दृश्यमान जगत वस्तुतः आणविक-रासायनिक जड़-पदार्थों से बना है। जीवधारियों की काया भी इन्हीं पंच तत्वों से बनी है। स्पष्ट है कि इस निर्जीव संरचना में ऐसा कुछ नहीं है जो चेतना को किसी प्रकार की भावनात्मक अनुभूति करा सके। अधिक से अधिक जड़ जगत की क्षमता इतनी ही मानी जा सकती है कि सर्दी-गर्मी जैसे प्रकृति प्रभावों की कायकलेवर को अनुकूल-प्रतिकूल प्रतिक्रिया की प्रतीति हो सके।
चेतना को जिस आनंद की आकाँक्षा रहती है-जिस प्रकार उल्लास और संतोष होता है, वह भावात्मक है। भव का उद्भव वस्तुओं से सम्भव नहीं। न उसे रासायनिक पदार्थों में पाया जा सकता है और न मल-मूत्र की गठरी किसी काया में वैसा कुछ होता है। चेतना को तृप्ति और तुष्टि देने वाली सरसता उसका अपना उत्पादन है। सुसंस्कृत अन्तःकरण एक प्रकार का कस्तूरी जैसा घटक है जो मृग को भी उत्साहित करता है और समीपवर्ती वातावरण में भी मादक सुगन्ध बखेरने का निमित्त रहता है।
परिष्कृत अन्तः चेतना मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उसके कारण अनायास ही कण-कण में रस छलकता है और क्षण-क्षण में आनन्द और उल्लास भरी लहरों का उभार अनुभव होता है। परिष्कृत दृष्टि जहाँ भी पड़ती हैं वहीं सौंदर्य छलकने लगता है। आन्तरिक श्रेष्ठता का स्पर्श जिस भी जीवधारी के साथ होता है उसके श्रेष्ठ अंश को प्रतिध्वनित होने का अवसर मिलता है। परिष्कृत आत्मा जड़-जगत के दर्पण में आत्मीयता और शालीनता के रूप में सर्वत्र परमात्मा सत्ता की झाँकी करती है।
ब्रह्मा को सत् आनन्द कहा गया है। सत् एग्जिस्टैन्स-स्थायित्व चित्-कान्शसनैस-चेतन। आनन्द ब्लिस एब्सौल्यूट-अन्त उल्लास। ईश्वर इन्हीं विशेषताओं से सम्पन्न है। जब जीवात्मा को अपने सम्बन्ध में भी ऐसी ही अनुभूति होने लगे तो समझना चाहिए कि ब्रह्म और जीवन की एकता बन रही है। आत्मा में परमात्मा का अवतरण हो रहा है।
सामान्यतया जीव पर शरीराध्यास ही छाया रहता है। पंच तत्वों से बनी काया में रमा होने के कारण वह अपने आपको नश्वर शरीर ही मानता है। उसके सुखों दुःखों को अपना सुख -दुःख समझता है। पदार्थों की लाभ-हानि ही उसे अपनी लाभ-हानि दीखती है। शरीर के सम्बन्धी ही उसे अपने सम्बन्धी लगते हैं। पदार्थ नश्वर है इसलिए वह अपने को पार्थिव होने के कारण मरण धर्म मानता है। मरने पर दुःखी होता है और जन्म -दिन पर खुशी मनाता है। यह प्रकृति -परायण मायाबद्ध जीव की स्थिति है। आत्म-ज्ञान द्वारा जब इस स्थिति का अन्त हो जाता है और अपनी सत्ता ‘सत्ता’अविनाशी दिखाई पड़ने लगती है तो शरीर और आत्मा के भेद पर विश्वास जमता है। तब भौतिक लाभ-हानि अपनी नहीं शरीर की-पराई प्रतीत होती है और अपने हित अनहित को आत्म-कल्याण में-आत्म सन्तोष में ढूंढ़ने लगता है जिसकी मनःस्थिति इस दिशा में चलने ढलने लगे समझना चाहिए उसने ईश्वर के एक तृतीयांश से संपर्क साध लिया।
ब्रह्मा का दूसरा गुण है-चित्त। ईश्वर व्यक्ति नहीं चेतन शक्ति है। विचारों एवं भावों की उत्कृष्टता में पवित्रता में ब्राह्मी सत्ता ज्योतिर्मय होती है। सौंदर्य वस्तुओं में नहीं भाव में दीखने लगें रस इन्द्रियों के माध्यम से नहीं भाव सम्वेदनाओं के रूप में मिलने लगें चिन्तन के क्षेत्र में आदर्शवादी उत्कृष्टता ही छाई रहे तो समझना चाहिए कि लोभ और भय के कारण दुष्कर्म बन पड़ने और दुर्भाव उठाने का आधार ही नष्ट हो गया। ब्रह्मचेतना में सदाशयता एवं सज्जनता के ही तत्व भरे रहते हैं। जिसका भाव संस्थान इस प्रकार की कोमलता जितनी संचय कर सके समझना चाहिए उसे उतने ही अनुपात में ब्रह्म सान्निध्य उपलब्ध हो चला।
ब्रह्मा की तीसरी धारा आनन्द है। आत्म-ज्ञानी उत्कृष्टता अपनाने वाला आन्तरिक दृष्टि से निरन्तर संतुष्ट प्रसन्न रहेगा दिव्य चिन्तन और दिव्य कर्त्तव्य में असाधारण रस है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। प्रेम किसी व्यक्ति या वस्तु के प्रति असाधारण आसक्ति को समझा जाता है पर वस्तुतः वह वैसा है नहीं। प्रेम में उदारता,आत्मीयता का गहरा पुट रहने से उसका व्यावहारिक स्वरूप निस्वार्थ सेवा भावना बन जाता है। प्रेमी को अपने प्रेम पात्र के प्रति इसी प्रकार का दृष्टिकोण अपनाना और व्यवहार करना पड़ता है। सीमित क्षेत्र में भी ऐसी बुद्धि रहे तो प्रसन्नता होगी, आत्म-सन्तोष रहेगा। यदि यह आत्मीयता का क्षेत्र व्यापक हो तो आनंद की कमी नहीं रहेगी। कर्त्तव्य-पालन की प्रकृति हो तो परिणाम की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती वरन् चिन्तन एवं कर्म ही आनन्द का स्रोत बन जाता है और पग-पग पर अन्तः उल्लास की अनुभूति होती रहेगी। जो हँसता-हँसाता दिखाई पड़े, जो हलकी फुलकी जिन्दगी जी रहा हो, जिसकी आँखों में आशा और उमंग चमकती हो, जिस पर आदर्शों की खुमारी छाई हो समझलो इस आनन्दी जीव ने आनन्द-कन्द परमेश्वर की समीपता का लाभ लेना आरम्भ कर दिया।
ईश्वरीय सान्निध्य की अनुभूतियाँ गोपनीय नहीं स्पष्ट होती हैं। वे भावमय-इमोशनल, स्फूर्तिवर्धक-इन्स्पायरिंग की नहीं स्पर्शनीय-ट्रेन्जिब्ल भी होती है। उसमें है। आदर्शों को कर्म में छलकता हुआ, चिन्तन को व्यवहार में क्रियान्वित होते हुए सहज ही देखा जा सकता है।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक न्यूटन से एक बार उनके एक मित्र ने पूछा-आप वैज्ञानिक होकर भी ईश्वर की उपासना करते हैं। यदि सचमुच भगवान् है तो वह क्या है?
“ज्ञान” न्यूटन ने गम्भीरतापूर्वक उत्तर दिया। हमार मस्तिष्क ज्ञान की खोज में जहाँ पहुँचता है वही उसे शाश्वत चेतना का ज्ञान होता है। कण-कण में जो ज्ञान की अनुभूति भरी पड़ी है वह परमात्मा का ही स्वरूप है। ज्ञान की ही शक्ति से संसार का नियन्त्रण होता है। विनाश के लिए भी ज्ञान की ही आवश्यकता है। परमात्मा इसी रूप में सर्व शक्तिमान है
स्पिनाजा ने विज्ञान और दर्शन दोनों का अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला कि संसार में दो प्रकार की सत्ताएँ काम कर रही है। एक दृश्य है-एक अदृश्य। एक का नाम है प्रकृति या पदार्थ। एक अदृश्य-अपदार्थ अथवा विचार। मृत्यु के अंतिम क्षणों तक विचार प्रक्रिया का बने रहना और मृत्यु के तुरन्त बाद समाप्त हो जाना इस तथ्य का द्योतक है कि जिस तरह पदार्थ अर्थात् धातुएं खनिजों, लवणों गैसों आदि से बना शरीर मृत्यु के बाद सड़ गलकर अपने-अपने तत्व से जा मिलता है, उसी तरह विचार अपनी प्रणाली में जा मिलते हैं विचार कभी नष्ट नहीं होते उससे यह सिद्ध होता है कि अविनाशी विचारों की केन्द्रीभूत सत्ता है और दार्शनिक दृष्टि से देखा जाये तो भी उनका अस्तित्व कभी नष्ट नहीं होता। विचार अवचेतन मन से आते हैं। कब किस विचार के स्पन्दन मन में उमड़ने लगें यह मनुष्य के नियन्त्रण में नहीं आते इससे प्रकट है कि यह अविनाशी तरंगें सूक्ष्म जगत में लहराती है और मस्तिष्क के किसी भाग से स्वसंचालित व्यवस्था की तरह उमड़ते रहते हैं। वैज्ञानिक हीगल के मतानुसार परमात्मा सामान्य इच्छाओं से अत्यधिक समुन्नत श्रेणी का इच्छाओं को भी नियन्त्रण में रखने वाला विचार (अव्सोलूट आइडिया) बताया है। वे लिखते हैं जिस तरह सामान्य श्रेणी से उच्च विद्वान लोग अपने ज्ञान से नये-नये विचारों और भावनाओं का स्वयं ही निर्माण करते हैं उन विचारों के अनुसार उन्नत श्रेणी की रचनाएँ या वैज्ञानिक अनुसन्धान कर सकने में सक्षम होते हैं उसी तरह “परम विचार” अति विशिष्ट रचनाएँ और वैज्ञानिक अनुसंधान करने में समर्थ है तभी तो उसका बनाया संसार इतना सुन्दर और उसके बनाये जीव-जन्तु अत्यधिक उन्नत श्रेणी के यन्त्रों से भी श्रेष्ठ ठहरते हैं। इस संदर्भ में मनुष्य शरीर की रचना उसका अत्यन्त उच्चकोटि का शिल्प और कलाकारिता कही जा सकती है।
सन्त इमर्सन और वर्कले में मन में सब आत्माओं में श्रेष्ठ शक्ति का नाम ही परमात्मा है। सारा संसार कहीं से उधार प्राण और चेतना ले रहो है। प्राणं और चेतना अपने मूल रूप में एक जैसी ही है मनुष्य व जीवों में एक जैसा स्पन्दन, आहार ,निद्रा ,भय, मैथुन के एक से क्रिया कलाप है। जिस तरह एक विद्युत घर से प्रवाहित विद्युत भार ही अनेक विद्युत बल्बों में प्रकाशित दृश्यमान होता है उसी तरह उधार ली गई यह चेतना जिस मूल उद्गम से निसृत होती है उसी का नाम परमात्मा है। यदि आत्माओं का स्वरूप प्रकाश है तो परमेश्वर भी निःसंदेह प्रकाश है। यदि “प्राण” अग्नि रूप है तो जगत नियन्तः भी अग्नि रूप होना चाहिए।
आइन्स्टीन का सापेक्षवाद सिद्धान्त और वेदान्त का “माया वाद” वस्तुतः एक ही व्याख्या के दो प्रकार हैं। वेदान्त “ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या” कहता है तो आइन्स्टीन ने जगत को “समय, ब्रह्मांड गति और कारण” नाम दिया गया है। आइन्स्टीन कहते हैं-समय नाम की कोई सत्ता नहीं है, घटनाओं के तारतम्य को ही समय कह सकते हैं। घड़ी की सुई एक प्वाइंट से दूसरे प्वाइंट तक चली उसे 1 मिनट कह दिया। सूर्य ने एक गोलार्द्ध पार कर लिया यह हमारे लिए 12 घन्टे हो गए, पर सूर्य के लिए तो वह निमिष मात्र ही हुआ जैसे जैसे घटनाओं का विराट बढ़ता है समय संकुचित होता जाता है एक स्थान ऐसा आता है जहाँ भूत भविष्य और वर्तमान सब एकाकार हो जाते हैं, इसी तरह गतियाँ परस्पर सापेक्ष है और परम-गति की स्थिति में वे सभी निस्तब्ध हैं, ब्रह्मांड अपने आप में पूर्ण नहीं, सभी एक दूसरे से सापेक्ष हैं वे सब एक महा ब्रह्मांड में जाकर स्थिर हो जाते हैं इसी तरह “कारण” सभी सापेक्ष हैं एक से दूसरे कारण की खोज करते चलें तो एक ऐसे महा कारण तक जा पहुँचते हैं जो समस्त सृष्टि की रचना का मूलाधार है। अब इस मूल तत्व को किस तरह अनुभव किया जाये उसके लिए आइन्स्टीन कहते हैं कि वहाँ ज्ञान के अतिरिक्त कुछ नहीं ठहरता इसी को वेदान्त में अनुभवगम्य स्थिति कहा है। आइन्स्टीन के इस सिद्धान्त की कई विशेषताएं हैं। जैसे उनका कथन है कि इस बिन्दु से जो वस्तु आज चलेगी वह कल वहाँ पहुँच जायेगी। हमारे दर्शन में प्रयुक्त हुआ कालातीत और आइन्स्टीन के इस सिद्धान्त में कोई अन्तर नहीं। यदि उसे समझा जा सके तो बह्म को समझना गणित के समीकरण की तरह सरल और आसान है। उपनिषद् के- अहं ब्रह्मास्मि, अयमात्मा ब्रह्म, तत्वमसि इसी सत्य के दार्शनिक भाव मात्र हैं। इसे ही वैज्ञानिक यूकन ने आध्यात्मिक जीवन का आधार कहा है।
1937 में प्रकाशित “दि मिस्टीरियस यूनीवर्स” नामक पुस्तक और “दि न्यू बैक ग्राउण्ड आफ साइंस” में सर जेम्स जीन्स ने लिखा है-”उन्नीसवीं शताब्दी के विज्ञान में पदार्थ और पदार्थ जगत ऊँचे सिद्धान्त माने जाते थे, अब हम उनसे दूर होते चले जायेंगे। अब जो नये तथ्य प्रकाश में आ रहे हैं उनसे हम विवश हैं कि प्रारम्भ में शीघ्रता में आकर हमने जो धारणा बनाली थी, उसे अब फिर से जाँचे। अब मालूम होता है कि जिस जड़ पदार्थ को शाश्वत सत्य मानकर बैठे थे वह भ्रम है पदार्थ मन या आत्मा से पैदा हुआ है और उसी का महूर (रूप) है।
“साशेल एनविरानमेण्ट्स एण्ड मारल प्रोग्रेस” पुस्तक में चार्ल्स डार्विन के मित्र जो कभी डार्विन के अनन्य समर्थक थे लिखा है कि “मुझे विश्वास है कि चेतना (आत्मा) ही पदार्थ का हस्तान्तरण करती है।
सर आलिवर लाज ने “आत्मा और मृत्यु” विषय पर भाषण करते हुए 1930 में व्रिस्टल में कहा था “यह सच है कि हम सब चेतन जगत में जी रहे हैं। यह चेतना शक्ति पदार्थ पर हावी है। पदार्थ उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”
सर ए॰ एस॰ एडिग्टन का कथन है कि-हम इस निष्कर्ष पर पहुँच गए हैं कि एक असाधारण शक्ति काम कर रही है, पर हम नहीं जानते वह क्या कर रही है।
1934 में प्रकाशित पुस्तक “दि ग्रेट डिजाइन “ में विश्व के 14 प्रख्यात विज्ञानाचार्यों का संयुक्त प्रतिवेदन प्रकाशित हुआ है-इस संसार को एक मशीन कहें तो यह मानना पड़ेगा कि वह अनायास ही नहीं बन गई, वरन् पदार्थ से भी सूक्ष्म मस्तिष्क और चेतना शक्ति उसका नियंत्रण कर रही है।
“स्टे एलाइव आल योग लाइफ” नामक पुस्तक में डॉ. नार्मन विन्सेन्ट पीले ने मरते हुए मनुष्यों की गति विधियों के बड़े सूक्ष्म निष्कर्ष प्रकाशित किये है। उन्होंने एक संस्मरण लिखा है-एक मनुष्य मर रहा था कुछ-कुछ इस संसार से भी संपर्क साध सकती थी और अतीन्द्रिय जगत को भी देख सकती थी उसने बताया मैं बहुत आश्चर्यजनक ज्योति देख रहा हूँ, उस ज्योति पुँज से बहुत मधुर संगीत विस्फुटित हो रहा है। स्मरण रहे ईश्वर को भारतीय तत्व दर्शन में “ऊंकार” इस्लाम दर्शन में “अलम” ध्वनि वाला मधुर संगीत बताया है।
वैज्ञानिकों, विचारकों और दार्शनिकों के यह कथन भ्रान्त प्रलाप नहीं ठहरायें जा सकते। यह प्रतिपादन अनुभूतियों और तथ्यों की ठोस शिला पर आधारित हैं। ब्रह्म की सत्ता दृश्य जगत का प्राण है उसके बिना इतना व्यवस्थित विश्व कभी भी सम्भव नहीं हो सकता था।
जीवन को मूर्तिमान देवता कह सकते हैं। यही परमेश्वर का प्रतीक प्रतिनिधि है। ईश्वर उपासना के साथ जुड़े हुए क्रिया-कलापों का उद्देश्य जीवन देवता की आराधना करना और अधिपति अन्तरात्मा को प्रसन्न करके अभीष्ट वरदान प्राप्त करना ही है।
जीवन देवता की गरिमा का गुणगान अमृत, कल्पवृक्ष एवं पारस के रूप में किया गया है इस जीवन दव को सिद्ध कर लेने पर अन्तः करण में अमृतोपम शांति -मनः क्षेत्र में पारस के सहारे मिलने वाली संपूर्ण सफलताएँ निरन्तर मिलती रहती हैं।
उपासना समस्त क्रिया-कलाप, विध-विधान,इस उद्देश्य के लिए विनिर्मित हुए हैं कि उनमें निदिष्ट संकेतों का अनुसरण मनुष्य अपने व्यक्तित्व को अधिकाधिक पवित्र परिष्कृत बनाने चलें और उदारता की अभिवृद्धि के लिए लोक-मंगल के लिए बढ़े-चढ़े अनुदान प्रस्तुत करें। पात्रता के अनुरूप ही समाज का सम्मान सहयोग मिलता है। उसी के अनुरूप आत्म-सन्तोष एवं ईश्वरीय अनुग्रह का अनुदान उपलब्ध होता है। स्वर्ग परिष्कृत दृष्टिकोण का नाम है। वह जिसके पास भी होगा वह गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से धरती का देवता बनता चला जायगा और अपनी गरिमा से संपर्क क्षेत्र को प्रभावित करके स्वर्गीय वातावरण का सृजन करेगा। मुक्ति को अध्यात्म साधनाओं का चरम प्रतिफल बताया गया हैं। भव-बन्धनों से मुक्ति का तात्पर्य है-बहिरंग कल्मष और अन्तरंग कषायों से छुटकारा पाना। दूसरे शब्दों में इसे संकीर्ण स्वार्थपरता एवं निर्मम निष्ठुरता की लाभ-मोह की, हथकड़ी-बेड़ियों को काट डालना, कुत्साओं और कुँठाओं की, दुष्प्रवृत्तियों की जड़े उखाड़ फेंकना इसी को मुक्ति पुरुषार्थ की साधना कहते हैं। समाधि की चर्चा साधना की सफलता के रूप में होती रहती है। मूर्छित समाधि एक मनोवैज्ञानिक प्रयास है वह किसी-किसी के लिए ही सम्भव है। जागृत समाधि सर्व सुलभ हैं। समाधि का अर्थ है,, बौद्धिक और भावनात्मक प्रवाहों को सन्तुलित एवं विवेक युक्त बना लेना। सुसंस्कृत चिन्तन पद्धति हाथ लगने पर समस्याओं का स्वरूप और समाधान उपलब्ध हो जाता है। ऐसी दशा में जो गहरी आत्म तुष्टि और अनवरत प्रफुल्लता बनी रहती है; उसी का नाम समाधि है। आत्म स्वरूप का, आत्मिक गरिमा का अनुभव होने लगे तो शरीर और मन की स्थिति स्वामी की नहीं सेवक का बन जाती है। यही आत्म- साक्षात्कार है। आदर्शवादी उत्कृष्टता के रंग में हर घड़ी रगें रहना-अपने आपको आत्मीयता को- व्यापक उपलब्धियां आत्म-परिष्कार के अनुपात से मिलती चली जाती हैं।
आत्म-परिष्कार में जिसने जितनी सफलता पाई वह उसी स्तर का संत ऋषि, महामानव, देवता एवं अवतार कहा जाता है। सामान्य लोगों की स्थिति भूतल पर रहने वाले प्राणियों की मानी जाय तो इन परिष्कृत महामानवों को ब्रह्मलोक के निवासी कहा जायगा। यह अन्तर सचमुच आश्चर्यजनक एवं चमत्कारी है। लौकिक सफलताओं को समृद्धि कहते हैं किन्तु आत्मोत्कर्ष की अलौकिक उपलब्धियां विभूतियाँ एवं सिद्धियाँ कहलाती है। सिद्ध पुरुषों के चमत्कारी कर्तृत्व ही संसार भर के महामानवों को ऐतिहासिक श्रेय सम्मान प्रदान करते हैं। उनकी गति विधियाँ एवं सफलताएँ असाधारण होती है इसलिए उन्हें चमत्कारी भी कहा जाता है। यह चमत्कारी बाजीगरों को जादूगरी जैसे बाल-विनोद के लिए दिखाये जाने वाले कौतुक-कौतूहलों जैसे तो भव-बन्धनों में जकड़े हुए दीन-दयनीय जीवधारियों के लिए जो सम्भव नहीं था; वह उनसे सामान्य परिस्थितियों और स्वल्प साधनों से ही किस प्रकार आश्चर्यजनक से कर दिखाया। साधना से सिद्धि मिलने और सिद्धि के चमत्कारी होने की मान्यता का यही सुनिश्चित और ठोस आधार है।
उपासना पद्धति की तत्व विवेचना में जितनी गहराई तक उतर जाय यही तथ्य उभरता चलेगा कि यह समस्या विधि-विधान पशु प्रवृत्तियों से छुटकारा पाने और देव संस्कृति के अनुरूप सद्भावना, सज्जनता, सहृदयता विकसित करने के लिए ही इन प्रयोगों का आविर्भाव हुआ है। पवित्रीकरण,आचमन प्राणायाम, न्यास आदि की आरम्भिक उपासना विधियाँ स्पष्टतः गुण,कर्म, स्वभाव में घुसे हुए दोष-गुणों को उखाड़ने और सुसंस्कारी सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बना लेने की प्रेरणा देने के लिए ही विनिर्मित हुई। संकेतों को जो जिस सीमा तक व्यवहार में उतार सके समझना चाहिए कि उसकी साधना उसी सीमा तक सार्थक हो गई।
ईष्ट देव के विभिन्न नाम रूप, आयुष, किस निमित्त गढ़े गये इसकी गम्भीरता विवेचना करने पर भी यही निष्कर्ष निकलता है कि उन संकेतों के अनुरूप हमें अपने जीवन का ढाँचा खड़ा करना एवं स्वरूप गढ़ना है। राम, कृष्ण ,शिव , हनुमान आदि जो इष्ट चुना गया हो उन्हें साँचा मानकर अपने को तद्नुरूप ढालने को ही लक्ष्य बनाया जाता है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम, पूर्ण पुरुष कृष्ण, श्रेय समुच्चय शिव ,श्रेष्ठता के लिए समर्पित आत्म दानी हनुमान ,विवेक के प्रतीक गणेश, समर्थ संघ शक्ति दुर्गा,ज्ञान की देवी सरस्वती, सुरुचि सृजन और उत्पादन की अधिष्ठात्री लक्ष्मी, प्रकाश और वर्चस के देव सविता आदि आदि देवी-देवताओं को इष्ट मानने का महानता के अमुक ढाँचे में ढालना चाहते हैं। इष्ट निर्धारण किसी देवता को फुसलाना, उसकी पार्टी कम्पनी में भर्ती होना नहीं, वरन् यह है कि हम जीवन का अमुक लक्ष्य निश्चित करते हैं और उसकी प्रति के लिए उपयुक्त उपायों का प्राण-प्रण से प्रयत्न करेंगे। देव पूजा के उपचारों और विधि विधानों में आदर्शवादिता से अपनी आस्था को अधिकाधिक गहरी बनाते जाने का तथ्य सन्निहित होता है।
जीवन ईश्वर प्रदत्त बहुमूल्य उपहार है। इससे बड़ा अनुदान ईश्वर के भंडार में और कोई भी नहीं है। इसमें असीम सरसताएँ और दिव्य सम्भावनाएँ भरी पड़ी है। शरीर और मन की समताओं के सहारे उच्च स्तरीय समृद्धियाँ तथा सफलताएँ उपलब्ध हो सकती है। इन उपकरणों का यदि सही उपयोग आता हो तो इस संसार में ऐसा कुछ भी नहीं जिसे मनुष्य प्राप्त न कर सके रहस्यमय एवं अतीन्द्रिय शक्तियों का तो कहना ही क्या? वे प्रसुप्त स्थिति में बीज रूप से अविज्ञात शक्ति संस्थानों में छिपी रहती है, यदि उन्हें जगाया उभारा जा सके तो निश्चय ही इसका प्रतिफल ऐसा हो सकता है अतिमानव एवं देव मानव बन सकने की सम्भावनाएँ इसी काय-कलेवर में भरी पड़ी है। उनसे अनजान बनकर रहा जाय और इन रक्त भांडागार को उपेक्षित रखा जाय तो बात दूसरी है अन्यथा इस सत्ता को गढ़ा इस प्रकार गया है जिसमें सब कुछ चमत्कारी ही चमत्कारी भरा हुआ देखा पाया जा सकता है।
जीवन का आनन्द लेने के लिए कुछ थोड़े से ही सूत्र है। पर उन्हें जान लेने मात्र से काम नहीं चल सकता। वे अपना चमत्कार तभी दिखाते हैं जब व्यवहार में उतारा जाय और गुण, कर्म ,स्वभाव का अड्डा बना लिया जाय।
हम कर्म योगी बनें। कर्तव्य पालन को प्रधानता दें। शरीर को भगवान की अमानत समझें और श्रम एवं संयम के सहारे उसे प्रखर बनायें रहें। अच्छे से अच्छे की आशा करें और बुरे से बुरे के लिए तैयार रहें। अपनी प्रसन्नता कर्तव्य पालन के केन्द्र से जुड़ी रखें मालिक किसी के न बनें। माली की तरह अपने संपर्क क्षेत्र के हर पदार्थ, प्राणी और सम्बन्धी को परिष्कृत करने भर का दृष्टिकोण रखें। उपयोग की आतुरता का खतरा समझें। साधनों और प्रयास करते रहें। ऐसा कुछ न करें जिस पर पीछे पश्चाताप करना पड़े। आत्मा धिक्कारे और बाहर से तिरस्कार बरसे। लोभ का आकर्षण-सम्बन्धियों का आग्रह तथा जोखिम का भय इन तीनों का सामना करने का साहस जुटा सकने वाला ही सच्चा शूरवीर है। कर्मयोगी उच्चकोटि के योद्धा होते हैं। जीवन संग्राम में अवाँछनीयता के शत्रुओं से पग पग पर जूझना पड़ता है। ईमानदारी, तत्परता और तन्मयता के साथ जब कर्म किया जाता है और उसकी उत्कृष्टता और समग्रता को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया जाता है, तो ऐसे ही सत्कर्म ईश्वर की श्रेष्ठतम उपासना एवं जीवन साधना के अति महत्वपूर्ण अंग बन जाते हैं। जीवन की सार्थकता का प्रथम सूत्र यह कर्मयोग ही है।
दूसरा सूत्र है-ज्ञान योग। ज्ञान का अर्थ जीविकोपार्जन एवं लोग व्यवहार में काम आने वाली कुशलता नहीं, वरन् वह दूरदर्शी विवेक बुद्धि है जो जीवन की भौतिक समस्याओं का समाधान करने और आत्मा को परम लक्ष्य तक पहुँचने का मार्ग बताती और उत्साह भरती है। खीज और असंतोष में कुकल्पनाओं और मनोविकारों में नष्ट होती रहने वाली विचार शक्ति को बचा सकना और उसे शालीनता भरे सृजनात्मक प्रयोजनों में लगाए रख सकना दूरदर्शी, विवेक बुद्धि के सहारे ही सम्भव होता है। अपनी उपलब्धियों को देखें-गुण-ग्राही बनें, दूसरे के उपकारों और सहयोग को स्मरण करें, तो वर्तमान स्थिति के प्रति जो असंतोष है वह देखते-देखते नष्ट हो जाएगा और लगेगा कि हम आनन्द दायक सुविधाओं से भरा-पूरा जीवन जी रहे हैं। मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जननी है यह समझ लिया जाए तो परिस्थितियां अनुकूल बनाने के लिए जितना प्रयत्न किया जाता है उससे भी अधिक चेष्टा मनःक्षेत्र पर छाये हुए कुसंस्कारों और भ्रम जंजालों को निरस्त करने के लिए कदम बढ़ाना होगा। ज्ञानयोग ही भव-बन्धनों से, कुविचारों एवं कुसंस्कारों से छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय है। ज्ञान से ही मुक्ति मिलने का सिद्धान्त अक्षरशः सही है। यदि इस तथ्य को हृदयंगम कर लिया जाए कि अपने उत्थान और पतन की, भाग्य एवं भविष्य निर्माण की कुँजी अपनी ही जेब में है तो फिर दूसरों को दोष देने या आसरा तकने की आवश्यकता न रहेगी। आत्मशोधन और आत्म-परिष्कार के लिए-आत्मबल और आत्म गौरव संवर्धन के लिए आकुशलता एवं साहसिकता उत्पन्न करने वाली प्रज्ञा ही गायत्री है। ज्ञानयोग के रूप में जागृत दूरदर्शिता एवं विवेकशीलता के सहारे ही आत्मिक प्रगति की योजना बनती है और सर्वतोमुखी प्रगति की दिशा में आगे बढ़ने की-समृद्धियों और विभूतियोँ से सुसम्पन्न बनाने की आकाँक्षा फलवती होती हैं।
