किसी मंदिर में एक बहुमूल्य वाद्य था। उसके स्वर असाधारण मधुर थे। मंदिर का चौकीदार बहुत सतर्क था। उसने बाजे को बहुत सँभाल कर रखा था और इस बात की खबर रखता था कि कोई उस तक जाने न पावे।
एक दिन एक फटे वस्त्रों वाला अजनबी वहाँ पहुँचा और उस वाद्य यंत्र का उपयोग करने के लिये आग्रह करने लगा। चौकीदार ने तिरस्कारपूर्वक उसे प्रांगण से बाहर खदेड़ दिया।
अजनबी अवसर ढूँढ़ता रहा और रोज ही उधर आता रहा। एक दिन दाव लगा। वह बाजे तक पहुँचा और तन्मयतापूर्वक बजाने लगा। इस दिन का वादन इतना मधुर था कि सुनने वाले सभी तरंगित और भाव- विभोर हो उठे। वादन बंद हुआ तो श्रोताओं ने पुलकित होकर वादक से पूछा आप हैं कौन? कहाँ से आये हैं? और वादन कला में इतने प्रवीण क्यों कर हैं?
अजनबी की आँखें बरस पड़ी। वह बोला-मैं ही इस अलौकिक बाजे का निर्माता हूँ।’ मैंने ही साधनापूर्वक इसे बनाया था और सोचा था मंदिर में बजाकर दर्शकों को रस पिलाया करूँगा। पर स्थापना के दिन से लेकर आज तक वैसा अवसर ही न मिला। दूसरे ही दिन उस पर भौंड़े राग गाते रहे।
जीवन मंदिर के भाव सम्वेदनाओं का वाद्य बजाने का अवसर यदि उसके निर्माता को मिल सके तो इस पुण्य क्षेत्र में अमृतमयी स्वर लहरी गूँज उठे। वादक को अपना वाद्य बजाने का अवसर न मिलने देने वाला चौकीदार बुद्धिमान होते हुए भी अनाड़ीपन का ही परिचय देता है।
-स्वामी रामतीर्थ
भगवान बुद्ध से एक बार श्रेष्ठी सुमन्तक ने पूछा- भन्ते अक्षय आनन्द की प्रगति का क्या उपाय है?” इस पर तथागत ने उत्तर दिया- इच्छाओं का त्याग करना।” प्रसंग को अधिक स्पष्ट कराने के लिये जिज्ञासु ने पूछा- बिना इच्छा के कोई कर्म तक नहीं हो सकता फिर इच्छा न रहने से तो निष्क्रियता छा जायेगी और निर्वाह तक कठिन हो जायेगा।
भगवान् ने विस्तार से बताया कि इच्छा त्याग से तात्पर्य बुद्धि एवं कर्म का परित्याग नहीं, वरन् व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षाओं को छोड़ कर आदर्शों के लिये काम करना है। शरीर रक्षा, परिवार पोषण एवं सामाजिक सुख-शान्ति का ऊँचा उद्देश्य रखकर जो काम किये जायेंगे उनमें स्वार्थान्धता नहीं रहेगी न उनके लिये दुष्कर्म करने पड़ेंगे। सामर्थ्य भर प्रयत्न करने पर जितनी सफलता मिलेगी उसमें संतोष रखते हुए आगे का प्रयास जारी रखा जाय, यही है इच्छाओं का त्याग। जिनमें किन्हीं आदर्शों का समावेश नहीं होता-लोभ और मोह की पूर्ति ही जिनका आधार होता है वे ही हेय और त्याज्य मानी गई हैं।
ईमानदारी के साथ उद्देश्य लेकर मनोयोगपूर्वक श्रम किया जाय यह कर्तव्य है। कर्तव्य कर्म करने के उपरान्त जो प्रतिफल सामने आये उससे प्रसन्न रहने का नाम सन्तोष है। सन्तोष का यह अर्थ नहीं है कि जो है उसी को प्राप्त मान लिया जाय, अधिक प्रगति एवं सफलता के लिए प्रयास ही ना किया जाय। ऐसा सन्तोष तो-अकर्मण्यता का- पर्यायवाचक हो जायेगा। इससे तो व्यक्ति की दरिद्रता बढ़ेगी। संतोष भरे उपार्जन में से व्यक्ति की प्रतिभा निखरती है और समाज की समृद्धि बढ़ती है।
दार्शनिक जैरोल्ड की परिभाषा के अनुसार सन्तोष, निर्धनों का निजी बैंक है, जिसमें पर्याप्त धन भरा रहता है। जार्ज इलियट का मत भी इसी से मिलता-जुलता है, वे कहते थे ‘असंतोषी कभी अमीर नहीं हो सकता और संतोषी के पास दरिद्रता फटक नहीं सकती।’ उदार और दूरदर्शी मस्तिष्कों में संतोष का वैभव प्रचुर मात्रा में भरा रहता है। आनन्द की तलाश करने वालों को उसकी उपलब्धि संतोष के अतिरिक्त और किसी वस्तु या परिस्थिति में हो ही नहीं सकती। सुकरात ने एक बार अपने शिष्यों से कहा था-संतोष ईश्वर प्रदत्त सम्पदा है और तृष्णा अज्ञान के असुर द्वारा थोपी गई निर्धनता।’
परिणाम को आनन्द का केन्द्र न मानकर यदि काम को उत्कृष्टता की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया जाय और उसका स्तर ऊँचा रखने में प्रयत्न किया जाये तो सदा उत्साह बना रहेगा और साथ ही आनन्द भी। कलाकार ब्राडनिंग कहते थे-हम किसी काम को छोटा न मानें वरन् जो भी काम हाथ में है उसे इतने मनोयोग के साथ पूरा करें कि उसमें कर्ता का व्यक्तित्व बोलने लगे। ऐसे कार्य अपने कर्ता के लिये श्रेय और सम्मान का कारण बनते हैं भले ही वे अधिक महत्त्वपूर्ण न हों।’ मनस्वी रस्किन की उक्ति है- काम के साथ अपने को तब तक रगड़ा जाय जब तक कि वह संतोष की सुगन्ध न बिखेरने लगे।’ वाल्टेयर ने लिखा है किसी काम का मूल्याँकन उसकी बाजारू कीमत के साथ नहीं, वरन् इस आधार पर किया जाना चाहिये कि उसके पीछे कर्ता का क्या दृष्टिकोण और कितना मनोयोग जुड़ा रहा है। अब्राहम लिंकन का यह कथन कितना तथ्य पूर्ण है जिसमें उन्होंने कहा था-हम जिस काम में जितना रस लेते हैं और मनोयोग लगाते हैं वह उतना ही अधिक आनन्ददायक बन जाता है।
आनन्द के लिये किन्हीं वस्तुओं या परिस्थितियों को प्राप्त करना आवश्यक नहीं और न उसके लिये किन्हीं व्यक्तियों के अनुग्रह की आवश्यकता है। वह अपनी भीतरी उपज है। परिणाम में संतोष और कार्य में उत्कृष्टता का समावेश करके उसे कभी भी, कहीं भी और कितने ही बड़े परिणाम में उसे पाया जा सकता है। मिलन से नई किस्म के पदार्थ बन सकते हैं, पर वे रहेंगे अन्ततः बोध रहित ही। चेतना का गुण बोध है। जिसे बोध नहीं-मात्र हलचल करता है- उसे चेतन की संज्ञा नहीं दी जा सकती।
महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धियाँ चेतन मस्तिष्क के प्रयास का प्रतिफल है। यदि ऐसा न होता तो प्रकृति की विद्युत शक्ति बहुत पहले ही अपने अस्तित्व का परिचय देने लगी होती और आज जो काम कर रही ही है वह उससे भी पहले ही करने लगी होती। पदार्थ में पाई जाने वाली एनर्जी हलचल भर कर सकती है। चेतना का मौलिक गुण है आत्म बोध। रेडियम आदि में शक्तिशाली एनर्जी पाई जाती है, पर वह आत्म-बोध के आधार पर संभव हो सकने वाली विचारणा और आकांक्षा से सर्वथा रहित है। किसी विचारशील के इशारे पर अपनी क्रियाशक्ति का प्रभाव भर देख सकती है। एनर्जी और चेतना दोनों एक वस्तु नहीं है जैसा कि विज्ञान पक्ष द्वारा प्रतिपादन किया जाता है।
न तो चेतना जड़ है और न जड़ में चेतना का अस्तित्व है। दोनों की अपनी-अपनी सत्ता और महत्ता है। हाँ दोनों के बीच ताल-मेल बहुत अधिक है। जड़ से चेतन को अपनी आकांक्षाएँ एवं आवश्यकतायें पूरी करने का अवसर मिलता है। चेतन से जड़ की उपयोगिता को उभारने और सुव्यवस्थित रूप से प्रयुक्त करके उसकी सार्थकता सिद्ध की जाती है। लोक व्यवहार में यही क्रम चलता है। सृष्टि निर्माण का आधार भी यही समझा जाना चाहिये।
विज्ञान की मान्यता यह है कि जो जाना गया वह जड़ है। उसका यह आग्रह नहीं है कि जो मान लिया गया उससे आगे और कुछ जानने के लिये नहीं है। जिज्ञासा का द्वार खुला रखने और भावी शोध से नये निष्कर्ष निकालने की आशा बनाये रहने के कारण विज्ञान को नास्तिक नहीं कहा जा सकता। वह आज ईश्वर को उस रूप में नहीं मानता जिसमें कि आस्तिक मानते हैं तो भी ऐसी सम्भावनाओं को स्वीकार करने के लिये मस्तिष्क खुला रखना होगा।
‘ईश’ का अर्थ है- अनुशासन इस सृष्टि के कण-कण में एक अनुशासन संव्याप्त है। मनुष्य अपने शरीर और मस्तिष्क को जितने अंश में अनुशासित रख सकता है वह उतने अंश में अपने आप का ईश्वर है। इस संसार में अनुशासनहीन कुछ भी नहीं है। आकाशस्थ, ग्रह नक्षत्र एक अनुशासन में बंधे हैं। उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन की सुव्यवस्था सर्वत्र देखी जा सकती है। प्राणी और पदार्थ एक दूसरे के पूरक बनकर रह रहे हैं। प्रजनन और काम कौतुक में प्रत्येक वर्ग की वंश वृद्धि का कैसा अद्भुत समन्वय है, जिसे देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। परमाणु समूह का अपने क्रिया-कलाप में बिना दूसरों से टकराये संलग्न रहना कितना विधिवत् और कितना व्यवस्थित है। शरीर की कोशिकाएँ अपने आप में एक स्वतंत्र व्यक्तित्व का परिचय देती हैं और सघन सहयोग के सहारे शरीर की गतिविधियों का सुसंचालन करती है। किसी भी क्षेत्र में-किसी भी दिशा में-दृष्टि पसार कर देखा जाय सर्वत्र अनुशासन संव्याप्त है। बाढ़, भूकम्प, आँधी, तूफान जैसी दुर्घटनायें भी अनायास नहीं होती उनके मूल में भी कोई सिद्धान्त काम करते हैं और उन्हीं के आधार पर वे घटनायें घटित होती हैं, जिन्हें यदा-कदा होने के कारण हम आकस्मिक अप्रत्याशित समझते और आश्चर्य करते हैं। इस अनुशासन को भी ईश्वर नाम दिया जा सकता है।
लहरों का पृथक् अस्तित्व देखने पर भी वे वस्तुतः समुद्र की विशाल जल राशि की ही छोटी-छोटी इकाइयाँ होती है। किरणों का समन्वय ही सूर्य है। व्यक्तियों के समूह को समाज कहते हैं। सृष्टि के सबसे छोटे घटक अण्ड या अणु कहलाते हैं इन्हीं का विशाल समुदाय ब्रह्माण्ड है। आत्माओं की सामूहिक चेतना परमात्मा है। हम हवा के विशाल समुद्र में उसी प्रकार साँस लेते और जीते हैं जिस प्रकार मछलियाँ किसी जलाशय में अपना निर्वाह करती है। प्राणियों की समग्र सत्ता ब्रह्म है। अणुओं का समुदाय ब्रह्माण्ड। प्राणी और पदार्थों की सत्ता दीखती तो स्वतंत्र हैं, पर वस्तुतः वह एक ही विशाल महाप्राण के अनन्त संसार से अपना पोषण प्राप्त करते हैं। उसमें उगते, बढ़ते और बदलते रहते हैं। इस महाप्राण को-महान् अनुशासन को ईश्वर कहा जा सकता है।
न तो पैर को पैर देख पाते हैं और न हाथ को हाथ। आँखों की ज्योति ही दोनों को देख सकने में समर्थ होती है। आँखें स्वयं ही इस ज्योति से प्रकाशवान होती है तो भी वे अपने आलोक को देख सकने में समर्थ नहीं होती। हाथ के लिये आँखें की ज्योति का देख सकना तो और भी कठिन है। जड़ पदार्थों से बने इन्द्रिय समूह से-यंत्र उपकरणों से उस परम चेतन ज्योति को कैसे देखा जाय? यह संभव न होने से ही यदि ईश्वर की सत्ता मानने से इनकार किया जाय तो बात दूसरी है, अन्यथा यदि सूक्ष्म और स्थूल की अनुभूति के लिये प्रत्यक्ष के साक्षी न बनने की बात स्वीकार कर ली जाय तो ईश्वर के अस्तित्व की अनुभूति पग-पग पर हो सकती है। जड़ से जड़ की नाप तौल हो सकती है। चेतन-चेतन की अनुभूति पा सकता है। परिष्कृत, परिशोधित आत्मा के लिये यह तनिक भी कठिन नहीं है कि वह अपने अन्तराल में विद्यमान् ऐसी सत्ता का अनुभव करे जो उसे निरन्तर ऊँचा उठने और आगे बढ़ाने का आह्वान करती है।
पास्कल कहते थे कि -जो हमारी पकड़ में नहीं आया, उसके संबन्ध में यह सोचना गलत है कि उसका अस्तित्व है ही नहीं। अब से कुछ शताब्दियों पहले बिजली, रेडियो आदि की कहीं चर्चा तक नहीं थी। भूतकाल में भी कभी उनकी उपस्थिति देखी नहीं गई थी। इन शक्तियों की कल्पना जब किन्हीं मस्तिष्कों में उदय हुई तब भी कोई ऐसे प्रमाण नहीं थे जिनसे उनकी उपस्थिति निश्चित रूप से सिद्ध की जा सके। फिर भी इनके अस्तित्व की संभावना स्वीकार की गई और खोजें चल पड़ी। विभिन्न आविष्कार इसी प्रकार प्रकट हुए हैं।
ईश्वर के अस्तित्व से मात्र इस आधार पर इनकार करना अयोग्य है कि वह इंद्रियों और यंत्रों की पकड़ में नहीं आता। ईश्वर तो चेतन है। जड़ जगत की भी अभी अनेकों शक्तियाँ पर्दे के पीछे से झाँकती हैं और अपने आभास का संकेत करती है। ‘शोधकर्ता इन्हीं सम्भावनाओं पर आस्था रख कर इतना श्रम, समय और धन खर्च कर रहें है। यदि यह मानकर चला जाय कि जितना प्रत्यक्ष होगा उन्हीं की संभावना स्वीकार की जायेगी तब तो विज्ञान की प्रगति का सारा आधार ही समाप्त हो जायेगा। तब उपलब्धियों का प्रयोग भर होता रहेगा। इन शोधों के लिये चेष्टा करना तो दूर उनकी कल्पना तक उपहासास्पद बन जायेगी।
आदर्शों के प्रति आस्था’ यही है ‘मानवी गरिमा का प्राण।’ यदि इसे हटा दिया जाय तो अपनी शारीरिक दुर्बलताओं, मानसिक विकृतियों और कुसंस्कारी दुष्टता के कारण वह किसी के लिये भी उपयोगी न रह जायेगा। यहाँ तक कि अपने आप के लिये भी अभिशाप सिद्ध होगा। तब इस संसार में न संस्कृति शेष रहेगी और न सभ्यता के कहीं दर्शन होंगे। जिसकी लाठी उसकी भैंस का मत्स्य न्याय ही सर्वत्र दृष्टिगोचर होगा। तब शासन, समाज, नीति, मर्यादा, व्यवस्था आदि की सुन्दर संरचना का सारा महल ढह जायेगा और या तो आदिम काल के बनमानुष युग में लौट चलना पड़ेगा, अथवा प्रलय तुल्य किसी महायुद्ध से संचित सभ्यता और प्रगति का पूरी तरह अन्त करना पड़ेगा।
शरीर के लिये जितनी आवश्यक ‘आक्सीजन’ है, उससे भी अधिक चेतना के लिये आदर्शवादी आस्था। उन्हीं के सहारे नर-पशु को मानवता का वरदान मिला है। यह छिन गया तो उसकी विशेषता कुछ रह ही नहीं जायेगी। तब जीवन में सुन्दरता, सरसता और उत्कृष्टता के वे तत्त्व भी रह नहीं जायेगी जिनके कारण प्रगति के पथ पर चलते हुए हम आज यहाँ पहुँचे हैं।
ईश्वर क्या है, इस तत्त्वज्ञान की विवेचना के अनेकों पक्ष हैं। यदि उनमें से इस तथ्य को ही स्वीकार कर लिया जाय कि ईश्वर उच्च आस्थाओं का समुच्चय है, तो इतने से भी काम चल जायेगा। किसी राष्ट्रीयता का प्रतीक उसकी ध्वज एवं प्रतीक मान लिया जाये तो भी आस्तिकता का मूल प्रयोजन पूरा हो सकता है। जूनियर हक्सले और एलिस्टर हार्डी ठीक ही कहते थे कि जीवन सुखद साधनों को कितना ही महत्त्व क्यों न दिया जाय सबसे ऊपर की बात उन संस्थाओं का संरक्षण है जिनसे मनुष्यता को सामाजिकता का उपहार देकर समान प्रगति का पथ प्रशस्त किया है।
आध्यात्मिक जीवन के पाँच पक्ष हैं- (1) धर्म (2) क्रिया (3) भाव (4) ज्ञान (5) योग। इन्हें विकास पक्ष की क्रमिक भूमिका कह सकते हैं।
धर्म वह पक्ष है- जो व्यवहार के सम्बन्ध में दिशा धारण की अन्तः क्षेत्र में प्रतिष्ठापना करता है। क्या करना है, क्या नहीं, इसका एक आदर्शवादी पक्ष भी है। स्वार्थ और कुसंस्कारों से पशुवत् स्वेच्छाचार बरतने की भी एक लहर ज्वार की तरह मन में उठती रहती है। उसे शान्त, समाहित और सन्तुलित करने के लिए अन्तःकरण का देवपक्ष काम करता है। समाज में मानवी मर्यादाएँ और परम्पराएँ भी मौजूद हैं। इस भीतरी और बाहरी उत्कृष्टता की जो छाप मान्यता के रूप में मन स्वीकार करता है उसे व्यक्तिगत धर्म कह सकते हैं। यों सामाजिक और दार्शनिक धर्म की व्याख्या, विवेचना तो शास्त्रों और प्रवचनों द्वारा अवगत होती ही रहती है।
(2) आध्यात्मिक जीवन का दूसरा पक्ष है- क्रिया मान्यताएँ जब प्रबल, परिपक्व और स्वभाव व्यवहार का अंग बन जाती है तो उनकी प्रेरणा से तद्नुरूप आचरण होने लगता है। कई बार तो मान्यताएँ कल्पना मात्र रहती हैं और उनका प्रयोग चर्चा प्रसंग तक सीमित रहता है, पर जब वे गहन अन्तराल को स्पर्श करती हैं, तो शरीर को उसी दिशा में चलने के लिए विवश करती हैं। दुष्ट कर्म, पूर्व संचित पूर्वाग्रहों और अभ्यासों से होते हैं। पर धर्माचरण के लिए आदर्शवादी नैतिक मानवी गरिमा की अनुभूति से ही प्रेरणा मिलती है। धर्म मान्यताओं को धर्माचरण का रूप मिलने लगे तो समझना चाहिए आत्मिक प्रगति की दूसरी कक्षा में पहुँचने की स्थिति बन गई।
(3) तीसरी कक्षा है- भाव भाव का तात्पर्य है रस। सदुद्देश्यों में रस आये, प्रीति बढ़े और विश्वास सुदृढ़ हो तो उस भाव समन्वय को ‘श्रद्धा’ कहते हैं। यों श्रद्धा दुष्ट, दुर्भावों और दुष्कर्मों में भी हो सकती है। असुरों की मनोभूमि इसी स्तर की होती है, पर जहाँ आत्मिक प्रगति का प्रश्न है वहाँ श्रेष्ठता के प्रति भाव भरी प्रीति को ही ‘श्रद्धा’ कहा जाएगा। इसी को शास्त्रकारों ने भाव कहा है। स्वभाव तो अभ्यास गतिविधियों से भी बन सकता है, पर भाव के लिए गहरी सुसंस्कारिता चाहिए। भगवान भाव के भूखे हैं। ‘भावो हि विद्यते देव’ जैसे तथ्यों से स्पष्ट है कि श्रद्धा की ज्योति से ही आत्म क्षेत्र की निर्जीव निस्तब्धता जागृति और गति रूप में प्रकट परिलक्षित होती है। मन्त्र सिद्धि से लेकर देव अनुग्रह तक का उत्पादक यही भाव संस्थान है। आन्तरिक आनन्द का सन्तोष से लेकर उपासना की सुखद प्रतिक्रिया का सृजन इस तीसरी भाव भूमिका में ही होता है।
