केन्द्र भीतर है। बाहर तो उसका कलेवर मात्र लिपटा हुआ है। परमाणुओं और जीवाणुओं के नाभिक मध्य में होते हैं। शक्ति से स्रोत उन्हीं में है। बाहर तो उनका सुरक्षा दुर्ग मात्र खड़ा रहता है। सूर्य की ऊर्जा उत्पत्ति उसके अन्तराल से होती हैं, बाहर तो विकिरण के वितरण भर की क्रिया चलती रहती है। अन्तरात्मा काय-कलेवर के अन्तराल में है। बाहर तो उसके निवास, निर्वाह का भवन मात्र खड़ा है।
जीवन की गरिमा बाहर से साधनों से नहीं और न शरीर के अवयवों पर उनकी निर्भरता है। उत्कर्ष भीतर से उदय होता है। बाहर तो उसकी हलचलें भर दृष्टिगोचर होती हैं अवनति के गर्त में यदि अन्तः चेतना गिरी हुई हो तो हर क्षेत्र में पतन और पराभव ही उपलब्ध होगा।
हम बाहर देखते और बाहर ही खोजते हैं, जब कि जिसे देखना और पाना है, उसका अस्तित्व भीतर ही विद्यमान् रहता है। कस्तूरी के हिरन की तरह बाहर सुगन्ध खोजने के प्रयत्न निष्फल ही नहीं जाते, खीज़ और निराशा भी गले बाँधते हैं। अभीष्ट की प्राप्ति के लिए नाभि संस्थान का आश्रय लेने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। मृग-तृष्णा में भटकने की अपेक्षा यदि अपने दृष्टि दोष को सुधार लिया जाय तो प्यास बुझाने के लिए उपर्युक्त स्थान ढूँढ़ने और सार्थक प्रयास करने का अवसर मिल सकता है समृद्धि और प्रगति के मूल तत्त्व भीतर हैं सुख और शान्ति के केन्द्र भी वहीं हैं तुष्टि ओर तृप्ति खोजनी हो तो अन्तः करण के रत्न भण्डार का ही खोदना, कुरेदना पड़ेगा।
भारतीय तत्त्व दर्शन और साधना विज्ञान का केन्द्र बिन्दु गायत्री मन्त्र है। उसके सहारे ज्ञान की अध्यात्मिक विभूतियाँ और विज्ञान की भौतिक सिद्धियाँ उपलब्ध होती है। धर्म-शास्त्र का विकास विस्तार गायत्री के बीज मन्त्र से उद्भूत वट-वृक्ष ही माना जाता है जो कुछ जानने और पाने योग्य है उसे गायत्री के अंतराल में प्रवेश करके प्राप्त किया जा सकता है।
गायत्री की उच्चस्तरीय साधना पंचकोशी हैं गायत्री के पाँच मुख्य चित्रित किये जाते हैं आत्मसत्ता पर चढ़े पाँच कोश-आवरण का इसे अलंकारिक चित्रण कह सकते हैं। पंच तत्त्वों से पदार्थ जगत बना हैं पंच कोशों से चेतना के स्थूल, सूक्ष्म, और कारण कलेवरों का निर्माण हुआ हैं विकसित स्थिति में यही पाँच प्रमुख देवताओं की तरह अनुग्रह बरसाते और वरदान देते देखे जाते हैं।
जप-ध्यान की प्रथम कक्षा उत्तीर्ण करके साधक को योग तप की उच्च भूमिका में प्रवेश करना पड़ता है। इसी का रहस्य यम ने नचिकेता को पंचाग्नि विद्या के रूप में समझाया हैं। उपनिषद्कार ने इन्हीं की शक्ति स्रोतों की पाँच प्राण के रूप में विवेचना की हैं वेदान्त की तत्त्व साधना में इसी को ‘पंजीकरण’ कहा गया है।
गायत्री महाशक्ति की उच्चस्तरीय साधना पंचकोशों की अनावरण प्रक्रिया कही जाती हैं। स्थूल जगत में संध्या पंच तत्त्वों पर और सूक्ष्म जगत में सन्निहित पंच प्राणों की प्रस्तुत क्षमता को इसी आधार पर जागृत किया जाता है समग्र प्रगति की इस साधना में पुरुषार्थ से असाधारण सहायता मिलती है। ब्रह्म वर्चस्’ की उच्चस्तरीय साधना में इसी पंचकोशी तपश्चर्या को प्रमुखता दी गई है।
ब्रह्म वर्चस् प्रक्रिया शक्ति-कुँज आकर क्रियात्मक शिक्षण प्राप्त करने वालों के लिए भी है और उन दूरवर्ती व्यस्त लोगों के लिए भी जो कारण वश उसमें सम्मिलित हो सकने की स्थिति में नहीं हैं। अखण्ड-ज्योति के प्रस्तुत अंगों में दोनों के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराई जा रही हैं। यह सभी के लिए उपयोगी है। जो साधना करने की स्थित में नहीं हैं उनके लिए भी यह ज्ञान उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि किसी श्रेष्ठतम ज्ञातव्य का संचय करना।
इस अंक में पंचकोश के उस पक्ष का वर्णन है जो भौतिक विज्ञान से प्रतिपादित और समर्पित हैं। इसके अतिरिक्त यह पक्ष अभी बताया जाना शेष है जिसके सम्बन्ध में प्रयोगशालाएँ कुछ कह सकने की स्थिति में नहीं हैं अनुभूतियों, संवेदनाओं और निष्ठाओं के आधार पर ही जिन्हें जा सकता है। अणु शक्ति अभी भी नेत्रों के लिए दृश्यमान नहीं है। गणितीय आधार पर ही उसके स्वरूप का निर्धारण नहीं है। गणितीय आधार पर ही उसके स्वरूप का निर्धारण होता है। अध्यात्म की समस्त उपलब्धियाँ भौतिक विज्ञान से समर्पित हो सकती हैं। ऐसा नहीं कहा जा सकता। तो भी इस बुद्धिवाद और प्रत्यक्षवाद के युग में जितना अधिक सम्भव हो सकेगा उतना प्रयत्न किया जाएगा। आगे की प्रगति, श्रद्धा और विश्वास के-प्रयोग एवं अनुभव के-आधार पर ही आगे बढ़ सकेगी।
इस अंक में पंचकोशों के स्वरूप एवं विवेचन के विज्ञान समर्पित पक्ष का विवरण है। अगले अंग में इस सन्दर्भ में किये जाने वाले साधना उपक्रम का उल्लेख होगा। इन दो अंगों को ब्रह्म वर्चस् साधना ज्ञान एवं विज्ञान-सिद्धान्त ऊहापोह के साथ आगे भी चलती रहेगी। पिछले दिनों प्रकाश-मार्ग दर्शन पर, ज्ञातव्य एवं विवेचन पर जोर दिया जाता रहा हैं। अगले दिनों उसकी प्रेरणा, साधना एवं क्रिया-पद्धति से जिज्ञासुओं को लाभान्वित किया जाता रहेगा। यही है अपनी ब्रह्म वर्चस् प्रशिक्षण की भावी रूप-रेखा
पाँच कोश मानवी चेतना के ही पाँच स्तर है। मनुष्य के सूक्ष्म शरीर के पाँच कलेवर है-(1) अन्नमय कोश (2) प्राणमय कोश (3) मनोमय कोश (4) विज्ञानमय कोश (5) आनन्दमय कोश। आत्मा-परमात्मा के मध्य अगणित आदान-प्रदान इन्हीं पाँच कोशों के द्वारा होते हैं। जो व्यक्ति जितने अधिक कोशों पर अधिकार कर लेता है-वह शक्तिहीनता तथा तुच्छता से उतना ही ऊपर उठता जाता है। पाँच कोशों पर अधिकार कर लेने वाला व्यक्ति देवपुरुषों की श्रेणी में जा विराजता है। इसका यह अर्थ नहीं कि वह चाहे, वह करने लगता है। यह सत्य है कि देवसत्ताओं की तरह वह भी उन कामों को सरलता से सम्पन्न कर सकता है, जिन्हें सामान्य व्यक्ति असम्भव ही माने रहता है। पर वह स्वेच्छाचारी नहीं हो जाता। देवसत्ताएँ भी सार्वभौम नियम-व्यवस्था के ही अनुसार कार्य करती है। उस श्रेणी तक पहुँचे हुए महापुरुष की भी कोई ‘वैयक्तिक इच्छा’ नहीं रह जाती। वह शाश्वत सत्ता की नियम-व्यवस्था से एकाकार हो जाता है। इसीलिए वह सामान्यतः असम्भव लगने वाले कार्य कर सकता तथा अदृश्य प्रतीत होने वाले दृश्य देख सकता है। यह चेतना-धरातल को उठाकर समष्टि-चेतना से तादात्म्य स्थापित कर लेने की स्थिति है। इस सम्पूर्ण सृष्टि में तथा उससे परे भी, सर्वत्र चेतना-प्रवाह विद्यमान् हैं इस इस चेतना की अनन्त परतें है। प्रत्येक चेतना-स्तर अपने ढंग का अनूठा है। सामान्य मनुष्य जिस चेतना धरातल का स्पन्दन ग्रहण कर पाने में अक्षम हो, वहाँ चेतना है ही नहीं, यह बात तार्किक दृष्टि से तो मान्य नहीं ही है, आधुनिक पदार्थ विज्ञानी भी अब इसी निष्कर्ष पर पहुँच चुके है कि चेतना के अनन्त समुद्र में हमारी पैठ अत्यल्प नगण्य है।
चेतना का विशाल सागर इस ब्रह्माण्ड में विस्तृत है। उसी ने पदार्थ को उत्पन्न किया है। पदार्थ भौतिक विज्ञानी ने पदार्थों में ही सत्य को सन्निहित मान सत्यान्वेषण प्रारम्भ किया और अब वह प्रकृति के सूक्ष्म से सूक्ष्म स्तरों में प्रवेश करता हुआ विस्मित हो उठा है पदार्थ की ही सत्ता संदिग्ध हो उठी है। और अपना सम्पूर्ण बोध ही एक भ्रम या आभास मात्र प्रतीत होने लगा है। अभी हम जो मानते हैं, वह सब हमारे बोध की परिधि में सिमटे सृष्टि-रूपों की झलक मात्र है। अर्थात् उसे आभास ही कहा जा सकता है, सत्य नहीं। यह आभास हमारे लिए ज्ञान चेतना-धरातल की परिधि में बद्ध है। यदि किसी प्रकार हमारी चेतना, जो भी बोध है, वह तब पूरी तरह बदल ही जाएगा। जिसे आज सर्वथा सत्य मान रहें है। कल वही एक भ्रम मात्र लगने लगेगा।
आइन्स्टीन ने चेतना के इसी आयाम को, “बोध” के नये धरातल को ‘चतुर्थ आयाम’ की संज्ञा दी थी। आज वैज्ञानिकों को चतुर्थ आयाम सम्बन्धी अनेक साक्ष्य प्राप्त हो रहें है।
मृत्यु के समय मानव-शरीर से तथा अन्य प्राणियों के भी शरीर से विद्युत-धाराएँ निकलती देखी गई है। वे धाराएँ कहाँ चली जाती हैं, यह वैज्ञानिक अभी तक नहीं जान सके है। त्रिआयामी विश्व की वैज्ञानिकों को जो जानकारी अभी है, उसके अनुसार तो ये निश्ट-सी ही हो जाती है, पर ऊर्जा अविनाशी है। अतः माना यह जा रहा है कि किसी चौथे आयाम में ये विद्युत धाराएँ पहुँच जाती हैं उसी प्रकार सहसा कुछ विद्युत-धाराएँ अज्ञात सी प्रकट होती देखी-पाई गई है, जिनका स्रोत नहीं जाना जा सका हैं ऊर्जा का यह अज्ञात क्षेत्र से प्रवाहित होना और अज्ञात क्षेत्र से प्रवाहित होकर यहाँ आना चौथे आयाम का प्रमाण माना जा रहा है जो विद्युत-धाराएँ सहसा प्रकट होती देखी गई है, उनका कारण नहीं जाना जा सका हैं अर्थात् वे ज्ञात जानकारियों के अनुसार “कारण रहित काय” है यह कारणता के सिद्धान्त के सर्वथा विपरीत है। प्रत्येक कार्य का कोई कारण अवश्य होता है। अतः विद्युत प्रवाहों के आकस्मिक प्राकट्य रूपी कार्य का कारण चतुर्थ आयाम से सम्बन्धित माना जा रहा है।
चतुर्थ आयाम की अवधारणा से अवगत होने के लिए उसे जो समझा जा सकता है। हमारा सम्पूर्ण बोध तीन आयामों तक सीमित है। जो कुछ भी हम देखते-जानते समझते-सोचते हैं, वह त्रिआयामी वस्तु-जगत से सम्बन्धित होता है। ये तीन आयाम है-पहला लम्बाई, दूसरा चौड़ाई, तीसरा मोटाई, गहराई अथवा ऊँचाई। यह तो हो सकता है कि किसी वस्तु का कोई आयाम अधिक हो, कोई कम। जैसे किसी सन्दूक की लम्बाई, चौड़ाई तथा ऊँचाई तीनों ही अधिक होती है, किन्तु कागज की मात्र लम्बाई-चौड़ाई ही अधिक होती है, केश या बाल की लम्बाई ही अधिक होती है, जबकि किसी धूलि-कण के तीनों आयाम बहुत छोटे होते हैं। ये तीनों आयाम देश या ‘स्पेस’ में होते हैं। आइन्स्टीन के अनुसार चौथा आयाम है। ‘टाइम्स’ या काल।
सामान्यतः तीन आयामों तक ही हमारा बोध-क्षेत्र हैं चतुर्थ आयाम का बोध होते ही हमारे सामने ज्ञान का एक अनन्त क्षेत्र खुल सकता है। तब यह संसार एक सर्वथा भिन्न रूप में नजर आने लगेगा। ऐसा बहुत कुछ जिसे हम यथार्थ, वास्तविक और सत्य मानने-जानते हैं, वह अयथार्थ और एक भ्रान्ति मात्र है, यह स्पष्ट हो जायेगा।
इसे क्रमशः इस तरह समझा जा सकता है-एक बिन्दु को लें। यद्यपि प्रत्येक बिन्दु कुछ न कुछ स्थान घेरता ही है, पर गणित में बिन्दु कुछ न कुछ स्थान घेरता ही है, पर गणित में बिन्दु वस्तुतः उसे ही कहते हैं, जिसका कोई स्थान तो हो, पर आकार न हो या कह सकते हैं रूप तो हो पर आकार न हो। अब कोई 10 सेंटीमीटर लम्बी रेखा को लें। इस रेखा में असंख्य बिन्दु समाहित हो सकते हैं, क्योंकि बिन्दुओं का तो कोई ‘साइज’ या आकार होता नहीं। यह 10 सेंटीमीटर लम्बी रेखा, ‘स्पेस’ की एक ही दिशा ‘लम्बाई’ का प्रतिनिधित्व करती है। यह हुआ एक आयाम। एक वर्ग जिसमें लम्बाई व चौड़ाई दोनों है, पर गहराई मोटाई या ऊँचाई नहीं, उसमें लम्बाई और चौड़ाई के दो आयाम हुए। जैसे किसी कागज के पन्ने की ऊपर सतह। जबकि किसी कमरे में, जिसमें लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई तीनों होती है, तीनों आयाम उपस्थित रहते हैं किसी सतह पर नाली में रहने वाले दो ऐसे कीड़ों की कल्पना कीजिए तो सिर्फ एक ही आयात लम्बाई जानते हो, चौड़ाई भी कोई वस्तु होती है, वह जानते ही न हों। इसका अर्थ है कि यदि वे संयोगवश आपने-सामने आ पड़ते हैं, तो वे एक दूसरे से बचकर नहीं निकल सकते। क्योंकि अगल-बगल जैसी कोई चीज वे जानते ही न होंगे। वे तो बस उसी रेखा में, उसी सीध में या तो आगे जा सकते हैं या पीछे आ सकते हैं। वही उनका संसार है।
किसी पुस्तक का पृष्ठ यदि चेतन हो उठे, पर उसका बोध-क्षेत्र लम्बाई और चौड़ाई इन दो ही आयामों तक सीमित हो तो वह उसी पुस्तक के दूसरे पृष्ठों के अस्तित्व को कभी भी नहीं जान सकता।
अपने त्रिआयामी बोध-सामर्थ्य के कारण जब हम किसी छाया-चित्र को देखते हैं, तो उसमें गहराई की स्वयं ही कल्पना कर उस चित्र को समझ लेते हैं। जबकि सामान्यतः यदि किसी कुत्ते को उसका या उसके स्वामी का छाया-चित्र दिखाया जाय, तो यह उसके लिए अर्थहीन होगा। उस पर इसकी कोई प्रतिक्रिया न होगी। लेकिन उस चित्र में गति आ जाने पर वही कुत्ता प्रतिक्रिया करेगा। क्योंकि तब जैसे उसकी चेतना में कोई स्मृति बोध जाती है गति का नया घटक स्थिति को बदल देता है। चल-चित्र आदि को देखकर इसीलिए कुत्ता भौंकने लगता है।
दो आयामों वाले चित्रों को देखने की अभ्यस्त हमारी जागृत मनश्चेतना त्रिविमितीय स्तर के छाया चित्रों को देखकर किस तरह विभ्रान्त हो उठती है, उस होलोग्राफी के जानकार लोगों को विदित हैं लेजर किरणों की कृपा से “होलोग्राफी’ के आधार पर त्रिविमितीय सिनेमाओं का निर्माण कई विकसित देशों में प्रारम्भ भी हो चुका है। जहाँ पर्दे पर मनुष्य, मोहर, घोड़े, रेलगाड़ी, भालू, शेर आदि यथार्थवत् चलते, दौड़ते दिखाई पड़ते हैं और अनभ्यस्त सिनेमा दर्शक प्रारम्भ में भ्रमित हो जाते हैं।
इस प्रकार तीसरे आयाम का ही नये सन्दर्भ में नवीन बोध जब हमें विस्मित-विमुग्ध कर दे सकता है, तब चतुर्थ आयाम की जानकारी तो पूरे बोध-क्षेत्र को ही उलट-पुलट देगी और हमारी वर्तमान निर्विवाद धारणाएँ भी जड़-मूल से उखड़ जायेगी।
आइन्स्टीन ने जब सर्व प्रथम सापेक्षता-सिद्धान्त की व्याख्या की तो सम्पूर्ण विश्व में केवल बारह वैज्ञानिक उसे समझ पाये थे। ऐसा कहा जाता है। फिर जब प्रोफेसर स्मिथ ने सर्वे सामान्य को समझाने के लिए सापेक्षता सिद्धान्त पर एक पुस्तक लिखी, तो एक विनोद ही चल निकला कि आइन्स्टीन ने सर्व प्रथम व्याख्या की, तो उसे बारह मय पाये, किन्तु प्रोफेसर स्मिथ की व्याख्या तो एक भी व्यक्ति नहीं समझ पाया। अँगरेजी में इस सन्दर्भ में एक हास्य-कविता भी है, जिसका मनोरंजक भावानुवाद यों होगा-
“एक थी लड़की- नाम जोन ब्राइट, चलती दिन उमंग में, प्रकाश से भी प्रखरतर वेग से चली वह आइन्स्टाइनी ढंग से, लौटकर आई तो थी पिछली “नाइट”।
किन्तु आत यह बात विनोद नहीं रह गई है। काल की गति पीछे की दिशा में भी लौट सकने की बात अब वैज्ञानिक जगत में सर्व स्वीकृत होती जा रही है। असीम वेग से चलने वाले कणों की जानकारी बढ़ती जा रही है। 1976 में गेराल्ड फीनवर्य ने काल्पनिक मात्रा के इन कणों को ‘टेकियान’ नाम दिया। टेकियान का प्रापर मास’ काल्पनिक होता है एवं उनका वेग प्रकाश-वेग से भी ज्यादा होता, प्रकाश-वेग से कम तो नहीं ही हो सकता। यद्यपि अभी ऐसे उपकरणों का अभाव है, जिनके द्वारा टेकियान को प्रदर्शित किया जा सकें, किन्तु वैज्ञानिकों द्वारा यह तथ्य मान्य हो चुका है कि ‘टेकियान’ विद्यमान् है।
1968 में टेक्सास विश्वविद्यालय, संयुक्त राज्य अमरीका में अनुसन्धान कार्य कर रहें डॉ0 दर्शन ने फीनवर्ग की परिकल्पना को सही सिद्ध कर दिया। ये तो हुए प्रकाश-वेग से अधिक तीव्रगति टेकियान, जिन पर अनुसन्धान जारी है। प्रकाश-वेग से गतिमान कणों को ‘लक्सान’ कहते हैं, जिनका ‘प्रापर मास’ शून्य रहता है। फोटोन, न्यूट्रिनो व एन्ट्रीन्यूट्रिनो स्थायी होते हैं। इन कणों की खोज ने काल सम्बन्धी एक नई अवधारणा को वैज्ञानिकों के बीच प्रतिष्ठित कर दिया है। और वे मानने लगे है कि समय मात्र आगे ही नहीं जाता, पीछे की तरफ भी लौट सकता है। फोटोन कणों का वेग प्रकाश- वेग के बराबर होता है, अतः उनके लिए तो काल-गति शून्य है। भूत, वर्तमान और भविष्य में कोई अन्तर नहीं हैं प्रकाश-वेग से अधिक गति वाले के सर्वथा विपरीत हो जाती है। हम अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य की काल-यात्रा करते हैं, किन्तु उन कणों की यात्रा भविष्य से वर्तमान और वर्तमान से अतीत में होती हैं। यही है काल के चतुर्थ आयाम की आइन्स्टीन की धारणा।
जब अतीत में लौटना भी सम्भव हो जाएगा तो हमारा वर्तमान बोध किस प्रकार अस्त-व्यस्त हो जाएगा, यह हम भली-भाँति समझ सकते हैं। उदाहरणार्थ हमारी वर्तमान धारणा है कि राम एवं कृष्ण, महात्मा गाँधी आदि मर गये। लेकिन तब हम स्पष्ट उन्हें उसी रूप में देख सकेंगे, जैसे कि वे उस समय थे। इससे जन्म-मृत्यु की भौतिकवादी धारणा पूरी तरह ध्वस्त हो जाएगी और भारतीयों की जो मान्यता अभी जन सामान्य प्रत्यक्षतः सत्य दिखाई देगी तब। यह स्पष्ट हो जायेगा कि जन्म या मृत्यु चरम अर्थों में एक भ्रान्ति मात्र है। यह हुआ काल के चतुर्थ आयाम की जानकारी का एक प्रभाव परिणाम। हमारे सम्पूर्ण बोध-क्षेत्र में ही ऐसी ही उथल-पुथल मच जायेगी। जिसे नष्ट होना मान बैठते हैं, वह रूप, परिवर्तन मात्र प्रतीत होगा। जिसे आज अपना बेटा, अपनी पत्नी मानते हैं, यह अतीत का अपना भाई, मित्र या शत्रु भी है। यह स्पष्ट दिख जाने पर रिश्तों के प्रति वर्तमान दुराग्रही मोह टूट जायेगा, क्योंकि वह एक मूर्खता पूर्ण भ्रान्ति मात्र है, यह स्पष्ट हो जायेगा।
यह सब अत्यन्त निकट है। रूसी वैज्ञानिक एलेक्जेन्डर बोलगोव का कहना है कि यह सुनिश्चित सम्भावना है। उनके अनुसार ‘आर्कियोविडयोफोन’ नामक संयन्त्र निर्मित किया जा सकता है, जो टेलीविजन-सेट जैसा होगा। यह संयन्त्र जिस व्यक्ति के पास होगा वह व्यक्ति अपने परिवार सम्बन्धी पात्रों या सम्बन्धियों के छाया-चित्रों आदि के आधार पर अपने दादाओं, परदादाओं की आकृतियाँ इस संयन्त्र के पर्दे पर देख सकेगा और उनसे वार्तालाप भी कर सकेगा। यह हुई काल के चतुर्थ आयाम के बोध की एक करामात।
पाँचवें आयाम में मस्तिष्क और चेतना के अकल्पित क्रिया, व्यापार सम्भव होगे। उस आयाम की खोज से आत्माओं की अवधारणा भी विज्ञान के सामने स्पष्ट हो सकती है तथा अनन्त लोकों की नवीन जानकारियों का द्वार खुल सकता है। अभी विश्व की जानकारी जितनी है, उसमें यांत्रिक माध्यमों से उच्चतर आयाम के अन्वेषण की विधि ज्ञात नहीं है। किन्तु मानव जाति ऐसी मनः नियन्त्रण की शक्ति अर्जित, विकसित कर सकती है। जिससे कि उक्त नवीन आयाम का बोध प्राप्त हो सके, भले ही यांत्रिक उपकरण वैसे सुलभ या सम्भव न हो सके।
भारतीय मनीषियों के मन की ऐसी ही साधना कर चेतना के विविध आयामों का बोध प्राप्त किया था। पंच कोश इन्हीं पाँच चेतना आयामों के ही नाम है। शरीरस्थ इन पाँच आणविक विद्युत भण्डारों को अन्तरिक्ष के संव्याप्त असंख्य शक्तिधाराओं के साथ सम्बन्ध जोड़ने वाले शक्तिशाली इलेक्ट्रानिक संयन्त्र के रूप में प्रयुक्त कर ज्ञान और शक्ति का अनन्त विस्तार किया जा सकता है। मनुष्य में समस्त देवशक्तियों का अंश विद्यमान् है, अतः वह अपने भीतर निहित इनमें से किसी भी शक्ति का अथवा सभी ताकि अनेक शक्तियों के समन्वित स्वरूप का विकास कर सकता है। पदार्थवाद अभी तक इस मार्ग में बाधा बनने का प्रयास कर रहा था। अब वही इस मार्ग का नया व्याख्याकार बनने जा रहा है।
अन्नमय कोश को ‘मैटर’ प्राणमय कोश को ‘सेल’ मनोमय कोश को “माइन्ड” विज्ञानमय कोश का “पार्टनालिटी” तथा आनन्दमय कोश को “इण्ट्यूशन” कहा जा सकता है। “मैटर” के बारे में विज्ञान उल्लेखनीय जानकारियाँ जुटाने में सफल हुआ है और इन्हीं जानकारियों ने उसे चतुर्थ आयाम की सम्भावनाओं के द्वार पर ला खड़ा किया है। “सेल” तथा “माइन्ड” के क्षेत्र में अभी वह कुछ ही कदम बढ़ा पाया है। शीघ्र ही इस दिशा में भी उल्लेखनीय प्रगति की आशा की जा सकती है। आवश्यकता है “पर्सनालिटी” और ‘इण्ट्शन’ के क्षेत्र में अन्वेषण प्रगति की। सामान्य मानसिक क्रियाशीलता की भी सभी सूक्ष्म गतिविधियाँ ऐन्ट्रिक अनुभवों द्वारा नहीं जानी जा सकती। फिर चेतना के उच्चतर आयामों के लिए तो ऐन्द्रिक अनुभव-परक उपकरणों की सीमाएँ स्पष्ट है।
आइन्स्टीन चतुर्थ आयाम से भी आगे एक पंचम आयाम की सम्भावना देखते हैं। चतुर्थ आयाम के अस्तित्व को अतीन्द्रिय ज्ञान की असंख्य घटनाएँ प्रमाणित करती रहती है। प्रेत शरीर के बारे से स्वप्नों को सही संकेतों के रूप में-दूर-दर्शन दूर श्रवण, विचार संचार आदि के रूप में हम अदृश्य जगत की सत्ता को प्रत्यक्ष वत् देखते हैं यह चौथे आयाम की पुष्टि है। पाँचवाँ आयाम वह है जिसमें ब्रह्माण्डीय चेतना और आत्म-चेतना का परस्पर सम्बद्ध करके मानवी सत्ता को ईश्वर तुल्य बनाया जा सकना और उतना ही शक्ति सम्पन्न सिद्ध कर सकना, सम्भव हो जाएगा। प्रति विश्व, प्रति कण, आदि के रूप में ही संसार से बिलकुल सटे एक ऐसे विश्व का अस्तित्व अगले दिनों सिद्ध होने जा रहा है जिसे पौराणिक काल के दैत्य-लोक के समतुल्य कहा जा सकें। यह क्षेत्र भी पंचम आयाम की परिधि में ही आ जाएगा।
लम्बाई, चौड़ाई, गहराई के तीन आयामों का अस्तित्व हमारी आँखें ही प्रत्यक्ष देखती है। ‘होलोग्राफी’ के आधार पर अब उसका उपयोग आश्चर्यजनक फोटोग्राफी के रूप में आ चुका है। चतुर्थ आयाम अतीन्द्रिय चेतना का है, जिसे परामनोविज्ञान आदि अनेक विज्ञान धाराएँ अपनी खोज का विशय बना चुकी है और उसकी प्रामाणिकता पर पूरी तरह विश्वास करने लगी है। बात इतनी ही जानना शेष है कि उस क्षमता को हस्तगत कर सकना और लाभ उठाया जा सकना कैसे सम्भव हो सकता है। वस्तुतः यह प्रसंग भी भौतिक भाग ही है। सूक्ष्म जगत अपने स्थूल जगत का ही अदृश्य भाग है। थोड़ा प्रयत्न करने पर उसका अस्तित्व आसानी से जाना जा सकता है। प्रकृति के रहस्यों की परतें खुल रही है। अदृश्य को खोजते-खोजते ही है, अणु शक्ति, लेजर किरण, ईथर, रेडियो विकिरण, कास्मिक किरणें आदि का अन्वेषण और उपयोग सम्भव हो सकता है। अतीन्द्रिय क्षमताएँ मनुष्य के मस्तिष्क केन्द्र में उत्पन्न होती है। वे आती इसी अपने संसार के अदृश्य क्षेत्र से है। इसलिए यह सब प्रकृति का अदृश्य-अविज्ञात क्षेत्र कहा जा सकता है। सामान्य प्रचलन में न रहने वाली हर बात अद्भुत लगती है। चतुर्थ आयाम के आश्चर्यजनक लगने का भी यही कारण है।
संक्षेप में आयामों को स्थूल और सूक्ष्म प्रकृति का क्षत्र कह सकते हैं। स्थूल की अनुभूतियाँ स्थूल शरीर और सूक्ष्म उपकरणों से होती है, सूक्ष्म के लिए मस्तिष्क-प्राण जैसे उच्चस्तरीय चेतना-युक्त औजार प्रयुक्त करने पड़ते हैं।
पाँचवाँ आयाम विशुद्ध चेतनात्मक है। उसे ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ जीव-चेतना के साथ जोड़ने की ओर उस स्थिति का असाधारण लाभ उठाने की प्रक्रिया कहा जा सकता है। आत्मा और परमात्मा का मिलना कितना आनन्ददायक कितना शक्तिशाली कितना प्रभावोत्पादक हो सकता है। इसकी आज की समुचित चर्चा कर सकना भी अपनी भौतिक मनःस्थिति में सम्भव नहीं है। पर तत्त्वज्ञानी सूक्ष्मदर्शी उसका रसास्वादन कर रहे है। इसी आधार पर वे देवात्मा बने है और दूसरों को अपनी नाव पर बिठा कर पार लगाया है।
पंचम आयाम में भी शिव और शक्ति का, विष्णु और लक्ष्मी का संयोग है। ब्रह्म ओर प्रकृति का वहाँ भी समन्वय है। अति सूक्ष्म, प्रकृति को शक्ति, लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती आदि कह सकते हैं। अति सूक्ष्म-ब्रह्म को शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदि कहा जाता है। इन देवी-देवताओं की उपासना से जीव किस स्थिति तक जा पहुँचता है इसकी चर्चा पौराणिक कथा-गाथाओं में अलंकारिक रूप से विस्तारपूर्वक होती रही है। वह वस्तु स्थिति है। बुद्धिवाद और अनुभव न कर सके फिर भी संवेदनाओं ओर अनुभूतियों के क्षेत्र की विशिष्टता अस्वीकार नहीं की जा सकती। नर-पशुओं और नर-नारायणों के बीच देखा जाने वाला अन्तर भी अकारण नहीं होता। उसमें पंचम आयाम की विशेषताएँ ही काम कर रही होती है।
पाँच कोश इन्हीं पाँच आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पंचकोशी साधना का महत्त्व इसी दृष्टि से है कि हम जड़ के भीतर हर क्षेत्र में काम कर रहे चेतन के साथ अपना सम्बन्ध जोड़ सके। पदार्थ का स्थूल उपयोग कर सकना ही पर्याप्त नहीं, उसकी मूल-सत्ता को हस्तगत किया जा सकें तो ही वास्तविक लाभ है। पाँच कोशों में प्रथम विशुद्ध पदार्थ परक है। दूसरे को पदार्थ का ऊर्जा क्षेत्र कह सकते हैं। प्रथम अन्नमय और दूसरा प्राणमय कोश है।
आगे चेतना का क्षेत्र आरम्भ होता है। व्यक्ति का ज्ञान क्षेत्र दो भागों में विभक्त है एक ज्ञात। दूसरा अविज्ञात। ज्ञात को मनोमयकोश कहते हैं। उसका प्रशिक्षण संवर्द्धन उपयोग, विचार-विमर्श एवं बौद्धिक आदान प्रदान के सम्भव हो जाता है। उस क्षमता के विकसित होने पर मनुष्य बुद्धिमान कहा जाता है और बुद्धि शक्ति के सहारे जो लाभ मिल सकते हैं, उन्हें उठाता है। उसे मनोमय कोश समझा जाना चाहिए।
विज्ञानमय कोश मनःचेतना की गहरी परत है। ‘चित्त’ और अहंकार के रूप में इसी की व्याख्या की जाती है। अतीन्द्रिय क्षमता का क्षेत्र यही हैं। सूक्ष्म जगत में प्रवेश करके अपने संसार की कारणभूत स्थिति के साथ सम्बन्ध जोड़ सकना इसी आधार पर सम्भव होता है। सिद्ध पुरुष इसी प्रक्रिया में प्रवीण होते हैं। ऋद्धि-सिद्धियाँ यही से उपलब्ध होती है।
व्यक्ति सत्ता का एक वर्गीकरण स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर के रूप में भी होता रहा है। पंच तत्त्वों से बना और प्रत्यक्ष होने के कारण यही अपना काम-काजी शरीर स्थूल कहलाता है। प्राण-शक्ति की इसी को सामर्थ्य है। इसलिए अन्नमय और प्राणमय कोशों का सम्मिलित स्वरूप स्थूल-शरीर कहा जाता है। मनोमय कोश ओर सूक्ष्म शरीर पूर्णतया एक ही है। कारण शरीर को विज्ञानमय कोश समझा जाना चाहिए। भाव सम्वेदना का, मस्तिष्क की अतीन्द्रिय चेतना का समावेश यही है। आनन्दमय कोश का उतना अंश इसी क्षेत्र में आता है। जिसमें जीव-सत्ता और परम-सत्ता के मिलन की आत्म साक्षात्कार, ब्रह्म साक्षात्कार जैसी दिव्य अनुभूतियाँ होती है। स्थिति प्रज्ञ, अवधूत, ब्रह्मज्ञानी, तत्त्वदर्शी, जीवन मुक्त इसी स्थिति में परिपक्व होते हैं।
यह सारे क्षेत्र शरीर स्थिति में सम्बन्धित है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण यह तीनों ही शरीर से सम्बन्धित है। स्थूल, सूक्ष्म, और कारण यह तीनों ही शरीर है। जीव चेतना का स्वतन्त्र अस्तित्व रहने तक ही इनकी स्थिति है इसके उपरान्त जब तीनों शरीरों से मुक्ति मिल जाती है तब वह अनिर्वचनीय स्थिति आती है। जिसमें जीव और ब्रह्म का अन्तर समाप्त होता है। द्वैत मिट कर अद्वैत बनता है।
गायत्री के पाँच मुख-पाँच कोशों के प्रतीक है। इस साधना को पूरी करते हुए हम पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचते हैं। इन्हें परीक्षा के पाँच वर्ग एवं स्तर कह सकते हैं। विज्ञान के क्षेत्र में इन्हीं की पाँच आयामों के रूप में व्याख्या की जाती है। आत्मिक प्रगति के पथ पर हम जितने-जितने आगे बढ़ते हैं, उतने ही उतने दिव्य-विभूतियों से सुसम्पन्न बनते चले जाते हैं। ब्रह्म वर्चस् साधना प्रक्रिया द्वारा इसी मार्ग पर आज की स्थिति के अनुरूप साधन, विधान बताकर प्रगति पथ पर अग्रसर करने का प्रयत्न किया जा रहा है।
पूर्वरात्रो परे चैव युञजानः सततं मनः। लध्वाहागे विशुद्धात्मा पश्यत्रात्मान्मात्मनि॥ प्रदीप्तेनेव दीपेन मनोदीपेन पश्यति। दृश्टवाडडत्मानं निरात्मानं स तदा विप्रभुच्यते॥
मनुष्य को चाहिये कि वह हल्का भोजन करे और अन्तःकरण को शुद्ध रखे। रात के पहले और पिछले पहर में सदा अपना मन परमात्मा के चिन्तन में लगावें। जो इस प्रकार निरन्तर अपने हृदय में परमात्मा के साक्षात्कार का अभ्यास करता है वह प्रज्वलित दीपक के समान प्रकाशित होने वाले अपने मनोमय प्रदीप के द्वारा निराकार परमेश्वर का साक्षात्कार करके तत्काल मुक्त हो जाता है।
न संस्तरोडश्मा न तृणं न मेदिनी, विधानतो नो फलको विनिर्मितः। यतो निरस्ताक्षकशायविद्विशः, सुधीभिरात्मैव सुनिर्मली मतः॥ न संस्तरों भद्र समाधिसाधनं, न लोक पूजा न च सन्धमेलनम्। यतस्ततोडध्यात्मरतो भवार्निशं, विमुच्य सर्वामपि बाहयवासनम्-अमितगति
अर्थात् ध्यान करने के लिये पाषाण की शिला, कुशा या पृथ्वी के आसन की आवश्यकता नहीं है। विद्वानों के लिये वह आत्मा ही स्वयं पवित्र आसन है, जिसने क्रोध आदि कषाय (कृवृत्ति) व इन्द्रिय-विषय-वासना रूपी शत्रु का संहार कर दिया है। हे मित्र! आत्म ध्यान के लिये न किसी आसन की न लोक पूजा की ओर न किसी सभा-सोसायटी की आवश्यकता है। जिस किसी प्रकार अपने हृदय से बाह्य वस्तुओं की वासना को निकाल कर, अपने ही स्वरूप में प्रतिक्षण लवलीन रहे, यही ध्यान एवं समाधि है।
मानवी शरीर यों उपेक्षित परिभाषा में एक ‘चलता फिरता पेड़ है। भौतिक दृष्टि से उसकी और कुछ व्याख्या हो भी नहीं सकती। वनस्पतियों में पाये जाने वाले रसायन ही न्यूनाधिक मात्रा में उसमें भी पाये जाते हैं। जन्म वृद्धि और मरण के चक्र में घास-पात की तरह मनुष्य भी भ्रमण करता है। आहार और साँस लेने की क्रिया ही पौधों की तरह उसे भी जीवित रखती है।
पिछले दिनों वैज्ञानिक इसी स्तर में प्रतिपादन करते रहे है। इससे किस सिद्धान्त की पुष्टि हो सकी-किसकी न हो सकी यह पीछे की बात है, पर मानवी सत्ता का अवमूल्यन निश्चित रूप से हुआ है। उसकी आत्मिक विशेषता को अस्वीकार कर देने पर मनुष्य वनस्पति वर्ग का रह जाता है। अधिक से अधिक उसे कृमि-कीटकों की तरह कुछ अधिक विकसित स्तर का काय-पिण्ड कह सकते हैं। इस स्थिति में उसके विशेष आदर्श कृतवय और उत्तरदायित्व मानने की भी आवश्यकता नहीं रह जाती। नैतिक मर्यादाओं में भी उसे क्यों बाँधा जाय? तब सेवा, उदारता, आत्मीयता, सहकारिता के आदर्शों का विस्तार करने की बात भी क्यों सोची जाय? त्याग, बलिदान की-तप और संयम की आवश्यकता भी क्यों मानी जाय? नास्तिक दर्शन में भस्मी भूत देह का पुनरागमन न होने की मान्यता अपनाने के उपरान्त ‘यावज्जीवेत् सुखंजीवेत् की नीति मान्य ठहराई गयी है। उसे ऋणं कृत्वाँ घृतं पिबेत् की ही नहीं, शोषण, उत्पीड़न और रक्तवान की भी पूरी छूट है। विचारणीय है कि यदि मनुष्य चलता-फिरता पौधा हो ठहरा दिया गया तो फिर उस पर कोई नैतिक उत्तरदायित्व न लादे जा सकेंगे ओर आदेशों के नाम पर आत्म संयम बरतने एवं परमार्थ कृत्यों से उत्साह रखने का औचित्य सिद्ध न किया जा सकेगा। इस दिशा में बढ़ते हुए हम संचित मानवी सभ्यता, संस्कृति और आदर्शवादिता को तिलाञ्जलि दे देंगे।
पौधे और मनुष्य के बीच पाये जाने वाले अन्तर पर दृष्टिपात करने से हमें दोनों के बीच हर क्षेत्र में मौलिक अन्तर दृष्टिगोचर होता है। विशिष्टता मानवी काया के रोम-रोम में संव्याप्त है। आत्मिक गरिमा पर विचार करना पीछे के लिए छोड़कर मात्र काय संरचना और उसकी क्षमता पर विचार करें तो इस क्षेत्र में भी सब कुछ अद्भुत दीखता है। वनस्पति तो क्या-पिछड़े स्तर के प्राणि शरीरों में भी वे विशेषताएँ नहीं मिलती जो मनुष्य के छोटे और बड़े अवयवों में सन्निहित है। कलाकार ने अपनी सारी कला को इसके निर्माण में झोंका है।
शरीर रचना से लेकर मनःसंस्थान और अन्तःकरण की भाव सम्वेदनाओं तक सर्वत्र असाधारण ही असाधारण दृष्टिगोचर होता है। यह सोद्देश्य होना चाहिए। अन्यथा एक ही घटक पर कलाकार का इतना श्रम और कौशल नियोजित होने की क्या आवश्यकता थी, यह मात्र संयोग नहीं है और न इसे रचनाकार का कौतुक-कौतूहल कहा जाना चाहिए। मनुष्य को विशेष प्रयोजन के लिए बनाया गया। इस विशेष को सम्पन्न करने के लिए उसका प्रत्येक उपकरण इस योग्य बनाया गया है कि उसके कण-कण में विशेषता देखी जा सकें। इन साधन उपकरणों के सहारे ही वह आत्म-कल्याण जैसे महान् प्रयोजन सम्पन्न कर सकने में समर्थ हो सकता है। सृष्टा ने इसी साज-सज्जा से अलंकृत करके उसे इस संसार में अभीष्ट कर्तव्यों का निर्वाह करने के लिए भेजा है।
हृदय की धड़कन में सिकुड़ने की-सिस्ट्रोल और फैलने की-डायेस्टोल क्रिया होती रहती है। इसी क्रिया के कारण रक्त संचार होता है। और जीवन के समस्त क्रिया-कलाप चलते हैं। यह रक्त प्रवाह नहीं नाले की तरह नहीं चलता, वरन् पम्पिंग स्टेशन जैसी विशेषता उसमें रहती है। पम्प में झटका मारने की क्रिया होती है। उससे गति मिलती है। नीचे की दिशा में तो प्रवाह अपने आप भी होता है, पर ऊपर की ओर ले जाना हो तो उसके पीछे शक्ति का दबाव होना आवश्यक है। आकुंचन-प्रकुञ्चन से झटका लगता है और उसके दबाव से रक्त-चक्र नीचे जाने और ऊपर आने की दोनों आवश्यकताएँ पूरी कर लेता है। हृदय की धड़कन रक्त के परिभ्रमण में काम आने वाली गति की व्यवस्था करती है।
कोई यन्त्र लगातार काम करने के गरम हो जाता है। श्रम के साथ विश्राम भी आवश्यक है। श्रम में शक्ति का व्यय होता है, विश्राम उसको फिर से जुटा देता है। हृदय के आकुंचन-प्रकुञ्चन से जहाँ झटके द्वारा शान्ति उत्पादन की आवश्यकता पूरी होती हैं वहाँ इन दोनों क्रियाओं के बीच मध्यान्तर की अवधि में विश्राम का लाभ भी उसे मिलता रहता है। एक धड़कन एक मिनट के 72 वें भाग में सेकेण्ड के पाँच बटे छह भाग में सम्पन्न होती है। इस अल्प अवधि में ही असंख्य विद्युत तरंगें उस संस्थान को इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम के माध्यम से रिकार्ड करके हृदय की स्वास्थ्य परीक्षा की जाती है। नवजात शिशु की प्रगति आवश्यकता के अनुरूप उन दिनों हृदय एक मिनट में 140 बार धड़कता है किन्तु वह जरूरत कम होते जाने से यह चाल भी घटती है। 3 वर्ष के बच्चे का एक मिनट में 100 बार और युवा मनुष्य का मात्र 72 बार धड़कता है। समर्थता की न्यूनाधिकता के अनुरूप धड़कन घटी-बढ़ी रहती है। चूहे का हृदय 500 बार, चिड़ियों का 250 बार, मुरगी का 200 बार, खरगोश का 65 बार, घोड़े का 50 बार और हाथी का 40 बार एक मिनट में धड़कता है। मनुष्य के शिशु और प्रौढ़ के बीच समर्थता वृद्धि के अनुपात से हृदय की धड़कन भी घटती जाती है।
पुरुष के हृदय का औसत वजन 330 ग्राम ओर स्त्री कास 260 ग्राम होता है। यह सम्पूर्ण अवयव परिकार्डियम नामक झिल्ली की थैली में बन्द रहता है। हृदय एक होते हुए भी उसके मध्य भाग में खड़ी रोप्टम नामक माँस पेशी उसे दो भागों में बाँट देती है। यह दो भाग भी दो-दो हिस्सों में बँट कर चार हो जाते हैं। इनमें से ऊपरी भाग को आरिकिल और नीचे के भाग को वेक्ट्रिकिन कहते हैं। हृदय से फुफ्फुसीय धमनी में जाने की प्रक्रिया को मध्यवर्ती वाल्व नियन्त्रित करते हैं।
हृदय के समान ही फेफड़े भी आजीवन कभी विश्राम नहीं करते। 20 से 30 धन इंच हवा को वे बार-बार भरते और शरीर तो ताजगी प्रदान करते रहते हैं। बच्चों की श्वास गति 25 से 40 तक होती है। क्योंकि यह उनका विकास काल होता है।
शरीर में उत्पन्न दूषित वायु कार्बन-डाई-आक्साइड गैस को बाहर निकालना और शुद्ध वायु आक्सीजन को शरीर पोषण के लिए उपलब्ध कराना यह दुहरा उत्तरदायित्व फेफड़ों का निबाहना पड़ता है। फेफड़ों में आँख से भी न दीख पड़ने वाला बहुत पतली वायु नलिकाएँ बहती है। इन 40 नलिकाओं के मिलने से एक वायुकोष्ठ एयरसैक बनता है। यही सघन होकर फेफड़े का रूप लेते हैं। इनकी संख्या प्रायः 1600 होती हैं। इन्हें श्वास विभाग के सफाई कर्मचारी भी कहा जा सकता है। इन वायुकोष्ठों की लचक अद्भुत है। इन्हें पूरी तरह फूलने का अवसर मिले तो वे समूचे शरीर से 55 गुने विस्तार में फैल सकते हैं।
साधारणतया उपलब्ध आक्सीजन का 4.5 प्रतिशत अंश ही शरीर ग्रहण कर पाता है। यदि श्वास लम्बी और गहरी लेने का अभ्यास डाल लिया जाय तो तीन गुनी अर्थात् 13.5 तक आक्सीजन ग्रहण की जा सकती है। इस उपार्जन का लाभ भी शरीर पोषण के लिए तीन गुना अधिक प्राप्त हो सकता है। इसी प्रकार सफाई का कार्य तीन गुना अधिक बढ़ सकता है। जिस अनुपात से गहरी साँस द्वारा आक्सीजन अधिक ग्रहण की जा सकती है उसी प्रकार कार्बन-डाई-आक्साइड को भी 45 प्रतिशत के स्थान पर 13.5 के अनुपात से बाहर निकाला जा सकता है। कहना न होगा कि शक्ति प्राप्त करने और विषाक्तता निकालने के अनुपात बढ़ जाये तो उससे आरोग्य वृद्धि में अत्यधिक लाभ मिलेगा। गहरी और लम्बी साँस लेने की सामान्य प्रणाली, डीप ब्रीदिंग, भौतिक विज्ञान की प्राणायाम प्रक्रिया कहलाती है। इसमें आध्यात्मिक आधारों को भी मिला दिया जाए तो फेफड़े स्वास्थ्य संवर्धन में अद्भुत भूमिका निभाने लगते हैं।
हृदय के समान ही फेफड़े भी आजीवन बिना विश्राम लिये काम करते रहते हैं। 20 से 30 धन इंच हवा वे बार-बार भरते और शरीर को ताजगी प्रदान करते रहते हैं। प्रति मिनट वे 17 बार के हिसाब से धोंकनी धोकते हैं। बच्चों की श्वास गति तो 25 से 40 तक होती हैं
हृदय और फेफड़े ही नहीं अन्य छोटे दीखने वाले अवयव भी अपना काम अद्भुत रीति से सम्पन्न करते हैं। गुर्दे की गांठें देखने में मुट्ठी भर आकार की-भरे कत्थई रंग की-सेम की बीच जैसे आकृति की-लगभग 150 ग्राम भरी है। प्रत्येक गुर्दा प्रायः 4 इंच लम्बा, 2.5 इंच चौड़ा और 2 इंच मोटा होता है। जिस प्रकार फेफड़े साँस को साफ करते हैं। उसी प्रकार जल अंश की सफाई इन गुर्दों के जिम्मे है। गुर्दे रक्त में धुले रहने वाले नमक, पोटैशियम, कैल्शियम, मैग्नेशियम, आदि पर कड़ी नजर रखते हैं। इनकी मात्रा जरा भी बढ़ जाय तो शरीर पर घातक प्रभाव डालते ही है। शरीर में जल की भी एक सीमित मात्रा होनी चाहिए। रक्त में क्षारीय एवं अम्लीय अंश न बढ़ने पाये इनका ध्यान भी गुर्दे को ही रखना पड़ता है। छानते समय इन सब बातों की सावधानी वे पूरी तरह रखते हैं गुर्दे एक प्रकार की छलनी है। उसमें 10 लाख से भी अधिक नलिकाएँ होती है। इन सबको लम्बी कतार में रखा जाय तो वे 110 किलोमीटर लम्बी डोरी बन जायेगी। एक घण्टे में गुर्दे इतना रक्त छानते हैं। जिसका वजन शरीर के भार से दूना होता है। विटामिन अमीनो अम्ल, हारमोन, शकर जैसे उपयोगी तत्त्व रक्त को वापिस कर दिये जाते हैं। नमक ही सबसे ज्यादा अनावश्यक मात्रा में होता है। यदि हम यह रुकना शुरू कर दे तो सारे शरीर पर सूजन चढ़ने लगेगी। गुर्दे ही है जो इस अनावश्यक को निरन्तर बाहर फेंकने में लगे रहते हैं।
दोनों गुर्दे में परस्पर अति सघन सहयोग है। एक खराब हो जाय तो दूसरा उसका बोझ अपने ऊपर उठा लेता है। गुर्दे प्रतिदिन प्रायः दो लीटर मूत्र निकालते हैं। मनुष्य अनावश्यक और हानिकारक पदार्थ खाने से बाज़ नहीं आता। इसका प्रायश्चित्त गुर्दों को करना पड़ता है। नमक, फास्फेट, सल्फेट, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नेशियम, लोहा, क्रिएटाइनिन, यूरिया, अमोनिया, यूरिक एसिड, हिप्पूरिक एसिड, नाइट्रोजन आदि पदार्थों की प्रचलित आहार पद्धति में भरमार है। गुर्दे इस कचरे को मूत्र मार्ग से बाहर करने और स्वस्थ सन्तुलन बनाये रखने का उत्तरदायित्व निबाहते हैं। यदि वे अपने कार्य में तनिक भी ढील कर दें तो मनुष्य ढोल की तरह फूल जाएगा और देखत-देखते प्राण गँवा देगा।
आमाशय का मोटा काम भोजन हजम करना माना जाता है पर यह क्रिया कितनी जटिल ओर विलक्षण है। इस पर दृष्टिपात करने से आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। इसे छोटी थैली की एक अद्भुत रसायन शाला को संज्ञा दी जाती है। जिसमें सम्मिश्रण के आधार पर कुछ से कुछ बना दिया जाता रहता है। कहाँ अन्न और कहाँ रक्त? एक स्थिति को दूसरी में बदलने के लिए उसके बीच इतने असाधारण परिवर्तन होते है- इतने अधिक रासायनिक सम्मिश्रण मिलते हैं कि इस स्तर के प्रयोगों की संसार भर में कही भी उपमा नहीं ढूँढ़ी जा सकती। आमाशय में पाये जाने वाले लवणास्त, पेप्सीन, रेन्नेट आदि भोजन को आटे की तरह गूंथते हैं। लवणाम्ल खाद्य-पदार्थों में रहने वाले रोग कीटाणुओं का नाश करते हैं। पेप्सीन के साथ मिलकर वे प्रोटीन से ‘पेप्टोन’ बनाते हैं। पेन्क्रयाज में पाये जाने वाले इन्सुलिन आदि रसायन शकर को सन्तुलित करते हैं और आँतों के काम को सरल बनाते हैं। इतने अधिक प्रकार के- इतनी अद्भुत प्रकृति के-इतनी विलक्षण प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करने वाले रासायनिक प्रयोग मनुष्यकृत प्रयोग प्रक्रिया द्वारा सम्भव हो सकते हैं, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। आमाशय की रासायनिक प्रयोगशाला क्या-क्या कौतुक रचती है और क्या से क्या बना देती है? इसे किसी बाजीगर की विलक्षण जादूगरी से कम नहीं कहा जा सकता।
यों तो कर्ता की कारीगरी का परिचय रोम-रोम और कण-कण में दृष्टिगोचर होता है, पर आँख कान जैसे अवयवों पर हुई कारीगरी तो अपनी विलक्षण संरचना से बुद्धि का चकित ही कर देती है। आँख जैसा कैमरा मनुष्य द्वारा कभी बन सकेगा। इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। कैमरों में नाभ्यान्तर-फोकस लेन्थ-को बदला जा सके ऐसे कैमरे कहीं नहीं बनें। फोटो लेने के लिए अच्छे कैमरों के लेन्स भी पहले एक निश्चित नाभ्यान्तर पर फिट करने होते हैं। फिल्मों तक में फोटो दृश्य और कैमरे की दूरी का सन्तुलन मिलाकर फोकस सही करना पड़ता है। इस व्यवस्था को बनाये बिना अभीष्ट फोटो खिंच ही नहीं सकेगा। किन्तु नेत्र संरचना में ऐसा कुछ साथ करना पड़ता। वे निकट से निकट और दूर से दूर को भी-आँखों का बिना आगे-पीछे हटाये-मजे में देखते रह सकते हैं। प्रिज़्म या थ्रीडाईमेंशनल कैमरे अद्भुत माने जाते हैं। पर वे भी रगों का वर्गीकरण उस तरह नहीं कर सकते जैसा कि आँखें करती है। सुरक्षा सफाई का प्रबन्ध जैसा आँखों में है वैसा किसी कैमरे में नहीं होता। कैमरे पहले उलटा फोटो लेते हैं, फिर दुबारा प्रिंट करके उन्हें सीधा करना पड़ता है। किन्तु आँखें सीधा एक ही बार में सही फोटो उतार लेती है।
कान जैसा ‘साउण्ड’ यन्त्र कभी मनुष्य द्वारा बन सकेगा, ऐसी आशा नहीं की जा सकती। रेडियो ओर वायरलैस की आवाजें एक निश्चित-फ्रीक्वेंसी पर ही सुनी जा सकती है। कानों के सामने इस प्रकार की काई कठिनाई नहीं है। वे किसी भी तरफ की-कोई भी ऊँची हलकी आवाज सुन सकते हैं। कई आवाजें एक साथ सुनने या कोलाहल के बीच अपने ही व्यक्ति की बात सुन लेने की क्षमता हमारे ही कानों में होती है। ध्वनि साफ करने के लिए “रेक्टीफायर” का प्रयोग किया जात है। कुछ यन्त्रों में ‘वैकुऊम’ के साथ ‘ग्रिड’ जोड़ना पड़ता है तब कही एक सीमा तक आवाज साफ होती है। किन्तु कान की तीन हड्डियाँ स्टेयिम, मेलियस ओर अंकस में इतनी स्वच्छ प्रणाली विद्यमान् है कि वे आवाज को उसके असली रूप में बिना किसी कठिनाई के सुन सकें। न मात्र सुनने की है उस सन्देश के अनुरूप अपना चिन्तन और कर्म निर्धारित करने के लिए प्रेरणा देनी वाली विद्युत प्रणाली कानों में विद्यमान् है। साँप की फुफकार सुनते ही यह प्रणाली खतरे से सावधान करती है और भाग चलने की प्रेरणा देने के लिए रोंगटे खड़े कर देती है। ऐसी बहुद्देशीय संरचना किन्हीं ध्वनि-ग्राहक यन्त्रों में सम्भव नहीं हो सकती।
शरीर पैर चमड़ी का क्षेत्रफल प्रायः 250 वर्ग फुट और वजन 6 पौण्ड होता है। एक वर्ग इंच त्वचा में 72 फुट लम्बाई वाला तंत्रिका जाल और 12 फुट से अधिक लम्बाई खाली रक्त नलिकाएँ बिछी बिखरी होती है। त्वचा के रोमकूपों से प्रायः एक पौंड पसीना बाहर निकलता है। शरीर का एयरकन्डीशन’ बनाये रखने के लिए त्वख फैलने और सिकुड़ने की क्रिया द्वारा कूलर और हीटर दोनों का प्रयोजन पूरा करती है। त्वचा के भीतर बिखरे ज्ञान तन्तुओं का एक लाइन में रख दिया जाए तो वे 45 मील लम्बे होंगे। इन तन्तुओं द्वारा प्राप्त अनुभूतियाँ मस्तिष्क तक पहुँचती है और टेलीफोन तारों जैसा उद्देश्य पूरा होता है। त्वचा से ‘कोरियम’ नामक एक विशेष प्रकार का तेल निकलता रहता है। यह सुरक्षा और सौंदर्य वृद्धि के दोनों ही कार्य करता है। यह सुरक्षा और सौंदर्य वृद्धि के दोनों ही कार्य करता है। उसकी रंजक कोशिकाएँ ‘नेलानिक’ रसासन उत्पन्न करती है। यही चमड़ी को गोर, काले, पीले आदि रगों से रंगता रहता है।
शरीर पूरा जादू घर है। उसी कोशिकाएँ, तन्तुजाल किस प्रकार जीवन-मरण की गुत्थियाँ स्वयं सुलझाते हैं और समूची काया को समर्थ बनाये रहने में योगदान करत हैं यह देखते ही बनता है। जीवन सामान्य है, पर उसे सुनियोजित एवं सुसंचालित रखने में एक छोटा ब्रह्माण्ड ही जुटा रहता है। पिण्ड मानवी काया का नाम क्रिया-प्रक्रिया का छोटा रूप ही कहा जा सकता है।
अन्नमय कोश जिसे स्थूल शरीर भी कहते हैं। परमेश्वर का विचित्र कारीगरी से भरा-पूरा है। उसके किसी भी अवयव पर दृष्टिपात किया जाय उसमें एक से एक बढ़ी-चढ़ी अपने-अपने ढंग की विलक्षणताएँ प्रतीत होगी। सामान्यतया इसे खाने-सोने में ही खपा दिया जाता है। पर यदि इस दृष्टि के सर्वश्रेष्ठ अनुदान के सदुपयोग की बात सोची जाय, उसकी प्रसुप्त क्षमताओं को जागृत किया जाय तो इतना कुछ कर गुजरना सम्भव हो सकता है जिससे मनुष्य जन्म को सच्चे अर्थों में सार्थक हुआ कहा जा सके।
मनुष्य गया-गुजरा उस स्थिति में-जब अपनी सामर्थ्य को पहचानने और उसका उपयोग करने में उपेक्षा बरते। महान् और असाधारण उस स्थिति में-जब वह अपनी गरिमा को समझे ओर असीम क्षमता पर विश्वास करे। साधारणतया यह आत्मा-विश्वास की कमी ही वह कठिनाई है। जिसके कारण हेय स्थिति में रहना पड़ता है।
