरी पड़ी हैं जिनमें देवताओं एवं ऋषियों के अनुग्रह से लोगों ने ऐसी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं, जिन्हें वे अपने सामान्य प्रयत्नों एवं स्वल्प साधनों से नहीं ही प्राप्त कर सकते थे। कभी-कभी गुरुजनों का आशीर्वाद भी फलता है और किसी दीन-दुःखी की सहायता करके गिरे को उठा कर उपकार किया होगा तो उसकी कृतज्ञता अभिवृद्धि भी उपकारकर्त्ता के लिए कल्याणकारी परिणाम उपस्थित कर सकती है। न तो इतिहास के पृष्ठों पर वरदानों के सत्परिणाम बताने वाली घटनाओं की कमी है और न वर्तमान में भी ऐसे प्रसंग कम हैं जिनसे वरदान के प्रत्यक्ष परिणाम सामने आते हैं।

विशिष्ट संवेदनाओं के साथ प्रकट हुई सद्भावनाएं ही आशीर्वाद बन कर प्रस्फुटित होती हैं। ऐसे आदान-प्रदान मात्र शिष्टाचार अथवा माँगने देने के उपक्रम से सम्भव नहीं होते। क्योंकि गहरी संवेदनाएँ ऐसे ही अकारण नहीं उपज पड़तीं। किसान, माली, विद्यार्थी, व्यापारी, कलाकार आदि को अभीष्ट सफलताएँ प्राप्त करने के लिए आवश्यक मूल्य चुकाना पड़ता है। धरती की करुणा सुप्रसिद्ध है, पर बिना उर्वरक प्रयत्न किये वह भी किसी को अपना हरीतिमा एवं खनिज सम्पदा से लाभान्वित नहीं करती। गाय को दुहे बिना दूध निकालना कठिन है। वरदान प्राप्त करने की प्रक्रिया में वाचालता एवं बाल-उपहारों के सहारे प्राप्त करने की बात नहीं सोची जानी चाहिए। पात्रता और प्रामाणिकता के सहारे ही महत्वपूर्ण व्यक्तियों पर छाप छोड़ी जा सकती है। उदार होते हुए भी वे परखी होती हैं और आशीर्वाद रूप में परिणित होने वाली अपनी तप सम्पदा का कहाँ, कितनी मात्रा में और किस निमित्त, अनुदान दिया जाना चाहिए, उसे विवेकपूर्वक देखते समझते हैं और वही करते हैं, जो औचित्य की दृष्टि से सही सिद्ध होता है।

अब तक की इस प्रकार की घटनाएँ एक ही सुनिश्चित तथ्य उपस्थित करती हैं कि तप के मूल्य पर ही वरदान मिले हैं। तप का अर्थ शरीर उत्पीड़न नहीं वरन् आदर्शों के लिए त्याग बलिदान प्रस्तुत कर सकने एवं कष्ट सह सकने की उदात्त निष्ठा का परिचय देना है। दूसरे शब्दों में इसी वर्चस्व को उस स्तर की प्रामाणिकता कहा जा सकता है जिससे द्रवित होकर उच्चस्तरीय आत्माएँ अपनी दिव्य सम्पदा का पय-पान कराती हैं। मात्र दर्शन, प्रणाम, पुष्प अक्षत एवं गिड़गिड़ाने की कीमत पर कोई छुटपुट भीख मिल सकती है, पर कोई कहने योग्य लाभ इस उथली विडम्बना द्वारा प्राप्त कर सकना सम्भव नहीं होता। मात्र भिक्षुक की याचना ही तो सब कुछ नहीं है। दानी को अपनी जेब, याचक का स्तर और दान के सदुपयोग आदि तथ्यों का ध्यान रखना होता है। दुःखी, दरिद्र, लोभी, लोलुप भी यत्किंचित् वरदान जहाँ तहाँ से बटोर सकते हैं, पर वे होते उतने ही हैं जितने समुद्र तट पर बिखरे सीप, घोंघे बीनना। महत्वपूर्ण आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए प्राप्तकर्त्ता को भी उसी स्तर की उदारता का परिचय देना पड़ता है जैसा कि दाता से उदार अनुग्रह करने की अपेक्षा की गई है। आदान के साथ प्रदान का ध्यान न रखने वाले सामान्य व्यवहार की दृष्टि से भी घाटे में रहते हैं और उच्चस्तरीय अनुदान पाने की औंधी-तिरछी तिकड़में भी व्यर्थ चली जाती हैं। स्वयं संकीर्ण स्वार्थपरता से बेहतर जकड़े हुए लोग जब किन्हीं दिव्यात्माओं से अपनी कष्ट संचित सम्पदा मुफ्त में ही-बिना औचित्य का ध्यान दिये ही उड़ेल देने की अपेक्षा करते हैं तो वे विश्व की सुनियोजित विधि व्यवस्था को ही झुठलाते हैं।

वरदान एक तथ्य है। आशीर्वाद का सत्परिणाम सुनिश्चित है, पर वह निकलना गहन अन्तस्तल से चाहिए। दिव्य शक्तियों को प्रसन्न करने के लिए बलिदान और दिव्यात्माओं का अनुग्रह पाने के लिए तप करना पड़ता है। इन शब्दों का सही अर्थ न समझने वाले प्राणी वध जैसे क्रूर कर्म को बलिदान से जोड़ते और शरीर उत्पीड़न को तप मान बैठते हैं, जब कि यह दोनों ही प्रयोग आदर्शों के लिए उदारतापूर्वक कुछ महत्वपूर्ण त्याग करने और कष्ट सहने की गतिविधियाँ अपनाने पर ही क्रियान्वित होते हैं।

वरदान की तरह आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों के रोष अभिशाप बन कर भी सामने आते हैं। गुरुजनों का असन्तोष भी कष्टकारक होता है। अभिभावकों के साथ दुष्टता बरतने वाली सन्तानें अभिशप्तों की तरह दुःख पाती हैं। निर्दोष को सताने, छल और विश्वासघातपूर्वक किसी को तिलमिला देने वाले लोग भी उनकी ‘हाय’ के शिकार बनते हैं और अपना बोया आप काटते हैं। ऐसे लोगों को इस प्रकार के शोक-सन्ताप सहन करने ही पड़ते हैं।

अभिशापों के दुःखद परिणामों की घटनाएँ भी वरदान अनुदानों की तरह ही सुविस्तृत हैं। शाप-सन्तप्त लोगों को क्या-क्या सहना पड़ा इसकी अगणित घटनाएँ प्राचीन काल की भी मौजूद हैं और आज भी उनकी कमी नहीं है।

सगर पुत्रों का कपिल मुनि के शाप से भस्म हो जाना शृंगी ऋषि के शाप से परीक्षित को साँप द्वारा काटा जाना, मेघदूत वर्णन में यक्ष का वियोग दुःख सहना, गांधारी के शाप से यदुकुल का लड़ मर कर समाप्त होना, नहुष का सर्प बनना, त्रिशंकु का उलटा लटकना, दमयन्ती के शाप से व्याध की दुर्गति होना जैसी असंख्य पुराण कथाएँ सुनी जाती हैं।

शाप प्रकरण के वर्तमान घटनाक्रम भी कम नहीं हैं। विगतकाल के अनेकों प्रमाण इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि अभिशाप न केवल व्यक्तियों के पीछे पड़ कर उन्हें भाँति-भाँति के कष्ट देता है वरन् पदार्थों तक पर छा जाता है और उन वस्तुओं के सम्पर्क में आने वाले व्यक्ति भी आग छूने पर जलने की तरह कष्ट भुगतते हैं।

मिश्र के पिरामिड समूह में एक कब्र वहाँ के किसी तूतन खामन नामक राजकुमार की है। उसके बाहर एक शिलालेख पर लिखा है-‘‘इस कब्र से छेड़खानी करने वाले को बेमौत मरना पड़ेगा।” पुरातत्ववेत्ताओं ने कुछ समय से इसकी खोजबीन करने के सिलसिले में उखाड़ पछाड़ की और उनमें से अधिकाँश को सचमुच ही बेमौत मरना पड़ा।

यूरोप भर में ‘होप हीरा अपनी मनहूसियत के लिए बहुत समय चर्चा का विषय बना रहा है। यह हीरा बर्मा के एक बौद्ध मन्दिर की प्रतिमा में जड़ा था।’ इसे वहीं से वेपटिस्ट अर्वानेयर नामक अँग्रेज ने चुराया था। इसे ‘टामस होप’ नाम जौहरी ने खरीदा और वह कुछ ही दिन में दिवालिया हो गया। वहाँ से उसे वाशिंगटन की कोई धनी युवती-इवलिन मेक्वीन रेनाल्ड खरीद ले गई। कुछ महीने के भीतर ही उस पर ऐसा उद्वेग छाया कि नींद की गोलियाँ खाकर आत्म-हत्या कर ली। वहाँ से वह ‘एण्यनर’ नामक ठेकेदार के पास पहुँचा। परस्पर के झगड़ों में शत्रुओं ने उसका सिर ही काट लिया।

यहाँ से वह आगे बढ़ा राजकुमारी लम्बल उसे खरीद ले गई, उनकी भी हत्या हो गई अब ‘होप’ एक नये जौहरी फास की दुकान की दुकान में पहुँचा और चोरी चला गया। चोर की भी खैर नहीं रही उसने भी एक सप्ताह के भीतर ही आत्म-हत्या कर ली। पीछे अभिनेत्री फालीजवर्गन उसे खरीद ले गई। वह उसे पहन कर पहली बार ही रंग मंच पर उतरी थी कि किसी दर्शक ने गोली मारकर उसे ढेर कर दिया। स्टॉक मार्केट के करोड़पति व्यापारी ने उसे खरीदा तो उसका भी दिवाला निकल गया। वहाँ से ‘होप’ अरब के सुल्तान अब्दुलहमीद के यहाँ पहुँचा और उन्हें भी गद्दी से उतरना पड़ा। एक धनी महिला वाल्य मैकलीन ने उसे जिस दिन खरीदा ठीक उसी दिन उनका लड़का किसी मोटर की चपेट में कुचल कर मर गया।

कुछ दिन तो यह घटनाएँ व्यक्तिगत जानकारी तक सीमित बनी रहीं, पर पीछे जब सारे सूत्र मिलाये गये तो पता चला कि वह हीरा कितना दुर्भाग्यग्रस्त था।

कराची (पाकिस्तान) के एक भूमिप्लाट के दुर्भाग्यग्रस्त होने का विवरण कितने ही पत्रों में छपा था। कहते हैं कि उस जमीन में किसी पीर की कब्र है। वह आत्मा नहीं चाहती कि उस भूमि का कोई उपयोग करे। इस जमीन पर जो भी अधिकार करता है वही भारी विपत्ति में फँसता है। इस जमीन को खरीदकर एक पारसी ने बँगला बनाया। वह स्वयं-उसके दोनों पुत्र दुर्घटनाग्रस्त होकर कुछ ही दिन में मर गये। फिर उसे एक अंग्रेज ने खरीदा वह पागल हुआ और उसकी स्त्री ने आत्म-हत्या कर ली। इसके बाद चार अँग्रेज सेनाधिकारी उसमें रहे और वे भी दुर्घटनाग्रस्त होकर मर गये। इसके बाद वहाँ अमेरिकी दूतावास बना तो राजदूतों को आये दिन विपत्तियों का सामना करना पड़ा। इसके बाद उनने भी अन्यत्र दूतावास बना लिया।

बहुत समय तक यह कार सेराजेवो के गवर्नर के महल में रखी रही। पीछे उसे सेनापति पोत्थोरेक द्वारा अपने प्रयोग में लाया जाने लगा। सेनापति पर दुर्भाग्य बरसा। वे एक छोटी लड़ाई हार जाने के कारण पदच्युत कर दिये गये। अन्त में दुर्दिन गुजारते हुए वियना में एक भिखारी के यहाँ आश्रय पाकर मौत के मुँह में चले गये।

एक दिन एक कप्तान उसकी जाँच-पड़ताल करने सड़क पर ले गया तो वह एक पुलिया से जा टकराई और उसी दुर्घटना में उस बेचारे का भी प्राणान्त हो गया।

पीछे वह यूगोस्लाविया के गवर्नर के स्वामित्व में पहुँची। एक महीने के भीतर ही उसने पाँच दुर्घटनाएँ कीं और अन्तिम में तो गवर्नर का दाहिना हाथ ही कट गया। गवर्नर ने उस मनहूस को नष्ट कर देने का हुक्म दिया था, पर एक दुस्साहसी डॉक्टर ने अनुरोधपूर्वक उस लाखों रुपये की सम्पत्ति को कौड़ी मोल मात्र एक हजार रुपये में खरीद लिया। खरीदार का नाम था सरकिस। वह मनहूसी को अन्ध-विश्वास कहता था और वैसा समझने वालों का उपहास उड़ाता था। कोई ड्राइवर उसका चालक बनने को तैयार न हुआ तो वह स्वयं ही चलाने लगा। एक दिन वह कार न जाने कैसे बेलन की तरह लुढ़की और एक खड्ड में गिर पड़ी। वह बनी बहुत मजबूत थी इसलिए इतनी दुर्घटनाओं के बाद भी वह जीवित बनी रही और मामूली-सी मरहम पट्टी कराने के बाद स्वस्थ होती रही। यहाँ से बिकी उसे एक व्यापारी ने खरीदा और आत्म-हत्या करके अपनी जान गँवा बैठा। पीछे एक और डॉक्टर ने खरीदा जिसका धन्धा ही चौपट हो गया। उन्हीं दिनों स्विट्जरलैण्ड में कार दौड़ प्रतियोगिता हो रही थी। एक ड्राइवर ने इसके लिए उस गाड़ी को अधिक उपयुक्त समझा और खरीद लिया। दौड़ में अन्य गाड़ियाँ तो आगे-पीछे रहने का रिकार्ड बनाती रहीं, पर यह शाही कार एक दीवार से जा टकराई और ड्राइवर के प्राण लेकर एकान्त में बैठी रही।

एक मनचले किसान ने उसे सस्तेपन के लोभ में खरीद लिया। एक दिन वह बीच रास्ते में ही अड़ गई। सारे प्रयत्न करने पर भी उसे आगे न धकेला जा सका तो अन्ततः मजबूत बैलों से मोटे रस्सों के सहारे घसीट ले चलने का प्रबन्ध किया गया। इस प्रकार कुछ ही दूर खिसकी होगी कि अचानक स्टार्ट हो गई और बैलों को कुचलती हुई मालिक को भी डकार गई।

कार के साथ जुड़ा दुर्भाग्य लोगों को विदित तो था फिर भी दुस्साहसियों की कमी नहीं। ‘ड्राइवर हर्शफील्ड’ नामक एक मिस्त्री ने उसे खरीदा और अपने हाथों नये सिरे से मरम्मत करके उसे काम में लाने लगा। एक दिन हर्शफील्ड अपने चार मित्रों समेत किसी भोज में उसी पर सवार होकर जा रहा था कि सामने से आती एक मोटर से भयंकर टक्कर हो गई। दूसरी गाड़ी को तो कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ, पर वे पाँचों व्यक्ति बुरी तरह घायल हो गये। उनमें से एक ही किसी प्रकार जीवित बच सका।

इस दुर्भाग्यग्रस्त कार का क्या हो? वह बहुत कीमती भी थी और आकर्षक भी। अन्ततः उसे सरकार द्वारा आस्ट्रिया के अजायब घर में रखवा दिया गया। उन दिनों प्रथम विश्व युद्ध चल रहा था। शत्रु के वायुयानों ने उस अजायब घर पर बम गिराये और इमारत के साथ उस कार की भी धज्जियाँ उड़ा दीं। इस प्रकार उस कार के साथ-साथ महायुद्ध का भी अन्त हो गया।

स्पेन का एक प्रतापी बादशाह हुआ है-‘एल्फँसो’। वह जन्मतः शाप सन्तप्त पैदा और जब भी उसने कभी कोई प्रयास आरम्भ किया तभी बुरी तरह असफल हुआ। उसके बारे में यह घोषणा सूक्ष्म दर्शियों ने आरम्भ से ही कर दी थी कि उसे चुपचाप किसी प्रकार दिन काटने चाहिएं। अन्यथा हर हलचल में उसे विपत्ति का सामना करना पड़ेगा।

इक्कीस वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उसे छह बार प्राण घातक हमलों का सामना करना पड़ा। जब वे कहीं गये तब वहाँ भी विपत्ति आई। एक बार वे इटली गये तो ठीक उन्हीं दिनों उस देश की पाँच नावें, एक पनडुब्बी तथा दर्जनों नाविक पानी में समा गये। यही उनकी पहली और अन्तिम यात्रा थी। जब भी उन्होंने कोई नया काम किया तभी उसमें भारी हानि उठानी पड़ी। वे डरे, सहमे महल में अपने दिन गुजारते थे। उनके शासन काल में प्रजा पर भी संकटों के बादल मँडराते रहे।

आधुनिक युग में भी विभिन्न सच्ची शाप कथाएँ सामने आई हैं और परामनोवैज्ञानिक उन पर खोज कर रहे हैं। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध है हिटलर के घनिष्ठतम सहयोगी रुडोल्फ हैस को मैक्सिको के एक गुप्त विधाविद् विशारद डॉक्टर द्वारा दिया गया स्मृति-भ्रंश का शाप।

हरहैस, हिटलर का रणनीति-निर्धारक परामर्शदाता था। सर्वाधिक तीक्ष्ण बुद्धि। विश्व युद्ध के दौरान मित्र राष्ट्रों के राजनेता जर्मनी के इस कूटनीतिज्ञ के चातुर्य से भयभीत हो उठे और उसे किसी भी तरह अक्षम बनाने का विचार करने लगे। पर यह सम्भव कहाँ था।

अन्त में ये राजनीतिज्ञ मेक्सिको के उक्त गुप्त विधा विशारद डॉक्टर को यह समझाने में सफल हुए कि विश्वशान्ति के लिए हैस को अक्षम बनाना आवश्यक है। डॉक्टर ने स्मृति-भ्रंश का शाप दिया और महान कूटवेत्ता, अप्रतिम मेधावी रुडोल्फ हैस स्मृति खो बैठा। पैराशूट से वह अपने शत्रु राष्ट्र इंग्लैण्ड में जा उतरा। उसका आतंक इतना था कि इंग्लैण्डवासी यह मानते रहे कि वह उन लोगों के गुप्त सैनिक भेद लेने के लिए स्मृति-भ्रंश का बहाना बना रहा होगा। पर धीरे-धीरे वास्तविकता स्पष्ट हो गई। हैस एक ही वाक्य अक्सर कहता-‘‘पता नहीं क्या हो गया मेरी स्मरण-शक्ति को? जैसे किसी ने उस पर एक आवरण डाल दिया हो।” न्यूरेर्म्वग जेल, जहाँ नाजी कैदियों को रखा गया था, वहाँ के मानस-रोग विशेषज्ञ डॉक्टर जी0एम0 गिलवर्ट ने ‘न्यूरेमवर्ग डायरी’ नामक अपनी पुस्तक में रुडोल्फ हैस के इस आकस्मिक स्मृति-भ्रंश पर प्रकाश डाला है। डॉ0 गिल्वर्ड स्वयं भी इसका कोई कारण नहीं जान पाये। काफी समय बाद उन्हें यह शाप वाली बात मालूम हुई

यहाँ स्मरणीय तथ्य यह है कि शाप अकारण ही किसी को नहीं दिया जा सकता। जब तक कोई तिलमिला देने वाली करारी चोट किसी को न लगे तब तक हास-परिहास में शाप नहीं दिया जा सकता। उसके पीछे कोई ठोस कारण होना चाहिए। दुष्टता एवं अनीति के बदले ही शाप दिये जा सकते हैं यदि भूल या भ्रम वश उतावली में शाप दिया गया हो तो वह उलट कर देने वाले का ही विनाश करता है। निर्दोष अम्बरीष को अकारण क्रोधजन्य होकर दुर्वासा ने शाप दिया है। वह उलट कर दुर्वासा पर ही संकट बनकर लौट पड़ा अन्यत्र भी ऐसा ही होता है। निर्दोष को शाप दिया जाना सम्भव नहीं। आत्मबल सम्पन्न भी वैसा नहीं कर सकते। वैसा प्रयास करने वाले तान्त्रिक, अघोरी, काल्पनिक स्तर के ओछे लोग अपनी संचित शक्ति को गँवा ही बैठते हैं अनीति अपनाने का दण्ड भुगतने के लिए प्रकृति व्यवस्था द्वारा बाध्य किये जाते हैं।

यदि हम अनीति से बचे रहें तो किसी के भी शाप से डरने की जरूरत नहीं है। किन्तु यदि स्वयं अन्याय करते हैं या अनीति में सहयोग देते हैं तो उसका दण्ड प्रकृति व्यवस्था के अनुसार तो निश्चित ही है। उसी में एक कड़ी दिव्यात्मा के रोष से उत्पन्न हुए अभिशाप की भी जुड़ सकती है।

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हम अहंकारी नहीं, स्वाभिमानी बनें।

भगवान के छोटे राजकुमार मानव ने आत्म-विश्वास रूपी अस्त्र ले इस धरती पर पदार्पण किया। जीवन-संग्राम में कठिन से कठिन कार्य भी आत्म-विश्वास के सहारे बड़ी सुगमता के साथ सफल हो जाते हैं। आत्म-विश्वास के प्रकाश में सम्पूर्ण उलझनपूर्ण समस्याओं का निदान खोजा जा सकता है।

विश्व के सभी महान दार्शनिकों एवं विद्वानों ने आत्म-विश्वास की महत्ता का बखान एक स्वर से किया है। भक्त कवि गोस्वामी तुलसीदास ने भवानी और शंकर के रूप में श्रद्धा और विश्वास को देखा। महात्मा टॉलस्टाय ने विश्वास को जीवन की शक्ति कहा तो शेक्सपीयर ने अथाह सागर में मार्ग ढूंढ़ निकालने का आधार बताया । स्वेट मार्डेन जैसे विद्वान ने विश्वास को मंजिल तक पहुँचाने का आधार कहा, तो महात्मा गाँधी ने जीवन नैया का पतवार। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि आत्म विश्वास के प्रकाश में ही भूले-भटके राही राह पाने में समर्थ हो सकते हैं।

आत्म-विश्वास का प्रादुर्भाव चेतना के प्रतिबिंब में अन्तर के दिव्य गुणों एवं शक्तियों के दर्शन करने से होते हैं। यह कोई वरदान या आशीर्वाद नहीं, बल्कि अन्तः करण की दिव्य-शक्तियाँ ही है। आत्म-सत्ता के हाथों अपने जीवन के पतवार को सौंपकर कर्त्तव्य-पथ पर चल पड़ना ही आत्म-विश्वास का सहारा लेना है। प्रगति की सारी सम्भावनाएँ इसी में हैं।

मृग की नाभि में कस्तूरी छिपी रहती है, लेकिन वह उसे ढूंढ़ने के लिए जंगल-जंगल भटकता फिरता है। हम मृग की इस मूर्खता पर भले ही हँस लें, लेकिन हम स्वयं अपने अन्तःकरण के अजस्र-शक्ति स्त्रोत को नहीं पहचान पाते। अपने अज्ञान और अविवेक के कारण हम भी दर-दर भटक रहे हैं। मानव प्रगति के जितने चरण आगे बढ़े हैं, वे सब विश्वास की फुलझड़ियाँ मात्र हैं। बड़े -बड़े आविष्कार तथा उपलब्धियाँ विश्वास की आधारशिला पर ही खड़ी हैं साधनों के अभाव रहते हुए भी विश्वास के बल पर विश्व के महान साहसी व्यक्तियों ने नई-नई खोजें कीं। कोलम्बस के आत्म-विश्वास ने अमेरिका को विश्व के रंग-मच पर ला खड़ा किया। नेपोलियन की विजयवाहिनी ने आल्पस-पर्वत को काट-छाँटकर अपने मार्ग से हटा डाला। सिकन्दर और मुसोलिनी के साहसपूर्ण कदमों ने विश्व को आश्चर्यचकित कर दिया। रामदूत हनुमान आत्म-विश्वास का सहारा लेकर समुद्र पार कर गये और सोने की लंका जला डाली।

अहंकार और आत्म-विश्वास का बाह्य-कलेवर देखने में एक समान दिखाई पड़ता है, लेकिन दोनों की आत्मा भिन्न है। महर्षि वशिष्ठ ने विश्वास को कुल की नारी और अहंकार को वेश्या की संज्ञा दी। स्वामी रामतीर्थ ने विश्वास को राम और अहंकार को रावण कहा।

आत्म-निष्ठा पर केंद्रित विश्वास राम है और अहंकार पर आधारित विश्वास रावण। लोक-मंगल के लिए सर्वस्व त्याग देने की प्रबल प्रेरणा यहीं से मिलती है। सुकरात को विष का प्याला पी जाने का साहस आत्म-बल द्वारा ही प्राप्त हुआ। ईसा का सूली पर चढ़ना तथा सरदार भगतसिंह को हँसते-हँसते फाँसी पर चढ़ने की हिम्मत आत्म-बल ने ही दी। आत्मा-निष्ठ विश्वासी राम तथा दधीचि को त्यागमय जीवनयापन की शक्ति वहीं से मिली।

अहंकार पर आधारित विश्वास पतन का द्वार खोलता है। भौतिकता से अभिभूत व्यक्ति संकीर्णता, स्वार्थपरता एवं अनुदारता के दल-दल में फँस जाते हैं। अहंकार का आधार ही मनोविकार एवं भौतिक पदार्थ है। भोग-लिप्सा के सिवाय उसे कुछ दिखलाई ही नहीं पड़ता। इसके अभिशाप से व्यक्ति दीन दुःखी, असहाय तथा निष्प्राण होकर धरती पर भार स्वरूप बना रहता है। सभी अनर्थों की जड़ अहंकार-जनित विश्वास है। अशान्ति, युद्ध, कलह और राग-द्वेष यहीं से उत्पन्न होते हैं। नेपोलियन, मुसोलिनी और सिकन्दर के अहंकार-युक्त विश्वास ने विश्व को तबाह कर डाला।

विश्वास अपने आप में एक शक्ति है। शक्ति रूपी आत्म-विश्वास हमें नर से नारायण की भूमिका में पहुँचा देता है। अपनी सत्ता-आत्म-विश्वास की जानकारी कर उसके सदुपयोग करने की कला परख होनी चाहिए। अन्तःकरण की सुषुप्त शक्तियों के जग पड़ने का नाम ही आत्म-विश्वास है।

आत्म-विश्वास आन्तरिक शक्तियों को केन्द्रित एवं नियन्त्रित करता है। जब केन्द्रित एवं संगठित शक्तियाँ एक दिशा की ओर चल पड़ती हैं तो सफलता ही सफलता मिलती जाती है। विश्वास की ज्योति जलाकर ही अन्धकार को मिटाया जा सकता है।

जीवन के हर क्षेत्र में विश्वास की आवश्यकता है। विश्वास हमारा मार्ग-दर्शन करता है तथा सद्पथ पर चलने की प्रेरणा देता है। जीवन -रहस्य को समझने के लिए आत्म-विश्वास का सहारा लेना ही पड़ेगा। जीवन-निर्माण में आत्म-विश्वास का प्रधान हाथ रहता है।

जो व्यक्ति अपनी इस शक्ति का विकास नहीं कर पाये, उन्हें अभाव और दरिद्रता में पलते हुए जीवन को समाप्त करना पड़ा। अविश्वासी व्यक्ति न तो किसी के सहायक हो पाते हैं और न दूसरों की आत्मीयतापूर्ण सहानुभूति ही प्राप्त कर पाते हैं।

जीवन-निर्माण के लिए आत्म-निष्ठा पर आधारित आत्म-विश्वास की अभिवृद्धि आवश्यक है। इसका सहज मार्ग अपने कर्त्तव्य एवं उत्तरदायित्वों को ईमानदारी के साथ पूर्ण करते चलने में है। कार्यों के छोटे-बड़े होने की चिन्ता नहीं होनी चाहिए।

छोटे-छोटे कार्यों के सम्पादन करते चलने से मनोबल बढ़ता है और आगे का मार्ग प्रशस्त होता है बड़े लोगों ने अपने जीवन-काल के प्रारम्भ में छोटे काम ही हाथ में लिए थे। कोई छोटा और बड़ा नहीं होता, यह तो कार्य-सम्पादन करने वालों की मनोभूमि पर आधारित होते हैं।

जीवन का आधार आत्म-विश्वास ही है,जिसने अपने को पहचाना और अपनी शक्तियों को विकसित किया। वे अवश्य ही जीवन-संग्राम में सफल होंगे।