(4) चौथा पक्ष है- ज्ञान ज्ञान से तात्पर्य है- आत्मज्ञान शिक्षा स्वाध्याय या प्रवचन परामर्श या अनुभव मनन से मिलने वाली जानकारी से आत्मज्ञान भिन्न है। उसमें अपने स्तर, स्वरूप, उद्देश्य और कर्तव्य की उच्चस्तरीय अनुभूति होती है और यह सघन विश्वास बन कर जीव चेतना का अंग बन जाती है। यह आन्तरिक काया-कल्प है। साधारणतया मनुष्य शरीर अध्याय में ही नख-शिख् पर्यन्त डूबा रहता है और इन्द्रिय लिप्सा, सम्पत्ति लालसा और बड़प्पन की अहमन्यता जैसे भौतिक उत्साह ही उस पर छाये रहते हैं। इन्हीं की पूर्ति में जीवन गुजरता है। आत्मज्ञान होने पर स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन होता है तब व्यक्ति अपने को सत्-चित आनन्द में अनुभव करता है। इन्हीं आत्म ज्ञानियों को तत्त्वदर्शी या ऋषि कहते हैं। भले ही वे रहन-सहन की कोई भी पद्धति अपनाये रहें।
(5) अन्तिम प्रगति स्थल है- योग योग का तात्पर्य है- मिलन-घुलन विलय, विसर्जन, समर्पण। नाले का नदी में, ईंधन का अग्नि में, नमक का पानी में विसर्जन होता है तो उनका द्वैत मिलकर अद्वैत बन जाता है। योगाभ्यास के कर्मकाण्ड तो अनेकों हैं और वे योग की अन्तः स्थिति उत्पन्न करने के लिए सुविधा भी उत्पन्न करते हैं। भ्रमवश लोग योगाभ्यास के कर्मकाण्डों को ही योग कहने लगते हैं और उनमें निरत लोग योगी कहे जाने लगते हैं। वस्तुस्थिति इससे भिन्न है। ‘योग’ अन्तःकरण की वह स्थिति है जिसमें जीव ‘स्व’ की पृथकता को समाप्त करके ईश्वरीय चेतना की लहर किरण बन कर सोचता और काम करता है। यह नर-नारायण की समन्वित स्थिति है। वेदान्त में तत्त्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म, शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम् की जिस मान्यता की सम्वेदना बना लेने का निर्देश है वस्तुतः वह ‘योग’ का लक्ष्य है। योगी को अवतार या परमात्मा कहा जा सकता है क्योंकि उनकी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति प्रायः ईश्वर तुल्य ही होती है।
अनन्त आकाश के गर्भ में यह सारा दृश्य पदार्थ एक छोटे-छोटे घटक के रूप में रह रहा है। उसकी इकाइयाँ दीखती तो अलग-अलग है, पर वे परस्पर इतनी अधिक गुथी हुई हैं कि उन्हें तत्त्वतः पृथक् कर सकना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं। मोटे तौर पर किसी भी पदार्थ को तोड़ा और बिखेरा जा सकता है।
चाहे परमाणु की अन्तर्देशीय संरचना पर दृष्टि डालें, चाहे सौर-परिवार की गतिविधियों को देखें अथवा ब्रह्माण्डीय गृह-तारकों निहारिकाओं को देखें, सर्वत्र एक ही नियम काम करता दिखाई देगा। इसी प्रकार स्थूल की परिधि से आगे जितनी गहराई में उतरते चले जाएँगे उतना ही यह स्पष्ट होता जाएगा कि इस विश्व में मात्र एक ही दिव्य-शक्ति संचारित हो रही है। उसी की हलचलें तरह-तरह के पदार्थ एवं दृश्य उपस्थित करती रहती हैं। उसी में सृजन, अभिवर्धन और परिवर्तन का त्रिविध क्रियाकलाप चलता रहता है। इस सब प्रसार, विस्तार पर गहराई में उतरने पर मात्र एक ही तत्त्व शेष रह जाता है, जिसे ब्रह्म प्रकृति अथवा दोनों की संयुक्त सत्ता अर्ध नारी नटेश्वर-पुरुष प्रकृति का गुँथन ही शेष रह जाता है। इसी स्थिति का वर्णन सियाराम मय सब जग जानी, के रूप में किया है और उसे भगवान के रूप में नमन अभिनन्दन किया है।
प्रगतिशील विज्ञान अब वयोवृद्ध वेदान्त के साथ सलाह-मशविरा कर रहा है और लड़ाई समाप्त करके चिरस्थायी समझौते की तैयारी कर रहा है। नवीनतम खोजें पदार्थ की जड़ तक पहुँचते-पहुँचते मात्र एक ही शक्ति का अस्तित्व शेष बचता देखती हैं। यह शक्ति जड़ नहीं वरन् विचार पूर्ण है। व्यवस्था और सन्तुलन उसकी नीति है। ऐसा कर सकना विवेकशील के लिए ही सम्भव हो सकता है। विवेक युक्त सर्वव्यापी शक्ति को ब्रह्म नाम दिया जाय या और कोई, निष्कर्ष वहीं पहुँचता है जहाँ एक ही सर्वव्यापी शक्ति के कीड़ा-कल्लोल के अतिरिक्त यहाँ और कुछ भी शेष नहीं रह जाता।
सामान्यतः भले ही किसी अनजान द्वारा इस तथ्य पर विस्मय व्यक्त किया जाय कि परमाणु का अधिकांश रिक्त ‘स्पेस’ है और शेष अत्यल्प हिस्से में ही इलेक्ट्रान, प्रोट्रान, न्यूट्रान, पाजिट्रान आदि विद्युत-प्रवाह हैं। किन्तु वेदान्त के अनुयायियों के लिए यह कोई नवीन तथ्य नहीं। वेदान्त के अनुसार द्रव्य का उद्गम आकाश से हुआ है, इसलिए द्रव्यमय जगत की प्रत्येक वस्तु तथा प्रत्येक कण में आकाश (स्पेस) की उपस्थिति अनिवार्य है।
परमाणु के शेष हिस्से में विभिन्न विद्युत प्रवाहों की सक्रियता ऊर्जा का ही सूक्ष्म रूप है। वेदान्त की भाषा में यही प्राण है।
रेडिएशन यद्यपि अति सूक्ष्म तथा वेगवान होता है, तो भी है वह द्रव्य के ही स्तर का। वेदान्त की मान्यता है कि प्रकाश दिक् तथा काल में ही विस्तृत व क्रियाशील रहता है। सर्वोच्च सत्ता रेडिएशन के क्षेत्र से परे है। कठोपनिषद् में उसका वर्णन करते हुए कहा गया है कि “वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता है, न ही चन्द्रमा और न ही नक्षत्र गण। प्रकाश के ये प्रवाह वहाँ नहीं पहुँच सकते। फिर नाशवान् अग्नि की तो बात ही क्या?
भौतिक विज्ञान भी आज चेतना-तरंगों के अनन्त विस्तार के द्वार पर आ पहुँचा है। डाल्टेन ने जब परमाणु की धारणा विज्ञान-जगत को दी उस समय से परमाणु को पदार्थ का मूल कारण माना जाता रहा है, पर अब यह धारणा संपूर्णतः ध्वस्त हो चुकी है।
एक सामान्य व्यक्ति की अनुभूति यही होती है कि यह वस्तु जगत रूप, रंग और ठोसपन से बना है। लेकिन जैसा कि 'द नेचर आफ द फिजीकल वर्ल्ड’ में एडिंगटन ने लिखा है जैसे-जैसे हम पदार्थ का विश्लेषण करते जाते हैं, वह अदृश्य होता जाता है।”
पहले जो परमाणु अविभाज्य माना जाता था, आज उसका विभाजन और विस्फोट अनन्त शक्ति और ज्ञान का स्त्रोत बन गया है। यह पाया गया कि परमाणु में दो विद्युत धाराएँ हैं। केन्द्रीय नाभिक तथा परमाणु के मुख्य भाग में पॉजिटिव (धनात्मक) विद्युत होती है और केन्द्रीय भाग के बाहरी हिस्से के चारों ओर ऋणात्मक विद्युतधारा से भरे इलेक्ट्रान होते हैं। केन्द्रीय नाभिक में भी दो भिन्न-भिन्न कण होते हैं, जिन्हें न्यूट्रान और प्रोट्रान कहते हैं। अपने स्वाभाविक रूप में परमाणु विद्युतावेशी नहीं होता, क्योंकि उसके भीतर की धनात्मक तथा ऋणात्मक विद्युत धाराएँ सदा समान होती हैं। ऋणावेशी इलेक्ट्रान और धनावेशी प्रोट्रान परस्पर सन्तुलन कायम रखते हैं। इस प्रकार परमाणु सौर-व्यवस्था का एक लघु प्रतीक होता है।
लेकिन परमाणु-सिद्धान्त के क्षेत्र में सर्वाधिक रोमांचक खोज तब हुई जब कि वैज्ञानिकों ने गैस की तरह से अवयवों को गुजारा। अवयव आर-पार हो गये। तब परमाणु के ठोस होने की धारणा खण्डित हो गई, क्योंकि ये अवयव कहीं भी न तो टकराये, न ही कोई अन्य प्रतिक्रिया की। परीक्षणों से ही यह भी ज्ञात हुआ कि परमाणु का नाभिक सूर्य की तरह और उसके चतुर्दिक् परिक्रमारत इलेक्ट्रान ग्रह-नक्षत्रों की तरह से हैं। इस प्रकार परमाणु सौर-मण्डल का ही एक छोटा नमूना सिद्ध हुआ। यह भी ज्ञात हुआ कि एक इलेक्ट्रान का व्यास सम्पूर्ण परमाणु के व्यास का 50 हजारवाँ हिस्सा है और नाभिक का व्यास भी लगभग उतना ही है। इस प्रकार पूरे परमाणु का लगभग शत-प्रतिशत हिस्सा रिक्त ‘स्पेस’ है। यदि मनुष्य शरीर के भीतर के समस्त परमाणुओं को इस प्रकार दबाया जाय कि उनमें से प्रत्येक का यह रिक्त ‘स्पेस’ (स्थान) भर जाए तथा वे परस्पर अधिकतम सघन हो जाएँ तो फिर मनुष्य का शरीर एक ऐसे छोटे-से धब्बे या बिन्दु की तरह हो जाएगा कि वह किसी श्रेष्ठ माइक्रोस्कोप से ही देखा जा सके।
प्रयोगों द्वारा यह ज्ञात हुआ कि पदार्थ का सारभूत अंश कण के रूप में नहीं तरंगों के ही रूप में है। “द लिमिटेशन आफ साइन्स” में श्री सलीवन लिखते हैं- इस प्रकार यह पहला संकेत था, जो कि आधुनिक विज्ञान की ओर से आया कि “पदार्थमय जगत का मूलभूत स्वरूप वस्तुतः पदार्थ कण (यानि द्रव्य के अवयव) के रूप में नहीं अपितु तरंगों के रूप में है। पदार्थ क्रमशः क्षीण होने लगा और उसकी सत्ता अज्ञात तरंगों में समाहित होती दिखने लगी।” “द् फिलॉसफी आव फिजीकल साइन्स” में एडिंगटन लिखते हैं- अन्ततः हम जहाँ पहुँचे हैं, वह है तरंगों का अनन्त विस्तार, तरंगें मात्र तरंगें।” “द मिस्टीरियस यूनीवर्स" के लेखक श्री जीन्स भी इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं।” हम तरंगों के संसार में रहते हैं, जहाँ तरंगों के अतिरिक्त और कुछ नहीं।”
प्रयत्न और परिश्रम से किये गये प्रयोगों तथा एकत्रित और विश्लेषित आँकड़ों एवं नित नवीन अनुसन्धानों द्वारा भौतिक विज्ञानी जिस तथ्य के निकट पहुँचे हैं वह यही कि विश्व-ब्रह्माण्ड की संरचना में समरसता और आन्तरिक संगति है और वह अत्यन्त सूक्ष्म, अति निपुण गणितीय मस्तिष्क का ही सुन्दर सुविस्तृत प्रकाशन है। प्रकृति राज्य की नियामक शक्तियों के रूप में वे कारण और क्रम-व्यवस्था ही पाते हैं। विज्ञान के विभिन्न सिद्धान्तों, नियमों का समन्वय अद्वैत वेदान्त की दिशा में ही होता दीख रहा है। वैज्ञानिक, दार्शनिक पाल आर हेल का कथन है- सम्पूर्ण सृष्टि-व्यापार की एक अन्तिम सुनिश्चित व्याख्या की खोज करता हुआ वैज्ञानिक चिन्तन अद्वैतवादी है।”
मैटर के कण ‘इलेक्ट्रान’ द्रव्य कण भी हैं तथा तरंग भी। उसी प्रकार ‘रेडिएशन’ के कण ‘फोटोन’ तरंग भी हैं तथा द्रव्य भी। इस प्रकार ‘मैटर’ और ‘रेडिएशन’ की पृथक् सत्ताएँ खतरे में पड़ गई हैं और वे दोनों एक ही मूल सत्ता, एक ही यथार्थ के अंग मात्र प्रतीत होते हैं। इसीलिए जीन्स महाशय कहते हैं- मैटर और ‘रेडिएशन’ दो पृथक् तथा अपरिवर्तनीय सत्ताएँ नहीं बने रह सकते हैं। वे परस्पर परिवर्तनीय हो सकते हैं। एकमात्र मूलसत्ता के ही वे अंग प्रतीत होते हैं, जो ‘मैटर’ और ‘रेडिएशन’ आदि के रूप में विभिन्न रूप आकार ग्रहण कर सकती है, पर इन सभी परिवर्तनों के बीच वही एक मूलसत्ता विद्यमान रहती है। उसका सम्पूर्ण योग सदा एक सा बना रहता है। स्पष्टतः यह वेदान्त की प्रसिद्ध मान्यता “पूर्णमदः पूर्णमिदं” के ही अनुरूप है, जिसमें कहा गया है- पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।”
चेतना और पदार्थ का द्वैतभाव अब मिट चला है। विश्व के निर्माण और नियन्त्रण करने वाली शक्ति का अनुभव आधुनिक वैज्ञानिकों को होने लगा है तथा इस शक्ति से मानवीय चेतना की समानता की भी अनुभूति की जा रही है। विज्ञान 'एकोऽहम् द्वितीयो नास्ति’ की पुष्टि और समर्थन के द्वार पर आ पहुँचा है, विज्ञान और अध्यात्म की मिलन वेला आ उपस्थित हुई है।
रूस के उक्रेन प्रान्त के प्रीलुका गाँव में एक तंनेबर का घर। पिता स्वयं ताँबे के बर्तनों को बनाने का काम करते थे। अतः इच्छा थी कि पुत्र बड़ा होकर औद्योगिक रसायनविद् बने। साधन तो अधिक थे नहीं।
तभी घर की कन्या बीमार पड़ी। डिप्थीरिया ने उसे अपनी चपेट में ले लिया। मृत्यु का ग्रास बनी बहिन को देखकर भाई का अन्तःकरण पीड़ा से सिहर उठा। कल तक दोनों साथ खेलते, खाते, विनोद करते थे, आज वही बीन रोग के क्रोध का शिकार बन गई है। उसने विचार किया-पता नहीं कितनी बहिनें और कितने भाई इन्हीं रोगों के प्रबल थपेड़ों से असमय ही इस दुनिया से चले जाते हैं। परिजन असहाय देखते रहते हैं।
युवक के पुरुषार्थ को जैसे कोई चिनगारी छू गई। उसने संकल्प किया- मैं अपनी शक्ति भर लोगों को रोग के इस भयानक चंगुल से मुक्त करने-कराने का प्रयास करूँगा। औद्योगिक व्यवस्था में तकनीकी कार्य-कौशल से बहुत धन मिल सकता है। पर वह धन मुझे नहीं चाहिए। मैं तो मानवीय पीड़ा के विरुद्ध संघर्ष में ही अपनी सम्पूर्ण शक्ति झोंकूँ, इसी में सार्थकता है।’
डस संकल्पवान युवक का नाम था सैलमेन अब्राह्म वाक्समैन। 22 वर्ष की आयु में 1910 में वे संयुक्त राज्य अमरीका में जा बसे। अपनी प्रखर बुद्धि के कारण उन्हें रुटजर्स विश्वविद्यालय, न्यू बुन्सविक, न्यू जरसी में छात्रवृत्ति सहित प्रवेश मिल गया। फिर पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त कर प्राध्यापक बने।
उन्होंने अपना सारा जीवन रोगों के विरुद्ध संघर्ष में बिता दिया। सूक्ष्मजीवियों तथा रोगाणुओं का विस्तृत अध्ययन किया। इन्हीं प्रोफेसर वाक्समैन ने स्ट्रेप्टोमाइसिन की खोज की। जो मिला प्राप्त धनराशि एवं स्ट्रेप्टोमाइसिन की सम्पूर्ण रॉयल्टी उन्होंने रुटजर्स विश्व-विद्यालय के नाम कर दी, जिससे इंस्टीट्यूट आफ माइक्रोवायलाजी” का निर्माण हुआ। स्ट्रेप्टोमाइसिन की खोज के लिए सम्पूर्ण मानव जाति प्रो वाक्समैन की ऋणी है।
संवेदन सच्ची, गहरी और व्यापक हो तो निश्चय ही वह कर्म और पुरुषार्थ में प्रतिफलित होती है। कर्म-शून्य सम्वेदना निरर्थक है।
नैपोलियन कहता था कि-मैं स्वयं ही परिस्थितियों को जन्म देता हूँ।” यह बात उसने भले ही अहंकार वश कही है, पर उसमें सच्चाई कूट-कूट कर भरी है। हर व्यक्ति जाने या अनजाने में अपनी परिस्थितियों का निर्माण आप करता है। आत्म-विश्वास से विचार, विचार से कर्म यही है- जीवन का प्रवाहक्रम जिसके फलस्वरूप परिस्थितियाँ उत्पन्न होती हैं।
ईसा कहते हैं- यदि तेरे भीतर आत्म-विश्वास है तो असफलता का मुँह न देखना पड़ेगा। असफलताओं का एक कारण तो यह होता है कि सामर्थ्य और साधनों का विचार न करते हुए ऐसे कदम बढ़ा लिए जायें जो विचारशीलता की दृष्टि से उस समय उपयुक्त नहीं थे। दूसरा कारण होता है आत्म-विश्वास की कमी। आत्म-विश्वास अनियन्त्रित भावुकता का नाम नहीं है, वरन् उस दूर-दर्शिता का नाम है जिसके साथ संकल्प और साहस जुड़ा रहता है। ऐसे आत्म-विश्वासी जो भी काम करते हैं उसमें न ढील-पोल होती है, न उपेक्षा न गैर जिम्मेदारी। वे जो कहते हैं उसे पूरी भावना, विचारणा और तत्परता के साथ करते हैं। इस स्तर के कार्य प्रायः असफल नहीं ही होते हैं।
ईसाई धर्म प्रचारकों में अग्रणी ड्वाइटमूडी जवानी तक अनपढ़ रहा। उसकी स्त्री थी तो कम पढ़ी पर चाहती यह थी कि उसका पति पादरी बने। सो उसने उसे पढ़ना लिखना स्वयं सिखाया और जोर देकर गिरजे का शौक लगाया। वह लगी ही रही और अन्ततः मूडी को धर्म प्रचारक ही बनाकर मानी। पादरी भी ऐसा जिसने ईसाई जगत में असाधारण ख्याति और प्रतिष्ठा प्राप्त की।
अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का पालन-पोषण उनकी सौतेली माँ ने किया था। गरीबी और कठिनाइयों के बीच दिन काटने वाली उस महिला ने इस बालक को ऐसी प्रेरणाएँ और नसीहतें दीं जिनके सहारे बच्चे की समझ और शिक्षा ही नहीं, आत्मा भी ऊँची उठती चली गई और वह राष्ट्रपति ही नहीं विश्व के महामानवों में से एक बना। एक बार अब्राहम लिंकन से उनकी उन्नति का कारण और शिक्षा का आधार पूछा तो उनने एक शब्द में उतना ही कहा-जन्मदात्री न होते हुए भी जिसने मेरी निर्मात्री का कार्य पूरा किया उसी अपनी माँ का बनाया हुआ मैं एक खिलौना भर हूँ।’
महान वैज्ञानिक टामस अल्वा एडीसन बचपन में अत्यन्त मन्द बुद्धि थे। पढ़ने में उनकी अक्ल चलती ही न थी। सो अध्यापक ने बच्चे के हाथों अभिभावकों को पत्र भेजा। इसे स्कूल से उठा लें, मन्द बुद्धि होने के कारण वह पढ़ न सकेगा। बच्चे की माँ ने भरी आँखों और भारी मन से पत्र को पढ़ा। बच्चे को दुलारा और छाती से चिपका कर कहा-मेरे बच्चे, तुम मन्द बुद्धि नहीं हो सकते। मैं स्वयं ही तुम्हें पढ़ाऊंगी।” बच्चे को स्कूल से उठा लिया गया और उसकी माँ ने पढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। परिणाम सभी के सामने है। बच्चा विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों में से एक बना।
