आप जिसे सुखी और सफल समझते हैं, निकट से उसके विगत जीवन का अध्ययन कीजिए। हो सके तो सीधे उससे ही पूछ लीजिए कि क्या आपके जीवन में कभी कोई मुसीबत नहीं आयी? तब आपको ज्ञात होगा-सुख और समृद्धि आसमान से फटकर ही उसे आप से आप नहीं मिले हैं। कठिनाइयों और मुसीबतों ने उसके जीवन को भी उसी प्रकार झकझोरा था, जिस प्रकार वह आज आपको परेशानी में डाले हुए है। जब आपको यह तथ्य ज्ञात हो जाये, तो आप पुनः पता लगावें कि फिर किसने उसे उस विपत्ति-जाल से उबारा? क्या किसी जादूगर ने आकर जादू की छड़ी घुमाई और वे सब अवरोध काफूर हो गये? खोज करने पर आपको पता लगेगा, विपन्नताओं के निवारण में उसका आत्म विश्वास ही उसका मुख्य सहायक रहा है। जब संसार के सभी मित्रों ने, परिजनों ने उसका साथ छोड़ दिया था, तब इसी आत्म विश्वास ने आशा के रूप में उभर कर उसको आश्वस्त किया था। हिम्मत बढ़ाकर उसे सतत् प्रयास के लिए प्रेरित किया था।
विश्वास कीजिए आपकी आज की परेशानी अपनी निराशा का ही परिणाम है। आप हार मान बैठे हैं कि हमसे कुछ नहीं होगा, विपत्ति स्वयं के बूते नहीं टलेगी। चारों ओर अंधेरा ही अंधेरा है। कोई प्रकाश दिखाने वाला नहीं, दुःखों से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं सूझता। अब जरा अपना आत्म-विश्वास जगाइये, वर्तमान में उपलब्ध साधनों का- भले ही वे अपेक्षाकृत कम और छोटे हों, आशावादी दृष्टिकोण से मूल्यांकन करिये। उनके प्रति श्रद्धा का- आदर का भाव रखते हुए उनके सदुपयोग में जुट जाइये कुछ दिनों में ही देखेंगे कि स्थिति में परिवर्तन प्रारम्भ हो गया। निराशा आशा में, असफलता-सफलता में बदलनी प्रारम्भ हो गई।
-विवेकानन्द
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सकडाल पुत्र मिट्टी के बर्तन बनाया और बेचा करता था। नगर के बाहर से वह मिट्टी खोद-खोद कर लाता और उसमें पानी मिला कर रोंध कर खिलौने बनाने के लिए मिट्टी तैयार करता था। उसका यह कार्य काफी अच्छा चलता था।
जमा जमाया व्यवसाय था- इसलिए सकडाल पुत्र यह मानने लगा था कि यह सब भाग्य का खेल है। वह नहीं जानता था कि उसके पूर्वजों को यह व्यवसाय जमाने में कितनी मेहनत करनी पड़ी थी। वह तो यही समझता था कि सब नियतिवश होता है और यह धारणा बनने के कारण वह धीरे-धीरे अकर्मण्य होता गया। भाग्यवाद के पोषक और महावीर स्वामी के प्रतिद्वन्द्वी गोशालक का भी वह अनुयायी बना और फिर तो एकदम वह आलसी बन गया और जब वह अकर्मण्य होने लगा तो उसका काम भी मन्द चलने लगा। व्यापार में भी घाटा होने लगा। घाटा होते देख कर सकडाल पुत्र घबराया। यह मान्यता तो उसकी नस-नस में भर गयी थी कि जो कुछ होता है, वह नियतिवश ही होता है- अतः वह एक तरह से परास्त होकर बैठ गया और किंकर्तव्यविमूढ़ रहने लगा।
एक दिन ग्राम में महावीर स्वामी का आगमन हुआ। उसने सोचा क्यों न महावीर के पास जाकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाये तथा अपने भाग्य के डूबते हुए सितारे को पुनः उदय होता हुआ देखा जाय। लेकिन तभी उसके मन में बैठा दुराग्रह का नाग फुफकार उठा-यह सोच कर कि-‘‘मैं महावीर का अनुयायी तो हूँ नहीं। अतः उनकी कृपा पाने के लिए क्यों उनके आगे हाथ पसारूं ! ’’
तभी उसने देखा सड़क पर दूर से आता हुआ श्वेत-वस्त्र धारियों का जुलूस। यह जुलूस महावीर और उनके अनुयायियों का ही था। धीरे-धीरे वह जुलूस समीप आता जा रहा था और सकडाल पुत्र असमंजस की स्थिति में तेजोद्दीप्त चेहरे की ओर देखता हुआ अपने मानसिक द्वन्द्व से झूल रहा था। एक मन तो हो रहा था कि महावीर के चरण पकड़ ले और उनसे कृपा की भीख माँगे तथा दूसरा कह रहा था नहीं। ऐसा नहीं करना चाहिए।
क्या करूं, क्या न करूं के द्वन्द्व में नाचते हुए सकडाल पुत्र को आश्चर्य तो तब हुआ, जब महावीर उसके घर के समीप रुक गये। महावीर ने न जाने क्या सोच कर पूछा-‘‘सकडाल पुत्र ! ये इतने सुन्दर खिलौने और इतने बढ़िया बर्तन क्या तुम बनाते हो ? कैसे बनाते हो भाई ! जरा हमें भी तो बताओ।”
सकडाल पुत्र बोला-‘‘सब संयोग वश होता है महाराज ! जब संयोग मिल जाते हैं तब ऐसा हो जाता है।”
महावीर ने फिर पूछा-‘‘अच्छा ! अगर तुम्हारे इन खिलौनों और बर्तनों को कोई फोड़ दे तो ? ”
अब की बार वह तमक गया-‘‘फोड़ेगा कैसे, इससे मेरा नुकसान जो होता है। और फोड़ने वाला मेरा नुकसान करने वाला होता है ?”
“अच्छा ठीक है और अगर कोई अत्याचारी तुम्हारी पत्नी का शील भंग करे तो.....?” महावीर ने पूछा।
कौन माई का लाल है जो मेरे रहते मेरी पत्नी की ओर आँख उठा कर भी देखे-अब की बार सकडाल पुत्र उबल पड़ा। ‘पर उसका क्या दोष है ? जो होता है, वह तो सब नियतिवश ही होता है’ महावीर का इतना कहना था कि सकडाल पुत्र की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसे भान हुआ कि वह कैसी गलत मान्यता बनाये हुए था। तब महावीर ने कहा-‘‘पुत्र ! भाग्य का बीज पुरुषार्थ है। मैं जानता हूँ कि तुम भाग्य द्वारा छले गये हो, पर पुरुषार्थ से पुनः नये भाग्य का सृजन करो।” और महावीर वहाँ से चल दिये।
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जड़ जगत को ही सब कुछ मान लेना और चेतना को भी जड़ के पीछे काम करने वाली हलचलों की प्रतिक्रिया समझ बैठना, जड़वाद का अन्ध समर्थन मात्र है। चेतना के अस्तित्व को झुठलाया जाना अपने युग का बौद्धिक दुर्भाग्य ही कहा जायगा। जिस चेतना ने जड़ पदार्थों को साज संभाल कर उपयोगी एवं सुन्दर बनाया - जिस चेतना ने अपनी सूक्ष्म बुद्धि से प्रकृति के अनेकानेक रहस्यों को जाना और उनसे लाभान्वित हो सकने की स्थिति तक मनुष्य को पहुँचाया, उसी चेतना के अस्तित्व तक से हम इनकार करने लगे तो इसे आत्म विस्मृति के अतिरिक्त और क्या कहा जायगा ?
चेतना का अस्तित्व हम शरीर के माध्यम से भी अनुभव करते हैं, पर वह उतने तक ही सीमित नहीं है। शरीर के बिना भी उसका अस्तित्व बना रहता है। प्रकृति का सूक्ष्म स्वरूप यों तो यन्त्र उपकरणों की सहायता से खोजा - पकड़ा जा सकता है, पर चेतना की परख के लिए कोई भौतिक साधन बन कर तैयार नहीं हुए हैं। वे हो भी नहीं सकेंगे। क्योंकि भौतिक उपकरण अपने सहधर्मी भौतिक पदार्थों को ही पकड़ सकते हैं। शरीर और उसकी इन्द्रियाँ पंचभूत तत्त्वों से बनी हैं। इसलिए उनकी अनुभूतियां भी तत्त्वों से बने परमाणु परक पदार्थों के आधार पर ही कुछ निष्कर्ष निकालती एवं रस लेती हैं। मशीन भी प्रायः धातुओं से बनी और विद्युत जैसी भौतिक ऊर्जाओं से चलती है। ऐसी दशा में उनका परख क्षेत्र भी स्थूल अथवा सूक्ष्म - दृश्य अथवा अदृश्य जड़ जगत तक ही सीमाबद्ध रहता है। चेतना को तो चेतना ही अनुभव कर सकती है। चेतना को समझने का कोई यन्त्र बन सका तो वह चेतना ही होगा। आत्मा और परमात्मा को प्रयोगशालाओं में अब तक सिद्ध नहीं किया जा सका और वह भविष्य में भी सिद्ध न हो सकेगा। इसी आधार पर वैज्ञानिकों ने इन दोनों की सत्ता को अस्वीकार किया है। वे शरीर को चलता-फिरता पौधा मानते हैं और उनकी चेतना को मस्तिष्कीय हलचल कहते हैं। मस्तिष्क तो शरीर का ही अंग है। इसलिए वे आत्मा की परिभाषा शरीर तक ही सीमित रखते हैं और मरने के बाद आत्मा की समाप्ति की बात कहते हैं। परमात्मा के सम्बन्ध में भी उनका ऐसा ही कथन है। प्रकृति व्यवस्था को वे स्वसंचालित मानते हैं। सृष्टि में चल रही विभिन्न व्यवस्थाओं को वे अपने आप - ढर्रे या धुरी पर घूमती हुई कहते हैं और इसमें किसी ईश्वर का दखल स्वीकार नहीं करते।
कठिनाई यह है कि विज्ञान जगत प्रत्यक्ष भौतिक प्रयोग - परीक्षणों को ही सब कुछ मान बैठता है और प्रयोगशालाओं की सिद्धि को ही प्रामाणिक ठहराता है जबकि तर्क और तथ्य यह भी कहते हैं कि इस विश्व के रहस्यों को - विशेषतया चेतन तथ्यों को जानने के लिए प्रयोगशालाओं की उपलब्धियों तक ही सीमित नहीं रहा जा सकता।
पदार्थों में पाई जाने वाली हलचल स्वसंचालित हो सकती है, यह प्रतिपादन गले नहीं उतरता। चेतन संचालक के बिना वस्तुएँ निश्चेष्ट और अस्त-व्यस्त पड़ी रहती हैं। बहुमूल्य जलयान, वायुयान, रेल इंजन आदि बिना ड्राइवर के नहीं चलते, फिर असीम ब्रह्माण्ड-व्यापी, अन्तर्ग्रही और सीमित परमाणु सत्ता में जो सुव्यवस्थित अनवरत गतिचक्र चल रहा है, वह अनायास स्वसंचालित कैसे हो सकता है ? इसके पीछे चेतन शक्ति की प्रेरणा एवं व्यवस्था होनी आवश्यक है। इसे तर्क बुद्धि सहज ही समझ सकती है। यदि विवेक, तर्क एवं बुद्धि को भी यान्त्रिक उपकरणों की तरह ही साक्षी साधन मान लिया जाय तो फिर ईश्वर के अस्तित्व को समझने-स्वीकार करने में कोई कठिनाई न रहेगी।
आत्मा के अस्तित्व को प्रयोगशालाओं में तो सिद्ध नहीं किया जा सका, पर अन्य ऐसे अकाट्य प्रमाण मौजूद हैं जिनमें यह सिद्ध होता है कि मरने के बाद भी जीव चेतना का अस्तित्व बना रहता है। इस तथ्य की साक्षी में प्रेतात्माओं की हलचलें तथा पुनर्जन्म की ऐसी घटनाएं प्रस्तुत की जा सकती हैं, जो प्रामाणिक व्यक्तियों के अनुभव में आई हैं और उन्हें झुठलाया नहीं जा सकता। इसी प्रकार पुनर्जन्म के भी अगणित प्रमाण मिलते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि पिछले जन्म की ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण नये जन्म में स्मरण बना रह सकता है, जो अन्य लोगों को विदित नहीं था। किसी ने सिखा-पढ़ा कर पूर्व जन्म विवरण का कौतूहल तो खड़ा नहीं कर दिया है? इस आशंका की काट उन प्रमाणों से हो जाती है, जिनमें बालकों ने अपने पूर्वजन्म के सम्बन्धियों को पहचाना और नाम लेकर पुकारा है। इसी प्रकार उनने नितान्त व्यक्तिगत ऐसी घटनाएं सुनाई हैं जो सम्बद्ध व्यक्तियों के अतिरिक्त अन्य लोगों को विदित नहीं हो सकती थीं। जमीन में अपना गड़ा हुआ धन बताकर उसे निकलवाना पूर्वस्मृति का ठोस प्रमाण समझा जा सकता है। प्रेतात्माओं के अस्तित्व और पुनर्जन्म के प्रत्यक्ष प्रमाणों को भी यदि प्रयोगशाला सिद्ध तथ्यों की तुलना में माना जा सके तो फिर आत्मा और परमात्मा के अस्तित्व में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती।
“ दी ह्यूमन पर्सनेलिटी एण्ड इट्स सरवाइवल आफ बाडीली डैथ ” नामक पुस्तक में ऐसे अनेक उदाहरण प्रस्तुत किये गये हैं, जो शरीर से पृथक आत्मा के स्वतन्त्र अस्तित्व को सिद्ध करते हैं। कई उदाहरण एक व्यक्ति के शरीर पर किसी दूसरी आत्मा द्वारा आधिपत्य रखने और फिर उसे मुक्त कर देने के हैं। साथ ही संगीत, गणित, ललित कलाओं आदि में अद्भुत क्षमता व प्रवीणता वाले बच्चों के विवरण भी हैं। जिनका असाधारण ज्ञान पूर्वजन्म की संचित ज्ञान सामग्री ही सिद्ध होता है।
गणित शास्त्री ओस्पेन्स्की ने तीन ग्रन्थों में गणित के आधार पर चेतना के व्यापक अस्तित्व को सिद्ध करने का अकाट्य प्रयत्न किया है। इस सन्दर्भ में उनके द्वारा लिखे गये ग्रन्थों में ‘ इन सर्च आफ दि मिरेकुलस - टर्टियम आर्गेन मथ्योरी आफ इन्टरनल लाइफ अधिक प्रसिद्ध हैं।
भौतिकी के आचार्य राबर्ट मायर ने ऊर्जा के दर्शन पर जो खोजें की हैं, वे बताती हैं कि उसकी अधिकाधिक सूक्ष्म स्थिति में जो तत्त्व शेष रह जाता है, उसे चेतना की संज्ञा दी जा सकती है। यह उच्च स्तर पर एकरस और सर्वव्यापी स्थिति में बनी रहती है। उसका उत्पादन और विलयन क्रम तो स्थूल रूप से ही चलता है।
मनोविज्ञानी जे. बी. राइन ने मानवी मनः चेतना को पराजागतिक और पराभौतिक की संज्ञा दी है। वे उसका स्वरूप विद्युतीय एवं चुम्बकीय स्तर की ऐसी स्वतन्त्र इकाई के रूप में मानते हैं जो मरने के बाद भी अपनी सत्ता बनाये रहता है। उसमें इतने प्रबल संकल्प भी जुड़े रहते हैं जिनके सहारे पुराने स्तर की तथा नये प्रकार की किसी आकृति का सृजन और धारण कर सके। उनकी दृष्टि में यह व्यक्ति चेतना दृश्य अथवा अदृश्य स्थिति में अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाये रहने में पूर्णतया समर्थ है।
आइन्स्टाइन ने सृष्टि के मूल में चेतना को सक्रिय माना था। जे. ऐ. थामसन, जेम्स जोन्स, ए. एस. एडिग्रन आदि ने विज्ञान की नवीन दिशाओं का अलग-अलग विवेचन करते हुए एक ही बात कही है - विज्ञान के पास जीवन के प्रारम्भ होने की कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है। वैज्ञानिक अन्वेषण अब चेतना और विचार जगत की ओर बढ़ रहे हैं।
भारतीय दर्शन और संस्कृति आदिकाल से आत्मा की अखण्डता पर आस्थावान हैं। अणु मात्र हो कर भी वह सम्पूर्ण शरीर पर आधिपत्य रखता है। भावनात्मक परिष्कार से आत्मबल बढ़ता है और अपने स्वरूप को जानने वाला जीवात्मा परमात्म-सत्ता से एक रूप हो जाता है।
नोबुल पुरस्कार विजेता भौतिकीविद् श्री पिपरे दि कोम्ते ने आत्मा को विश्वात्मा से सम्बन्धित बताया है तथा इसी आधार पर उसे अमर भी कहा जाता है, क्योंकि विश्व चेतना अमर है और आत्मा उसी की छोटी इकाई मात्र है।
इलेक्ट्रो डायनेमिक सिद्धान्तों के अनुसार ‘ईगो’ की छानबीन की जाने पर ये तथ्य सामने आए हैं कि जन्म मरण- चक्र में भ्रमण करती हुई, भिन्न-भिन्न आकृति-प्रकृति अपनाते हुए भी, मूल-सत्ता अक्षुण्ण रहती है।
विभिन्न खोजों के बाद विश्वविख्यात वैज्ञानिक फ्रेड हायल तथा जयंत विष्णु नार्लीकर ने यह स्थापना की है कि विश्व रचना में कारणभूत अणु और मानवीय शरीर की संरचना में कारणभूत जीवाणु की मूल संरचना एक सी है।
“दि सूट्स आफ कोइन्सिडेन्स” के लेखक आर्थर डा कोएस्लर ने जीवसत्ता को आणविक या रासायनिक संघात से सर्वथा भिन्न माना है।
“यू डू टेक इट विद यू” के लेखक डिविट मिलर ने मस्तिष्कीय कोशों में ही घुली हुई एक अतिरिक्त चेतना को माना है तथा उसका स्वतन्त्र अस्तित्व स्वीकार किया है। यह चेतना मस्तिष्क के कोशों को प्रभावित करती है।
हमारा विश्व एक विराट शक्ति सागर है। यह शक्ति सागर जड़ चेतन से मिश्रित है। प्राणियों की सत्ता इसमें एक बुलबुले की तरह स्वतन्त्र अस्तित्व बनाती है, विकसित होती है और समयानुसार विलीन हो जाती है।
मूर्धन्य वैज्ञानिकों की मान्यता है कि इस विराट् शक्ति सागर में एक भौतिक शक्तिधारा है, दूसरी प्राणिज। दोनों एक अविच्छिन्न युग्म बनाती हैं।
विकासमान विज्ञान अब जीवन को रासायनिक संयोग मात्र नहीं मानता। मनश्चेतना की मरणोत्तर सत्ता तो स्वीकार ही कर ली गई है। अब चेतना जगत की स्वतन्त्र सत्ता को एक घटक मानने की बारी है।
इन दिनों ब्रह्माण्डीय चेतना की वैज्ञानिक क्षेत्रों में बहुत चर्चा है। उसे परा प्रकृति की स्वीकृति, माना जाना चाहिए। प्रकृति के दो स्तर हैं एक ‘परा’ दूसरा ‘अपरा’। ‘परा’ वह है जिसे पंच भौतिक कह सकते हैं। इन्द्रिय चेतना से जो अनुभव की जा सकती है अथवा यन्त्र उपकरणों की सहायता से जो प्रत्यक्ष हो सकती है। भौतिक विज्ञान का कार्यक्षेत्र यहीं तक सीमित है। कुछ समय पूर्व तक वैज्ञानिक इतने को ही सब कुछ मानते थे। चेतना की व्याख्या आणविक एवं कम्पन परक हलचलों की ही प्रतिक्रिया कहते थे। अब बात आगे बढ़ गई। विज्ञान के बचपन ने किशोरावस्था में प्रवेश किया है। फलतः अपरा प्रकृति का अस्तित्व सहमते-झिझकते स्वीकार किया गया है। इस नये कार्यक्षेत्र को सूक्ष्म जगत कहा जाने लगा है। इसकी हलचलें आणविक गतिविधियाँ नहीं कही जा सकतीं और न ताप, प्रकाश शब्द के कम्पनों से उसकी कोई तुलना है। उसे समष्टि मस्तिष्क माना गया है। बल्ब में जलने वाली बिजली-अन्तरिक्ष में व्यापक विद्युत शक्ति की एक चिनगारी समझी जाती थी और दोनों का परस्पर सघन सम्बन्ध स्वीकार किया जाता था। अब व्यष्टि मस्तिष्क की एक चिनगारी और समष्टि मस्तिष्क की व्यापक अग्नि के समकक्ष माना गया है। व्यक्तिगत मस्तिष्क की अपनी सत्ता और क्षमता है किन्तु वह सर्वथा स्वतन्त्र नहीं है वरन् वह समष्टि मस्तिष्क का एक अंग है जिसे इन दिनों वैज्ञानिक क्षेत्र में ‘ब्रह्माण्डीय चेतन’ नाम दिया गया है। व्यक्ति समाज का एक अविच्छिन्न अंग है। एकाकी रहने लगे तो भी वह समष्टि से पृथक होने का दावा नहीं कर सकता। उसे अब तक जो ज्ञान, अनुभव, संस्कार, कौशल आदि मिला है-शरीर पोषण हुआ है।-वह सब समाज का ही अनुदान है। एकाकी निर्वाह में भी आखिर कुछ उपकरण तो साथ रखे ही गये हैं। माला, कमण्डल, कोपीन, कुल्हाड़ी, जैसे साधनों के बिना तो गुफा में रहने वाले भी काम नहीं चला पाते। अग्नि का आविष्कार उस एकाकी व्यक्ति ने स्वयं नहीं किया है। इस प्रकार एकान्तवासी कहलाने वाले का भूतकालीन और वर्तमान क्रिया-कलाप समाज सम्बद्ध रहा। आगे भी अन्तरिक्ष में चलने वाली असंख्य व्यक्तियों की असंख्य विचार तरंगें अप्रत्यक्ष रूप से उसे प्रभावित करेंगी और वह स्वयं दूसरों को अपनी मनःतरंगों से प्रभावित करेगा, यह भी सामाजिक आदान-प्रदान हुआ।
व्यक्ति का शरीर निर्वाह एवं विकास समाज पर आश्रित है और अविच्छित रूप से सम्बद्ध है। ठीक इसी प्रकार व्यष्टि मस्तिष्क स्वतन्त्र दिखने पर भी वह समष्टि मस्तिष्क का एक अंग है। युद्ध और शान्ति के दिनों वातावरण में कितना अन्तर होता है और लोकमानस की चिन्तन प्रक्रिया में कितना उतार-चढ़ाव रहता है- यह सर्वविदित है। एक समय की लोक रुचि-मान्यता दूसरे समय से भिन्न होती है लोगों का चिन्तन प्रवाह अपने समय में प्रायः एक ही दिशा में होता है। मनस्वी और स्वतन्त्र चिन्तकों के कुछ अपवाद तो सर्वथा पाये जाते रहते हैं पर सामान्यतः चिन्तन प्रवाह की धारा एक ही दिशा में बहती है। अपने समय में पूर्वजों के कथन को प्रमाणित मान लेने की श्रद्धा उखड़ रही है और तर्क तथा प्रमाणों पर आधारित बुद्धिवाद को मान्यता मिली है। किसी जमाने में त्याग, बलिदान और आदर्श-वाद अपनाने में एक, दूसरे से प्रतिस्पर्धा लगाता था और इस क्षेत्र में जो जितना सफल होता था उतना ही गौरव अनुभव करता था। आज स्थिति उससे सर्वथा भिन्न है। अपने समय में विलासिता की धूम है। संग्रह, उपभोग, पद प्रदर्शन के प्रलोभन का भूत हर मस्तिष्क पर छाया हुआ है। इसे लोकमानस कहा जा सकता है। समय-समय पर कई तरह के फैशन-कई तरह के व्यसन- कई तरह के क्रिया-कलाप अनायास ही पनपते और देखते-देखते एक प्रथा प्रचलन बन जाते हैं। सामान्य लोग उस प्रवाह में अनजाने ही बहने लगते हैं। इसे लोक प्रवाह कहा जा सकता है।
‘समूह मस्तिष्क’ के अस्तित्व और उसके ‘व्यक्ति मस्तिष्क’ के साथ आदान-प्रदान की बात अब दिन-दिन अधिक स्पष्ट होती और अधिक प्रामाणिक बनती चली जा रही है। मनुष्य का अचेतन मन अत्यधिक अद्भुत और रहस्यमय होने की बात तथ्य रूप में स्वीकार कर ली गई है। चेतन मन की बुद्धि क्षमता उसकी तुलना में अति तुच्छ है। इसी प्रकार अन्तरिक्ष में मनुष्यों के छोड़े हुए विचार और उनके आदान-प्रदान की जानकारी भी ऐसी ही उथली और कम महत्व की समझी जाने लगी है और रहस्यमय उस प्रवाह को माना जाने लगा है जो समष्टि की अचेतन-चेतना से सम्बद्ध है।
मानवी चेतना मोटे तौर से शरीर निर्वाह एवं अहंता की तुष्टि तथा विस्तृति में संलग्न हलचल मात्र दृष्टिगोचर होती है। उसका प्रयोजन शरीर को सुखी तथा सक्रिय बनाये रहना भर प्रतीत होता है। लगता है शरीर मुख्य है और उसकी तृप्ति, पुष्टि, सुरक्षा एवं प्रगति के लिए सरंजाम जुटाने भर के लिए उसका सृजन एवं उदय हुआ है। आमतौर से ऐसा ही समझा जाता है। उपयोग भी इसी स्तर पर होता है। मस्तिष्क का शरीर सुख के लिए जितना अधिक उपयोग हो सके उतनी ही उसकी सफलता एवं सार्थकता मानी जाती है।
गहराई में उतरने पर बात कुछ दूसरी ही दृष्टिगोचर होती है। मस्तिष्क - चेतना के निवास का केन्द्रीय शक्ति संस्थान है। यहाँ ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ जीव चेतना का मिलन संगम होता है और उस आदान-प्रदान के आधार पर प्राणि जगत को अनेकानेक सुविधाएं एवं सम्वेदनाएं उपलब्ध होती हैं। यह मस्तिष्कीय केन्द्र इतना अधिक ब्रह्माण्ड की एकता का अनुभव एवं लाभ आश्चर्यजनक मात्रा में उपलब्ध किया जा सकता है।
पृथ्वी यों मोटे तौर से एकाकी लगती है। उसकी सम्पदा एवं हलचल अपनी ही परिधि में-अपने ही लिए-काम करती दिखाई पड़ती है, पर वस्तुतः वह अन्तर्ग्रही आदान-प्रदान पर जीवित है। सूर्य की ऊर्जा का शोषण पृथ्वी का वातावरण करता है और उस ईंधन से जड़ परमाणुओं और चेतन जीवाणुओं की विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ चल सकने की सामर्थ्य मिलती है। पृथ्वी अपनी विशिष्टताओं को बनाये रहने में बहुत कुछ सूर्य पर निर्भर है। दूर रहते हुए भी वह पृथ्वी को इतना उदार दुलार देता है कि उसे देखते हुए पति-पत्नी अथवा प्रेमी-प्रेमिका जैसा रिश्ता मानने को जी करता है। पृथ्वी भी तो उसी का मुँह निहारते और परिक्रमा करते रहने में अपने जीवन की सार्थकता मानती है।
चन्द्रमा का पृथ्वी पर कितना प्रभाव पड़ता है यह समुद्र तट पर जाकर प्रतिदिन के सामान्य और पूर्णिमा अमावस्या के ज्वार-भाटे देख कर सहज ही जाना जा सकता है। चन्द्रमा को रसराज कहा गया है। कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष में वनस्पतियों तथा प्राणियों में सरसता की जो घट-बढ़ होती रहती है उससे पता चलता है कि न केवल समुद्र को वरन् पृथ्वी की समग्र सरसता की वह व्यापक रूप से प्रभावित करता है।
यही बात अन्य ग्रहों की है। सौरमण्डल के ग्रह उपग्रह अपने-अपने स्तर के रंग-बिरंगे-छोटे-बड़े उपहार पृथ्वी को अनवरत रूप से भेजते हैं। पृथ्वी भी चुप नहीं बैठी रहती वह भी आदान-प्रदान को शिष्टाचार और समूह कर्तव्य समझती है तदनुसार अपने अनुदान अन्य ग्रहों को भेजती है। इन प्रेषणों का लाभ वे ग्रह भी उसी प्रकार उठाते है जिस प्रकार कि पृथ्वी उनसे। इस आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण केन्द्र ध्रुवीय क्षेत्र है।अन्तर्ग्रही आदान-प्रदान इन्हीं छिद्रों से आते जाते हैं। उत्तरी ध्रुव से ग्रहण की और दक्षिणी ध्रुव से विसर्जन की प्रक्रिया सम्पन्न होती रहती है। उत्तर में आदान का और दक्षिण में प्रदान का संयंत्र नियति ने फिट करके रखा है। उत्तर को मुख और दक्षिण को मल द्वार कह सकते हैं। जितना उपयोगी है उतना पचा कर पृथ्वी का शरीर अपने में धारण कर लेता है और जो अनावश्यक है उसे मल रूप में विसर्जित कर देता है। प्राणि शरीर की तरह धरती भी एक शरीर है जिसे अपनी जीवन चर्या की सामग्री अन्तर्ग्रही शक्ति भण्डार से उपलब्ध करनी पड़ती है। शरीर को हवा, पानी और अन्न भी तो बाहर से ही उपलब्ध करना पड़ता है। अन्तर्ग्रही हाट से आवश्यक वस्तुएं खरीदे बिना धरती की गुजर नहीं हो सकती। ठीक इसी प्रकार प्राणी को भी अपनी सूक्ष्म चेतनात्मक उपलब्धियों के लिए अन्तर्ग्रही-ब्रह्माण्डीय चेतना पर निर्भर रहना पड़ता है। मस्तिष्क मुख है। ग्रहण शक्ति उसी में है। जननेन्द्रिय विसर्जन संस्थान है। दोनों को प्राणि सत्ता के ध्रुव केन्द्र कहा जा सकता है। ऊर्ध्व केन्द्र को शिव और अधः संस्थान को शक्ति संस्थान माना गया है। इन्हें ब्रह्मवर्चस् और कुण्डलिनी केन्द्र भी कहते हैं। इनके बीच पारस्परिक संबंध संतुलन ठीक बना रहे तो सब कुछ ठीक बना रहेगा और अभीष्ट प्रगति का लक्ष्य पूरा होता रहेगा। इनके बीच असन्तुलन या अवरोध उत्पन्न होने से अपच और तज्जनित अनेकों रोग-विकार उत्पन्न होने लगते हैं।
इन पंक्तियों में चर्चा दक्षिण ध्रुव की नहीं, उत्तर ध्रुव की मस्तिष्क की, की जा रही है। सामान्य मस्तिष्क शरीर और उससे सम्बन्धित अनेकों प्रयोजनों पर सोचता-निर्णय करता एवं व्यवस्था बनाता है। असामान्य की स्थिति उच्चस्तरीय होती है वह ब्रह्माण्ड चेतना के आदान-प्रदान की गति को तीव्र करता है और ऐसी उपलब्धियाँ उपार्जित कर लेता है जिन्हें आश्चर्यजनक सिद्धियों के नाम से पुकारा जा सके।
हमें सामान्य जानकारियाँ इन्द्रिय शक्ति के आधार पर मिलती हैं। पर यदि प्रसुप्त अतीन्द्रिय शक्ति को जागृत किया जा सके तो व्यापक ब्रह्माण्ड सत्ता के साथ अपना सम्पर्क जुड़ सकता है और ससीम से असीम स्थिति में पहुँचा जा सकता है।
इस विश्व में जड़ और चेतना की द्विधा अपने-अपने नियत प्रयोजनों में संलग्न है। उनका वैभव भी महासमुद्र की तरह है जिसके किनारे पर बैठ कर मनुष्य ने सीप और घोंघे ही ढूँढ़े हैं। प्रकृत परमाणुओं में और जीवाणु घटकों में जो सामर्थ्य तथा चेतना विद्यमान है उसका बहुत छोटा अंश ही जानना, हथियाना, सम्भव हो सका है। सब कुछ पाना खींच तान से-छीना झपटी से नहीं उसमें घुल जाने से ही सम्भव हो सकता है। समुद्र के पानी की कोई घड़ा कितनी मात्रा में अपने में भर सकेगा? सम्पूर्ण समुद्र के साथ एकता स्थापित करनी हो तो घड़े को अपना जल समुद्र में मिला देना पड़ेगा तभी तुच्छता को सुविस्तृत स्थिति में अनुभव कर सकना सम्भव होगा।
योग साधना अपनी असीमता को असमता के साथ जोड़ देना है। इस प्रयोजन में जितनी ही सफलता मिलती जाती है उतनी ही आधिपत्य जमाता जाता है जिस प्रभाव को हम जड़-चेतना जगत में अपने चारों ओर फैला हुआ देखते हैं, सीमाबद्ध स्थिति में हम तुच्छ और दरिद्र होते हैं, पर असीम के साथ जुड़ जाने पर महानता प्राप्त करने में कोई कमी नहीं रह जाती। संपन्नता से - भरे पूरे भण्डार से हमारी भागीदारी जितनी अधिक होती है उतनी ही अपनी स्थिति भी विभूतिमयी बनती चली जाती है। सिद्ध पुरुषों में देखी गई विशिष्ट क्षमताएं और कुछ नहीं विराट के साथ उन की घनिष्ठता का आरम्भिक उपहार भर है। बढ़ी-चढ़ी स्थिति तो ऐसी बन जाती है जिसमें आत्मा और परमात्मा के बीच कोई बहुत बड़ा अन्तर नहीं रह जाता, दोनों से सम तुल्य ही दिखते हैं।
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आज के नागरिक की दिनचर्या, रहन-सहन और आदतें देखकर उसकी जो तस्वीर बनती है वह यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि मनुष्य का जीवन भी एक यन्त्र की तरह हो गया है। पाषाण, लौह और ताम्रयुगीन विभाजनों के साथ वर्तमान सन्दर्भों को देखा जाय तो इसे निश्चित ही यन्त्र युग कहना पड़ेगा। क्योंकि मनुष्य का जीवन और यान्त्रिक उपकरण परस्पर इतने घनिष्ठ हो गये हैं कि उन दोनों को एक दूसरे से विलग कर पाना ही असम्भव है। उस क्षण की स्थिति को कल्पनाँकित ही नहीं किया जा सकता, जबकि मनुष्य का जीवन यन्त्रों की सुविधा से एकदम रहित हो जाय। मिल कपड़े बनाते हैं, कारखानों में खाद्य तैयार होते हैं, साबुन, तेल, ईंधन आदि सब किसी न किसी रूप में मशीनों से सम्बद्ध मिलेंगे। यहाँ तक कि जिस रोशनी का हम रात-दिन उपयोग करते हैं वह भी रात-दिन मशीनों द्वारा ही पैदा होती है और हम तक पहुँचाई जाती है।
हम जिन परिस्थितियों, वातावरणों तथा वस्तुओं के संसर्ग में रहते हैं, उनका हम पर प्रभाव पड़ता है और हमारा उन पर। मनुष्य से समाज बनता है और समाज मनुष्य को बनाता है। मनुष्य अपने आस-पास के वातावरण से प्रभावित होता है और वातावरण मनुष्य को प्रभावित करता है। प्रभाव पड़ने या पैदा होने की यह प्रक्रिया दोनों ओर से होती है एकाँगी कभी नहीं। लेकिन यन्त्रों के सम्बन्ध में कुछ और ही सचाई है। सिलाई की मशीन पाँव चलाने से चलती है और रोक देने पर बन्द हो जाती है। बाद में वह कोई गति नहीं करती, परन्तु दिन-रात सिलाई मशीन पर बैठने वालों के पाँव कभी-कभी अपने आप भी चलने लगते हैं। यह आदतन प्रभाव है।
आदतन प्रभाव की तरह ही मनुष्य भावनाओं से भी प्रभावित होता है और आजकल ‘यान्त्रिक-सभ्यता’ की समीक्षा करते समय इसी भावनात्मक प्रभाव की चर्चा की जाती है। हाँलाकि संसर्ग के अतिरिक्त इसके और भी कई कारण हैं। इसी तथ्य की ओर इशारा करते हुए प्रसिद्ध विचारक नीत्शे ने कहा था-‘‘यन्त्र जितनी तीव्रता से प्रगति कर रहा है उसी अनुपात से मनुष्य की धर्म सम्वेदना का ह्रास हो रहा है। समस्त भौतिक सुविधाओं से सम्पन्न हो जाने पर भी मनुष्य इतना आत्म-विपन्न हो रहा है कि बीसवीं शती के अन्त तक वह एकदम खोखला हो जायेगा और भयंकर रूप से दुःखी रहने लगेगा।’’
इस बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए एक आधुनिक विचारक का कथन है कि- “आज के युग में जीने वाले व्यक्ति की स्थिति विचित्र कम और शोचनीय अधिक है। समस्त मानवीय सम्बन्ध अब केवल वित्तीय स्तर पर बनते हैं अन्य सभी माध्यमों को या तो नगण्य घोषित कर दिया गया है अथवा फिर यान्त्रिकता से जकड़े हुए नये समाज में वे किसी अज्ञात प्रक्रिया द्वारा स्वतः डूबते जाते हैं।” चूँकि मनुष्य समाज का एक अंग है और इस नाते उसे दूसरे अन्य अंगों के सम्पर्क में आना पड़ता है। मानवता का तकाजा तो यह है कि हम अपने पड़ौसियों के दुःख-सुख में काम आयें, उनकी खैर-खबर रखें और कुशल-क्षेम से अवगत रहने के साथ-साथ समय-समय पर काम भी आयें। परन्तु पड़ोसियों के प्रति यह आत्मीयता का भाव धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है। महानगरों की स्थिति तो यह है कि वहाँ रहने वाला एक व्यक्ति अपने पड़ोसी के दुःख-दर्द में साथ देने के स्थान पर उसे जानता तक भी नहीं। शहरों और कस्बों के नागरिकों को भी अपनी समस्याओं से कम ही फुरसत मिल पाती है और इस फुरसत को पड़ौसियों से मेल-जोल बनाने के स्थान पर सिनेमा देखने या सैर करने में गुजारना अधिक अच्छा समझते हैं।
पड़ौसियों से कटे रहने तक की ही बात सीमित रहती तो इतनी शोचनीय स्थिति नहीं आती। आश्चर्य तो तब होता है जब लोगों को अपने रिश्तेदारों और सम्बन्धियों से सम्पर्क रखने का भी समय नहीं मिलता। यही नहीं आदमी अपनी बीमार पत्नी के पास बैठने की अपेक्षा दिन भर की थकान उतारने के लिए रेडियो सुनना और घूमने निकल जान अधिक अच्छा समझता है। कोई अभिभावक ऐसे हैं जो अपने बच्चों की पढ़ाई में क्या स्थिति है- इससे अनभिज्ञ रहते हैं। कई लोग ऐसे हैं जिन्हें अपने शहर में रहने वाले मित्रों और सम्बन्धियों के घर न जाये ही महीनों बीत चुके हैं। अर्थात् मनुष्य समाज में रहता तो है अवश्य, पर समाज के प्रति उसके क्या उत्तरदायित्व हैं- या तो वह अनभिज्ञ है अथवा जान-बूझकर उनकी उपेक्षा करता है।
इतना एकाकीपन होने के बावजूद भी मनुष्य आर्थिक दृष्टि से किसी से सम्पर्क सूत्र कायम करने में चूकना नहीं चाहता। कई लोगों को अक्सर यह कहते सुना जाता है- फूफाजी के पास जाने से क्या फायदा अब तो वे चाय तक के लिए नहीं पूछते। जैसे चाय पीना ही मिलने का उद्देश्य हो और इन सबका कारण यंत्र युग को बताया जाता है। कारण है कि यंत्रों की बाढ़ ने मनुष्य का श्रम हल्का किया है और उसकी सुविधाएं बढ़ाई हैं। इसलिए उपभोग सामग्रियों से बाजार भरे पड़े हैं। जो समर्थ हैं, वे उन्हें खरीद सकते हैं तथा वे भी उनका वैसा ही उपयोग करने के लिए अतिरिक्त आर्थिक साधन चाहिए। इस समर्थता और असमर्थता ने सम्पन्नता को ही प्रतिष्ठा का बिन्दु बना दिया है। जिसे हर कोई बींधना चाहता है और उसे बींधने में इस कदर लवलीन है कि उसे अपने आस-पास की चीजें भी नहीं दिखाई दीं।
यान्त्रिक संसर्ग का जहां तक प्रश्न है मशीनी वातावरण में रहने का अपना एक अलग प्रभाव है। लेकिन उससे भी अधिक बुरी तरह प्रभावित और आत्म-विपन्न कर देने वाली स्थिति बदलते दृष्टिकोण से उत्पन्न हुई है। जिसने वित्तीय- दशा को ही सर्व प्रधान बना दिया और उसे पूरा करने के लिए मनुष्य इतना मदमत्त होकर दौड़ने लगा कि एकाकीपन, संत्रास, आत्म-विपन्नता, स्वकेन्द्रित मनोवृत्तियां, कुण्ठाएं और विक्षेप उसे चारों ओर से छेदने लगे हैं। मशीनों के संसर्ग का एक दिन व्यवस्थित कार्य-क्रम है, जो सुखी जीवन की एक निश्चित गारण्टी है। परन्तु उसके बावजूद और-और कारण जो यान्त्रिक सभ्यता के दोषों से विषाक्त करते हैं मनुष्य को तनावग्रस्त तथा असुरक्षित बनाते हैं।
अब से 25-50 साल पहले युवकों के सामने जीवन में प्रवेश करने का यह एक रेडीमेड तरीका था कि पढ़ना-लिखना और डिग्री प्राप्त करना तथा उसके बाद नौकरी से लग जाना या शिक्षा प्राप्त करना। नौकरी धन्धे से लगने और परिवार बस जाने के बाद भी युवक को परिवार का आर्थिक संरक्षण मिलता रहता था। इसका एक कारण तो यह था कि उस समय संयुक्त परिवार प्रथा थी। जिसके सभी सदस्यों के हित परस्पर जुड़े हुए थे तथा प्रत्येक एक दूसरे के प्रति अपने दायित्वों का अनुभव करते थे। लेकिन आज संयुक्त परिवार टूटते जा रहे हैं और एकाकी परिवार अधूरी-अधकचरी स्थिति में जीते हुए अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की आशा बांधे रहते थे। अपने माता-पिता और सहोदर भाई-बहनों से सिकुड़ कर मानवी गतिविधियों का केन्द्र पत्नी, बच्चे और स्वयं तक ही सीमित हो गया है। जो संयुक्त परिवार किसी प्रकार टूटने से बचे हुए हैं, जिनके सदस्य एक दूसरे के प्रति अपने कुछ दायित्व अनुभव करते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए सजग रहते हैं, वे भी नौकरी और रोजगार करने के लिए बिखरे पड़े हैं। कहने का अर्थ यह है कि आर्थिक स्थिति मजबूत करने और सुदृढ़ बनाने के चक्कर में हम और अधिक दीन-हीन व एकाकी बनते जा रहे हैं। यह भी कहा जा सकता है कि जो लोग अपने माता-पिता और सहोदर भाई-बहिनों के लिए ही कुछ करना व्यर्थ समझते हों वे पड़ौसियों और मित्रों के लिए कुछ करने की क्या सोचेंगे?