दो मुर्गे आपस में गुत्थमगुत्था (kahani)

कूड़े के ढेर पर दो मुर्गे आपस में गुत्थमगुत्था हो गये । अधिक तगड़े ने दूसरे को पराजित कर भगा दिया, तो आस-पास घूम रहीं सभी मुर्गियाँ उस के चारों ओर जमा होकर उसका यशोगान करने लगीं। प्रशंसा से पुलकित मुर्गे की यश-कामना और तेज हुई। उसने चाहा कि पास-पड़ौस में भी उसकी कीर्ति जानी-कही जाए। तीव्र आकांक्षा ने उसे प्रेरित किया और वह पास के खलिहान में चढ़ गया अपने पंख फड़फड़ाकर उच्च स्वर में बोला-‘‘में विजयी मुर्गा हूँ । मुझे देखो। मेरे समान बलवान कोई अन्य मुर्गा नहीं है।”

उसका अन्तिम वाक्य समाप्त होने के पूर्व ही ऊपर मंडराती चील की ऊँचे चढ़े उस एकाकी मुर्गे पर दृष्टि पड़ी। उसने एक झपट्टा मारा और अपने पंजों में दबोचकर मुर्गे को अपने घोंसले में ले गई।

---लियो टाल्सटाय

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एकाग्रता का दर्शन, महत्व और चमत्कार

अध्यात्म क्षेत्र में एकाग्रता को अत्यधिक महत्व दिया गया है। साधनाओं में से अधिकाँश का उद्देश्य एकाग्रता की क्षमता उत्पन्न करना ही है। ध्यानयोग के अन्तर्गत ही नादानुसंधान, चक्र वेधन, शक्ति भावना जैसी उपासनाओं को गिना जाता है। राजयोग में प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के रूप में जिसे चार चरणों में बाँटा गया है उसकी वस्तुतः एक ही प्रक्रिया है-उच्चस्तरीय चिंतन सहित एकाग्रता की साधना। एक ही चेतना की चार गतिविधियों को मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार को अन्तःकरण चतुष्टय की संज्ञा दी गई है। चार स्वरूप और व्याख्याएँ होते हुए भी वस्तुतः यह एक ही सत्ता की विवेचनाएँ हैं। ठीक इसी प्रकार एकाग्रता की उपयोगी विद्या में दक्षता प्राप्त करने के लिए योगसाधना के अन्तर्गत राजयोग, हठयोग, भक्ति योग और लययोग की चारों दिशाएँ, चारों विद्याएँ अपनी-अपनी सड़क पर चलते हुए अन्ततः जिस केन्द्रबिन्दु पर जा मिलती हैं, उसे एकाग्रता कहा जा सकता है। किसी गोले पर भिन्न दिशाओं में खींची गई रेखाएँ भी किसी जगह एकत्रित होकर ही रहती हैं, इसी प्रकार साधनाओं के विभिन्न स्वरूप और विधान भी एकाग्रता का प्रयोजन पूरा करते हैं। सभी साधक अपनी प्रगति और सफलता का अनुमान उपलब्ध एकाग्रता की मात्रा को देखकर ही लगाया करते हैं।

एकाग्रता की शक्ति सर्वविदित है। केन्द्रीकरण और विकेन्द्रीकरण की प्रतिक्रिया में कितना अन्तर होता है, इसे कौन नहीं जानता? छोटे से आतिशी शीशे में सूर्य किरणें एकत्रित कर लेने पर देखते-देखते अग्नि उत्पन्न होती है और दावानल का रूप धारण करने तक में समर्थ होती है। जब कि मीलों के बीच बिखरी वही सूर्य किरणें सामान्य गर्मी, रोशनी देने के अतिरिक्त कोई चमत्कारी प्रयोजन सिद्ध नहीं करतीं। ढेरों भाप, तालाबों, जोहड़ों से उठती और अन्तरिक्ष में विलय होती रहती है। उससे कोई विशेष प्रयोजन नहीं सधता, किन्तु थोड़ी सी भाप केन्द्रीकृत करके प्रेशर कुकर मिनटों में भोजन पकाते और रेलगाड़ी के इंजन भारी बोझ .खींचते हुए द्रुतगति से पटरी पर दौड़ते हैं। बिखरी बारूद जला देने से क्षण भर के लिए चमक दिखेगी और लपट दिखेगी किन्तु उसी को बन्दूक की नली में एकत्रित करके दिशा विशेष में धकेला जाय तो भयंकर धड़ाका करते हुए लक्ष्यवेध के रोमाँचकारी परिणाम उत्पन्न करती है। बिखरे हुए कच्चे धागे एकत्रित होकर हाथी को बाँधे रह सकने योग्य मजबूत रस्से बनते हैं। बुहारी की क्षमता दुर्बल सींकों के एकत्रीकरण से ही सम्भव होती है। इन मोटे उदाहरणों को हर कोई जानता है। उन पर ध्यान दिया जाय तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि भौतिक जगत में संगठन समझी जाने वाली और आत्मिक क्षेत्र में एकाग्रता कही जाने वाली शक्ति का कितना अधिक महत्व है। उसकी प्रतिक्रिया ही समस्त प्रकार की सफलताओं, विशेषताओं एवं विभूतियों की जननी है।

पौराणिक कथा के अनुसार राजा द्रुपद अपनी अति गुणवती पुत्री को किसी ऐसे समर्थ सहचर के सुपुर्द करने के इच्छुक थे, जिसमें सफल जीवन जी सकने की क्षमता हो। ऐसा व्यक्ति कौन हो सकता है-उसमें क्या लक्षण होने चाहिएं? इस सन्दर्भ में राजा ने मनीषियों से विचार विमर्श किया तो यही निष्कर्ष निकला कि बिखरी हुई मनः स्थिति के लोग प्रायः अपने सभी कामों में असफल होते हैं जब कि एकाग्रचित्त से छोटे कामों में भी जुड़े रहने वाले लोग क्रमशः आगे बढ़ते और ऊँचे उठते चले जाते हैं। अन्ततः यही निर्णय हुआ कि राजकुमारी का विवाह ऐसे व्यक्ति से किया जाय तो एकाग्रता की सत्प्रवृत्ति का अभ्यस्त सिद्ध हो सके। पानी में छाया देखकर, छत पर लहकती हुई मछली की आंख पर निशाना लगाना स्वयंवर की शर्त रखी गई। उसमें मात्र अर्जुन ही सफल हुए और वे ही सर्वगुण सम्पन्न द्रौपदी का वरण कर सके। अर्जुन की प्रगति और विशिष्टता का परिचय अनेकानेक कथा गाथाओं में मिलता है, इस प्रगतिशीलता के मूल में उसकी एकाग्र वृत्ति की प्रमुख भूमिका मानी जा सकती है।

नृतत्व विज्ञानी जानते हैं कि मनुष्य की तुच्छ दिखने वाली सत्ता वस्तुतः असीम सम्भावनाओं से भरी पूरी है। उसमें बीज रूप से वे सभी तत्व विद्यमान हैं जो उसके सृजनकर्त्ता परमेश्वर में पाये जाते हैं। मनुष्य की समूची सत्ता एक नगण्य से शुक्राणु में विद्यमान रहती है। विशाल वृक्ष का समूचा ढाँचा छोटे से बीज में विद्यमान रहता है। प्रश्न विकसित होने का अवसर मिल सकने का है। सामान्य क्षमता एवं परिस्थिति के रहते हुए भी संसार के महामानव अनेकानेक कठिनाइयों एवं अभावों से जूझते हुए प्रगति पथ पर आगे बढ़े हैं और उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचे हैं। इसमें उनकी प्रमुख विशेषता एक ही रही है कि अपने मानसिक चिन्तन और शारीरिक श्रम को अभीष्ट लक्ष्य की ओर पूरे उत्साह के साथ नियोजित किये रहे हैं, द्रुतगामी खरगोश से मन्दगामी कछुए ने बाजी जीती थी, यह ईसप की नीति कथा प्रायः सभी ने सुनी है। कछुआ अपनी बुद्धि और क्रिया को एक ही दिशा में नियोजित किये रहा और अधिक समर्थ खरगोश से आगे पहुँचा। खरगोश इसलिए हारा कि चंचलता उसे घेरे रही और अपने समय तथा क्रिया कलाप को अस्त व्यस्त ढंग से बखेरता हुआ उपहासास्पद और असफल बनकर रह गया। एकाग्रता और क्रमबद्धता का उसे अभ्यास रहा होता तो कछुआ की तुलना में उसी को बाजी जीतने का अवसर मिलता। मनुष्य जीवन को आये दिन मिलने वाली सफलताओं और असफलताओं के पीछे प्रायः यही तथ्य काम करता पाया जाता है।

‘योगश्चित्त वृत्ति निरोधः’ सूत्र में योग की परिभाषा चित्त वृत्ति के निरोध रूप में की गई है। चित्त की अवाँछनीय प्रवृत्तियों में एक है अनावश्यक चंचलता। अभीष्ट प्रयोजन की निर्धारित लक्ष्य की सीमा में रहकर विचार मंथन की उपयोगिता को सराहा गया है। वैज्ञानिक, कवि, कलाकार, तत्वदर्शी योगी अपने-अपने विषय में द्रुतगति से चिन्तन करते हैं, पर वह होता सीमाबद्ध है। मस्तिष्कीय चंचलता तो बुद्धिमानों को भी मूर्खों की तरह असफल बनाती रहती है। अस्तु आत्मिक प्रगति के आकाँक्षी योगीजनों को शास्त्र ने चंचलता के निरोध का अनुशासन मानने के लिए कहा है। जो ऐसा कर सकेगा वही अपनी बहुमूल्य क्षमताओं को योजनाबद्ध रूप से अभीष्ट दिशा में लगा सकने में समर्थ हो सकेगा। सफलता के लिए यह प्रथम शर्त है। क्या भौतिक और क्या आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों की प्रगति बिखराव को समेटने और दिशाबद्ध चरण बढ़ाते चलने पर ही सम्भव हो सकती है।

आकाश से उतरकर वर्षा का स्वच्छ जल विस्तृत भूमि पर बरसता और फैलता, बहता जहाँ-तहाँ भटकता हुआ क्रमशः अधिक नीचे गिरता चला जाता है और अन्ततः समुद्र के खड्ड में जा गिरता है और खारी बनकर अपेय स्थिति में जा पहुँचता है। इसी अतुलित जल राशि का एक थोड़ा सा अंश बाँध में सीमाबद्ध कर लिया जाता है तो उससे प्यासी भूमि की सिंचाई होती और धन धान्य का लाभ मिलता है। नदी, नहरों में बहने वाला सीमाबद्ध जल उपयोगी सिद्ध होता है किन्तु वह बाढ़ के रूप में बिखर पड़े तो उससे हानि ही होगी। विशाल जल राशि को छोटे मार्ग में होकर गुजारने पर जो शक्ति उत्पन्न होती है उससे बड़े-बड़े बिजली घर बनते हैं। यह शक्ति के सीमाबद्ध प्रयोग का ही चमत्कार है।

चिन्तन क्षमता को प्रायः महत्व ही नहीं दिया जाता। लोग ऐसे चिन्तन में उलझे रहते हैं जिनका अपनी वर्तमान परिस्थितियों के साथ कोई ताल मेल नहीं बैठता। असंगत और निरर्थक सोचते रहने से इस उपयोगी सामर्थ्य का अपव्यय होता है। जो विचार आज की समस्याओं के समाधान में योग दे सकते हैं-भविष्य निर्माण का पथ प्रशस्त करते हैं उन्हें उथलेपन के साथ नहीं वरन् गहराई और दिलचस्पी के साथ अपनाया जाना चाहिए। किन्तु जो अनुपयोगी एवं अनैतिक हैं, उन कल्पनाओं से पिण्ड छुड़ाते रहने में ही लाभ है। किन विचारों को मस्तिष्क में स्थान दिया जाय किन्हें न दिया जाय इनका फैसला पहले से ही कर लिया जाय तो प्रवेश उन्हीं को दिया जायगा जिनकी उपयोगिता असंदिग्ध है। रोगी, चोर, उठाईगीरे, बाजारू कुत्ते, चमगादड़, छछूंदर, कीड़े, मकोड़े, साँप, बिच्छू आदि को घर में प्रवेश करने एवं अड्डा जमाने का सदा प्रतिरोध ही किया जाता है। अवाँछनीय विचारों की हानि इन सबसे भी अधिक है। वे मात्र मस्तिष्क में भ्रमण ही नहीं करते रहते, वरन् अपने अनुरूप क्रिया करने के लिए पूरे व्यक्तित्व और अंग प्रत्यंगों को अपनी प्रेरणा के अनुरूप ढलने एवं चलने के लिए प्रशिक्षित करते हैं।

मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि विचार बीज और कर्म उसका अंकुर है। मस्तिष्क की उर्वरा भूमि में जिस स्तर के विचारों को प्रश्रय मिलेगा, उसी प्रकार की अभिरुचि उत्पन्न होगी और फिर वैसा ही कर गुजरने के लिए मन करेगा। अश्लील साहित्य पढ़ते-पढ़ते मन में कामुकता उभरती है और फिर यौनाचार की पृष्ठभूमि किसी न किसी प्रकार बनने ही लगती है। अपराधी दृश्यों की फिल्में देखकर कितने ही कच्ची मनोभूमि के युवक उसी प्रकार का आचरण करने पर उतारू हो जाते हैं। ठीक इसी प्रकार उपयोगी विचारों को मस्तिष्क में लगातार स्थान मिलते रहने के कारण जीवन प्रवाह उसी धारा में बहने लगता है। विचारों का बिखराव रोका जा सके, निरर्थक और अनर्थमूलक चिन्तन से बचा जा सके, निर्धारित लक्ष्य की परिधि में ही विचार प्रक्रिया को नियन्त्रित किया जा सके तो तद्विषयक बौद्धिक प्रगति आश्चर्यजनक रीति से होती देखी जा सकती है। मन्द बुद्धि समझे जाने वाले लोग भी अपनी रुचि के विषय में प्रवीण पाये जाते हैं। इसका एक ही कारण है उन्होंने जिस दिशा में गहराई और रुचिपूर्वक सोचते रहने का प्रयास किया, उसी संदर्भ में उन्हें प्रवीणता उपलब्ध हो गई। पर चिन्तन की एकाग्रता का ही परिणाम है कि लोग अपने विषय के विशेषज्ञ बनते और सद्विषयक सफलता के उच्चशिखर पर जा पहुँचते हैं।

व्यवस्थित दिनचर्या बनाकर समय और श्रम को अभीष्ट उद्देश्य में लगाये रखा जाय, निर्धारित क्रिया कलापों में उत्साह एवं मनोयोग जोड़कर रखा जाय तो किये गये काम अधिक परिमाण में भी होते हैं और उनका स्तर भी ऊँचा रहता है। अभ्यास से प्रवीणता प्राप्त होने का तथ्य सर्वविदित है। अभ्यास का अर्थ है-रुचि, मनोयोगपूर्वक सामर्थ्य का नियोजन। यह रीति-नीति अपनाने वाला अपने विषय का कलाकार सिद्ध होता है। इसके विपरीत यदि चंचलता एवं अस्त व्यस्तता स्वभाव का अंग बन गई हो और बन्दर की तरह क्षण-क्षण में मन इधर उधर मचकता, उचकता रहता हो तो सामर्थ्य और साधन रहते हुए भी हर कार्य अधूरा, लँगड़ा, काना, कुबड़ा बना रहेगा। काम की उस कुरूपता को देखकर सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकेगा कि यह हरकत किसी फूहड़ व्यक्ति की है। उसमें ढेरी की ढेरी त्रुटियाँ रह रही होंगी और जो किया गया है उसे अनुपयुक्त उपहासास्पद ठहराया जायगा।

जिन लोगों ने अपना जीवन लक्ष्य निर्धारित किया और योजनाबद्ध रूप से आगे बढ़ने की योजना बनाई वे सफलता की मंजिल पूरी नहीं तो सन्तोषजनक सीमा तक अवश्य ही पूरी कर सके हैं। साधना और क्षमता की न्यूनता को लगन के माध्यम से पूरा किया जा सकता है। संसार के महामानवों में अधिकाँश की प्रारम्भिक स्थिति बड़ी शोचनीय थी। न उसके पास साधन थे और कौशल न सहयोग। वे अपने स्वल्प क्षमता के सहारे ही अभीष्ट लक्ष्य की ओर धैर्य और साहस का सहारा लेकर लोग संकल्प पूर्वक आगे बढ़े। निष्ठा और तत्परता की कसौटी पर खरे सिद्ध होने वालों को भगवान प्रगति की ओर बढ़ चलने के अनेक अवसर प्रदान करते हैं-अभावों की पूर्ति होने लगती है और मनस्वी कर्मनिष्ठों को सहयोग की कमी नहीं रहती। प्रामाणिकता और पात्रता सिद्ध करने वाले लोगों का मूल्याँकन किया जाता है और उन्हें अनुरूप गौरव मिलता चला जाता है।

एकाग्रता का तात्पर्य ठप्प या अवरुद्ध हो जाना नहीं है। विचारों में मस्तिष्कीय और कर्म में शारीरिक हलचलें तो रहेंगी उन्हें रोकना हो तो मूर्छित या अर्ध मूर्छित स्थिति में जाना पड़ेगा। यह तो निष्क्रियता की स्थिति हुई। आपरेशन के समय, पीड़ा मुक्ति की सुन्नता उत्पन्न करने के लिए अथवा उच्चस्तरीय योगसाधना में चिन्तन एवं कर्म की समाप्ति वाली आत्मिक अथवा कृत्रिम निःचेष्टता अभीष्ट हो सकती है। सामान्य स्थिति में तो यह अनुत्पादक ही है। इससे कोई लाभ दिखाई नहीं पड़ता। बहुधा ध्यान की तन्मयता में मस्तिष्कीय निःचेष्टता की अपेक्षा की जाती है, यह व्यर्थ है। उपयोगी यह है कि मात्र बिखराव को रोका जाय। अवाँछनीय चिन्तन और अनावश्यक कर्म से बचा जाय। इस प्रकार अपव्यय से बची हुई सामर्थ्य को अभीष्ट प्रयोजन में लगाकर सफलता की दिशा में द्रुतगति से आगे बढ़ा जा सकता है।

एकाग्रता का परिपक्व स्वरूप यह है कि विचारों पर नियन्त्रण स्थापित किया जाय उन्हें अनुपयोगी उलझनों से निकाल कर मात्र विधेयात्मक प्रयोजनों में नियोजित कर सकने का कौशल प्राप्त किया जाय। वैचारिक अंकुश रख सकना एकाग्रता की सिद्धि है। इसके लिए ध्यानयोग, नादयोग आदि के व्यायाम साधन किये जा सकते हैं। तन्मयता और तत्परता का अभ्यास जिस भी उपाय से किया जा सकता हो उसे तद्विधायक साधना कहा जा सकता है। भक्तियोग के माध्यम से भी यह सफलता मिल सकती है। ईश्वर गुरु या आप्त मानवों के प्रति गहरी श्रद्धा उत्पन्न करके उनके साथ सघन आत्मीयता स्थापित करने की मनोविज्ञान समर्पित अध्यात्म साधना से तन्मयता उत्पन्न होती है और एकाग्रता उत्पन्न होने का साधन बन जाता है। किसी वस्तु का लाभ एवं मूल्य विदित होने पर उसे पाने की ललक उठती है, इस प्रकार रुचि उभारने और तत्परता उत्पन्न करने का आधार बनता है। ईश्वरीय अनुग्रह-योग का चमत्कार, कर्मकांडों का माहात्म्य, धर्म धारणा का स्वर्ग फल जैसे माहात्म्यों का विस्तृत वर्णन इसीलिए किया गया है कि उस मार्ग के पथिकों में आवश्यक उत्साह बना रहे तथा धैर्यपूर्वक लम्बी मंजिल को क्रमिक गति से पार करते चलते का साहस स्थिर बना रहे।

प्रगति पथ पर अग्रसर होकर अभीष्ट सफलताएँ प्राप्त करने के लिए जो दो चरण बढ़ाने पड़ते हैं उनमें से एक का नाम तन्मयता और दूसरे का तत्परता है। इन्हें मनोयोग और कर्मयोग भी कह सकते हैं। वैचारिक नियोजन और भाव भरी ललक का समावेश भी आवश्यक है अन्यथा चिन्तन उखड़ा रहेगा। तन्मयता में विचारणा ही नहीं इच्छा, आकाँक्षा की ललक भी जुड़ी होती है। इस ललक को ही भक्तियोग कहते हैं। ज्ञानयोग और भक्तियोग का समन्वय मानसिक बलिष्ठता का-तन्मयता का उपार्जन करता है। इसे एकाग्रता की सिद्धि प्राप्त करने का अति महत्वपूर्ण अंग कह सकते हैं। कर्म की प्रखरता में भी उत्साह, कौशल, श्रम एवं समय का समुचित समावेश होना चाहिए। तभी वह अधिक परिमाण में अधिक ऊँचे स्तर का बनता है। उपेक्षा और तत्परतापूर्वक किए गये कामों का घटियापन और बढ़ियापन सहज ही कर्त्ता की स्थिति का परिचय खोलकर रख देता है।

उपलब्धियों पर सुख-सन्तोष निर्भर है। उपलब्धियां साधना से मिलती हैं। साधना का ही दूसरा नाम एकाग्रता है। एकाग्रता के दो अविच्छिन्न पथ हैं-तन्मयता और तत्परता। सफलताओं के वट वृक्ष के मूल में एकाग्रता की जड़ें ही गहराई तक प्रवेश होती और सक्रिय रहती देखी जा सकती हैं। आलस्य पर नियन्त्रण स्थापित करने के लिए श्रम और समय का पूरी तत्परता के साथ अभीष्ट प्रयोजन में समावेश करना पड़ता है। कर्म के बिखराव को रोक देना और विचारों पर अंकुश रखना इसी का नाम मनोनिग्रह है। अध्यात्म शास्त्र में इसी को ‘आत्म-जय’ कहा गया है। प्रमाद का बिखराव ही मानसिक क्षमता को अस्त-व्यस्त करता है। अति संक्षेप और सारभूत शब्दों में यदि एकाग्रता की महान उपलब्धि के आधार का वर्णन किया जाय तो आलस्य और प्रमाद की अस्त व्यस्तता पर अंकुश कर लेने की सफलता के रूप में उसकी व्याख्या विवेचना हो सकती है। इस दिशा में परिपक्व सफलता दैनिक जीवन की समस्त गतिविधियों को सुनियोजित करने की आत्म साधना में चिरकाल तक निरत रहने से ही सम्भव होती है। एकाग्रता का कल्प वृक्ष प्राप्त करने के लिए हमें आलस्य और प्रमाद को मार भगाने की-अभीष्ट प्रयोजन में तन्मयता और तत्परता उत्पन्न करने की जीवन साधना अनवरत रूप से करनी चाहिए। आत्मिक और साधना अनवरत रूप से करनी चाहिए। आत्मिक और भौतिक प्रगति के उभय-पक्षीय लाभ इस सत्प्रयत्न के साथ जुड़े हुए हैं। भौतिक ऋद्धियाँ और आत्मिक सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए हमें एकाग्रता का महत्व समझना चाहिए और उस पूजा काल की विशेषता नहीं समूचे जीवन क्रम को सारभूत एवं स्वर्णिम उपलब्धि मानकर परिपूर्ण श्रद्धा के साथ उसके उपार्जन में संलग्न रहना चाहिए।

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समय भविष्य की ओर ही नहीं चलता, भूतकाल की ओर भी लौटता है।

आवश्यक नहीं कि जो बात एक समय सही मानी जाती है वही दूसरे समय भी उसी प्रकार मानी जाती रहे, इसी प्रकार यह भी आवश्यक नहीं कि जिस बात को आज अप्रमाणिक माना जाता है उसे भविष्य में भी वसा ही समझा जाय। उदाहरण के लिए अपने समय के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक गैलीलियो ने ब्रह्माण्डीय गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त मानने से इनकार किया था। वे पृथ्वी की आकर्षण शक्ति को तो मानते थे, पर यह स्वीकार नहीं करते थे कि एक ग्रहपिण्ड की आकर्षण शक्ति दूसरों को भी प्रभावित करती है और इसी आधार पर वे एक दूसरे के साथ बँधे हुए हैं। न्यूटन तक ने ग्रहों के आपस में बँधे रहने वाले गुरुत्वाकर्षण को बहुत पीछे और बड़ी कठिनाई के बाद स्वीकार किया था, पर आज वे विरोध ठण्डे पड़ गये और ग्रहों के बीच गुरुत्वाकर्षण की बँधन शृंखला की वास्तविकता स्वीकार करने में किसी को कोई आपत्ति नहीं है।

इस समय विश्व की उत्पत्ति के बारे में वैज्ञानिकों की मुख्य-मुख्य परिकल्पनाएँ ये हैं।

एक परिकल्पना के अनुसार अरबों वर्ष पूर्व, सम्पूर्ण विश्व का द्रव्य एक पुँजीभूत महापिंड के रूप में था। नाभिकीय कणों का सघन सम्पुँजन किया जाए तो एक घन सेन्टीमीटर स्थान में करोड़ों टन द्रव्य समा सकता है। इसीलिए सम्पूर्ण विश्व द्रव्य का महापिण्ड में सम्पुँजन सम्भव है।

इस महापिंड का विस्फोट हुआ और विस्तार होने लगा। उसी से मन्दाकिनियाँ-नीहारिकाएँ-बनीं ग्रह नक्षत्र बने, यह विस्तार अभी जारी है। इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि दूरस्थ आकाश गंगाएँ हमसे लगातार दूर भाग रही हैं। उनमें पृथ्वी से दूर हटने की गति पृथ्वी से उनकी दूरी के अनुपात में है। इससे स्पष्ट है कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है।

मन्दाकिनियों के लगातार दूर भागने की बात की पुष्टि विख्यात वैज्ञानिक प्रो0 फ्रेड हायल के एक परीक्षण से हुई है। सुदूरस्थ आकाश गंगाओं से पृथ्वी तक आने में प्रकाश तरंगों का कम्पन बढ़ जाता है। दूर से आने वाले प्रकाश का झुकाव, वर्णपट प्राप्त करने पर, नीले रंग की ओर होता है और दूर जाने वाले प्रकाश स्रोत के प्रकाश का झुकाव लाल रंग की ओर होता है। आकाशगंगाओं से आने वाली प्रकाश तरंगों के प्रकाश का वर्णपट प्राप्त करने पर, उस वर्णपट का झुकाव लाल रंग की ओर पाया गया। इससे पता चला कि आकाशगंगाएँ दूर जा रही हैं। माउण्ड पोलोयर वेधशाला की दूरबीन से भी आकाश गंगाओं की दूर हटने की प्रक्रिया देखी गई।

एक सिद्धान्त यह है कि विश्व जैसा अभी है, वैसा ही आरम्भ से है। आकाशगंगाएँ दूर भाग रही हैं, तो पास भी आ रही होंगी, जो अभी हमें दिखती नहीं। वस्तुतः यह सिद्धान्त प्रो0 हायल का है, जिसे ‘समतुलित अवस्था सिद्धान्त’ कहते हैं। प्रो0 फ्रेड हायल ने ही सर्वप्रथम यह खोजा था कि आकाशगंगाएँ पृथ्वी से दूर हट रही हैं। इससे जहाँ कुछ वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है लेकिन स्वयं प्रो0 हायल का निष्कर्ष यह था कि पुरानी मन्दाकिनियाँ, जो दूर भागती दिखती हैं, अस्तित्वहीन होती रहती हैं और नई मन्दाकिनियाँ जन्म लेती रहती हैं। इससे ब्रह्माण्ड की पिंड संख्या स्थिर रहती है और घनत्व अपरिवर्तित।

टामस गोल्ड, हर्मन वाँडो, वेरोजोफ, वेल्मामिनफ आदि भी इसी सिद्धान्त को मानते हैं।

एक मत यह है कि प्रारम्भ में प्लाज्मा रूप में विश्व का समस्त द्रव्य एकत्र था। वह सन्तुलन की स्थिति थी। धीरे-धीरे असन्तुलन का आरम्भ हुआ। प्लाज्मा के कणों तथा प्रतिकणों के विस्फोट हुए। इससे फोटोन-कण निकले। फोटोन कणों यानी प्रकाश के कणों से परमाणु बने। समय बीतने पर परमाणु बादल बने, उन्हीं से क्रमशः विविध आकाशीय पिंड अस्तित्व में आए। इसका आधार कणों तथा प्रतिकणों की खोज है।