अस्पताल की एक नर्स फ्लोरेन्स नाइटिंगल जब रेडक्रास सोसाइटी की स्थापना का उद्देश्य और स्वरूप लेकर बड़े आदमियों के पास गई तो उसकी हैसियत और कार्य की गरिमा को देखते हुए यही कहते रहे-आपके लिए इतनी बड़ी उड़ानें अनुपयुक्त हैं। नाइटिंगल हताश नहीं हुई। उसने अपनी हैसियत के अनुरूप काम आरम्भ किया किन्तु धीरे-धीरे विकसित होते हुए वह मिशन आज अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के महान् संस्थानों में से एक है।
तत्परता और तन्मयता जहाँ भी एकत्रित होगी वहाँ अभिनव सामर्थ्य के ऐसे शक्ति प्रवाह चल पड़ेंगे जो शब्दबेधी बाण की तरह लक्ष्य को पूरा करके ही रहें।
कोई 50 वर्ष पूर्व की बात है- विश्वविख्यात नक्षत्र विद् डा. हबल अपने दूर-दर्शी स्पेक्ट्रोमीटर पर सुदूर नक्षत्रों से आने वाले प्रकाश के वर्णक्रम का अध्ययन करते थे। सूर्य का श्वेत प्रकाश सात रंगों के मेल से बना है। स्पेक्ट्रोमीटर एक ऐसा यन्त्र है जिसमें एक त्रिपार्श्व काँच लगा रहता है जब प्रकाश की एक किरण को उसमें कुदाया जाता है तो इस काँच के गुण के अनुसार वह अपने सातों रंगों में फूट पड़ता है। इन रंगों के वर्णक्रम से प्रकाश की स्थिति अन्तरंग खनिज स्रोतों की जानकारी भी की जाती है। पर यहाँ जो प्रयोग चल रहा था उसका प्रयोजन एक आकाश गंगा की दूरी की जाँच करना था जो उस समय ब्रह्माण्ड की सीमा पर प्रतीत हो रही थी।
जाँच के समय एक बिलकुल ही नया तथ्य प्रकाश में आया। वर्णक्रम का लाल रंग निरन्तर सरकता और क्षीण होता प्रतीत हो रहा था, जिसका अर्थ था कि आकाश गंगा परे हट रही है। उससे आने वाला अनहद नाद भी क्रमशः मन्द पड़ता जा रहा था, उससे भी उपरोक्त तथ्य की ही पुष्टि हो रही थी। इस परिवर्तन को “डाप्लर प्रभाव” की संज्ञा दी गई और एक नये दर्शन ने जन्म लिया कि ब्रह्माण्ड निरन्तर बढ़ रहा है। यह चौंका देने वाली जानकारी थी, जिसने वैज्ञानिकों के सामने विचार के लिये सैकड़ों प्रश्न खड़े किये, अस्तित्व का उद्गम क्या है, क्या बह बुदबुदों की तरह से मात्र है, अथवा उसमें जीवन अमरता के भी कोई द्रव्य विद्यमान हैं।
अभी कुछ दिन पूर्व एक अन्य वैज्ञानिक डा फ्रेडहायल भारतवर्ष आये थे, विज्ञान भवन में उपरोक्त प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा था-अन्तरिक्ष की गहराइयाँ जितना अनन्त की ओर बढ़ेगी, उसमें झाँककर देखने से मानवीय अस्तित्व का अर्थ और प्रयोजन उतना ही स्पष्ट होता चला जायेगा। शर्त यह रहेगी हमारा अपना भी विकास और विस्तार हो। यदि हमारी बुद्धि, विचार और ज्ञान मात्र पेट प्रजनन, तृष्णा अहंता तक ही सीमित रहता है तब तो हमें पड़ोसी भी नहीं जान सकेंगे, पर यदि इन सब से पूर्वाग्रह युक्त हों तो ब्रह्माण्ड इतनी खुली और अच्छे अक्षरों में लिखी चमकदार पुस्तक है कि उससे हर शब्द का अर्थ, प्रत्येक अस्तित्व का अभिप्राय समझा जा सकता और अनुभव किया जा सकता है।
ब्रह्माण्ड के निरन्तर विकास का अर्थ यह हुआ कि सृष्टि में जो कुछ भी है चाहे वह पदार्थ हो, ऊर्जा हो, चुम्बकत्व हो, प्रकाश हो, अथवा विचार सत्ता जो भी स्थूल या सूक्ष्म अस्तित्व में है वह सब एक ही केन्द्र बिन्दु पर समाहित था। इस सन्दर्भ में भारतीय दर्शन और वैज्ञानिक दोनों की धारणायें एक जैसी हैं। प्रारम्भ में एक महापिण्ड था। यह विज्ञान की मान्यता है कि उस महापिण्ड में किसी समय एकाएक विस्फोट हुआ। विस्फोट से समस्त दिशाओं में आकाश गंगाओं के रूप में पदार्थ बह निकला, अब तक की शोधों के अनुसार ब्रह्माण्ड में 19 आकाश गंगाएँ हैं और आकाश गंगा में 10 अरब तारे हैं। एक आकाश गंगा की परिधि या व्यास लगभग एक लाख प्रकाश वर्ष अर्थात् 300000 ग 60 ग 60 ग 24 ग 365 1।4 प्रकाश की गति ग 1 मिनट में ग 1 घन्टे में ग 1 दिन में ग 1 वर्ष = 1 से में कि0 मी0 852560000000 किलोमीटर दूरी 1 प्रकाश वर्ष की हुई, इससे 1 लाख गुना बड़ा व्यास अपनी आकाश गंगा का है जब कि उसके परिवार के दूर-दूर तक छिटके तारों की दूरी भी अरबों प्रकाश वर्ष में है अतएव इस भयंकरतम विस्तार का तो कुछ पता ही नहीं चलता।
सूर्य और पृथ्वी की दूरी सवा नौ करोड़ मील है। वहाँ से यहाँ तक प्रकाश आने में सवा 8 मिनट लगते हैं। यदि किसी तारे का प्रकाश पृथ्वी तक 8 हजार वर्षों में आता है उसका अर्थ यह हुआ कि वह पृथ्वी से 47 पद्म मील की दूरी पर है। लेकिन इन से कुछ तारे तो इतनी दूर हैं कि उनका प्रकाश पृथ्वी तक आने में ही अरबों वर्ष लग जायेंगे अर्थात् उस दूरी का तो अनुमान ही असम्भव है। इस तरह सृष्टि की अनन्त गहराई में अनन्त प्रकृति अनेक रूपों में विद्यमान हैं।
भारतीय दर्शन की मान्यता चेतन को मूल मानकर ज्यों की त्यों है। प्रारम्भ में एक ही तत्व परमात्मा पिण्ड रूप में था। उसके नाभि देश से 'एकोऽहं बहुस्याम्’ मैं एक हूँ बहुत हो जाऊँ इस तरह की स्फुरणा, भावना या विचार उठा इससे वह फट पड़ा और महा प्रकृति की रचना हुई। उसमें सत् रज, तम तीन गुणों का सम्मिलन था, इन्हीं से सृष्टि में जीवन का निमार्ण हुआ। सृष्टि के विस्तार की तरह ही 84 लाख जीव योनियों का निरन्तर विस्तार होता चला गया। जिस तरह ब्रह्माण्ड विकसित हो रहा है नाना प्रकार की जीवन सृष्टि का भी विकास होता जा रहा है यह सब अत्यधिक करुणाजनक, स्नेहजनक मातृसंज्ञक रूप से चल रहा है। भौतिक या आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से आकाश गंगाएँ माता का हृदय कही जा सकती है। इन से एक ओर भौतिक जगत को आवश्यक जीवन और प्रकाश मिलता है तो दूसरी ओर जीवन सत्ता उसी से प्राण और पोषण पाती है। ब्रह्माण्ड के समान हमारी सामाजिक व्यवस्थाएँ भी मातृसत्ता प्रधान बनी रहें तो इन महापिण्डों की सुचारु व्यवस्था शान्ति और सामूहिकता के आधार पर अपने सामाजिक जीवन में भी निस्वार्थ प्रेम, परोपकार, दया, करुणा, उदारता और सहकारिता का समावेश तथा फलस्वरूप स्वास्थ्य सुख-शान्ति समृद्धि और सुव्यवस्था प्रतिष्ठित बनी रह सकती है।
चेतना कहीं भी प्रकृति से भिन्न नहीं है। किसी न किसी अवस्था में दोनों अन्योऽन्याश्रित हैं, “गिरा अरथ जल भीचि सम कहियत-भिन्न वाली स्थिति है। यदि दोनों में से कोई इस सन्तुलन को बिगाड़ने का प्रयास करते हैं वहीं संकट पैदा हो जाता है। महापिण्ड या परमात्मा ने अपनी शक्ति स्वरूपा सहचरी आकाश गंगाओं को विपुल शक्ति देकर व्यवस्था के लिए भेज दिया। मन्दाकिनियाँ उस अनुदान को हर मण्डल के एक-एक मुखिया सूर्य उन आद्य शक्ति से अपनी माँ से पोषण और बल लेकर अपने समस्त और मण्डल को जीवित और जागृत रखते हैं। सब को शक्ति, प्रकाश, गर्मी, वायु, जल, वर्षा, प्रकृति अन्न आदि देते हैं। इन सब का प्रयोजन चेतना को -इच्छा शक्ति को जीवित रखना ही तो हो सकता है। यदि परिवार संस्थाएँ प्रेम सद्भावना और सहकारिता के इस चुम्बकत्व को स्वयं भी धारण कर लें, विशाल और परिवार की तरह करोड़ों जीवों का समुदाय एकत्र हो जाने पर भी सभी आनन्द और उल्लास का जीवन जीते रह सकते हैं।
अनेक ग्रह नक्षत्रों का परिवार, जिन्हें अनुशासित, मर्यादित, पोषित और संरक्षित रखने का काम निरन्तर तप कर सूर्य भगवान् करते हैं, सौर परिवार या सौर मण्डल कहलाता है। सूर्य उन सब का मुखिया है देखने में वह आग का गोला लगते हैं, पर उनमें सोडियम, लोहा, मैग्नेशियम, कैल्शियम आदि सब कुछ है। 1859 में डा मेघनाद साहा ने अपनी खोजों से यह सिद्ध किया था कि सूर्य के प्लाज्मा में दृश्य जगत का हर तत्व विद्यमान है। लोगों को सूक्ष्म अस्तित्व में भी आत्मिक आनन्द की सभी सामग्री बताई जाती है तो लोग विश्वास नहीं करते। उनकी स्थूल दृष्टि में दृश्य जगत और स्थूल पदार्थ ही प्रसन्नता के मूल हैं, पर हमारी अनुभूतियाँ जितनी सूक्ष्म और विशाल होती जाती हैं रस और आनन्द के तत्व भी उसी अनुपात में असीम तृप्ति वाले बनते चले जाते हैं।
सूर्य ने कभी शक्तियों पर एकाधिकार परिग्रह नहीं किया। वह अपनी शक्तियाँ निरन्तर बाँटते रहते हैं। इससे वे रिक्त नहीं हुये वरन् परमात्मा का मातृ हृदय यथावत बनाये रखें हैं। जब मनुष्य समाज ने संग्रह का पाप लाद कर कितनी अव्यवस्थाएँ बढ़ा दी हैं, यह हर कोई भली प्रकार अनुभव करता है।
सूर्य की तरह हर तारे का अपना भी एक परिवार होता है उसके अपने चन्द्रमा होते हैं, उसका अपना वातावरण होता है उसी के अनुरूप वह शक्ति का आवश्यक अंश ग्रहण करता रहता है। मनुष्य समाज विभिन्न इकाइयों वर्गों में बँटा रह कर भी यदि नियम व्यवस्था का पालन करते रहें तो वह इस विशाल परिवार की तरह ही जीवन्त और गतिशील, समृद्ध और व्यवस्थित बने रह सकते हैं। उन्हें अपने को एकाकी और अधिकतम अधिकार, स्वेच्छाचारिता की प्रवंचना नहीं बरतनी चाहिए अन्यथा इकारस जैसे उन क्षुद्र ग्रहों की तरह जो मान मर्यादायें तोड़ कर स्वच्छन्द निकल पड़ते हैं न केवल दूसरों को डराते भयभीत करते रहते हैं अपितु स्वयं भी लड़-लड़कर टूटते (उल्कापात इन्हीं क्षुद्र ग्रहों का होता है) रहते हैं। आकाश में जाने वाले उपग्रहों को इनसे बचाने की खास सावधानी करनी पड़ती है। जेलें, पुलिस और दण्ड विधान ऐसे ही स्वेच्छाचारियों के लिये है, जिन्हें सामाजिक और पारिवारिक मान-मर्यादायें प्रिय नहीं होती।
परम ब्रह्माण्ड से लेकर मन्दाकिनी परिवारों के विराट् जगत् और तारा-मण्डल से लेकर प्रकृति के सूक्ष्म परमाणु तक में सर्वत्र नियम, क्रम व्यवस्था और अनुशासन है। यह तत्व शान्ति और प्रगति के मूल आधार हैं उनकी उपेक्षा कहीं भी उचित और सह्य नहीं। ब्रह्माण्ड का यह विधान समान रूप से मनुष्य जीवन भर भी लागू है।
तारों को एक ताप-नाभिकीय भट्ठियों की संज्ञा दी जा सकती है। इस उच्च ताप में ही तत्वों का निर्माण होता रहता है किन्तु कहीं भी विखण्डन की स्थिति नहीं आती अन्यथा महाविस्फोट हो जाये और किसी भी एक तारे की मर्यादा भंग से सारी सृष्टि का सर्वनाश हो सकता है। सामाजिक व्यवस्था की दृष्टि से जिन्हें बड़े उत्तरदायित्व-जिम्मेदारियाँ दी जाती हैं उन्हें असीमित अधिकार देने की परम्परा प्रकृति में भी है। मनुष्य समाज में भी प्रकृति अपना सन्तुलन निरन्तर बनाये हुए है इसी से संसार में सुव्यवस्था कायम है, जब कि मनुष्य इन अधिकारों का हनन करके अपने लिये देश, समाज, संस्कृति सभी के लिए संकट पैदा करता रहता है। शेक्सपियर ने सम्भवतः इसी तथ्य की ओर संकेत करते हुए जूलियस सीजर में लिखा है- दोष अपने तारों में नहीं स्वयं मनुष्य में है”
ब्रह्माण्ड की गति और विस्तार का क्रम सर्वत्र एक सा है। हर ग्रह नक्षत्र अपनी धुरी पर घूमता है। पृथ्वी 24 घण्टे में अपनी एक परिक्रमा पूरी करती हैं जब कि चन्द्रमा 336 घण्टे में। अर्थात् वहाँ के दिन और रात में हमारी पृथ्वी के दिन व रात से 14 गुने बड़े दिन और 14 गुनी बड़ी रात। बुध की परिस्थितियाँ भिन्न हैं अर्थात् उसका एक भाग निरन्तर सूर्य की ही और बना रहता है दूसरी ओर अन्धकार में पर अपने आप में गतिशील वह भी है। हम समझते हैं सूर्य स्थिर है, पर ऐसा नहीं वह भी 1 सेकेण्ड में 13 मील की गति से घूमता है। मन्दाकिनियाँ भी अपने सौर परिवारों को लेकर किसी विराट् परिक्रमा में संलग्न हैं। अपनी “स्पाइरल” आकाश गंगा की स्वयं की गति 200 मील प्रति सेकेण्ड है। इसी तरह ब्रह्माण्ड 150 मील प्रति सेकेण्ड की गति से विकसित हो रहा है। यह गति हर जगह हैं। इसी तरह प्रत्येक व्यक्ति को अपनी एक आचार संहिता ऐसी निर्धारित करनी चाहिए जिससे समाज में गतिशीलता तो रहे पर किसी की सीमा किसी के अधिकारों का अतिक्रमण न हो। हर ग्रह अपने मुखिया की परिक्रमा में लगा है। हर चन्द्रमा अपने ग्रह का, ग्रह सौर परिवार का, सौर मण्डल मन्दाकिनियों की परिक्रमा करते और मनुष्य को अपने देश, जाति, समाज के प्रति कर्तव्यनिष्ठ बने रहने की प्रेरणा देते रहते हैं।
सृष्टि निरन्तर विकसित हो रही है, ब्रह्माण्ड फैल रहा है, कहने को तो हम सबके साथ भी ऐसा ही हो रहा, वह सकते हैं, पर यह फैलाव भौतिक दिशा में ही हो रहा है। जिस तरह प्रकृति विरल होते हुये निरन्तर विकसित हो रही है अपनी भावनाओं से, तात्त्विक दृष्टि से अपनी आत्मा का भी विस्तार आवश्यक है। मनुष्य जीवन की सम्भावनाएँ अनन्त और अपार हैं। ठीक ब्रह्माण्ड की तरह यदि प्रकृति के प्रत्येक प्रस्ताव को हम अपने जीवन में धारण कर सकें तो हमारा जीवन ब्रह्माण्ड जैसा ही विराट् हो सकता है। अनन्त अन्तरिक्ष एक दर्पण है हमें उसमें अपना प्रतिबिम्ब निरन्तर देखते रहना चाहिए, ताकि शरीर पर लगे दाग धब्बे छुड़ायें जाते रह सकें। अपना शरीर मन अपनी भावनायें पवित्र की जाती रहें, जिससे हम भी ब्रह्माण्ड जैसा ही महान् सुन्दर और सुखी बन सकें।
हमारे चिन्तन में गहराई हो, साथ ही श्रद्धा युक्त नम्रता भी। अन्तरात्मा में दिव्य-प्रकाश की ज्योति जलती रहे। उसमें प्रखरता और पवित्रता भरी रहे तो पर्याप्त है। पूजा के दीपक इसी प्रकार टिमटिमाते हैं। आवश्यक नहीं कि उनका प्रकाश बहुत दूर तक फैले। छोटे से क्षेत्र में पुनीत आलोक जीवित रखा जा सके तो वह पर्याप्त है।
अल्बर्ट श्वाइत्जर कहते थे- आदर्शों को चरितार्थ करने के लिए मुहूर्त की प्रतीक्षा आवश्यक नहीं। उसके लिए सदा सुअवसर है। वह अभी भी है और कभी भी। सबसे अच्छा समय है जब परिस्थितियाँ सर्वथा प्रतिकूल जा रही हों।
हम आकाश में बिखरी सुविस्तृत महानता को देखें। साथ ही समुद्र जैसी गहराइयों को भी। मनुष्य इन सबसे बड़ा है उसका वजन पर्वत से भारी है। पर्वत बेजान है और आदमी जानदार। संसार को बनाया तो भगवान ने है, पर उसे सुधारा और सँभाला आदमी ने है। इस पृथ्वी की शोभा, सज्जा और उपयोगिता आज जिस रूप में दिख पड़ती है वैसी पहले नहीं थी। यह आदमी की सूझ बूझ और मेहनत है, जिसने इतने प्रभावशाली परिवर्तन प्रस्तुत किये और प्रगति के चरण उठाये हैं। इतने पर भी ध्यान रखने योग्य बात यह भी है कि वही जेलखानों और पागलखानों में भी बन्द है। कुकृत्यों से वही सृष्टा की इस कलाकृति, मानवीय काया को कलंकित करने में भी पीछे नहीं है। अपने आपको तो पूरी तरह नष्ट कर सकता है, साथ ही दूसरों को भी क्षति पहुँचा सकता है।
जीवन का सम्मान ही आचार शास्त्र है। अनीति ही जीवन को नष्ट करती है। मूर्खता और लापरवाही से तो उसका अपव्यय भर होता है। बुरी तो बर्बादी भी है, पर विनाश तो पूरी विपत्ति है। बर्बादी के बाद तो सुधरने के लिए कुछ बच भी जाता है पर विनाश के साथ तो आशा भी समाप्त होती है। अनीति अपनाने से बढ़ कर जीवन का तिरस्कार और कुछ हो नहीं सकता। पाप अनेकों हैं उनमें प्रायः आर्थिक अनाचार और शरीर को क्षति पहुँचाने जैसी घटनाएँ ही प्रधान होती हैं। इनमें सबसे बड़ा पातक जीवन का तिरस्कार है। अनीति अपना कर हम उसे क्षतिग्रस्त, कुण्ठित, हेय और अप्रमाणिक बनाते हैं। दूसरों को हानि पहुँचाना जितनी बुरी बात है- दूसरों के ऊपर पतन और पराभव थोपना जितना निन्दनीय है उससे कम पातक यह भी नहीं है कि हम अपने जीवन का गला अपने हाथों घोटे और उसे कुत्सित, कुण्ठित, वांछित, अपंगों एवं तिरस्कृत स्तर का ऐसा बना दें जा मरण से भी अधिक कष्टदायक हो।