मनुष्य की क्षमता का एक छोटा उदाहरण उसकी आरम्भिक स्थिति ‘भ्रूणावस्था की गतिविधियों का पर्यवेक्षण करते हुए सहज ही किया जा सकता है। अपनी सत्ता के प्रकटीकरण अवसर पर साधन रहित स्थिति में यदि इतना अधिक पुरुषार्थ किया जा सकता है। तो साधन सम्पन्न ओर विकसित स्थिति में अपेक्षाकृत और भी अधिक पराक्रम कर सकना सम्भव होना चाहिए। किन्तु देखा यह जाता है कि श्री गणेश का उपक्रम पीछे चल कर शिथिलता की दिशा में बढ़ने लगता है और क्रमशः ठंडा होता चला जाता है। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए। अन्यथा कोई कारण नहीं कि आरम्भ में जिस स्तर की सक्रियता अपनाई गई थी, उसमें शिथिलता आने लगे। यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि आरम्भ में विशेष क्षमता होती हैं और वह पीछे स्वयमेव घट जाती है। बीज से अंकुर निकलते समय अंकुर का पौधा बनते समय जो प्रगति क्रम दृष्टिगोचर होता है वह पीछे समाप्त या शिथिल कहाँ होता है। उस विकास प्रक्रिया में क्रमशः अभिवृद्धि ही होती चलती है। फिर कोई कारण नहीं कि प्रथम चरण में मनुष्य द्वारा किया जाने वाला पुरुषार्थ आगे चलकर अधिकाधिक तीव्र न होता चले। यदि इसी क्रमिक विकास की प्रक्रिया को अपनाये रहा जाय, उसमें शिथिलता न आने दी जाय तो मनुष्य देव या दैत्य स्तर से बढ़े-चढ़े काम करता रह सकता है।
पिता के शरीर से निकला हुआ शुक्राणु इतना छोटा होता है कि आलपिन की नोंक पर उसके हजारों भाई बैठ सकते हैं। उसे बिना शक्तिशाली सूक्ष्म-दर्शक यन्त्र के खुली आँखों से तो देखा तक नहीं जा सकता। रतिक्रिया से जो मंथन क्रिया होती है। उससे यौन संस्थान में तीव्र विद्युत स्पन्दन सत्ता का निर्माण करने के लिए सहयोगी की तलाश में द्रुतगति से परिभ्रमण करता है। उस समय हमारे हाथ, पैर आँख आदि कुछ नहीं होते, तो भी अपनी आन्तरिक आकांक्षा से प्रेरित होकर अभीष्ट साथी को खोजने के लिए इसी तेजी से दौड़ता है कि हिरन, चीते की दौड़ से भी उसका अनुपात बढ़ा-चढ़ा रहता है।
शुक्राणु को डिम्बाणु तक पहुँचने में-अपने आकार और स्थान की दूरी के अनुपात से उतनी लम्बी यात्रा करनी पड़ती है जितनी कि उसे मनुष्य की बराबर आकार का होने पर पूरी पृथ्वी की दूरी नापनी पड़ती। इस यात्रा पर स्खलन के समय लाखों शुक्राणु अभीष्ट मनोरथ की पूर्ति के लिए निकलते हैं। इसे डर्बी की धुड़ दौड़ से समतुल्य प्रतिस्पर्धा माना जा सकता है प्रकृति सबल को सफलता देने की नीति अपनाती है। जो उस लम्बी और कष्ट साध्य यात्रा में अन्त तक प्रबल पुरुषार्थ नहीं कर पाते, बीच में ही थककर बैठ जाते हैं, वे दम तोड़ देते हैं। जो अणु प्राणपण का साहस करता है वही सफल होता है और भ्रूण बनने का-प्रगति पथ पर अग्रसर होने का-श्रेय प्राप्त करता है।
शुक्र ओर डिम्ब का मिल कर बना हुआ ‘कलल’ बिजली की निगेटिव और पाजेटिव दो-दो धाराओं के सम्मिलित से उत्पन्न शक्ति प्रवाह की तरह सक्रिय हो उठता है। गंगा यमुना का यह मिलना तीर्थराज संगम बनता है। सहयोग और सहकारिता का-मैत्री और साधन आत्मीयता का-जीवन के पहले ही दिन जो पाठ पढ़ा जाता है। उसका सत्परिणाम तत्काल देखने को मिलता है। यह सहकारिता यदि आगे भी जारी रखी गई होती, उसका महत्त्व भूला न दिया गया होता तो मनुष्य प्रगति करते-करते न जाने कहाँ से कहाँ तक पहुँचा होता।
भ्रूण कलल आरम्भ में बाल की नोंक की बराबर होता है। किन्तु वह एक महीने के भीतर ही इतनी प्रगति करता है कि आकार में 50 गुना और वजन में 8000 गुना बढ़ जाता है। जो पहले दिन चिपचिपे जल बिन्दु के अतिरिक्त और कुछ नहीं था। वही एक महीने में चौथाई इंच का बुलबुला बन जाता है। उसे परीक्षण, विश्लेषण की मेज़ पर रखा जाय तो स्थिति को देखकर आश्चर्य चकित रह जाना पड़ेगा। उसके शरीर और धड़ को देखा जा सकता है। पैर पूँछ की तरह होते हैं। हाथ तो स्पष्ट नहीं होते पर हृदय धड़कता हुआ और नसों में रक्त चक्कर लगाता हुआ देखा जा सकता है। जीव की सृजनात्मक गति का यह अद्भुत परिचय है। निर्माण का संकल्प जब कार्य रूप में परिणत होने के लिए आतुर हो उठे तो सहयोग साधन और परिस्थितियाँ किस प्रकार अनुकूल होती चली जाती है। इसका यह प्रत्यक्ष प्रमाण है। एक महीने मात्र स्वल्प समय में किया गया काय-निर्माण का कार्य कितनी प्रगति कर लेता है इसे देखते हुए जीव की अद्भुत सृजनात्मक शक्ति पर सन्देह करने का कोई कारण शेष नहीं रहता।
माता के शरीर में असीम मात्रा में पोषक पदार्थ भरे रहते हैं। उसे इच्छानुसार मात्रा में प्राप्त करने में भ्रूण पर कोई रोकथाम नहीं होती, पर वह सही विकास के सिद्धान्त को समझता है कि निर्वाह मात्र के लिए न्यूनतम लिया जाय अन्यथा अनावश्यक संग्रह उसके लिए अन्ततः भार बनेगा और विपत्ति उत्पन्न करेगा। ‘त्येनत्यक्ते भुँजीथा’ का पाठ प्रत्येक प्रगतिशील को पढ़ना पढ़ा है। उसे शरीर के चारों ओर एक परत चढ़ानी पड़ती है। जो गर्भाशय में उपलब्ध सामग्री में से छना हुआ, उपयुक्त पोषक पदार्थ ही भ्रूण तक जाने देती है। इसे संयम और मर्यादा का आवरण कह सकते हैं। शरीर शास्त्र की दृष्टि से इस झिल्ली को ‘ट्रोफोब्लासट’ कहते हैं। सम्पत्ति के समुद्र में से मात्र उपयुक्त निर्वाह स्वीकार करने की व्यवस्था यह झिल्ली हो बनाती है। आक्सीजन और रसायन मिश्रित भ्रूण का उपयोगी आहार उसके शरीर में इसी झिल्ली द्वारा छन कर भीतर पहुँचता है। बात इतने से ही समाप्त नहीं होती। भ्रूण के शरीर से मल भी बनता है। उसे बाहर निकालना आवश्यक है। यह झिल्ली ही उस मल को बाहर लाती है और माता के रक्त में धकेल देती है। उसकी सफाई माता के रक्त को अपनी निज की सफाई के साथ साथ ही करनी पड़ती है। उपलब्धि की तरह परित्याग का सिद्धान्त अपनाया जाना कितना आवश्यक है। इसे हृदयस्थ करने पर ही भ्रूण कलल की सुरक्षा और अभिवृद्धि सम्भव होती हैं हम तथाकथित ‘बुद्धिमान’ लोग दोनों हाथों से अनावश्यक संग्रह में जुटते हैं और स्वेच्छा से परित्याग के लिए कृपणता वश साहस की नहीं जुटाते। फलतः उस भार संग्रह की विषाक्तता जीवन की नाव को बीच मझधार में डुबा देने का कारण बनती है।
अनुदानों के लिए लालायित रहने वाले लोग सोचते हैं कि दूसरों के अनुग्रह से मिली सामग्री से ही काम चल सकता है। पर यह कुकल्पना सर्वथा निरर्थक ही सिद्ध होती है। लोग सम्भवतः यही मानते हैं कि माता का रक्त ही भ्रूण की नसों में घूमता है किन्तु वास्तविकता वैसी है नहीं। बच्चे का अपना स्वतन्त्र रक्त होता है यह बात अलग है कि उसके निर्माण की साधन सामग्री माता के शरीर से उपलब्ध होती है।
दूसरे महीने में भ्रूण के ऊपर एक रक्षा कवच-जलीय जाकिट के रूप में धारण कर लेता है। वह जानता है कि हर समर्थ को सुरक्षा संग्राम में उतरना पड़ता है। जीवन एक खुला संघर्ष है। जो इस रण क्षेत्र में उतरने से डरता है-सुविधाएँ की वर्षा होते रहने के सपने देखता है, वह पाता कुछ नहीं खोता बहुत है। संकटों से जूझने में जितने मरते हैं। उसकी तुलना में उनसे डरने के कारण, बेमौत मरने वाले कायरों की संख्या कही अधिक होती है। भ्रूण की शरीर सम्पदा बढ़ती है। तो साथ ही खतरा भी बढ़ता है। बाल की नोंक या चना, महर जितने शरीर को पेट में कुछ विशेष खतरा नहीं था, पर जब आकार बढ़ेगा तो खतरे की आशंका भी रहेगी ही। बच्चे के बढ़े हुए शरीर पर माता के पेट का दबाव बढ़ता है। साथ ही उसके चलने-फिरने उलटने-पलटने की क्रिया भी भ्रूण को प्रभावित करती है। ऐसी दशा में यह सुरक्षा कवच आवश्यक है। सुरक्षात्मक जीवन संघर्ष के क्षेत्र में भ्रूण को कवच धारण करके उतरना पड़ता है और उसकी आवश्यकता मृत्यु पर्यन्त बनी ही रहती है स्वावलम्बन की-सतर्कतापूर्वक आत्म-रक्षा की-प्रगति के लिए अपने पैरों खड़े होने की जो शिक्षा प्रथम मास के कार्य-काल में कार्यान्वित की गई थी, उसे यदि भविष्य में भी अपनाये रहा जा सके तो प्रगति की असीम सम्भावनाएँ मूर्तिमान् होती चलती हैं।
एक महीने का भ्रूण एक इंच के दसवें भाग की बराबर लम्बा होता है। तभी से उसके हृदय, मस्तिष्क, फेफड़े और आँतें बनना शुरू हो जाती है। गुर्दे बनाने में तो जीव को भारी उखाड़-पछाड़ करनी पड़ती है। आरम्भिक गुर्दा मछली के गुर्दे से मिलता-जुलता होता है। पीछे वह मेंढक जैसा बनता है। फिर उसकी आकृति छोटे पशुओं के समतुल्य होती है। सम्भवतः यह विकास परम्परा का क्रम है। शरीर की मूल-सत्ता आदिम स्मृतियों को धारण किये रहती है। और अपना काम वहीं से आरम्भ करती है। किन्तु विकसित जीव उससे अपना काम चलता नहीं देखता। फलतः वह अपनी मर्जी के गठन में जुटता है। गुर्दे के परिवर्तन में देखी जाने वाली प्रवृत्ति यदि आगे भी चलती रहे तो पशु-प्रवृत्तियों से लड़-झगड़ कर उन्हें खदेड़ देना और आत्म-गौरव के अनुरूप उच्चस्तरीय प्रकृति ढाल लेना और प्रवृत्ति अपना लेना कुछ भी कठिन न रह जाएगा।
पहले महीने में भ्रूण की जो स्थिति होती है। दूसरे महीने में उसका क्रम बढ़ता ही चला जाता है। पहले महीने की तुलना में उसकी लम्बाई छः गुनी और वजन 500 गुना बढ़ता है। ज्ञानेन्द्रियों के निशान-रीढ़ की हड्डी-अस्थियों का ढाँचा-तंत्रिकाओं का जाल-इसी अवधि से विनिर्मित होने आरम्भ हो जाते हैं।
तीसरे महीने में यों शरीर के अन्य अवयव भी स्पन्दन, ऐंठन और हलचल करते देखे जाते हैं, पर सबसे अधिक उथल-पुथल आँतों में होती है। वे होती तो अनगढ़ रस्सी की तरह है, पर उनकी मन्थन क्रिया देखते ही बनती है। पूर्ण मनुष्य की आँतें जितना जिस गति से काम करती है, उसकी तुलना में भ्रूण की आँतें प्रायः हजार गुना अधिक पुरुषार्थ कर रही होती है। इससे उसकी तात्त्विक सामर्थ्य का पता चलता है। यदि इसे कुंठित न किया जाय तो पेट की पाचन शक्ति अद्भुत स्तर तक अपनी क्रियाशीलता का परिचय देती रह सकती है।
शरीर में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण अवयव दो हैं एक मस्तिष्क दूसरा हृदय तीसरे महीने इनका विकास आरम्भ हो जाता है। बुद्धि और भावना की दो क्षमताएँ ही ऐसी है जो मनुष्य को अभीष्ट गति और उपयुक्त दिशा देती है। विकास साधनों के आधार पर नहीं, इन्हीं दो अवयवों, दो विभूतियों के आधार पर होता है। सफलताएँ और उपलब्धियाँ तो इन दो तत्त्वों की प्रतिक्रिया मात्र है। गर्भस्थ शिशु इन्हें विकसित करने की आवश्यकता समझता है और किसी योग्य हो सकने की स्थिति में आने के लिए दो महीने की अवधि पूरी होते ही वह इन दो अतिमहत्त्वपूर्ण केंद्रों के विकसित करने में जुट जाता है। उन दिनों इन पर जितना श्रम होता है। उतना ही यदि जन्मकाल के उपरान्त भी किया जा सके तो मनुष्य की ज्ञान सम्पदा और भाव विभूति की चरम उन्नति हो सकती है। ऐसा मनुष्य देवात्मा स्तर का आलोकमय जीवनयापन कर सकता है।
लिंग भेद की पृथकता तीसरे महीने से प्रारम्भ होती है। उससे पूर्व भ्रूण में उभय-लिंगी होते हैं। दोनों में से जीव किसका चुनाव करता है। यह उसकी अपनी चेतनात्मक प्रकृति पर निर्भर हैं। जीव की पसन्दगी के आधार पर ही उसका प्रिय एवं अभ्यस्त लिंग विकसित होने लगता है। प्रकृति के दोनों ही अनुदान उसके सामने खुले रखे है। जिसे भी जीवन चुनना चाहे स्वेच्छापूर्वक उनमें से एक को स्वीकार और दूसरे का अस्वीकार कर सकता है।
जन्म लेते ही बालक संघर्ष के लिए भयंकर मल्ल-युद्ध आरम्भ करता है। भीतर और बाहर की परिस्थितियों में भारी अन्तर होता है। उदर से सुरक्षित दुर्ग में उसे बाहरी खतरों का सामना नहीं करना पड़ता था। पर बाहर तो ऋतु प्रभाव से लेकर घातक विकिरणों से भरा हुआ नया एवं अपरिचित संसार होता है। आहार, विश्राम, मलत्याग आदि का सर्वथा नई परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। इस परिवर्तन को ऐसा ही माना जा सकता है जैसे एक लोक के प्राणी को दूसरे लोक में बसने के समय हो सकता है। स्थिति का सामना करने के लिए बहुमुखी समर्थता चाहिए। यह अनुदान कोई और नहीं दे सकता। जीव को अपने ही बलबूते उपार्जित करना पड़ता है। जन्म लेते ही वह अपने शरीर को नई परिस्थितियों से टक्कर लेने योग्य बनाने के लिए प्रचंड प्रयास करता है। इसको जन्म काल में बालक की विचित्र गतिविधियों के रूप में देखा जा सकता है। नवजात शिशु जन्म लेते ही हाँफता है, काँपता है, चिल्लाता है, हाथ-पैर पीटता है, यह सब क्या है? इसे उसका सामर्थ्य सम्पादन प्रयत्न ही कहा जा सकता है गर्भ रज्जु कटते ही उसे स्वावलम्बन का उत्तरदायित्व सम्भालना पड़ता है। जब माता उसके विकास में सीमित सहयोग ही दे पाती हैं। इस संसार का यही नियम है कि जीव को अपने बलबूते निर्वाह और प्रगति के साधन जुटाने पड़ते हैं। सहयोग तो आदान-प्रदान के सिद्धान्त पर ही टिकता है। उदर अनुदान तो क्रमशः घटते ही जाते है? माता की सहायता गर्भकाल जितनी कहाँ मिलती है। उसका अनुपात क्रमशः घटता ही जाता है। बालक इस कमी को अपने स्वावलम्बी प्रयासों से पूरी करता है।
पेट से बाहर आने में कष्ट तो माता को होता है, पर उसके बाहर आने की प्रक्रिया में प्रबल चेष्टा और अदम्य आकांक्षा शिशु की ही काम कर रही होती है। गर्भस्थ शिशु अतिशय दुर्बल हो तो वह माता की कितनी ही इच्छा होने पर भी बाहर न आ पड़ेगा। उसे माता का पेट चीर कर ही बाहर निकालना पड़ेगा। इसी प्रकार यदि जन्मने के तुरन्त बाद बालक रोये, चिल्लाए नहीं हाथ पैर न पीटे तो उसका जीवित रहना कठिन हो जाएगा। ऐसी स्थिति होने पर चतुर दाइयाँ ठंडे पानी के छींटे देकर या दूसरे कृत्रिम उपायों से बच्चे को रोने, चिल्लाने के लिए प्रोत्साहित करती है। कहावत है कि बिना रोये माता दूध नहीं पिलाती। प्रकृति भी समर्थता का उपहार बालक को तभी देती है। जब वह इसके लिए भारी उत्कंठा प्रकट करें। रोने चिल्लाने में इसी माँग की प्रचंडता का आभास मिलता है।
जीव को जन्म लेने के उपरान्त नये लोक में पहुँचकर नये उत्तरदायित्व सम्भालने, नये लोगों के साथ तालमेल बिठाने, नई परिस्थितियों को समझने, नये साधन उपयोग करने की तरह हर स्तर की नवीनता से परिचित ही नहीं अभ्यस्त भी होना पड़ता है। इसके लिए क्या कुछ सीखना और क्या कुछ करना पड़ता है। इसकी कल्पना तक इस समय तो अपने लिए कठिन ही है।
जीव को प्रसुप्ति से जागृति में आने और तज्जनित परिस्थितियों का सामना करने में कितने प्रबल पुरुषार्थ और कितनी अधिक सामर्थ्य की आवश्यकता पड़ती है। इसे देखकर उसकी मौलिक गरिमा का अनुमान लगाया जा सकता है।
आत्मा की सामर्थ्य का मूल स्रोत परमात्मा हैं परमात्मा अनन्त समर्थता का पुंज है। फिर उससे अविच्छिन्न सम्बन्ध सूत्रों के साथ जुड़ा हुआ आत्मा ही क्यों किसी प्रकार अभावग्रस्त हो सकता है? अन्नमय कोश काय-कलेवर हाड़ माँस का पिटारा नहीं है। उसके रोम-रोम में आत्म-सत्ता ओत-प्रोत है। अपने आरम्भिक दिनों में जीव अपने धरोदे का जिस प्रबल पुरुषार्थ के सहारे विकसित करता है। वह समर्थता उसमें सदैव बनी रहती है। उसे विस्मृत और उपेक्षित पड़े रहने देने से ही हमें हेय और दुर्बल स्थिति का सामना करना पड़ता है।
अन्नमय कोश की साधना से वह पथ-प्रशस्त होता है। जिससे मानवी काया में सन्निहित विशेषताओं को उभारना और उपयोग में लाना सम्भव हो सकें। कहना न होगा कि यदि निष्ठापूर्वक इसके लिए प्रयास किया जाए तो कोई भी व्यक्ति उतनी प्रगति कर सकता है। जितनी कि भूतकाल में किसी ने की है। इतना ही नहीं भविष्य की संभावनाएँ तो भूतकाल की सफलताएँ की अपेक्षा और भी अधिक बढ़ी-चढ़ी हो सकती है।
अवयवों की प्रत्यक्ष हलचलें ही शरीर विज्ञान की शोध का विषय रही हैं अब तक जो खोजे हुई है। उनमें यह प्रत्यक्ष ही मूलभूत आधार है इसलिए समझा जाता है कि पंच तत्त्वों से बना हुआ यह ढाँचा मात्र ही शरीर है। समझा जाता है कि अन्न, जल, वायु, वियोग आदि के सहारे ही जीवन की गाड़ी चलती हैं इतना होते हुए भी शरीरगत अनेक सन्दर्भ ऐसे है जिन पर रहस्य का पर्दा ही पड़ा हुआ है।
स्थूल शरीर पर सूक्ष्म-सत्ता का नियन्त्रण हमें इन्हीं हलचलों के पीछे झाँकता हुआ दिखता है। अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ-वंशानुक्रम प्रक्रिया-भ्रूणावस्था में जीव का अत्यन्तिक उग्र विकास क्रम, जीवकोषों की अद्भुत क्षमता, अचेतन मन की रहस्यमय गतिविधियाँ, भाव सम्वेदना से उत्पन्न अदम्य प्रेरणा, अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ, जीवाणुओं की स्वं संचालित जीवन-पद्धति प्रभावशाली तेजोवलय जैसे अनेकानेक सन्दर्भ ऐसे है जिनका शरीर की सामान्य संरचना के साथ कोई ताल-मेल बैठता। रासायनिक पदार्थों के अपने गुण, धर्म होते हैं। सम्मिश्रण से उनमें भिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएँ भी होती है, किन्तु ऐसे रहस्य उत्पन्न नहीं होते जैसे कि अनबूझ, पहेलियों के रूप में सामने आते रहते हैं। इनके भौतिक समाधान अभी तक नहीं मिले है और न भविष्य में मिलने की सम्भावना है। इनके कारण हमें सूक्ष्म शरीर में ही खोजने होगे।
अन्नमय कोश का वर्णन अपेक्षाकृत सूक्ष्म संस्थानों के अंतर्गत आता है। इसमें रासायनिक हलचलों की उत्पन्न क्रिया-प्रक्रिया स्थूल शरीर के क्षेत्र में आती है। शरीर शास्त्रियों की खोज-बीन यही तक सीमित हैं। स्वास्थ्य संवर्द्धन के लिए चिकित्सा उपचार के लिए जो क्रियाकलाप चलते हैं। उन्हें भौतिक क्षेत्र की मर्यादा माना गया है। ऐसे अद्भुत रहस्य ताल-मेल रासायनिक हलचलों से नहीं बैठता, उन्हें सूक्ष्म शरीर की शक्ति सत्ता का प्रभाव कहा जा सकता है। यह क्षेत्र अत्यन्त सुविस्तृत है। उसका थोड़ा सा परिचय जिन प्रत्यक्ष प्रमाणों के आधार पर प्राप्त हो सकता है, उनमें अंतःस्रावी हारमोन ग्रन्थियों की भी गणना की जा सकती हैं। उनसे निकलने वाले राई-रत्ती स्राव शरीर में कितनी अद्भुत गतिविधियाँ सम्पन्न करते हैं। उन्हें देखकर चकित रह जाना पड़ता है।
शरीर-विज्ञान की अन्तरंग शोधों से यह स्पष्ट हो गया है कि हृदय, आमाशय, आँख, कान, त्वचा आदि तो यन्त्र है। इन यन्त्रों के संचालक सूक्ष्म अवयव अन्य ही होते हैं और उन संचालक तत्त्वों का अवयवों के स्वरूप पर ही हमारे स्वास्थ्य का बहुत कुछ आधार निर्भर रहता है। इन सूक्ष्म अवयवों में हारमोनोँ का स्थान अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। उनकी सक्रियता-निष्क्रियता का हमारी शारीरिक एवं मानसिक स्थितियों पर भारी प्रभाव पड़ता है। शरीर की आकृति कैसी भी हो, उसकी प्रकृति का निर्माण तो मुख्यतः इन हारमोन रसों से ही प्रभावित होता है। यद्यपि आकृति पर भी इन जीवन रस-स्रावों का प्रभाव पड़ता ही है। कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि विशेष मनःस्थिति के कारण किन्हीं युवतियों का रूप लावण्य तब तक बना रहा, जिस आयु में सामान्य रूप से शरीर पर वृद्धता के चिन्ह उभर आते हैं। उनके बने रहने का रहस्य-सूत्र भी निश्चय ही इन हारमोन-स्रावों में छिपा हुआ माना जाता है। यद्यपि औषधि विद्या और शल्य-प्रक्रिया की पहुँच अभी वहाँ तक नहीं हो पाई है पर उनके स्वरूप की कुछ-कुछ जानकारी तो आधुनिक शरीर शास्त्र को हो ही गई है।
हारमोन स्रावों के विशेष अनुसंधानकर्ता डॉ0 क्रुकशेर ने इस स्रावों की आधार ग्रंथियों के ‘जादुई ग्रन्थियाँ कहा हैं और बताया है कि व्यक्ति की वास्तविक स्थिति को जानने के लिए इन स्रावों के सन्तुलन और क्रियाकलाप का परीक्षण करके ही यह जाना जा सकता है कि उसका स्तर एवं व्यक्तित्व सचमुच क्या हैं? हारमोन वे रासायनिक तत्त्व या रहस्यमय जीवन रस है, जो अंतःस्रावी ग्रन्थियों द्वारा स्रवित होते हैं।
ग्रन्थियाँ दो प्रकार की होती है-(1) बहिर्स्रावी ग्रन्थियाँ या प्रणाली युक्त ग्रन्थियाँ (डक्ट या एक्सटेरो ग्लैण्ड्स) (2) अंतःस्रावी या प्रणाली विहीन ग्रन्थियाँ (इन्डोक्राइन या डक्टलैस ग्लैण्ड्स)।
(1) बहिर्स्रावी ग्रन्थियाँ-इन ग्रन्थियों में प्रत्येक के साथ एक नलिका मिली होती है। नलिका द्वारा ग्रन्थियों का रसरसाव शरीर के रक्त-प्रवाह में न मिलकर शरीर की ऊपरी सतह पर चला जाता है इन रसों के द्वारा शरीर की अनेक जरूरतें पूरी की जाती है। प्रमुख बहिर्स्रावी ग्रन्थियाँ तीन है-(1) अश्रु ग्रन्थियाँ (टियर ग्लैण्ड्स) (2) प्रस्वेद ग्रन्थियाँ (स्वीट ग्लेण्ड्स) (3) लार ग्रन्थियाँ (सेलिहरी ग्लेण्ड्स)।
(2) अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ- इन दिनों क्रोमोसोम्स तथा वंशानुक्रम की चर्चाएँ बहुत व्यापक रूप से उठा करती है। इन प्रक्रियाओं के मूल में अंतःस्रावी ग्रन्थियों के स्राव कुछ विशिष्ट हारमोन्स ही है। अब तक की शोधों के आधार पर अंतःस्रावी ग्रन्थियों के 8 केन्द्र माने जाते हैं। यह शरीर के विभिन्न अण्डों में अवस्थित है। जैसे-सिर में (1) पीनियलबाड़भ (2) पिट्यूटरी ग्लैण्ड होते हैं। वक्षस्थल के ऊपरी भाग में (3) पैराथाइराइड और (4) याइराइड ग्लैण्ड होते हैं। वक्षस्थल के ऊपरी भाग में (5) थाइमस ग्लैण्ड स्थित है। उदर प्रदेश में (6) एड्रीनल ग्लैण्ड्स और (7) पैक्रियाज ग्रन्थियाँ है। पेड क्षेत्र में (8) गोनड्स ग्रन्थियों का स्थान है।
इन ग्रन्थियों की अद्भुत क्षमता के सम्बन्ध में अभी वैज्ञानिकों को पूरी जानकारी नहीं है। उनके बारे में सांकेतिक जानकारी ही प्राप्त हो सकी है। फिर भी यह विश्वास किया जाता है कि यदि इनके प्रभाव को जाना और नियन्त्रित किया जा सकें तो मनुष्य अपने अन्दर आश्चर्यजनक परिवर्तन ला सकता है। इन सभी ग्रन्थियों की सामान्य जानकारियाँ निम्नानुसार है।
(1) पीनियल बॉडी और (2) पिट्यूटरी ग्रन्थि- ये दोनों मिलकर जिस चेतन-पक्ष का निर्माण करते हैं, उसे ही आज्ञा-चक्र कहा जाता है।
मस्तिष्क के मध्य में स्थित, पिन की नोंक के बराबर पीनियल ग्रन्थि मानसिक तथा आध्यात्मिक विकास से सम्बन्धित है। सुविस्तृत स्थूल तथा सूक्ष्म जगत की विभिन्न हलचलों के साथ सम्पर्क का माध्यम यही केन्द्र बनता है। प्रेतात्मा ओर देवदूतों के साथ सम्बन्ध बनाने का केन्द्र यही है। ईथरीय प्रकाश का उत्पन्न करने तथा ग्रहण करने का कार्य यहीं से होता है।
पिट्यूटरी ग्रन्थि ‘मास्टर’ ग्रन्थि है। यह सभी अंतःस्रावी ग्रन्थियों की नियन्त्रक है। यह खोपड़ी के आधार में- मस्तिष्क के नीचे एक छोटे-से गड्ढे में स्थित है। यह एक छोटी-सी नलिका द्वारा मस्तिष्क से जुड़ती है। यह आकार में छोटी, पर प्रभाव में बहुत प्रखर है। इसमें अधिक स्राव होने लगें तो मनुष्य असाधारण रूप से लम्बे और बेडौल हो जाते हैं, कम हुआ तो बौने रह जाते हैं। बुद्धि की तीव्रता, प्रेम सम्बन्ध, उत्साह, आत्म-नियन्त्रण उसका मुख्य कार्य है। पुरुषत्व और नारीत्व का दिशा-परिवर्तन यही से होता है। यौवन के उतार-चढ़ाव तथा प्रजनन सम्बन्धी गतिविधियों का सम्पर्क इसी केन्द्र से है। शक्कर, चर्बी, स्टार्च, पानी आदि की ठीक मात्रा शरीर में बनाये रहना इसी का काम है।
(3) पैराथाइराइड- गेहूँ के दाने के बराबर की पैराथाइराइड्स का स्नायु-संस्थान से निकट सम्बन्ध है। ये चार के समूह में होती है। इनका स्थान थाइराइड ग्रन्थि के पीछे है। ये चारों वस्तुतः लघु ग्रन्थियों के दो युग्म है। इनसे स्रावित पैराथोरमोन नामक हारमोन तंत्रिका क्रिया के कैल्शियम और फास्फोरस की मात्रा को नियन्त्रित करता है। हड्डियों को मजबूत बनाता है। यदि इनके स्राव बढ़ जाएँ, तो हड्डियाँ बालुई हो जायेगी और तनिक से आघात से टूटने या मुड़ने का खतरा बना रहेगा। गुर्दे की पथरी भी इसी गड़बड़ से उत्पन्न होती है। स्त्रियों के प्रजनन केन्द्रों की हड्डियाँ गड़बड़ा जाने से वे बिना आपरेशन के बच्चा नहीं जन पाती हैं।
इसमें अवांछनीयता से जूझने का साहस भरा रहता है। टूटी हुई कोशिकाओं का पुनर्निर्माण, स्नायु तन्त्रों का गठन, स्फूर्ति, रोग-निरोधी क्षमता का भण्डार इसी केन्द्र में भरा है।
(4) थाइराइड-यह ग्रन्थि श्वास नली के चतुटिक स्थित होती हैं। इसमें थायरोक्सिन नामक हारमोन निकलता है। यह थायरोक्सिन उस सामान्य गति को नियन्त्रित करता है, जिससे शरीर में ऊर्जा उत्पन्न होती है। थायरोक्सिन की मात्रा कम रह गई तो ऊर्जा धीरे-धीरे पैदा होती है, भले ही शरीर में खाद्य-सामग्री पर्याप्त भी हो। ऐसी स्थिति में व्यक्ति आलसी हो जाता है। यदि थायरोक्सिन अधिक हो जाये, तो क्रियाशीलता बहुत बढ़ जाती है। उस स्थिति में व्यक्ति अधीर, अशान्त, उत्तेजित, बकवादी हो सकता है। इस प्रकार आलस्य और उत्साह के लिए यही केन्द्र जिम्मेदार है। प्रतिभावान, विकासोन्मुख व्यक्तियों को वैसा अवसर थाइराइड की सुव्यवस्था ने ही प्रदान किया होता है।
(5) थाइमस-ये वक्षस्थल के ऊपरी भाग में होती है। गर्भस्थ स्थल में विकास करने की क्षमता इसी में भरी है। यदि यह ग्रन्थि अविकसित रहे तो भ्रूण, स्वस्थ माता से भी उचित पोषण प्राप्त न कर सकेगा। जन्म से लेकर किशोरावस्था और यौवन के द्वार तक ठीक तरह पहुँचा देने की जिम्मेदारी भी उसी को सम्भालनी पड़ती है। संक्षिप्त में इसे विकास-ग्रन्थि भी कह सकते हैं।
(6) एड्रीनल-ग्रन्थियाँ-गुर्दे के ऊपर दो हिस्सों में बँटी होती है। एक को कॉर्टेक्स ओर दूसरी को मेडुला कहते हैं। कॉर्टेक्स से दो प्रकार के स्राव निकलते हैं। (1) ग्लूको-कार्टिकाइड (2) इलेक्ट्रो कार्टिकाइड। ग्लूकोकार्टिकाइड का कार्य शरीर में कार्बोहाइड्रेट तथा वसा का भण्डार जमा करना है और प्रोटीन का सही विभाजन करना है। वही इस संचय का उपयोग संकट काल में करता है।
दूसरा स्राव-समूह इलेक्ट्रो कार्टिकाइड भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। यह शरीर में पानी को तथा सोडियम क्लोराइड आदि रसायनों को नियन्त्रित करता है। यह रोकथाम न हो तो शरीर पाला मारे वृक्ष की तरह सूख जायेगा।
यह भावनात्मक उद्वेगों से एड्रीनल ग्रन्थियाँ असाधारण रूप से उत्तेजित हो जाती है और आपत्ति से लोहा ले सकने योग्य शारीरिक एवं मानसिक ऊर्जा उत्पन्न करती है। क्रोध, भय, हर्ष, रोमांस जैसे अवसरों पर रोमांच हो जाता है। साँस तेज हो जाती है। रक्त-प्रवाह बढ़ जाता है। पसीना छूटता है, यह सब इसी ग्रन्थि के हारमोन का चमत्कार है।
(7) पेन्क्रियाज-यह ग्रन्थि आमाशय के नीचे स्थित है। इसका मुख्य कार्य भोजन पचाने के लिए पाचक रसों का उत्पादन है। भोजन पचाने के दौरान अनेक तरह के रसों की उन पर प्रतिक्रिया की जाती है। उनका सन्तुलन बिगड़ने पर पाचन संस्थान लड़खड़ा जाता है। उस स्थिति में आहार शरीर में ऊर्जा पैदा करने के लिए कोशों तक नहीं पहुँच पाता। पेंक्रियाज की इस भूमिका के कारण इनकी गणना बहिर्स्रावी ग्रन्थियों में भी की जाती है।
पेन्क्रियाज के अन्दर ही विशेष खण्ड ‘आइलेट्स आफ लैंगरहेन्स’ है। इसमें से इन्सुलिन नामक एक विशेष हारमोन पैदा होता है। शरीर के अन्दर शर्करा के अनुपात का नियन्त्रण यह रखता है। शरीर में ऊर्जा पैदा करने के लिए जितनी शर्करा खर्च होती है। यदि उससे अधिक शर्करा में हो जाय जो मधुमेह (डायबिटीज) रोग हो जाता है। इन्सुलिन कार्बोहाइड्रेट से अधिक शर्करा न देने तथा अतिरिक्त शर्करा को चर्बी आदि में बदल देने का कार्य करता है।
(8) गोनड्स-ये कामवासना सम्बन्धी ग्रन्थियाँ होती है। इन्हें हम प्रजनन ग्रन्थियाँ भी कह सकते हैं। पुरुष की प्रजनन ग्रन्थियाँ शुक्र ग्रन्थियाँ या वृषण तथा स्त्रियों की प्रजनन ग्रन्थियाँ, डिम्ब ग्रन्थियाँ या अण्डाशय कहलाती है। पुरुष सेक्स हारमोन्स की उत्पादिका वृषण-ग्रन्थि नर में होती है। उसी से उसका पुरुषत्व जगता है। पुरुष आकृति को नारी से भिन्न करने वाले दाढ़ी-मूँछ आदि लक्षण प्रकट होते हैं। नारी में डिम्ब ग्रन्थियाँ गर्भाशय के दोनों छोरों पर होती है। इन स्त्री-गोनड्स से अनेक स्राव निकलते हैं। जिनमें मुख्य है। दो- (1) एस्ट्रोजेन्स (2) प्रोजेस्ट्रोन।
शारीरिक विकास की दृष्टि से स्राव अत्यधिक महत्त्वपूर्ण हैं। स्त्रियोचित, कोमलता तथा गर्भधारण की क्षमता इन्हीं स्रावों से सम्बन्धित है। लिंग परिवर्तन की जो घटनाएँ घटित होती रहती है। वह इसी ग्रन्थि के स्रावों की उल्टी-पुल्टी के परिणाम स्वरूप होती है।
गोनड्म (जनन ग्रन्थियाँ) जननेन्द्रिय हलचलों की क्षमता को तथा प्रजनन-शक्ति को नियन्त्रित करती है। पुरुष-यौवन का इसी ग्रन्थि से सम्बन्ध रहता है। वृद्धावस्था में आमतौर से शरीर बहुत शिथिल हो जाता है। और इन्द्रियाँ जवाब दे जाती है। फिर भी कई बार यह आश्चर्य देखा गया है कि शताधिक आयु वाले व्यक्ति भी नवयुवकों की तरह प्रजनन क्रिया सफलतापूर्वक सम्पन्न करते रहते हैं। यह गोनड्स ग्रन्थियों के सशक्त बने रहने और समुचित यौन-हारमोन्स स्रावित होते रहने का ही परिणाम है।
मनःशास्त्री एडलर ने काम-प्रवृत्ति की शोध करते हुए पाया कि बाहर से अतीव सुन्दर आकर्षक और कमनीय दिखाई देने वाली अनेक महिलाएँ काम-शक्ति से सर्वथा रहित है। उनमें न तो रमणी-प्रवृत्ति थी, न नारी सुलभ उमंग। खोज करने पर ज्ञात हुआ कि यौन-हारमोन्स के श्रोत ही इन विशेषताओं को आधार है।
एडलर ने अपनी खोज के दौरान देखा कि कितनी ही युवकों की शारीरिक स्थिति सामान्य थी, ऊपर से उनमें मर्दानगी भरी ही दिखाई देती थी। पर थे वे वस्तुतः नपुंसक। न तो उनके मन में काम उमंग थी, न जननेन्द्रिय में उत्तेजना। कारण तलाश करने पर उनमें सेक्स-हारमोन का अभाव पाया गया। इसके विपरीत उन्हें ऐसे नर-नारी भी मिले जो अल्पवयस्क अथवा वयोवृद्ध होते हुए भी काम पीड़ित रहते थे।
अन्तःस्रावी ग्रन्थियों और उनसे उत्पन्न हारमोन के आश्चर्यजनक प्रभावों के ढेरों प्रमाण अध्ययनकर्ताओं को मिले है। बीथोवेन वैसे बहरे का प्रखर संगीतज्ञ बनना, डीमास्थनीज जैसे हकलाने वाले धुरन्धर वक्ता हो सकना, डैनियलबोर्न जैसे मन्द-दृष्टि का- सुन्दर दृश्यों का अडन करने वाला कुशल चित्रकार बन पाना इन्हीं हारमोन के स्राव की मात्रा पर निर्भर रहा है।
‘एस्ट्रालोजिकल कोरिलेशक्स विथ द डक्टलैस ग्लैण्ड्स’ नामक ग्रन्थ में अंतःस्रावी ग्रन्थियों की चर्चा आन्तरिक ग्रहों के रूप में की गई है। जिस प्रकार सौर-मण्डल के विविध ग्रह परस्पर संतुलन की स्थिति बनाये है, वैसे ही ये अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ शारीरिक, मानसिक सन्तुलन साधे रहती है।
इस तुलना-क्रम में सूर्य को पीनियलबॉडी से, चन्द्र की पिन्युटरी से, मंगल की पैराथाइराइड से, बुध की थाइराइड से, बृहस्पति की एड्रीनल से तथा शुक्र की थाइमस से तुलना की गई है। “आकल्ट एनाटामी” के लेखन ने इस ग्रन्थियों का उल्लेख “ईश्वर सेन्टर्स” के रूप में किया है तथा उनके उद्दीपन को उत्नर्ग्रही चेतना के साथ जोड़ा है। प्रतीत होता है। कि अविज्ञात चेतना-केन्द्रों से इन ग्रन्थियों के माध्यम से मनुष्य को कुछ असाधारण अनुदान मिलता रहता है।
ईक्षते योगमुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥
“जो सभी वस्तुओं में आत्मा को और आत्मा में ही सब वस्तुओं को देखता है वह समस्त जगत में मूल में व्याप्त एक ही सत् तत्त्व को जान लेता है और समदर्शी हो जाता है।
अन्नमय कोश की-दृश्यमान शरीर की-स्थूल संरचना तो अन्य प्राणियों जैसी ही है। पर उसके अन्तराल में प्रवेश करने पर पता चलता है कि पग-पग पर उसमें विलक्षणतायें भरी पड़ी है। इनके स्वरूप और उपयोग को जाना जा सकें तो तिलस्म के वे पर्दे उठ सकते हैं जिनके भीतर रहस्यमय सिद्धियों के अनन्त भाण्डागार भरे पड़े है। काय-कलेवर में प्रजनन क्षमता की सूत्रधार अत्यन्त छोटी इकाई है-जीन्स। यह आँख से दृष्टिगोचर न होने वाले शुक्राणु और डिंबाणुओं के अन्तराल में रहने वाले अत्यन्त ही क्षुद्र घटक है। इतने पर भी उसकी क्षमता देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। यह नहीं सोचना चाहिए कि हारमोन जा जीन्स ही रहस्यमयी क्षमताओं से सुसम्पन्न है। सच तो यह है कि पूरी काया ही तिलस्मी रहस्यों से भरी पूरी है। दुर्भाग्य सही है कि हम न तो उसकी सामर्थ्य को समझ पाते हैं और न उसके सदुपयोग का ही साहस जुटाते हैं।
हम जानते हैं कि हमारी काया का स्थूल भाग अन्नमय कोश छोटी-छोटी कोशिकाओं (सैल्स) से बना हैं इन कोशिकाओं के अन्दर एक द्रव ‘साइटोप्लाज्म’ (बसामय पीला सा द्रव) पदार्थ भरा रहता है। इसके बीच में अवस्थित होता है, कोशिका का नाभिक अथवा केन्द्रक (न्यूक्लिमस)। पुरुष की शुक्राणु कोशिका अथवा नारी की अण्डाणु या डिम्बाणु कोशिका के नाभिक में छोटे छोटे धागे जैसे गुण सूत्र (क्रोमोसोम) होते हैं। एक नाभिक में इनके 23 या 24 जोड़े होते हैं इन्हीं से लाखों की संख्या में ‘जीन्स’ चिपके रहते हैं। नये मनुष्य शरीर के निर्माण तथा उनमें अनुवांशिक गुण धर्मों का विकास इन्हीं पर निर्भर करता है।
यह जीन्स क्या है? कैसे यह अपनी आश्चर्यजनक भूमिका पूरी करते है? कैसे यह अपनी आश्चर्यजनक भूमिका पूरी करते है? इस रहस्य पर से विज्ञान अभी पर्दा उठा नहीं सका हैं। उनके सम्बन्ध में बड़ी तेजी से शोध कार्य चल रहे है, बहुत से रहस्य खुले भी है, फिर भी वह नहीं के बराबर है।
अभी तक के अध्ययन के आधार पर ‘जेन्स’ छोटे से विधुन्मय पुटपाक या पुड़िया (पैकेट) है। माना जाता है कि इनकी रचना कई तरह से न्यूक्लियल अम्लों के संयोग से हुई है। उनमें से अभी केवल दो के बारे में जाना जा सका है। वे है (1) डी0एन0ए0 (डी0आक्सी राइबो न्यूक्लिक एसिड) (2) आर0एन0ए0 (राइबो न्यूक्लिक एसिड)।
जीन्स की संरचना के बारे में अभी तक नहीं जाना जा सका है, किन्तु यह जानकारियाँ निश्चित रूप से हो गयी है कि शरीर के अंग-प्रत्यंग की विशिष्ट रचना से लेकर अनेक परम्परागत स्वभावों, रोगों तथा गुणों के विकास की आश्चर्यजनक क्षमता इनमें है। इनके गुणों और कार्य कलापों को वैसे नियन्त्रित किया जाय वह पता विज्ञान अभी नहीं लगा सका है, किन्तु यह माना जाने लगा है कि यदि ‘जीन्स’ के गुणों और कार्य-प्रणाली का प्रभावित किया जा सके, तो आश्चर्यजनक उपलब्धियाँ प्राप्त हो सकती है। यह अन्नमय कोश के छोटे-छोटे घटक एक कोशिका के नाभिक में रहने वाले नगण्य आकार वाले विद्युतमय पैकेट मनुष्य के आसपास के वातावरण से लेकर उसके विचारों और भावनात्मक विशेषताओं के संस्कार ग्रहण करने में समर्थ है।
मनुष्य के विकास के सम्बन्ध में भारतीय मान्यता यह रही है कि उस पर अनुवांशिकता के साथ-साथ मान्यता यह रही है कि उस पर अनुवांशिकता के साथ-साथ बाह्य वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है। पहले इस मान्यता के प्रति उपेक्षा बरती जाने लगी थी।
यह स्पष्ट हो गया है कि अपने वातावरण तथा अपनी चेष्टा द्वारा व्यक्ति जिन स्वभाव गुणों को अर्जित करता है, वे वंशानुक्रम से प्राप्त नहीं होते और न ही कोई व्यक्ति उन अर्जित विशेषताओं को वंशानुक्रम द्वारा अपने बच्चों को प्रदान कर सकता है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति ने अनेक भाषाएँ सीखी है, तो वह उस भाषा-ज्ञान को अपने बच्चों को वंशानुक्रम द्वारा नहीं दे सकता। बच्चों को भी भाषा-ज्ञान की प्रचलित विधियों को ही अपनाना होगा तथा मेहनत करनी पड़ेगी। वही दूसरी ओर यह भी स्पष्ट हो गया है कि वंशानुक्रम का निश्चित प्रभाव सन्तान पर पड़ता है। आनुवांशिकी (जेनेटिक्स) का सारा ढाँचा ही इसी आधार पर खड़ा है यह सही है कि कोई भी व्यक्ति जंगली बेर के बीज बोकर उनसे गुलाब के फूलों की आशा नहीं कर सकता। गौरैया के अण्डों को सेकर उनमें से मोर के बच्चे कौन निकाल सकता है? लेकिन जिन पौधों के बीज बोये जाते हैं, उनसे उन्हीं जैसे पौधे आखिर क्यों उगते है? चूहों से चूहा और बिल्ली से बिल्ली ही क्यों पैदा होती हैं? इसका उत्तर है, आनुवांशिकता अर्थात् नियमित वंश परम्परा, जिसके कारण ही ऐसा होता है। जो वस्तु जिस वंश की होगी, उसका बीज डाले जाने पर वैसा ही फल होगा। आनुवांशिकता में काम करने का ढंग भी शामिल है और चीजों का कद तथा रंग भी। उदाहरण के लिये बया पक्षी को बढ़िया लटकने वाला घोंसला बनाना किसी को सिखाना नहीं पड़ता है।
आनुवांशिकता अपने पूर्वजों से मिलने वाली विशेषताओं का ही दूसरा नाम है। वैज्ञानिक जानते हैं कि जीवों में जो विशेषताएँ होती हैं, वे उन्हें अपने माता-पिता से अत्यन्त सूक्ष्म कणों के रूप में मिलती हैं। इस सूक्ष्म कणों को ‘जीन’ कहा जाता है। हमार शरीर बहुत-सी कोशिकाओं के ‘जीन’ अपने फलने-फूलने लगेगी। उसकी कोशिकाओं के ‘जीन’ अपने पहले के पेड़ की ही भाँति होगे। ठीक उसी तरह जिस तरह किसी स्पंज के टुकड़े में वैसे ही छिद्र होते हैं, जैसे उस स्पंज में थे जिसमें से कि टुकड़े को तोड़ा गया है।
अधिकांश पौधों और जीवों की उत्पत्ति नर और मादा से होती हैं कुछ ‘जीन’ नर से और कुछ मादा से मिलते हैं। झरबेरी झाड़ी के बीज गुलाब तो नहीं, लेकिन ऐसा पौधा अवश्य उगा सकते हैं, जिसमें एक की बजाय दो तरह से फूल हों। काली बिल्ली का बच्चा एकदम सफेद हो सकता है। यदि कोई पौधा या जानवर दो तरह की विशेषता के “जीन” अनुवांशिकता द्वारा प्राप्त करता है, और दोनों का प्रभाव बराबर रहता है। तो दोनों के मिलने से तीसरी विशेषता उत्पन्न होती है। अगर लाल गाय और सफेद रंग का साँड़ हो तो उनका बछड़ा न तो सफेद होगा और न लाल। वह भूरा, यानी दोनों के बीच के रंग का हो सकता है ऐसा हो जाने के नियम की वैज्ञानिक व्याख्या अनुवांशिकता के सिद्धान्त के आधार पर की जाती हैं। ‘जीन’ ही इस अनुवांशिकता के वाहक है और अनुवांशिकता की बुनियादी इकाई है। अभी तक किये गये परीक्षणों से यही जाना जा सका है कि व्यक्ति की शारीरिक विशेषताएँ जैसे रंग, रूप, नेत्र, त्वचा खून का प्रकार लम्बाई, ठिगनापन आदि सब ही अनुवांशिक और पित्रागत होते हैं। ये शारीरिक गुण भी मात्र माता-पिता से नहीं प्राप्त होते, वरन् वे दादा, परदादा तथा अन्य पूर्वजों से क्रमशः संक्रमित होकर आते हैं। वंशानुगत गुणों में माता-पिता का दाय प्रत्येक गुण में आधा होता है। यानी माँ का एक चौथाई और पिता का एक चौथाई उनके पूर्व के चार पितरों में प्रत्येक का दाय प्रत्येक गुण का सोलहवाँ भाग होता है। अर्थात् चारों पितरों का कुल दाय एक चौथाई भाग होता है। शेष 1 चौथाई और पुरानी पीढ़ियों से आते हैं।
व्यक्ति के संस्कार तो उसके जन्म-जन्मान्तरों की संचित सम्पदाएँ और साधन है। किन्तु उसके उपयुक्त उपकरण-अन्नमय कोश, के निर्माण के घटक जीन्स-क्रोमोसोम्स का भी स्वरूप-निर्धारण कितनी सूक्ष्मताओं और जटिलताओं के आधार पर होता है, यह आनुवांशिकी की आधुनिक खोजो द्वारा भी स्पष्ट होता है। भारतीय मनीषी इन सूक्ष्मताओं से परिचित थे तभी वे सुसन्तति के लिए माता-पिता का चरित्रबल, तपस्वी-संयमी होना अनिवार्य बतलाते थे। इन्द्रिय लिप्साओं की खुजली को शान्त करते रहने की कुचेष्टाओं के साथ सुसन्तति की आकांक्षा करते रहना एक असम्भव कल्पना मात्र है। उसके सफल होने की कदापि कोई भी सम्भावना नहीं है। अन्नमय कोश की इन सूक्ष्मताओं के परिचित होकर, अपना जीवनक्रम हर प्रकार व्यवस्थित कर व्यक्ति न केवल सुयोग्य सन्तति का जनक-जननी बनने की क्षमता से, अपितु उन अनेक विशिष्ट क्षमताओं, विभूतियों से सम्पन्न बनता है, जिनसे मनुष्य शरीर की सार्थकता और गरिमा है। अन्नमय कोश की साधना स्वयं की इन क्षमताओं के विकास का ही नाम है।
अनुवांशिकता का प्रभाव बिलकुल सीधा और स्थूल नहीं होता। उदाहरण के लिए किसी माता-पिता में से दोनों को या किसी एक को टी०बी० रोग (क्षयरोग) हो तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि बच्चे को जन्म से ही टी०बी० (क्षय रोग) हो, अपितु इसका सिर्फ यह अर्थ है कि बच्चे के शरीर में ऐसी वृत्ति या तत्परता विद्यमान् है कि क्षय रोग के कीटाणु शरीर में पहुँचते ही वहाँ जड़ पकड़ लेंगे।
इसी प्रकार मान लीजिए कि कोई बढ़ई है, जो अपने काम में बड़ा दक्ष है। यह कार्य दक्षता बच्चे में जन्मजात रूप से नहीं उत्पन्न होती। अपितु यदि बच्चे को भी कुशल बढ़ई बनाना है, तो उसे बढ़ईगिरी का काम सिखाना ही होगा। हाँ, उस बच्चे के हाथ ऐसे हो सकता है, जिनके द्वारा कि उन औजारों का अधिक अच्छा उपयोग सम्भव हो, जो बढ़ईगिरी के काम आते हैं।
इसीलिए अनुवांशिकता और पर्यावरण दोनों को समान महत्त्व दिया जाता है। अनुवांशिकता द्वारा अर्जित गुण नहीं प्राप्त होते। कुछ जन्मजात गुणों का आधार ही अनुवांशिकता को माना जाता है। ये जन्मजात गुण वंशानुक्रम के आधार पर प्राप्त होते हैं। क्रोमोसोम्स में होते हैं-जीन जो व्यक्ति के “करेक्टरिस्टिक्स” का निर्माण करते हैं।
‘जीन’ का व्यवहार या आचरण से सीधा सम्बन्ध नहीं होता। जीन शरीर के उत्तक तथा अण्डों के विकास को निर्देशित नियन्त्रित करते हैं। इस प्रकार वे शरीर की क्रियाशीलता को भी नियन्त्रित करते हैं। शरीर की ये उस रूप में जीन्स का सम्बन्ध व्यवहार से भी होता है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति वंशानुक्रम से छोटी, टाँगे, ठूँठदार अंगुलियाँ या बहरे कान प्राप्त करता है तो निश्चय ही कुछ क्षेत्रों में उसकी योग्यता सीमित हो जायेगी। इसी प्रकार शारीरिक क्रियाओं में भाग लेने वाले हजारों रासायनिक तत्त्व भी जीन्स द्वारा ही निर्धारित होते हैं। जैसे दृष्टि के लिए प्रकाश संवेदी तत्त्व याक्रिरक्त के जमने में कई रासायनिक तत्त्व योग देते हैं। इन तत्त्वों की उपस्थिति सशक्तता या दुर्बलता का सम्बन्ध जीन्स से ही होता है। ऐसे अनेक लक्षण वंशानुक्रम से सम्बन्धित होते हैं।
वंशानुक्रम के आधारभूत घटकों, जीन्स और क्रोमोसोम्स के अध्ययनों के निष्कर्ष इस तथ्य के द्योतक है कि अन्नमय कोश में निर्माण का सूक्ष्म आधार कितना व्यापक और जटिल होता है। पौष्टिक भोजन मात्र से अन्नमय कोश सुदृढ़ नहीं हो जाता। इसके विपरीत अन्नमय कोश की सुदृढ़ता ही भोजन के परा-परिपाक का कारण व आधार बनती है। बढ़िया खाने-पहनने की चिन्ता करते रहने को ही जीवन का पुरुषार्थ मान बैठने वाले अन्नमय कोश के निर्माण के आधारों से अनभिज्ञ रहकर उसे अस्त-व्यस्त और दूषित, विकृत बनाते रहते हैं। और भावी सन्तति को भी उस विकृति का अभिशाप दे जाते हैं।
एक जीन, युग्म शरीर के किसी विशेष ‘करेक्टरिस्टिक’ के विकास का निर्देश करता है आँखें, भूरी हैं या नीली, बाल घने काले हैं या हल्के स्वर्णिम हैं अथवा लाल, घुँघराले हैं या सीधे, सामान्य बाल हैं या गंजापन है, दृष्टि सामान्य है, या रतौंधी ज्यादा होने की सम्भावना है, श्रवण-शक्ति सामान्य है या जन्मजात बहरापन है, रक्त सामान्य है या कि “हेमोफीलिया” का दोष है, रंग-बोध स्पष्ट है या वर्णान्धता दोष है, उँगलियों या अँगूठों की संख्या सामान्य है या कम-अधिक है, किसी जोड़ में कोई उँगली छोटी-बड़ी तो नहीं है, सभी अवयव सामान्य है या कुछ अवयव विरूप है, आदि सभी शारीरिक “करेक्टरिस्टिक्स’ जीन-युग्मों पर ही निर्भर करते हैं।
फ्राँसीसी दार्शनिक मान्टेन को 45 वर्ष की आयु में पथरी की बीमारी हुई। उनके पिता को यह रोग 25 वर्ष की आयु में आरम्भ हुआ। जबकि मान्टेन के जन्म के समय उनके पिता सिर्फ इक्कीस वर्ष के थे। उस समय उन्हें यह रोग नहीं था। लेकिन उनके जीन्स में इस रोग के आधार विद्यमान् थे। मान्टेन की पित्ताशय की पथरी की बीमारी कई पीढ़ियों से चली आ रही थी।
बालकों का ‘गैलेक्टो सीमियाँ’ रोग जीन्स से ही सम्बन्धित होता है। वह जीन, जब “जीरों डायल ट्रान्सफरे एन्जाइम नहीं बनते देता, तो बच्चे दूध में रहने वाली मिठास-गैलेक्टोस-को पचा नहीं पाते। फलतः वह खून में जमा होती रहती है और जिगर में इकट्ठी होकर बच्चे का पेट खराब कर देती है तथा मृत्यु का भी कारण बन बैठती।
“एक्रोडमे टाइटिस ऐटेरोपैथिका” नामक रोग का कारण भी मुख्यतः जीन्स की विकृतियाँ ही होती है। आँख का कैन्सर-रेटीनों ब्लास्टीमा-जीन्स-दोष का ही परिणाम है। जीन्स की एक्रोड्रोप्लास्या-विकृति के कारण बच्चे अविकसित रह जाते हैं। वे जल्दी मरते हैं। बच गये तो भी वंश-वृद्धि में असमर्थ होते हैं। ऐसे दोष वाली महिलाएँ गर्भवती होने पर स्वयं की भी प्राण-रक्षा नहीं कर पाती बच्चे की जान तो खतरे में होती ही है।
‘राइजोंवियम’ नामक जीवाणु की जान का यदि धान, गेहूँ, ज्वार, बाजरा आदि फसलों की जड़ों में पलने वाले किसी जीवाणु में प्रत्यारोपित करना सम्भव हो तो इन फसलों के लिए अधिक उर्वरक नहीं खर्च करना पड़ेगा। भारत समेत विश्व भर की आनुवांशिकी प्रयोगशालाओं में इस हेतु प्रयास हो रहा है।
स्थूल दृष्टि से उपेक्षणीय लगने वाले इस अन्नमय कोश के अति सूक्ष्म घटक ‘जीन्स’ के साथ मनुष्य के उत्कर्ष की कितनी धारायें, कितनी सम्भावनायें जुड़ी है, इसे देखकर इसके रचयिता उस महान् कलाकार की कलाकारी को शत शत नमन ही करते बनता है। अन्तर में बार-बार यही हूक उठती है कि क्या हो अच्छा होता कि हम इन महत् शक्तियों के जागरण और उपयोग की विधि जान पते, सीख पाते और अपना पाते?