जीवन की सार्थकता का तीसरा सूत्र है भक्तियोग। भक्ति अर्थात् ईश्वर विश्वास और ईश्वर प्रेम। सर्वविदित है कि ईश्वर की अनुकम्पा भक्त की सत्पात्रता के आधार पर बरसती है। चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा के सहारे सत्पात्रता निखरती है और उस निखार के अनुरूप ही ईश्वरीय विशेष करुणा का विशेष लाभ मिलता है। ईश्वर प्रेम का अर्थ है ईश्वरीय आदेशों का सच्चे मन से शिरोधार्य करना और आदर्शवादी गतिविधियों को जीवन में उतारना। ईश्वर विश्वास की वास्तविकता कर्मफल की सुनिश्चिता को विश्वासपूर्वक स्वीकार करना। सत्कर्मों और दुष्कर्मों का भला बुरा प्रतिफल आज नहीं तो कल मिल कर ही रहेगा। इस मान्यता को हृदयंगम करने वाला व्यक्ति सर्वव्यापी ईश्वर की दृष्टि से बचने का कोई स्थान नहीं देखता और दुष्कर्मों से आग, विष, सर्प, सिंह आदि घातक तत्वों की तरह ही बचता है।
ईश्वर प्रेम का व्यवहारिक रूप है-उसकी दुनिया से प्रेम करना। प्रेम की यथार्थता प्रेम की अधिक से अधिक देने के रूप से प्रकट होती है। विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने का समस्त क्रिया-कलाप ईश्वर पूजा का प्रत्यक्ष रूप है। इस पवित्रता एवं उदारता की सत्पात्रता को जगाने के लिए ही तो उपासना प्रक्रिया का सुविस्तृत आधार खड़ा किया है। श्रद्धा का तात्पर्य है-श्रेष्ठता से असीम प्यार। भक्ति कहते हैं-करुणा, उदारता एवं सेवा को। श्रद्धा और भक्ति की इन्हीं सत्प्रवृत्तियों के सहारे आत्म-चेतना में ईश्वर का अवतरण होता है। भगवान दो उद्देश्य लेकर अवतरित होते हैं। एक धर्म का संस्थापन साधुता का अभिवर्धन। दूसरा अधर्म का विनाश अनीति का उन्मूलन। ईश्वर भक्त में यह दोनों की प्रवृत्तियाँ दिन-दिन प्रचंड होती चली जाती हैं। उसकी अन्तःचेतना, क्रिया-पद्धति एवं साधन सामग्री इन्हीं दो प्रयोजनों में संलग्न रहती है। उपासना का बीज सद्भावना-सम्वेदना, सहानुभूति, सहिष्णुता जैसी कोमलताओं से अन्तःकरण को निरन्तर दैवी सरसता से ओत-प्रोत किए रहता है।
ईश्वरमय जीवन-सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से भरा पूरा जीवन यही है-दिव्य जीवन या देव जीवन। ऐसा व्यक्ति नाभि में बसी कस्तूरी की गन्ध से उल्लसित रहने वाले कस्तूरी मृग की तरह प्रसन्न रहते, प्रसन्न करते, हँसते-हँसाते, खिलते-खिलाते आनंद भरा हलका-फुल्का जीवन जीता है। पुष्प की तरह श्रेय और सम्मान पाता है। सज्जन के ऊपर सम्मान और सहयोग की अजस्र वर्षा होती है।
अन्य किसी देवता की साधना के प्रतिफल के बारे में सन्देह भी किया जा सकता है पर जीवन देवता की आराधना, साधना करने वाला भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों से भरता ही चला जाता है। उसे स्वर्ग खोजने की आवश्यकता नहीं पड़ती उसके इर्द-गिर्द ही स्वर्गीय वातावरण बनता है। विश्व की सुख शान्ति और मानवी भविष्य के उज्ज्वल होने की सम्भावना ऐसे ही दिव्य वातावरण के साथ जुड़ी हुई हैं जो जीवन साधना के आधार पर विनिर्मित एवं अवतरित होता है।
कौन जीवित है और मृतक है? इसके उत्तर दो तलों पर ढूंढ़े और दिए जा सकते हैं तथा ढूंढ़े दिए जाते रहे हैं। पहला शारीरिक तल पर, दूसरा आध्यात्मिक तल पर। पहले में शरीर-संचालक शक्तियों की प्रक्रिया तथा स्थिति की जाँच की जाती है, दूसरे में आत्मिक शक्तियों की-यानी चेतना की गति व स्तर को देखा-समझा जाता है। दोनों के निष्कर्षों में लगभग पूर्ण साम्य है।
शारीरिक दृष्टि से मुर्दा कौन है? प्रसिद्ध शरीर विज्ञानी प्रो0 नेगेस्की के अनुसार मृत्यु को चार चरणों में बाँट सकते हैं। पहली स्थिति है-अवरुद्ध होती है श्वास-गति और मन्द होती हृदय-गति। इस स्थिति में यदि इलेक्ट्रो एन्सेफलो ग्राफ (ई॰ ई॰ जी0) यंत्र से पता लगाया जाए, तो मस्तिष्क शिथिल गति से देह-घटकों को सन्देश संप्रेषित कर रहा दिखेगा।
दूसरी स्थिति है ‘क्लीनिकल डेथ’ की है। नाड़ी-गति, हृदय-स्पन्दन, श्वसन-क्रिया रुद्ध। मस्तिष्क गहरी मूर्च्छना में। किन्तु किन्हीं अवयवों में मन्दगति से स्थानीय हलचल चलती रहती है। यदि उत्कृष्ट उपचार सम्भव हो, तो जीवन को अभी भी लौटाया जा सकता है।
चौथी स्थिति वह है जहाँ जीवाणुओं में सड़न शुरू हो जाती है। जीवन की सभी संभावनाएं समाप्त। यही पूर्ण मृत्यु है। इसे ही ‘बायोलॉजिकल डेथ’ कहा जाता है।
श्वसन-क्रिया एवं हृदय-गति का अवरोध, नाड़ी की गति बन्द होना, रक्त संचार की समाप्ति, पुतली पथराना, चमड़ी का श्वेत पड़ जाना, ये सब लक्षण हैं, जिनसे यह ज्ञात होता है कि जीवाणुओं की आन्तरिक संघटना का क्षय तेजी से हो रहा है। इसे उतनी ही तेजी से रोका भी जा सकता है। यदि समुचित चिकित्सा की व्यवस्था हो सके। इस प्रकार मूर्च्छा शास्त्र की खोजों के अनुसार ‘सेन्ट्रल नर्वस सिस्टम’ से संचालित समस्त जीवन क्रियाएं बन्द होने पर भी पूर्ण मृत्यु नहीं घोषित की जा सकती।
मस्तिष्क की क्रिया-शक्ति की समाप्ति के 72 घण्टे बाद तक और साँस चलने की क्रिया समाप्त होने के 24 घण्टे बाद तक कई रोगियों को पुनः जीवित किया जा सका है। जर्मनी के डॉ. बुशर्ट और डॉ. रिट्मेयर इस क्षेत्र में प्रसिद्ध हो चुके हैं।
रूसी वैज्ञानिक प्रो0 एल॰ लोजिन लाजिनस्की ने 1964 में मक्के के कीटों को शून्य से 4 डिग्री ऊपर हीलियम द्रव में जमा दिया और 6.30 घंटे इसी दशा में रखा। फिर ताप देकर क्रमिक चेतना लाई गई तो 20 में से 13 कीट पुनः जीवित हो गए।
एक अन्य सोवियत वैज्ञानिक पी0 कोसरेव ने ‘डाफनिया’ नामक जल-कीट और शेवाल का परीक्षण कर पाया कि उनमें से कुछ 25 हजार वर्ष पुराने थे। 25 हजार वर्ष से सुषुप्त पड़े अनेक ऐसे मृत-वत् जीवों को श्री कोसरेव ने जीवित कर दिया। हिमालय के भालू भी 6-6 महीने बर्फ में दबे पड़े रहते हैं। सूर्य की धूप से उनकी साँस फिर चलने लगती है। हिम प्रदेशों में रीछ ठंड में बर्फ में दब जाते हैं। श्वास गति का पता नहीं चलता। गर्मी में बर्फ पिघलते ही वे भी दबे रीछ पुनः सक्रिय हो जाते हैं।
मोटी जाँच-पड़ताल के आधार पर घोषित की गई मृत्यु के उपरान्त कितने ही व्यक्तियों ने फिर जी पड़ने के उदाहरणों की कमी नहीं है। नाड़ी की, हृदय की धड़कन बन्द हो जाने, सास रुक जाने, पुतली थम जाने, हाथ पैर अकड़ जाने जैसे लक्षणों को देखकर यह मान लिया जाता है कि मनुष्य कर गया। इसके बाद अंत्येष्टि की तैयारी आरम्भ कर दी जाती है, पर देखा गया है कि श्मशान घाट पहुँचते-पहुँचते जान वापिस लौट आई और मुर्दा फिर से जिन्दा हो गया। ऐसी घटनाएँ न केवल गाँव, घरों में ही होती हैं, वरन् साधन सम्पन्न अस्पतालों में विधिवत् परीक्षा के बाद घोषित की गई मृत्यु के उपरान्त भी मुर्दाघर से जिन्दा होकर वापिस लौट आने वालों के भी रिकार्ड मौजूद हैं।
इससे यह स्पष्ट होता है कि श्वसन क्रिया एवं हृदय-गति अवरुद्ध होने से ही मृत्यु नहीं हो जाती, क्योंकि मस्तिष्क तब भी क्रियाशील रहता है। पूर्ण मृत्यु तो मस्तिष्कीय कोशों के निष्कृष्ट हो जाने पर ही होती है। हृदयगति रुकने पर मस्तिष्क को शुद्ध रक्त नहीं मिल पाने से वह शर्करा नहीं प्रज्वलित कर पाता और शक्ति खोता जाता है। पर 6 मिनट तक मस्तिष्क बिना रक्त भी जीवित रह सकता है। यदि आर्गनिक पदार्थों के संश्लेषण से मस्तिष्क को जीवित रखने की विधि निकल आई तो दीर्घकाल तक सुषुप्ति सम्भव होगी। शारीरिक दृष्टि से यह योगियों की समाधि जैसी स्थिति होगी।
वैज्ञानिकों के लिए मृत्यु अभी रहस्य बनी हुई होने का कारण यही है कि मस्तिष्कीय-प्रणाली की अभी तक वैज्ञानिक अत्यल्प जानकारी रखते हैं। बाह्य-मस्तिष्क की अभी 17 प्रतिशत ही जानकारी उपलब्ध हो सकी है और मध्य-मस्तिष्क (मिडिल ब्रेन)की तो मात्र 3 प्रतिशत ही। शरीर का पूर्ण अधिपति है-मस्तिष्क। मस्तिष्कीय कोशों में किंचितमात्र प्राण-शक्ति शेष हो,तो चेतना का पुनः प्रस्फुरण सम्भव है। तब तक,जब तक कि शारीरिक अवयव सड़ना न शुरू हो गये हों।
नोबुल-पुरस्कार विजेता शीर्षस्थ रूसी वैज्ञानिकों में से एक प्रा0 लेव्हलैडो 1962 में एक मोटर दुर्घटना में अत्यधिक आहत हो गये। तीन माह वे अचेत रहे। चार बार उनकी हृदयगति कई -कई घन्टों बन्द रही। चारों बार ‘क्लीनिकल डेथ’ घोषित कर दी गई। पर चेतना शेष थी। अन्तिम बार उनकी धर्मपत्नी ने जब प्रेम से उनके सिर पर हाथ फेरकर कहा-”प्रियतम! यदि तुम मुझे पहचानते हो और सुन सकते हो, पर वाणी रुद्ध है, तो चार बार पलकें झपकाओ।” प्रो0 लेव्हलैडो ने चार बार पलकें झपकाई। डाक्टरों ने जान लिया कि चेतन शेष है। उपचार जारी रहे। वे स्वस्थ हो गए और अगले छह वर्ष यानी 1968 तक सहज जीवन जिया।
स्पष्ट है कि जहाँ चेतना का अंश शेष है, वहाँ नव जीवन संचार सम्भव है। मृत्यु वस्तुतः आन्तरिक शक्तियों का क्रमशः ह्रास है। जिससे भारी थकान और गहन मूर्च्छा आती है और इसी की चरम परिणति मृत्यु है।
दुर्घटनाओं में आन्तरिक शक्तियों को आकस्मिक प्रचण्ड आघात लगता है। उनका क्षय तेजी से होता है। जबकि वृद्धावस्था में होने वाली मृत्यु मन्द गति से क्रमशः घटित होती है। जीव-कोषों का धीरे धीरे क्षय होता है। अतः उनमें नव-जीवन संचार अत्यन्त कठिन होता है। वैज्ञानिक प्रयास कर रहे हैं कि जर्जरित शरीर में नये सिरे से ताजगी लाई जा सके।
वैज्ञानिक यह प्रयास भी कर रहे हैं कि मृत व्यक्ति को एक दीर्घकाल तक विश्राम करने दिया जाए। 25 वर्ष बाद उन्हें पुनः जीवित करने का प्रयास किया जाए। इसी बीच श्रम से शिथिल और क्षरित शरीर कोशिकाएं, विश्राम से नवस्फूर्ति पा जाएंगी। मृत्यु के बाद देह स्थित जीवाणुओं में विघटन प्रारम्भ हो जाता है, जिसका परिणाम होता है सड़न। शरीर को वायु और गर्मी से सुरक्षित रखते हुए शून्य से नीचे के तापमान पर रखने पर उसमें विकृति नहीं आती। अमेरिका में मनोविज्ञान के प्राध्यापक डॉ. जेम्स वेडफोर्ड ने अपनी वसीयत में ही यह इच्छा व्यक्त की थी कि उनके शरीर पर यह प्रयोग किया जाए। इस हेतु उन्होंने पर्याप्त धनराशि भी छोड़ी थी। तद्नुसार यह व्यवस्था की गई है। जनवरी 67 में मृत्यु के बाद उनकी देय सुरक्षित रख दी गई। 11 अन्य अमेरिकियों के शव भी इसी भाँति रखे गये हैं। इन शरीरों से मलादि निकालकर उन पर चाँदी की पतली पर्त लपेटी गई है और फिर दो परत वाले ताबूत में भीतरी पर्त में उन्हें बन्द कर वहाँ हवा न पहुँच पाए, ऐसी व्यवस्था की गई है। बाहरी परत में पर्याप्त नाइट्रोजन द्रव भरा गया है, ताकि आवश्यक शीतलता का तापक्रम बना रहे। यह द्रव हर छः महीने बाद पलट दिया जाता है। 25 वर्ष बाद यानी 1992 तक वैज्ञानिक उन शरीरों को पुनर्जीवित करने का प्रयास करेंगे। प्रयोग सफल हो सका, तो इसी देय में पुनर्जन्म सम्भव हो सकेगा।
इस सम्भावना को आशा मय दृष्टि से इसलिए देखा जा रहा है कि जीवन के समय वैसे तो विघटन एवं निर्माण की दोनों प्रक्रियाएँ होती रहती हैं। किन्तु मृत्यु के समय निर्माण प्रक्रिया प्रायः बन्द होने को होती है और विघटन प्रक्रिया अधिक तीव्रगति से प्रारम्भ हो जाती है। यदि मृत्यु के पूर्व ही निर्माण प्रक्रिया का बन्द होना रोका जा सके तो जीवित रहना सम्भव है। वैज्ञानिकों का विश्वास है कि यदि एनाबोजिल्म (कोशों की पुनर्रचना) तथा मेटाबोलिज्म (रस प्रक्रिया) का क्रम निरन्तर रखा जा सके तो 21 वीं सदी के पूर्व या 20 वीं सदी के अन्त तक मृतक को कुछ समय विश्राम देकर उसे पुनर्जीवित किया जा सकेगा।
आहार-विहार, रहन-सहन संयम, मानसिक सन्तुलन, दिनचर्या जैसी छोटी समझी जाने वली बातों पर यदि सतर्कतापूर्वक ध्यान रखा जा सके और अवाँछनीय गतिविधियों को रोका जा सके तो सहज ही दुर्बलता और रुग्णता की समस्या का समाधान निकल सकता है।
मृत्यु एक दिन तो सभी की होनी है। जन्म लेने वाले को मरना पड़ता है इस शाश्वत सत्य को झुठला सकने का दावा किसी के लिए भी कर सकना सम्भव नहीं, पर इसमें सन्देह नहीं है कि मृत्यु को काफी पीछे धकेला जा सकता है। जितने दिन जीने की सम्भावना दीखती थी उसकी तुलना में काफी अधिक समय तक जीवन का आनन्द लिया जा सकता है। शर्त एक ही है कि शक्तियों के क्षरण करने वाली उन भूलों को तत्परतापूर्वक सुधार लिया जाए जो हमारे स्वभाव का अंग बन गई हैं और आए दिन होती रहती हैं।
अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन तथा जेरियाट्रिक्स सोसायटी के भूतपूर्व अध्यक्ष डॉ. एडवर्ड बोर्ड का निष्कर्ष है कि आचार-व्यवहार में सामान्य सतर्कता बरतने से ही मनुष्य सौ वर्ष तक सहजता से जी सकता है। अल्पायु में निधन का कारण 7 त्रुटियाँ हैं-(1) आहार में लापरवाही (2) अस्त-व्यस्त दिनचर्या (3) बहुत अधिक या बहुत कम परिश्रम (4) कामवासना की अति (5) नशेबाजी (6) अनावश्यक मानसिक तनाव (7) स्वच्छता के नियमों का पालन न करना। इनसे बचे रहने पर स्वस्थ शत वर्षीय जीवन सहज सम्भव है।
रूस के शरीर शास्त्रविद् इवान मेचनिकाव एवं ए0 बोगोपीलत्स की खोजों के अनुसार मानव शरीर की सहज संरचना ही ऐसी है कि 125-150 वर्षों तक सरलता से जिया जा सकता है। रूस के 162 वर्षीय वृद्ध युवा शेराली और उनकी 94 वर्षीय पत्नी अपने आधि-व्याधि रहित दीर्घायुष्य का रहस्य मात्र निश्चिन्त मनःस्थिति व सरल दिनचर्या बताते हैं।
इसी दृष्टि से अमेरिका में एक छोटी बालिका का पालन-पोषण वैज्ञानिक ढंग से किया जा रहा है जिससे पता लगाया जा सके कि क्या अमरत्व या दीर्घजीवन को प्राप्त किया जाना सम्भव है या नहीं। बुरे विचार एवं असंयम ही बीमारियों के प्रधान कारण हैं। इनसे मुक्त रहने पर रोग मुक्ति सहज सम्भव है। इसी आधार पर उस लड़की का पालन-पोषण किया जा रहा है। उसे अच्छी जलवायु वाले ‘लाज’ नामक टापू में एक भव्य भवन में रखा जा रहा है। वहाँ जीवन से सम्बन्धित सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इस प्रयोग में ‘रायल फ्रेटरनिटी आफ मास्टर मेटाफिजिशियन्स’ नामक संस्था के अध्यक्ष जेम्स वी0 शेफर अधिक रुचि ले रहे हैं। उस लड़की की शारीरिक, मानसिक स्थितियों एवं व्यवस्था की देख-रेख के लिए एक हजार विशेषज्ञों का दल नियुक्त किया गया है।
दीर्घ जीवन के दो प्रमुख आधार हैं-श्वास धीरे 2 लेना और शीत वातावरण में रहना। इसीलिए योगी लोग प्राणायाम क्रिया करते और हिमालय की मन्दराओं में रहते हैं। शीत ऋतु में रीछ, सर्प, कछुए, मेंढक आदि अपने आपको इसलिए सिकोड़कर बैठ जाते हैं कि ताप की तीव्रता के कारण शक्ति का जो क्षरण हुआ है, वह बचाया जा सके।
रेफ्रिजरेटरों में रखकर फलों को अधिक दिनों तक ताजे रखा जा सकता है। बर्फ में दबी लाशें कई दिनों बाद निकालने पर ज्यों की त्यों निकलती हैं। इसी प्रकार दूरवर्ती ग्रहों पर मनुष्य को कृत्रिम शीत वातावरण में रखकर ही भेजा जा सकेगा। वहाँ पहुँचने पर पृथ्वी में रखकर ही भेजा जा सकेगा। वहाँ पहुँचने पर पृथ्वी के नियंत्रण कक्ष से ही धीरे 2 गरम वातावरण देकर मनुष्य को सक्रिय कर लिया जावेगा। क्योंकि उन ग्रहों पर पहुँचने के लिए हजार वर्ष तक लग सकते हैं। मनुष्य को फ्रिजकर देने पर उसकी शक्ति का क्षरण बन्द हो जावेगा। गरम होने पर पुनः उसी शक्ति एवं आयु के साथ जीवित हो जावेंगे।
औसत आयु में वृद्धि होने के कारण संक्रामक रोगों पर अधिकार पाना भी है। हैजा, प्लेग, इन्फ्ल्यूऐन्जा, मलेरिया आदि के टीके लगाकर पूर्व में ही हजारों लोगों को इन बीमारियों से बचा लिया जाता है। लोगों का रहन-सहन ऊँचा उठाने हेतु भी रूस में अधिक प्रयत्न हुए हैं। लाखों नये घर बनाकर लोगों को सुविधाजनक एवं स्वास्थ्यप्रद परिस्थितियों में रखा गया है।
रूस में 100 वर्ष पूर्व मनुष्यों की मृत्यु 40-50 वर्ष की उम्र में हो जाती थी किन्तु अब मृत्यु 70-80 वर्ष की उम्र में होती है। वहाँ 60 से 70 वर्ष तक व्यक्ति को अधिक क्रियाशील माना जाता है। आध्यात्मवादी भी जानते हैं कि चेतना का एक अंश भी शेष हो, तो नव-जीवन का संचार सम्भव है। मूर्च्छा जितनी गहरी हो उपचार भी उतना ही प्रखर आवश्यक है। मन पर पड़ने वाले आघात मस्तिष्क और हृदय की जाग्रति पर प्रहार करते हैं और व्यक्ति में स्फूर्तिहीनता, नैराश्य आदि की भावना बढ़ती है। गलत जीवन यापन से भी अन्तर्ज्योति मन्द पड़ती है।जीवन का सही दृष्टिकोण अपनाकर प्रबल पुरुषार्थ करने पर शरीर, मन, मस्तिष्क की शक्तियाँ क्रमशः विकसित ही होती जाती हैं। जिनकी ये शक्तियाँ शिथिल हैं, वे शारीरिक दृष्टि से जीवित रहते हुए भी गहरी मूर्च्छा में पड़े हुए हैं और मुर्दों जैसे ही हैं। आत्म-बोध, आत्मचिंतन तथा प्रखर प्रोत्साहन से यह मूर्च्छा हट सकती है और तेजस्विता बढ़ सकती है। मन्द चेतना क्रमशः समग्र जागरुकता के रूप में विकसित हो सकती है।
भार भूत जीवन जीने वाले साँस चलते रहने पर भी मृतक ही कहे जायेंगे इसके विपरीत जो शरीर से मर गए पर अपना यश शरीर धरती पर छोड़ गए हैं उन्हें सदा अमर रहने वाले देवताओं की श्रेणी में ही गिना जा सकता है। वैज्ञानिक मृत्यु की परिभाषा अब शारीरिक अवयवों के निष्क्रिय हो जाने के आधार पर नहीं मस्तिष्कीय चेतना का दीप बुझ जाने पर घोषित करते हैं। वस्तुतः शरीर नहीं मन ही प्रधान है। मन को जीवन्त रखकर हमारी प्रस्तुत आयुष्य भी बड़ी सुखद बन सकती है। उतने भर में ही हम असाधारण लाभ ले सकते हैं किन्तु यदि थका हारा, टूटा, निराश, नीरस रहते हुए दिन गुजारे जायें, लक्ष्य विहीन गतिविधियाँ अपनाये रहकर नर-पशुओं जैसा समय गुजारा जाए तो समझना चाहिए कि जीवित एमरु जाते रहने पर भी मृतकों की श्रेणी में रहकर किसी प्रकार जिन्दगी की लाश ढोते रहा गया है।
कौन सुखी? कौन दुखी? इसका निर्णय किसी की मनःस्थिति के आधार पर किया जा सकता है, परिस्थिति देखकर नहीं। दार्शनिक वर्ट्रेन्ड रसेल ने अपनी पुस्तक ‘कान्स्वेस्ट आव हैप्पीनैस’ में सुख और दुख की विवेचना करते हुए तथ्यों पर सुविस्तृत प्रकाश डाला है। वे कहते हैं आत्मा केन्द्रित बैठे ठाले और खाली मस्तिष्क वाले लोग ही निषेधात्मक कल्पनाओं में डूबे रहने का अवसर अधिक पाते हैं। फलतः छोटी-छोटी कमियों, कठिनाइयों एवं घटनाओं के कारण आगत कठिनाइयों को बढ़ा-चढ़ाकर सोचते हैं और दुःखी रहते हैं। भविष्य में दुर्घटनाएं घटित होने-बुरे दिन और असफलता मिलने की बात सो-सोचकर भी कितने ही लोग विक्षुब्ध रहते पाये जाते हैं। उनके दुःख काल्पनिक होते हैं। हर मनुष्य के जीवन में कुछ न कुछ प्रतिकूलताएं रहती हैं। इच्छित सुविधाएं कदाचित् ही कोई पा सका होगा। सामान्य-सी प्रतिकूलताओं की भयानक प्रतिक्रिया सोचते रहना ही संसार के तीन चौथाई दुःखों का कारण है। यदि लोग शरीर और मन को व्यस्त रखना सीखें, वर्तमान को अधिक व्यवस्थित बनाने पर ध्यान केन्द्रित करें, भूतकाल की अप्रिय स्मृतियों और भविष्य की भयानक सम्भावनाओं को सोचते रहने से हाथ खींच लिया जाए तो दुःखी रहने वाले व्यक्ति भी देखेंगे कि वे भी ऐसा सामान्य जीवन जी रहे हैं जिसमें हँसी-खुशी के दिन गुजारने में कोई कठिनाई नहीं।
दार्शनिक विलियम जेम्स ने सुख-दुःख का गणितीय ढंग से समाधान प्रस्तुत किया है वे कहते हैं कामना में कम दर्जे की परिस्थिति रहने पर मनुष्य दुःखी देखा जाता है। इसके विपरीत जिसकी अभिलाषाएं कम हैं वह स्वल्प साधनों और सामान्य परिस्थितियों में भी प्रसन्न बना रहता है। जिन परिस्थितियों को एक व्यक्ति अपने लिए संतोष और सौभाग्य का कारण मानता है उसी में दूसरा व्यक्ति अपने को दीन-दरिद्र मानता रहता है। ऐसी दशा में सुख और दुःख का कोई मापदंड नहीं बन सकता। दरिद्रता और सम्पन्नता की भी सीमा नहीं बाँधी जा सकती। फिर किसी को सुखी या दुःखी किस आधार पर कहा जाए? वस्तुतः व्यक्ति की मनःस्थिति और तुलना शैली पर ही सब कुछ निर्भर है। यदि ऐसा न होता तो सभी सम्पन्नों को सुखी और सभी विपन्नों को दुःखी पाया जाता। पर बहुधा देखा इसके विपरीत ही जाता है। सम्पन्न लोग अधिक की अपेक्षा करते और अधिक उद्विग्न रहते हैं जबकि सामान्य स्थिति में निर्वाह करने वाले सन्तोषपूर्वक जीवन का आनंद लेते और प्रसन्नता भरे दिन काटते देखे जाते हैं।
विचारक शोपनहार का कथन है कि मनुष्य की चिन्तन शैली का नाम ही नरक और स्वर्ग है। प्रतिगामी चिन्तन के अभ्यास अपने चारों ओर कष्टकर परिस्थितियों और विद्वेषी व्यक्तियों का घेरा खड़ा करते हैं। यह उनकी विकृत कल्पना शक्ति का सृजन होता है। वस्तुतः वे दूसरे असंख्यों की तरह सामान्य स्थिति में ही रह रहे होते हैं। अपनी विषेधात्मक मान्यताएँ और आशंकाएँ ही डरावनी प्रतिक्रिया बनाती और डरावनी प्रतीत होती हैं।
महाकवि कीट्स ने विपत्ति को कुकल्पना की झाड़ी पर फलने वाले कुरूप पुष्प कहा है। वे कहते हैं कि इस संसार में आनन्द और सौंदर्य इतना अधिक है कि यदि उसका चिन्तन भर करते रहा जा सके तो आनन्द की सभी भी कमी नहीं रहेगी। दुःखद सम्भावनाएं तो यहाँ इतनी स्वल्प हैं कि उन्हें हँसकर भी टाला जा सकता है।
कबीर ने दृष्टि पसार कर देखा तो सर्वत्र दुःखियों की ही भीड़ देखी। इसका कारण ढूँढ़ने पर उनमें मानसिक दुर्बलता की निमित्त पाई। सुखियों में जिनकी गणना की जा सकती है वे उतने ही हैं जितनों में अपने चिन्तन की शैली बदल ली। कबीर कहते हैं -