अन्तरात्मा में यदि किसी दिव्यवाणी को सुनने की शक्ति हो तो अपने भीतर बैठा हुआ कोई ‘नैतिक’ यह कहते हुए पाया जाएगा कि जो सुख साधन समाज के अनुग्रह से मिले हैं उन्हें लूट का माल न समझा जाय। ऋण माना जाय और उसका प्रतिदान चुकाया जाय। अपने पास जो स्वस्थता, शिक्षा, प्रतिभा, योग्यता, सुविधा, सम्पदा, प्रतिष्ठा उपलब्ध है वह अनेकों ज्ञात एवं अज्ञात, जीवित एवं दिवंगत-मनुष्यों के सहयोग से ही सम्भव हुई है। उसे ऐसे हजम नहीं कर जाना चाहिए और न परिवार वालों के लिए यह सब कुछ संग्रह करके रखना चाहिए। इसमें अन्यों को भी हिस्सेदार बनाया जाय- विशेषतया जो अपने पैरों दूर तक चल नहीं सकते, जिन्हें किसी की सहायता की अपेक्षा है, यदि इस आत्मा की पुकार को न सुना जाय तो उसका प्रतिफल यह होगा कि ऋणग्रस्तों की तरह अपना अन्तःकरण भारी होता चला जाएगा और उस उल्लास की अनुभूति न हो सकेगी जो जीवन देवता के अनुग्रह से हर घड़ी होती रहनी चाहिए। मनुष्य की मूलसत्ता सहयोग परायण और सृजनात्मक है, इन्हीं दो मूल प्रवृत्तियों को प्रगति का आधारभूत कारण कह सकते हैं। अन्यथा शारीरिक दृष्टि से अन्य कितने ही प्राणियों की तुलना में उसका पिछड़ापन स्पष्ट है। मानसिक विकास सहकारिता का परिणाम है, अन्यथा चतुरता और कुशलता की दृष्टि से सहस्रों जातियों के प्राणी उससे आगे हैं और कितनी ही क्षमताओं में बाजी मारते हैं
सहकारिता की प्रवृत्ति ने मिल-जुलकर कबीले बनाये, परिवार बसाए, समाज की संरचना की, उत्पादन बढ़ाया, अर्थ तन्त्र खड़ा किया और शासन की स्थापना की। सुरक्षा, कृषि, उद्योग, शिक्षा, संस्कार आदि कितनी ही गतिविधियों का सृजन संचालन हुआ। ज्ञान-विज्ञान के अनेकों स्त्रोत उभरे और उपार्जन के अनेकों स्त्रोत उभरे, विनोद कला, धर्म, अध्यात्म, भाषा, साहित्य आदि को सहकारिता का ही अनुदान कहा जा सकता है।
सृजन की वैसी सुविकसित प्रवृत्ति, और किसी प्राणी में नहीं पाई जाती जैसी कि मनुष्य में। अन्य प्राणी अपने निवास स्थल का निमार्ण करने भर की सीमा में इस प्रवृत्ति का यत्किंचित् परिचय दे पाते हैं, किन्तु मनुष्य ने शरीर सुविधा से आगे आगे बढ़ कर अनेकों प्रकार के सृजन प्रस्तुत किये हैं। भाषा, साहित्य, संगीत कला, जैसे कार्य ऐसे नहीं हैं जिनके बिना उसका दैनिक निर्वाह सम्पन्न हो सके। विज्ञान के छोटे-बड़े आविष्कार, शोध प्रयोजनों में संलग्न रह कर उसने प्रकृति की सूक्ष्म शक्तियों को खोज निकाला है और थल से आगे बढ़ कर जल में-आकाश में अपनी गति बनाई है। आदिम काल की ऊबड़ खाबड़ धरती आज सुरम्य उद्यान की तरह सजी पड़ी है। प्रकृति के सौंदर्य को निखारने और उसे कामधेनु की तरह अनेकानेक अनुदान देने की वर्तमान स्थिति तक पहुँचाने में मानवी श्रम एवं कौशल का ही नियोजन हुआ है। उद्योग, व्यवसाय, समाज, शासन, शिक्षा, कला, विज्ञान, संचार, वाहन जैसे अनेकों ऐसे क्षेत्र प्रगति के उच्च शिखर पर जा पहुँचे हैं जिनका आदिम काल में अता-पता भी नहीं था। तब इनकी कल्पना तक सम्भव नहीं थी। यह सब मानवी सृजन शक्ति का चमत्कार ही कहा जा सकता है।
सहयोग और सृजन के आधार पर साधनों की असीम अभिवृद्धि हुई। वे इतने समर्थ हैं कि जहाँ भी उनका उपयोग किया जाएगा वहीं चमत्कार उत्पन्न होगा, इस तथ्य को समझाते हुए हमें इस निर्णय पर पहुँचना चाहिए। इन्हें मात्र साधन संवर्द्धन तक सीमित न रखकर उस क्षेत्र के लिए भी प्रयुक्त किया जाय तो सुख-शान्ति का वास्तविक आधार है। मनुष्य साधन नहीं, साधन तो उसकी सुविधा के लिए प्रयुक्त होते हैं। सुविधाओं का जो उपयोग करता है वह चेतन ही मनुष्य की मूल सत्ता है। इसे सुविकसित बनाये रहने के लिए कुछ ऐसी आधारभूत आवश्यकताएँ हैं जिनकी पूर्ति होनी ही चाहिए, अन्यथा साधनों का सदुपयोग होने के स्थान पर दुरुपयोग होने लगेगा और सम्पत्ति संवर्द्धन के लिए किया गया श्रम उलटा शोक-सन्ताप उत्पन्न करने लगेगा। चेतना का स्तर परिष्कृत करने का तात्पर्य है मनुष्य की आस्थाओं, आकांक्षाओं एवं विचारणाओं को उत्कृष्टता के आदर्शों के साथ जोड़ देना। इस विकास के सहारे ही उसकी दिशाधारा बनती है।
‘द् कन्सट्रक्शन आफ ह्यूमिनिटी’ के लेखक विचारक पितिरिम सोरोकिन ने लिखा है- जन चेतना का प्रवाह जिस दिशा में बह रह है उसे उलटना अपने युग की सबसे बड़ी आवश्यकता है। मनुष्य की स्वार्थान्धता उसे उन नैतिक मूल्यों से विरत कर रही है जिनके कारण व्यक्ति का सुसंस्कृत और समाज का समुन्नत बने रह सकना संभव हुआ है। नैतिक मूल्यों को गवाँ देने के उपरान्त प्रस्तुत साधनों का सदुपयोग सम्भव न हो सकेगा। वैभव विपत्ति उत्पन्न करेगा। बढ़ी हुई बुद्धि भ्रम और अनाचार फैलाने के काम आयेगी। विलास और अहंकार द्वारा विनिर्मित वातावरण ऐसा होगा जिसमें पशुता भर जीवित रह सकती है, मनुष्यता का तो दम ही घुट जायेगा।
दार्शनिक वर्टेरड रसेल इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मनुष्य के चिन्तन और रुझान में आमूल-चूल परिवर्तन होना चाहिए। प्रचलित मान्यताओं में बहुत थोड़ी ऐसी बच गई हैं जिनमें बदली हुई परिस्थितियों को देखते हुए प्रगति में सहायक और शान्ति की संरक्षक कहा जा सके। यदि इस पुनर्निर्माण की ओर ध्यान न दिया गया तो वैयक्तिक विद्वेष और सामाजिक कलह बढ़ते ही चले जाएँगे। इन अवांछनीयताओं की अभिवृद्धि से विनाश ही प्रस्तुत होगा। बढ़े हुए सुख साधनों से भी पतन की दुःखदायी प्रतिक्रिया को रोका न जा सकेगा।
पुनर्निर्माण का अर्थ है- चिन्तन और रुझान का परिवर्तन। अनौचित्य के परित्याग और औचित्य को स्वीकार करने का नये सिरे से साहस भरा प्रयास। अपराध और अनाचार का वातावरण बनाने वाली बुद्धि के लिए क्या यह सम्भव नहीं कि वह अपनी गतिविधियाँ सुधारे जो मनोयोग तथा श्रम प्रयत्न को उन कामों में लगाये जिनमें वैचारिक श्रेष्ठता और व्यावहारिक शालीनता का अभ्यास प्रयोग के आने लगे। जिस प्रकार आज एक दूसरे से निष्कृष्टता का प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं उसी तरह बदली हुई परिस्थितियों में एक दूसरों की सद्भावना का भी अनुकरण करने के लिए उत्साह ग्रहण कर सकते हैं। भुखमरी, बेकारी, बीमारी, अशिक्षा एवं पिछड़ेपन से ग्रसित असंख्य मानवों में सुयोग्य एवं सम्पन्न व्यक्तियों की सहायता पग पग पर चाहिए। क्या सृजन और सहयोग का द्वार उनके लिए नहीं खुल सकता।
आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य को इस बात का बोध कराया जाय कि उसकी क्षमताएँ निर्वाह के साधन जुटाने तक सीमित नहीं हैं। उसमें सृजनात्मक सामर्थ्य के अकूट भण्डार भरे पड़े हैं। उन्हें प्रसुप्त से जागृत स्थिति में लाना है। बिखराव को समेटना है और अस्तव्यस्तता को क्रमबद्ध बनाना है। सुख की आकांक्षा स्वाभाविक है, पर उसकी उपलब्धि का स्तर उठना चाहिए। हममें इन्द्रिय तृप्ति, संग्रह की कृपणता और दूसरों को छोटा सिद्ध करके बड़प्पन पाने की अहंता, यही हैं वे अभिलाषाएँ जिन्हें पूरा करने में सुखानुभूति मिलने की बात सोची जाती है। सोचने का स्तर ऊँचा उठाया जा सके तो दृष्टिकोण में आदर्शवादी उत्कृष्टता समन्वित करने का गौरव अनुभव किया जा सकता है। यह सन्तोषजनक भी होगा और दूसरों का भाव भरा सहयोग प्राप्त करने में समर्थ भी। दृष्टिकोण में इस प्रकार का परिवर्तन हो सके तो सुख के लिए प्रतीक्षा न करनी पड़ेगी, वरन् प्रस्तुत स्थिति में ही तत्काल आनन्दानुभूति की मात्रा बढ़ती दिखाई देगी।
सबसे बड़ी बात है सृजनात्मक चिन्तन। जीवन को और उसके संपर्क क्षेत्र को अधिक समुन्नत बनाने वाले प्रयासों एवं साधनों का अभिवर्धन। मानवी गतिविधियों का प्रवाह यदि अपव्यय से हटाकर सृजन में नियोजित किया सके तो समय की कुरूपता को भविष्य के स्वर्गीय सौंदर्य में बदल देना सहज सम्भव हो सकता है।
मरणोत्तर जीवन का अस्तित्व सिद्ध करने के लिए प्रेतात्माओं के क्रिया कलापों और पूर्व जन्मों की स्मृतियों को साक्षी रूप में प्रस्तुत किया जाता है। अब तक उपलब्ध साक्षियाँ इतनी अधिक और इतनी प्रामाणिक हैं कि उनमें अविश्वास ठहराने का कोई कारण नहीं रह गया है। अब इस निष्कर्ष पर पहुँचना शेष है कि वे स्मृतियाँ आखिर उद्भूत कहाँ से होती हैं। उनका आधार क्या है? इस सन्दर्भ में कितने ही निष्कर्षों पर विचार किया जा रहा है। इनमें से एक यह है कि मनुष्य का अचेतन मन न केवल वर्तमान जन्म की स्मृतियों को अंकित करता है वरन् पूर्व जन्मों की स्मृतियाँ भी अति सूक्ष्म संस्कारों के रूप में अपने भीतर समेटे रहता है। उन्हें अनायास जगने का भी कोई कारण हो सकता है। दूसरा कारण यह सोचा गया है कि एक व्यक्ति का अचेतन मन दूसरे के अचेतन के साथ आसानी से संपर्क मिला सकता है और उसकी गहराई में उतर कर बहुत कुछ रहस्य जान सकता है जब कि सचेतन भाग की सामान्य जानकारियों का पता लगाना कठिन होता है। जिस प्रकार सागर जल में घुली हुई आक्सीजन में से सभी जलचर अपने लिए प्राणवायु ग्रहण करते हैं उसी प्रकार इस निखिल विश्व में एक जीवन तत्व संव्याप्त है। उसी में से हर प्राणी अपने लिए आवश्यक अनुभूतियाँ एवं सम्वेदनाएँ ग्रहण करता है। इस प्रकार हर व्यक्ति की ज्ञानपरिधि विश्व ज्ञान की ही एक इकाई होती है। इसकी मात्रा प्रशिक्षण के माध्यम से तो बढ़ती ही है दूसरे रहस्यमय उपायों एवं आधारों से भी उसका विकास अभिवर्धन हो सकता है और मानवी ज्ञान उस स्तर तक पहुँच जाता है जिसे अतीन्द्रिय क्षमता नाम दिया जाता है।
परामनोविज्ञान की एक शाखा के अंतर्गत ऐसे प्रमाण एकत्रित किये गये हैं जिनसे मनुष्यों का पूर्व जन्म होने के प्रमाण मिलते हैं। ऐसे अन्वेषणों में प्रो राइन की खोजें बहुत विस्तृत और प्रामाणिक मानी गई हैं उनके आधार पर अन्यत्र भी इस दिशा में बहुत सी जाँच पड़ताल हुई है। इस खोजबीन के निष्कर्ष इस मान्यता का पलड़ा भारी करते हैं कि आत्मा का अस्तित्व मरने के बाद भी बना रहता है और वह पुनर्जन्म धारण करती है। हिन्दू धर्म में आत्मा की अमरता एवं पुनर्जन्म की सुनिश्चितता को आरम्भ से ही मान्यता प्राप्त है किन्तु संसार में दो प्रमुख धर्मों - ईसाई और इस्लामी धर्मों के बारे में ऐसी बात नहीं है। उनमें मरणोत्तर जीवन का अस्तित्व तो माना जाता है, पर कहा जाता है कि वह प्रसुप्त स्थिति में बना रहता है। महाप्रलय के होने के उपरान्त फिर कहीं नया जन्म मिलता है। इतने विलम्ब से पुनर्जन्म होने की बात न होने जैसी ही बन जाती है। ऐसी दशा में इन धर्मों के अनुयायियों के बारे में पुनर्जन्म न मानने जैसी ही मान्यताएँ हैं। ऐसी दशा में उस प्रकार की घटनाओं एवं प्रमाणों को न तो खोजा ही जाता है और न वैसा कोई प्रमाण मिलने से उन पर ध्यान ही दिया जाता है। पर अब धार्मिक कट्टरता घट जाने और तथ्यों पर ध्यान देने की सोच चल पड़ी है। विज्ञान और बुद्धिवाद के समन्वय ने यह नई दृष्टि दी है अस्तु पाश्चात्य देशों में तथ्यों पर ध्यान देने की प्रवृत्ति ने पुनर्जन्म के सम्बन्ध में भी जाँच-पड़ताल करने पर जो तथ्य सामने आयें उन पर विचार करने के सम्बन्ध में उत्साह उत्पन्न किया है।
विगत शताब्दी में यूरोप में सबसे पहली किताब फ्रेडरिक स्पेन्सर ओलवर द्वारा लिखित एन अर्थ डवेलर्स रिटर्न थी, जिसमें उसने अपन पिछले 32 जन्मों का हाल लिखा था। उसका कथन था वह पुस्तक उसने नहीं लिखी किन्तु किसी दिव्यात्मा ने उसके शरीर में प्रवेश करके लिखाई है। इस पुस्तक के पीछे तर्क और प्रमाण न होने से उसे विश्वास तो नहीं माना गया, पर जब उसमें की गई भविष्य वाणियों में से कितनी ही सही सिद्ध हुई तो वह बहुचर्चित अवश्य बन गई।
इसके बाद मनोविज्ञान और चिकित्सा शास्त्र में समान रूप से ख्याति प्राप्त डा जीना सरमी द्वारा लिखित “मैनी मेन्शन” का नम्बर आता है जिसमें ऐसे कितने ही आधार प्रस्तुत किये गये हैं जिनसे शरीर न रहने पर भी आत्मा का अस्तित्व बना रहने तथा फिर से जन्म होने की बात पर विश्वास जमता है।
उन्नीसवीं सदी में सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्रमाण एक जीवित व्यक्ति का सामने आया, जिसने पुनर्जन्म की मान्यता को वैज्ञानिकों और मनीषियों की गहरी खोज का विषय बनाने के लिए विवश किया। उस व्यक्ति का नाम था एडगर कैसी। उसमें ऐसी चेतना उभरी जो कितने ही व्यक्तियों के पूर्व जन्मों के हाल बताती थी। ऐसे तो इस प्रकार की बातें ढोंगी और अर्ध विक्षिप्त लोग भी करते रहते हैं, पर कैसी के कथनों में यह विशेषता होती थी कि वह जो कुछ बताता था तलाश करने पर उसके सारे प्रमाण यथावत् मिल जाते थे। वर्णन इतने पुराने, इतनी दूर के और इतने महत्त्वहीन होते थे कि उन्हें बिना किसी पूर्वाग्रह के कहीं बताने जैसी न तो आशंका की जा सकती थी और न वैसी सम्भावना ही थी। टेढ़ी मेढ़ी परीक्षणों पर जब उसके कथन को बुद्धिजीवियों द्वारा जाँचा और सही पाया गया तो उसके कथन को महत्व दिया गया और पुनर्जन्म के सम्बन्ध में नये सिरे से नये उत्साहपूर्वक शोध प्रयास आरम्भ हुआ।
अमेरिका के कैन्टकी प्रान्त में होपकिन्स विले नामक व्यक्ति देहात में हुआ। वह अपने अन्य परिवारियों की भाँति नाम मात्र को ही शिक्षित था। उसे सम्मोहन विद्या से वास्ता पड़ा। वह उस तन्द्रा से ऐसी बातें करने लगा जिन्हें अतीन्द्रिय अनुभूतियों की संज्ञा मिलने लगी। आरम्भिक दिनों में वह रोगियों के कष्ट, निदान एवं उपचार के सम्बन्ध में तन्द्रित स्थिति में परामर्श देता था जो लाभदायक सिद्ध होते थे। फिर उसमें पिछले जन्मों का हाल बताने की नई क्षमता जगी। उसने सैकड़ों के पूर्व जन्मों के विवरण बताये और वे सभी ऐसे थे जो तलाश करने पर सही प्रमाणित हुए। इस प्रमाणों की साक्षी कहाँ से प्राप्त की जाय इस सन्दर्भ में उसने अनेकों सरकारी और गैर सरकारी कागजों में दर्ज ऐसे पुराने विवरण बताये जिनका साधारण रीति से पता लगाना अति कठिन था। साक्षी रूप में वे ढूँढ़े गये तो जैसा कि उल्लेख बताया गया था, ठीक उसी रूप में उसी तरह वह सब मिल गया।
इसी प्रकार कैसी ने ऐसे विवरण भी बताये जिनमें पुराने जन्मों के दुष्कर्मों का फल इस जन्म में मिलने के सिद्धान्त की प्रामाणिकता सिद्ध होती है। इन कष्ट पीड़ितों में अधिकाँश विकलांग एवं रोगी थे। उन्हें यह विपत्ति किस कारण उठानी पड़ रही है, इसके सन्दर्भ में विवरण बताये गये वे भी उस कथन की पुष्टि के लिए सबल साक्षी थे। इनकी प्रामाणिकता भी बताये घटनाक्रम के साथ भली प्रकार खोजी गई और जो बताया गया था वह सही मिला। इस प्रकार कैसी रोग चिकित्सा-पूर्व जन्म और कर्मफल के तीन तथ्यों पर ऐसे रहस्यमय प्रकाश डालता रहा जो इससे पूर्व इतनी अच्छी तरह कभी भी सामने नहीं आये थे।
पुनर्जन्म की घटनाओं से जहाँ आत्मा की अमरता का सिद्धान्त पुष्ट होता है वहाँ प्रेतात्माओं के अस्तित्व को सिद्ध करने वाले अगणित प्रत्यक्ष प्रमाण भी इसी तथ्य की साक्षी देते हैं। मरणोत्तर जीवन में रहने वाले आत्माओं का एक ऐसा वर्ग भी है, जो जीवित लोगों में पाये जाने वाले ऋषियों एवं महामानवों की तरह ही उदार है, लोगों की विविध प्रकार सेवा सहायता करते हैं। श्रेष्ठ कार्यों में परोक्ष सहायताएँ प्रस्तुत करने में उन्हें सहज रुचि होती है। सुकरात के साथ एक ऐसी ही अदृश्य आत्मा देवी थी। विक्रमादित्य का भी ऐसी ही कुछ आत्माओं के सहयोग का उल्लेख मिलता है। कापालिक, अघोरी, प्रेत-पिशाचों का और देव साधन देव पितरों का सहयोग प्राप्त करके अपने अपने बुरे भले उद्देश्यों में सफल होते देखे जाते हैं।
थियोसोफी के जन्मदाताओं में से एक सर आलिवर लाज, ने लिखा है- जीवित और मृत का भेद स्थूल जगत तक ही सीमित है। सूक्ष्म जगत में सभी जीवित हैं। मरने के बाद आत्मा का अस्तित्व समाप्त नहीं हो जाता। जिस प्रकार हर जीवित लोग परस्पर विचार विनिमय करते हैं उसी प्रकार जीवित और मृतकों के बीच में आदान प्रदान हो सकना सम्भव है। हमें विज्ञान के इस नये क्षेत्र में प्रवेश करना चाहिये और एक ऐसी दुनिया के साथ संपर्क बनाना चाहिये जो हमसे अधिक साधन सम्पन्न है। इस नये संपर्क का द्वार खोलकर हम मानवी परिवार को कहीं अधिक सुविस्तृत सुखी और प्रगतिशील बना सकेंगे।