यथा चानिमिशाः स्थूला जाल छित्वा पुर्नजलम्। प्राप्नुवन्ति तथा योगास्तत्पंद वीतकल्मशाः॥
तथैव वागुरां छित्वा बलवन्तों यथा मृगाः। प्राप्नुवन्ति मार्ग विभुक्ताः सर्वबन्धनैः॥
लोभ जानि तथा राजन् वहिनर्जातवलः पुनः। छित्वा योगाः परं मार्गे गच्छन्ति विमलं शिवम्॥
स एव च यदा राजन् वहिनर्जातवलः पुनः। समीरणगतः क्षिमं दहेत कृत्सनाँ महीममि॥
तद्वज्जातवलों योगी दीप्ततेजा महावलः। अन्तः काल इवादित्यः कृत्स्नं सशोशमज्जगत्॥
तदैव च महास्त्रोतो निश्टम्भयति वारणः। तद्वद्योयवलं लन्ध्वाँ व्युहेत् विशयान् वहन्॥
न यनोनान्तकः क्रुद्धो न मृत्युर्भीम विक्रमः। ईशते नृपते सर्वे योगस्यामिततेजसः॥ (म0शा0प0मो0अ॰ 300)
जैसे मगर मच्छ जाल को काट कर फिर जल में चले जाते हैं। उसी प्रकार योगी जन पाप बन्धन से छूट कर उस ब्रह्म पद को प्राप्त हो जाते हैं। जैसे बलवान सिंह आदि जंगली पशु पिंजरे आदि पाश बन्धनों को तोड़ कर सर्व बन्धनों से छूटकर विशाल मार्ग को प्राप्त हो जाते ह। वैसे ही हे राजन् बलवान, आत्मबल वाले योगीजन लोभ वाले बन्धनों को काटकर विमल ऊँचे कल्याण मार्ग को प्राप्त करते हैं। अग्नि जैसे बढ़ी हुई वायु से भड़काई हुई सारी पृथिवी को भी शीघ्र जला देती है। इसी प्रकार आत्मबल वाला योगी दीप्त तेज वाली अग्नि की भाँति अन्त करने वाले सूर्य की भाँति जगत सुखा देता है। या जैसे श्रोत को बाँध या हाथी रोक देता है उसी प्रकार योगी भी योगबल प्राप्त करके बहुत विषयों को रोक देता है। हे राजन् अतुल बल वाले योगी के ऊपर उसकी भावना पर यम, अन्तक, भयंकर, मृत्यु भी क्रुद्ध हुआ स्वामित्व नहीं कर सकता है।
व्यक्तित्व के विकास निर्माण में आमतौर से वातावरण और प्रयत्न पुरुषार्थ का महत्त्व माना जाता है। यह मान्यता एक सीमा तक ही ठीक है। क्योंकि एक जैसी परिस्थितियों में जन्मे और पले बालक आगे चलकर भारी भिन्नता युक्त देखे गये है। यह उनकी मौलिक विशेषता का ही प्रभाव पड़ता है।
जीव सत्ता की रहस्यमय परतों का रहस्योद्घाटन करने के लिए हमें काय-कलेवर के गहन अन्तराल में प्रवेश करके वह समझने का प्रयत्न करना चाहिए कि व्यक्तित्व को प्रभावित करने, दिशा देने एवं उठाने-गिराने में सूक्ष्म शक्तियों का कितना बड़ा योगदान रहता है। अन्नमय कोश-स्थूल शरीर की वास्तविक स्थिति मात्र आहार बिहार पर निर्भर नहीं है। वरन् ऐसे तथ्यों वर टिकी है जिन पर मानवी बुद्धि का कोई प्रत्यक्ष नियन्त्रण नहीं है।
वंशानुक्रम विज्ञान पर दृष्टि डालने से प्रतीत होता है। कि मनुष्य के शरीर, मन और व्यक्तित्व को बनाने में ऐसे कारणों का भी बहुत बड़ा हाथ होता है। जो दुर्भाग्य या सौभाग्य की तरह बहुत पहले से ही पल्ले बँधे होते हैं। और उनसे न पीछा छुड़ाना सम्भव होता है और न परिवर्तन का पुरुषार्थ ही सफल होता है। ऐसे प्रसंगों पर अध्यात्म साधनाएँ ही एकमात्र वह उपाय है जिनके सहारे वंशानुक्रम एवं संगृहीत संस्कारों में अभीष्ट परिवर्तन सम्भव हो सकता है। इस दृष्टि से शरीर विज्ञान एवं आरोग्य शास्त्र की अपेक्षा अध्यात्म उपचारों की सामर्थ्य बहुत बढ़ी-चढ़ी है उनके सहारे शारीरिक एवं मानसिक स्थिति का ही नहीं स्वभाव, दृष्टिकोण एवं समूचे व्यक्तित्व का ही कायाकल्प हो सकता है।
भावी पीढ़ियों के निर्माण में आमतौर से पति-पत्नी की शारीरिक स्थिति की देख-भाल की जाती है और समझा जाता है। कि निरोग एवं बलिष्ठ पति-पत्नी के संयोग से सुविकसित पीढ़ी बन सकती है। रक्त शुद्धि की मान्यता सम्भवतः इसी आधार पर बनी है। मिश्र के शासक कभी इस सम्बन्ध में बहुत कठोर थे, वे मात्र अपने ही निकटवर्ती कुटुम्ब की मर्यादा में विवाह-शादी करते थे। ताकि अन्य परिवारों के साथ रक्त सम्मिश्रण न हो और उनकी परम्परागत विशेषताओं में अन्तर न आये। योरोप के राज्य परिवारों में भी इस रक्त-शुद्धि के सिद्धान्त की मान्यता मिलती रही है। हिटलर ने इस मान्यता को उन्माद की तरह उभारा था वह जर्मनों में आर्य रक्त की श्रेष्ठता बताता था और अन्यों से अपने लोगों को श्रेष्ठ मानता था। भारत में भी रोटी बेटी व्यवहार में सम्भवतः ऐसी ही मान्यताओं का प्रभाव रहा हों।
उपरोक्त मान्यताएँ अवैज्ञानिक और अन्ध-विश्वासों पर आधारित रही है। तथ्य यह है कि भिन्न रक्त के सम्मिश्रण से नये किस्म में परिवर्तन होते हैं। और उनसे नई प्रगति के आधार बनते हैं। सन्तान के व्यक्तित्व का ढाँचा बनाने में जो जीन्स काम करते हैं, वे न जाने कितनी पीढ़ियों से चले आते हैं। मातृ कुल और पितृ कुल के सूक्ष्म उत्तराधिकार से वे बनते हैं। सम्मिश्रण की प्रक्रिया द्वारा वे परम्परागत स्थिरता भी बनाये नहीं रहते, वरन् विचित्र प्रकार से परिवर्तित होकर कुछ से कुछ बन जाते हैं। यदि पीढ़ियों को दोष मुक्त प्रखर एवं सुसंस्कृत बनाना है तो इस जीन प्रक्रिया को प्रभावित तथा परिवर्तित करना होगा, यह अति कठिन कार्य है। उतनी गहराई तक पहुँच सकने वाला कोई उपाय उपचार अभी तक हाथ नहीं लगा है जो इस सूक्ष्म इकाइयों के ढाँचे में सुधार या परिवर्तन प्रस्तुत कर सकें।
असमर्थता देखते हुए भी यह कार्य बड़ा आवश्यक है। कि जीन्स जैसी व्यक्तित्व निर्माण की कुँजी को हस्तगत किया जाय। अन्यथा परिस्थिति वातावरण, आहार-विहार शिक्षा परिष्कार के समस्त साधन जुटाने पर भी व्यक्तित्वों का निर्माण विधि-विधान स्तर का ही बना रहेगा। इस सन्दर्भ में आशा की किरण अध्यात्म उपचार में ही खोजी जा सकती है। साधना प्रयत्नों के अन्नमय कोश की अन्तः प्रक्रिया में परिवर्तन लाया जा सकता है। उससे जीन्स की स्थिति बदलने और पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य की आशा की जाती है। इतना ही नहीं पैतृक प्रभाव के कारण वयस्क व्यक्ति का जो ढाँचा बन गया है। उसमें भी सुधार परिष्कार सम्भव हो सकता है शारीरिक कायाकल्प-मानसिक ब्रेन वाशिंग की चर्चा होती रहती है। व्यक्तित्वों के परिवर्तन में साधनात्मक प्रयोग का परिणाम और भी अधिक उत्साहवर्धक हो सकता है।
आनुवांशिकी की खोजो से स्पष्ट हो गया है कि जीन्स में मात्र भोजन की पौष्टिकता का तो प्रभाव नगण्य ही होता है, शारीरिक सुदृढ़ता, स्फूर्ति, अभ्यास, कर्म-कौशल व्यवहार, विकास, चरित्र का स्तर, मस्तिष्कीय क्षमताओं के विकास आदि सम्पूर्ण व्यक्तित्व का सारभूत अंश उनमें विद्यमान् रहता है। शरीर की विकृतियों का भी वे कारण होते हैं, पर उससे अनेक गुना महत्त्वपूर्ण तो मनः स्थिति, बौद्धिक क्षमताएँ और चारित्रिक प्रवृत्तियाँ होती है। आलस्य और प्रमाद के कारण व्यक्तित्व की क्षमताएँ प्रखरताएँ बिखरती, नष्ट होती रहीं, तो शारीरिक सुगढ़ता में तो दोष आते ही है, व्यक्तित्व का मूलभूत स्तर घटिया होता जाता है। जिससे स्वयं का जीवन भी देवोपम विभूतियों से वंचित रहा आता है और अपनी सन्तान पर भी उसका विषाक्त प्रभाव छोड़ने का अपराधी बनना पड़ता है।
आनुवांशिकी शोधें इतना भर विश्वास दिलाती है कि उपयुक्त रक्त मिश्रण से नई पीढ़ी का विकास हो सकता है। आरोपण प्रत्यारोपण की सम्भावना भी स्वीकार की गई है। वर्तमान स्थिति को बदलने के लिए नहीं भावी में सुधार होने के सम्बन्ध में ही यह आश्वासन लागू होता है। वैज्ञानिक कहते है- ‘जीन’ सामान्यतया निष्क्रिय स्थिति में पड़े रहते हैं। उनकी सक्रियता नर-नारी का संगम होने के उपरान्त उभरती है। जीन का कार्य युग्म रूप में आरम्भ होता है। जिनका एक सदस्य पिता से आता है और दूसरा माता से। यह जोड़ा मिलकर नई संरचना की विधि-व्यवस्था में जुटता है। यदि दोनों पक्ष एक प्रकृति के हुए तो उनका सृजन ठीक उसी रूप में होगा, किन्तु यदि भिन्नता रही तो दोनों के सम्मिश्रण का जो परिणाम होगा वह सामने आयेगा। जो पक्ष प्रबल (डामिनेन्ट) होगा वह दुर्बल पक्ष- (रिसेसिव) की विशेषताओं को दबाकर अपना वर्चस्व प्रकट करेगा। फिर भी दुर्बल पथ की कुछ विशेषताएँ तो उस नये सम्मिश्रित सृजन में दृष्टिगोचर होती ही रहेगी। एकरूपता मिलते चलने पर आकार भार बढ़ेगा। पानी में पानी मिलाते चलन पर रहेगा पानी ही, उसका परिणाम भर बढ़ेगा। किन्तु दो भिन्नताएँ मिलकर आकार ही नहीं स्थिति और प्रकृति का परिवर्तन भी प्रस्तुत करेगी। पीला और नीला रंग मिला देने पर वे दोनों ही अपना मूल स्वरूप खो बैठेंगे ओर तीसरा नया हरा रंग बन जाएगा। जीनों की परम्परा में पाई जाने वाली विशेषताएँ तथ्य रूप तो बनी रहेगी, पर उसका प्रत्यक्ष रूप परिवर्तित दृष्टिगोचर होगा। घोड़ी और गधे के सम्मिश्रण से नई किस्म के खच्चर पैदा होते हैं। कलमी पौधों के फल-फूलों में नये किस्म की विशेषताएँ उभरती है।
आनुवांशिकी के आधार पर अब तक इतना ही सम्भव हो सका है कि उपयुक्त जोड़े मिलाकर भावी पीढ़ी के विकास की बात सोची जाय। उस क्षेत्र में भी यह प्रश्न बना ही हुआ है कि निर्धारित जोड़े में जो विकृतियाँ चली आ रही होंगी उनका निवारण, निष्कासन कैसे होगा? अच्छाई अच्छाई से मिलकर अच्छा परिणाम उत्पन्न कर सकती है तो बुराई बुराई से मिलकर अधिक बुराई क्यों उत्पन्न न करेगी? यदि अच्छाई-बुराई के बीच संघर्ष आरम्भ हो गया तो नई मध्यवर्ती स्थिति बन सकती है पर प्रगति का अभीष्ट परिणाम किस प्रकार उपलब्ध हो सकेगा।
आनुवांशिकी शोधें तथ्यों पर पड़े पर्दे का तो उद्घाटन करती है, पर अभीष्ट सुधार के लिए उपयुक्त एवं सुनिश्चित मार्ग-दर्शन करना उनके लिए भी सम्भव नहीं हो सका है। वनस्पति में प्रत्यारोपण क्रिया के उत्साहवर्धक परिणाम सामने आये है। कृत्रिम गर्भाधान तथा दूसरे प्रत्यारोपण का परिणाम भी किसी कदर अच्छा निकला है। मनुष्य की शरीर रचना में भी थोड़े हेर-फेर हुए है। गोरे और काले पति-पत्नी के संयोग से तीसरी आकृति बनी है। एँग्लोइण्डिसन रेस अपने ढंग की अलग ही है। इतने पर भी मूल समस्या जहाँ की तहाँ है। जीन के साथ जुड़ी हुई पैतृत्व परम्परा में जो रोग अथवा दुःस्वभाव जुड़े रहेंगे उनको हटाना या मिटाना कैसे बन पड़ेगा? यह तो भावी पीढ़ी के परिवर्तन में प्रस्तुत कठिनाई हुई। प्रधान बात यह है कि वर्तमान पीढ़ी को अवांछनीय उत्तराधिकार से किस प्रकार छुटकारा दिलाया जाय? उसे असहाय स्थिति में पड़े रहने की विवशता से त्राण पाने का अवसर कैसे मिले? इस क्षेत्र में परिवर्तन हो सकने की बात बहुत ही कठिन मालूम देती है।
मनुष्य के एक जीन में करोड़ों इकाइयाँ होती है। इन पर विषाणुओं, वायरसों की क्या प्रतिक्रिया होती है, प्रस्तुत शोधें इसी उपक्रम में इर्द-गिर्द धूम रही है। डा० हरगोविन्द सिंह खुराना ने जिस जीन के कृत्रिम संश्लेषण में सफलता प्राप्त करके नोबुल पुरस्कार जीता था, वह मात्र 199 इकाइयों वाला था। जिस नये जीवाणु की जीन बनाई जा सकी है। उसकी 199 इकाइयों को सही क्रम में जोड़ने में 9 वर्ष लगे है। यह तो एक प्रयोग भर हुआ। मनुष्य के एक जीन में पाई जाने वाली करोड़ों इकाइयों को सही क्रम से जोड़ना अतीव दुष्कर है। यहाँ एक बात और भी ध्यान रखने की है कि प्रत्येक जीवाणु कोशिका में ऐसे कई लाख जीन होते हैं। जो मानव शरीर से भिन्न -भिन्न अवयवों के निर्माण एवं संचालन का कार्य सम्पन्न करते हैं।
शरीर के विभिन्न अंग-प्रत्यंगों के जीन्स द्वारा निर्माण की प्रक्रिया को अनुशासित रखने का दायित्व ‘ऐंजाइमों’ का है। ये ‘ऐंजाइमों’ ‘न्यूक्लिक अम्लों’ के माध्यम से-जीन्स से सम्बद्ध रहते हैं। चुम्बकत्व अम्लों के माध्यम से-जीन्स से सम्बद्ध रहते है-चुम्बकत्व-शक्ति के प्रयोगों-उपचारों द्वारा इन ऐंजाइमों को प्रभावित कर जीन्स के विकास-क्रम पर प्रभाव डाला जा सकता है। अभी वैज्ञानिक इस दिशा में अध्ययन कर रहें है।
भारत में अतीतकाल में सुसन्तति के लिए तप-साधना का विधान था, जो कि मनुष्य में अन्तर्निहित चुम्बकत्व शक्ति का विकास-अभिवर्धन करता था। कृष्ण और रुक्मिणी ने बद्रीनाथ धाम में बारह वर्ष तक पर अपनी चुम्बकत्व-शक्ति को अत्यधिक उत्कृष्ट बना लिया था। तभी उन्हें प्रद्युम्न के रूप में मनोवाँछित सन्तान प्राप्त हो सकी थीं
वैज्ञानिकों का मत है कि जीन्स की विशेषताएँ विकिरणों द्वारा प्रभावित की जा सकती है। शरीर के भीतर रश्मियों के केन्द्रीकरण द्वारा ऐसी विकिरण-चिकित्सा व्यवस्था की जा सकती है। विद्युत-क्षेत्र इलेक्ट्रिक-फील्ड्स द्वारा जीन्स की रासायनिक और विद्युतीय दोनों विशेषताओं में परिमार्जन संशोधन किये जा सकते हैं। ध्वनियों तथा अतिध्वनियों के क्षेत्र में भी खोजें चल रही है। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि उनके द्वारा भी जीन्स में परिवर्तन की विधि खोजी जा सकती है।
भौतिक विज्ञान से यह सम्भव हो या न हो, पर अध्यात्म विज्ञान से तो यह साध्य है ही। भारतवर्ष में साधना द्वारा शरीरस्थ जैविक विद्युत को प्रखर बनाकर विकिरण का उपयोग इस दिशा में सफलतापूर्वक किया जाता रहा है। इन्द्र को जीतने में समर्थ वृत्रासुर की उत्पत्ति तथा राजा दशरथ के यहाँ राम भरत जैसी सुसन्तति की प्राप्ति ऐसे ही प्रयोगों द्वारा सम्भव हुई थी।
अध्यात्म विज्ञान वहाँ से आरम्भ होता है जहाँ भौतिक विज्ञान की सीमाएँ प्रायः समाप्त हो जाती है। स्थूल की अगली सीढ़ी सूक्ष्म है अन्तःस्रावी ग्रन्थियों से निकलने वाले विचित्र हारमोन स्रावों की तरह आनुवांशिकी क्षेत्र के रहस्यमय घटक ‘जीन’ भी उतने ही विलक्षण है। इन्हें प्रभावित करने में, भौतिकी सफल न हो सकें तो इसमें निराश होने की कोई बात नहीं है। सुनियोजित अध्यात्म विज्ञान के पीछे वे संभावनाएँ झाँकती है जिनसे न केवल हारमोन ओर जीव वरन् ऐसे-ऐसे अनेकों रहस्यमय केन्द्र प्रभावित परिष्कृत किये जा सकते हैं। जो सामान्य मनुष्य जीवन को असामान्य-देवोपम बना सकने में समर्थ है। अध्यात्म विज्ञान की ‘अन्नमय कोश’ की कक्षा प्रयोग प्रक्रिया इसी उद्देश्य को पूरा करती है। उस सन्दर्भ में यदि शोध और प्रयोग के लिए आवश्यक उत्साह जुटाया जाय, तो व्यक्ति को निकृष्ट से उच्च, उच्च से उच्चतर और उच्चतर से उच्चतम बनाया जा सकना सम्भव हो सकता है।
भारतीय दर्शन के अंतर्गत जीवन के सर्वांगीण विकास के लिए अन्नमय कोश की शुद्धि-पुष्टि ओर विकास को भी पर्याप्त महत्त्व दिया गया है। भौतिक प्रगति हो या आध्यात्मिक लक्ष्मी की प्राप्ति-दोनों के लिए ही उसे आवश्यक और उपयोगी ठहराया गया है। योग साधनाओं में अन्नमय कोश की साधना को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। और उसके अनेक लाभों एवं सिद्धियों का भी उल्लेख मिलता है। इसके द्वारा ही योगी आरोग्य तथा शरीर संस्थान पर अद्भुत अधिकार प्राप्त कर लेते हैं। इच्छानुसार शरीर को गर्म या ठण्डा रखना, ऋतुओं के प्रभाव से अप्रभावित रहना, शरीर की ऊर्जा पूर्ति के लिए आहार पर आश्रित न रहकर उसे सीधे प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त कर लेना, दीर्घ-जीवन शरीर में वृद्धावस्था के चिह्न न उभरना आदि सभी उपलब्धियाँ अन्नमय कोश की साधना पर निर्भर करती है।
यह सब उपलब्धियाँ आध्यात्मिक साधना मार्ग पर बढ़ने के लिए भी उपयोगी सिद्ध होती है। ओर साँसारिक जीवनक्रम में भी इनका प्रत्यक्ष लाभ मिलता है। यह उपलब्धियाँ बड़ी आकर्षक भी लगती है। किन्तु योग मार्ग की यह बहुत प्रारम्भिक सीढ़ियाँ मात्र है। यह इसलिए आवश्यक है कि योग साधना के लिए आवश्यक साधना क्रम में यह शरीर अपनी असमर्थता प्रकट करके साथ देने से कतराने न लगे। अन्नमय कोश शुद्ध ओर पुष्ट होने पर ही व्यक्ति साँसारिक उतार-चढ़ाव के बीच अपनी शरीर यात्रा सन्तुलित क्रम से चलाता हुआ, अपने आत्मिक लक्ष्य की ओर अनवरत क्रम से बढ़ सकता है।
एक और सूक्ष्म प्रश् है जिसके लिए अन्नमय कोश को तैयार करना पड़ता है। आत्मिक प्रगति के क्रम में शरीर में अनेक दिव्य संवेदनाओं का संचार होता है। असंस्कारित अन्नमय कोश उसमें बाधक बना जाता है। अथवा वाँछित सहयोग नहीं देने पाता। इस क्रम में अनेक दिव्य क्षमताएँ उभरती है। उन्हें धारण करना उनके स्पन्दनों को सहन करने अपना सन्तुलन बनाये रखना भी बहुत आवश्यक है। यही सभी बातें परिष्कृत एवं विकसित क्षमता सम्पन्न अन्नमय कोश से ही सम्भव है।
इन सब उपलब्धियों एवं क्षमताओं का लाभ पाने के लिए अन्नमय कोश, उसके स्वरूप तथा सामान्य गुण धर्म के बारे में भी साधक के मस्तिष्क में स्पष्ट रूप रेखा होनी चाहिए। पाँचों कोशों की संगति में अन्नमय कोश की भूमिका तथा उसके महत्त्व को उचित अनुपात में समझना आवश्यक है।
हमारी सत्ता, स्थूल-सूक्ष्म अनेक स्तर के तत्त्वों के संयोग से बनी है। उनमें से हर एक घटक का अपना-अपना महत्त्व है। किसी एक घटक का महत्त्व बतलाने से किसी दूसरे घटक का महत्त्व कम नहीं होता, क्योंकि एक घटक दूसरे का सहयोगी पूरक तो है, किन्तु उसका स्थान वह स्वयं नहीं ले सकता। उदाहरण के लिए भवन निर्माण में प्रयुक्त सीमेन्ट का गारा (मार्टर) लें। उसमें सीमेन्ट, बालू, पानी रग आदि सभी मिलाये जाते हैं। किसी एक का भी स्तर घटिया हो तो सारा घटिया हो जाएगा। उसकी लोच, मजबूती, सुन्दरता आदि इन सभी के सन्तुलित संयोग से है। हमारे अस्तित्व के बारे में भी यही तथ्य लागू होता है। हमारे अस्तित्व के हर घटक का हर कोश का अपना-अपना महत्त्व है, इसीलिए उन सबकी उत्कृष्टता एवं सन्तुलन का ध्यान रखना आवश्यक है।
हमारी संरचना में एक बड़ा भाग वह है। जिसका सीधा सम्बन्ध स्थूल पदार्थों-पंच भूतों से है। उसके अस्तित्व, पोषण, एवं विकास के लिए स्थूल पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है। शरीर संस्थान के इसी भाग को अन्नमय कोश कहते हैं। यह अगणित छोटी-छोटी स्थूल इकाइयों से बना हुआ है। इन्हें कोशिका (सेल) कहते हैं। स्पष्ट है कि यह इकाइयाँ जिस प्रकार की, जिन गुण धर्मों से युक्त होगी, संयुक्त शरीर संस्थान में भी वही गुण धर्म प्रकट होंगे। उन मूल इकाइयों को बदले बिना बाह्य दृश्य संस्थान में इच्छित विशेषताएँ पैदा नहीं की जा सकतीं अन्नमय कोश को आवश्यकता के अनुरूप बनाने ढालने के लिए भी उसकी मूल इकाइयों को ध्यान में रखना होगा।
उदाहरण के लिए कोई वस्त्र लें। वस्त्र किस कोटि का हैं यह इस आधार पर निर्भर करता है। कि उसकी रचना में किस प्रकार के धागों का उपयोग हुआ है। उन धागों के लिए किस प्रकार के तन्तुओं (फाइबर्स) का प्रयोग किया गया है। वस्त्र कैनवास जैसा मजबूत है, रेशम जैसा भड़कीला है, टेरेलीन जैसा लुभावना है ऊन जैसा गर्म है। मखमल जैसा आराम देह है या मलमल जैसा हलका एवं मुलायम है, यह सब विशेषताएँ उसके लिए प्रयुक्त धागों एवं उसके तन्तुओं को आधार पर टिकी रहती है।
इसी तरह शरीर भी अनेक प्रकार की विशेषताओं से युक्त होते हैं। बन्दर एवं हिरन जैसा फुर्तीला, सिंह एवं हाथी जैसे बलशाली, बैल एवं घोड़े जैसे परिश्रमी गँडे जैसा कठोर, हंस जैसा सौम्य, सर्प जैसा लचकदार आदि अनेक प्रकार की विशेषताएँ शरीरों में पायी जाती है, अथवा पैदा की जा सकती है। यह बहुत स्थूल वर्गीकरण है। इससे थोड़े सूक्ष्म स्तर पर देखें तो, ध्रुव प्रदेश एवं हिमालय की ठंड को, स्वाभाविक रूप से सहन कर सकने वाले शरीर, भूमध्य रेखा के निकट प्रदेशों की भीषण गर्मी में सुखी रहने वाले शरीर, जल जीवों की तरह पानी के संसर्ग में रहने वालों से लेकर मरुभूमि के शुष्कतम वातावरण में निवास करने वाले शरीरों की अपनी-अपनी विशेषताएँ, उनकी सेल इकाइयों के अनुरूप ही विकसित होती है।
इससे एक चरण और आगे चलें तो अन्नमय कोश की सूक्ष्म क्षमताओं का स्वरूप भी उभर कर सामने आयेगा। किसी भी क्षेत्र में उच्च स्तरीय साधक का सारा शरीर उसकी मुख्य साधना में सहयोगी बन जाता है। श्रेष्ठ चित्रकार जब किसी चित्र की कल्पना करता है तो उसके शरीर की हर इकाई उसके स्पन्दनों से प्रभावित होती है। शरीर की हलचल में उस कल्पना के स्पन्दन समाविष्ट हो जाते हैं तथा निर्जीव तूलिका सामान्य रंगों से जीवन्त चित्र का निर्माण कर देती हैं। वाणी के साधक गायक के मन में जो भाव उभरते हैं वह उसके हाव-भाव तथा स्वर लहरी में न जाने वहाँ से-कैसे गुँथ जाते हैं और उसमें अद्भुत प्रभाव पैदा कर देते हैं। अपने कार्य के प्रति निष्ठावान् चिकित्सक के चर्मचक्षुओं और माँसपेशियों में न जाने क्या विशेषता आ जाती है कि वह रोग के सूक्ष्म से सूक्ष्म चिह्न तथा गम्भीर से गम्भीर स्तर को पकड़ लेता है। इन साधकों के चमत्कारों के पीछे यही तथ्य छिपा है कि उनके अन्नमय कोश की हर इकाई उनके अन्दर की सूक्ष्म सम्वेदनाओं को अनुभव करने, स्वीकार करने तथा उसके अनुरूप प्रभाव पैदा करने में सक्षम हो जाती है। उसके संस्कार उसके अनुरूप हो जाते हैं। किसी भी उच्चस्तरीय साधना के लिए विज्ञान से लेकर उपासना तक के किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय स्तर पाने के लिए अपने अन्नमय कोश को ऐसी ही सुसंस्कृत, सुयोग्य, सक्षम स्थिति में लाना आवश्यक होता है। उसके लिए उसकी मूल इकाइयों को विशेष रूप से गढ़ना-ढालना पड़ता है इसे ही अन्नमय कोश के परिष्कार विकास की साधना कहा जाता है।
प्रश्न उठता है कि क्या अन्नमय कोश की मूल इकाइयों की वाँछित ढंग का बनाया जा सकता है? हाँ, यह सम्भव है। इसकी पुष्टि भारतीय दर्शन की सनातन मान्यता तथा वर्तमान वैज्ञानिक शोधों, दोनों ही आधारों पर होती है। वस्त्र आदि तो जैसे बन गये वैसे बन गये कैनवास का मखमल में नहीं बदला जा सकता। क्योंकि वह जड़ संस्थान है। किन्तु शरीर तो चेतन संस्थान है। उसमें नये कोशों का निर्माण तथा पुरानों की विघटन सम्भव ही नहीं हैं, वह तो उसकी एक स्वाभाविक एवं अनिवार्य प्रक्रिया है। यह प्रक्रिया धीमी पड़ने से ही मनुष्य शरीर जराजीर्ण होने लगता है। जरा बुढ़ापा कुछ और नहीं अन्नमय कोश में नवीन स्वस्थ कोशिकाओं की संरचना तथा पुरानों के निष्कासन की गति शिथिल हो जाना मात्र है। इस प्रक्रिया को व्यवस्थित, नियमित बनाकर शरीर संस्थान में क्रमशः इच्छित परिवर्तन लाये जा सकते हैं।
सामान्य व्यक्तियों में भी अन्नमय कोश की इकाइयों में परिवर्तन होता ही रहता है। किन्तु उसकी कोई व्यवस्था, योजना न होने के कारण एक ढर्रा भर चलता रहता है। सामान्य रूप से किसी भी फैक्टरी में पुराने पुर्जे तथा पुरानी मशीनों के स्थान पर नये पुर्जे एवं नई मशीनों को स्थापित करने का क्रम चलता ही रहता है। उससे एक ढर्रे का उत्पादन निकलता भी रहता है। किन्तु कोई कुशल शिल्पी-उद्योगी जब अपने उत्पादन का स्तर बढ़ाने, नयी वस्तुएँ उत्पादित करने की योजना बनता है तो फिर ढर्रे का क्रम पर्याप्त नहीं। उस स्थिति में लक्ष्य को ध्यान में रखकर सूझबूझ के साथ हर परिवर्तन व्यवस्थित ढंग से करना होता है। पुर्जों और मशीनों से लेकर औजार (टूल) तथा कच्चे माल की व्यवस्था भी उसी योजना के अनुरूप करनी होती है। अपने शरीर की हर कोशिका को एक सजीव पुर्जा, औजार, मशीन मानकर उन्हें लक्ष्य के अनुरूप बनाना, उसके लिए उपयुक्त आहार बिहार अपनाना, योग्य साधक के लिए आवश्यक हो जाता है।
सामान्य व्यक्ति के अन्नमय कोश तथा योगी के अन्नमय कोश में अन्तर क्यों? किसी आधार पर आवश्यक है? इसे एक सामान्य उदाहरण से समझा जा सकता है। एक बिजली की लाइन को ले। विद्युत तारों में बहती है उन्हें सहारा देने के लिए खम्भे रहते हैं। तार और खम्भों के बीच में ऐसे उपकरण लगे रहते हैं। जो बिजली को खम्भों में होकर पृथ्वी में प्रविष्ट होने से रोके रहे। उन्हें ‘कुचालक इन्सुलेटर’ कहते हैं। सामान्य दबाव (वोल्टेज) की विद्युत के लिए तार खम्भे तथा इन्सुलेटर सामान्य ही चल जाते हैं। किन्तु यदि ऊँचे दबाव (वोल्टेज) की विद्युत के लिए तार ऊँचे दबाव (हाई वोल्टेज) की बिजली अधिक मात्रा में प्रवाहित करनी हो तो उसके लिए यह सभी उपकरण विशिष्ट स्तर के लगाने पड़ते हैं। यही बात सामान्य व्यक्ति तथा विशिष्ट साधक के साथ लागू होती है। सामान्य जीवन क्रम में सामान्य शारीरिक जैवीय विद्युत (बायो इलेक्ट्रिसिटी) की ही आवश्यकता पड़ती है। किन्तु उच्च लक्ष्यों के लिए अधिक प्रखर शक्ति तरंगें पैदा करनी होती है। उनका संवेदन, संचार करने के लिए अधिक सशक्त संस्थान की आवश्यकता स्वाभाविक रूप से पड़नी ही चाहिए। इसीलिए साधक को अपने अन्नमय कोश के परिष्कार, उसकी पुष्टि और विकास के लिए विशेष ध्यान देना, विशेष प्रयास करना होता है। तभी वह प्राणमय मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय कोशों के विकास में सहायक बनने तथा उनकी विकसित स्थिति के साथ तालमेल बिठाने में समर्थ हो पाता है।
ताल मेल बिठाने की बात यों ही नहीं कही गयी है, उसका अपना विशिष्ट अर्थ है निर्जीव घटक तालमेल नहीं बिठा सकते, वह तो चेतना सम्पन्न के लिए ही सम्भव है। अन्नमय कोश की हर इकाई, हर कोशिका (सेल) को आज के वैज्ञानिक भी स्वतन्त्र जैविक इकाई मानने लगे है। हर सेल में उसका हृदय न्यूक्लियस होता है। उसके श्वाँस संस्थान को वैज्ञानिक भाषा में ‘माइटो कौड्रिया’ कहते हैं। हर सेल में एक नाली ‘गाल्गी एप्रेटस’ होता है, जो उसके पाचन संस्थान का काम करना है। हर कोश अपने जैसे नये कोश का उत्पादन कर सकता है। इस व्यवस्था की वैज्ञानिक ‘न्यूक्लियोलस एण्ड क्रोमेर्टिन नेटवर्क’ कहते हैं। हर सेल में अपनी एक विशिष्ट जैवीय विद्युत का प्रभार (चार्ट) होती है। जिसे उसका प्राण कह सकते हैं। इस प्रकार हर कोशिका एक स्वतन्त्र जैविक इकाई के रूप में अपने अस्तित्व को बनाये रखते हुए, शरीर संस्थान से अपना तालमेल बिठाने रखता है।
अन्नमय कोश के कोटि-कोटि सदस्य यह कोशिकाएँ (सेल) इष्ट उद्देश्य-लक्ष्य के अनुरूप स्वयं में स्वाभाविक क्षमता उत्पन्न कर सकें, उसके लिए विशिष्ट संस्कारवान नयी कोशिकाओं का उत्पादन कर सकें, उसके लिए विशिष्ट संस्कारवान नयी कोशिकाओं का उत्पादन कर सकें, तो उच्चतम लक्ष्य प्राप्ति की सुनिश्चित पृष्ठभूमि बन जाती है। इसके लिए उन्हें विशेष रूप से-योजनाबद्ध प्रक्रिया द्वारा तैयार किया जाता है। उनके लिए आहार, बिहार, चिन्तन आदि की विशिष्ट एवं व्यवस्थित पद्धति का अनुसरण करना होता है। जैसे बच्चों को सुयोग्य बनाने के लिए उन्हें साधन ही नहीं श्रेष्ठ संस्कार भी देने पड़ते हैं, इसी प्रकार इन कोशिकाओं के लिए भी आहार व्यवहार से लेकर ध्यान उपासना तक के अनेक माध्यम अपनाने होते हैं। उन सबके संयोग से ही अन्नमय कोश की प्रभावशाली साधना का स्वरूप बनता है।
भारतीय मान्यता है कि मनुष्य की स्थूल काया में व्याप्त उसी के अनुरूप एक प्राण शरीर भी होता है प्राण शरीर-शरीरस्थ प्राण संस्थान के न केवल अस्तित्व का बल्कि उसके गुण, धर्मों तथा क्रिया-कलापों प्रभावों आदि का भी वर्णन विस्तारपूर्वक भारतीय ग्रन्थों में मिलता है। इस मान्यता को स्थूल विज्ञान बहुत दिनों तक झुठलाता रहा, किन्तु शरीर विज्ञान के सन्दर्भ में जैसे जैसे उसकी जानकारियाँ बढ़ रही है। प्राण संस्थान के अस्तित्व को एक सुनिश्चित तथ्य के रूप में स्वीकार किया जाने लगा है। भौतिक विज्ञान के स्थूल उपकरणों की पकड़ में भी इस सूक्ष्म सत्ता के अनेक प्राण आने लगे है।
रूप के इलेक्ट्रानिक विज्ञानवेत्ता ऐमयोन किर्लियान ने एक ऐसी फोटोग्राफी का आविष्कार किया है जो मनुष्य के इर्द-गिर्द होने वाली विद्युतीय हलचलों का भी छायांकन करती है। इससे प्रतीत होता है। कि स्थूल शरीर के साथ-साथ सूक्ष्म शरीर की भी सत्ता विद्यमान् है और वह ऐसे पदार्थों से बनी है जो इलेक्ट्रानों से बने ठोस पदार्थ की अपेक्षा भिन्न स्तर का है ओर अधिक गतिशील भी।
इंग्लैंड के डा. किलनर एक बार अस्पताल में रोगियों का परीक्षण कर रहे थे। एक मरणासन्न रोगी की जाँच करते समय उन्होंने देखा कि उनकी दूरबीन (माइक्रोस्कोप) के शीशे पर एक विचित्र प्रकार के रंगीन प्रकाश कण जम गये है। जो आज तक कभी भी देखे नहीं गये थे। दूसरे दिन रोगी के कपड़े उतरवा कर जाँच करते समय डा० किलनर फिर चौके उन्होंने देखा जो प्रकाश कल दिखाई दिया था आज वह लहरों के रूप में माइक्रोस्कोप के शीशे के सामने उड़ रहा है। रोगी के शरीर के चारों और छः सात इंच परिधि में यह प्रकाश फैला है, उसमें कई दुर्लभ रासायनिक तत्त्वों के प्रकाश कण भी थे। उन्होंने देखा जब प्रकाश मन्द पड़ता है। तब तक उसके शरीर और नाड़ी की गति में शिथिलता आ जाती है। थोड़ी देर बाद एकाएक प्रकाश पुँज विलुप्त हो गया। अब की बार जब उन्होंने नाड़ी पर हाथ रखा तो पाया कि उसकी मृत्यु हो गयी। इस घटना को कई पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कराने के साथ-साथ डा० किलनर ने विश्वास होते हैं वह पदार्थ से प्रथम अति सूक्ष्म सत्ता है। उसका विनाश होता हो ऐसा सम्भव नहीं है।
प्राण तत्त्व को एक चेतन ऊर्जा (लाइव एनर्जी) कहा गया है। भौतिक विज्ञान के अनुसार एनर्जी के छः प्रकार माने जाते है-1 ताप (हीट) 2 प्रकाश (लाइट) 3 चुम्बकीय (मैगनेटिक) 4 विद्युत (इलेक्ट्रिसिटी) 5 ध्वनि (साउण्ड) 6 घर्षण (फ्रिक्शन) अथवा यांत्रिक (मेकेनिक)। इस प्रकार की एनर्जी को किसी भी दूसरे प्रकार की एनर्जी में बदला भी जा सकता है। शरीरस्थ चेतन क्षमता - लाइव एनर्जी इन विज्ञान सम्मत प्रकारों से भिन्न होते हुए भी उनके माध्यम से जानी समझी जा सकती है।
एनर्जी के बारे में वैज्ञानिक मान्यता है कि वह नष्ट नहीं होती बल्कि उसका केवल रूपान्तरण होता है। यह भी माना जाता है कि एनर्जी किसी भी स्थूल पदार्थ से सम्बद्ध रह सकती है, फिर भी उसका पदार्थ में स्थानान्तरित (ट्राँस्फर) की जा सकती है। प्राण के सन्दर्भ में भी भारतीय दृष्टाओं का यही कथन है। अब तो पाश्चात्य वैज्ञानिक भी इसे स्वीकार करने लगे है।
इस सन्दर्भ में फोनोग्राफ, प्रकाश के बल्ब के आविष्कारक टामस एडीसन ने अत्यन्त बोधगम्य प्रकाश डालते हुए लिखा है-प्राणी की सत्ता उच्चस्तरीय विद्युत-कण गुच्छकों के रूप में तब भी बनी रहती है। जब वह शरीर से पृथक् हो जाती है। मृत्यु के उपरान्त यह गुच्छक विधिवत् तो नहीं होते, पर वे परस्पर सम्बद्ध बने रहते हैं। यह बिखरते नहीं, वरन् आकाश में भ्रमण करते रहने के उपरान्त पुनः जीवन चक्र में प्रवेश करते और नया जन्म धारण करते हैं। इनकी बनावट बहुत कुछ मधुमक्खी के छत्ते की तरह होती है। पुराना छत्ता वे एक साथ छोड़ती है और नया एक साथ बनाती है। इसी प्रकार उच्चस्तरीय विद्युत कणों के गुच्छक अपने साथ स्थूल शरीर की सामग्री अपनी आस्थाओं और सम्वेदनाओं के साथ लेकर जन्मने-मरने पर भी असर बने रहते हैं।
इन प्रमाणों से शरीर में अन्नमय कोश से सम्बद्ध किन्तु एक स्वतन्त्र अस्तित्व सम्पन्न प्राणमय कोश का होना स्वीकार करना ही पड़ता है। यों भी शरीर में विज्ञान सम्मत ताप आदि छहों प्रकार की एनर्जी ऊर्जा के प्रमाण पाये जाते हैं, किन्तु सारे शरीर से संव्याप्त प्राणमय कोश का स्वरूप सबसे अधिक स्पष्टता से जैवीय विद्युत (बायो इलेक्ट्रिसिटी) के रूप में समझा जा सकता है।
शरीर विज्ञान में अब कामिक विद्युत पर पर्याप्त शोधें हो रही है। शरीर में कुछ केन्द्र तो निर्विवाद रूप से विद्युत उत्पादक केन्द्रों के रूप में स्वीकार कर लिए गये है। उनमें प्रधान है-मस्तिष्क हृदय तथा नेत्र। मस्तिष्क में विद्युत उत्पादन केन्द्र को वैज्ञानिक ‘रेटिकुलर ऐक्टिवेटिंग सिस्टम’ कहते हैं। मस्तिष्क के मध्य भाग की गहराइयों में स्थित कुछ मस्तिष्कीय अवयवों में से विद्युत स्पंदन (इलेक्ट्रिक इम्पल्स) पैदा होते रहते हैं। तथा सारे मस्तिष्क में फैलते जाते हैं। यह विद्युतीय आवेश ही मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों को संचालित तथा परस्पर सम्बन्धित रखते हैं। चिकित्सा विज्ञान में प्रयुक्त मस्तिष्कीय विद्युत मापक यन्त्र (इलेक्ट्रो इन्कैफलोग्राफ) ई०ई०जी० द्वारा मस्तिष्कीय विद्युत धाराओं को नापा जाता है। उन्हीं के आधार पर मस्तिष्क एवं सिर से सम्बन्धित रोगों के बारे में निर्धारण किया जाता है। सिर में विभिन्न स्थानों पर यन्त्र के रज्जु (कार्ड) लगाये जाते हैं। उनसे नापे गये विद्युत विभव (पोटैशल) का योग लगभग 1 मिली बोल्ट आता है।
हृदय के संचालन में लगभग 20 तार शक्ति विद्युत की आवश्यकता पड़ती है। यह विद्युत हृदय में ही पैदा होती है। हृदय में जिस क्षेत्र से विद्युत स्पंदन पैदा होते हैं उसे पेसमेकर कहते हैं। यह विद्युत स्पंदन पैदा होते ही लगभग 0.8 सेकेण्ड में एक विकसित मनुष्य के सारे हृदय में फैल जाते हैं। इतने ही समय में हृदय अपनी एक धड़कन पूरी करता है। हृदय की धड़कन के कारण तथा नियन्त्रक यही विद्युत स्पंदन होते हैं। इन विद्युत स्पंदनों का प्रभाव ई०सी०जी० (इलेक्ट्रो कार्डियोग्राफ) नामक यन्त्र पर अंकित होते हैं। हृदय रोगों के निर्धारण के निर्धारण के लिए इन विद्युत स्पंदनों को ही आधार मानकर चला जाता है।
नेत्रों में भी वैज्ञानिकों के मतानुसार फोटो इलेक्ट्रिक सेल जैसी व्यवस्था है। फोटो इलेक्ट्रिक सेल की विशेषता यह होती है कि वह प्रकाश का विद्युत तरंगों में बदल देता है। नेत्रों में भी इसी पद्धति से विद्युत उत्पादन की क्षमता वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं। नेत्र रोगों के निर्धारण वर्गीकरण के लिए नेत्रों में उत्पन्न विद्युत स्पंदन को र्इ्र०आ०जी० (इलेक्ट्रो रैटिनोग्राफ) यन्त्र पर अंकित किया जात है।