धूत दुःखी, अवधूल दुःख है, रंक दुःखी धन रीता रे। कहें कबीर वही नर सुखिया, जिसने मन को जीता रे ॥
बड़ी आकृति वाले थलचर प्राणियों से ही हमारा परिचय है। इससे आगे भी कहीं जीवधारियों का अस्तित्व है और उनकी भी कोई अपनी दुनिया है इस तथ्य की बहुत कम लोगों को जानकारी होती है। पृथ्वी पर रेंगने वाले प्राणियों की कितनी अधिक जातियाँ और उप-जातियाँ हैं-उनकी आकृति-प्रकृति क्या है? उनके सोचने और करने का उपक्रम क्या है? उन्हें किन साधनों से गुजारा करना पड़ता है और किन परिस्थितियों में रहना पड़ता है, इसकी जानकारी रखना तो दूर ठीक तरह कलपना कर सकना भी हमारे लिए सम्भव नहीं।
हमारी चेतना मानवी मस्तिष्क-परिस्थिति एवं साधनों के अनुरूप ढली है, अस्तु उसे जो सीमित दृष्टिकोण एवं ज्ञान मिला है उसी को लेकर काम चलाना पड़ता है फिर अन्य प्राणियों की विलक्षण दुनिया के बारे में सही कल्पना कर सकना कैसे सम्भव हो। यही बात जानकारियों के सम्बन्ध में भी है। आँखों से देखे जा सकने वाले जल जीवों की जानकारी-उतनों तक ही सीमित है जो आँखों के सामने आते और अपना परिचय देते रहते हैं समुद्र तल में ही निर्वाह करने वाले जल जीवों की नगण्य जितनी जानकारियाँ ही है। उनकी प्रकृति और परिस्थितियों का पता लगाने के लिए जैसा चिन्तन चाहिए-जैसे उपकरणों और साधनों की आवश्यकता है उन्हें जुटाना अन्तरिक्ष यंत्रों से भी कठिन सिद्ध होगा। इतने पर भी यह तथ्य है कि अपनी धरती की ‘दुनिया’ उतनी छोटी नहीं है जितनी कि मनुष्यों द्वारा सोची और जानी गयी है। इसी धरती पर असंख्य जाति के जीवधारी निवास करते हैं। उनकी संख्या भी इतनी बड़ी है कि तुलनात्मक दृष्टि से 400 करोड़ मनुष्यों का संख्या बल बहुत ही नगण्य एवं उपहासास्पद प्रतीत होगा। संख्या बल के अतिरिक्त उनकी प्रकृति, आवश्यकता, पारस्परिक सहयोग व्यवस्था, निर्वाह, विनोद, वंशवृद्धि, प्रसन्नता, आयुष्य आदि की परिस्थितियाँ इतनी विचित्र मिलेंगी जिन्हें देखते हुए उन्हें मनुष्यों की ‘दुनिया’ से सर्वथा भिन्न एवं विलक्षण स्तर की कहा जा सकता है। प्राणियों की, असंख्य स्तर की चित्र-विचित्र दुनिया बसी हुई है। असंख्य सभ्यताएँ फल-फूल रही हैं। असंख्य जीवन विधाओं का कार्यान्वयन हो रहा है किन्तु हम अपनी ही दुनिया तक सीमित हैं और उस सीमित क्षेत्र को ही सब कुछ मानकर मूर्खों की दुनिया में रहने की उक्ति चरितार्थ कर रहे हैं।
सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध में वैज्ञानिक ऑनोफाल्यूवेनाक ने सूक्ष्म जीवों को स्वनिर्मित लैन्सों से देखा। उन्नीसवीं शताब्दी में लुई पास्टर ने सूक्ष्म जीवों की दुनिया की जानकारी प्राप्त कर उनकी भूमिका को प्रयोग द्वारा दिखाया। फिर यह सिलसिला बढ़ता ही गया। कोरव, मैक्निरवोव, फिनले, फ्लेमिंग द्वारा विकसित सूक्ष्म जीव विज्ञान आज विशाल अध्ययन-अन्वेषण का क्षेत्र बना है।
सूक्ष्म जीव इतने छोटे होते हैं कि आँखों से उन्हें नहीं देखा जा सकता। पास-पास रखने पर साधारणतः 25 हजार सूक्ष्म जीव एक इंच की जगह में समा जाएंगे। इनकी आकृति और वजन दोनों के आधार पर कई जातियां हैं। सामान्यतः बीज अरब सूक्ष्म जीवियों का वजन एक खस-खस के दाने के बराबर होता है।
सूक्ष्मजीवी प्रत्येक जगह पर मिलते हैं। यहाँ तक कि ये ऐसे स्थानों पर भी पाए गए हैं, जहाँ जीवन की कोई सम्भावना नहीं मानी गई थी। पृथ्वी के वायुमण्डल की ऊपरी तह में, दक्षिणी ध्रुवों की बर्फ में, गर्म स्रोतों के खौलते प्रवाह में, नाभिकीय रिएक्टरों की शीतलन प्रणालियों में भी इन्हें पाया गया है।
‘मृत सागर’ से साफ पानी तक, स्तनपाइयों की आँतों से लोहे के जमींनदोज नलों की सतहों तक इनका बोलबाला है। प्रतिदिन अनेक सूक्ष्मजीवी हमारे शरीर के भीतर नाक और मुँह के रास्ते घुसते हैं। वे हमारी त्वचा पर भी विहार करते हैं।
इन सूक्ष्म जीवियों की असंख्य जातियाँ हैं। कुछ सूक्ष्मजीवी अम्लीय माध्यम में रहते हैं, तो कुछ क्षारीय। कुछ ऊँचे तापक्रम पर, तो कुछ नीचे तापक्रम पर। कुछ हवा के बिना नहीं जी सकते, तो कुछ हवा में ही नहीं जी सकते, बिना हवा के मजे में रह लेते हैं। यह माध्यम क्या है? जीवाणु जिस वस्तु में जन्म लेते, पलते-पनपते हैं, वही उनका माध्यम है। ये छोटे इतने होते हैं कि किसी भी द्रव माध्यम के एक धन सेन्टीमीटर में लगभग 1 करोड़ जीवाणु आराम से रह लेते हैं। जिस माध्यम में ये जीवाणु रहते हैं,उसी से आहार प्राप्त करते हैं। उसी माध्यम में ये बढ़ते, बच्चे पैदा करते और बलवान बनते हैं।
इनके बढ़ने और बच्चे पैदा करने का ढंग दिलचस्प है। प्रत्येक जीवाणु एक कोशिका भी है और एक जीव भी। इसीलिए यह कोशिकीय जीव कहलाता है। एक सूक्ष्मजीवी थोड़ा-सा लम्बा होकर स्वयं दो भागों में विभक्त हो जाता है। ये दोनों ही भाग मूल कोशिका के ही समान दो पृथक् सूक्ष्मजीवी बन जाते हैं। इनकी बढ़ने की रफ्तार भी गजब की होती है। एक सूक्ष्मजीव चौबीस घण्टे में 70 पीढ़ियां पैदा कर सकता है। पिषूचिका का एक सूक्ष्मजीवी एक दिन में 4 अरब 80 करोड़ की संख्या में हो जाता है। तभी तो इस रोग के अधिकाँश रागी देर होने पर बच नहीं पाते। पोपक माध्यम की कुछ ही बूँदों में सूक्ष्मजीवियों की 7 अरब आबादी का आवास सम्भावित होता है। एक सूक्ष्मजीवी द्वारा स्वयं को दो भागों में बाँटकर फिर पृथक्-पृथक् यही क्रम अपनाते हुए बढ़ते जाने के कारण इनकी वंश वृद्धि की क्रिया को ‘विखण्डन-क्रिया द्वारा वंश-वृद्धि’ कहा जाता है।
सूक्ष्मजीवियों की विविध जातियाँ हैं। सूक्ष्मजीवियों की ही तरह सरलतम जीवधारी ‘वायरस’ (विषाणु) होता है। वायरस अपने आप में एक कोशिका नहीं होता। इसमें केवल कभी आर॰ एन॰ ए॰। वायरस भी अपने से अपने जैसी अनन्त प्रतिकृतियाँ पैदा कर सकते हैं, पर वे यह कार्य परपोषी केशिका के अन्दर ही कर सकते हैं जीवाणुओं की किस्मों की विविधताओं तथा व्यवहार की भिन्नताओं के कारण ही सूक्ष्म जीव विज्ञान की आत अनेक शाखाएँ है। ‘वायरालाजी’ संक्रामक रोगों के जीवाणुओं का अध्ययन करती है। निराग विज्ञान के अंतर्गत संक्रामक राग के जीवाणु जिन जीवों पर आक्रमण करते हैं, उनकी प्रतिक्रिया का अध्ययन किया जाता है, जानपदिक रोग विज्ञान के अंतर्गत रोगोत्पादक सूक्ष्मजीवों के जीवन, विकास, विस्तार और बिहार तथा इनके चेभोथेरेपी में सूक्ष्मजीवों के विनाश के साधनों का अध्ययन होता है। आदि आदि।
प्रयोगशाला में सूक्ष्मजीवियों की विभिन्न नस्लें जिस पदार्थ में पैदा की जाती है, उस पदार्थ को ‘सम्वर्धन-माध्यम’ कहा जाता है। इन सम्वर्धन-माध्यमों में सहभागी जीवाणु-समूह पैदा कर जीव रासायनिक प्रतिक्रियाओं का अध्ययन होता है। जीवाणु खाद्य के रूप में जिस पदार्थ का उपयोग करत हैं,वह पचकर रूपांतरित हो जाता है, इसे ही ‘चयापचित’ होना कहते हैं।
जीवाणुओं की प्रत्येक नस्ल एक दूसरे से भिन्न होती है। इस भिन्नता का कारण जिस खाद्य का जीवाणु प्रयोग करते हैं,जिन पदार्थों का वे विच्छेदन करने में समर्थ होते हैं और रासायनिक ऊर्जा स्रोत अथवा सूर्य से वे जो ऊर्जा प्राप्त करते हैं, उनकी मात्राओं की भिन्नताएँ होती है। क्यों कि खाद्य-पदार्थ वह ऊर्जा की मात्रा संयोग हर बार भिन्न-भिन्न सम्भव है,इसीलिए जीवाणुओं की नस्लें भी परस्पर भिन्न होती है।
दाल, रोटी, साग आदि का स्वाद बिगड़ जाना, दूध का खराब हो जाना, रोटी में फफूँदी आ जाना, अचार वगैरह में फफूँदी लग जाना इन सबका कारण सूक्ष्मजीव ही होते हैं। ताजे सन्तरे का रस निकाल कर खुली हवा में रख दें, तो दो दिन में खराब हो जाएगा। कृपा इन्हीं सूक्ष्मजीवियों की। यदि वही रस बोतल में इस युक्ति के साथ रख दिया जाए, कि वहाँ सूक्ष्मजीवी हवा के साथ पहुंच न पाएँ, तो वह महीनों बाद भी वैसा ही ताजा निकलेगा अब तक मनुष्य के सहायकों में श्रम, दूध बाल, चर्म माँस आदि देने वाले प्राणियों की गणना होती थी और वनस्पति वर्ग को छाया, अन्न शाक, फल, फल, लकड़ी आदि देने वाले सहायकों में गिना जाता था। प्राणियों और वनस्पतियों के सहारे ही मानव जीवन की गाड़ी घिसटती दिखाई देती थी, अब सहायकों के वर्ग में सूक्ष्मजीवों की एक नई जाति सम्मिलित हुई है। विज्ञान ने धरातल की दूरी को ही समीपता में नहीं बदला है,वरन् प्राणियों के बीच की दूरी को भी घसीट कर एकता में परिणत कर दिया है। अब सूक्ष्म जीव हमारे लिए पशु और वृक्ष वनस्पतियों से भी अधिक उपयोगी एवं सहायक सिद्ध होने जा रहे हैं।
सतर्कता तो मित्रो से रखनी पड़ती है। अनियंत्रित और अव्यवस्थित छोड़ देने पर तो सुई भी काँटे का काम करेगी और संकट में फँसा देगी। संक्रामक रोग कीटकों की हानि को ध्यान में रखते हुए उनसे सुरक्षा का प्रबन्ध भी करना होता है और उनके मारण निवारण का सरंजाम भी जुटाना होता है। इतने पर भी समूची सूक्ष्म जीवों की दुनिया हमारे लिए शत्रु का नहीं मित्र का ही काम करती है और निकट भविष्य में उनकी सहायता से भारी हित साधना हो सकने की अपेक्षा है।
संक्रामक रोगों की भयानकता प्रसिद्ध है। तपेदिक, प्लेग, मोतीझरा, हैजा, इन्फ्लुएंजा, चेचक, डिप्थीरिया, कुकरखाँसी, टेट्नस, अधरड आदि अनेक संक्रामक यानी छूत के रोग है संक्रामक रोगियों से दूर रहन की सलाह इसी आधार पर दी जाती है। छोटे-छोटे कृमि होते हैं। इन्हें बैक्टीरिया या सूक्ष्मजीव अथवा जीवाणु कहते हैं। विषाणुओं से डरना और सतर्क रहना उचित है, पर यह भी ध्यान में रखा जाना है कि सूक्ष्म जीवियों की अधिकाँश जातियाँ हमारी शत्रु नहीं मित्र है। वे अनायास ही हमें बहुत लाभ पहुँचाती हैं, पर जब उनका सहयोग विधिवत् आमन्त्रित किया जायगा तब तो वे अपनी मित्रता का उससे भी बड़ा परिचय देंगी जैसा कि अब तक उपयोगी प्राणियों और वनस्पतियों का मिलता रहा है।
गठिया तथा अन्य सूजन वाले रोगों के इलाज के लिए उड्रेनल हारमोन की जरूरत पड़ती है। वृद्धावस्था में विशेषकर और विशिष्ट जरिस्थितियों में किसी भी उम्र में, प्रतिस्थापन-चिकित्सा में पुरुष तथा स्त्री को नव-शक्ति देने के लिए हारमोन जरूरी होते हैं।
मनुष्यों तथा पशुओं में शारीरिक ऊतकों के विकास के लिए भी हारमोन जरूरी होता है। शल्य-चिकित्सा के समय ऊतकों को जो क्षति पहुँचती है, उन्हें पुनर्लाभ के लिए प्रेरित करने हेतु मनुष्य को इन हारमोनों की वृद्धि हेतु हारमोन दिये जाते हैं। परिवार नियोजन हेतु निरोधक गोलियाँ बनने के लिए हारमोन जरूरी होते हैं।
इन हारमोनों का प्राप्त करना अब तक बहुत ही कठिन था। हाल ही में सूक्ष्म जीव विज्ञान के क्षेत्र में हुई खोज ने इसे सरल बना दिया है। एक ऐसे जीवाणु-समूह तथा रासायनिक की खोज की गई है, जिनके गुणों के कारण एन्ड्रोस्टान नामक पदार्थ का उत्पादन सम्भव हो सका है। इस एन्ड्रोस्टान को आसानी से रुढ हारमोनों में बदला जा सकता है। इस प्रक्रिया के औद्योगीकरण से ऊपर लिखे सभी हारमोन सुलभ हो सकेंगे।
इसी तरह अभी तक भेड़ की ऊन की यसा में से कोलेस्टरोल नामक एक पदार्थ प्राप्त कर उसे रुढ हारमोनों में बदला जाता था। पर परम्परागत रासायनिक विधियों से इस कोलेस्टरोल को हारमोनों में बदलना बहुत कठिन होता था। कुछ समय पूर्व ऐसे सूक्ष्मजीवी खोज निकाले गये है, जो कोलेस्टरोल को हारमोनों में बदलने में मददगार सिद्ध होंगे।
इससे एक बड़ा फायदा होगा परिवार नियोजन की निरोधक गोलियों के सुलभ होने तथा उनकी अंधाधुंध मूल्य-वृद्धि रुकने का। ये गोलियाँ मैक्सिको तथा मध्य अमरीका के पहाड़ी इलाकों में उगने वाली अरबी से निकाले जाने वाले एक रासायनिक पदार्थ से बनने वाले दो रूढ़ हारमोनों से बनती हैं। इस पदार्थ का वार्षिक उत्पादन लगभग 700 टन प्रतिवर्ष होता है, किन्तु जिन जंगली पौधों से ये निकाला जाता है, वे बड़ी मात्रा में चुन लिए गये हैं, जब उनकी पैदावार देर से तथा कठिनाई से होती है। इससे इनका मूल्य लगातार बढ़ रहा था। अब कोलेस्टरोल के रासायनिक परिवर्तन हेतु सहायक सूक्ष्म जीवियों की खोज से यह समस्या सुलझी है।
इसी तरह विश्व-खाद्य समस्या के समाधान में भी सूक्ष्मजीवी सहायक सिद्ध हो सकते हैं। प्रतिवर्ष बढ़ने वाली 7 करोड़ की आबादी को 20 लाख टन अतिरिक्त प्रोटीन चाहिए। इसके लिए 4 करोड़ हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन पर सोयाबीन की खेती की जरूरत पड़ेगी। जबकि एक कोशिकीय प्रोटीन के व्यापार पैमाने पर उपयोग करने पर 200 घन मीटर धारिता वाले दो हजार टैंक बीस लाख इन अतिरिक्त प्रोटीन सूक्ष्मजीवियों की सहायता से तैयार करने के लिए काफी होंगे। इस विधि से इस 20 लाख टन पर्याप्त होगी। सोयाबीन उत्पादन की वर्तमान विधि द्वारा इतने ही प्रोटीन के उत्पादन हेतु वाँछित भूमि का यह चार करोड़वां हिस्सा है।
इसी तरह औद्योगिक प्रक्रिया से काफी मात्रा में बनने वाले कूड़े का उपयोग प्रोटीन बनाने तथा बढ़ाने में किया जा सकता है-सूक्ष्मजीवियों की सहायता से। यदि विश्व के वर्तमान तेल उत्पादन से उपलब्ध संपूर्ण पैराफिन को प्रोटीन में बदल दिया जाए, तो लगभग 70 करोड़ टन प्रतिवर्ष का उत्पादन होगा।
दुनिया का 10 प्रतिशत दूध प्रतिवर्ष पनीर बनाने के काम आता है। इस प्रक्रिया में प्रोटीन जमाने के लिए दुधमुँहे बछड़े के पेट से प्राप्त होने वाले एक किण्वाणुओं को जिसका नाम है-रेन्नेट, मिलाना जरूरी होता है।
इस रेन्नेट के लिए पहले प्रतिवर्ष 4 करोड़ बछड़ों का वध किया जाता था। पिछले 15 वर्षों में तो पनीर उत्पादन खूब बढ़ा। फिर रेन्नेट की कमी का सामना करना पड़ गया। सूक्ष्म जीव विज्ञानियों ने फफूँदी के विलगन से रेन्नेट की तरह के किण्वाणुओं के उत्पादन की विधि खोजी। इससे केवल एक ग्राम तैयार पदार्थ, 700 किलोग्राम पनीर बनाने को पर्याप्त होता है। एक सूक्ष्मजीवी ने डेयरी-उद्योग को इस तरह सहायता दी है।
विभिन्न प्रकार के दूषणों के लिए सूक्ष्मजीवी जिम्मेदार माने जाते रहे हैं किन पर्यावरण की सफाई में भी सूक्ष्मजीवों की उतनी ही प्रमुख भूमिका है। गन्दे द्रव की सफाई की मोटे तौर पर तीन विधियाँ है-क्रियाशील, कीचड़-विधि, निस्पन्दन तथा किण्वीकरण। तीसरी विधि में सूक्ष्मजीवियों की भूमिका प्रमुख है। तीसरी विधि मौथेन-किण्वीकरण में एक विशेष प्रकार के जीवाणु कार्बोनिक गन्दगी को कार्बोनिक अम्लों में बदल देते हैं। उसके बाद मीथेन-जीवाणु कार्बोनिक अम्लों को मीथेन तथा कार्बनडाइ-आक्साइड में बदल देते हैं। इस विधि में गति मन्द होती है। पर लाभ यह है कि गन्दगी की ऊर्जा का 80 प्रतिशत अधिक मीथेन के रूप में मिल सकता है। इस तरह सूक्ष्मजीव दुनिया की एक और बड़ी समस्या के समाधान में सहायक हो सकते हैं।
लाइसीन उन तीन अनिवार्य अमीनो अम्लों में से एक है, जो अनाज में नहीं होते। गेहूँ या मक्का में मात्र 1/4 यानी 0.25 प्रतिशत लाइसीन मिलाने पर आटे का जैवीयमान बढ़कर दूध के बराबर हो जाता है। पशुओं को भी चारे के साथ दिये जाने पर जाइसीन बहुत लाभ पहुँचाता है।
सूक्ष्म जीवों की सहायता से अनाज के खाद्यान्न को भी बढ़ाया जा सकता है। मनुष्य के लिए 20 में से 9 अमीनो अम्ल आवश्यक हैं। अन्न प्रोटीन पशु प्रोटीनों से घटिया होते हैं, अतः इनमें कुछ अमीनो-अम्लों की कमी होती है।
व्यावसायिक पैमाने पर सूक्ष्मजीवों की सहायता से अमीनो अम्लों को उत्पादन किया जा रहा है। साथ ही जापानी सूक्ष्मजीव विज्ञानियों ने ग्लूनेटिक अम्ल तैयार करने वाला जीवाणु ढूंढ़ निकाला है। प्रदीपन से यही जीवाणु एक उत्परिवर्ती पैदा करता है, जो लाइसीन नामक पदार्थ के बड़े पैमाने पर उत्पादन में सहायक होते हैं।
ऐसे स्वादहीन विभिन्न खाद्य पदार्थ जो विश्व में उपलब्ध है, पर अभी खाद्य प्रयोग में नहीं आते, उन्हें स्वादिष्ट बनाने में भी सूक्ष्मजीवियों की मदद जरूरी है।
इस तरह पर्यावरण-प्रदूषण की समस्या और विश्व खाद्य समस्या, विश्व की इन दो सबसे बड़ी समस्याओं के समाधान में सूक्ष्मजीवियों की महत्वपूर्ण भूमिका है। आबादी की सर्वाधिक महत्वपूर्ण समस्या के क्षेत्र में भी परिवार नियोजन-निरोधक गोलियों के निर्माण में इनके विशिष्ट योगदान है। मनुष्य को निरोगी बनाने हेतु उपचारों- औषधियों के निर्माण में भी इनकी अनिवार्यता है। ऊर्जा की समस्या में भी उनकी सहायता समाधान कारक सिद्ध होगी।
विकास तथा प्रौद्योगिक प्रगति में प्रायोगिक सूक्ष्म जीव विज्ञान की विशिष्ट भूमिका है। कृषि, कोशिकीय, आग्विक, आनुवंशिक तथा विकिरण जीव वैज्ञानिक अनुसन्धान इसकी शाखाएँ हैं। उद्योग, अभियान्त्रिकी एवं औषध क्षेत्रों में इसके प्रभावी परिणाम, सामने आये है।
एक पूर्ण-पोषित मनुष्य अपने जीवन में पानी और आक्सीजन के साथ-साथ बड़ी तादाद में कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन ग्रहण करता है। इनका उत्पादन सूक्ष्मजीवों पर ही निर्भर करता है। पानी को प्राकृतिक रूप से शुद्ध कौन करता? सूक्ष्मजीव।
जन्तु और पौधों के मरने के बाद सूक्ष्मजीव इन्हें अपघटित करते हैं। अन्यथा पर्यावरण में दूषण ही फैले। एक आदमी अपने सम्पूर्ण जीवन में जितना कूड़ा बनाता है, उसी से एक पहाड़ बन जाए, यदि सूक्ष्मजीव उन्हें अपघटित करके प्रकृति-चक्र में दुबारा न डाल दें।
इसके साथ ही सूक्ष्म जीव विज्ञान नाइट्रोजन में बदलने की क्षमता के विकास की भी कोशिश कर रहे हैं। जिससे गन्दे पानी के पौधों और खेती के नाइट्रेट द्वारा नदियों-झीलों में फैल रही सड़न समाप्त की जा सकेगी।
यह आशा भी है कि कई सूक्ष्मजीवों का उच्च जीवों में आनुवंशिक रूपांतरण सम्भव होगा, इससे कुछ मानवीय किण्वाणु कमियाँ पूरी की जा सकेंगी। दालों की जड़ों में रहने वाला नाइट्रोजन-उत्पादन सूक्ष्मजीवों को यदि सामान्य अनाज की जड़ों में संयुक्त किया जा सका तो इससे भी आर्थिक एवं सामाजिक लाभ होगा, क्योंकि इन अनाजों का खाद्यामान इससे बढ़ जाएगा।
इस तरह विज्ञान आज सिर्फ बाह्य अन्तरिक्ष की चुनौतियों में ही नहीं उलझा है, बल्कि वह आन्तरिक अन्तरिक्ष की इन चुनौतियों से भी जूझ रहा है, जहाँ हमारे सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करने वाले अदृश्य रूपाकृति वाले अनन्त सूक्ष्मजीवों और सूक्ष्मतर हलचलों का विराट संसार है, महाकदि गेटे के शब्दों में कहें तो इस अंतरिक्ष को सिर्फ “देखना” पर्याप्त नहीं उसे “जानना” भी जरूरी है।
शरीर का बौनापन उपहासास्पद माना जाता है। असाधारण कम ऊँचाई के मनुष्य बौने कहलाते हैं। अपनी शारीरिक कमी के कारण वे अन्य सामान्य लोगों की तरह पुरुषार्थ नहीं कर पाते फलतः उनकी प्रगति भी अवरुद्ध ही रह जाती है। दूसरे लोग अपनी तुलना में उन्हें छोटा पाते हैं तो कौतुक-कौतूहल की दृष्टि से देखते और उपहास करते हैं।
मन का बौनापन, शरीर की ऊँचाई कम होने से भी अधिक उपहासास्पद है। शरीर की वृद्धि रुक जाने में मनुष्य के अपने पुरुषार्थ का दोष नहीं होता। उसके कारण अविज्ञात होते हैं और उन्हें हटाने में व्यक्ति के प्रयत्न प्रायः कुछ अधिक काम नहीं आते। किन्तु कन के बौने पन के बारे में ऐसी बात नहीं। मनुष्य चाहे तो अपने चिन्तन की उत्कृष्टता ही नहीं मस्तिष्क की प्रखरता भी बढ़ा सकता है। मानसिक दृष्टि से पिछड़े हुए मनुष्य को बौने मन वाला और भी उपहासास्पद माना जाता है।
वंशानुक्रम में उत्पन्न हुई खामी एवं हारमोन ग्रन्थियों की विकृति शारीरिक बौनेपन के प्रमुख कारण यह दो माने जाते हैं। यो। कुपोषण आदि अन्य कारण भी होते हैं। सतर्कता रखी जाय और बालकों के विकास में काम करने वाले तथ्यों पर आरम्भ से ही ध्यान दिया जाय, तो वंशानुक्रम से चले आने वाले तथा शरीर क्रम में विकृति होने के दोनों ही कारणों को निरस्त किया जा सकता है। प्रगतिशीलता और सतर्कता बढ़ने के साथ साथ इस व्याधि में क्रमशः कमी भी आती जा रही है।
शरीर शास्त्र के अनुसार पुरुष की सामान्य ऊँचाई कम से कम चार फुट ग्यारह इंच होनी चाहिए। यदि इससे कम है तो उसे बौना कहा जायगा। आश्चर्यजनक मनुष्य तब माना जाता है जब चार फुट से भी कम ऊँचाई रह जाय।
यों तो औसत कद से किसी भी व्यक्ति को बौना कहा जा सकता है किन्तु वास्तव में चार फुट से नीचे वालों को ही कौतुक-कौतूहल की दृष्टि से देखा जाता है। आमतौर से तीन फुट से ऊँचे ही वे होते हैं। इससे कम ऊँचाई वाले मनुष्य भी पाये जाते हैं पर उन्हें अपवाद ही कहा जा सकता है।
संसार में कुछ बौनी जातियाँ भी थीं या हैं। इनका ठिगनापन वंश परम्परा से सम्बन्धित है, इसलिए उनके अंगों का अनुपात उतना बेडौल नहीं होता जितना कि हारमोन स्रावों की न्यूनता एवं विकृति के कारण छोटे रह जाने वाले लोगों का, उनका सिर बड़ा होता है। धड़ में भी अनुपात रहता है किन्तु पैर बहुत छोटे रह जाते हैं। पिंडलियाँ प्रायः टेड़ी भी होती है। यही हालत हाथों की होती है। कलाई से लेकर पंजों तक अनुपात एक तरह का होता है तो कंधे से लेकर कलाई तक का दूसरे प्रकार का। लगता है दो ऐसे व्यक्तियों के हाथ का आकार जोड़े गये है; जिनके आकार में समानता नहीं थी।
पुरातत्त्ववेत्ताओं का कथन है कि पिछली सहस्राब्दी में लंका, भारत, जापान, चीन, फ्राँस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड आदि एशिया एवं योरोप के भी कई देशों में बौनी जातियाँ रहती थीं। वे या तो अविवाहित रहने के कारण अथवा बड़ी आयु के लोगों के साथ रक्त मिश्रण कर बैठने के कारण समाप्त होते चले गये।
इतिहास को देखने से पता चलता है कि संसार में पहले बौनापन अधिक था, अब वह क्रमशः घट रहा है। वंशानुक्रम की परतों तक जहाँ इस कमी ने प्रवेश कर लिया है वह अब भी पीढ़ी दर पीढ़ी यह कमी चलती रहती है और बौनी जातियाँ ही बन जाती हैं। अभी भी फिलीपाइन्स-मलेशिया, न्यू-गायना, मध्य एशिया अफ्रीका में कितने ही कबीले कद की दृष्टि से बौने ही बने हुए हैं।