सर आर्थर कानन डायल भी इसी विचार के थे। वे कहते थे अपनी दुनिया की ही तरह एक और सचेतन दुनिया है जिसके निवासी न केवल हमसे अधिक बुद्धिमान है वरन् शुभ-चिन्तक भी है। इन दोनों संसारों के बीच यदि आदान-प्रदान का मार्ग खुल सके तो इससे स्नेह सम्वेदनाओं का सुखद सहयोग का एक नया अध्याय प्रारम्भ होगा। मृतकों और जीवितों के बीच संपर्क स्थापना का प्रयास यदि अधिक सच्चे मन से किया जा सके तो अब तक की प्राप्त वैज्ञानिक उपलब्धियों से कम नहीं वरन् बड़ी सफलता ही मानी जायेगी।
आत्मा शरीर के साथ उत्पन्न होती है और उसी के साथ मर जाती है। यह मान्यता पिछले दिनों के पदार्थ विज्ञानियों की तरह है। वे प्राणी को एक चलने फिरने और सोचने बोलने वाला समर्थ पौधा मानते रहे हैं। पौधों के जन्म और मरण के साथ ही उसके अस्तित्व का उदय और अन्त ज्ञानी और विज्ञानी एक समान मानते हैं।
प्रश्न प्राणियों के विशेषतया मनुष्य के सम्बन्ध में उपस्थित होता है क्योंकि उसके समाधान से हमारा सीधा सम्बन्ध है। क्योंकि तब सोचना पड़ेगा कि यदि जीवन शरीर के बाद भी बना रहता है तो शरीर त्याग के बाद उसे किस स्थिति का सामना करना पड़ता है। स्वर्ग, नरक, परलोक के प्रसंग इसी सन्दर्भ में सामने आते हैं। यदि पुनर्जन्म होता है तो पिछले जन्म की स्थिति का इस जन्म पर और इस जन्म का अगले जन्म पर क्या प्रभाव पड़ता है? इतना ही नहीं इस सम्बन्ध में जो निष्कर्ष निकलता है उससे वर्तमान जीवन का उपयोग करने के सम्बन्ध में नीति निर्धारित करने की बात भी सामने आ खड़ी होती है।
सामान्यतया हम भूतकाल से बहुत कुछ सीखते रहते हैं और भावना उस सब को स्मरण रखता है जो हमने खोया या पाया है। वर्तमान में जो कुछ हम है वह भूतकाल में रोपे गये वृक्ष के ही फल-फूल हैं। भविष्य में कुछ बनना है वह आज के क्रिया-कलाप का प्रतिफल ही होगा। इन दिनों जो कुछ करते हैं उसका लाभ तत्काल तो मिलता नहीं-कुछ समय उपरान्त ही उसके परिणाम सामने आते हैं। इस प्रकार हमारी समस्त गतिविधियाँ प्रायः भविष्य निर्माण में ही नियोजित रहती है। फिर यदि जीवन मरने के बाद भी बना रहता है तो स्वभावतः उसकी भी चिन्ता करनी पड़ेंगी और भविष्य के लिए सुखद अवसर प्राप्त करने की तैयारी को भी महत्व देना होगा। यदि जीवन शरीर के साथ ही समाप्त होता है तो मरणोत्तर जीवन के बोर में चिन्ता या तैयारी नहीं करनी पड़ेगी, तब वर्तमान शरीर के वर्तमान और भविष्य को ही सब कुछ मानकर तद्नुरूप जीवन यापन की नीति निर्धारित करनी होगी। दोनों परिस्थितियों में दृष्टिकोण अपनाने और कार्यक्रम निर्धारित करने में भारी अन्तर होगा। आस्तिकों को मरणोत्तर भविष्य निर्माण करने के लिए स्वर्ग मुक्ति-शान्ति सद्गति की बात सोचनी पड़ती है और इस जीवन में तप, संयम, दान, परमार्थ जैसे धर्मानुष्ठानों को महत्व देना पड़ता है भले ही प्रत्यक्षतः उसमें आर्थिक हानि एवं शारीरिक असुविधाएँ ही सहन क्यों न करनी पड़ती हों। इसके विपरीत नास्तिक तात्कालिक आमोद-प्रमोद एवं सुख-साधनों को ही महत्व देते हैं। जब देह भस्मीभूत ही ठहरा और पुनरागमन की सम्भावना नहीं रही हतो ‘ऋण कृत्वा घृतं पिबेत्' की नीति अपनाने में कोई अनौचित्य नहीं कहा जा सकता। जीवन का आदि अन्त शरीर तक ही सीमित है या उसके पश्चात् भी उसका अस्तित्व है यह मात्र दार्शनिक पहल नहीं है। उसका आज की गतिविधियों से सीधा सम्बन्ध है। एक निश्चय के उपरान्त एक दिशा में चलना पड़ता है और दूसरा निश्चय होने पर दूसरी दिशा में चलने की आवश्यकता अनुभव की जायगी।
क्या मृत्यु की अनुभूति कभी हो सकती है? इसका उत्तर नकारात्मक ही हो सकता है। मैं मरने वाला हूँ, मर रहा हूँ जैसे शब्दों का उच्चारण करते हुए भी कहने वाला अपने को जीवित ही अनुभव करता है। सपने में अपनी मृत्यु का दृश्य देखा जा सकता है। शरीर अचेतन पड़ा हुआ और स्वजन सम्बन्धी रोते कलपते दिखाई पड़ते हैं। इतने पर भी अपनी सत्ता बनी ही दिखती है। मरण का अनुभव अपने को ही होता है। इससे स्पष्ट है कि अपना मरण स्वीकार करना आत्मा का स्वभाव ही नहीं है।
जिसका जो स्वभाव है। मच्छर गन्दगी पसन्द करते हैं और खटमल रक्त पीते हैं । इसमें उन्हें घृणा नहीं प्रसन्नता होती है। आत्मा यदि मरण धर्मी होता तो उसे मरने से तनिक भी डर न लगता। चूँकि वह मरना नहीं चाहता, मृत्यु संकट आने पर उससे बचने का हर सम्भव उपाय करता है। मरने से डरना यह बताता है कि मृत्यु अस्वाभाविक है। जीवात्मा उस स्थिति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं। यों शरीर मरता है, आत्मा की मृत्यु नहीं होती तो भी उसे न केवल अपनी वरन् अपने शरीर और स्वजनों तक की मृत्यु अनुपयुक्त अप्रिय लगती है। जीवन ही आत्मा का धर्म है। अपना मरण तो होता नहीं है। शरीर पर पदार्थों के लिए मरण स्वाभाविक होते हुए भी चेतना पर उसकी प्रतिकूल प्रतिक्रिया होती है। यह सब लक्षण इस बात के हैं कि मानवी सत्ता मरणशील नहीं न उसे मरण से कोई सहानुभूति है।
स्वास्थ्य स्वाभाविक है और रोग अस्वाभाविक। स्वस्थ सदैव बने रहने में भी किसी को कोई आपत्ति नहीं। अस्वस्थता थोड़े दिन की भी असहनीय होती है। किसी प्रिय जन के रोगी होने से चिन्ता होती है, उसकी स्थिति तथा वजह पूछने जानने के लिए आतुरता व्यक्त की जाती है किन्तु स्वस्थ रहने पर कोई उसके लिए चिन्ता नहीं करता और न यह पूछता है कि आप स्वस्थ क्यों है? इससे स्वाभाविक और अस्वाभाविक होने का परिचय मिलता है। मृत्यु और जीवन के सम्बन्ध में भी यही बात है मृत्यु का समाचार पाकर या उसकी सम्भावना विदित होने पर चिन्ता सम्वेदना प्रकट की जाने लगती है, पर जीवित रहने पर ऐसी कोई व्यग्रता कहीं से भी नहीं होती। इससे जीवन की स्वाभाविकता सिद्ध है। अस्वाभाविक तो मरण ही है। जब शरीर तक के मरण में अस्वाभाविकता मानी आती है तब आत्मा की चेतना सत्ता का मरण स्वीकार करने की बात तो किसी के गले उतरती ही नहीं।
इस संसार में जितना पदार्थ सृष्टि के आरम्भ में था उतना ही अन्त तक रहेगा। उसमें न्यूनाधिकता नहीं होती। वस्तुओं के स्वरूप में परिवर्तन होता रहता है। ठोस, तरल और वायु भूत इन स्थितियों में वस्तुएँ बदलती रहती हैं। पानी तरल है, ठण्डक पड़ने पर बर्फ बन जाता है। गर्मी पड़ने पर भाप बनकर आकाश में उड़ जाता है फिर बादल या ओस बन कर तरल रूप में दिखाई पड़ता है। यही अदला-बदली वस्तुओं की उत्पत्ति और मृत्यु के रूप में प्रकट-अप्रकट होती रहती है, वस्तुतः कोई वस्तु कभी नष्ट नहीं होती। इस सिद्धान्त को रसायन शास्त्र के विद्यार्थी भली प्रकार जानते हैं। भौतिक विज्ञान में इसी सिद्धान्त को ‘तत्व का अणुत्पत्ति- तत्व का अतिनाशित्व-अध्यात्म शास्त्र में पदार्थ और प्राणी दोनों पर ही इसी तथ्य का समान रूप से कार्यान्वयन प्रतिपादित किया गया है। गीता कहती है- ना सतो विद्यते भावो, ना भावो विद्यते सतः।” अर्थात् जो नहीं था वह पैदा नहीं होता और जो है उसका नाश नहीं हो सकता। इस प्रतिपादन में पदार्थ की तरह आत्मा की अमरता भी सन्निहित है।
किसी से पूछा जाय कि आप का अस्तित्व इस समय है या नहीं, वह यही है, में ही उत्तर दे सकता है। यदि यह ‘मैं’ इस समय विद्यमान है तो वह पहले भी था और आगे भी बना ही रहेगा। हाँ, नाम, रूप और स्थान का परिवर्तन प्रकृति के स्वाभाविक क्रम के अनुसार अवश्य होता रहता है। यदि स्थानान्तरण को मृत्यु समझा जाय तब तो बात दूसरी है पर यदि विनाश या समाप्ति के रूप में मरण की व्याख्या की जाती है वह भौतिक शास्त्र और दर्शन शास्त्र दोनों ही दृष्टियों के उपरान्त भी बना रहता है। इस तथ्य से वे धर्म भी इनकार नहीं करते जो पुनर्जन्म को नहीं मानते। उस परलोक का अस्तित्व तो उन्हें भी मान्य है, जिसमें मरने के बाद भी आत्मा किसी न किसी स्थिति में निवास करता रहता है।
साधारणतया जन्म शब्द का अर्थ पैदा होना और मृत्यु का नष्ट एवं समागत हो जाना है। यह दो घटनाएँ समझी जाती है। संस्कृत भाषा में ‘जन्म’ और ‘मृत्यु’ शब्दों की व्याख्या व्युत्पत्ति में तथ्य को पूरी तरह स्पष्ट किया गया है। उसमें जन्म का अर्थ प्रकट होना और मृत्यु का देखने योग्य न रहना भर है। इन शब्दों में स्थिति के परिवर्तन भर का संकेत है किसी नवीन उत्पादन या आत्यंतिक विकास प्रतिपादन नहीं है।
संस्कृत की जननी-प्रादुर्भाव धातु से जन्म शब्द बना है। प्रादुर्भाव का अर्थ है- प्रकटीकरण-आकिजिन प्रकट होने का तात्पर्य हैं जो छिपा था उसका सामने आ जाना ‘जन्म’ शब्द का दूसरा पर्यायवाचक है। उत्पत्ति यह शब्द उत-पद से मिलकर बना है। जिनका अर्थ है ऊपर आना! इस व्याख्या में भी स्थिति के बदलने भर का संकेत है। जन्म के पर्यायवाची में एक और शब्द है- सृष्टि - क्रिएशन। यह शब्द सृजन-विसर्ग धातु से बना है। जिसका तात्पर्य लगभग वैसा ही है जैसा कि जन्म एवं उत्पत्ति का। सृष्टि को बाहर आना-प्रत्यक्ष होना कह सकते हैं। हमारी इन्द्रियों में सब कुछ देखने का सामर्थ्य नहीं है। वे पंचतत्वों से बनी होने के कारण मात्र किन्हीं वस्तुओं की स्थूल स्थिति को ही देख सकती हैं। कितनी ही वस्तुओं का अस्तित्व सूक्ष्मदर्शी यन्त्र से रेडियो टेलिस्कोप से एवं अन्यान्य साधनों से जाना जा सकता है। आँख एवं इन्द्रियाँ तो वायुभूत पदार्थ तक को नहीं देख पाती, जबकि अन्य इन्द्रियाँ उनकी उपस्थिति का अनुभव करती हैं। आग पर मिर्च जला देने से वे हवा में उड़ जाती हैं तब उस वायुभूत मिर्च को आँखें नहीं देखतीं किन्तु नाक गन्ध रूप में उसकी उपस्थिति अनुभव करती है। इसके आगे सूक्ष्मता आने पर वे इन्द्रियों की पकड़ से बाहर हो जाती हैं तो भी उनका अप्रकट अस्तित्व बना रहता है। पदार्थ और आत्मा दोनों के सम्बन्ध में यह सिद्धान्त एक समान लागू होता है। जन्म का अर्थ नवीन उत्पत्ति नहीं किन्तु अप्रकट का प्रकट भर हो जाना है।
‘मृत्यु’ शब्द का संस्कृत भाषा में जो अर्थ है उससे भी वस्तुस्थिति पर भली प्रकार प्रकाश पड़ता है। मृत्यु के लिए नाश शब्द का प्रयोग होता है। नाश-ना दर्शनेन' धातु से बना है। जिसका तात्पर्य है- देखने योग्य न रहना। इसमें अस्तित्व के अभाव की बात नहीं कही गई है, मात्र इतना ही संकेत है कि वह पदार्थ दृष्टि पथ से ओझल हो गया। ऐसा तो बच्चे ‘आँख मिचौनी’ खेल में भी करते रहते हैं। बादलों की छाया सूर्य चन्द्र तक को गुप्त प्रकट होने तक के लिए विवश करती रहती है। धूप-छाँव की स्थिति को सूर्य चन्द्र की उत्पत्ति या समाप्ति तो नहीं कह सकते। ठीक इसी प्रकार आत्मा के शरीर धारण करने और चोला उतार देने की स्थिति के सम्बन्ध में समझा जाना चाहिए। इसमें अस्तित्व तो बना ही रहता है। उसकी अमरता में कोई अन्तर नहीं आता।
मौत न डरने की जरूरत है और न उसके लिए उतावले होने की। शरीर ही बदलते हैं आत्मा के अस्तित्व पर मौत का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। कपड़े बार-बार बदलने पड़ते हैं पर शरीर वही बना रहता है- शरीर भी कपड़े की तरह बदलते रहते हैं। जीवन ईश्वर के समान ही अनादि और अनन्त है। कोई सत्कर्म किया है तो उसका फल अगले दिन- अगले जन्म में मिल सकता है उस में अधीरता की आवश्यकता नहीं है। वृद्ध हो गये, मरने के दिन आ गये। अब पढ़ कर क्या करेंगे? अब के आरम्भः इन मान्यताओं को अपनाया रहकर हम शरीर की मृत्यु निश्चित मानते हुए भी अजर-अमर जैसा निश्चिन्त प्रसन्न और योजनाबद्ध प्रगतिशील जीवन जी सकते हैं।
अगर संसार में तीन करोड़ ईसा, मुहम्मद, बुद्ध या राम भी जन्म लें तो भी तुम्हारा उद्धार नहीं हो सकता, जब तक तुम स्वयं अपने अज्ञान को दूर करने के लिए कटिबद्ध नहीं होते, तब तक तुम्हारा कोई उद्धार नहीं कर सकता इसलिए दूसरों का भरोसा मत करो-
-स्वामी रामतीर्थ
प्रकृति ने प्रत्येक जीव को उसकी दुनिया के हिसाब से परिपूर्ण बनाया है। उसे देखकर मनुष्य यह विश्वास करने को विवश होता है कि हर चेतना का निर्माण किसी उच्च चेतना के गहन चिन्तन-मनन के बाद होता है। लीमर जीव जब अपने शरीर की सफाई करता है तो उसके बहुत से बाल दाँतों में फँस जाते हैं। उस बेचारे को जिन्दगी भर इस परेशानी का सामना करना पड़ता यदि रचयिता ने उसकी जीभ के नीचे एक दूसरी छोटी कंघीनुमा जीभ नहीं लगाई होती। इसकी सहायता से वह फँसे हुए वालों को निकाल लेता है। यदि इस सहायक जीभ को नहीं लगाया गया होता तो बेचारे का मुँह न जाने कब का सड़ जाता।
माना कि मनुष्य की रचना परमात्मा की पूर्ण विकसित कला है, किन्तु यदि साँसारिक जीवन की सुख सुविधाएँ ही अभीष्ट हैं तो उस दृष्टि से अन्य जीवों को भी छोटा नहीं कहा जा सकता। घोंघे को अपना आहार खुरच कर खाना होता है इसलिए उसकी जीभ में प्रकृति ने दाँत लगाये हैं, इन दाँतों की संख्या 12 सौ से 15000 तक होती है।
अनातीदी जाति के पक्षियों में प्रकृति ने उनके पंखों के नीचे कुछ ऐसी ग्रन्थियाँ बनाई है जिनसे तेल निकलता रहता है। उसके कारण ही उनके पंखों का विकास होता है तथा वे चिकने और स्वस्थ बने रहते हैं। एक प्रयोग में एक बतख की तेल उत्पादक ग्रन्थि को आपरेशन करके निकाल दिया गया तो उसके पंख कुछ ही दिनों में झड़ गये। इसका यह अर्थ हुआ कि प्रकृति स्थानीय परिस्थितियों में प्रत्येक जीव के अनुरूप संरचना का ध्यान पहले से पहन रखती है इस दृष्टि से मनुष्य निर्माण पर गर्व प्रकृति या परमात्मा करे तब तो उचित भी है मनुष्य का अहंकार करना तो उसकी तुच्छता ही है। 100 फुट लम्बी व्हेल का वजन 125 टन के लगभग होता है। इसके शरीर में 35 टन चर्बी और 70 टन मांस होता है यदि उसे हाथियों से तोला जाये तो दूसरे पलड़े पर 20 से 25 हाथी तक चढ़ाने पड़ जायें। अकेले उसकी जीभ 3 टन और 2 मन वजन का दिल होता है जो 8 टन खून की नियमित सफाई में दिन-रात लगा रहता है इसके लिए उसके फेफड़े एक बार में 14000 लीटर वायु खींचते हैं। नवजात व्हेल शिशु का ही वजन 6 टन होता है और उसकी वृद्धि 1 क्विन्टल प्रतिदिन के हिसाब से होती है। कोई मनुष्य इतना बड़ा विकास स्वेच्छा से कर सकता है क्या? व्यायाम से कोई किंगकांग, दारासिंह और चन्दगीराम हो सकता है, पर व्हेल बनाना - काम परमात्मा का ही हो सकता है अतएव सर्वोपरि कलाकार के रूप में वन्दनीय वही है मनुष्य नहीं।
वीटल-कीटक की आँखों पर प्रकृति ने एक चश्मा भी चढ़ा दिया है ऊपर की आँखों से वह हवा में देखता है किन्तु जब यह पानी में चला जाता है तब नीचे की आँखों से देखने लगता है। हम समझते हैं हमारे पास ही इतनी बुद्धि है कि लेंस लगा कर आँखों की बीमारी ठीक करने हों तो इतने विशालकाय संसाधन आवश्यक होंगे कि उनके वजन से दब कर ही मनुष्य मर जाये। अपनी परिपूर्णता बाहर नहीं अन्दर खोजी जाये तब तो कोई बात है बात ही नहीं मनुष्य के भीतर जो सर्वांगपूर्ण सृष्टि भरी हुई है उसे खोजा जा सके तो मनुष्य को बाहर कुछ पाने की आकांक्षा ही न रहे।
कुछ भालुओं को ताड़ी के नशे की आदत पड़ जाती है तो उनको बार-बार ताड़ी के पेड़ों की तरफ जाना पड़ता है। ताड़ी पीकर भालू झूमने लगते हैं उनके पाँव लड़खड़ाने लगते हैं शिकारी इस स्थिति का लाभ उठाकर उसी प्रकार जा धमकते हैं जिस तरह नशेबाज मनुष्य को बीमारियाँ दबोच लेती हैं। भालू का शिकार भी इस स्थिती में अत्यन्त सुगम हो जाता है। अतएव वे इस ताक में रहते हैं कि भालू किस ताड़ में लगे। मिट्टी के बर्तन को फोड़कर वे ताड़ी पी जाते हैं। मनुष्य को भी लगता है उसी तरह बाहर खोजने का नशा हो गया है उससे सम्भव है कुछ समय की मस्ती तो हाथ लग जाये, पर शिकारी के हाथों पड़ जाने वाले भालू की तरह अन्ततः मनुष्य भी दुर्दैव का ही ग्रास बनता है। तब फिर उसकी शोभा क्या रही?