अकेलेपन का यह मानसिक प्रभाव नगरीय लोगों में अधिकांशतः है। इसकी तुलना सौ वर्ष पुराने समाज से करते हुए लिखा गया है- ‘‘उन्नीसवीं शती का मनुष्य अपनी आत्म-सम्पन्नता के बल पर ही अनेक दुःख झेलकर भी मानवीयता से भ्रष्ट नहीं हो पाता था और उसकी इस आत्म-सम्पन्नता के पीछे संयुक्त परिवार प्रथा, धर्म और संस्कारों का बहुत बड़ा हाथ था। जब कि बीसवीं शती का मनुष्य इतना बहिप्रविष्ट हो गया है कि सामान्यतया स्वयं को नगण्य व एकाकी मानता हुआ किसी भी क्षण अपने आपको दूसरों के हाथों में छोड़ देने के लिए विवश हो जाता है या मजबूरन अपने को तैयार करता है।’’
यान्त्रिक सभ्यता में मनुष्य की दृष्टि का केन्द्र बिन्दु बदला है और उसने मानवीयता के स्थान पर आर्थिकता को व्यक्ति की प्रत्यभिज्ञा माना है। वही उसका अपना जीवन भी एकरस और उनके कारण विद्रोही बना है। हाल ही में पिछले वर्षों ब्राक्स में एक अद्भुत घटना घटी। एक बस ड्राइवर अपनी बस समेत अनायास लापता हो गया। तीन-चार दिन बाद वह बस समेत फ्लोरिडा में पकड़ा गया। इस बीच अखबारों में वह बड़ी चर्चा का विषय बन गया। बस कम्पनी के मालिकों ने जब उससे भागने का कारण पूछा तो उसने बताया कि पिछले सात वर्षों से वह एक ही रूट पर बस चलाते-चलाते और उन्हीं स्थानों पर बार-बार बस रोकते-रोकते बुरी तरह बोर हो गया है। परिवर्तन के लिए ही उसे फ्लोरिडा आने का निर्णय लेना पड़ा।
जैसा कि कहा जा चुका है कि मनुष्य के पास पहले की अपेक्षा आज अधिक सुनिश्चित और व्यवस्थित कार्य-क्रम है। परंतु उसकी उबाऊ एकरसता ने मनुष्य की चेतना को एकरस बना दिया है और वह इस स्थिति को स्वीकार करने के लिए एकदम से तैयार नहीं है। इस उबाऊ एकरसता के कारण वह बोरियत अनुभव करता है और उसे तोड़ देने के लिए स्वच्छंदता, उन्मुक्तता और हिप्पीवाद की अनेकानेक भ्रान्त धाराओं में वह निकलना चाहता है। यंत्र जिस प्रकार एक ही गति और लय में चलता है उसी प्रकार मनुष्य भी एक ही स्थिति को बार-बार भोगने के लिए अपने आपको विवश अनुभव करता है। कहने का अर्थ यह है कि वह अपने आपको कोल्हू के बैल वाली स्थिति में पाता है, जिसे उसकी प्रवाहमान गतिशील चेतना किसी भी दशा में भोगने को तैयार नहीं है। एक अर्थ शास्त्री के शब्दों में मनुष्य की चेतना ह्रासमान उपयोगिता की भांति सम्वेदना शून्य बनती जा रही है। वह व्यक्ति को इस सीमा तक जड़ी भूत किये दे रही है कि वह उकता कर अपने आपको ऐश्वर्य से बचाने के लिए छटपटा रही है।
यह स्थिति ऐश्वर्य सम्पन्न लोगों के लिए ही नहीं है। उन लोगों के लिए भी उसी प्रकार विकराल है जिनकी दौड़ ऐश्वर्य का लक्ष्य सामने रखकर चल रही है। ऐश्वर्यशाली अपने ऐश्वर्य में आत्मा को खोया अनुभव करते हैं तो ऐश्वर्य-अभिलाषी अपनी आकांक्षा के दहर में आत्मा को दग्ध पा रहे हैं।
इन सब बातों का यह अर्थ नहीं है कि यन्त्र सभ्यता को छोड़कर समाज पीछे चला जाये। यह एक और बड़ी गल्ती होगी। हमें यह सोचना चाहिए कि हम अपने मूल्यों को सुरक्षित रखते हैं यन्त्रों द्वारा श्रम की थकान को कम करें, न कि नष्ट। इसके लिए बदलती आय की मान्यताओं पर तीक्ष्ण दृष्टि रखने की आवश्यकता है।
ईसा मसीह एक बार केपर नगर के बदनाम मुहल्ले में जाकर ठहरे। वहां शराब पीने वालों, चोर तथा ठगों की भरमार थी।
नगर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने इस समाचार को बड़े आश्चर्य से सुना। कितने ही अनुयायी उनके पास दौड़े हुए आये और निवेदन करने लगे- ‘‘आपके लिए इस नगर में ठहरने के स्थानों की क्या कमी है? अच्छी से अच्छी व्यवस्था की जा सकती है- आप चलिये। यहां तो आपको रात काटना भी मुश्किल पड़ जायगा।’’
महाप्रभु ने हँसकर उत्तर दिया- ‘‘बात तो तुम लोगों की ठीक है। पर यह क्यों भूल जाते हो कि चिकित्सक बीमारों को देखने घर-घर जाता है, स्वस्थ लोगों को नहीं। इस दृष्टि से यह स्थान मेरे लिए उपयुक्त ही है।’’
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विज्ञान की आकाश में गहरी रुचि और अध्ययन-अनुसंधान जिन रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन कर रहे हैं, वे भारतीय तत्वदर्शन के निष्कर्षों को ही पुष्ट कर रहे हैं। बीसवीं शताब्दी के पहले तक भौतिक विज्ञान भारतीय तत्वदर्शन की वैदिक काल से चली आ रही इस मान्यता का उपहास उड़ाता था कि आकाश पोला नहीं है, बल्कि हमारे शरीर की और पृथ्वी की संरचना में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है तथा वह ईश्वरीय चेतना के सर्वाधिक निकट है।
इधर वैज्ञानिकों का ध्यान तेजी से आकाश की गहराइयों की ओर गया है। ब्रह्माण्डीय किरणों तथा आकाश के उच्च ऊर्जा सम्पन्न व अदृश्य गुणों वाले सूक्ष्म कणों के अध्ययन से प्रकृति के गूढ़तम रहस्यों के उद्घाटन की सम्भावना है। इससे माइक्रोकोस्म के गुणों की जानकारियाँ मिल सकेंगी तथा गैलेक्सी में एवं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में चल रही कई रहस्यमय गतिविधियों की समझा जा सकेगा।
भौतिकीविद् प्राथमिक कणों की लगातार खोज कर रहे हैं। क्योंकि उनकी मान्यता है कि प्राथमिक कणों के गुण-धर्मों के बोध से ही विश्व की उत्पत्ति तथा विकास-क्रम को समझा जा सकेगा। प्राथमिक कण का अर्थ है द्रव्य की वह सबसे छोटी इकाई या वह मूल कण, जिससे सभी बड़ी इकाइयों का संयोजन हो सका है। स्पष्ट है कि प्राथमिक कण केवल कोई एक विशेष कण ही हो सकते हैं। पर इस अर्थ में अभी तक किसी प्राथमिक कण की खोज नहीं की जा सकी है। इसलिए अभी तो भौतिकवेत्ता प्रोटॉन, न्यूट्रॉन आदि सौ से भी अधिक कणों को प्राथमिक कण कहते हैं।
न्यूट्रॉन की खोज होने पर ही परमाणु-ऊर्जा का परमाणु-बम दोनों बने। ‘न्यूट्रॉन-भौतिकी’ नामक विज्ञान शाखा चल पड़ी।
इधर वैज्ञानिक अन्वेषणों से ज्ञात हुआ है कि परमाणु के सूक्ष्म विश्व में प्रत्येक कण का एक प्रतिकण विद्यमान है ऐसे ऋणावेशी कण इलेक्ट्रान है, तो उसका विरोधी, धनवेशी कण है-पोजिट्रान। उसी तरह प्रत्येक कण का प्रतिकण है।
कण और प्रतिकण सब परस्पर पास आते हैं विस्फोट होता है और ऊर्जा का उत्सर्जन होता है।
इस ऊर्जा की इकाई है-इलेक्ट्रान वोल्ट। किसी वस्तु को पेन्सिल की नोंक से हल्के से टक-टक करके उस वस्तु के परमाणु को एक इलेक्ट्रानिक वोल्ट ऊर्जा मिल जायगी। पर इस ऊर्जा से परमाणु में कोई गति या चंचलता नहीं आ सकेगी। 1 हजार से 10 हजार तक इलेक्ट्रान-वोल्ट ऊर्जा पाकर परमाणु के इलेक्ट्रान चंचल हो उठते हैं। इसी से रासायनिक द्रव्यों का संयोजन होता है। पर परमाणु का नाभिक अभी भी गतिशील नहीं होता। वह 1 लाख से 100 लाख इलेक्ट्रान-वोल्ट ऊर्जा से ही गतिशील होता है।
लाखों रुपयों की लागत से साइक्लोट्रोन, सिंकोट्रोन आदि विशेष प्रकार के त्वरण यन्त्र बनाये जाते हैं जो प्रोटान आदि कणों को करोड़ों, अरबों इलेक्ट्रान वोल्ट ऊर्जा प्रदान करते हैं। प्रोटान धनावेशी कण है, ऋणावेशी इलेक्ट्रान इनका चक्कर काटते हैं।
जब न्यूट्रॉन का वीटा-विखंडन होता है, तब प्रोटान, इलेक्ट्रान तथा न्यूट्रिनों ये तीन कण उत्सर्जित होते हैं। वैज्ञानिक इस दिशा में तेजी से काफी काम कर रहे हैं। किन्तु प्राथमिक कणों की खोज अभी भी जारी है। अभी तक ज्ञात प्राथमिक कणों की वैज्ञानिकों ने कुछ वर्गों में बाँट दिया है- जैसे लेप्ट्रोन, मेसोन, बोरिओन आदि। इनमें से प्रोटोन, न्यूट्रिनों, इलेक्ट्रान और पोजिट्रोन स्थायी कण हैं। शेष अस्थायी कण हैं। फोटोन तथा न्यूट्रिनों का स्थिर द्रव्यमान शून्य है। इलेक्ट्रान और पोजिट्रोन का 1 स्थिर द्रव्यमान है। प्रोटान का 1836 तथा न्यूट्रॉन का 1838 है।
न्यूट्रिनों का स्थिर द्रव्यमान शून्य है, इसका तात्पर्य यह है कि स्थिर न्यूट्रिनों नाम की कोई वस्तु नहीं। न्यूट्रनो कण जन्म के साथ ही प्रकाश की गति से यानी 3 लाख किलोमीटर प्रति सैकिण्ड के वेग से दौड़ने लगते हैं। ये न्यूट्रिनो अन्य द्रव्य कणों के साथ बहुत मन्द परस्पर क्रिया दर्शाते हैं। इसीलिए ये अन्य द्रव्य कणों से सामान्यतः कराते नहीं। अतः न्यूट्रिनो, पृथ्वी पिण्ड से आर-पार हो सकते हैं। यहाँ तक कि सूर्य में से भी आर-पार हो सकते हैं। इन न्यूट्रिनो के भी प्रतिकण विद्यमान हैं-जिन्हें प्रतिट्रिनो कहते हैं।
खोजों से यह भी पता चला है कि आकाश में विद्युत कणों की अनेक परतें हैं। इन अनेक परतों को अयनमंडल (आइनोस्फियर) कहते हैं। हमारी पृथ्वी आकाश में स्थित है। अयनमंडल पृथ्वी को सभी ओर से घेरे हुए है। विद्युत कणों की इन अनेक परतों में तीन मुख्य हैं। एयल्टन ने इन्हें “ई”, “एफ” और “डी” परतें कहा है।
धरती की ऊंचाई पर कब वायुमंडलीय दबाव वाले क्षेत्र में अणु-परमाणु अपना ऋणाणु (इलेक्ट्रान) खो देते हैं। सूर्य इलेक्ट्रानों को तोड़ता है। यह क्रिया जितनी तीव्र होती है, अयनमंडल उतनी ही तीव्रता से पृथ्वी में मौसम आदि का नियन्त्रण करता है। साथ ही अयनमंडल लोगों के मन, हृदय और गुणों को भी प्रभावित करता है। इलेक्ट्रान के तोड़ लिए जाने के बाद अणु परमाणुओं में केन्द्रक शक्ति शेष रहती है। अयनमंडल में विद्यमान यह केन्द्रक शक्ति ही लोगों के गुणों को, मन और हृदय को प्रभावित करती है। इससे पता चलता है कि केन्द्रक कोई मनोमय शक्ति है, मात्र भौतिक शक्ति नहीं।
पृथ्वी की ओर नीचे आने पर इन कणों की शक्ति घट जाती है। जैसे-जैसे वायुमंडलीय दबाव बढ़ता है, अयन-मंडलीय दबाव घटता है। क्योंकि पृथ्वी तक आते-आते उन कणों में धूलि कण व गैसों के कण मिल पाते हैं। अधिक ऊंचाई पर अधिक स्वच्छ वायु ही स्वास्थ्य को पुष्ट नहीं करती। प्रत्युत, मनोमय शक्ति वाले तथा अत्युच्च ऊर्जा वाले ये प्रकाश कण चित को प्रसन्नता, स्फूर्ति व शक्ति देते हैं। इस प्रकार ऊंचे स्थानों पर उत्तम स्वास्थ्य का शुद्ध वायु से भी बड़ा कारण ये सूक्ष्म कण होते हैं। ‘फोटोन’ की विलक्षण कर्तृत्व शक्ति ज्ञात हो चुकी है। फोटोन तथा न्यूट्रिनो दोनों निरन्तर गतिशील रहते हैं। इनके प्रतिकणों के भी गुण, धर्म जाने जा सके तो कई नये रहस्य सामने आयेंगे। इसीलिए इसी दिशा में तेजी से वैज्ञानिक कण अन्वेषण कर रहे हैं। क्योंकि अनुमान है कि विश्व की उत्पत्ति व विकास विस्तार में न्यूट्रिनों एवं प्रतिन्यूट्रिनों कणों का महत्वपूर्ण योगदान है। स्मरणीय है कि कुछ ही वर्षों पूर्व रूसी और अमरीकी वैज्ञानिकों की खोजों से पता चला कि प्रकृति में अत्युच्च ऊर्जा वाले कण विद्यमान हैं।
एक एक्सीलरेटर से दस लाख इलेक्ट्रान वोल्ट तक की ऊर्जा के कण उत्पन्न किये जा सकते हैं। इसी क्रम में सायक्लोट्रान और वीटाट्रान का निर्माण हुआ है, जिनसे डेढ़ करोड़ इलेक्ट्रान वोल्ट की ऊर्जा वाले कण उत्पन्न किये जा सकते हैं। इतनी शक्ति से विशाल अन्तरिक्षयानों को ढोया और सुदूर नक्षत्रों तक पहुंचाया जा सकता है।
पर प्रकृति के ऊर्जा कणों की शक्ति तो इससे बहुत अधिक है। आकाश की ‘कॉस्मिक’ किरणों में मेसान, हायपरान आदि अस्थित कण है, जिनमें प्रचण्ड प्रचण्ड ऊर्जा है।
‘गैलेक्सी’ के केन्द्रीय क्षेत्र में सूर्य जैसे प्रायः 10 खरब नक्षत्र पुंज हैं। अब तक इस क्षेत्र में ज्ञात कुल तारों की संख्या दस घात चौबीस है। यह सम्पूर्ण विस्तार ही गैलेक्सी कहलाता है।
ज्योतिषी भौतिकी विदों (एस्ट्रा फिजिसिस्ट्स) के अनुसार इस केन्द्रीय क्षेत्र में कणों का विघटन तेजी से होता है। तारों के अदृश्य कण निकलकर प्लाज्मा के रूप में पोले दीखने वाले आकाशीय क्षेत्र में फैल जाते हैं। इनके इस फैलाव से ही विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र तथा गुरुत्वाकर्षण आदि की क्रियाएं सम्पन्न होती है। ऐसे फैले हुए प्लाज्मा को आयनीकृत प्लाज्मा (आइनोस्फेरिक प्लाज्मा) कहते हैं। आइनोस्फेरिक प्लाज्मा द्वारा कई तरह के क्षेत्र बनते हैं। आइनोस्फेरिक प्लाज्मा के रूप में फैले ये कण ही विभिन्न विचारों, प्रक्रियाओं, घटनाओं, दृश्यों वाले हलचल पूर्ण जगत का कारण है तथा उसे प्रभावित नियन्त्रित करते हैं। लाखों वर्षों से आवारागर्दी करते-करते ये कण भूल ही गये हैं कि वे कहां से आये हैं।
ये भूले हुए कण ही कॉस्मिक कणों के रूप में पृथ्वी की ओर भी आते रहते हैं। इन कणों में उच्च गति वाले प्रोटान तथा कई तत्वों के परमाणु होते हैं, इनमें अत्यधिक ऊर्जा होती है। वायुमंडल में इनके प्रवेश करते ही हलचल मच जाती है। इसी हलचल से एक्सटेन्डेड एयर शावर्स (फैले हुए वायु-शावरों) का निर्माण होता है। पृथ्वी की स्थूल हलचल इस प्रकार इन अनेक स्वभाव तथा गुणों वाले कणों के कारण ही होती है।
विचार तरंगें पैदा करने वाले आकाशस्थ कण अति सूक्ष्म होते हैं। इनका जीवन काल सैकिण्ड का भी अत्यल्प अंश ही होता है। उनका उद्भव और विनाश अनुमान में भी नहीं आ पाता। ये कण धन तथा ऋण दोनों आवेशों वाले होते हैं।
विचार तरंगें पैदा करने वाले अत्युच्च ऊर्जा सम्पन्न कणों का संचय ध्यान-धारणा द्वारा सम्भव है। जिस देव-शक्ति (चेतन-शक्ति) की ध्यान-धारणा करेंगे, उसी प्रकार की क्षमताओं वाले सूक्ष्म ऊर्जास्वी कण व्यक्तित्व में संचित हो जायेंगे। इस तरह जो शक्तियां जितनी बलवान होती हैं, वे अपने उपासक को उतनी ही अधिक सिद्धि व सामर्थ्य दे पाती हैं। ये चित्-शक्तियां वस्तुतः नाभिकीय चेतनाएं (न्यूक्लियर एक्टिविटीज) हैं। इनका कारण क्यू-मेसान, न्यूट्रिनो और पाई-मेसान जैसे अत्यन्त सूक्ष्म कणों में से कोई भी हो सकते हैं। इन कणों तथा नाभिकीय-चेतनाओं पर गैलेक्सी के चुम्बकीय क्षेत्र भी प्रभाव नहीं डाल सकते हैं।
बम्बई के टाटा इन्स्टीट्यूट के प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ0 प्राइस की खोजों से प्राप्त निष्कर्षों के अनुसार ये ऊर्जस्वित कण तथा ब्रह्माण्डीय किरणें जब ठोस पदार्थों से गुजरती हैं तो उन पर अपना प्रभाव छोड़ जाती हैं। इस प्रभाव को सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से देखा, परखा जा सकता है। जड़ पदार्थों में करोड़ों वर्ष पूर्व का इन चेतन किरणों का प्रभाव भी अभी भी विद्यमान है। इसका अर्थ है कि इन चेतन किरणों के अध्ययन, विश्लेषण तथा उनके सम्पर्क की विधि ज्ञात हो गई तो ब्रह्माण्ड में अतीत में घटित, वर्तमान में घट रही या कि भविष्य में करोड़ों वर्षों तक घटित होने वाली घटनाओं का दृश्य देखा जाना जा सकता है। इन ब्रह्माण्डीय किरणों के वर्ग भी अधिक नहीं हैं।
‘काल’ तत्व की गम्भीर विवेचना डबल्यू0 एच0 डन ने अपने ग्रन्थ ‘एक्सपेरीमेंट विथ टाइम’ में बताया है कि आमतौर से मनुष्य की चेतना समय के उस छोटे से केन्द्र पर जुड़ी रहती है जिसे वर्तमान कहते हैं। बन्धन की इसी जकड़न के कारण मन से इतना ही बन पड़ता है कि वह वर्तमान की समस्याओं और अनुभूतियों के क्षेत्र में अपनी हलचलें केन्द्रित रखे। किन्तु ऐसी भी स्थिति प्राप्त की जा सकती है जब चेतना को वर्तमान के बन्धन शिथिल करने का अवसर मिल जाय। गहरी सुषुप्ति भी ऐसी स्थिति हो सकती है। उस स्थिति में समय के अन्य दो आयाम भूत और भविष्य भी उसी तरह अनुभव की परिधि में आ सकते हैं जिस तरह कि आमतौर से वर्तमान अनुभव में आता है।
इसी प्रकार एअर शावर्स (वायु शावरों) में लाखों करोड़ों अत्युच्च ऊर्जा सम्पन्न कण हैं, जिनके हजारवें हिस्से की शक्ति ही विशाल अन्तरिक्षयानों को किसी भी ग्रह-नक्षत्र तक पहुंचाने में समर्थ है।
वायु शावरों के अध्ययन से पता चला कि उनमें इलेक्ट्रान और पाजिट्रान कण भी सम्मिलित हैं। कॉस्मिक किरणों के वायुमण्डल में पहुंचने से विभिन्न भौतिक पदार्थों की रचना होती है। इन भौतिक पदार्थों की मानसिक क्रियाएं भी अब अध्ययन का विषय है। वैज्ञानिकों को विश्वास है कि सृष्टि के आविर्भाव काल से अब तक ब्रह्माण्ड के विस्तार के मूल तत्व इन स्थूल भौतिक पदार्थों में बीज रूप में विद्यमान है। उनका अध्ययन अनेक क्रियाएं उद्घटित करेगा तथा असंख्य रहस्यों का भेदन करेगा।
विचारों की तरंगें वही तत्व पैदा करते हैं जिस दिन इस तथ्य का उद्घाटन होगा कि विचार तरंगें आकस्मिक नहीं पैदा हो जातीं, बल्कि वे अगणितीय नियमों के अनुसार तथा संकल्प के कारण निःसृत तथा विस्तृत होती हैं, उस दिन ब्रह्माण्ड-व्यापी चेतन-शक्तियों की भी जानकारी हो जायेगी तथा उन चेतन-शक्तियों से मानसिक सम्पर्क की जरूरत महसूस होगी। क्योंकि इस मानसिक सम्पर्क से अनेक प्रकार की उपलब्धियां सम्भव हैं। इन चेतन-शक्तियों को ही देव-गण तथा उनके समन्वय को ईश्वर कहा जाता है।
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पूर्वी बंगाल में उन दिनों भयंकर अकाल पड़ रहा था। दैन्य, दारिद्रय और अभावग्रस्त लोग अनाज की उपज कम होने के कारण अपनी क्रय शक्ति खो बैठे थे। थोड़ा बहुत अनाज जो बाहर से आ रहा था वह धनाढ्य व्यक्ति महंगे दामों पर खरीद लेते थे। गरीबों के पल्ले विवशता ही रहती थी। कमजोर, भूखे और निराश लोगों में फिर महामारी फैली और लोग धड़ाधड़ कीड़े-मकोड़ों की तरह मरने लगे।
ऐसी स्थिति में स्वामी विवेकानन्द ने अपना सार प्रचार कार्य स्थगित कर दिया और अपने गुरु भाइयों के साथ पीड़ित मानवता की सेवा में जुट गये। सम्पन्न लोगों का हृदय परिवर्तन करने तथा पीड़ित लोगों के लिए अन्न, वस्तु जुटाने में उन्होंने न केवल रात-दिन एक कर दिये वरन् दूर-दूर नगर भी नाप डाले। उस समय स्वामी जी ढाका में थे।
वहां उन्हीं दिनों कुछ वेदान्ती पण्डित स्वामी जी के पास शास्त्रार्थ करने के लिए आये। पण्डितों की इच्छा थी कि विदेशों में भी भारतीय धर्म और वेदान्त की विचारधारा की दुन्दुभि बजाने वाले इस तेजस्वी स्वामी को हम शास्त्रार्थ में परास्त कर दें और इसी प्रकार विश्व ख्याति की लब्धि कर लें।
स्वामी जी पण्डितों के मनोभाव ताड़ गये थे और चाहते तो शास्त्रार्थ द्वारा उन्हें करारा उत्तर भी देते। पर उनके सामने तो पीड़ित मानवता की सेवा प्रमुख लक्ष्य था। अतः उन्होंने विषयान्तर करते हुए कहा- ‘‘जब में ‘अकाल’ से लोगों को मरते हुए देखता हूं तो मेरी आंखों में आंसू उमड़ आते हैं। भगवान की भी क्या लीला है और क्या इच्छा?’’
सुनकर आये सभी पण्डित एक दूसरे की ओर देखने लगे। स्वामी जी समझते थे कि इन अभिमानी पण्डितों पर इस सीधी-साधी बात की यही प्रतिक्रिया होगी। फिर भी उन्होंने पूछा- ‘‘भला मैंने ऐसी कौन-सी बात कह दी है जिसे सुनकर आप मुस्करा रहे हैं।’’
एक पण्डित जोर से ठठाकर हंस उठा और बोला- ‘‘स्वामी जी! हम तो समझते थे कि आप वीतराग संन्यासी हैं। सांसारिक दुःख-सुख से ऊपर हैं, लौकिक घटनाएं आपको छू नहीं पातीं। लेकिन आप तो इस नाशवान प्राण के लिए आंसू बहाते हैं, जो आत्मा के निकल जाने पर मिट्टी से भी गया बीता है।’’
स्वामी जी उक्त पण्डित का तर्क सुनकर देखते रह गये। फिर उन्होंने क्रोधित होने का अभिनय करते हुए कहा- ‘‘आप स्वयं को दिग्गज वेदान्ती मानते हैं न, तो लीजिए में आज आपकी परीक्षा लेता हूं।’’
यह कहकर उन्होंने अपने पास उखा हुआ दण्ड उठाया- ‘‘यह दण्ड है और मैं इससे आपके शरीर पर प्रहार करूंगा। यह दण्ड आपके शरीर को ही छुएगा। आत्मा को तो स्पर्श करेगा ही नहीं। केवल नश्वर देह को ही मारेगा। अगर आप यथार्थ में पण्डित हैं तो अपनी जगह से जरा भी मत हिलना।’’ स्वामी जी को क्रोधित देखकर वे सब भाग गये।
उनके चले जाने के बाद स्वामी जी ने अपने शिष्यों से कहा- ‘‘आत्मा की पूजा ही वेदान्त धर्म है। पर आत्मा को पूजना तो दूर कोई उसके दर्शन तक नहीं कर सकता और फिर वेदान्ती तो सब में अपनी सुख-सुविधाओं का ध्यान रखते हैं उसी प्रकार दूसरों के सुख-दुःख का भी ध्यान रखना चाहिए। अपना-पराया भूलकर प्राणि मात्र की मंगल-कामना और हित-साधना करनी चाहिए। सिद्धान्तों के शब्द जाल में उलझकर व्यक्ति ज्ञानी तो नहीं अभिमानी जरूर बन जाता है और एक साधक को अभिमान से वैसे ही दूर रहना चाहिए जिस प्रकार जल से कमल।’’
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प्राचीन भारत के मनीषियों ने धर्म का अर्थ व्यापक माना है सम्प्रदाय, मत-पन्थ आदि संकीर्ण हैं। धर्म शब्द का दुरुपयोग इनके पर्याय रूप में नहीं होना चाहिए। ऋषि-मुनियों ने वर्ग सम्प्रदाय आदि भेद-भाव के बिना प्राणि मात्र के- कल्याण के निमित्त ज्ञान-विज्ञान का अन्वेषण किया। जप-तप की अनुभूतियों से विश्व-मानव को लाभान्वित करने सूत्र और मंत्रों की रचना की। वेद-वेदांग इसका ज्वलन्त प्रमाण है।
वेद को धार्मिक ग्रन्थ माना जाता है। उसमें समग्र जीवन जीने की कला वर्णन मिलता है। व्यक्तिगत ही नहीं, सामाजिक समस्याओं का समाधान है। आध्यात्मिक ही नहीं अपितु आर्थिक, राजनैतिक विषय भी है। शासन-प्रणाली के प्रसंग में ‘‘साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं वैराज्यं पारमेष्ठयं राज्यम्’’ आदि ऋग्वेद के ऐतरेय ब्राह्मण में उल्लेख किया गया है।
हमारा कोई धर्म ग्रन्थ एकांगी नहीं। धर्म-शास्त्रों में भी सर्वांगीण विधि बताई गई है। धर्म की परिभाषा है- ‘‘यतोऽभ्युदय निःश्रेयस सिद्धि स धर्मः।’’ ऐहलौकिक अभ्युदय भला भौतिक-आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक ज्ञान शून्यता से कैसे सम्भव है? धर्म परमार्थ के साथ पुरुषार्थ सिखाता है। आत्मिक उन्नति के मार्ग पर चलने के लिए कहकर जीवन को पूर्णता प्रदान करता है।
आज लोग हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन आदि को धर्म मानने लगे हैं। अतः इनसे भेद-भाव रहित होना ‘धर्म निरपेक्षता’ कहलाता है। यह भ्रामक और गलत दृष्टिकोण है। मुस्लिम, यहूदी, मसीही आदि संप्रदाय हैं, धर्म नहीं। धर्म तो एकांगी पंथ-संप्रदायों से ऊपर है। सम्प्रदाय जल-बिन्दु के समान हैं। धर्म समुद्र है। संप्रदायातीत जीवन ही मानवता का स्वरूप है।
परन्तु वर्तमान विश्व में जितनी विचारधाराएं जोरों पर फैली रही हैं, उनमें कृत्रिमता और अधूरा दर्शन है। कुछ एकांगी विचार प्रतिक्रियात्मक और कुछ नकली हैं। पूंजीवाद एकांगी विचार है। पूंजीवाद की प्रतिक्रिया स्वरूप साम्यवाद है। अन्य भारत में प्रचलित कई धारणा तो अंग्रेजों की सीधी नकल हैं। इस तरह के विचार उस काल में चलते हैं। फिर थोड़े समय के बाद खतम हो जाते हैं।
इस युग की यही विडम्बना है कि उद्योग और विज्ञान के विकास से हमारा दृष्टिकोण भौतिकवादी और स्वार्थपरायण बन गया है। अनास्था और अविश्वास के कारण धार्मिक दर्शन के प्रतिद्वंद्व उत्पन्न हुआ। विद्या-विहीन शिक्षित और साधन-सम्पन्न लोग यह समझते हैं कि नये समाज के निर्माण की शक्ति धर्म में रही नहीं। धर्म तत्व के प्रति अश्रद्धा और उपेक्षा इसी अज्ञान की उपज है।
यद्यपि विभिन्न मत-पंथ संप्रदाय और वादों का प्रारम्भ व्यक्तिगत तथा समष्टिगत भूलों को सुधारने की दृष्टि से होता है। व्यक्ति का कल्याण एवं सुन्दर समाज का निर्माण ही सभी मत-वादों का मुख्य उद्देश्य है। किन्तु उनकी ममता व्यक्ति को पागल बना देती है। यही भ्रान्ति और मोह कहलाता है। हम भूल जाते हैं कि औषधि का सेवन आरोग्य के लिए है, ममता किम्बा असक्ति हेतु नहीं। सभी विचारों से स्वयं एवं समाज को सुन्दर तथा आनन्ददायक बनाने की अपेक्षा की जाती है।
जिस दृष्टिकोण की गला फाड़-फाड़कर प्रशंसा की जाती है, यदि यह विश्व कल्याण हेतु जीवात्मा को सन्मार्ग पर चलाने में उपयोगी न बन सका तो उसका परिवर्तन स्वाभाविक है। प्रेम, सत्य और यथार्थ ही धर्म है। एकता और समता का मूल यही धार्मिक दृष्टिकोण है। धर्म का नया दृष्टिकोण इसी सार्वभौम धर्म का प्रतिपादन करता है।
अनुपयोगी मत-वाद और साम्प्रदायिक भेद-भाव तथा पाखण्ड को अब भुलाकर धर्म के इस नये दृष्टिकोण को जीवन के व्यवहार से क्रियान्वित करना ही पड़ेगा। अन्यथा अधर्म, अनास्था, अभाव, दुर्भाव के कारण विविध समस्या जनित संकट समूची मानव सभ्यता के विनाश का चित्र प्रस्तुत कर देगा।
हम जानते हैं कि मानव मात्र के अन्तःकरण में धर्म का दैवी भाव भी विद्यमान है। प्रयोजन है, परम सत्य की अनुभूति का अमृत पिलाकर आत्म-परिचय कराने का- अखण्ड-ज्योति जलाकर सद्ज्ञान के अनुदान से सद्भाव जागरण का।
जीवात्मा का ध्येय है अनन्त आनन्द की प्राप्ति। ‘‘मृत्योर्मा अमृतं गमय’’ में इसी अमरता की मांग है। नदियां अपने आप में संतुष्ट न होने से समुद्र की ओर दौड़ी चली जाती हैं। हवा को एक स्थान पर चैन नहीं। यह प्रतिक्रिया संसार के प्रत्येक परमाणु में चल रही है। किसी को भी अपने आप में संतोष नहीं मिलता। जड़ व चेतन सभी पूर्णता के लिए गतिवान् हैं। अपने स्वत्व को किसी महान् सत्ता में घुला देने के लिए सबके सब सतत् क्रियाशील दिखाई देते हैं।
ऐसी ही प्रक्रिया जीवात्मा की है। व्यष्टि में उसे अनन्त आनन्द की प्राप्ति नहीं। समष्टि की परमात्मा के पावन स्पर्श हेतु सेवा-भक्ति अनिवार्य है। आत्म-चिन्तन की प्रवृत्ति से जीवन-मरण के रहस्य का अनावरण होता है। उसे यह आभास मिलता है कि मानव को यहां वे सारी परिस्थितियां प्राप्त हैं जिनके सहारे सक्रिय होने पर वह अपनी विकास यात्रा आसानी से पूरा कर सकता है।
परमात्मा से प्रेम एवं आत्मीयता स्थापित करने का अच्छा तरीका यह है कि हम उनका अभ्यास परिजनों से प्रारम्भ करें। न्याय रखें और सहिष्णुता बरतें। स्वार्थ की अहं वृत्ति का परित्याग कर परमार्थ के विशाल क्षेत्र में पदार्पण करें। इससे मनुष्य विराट् की ओर अग्रसर होता है। यही नया दृष्टिकोण युग की अनिवार्य आवश्यकता है ।
ऐसा धार्मिक दृष्टिकोण वाला व्यक्ति हजारों, लाखों योनियों के बाद सौभाग्य से उपलब्ध मानव जीवन को तुच्छ स्वार्थमय गोरखधन्धों में ही दुरुपयोग करने की मूर्खता नहीं करेगा। यह प्रत्यक्ष है कि पशु-पक्षी की तुलना में ज्ञान या धर्म-भावना के कारण ही वह श्रेष्ठ है।
धर्म के इस दृष्टिकोण के फलस्वरूप जीवन आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर प्रगति करता है। सड़ी-गली रूढ़ियों और परम्पराओं के बंधन से मुक्ति मिलती है। स्थित प्रज्ञ और परमहंस ही स्थिति से परम सुख-शान्ति पाता है। इस प्रकार अभ्युदय-निःश्रेयस की सिद्धिदायक विश्वात्मा के विराट् रूप की ज्ञान, कर्म, उपासना ही अभिनव धार्मिक दर्शन का मूल स्वरूप है।
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बालक के पास भी अभिभावकों से उत्तराधिकार में मिलने वाली सम्पत्ति होती है, पर वे न तो उससे परिचित होते हैं और न उसका कुछ उचित उपयोग कर पाते हैं। अविकसित मनःस्थिति में पिता की सम्पत्ति की उन्हें जानकारी हो जाय और उसका मनचाहा उपयोग करने की छूट मिल जाये तो निश्चय ही इस असामयिक अधिकार का प्रतिफल दुष्परिणाम स्तर का ही होगा। वह संपत्ति भी नष्ट होगी और प्रयोगकर्ता बालक का भी विनाश करेगी। इस आशंका को ध्यान में रखते हुए अभिभावक बन्दूक की बारूद और तिजोरी की चाबी जैसी महत्वपूर्ण वस्तुओं को इस प्रकार रखते हैं कि बच्चे उन्हें प्राप्त न कर सकें। इस दुराव में द्वेष का नहीं वरन् सतर्कता का ही समावेश है। बच्चों के प्रति अभिभावकों का असीम और असंदिग्ध प्यार होता है, फिर भी जब कोई गोपनीय वार्ता प्रसंग बन रहा होता है अथवा बहुमूल्य वस्तुओं को किसी गुप्त स्थान पर रखा जा रहा होता है तो बच्चे किसी बहाने वहाँ से अन्यत्र खिसका दिये जाते हैं। यहाँ परायेपन की उपेक्षा या द्वेष अविश्वास जैसा कोई कारण नहीं है। मात्र इतनी ही सतर्कता है कि बालक अबोध मनःस्थिति के कारण कहीं कोई अवाँछनीय दुर्घटना खड़ी न कर दें।
चेतना का बचपन ईश्वरीय सत्ता के हाथ दिव्य अनुदान देने से रोकता है। अन्यथा आत्मा और परमात्मा के बीच का प्रगाढ़ सम्बन्ध अजस्र अनुदान सम्भव है। होता रहा है और होता रहेगा। देव मानवों की स्थिति सामान्य स्तर के नर-वानरों की तुलना में कितनी भिन्न होती है, इसका विश्लेषण करने पर सहज ही यह पता चल जाता है कि चेतना की उच्च परतें कितनी सशक्त और समर्थ हैं और उन्हें प्राप्त करके मनुष्य कितना उच्चकोटि का बन सकता है।