अफ्रीका का कांगो देश बौने नागरिकों के लिए प्रसिद्ध है। वहाँ के वन्य प्रदेश में चार फुट से कम ऊंचाई के लोगों की बहुत बड़ी आबादी है। अँग्रेज नाविक एन्ड्रवैटल ने उस देश में अठारह वर्ष रहने के उपरान्त बौने लोगों के आकार-प्रकार और रहन-सहन पर अपनी विवरण पुस्तक छपाई थी। ऐसी ही एक पुस्तक पर्यटक ग्रागन ने भी प्रकाशित कराई थी जिसे पढ़ने से पता चलता है कि आकार के साथ मनुष्य के दृष्टिकोण तथा रीति-नीति में भी ओछापन घुस पड़ता है।
शरीर के छोटे होने से मन भी छोटा हो जाता है और सूझ-बूझ तथा परिस्थितियों का सामना कर सकने की कुशलता में भी कमी आ जाती है। इसका उदाहरण बौनों के द्वीप वाली एक प्रख्यात कथा पुस्तक में मिलता है।
बल कथा की पुस्तक ‘गुलीवर की यात्राएँ में एक लिलिपुट’ नामक क्षेत्र की कल्पना की गई है जिसमें अँगूठे की बराबर ऊँचाई के आदमी रहते थे। गुलीवर उस क्षेत्र में जाता है। वहाँ के लोग साड़े पाँच फुट ऊँचाई आदमी को दैत्य समझते हैं और डर जाते हैं। अपना बचाव करने की तरकीबें सोचते हैं। गुलीवर सो जाता है। बौने लोग अपने मकड़ी के जाले जैसे रस्सों से चुपचाप उसे जकड़ते हैं इस प्रकार वे अपने शत्रु को घसीट कर समुद्र में पटक दें और आतंक से छुटकारा पा लेंगे। गुलीवर आँख मूंदे चुपचाप पड़ा रहता है और मन ही मन इस कौतुक का रस लेता रहता है। वह जब अंगड़ाई लेकर उठता है तो सारे धागे टूट जाते हैं और बौने भाग खड़े होते हैं। वह कुछ बौनों को पकड़ कर हथेली पर रख लेता है और आश्चर्य की तरह उन्हें देखता और इतने उपहासास्पद छोटेपन पर हँसता है।
संसार में ऐसे लोग कम हैं जो पिछड़ों की सहायता करके उन्हें समर्थ बनाने के लिए प्रयत्न करते हैं। अधिकाँश तो पिछड़ों का उपहास करके अहंकार को पुष्ट करने का ही रिवाज पाया जाता है। पक्षियों की स्वाधीनता का अपहरण करके उन्हें पिंजड़े में बन्द रखना कितनों का ही मनोरंजन हैं। कई कुत्ते बिल्लियों का ब्याह रचाते देखे गये है। ऐसा ही मखौल कभी-कभी बौने लोगों के साथ भी हुआ है। अमीरों ने उन्हें अपने मनोरंजन का साधन बनाया है।
कितने ही राजा रानियों को बौने पालने का भी वैसा ही शौक था जैसे कइयों को कई तरह के चित्र विचित्र जानवर पालने का शौक होता है। रोमन सम्राट आस्तस की भतीजी ने ऐसे दो बौने पाले थे। उनकी ऊँचाई प्रौढ़ावस्था तक पहुँचने पर भी मात्र दो फुट चार इंच थी। राजा इस्वेला डी एस्टे ने तो अपने महल का एक भाग बौनों को पालने के लिए ही सुरक्षित कर दिया था। सम्राट पेपी के लिए गवर्नर हरकीफ बौने पकड़कर लाने के लिए सूडान गया था और वहाँ से कई बौने लाया था। राजा टालेमी को उस देश के बौने एक मण्डली बनाकर मनोरंजन करने और उपहार लेने जाया करते थे।
रूस में बौनों के विवाह राज दरबार की देख.-रेख में होते थे। एक बौने की शव यात्रा में तो रूस के राजा और मन्त्री सभी श्मशान घाट तक गये थे।
कद की ऊँचाई-निचाई समस्या में अमेरिकी शोधकर्ता एवं विशेषज्ञ डॉ. मैकोसिक ने अपने अध्ययन से बताया है कि बौनापन प्रकृति प्रदत्त लगते हुए भी वस्तुतः मनुष्य कृत है। उसे अन्य रोगों की तरह प्रयत्न पूर्ण हटाया जा सकता है। कोई भी कठिनाई ऐसी नहीं जो सरल न की सके। कोई भी समस्या ऐसी नहीं जिसका पूरा अधूरा हल न निकल सके। बौनापन भी इसका अपवाद नहीं है। विशेषज्ञों ने उसके कारण और निवारण खोजने का प्रयत्न किया है और उत्साहवर्धन सफलता भी पाई है। इस आधार पर यह आशा बँधती चली जाती है कि निकट भविष्य में इस व्याधि का भी अन्य बीमारियों एवं विकृतियों की तरह निराकरण सम्भव हो सकेगा।
शरीर शास्त्री वंश परम्परा के बौनों को छोड़ कर अकस्मात किसी के बौने रह जाने का कारण हारमोन ग्रन्थियों का स्रावों में असन्तुलन उत्पन्न होना बताते हैं। पिट्यूटरी ग्रन्थि से संचित होने वाले हारमोन कार्टिलेज कोशिकाओं को समर्थ बनाये रखने के लिए आवश्यक होते हैं। उनमें कमी पड़ जाय तो शिर भाग को छोड़ कर शेष सभी अवयवों का विकास क्रम रुक जाता है। थाइराइड ग्रन्थि के हारमोनों की भी शरीर के सन्तुलित विकास में महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। इन स्रावों के स्तर एवं अनुपात में गड़बड़ी आ जाने से भी बौनापन तथा ऐसी ही दूसरी विनाश बाधाएँ उठ खड़ी होती हैं।
बौनेपन की चिकित्सा के संदर्भ में पिट्यूटरी ग्रन्थि का स्राव-रोगी के शरीर में प्रवेश कराने में से ही निकलता है; पर यह स्राव मानव शरीर में से ही निकलता है और वह भी स्वल्प मात्रा में होता है। शव परीक्षा के समय बहुधा यह ग्रन्थि निकाली जाती है और उतनी अवधि में यदि वह विकृत नहीं हो चुकी है तो उसका सत्व निकाल लिया जाता है; फिर भी मात्रा इतनी कम रहती है कि प्रायः 150 शरीरों का स्राव मिलने पर एक बौने का इलाज हो सके। बन्दर की ग्रन्थियों से अथवा कृत्रिम उत्पादन से इसे प्राप्त करने का प्रयत्न किया गया, पर उससे भी समस्या की विशालता को देखते हुए कोई आशाजनक हल निकलता दिखाई नहीं पड़ा है।
हारमोन स्रावों का असन्तुलन न केवल छोटा रह जाने की विपत्ति उत्पन्न करता है वरन् असामान्य ऊँचाई बढ़ाकर नये किस्म का संकट खड़ा कर देता है। संसार में बौने लोगों की तरह ऐसे भी कितने ही व्यक्ति हुए हैं जो असाधारण रूप से बढ़ते ही चले गये हैं। राबर्ट बाइलो जन्म के समय सामान्य बालकों की तरह मात्र आठ पौण्ड का था। इसके बाद वह बेहिसाब बढ़ता और फूलता चला गया। आठ साल का होते-होते वह छह फुट ऊँचा और 195 पौण्ड भारी हो गया तब भी वह एक अजूबा था और दैत्य बालक कहा जाता था। पर प्रगति रुकी नहीं। अठारह साल का होते-होते वह सवा सवा आठ फुट ऊँचा और 400 पौण्ड भारी हो गया तभी उसे संसार का सबसे बड़ा दैत्याकार मानव घोषित कर दिया गया था। बाईस वर्ष की आयु पाकर स्वर्गवासी हो गया। मरने के दिनों उसकी ऊँचाई पूरे नौ फुट की हो गई थी और वजन 491 पौण्ड हो गया था। उसका शरीर जाँचने वाले कहते थे कि यदि मृत्यु न होती तो बाइलो का कद और वजन बढ़ता ही रहने वाला था।
मोटी मान्यताएँ बहुत लोगों की प्रतिक्रिया को देख कर बनती हैं। शरीर से छोटे लोग मन से भी छोटे होते है, यह मान्यता किसी हद तक ठीक हो सकती हैं। पर उसे निर्विवाद एवं सुनिश्चित नहीं कहा जा सकता। चेतन सत्ता पा कोई सीमा बन्धन नहीं लग सकते। वह इच्छा और संकल्प लेकर खड़ी हो जाय तो अद्भुत एवं असाधारण प्रगति हर परिस्थिति में करके दिख सकती हैं। अष्टावक्र ऋषि आठ जगह से टेड़े-मेड़े अपंग कुबड़े होते हुए भी प्रतिभा का चमत्कार दिखाते रहे हैं। अन्धी, बहरी, गूँगी हेलर, प्रमुख ज्ञानेन्द्रियों से वंचित होने पर भी अपनी विद्या एवं प्रतिभा का अद्भुत कीर्तिमान स्थापित कर सकी है। बौनों में भी कभी-कभी ऐसी विशेषताएँ जाती हैं जिनसे भाग्य पर पुरुषार्थ की विजय का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है। फ्राँस का प्रसिद्ध चित्रकार और फिल्म अभिनेता तुलूज लात्रे अपनी प्रतिभा के कारण ही प्रख्यात हुआ था, पर उसके बौनेपन ने इस प्रसिद्ध में और भी चार चाँद लगा दिये थे।
होमर, हैराडोटस् प्लिनी, पोम्योनियम, अरस्तू आदि मनीषियों का शारीरिक दृष्टि से बौने के रूप में उल्लेख हुआ है।
इतिहास में अनेक बौने व्यक्तियों की प्रतिभा का उल्लेख मिलता है। हिन्दू धर्म की अवतार शृंखला में एक ‘वामन’ भी थे। यह नाम इसलिए दिया गया कि वे 52 अंगुल के थे। शब्द शास्त्र की दृष्टि से वामन और बोना लगभग एक ही अर्थ का बोधक है। अष्ट वक्र ऋषि के हाथ-पैर मुड़े-तुड़े थे; पीठ कूबड़ वाली इस प्रकार वे ऊँचाई की दृष्टि से बोने जितने ही रह गये थे।
ग्रीक कवि फिलेटास की गणना बहुत छोटे कद के लोगों में ही होती है। वे बहुत भारी जूते इस डर से पहनते थे कि हलके होने के कारण कहीं हवा में उड़ न जायँ। वे मिश्र के राजगुरु भी थे।
इंग्लैंड के एक बोने जेफरो हडसन ने हँसाने की कला में भारी ख्याति और प्रवीणता प्राप्त की थी वे इसी आधार पर अच्छी आजीविका भी उपार्जित कर सके। ड्यूक आफ बर्मिघम की रानी बहुत कृपा पात्र थीं एक बार चोरों ने उनका अपहरण कर लिया तो रानी ने एक बड़ी राशि की ‘फिरौती’ देकर किसी प्रकार उनके पंजे से छुटकारा पाया।
अमेरिका में गत शताब्दी में जनरल टाम थम्ब अपनी प्रतिभा के लिए प्रख्यात थे। वे मात्र इकत्तीस इंच के थे। इनके समान या छोटे कद की पत्नी न मिली तो उन्हें अपने से दो इंच ऊँची लेविनिया वारेन नामक बौनी से विवाह स्वीकार करना पड़ा।
फ्राँस में एक तेईस इंच ऊँचा बौना रिचीवर्ग युद्ध काल में जासूसी की अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा। उसे बालक समझा जाता और वह युद्ध मोर्चे तक बहुत काम के कागज पहुँचाने और लाने का काम सफलतापूर्वक करता। उसने 90 वर्ष की आयु पाई।
फ्रांसीसी नृतत्व वेत्ता व्रेसचिन ने अपनी पुस्तक में बौनों में कई गुणा अधिकता रहने की बात लिखी उनके अनुसार बौने अपने आकार की तुलना में अधिक फुर्तीले, हिम्मत वाले होते हैं। वे मिल जुलकर रहने और प्यार मुहब्बत का परिचय देने में किसी से कम नहीं होते। वफोन ने मैडागास्कर में पाई जाने वाली कीमोस नामक एक बौने कबीले को कई दृष्टियों से विवेचन किया है और स्वीकार किया है कि शरीर छोटे होने के साथ-साथ मनुष्य की अनेक क्षमताएँ घट जाती है फिर भी भावनात्मक स्तर में बहुत कमी नहीं आती।
अमेरिका में बौने लोगों का संगठन दी ‘लिटिल पीपुल्स आर्गनाइजेशन’ विलीवार्टी नामक एक प्रतिभा वान व्यक्ति ने की थी जो माना हुआ विद्वान और प्रतिभा शाली होने के साथ-साथ बौना भी था।
वाल्टी मोर में एक बौना सम्मेलन हुआ था। जिसमें इस विकृति के कारणों को खोजने और निवारण उपायों की शोध करने का निश्चय किया गया था। शारीरिक कमी के कारण उन्हें अर्थोपार्जन एवं नागरिक सम्मान पाने में जो कठिनाई पड़ती है उसके निवारण में सहयोग देने की अपील भी सरकार तथा जनता से की गई थी। बौने आपस में मिलजुल कर रहें और एक-दूसरों की कठिनाई समझने तथा सहयोग देने का प्रयत्न करें। ऐसे और भी कई प्रस्ताव उस बौने सम्मेलन में पारित किये गये थे। यह संस्था बौने नर-नारियों के जोड़े ढूंढ़ने और उन्हें सुविधा का अवसर दिलाने को भी काम करती है।
इस बौना सम्मेलन में एक बहुत छोटे कद के इंजीनियर अपने निजी विमान को स्वयं चलाते हुए भाग लेने पहुँचे तो उपस्थित सदस्यों का साहस बढ़ा और उनने समझा कि शरीर की ऊँचाई कम होने से भी अन्य विशेषताओं को ऊँचा उठाने में कोई विशेष अड़चन उत्पन्न नहीं होती है।
पिछड़ेपन के अनेकों अभिशाप विभिन्न कारणों से मनुष्य पर बरसते रहते हैं। वे व्यक्तित्व को दबाने का प्रयत्न करते हैं और सामान्य मनः स्थिति के लोभ उनके दबाव से भिच भी जाते हैं किन्तु इतने पर भी मनुष्य का संकल्प और पुरुषार्थ सर्वोपरि है। वह हर कठिनाई से लड़ने और हर स्थिति में सफल हो सकता है। शारीरिक एवं मानसिक बौनेपन के कारण उत्पन्न पिछड़ेपन को निरस्त कर सकना भी मानवी पुरुषार्थ के लिए नितान्त सम्भव है।
जीवन में सभी तरह के अवसर आते हैं। सीधी पगडण्डी भी मिलती है, प्रशस्त राजपथ भी और ऊबड़-खाबड़ चट्टानें भी। नदी-नाले भी मिलते हैं और फूलों से काँटे कुछ अधिक ही पाये जाते हैं। इन सबमें होकर आगे बढ़ते जाने का एक ही उपाय है, कष्ट-कण्टकों को धैर्यपूर्वक सहन करता।
जीवन के किसी भी क्षेत्र में काम करते समय प्रतिकूलताएँ उपस्थित होती ही हैं। बना-बनाया,निष्कंटक राजमार्ग किसी को कभी नहीं मिला। प्रतिकूलताएँ उपस्थित होते ही विक्षुब्ध हो उठने पर चट्टानों से सर टकराने, नहीं में कूद पड़ती है। इससे स्वयं की हानि होती है। लक्ष्य तक पहुँचने में तो कुछ मदद मिलती नहीं।
व्यावहारिक जीवन में सर्वथा भले आदमियों का ही संग मिलना और अनुकूलताएँ ही सामने आना सम्भव नहीं होता। झगड़ालू, कलहकारी, विक्षुब्ध, दुष्ट प्रकृति के लोगों से बचते रहने को कितना भी यत्न किया जाए, पर अधिकार एवं प्रतिष्ठा प्राप्त भी ऐसे कई लोग होते हैं। उनसे नित्य ही सम्बन्ध आता है। उनके दुर्वचनों, अशोभन व्यवहारों के प्रति असहिष्णु हो जाने पर मन की शान्ति निरंतर भंग होती रहती है एवं अशान्त, उद्विग्न मनःस्थिति में कार्य भली-भाँति सम्पन्न नहीं हो पाता। शान्त और सन्तुलित मनःस्थिति बनाये रखने के लिए सहिष्णुता नितान्त आवश्यक होती है। असहिष्णुता से मनः स्थिति अशान्त-उद्वेलित हो उठती है। सम्पूर्ण शरीर थरथराने-सा लगता है। इस विक्षुब्ध मनःस्थिति में क्रोध उभर सकता है और अनुचित कार्य हो सकता है। आवेगों से बचने के लिए सहिष्णुता आवश्यक है।
कई बार प्रतिकूल परिस्थितियों में ही कार्य करते रहना होता है। उनके प्रति असहिष्णु बने रहने से मन में आवेग उद्वेग उठते और चित्त को विचलित करते रहते हैं। इससे कार्य सिद्धि अधिक कठिन हो जाती है। जीवन में प्रतिकूलताओं के बीच भी मानसिक सन्तुलन बनाये रखना आवश्यक होता है। उस हेतु सहिष्णुता एक महत्वपूर्ण साधन है।
असहिष्णुता का जन्म आतुरता में से होता है। हथेली पर सरसों जमी देखना चाहने वाली बाल-बुद्धि में सहिष्णुता और धैर्य कहाँ से आये? प्रतिकूलताओं की चुनौती हमारी योग्यता और श्रमशीलता की परीक्षा के लिए ही उपस्थित होती है। जीवन में जिनने भी विशिष्ठ सफलताएँ अर्जित की है , वे सभी धैर्यवान एवं सहिष्णुता रहे हैं। असहिष्णुता एक क्षुद्रता और उथलापन ही है। सहिष्णुता समुद्र की सी गम्भीरता का नाम है। इसमें बाधाओं, प्रतिकूलताओं की बड़ी-बड़ी चट्टानें भी बिना व्यापक उथल-पुथल उत्पन्न किये समा जाती है। असहिष्णुता की स्थिति में लिए गये निर्णयों में प्रतिक्रिया का भाव विशेष रहता है। यही निर्णय कर सकना सहिष्णुता व्यक्ति के लिए ही सम्भव होता है।
असहिष्णुता असंस्कारिता और नादानी की द्योतक है। सुसंस्कृत व्यक्ति सदा सहिष्णु होता है, क्योंकि वह जानता है कि विश्व -व्यवस्था ऐसी ही है कि यहाँ अनुकूलताओं के साथ ही प्रतिकूलताएँ भले लोगों के साथ ही बुरे लोगों पुष्पों के साथ ही काँटों का भी अस्तित्व है और उनसे हम बचकर नहीं रह सकते।
किसी भी तरह सफलता पा जाने, तनिक भी झंझट न झेलने पड़ने की कामना से असहिष्णुता पैदा होती है। मात्र अपने दृष्टिकोण को सही मानने, अपना मत, अपना पथ, अपने प्रियजन अपनी विचारधारा ही श्रेष्ठ और दूसरों के मत, पंथ प्रियजन एवं विचारधारा को निकृष्ट मानने की क्षुद्रता एवं मूढ़ता को उभारती है। इससे समालिक विद्वेष की भावना बढ़ती है। असहिष्णुता घृणा को जन्म देती है, दूसरी ओर श्रेष्ठता का दम्भ पनपाती है। दूसरे का विचार, व्यवहार, हीन कोटि का लगने लगता है और उसे मिटा देने की भावना उभरने लगती है। यह क्षुद्र अहं की पराकाष्ठा ही है भिन्न-भिन्न मत वालों की असहिष्णुता व्यापक सामाजिक कलह और संघर्ष का कारण बनती रही है। हिटलर यहूदियों के प्रति इतना अधिक असहिष्णु हो उठा था कि उसने उनका भयंकर उत्पीड़न और नृशंस सामूहिक वध किया। ईसाई एवं मुसलमानों में मध्यकाल में मूर्तिपूजन के प्रति ऐसी असहिष्णुता बढ़ी कि उन्होंने इसके लिए रक्तपात से लेकर लूटपाट तक की क्रूर गतिविधियों को अपनाया।
अन्याय, अनीति को सहना सहिष्णुता नहीं कायरता है। सहिष्णुता तो अपने से भिन्न विचार को सुन सह सकने की उदारता का तथा कठिनाइयों को झेलकर लक्ष्य पथ पर बढ़ते जाने की दृढ़ता एवं विशालता का नाम है। सहिष्णुता भी क्रोध, घृणा, प्रेम आदि की तरह संप्रेषण मनोवेग है। जिसके प्रति हम असहिष्णु होंगे, उसे हमारा भी अस्तित्व सहन न होगा और परिणाम में कलह-संघर्ष तथा विनाश की स्थिति उत्पन्न होगी। इससे विपरीत जिसके प्रति हम उदार सहिष्णुता का रुख रखेंगे, वह अधिक समय तक उपेक्षा-भाव नहीं बनाये रख सकेगा और हमारी स्थिति भी समझने का प्रयास करने को प्रेरित होगा।
सहिष्णुता का व्यापक पैमाने पर प्रयोग महात्मा गाँधी ने किया और उसके चमत्कारी परिणाम विश्व के समक्ष आये। उनकी सहिष्णुता का प्रभाव ब्रिटिश शासकों पर भी पड़ा और अनेकों प्रबुद्ध अंग्रेज उनके मित्र, प्रशंसक, सहयोगी, अनुयायी और भक्त बन गए।
सभ्य, सुसंस्कृत जातियों में सहिष्णुता का तत्व अनिवार्य रूप से विद्यमान रहता है। वार्तालाप, तर्क-वितर्क, बहस के दौरान असहिष्णु हो उठने वाले व्यक्ति को निन्दा का ही पात्र बनना पड़ता है।
कई लोग किसी सार्वजनिक विषय पर वार्तालाप करते-करते निजी प्रसंगों पर आ जाते हैं और फिर असहिष्णु होकर परस्पर कटु आक्षेप करने लगते हैं और व्यक्तिगत बुराई पर उतर आते हैं। यह असहिष्णुता मन-बुद्धि की दुर्बलता ही मानी जायगी। इसके द्वारा सार्थक बातचीत एवं बहस कर पाना तथा सत्य तक पहुँच पाना सम्भव नहीं होता और अपने ही संकीर्ण दायरे में बन्द रहे जाना पड़ता है।
कई लोग अपनी मर्जी के खिलाफ जरा सी बात सुन कर भड़क उठते हैं और थोड़ी भी प्रतिकूल स्थिति से उत्तेजित हो उठते हैं। ऐसे व्यक्ति न तो लोगों की प्रशंसा एवं सम्मान अर्जित कर पाते हैं और न ही अपना प्रयोजन साध पाते हैं।
यह असहिष्णुता यदि बहिर्मुखी न रहकर अन्तर्मुखी हो जाए, तब तो लाभ निश्चित है। अपनी त्रुटियों, कमजोरियों के प्रति असहिष्णु रहना स्वयं के विकास का सुनिश्चित मार्ग है। यद्यपि उसमें भी यदि अधिक उतावली का योग हो जाय और तत्काल ही परिणाम की अपेक्षा की जाने लगे, तो सफलता तो मिलने से रही, कई-नई मानसिक जटिलताएं अवश्य उठ खड़ी होंगी। लम्बे समय से यदि कोई कमजोरी या त्रुटि स्वभाव में रूढ़ हो गई है, तो प्रचंड संकल्प के बाद भी उसके दूर होने में कुछ समय लगता है। उस बीच बहुत ही अधिक व्यग्र, अधीर हो उठने से उद्वेग ही बढ़ेगा। यही बात सामाजिक क्षेत्र में भी लागू होती है। सामाजिक बुराइयों के प्रति तो असहिष्णु रहना आवश्यक है, किंतु बुरे व्यक्ति के प्रति असहिष्णु हो उठने से बात बनती नहीं और उस पर उल्टी ही प्रक्रिया होती है। बुरे व्यक्ति में भी अच्छाई के अंश तो रहते ही हैं। सहिष्णु व्यक्ति ही संयत ढंग से उनकी बुराइयों को समझा-बुझाकर और आवश्यक असहयोग-विरोध कर दूर कर सकता है। असहिष्णुता की प्रतिक्रिया में तो व्यक्ति और अधिक उद्धत ही बनता जाता है।
असहिष्णुता, अद्वितीय-वीरता नहीं, अहंकार मात्र है। अपने अतिरिक्त अन्यों के विचार एवं कार्य को न सह पाना संकीर्ण अहं के सिवाय और कुछ नहीं। असहिष्णु व्यक्ति के व्यवहार से लोगों से यह भावना घर कर जाती है कि यह अपने को बढ़-चढ़कर देखता तथा स्वयं की श्रेष्ठता के समक्ष हमारा निरादर करना चाहता है। मनुष्य की प्रवृत्ति प्रायः प्रतिशोधगामिनी होती है। असहिष्णु व्यवहार से दुःखी हो वह उस व्यक्ति के साथी भी वैसा ही दुःखद व्यवहार कर बदला लेने की योजना बनाने लगता है। प्रतिक्रिया में असहिष्णुता-जन्य उद्वेग बढ़ता जाता है तथा विद्वेष की कष्टकारक, हानिमूलक परम्परा बढ़ने लगती है। परिणाम में सन्ताप और अशान्ति ही प्राप्त होती है।
रावण की विद्वता संसार-प्रसिद्ध है। उसके बल की तो थाह नहीं ही थी, वह एक महान बुद्धिमान, विचारक व्यक्ति भी था। किन्तु अपने अतिरिक्त औरों की विचार-धारा तथा रहन-सहन की पद्धति के प्रति उसमें सहिष्णुता नहीं थी। किसी और की विचार-शैली और जीवन-पद्धति उसकी दृष्टि में सही नहीं हो सकती थी। ऋषियों का उत्पीड़न उसने इस असहिष्णुता के कारण ही किया था। इससे चारों ओर उसके प्रति असम्मान-तिरस्कार घृणा की भावना ही दृढ़ होती गई। यह अहंकार उसके विनाश का कारण बना। असहिष्णुता का पर्यवसान अहंकार में ही होता है। असहिष्णु यदि निर्बल हुआ तो मन ही मन जलता-भुनता, क्षुब्ध होता रहता है। वह प्रत्येक क्षण अशान्त बना रहता है और तरह-तरह की मानसिक विकृतियों का शिकार बनता जाता है। विश्व में किसी एक व्यक्ति की ही इच्छा कभी भी नहीं चल सकती और न ही एक ही विचार की सर्वव्यापी स्वीकृति सम्भव है। अपने से भिन्न विचार और अपने से भिन्न इच्छा एवं व्यवहार को सहने की यदि मनःस्थिति न रही तो प्रत्येक क्षण क्लेश, अशान्ति, कटुता ही मन को बेधती-मथती रहेगी।
निजी जीवन में असहिष्णु व्यक्ति को सदैव अशान्त बना रहना पड़ता है। पारिवारिक जीवन तो सहिष्णुता के बिना चल ही नहीं सकता। परिवार में भिन्न-भिन्न सदस्यों की प्रवृत्तियों में विभिन्नता स्वाभाविक है। किसी एक को क्रीड़ा में विशेष रुचि है, तो दूसरे को संगीत ही जीवन का सार और आनन्द का स्रोत मालूम पड़ता है, तीसरे को साहित्य पुस्तकें ही सच्ची सहयोगिनी और जीवनाधार दिखाई पड़ती हैं, चौथे के लिए जीवन का अर्थ है गम्भीर वैज्ञानिक अध्ययन-अनुसंधान, पाँचवें के लिए दार्शनिक ऊहापोह का रस ही आनन्द का स्रोत है, छठवें को अनेक विषयों में समान रुचि है। एक ही विषय क्षेत्र में भी कम भिन्नता नहीं होती। कइयों को क्रिकेट में अत्यधिक रुचि होती है, तो दूसरे क्रिकेट के नाम से चिढ़ते हैं और हाकी-जिम्नास्टिक आदि में रस मग्न रहते हैं। तो भी परिवार में इन रुचि-भिन्नताओं के कारण कलह उत्पन्न नहीं होती। सहिष्णुता और पारस्परिक स्नेह, सम्मान की भावना ही पारिवारिक सुव्यवस्था को बनाए रखती है।
समाज तो सहिष्णुता के बिना चल ही नहीं सकता। सहिष्णुता न हो तो मैत्री का भी निर्वाह नहीं हो सकता। मित्र एक दूसरे की खूबियों, अच्छाई में ही सहयोगी नहीं होते, कमजोरियों के प्रति भी सहिष्णु रहते हैं। यह सहिष्णुता दोष-दुर्बलता से समझौते के लिए नहीं होती, अपितु उसके दूर हो सकने के विश्वास के कारण होती है।
इस प्रकार सहिष्णुता, दुर्बलता या कायरता नहीं है। वह उदात्त मनोभूमि और शक्तिशाली व्यक्तित्व का अभिन्न अंग है। जिसमें मानवीय रुचियों, इच्छाओं एवं प्रयोजनों की विविधता की स्वीकृति
तथा शिवत्व के प्रति अविचल आस्था का समावेश रहता है।
एक चोर सन्त नानक के पास पहुँचा और इस बुरी आदत से छुटकारा पाने का उपाय पूछा।
नानक ने जो उपाय बताये वे उससे निभते न थे। एक के बाद एक उपाय बदलते-बदलते जब हुत दिन बीत गये और किसी से भी वह आदत न छूटी तो उन्होंने चोर को बताया कि तुम अपने पाप सबके सामने प्रकट करो।
चोर का बार-बार आना और पूछना समाप्त हो गया और आदत भी सुधर गई। पाप प्रकट करने में उसे लज्जा लगती थी, सो उसने चोरी करना ही बन्द कर दिया।