मनुष्य ने बिजली बना ली, पर अपने भीतर की बिजली को तो वह जान भी नहीं सका। व्हेल मछली का तो नाम ही “इलेक्ट्रिक व्हेल “ जिसके नाम से ही उसके विद्युत जनरेटर होने का पता चलता है। इस विद्युत शक्ति का उपयोग वह शिकार करने में करती है वह इसके एक झटके से तैरते हुए घोड़े को भी गिरा देती है।
“इलेक्ट्रिक रे” या “टारपीड़ो फिश” का विद्युत भाग पीठ पर होता है, इसमें कितनी अधिक विद्युत शक्ति होती है, इस सम्बन्ध में जेराल्ड ड्यूरेल नामक जीव-विज्ञानी का एक संस्मरण उल्लेखनीय है वे यूनान की एक घटना के हवाले से बताते हैं कि एक लड़का त्रिशूल से मछलियों का शिकार किया करता था, एक दिन उसने अपना निशाना इस मछली को बनाया किन्तु त्रिशूल ने जैसे ही मछली का स्पर्श किया इतना जबर्दस्त झटका उसे लगा कि एक भयानक आवाज के साथ वह पानी में जा गिरा। उसे इतना जबर्दस्त विद्युत- शाक लगा था कि घण्टों बाद उसे होश आया।
सात-आठ फुट लम्बा 2-3 मन का शुतुरमुर्ग संकट के समय बालू में सिर घुसेड़ लेने की मूर्खता के लिए ही विख्यात नहीं तेज दौड़ने की गति के लिए भी प्रसिद्ध है। इसकी दौड़ने की गति प्रायः 60 मील प्रति घण्टे की है। उसकी चोंच का प्रहार इतना तीक्ष्ण होता है कि लोहे की चादर में भी छेद हो जाता है। इसकी पाचन शक्ति भी ऐसी होती है कि कठोर से कठोर वस्तु भी खाकर पचा लेता है। लगता है यह बीमारी मनुष्य को भी है तभी तो कुछ भी इकठ्ठा करते रहने की तृष्णा उसे अहर्निश पीड़ित किये रहती है। वास्तव में यह शुतुरमुर्ग की तरह रेत में मुँह छिपाने की तरह की मूर्खता है जब कि मृत्यु निरन्तर पास आती रहती है उसके लिए जो पूर्व तैयारी की जा सकती थी मूर्खतापूर्ण मनुष्य उससे वंचित बना रहता है।
संरचना की दृष्टि से तो एक मक्खी भी मनुष्य से कम रहस्यपूर्ण नहीं। उसे देखकर कलाकार की कला पर आश्चर्य होता है। उसके पाँव में एक विशेष प्रकार का स्राव होता है। मक्खी जहाँ बैठी यह स्राव उस स्थान पर चिपका और उस स्थान की भोजन सामग्री को पैरों से ही चूस कर सारे शरीर में पहुँचा दिया। उसकी आँखें प्रकृति की विलक्षण रचना है। इस पर भी उसकी लगभग 80000 जातियाँ पृथ्वी पर तब से विद्यमान चली आ रही हैं जब मनुष्य भी नहीं आया था। इसके पंख अत्यधिक कुशल सन्तुलन तो बनाये रखते ही हैं वह उनसे ही इंद्रियों की बोध क्षमता का लाभ लेती है, कोई भी यांत्रिक यन्त्र ऐसा नहीं बन पाया जो जिरास्कोप का भी काम कर सके हिचकोले भी लें सके। उसके पंख सीधे मस्तिष्क के ज्ञान तंतुओं से सम्बद्ध होते हैं जिससे वह तुरन्त परिस्थिति के अनुरूप इनसे काम ले लेती है।
जीवन का नाम यदि पेट और प्रजनन ही हो तो मक्खी बनने में ज्यादा लाभ है। मादा मक्खी एक ही बार में 125 से लेकर पाँच हजार तक अण्डे देती है। मनुष्य के शरीर का विकास तो लम्बी अवधि के बाद होता है, पर मक्खी के शरीर में ऐसा न जाने क्या तन्त्र है कि यदि उसे 5 माह की भी जिन्दगी मिल जाये तो वह इसी अवधि में 500000000000 पाँच खरब बच्चे पैदा कर देगी। यही यदि एक ही जोड़ा पितामह बनने तक जीवित बच जाये तो वह इतनी सन्तान पैदा कर देगा जिससे 6 माह में ही सारी पृथ्वी में 50 फुट ऊँचा विशालतम ढेर लग जायेगा। यह तो उसकी यह क्षुद्र प्रवृत्ति ही है कि वह जितना वंश वृद्धि करती है काल उतना ही उसे चबेना बना डालता है और यह बताता रहता है कि जो भी जीव पृथ्वी का भार बढ़ाने का प्रयास करेगा उसका भी अन्त इन्हीं की तरह शत्रुओं से, अकाल मृत्यु और रोग-शोक से घिरा हुआ रहेगा उसे अन्यत्र कुछ सोचने-विचारने प्रगति करने का तो अवसर ही मिलता कहाँ है?
मक्खियाँ धरती के लिए ही नहीं हर जीव के लिए भार है। उन्हें स्थान नहीं मिलता तो कुछ हवा में ही अण्डे दे देती हैं, कुछ भेड़ों के थूथन पर अण्डे देती हैं। कुछ उड़ती हुई मधुमक्खियों की पीठ पर अण्डे देकर अपना प्रयोग तो पूरा कर लेती हैं, पर यह प्रयोग अन्ततः उसके ही वंश नाश का कारण बनते हैं। अधिक प्रजनन कम आयु का सिद्धान्त चाहे मक्खी हो या मनुष्य सर्वत्र एक-सा है। मक्खी का बच्चा 6 दिन में ही विकसित हो जाता है और 10 दिन में मर जाता है। कुछ ही मक्खियाँ ज्यादा दिन जीती हैं पर उनकी प्रजनन क्षमता उतनी ही कम होगी। इतनी वंश वृद्धि आखिर जियेगी। कनाडा की पाइन-सा मक्खियाँ प्रति वर्ष हजारों एकड़ भूमि की उपज हजम कर जाती हैं विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार मुर्गियों के विनाश का मूल कारण यह मक्खी ही है जिसके छोटे-से पंख में एक लाख से अधिक रोग कीटाणु होते हैं। संख्या का गन्दगी से अन्योऽन्याश्रित सम्बन्ध है, गन्दगी का बीमारी से। मनुष्य जीवन का वर्तमान लेखा-जोखा उसी का नमूना है, यदि यह क्रम न रुके तो अगले दिनों हर मनुष्य एक लाख विषाणुओं की प्रयोगशाला बन जाये तो कोई आश्चर्य नहीं। आज तो मक्खी प्रति वर्ष हजारों मनुष्यों को अँधा कर देती है तब मनुष्य मनुष्य को ही जीवित खाने लग सकता है। मनुष्य स्वयं बढ़ सकता है आखिर पृथ्वी तो नहीं बढ़ सकती, साधन तो उस अनुपात का साथ नहीं दे सकते।
यदि यह विवेक न हो तो मनुष्य उतना ही उपहासास्पद है जितना सुरीनाम टैड। उसकी अण्डे देने और उनको सेने की क्रिया बहुत ही विलक्षण होती है- मादा अपने अण्डे अपनी पीठ पर डालती जाती है। अण्डा खाल में कुछ इस तरह धँस जाता है कि ऊपर एक और खोल ढक्कन की तरह चढ़ जाता है इसी तरह सारे अण्डे पीठ में ही पकते रहते हैं। विकसित होने पर जब ये बच्चे फुदक-फुदक बाहर निकलते हैं तो किसी निहारिका के विस्फोट से बनने वाले ब्रह्माण्डों की कल्पना साकार हो उठती है। यह बच्चे थोड़े ही समय में स्वेच्छाचारी जीवन जीते और मनुष्य को यह बताते हैं कि यदि प्रजनन उद्देश्यपूर्ण न हुआ तो वह मेरी तरह भार ही होगा।
उल्लू जैसा मूर्ख समझा जाने वाला पक्षी कितनी विलक्षणताओं से परिपूर्ण है उसकी कल्पना करते ही प्रकृति की सचेतन कलाकारिता पर आश्चर्य हुए बिना नहीं रहता। कहते हैं उल्लू रात का राजा होता है वस्तुतः उसे रात में दिखाई नहीं देता। इस कमी की पूर्ति के लिए प्रकृति ने उसे ऐसे कान दिये हैं जिनमें एक विचित्र ढक्कन लगा होता है यह पूरी तरह कान को ढकता नहीं । जब कोई ध्वनि उल्लू के पास आती है तो पहले उसे वह ध्वनि एक कान से सुनाई देती है पीछे कुछ क्षणों के बाद दूसरे से। बस श्रवण के इस अन्तर को ही वह फटाफट गणित में बदल कर यह पता लगा लेता है कि आवाज किस दिशा से कितनी दूर से आई है। मनुष्य जो कि प्रकृति का परिपूर्ण प्राणी माना जाता है उसे भी इतने संवेदनशील कान न मिलने का दुःख हो तो कुछ आश्चर्य नहीं जिनसे वह और नहीं तो पृथ्वी के घूर्णन की, ग्रहों के चलने और सौर घोष जैसी ध्वनियाँ तो सुन ही लेता, यदि ऐसा हो सका होता निःसन्देह उसके चिन्तन और दृष्टिकोण में आज जो संकीर्णता भरी हुई है वह नहीं ही होती ।
सुप्रसिद्ध जीव शास्त्री जान एच॰ टाड ने एक बार मछलियों पर एक प्रयोग किया। मछलियाँ एक नियत समय पर अपने सामान्य निवास से चलकर किसी विशेष स्थल में जाकर अण्डे देती हैं। विकसित होने के बाद उनके बच्चे स्वयं ही अपने माता-पिता की जन्म भूमि को लौट आते हैं, वे किस बौद्धिक सूझ और अंतःप्रेरणा से ऐसा करती हैं यह जानने के लिए ही यह प्रयोग किया गया था। प्रयोग के समय जहाँ मछलियाँ थी उस स्थान को घेर दिया गया और उस स्थान का सम्बन्ध एक कुँए से जोड़ दिया गया ऐसा करने पर भी वे मछलियाँ कुएँ की और नहीं गई, अपितु उस रासायनिक संकेत के सहारे ही समुद्री धारा में बढ़ने लगीं जिधर उन्हें अण्डे देने जाना होता है। अपने स्थान पर लौटाने या नये स्थान जाने के अतिरिक्त भी मछलियों की एक रासायनिक भाषा होती है जिससे वे सजातियों को सामाजिक व्यवस्था की जानकारी देती रहती हैं।
जन-समुदाय को कोई चेतावनी या सूचना देनी हो तो ढोल पीट कर मुनादी की प्रथा प्रचलित है। कदाचित कोई दीमकों के सूक्ष्म जीवन पर दृष्टि डाले तो उसे यह जानकर आश्चर्य हुए बिना न रहेगा कि यह परम्परा उनमें भी पाई जाती है। सैनिक दीमक को जब किसी शत्रु का पता चलता है तो वे एक विशेष ध्वनि से अपने कुनबे को सचेत कर देते हैं। बात की बात से सारे दीमक नगर को सूचना हो जाती है और वे सब के सब अपना माल, असबाब बाँध कर दूसरे आश्रय के लिए चल पड़ते हैं।
विवेक बुद्धि मिल जाने पर मनुष्य चाहे तो गर्व कर सकता है, पर इतना होने पर भी जब यह जीवन की गुत्थियाँ नहीं सुलझा पाता तो उसकी इस बुद्धिमत्ता पर तरस आता है।
कला-कौशल और अपनी बौद्धिक सामर्थ्य से आज मनुष्य ने धरती, वायु, आकाश सर्वत्र अपनी कीर्ति-पताका फहरा दी है किन्तु यदि इतने मात्र को ही श्रेष्ठता का मानदंड मान लिया जाये तब तो पशु-पक्षी उससे इक्कीस ही बैठेंगे उन्नीस नहीं। आज मनुष्य ने तरह-तरह के विमान विकसित कर लिए, पर जीवों की सदृश क्षमताएँ अभी भी उसे उपलब्ध नहीं। उड़ने को अमेरिका की कुछ गिलहरियाँ भी उड़ लेती हैं। मलाया, सिंगापुर की छिपकली और साँप उड़ानों के लिए विश्व प्रसिद्ध हैं। एक समय था जब टेरोडक्टाइल नामक विशालकाय सरीसृप उन्मुक्त आकाश में उड़ते थे तब तक तो मानवी सभ्यता अस्तित्व में भी नहीं आई थी। इस तरह उड़ान का श्रेय राइट बन्धुओं को नहीं अपने इन छोटे कहे जाने वाले भाइयों को ही देना पड़ेगा।
“एक्सोसिटायडी” मछलियाँ मनुष्य की तरह पारिवारिक जीवन बिताती हैं। ये सदैव समूह में रहती, एक दूसरे के हितों का ध्यान रखती, प्रसव जैसी कठिन परिस्थितियों में एक दूसरे की सहायता करती हैं यही नहीं यह अपने बच्चों को पेड़ों पर चढ़ाकर उन्हें विधिवत् उड़ना भी सिखाती हैं। इस तरह यह समूचा समुदाय उड़न-दस्तों की तरह ही जीवनयापन करता है। कुछ मछलियों को तो प्रकृति ने पीठ ही नहीं पेट में भी पंख अर्थात् चार-चार डैने प्रदान किये हैं। इसमें पेलथिक मछली अत्यन्त कुशल उड़ाका होती है। यह अपने पीठ के कन्धों से ‘ग्लाइडर’ का काम लेती है और किसी स्थान विशेष में ठहरना चाहे तो पंखों को लहराती हुई ठहर भी जाती है इतनी उन्नत किस्म तो मानवीय यानों ने भी अभी नहीं पाई। मनुष्य ने तो उड़ान के तरीके लगता है “हैचेट” तथा “बटरफ्लाई” मछलियों के ही करतब देखकर सीखे हैं जिनके सहारे वे पहले पानी में ही प्रचुर वेग लेकर ऊपर उड़ जाती हैं। जावा में एक मेंढक पाया जाता है यह भी उड़ता है। “गरनार्ड” मछली इन सबसे उन्नत किस्म की उड़ाका होती है ये अपने पंखों के सहारे पानी में तैर भी सकती है सतह पर संतरण भी कर सकती है और उड़ तो सकती है। उड़ान में तो मनुष्य मक्खी से भी हार मानता है, सिफेनेमिया जाति की मक्खी 816 मील प्रति घण्टा की भयंकर गति से उड़ने में सक्षम है।
प्रगति और आत्म-रक्षा के लिए जड़ता का आश्रय एक दिन जीवन चेतना को ही जड़ बना दे तो कुछ आश्चर्य नहीं। स्पंज और मूँगे जीव हैं किन्तु वे इसी ताक में रहते हैं कि कहीं उन्हें कोई चट्टान, काई का ढेर या रेत मिल जाये बस वे उसी से चिपक कर जड़ हो गये, उनकी मूल चेतना का विनोद समाप्त हुआ वे न वैसे का आनन्द ले सकते हैं न विविध पूर्ण सृष्टि के विहंगावलोकन का मस्सेल, ओइस्टर ड्रिल बारनंकल तथा इसी श्रेणी के जीवन है जिन्होंने अपनी दुनिया सीमित कर ली है और व्यापक दृष्टि से वंचित हो गये हैं। मनुष्य जाति भी कुछ इसी तरह होती जा रही है। जड़ता के अनुसन्धान के साथ-साथ चेतन मन की सम्वेदना और उसकी भावनाएँ बुरी तरह नष्ट होती जा रही हैं। उसकी मैत्री भावना, करुणा, दया और उदारता नष्ट होती जा रही है और इन्द्रिय लिप्सा इन जीवों की तरह बढ़ती रहती है।
जीवन का यदि कोई दर्शन हो, उसके साथ कुछ आस्थाएँ, मान्यताएँ जुड़ी न हो, किन्हीं सिद्धान्तों का समावेश न हो तो आदमी , आदमी न रहकर एक प्राणी मात्र रह जाता है। गुजारे भर का लक्ष्य लेकर चलने वाले अपनी योग्यता और तत्परता के अनुसार सुविधा साधन तो न्यूनाधिक मात्रा में उपार्जित कर लेते हैं किन्तु कोई ऊँचा लक्ष्य सामने ना रहने पर अन्तरात्मा में जीवन्त उत्साह नहीं सँजो पाते। यों सामान्य उत्साह तो भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं की आतुर लालसा से भी उत्पन्न हो सकता है पर उसके नैतिक बने रहने में सन्देह ही बना रहेगा। भौतिक लाभों की अपेक्षा यदि किन्हीं आदर्शों की पूर्ति को लक्ष्य बनाकर चला जाय तो उत्साह भरी सक्रियता के अतिरिक्त उसके साथ उत्कृष्टतावादी तत्व भी जुड़े रहेंगे और उन प्रयासों से आत्मिक उन्नति का लाभ होता रहेगा भले ही भौतिक लाभ उतना न हो। लोकहित की ऐसी महत्त्वाकाँक्षाएँ जिनमें अपने पुरुषार्थ का प्रकटीकरण ही नहीं आदर्शवादी होने का परिचय मिलता हो, निश्चित रूप से उस महत्त्वाकाँक्षी के व्यक्तित्व को सम्मानास्पद बनाती हैं। इस उपलब्धि के सहारे वैसा कुछ प्राप्त किया जा सके जो धन सम्पदा से भी अधिक मूल्यवान है।
मानवी प्रगति की व्यवस्था करते हुए हमें उसके दृष्टिकोण और चरित्र के स्तर का भी मूल्याँकन करना चाहिए। भौतिक दृष्टि से सुखी सम्पन्न बन जाने पर भी यदि मनुष्य उद्देश्य विहीन और आदर्श रहित बना रहे तो वह अपने लिए सन्तोष एवं गौरव प्राप्त न कर सकेगा। समाज में उसे न तो उपयोगी माना जाएगा और न उसे सम्मान दिया जाएगा।
नोबेल पुरस्कार विजेता फ्रांसीसी वैज्ञानिक अलोक्सिस करेल ने कहा है- हम बहुत कुछ खोज चुके और अगले दिनों इससे भी अधिक रहस्यपूर्ण प्रकृतिगत रहस्यों को खोजने जा रहे हैं, किन्तु अभी भी “मनुष्य” पहले की तरह ही अविज्ञात बना हुआ है। सच तो यह है कि वह इस प्रकार खोता चला जा रहा है कि अगले दिनों उसे खोज निकालना कठिन हो जाएगा। मनुष्य की ज्ञान सम्पदा में अभी भी असीम अज्ञान से जकड़ा हुआ है।
विद्वानों की संख्या बढ़ती देखकर प्रसन्नता होती है पर खेद इस बात का है कि ‘ज्ञानी’ तेजी से समाप्त होते चले जा रहे हैं। विद्वान और ज्ञानी का अन्तर बताते हुए चीनी दार्शनिक लाओत्से कहते थे- जो अपने को जानता है वह ज्ञानी और जो दूसरों को जानता है वह विद्वान है। अपने सम्बन्ध में बढ़ता हुआ अनाड़ीपन ही मनुष्य को कठिन समस्याओं में जकड़ता चला जा रहा है।
“मैन दी अननोन” ग्रन्थ के लेखक विज्ञानी अलेक्सिस ने लिखा है- मानवी काया का रासायनिक विश्लेषण सरल है। अवयवों की हरकतें समझने में सफलता मिली है। सोचने का तन्त्र मस्तिष्क किधर चलता और किस तरह करवटें बदलता है इसका पता भी लगता जा रहा है कि उसकी मूल सत्ता में विद्यमान ‘मानव’ की खोज खबर लेने वाले धनाढ्य दृष्टिगोचर नहीं होते । सभ्यता और सम्पत्ति का विकास हो रहा है, पर मनुष्य का पिछड़ापन बरकरार है। आदमी ने दुनिया को अपने योग्य बनाया है पर वह अपने लिए ‘पराया’ बन गया है। सूनेपन का दबाव बढ़ रहा है और भीड़ से अलग होकर जब वह देखता है तो लगता है न वह किसी का है और न कोई उसका । यह अपने आपे की क्षति इतनी बड़ी है जिसकी पूर्ति कदाचित प्रगति के तथाकथित सभी चरण मिलकर पूरा नहीं कर सकेंगे।
मनुष्य के खण्ड-खण्ड का चिन्तन विश्लेषण चल रहा है। उसके अस्तित्व के एक एक भाग को समग्र शास्त्र का रूप दिया गया है। शरीर शास्त्र , मन शास्त्र , समाज शास्त्र, अर्थ शास्त्र जैसे खण्डों की जानकारी भी है तो, उपयोगी पर समग्र मानव को समझे बिना उसकी मूल प्रकृति पर ध्यान दिये बिना एकांगी आंशिक समाधानों से कुछ बनेगा नहीं। एक छेद सीते-सीते दूसरे और नये फट पड़े तो उस मरम्मत से कब तक काम चलेगा। विज्ञान की शोधें मनुष्य की कतिपय आवश्यकताओं को पूरा करने और जानकारियों को बढ़ाने के उद्देश्य से पूरी की जाती है किन्तु उस महाविद्या की ओर से क्यों उदासी है जिसे समग्र मानव की विवेचना साइंस आफ मैन कह सकते हैं।