इन प्रमाणों से सिद्ध होता है। कि शरीरस्थ कुछ केन्द्रों में विद्युतीय स्पन्दनों के उत्पादन के साथ-साथ सारे शरीर में उनका संचार भी होता है। ई०ई०जी० द्वारा सिर के हर हिस्से में मस्तिष्कीय विद्युत के स्पंदन रिकार्ड किये जाते हैं। यही नहीं बहुत बार तो उनका प्रभाव गर्दन से नीचे वाले अवयवों में भी स्पष्टता से मिलता है। हृदय की विद्युत का प्रभाव तो ई०सी०जी० यन्त्र द्वारा पैर के टखनों तक पर रिकार्ड किया जाता है। हृदय के निकटतम तथा दूरतम सभी अंगों में यह स्पंदन समान रूप से शक्तिशाली पाये जाते हैं।
शरीरस्थ प्राण प्रवाह के माध्यम से रोगों के निदान पर चिकित्सा शास्त्रियों का विश्वास दृढ़ हो गया है। माँस- पेशियों की निष्क्रियता तथा स्नायु संस्थान के रोगों में भी प्राणांकन पद्धति प्रयुक्त की जाती है। इसके लिए ई.एम.जी.(इलैट्रो मायोग्राफ) का प्रयोग होता है। शरीर के हर क्षेत्र में स्नायुओं अथवा माँस-पेशियों में विद्युतीय ऊर्जा की उपस्थिति तथा सक्रियता का यह स्पष्ट प्रमाण है। यहाँ तक कि शरीर की त्वचा जैसी पतली पर्त में भी उसकी अपने ढंग की विद्युत विद्यमान् है। चिकित्सा शास्त्री त्वचा के परीक्षण में भी त्वक विद्युतीय प्रतिक्रिया (गैल्वाँनिक स्किनरिस्पाँन्स) पद्धति का प्रयोग करते हैं।
इन वैज्ञानिक प्रमाणक के अतिरिक्त सामान्य व्यावहारिक जीवन में भी मस्तिष्क से लेकर त्वचा तक में विद्युत संवेगों की क्षमता के प्रमाण मिलते रहते हैं। किसी व्यक्ति विशेष के प्रति आकर्षण तथा किसी के प्रति विकर्षण, यह शरीरस्थ विद्युत की समानता, भिन्नता की ही प्रतिक्रियाएँ है। दो मित्रों के परस्पर एक दूसरे को देखने स्पर्श करने में विद्युतीय आदान-प्रदान होता है। योगी तो स्पर्श से अपनी विद्युत का दूसरे व्यक्ति के शरीर में प्रवेश पव्रयोग संकल्प शक्ति के सहारे विशेष रूप से कर सकते हैं, किन्तु सामान्य स्पर्श से भी शरीरस्थ विद्युत का आँशिक आदान-प्रदान होता है। स्पर्श, सहलाने, हाथ मिलाने, गले मिलने आदि से जो स्पंदन अनुभव किये जाते हैं। वे विद्युतीय आवेगों के ही आदान प्रदान के फलस्वरूप होते हैं। यह तथ्य भी अब वैज्ञानिक स्वीकार करने लगे है।
भारतीय मत रहा है कि शरीर का अस्तित्व बनाये रखने, उसके पोषण पुनर्निर्माण, विकास एवं संशोधन जैसी हर क्रिया प्राण द्वारा ही संचालित हैं अन्नमय कोश में व्याप्त प्राणमय कोश ही उनका संचालन, नियंत्रण करता है। शरीर संस्थान की छोटी से छोटी इकाई में भी प्राण विद्युत का अस्तित्व अब विज्ञान ने स्वीकार कर लिया है। शरीर की हर कोशिश विद्युत विभव (इलेक्ट्रिक चार्ज) है। यही नहीं किसी कोशिका के नाभिक (न्यूक्लियस) में लाखों की संख्या में रहने वाले प्रजनन क्रिया केक लिए उत्तरदायी जीन्स जैसे अति सूक्ष्म घटक भी विद्युत आवेश युक्त पुटिकाओं (पैक्ट्सि) के रूप में जाने और माने जाते हैं। तात्पर्य यह है कि विज्ञान द्वारा जानी जा सकी शरीर की सूक्ष्मतम इकाई में भी विद्युत आवेश रूप में प्राणतत्त्व की उपस्थिति स्वीकार की जाती है।
शरीर की हर क्रिया का संचालन प्राण द्वारा होने की बात भी सदैव से कही जाती रही है। योग ग्रंथों में शरीर की विभिन्न क्रियाओं को संचालित करने वाले प्राणतत्त्व को विभिन्न नामों से संबोधित किया जात है। उन्हें पंच-प्राण कहा गया है। इसी प्रकार शरीर के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय प्राण को पंच उपप्राण कहा गया है। वर्तमान शरीर विज्ञान ने भी शारीरिक अन्तरंग क्रियाओं की व्याख्याएँ विद्युत संचार क्रम के ही आधार पर की है। शरीर के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जो संचार क्रम चलता है। वहविद्युततीय संवहन प्रक्रिया के माध्यम से ही है। संचार कोशिकाओं में ऋण और धन प्रभार (निगेटिव तथा पॉजिटिव चार्ज) अंदर बाहर होते रहते हैं और इसी से विभिन्न संचार क्रम चलते रहते हैं। इसे वैज्ञानिक भाषा में सेल का डिपोलराइजेशन तथा ‘रेपोलराइजेशन’ कहते हैं। यह प्रक्रिया भारतीय मान्यतानुसार पंच-प्राण में वर्णित ‘व्यान’ के अनुरूप है।
आमाशय तथा आँतों में भोजन का पाचन होकर उसे शरीर के अनुकूल रासायनिक रसों में बदल दिया जाता है। वह रस आँत की झिल्ली में से पार होकर रस में मिलते हैं तब सारे शरीर में फैल पाते हैं। कुछ रसायन तो सामान्य संचरण क्रम से ही रक्त में मिल जाते हैं। किन्तु कुछ के लिए शरीर को शक्ति खर्च करनी पड़ती है। इस विधि को ‘एक्टिव ट्रांसपोर्ट (सक्रिय परिवहन) कहते हैं। यह परिवहन आँतों में जो विद्युतीय प्रक्रिया होती है। उसे वैज्ञानिक सोडियम पम्प के नाम से संबोधित करते हैं। सोडियम कणों में ऋण और धन प्रभार बदलने से वह सेलों की दीवार के इस पार से उस पार जाते आते हैं। उनके संसर्ग से शरीर के पोषक रसों (ग्लूकोस वसा आदि) की भेदकता बढ़ जाती है। तथा वह भी उसके साथ संचरित हो जाते हैं। यह प्रक्रिया पंच-प्राणों में ‘प्राण’ वर्ग के अनुरूप कही जा सकती है।
ऐसी प्रक्रिया हर सेल में चलती है। हर सेल अपने उपयुक्त आहार खींचता है तथा उसे ताप ऊर्जा में बदलना है। ताप ऊर्जा भी हर समय सारे शरीर में लगातार पैदा होती और संचित होती रहती है। पाचन केवल आँतों में नहीं शरीर के हर सैनल में होता है। उसके लिए रसों को हर सेल तक पहुँचाया जाता है। यह प्रक्रिया जिस प्राण ऊर्जा के सहारे चलती है उसे भारतीय प्राणवेत्ताओं ने ‘समान’ कहा है। इसी प्रकार हर कोशिका में रस परिपाक के दौरान तथा पुरानी कोशिकाओं के विखण्डन से जो मल बहता है उसके निष्कासन के लिए भी विद्युत रासायनिक (इलेक्ट्रो कैमिकल) क्रियाएँ उत्तरदायी है। प्राण विज्ञान में इसे ‘अपान’ की प्रक्रिया कहा गया है।
पंच-प्राणों में एक वर्ग ‘उदान’ भी हैं इसका कार्य शरीर के अवयवों को कड़ा रखना हैं वैज्ञानिक भाषा में इसे इलेक्ट्रिकल स्टिमुलाइजेशन कहा जाता है। शरीरस्थ विद्युत संवेगों से अन्नमय कोश के सेल किसी भी कार्य के लिए कड़े अथवा ढीले होते रहते हैं।
शरीर में इस प्रकार की अनेक अंतरंग प्रक्रियाएँ कैसी चलती है। इसकी व्याख्या वैज्ञानिक पूरी तरह नहीं कर सकें है। उसके लिए उन्होंने कई तरह के स्थूल सिद्धान्त बनाये है। उनके सोडियम पोटैशियम साइकिल, पोटैशियम पंच-ए-टी-फी-ए-डी-पी सिस्टम, तथा साइकिलिक ए.एम.पी. आदि के है। इनकी क्रिया पद्धति तो कोई रसायन विज्ञान का विद्यार्थी ही ठीक से समझ सकता, है। किन्तु है यब सब विद्युत रासायनिक सिद्धान्त ही। इस सिद्धान्त के अनुसार किसी घोल में रासायनिक पदार्थों के अणु ऋण और धन प्रभार युक्त भिन्न-भिन्न कणों में विभक्त हो जाते हैं। इन्हें अयन कहा जाता है। इन आयनों की संचार क्षमता बहुत अधिक होती। इच्छित संचार के बाद ऋण बौर धन प्रभार युक्त अयन मिलकर पुनः विद्युतीय दृष्टि से उदासीन (न्यूट्रल) अणु बना लेते हैं। शरीर में पाचन, शोधन, विकास एवं निर्माण की अगणित प्रक्रियाएँ इसी आधार पर चल रही है। तत्त्व दृष्टि से देखा जाय तो सारे शरीर संस्थान में प्राणतत्त्व की सत्ता और सक्रियता स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ेगी।
इन मोटी गतिविधियों से आगे बढ़कर शरीर की सूक्ष्म, गहन गतिविधियों को विश्लेषण करने पर उनमें भी प्राण शरीरस्थ प्राणतत्त्व का नियंत्रण तथा प्रभाव दिखाई देता है। शरीर में हारमोन्स और ऐंजाइमों की अद्भुत प्रक्रिया सर्वविदित है। इन दोनों की सक्रियता शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन लाने एवं शक्ति संचार करने में समर्थ है। प्रजनन विज्ञान के अंतर्गत जीन्स की विलक्षण भूमिका की चर्चा आजकल वैज्ञानिक क्षेत्र में सर्वत्र द्वारा प्रभावित किये जाने की संभावना वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं। वह अभी जाने की संभावना वैज्ञानिक स्वीकार करते हैं। वह अभी ऐसा कर नहीं सकें है। किन्तु उस पर विश्वास करते हैं तथा उसके लिए तीव्र शोध कार्य किए जा रहे है। विश्वास किया जाता है। कि ऐसी विधि हाथ लग जाये तो शरीर क्षेत्र में हर चमत्कार संभव हो जाएगा।
भारतीय ऋषियों ने प्राण-प्रक्रिया द्वारा शरीरस्थ संस्थान में चमत्कारी परिवर्तन लाने के लिए प्राणमय कोश की शुद्धि, शरीरस्थ प्राण ऊर्जा के प्रयोग की बात बलपूर्वक कही हैं। वह कोई अतिशयोक्ति नहीं। स्थूल विज्ञान की दृष्टि से ही मस्तिष्क एवं हृदय जैसे विलक्षण केन्द्रों से लेकर त्वचा तक में व्याप्त प्राण संस्थान तथा उसके प्रभाव को स्वीकार किया जा रहा है। योग दृष्टि तो इससे भी सूक्ष्म रही है। उसके द्वारा जो निष्कर्ष निकाले गये है। वे और भी अधिक गहन तथा व्यापक स्तर के रहस्यों तथा तथ्यों को प्रकट करने वाले होने ही चाहिए। अस्तु, ‘प्राणमय कोश को परिष्कृत एवं सबल बनाकर न केवल अपने शरीर बल्कि दूसरे शरीरों को भी प्रभावित एवं विकसित करने की बात कोई अतिशयोक्ति नहीं है। प्राणतत्त्व संबंधी विज्ञान जैसे जैसे प्रगति करेगा-भारतीय तत्त्व दृष्टाओं की विलक्षण किन्तु तथ्यपूर्ण घोषणाओं को नतमस्तक होकर स्वीकार करता चलेगा।
अलौत्यमारोग्यमनिश्ठूरत्वगन्धशुभोमूत्रपुरोशमल्पम्। कान्तिः प्रसादः स्वरसौम्यता चयोगबृत्तः प्रथमहिचिहम्।63
अनरुरागंजनोय तिपरोक्षगुणकीर्तनम्। नबिभ्यतिचसत्तवानिसिद्धेर्लक्षणमुत्तमम्-मारर्कण्डेय पुराण
चंचलता का दूर हो जाना, आरोग्य, सहृदयता, देह से सुगंध उठना, मल मूत्र में न्यूनता, चेहरे पर क्रान्ति प्रसन्नता वाणी में मधुरता, यह सब लोगों की प्रगति के चिह्न है।
जिस अवस्था में मनुष्य के पीठ पीछे प्रशंसा होने लगे। सब कोई उससे निर्भय रहें। यही योग सिद्ध के लक्षण है।
संस्कृत में प्राण शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘अन्’ धातु से होती है। ‘अन्’ धातु (प्राण ने) जीवनी शक्ति-चेतना बोधक है। इस प्रकार प्राण शब्द का अर्थ चेतना शक्ति होता है। जीवधारियों को प्राणी इसीलिए कहते हैं। प्राण और जीवन दोनों एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। प्राण आत्मा का गुण है। यह परम आत्मा से-परे ब्रह्म से निसृत होता है। आत्मा, परमात्मा का ही एक अविच्छिन्न घटक है। वह अंश रूप है। तो भी उसमें मूल सत्ताधीश के सारे गुण विद्यमान् है। व्यक्तिगत प्राण धारण करने वाला प्राणी गुण विद्यमान् है। व्यक्तिगत प्राण धारण करने वाला प्राणी जब सुविकसित होता है। तो वह भी बूँद के समुद्र में पड़ने पर सुविस्तृत होने की तरह ही व्यापक बन जाता है।
जड़ जगत में शक्ति तरंगों के रूप में संव्याप्त सक्रियता के रूप में प्राण शक्ति का परिचय दिया जा सकता है और चेतन जगत में उसे विचारणा एवं संवेदना कहा जा सकता है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया के रूप में वह जीवधारी में काम करती है। जीवन्त प्राणी इसी के सहारे जीवित रहते हैं। इस जीवनी शक्ति की जितनी मात्रा जिसे मिल जाती है वह उतना ही अधिक प्राणवान कहा जाता है। चेतना की विभु सत्ता समस्त विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है। चेतना प्राण कहलाती है। उसी का अमुक अंश प्रयत्न पूर्वक अपने में धारण करने वाला प्राणी-प्राणवान एवं महाप्राण बनता है। यह प्राण जड़ पदार्थों में सक्रियता के और चेतन प्राणियों में सजगता के रूप में दृष्टिगोचर होता है। जड़ चेतन जगत की सर्वोपरि शक्ति होने के कारण उसे जयेसत एवं श्रेष्ठ कहा गया है।
प्राणें व व ज्येश्ठश्र श्रेश्टश्र। - छांदोग्य॥
यह तत्त्व अनादि और अनन्त है। इसी में सृष्टि बार बार विलीन और उत्पन्न होती रहती है। सृष्टि से पूर्व यहाँ क्या था। इसका उत्तर देते हुए शास्त्र कहता है-
असद् वा इद मग्न आसात् तदाहुः किं तदसदासी दित्यृशयो वा व। तेडग्नेडसदा सीत्, तदाहुः के ते ऋशय इति प्राणा वा ऋषय-शतपथ
पूछा गया-ऋषि से पहले क्या था? उत्तर दिया-ऋषि थे। पूछा- यह ऋषि क्या थे। उत्तर दिया- वे प्राण थे। यह प्राण ही ऋषि है।
सृष्टि के आरम्भ में सर्व प्रथम प्राण तत्त्व के उत्पन्न होने का वर्णन है। जड़ जगत में पंच तत्त्वों का और चेतन प्राणियों में विचार शक्ति का आविर्भाव उसी से हुआ है।
‘स प्राणमसृजत, प्राणच्छद्धां, रव वायुर्ज्योति रूपः पृथिविन्द्रिय मनोडन्नम्-प्रश्नोपनिषद-/
अर्थात् उस ब्रह्म ने प्राण उत्पन्न किया। प्राण से श्रद्धा, बुद्धि, मन एवं आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी पंच तत्त्वों की उत्पत्ति हुई तब अन्न उत्पन्न हुआ।
अथर्व वेद के प्राण सूत्त में आता है।
प्राणाय ननों यस्य सर्वमिदं वशे, यो भूतः सर्वस्येश्वरों यस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितम्
अर्थात् उस प्राण को नमस्कार, जिसके वंश में सब कुछ है। जो सब प्राणियों का अधिष्ठाता है जो सब में समाया है, जिसमें सब समाये है।
वैदिक विवेचना में प्राण के साथ ‘वायु’ का विशेषण भी लगा है। उसे कितने ही स्थानों पर प्राण वायु कहा गया है। इसका तात्पर्य आक्सीजन, नाइट्रोजन आदि वायु विकारों से नहीं वरन् उस प्रवाह से है। जिसकी ‘गतिशील विद्युत तरंगों, के रूप में भौतिक विज्ञानी चर्चा करते रहते हैं। अणु विकिरण-ताप ध्वनि आदि की शक्ति धाराओं के मूल में संव्याप्त सत्ता भी उसे कहा जा सकता है। यदि उसके अध्यात्म स्वरूप का विवेचन किया जाय तो अँगरेजों के लेटेन्ट लाइट-डिवायन लाइन्ट आदि शब्दों के संगति बैठती है। जिसमें उसके दिव्य प्रकाश के समतुल्य होने को संकेत मिलता है। प्रश्नोपनिषद् में प्राण का उद्गम केन्द्र सूर्य को माना गया है। “सं एव वैश्वानरो विश्व रूपः प्राणेडग्निरुदयत।” अर्थात् प्राणाग्नि विश्वव्यापी है। उसका केन्द्र उदीयमान सूर्य है।
प्राण विद्युत के सम्बन्ध में शरीर विज्ञानी हम निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि पेशियों में काम करने वाली स्थिति तक ऊर्जा-पोटोन्शियल का तथा उसके साथ जुड़े रहने वाले आवेश-इन्टेन्सिटी का जीवन संचार में बहुत बड़ा हाथ है। इन विद्युत धाराओं का वर्गीकरण तथा नामकरण सीफेली ट्राइजेमिल न्यूनैलाजिया की व्याख्या चर्चा के साथ प्रस्तुत किया जाता है। ताप विद्युत संयोजन-थर्मोलैरिक कपलिंग-के शोधकर्ता अब इसी निष्कर्ष पर पहुँचे है कि मानव शरीर का सारा क्रिया कलाप इसी विद्युतीय संचार के माध्यम से गतिशील रहता है।
पृथ्वी के इर्द गिर्द एक चुम्बकीय वातावरण दूर दूर तक फैला हुआ है। धरती का गुरुत्वाकर्षण ही सब कुछ नहीं है यह चुम्बकीय वातावरण उसके साथ मिलकर अपने लोक में संव्याप्त कितनी ही क्षमताओं को जन्म देता है। उनके आधार पर संसार की अनेक गतिविधियों तथा प्राणियों को कितनी ही आवश्यकता पूरी करने वाले सुयोग बनते हैं। यह चुम्बकत्व आखिर आता कहाँ से है? उसका उद्गम स्रोत कहाँ है? इसकी खोज अन्तर्ग्रही अनुदानों के रूप में की जा रही थी पर अब यह पता चला है कि यह पृथ्वी के अपने ही गहन अन्तराल से निकलने वाला शक्ति प्रवाह ही है। लोहे की सुई यदि धागे में बाँधकर अधर लटकाई जाय तो उसका एक सिरा उत्तर की ओर दूसरा दक्षिण की ओर रहेगा दिशानिर्देशक यंत्र-कम्पास-इसी आधार पर बनते हैं। प्राणियों के कितने ही क्रिया कलाप इसी चुम्बकीय निर्देशन पर विनिर्मित होते हैं।
मनुष्य शरीर में बिजली काम करती है। यह तथ्य सर्व विदित है। इलेक्ट्रो काड्रियों ग्राफी तथा इलेक्ट्रो इनसिफैलों ग्राफी द्वारा इस तथ्य को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। हमारी रक्त नलिकाओं में लौह युक्त होमोग्लोबिन भरा पड़ा है। लौह चूर्ण और चुम्बक जिस प्रकार परस्पर चिपके रहते हैं। उसी प्रकार हमारी जीवन सत्ता भी जीव कोशों को परस्पर संबद्ध किये रहती है। उनकी सम्मिलित चेतना से वे समस्त क्रिया कलाप चलते हैं जिन्हें हम जीवन संचार व्यवस्था कहते हैं।
शरीर में जो चमक, स्फूर्ति ताजगी, उमंग, साहस, उत्साह, निष्ठा, तत्परता जैसी विशेषताएँ है। मनस्वी, ओजस्वी, तेजस्वी, तपस्वी, आदि शब्द इसी क्षमता का बाहुल्य व्यक्त करते हैं। ऐतिहासिक महामानवों में यही विशेषता प्रधान रूप से रही है।
ऊर्जा के सहारे ही यंत्रों का संचालन होता है। मनुष्य शरीर भी एक यंत्र है। उसके संचालन में जिस विद्युत की आवश्यकता पड़ती है। उसे प्राण कहते हैं। प्राण एक अग्नि है जिसे ज्वलंत रखने के लिए आहार की आवश्यकता पड़ती है। आधुनिक वैज्ञानिक ने इसे ‘जीव विद्युत नाम दिया है।
निद्रा मात्र थकान मिटाने की, विश्राम प्रक्रिया मात्र नहीं है। वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार निद्रा में मस्तिष्क का सचेतन भाग अचेतन की स्थिति में इसलिए जाता है कि उस स्थिति में अन्तरिक्ष में प्रवाहित रहने वाली विद्युत धाराओं में से अपने उपयोग का अंश संग्रह सम्पादित कर सकने का अवसर मिल जाय। ‘एरियल’ रेडियो तरंगों को पकड़ता है! निद्रावस्था में हमारा अचेतन मस्तिष्क उसी स्थिति का बन जाता है। और आकाश से इतनी विद्युतीय खुराक प्राप्त कर लेता है। जिससे शारीरिक और मानसिक क्रिया कलापों का संचालन ठीक प्रकार संभव हो सके। निद्रा की पूर्ति न होने पर शारीरिक और मानसिक स्थिति में जो गड़बड़ी उत्पन्न होती है। उस अभीष्ट मात्रा में विद्युतीय खुराक न मिलने को चेतनात्मक ‘दुमुक्षा’ कहते हैं। इसके बने रहने पर मनुष्य विक्षिप्त या अर्थ विक्षिप्त बन जाते हैं। पागलपन छा जाने से पूर्व प्रायः कुछ दिन पहले से अनिद्रा रोग उत्पन्न होता है। अनिद्रा में इस विद्युतीय आहार की ही कमी पड़ती है।
भौतिक लौह चुम्बक से सभी परिचित है। पर यह तथ्य कम ही लोगों को मालूम है कि उससे भी कही अधिक उच्च स्तर का एक जैव चुम्बक भी होता है। जिस वैज्ञानिकों की भाषा में ऐनिमल मैगनेट कहा जाता है। अध्यात्म विज्ञान के अनुसार इसका उपयोग, वरदान, आशीर्वाद स्तर के आदान-प्रदान में होता रहा है। छोटे अपने बड़ों के चरणस्पर्श करके अभिवादन करते हैं। इस चरणस्पर्श में बड़ों की शुभेच्छा सम्पन्न विद्युत शक्ति का अनुदान दोनों को मिलता है। गुरु शिष्य परंपरा में भी यह परिपाटी चलती है। इसका एक प्रकार शिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देना भी है। छोटों के द्वारा बड़ों के पैर दबाने और बड़ों के द्वारा छोटों का आलिंगन, चुम्बन, गोदी में लेना, पीठ, आदि पर हाथ फिराना भी इसी विद्युतीय अनुदान प्रक्रिया के अंतर्गत आता है। बड़ों की विद्युत छोटों की ओर-समर्थों की असमर्थों की ओर दौड़ती है। इस प्रकार इस स्पर्श में छोटे ही प्रमुखता लाभ लेते हैं। देने का संतोष बड़ों के हिस्से में भी आता है।
शरीर संचार की समस्त गतिविधियाँ तथा मस्तिष्कीय उड़ाने मास जैसे साधना से उस विद्युत प्रवाह के द्वारा संभव होती है। जो जीवन तत्त्व बनकर रोम रोम में संव्याप्त है। इसी को मानवीय विद्युत कहते हैं। ओजस्वी, मनस्वी और तेजस्वी उसी विशेषता से सुसम्पन्न लोगों को कहते हैं। प्रतिभाशाली प्रगतिशील लोगों ओर शूरवीर साहसी लोगों में इसी क्षमता की बहुलता पाई जाती है।
यह जैव विद्युत उस भौतिक बिजली से भिन्न है। जो विद्युत यंत्रों में प्रयुक्त होती है। बैटरी, मैगनेट, जनरेटर आदि का स्पर्श करने पर बिजली का झटका लगता है। उसके सम्पर्क से बल्ब, पंखे, रेडियो, हीटर आदि काम करने लगते हैं। जीव विद्युत का स्तर भिन्न है इसलिए वह यह कार्य तो नहीं करती पर अन्य प्रकार की प्राणी की अति महत्त्वपूर्ण आवश्यकता पूरी करने वाले कार्य सम्पन्न करती देखी जा सकती है।
कभी कभी इस प्रक्रिया में व्यतिरेक भी होते देखा जा सकता है। भौतिक बिजली जीव विद्युत तो नहीं बन सकती पर जीव विद्युत के साथ भौतिक बिजली का सम्मिश्रण बन सकता है। ऐसी विचित्र घटनाएँ कई बार देखने में आई है जिनमें मानवी शरीरों को एक छोटे जनरेटर या डायनेमो की तरह काम करते देखा गया है।
सोसाइटी आफ फिजीकल रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार केवल अमेरिका में ही 20 से अधिक बिजली के आदमी पाये गये है। तलाश करने पर वे संसार के अन्य देशों में भी मिल सकते हैं। कोलराडी निवासी डबल्यू० पी० जोन्स ओर उनके सहयोगी नार्मन लोग ने इस संदर्भ में लम्बी शोधें की है और इस नतीजे पर पहुँचे है। कि इसमें कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं हैं सामान्य या शारीरिक व्यक्तिक्रम है। शरीर की कोशाओं के नाभिकों की बिजली आवरण ढीले पड़ने पर ‘लीक’ करने लगती है। तब शरीर की बाहरी परतों पर उसका प्रवाह दौड़ने लगता है। वस्तुतः नाभिकों में अनन्त विद्युत शक्ति का भण्डार तो पहले से ही विद्यमान् है। इन शोधकर्ताओं का कथन है कि स्थान और उपयोग की भिन्नता से प्राण विद्युत और पदार्थ विद्युत के दो भेद हो जरूर गये है, पर तात्त्विक दृष्टि से उनमें मूलभूत एकता ही पाई जाती है।
शोधकर्ता जोन्स स्वयं भी एक विद्युत मानव थे। उन्होंने नंगे पैरों धरती पर चलकर भू-गर्भ की अनेकों धातु खदानों का पता लगाने में भारी ख्याति प्राप्त की थी। उनके स्पर्श से धातुओं से बनी वस्तुएँ जादूगरों के खिलौनों की तरह उछलने खिसकने की विचित्र हलचलें करने लगती थी। छूते ही बच्चे झटका खाकर चिल्लाने लगते थे।
अमेरिका के मोन्टाना राज्य के मेडारिया कस्बे की जेनी मोरन नामक लड़की एक चलती फिरती बैटरी थी। जो उसे छूता वही झटका खाता। अंधेरे में उसका शरीर चमकता था। अपने प्रकाश से वह घोर अँधेरे में भी मजे के साथ मात्रा कर लेती थी। साथ उसके चलने वाले किसी जीवित लालटेन के साथ चलने का अनुभव करते थे। उसके शरीर के स्पर्श से 100 वाट तक का बल्ब जल उठता था। यह लड़की 30 वर्ष की आयु तक जीवित रही और अस्पर्श बनी एकान्त कोठरी में दिन गुजारती रही।
कनाडा के ओन्टोरियों क्षेत्र बोण्डन गाँव में जन्मी एक लड़की 17 वर्ष तक जीवित रही। धातु का सामान उसके शरीर से चिपक तक जीवित रही। धातु का सामान उसके शरीर से चिपक जाता था। इसलिए उसके भोजन पात्र तक लड़की या काँच के रखे जाते थे।
मास्को निवासी कुमारो माइखोनोवा रूसी वैज्ञानिकों के लिए एक दिलचस्प शोध का विषय रही है। वह अपने दृष्टिपात से चलती घड़ियाँ बन्द कर देती थीं अथवा सुइयाँ आगे पीछे छुपा देती थीं इसके करतत्रों की फिल्म बना कर कितनी ही प्रयोगशालाओं में भेजी गई ताकि अन्यत्र भी उस विशेषता के संबन्ध कार्य चलता रह सकें। वैज्ञानिकों ने इसे मस्तिष्कीय विद्युत की चुम्बकीय शक्ति-इलेक्ट्रो-फार्म की विद्यमानता निरूपित किया है। वे कहते हैं यह शक्ति हर मनुष्य में मौजूद है। परिस्थिति वश वह किसी में भी अनायास ही प्रकट हो सकती है और प्रयत्नपूर्वक उसे बढ़ाया भी जा सकता है। रूसी वैज्ञानिक लाखमोव से हर मनुष्य के शरीर से निकलने वाले विद्युत विकिरणों को अंकित कर सकने वाला एक यंत्र ही बना डाला है।
विश्व के अनेक भागों में पाई जाने वाली ईल मछली के शरीर में प्रायः 15 अरब शक्ति तक की बिजली आँकी गई है। इससे वह एक घातक अस्त्र की तरह अपने शरीर पर प्रहार करती है। यदि ईल की बिजली का उपयोग हो सके तो उससे एक अच्छा खासा कारखाना चल सकता है।
विश्वव्यापी विद्युत चुम्बक के कौन कितना लाभ उठाने यह उस प्राणी की शरीर रचना एवं चुम्बकीय क्षमता पर निर्भर है कितने ही पक्षी ऋतु परिवर्तन के लिए झुण्ड बनाकर सहस्रों मील की लम्बी उड़ाने भरते हैं वे धरती के एक सिरे से दूसरे सिरे तक जा पहुँचते हैं। इनकी उड़ानें प्रायः रात को होती है। उस समय प्रकाश जैसी कोई सुविधा भी उन्हें नहीं मिलती, यह कार्य उनकी अन्तः चेतना पृथ्वी के इर्द-गिर्द फैले हुए चुम्बकीय घेरे में चल रही हलचलों के आधार पर ही पूरा करती है। इस धारा के सहारे वे इस तरह उड़ते हैं मानो किसी सुनिश्चित सड़क पर चल रहे हों।
टरमाइन कीड़े अपने घरों का प्रवेश द्वार सदा निर्धारित दिशा में ही बनाते हैं। समुद्री तूफान आने से बहुत पहले ही समुद्री बतखें आकाश में उड़कर तूफानी क्षेत्र से पहले ही बहुत दूर निकल जाती है। चमगादड़ अंधेरी रात में आँख के सहारे नहीं अपनी शरीर विद्युत के सहारे ही वस्तुओं की जानकारी प्राप्त करते हैं। और पतले धागों से बचकर उपयोगी रास्ते पर उड़ते हैं। मेंढक मरे और जिंदे शिकार का भेद अपनी शारीरिक विद्युत के सहारे ही जान पाता है। मरी और जीवित मक्खियों का टेर सामने लगा देने पर वह मरी छोड़ता और जीवित खाता चला जायेगा। उल्लू की शिकार दबोचने की क्षमता उसकी आँखों पर नहीं विद्युत संस्थान पर निर्भर रहती है। साँप समीपवर्ती प्राणियों के शरीरों के तापमान का अन्तर समझाता है। और अपने रुचिकर प्राणी को ही पकड़ता है। भुनगों की आँखें नहीं होती वह अपना काम विशेष फोलों सेलों से बनाते हैं। अपने युग में अनेकों वैज्ञानिक यंत्र प्राणियों की अद्भुत विशेषताओं को छानबीन करने के उपरान्त उन्हीं सिद्धान्तों के सहारे बनाये गये है। प्राणियों में पाई जाने वाली विद्युत शक्ति ही उनके जीवन निर्वाह के आधार बनाती है। इन्द्रिय शक्ति कम होने पर भी वे उसी के सहारे सुविधापूर्वक समय गुजारते हैं।
यूनान के चिकित्सा विज्ञानी ‘पैपिरस’ ने रोगों की उपचार प्रक्रिया में चिकित्सक द्वारा रोगी के सिर पर हाथ फिराकर अच्छा करने की प्रक्रिया को शास्त्रीय रूप दिया था। सम्राट पाइरस और बैस पैसियन को ऐसे ही उपचारों के कष्टसाध्य रोगों से मुक्ति मिली थी। फ्राँस के शाही परिवार में फ्राँसीसी प्रथम से लेकर चार्ल्स दशम तक की चिकित्सा में जीव चुम्बक का प्रयोग शक्तिशाली प्रक्रियाओं द्वारा होता रहा है। हाथ का स्पर्श ओर विशिष्ट दृष्टिपात इस प्रक्रिया में विशेष रूप से प्रयुक्त हुआ है।
विद्वान स्काचमेन मैक्सवेल ने सन् 1600 से यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया था कि ब्रह्माण्ड व्यापी एक ‘जीवनी शक्ति’ का अस्तित्व मौजूद है। प्रयत्न करके उसकी न्यूनाधिक मात्रा अपने में भरी जा सकती है और उसे स्व पर उत्कर्ष के अनेक प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है।
मैकसवेल से पहले महामनीषी गोक्लेनियस अनेक तर्कों और प्रमाणों से यह सिद्ध कर चुके थे कि मनुष्य के आत्मबल का प्रमुख आधार यह जीवनी शक्ति ही है जिसे ‘जैक’ चुम्बकत्व’ के स्तर का समझा जा सकता है। बान हेलमान्ट इस शक्ति का उपयोग करके शारीरिक ओर मानसिक रोगियों को कष्ट मुक्त करने में ख्याति प्राप्त कर चुके है। महाप्रभु अपनी इसी क्षमता के कारण अपने जीवन काल में ही सिद्ध पुरुष गिने जाने लगे थे।
इटली के वैज्ञानिक सेटानेली ने अठारहवीं सदी के आरम्भ में अनेक प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया था कि मनुष्य शरीर में प्रचंड विद्युतीय विकिरण का अस्तित्व विद्यमान है।
सन् 1734 से सन् 1815 तक लगभग पूरे जीवन में डाक्टर फैडरिक मैस्मर ने प्राणशक्ति के अस्तित्व एवं उपयोग के सम्बन्ध में शोध कार्य किया उन्होंने अपने अनुसंधानों के निष्कर्षों की क्रमबद्ध बनाया और मैस्मिरिज्म नाम दिया। आगे चलकर उनके शिष्य काँसटेट सुसिगर ने उसमें सम्मोहन विज्ञान की नई जोड़ी और कृत्रिम निद्रा लाने की विधि को ‘हिप्नोटिज्म नाम दिया फाँस के अन्य विद्वान भी इन दिशा में नई खोजे करते रहें। ला फान्टेन एवं डा. ब्रेड ने इन अन्वेषणों को और आगे बढ़कर इस योग्य बनाया कि चिकित्सा उपचार में उसका प्रामाणिक उपयोग संभव हो सकें।
पिछले दिनों अमेरिका में न्यू आरलीन्स तो ऐसे प्रयोगों का केन्द्र ही बना रहा है। इस विज्ञान को अमेरिकी वैज्ञानिक डारलिंग ओर फ्राँसीसी डा. द्रुराण्ड डे ग्रास की खोजो ने वान जगत को यह विश्वास दिलाया कि प्राणशक्ति का उपयोग अन्य महत्वपूर्ण उपचारों से किसी भी प्रकार कम लाभदायक नहीं है। इस प्रक्रिया को इलेक्ट्रोवायो-लाजिकल्स नाम दिया गया है। ली वाल्ट की जीव विद्युत के आधार पर चिकित्सा उपचार पुस्तक की प्रामाणिकता भी मिली ओर सराहना भी हुई। इस संदर्भ में जिन तीन प्रमुख संस्थानों ने विशेष रूप में शोध कार्य किये है उनके नाम (1) दि स्कूल आफ नेन्सी (2) दि स्कूल ऑफ चारकोट (3) दि स्कूल आफ मेसमेरिस्ट। इनके अतिरिक्त भी छोटे बड़े अन्य शोध संस्थान व्यक्तिगत एवं सामूहिक अन्वेषणों को प्रोत्साहन देते रहें है।
विज्ञानी मोडात्युज तथा काउण्ट पुलीगर के शोधों ने यह सिद्ध किया है कि प्राण शक्ति द्वारा उपचार तो एक हल्की सी खिलवाड़ मात्र है। वस्तुतः उसके उपयोग बहुत ही उच्च स्तर के हो सकते हैं। उसके आधार पर मनुष्य अपने निज के व्यक्तित्व में बहुमुखी प्रखरता उत्पन्न कर अनेकों मंजिलें पर कर सकता है। पदार्थों को प्रभावित करके अधिक उपयोगी बनाने तथा इस प्रभाव से जीवित प्राणियों की प्रकृति बदलने के लिए भी प्रयोग हो सकता है। जर्मन विद्युत विज्ञानी रीकन वेक इसे एक विशेष प्रकार की ‘अग्नि’ मानते हैं। उसका बाहुल्य वे चेहरे के इर्द-गिर्द मानते हैं। और ‘ओरा’ नाम देते हैं। प्रजनन अंगों में उन्होंने इस अग्नि की मात्रा चेहरे से भी अधिक परिमाण में पाई है। दूसरे शोधकर्ताओं ने नेत्रों में तथा उँगलियों के पोरवों में उसका अधिक प्रवाह माना है।
हाँगकाँग को अमेरिकी डॉक्टर आर्नोल्ड फास्ट ने सम्मोहन विधि से निद्रित करके कई रोगियों के छोटे आपरेशन किये थे। पीछे डेन्टल, सर्जनों ने यह विधि अपनाई और उन्होंने दाँत उखाड़ने में सुन्न करने के प्रयोग बद करके सम्मोहन विधि प्रयोग को सुविधा जनक पाया। दक्षिण अफ्रीका जोहन्सवर्ग के टारा अस्पताल में डा. बर्नार्ड लेविन्सन ने बिना क्लोरोफार्म सुँघाये इसी विधि से कितने ही कष्ट रहित आपरेशन करके यह सिद्ध किया कि यह विधि कोई जादू मंतर नहीं वरन् विशुद्ध वैज्ञानिक है। अंग्रेज विज्ञानी जेम्स ब्राइड ने भी नाड़ी संस्थान में पाई जाने वाली विद्युत शक्ति की क्षमता को मात्र शरीर निर्वाह तक सीमित न रहने देकर उसमें अन्य उपयोगी कार्य संभव हो सकने का प्रतिपादन किया है।
द्वितीय महायुद्ध के समय लोगों के मनों में से छिपे हुए रहस्य उगलवा लेने के लिए प्राण विद्युत के प्रयोग की रहस्यमयी विधियाँ खोजी गई थी। मनोविज्ञानी जे0एच॰ एट्स ब्रुक ने इस संदर्भ में कई नये सिद्धान्त खोज निकाले थे और उनका प्रयोग जासूसी विभाग के अफसरों को सिखाया था। इसके लिए तब जर्मनी में एक ‘हिम्नोटाइज्ड इन्टेलीजेन्स’ विभाग ही अलग से बनाया गया था। उसके माध्यम से कितनी ही अद्भुत सफलताएँ भी मिली थी।
प्राणशक्ति के वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में अभी प्राथमिक जानकारियाँ ही उपलब्ध हो सकती है। उसके थोड़े से सूत्र निर्धारित किये गये है और यत्किंचित् उपयोग उपचार जाने गये है। आत्म विज्ञानी मानवी चेतना में सन्निहित इस अद्भुत सामर्थ्य की गरिमा आरम्भ से ही गाते रहें है और कहते रहे है कि जो प्राण विद्या को जान लेता है, उसके लिए इस संसार में ऐसा कुछ भी अनुपलब्ध नहीं रह जाता जो समृद्धि प्रगति और सुख शान्ति के लिए आवश्यक है।
मनुष्य शरीर में विद्युत शक्ति का विपुल भण्डार भरा पड़ा है। मस्तिष्क से विचारों के कम्पन विद्युत प्रवाह के रूप में ही निकलते हैं। शरीर की आन्तरिक क्रिया प्रक्रिया नाड़ी समूह के साथ साथ प्रवाहित होते रहने वाले विद्युत प्रवाह के द्वारा ही संभव होती है। मस्तिष्कीय विद्युत में मन ओर बुद्धि के द्वारा देखे जाने वाले अनेकानेक चमत्कार आये दिन सामने आते हैं। साहस और उत्साह के रूप में-स्फूर्ति ओर उमंगों के रूप में इसी क्षमता के उभार उफनते दीख पड़ते हैं। विज्ञानवेत्ता प्राण की व्याख्या इसी मानवी विद्युत के रूप में करते हैं।
मनुष्य के काम करने वाला यह विद्युत प्रवाह भौतिक बिजली के समतुल्य नहीं है। बादलों के कड़कने वाली बिजली और धूप से अनुभव होने वाली गर्मी के समकक्ष उसे नहीं माना जा सकता यह बिजली घरों में उत्पन्न की जाने वाली ‘शक्ति’ के समान भी नहीं है। भौतिक बिजली में धक्का मारने, आगे बढ़ने एवं फैलाने की क्षमता है। उसकी गणना अश्व ‘शक्ति’ के रूप में की जाती है। किन्तु मानवी विद्युत की क्रिया पद्धति इससे भिन्न है उसमें व्यक्तिगत के बहुमुखी विकास की अनेकानेक संभावनाएँ जुड़ी हुई है। इतना ही नहीं वह अन्य प्राणियों को-पदार्थों को प्रभावित करती है। और वातावरण पर अपना असाधारण प्रभाव छोड़ती है।
अध्यात्म विवेचना में उसका वर्णन ‘प्राण’ के रूप में किया जाता है। ह्यूमन मैगनेटिज्म एवं मेटाबोलिज्म उसे कहा जाता है। इसी का जीवनी शक्ति एवं मानवीय विद्युत कहा जाता है।
“प्रोजोक्टिज्म आफ एस्ट्रल बॉडी” ग्रन्थ में मानवी काया की अद्भुत संरचना ओर विचित्र कार्य पद्धति पर विस्तृत प्रकाश डालते हुए वहाँ गया है कि इतना अद्भुत होते हुए भी यह यंत्र काम कर सकने में इस क्षमता को आधार पर ही समर्थ होता है। जिसे मानवीय विद्युत कहा जाना चाहिए। इसकी मात्रा एवं स्थिति यदि दुर्बल होगी, तो उनका प्रभाव शरीर संरचना सब प्रकार उपयुक्त होते हुए भी निराशाजनक ही देखा जा सकेगा। लेखन का कथन है कि सौर-मण्डलीय परिवार की तथा अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों की ज्ञात और अज्ञात किरणें धरती पर आती है। उनका प्रभाव पदार्थों पर तो पड़ता ही है। मानवी काया भी उस अनुदान में से अपना भाग ग्रहण करती है। सामान्यतया पदार्थों की तरह जीव धारियों को भी उस अभिवर्षण का लाभ अनायास ही मिलता रहता है किन्तु यदि संकल्प शक्ति की प्रखरता हो तो व्यक्तिगत चुम्बकत्व प्रचंड होता चला जायेगा और उस आकर्षण से वह अन्तर्ग्रही सामर्थ्य प्रचुर परिमाण में उपलब्ध होती चली जायेगी।