विनम्रता और शालीनता सुसंस्कृत व्यक्तित्व के अनिवार्य अंग हैं। अहंकारी कठोरता का स्पर्श किसी को प्रिय नहीं होता, जबकि विनम्रता के शीतल स्पर्श की सभी में सुखद प्रतिक्रिया ही होती है और मन प्रसन्नता से भर उठता है।
जीवन को सुखी और सन्तुष्ट बनाने के लिये जो आवश्यक वस्तुएँ मानी गई, उनमें स्वास्थ्य और शक्ति के साथ शील का भी समावेश है। अहंताजन्य आकांक्षाएं आंतरिक असन्तोष का कारण तो भी बनती है, व्यवहार में कर्कशता के रूप में भी अभिव्यक्त होती है। इसकी प्रतिक्रिया में अपने परिचितों सामीप्यों की उपेक्षा तिरस्कार, उपहास एवं विरोध ही प्राप्त होता है। सहज विनम्र व्यक्ति परिचितों के सम्मान का भाजन बनता है।
विनम्रता का अर्थ है- दूसरों का भी अपने जैसा ही सम्मान। सबके मस्तिष्क भिन्न-भिन्न हैं, सोचने-विचारने के तरीके अलग-अलग हैं। उनके दृष्टिकोण के प्रति असहिष्णुता अनुचित है। जो हमारे लिए अनपेक्षित है, वह गलत ही है, यह नहीं माना जा सकता। अतः उनके दृष्टिकोण को भी समझने की सन्नद्धता सदैव बनी रहनी चाहिए। फिर, समस्याओं का समाधान भी विनम्र तथा प्रशान्त मनः स्थिति में ही प्राप्त होता है। कलह कटुता से तो समस्याएँ और अधिक उलझती जाती है। विनम्रता इन उलझनों के बीच पथप्रदर्शक प्रकाश का काम करती है। अहं का औद्धत्य क्रोध के रूप में व्यक्त होता है। क्रोध वीरता का नहीं, दुर्बलता का लक्षण है। वीरता सदैव प्रसन्नता प्रदान नहीं करती है, जबकि क्रोध खिन्नता के ही अवसर उपस्थित कराता रहता है।
विनम्रता विशाल अन्तः करण की भावाभिव्यक्ति है। वह व्यक्तित्व की वास्तविक शोभा है। जिनकी भावनाएँ स्नेहसिक्त, मधुर है, वे ही विनम्र शालीन व्यवहार कर सकते हैं। रूखे, नीरस और स्वार्थी व्यक्ति दूसरों से सत्कार सहयोग नहीं प्राप्त कर सकते। विनम्रता ही औरों का सहयोग-सदा अर्जित-आकर्षित करती है।
किन्तु विनम्रता तभी सच्ची कही जा सकती है, जब वह एक नैतिक चेतना से सम्पन्न हो। ‘गंगा गए गंगा दास, जमुना गये जमुनादास’ की वृत्ति को विनम्रता नहीं कहा जा सकता। चापलूस और विनम्रता परस्पर एक दूसरे के विरोधी है। उन्हें एक मानने का भ्रम नहीं होना चाहिए। विनम्रता यदि आत्मबल से पुष्ट न होकर अहंकार का ही छद्म रूप हो, तो वह अधिक दिन टिकती नहीं और छिपी भी नहीं रह पाती।
विनम्रता यदि अपने सिद्धान्तों के प्रति समझौते के रूप में होगी, तो वह तिरस्करणीय ही कही जाएगी। विनम्रता का यह अर्थ कदापि नहीं कि हम अपनी कर्त्तव्य बुद्धि लोगों के हाथों बेच दें। यह तो पूरी पराधीनता हो गई।
सच्ची विनम्रता में दृढ़ता मिली रहती है भौतिक सुख-सुविधाओं की असीमित तृष्णा से उद्विग्न व्यक्ति कभी विनम्र नहीं हो सकते। सच्ची विनम्रता को अर्थ है अन्तः करण में प्रवाहित अमृत-निर्झर से उपजी शीतलता। उस विनम्रता में कर्तव्यनिष्ठा की दृढ़ता सदा ही विद्यमान रहती है। दूसरों को प्रभावित, आकर्षित या आकर्षित या आतंकित कर, उनका उपयोग अपनी संकीर्ण कामनाओं की सिद्धि के लिये करना, उसे अभीष्ट नहीं होता। आन्तरिक उल्लास ही उसके पथ का पाथेय होता है। औरों की प्रशंसा-निन्दा उसे पथ से विचलित नहीं कर सकती। उसे अपने श्रम एवं अध्यवसाय के ऊपर विश्वास रहता है। वह ईश्वरीय आस्था की परिचायक है। सच्ची विनम्रता को प्रतिकूल परिस्थितियाँ कभी उत्तम-उद्विग्न नहीं कर पातीं, अतः उसमें दृढ़ता सन्निहित ही होती है। अन्याय अत्याचार के समक्ष मूक या शिथिल रह जाना विनम्रता नहीं, कायरता है। दूसरों का मन रखने के लिए उनकी अनुचित बाते भी स्वीकार कर लेना तथा अशुभ प्रवृत्तियों की भी प्रशंसा करना विनम्रता नहीं, चापलूसी है। कायरों चापलूसों को विनम्र नहीं माना जा सकता।
विनम्रता की शीतलता में वास्तविक और उपयोगी डडडडड सदा ही विद्यमान रहती है दाहक उत्ताप अन्ततः शिथिलता के लिए बाधित ऊष्मा तो विनम्र शीतलता में ही भरपूर होती है।
शीत की शक्ति के उपयोग पर आज अधिकाधिक ध्यान दिया जा रहा है। क्र्रियोजेनिक्स का विकास शीत के सार्थक उपयोग की ही खोज हैं। अंतरिक्ष की यात्रा हेतु जाने वाले यान वर्तमान कल्पना के अधिकतम वेग से चलने पर भी दूरस्थ नक्षत्र पिंडों तक सैकड़ों वर्षों में पहुंचेंगे। एक सामान्य व्यक्ति उतने वर्षों तक कदापि जीवित नहीं रह सकता। फिर उतने वर्षों के लिए खाद्य पदार्थ तथा दैनिक उपयोग की वस्तुएं यान में संचित करने पर वे यान से भी अधिक वजन की ही जाएगी। अतः क्रियोजेनिक्स के अधीन ऐसी विधि विकसित की जा रही है, जिससे मनुष्य को शीत में जमा दिया जाय। जमा हुआ प्राणी हजारों वर्षों तक शून्य स्थिति में पड़ा रह सकता है। फिर आवश्यकता होने पर यान में जमे पड़े अन्तरिक्ष यात्री को स्वसंचालित यान अभीष्ट तापमान उत्पन्न कर जीवित कर लिया करेगा। नक्षत्र पिंड पर निर्दिष्ट कार्य संपन्न कर पृथ्वी की ओर लौटते समय यही प्रक्रिया पुनः अपनाई जाएगी।
शीत की शक्ति का उपयोग कर वस्तुएं दीर्घकाल तक सुरक्षित रखी जाती है। तरल नाइट्रोजन को फ्रीजीग्र प्वाइंट दे सकने में सफलता मिलने ही वाली है। तब चलता दौड़ता रक्त भी बिना विकार के जम जाएगा और अनिश्चित काल तक अपनी प्राण शक्ति सुरक्षित रखेगा, वांछित समय पर पुनः वैसा ही चलन दौड़ने लगेगा। शरीर के कोई भी अंग भविष्य में शीत विज्ञान की विकसित विधियों के द्वारा चिरकाल तक सुरक्षित रखे जा सकेंगे और प्रत्येक विश्राम के बाद नई शक्ति के साथ पुनः सक्रिय हो सकेंगे।
शीत के ये लाभ ही विनम्रता के लाभों का संकेत करते हैं। उत्तप्त स्वभाव से उद्विग्नता, खीझ और झुझलाहट ही पल्ले पड़ती है। स्वयं का सन्तुलन बिगड़ने से शरीर मस्तिष्क में जीवनी शक्ति का अपव्यय होता है और दूसरों को अपमानित, उत्तेजित , खिन्न कर देने भी स्वयं की ही क्षति होती है॥विनम्र व्यक्ति प्रतिक्रियाओं से बचा रहता है। पर यह सम्भव तभी है, जब विनम्रता वास्तविक हो ओर कर्तव्यनिष्ठा की दृढ़ता से जुड़ी हुई हो।
सामाजिक व्यवहार में इन दिनों तो विनम्रता की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है। लोगों का मत वैसे भी उद्विग्न उत्तप्त बना रहता है। हमारा आवेश उन्हें और भड़काता है। विनम्रता की शीतल फुहार उन्हें शान्ति प्रदान करती है और विनम्र व्यक्ति के प्रति उनमें आकर्षण पैदा करती है।
किन्तु विनम्रता यदि चारित्रिक दृढ़ता पर आधारित न रही तो वह क्षणिक ओर सतही ही होगी। नकली विनम्रता के नीचे भय छिपा रहता है। ऐसे लोगों को विनम्र नहीं, दब्बू ही कहा जाता है। विनम्रता तभी सार्थक है, जब उसके पीछे सशक्त दृढ़ता हो। दब्बू को सभी दबाने सताने का प्रयत्न करते और सदा उपहास ही करते रहते हैं। अन्तरात्मा को कुचलकर अन्याय अनीति को सहते जाने और उसे विनम्रता का नाम दे देने पर सुख शान्ति मिल पाना तो असम्भव है, अंधकार और पतन ही पल्ले पड़ेगा।
वस्तुतः विनम्रता का अर्थ हर स्थिति में मानसिक सन्तुलन बनाये रखना तथा मानवीय शील को न छोड़ना ही है। ऐसा तभी सम्भव है, जब मानसिक प्रखरता हाँ। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य ही ऐसी मानसिक प्रखरता दे सकता है। इस प्रखरता में लक्ष्य के प्रति समर्पण की दृढ़ता सदैव ही बनी रहती है। नैतिक दृढ़ता के बिना सच्ची विनम्रता की कल्पना भी असम्भव है। वह ओढ़ी हुई विनम्रता होगी और अधिक समय तक टिकेगी नहीं।
विनम्रता पुरुषार्थी को ही शोभा देती है। बड़े से बड़े संकटों से जूझ पाने की दृढ़ता ही विनम्रता को गरिमा प्रदान करती है। प्रखर दृढ़ता के बिना विनम्रता व्यर्थ है।
दृढ़ता से रहित विनम्रता नैतिक अंतर्द्वंद्व का कारण बनती है। सही, खरी, उचित और सामान्य बात भी किसी से इस भय से न कही जाय कि कही उसके अहं को चोट न पहुंच जाए, कही वह भड़क न उठे या कि रुष्ट न हो जाए, तो यह विनम्रता नहीं। भले ही इस विनम्रता के पीछे दब्बूपन न हो, पर सामाजिक नैतिकता की उपेक्षा तो है ही। अनौचित्य के विरुद्ध दृढ़ता आवश्यक है। वहाँ विनम्रता का प्रदर्शन या तो कायरता होती है, या फिर धूर्तता। कायरतापूर्ण विनम्रता का तात्पर्य है दब्बूपन और धूर्ततापूर्ण विनम्रता का अर्थ है अनैतिक जीवन। अनैतिकता का समर्थन कहीं न कहीं अनैतिक आचरण से भी जुड़ा ही रहता है।
भीतर सच्ची विनम्रता होते हुए भी कई बार ऊपर से कठोर दृढ़ता अपनानी पड़ती है। महाप्राण निराला के व्यवहार में कभी कभी अधिक उभर आने वाली तीक्ष्णता को जब कई लोगों ने कठोरता की संज्ञा दी, तब उनके मित्र महाकवि जयशकंर प्रसाद ने कहा था कि निराला के भीतर तो मातृ हृदय की मधुरता कोमलता का ही आधिपत्य है, पर वे यह भी जानते हैं कि धूर्त चापलूस लोग उनकी इस अतिशय कोमलता का अनुचित लाभ उठाने को प्रयत्नशील रहते हैं। तथा इस तरह उन्हें क्षति पहुंचाते हैं, इसलिए उन्होंने उग्रता कठोरता का कवच धारण कर रखा है।
जब चारों ओर परिस्थितियाँ प्रतिकूल और दाहक हो, मरुभूमि सी, विकट विपरीत, स्नेहशून्य, रेतीली, रूखी और पथरीली हो, तब कैक्टस जैसी दृढ़ता आवश्यक होती है। इस दुनिया में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो दूसरों का उन्मूलन करके ही अपना प्रयोजन पूरा करते हैं। वे सज्जनता को मूर्खता मानते हैं और उससे अनुचित लाभ उठाने की जुगाड़ में लगे रहते हैं। उनके सामने सरल विनम्र रहने बात बनती नहीं। ऐसों के सामने अपने वाह्य आवरण को कैक्टस जैसा ही मोटा मजबूत बनाए रखना होता है। अधिक कुशल व्यक्ति तो ऐसों का ही उपयोग कर लेते हैं और उनके दुष्ट मनोरथों को विफल भी कर देते हैं। वैसे ही जैसे कि कैक्टस पौधों के मोटे तनों के एकमार्गी छेद सूर्य से प्रकाश तो ग्रहण कर लेते हैं, पर अपनी स्निग्धता आर्द्रता को भी भीतर ही संचित रखते हैं। बाहर मरुभूमि की शुष्कता में उसे बिखर कर विलीन हो जाने के लिए नहीं निकाल देते। संकीर्ण स्वार्थ की दुष्ट प्रवृत्तियों को दलित करने के लिए वांछित दृढ़ता के साथ ही विनम्रता अधूरी है, वह गुण नहीं, दोष बनकर रह जाती है।
वन्धुवर! पुष्प। लो सवेरा हुआ, माली इधर ही आ रहा है, अपनी सज्जनता, सोमनस्यता तथा उपकार की सजा भुगतने के लिए तैयार हो जाओ। तात ! यदि मेरी सीख मानते और कठोरता व कुटिलता का आश्रय ग्रहण किये रहते तो आज यह नौबत नहीं आती।
फूल कुछ बोला नहीं, उसकी स्मिति और भी मोहक हो उठी। माली आया, उसने फूल को तोड़ा और डलिया में रखा। काँटा दर्प में हंसा, माली की वृद्ध उंगलियों में चुभा भी ओर अहंकार में ऐंठ गया। माली उसे गालियाँ बकता हुआ वापस लौट गया।
समय बीता एक दिन देव मन्दिर में चढ़ाये उस फूल की सूखी काया को उठाकर कोई उसी वृक्ष की जड़ों के पास डाल गया। काटें ने म्यान सुमन को देखा तो हंसा और बोला कहो तात! अब तो समझ गये कि परोपकारी होना अपनी ही दुर्गति कराना है।
फूल की आत्मा बोली-बन्धु, यह तुम्हारा अपना विश्वास है। शरीरों में चुभ कर दूसरों की आत्मा को कष्ट पहुंचाने के पाप के अतिरिक्त तुम अपयश के भी भागी बने। अन्त तो सभी का सुनिश्चित है, किन्तु अपने प्राणों को देवत्व में परिणत करने और संसार को प्रसन्नता प्रदान करने का जो श्रेय मुझे मिला, तुम उससे सदैव के लिए वंचित रह गये।
स्वास्थ्य रक्षा के नियमों में सभी सरल और स्वाभाविक हैं। उनमें न कोई कठोर हैं और न कष्टसाध्य। कठिन तो दुष्कर्म होते हैं। चोरी , उठाईगीरी , छल आदि दुष्कर्म करने के लिए असाधारण चतुरता और कुशलता की आवश्यकता पड़ती है किन्तु सचाई, ईमानदारी की राह पर चलना किसी अल्प बुद्धि वाले के लिए भी सरल है। इसी प्रकार प्रकृति प्रेरणा के अनुरूप जीवनयापन पशु पक्षी भी कर लेते हैं और आजीवन निरोग बने रहते हैं। सृष्टि के सभी जीवधारी जन्मते, बढ़ते ,वृद्ध पशु पक्षियों में कदाचित ही कभी कोई रोगी देखा गया हो। संसार में एक ही मूर्ख प्राणी है जो आये दिन बीमार पड़ता है, वह है-मनुष्य उसके चंगुल में फंसे हुए पालतू पशु भी बीमार होते पाये जाते हैं। मनुष्य ही है जो स्वयं बीमार पड़ता है ओर अपने संपर्क अधिकार के अन्य प्राणियों को बीमार करता है। यह अभिशाप असंयम का-प्रकृति प्रेरणा के विपरीत आचरण करने का है यदि कुचाल चलने की मूर्खता को छोड़ दिया जाय तो सृष्टि अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य के लिए भी सक्षम और निरोग जीवनयापन नितान्त सरल एवं सम्भव हो सकता है।
प्रकृति प्रेरणा का अनुगमन करके सभी जीवधारियों ने अपने शरीरों को निरोग बनाये रहने का वरदान पाया है। मनुष्य के लिए भी एकमात्र रास्ता यही है। प्रकृति के नियमों को झुठलाया नहीं जा सकता। उसके उल्लंघन की क्षमता मनुष्य में नहीं है। यहाँ बरती गई चतुरता में लाभ नहीं, हानि ही हानि है। प्रकृति से लड़कर नहीं हम उसका अनुगमन करके ही चैन से रह सकते हैं। यह तथ्य यदि हृदयंगम किया जा सके तो मनुष्य जाति के सामने खड़ी स्वास्थ्य संकट की विषम विभीषिका से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है। यदि सही राह पर चलने का साहस जुटाया जा सके-विकृत जीवन क्रम अपनाये रहने का दुराग्रह छोड़ा जा सके तो आरोग्य रक्षा, निरोगता एवं दीर्घजीवन की समस्या का सहज ही समाधान हो सकता है। कुछ थोड़े से नियम अनुशासन ही ऐसे है जिन्हें यदि दृढ़तापूर्वक अपनाया और स्वभाव का अंग बनाया जा सकें तो न केवल बिगड़े हुए स्वास्थ्य को ही सुधारा जा सकता है, वरन् संयम साधना के फलस्वरूप मिलने वाली बलिष्ठता एवं दीर्घजीवन का वरदान भी पाया जा सकता है। इस प्रकार के नियमों में सात प्रमुख माने गये है। इन्हें आरोग्य सूर्य की सप्त वर्ण, सप्त किरणें भी कहा जा सकता है।
(1) कड़ी भूख लगने पर ही खाया जाय। जब तक पेट की तीव्र माँग न हो तब तक मुंह में कुछ भी न डाला जाय। जब खाना हो तब आधा पेट आहार से भरा जाय। चौथाई पानी के लिए और चौथाई हवा के लिए खाली रखा जाय। ठूंस ठूंसकर इतना न खाया जाय कि आलस्य आने लगे और काम करना कठिन हो जाय। मुख के ग्रास को इतना चबाया जाय कि वह पतला होकर सहज ही गले से नीचे उतर जाय। दिन में दो बार खाना पर्याप्त है। बीच बीच में बकरी की तरह कुछ कुछ खाते रहने का स्वभाव न बनाया जाय। प्रातः जलपान में भारी चीजें न ली जायें। दूध, छाछ, फलों का रस , शाक का सूप जैसे पतले पदार्थ ही जलपान के लिए पर्याप्त समझे जाय। तीसरे प्रहर जरूरत पड़े तो ऐसे ही तरल पदार्थ लिए जा सकते हैं।
(2) खाद्य पदार्थों को न्यूनतम अग्नि संस्कारित किया जाय। तेल, घी में तलने भूनने की रीति अपनाकर उनका जीवन तत्व समाप्त न किया जाय। सब्जियों को उबाल लेना पर्याप्त है। जहाँ तक हो सके अन्न, फल, शाक, छिलके समेत ही लिया जाय। छिलके वाले भाग में आहार का अधिक महत्वपूर्ण तत्व रहता है। दालें साबुत ही पकाई जाय। तेज आग पर पकाने से खाद्य पदार्थों के जीवन तत्व जल जाते हैं इसलिए उन्हें मन्दी आग पर पकाया जाय। अच्छा तो भाप से पकाना है। इसके लिए स्टीम कुकर का उपयोग किया जा सके तो उत्तम है मौसमीफल कच्चे शाकों का सलाद, कच्चे अन्न,अंकुरित धान्य ,दूध, दही जैसे सात्विक एवं पौष्टिक पदार्थ ही उपयोग में लाये जायें। मिष्ठान, पकवान, गरिष्ठ, अधिक चिकनाई एवं मसाले पड़े भोजन से बचा जाय। आचार, चटनी जैसे उत्तेजक पदार्थों से बचा जाय। थाली में अधिक संख्या वस्तुएं न रहे। उनकी संख्या जितनी कम रहे उतनी ही पाचन में सुविधा रहेगी।
(3) शारीरिक श्रम इतना किया जाय जिससे थक कर गहरी निद्रा का आनन्द लिया जा सके। शरीर से कम और मस्तिष्क से अधिक काम लेने वाले अक्सर बीमार पड़ते हैं पशु पक्षी सारे दिन आहार की तलाश में दिन भर भागते दौड़ते, उड़ते उछलते रहते हैं इसलिए उनके शरीर निरोग एवं बलिष्ठ बने रहते हैं। हमारी जीवनचर्या में भी शारीरिक श्रम के लिए समुचित स्थान होना चाहिए। व्यायाम में स्वास्थ्य सम्वर्धन साधना का मनोयोग जुड़ा रहता है इसलिए उससे दुहरा लाभ है। शरीर की स्थिति के अनुरूप हलके भारी थोड़े बहुत व्यायाम का क्रम भी दिनचर्या में जोड़ कर रखा जाय। घर के कामकाज में हाथ बंटाना, टूट फूट की मरम्मत, सफाई, घरेलू शाक वाटिका, गृह उद्योग, चक्की पीसना जैसे कामों में परिवार के सभी लोग भाग लेते रहे तो शारीरिक श्रम के अतिरिक्त सुव्यवस्था, आर्थिक लाभ भी मिलेगा और सुरुचि, सुसज्जा का वातावरण दृष्टिगोचर होगा। रुग्ण दुर्बल व्यक्ति भी चारपाई पर पड़े पड़े अंग संचालन व्यायाम करते रह सकते हैं। मालिश से भी इस प्रयोजन की पूर्ति होतीं है। श्रम शारीरिक स्थिति के अनुरूप हो। लोभ या दबाव से वह इतना अधिक न हो जाय कि अत्यधिक शक्ति नष्ट होने से थकान चढ़ी रहे और जीवन संकट उत्पन्न होने लगे। श्रम और विश्राम का सन्तुलन मिलाकर चला जाय तो ही बात बनती है।
(4) स्वच्छता से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की व्यवस्था बनी रहती है।घर, आंगन, कपड़े, बिस्तर, बर्तन , खाद्य पदार्थ, पानी आदि में गन्दगी न रहने पाये इसके लिए सतत् सतर्कता बरतने और उन्हें स्वच्छ रखने के उपाय बरतने की आवश्यकता होती है। खुली धूप और हवा का घरों में प्रवेश रहना चाहिए। सीलन , घुटन के वातावरण में रहने से रुग्णता आ घेरती है। वृक्ष, पौधे, बेलें, फूल, तुलसी आदि की हरियाली घर, आंगन में रहे तो उससे सुन्दरता सुसज्जा के अतिरिक्त स्वच्छ वायु का लाभ भी मिलता है। टट्टी, पेशाब, स्नान, घर, नाली, कूड़ेदान, बरतन मांजने का स्थान, रसोई घर आदि की सफाई पर विशेष रूप से ध्यान रखा जाय। प्रायः इन्हीं स्थानों पर गन्दगी जमती और रुग्णता पलती है। मक्खी, मच्छर, खटमल, पिस्सू मकड़ी, जुए आदि बढ़ने पलने न पाये, इसकी सतर्कता रखी जाए। फिनायल, चूना, साबुन, डिटोल आदि का समय समय पर उपयोग करते रहा जाय। बुहारी और झाड़न जल्दी ओर बार बार काम में लाये जाय। गरम पानी और धूप का उपयोग सफाई में सहायक सिद्ध होता है। स्नान तौलिये से रगड़ कर इस प्रकार किया जाय कि किसी भी अवयव पर मैल की परत जमा न रहने पाये। दाँत, मुख एवं अन्य छिद्रों की सफाई पर विशेष ध्यान रखा जाय।
(5) नियमितता का सदा ध्यान रखा जाय। यथासम्भव दिनचर्या नियत निर्धारित रखी जाय। जिनकी नौकरी में ड्यूटी बदलती रहती है या दिन रात भाग दौड़ करनी पड़ती है उन्हें भी स्थिति के अनुरूप अपनी दैनिक समय व्यवस्था बनाते और बदलते रहना चाहिए। जिनकी कार्य पद्धति नियत निर्धारित है उन्हें तो समय का विभाजन करने और दृढ़तापूर्वक पालन करने की बात ध्यान में रखनी ही चाहिए। जल्दी सोना और जल्दी उठना बहुत अच्छी आदत है। प्रातःकाल का समय जिन कार्यों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। उनमें अधिक सफलता मिलती है। सवेरे जल्दी उठना उन्हीं के लिए सम्भव है जो रात को जल्दी सोते हैं। अन्यथा निद्रा पूरी न हो सकेगी। इंद्रियों से सीमित काम लिया जाय। रात्रि को तेज प्रकाश में आँखों पर दबाव डालने वाले काम न किये जायं। ब्रह्मचर्य का अधिक पालन किया जायं समय विभाजन में नित्यकर्म, आजीविका विश्राम, मनोरंजन, परिवार व्यवस्था, स्वाध्याय, उपासना लोक सेवा के सभी पक्षों का समावेश रखा जाय। उपार्जन में ही पूरा समय न खपा दिया जाय।
(6) चित्त को हर घड़ी प्रसन्न रखा जाय। जिन्दगी को खेल की तरह जिया जाय। हर काम उत्साह और मनोयोग के साथ किया जाय, पर सफलता असफलता से अत्यधिक उद्विग्न न बना जाय। तैयारी बड़ी से बड़ी की किन्तु असफलता हाथ लगने पर सन्तुलन बनाये रहने की मनःस्थिति भी रखे रहे मन पर छाये रहने वाले निराशा भय, आशंका, भीरुता, आत्म हीनता, संकोच जैसे अवसाद और क्रोध ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध, चिन्ता, उद्विग्नता, कामुकता जैसे आवेश केवल हानि ही हानि करते हैं। ज्वार भाटों की तरह मन को उछलने, गिरने न देना चाहिए। इसमें बहुमूल्य मनःस्थिति का दुरुपयोग होता है और प्रगति के लिए रचनात्मक चिन्तन करने की क्षमता ही नष्ट हो जाती है। मनोविकारों से उत्तेजित मस्तिष्क से अगणित शारीरिक और मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। वासना, तृष्णा ओर अहंता की मात्रा जितनी बढ़ी चढ़ी होगी मस्तिष्क में इतनी ही आग जलेगी और उतनी ही अशान्ति रहेगी। जो है। उस पर प्रसन्न रहा जाय, अधिक पाने के लिए उत्साहपूर्वक प्रयत्न किया जाय किन्तु अभीष्ट लाभ न मिलने पर खिन्न होने की आदत न डाली जाय। सादगी, सचाई, ईमानदारी, सज्जनता, सहृदयता, प्रसन्नता भरा स्वभाव बना लेना और मानसिक सन्तुलन बनाये रहना बहुत बड़ा गुण है जिसके आधार पर जीवन को सफलतापूर्वक जिया जा सकता है और आनन्दित रहा जा सकता है। ऐसी स्थिति रहने पर शारीरिक और मानसिक दोनों ही स्वास्थ्य दृष्टि से अक्षुण्ण बना रहता है। महत्वाकाँक्षा, जिम्मेदारी एवं आवश्यकताएं उतनी ही बढ़ाई जाय जितनी वर्तमान स्थिति के अनुरूप हो। अधिक बच्चे पैदा करने और इतनी अधिक लम्बी चौड़ी योजना बनाना जिनका ताल मेल वर्तमान स्थिति के साथ न बैठना हो, जीवन क्रम में नरक घोलने एवं स्वास्थ्य को नष्ट करने काक मार्ग ही कहा जा सकता है। हलकी फुलकी, हंसती हंसाती, प्रसन्न, सन्तुष्ट, उत्साहित, आनन्दित और आशान्वित जिन्दगी जीने की रीति नीति अपनाई जाय तो गरीबी ओर कठिनाइयों के रहते हुए भी आनन्द, उल्लास भरा निरोग जीवन जिया जा सकता है।
(7) स्वास्थ्य संरक्षण के लिए नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं का पालन आवश्यक हैं। दुष्टता, अनीति और उच्छृंखलता अपनाने वाले व्यक्ति भरपूर सुख सुविधाओं के रहते हुए भी आत्म प्रताड़ना सहते रहते हैं और शोक सन्ताप भरा जीवन जीते हैं। आहार बिहार से स्थूल शरीर का-सन्तुलन और सत चिन्तन से सूक्ष्म शरीर का-एवं सौजन्य सद्भाव से कारण शरीर का स्वास्थ्य संरक्षण होता है। मात्र हाड़ मांस का शरीर ही सम्पूर्ण आरोग्य का केन्द्र नहीं
कटोरी घड़े के सिर पर रखी रहती-फिर भी वह सदा खाली ही दीखती, अपनी रिक्तता पर खेद व्यक्त करते हुए एक दिन कटोरी ने घड़े से शिकायत की-आप सभी पास आने वाले को भरपूर जल देते हैं। फिर मुझ पर अनुग्रह क्यों नहीं करते?