विज्ञान के आविष्कारों में अपने आपको खपाया- श्रमिकों के स्वेद कणों ने विशालकाय निर्माण सम्पन्न किये हैं- इंजीनियरों की तन्मयता से निर्माण की योजनाएँ बनती हैं। कलाकार अपनी चेतना भाव तरंगों में घुलाकर उपस्थित लोगों को मन्त्र मुग्ध करते हैं। आत्मज्ञानी अपने चिन्तन और कर्म का समन्वय करते हुए अपने व्यक्तित्वों को एक सफल प्रयोगशाला के रूप में प्रस्तुत कर सके तो जन साधारण में भी उसके लिए उत्साह उत्पन्न होगा। लक्ष्य ऊँचा हो और संकल्प प्रखर तो फिर मनुष्य के लिए बड़े से बड़ा उत्सर्ग कर सकना भी कुछ कठिन नहीं है। चिन्तन और व्यवहार का समन्वय करती हुई आदर्शवादी आस्थाओं की स्थापना ही अपने युग की महान क्रान्ति हो सकती है। उज्ज्वल भविष्य की आशा उसी से बँधेगी। इसका नेतृत्व करने के लिए ऐसे अग्रगामियों की आवश्यकता है जो लोक शिक्षण के लिए सबसे प्रभाव शाली उपाय आदर्श के अनुरूप आत्म निर्माण अपना सकें और जलते दीपक द्वारा नये दीपकों के जलने की परम्परा स्थापित कर सकें।
व्यक्ति, समाज का एक मूल्यवान घटक है। उसके प्रयासों का परिणाम उस अकेले तक ही सीमित नहीं रहता वरन् अनेकों की इसमें साझेदारी रहती है। समुद्र की लहरें एक दूसरे को प्रभावित करती हैं और मनुष्य एक दूसरे पर अनायास ही अपना प्रभाव छोड़ते हैं। बुरा व्यक्ति अपनी बुराई करके स्वयं दुष्परिणाम भुगत लेता तो कोई चिन्ता की बात नहीं थी, पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि उसकी प्रत्येक गतिविधि की दूसरों पर भली-बुरी प्रतिक्रिया होती है। भला मनुष्य परोक्ष रूप में भली परम्परा पैदा करके असंख्यों को किसी न किसी रूप में सुखी बनाता और ऊँचा उठाता है। इसके विपरीत दुर्बुद्धि ग्रस्त व्यक्ति अपने दुष्ट चिन्तन और चरित्र से कइयों को अनुयायी बनाता है और कितनों को ही कष्ट कारक परिस्थितियों में धकेलता है। अस्तु समग्र प्रगति की सुख-शान्ति दायिनी दिशा अभीष्ट हो तो व्यक्ति के अन्तराल को परिष्कृत बनाने के लिए भी उतने ही प्रयत्न करने पड़ेंगे जितने कि भौतिक सुविधा संवर्द्धन के लिए किये जाते हैं। भीड़ को दिशा निर्देश देने का काम चलता रहे पर व्यक्तित्वों की गहरी परतें कितनी मूल्यवान है इसका महत्व आँखों से ओझल न होने पाये इसका पूरा-पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए।
स्मरण शक्ति की कमी की शिकायत वृद्ध ही नहीं युवा व्यक्ति भी करते पाये जाते हैं। इस कमी से वे परीक्षा में उत्तीर्ण होने से लेकर व्यावसायिक तथा दैनिक काम-काजों में बड़ी अड़चन अनुभव करते हैं। बहुधा इसे कोई रोग मान लिया जाता है और उसके निवारण के लिए तरह-तरह के औषधि उपचारों तथा पुष्टाई सेवन का सिलसिला चलता है।
उपचार करने से पूर्व विस्मृति का कारण जानने की आवश्यकता है साथ ही यह समझना भी उपयोगी है कि मस्तिष्क में स्मृति को संग्रह करने वाली सुरक्षित रखने वाली संरचना कैसी है। मोटर की मशीन और उसके चलाने की विधि ठीक तरह समझ ली जाय तो उसके संचालन में जो व्यवधान आते हैं उनमें से अधिकाँश का निवारण सहज ही हो जाता है।
स्मरण शक्ति प्रायः अपने स्थान पर यथावत् रहती है। बचपन के प्रारम्भिक और वृद्धावस्था के अन्तिम दिनों को छोड़कर शेष प्रौढ़ परिपक्वावस्था में स्मृति का स्तर प्रायः समान ही रहता है। हमें स्मरण रखने की प्रक्रिया में अन्तर पड़ जाने से उसकी मात्रा घट बढ़ जाने का भ्रम होने लगता है। यदि स्मरण रखने की पद्धति का ज्ञान हो और स्मरण तन्त्र की संरचना को ध्यान में रखते हुए तद्नुरूप घटनाओं को स्मरण रखने की विधि व्यवस्था बना ली जाय तो फिर स्मृति की उतनी शिकायत न रहे जैसी आमतौर से रहती है। यों हर मनुष्य में दूसरों की अपेक्षा कुछ न कुछ तो न्यूनाधिकता हर बात में रहती है।
समझा जाता है कि बचपन में स्मरण शक्ति तीव्र होती है और पीछे आयु बढ़ने के साथ-साथ मन्द होती जाती है। पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। छोटी आयु में मस्तिष्क के ऊपर बोझ कम रहता है विचारणीय प्रश्न कम रहते हैं, घटनाएँ, सम्वेदनाएँ और समस्याएँ भी उन दिनों थोड़ी ही रहती हैं। फलतः बोझ कम रहता है और जो सोचना, याद रखना है वह आसानी से निपट जाता किन्तु बड़े होने के साथ-साथ कार्य क्षेत्र बढ़ता जाता है, साथ ही स्मरण रखने निष्कर्ष निकालने एवं निर्णय करने का भार भी। ऐसी दशा में बहुत काम करते रहने पर भी कुछ में अधूरापन रह जाना अप्रत्याशित नहीं। जो कुछ सही रीति से पूरा हो गया उसकी ओर तो ध्यान दिया नहीं गया, पर जो कमी रह गई उसी को मस्तिष्क की कमजोरी या स्मरण शक्ति की कमी मान लिया गया। ऐसे ही प्रसंगों को लेकर दिमागी शक्ति घट जाने की बात सोच ली जाती है और चिन्ता होने लगती है जबकि वस्तुतः वैसा कुछ होता नहीं।
विस्मृति का बहुत बड़ा कारण है- उपेक्षा जिस वस्तु, बात, या सन्दर्भ में अन्यमनस्कता होती है वहाँ उथला ध्यान दिया जाता है और स्मृति की परतों पर अंकन बहुत ही हलका-धुँधला हो पाता है। उसके मिटने में भी देर नहीं लगती। इसके विपरीत जिन प्रसंगों में अपनी दिलचस्पी होती है, उन्हें ध्यानपूर्वक सुना देखा और समझा जाता है। फलतः उनके मानस चित्र अधिक स्पष्ट बनते हैं और स्मृति पटल पर उनका अंकन इतना गहरा हो जाता है कि आवश्यकतानुसार उसे फिर पूर्ववत् देखा जा सके। यों समय बीतने के साथ साथ सभी स्मृतियाँ धुँधली पड़ती जाती है, फिर भी जिन्हें मनोयोग पूर्वक अपनाया गया है उनकी रेखाएँ अमिट न सही चिरस्थायी तो बनी ही रहती है।
स्कूली छात्रों को पाठ याद न होने की शिकायत रहती है, पर वे ही किसी देखी हुई फिल्म का पूरा कथानक भली प्रकार सुना देते हैं और साथ ही उसके गीत भी याद रखते हैं। दादी अपनी पोती का नाम बार-बार भूल जाती है पर अपने पति या ससुर की श्राद्ध तिथि नहीं भूलती। व्रत उपवास की तिथियाँ भी विस्मरण नहीं होती। युवक अपने पिता को पत्र लिखने की बात भूल जाते हैं, पर प्रेमिका को नियमित रूप से लिखते रहते हैं। सामान्य प्रसंगों में तारीखें याद नहीं रहतीं पर वेतन पाने की तारीखें भूलने में कदाचित ही किसी से कभी भूल होती होगी। भुलक्कड़पन वस्तुतः कोई रोग नहीं वरन् आदत है, जो दिलचस्पी की कमी वाले क्षेत्रों को ही प्रभावित करती है। नोटबुक को साथी बना लेने उसमें करने योग्य आवश्यक काम नोट करते रहने और उन पृष्ठों को सामने खुला रखने तथा बार-बार पलटते रहने से सभी महत्वपूर्ण बातें याद रखी जा सकती हैं और सभी आवश्यक काम निपटते रह सकते हैं। नोटबुक साथ रखने जैसे सामान्य से उपचार से विस्मृति की वह विभीषिका टल जाती है जिसके कारण बहुत से लोग बुरी तरह घबराते और खर्चीले इलाज कराते रहते हैं।
भगवान ने स्मृति की तरह विस्मृति को भी एक वरदान की तरह सृजा है। उपयोगी बातें याद रखें और आवश्यकता के समय सहायक बनें यह उत्तम है। इसी प्रकार यह भी ठीक है कि द्वेष-दुर्भाव और शोक-संताप की कटु स्मृतियाँ धुँधली होते होते विस्मरण स्तर तक जा पहुँचे। क्रोध, हानि, वियोग आदि की स्थिति में मन जितना उद्विग्न होता है यदि उतना ही संताप बना रहे तो जीवन कठिन हो जाय। एक बार जिनके साथ झगड़ा हो जाय फिर कभी सद्भाव बन ही न सके। मस्तिष्क में यों करोड़ ग्रन्थों के समा सकने जितना स्मृति क्षेत्र है पर क्षण क्षण में जो विविध जानकारियाँ मस्तिष्क को मिलती रहती हैं उनका विस्तार तो स्मृति क्षेत्र की तुलना में बहुत अधिक है। ऐसी दशा में पुरानों को हटाकर ही नयों के लिए जगह मिल सकती है। रेलगाड़ी के मुसाफिर खानों में बैठे यात्री यदि वहाँ जम बैठें तो नये आगन्तुकों को जगह कहाँ मिलेगी।
उनींदे-झपका लेते हुए मनुष्य किसी सम्भाषण को कानों से सुनते हुए भी उसका बहुत थोड़ा अंश समझ पाते हैं। दत्त चित्त होकर सावधानी एवं दिलचस्पी के साथ कोई बात सुनी जाय तो वह न केवल भली प्रकार समझ में ही आ जायगी वरन् चिरकाल तक स्मरण भी बनी रहेगी और छाप भी छोड़ेगी। समझाने के ढंग या स्तर की जितनी महत्ता है, उससे भी अधिक सुनने वालों की दिलचस्पी और सावधानी पर ज्ञानवर्धन की सफलता बहुत कुछ निर्भर रहती है।
शरीर किस स्थिति में है इसका भी मस्तिष्क पर प्रभाव पड़ता है। आराम कुर्सी पर शिथिल शरीरावस्था में पड़े-पड़े अपेक्षाकृत अधिक अच्छी तरह सोचा जा सकता है। कल्पना की उड़ानें उस स्थिति में अधिक दूर तक और सही दिशा में चलती है। पढ़ने के लिए मुस्तैदी से बैठना उत्तम है। चलते-फिरते जो कुछ सोचा पढ़ा जाएगा वह सब आधा-अधूरा ही रहेगा।
स्मृति और मस्तिष्क का तारतम्य समझने के लिए हमें यह भी जानना चाहिए कि ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से मस्तिष्क को अनेकों प्रकार की जानकारियाँ हर घड़ी प्राप्त होती रहती है। इसमें अधिकाँश वो होती हैं जो स्थिति का परिचय देकर अपना काम समाप्त कर देती हैं। उस जानकारी का यदि कुछ सीधा प्रभाव अपने ऊपर नहीं पड़ता है और उसकी कुछ प्रतिक्रिया नहीं होनी है तो विस्मृति की रद्दी की टोकरी में जा पड़ती है और सदा के लिए समाप्त हो जाती है। कुछ जानकारियाँ ऐसी हैं जिनसे निपटना है तो शरीर के अन्य कल पुर्जों को वैसा आदेश मिलता है और तद्नुसार हलचल होती है जैसे पैर में मच्छर काटे तो मस्तिष्क उसके निवारण के लिए हाथ को आज्ञा देता है और वह तत्काल उस स्थान पर पहुँच कर मच्छर पर आक्रमण करता है। ऐसी जानकारियाँ अपना सामान्य प्रयोजन पूरा करके जली हुई दियासलाई की तरह अपना सामयिक प्रयोजन पूरा करके विस्मृति के गर्त में चली जाती है। संग्रह तो थोड़ी-सी ही की जा सकती है। मस्तिष्क में इतनी जगह नहीं है कि हर घड़ी इन्द्रियों की सहायता से जो ज्ञान प्राप्त होता है उस सभी को अर्जित किया जा सके, तो भी जो महत्वपूर्ण है उसे सुरक्षित रखे जाने की इस छोटे किन्तु सुविस्तृत भण्डार में पर्याप्त जगह है।
टेप रिकार्डर पर कुछ आवाजें अंकित कर ली जाती हैं। इसके बाद वे चुप हो जाती हैं। आवश्यकतानुसार उसे उत्तेजित करके फिर से सुना जा सकता है। मस्तिष्क एक प्रकार का टेप रिकार्डर है उसमें असंख्य टेप की हुई घटनाएँ स्मृतियों के रूप में अंकित हो जाती हैं। इसके बाद वे विस्मृत हो जाती हैं किन्तु फिर जब कभी आवश्यकता पड़े उन्हें फिर से उभारा जा सकता है। यह स्मृतियाँ ध्वनि और चित्र एवं सम्वेदनाओं के त्रिविध सम्मिश्रणों के रूप में होती है। टेप रिकार्डर में तो मात्र आवाज ही अंकित रहता है पर मस्तिष्क की स्मृति-कोशिकाओं पर दृश्य भी नोट होता रहता है। इतना ही नहीं जो भाव सम्वेदना उस समय प्रतीत हुई थी वह भी अर्जित रहती है। समयानुसार यह चित्र धूमिल होते जाते हैं। दस दिन पहले की घटना का विस्तार पूर्वक वर्णन किया जा सकता है वैसा दस वर्ष बाद नहीं हो सकता। तब तक वे अंकन काफी जीर्ण और धुँधले हो चुके होते हैं। अस्तु उनमें से उतना ही भाग याद रहता है जो अंकन के समय अधिक महत्वपूर्ण प्रतीत हुआ था और जिसने अधिक गहरी छाप छोड़ी थी।
यहाँ एक बात और भी जानने योग्य है कि स्मृति अंकन के समय मस्तिष्क की क्या स्थिति थी इस बात पर भी यह निर्भर करता है कि कितनी गहराई तक स्मरण को नोट किया गया है। उथले अंकन गहरे अंकनों की तुलना में जल्दी ही घट या मिट जाते हैं। कुछ मस्तिष्कों की जन्मजात बनावट ही बहुत भौंड़ी होती है वे काम चलाऊ स्मृतियाँ ही नोट कर सकते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि किसी शारीरिक कष्ट या मानसिक उद्वेग में मानसिक चेतना बुरी तरह उलझी रहती है या उपेक्षा-उदासीनता का दौर रहा होता है। ऐसी दशा में जो जानकारियाँ मिल रही हैं वे या नोट हो ही नहीं पाती या फिर वे इतनी उथली होती हैं कि दुबारा फिर उन्हें आसानी से उभार सकना सम्भव नहीं रहता।
मस्तिष्क विज्ञानी स्मरण शक्ति का आधार उस विद्युत धारा को मानते हैं जो संवाद वाहिनी तंत्रिकाओं में गतिशील रहती है। न केवल स्मृतियों का अंकन और पुनर्जागरण वरन् मस्तिष्कीय संरचना को अपना काम ठीक करने योग्य बनाये रहने में भी इसी विद्युतधारा की प्रधान भूमिका रहती है। विद्युत विज्ञान के छात्र आवर्तन शील विद्युतचक्र रिवर्वरेटिंग सर्किट की क्रिया-प्रतिक्रिया से परिचित होते हैं। नाड़ियों में रक्त परिभ्रमण की तरह कुछ विद्युतधारा भी अपने कार्यक्षेत्र में गतिशील रहती है। इस गतिचक्र में कितना विद्युत आवेश और परिभ्रमण में कितनी गतिशीलता है इन दोनों बातों पर यह निर्भर है कि स्मृतियों का स्थापन कितने समय तक और किस सीमा तक बना रहेगा। यह विद्युत स्व संचालन और स्व निर्मित होती है। मस्तिष्कीय तंत्रिकाओं की संरचना में सोडियम और पोटैशियम के-आयन काम करते हैं उनमें उथल-पुथल शरीर के अन्य अवयवों की भाँति होती रहती है। उसी सहज हलचल से मस्तिष्कीय विद्युतधारा उत्पन्न होती और अपना काम करती रहती है। यह झीनी तो होती जाती है पर पूर्णतया अन्त उसका तब तक नहीं होता जब तक कि जीव सत्ता का ही पूरी तरह अन्त न हो जाय।
मस्तिष्क यों शारीरिक अवयव माना जाता है पर जीव चेतना का केन्द्र संस्थान वही है। जड़ और चेतन का संगम इसी को माना जाता है। शरीर न रहने पर भी मस्तिष्क का सार-तत्व जीव चेतना के साथ लिपटा रहता है। मरणोत्तर काल में भी उसकी सत्ता बनी रहती है। भूत प्रेतों की परित्यक्त शरीर के साथ सम्बन्धित घटनाएँ स्मरण बनी रहती हैं और वे उस भूत चिन्तन के आधार पर ही अपना समय गुजारते हैं। वर्तमान और भविष्य के लिए उपयुक्त साधन उनके पास उस स्थिति में नहीं होते अस्तु भूतकालीन स्मृतियों का दबाव ही उन पर छाया रहता है। सम्भवतः मृतात्माओं का नाम करण ‘भूत’ इसी आधार पर किया गया हो। पुनर्जन्म में कइयों को कितनी ही घटनाएँ पिछले जीवन की याद बनी रहती है और ऐसे कथन बहुत बार आश्चर्यजनक रीति से सत्य पाये जाते हैं। इतनी तो हर किसी को होता है कि भूतकाल के अनुभव एवं संस्कार जन्म-जन्मान्तरों तक चलें जाते हैं। जन्म जात विशेषताओं का ऐसा परिचय भी बहुत बार मिलता है जिनकी आनुवांशिकी तथा पारिवारिक परिस्थितियों के साथ कुछ भी तालमेल नहीं बैठता। पूर्व जन्मों की संग्रहित पूँजी मस्तिष्क के बहीखाते में जमा रहती है और अपने अस्तित्व के प्रभाव का परिचय नये जन्म में भी देती रहती है।
ईंधन न मिलने पर चूल्हा ठंडा हो जाता है। मस्तिष्कीय कोशिकाओं को भी अपना काम सही रीति से करते रहने के लिए आक्सीजन का ईंधन चाहिए। बचपन में नई मशीन यह ईंधन पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध और वितरण करती है। तब मस्तिष्क को भी यह खुराक पर्याप्त मात्रा में मिलती है और बच्चों की स्मरण शक्ति तीव्र रहती है वे अपने पाठ आसानी से याद कर लेते हैं। जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, वैसे-वैसे कोमलता घटती है और कठोरता बढ़ती है। फलतः आक्सीजन का उत्पादन-वितरण घटता जाता है अवयवों में जो कोमलता बचपन अथवा किशोरावस्था में, होती है वह आयु बढ़ने के साथ घटती जाती है। आक्सीजन प्रवाह के मस्तिष्कीय कोशिकाओं तक पूरी तरह पहुँचने में भी व्यवधान उत्पन्न होता है। फलतः आयु के साथ-साथ स्मरण शक्ति घटती है। बुद्धिमत्ता समस्त स्मृतियों के मन्थन का निष्कर्ष है। अस्तु उसकी मात्रा तो बढ़ती है पर स्मरण शक्ति के सन्दर्भ में बच्चों की स्थिति की अपेक्षा बड़ी आयु वाले कमजोर ही पड़ते हैं। वृद्धावस्था में रक्त वाहिनियाँ कठोर पड़ जाती हैं और रक्त संचार उतनी अच्छी तरह नहीं हो पाता, फलतः मस्तिष्कीय कोशिकाएँ पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन न मिलने के कारण दुर्बल होती जाती हैं। फलतः बूढ़े लोगों की स्मृति दिन-दिन क्षीण होती जाती है। प्रायः वे अपने दैनिक उपयोग की वस्तुएँ तक जहाँ-तहाँ भूलने लगते हैं। परिचितों के नाम तक याद नहीं रहते।
इतने पर भी देखा गया है कि बूढ़ों को भी अपने बचपन या युवावस्था की वे स्मृतियाँ बिलकुल तरोताजा रहती हैं, जिन्हें वे महत्वपूर्ण समझते रहते हैं। देखा गया है कि वे अपनी उन स्मृतियों को आये दिन किसी न किसी को सुनाते रहते हैं। उन्हें वह सब कुछ इस प्रकार याद रहता है मानों अभी कल-परसों की बात हो। ऐसा इसलिए भी होता है कि नई स्मृतियाँ समुचित आक्सीजन के अभाव में न तो मस्तिष्कीय कोशिकाओं पर पूरी तरह अंकित हो पाती हैं और न उनमें स्थायित्व होता है। ऐसी दशा में नये स्मरणों की भीड़-भीड़ रहती नहीं और वे पुरानी अनुभूतियाँ निर्द्वन्द्व होकर पूरे मस्तिष्क पर छाई रहती हैं।