बहिरंग भौतिक प्रगति का अपना महत्व है। श्रम और मनोयोग के आधार पर ही बलिष्ठता, विद्या, प्रतिभा, सम्पदा, कीर्ति जैसी साँसारिक उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं। इनसे भी बड़ी विभूतियाँ आन्तरिक हैं। जड़ जगत द्वारा जो साधन और सुख मिल सकता है उसकी तुलना में चेतन जगत के वरदान असंख्य गुने अधिक हैं। जितना प्रयास बहिर्जगत की सुख सुविधाएं उपार्जित करने के लिए किया जाता है उसका आधा चौथाई भी यदि अन्तर्जगत की विभूतियों को पहचानने और विकसित करने में किया जा सके तो उसकी सफलता देखते ही बनेगी और प्रतीत होगा कि तिजोरी में भरी अजस्र संपदा से अपरिचित रहकर और जहाँ-तहाँ कंकड़-पत्थर बीनने के लिए किये गये श्रम में कितना बड़ा अन्तर था।
पेड़ की जड़ों की गहराई और लम्बाई के आधार पर उसका ऊपरी विस्तार होता है। जड़ें छोटी होंगी तो पेड़ भी बड़ा न बनेगा। किसी प्रकार बढ़ भी जाय तो वह चिरस्थायी न रह सकेगा- हवा के छोटे से थपेड़े में ही उखड़ जायगा। फसल के लहलहाने में प्रशंसा तो पौधों की ही होती है, पर वस्तुतः वह धरती की उर्वरता ही उफन कर ऊपर आई होती है। यदि उर्वरता तत्व खेत में न होंगे तो बाहरी प्रयत्नों से शस्य श्यामला के नयनाभिराम दृश्य और बहुमूल्य उत्पादन उपलब्ध न हो सकेंगे अन्तरंग जीवन की आमतौर से उपेक्षा होती रहती है उस क्षेत्र का कोई महत्व नहीं माना जाता। स्वास्थ्य और शिक्षा के सहारे शरीर और मस्तिष्क को भारी भरकम बनाया जाता है और उसके सहारे अर्थोपार्जन का लाभ लिया जाता है। इतना तो सहज ही हो जाता है, पर उपलब्धियों का उपयोग किस प्रयोजन के लिए हो इसका महत्वपूर्ण निर्णय नहीं हो पाता।
भौतिक प्रगति के लिए प्रयत्न करने की प्रशंसा ही की जा सकती है और उसके लिए प्रोत्साहन ही दिया जा सकता है। यहाँ आक्षेप उस विकृत दृष्टिकोण पर किया जा रहा है जो इस उपार्जन को विलासिता और अहंमन्यता के लिए विनष्ट करने की प्रवंचना रचकर खड़ी करता है। यदि इस मूर्खता को समझा जा सके तो आत्मिक प्रगति की बात सोचने-उसके महत्व को जानने का अवसर मिले।
हर महत्वपूर्ण वस्तु को प्राप्त करने के लिए उसका समुचित मूल्य कठोर श्रम, प्रखर मनोयोग एवं अभीष्ट साधन जुटाने के रूप में चुकाना पड़ता है। इससे कम अनुदान लिए बिना तो कोई भौतिक सफलता भी नहीं मिलती फिर आत्मिक प्रगति का क्षेत्र तो और भी बड़ा है। उसकी उपलब्धियाँ भी अपेक्षाकृत अधिक बहुमूल्य एवं अधिक महत्वपूर्ण हैं। ऐसी दशा में उसके लिए चिन्तन और कर्तृत्व का विनियोग भी अधिक मात्रा में किया जाना स्वाभाविक है। पूजा-पाठ के छुट-पुट प्रयोग बालकक्षा के छात्रों द्वारा विद्या प्राप्ति के लिए किया गया पट्टी-पूजन जैसा छोटा किन्तु अति उपयोगी प्रयास है। बात इतने भर से नहीं बन सकती। जप, ध्यान जैसे प्रयास आत्मिक प्रगति की दिशा में उठाये गये आरम्भिक चरण हैं इन्हें किसी किसान द्वारा बीज बोने के समतुल्य माना जा सकता है। यह आवश्यक तो है, पर पर्यवेक्षण करना और उन्हें नये सिरे से सुव्यवस्थित करने का नाम ही श्रेय पथ का अवलम्बन है।
पिछले दिनों धीरे-धीरे अगणित अनुपयुक्त मान्यताएं अनावश्यक विचारणाएं तथा अवाँछनीय आदतें चेतना की गरदन पर लद पड़ी होती हैं। इनसे पीछा छुड़ाये बिना उस भार से मुक्ति नहीं मिल सकेगी जिसके भार ने अन्तः-करण को बहुत बोझिल बना दिया है और वह उच्चस्तरीय प्रगति के कठिन मार्ग पर ऊंचा चढ़ सकने में समर्थ नहीं हो सकता। आन्तरिक स्वच्छता वह चरण है जिसको भूमि जोतने, गोड़ने, खाद युक्त और नम बनाने जैसे कृषि प्रयासों के समतुल्य माना जा सकता है। आत्मिक प्रगति के पथ पर मिलने वाले चमत्कारी सिद्धियों के अनेक पड़ावों का आनन्द तब लिया जा सकता है जब मलीनता के- अवाँछनीयता के-लदे हुए भार से छुटकारा पाने में सफलता मिले। मैला-कुचैला कपड़ा रंगने का प्रयास व्यर्थ है। इसमें रंग खरीदने में खर्च किया गया पैसा और रंगाई के लिए किया गया श्रम भी निरर्थक चला जाता है। अच्छी रंगाई की सफलता इस बात पर निर्भर है कि कपड़े की अच्छी तरह धोकर स्वच्छ बना लिया गया हो। पूजा-पाठ के समस्त अनुशासन को यदि गहराई से देखा जाय तो उसके पीछे यही तथ्य और संकेत झाँकते दिखाई पड़ेंगे जिन्हें अपनाने पर उत्कृष्ट व्यक्तित्व के निर्माण का मार्ग अपनाना पड़ता है। आत्मशोधन की-आत्म निर्माण की उपेक्षा करके-मात्र पूजा पाठ के सहारे वह प्रयोजन पूर्ण नहीं हो सकता जिसे आत्मिक प्रगति के नाम से पुकारा जाता है।
श्रेय को प्रधानता देने पर प्रेय स्वभावतः गौण हो जाता है। प्रेय की प्रधानता रहेगी तो श्रेय के लिए अन्यमनस्क आधे-अधूरे प्रयत्न ही सम्भव होंगे। फुरसत न मिलने और मन न लगने की शिकायत एक पक्ष में तो बनी ही रहेगी। या तो मन श्रेय में लगेगा और प्रेय के प्रति उतना ही ध्यान रहेगा जितना निर्वाह के लिए आवश्यक है। स्पष्ट है शरीर यात्रा बहुत सस्ती और हल्की है। यदि तृष्णाओं के पर्वत उस पर न लादे जायं तो गुजारे का प्रश्न बहुत ही हलका-फुलका लगेगा और वह थोड़े से प्रयास में भली-भाँति पूरा होता रहेगा। सतर्कता और तत्परता के साथ निर्वाह साधन जुटाने में उतना ही दबाव पड़ता है जितना खिलौनों से खेलने की खिलवाड़ में। हास-परिहास के लिए- क्रीड़ा-विनोद के लिए जितनी दौड़ धूप करनी पड़ती है उतनी से ही निर्वाह साधन जुट जाते हैं।
यदि यह समझा जा सके कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं और आत्मा की प्रखरता का निखार आत्मिक प्रगति के साथ जुड़ा हुआ है- जीवन की सार्थकता आत्म-विकास, आत्म-साक्षात्कार एवं आत्म-कल्याण में है तो फिर निश्चय ही अपने साधनों का उपयोग इन्हीं पुण्य प्रयोजनों के लिए किया जायगा। घोड़े को घास तो सभी खिलाते हैं, पर इत्र स्नान कोई विरला ही कराता है। शरीर की भौतिक आवश्यकताएं तो पूरी की जानी चाहिए, पर उसको वासना, तृष्णा के लिए सारी जिन्दगी क्यों बर्बाद की जानी चाहिए, आत्मा के लिए शरीर है- न कि शरीर के लिए आत्मा। हमें रोटी खानी चाहिए न कि रोटी, उलट हमें ही खाने लगे। यदि इस उलटी चाल को बदल कर सीधी राह अपनाई जाय तो आत्मिक प्रगति की राह पर बहुत आगे तक द्रुतगति से बढ़ा जा सकता है। हर हालत में आत्मिक प्रगति जैसे महत्वपूर्ण कार्य के लिए साधनों का एक बड़ा हिस्सा नियोजित रहना चाहिए। मुक्त में या स्वल्प प्रयास से तो छोटे-छोटे काम भी पूरे नहीं होते फिर आत्मिक विभूतियाँ प्राप्त करने की सफलता स्वल्प श्रम से किस प्रकार सम्पन्न हो सकती है। वस्तुतः जीवन के अन्तरंग और बहिरंग स्तरों का परिष्कार ही वह स्थिति है जिसमें ईश्वर का अनुग्रह और उसकी दिव्य विभूतियों का अवतरण मनुष्य को प्राप्त हो सकता है।
आत्मिक प्रगति की आरम्भिक तैयारी का प्रथम चरण यह है कि निर्वाह व्यवस्था और परमार्थ प्रयोजनों के बीच साधनों का उचित बंटवारा किया जाय और इस प्रकार सन्तुलन बिठाया जाय कि दोनों ही प्रयोजन ठीक तरह पूरे हो सकें। श्रम, समय, मनोयोग, कौशल, प्रतिभा जैसे व्यक्तित्व के साथ जुड़े हुए साधनों को ही वास्तविक वैभव माना गया है। इन्हें आत्मिक प्रगति के प्रयोजनों में जितनी मात्रा में लगाया जायगा उतनी ही सफलताएं मिलेंगी। जितना गुड़ पड़ेगा उतना ही मीठा होगा। यदि सारे साधन भौतिक प्रयोजन में लगे रहेंगे तो स्थिति के अनुरूप पूरी अधूरी सफलता उसी क्षेत्र में मिलेगी। पूजा-पाठ की बेगार ज्यों-त्यों करके भुगत ली जाय तो उतने भर से किसी बड़ी प्रगति की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
व्यक्तित्व का निर्माण एक जटिल काम है। बहिरंग क्रिया-कलापों में हरे-फेर करना सरल है। वस्तुओं को बदल लेना भी सरल है, पर गुण, कर्म, स्वभाव में हेर-फेर करना कठिन है। आदतें कितनी ढीठ होती हैं इसे हर कोई जानता है। उन्हें बदलने के लिए कितने तापमान का मनोबल चाहिए इसे अनुभवी ही जानते हैं और उस आत्म-संघर्ष को महाभारत जीतने जैसा बताते हैं। दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण कर लेने से आधी बात बनती है, आधी तब पूरी होती है जब निराकरण से खाली हुए स्थान को उच्चस्तरीय सत्प्रवृत्तियों से भरा जा सके। इसका अभ्यास लोक मंगल के परमार्थ प्रयोजनों में संलग्न हुए बिना और किसी प्रकार सम्पन्न नहीं हो सकता। यह कार्य भी बातें बनाने या कल्पना के घोड़े दौड़ाने भर से नहीं हो जाता। उसके लिए बढ़े-चढ़े अनुदान देने पड़ते हैं। साधु, ब्राह्मणों की परम्परा यही रही है कि वे भौतिक आवश्यकताएं न्यूनतम रखते थे और इस प्रकार अपनी बहुत कुछ क्षमताएं निर्वाह से बचाकर लोक मंगल की साधना में लगा सकते थे। लिप्सा लालसाएं छोड़े बिना यह बचत अन्य किसी प्रकार नहीं हो सकती। अस्तु जिन्हें आत्मिक प्रगति-ईश्वर की अनुभूति वस्तुतः ही अपेक्षित हो उन्हें अपने साधनों का श्रेय और प्रेय के बीच उचित विभाजन करने की योजना बनानी चाहिए।
परमार्थ साधना का एक और भी तरीका हो सकता है कि सेवा कार्यों की योग्यता अपने में न्यून हो तो दूसरे अधिक उपयुक्त व्यक्तियों द्वारा वह कार्य सम्पन्न कराये जायं और उसके निर्वाह का एवं साधन जुटाने का उत्तरदायित्व स्वयं उठाया जाय। एक व्यापारी जन जागरण जैसे बौद्धिक एवं भावनात्मक स्तर की क्षमता द्वारा सम्पन्न हो सकने वाले कार्य स्वयं तो नहीं कर सकता, पर जो लोग उस प्रकार की क्षमता से सम्पन्न हैं उन्हें निर्वाह की चिन्ता से मुक्त करने के लिए अपने उपार्जन को उदारतापूर्वक देता रह सकता है। लोक-मंगल के कार्यों में कितने ही उपकरणों एवं साधनों की आवश्यकता पड़ती है। उनके बिना खाली हाथ सेवा-भावी व्यक्ति भी कुछ अधिक कार्य नहीं कर सकते। इन साधनों को जुटाने में अर्थसम्भव उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। इनके लिए भी पैसा चाहिए। वह व्यापारी अपने व्यवसाय में जुटा सके, अधिकाँश अथवा सारा समय उसी में लगावें और अपने लिए न्यूनतम सुविधा लेकर अधिकाँश उत्पादन उन्हीं पुण्य प्रयोजनों में लगा दे तो समझना चाहिए कि उसने ब्राह्मण परम्परा का निर्वाह कर लिया।
मूल तथ्य यथास्थान रहेगा उसका स्वरूप बदल जायगा। एक लोकसेवा प्रत्यक्षतः अपनी लेखनी, वाणी, श्रम अथवा प्रतिभा से करता है। उसी कार्य को एक दूसरा व्यक्ति अप्रत्यक्ष रूप से उन्हीं कार्यों के लिए अपने साधन देकर भी कर सकता है। साधन भी तो आखिर श्रम और मनोयोग से ही जुटते हैं, इनका उपयोग यदि परमार्थ कार्यों में हो गया तो लक्ष्य वही पूरा हुआ जो स्वयं सीधा परिश्रम करके सम्पन्न किया जा सकता है। स्वयं ज्ञानवान, चरित्र-निष्ठ और प्रतिभा सम्पन्न बनने में देर लग सकती है, पर उसी स्तर के व्यक्ति को अपना सहयोग देकर यदि परमार्थ प्रयोजन सम्पन्न कर लिए तो उद्देश्य एक ही पूरा हो गया। महामारी पीड़ित लोगों की सेवा, सहायता के लिए एक वृद्ध और अनुभवहीन व्यक्ति अपने शरीर से कुछ बड़ा काम नहीं कर सकता किन्तु यदि वह अपने साधक उन कार्यों में झोंक देता है और स्वयं सेवकों की- चिकित्सा उपचार की व्यवस्था बना देता है तो भी पीड़ितों को उतना ही लाभ मिल सकता है जो उस वृद्ध के स्वयं चिकित्सक होने और सेवा संलग्न रहने पर सम्भव हो सकता था।
अन्धे और पंगे की कहानी सर्वविदित है। उन्होंने नदी नाले पार करते हुए कठिन और लम्बी मंजिल पूरी कर ली थी। अलग-अलग रहकर वे दोनों ही असफल रहते। पारस्परिक सहयोग ने दो अपूर्णों को मिलाकर एक पूर्ण बना दिया। समर्थ रामदास और शिवाजी प्रताप -भामाशाह, चाणक्य-चन्द्रगुप्त, शंकराचार्य-मान्धाता, बुद्ध-हर्षवर्धन, रामकृष्ण परमहंस विवेकानन्द, गाँधी और जवाहर जैसे युग्य परस्पर सहयोग से कितनी बड़ी सफलताएं प्राप्त कर सके यह सर्वविदित है। उन युग्मों के दोनों पक्षों की क्षमताएं अपने अपने ढंग की अनोखी थीं, फिर भी वे एकाकी होने पर प्रायः अपूर्ण ही बनी रहतीं और उनके स्वतन्त्र एकाकी प्रयासों का उतना प्रतिफल न होता जो मिल-जुलकर काम करने में सम्पन्न हो सका। आग और ईंधन की मिलन प्रक्रिया से गगनचुम्बी दावानल उत्पन्न होने की बात जिनके ध्यान में है वे अपनी सेवा क्षमताएं स्वल्प होने की चिन्ता नहीं करते, वरन् नाले और नदी के मिलन की तरह किसी उपयोगी लोकसाधना में अपने को नियोजित कर देते हैं। श्रेय किसको मिले यह कृपणता यदि मन में न हो तो परोक्ष रूप से श्रेय दोनों पक्षों को प्रकारांतर से लगभग समान ही मिल जाता है। ईसाई धर्म का पुनर्निरूप सेन्टपाल ने अपने अथक परिश्रम और अजस्र अनुदान से सम्पन्न किया था। वे स्वयं ईसा तो न बन सकें, पर सन्त ईसा को परमेश्वर का बेटा बना देने के श्रेयाधिकारी वे ही माने गये। सेन्टपाल का यह उपलब्धि परोक्ष रूप से ईसा के समतुल्य ठहराई जाय तो तथ्य स्वीकारने में किसी विचारशील को कोई बड़ी आपत्ति न होगी।
प्रयास प्रत्यक्ष हो या परोक्ष-लोक साधना स्वयं की जाय या दूसरों से कराई जाय यह निर्णय परिस्थितियों को देखकर भिन्न-भिन्न प्रकार से हो सकता है। बात क्रिया की नहीं भावना की है। अपने लिए न्यूनतम, परमेश्वर के लिए-आदर्शवाद के लिए अधिकाधिक का मार्ग अपना कर ही कोई आत्मचेतना को विकसित कर सकता है। सदाशयता और आस्था का प्रमाण इसी परीक्षा में उत्तीर्ण होने पर मिलता है। सहृदयता यदि वस्तुतः है तो उसे सेवा में अनिवार्य रूप से परिणत होना चाहिए। करुणा, ममता और भक्ति निर्वीर्य, निस्तेज और नपुंसक नहीं होती वह वाचालता एवं कल्पना-जल्पना तक सीमित नहीं रहती। उसे कार्यान्वित हुए बिना चैन ही नहीं पड़ता। जो सोचता तो बहुत है, पर करता कुछ नहीं, उसकी श्रद्धा को उथली और निर्जीव ही कहा जायगा। ऐसी अन्त: स्थिति के रहते आत्मिक प्रगति का वह पुण्य प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता जिससे आधार पर ईश्वर का अनुग्रह और चमत्कारी ऋद्धि-सिद्धियों का अवतरण अनायास ही वर्षा के बादलों की तरह बरसता हुआ दृष्टिगोचर होता है।
कला की सार्थकता इसमें नहीं कि वह कुछ क्षण तक विनोद की मनःस्थिति उत्पन्न कर दे। जो कला अन्तरात्मा का स्पर्श न कर सके वह क्षणिक उत्तेजना देकर स्थायी थकान देने वाली मदिरा के समान है। उद्वेग और आवेशों के जलते-झुलसते मनुष्य को भावभरी सदाशयता की शीतल छाया में बिठा सकना यह कला का उद्देश्य है और यही होना भी चाहिए।
-सामरसेट माम
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बहुधा ऐसी घटनाएं देखने में आती हैं जिनकी सामान्य स्थिति के साथ संगति नहीं बैठती और वे अद्भुत असामान्य और चमत्कारी लगती है। अतीत काल में इसके समाधान सरल थे। तब देवी-देवताओं और भूत-पलीतों की करतूतें उन्हें समझ लिया जाता था और उससे उनके अनुग्रह तथा रोष का अनुमान लगा कर पूजा-उपचार का ताना-बाना बुन लिया जाता था। आज उतने से किसी को सन्तोष नहीं है। यदि देवी देवताओं की ही वे कृतियाँ है तो इन आत्माओं का अस्तित्व सिद्ध होना तथा स्वरूप स्वभाव समझा जाना आवश्यक है। किंवदंतियों-दन्तकथाओं-मूढ़ मान्यताओं और अन्ध-परम्पराओं की मान्यता अपने युग में निरस्त कर दी गई है। अस्तु देवी-देवताओं का अस्तित्व भी अप्रामाणिक और अविश्वस्त ठहरा दिया गया है। ऐसी दशा में समय-समय पर घटित होने वाली ऐसी घटनाओं का कोई आधार ढूँढ़ना ही होगा अप्रामाणिक भी नहीं कही जा सकतीं और जिनका सामान्य स्थिति के साथ कोई समाधान भी नहीं निकलता।
मनुष्य के अतीन्द्रिय अनुभवों की शृंखला बहुत बड़ी है और उनके प्रकारों का ठीक तरह वर्गीकरण करना तथा सीमा परिधि निर्धारित कर सकना कठिन है। तो भी आये-दिन सामने वाले चमत्कारी अनुभवों को कुछ वर्गों में मोटे रूप से विभक्त किया जा सकता है। यथा- (1) सुदूर स्थानों में घटित हुई घटनाओं की बिना ज्ञातव्य साधनों के स्पष्ट जानकारी मिलना (2) एक व्यक्ति को अन्य व्यक्ति की मनः स्थिति एवं परिस्थिति का ज्ञान होना (3) भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का समय से बहुत पहले ही आभास मिल जाना (4) मृतात्माओं द्वारा ऐसे कृत्य किये जाना जिससे उनके अस्तित्व का प्रत्यक्ष परिचय मिलता हो (5) पुनर्जन्म की वे घटनाएं जिनमें यह प्रमाण मिलता तो है कि यह व्यक्ति पूर्वजन्म की ऐसी जानकारियाँ दे रहा है जो अन्य लोगों द्वारा उसे सिखाई पढ़ाई नहीं जा सकती थीं (6) किसी प्रकार प्रकट करना जो प्रस्तुत व्यक्तित्व से अत्यधिक ऊंचा अथवा भिन्न हो। (7) शरीरों में अनायास उभरने वाली ऐसी शक्ति जो सम्पर्क में आने वालों को प्रभावित करती हो (8) ऐसा मनोबल जो दुस्साहसों को क्रीड़ा-विनोद की तरह कर गुजरे और अपनी तत्परता के सहारे अद्भुत पराक्रम कर दिखाये। (9) अदृश्य आत्माओं के साथ सम्बन्ध स्थापित करके उनका असाधारण सहयोग प्राप्त करना। (10) शाप वरदान का दीर्घ काल तक वस्तुओं तथा व्यक्तियों पर बना रहने वाला प्रभाव (11) पर काया प्रवेश।
इस प्रकार के ओर भी अनेक ऐसे प्रसंग सामने आते हैं जिन्हें उपरोक्त वर्ग विभाजन की श्रेणी में नहीं सोचा जा सकता। उन्हें फुटकर एवं विसंगत बहुवर्गीय कहा जा सकता है। सिद्धि और चमत्कारों के नाम से इन्हें समझा, समझाया जा सकता है। यह अतीन्द्रिय शक्ति के प्रमाण का क्षेत्र है। इन्द्रियों की सहायता से हम जो अनुभव करते हैं वह स्वाभाविक एवं सरल है। यों है तो वह भी आश्चर्यजनक ही। अन्य प्राणियों की तुलना में मानवी संयन्त्र कितना परिष्कृत है और उसकी ज्ञान क्षमता तथा संवेदनाएं कितनी विशिष्ट हैं इसे कोई प्रखर समीक्षक ही बता सकता है। अभ्यस्त होने के कारण हम तो उस विशिष्ट स्थिति को भी सामान्य ही मानने लगे हैं। इन्द्रियों के अतिरिक्त दूसरे साधन वैज्ञानिक उपकरण हैं जो हमारे ज्ञान तथा साधनों का क्षेत्र अत्यधिक विशाल बना देते हैं। इन्द्रिय अनुभूतियों की तरह ही अब यह यान्त्रिक क्षमता भी मनुष्य की व्यक्ति क्षमता का ही एक अंग बन गई है। यों जिन दिनों बिजली जैसी शक्तियों और टेलीफोन जैसे उपकरणों का आविष्कार नहीं हुआ था। उन दिनों की आज की सुविधा सम्पन्न परिस्थितियों से तुलना की जाय तो वह भी जादुई स्तर का चमत्कार ही प्रतीत होगा। अब से चार सौ वर्ष पूर्व के मनुष्य कहीं हों और आज की वैज्ञानिक उपलब्धियों तथा यान्त्रिक प्रगति के सहारे मिले सुविधा-साधनों को देखें तो प्रतीत होगा कि इस जमाने के लोग किसी जादूगरों के लोक में रह रहे हैं। यह प्रकृति के पदार्थ परक स्थूल क्षेत्र की उपलब्धियाँ हैं, जो प्रयत्न करने पर हाथ लगी हैं, यों उनका अस्तित्व तो सृष्टि के आदि काल से ही था। अन्तर इतना ही हुआ कि भूतकाल में मनुष्य उनके अस्तित्व एवं उपयोग से अपरिचित था। अब वह स्थिति बदल गई।
अतीन्द्रिय ज्ञान के सम्बन्ध में इन दिनों जो खोजबीन चल रही है उसमें शोध को चार भागों में विभक्त किया गया है। (1) परोक्ष दर्शन (क्लेअर वायेन्स) ज्ञान प्राप्ति के सामान्य आधारों के बिना ही उन वस्तुओं या घटनाओं की जानकारी पाना जो प्रत्यक्ष नहीं हैं (2) भविष्यज्ञान (प्रिकाग्नीशन) भविष्य में घटित होने वाले घटनाक्रम की बिना किसी मान्य आधार के जानकारी प्राप्त करना। (4) विचार संचार (टेलीपैथी) अपने विचार दूसरों के पास बिना किसी साधन के पहुँचाने और उनके पकड़ने की कला।
सरजान एक्लीस का कथन है कि मस्तिष्कीय संस्थान से काम करने वाले अणुओं में एक न्यूरॉन को प्रभावित किया जा सके तो प्राणी की क्रियाशक्ति और इच्छाशक्ति में पहले की अपेक्षा असाधारण परिवर्तन हो सकता है।
विज्ञानी फेन माँ का कथन है कि समय की गति साधारणतया पीछे से आगे को चलती है, पर यह अनिवार्य नहीं। ऐसा भी हो सकता है कि समय आगे की अपेक्षा पीछे को लौटने लगे। हम भविष्य की ओर बढ़ने की अपेक्षा भूतकाल की घटनाओं को देखते हुए चिरअतीत का अवलोकन करने को ही प्रगति अनुभव करने लगें।
‘लीग फॉर स्प्रिचुअल डिस्कवरी’ नामक संगठन का उद्देश्य है-मनश्चेतना से परे की चेतन-तत्व की तलाश। इस संस्था की स्थापना का आधारभूत कारण मनस्तत्व की विभिन्न शक्तियों का परिचय रहा है। उसी से प्रेरणा लेकर यह गठित हुई। एलन गिंसवर्ग ने विभिन्न रासायनिक तत्वों के आधार पर की गई मानसिक अनुभूतियों को प्राप्त कर, मन को ही जीव-चेतना का अन्त माना है। डॉ0 टिमोदी लियरी ने भी मन को ही सब कुछ माना है और अध्यात्म का उसे ही आधार माना है। भारतीय तान्त्रिक और तिब्बती तन्त्र साधक भी विभिन्न रासायनिक तत्वों के द्वारा मनश्चेतना के विस्तार-प्रसार और उसकी असामान्य अनुभूति-क्षमताओं का लाभ उठाते रहे हैं। कभी-कभी दूरवर्ती ज्ञान भी उससे सम्भव है।
डॉ0 टिमोदीलियरी ने नशा और कुछ औषधियों द्वारा मनश्चेतना के विस्तार के प्रयोग व अनुभव किए हैं। उस स्थिति में शक्ति का विशेष अनुभव होता है और जीवन में आनन्द छा जाता है। वह भी वस्तुतः चेतना को निम्न तल के उठाकर कुछ समय के लिए जगत के मूलभूत तत्वों से एकाकार कर देने की ही स्थिति है।
जैकी केसन ने भी मनोविस्तारक प्रयोग किए हैं। प्रकाश किरणों को विभिन्न आकृतियों में संयोजित कर वे उनके छायाचित्र पानी के माध्यम से किसी पर्दे में प्रक्षेपित करती हैं। उन चित्रों को ध्यान से देखने वाला व्यक्ति सम्मोहित हो जाता है और विचित्र अनुभूतियाँ उसे होने लगती हैं। यह भी है-आत्मतत्व से एकाकार की ही स्थिति।
मनःशक्ति की उत्तेजक और वर्धक औषधियों में सोमरस प्रसिद्ध कहा है। आल्डुअस हक्सले ने उसका भारी गुणगान किया है। उत्तरी योरोप में भी ऐसा ही एक पेच, ‘फलाई एगेरिक’ नामक कुकुरमुत्तों से बनता है। फिजी में ‘कावा’ और एण्डियन तहाई (अमरीका) में ओयाहुस्का पेच प्रचलित हैं, जो दिवास्वप्न की सी अनुभूतियाँ देने लगते हैं। इस स्थिति में कई बार भविष्य, नोप्य भी होता है और मृतात्माओं से सम्पर्क भी। स्पष्ट है कि उस स्थिति में मन किसी महत् तत्व से क्षणिक एकाकारिता की स्थिति प्राप्त कर ही, वे अनुभूतियाँ कर पाता है।
जीव-वैज्ञानिकों की ताजी खोजें बताती हैं कि शरीरस्थ कोशिकाओं और परमाणुओं को मनःशक्ति नियन्त्रित करती है। मनःचेतना वंशानुक्रम-विधि से तो गतिशील रहती ही है मरणोत्तर जीवन में भी वह सक्रिय रहती है।
फ्रायड ने ‘सुपरईगो’ और ‘सेन्सर’ की परिधि में मनःशास्त्र रचा, पर अब मनोविज्ञान निरन्तर आगे ही बढ़ता जा रहा है। जर्मन मनोवैज्ञानिक हेन्सा वेन्डर ने अतीन्द्रिय क्षमता के अनेक प्रमाण जुटाए हैं। टेलीपैथी के शोधकर्ता रेने वार्कोलियर ने कहा है-‘‘मन की व्याख्या पदार्थ विज्ञान के प्रचलित सिद्धान्तों द्वारा सम्भव नहीं।”
मन निस्सन्देह अति सूक्ष्म सत्ता है, पर वह अन्न को ही गैसीय स्थिति है। अन्न से रस बनते हैं। रस, रक्त माँस, मेदा, मज्जा, अस्थि, वीर्य ये सप्त धातुएं कहीं गई हैं। ये अन्न से ही बनते हैं। वीर्य इनकी अन्तिम स्थिति है। वहाँ से आगे मन, बुद्धि, चित, अहंकार आदि अन्तःकरण चतुष्ट्य हैं। मन चाहे तो साँसारिक पदार्थों से ही घिरा रहे, चाहे सूक्ष्म-सत्ता को प्राप्त कर समाधि सुख प्राप्त करे, पर मन है एक रासायनिक तत्व ही, आत्मा नहीं।
मात्र मनःशक्ति के विस्तार तथा उसकी किसी कौतुक क्रीड़ा का नाम अतीन्द्रिय विज्ञान नहीं है। वस्तुतः कौतुक-क्रीड़ा में परितुष्टि सदा अविकसित मन को ही होती है। मनश्चेतना का प्रसार होते ही इन बाल-क्रीड़ाओं से गहरी विरक्ति हो जाती है। तब ब्रह्म चेतना से एकाकार होने की तड़प बढ़ने लगती है। इस एकाकारिता की स्थिति में प्रकृति में क्रियाशील नियमों की जानकारी प्राप्त होने लगती हैं। अतीन्द्रिय विज्ञान मनःशक्ति के विकास तथा आत्मतत्व से उसे एकाकार कर प्रकृति के गूढ़ रहस्यों के पीछे क्रियाशील नियमों-सिद्धान्तों की जानकारी की विधा है। यह मात्र मनश्चेतना का विस्तार नहीं, बल्कि मनश्चेतना के विस्तार द्वारा ब्रह्माण्ड व्यापी चेतना से एकाकार होने का निरन्तर प्रयास और उसके परिणाम स्वरूप उस ब्रह्म चेतना की कार्यविधि तथा उसके गणितीय नियमों की अधिकाधिक जानकारी प्राप्त करने का विज्ञान है।
मानवी चेतना एक है। उसके विभिन्न क्रिया कलापों के अनुसार समय-समय पर उसे विभिन्न नाम दिये जाते हैं। जैसे एक ही व्यक्ति परिस्थितिवश वैद्य, रोगी, ग्राहक, आक्रान्ता, दानी, गायक आदि हो सकता है उसी प्रकार मनःचेतना को उसी की सामयिक स्थिति के अनुरूप कई नाम दे दिये जाते हैं। एक ही व्यक्ति विभिन्न व्यक्तियों की दृष्टि में पिता, पुत्र, भाई, मालिक, नौकर आदि समझा जाता है उसी प्रकार मन भी प्रयोजन विशेष की भूमिका निभाते समय विभिन्न नामों से संबोधित किया जाता है।
सोचते समय चेतना के मनःनिष्कर्ष निकालने की स्थिति में बुद्धि-संस्कारों के जाल में जकड़ी हुई स्थिति चित और आत्म मान्यताओं की गहन आस्था अहंकार है। इन में से जब जो स्थिति अधिक उभरी होती है तब मनुष्य को उसी स्तर का ठहराया जाता है, किन्तु यह स्थिति भी सदा एक जैसी नहीं रहती। वकील के रूप में बहस करता हुआ व्यक्ति बुद्धिमान कहा जा सकता है, पर जब वह नशे की लत से अपने को विवश अनुभव कर रहा होगा तो उसे चित ग्रसित कहा जायगा।
प्राणियों में पाई जाने वाली चेतना में शरीर निर्वाह एवं सुखोपभोग के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों में कितना क्रिया-कौशल कितना चातुर्य विद्यमान है यह देख कर एक ओर उनकी बुद्धिहीनता और दूसरी ओर उनकी बुद्धिमता के बीच आकाश-पाताल जैसा अन्तर देख कर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। चींटी कितनी तुच्छ और कितनी बुद्धिहीन, पर उसकी समाज व्यवस्था-भवन निर्माण कला-अनुशासित सहकारिता देखते ही बनती है। मधुमक्खियों की अपनी दुनिया है। उनका जीवन क्षेत्र जिस परिधि में सीमित है उसमें वे किसी कुशल कलाकार, शिल्पी वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, शासनाध्यक्ष, धर्माध्यक्ष एवं समाज व्यवस्थापक की समस्त विशेषताओं के समन्वय का परिचय देती हैं। दीमक द्वारा बनाये जाने वाले नगरों को देखकर उसकी तुलना मनुष्य भवन निर्माताओं से की जाय तो प्रतीत होगा कि स्थिति और सुविधा को ध्यान में रखकर की गई समीक्षा में दीमक को कहीं अधिक कुशल ठहराया जायगा। मकड़ी का जाला तनना-अपने निर्वाह, भोजन एवं वंश वृद्धि के प्रयत्नों में बरते गये वर्चस्व को देखकर मनुष्य का गर्व गल जाता है। मनुष्य और मकड़ी के बीच कितनी असमानता है फिर भी मकड़ी अपने क्षेत्र में अपने स्तर के अनुरूप जो विशेषता प्रस्तुत करती है वैसी उस अनुपात से विकसित से विकसित मनुष्य भी अपने क्षेत्र में कर सकेगा ऐसी सम्भावना नहीं है।
फिर मनुष्य की बुद्धिमता भी एक आश्चर्य है। सिर की खोपड़ी के भीतर जो तनिक सा लिवलिवा पदार्थ भरा है, उसमें किस प्रकार चिन्तन की अद्भुत विशेषता उत्पन्न होती है। विचारों के आँधी-तूफान और भावनाओं के ज्वार भाटे किस आधार पर उठते हैं? आदतों और आकाँक्षाओं में इतनी विचित्रता एवं भिन्नता क्यों रहती है? प्राणियों में शरीर निर्वाह भर की कुशलता पाई जाती है, पर मनुष्य के मस्तिष्क में जो ज्ञान विज्ञान का भण्डार संजोये रह सकने योग्य जो स्वरूप बना हुआ है उसका कारण क्या है? मानवी मस्तिष्क की विचित्र स्थिति के लिए उत्तरदायी कौन है? यह प्रश्न ऐसे हैं जिन पर विचार करते हुए बुद्धि हतप्रभ होकर बैठ जाती है।
अतीन्द्रिय चेतना की परतें और भी विलक्षण हैं। इसका मोटा स्वरूप भाव संवेदनाएं और गहरा स्वरूप वे जानकारियाँ है जो प्रत्यक्ष न होकर परोक्ष होती हैं, जिनका ज्ञानेन्द्रियों के साथ कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता।