घड़े ने कहा-दूसरे विनयपूर्वक झुकते और माँगते हैं, पर तुम तो अहंकार से मेरे सिर पर ही सवार रहती हो तुम्हें दे भी पाऊं तो कैसे? विनयशीलता के बिना किसी को भी तो कुछ नहीं मिलना।
जीवों जीवस्य जीवनम् इस उक्ति का अर्थ यह है कि जीव का जीवन सजीव आहार पर ही टिका रह सकता है। जीवन तत्व से भरपूर भोजन ही हमें जीवनी शक्ति देता है। जिस आहार का जीवन तत्व नष्ट हो गया हो, वह कितना भी महंगा क्यों न हो, जीवनी शक्ति की वृद्धि नहीं कर सकता।
मनुष्य के शारीरिक और मानसिक कष्टों में से आधे का कारण भोजन सम्बन्धी अज्ञान और असंयम है। अधिकांश लोगों ने भोजन का मुख्य सम्बन्ध स्वाद से जोड़ रखा है। फिर यह स्वाद प्रियता भी स्वाभाविक नहीं रहने दी जाती। बाल्यावस्था से ही जीभ की सहज सामर्थ्य को निरन्तर विकृत किया जाता है। छोटा बच्चा तनिक सी मिर्च का जिह्वा से स्पर्श होते ही तिलमिला उठता है, चीखने चिल्लाने लगता है, परन्तु धीरे धीरे बड़ों के अनुकरण में वह भी इस पीड़ा को अपने आवश्यकता बना बैठता है। यदि जीभ की प्रकृत शक्ति को विकृत न किया जाये, तो वह अपने उपयुक्त भोजन को पहचानने में समर्थ हो सकती है। पशुओं में यह शक्ति सुरक्षित रहती है ओर वे अखाद्य नहीं खाते। पालतू पशुओं को तो मनुष्य ने अपनी ही तरह कृत्रिम बनाने की हर प्रकार की कोशिशें की है। किन्तु प्रकृति के अंचल में स्वतन्त्र विचरण करने वाले जीव बाहरी आघातों से ही आहत पीड़ित होते हैं, खान पान की किसी गड़बड़ी से वे कभी भी अस्वस्थ नहीं देखे जाते। इसका कारण उनकी स्वादेन्द्रिय की सहज शक्ति बनी रहना ही है।
एक बार जीभ स्वाद की गुलाम हो गई, तो उसकी शक्ति में ह्रास ही होता जाता है। तब लोग उसी स्वाद की आकाँक्षा को तृप्त करने के लिये खाते हैं। जो पदार्थ घी, तेल, मिर्च, मसाले से भरपूर हो, जिनको देखते ही मुंह में लार भर भर आये, वही भोजन उत्तम मान लिया जाता है। इसके दूसरे सिरे पर ऐसे लोग होते हैं। जो मानते हैं कि भोजन का अर्थ पेट के खालीपन को भरना ही तो है। जब जो कुछ जैसा भी मिल जाये, पेट में डाल लो ताकि उसकी आग शान्त हो जाये।
दोनों ही दृष्टिकोण डान्त एवं हानिकर हैं। चटोरे लोग मिर्च-मसाले, शक्कर-गुड़, धी-तेल की भरमार से भोजन को भारी, दुष्पाच्य बना डालते ओर अपच की शिकायत करने घूमते हैं तो भोजन के प्रति उपेक्षा भाव रखने वाले अपीष्टिक पदार्थों के प्रयोग से शक्ति व स्फूर्ति गंवाते जाते हैं।
मनुष्य को कोई भी क्रिया बिना समझे बूझे नहीं करनी चाहिए। फिर भोजन तो एक महत्वपूर्ण क्रिया है। शरीर संचालन का वह आधार बनती है। वह अन यज्ञ ही है। यज्ञाग्नि में अशुद्ध, अनुपयुक्त, निषिद्ध आहुति देने से हानि की ही सम्भावना रहती है। उसी प्रकार जठराग्नि में अखाद्य, अयुक्त आहार का हवि देने पर स्वास्थ्य और शक्ति को क्षति पहुंचेंगे। अतः भोजन की क्रिया का महत्व समझकर भोज्य पदार्थों का चयन सतर्कता पूर्वक करना चाहिए।
वर्तमान युग में कब्ज एक सार्वजनिक रोग हो गया है। अनुमान है कि अन्य सभी रोगों की जितनी दवाइयाँ बिकती है, उससे आठ गुनी केवल कब्ज रोग की औषधियाँ बेची जाती है। इसका कारण यही है कि आँतों के स्नायु और उनसे लगी रक्तवाहनियां गरिष्ठ तथा भारी भोजन बार बार किये जाने पर उस बोझ को नहीं सम्भाल पाती और उनको कार्य शक्ति शिथिल होने लगती है। वे पाचन क्रिया ठीक से नहीं संपन्न कर पाती और कब्ज रहने लगता है। इसलिये आवश्यकता अधिक और महंगा खाने, घी तेल से भरपूर भोजन की नहीं, अपितु ऐसा भोजन करने की है, जिसमें जीवन तत्व विद्यमान हो। महंगा और भारी खाना जीवन तत्व से वंचित भी हो सकता है। यदि सफाई के प्रदर्शन के फेर में अन्नों के अधिकांश जीवन तत्व नष्ट किये जा चुके हो, शाक भाजी को डटकर खौलाया पकाया गया हो और मिर्च मसालों की जोरदार छौक मारी गई हो, तो उस भोजन के समय, श्रम ओर पैसा लगाने के बावजूद जीवन तत्व बहुत कम ही रह गये होंगे तथा उससे लाभ होने वाला नहीं उल्टे हानि ही होगी। अतः आवश्यक यह है कि भोजन को जीवंत रखा जाय। उसे मृत विकारग्रस्त, निष्क्रिय न बना डाला जाये।
जीवन तत्व प्रकृति के सान्निध्य में, सूर्य की किरणों के संपर्क में पनपते फैलते हैं। इसलिये आहार के प्राकृतिक स्वरूप को जितना सुरक्षित रखा जायेगा, उसमें जीवन तत्व उतने ही सुरक्षित रहे आयेंगे। यह सही है कि पाक क्रिया भी मानवीय भोजन का एक अनिवार्य अंग बन चुकी है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि पकाते समय भी इस तथ्य को ध्यान में रखा जाय कि आहार के प्राकृतिक स्वरूप को पूरी तरह नष्ट नहीं कर डालना है। साथ ही भोजन का एक अच्छा अंश कच्चे रूप में ही लेने की आदत डालनी चाहिए।
अन्न पाक क्रिया के उपरान्त ही ग्रहण किया जाता है। किन्तु थोड़ा अन्न नियमित रूप से कच्चे रूप में लेना चाहिए। इसके दो उपाय है- पहला जो अन्न दूधिया, हरे, कच्चे रूप में भी लिये जा सकते हैं। दूसरा सूखे अन्न को भी हरा, जीवन्त बना डाला जाये।
हरे, कच्चे अन्न में जीवन तत्व प्रचुरता से होता है। गांवों में लोग सदा गेहूं, जौ की बाले, मक्के ज्वार के भुट्टे चने आदि हरे रहने पर ही कच्चे या भूनकर खाते हैं। उनका स्वाद भी इस रूप में अलग ही होता है। ग्रामीण लोगों का स्वास्थ्य शहर की तुलना में अच्छा होता है। जिन्हें अतिशय गरीबी में जीना पड़ रहा है तथा बेकारी के कारण मजदूरी भी नहीं मिलती, वे ग्रामीण दलित जन तो अपोषण और भुखमरी की स्थिति में जीने को विवश हैं उनकी बात भिन्न है। किन्तु शहरी मध्यवर्ग के लोगों से ग्रामीण मध्यवर्गीय लोगों का स्वास्थ्य बहुत अच्छा होने का कारण आहार को प्राकृतिक रूप में ग्रहण करने का उनका यह अभ्यास ही है। इस हरे अन्न के साथ ही वे लोग भिगोया अन्न भी कच्चे रूप में नित्य ग्रहण करते हैं।
शहरों में भी फसल के समय गेहूँ की बाले, मक्का ज्वार के भुट्टे, हरे चने आदि बाजार में बिकने आते रहते हैं। उनका प्रयोग किया जाना चाहिए। सूखे अन्न को यदि एक दिन भिगोकर रख दिया जाय और दूसरे दिन एक पोटली में गीले कपड़े से बांधकर उस पर पानी के छींटे मारते रहा जाये ताकि वह सूखे नहीं, तो तीसरे या चौथे दिन वह अंकुरित हो जाता है। तब उसमें भी हरे अन्न का ही गुण आ जाता है। उबालकर खाये जाने की तुलना में अधिक लाभकारी होते हैं। चावल को धान की भूसी या खोल से अलग करने पर वह जिस रूप में उपलब्ध होता है, उसमें एक साल परत रहती है। उस परत को हटाकर फिर पालिश कर जो चमचमाता चावल बाजार में बिकता है, उसके पोषक तत्व नष्ट हो चुके होते हैं।
अन्न के दो वर्ग किये जा सकते हैं। एक पौष्टिक वर्ग के अन्न, दूसरे अल्प पौष्टिक तत्व वाले अन्न। गेहूं, चावल, चना, जो, बाजरा पौष्टिक अन्न हैं। ज्वार, मक्का आदि में पौष्टिकता अपेक्षाकृत कम होता है।
दालों, अनाजों, फलों और सागों के बारे में एक तथ्य सदा ध्यान में रखना चाहिए। जहाँ तक सम्भव हो, इन्हें छिलके समेत खाएं। कोदों या धान जैसे अन्न के बाहरी छिलके तो खाये नहीं जा सकते, इनमें भूसी हटाने के बाद जो अन्न निकलता है, उसका छिलका नहीं हटाना चाहिए। छिलके समेत खाने का कारण यह है कि छिलके सूर्य किरणों के अधिक स्पर्श में रहते है, अतः उनमें जीवनी शक्ति अधिक होती है। दालें सदैव छिलकों समेत खानी चाहिए। अभी सफाई के नाम पर अरहर, चना, मूंग, उड़द, आदि की दालों के छिलके अलग कर उन्हें साफ रूप में खाया जाता है। इस प्रक्रिया में छिलके के साथ ही बहुमूल्य पोषक तत्व भी साफ हो चुका होता है। दालें साबुत खाने की आदत डाल ली जाये, उन्हें दलकर दो दालों में विभक्त न किया जाये, तो यह अधिक उपयोगी होता है। जहाँ दालों के दोनों दल मिलते हैं, वहाँ बीच में एक अंकुर सा ऊपर उठा रहता है, जिसे बीज की नाक भी कहते हैं। यह छोटा सा अंश यद्यपि कसैला होता है, पर उसमें अत्यधिक उपयोगी तत्व होते हैं। यदि घुन पूरे दाने को भी खा ले किन्तु इस नाक को न खाये, तो खेत में वह बीज बोये जाने पर अंकुरित होकर फूलता फलता है। किन्तु यदि पूरा दाना साबुत रहा आये और नाक, घुन खा जाये, तो फिर वह अंकुरित नहीं हो सकता। इसी से स्पष्ट है कि उसमें ही जीवन्त शक्ति होती है। दूसरे अन्न की भी यही स्थिति है। पर गेहूँ आदि की रोटी बनानी होती है और दाल चावल व रोटी दोनों के साथ खाई जाती है, अतः दाल को यदि साबुत खाने का अभ्यास हो जाये तो पके भोजन के रूप में भी वह उतनी ही उपयोगी बनी रहती है।
हरी शाक सब्जी भी अपने प्राकृतिक रूप में खाने पर ही लाभकारी होती है। कच्ची न खायी जा सके, या कच्ची खाने का अभ्यास नहीं हो, तो भी धीमी आँच में पकाकर खाई जाय। तेल, घी, मिर्च मसाले की अधिकता से उनके गुण नष्ट हो जाते हैं। शाकों में जमीकन्द या सूरन, रतालू और कटहल जैसे दो चार ही ऐसे वर्ग में आते हैं, जिन्हें अधिक पकाना आवश्यक होता है और जिनमें जीवन तत्व भी कम होते हैं। शेष को सदा कम पकाना चाहिए। हरा साग जहाँ जो जब उपलब्ध हो उसका प्रयोग अवश्य करना चाहिए। लौकी, बन्दगोभी, फूलगोभी, भिंडी, बैंगन आदि सबको कम ही उबालना चाहिए। कई शाक तो कच्चे ही खाये जा सकते हैं और उनमें पोषक तत्व प्रचुरता से पाये जाते हैं।
टमाटर, गाजर ,मूली, चुकन्दर, खीरा ,ककड़ी आदि को कच्चा ही खाया जा सकता है। स्वाद के लिये साथ में नमक, जीरा, काली मिर्च का पुट दे सकते हैं। जिन्हें प्याज खाने में आपत्ति न हो, वे प्याज को शाक रूप में नहीं, कच्चे रूप में ही खाये, तो अधिक लाभ होगा। प्याज,टमाटर, गाजर, लौकी, मूली, ककड़ी, आदि के छोटे छोटे टुकड़े कर सलाद बना ली जाती है। उसमें धनिया, नमक, नीबू अदरक सबको मिला देने से यह स्वादिष्ट भी हो जाती है। और जीवन तत्वों से भी भरपूर होती है।
प्राकृतिक आहार की दृष्टि से फलों का अपना विशेष स्थान है। केला, आम, पपीता, नीबू, अमरूद, बेल आदि ऋतु फलों को मौसम में अवश्य खाना चाहिए, क्योंकि इनमें जीवन तत्व होते हैं।
भाजी कोमल होती है। इन्हें अधिक पकाने से इनका कचूमर ही निकल जाता है अतः धीमी आंच में थोड़ी देर ही पकाये। छोंक बधार की अधिकता न की जाये। भाजी को तेजी से रगड़कर धोना भी नहीं चाहिए। अपितु पानी में हलके हाथ से धोकर साफ कर लेना चाहिए। भाजी और तरकारी को सदा काटने से पहले धो लिया जाय। काटकर फिर धोने पर जीवन तत्व क्षरित हो जाते हैं। हाँ यह सदा देख लिया जाये कि उनमें कही कोई कीड़े आदि तो नहीं है। शाक सब्जी तथा फलों के साथ भी यह सतर्कता बरतनी चाहिए।
दूध को बहुत अधिक उबालने से उसके भी जीवन तत्व नष्ट हो जाते हैं। अतः उसे भी एक या दो उफान तक ही उबालना चाहिए। धारोष्ण दूध में जीवन तत्व अधिक रहते हैं।
इस प्रकार यह सदा ध्यान में रखा जाना चाहिये कि हमारा भोजन जीवन्त हो। मृत और व्यर्थ न हो। मैदा, सूजी आदि अन्न का कचूमर निकाल डालने की ही स्थितियाँ हैं। फिर उनकी डबल रोटी, पूरी, पकवान बनाना तो उन्हें और कमजोर व हानिकर बना डालता है। यही बात मशीन से पिसे गेहूं के आटे का चोकर छान डालने और चावल की लाल परत हटाकर पालिश कर देने के बारे में है। चावल को रगड़ रगड़कर धोना और फिर माड़ भी निकाल देना, दालों को मसालों और बघार से भून तल कर गरिष्ठ बना देना ये सभी जीवन तत्व को नष्ट कर डालने के उपक्रम है।
खाद्य पदार्थों में शक्ति, लावण्य, स्निग्धता और प्राण उनमें निहित जल तत्व होता है। यह जल, पेड़, अपनी जड़ा के द्वारा धरती के गर्भ से चूसते हैं और फिर फल की कोशिकाओं तक पहुँचाते हैं। अतः इस जल तत्व को जितना सुरक्षित रखा जा सके, खाद्य पदार्थ उतने ही प्राणवान रहते हैं। जिस पदार्थ के जल तत्व को पका सुखा कर जितना कम कर दिया जायेगा, उसका जीवन तत्व उसी अनुपात में कम हो जायेगा। तलने से या चिकनाई से भर देने से तो पदार्थों की कोशिकाओं का जल तत्व से सम्बन्ध ही विच्छिन्न हो जाता है और वे निष्प्राण से हो जाते हैं। इन्हें खाने पर पेट में विष विकार ही तो बढ़ेगा।
खाद्य पदार्थों को इस तरह जलाने भूनने, रूपांतरित कर डालने के सारे प्रयास मात्र इसलिये ही तो होते हैं कि वे स्वादिष्ट हो जायें और सरलता से खाये जा सके। किन्तु यदि भोजन इस तरह खाया गया कि दाँत और दाढ़ों को पर्याप्त परिश्रम न करना पढ़े तो उसमें पर्याप्त लार भी मिल न पायेगी ओर तब वह दुष्पाच्य हो जायेगा।
आखिर भोजन का ठीक से पचना तो आवश्यक ही है, तभी वह रस व शक्ति दे सकेगा, अन्यथा भोजन के ये चार उद्देश्य पूरे न हो सकेंगे:- (1) शरीर के टूटे ऊतकों की मरम्मत करना और उन्हें पोषण देना।
(2) शरीर की ऊष्मा बनाये रखना तथा जीवनी शक्ति व रोग प्रतिरोधक शक्ति को बनाये रखना।
(3) शरीर को विकसित करना और (4) कार्य की शक्ति देना।
भोजन के पदार्थों का चुनाव करते समय भोजन के इन कार्यों को ध्यान में रखा जाये, तो फिर यह स्पष्ट हो जायेगा कि इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए उसमें जीवन तत्व का बने रहना आवश्यक है। उन्हें सदा सुरक्षित रखना चाहिए।
लटविया में 55 वर्ष पहले पैदा हुए वाल्टर कार्नेलियस को दुनिया का सर्वाधिक बलवान व्यक्ति माना जाता है। इन दिनों वह ब्रिटेन में पीटखौरो में लोगों को तैराकी सिखाता है। अब तक 46 बार उसने तैराकी की विश्व चैम्पियनशिप जीती है। लोहे की मोटी से मोटी राड को वह स्प्रिंग की तरह मोड़ देता है। उसकी देह किसी पुष्ट साँड़ जैसी है और पर्याप्त श्रम तथा व्यायाम से उसे भूख भी जमकर लगती है। उसका आहार है ताजी घास। उसने आज तक न तो दूध पिया, न घी लिया, न मक्खन खाया, न मेवा, न रोटी खाई, न कोई व्यंजन।
प्रारंभ में वाल्टर कार्नेलियस ने आर्थिक अभाव के कारण घास खाना शुरू किया। पर जब अभ्यास के बाद यही उसका एक मात्र आहार है। वह चारागाह में स्वयं ही पहुंच जाता है। और वहीं घास काट काटकर गुच्छे के गुच्छे रखता जाता है। फिर इत्मीनान से बैठ जाता है। अपनी सभ्यता का एक प्रभाव उसमें आहार सम्बन्धी भी शेष है। वह काँटे और छुरी की सहायता से घास काटता है और खाता जाता है। खाकर मस्त हो जाता है। तब पानी पीता है।
वाल्टर का जब कही से बुलावा आता है, तो वह पहले यह पता लगाकर आश्वस्त हो लेता है कि यहाँ आसपास बढ़िया स्वच्छ चरागाह है या नहीं।
माँस और औषधियां का गुण गान करने वाले और मेवा, मिष्ठानों में शक्ति तलाश करने वाले यदि वनस्पति आहार की महिमा समझ सके होते और उसका ठीक प्रकार उपयोग करते तो बलिष्ठता का वह भण्डार सहज ही हस्तगत हो जाता , जिसके लिए मनुष्य तरसता ही रहता है।
समुन्नत जीवन की व्यापक विस्तृत सम्भावनाओं का आधार सद्विचार ही है। विचारों की तरंगें प्रकाश, ताप, ध्वनि एवं विद्युत की अपेक्षा ही शक्तिशाली है, कम नहीं।
शिकागो वासी टेड सीरियस द्वारा कल्पनाओं के फोटो खींच सकने की बात अब विश्व विदित है। टेड की इस शक्ति से विचार तरंगों की शक्ति व गति का ही संकेत मिलता है।
विचार है क्या? प्राण शक्ति (वाइटल फोर्स)की स्फुरणा (डिस्चार्ज) ही विचार है। फोटोन कण प्रकाशवेग से चलते हैं, इसलिए वे अनन्त यात्रा कर सकते हैं। समय फोटोन के लिए गतिशून्य हो जाता है। विचार शक्ति भी कालातीत हैं, क्योंकि उसकी गति प्रकाशवेग से भी अधिक है। सेकेंड के करोड़वें हिस्से से भी कम समय में हम विश्व के किसी भी बिन्दु पर विचार शक्ति द्वारा पहुँचकर वापस आ सकते हैं।
सामान्यतः। मनुष्य अपनी विचार शक्ति का उपयोग नहीं करता। विचार शक्ति में प्राण शक्ति के स्फुरण वेग के अनुसार ही शक्ति होती है। उसकी तीव्रता (इन्टेन्सिटी) के आधार पर उसे मन्द, मध्यम और गहन प्रचण्ड इन तीनों वर्गों में बाँट सकते हैं। अनियमित टूटे फूटे विचारों में बल व वेग मन्द होता है। उनका सम्प्रेषण थोड़ी ही दूर तक किया जा सकता है और उनमें प्रभावित कर सकने की सामर्थ्य भी अत्यल्प होती है। अविकसित व्यक्तियों की विचार शक्ति मन्द ही होती है।
सामान्य औसत व्यक्तियों की विचार शक्ति मध्यम होती है। शिक्षा व सम्पत्ति के अर्जन में यही यथेष्ट सहायिका होती है। मध्यम विचार शक्ति वाले लोगों की बुद्धि पल्लव ग्राही होती है, मूल ग्राही नहीं। बन्दर इस डाल से उस डाल पर पत्तियों को छूता, पकड़ता, खाता, कूदता रहता है। यही पल्लव ग्राहिता है। सामान्य व्यक्ति विविध जीवन क्षेत्रों की सतही जानकारी रखते हैं तथा उसके सहारे व्यवहार कौशल का कार्य सम्पादित करते हैं।
किसी विषय में गहरे पैठने की प्रवृत्ति को मूल ग्राही प्रवृत्ति कहते हैं। गहनता से विचार करने हेतु अपनी सम्पूर्ण ध्यान शक्ति नियोजित करनी होती है। इससे प्राण शक्ति का विशेष स्फुरण होता है। देर तक एक ही विषय से संबद्ध विचार मस्तिष्क में बना रहने पर उसमें संवेग (मूमेन्टम) बढ़ता रहता है। विकसित इच्छा शक्ति से जुड़े विचारों में मस्तिष्क एवं हृदय, दोनों का बल काम करता है। इससे उनकी गति तीव्र ओर प्रभाव गहन हो जाता है वे अत्यधिक शक्तिशाली हो जाते हैं और उनका परिणाम भी शीघ्र ही प्राप्त होता है। प्रचण्ड, प्रभावशाली और साकार विचारधारा में प्राण शक्ति का ही प्रभाव होता है। जब मन को अन्य सभी दिशाओं से हटाकर किसी विशेष बिन्दु पर, किसी आदर्श विशेष में या विषय विशेष में केन्द्रीकृत किया जाता है , तो चिन्तन और आकाँक्षाओँ का बिन्दु वही एक हो जाता है। मनुष्य उसी उधेड़बुन में लगा रहता है। उसी प्रयोजन के लिए प्रतिफल, सक्रिय, जागरुक एवं गतिशील रहता है। आस्था उसी आदर्श में दृढ़ होती है। विचारो का केन्द्र वही होता है और गतिविधियों का प्रेरणा सूत्र भी वही होता है॥ आस्था, चिन्तन और कर्म की त्रिवेणी प्रचण्ड मस्तिष्कीय ऊर्जा के रूप में प्रवाहित होती है। वह सृजनात्मक गतिविधियों और अनुभूतियों का आधार बनती है। प्रबल अवरोधों से टकराकर भी टिके रहने और प्रवाहित रहने की शक्ति उसमें आ जाती है। यह त्रिवेणी व्यक्तित्व को दिव्य पवित्र बनाती है। वस्तुतः श्रेष्ठ व्यक्तित्व उस स्थिति का ही नाम है, जहाँ मध्य में होती है, प्रखर उत्कृष्ट विचार शक्ति और उसमें भावना निष्ठा आस्था की हृदय शक्ति तथा तद्नुरूप आचरण व्यवहार की क्रियाशील का समन्वय होता है।
प्राण शक्ति का चुम्बकीय विद्युत प्रवाह ही विचारों को प्रचण्ड बनाता है। प्राण को मानवी व्यक्तित्व के आधार पर ढली हुई विशिष्ट ऊर्जा कह सकते हैं। इस ऊर्जा को जब निर्धारित लक्ष्य की एक ही दिशा में नियोजित किया जाता है, तब उसका विशिष्ट प्रभाव स्वाभाविक ही है। प्राण की विद्युत के अनुपात से विचार तरंगों में प्रखरता आती है। एंप्लिफायर के माध्यम से हल्की सी आवाज को इतना शक्तिशाली बना दिया जाता है कि उसे सैकड़ों हजारों मील दूर दूर तक बैठे लाखों व्यक्ति सुन सकते हैं। परिष्कृत सघन प्राण शक्ति की सूक्ष्मता का सदुपयोग विचारो को भी ऐसी ही प्रभावोत्पादकता से संपन्न बनाता है।
इससे स्पष्ट है कि विचार शक्ति के घटने बढ़ने का सम्बन्ध प्राण शक्ति की विशिष्ट ऊर्जा से है। अन्यमनस्कता, आलस्य, अस्तव्यस्तता, अवसाद, उपेक्षा और उत्साह हीनता की मनोभूमि में शिथिल, शक्तिहीन विचार ही उत्पन्न होते हैं और मुरझा जाते हैं। स्वयं के जीवन में ही उनका कोई प्रभावशाली परिणाम नहीं परिलखित होता, फिर दूसरों को प्रेरणा दे पाना उनसे कहाँ तक सम्भव हो सकेगा? सामान्य भाषणकर्ताओं, प्रवचनकारों, कथाकारों, वेत्ताओं की मनोभूमि ऐसी ही होती है। थोड़ी सी रटी हुई बाते घुमा फिराकर दुहराई जाती रहती है। मस्तिष्क के उथले स्तर से ही ये निकलते हैं। कण्ठ को और जिह्वा के अग्रभाग को साध लेने पर ऐसे भाषण आदि सुनने में सुहावने लग सकते हैं। समझते समय भी वे आकर्षक प्रतीत हो सकते हैं। इससे आगे उनकी प्रभाव गति नहीं होती। प्राण शक्ति की न्यूनता उनको प्रभाव परिपुष्ट नहीं बना पाती। दूसरी ओर उत्कृष्ट, प्रखर प्राण शक्ति से निकले शब्दों पर भले ही लच्छेदार प्रभाव न हो, पर आस्था, अनुभूति और आचरण का आधार उन्हें मर्मस्पर्शी और स्थायी प्रभाव पैदा कर सकने योग्य बना देता है। महामानवों की वाणी में लोक मानस की जकड़न को समाप्त कर उसका दिशा निर्देश कर सकने की क्षमता इसी आधार के कारण होती है।
एकाग्रतापूर्वक तीव्र इच्छा शक्ति के साथ किये गये विचारो की शक्ति आचरण से जुड़ जाने पर प्रभावपूर्ण हो ही जाती है। यह सम्मिलित शक्ति सद्भाव प्रेरित हुई तो सत्प्रवृत्तियों को प्रदीप्त करती है। दुर्भावनाओं से जुड़ी हुई तो वहाँ पतन के लिए आकर्षित करने वाला प्रभाव पैदा करती है॥ श्मशान में चिता न जल रही हो, तो भी वातावरण की वीभत्सता की अनुभूति वहाँ पहुँचने पर होती ही है। कसाईखाना साफ सुथरा पड़ा हो, तो भी उसमें घुसते ही आतंककारी का प्रभाव मन पर पड़े बिना नहीं रहता। सामूहिक रूप से जहाँ भी अवांछनीय दुष्प्रवृत्तियों की परिस्थितियाँ पाली पोसी जाती हे, वहाँ पतन की सम्मोहन शक्ति प्रचंड हो उठती है।
सत्प्रवृत्तियों के लिए इसी सम्मिलित शक्ति का उपयोग उत्कर्ष की प्रेरणा उत्पन्न करता है। सामूहिक सत सम्मेलनों और धर्मानुष्ठानों के पीछे एक बड़ा प्रयोजन ऐसी प्रेरणा उत्पन्न करना भी होता है। साधु संस्थाओं का जन्म इसी सदुद्देश्य के लिए हुआ। एकत्र रहकर वे प्रखर प्रेरणा का प्रभावी वातावरण विनिर्मित करते थे। सत्कर्मों के सामूहिक आयोजनों की यही महत्वपूर्ण भूमिका होती है। तीर्थों, सत्संग भवनों की महिमा इसी प्रयोजन को पूरा कर सकने के कारण है। देवालयों की प्रभाव शक्ति का यही रहस्य है। मनस्वी महामानवों के निवास स्थान इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण होते है, उनको दिव्य स्मारकों के रूप में सुरक्षित रखने का प्रयोजन वे लक्ष्य प्रेरणाएं प्राप्त कर सकना ही होता है, जो वहाँ बिखरी होती है।
एकाग्रता और मनोयोग तभी सम्भव है, जब अपनी आन्तरिक अभिरुचि उससे जुड़ जाए। दार्शनिक और वैज्ञानिक अपने एक ही विषय बिन्दु पर देर तक गहराई से विचार कर सकने की प्रवृत्ति और सामर्थ्य के कारण ही समुद्र में गहरे उतरने वाले गोताखोरों की तरह मणि मुक्ता ढूंढ़ लाते हैं। इसलिए महत्वपूर्ण है उत्कृष्ट लक्ष्यों के प्रति आन्तरिक अभिरुचि का उत्पन्न होना। वैसी रुचि जाग गई, तो फिर विचार शक्ति की अनन्त सामर्थ्य अपना चमत्कारी परिणाम दिखाती ही है।
चेतना के उपयोग के लिए प्रकृत सम्पदाओं का उचित उपयोग हो यही औचित्य की मर्यादा है। इससे आगे का अतिक्रमण निश्चित रूप से दुःखदायी है। पदार्थ की सत्ता चेतना पर हावी होने लगे तो फिर खतरा ही खतरा है। घोड़ा अपने मालिक पर चढ़कर चले, नाव को सिर पर लाद कर यात्री लोगों को चलना पड़े, तो यह असमंजस की बात है। आपत्ति काल की बात दूसरी है। सामान्य प्रचलन के रूप में यह स्थिति चिन्तनीय है और अशोभनीय भी।
पदार्थ का आकर्षण जब चेतना को लुभाता और उस पर आधिपत्य जमाता है तो यह विडंबना में चेतना का पराभव अनुभव किया जाता है। तत्वदर्शियों ने लोभ और मोह की निन्दा की है। यह मर्यादा के अतिक्रमण का विरोध है। वस्तु की उचित आवश्यकता की पूर्ति के लिए नीति युक्त उपायों से साधन उपार्जित किये जाय और उनका सीमित उपयोग निर्वाह के लिए करने के उपरान्त जो बचे उसे लोकोपकारी प्रयोजनों में लगा दिया जाय। यही वस्तुओं के-पदार्थों के-धन वैभव के उपार्जन एवं उपयोग की मर्यादाएं है। उतने में निन्दा की कोई बात नहीं, लोभ की भर्त्सना इस कारण की गई है कि उसके कारण अति उपयोग और कृपण संग्रह की ललक उत्पन्न होतीं है। यह लालच जब सिर पर सवार हो जाता है तो उसके लिए अनैतिक और अपराध माने जाने वाले कुकृत्यों को करने में भी संकोच नहीं होता। यह स्थिति व्यक्ति और समाज दोनों के लिए ही अहितकर है। इससे विग्रह उत्पन्न होते और संकट बढ़ते हैं।
मोह की निन्दा इसलिए है कि प्राणियों के बीच पारस्परिक घनिष्ठता इस सीमा तक रहनी चाहिए जिसमें मानवी मर्यादाओं का- न्याय एवं औचित्य का उल्लंघन न होता हो। मैत्री के कारण जब अनावश्यक एवं अवाँछनीय सुविधाएं देने की बात मन में उठती है तो स्वभावतः पक्षपात उठता है और अन्याय पनपता है। जिनमें मोह होता है उन्हें अत्यधिक महत्व मिलता है और उतनी सुविधाएं दी जाती है जो उन्हें अहंकारी आलसी, दुर्व्यसनी, अपव्ययी बनाती चली जाती है। मोह के कारण हम जिन्हें भी अनुचित उपहार देते हैं वे तत्काल तो प्रसन्न होते हैं, पर पीछे प्रखरता नष्ट होते जाने के कारण वे घाटे में ही रहते हैं। मोह समवितरण और स्वम्बद्व क्षेत्र में कर्तव्य पालन कर सकने का मार्ग रोकता है। प्रेम में सद्गुणों के आधार पर मैत्री पनपती और श्रद्धा एवं घनिष्ठता के रूप में विकसित होती है। जबकि मोह के आधार पर अनुचित लाभ देकर पोसे गये व्यक्ति अपने पोषणकर्ता के लिए ही घातक बनते हैं। मोह के कारण चिन्तन, श्रम, साधन थोड़े से कुपात्र लोगों पर थोप दिये जाते हैं और सत्पात्रों को उचित अनुदान पाने से भी वंचित रहना पड़ता है। स्वयं मोहग्रस्त भी तो अनीति पोषक एवं अविवेकी बनता ही है।