कणों तथा प्रतिकणों के ही आधार पर द्रव्य और प्रतिद्रव्य की धारणा परिकल्पित की गई है। गोल्डहानर ने एक परिकल्पना प्रस्तुत की है कि पुँजीभूत द्रव्य का महापिंड विखण्डित हो गया और विखण्डित होते ही दो विश्वों में बँट गया-एक द्रव्यमय विश्व, दूसरा प्रति द्रव्यमय विश्व।

गोल्डहानर व अन्य कुछ वैज्ञानिक एक सर्वथा भिन्न प्रति द्रव्यमय विश्व की परिकल्पना करते हैं। तो कुछ वैज्ञानिकों के अनुसार इसी ज्ञेय विश्व में प्रतिद्रव्य वाली आकाशगंगाएँ अस्तित्व में हैं, किन्तु हमें उनका ज्ञान अभी सम्भव नहीं क्योंकि हम तो मात्र आकाशीय पिंडों से उत्सर्जित विकिरण द्वारा ही उन पिंडों के बारे में जान पाते है और द्रव्य तथा प्रतिद्रव्य का विकिरण एक जैसा ही होता है, इसलिए हम उसे अलग से पहचानने में असमर्थ हैं।

विज्ञानी फेयन माँ के अनुसार ब्रह्माण्डव्यापी ‘प्रति पदार्थ के अति सूक्ष्म घटक-पाजिट्रोन-काल से पीछे की ओर भी चलते हैं और उनका प्रवाह भविष्य की ओर न होकर भूतकाल की ओर लौटता है। ठीक इसी प्रकार अन्तरिक्षवेत्ता फ्रैडहायल का कथन है कि समय आमतौर पर जिस प्रकार वर्तमान से भविष्य की ओर चलता है उसी प्रकार सिद्धान्ततः वह भूतकाल की ओर गतिशील हो सकता है।

अन्तरिक्ष विज्ञान के शोधकर्ता इस तथ्य का समर्थन कर रहे हैं कि अपने सौरमण्डल में तो नहीं पर अनन्त आकाश में ऐसे कितने ही ग्रह हैं जो पदार्थ से नहीं प्रति पदार्थ से बने है। वहाँ भरे हुए परमाणुओं का ‘टेकयोन’ नाम दिया गया है। उनकी चाल प्रकाश में भी तीव्र तथा गति भविष्य की ओर न होकर भूतकाल की ओर चल रही है।

साधारणतया हम वर्तमान को भविष्य के साथ जोड़ते हैं। भविष्य की तैयारी के लिए वर्तमान को नियोजित करते हैं। कल्पनाएँ और योजनाएँ भविष्य निर्धारण के लिए जुटी रहती हैं। आकाँक्षाओं की पूर्ति आगे चल कर होने की ही बात सोची जाती है और उसी पर विश्वास किया जाता है अपनी परिस्थितियों में यही संभव भी है। जल की धारा जिस दिशा में बह रही हो-हवा जिस ओर उड़ रही हो उसी में प्रगति की उपलब्धियों की आशा करना सहज स्वाभाविक है। भूतकाल से तो इतना ही लाभ लिया जाता है कि उसके आधार पर संग्रह किये गये अनुभवों से लाभ उठाया जाय और भावी गतिविधियों के निर्धारण में उनका ध्यान जाय। मीठी कड़ुई स्मृतियां सँजोये रह कर उनके दृश्य चित्रों से अठखेलियाँ करते रहने के अतिरिक्त और कोई बड़ा प्रयोजन उनके द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता।

किन्तु तथ्य इससे भिन्न भी है। समय की गति पीछे की दिशा में लौट सकने की बात आज तो ठीक से समझ में भी नहीं आती और उस पर विश्वास करने को भी जी नहीं करता इतने पर भी तथ्य तो अपने स्थान पर बने ही रहेंगे। अन्य प्राणी वर्तमान तक ही सीमित रहते हैं उनकी भविष्य कल्पना आज का आहार पाने के अम्बन्ध में कुछ अनुमान भर लगा सकती है। वे हमारी तरह भविष्य कल्पना नहीं कर सकते। ठीक इसी प्रकार हम भी भूतकाल की कुछ अधिक प्रभावोत्पादक घटनाओं की की स्मृति तक ही सीमित रहते हैं। यदि भविष्य कल्पना में भूतकाल के अनुभव अपना समुचित योगदान दे सकें तो भविष्य निर्धारण सही भी होगा और सरल भी। किन्तु भूत के अनुभवों का लाभ तो हम यत्किंचित् ही उठा पाते हैं।

मोटर और रेलगाड़ी प्रायः आगे की ओर ही चलती है, पर उन्हें पीछे की दिशा में लौटाते हुए भी कोई विशेष कठिनाई नहीं होती। इसी प्रकार समय का आगे की तरह पीछे लौट सकना भी सम्भव हो सकता है। आमतौर से नदी में प्रवाह की दिशा में ही तैरा और बहा जाता है किन्तु कुशल तैराक के लिए यह भी सम्भव है कि वह उलटी दिशा में धारा को चीरता हुआ तैर सके, विज्ञान ने तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि भूत भी सर्वथा नहीं हो जाता। वह मस्तिष्क स्मृतिपटलों की तरह धुँधला भर होता है, अपना अस्तित्व बनाये ही रहता है। इसी प्रकार भूत गुजर भले ही गया है, पर उसका अस्तित्व इस ब्रह्माण्ड में अपनी सत्ता अक्षुण्ण रखे हुए है। राम और हनुमान के शरीर अब नहीं रहे, पर उनका व्यक्तित्व और कर्तृत्व अभी भी इस संसार में मौजूद है। यदि कोई मार्ग खोजा जा सके तो हम उलटी दिशा में तैरने वाले तैराक की तरह उन महामानवों के सम्पर्क का उसी प्रकार लाभ उठा सकते हैं जैसा कि उनके सहचर उठाया करते थे।

देव भक्ति का मूल सर्वविदित है, पर यदि हम भूत भक्ति में निष्णात हो सकें। भूत विद्या सिद्ध कर सकें तो उसका लाभ भी कम नहीं है। कहते हैं तुलसीदास को किसी भूत ने ही हनुमान और राम से उनका मिलना सम्भव बनाया है। वही भूत हमें कृष्ण के मुख से गीता सुनने का आनन्द दिला सकता है। तत्वदर्शी ऋषियों के आश्रमों में निवास करने से लेकर पृथ्वी की जन्म कथा देखने तक हमारे लिए वह सब सम्भव हो सकेगा। जो भविष्य की सुखद कल्पनाओं से भी अधिक सुखद, उत्साहवर्धक एवं उपयोगी है।

वैज्ञानिकों ने भूत की सत्ता और उपस्थिति को स्वीकार किया है अब उतना ही शेष है कि उसे वशवर्ती कैसे किया जाय। साधना ने हमें भविष्य के निर्धारण कर्त्ता का श्रेय दिया है विज्ञान के बढ़ते चरण हमें भूत के अनुग्रह से मिल सकने वाली सिद्धियों और उपलब्धियों से भी लाभान्वित कर सकेंगे ऐसी सम्भावना की नींव पड़ चुकी, अब उसके मूर्तिमान होने पर ही विश्वास किया जा सकता है।


नरक के निर्देशकों की आपात-बैठक (kahani)

नरक के निर्देशकों की आपात-बैठक एक गुप्त कक्ष में चल रही थी। अध्यक्ष थे महामहिम शैतान। मन्त्रणा का विषय था-नरक में आने वालों की संख्या में लगातार कमी रोकने का उपाय सोचना। क्योंकि यदि रफ्तार वही रही, तो नरक खाली हो जाने का भय था।

एक निर्देशक ने नहला मारा-‘‘चिन्ता की कोई बात नहीं। मैं जाता हूँ और मृत्यु लोक में प्रचार करता हूँ कि स्वर्ग का कहीं अस्तित्व ही नहीं।

“बेकार है।” शैतान ने मुँह बिचकाया-‘‘पहले भी इस फार्मूले पर जमकर काम किया जा चुका है। नतीजा कुछ नहीं निकला।” तब तक दूसरे ने दहला फेंका “हम प्रचार करें कि नर्क है ही नहीं।” “बकवास!”शैतान ने दुबारा मुँह बिचकाया। “लोग इतने मूर्ख नहीं, जितना आप उन्हें समझे हैं।”

थोड़ी देर तक मन्त्रणा कक्ष में मौन छाया रहा। सहसा एक तरुण निर्देशक उठा और विनम्र दृढ़ता के साथ बोला- “हम जाएँ और मृत्यु लोक में प्रचार करें कि लोगों! अभी तो तमाम जिन्दगी पड़ी है। जल्दी काहे की! काम की इतनी व्यग्रता क्यों? अभी तो आराम करें, जिन्दगी का मजा लें, मौज करें। अध्यक्ष ने प्रशंसा भरी दृष्टि उस तरुण पर डाली।

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अपने आपके साथ सद्व्यवहार

किसी विचारक ने कहा है-‘मनुष्य यदि सबसे ज्यादा निष्ठुर और सबसे अधिक क्रूरतापूर्वक व्यवहार किसी के साथ करता है तो स्वयं अपने से ही’। विचारपूर्वक इस कथन को तथ्य की कसौटी पर कसा जाय तो यह उद्धरण सत्य ही सिद्ध होगा। अपने प्रति दुर्व्यवहार के ऐसे अनेकों उदाहरण देखने में आते हैं जिन पर शान्तिपूर्वक देखा जाय तो लगता है कि हम अपनी सर्वाधिक प्रिय वस्तु-जीवन को ही समाप्त कर डालने के लिए उतारू हो गये हैं।

अपने प्रति दुर्व्यवहार के सम्बन्ध में हम आहार और शक्ति ग्रहण की प्रवृत्ति को ही लें। भोजन इसलिए किया जाता है कि प्रतिदिन के कार्यों में खर्च होने वाली शक्ति का पुनरुत्पादन क्रम चलता रहे। अच्छे से अच्छा पौष्टिक आहार इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए बनाया जाता है और उसे स्वादिष्ट बनाया जाय-ताकि भोजन करना एक अरुचिपूर्ण कार्य न रहे, उसे ग्रहण करने में भी रस मिलता रहे। यहाँ तक तो बात समझ में आ जाती है, परन्तु व्यक्ति स्वादों का इतना दिवाना हो जाता है कि भोजन करते समय उसे अपनी पाचन शक्ति, शरीर की आवश्यकता और पौष्टिकता का ध्यान ही नहीं रहता। यहाँ तक कि भोजन केवल स्वाद के लिए ही करने लगता है। फिर वे पदार्थ इतने अधिक मीठे हों कि मधुमेह की शिकायत पैदा हो जाय या इतने अधिक नमकीन कि रक्त कोष ही गलने फटने लगे।

सामान्यतः अस्सी प्रतिशत रोग इसलिए उत्पन्न होते हैं कि आहार ग्रहण करते समय तत्सम्बन्धी आवश्यक बातों का ध्यान नहीं रखा जाता। स्वाद लिप्सा के वशीभूत होकर आवश्यकता से अधिक कर लिया गया भोजन पेट और पाचन तन्त्रों पर इतना अनावश्यक अतिरिक्त भार उत्पन्न कर देता है कि वह शक्ति जो शरीर के संचार और पोषण में लगनी चाहिए, उस भोजन को पचाने में खपती है। फिर भी क्षमता के बाहर होने के कारण और दूसरे गरिष्ठतावश भी वह भोजन ठीक से पचता नहीं। परिणामस्वरूप शरीर में विकार ही उत्पन्न करता है। औरों के प्रति अपनी सद्भावना व्यक्त करते हुए, स्वास्थ्य रक्षा का सत्परामर्श देते हुए यह कहा जाता है कि सन्तुलित भोजन किया करें। परन्तु यह सत्परामर्श स्वयं के लिए कितना होता है-यह स्वयं ही जानने का विषय है। आहार की अति और स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए लार टपकाते हुए आहार विहार में बरती गई गड़बड़ी अपने आप पर अनाचार, अत्याचार, दुर्व्यवहार नहीं तो क्या है?

ऐसी न जाने कितनी मूढ़ताएँ हैं जो स्वयं के साथ की जाती हैं। मूढ़ता कहना तो सब उचित होगा जबकि उन बातों का ज्ञान न हो। लेकिन उन सावधानियों को जानते हुए भी, उन असतर्कताओं को समझते हुए भी हम उन्हें होते रहने देते हैं तो उसे स्वयं के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया ही कहा जाना चाहिए। यदि यह कहा जाय कि अधिकाँश व्यक्ति रोगी, दुःखी और शोक संविग्न इसलिए नहीं रहते कि उन्हें सन्तुलित रहना नहीं आता वरन् इस लिए रहते हैं कि जानते बूझते भी वे असन्तुलित, अनियमित, अनियन्त्रित और असंयमी जीवनयापन करते हैं, तो अनुचित न होगा। जान बूझकर बरती गई अस्त व्यस्तता, जान बूझकर किये गये अत्याचार और दुर्व्यवहार की श्रेणी में आती है।

दुर्व्यवहार तो दुर्व्यवहार है और वह किसके प्रति किया गया यह प्रमुख नहीं है, प्रमुख है किया गया? अब वह औरों के लिए किया गया हो या अपने प्रति। परिणामों की दृष्टि से यह बाद की बात है। उसके दुष्परिणाम तो भोगने ही पड़ेंगे और जब कोई व्यक्ति अपने साथ दुर्व्यवहार करता है तो जगन्नियन्ता की दृष्टि में और भी गम्भीर अपराध हो जाता है। उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति किसी की हत्या करने का प्रयास करे और इसमें असफल हो जाय तो न्याय व्यवस्था लम्बी सजा का भागीदार मानती है लेकिन आत्महत्या का प्रयास करे और सफल हो जाय तो मर जाने के कारण सजा नहीं होती हाँलाकि उसने अपराध तो किया? परन्तु असफल हो जाय तो उस प्रयास को एक गम्भीर अपराध मानकर कठोर दण्ड मिलता है। ठीक उसी प्रकार अपने प्रति दुर्व्यवहार आत्महत्या की ही एक धीमी प्रक्रिया है और वह एकबार में ही पूरी नहीं होती है इसलिए बार-बार गम्भीर अपराधों के परिणामस्वरूप कितने ही दण्ड सहने पड़ते हैं।

सामान्यतः दूसरों के साथ बुराई करने को पाप कहा जाता है। इसे बुरी दृष्टि से भी देखा जाता है। बदले में लोकनिन्दा, अपमान और घृणा तिरस्कार के दण्ड भी मिलते हैं। परन्तु जब कोई व्यक्ति अपने ही प्रति दुर्व्यवहार करता है तो लोक समाज में भले ही उसके लिए कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न की जाय वह निन्द्य और जघन्य पाप तो है ही। शरीर क्षय, रोग, महारोग, मानसिक वेदना, चिन्ता, निराशा आदि अनेकानेक दाहकारक सजायें उसे मिलती हैं और तत्काल इनका प्रभाव भी दिखने लगता है। अपनी ही दृष्टि में अपना अवमूल्य, आत्म-प्रताड़ना, आत्म-ग्लानि और तज्जनित चेतना की अधोगामिता आदि सैकड़ों दुष्प्रभाव हैं जिनकी अनुभूति नारकीय वेदनाओं भी अधिक कष्टप्रद होती हैं।

इन कारणों से हमें शान्त और गम्भीर चित्त से विचार करना चाहिए कि कहीं हम भी तो अपने प्रति दुर्व्यवहार नहीं कर रहे हैं। शान्त चित्त अवस्था में ही अन्तर्जगत में प्रवेश सम्भव है और वहाँ बड़ी सूक्ष्म दृष्टि आवश्यक है। क्योंकि मनुष्य सदैव इस भ्रम को पाले रहता है कि मैं अपनी भलाई और कल्याण के लिए ही सब कुछ कर रहा हूँ। पूजा उपासना जैसे धार्मिक आध्यात्मिक कर्मकाण्ड हों या भोजन, निद्रा, विश्राम जैसे शारीरिक कार्य हों, क्रिया, भावना और विचार सभी के संदर्भ में पूर्व निर्धारित मान्यता रहती है कि हम अपनी भलाई और अपने कल्याण के लिए ही सब कुछ कर रहे हैं। स्वार्थी से स्वार्थी और निन्दित से निन्दित व्यक्ति भी यही सोचता है और परमार्थ परायणता का गर्व रखने वाला भी यही मानता है। वस्तुस्थिति क्या है यह जानने के लिए मनोविज्ञानवेत्ताओं ने कुछ कसौटियाँ स्थिर की हैं, जिनमें से कुछेक इस प्रकार हैं-स्वयं के प्रति अपनी धारणा, शरीर के प्रति अपना व्यवहार बाह्य घटनाओं के प्रति दृष्टिकोण और उनकी प्रतिक्रिया तथा आध्यात्मिक विश्वास। इन चार कसौटियों पर अपने बाह्य जीवन और अन्तरंग को परख कर यह निश्चित किया जा सकता है कि स्वयं के प्रति हमारा व्यवहार कैसा है?

मनुष्य के विचार क्षेत्र में सर्वप्रथम अपने प्रति अपनी धारणा का जन्म होता है। विचार क्षेत्र में जन्मी अपने प्रति धारणा और मान्यता पर ही यह अवलम्बित है कि भविष्य में प्रगति के अवसरों को कितना उपयोग किया जा सकेगा। स्वयं को दीन हीन मानने वाला व्यक्ति संयोगवश ऐसे अवसरों पर जब कि वह आसानी से प्रगति के शिखर पर चढ़ सकता है, हाथ पर हाथ रखे बैठा रह जाता है। ऐसे व्यक्ति दुःख और कष्ट तो कितने ही सहते रहते हैं, परन्तु आनन्ददायक सुखमय परिस्थितियों की एक झलक भी सह सकने की क्षमता उनमें उत्पन्न नहीं हो पाती। अक्सर सुनने में आता है कि रोज कुँआ खोदकर रोज पानी पानी वाले और कभी भूखे भी रह जाने वाले लोग लाटरी का टिकट खरीदकर अपनी किस्मत आजमाते हैं और संयोगवश नम्बर लग जाये तो उसकी खुशी ही उन्हें इतना पागल कर देती है कि हृदय की धड़कन बन्द हो जाती है। खुशी किसी को पागल नहीं करती वरन् अन्तरंग में गहराई तक बैठी वह धारणा-जो उसने स्वयं के सम्बन्ध में बनाई है-जब टूटती है तो विक्षिप्तता पैदा हो जाती है। यह तो सभी जानते हैं कि आदमी भावनाओं का पुतला है और बाह्य परिस्थितियाँ नहीं भावनाएँ ही उसे प्रभावित करती हैं। जब अपेक्षित अवसर आते हैं और धारणा भंग होती है तो भावनाओं पर पहुँचा वह आघात ही मनुष्य को ले डूबता है।

आत्महीनता की भावना वस्तुतः अपने प्रति अत्याचार आत्मघात की श्रेणी में ही रखी जायगी और बातें आत्महिंसक हैं तो आत्महीनता, आत्मघातक है। अपने प्रति सद्व्यवहार की प्रवृत्ति का श्रीगणेश करते हुए व्यक्ति को सर्वप्रथम आत्महीनता की ग्रन्थि बेधने का कदम उठाना चाहिए। वस्तुतः मनुष्य परमात्मा का पुत्र है और परमात्मा इस सृष्टि का अधिपति। इन अर्थों में मनुष्य न तो दिन हीन है और न क्षुद्र नगण्य। मानवीय सत्ता को ईश्वरीय साम्राज्य में युवराज का पद प्राप्त हो और कोई युवराज अपने सम्मानित आसन से उठकर भिखारियों की पंक्ति में खड़ा हो जाय, रोने लगे तो उसे स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। उसके स्वास्थ्य अर्जन का ही प्रबन्ध किया जाना चाहिए। परन्तु मनुष्य की सत्ता न तो अस्वस्थ हुई है और न विक्षिप्त। अज्ञान वश स्वयं के प्रति उसका व्यवहार अवश्य बिगड़ा है जिसे सुधारने के लिए इस रूप में पहला कदम उठाना चाहिए और अपना सही मूल्याँकन करना चाहिए।

अपने प्रति व्यवहार को परखने का दूसरा सूत्र है-शरीर के प्रति बरती गई रीति नीति। यह ठीक है कि शरीर नश्वर है और आत्मा का उपकरण मात्र है, परन्तु इसका अर्थ यह नहीं है कि इसके प्रति जैसा जी चाहे बर्ताव किया जाय। आध्यात्मिक मनोवृत्ति के लोग भली भाँति जानते हैं कि यह अध्यात्म साधना में प्रगति के लिए उपकरण का काम देता है। मशीनें खराब हो जाएं, उन्हें लापरवाही से चलाया जाय और उनका कोई अंग टूट फूट जाय तो उसका जिस तरह ध्यान रखा जाता है, उसी तरह आत्मा के इस उपकरण की टूट-फूट को भी दृष्टिगत रखना चाहिए और इस पर ध्यान देना चाहिए। स्वास्थ्य, शक्ति और युवावस्था को जिस बेतरह बर्बाद किया जाता है, व्यर्थ के कार्य में, वह ठीक मशीन को लापरवाही से चलाने जैसा है। इस महत्वपूर्ण उपकरण की उपेक्षा करने वाले पहले वर्ग के तो वे लोग हैं जिनकी चर्चा इस लेख के आरम्भ में की गई है और दूसरे वे जो उपयुक्त साधन सुविधाएँ होती हुए भी इसकी भली भाँति देख रेख नहीं करते। न उचित खान पान, न स्वस्थ स्थान में निवास और न पर्याप्त विश्राम। दिन रात रुपये पैसे इकट्ठे करने की ही योजनाएँ चलती रहती हैं और रुपया जीवन से भी अधिक मूल्यवान बन जाता है। शरीर के प्रति अनाचार तब सीमा से भी बाहर हो जाते हैं जब रुपया जीवन की अपेक्षा महत्वपूर्ण हो जाता है और उसके लिए शरीर की भी उपेक्षा होने लगती है। इन दोनों विडम्बनापूर्ण स्थितियों को बदला जाना चाहिए। रहन सहन, आहार-बिहार और पर्यावरण इस प्रकार का रहे कि वह जीने में सहायक बने, बाधक नहीं और दूसरे रुपये पैसों के लिए शरीर की जीवन की उपेक्षा न की जाय।

शारीरिक सद्व्यवहार के बाद आता है मानसिक सद्व्यवहार। बाह्य घटनाओं के प्रति प्रायः हमारा दृष्टिकोण कुछ इस प्रकार का होता है कि जैसे वे हम पर ही आपत्ति का पहाड़ बनकर टूट रही हों। ऐसे भावुक लोगों की कमी नहीं है जो प्राकृतिक हलचलें-चाहे वे कहीं भी हुई हों इस दृष्टिकोण से लेते हैं कि वे जैसे हमारा ही सर्वनाश करने के लिए घटित हुई हैं। भले ही वे उनके प्रभाव क्षेत्र से मीलों दूर रह रहे हों। यह प्रवृत्ति सूक्ष्म रूप में भी देखी जा सकती है। बाहरी घटनाओं से अकारण ही खिन्न होकर ऐसे भावुक व्यक्ति अपना कितना खून सुखा लेते हैं, कुछ कहा नहीं जा सकता।

मनोजगत के प्रति दुर्व्यवहार की एक विडम्बना द्वेष दुर्भाव और दुश्चिन्ताओं के रूप में भी देखी जा सकती है। जो प्रगति कर रहा है, उन्नति के पथ पर आगे बढ़ रहा है उससे डाह रखकर हम उसकी प्रगति तो नहीं रोक सकते, हाँ अपने ही विकास में रोड़े जरूर खड़े कर सकते हैं। यह शत्रुता फिर किसके साथ बरती गई कही जायगी-प्रगति करने वाले के साथ या अपने आपके साथ। इसी प्रकार की निर्मूल चिन्ताएँ, अकरणीय आशंकाएँ और आन्तरिक द्वंद्वों के बीच अपनी योग्यता, प्रतिभा शक्ति को पीसते रहकर आत्म हिंसा का मार्ग ही तैयार किया जा सकता है।

विवेकशीलता का तकाजा है कि व्यक्ति दूसरों के साथ सद्व्यवहार तो करे ही, औरों के सुख-दुख की चिन्ता और उनका हित-साधन भी करे। परन्तु अपने प्रति दुर्व्यवहार की रीति-नीति को भी समझे, बदले। अपने प्रति किया सद्व्यवहार विकसित होकर परमार्थ साधना भी बन सकता है, बनता है। इस रीति नीति को अपनाने के लिए आध्यात्मिक विश्वास और उसे साकार रूप देना एकमात्र मार्ग है। इस मार्ग पर चलकर व्यक्ति आत्म-कल्याण और लोकहित दोनों प्रयोजनों को एक साथ पूरा कर सकता है।

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कोई काम न तो सरल है और न कठिन

संसार में हर काम कठिन है और हर काम सरल। सरल वे हैं जिन्हें खेल की तरह, दिलचस्पी के साथ और अपनी क्षमता के विकास का अभ्यास समझ कर किया जाता है। कठिन वे हैं जिन्हें आशंका, उदासी और भार बेगार की तरह किसी प्रकार पूरा किया जाता है।

जब यह लगता है कि यह काम किसी ने सिर पर थोपा है-उसे करने के लिए मजबूर किया है और उसे पूरा करके में अपनी व्यक्तिगत दिलचस्पी नहीं है तो उस पर मन एकाग्र नहीं होता। मन कहीं- शरीर कहीं की विश्रृंखलित स्थिति में अपनी क्षमता का तीन चौथाई भाग ऐसे ही बिखरा पड़ा रहता है और नष्ट होता है। एक चौथाई मनःशक्ति लगने पर हाथ में लिया हुआ काम अनेकों त्रुटियों से भरा, अपूर्ण और अस्त-व्यस्त रहेगा। शरीर में उसे करने की क्षमता होते हुए भी उचित परिश्रम करते न बन पड़ेगा । खाद और पानी न मिलने पर पौधे सूखते-मुरझाते हैं। समुचित श्रम और रुचिर मनोबल का खाद, पानी पाये बिना किसी कार्य को सुन्दरता और सफलता के साथ सम्पन्न नहीं किया जा सकता। आधे अधूरे मन से और भार-भूत समझ कर किये गये अलसाए शरीर के काम उस स्तर के हो ही नहीं सकते जिन्हें देख कर अपने मन की कली खिले और दूसरे लोग जिसे देखकर अनुकरण का उत्साह ग्रहण करें।

छोटे से छोटा और सरल से सरल काम भी भारी पड़ेगा यदि उसमें व्यक्तिगत दिलचस्पी न होगी। जेलखानों में बन्द रहने वाले कैदियों को सामान्य किसान, लुहार या श्रमिक की अपेक्षा कम और क्रमबद्ध काम ही करना पड़ता है, पर वे शारीरिक शक्ति रहते हुए भी उतने से ही बेतरह थक जाते हैं और-अपने दुर्भाग्य को कोसते हैं। साथ ही जेल अधिकारी भी उस काने-कुबड़े काम को देखकर असन्तुष्ट रहते हैं उन्हें लगता है कि इनसे न करा कर यही कार्य किन्हीं दूसरों से पैसा देकर कराया गया होता तो आर्थिक लाभ भी रहता और काम भी अच्छा होता। मुफ्त में किया गया कैदियों का काम बाजारू मोल की तुलना में सस्ता नहीं महंगा पड़ता है।

इसके विपरीत जहाँ दिलचस्पी का का समावेश है उसकी शोभा और विशेषता देखते ही बनती है। प्रेयसी अपने भावी पति को उपहार में देने के लिए जो स्वेटर बुनती है उसका एक-एक फन्दा किस खूबसूरती और मजबूती के साथ लगा है यह देखते ही बनता है। माता अपने हाथ से अपने बच्चों के लिए जो भोजन बनाती है उसका स्वाद और गुण सहज ही सराहा जा सकता है। किसान दुबला और रुग्ण होने पर भी कितने अधिक घण्टे तक, कितना अधिक काम, कितनी अच्छी तरह पूरा करता है, उसका लेखा-जोखा लेने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि अपने परिवार की सुव्यवस्था के साधन जुटाने वाले कृषि कर्म में उसे कितनी अधिक दिलचस्पी थी और उसकी रुचि ने कितनी विषम स्थिति रहने पर भी कितनी अच्छी तरह उस काम को करा लिया।