सर्दी-गर्मी, स्वाद, आघात स्पर्श, हानि-लाभ से प्रसन्नता-अप्रसन्नता होने जैसी प्रतिक्रियाएं मस्तिष्कीय संरचना से सीधी सम्बद्ध मानी जा सकती हैं। भय, आक्रोश, शोक जैसे घटनापरक प्रभावों को भी किसी कदर समझा जा सकता है, पर प्रेम, दया, करुणा, सेवा, सहानुभूति जैसी उन उदात्त संवेदनाओं का क्या आधार माना जाय जिनसे प्रेरित होकर मनुष्य कष्ट सहने और त्याग करने जैसे ‘अबुद्धिमता’ पूर्ण कदम उठाने के लिए तैयार हो जाता है। देश धर्म के लिए हंसते-हंसते प्राण होम देने वाले- परमार्थ के लिए सब कुछ लुटा देने वाले- आत्म कल्याण के लिए अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य तप साधन दान-पुण्य व्रत उपवास जैसी कष्ट साध्य रीति-नीति अपनाने वाले क्यों इन कार्यों में सन्तोष, आनन्द अनुभव करते हैं? इन समस्याओं का समाधान मस्तिष्कीय संरचना की शरीर के साथ प्रस्तुत संगति को देखते हुए किसी भी प्रकार नहीं दिखता। श्रद्धा भक्ति की-उदार आत्मीयता की- स्थिति किस कारण अन्तःकरण में उत्पन्न ही नहीं, इतनी प्रबल भी होती है कि उस आधार पर शरीर सुख की स्वाभाविक चेष्टा ही उलट जाय।
धर्म, अध्यात्म, संयम, उदारता और कर्तव्य पालन के सिद्धान्त अपनाने से व्यवहारतः मनुष्य घाटे में रहता है। घाटे को न होने देने के लिए ही मस्तिष्क तन्त्र है फिर उस स्वाभाविक संरचना से विपरीत आदर्शवादी तत्व दर्शन क्यों मनुष्य को स्वीकार्य होता है। दूसरों के दुःख में अपने आंसू क्यों निकलते हैं? दूसरों को सुखी देख कर अपने को सुख क्यों होता है? दूर देशों में घटित होने वाली घटनाएं हमें भावनात्मक स्तर पर प्रभावित क्यों करती हैं? मानवतावादी, आदर्शवादी, अध्यात्मवादी उमंगें, महानता की आकांक्षाएं बन कर क्यों अन्तःकरण को मथती और बेचैन दिखाई पड़ती हैं? इन प्रश्नों का उत्तर उन मनोविज्ञानियों के पास नहीं है जो घटनाओं को प्रतिक्रिया स्वरूप चिन्तन तन्त्र की गति-विधियों का निरूपण निर्धारण करते हैं। इसके आगे की अति चेतन स्थिति बहुत ही अद्भुत है और उसके रहस्य समझने में अति कठिनाई उत्पन्न होती है। यों शरीर संरचना के घटकों का क्रिया-कलाप और पारस्परिक योग भी कम विचित्र नहीं हैं। ज्ञानेन्द्रियों के आधार पर जिस प्रकार मस्तिष्क की सूचनाएं मिलती हैं और उस विधान के अनुसार वह स्थिति का स्वरूप निर्धारित करता है वह तन्त्र भी कम विलक्षण नहीं है। शारीरिक और मानसिक हलचलों को मोटे रूप में देखा जाय तो बात दूसरी है अन्यथा थोड़ी गहराई में प्रवेश किया जाय तो प्रतीत होगा कि हमारी सामान्य गति-विधियों के पीछे कितनी असामान्य विधि-व्यवस्था काम कर रही है।
मस्तिष्क सोचने का कार्य करता है। निर्वाह की आवश्यकताएं जुटाने तथा प्रस्तुत कठिनाइयों का समा-धान ढूँढ़ना उसका काम है। उसकी ज्ञान आकांक्षा इसी प्रयोजन के लिए उपयोगी जानकारी प्राप्त करने तक सीमित हो सकती है।
उसके पीछे अचेतन मन की परत है वह रक्त संचार हृदय की धड़कन, श्वास-प्रश्वास, आकुंचन-प्रकुंचन, निमेष-उन्मेष ग्रहण-विसर्जन, निद्रा-जागृति जैसी अनवरत शारीरिक क्रिया-प्रक्रियाओं का स्वसंचालित विधि-विधान बनाये रहता है।
आदतें अचेतन में जमा रहती हैं और आवश्यकता पूर्ति के लिए चेतन मन काम करता रहता है। मोटे तौर पर मस्तिष्क का कार्य क्षेत्र यहीं समाप्त हो जाना चाहिए।
इससे आगे जादू से बने संसार का अस्तित्व सामने आता है। जिसकी अनुभूति तो होती है, पर कारण और सिद्धान्त समझ में नहीं आता। इस प्रकार की अनुभूतियाँ प्रायः अतीन्द्रिय मनः चेतना की होती हैं। भूतकाल की अविज्ञात घटनाओं का परिचय, भविष्य का पूर्वाभास, दूरवर्ती लोगों के साथ वैचारिक आदान-प्रदान, अदृश्य आत्माओं के साथ सम्बन्ध, पूर्वजन्मों की स्मृति, चमत्कारी ऋद्धि-सिद्धियाँ, शाप-वरदान, जैसी घटनाएं अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ मानी जाती हैं। व्यक्तित्व का स्तर भी इसी उपचेतना की परतों में अन्तर्विहित होता है विज्ञानी इसे पैरासाइकिक तत्व कहते हैं। इसके सम्बन्ध में इन दिनों जिस आधार पर शोध कार्य चल रहा है, उसे परामनोविज्ञान-पैरा साइकोलॉजी नाम दिया गया है।
स्थूल और कारण शरीरों के बीच एक सूक्ष्म शरीर भी है। विविध शरीरों में एक स्थूल है जिसमें ज्ञानेन्द्रियों का, कर्मेन्द्रियों का समावेश है। सूक्ष्म को मन, बुद्धि, चित और अहंकार के चार परतों में विभक्त किया गया है। मनोविज्ञानी इसे चेतन और अचेतन मन में विभक्त करते हैं और उसके कई-कई खण्ड करके कई-कई तरह से उस क्षेत्र की स्थिति को समझाने का प्रयत्न करते हैं। कारण शरीर को अन्तरात्मा कहा जाता है संवेदनाएं एवं आस्थाएं उसी क्षेत्र में जमी होती हैं। योगी लोग प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि द्वारा इसी क्षेत्र को जागृति एवं परिष्कृत करने का प्रयास करते हैं।
अतीन्द्रिय क्षमता सूक्ष्म शरीर का-मस्तिष्कीय चेतना का विषय है। इन्द्रिय शक्ति के आधार पर ही प्रायः मनुष्य अपनी जानकारियाँ प्राप्त करता है और उस प्रयास में जितना कुछ मिल पाता है उसी से काम चलाता है। मस्तिष्क ब्रह्माण्डीय चेतना से सम्पर्क बना सकने और उस क्षेत्र की जानकारियाँ प्राप्त कर सकने में समर्थ है। अविकसित स्थिति में उसे ज्ञान सम्पादन के लिए इन्द्रिय उपकरणों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। वे जितनी जानकारियाँ दे पाती हैं उतना ही व्यक्ति का ज्ञान-वैभव सम्भव होता है, पर जब मस्तिष्कीय चेतना का अब के अथवा पिछले प्रयत्नों से अपेक्षाकृत अधिक विकास हो जाता है तो फिर बिना इन्द्रियों की सहायता के ही समीपवर्ती एवं दूरवर्ती घटनाक्रम की जानकारी होने लगती है। इतना ही नहीं ब्रह्माण्ड व्यापी ज्ञान-विज्ञान की असंख्य धाराओं से अपना सम्पर्क बन जाता है। प्रयत्न पूर्वक तो थोड़ा सा धीरे-धीरे ही कमाया जा सकता है, पर यदि किसी अक्षय रत्न भण्डार पर अधिकार प्राप्त हो जाय तो अनायास ही धन कुबेर बना जा सकता है। अन्तरिक्ष के अन्तराल में असंख्य मनीषियों की ज्ञान सम्पदा बिखरी पड़ी है विकसित सूक्ष्म शरीर उस ज्ञान भण्डार से सम्बन्ध मिला सकता है और अपनी जानकारियों का इतना विस्तार स्वल्प समय में ही कर सकता है जितना सामान्य प्रयत्नों में सम्भव नहीं हो सकता।
मनुष्य के उपचेतन मन का पक्षी मस्तिष्क के घोंसले में रहता भर है, पर वह उतने में ही आबद्ध रहने के लिए विवश नहीं है। वह देश और काल का-मर्यादाओं का अतिक्रमण करके हजारों वर्ष पूर्व की-अथवा हजारों मील दूर की घटनाओं को उसी प्रकार देख सकता है मानो वे उसके ठीक सामने घटित हो रही है। मानसोपचार विज्ञानी डॉ0 थेमला मौस ने ठीक ही कहा है कि चेतन मस्तिष्क का दबाव यदि उपचेतन पर से हट जाय और वह स्वच्छन्दतापूर्वक विचरण कर सकने की सुविधा प्राप्त कर सके तो उसके ज्ञान की और गति की क्षमता असीमित बन सकती है।
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उपभोग की इच्छा, कृमि-कीटकों, पशु-पक्षियों और अविकसित प्राणियों में भरी रहती है, उसी से प्रेरित होकर वे अपने विविध क्रिया-कलाप चलाते हैं। पेट की भूख को पूरा करने के लिए जीव-जन्तु अहर्निशि भागते, दौड़ते देखे जाते हैं। प्रौढ़ावस्था में उन्हें प्रजनन की उत्तेजना व्यग्र करती है उसकी है तृप्ति के लिए वे जोड़ा मिलाते हैं और भिन्न लिंग वाले प्राणी के साथ दोस्ती गाँठते हैं। मादा को प्रकृति ने एक और भावनात्मक विशेषता दी है- वात्सल्य इस प्रेरणा से उसे घोंसला बनाने, अंडे सेने और बच्चे पालने का भी झंझट सहन करना पड़ता है। यदि उस जाति के प्राणी में नर-मादा के साथ रहने का प्रचलन रहा तो फिर उसे भी पत्नी को शिशु पालन में सहारा देना पड़ता है। इतनी ही छोटी सीमा में अविकसित पशु-पक्षियों और प्राणियों की जीवनचर्या का आरम्भ और अन्त होता है। शरीर की दो ही भूख हैं पेट और प्रजनन। निकृष्ट स्तर के प्राणी इन दो ही तृप्ति के अतिरिक्त और कुछ और न तो सोचते हैं और न करते हैं। भूख और उसकी तृप्ति को खाते रहने का प्रयास इस एक शब्द में कही कहा समझा जा सकता है।
अविकसित मनुष्य भी इसी परिधि में घूमते हैं। उनके सोचने और करने का घेरा इतना ही सीमित होता है। स्वादेन्द्रिय से लेकर जननेन्द्रिय तक की लिप्साएं-लालसाएं मन में विविध प्रकार के विक्षोभ उत्पन्न करती हैं और उन उद्वेगों के समाधान के लिए कई तरह की गतिविधियाँ अपनानी पड़ती हैं। स्वादिष्ट भोजन पाने-पकाने के लिए रसोईघर का पाक विद्या का विस्तार होता है। एक के बाद दूसरे स्वाद और शकल के व्यंजन बनाये तलाशे जाते हैं। घर में संतोष नहीं होता तो हाट, बाजार और होटलों में पत्ते चाटे जाते हैं। स्पष्ट है कि यह चटोरापन ही स्वास्थ्य सम्पदा का सत्यानाश करता है। रुग्णता और अकाल मृत्यु का ग्रास बनाता है फिर भी स्वाद तो स्वाद ही ठहरा। विकसित कहे जाने वाले अविकसित स्तर के नर पशु के लिए स्वाद की महिमा बहुत बढ़ी-चढ़ी हो गई अन्य प्राणी भूख की तृप्ति के लिए व्याकुल रहते हैं। मनुष्य की विकासोन्मुख विशेषता स्वादेन्द्रिय के चटोरेपन तक बढ़ गई। मूल बात खाने और पेट भरने तक ही सीमित बनकर रह गई।
शरीर की अगली भूख काम चेष्टा है। अन्य प्राणी साथी की तलाश और यौन प्रयोजन पूरा करने उस क्षुधा की तृप्ति कर लेते हैं। मनुष्य ने काम चेष्टा का बौद्धिक विस्तार किया है और बहुत दिनों तक साथ रहने वाले साथी की तलाश और निर्बाध यौन कर्म का विधि विधान बनाया है। विवाह उसी का नाम है। इतने से काम नहीं चला तो बौद्धिक और शारीरिक व्यभिचार के अनेकानेक तरीके ढूँढ़े। नर-नारी साथ साथ रहे तो यौन कर्म के प्रतिफल प्रजनन को भी व्यवस्थित करना पड़ा। नारी को प्रसव और नर को शिशु पालन के आवश्यक साधन जुटाना भी आवश्यक हो गया। बात यौन-कर्म भर की थी, पर उसी की प्रतिक्रिया बच्चे-कच्चों के रूप में सामने आ खड़ी हुई तो समाज व्यवस्था के अनुसार वह उत्तरदायित्व भी वहन करना पड़ा। समीप और साथ रहने के कारण बालकों की कोमलता एवं सुषमा भी सुहाने लगी अतः बन्धन और भी कड़े हुए और घर-परिवार बन गया।
अन्य प्राणी भी यौन कर्म की ऐसी ही क्रिया-प्रतिक्रिया में व्यस्त पाये जाते हैं। मनुष्य ने भी अपने स्तर के अनुरूप इन्हीं दो पशु प्रवृत्तियों का विकास किया है। पेट भरने की साधन सुविधा, तन ढकने विलास विन्यास के साधन जुटाने की अन्य कई दिशाओं में विस्तृत हो गई। यौन कर्म का विस्तार कतिपय काम क्रीड़ाओं एवं विनोद विडम्बनाओं में विकसित हुआ। विवाह परिवार और व्यभिचार इसी यौन लिप्सा का विस्तार है। इन्हीं प्रयासों में लगी हुई बौद्धिक चेतना को खाने की-शरीर तृप्ति की -प्रवृत्ति ही कह सकते हैं। इस क्रियाशीलता की भाव-प्रेरणा को लोभ और मोह कह सकते हैं जननेन्द्रिय प्रतिक्रिया के कारण जिन प्राणियों से सम्बन्ध जुड़ा उन्हें ‘मोह’ की परिधि में ले सकते हैं और पेट पालने से लेकर शरीर संरक्षण के अन्य प्रयोजनों की पूर्ति के लिए आवश्यक साधन जुटाने की प्रवृत्ति को लोभ कह सकते हैं। आमतौर से नर-पशुओं का क्रिया-कलाप इतने तक ही सीमित रहता है।
थोड़ा और बौद्धिक विकास हुआ तो एक नई मस्तिष्कीय भूख जगती है- जिसे अहंकार की तृप्ति कहते हैं। दूसरों की तुलना में अपना बड़प्पन चाहना-इसे अहंता कहा गया है। अहंकार की पूर्ति के लिए मनुष्य ऐसे काम करते हैं जिससे उन्हें दूसरों की तुलना में अधिक सफल और अधिक सम्पन्न कहा जा सके। चूँकि आज धनवान को अधिक सम्मान प्राप्त है इसलिए चेष्टा अधिकाधिक धनी बनने की होती है। इसमें सम्मान के अतिरिक्त अधिक मात्रा-अधिक सुविधाजनक वस्तुओं को प्राप्त करने का अवसर रहता है। धनी व्यक्ति निर्धनों पर अपनी गरिमा की छाप तो डालते हैं, परिवार समेत इसी, धन संपदा के आधार पर अधिक सुखोपभोग किया जा सकता है। अस्तु धन संग्रह की एक अतिरिक्त आकाँक्षा भी मनुष्य में बढ़ी-चढ़ी मात्रा में पाई जाती है जिसे ‘तृष्णा’ कहते हैं।
वैभव का प्रदर्शन करने के लिए-तरह तरह के ठाट-बाट बनाये जाते हैं। शृंगारों, साज-सज्जा का यही प्रयोजन है कि निर्धन और अभावग्रस्त लोग उस वैभव का आतंक मानें और धनवान को अपने से ऊंचे स्तर का समझ कर सम्मान प्रदान करें। कई बार तो गुण्डागर्दी और आतंकवाद का भी उद्देश्य यह अहंकार प्रदर्शन ही होता है। प्राचीन काल में तो युद्ध भी इसी अहंता की सनक पूरी करने के लिए लड़े जाते थे। लूट-खसोट से लेकर रोष-प्रतिशोध भी उन दिनों युद्ध प्रवृत्ति को भड़काते थे, पर मूल कारण आतंकवादी, अहंकार का प्रदर्शन ही रहता था। अब भी लोग इसी प्रवृत्ति से प्रेरित होकर करने न करने योग्य, कृत्य-कुकृत्य करते रहते हैं। कई बार तो धर्माडम्बरों के खर्चीले और कष्टसाध्य प्रदर्शन भी इसी निमित्त किये जाते हैं।
वैभव संचय और अहंकार प्रदर्शन की संयुक्त महत्वाकाँक्षा को ‘तृष्णा’ नाम दिया जाता रहा है। शरीर तृप्ति को प्रवृत्ति की वासना और मानसिक लिप्सा की पूर्ति को तृष्णा कहते हैं। देखा जाता है कि ओछे स्तर का मनुष्य समाज अपनी समस्त क्षमता को इन्हीं दो कार्यों में जुटाये रहता है। खाने और पाने की अभिलाषा ही उसके समस्त क्रिया-कलापों का केन्द्र बिन्दु होता है। इसे पशु प्रवृत्ति से एक कदम भी ऊंचा स्तर नहीं कहा जा सकता है। पशु शारीरिक और मानसिक क्षमताओं की दृष्टि से पिछड़ा होता है, इसलिए उसके प्रयास भी उतने ही छोटे और क्षणिक होते हैं। मनुष्य चूँकि विकसित स्तर का है इसलिए उसने न केवल शारीरिक सुखोपभोग के दो आधार पेट और प्रजनन का विकास विस्तार किया है, वरन् अहंता की मानसिक क्षुधा विकसित करके तृष्णा पूर्ति के साधन जुटाये हैं। यों वह तृष्णा, अहंता अन्य प्राणियों में भी पाई जाती है। मधुमक्खियाँ और चींटियाँ संग्रह करना जानती हैं और सर्प, सिंह आदि को अहंकारी आक्रोश प्रकट करते सदा ही देखा जाता है। दहाड़ते, चिंघाड़ते नर वर्ग के प्रौढ़ प्राणी प्रायः अपना अहंकार ही व्यक्त करते हैं कई बार तो वे इसी प्रवृत्ति से प्रेरित होकर मल्ल-युद्ध की चुनौती भी देते हैं।
सृष्टि के अन्य प्राणियों से मनुष्य को जो विशिष्टता प्रदान की गई है वह उसकी शारीरिक बौद्धिक गरिमा नहीं वरन् भावनात्मक महानता है। शरीर की दृष्टि से मनुष्य कितने ही प्राणियों से पिछड़ा है। उसमें जलचरों और नभचरों जैसी डूबने, तैरने या उड़ने की विशेषता कहाँ है। थलचरों में भी घोड़े जैसे दौड़ने वाले-हाथी जैसे विशालकाय और सिंह जैसे पराक्रमी कितने ही प्राणी हैं जो मनुष्य की शारीरिक क्षमता को सहज ही चुनौती दे सकते हैं। मानसिक दृष्टि से-इन्द्रिय उत्कृष्टता की दृष्टि से छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़े तक मनुष्य से कहीं आगे हैं। गन्ध का आश्रय लेकर छोटे कीड़े अपनी जीवनचर्या चलाते हैं। कुत्ते की घ्राण क्षमता से सभी परिचित हैं। चमगादड़, मकड़ी, मधुमक्खी, चींटी, दीमक जैसे तुच्छ प्राणियों की मानसिक विशेषताएं देखकर दंग रह जाना पड़ता है। इनमें से कितनों को तो वर्षा, सूखा ऋतु परिवर्तन से लेकर भूकम्प आदि का भी पूर्वाभास रहता है। इन विशेषताओं का लेखा-जोखा लिया जाय तो मनुष्य को इन प्राणियों की तुलना में पिछड़ा हुआ ही पाया जायगा। वह बन्दर की तरह न तो पेड़ों पर रहकर जीवनयापन कर सकता है और न चूहे की तरह बिलों में ही उसका गुजारा है। बर्फ में रहने वाले सफेद भालू, पेन्गुइन पक्षी जितनी क्षमता भी तो उसमें नहीं है। बिना दिशा यन्त्र या घड़ी की सहायता के हजारों मील लम्बी यात्रा करने और अपने स्थानों की लौट आने वाले पक्षियों जैसी विशेषताएं उसमें कहाँ हैं?
मनुष्य की अपनी महानता और विशेषता एक ही है भावनात्मक उत्कृष्टता। वह खाने में नहीं खिलाने में रस लेता है और उसी से अपनी महानता को सन्तुष्ट परिपुष्ट करता है। दूसरों को दुःख पाते देखकर स्वयं दुःखी हो उठना और पिछड़े हुओं की-पीड़ितों की सहायता के लिए हाथ बढ़ाना जिसके लिए अनिवार्य और अपरिहार्य हो जाय उसे ही मानवी विशेषता से सम्पन्न कहना चाहिए। ‘करुणा’ को मानवी उत्कृष्टता का अविच्छिन्न अंग कह सकते हैं। हिमालय के उच्च शिखर पर जमा हुआ बर्फ पिघल कर निचले क्षेत्र की जल आवश्यकता को पूरा करने के लिए नदी निर्झरों के रूप में बहता है। इस बहाव में प्रकृति की करुणा को बहता हुआ देखा जा सकता है। बादलों में से ऊपर से जल राशि के रूप में यह करुणा ही बहती है। वृक्षों में से पत्र पुष्प और फलों के उत्पादन को अभावग्रस्त आवश्यकता की पूर्ति के लिए करुणा का विकास ही कह सकते हैं। घास इसी उद्देश्य को लेकर उगती और जीवित रहती है कि उससे प्राणियों की क्षुधा पूर्ति का साधन बन सके।
आत्मा का गुण है-आत्मीयता। आत्मीयता का अर्थ है-अपनी विशेषताओं और परिस्थितियों से दूसरों को सजाने, संजोने की प्रवृत्ति। हमें जो वैभव मिला है उसे मिल बाँटकर खाने के लिए यह आत्मीयता ही प्रेरित करती है। अपना आपा शरीर तक सीमित न रहकर जब अधिकाधिक क्षेत्र में विकसित होता है तो उसे आत्म विस्तार कहते हैं। आत्म विकास ही मानव जीवन का लक्ष्य है। अपूर्णता का अर्थ है सीमाबद्धता और पूर्णता का तात्पर्य है सीमा का अधिकाधिक विस्तार। शरीर और परिवार तक सीमाबद्ध रहना उतने ही क्षेत्र के सुख-दुःख में दिलचस्पी रखना यह बताता है कि चेतना को स्वार्थ भरी संकीर्णता ने भव बन्धनों में अवरुद्ध करके रखा है। आत्म विस्तार जिस क्रम से जितना होगा उतनी ही आत्मीयता की परिधि बढ़ती जायगी। जो आत्मीय होते हैं उनके दुःख बंटाने और सुख बढ़ाने की आकांक्षा स्वभावतः उमगती है। जिसके अन्तःकरण में असंख्यों को अपना मानने की भाव चेतना जग पड़े समझना चाहिए कि आत्मीयता की महान आध्यात्मिक विभूति का वरदान इसे उपलब्ध होने लगा।
आत्मा को परमात्मा का पद तब प्राप्त होता है जब वह अपनी लघुता को महानता में विसर्जित करता है और स्वार्थ को परमार्थ की सीमा तक बढ़ाता है। जिसे परमार्थ ही स्वार्थ प्रतीत होने लगे समझना चाहिए उसे आत्म विस्तार का अध्यात्म अनुदान मिलना आरम्भ हो गया। नर को नारायण- पुरुष को पुरुषोत्तम बनने के लिए आत्म-विकास की मंजिल पूरी करनी पड़ती है। सीमित से असीम बनना पड़ता है। ‘‘अपने में सबको और सब में अपने को’’ देखने का दृष्टिकोण ही तत्वज्ञान है। इसी को ब्रह्म-विद्या एवं आध्यात्मिकता का सार कह सकते हैं। पेट प्रजनन की और अहंता की परिधि से ऊँचे उठकर जब संसार के पिछड़ेपन को हटाने के लिए अपने समस्त साधनों को नियोजित करने की करुणा जगे तो समझना चाहिए कि महान मानवता का प्रकाश अन्त:करण में उठा। जब शरीर और परिवार से आगे बढ़कर समस्त संसार को समुन्नत बनाने के लिए सक्रिय सद्भावना उमंगे तो कहना चाहिए मानवी गरिमा का उत्कर्ष हो चला। यही है मानव जीवन का लक्ष्य- जिसे पाये बिना किसी का भी अन्तरात्मा सुखी सन्तुष्ट नहीं हो सकता।
पैसे की गरीबी उतनी दुःखदायी नहीं जितनी कि प्रगति के लिए आकुलता की कमी। जो अपनी दुर्दशा से सन्तुष्ट है उनके लिए सुखद अवसर कहाँ से- कैसे और क्यों आवेगा?
-डेलकार नेगी
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क्षुद्र और महान में अन्तर यह होता है कि क्षुद्र व्यक्ति अत्यन्त छोटे दायरे में अपने आपको सीमाबद्ध करके सोचता है और उसी छोटी परिधि में अपनी विचारणाएं, आकाँक्षाएं एवं गतिविधियाँ सीमित रखता है। अपने शरीर को ही प्रायः क्षुद्र व्यक्ति अपना समझते हैं। उसी के व्यसन, मनोरंजन, प्रदर्शन के लिए तरह-तरह के साधन जुटाने में लगे रहते हैं। इन्द्रिय लिप्सा उन्हें परमप्रिय होती है- जीभ का चटोरापन, यौन लिप्सा, उत्तेजन दृश्य और आकर्षक श्रवण, आराम तलबी, मौज-मजा, मस्ती, मटर गश्ती- जैसी शरीर साधना में परायणता होती है कि अपना दूरगामी हित साधन भी दृष्टि से ओझल हो जाता है। स्वास्थ्य खोखला हो चले-अकाल मृत्यु से मरना पड़े इसकी चिन्ता नहीं, लोकनिन्दा, परलोक पतन-जैसे संकट आयें परवाह नहीं-हर हालत में, हर कीमत पर-उचित-अनुचित का विचार किये बिना इन्द्रिय लिप्सा, इन्द्रिय वासना पूरी होती रहनी चाहिए।
जो एक कदम और आगे बढ़ पाते हैं उन्हें स्त्री से यौन लिप्सा एवं रूप आकर्षण के कारण प्रीति हो जाती है। वह बच्चे जनती है। ममता अपने शरीर से बढ़ाकर स्त्री, बच्चों को भी अपनेपन की सीमा में ले आती है। अथवा वे विनोद आकर्षण एवं सुविधा, व्यवस्था के कारण सह्य अभ्यस्त होते-होते आवश्यक बन जाते हैं। ऐसी दशा में भी वे भी किसी कदर अपने जैसे लगते लगते हैं, ममता के बन्धन उनसे भी बंध जाते हैं, मोह उनसे भी जुड़ जाता है, उनके लिए सुविधा, साधन जुटाने-संग्रह जोड़ने-जमाने की बात सोची जाने लगती है। यों गहराई के साथ देखा जाय तो प्रेम उनसे भी नहीं होता। प्रेम का फलितार्थ सदा प्रेमी का हित-साधन करने की ही बात सोचता रहा है। पर क्षुद्र व्यक्ति न तो प्रेम जैसी किसी वस्तु से परिचित होते हैं और न प्रेमी के लिए क्या किया जाना चाहिए यह समझते हैं। स्त्री जिस दिन से घर में आती है उसी दिन से उसका जीवन रस नष्ट भ्रष्ट करने में लगते हैं और कुछ ही दिनों में उसे यौन रोगों की दुर्बलता की आग में जलने के लिए झोंक देते हैं। बच्चे पर बच्चे पैदा करते जाते हैं, यह नहीं सोचते कि इस असहाय अबला के शरीर में कितने प्रजनन करने की-कितनों को दूध पिलाने और पालन करने की शक्ति है। उसके कन्धों पर असह्य वजन लादते हैं और अन्ततः उसका शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य चौपट हो जाता है, जिन्दगी भर कराहते, कलपते दिन गुजारती है। दाम्पत्य जीवन की वफादारी तो थी नहीं, उसके कर्तव्य उत्तरदायित्वों का बोध था नहीं- ऐसी दशा में पत्नी का यौवन उभार ढलते ही इधर-उधर ताक झाँक शुरू हो जाती है। आरम्भिक दिनों में पत्नी के प्रति जो भाव दिखाये गये वे उनके लिए वह बेचारी तरसती ही रहती है। रोटी, कपड़ा दिया जाता रहे बात दूसरी है। घर की रखवाली करने वाली चौकीदारिन जैसा जीवन जीती है। यों कहने को वह अपनी पत्नी है, पर उसके व्यक्तित्व की प्रगति के लिए, स्वावलम्बन एवं स्वास्थ्य विकास के लिए सोचने की कभी आवश्यकता नहीं समझी गई। उससे अधिक से अधिक लाभ उठाना बस इतना ही दृष्टिकोण रहा। ऐसी दशा में गम्भीरता से देखा जाय तो अपनी वास्तविक ममता पत्नी के प्रति भी नहीं थी। मूल में तो अपने ही शारीरिक स्वार्थ काम करते थे। पत्नी तो उनकी पूर्ति का निकटवर्ती माध्यम मात्र रही।
यही बात बच्चों के सम्बन्ध में है। उन्हें खिलाने, पिलाने, अमीरी, ठाट-बाट, सजाने में रुचि इसलिए रही कि अपनी अमीरी की छाप दूसरों पर पड़े और अपने अहंकार की पूर्ति होती रहे। बच्चों के व्यक्तित्व का विकास अभिभावकों के प्रगाढ़ स्नेह पर निर्भर रहता है। उन्हें जैसा बनाना, ढालना हो उसके लिए घर का वातावरण विनिर्मित करना पड़ता है। अपने को वैसा ही साँचा बनना पड़ता है जिसमें ढलकर बच्चे सुसंस्कृत बन सकें। बालकों को दिया जा सकने वाला सबसे महत्वपूर्ण उपहार यही हो सकता है कि अभिभावक उन्हें गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता प्रदान करे उन्हें सुसंस्कृत बनायें। यह प्रयोजन उन्हें किसी महंगे स्कूल में भेजने से पूरा नहीं हो सकता। अभिभावक स्वयं उस प्रकार के साँचे बनें और बालकों को उसमें ढालें तो ही उनका वास्तविक हित साधना हो सकता है। सुसंस्कारी बालक अपनी प्रतिभा से स्वावलम्बी जीवन जी सकते हैं अनेकों को सहारा दे सकने योग्य हो सकते हैं। कुसंस्कारी सन्तान के लिए दौलत छोड़ मरना उन्हें दुर्गुणी, दुर्व्यसनी और आत्मघाती बनाने का ही पथ प्रशस्त करना है।
आमतौर से क्षुद्र मनुष्य स्त्री बच्चों के साथ ऐसी ही दुष्ट ममता का परिचय देते हैं। नस-नस में भरी क्षुद्रता उन्हें इससे आगे की बात सोचने ही नहीं देती। स्त्री पर वासना का दबाव-औलाद पर दौलत का दबाव वस्तुतः उनके साथ अपराध भरा आचरण ही है, पर क्षुद्र मनुष्य इसी को उन पर लादा गया अहसान मानते हैं। प्रेम तत्व का यदि ज्ञान रहा होता तो स्त्री, बच्चे ही प्रेम भाजन बनकर थोड़े ही रह जाते। तब माता-पिता, भाई-बहिन भी उसी परिधि में आते और वह ममता, प्रेम-भावना, सहायता परिवार के अन्य लोगों को भी उपलब्ध रही होती। मित्र, परिचित, पड़ौसी अन्य लोग भी उससे लाभ उठाते। अभावग्रस्तों और पिछड़े लोगों को भी उस उदारता का लाभ मिलता। पर क्षुद्रता ने कभी ऐसा करने नहीं दिया। जो कुछ सोचा गया, जो कुछ किया गया अत्यन्त छोटी स्वार्थ संकीर्णता की परिधि में ही सीमित रहा।
उपार्जन, श्रम, व्यवसाय में भी जब संकीर्ण स्वार्थ का आधिपत्य रहता है तब वह कर्तव्य, धर्म, नीति, न्याय, औचित्य आदि का तनिक भी विचार नहीं करता। पिटाई से बचने की तरकीबें ढूँढ़ कर वह हर प्रकार के छल, कुकर्म करने में निरत रहता है। दूसरों पर क्या बीतेगी इसकी परवाह किये बिना अपना ही लाभ कमाते रहने का नाम ही अपराध प्रवृत्ति है। चोर, डाकू, उचक्के, ठग यही सब तो करते हैं। जो दुस्साहसपूर्वक यह कर गुजरते हैं और पकड़े जाते हैं उन्हें अपराधी कहते हैं। जो चतुरता से- लुक-छिपकर यही सब करते रहते हैं उन्हें क्रिया कुशल और बुद्धिमान कहा जाता है। आज हर व्यवसाय में-हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार संव्याप्त है। इसका कारण कोई ऐसी मजबूरी नहीं है जिससे ऐसा करने के लिए विवश ही होना पड़े, वरन् वह क्षुद्रता है जो अपने शरीर के अतिरिक्त और किसी को भी-यहाँ तक कि अपने जीवन-लक्ष्य और परलोक को भी अपना नहीं मानने देती। तात्कालिक भौतिक और निजी लाभ ही सब कुछ रहता है। अपने मन की परिधि इतनी ही छोटी रहती है। यह क्षुद्रता ही नर-कीटकों की, नर-पशुओं की, पतित पामरों की निशानी है। आज शिक्षित और अशिक्षित, सम्पन्न और विपन्न सब इसी नरक में सड़ रहे हैं।
समस्त पापों की, समस्त विग्रहों की, समस्त उलझनों की जननी यह क्षुद्रता ही है। यह जब तक जन मानस में बसी और घुसी रहेगी तब तक क्षण-क्षण में- पग-पग पर विविध आकार-प्रकार की समस्याएं और विपत्तियाँ सामने आती रहेंगी। यदि सुख-शान्ति की अपेक्षा हो तो भावना क्षेत्र में जमी हुई इस विष वेलि की जड़ उखाड़नी पड़ेगी। मनुष्य को अधिक विस्तृत-अधिक व्यापक, अधिक उदार, अधिक दूरदर्शी बनाना पड़ेगा। अध्यात्म का-धर्म का समस्त ढाँचा इस एक ही प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। उपासना और साधना की, प्रक्रिया व्यक्ति की मनःस्थिति को व्यापक बनाने के लिए ही रची गई है। आत्मवत् सर्वभूतेषु की, विश्व परिवार की मान्यता ही आत्म विस्तार का आत्म कल्याण का प्रयोजन पूरा करती है। व्यक्तिगत सुख-सुविधा को पद दलित करके उन्हें परमार्थ प्रयोजनों के लिए नियोजित करना इसी का नाम परमार्थ साधना है। व्यक्ति का स्वार्थ जितना व्यापक होता है उतना ही वह परमार्थी बनता है। परमार्थी को ही ईश्वरभक्त, अध्यात्मवादी, महामानव तत्वदर्शी आदि का दूसरा नाम दिया जाता है। आत्मा का दायरा जिसने असीम बना दिया-परम कर लिया वही परमात्मा है। जिसने संकीर्ण स्वार्थपरता से छुटकारा पा लिया समझना चाहिए उसे जीवन मुक्ति का लाभ मिल गया।
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‘दि अदर वर्ल्ड’ ‘जर्नीज आऊट आफ दि बॉडी’ आदि ग्रन्थों में इस प्रकार की अनेक घटनाओं का वर्णन है- जिसमें आत्माओं ने अपने शरीर को छोड़ कर सूक्ष्म शरीर के सहारे बहुत कुछ देखा और बहुत कुछ किया है। इन घटनाओं से इस तथ्य पर प्रकाश पड़ता है कि अशरीरी आत्माओं का किन्हीं दूसरों के शरीर में प्रवेश करके उनसे कुछ विशेष कार्य करा लेना सम्भव है। इसी प्रकार यह भी सम्भव है कि सूक्ष्म शरीर स्वयं इतना परिपुष्ट हो जाय कि शरीर धारी की तरह स्वयं ही अपने क्रिया-कलाप का परिचय दे सके।
अरविन्द आश्रम की संचालिका माता जी के बारे में कहा जाता है कि वे अपने बाल्यकाल में देह से आत्मा को बाहर निकाल कर सूक्ष्म शरीर से दूर-दूर की यात्राएं करती थीं।
परा मनोविज्ञान वेत्ता प्रो0 मुलडोन ने अपने ग्रन्थ ‘दि प्रोजेक्शन आफ एस्ट्रेल बॉडी” में परकाया प्रवेश के सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए बताया है कि एक ‘रजत तन्तु’ से आत्मा अपने स्थूल शरीर से सम्बन्ध बनाये रख कर भी अन्यत्र किस प्रकार जा सकता है और क्या कर सकता है?