उपरोक्त पंक्तियों में व्यवहार दर्शन की नहीं इस तथ्य की चर्चा है कि चेतना का अस्तित्व सर्वोपरि है। शरीर समेत समस्त वस्तुएं उसी की सुविधा एवं प्रसन्नता के लिए है। किन्तु जब वे ही उल्टे चेतना पर हावी हो जाते हैं और उन्हीं का आकर्षण जीवात्मा को अपने मूलभूत वर्चस्व को गवाँ बैठने तक के लिए बाध्य करता है तो यह बहुत ही महंगा सौदा सिद्ध होता है। इसमें पाने के स्थान पर खोना ही अधिक पड़ता है। इस विश्व उद्यान में जो आनन्द मिल सकता था वह तो न जाने कहाँ चला जाता है उल्टे शोक सन्ताप से अहिर्निशि जलते कुपते रहना पड़ता है। लोभ और मोह का अर्थ आत्मा की मौलिक विशेषताओं को गवाँ बैठना और प्रकृति का पदार्थ का उस पर आधिपत्य स्थापित हो जाना ही है। चेतना की प्रज्ञा इतनी प्रखर रहनी चाहिए कि वह प्रकृत पदार्थों और परिस्थितियों का सही उपयोग कर सकने की अपनी दूरदर्शिता एवं विवेकशीलता को अक्षुण्ण बनाये रह सके। उस पर कोई भी भौतिक दबाव हावी न हो सके तो ही यह कहा जा सकेगा कि प्राणी स्वतन्त्र होकर जी रहा है, उसे भव-बन्धनों से मुक्ति मिली हुई है। कर्तव्यपरायण मर्यादा पालन का स्वेच्छा अनुशासन तो चेतना की तात्विक स्वतन्त्रता का चिन्ह माना जाता है।
मनुष्य जाति के दुर्भाग्य के एक भयंकर अभिशाप यह रहा है कि उसकी दिव्य चेतना पर प्रकृति के आकर्षण वे हिसाब छाये रहे और वह लोभ, मोह के कुचल में फँसकर अपने वर्चस्व को प्रखर करने और लक्ष्य को पाने में असमर्थ रहा। अधिकाँश लोग सड़ा-गला जीवन ही जी पाते हैं, महानता की गरिमा प्राप्त करके तो कोई विरले ही जीवन संग्राम के विजेता बनकर परमेश्वर के दरबार से वापिस लौटते हैं।
आकर्षणजन्य चिर प्राचीन बन्धनों में एक नई कड़ी जो न जाने अभिशाप बनकर मानव समाज की दुर्गति करती चली आई है यह तो अपने स्थान पर जमी हुई भी है और बढ़ती पनपती भी जा रही है। उसके हटने, मिटने की परिस्थितियाँ तो बन रही थी, उलटे एक और नया दुर्भाग्य विज्ञान की नवीनतम देन के रूप में और आ धमका। यह संकट इतना बड़ा है कि यदि उसे विकसित होने का अवसर मिल गया तो समझना चाहिए कि चेतना की आत्मिक स्थिति को भौतिकता ने पूरी तरह निगल लिया। चिन्तन तत्व की इतिश्री हुई और व्यक्ति उसी तरह विज्ञान की अधिपति सत्ता के आधीन हो गया जिस तरह पालतू पशुओं का भला बुरा उपयोग उनके स्वामी कहलाने वाले मनुष्यों द्वारा होता है।
वैज्ञानिक खोज ने ऐसे सूत्र प्राप्त कर लिए है जिनके आधार पर मस्तिष्क पर जड़ शक्तियों के सहारे अधिकार मिल जाता है और किसी की भी विचारधारा को उसकी स्वतन्त्र चेतना के विरुद्ध सोचने और मानने के लिए विवश किया जा सकता है। पशु के शरीर पर जैसा अधिकार उसके स्वामी का होता है उसी प्रकार मस्तिष्क को विज्ञान के सत्ताधीशों के सामने स्वेच्छया समर्पण करने के लिए विवश होना पड़ेगा। शरीर के बलपूर्वक उपयोग करने पर प्राणी की स्वतन्त्र चेतना कम से कम असहमत या विरुद्ध तो बनी रहती और भीतर ही भीतर उस स्थिति से छूटने की चेष्टा एवं इच्छा तो बनाये रहती है, पर विज्ञान सम्मोहित व्यक्ति तो वैसा भी कुछ न कर सकेगा। स्वेच्छया समर्पण के लिए बाधित किया गया व्यक्ति यही समझता रहेगा कि स्वेच्छा से ही सब कुछ कर रहा है, वस्तुतः उसकी निजी मौलिकता, चेतना, इच्छा, प्रकृति एवं आस्था पूरी तरह मूर्छाग्रस्त होकर मृतप्राय स्थिति में पड़ी होगी और उसके चिन्तन को दूसरे लोग कठपुतली की तरह संचलित कर रहे होंगे और वह मदारी की रस्सी के इशारे पर उछल कूद करने वाले बन्दर के अतिरिक्त और कुछ शेष ही नहीं रह गया होगा।
फ्राँसीसी वैज्ञानिक प्रो0 देल्गादो ने बताया है कि नसों में रक्त चढ़ाने जैसा ही सहज कार्य मस्तिष्क में इच्छानुकूल आदतों का प्रवेश करा सकना भी है और अगले ही दिनों यह सहज सम्भव होगा कि प्रवृत्तियों और अभ्यासों की वैसी ही काट−छांट की जा सके, जैसे अभी फोड़े फुन्सियों की होती है।
यह जानने की दिशा में तेजी से कार्य हो रहा है कि मस्तिष्क में किस स्थान पर-किस प्रकार की क्षमता के संचालक, नियामक केन्द्र है। मस्तिष्क में गहरी दबी पड़ी विस्मृतियों को बिजली के झटके देकर ताजी बनाया जा सकता है, जिससे लगने लगे कि सम्बन्धित घटना अभी अभी घटित हुई है। कनाडा के मनोवैज्ञानिक डॉ. डब्ल्यू0 जी0 पेनफील्ड ऐसे इलेक्ट्रोड खोजने में सफल हुए है, जिनका स्थान विशेष की कुछ कोशिकाओं से सम्बन्ध जोड़ने पर मनुष्य अतीत की घटनाएं अपने सामने पुनः घटित हो रही सी ही ताजी, अनुभव कर सकता है। विगत संवादों विवादों, चर्चाओं आदि को भी तत्काल संपन्न अनुभव कर सकता है।
स्नायु विज्ञानी कार्ल लैसले ने खोज की है कि मस्तिष्क के किस स्तर पर किस शक्ति से कितना विद्युत प्रवाह किये जाने नर किस काल खण्ड की (पुरानी से पुरानी) किस किस्म की स्मृतियाँ ताजी हो सकती है। मैकमिल विश्व विद्यालय, मान्ट्रील (कनाडा) के डॉ. विल्डर पेनफील्ड ने विचार, ध्वनि और दृश्य का सम्बन्ध स्थापित करते हुए उस दिशा में प्रगति की सम्भावना व्यक्त की है, जहाँ लोगों के मस्तिष्क निर्दिष्ट चिन्तन के लिए ही प्रेरित प्रशिक्षित किये जा सकेंगे। कैलीफोर्निया इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी के डॉ. रोगरस्परी ने सुदीर्घकाल से संचित आदतों अभ्यासों से मुक्त होने तथा सर्वथा नये अभ्यासों को गहराई से अपना प्रयोगों में सफलता प्राप्त की है।
स्वीडन के डॉ. हाल्गर हाइडन ने अपने प्रयोगों द्वारा पाया है कि मस्तिष्क चेतना के आधार स्तम्भ रिवोन्यूक्लिक एसिड (आर॰ एन॰ ए0) नामक रसायन की मात्रा को चेतना की विधि एवं दिशा में परिवर्तन सम्भव है।
जीवन शास्त्री जेम्स ओल्डस ने चूहों के मस्तिष्क पर आँशिक नियन्त्रण की प्रक्रिया खोज निकाली और उनके मस्तिष्क से बिल्लियों के प्रति भय का भाव निकाल दिया। परिणाम यह हुआ कि वे चूहे बिल्लियों की पीठ पर बेझिझक चढ़ने दौड़ने लगे। उनके प्रति भय का भाव ही विदा हो गया और वे बिल्लियों को अपने हितैषी वर्ग का मानने लगे।
डॉ. डी0 एलवर्ट ने भी चूहों पर ही प्रयोग किया और उनकी एक ऐसी जाति पैदा की, जो रूपाकार में तो वैसी ही है, पर कार्य विधि एवं चिन्तन विधि में सर्वथा नयी है। डॉ. जे0 वी0 ल्यूको ने यही प्रयोग तिलचट्टों के साथ किया। डॉ. राबर्ट थामसन ने यही प्रयोग प्लेरियन नामक कीड़े पर किये है। यह आध इंच आकार का जलचर कीड़ा है, इसे रेडियो संकेतों के सहारे कुछ भी करने के लिए विवश करना पूरी तरह सम्भव हो गया है।
मस्तिष्क का बहिरंग और अंतरंग संरचना के सम्बन्ध में अब पहले की अपेक्षा बहुत अधिक जान लिया गया है। एक समय था जब मस्तिष्क के भीतर भरी वसा कोशिकाएं, तन्त्रिकाएं ही चिन्तन की आधारशिला मानी जाती रही और समझा जाता रहा कि जिसका मस्तिष्क जितना भारी और बड़ा होगा वह उतना ही बुद्धिमान होगा। इस मान्यता के कारण मस्तिष्क के स्वरूप का विकास करने के लिए ऐसी औषधियों और खाद्य पदार्थों का सरंजाम जुटाया जाता रहा जो उस अवयव को परिपुष्ट बनाने में सहायक सिद्ध हो सके। अब वह अध्याय समाप्त होते जा रहा है और समझा जा रहा है कि इस संस्थान के अंतरंग क्षेत्र में काम करने वाली विद्युत शक्ति ही विचार शक्ति बनती है। इस विद्युत को लगभग उसी स्तर की भौतिक विद्युत द्वारा प्रभावित किया जा सकता है और चिन्तन के बाहरी दबाव से उभारा या दबाया जा सकता है।
खोजो से स्पष्ट हुआ है कि मस्तिष्क आकृति व भार से मस्तिष्कीय सक्रियता व शक्ति का सीधा सम्बन्ध नहीं हैं। ह्वेल का मस्तिष्क 7 हजार ग्राम, हाथी का 5 हजार दो सौ, डाल्फिन का 1 हजार 8 सौ, घोड़े का साढ़े छह सो, गेंडे का छह सौ, गोरिल्ला का 5 सौ, कुत्ते का 130 ओर बिल्ली का मस्तिष्क 30 ग्राम वजनी होता है। पर इसी हिसाब से इनके मस्तिष्कीय सामर्थ्य को नहीं परखा जा सकता।
आदमी के मस्तिष्क का वजन सामान्यतः 1 हजार 350 ग्राम होता है। लेकिन समझदारी का सम्बन्ध वजन से नहीं है कपाल के भीतर भरी मज्जा के अंतर्गत सूक्ष्म घटक, जो न्यूरान कहलाते हैं। जितने अधिक सूक्ष्म व सक्षम होते हैं, बुद्धिमता का विकास उसी अनुपात से होता है। ये घटक अगणित वर्ग के है और इन्हीं वर्गों के विकास पर मानसिक गतिविधियों का निर्धारण , निर्देशन होता है समझदारी का सम्बन्ध इस बात से है कि ये सूक्ष्म घटक “न्यूरान कितने है और परस्पर कितनी सघनता से संबद्ध है।
मानव मस्तिष्क में प्रायः। 1 खरब 40 अरब न्यूरान होते हैं। प्रत्येक न्यूरान स्वयं का काम तो करता ही है, दूसरे न्यूरानों के कार्य में भी भारी योगदान करता है।
मनुष्य की बुद्धिमता पिछले दस हजार वर्षों में लगातार बढ़ी है। किन्तु उसके मस्तिष्क के आकार और भार में कोई खास फर्क नहीं आया है। यदि वजन और विस्तार के अनुसार बुद्धिमता होती, तब तो अब तक मस्तिष्क आदमी के शरीर का बहुत बड़ा हिस्सा बन गया होता।
मस्तिष्कीय कणों का मध्यवर्ती न्यूक्लिक एसिड रासायनिक बैटरी का काम करता है तथा मस्तिष्क में विभिन्न प्रकार के, विभिन्न स्तरों के संवेग और सम्वेदनाएं एक विद्युत संवेग के रूप में उत्पन्न करता एवं उस विद्युत संवेग को नियन्त्रित भी करता है। इस न्यूक्लिक अम्ल के समुचित उत्पादन के लिए मैग्नेशियम पेन्सिलीन खोजी गई है। केन्सास विश्व विद्यालय के रसायनवेत्ताओं ने कुछ प्रोटीन एटम्स भी इसी हेतु ढूंढ़े है।
मस्तिष्कीय कोशिकाओं के आपसी सम्बन्ध सूत्रों को जोड़ता है एक विद्युत प्रवाह। यह प्रवाह मनश्चेतना की इच्छानुसार मस्तिष्क की विभिन्न परतों में तीव्रगति से कौंधता है और अरबों कोशिकाओं में बिखरी पड़ी क्षमताओं और स्मृतियों में से अमुक क्षण विशेष में आवश्यक तथ्य ढूंढ़ लाता है। यह विद्युत प्रवाह जितना ही सुव्यवस्थित, द्रुतगामी एवं संवेदनशील होगा, मनुष्य उतना ही कुशल व बुद्धिमान होगा। यह प्रवाह धीमा रुका सा चले तो मनुष्य अस्त व्यस्त, भुलक्कड़, मन्द बुद्धि बन जाएगा। मस्तिष्क को मेरुदण्ड से जोड़ने वाले रेक्टिक्युलर फार्मेशन की गतिविधियों को जितनी अधिक मात्रा में समझा और प्रभावित किया जा सकेगा, उतनी ही मानवीय संवेदनाएं नियन्त्रित हो सकेगी। बिना किसी घटना या उपलब्धि के भी इस नियंत्रण द्वारा हर्ष, शोक आदि की अनुभूतियों की तरंगें दौड़ाई, अनुभव कराई जा सकती है।
मात्र विद्युत शक्ति से रेडियो ऊर्जा से ही नहीं, यह कार्य रासायनिक पदार्थों, औषधियों के सहारे भी एक सीमा तक सम्भव हो सकता है। नशे का प्रभाव बहुत पहले से विदित है अब रासायनिक पदार्थों से चिन्तन को मोड़ने, मरोड़ने और इच्छित प्रयोजन की दिशा में घसीट ले जाने में भी सफल बनाया जा सकता है।
रूसी वैज्ञानिक प्रो0 एनोखोव ने एमीनाजाइन नामक एक दवा तैयार की है, जो रेक्टिक्युलर फार्मेशन में स्थित पीड़ा संवेदन केन्द्र को जकड़ लेती है। इससे पीड़ित अंगों में होने वाले दर्द की, रोगी को अनुभूति नहीं होती। भले ही कोई शरीर का मांस काट डाले, तो भी दर्द न होगा। इसके लिए निद्रा लानी आवश्यक नहीं। यह एड्रेनेलीन साइटिका, तीव्र उदरशूल, सिरदर्द आदि रहते हुए भी आदमी को कोई कष्ट न अनुभव होगा और वह अपना काम निपटाता रहेगा। जब आपरेशन आदि की जरूरत पड़ी भी, तो वह भी बिना किसी कष्ट के सरलता से संपन्न हो सकेगा। चीर फाड़, प्लास्टिक सर्जरी, अंगों का प्रत्यारोपण, विकिरण आदि के क्षेत्र में जिस प्रकार प्रगति होती रही है, उसी तरह मनोरोगों, मनोव्यथाओं से मुक्ति की दिशा में बहाया जा सके, इसके प्रयोग भी प्रगति पर है।
इन प्रयोगों से निश्चय ही पीड़ित मानवता को लाभ होगा। लेकिन तभी जब इन्हें मस्तिष्कीय दुर्बलता और रुग्णता दूर करने तक ही सीमित रखा जाए। यदि चिन्तन की दिशा भी इसके द्वारा प्रतिबन्धित कर दी गई और महत्वाकांक्षी अधिनायक, जन समूह का उपयोग मक्खी, मच्छरों, भेड़ बकरियों की तरह करने लगे तो मानव जाति भयंकरतम विभीषिका में फंस जाएगी। यह अणुबमों के प्रयोग से भी अधिक भयानक विभीषिका होगी। सम्पूर्ण बौद्धिक दासता का एक निरंकुश साम्राज्य स्थापित हो जाएगा। सिर्फ सत्ताधारी समर्थ जन इस दासता से मुक्त होंगे और वे ही मनुष्य जाति के सार्वभौम स्वामी होगे, तब प्रगति की दिशाएं भी रुद्ध और बद्ध हो जायेगी। मानवीय प्रगति का आधार स्वतन्त्र चिन्तन ही है। यों भी उसे प्रभावित करने के सभी सम्भव हथकंडे सत्ताधारी अपनाते रहे हैं। धर्म कला, साहित्य, भाषण एवं दृश्य श्रव्य माध्यमों से मानवर मेधा को मोहित और मृतप्राय बनाने की चेष्टाएं पहले से ही होती रही है। अब विज्ञान का सहारा लेकर उस कार्य को अभूतपूर्व तत्परता और शक्ति के साथ पूरा किया जा सकेगा। इस भयानक अमानवीय षडयन्त्र के विरुद्ध विश्व व्यापी जनमत जागृत किया जाना चाहिए। यदि इस क्षेत्र में विज्ञान के सत्ताधारियों ने सफलता प्राप्त करली तो समझना चाहिए मानवी स्वतन्त्र चेतना का अन्त ही हो गया। ऐसा हुआ तो समझना चाहिए मनुष्य को सर्वदा के लिए प्रतिबन्धित कर दिया। इस दुर्भाग्य से बढ़कर मनुष्य जाति के लिए ओर किसी दुर्भाग्य की कल्पना भी नहीं की जा सकती। समय रहते हम आत्मा रक्षा के लिए सुरक्षात्मक उपाय कर सके तो ही इस संकट से बचा जा सकता है।
प्रसुप्त स्थिति में हमारी क्षमताएं मूर्छित पड़ती है और लगता है कि हम साधन हीन दीन दरिद्र स्थिति में पड़े हुए है। मूर्छित स्थिति में ऐसी दुर्गति का होना स्वाभाविक है। कुम्भकरण की सामर्थ्य अकूत थी, पर वह छह महीने सोते रहने के कारण निर्जीव जैसी स्थिति में पड़ा रहता था। जिस दिन जागता था उसी दिन इतना पुरुषार्थ करता था कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़े।हम सब एक प्रकार के कुम्भकरण ही है। अपनी सामर्थ्यों को न पहचान पाने और उनके जागरण एवं उपयोग पर ध्यान न देने के कारण ही हेय स्थिति में रहना पड़ रहा है। सुषुप्ति में पड़ा हुआ व्यक्ति मृतक तुल्य होता है। किन्तु जब वह जागृत होता है तो प्रबल पराक्रम का परिचय देता है।
आत्म विस्मृति की निद्रा से ग्रसित स्थिति में हम यह नहीं समझा पा रहे कि परमेश्वर का जेष्ठ पुत्र शक्ति और सामर्थ्य का पुंज है, सौरमंडल की समग्र सत्ता छोटे परमाणु में विद्यमान है। पुरे मनुष्य की सत्ता छोटे से शुक्राणु में सन्निहित रहती है। पूरे वृक्ष की सत्ता छोटे से बीज में भरी रहती है। प्रश्न जागृति का है। अणु परमाणुओं की नगण्य सी सत्ता तुच्छ और उपहासास्पद है, पर जब उनमें से एक कण भी जागृत स्थिति में पहुँच सके तो उसके विस्फोट से प्रलय का छोटा रूप उपस्थित हो जाता है। जागृति और सुषुप्ति का अन्तर स्पष्ट है।
व्यक्ति की चेतना को जागृत करने के लिए उसे तपाने, गरमाने की आवश्यकता पड़ती है। सूर्य की गर्मी से पौधे बढ़ते और फलते फूलते हैं। शीत की अधिकता से तो वृक्षों के पत्ते तक झड़ जाते हैं। जिन दिनों सूर्य की गर्मी न्यून रहती है उन दिनों वनस्पतियों का विकास रुक जाता है। सर्दी से ठिठुरे हुए हाथ कुछ अधिक काम नहीं कर पाते। गर्मी पाते ही हाथ पैर खुलते है-काम करने को जी चाहता है ओर कुछ करते धरते ही बन पड़ता है। सर्दी में तो साँप, रीछ जैसे कितने ही प्राणी गहरी नींद में चले जाते हैं और निष्क्रिय स्थिति में पड़े रहते हैं।
भोजन पकाने के लिए चूल्हा गरम करना पड़ता है। उसकी सुविधा न हो तो खाया पदार्थ प्रचुर परिणाम में होते हुए भी वे खाने और पचने योग्य न बन सकेंगे। कल कारखानों की दैत्याकार मशीनें बहुमूल्य एवं प्रचुर उत्पादन करती है, पर उनकी कार्य क्षमता ईंधन के आधार पर ही गतिशील होती है। भाप, कोयला, तेल, बिजली जैसे ईंधन न मिले तो मशीनें ठप्प पड़ी रहेगी और उनसे कुछ भी लाभ न उठाया जा सकेगा। अग्नि की गर्मी की आवश्यकता हर क्षेत्र में पग पग की अनुभव की जाती है।
मानवी विकास के लिए तप साधना का अत्यधिक महत्व है। इस गर्मी को उत्पन्न किये बिना व्यक्ति मूर्छित स्थिति में पड़ा रहता है। उसकी ईश्वर प्रदत्त क्षमता निरर्थक, निर्जीव एवं अविज्ञात रूप में पड़ी रहती है। किसी भी क्षेत्र में प्रगति की जाय उसके लिए गतिशीलता की अनिवार्य आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए ऊर्जा जुटानी ही पड़ेगी। उसका उत्पादन गरमी लाने से ही सम्भव होता है। पैट्रोल, डीजल, मिट्टी का तेल तभी अपनी शक्ति का परिचय देते हैं, जब उनके साथ अग्नि का संयोग होता है। कोयला और पानी दोनों रहने पर भी तब तक भाप नहीं बन सकती जब तक कि आग का संयोग न हो। चूल्हा हो या दीपक उन्हें प्रज्वलित करने के लिये आग की चिनगारी तो चाहिए ही। यही ऊर्जा उत्पादन मानवी क्षमताओं को विकसित करने के लिए भी आवश्यक होता है। शरीर और मन को इसी आधार पर सक्षम समुन्नत बनाना पड़ता है।
लौकिक जीवन में भौतिक उपलब्धियों के लिए व्यक्ति की प्रखरता उभारनी पड़ती है। शरीर से श्रम करने पर उसकी पुष्टि अक्षुण्ण रहती है और आवश्यक उपार्जन भी सम्भव होता है। श्रमिक, कृषक आदि को शरीर का और साहित्यकार वैज्ञानिक आदि को मस्तिष्क का श्रम करना पड़ता है। क्षमता अभिवर्धन और अभीष्ट उत्पादन के लिए परिश्रम पुरुषार्थ किये बिना काम चल ही नहीं सकता। निष्क्रिय पड़े रहने पर तो ईश्वर प्रदत्त क्षमताएं चाहे कितनी ही बढ़ी चढ़ी क्यों न हो वे निर्जीव स्थिति में ही पड़ी रहेगी। संसार में जितने भी प्रगतिशील मनुष्य हुए हैं उनमें से प्रत्येक को अपने अपने क्षेत्र में, अपने अपने ढंग का कठोर श्रम करना पड़ा है। जिसने इस संदर्भ में उपेक्षा बरती वह अविकसित, हेय ओर गई गुजरी, दीन दरिद्र स्थिति में ही जीवन गुजारता रहा है। परिश्रम ही धन है। प्रगति की प्रत्येक सम्भावना उसी के आधार पर बनती है। इस तथ्य को जो जानते हैं वे आरम्भ से ही अपनी अभिरुचि कठोर श्रम करने में जुटाये रहते हैं। अनिवार्य विश्राम के अतिरिक्त उन्हें आलसियों जैसा आराम सचमुच ही हराम लगता है। प्रगतिशीलता श्रम निष्ठा पर निर्भर है। परिश्रम और पुरुषार्थ की प्रवृत्ति को सामान्य जीवन की तपश्चर्या ही कहा जाता है। जीवन देवता को परिश्रम और मनोयोग की साधना द्वारा जिसने प्रसन्न किया है उन्होंने संसार में एक से एक बढ़ी चढ़ी सफलताएं प्राप्त की हैं।
आध्यात्मिक जीवन में भी यही तथ्य काम करता है। मानवी अन्तराल में एक से एक बढ़ी चढ़ी विभूतियाँ विद्यमान है। पर वे सभी प्रायः प्रस्तुत स्थिति में पड़ी रहती है। यदि उनकी ओर ध्यान चला जाय-उनका महत्व समझा जाय और जीवन्त बनाने के लिए साहस जुटाया जाय तो गई गुजरी स्थिति में पड़ी चेतन सत्ता का असाधारण विकास हो सकता है। विकसित व्यक्तित्व साधन विहीन परिस्थितियों में भी ऊंचा उठता है। प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदल लेना सुसंस्कृत लोगों के लिए कुछ भी कठिन नहीं होता। वे अपनी प्रामाणिकता एवं उत्कृष्टता के आधार पर दूसरों को अत्यधिक प्रभावित करते हैं। आदर्शों के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा, विश्वास रखने वाले और उसी रीति नीति को अपनाकर जीवन जीने वाले व्यक्ति सहज ही लोकश्रद्धा का सम्पादन कर लेते हैं। उन पर सर्वत्र विश्वास किया जाता है। फलतः सहयोग की आयाचित वर्षा होने लगती है। जिनने ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली उनके लिए प्रगति का पथ सहज ही प्रशस्त होता चला जाता है।
चेतना पर पशु प्रवृत्तियों के कुसंस्कारों की परतें चढ़ी रहती है। निम्न योनियों में से क्रमिक प्रगति करते करते जीव को मनुष्य योनी प्राप्त होती है। फिर भी पिछली निकृष्टता की छाया चेतना पर न्यूनाधिक मात्रा में छाई ही रहती है। इसका परिष्कार किये बिना जीवन का स्वरूप नर कीटकों नर पशुओं नर वानरों जैसा बना रहता है। स्पष्ट है कि मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थितियाँ उपलब्ध होती है। भीतरी चुम्बकत्व हर अपने स्तर का वातावरण स्वयं ही बुनता विनिर्मित करता है। संपर्क क्षेत्र अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुरूप बनता है और साधन भी प्रायः वैसे ही मिलते हैं। परामर्श और सहयोग भी वैसा ही मिलेगा जैसा कि अन्तःस्थिति ने अपना स्वरूप बना रखा है। आन्तरिक निकृष्टता ही आमतौर से हेय परिस्थितियों , दुर्गतियों और विपत्तियों का कारण होती है।
समुन्नत स्थिति प्राप्त करने के लिए सबसे पहला कदम अपनी भीतरी स्थिति को सुधारने से आरम्भ करना होता है। इस क्षेत्र में सुधार न किया जाय और सुखद परिस्थितियों की आकाँक्षा करते हुए साधन जुटाने के लिए भाग दौड़ की जाय तो उसमें कदाचित ही किसी को स्थायी सफलता मिलेगी। व्यक्तित्व हेय बनाये रखने वाले-निकृष्ट साधनोँ से धूर्ततापूर्वक सुखद परिस्थितियाँ पाने का ताना बाना बुनते हैं। प्रपंची और अपराधी व्यक्ति प्रायः इसी नीति को अपनाते हैं। पोल न खुलने तक उन्हें कुछ लाभ भी मिल सकता है, पर वास्तविकता प्रकट होने पर वे दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंके जाते हैं और सामान्य से थोड़ा लाभ प्राप्त करते रहने की स्थिति को भी गँवा बैठते हैं।
उच्चस्तरीय स्थिति प्राप्त करने की महत्वाकाँक्षा पूरी करने का एक ही उपाय है कि अपनी अन्तः चेतना को परिष्कृत किया जाय। उस पर चढ़े कुसंस्कारों को निरस्त किया जाय और जिन मानवोचित सत्प्रवृत्तियों की न्यूनता है उन्हें पूरा करने के लिए प्रबल प्रयत्न किया जाय। इस परिवर्तन में-उखाड़ पछाड़ में अपने आपे के साथ कठिन संघर्ष करना पड़ता है। इस संघर्ष को सफलतापूर्वक लड़ सकने योग्य आत्मबल प्रचण्ड संकल्प शक्ति से ही सम्पादित किया जाता है। यह संकल्प शक्ति ही वह साधना है जिसके सहारे आत्म परिष्कार का उद्देश्य पूरा हो सकता है। इस सामर्थ्य को उपार्जित करने के लिए जो साधन काम में लाने पड़ते हैं उन्हें तप कहते हैं। आत्मिक प्रगति के लिए तप तितीक्षा की साधना करनी अनिवार्य रूप से आवश्यक होती है।
आत्मोत्कर्ष की साधना में-तप तितीक्षा का प्रमुख स्थान हैं। पूजा उपासना के विधि विधान एवं कर्मकाण्डों को ही सब कुछ मान बैठना पर्याप्त नहीं। जप, ध्यान आदि के क्रिया कलाप अति सरल है। उनमें न शारीरिक कष्ट उठाने पड़ते हैं और न मनोनिग्रह की आवश्यकता पड़ती है। मुख से कुछ शब्दों का उच्चारण और कर्मकाण्ड में प्रयुक्त होने वाले सस्ते उपकरणों के साथ साथ हाथों की थोड़ी सी हेरा फेरा इतनी महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली नहीं हो सकती कि उतने भर से दिव्य शक्तियों का अनुदान वरदान प्राप्त कर सकना सम्भव हो सके। इसके साथ साथ चेतना को गरम करने वाली तपश्चर्या का जुड़ा रहना नितान्त आवश्यक है। विलासी और शौक मौज का जीवन इंद्रियों को प्रसन्नता देता है, पर उसने अन्तरात्मा पर थकान चढ़ती है। सुविधा संपन्न जीवन क्रम अपनाने वाले व्यक्ति कदाचित ही आत्मिक प्रगति के मार्ग पर कुछ दूर चल पाते हों। तर्क की दृष्टि से शरीर सुविधा का समर्थन किया जा सकता है और आराम के अधिक साधन रहने पर कम थकान चढ़ने और अधिक काम होने का प्रतिपादन किया जा सकता है। किन्तु वस्तुस्थिति दूसरी ही है-स्वेच्छापूर्वक सदुद्देश्य के लिए अपनाई गई आमन्त्रित की गई कठिनाइयाँ अन्त क्षेत्र में अद्भुत तेजस्विता भरती है। यदि ऐसा न होता तो साधु और ब्राह्मणों को अपरिग्रही, तपस्वी, कष्टसाध्य, जीवन जीने की आवश्यकता न पड़ती। तब वे लोग भी अधिक सुविधा मिलने पर अधिक सेवा कार्य बन पड़ने के तर्क उपस्थित करते। ऐसी दशा में उनके संपन्न शिष्य अनुयायी उनकी सुविधा के लिए अपने से भी अधिक साधन जुटा देते।
तपस्वी और विलासी जीवन के अन्तर स्पष्ट है। तप साधना से आत्मिक प्रखरता उभरती है जब कि विलासिता अपनाने पर वह दिन दिन क्षीण और कुण्ठित होती चली जाती है। साधना अनुष्ठान की प्रखरता एवं सफलता इस बात पर निर्भर है कि साधक ने उस अवधि में अपने को कितना तपाया-कितना गरम किया। साधना औजार है और तपस्या उसे चलाने वाली शक्ति ऊर्जा। तपश्चर्या से कतराने वाले-विलासिता अपनाये रहकर ज्यों ज्यों भजन पूजन करते रहने वाले-कुछ तो पाते भी है, पर वह होता अत्यन्त स्वल्प है।