अमीरों के बच्चे अक्सर बुद्धू, कामचोर, असफल और अदक्ष रहते हैं। इसके विपरीत गरीबों के लड़कों में तेजी एवं प्रतिभा की बहुलता पाई जाती है। उसमें अमीरी-गरीबी को श्रेय दोष देना व्यर्थ है। कारण यह है कि अमीर का लड़का यह अनुभव नहीं करता कि काम को तत्परतापूर्वक करने और सफलता पाने की उसे भी कुछ आवश्यकता है। घर में जब सभी सुविधा साधन मौजूद हैं तो वह परिश्रम के झंझट में पड़ने की अपेक्षा मौज-मजा करने में ही समय क्यों न गुजारे? यह विचार मन में आते ही मस्तिष्क की दक्षता और शरीर की क्षमता विदा होने लगती है और वह लड़का बुद्धू एवं असफल रहने लगता है। इसके विपरीत गरीब का बालक सोचता है-उसे अपने पैरों पर ही खड़ा होना है, अपने ही बलबूते जिन्दगी काटनी है। आज का आलस्य कल दरिद्र बनकर सामने आ खड़ा होगा और पग-पग पर नीचा दिखावेगा। यह विचार उसे तिलमिला देता है और जैसी भी कुछ हलकी पूरी योग्यता थी-जैसी भी कुछ कानी-कुबड़ी परिस्थिति थी उसी को समेट, सँजोकर तत्परतापूर्वक प्रयत्नरत होता है और अन्ततः उतनी अधिक प्रगति कर लेता है कि समीक्षा करने वाले अचम्भे में रह जाते हैं।

हर व्यक्ति में दक्षता के बीज समुचित मात्रा में विद्यमान रहते हैं। प्रश्न इतना भर है कि उनके विकास का प्रयत्न किया गया या नहीं। मस्तिष्कीय दुर्बलता से ग्रसित कालिदास का विद्वान होना, सदा बीमार रहने वाले सेन्डो का विश्व विख्यात पहलवान बनना और दस्यु बाल्मीक का उच्चकोटि का ऋषि बनना यह बताता है कि अनभ्यस्त दिशा में प्रगति कर सकने की क्षमताएँ भी मनुष्य में विद्यमान रहती हैं। यदि मनुष्य उनके विकास की आवश्यकता सच्चे मन से गहरी सम्वेदना के साथ अनुभव करे तो भीतर से इतना उत्साह उठेगा कि प्रसुप्त क्षमताओं के सजग सक्रिय होने में देर न लगेगी। बहुधा किसी बड़ी ठोकर के लगने के बाद आदमी अधिक सक्रिय और सफल होता है। इसका कारण अत्यन्त स्पष्ट है कि विपत्ति ने उसकी आन्तरिक सुषुप्ति को झकझोरकर रख दिया और उसे सक्रियता की गरिमा स्वीकार करनी पड़ी।

आवश्यक नहीं कि हर व्यक्ति को गरीबी या मुसीबत के थपेड़े ही सक्रिय बनावें। प्रश्न दिलचस्पी का है। वह बिना दरिद्र और बिना विपत्ति के भी लग सकती है। यदि कार्य की दक्षता को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया जाय और उस आधार पर अपनी प्रतिभा, गरिमा को विकसित करने का लक्ष्य रखा जाय तो यह विश्वास जमेगा कि हाथ में लिया हुआ हर काम अपने वर्चस्व का प्रमाण बनकर बाहर आये। अधूरे और बेतुके काम को यदि अपनी निन्दा, निकृष्टता का उद्घोष समझा जा सके तो फिर मन यही कहेगा कि जो कुछ किया जा रहा है वह शानदार होना चाहिए ।

ऐसी ही मनःस्थिति में मनुष्य की दक्षता का विकास होता है। जो योग्यता पहले नहीं थी वह धीरे-धीरे बढ़ती चली जाती है। एकाग्रता और दिलचस्पी से बढ़कर जादुई शक्ति और कुछ नहीं , उन्हें जहाँ भी नियोजित किया जाता है वहाँ योग्यता की कमी नहीं रहती। कुछ पहले दिनों जिन कार्यों में अपनी अनभिज्ञता और अयोग्यता थी भी उन्हीं कार्यों में थोड़ी ही समय के उपरान्त प्रखर प्रवीणता दिखाई पड़ती है, इसका कारण कोई दैवी चमत्कार नहीं वरन् यह है कि उस दिशा में पूरा मनोयोग लगाया गया और पूरी तत्परता के साथ प्रयत्न किया गया।

जन्म-जात प्रतिभा में न्यूनाधिकता हो सकती है। कुछ लोग आरम्भ से ही चतुर होते हैं और अपेक्षाकृत कम समय और कम परिश्रम से सफलता पा लेते हैं । किन्तु यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि दूसरों में वे योग्यताएँ हैं ही नहीं। हर मनुष्य में हर स्तर की क्षमता बीज रूप में विद्यमान है। प्रयत्नपूर्वक उन्हें जगाया और बढ़ाया जा सकता है। अधिक समय लगे और अधिक श्रम करना पड़े यह बात दूसरी है, पर मन्दमति कहे जाने वाले भी अध्यवसाय का सहारा लेकर उतने ही ऊँचे उठ सकते हैं, उतने ही सफल हो सकते हैं जितने कि जन्म -जात प्रतिभा वाले होते देखे जाते हैं।

काम कौन-सा कठिन है कौन-सा सरल इसकी व्याख्या विवेचना करनी हो तो यही कहना चाहिए कि जिस कार्य में जितनी कम दिलचस्पी और तत्परता होगी वह उतना ही कठिन होगा और जिसमें मनोयोग, अभिरुचि एवं श्रमशीलता का जितना पुट लगेगा वह उतना ही सरल होगा। मनुष्य आकाश-गगन से लेकर समुद्र तल की गहराई में उतरने तक के जोखिम भरे काम हँसते-खेलते पूरे करते हैं और नगण्य से घरेलू काम आधे-अधूरे, सड़े-मरे, जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े रहते हैं। जरा-जरा से कामों में असफल होना और दुस्तर समझे जाने वाले कामों का सुसम्पन्न होना यह सिद्ध करता है कि अमुक काम को सरल या अमुक काम को कठिन कहना व्यर्थ है। रुचि, आकाँक्षा और श्रमशीलता का त्रिविधि संयोग जिस भी दिशा में-जिस भी प्रयास में नियोजित होगा उसका सरल रहना और सफल होना सुनिश्चित है। असफल तो वे ही कार्य रहते हैं जिन्हें बेकार, बेगार समझकर हाथ में लिया गया और रोते-झींकते पूरा किया गया।

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स्वप्न स्थूल और सूक्ष्म जगत के मध्य शृंखला

स्वप्न सार्थक भी होते हैं और निरर्थक भी। यह एक अनोखी दुनिया है, जिसमें विचरण करते हुए हम जाने क्या-क्या चित्र-विचित्र देखते हैं? जाग जाने पर तो वे बेसिर-पैर के लगते हैं, पर देखते समय लगता है मानो यह सब यथार्थ ही यथार्थ है। उन दृश्यों का प्रभाव भी मन पर पड़ता है। इनमें से बहुत से विस्मृति के गर्त में भी चले जाते हैं। जो याद रहते हैं उनमें कुछ तो बिना टिकट के घर बैठे देखे गये सिनेमा की तरह मनोरंजक, कौतुहल-वर्धक मात्र लग कर रह जाते हैं और कुछ देर तक मनः क्षेत्र को आन्दोलित किये रहते हैं। स्वप्न एक ऐसी सचाई है जो आये दिन सामने आती है, पर रहस्य की परतों में लिपटे हुए अचरज और कौतूहलमय ही बने रहते हैं। उनका न तो कारण समझ में आता है और न उद्देश्य।

नींद में पड़ने वाले विक्षेप भी तरह-तरह के प्रिय अप्रिय स्वप्न लाते हैं। सोते सोते यौन उत्तेजना होने पर मैथुन के दृश्य दिखते हैं और स्वप्नदोष तक हो जाते हैं जुएँ, चीलर, खटमल, मच्छर आदि शरीर को काटते हैं तो कष्टकारक अनुभूतियाँ देने वाले स्वप्नों की फौज सामने आ खड़ी होती है। पेट का अपच, शिर का भारीपन, मानसिक तनाव, चिन्ता रोष, उद्वेग जैसी शारीरिक, मानसिक कठिनाइयां भी अपने अपने स्तर के स्वप्न गढ़ लेती हैं। अतृप्त आकाँक्षाएँ भी अपना रंग महल आप ही बनाने, बिगाड़ने का खेल खेलती हैं और चित्र विचित्र स्वप्नों के रूप में सामने आती हैं। यह सामान्य स्तर के स्वप्न हुए जिन्हें मोटी दृष्टि से महत्वहीन कहा जा सकता है। यों विश्लेषण करने पर उनके सहारे मनःस्थिति का निदान निरूपण उसी प्रकार किया जा सकता है जिस प्रकार कि शारीरिक रोग निदान में मल, मूत्र, रक्त, एक्सरे आदि की जाँच करके बीमारी का स्वरूप और कारण जाना जाता है।

कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय के स्वप्न परीक्षण विभाग ने यह जांचने का प्रयत्न किया कि देखें सामयिक परिस्थितियों का भी मनुष्य पर कुछ प्रभाव पड़ता है या नहीं। प्रयोग के लिए एक सोए हुए खिलाड़ी की बन्द आँखों के सामने जलती हुई मोमबत्ती रखी गई। खिलाड़ी ने सपना देखा कि गेंद बल्ला सामने रखा है और वह खेलने के लिए उन्हें उठा रहा है। क्लर्क ने देखा कि एक हाथ में लालटेन और एक हाथ में मोटा डंडा लिए कोई शत्रु उसे मारने आ रहा है। गेंद एवं लालटेन मोमबत्ती का जलता भाग था और उसका बिना जला हिस्सा एक के सामने बल्ला और दूसरे के सामने डण्डा बनकर स्वप्न रूप में परिलक्षित हो रहा था।

नींद और सपनों का परस्पर सम्बन्ध किस प्रकार जुड़ता है। शरीर का कौन-सा अवयव इसके लिए उत्तरदायी है, इसकी शोध में शिकागो विश्वविद्यालय के दो छात्र निरत थे। एक नेपोलियन क्लीटमा-दूसरा यूजोन एसेरिन्स्की। दोनों की खोज इस रहस्य का पता लगाने में अवरोधग्रस्त हो गई।

एक दिन उन्होंने दिवा स्वप्न की तरह एक बच्चे की पुतलियाँ बन्द पलकों के भीतर तेजी से गति करते और साथ ही उसके चेहरे पर कई तरह की भाव मुद्राएँ उभरती देखीं। इस दृश्य ने उन्हें नया आधार दिया कि पुतलियों की हलचलें, स्वप्न देखने की भूमिका बनाती हैं। शोध को उस आधार पर नई दिशा मिली और वे खोजें इसी मार्ग पर चलती हुई आज बहुत आगे बढ़ गई हैं।

स्वप्नों की साँकेतिक भाषा है। गुप्तचर अपने भेदों के समाचार जब मुख्य संचालक के पास किसी सन्देश के माध्यम से भेजते हैं तो साँकेतिक भाषा का प्रयोग करते हैं। रास्ते में भेद न खुलने पाये इस दृष्टि से ऐसी सुरक्षा आवश्यक होती है। ठीक ऐसा ही कुछ प्रबन्ध स्वप्न व्यवस्था के सम्बन्ध में भी है। वे अनबूझ पहेलियों की तरह दिखाई पड़ते हैं। उनमें साँकेतिक दृश्य एवं संवादों का समावेश रहता है। उन्हें समझना भारी माथा-पच्ची और सूक्ष्म दृष्टि के सहारे ही सम्भव हो सकता है।

यों मानसिक गुत्थियाँ और व्यावहारिक जीवन की अनुभूतियाँ, अभिव्यंजनाएं भी मस्तिष्क में लुक-छिपकर बैठी रहती हैं और बुद्धि का दबाव जब घट जाता है तब निद्रावस्था में अपना रास रचाने के लिए निकल पड़ती हैं। पिछले संस्मरणों का उलझा-सुलझा, ताना-बाना स्वप्न बनकर दिखाई देता है। वे अधिकतर इसी स्तर के होते हैं। जिनकी अन्तःचेतना अविकसित है उन्हें तो प्रायः ऐसे ही अनगढ़ सपने दिखते हैं जिनका कोई विशेष तात्पर्य नहीं होता, उन्हें बाल-क्रीड़ा के समतुल्य ही माना जा सकता है। कुछ दिव्य आभास दे सकने वाले स्वप्न उन्हें आते हैं जिनकी मनोभूमि अधिक सम्वेदनशील होती है। किन्हीं किन्हीं में ऐसी विशेषता पूर्व संचित संस्कारों के कारण पाई जाती है। कई अपनी मलीनता एवं भोथरेपन को साधनात्मक उपायों से घटाते हैं और आत्मिक तीक्ष्णता उत्पन्न करते हैं। ऐसे लोग रात्रि स्वप्न, दिवा स्वप्न, योग तन्द्रा जैसी स्थितियों में कई ऐसे संकेत प्राप्त करते हैं जिनके फलितार्थ बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो सकें।

कई बार स्वप्न ऐसे प्रेरक होते हैं कि उनके प्रकाश में मनुष्यों का जीवन-क्रम ही बदल जाता है। भगवान् बुद्ध तब राजकुमार थे। नवयौवन में प्रवेश ही किया था। एक दिन उनने स्वप्न देखा कि श्वेत हाथ पकड़ कर श्मशान ले पहुँचा। उँगली का इशारा करते हुए उसने दिखाया-‘देख यह तेरी ही लाश है। इस तथ्य को समझ और जीवन का सदुपयोग कर।’ आँख खुलते ही बुद्ध विह्वल हो गये और उनने निश्चय कर ही डाला कि इस बहुमूल्य सौभाग्य का उन्हें किस प्रयोजन के लिए-किस प्रकार-उपयोग करना है। वे राज-पाट छोड़कर श्रेय की खोज में चल पड़े और अन्ततः उन्होंने उसे प्राप्त कर भी लिया।

फ्राँसीसी राज-क्रान्ति की सफल संचालित ‘जान आफ आर्क’ एक मामूली से किसान के घर में जन्मी थी। उन्होंने वहीं एक रात सपना देखा कि आसमान से उतरता कोई फरिश्ता उन्हें कह रहा है कि-‘अपने को पहचान, समय की पुकार सुन, स्वतन्त्रता की मशाल जली।’ ये तीनों ही बातें उनने गाँठ बाँध ली और उसी समय से वे फ्राँस को स्वतन्त्र कराने के लिए नये आवेश के साथ उस संग्राम में कूद पड़ी।

सिग्मंड फ्रायड स्वप्नों को दमन की गई मनोभावनाओं की प्रतिक्रिया कहते थे और दमन की गई भावनाओं से सबसे अधिक वे यौन आकाँक्षा को मानते थे। उनकी दृष्टि से यौन अतृप्ति ही सारी गड़बड़ी की जड़ है। इन्हीं गड़बड़ी में स्वप्न जंजाल भी सम्मिलित है।

फ्रायड के विचारों का खण्डन प्रख्यात मनःशास्त्री कार्ल गुस्ताव जुँग ने किया है। वे कहते हैं दैनिक घटनाओं और सम्वेदनाओं का प्रभाव स्वप्नों में रहता तो है, पर वे इतने तक ही सीमित नहीं है। ब्रह्माण्ड में प्रवाहित होती रहने वाली पराचेतना में स्थितिवश अनेक विश्व प्रतिबिंब तैरते रहते हैं। मनुष्य की अनुभूतियाँ उनसे प्रभावित होती हैं और वह प्रभाव व्यक्ति की निज की स्थिति के साथ सम्मिलित होकर स्वप्न जैसी विचित्र प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। उनका अभिप्राय यह है कि व्यक्ति की सीमित चेतना व्यापक पराचेतना के साथ मिलकर जिस स्तर का अनुभव करती है उसका सीधा तो नहीं, पर आड़ा टेढ़ा परिचय स्वप्न संकेतों में मिल जाता है।

यहाँ यह स्मरण रखे जाने योग्य तथ्य है कि स्वप्न मनुष्य के निज के स्तर की परिधि में ही आवेंगे। जो जानकारियाँ उसे नहीं हैं अथवा जिस ओर उसकी दिलचस्पी बिलकुल नहीं है, वैसे स्वप्न प्रायः नहीं ही आते। लुहार के लिए यह कठिन है कि वह कलाकार होने के स्वप्न देखे। पर दैवी रहस्यों के बारे में ऐसी बात नहीं है वह किसी भी स्तर का व्यवसाय करने पर कोई रुकावट अनुभव नहीं करते और किसी को भी स्वप्नों के आधार पर लाभान्वित कर सकते हैं।

मनःशास्त्र के विश्व विख्यात आचार्य कार्लजुँग ने उपचेतन मन का विश्लेषण करते हुए अपने ग्रन्थ, मेमोरीज ड्रीम्स रिफ्लैक्शन में लिखा है कि ज्ञान प्राप्ति के जितने साधन चेतन मस्तिष्क को प्राप्त हैं उससे कहीं अधिक विस्तृत और कहीं अधिक ठोस साधन उपचेतन की सत्ता को उपलब्ध हैं। चेतन मस्तिष्क दृश्य, श्रव्य तथा अन्य इन्द्रिय अनुभूतियों के आधार पर ज्ञान संग्रह करता है, पर उपचेतन के पास तो असीम साधन हैं। वह ब्रह्माण्ड व्यापी शाश्वत चेतना के साथ सम्बद्ध होने के कारण अन्तरिक्ष में प्रवाहित होते रहने वाले ऐसे संकेत कम्पनों को पकड़ सकता है जिनमें विभिन्न स्तर की असीम जानकारियाँ भरी पड़ी हैं।

मनोविज्ञानी हैफनर-मआस्स-राबर्ट जैसे विद्वानों का कथन है कि स्वप्न मनुष्य के भौतिक जीवन की प्रतिच्छाया और प्रतिक्रिया मात्र होते हैं, पर अन्य विद्वान वैसा नहीं मानते। फिख्ते का प्रतिपादन है कि सपने मानवी मन की भीतरी परतों को साँकेतिक भाषा में उभार कर ऊपर लाते हैं। उनके आधार पर यह जाना जा सकता है कि स्वप्नदर्शी को शारीरिक और मानसिक चेतना की किस स्थिति में निर्वाह करना पड़ रहा है। स्ट्रम्पैल का कथन हैं कि सपने जागृत जीवन से आगे की प्रसुप्त भूमिका का रहस्योद्घाटन करते हैं। बर्डेक कहते है कि सपनों को दैनिक जीवन की छाया मात्र कहकर उपहासास्पद नहीं समझ लिया जाना चाहिए उनमें बहुत सी उपयोगी सूचनाएँ सन्निहित रहती हैं।

स्वप्नों में भीतर ही भीतर पक रही खिचड़ी के ऊपर तैरने वाले झाग या छिलके तैरते देखे जा सकते हैं और उनके सहारे यह जाना जा सकता है कि क्या अन्तः चेतना की सीपी में कोई बहुमूल्य मोती विनिर्मित और परिपक्व होने जा रहा है।

स्वप्न में सक्रिय मस्तिष्क शिथिल हो जाता है दबाव या बन्धनों के भार से, हलकापन आने पर अन्तः चेतना अपने खेलकूद का मौका ढूँढ़ लेती है और उन हलचलों के पीछे किसी महत्वपूर्ण उपलब्धि के संकेत ढूँढ़े जा सकते हैं। इसी स्थिति में बहुतों को ऐसे आधार हाथ लगे हैं जो तार्किक मस्तिष्क द्वारा बहुत माथा पच्ची करने पर भी हस्तगत नहीं हो सकते थे।

फ्लोरन्स (इटली) निवासी मनः शास्त्री गेस्टन उगदियानी ने अपने एक स्वप्न का विश्लेषण स्वयं ही किया है। सात वर्ष की आयु में उनने सपना देखा कि वे किसी मन्दिर में पुजारी का काम करते हैं। सपना इतना अधिक स्पष्ट था कि मन्दिर की इमारत का नक्शा पूरी तरह उनके मस्तिष्क पर जमा रहा और उस स्वप्न दर्शन की गहरी छाप उनके मस्तिष्क पर सदा ही जमी रही। अन्ततः वे जिज्ञासा का समाधान करने के लिए मन्दिरों के देश भारत में आये और खोजते-खोजते दक्षिण भारत के महाबलीपुरम् नगर के एक मन्दिर को देखकर वे सन्न रह गये, वह बिलकुल वैसा ही बना हुआ था जैसा कि उनने सपने में देखा था। इस स्वप्न का विश्लेषण उन्होंने पूर्व जन्म की स्मृति की संज्ञा देते हुए किया है।

दूर दर्शन, अविज्ञात का ज्ञान, भविष्य आभाएं जैसी चमत्कारी विशेषताएँ भी कभी-कभी स्वप्नों के साथ जुड़ी होती हैं। उनकी यथार्थता पर विचार करने से निष्कर्ष निकलता है कि सूक्ष्म जगत की हलचलों के साथ मनुष्य अपनी चेतना का सम्पर्क बनाने में स्वप्नों का सहारा ले सकता है। बुद्धि चेतना के दबाव में अन्तर्मन की भली-बुरी, गहरी उथली परतें ऐसी ही दबी डरी जहाँ तहाँ छिपी रहती हैं। उस दबाव से निद्रा की स्थिति में आंशिक छुटकारा मिलता है तब स्वप्न के माध्यम से अन्तर्मन को सूक्ष्म जगत से सम्बन्ध जोड़ने और रहस्यमय अविज्ञात को जानने का अवसर मिलता है। समाधि, ध्यान, धारणा एवं योगनिद्रा की स्थिति में भी बुद्धि का दबाव घट जाता है। फलतः सूक्ष्म अन्तःकरण के सक्रिय होने और दिव्य जगत से सम्पर्क बनाने का लाभ मिल जाता है। पूर्ण समाधि और अर्ध समाधि की स्थिति में साधकों को जो दिव्य अनुभूतियाँ होती हैं उन्हें जागृत एवं अधिक यथार्थ स्वप्न कहा जाय तो उसमें कोई अत्युक्ति न होगी।

सिडनी के टामफीचर ने अपनी अन्तः क्षमता को इस दिशा में विशेष रूप से प्रशिक्षित किया था कि वे अनायास आये स्वप्नों का संकेत समझ सकें। इतना ही नहीं वे प्रस्तुत समस्याओं के समाधान सूक्ष्म जगत से प्राप्त कर सकें, गुत्थियों के हल ढूँढ़ सके और अविज्ञात को जानने के सूत्र खोज सकें। इस साधना में उनने भारी पुलिस की सहायता की थी। बालक इस समय कहाँ है, उसका सही पता, ठिकाना एवं चुराने वालों के नाम आदि सही रूप में बता देने के कारण पुलिस ने तत्काल वहाँ धावा बोला और अपने प्रयास में सफलता पाई। इस सहयोग के उपलक्ष में टामफीचर को दो हजार डालर का सरकारी पुरस्कार दिया गया था।

मन जब आत्मा की ‘फ्रीक्वेंसी’ पर पहुँच जाता है तो वह व्यापक क्षेत्र से अनुभूतियाँ प्राप्त करता है। स्वप्नों का सत्य इसका प्रमाण है। पर ओलिवरलाज ने अपनी पुस्तक ‘सरवाइवल आफ मैन’ नामक पुस्तक के पृष्ठ 112 में यह स्वीकार किया है कि कोई माध्यम है जो हमें अलौकिक ज्ञान कराता है साथ ही पृष्ठ 106-107 पर तत्संबंधी एक घटना भी यों दी है-

“पादरी इ0 के0 इलिमद अटलाँटिक समुद्र में यात्रा कर रहे थे। 14 जनवरी 1887 की रात उन्हें स्वप्न में चाचा का पत्र मिला, जिसमें छोटे भाई की मृत्यु की सूचना थी। उन्होंने अपनी डायरी में लिखा है कि स्विट्जरलैंड छोड़ते समय भाई को सामान्य बुखार था। उसकी मृत्यु की तो कल्पना तक नहीं थी, पर इंग्लैण्ड पहुँचने पर बात सच निकली। यह परोक्ष-दर्शन (क्लेयर वायेंस) के अतिरिक्त और क्या हो सकता है?”