गामा, बीटा, एक्म, लेसर, आल्ट्रा वायलेट, अल्फज्ञ वायलेट आदि कितने ही स्तर की शक्ति किरणें भू-मण्डल के भीतर और बाहर काम करती है। उन सब का समुचित समावेश मनुष्य के सूक्ष्म शरीर में हुआ है। स्थूल शरीर जड़ पदार्थों की बन्धन रज्जुओं से जकड़ा होने के कारण ससीम है। पर सूक्ष्म शरीर में सम्मिलित शक्तियों का कोई अन्त नहीं। उसका निर्माण ऐसी इकाइयों से हुआ है। जिनकी हलचल ही इस वातावरण में विविध-विधि क्रियाकलाप उत्पन्न करती है। इस दृष्टि से मनुष्य बाहर से एक जीवधारी मात्र दीखते हुए भी वस्तुतः असीम सामर्थ्यों का पुँज है। कठिनाई एक ही है। कि वे सामान्यतया प्रस्तुत स्थिति में पड़ी रहती है जिन्हें अधिक मात्रा में आकर्षित करने और व्यावहारिक भूमिका का निर्वाह कर सकने योग्य बनाने में व्यक्तिगत रूप से प्रबल प्रयत्न करने पड़ते हैं।
ब्रह्माण्ड-व्यापी महाशक्तियों में ग्रहों की गुरुत्वाकर्षण क्षमता सर्वविदित है। आकाश में अवस्थित सभी ग्रह नक्षत्र गुरुत्वाकर्षण आखिर है क्या? इसका सूक्ष्म अन्वेषण करने पर यह निष्कर्ष निकलता है कि यह मूलतः इलेक्ट्रो मैगनेटिक विद्युत चुम्बकीय क्षमता है। जो ग्रह-नक्षत्रों की भ्रमणशीलता और आकर्षण शक्ति के उभय-पक्षीय प्रयोजन पूरे करती है। प्रकाश, ताप, ध्वनि, विद्युत इसी के स्वरूप है। अणुओं की हलचलों से लेकर रासायनिक परिवर्तनों का सरंजाम वही जुटाती है। ईश्वर के ब्रह्माण्ड -व्यापी महासागर पर इसी विद्युत चुम्बक का आधिपत्य छाया हुआ है। यह शक्ति जड़ नहीं है। यदि वह जड़ रही होती, तो अणु-परमाणुओं की संरचना ओर हलचलों में अद्भुत व्यवस्था दिखाई पड़ती और उसके दर्शन न होते।
यही विद्युत चुम्बक ‘प्राण’ है। मनुष्य में वह तेजोवलय के रूप में काया के इर्द-गिर्द फैला हुआ देखा जा सकता है। शरीर में ऊर्जा के रूप में उसका अस्तित्व है। जीवाणुओं की-अवयवों की विभिन्न हलचलें इसी के सहारे संचारित होती है। मस्तिष्क की मशीन अपने आम में अद्भुत है, पर वह स्वसंचालित नहीं है। यदि उसकी अपनी सामर्थ्य रही होती तो फिर मृत शरीर का मस्तिष्क भी अपना काम करते रह सका होता। यह ‘प्राण्’ है जो मस्तिष्क की चेतन ओर अचेतन परतों पर छाया हुआ है और उन्हें अपने निर्धारित क्रिया-कलाप करते रहने के लिए आवश्यक सामर्थ्य प्रदान करता है।
ग्रहों में अपना-अपना गुरुत्वाकर्षण है। फिर भी वह उनका निजी उत्पादन नहीं है। ब्रह्माण्ड-व्यापी विद्युत चुम्बकीय क्षमता में से ही यह ग्रह-नक्षत्र अपना हिस्सा बँटाते हैं और गुरुत्वाकर्षण दूसरे शक्ति संचारों से भरे रहते हैं। यह सम्मिलित पूँजी है जिसमें से विश्व परिवार के सभी घटक अपना-अपना भाग पाते और गुजारा करते हैं। यही बात प्राण-शक्ति कि सम्बन्ध में भी है। विश्व व्यापी ‘महाप्राण’ एक तथ्य है। उसी विशाल वैभव में से पृथ्वी के जीवधारी अपनी-अपनी पात्रता और आवश्यकता के अनुरूप भाग बँटाते हैं। मनुष्य की यह विशेषता है कि वह इस सामान्य वितरण में से उपेक्षापूर्वक उसे गँवाता रह सकता है। जो उसके लिए सहज सुलभ है। इसी प्रकार उसके लिए यह भी सम्भव है कि प्रयत्न करे। उत्साह, सँजोये और संकल्पबल के सहारे व्यापक प्राण-शक्ति में से बड़े से बड़ा भाग अपने लिए उपलब्ध कर सकें। प्राणयोग की साधना-प्राणायाम प्रक्रिया इसी प्रयोजन की पूर्ति का एक सुनिश्चित-विज्ञान सम्मत आधार है।
प्राण एक चेतन विद्युत ऊर्जा है जिसकी मात्रा बढ़ी-चढ़ी होने पर बहिरंग और अन्तरंग जीवन के दोनों पक्षों में उसका चमत्कारी प्रभाव देखा जा सकता है। यह प्राण शक्ति ही व्यक्तिगत जीवन में साहस और उत्साह के रूप में चमकती है। उसे दृढ़ता और तत्परता के रूप में देखा जा सकता है। संकल्प शक्ति के रूप में उसी का परिचय प्राप्त किया जाता है निश्चय को पूर्ण करने के लिए मनुष्य इसी क्षमता के सहारे अनेकानेक कठिनाइयों को चीरता-अवरोधों से जूझता श्रम-साध्य और समय साध्य मंजिल को पार करता है, प्रतिकूलताओं के बीच भी जो, अनुकूलता उत्पन्न करने का प्रबल प्रयास कर रहा है-निराशाजनक परिस्थितियों में जिस आशा की क्षीण किन्तु सुनिश्चित किरणें दीख पड़ती हों उसे प्राणवान कहा जा सकता है। लोक-प्रवाह के विपरीत जो अपनी राह एकाकी बना सके-अपने बलबूते अपनी योजनाओं को कार्यान्वित करने का शौर्य दिखा सके-उसमें आत्म-विश्वासी प्राण शक्ति की उपयुक्त मात्रा काम करते हुए देखी जा सकती है।
ऐतिहासिक महामानवों में इसी, प्राणतत्त्व की समुचित मात्रा रही है। इसी के सहारे उन्होंने महत्वपूर्ण निर्णय लिए और अपने स्वतन्त्र भाव निश्चय घोषित किये तो कुटुम्बी, सम्बन्धी और तथाकथित हितैषी एक जुट होकर उनका उपहास, असहयोग और विरोध करने पर उतारू हो गये। उनने प्रवाह के विपरीत चलने में खतरे की आशंका देखी ओर शुभ-चिन्तक के नाते उस खतरे से बचने का परामर्श दिया, किन्तु प्राणवानों को तो आदर्शवादी मार्ग अपनाने में-संकटों के साथ आँख-मिचौली खेलने में-ही मजा आता रहा है। खतरों के बीच ही प्रगतिशीलता पनपती है।
महामानवों की सफलताएँ उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितनी कि उसके साहस प्रदर्शन की स्मृतियाँ। सफलताएँ तो कइयों को संयोगवश भी मिल जाती है। उन्हें छल-बल से भी उपार्जित किया जा सकता है। महत्व उन घटनाओं का है। जिनमें साहस के आधार पर घनघोर अँधेरे में प्रकाश जलाया गया और आँधी-तूफान के बीच उन आलोक को बुझने से बचाया गया।
लिंकोलन के राजा रिचार्ड ने तत्कालीन विशपहयूगो को आदेश भेजा कि वे अपनी सेनाएँ नारमण्डी युद्ध के लिए भेजे। विशप ने इस आज्ञा को मानने से इनकार कर दिया। स्पष्ट था कि ऐसी अवज्ञा क्रोधी रिचर्ड सहन न करेगा और विशप को पदच्युत करने से लेकर मौत तक का कोई दण्ड देगा। किन्तु विशपहयूगो इससे तनिक भी विचलित नहीं हुए, वरन् वे सीधे दनदनाते हुए राजमहल में चले गये। राजा उस समय भोजन कर रहे थे। विशप को देखते ही वे आग बबूला हो गये और उनकी ओर से मुँह फेर लिया।
विशप ने कड़क कर कहा-उठो विशप का अभिवादन करो।” राजा चुप रहा। इस पर हयूगो ने राजा का कन्धा पकड़ कर बुरी तरह झकझोर डाला ओर आज्ञा पालन का आदेश दिया।
रिचार्ड सत्र रह गये। वे उठे और अभिवादन किया। भोजन के बाद परामर्श का क्रम चला ओर जैसे विशप चाहते थे, वैसा ही समाधान बन गया। रिचार्ड ने अपने एक संस्मरण में स्वयं लिखा है- विशप में कुछ विलक्षण शक्ति है। उनसे आँख मिलाते ही मनुष्य स्वयमेव पराभूत हो जाता है।
क्या भौतिक सफलताएँ पाने वाले, क्या आत्मिक प्रगति करने वाले सभी के व्यक्तित्व का तात्त्विक विश्लेषण करने पर उनकी विलक्षणता के पीछे प्राण-प्रतिभा ही झाँकती पाई जायगी। नैपोलियन, सिकन्दर, सरीखे पराक्रमी ओर लिंकन, वाशिंगटन जैसे प्रगतिशील अपने संकल्पों को पूरा करने में प्राणपण से जुटे रहने के कारण ही कुछ कहने लायक प्रगति कर सके थे।
आत्मिक क्षेत्र की समस्त सिद्धियों का स्रोत यही सत्साहस और प्रबल पुरुषार्थ है जिसे वैज्ञानिक शब्दों में प्राण-शक्ति का चमत्कार कह सकते हैं आत्म संयम नहीं के प्रवाह को रोकने की तरह है, उसमें इन्द्रियों के उद्दण्ड घोड़ों की लगाम कसकर पकड़नी होती है। मन एक दुर्दान्त दैत्य है। उसे वशवर्ती बना लेना, सरकस के हिंसक पशुओं से विलक्षण खेल कराने वाले प्रशिक्षक द्वारा दिखाये जाने वाले दुस्साहस की तरह है। जबकि हर जगह सुविधाओं की पुकार है। तब तप-तितीक्षा का स्वेच्छा संकल्प कितना कठिन ओर कितना जटिल समझा जा सकता है। संग्रह ओर उपभोग के लिए सर्वत्र बिखरी आकुलता के बीच जो त्याग ओर बलिदान की बात सोचते ही नहीं उसे कर दिखाने के लिए भी कटिबद्ध हो जाते हैं, उन्हें प्राणवान ही कहा जा सकता है। उन्हें जो उपहार मिलते हैं। उन्हें उस साहसिकता का ही पुरस्कार कह सकते हैं, जिसकी व्याख्या प्राण-शक्ति के नाम से भी की जा सकती है।
पनडुब्बी गहरे समुद्र में डुबकी लगाकर मोती बीनते हैं। बहुमूल्य खनिज प्राप्त करने के लिए धरती को गहराई तक खोदते जाने ओर उस विभीषिका के मुख में प्रवेश करने का साहस जुटाना पड़ता है। अपनी प्रस्तुत शक्तियों के जाग्रत करने के लिए-अन्तःचेतना ही गहरी परतों में उतरने के लिए-अद्भुत धैर्य और अविचल प्रयत्न करने होते हैं। यह सब अनायास ही नहीं हो जाता, वरन् अग्नि परीक्षा में गुजरने पर ही सफलता का श्रेय प्राप्त होता है। सोते सर्व ओर सोते सिंह को जगाने में जितना पराक्रम चाहिए उतना ही अन्तःचेतना के सूक्ष्म संस्थानों को जगाते समय भी चाहिए। वन्य पशुओं को पालतू ओर प्रशिक्षित करना धैर्यवान् लोगों का काम हैं मरुस्थल को उर्वर बना लेने के लिए दूर-दर्शिता अथक श्रम-शीलता और साधन सामग्री जुटानी पड़ती है। अनपढ़ व्यक्तिगत सुगढ़ ओर सुसंस्कृत बनाने के लिए कलाकारों जैसा कौशल विकसित करना पड़ता है। शत्रु का मित्र बना लेने की प्रशंसा है। अनर्थ में संलग्न विकृत कुसंस्कारों को आमूलचूल परिवर्तित करके श्रेय साधक बना देना विष से अमृत निकालने के समतुल्य है। ऐसे मार्ग पर चलने के लिए अजस्र प्राण-शक्ति चाहिए। अध्यात्म साधनाओं संचय करने की आवश्यकता इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए बताई गयी है।
कोशीतकि ब्राह्मणोपनिषद् के दूसरे अध्याय में इन्द्र ने प्राण विद्या का रहस्योद्घाटन करते हुए कहा है।
अथ खलु तस्मा देतमेवोक्थ मुपासीतं। यो वे प्राणः सा प्रज्ञा या वा प्रज्ञा स प्राणं स यदा प्रतिबुध्यते यथाडग्नेविस्फुलिंग। विप्रतिश्ठनते प्राणेभ्यों देवा देवेभ्यों लोका।
अर्थात् जब मन विचार करता है, तब अन्य सभी प्राण उसके सहयोगी होकर विचारमग्न हो जाते हैं, नेत्र किसी वस्तु को देखने लगते हैं तो अन्य प्राण उनका अनुसरण करते हैं। वाणी जब कुछ कहती है, तब अन्य प्राण उसके सहायक होते हैं। मुख्य प्राण के कार्य में अन्य प्राणों का पूर्ण सहयोग होता।
अन्य श्लोकों में बताया गया है कि मन और इन्द्रियों के साथ प्राण-शक्ति को मिला देने से वे अत्यन्त प्रभावशाली हो उठती है और अपनी सामर्थ्य से किसी को भी प्रभावित कर सकती है। ऐसे प्राणवान के सन्देश कही भी सुने और हृदयंगम किये जा सकते हैं। वह अपने प्राणों को किसी के प्राण में घुला कर उसके प्राणों को जागृत कर सकता है। ऐसे व्यक्ति की आज्ञा को पर्वत भी अमान्य नहीं करते। जो ऐसे प्राणवान से द्वेश करता है, वह नष्ट हो जाता है।
इसी उपनिषद् में यह भी वर्णन है कि सामर्थ्यवान् गुरु अपने शिष्यों को इसी प्राण-सम्पदा से सुसम्पन्न बन कर उन्हें उत्तराधिकार का श्रेय वैभव प्रदान करते हैं। यही अनुदान प्राप्त करने के लिए श्रद्धालु-शिष्य ऋषि आश्रमों में निवास और तप-साधन करते हुए अपनी पात्रता का विकास करते थे।
महर्षि धौम्य ने आरुणी को, गौतम ने जाबालि का, इन्द्र ने अर्जुन को, यम ने नचिकेता को, शुक्राचार्य ने कच को-इसी प्रकार उच्च स्थिति में पहुँचाया था। रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द को और विवेकानन्द से सिस्टर निवेदिता को इसी प्रकार प्राण प्रत्यावर्तित किये थे।
प्राण-शक्ति जीवात्मा को-सत् सता को-चित् समता से परिपूर्ण बनाती है। इन दोनों का समन्वय हो जाने से वह स्थिति उत्पन्न होती है। जिसके कारण पदार्थों के उपभोग और प्राणियों के सहयोग का ‘आनन्द’ उठाया जा सकता है। सत् चित आनन्द की संभावनाएँ हमारे चारों ओर भरी पड़ी है। उपभोक्ता में ‘आत्मा’ की सत्ता मौजूद है। आनन्ददायक सामग्री की भी कमी नहीं। परिस्थितियों की अनुकूलता भी विद्यमान है। फिर भी अशक्तिजन्य दरिद्रता से प्राणी घिरा ही रहता है। प्राण शक्ति को न्यूनता के अतिरिक्त इस विपन्नता का और कोई कारण नहीं है। जीवधारी को ‘प्राणी’ कहा ही इसलिए जाता है कि उसकी जीवन प्रक्रिया प्राण शक्ति के सहारे ही संचालित होती है। शरीर में प्राण की कमी होते चलने पर ‘प्राणान्त’ की स्थिति ही सामने आ खड़ी होती है।
मनुष्य में जो चमक, चेतना, स्फूर्ति, तत्परता, तन्मयता, दृष्टिगोचर होती है। वह उसमें विद्यमान प्राण-शक्ति की ही प्रतिक्रिया है। यह तत्व जिसमें जितना कम होगा वह उतना ही निस्तेज, निर्जीव, निर्बल दिखाई देगा। उत्साह, साहस और सन्तुलन की उपलब्धता प्राण-शक्ति की मात्रा पर ही निर्भर रहती है। ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी और तपस्वी व्यक्तियों की प्रखरता उनमें विद्यमान प्राण का परिणाम प्रकट करती है। पराक्रमी मनुष्यों की शरीर रचना में-मस्तिष्कीय संगठन में-कोई विशेषता नहीं होती। इस दृष्टि से वे भी सामान्य लोगों की तरह ही होते हैं। उनकी विशेषता प्राण ऊर्जा के रूप में बढ़ी-चढ़ी होती है। संकल्प शक्ति में-इच्छा शक्ति में-दृढ़ता सुनिश्चितता का अंश ही व्यक्तित्व को प्रखर बनाता है। इसी के आधार पर प्रगति के साधनों को जुटाना और अवरोधों को हटाना सम्भव होता है। आँखों में चमक, वाणी में प्रभावोत्पादक, चेहरे पर ओजस्, व्यवहार में प्रखरता का परिचय प्राण-शक्ति ही देती है। प्रभावशाली व्यक्तित्वों में इसी तत्व का बाहुल्य रहता है।
वायु, ईथर, विद्युत, ताप, प्रकाश, जैसी भौतिक शक्त धाराएँ अनन्त आकाश में भरी पड़ी है। चेतन शक्तियों में प्रमुखता प्राण शक्ति की है। इसी को ब्रह्माण्डीय चेतना कहते हैं। यह तत्व निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है। विचार-शक्ति का प्रवाह इसी धारा में गतिशील रहता है। जीवधारी इसी महासमुद्र में जलचरों की तरह अपनी सत्ता बनाये रहते हैं। कल्पनाएँ और सम्वेदनाएँ इसी चेतना सागर की उपलब्धियाँ है।
मछली जल में रहती है उसी के उपादानों पर उसका निर्वाह चलता है। शरीर में जल में पाये जाने वाले पदार्थों की ही भरमार रहती है। व्यापक प्राण समुद्र में निवास करने वाले प्राणी के स्थूल ओर सूक्ष्म उपकरणों को गति ओर प्रगति देने वाला भी प्राणतत्त्व ही होता है जीवधारियों की गरिमा का मूल्यांकन इसी की न्यूनाधिक मात्रा के आधार पर आँका जाता है।
यों प्राणतत्त्व एक है, पर प्राणी के शरीर में उसकी क्रियाशीलता के आधार पर कई भागों में विभक्त की गयी है। शरीर के प्रमुख अवयव माँस-पेशियों से बने है। पर संगठन की भिन्नता के कारण उनके आकार-प्रकार में भिन्नता पाई जाती हैं इसी आधार पर उनका नामकरण एवं विवेचन भी पृथक्-पृथक् होता है। मानवी काया में प्राण-शक्ति को जो विभिन्न उत्तरदायित्व निबाहने पड़ते हैं। उन्हीं के आधार पर उनके नामकरण भी अलग है और गुण, धर्म की भिन्नता भी बताई जाती है। इस पृथकता के मूल में एकता विद्यमान है। प्राण अनेक नहीं हैं उसके विभिन्न प्रयोजनों में व्यवहार पद्धति ही पृथक् है। बिजली एक है, पर उनके व्यवहार विभिन्न यन्त्रों में भिन्न प्रकार के होते हैं। हीटर, कूलर, पंखा, प्रकाश, पिसाई आदि करते समय उसकी शक्ति एवं प्रकृति भिन्न लगती है उपयोग और प्रयोजन को देखते हुए भिन्नता अनुभव की जा सकती है। तो भी जानने वाले जानते हैं। कि यह सब एक ही विद्युत शक्ति के बहुमुखी क्रिया-कलाप है। प्राण-शक्ति के सम्बन्ध में भी यही बात कही जा सकती है। शास्त्रकारों ने उसे कई भागों में विभाजित किया है, कई नाम दिये है और कई तरह से व्याख्या की है। उसका औचित्य होते हुए भी इस भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं कि प्राणतत्त्व कितने ही प्रकार का है। और उन प्रकारों में भिन्नता एवं विसंगति है। इस प्राण विस्तार को भी ‘एकोडहं बहुस्याम’ का एक स्फुरण कहा जा सकता है।
मानव शरीर में प्राण को दस भागों में विभक्त माना गया है। इनमें 5 प्राण और 5 उप प्राण है। प्राणमय कोश इन्हीं 10 के सम्मिश्रण से बनता है। 5 मुख्य प्राण है- (1) अपान (2) समान (3) प्राण (4) उदान (5) व्यान। उपप्राणों को (1) देवतत्त (2) वृकल (3) कूर्म (4) नाग (5) धनंजय नाम दिया गया है।
शरीर क्षेत्र में इन प्राणों के क्या क्या कार्य है? इसका वर्णन आयुर्वेद शास्त्र में इस प्रकार किया गया है-
(1) अपान-अपनयति प्रकर्शेण मलं निस्सारयति अपकर्शाति च शक्तिम् इति अपानः।
अर्थात्-जो मलों को बाहर फेंकने की शक्ति में सम्पन्न है वह अपान है। मल-मूल-स्वदे कफ़, रज, वीर्य आदि का विसर्जन भ्रूण का प्रसव आदि बारह फेंकने वाली क्रियाएँ इसी अपान प्राण के बल से सम्पन्न होती है।
(2) समान-रसं समं नयति सभ्यक् प्रकारेण नयति इति समानः।
अर्थात्-जो रसों को ठीक तरह यथास्थान ले जाता ओर वितरित करता है वह समान है। पाचक रसों का उत्पादन और उनका स्तर उपयुक्त बनाये रहना इसी का काम है।
पतंजलि योग सूत्र में पाद 3 सूत्र 40 में कहा गया है-समान जयात् प्रज्वलनम्” अर्थात् समान द्वारा शरीर की ऊर्जा एवं सक्रियता ज्वलन्त रखी जाती है।
(3) प्राण-प्रकेर्शेण अनियति प्रकर्शेण वा बलं ददाति, आकर्शति च शन्ति स प्राणः।
अर्थात्-जो श्रृस, आहार आदि को खींचता है और शरीर में बल संचार करता है वह प्राण है। शब्दोच्चार में प्रायः इसी की प्रमुखता रहती है।
(4) उदान-उन्नयति यः उद्आनयति वा उदानः।
अर्थात्-जो शरीर को उठाये रहे, कड़क रखे, गिरने न दे-वह उदान है। ऊर्ध्वगमन की अनेकों प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष क्रियाएँ इसी के द्वारा सम्पन्न होती है।
(5) व्यानः-व्याप्नोति शरीरं यः स व्यानः।
अर्थात्-जो सम्पूर्ण शरीर में संव्याप्त है-वह व्यान है। रक्त-संचार श्वास-प्रश्वास ज्ञान-तन्तु आदि माध्यमों से यह सारे शरीर पर नियन्त्रण रखता है। अंतर्मन की स्वसंचालित शारीरिक गतिविधियाँ इसी के द्वारा सम्पन्न होती है।
उपप्राणों को शरीर क्षेत्र में पाँच भागों में बाँटकर अपने अपने क्षेत्र पर अधिकार रखने एवं उत्तरदायित्व संभालने वाला कहा गया है। (1) देवदत्त को मुख मंडल तथा उसके साथ जुड़े जुए नेत्र, कर्ण, जिव्हा, नासिका आदि का प्रहरी कहा गया है। (2) वृकल को कण्ठ का अधिकारी कहा गया है। गायन, संभाषण, आदि क्रियाएँ उसी से होती है। (3) कूर्श-उदर क्षेत्र के अवयवों की साज संभाल रखता है। (4) नाग-जननेन्द्रियों का अधिकारी माना गया है। कुण्डलिनी शक्ति, कामवासना, प्रजनन, आदि पर इसी का नियंत्रण है। (5) धनंजय का कार्य-क्षेत्र जंघाओं से लेकर एड़ी तक है। गतिशीलता, स्फूर्ति, अग्रगमन का उत्साह इसी की समुन्नत स्थिति का परिणाम होता है।
प्राण-शक्ति का यथास्थान सन्तुलन बना रहे तो जीवन सत्ता के सभी अंग-प्रत्यंग ठीक काम करेंगे। शरीर स्वस्थ रहेगा, मन प्रसन्न रहेगा ओर अन्तः करण में सद्भाव सन्तोश झलकेगा। किन्तु यदि इस क्षेत्र में विसंगति विकृति उत्पन्न होने लगे तो उसकी प्रतिक्रिया आधि-व्याधियों के रूप में- विपत्तियों, विभीषिकाओं के रूप में सामने खड़ी दिखाई देगी। रक्त दूषित हो जाने पर अनेकों आकार प्रकार के चर्म रोग, फोड़े-फुंसी दर्द, सूजन आदि के विग्रह उत्पन्न होते हैं, इसी प्रकार प्राणतत्त्व में असन्तुलन उत्पन्न होने पर शारीरिक अवयवों की क्रियाशीलता लड़खड़ाती है। कई प्रकार की व्यथा, बीमारियाँ उपजती है। मनःक्षेत्र में उत्पन्न हुआ प्राण विग्रह-असन्तुलनों आवेगों, और उन्मादों के रूप में दृष्टिगोचर होता है। भावना क्षेत्र में विकृत हुई प्राण सत्ता मनुष्य को नर-कीटाणु के-नर पिशाचों के घिनौने गर्त में गिरा देती है। पतन के अनेकों आधार प्राणतत्त्व की विकृति से सम्बन्धित होते हैं। उनके सुधार के लिए सामान्य उपचार कारगर नहीं होते। क्योंकि उनका प्रभाव उथला होता है। जबकि समस्या की जड़ें बहुत गहरी-प्राण चेतना में घुसी होती है। अनुभूत ओर परीक्षित उपचार भी जब निष्फल सिद्ध हो रहे हों तो समझना चाहिए कि चेतना की गहरी परतों में विक्षेप घुस गया है। चमड़ी में काँटा चुभा हो तो उसे नाखूनों की पकड़ से दबाकर बाहर निकाला जा सकता है, किन्तु यदि बन्दूक की गोली आँतों में गहरी घुस गई हो तो उसके लिए शल्य-क्रिया का आश्रय लिए बिना और कोई चारा नहीं।
प्राणायाम साधारणतया श्वास-प्रश्वास का एक व्यायाम प्रतीत होता है स्वास्थ्य संवर्द्धन के क्षेत्र में उसे फेफड़ों की कसरत’ के रूप में लिया जात है। आरोग्य शास्त्री उसका लाभ उसी सीमा में बताते हैं। श्वास प्रणाली की गड़बड़ी अथवा फेफड़ों की दुर्बलता, रुग्णता का उपचार करने के लिए कई प्रकार को श्वास-प्रश्वास कसरतें प्रचलित है। यह सभी प्रयोग अपनाये जाते योग्य और सराहनीय है किन्तु उसे बाल कक्षा मात्र ही माना जाना चाहिए। प्राणायाम का प्रयोजन तो निखिल ब्रह्माण्ड में से प्राणतत्त्व की अभीष्ट मात्रा को आकर्षित करने की तथा उस उपलब्धि का अभीष्ट संस्थानों में पहुँचाने की विशिष्ट कला के रूप में ही समझा जाना चाहिए। साँस को प्राण नहीं कह सकते हैं। साँस के साथ प्राण घुला होना-साँस के सहारे प्राणतत्त्व को आकर्षित कर सकना एक बात है और मात्र श्वास-प्रश्वास को आकर्षित कर सकना एक बात हैं और मात्र श्वास-प्रश्वास क्रिया करना सर्वथा दूसरी। प्राणायाम में प्रबल संकल्प-शक्ति क्रिया करना सर्वथा दूसरी। प्राणायाम में प्रबल संकल्प-शक्ति का समावेश करना पड़ता है। उसी के चुम्बकत्व से व्यापक प्राणतत्त्व का आकाश में खींच सकने में सफलता मिलती है। फिर उस उपलब्धि को अभीष्ट स्थान पर भेज सकना ओर मनोवाँछित परिणाम प्राप्त करना भी तो प्रबल संकल्प-बल से ही सम्भव है। श्वसन क्रिया के साथ-साथ प्रचण्ड मनोबल का समावेश करने से ही प्राणायाम क्रिया होती है। उसी समन्वय से वे परिणाम मिलते हैं जिनका प्राण-विद्या के अंतर्गत वर्णन किया गया है।
मनोमय कोश की साधना मस्तिष्कीय क्षेत्र में घुसे मनोविकारों को-दुष्प्रवृत्तियों को-निरस्त करने के लिए लड़ा जाने वाला महाभारत हो, साथ ही इसमें धर्म राज्य की-राम राज्य की-स्थापना लक्ष्य संकल्प भी जुड़ा हुआ हों।
इस सन्दर्भ में वैज्ञानिक-अनुशीलन ध्यान देने योग्य है। बहुत समय पहले शारीरिक रोगों का कारण, बात पित्त, कफ़, अपच, मलावरोध, ऋतु प्रभाव, विषाणुओं का आक्रमण आदि माना जाता है। नवीनतम शोधें शरीर पर पूरी तरह मनःसत्ता का अधिकार मानती है। और बताती है कि बाह्य कारणों से उत्पन्न हुए रोग तो शरीर की जीवनी शक्ति से ही अच्छे हो सकते हैं। जटिल रोग तो आमतौर से मनोविकारों के ही परिणाम होते हैं। उनका निराकरण दवा दारु से नहीं मानसिक परिशोधन से ही सम्भव हो सकता है।
शारीरिक ही नहीं मानसिक रोगों का भी यही प्रधान कारण है। दुष्कर्म अथवा दुर्बुद्धिग्रस्त-व्यक्ति शारीरिक ही नहीं मानसिक रोगों से भी ग्रसित रहते हैं। उन्माद विस्फोट की स्थिति न आये तो भी असन्तुलन से ग्रस्त व्यक्ति अर्ध विक्षिप्त स्थिति में पड़े रहते हैं। अकारण दुःख पाते और अकारण दुःख देते हैं। इनकी मनःस्थिति कितनी दयनीय होती है। यह देखने भर से बड़ा कष्ट होता है। शारीरिक व्यथाओं से पीड़ितों की अपेक्षा मनोरोगों से ग्रस्त लोगों की संख्या ही नहीं पीड़ा भी अधिक है इन व्यथाओं से छुटकारे का उपाय अस्पतालों में नहीं, मानसिक संशोधन की साधनाओं पर ही अवलम्बित है। वे उपाय, उपचार अन्तय प्रकार भी हो सकते हैं, पर अध्यात्म विज्ञान के आधार पर उसे मनोमय कोश से साधना से अधिक सुविधापूर्वक सम्पन्न किया जा सकता है।
कार्य-विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि मस्तिष्क के साथ जुड़े हुए ज्ञान तन्तु सारे शरीर में फैले है। उन्हीं के माध्यम से इस जटिल यन्त्र का संचालन होता है। इन्द्रियों की क्रियाशक्ति, अनुभूतियाँ, सरसताएँ मस्तिष्क में ही जाकर खुलती है। इन्द्रिय गोलक तो मात्र सूचनाएँ संग्रह करने और उन्हें मस्तिष्कीय केन्द्रों तक पहुँचाने भर का काम करते हैं। कोई मानसिक कष्ट होने पर सारा शरीर शिथिल हो जाता है। और क्रिया शक्ति में स्पष्टतया अस्त-व्यस्तता दीखने लगती है। भय, चिन्ता, शोक, निराशा, जैसे प्रसंगों पर किसी भी मनुष्य का चेहरा उदास और सारा शरीर शिथिल देखा जा सकता है। क्रोध, अपमान, द्वेश, प्रतिशोध, की स्थिति में किस प्रकार अंग-प्रत्यंगों में उत्तेजना दीख जाती है, इसे किसी आवेशग्रस्त पर छाये हुए भावोन्माद को, देखकर सहज ही देखा, समझा जा सकता है। प्रसन्न और निश्चित रहने वाले स्वस्थ रहते और दीर्घजीवी बनते हैं। इसके विपरीत क्षुब्ध रहने वाले अकारण दुर्बल होते जाते हैं। और अकाल मृत्यु से असमय मरते हैं। यह तथ्य स्पष्ट करते हैं कि शरीर संस्थान पर आहार-बिहार का, जलवायु का जितना प्रभाव पड़ता है उससे कहीं अधिक भाव-संस्थान का होता है।
शरीर में स्नायु मंडल द्वारा तथा नलिका विहीन ग्रन्थियों द्वारा भावनाएँ क्रियाशील होती है। हमारे सम्पूर्ण शरीर में स्नायुओं का जाल बिछा हुआ है। सामान्यतः स्नायु उज्ज्वलवर्णी होते हैं। ओर तार की तरह ठोस होते हैं। हमारी सभी पेशियाँ स्नायुओं के ही आधार पर चलती है। प्रत्येक पेशी में पहुँचने वाला मुख्य स्नायु सुतली की तरह मोटा होता है। फिर उसकी शाखा-प्रशाखाएँ तो बारीक सूत जैसी पतली होती है।
सम्पूर्ण स्नायु मण्डल के दो भाग है।- (1) ऐच्छिक (2) अनैच्छिक। चलने-फिरने झुकने-मुड़ने वस्तुएं उठाने, रखने आदि की क्रियाओं में हम अपने हाथ-पैर आदि को इच्छानुसार हिलाते हैं। यह ऐच्छिक स्नायुओं के ही कारण है। अनैच्छिक स्नायुओं पर हमारा ऐसा अधिकार नहीं होता। वे शरीर की आन्तरिक क्रियाएँ सम्पादित करते हैं। जैसे हृदय की धड़कने, साँसों का आना जाना आदि।
अनैच्छिक स्नायु मंडल का केन्द्र मस्तिष्क का एक लघु अंश हाइपोथैलेमस होता है। यही ‘हाइपोथैलेमस’ नारी व पौरुष ग्रंथियों को भी नाम किण्वज (एन्जाइम) भी सम्पूर्ण शरीर से विकीर्ण होते हुए भी केन्द्रीय स्नायुविक प्रणाली में विशेष रूप से जमा रहता है। ‘हाइपोथैलेमस’ द्वारा पिट्यूटरी ग्रन्थि भी उत्तेजित होती है और उससे विभिन्न हारमोन्स निकलते हैं। जो भावनाओं का परिणाम भी होते हैं और नई भावनाओं का कारण भी। किसी नई परिस्थिति के उपस्थित होने पर नलिकाविहीन ग्रन्थियों पर दबाव पड़ता है और वे विभिन्न हारमोनों को स्रावित करती है। इन हारमोनों की शरीर में प्रति क्रिया होती है और यह प्रतिक्रिया उसी के अनुरूप भावना समूहों को जन्म देती है जैसे किसी रोग के कीटाणुओं के संक्रमण-दबाव से पिट्यूटरी ग्रन्थि ने कोई हारमोन छोड़ा, इससे शरीर में तेज हलचल मच गई, व्यक्ति को अस्वस्थता महसूस होने लगी और वह खाट पर पड़ गया। अब बीमारी की दशा में तरह-तरह की भावनाएँ जो अचेतन मन में दबी थीं, उभरने लगीं। उनके परिणाम स्वरूप अनेक प्रकार की शारीरिक प्रतिक्रियाएँ भी पैदा होने लगती है।
मनोमय कोश का निवास मस्तिष्क में बताये जाने का अर्थ केवल इतना ही है कि उसका केन्द्रीय कार्यालय वही है। उसके सूक्ष्म अवयव उसकी शाखा-प्रशाखाएँ तो सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त-विस्तृत है। मस्तिष्क के जीवाणु अन्य जीवाणुओं से अधिक समझदार और अधिक अनुभवी होते हैं। इसीलिए वे शेष जीवाणुओं के अगुआ नेता कहे जाते हैं। वे जिस दिशा में चलते हैं, शेष जीवाणु भी उसी दिशा धारा में बहने लगते हैं। सम्पूर्ण सूक्ष्म शरीर को स्वस्थ, प्रसन्न, उल्लसित, प्रगतिशील बनाये रखने के लिए मस्तिष्कीय-स्थिति वैसी होनी जरूरी है। नेता ही निराश-हताश कुण्ठित-अस्त हुआ, तो प्रगति की क्या आशा की जा सकती है। नेता का संवेग समस्त अनुयायियों को प्रभावित करता है।
वियना के मनोचिकित्सक डा. फैकल का मत है कि मानसिक-धरातल ही शारीरिक स्वास्थ्य का आधार है। मानसिक असन्तुलन का कारण जीवन की सार्थकता को न समझाना है। इसीलिए उन्होंने ‘लौगोथेरेपी’ या अर्थ बोधचिकित्सा’ नाम की चिकित्सा पद्धति विकसित की है। डा. फैकल की मान्यता है कि जिस व्यक्ति को अपने जीवन और कार्य की सार्थकता का बोध नहीं हो, वह स्वस्थ नहीं रह सकता। मनुष्य जीवन के लक्ष्य और उनकी सिद्धि ही आनन्द का आधार है। डॉ0 फैकल की चिकित्सा पद्धति में रोगी से प्रिय-अप्रिय सभी विषयों पर चर्चा कर, उसे जीवन की सार्थकता की तलाश की प्रेरणा दी जाती है। व्यक्ति को जैसे ही जीवन में सार्थकता की अनुभूति हो उठती है, वह अपने भीतर निहित शक्तियों का स्मरण कर आत्मविश्वास से भर उठता है। और धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगता है। मनःक्षेत्र की स्वस्थता उसके स्थूल शरीर को भी स्वस्थ बना देती है।
सूक्ष्म शरीर की हलचलों का स्थूल शरीर पर स्पष्ट एवं निश्चित परिणाम होता है। तन्त्रकीय रोगों का कारण दबे हुए गन्दे विचार की होते हैं। शरीर-शास्त्रियों का भी मत है कि मात्र मानसिक-चित्रों के आधार पर ही अनेक शारीरिक बीमारियाँ उत्पन्न हो जाती है। “इन्फ्लुएन्स आन द माइन्ड अपान न बॉडी” नामक पुस्तक के लेखक डॉ0 टुके ने लिखा है-विक्षिप्तता मूढ़ता, अण्डों का निकम्मा हो जाना, पित्त, पाण्डुरोग केश-पतन रक्ताल्पता, घबराहट, मूत्राशय के रोग, गर्भाशय में पड़े बच्चे का अग भग हो जाना, चर्मरोग फुंसियां, फोड़े, एग्जिमा आदि अनेक स्वास्थ्यनाशक रोग मात्र मानसिक क्षोभ तथा भावनात्मक उद्देलन के परिणाम होते हैं। मानसिक क्षोभ, भावनात्मक उद्देलन, निषेधात्मक चिन्तन, सूक्ष्म शरीर की विकृतियाँ है, जिनका स्थूल शरीर पर स्पष्ट प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार परिष्कृत दृष्टिकोण स्वस्थ-उदान्त चिन्तन, आदर्शवादी विचारधारा सूक्ष्म-शरीर को तेजस्वी प्रखर बनाती है। और उसका श्रेष्ठ प्रभाव स्थूल शरीर पर भी स्पष्ट देखा जा सकता है।
विधेयात्मक विचारों की, ऊर्ध्वमुखी चिन्तन की आश्चर्यजनक महत्ता के प्रतिपादन में डा. बैनेट ने स्वयं को ही प्रस्तुत किया है। 50 वर्ष की आयु तक डा. बैनेट निराशा और अवांछनीय चिन्तन के कारण अपना स्वास्थ्य पूरी तरह गँवा बैठे। उन्हें जब ऊर्ध्वगामी चिन्तन की इस असीम उपादेयता का पता चला तो उन्होंने अपना जीवन क्रम ही बदल डाला। मन की जड़ता और विषय विकारों का जुआ उनने उतार फेंका, हृदय को श्रद्धा आस्था से भरा, सदैव प्रसन्न प्रफुल्ल रहने की आदत बना ली। 20 वर्षों के अपने इस जीवन को स्वर्गीय सुख से ओत-प्रोत बनाते हुए डा. बैनेट ने अपनी 50 वर्षीय फोटो तथा 70 वर्षीय फोटो भी इस पुस्तक में छापी है। पहली में उनका चेहरा झुर्रियों से पिचके गाल, धँसी आँखों के कारण मनहूस दिखाई देता है। जबकि 70 वर्ष की आयु में वे स्वस्थ सशक्त दिखाई देते हैं, झुर्रियाँ न जाने कहाँ चली गई, चेहरे में उद्दीप्ति है और युवकों जैसी सक्रियता।
अब तक किये गये ऐसे ही विविध आधुनिक प्रयोगों से यह स्पष्ट हो गया है कि मन का, मस्तिष्क का कष्ट प्रत्येक जीवाणु को कष्ट में डाल देता है। घृणा, ईर्ष्या, क्रोध, का अनिष्ट प्रभाव समस्त जीवाणुओं में तुरन्त दौड़ जाता है, झलक उठता है। मस्तिष्क में प्रसन्नता का भाव आते ही प्रत्येक जीवाणु प्रसन्न-पुलकित हो उठता है। ये सभी जीवाणु परस्पर गहन आत्मीयता और अभिन्नता का भाव रखते हैं। प्रत्येक जीवाणु की दशा से सभी प्रभावित होते है-इनका सुख-दुख मिला-जुला ही होता है। इनका पारस्परिक सौहार्द-सद्भाव अनूठा है। सच्ची मैत्री, प्रगाढ़ आत्मीयता समानुभूति के ये अनूठे उदाहरण है। कल्पना करें कि एक व्यक्ति को तेज भूख लगी है। सुस्वादु भोजन का थाल सामने है। उसी समय किसी प्रियजन की मृत्यु का तार मिलता है। उसे पढ़ते ही मस्तिष्क में उस प्रियजन की संचित स्मृति सहसा जागृत हो उठती है। मन में आत्मीय सम्वेदना उमड़ पड़ती है। मस्तिष्क के जीवाणुओं में हलचल, उथल-पुथल मच जाती है। मस्तिष्क के जीवाणुओं की इस प्रतिक्रिया का तत्काल सम्पूर्ण शरीर के जीवाणुओं पर प्रभाव पड़ता है। जीभ सूखने लगती है। भूख बढ़ाने वाले जीवाणु जो उछल-कूद मचा रहे थे, चीख-चीख कर भोजन की माँग कर रहे थे, सहमकर शान्त, निष्क्रिय, दुबके से बैठ जाते हैं। हृदय और दूसरे अंग भी निष्प्राण से हो चलते हैं। दिल-डूबने लगता है, आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है। शरीर निढाल हो जाता है। समस्त अंगों पर यह प्रभाव पड़ता है। स्पष्ट है कि मस्तिष्कीय जीवाणुओं की भावदशा का तत्काल प्रभाव सम्पूर्ण शरीरस्थ जीवाणु-समूहों पर पड़ता है।
‘ओल्ड एजः इट्स काज एन्ड प्रिवेन्शन’ नामक पुस्तक में उसके रचयिता सुप्रसिद्ध अमरीकी वैज्ञानिक तथा लेखक डा. बैनेट ने एक बहुत ही मनोरंजक किन्तु शिक्षाप्रद घटना दी है। एक 16 वर्षीय फ्रांसीसी युवती ने एक अमेरिकन नव-युवक से विवाह का निश्चय किया। युवक निर्धन था सो तय यह हुआ कि पहले वह अमेरिका जाकर धन कमाएगा और लौटकर शादी करेगा। युवक ने 3 वर्ष में पर्याप्त धन कमा लिया, पर दुर्भाग्य से कोई मुकदमा लग जाने के कारण वह 15 वर्ष तक फ्रांस नहीं लौट सका। 15 वर्ष बाद जब वह वापस लौटा तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गया कि उसकी मंगेतर का स्वास्थ्य सौंदर्य बिलकुल वैसा ही है जैसा वह 16 वर्ष पूर्व था। 34 वर्ष की अधेड़ हो जाने पर भी उसमें 16 वर्षीय नव-युवती के गुण विद्यमान थे।
घटना का विवेचन करते हुए बैनेट महोदय लिखते है- प्रकृति में मनुष्य शरीर की संचालन प्रक्रिया इस प्रकार रखी है कि शरीर का प्रत्येक कोश (सेल) 80 दिन पीछे पुराना होकर मैल के रूप में उसी प्रकार बाहर निकल जाता है। जिस प्रकार समुद्री लहरों में निरन्तर ज्वार-भाटे से समुद्र की गन्दगी तटों पर जमा होती रहती है। कोश-परिवर्तन की यह प्रक्रिया आयु बढ़ने के साथ क्षीण होती रहती है, उसी का नाम वृद्धावस्था है-किन्तु इस घटना ने इस प्राकृतिक व्यवस्था को ही उलट दिया, ऐसा क्यों?