हमारे शरीर का प्रत्येक भाग कोशिकाओं से बना है। एक इंच जगह में 6 हजार कोशिकाएं समा जाती हैं। प्रत्येक कोशिका के भीतर प्रोटोप्लाज्म नामक पतला चिकना पदार्थ भरा रहता है। यह प्रोटोप्लाज्म वायु-खींचता व कार्बन (दूषित वायु) बाहर फेंकता है। इस तरह हमारे शरीर के लाखों-करोड़ों प्रोटोप्लाज्म हमारी साँस के साथ साँस लेते हैं। प्रोटोप्लाज्म में एक ‘न्यूक्लियस’ होता है। वैज्ञानिक उसे ही जीवन का आधार मानते हैं। नई कोशिकाएं बनाने की उसी में क्षमता होती है। जब न्यूक्लियस निर्बल होने लगता है, तो प्रोटोप्लाज्म भी सूखने लगता है और एक दिन प्रोटोप्लाज्म से मूल चेतना गायब हो जाती है। वह कहाँ चली जाती है, यह अभी वैज्ञानिक नहीं समझ सके हैं।
वीर्य का प्रत्येक ‘सेल’ पिता के और माता की प्रत्येक डिम्बकोश (आवेम) माता के सभी गुणों को धारण किए रहती है। सूक्ष्म रोगों, तक का वीर्य के प्रत्येक ‘सेल’ में प्रभाव होता है। ‘सेल्स’ के ‘नाभिक’ में अचेतन के समस्त भावों का प्रभाव रहता है। यानी व्यक्ति के समस्त संस्कारों की छाप प्रत्येक सेल में होती है।
संस्कारों के इतने सूक्ष्म ‘सेल्स’ में भी पूर्णतः विद्यमान होने और उनका एक शरीर से दूसरे शरीर में संप्रेषण सम्भव होने का यह सिद्धान्त स्पष्टतः पुनर्जन्म के सिद्धान्त की भी युक्ति-युक्तता प्रतिपादित करता है। जिस तरह वीर्य के सेल के साथ सूक्ष्म संस्कार जाते हैं उसी तरह जीवात्मा के साथ भी वे बने रहते हैं और पुराने शरीर से नये शरीर में जाते हैं।
आधुनिक वैज्ञानिकों की मान्यता है कि सम्भवत मृत्यु के समय शरीरस्थ ‘प्रोटोप्लाज्म’ शरीर से पृथक् हो मिट्टी राख आदि में मिल जाते हैं और वहाँ से वनस्पतियों, फसलों आदि में पहुँच जाते हैं। वनस्पतियों, फसलों, पेड़-पौधों की पत्तियों, फूलों और फलों-दानों आदि में वे सन्निहित रहते हैं। इन पत्तियों, फूलों, फलों-अनाज आदि को गुण-साम्य के अनुरूप भेड़-बकरी, कुत्ता, बैल-गाय-भैंस, कौआ-तोता, मनुष्य आदि खाते हैं और उनके द्वारा ‘प्रोटोप्लाज्म’ शरीर के भीतर पहुँच जाते हैं। यही ‘प्रोटोप्लाज्म’ ‘जीन्स’ में समाहित रहते हैं और नये शिशु के साथ पुनः जन्म लेते हैं। इस प्रकार पूर्व शरीर के प्राणी का प्रोटोप्लाज्म ही नये शरीर के साथ जन्म लेता है।
शिशु के स्मृति पटल में पहुँच कर जब कभी कोई प्रोटोप्लाज्म जाग्रत हो उठता है, तो उससे सम्बन्धित पूर्वजन्म की घटनाएं भी याद आ जातीं हैं। इस तरह पुनर्जन्म प्रोटोप्लाज्म का होता है, आत्मा का नहीं! लेकिन इधर आत्मा सम्बन्धी खोजें वैज्ञानिकों को अपना पूर्वाग्रह परिवर्तित करने को प्रेरित कर रही हैं।
विलियम मैण्ड्रगल ने आत्मा के बारे में तरह-तरह से वैज्ञानिक खोजें की हैं। उन्होंने एक ऐसा तराजू तैयार किया, जो पलंग पर पड़े रोगी का ग्राम के हजारवें हिस्से तक वजन ले सके। उस पर एक मरणासन्न रोगी को लिटाया। कपड़े सहित पलंग का वजन, फेफड़े की साँसों का वजन, सब ले लिया। रोगी का वजन भी लिया और दी जाने वाली दवाइयों का भी। रोगी जब तक जीवित रहा। तराजू की सुई एक ही स्थान पर टिकी गई। वह 1 ओंस यानी आधा छटाँक वजन कम बता रही थी। फिर कई रोगियों पर यह प्रयोग किया गया। एक चौथाई से डेढ़ अंश तक वजन में कमी पाई गई। इससे मैण्ड्रगल ने निष्कर्ष निकाला कि शरीरस्थ कोई सूक्ष्म तत्व ही जीवन का आधार है। विभिन्न निरीक्षणों, प्रयोगों द्वारा उन्होंने उसका सामान्य औसत भार भी निकाला।
डॉ0 गेट्स ने कालापन लिए लाल सी यानी वनफशई रंग की किरणें खोजी हैं। इन किरणों का प्रकाश मनुष्य आंख से नहीं देख सकता, पर कमरे की दीवारों पर ‘रोडापसिन नामक पदार्थ का लेप कर उस पर ये किरणें फेंकी गईं, तो उसका रंग बदल गया। ये किरणें हड्डी, लकड़ी, पत्थर, धातु को पार करके चमकने लगती हैं, पर इन किरणों को दीवार पर डाला जाए और बीच में कोई मनुष्य आ जाए, तो दीवार पर उसकी छाया दिखेगी यानी ये किरणें जीवित प्राणी का शरीर नहीं भेद सकतीं।
डॉ0 गेट्स ने इन प्रकाश- किरणों को तत्काल मरे पशुओं की आँखों से प्राप्त किया है। एक मरणासन्न चूहे को गिलास में रखकर ये किरणें फेंकी गईं। दीवार पर उस चूहे की छाया पड़ी। पर जैसे ही चूहे के प्राण निकले, एक छाया गिलास से निकली और मसाला लगी दीवार की तरफ लपकी। वह कुछ ऊपर तक गई और लुप्त हो गई। अब दीवार पर चूहे की छाया नहीं थी यानी चूहे का मृत शरीर उन किरणों के लिए पारदर्शी हो चुका था। परीक्षा के समय दो अध्यापक भी मौजूद थे। उन्होंने भी मृत्यु क्षण में छाया को ऊपर नीचे-जाते व सहसा लुप्त होते देखा। अब डॉ0 गेट्स का प्रयास है कि यह जाना जाए कि छाया जब शरीर से निकलती है-लुप्त होने के लिए तो उस समय उसमें ज्ञान रहता है या नहीं।
इन किरणों के लिए चूहा जीवित अवस्था में पारदर्शी क्यों नहीं था? गेट्स ने उत्तर के लिए गैलवानों मीटर से उन किरणों की शक्ति तथा मानवीय देह में संचालित विद्युत तरंगों की शक्ति को मापा व बताया कि शारीरिक बिजली की शक्ति अधिक है।
जीवित स्थिति में शारीरिक विद्युत प्रवाह तीव्रतर होने से ये किरणें शरीर से टकराकर लौट जाते हैं, शारीरिक विद्युत प्रवाह उन्हें धकेल देता है। निष्प्राण होने पर ऐसी कोई बाधा बचती नहीं और किरणें शरीर को भेद जाती हैं।
डॉ0 गेट्स शरीर की विद्युत शक्ति को ही आत्मा की प्रकाश-शक्ति मानते हैं।
फ्रांस के डॉ0 हेनरी वाराहुक ने अपनी मरणासन्न पत्नी एवं बच्चे पर प्रयोग कर मृत्यु के फोटो लिए तो कुछ रहस्यमय किरणों के चित्र प्राप्त हुए। डॉ0 एफ॰ एम॰ स्ट्रा ने तो इस तरह का सार्वजनिक प्रदर्शन ही किया, जिसमें अखबारी प्रतिनिधियों ने भी चित्र लिए और रहस्यमय किरणों के चित्र प्राप्त किए।
अमरीका में विलसा क्लाउड चेम्बर द्वारा आत्मा के अस्तित्व सम्बन्धी अनेक प्रयोग किए गए हैं। यह चेम्बर एक खोखला पारदर्शी सिलेण्डर है। इसके भीतर से हवा पूरी तरह निकालकर, भीतर रासायनिक घोल पोत देते हैं। इससे सिलेण्डर में एक मन्द प्रकाशपूर्ण कुहरा छा जाता है। इस कुहरे से यदि एक भी इलेक्ट्रॉन गुजरे तो फिट किए गये शक्ति सम्पन्न कैमरों द्वारा उनका फोटो ले लिया जाता है। सिलेण्डर में होने वाली हर हलचल का चित्र आ जाता है।
इस चेम्बर में जीवित चूहे और मेंढक रखकर बिजली के करेंट से उनको प्राणहीन किया गया। देखा गया कि मरने के बाद चूहे या मेंढक की हूबहू शक्ल उस रासायनिक कुहरे में तैर रही है। उस आकृति की गति विधियाँ सम्बन्धित प्राणी के जीवनकाल की ही गतिविधियों के अनुरूप थी। क्रमशः यह सत्ता धुंधली होती जाती है फिर कैमरे की पकड़ से बाहर चली जाती है।
लन्दन के प्रसिद्ध डॉ0 डब्लू0 जे0 किल्लर ने एक पुस्तक लिखी है-‘दि ह्यूमन एटमास्फियर’। इसमें उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण तथ्य गिनाकर भौतिक विज्ञान को इन चुनौतियों से जूझने का आह्वान किया है। एक तथ्य यह है-अपने सेन्ट जेम्स अस्पताल में डॉ0 किल्लर ने रोगियों के परीक्षण के दौरान एक दिन खुर्दबीन पर एक दुर्लभ रासायनिक रंग के धब्बे देखे। यह रंग आया कहाँ से, वे व्यग्रता से खोज करने लगे।
दूसरे दिन इसी रासायनिक रंग की लहरें उन्होंने एक रोगी की जाँच करते समय शीशे से देखीं और चौंक पड़े। रोगी के सभी कपड़े हटा दिए फिर देखा-रोगी के छह सात इंच की परिधि में वही लहरें एक आभामण्डल बनाए हैं। वह प्रकाश किसी भी शारीरिक अस्वस्थता का परिणाम नहीं था। प्रकाशमण्डल मन्द पड़ रहा था। डॉ0 किल्लर सतर्क हो गये। रोगी मरणासन्न था। जैसे-जैसे प्रकाश मण्डल मन्द पड़ता गया, रोगी शिथिल होता गया। सहसा वह प्रकाश जाने कहाँ खो गया। डॉ0 किल्लर ने देखा, रोगी निष्प्राण हो चुका था। अब उस ठण्डे शरीर के आस पास कहीं कोई रासायनिक रंग शेष नहीं रहा था। इस घटना की रिपोर्ट छपी तो लोग चकित रह गये।
वार्कले, कैलीफोर्निया (अमरीका) में कार्यरत डॉ0 लीसनेला और उनके साथियों ने इस विषय पर न केवल खोज की है, बल्कि ‘साइकोसिस और ट्रान्सेन्डेन्स?’ शीषेग् एक लेख में ‘द रिबर्थ प्रासेस’ (पुनर्जन्म प्रक्रिया) की गहरी छानबीन व दस्तावेजों से भरी व्याख्या भी प्रस्तुत की है।
डॉ0 सनेला के समूह ने शीजोफ्रेनिया, मेनिअक, डिप्रेसन (एक अवधि के लिए मानसिक उन्माद की स्थिति आ जाना फिर सामान्य मनःस्थिति, इसी तरह अनवरत क्रम) तथा मानसिक असन्तुलन जन्य अन्य रोगों के रोगानुसन्धानों का विवरण देते हुए यह तथ्य प्रदर्शित किया है कि उनमें से अधिकाँश उच्चतर मानसिक विकास की प्रक्रिया वाले वे लोग हैं, जो विराट आन्तरिक शक्तियों के अपरिपक्व तथा असन्तुलित प्रस्फुटन के कारण इस स्थिति में पहुँचे हैं। सनेला- समूह के अनुसार विकास की यह स्थिति वस्तुतः मानसिक रोग नहीं है बल्कि ‘पुनर्जन्म-प्रक्रिया’ की ओर यह गति मात्र है।
पहले विज्ञान पदार्थ की चार अवस्थाएं ही जानता था- ठोस, द्रव, गैस और प्लाज्मा। प्लाज्मा मात्र बाह्य अन्तरिक्ष में विद्यमान है, किन्तु भौतिकी प्रयोगशालाओं में भी उसे अत्युच्च तापमान पर उत्पादित किया जा सकता है।
प्रो0 ग्रिश्चेन्को के अनुसार जैव प्लाज्मा में इयान्स स्वतन्त्र इलेक्ट्रान और स्वतन्त्र प्रोटान होते हैं, जो कि नाभिक से स्वतन्त्र अस्तित्व रखते हैं। यह तीव्र संचालक है और दूसरे अवयवों या जीवधारियों में शक्ति के संग्रहण, रूपांतरण तथा संवहन में सक्षम होता है। यह मनुष्य के मस्तिष्क में और सुषुम्ना नाड़ी में एकत्रित रहता है। यह अत्यधिक दूरियों को तीव्र गति से लाँघ सकता है और इस तरह टेलीपैथी, मनोवैज्ञानिक और मनोगति की प्रक्रियाओं से सम्बन्धित है।
इस अनुसन्धान के बाद, सोवियत विज्ञान ने तेजी से इस क्षेत्र में प्रगति की है। अपने प्रयोगों के दौरान रूसियों ने अत्यधिक विकसित उपकरणों का उपयोग किया उच्च वोल्टेज वाली फोटोग्राफी की प्रक्रिया जिसमें इलेक्ट्रानिक माइक्रोस्कोप भी शामिल हों, क्लोज-सर्किट टेलीविजन तथा माशेन पिक्चर, टेक्नीक का उपयोग, जिसे एस0 डी0 कीर्लियन और व्ही0 के0 कीर्लियन ने विकसित किया है। रेडिएशन-फील्ड फोटोग्राफी को रूसी “कीर्लियन औरा’’ कहते हैं। इनके द्वारा प्रो0 ग्रिश्चेन्को की ‘बायो प्लाज्मा’ और उसके भारतीय समतुल्य ‘सूक्ष्म शरीर’ तथा उसमें परिव्याप्त प्राण आवरण की अवधारणाओं की पुष्टि होती है। इस तरह यह अज्ञात ईथर तत्व के जगत में वैज्ञानिकों द्वारा अति महत्वपूर्ण भौतिक आधारों की खोज है।
सोवियत रूस के प्रसिद्ध अन्तरिक्ष केन्द्र के पास अत्माअता में कजाकिस्तान राज्य विश्वविद्यालय की जैव विज्ञान प्रयोगशाला के निर्देशक डॉ0 ह्वी0 एम0 इन्युशिन पी0 एच0 डी0 ने अपने एक शोधपत्र में कहा है कि उच्चस्तरीय विशेषीकृत तथा क्लिष्ट विधियों के द्वारा अत्युच्च संवेदना वाली कीर्तियन-फोटोग्राफिक प्रक्रियाओं द्वारा पहले खरगोश और बाद में मनुष्यों के फोटोग्राफ लिए जाने पर, सोवियत वैज्ञानिक ‘बायोप्लाज्मा’ तथा शरीर के चारों ओर उसकी परिव्याप्ति (झीनी चादर) की फोटो लेने में सफल रहे हैं। कीर्लियन फोटोग्राफों से पता चलता है कि जैविक-प्रकाश (चमक) का कारण जैव प्लाज्मा है। इनका आकार होता है और इनमें ध्रुवीय छोर होते हैं।
प्रयोगों से प्रमाणित होता है कि-
(1) प्लाज्मा मस्तिष्क में सर्वाधिक सघन है।
(2) सुषुम्ना नाड़ी और उसकी स्नायविक कोशिकाएं बायोप्लाज्मा गतिविधियों के केन्द्र हैं।
(3) यह अंगुलियों के छोर तथा सूर्य चक्र कीं पीठ में अधिक सुदृढ़ होता है।
(4) रक्त की तुलना में स्नायुओं के केन्द्रों में अधिक प्लाज्मा होता है।
नेत्र तीव्र विकिरण के स्रोत हैं। (इससे पता चलता है कि हिप्नोटिस्ट क्यों अपने सब्जेक्ट की आँखों में गहराई तक झाँकते हैं और इस तरह अपने विचारों से उसे प्रभावित करते हैं।)
डॉ0 इन्सुशिन स्पष्ट करते हैं-अपनी प्रयोगशाला में हमने लगातार प्रयोग किये हैं- यह जानने के लिए कि क्या बायोप्लाज्मा का (प्राण शक्ति का) वास्तविक अस्तित्व है। हम जानते हैं कि प्रत्येक जीवधारी के पास एक ऐसी प्रणाली है जो शक्ति का विकरण करती है और अपने चारों ओर एक क्षेत्र (सूक्ष्म शरीर) तैयार करती है।
किन्तु हम जीवधारियों की शक्ति- प्रक्रिया को बहुत कम जानते हैं, विशेषकर टेलीपैथी में, जबकि दो व्यक्ति एक ऐसी दूरी पर रहते हुए एक साथ परस्पर सम्बद्ध क्रियाएं करते हैं कि उसकी प्रक्रिया परंपरागत साधनों द्वारा ठीक से समझाई नहीं जा सकती।
एक जीवित देहधारी को एक जैविक क्षेत्र कहा जा सकता है, जिसमें एक दूसरे को प्रभावित करने वाली शक्तिधाराओं का अस्तित्व हो। इन जैविक क्षेत्रों द्वारा विनिर्मित हैं-इलैक्ट्रोस्टेटिक, इलैक्ट्रोमैग्नेटिक, हाइड्रोडायनमिक, श्रव्य तथा सम्भवतः ऐसे अनेक क्षेत्र भी, जिनके बारे में हम अभी नहीं जानते। बायो-प्लाज्मा इनमें से किसी एक क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है।
मनुष्य की विभिन्न शरीर क्रिया वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं की जाँच की गई। देखा गया कि सुषुम्ना नाड़ी का केन्द्र, अनेक स्नायविक कोशिकाओं के गुच्छों के साथ (चक्र) जैव-प्लाज्मीय सक्रियता का केन्द्र है। बायो-प्लाज्मिक सक्रियता ‘भूड़’ पर निर्भर देखी गई। उदाहरणार्थ कलाकार किसी कलाकृति के बारे में सोचते समय उच्चस्तरीय चेतना की स्थिति में थे। यानी उनका ‘कोरोना’ अत्यन्त प्रकाशवान था, जबकि कुण्ठित, तनावग्रस्त व्यक्ति का ‘कोरोना’ बहुत पतला था तथा उसमें कई काले धब्बे थे।
शरीर में जैव प्लाज्मीय (बायो-प्लाज्मिक) क्षेत्र की सापेक्ष स्थिरता के बावजूद बायोप्लाज्मा के द्वारा शक्ति का एक महत्वपूर्ण अंश अन्तरिक्ष में विकीर्ण होता है। यह माइक्रोस्टीमर्स के रूप में हो सकता है या फिर ‘बायो-प्लाज्माइड्स के रूप में। माइक्रो स्टीमर्स हवा के द्वारा बनने वाले बायो-प्लाज्मिक अवयवों के स्रोत हैं, जबकि बायोप्लाज्माइड्स बायो प्लाज्मा के वे टुकड़े हैं, जो शरीर से अलग हो गये हैं (यानी वे कॉस्मिक-चेतना को मानवीय चेतना से जोड़ने के स्रोत हैं।)
एक अन्य प्रख्यात वैज्ञानिक जर्मनी के प्रो0 विलहेमरीच भी प्राण शरीर के अस्तित्व में भारतीय सिद्धान्त का, मानवीय देह की एक प्रतिकृति के अस्तित्व के रूप में समर्थन करते हैं। वे इसे ‘आर्गोन’ कहते हैं यानी एक जैव विद्युतीय शक्ति, जो नीले रंग की है।
सोवियत खोज को अमेरिकी वैज्ञानिकों के सामने प्रस्तुत करते हुए, शैला आस्ट्रेन्डर तथा लिन स्क्रोडर ने लिखा है, “सोवियतों को ऐसा साक्ष्य मिल गया प्रतीत होता है कि समस्त जीवधारियों में शक्ति का कोई साँचा, एक प्रकार का अदृश्य शरीर अथवा भौतिक शरीर को परिवृत करने वाला कोई प्रकाश पिंड होता है।’’
“इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की आँखों से इन वैज्ञानिकों ने प्रशान्त उच्चस्तरीय ‘फ्रीक्वेन्सी’ पर कोई ऐसी वस्तु निरन्तर ‘डिस्चार्ज’ होते देखी है, जो पहले ‘क्लेयर वोमेन्टस’ (भविष्यदृष्टा) ही देख पाते थे। उन्होंने जीवित देह में एक जीवित प्रतिकृति को गतिवान देखा है।
“यह प्रतिकृति क्या है? यह एक समग्र एकीभूत देह ही है।” जो एक इकाई की तरह काम करती बताई जाती है। यह अपने स्वयं के विद्युत चुम्बकीय क्षेत्रों का अतिक्रमण करती है तथा जीव वैज्ञानिक क्षेत्र का यह आधार है।
यह जैविक प्रकाश पिंड, जो कीर्लियन चित्रों में देखा जा सकता है, बायोप्लाज्मा के द्वारा विनिर्मित है। कजाक वैज्ञानिकों के अनुसार इस कम्पनशील रंगीन, शक्ति-शरीर की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि उसकी एक विशिष्ट स्थानिक संरचना है। उसमें आकार है तथा वह पोलराइण्ड भी है (यानी उसमें घोर भी है)।
यह हैं कुछ निष्कर्ष जो पदार्थ विज्ञान के आधार पर मरणोत्तर जीवन की सम्भावनाओं पर प्रकाश डालते हैं और शरीर त्यागने के उपरान्त भी जीवात्मा का अस्तित्व बना रहने की मान्यता का समर्थन करते हैं। किन्तु यह यों तो तथ्य का एक छोटा और भोंड़ा पक्ष है। वस्तुतः उस संदर्भ में दूसरे आधार पर नये सिरे से विचार करना होगा। विशाल ब्रह्माण्ड का लघुत्तम घटक अणु-अण्ड है। दोनों के सघन समन्वय पर ही इस संसार की विविध हलचलों की व्याख्या विवेचना सम्भव होती है। भौतिकी का सुविस्तृत शास्त्र इन्हीं शोध प्रयोजनों में संलग्न रहता है। यह विश्व का स्थूल आवरण हुआ उसका प्राणतत्व उस सूक्ष्मसत्ता के रूप में जाना जाता है जिसे ब्रह्माण्डीय चेतना अथवा ब्रह्म तत्व कहते हैं। विराट् ब्रह्म का लघुतम घटक जीव है। जीव और ब्रह्म के बीच होने वाले आदान-प्रदान पर ही चेतनात्मक हलचलों का आधार खड़ा है। जीव ब्रह्म में से ही उदय होता है और अन्ततः उसी में उसे लय भी होना पड़ता है। भौतिकी को आवरण विवेचना कहा गया है और ब्रह्म विद्या को चेतना का तत्वदर्शन। दोनों के अपने-अपने क्षेत्र हैं और अपने-अपने प्रयोजन। जिस दिन भौतिकी की तरह ब्रह्मविद्या का भी सुनिश्चित एवं प्रामाणिक शास्त्र बन कर तैयार हो जायगा उसी दिन जीव सत्ता और ब्रह्म सत्ता का पारस्परिक सम्बन्ध सम्पर्क ठीक प्रकार समझा जा सकेगा। ऋषियों ने अपने ढंग से दार्शनिक पृष्ठभूमि पर ब्रह्मविद्या का ढाँचा खड़ा किया था आज उन निष्कर्षों का समर्थन प्रत्यक्षवादी आधारों पर किये जाने की युग अपेक्षा है सत्य तो सत्य ही है। तथ्य तो तथ्य ही है। उन्हें इस आधार पर भी सिद्ध किया जा सकता है और उस आधार पर भी। ब्रह्म सत्ता को प्रत्यक्षवादी आधार ब्रह्माण्डीय चेतना के रूप में। दोनों का तारतम्य बैठ रहा है। आशा की जननी चाहिए कि अगले ही दिन जीव चेतना के सम्बन्ध में अनेकों महत्वपूर्ण निष्कर्ष प्रत्यक्षवादी पृष्ठभूमि पर भी प्रस्तुत हो सकेंगे तब सर्वसाधारण के लिए मरणोत्तर जीवन के अस्तित्व के तथ्य को सिद्ध कर सकना भी कुछ कठिन न रह जायगा।
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प्रायः किसी को हानि पहुँचाने के लिए-किसी के साधनों एवं व्यक्तित्व का अपहरण करने के लिए ही आक्रमण किये जाते हैं। इसलिए उन्हें बुरा कहा जाता है, उनकी निन्दा की जाती है और आक्रमणकारियों को अपराधियों की पंक्ति में खड़ा करके दण्डित प्रताड़ित किया जाता है। समाज को आक्रमण की नीति असह्य है। प्रत्येक के नागरिक अधिकार सुरक्षित रहने चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के सम्मान और उपार्जन पर किसी दूसरे को आक्रमण नहीं करना चाहिए यह सभ्य समाज की मान्यता है। इसे अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए समाज व्यवस्था, कानून व्यवस्था एवं दण्ड व्यवस्था का निर्धारण किया गया है। यह औचित्य एवं विवेक की मर्यादा है कि हर व्यक्ति अपना जीवनयापन स्वेच्छा से करे तो सही, पर साथ ही यह भी ध्यान रखे कि वह किसी दूसरे से टकराता तो नहीं-किसी को अनीति-युक्त क्षति तो नहीं पहुँचाता। व्यक्ति विशेष को अथवा समाज व्यवस्था को-सार्वजनिक सम्पत्ति को क्षति पहुँचाना भी गर्हित है। किसी को यह छूट नहीं मिल सकती कि वह अपनी सुविधा के लिए दूसरों के अधिकारों का अपहरण करे और अवाँछनीय रीति-नीति अपनाकर अपने बड़प्पन का ठाठ बनाये। सामान्यतया नागरिक शास्त्र, राजनीति शास्त्र, समाजशास्त्र, धर्मशास्त्र की विविध निर्धारणाएं इसी सन्तुलन को बनाये रखने के लिए हुई हैं।
अहिंसा को अध्यात्म मर्यादा का अति महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। उसका तात्पर्य इतना ही है कि किसी के उचित अधिकार अथवा सम्मान पर आक्रमण न किया जाय। जीव हिंसा या चोट पहुँचाना तो प्रत्यक्ष हिंसा है ही, अप्रत्यक्ष हिंसा किसी की अवमानना, उपेक्षा करना भी है। छल करके अपना स्वार्थ सिद्ध करना एवं दूसरों को हानि पहुँचाना भी हिंसा है। यद्यपि उसमें मार-पीट जैसा कुछ नहीं होता। दूसरों को बहकाना, भ्रम में डालना, अनैतिक परामर्श-प्रोत्साहन देना, कुमार्गगामी बनाना, बुरी आदतों में फंसाना, मनोबल गिराना, अन्धकारमय भविष्य के चित्र दिखाकर खिन्न –उद्विग्न कर देना, डराना, हिंसा है। विवशता के कारण कोई अनैतिक दबाव, अनिच्छा रहते हुए भी करने के लिए बाध्य हो जाय ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करना भी हिंसा है। इस प्रकार की गतिविधियों में खून-खराबी या मार-पीट नहीं होती किन्तु दूसरों को भटकने या पतित करने का पथ प्रशस्त होता है। ऐसे आचरण हिंसा वर्ग में गिने जायेंगे।
मनुष्य एक दूसरे की सहायता ऊंचे उठने-आगे बढ़ने और सुखी बनाने के लिए करते रहें यही धर्म मर्यादा है। वैयक्तिक और सामाजिक कर्त्तव्यों का ठीक तरह पालन किया जाता रहे तो ही दूसरों को बिना क्षति पहुँचाये सज्जनता भरा जीवन निर्वाह हो सकता है। मनुष्य एकाकी नहीं है, वह समाज यन्त्र का पुर्जा मात्र है। व्यक्ति की असंख्य आवश्यकताएं दूसरों की सहायता से ही पूरी होती है। अपने बलबूते दैनिक जीवन में उपस्थित होती रहने वाली आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो सकती। भोजन, वस्त्र, आजीविका एवं उपयोग में आने वाले छोटे-छोटे पदार्थों के लिए उसे दूसरों के श्रम तथा उपार्जन पर निर्भर रहना पड़ता है। इस सहयोग शृंखला की एक कड़ी स्वयं को भी बनना चाहिए और जिस प्रकार सहकारिता के सद्भावनाओं के उदार आधार विकसित होते रहें ऐसा ही दृष्टिकोण एवं आचरण रखा जाना चाहिए। इसी को सदाचरण एवं सद्व्यवहार कहते हैं। सज्जनता एवं शालीनता यही है। अध्यात्म की भाषा में इसी को अहिंसा कहते हैं। अहिंसा निषेधात्मक शब्द है अच्छा होता इसे प्रेम अथवा सद्भाव, उदार, सहकारिता कहा जाता और उसकी व्याख्या अधिकार से अधिक कर्त्तव्य का ध्यान रखने की रीति-नीति के रूप में की जाती।
हिंसा का अर्थ मारकाट या खून-खराबी मानने तक सीमित कर देने से उस उच्चस्तरीय तत्व दर्शन की एक प्रकार से मिट्टी पलीद हो जाती है और उपहासास्पद दुर्दशा बन जाती है। बौद्ध धर्मानुयायी बकरे को मुँह बाँधकर गला मरोड़ कर मारते और उसका माँस पकाकर खाते हैं। उनकी अहिंसा मान्यता इतने भर में पूर्ण हो जाती है कि किसी प्राणी के शरीर से रक्त न टपके। इतनी ही बात हो तो अफीम जैसा कष्ट रहित विष देकर किसी का प्राण हरण कर लेने में भी हिंसा नहीं मानी जायगी।
दूसरी ओर यह भी अहिंसा का अतिवाद है कि साँस या पानी के माध्यम से पेट में पहुँचने वाले अदृश्य जीवाणुओं की रक्षा करने की बात सोची जाय। ऐसे तो अन्न, शाक एवं वनस्पतियों में भी जीवन है। कृषि योग्य जमीन में रहने वाले जीवाणु ही वनस्पति बनते हैं और हमारे जीवन का आधार रहते हैं। “जीवों जीवस्य भोजनम्” उक्ति का तात्पर्य इतना ही है कि जीवन युक्त खाद्य पदार्थ प्राणियों का आहार है। यहाँ माँसाहार का समर्थन नहीं। मात्र इस तथ्य का प्रतिपादन है कि प्राणियों के शरीर जीवन युक्त पदार्थों के सहारे टिके रहते हैं। वनस्पति में जीवन का होना तो स्पष्ट है। उनमें ज्ञान सम्वेदनाएं न्यूनतम होती हैं वे हमारी तरह न तो मरण कष्ट अनुभव करते हैं और न जीवन की हमारे जैसे विकसित स्तर की प्रसन्नता होती है, फिर कुछ होती भी हो तो विवशता है। वनस्पति को उदरस्थ करके जीवित रहा जाय अथवा अन्न, जल और वायु में रहने वाले जीवाणुओं का ध्यान रखकर इनका उपयोग छोड़ा जाय और जीवन समाप्त किया जाय? इस प्रश्न के समाधान में जीवन रक्षा को ही प्रधानता देनी पड़ती है और उसे प्रकृति व्यवस्था मानकर सन्तोष करना पड़ता है। वनस्पति आहार एवं जल ग्रहण में भी हिंसा मानी जाय तो उसे न्यूनतम अनिवार्य अपरिहार्य मानकर अंगीकार करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं।
रास्ता चलते पैरों के नीचे छोटे कीड़े-मकोड़े अनजान में ही मर जाते हैं, चूल्हा जलाने में-खेत जोतने, पौधे सींचने में भी अवश्य ही कुछ दृश्य-अदृश्य कीड़े अनजान में ही मरते होंगे। इनकी रक्षा अपने जीवन को निष्क्रिय बनाकर अथवा अन्त करके ही की जा सकती है। इतने आगे की बात सोचना भावनात्मक दृष्टि से प्रतीक रूप में तो हो सकता है, पर पूर्णतया पालन सम्भव नहीं। पानी छानकर पीने या नाक पर पट्टी लटकाने से भी सूक्ष्म जीवाणु भीतर नहीं जायेंगे इसकी कोई गारण्टी नहीं। रास्ते झाड़ते हुए चलने पर भी उस झाड़ने की क्रिया से भी हिंसा होती-हो सकती है। इसलिए भाव प्रतीक के रूप में ही ऐसी रक्षा पंक्ति खड़ी तो की जा सकती है, पर वस्तुतः इस प्रकार की अति अहिंसा व्यावहारिक नहीं हो सकती।
हिंसा वस्तुतः एक वृत्ति है जिसमें प्राणि मात्र के प्रति न्याय का उद्देश्य जुड़ा है। किसी को कष्ट होने न होने के रूप में उसकी व्याख्या होने लगे तब तो वह स्थूल परिभाषा ऐसा धर्म संकट उत्पन्न कर देगी जिसे आत्महत्या के अतिरिक्त और किसी प्रकार सुलझाया न जा सकेगा।
डाक्टरों को नित्य ही इन्जेक्शन लगाने पड़ते हैं और आये दिन छोटे-बड़े आपरेशन करने पड़ते हैं। इन्हें हिंसा कहा जाय या अहिंसा? न्यायाधीश को मृत्यु दण्ड जैसे फैसले करने पड़ते हैं और बन्दीगृह के अधिकारियों को उस कठोर कर्म की व्यवस्था करनी पड़ती है। उन न्यायाधीशों और जेल अधिकारियों को क्या कहा जाय? सामाजिक सुरक्षा, न्यायनिष्ठा एवं अव्यवस्था निवारण के लिए की गई हिंसा के सम्बन्ध में शास्त्र की उक्ति है “वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति” अर्थात् विवेक की दृष्टि से न्यायोचित आधार पर किसी को दिया गया कष्ट वस्तुतः हिंसा की श्रेणी में नहीं आता। ऐसे तो पुलिस को लाठी चार्ज और सेना को गोलाबारी भी करनी पड़ती है। यह आत्मरक्षा के लिए-न्याय रक्षा के लिए औचित्य बनाये रहने के लिए किया गया बलप्रयोग किन्हीं को कष्टकर भी हो सकता है, पर उससे अहिंसा के आदर्श को कोई क्षति नहीं पहुँचती।
कुछ हिंसा कर्म प्रत्यक्ष होते हैं और उन्हें अपनी ओर से भी करना पड़ता है, पर वे अनिवार्य हैं- न किये जायं तो आत्म रक्षा भी सम्भव न हो सकेगी। घर में बस गये साँप, बिच्छुओं को प्रेमपूर्वक विदा करने का कोई उपाय नहीं है। उन्हें हटाने के लिए मारने की आवश्यकता पड़ सकती है। घर में बढ़े हुए मक्खी, मच्छरों का क्या किया जाय? कपड़ों और बालों में पड़ने वाले जुएं तथा चारपाइयों में घूम हुए खटमलों से कैसे निपटा जाय। इसका अहिंसात्मक समाधान ढूँढ़ा जाय तो एक ही हल निकलेगा कि अपने आपको जोखिम में डालकर बेमौत मरा जाय?
आँतों में कई बार आँखों से दिख पड़ने वाले कीड़े पाये जाते हैं। जख्मों में पड़ने वाला मवाद कीटाणुओं द्वारा उत्पन्न की गई सड़न प्रतिक्रिया ही है। उसमें ‘माइक्रोस्कोप’ से विषाणु रेंगते हुए प्रत्यक्ष देखे जा सकते हैं। प्रायः प्रत्येक रोग में विषाणुओं की उपस्थिति पाई जाती है और उन्हीं को मारने के लिए समस्त चिकित्सा उपचार किये जाते हैं। यदि शाब्दिक हिंसा-अहिंसा के फेर में पड़ा जाय तो पूरे का पूरा चिकित्सा कार्य एवं औषधि निर्माण कार्य हिंसा कृत्य ठहराया जा सकता है।
आक्रमणकारी आततायियों से जूझना आवश्यक है। अन्यथा वे दुष्टता का प्रतिरोध न होने पर अधिकाधिक उद्दण्ड होते चले जायेंगे और अपनी विनाशलीला को चरम सीमा तक पहुँचाये बिना रुकेंगे नहीं। हिंस्र जन्तुओं के प्रति दया पाली जाय तो वे असंख्य निरीहों का प्राण हरण करेंगे। एक हिंसा रुकी और हजार हिंसा करने का कठोर निर्णय करना पड़ेगा। आक्रमणकारी आततायियों का मुँह तोड़ने के लिए यदि प्रत्याक्रमण करना पड़ता है तो उसका आपत्ति धर्म की तरह पालन करना ही पड़ेगा।
अहिंसा धर्म के प्रबल प्रतिपादक महात्मा गाँधी कहते थे- ‘‘कायरता से हिंसा अच्छी” वे अनीति का प्रत्येक सम्भव निराकरण चाहते थे। अहिंसा द्वारा वैसा हो सकता हो तो सर्वोत्तम अन्यथा यदि अनीति और हिंसा में से एक का चुनाव करना पड़े तो अनीति सहने की अपेक्षा हिंसा जैसे कदम उठाये जा सकते हैं। यही उनका प्रतिपादन था। गाँधी जी ने एक बार अति कष्ट पीड़ित असाध्य एक बछड़े को आसानी से प्रयाण कर सकने की सुविधा देने के लिए डॉक्टर को जहर की सुई लगा देने की इजाजत दे दी थी। वह प्रत्यक्षतः हिंसा ही हुई, पर उसमें उस मरणासन्न प्राणी की अति पीड़ा को सरल बनाने की करुणा का ही भाव था इसलिए उसे अहिंसा के स्तर पर ही रखा जायगा।
जीवित रहने के लिए आक्रमणकारी कृमि-कीटकों से लेकर आक्रमणकारी हिंस्र आततायियों से जूझने और उन्हें निरस्त करने की आवश्यकता पड़ती है। निर्वाह की अनिवार्य आवश्यकताओं में अन्न, जल, वायु, आग आदि को गिना जा सकता है उनके उत्पादन उपयोग में भी किन्हीं छोटी जाति के कृमि कीटकों का हनन हो सकता है। यह अनिवार्य हिंसा है। आततायी आक्रमणकारियों से जूझना वैदिकी हिंसा है। उसमें न्याय एवं औचित्य की रक्षा करने की दूरदर्शी विवेकशीलता जुड़ी हुई है। ऐसी हिंसा मानवी मर्यादाओं को तथा सामाजिक सुव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए करनी पड़ती है। इसमें कुछ अवाँछनीय तत्वों को कष्ट हो सकता है, पर सार्वजनिक सुरक्षा का उद्देश्य पूरा करने वाले उस कठोर कृत्य को भी मान्यता देनी पड़ती है।
अहिंसा एक आदर्श एवं दृष्टिकोण है। जिसमें दूसरों के सम्मान तथा अधिकार को अक्षुण्ण रहने देने की दृढ़ता का समावेश है। उसमें आत्मीयता, सहनशीलता, करुणा एवं उदारता का समावेश है। अपने कष्ट की ही तरह यदि दूसरों के कष्ट को भी माना जाय, अपनी क्षति की तरह ही यदि दूसरों की क्षति भी आँकी जाय तो सहज ही उस तरह की नीति अपनानी पड़ेगी जैसी कि हम दूसरों द्वारा अपने प्रति अपनाये जाने की अपेक्षा करते हैं। अहिंसा का मोटा अर्थ दूसरों को कष्ट न देना होता है, पर यह तभी व्यावहारिक होगा जब उसमें अनिवार्य जीवन रक्षा, औचित्य एवं आक्रान्ताओं को निरस्त करने के लिए अपनाई गई हिंसा को भी आपत्ति धर्म के रूप में स्वीकार सम्मिलित कर लिया जाय।
अहिंसा में किसी को न मारना तो है ही, कुविचार मात्र हिंसा है, मिथ्या भाषण हिंसा है, किसी का बुरा चाहना भी हिंसा है।
-गाँधी जी
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प्यार शब्द में असीम मृदुलता और सुखद सम्भावना भरी पड़ी है। सद्भाव और सद्व्यवहार की सघनता को प्यार कहते हैं। जिनके साथ इस प्रकार के आश्वासन का आदान-प्रदान चल पड़े, उन्हें स्नेह सूत्र में आबद्ध हुआ कहा जा सकता है। मैत्री यों समवयस्कों में अधिक फवती है, पर वह इतने तक ही सीमित है। आयु, पद, वैभव, वर्चस्व आदि में असाधारण अन्तर होने पर भी वह निर्बाध रूप से निभती है। अन्तर इतना भर होता है कि दोनों पक्षों की स्थिति के अनुरूप उसके स्वरूप एवं व्यवहार में थोड़ा सा अन्तर आ जाता है। इतने पर भी मूल स्थिति यथावत् बनी रहती है।
बड़े और छोटे के बीच पनपने वाली मैत्री वात्सल्य एवं श्रद्धा के नाम से जानी जाती है। बड़े, छोटों के प्रति वात्सल्य भाव रखते हैं और छोटों को बड़ों के प्रति श्रद्धा रहती है। सेवक और स्वामी के बीच भी गहरा सद्भाव और वफादारी का सुदृढ़ आधार बना रह सकता है, उनकी यह ‘मैत्री अनुराग या ऐसे ही किसी नाम से पुकारी जा सकती है। सघन मित्रता तो घनिष्ठ सम्पर्क क्षेत्र में कुछ ही व्यक्तियों तक सीमित रहती है, पर सौजन्य असंख्य लोगों तक विस्तृत हो सकता है। आत्मवत् सर्वभूतेषु- वसुधैव कुटुम्बकम् के आदर्शानुसार वह मानव मात्र की परिधि तक सीमित न रह कर प्राणि मात्र तक व्यापक हो सकती है। श्रुति अनुशासन है कि हम मैत्री की आँख से सब को देखें। इस प्रकार का दृष्टिकोण अपना लेने पर आत्मीयता इतनी विस्तृत बन जाती है कि उसके आँचल में इस समस्त संसार को ढका जा सके।
आदान-प्रदान के क्षेत्र में मित्रता, लाभ और लोभ के आधार पर प्रारम्भ होती है और उपलब्धियों के आधार पर घटती-बढ़ती रहती है। ग्राहक और व्यापारी के बीच प्रधानतया इसी कारण घनिष्ठता पनपती है और पीछे उसमें स्वभाव की समता एवं व्यक्तिगत सद्व्यवहार का खाद पानी लगते रहने पर पौधा और भी अधिक तेजी से पनपता रहता है। वर्ष प्रवेश में कलेण्डर आदि उपहार तथा दिवाली, क्रिसमस जैसे त्यौहारों पर ‘ग्रीटिंग कार्ड’ आदि भेजने में-चाय पर बुलाने तथा जाने में-मिलने पर स्वागत सत्कार पर कुछ खर्च करने में प्रायः मित्रता की अनुभूति उभारना ही प्रधान कारण रहता है। समान व्यसन के लोग भी स्वभाव गत आकर्षण से मित्र बन जाते हैं। नशेबाजी, आवारागर्दी, खिलाड़ीपन, व्यभिचार, जुआ, शौकीनी आदि पतनोन्मुख एवं सत्संग, सहगान सेवा सहकार, साम्प्रदायिक समता जैसे कारणों से प्रगतिशील मैत्री पनपती देखी गई है। किसी आपत्ति से बचा लेने अथवा उन्नति में विशेष सहायता कर देने पर भी मित्रता का बीजाँकुर जम जाता है और यदि उसका सिंचन होता रहे तो कृतज्ञता की अनुभूति के साथ वह बढ़ता भी रहता है।
गुण, कर्म, स्वभाव की समता सहज ही मित्रता के रूप में परिणत हो जाती है भले ही वह उथले स्तर की सिद्ध होती हो। समता में कई प्रकार की आकर्षक सम्भावनाएं जुड़ी रहती हैं। समर्थन, सहकार एवं आदान-प्रदान की अधिक गुंजाइश समान स्तर के लोगों में ही होती है। अस्तु ‘चोर-चोर मौसेरे भई की उक्ति ऐसे प्रसंगों में सहज ही चरितार्थ होने लगती है। रूप, यौवन, वेश-विन्यास, सज-धज आँखों में मादकता उत्पन्न करती है। और सुन्दरता के ऊपर मन अनायास ही टूट पड़ता है। वाणी की मधुरता, मृदुल व्यवहार बहुधा अपना आकर्षक प्रभाव छोड़ता है। गीत, वाद्य, नृत्य, साहस, चातुर्य, कला-कौशल जैसे गुणों में भी ऐसा खिंचाव रहता है। जिसके आधार पर अपरिचितों तक के बीच बात की बात में मित्रता हथेली पर सरसों की तरह जादुई रीति से जमती, उछलती देखी गई है। भले ही वह पानी के बुलबुले की तरह देखते-देखते ही समाप्त क्यों न हो जाय।