जब रोम के महान् सम्राट सीजर को उनकी पत्नी द्वारा एक अमुक दिन सीनेट-भवन न जाने का आग्रह किया गया तो सीजर अपनी पत्नी के स्वप्न में खुले बाल लिए पति की रक्त रंजित लाश गोद में देखने की बात न मानते हुए चला ही गया और सचमुच ही भवन में पहुँचते ही उसके मित्र ब्रूटस द्वारा एक तंग स्थान पर उसकी हत्या कर दी गई।

एक सात्विक विचारों वाला व्यक्ति चार्ल्स फिलकोर अमेरिका का एक सामान्य गृहस्थ था। उसे प्रायः सात्विक स्वप्न ही आते थे।

एक रात उन्होंने स्वप्न में देखा कि एक अपरिचित व्यक्ति उनसे पीछे-पीछे चलने को कह रहा है। वे पीछे-पीछे चल पड़े और एक नगर कंसास में पहुँचे जो उनका देखा हुआ था। पर फिर वह व्यक्ति उन्हें ऐसे स्थान पर ले गया जो अपरिचित था। वहाँ उसने उनके हाथ में एक समाचार पत्र दिया। वे उसका पहिला अक्षर ‘यू’ पढ़ पाये थे कि एक के बाद एक समाचार पत्र उनके हाथ में आते गये और अनायास नींद खुल गई।

वे ध्यान, साधना आदि का अभ्यास लोगों को कराते थे। बड़े-बड़े लोग उनसे प्रभावित थे पर प्रचार-प्रसार की बात दिमाग में थी ही नहीं। पर एक दिन कुछ लोगों ने उनके पास आकर इस पुनीत कार्य के प्रचार प्रसार को देखकर एक संस्था का प्रस्ताव रखा और ‘सोसायटी आफ सायलेंट यूनिटी’ नामक संस्था का निर्माण भी हो गया। कार्यालय के लिए अनायास ही कंसास शहर को लोगों ने प्रस्तावित किया और वही स्थान जिसे फिलकोर ने स्वप्न में देखा था और एक अखबार भी ‘यूनिटी’ नाम से निकला गया जिसका पहला अक्षर ‘यू’ ही था। बाद में और भी पत्र पत्रिकाएँ वहाँ से छपीं और स्वप्न का तथ्य सत्य हो गया।

प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता रोमान नोवारो ने एक घटना बताई कि वह जिस होटल में ठहरा था उसका स्वामी मर चुका था और सम्पत्ति की कोई वसीयत न होने के कारण बड़ा लड़का सब हड़प जाना चाहता था। अतः वह छोटे को तंग भी करता रहा। छोटे लड़के ने नोवारो से अपना दुःख दर्द बताया, पर वह कुछ भी मदद करने में असमर्थ था। रात को स्वप्न में उसने देखा कि एक आदमी होटल के उसी कमरे के एक आले की ओर इशारा कर लकड़ी से उस स्थान पर ठक्क ठक्क कर रहा है। नोवारो की नींद टूटने पर उसने समझा चूहे गड़बड़ कर रहे होंगे। पर पुनः सोने पर वही दृश्य दिखाई दिया। नींद खुलने पर उसने आले के कागज हटा कर देखे तो एक कपड़े में लिपटी वसीयत रखी थी। प्रसन्नतापूर्वक उसने वह वसीयत छोटे लड़के को दे दी और तद्नुसार छोटा लड़का भी आधी जायदाद का स्वामी बन गया। बड़े लड़के के मनसूबे विफल हो गए।

संसार की स्वर्ण खदानों में दूसरे नम्बर की खदान वैटिल पहाड़ पर है उसके मालिक विनफील्ड स्काट स्ट्राटन ने इस खदान को प्राप्त करने सम्बन्धी आत्म विवरण में लिखा है कि वह दुर्भाग्यग्रस्त होकर व्यापार में अपना सब कुछ गँवा बैठा था। दुःखी और उद्विग्न मन को शान्ति देने के लिए इधर-उधर भटकता रहता था। 4 जुलाई 1891 को वह ही कोलेरेडो क्षेत्र के एक खुले मैदान में रात्रि बिता रहा था। सपने में उसने देखा कि एक फरिश्ता आया है और उसे वैटिल पहाड़ पर जाने का रास्ता बता रहा है और एक जगह पर निशान लगाकर बता रहा है कि यहाँ सोने की खदान है तुम इसे पाकर मालदार बन सकते हो।

स्ट्राटन हड़बड़ा कर उठ बैठा। अपने पास वह जमीन खरीदने और खुदाई करने के लिए पैसा था नहीं से उसने अपने सम्पन्न मित्रों से सपने की चर्चा की और वहीं खोदने का प्रस्ताव रखा। सभी ने उसका उपहास उड़ाया। भू-गर्भ विज्ञानी 18 वर्ष पूर्व उस सारे पथरीले क्षेत्र की भली-भाँति खोज कर चुके थे और घोषणा कर चुके थे कि यहां किसी कीमती खनिज के मिलने की सम्भावना नहीं है। अस्तु कोई भी उसका साथ देने के लिए तैयार न हुआ।

स्ट्राटन निराश नहीं हुआ वह अकेला ही वहाँ पहुँचा। हाथ से खोदने पर ही उसे सोने का डेला मिल गया। इसके बाद उसने किसी प्रकार धन जुटाया वह क्षेत्र खरीदा और अरबपति बन गया।

स्वप्नों के संकेत समझना सम्भव हो सके तो यह हमारे जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि हो सकती है। जिस स्थूल जगह में हम निवास, निर्वाह करते हैं उसकी जड़ें सूक्ष्म जगत में रहती हैं। पेड़ दिखता है, पर जड़ें दिखाई नहीं पड़तीं। वस्तुतः पेड़ की विशालता, मजबूती और हरियाली इस बात पर निर्भर रहती है कि उसकी जड़ें कितनी गहरी और सक्षम हैं। इसी प्रकार स्थूल जगत अथवा स्थूल जीवन प्रस्तुत उपलब्धियाँ सूक्ष्म जगत से ग्रहण करता है। सूक्ष्म को समझ सकने पर ही उसके साथ तालमेल बिठा सकना सम्भव हो सकता है। यह तालमेल पूरी तरह तो योग साधना द्वारा आन्तरिक निर्मलता प्राप्त करने से ही बिठाया जा सकता है, पर उसका आधा-अधूरा काम स्वप्नों के माध्यम से भी चल सकता है। स्वप्नों को स्थूल और सूक्ष्म के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी कहा जा सकता है।

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अधिक खाना स्वास्थ्य को गँवाना ही है।

एक अँग्रेजी कहावत है-‘‘मनुष्य मरता नहीं वह अपने आपको मार डालता है।” इस उक्ति में बहुत कुछ सार इसलिए है कि लोग आवश्यकता से कहीं अधिक खाने की आदत डाल कर अपने पाचन तन्त्र को बिगाड़ते हैं और अपच के शिकार होकर उपयोगी भोजन को पेट में विष उत्पन्न करने वाली विकृति के रूप में बदल लेते हैं।

पेट की रचना ऐसी है कि उसे ठीक तरह काम करने देने के लिए हलका फुलका रखा जाय। इतना वजन डाला जाय जिसे वह आसानी से वहन कर सके। पशु पक्षी पचता-पचता खाते चलते हैं। पेट पर एक दम अनावश्यक भार वे नहीं डालते। यही आदत सृष्टि के अन्य प्राणियों की है। केवल कुछ ही भोंड़े-जन्तु इसके अपवाद हैं-शेर, सुअर, मगर आदि एक दम बहुत सा भोजन पेट में भरते हैं इसका फल यह होता है कि वे स्फूर्ति गँवा कर बहुत समय तक निःचेष्ट, आलस्यग्रस्त, उनींदे पड़े रहते हैं। अन्य सभी प्राणी पेट को हलका रखते हैं और अपनी स्फूर्ति बनाये रहते हैं। पेट को भी पाचन में सुविधा इसी क्रम से रह सकती है।

थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पचता-पचता भोजन करने का अभ्यास डाला जाय तो वह अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में और अधिक आसानी से पच जायगा। यदि उसमें असुविधा रहती हो तो वर्तमान स्थिति में दो बार भोजन करने से काम चल सकता है, पर उसकी मात्रा पेट की क्षमता के अनुरूप ही होनी चाहिए। आजकल शत-प्रतिशत मनुष्य पाचन क्षमता से कहीं अधिक खाते हैं और उससे स्वास्थ्य एवं पैसे की बर्बादी की दुहरी हानि उठाते हैं। यह भ्रम नितान्त असत्य है कि जितना अधिक खाया जायगा, उतना बल बढ़ेगा। सच यह है कि जो पचेगा वही हितकर सिद्ध होगा।

ईरान के बादशाह बहमन ने एक दिन राज्य चिकित्सक लेत्सुस से पूछा-स्वस्थ मनुष्य को दिन रात में कितना खाना चाहिए। लेत्सुन ने उत्तर दिया 39 तोला इस पर बादशाह ने पूछा-भला इतने कम भोजन से क्या काम चलेगा? चिकित्सक ने उत्तर दिया। स्वस्थ रहने के लिए तो इतना ही पर्याप्त है। वजन ढोने के लिए कितना ही खाया जा सकता है।

आहार पर संयम करने वाले अपने दीर्घायुष्य के बारे में निश्चिन्त हो सकते हैं। थाम्स एडीसन शर्त लगाकर कहते थे कि मैं सौ वर्ष अवश्य जीऊँगा। गाँधी जी भी अपने 125 वर्ष जीने की घोषणा की थी। यदि गोली से न मारे गये होते तो सम्भवतः उतनी लम्बी आयु वे अपने आहार संयम के बल पर पा भी सकते थे।

विश्व विख्यात डॉक्टर मैकफेडन ने कहा है-भोजन अभाव से संसार में जितने लोग अकाल पीड़ित होकर मरते हैं उससे कहीं अधिक अनावश्यक भोजन करने के कारण रोगग्रस्त होकर मरते हैं।

यूनान की एक कहावत है-तलवार उतने लोगों को नहीं मारती जितने अधिक खाकर मरते हैं। सुलेमान कहते हैं-जो अधिक खायेगा वह अपना दाना पानी जल्द खतम करके मौत के मुँह में समय से पहले ही चला जायगा

आस्ट्रेलिया के ख्यातिनामा डॉक्टर हर्न कहते थे। लोग जितना खाते हैं उसका एक तिहाई भी पचा नहीं पाते स्वास्थ्य विज्ञानी हेरी वेजामिन ने लिखा है-बेवकूफियों में परले सिरे की बेवकूफी है-अधिक भोजन करना। डॉक्टर लोएन्ड ने आयु को घटाने वाले जो दस कारण बताये उनमें प्रथम अधिक भोजन करने की बुरी आदत को गिना है।

संसार के महापुरुषों में से प्रायः प्रत्येक की यह विशेषता रही है कि उन्होंने पेट की माँग से कम मात्रा में भोजन लेने का नियम रखा और अपने स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रह सके।

संसार के दीर्घजीवियों में सात को अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया जाता है। (1) अमेरिका केमेलेटोजा 187 वर्ष के होकर मरे (2) हंगरी के पीटर्स झोर्टन जो 185 वर्ष जिये (3) यार्क शायर के हेनरी जेनकिस जिन्होंने 161 वर्ष की आयु पाई (4) इटली के जोसेफ रीगंटन जिन्होंने 160 वर्ष की आयु पाई, जब वे मरे तब उनका बड़ा लड़का 108 वर्ष का और छोटा 8 वर्ष का था। (5) इंग्लैण्ड के थामस पार जिनकी मृत्यु 152 वर्ष की आयु में हुई (6) लेडी कैथराइन काउण्टेस डेसमाँड जो 146 वर्ष तक जीवित रहे और जिनके मुँह में तीन बार दाँत निकले (7) जोनाथन हारपोट जो 139 वर्ष के होकर मरे। उनके 7 पुत्र 26 पौत्र और 140 प्रपौत्र उनके सामने ही पैदा हुए थे।

इन सबने अपने दीर्घजीवन के अन्यान्य कारणों के अतिरिक्त एक कारण एक स्वर से बताया कि उन्होंने सदा भूख से कम भोजन किया और पेट को खाली रखने का स्वभाव बनाया।

बंगाल के प्रख्यात डॉक्टर और सर्वविदित कांग्रेसी नेता डॉ0 विधानचन्द्र राय कहते थे कि 80 प्रतिशत मनुष्य आवश्यकता से अधिक मात्रा में भोजन करने के कारण बीमार पड़ते हैं। पं0 नेहरू ने एक बार खाद्य समस्या पर प्रकाश डालते हुए संसद में कहा था-अपने देश में एक ओर तो अन्न की कमी है और दूसरी और आवश्यकता से अधिक खाने की बुरी आदत लोगों को पड़ी हुई है।

सर विलियम टेम्पिल ने अपने ‘लोंग लाइफ’ ग्रन्थ में मिताहार पर बहुत जोर दिया है और कहा है यदि अधिक दिन जीना हो तो अपनी खुराक को घटाकर उतनी रखो जितने से पेट को बराबर हलकापन अनुभव होता रहे।

व्रत उपवासों की परम्परा का प्रचलन इसी दृष्टि से हुआ है कि लोग कम खाने का अभ्यास करें और दीर्घजीवी बनें। समय-समय पर पेट को अवकाश देने की दृष्टि से तथा दैनिक जीवन में उपयुक्त मात्रा का भोजन औषधि रूप में सेवन करने की ही भारतीय परम्परा रही है।

दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाये। उनमें से एक मछली भी थी। जिसने जिह्वा की लोलुपता से अधीर होकर कांटे समेत आटे को निगला था और उसी मूर्खता की वेदी पर अपना प्राण गंवाया था। दत्तात्रेय ने निष्कर्ष निकाला कि जिसकी स्वादेन्द्रिय काबू में न होगी वह इसी तरह बेमौत मरेगा। यह बहुमूल्य शिक्षा प्रकारान्तर से देने के कारण उन्होंने मछली को भी एक गुरु माना था।

अश्विनीकुमारों ने वागभट्ट से पूछा- निरोगी कौन? उसके उत्तर में उन्होंने उत्तर दिया- ‘हित भुक् मितभुक्’ अर्थात् जो उपयोगी खाद्य-पदार्थ ही ग्रहण करता है और भूख से कम खाता है। इसी का दूसरा पक्ष यह है कि जो उपयोगिता को भुलाकर चटोरेपन पर आश्रित रहेगा और पेट पर अनावश्यक वजन लादेगा वह बीमार पड़ेगा।

आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ वागभट्ट में भोजन की मात्रा कम रखने का निर्देश दिया गया है। अन्नेन कुक्षेद्वविंशी पाने नैक प्रपूरयेत्।आश्रयं पवनादीनां चतुर्थ मवशेष येत्॥

अर्थात्- पेट का आधा भाग आहार से भरें चौथाई को पानी के लिए और चौथाई को हवा के लिए खाली रहने दें।चरक में ‘मात्रा शीस्यात्’ निर्देश में स्वल्प मात्रा में भोजन करने के लिए कहा है।

स्वामी रामतीर्थ ने पापों की चर्चा करते हुए कहा है- ‘खूब ठूंस-ठूंस कर खाना ही सबसे बड़ा पाप है।’

भगवान मनु का निर्देश इस सम्बन्ध में स्पष्ट है।मनुस्मृति का वचन है-

अनारोग्य मनायुष्य मस्वर्गचाति भोजनम्।

आयुष्यं लोक विद्विष्टम् तस्मात्तत् परिवर्जयेत्।

अति भोजन करना स्वास्थ्य को नष्ट करने वाला, आयु को घटाने वाला, नरक में ले जाने वाला, पाप रूप और लोक निन्दित है। इसलिए इस कुटे व को अवश्य ही छोड़ देना चाहिए।

इस तथ्य को ध्यान में रखकर चला जाय तो हम वर्तमान भोजन मात्रा में कम से कम एक तिहाई कमी अवश्य ही करने का बाध्य होंगे। इसके स्वास्थ्य और धन की बर्बादी से सहज ही बचा जा सकेगा।

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भोजन की तरह उपवास भी आवश्यक है।

मनुष्य को सभ्य बनाने में प्रकृति का बड़ा हाथ रहा है। सभ्यता के विकास के साथ-साथ मनुष्य ने अपने खानपान की ओर ध्यान देना आरम्भ किया। प्राचीन काल में भोजन के लिए फल, कच्चा माँस, दूध, हरी पत्तियाँ आदि प्रयोग में आती थीं, लेकिन आज के समाज में मानव की आवश्यकताएँ चटपटा भोजन मिर्च मसालेदार पदार्थ, शराब, चाय, तली हुई वस्तुएं एवं अचार से पूर्ण होती हैं। मानव की कोमल आँतें चाहे इस प्रकार के भोजन को पचाने में सक्षम न हों लेकिन चटोरी जीभ के स्वाद के वशीभूत होकर इस प्रकार का खर्चीला एवं कष्टदायक भोजन बनाने के लिए मजबूर होता है।

जिस तरह कल कारखाने में कार्य वाली मशीन को कुछ घण्टे आराम की आवश्यकता पड़ती है उसी प्रकार भोजन के अत्याचार से दुःखी हुए पेट को भी आराम की आवश्यकता पड़ती है। इस विषय में जानवर अधिक समझदार दिखलाई देता है क्योंकि देखा जाता है कि जब जानवर अपना उपवास करता है तो कितना ही प्रयत्न किया जावे वह भोजन नहीं करता।

उपवास से आन्तरिक शुद्धि एवं आँतों की सफाई होती है यही कारण है कि महात्मा गाँधी कई बार अपनी आन्तरिक सफाई के लिए उपवास किया करते थे। मनुष्य को भी बीमारी एवं आन्तरिक सफाई के लिए उपवास रामबाण औषधि है। हर धार्मिक ग्रन्थ में उपवास के लिए लिखा गया है। जैन सम्प्रदाय में उपवास के लिए परयूशण, हिन्दुओं में अमावस्या, एकादशी, पूर्णिमा व्रत आदि और मुसलमानों में रोजा इसके उदाहरण हैं। साधारणतया यह देखने में आता है कि उपवास के दिन अच्छी-अच्छी मिठाइयाँ एवं गरिष्ठ भोजन ठूँस-ठूँस कर खाया जाता है इस प्रकार के उपवास से लाभ की अपेक्षा हानि अधिक होने की सम्भावना है अतः ऐसा उपवास ही न किया जाये तो अच्छा है। उपवास को विधिपूर्वक करने से ही स्वास्थ्य लाभ मिलता है। अधिक और न पचने वाले पदार्थ खाकर किया जाने वाला उपवास हमेशा हानिकारक होता है। पेट से अनावश्यक काम न लेने से मानव की बहुत सी शक्ति व्यर्थ नष्ट होने से बच जाती है। मस्तिष्क एवं पेट एक दूसरे के विरोधी लगते हैं, यदि पेट भरा रहे तो मस्तिष्क से कार्य नहीं लिया जा सकता और मस्तिष्क से कार्य लिया जाये तो पाचन क्रिया में बड़ी बाधा पड़ती है दोनों एक दूसरे के बाधक हैं। मस्तिष्क से काम उसी समय लिया जा सकता है जब पेट को अपना कार्य करने में आराम मिले।

उपवास की आवश्यकता-आज के जीवन में बढ़ते हुए वैद्य, डॉक्टर, हकीमों की संख्या इस बात का प्रमाण देते हैं कि हमारी जीवन प्रणाली में कोई भयंकर भूल है। बहुत सी बीमारियाँ आवश्यकता से अधिक भोजन का ही परिणाम हैं कुछ बीमारियाँ इसके विपरीत कुपोषण व कम भोजन मिलने से भी हो सकती हैं लेकिन वे कम व गरीब वर्ग में मिलेंगी। लोगों ने पेट को तो अच्छा खासा स्टोर रूम समझ रखा है जिसमें चाहे जितना ही भरते जाओ उसको रखने का कार्य है। भोजन करने का भी समय होता है लेकिन आजकल का मानव सुबह से शाम तक खाता ही रहता है। सुबह उठते ही चाय, फिर सुबह का नाश्ता, दिन में चाय, दोपहर को लंच, शाम की चाय, रात्रि का भोजन, इसके बाद सोते समय दूध। अब आप ही सोचिये कि इतना सारा भोजन पेट कैसे पचा सकेगा? लोग यह भी नहीं सोचते कि आँतों पर इतना अधिक कार्य पड़ने पर उन पर तनाव आ जाता है और उनकी कार्य शक्ति क्षीण होती चली जाती है। अतः पूर्ण रीति से पाचन कार्य नहीं होने पाता और अपचा भोजन आँतों के किसी कोने में जमा हो जाता है। आँतें इस मल का रस चूसती रहती हैं अतः धीरे-धीरे उपेक्षित मल कड़ा पड़ता जाता है और जब अधिक कड़ा पड़ जाता है तो उसकी रगड़ से कमजोर आँतों में घाव पड़ जाते हैं। इसके कारण आँव आदि शरीर के द्वारा बाहर निकालने का कार्य आंतें करती हैं। पेट में दर्द होता है और पेट दर्द से भयंकर बीमारियाँ होने लगती हैं।

इन सब बीमारियों से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है वह है ‘उपवास’। सप्ताह में एकबार तो निश्चित रूप से उपवास करना ही चाहिए। लम्बी बीमारियों में लम्बा उपवास करने की आवश्यकता है। इससे पेट का उपेक्षित मल धीरे-धीरे निकल जाता है। अधिक भोजन का भार न पड़ने के कारण आँतें अपना कार्य पूरी सजगता से करती हैं। हमारे देश में अन्न की भी कमी है जो विदेशों से निर्यात किया जाता है। अतः सप्ताह में एकबार उपवास करने से अन्न के खर्चे में भी बचत हो सकेगी, यही कारण था कि भूतपूर्व प्रधान मन्त्री श्री लालबहादुर शास्त्री ने सोमवार का व्रत रखने पर जोर दिया था।

उपवास करने की विधि-उपवास का अर्थ है पेट को आराम दिया जाय और भोजन का पूर्णतः त्याग किया जाय। उपवास करते समय ध्यान रखना चाहिए कि बदपरहेजी न हो और उपवास करने के पहले दिन संध्या समय भोजन न करके केवल फलों को लेना चाहिए, उबली हुई तरकारियाँ व हरी सब्जी जैसे गाजर, मूली, टमाटर आदि भी ली जा सकती हैं। उपवास के दिन प्रातः काफी मात्रा में जल पीकर टहलना चाहिए। अगर आवश्यकता हो तो एनीमा भी लिया जा सकता है। दिन भर पानी पीना चाहिए, यदि कमजोरी मालूम पड़े तो नींबू और शहद का पानी लिया जा सकता है। उपवास के दिन कठिन परिश्रम नहीं करना चाहिए, जहाँ तक सम्भव हो आराम करना चाहिए। उपवास के दूसरे दिन हल्का एवं सुपाच्य भोजन करना चाहिए जैसे फल, सादा भोजन, दूध, दलिया, खिचड़ी इत्यादि ली जा सकती है।

बीमारी में उपवास का अधिक महत्व बढ़ जाता है क्योंकि सब रोगों की जड़ पेट ही है और जब तक उसे साफ न रखा जाये तब तक शरीर की किसी भी बीमारी को दूर नहीं किया जा सकता। अतः पेट की सफाई व मन की शान्ति के लिए लम्बा उपवास आवश्यक है। जैसे शरीर को नई स्फूर्ति सोने व विश्राम से मिलती है, उसी प्रकार आँतों को स्फूर्ति उपवास से मिलती है।

उपवास से लाभ-हमारा शरीर दो कार्य करता है-(1) पाचन (2) निष्कासन इसी तरह भोजन भी हमारे पेट में तीन कार्य करता है-(1) शारीरिक मेहनत के समय जो कोष (सैल) टूट जाते हैं उनकी मरम्मत करना (2) जीवन सत्ता बनाये रखने के लिए आवश्यक जीवनदायिनी शक्ति उत्पन्न करना (3) खाद्य-पदार्थों के जलने से शरीर को गर्मी प्रदान करना, भोजन से रस बनते हैं और रसों से रक्त बनता है। रक्त से हमें शक्ति और पुष्टि मिलती है। सभी भोजन रस और रक्त के रूप में परिवर्तित नहीं होता, उसमें से बहुत सा निष्क्रिय अंश बच जाता है। साधारण अवस्था में दोनों क्रियाएँ पाचन व निष्कासन नियमित रूप से बिना बाधा के होती रहती हैं, किन्तु उपवास के समय में भोजन न करने के कारण शरीर के पाचन का कार्य बन्द हो जाता है केवल निष्कासन का कार्य करता है। अतः शरीर अपनी पूर्ण शक्ति के साथ उस कार्य में जुट जाता है और जब पेट का विकार निष्कासन की क्रिया से निकल जाता है तो शीघ्र ही शरीर निरोग हो जाता है।

किसी भी रोग अथवा व्याधि के समय हमारी सारी शक्ति रोग से जूझने में लगी रहती है। ऐसे समय हमें स्वभावतः भोजन से अरुचि हो जाती है मानो हमारी जठराग्नि यह सूचना दे रही है कि रसोई घर की मरम्मत की आवश्यकता है, मैं अपना कार्य भण्डार में रखी हुई चीजों से चलाकर वह मरम्मत कर डालूँगी। दूसरे शब्दों में हमारी शारीरिक क्रिया में जहाँ किसी प्रकार का व्यतिक्रम होता है हमारी भूख बन्द हो जाती है और इस प्रकार वह उपवास के महत्व की घोषणा करती है। अस्तु कड़ी भूख लगने की प्रतीक्षा में तो नित्य ही उपवास करना चाहिए। इसके अतिरिक्त सप्ताह में एक दिन या आधे दिन उपवास करने की भी आदत डालनी चाहिए इससे स्वास्थ्य सुधार में निश्चित रूप से सहायता मिलेगी।

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माताएँ शिशुओं को स्तन-पान कराने में संकोच न करें।

इन दिनों सोचा जाता है कि बच्चे को दूध पिलाने से माता का स्वास्थ्य दुर्बल होता है। इसलिए शिशुओं को ऊपरी दूध पिलाना चाहिए ताकि माता की स्वास्थ्य रक्षा सम्भव हो सके। सुसम्पन्न और शिक्षित लोग प्रायः ऐसा ही करते हैं।

यह एकाँगी चिन्तन है। माता के स्वास्थ्य और सौन्दर्य की रक्षा के लिए समुचित ध्यान दिये जाने और सौन्दर्य की रक्षा के लिए समुचित ध्यान दिये जाने और उसकी सुरक्षा व्यवस्था बनाने की बात का औचित्य सहज ही समझ में आता है। इस सन्दर्भ में जो कुछ भी सम्भव हो सो किया ही जाना चाहिए, पर यहाँ ध्यान रखने योग्य बात यह भी है कि जिस बालक को आमन्त्रित करके बुलाया गया है उसके परिपोषण एवं विकास के सम्बन्ध में कृपणता क्यों बरती जाय?

नवजात बालक का पाचन तन्त्र इतना कोमल और संवेदनशील होता है कि माता का दूध ही सरलतापूर्वक पच सके। जिस शरीर के भीतर रह कर उसने अपना अस्तित्व विकसित किया है। उसी के रासायनिक पदार्थ अनुकूल पड़ते हैं। पशुओं के दूध तथा अन्यान्य खाद्य पदार्थों को पचाने की क्षमता तो धीरे-धीरे ही विकसित होती है। जन्मकाल से लेकर कई महीने तक पेट की स्थिति इसी स्तर की बनी रहती है कि वह माता के दूध को ही ठीक तरह पचा सके और उससे उचित एवं अनुकूल पोषण प्राप्त कर सके।

नवजात असहाय बालक की सेवा सुश्रूषा, देख-भाल, स्नेह दुलार के लिए ही नहीं, उचित आहार के लिए भी माता की ओर ही आशा भरी दृष्टि से निहारना पड़ता है। यदि उस अंचल में भी उसे शरण न मिले तो किसका मुँह जोहे, किसका पल्ला पकड़े? यों उसकी क्षुधा शान्त करने के लिए तो डिब्बे का पशुओं का दूध भी काम दे सकता है, पर उसकी वह आवश्यकता जिसमें न केवल शरीर का वरन् प्राणों का भी रस टपकता है, अन्यत्र कहाँ से मिलेगा। पति और पत्नी भी कहने को तो एकत्व का दावा करते हैं, पर तात्विक दृष्टि से माता और बालक की एकात्मता ही सही सिद्ध होती है। पति पत्नी अपना रिश्ता तोड़ और नया सम्बन्ध जोड़ सकते हैं, पर माता और संतान के बीच इस जोड़-तोड़ की कोई गुंजाइश नहीं है। जन्म देने तक तो उदरस्थ बालक माता की सत्ता में घुला ही रहता है। प्रसव के उपरान्त भी बहुत समय तक यह परिपोषण चलता रहता है घटोत्तरी तो तब आरम्भ होती है जब बालक को संसार की अन्य वस्तुएँ आकर्षित करने लगती हैं।

गर्भस्थ शिशु को सींचने की प्रक्रिया प्रसव के उपरान्त भी बहुत समय तक माता को जारी रखनी पड़ती है। यह सम्पर्क सूत्र अन्य आधारों के साथ-साथ स्तन पान के साथ विशेष रूप से जुड़ा रहता है। पेट में माता का परिपोषण किसी कारणवश शिथिल हो जाय तो भ्रूण की सत्ता अविकसित स्थिति में ही पड़ी रहेगी और अपना अस्तित्व खो बैठेगी। यह तथ्य जन्म के उपरान्त भी जारी रहता और उसमें क्रमशः ही कमी आती है। नवजात शिशु को बहुत समय तक माता के दूध की आवश्यकता बनी रहती है। क्योंकि शारीरिक एवं मानसिक पोषण के अतीव उपयोगी तत्व उसी केन्द्र से मिल सकते हैं जिसने उसे जन्म दिया है। इतनी अधिक अनुकूलता अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं हो सकती, जितनी कि बच्चे को माता से मिलती है।

माता रुग्ण अथवा अशक्त हो तो उस स्थिति में शिशु के आहार की ऊपरी व्यवस्था की जा सकती है। किन्तु जब दूध निकलता हो तो उसे इसलिए नहीं रोका जाना चाहिए कि इससे माता को दुर्बलता घेरेगी। यही बात थी तो गर्भ स्थापना से ही बचा जाना चाहिए था। भ्रूण का विकास माता के शरीर को क्षति पहुँचाये बिना सम्भव नहीं। प्रसव वेदना के साथ साथ होने वाले रक्त स्राव में कितनी क्षति पहुँचती है यदि इसका हिसाब लगाया जाय तो प्रतीत होगा कि स्तन पान कराने में होने वाली क्षति उससे कहीं कम है जो प्रसव से पूर्व हो चुकी। यह तो मुहर देने के उपरान्त एक पैसे पर झंझट करने जैसी बात हुई।

बालक के शारीरिक, मानसिक पोषण के साथ उसके समग्र व्यक्तित्व के अन्तःकरण के, विकास की भी आवश्यकताएँ रहती हैं इनकी पूर्ति माता के भावनात्मक एवं रासायनिक अनुदानों से ही हो पाती है। स्तनपान में अवरोध खड़ा होने पर बालक तो निश्चित रूप से घाटे में रहता है। शिशु आहार के नाम पर जिन वस्तुओं का गुणगान किया जाता है वस्तुतः उनकी उत्कृष्टता माता के दूध की तुलना में शताँश भी नहीं होती। यों बहकाने को तो द्रोणाचार्य ने अपने बेटे अश्वत्थामा की दूध माँग को खड़िया मिट्टी का सफेद पानी पिला कर भी काम चला लिया था। माता के दूध से वंचित बालक को जिस तिस वस्तु के सहारे इसी प्रकार अपना गुजारा करना पड़ता है। ऐसी स्थिति उत्पन्न करना किसी सहृदय माता के लिए किस प्रकार संतोषजनक हो सकता है। इसे मोटे तर्कों और भौतिक स्वार्थों को आगे रख कर नहीं किया जा सकता। ऐसे मार्मिक प्रसंगों में तथाकथित स्वास्थ्य एवं सौन्दर्य रक्षा की बात सोचते समय बालक के विकास और भविष्य को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