इसका उत्तर युवती के मुँह से दिलवाते हुये श्री बैनेट लिखते हैं कि-मैं प्रतिदिन प्रातःकाल एक आदमकद शीशे के सम्मुख खड़ी होकर अपना चेहरा देखती और मन ही मन अनुभव करती कि मैं ठीक वैसी ही हूँ जैसी कल थी। दिन के परिवर्तन ने मेरे शरीर में कोई प्रभाव नहीं डाला इच्छा शक्ति की यह दृढ़ता मुझे दिन भर पुलकित और प्रसन्न बनाये रखती। उसी का फल है जो मैं जैसी 15 वर्ष पूर्व भी वैसी ही आज भी हूँ।” सूक्ष्म शरीर के शोधन की-विचारों को ऊँचा उठाने की-संकल्प की महत्ता उन्होंने अमरीका के अध्यात्म परायण व्यक्ति डा. मरडन की पुस्तक लौह इच्छा शक्ति” (ऐन आइरन बिल) से समझी। जिसमें बताया गया है-मनुष्य अपने विचार नये कर ले, चरित्र को ऊँचा उठा ले तो अपना शरीर ही बदल सकता है।” यह स्वाध्याय उनके लिये तो औषधि बना ही, सैकड़ों को नया जीवन देने वाला है। प्रेम, मैत्री, दया, करुणा, और परोपकारी विचारों को धारण कर कोई भी इसका प्रत्यक्ष लाभ ले सकता है।
खोपड़ी के ऊपर या नीचे की रक्तवाहनियों की पेशियाँ भावनाओं के अनुसार फैलती-सिकुड़ती व तीव्र संवेदनात्मक प्रतिक्रियाएँ करती है।
अस्वस्थ भावनाएँ विभिन्न शारीरिक रोगों का कारण बनती है। सामान्य सिर दर्द से लेकर” माइग्रेन नामक कठिन सिर दर्द भावनात्मक तनाव से होता है। इस तनाव से खोपड़ी की रक्तवाहनियाँ सिकुड़ती है और इससे सिर दर्द शुरू हो जाता है। आज तो यह पाया जाता है कि सिर दर्द की सौ घटनाओं में से पचासी का कारण भावनात्मक तनाव होता है।
भावना-क्षोभ के कारण पेशियों में उत्पन्न तनाव के कारण कई बार भोजन के बाद ऐसा अनुभव करते हैं कि कलेजे पर बोझ आ पड़ा है। और भोजन नीचे सरक ही नहीं रहा है। अधिक तनाव होने पर उबकाई आने लगती है। जी मिचलाने लगता है।
भावनात्मक तनाव से उत्पन्न स्नायु-रोगों में डकारें आना, पेट में ऐंठन होना, विभिन्न वायु-विकार अनेक त्वचा-विकार एन्जिमा, खुजली आदि होते हैं।
कमर दर्द के बारे में अब ऐसा ज्ञात हुआ है कि अधिकाँश मामलों में इसका कारण भावनात्मक तनाव ही होता है।
यह जान लेने पर कि भावनात्मक तनावों एवं विकृतियों से ही अधिकाँश रोग पैदा होते हैं, यह प्रश्न अनेकों को कचोटता है कि भावनाओं पर नियन्त्रण कैसे हो? इसका एक ही सरल मार्ग है- समझदारी भरे दृष्टिकोण का नित्य-प्रति के जीवन में अभ्यास। बिना अभ्यास के यह दृष्टिकोण व्यावहारिक जीवन में नहीं उतरता। जिन्दगी को बोझ न मानते हुए, खेल-भावना से जीना, अभ्यास द्वारा ही सम्भव है। अपनी सीमाओं को पहचानना, शक्ति के सर्वोत्तम उपयोग की व्यवस्था करना, मैं-मैं की चीख-पुकार से मुक्त होकर अपने दायित्वों को समझना और निभाना, तथा सृजनात्मक वृत्तियों का जीवन में निरन्तर विकास करना ही एकमेव राजमार्ग है।
सामान्यतः कठोरता, क्रोध, बात-बात में लड़ बैठना आदि को हम भ्रान्ति वश शक्ति का पर्याय मान बैठते हैं, जबकि मनोवैज्ञानिक इस सबको ‘बचकानी हरकतें’ मानते हैं। ये दुर्बलता के प्रतीक है। शक्तिशाली व्यक्ति विनम्र एवं दृढ़ होता है। सादगी-संयम का अभ्यास ही शक्ति का स्रोत है। किन्तु अपनी दुर्बलताओं पर व्यर्थ की खीझ भी लाभकर न होगी। धीरे-धीरे ही कुसंस्कार चित्त तल पर जमते हैं। और धीरे-धीरे ही उनका उन्मूलन सम्भव है। सतत् अभ्यास ही सर्वोत्तम उपचार है इस बात को सदा ध्यान में रखा जाय कि मन की कुटिलता और अनैतिक कर्म ही रोग का आधार है। तथा मन की शुचिता, स्नेहः करुणा और व्यापक मानवीय प्रेम द्वारा इन रोगों को मिटा सकना सरलता से सम्भव है।
मस्तिष्क की धुलाई सफाई वैज्ञानिक उपकरणों से भी सम्भव हो सकती है। फिर अध्यात्मिक साधना के उपचार तो उससे अधिक ही सशक्त समर्थ होते हैं। उनका प्रभाव तो और भी अधिक होना चाहिए।
इलेक्ट्रिकल स्टीम्यूलेशन आफब्रेन (ई0एम0बी0) पद्धति के अनुसार कई एशियन विश्वविद्यालयों ने आँशिक रूप से मस्तिष्क की धुलाई (ब्रेन वाशिंग) में सफलता प्राप्त करती है अभी यह बन्दर, कुत्ते, बिल्ली, खरगोश, चूहे, जैसे छोटे स्तर के जीवों पर ही प्रयोग किये गये है। आहार की रुचि, शत्रुता, मित्रता, भय, आक्रमण, आदि के सामान्य स्वभाव को जिन प्रकार चरितार्थ किया जाना चाहिए उसे वे बिलकुल भूल जाते हैं और विचित्र प्रकार का आचरण करते हैं। बिल्ली के सामने चूहा छोड़ा गया तो वह आक्रमण करना तो दूर उससे डरकर एक कोने में जा छिपी। क्षणभर में एक-दूसरे पर खूनी आक्रमण करना, एक आध मिनट बाद परस्पर लिपट कार प्यार करना यह परिवर्तन उस विद्युत क्रिया से होता है। जो उनके मस्तिष्कीय कोशों के साथ सम्बद्ध रहती है। यही बात मनुष्यों पर भी लागू हो सकती है। मानव मस्तिष्क अपेक्षाकृत अधिक परिष्कृत होता है। उसमें प्रतिरोधक शक्ति भी अधिक होती है इसलिए उसमें हेर-फेर करने के लिए प्रयास भी कुछ अधिक करने पड़ेंगे और पूर्ण सफलता प्राप्त करने में देरी भी लगेगी, पर जो सिद्धान्त स्पष्ट हो गये है, उनके आधार पर यह निश्चित हो गया है। कि मनुष्य को भी जैसा चाहे सोचने, मान्यता बनाने और गतिविधियाँ अपनाने के लिए विवश किया जा सकता है।
मनोमय कोश की साधना मस्तिष्कीय क्षेत्र की धुलाई-सफाई ही नहीं करती, वरन् उसे समुन्नत सुसज्जित एवं सुसंस्कृत बनाने का काम भी बहुत हद तक पूरा कर सकती है।
मनोमय कोश शरीर और मस्तिष्क के समूचे क्षेत्र को अपने अंचल में समेटे हुए है। वह इन दोनों क्षेत्रों को प्रभावित करता है। अन्तः करण के अस्त-व्यस्त और विकृत स्थिति में बने रहने पर उसकी प्रतिक्रिया शारीरिक और, मानसिक स्वास्थ्य पर विनाशकारी प्रभाव डालती है। व्यक्तिगत लड़खड़ा जाने पर दृष्टिकोण और व्यवहार दोनों ही गड़बड़ाते हैं। फलतः गतिविधियाँ अवांछनीयता से भर जाती है। स्पष्ट है कि ऐसी स्थिति में विपत्तियाँ ही उत्पन्न होगी। अवरोध ही खड़े होगे। कलह और संकट आक्रमण करेंगे। समूचा जीवन ही नरक बन जायेगा। इस नारकीय यंत्रणा से छुटकारा कोई और नहीं दिला सकता। क्योंकि इस विपत्ति का दोष भले ही किसी पर थोपा जा सकें उसका कारण अपना आपा ही होता है। मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थिति बनने का तथ्य इतना स्पष्ट है कि उसे झुठलाये जाने की कही कोई गुँजाइश नहीं है। अपने आप में परिवर्तन किये बिना हम इस नरक से किसी तरह उबर नहीं सकते। जीवन क्रम उत्पन्न विविध-विधि अवरोधों से छुटकारा पाये बिना हमारा उद्धार हो नहीं सकता समस्याओं और विपन्नताओं से प्राण मिल नहीं सकता।
समृद्धि, प्रगति और सुख-शान्ति की समस्त सम्भावनायें बीज रूप में अपने ही भीतर भरी पड़ी है। सत्प्रवृत्तियों की देवी और सद्भावनाओं के देवता ही हमें दिव्य वरदानों से सुसम्पन्न बनाते हैं। अन्तरंग की विभूतियाँ ही बहिरंग की सिद्धियाँ बन कर सामने आती है। आत्मशोधन और आत्म परिष्कार जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ माना गया है। इसे प्रत्यक्ष कल्प-वृक्ष की उपमा दी जा सकती है।
मनोमय कोश का विज्ञान और साधन हमारी मानसिक स्थिति के परिष्कार का ऋषि प्रणीत उपाय है। इस दिशा में कदम बढ़ाने पर हम हर दृष्टि से लाभान्वित ही होते हैं।
गुंरौभनुश्यबुद्धि च मन्त्रे चाक्षरवाचितम्। प्रतिमासु शिला बुद्धि कुर्वाणों नरकं ब्रजेत्॥
गुरु में मनुष्य, मंत्र में अक्षर और प्रतिमा में प्रसार-बुद्धि रखने वाला नरक गामी होता है।
अशुचिर्वा शुचिर्वापि गच्छंन्सितश्ठन् स्वपत्रपि। मन्त्रैकशरणौ विद्वान् मनसै व समभ्यसेतृ॥ न दोशों मानसे जापे सर्वदेशेडपि सर्वदा। जपनिश्ठाकें द्विजश्रेश्ठोंडखिंल यज्ञफलं लमेत्॥
जो विद्वान निरन्तर मन्त्रों के जप करने का व्रत ग्रहण कर चुके है, उनके लिए सोते-जागते चलते-फिरते पवित्र तथा अपवित्र किसी अवस्था में किसी देश या काल में मानसिक जप करने में दोष नहीं है, वे अपने मानसिक जप का अभ्यास चालू रख सकते हैं। इस प्रकार निरन्तर जप परायण श्रेष्ठ द्विज समस्त यज्ञों के फल के भागी होते हैं।
मनोमय कोश का साधना में एकाग्रता की शक्ति का सम्पादन एवं अभिवर्धन प्रमुख है। सर्वविदित है कि बिखराव से समर्थता भी छिन्न-भिन्न हो जाती है। असंगठित होने पर समर्थ लोग भी कुछ कर नहीं पाते, जब कि थोड़े से छोटे लोग मिलकर भी बड़े-बड़े कार्य पूरे कर लेते हैं। यही बात मनःशक्ति के सम्बन्ध में भी है वह बिखरी रहे तो मस्तिष्क यन्त्र के पूर्ण समर्थ होते हुए भी उसकी क्षमता गये-गुजरे स्तर पर पड़ी रहेगी और वह बौद्धिक दुर्बलता के साथ-साथ प्रगति के हर क्षेत्र में पिछड़ा हुआ ही बना रहेगा।
ध्यान-योग में एकाग्रता की शक्ति का ही विकसित किया जाता है। इसके कई लाभ है। बिखराव दूर करके यदि चिन्तन एवं संकल्प को एकत्रित करने की कला सीख ली जाय और उसे मनःसंस्थान में अवस्थित विभिन्न क्षमता केन्द्रों पर इकट्ठा कर लिया जाय, तो वे संस्थान जागृत होगे और जो विशेषताएँ अपने भीतर पहले नहीं थी वे समुन्नत होने लगेंगी। इस आधार पर स्मरण शक्ति जैसी कितनी ही क्षमताएँ विकसित की जा सकती है।
आतिशी शीशे के माध्यम से कुछ इंच के घेरे में फैली हुई सूर्य किरणों को यदि एक बिन्दु पर केन्द्रित किया जा सके तो उतने भर से तत्काल अग्नि प्रज्वलित हो जायेगी। उसका उपयोग करके विकराल, दावानल उत्पन्न किया जा सकता है। मनुष्य की शारीरिक श्रम शक्ति और मानसिक चिन्तन शक्ति को अस्त-व्यस्तता ही उसे गई-गुजरी स्थिति में डाले रखने के लिए जिम्मेदार है। यदि हम क्षमताओं का सदुपयोग सम्भव हो सके तो उसका सत्परिणाम देखते ही बनेगा। सांसारिक जीवन में अनायास ही आकस्मिक सफलताएँ तो कदाचित ही किसी का मिलती होगी। सामान्यतः हर प्रगतिशील व्यक्ति को अपनी क्षमताओं को बिखराव से रोककर अभीष्ट लक्ष्य के लिए नियोजित करना पड़ता है प्रगति की सम्भावना का मार्ग इसी उपाय से प्रशस्त होता है जो अपने श्रम, समय को-चिन्तन मनोयोग को-दिशा धारा को किसी लक्ष्य विशेष पर नियोजित न कर सकें, तो वे सुयोग्य एवं साधन सम्पन्न होने पर भी कुछ कहने लायक सफलता प्राप्त न कर सकेंगे। इसके विपरीत स्वल्प बुद्धि और स्वल्प साधन होते हुए भी कितने ही व्यक्ति उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचते देखे गये है। सफलताओं में से अधिकाँश का श्रेय कर्ता की तत्परता एवं मन्मयता पर ही निर्भर रहता है। इसी को एकाग्रता भी कहते हैं।
चूल्हे पर पानी गरम करते समय ढेरों भाप ऐसे ही उड़ती रहती है। पर यदि दो छटाँक पानी की भाप प्रेशर कुकर में ठीक ढंग से प्रयुक्त ही जाय तो उतने भर से कई आदमियों का भोजन तुर्त-फुर्त पक सकता है। यदि उतने पानी में गर्मी बढ़ती रहे और भाप को निकलने का अवसर न मिले तो कुकर फट सकता है ओर एक छोटा बम फटने जैसा उपद्रव खड़ा हो सकता है। भाप का बिखराव निरन्तर होता रहता है, पर उसका संग्रह विरोध चमत्कारी परिणाम उत्पन्न करता है। रेलगाड़ी के इंजन में बनने वाली थोड़ी-सी भाप कितना बड़ा काम करती है। जबकि जहाँ-तहाँ फैले पानी की ढेरों भाप ऐसे ही हवा में उड़ती और निरर्थक नष्ट होती रहती है।
ढेरों बारूद जमीन पर फैलाकर आग लगा दी जाय तो उससे थोड़ी-सी लपट भर उठेगी-जरा-सी रोशनी भर चमकेगी किन्तु यदि उसमें से तनिक सी मात्रा बन्दूक की नली में बन्द करके चलाई जाय तो वह किसी मोटे आवरण को चीरती हुई पार जा सकती है। बाँध में पानी भरा रहता है।पर उसमें एक छोटा छेद करके उसे नीचे गिराया जाय तो उतने से दबाव के कारण बिजली घर बनने-जैसे बड़े काम हो सकते हैं। ऊपर से गिरने वाले झरनों से पनचक्कियाँ तथा दूसरी मशीनें चल सकती है। बिखराव को रोकने और उसे केन्द्रीकरण की दिशा में मोड़ने से कितनी चमत्कारी परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं। इसे सहज ही कभी भी देखा जा सकता है। मोटी उड़ ठूँसने से उतनी आसानी से गहरा छेद नहीं हो सकता जितना कि उसमें पैनी नोंक निकाल लेने पर हो सकता है। नोंक में यदि विशेषता है कि एक छोटे से आधार पर दबाव की अधिक शक्ति केन्द्रीभूत होती है। सुई से लेकर छेद करने के बरमें तक इसी सिद्धान्त पर बने हैं कि दबाव को पतली नोंक पर केन्द्रित करने से उसकी शक्ति बिखराव की तुलना में अनेक गुनी बढ़ जाती है।
आमतौर से जीवन की असंख्य घटनाएँ विस्मृति के गर्त में चली जाती है, पर कभी-कभी कोई मन में चुभने वाले प्रसंग ऐसे होते हैं जो आजीवन स्मरण बने रहते हैं। कारण एक ही कि उस घटना को गम्भीरतापूर्वक लिया गया। उस पर मस्तिष्क का सारा ध्यान केन्द्रित हो गया। भुलक्कड़पन में मस्तिष्क की कमजोरी प्रधान कारण नहीं होती, वरन् उपेक्षापूर्वक पढ़ने की अन्यमनस्कता ही निहित होती है। यदि किसी विषय को बारीकी से-दिलचस्पी से-सावधानी के साथ पढ़ा जाय तो वह सहज ही विस्मरण न होगा। स्मरण शक्ति की कमी की शिकायतों पर यदि गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाये तो उसके पीछे उदासीनता-उपेक्षा एवं अन्यमनस्कता का दोष ही उभरा हुआ दिखाई देगा।
कछुए और खरगोश की प्रतिस्पर्धा में कछुए का बाजी जीत लेना इसी कारण सम्भव हुआ कि वह एक निष्ठ भाव से अपनी राह चलता रहा जबकि खरगोश अधिक समर्थ होते हुए भी अस्त-व्यस्त उछल-कूद करते रहने के कारण लक्ष्य स्थान तक पीछे पहुँचा और बाजी हार गया। नित्य एक घण्टा विदेशी भाषाएँ सीखने में लगाते रहने के कारण बिनोवाभावे तेईस भाषाओं के विद्वान बन सके। जबकि हमारा घण्टों का समय अस्त-व्यस्त में ऐसे ही नष्ट होता रहता है और उसका कुछ भी लाभ मिल सकना सम्भव नहीं होता।
प्रवीणता, पारंगत, सफलता, जैसी अनेकों उत्साहवर्धक विभूतियाँ वस्तुतः एकाग्रता की ही उपलब्धियाँ होती है। रुचिपूर्वक, उत्साहपूर्वक, मनोयोगपूर्वक, निष्ठापूर्वक, जो भी काम करते रहा जाएगा उसमें स्वभावतः प्रवीणता उत्पन्न होती चल जायेगी। योग्यता और क्षमता सभी में लगभग एक जैसे स्तर की होती है। अन्तर थोड़ा-सा ही रहता है, उसे प्रयत्नपूर्वक दूर किया जा सकता है। असफलताओं का और कोई कारण उतना नहीं होता जितना कि अनुत्साह। उपेक्षापूर्वक आधे-अधूरे मन से किये गये कामों का परिणाम असफलता के रूप में ही सामने आयेगा।
कभी-कभी किन्हीं विशेष व्यक्तियों में विलक्षण मानसिक विशेषताएँ पाई जाती है। किन्हीं की स्मरण शक्ति इतनी विकसित होती है कि सामान्य लोगों के साथ उसकी तुलना करने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। किन्हीं में कला-कौशल की इतनी पारंगतता आरम्भिक जीवन में ही पायी जाती है जिनके कारण वे एक आश्चर्य की तरह दर्शनीय और ख्याति प्राप्त बनते हैं।
इन अद्भुत घटनाओं के मूल में रहस्य इतना ही होता है कि उनका मानसिक बिखराव संयोगवश एकाग्र बन गया होता है। संयोग भी एक नियम विशेष के आधार पर बनते हैं। पूर्व जन्मों की उपलब्धियाँ ही ऐसे कारणों में प्रधान भूमिका निभा रही होती है मनुष्य पिछले जन्म के असंख्य संस्कार अपने साथ लेकर आता है। उन्हीं में एक मस्तिष्कीय विकास का होना भी एक हो सकता है।
मस्तिष्कीय विकास, मात्र उस शिक्षण पर निर्भर नहीं, जो स्कूलों में या समीपवर्ती लोगों से मिलता है। वह जानकारी बढ़ाना मात्र है। बलिष्ठ मस्तिष्कों की विद्युत शक्ति का प्रवाह यदि दुर्बल मस्तिष्कों की ओर मुड़ जाए तो उनकी तीक्ष्णता में भारी परिवर्तन हो सकता है और उसका परिचय विशेष प्रोटीन की मात्रा की वृद्धि के रूप में सहज ही देखा जा सकता है। मस्तिष्कीय पोषण के लिए सुविकसित चेतना सम्पन्न मनस्वी लोगों का सान्निध्य अत्यन्त उपयोगी है। उनकी बढ़ी-चढ़ी प्राण शक्ति दुर्बल मनःचेतना की अभाव पूर्ति कर सकती है। प्रयोगशालाओं में मामूली बिजली को कुछ विशेष कोष्ठक में पहुँचा कर प्राणियों की प्रकृति कुछ समय के लिए बदलना सम्भव हो सकता है। प्रतिभाशाली लोगों का प्राण दुर्बल मनःस्थिति को बदलने में स्थायी उपचार का प्रयोजन पूरा कर सकता है।
येल निवासी मस्तिष्क विज्ञानी डा. जोजे डेलगाडों ने अपने प्रयोगों से यह सिद्ध कर दिया है कि मस्तिष्क में बाहर से बिजली पहुँचा कर उसका का केन्द्रों को उद्दीप्त एवं प्रसुप्त किया जा सकता है। तदनुसार उस प्राणी को इच्छित कार्य कराने ओर आज्ञा पालन के लिए विवश किया जा सकता है।
डा. जोजे ने अपने प्रयोगों की सार्वजनिक प्रदर्शनी करके दर्शकों को आश्चर्यचकित कर दिया। उनके हाथ में एक विद्युत संचालक था और कुछ प्राणियों की खोपड़ियों पर अमुक स्थान एवं अमुक संख्या में इलैक्ट्रोड लगा रहे गये थे। इस प्रकार यन्त्र और प्राणी के बीच रेडियो सम्पर्क स्थापित हुआ। प्रसारित सूचनाओं के अनुसार प्राणी ऐसे काम करने लगे जो उनकी सामान्य प्रवृत्ति के विपरीत थे। नम्र प्राणी उद्धत हो उठे और उद्धत प्रकृति वाले पूर्ण शान्त होकर एक कोने में जा बैठे। साँड, बन्दर, कुत्ते, चूहे, बिल्ली, आदि प्राणियों ने इस विद्युत संचार प्रणाली से प्रभावित होकर वे काम किये जिसकी आशा प्रदर्शन में उपस्थित जनता ने कभी भी नहीं की थी।
मनुष्यों पर भी यह प्रयोग किये गये है। और उनकी इच्छा शक्ति ज्ञान शक्ति एवं क्रिया शक्ति पर नियन्त्रण करके अमुक प्रकार से सोचने और अमुक प्रकार के काम करने को उन्हें विवश कर दिया गया है।
स्मरण शक्ति की विलक्षणता कई व्यक्तियों में इतनी अधिक मात्रा में विकसित पाई जाती ह। कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। लिथुयानिया का रैवी एलिजा दो हजार पुस्तकें कण्ठस्थ रखने के लिए प्रसिद्ध था। कितनी ही बार उलट-पटल कर उसकी परीक्षा की गई और वह सदा खरा उतरा। फ्राँस का राजनेता लिआन गैम्वाटा को विक्टर हयूगों की रचनाएँ बहुत पसन्द भी। उनमें से उसने हजारों सन्दर्भ के पृष्ठ याद कर रक्खे थे और उन्हें आवश्यकतानुसार धड़ल्ले के साथ घण्टों दुहराता रहता था। इसमें एक भी शब्द आगे-पीछे नहीं होता था। पृष्ठ संख्या तक वह सही-सही बताता चलता था।
ग्रीक विद्वान रिचार्ड पोरसन को भी पढ़ी हुई पुस्तकें महीनों याद रहती थी। जो उनने आज पढ़ा है उसे एक महीने याद रहती थी। जो उनने आज पढ़ा है उसे एक महीने तक कभी भी पूछा जा सकता था वे उसे ऐसे सुनाते थे मानों अभी-अभी रट आये हो। शतरंज का जादूगर नाम में प्रख्यात अमेरिकी नागरिक हेरी नेलसन पिल्सवरी एक साथ बीस शतरंज खिलाड़ियों की चाल को स्मरण रखकर उनका मार्ग-दर्शन करता था। यह सब काम पूरी मुस्तैदी और फुर्ती से करता था, बीसों खिलाड़ी उसका मार्ग-दर्शन पाते और खेल की तेजी बनाये रखते थे। प्रसा जर्मनी को लायब्रेरियल मैथुरिन वेसिरे दूसरों के कहे शब्दों की हू-बहू पुनरावृत्ति कर देता था। जिन भाषाओं का उसे ज्ञान नहीं था उनमें वार्तालाप करने वालों की बिना चूक नकल उतार देने की उसे अद्भुत शक्ति थी। एक बार भाशा-भाशी लोगों ने अपनी बोली में साथियों से वार्तालाप किये। मधुरिन ने क्रमशः बारहो के वार्तालाप को यथावत् दुहरा कर सुना दिया। बरमान्य का आठ वर्षीय बालक जेरा कोलबर्न गणित के अति कठिन प्रश्न को बिना कागज-कलम का सहारा लिए मौखिक रूप से हल कर देता था। लन्दन के गणितज्ञों के सम्मुख अपने अपनी अद्भुत प्रतिभा का प्रदर्शन करके सबको चकित कर दिया था। हर्म्वग निवासी जाब मार्टिन डेस भी अति कठिन गणित प्रश्नों को मौखिक रूप से हल करने में प्रसिद्ध था। उस दिनों उसके दिमाग की गणित क्षमता इतनी बढ़ी-चढ़ी थी कि आज के गणित कम्प्यूटर भी उससे प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकते थे।
मस्तिष्क की अनोखी हलचलों का विश्लेषण अणु जैविकी-मोलीक्यूलर बायोलॉजी के आधार पर करते हुए स्वीडन की गोटन वर्ग यूनिवर्सिटी के जीव विज्ञानों होल्गर हाइर्डन इस नतीजे पर पहुँचे है कि मस्तिष्क को दक्ष बनाने वाले शिक्षण एवं चिन्तन कार्य कोशिकाओं में महत्वपूर्ण रासायनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ा देते हैं और वे अधिक संवेदनशील बनकर बुद्धिमान का क्षेत्र विस्तार करती है।
इससे सिद्ध होता है कि मस्तिष्कीय क्षमताओं को विकसित करने की प्रक्रिया न केवल अपने ही बौद्धिक संस्थान को परिष्कृत करती है। वरन् उससे दूसरों को भी प्रभावित किया जा सकता है। प्रतिभा इसी का नाम है। बुद्धिमान और प्रतिभा दोनों को मानसिक दक्षता का ही एक अंग कह सकते हैं। यह दक्षता जन्म-जात रूप में-पूर्व संचित सम्पदा के रूप में-अनायास उपलब्ध भी दीख सकती है और उसे साधनात्मक प्रयत्नों के द्वारा योजनाबद्ध रूप से बढ़ाया भी जा सकता है। मनोमय कोश के परिष्कार की साधना अपनाकर क्रमशः इसी क्षेत्र में पदार्पण करना सम्भव होता है।
संयुक्त-राष्ट्र संघ में एक ऐसे भाषा-अनुवादक थे, जो एक ही समय में चार भाषाओं का अनुवाद अपने मस्तिष्क में जमा लेते थे ओर चार स्टेनोग्राफ़र बिठाकर उन्हें नोट कराते चले जाते थे।
दार्शनिक जेरमी वेन्थम जब चार वर्ष के थे, तभी लैटिन और ग्रीक भाषाएँ ठीक तरह बोलने लगे थे। जर्मनी के गणितज्ञ जाचारियस ने एक बार 200 अंकों वाली लम्बी संख्या का गुणा में नहीं मन करके लोगों को अचम्भे में डाल दिया था। अमेरिका के एक गैरिज कर्मचारी को सैकड़ों मोटरों के नम्बर जवानी याद थे और वह उनकी शकल देखते ही पुरानी मरम्मत की बात भली प्रकार याद कर लेता था।
डान फ्राँसिस कोलंबिया विश्व-विद्यालय में जब प्राकृतिक इतिहास का प्रोफेसर नियुक्त हुआ, तब उसकी आयु मात्र 16 वर्ष की थी।
आक्सफोर्ड विश्व-विद्यालय ने एक चार वर्षीया बालिका बेबेल थाम्पनन के गणित अध्ययन के लिए अतिरिक्त प्रबन्ध किया है। यह बालिका इतनी छोटी आयु में ही अंग गणित, त्रिकोण-मिति और प्रारम्भिक भौतिक शास्त्र में असाधारण गति रखती है। इस उम्र के बालक को जिसने प्रारम्भिक पढ़ाई क्रमबद्ध रीति से नहीं पढ़ी, आगे कैसे पढ़ाया जाय? इसका निर्धारण करने के लिए शिक्षा-शास्त्रियों का एक विशेष पैनल काम कर रहा है।
मद्रास संगीत अकादमी न्यास की ओर से रविकिरण ढाई वर्ष के बालक को उसकी अद्भुत संगीत प्रतिभा के उपलब्ध में विशेष छात्र-वृत्ति देने की घोषणा की गई है। यह बालक न केवल कई वाद्य यन्त्रों का ठीक तरह बजाना जानता है, वरन् दूसरों द्वारा गलत बजाये जाने पर उस गलती को बताता भी है।
जापान निवासी हनाबा होकाइशी सन् 1722 में जन्मा ओर पूरे 101 वर्ष जीकर 1523 में मरा। वह सात वर्ष की आयु में अन्धा हो गया था। पर इससे क्या उसने बिना नेत्रों के ही दूसरों से सुनकर अपनी ज्ञान-वृद्धि आरम्भ कर दी। जो सुना-उसे पूरे मनोयोग के साथ सुना और ध्यान में रखा फलस्वरूप उसके ज्ञान का कोश इतना बढ़ गया कि उसे एक अद्भुत आश्चर्य माना जाता था। उसके द्वारा नोट कराये गये ज्ञान-भण्डार को जापान में 2820 खण्डों के एक अनुपम विशाल ग्रंथ के रूप में छापा गया है। यह अब तक का संसार का सबसे बड़ा ग्रंथ है।
बरमानट निवासी आठ वर्षीय बालक जेरा कोलबर्न ने बिना गणित का क्रमबद्ध अध्ययन किये और बिना कागज कलम की सहायता के-दिमागी आधार पर कठिन प्रश्नों के उत्तर देने की जो क्षमता दिखाई, उससे बड़े-बड़े गणितज्ञ चकित रह गये। जिन कठिन सवालों को केवल अच्छे गणितज्ञ ही काफी समय लगाकर हल कर सकते थे। उसने उन्हें बिना हिचके आनन-फानन में कैसे हल कर दिया। इसे देखकर सब लोग दंग रह जाते थे। आश्चर्य यह था कि पुस्तकीय आधार पर उसे गणित के सामान्य नियम भी ज्ञात न थे।
गणित-शास्त्री जेडिया बाक्सटन बहुत समय के एक गणित समस्या में उलझे हुए थे, हल निकल नहीं रहा था। एक दिन उनकी भेंट स्मरण शक्ति के धनी व्यक्ति जानमार्टिन डेस से हुई। उसने उनका हल मिनटों में बता दिया। गणित सम्बन्धी उलझनों को सुलझाने के लिए डेस अपने समय में दूर-दूर तक प्रख्यात था।
सर जान फील्डिंग इंग्लैंड के जज थे। वे अन्धे थे, पर उनके काम इतने सक्षम थे कि अपने जीवन काल में जिन 3000 अपराधियों से उन्हें वास्ता पड़ा था, उन सब की आवाज वे ठीक तरह पहचान सकते थे और उनका नाम बता सकते थे। मुकदमों के मुद्दतों बाद वे लोग कभी उनसे मिलने आते, तो नेत्र न रहने पर भी केवल स्मरण-शक्ति के आधार पर उसका नाम और मुकदमों का सन्दर्भ बता देते थे। उनकी यह अद्भुत स्मरण-शक्ति चिरकाल तक चर्चा का विशय बनी रही।
फ्रांसिस्को मैरिया गेरिबाल्डी नामक एक प्रसिद्ध कवि चौदहवीं शताब्दी के अन्त में हुआ है। वह इटली का निवासी था। उसकी विलक्षण प्रतिभा यह थी कि दोनों हाथों से दो कविताएँ एक साथ लिखता जाता था। इनमें एक लैटिन भाषा में होती और दूसरी पुरातन ग्रीक भाषा में।
कैन्टरबरी के प्रधान पादरी टामस फ्रेकर ने तीन महीने में पूरी बाइबिल जवानी याद कर डालने का एक अनोखा उदाहरण प्रस्तुत किया। सन् 1724 में जन्मा और 1822 में मरा स्काटलैंड का प्रख्यात कवि डंकन मेक इन्टायर उन दिनों अपनी कविताओं के लिए अपने देश ही नहीं सारे योरोप में प्रसिद्ध था। पर वह न पढ़ना जानता न लिखना। अपनी सारी प्रतिभा उसने सुन समझ कर ही विकसित की थी।
ग्रीक पोरसन नामक व्यक्ति को मिल्टन की प्रायः सभी रचनाएँ याद थी और वह उन्हें सीधी ही नहीं उल्टी करके भी सुना सकता था।
लाक्राज ने अपनी स्मरण शक्ति का एक अनोखा प्रदर्शन करके दर्शकों को चकित कर दिया। उसने अपरिचित 12 भाषाओं की 12 कविताएँ सुनी और दूसरे ही क्षण उसने उन्हें ज्यों का त्यों दुहरा दिया।
मयूनिख की राष्ट्रीय लाइब्रेरी के संचालक जोसेफ वर्न हार्ड डंकन अद्भुत प्रतिभा सम्पन्न थे। उन्होंने 6 भाषाएँ सीखी ही नहीं थी उनमें पारंगत भी बने थे। इसके अतिरिक्त उनकी उस विशेषता को देखकर दंग रह जाना पड़ता था। जबकि वे 6 भाषाओं के अपने स्टेनोग्राफ़र को एक साथ बिठाकर उन सभी को उन्हीं की भाषा में लेख नोट कराते थे। इतना मस्तिष्कीय सन्तुलन अथाह ज्ञान और विकसित स्मरण-शक्ति का प्रमाण कदाचित ही कही कभी देखने को मिलता है।
5 अक्टूबर 1950 को लन्दन में एक भारतीय महिला शकुन्तला देवी उन्हें गणित की जादूगरनी (विजार्ड आफ मैथेमेटिक) कहा जाता है, टेलीविजन पर अपना कार्यक्रम प्रस्तुत कर रही थी। तभी एक सज्जन ने उन्हें एक गणित का प्रश्न हल करने को कहा। बिना एक क्षण का विलम्ब किये हुए उन्होंने कहा यह प्रश्न गलत है। यह प्रश्न ब्रिटेन के बड़े-बड़े गणिताचार्यों ने तैयार किया था। इसीलिए सब लोक एकदम आश्चर्य में डूब गये प्रश्न गलत कैसे हो सकता है? बी.बी.सी. कार्यक्रम के आयोजन कर्ता ने प्रश्न की जाँच कराई तो वह विस्मित रह गया कि प्रश्न सचमुच गलत है। उसने भी यह माना कि-हम जितना समझा पाये है, मन की शक्ति ओर सामर्थ्य उससे बहुत अधिक है।”
सिडनी (आस्ट्रेलिया) स्थित न्यू साउथ बेल्स विश्व विद्यालय में उनकी प्रतिद्वंद्विता 20 हजार पौंड मूल्य के संगणन (कम्प्यूटर) से हुई। यह कम्प्यूटर विद्युत चलित था ओर उसका आपरेशन प्रसिद्ध गणितज्ञ श्री आर0जी0 स्मार्ट और वेरी थार्नटन कर रहे थे, किन्तु जब भी कोई प्रश्न पूछा जाता था शकुन्तला उसका तुरन्त उत्तर दे देती थी। जब कि मशीन के उत्तर की प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। शकुन्तला के उत्तर शत-प्रतिशत सही पाकर वे सब चौंक पड़े।
मन की अद्भुत शक्ति के सन्दर्भ में वैज्ञानिकों ने अनेक तरह के शोध किये है और उन्हें मनोविज्ञान अनुसन्धान समिति द्वारा “दि ह्यूमन परसनैलिटी एण्ड इट्स सरवाइबल ऑफ बाडिली डेथ” नामक शोध ग्रन्थ में विधिवत् प्रकाशित भी किया गया है। उपरोक्त पुस्तक में ऐसे छोटे बच्चों के अनेक उदाहरण भी दिये है जो गणित संगीत, ज्यामिती, चित्रकला आदि में इतने पारंगत थे कि उस विषय के प्राध्यापक भी उतने निष्णात नहीं होते। जगद्गुरु शंकराचार्य ने अपनी ऐसी ही विलक्षण प्रतिभा से अपने गुरु को स्तम्भित कर दिया था। बिना शिक्षा व्यवस्था के पाँच-छः वर्ष जितनी छोटी आयु में ही इस प्रकार का असाधारण ज्ञान होना इसी एक आधार पर सम्भव होता है कि किसी आत्मा को अपने पूर्व जन्म की संचित ज्ञान सामग्री उपलब्ध हो। पूर्व जन्म की सिद्धि आत्मा के स्वतन्त्र अस्तित्व का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
200 वर्ष पूर्व जर्मनी में हानरिस हानेन्केन नामक बच्चे का जन्म हुआ। बालक तीन वर्ष का था तभी उसे हजारों लैटिन मुहावरे कण्ठस्थ थे। जोड़, बाकी, गुणा, भाग वह बड़ी आसानी से कर लेता। इसी आयु में उसने फ्रेंच भाषा और भूगोल पड़ने की भी इच्छा की। ‘साइबर नेटिम’ के रचयिता ‘वीनर’ 5 वर्ष के थे तभी 18 वर्ष के विद्यार्थियों के साथ विज्ञान में रुचि लेने लगे थे। गेटे 9 वर्ष की आयु में कविताएँ लिखने लगे थे। वायरन, स्काट तथा विकासवाद सिद्धान्त के जन्मदाता डारविन भी ऐसी ही विलक्षण क्षमताओं के बच्चे थे। पास्काल की प्रथम विज्ञान रचना 15 वर्ष की आयु में ही प्रकाशित हो गयी थी जिसमें उसने 100 से अधिक प्रमेय सिद्ध किये थे।
अमेरिका के भौतिक शास्त्री डा.स्टीवेंसन ने 600 ऐसी घटनाएँ एकत्रित की हैं जिनमें किन्हीं व्यक्तियों विशेषकर 14 वर्ष की आयु तक के बालकों द्वारा बताये गये उनके पूर्व जन्मों के अनुभव प्रामाणिक सिद्ध हुई है, 170 प्रमाण अकेले भारत के है।
पूर्व जर्मनी के विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न तीन वर्ष का बालक ‘हामेन केन’ विद्या के शोधकर्ताओं का केन्द्र रहा है। यह बालक 3 वर्ष की आयु में जर्मन के उच्च साहित्यिक ग्रंथ न केवल पढ़ लेता था अपितु उनका विश्लेषण भी कर लेता था।
साधना की सिद्धि का सिद्धान्त हर क्षेत्र में काम करता है। श्रम का पुरस्कार मिलने की बात सर्वविदित है। पुरुषार्थ का प्रतिफल प्राप्त होने के विविध क्रिया-कलाप चल रहे है। अध्यात्म साधना के सम्बन्ध में भी यह बात है। यदि वह तथ्यों पर आधारित हो ओर विधिवत् संपन्न की जाय तो उसके लाभ मिला भी सुनिश्चित ह।
मनोमय कोश को जागृत परिष्कृत करने के प्रयत्नों में ध्यान एकाग्रता को प्रमुखता दी गयी है जिससे संकल्प बल प्रचण्ड हो, लक्ष्य विशेष पर उसका नियोजन हो सकें। इस आधार पर मस्तिष्क संस्थान को विकसित करने, व्यक्तित्व में चमत्कारी प्रतिभाओं को जगाने जैसे अनेकों लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं।
मिशन की सभी पत्रिकाओं की सदस्य संख्या बढ़ाई जाय।
अखण्ड-ज्योति का अपना महत्व है। उसे परिजन रुचिपूर्वक पढ़ते और प्रसार करते हैं। यह उनकी गुण ग्रहिता एवं सत्प्रयोजनों में सहकार करने की सद्भावना का परिचायक है। किन्तु यह नहीं समझा जाना चाहिए कि मिशन की विचार-धारा समझने और उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के लिए सभी आवश्यक प्रेरणाएँ मात्र उसी से प्राप्त हो सकती है। मिशन की अन्य पत्रिकाएँ उसकी पूरक के रूप में निकलती है।
गुजराती, मराठी, उड़िया में युग-निर्माण योजना इस दृष्टि से निकलती है। कि उन क्षेत्रों की जनता भी इस प्रकाश से लाभान्वित हो सके। हिन्दी युग- निर्मा में सामाजिक समस्याओं एवं महामानवों की अनुकरणीय गतिविधियों की जानकारी देकर समाज निर्माण की आवश्यकता पूरी करती है। मिशन की क्रियात्मक गतिविधियाँ का विवरण एवं मार्ग-दर्शन पाक्षिक युग-निर्माण योजना में रहता है। यह सभी पत्रिकाएँ अपने-अपने प्रयोजनों को पूरा करती है। तदनुसार उनके सम्मिलित प्रभव से युग-निर्माण मिशन को अग्रगामी बनाने का उद्देश्य पूरा होता है। इनमें से प्रत्येक अपने स्थान पर अति महत्वपूर्ण है। इनमें से किसी को भी उपेक्षणीय नहीं समझा जाना चाहिए।
अखण्ड-ज्योति परिजनों से अनुरोध है कि वे इन सभी पत्रिकाओं को मिशन का ढाँचा खड़ा करने में रक्त, माँस, अस्थि, चर्म आदि की तरह अविच्छिन्न और आवश्यक समझे। इनके सदस्य रहने और नये सदस्य बनाने की बात का वैसा ही ध्यान रखें जैसा कि अखण्ड-ज्योति का रखा जाता है। इन पत्रिकाओं का नया वर्ष भी जनवरी से आरम्भ होता है, अस्तु उनके ग्राहक बनाने का प्रयत्न भी इन्हीं दिनों पूरे उत्साह के साथ किया जाना चाहिए।- भगवती देवी शर्मा
मनोमय कोश मस्तिष्क के मन और बुद्धि संस्थानों से सम्बन्धित है। उसकी साधना हमारी, बुद्धि, कल्पना स्मरण शक्ति आकद के क्षेत्रों को सुविकसित करती है। कालिदास, वरदराज जैसे मन्द मति प्रयत्न पुरुषार्थ से विद्वान, बुद्धिमान बने थे। यह अनपढ़ को सुगढ़ बनाने की प्रक्रिया है इसे प्रशिक्षण द्वारा विकसित करने का उपाय सर्वविदित है। अध्यात्मिक प्रयत्नों द्वारा इस प्रयोजन को किस प्रकार पूरा किया जाय, उसी के प्रयोग में मनोमय कोश की साधना सहायता करती है।
इस साधना का दूसरा क्षेत्र है। साहसिकता का संकल्प-शक्ति का-अभिवर्धन चिन्तन में उत्कृष्टता और क्रिया-कलाप में आदर्शवादिता का मनोवेश करने वाली वे सद्विचारणाएं भी क्षेत्र में विकसित होती है जो चरित्रनिष्ठा विकसित करने के लिए उत्तरदायी है।
शिक्षा के आधार पर ज्ञान सम्पदा बौद्धिक तीक्ष्णता एवं क्रिया कुशलता बढ़ाने के प्रयत्न होते हैं। इसके साथ संकल्प शक्ति का महत्व भी समझा जाना चाहिए, वे उपाय भी अपनाये जाने चाहिए जिनके आधार पर व्यक्ति संकल्पवान बनता है और प्रगति के पथ पर अग्रसर होने में सफल होता है। मनोमय कोश को जागृत करने के उपाय जो भी हों, पर संकल्प-शक्ति का उदय उसी क्षेत्र से होता है।
प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए-अभावों और असुविधाओं से लड़ने के लिए-प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलने के लिए-न केवल साधन सामग्री की अभिवृद्धि आवश्यक है। वरन् यह और भी अधिक अभीष्ट है कि मानवी संकल्प-शक्ति को बढ़ाया जाय। मात्र साधनों की बहुलता से तो मनुष्य विलासी और आलसी भी बनता चला जायेगा। इससे उसकी अकर्मण्यता अशक्तता और अदक्षता ही बढ़ेगी। प्रगति के इतिहास में साधनों एवं परिस्थितियों का उतना योगदान नहीं है जितना कि विचारणा और आकांक्षा का। संकल्प इन्हीं के समन्वय को कहते हैं। संकल्प की प्रखरता ही प्रगति का पथ-प्रशस्त करती है। जहाँ इसकी कमी होगी वहाँ प्रगति का रथचक्र उतना ही अवरुद्ध एवं दलदल में फँसा दिखाई पड़ेगा।
विकासवाद के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में एक कोशीय एवं बहु कोशीय जन्तुओं की शरीर रचना बहुत ही सरल थी। प्राचीनतम प्राणी ‘प्रोटोजोन्स’ वर्ग के थे। वे एक कोशीय थे। अमीबा, यूग्लोना, पैरापीसियम, बर्टीमेला का आरम्भ इसी रूप में हुआ। पीछे उनमें संकल्प शक्ति जगी, वे सुरक्षा और सुविधा की आवश्यकता अनुभव करने लगे। इसके लिए उन्हें पारस्परिक सहयोग का उपाय सूझा और उसके लिए पारस्परिक सहयोग का उपाय सूझा और उनके लिए सम्मिलित प्रयास करने में जुट गये “बालकाक्स’ वर्ग के जीव छोटे परिवार बनाकर रहने लगे। उनने मिल-जुलकर काम करने की व्यवस्था बनाई। कर्तव्य और उत्तरदायित्व बाँटे। इनमें से कुछ आहार जुटाने में, कुछ सुरक्षा सम्भालने में, कुछ वंश-वृद्धि करने में, कुछ सुविधा सम्पादन में, कुछ व्यवस्था यहीं से आरम्भ हुई। सहयोग के आधार पर न केवल सुविधा बँटी, वरन् उनका निज का स्वरूप एवं अस्तित्व भी विकसित होता चला गया। एक कोशीय जन्तुओं ने अपना काय-कलेवर बहुकोशिय ‘मल्टी सेल्युलर’ वर्ग के जन्तुओं में विकसित कर लिया। वे सरल से जटिल होते गये। इसी चेतनात्मक स्फुरणा को प्रकृति की मौलिक क्रिया माना गया है। विकास के मूल में यही तत्व काम कर रहा है। इसी को संकल्प शक्ति का चमत्कार भी कह सकते हैं।
एक कोशीय जीवों की तुलना में बहुकोशिय जीवों की काया काफी समुन्नत-बनावट की दृष्टि से जटिल बनती हुई। स्पंज, हाइड्रा, जेलीफिश, कोरल, एनीमोन आदि बहु कोशीय जीवों की स्थिति तक पहुँचने पर भी उनके शरीरों में भोजन और मल विसर्जन के लिए एक ही छिद्र था। इन दो प्रयोजनों के लिए दो द्वार तो आगे चलकर बने। विकास का रथ मार्ग पर बढ़ता चला गया है। हड्डियाँ विकसित हुई, मेरुदण्ड बने, खोपड़ी वाले जीवों के शरीर में मस्तिष्कीय चेतना की उपयोगिता देखते हुए खोपड़ी के मजबूत किले बनकर खड़े हो गये। जलचरों ने थल में रहना सीखा। उनमें से कुछ तो हवा में उड़ने की हिम्मत करने लगे। यही विकास क्रम उद्धिज, स्वदेज, अंडज, जरायुज प्राणियों में अग्रसर हुआ है। प्राणियों की अनेक क्षमताएँ उनके कार्य विकास के साथ साथ बढ़ती चली आई है। इन्द्रियों की क्षमता और अवयवों की संरचना का क्रम गाड़ी के दो पहियों की तरह साथ-साथ बढ़ा ह। इसी मार्ग पर चलते हुए आदिम कालीन एक कोशीय जीवन वर्तमान स्थिति तक पहुँचा है। दोनों परिस्थितियों में जमीन आसमान जैसा अन्तर देखा जा सकता है।
विकास की इस प्रक्रिया के आधारभूत कारण खोजने में वैज्ञानिकों ने अपने-अपने ढंग से प्रयत्न किया है और अपने-अपने दृष्टिकोण-निष्कर्ष प्रस्तुत किये है। लेमार्क और हयू गोडिव्राइस ने इस सम्बन्ध में बहुत कुछ खोजा ओर बताया है। अपनी शताब्दी में चार्ल्स डार्विन ने बहुत सन्दर्भ में काफी खोजे हुई है। इन प्रतिपादनों में जीव तत्व को मात्र रासायनिक पदार्थ मान कर विज्ञान वेत्ता एक विचित्र उलझन में फँस गये है। ‘प्रोटोप्लाज्मा’ के काय-कलेवर को बनाने बौर चलाने की क्षमता तो है, पर क्रमिक विकास की ओर बढ़ सकने जैसी क्षमता उसमें किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं होती। फिर विकास क्रम किस प्रकार निरन्तर अग्रसर होता चला गया?