कच्चा मिट्टी मिला लोहा भट्टी में तपाये जाने पर ही शुद्ध लोहा बनता है। खदान से निकली प्रायः सभी धातुएं ऐसे ही मिट्टी मिश्रित होती हैं उन्हें शुद्ध करने का एकमात्र तरीका भट्टी में तपना ही है। अधिक अग्नि संस्कार करने पर ही धातुओं की भस्में बनती है ओर वे बहुमूल्य रसायन का काम देती है। सोने के खरे खोटे होने की परीक्षा तो अग्नि में तपाने से ही सम्भव होती है। दूध को तपाने से मलाई और घी निकलते हैं।कच्ची मिट्टी के बरतनों और ईंटों को तपाने से भी उनमें मजबूती आती है। पानी को गरम करने से भाप की शक्ति उत्पन्न होती है। सूर्य ताप से हिमाच्छादित चोटियाँ पिघल कर नदी के रूप में बहती है और उन नदियों से शोभा, सुविधा उपलब्ध होती है। समुद्र मंथन में देवता और दैत्यों ने मिलकर समुद्र जल को गरम किया था और उसमें से 14 बहुमूल्य रत्न निकाले थे।
तपश्चर्या की उपलब्धियों का वर्णन विवेचन करते हुए शास्त्रकारों ने कहा है कि ईश्वर भी तप के प्रभाव से ही इस सृष्टि की रचना में समर्थ हुआ है। मनुष्य के लिए तो अभीष्ट उपलब्धियों के लिए भी तप ही एकमात्र मार्ग है-
यः पूर्व तपसो जातमदभ्यः पूर्वमजायत गुहा प्रविश्य तिष्ठान्त यों भूतेभिर्व्यपश्चता एतद्वैतत्
उस परमेश्वर ने सर्व प्रथम तप किया। उस तप के श्रम स्वेद से जल उत्पन्न हुआ।
सोडकामत। बहुस्याँ प्रजायेयेति। स तपोडतप्यत। स तपस्वप्त्वा इद सर्वमसृजत यदि कि च सत्सृष्टवा तदेवानुप्राविशित -तैत्तिरीय ब्रह्मावल्ली
उस परमात्मा ने प्रकट होने की इच्छा की। इसके लिए तप किया। तप की शक्ति से जगत रचा और फिर उसी में प्रविष्ट हो गया।
अवीहि भगवों ब्रह्रोति। त होवाच ब्रह्म विजिज्ञासस्व तपो ब्रहयेति स तपोडतप्त्वा -तैत्तिरीय भृगुवल्ली
भृगु ने कहा- ब्रह्म का ज्ञान कराइए। तब वरुण बोले- तप के द्वारा ब्रह्म को जानो। तप ही ब्रह्म है। यह सुनकर भृगु तप करने चले गये।
तपश्चचार प्रथमममराणाँ पितामहः आवर्भूतास्ततो वेदाः साडोंगपाँगपदक्रमाः -मत्स्य पुराण।
देवों के पितामह ने सबसे प्रथम तो तपश्चर्या की थी। इसके अनन्तर सब वेदों का आविर्भाव हुआ था जो अपने अंग शास्त्र उपांग तथा पद एवं क्रम से संयुक्त थे।
तपामूलमिद सर्व यन्मा पृच्छसि क्षत्रिय। तपसा वेदविद्वासः पर त्वमृतमाप्नुयु। -महाभारत
राजन! तुम जिस तपस्या के विषय में मुझसे पूछ रहे हो, तपस्या ही सारे जगत का मूल है, वेदवेत्ता विद्वान इस तप से ही परम अमृत मोक्ष को प्राप्त होते हैं।
न विद्यया केवलया तपसा चाडपि पात्रता यत्र वृत्तमिमे चोभे तद्वि पात्रम्प्रचक्षते -स्कन्द
केवल विद्या से और न केवल तपश्चर्या से पात्रता हुआ करती है। जहाँ पर सच्चरित्रता है और ये दोनों (विद्या और तप) भी विद्यमान है वह ही वस्तुतः पात्र कहा जाया करता है।
अद्विर्गात्राणि शुद्वयन्ति, मनः सत्येन शुद्ध यति विद्यातपोभ्यों भतात्मा , बुँद्विर्ज्ञानेन शुद्ध यति। -मनु
शरीर जल से शुद्ध होता है। मन सत्य से। आत्मा विद्या और तप से तथा बुद्धि, ज्ञान से शुद्ध होतीं है।
जिह्म ज्या भवति कुल्मलं वाड, नाडिका दन्ता स्त्पसाभिदिग्धाः तेभिर्ब्रह्म विध्यति देवपीयून हदबर्लर्धनुभिर्देवजूतैः।
देव भावनाओं से भरा ब्राह्मण का आत्म बल ही धनुष है। उसकी वाणी प्रत्यंचा है। उसका तप बाण है इस अचूक ब्रह्मास्त्र से सुसज्जित ब्राह्मण तो असुरता को बेध कर रख देता है।
तपसा स्वर्ग भवाव्नोति -अत्रि
तप से ही स्वर्ग मिल सकता है। तपस्विनः पूजनीयाः -याज्ञवल्क्य
पूजनीय केवल तपस्वी होते हैं।
अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने के लिए चिन्तन एवं क्रिया कलाप में घुसी हुई निकृष्टता का उन्मूलन करने के लिए अपने आप से हर घड़ी जूझना पड़ता है वह निरन्तर चलने वाला तप है। आदर्शों को अपनाने में संचित कुसंस्कार भारी अवरोध उत्पन्न करते हैं उन्हें अभ्यस्त और सहमत करने के लिए भी संकल्पपूर्वक अपने सुधार का उपक्रम बनाना पड़ता है। इन प्रयत्नों को तपश्चर्या कहा जा सकता है। इनका अभ्यास करने के लिए शरीर और मन को तितीक्षा के आधार पर प्रशिक्षित करना पड़ता है। स्वेच्छापूर्वक सदुद्देश्यों के लिए किया गया कष्ट सहन साधना विज्ञान का महत्वपूर्ण अंग है। इसे तितीक्षा कहते हैं। तपश्चर्या के तत्व दर्शन को तितीक्षा द्वारा ही कार्य रूप में परिणित किया जाता है।
श्रीमद्भागवत् के बारहवें स्कन्ध में दूसरे अध्याय के तीसरे श्लोक में हिमालय में दिव्य सिद्ध पुरुषों का निवास बताया गया है और उनके समवेत होने के केन्द्र की कलाप कहा गया है। 10 वें स्कन्ध के 87 वें अध्याय के 5, 6, 7, श्लोकों में भी ऐसा ही वर्णन है। थियोसाथी सम्प्रदाय के क्षेत्र में सिद्ध पुरुषों की पार्लमेन्ट होने और अध्यात्म क्षेत्र के महत्वपूर्ण फैसले होते रहने की बात कही गई है। ओटोवायों आफ योगी ग्रन्थ में ऐसे अनेक प्रसंगों का उल्लेख है जिसमें हिमालय के सिद्ध योगियों के विलक्षण कर्तृत्वों का विवरण है। पाल ब्रिटन और रम्पा जैसे शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र में समर्थ सिद्ध पुरुषों का अस्तित्व पाया है। दो सौ वर्ष जीवित रहने वाले स्वामी कृष्णाश्रय ने हिन्दू विश्वविद्यालय की आधार शिला रखी थी। वे नग्न अवधूत की तरह हिम प्रदेश में निवास निर्वाह करते थे। जिन लोगों को भी ऐसे शरीरधारी और अशरीरी सिद्ध पुरुषों के साक्षात्कार यहाँ होते रहते हैं, जिनके उनके साथ संपर्क सधे है उनमें इन पंक्तियों का लेखक भी एक हैं।
हिमालय में छोटे बड़े जितने देवस्थान है उतने अन्यत्र मिलने कठिन है। अमरनाथ, ज्वालामुखी, हरिद्वार, केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, पशुपतिनाथ तो प्रख्यात है ही। इनके समीपवर्ती क्षेत्रों में छोटे छोटे तीर्थों की तो शृंखला ही बिखरी पड़ी है। ऋषिकेश से बद्रीनाथ जाने के मार्ग में ही देव प्रयाग, नन्द प्रयाग, कर्ण प्रयाग आदि कितने ही प्रयाग तथा उत्तरकाशी, गुप्त काशी, दिव्य काशी आदि कितने ही तीर्थ मिलते हैं। शिव और शक्ति के विभिन्न काम रूपों के देवस्थान थोड़ी थोड़ी दूर पर गामों के समीप एवं पर्वतीय घाटियों में सर्वत्र पाये जाते हैं। सती के आत्म विसर्जन का-पार्वती की तप साधना का यही साधन है। शिव ताण्डव भी यही हुआ था। उस अवसर पर प्रयुक्त हुआ त्रिशूल उत्तरकाशी के एक प्राचीन स्थान में स्थापित बताया जाता है। जमदग्नि और परशुराम की तप साधना उत्तरकाशी में संपन्न हुई थी।
आयुर्वेद, रसायन विद्या, अस्त्र संचालन, साहित्य सृजन, योगानुसंधान जैसे महत्वपूर्ण प्रयोग हिमालय क्षेत्र की सुविस्तृत प्रयोगशाला में होते रहे हैं। सप्त ऋषियों के- महामनीषी देव मानवों के कार्यक्षेत्र इसी भूमि में रहे हैं। छात्रों के लिए गुरुकुल और श्रेयार्थियों के लिए आरण्यक यही थे। राजतंत्रों के सूत्र संचालक वशिष्ठ जैसे धर्माध्यक्षों के निवास इसी भूमि में थे। प्रायः सभी महत्वपूर्ण ऋषि कल्प देवात्माओं की विविध विधि गतिविधियाँ हिमालय की सुरम्य घाटियों और कन्दराओँ में सुविकसित होती रही है। उन प्रयोगों से लाभान्वित होकर विशाल भारत के 33 करोड़ निवासी तेतीस कोटी देवता कहलाते रहे हैं। भौतिक और आत्मिक प्रगति की उच्चस्तरीय विभूतियों से भरी पूरी होने के कारण भारत भूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाती है। गरीयसी न सही स्वर्ग तो वह रही ही है। यह अनुदान हिमालय क्षेत्र से ही अवतरित होता रहा है। जलधारा वाली भागीरथी ही नहीं देव लोक की ज्ञान गंगा का अवतरण एवं प्रवाह भी इसी क्षेत्र से आरम्भ होता रहा है।
इतिहास और भूगोल की दृष्टि से स्वर्ग कोई ऐसा स्थान विशेष होना चाहिए जहां लोगों का आना जाना बिना किसी विशेष कठिनाई के होता रहता हो। जहाँ भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों का बाहुल्य रहता हो। दशरथ, अर्जुन, नारद आदि के ऐसे कितने ही कथानक है जिनमें स्वर्ग जाना और वापिस आना उसी प्रकार बताया गया है जैसे हम सामान्य स्थानों पर बिना अधिक कठिनाई उठाये आते जाते रहते हैं। पाण्डवों के स्वर्गारोहण की तुक इस प्रकार बैठती है कि वे जीवन के अन्तिम दिनों उसी शान्तिमय क्षेत्र में निवास करने के लिए चले गये थे।
पांडवों ने अन्त समय स्वर्ग के लिए प्रयाण किया था। वह स्वर्गारोहण पर्वत अभी भी वसोधरा पठार के आगे विद्यमान है। व्यास जी ने जहां महाभारत लिखा था वह व्यास गुफा वही है उन्हीं के पास लिपिकार गणेश रहते थे। गणेश गुफा भी व्यास गुफा के समीप ही है। यह स्वर्ग क्षेत्र उस प्रदेश में था जिसे बद्रीनाथ और गंगोत्री का मध्यवर्ती भाग कह सकते हैं यही हिमालय का हृदय है।
दिव्यदर्शियों का कथन है कि ब्रह्मांड की सघन अध्यात्म चेतना का धरती पर विशिष्ट अवतरण इसी क्षेत्र में होता है। भौतिक शक्तियों के धरती पर अवतरण का केन्द्रबिन्दु विज्ञान जगत में ध्रुव प्रदेश को माना जाता है। अध्यात्म जगत में वैसी ही मान्यता इस हिमालय के हृदय के सम्बन्ध में है। यह स्वर्ग क्षेत्र ब्रह्माण्ड व्यापी दिव्य चेतनाओँ का अवतरण केन्द्र है जहाँ शोध करते हुए, तप करते हुए, महामनीषी अपने को देव शक्तियों से सुसज्जित करते थे। अभी भी उस क्षेत्र में स्थूल और सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य सत्ताओँ के अस्तित्व पाये जाते हैं। वे अपने क्रिया कलाप से समस्त भूमण्डल को प्रभावित करते हैं।
इन्द्र देवता की सहायता के लिए दशरथ जी अपना रथ लेकर गये थे। पहिया गड़बड़ाने लगा तो कैकेयी ने अपनी उंगली लगाकर उस विपत्ति का समाधान किया था। ठीक इसी प्रकार का एक और वर्णन यह मिलता है कि अर्जुन इन्द्र की सहायता करने गये थे, प्रसन्न होकर इन्द्र ने अर्जुन को रूपसी, उर्वशी का उपहार दिया था जिसे उसने अस्वीकार कर दिया था। जहाँ मनुष्यों का आवागमन सम्भव हो सके ऐसा स्वर्ग धरती पर ही हो सकता है। इन्द्र और चन्द्र देवताओं का गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या से छल करना धरती पर ही सम्भव है। दधीचि ने अपनी अस्थियाँ याचक देवताओं को प्रदान की थी। आदि आदि अगणित उपाख्यान ऐसे है जिसमें देवताओं और मनुष्यों के पारस्परिक घनिष्ठ सहयोग की चर्चा है। इन पर विवेचनात्मक दृष्टि से विचार करे तो उसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि स्वर्ग कही भूमि पर ही होना चाहिए और देवता , मनुष्यों का कोई वर्ग विशेष ही होना चाहिए। इसका समाधान उत्तराखण्ड को देव भूमि स्वर्ग मान लेने से ही हो सकता है। देवर्षि नारद का बार बार विष्णुलोक में जाना और वहाँ के अधिपति विष्णु से साँसारिक समस्याओं पर विचार विनिमय करना तभी सही सिद्ध होगा जब हम उस पुण्यभूमि को स्वर्ग के रूप में मान्यता दे। उस क्षेत्र में अभी भी भ्रमण करके ऐसे अनेकानेक प्रमाण उपलब्ध किये जा सकते हैं जिनके आधार पर पौराणिक स्वर्ग की संगति इस क्षेत्र के साथ बिठाई जा सके।
प्राचीन काल में देव मानव इसी क्षेत्र में निवास करते रहे हैं। भौतिक और आध्यात्मिक वातावरण उन्हें हर दृष्टि से उपयुक्त लगा होगा और वे यही निवास करने लगे होगे। यहाँ रहकर वे शान्त चित्त से धर्म तन्त्र की उपलब्धियों से समस्त विश्व को लाभान्वित बनाने की विविध विधि योजनाएं बनाते थे, तैयारियाँ करते थे और साधन जुटाते थे। इन कष्टसाध्य महा प्रयासों का नाम ही तप था। तपस्वी देवता एक प्रकार के अध्यात्म विज्ञान के शोधकर्ता और विभूति उत्पादक कहे जा सकते हैं। यह क्षेत्र ऐसी वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं से भरा पड़ा था जिनमें शरीर यन्त्र और मनःतन्त्र के भीतर छिपे हुए शक्तिशाली रहस्यों का अधिकाधिक अनावरण सम्भव हो सके। शास्त्रों का सृजन ,योगाभ्यास की उपलब्धियाँ अध्यात्म दर्शन का विकास, स्वास्थ्य , चिकित्सा शिक्षा, शास्त्र, रसायन, शिल्पकला आदि की भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियाँ इसी क्षेत्र से निकल कर आती थी ओर उनसे लाभान्वित होने वाले उसे स्वर्ग निवासी देवताओं का वरदान कहकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते थे।
देवार्चन हर मनुष्य का कर्तव्य था ताकि उस क्षेत्र में किसी प्रकार का अभाव अनुभव न हो। गीता में यज्ञ से देवताओं की पुष्टि की बात कही गई है, इसे सर्वसाधारण द्वारा देव प्रयोजनों के लिए विविध विधि अनुदान प्रस्तुत करना ही समझा जाना चाहिए। यज्ञ का सीधा अर्थ दान एवं त्याग, बलिदान है। देव प्रयोजनों के लिए श्रम,समय, मन, धन आदि से सहयोग करते रहना है। यज्ञ से पूजित देवता मनुष्यों पर सुख शान्ति बरसाते हैं। और यज्ञ न करने वाले विपत्ति में फंसते हैं। इस गीता वचन में सामान्य प्रयोजनों को देव वर्ग को देव कर्म को, समुचित सहयोग प्रदान करते रहने की अनिवार्य आवश्यकता का उद्बोधन कराता है। यह देवता और कोई नहीं- उस समय स्वर्ग क्षेत्र में निवास करके धर्म प्रेरणा के-भावनात्मक परिष्कार के विविध विधि आधारों का निर्माण करने वाले महामानव ही थे। समस्त धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण करने के लिए उनका महा प्रयास, जन साधारण को देव वन्दन एवं देव पूजन के लिए अनायास ही प्रेरित करता था
हिमालय की शोभा का वर्णन करते हुए तत्वज्ञानी कवि कहता है-
देव सेव्य च तत्स्थानं दैवत नाँ च दुर्लभम महा पुण्य महोपुण्य पूरषैरव लौकितम नैतत केवल मक्षाणाँ सदैवहादक मुनें सर्व पुण्य महातीर्थ मूर्द्व भूषेत विद्वितम
यह स्थान देवताओं द्वारा सेवनीय परम दुर्लभ और महान पुण्यप्रद है। इसका पुण्यात्मा लोग ही अवलोकन करते हैं। हे नारद ! यह स्थान केवल इन्द्रियों को सुख प्रदान करने वाला ही नहीं, किन्तु उसे समस्त महान तीर्थों का शिरोमणि जानों।
तथाहिन कलधौताभैः सायंच कनक प्रभैः प्रहर्षयति या चित्त पर्वताग्रेर लौकिके किमयं तपनीयादिं्र किवा रजत पर्वत इति सदेंहा तो यत्र बाढ़ मुहयन्ति मानवः
दिन में चांदी के प्रकाश वाले और सायं सुवर्ण के प्रकाश वाले दिव्य पर्वत शिखरों से चित्त को अत्यन्त आह्लाद प्राप्त होता है। मनुष्य संदेहग्रस्त होकर सोचता है कि क्या यह सोने का पर्वत है? क्या यह चांदी का पर्वत है?
सौंदर्य बह्मणों रूप प्रकृत्या मनु वर्तते प्रकृतेर्नास्ति सौंदर्य स्वस्वरुपात्मको गुणा तादृशास्तादृशो स्थाने ब्रहा सौंदर्य दीपिते। ब्रह्मसम्पति मायान्ति भावाविष्टधियोबलात
सौंदर्य ब्रह्म का ही स्वरूप है। प्रकृति स्वयं सुन्दर नहीं है वह ब्रह्म के प्रकाश से ही सौंदर्यवान होती है।
ब्रह्म सौंदर्य से संपन्न ऐसे पुण्य स्थानों में ब्रह्मवित् लोग भावाविष्ट होकर स्वयमेव ब्रह्म समाधि को प्राप्त हो जाते हैं।
कैलाश ओर मानसरोवर भारतीय हिमालय क्षेत्र में ही थे और अभी भी है। कैलाश वासी शंकर जी के सिर से गंगा प्रवाहित होती है। इसकी संगति तिब्बत में स्थिति कैलाश पर्वत से नहीं मिलती। क्योंकि वहाँ से गंगा का गोमुख तक आना भौगोलिक स्थिति के कारण किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है। गंगोत्री से जेलूखागा घाटी होकर कैलाश करीब 300 मील है फिर बीच में कई आड़े पहाड़ आये है जिसके कारण भी कोई जलधारा या हिमधारा वहाँ तक नहीं आ सकती। असली शिव लोक इस धरती के स्वर्ग में ही हो सकता है। गंगा ग्लेशियर शिवलिंग के समीप है। स्वर्ग गंगा भी वही है। गौरी सरोवर वहाँ मौजूद ही है। इस प्रकार गंगा धारण करने वाले शिव का कैलाश यह हिमालय का हृदय ही हो सकता है। यदि प्राचीन कैलाश यहां न रहा होता तो भागीरथजी यहाँ तप क्यों करते? वे तिब्बत वाले कैलाश पर ही शिव के समीप क्यों न जाते? इस पुण्य प्रदेश में शिवलिंग , केदार शिखर ओर नीलकण्ठ शिखर यह तीनों ही शिवजी के निवास है मानसरोवर का भी इस देवभूमि में होना स्वाभाविक है। सुरालय, हिमधारा, सत्पथ हिमधारा तथा वरुण वन नामों से भी इसी प्रदेश का देवभूमि होना सिद्ध है अष्ट वसुओं ने जिस स्थान को अपना निवास बनाया वह वसुंधरा भी अलकापुरी के पास ही है। इन सब बातों पर विचार करने से वास्तविक कैलाश और मानसरोवर इसी प्रदेश में अवस्थित सिद्ध होते हैं।
आजकल का तिब्बत प्रदेश वाला कैलाश अब विदेशी प्रतिबंधों के कारण यात्रा की दृष्टि से दिन दिन असुविधाजनक हो रहा है। वहाँ डाकुओं का भी भय सदा रहता है। दूरी भी बहुत है उस प्रदेश में भारतीय वातावरण भी नहीं है।, न अपनी भाषा न संस्कृति। वहाँ जाकर विदेश सा अनुभव होता है। जिस समय भारत की संस्कृति का वहाँ तक विस्तार रहा था उस समय वह तीर्थ उपयुक्त रहा होगा, पर शिव का वास्तविक निवास, गंगा का वास्तविक उद्गम और सच्ची आध्यात्मिक मानसरोवर का दर्शन करना हो तो हमें इस हिमालय के हृदय धरती के स्वर्ग में वास्तविक कैलाश की खोज करनी पड़ेगी। परीक्षा के लिए व्यक्ति तिब्बत वाले कैलाश और इस हिमालय के हृदय वाले कैलाश की यात्रा करके देखे, वह स्वयं अनुभव करेगा कि धरती के स्वर्ग प्रदेश वाला कैलाश कितना शान्तिप्रद एवं कितने दिव्य वातावरण से परिपूर्ण है। वस्तुतः असली कैलाश ओर मानसरोवर इसी क्षेत्र में है। उस पर किसी विदेशी की छाया भी नहीं पड़ सकती।
हिमालय को भारतीय संस्कृति का प्रत्यक्ष उद्गम स्रोत कहा जाय, तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी। इतिहासकारों के अनुसार आर्य लोग मध्य एशिया से आकर हिमालय क्षेत्र में बसे और इसके उपरांत भारत के मैदानी प्रदेश में उतरे थे।
स्वर्ग का वर्णन पुराणों में आता है। उसकी प्रायः सूक्ष्म व्याख्या में उदात्त दृष्टिकोण और उत्कृष्ट भाव अभिव्यंजना के रूप में व्याख्या होती है। जो उचित भी हैं पर यदि उसका भौगोलिक स्वरूप ढूंढ़ना हो, और सौंदर्य वातावरण को परखना हो तो वह किसी ग्रह नक्षत्र में नहीं वरन् अपनी धरती पर ही परिलक्षित होता है। उपाख्यानों के आधार पर हिमालय को धरती का स्वर्ग कहा जा सकता है।
महाभारत की एक आख्यायिका है कि अर्जुन द्रौपदी से कोई उपहार मांगने का हठ करते है, उत्तर में संकोच पूर्वक द्रौपदी याचना करती है कि - मेरे लिए नन्दन वन के पारिजात पुष्प ला दे, जो जल में नहीं पत्थरों में पैदा होते है। जिनका सौंदर्य दिव्य सौंदर्य की अनुभूति करा देता है। अर्जुन हिमालय जाते हैं। नन्दन वन पहुंचते हैं। रक्षक से युद्ध करते हैं और वहाँ से एक पारिजात पुष्प द्रौपदी के लिए लाते हैं।
नन्दन वन हिमालय क्षेत्र के पुष्पोद्यान का नाम है। यह गौमुख के आगे तपोवन पार करते ही मिलता है, शिव लिंग पर्वत के समीप ही यह क्षेत्र बिखरा पड़ा है। यहाँ वर्षा के उपरान्त बसन्त आता है। और सारा क्षेत्र फूलों के गलीचे की तरह नयनाभिराम बन जाता है।
ऐसा ही एक उद्यान यातायात की दृष्टि से सुगम भी मिलता है। यह फूलों की घाटी के नाम से प्रसिद्ध है। समुद्र तल से 13200 फीट की ऊंचाई पर अवस्थित यह क्षेत्र विश्व विख्यात है। इस 10-15 मील के क्षेत्र में प्राकृत रूप से उगने वाले हजारों प्रकार के चित्र विचित्र पुष्प अनायास हो उगते हैं। संसार में ऐसा सुन्दर और अद्भुत क्षेत्र अन्यत्र कही नहीं है। इसे देखने के लिए हजारों देशी विदेशी पर्यटक हर साल पहुंचते है। प्रकृति की अनुपम छटा देख कर धन्य बनते हैं। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह उत्पादन प्रकृति का नहीं वरन् विचार शील व्यक्तियों का अतीत काल में किया गया शुभारम्भ है। यह पौधे सुनियोजित ढंग से विकसित किये गये हैं सम्भव है, यहां कोई राजोद्यान अथवा किसी महर्षि का तपोवन आश्रम रहा होगा। पुष्प ही नहीं इस क्षेत्र में बहुमूल्य वनौषधियाँ भी मिलती है। इस क्षेत्र में समय समय पर यज्ञों के उपकरण, बहुमूल्य धातु पात्र, आभूषण, अस्त्र आदि भी मिलते रहे हैं। जिनसे प्रतीत होता है। कि यह क्षेत्र जनशून्य नहीं रहा। यहाँ कोई सुविकसित लोग रहते रहे हैं।
इंग्लैंड की श्रीमती जान लेग इस क्षेत्र के पुष्पानुसंधान में वर्षों लगी रही, उन के 500 से भी अधिक प्रकार के पुष्प बीज संग्रह करके अपने देश भेजे थे। वैसे लगभग 3000 किस्म के ऐसे फूल इस क्षेत्र में पाये जाते हैं, जो प्रयत्न पूर्वक उगाये गये , गुलाब आदि का शिर नीचा कर देते हैं। यहाँ उगने वाला ब्रह्म कमल ही वह पुष्प है जिसके लिए द्रौपदी ने अर्जुन से याचना की थी।
जोशी मठ तक पक्की सड़क है। जोशी मठ से बद्रीनाथ जाने वाली सड़क पर मध्य में गोविन्द घाट मोटर से उतरना पड़ता है। वहाँ से 7 मील पैदल चलकर बाबरिया तक पहुंचना पड़ता है। यहाँ से मुख्य घाटी तक पहुँचने में एक घण्टा लगता है। कामेट झरना उस क्षेत्र का बहुत ही सुहावना निर्झर है क्यूड गांव से ही , पुष्प घाटी आरम्भ हो जाती है। यह 10-15 मील के घेरे में फैली हुई है।
घाटी के दाहिने पक्ष में कुबेर भण्डार पर्वत है, किंवदंती है कि यही कही देवलोक के कोषाध्यक्ष कुबेर की बहुमूल्य सम्पदा अभी भी दबी पड़ी है।
गंगा ग्लेशियर से आगे गहन हिमधारा व वरुण वन क्षेत्र है कहते हैं कि यह इलाका वरुण देवता का कार्य क्षेत्र रहा है यहाँ से सुमेरु पर्वत भली प्रकार दिखाई देता है। यहाँ प्रात सायं के सूर्योदय एवं सूर्यास्त काल में सुनहरा दिखाई पड़ता है। सुनहरी सूर्य किरणें बर्फ से ढकी चोटियों पर प्रतिबिंबित होती है। और यह पर्वत ऐसा लगता है मानों वह सोने का बना हो। पुराणों में सुमेरु पर्वत देवताओं का निवास और स्वर्ण का बना बताया गया है। यह उपमा प्रातः और सायं कालीन सुमेरु के स्वर्ण की तो नहीं, पर स्वर्णवत आभावान देखते हुए अभी भी चरितार्थ होती है। स्वर्ग में सुमेरु होने के कथन से इस क्षेत्र को स्वर्ग कहा जा सकता है।
हिम प्रदेश में इन्द्र धनुषों की बाढ़ रहती है। झरनों में, उड़ती फुहारों में, बादलों में घाटियों में नमी के कारण उन पर प्रतिबिंबित होने वाली सूर्य किरणें चित्र विचित्र प्रकार के इन्द्र धनुष बनाती है। लगता है देवताओँ के यह सप्त वर्ण आयुध इस क्षेत्र में अपना और अपने अधिपति देव सत्ताओं का अस्तित्व इस क्षेत्र में होने का प्रमाण करते हैं।
हिमालय भारत का सुरक्षा प्रहरी है। तीन सीमाएं समुद्र घेरे हुए है। उत्तर दिशा में गवोनत मस्तक किये हिमालय खड़ा है। यों मध्य एशिया में हमले होते तो रहे हैं, पर इस दुस्साहस में आक्रमणकारियों को लोहे के चने चबाने पड़े है। चीन ने अपनी सुरक्षा के लिए कभी मोटी दीवार खड़ी की थी, भारत की सुरक्षा के लिए वह उत्तरदायित्व हिमालय ने अनादि काल से ही अपने कन्धों पर उठा रखा है।
हिमालय प्रकृति शोभा, वन सम्पदा , बलिष्ठ जलवायु, एवं आध्यात्मिक वातावरण का धनी ही नहीं रहा है। वह प्राचीनकाल में विकसित राज सत्ताओं का भी केन्द्र रहा है। पुरातन युग में इस क्षेत्र के राजा इन्द्र पदवी धारण करते थे। मध्यकाल में भी महाभारत के अनुसार द्विगर्त, त्रिगर्त, माद्रा राज्य हिमालय क्षेत्र में रहे हैं। काश्मीर, नेपाल, गढ़वाल जैसे प्रान्त एवं देश अभी भी हैं। हिमालय एक काश्मीर हिमालय की ही सीमा के अंतर्गत हैं। क्षेत्र फल की दृष्टि से यह भूमि, समूचे भारत का एक चौथाई भाग कही जा सकती है। पंजाब एवं उत्तर प्रदेश के एक बड़े भाग को हिमालय की छाया प्राप्त करने का सौभाग्य उपलब्ध है।
मेघदूत, हर्षचरित, कुमारसंभव, कथा सरित्सागर जैसे संस्कृत काव्यों में तथा प्रायः सभी पुराणों में हिमालय की भाव भरी गरिमा तथा उस क्षेत्र में घटित हुई घटनाओं की गौरव गाथा भरी पड़ी है। आर्ष साहित्य में एक प्रकार से हिमालय की ही आत्मा बोलती है
उत्तरी पूर्वी तथा पश्चिमी भारत को सींचने का श्रेय हिमालय से निकलने वाली नदियों को ही है। पंजाब, सिंध के लिए पंच नद। आसाम से लेकर बर्मा तक के लिए ब्रह्म पुत्र। उत्तर प्रदेश , बिहार, बंगाल के लिए गंगा, यमुना, सरयू आदि यह सभी हिमालय की देन है। बादल बरसते हैं यह ठीक है, पर वस्तुतः निरन्तर हिमालय ही बरसता है। उसके भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही महत्व है। भौतिक में वन सम्पदा, वनस्पति औषधि , जल, पत्थर तथा खनिज। आध्यात्मिक वातावरण जिसके कारण उस क्षेत्र के कुली, मजूर जैसे दरिद्र वर्ग के लोग भी ईमानदार तथा सदाचारी पाये जाते हैं। तपोभूमि तो वह है ही। देवताओं, ऋषियों , तपस्वियों का यह क्रीडा प्राँगण है। इसी से भगवान ने गीता में हिमालय को अपना प्रतीक बताया है- स्थावरणाँ हिमालय!
अर्थात् स्थाविरों में हिमालय में ही हूँ।
हिमालय देखने भर में निर्जीव पाषाण खण्ड प्रतीत होता है, तात्विक दृष्टि से पर्यवेक्षण करने पर वह एक प्रत्यक्ष देव है। जीवन उसके कण कण में है। हिम की शीतलता अपने दिव्य प्रभाव से उस क्षेत्र में जा पहुंचने वाले प्राणियों के अंतरंग में प्रवेश करके शान्ति ही प्रदान करती है। आत्म साधना की दृष्टि से इस क्षेत्र का सर्वोपरि महत्व प्राचीन कालं की तरह अभी भी बना हुआ है। और सम्भवत सदा ही बना रहेगा। ब्रह्मवर्चस आरण्यक की स्थापना हिमालय की छाया में उपयुक्त वातावरण को ध्यान में रख कर ही की गई है।