असभ्य लोगों में अपने ढंग के अन्धविश्वास उठते मरते रहते हैं। सभ्य कहलाने वाले लोग भी इस मामले में उनसे पीछे नहीं हैं। असभ्यों की मूढ़ मान्यताओं पर सभ्य लोगों द्वारा व्यंग उपहास करने की बात समझ में आती है पर आज की स्थिति में यदि तथाकथित समझदार और सभ्यताभिमानी लोगों पर पिछड़े लोग कभी मूर्खता का आरोपण करने लगें तो उसे भी अनुपयुक्त नहीं कहा जा सकता। सभ्य अन्ध विश्वासों में से एक यह भी है कि बच्चे को दूध पिलाने से माता कमजोर हो जाती है। वस्तुतः वैसा कुछ नहीं। प्रसव के उपरान्त जिस स्तर के आहार विहार की सतर्कता बरतनी चाहिए उसमें त्रुटि करने से स्वास्थ्य को आघात पहुँच सकता है और उस गड़बड़ी को स्तन पिलाने के साथ जोड़ा जा सकता है। यह आत्म प्रवंचना फिर भी तथ्यों से प्रतिकूल ही बनी रहेगी।

शरीर विज्ञान के जानकार भली प्रकार समझते हैं कि प्रकृति हर प्राणी के शरीर में सामयिक आवश्यकताओं के अनुरूप कई प्रकार के अतिरिक्त उत्पादन करती है। उनका सही प्रयोग होता रहे तो इससे स्वास्थ्य बिगड़ता नहीं वरन् उलटी सुरक्षा होती है। किशोरियों को मासिक धर्म प्रारम्भ होता है और हर महीने रक्त जाता है। साधारणतया नस काट कर उतना रक्त बहाया जाया करे तो उससे हानि होगी, पर मासिक धर्म नियमित होते रहने से उनका स्वास्थ्य बिगड़ता नहीं वरन् बनता है किसी सामान्य अंग का असामान्य रूप से बोझिल हो जाना चिन्ता का विषय है। ट्यूमर, रसौली, गाँठ, फोड़ा आदि के उभार आपत्तिजनक माने जाते हैं किन्तु लड़कियों की उठती उमर में वक्षस्थल का उभार स्वाभाविक माना जाता है। लड़कियों की आयु बढ़ जाने पर भी यदि मासिक धर्म आदि यौवन चिन्ह प्रकट न हों तो इसमें स्वास्थ्य संकट जैसी चिन्ता करनी पड़ती है। शिशु जन्म से पूर्व ही माता का दुग्ध संस्थान विकसित एवं सक्रिय हो जाता है। प्रकृति प्राणी की आवश्यकताओं का भली प्रकार ध्यान रखती है और उनकी पूर्ति के साधन जुटाती रहती है। इस स्वाभाविक क्रिया प्रक्रिया में किसी विपत्ति की आशंका नहीं करनी चाहिए। उत्पादन विसर्जन का चक्र हर क्षेत्र में घूमता है और क्षति पूर्ति की व्यवस्था अनायास ही होती रहती है।

शरीर विज्ञानी जानते हैं कि यौवन के आरम्भ होते ही ‘इस्टेरोजन’ और प्रोजेस्टोरान हारमोन सक्रिय हो जाते हैं और स्तन संस्थान को विकसित एवं दुग्ध उत्पादन के लिए सक्षम बनाते हैं। गर्भावस्था में इस संस्थान का चरम विकास होता है। प्रसव के उपरान्त प्रोजेस्टोरान अकेला ही शरीर की सामान्य प्रक्रिया के अन्तर्गत ही शिशु आहार के लिए आवश्यक दुग्ध बनाते रहने का काम सँभाल लेता है। इस प्रक्रिया के अन्तर्गत दुग्ध स्राव के कारण होने वाली क्षति की पूर्ति भी साथ-साथ होते चलने की व्यवस्था है। यदि दुग्ध स्राव बन्द कर दिया जाय तो प्रकृति उलट कर प्रोजेस्टोरान को निष्क्रिय बनाती है अन्यथा दूध बनते रहने पर भी उसके निकलने का प्रबन्ध न रहने के कारण उस संस्थान में भयंकर पीड़ा एवं अर्बुर आदि उठ खड़े होने का संकट हो सकता है। उपरोक्त हारमोन जब अपना कार्य समेटता है तो उसके साथ ही माता को पयपान के कारण होने वाली क्षतिपूर्ति के अतिरिक्त आधार भी बन्द हो जाते हैं। दूध पिलाने के बदले प्रकृति से जो अन्य अतिरिक्त अनुदान मिल रहे थे, उनका स्रोत बन्द हो जाने से माताएँ किसी लाभ में नहीं रहती, वरन् बच्चे को उचित पोषण से वंचित करके अपने गौरव से गिरती ही हैं।

माता के दूध में कई अतिरिक्त पदार्थ हैं जो पशुओं से प्राप्त अथवा रसायन निर्मित पदार्थों से बने दूध में सम्भव नहीं। रक्त के ग्लुकोज से लेवटोन, अमीनो ऐसिड से प्रोटीन और न्यूटरल पेन्टस से पेन्टस बनता है। यह तीनों पदार्थ माता के दूध में ही उस स्तर के पाये जाते हैं जिनसे शिशु पोषण की संतुलित व्यवस्था बन सके। यों इनके स्थानापन्न में अन्य पदार्थ भी मिलाये जा सकते हैं, पर उनका स्तर माता के दूध की तुलना में कहीं घटिया होता है अस्तु उससे शिशु पोषण के उपयुक्त आहार में त्रुटि ही रह जाती है।

रासायनिक जाँच से यह सिद्ध होता है कि शिशु की आयु बढ़ने के साथ-साथ उसकी पोषण आवश्यकताएँ बढ़ती जाती हैं। उसे नये-नये रासायनिक पदार्थों की क्रमशः अधिकाधिक मात्रा अपेक्षित होती है। इस संतुलन को माता का दूध ही पूरा करता है। प्रसव काल के समय माता का दूध जिस स्तर का होता है उसमें क्रमशः परिवर्तन होता चला जाता है यह परिवर्तन छह महीने उपरान्त तो इतना अधिक हो जाता है कि उनमें आश्चर्यजनक भिन्नता देखी जा सकती है। यह सब इसलिए होता है कि बच्चा आयु वृद्धि के साथ-साथ अपनी पाचन प्रणाली तथा आवश्यकता के अनुरूप अधिक उपयुक्त पोषण प्राप्त कर सके। इस क्रम से कुछ घटोत्तरी होती है तो कुछ बढ़ोतरी। प्रथम मास में प्रोटीन अधिक होता है जो क्रमशः घटता है किन्तु आयु वृद्धि के साथ-साथ अभीष्ट कोसिनोजन की मात्रा में बढ़ोतरी होती चली जाती है।

डिब्बे बन्द दूध को चूर्ण अथवा चटनी के रूप में सूखा या गीला बनाने के लिए उसे उबालना आवश्यक होता है दूसरी यान्त्रिक एवं रासायनिक क्रियाओं की भी इस संदर्भ में सहायता ली जाती है। पेन्सिलवेनिया के रसायन विज्ञानी ब्रोकयन और जेफरी के अनुसार इस प्रकरण में लगभग आधे जीवन तत्व नष्ट हो जाते हैं और वह खाद्य अपनी प्रकृत विशेषताएँ बुरी तरह खो बैठता है। दूध का लायसिन रसायन जो दाँतों की सुरक्षा तथा अन्य पोषक प्रयोजनों के लिए नितान्त आवश्यक है, डिब्बा बन्द स्थिति में पहुँचते-पहुँचते अपना अस्तित्व बहुत बड़ी मात्रा में खो बैठता है। कैलिफोर्निया विश्व विद्यालय के प्रो0 डेश्विकी जेलिफ ने न्यूट्रिशन सोसाइटी में भाषण करते समय बताया था कि स्तनपान द्वारा उचित पोषण प्राप्त न कर सकने के कारण अकेले भारत में ही प्रायः एक करोड़ बच्चे बेमौत मरते हैं। यों माता की शारीरिक दुर्बलता ही दूध की कमी का प्रमुख कारण होती है, पर जान-बूझकर न पिलाने वाली माताएँ भी कम नहीं होतीं।

डॉ0 जेलिफ के अनुसार बच्चा माँ का दूध पीता रहे तो अगला बच्चा देर में पैदा होगा। यदि उसे बन्द कर दिया जाय तो प्रकृति नये बालकों के उत्पादन का सरंजाम जुटाने लगती है। माता को जल्दी मासिक धर्म शुरू हो जाता है और दो बालकों के बीच जितना अन्तर होना चाहिए उसकी तुलना में कहीं जल्दी नया बच्चा जन्मने का उपक्रम चल पड़ता है।

स्तन कैन्सर के कारणों का सर्वेक्षण करने पर यह पता चला है कि दूध पिलाने वाली माताओं की तुलना में उन्हें यह विपत्ति अधिक घेरती है जो दूध पिलाने में आना कानी करती हैं। स्वभावतः दूध आना बन्द हो जाय तो बात दूसरी है अन्यथा उत्पादन के उफान में कृत्रिम अवरोध उत्पन्न करने की प्रतिक्रिया हानिकारक ही होती है। इससे स्तन संस्थान में कई तरह की ऐसी विकृतियाँ उठ खड़ी होती हैं जिनसे पयपान करते रहने पर सहज ही बचा जा सकता था।

बच्चे को दूध पिलाने पर माता घाटे में रहती है यह शिक्षित कहे जाने वाले लोगों का अन्धविश्वास ही है। इससे माता और सन्तान दोनों को दुहरी हानि उठानी पड़ती है। वस्तु स्थिति को यदि समझा जा सके तो इस निरर्थक अवरोध में बढ़ता हुआ उत्साह घट सकेगा और उससे जननी तथा शिशु दोनों को ही लाभ मिलेगा।

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हम कितने समृद्धिशाली?

शिशु का जब जन्म होता है तो लोग समझते हैं कि वह कुछ भी लेकर पैदा नहीं हुआ है, परन्तु कानून उस बच्चे को अपने पिता की सम्पत्ति और जायदाद का उत्तराधिकारी तभी से मान लेता है। वह यदि किसी राजघराने में उत्पन्न हुआ है तो भावी सम्राट्, लखपति परिवार में जन्मा हो तो अपने समृद्ध पिता की सम्पत्ति का हकदार और धनवान के घर में उत्पन्न हुआ तो धनिक पुत्र का विशेषण अनायास ही उसके साथ जुड़ जाता है। उसी प्रकार व्यक्ति जो वस्तुतः परमात्मा का पुत्र है, सब ऐश्वर्यों और सम्पदाओं का स्वामी है भी, अपने पिता की विभूतियों का समान भाग स्वत्व के रूप में प्राप्त कर लेता है। हवा, धूप, आकाश, पृथ्वी पर रहने का जीवन अधिकार और उपार्जन निर्वाह की चेष्टाएँ उसे परमात्मा की ओर से अनायास ही प्राप्त हो जाती हैं।

इनके अतिरिक्त भी उसे मिलता है सोच विचार करने की क्षमता वाला मस्तिष्क, अमूल्य शरीर, शक्ति, स्वास्थ्य, करोड़ों रुपये खर्च करके भी पुनः न लौटाया जाने वाला समय, प्रतिभा और गुण जिनके आधार पर कि संसार के प्रत्येक महापुरुष ने साधारण जीवन से असाधारण प्रगति की है। इतना सब होने के बावजूद कई लोग दीनता, दरिद्रता और अभावग्रस्तता का रोना रोते हुए देखे जाते हैं। इसका कारण यह नहीं कि नियति ने उनके साथ भेदभाव बरता है, वरन् वास्तविक कारण है-उनकी विचार पद्धति का अस्वस्थ होना और समृद्धि को केवल भौतिक उपलब्धि समझना यही कारण है कि जितने लोग गरीबी से दुःखी होते हैं उनमें से अधिकाँश गरीबी के विचार से दुःखी होते हैं।

बुद्धि, श्रम, शक्ति और समय का सदुपयोग करके ही दुनिया के सभी लोग समृद्धिशाली बने हैं। मानव इतिहास के जिस काल को आदिम युग कहा जाता था, उस युग में कौन समृद्ध था। बताया जाता है कि आज का सभ्य मानव तब जंगल में पशुओं की तरह रहता था और जब भूख लगती तब भोजन की तलाश करता, जब पानी गिरता या धूप तेज होती तो छाँह खोजता। आज के समृद्ध दिखाई देने वाले व्यक्तियों की वंश शृंखला भी उसी युग से आरंभ हुई जिससे कि गरीब कहे जाने वालों की शुरू हुईं। परन्तु उन लोगों ने या उनके किन्हीं पूर्वजों ने परमात्मा की ओर से मिलने वाले अनुदानों का-बुद्धि, श्रम, शक्ति और समय का सदुपयोग करना सीखा फलतः आज इस स्थिति तक पहुँच सके।

यहाँ चर्चा लोगों की जा रही है जिन्होंने परिश्रम और लगन द्वारा ईमानदारी से सम्पत्ति कमाई, उनकी नहीं, जो अपनी कुछ बुद्धि से लोगों का श्रम और सम्पत्ति लूटते रहे। कहा गया है कि बुद्धि, श्रम और शक्ति, समय का जिन लोगों ने सदुपयोग करना सीख लिया उनके लिए तो सम्पन्नता एक सहज उपलब्धि बन गई, पर जो मन की निर्धनता को यथावत् बनाये रहे और बाहरी निर्धनता हठात् भाग जाने की प्रतीक्षा करते रहे उनके लिए समृद्धि दिवा स्वप्न के अतिरिक्त और क्या सिद्ध होगी? किसी विचारक का यह कथन अपनी अन्तर्निहित समृद्धि को उघाड़ने के तरीके का इशारा करता है जिसमें उसने कहा है-‘‘सच्ची समृद्धि मन की समृद्धि से ही आती है। जिसका जन्म आशा और उल्लास की गोद में होता है। जिस ईश्वर ने सारे संसार को पूर्णता प्रदान की है। उसके भण्डार में प्रत्येक व्यक्ति के लिए सब कुछ है। सीमाएँ बाँधने वाला तो स्वयं व्यक्ति ही है अन्यथा ईश्वर तो सदैव ही प्यासी आत्मा के लिए अमृत बरसाता रहता है।

प्यास केवल प्यास-प्यास कहते रहते से न तो पूरी होती है और न ही पानी सामने रखा हो तो गला नम होता है। परन्तु ईश्वर ने अपने अनुदानों से मनुष्य के लिए समृद्धि इतनी सहज बना दी है जैसे मुँह में पानी और उसके बाद भी कोई उसे गले से नीचे न उतारे व प्यास की पीड़ा भोगता रहे तो न इसमें दोष पानी का है और न प्यास का। ईश्वर के उपहार मनुष्य को समृद्ध बनाने के लिए चौबीसों घण्टे हाथ में हैं। वस्तुतः मनुष्य है ही समृद्ध, फिर भी मन से वह दीन हीन, दरिद्र, निर्धन बना रहे तो त्रुटि अपनी ही कही जायगी।

एक-एक अनुदान के सम्बन्ध में विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि मनुष्य लाखों और करोड़ों की सम्पत्ति का नहीं अनन्त सम्पदा का स्वामी है। वह उसके उपयोग न करने की भूल करता है और अभाव तथा दरिद्रता में ही जीता रहता है। उसकी स्थिति उस भिखारी जैसी है जो एक गड़े हुए खजाने के ऊपर की जमीन पर बैठकर भीख माँगता रहा और जीवन में दो पैसे भी नहीं जोड़ सका।

जिस बिजली से जीरो पावर का मन्दिम प्रकाश उत्पन्न होता है उससे सौ किलोवाट का तेज चौंधिया देने वाली रोशनी का बल्ब भी जल सकता है। जिन शक्तियों और साधनों से हम अपना रोज का काम चलाते हैं, उन्हीं साधनों और शक्तियों से अपनी निर्धनता को भी दूर भगा सकते हैं। पर हमारी स्थिति ऐसी है जैसे इस उधेड़ बुन में उलझे हुए व्यक्ति की जिसे जीरो पावर बल्ब को जलाने वाली बिजली की बड़ी सामर्थ्य पर ही शंका होती है जिन क्षमताओं और शक्तियों का सहारा लेकर निर्धन से निर्धन और धनवान से धनवान व्यक्ति अपना निर्वाह करते और काम चलाते हैं वे हैं-बुद्धि, शक्ति, स्वास्थ्य और समय।

ईश्वर प्रदत्त एक-एक अनुदान अमूल्य है और उनमें सर्वप्रथम गणना होती है बुद्धि की। बुद्धि को परमात्मा की ही देन कहा जायगा क्योंकि उसे न तो किसी कारखाने में बनाया जा सकता है और न खेत में ही उगाया। कहा जा सकता है कि कम्प्यूटर, स्वचालित ज्ञान और अन्य विकसित वैज्ञानिक उपकरण मनुष्य बुद्धि से कहीं इक्कीस हैं। परन्तु यह प्रतिपादन वहीं निरस्त हो जाता है जहाँ यह विचार आता है कि ये साधन आविष्कृत और विकसित तो आखिर मनुष्य की बुद्धि द्वारा ही हुए हैं और उनका संचालन मनुष्य की बुद्धि से ही होता है। किस आधार पर उन्हें स्वतः उद्भूत या विकसित कहा जा सकता है। बुद्धि के रूप में-प्रज्ञा के रूप में मनुष्य को एक ऐसा दैवी वरदान मिला है जिसके द्वारा अर्जित सूझ-बूझ, विकसित ज्ञान और सतर्कताओं तथा सावधानियों का ध्यान मनुष्य की सफलता का मार्ग कदम-कदम पर प्रशस्त करता है।

शक्ति भी मनुष्य को एक दैवी वरदान के रूप में मिली है। जिसका बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग उसे धन, ज्ञान, प्रभाव और प्रगति से सम्पन्न सफल बनाता है। यह शक्ति भी कई रूपों में प्राप्त होती है। शरीर बल, मनोबल ज्ञानबल, आत्मबल आदि इसकी कई शाखा-प्रशाखाएँ हैं। परन्तु दीनता के अभिशाप से ग्रस्त लोग इन शक्तियों का अपव्यय, दुरुपयोग अथवा निरुपयोग ही करते हैं। व्यर्थ के कार्यों में अपनी शक्तियाँ खर्च करना या निठल्ले बैठे रहना ही दैन्य के दो प्रमुख कारण हैं। अधिकाँश व्यक्ति शरीर बल और बुद्धिबल को ऐसे कार्यों में नियोजित करते रहते हैं जिनका कोई अर्थ ही नहीं होता। निष्प्रयोजन ही अपनी शक्तियों का अपव्यय यदि रोका जाय और उन्हें उपयोगी दिशा में प्रवृत्त रखा जाय तो मनोवाँछित उपलब्धियाँ सहज ही प्राप्त की जा सकती हैं। इसके लिए विवेक बुद्धि का सहारा लेकर अपनी शक्तियों को लक्ष्य साधन की ओर लगाना ही एकमात्र रास्ता है।

शक्ति और बुद्धि की तरह ही परमात्मा की अनुकम्पा स्वास्थ्य के रूप में प्राप्त है। स्वस्थ रहना हमारा स्वभाव है। यदि हम न चाहें तो कोई भी परिस्थिति हमें रुग्ण नहीं बना सकती। आहार विहार का असंयम, स्वास्थ्य के प्रति असावधानी और आवश्यकताओं के प्रति लापरवाही ही हमें बीमार और रोगी बनाती है। चटोरापन, व्यसन, अनियमितता, गन्दगी और सामर्थ्य से अधिक दबाव डालना भिन्न-भिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न करने की परिस्थितियाँ पैदा करता है। अन्यथा प्रकृति ने प्रत्येक व्यक्ति के लिए स्वास्थ्य और शरीर प्रक्रिया के सुचारु संचालन की अतिसुगम व्यवस्था कर रखी है उसमें अपनी ओर से जरा भी असावधानी स्वस्थ शरीर के लिए अस्वास्थ्यकर बन जाती है। दुनिया में जितने भी डॉक्टर चिकित्सक और वैद्य हकीम हैं-उनमें नैसर्गिक स्वास्थ्य को लाखों रुपयों में भी खरीदा नहीं जा सकता क्योंकि औषधियाँ और उपचार सामयिक शिथिलता मात्र लाती हैं। जब तक प्राकृतिक जीवन-क्रम न अपनाया जाय तब तक स्वास्थ्य की आशा-आकाँक्षा पूरी नहीं होती है।

उपरोक्त विभूतियों की भाँति मनुष्य समय की संपदा का स्वामी भी है। समय-जिसके एक-एक क्षण का सदुपयोग मनुष्य को क्षुद्र से महान और निर्धन से धनाढ्य बना सकता है। विश्व के जिन भी प्रसिद्ध धनपतियों ने दैन्य दारिद्रय से उठकर समृद्धि का शिखर चूमा है, उन्होंने अपने एक-एक क्षण का सदुपयोग किया है। आमतौर पर देखा जाता है कि अभावग्रस्त और कंगाल परिस्थितियों में रह रहे व्यक्तियों में कई लोग ऐसे होते हैं जो अपना समय गपशप या निन्दा, आलोचना में ही खर्च करते हैं। सभी की यह प्रवृत्ति हो- ऐसी बात नहीं है, पर जिनमें यह दोष किन्हीं कारणों से आ गया हो उन्हें समय का मूल्य समझना चाहिए।

ये विभूतियाँ ऐसी हैं जो हर व्यक्ति को प्राप्त हैं। आध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो मनुष्य को जो कुछ प्राप्त है या मिलता रहता है वह किसी भी प्रकार कम नहीं है। ये विभूतियाँ हमें स्थायी सम्पत्ति के रूप में मिली हैं। इनके द्वारा अपनी निर्धनता को दूर करना कोई बड़ी बात नहीं है और व्यक्ति को मेरे पास कुछ नहीं है मैं अकिंचन हूँ, दीन हीन हूँ, अभावग्रस्त हूँ यह सोच-सोचकर संतप्त होते रहने का कोई कारण नहीं है और सचमुच ही जो गरीब है, निर्धन है, अभावग्रस्त है, वह भी अपनी गरीबी, निर्धनता और अभावों को भी इस अमूल्य सम्पदा के बल पर दूर हटा सकता है और अपनी रचनात्मक क्षमताओं के द्वारा समृद्धि और सम्पन्नता ही नहीं सुख-शान्ति का भी अर्जन कर सकता है।

वस्तुतः दैन्य न तो बाहरी साधनों और भौतिक संपत्ति की विपुलता से हटाया जा सकता है और न ही उसका रोना रोते रहने से। दारिद्रय घर में नहीं मन में रहता है। विपुल सम्पत्ति रहते हुए भी धन लिप्सा के उचित अनुचित का ध्यान न रखकर रुपये पैसों का अम्बार लगाने के लिए दौड़ते रहने वालों को क्या सम्पन्न कहा जायगा? अध्यात्म की भाषा में वे उसी स्तर के दीन हैं जिस स्तर के साधनहीन रोते कलपते रहने वाले लोग।

समृद्धि का सम्बन्ध धन से नहीं मन से है। सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहे और व्यक्ति उसी में सुखी सन्तुष्ट रहकर आगे की प्रगति के लिए प्रयत्नशील रहे। अध्यात्म की भाषा में वही व्यक्ति भौतिक साधनों से सम्पन्न कहा जायगा। अतः भौतिक साधनों की अन्धी दौड़ में ठोकरें और धक्के खाते रहने के स्थान पर हमें अपनी वास्तविक सम्पदा को देखना चाहिए और यथार्थ समृद्धि का मार्ग वरण करना चाहिए।


काशी की एक सुनसान गली (kahani)

उस दिन मैं काशी की एक सुनसान गली में होकर गुजर रहा था। वहाँ बन्दरों का अड्डा था। मैं सहज स्वभाव आगे बढ़ रहा था कि वे चारों ओर से इकट्ठे होकर मेरे ऊपर हमला करने लगे। इस तरह अकेला घिर जाने पर मैं घबराया और भागने का उपक्रम करने लगा।

उलट कर थोड़ा ही भागा हूँगा कि बन्दरों की हिम्मत दूनी हो गई और उन्होंने हमले आरम्भ कर दिये। पैर नोंच डाले और कपड़े फाड़ डाले। इतने में एक जानकार व्यक्ति चिल्लाया-‘‘भागो मत-सामना करो।” मैंने हिम्मत बाँधी और उलट कर घूँसा तानते हुए बन्दरों की ओर लपका।

देखते-देखते-पासा पलट गया। आक्रमणकारी बन्दर एक-एक करके खिसकने लगे और मैदान खाली हो गया। तब मैं छाती ताने हुए बन्दरों को घूँसे से डराता हुआ, अपने गन्तव्य स्थान को चला गया।

सुझाया किसी अज्ञात व्यक्ति ने-बन्दरों से आत्म-रक्षा के सन्दर्भ में था, पर वह तथ्य निर्देश मेरे रोम रोम में बस गया है-‘भागो मत-सामना करो।’

-स्वामी विवेकानन्द

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अविज्ञात भूत और अकल्पित भविष्य जानना भी सम्भव है।

खगोल विद्या की गणित विधि अमुक सिद्धान्तों- अनुभवों और निष्कर्षों पर आधारित है। चन्द्र, सूर्य और पृथ्वी की चाल का उनकी कक्षाओं का,-विवरण हमें ज्ञात है अस्तु भविष्य में सूर्य या चन्द्र पर ग्रहण कब लगेगा-कितनी छाया पड़ेगी-इसकी पूर्व घोषणा बिना किसी कठिनाई के की जा सकती है। यह भविष्य कथन वैज्ञानिक है। इसे भाग्यवाद या विधि विधान की व्याख्या के अन्तर्गत तभी तक लाया जाता रहा होगा जब तक खगोल विद्या का क्रमबद्ध विकास नहीं था। अब ग्रह−नक्षत्रों के उदय अस्त-ग्रहण-उनके मार्गी वक्री होने की भावी सम्भावना को गणित व्यवस्था के अन्तर्गत ले लिया गया है इसमें अनिश्चित भाग्यवाद या विधि विधान जैसी कोई बात नहीं है।

भविष्य कथन का धन्धा करने वाले तो ऐसे ही तीर तुक्का मिलाते रहते हैं। सामान्य अनुमान ही उनका प्रधान अस्त्र होता है जिसे पोथी पत्रा की उलट पुलट के बहाने लोगों को बताते सुनाते रहते हैं। इनमें से बहुत सा सही और बहुत सा गलत निकलता रहा है जिनका सही निकला वे ज्योतिषी जी की प्रशंसा करते और भेंट पूजा चढ़ाते हैं, जिनका गलत निकला वे मन मसोस कर रह जाते हैं। यह तो ऐसे ही अटकल पच्चू से खेलविनोद हैं जिनमें धूर्त और मूर्ख अपने कारणों से रुचि लेते और भ्रम जंजाल की बेल को पोसने फैलाने की विडम्बना रचते रहते हैं।

चर्चा ऐसे लोगों की नहीं, उनकी की जा रही है जो अपनी अतीन्द्रिय क्षमता के कारण व्यक्तिगत अथवा समूहगत भविष्य की घोषणा करते हैं और वे प्रायः सही सिद्ध होती हैं। इन का आधार सूक्ष्म जगत में पक रही वह खिचड़ी होती है जो वर्तमान और भूतकाल की परिस्थितियों एवं हलचलों के दाल चावल को डाल कर तैयार की गई है। इसे देख सकना असामान्य होने के कारण आश्चर्यजनक तो है, पर वह असम्भव अथवा आधार रहित नहीं है।

तथ्य यह है कि समस्त विश्वब्रह्माण्ड चेतना का एक सुविस्तृत समुद्र है। स्थूल जगत में जो होता है, उसकी प्रतिक्रिया सूक्ष्म जगत में निश्चित रूप से होती है। उसे देख समझ सकना, हर किसी के लिए सम्भव नहीं होता, पर जिनकी चेतनात्मक स्थिति विशिष्ट है वे उस अदृश्य को दृश्य की तरह देख सकते हैं और सुविदित की तरह जान सकते हैं।