नये वैज्ञानिक प्रतिपादनों के अनुसार प्रोटोप्लाज्मा के समतुल्य ही एक दूसरे जीव तत्व की सत्ता स्वीकार की गई है। वह है- ‘ईडोप्लाजमा’। वंश परम्परा में अब इन दोनों का समान योगदान माना जाने लगा है। वंशानुक्रम की मात्र रासायनिक पदार्थों के आधार पर व्याख्या अधूरी और असमाधानकारक ही रही है। अभिरुचियाँ, आस्थाएँ, भावनाएँ, मान्यताएँ, रसायनों के माध्यम से बनी रहने और परिष्कृत होते चलने का कोई तुक नहीं बैठता। ‘ईडोप्लाज्मा’ के संयोग से वह बात बनती है। यह दोनों तत्व एक नहीं है। उनकी सत्ता स्वतन्त्र है। ये एक दूसरे के पूरक भर है। यहाँ प्रोटोप्लाज्मा को-पदार्थ सत्ता का और ईडोप्लाज्मा को चेतना का प्रतिनिधित्व करते हुए पाया जाता है। गतिशीलता, समर्थता, आकांक्षा स्थिति के अनुरूप परिवर्तन, प्रजनन उत्साह, सुरक्षा के लिए संघर्ष, खाद्य पदार्थों को ऊर्जा के रूप में बदल लेना आदि कितने ही कार्य ऐसे है जिन्हें प्रोटोप्लाज्मा के हाथ से छीन लिया गया है। और उनका श्रय ईडोप्लाज्मा को दिया गया है। परमाणु निर्धारित हलचलें करते रह सकते हैं, पर वे उत्साह एवं परिवर्तन की स्फुरणा अपने भीतर से प्रकट नहीं कर सकते। जीवाणु की यही मौलिक विशेषताएँ है। जिनसे उसे पदार्थ वर्ग में रासायनिक संगठना में गिन लेने मात्र से समाधान नहीं हो सकता।
जीवन तत्व की रासायनिक व्याख्याएँ कभी बड़े उत्साह के साथ की जाती थी, पर अब वह जोश ठण्डा पड़ गया है और जीवन सत्ता के सम्बन्ध में स्वतन्त्र रूप से सोचने और खोजने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। जीव विज्ञानी ई॰ के0 लेन कास्टर का कथन है-भौतिक जगत में चल रही हलचलों के साथ जीवन सत्ता का तालमेल नहीं बैठता। उस निरूपण के पक्ष में प्रस्तुत किये गये प्रतिपादन ओछे पड़ते हैं। जीवन का एक स्वतन्त्र विज्ञान होना चाहिए। पदार्थ विद्या के बटखरों से उसकी नाप-तौल ठीक प्रकार से हो सकता सम्भव नहीं दीखता।
पदार्थ में केवल अस्तित्व है। उसमें न तो जीवन है ओर न हलचल। वनस्पति में अस्तित्व के साथ-साथ जीवन भी है। प्राणियों में अस्तित्व, जीवन और अनुभूति तीनों है। किन्तु विवेचना बुद्धि ओर स्वतन्त्र इच्छा की न्यूनता है। जीवन निर्वाह के परम्परागत अनुभवों और आवश्यकताओं के अनुरूप हो उनके चिन्तर को गाड़ी एक बनी बनाई पर लुढ़कती जाती है। मनुष्य की चेतना सुविकसित स्तर पर पहुँची हुई इसीलिए मानी जाती है कि उसकी संकल्प शक्ति विवेचनात्मक क्षमता ने काफी प्रगति कर ली है। जबकि अन्य जीवधारी शारीरिक दृष्टि से अपेक्षाकृत अधिक बलिष्ठ होते हुए भी चेतना के क्षेत्र में पिछड़े हुए है। जड़ ओर चेतन की आणविक हलचलों में समानता हो सकती है। पर यह सम्भव नहीं दिखता कि पदार्थ कभी चेतना के समतुल्य प्रगति कर सकने में समर्थ हो सकेगा। क्या धातुएँ कभी पक्षियों के तरह आकाश में उड़ने चहचहाने तथा अण्डे देने में समर्थ हो सकेगी? जीवन को रासायनिक सिद्ध करने के प्रयत्नों से काम चलता न देखकर कोल्बिन, हैमरीज, किचनर, अरर्हेनिस, आदि ने अपने-अपने शब्दों में यह कहा है-जीवन किसी अन्य लोक से भूलता, ‘भटकता पृथ्वी पर आ पहुँचा है, पर वह है पदार्थ से भिन्न। यों उसकी सत्ता पदार्थ के समन्वय से ही चिन्तनात्मक प्रयोजन पूरे कर सकती है।
इससे एक कदम आगे बढ़कर पास्टयूर और टैण्डाल ने कहा है ‘जीवन पदार्थ से नहीं जीवन से ही उत्पन्न होता है, हो सकता है।” विकास इतिहास की पृष्ठभूमि का पर्यवेक्षण करते हुए वे कहते है-आदिम काल में सेल किसी दबाव से नहीं स्वेच्छा से वंश वृद्धि करते थे। पीछे वे नर और मादा के रूप में बँट गये। संयोग का आनन्द लेना और उत्तरदायित्व सम्भालना शुरू किया। ऐसी-ऐसी अनेक उलट-पुलट करते-करते जीवधारी वर्तमान स्थिति तक बढ़ते चले आये है। यह स्फुरण का ही चमत्कार है यही वह मौलिक अन्तर है जो जड़ ओर चेतन के बीच भिन्नता की दीवार खड़ी करता है।
आइन्स्टीन कहते थे-अणु सत्ता पर किसी अविज्ञात चेतना का अधिकार और नियन्त्रण है। पदार्थ मौलिक नहीं है उसका उद्भव चेतना की प्रतिक्रिया से ही सम्भव हुआ है। आज यह तथ्य प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं होते तो मेरा विश्वास है कि आज न सही कल यह सब सिद्ध होकर ही रहेगा।
जीवन का मूल स्वरूप उसकी चिन्तन स्फुरणा के साथ जुड़ा हुआ है। विचारणा और आकांक्षा के समन्वय से जो ‘संकल्प’ उठता है। उसी में प्रगति की समस्त संभावनाएँ सन्निहित है। विकासवादी प्रगति पर दृष्टिपात करने पर हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है। वे एक जैसी परिस्थितियों में रहने पर भी एक की प्रगति दूसरे की यथास्थिति और तीसरे के अवगति का अन्तर देखकर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है। कि यह संकल्प शक्ति की न्यूनाधिकता का ही प्रभाव है। साधनों के अभाव में भी लोग आगे बढ़ते हैं। सहयोग के बिना भी प्रगति करते हैं। इसके पीछे उनकी प्रखर संकल्प-शक्ति ही काम करती है। आगे बढ़ने वालों के पीछे साधन भी बनता है। और सहयोग भी जुटता है। मोटर दौड़ती है तो उसके पीछे धूलिकण और पत्ते भी उड़ते चले आते हैं। संकल्प ही मानव जीवन की सर्वोपरि शक्ति है। उसके सहारे सामान्य स्थिति से आगे बढ़कर असामान्य स्तर तक पहुँचा जा सकता है। अन्धकार में प्रकाश उत्पन्न करने की-निराशा में आशाजनक संभावनाएँ प्रस्तुत करने की क्षमता उसी में है ऊँचे उठने और आगे बढ़ने के लिए साधन जुटाने और सहयोग बनाने की आवश्यकता सभी मनः संस्थान ज्ञान, अनुभव एवं कौशल का ही नहीं प्रतिभा का भी क्षेत्र है। उत्कृष्टता के प्रति आस्था के बीज भी इसी भूमि में जमते हैं। संकल्प शक्ति का उद्गम केन्द्र यही है। मनोमय कोश की साधना द्वारा यदि इन विभूतियों का जागृत एवं उपलब्ध किया जा सकें तो इन विभूतियों को जागृत एवं उपलब्ध किया जा सकें तो उस दिशा में किया गया प्रयत्न सामान्य कार्यों की दौड़-धूप से कम नहीं अधिक ही लाभदायक और बुद्धिमत्तापूर्ण सिद्ध होगा।
अन्येशां च न सिद्धिः स्यात्तस्माद् यत्नेन साधयेत्॥ शिव संहिता।
श्रद्धावान व्यक्ति को ही सिद्धि मिलती है। दूसरे को नहीं इसलिए प्रयत्न और श्रद्धापूर्वक साधना करे।
विज्ञानमय कोश आत्म-चेतना का वह गहन अन्तराल है जिसका सीधा सम्बन्ध ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ बनता है। अन्नमय, प्राणमय, और मनोमय कोश व्यक्ति चेतना की परिधि में बँधे रहते हैं। उनके विकास का लाभ मनुष्य के निजी उत्कर्ष में दृष्टिगोचर होता है। सम्पर्क क्षेत्र के व्यक्ति उत्कर्ष में दृष्टिगोचर होता है। सम्पर्क क्षेत्र के व्यक्ति उससे लाभ उठाते हैं। बलिष्ठ शरीर, प्रखर, प्रतिमा और विद्या बुद्धि के सहारे कितने ही महत्वपूर्ण कार्य सधते हैं। व्यक्तित्व निखरता और क्षमता सम्पन्न बनता है। प्रगति के आरम्भिक चरण यही है। क्रमिक उन्नति करते हुए इसी मार्ग से चरम लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव होता है।
ज्ञान, सामान्य, लौकिक जानकारी को कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे शिक्षा भी कहा जा सकता है। विज्ञान का तात्पर्य है-विशेष ज्ञान! अध्यात्मिक प्रयोजनों में यह शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त है, क्यों व्यवहार में विज्ञान का तात्पर्य ‘साइन्स’ समझा जाता है। उसे पदार्थ विज्ञान का संक्षेप माना गया है पर अध्यात्म में वैसा नहीं है। सामान्य अर्थात् काम काजी, लौकिक, भौतिक, व्यावहारिक विशेष अर्थात् आन्तरिक, अन्तरंग सूक्ष्म, चेतन, अध्यात्मिक। विशेष ज्ञान अर्थात् विज्ञान। सामान्य बुद्धि-ऋतम्भरा प्रज्ञा कहलाती है। उसके द्वारा आन्तरिक प्रगति और आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति का साधन जुटाया जाता है। विज्ञानमय कोश चेतना की वह परत है, जो अपने भीतर उच्चस्तरीय विभूतियों को छिपाये रहती है। कोश भण्डार को भी कहते हैं। विशेष अलौकिक जानकारी, विशेष शक्ति, अन्तःकरण की उच्चस्थिति इस संस्थान की उत्पत्ति एवं उपलब्धि है। इस सामर्थ्य के सूत्र यों रहते तो अपने ही अन्तःकरण में है, पर वस्तुतः उनका सम्बन्ध सूक्ष्म जगत में संव्याप्त ब्रह्माण्डीय चेतना से जुड़ा रहता है।
छोटे बैंक बड़े बैंकों से सम्बद्ध हों तो आवश्यकतानुसार उनके बीच आदान-प्रदान होता रहता है। जरूरत के समय छोटे बैंक बड़े संस्थानों से संरक्षण और सहयोग प्राप्त कर सकते हैं। इसी प्रकार सूक्ष्म जगत की हलचलों की जानकारी और उपयोगी विभूतियों को उपलब्ध कर सकना उनके लिए सम्भव हो जाता है जिनका विज्ञानमय कोश समुन्नत स्तर का बन चुका है। प्रसुप्ति तो मरण के समतुल्य होती है। सोता हुआ मनुष्य अचेत पड़ा रहता है, उसके लिए दूसरों के निमित्त कुछ कर सकना तो दूर अपने वस्त्र सम्भाल सकना तक कठिन हो जाता है। भौतिक जगत के पाँच तत्वों में विभक्त है।साधना विज्ञान के अनुसार उन्हें पाँच कोश कहा जाता है। यदि वे जागृत हों तो सामान्य काया भी देवोपम विशिष्टताओं का परिचय देगी किन्तु यदि सुषुप्ति छाई हुई हो तो फिर निर्जीव निस्तब्धता के अतिरिक्त और कुछ भी दृष्टिगोचर न होगा।
विज्ञानमय कोश की विशिष्ट साधनाएँ है उनके माध्यम से प्रयत्नपूर्वक उस केन्द्र में सन्निहित क्षमताओं का अभिवर्धन किया जा सकता है। साधना के अनेक प्रकार है। उनमें से कुछ योगाभ्यास एवं तपश्चर्या स्तर के है। कुछ ऐसे है जिनमें चरित्र निष्ठा एवं समाज निष्ठा में संलग्न रह कर चेतना के अन्तराल को परिष्कृत किया जाता है। आत्म-निर्माण एवं लोक-निर्माण में आदर्शवादी श्रद्धा सद्भावना को अपनाते हुए तत्पर रहा जाय तो वे क्रिया-कलाप भी उच्चस्तरीय साधना का प्रयोजन पूरा करते हैं। चरित्र को स्वर्ण की तरह तपा लेना संयम की अग्नि में अपने कषाय-कल्मषों को जला डालना विशुद्ध तप साधना ही है। अपने स्वार्थ को परमार्थ में जोड़ देना- व्यष्टि को समष्टि में विलय कर देना- इसे योग ही कहा जायेगा। कितने ही महामानव अपनी जीवन प्रक्रिया को उत्कृष्ट आदर्शवादिता में ढाल कर एक प्रकार से सन्त ही बने रहे है, भले ही उनने वैसी वेशभूषा धारण न की हो ऐसे लोगों को भी विज्ञानमय कोश की साधना का परिपूर्ण लाभ मिलता रहा है।
साधना इस प्रकार से की गई या उस तरह, इसका कोई विशेष महत्व नहीं है। बात कर्मकाण्डों के विधि-विधानों की नहीं, अन्तराल में आदर्शवादी उत्कृष्टता को प्रतिष्ठापित करने की है। उसे जिस भी प्रकार वो लिया जाय, अंकुर उगेगा और समयानुसार विशाल वृक्ष बनकर पल्लवित और फलित होगा।
ब्रह्म वर्चस् प्रक्रिया के अंतर्गत जो उपासनात्मक विधि-विधान बताये जाते हैं। उन बीजांकुरों में खाद पानी भी चरित्र निष्ठा और समाज निष्ठा का ही देना पड़ेगा। कोई साधना कितनी ही शास्त्र सम्मत एवं अनुभूत क्यों न हो अन्तः करण का स्तर निकृष्ट बने रहने पर विकसित न हो सकेगी। मरुस्थल में लगाये हुए बहुमूल्य पौधे भी उद्यान कब बन पाते है? ताप तापोँ की जलन साधना को भी उसी तरह जला देती है। जैसे कि तप्त बालू में लगाये गये पौधे मुरझाते और नष्ट होते हैं।
जपयोग, लययोग, ध्यानयोग, हठयोग, राजयोग, प्राणयोग, ऋजयोग, विभुयोग आदि की तरह की एक योग साधन जीवन साधना भी है। इसे अन्य किसी योगाभ्यास से कम न माना जाय। व्यायामों के कला-कौशल सीख कर दंगल पछाड़ने वाले पहलवान बनते हैं, सरकस में भी उनकी प्रशंसा होती है। किन्तु ऐसे भी अनेक व्यक्ति हुए है जिनने व्यायामशाला में प्रवेश नहीं किया और उन विशिष्ट कला-कौशलों को नहीं सीखा जिन्हें वहाँ बताया और अभ्यास कराया जाता है फिर भी उन्होंने आहार-बिहार के संयम-नियम दिनचर्या, प्रकृति अनुसरण प्रसन्न सन्तुष्ट स्वभाव, उच्च-दृष्टिकोण जैसे आधार अपना कर निरोग, बलिष्ठ दीर्घ जीवन प्राप्त किया। व्यायामशाला में लगने वाला समय और श्रम उन्होंने अन्य अधिक महत्वपूर्ण कामों में लगाया। यह नीति भी दूरदर्शिता पूर्ण है। इससे व्यायाम अभ्यास से कम बुद्धिमान नहीं है। अन्यान्य योगाभ्यासों की तुलना में जीवन परिष्कार की योग साधना किसी भी प्रकार कम महत्वपूर्ण और कम फलप्रद नहीं है। उत्कृष्ट चिन्तन आदर्श कर्तव्य एवं परमार्थ प्रयोजनों में सघन तत्परता रखने वाले उदात्त महा मानव भी अपने ढंग के सिद्ध पुरुष ही बनते हैं। उनका यश एवं वर्चस्व योगी, तपस्वियों से किसी भी प्रकार कम नहीं रहता, आत्म-कल्याण और विश्व कल्याण में उनकी भूमिका आत्मिक प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँचे हुए लोगों के समतुल्य ही होती है।
साधना से सिद्धि का तात्पर्य यदि चमत्कारी कौतुक कुतूहलों का प्रदर्शन और उस आधार पर कीर्ति सम्पादन हो तो उस उपलब्धि का ओछे स्तर की विडम्बना मात्र ही कहा जायेगा। इसीलिए लोक प्रचलन की यह मान्यता गलत ही कही जायगी कि साधना की सफलता सिद्धि से आँकी जानी चाहिए। कितने ही महामानव लौकिक सफलता की दृष्टि से नितान्त असफल रहे है। फिर भी उनकी सिद्ध स्थिति पर उँगली उठाये जाने का कोई कारण नहीं बना।
महा प्रभु ईसा मसीह के जीवन में मात्र तेरह उनके शिष्य बने थे और वे भी परीक्षा की घड़ियों में दुर्बल सिद्ध हुए। ईसा को फाँसी लगी। यह प्रत्यक्ष असफलता ही है फिर भी उनकी महानता में इससे कोई अन्तर नहीं आया। दधीचि के अस्थि दान से लेकर सुकरात के विष पान तक का लम्बा इतिहास उनका है, जिन्होंने कष्ट उठाये और घाटे सहे। सीता से लेकर लक्ष्मी बाई रानी तक की कथा-गाथाओं में असफलताओं का ही समावेश है। गुरु गोविन्दसिंह से लेकर भगतसिंह तक की परम्परा अपनाने वाले को न सफल कहा जा सकता है न सिद्ध। अस्तु साधना से सिद्धि का तात्पर्य यदि लौकिक, सफलता, चमत्कार या ख्याति के रूप में देखा जायेगा तो उस परख प्रक्रिया को खोटी कहना पड़ेगा। हाँ आदर्शों की स्थापना में सफलता की बात कही जाय तो उसे तथ्यपूर्ण माना जायेगा। कितने ही महामानव ऐसे हुए है, जो जीवन भर कष्ट सहते रहे, घाटे में रहे, ठगे गये, पग-पग पर असफल हुए, तिरस्कृत एवं उपहासास्पद बने, फिर भी उन्होंने ऐसे आदर्शों की स्थापना की, जिनके पद चिह्नों पर चलकर असंख्यों ने प्रकाश पाया अपना जीवन धन्य बनाया। उच्च स्तरीय आध्यात्मिक साधना की यही सच्ची सिद्धि है कि उन कठिनाइयों की अग्नि परीक्षा में साधक खरा उतरे। प्रलोभन और भय उसे विचलित न कर सकें। दूसरों के लिए ऐसी परम्परा छोड़े जिसका अनुकरण करने वाले मनुष्य जन्म को सार्थक बना सकें। राजा हरिश्चन्द्र का नाटक बचपन में गाँधी जी ने देखा। और वे उससे इतने प्रभावित हुए कि दूसरे हरिश्चन्द्र ही बनकर रहे। महामानव साथियों के लिए-अगली पीढ़ियों के लिए -ऐसे ही अनुकरणीय उदाहरण छोड़कर जाते हैं। सच्चे अर्थों में साधना की सिद्धि यही है। जीवन साधना का योगाभ्यास उसी प्रकार की सिद्धियों से भरा पूरा होता है।
संसार के महामानवों में से अधिकाँश विपन्न परिस्थितियों और दरिद्र परिवारों में जन्मे। उन्हें न तो बड़े लोगों का परिचय सहयोग प्राप्त था और न साधनों का-परिस्थितियों का ही ऐसा सुयोग प्राप्त था जिसके सहारे प्रगति की सम्भावना सोची जा सके। सामान्य लोग उस स्थिति में किसी प्रकार जिन्दगी की लाश ही ढोते हैं। किन्तु जिनके व्यक्तित्व में सद्गुणों की सम्पदा भरी होती है, वे अपने साथियों का हृदय जीतते हैं, सहयोग खीचते हैं। साधन उनके पास दौड़ते चले आते हैं और प्रगति की संभावनाएँ विकसित होती चली जाती है। कुछ उदाहरण गिना देने की आवश्यकता नहीं व्यक्तित्व की महानता उत्कृष्ट चरित्र, उदात्त व्यवहार एवं परिष्कृत दृष्टिकोण के कारण ही उनकी चुम्बकीय शक्ति प्रखर बनी है। उसी ने उन्हें ऐतिहासिक महामानवों की पंक्ति में खड़ा किया है। उनके व्यक्तिगत उत्कर्ष और समाज को दिये अनुदानों का मूल्याँकन करने से स्पष्ट हो जाता है कि उनने साधना से सिद्धि का सिद्धान्त पूरी तरह प्रमाणित कर दिया। जीवन साधना का योगाभ्यास ऐसा है जिसकी सिद्धि बाजीगरी कौतुक जैसी चमक दिखा कर समाप्त नहीं होती, वरन् अद्भुत सफलताओं के रूप में-लोक-श्रद्धा के रूप में -इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर अंकित अमिट अक्षरों के रूप में- सदा सर्वदा जीवन्त बनी रहती है। ऐसे महामानवों की नामावली, जीवन चरित्रों का पर्व तो जितना साहित्य उलट कर हम जीवन भर तैयार करते रह सकते हैं।
कुतूहलों की बात ही यदि ‘सिद्धि’ मानी जाय तो सज्जनता से प्रभावित होकर दिव्य शक्तियों द्वारा अनुग्रह बरसाने की कथा-गाथाएँ पुराणों के पन्ने-पन्ने पर पढ़ी जा सकती है। हनुमान् को राम का, अर्जुन को कृष्ण का अनुग्रह अकारण ही नहीं मिला था। अपनी पात्रता सिद्ध करके ही वे भगवान के प्रिय पात्र और शक्ति सम्पन्न बने थे। सुकन्या, सावित्री, अनसूया, दमयंती, गान्धारी आदि महिलाओं में दैव्य सामर्थ्य होने की कथाएँ बताती है कि उनने कोई विशेष योगाभ्यास नहीं किये थे, वरन् उच्च चरित्र के आधार पर ही वैसे चमत्कार दिखाने में समर्थ हुई जो उनके चरित्रों में बताये जाते हैं। शबरी, सुदामा, डडड, अंबरीष, रैदास, कबीर, नानक, सूर, तुलसी, एकनाथ, रामदास, विवेकानन्द, गाँधी आदि की जीवन गाथाओं में योगाभ्यास का कम और लोक साधना का ध्यान प्रमुख रहा है। फिर भी उन्हें दैवी अनुग्रह का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। यहाँ तक कि जटायु जैसे पक्षी और सेतुबन्ध के समय पुरुषार्थ करने वाली गिलहरी तक ने भगवान का प्यार प्राप्त हुआ था।
आत्मा अनन्य शक्तियों का भंडागार है। उसमें अपने सन्निहित है। उन्हें उगाने और बढ़ाने के लिए चरित्र निष्ठा का खाद और उदार सेवा साधना का पानी लगाना पड़ता है। इस नीति को अपना क्रूर कोई भी साधक बुद्धिमान माली की तरह अपने अन्तः क्षेत्र में ऋद्धि-सिद्धियों से भरा पूरा उद्यान खड़ा कर सकता है। इसके लिए बाहर से कुछ ढूँढ़ने, लाने या पाने का आवश्यकता नहीं है। मात्र कषाय-कल्मषों की परतों को हटा देने भर का साहस सँजो लेना पर्याप्त है। आत्म-शोधन और आत्म परिष्कार ही विभिन्न साधनाओं का वास्तविक उद्देश्य है। अँगारे पर चढ़ी राख की परत ही उसे धूमिल और निस्तेज बना देती है। यह परत हटते ही अंगारा फिर अपनी गर्मी और चमक का परिचय देने लगता है। निकृष्ट चिन्तन और घृणित कर्तृत्व से यदि हाथ खींच लिया जाय तो फिर आत्मिक प्रखरता के कारण उपलब्ध होने वाली असंख्य ऋद्धि-सिद्धियों के मार्ग में और कोई बड़ा व्यवधान शेष नहीं रह जाता।
विज्ञानमय कोश दो प्रयोजन पूरे करता है। प्रथम है-अन्तःकरण की चिन्ता तथा अहंकार परतों का विज्ञानमय कोश की अतीन्द्रिय सामर्थ्य अनावरण, उन्नयन, परिष्कार। सुसंस्कारों की जड़े इसी में प्रवेश करती और फैलती है। जीवन को कल्प-वृक्ष स्तर का बना सकने के उपयुक्त क्षेत्र यही है। उस कोश को समुन्नत बनाने के लिए किये गये प्रयास चाहे इस प्रकार के हों चाहे उस प्रकार के-व्यक्तित्व में प्रखरता उत्पन्न करते हैं और उसके सहारे सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर बढ़ चलना सम्भव होता है।
विज्ञानमय का दूसरा प्रयोजन है अन्तःचेतना की उन गहरी परतों को सजग करना जो सूक्ष्म जगत के साथ अपना सम्बन्ध बनाने और अधिकार जताने में समर्थ है। अतीन्द्रिय क्षमताओं को भण्डार यही है। उन्हें जगा लेने पर सीमा-बन्धन की दीवारें टूटती है। असीम के साथ सम्बन्ध जुड़ता है। विज्ञानमय कोश वह द्वार है जिसे खोलकर हम बन्धन मुक्त-जीवन युक्त होते हैं। उसी द्वार में प्रवेश करके वह प्राप्त किया जा सकता है जिसे पाने की आकांक्षा से अन्तरात्मा का सदा उद्विग्न और अशान्त रहना पड़ता है।
चेतना के चतुर्थ आयाम विज्ञानमय कोश की मूर्छना यदि दूर की जा सके तो सूक्ष्म जगत के साथ सम्बन्ध जुड़ सकता है और उस क्षेत्र में बिखरी पड़ी ऐसी विभूतियों का लाभ मिल सकता है जो सर्व साधारण के लिए सामान्यतया उपलब्ध नहीं है।
कभी-कभी विज्ञानमय कोश की विशेषता अनायास ही उग आती है। निर्जन द्वीपों में भी फलदार वृक्ष पाये गये है। यह वहाँ की अपनी उपज नहीं है, वरन् चिड़ियों की बीट में वे बीज उधर पहुँचे और उगे है। ऐसे अनायास सुयोग भी कई सामान्य व्यक्तियों को ऐसे लाभ देते हैं जिन्हें अद्भुत एवं अप्रत्याशित ही कहा जा सकता है। प्रयत्नपूर्वक यह क्षमता व्यवस्थित रूप से जगाई जा सकती है। इस सन्दर्भ में समय समय पर उपलब्ध होती रहने वाली घटनाएँ यह बताती है कि दिव्य अनुभूतियों की कोई सत्ता-व्यवस्था इस संसार में निश्चित रूप से विद्यमान है।
दिव्य दर्शन का लाभ जागृत अनुभूतियों की तरह स्वप्न में भी मिल सकता है। सजग मस्तिष्क, जिस समय निद्रित स्थिति में होता है। उस समय ‘अचेतन’ को अधिक स्वतन्त्रता अच्छी तरह अपनी क्षमता का परिचय दे सकता है। ऐसी कितनी ही घटनाएँ है जिनमें कुछ लोगों को स्वप्न में दिव्य दर्शन का लाभ मिला है।
गेटे ने अपनी आत्म-कथा में लिखा है कि उसे एक दिन अचानक यह अनुभूति हुई कि सिसली में भयंकर भूकम्प का विवरण छपा तो उसने जाना कि वह अनुभूति एक यथार्थता थी। “मंगल ग्रह के दो चन्द्रमा होने और उनमें से एक की चाल दूसरे से दूनी होने” की बात लिखी है। उस समय वह बात गप्प समझी गयी थी, पर उस लेख के 150 वर्ष बाद सन् 1577 में जब वाशिंगटन की ‘नेबल आवजरवेटरी’ में शक्तिशाली दूरबीन से उस कथन की सत्यता घोषित की गई तो लोगों ने उस दिव्य-दर्शन पर आश्चर्य प्रकट किया कि बिना किसी साधन के ऐसी जानकारी किस प्रकार सम्भव हो सकी।
जे0.डबल्यू0 डने के ग्रन्ट “एन एक्सपेरिमेन्ट विद टाइम’ में ऐसे अनेक विवरणों का संग्रह है जिनमें समय से पूर्व मिली जानकारियाँ समय आने पर बिलकुल सही सिद्ध हुई।
‘दि आर्ट आफ थौट’ के लेखक विद्वान ग्राहमवालाँस ने लिखा है कि सृजनात्मक चिन्तन अनायास ही नहीं फूट पड़ते। पहले-पहले उनका अनुमान आभास होगा, पीछे वे हाँडी के चावलों की तरह मस्तिष्क में पड़े-पड़े पकते रहते हैं। माता के पेट में प्रवेश हुए भ्रूण की तरह यह आभास अनपढ़ होते हैं किन्तु भीतर ही भीतर कोई अविज्ञात चेतना उन्हें अपने ढंग से पकाती रहती है। तदुपरान्त ऐसी स्थिति आती है। जिसे उत्साह और विश्वास का सम्मिश्रण कह सकते हैं। इस स्थिति में अपने आपको लगता है- कोई व्यावहारिक आधार हाथ लग गया। इसी स्थिति के परिपक्व विचार ही इस लायक होते हैं कि उन्हें गुण-अवगुण की कसौटी पर तर्क और बुद्धि के सहारे परखा जा सकें। इतनी मंजिलें पार कर लेने के उपरान्त किन्हीं महत्वपूर्ण सृजनात्मक अनुमानों को व्यावहारिक बन सकने की स्थिति तक पहुँचने का अवसर मिलता है।
आइन्स्टीन से पूछा गया कि उन्होंने रेलटिविटी के सिद्धान्त का सर्व प्रथम आभास किस प्रकार पाया? तो उन्होंने उत्तर दिया-इट हैपेण्ड’ अर्थात् वह अनायास ही सामने ही आ खड़ा हुआ। रेडियम खोज के सम्बन्ध में जब क्यूरी से पूछा गया तो उनका उत्तर भी इसी से मिलता-जुलता था। संसार में जो कुछ अद्भुत और असाधारण है उसका उदय भाव सम्वेदना के क्षेत्र से होता है। विज्ञान की उपलब्धियों के सूत्र संकेत भी उसी क्षेत्र से मिले है। और दार्शनिक क्षेत्र के अद्भुत विचारों का उदय भी वही से हुआ है। अन्तःकरण को मस्ती से भर देने वाली और लोक-मानस को झकझोर देने वाली दिव्य सम्वेदनाओं का उद्गम, भाव-सम्वेदनाओं के गहरी तली से ही उभर कर ऊपर आता है।
विज्ञान क्षेत्र में हुए अनेकानेक आविष्कारों का आरम्भ कहाँ से हुआ? इस प्रश्न का सर्वत्र एक ही उत्तर मिलेगा कि- ‘वह सम्भावना अनायास ही सूझ पड़ी।' मात्र सूझ ही नहीं पड़ी वरन् अन्तःकरण में किसी ने यह विश्वास भी दिलाया कि वह आभास भ्रम जंजाल नहीं, वरन् सर्वथा सत्य है। इस आश्वासन भरे आभास के सहारे ही उन लोगों ने अपनी खोजे अधिक गम्भीरता, अधिक तत्परता और अधिक तन्मयता के साथ प्रारम्भ की, फलतः उनका पथ-प्रशस्त होता चला गया और थोड़े से प्रयत्न ने आश्चर्यजनक सफलता उनके सामने लाकर खड़ी कर दी। प्रायः सभी महत्वपूर्ण आविष्कारों का आरम्भ इसी प्रकार होता रहा है।
जेम्स वाट के एक आविष्कार की कहानी स्वप्न संकेतों के साथ जुड़ी हुई है। उन दिनों बन्दूक के छर्रे सीसे का तार काट-काटकर बनाये जाते थे। वह कोई ऐसा सुगम, सस्ता तरीका ढूँढ़ना चाहता था जिससे छर्रे अपेक्षाकृत सुन्दर भी बने।
उन्हीं दिनों एक राम जेम्स वाट ने सपना देखा कि वह कहीं जा रहा है। आँधी आई और पानी बरसा पानी की बूँदों की जगह उसके सिर पर सीसे के गोल छर्रे बरस रहे है। आँखें खुलने पर उसने इस विचित्र सपने को मन की भटकन भर माना और विशेष ध्यान नहीं दिया। किन्तु वही सपना कई रात लगातार उसी तरह आता रहा। तब वाट ने उसका संकेत खोजा। उसे लगा किसी ऊँची जगह से गरम सीसा पिघला कर पानी के तालाब में डाल कर प्रयोग करने पर छर्रे बन जाने की सम्भावना का यह संकेत हो सकता है बड़ी कठिनाई से प्रयोग के लिए एक ऊँची इमारत उसे मिली जिसकी दीवार से सटा हुआ जलाशय भी था। जेम्स ने गरम सीसे की बूँदें ऊपर से गिराई और पानी में गिरने पर से गोल छर्रे के रूप में बदल गयी। वाट का आविष्कार सफल हुआ और तभी से बन्दूक में काम आने वाले गोल छर्रे बनने लगे।
पेन्सिल बेनिया यूनिवर्सिटी के प्रा0 लेम्बरटन एक वैज्ञानिक गुत्थी को वर्षों से सुलझाने में लगे हुए थे। पर कोई समाधान सूझ नहीं पड़ता था। अचानक एक रात उन्होंने वह हल दीवाल पर चमकता देखा। पाया गया कि वह उत्तर पूरी तरह सही था।
कोलरिज, गेटे,स्टीवेन्सन, ब्लेके, सरीखे मूर्धन्य कवियों को अपनी सर्वश्रेष्ठ कविताओं की पृष्ठभूमि स्वप्नों में ही उपलब्ध हुई है। गणित ओर दर्शन का समन्वय करने वाले विलक्षण दार्शनिक रेने देकार्त ने अपने प्रतिपादन का आधार स्वप्न में ही ढूँढ़ा था।
गणित सिद्धान्तों के आविष्कारों के सम्बन्ध में खोज करने वाले विद्वान हेनरी फेहर ने संसार के 69 गणितज्ञों के सम्बन्ध में जानकारी एकत्रित करने पर यह पाया कि उनमें से 51 को गणित के गढ़ सिद्धान्तों को ढूँढ़ निकालने में स्वप्न संकेतों से ही असाधारण सहायता मिली है।
हालैण्ड के “डच सोसाइटी फार साइकिकल रिसर्च’ के सुविस्तृत अनुसन्धानों में एक विचित्र घटना यह भी दर्ज है कि एक व्यक्ति ने 3684 की संख्या कई दिन स्वप्न में लगातार देखी। वह उसका और कुछ मतलब ही न समझ सका, पर उसी नम्बर का लाटरी टिकट खरीद लिया। उसे सन् 1648 का लाटरी का प्रथम पुरस्कार मिला।
सिलाई की मशीन का आविष्कर्ता ऐलियास उस अति उपयोगी यन्त्र का ढाँचा प्रायः तैयार कर चुका था, पर उसके लिए उपयुक्त सुई कैसे बने वह समझ में नहीं आ रहा था। जितनी तरह की सुइयाँ बनाई वे सभी असफल हुई ऐलिसास की उधेड़-बुन और चिन्ता बढ़ती जाती थी, पर कोई तरकीब हाथ नहीं नग पा रही थी।
एक रात ऐलियास ने सपना देखा कि सिलाई की मशीन चौबीस घण्टे में बनाकर तैयार करने की उसे राजाज्ञा मिली है। वह पूरा नहीं कर पाया तो उसे मार डालने का फरमान निकला और मारने के लिए घुड़सवार भाले लेकर, वध स्थल पर जमा हो गये। भालों को उसने भय और आतंक के साथ देखा उनकी नोंक में छेद था। सपना समाप्त हो गया। आँख खुलते ही एलियास का नई दिशा मिली। उसने सुई की पैनी नोंक पर ही छेद किया और मशीन में उलटी चलने के लिए लगा दिया। बस आविष्कार पूर्ण हो गया।
उन दिनों विज्ञान के क्षेत्र में परमाणु की मान्यता तो मिल गई थी, पर उसका स्वरूप स्पष्ट न था। विज्ञानी नील्स वोहर इसी के शोध प्रयास में भारी माथा-पच्ची कर रहा था, पर कोई सूत्र कही से हाथ नहीं लग रहा था।
एक दिन उसने सपना देखा कि-वह सूर्य के बीचों बीच जलती ज्वालामुखी में खड़ा है। अनेकों ग्रह-नक्षत्रम् उसके इर्द-गिर्द घूम रहे है। नील्स सीटी बजाता है, गैस ठण्डी हो जाती है और सूरज टूट कर टुकड़े-टुकड़े बिखर जाता है। वे टुकड़े फिर अपने केन्द्र का चक्कर काटना शुरू कर देते हैं सपना समाप्त हुआ और नील्स हड़बड़ा कर उठ बैठा। यह दृश्य अजीब भी था और भयंकर भी। उसने उसे निरर्थक नहीं माना, वरन् अपने शोध विशय में किसी अज्ञात सहायता के संकेत की तरह लिया। अणु संरचना की उसने संगति बिठाई कि सूर्य की तरह उसके मध्य में ‘नाभिक’ है और उसके इर्द-गिर्द इसी के खण्ड इलेक्ट्रानों के रूप में चक्कर लगाते हैं इस अनुमान पर वह अपनी खोज चलाता रहा और अन्ततः उसे पूर्णतया सत्य पाया। विज्ञान को परमाणु के स्वरूप का निर्धारण करा सकने में नील्स का वह सपना कितना आधारभूत सिद्ध हुआ, यह समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि अध्यात्म की उपलब्धियों ने विज्ञान की प्रगति में कितनी बहुमूल्य सहायता की है।
पैरिस (फ्रान्स) की अध्यात्मवादी शोध संस्था “रिसर्चेज साइकालाँजिक आडकरे स्पाण्डेन्स सर ला मैगनेटिज्म वाइटल एन्ट्रेअना सालिटेयर एट एम डिल्यूज” के अध्यक्ष डॉ0 विल्लाट ने मनुष्य में पाई जाने वाली अतीन्द्रिय क्षमता के सम्बन्ध में गहरी खोज-बीन संस्था के माध्यम से और निजी तौर से की है। उन्होंने आत्म-शक्ति को भी भौतिक शक्ति के ही समतुल्य माना है।
सुकरात कहते थे मेरे भीतर एक ‘डेमन’ रहता है। उसी के सहारे वे दूरानुभूति के आश्चर्यजनक प्रमाण प्रस्तुत करते थे। गेटे को भी ऐसी ही अदृश्य अनुभूतियाँ होती थी। जिनका कोई प्रत्यक्ष आधार तो नहीं था, पर वे प्रायः सत्य ही सिद्ध होती थी। यह ‘डेमन’ क्या हो सकता है। इसके उत्तर में उनने स्वयं ही कहा था- ‘यह सुविकसित अन्तःकरण का ही दूसरा नाम है, किसी प्रेत बेताल का नहीं।
मनःशास्त्र के महामनीषी डॉ0 जोसेफ राइन ने सर्वे प्रथम अतीन्द्रिय विज्ञान पर अपनी वैज्ञानिक आधार पर लिखी हुई पुस्तक ‘एक्ट्रा सेन्सरी’ प्रकाशित कराई थी। तब से लेकर अब तक इस सन्दर्भ में शोध कार्य बहुत आगे चला गया है। डॉ0 जोसेफ ने प्रायः 85 हजार घटनाओं की साक्षियों का विश्लेषण करके कुछ निष्कर्ष निकाले थे। उसने कहा है- ‘बिना संचार साधनों की सहायता के एक मन दूसरे मन को प्रभावित कर सकता है। मन में पदार्थों को प्रभावित करने की सामर्थ्य मौजूद है। मनःशक्ति की लम्बी दौड़ में दूरी ताप, ऊँचाई, गहराई अथवा अन्य कोई भौतिक कारण व्यवधान उत्पन्न नहीं करते।
रूसी परामनोवानवेत्ता एल0एल॰ वेसिलियेब ने एलेक्ट्रो मैगनेटिज्म-एक्सरेज आदि के व्यवधान उत्पन्न करके यह पता लगाने का प्रयत्न किया कि मन की दूर बोध शक्ति में उनके कारण कोई अड़चन उत्पन्न होती है, या नहीं। पर पाया यही गया कि जिनमें यह शक्ति मौजूद है उनका कार्य प्रत्येक वैज्ञानिक बाधा के बावजूद यथावत् चलता रहता है। मन की क्षमता को कोई भौतिक शक्ति प्रभावित नहीं करती। इससे वे यह सोचने को बाध्य होते हैं कि मन की शक्ति कोई अभौतिक शक्ति हो सकता है।
ळनावा होकीची जापान के मुसाशी प्रान्त का रहने वाला व्यक्ति सात वर्ष की आयु में अन्धा हो गया था। किन्तु उसने अपना जीवन उच्चकोटि के विद्वानों को इकट्ठा कर उन्हें पढ़ाने में बिताया। उसने स्वयं ने सुनकर पढ़ा था और अपनी बौद्धिक क्षमता को इतना प्रखर बनाया था कि 400000 हस्तलिपि की विशय-सूची तैयार कर सकता था। उसने एक ऐसी पुस्तक संकलित की जिसके 2820 खण्ड है। ऐसी विशाल पुस्तक आज तक दुनिया में किसी ने भी नहीं लिखी। उसने बागाक्से में एक स्कूल भी खोना जिसमें जापानी साहित्य पढ़ाया करता था।
स्पेन की सर्वश्रेष्ठ समझी जाने वाली इमारत ‘इस्कोपियल’ वहाँ के राजा फिलिप द्वितीय ने अपनी पत्नी मेरी ट्यूडार को स्मृति में बनवायी थी। उसमें यह भी व्यवस्था थी कि राजाओं की मृत्यु के बाद उन्हें इन्हीं में बनी कब्रों में दफनाया जाया करें। फिलिप का एक भविष्यवक्ता ने बताया था कि उसका राजवंश 24 पीढ़ी तक चलेगा। उस कथन पर राजा को पूरा विश्वास था। इसीलिए उसने 24 कब्र ही बनवा कर रखी। आश्चर्य यह कि कि भविष्यवाणी पूर्णतया सच निकली। रानी मेरिया क्रिस्टिना को सन 1626 में 23 वीं कब्र में दफनाया गया। इसके बाद 24 वें राजा अलफोनों को दो वर्ष बाद ही गद्दी छोड़नी पड़ी। साथ ही राजतन्त्र का भी अन्त हो गया। वहाँ गणतन्त्र स्थापित हुआ और अलफोनो स्पेन का अन्तिम चौबीसवाँ राजा कहलाया।
“इसिंस अनबेल्ड” ग्रन्थ में ऐसे कितने ही उल्लेख है। जिनमें विचार-शक्ति द्वारा दूसरों को भले या बुरे प्रयोजन के लिए प्रभावित किये जाने के उल्लेख है। पुस्तक में “सैक्यूज पेलिसियर” नामक व्यक्ति का उल्लेख है जो अपनी वेधक दृष्टि से चिड़ियों को मूर्छित करके पकड़ लेता था और अपनी आजीविका चलाता था। डाक्टर एसगर ने अपनी साक्षी सहित वह विवरण विस्तारपूर्वक प्रकाशित कराया है, जिसमें उपरोक्त व्यक्ति उड़ती चिड़ियों को किस प्रकार वशवर्ती करके उनके प्राण-हरण करता था।
विचारों से वस्तुओं को प्रभावित करने की विद्या “साइकोमेट्री” के नाम से जानी जाती है। जिन पदार्थों का जिस प्रयोजन के लिए प्रयोग होता रहा है, वे उससे भर जाते हैं और फिर जहाँ भी उनका प्रयोग होता है। वहाँ वे उस क्षमता का परिचय देते हैं जो उनने दीर्घकालीन सम्पर्क से संचित की थी।
ड्यूक विश्व-विद्यालय के प्रोफेसर जी0वी0 राइन ने अतीन्द्रिय ज्ञान से सम्पन्न कितने ही व्यक्तियों की क्षमताओं को जाँचा और तथ्यपूर्ण पाया है। विज्ञानी कैरिग्टन के शोधकर्ता में भी मनुष्यों में अतीन्द्रिय शक्ति पाये जाने की यथार्थता स्वीकार की गई है।
डॉ0 ब्रोरा, डॉ0 बेगनर, डॉ0 वेची, डॉ0 चेना आदि मूर्धन्य शरीर शास्त्रियों की एक मण्डली ने विश्व भ्रमण करके योगियों की विलक्षणताओं का पता लगाया था। उनने अपने अनुभवों में ऐसे कितने ही योगियों का वर्णन किया है। जिनमें ऐसी असामान्य क्षमताएँ पाई, जिनके आश्चर्यजनक कहाँ जा सके।
अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न व्यक्तियों तथा घटनाओं के ऐसे उदाहरण आये दिन देखने को मिलते हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि मस्तिष्क का सामान्य ज्ञान एवं कौशल ही सब कुछ नहीं है। सूक्ष्म जगत में ऐसा बहुत कुछ है जो सामान्य लोगों को उपलब्ध नहीं है। इसे प्राप्त करने के लिए अचेतन मन की उस परत को परिपुष्ट करना पड़ता है जिसे आत्म-विज्ञान में विज्ञानमय कोश नाम दिया गया है।
अचेतन मन की उच्चस्तरीय सत्ता में सूक्ष्म जगत के साथ सम्बन्ध जोड़ने की क्षमता है। दृश्य जगत का व्यवहार मन और बुद्धि के सहारे चलता रहता है। शरीर की निर्वाह व्यवस्था को यथा क्रम सुसंचालित बनाये रहने का काम मस्तिष्क के पिछले भाग में अवस्थित अचेतन क्षमता चलाती रहती है, विशिष्ट शक्तियों से भरा पूरा है। सामान्यतया वह कुम्भकरण जैसी गहन निद्रा में पड़ा रहता है। यदि उसे जागृत होने का अवसर मिल जाये तो व्यक्तित्व को देवोपम बनाने से लेकर चमत्कारी सिद्ध पुरुषों जैसे अलौकिक स्तर के ज्ञान और कर्म का परिचय दे सकता है। विज्ञानमय कोश की जागरण साधना इसी दिव्य चेतना का समुन्नत बनाने की प्रक्रिया का नाम है।
मनोविश्लेशण्वादी मनोवैज्ञानिकों के अनुसार हमार सचेतन (कान्शस स्टेट) अवस्था से गहरी एक अन्य चेतना है, जो (अनकान्शस स्टेट) अचेतन अवस्था कहलाती है। सचेतन अवस्था किसी समुद्र में तैरते विशाल हिमखण्ड (ग्लेशियर या आइसवर्ग) का ऊपर निकला हुआ दशमांश भाग है और अचेतन ‘अवस्था समुद्र की ऊपरी सतह के नीचे पानी में छिपे फैले ग्लेशियर का शेष विशाल भाग है, जो सचेतन से नौ-दस गुना बड़ा है। ग्लेशियर का कुछ हिस्सा पानी की ऊपरी सतह को कुछ ऊपर से, कुछ नीचे से छू रहा होता है, यही सचेतन-अचेतन के बीच की अवचेतन (सबकाँशस) अवस्था है।
वैज्ञानिकों की मान्यता है कि कथित गृह शक्तियाँ वस्तुतः अत्यन्त शक्तिशाली अचेतन मस्तिष्क की ही करामातें है। मृतात्माओं देवात्माओं से सम्पर्क के ठोस प्रमाण भी उपचेतन एवं अवचेतन की अज्ञात सामर्थ्य का ही परिणाम है। सम्मोहन अतीन्द्रियानुभुति परक स्वप्न, समस्याओं का अचेतन मस्तिष्क द्वारा आकस्मिक समाधान (किसी निश्चित समस्या पर मनन करते हुए सो जाने पर अचेतन मस्तिष्क द्वारा सोते समय ही उसका कोई ऐसा समाधान ढूँढ़ निकालना, जो जागने पर बुद्धि-पटल पर स्पष्टतः उभरकर विस्मित कर दें) आदि सभी के प्रति वैज्ञानिकों की मान्यता यही है कि वे अवचेतन मस्तिष्क की गतिविधियाँ है।
फायड ने ‘सेल्फ’ को तीन भागों में बाँटा है-इगो अर्थात् चेतन आत्म। ‘इड’ यानी सहज प्रेरणाओं का अचेतन भण्डार। ‘सुपर इगो यानी नैतिक प्रेरणाओं और मान्यताओं का क्षेत्र। प्रेम की सहज प्रेरणा (इन्स्टिनक्ट) या मूल प्रवृत्ति को उसने ‘लिबिडो’ का विशेषण दिया। उनके अधिकाँश लेखों में ‘लिबिडो’ तथा सामाजिक मान्यताओं के अन्तर्द्वन्द्व का विवेचन है। उसके अनुसार ‘लिबिडो’ का असन्तुष्ट अंश मार्गान्तरित होकर सृजन के विविध रूपों में प्रवाहित होता है। और उदात्तीकरण के द्वारा कला तथा संस्कृति के विविध क्षेत्रों में सक्रिय होता है। जुँग ने ‘लिबिडो’ की व्यापक व्याख्या की और सभी मूल प्रवृत्तियों से उसे सम्बद्ध बताया न कि मात्र प्रेम से। जुँग ने 'सामूहिक अवचेतन’ की भी धारणा दी। ‘काम्प्लेक्स’ की भी उसने विशेष व्याख्या की और प्रतिपादित किया कि ‘कम्प्लेक्स’ का अर्थ होता है-अचेतन मस्तिष्क में किसी भी विचार-समूह का एक विशिष्ट भावावेग के साथ विद्यमान होना।
चेतन की खोज जैसे-जैसे बढ़ती जाती है, अलौकिक कही-कही जाने वाली अनेक बातों के सूत्र स्पष्ट होते जाते हैं। साथ ही विज्ञान के अब तक के अनेक सिद्धान्तों एवं नियमों का आधार भी ध्वस्त हो रहा है। नये नियमों का उदय, समर्थन हो रहा है। मनोविज्ञान की तो अधिकाँश स्थापित मान्यताओं में भारी उलट-पुलट हो रही है।
यही कारण है कि प्रारम्भ में अनेक वैज्ञानिकों मनोवैज्ञानिकों ने उन तथ्यों पर विश्वास करने से ही इंकार कर दिया था, जो आज परामनोविज्ञान का आधार बने हुए है। उन्हें प्रारम्भ में विचित्र और वाहियात बातें मात्र माना गया था।
बहुत दिन नहीं हुए, जब मानसिक क्रिया-कलापों को शारीरिक आवश्यकताओं के अनुसार चलने वाला माना जाता था। भूख लगती है, इसीलिए पेट भरने की चिता मस्तिष्क को होती है। और पैर उधर मुड़ जाते हैं, जहाँ उदर-भरण हो सके। हाथ खाद्य-पदार्थों को मुँह तक पहुँचाते, मुँह उन्हें चबाता, पेट पचाता है, इसी तरह प्रत्येक मानसिक गतिविधि देह की जरूरतें पूरा करने के लिए ही होती है।
अचेतन मन की प्रारम्भ में जब जानकारी मिली, तब भी ध्यान इसी ओर दिया गया कि शरीर को जीवित गतिशील रखने के लिए वह निरन्तर हमारे अनजाने ही चलने वाले विविध क्रिया-कलापों का संचालन करता है। जैसे-रक्त संचार श्वास-प्रश्वास हृदय की धड़कन आकुंचन-प्रसारण पाचन-विसर्जन-पलकों का झपकना आदि। इस प्रकार बहुत समय तक मस्तिष्क को शारीरिक प्रयोजनों का पूर्ति कारक अवयव ही माना गया। विचार शक्ति शारीरिक आवश्यकताओं की ही अनुवर्ती, अनुचरी मानी गयी। शरीर से सम्बद्ध समस्याओं के समाधान कारक उपाय ढूँढ़ने और उनके व्यवहार की व्यवस्था बनाने में ही विचार शक्ति की पूर्ण सार्थकता मानी गयी।
पर यह शिशु मान्यता अधिक दिन नहीं टिकी। शोध क्षेत्र में प्रौढ़ता बढ़ी और धीरे-धीरे वैज्ञानिकों का ध्यान इस ओर गया कि ऐसे भावों की भी मनुष्य मस्तिष्क में कमी नहीं जो शरीर का लाभ पहुँचाना तो दूर, उल्टे हानि ही पहुँचाते हैं। औरों के दुःख से स्वयं दुःखी हो जाने, पर-सेवा लोक-मण्डल के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर देने, देश समाज, विश्वमानव के लिए अपनी सुख सुविधाएँ ठुकरा देने आदि आचरणों से शरीर का तो कोई भी सुख मिलता नहीं, कष्ट ही भोगता पड़ता है। फिर, यह भी देखा गया कि भावनाएँ व्यक्ति को क्रिया शील ही बनाती हों यो नहीं, वे तो शरीर और मन की सामान्य कार्य-व्यवस्था को भी कभी-कभी अस्त-व्यस्त करके रख देती है। किसी प्रियजन की मृत्यु से हृदयगति अवरुद्ध हो सकती है, मस्तिष्क विक्षिप्त हो सकता है। नृशंस क्रूर कर्मों को देखकर भय से कई लोग अचेत हो सकते हैं, कुछ क्रोध से अत्यन्त उत्तेजित हो सकते हैं।
इस दिशा में ध्यान देने पर मस्तिष्क के अचेतन स्तरों की विशालता-विविधता की ओर ध्यान गया। भावनाओं का महत्व जाना गया। अमरीकी वैज्ञानिक डॉ0 पाल मैकलीन, डॉ0 जोसे डैलगेडी आदि ने गहन विश्लेषण कर निष्कर्ष निकाला कि भावनाएँ शारीरिक व मासिक स्वास्थ्य को अत्यधिक प्रभावित करती है। व्यक्ति की अनेक शारीरिक-मानसिक हलचलें इन्हीं भावनाओं के संकेत पर होती रहती है।
वैज्ञानिकों ने देखा कि आहार-बिहार का अपना महत्व है, पर उतनी भर व्यवस्था सध जाने पर स्वास्थ्य ठीक ही बना रहे, यह निश्चित नहीं। अध्ययन-अध्यापन द्वारा चेतन मन की जानकारी बढ़ती है। पर शिक्षा सुविधाएँ उपलब्ध हो जाने पर व्यक्ति मनोविकारों से रहित, स्वस्थ मस्तिष्क सम्पन्न हो जाए, यह अनिवार्य नहीं।
यही से मन के अचेतन-अधोचेतन-स्तरों की ओर ध्यान गयाँ ड्यूक विश्वविद्यालय में परामनोविज्ञान विभाग के अध्यक्ष डॉ0 राइस ने अपनी पुस्तक “द रीच ऑफ माइन्ड” में “फाइव ग्रेट स्टेप्स’ शीर्षक के अंतर्गत अपने अनेक वर्षों के अनुसंधानों को संश्लिष्ट रूप से प्रस्तुत किया।
इस प्रकार अचेतन मन की अनन्त सामर्थ्य के द्वार खुले। मायर्स ने इसे “सब्लीमाइरनल माइन्ड” नाम दिया। मस्तिष्क के अचेतन स्तरों की खोज इन दिनों गम्भीरतापूर्वक की जा रही है। मनोवैज्ञानिकों ने मस्तिष्क के तीन कार्यक्षेत्र माने है। (1) चेतन (2) उपचेतन (3) अचेतन
उपचेतन तथा अचेतन मस्तिष्क के क्रिया-कलापों के बारे में जैव भौतिक-विज्ञानी दृष्टि से अभी तक ठीक-ठीक कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। एलेक्ट्रोएनसेफालोग्राम से भी इस विशय में स्पष्ट कुछ नहीं जाना जा सका है। अल्फा, बीटा, डेल्टा, थीटा, आदि मस्तिष्कीय लयों (श्रिडडड) से मस्तिष्कीय की विश्रान्ति, सतर्कता, उद्वेग, सुषुप्ति, स्वप्नावस्था आदि का भान मात्र होता है। मस्तिष्क के विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र की भी ऐसी व्यापक जानकारी नहीं मिल सकी है कि कुछ निश्चित निष्कर्ष उस आधार पर निकाले जा सकें। मस्तिष्क के मुख्य भाग (फोरब्रेन) बाबत मात्र 3 प्रतिशत जानकारी मिल सकी है। 67 प्रतिशत अभी भी अविज्ञात ही है। सूक्ष्म विघुदग्रो द्वारा स्मरण-शक्ति को जाग्रत एवं सम्वेदना-विशेष को उद्दीप्त करने के प्रयोग किये जा रहे है। फ्रेंच वैज्ञानिक प्रो0 डेलगाडों ने लूलू नामक डरपोक जानवर की कनपटी में सूक्ष्म विघुदाग्र (इलैक्ट्राड) के द्वारा एक विशेष भाग को उत्तेजित कर दिया, जिससे वह निर्भीक आचरण करने लगा। रूसी वैज्ञानिक प्रोफेसर एनोरबीन ने अपने प्रयोगों द्वारा ‘रेटिक्युलर फार्मेशन’ उन ग्रन्थियों का पता लगाया, जिनमें से कुछ मधुर रसों का स्राव करती है और प्रसन्नता-प्रफुल्लता हँसी, मृदुता, शिष्टता, सौम्यता आदि प्रतिक्रियाओं को जन्म देती है, तो दूसरी ऐसे रस स्रवित करती है, जो चिन्ता, क्षोभ, निराशा, उद्वेग को जन्म दे। डॉ0 एनोरवीन ने यह भी पता लगाया कि इन ग्रन्थियों का स्राव भी विचारों एवं भावनाओं से ही नियन्त्रित होता है।
कनाडा के शोध वैज्ञानिक डॉ0 डब्ल्यू0 जे0 पेनफील्ड ने अपने प्रयोगों द्वारा स्मरण शक्ति की पट्टियों के बारे में आश्चर्यजनक जानकारी एकत्र की। एक व्यक्ति की स्मरण-शक्ति की पट्टी के किसी विशेष हिस्से में विद्युत दौड़ने पर उसकी पूर्वजन्म की स्मृतियाँ जागृत हो गई इन्हीं प्रयोगों से यह भी जाना गया है कि हम जो भी काम करते हैं, वह कितना भी छिपकर क्यों न करें, अचेतन मस्तिष्क में वह सब अंकित होता रहता है।
मस्तिष्क के इन अचेतन स्तरों का ज्ञान हो जाने पर आधुनिक सभ्यता का आधार ही बदल जाएगा। इस सभ्यता का वर्तमान आधार चेतन मन की क्रियाएँ है। यह मन सदा बाह्य वस्तुओं और विषय-सुख में संलग्न रहता है। जब अपने ही भीतर के विशाल खजाने की जानकारी मिल जाएगी, तो उसकी प्राप्ति के लिए सचेष्ट हो जाना स्वाभाविक है।
प्राचीन भारतीय मनीषी मानव-मन के इन स्तरों के जानकारी रखते थे। मन की इन शक्तियों को अभिव्यक्त करने और इन पर अधिकार रखने की कला ही योग है। अचेतन की अनन्त सामर्थ्य का योग-शक्ति द्वारा प्रयोग कर प्राचीन भारतीय मनीषी अतीत-अनागत के ज्ञान, सर्वभूत-सतज्ञान परिचित ज्ञान, पूर्वजन्मों के ज्ञान, भुवनज्ञान, कायव्यूह ज्ञान, तराश्रव्यूह ज्ञान, तारागति ज्ञान, दूरश्रवण, दूरबोध, सर्वज्ञत्व आदि अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न होते थे। योगवासिष्ठ में इसीलिए मन को ‘आकाश’ के समान सर्वत्र स्थित- कहा गया है।