प्यार भौतिक कारणों से भी हो सकता हैं, पर उसमें न तो स्थायित्व है, न गहराई, न तृप्ति। साधारणतया नर और नारी के बीच प्रकृति प्रेरणा से उत्पन्न यौनाकर्षण ही प्यार के नाम से बहुचर्चित है। शृंगारिकता से लेकर अश्लीलता तक की पृष्ठभूमि पर इसी की विरुदावलियाँ गाई जाती हैं। कला क्षेत्र में प्रायः इसी तत्व का साम्राज्य है। गायक इसी के गीत गाते-वादक इसी पर बजाते और अभिनेता इसी के अभिनय करते देखे जाते हैं। मूर्तिकार, चित्रकार, गीतकार, साहित्यकार अपनी-अपनी कलाकृतियों में वासना भड़काने वाली मांसलता को उभारने और भड़काने में संलग्न पाये जाते हैं। यदि प्रेम का यही आधार है तो फिर वासना तृप्ति की तरह क्षुधा-तृप्ति का उपक्रम भी प्रेम ही कहा जायगा। जिह्वा इन्द्रिय को सुस्वादु भोजनों में कितनी सरसता अनुभव होती है और पाक-विद्या के अन्तर्गत इस प्रयोजन के लिए की जाने वाली दौड़-धूप और जुटाया गया सरंजाम भी प्रेम प्रसंग ही कहा जायगा। अन्यान्य इन्द्रियाँ भी अपने रुचि क्षेत्र पर इसी प्रकार का दावा कर सकती हैं। तब कदाचित हिंस्र पशुओं द्वारा कोमल माँस वाले प्राणियों का रुचिपूर्वक उदरस्थ करना भी, इस श्रेणी के क्रिया-कलापों में गिने जाने में आना-कानी करने की भी गुंजाइश न रहेगी।
प्रेम वस्तुतः भौतिक नहीं आत्मिक है वह पदार्थ-परक नहीं। शरीरों समेत अन्यान्य पदार्थों के प्रति जो आकर्षण दृष्टिगोचर होता है-उसमें लोभ और लाभ की ललक ही प्रधान रूप से काम कर रही होती है। अस्तु पदार्थों की उत्पत्ति, वृद्धि, शिथिलता, परिवर्तन एवं समाप्ति का उपक्रम उसमें चलते रहना भी स्वाभाविक है। ऐसा ही होता भी रहता था। तथाकथित मैत्रियाँ बरसाती उद्रिजों की तरह उपजती-अपने क्षेत्र को काटती कचोटती रहती है और शरद की तनिक सी परीक्षा सामने आते ही अपने अस्तित्व को समाप्त कर लेती है। यौनाचार सहित अन्यान्य भौतिक कारणों से उत्पन्न हुई घटाटोप जैसी मैत्री का अन्त भी इन्द्रधनुष की तरह देखते-देखते ही होता रहता है।
आत्मा का सहज गुण आत्मीयता है। यह सनातन और शाश्वत है। उसमें स्थायित्व है। क्योंकि वह आदर्शों पर टिकी होती है और प्रतिदान का पोषण पाये बिना भी एकाकी अपने पथ पर अड़ी-खड़ी रहती है। माता का अपने शिशु के प्रति ऐसा ही वात्सल्य देखा जा सकता है। बच्चा अपनी माँ को कोई प्रतिदान नहीं दे पाता उलटे हर घड़ी गड़बड़ी और कठिनाई ही उत्पन्न करता रहता है। इतने पर भी माँ के दुलार में किसी प्रकार की कमी नहीं आती। बच्चे की हरकतों से जो असुविधा उत्पन्न होती है उसका उसे न तो बुरा लगता है और न अखरने वाला दबाव ही अनुभव होता है। माता अपने पक्ष को पूरी तरह निभाती रहती है। उसके वात्सल्य की अजस्र वर्षा में कहीं कोई त्रुटि दिखाई नहीं पड़ती। वयस्क होने पर बच्चे उपेक्षा, कृतघ्नता, अवज्ञा और दुष्टता बरतते भी देखे गये हैं, फिर भी माँ की ममता में बहुत बड़ा अन्तर नहीं आता। ऐसे ही आदर्श प्रेम की साधना भक्तियोग के अन्तर्गत की जाती है। पाषाण प्रतिमाओं की पूजा अर्चा करने वाले न तो प्रतिदान पाते हैं और न प्रत्युत्तर। फिर भी वे एकाँगी-एकाकी उपासना श्रद्धा पूर्वक अपनाये रहते है।
स्नेह विशुद्ध रूप से आत्मिक उत्कृष्टता की सहज सुलभ झाँकी है, जिसे दूसरे शब्दों में आत्म-विकास की प्रक्रिया कह सकते हैं। अविकसित स्थिति में ‘अहम्’ मात्र शरीर तक सीमित रहता है। उस स्थिति में पेट और प्रजनन में ही रुचि रहती है। वासना और तृष्णा के अतिरिक्त और कुछ रुचता ही नहीं। तब लोभ और मोह की समस्त हलचलों के केन्द्र बने होते हैं। अहंता का परिपोषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के आडम्बर रचे जाते रहे हैं। इन्हीं इच्छाओं की पूर्ति में अविकसित मनुष्य आतुर रहता है और उसके लिए नीति-अनीति की मर्यादायें तोड़कर कुछ भी कर गुजरने पर उतारू हुआ देखा जाता है। किन्तु जब अन्तरात्मा विकासोन्मुख होती है तो उसका ‘आपा’ अपना क्षेत्र विस्तार करता चला जाता है। निकटस्थ लोगों से आरम्भ होकर उसकी परिधि दूरस्थ लोगों तक फैलती चली जाती है, तब थोड़े से ही स्वजन सम्बन्धी नहीं रहते वरन् उस आँचल में अगणितों को आश्रय मिलता चला जाता है।
सच्चा प्यार आत्मा की अपनी सुविकसित स्थिति है। उसमें दूसरे का आकर्षण बहुत ही कम मात्रा में प्रभावोत्पादक होता है। सहज सौजन्य की ममता और शुचिता की सत्प्रवृत्तियाँ ही आत्मीयता की निर्झरिणी बन कर प्रवाहित होती हैं और उसमें अनेकानेकों को अपनी तृष्णा जलन बुझाने का अवसर मिलता रहता है। परमात्मा की तरह आत्मा भी अहेतुकी अनुकंपा बरसाते हुए अपनी गरिमा का परिचय देती रहती है। सकारण नहीं वरन् अकारण ही वर्षा ऋतु की तरह स्नेह सलिल बरसाते रहना आत्मवानों का सहज आचरण होता है।
उत्कृष्टता जुड़ी रहने के कारण आत्मीयता में जहाँ सघन सद्भाव और उदार सहयोग का प्रवाह बहता है। वहाँ हित कामना भी पूरी तरह जुड़ी रहती है ऐसी दशा में दुलार की तरह सुधार का उपक्रम भी चलता रहता है। यही उचित भी है और आवश्यक भी। माता के संतुलित व्यवहार में इन दोनों तत्वों का समुचित समावेश रहता है। वह बालक को असीम प्यार करती है, पर वह होता एक आँख से ही है। दूसरी आँख वह सुधार के लिए सुरक्षित रखती है। बच्चा बड़ा होता जाता है साथ ही उसमें कई प्रकार के सम्पर्क एवं संस्कार जन्य दोष उभरते आते है। उन्हें सुधारने संभालने के लिए कुशल माता उतनी ही प्रयत्नशील रहती है, जितनी कि दुलार के साथ सहायता करने के लिए। हाँ इतना अवश्य होता है कि यह सुधार प्रक्रिया रोष-आक्रोश से, द्वेष-दुर्भाव से सर्वथा अछूती रहती है और उसमें सहृदय चिकित्सक जैसी करुणा के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता।
मित्रता के प्रमुख लक्षणों का उल्लेख करते हुए रामायण में कहा गया है-‘‘कुपथ निवारि सुपंथ चलावा” गुण प्रकटै अवगुणहिं दुरावा।” मित्र को जहाँ स्नेह सहकार दिया जाना है वहाँ उसे कुपथ से विरत करने की दृष्टि भी प्रखर रखे जाने की आवश्यकता है। मित्र के गुणों को उभारने और दुर्गुणों को निरस्त करने का प्रयास भी हितवादी मित्रता के कर्त्तव्यों में ही सम्मिलित है।
स्वभावतः मनुष्य अपनी रूचि का समर्थन और स्वार्थों का पोषण चाहता है। न्याय और औचित्य के झंझट में न पड़कर अपने प्रति मित्र से मात्र सहयोग की अपेक्षा करता है। भले ही वह अनीतियुक्त एवं अहितकर ही क्यों न हो? मित्रता के दबाव में प्रायः एक दूसरे के प्रति ऐसे ही पक्षपातपूर्ण सहयोग की आशा अपेक्षा करते हैं। उसमें शिथिलता दिखाई पड़ती है तो मित्रता में शिथिलता का आरोप लगाते हैं। ऐसे प्रसंगों में यह समझा जाना चाहिए कि मैत्री मात्र सहयोग तक ही सीमित नहीं है वरन् उसके साथ असहयोग एवं विरोध के उत्तरदायित्व भी जुड़े हुए हैं। कई बार तो इस प्रकार का प्रतिरोध-सहयोग से भी अधिक आवश्यक होता है।
माता से अधिक शुभ चिन्तक और कोई नहीं हो सकता पर वह भी कई बार बच्चों पर लाल पीली होती देखी जाती है। डॉक्टर की भरपूर सद्भावना होते हुए भी उसे रोगी के शरीर में नश्तर चुभाते हुए देखा जाता है। यह अप्रिय प्रसंग देखने में निष्ठुरता एवं शत्रुता जैसे लगते हैं, पर तात्विक दृष्टि उनके पीछे ऐसी आत्मीयता झाँकती दिखती है जिसमें कल्याणकारी हित चिन्तन के अतिरिक्त और कोई अनुपयुक्त उद्देश्य नहीं ढूंढ़ा जा सकता। वह मित्रता तो अदूरदर्शिता मात्र है जिसमें प्रसन्नता प्रदान करने के लिए अनुचित को भी सहन किया जाता है और अनौचित्य में भी सहयोग दिया जाता है। इसमें मित्र को प्रसन्न करने भर का लक्ष्य है उसका भविष्य अन्धकारमय बनने के संदर्भ में उपेक्षा बरती गई होती है। इससे मित्र का अन्ततः अहित ही होता है। प्रत्यक्षतः उसका रूप कुछ भी क्यों न हो परिणामतः यह प्रसन्न करते रहने भर की नीति शत्रुता से कम विघातक सिद्ध नहीं होती।
स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि प्यार आध्यात्मिक गुण है। उसकी सार्थकता तभी है, जब उसके साथ उत्कृष्टतावादी आदर्शों में समन्वय रह सके। ऐसा प्यार ही प्रयोक्ता और उपभोक्ता के लिए समान रूप से श्रेयस्कर होता है। सच्चे प्यार में एक आँख दुलार की और एक आँख सुधार की रहती है। इसके बिना अनीति पोषक मैत्री तो अमैत्री से भी अधिक अहितकर सिद्ध होती है।
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मंत्र शब्द की व्युत्पत्ति कई प्रकार से होती है। निरुक्त में ‘मन्त्रा मनात्’ मन से संचारित होने वाली प्रक्रिया को मन्त्र कहा गया है। ‘मंत्रि गुप्त भाषणे’ रहस्यमय सम्भाषण को मन्त्र कहते हैं। शतपथ ब्राह्मण में ‘वाग्वै मन्त्रः’ परिष्कृत वाणी से उच्चारित शब्द शृंखला को मन्त्र बताया गया है।
मनुष्य सत्ता दो भागों में विभक्त है- शरीरगत और मनोगत । शरीर क्रिया करता है और मन चिन्तन। दोनों से ही अपने-अपने ढंग के विद्युत -प्रवाह निसृत होते हैं। शरीर में घर्षणात्मक क्रिया होती है। हृदय की धड़कन, नाड़ी समूह में रक्त का आवागमन-फेफड़ों द्वारा श्वास का ग्रहण विसर्जन-माँस-पेशियों का आकुंचन-प्रकुंचन एक प्रकार का घर्षण उत्पन्न करता है और उन हलचलों से जो गर्मी उत्पन्न होती है उसे शरीरगत ऊर्जा कह सकते हैं। इसी के बल पर शरीर यन्त्र विभिन्न प्रकार के क्रिया-कृत्य करने में समर्थ होता है। इसे घर्षणपरक विद्युत कहा जाता है।
मस्तिष्क से चुम्बकीय विचार तरंगें उत्पन्न होती हैं। तालाब में ढेला फेंकने पर लहरें उठती हैं और वे धीरे-धीरे बहती हुई तालाब के अन्तिम छोर तक जा पहुँचती हैं। यह विश्व-ब्रह्माण्ड भी एक प्रकार का तालाब है किन्तु है गोल । इसलिए इसका अन्तिम छोर भी वही स्थान होता है जहाँ से संचरण क्रिया आरम्भ हुई थी। मस्तिष्क से ताप-प्रकाश की तरह ही विचारों की विद्युत तरंगें निकलती हैं। वे आगे-आगे बहती बढ़ती चली जाती हैं। अन्ततः वे एक पूरी परिक्रमा करने के बाद अपने मूल उद्गम स्थान पर शब्द बेधी बाण की तरह लौट आती हैं।
यह यात्रा चुपचाप नहीं होती रहती, वरन् इनकी चुम्बकीय शक्ति बहुत कुछ ग्रहण विसर्जन भी करती चलती है। यह तरंगें जिस क्षेत्र से सम्पर्क बनाती हैं उसे प्रभावित करती और स्वयं प्रभावित होती हैं यह प्रभाव प्रक्रिया सजातीयता के आधार पर चलती है। समान वर्ग के पदार्थ अथवा प्राणी एक दूसरे से प्रभावित और आकर्षित होते हैं। पालतू पक्षी उड़ा दिया जाय तो वह अपनी ही जाति के पक्षियों के झुण्ड में जा मिलेगा। अन्य जाति के पक्षियों की उपेक्षा करता हुआ वह सजातीयों को ढूँढ़ेगा और वे जहाँ भी मिलें वहीं अपने रहने का प्रबन्ध करेगा। विचार भी एक प्रकार के पक्षी हैं। वे अपनी ही जाति के विचार प्रवाहों के साथ रिश्ता बनाते और आदान-प्रदान करते हैं।
कुछ जाति के पक्षी ऋतु परिवर्तन का लाभ लेने के लिए अपने जन्म स्थान से बहुत दूर उड़ जाते हैं किन्तु समय पर फिर लौटकर अपनी जगह वापिस आ जाते हैं। विचारों की मात्रा भी इसी प्रकार की है। उनकी तरंगें मस्तिष्क से उठती हैं। विश्व भ्रमण के लिए निकलती हैं। इस यात्रा में वे पुण्य बटोरती और दान-पुण्य करती तीर्थ-यात्रा जैसी रीति-नीति अपनाती हैं। भले या बुरे विचार घर से निकलते हैं और अपने साथ सजातीयों का एक पूरा झुण्ड लेकर अपने उद्गम स्थान पर अपेक्षाकृत अधिक बलवान होकर लौट आते हैं। इस प्रक्रिया के अनुसार मनुष्य अपनी विचार सम्पदा से-जहाँ असंख्यों को लाभान्वित करता है वहाँ उनसे बहुत कुछ प्राप्त भी करता है। इस प्रकार अपने विचार वस्तुतः दूसरों को कम और अपने को अधिक प्रभावित करते हैं। खेत में बोया हुआ बीज बढ़ता और फलता है। उस फसल का लाभ बोने वाले किसान को ही मिलता है। अपने मस्तिष्क रूपी खेत में हम विचारों के बीज बोते हैं और उनकी फसल स्वयं ही काटते हैं। अशुभ विचारों से दूसरों को भी हानि होती है किन्तु वापिस लौटने पर उनकी बढ़ी-चढ़ी घातक शक्ति की हानि अपने को ही अधिक भुगतनी पड़ती है। यह बात सद्विचारों के सम्बन्ध में भी है। वे भी सारा वातावरण प्रभावित करते हैं, जिधर से गुजरते हैं उधर ही सुगन्धित शीतल वायु जैसा उत्तम प्रभाव छोड़ते हैं और अन्ततः अनेक गुने परिपुष्ट होकर जब लौटते हैं तो उसका लाभ सृजेता को ही मिलता है। गाय सवेरे जंगल में चरने जाती है और शाम को वापिस लौटती है इस वापसी में घास से पेट भरने के साथ-साथ थनों में दूध भरकर भी घर आती है। विचार दुधारू गाय की तरह हैं वे जहाँ निकलते हैं वहाँ मात्र विचार होते हैं, पर परिभ्रमण के बाद उनकी स्थिति काफी सुदृढ़ हो चलती है। तद्नुसार उसका परिणाम भी उद्गम स्थल को मिलता है। बादल समुद्र से उठते हैं। दूर देशों में बरसते हैं। वर्षा का जल नदी-नालों में होकर समुद्र में फिर वापसी जा पहुँचता है, पर इस वापसी में पृथ्वी में रहने वाले अनेक खनिज पदार्थ भी उसके साथ घुले होते हैं। उन्हीं के कारण समुद्र का पानी क्रमशः अधिक खारी और अधिक गाढ़ा होता जाता है। मस्तिष्क रूपी, समुद्र विचार रूपी बादलों को आकाश में उड़ाता है, तो सजातीय अनुभवों एवं अनुदानों की पोटली अपनी अभिनव कमाई के रूप में अपने साथ लादे हुए होते हैं।
शब्द के साथ ऊर्जा लिपटी होती है। यदि कोई हलकी-सी ध्वनि लगातार एक वर्ष तक जारी रखी जाय और उसकी ऊर्जा संग्रहीत रखी जाय तो इतनी गर्मी मिलेगी जो एक कटोरी पानी को खौला सके ।
शरीर द्वारा शब्द की उत्पत्ति का मोटा विवरण यह है कि बाहर की वायु अन्तर के अमुक स्नायु संस्थानों से टकराती है और उस आघात से शब्द उत्पन्न होता है। इस उत्पन्न में भी शारीरिक अवयवों की हलचल अपने आप नहीं हो जाती वरन् मन का पूरा नियन्त्रण रहता है बाहरी हवा का कितना दबाव किस अवयव पर किस उतार-चढ़ाव के साथ पड़े और उससे किस स्तर का ध्वनि प्रवाह निसृत हो, किन्हीं शब्दों को सौम्य, आवेश युक्त, अपेक्षित गद्य अथवा पद्य शैली में भिन्न-भिन्नता प्रकार से बोला जा सकता है। यह भिन्नता मन जनित है। जब हम चाहते हैं तब इच्छा शक्ति द्वारा नियोजित वे हलचलें आरम्भ होती हैं जो बाहरी वायु को खींचने भीतरी से टकराने -स्नायुगत हलचल उत्पन्न होने और ध्वनि प्रवाह चल पड़ने तक की लम्बी किन्तु क्षण भर में सम्पन्न होने वाली क्रिया का उपक्रम बन जाती हैं।
शब्द में शरीरगत घर्षण विद्युत का समावेश होता है क्योंकि वह अवयवों की हलचल से उत्पन्न होता है। किन्तु साथ ही मन का सहयोग भी उसमें पूरी तरह जुड़ा होता है इसलिए धारावाहिक विद्युत का भी सहज समन्वय हो जाता है। इसलिए शब्द में उभय-पक्षीय विद्युत संचार जुड़े हुए देखे जा सकते हैं। सहज धकेलने में मात्र शारीरिक हलचल ने ही काम किया उसमें घर्षण विद्युत ने ही काम किया किन्तु यदि किसी को क्रोध पूर्वक हलका सा भी चाँटा मारा गया है तो उसकी प्रतिक्रिया कहीं अधिक उग्र होगी क्योंकि सहज धकेल में उतना विद्युतीय प्रवाह नहीं था जितना कि आवेश युक्त चाँटे में। उसमें शरीरगत और मनोगत विद्युत का दुहरा रोल रहा इसलिए आघात न केवल शरीर पर ही लगेगा, वरन् मनः क्षेत्र को भी तिलमिला देगा।
वायु के भीतर एक और सूक्ष्म तत्व है जिसे ‘ईथर’ कहते हैं। शब्द के कम्पन इस ईथर में ही होते हैं ईथर के कंपन उसकी सूक्ष्मता के अनुरूप अत्यधिक तीव्र होते हैं। उनकी गति भी उसी हिसाब से तीव्र होती है। प्रकाश कम्पनों की गति एक सैकिण्ड में एक लाख छियासी हजार मात्र है। जबकि ईथर में शब्द के कंपन एक सैकिण्ड में 2305793009213693952 तक पाये जाते हैं। हमारे कान इतने तीव्र कम्पनों को पकड़ नहीं सकते। उनकी रचना बहुत सीमित ध्वनियों को ही सुन सकने योग्य हुई है। वे मात्र 32770 गति के कम्पन सुन सकते हैं। मनुष्य के कानों की पकड़ से मन्द और तीव्र असंख्य ध्वनियाँ इस आकाश में प्रवाहित रहती हैं, पर अपनी सीमित श्रव्य शक्ति के कारण वह सुन नहीं सकते।
शब्द के कम्पन अपनी चरम स्थिति पर पहुँचकर ‘क्ष’ किरणों एक्सरेज के रूप में परिणत हो जाती हैं। तब उनकी गति एक करोड़ मील प्रति सैकिण्ड होती है।
कम्पन कभी नष्ट नहीं होते वे भी अमर होते हैं। वे कुछ समय तो आकाश में उड़ते हैं, पर धीरे-धीरे पृथ्वी की आकर्षण शक्ति से खिंचकर नीचे उतरते आते हैं और धरती की सतह पर परत की तरह जमते चले जाते हैं। यहाँ भी वे मृत नहीं बन जाते किन्तु सक्रियता जारी रखते हैं। प्रभावित होने और प्रभावित करने का आदान-प्रदान इस स्थिति में भी चलता रहता है। इस क्षमता का मन्द अथवा तीव्र होना इस बात पर निर्भर रहता है कि विचारकर्ता का व्यक्तित्व कितना विद्युतीय था और उसमें किस स्तर की संकल्प शक्ति का प्रयोग हुआ।
सजातीयों का एकत्रीकरण प्रकृति का नियम है। भू-गर्भ में खदानें इस सिद्धान्त पर बनती और बढ़ती हैं कि अमुक स्थान पर एकत्रित खनिज एक संयुक्त चुम्बकत्व उत्पन्न करते हैं। उसका प्रभाव जितने क्षेत्र में होता है वहाँ से उसी जाति के बिखरे कण खिंचते हुए चले आते हैं और उस जमाव में सम्मिलित होने लगते हैं। इस प्रकार खदान का आकार बढ़ता है साथ ही उसका चुम्बकीय क्षेत्र भी। जितनी बड़ी खदान उतना बड़ा चुम्बकत्व और फिर उतने ही सुदूर क्षेत्र तक उसकी आकर्षण प्रक्रिया का प्रभाव। यही है वह आधार जिसके सहारे धातु आदि की खदानें धीरे-धीरे अपना आकार बढ़ाती रहती हैं।
शब्द, ताप आदि की तरह विचार भी एक प्रकार का पदार्थ ही है। कम्पन और गति के साथ जो वस्तु जुड़ी, वह पदार्थ बनी। सूक्ष्मता, स्थूलता का अन्तर तो बना ही रहेगा। इससे सत्ता में कोई अन्तर नहीं आता। खदानों की तरह कोई अति तीव्र और अधिक व्यापक विचार सघन होकर समर्थ गुच्छकों के रूप में विकसित होते रहते हैं। इनका बहुत प्रभाव होता है। धर्म, सम्प्रदायों के अपने विचार गुच्छक हैं। राजनैतिक क्षेत्र में साम्यवाद, पूँजीवाद, प्रजातन्त्रवाद, अधिनायकवाद के बड़े प्रचण्ड विचार गुच्छक हैं और वे जिन मस्तिष्कों में अनुकूलता पाते है उन्हीं पर चढ़ दौड़ते हैं अध्यात्म की भाषा में इन्हें ‘अधि-देवता’ कहा गया है।
हर मन्त्र का एक अधि देवता माना गया है। उसकी अपनी आकृति और प्रकृति का वर्णन है। मन्त्र में शक्ति उसी से आती है और सिद्ध होने पर साधक को उसी से वरदान मिलता है। ध्यान साधना की सुविधा के लिए इन अधि देवताओं को मनुष्य की आकृति दी गई है और शस्त्रों, आभूषणों एवं वाहनों से अलंकृत किया गया है। इससे प्रतीत होता है कि वे कोई मनुष्य जैसे ही देव दानव स्तर के होंगे और मनुष्यों की तरह खाते, सोते, बोलते और क्रुद्ध, प्रसन्न होते होंगे। आलंकारिक दृष्टि से इस प्रतिपादन में समझाने समझने की सुविधा रह सकती है, पर यदि यथार्थता जाननी हो तो इन अलंकारों के पीछे छिपे हुए तथ्यों को जानना पड़ेगा।
तात्विक दृष्टि से कुछ विशिष्ट प्रकार के विचार गुच्छकों को ‘अधि देवता’ कहा जा सकता है। विशिष्ट अर्थात् जिनके पीछे मनस्वी लोगों का अनुमोदन, सघन निष्ठा का समन्वय, उनका कार्यान्वित होना जैसे आधारों का समन्वय। उदाहरण के लिए गायत्री महामन्त्र अति प्राचीन है। उसकी शब्द रचना का निर्धारण-अमुक स्तर के शक्ति कम्पन उत्पन्न कर सकने की विशेषता को ध्यान में रखकर किया गया है। मन्त्र में शब्दार्थ का कम और उसकी शक्ति उत्पादन क्षमता का महत्व अधिक होता है। गायत्री मन्त्र के पीछे अगणित अति मनस्वी लोगों की मानसिक श्रद्धा ऊर्जा सम्मिलित है। साधना-पुरश्चरण प्रक्रिया की असंख्य धाराएं उसके साथ मिलती चली गई हैं। दैनिक उपासना के रूप में उसे अब तक अगणित व्यक्तियों द्वारा प्रयुक्त किया गया है। इससे उस दिव्य शक्ति की क्षमता युग युगों से निरन्तर बढ़ती चली आई है और वह अधि देवता अधिकाधिक परिपुष्ट होता चला आया है। गायत्री की शक्ति अन्य मन्त्रों से अधिक है। इस स्पष्ट तथ्य का कारण उसके अधि देवता का शक्ति सम्पन्न होना है। गायत्री एक अधि देवता भी है। उसका प्रतीक पूजन साधक को इस शक्ति प्रवाह के साथ संयुक्त करने में सहायक सिद्ध होता है। यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि देवताओं की आकृतियों का निर्धारण, अमुक स्तर के विचार गुच्छकों की क्षमता का प्रतीकात्मक वर्णन ही है। यदि आकृति की वास्तविकता को स्वीकार करने न करने के झंझट में न पड़ा जाय तो साकारवादी और निराकारवादी गुच्छकों के अस्तित्व का अनुभव कर सकते हैं।
प्रत्येक वेद मन्त्र का एक देवता है। हर मन्त्र के साथ उसका परिचय विनियोग जुड़ा हुआ है। हर मन्त्र का एक छन्द-ऋषि और देवता होता है। इनकी व्याख्या ध्वनि प्रवाह- अनुमोदन परम्परा और ऊर्जा गुच्छक के रूप में की जा सकती है। छन्द अर्थात् मन्त्र शृंखला के द्वारा उत्पन्न होने वाले कम्पनों का प्रवाह स्तर। ऋषि अर्थात् वह मान्यता और भावना जो उसके साथ चिरकाल से एक परम्परा बनकर चलती आ रही है। देवता अर्थात् छन्द बीज का परिपुष्ट वट-वृक्ष। इतने आधार हर मंत्र के साथ जुड़े होते हैं। इसलिए उपासना काल में इन सब को पूजा प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठापित किया जाता है। उनकी छवि का ध्यान एवं उपचार पदार्थों से पूजा सत्कार किया जाता है। यह देव सान्निध्य की तथ्यपूर्ण मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। मोटी बुद्धि से इसे अन्ध-विश्वास कहा जा सकता है। पर वस्तुतः वैसी बात है नहीं। परमाणु के इलेक्ट्रॉन घटकों सहित चित्र प्रायः छपते रहते हैं। और उनमें कई गेंद, गोले उड़ते, भ्रमण करते दिखाई पड़ते हैं। तथ्यतः वैसा देखने योग्य कहीं कुछ नहीं है। परमाणु के घटक मात्र विद्युतीय कण हैं। उन्हें रेत कण की तरह आकृति युक्त स्थिति में नहीं देखा जा सकता। उनके परिणामों को देखकर वैसा अनुमान लगाया गया है कि जैसा कि ऐटम के चित्रों में छपा हुआ देखा जाता है। झंझट ही खड़ा करना हो तो ऐटम की आकृतियों को भी झुठलाया जा सकता है। देवताओं की आकृतियाँ भी इसी आधार पर कपोल कल्पित कही जा सकती हैं, पर इस खण्डन-मण्डन से कुछ बिगड़ता बनता नहीं। देखना यह होगा कि मंत्र शक्ति की कुछ प्रतिक्रिया होती है या नहीं? यदि होती है तो उसके सूक्ष्म स्वरूप की स्थूल स्थापना करने में कोई हर्ज नहीं। इससे समझने-समझाने में सुविधा रहती है। एटम का वह चित्र जितने गोले उड़ते, घूमते दीखते हैं बन जाना कुछ अनर्थ जैसा नहीं हुआ है। आत्म-शक्ति से भरे-पूरे शक्ति गुच्छकों के सान्निध्य में आने से जो प्रभाव उत्पन्न होता है उसके सहारे मन्त्र सत्ता के रूप में निर्धारण में कोई दोष नहीं है। अधि देवताओं का मंत्र शक्ति के साथ जुड़े होने का तथ्य इसी आधार पर समझा जाना चाहिए।
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भोजन की अधिकता एवं अनियमितता से बने शरीर में विजातीय द्रव्य एवं विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने का प्रभावशाली उपाय है-उपवास। स्वास्थ्य को बनाए रखने, पाचन संस्थानों में आई खराबी को दूर करने तथा आँतों को पुनः सबल बनाने के लिए उपवास का कम महत्व नहीं है।
उपवास का अर्थ उप+वास- पास में रहना अर्थात् स्वस्थ, नीरोग जीवन के निकट रहना। उपवास आन्तरिक शुद्धि एवं आँतों की सफाई का एक सुगम उपाय बताया गया है। धर्म ग्रन्थों एवं पौराणिक कथाओं में भी उपवास के महत्व का प्रतिपादन किया गया है।
उपवास सम्बन्धी आज की हमारी मान्यताएं हास्यास्पद एवं मूर्खतापूर्ण हैं। लोग उपवास के दिन तो अन्य सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक गरिष्ठ एवं मात्रा में भी अधिक, भिन्न-भिन्न प्रकार का मिष्ठान एवं पकवान खाते हैं। उपवास के एक दिन पूर्व से ही भोजन में भिन्नता दिखाई देती है। इसे उपवास न कहकर चटोरेपन की आदत ही कहेंगे, जिससे न तो किसी उद्देश्य की पूर्ति होती है और न स्वास्थ्य पर ही लाभकारी प्रभाव पड़ता है।
जिस प्रकार एक मशीन को लगातार चलते रहने पर कुछ घण्टे आराम की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार अधिक एवं अभक्ष्य भोज्य पदार्थों के खाने के अत्याचार से पीड़ित पेट को आराम देने के लिए आवश्यकता होती है।
पुराने समय के लोग मानसिक एवं शारीरिक दृष्टि से अधिक स्वस्थ रहते थे। इसका कारण उसकी दिनचर्या, उनका खान-पान था। वे दिनभर परिश्रम करते थे तब कहीं उन्हें भोजन की उपलब्धि होती थी। जंगलों की स्वच्छ हवा, ताजे फल एवं सब्जियाँ उन्हें उपभोग हेतु मिलती थीं। पाकशास्त्र आज जैसे विकसित रूप में उस समय नहीं था। इसी कारण उनके भोजन में सादगी एवं सात्विकता होती थी। मिर्च मसाले से युक्त, गरिष्ठ एवं तले-भुने पदार्थों का सेवन नहीं किया जाता था तथा धर्मानुसार सही ढंग से व्रत एवं उपवास का सही ढंग से पालन किया जाता था। आज की स्थिति सही इसके विपरीत है फलतः आंतें कुछ ही दिनों में कमजोर हो जाती हैं और व्यक्ति अनेक रोगों से घिर जाता है।
उपवास शरीर में बढ़े तथा जमा स्टार्च एवं चर्बी को जिसके कारण शरीर में एसिड की मात्रा कम हो जाती है बाहर निकाल कर शरीर को स्वस्थ रखने में सहायक होता है। साधारणतः व्यक्ति यह समझ लेता है कि शरीर से मल बाहर निकल ही जाता है, भूख लगती ही है तो पेट सम्बन्धी विकार क्यों होने लगा चाहे वह कैसा भी भोजन करे उसे नुकसान नहीं करेगा। परन्तु यह भूल है, जो खाना खाया जाता है उसमें कुछ का रस बनता हैं, खून बनता है, माँस, मज्जा एवं हड्डी का निर्माण होता है और शेष मल-मूत्र के रास्ते से निकल जाता है। परन्तु गरिष्ठ एवं अधिक मात्रा में किये भोजन का कुछ अंश आँतों के चारों ओर चिपक जाता है जो सड़ांद पैदा करता है और रोगों को आमन्त्रित करने का कारण बनता है। उपवास इसी गन्दगी को बाहर निकाल कर पेट एवं आँतों को स्वस्थ रखने में मदद करता है।
उपवास का अर्थ पेट को पूर्ण आराम देना तथा भोजन का पूर्णतः त्याग देना है। यह साप्ताहिक भी हो सकता है पाक्षिक अथवा मासिक भी जैसी भी स्थिति हो। तथा लम्बी बीमारी एवं रोग को देख कर लगातार क्रम में भी।
उपवास करने के पूर्व संध्या समय भोजन न करके फलों का रस या उबली तरकारी ही लेनी चाहिए। उपवास के दिन काफी मात्रा में जल लेकर 1-2 मील का पैदल चक्कर लगाना चाहिए तत्पश्चात एनीमा लेना चाहिए इससे आन्तरिक सफाई अच्छी प्रकार हो जाती है। कमजोरी महसूस होने पर नीबू या शहद का पान लिया जा सकता है। उस दिन पूरा-पूरा विश्राम करना चाहिए। उपवास के दूसरे दिन बड़ी सावधानी एवं धैर्य से कार्य लेना चाहिए- क्योंकि उपवास के बाद भूख जोर से लगती है इसलिए ऐसा न हो जाए कि एकदम खाने पर टूट पड़ें इससे लाभ की अपेक्षा हानि होने की सम्भावना हो सकती है। दूसरे दिन फलों के रसों से उपवास तोड़ा जाय- दोपहर या संध्या को फल और सादा भोजन, रोटी, दलिया, तथा उबली सब्जियां ली जावें।
लम्बी बीमारी के पश्चात् किये उपवास या दीर्घकालीन उपवासों में योग्य चिकित्सक से परामर्श एवं सहयोग लेना आवश्यक है। जब एकत्रित विजातीय एवं विषैले पदार्थ बाहर निकल जाएँ और पेट साफ हो जाए तो उपवास चालू नहीं रखना चाहिए अन्यथा स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है।
युग के महापुरुष महात्मा गाँधी हमेशा उपवासों के समर्थक रहे हैं, तभी वे वृद्धावस्था में भी उतना ही कार्य कर लेते थे जितना कि जवानी में। सन्त बिनोवा की जीवनी शक्ति का रहस्य सादगीपूर्ण जीवन एवं उपवास ही है। व्रत एवं उपवास को किस योगी पुरुष एवं धर्म ग्रन्थों ने नहीं सराहा। परन्तु चिकित्सा पद्धति में रोग निवारणार्थ उपवासों का विशेष महत्व है इसे भुलाया नहीं जा सकता है। उपवास प्रणाली को अपनाकर अर्थ भार से तथा रोगों से आसानी से मुक्त हो सकते हैं। औषधियाँ रोगों को जड़-मूल से भगाती नहीं बल्कि उन्हें दबा देती हैं। जबकि उपवास विधि रोगों को उत्पन्न ही नहीं होने देती। दीर्घ एवं स्वास्थ्यपूर्ण सुखी-सम्पन्न जीवन के लिए उपवास के बारे में जितना लिखा जाए थोड़ा है।
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सत्य-असत्य का- उचित-अनुचित का भेद करने के लिए मनोभूमि निष्पक्ष होनी चाहिए। उसमें किसी प्रकार के पूर्वाग्रह नहीं होने चाहिए। किसी मान्यता पर आग्रह जमा हो तो मनोभूमि पक्षपात ग्रसित हो जायगी। तब अपनी ही बात को किसी न किसी प्रकार सिद्ध करने के लिए बुद्धि कौशल चलता रहेगा। बुरी से बुरी बात को भली सिद्ध करने के लिए तर्क ढूंढ़े जा सकते हैं और अपने पक्ष समर्थन में कितने ही तथ्य तथा उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं। इस स्तर के विवादों का कभी अन्त नहीं होता। पूर्वाग्रह जब प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है तो फिर अपनी जीत और विपक्षी की हार ही अभीष्ट होती है।
शास्त्रार्थों का एक जमाना था जिसमें भिन्न-भिन्न मतवादी अपने पक्ष का समर्थन और विपक्ष के खण्डन करने के लिए एड़ी चोटी का पसीना एक करते थे। अपनी जीत और सामने वाले की हार के लिए वे पर्याप्त मसाला एकत्रित कर लेते थे। जिसकी चतुरता जितनी पैनी होती थी, वह उतना ही तगड़ा पड़ता था, पर हार स्वीकार करना कम चतुर के लिए भी सम्भव न था। अस्तु शास्त्रार्थ का अन्त वितण्डावाद के रूप में- आरोप-प्रत्यारोप के रूप में- आक्रमण-प्रत्याक्रमण रूप में होता है और वे अनिर्णीत स्थिति में रोष विद्वेष का वातावरण छोड़कर समाप्त हो जाते हैं। मध्यस्थ किसी का पक्ष समर्थन करता है तो उसे उस ओर का समर्थक पक्षपाती कहा जाता है। किसी पक्ष की हार घोषित कर दी जाय तो भी वह उसे स्वीकार करने को तैयार नहीं होता।
वकीलों की बहस जो सुनते रहते हैं वे जानते हैं कि तथ्यों को अपने अनुकूल ढालने का बुद्धि कौशल अब कितना आगे बढ़ गया है। एक ही कानून के पक्ष-विपक्ष के वकील किस प्रकार भिन्न अर्थ निकालते और एक ही बयान एवं एक ही घटनाक्रम को किस प्रकार अपने समर्थन के लिए तोड़ते-मरोड़ते और खींच-तान करते हैं। सामान्य व्यक्ति की बुद्धि इसमें भ्रमित हो जाती है और जिस वकील की दलील सुनती है उसी को सही मानने लगती है। निष्पक्ष न्यायाधीश ही यह निर्णय कर सकता है कि इन दलीलों में कितना तथ्य है ऐसा कर सकना उसके लिए तभी सम्भव होता है जब वह दोनों में से किसी के प्रति भी झुकाव नहीं रखता। यदि उसे किसी पक्ष के प्रति पहले से ही सहानुभूति होगी तो फैसले में वही झुकाव अनर्थ प्रस्तुत कर रहा होगा।
न केवल शरीर की दृष्टि से वरन् मन, बुद्धि और भावना की दृष्टि से भी जीव का क्रमिक विकास हुआ है। आदिम काल की और आज की मान्यताओं में जमीन-आसमान जितना अन्तर हो गया है। जो बातें किसी समय सत्य समझी जाती रही होंगी, वे आज उस रूप में नहीं मानी जातीं। यह प्रगति तभी सम्भव हुई जब पूर्वाग्रहों की तुलना में तर्क और प्रमाण के आधार पर जो अधिक उपयुक्त जंचा उसे स्वीकार किया गया। यदि यह आग्रह रहा होता कि जो अब तक जाना माना गया है वही सत्य है-अपरिवर्तनीय है-तब फिर हम आदिम काल की मान्यताओं से ही चिपके बैठे रहे होते और प्रगति के पथ पर जितनी लम्बी यात्रा हो चुकी है वह सम्भव न हुई होती।
आज जो माना जा रहा है कल की विकसित परिस्थितियों में उसे भी अमान्य ठहराया जा सकता है। यह गुंजाइश मन में रखनी चाहिए। तभी सत्य की शोध के लिए चल रही मानवी प्रगति का क्रम अक्षुण्ण रह सकेगा और अनेकता से एकता की दिशा में प्रगति सम्भव हो सकेगी।
प्रचलित मत-मतान्तरों में प्रचलित मान्यताओं को यदि उनके अनुयायी नितान्त सत्य मानते रहेंगे तो अपने से भिन्न अन्य सभी मतों को, धर्मों को, असत्य माना जाता रहेगा और उनको मिटाने के लिए आक्रमण, प्रत्याक्रमण का सिलसिला चलता रहेगा। बहस का अन्त न होते देख कर पिछले दिनों विचार परिवर्तन के लिए तलवारों का खुलकर प्रयोग हुआ है। लेखनी और वाणी की शक्ति से काम चलता न देखा तो लाठी के बल पर अपनी मान्यता दूसरों पर थोपने की चेष्टा की गई है। योरोप में रोमन कैथोलिक और प्रोटैस्टेण्टों में इसी प्रश्न को लेकर शताब्दियों तक भयंकर रक्तपात होता रहा है कि किस मत को सही और किस को गलत माना जाय। अपने देश में भी चोटी कटाने की बात पर सहमत न होने वालों के असंख्य सिर कलम हुए है और रक्त की नदियाँ बहती रही हैं। कुछ दुर्बल मनःस्थिति के लोग डर से सिर झुका गये हों यह बात दूसरी है, पर प्रश्न हजारों वर्ष उपरान्त भी जहाँ का तहाँ हैं विभिन्न मतों के अपने अनुयायी हैं और वे सभी अपने-अपने पक्ष समर्थन में पूरे आग्रह के साथ अड़े हुए हैं। इन सभी के पास अपने-अपने तर्क और तथ्य हैं, विपक्ष को हराने, घटाने के लिए उनके नरम-गरम उपाय भी पूरी शक्ति के साथ चलते हैं फिर भी कोई न तो जीतता है और न हारता है। यथास्थिति में परिवर्तन होने के कोई लक्षण प्रतीत नहीं होते।
सर्वधर्म समन्वय की चर्चा देर से चलती रही है- सर्वधर्म सम्मेलन के आयोजन भी जब-तब होते रहते हैं, पर वह पूर्वाग्रह जहाँ का तहाँ है जिसमें सब धर्मों का सार लेकर एक विश्व धर्म बनाने की संभावना का साकार हो सकना कठिन ही बना रहेगा। थियोसॉफी जैसे प्रयत्न कारखाने में तूती की आवाज बन कर रह गये। धार्मिक क्षेत्र की तरह राजनीतिक क्षेत्र में भी शासन तन्त्र किस आधार पर चलाये जाय इस संदर्भ में भारी मतभेद मौजूद हैं और वे एक दूसरे का अस्तित्व मिटाये बिना समन्वय का-सत्यान्वेषण का कोई रास्ता ढूंढ़ नहीं पा रहे हैं।
सत्य की शोध में सबसे बड़ी बाधा पूर्वाग्रहों की है। उन्हें छोड़े बिना निष्पक्ष मनोभूमि बन नहीं सकती और जहाँ पक्षपात पहले से ही जड़ जमाये हुए हैं वहाँ यथार्थता का दर्शन कर सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता।