प्रयत्नपूर्वक चेतना का अतींद्रिय विकास किया जा सकता है और अपनी जानकारी का क्षेत्र इन्द्रिय शक्ति के आधार पर सीमित रहने का बन्धन तोड़ कर वह सब भी जाना जा सकता है जो इस ब्रह्माण्ड में किसी भी क्षेत्र में हो रहा है या हो चुका है। जब तक बूँद समुद्र से अलग है तब तक उसका विस्तार, मूल्य एवं बल स्वल्प है, किन्तु जब वह समुद्र में मिल जाती है तो फिर उसका स्वरूप सागर जैसा सुविस्तृत बन जाता है और ज्वार−भाटों की तरह ऊँचा उठने लगता है और नीचे गिरने की नई सामर्थ्य प्राप्त करने का अवसर मिल जाता है। बूँद रहने पर उसका अपना अलग स्वरूप और स्वाद था, पर अब उसमें आमूल-चूल परिवर्तन हो गया। समुद्र जल का खारीपन- भारीपन उसमें ओत-प्रोत हो गया। ब्रह्माण्डीय चेतना से-ब्रह्म सत्ता से -सम्बद्ध व्यक्ति सीमा बन्धन तोड़ कर असीम बनता है। उसकी जानकारी का क्षेत्र असीम हो जाता है। स्तर बढ़ते चलने पर स्थिति और भी आगे बढ़ती है। आत्मा में वे गुण उत्पन्न हो जाते हैं जो परमात्मा में हैं। परमात्मा सत्, चित, आनन्दमय है-सत्यं शिवं सुन्दरं है। ब्रह्म परायण का व्यक्तित्व इन्हीं विभूतियों का प्रतीक प्रतिनिधि बन जाता है। इतना ही नहीं ईश्वर में जो सामर्थ्यों एवं विशेषताएं हैं उनकी झाँकी भी ऐसे मनुष्यों में होने लगती है। वे महानताओं-महामानवों एवं देवताओं अवतारों जैसे उस प्रकार के काम करते हैं जो सामान्य लोगों को अपने लिए अद्भुत एवं असंभव प्रतीत होते हों। युग प्रवाह को मोड़ना और व्यापक असन्तुलन को सन्तुलन में बदलना ऐसे ही महामानवों के लिए सम्भव होता है, जो ब्रह्म सत्ता के साथ अपना विशेष सम्बन्ध बना कर असाधारण आत्म-शक्ति के अधिकारी बन गये हैं। सीमित व्यष्टि चेतना भव-बन्धनों में-पंचभूत कलेवर में-जकड़े हुए लोग तो अपना सामान्य निर्वाह तक ठीक प्रकार नहीं कर पाते और उतने भर प्रयोजन में रोते कलपते असफलता पर हाथ मलते पाये जाते हैं। जबकि आत्मशक्ति सम्पन्न न केवल अपना वरन् व्यापक क्षेत्र को प्रभावित करते और समय की आवश्यकता को पूरी करते देखे जाते हैं।

आत्म-शक्ति का अभिवर्धन ब्रह्म सत्ता के साथ घनिष्ठता स्थापित करने से सम्भव होता है। तपश्चर्याएँ एवं योग साधनाएँ उसी प्रयोजन के लिए की जाती हैं। यह ऊँची स्थिति एवं आगे की बात हुई। ऊपर की पंक्तियों में ब्रह्म सम्बन्ध बनाने और योगी की दिव्य शक्ति प्राप्त करने का प्रसंग है। इससे पहले की हलकी स्थिति वह है जिसमें आत्म-शक्ति बढ़ाने के लक्षण तो नहीं मिलते पर मस्तिष्कीय चेतना से सीमाबन्धन टूटते और असीम के साथ सम्बन्ध बनते हैं। यह पंच भौतिक प्रकृति के व्यापक क्षेत्र में प्रवेश की बात है। भौतिक जगत उतना ही नहीं है जितना कि आँख से देखा हाथ से छुआ या अन्य इन्द्रियों के आधार पर प्रत्यक्षतः जाना जाता है। अप्रत्यक्ष एवं अविज्ञात भी असीम हैं वैज्ञानिक शोधों द्वारा उसी को खोजा जा रहा है जो अप्रत्यक्ष होने पर भी प्रत्यक्ष की तुलना में अत्यधिक शक्तिशाली है। इसी सूक्ष्म प्रकृति के नेत्र में मस्तिष्कीय चेतना का प्रवेश होता है और प्रत्यक्ष जगत की जो छाया- प्रतिक्रिया-सूक्ष्म जगत में विद्यमान है उसका परिचय स्पष्ट रूप से मिलने लगता है।

अतीन्द्रिय चेतना की चर्चा अध्यात्म ग्रन्थों में आज्ञाचक्र एवं तृतीय नेत्र के रूप में होती रही है। शिव के-दुर्गा के मस्तक में भृकुटि के मध्य एक तीसरा नेत्र होने का उल्लेख है। इसे दिव्य चक्षु भी कहते हैं। दिव्य दृष्टि इसी में रहती है। शिव ने इसी का उन्मूलन करके काम विकार को जला कर भस्म किया था। अर्जुन को विराट् ब्रह्म का दर्शन इसी दिव्य चक्षु से हुआ था। संजय ने महाभारत का घटना क्रम इसी नेत्र से देखते हुए धृतराष्ट्र को सारा वृत्तांत सुनाया था। ‘अदृश्य दर्शन’ इसी केन्द्र का काम है। यह रूप शक्ति का- ‘दृष्टि’ क्षेत्र का प्रसंग है। शब्द, रस, गन्ध, स्पर्श की अन्य ऐसी अनुभूतियाँ भी अतीन्द्रिय क्षमता से हो सकती हैं जो प्रत्यक्ष सम्पर्क से तो बहुत परे हैं, पर देश काल की सीमा लाँघ कर अपना अस्तित्व अन्यत्र कहीं न कहीं सूक्ष्म रूप में बनाये हुए हैं। इसी प्रकार के अनुभव सर्व साधारण को नहीं होते, इसलिए वे अद्भुत, अलौकिक प्रतीत होते हैं किन्तु वस्तुतः वे होते सर्वथा लौकिक एवं सामान्य ही हैं। इस संसार में जो कुछ घटित होता है वह नितान्त क्रमबद्ध और प्रकृति व्यवस्था के अनुरूप ही होता है। अन्तर इतना ही है कि हम प्रकृति के थोड़े से नियमों से ही परिचित हैं। जो अभी भी अविज्ञात बना हुआ है उसका क्षेत्र, विज्ञात की तुलना में असंख्य गुना अधिक है। इन्द्रिय शक्ति के आधार पर जितनी अनुभूतियाँ हमें होती हैं वे ही सामान्य अथवा लौकिक प्रतीत होती हैं। इसमें आगे की सभी बातें असामान्य एवं अलौकिक हैं। जो सब नहीं कर सकते कोई विशिष्ट ही कर पाते हैं उन्हें ‘अद्भुत’ कहा जाता है। उस स्थिति पर पहुँचे हुए व्यक्ति देखते हैं कि उनकी विशिष्ट उपलब्धियाँ वस्तुतः सामान्य ही हैं और प्रकृतिक्रम से बाहर की कोई बात उनमें नहीं है।

प्रकृति व्यवस्था की सामान्य जानकारी अत्यल्प है। उससे गहरे जाकर जो लोग अन्तर्निहित नियम-सूत्रों तथा विधि-व्यवस्थाओं की जानकारी प्राप्त कर लेते हैं और प्रकृति की सूक्ष्म तथा गहरी परतों के विश्लेषण एवं अर्थ संकेतों को समझने की क्षमता अपने में विकसित कर लेते हैं, उन्हें यद्यपि प्रकृति-गर्भ में पक रही घटनाएँ प्रत्यक्षवत् ही दृष्टिगोचर होती हैं, किन्तु सामान्य लोकानुभव में तो इन घटनाओं को वर्षों बाद ही आना है और उस समय तो वे सर्वतः अज्ञात व अनुमानातीत ही होती हैं। अतः भविष्य की उन घटनाओं का कथन जनसामान्य में विस्मय का कारण बने, यह स्वाभाविक ही है।

वर्तमान में जो सामने है जिसे जानने के साधन उपलब्ध हैं उसे जाना जा सकता है, पर जो स्थान की दृष्टि से दूर हैं-जहाँ के समाचार साधन रहित स्थिति में हैं पहुँच नहीं सकते वहाँ की परिस्थितियों को प्रत्यक्ष घटना की तरह दृश्य रूप में देखने, श्रव्य रूप से सुनने की घटनाएँ निश्चय ही आश्चर्यजनक हैं। वर्तमान का ज्ञान भी तभी मिल सकता है जब वे इन्द्रिय अनुभूति के द्वारा प्रत्यक्ष हों अथवा पत्र, संदेश, टेलीफोन, तार रेडियो, टेलीविजन जैसे उपकरणों के सहारे उन्हें जाना जा सकता है। ऐसी स्थिति न होने पर भी यदि कोई घटनाक्रम प्रत्यक्ष की भाँति ही जाना जा सके तो उसे आश्चर्यजनक एवं अतीन्द्रिय क्षमता का चमत्कार ही कहा जाएगा।

वर्तमान में दूरवर्ती घटनाक्रमों को देख या सुन सकना भी विकसित इन्द्रिय शक्ति की परिधि में आ सकता है, पर भूतकाल की अविज्ञात घटनाओं का इस प्रकार प्रस्तुत करना कि उनकी प्रमाणिकता में कोई संदेह न रहे, सचमुच ही आश्चर्य की बात है। इससे भी अधिक आश्चर्य उन सम्भावनाओं की जानकारी का है जो अभी घटित ही नहीं हुईं और अनुमान के आधार पर भी उस प्रकार की कल्पना करने का कोई कारण प्रतीत नहीं होता।

भूतकाल और वर्तमान के बीच समय की दूरी एक प्रकार की खाई है जिसे पाट सकना सामान्यतया अति कठिन प्रतीत होता है। इतिहास के पृष्ठों पर अंकित लेखों- खंडहरों-पुरातत्व शोधों तथा जन श्रुति प्रसंगों के आधार पर ही भूतकाल का आधा, अधूरा विवरण प्राप्त होता है, पर उसे ज्यों का त्यों जान सकना-प्रसंगों को उसी प्रकार देख या सुन सकना कठिन है। सामान्य मानवी चेतना इतनी लम्बी खाई छलाँग सके ऐसे साधन उसके पास नहीं हैं। अतीन्द्रिय विद्या के सहारे यह सम्भव हो सकता है। विकसित चेतना भूतकाल की घटनाओं को उसी प्रकार देख, सुन या जान सकती है, जिस प्रकार कि हम सब वर्तमान के प्रत्यक्ष घटनाक्रम की जानकारी सरलता पूर्वक प्राप्त कर लेते हैं।

भविष्य दर्शन और भी कठिन है। जो हो चुका उसके स्थूल अथवा सूक्ष्म प्रमाणों का मिल सकना समझ में आता है। पुरातत्व शोधें जिस प्रकार अवशेषों के सहारे प्राचीन घटनाक्रम का निष्कर्ष निकालती हैं उसी प्रकार सूक्ष्म जगत में विद्यमान किन्हीं प्रमाणों को सूक्ष्म चेतना द्वारा जाना जा सकना-तार्किक दृष्टि से सम्भव हो सकता है। उस प्रकार के उपकरणों का विकास अभी नहीं हो सका, यह दूसरी बात है, पर उसे जानने की सम्भावना को सिद्धान्ततः स्वीकार करने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मस्तिष्क के किसी कोने में पड़ी चिर विस्मृत घटनाएँ कई बार प्रसंगवश तथा स्वप्न में अनायास ही उभर आती हैं इसी प्रकार ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क में पड़ी भूतकाल की घटनाएँ भी जानी जा सकती हैं, यह सम्भावना सहज ही समझ में आती है। किन्तु जो हुआ ही नहीं- जो अनिश्चित है-उसकी जानकारी कैसे मिले?

यदि भविष्य निश्चित है और उसे हम जान सकते हैं तो एक नया संकट यह उत्पन्न होता है कि ‘कर्म’ की कोई उपयोगिता या महत्ता नहीं रहती। विधि का विधान-भाग्य का निर्धारण-यदि पूर्व निश्चित ही है तो फिर उसी की प्रतीक्षा में बैठे रहना कोई बुद्धिमानी है-तब विविध विधि दौड़ धूप करने की आवश्यकता क्या रही? ऐसी दशा में मनुष्य मात्र भाग्य की कठपुतली बन जाता है और पुरुषार्थ का कोई मूल्य नहीं रहता। यह विचित्र स्थिति है। इसे स्वीकार करने पर तो भाग्यवाद का ही समर्थन बनेगा और अकर्मण्यता ही पनपेगी। तब मनुष्य कुम्हार द्वारा चाक पर घुमाई जाने वाली मिट्टी की तरह अपने को असहाय अनुभव करेगा और इस प्रतीक्षा में बैठा रहेगा कि देखें भाग्य हमें किस ढाँचे में ढालता और किस परिस्थिति में ले जा कर पटकता है। यदि यही तथ्य है तो फिर मनुष्य को दयनीय स्थिति में रहता हुआ ही अनुभव किया जा सकेगा और पुरुषार्थ की निरर्थकता घोषित करने में किसी को कोई संकोच न होगा।

तत्वतः भविष्य दर्शन और भाग्यवाद एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। समान दिखते हुए भी उनकी स्थिति में जमीन आसमान जितना अन्तर है। भाग्यवाद-सुनिश्चित विधि विधान का प्रतिपादन करता है जब कि भविष्य दर्शन इस बात पर निर्भर है कि जो कुछ वर्तमान में घटित हो रहा है अथवा भूतकाल में घट चुका है उसकी संयुक्त प्रतिक्रिया निकट भविष्य में क्या होने वाली है।

इन दिनों गणितीय जटिलताओं को सरल बनाने के लिए अनेकों प्रकार के कम्प्यूटर बने हैं। वे ऋतु सम्भावनाओं जैसी सामान्य ही नहीं-युद्ध, शान्ति एवं राजनैतिक सामाजिक उतार-चढ़ावों सम्बन्धी भविष्यवाणियां भी करते हैं और उनमें से अधिकाँश सही भी निकलती हैं। अब ज्योतिषियों का स्थान यह ‘कम्प्यूटर’ गृहण कर रहे हैं और उनके भविष्य कथन को अधिक विश्वस्त एवं प्रामाणिक माना जा रहा है। इन यन्त्रों को अमुक स्थिति का अमुक उतार चढ़ावों में अमुक परिणाम निकलता है इस सिद्धान्त के आधार पर बनाया गया होता है। फार्मूले पूर्व निश्चित होते हैं उसी आधार पर वे मशीनें निष्कर्ष निकालती चली जाती हैं। इन भविष्य घोषणाओं को चमत्कारी समझा तो जा सकता है, पर वस्तुतः उनमें वैसा कुछ है नहीं। तथ्यों की सुविदित प्रतिक्रिया के पूर्व निर्धारण का फलितार्थ ही है जिसे ‘कम्प्यूटर’अपनी विशेष संरचना के कारण सर्व साधारण के लिए सुलभ करते रहते हैं।

मामूली किसान भी प्रचलित अटकलों के आधार पर वर्षा और फसल सम्बन्धी अनुमान लगाते हैं और उनमें बहुत कुछ सचाई भी होती है। कई पशु-पक्षियों और कीड़ों की हलचलों को देख कर ऋतु परिवर्तनों एवं भावी घटना-क्रमों का अनुमान लगाया जाता है। शकुन विद्या में यदि कुछ तथ्य है तो उसका आधार अन्य प्राणियों की अतीन्द्रिय क्षमता के आधार पर दृष्टिगोचर होने वाली हलचलों को ही आधार भूत माना जा सकता है।

बुद्धिमान लोग अपनी सामान्य सूझ-बूझ के आधार पर भावी सम्भावनाओं का ऐसा निष्कर्ष निकालते हैं जो प्रायः सही ही बैठता है। ‘सटोरिये’ मात्र जुआरी नहीं होते वे वर्तमान घटनाक्रमों पर पैनी नजर रखते हैं और अनुभवों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालते हैं कि इन परिस्थितियों की प्रतिक्रिया किस परिणाम को उपस्थित कर सकती है। यह सूझ-बूझ जिस सटोरिये में जितनी पैनी होती है वह उसी के सहारे दाव लगाता है और नफा उठाता है। बड़ी-बड़ी योजनाओं का निर्धारण इसी आधार पर होता है। भविष्य के स्वप्न साकार करने में किसी चाल से, किन साधनों के सहारे, किस प्रकार पहुँचना होगा, इसी सूझ-बूझ के सहारे योजनाएँ बनतीं और उन्हें पूरा करने का विधान बनता और सही सिद्ध होता है।

जिस प्रकार वर्तमान को देख कर भूतकाल के घटनाक्रमों का बहुत कुछ अनुमान लगा लिया जाता है उसी प्रकार वर्तमान की गतिविधियों का भावी परिणाम क्या हो सकता है इसकी कल्पना कर लेना कुछ कठिन नहीं है। ऐसा भविष्य दर्शन प्रायः हर मनुष्य करता है। उसमें अतिवाद घुसा हुआ हो तो बात दूसरी है अन्यथा दूरदर्शितापूर्ण चिन्तन अपने साथ क्रिया-प्रक्रिया लेकर लक्ष्य की दिशा में अग्रसर होता है और बहुत अंशों में सफल ही होकर रहता है। छोटे-बड़े परिणाम में हर स्थिति के व्यक्ति को भावी कल्पनाएँ करनी और योजनाएँ बनानी पड़ती हैं। किसान अनुमान लगाता है कि अगले वर्ष अमुक कारणों से अमुक फसल बोने से अधिक लाभ हो सकता है। अस्तु वह अपने अमुक खेत में अमुक बीज बोने की तैयारी बहुत विचार मन्थन के बाद आरम्भ करता है। इस प्रकार प्रायः हर स्तर के व्यक्ति भविष्य दर्शन का प्रयत्न करते हैं- कल्पना तथ्य और अनुभव का समन्वय ऐसे निष्कर्ष निकालता है जो सचाई और सम्भावना के बहुत कुछ समीप होते हैं।

यह सामान्य जीवन की-सामान्य सूझ-बूझ परक चर्चा हुई। अब असामान्य को देखा समझा जाय- सूक्ष्म जगत का पर्यवेक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि भूत और वर्तमान के घटनाक्रमों की प्रतिक्रिया अपने ढंग से पकती और पनपती रहती है। समयानुसार उसका प्रकटीकरण तो होता ही है, पर सूक्ष्म बुद्धि उसका आभास पहले से ही लगा लेती है। प्रसव के बाद यह पता हर किसी को चल जाता है कि लड़का पैदा हुआ या लड़की। पर जानकार लोग गर्भवती में उभरे लक्षणों को देख कर उसकी भविष्यवाणी पहले से ही कर देते हैं। अमुक मुकदमे का क्या फैसला हो सकता है इसका अन्दाज न्याय विशेषज्ञों को पहले से ही लग जाता है।

सूक्ष्म जगत में प्रस्तुत परिस्थितियों एवं हलचलों के आधार पर सम्भावना बननी आरम्भ हो जाती है। समयानुसार उसका प्रकटीकरण तो होना ही है पूर्वाभास के रूप में भी उसे जानना सम्भव हो सकता है। भविष्य वक्ताओं की दिव्य चेतना उस अदृश्य को देखती और अव्यक्त को व्यक्त करती है जो निकट भविष्य में घटित होने जा रहा है। सामान्य अनुमान तो सभी लगाते और अपनी-अपनी सम्भावना व्यक्त करते हुए शर्त लगाते हैं। आश्चर्य तब माना जाता है कि सामान्य बुद्धि के आधार पर सोची जा सकने वाली बात की अपेक्षा कोई अटपटी बात कही जाती है और वह सत्य सिद्ध होकर रहती है। यही ‘विधि विधान’ मानने को मन करता है, पर वस्तुतः वैसा होता कुछ नहीं। भविष्य कथन प्रस्तुतः परिस्थितियों की ऐसी प्रतिक्रिया भर है जो सामान्य सूझ-बूझ की परिधि से आगे चली जाती है और ऐसे परिणामों का परिचय देती है जो मोटी बुद्धि के लिए अटपटे और असम्भव लगते हैं। यद्यपि वे सम्भावनाएँ होती तथ्यों पर आधारित ही हैं।

वर्तमान की घटनाएँ अन्यत्र अपने अदृश्य रूप में सूक्ष्म रूप धारण करने अनन्त आकाश में बिखर जाती हैं। उन्हें विशिष्ट व्यक्तियों अथवा परिस्थितियों द्वारा पकड़ा एवं समझा जा सकता है। किसी के मन की बात बता देना-किसी के लिखे कागज गुप्त रखने पर भी पढ़ लेना जेब अथवा बन्द डिब्बे बक्से में रखी वस्तुओं का यथा विवरण परिचय प्रस्तुत कर देना-कई विशिष्ट अल्प क्षमता सम्पन्न व्यक्तियों के लिए सम्भव होता है। ऐसे चमत्कारों के प्रमाण समाचार अनेक बार देखने, सुनने को मिलते रहते हैं।

विश्व चेतना के गर्भ में वर्तमान की हलचलों का सूक्ष्म रूप विद्यमान रहता है। उसे अन्यत्र पकड़ा और फिर पूर्व रूप में स्थूल किया जा सकता है इसके प्रमाण रेडियो और टेलीविजन के माध्यम से भली-भाँति जानने चाहिएं। रेडियो स्टेशन में ब्रॉडकास्ट की हुई वाणी-ध्वनि कम्पनों के रूप में अनन्त अन्तरिक्ष में उसी तरह बिखरती है जिस तरह तालाब में ढेला फेंक देने पर उसकी लहरें चारों ओर चलने लगती हैं। इन्हीं लहरों को घरों में लगे रेडियो, ट्राँजिस्टर पकड़ते हैं और उन्हें फिर प्रत्यक्ष आवाज में परिणत करके सुनने वालों के सामने प्रस्तुत करते हैं। टेलीविजन में भी यही होता है। आवाज बिजली के रूप में परिणत होती है और तार के सहारे गन्तव्य स्थान तक चली जाती है। उस बिजली को रिसीवर फिर आवाज में बदल देता है। टेलीविजन में प्रकाश की तरंगें आकाश में फैलती हैं और उन्हें जहाँ भी उपकरण लगे होते हैं वहाँ फिर दृश्य रूप में बदल लिया जाता है। प्रत्यक्ष का अप्रत्यक्ष में बदलना और उसका फिर अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष हो जाना टेलीविजन, टेलीफोन, टेप रिकॉर्डर, ग्रामोफोन आदि यन्त्रों से स्पष्ट है।

भूतकाल की घटनाएँ भी अनन्त आकाश में अपना अस्तित्व बनाये रहतीं और ढूँढ़ खोज करने पर उन्हें फिर उसी प्रकार प्राप्त किया जा सकता है जैसी कि वे अपने समय में थीं। प्रयत्न करने पर कृष्ण के मुख से निकली हुई गीता जिसे अर्जुन ने सुना था अब पुनः खोजी और उसी रूप में सुनी जा सकती है। आत्मा की तरह पदार्थ भी अविनाशी है। उसका रूपांतरण तो होता रहता है, पर अस्तित्व समाप्त नहीं होता। सूक्ष्म जगत में भूत काल का घटना क्रम अदृश्य रूप में विद्यमान रहता है, वह झीना पड़ता जाता है और बात जितनी पुरानी होती है उतना ही उसका ढूँढ़ निकालना कठिन पड़ता है, फिर भी इतना निश्चित है कि उसका अस्तित्व अनन्त काल तक बना रहता है। आवश्यकतानुसार उसे कभी भी प्रयत्नपूर्वक ढूँढ़ निकाला जा सकता है।

भूतकाल की घटनाएँ ही नहीं-वस्तुओं की सत्ता ही नहीं-कई बार तो उन मृतात्माओं के अस्तित्व का भी परिचय मिलता है जिनके शरीर अंत्येष्टि कर्म द्वारा समाप्त किये जा चुके हैं। वे अपना अस्तित्व चेतना क्षेत्र में एक प्रत्यक्ष सत्ता की तरह बनाये रहते हैं। इतना ही नहीं वे उस प्रकार के आचरण भी करते हैं। मानो उनकी स्थिति अभी भी प्रत्यक्ष जगत में हस्तक्षेप करने योग्य बनी हुई हो। स्थूल शरीर न रहने के कारण प्रत्यक्ष इन्द्रियाँ तो शेष नहीं रहतीं फिर भी उनका सूक्ष्म शरीर अपने सूक्ष्म उपकरणों के साथ इस स्थिति में बना रहता है कि साँसारिक क्रिया कलापों में अपना योगदान दे सकें एवं अभीष्ट व्यक्तियों को प्रभावित कर सकें।

भविष्य में होने वाली घटनाओं के भी कई बार ऐसे आभास मिलते हैं जिनकी उस समय कोई सम्भावना नहीं थी, पर वह पूर्व सूचना पर सही सिद्ध हुईं। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं। फलित ज्योतिष तो भविष्य कथन को आधार बनाकर एक व्यवसाय ही बन गई है। भविष्यवक्ताओं में से अधिकाँश तो बाजारू लोग होते हैं और ऐसे ही तीर तुक्का मारकर लोगों को बहकाने और जेब काटने में लगे रहते हैं। फिर भी इस तथ्य से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भविष्य का आभास मिलना एक सचाई है और वह बहुत बार अपनी वास्तविकता एवं प्रामाणिकता का परिचय देती है।

परिस्थितियों का प्रवाह बदल जाय तो भविष्य दर्शन भी निश्चित रूप से बदल जायगा। भविष्यवाणियाँ वहीं सही उतरती हैं जिनसे घोषणा तथा फलित होने के मध्य घटना प्रवाह अपनी चाल पर यथावत् चलता रहता है। मनुष्य की सत्ता प्रचण्ड है वह अपने पराक्रम से सामान्य चाल को उलट कर नई रीति-नीति अपना सकता है। साहसी व्यक्ति ऐसे मोड़ बहुधा लेते रहते हैं। ऐसी दशा में उनके सम्बन्ध में बताया गया भविष्य भी निश्चित रूप से उलटे या मोड़ लिया देखा जायगा। व्यक्ति की भाँति ही-समूहगत सामाजिक हलचलें भी अपने प्रवाह की दिशा धारा बदल सकती हैं। ऐसी दशा में समूहगत भविष्य कथन भी बदलते देखे जाएंगे।


महर्षि वैनतेय (kahani)

महर्षि वैनतेय उस समय शिष्यों, स्नातकों से परामर्श कर रहे थे तभी वहाँ प्रवेश किया महाराज सुवर्णवाहु ने। नरेश ने सुना था महर्षि महान् अनासक्त कर्मयोगी हैं किन्तु विशाल आश्रम, उसकी अनोखी साज सज्जा, स्वर्ण मण्डित सभा सदन और स्वयं महर्षि की राजकीय वेश भूषा देखकर वे आश्चर्यचकित थे। यह निर्णय करना कठिन था कि ऐसे ऐश्वर्य के बीच रह कर भी कोई अनासक्त हो सकता है।

वे महर्षि के समीप पहुँचे, वैनतेय से उनकी प्रश्न मूलक मुद्रा छिपी न रह सकी। नृपति के वहाँ पहुँचते ही सभा विसर्जित कर महर्षि उठ खड़े हुए और महाराज सुवर्णवाहु को साथ लेकर वनस्थली के एक ओर चल पड़े।

दिन ढलता जा रहा था किन्तु ब्रह्मज्ञान की चर्चा करते हुए बढ़ रहे महर्षि वैनतेय के चरण पीछे लौटने का नाम भी नहीं ले रहे थे। राज्याधिप का ध्यान बार-बार अपनी स्वर्णवाहुकाओं की ओर, लौटने की ओर लगा हुआ था। जब महर्षि के पीछे लौटने का कोई इंगित न देखा तो उन्होंने कह ही दिया-गुरुवर! देर हो गई, मेरा वाहन, मेरी पादुकाएँ सब आश्रम में ही छूट चुके हैं क्या आप लौटेंगे नहीं?