मस्तिष्कीय शक्ति की इन्हीं विशेषताओं का इच्छित विकास व्यक्तित्व को अनन्त विभूति सम्पन्न बना सकता है। श्रवण-शक्ति की दिव्य-क्षमताएँ विकसित कर अनन्त ब्रह्माण्ड में होने वाली हलचलों को सुना-समझा जा सकता है और विश्व में घटित होने वाले घटनाक्रम को जाना जा सकता है। प्राणियों की मनःस्थिति के कारण उत्पन्न होने वाली अदृश्य ध्वनियाँ को समझने की क्षमता भी विकसित की जा सकती है और मानव ही नहीं, पशु-पक्षियों, जीव-जन्तुओं की मनःस्थिति का परिचय प्राप्त किया जा सकता है।
दृश्य-शक्ति का विकास कर अदृश्य जगत की सूक्ष्म हलचलों को प्रत्यक्षतः देखा-समझा जा सकता है और गुप्त रहस्यों का ज्ञान हो सकता है दूर की घटनाओं का ज्ञान, दूरवर्ती आकाश में हो रही सूक्ष्म हलचलों का ज्ञान एवं स्वप्नावस्था में दिव्य-दृश्य तथा भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास इसी दृश्य-शक्ति या तृतीय नेत्र के विकास की साधना के सत्परिणाम है। घ्राण-शक्ति का विकास भी ऐसे ही चमत्कारी सुफल सामने ला सकता है। कुत्तों जैसे जानवरों की विकसित घ्राण शक्ति का सदुपयोग कर आज अपराधों के अचेष्टा में उनसे सहायता ली ही जा रही है। स्वाद-शक्ति (रसना) और वाक् शक्ति (वाणी) का विकास तृप्ति एवं वाग्वल का वचन-सिद्धि का आधार बनता है। त्वचा की संवेदनशीलता का विकास कर उससे परिवेश के सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्पन्दनों को ग्रहण एवं विश्लेषित किया जा सकता है।
प्रखरता के आधार पर विचार-शक्ति तीन भागो में विभक्त होती है। (1) मन्द विचार इनमें जड़ता की मात्रा अधिक होती है। इसलिये यह न तो दूर तक जा सकते हैं न किसी को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे लोग अदूरदर्शी अविवेकी और समस्या ग्रस्त होते हैं। जन-साधारण (2) मन्द विचारों की कोटि में आते हैं, यह लोग अपनी सफलता ओर साँसारिक-जीवन किसी तरह गतिशील तो कर लेते हैं, सम्पत्ति और विद्या-बुद्धि भी प्रचुर संचित कर लेते हैं किन्तु असाधारण कार्य करने की क्षमता उनमें भी नहीं होती। (3) इन्हीं विचारों को गहनता से सोचने और सम्पूर्ण ध्यान शक्ति समर्पित कर देने से वे अत्यधिक वेगवान बलवान हो उठते हैं। उनकी अधिक प्राण-शक्ति काम करने लगती है। हृदय और मस्तिष्क की शक्ति भी संयुक्त हो जाती है। यह वेग तुरन्त आश्चर्यजनक परिणाम देने वाले तथा अनेकों लोगों को इच्छित दिशा में चलाने की सामर्थ्य ओत-प्रोत हो जाते हैं। ऐसे मस्तिष्क न केवल रचनात्मक अपितु ध्वंसात्मक कार्य भी कर सकते हैं। दूर-संचार दूर-दर्शन दूर-श्रवण और पूर्वाभास आदि अतीन्द्रिय कार्य इसी तरह की ध्यानस्था विचार-शक्ति के ही परिणाम होते हैं।
तस्येन्द्रियाण्यवश्याति दृश्टाश्वा इव सारथेः॥
जो योग साधन से रहित, असावधान, चंचल चित्त और संशयग्रस्त रहता है, उसका मन भी अज्ञानी विषयी रहता है और उसकी इन्द्रियाँ अनाड़ी सारथी के घोड़ों की तरह वश में नहीं रहती।
फार्म - 4
1.प्रकाशन का स्थान-मथुरा
2.प्रकाशन का अवधि क्रम-मासिक
3.मुद्रक का नाम-मृत्युंजय शर्मा
राष्ट्रीयता-भारतीय
पता-जन-जागरण प्रेस, मथुरा।
4.प्रकाशक का नाम-मृत्युंजय शर्मा
राष्ट्रीयता-भारतीय
5.सम्पादक का नाम-भगवती देवी शर्मा
राष्ट्रीयता-भारतीय
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।
6.स्वत्वाधिकारी- मृत्युंजय शर्मा
पता-अखण्ड-ज्योति संस्थान, मथुरा।
मैं मृत्युंजय शर्मा यह घोषित करता हूँ कि ऊपर दिये गये सब विवरण मेरी अधिकतम जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य है।
-हस्ताक्षर, मृत्युंजय शर्मा,
विज्ञानमय कोश के भाण्डागार में अतीन्द्रिय अद्भुत क्षमताओं के कोश भण्डार भरे पड़े है। खदान खोद कर रत्न राशि पाने वालों की तरह हम भी साधना प्रयत्नों द्वारा अपनी अलौकिक सिद्धियाँ-लौकिक जीवन में प्रकट कर सकने योग्य बन सकते हैं।
आत्मसत्ता का मूल स्वरूप सत्य, शिव, सुन्दर कहा गया है। परमात्मा सत्ता की व्याख्या सत्-चित् आनन्द रूप में होती है। दोनों ही स्थितियाँ परम सुखद है। सर्वभाव है जीवन को सुखद, सन्तोषजनक और आनन्दमय होना चाहिए।
बहिरंग जगत में चारों और सौंदर्य बिखरा पड़ा हैं प्रकृति की आकृति और प्राणियों की प्रकृति की गहराई में यदि प्रवेश किया जा सके तो वहाँ अन्तरात्मा को पुलकित कर देने वाली शोभा दिखाई पड़ेगा। वस्तुओं की उपयोगिता को सिद्ध करने में ही तो सारा विज्ञान क्षेत्र लगा हुआ है। प्रकृति कामधेनु है, उसमें से एक से एक बढ़े-चढ़े अनुदान प्राप्त किये जा सकते हैं।
अन्तरंग जगत पर दृष्टि डालते हैं, तो उसकी संरचना का कण-कण आनन्द की निर्झरिणी बहाता दिखता है। इन्द्रियों की सम्वेदना इतनी सुखद है कि उनका उपभोग करने में कई बार तो मनुष्य स्वास्थ्य, यश, धन, परलोक आदि की बाजी लगाकर भी किसी भी मूल्य पर अपनी ललक-लिप्सा पूरी करने में आतुरता दिखाता है। मस्तिष्क अपना इच्छित कल्पना-लोक इतना सुन्दर गढ़ सकता है कि उसे वास्तविक जगत से किसी भी प्रकार कम प्रेरणाप्रद नहीं कह सकते। भगवान का बनाया अपना संसार जितना अपने सृष्टा के लिए वास्तविक है, मनुष्य द्वारा अपनी भावना और आस्था के सहारे जैसा भी संसार गढ़ लिया है वही उसकी अनुभूतियों का केन्द्र है। मकड़ी अपना जाला स्वयं बुनती और स्वेच्छा से उसमें निवास करती है। मनुष्य अपने लिए-अपनी आस्थाओं के सहारे अपनी एक नई दुनिया बनाता है और उसमें स्वतंत्रतापूर्वक निवास करता है। अपनी दुनिया भली बनाये या बुरी- स्वर्ग रचे या नरक- यह उसकी इच्छा और क्रिया पर अवलम्बित है। तथ्य जहाँ का तहाँ है। शरीर अपनी तत्परता के-कर्मनिष्ठा के-सहारे हमारे मनोरथ पूरे कराने में कल्प-वृक्ष का काम करता है तो मनःशरीर को कामधेनु कह सकते हैं। हमारी विचारणा, भावना यदि उत्कृष्टता का अवलम्बन पकड़े रहे तो इसका प्रतिफल यह है कि मनुष्य इस धरती पर निवास करते हुए भी स्वर्ग सम्वेदनाओं के रसास्वादन का लाभ हर घड़ी लेता रह सकता है।
कारण शरीर की भाव अभिव्यंजना का तो अन्त ही नहीं। करुणा आत्मीयता जैसी दिव्य सम्वेदनाएँ यदि उमड़ती रहें तो फिर मनुष्य अपने उसी आत्म अनुदान की प्रतिक्रिया से हर घड़ी भाव-विभोर स्थिति में रह सकता है। आत्म-बोध एवं आत्म-जागृति की स्थिति इतनी उच्चस्तरीय है कि मनुष्य अपनी गरिमा को देवात्मा स्तर की- परमात्मा स्तर की अनुभव कर सकता है। उतना ही गौरवान्वित रह सकता है, जितना कि देव सत्ता एवं परमात्मसत्ता अपने को अनुभव करती होगी। यह अध्यात्मिक दृष्टिकोण ही अमृत है। इसे प्राप्त करने पर अजरता, अमरता, प्रौढ़ता, सुन्दरता, प्रखरता की दिव्य विभूतियाँ हर घड़ी अपने को अमृतत्व का मिठास देती रहती है।
जीव साधारणतया सीमाबद्ध रहता है। उसकी ज्ञानेन्द्रिय सीमित रसास्वादन दे पाती है और कर्मेन्द्रियों द्वारा सीमित सम्पदा का उपार्जन हो सकता है। किन्तु मनुष्य के अन्तराल में बीज रूप में इतनी सम्भावनायें भरी पड़ी है जितनी कि इस ब्रह्माण्ड में गुप्त या प्रकट रूप में विद्यमान है। स्थूल जगत कलेवर है, सूक्ष्म जगत उसका प्राण है। कलेवर से प्राण की क्षमता अधिक ही होती है। दृश्यमान पदार्थों की तुलना में ताप, ध्वनि, विद्युत, ईथर आदि की अदृश्य शक्तियाँ अधिक प्रबल है। इस अदृश्य प्रकृति से भी सूक्ष्म जगत की समर्थता असंख्य गुनी बढ़ी-चढ़ी है। उसके साथ सम्बन्ध प्राप्त कर सकने के पश्चात् सीमा-बन्धन समाप्त हो जाते हैं और असीम सामर्थ्य का उदय होता है। अतीन्द्रिय सम्भावनायें ही अभी अपने सामने है। उनके कुछ कौतुक ही कभी-कभी देखने को मिलते और चकित करते रहते हैं। यदि सचमुच उस क्षेत्र में कुछ अधिक प्रवेश मिल सके- दिव्य विभूतियों का उपार्जन एवं उपयोग जाना जा सकें तो उसकी विलक्षणता सिद्ध पुरुषों जैसी हो सकती है। तब मनुष्य में देवत्व का उदय और नर में नारायण का दर्शन हो सकता है। यह परम आनन्द की स्थिति ही होगी।
उपरोक्त कथन का तात्पर्य यह है कि बाह्य जगत और अन्तर्जगत् के दोनों ही क्षेत्र असीम दिव्य संवेदनाओं से भरे पड़े है। उनकी सुखद सम्वेदनाओं का अन्त नहीं। वस्तु स्थिति यही है। अपनी भ्रान्तियों में उलझ कर उपलब्धियों का लाभ नहीं-लिया यह दूसरी बात है कस्तूरी का मृग नाभि में सुगन्ध के भण्डार का समझ नहीं पाता, वह उसे बाहर ढूँढ़ता है और प्राप्त करने के प्रयास में जितनी ही भाग-दौड़ करता है उतना ही थकता और निराश होता है। इस दुर्भाग्य पर दाता को दोष नहीं दिया जा सकता। उसने तो कस्तूरी प्रचुर मात्रा में निकटतम स्थान नाभि में ही भर दी, करतलगत उपलब्धियों का लाभ लेने में भी बुद्धि समर्थ न हो सके तो कोई क्या करे? मृग-तृष्णा के भटकाव में प्रकृति का नहीं कुछ का कुछ और समझने वाले का ही दोष है।
परमेश्वर ने अपने जेष्ठ पुत्र राजकुमार मनुष्य को अपने इस दिव्य उद्यान में -संसार में आनन्द लेने के लिए भेजा है। यहाँ आनन्द की सभी सम्भावनायें एवं सुविधाएँ मौजूद है। दुःख तो हमारे विकृत दृष्टिकोण ओर निकृष्ट क्रिया-कलाप की प्रतिक्रिया मात्र है। यहाँ सुख स्वाभाविक और दुःख कृत्रिम है। परमात्मा ने मनुष्य को अपने इस सुरम्य उद्यान में दुःख भोगने के लिए नहीं आनन्द पाने और आनन्द बिखेरने के लिए भेजा है। इस संसार को अधिक सुन्दर, समुन्नत, समृद्ध एवं सुसंस्कृत बनाने के प्रयास में संलग्न रहकर वह अपने ईश्वर प्रदत्त आनन्द को अपने उपार्जन को जोड़कर अधिकाधिक सुखी, आनन्दित रह सकता है। इसके लिए कोई बड़ा कदम नहीं उठाना पड़ता। इसके लिए मात्र अपनी दुर्बुद्धि का निराकरण और दुष्प्रवृत्ति का निवारण पर्याप्त होता है। आनन्द मनुष्य की पैतृक दुष्प्रवृत्ति का निवारण पर्याप्त होता है। आनन्द मनुष्य की पैतृक सम्पत्ति है। वह उसे उत्तराधिकार में प्रचुर परिमाण में-मिली है। उपलब्धियों का स्वरूप समझना और उनका सदुपयोग करना जानता चाहिए। जिनसे इतना भी नहीं बन पड़ता उन्हें दुर्बुद्धि जन्य दयनीय दुर्दशा में ही पड़ा हुआ माना जायेगा।
परमात्मा आनन्द स्वरूप है। जीव सत्ता के कण-कण में आनन्द का स्रोत है। प्रकृति में सौंदर्य और सुविधा प्रदान करने की आनन्दमयी विशेषता भरी पड़ी है। यहाँ सर्वत्र आनन्द ही आनन्द है। इसी से जीवन को ‘आनन्दमय’ कहा गया है। यह कोश उसे असीम मात्रा में, सहज सुखद रूप से उपलब्ध है। हम आनन्दमय लोक में रह रहे है।
दुर्भाग्य लगभग वैसा ही है जैसा कि कबीर की एक उलटबांसी में व्यक्त किया गया है। वे कहते हैं।-
पानी में मीन पियासी। मोहि लखि-लखि आवे हाँसी॥
कोई व्यक्ति अपने घर का ताला बन्द करके कही चला जाय। लौटने पर ताली गुम जाने से बाहर बैठा ठण्ड में सिकुड़े और दुःख भोगे। ठीक ऐसी ही स्थिति हमारी है। तिजोरी की ताली गुम जाने से दैनिक खर्च में कठिनाई पड़ रही है और भूखा-नंगा रहना पड़ रहा है। आनन्दमय कोश अपने भीतर भरा पड़ा है, किन्तु रहना पड़ रहा है निरानन्द स्थिति में। कैसी विचित्र स्थिति है? कैसी विडम्बना है? यह अपने ही साथ अपना कितना विलक्षण उपहास है।
आनन्दमय कोश की साधना इसी दुःखद दुर्भाग्य का अन्त करने के लिए है। उसके आधार पर उस ताले को खोला जा सकता है जिसमें उल्लास का जय भाण्डागार भरा पड़ा है। यह कार्य आत्मा और परमात्मा के मिलन की विधि-व्यवस्था बनाकर-रीति-नीति अपनाकर ही सम्भव हो सकता है। पंचकोशों की साधना के उच्चस्तर पर पहुँच कर इसी ताली को ढूँढ़ना पड़ता है और ताले को खोलने की व्यवस्था बनानी पड़ती है। जो उसे कर सका उसे फिर यह नहीं कहना पड़ा कि हम निरानन्द नीरस जीवन जीते हैं। दुःख ओर दुर्भाग्य से ग्रसित है।
आनन्दमय कोश की साधना का स्वरूप ईश्वर और नाम भर से परिचित है, उसका नाम जब-तक लेते भी है और भजन-पूजन का उपक्रम भी चलाते हैं, पर यह प्रयत्न होता ही नहीं कि ईश्वर को अपने में-और अपने को ईश्वर में-समाहित करने का प्रयत्न करें। इस समन्वय का कितना सुखद परिणाम हो सकता है इसकी कभी कल्पना भी तो नहीं आती। आमतौर से ईश्वर एक ऐसा व्यक्ति माना जाता है जो थोड़े से स्तवन पूजन से प्रसन्न किया जा सकता है और जिससे तुर्त-फुर्त मनोवाँछित वरदान मिल सकते हैं। इसी प्रलोभन में पूजा उपचार की सारी विडम्बनाएँ चलती है। ऐसे भगवत् भक्त कहाँ है, जो अपने ऊपर ईश्वरीय अनुशासन की स्थापना करते हैं। अपना समग्र समर्पण उसके चरणों में प्रस्तुत करते हैं वस्तुतः भक्ति का यही स्वरूप है। यह जहाँ भी अपने वास्तविक स्वरूप में होगी वहाँ निश्चित रूप से अमृत की वर्षा हो रही होगी। स्वर्गीय परिस्थितियाँ बनी होगी। उल्लास बिखरा पड़ा होगा, सन्तोश की शान्ति रह रही होगी। आत्मा और परमात्मा का यथार्थ मिलन रसास्वादन कैसे सम्भव हो सकता है? इसकी पृष्ठभूमि क्या है? यह जानने के लिए हमें आनन्दमय कोश की विवेचना एवं साधना की गहराई में उतरना होगा।
श्रेष्ठ तत्वों का मिलन कितना सुखद होता है इसकी जानकारी सभी को है। पृथ्वी को सन्तुलित सूर्य सम्पर्क मिला और यहाँ जीवन की उत्पत्ति हुई। जिन ग्रह -पिण्डों को यह सुयोग नहीं मिला वे निर्जीव निस्तब्ध पड़े है। गंगा-यमुना के मिलन से संगम बना और तीर्थराज प्रयाग का महत्व बढ़ा। लौह पारस के स्पर्श से सोना बनने वाली बात प्रख्यात है। दो गैसें मिलकर पानी बनाती है। जड़ और चेतन के मिलन से गतिशील शरीर बनाता है। ऋण और धन विद्युत के मिलन से शक्तिधारा प्रवाहित होती है। जिधर भी आँख उठा कर देखा जाय श्रेष्ठता के साथ सम्पर्क से लाभ ही लाभ है। इस मिलन प्रक्रिया को अपनाकर तो दुष्ट, दुरात्मा भी अपनी दुरभि संधियाँ तक पूरी करते रहते हैं। ब्रह्म और जीव का-आत्मा और परमात्मा का मिलन कितना भाव-विभोर कर देने वाला समर्थता और सम्पन्नता से भर देने वाला-आनन्द के समुद्र में डूबो देने वाला है। इसे शब्दों में नहीं बताया जा सकता, यह तो विशुद्ध रूप से अनुभूति का विशय है। भगवत् भक्तों की गरिमा पर जब दृष्टिपात करते हैं तो लगता है इसी में जीवन की सच्ची सार्थकता है।
श्रद्धा और भक्ति का युग्म है। श्रद्धा कहते है-श्रेष्ठता के प्रति असीम निष्ठा एवं आस्था को अन्तःकरण की गहराई में स्थापित करना। भक्ति कहते है-प्रेम सम्वेदना को-आत्मीयता की अनुभूति को। ईश्वर की उपासना श्रद्धा ओर भक्ति के आधार पर ही सम्भव होती है।पूजा उपचार तो उन सम्वेदनाओं को उभारने वाले प्रयोग अभ्यास भर है। ईश्वर परायणता की परख श्रद्धा और भक्ति की कसौटी पर ही होती है।
ईश्वर व्यक्ति नहीं, शक्ति है। उसे मनुष्यों की तरह मनुहार उपहार के सहारे प्रसन्न नहीं किया जा सकता। बिजली का समुचित लाभ उठाने के लिए उसके उपयोग की मर्यादाओं को अपनाना पड़ता है। ईश्वर की प्रसन्नता इन तथ्यों पर अवलम्बित है जिन्हें उत्कृष्टता के नाम से जाना जाता है। जिसे भावना क्षेत्र में आस्तिकता, चिन्तन, क्षेत्र में आध्यात्मिकता और कर्मक्षेत्र में धार्मिकता के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
उपासना का स्वरूप है- समन्वय। भक्ति का चरम लक्ष्य है- समन्वय-एकीकरण-समर्पण द्वैत को मिटा कर अद्वैत की स्थापना। यह नाले का नदी में समर्पण हुआ। इसे कठपुतली का बाजीगर की उँगलियों के साथ गठबंधन कहा जा सकता है। इसे पत्नी का पति का वरण समझा जा सकता है-अनुशासन की स्थापना यही है। अपनी स्वतन्त्र इच्छा आकांक्षा समाप्त करके ईश्वरीय अनुशासन को अपने ऊपर स्थापित कर लेना-समर्पण यही है। इसी आत्म-समर्पण की गीता में भगवान ने भक्त से माँग की है। ईंधन अपने को अग्नि में डालकर अग्निमय हो जाता है। पानी दूध में मिलकर एक रूप बन जाता है। ईश्वर को मनोकामना पूर्ति का ‘ट्रल’ नहीं बनाया जाना चाहिए, वरन् उसकी गरिमा में अपने आपको आत्मसात् कर देना चाहिए। इसी स्थिति को ब्रह्म निर्वाह-ईश्वर दर्शन या भगवत् प्राप्ति कहा गया है। यही ब्रह्मविद्या की अद्वैत साधना है। इसी आधार पर नर को नारायण-पुरुष को पुरुषोत्तम-जीव को ब्रह्म-आत्मा को परमात्मा बनने का अवसर मिलता है।
प्रेम में आकर्षण है- चुम्बकत्व है। प्रेमी की समीपता सुहाती है, उसी के लिए अधीरता रहती है। ईश्वर भक्ति का-भगवत् प्रेम का-स्वरूप यही है कि बीच की दूरी को समाप्त किया जाय। दोनों के बीच गहन समस्वरता दिखाई दे। इस स्थिति में या तो ईश्वर को जीव की इच्छानुसार काम करना पड़ेगा या जीवन को ईश्वर का अनुवर्ती बनना पड़ेगा। स्पष्ट है कि नदी नाले में नहीं मिल सकती, उसकी गहराई, चौड़ाई इतनी नहीं है जिसमें नदी समा सके। नाले का ही नदी में मिलना सम्भव है। जीव का इच्छानुवर्ती ईश्वर नहीं हो सकता। यह भ्रान्ति छोड़ देनी चाहिए। भक्त को ही भगवान् का अनुवर्ती होना चाहिए। यह कार्य भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं को समाप्त करके, ईश्वर के अनुवर्ती बनने से ही होता है। श्रद्धा और भक्ति का स्वरूप यही है। इसी आधार पर ईश्वर प्राप्ति का आनन्द लिया जा सकता है।
ईश्वर प्रेम सीमाबद्ध नहीं रह सकता। हिमालय के हृदय से निकली हुई गंगा, कही अवरुद्ध नहीं बैठी रहती, वरन् सूखे भू-खण्डों और प्यासे प्राणियों की प्यास बुझाती हुई अपनी क्षुद्रता को समुद्र की विशालता में समर्पित करती है। भक्ति का अर्थ है-प्रेम प्रेम सम्वेदना की प्रतिक्रिया है-आत्मीयता करुणा, उदारता, सेवा सद्भावना। यह श्रेष्ठ सम्वेदनाएँ कल्पना ओर भावना क्षेत्र में आगे बढ़कर जब व्यवहार बनकर विकसित होती है। तो उसका स्वरूप आत्म-निर्माण और लोक-निर्माण के विविध क्रिया प्रयोजनों में ही परिलक्षित होता है। अपने को और दूसरों को ईश्वर की शरण में ले जाने की- श्रद्धा ओर भक्ति का अवलम्बन, आश्रय दिलाने की-ही आकांक्षा प्रबल रहती है निरन्तर इसी दिशा में सोचा जाता है और ऐसे ही कृत्य करने का ताना-बाना बुना जाता है।
यही है वह स्थिति-जिसे आनन्दमय कोश की जागृति कह सकते हैं। पंचकोशी गायत्री उपासना की यही सर्वोच्च स्थिति है। इसमें निरन्तर ईश्वर दर्शन की अनुभूति होती है। भगवान सूक्ष्म है, उसका साक्षात्कार भावानुभूति के रूप में ही होता है। आँखों से खिलौने की तरह ईश्वर को देखने की इच्छा करना बाल-बुद्धि के अतिरिक्त और कुछ नहीं। जब हवा, सर्दी, मैत्री, क्रोध, सुख, दुख जैसे प्रत्यक्ष आँख से नहीं देखे जा सकते तो ईश्वर जैसे अचिन्त्य, अप्रमेय को इन चर्म-चक्षुओं से देखा जा सकना कैसे सम्भव हो सकता है? जिन्हें ऐसे दृश्य दीखते भी है वे उनकी ध्यान चेतना की प्रगाढ़ता का परिचय मात्र देते हैं। उन्हें दिवा स्वप्न के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। ईश्वर दर्शन तो अन्तःकरण में दिव्यता की झाँकी करने के रूप में ही होते हैं। उसके लिए श्रद्धा और भक्ति के दो पैरों के सहारे लम्बी यात्रा पूरी करनी पड़ती है।
आनन्दमय क्रोश-श्रद्धा और भक्ति का उद्गम केन्द्र है। वहाँ ईश्वर मिलन की अनुभूति होती है। मूलाधार में अवस्थित जीव चेतना कुण्डलिनी को सहस्रार स्थित ब्रह्म चेतना में मिलाया जाता है। शक्ति शिव से मिलती है। अग्नि कुण्ड में दग्ध हुई सती को फिर नये शरीर से शिव को वरण करने का अवसर मिलता है। अस्तु ईश्वर मिलन का लक्ष्य पूरा करने के लिए गायत्री की उच्चस्तरीय पंचकोशी साधना में-कुण्डलिनी जागरण की विधि-व्यवस्था बनी है भावनात्मक क्षेत्र में इस दिव्य मिलन की प्रतिक्रिया आनन्द और उल्लास के रूप में दृष्टिगोचर होती है। संसार के श्रेष्ठ-देव पक्ष को देखते हुए प्रसन्न होना आनन्द है और निकृष्ट-दैत्य पक्ष को निरस्त करने के लिए उमगते हुए शौर्य, साहस का नाम है-उल्लास धर्म की स्थापना और अधर्म के नाश के लिए ईश्वर का अवतार होने की प्रतिज्ञा को साधक अपने ही भीतर पूरी होते देखता है। उसे लगता है कि भगवान का अवतार आनन्द और उल्लास के-श्रद्धा ओर भक्ति के-कुण्डलिनी जागरण के रूप में अपने ही भीतर हो रहा है। आनन्दमय कोश का यह भाव पक्ष है।
कुण्डलिनी जागरण को आनन्दमय क्रोश का शक्ति पक्ष कहा गया है। ईश्वर भाव-सम्वेदना भी है और समृद्धि सामर्थ्य का भण्डार भी। श्रद्धा और भक्ति के आधार पर की गई सोऽहम् साधना, खेचरी मुद्रा जैसी उपासना भाव पक्ष को समुन्नत करती है। कुण्डलिनी जागरण से शक्ति पक्ष उभरता है। उससे मानवी अस्तित्व में ईश्वरीय वर्चस्व की प्रचण्डता प्रकट होती है। आनन्दमय कोश की कुण्डलिनी साधना में भक्ति और शक्ति दोनों का समन्वय है।
पृथ्वी के उत्तरी दक्षिणी ध्रुवों की तरह मानवी काया के भी दो आधार है-जिन्हें धुरी के दो छोर कह सकते हैं। इनमें से एक है ब्रह्मरंध्र स्थित सहस्रार कमल, दूसरा है मल-मूत्र छिद्रों के मध्य मूलाधार चक्र। सहस्रार चक्र को उत्तरी ध्रुव और मूलाधार को दक्षिणी ध्रुव समझा जाना चाहिए। ब्रह्मरंध्र में ज्ञान बीज और जननेन्द्रिय मूल में काम बीज माना जाता है। स्थूल रूप से तो शरीर के सभी अंगों में रक्त माँस आदि भरे है, पर सूक्ष्म रूप से अवयवों के मध्य जो चेतना संस्थान है उसे शक्ति चक्र कहा जाता है। चक्र शृंखला में आदि और अन्त के यही दो प्रमुख हैं। शेष तो इन्हीं के मध्यान्तर में बने हुए हैं।
मस्तिष्क के ‘ज्ञान बीज’ से हमारी समस्त चेतना प्रभावित होती है। शरीर निर्वाह तथा लोक-व्यवहार में उसी की भूमिका प्रधान है उच्चस्तरीय भूमिका में यही केन्द्र अतीन्द्रिय क्षमताओं का उद्गम स्रोत सिद्ध होता है। और अन्ततः ब्रह्म और जीव को मिलाने वाली जीवन लक्ष्य को पूर्ण करने वाली-परमानन्द प्रक्रिया भी यही सम्पन्न होती है। ब्रह्मरंध्र अर्थात् ब्रह्म संस्थान, ब्रह्मलोक गायत्री की ब्राह्मी शक्ति कहा गया है उसका प्रभाव क्षेत्र ज्ञान चेतना है। गायत्री को ब्राह्मणी-ब्रह्म-पत्नी कहा गया है। उसकी सामर्थ्य व भौतिक जगत में दुःख दारिद्र का विनाश करने वाले ब्रह्मरंध्र के रूप में दृष्ट-दुश्कलों को परास्त करने वाले ब्रह्म दण्ड के रूप में देखा जाता है। अध्यात्म क्षेत्र में उसका स्वरूप ब्रह्म वर्चस् के रूप में देखा जाता है। गीता में कही गई ब्राह्मी स्थिति और उपनिषद् में वर्णित ब्रह्म चेतना का उद्भव उन्नयन इसी महाशक्ति के माध्यम से होता है।
पौराणिक कथा के अनुसार ब्रह्म जी के दो पत्नियाँ थी। प्रथम गायत्री दूसरी सावित्री। इसे अलंकारिक प्रतिपादन में ज्ञान चेतना और पदार्थ सम्पदा कहा जा सकता है। इसमें एक परा प्रकृति है, दूसरी अपरा। परा प्रकृति के अंतर्गत मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार-अहंकार चतुष्टय ऋतम्भरा प्रज्ञा आदि का ज्ञान क्षेत्र आता है। दूसरी पत्नी सावित्री, इसे अपरा प्रकृति, पदार्थ चेतना जड़ प्रकृति कहा जाता है। पदार्थों की समस्त हलचलें-गतिविधियाँ-उसी पर निर्भर है। परमाणुओं की भ्रमणशीलता, रसायनों की प्रभावशीलता, विद्युत, ताप, प्रकाश, चुम्बकत्व, ईथर आदि उसी के भाग है। पदार्थ विज्ञान इन्हीं साधनों को काम में लाकर अगणित आविष्कार करने और सुविधा साधन उत्पन्न करने में लगा हुआ है। इसी अपरा प्रकृति को सावित्री कहते हैं। कुण्डलिनी इसी दूसरी शक्ति का नाम है।
चेतना की शक्तियों का वारापार नहीं। विद्वान, विज्ञानी, आत्म-वेत्ता महामानव, ऋषि, मनीषी इसी शक्ति का अपने-अपने ढंग से अपने-अपने क्षेत्र में उपयोग करके अपने क्षेत्र में प्रगति करते हैं। मस्तिष्कीय विकास के लिए स्कूली प्रशिक्षण से लेकर स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन, मनन और साधना समाधि तक के अगणित प्रगति प्रयास इसी आधार पर होते हैं। व्यक्तित्व और वर्चस्व की-प्रखरता की समस्त सम्भावनायें इसी क्षेत्र के साथ जुड़ी हुई है। परा प्रकृति की साधना एवं गायत्री उपासना के सहारे ही अन्तःचेतना का विकास होता है।
दूसरी शक्ति सावित्री-पदार्थ शक्ति, क्रियाशीलता इस अपरा प्रकृति से ही प्राणियों का शरीर संचालन होता है और संसार का प्रगति चक्र चलता है। शरीर में श्वास-प्रश्वास रक्त-संचार निद्रा-जागृति पाचन-विसर्जन ऊष्मा-ऊर्जा विद्युत प्रवाह आदि अगणित क्रिया-कलाप काया के क्षेत्र में चलते हैं। संसार का हर पदार्थ क्रियाशील है। उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन का गतिचक्र इस सृष्टि में अनवरत गति से चलता है। प्राणी और पदार्थ सभी अपने-अपने ढंग से प्रगति पथ पर द्रुतगति से दौड़ रहे है। विकास की दिशा में कण-कण को धकेला जा रहा है। निष्क्रियता को सक्रियता के रूप में बदलने का प्रेरणा केन्द्र जिस महतत्व में सन्निहित है, उसे अपरा प्रकृति कहते हैं। सत्, रज, तम-पंचतत्व तन्मात्राएँ आदि का सूत्र संचालन यही शक्ति करती है। सिद्धियाँ और वरदान इसी के अनुग्रह से मिलते हैं। ब्रह्म जी की द्वितीय पत्नी सावित्री इसी को कहते हैं। मनुष्य शरीर में आरोग्य, दीर्घजीवन, बलिष्ठता, स्फूर्ति, साहसिकता, सौंदर्य आदि अगणित विशेषताएँ इसी पर निर्भर है। यों इसका विस्तार तो सर्वत्र है, पर पृथ्वी में ध्रुव केन्द्र में और शरीर के मूलाधार चक्र में इसका विशेष केन्द्र है। साधना प्रयोजन में इसी को कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं।
गायत्री और सावित्री दोनों परस्पर पूरक है। इनके मध्य कोई प्रतिद्वंद्विता नहीं। गंगा-यमुना की तरह ब्रह्म हिमालय की इन्हें दो निर्झरिणी कह सकते हैं। सच तो यह है कि दोनों अविच्छिन्न रूप से एक-दूसरे के साथ गुँथी हुई है। इन्हें एक प्राण दो शरीर कहना चाहिए। ब्रह्मज्ञानी को भी रक्त-माँस का शरीर और उसके निर्वाह का साधन चाहिए। पदार्थों का सूत्र संचालन चेतना के बिना सम्भव नहीं। इस प्रकार यह सृष्टि क्रम दोनों के संयुक्त प्रयास से चल रहा है। जड़-चेतन का संयोग बिखर जाय तो फिर दोनों में से एक का भी अस्तित्व शेष न रहेगा। दोनों अपने मूल कारण में विलीन हो जायेंगे। इसे सृष्टि के- प्रगति रथ के-दो पहिये कहना चाहिए। एक के बिना दूसरा निरर्थक है। अपग तत्त्वज्ञानी और मूढ मति नर-पशु दोनों ही अधूरे है। शरीर में दो भुजाएँ, दो पैर, दो आँख, दो फेफड़े, दो गुर्दे आदि है। ब्रह्म शरीर भी अपनी दो शक्ति धाराओं के सहारे यह सृष्टि प्रपंच संजोये हुए है, इन्हें उसकी दो पत्नियाँ, दो धाराएँ आदि किसी भी शब्द प्रयोग के सहारे ठीक तरह वस्तु स्थिति को समझने का प्रयोजन पूरा किया जा सकता है। पत्नी शब्द अलंकार मात्र है चेतन सरता का कुटुम्ब परिवार मनुष्यों जैसा कहाँ है? अग्नि तत्व की दो विशेषताएँ है-गर्मी और रोशनी। कोई चाहे तो इन्हें अग्नि की दो पत्नियाँ कह सकते हैं। यह शब्द अरुचिकर लगे तो पुत्रियाँ कह सकते हैं। सरस्वती को कही ब्रह्मा की पत्नी कही पुत्रियाँ कहा गया है। इसे स्थूल मनुष्य व्यवहार मात्र उपमा भर के लिए है। आत्म शक्ति को गायत्री और वस्तु-शक्ति को सावित्री कहते हैं। सावित्री को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। उसमें शरीरगत प्राण ऊर्जा की प्रस्तुति, विकृति के निवारण का प्रयास होता है। बिजली की ऋण और धन दो धाराएँ होती है। दोनों के मिलने पर ही शक्ति प्रवाह बहता है। गायत्री और सावित्री के समन्वय से साधना की समय आवश्यकता पूरी होती है। गायत्री साधना का सन्तुलित लाभ उठाने के लिए सावित्री शक्ति को भी साथ लेकर चलना पड़ता है।
अध्यात्म क्षेत्र में ज्ञान भाग को दक्षिण मार्ग कहते हैं उसे निगम-राजयोग वेद मार्ग आदि भी कहा जाता है। दूसरे क्रिया भाग को वाम मार्ग, आगम, तन्त्र, हठयोग आदि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। दोनों पृथकता-प्रतिकूलता हानिकारक है। इससे कलह और विनाश उत्पन्न होता है। देवासुर संग्राम के-उपाख्यानों को पढ़कर किसी को प्रसन्नता नहीं होती। उस वर्णन का पढ़कर खिन्नता ही उभरती है दोनों जब मिलकर साथ चलें-समुद्र मंथन में सहयोग किया तो उस क्षेत्र में दबी हुई प्रचुर सम्पदा उपलब्ध हुई। समुद्र मंथन के फलस्वरूप बहुमूल्य चौदह रत्न निकलने की कथा सर्वविदित है।लक्ष्मी, अमृत-कलश कामधेनु, कल्प-वृक्ष आदि उसी सम्मिलित प्रयास के फलस्वरूप उपलब्ध हुए थे। जब तक देव और दानव पृथक्-पृथक् रहे- लड़ते-झगड़ते रहे- कष्ट और विनाश के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त न कर सके, पर जैसे ही सहयोग बना वैसे ही समुद्र मंथन और उसकी उपलब्धि का आधार बन गया। गायत्री और सावित्री के समन्वय को ठीक इसी प्रकार के देवासुर सहयोग स्तर का कहा जा सकता है।
शिव और पार्वती के विवाह से दोनों का एकाकीपन दूर हुआ था। दोनों के संयोग से दो पुत्र हुए एक सिद्धि-दायक गणेश। दूसरे अमुर निकंदन कार्तिकेय। एक से धर्म की स्थापना होती है दूसरे से अधर्म के विनाश की। गणेश का वरदान ‘प्रज्ञा’ और कार्तिकेय का अनुदान ‘शक्ति’ है। कार्तिकेय के छः मुख है, इन्हें हठयोग के षट्चक्र कहते हैं।
गायत्री की सर्वोपयोगी सर्व-सुलभ साधना नित्य-कर्म में सम्मिलित की गई है। संध्या वन्दन अध्यात्म साधना का अनिवार्य अंग है। ‘संध्या’ का कृत्य गायत्री उपासना के बिना नहीं हो सकता। इसके उपरान्त आगे की विशेष साधनाएँ अपनाई जाती। एक अनुष्ठान दूसरा पुरश्चरण।
गायत्री साधना को चेतना पर चढ़े कषाय-कल्मषों के निवारण की पुण्य प्रक्रिया कह सकते हैं इससे आत्मसत्ता के दिव्य स्वरूप का निखार होता है। भौतिक क्षेत्र में आत्म-चेतना का प्रभाव उत्पन्न करने के लिए सावित्री साधना का उपयोग करना पड़ता है। आत्मा को संसारी वर्चस्व बनाने के लिए शरीर धारण करना पड़ता ह। गायत्री रूपी आत्मा को संसारी कर्तव्यों की पूर्ति के लिए जिस सामर्थ्य की आवश्यकता पड़ती है, उसे सावित्री साधना से सम्पन्न किया जाता है। पंचकोशी साधना इसी को कहते हैं।
कुण्डलिनी की शक्ति और महिमा पर प्रकाश डालने वाले अनेकों शास्त्र वचन उपलब्ध होते हैं।
या देवता भोग करीसा। मोक्षायन कल्पते। मोक्षदा नहि भोगाय त्रिपुरा तु द्वय प्रदा-त्रिपुरा तन्त्र
जो देवता भोग देते हैं, वे मोक्ष नहीं देते। जो मोक्ष देते हैं वे भोग नहीं देते। पर कुण्डलिनी दोनों प्रदान करती है।
उद्घाट्येत्कपाटं तु यथा कुंचिकया हठात्। कुंडलिन्या तथा योगी मोक्ष द्वारं विभेदयेत्-शाभवी तन्त्र
जिस प्रकार कोई मनुष्य अपने बल से द्वार पर लगी हुई अर्गला आदि का ताली से खोलता है, उसी प्रकार योगी कुण्डलिनी के अभ्यास द्वारा सुशुम्ना के मार्ग का भेदन करता है। ओर ब्रह्म-लोक में पहुँच कर मोक्ष को प्राप्त होता है।
मूलाधारे आत्मशक्तिः कुण्डलिनी परदेवता। शायिता भुजगाकारा सार्द्ध़त्रय बलयान्विता॥
यावत्सा निद्रिता देहे तावज्जीवः पशुर्यथा। ज्ञानं न जायते तावत् कोटियोगविधेरपि॥
आधार शक्ति निद्रायाँ विश्व। भवति निद्रया। तस्याँ शक्ति प्रबोधेन त्रैलोक्यं प्रति बुध्यते-महायोग विज्ञान
आत्म-शक्ति कुण्डलिनी मूलाधार चक्र में साड़े में साड़े तीन कुण्डलिनी लगाये हुए सर्पिणी की तरह शयन करती है।जब तक वह सोती रहती है तब तक जीव पशुवत् बना रहता है। बहुत प्रयत्न करने पर भी तब तक उसे ज्ञान नहीं हो पाता। जिसकी आधार शक्ति सो रही है उसका सारा संसार ही सो रहा है। पर जब वह जागती है तो उसका भाग्य और संसार ही जाग पड़ता है।
यदा भवति सा संविद्विगुणीकृतविग्रहा। स प्रसूते कुण्डलिनी शब्द ब्रहमयी विभुः॥
शक्ति ततो ध्वतितस्मात्रादस्तसमान्निबोधिका। ततोडर्धेन्दुस्ततो बिन्दुम्तस्मादसीत्परा ततः।
पश्यन्ती मध्यमा वाणी वैखरी सर्ग जन्मभूः। इच्छा ज्ञान-क्रियात्मासौ तेजोरुपा गुणात्मिका॥ क्रमेणानेन सृजति कुण्डली वर्णमालिकाम-महा तन्त्र
जागृत हुई कुण्डलिनी असीम शक्ति का प्रसव करती है। उससे जाद जागृत होता है। फिर बिन्दु। परा, पशन्ती, मध्यमा और वैखरी यह चारों वाणियाँ प्रखर होती है। इच्छा-शक्ति ज्ञान-शक्ति और क्रिया-शक्ति में उभार आता है और वर्ण मालिका की शृंखला से सम्बद्ध अनेक शारीरिक, मानसिक शक्तियों का विकास होता है।
शक्ति कुण्डलिनोति विश्वजननव्यापाराबद्धोद्यमा। ज्ञात्वे थं न तुनर्विशन्ति जननागर्भेडर्भकत्वंनराः-शक्ति तन्त्र
कुण्डलिनह महाशक्ति के प्रयत्न से ही संसार का सारा व्यापार चल रहा है जो इस तथ्य को जान लेता है वह शोक-सन्ताप भरे बन्धनों में नहीं बँधा रहता।
कूजन्ती कुलकुण्डली च मधुरं मत्तालिमालास्फुट, वाचः कोमलकाव्यवन्धरचनाभेदातिभेदक्रमैः। श्वासोच्छ्वास विभजनेन जगताँ जीवों यया धार्यत। स मूलाम्बुजगहरे विलसति प्रोछामदीप्त्याबलः-शट्चक्र निरुपणम्
कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने पर वाणी में मधुरता आ जाती है। काव्य-कला और साहित्य में प्रगति होनी है यह मूलाधार चक्र में दीप शिखा जैसी चन्द्र ज्योति जैसी प्रकाशित है, प्राण वायु द्वारा यह धारण की जाती है।
शरीर की उत्पत्ति काम बीज में है। फाइड के अनुसार वह बालकपन में दुग्ध-पान से लेकर साथियों की छेड़छाड़ के अनेक रूपों में विकसित होता है। किशोरावस्था में वह जोश बनकर उभरता है होश को पीछे छोड़कर जोश की जो तूफानी लहरें उठती है उनमें मनोविज्ञानी काम तत्व की प्रबलता देखते हैं। लड़कों में नये स्थान पर नये केश उत्पन्न होने- जननेन्द्रिय में प्रौढ़ता बढ़ने के रूप में उसकी अभिवृद्धि प्रकट होती है। लड़कियों में रजो-दर्शन तथा वक्षस्थल का उभार इसी का प्रमाण है। कल्पना क्षेत्र में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षक कल्पनाओं के आँधी-तूफान उठने लगते हैं। आगे चलकर इसकी परिणति प्रणय में होती हैं दाम्पत्य सूत्र जुड़ते हैं आदान-प्रदान के भाव भरे रसास्वादन मिलते हैं और सन्तानोत्पत्ति का क्रम चल पड़ता है। एक नये गृहस्थ का-नये परिवार का श्री गणेश होता है। और पति-पत्नी को उसी की विविध-व्यवस्थाएँ जुटाने में अपनी लगभग पूरी शक्ति झोंकनी पड़ती है यह काम बीज से उत्पन्न वट-वृक्ष है, जिसका विस्तार भली या बुरी व्यस्त क्रिया प्रक्रियाओं में होता है। जीवन सम्पदा का उत्सर्ग इसी वेदी पर होता देखा गया है। बीज-बीच में उच्छृंखल यौनाचार की कल्पनाएँ अथवा क्रियाएँ अपने अलग ही कुहराम मचाती रहती है उन पर सामाजिक नियन्त्रण न हो तो उस स्वेच्छाचार की प्रतिक्रिया से सामाजिकता का, पारिवारिकता का, सभ्यता का, मानवी प्रगति का अन्त हुआ ही समझना चाहिए। अपराधों के घटना-क्रम में काम-विग्रह का-उसकी विकृत प्रतिक्रिया का-जितना हाथ रहता है उतना सब अनाचारों से मिलकर भी नहीं होता। नीति मर्यादाओं का उल्लंघन इसी प्रबल प्रेरणा से आये दिन होता रहता है।
इतने प्रेरक तत्व को तुच्छ मानकर नहीं चलना चाहिए। उसकी सामर्थ्य असीम है। एक शरीर से दूसरे का उत्पन्न होना इस सृष्टि का अभ्यस्त किन्तु अद्भुत आश्चर्य है। मानव तत्व की भावना, विचारणा एवं क्रिया को अपने जाल-जंजाल से समेट बटोर कर बैठ जाना इसी आकर्षण का काम है। भव-बन्धनों की चर्चा जब-तब होती रहती है। प्रकारान्तर से वह संकेत काम-विग्रह के लिए ही किया गया होता है गीता के कर्मयोग में निष्काम होने पर जोर दिया गया है। यों उसका मोटा अर्थ कामनाओं से पीछा छुड़ाकर कर्तव्य-परायण होना है, पर गहराई में उतरने पर उसमें ‘काम’ रहित होने पर उच्च स्तरीय आत्मिक प्रगति होने-आत्म-कल्याण एवं ईश्वर दर्शन का लाभ मिलने का तथ्य सामने आ खड़ा होता है।
ब्रह्मचर्य का महत्व सनातन धर्म के रूप में सभी सम्प्रदायों ने समान रूप से बताया है। उसके कई प्रकार के लाभ सत्परिणाम बताये है। ब्रह्मचर्य का मोटा अर्थ संयोग से बचना बताया गया है। यह शारीरिक मर्यादा है। पर इसका लाभ भी तभी होता है जब उसे मानसिक रूप से भी निबाहा जाय। सच तो यह है कि वह प्रसंग शारीरिक कम और मानसिक अधिक है। मन में कामुकता छाई रहे तो शरीर संयम निरर्थक ही नहीं कई बार तो हानिकारक ही होता है। शरीर शास्त्री काम निरोध को हानिकारक भी बताते हैं। यह बात उस स्थिति में सही भी है जब मानसिक असंयम तो बनाये रहा जाय किन्तु शरीर को हठपूर्वक नियन्त्रित किया जाय। ऐसी दशा में स्वप्न दोष होने लगेंगे अथवा गुप्त कुकृत्यों का सिलसिला चल पड़ेगा। इसमें प्रत्यक्ष मैथुन से कम नहीं अधिक ही हानि है। इसके विपरीत यदि धर्म-पत्नी के साथ, मित्र, सहचर, सहोदर के भाव से रहा जाय और आवश्यकतानुसार मर्यादित काम सेवन क्रम भी चलता रहे तो उसकी कोई बुरी प्रतिक्रिया न होगी। सच तो यह है कि उससे कुकल्पनाओं और कुचेष्टाओं को निरस्त करने में सहायता भी मिलेगी। देवताओं, ऋषियों और महामानवों को भी जब विवाहित जीवन-चक्र अपनाते देखते हैं तो लगता है यह कोई गर्हित कृत्य नहीं है। यदि ऐसा होता तो वे इस मार्ग पर क्यों चलते?
यहाँ विवाहित रहने या अविवाहित रहने की उपयोगिता के पक्ष-विपक्ष के कुछ नहीं कहा जा रहा है। व्यक्ति विशेष की मनःस्थिति, परिस्थिति एवं कार्य-पद्धति को देखते हुए दोनों ही मार्ग उपयोगी है। जिन्हें उच्च आदर्शों में निरत रहना है उन्हें अपनी शक्तियाँ बचाकर लक्ष्य के लिए अधिक कुछ कर सकना तभी हो सकता है। जब गृहस्थ का भार ढोने से अवकाश मिले। प्राचीन काल के साधु परम्परा यह रास्ता अपनाती रही है। परिव्राजक कार्य-पद्धति में, न्यूनतम निर्वाह में, चिन्ता मुक्त रहने में उन्हें सुविधाएँ अविवाहित रहकर ही मिलती थी। इसके विपरीत जिन्हें आश्रम चलाने पड़ते थे वे सुविधा देखते थे। जो हो यह प्रसंग यहाँ नहीं उठना है। चर्चा काम प्रक्रिया की हो रही थी। वह शरीर क्षेत्र से कम और मनः क्षेत्र से अधिक सम्बन्धित है। शरीर का ब्रह्मचारी मन से व्यभिचारी रहे तो उसे इस प्रति बन्धन की विडम्बना का कोई लाभ न मिल सकेगा। इसके विपरीत यदि मन पवित्र रहे तो गृहस्थ भी एक योगी बन सकता है। तब घर में तपोवन का वातावरण बना देना कुछ कठिन न होगा। वासना और विलासिता का स्थान यदि स्वच्छ सहकार और बालकोपम् हास्य-विनोद ग्रहण कर ले तो उसे बाधित ब्रह्मचर्य से कम नहीं अधिक लाभदायक ही कहा जायेगा।
समस्या यहाँ आकर अटक जाती है कि यदि काम बीज जीवन चेतना की इतनी गहराई में घुसा बैठा है उसकी शक्ति इतनी प्रबल और जड़ इतनी गहरी है तो फिर उससे बच सकना कैसे हो सकता है? तब ब्रह्मचर्य के लाभों से लाभान्वित कैसे हुआ जा सकता है? यदि संयम न बरता जाय तो ओजस् की क्षति होती है। यदि बरता जाय तो दमित मानस विकृत ग्रन्थियों का हानिकारक संग्रह करता है। इधर खाई, उधर कुआँ। आखिर किया जाय तो क्या किया जाय?
मनीषियों ने इसका उत्तर कुण्डलिनी जागरण की साधना के रूप में दिया है। इसका कर्मकाण्ड और विधिविधान जितना चमत्कारी है उससे अधिक महत्वपूर्ण है उसका तत्व दर्शन। कुण्डलिनी विधान जानने से पहले उसका दर्शन जानना आवश्यक है। प्रतिपादन यह है कि काम-कला को ब्रह्म विद्या के रूप में परिवर्तित किया जाय। इसे विज्ञान की भाषा में - ट्रान्सफार्मेशन-रूपान्तरण कहते हैं काम को कला में परिणत, परिष्कृत किया जा सकता है भक्ति भावना उसी प्रयास का उत्कृष्ट रूप है, ललित कलाओं में, उद्देश्य पूर्ण शौर्य, साहस में, पारमार्थिक सेवा साधना में जो उच्चस्तरीय उल्लास उपलब्ध होता है। उसे ‘काम’ तत्व की परिष्कृत भाव भूमिका कह सकते हैं। चिन्तन की दिशा धारा मोड़ देने से यह परिवर्तन सम्भव हो सकता है। वर्षा का जल यदि अनियन्त्रित फैले तो खेतों, घरों को डुबाकर हानिकारक सिद्ध होगा। पर यदि नदी लाले के माध्यम से बाँध बनाकर संग्रह किया जाय ओर नहरों के माध्यम से सिंचाई के लिए खेतों तक पहुँचाया जाय तो इससे हर प्रकार लाभ ही लाभ है अनियन्त्रित काम प्रवृत्ति का निरोध इसी प्रकार उचित है उसे हठ पूर्वक नष्ट कर देने की बात न सोची जाय, वरन् ऐसे प्रयोजन में लगा दिया जाय जिसमें उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति हो।
पौराणिक कथा में कामदेव भगवान शंकर पर प्रकोप करता है, उन्हें अपनी उँगली के इशारे पर नचाना चाहता है। शिवजी अपने दूरदर्शी विवेक से -तृतीय नेत्र से इसके दुष्परिणामों को समझने का प्रयत्न करते हैं। वस्तु स्थिति समझ में आती ही, तृतीय नेत्र खुलते ही सम्भावना समाप्त हो जाती है। कामदेव जलकर भस्म हो जाता है। यह विवेकशीलता की-पशु प्रवृत्ति पर प्रत्यक्ष विजय है। कुविचारों को सद्विचारों से ही निरस्त किया जाता है। लोहे से लोटा कटता है कामुकता से दुष्परिणामों और संयम से सत्परिणामों पर विस्तारपूर्वक विचार किया जाय तो विवेक का निर्णय औचित्य के पक्ष में होगा। चोर की घात तो तब लगती है जब घर मालिक सोये हुए हों जब उनमें से कोई बच्चा रोने लगे-बुड्ढा खाँसने लगे तो बलिष्ठ चोर की भी हिम्मत टूट जायगी और उसे उलटे पैरों भागना ही पड़ेगा। कामुकता सम्मत समस्त कुविचारों के सम्बन्ध में यही बात लागू होती है। यदि आदर्शवाद के समर्थक तर्कों, तथ्य, प्रमाण और उदाहरणों की सेना सजा ली जाय और जब भी शत्रु शिर उठाये तभी वह सेना लड़ा दी जाये तो समझना चाहिए कि औचित्य ही जीतेगा। कल्मषों के उन्मूलन का यही एकमात्र मार्ग है महाभारत युद्ध की घटना को लेकर जीव रूपी अर्जुन को-दुरित दुर्जनों को परास्त करने के लिए जिस सैन्य सज्जा के लिए कहा गया है उसे अन्तःसधर्म ही समझना चाहिए। शिवजी का काम दहल भी इसी तथ्य के समर्थक में एक प्रेरणाप्रद प्रसंग है।
पीछे काम पत्नी, रजि, सरसता विलाप करती है। विधवा के दुःख को-भगवान आशुतोष सहन नहीं कर पाते। वे द्रवित होते हैं और वरदान देते हैं। कि भस्मसात् कामदेव शरीर समेत तो जीवित नहीं हो सकते, पर वे सूक्ष्म रूप से फिर सजीव हो जायेंगे और उच्च आत्माओं पर भी अपना अस्त्र छोड़ने की अपनी कामना पूरी करेंगे।
इस वरदान का अभिप्राय यही है कि पशु-प्रवृत्तियों को भड़काने वाली और जीवन सम्पदा को कुमार्गगामी बनाने वाली कामुकता को परिष्कृत किया जा सकता है। उसे भावनात्मक श्रेष्ठ सम्वेदनाओं से लगा कर स्थूल यौनाचार के आकर्षण से विरत किया जा सकता है।
कुण्डलिनी के स्वरूप चक्र को बताया गया है। स्पष्ट है। काम केन्द्र मूलाधार चक्र को बताया गया है। यह जननेन्द्रिय के मूल में है। इसे अग्नि कुण्ड, अग्नि, समुद्र शक्ति समुद्र भी कहा गया है। उमंगें और उत्साह भरने की क्षमता वहाँ केन्द्रित है। इस स्थिति में उसकी संबा सर्पिणी की है सर्प दंश और सर्प विष की भयानकता सर्वविदित है। सामान्य स्थिति में अधोगामी और बहिर्मुखी रहती है उसके क्षरण-स्राव-जननेन्द्रिय मार्ग से नीचे की ओर टपकते हैं। उसका प्रत्यक्ष रूप त्वचा तल से ऊपर उभरा रहता है। नर और नारी की जननेन्द्रियों की स्थिति इस दृष्टि से लगभग एक जैसी ही है। इसे कुण्डलिनी की गर्हित, मूर्छित, अधःपतित स्थिति समझा जाना चाहिए।
कुण्डलिनी जागरण साधना में समुद्र मंथन जैसे प्रयत्न करने पड़ते हैं। फलतः प्रसुप्ति जागृति में बदलती है। तप की उष्णता पाकर अन्तः ऊर्जा उभरती है और ऊपर की ओर चलने का प्रयत्न करती है। गर्मी से वायु, जल आदि सभी का विस्तार होता है। वे ऊपर की ओर उठते हैं। ग्रीष्म में चक्रवात गरम हवा के द्वारा ही उठते हैं। पानी से भाप गर्मी ही ऊपर की ओर उठाती है मूलाधार से जगी हुई व्यक्ति ऊर्जा, प्राण-शक्ति कुण्डलिनी ऊपर को उठती है। मेरुदण्ड मार्ग से सर्पिणी की तरह लहराती हुई ब्रह्मरंध्र की ओर चलती है, बिजली की यही चाल है। यह ऊर्जा मस्तिष्क में पहुँचती है सहस्रार कमल से सम्बन्ध बनाती है और उसी में लय हो जाती है। कमल सात्विकता का, कला का, दिव्य सौंदर्य का केन्द्र माना गया है। भगवान के अंगों का -अवयवों का-वर्णन कमल उपमा के साथ किया जाता रहा है। लक्ष्मी कमलासन पर विराजमान् है। गजेन्द्र ने ग्राह से मुक्ति पाने के लिए कमला लक्ष्मी का दूसरा नाम है। विष्णु के चार हाथों के चार उपकरण है। शंख, चक्र, गदा के उपरान्त चौथा ‘पद्य’ ही आता है। इस प्रकार पौराणिक संगतियों में कमल को दिव्यता की प्रतीक माना गया है। मस्तिष्क के मध्य क्षेत्र में -ब्रह्मरंध्र में-सहस्रार कमल अवस्थित है। उस पर कही विष्णु की, कही शिव की, कही सद्गुरु की स्थापना और ध्यान का उल्लेख है। यह प्रतिपादन यही इंगित करता है कि कामुकता में संलग्न अन्तः ऊर्जा को उस पतन के गर्त से निकाल कर ब्रह्म चेतना में-उत्कृष्ट प्रदान करने वाली ब्रह्म विद्या में-नियोजित किया जाना चाहिए।
इस परिवर्तन परिष्कार को-उत्कर्ष उन्नयन को कुण्डलिनी जागरण कहा गया है। ब्रह्मचर्य की तात्त्विक साधना यही है। इसी में अध्यात्म तत्व ज्ञान के समस्त सूत्र संजोये हुए है। इस ट्रान्सफार्मेशन का-रूपान्तर का सत्परिणाम, महान् जागरण, महान परिवर्तन दिव्य जीवन के पक्ष में सामने आता है। काम बीज का यह ब्रह्म समर्पण कितना श्रेयस्कर होता है इसे कुण्डलिनी महाविज्ञान की जागरण साधना एवं तत्व भावना को अपना कर ही जाना जा सकता है।
*समाप्त*