मतभेदों की दीवारें गिराये बिना एकता, आत्मीयता, समता, ममता जैसे आदर्शों की दिशा में बढ़ सकना सम्भव नहीं हो सकता। विचारों की एकता जितनी अधिक होगी स्नेह, सद्भाव एवं सहकार का क्षेत्र उतना ही विस्तृत होगा। परस्पर खींचतान में नष्ट होने वाली शक्ति को यदि एकता में-एक दिशा में प्रयुक्त किया जा सके तो उसका सत्परिणाम देखते ही बनेगा। प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी कठिनाई पारस्परिक मतभेदों और तज्जनित संघर्षों में शक्ति की असीम मात्रा का नष्ट होते रहना ही है। इस अपव्यय को रोका जा सके तो मानवीय सामर्थ्य एवं उपलब्ध सम्पत्ति के आधार पर असीम सुख साधन उत्पन्न किये जा सकते हैं और उनके सहारे अगले कल ही स्वर्गीय परिस्थितियों का सृजन किया जा सकता है।
यदि मनुष्यता को जीवित रहना है तो उसे एकता और आत्मीयता की दिशा में बढ़ना होगा। मत-भेदों की दीवारें गिरानी पड़ेंगी और चिन्तन तथा कर्तव्य को एकरूपता प्रस्तुत कर सकने वाला राजमार्ग बनाना पड़ेगा। जीवन और मरण के बीच और कोई विकल्प नहीं। सद्भावपूर्वक निर्वाह करने या मर-कट कर नष्ट हो जाने के अतिरिक्त शान्ति का और कोई मार्ग नहीं, मतभेद जितने ही बने रहेंगे विनाश का असुर उतना ही भयावह होता चलेगा।
सत्य की दिशा में बढ़ने से ही मतभेदों को दूर किया जा सकता है तथा एक सर्वमान्य मार्ग निकल सकता है इसके लिए यह प्रारम्भ आवश्यकता है कि हर व्यक्ति पूर्वाग्रहों को एक ओर रखकर निष्पक्ष मनोभूमि का विकास करे। विवेक की स्थापना ऐसी ही मनःस्थिति में सम्भव होती है निष्पक्ष चिन्तन से सत्य की शोध की जा सकती है। सत्य को अपना कर ही एकता की ओर बढ़ा जा सकता है। इसके लिए पूर्वाग्रहों की खिड़कियाँ खोलकर उन्मुक्त निष्पक्ष चिन्तन को अपनाये जाने की आवश्यकता जन-साधारण को समझाई जानी चाहिए।
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खाद्यान्नों में गेहूँ और चावल का स्थान मूर्धन्य है। इसके बाद दालों का नम्बर आता है। ज्वार, बाजरा, मक्का आदि सस्ते अन्न भारत में तो प्रयुक्त होते हैं, पर अमेरिका जैसे समृद्ध देशों में तो उन्हें पशु खाद्यों में ही गिना जाता है।
इन दोनों धान्यों और दालों में जीवनोपयोगी तत्व पर्याप्त मात्रा में हैं यदि इन्हें ठीक तरह प्रयुक्त किया जाय तो हमें पर्याप्त पोषण मिल सकता है पर दुर्भाग्य ने हमारा पीछा इस क्षेत्र में भी नहीं छोड़ा। कुछ ऐसी कुमति सिर पर सवार हुई है कि इनका जो उपयोगी अंश है उसे हम अस्वादिष्ट या कुरूप समझ कर फेंक देते हैं और जो छूँछ वाला अंश है उसी के उपयोग करने में प्रसन्नता अनुभव करते हैं।
सर्वविदित है कि सूर्य की सीधी किरणें फल के जिस भाग पर पड़ती है वह पोषक तत्वों से अन्य भागों की अपेक्षा कहीं अधिक भरा-पूरा होता है। गेहूँ का छिलका, दालों का छिलका इतना बहुमूल्य होता है जिनकी तुलना में उनका मैदे वाला-गूदे वाला भाग अत्यन्त नगण्य ठहरता है। गेहूँ को दैत्याकार चक्कियों से पीसते समय जो गर्मी उत्पन्न होती है उससे अधिकाँश पोषक तत्व जल जाते है और वह लगभग भुने हुए सत्तू की तरह निर्जीव बन जाता है। इस पर भी चोकर छानकर रहा बचा उपयोगी अंश फेंक दिया जाता है। दालों की भी यही दुर्गति होती है यदि उन्हें समूचा पकाया जाय तो पूरा लाभ मिलेगा। किन्तु छिलका निकाल कर उनका भी उपयोगी भाग फेंक दिया जाता है। दो दल वाले चना, मटर, उड़द, मूँग, अरहर आदि दाल कहे जाने वाले अन्नों के भीतर जोड़ने वाले स्थान पर जो अंकुर-सा उठा रहता है उसमें ही अंकुर उत्पन्न करने की क्षमता होती है। उसे दालों की जननेन्द्रिय और वीर्यकोष कहते है। दलने में यह अंश भी निकाल दिया जाता है। यह मध्यवर्ती चुनी भाग चूंकि कुछ कसैला होता है, उससे अभ्यस्त स्वाद में यत्किंचित् कमी आती है इतने से कसूर पर उसे देश निकाला दे दिया जाता है। छिलके रहित दालें चूंकि देखने में-खाने में अच्छी लगती हैं, इसलिए उन्हें ही प्रयोग करने का प्रचलन बन गया है।
चावल पर से छाल उतारने के बाद एक परत रह जाती है जो मटमैली-सी होती है। चावल के पोषक तत्व का अधिकाँश भाग भी इसी में होता है। पर गेहूँ एवं दालों की तरह चावल की भी दुर्गति बनाई जाती है और मशीनों से छिलका उतार कर पालिशदार चावल बनाया जाता है। यह भी देखने में, खाने में अच्छा लगता है इसलिए उसी की खपत होती है। पकाने की विधि भी विचित्र है। जो कुछ रहा बचा पोषक तत्व चावल में रहता है वह अधिक पानी में पकाने से ‘माँड’ में चला जाता है। माँड़ फेंक दिया जाता है और वह चावल ऐसा रह जाता है जैसा चाय को पानी में पका कर उसका अर्क तो फेंक दिया जाय और पत्तियों की छूँछ को रुचिपूर्वक खाया-चबाया जाय। नीबू का रस निचोड़ कर फेंक दें और उसके छिलके का रुचिपूर्वक भोग लगायें। विचार करने पर यह प्रत्यक्ष मूर्खता है, पर जब मूर्खता भी रिवाज बन जाती है तो लोग उसी को पसन्द करने लगते हैं चावल को कूटने और पकाने में उसका प्राण निकाल दिया जाता है केवल निर्जीव लाश ही खाने वालों के पल्ले पड़ती है।
संसार के धान उत्पादक क्षेत्र का दो तिहाई भाग चीन और भारत में है। भारतीय जनता का 70 प्रतिशत भाग अधिकतर चावल खाता है। यों चावल, गेहूँ जैसा पौष्टिक नहीं होता तो भी उसमें प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, फास्फोरस, फैट, थायमाइन वर्ग का विटामिन बी0 पाया जाता है। कूटने और पकाने की दुर्गति में चावल अपनी इन विशेषताओं का अधिकाँश भाग गंवा बैठता है। और देखने में अधिक सुन्दर, खाने में अधिक स्वादिष्ट बनाने के फेरे में पड़ने वाले के पल्ले सत्व रहित-तत्व रहित छूँछ ही पड़ती है।
इन तत्वों के अभाव में शरीर को समुचित पोषण न मिलने से तरह-तरह की कमजोरियाँ और बीमारियाँ पीछे पड़ती हैं। मद्रास में अक्सर फैलने वाला बेरी-बेरी रोग प्रायः इसी के कारण पनपता है बच्चों में से बहुतों को इसी रोग से मरना पड़ता है। शरीर में कमजोरी, सुस्ती, हाथ-पैरों में झुनझुनी, वजन घटना, तेज चलने में कठिनाई जैसे लक्षणों को सूखी बेरी-बेरी कहते है? तर बेरी-बेरी में हृदय का फूलना, साँस लेने में कठिनाई, पेट तथा दूसरे अंगों का फूलना जैसे लक्षण प्रकट होते हैं। हाथ-पैरों में जलन, मुँह में छाले, पेचिश, जकड़न, चर्म-रोग, अपच, खून की कमी, उदासी जैसी बीमारियाँ पोषण रहित चावल खाने वालों के पीछे लग लेती हैं।
चावल पकाने से पूर्व कई-कई बार रगड़ मसलकर धोने का रिवाज बुरा है, इसमें भी उसके उपयोगी अंश धुल जाते हैं। धोना हो तो एक बार धोना पर्याप्त है कम पानी में पकाया जाय तो माँड नहीं निकलेगा। यदि माँड निकालना ही है तो उसे फेंकना नहीं चाहिए। दाल आदि में मिला देना चाहिए उसमें उपयोगी अंश रहते हैं।
हाथ की कुटाई के जरिये 68 प्रतिशत चावल प्राप्त होता है और मिल की कुटाई से 62 प्रतिशत। इस प्रकार मिल की कुटाई के पालिशदार चावल के फेर में हम 6 प्रतिशत वजन गंवा देते हैं यदि यह बर्बादी बचाई जा सके तो इतने धान्य की बचत हो सकती है और देश की खाद्य समस्या को हल करने में बड़ी सहायता मिल सकती है। बाजार में 85 प्रतिशत चावल मशीन का और 15 प्रतिशत हाथ का बिकता है। इसमें 6 प्रतिशत का वजन और उसके पौष्टिक अंश का गंवा देना देश की सामान्य क्षति नहीं है।
अमेरिका के एक आहार शास्त्री डॉ0 टी0एल0 क्लेव ने पेट की बीमारियों पर एक प्रामाणिक शोध ग्रन्थ प्रकाशित किया है उसका नाम है- ‘‘पौष्टिक अलसर काजेशन प्रीवेन्सन एण्ड अरैस्ट” उसमें उनने लिखा है-लोगों की भोजन सम्बन्धी बुरी आदतों ने ही उन्हें पेट के रोगों से ग्रसित बनाया है। उन्होंने द्वितीय महायुद्ध के समय कैदियों और सैनिकों में हुई पेट की बीमारियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करते हुए बताया कि मशीन के कुटे हुए चावल और मैदे की रोटी ने यह बीमारियाँ फैलाईं। जब शोधकर्ताओं ने वास्तविक कारण जाना और भोजन सुधार कराया तो वे बीमारियाँ अपने आप अच्छी हो गईं।
हाथ के कुटे चावल का यदि प्रचलन हो जाय तो एक बड़ा गृह उद्योग भारतीय जनता के हाथ लग सकता है देहातों की बेकारी दयनीय है। कृषि कार्य से लोगों के-विशेषतया महिलाओं के पास बहुत-सा समय बच जाता है। इस समय का उपयोग पहले चर्खा, चक्की आदि कई स्वास्थ्यवर्धक और अर्थ बचत कार्यों में किया जाता था अब वे कार्य बड़े मिलों ने छीन लिए। इसी प्रकार चावल के साथ जुड़ा हुआ धान कुटाई का उद्योग भी मिलों के हाथों चला गया और देहाती गरीब जनता उससे भी वंचित हो गई। चूँकि भारत का 70 प्रतिशत आहार चावल है इसलिए यदि उसका छिलका उतारने वाला उद्योग ग्रामीण जनता के हाथों रहने दिया जाय तो न केवल स्वास्थ्यकर आहार की वरन् ग्रामीण क्षेत्र की अर्थ-व्यवस्था सुधारने में भी उससे एक हद तक योगदान मिल सकता है।
यदि 100 मन धान मिल में कुटवाया जाय तो 70 मन चावल मिलेगा। धान का छिलका ही नहीं चावल के ऊपर का लाल वाला वह बहुमूल्य अंश भी उतर जायगा जिसे चावल का प्राण कहना चाहिए। छिलका और चावल का ऊपरी भाग मिलाकर 30 मन निकल जाता है। यदि उसी को ढेंकी या हाथ की मोटी चक्की से निकाला जाय तो 75 से 77 मन तक चावल हाथ लगेगा। छिलका भर उतरेगा चावल की ऊपरी परत नष्ट न होगी। इस प्रकार उसकी पौष्टिकता भी बनी रहेगी और हर सौ मन पीछे 5-7 मन चावल भी अधिक मिल जायगा। इस महंगाई के जमाने में इतने चावल की बचत भी कुछ माने रखती है।
इस माने में घुन नामक छोटा कीड़ा ज्यादा बुद्धिमान है जो अपने लिए उपयुक्त और लाभदायक अंश चावल में से पहचान लेता है घुन अक्सर चावल की उसी ऊपरी परत को खाता है, इसमें पौष्टिक तत्वों की सबसे अधिक मात्रा है। मशीन के कुटे, पालिश किये चावल में अक्सर घुन नहीं लगता क्योंकि वह जानता है कि इसका पोषक तत्व पहले से ही नष्ट हो चुका है। निर्जीव छूंछ को खाने से क्या लाभ? घुन हम मनुष्यों की बुद्धि को चुनौती देता है जो लाभ वाले भाग को फेंक कर सिर्फ खावट और जायके के फेर में चावल का निरर्थक अंश ही उदरस्थ करते रहते हैं।
यही बात मिल के पिसे आटे के सम्बन्ध में भी है। मिल की चक्की में एक मन का 39 सेर आटा बैठता है। 1 सेर जल जाता है। इस प्रकार 2॥ प्रतिशत वजन की बर्बादी होती है। ताप की अधिकता से विटामिन ई सरीखे उसके बहुत से पौष्टिक गुण भी नष्ट हो जाते हैं हाथ की चक्की से पिसे आटे में यह 2॥ प्रतिशत की बर्बादी रुकती है। जितना गेहूँ था प्रायः उतना ही आटा मिल जाता है। पिसाई में अधिक गर्मी उत्पन्न न होने से सभी जीवन तत्व सुरक्षित रहते है। इसके अतिरिक्त पीसने वाले को पेट तथा छाती का अति उपयोगी व्यायाम करने का अवसर मिल जाता है। उस आधार पर स्वास्थ्य संवर्धन का जो लाभ मिलता है उसकी तो कुछ कीमत आँकी ही नहीं जा सकती।
अब बढ़ती हुई सभ्यता के साथ-साथ डबल रोटी बिस्कुटों का प्रचलन बढ़ रहा है। रोज-रोज हाथ से रोटी बनाने और चूल्हा काला करने के झंझट से बचने के लिए लोग यह सुविधाजनक समझने लगे हैं कि बाजार की बनी डबल रोटी खरीद ली जाय और उसे डिब्बे में बन्द अचार, चटनी बनी हुई सब्जी आदि के सहारे खा लिया जाय। लोगों के बढ़ते हुए आलस्य ने भोजन बनाने की झंझट भरी प्रक्रिया का सफाया करना शुरू कर दिया है और मैदे की बनी खूबसूरत डबल रोटियों का मोहक स्वरूप तथा स्वाद लोगों को पसन्द आने लगा है। बड़ी मशीन से आटा पीस कर-चोकर छानकर भी यदि कुछ तत्व बच जाता था तो वह मैदा की रोटी समाप्त कर देती है। उसे बनाने-खमीर उठाने में जो रासायनिक सम्मिश्रण किये जाते हैं वे उसे न केवल निरुपयोगी वरन् विषाक्त भी बना देते हैं।
होटलों में आमतौर से मैदे से खमीर उठाने के लिए अमोनियम क्लोराइड डाला जाता है। यह वही पदार्थ है जो कपड़ों का मैल काटने और कड़े चमड़े को मुलायम करने के उद्योग में प्रयुक्त होता है। खमीर उठाने के लिए नाइट्रोजन, पेरोक्साइड, प्रोपिओनिक एसिड, वेनजोल पैराक्साइड, पोटेशियम व्रेमिट, ऑक्साइड आफ नाइट्रोजन, निस्ट्रीसल क्लोराइड, सोडियम अल्यूमिनियम सल्फेट सरीखे पदार्थ मिलाये जाते हैं। घर की बनी रोटियाँ जबकि दूसरे ही दिन सूख जाती हैं तब बाजारू डबल रोटी कई दिन तक नम बनी रहती हैं। इस नमी को बनायें रखना भी खमीर उठाने के अतिरिक्त उपरोक्त रसायनों का एक उद्देश्य है। इन लाभों को तो ध्यान में रखा जाता है, पर यह भुला दिया जाता है कि उनका हानिकारक प्रभाव चमड़े पर लाल चकत्ते उठाना एवं दमा जैसी कितनी ही बीमारियाँ भी पैदा कर सकता है।
भगवान ने हमें गेहूँ, चावल और दालें जैसे उपयोगी धान्य प्रदान किए हैं, पर इस दुर्बुद्धि को क्या कहें जो ऐसी विधि विकसित करने में लगी हुई है जिससे वे लाभदायक खाद्य-पदार्थ न केवल निरर्थक वरन् हानिकारक भी बनते चले जाएं।
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माना कि परिस्थितियों से हताशा, गरीबी से निराशा और बीमारियों के कारण टूटी हुई जीवन-आशा आत्महत्या की कापुरुषता के लिए उकसाती है। इन प्रयासों में स्पष्ट रूप से मनोबल का अभाव ही कारण है परन्तु घरेलू झगड़ों तथा भाई-भतीजे के विवादों में व्यक्ति जब आत्महत्या का प्रयास करे तो यह तो नहीं कहा जा सकता कि उस प्रयास का कारण केवल मनोबल का अभाव ही है।
वस्तुतः आत्महत्या के कई कारणों में से एक प्रधान और प्रमुख कारण प्रतिशोध की भावना भी है। आत्महत्या कई व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक तथा आर्थिक कारणों से आहत होकर यह विवश कदम उठाता है। लेकिन आत्महत्या करने से पूर्व वह कई अर्थों में इस प्रकार टूट भी चुका होता है-जो उसे प्रतिशोध के लिए भी प्रेरित करता है। कुछ वर्षों पूर्व बरेली के एक युवक को आत्महत्या का मामला प्रकाश में आया था। यह युवक हट्टा-कट्टा और स्वस्थ होने के साथ-साथ उद्दण्ड तथा उपद्रवी भी था। परिवार अच्छी स्थिति का था अतः किसी प्रकार का दायित्व भी उसके कन्धों पर नहीं आया था जो उसे गम्भीर बना सके। अपने साथी संगियों की सोहबत में रहकर वह शराब भी पीता, मारपीट भी करने लगा और बाहर भी रहने लगा। माँ जरा भावुक स्वभाव की थी और अपने बेटे की उन करतूतों से परेशान रहती थी अतः वह रोक-टोक भी करती। इस रोक-टोक को लेकर उच्छृंखल बेटे और ममत्वमयी माँ में झगड़ा हुआ करता। पिता तो अपने बेटे की प्रवृत्तियों से इतने अधिक क्षुब्ध थे कि वे उससे बात भी नहीं करते थे।
जब उक्त युवक की प्रवृत्तियाँ काफी अटकने लगीं तो चचेरे भाई ने उसे स्नेह और ममत्व दिया। इस प्रकार आरम्भ हुई उसके सुधार की प्रक्रिया। भाई उसे अपने साथ रखने लगा, पास बिठाता और सम्मानपूर्ण तथा स्नेहाभिभूत व्यवहार करता। भाई ने उस युवक को यह अनुभव करा दिया कि उसे अपनी दिशाओं को बदलना चाहिए। आर्थिक सहायता भी की तथा कुछ महीने बाद ही उक्त युवक टाइप सीखकर टाइपराइटर लेकर कचहरी में बैठने लगा। अच्छी आमदनी भी होने लगी और बुरी आदतें भी धीरे-धीरे छूटती गईं।
परन्तु माता-पिता ने तो उसे बिगड़ैल और आवारा ही समझ रखा था। वे उससे पहले की तरह ही पेश आते। घर में रोज झगड़ा होता। आखिर एक दिन उसने अपने आपको कमरे में बन्द कर मिट्टी का तेल छिड़का और आग लगा दी। अस्पताल में जब उसे बचाने के प्रयास किये गये तो माँ-बाप छाती पीट कर रो रहे थे और युवक की आँखों में सन्तोष झलक रहा था। शायद इसलिए कि जिस विष को वह अब तक चुपचाप पीता रहा-उसका प्रतिशोध ले लिया है।
आदमी जब खुलकर प्रतिशोध नहीं ले पाता तो इस प्रकार प्रतिशोध लेता है। एक प्रकार से प्रतिशोध का यह उपाय आत्मघाती है और निर्वीर्य भी, परन्तु यह एक तथ्य है कि दुश्मन से लड़ना आसान है और अपनों से लड़ना बहुत ही मुश्किल। अब अपनों से तो सीधा स्पष्ट प्रतिशोध लेने का कोई मार्ग नहीं सूझता क्योंकि अभ्यासवश पड़े संस्कार तथा परिवेश मजबूर करते हैं और इसी कारण क्रुद्ध होने के बावजूद भी व्यक्ति अपनों से-अपने परिवार से टक्कर लेने में असहाय होता है।
और दूसरी ओर अपने प्रति हो रहे दुर्व्यवहारों को भी सहन करते रहने की क्षमता नहीं है। वह घुटन बढ़ती रहती है और बाहर के प्रतिबन्ध भी उसी अनुपात से कसते जाते हैं ऐसी स्थिति में प्रतिशोध और निस्तार का यही उपाय सूझता है कि आत्महत्या कर ली जाय। ‘परिवार वालों को मेरा अभाव निश्चित रूप से खलेगा ही और जमाना भी उन्हें बुरा कहेगा’-अपने जीवन का अर्थ ही जब घुटन और कुण्ठाओं के अन्धकार में खो जाता है तो यह भाव उदय होते हैं और इन्हीं भावों की परिणति देखी जाती है-आत्महत्या के रूप में।
पारिवारिक कलह के कारण की गई आत्म-हत्याओं के पीछे जीवन से निराशा का कारण जितना ज्वलन्त है उतनी ही ज्वलन्त है प्रतिशोध की भावना। इसी कारण देखा जाता है कि महिलाएं जो अपने पति, सास ससुर अथवा परिवार के अन्य लोगों का विरोध नहीं कर पाती, वे आत्महत्या की राह पर चल पड़ती हैं। उनकी मृत्यु से उनके तो जीवन की ही क्षति होगी, परन्तु परिवार के अन्य लोगों का समूचा जीवन ही नारकीय बन जाता है। लोग उन्हें लम्बे समय तक अपने अत्याचार और उत्पीड़न के लिए लाँछित करते रहेंगे।
यद्यपि जीवन संघर्ष और बाह्य परिस्थितियों का सामना प्रायः पुरुष वर्ग को ही करना पड़ता है। इस कारण जीवन से निराश हो पलायन कर जाने की प्रवृत्ति के कारण आत्म-हत्याओं की संख्या में पुरुष ही अधिक है, जबकि महिलाओं को बाह्य-संघर्षों का प्रायः कोई सामना नहीं करना पड़ता। वे पारिवारिक कलह के कारण आत्म-हत्या करती हैं और इसमें पारिवारिक यन्त्रणाओं से मुक्ति के साथ परिवार के लोगों से प्रतिशोध की भावना भी मुख्य रूप से काम करती है।
महानगरों में जहां आधुनिक सभ्यता का नशा युवा पीढ़ी में आया है वही स्वच्छन्द जीवन और उन्मुक्त मैत्री की प्रवृत्ति भी बढ़ी है। लड़के-लड़कियाँ इसी कारण एक दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं तथा मिलते हैं। इन सम्बन्धों में से सभी की परिणति विवाह के रूप में तो नहीं होती परन्तु थोड़े बहुत पूर्व परिचित और सम्बद्ध युवक-युवतियाँ दाम्पत्य सूत्रों में बंधते हैं अपने संजोये सपनों को टूटते देखते हैं। विवाह से पूर्व प्रेमी और प्रेमिका भावुकता जन्य सपनों के संसार में विचरण करते हैं और विवाह के बाद जीवन के कठोर यथार्थों से सामना करना पड़ता है तो खीझ ही उठते हैं।
प्रायः देखा गया है कि युवक-युवतियाँ जो स्वच्छन्द सम्बन्ध बना लेते हैं और एक-दूसरे को जीवन साथी के रूप में देखना चाहते हैं-अपने परिवार के अन्य सदस्यों को बाधा रूप में खड़े देखते हैं। कारण चाहे जो भी हो, परिवार के अन्य सदस्य स्वेच्छया जीवन साथी के चुनाव को प्रायः मान्य नहीं ही करते हैं। युवक-युवतियाँ चूंकि निर्वाह और व्यक्तिगत आवश्यकताओं के लिए परिवार पर ही निर्भर रहते हैं इसलिए प्रत्यक्ष रूप से उसकी उपेक्षा भी नहीं कर सकते। फिर भी अन्त तक उनके प्रयास अपनी आकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए होते हैं और जब उनकी आकाँक्षाएं निश्चित रूप से अपूर्ण रह जाती हैं-प्रेमी या प्रेमिका का विवाह अन्य कहीं हो जाता है तो परिवार के प्रति प्रतिशोध आत्म-हनन का उग्र रूप धारण कर लेता है। दूसरे लड़की जब बहू बनकर किसी के घर जाती है तो वहाँ एक सर्वथा नया ही संसार देखने को मिलता है। माँ की प्रतिमूर्ति सास के रूप में तो दिखाई देती है और सास के लिए भी बहू बेटी के समान ही है। लेकिन दोनों एक दूसरे को भिन्न रूप में ही ग्रहण करते हैं। बहुत से रूपों में व्यवहार क्षेत्र में इसकी प्रतिक्रिया देखने में आती है और एक दूसरे की अपेक्षाएँ पूर्ण न होने के कारण उत्पन्न होता है-गृह-कलह।
परिवार में एक शीतयुद्ध का-सा वातावरण बन जाता है। दहेज, पिता-माता और बहू के परिवार रिश्तेदारों से लेकर कुलरीति तथा खानदानी परम्पराओं के बखान के वाक्युद्ध में तीखे तीर चलते हैं। पति न तो पत्नी की ओर बोल सकता है और न माता-पिता का पक्ष ले सकता है, प्रायः तटस्थ ही रहने में अपना भला समझता है। इन परिस्थितियों में-पारिवारिक परिवेश में स्त्रियाँ मात्र प्रतिशोध लेने के लिए कोई और उपाय न देखकर आत्म-हनन कर लेती हैं, जिसके दोहरे लाभ दीखते हैं। पहला तो यह कि प्रतिशोध की भावना भी पूरी हो जाती है और दूसरा यह कि उन परिस्थितियों, यन्त्रणाओं से भी छुटकारा मिल जाता है, प्रतिशोध की भावना का एक प्रमाण यह भी है कि आत्म-हत्या करने वाली बहुओं में से 70 प्रतिशत युवतियाँ अपने ससुराल में ही आत्महत्या कर लेती है। निस्सन्देह इसका कारण यह है कि सास जहाँ बहू को दूसरे घर से आई लड़की और मुफ्त की नौकरानी समझती है और बहू भी सास को माँ के स्थान पर प्रतिष्ठित नहीं कर पाती और यह स्थिति बहू के लिए आत्म-हननकारी परिस्थितियाँ ही उत्पन्न करती है।
महिलाओं की तरह विषम पारिवारिक और दाम्पत्य जीवन से परेशान होकर पुरुष भी आत्महत्या करते हैं। पुरुष भावुक किस्म के कम होते हैं, फिर भी कलह की एक सीमा होती है जिसका अतिक्रमण पुरुष की सहन शक्ति से बाहर की बात हो जाती है। बाहर के संघर्षों और द्वन्द्वों से हारा-थका आदमी घर में अपनी पत्नी की मुस्कान और बच्चों की तोतली बातों में डूबकर कुछ समय के लिए मानसिक उद्वेगों से बाहर आ जाना चाहता है। जीवन, समय और श्रम जिन लोगों के लिए लगा रहा है उनसे यह थोड़ी-सी आशा की जाय तो अनुचित नहीं होगा। लेकिन यह आशा जब पूरी नहीं होती, उल्टे सामने आती है फरमाइशों और शिकायतों की लम्बी फेहरिस्त तो उद्वेगपूर्ण वातावरण का निर्मित होना स्वाभाविक ही है।
पत्नी की फरमाइशों और शिकायतों के कारण तो छोटे-छोटे हैं परन्तु इनके साथ अन्य ऐसी गुत्थियों और समस्याएं भी हैं-जिन्हें मनोवैज्ञानिक भी अपने बस के बाहर समझते हैं। पति-पत्नी के तनावपूर्ण सम्बन्ध और बाहरी संघर्ष दोनों मिलकर आदमी को तोड़ डालते हैं। कहा जा सकता है कि बाहरी संघर्ष ज्यों के त्यों रहते और पति-पत्नी के सम्बन्ध मधुरतापूर्ण रहे होते तो कई पुरुष आत्महत्या का कदम उठाने के लिए अपने आपको विवश अनुभव नहीं करते।
आँकड़े बताते हैं कि अविवाहित पुरुषों की अपेक्षा विवाहित पुरुष ही अधिक आत्महत्याएं करते हैं। इन आत्महत्याओं के पीछे असन्तुष्ट विषम दाम्पत्य-जीवन का कारण अविच्छिन्न रूप में जुड़ा हुआ है। बाहरी संघर्षों से निराशा और आन्तरिक पारिवारिक सम्बन्धों की विषमता व तज्जनित प्रतिशोध का भाव व्यक्ति को आत्मघात की ओर धकेल दे तो इस असम्भावित घटना नहीं कहना चाहिए।
पारिवारिक कलह और दाम्पत्य जीवन की असफलता व्यक्ति के जीवन को एक ओर जहाँ नीरस बना देती है। वहीं दूसरी ओर ऐसे भयंकर आत्मघाती प्रतिशोध की आग भी जला देती है जिसकी ज्वालायें आत्महन्ता के जीवन का अन्त तो करती ही हैं, उससे उड़ता धुँआ और फैलती दुर्गन्ध आसपास के लोगों की आँखें भी जला देती है और साँस लेना भी मुश्किल कर देती है।
इस कदम के लिए मनोबल का अभाव तो उत्तरदायी है ही, जीवन और जगत के प्रति व्यावहारिक तथा स्वस्थ दृष्टिकोण की असमता भी है। आवश्यकता है ऐसे प्रयासों की जो व्यक्ति के मन में जीने का उत्साह, परिस्थितियों से संघर्ष का साहस और प्रतिशोध के साथ प्रेम का सम्मिश्रण करा दे। यह सब जीवन के प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण के विकास से ही सम्भव हो सकता है।
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शान्तिकुँज की सत्र शिक्षण योजना के अंतर्गत प्रथम पाँच वर्षों में प्रायः दस हजार व्यक्तियों ने आत्म-निर्माण और लोक-कल्याण की शिक्षा ग्रहण की है। परिवार की जागृत आत्माओं को-अन्तःकरण को उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने और गतिविधियों में लोक-मंगल के आदर्शों का अधिकाधिक समावेश करने का प्रशिक्षण दिया गया है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का लक्ष्य पूरा करने के लिए यही प्रथम चरण है कि जागृत आत्माएं दीपक की तरह स्वयं ज्योतिर्मय बनें और अपने प्रकाश से सम्पर्क क्षेत्र में आलोक उत्पन्न करें। इसी प्रयोजन के लिए गत वर्षों में (1) एक वर्ष के कन्या शिक्षण सत्र (2) एक महीने के महिला शिविर (3) दस दिन की जीवन साधना शिक्षा (4) एक महीने के वानप्रस्थ शिविर चलते रहे हैं। इस आरण्यक शिक्षा-पद्धति के सत्परिणाम देखते हुए निकटस्थ व्यक्ति को यह विश्वास उत्पन्न हुआ है कि व्यक्ति, परिवार और समाज का नवनिर्माण करने के लिए इस प्रकार की शिक्षण प्रक्रिया से बढ़कर युग परिवर्तन का आरम्भिक प्रयास और कोई हो ही नहीं सकता।
साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष में इस शिक्षण प्रक्रिया का स्तर और भी ऊँचा उठा दिया गया है। यह सत्र तो भविष्य में भी जारी रहेंगे, पर उनके छात्रों की पात्रता को अधिक परखने के बाद ही प्रवेश दिया जायगा और जो आवेंगे उनके प्रशिक्षण में प्रकाश के अतिरिक्त प्रेरणा तत्व का अधिक मात्रा में समावेश रहेगा। प्रकाश से तात्पर्य है बौद्धिक शिक्षण-ज्ञान सम्पदा का अभिवर्धन। स्वाध्याय और सत्संग से इसी प्रयोजन की पूर्ति होती हैं। लेखनी और वाणी द्वारा-दृश्य और श्रव्य माध्यम द्वारा जानकारियों का विस्तार और बुद्धिबल का विकास होता है। तथ्यों की जानकारी मिलने से दिशा निर्धारण में सहायता मिलती है अस्तु प्रकाश प्रयोजन के लिए विभिन्न स्तर की शिक्षा प्रक्रिया चलती है अपने स्तर की शिक्षा देने में शान्तिकुँज ने पिछले सत्रों में इसी आवश्यकता की पूर्ति की है।
यों साधना की-प्रेरणा की गरिमा को आरम्भ से ही समझा गया है और प्रकाश प्रशिक्षण के साथ उसे जुड़ा रखने का प्रयास निरन्तर किया गया है। वह शान्तिकुँज की शिक्षण प्रक्रिया आरम्भ करते समय यह निश्चय किया गया था कि अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति दो खण्डों में पूरी हो सकेगी। इसलिए उसके लिए दो पाठ्य-क्रम निर्धारित किये जायं। भूमि जोतने और बीज बोने की प्रक्रिया में यों परस्पर सम्बन्ध है, पर किसान उसे एक-एक करके दो बार में सम्पन्न करता है। प्रथम पाँच वर्षों में शान्तिकुँज की शिक्षण प्रक्रिया प्रकाश प्रधान रही है। उसमें सद्ज्ञान संवर्धन के उद्देश्य से आवश्यक उद्बोधन देने की बात को प्रमुखता दी गई। यह कृषि को जोतने जैसा एक चरण पूरा हुआ।
आगामी पाँच वर्षों में दूसरे-प्रेरणा पक्ष की-प्रधानता रहेगी। पिछले दिनों शिक्षार्थियों का अधिकाँश पाठ्यक्रम में अधिकाँश क्रिया-कलाप के लिए निर्धारित था। अगले दिनों साधना प्रयोजनों की प्रमुखता रहेगी। शिक्षार्थियों को योग-साधना एवं तपश्चर्या में निरत रहना पड़ेगा। प्रथम पाँच वर्षों में शान्तिकुँज के आरण्यक का प्रशिक्षण स्कूली स्तर का समझा जा सकता है और इस प्रकार सोचा जा सकता है कि अब वह कालेज स्तर में परिणत हो चला। उसमें साधना प्रक्रिया पर जोर दिया जायगा, शिक्षण का यों समावेश तो रहेगा, पर उसे उतना ही पर्याप्त मान लिया जायगा जितना अभीष्ट प्रयोजन के लिए नितान्त आवश्यक है।
साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष में ही शान्तिकुँज की द्वितीय पंचवर्षीय योजना आरम्भ हो रही है उसमें कई अति महत्वपूर्ण कार्यों को हाथ में लिया गया है। अब तक ‘धर्म मंच में लोक-शिक्षण’ की प्रक्रिया हिन्दू धर्म की प्रयोगशाला में ही प्रयुक्त होती रही है। अब उसका कार्यक्षेत्र विश्व के अन्य प्रमुख धर्मों की परिधि में विस्तृत किया जायगा। इसके लिए लगभग वैसा ही प्रस्तुतीकरण और प्रसार अभियान व्यापक रूप से चलाना पड़ेगा जैसा कि अब तक हिन्दू धर्म के क्षेत्र में चलता रहा है। अब तक हिन्दी भाषा ही अपने विचार विस्तार का प्रमुख माध्यम रही है। हिन्दी भाषी क्षेत्र में ही युग-निर्माण विचारधारा का प्रसार सम्भव हो सका है। अब क्षेत्र विस्तार की दिशा में कदम बढ़ने हैं तो स्वभावतः अन्य भाषाओं का भी आश्रय लेना पड़ेगा। अपनी द्वितीय पंचवर्षीय योजना में इन दो कार्यों के अतिरिक्त यज्ञ प्रक्रिया की वैज्ञानिक शोध भी एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है। पिछले दिनों यज्ञीय परम्परा को वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन में अधिकाधिक स्थान दिलाने के लिए यज्ञ विज्ञान को बौद्धिक एवं भावनात्मक उत्कर्ष का माध्यम बनाया जाता रहा है। अब उसे मानसिक और आत्मिक क्षेत्र में घुसी हुई आधि-व्याधियों के निराकरण का समर्थ माध्यम बनाया जाना है। भौतिक कठिनाइयों-वैयक्तिक विकृतियों का समाधान करने में यज्ञ विज्ञान किस प्रकार, किस सीमा तक समर्थ हो सकता है यह अनुसंधान अगले ही दिनों किया जाना है। शास्त्रीय फलश्रुतियाँ बताते रहने से आज का तर्कवादी मस्तिष्क किन्हीं तथ्यों को स्वीकार नहीं कर सकता। श्रद्धा के पोषण में पहले भी विवेक का समन्वय किया जाता था अब तो प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर कसे बिना कुछ भी गले नहीं उतरता। ऐसी दशा में चेतना पर चढ़ी हुई मलीनताओं को निरस्त करने में स्वर्णकार की भट्टी की तरह ही यज्ञ प्रक्रिया का प्रयोग करना पड़ेगा। व्याधियों के निराकरण में होम्योपैथी, एलोपैथी, आयुर्वेदिक, बायोकैमीक, नैचरोपैथी आदि अनेक चिकित्सा पद्धतियाँ प्रचलित हैं। वे शरीर को रोग मुक्त करने का दावा करती हैं। हमें चेतना को रुग्ण बनाने वाले कषाय-कल्मषों के निवारण में ‘यज्ञ पैथी’ का आश्रय लेना पड़ेगा। पर आज की स्थिति में युग के अनुरूप उन पुराने प्रयोगों को नये रूप में किस प्रकार परिष्कृत किया जा सकता है यह गम्भीर शोध का जटिल विषय है। अगले दिनों ऐसे ही अनेक महत्वपूर्ण कार्यों में जीवन का बचा खुचा समय प्रयुक्त होना है। प्रवासी भारतीयों के लिए संस्कृति के ऐसे प्रहरी तैयार करने हैं जो इन भारत माता के लालों को अपनी माता के साथ भावनात्मक रूप में जुड़ा रखने के लिए अपने को खपा सकें।
यह सब तो वे कार्य हैं जिनमें कुछेक प्रतिभाओं के सहचरत्व में हमें सम्पन्न करना है। व्यापक कार्य यह है कि अपने लाखों परिजनों में से कुछ हस्तियाँ ऐसी छोड़कर जायं जो आध्यात्मिकता की क्षमता, उपयोगिता को अपने विकसित व्यक्तित्व के सहारे प्रमाणित करते रह सकें। इसके लिए उपयुक्त पात्रों की खोज का प्रथम चरण पिछले पाँच वर्ष में पूरा हुआ है। एक प्रकार से यह “इन्टरव्यू” था। इसमें जाग्रत आत्माओं को निकट से देखने और परखने का अवसर मिला। आदान-प्रदान का उपयोगी उपक्रम भी चला। अब उपयुक्त समझे गये व्यक्तियों की नियुक्ति होनी है और कार्य सँभालने के लिए ट्रेनिंग मिलनी है। संक्षेप में अगले पाँच वर्ष तक शांतिकुंज में चलने वाली शिक्षण प्रक्रिया का यही आधार एवं उद्देश्य समझा जा सकता है।
पिछले दिनों जो सत्र चलते रहे हैं उनके नाम तो वही रहेंगे, पर समूची शिक्षा का उन्हें उत्तरार्द्ध कहा जा सकेगा। जो लोग पिछले पाँच वर्षों में आ चुके हैं उन्हें अगले पाँच वर्षों में भी उत्तरार्ध पूरा करने के लिए अवसर मिल सकेगा। एम0 ए0 दो वर्षों में होती है। दोनों के परीक्षा अंक जुड़ते हैं और उनके योग पर उत्तीर्ण होने की घोषणा होती है। अस्तु इन पंक्तियों द्वारा उन सभी शिक्षार्थियों को आमन्त्रित किया जाता है जो प्रकाश की तरह प्रेरणा की भी-ज्ञान की तरह शक्ति की भी आवश्यकता अनुभव करते हैं।
इन सत्रों में शिक्षण का स्तर व्यावहारिक मार्ग-दर्शन से ऊँचा उठाकर आध्यात्मिक आधार पर चेतना की मूल सत्ता को परिष्कृत करने की विवेचना के साथ जोड़ दिया जायगा। साधना प्रमुख रहेगी। दस दिवसीय सत्रों में गायत्री अनुष्ठान अनिवार्य होगा और एक महीने के वानप्रस्थ सत्रों में पुरश्चरण करना होगा। इसके अतिरिक्त व्यक्ति की स्थिति और आवश्यकताओं को देखकर तदनुरूप अन्य साधनाएँ अन्तःकरण की चिकित्सा स्तर पर कराई जायेंगी। यह साधनाएँ ‘योग’ विज्ञान के अन्तर्गत आती हैं। राजयोग, हठयोग, लययोग, प्राणयोग, कुण्डलिनी योग जैसी उपासना परक और ज्ञानयोग, कर्मयोग, भक्तियोग जैसी भावना पर कितनी ही साधनाएँ हैं जो पात्रता और स्तर के अनुरूप बताये और अपनाये जाते हैं। मनःस्थिति का निर्माण इसी आधार पर सम्भव होता है। बौद्धिक शिक्षण तो उसकी पृष्ठभूमि भर बनाता है।
साधना का दूसरा चरण होगा ‘तप’। तप का अर्थ है-शारीरिक सुविधाओं और मन की ललक लिप्साओं पर कठोरतापूर्वक अंकुश नियन्त्रण की स्थापना। कष्टसाध्य तितीक्षाएँ इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए होती हैं, स्पष्ट है कि तपाने की गर्मी से हर वस्तु में प्रखरता और परिपक्वता आती है। कच्ची ईंटें पकाने से चिरस्थायी बनती हैं। कुम्हार के बर्तन अवे में पककर ही सुदृढ़ बनते हैं। आयुर्वेदीय रसायनों एवं भस्मों में अग्नि संस्कार ही मुख्य है। सामान्य पानी जब आग के सम्पर्क से भाप बनता है तो रेलगाड़ी के इंजन को दौड़ाने लगता है। मिट्टी मिला कच्चा लोहा भट्टियों में गरम किये जाने पर ही शुद्ध बनता और फौलाद के रूप में विकसित होता है। सोने का खरापन आग में तपने पर ही प्रमाणित होता है। प्राचीन काल के आत्मबल सम्पन्न महामानव तप शक्ति से ही महात्मा, देवात्मा एवं परमात्मा बन सकने में समर्थ हुए। तप से आत्मबल बढ़ता है और उसकी परिणित अनेकानेक सिद्धियों तथा चमत्कारों में देखी जाती है। आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ देने में तप वही काम करता है जो दो धातु खंडों को तपाकर एक बना देने में ‘वैल्डिंग’ उपचार काम करता है। तलवार पर धार चढ़ाने में अग्नि संस्कार की आवश्यकता होती है और व्यक्तित्व को निखारने में तप से अद्भुत परिणाम उत्पन्न होता है। पार्वती ने तप बल से ही शंकर की पत्नी बनने में सफलता पाई थी। भागीरथ तप से ही गंगा लाये थे। तपस्वी दधीच की अस्थियों से वज्र बना था। सप्त ऋषियों का वर्चस्व उनकी तप साधना के कारण ही निखरा था। आज भी वह सनातन तथ्य अपने स्थान पर जहाँ का तहाँ मौजूद है।