महर्षि हँसे और बोले-राजन! कलात्मक जीवन आत्म विकास में बाधक नहीं, बाधा तो सुख सामग्री के प्रति आसक्ति ही है। आप उससे अभी तक मुक्त नहीं हो पाये जब कि मेरे लिए उनका कोई महत्व नहीं।

नरेश ने अनासक्ति का मर्म समझा और महर्षि को प्रणाम कर वापस लौट आये।

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अपनों से अपनी बात


साधना विज्ञान की सामयिक शोध और अभिनव प्रतिष्ठापना

साधना का वैज्ञानिक-सुव्यवस्थिति एवं बदली परिस्थितियों के अनुरूप ढाँचा खड़ा करने के लिए हमें नये सिरे से प्रयत्न करने होंगे। हर युग की मनः स्थिति और परिस्थिति अलग होती है। प्राचीनकाल में तर्क शक्ति का विकास नहीं हुआ था। उन दिनों श्रद्धा से ही आवश्यक समाधान हो जाते थे। शास्त्र विधान, आप्त वचन, गुरु निर्देश, परंपरा निर्वाह मात्र को ही पर्याप्त मानकर अनुशासन स्वीकार कर लिया जाता था, पर अब वैसा नहीं हो सकता। विज्ञान ने तर्क शक्ति को जगाया है। क्यों, कैसे? का उत्तर दिये बिना इस युग में गाड़ी एक कदम नहीं चल सकती। तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत किये बिना-प्रत्यक्ष के आधार पर स्थिति को प्रमाणित किये बिना अब किसी बात को हृदयंगम कराया जा सकना कठिन है। ऐसी दशा में ब्रह्म विद्या का ज्ञान-पक्ष एवं साधना विधान का क्रिया-पक्ष दोनों ही तथ्यों और तर्कों के आधार पर प्रमाणित किये जाने हैं। सोने को अग्नि परीक्षा और कसौटी की रगड़ के बिना जब खरा स्वीकार नहीं किया जा सकता तो आत्म विज्ञान के काल्पनिक अथवा प्रामाणिक होने की बात की जाँच पड़ताल क्यों न होगी? प्राचीनकाल में जन मानस तर्क को इतनी मान्यता नहीं देता था, पर आज तो इसके बिना गाड़ी एक कदम आगे नहीं बढ़ती। अस्तु ब्रह्मविद्या के प्राचीन आधारों को युग की आवश्यकता के अनुरूप नये ढाँचे में ढालना पड़ेगा।

इसी प्रकार साधना विधानों में सामयिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक हेर फेर करना होता है। आहार बिहार, क्रिया कलाप एवं वातावरण के अनुरूप शरीर और मन के स्तरों में समयानुसार भारी अन्तर पड़ता रहता है। किसी समय लोगों के रक्त इतने शुद्ध थे कि तुलसी के पत्ते, कालीमिर्च, अदरक, गिलोय, सोंठ, अजवायन जैसी घरेलू वस्तुओं से बड़े-बड़े रोग अच्छे हो जाते थे, अब तीक्ष्ण एन्टीबायोटिक्स लिए बिना जुकाम, खाँसी जैसे छोटे रोगों तक से छुटकारा नहीं मिलता। किसी समय खाने और पचाने में पेट पूरी तरह सक्षम थे, आज हर कोई कब्ज को जन्मजात साथी की तरह छाती से चिपकाये बैठा है। श्रम की दृष्टि से हर कोई असमर्थ बनता जाता है। थोड़ा सा काम करते ही भारी थकान आती है। मनः स्थिति में अब निश्चिंतता, प्रफुल्लता, उदारता, सज्जनता जैसे तत्व बेतरह घट गये हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता एवं विलासिता बढ़ रही है। संकल्प शक्ति का- साहस का तो एक प्रकार से दिवाला ही पिट गया है। आत्महीनता और उत्तेजना से मस्तिष्कों में अशान्ति भरे उद्वेग छाये रहते हैं। अन्न, जल और वायु के स्तर में पहले की अपेक्षा अब भारी अन्तर आ गया है। ऐसी दशा में शरीर और मन को जो आत्म-साधनाएँ प्राचीन काल में सह्य और सरल मालूम पड़ती थीं, वे अब अति कठिन बन गई हैं। मानसिक बलिष्ठता के कारण जो ध्यान धारणा सहज की बन पड़ती थी वह अब मनस्वी लोगों के लिए भी अति कठिन पड़ती है।

दृश्य गणित के अनुसार ज्योतिष शास्त्र को प्रत्येक पाँच हजार वर्ष में नये सिरे से संशोधित करना पड़ता है। ग्रह नक्षत्रों का-पृथ्वी की कक्षा, परिधि गति आदि का जो निर्धारण किया गया है वह अनुमानित है। उसे यथार्थता के समीप भर कहा जा सकता है। अन्तर तो इतने में भी ढेरों रह जाता है। वे कारण अभी भी अविज्ञात हैं जिनके कारण ग्रह गति में अन्तर पड़ता रहता है और एकबार का निर्धारण पाँच हजार वर्ष में इतना गड़बड़ हो जाता है कि उसे वेधशालाओं में ग्रहों की प्रत्यक्ष स्थिति देखकर पुराने निर्धारण को नये सिरे से परिशोधित किया जाया। ठीक यही बात योग साधनाओं के सम्बन्ध में भी है। अति प्राचीन काल के विधि विधान उस समय के मनुष्यों और परिस्थितियों के लिए निस्सन्देह उपयुक्त थे, पर आज के और उस समय के अन्तर को देखते हुए नये सिरे से शोध करने और वर्तमान के अनुरूप क्रिया पद्धति निर्धारण करने की आवश्यकता होगी। हुई भी है। प्राचीनकाल में अनुष्ठान, जप का दशांश होम करने का विधान था। आज की परिस्थिति में वैसा करना मुट्ठी भर सुसम्पन्न लोगों के लिए ही सम्भव हो सकता है। वह अत्यधिक महंगा पड़ेगा और गरीब एवं मध्यम श्रेणी के लोग उसके लिए कभी साहस ही न कर सकेंगे। घी की महंगाई तथा शुद्धता की संदिग्धता को देखते हुए युग के अनुरूप दशांश के स्थान पर शताँश होम पर्याप्त होने की प्रथा प्रचलित की गई है। शास्त्रकारों ने इस प्रकार के परिवर्तनों के लिए गुंजाइश रखी है और छूट दी है। देश, काल, पात्र का ध्यान रख कर विधि व्यवस्थाओं में हेर फेर करते रहने के लिए सर्वत्र निर्देश दिये गये हैं। युग की स्थिति एवं आवश्यकता को समझते हुए योग साधनाओं में नये सिरे से कुछ निर्धारण करने पड़े तो उसमें कोई आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए।

भगवान् के विभिन्न अवतार समय की आवश्यकता देखते हुए होते हैं और पिछले अवतारों की तुलना में नये ढंग से, नये प्रकार की लीलाएँ प्रस्तुत करते हैं। यदि एक ही रीति-नीति सदा काम देती रहती तो नये अवतारों की-नये प्रकार के क्रिया-कलापों की आवश्यकता ही न पड़ती। यही बात शास्त्रकारों के सम्बन्ध में भी है। आदि काल में मात्र ‘मनुस्मृति’ ही एक धर्म शास्त्र था। पीछे परिस्थितियाँ बदलती गईं और नये संविधान बदलते गये। युग दृष्टा ऋषियों ने समय की आवश्यकता पूरी करने वाली स्मृतियाँ बनाईं और वह सिलसिला एक-एक कदम आगे बढ़ता ही चला आया। इन दिनों हिन्दू कानून बनाने वालों ने याज्ञवलक्य स्मृति को युग के अनुरूप माना है और उसी के अनुशासन में बनी हुई व्यवस्था को सरकारी मान्यता मिली है। मनुस्मृति के प्रति आदर भाव तो अभी भी बना हुआ है किन्तु उसके कितने ही विधान समय से पीछे के कहकर अमान्य ठहरा दिये गये हैं। हर समाज में सुधारकों के रूप में देवदूत आते रहे हैं और अपने ढंग से लोक नेतृत्व करके असामयिक परम्पराओं को निरस्त करके उनके स्थान पर नये प्रचलन आरम्भ करते रहे हैं। सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक, नैतिक, कलात्मक राजनैतिक आदि क्षेत्रों में क्रान्तियाँ होती रही हैं। इनके सूत्र-संचालकों के प्रति लोक मानस ने-सच्चे हृदय से आभार माना है। वायु प्रवाह और जलधारा की तरह सामयिक परिवर्तनों की भी आवश्यकता समझी जाती रही है और यह क्रम काल चक्र से साथ-साथ अनवरत गति से अनन्त काल तक चलता भी रहेगा। भौतिक विज्ञान के प्रतिपादनों में क्रमशः भारी सुधार अप्रभावित नहीं रहा है। एक ऋग्वेद का विकास-चार वेदों में हुआ। एक तत्व दर्शन छह धाराओं में विभक्त हुआ। युग के अनुरूप ब्रह्म-विज्ञान की स्थापना के लिए अब वेदान्त दर्शन को अधिक प्रामाणिक एवं आधुनिक माना जाता है। यों आत्म दर्शन भी अपनी प्राचीनता एवं महत्ता के कारण आदर की दृष्टि से देखे जाते हैं। योगविज्ञान के सम्बन्ध में भी इस प्रगतिशीलता का समावेश आवश्यक है।

सामयिक आत्म-साधना पद्धति का निर्धारण करते समय यह ध्यान रखना होगा कि उस क्षेत्र में जिन मान्यताओं की स्थापना रखनी अथवा की जानी है, वे सभी तर्क एवं तथ्यों के आधार पर प्रामाणिक होने चाहिएं। बुद्धिवाद के इस युग में क्यों और कैसे का समाधान किये बिना अब कोई बात बन नहीं सकती। श्रद्धा की-गरिमा स्वीकार तो की जा सकती है, पर वह श्रद्धा भी विवेक सम्मत होनी चाहिए। साथ ही यह हृदयंगम कराया जाना चाहिए कि इस स्तर की श्रद्धा अपनाने में किस प्रकार-किस स्तर का सत्परिणाम प्राप्त हो सकेगा। मात्र परंपराओं एवं शास्त्र वचनों के आधार पर कुछ भी कहते सुनते रहा जाय उसे हृदयंगम न कराया जा सकेगा। अस्तु आत्मिक प्रगति के लिए जिस श्रद्धा तत्व को अपनाने के लिए साधकों से कहा जाना है उसकी उपयोगिता सिद्ध करने के लिए नये सिरे से तर्कों और प्रमाणों का परिपक्व आधार खड़ा करना होगा।

साधना का स्वरूप कलेवर विधि-विधान एवं कर्म-काण्ड निर्धारित करते समय प्राचीन परिपाटी का अन्धानुकरण करते रहने से भी काम नहीं चलेगा। अब च्यवन ऋषि जैसी सारे शरीर पर दीमक छा जाने पर भी अविचल समाधि स्थिति प्राप्त कर सकना कदाचित किसी के लिए भी सम्भव न हो सकेगा। पार्वती की तरह पत्ते खाकर, जल पीकर और वायु के आधार पर-चिरकाल तक साधना रत रह सकना आज की परिस्थिति में किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। अन्यान्य साधनाओं के सम्बन्ध में भी यही बात है। अपने युग में मनुष्यों का शारीरिक एवं मानसिक स्तर जिस प्रकार का है उसी को ध्यान में रखकर बनाये गये और बताये गये विधान फलप्रद हो सकते हैं।

साधना का उद्देश्य क्या हो, उस पुरुषार्थ के प्रतिफल की क्या अपेक्षा की जाय यह भी सामयिक प्रश्न है। प्राचीनकाल में भौतिक आवश्यकताएँ न्यूनतम थीं और लौकिक महत्वाकांक्षाओं को हेय समझा जाता था। अस्तु आत्मिक प्रगति का सीधा सादा सा लक्ष्य स्वर्ग मुक्ति, ईश्वर दर्शन, आत्म साक्षात्कार की परिधि तक सीमित थे। उसी प्रयोजन के लिए तत्वदर्शी ऋषि मनीषियों की साधनाएँ चलती थीं। इस मार्ग पर चलते हुए अनायास ही जो ऋद्धियाँ मिलती थीं, उनका प्रदर्शन एवं अपव्यय भी हानिकारक माना जाता था और इस प्रकार के उपयोग का निषेध था। पर आज तो वैसी निस्पृह मनः स्थिति नहीं रही। इन दिनों की आकाँक्षा व्यक्तित्व के ऐसे परिष्कार की है जिसके सहारे भौतिक सफलताएँ और आन्तरिक विभूतियों की उपलब्धि समान रूप से सम्भव हो सके।

अब संसार को माया मिथ्या कहने की बात उपहासास्पद बन पाई है। निवृत्ति और वैराग्य की गृहत्याग वाली व्याख्या अब अमान्य बन चली है। इन दिनों सोचा यह जा रहा है कि आत्म-शक्ति की अभिवृद्धि के फलस्वरूप शरीर को ओजस्वी, मस्तिष्क को मनस्वी और अन्तस् को तेजस्वी बनाया जा सकना सम्भव हो सके।

मध्यकाल में आत्म-साधना के फलस्वरूप चमत्कारी ऋषि सिद्धियों के प्रदर्शन का दौर चला था और किसी के योगी होने का प्रमाण उसका चमत्कार प्रदर्शन कर सकना माना जाने लगा था। फलतः असली सिद्ध पुरुष तो कोई-कोई कभी-कभी ही देखने में आये पर नकलची बाजीगरों की घात भली प्रकार बन आईं। उनने जादूगरी के धन्धे को अध्यात्म से मिलाकर लोगों को मूर्ख बनाना और ठगना आरम्भ कर दिया। बालों में से रंगीन बालू निकाल देने या ऐसे ही अन्य बाजीगरी के खेल दिखाने वाले धूर्त इस बुद्धिवाद के युग में भी सिद्ध पुरुष होने का दावा करते हैं। और अगणित अन्धविश्वासी उनके चंगुल में फँसकर अपना समय और सद्भाव नष्ट करते हैं। प्रकाश के उदय के साथ अन्धकार मिट जाने और निशाचरों का धन्धा बन्द हो जाने की सम्भावना तो सन्निकट है, पर स्थिति इतनी तो बनी ही रहेगी कि आत्मिक प्रगति के आधार पर जीवन क्रम के हलके-फुलके रहने, समस्याओं के सुलझने, मार्ग मिल सकने का लाभ प्राप्त होता रहे। अब नकद धर्म की आवश्यकता समझी जाती है। ऐसे अध्यात्म की अपेक्षा की जाती है जो भौतिकता को हेय ठहराने की अपेक्षा उसके साथ समझौता कर सके और समन्वित प्रगति का पथ प्रशस्त कर सके।

बाजीगरी स्तर के चमत्कार प्रदर्शन की व्यर्थता सामने आ जाने पर भी पराविज्ञान सम्मत अतीन्द्रिय क्षमता के विकास की सम्भावना स्पष्टतः सामने है। अन्तर्मन की चेतना परतें। कितनी सम्वेदनशील और कितनी सूक्ष्म हैं इसका रहस्य अब दिनों दिन अधिक स्पष्ट होता चला आ रहा है। जीवन निर्वाह में तो अन्तर्मन की तीन प्रतिशत सामर्थ्य ही काम में आती है शेष 97 प्रतिशत तो प्रसुप्त स्थिति में ही पड़ी रहती है। इस महादैत्य का यदि जागरण सम्भव हो सके तो मनुष्य की सामान्य समझी जाने वाली सामर्थ्य असामान्य बन सकती है और उसका उपयोग करके व्यक्ति त्रिकालदर्शी से लेकर सूक्ष्म जगत के अद्भुत रहस्यों का उद्घाटनकर्त्ता बन सकता है।

प्रशिक्षण के आधार पर मस्तिष्कीय ज्ञान बढ़ाने के अतिरिक्त ऐसे साधनपरक आधार भी मौजूद हैं जिनके सहारे कालिदास जैसे मंद बुद्धि उच्चस्तरीय विद्यावान बन सकते हैं। स्वास्थ्य संवर्धन के लिए आहार बिहार की प्रचलित परिपाटी ही एक मात्र आधार नहीं है। योग साधन से कायाकल्प कर डालने और परिपुष्ट दीर्घजीवन प्राप्त कर सकने के अन्य सूत्र भी मौजूद हैं। प्रतिभाशाली बनने के लिए क्रिया कौशल, लोक व्यवहार एवं बुद्धि चातुर्य ही उपाय नहीं है ऐसी पगडंडियाँ भी मौजूद हैं जिन पर चलते हुए प्रचंड प्रखरता विकसित की जा सकती है और उससे वातावरण को प्रभावित एवं परिवर्तित कर सकना सम्भव हो सकता है। चेतना की अविज्ञात परतों का जैसे-जैसे पता चल रहा है वैसे-वैसे यह अनुभव किया जा रहा है कि मानवी सत्ता में अन्तर्निहित शक्तियों को जागृत कर सकने और उन्हें उपयोग में ला सकने की क्षमता भी उपलब्ध होनी चाहिए। निश्चित रूप से यह कार्य अध्यात्म साधनाओं के माध्यम से सम्भव हो सकता है।

पिछले दिनों इस दिशा में कुछ प्रयत्न अदृश्य दर्शन अश्रव्य श्रवण, विचार संचालन, सम्मोहन,-निर्देशन, परकाया प्रवेश आदि के प्रयोग रूप में हुए भी हैं। उनके सत्परिणामों को देखते हुए यह सम्भावना उभरती आ रही है कि यदि प्रयत्न किया जाय तो मानवी काया में से ही भौतिक एवं आत्मिक सामर्थ्यों के एक से एक बढ़े चढ़े ऐसे दिव्य अनुदान उपलब्ध हो सकते हैं जिनके सहारे अब की तुलना में भविष्य को अत्यधिक उज्ज्वल, समर्थ और सुविधासम्पन्न बनाया जा सकना सम्भव हो सके।

इन दिनों चेतना की उन शक्तियों का अधिक महत्व समझा जा रहा है जो मानवी प्रतिभा क्षेत्रों को सुविकसित कर सकें। प्रसुप्त शक्तियों को जगा सकें और व्यक्ति की गरिमा को समुन्नत बना कर उसे महामानवों की पंक्ति में प्रतिष्ठापित कर सकें। इन दिनों लोग स्वर्ग जाने की बात नहीं सोचते वरन् अपनी परिस्थितियों को ही स्वर्गीय बनाना चाहते हैं। मुक्ति में जाने के किसी को आतुरता नहीं-कहा यह जा रहा है कि विक्षोभों एवं संकटों से छुटकारा मिले तथा हँसती हंसाती, खिलती खिलाती जिन्दगी का अजस्र एवं उन्मुक्त आनन्द उपलब्ध करना सम्भव हो सके। ईश्वर दर्शन से अब कदाचित ही किसी को संतोष हो सके। कण-कण में- क्षण-क्षण में ऐश्वर्य की अनुभूति करा सकने वाली संवेदनाएँ चाहिएं। इतने भर में ईश्वर का लाभ उपलब्धि करने जैसा संतोष पर्याप्त समझा जा सकता है। युग की इन आवश्यकताओं को पूरा कर सकने वाली साधना ही आज की परिस्थितियों में अभीष्ट हो सकती है।

उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए युग साधना का ऐसा ढाँचा खड़ा करना होगा जो प्रस्तुत मनः स्थिति एवं परिस्थिति के साथ मेल खाता हो। यह व्यवस्था बन पड़ी तो ही उस से समय का समाधान होगा और लोक रुचि उसे स्वीकार करेगी। समय की आवश्यकता एवं माँग को पूरी सकने वाले तथ्यों को ही जीवित रहने और बढ़ने का अवसर मिलता रहा है। अध्यात्म विज्ञान के सम्बन्ध में भी यही सिद्धान्त लागू होगा। परम्परागत ढर्रे से आगे न बढ़ने का दुराग्रह किया जाता रहा तो स्थिति के साथ ताल-मेल न बैठ सकेगा और असफलताजन्य निराशा ही पल्ले बँधती चली जायगी। इससे उस महान विज्ञान की कोई सेवा न हो सकेगी जिसकी प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए परम्परा में आगे न बढ़ने का हठ किया जा रहा था।

युग साधना का स्वरूप और आधार खड़ा करना अपने समय का अत्यधिक महत्वपूर्ण कार्य है। इसके लिए प्राचीन परिपाटी का गहनतम अध्ययन-समय का सूक्ष्मदर्शी विश्लेषण-विसंगतियों का संगतिकरण-निज का क्रियात्मक अनुभव एवं दिव्य प्रकाश की समन्वयात्मक आवश्यकता पड़ेगी। यह कार्य किसी न किसी को तो करना ही था यदि अपने कन्धे पर वह उत्तरदायित्व लद रहा है तो उसकी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। ईश्वर की इच्छा है तो अपने युग की इस महती आवश्यकता की भी पूर्ति होगी। युग साधना का ऐसा ढाँचा सम्भवतः अगले ही दिनों खड़ा होगा जिसे तथ्यपूर्ण एवं प्रत्यक्ष लाभदायक पाया जा सके। ऐसी स्थापना से अध्यात्म तत्व ज्ञान को नव जीवन प्राप्त हो सकता है यह मानने को सहज ही जी करता है।

जीवन के शेष दिनों में जिन महत्वपूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने का निश्चय पिछले दिनों घोषित किया गया था उनमें अध्यात्म विज्ञान का युग के अनुरूप ढाँचा खड़ा करने की बात सर्वप्रथम और सर्वप्रधान है। यज्ञ विज्ञान का शोध कार्य यों पृथक लगता है, पर वह भी वस्तुतः ब्रह्मविद्या के विशाल क्षेत्र की ही एक अंशभूत प्रक्रिया है। विश्व के प्रमुख धर्मों को एक लक्ष्य की ओर घसीट ले चलने की बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यह बन पड़ा तो सार्वभौम एकता-सर्वजनीन घनिष्ठता का एक नया और अति प्रभावशाली पथ प्रशस्त होगा। ऐसे ही कुछ अन्य कार्य है जो शेष जीवन की थोड़ी सी अवधि में ही पूरे किये जाने के लिए सामने पड़े हैं। आशा की जानी चाहिए कि जो करना है उसका बड़ा अंश अगले ही दिनों निपट जायगा, जो शेष रह जायगा उसकी ऐसी क्रमबद्ध दिशा धारा बन जायगी जिसे हमारे उत्तराधिकारी भी करते रह सकेंगे।

शांति−कुंज की शिविर शृंखला के सम्बन्ध में कुछ संकेत पिछले अंग में दिये गये हैं। भविष्य में चलने वाले दस-दस दिवसीय सत्र साधना प्रधान होंगे। उनमें प्रकाश प्रशिक्षण भी रहेगा, पर वह स्वल्प एवं सूत्र रूप में ही रहेगा। विशेष व्यवस्था प्रेरणात्मक-साधना की रहेगी। शिक्षार्थियों का अधिक समय साधना में और कम शिक्षण सत्संग में लगेगा। अभी तो शांति−कुंज में सामूहिक निवास एवं सामूहिक साधना की ही व्यवस्था है, पर निकट भविष्य में जिस ‘ब्रह्म वर्चस् आरण्य’ के निर्माण की बात सामने है उसमें हर साधक को एक कुटिया में-एकाकी रहने और एकांत साधना करने की व्यवस्था उसी प्रकार बनाई जायगी जिस प्रकार योगियों को एकान्त गुफा में निवास करने और अन्तर्मुखी रहने की रीति-नीति अपनानी पड़ती है। एक-एक वर्ष के लिए हमें भी हिमालय में जिस विशिष्ट साधना के लिए जाना पड़ा है उसमें भी एकान्त साधना ही अपनानी पड़ी है। वही पद्धति भविष्य में आपने साथ सम्पर्क सूत्र में बँधे हुए साधकों को अपनानी पड़ेगी। जब तक वह प्रबन्ध नहीं बन पड़ता तब तक वर्तमान आश्रम में ही कुछ उलट फेर करके उस तरह का प्रबन्ध किया जायगा कि सूत्रों की रूप रेखा में साधना तत्व का अधिकाधिक समावेश हो सके।

व्यस्त व्यक्तियों के लिए यही उपयुक्त है कि वे दस दिन तक हमारे समीप गंगा तट और हिमालय की गोद में रहकर तपश्चर्या करें। एक साल के लिए अपनी भावी साधना पद्धति निर्धारित करें और फिर पिछले का लेखा-जोखा देने तथा आगे की नई कक्षा के अनुरूप पाठ पढ़ने तथा कार्य पद्धति बनाकर जाने की व्यवस्था बना लिया करें। जिनके पास अधिक समय हो, गृह कार्यों से निवृत्त हो चुके हैं वे अधिक समय यहाँ रह सकेंगे और साधना क्रम को अनवरत रूप से आगे बढ़ा सकेंगे। साधना के चार चरण सर्वविदित हैं स्वाध्याय, संयम और सेवा के लिए साथ मिली रहने वाली साधना ही सार्थक होती है। यही हमें भी आजीवन करते रहना पड़ा है और यही समन्वय उन सबको भी रखना पड़ेगा जो हमारे कन्धे से कन्धा और कदम से कदम मिलाकर चलने के लिए उत्सुक हैं।

विशिष्ट साधना प्रक्रिया निर्धारण में हर साधक की मनः स्थिति, परिस्थिति, स्तर एवं उद्देश्य का ध्यान रखना पड़ता है। दैनिक संध्या वंदन, नवरात्रि अनुष्ठान, सामूहिक यज्ञ जैसे साधन तो सबके लिए एक जैसे हो सकते हैं, पर यदि व्यक्तिगत दुर्बलताओं के निराकरण एवं समस्याओं के समाधान की बात हो तो चिकित्सा स्तर पर ही उसका प्रबन्ध करना होता है। एक ही मर्ज के रोगियों के लिए चिकित्सक उनकी स्थिति की भिन्नता को देखते हुए उपचार का निर्धारण करते हैं। ज्वर से आक्रान्त सभी रोगियों को एक सी दवा नहीं दी जाती। बच्चे, गर्भिणी, तरुण, वृद्ध, रोगी की प्रकृति, रोग की जीर्णता, नवीनता आदि को ध्यान में रखकर भिन्न भिन्न प्रकार के उपचार, अनुपान एवं पथ्य बताये जाते हैं। साधना भी एक प्रकार से सूक्ष्म एवं कारण शरीरों का उपचार ही है, इसलिए उसमें भिन्नता रहनी भी स्वाभाविक है। यह प्रयोजन पत्र व्यवहार से नहीं, निकटवर्ती निदान परीक्षण एवं परामर्श से ही सम्भव होता है। अस्तु अगले दिनों साधना में रुचि रखने वालों के प्रत्यक्ष मार्ग दर्शन करने के लिए शिविर चलेंगे। इसके अतिरिक्त शोध संदर्भ में परीक्षण चलते रहेंगे और युग के अनुरूप साधना का निर्धारण करने के लिए इतना महत्वपूर्ण समुद्र मंथन चलता रहेगा जिसके द्वारा मनुष्य जाति को कुछ उपयोगी रत्न राशि उपलब्ध होने की अपेक्षा की जा सके। उपरोक्त गतिविधियों में जिनकी रुचि है-जो इन क्रियाकलापों का महत्व समझते हैं इस सम्बन्ध में अधिक परिचित हो सकें और इन प्रयासों को सफल बनाने में अपने-अपने ढंग का योगदान कर सकें, इसी उद्देश्य से यह पंक्तियाँ लिखी गई हैं।

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धर्म और विज्ञान का मिलन


धर्म और विज्ञान का मिलन (kavita)

सही रूप उभरेगा उस दिन मानव के उत्थान का। जिस दिन होगा मिलन विश्व में धर्म और विज्ञान का॥

परम्पराओं की तुलना में तब विवेक ही वन्दित होगा। रूढ़िवाद की रात्रि मिटेगी, नव-प्रभात अभिन्दित होगा॥

गूँजेगा सहगान मानवी शक्ति और सद्ज्ञान का। जिस दिन होगा मिलन विश्व में धर्म और विज्ञान का॥

रंग, वर्ग जातीय भेद की टूटेंगी ओछी दीवारें। नहीं सत्य का हनन करेंगी सम्प्रदाय की विषम कगारें॥

जागेगा देवत्व देह धर, तोड़ कवच पाषाण का। जिस दिन होगा मिलन विश्व में धर्म और विज्ञान का॥

दिशाहीन उन्मत्त न होगी, भौतिकता की सिद्धि अधूरी। तय कर लेगा विकसित जीवन, आध्यात्मिक मंजिल की दूरी॥

होगा सदुपयोग मंगलमय, हर विभूति-अनुदान का। जिस दिन होगा मिलन विश्व में धर्म और विज्ञान का॥

स्वार्थ नहीं, परमार्थ बनेगा, चरम लक्ष्य जग में जन जन का। ईर्ष्या द्वेष, कलह-हिंसा से कलुषित क्षेत्र न होगा मन का॥

परिमार्जन पुरुषार्थ करेगा, बिगड़े भाग्य-विधान का। जिस दिन होगा मिलन विश्व में धर्म और विज्ञान का॥

स्वस्थ सृजन का प्रेरक होगा, श्रद्धा और तर्क का संगम। बुद्धि हृदय मिलकर छेड़ेंगे वाणी की सुन्दरतम सरगम॥

निखरेगा हर एक कला में रूप नये इन्सान का। जिस दिन होगा मिलन विश्व में धर्म और विज्ञान का।

-डॉ. हरगोविन्द सिंह

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*समाप्त*