सोचा गया है जिस आधार पर हमें कुछ बनने और कुछ करने की सफलता मिली उस कष्टसाध्य तपश्चर्या का कुछ-कुछ अनुभव उन शिक्षार्थियों को भी कराया जाय जिनसे हमें कुछ अपेक्षा है अथवा जो हमसे कुछ आशा करते हैं। तप प्रक्रिया को हटा देने पर हमारे निज के जीवन में कुछ बच ही नहीं रहता। प्रकरण कष्टसाध्य और अरुचिकर हो सकता है, पर महत्वपूर्ण उपलब्धियों के लिए इससे कम मूल्य चुकाने से बात बनती भी तो नहीं है। अस्तु अगले दिनों जीवन-साधना और वानप्रस्थ सत्रों के साथ प्रकाश अनुदान के लिए ब्रह्म-विद्या स्तर के प्रशिक्षण-मनोनिग्रह के लिए योगाभ्यास तथा प्रसुप्त दिव्य शक्तियों के जागरण के लिए तपश्चर्या का त्रिविधि समन्वय बनाकर चला जायगा। इस त्रिवेणी संगम से कुछ महत्वपूर्ण परिणाम दृष्टिगोचर हो सकेंगे यह सुनिश्चित है।
अगले दिनों शान्तिकुँज में आने वाले शिक्षार्थियों को कष्टसाध्य नियन्त्रित एवं कठोर अनुशासन का पालन करने के लिए तैयार होकर आना चाहिए। तप साधना में - (1) मात्र गंगाजल ही पीना (2) स्थिति के अनुरूप व्रत उपवास (3) हविष्यान्न एवं आंवला कल्प का सेवन (4) मौन (5) नंगे पैर रहना (6) अपनी शारीरिक सेवाएँ करना (7) भूमि शयन (8) ब्रह्मचर्य पालन (9) आश्रम की स्वच्छता के निमित्त श्रमदान (10) निर्धारित दिनचर्या का बिना आलस्य-प्रमाद के परिपालन। मुख्यतया यही दस तप साधन हैं जो साधकों की स्थिति के अनुरूप बताये कराये जायेंगे।
जीवन-साधना सत्रों में पिछले दिनों जिन्दगी जीने की कला का सिद्धान्त पक्ष समझाया जा चुका है अगली बार उनमें व्यावहारिक क्रिया-कलाप की सुनिश्चित रूपरेखा व्यक्ति विशेष की परिस्थितियों को देखते हुए बना दी जायगी। वानप्रस्थ सत्रों में धर्म-तन्त्र से लोक-शिक्षण के लिए कथा, प्रवचन, पर्व, संस्कार, यज्ञ कर्मकाण्ड आदि का अभ्यास कराया जाता रहा है। उन प्रयोजनों को अधिक प्रभावशाली कैसे बनाया जा सकता है, यह उत्तरार्ध में अगली बार सिखाया जायगा। वानप्रस्थ स्तर के लोग, साधु व ब्राह्मण की उभय-पक्षीय प्रक्रिया का समन्वय करते हैं और आत्म-निर्माण तथा समाज निर्माण की अति महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करते हैं। यह सब किस प्रकार सम्भव हो सकता है इसके मार्मिक प्रशिक्षण की विधि-व्यवस्था इन सत्रों में सम्मिलित होने वालों को पूरी तरह ध्यान में रखते हुए पृथक-पृथक प्रकार की बनाते रहने का क्रम चलाया गया है।
इन जटिलताओं का समावेश हो जाने से पिछले दिनों जो भीड़-भाड़ शिविरों में रहा करती थी वह स्वभावतः घट जायगी। जिन्हें वस्तुतः आत्मोत्कर्ष में ठोस रुचि होगी वे ही आने का साहस करेंगे। इससे हमारी भी एक बड़ी कठिनाई दूर होगी। तीर्थयात्रा, पर्यटन आदि का मनोरंजन करने वाले सैलानी अक्सर सत्रों की आड़ में यहाँ घुस पड़ते हैं। शिक्षार्थी अपने साथ अड़ौसी-पड़ौसी, नाते-रिश्ते वाले, तथा स्त्री-बच्चे लेकर आ धमकते थे और इस आश्रम के तपोवन को धर्मशाला तथा अन्य क्षेत्र की तरह प्रयुक्त करने का आग्रह करते थे। दुख कष्टों की निवृत्ति का आशीर्वाद अनुदान पाने के लिए तथा कौतूहल शान्ति करने वाले दर्शनार्थी मात्र परामर्श करके ही विदा नहीं होते थे। यहीं अड्डा डालकर कितने ही दिन रहना भी चाहते थे। स्पष्ट है इन अनचाहे अतिथियों से आश्रम व्यवस्था में भारी अव्यवस्था फैलती थी और तपोवन का गौरव स्तर तथा अनुशासन बेतरह गिरता था। हमारे लिए ऐसे प्रसंग साँप, छछूँदर जैसे असमंजस में डालने वाले होते रहे हैं। गरम दूध न पीते बनता था न उगलते। अनचाहे अतिथियों को ठहरने देने और न ठहरने देने में भारी धर्म संकट का सामना करना पड़ता था और उस उलझन से निपटने के लिए कोई हल निकालना और सन्तुलन बनाये रहना अति कठिन पड़ता था। अब भावी सत्रों में साधना की कठोरता जुड़ जाने से घुसपैठियों का प्रवेश पा सकना सम्भव न रहेगा और जो नर-नारी वस्तुतः अभीष्ट प्रयोजन के लिए आने वाले होंगे उन्हीं की व्यवस्था हमें करनी पड़ेगी।
परिवर्तित शिक्षण प्रक्रिया इन्हीं दिनों आरम्भ की जा रही है। सितम्बर का वानप्रस्थ सत्र तथा अक्टूबर से आरम्भ होने वाले दस दिवसीय सत्र इसी नये स्तर के अनुरूप होंगे तथा भविष्य में भी इसी आधार पर चलते रहेंगे। यों भावी योजना इस प्रयोजन के लिए अलग आश्रम बनाने की है। विधिवत् ‘आरण्यक’ विधि-व्यवस्था उसी में चलेगी। उसका नामकरण ‘ब्रह्मवर्चस’ सोचा गया है। इसके लिए शान्तिकुँज के समीप ही जमीन खरीदने की तैयारी चल रही है। कुछ कठिनाइयों से यह प्रगति धीमी है। देर लगे तो उसके लिए नये चरण रोके नहीं जा सकते। वर्तमान आश्रम का ही उस प्रयोजन के लिए वैसा ही उपयोग होता रहेगा जैसा कि अब तक होता रहा है। मत्स्यावतार की तरह महिला जागृति अभियान की बढ़ती हुई गतिविधियों के लिए यह इमारत भी कम पड़ रही है ऐसी दशा में ‘ब्रह्मवर्चस् आरण्यक’ का अलग आश्रम तो देर सवेर में बनेगा ही, पर अभी तो जैसा कुछ चलता रहा है वैसा ही चलेगा।
आवेदन पत्र हाथ से लिख कर भेजा जा सकता है। उसके आरम्भ में मोटे अक्षरों एवं लाल स्याही से यह लिखा जाना चाहिए कि किस सत्र की किन तारीखों में आने की इच्छा प्रकट की गई है।
अब तक के आवेदन पत्रों में (1) शिक्षार्थी का नाम (2) पूरा पता (3) शिक्षा (4) व्यवसाय (5) आयु (6) जन्म-जाति (7) शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के सही होने की घोषणा (8) 14 वर्ष से कम आयु के बालकों को सत्रों में न लाने के प्रतिबन्ध तथा बिना स्वीकृति वालों को घसीट लाने की रोकथाम पर सहमति। इन आठ बातों का उल्लेख रहता था। अब नये आवेदन पत्रों में कुछ प्रश्न और जोड़ दिये गये हैं (9) पिछले किसी सत्र में शान्तिकुँज आ चुके हों तो उसका उल्लेख (10) अब तक के जीवन क्रम में घटित हुई भली बुरी किन्तु महत्व की घटनाओं का विस्तृत विवरण (11)सामने प्रस्तुत समस्याओं एवं कठिनाइयों की जानकारी (12) भविष्य के लिए मन में उठने वाली आकांक्षाओं एवं क्रिया-कलापों की झलक तथा तैयारी। (13) अब तक की की गई साधनाओं का विवरण तथा निष्कर्ष। इन दिनों इस दिशा में जो किया जाता हो उसका परिचय। पुराने आठ और नये पाँच कुल तेरह प्रश्नों के उत्तर आदि कागज पर लिख कर भेजे जाने चाहिए और स्वीकृति मिलने पर नियत समय पर पहुँचने की तैयारी करनी चाहिए। यदि किसी कारणवश समय पर पहुँचना सम्भव न हो सके अथवा तारीख बदलवाना हो तो समय से पूर्व ही उसकी सूचना दे देनी चाहिए ताकि उस खाली स्थान का लाभ किसी अन्य साधक को मिल सके। भोजन व्यय एक महीने का 70) और दस दिन का 25) है। यह शिक्षार्थी को स्वयं ही वहन करना चाहिए और आते ही जमा कर देना चाहिए।
परिजनों की कन्याएँ एक वर्ष के और महिलाएँ एक महीने के शिविरों में आती रही हैं। वे सत्र भविष्य में भी यथावत चलते रहेंगे। अगले वर्ष के लिए उनके आवेदन पत्र जनवरी से ही भेज देने चाहिए ताकि समय से पूर्व ही स्वीकृति प्राप्त करके स्थान सुरक्षित करा लिया जा सके। इस वर्ष मई जून में जितने आवेदन पत्र भेजे थे उन्हें सभी सीटें पहले से भर जाने के कारण स्वीकृति न दी जा सकी। सीमित स्थान और आवेदनों की अधिकता वाली कठिनाई कन्याओं और महिलाओं के प्रशिक्षण में भी रहती है। अस्तु देर से चेतने वालों को निराश ही होना पड़ता है।
स्तर ऊँचा उठाने वाला प्रयोग कन्याओं और महिलाओं के सम्बन्ध में भी किया जायगा बहुत छोटी आयु न्यून शिक्षा तथा बौद्धिक विकास की कमी वाली छात्राओं को न लिया जा सकेगा। ऐसी प्रतिभावान छात्राओं के प्रशिक्षण की आवश्यकता है जो व्यक्तिगत उत्कर्ष के साथ साथ नारी जागरण के लिए कुछ करने की भावनाओं से ओत-प्रोत हों।
जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व हलके हों-पूरे हो चूके अथवा है ही नहीं-ऐसी महिलाओं के लिए नारी उत्थान के लिए कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकना अधिक अच्छी तरह संभव हो सकता है। ऐसी छात्राओं को इस आशा से प्राथमिकता दी जायगी कि सम्भवतः वे युग की पुकार को पूरी करने के लिए महिला जागरण अभियान में कुछ अधिक योगदान दे सकेंगी। इसी प्रकार जिनके विवाह में बहुत उतावली न हो रही हो उन्हीं का कन्या शिक्षण में आना अधिक सार्थक है। इन तथ्यों को अगले वर्ष कन्याओं और महिलाओं को स्वीकृति में प्रमुखता देते हुए ध्यान में रखा जायगा। इस प्रशिक्षण का लाभ जन-कल्याण के लिए उपलब्ध हो सके तो ही उसकी सार्थकता है। व्यक्तिगत लाभ तक ही जिस शिक्षा का सीमा बन्धन बना रहे तो उसका उतना महत्व नहीं जिस पर सन्तोष व्यक्त किया जा सके।
जीवन साधना और वानप्रस्थों के लिए न्यूनतम समय तो घोषित कर ही दिया गया है, पर जिनकी आकाँक्षा एवं पात्रता होगी वे विशेष अध्ययन एवं विशेष साधना के लिए अधिक समय भी यहाँ ठहर सकेंगे। कुछ पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त व्यक्ति आजीवन परमार्थ प्रयोजनों में निरत रहना चाहते हैं। ऐसे लोगों के व्यक्तित्व यदि समाज सेवा के उपयुक्त सिद्ध हुए तो उन्हें देर तक इधर रुकने की स्वीकृति दी जा सकती है। लोक मंगल के लिए समर्पित जीवनों का स्वागत करने के लिए अपने मिशन का द्वार सदा से खुला है। उनके ब्राह्मणोचित स्तर के निर्वाह की व्यवस्था भी यहाँ मौजूद है, पर ऐसे समर्पण स्वीकार तभी होंगे जब उन्हें कई कसौटियों पर परख कर खरा मानने की स्थिति सामने आ जायगी।
कुछ लोग पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त होकर किसी शान्त एवं प्रकाशपूर्ण वातावरण में शेष जीवन बिताने के इच्छुक होते हैं। रिटायर पेन्शनर तथा जिनके पास अपने गुजारे के दूसरे प्रबन्ध हैं वे आरम्भ से ही यह अनुरोध करते रहे हैं कि उन्हें शान्तिकुँज में स्थायी निवास का अवसर दिया जाय। स्थानाभाव के कारण अब तक उन्हें मना ही किया जाता रहा है, पर अब ऐसी स्थिति बन चली है जिसमें कुछ चुने हुए लोगों को यहाँ स्थायी निवास की स्वीकृति दी जा सके। अस्तु इस प्रकार की इच्छा वाले व्यक्ति कुछ समय प्रयोग के रूप में इधर निवास करने की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हैं और पीछे जब उन्हें यहाँ अनुकूलता प्रतीत हो तो स्थायी रूप से निवास का निर्णय कर सकते हैं।
विचारों का आदान-प्रदान सरल भी है और आवश्यक भी। उसके लिए लेखन, भाषण एवं दृश्य, श्रव्य जैसे माध्यम भी अनेकों हैं, पर विडम्बना यह है कि सब कुछ जान लेने पर भी कुछ भी न मानने की हठी मनोभूमि जहाँ की तहाँ बनी रहती है। विशेषतया जब कभी आदर्शवादिता को व्यावहारिक जीवन में उतारने का अवसर आता है तब तो धर्म प्रवक्ता भी बगलें झाँकते देखे जाते हैं। धर्मोपदेशों में कुशल व्यक्ति भी जब अपने निजी आचरण में खोटे उतरते हैं तब प्रतीत होता है कि विचारों के पीछे जानकारियाँ तो बहुत होती हैं, पर वह सामर्थ्य बहुत स्वल्प होती है जिसके सहारे व्यक्तित्व उभरते और अस्तित्व प्रखर बनते देखे जाते हैं।
मनुष्य की मूल सत्ता अनुकरण प्रिय है। प्रायः वह मनस्वी वर्चस्व से प्रभावित होती है। ओजस्वी मनुष्य असंख्यों को अपना अनुयायी बनाते हैं। प्रभाव का केन्द्र प्राण है। प्राण शक्ति मन, वचन, कर्म की एकता से प्रखर बनती है। प्राणवान् व्यक्तित्वों और वातावरणों का सान्निध्य ग्रहण करके सामान्य लोग भी आगे बढ़ने तथा ऊँचे उठने के लिए आवश्यक मनोबल प्राप्त करते हैं। तीर्थ स्थानों में जाने और वहाँ निवास करने का जो लाभ प्राचीन काल में मिलता था इसके पीछे वहाँ का प्राणवान वातावरण ही मुख्य कारण था। शान्तिकुँज को प्राण शक्ति युक्त बनाने के लिए हर सम्भव प्रयत्न किया जाता रहा है। यह स्थान कुछ समय पूर्व गंगा की धारा के बीचों बीच था। बाँध बन जाने से गंगा का प्रवाह सीमित बना और डूबी जमीन को उपयोग के लिए निकाल लिया गया। इसी भूमि पर शान्तिकुंज बना है। 55 वर्ष से जल रहे जिस अखण्ड धृत दीपक पर अपनी गायत्री साधना सम्पन्न होती आई है उसे अब इस भूमि पर लाकर स्थापित कर दिया गया है। आरम्भ के दिन से लेकर आज पर्यन्त करोड़ों गायत्री मन्त्र के जप पुरश्चरण-नित्य यज्ञ, शास्त्र प्रवचन, स्वाध्याय परायण जैसे अनेकों आत्मशक्ति सम्वर्धक प्रयोग यहाँ चलते रहते हैं। इसका प्रभाव इस भूमि को सच्चे अर्थों में युग तीर्थ बना सकने में समर्थ हो गया है। हिमालय की दिव्य सत्ताओं का यहाँ संरक्षण है। इसके सूत्र संचालक तत्व इसे अधिकाधिक महत्वपूर्ण बनाने के लिए प्राण-प्रण से प्रयत्नशील हैं। ऐसे तपोवन में कुछ समय का निवास अपने आप में एक ऐसा सौभाग्य है जिसका सत्परिणाम कोई भी और कभी भी देख सकता है।
पिछले पाँच वर्षों में चलती रही प्रशिक्षण प्रक्रिया के जो प्रतिफल देखने में आये हैं उनसे प्रत्येक सम्बद्ध व्यक्ति को भारी सन्तोष एवं उत्साह मिला है। अगले अग्रिम चरण के रूप में आरम्भ हो रही साधना प्रक्रिया का महत्व, प्रथम चरण की-पिछले पाँच वर्ष वाले प्रशिक्षण की तुलना में अत्यधिक है। इसलिए इसका लाभ उठाने के लिए उन सब को पुनः आमन्त्रित किया जा रहा है जो पिछले किसी शिविर में आ चुके या जो अभी तक नहीं आयें हैं। यहाँ अधिक समय तक ठहर सकना एवं स्थायी निवास बना लेना तो और भी उच्चस्तर का सौभाग्य है। जागृत आत्माओं के साथ रहने और साथ रखने की हमारी आकाँक्षा की पूर्ति इन सत्रों के माध्यम से ही सम्भव हो सकेगी, इसलिए उस ओर भावनाशील परिजनों में से प्रत्येक का ध्यान आकर्षित किया जा रहा है।
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साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष की उपलब्धियों पर जितनी गहराई से विचार किया जाता है उतनी ही उसकी गरिमा स्पष्ट होती और निखरती चली जाती है। लगता है कि इस अवसर पर उत्पन्न हुआ उत्साह अति महत्वपूर्ण सृजनात्मक प्रयोजनों में लगा है और उसका समस्त विश्व को प्रभावित करने वाला सत्परिणाम उभर कर ऊपर आया है।
भौतिक पुरुषार्थों की तरह साधना भी आत्मिक प्रगति के लिए एक महत्वपूर्ण आधार है अधीर और अस्थिर मन हथेली पर सरसों जमाने के लिए आतुर रहता है और तुर्त-फुर्त मनोकामनाएं पूरी होते न देखकर निराश हो बैठता है। यदि इस दोष का परिमार्जन हो सके-श्रद्धा की परतें अन्तःकरण की गहराई तक प्रवेश पा सकें तो प्रतीत होगा कि किसी भी लाभदायक व्यवसाय की तुलना में साधना प्रयोजनों में लगने वाली शक्ति कम नहीं अधिक ही सत्परिणाम उत्पन्न करती है। अधीरता और अनास्था के वातावरण में स्वर्ण-जयन्ती साधन शृंखला ने नये उत्साह और नये विश्वास का संचार किया है। अपेक्षा की जानी चाहिए कि इससे आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता की शक्तियाँ सुदृढ़ होंगी और उनके पल्लवित होने एवं फल-फूलों से लदने का सुखद अवसर प्राप्त होगा।
भौतिक सम्पत्ति द्वारा मिलने वाले सुविधा साधनों से सभी परिचित हैं अस्तु उसके उपार्जन में सहज ही सबकी रुचि रहती है कदाचित ऐसा ही परिचय आत्मिक विभूतियों से भी रहा होता और उनके द्वारा मिलने वाले सत्परिणामों को समझा गया होता तो प्रतीत होता कि इस प्रयोजन के लिए किया गया श्रम कितना अधिक उपयोगी है। इस प्रयास से व्यक्तित्व के सर्वतोमुखी विकास की जो पृष्ठभूमि बनती है, उसे भूतकालीन सच्चे आध्यात्मवादियों की उपलब्धियों का पर्यवेक्षण करने वाला सहज ही समझ सकता है। अनादिकाल से चले आ रहे प्रकृति के मौलिक सिद्धान्त अनन्तकाल तक चलते रहते हैं। साधना और सिद्धि का समन्वय भी एक ऐसा ही अकाट्य सिद्धान्त है। उसकी सच्चाई समझने का साधन-शृंखला के सदस्यों को अवसर मिलेगा, ऐसी आशा करने में कोई अतिवाद नहीं है।
साधन शृंखला के सदस्यों की सीमित संख्या सोची गई थी, पर पूरी हो गई और अब नये सदस्यों का पंजीकरण बन्द कर दिया गया है। बसन्त पर्व से लेकर गायत्री जयन्ती तक की अवधि के चार महीने साधकों के नामाँकन और उनके मार्ग-दर्शन एवं शंका समाधान के लिए नियत थे। वह समय पूरा होते-होते सभी साधनों में स्थिरता आ गई है और वे अपनी साधन प्रक्रिया में निष्ठापूर्वक संलग्न हो गये हैं। नये अनुसाधक भी बन रहे हैं, पर उनका उत्तरदायित्व एवं मार्गदर्शन पंजीकृत साधकों के ऊपर छोड़ दिया गया है। इस प्रकार दीपक से दीपक जलाने का यह क्रम चिरकाल तक चलता रहेगा। यों एक वर्ष का संकल्पित अनुष्ठान तो आगामी बसन्त पंचमी को ही पूर्ण हो जायगा। आँखों से यह प्रयास किसी प्रत्यक्ष आयोजन उत्सव के रूप में नहीं देखा जा सकता तो भी उसकी परोक्ष सम्भावनाओं को किसी विशाल प्रदर्शन की तुलना में कम नहीं अधिक ही माना जाना चाहिए।
ऊपर की पंक्तियों में साधन शृंखला के प्रथम चरण की चर्चा हुई जिसे अब तक एक प्रकार से पूरा हुआ ही समझा जा सकता है। दूसरा चरण यह है कि साधकों, अनुसाधकों तथा उपासना क्षेत्र में उत्साह रखने वाले परिजनों से प्रत्यक्ष सम्पर्क की व्यवस्था करना और यह देखना कि उनकी प्रगति किस क्रम से चल रही है। उन्हें किसी अवरोध का सामना तो नहीं करना पड़ रहा है, वे कहीं भटक तो नहीं रहे हैं। यह बातें यों पत्र-व्यवहार से भी किसी कदर हल हो सकती हैं, पर अधिक उपयुक्त यही है कि परस्पर विचार-विनियम एवं प्रत्यक्ष सम्पर्क से वस्तुस्थिति को समझा जाय और स्थिति के अनुरूप समाधान प्रस्तुत किया जाय। अगले चार महीने इसी प्रयोजन के लिए नियत निर्धारित किये गये है।
व्यवस्था यह की गई है कि जहाँ भी साधना-परक उत्साह है वहां अपने प्रतिनिधि भेजे जायं। उनका कार्यक्रम एक केन्द्र पर दो दिन का हो। अच्छा तो यह है कि सभी साधक एक जगह रहने और पूरे दो दिन की सामूहिक साधना प्रक्रिया अपनायें। जहाँ ऐसा न हो सके वहां इतना तो होना ही चाहिए-प्रातः 6 से 9 तक सभी साधक-अनुसाधक तथा दूसरे आस्थावान व्यक्ति एकत्रित होकर सामूहिक जप एवं हवन करें और पहुँचे हुए प्रतिनिधि के साथ विचार-विनियम करते हुए अपनी साधना को अधिक प्रखर बनाने का प्रयत्न करें।
प्रातः के तीन घंटे विशुद्ध रूप से साधकों के सामूहिक सम्मिलन के लिए सुरक्षित रहेंगे। तीसरे प्रहर भेजे गये प्रतिनिधि लोगों के घरों पर उनसे सम्पर्क के लिए जाने अथवा सबको एकत्रित करके व्यक्तिगत परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त करने एवं भावनात्मक नव-निर्माण की पुण्य प्रक्रिया को अग्रगामी बनाने के सन्दर्भ में विचार-विनिमय का क्रम चलायेंगे। इसे विचार गोष्ठी अथवा सम्पर्क मिलन कहा जा सकता है। रात्रि को सार्वजनिक आयोजन किया जायगा। जिसमें अध्यात्म तत्वज्ञान के स्वरूप क्रियान्वयन प्रयोग एवं परिणामों के सम्बन्ध में प्रकाश डाला जायगा। तीसरे प्रहर का जन-सम्पर्क और रात्रि का सार्वजनिक आयोजन किस स्थान पर रखा जाय और उसका समय क्या हो यह निर्धारण करना स्थानीय सुविधा देखते हुए स्थानीय लोगों का ही काम है।
प्रयत्न यह किया जा रहा है कि जहाँ भी साधना प्रयोजनों में समुचित उत्साह है और जहाँ कई निष्ठावान साधक हैं उन सभी स्थानों पर प्रतिनिधि भेजे जायं और वहाँ उपरोक्त प्रकार के दो दिवसीय आयोजन सम्पन्न हों। फिर भी प्रतिनिधियों की कमी और यातायात की कठिनाइयों को देखते हुए कुछ स्थान छूट भी सकते हैं। प्रयत्न यही रहेगा कि यथासम्भव अधिकाधिक स्थानों में इस प्रकार के छोटे सम्मेलन आयोजन सम्भव हो सके।
प्रतिनिधि अपने प्रवास एवं कार्यक्रम का एक निर्धारित सर्किल बनाकर निकलेंगे और एक के बाद दूसरे सम्मेलन का प्रबन्ध करते हुए प्रायः दो महीने में वापिस लौटेंगे। वे एक जगह प्रायः दो दिन रह सकेंगे। आधा दिन यात्रा में लग जाया करेगा। एक जगह का कार्यक्रम पूरा करके यहाँ से प्रातःकाल चल पड़ना और शाम तक नई जगह जा पहुँचना। रात्रि को उस नये स्थान के कार्यकर्त्ताओं से मिलना तथा निर्धारित कार्य-प्रक्रिया से परिचित करना उनका प्रथम प्रयास होगा। साधक उस दिन एक स्थान पर एकत्रित होंगे, परस्पर परिचय प्राप्त करेंगे और आयोजन की पूर्व निर्धारित कार्य-पद्धति के सम्बन्ध में परामर्श करेंगे। बस उस रात्रि को इतना ही कार्यक्रम रहेगा। प्रतिनिधि पूरे दो दिन ठहरेंगे और प्रातः साधक सम्मेलन-तीसरे प्रहर के सम्पर्क विचार-विनिमय एवं रात्रि का सार्वजनिक आयोजन सम्पन्न करेंगे। यही कार्यक्रम सभी स्थानों पर रहेगा।
इन्हीं दिनों उन स्थानों की सूची तैयार की जा रही है और यात्रा चक्र बनाये जा रहे हैं जहाँ होते हुए प्रतिनिधिगण अपने-अपने प्रवास कम को पूरा करते हुए आगे बढ़ते रह सकेंगे। सम्भवतः 15 सितम्बर से यह क्रम चल पड़ेगा और 15 जनवरी तक यह क्रम जारी रहेगा। चार महीनों की अवधि में कितने सम्मेलन सम्भव हैं, कितने प्रतिनिधि भेजे जाने योग्य हैं, किन स्थानों पर इस प्रयास के ठीक तरह सम्पन्न हो सकने की सम्भावना है-यह रूप-रेखा अगस्त के महीने में बन जायगी। जिन्हें अपने यहाँ इस प्रकार की व्यवस्था करनी अभीष्ट है, वे पत्र द्वारा सूचित करेंगे अन्यथा केन्द्र की ओर से ही उन्हें सूचना दे दी जायेगी कि किन तिथियों में उनके यहाँ आयोजन रखा गया है इस सूचना आदान-प्रदान के आधार पर इन छोटे आयोजनों की व्यवस्था हर जगह बन जायगी और वह पूरी तरह सफल होगी, ऐसी सम्भावना है।
इन छोटे आयोजनों के लिए मानसिक उत्साह एवं परस्पर मिल-जुलकर एकीकरण एवं आदान-प्रदान की सुखद सम्भावना साकार हो सके, ऐसी तैयारी की जानी चाहिए। प्रत्यक्षतः यह छोटे आयोजन हैं। दो दिन के सभा सम्मेलन का प्रचार करने में ऐलान, पर्चे, पोस्टर, निमन्त्रण, सम्पर्क जैसे प्रयास तो करने ही होंगे अन्यथा जनता को पता ही नहीं चलेगा और इकट्ठे होने की बात बन ही नहीं सकेगी। सभा स्थल, मंच, पंचाल, बिछावन, रोशनी, लाउडस्पीकर जैसे प्रबन्ध भी करने ही होंगे। आरम्भ में थोड़ी संगीत व्यवस्था बनाने के लिए गायकों को अपने विषय के गाने देने होंगे और वाद्य यंत्रों को बजाने वाले ढूंढ़ने पड़ेंगे। जिन्हें आयोजनों का अभ्यास है वे इस प्रकार का प्रबन्ध आसानी से कर लेते हैं तो भी किफायत बरतते-बरतते कुछ पैसा तो खर्च हो ही जाता है। सौ रुपये तो बात की बात में उठ जाते हैं। प्रातःकाल में साधक सम्मेलन में दो दिन का हवन तो महंगा नहीं पड़ता, पर साधन तो उसके लिए भी जुटाने ही पड़ते हैं।
आगामी बसन्त पर्व 24 जनवरी सन् 77 चन्द्रवार का हैं उस दिन साधना मंडली द्वारा अपने-अपने स्थान पर इस युग साधना की पूर्णाहुति अधिक उत्साहपूर्वक यथासम्भव बड़े रूप में सम्पन्न की जाय। यों बसन्त पर्व अपने परिवार का सबसे बड़ा पर्व है और उसे हम लोग पूरे उत्साह के साथ मनाते एवं नये-नये संकल्प लेकर आत्मिक प्रगति के मार्ग पर क्रमशः भाव भरे कदम उठाते रहे हैं। इस बार उसमें स्वर्ण-जयन्ती की विशेषता जुड़ गई है। इसलिए उसके लिए उत्साह भी तदनुरूप ही प्रदर्शित किया जाना चाहिए। सन् 77 का बसन्त पर्व कहाँ किस प्रकार किस तैयारी के साथ मनाया जाय ? इसकी तैयारी अभी से की जानी चाहिए। वक्ता तपोभूमि से सर्वत्र नहीं भेजे जा सकेंगे, इसलिए उनकी पूर्ति अपने-अपने क्षेत्रों से ही करनी पड़ेगी। गायन और प्रवचन किसे किस विषय पर करना है इसके लिए सामग्री समय से पहले ही दी जा सके तो फिर अपने मंच से अप्रासंगिक बकवास चल पड़ने की आशंका नहीं रह जायगी। आरम्भ से ही यह प्रसंग ध्यान में रखा जाय तो बसन्त पर्व आयोजन के सुनियोजित और सुसम्बद्ध रहने में किसी प्रकार की कठिनाई न रहेगी।
यह साधना प्रक्रिया और सम्मेलन की व्यवस्था हुई। आगे की बात आत्म निर्माण और समाज निर्माण के मूल प्रसंग की है जिसके लिए अपने मिशन को बनाया और चलाया गया है। अपने व्यक्तित्व का सर्वतोमुखी विकास करके ही हम अध्यात्म परायणता को सार्थक सिद्ध कर सकते हैं। अपने गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार करने के साथ आत्मिक प्रगति के सारे सूत्र जुड़े हुए हैं उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व ही धर्म धारणा का एकमात्र प्रमाण है। चरित्रनिष्ठा और समाज-निष्ठा किसमें कितनी परिपक्व हुई इसी कसौटी पर कस के किसी की आत्मबल-वृद्धि एवं आत्मिक प्रगति का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। आस्तिकवाद का लक्ष्य यह है कि व्यक्ति अधिकाधिक प्रामाणिक सज्जन, कर्त्तव्य परायण एवं लोकसेवी बनता चला जाय और ईश्वर के समतुल्य भावना क्षेत्र में उदात्त एवं परिष्कृत सिद्ध हो सके।
यह वर्ष हम सब के कठोर आत्म निरीक्षण का है। अपने क्रिया-कलाप को, विचार संस्थान को, भावना केन्द्र अन्तःकरण को कठोर समीक्षा पूर्वक परखें और जहाँ जो छिद्र दिखाई पड़े उन्हें साहसपूर्वक रोकने के लिए जूट जायं। सज्जनता की सभी विशेषताओं को अपने में उत्पन्न करते और बढ़ाते चले जायं। संकीर्ण स्वार्थपरता के भव बन्धनों को काटें और उदार परमार्थ परायणता की दिशा में चलते हुए अपने आप में देवत्व का अवतरण कर दिखायें। लोक-सेवा हमारा व्रत है-जन-कल्याण के लिए किये गये प्रयत्नों में जीवन की सार्थकता अनुभव करें। देश, धर्म, समाज और संस्कृति को अधिकाधिक समुन्नत बनाने के लिए हमारी उमंगें समुद्र की लहरों से प्रतिस्पर्धा करती दिखाई पड़ें। बड़ा आदमी नहीं महामानव बनने में हमारी आकाँक्षा अभिलाषा केन्द्रित बन सके, ऐसी रीति-नीति अपनाते हुए भावी जीवन की रूपरेखा विनिर्मित की जानी चाहिए।
साधना स्वर्ण जयन्ती की सार्थकता इसी में है कि अपने परिवार का हर सदस्य आत्म-विकास की दिशा में अधिक कारगर कदम उठाये और अब की अपेक्षा अगले दिनों अधिक आदर्शवादी, अधिक उत्कृष्ट एवं अधिक कर्त्तव्यनिष्ठ हो सके। आत्मोन्नति एक प्रकार की योग साधना है इसके लिए लोक-सेवा का व्रत लेकर चलना पड़ता है। स्वार्थों की उपेक्षा करते हुए परमार्थ में जो जितना उत्साह प्रदर्शित कर सके समझना चाहिए उसे उतना ही ईश्वरीय अनुग्रह उपलब्ध हो गया। इस सम्बन्ध में हम में से प्रत्येक को एक दूसरे से आगे बढ़ने की प्रतिस्पर्धा करनी चाहिए। स्वयं बढ़ते हुए अपने साथ अन्य साथियों को घसीट ले चलें–पीठ पर लाद ले चलने का साहस जुटाना चाहिए। इस दिशा में जो जितना अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए जो जितना प्रयत्न कर रहा होगा समझना चाहिए कि साधना स्वर्ण जयन्ती की अन्तरात्मा को पहचानने में उसने उतनी ही सफलता प्राप्त कर ली। हम इसी कसौटी पर इस साधना वर्ष की सफलता का मूल्याँकन करेंगे। अस्तु हर परिजन को आत्म- निर्माण एवं समाज-निर्माण की दिशा में अपने प्रयासों को तीव्रतम बनाने के लिए पूरी तत्परता के साथ अपनी गति-विधियों को अग्रसर करना चाहिए।
समूचे परिवार को आत्मिक प्रगति की दिशा में झकझोरने-मोह निद्रा से विरत करने-जीवन लक्ष्य की दिशा में तेजी से बढ़ चलने की प्रेरणा देने के लिए- स्वर्ण-जयन्ती का पर्व उपयोगी हो सके यही उद्देश्य सामने रख कर इस साधनात्मक आयोजन का कार्यक्रम सोचा, सँजोया गया है। अभीष्ट उद्देश्य को समझा जा सके और उसे पूरा किया जा सके तो ही उसकी सार्थकता है अन्यथा आये दिन खड़े रहने वाले विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों में से ही एक अपना यह प्रयोग भी गिना जायगा और थोड़ी ही चर्चा एवं हलचल दृष्टिगोचर होने के बाद इसकी भी पानी के बबूले जैसी दुर्गति होगी।
सम्पर्क आयोजनों का उद्देश्य यह है कि सार्वजनिक रूप से घोषित उपासना एवं साधना पद्धति के अतिरिक्त परिजनों की व्यक्तिगत मनःस्थिति एवं परिस्थिति के अनुरूप उनका मार्गदर्शन किया जा सके और सिद्धान्तों को व्यवहार में उतारने का उपाय बताया जाय। उपरोक्त सम्पर्क आयोजनों की चार महीने तक चलने वाली सम्पर्क योजना का उद्देश्य यही है। प्रतिनिधि सभी शाखा केन्द्रों में इसी प्रयोजन के लिए भेजे जा रहे हैं कि साधकों के व्यक्तित्व का परिष्कार और नव-निर्माण के लिए रचनात्मक प्रवृत्तियों का अभिवर्धन जहाँ जिस प्रकार सम्भव हो सकता हो वहाँ उसके लिए विचार-विनिमय द्वारा रास्ता खोज निकाला जाय।
अब तक शांतिकुंज में चलती रही सत्र शृंखला हर दृष्टि से बहुत सफल रही है। मात्र पाँच वर्षों में 10 हजार से अधिक परिजनों ने आत्म-निर्माण और समाज-निर्माण की व्यवहारिक शिक्षा प्राप्त की है। इस दिशा में परिजनों का उत्साह बढ़ता ही गया है। एक को देख कर दूसरे ने उसकी उपयोगिता समझी है और इन शिविरों में सम्मिलित होकर लाभान्वित होने की उत्सुकता प्रकट की है। शिक्षार्थियों की संख्या हर वर्ष निरन्तर बढ़ी है, पर अब एक नई कठिनाई यह सामने आई है कि महिला जागृति अभियान के सन्दर्भ में शिक्षण प्राप्त करने वाली कन्याओं और महिलाओं की संख्या द्रुतगति से बढ़ रही है। उनके उमड़ते हुए उत्साह को देखकर शांतिकुंज में उनके लिए अधिक स्थान देना पड़ा है। फलतः पुरुष शिविरार्थियों के लिए अब मात्र 100 की गुंजाइश रह गई है। जबकि पिछले दिनों उनकी संख्या प्रायः 500 तक रहती रही है। अब एक नया शांति−कुंज बनाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहा। वर्तमान इमारत को नारी प्रशिक्षण के लिए सुरक्षित करना पड़ेगा और पुरुष शिविरार्थियों के लिए दूसरे आश्रम का निर्माण होगा। इस निर्माण को साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष का चिरस्थायी स्मारक कहा जा सकेगा। इसमें एक-एक कुटिया अपनी और से बनवा देने के लिए समर्थ परिजनों से आग्रह किया गया है। एक छोटी कुटिया प्रायः दो -ढाई हजार और बड़ी कुटियामय बरामदा, रसोई, स्नानघर, स्टोर सहित चार हजार की बनेगी। अपने परिवार में ऐसे सौ भावनाशील व्यक्ति निकल सकते हैं। जो यह छोटा-छोटा अनुदान देकर नये आश्रम के निर्माण में हमारा हाथ बढ़ा लें। उतनी उदार सहायता मिल गई तो आशा है कि अगले वर्ष की गायत्री जयन्ती या गुरु पूर्णिमा से नये आश्रम में नये उत्साह के साथ पुरुषों की शिविर शृंखला चल पड़े और वर्तमान आश्रम में कन्याओं और महिलाओं की ड्यौढ़ी संख्या प्रशिक्षण का लाभ उठाने लग सके। गत वर्ष 75 छात्राएँ थीं इस वर्ष 150 हैं। अगले वर्ष 250 तक यह संख्या हो सकती है। कहना न होगा कि इस प्रशिक्षण के फलस्वरूप महिला जागरण अभियान की आँधी तूफान जितनी प्रगति सम्भव हो सकेगी। इस विस्तार को स्वर्ण जयन्ती वर्ष की एक चिरस्थायी उपलब्धि कहा जा सकेगा।
गत वर्ष महिला सम्मेलनों की माँगें बीच-बीच में आती रहीं और नये आग्रहों की पूर्ति पूर्व निर्धारित कार्य-क्रमों में से काट-छाँट करके पूरी की जाती रही। इस बार आरम्भ में ही पूरे वर्ष के कार्यक्रम निर्धारित कर देने का निश्चय किया गया है। देवकन्याओं के जत्थे गतवर्ष जहाँ गये हैं। वहां के महिला सम्मेलन हर दृष्टि से अतीव सफल रहे हैं। उपस्थित जनता ने उनसे भारी प्रेरणा ग्रहण की है। इस वर्ष उनके लिए स्वभावतः अधिक माँग और अधिक आग्रह होगा। बीच-बीच में काट-छांट न करनी पड़े इसलिए जिन्हें अपने यहाँ महिला सम्मेलन करने हैं और देवकन्याओं के जत्थे बुलाने हैं उन्हें शीघ्र से शीघ्र ही अपनी माँगे भेज देनी चाहियें । हाल में ही पूरे वर्ष में कार्यक्रम निर्धारित हो जायेंगे और सितम्बर से देवकन्याओं के जत्थे निर्धारित प्रोग्राम पूरे करने के लिए निकल पड़ेंगे। स्वर्ण जयन्ती वर्ष में नया सन्देश नया प्रकाश लेकर देव कन्याओं के जत्थे प्रायः 500 सम्मेलनों में उद्बोधन करेंगे। इनमें उपस्थित आचार्यों का जनसमूह अति महत्वपूर्ण प्रेरणा प्राप्त कर सकेगा। आशा की जानी चाहिए कि इस आधार पर उत्पन्न हुई नव जागृति की लहर भी साधना वर्ष का लक्ष्य पूरा करने में उत्साहवर्धक भूमिका सम्पन्न करेगी।
साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष के लगभग छह महीने इस अंक के पाठकों के हाथ में पहुँचने के समय तक पूरे हो चुकेंगे। लगभग इतना ही समय और शेष है। इस अवधि में वह भावभरा उत्साह दिन-दिन बढ़ता रहना चाहिए जिसे उभारने के लिए इस महान अध्यात्म अनुष्ठान का आयोजन किया गया है। मनुष्य में देवत्व का अवतरण करने वाली सद्भावनाएँ और सत्प्रवृत्तियां मात्र चिन्तन तक सीमित न रह जायं वरन् उन्हें प्रस्फुटित होने का समुचित अवसर मिले हम सब के यही प्रयास तत्परतापूर्वक होने चाहिएं। इस संदर्भ में क्या किया जाना है इसकी संक्षिप्त सी न्यूनतम रूपरेखा ऊपर दी गई है। इसमें अधिकाधिक जिनसे जो कुछ आदर्शवादी गतिविधियाँ अपना सकना बन पड़े उन्हें उसके लिए बढ़-चढ़ कर साहस संजोना चाहिए। इस विशेष पर्व की सार्थकता और सफलता इसी में है।
महिला सम्मेलनों और सब शिविरों के सम्बन्ध में पत्र व्यवहार शांति−कुंज और सितम्बर से सितम्बर तक चलने वाले सम्पर्क आयोजनों के लिए गायत्री तपोभूमि मथुरा से पत्र व्यवहार किया जाए- क्योंकि इन दोनों व्यवस्थाओं का सृजन संचालन इसी प्रकार पृथक दो स्थानों से होगा।
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तुम समय की रागिनी गाओ,
सवेरा हो रहा है!
रात का शृंगार, भागा जा रहा देखो,सो चुका संसार जागा जा रहा देखो,
दीपक की लौ और उकसाओ,
सवेरा हो रहा है!
आत्म-विस्मृति की खुमारी जा रही भागी,ज्योति की क्षमता, बनायी जा रही बागी,
चेतना के फूल मुस्काओ,
सवेरा हो रहा है!
रात में रजनीचरों का बोलबाला था, बन्द कारा में पड़ा रोता उजाला था,
सूर्य का दायित्व बतलाओ,
सवेरा हो रहा है!
स्वर्ण-पिंजर के लिये मत भूलकर मुड़ना!
मुक्त होकर, भूमि से आकाश तक उड़ना!
पंछियों, युग-पंख फैलाओ,
सवेरा हो रहा है!
सिन्धु खारी है नहीं, रस-सिक्त गागर हैं,भावना के मोतियों से रिक्त सागर है!
साधना के स्वाति-घन छाओ,
सवेरा हो रहा है!
-लाखनसिंह भदौरिया ‘सौमित्र’
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*समाप्त*