मस्तिष्क एक दीखता भर है, वस्तुतः वह असंख्य घटकों में विभाजित हैं। वे पृथक पृथक होते हुए भी परस्पर एक दूसरे के साथ अति घनिष्ठता पूर्वक बंधे हुए हैं और भरपूर सहयोग देते हैं। यह सहयोग जिस मस्तिष्क में जितना प्रखर होगा उसमें स्मरण शक्ति उतनी ही तीव्र पाई जायगी। जहाँ इस सहयोग में जितना अनुत्साह होगा वहाँ मंदबुद्धि एवं विस्मृति की शिकायत उसी अनुपात से बनी रहेगी।
ध्यान धारण में यह विशेषता है कि मस्तिष्कीय विद्युत का बिखराव रुकता है और उस तन्त्र में ऐसी उत्तेजना उत्पन्न होती है जिसमें तंत्रिकाओं का मध्यवर्ती सहयोग प्रखर हो उठे और स्मरण शक्ति का अभाव अनुभव न हो। इसके लिए ध्यान अभ्यासों में से जो भी अपने लिए उपयुक्त हो उसे चुन लेना चाहिए। एकाग्रता बढ़ाने वाले सभी अभ्यास मनोबल बढ़ाते और स्मरण रखने की क्षमता को सतेज कर देते हैं।
स्मृति संस्थान के घटकों की तुलना किसी प्रशिक्षित और घनिष्ठ सहयोग अनुशासन अपना कर चलने वाली सेना से कर सकते हैं। मस्तिष्कीय साम्राज्य को सुसंचालित रखने के लिए कुशल कर्मचारियों की एक कुशल सेना नियुक्त है। इन सैनिकों अथवा इंजीनियरों का नाम है- नर्व सेल्स- तंत्रिका कोशिकाएँ। इनकी संख्या प्रायः दस अरब आँकी गई है। इनकी लघुता देखते ही बनती है। कार्य की महत्ता और आकार की लघुता को देखते हुए ईश्वर की महिमा वर्णन में कही जाने वाली उक्ति ‘अणोरणीयान् महतो महीवान्’ मस्तिष्क तन्त्र पर भी पूरी तरह लागू की जो सकती है। तंत्रिकाएँ कोशिका का आकार एक इंच के हजारवें भाग से भी कम होता है और वजन की दृष्टि से वह एक ओस का छः खरबवाँ हिस्सा मात्र होती है।
सेना के सभी सदस्यों को यों पृथक पृथक काम करना पड़ता है, पर उसकी वास्तविक शक्ति सैनिकों के परस्पर मिलकर काम करने में और एक-दूसरे के लिए आवश्यक साधन जुटाते रहने में सन्निहित रहती है। ठीक यही पद्धति तंत्रिका कोशिकाओं में काम करती है। उन्हें परस्पर जोड़े रहने का कार्य नर्व फाइवर- तंत्रिका तन्तु-करते हैं। इनके इन्सुलेशन पूरी तरह इस संस्थान पर छाये हुए हैं और उनमें बिजली के- इपल्स- दौड़ते रहते हैं। यों प्रत्येक कोश और तन्तु अपने आप में महत्वपूर्ण और अपनी भौतिक विशेषता से सम्पन्न हैं तो भी उन्हें मिलजुलकर ही अपना काम सम्पन्न करना पड़ता है। उनकी संयुक्त शक्ति से ही विभिन्न मानसिक प्रयास बनते और चलते हैं। इन्द्रिय संस्थान से जो कोई सूचनाएँ मस्तिष्क में पहुँचती हैं उनका क्या उपयोग किया जाय इसका मुकदमा मस्तिष्क मजिस्ट्रेट को तत्क्षण करना पड़ता है। यह अनायास ही नहीं हो जाता । इसके लिए अनेकों गवाहों, वकीलों, सबूतों, नजीरों, कानूनों की उसे देखभाल करनी पड़ती है। इस कार्य में तंत्रिका कोशिकाओं में संग्रह हुए अनुभव काम आते हैं। विभिन्न व्यक्तियों की कोशिकाएँ पृथक पृथक प्रकार के अनुभव एवं अभ्यास सँजोये रहती है। इसलिए उनके निर्णय भी भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। एक ही प्रश्न पर लोगों के अलग अलग प्रकार के फैसले होते हैं यह उनके कोशिका समूह के संग्रहित अनुभवों और अभ्यासों की भिन्नता पर निर्भर रहता है। इन कोशिकाओं के छोटे-छोटे समूह होते हैं जो परस्पर मिलकर एक प्रकार का काम पूरा करने की दृष्टि से क्षमता और अभ्यस्त होते हैं। यह मण्डलियाँ कभी-कभी तो दस-दस हजार कोशिकाओं की टीम की तरह मिल जुलकर काम करती देखी गई हैं। सभी दस अरब कोशिकाएँ एक साथ तो काम धाम नहीं करती, पर सामान्य रूप से जो काम होता रहता है उसे भी जब इलेक्ट्रो एन्सेफैलोग्राम जैसे यंत्रों से देखा जाता है तो लगता है खोपड़ी के भीतर भयंकर विद्युतीय तूफान उठते और भारी हलचलें उत्पन्न करते हैं। अब तक बने कम्प्यूटरों में जो सर्वश्रेष्ठ है उनमें दस लाख से अधिक इकाइयाँ नहीं रखी जा सकीं और उनमें से प्रत्येक का संपर्क समीपवर्ती पाँच छः के साथ ही जुड़ सकना सम्भव हो सका है, पर इसकी तुलना में मस्तिष्क की तुलना कर सकना अतीव कठिन है। यों मस्तिष्क एक है और उसके सभी घटक एक दूसरे के साथ पूर्णतया सुसम्बद्ध हैं इतने पर भी विभिन्न मानसिक क्रिया-कलापों के लिए छोटे बड़े विभिन्न क्षेत्र निर्धारित हैं और अपने अपने जिम्मे के काम निपटाने में लाखों करोड़ों कोशिकाएँ चींटियों, दीमकों एवं मधुमक्खियों की तरह एक जुट होकर काम करती देखी जा सकती हैं। इनकी क्रियाशीलता न केवल वर्तमान जन्म के द्वारा संग्रहित अनुभवों पर निर्भर है वरन् उसमें वंश परम्परागत अनुभवों और अभ्यासों का भी भण्डार भरा रहता है।
पशु पक्षियों तथा दूसरे जीव जन्तुओं के मस्तिष्क तो प्रायः इन आनुवांशिकी उपलब्धियों के सहारे ही अपना सारा क्रिया कलाप चलाते हैं।
मस्तिष्कीय गतिविधियों की प्रत्यक्ष जानकारी को देखते हुए उसे किसी अलौकिक कलाकार की अद्भुत संरचना कहा जा सकता है। वैसा कुछ बना सकने की बात सोचने का साहस ही कौन करेगा, अभी तो उसकी गतिविधियों को समझ सकने में ही बुद्धि हतप्रभ रह जाती है। अनुमान है कि विदित मस्तिष्कीय गतिविधियाँ बहुत स्वल्प है। समूची मानसिक क्षमता का प्रायः सात प्रतिशत ही क्रियाशील पाया जाता है। शेष तो अभी अविदित अर्धमूर्छित स्थिति में ही सील बन्द स्टोर की तरह सुरक्षित पड़े हैं। जो क्रियाशील हैं वे उस प्रयोजन में काम आते हैं जिसमें सामान्य जीवन की निर्वाह व्यवस्था का संचालन होता है। निर्वाह प्रयोजन तो समग्र जीवन सत्ता का एक छोटा सा अंश है। उसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ सोचने और करने को बच जाता है। कभी किसी को उस अविज्ञात को जानने की, निष्क्रिय को क्रियाशील बनाने की और प्रसुप्त को जागृत करने की आवश्यकता पड़े तो उसे इन सील बन्द स्टोरों को खोलना पड़ेगा जो अपने भीतर बढ़ी-चढ़ी दिव्य क्षमताएँ छिपाये हुए हैं। उच्च अध्यात्म प्रयोजनों के लिए इन्हीं कोष्टकों को खोलने और उनसे उपलब्ध क्षमता को असाधारण कार्यों में लगाने का प्रयत्न योगी तपस्वियों द्वारा किया जाता है।
स्मृति-विस्मृति को चर्चा करने की अपेक्षा जागृति और सुषुप्ति के आधार पर विवेचन करना अधिक युक्तिसंगत है। असावधानी उपेक्षा और अनुत्साह की मनःस्थिति रहेगी तो विस्मृति की शिकायत बनी ही रहेगी । जहाँ ऐसी कठिनाई अनुभव होती हो वहाँ मानसिक पोषण देने वाले आहार का परामर्श देना कोई विसंगति नहीं है, पर अधिक उपयुक्त यह है कि चिन्तन तन्त्र पर छाई हुई शिथिलता को दूर किया जाय। इसके लिए ध्यान धारण के सभी उपचार न्यूनाधिक मात्रा में लाभदायक ही सिद्ध होते हैं। उपासना में ध्यान धारण पर जोर देने के अनेक लाभों आध्यात्मिक लाभों के अतिरिक्त एक अतिरिक्त लाभ यह भी है कि उसे करते रहने पर विस्मृति की शिकायत पनपने नहीं पाती।
इन दिनों हम अर्थ सभ्यता के युग में रह रहे हैं। बौद्धिक रुझान उसी की देन है। विज्ञान का अभ्युदय अर्थ तन्त्र द्वारा ही नियोजित होता है। शिक्षा से लेकर शासन तक, साहित्य से लेकर कला तक, धर्म से लेकर अध्यात्म तक के छोटे-बड़े महत्वपूर्ण, महत्त्वहीन अगणित प्रयोजन अर्थ तन्त्र के संकेतों पर गतिशील रहते हैं। ऐसी दशा में बेचारा मानव क्या करे ? क्या सोचे ? किस आधार पर आदर्शों का अवलम्बन लिए हुए कमर सीधी करके खड़ा रह सके, यह एक जटिल प्रश्न है। जो ढर्रा चल रहा है उसे ही चलने दिया जाय तो मनुष्य क्षीण होते-होते नैतिक मृत्यु के समीप जा पहुँचेगा और वह स्वयं पशुवत् आचरण करेगा अथवा भय और प्रलोभन के दबाव से समर्थ लोगों द्वारा कहीं भी घसीट लिया जाएगा । यह स्थिति बहुत ही दयनीय होगी जब मनुष्य का आत्म-वर्चस्व मर जाएगा और सुविधा ही उसका सर्वस्व बन जायगी।
संसार के हर क्षेत्र में गति आई है और तेजी बढ़ी है। तथाकथित ‘प्रगति’ में भी इस तीव्रता को गगन-चुम्बी बनाने की दिशा में बहुत कुछ सोचा और बहुत कुछ किया जा रहा है। इस तीव्रगामिता में पतन और विनाश भी शामिल है। नीरसता और कुरूपता बढ़ रही है। सरसता पाने के लिए लोग छविग्रहों, नग्नता के उपक्रमों, मद्य तलाश में दौड़ते हैं। होटल जितना लेते हैं उसका शतांश भी दे नहीं पाते। ऐसी दशा में पाने के लिए गया हुआ निरीह ‘मनुष्य’ जेब कटाते हुए-तिरस्कृत हुए-हारे जुआरी की तरह वापिस लौटता है। इस असहाय प्राणी के पास सजधज, ऐंठ-अकड़ के लिए तो कुछ होता भी है, पर भीतर से इतना खोखलापन रहता है कि चारित्रिक दृढ़ता की अपेक्षा नहीं ही की जा सकती । हवा के झोंके के साथ उड़ने वाले तिनके की तरह वह कहीं भी, किसी भी दिशा में उड़ता या उड़ाया हुआ देखा जा सकता है। यह मनुष्य के मरण का चित्रण है भले ही उसमें काया को जीवित समझा जाता रहे।
मनुष्य महान है। यह विश्व, भगवान की कृति ही माना जाएगा, किन्तु स्पष्ट है कि धरती पर जो कुछ भी सुखद सुन्दर है उसे बनाने में मनुष्य का असीम श्रम लगा है। मनुष्य की सृजन शक्ति घटेगी या मिटेगी तो यह दुनिया भी उठेगी नहीं, गिरेगी। मनुष्य टूटेगा-हारेगा तो समूची सभ्यता ही हार जायगी। मनुष्य मरेगा उसकी आत्मा गलेगी तो फिर यह जो कुछ भी बचा रहेगा उसे श्मशान की तरह जलता और दुर्गन्ध फैलता हुआ-डरा-बना ही पाया जाएगा । स्वर्ग की गरिमा बहुत है पर नरक की विभीषिका का आतंक भी कम कहाँ है ? यदि हम वर्तमान को समझ सके और भविष्य का अनुमान लगा सके तो एक ही तथ्य सामने रह जाएगा कि किसी भी कीमत पर मनुष्य को-उसके वर्चस्व को-मरण से बचाने और जीवित रखने का प्रयत्न किया जाय।
समय की सबसे बड़ी आवश्यकता मनुष्य को मनुष्य-सच्चा मनुष्य बनाने के लिए प्रबल प्रयत्न करने की है। मनुष्य के मानसिक, बौद्धिक, नैतिक, कलात्मक, आध्यात्मिक, भावनात्मक, दार्शनिक एवं क्रियात्मक आदि सभी पक्ष ऐसे हैं जिन्हें स्वस्थ और शालीन रखे जाने की आवश्यकता है। बौद्धिक और आर्थिक प्रगति के लिए कुछ भी किया जाय-नैतिक स्थिरता एवं प्रौढ़ता पर कम नहीं अधिक ही ध्यान दिया जाय। इसके लिए सोचते रहने से काम नहीं चलेगा। जिस प्रकार कृषि, उद्योग, बिजली, शिक्षा, सुरक्षा आदि के भौतिक प्रयत्न किये जाते हैं उनसे हलके नहीं भारी प्रयत्न ही नैतिक परिपक्वता के लिए आवश्यक होंगे ।
शरीर की सुरक्षा और दृढ़ता उसके अन्तराल में सन्निहित एक विशेष शक्ति पर निर्भर है जो यन्त्रों से तो नहीं परखी जाती, पर होती जीवन प्राण स्तर की है। इसे अनुकूलन, एडेप्टेशन कहते हैं। कभी-कभी इसे जीवनी शक्ति भी कहा जाता है। यह पर्याप्त मात्रा में हो तो शरीर में स्फूर्ति, मन में उमंग, बुद्धि में सन्तुलन, भावनाओं में उदार संवेदन का बाहुल्य दृष्टिगोचर होगा। साहस, आशा, उत्साह इसी जीवनी शक्ति के परिणाम प्रस्तुत करते हैं। यह एडेप्टेशन जब गहराई में जाकर आत्मबल बन जाता है- जिसका अर्थ होता है चारित्रिक दृढ़ता, उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श क्रिया-कलाप प्रकारान्तर से इसी को महानता कहते हैं।
जिस प्रकार शरीर की दृढ़ता आहार पर और मन की साहसिकता, शिक्षा पर निर्भर है उसी प्रकार व्यक्तित्व की गरिमा प्रतिभा, पद या वैभव पर नहीं, व्यक्ति की आन्तरिक महानता पर निर्भर है और यह उदात्त दृष्टिकोण पर-आदर्शवादी निष्ठाओं पर निर्भर है। यही है वह तत्व जो मनुष्य को महत्वपूर्ण एवं बहुमूल्य बनाता है। इसकी कमी पड़ने से ही क्षुद्रता बनी रहती है और पिछड़ापन बढ़ता जाता है, भले ही छुट-पुट भौतिक सफलताएँ किसी प्रकार हाथ लग जावे।
जीवन सत्ता में अनेकों तत्व जुड़े हुए हैं, उनमें से जिनका उपयोग होता है वे उभरते और बलिष्ठ होते चले जाते हैं। जिनकी उपेक्षा रहती है जो काम में नहीं आते, वे घटते और लुप्त होते चले जाते हैं। मानवी अन्तराल में काम करने वाली उत्कृष्टता जिसे शरीर क्षेत्र की एडेप्टेशन शक्ति के समतुल्य माना जा सकता है, यदि घटेगी तो विकृतियाँ भीतर से उभरेंगी और बाहर से आक्रमण करेगी। सर्वविदित है कि जब शरीर की जीवनी-शक्ति घट जाती है तो हाथ-पैरों की सक्रियता, पेट की पाचन शक्ति, मस्तिष्क की तीक्ष्णता और रक्त की रोग निरोधक क्षमता में भारी कमी आ जाती है। वाह्य उपचारों से उसकी आँशिक-यत्किञ्चित् पूर्ति ही हो पाती है। जिसका रोग-निरोधक तत्व घट जाय तो बहुमूल्य उपचार करने पर भी मामूली से घाव भरने में नहीं आते। संकल्प-शक्ति के अभाव में दैनिक जीवन के छोटे-छोटे काम तक अधूरे पड़े रहते हैं। छोटे-छोटे प्रलोभनों का आकर्षण चरित्र को गिरा देता है- छोटे-छोटे अवरोध सन्तुलन डगमगा देते हैं और भयभीत व्यक्ति कुछ भी अकरणीय करने पर उतारू हो जाता है। इस विषम परिस्थिति की छाया जीवन के जिस क्षेत्र में जितनी मात्रा में दृष्टिगोचर होती है उसमें उसी काम रूप की समस्याएँ उपजती हैं। उनकी जटिलता उसी अनुपात से अधिक होती है और वे सुलझने में उतना ही अधिक समय लगाती हैं। साधारण बुद्धि इन उलझनों को खण्ड-खण्ड करके देखती है और उनके पृथक-पृथक उपचार सोचती हैं, जब कि समस्त समस्याओं के मूल में एक ही तथ्य काम करता है- मानवी गरिमा के प्रति आस्था का अभाव। इसी को ईमान कहते हैं। नास्तिकता मर्ज के मरीज हैं। नास्तिकता ईश्वर की अस्वीकृति को नहीं आत्मा का प्रसंग है। आस्था रहित व्यक्ति के पग-पग पर पतित होने की आशंका बनी रहेगी। इसके विपरीत जिसके अन्तःकरण में श्रेष्ठता के प्रति श्रद्धा की सघनता है उसे निरन्तर प्रतिकूलताओं के बीच रहते हुए पतित आचरण करने की स्थिति न आने पावेगी। वह आत्मबल के सहारे बाहरी सभी दबावों को हँसते-हँसाते सहन करते हुए समय काट लेगा। ज्वार-भाटे चलते रहते और मध्य सागर में जहाज अपना लंगर डाले शान्तिपूर्वक खड़े रहते हैं। आस्थावान् व्यक्तित्व किन्हीं भी परिस्थितियों में विचलित नहीं होते । उनकी यह उत्कृष्टतावादी दृढ़ता-महानता-न केवल उन्हें ही श्रेय प्रदान करती है, वरन् अपने प्रभाव क्षेत्र को-सामयिक वातावरण को भी समुन्नत बनाने में सहायता करती है।
साधन तो उपकरण हैं- मूल सत्ता तो साधक की है। साधक यदि अनाड़ी या उद्धत हो तो उपयोगी साधन भी विनाश का कारण बनेंगे । सुई और माचिस जैसे छोटे उपयोगी साधन तक दुरुपयोग किये जाने पर मरण संकट खड़ा कर सकते हैं। प्रयोक्ता चेतना होती है और प्रयुक्त की जाने वाली वस्तुएँ जड़। पदार्थ का महत्व कितना ही क्यों न हो-उसमें गुण कैसे ही क्यों न हों प्रयोक्ता का पिछड़ापन उपलब्ध साधनों से मात्र विपत्ति ही उपार्जित करेगा। इसके विपरीत सुसंस्कृत व्यक्ति स्वल्प साधनों से भी सुखी रह सकता है और उनका सदुपयोग करके साधन सम्पन्न लोगों से भी बढ़ी-चढ़ी सफलताएँ प्राप्त कर सकता है। हम साधन वृद्धि में जोरों से लगे हैं, पर यह भूल गये हैं कि जिसके द्वारा इन साधनों का उपयोग होना है उनके स्तर में अभिवृद्धि हो रही है या नहीं। इस दिशा में बरती जाने वाली वर्तमान उपेक्षा यदि भविष्य में भी ऐसी ही बनी रही तो बढ़ते हुए साधनों से विपत्ति ही बढ़ेगी । तब वह सम्पन्नता-दरिद्रता से भी अधिक महँगी पड़ेगी । विज्ञान, बुद्धि और अर्थ साधनों द्वारा सुविधा संवर्द्धन के लिए किये जाने वाले प्रयासों की प्रशंसा ही की जो सकती है, पर ध्यान रखने योग्य बात एक ही है कि यदि व्यक्तित्व के स्तर की प्रगति को महत्व न दिया गया तो परिणाम सुखद न होगा। तालाब में पानी बढ़ता है तो तैरने वाले कमल पुष्पों का डंठल भी ऊँचा उठता है। पानी बढ़े डंठल न उठा तो तैरने वाले शोभायमान कमल पुष्पों के डूब कर नष्ट होने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा । साधन बढ़ना सराहनीय हैं, पर उपभोक्ता का स्तर भी बढ़ना चाहिए। रोगी के लिए पौष्टिक आहार भी कहाँ हितकर सिद्ध होता है ?
मनुष्य, समाज का एक अंग है। यह तथ्य है और यह भी सत्य है कि समाज के हित में जीवनयापन करने के लिए व्यक्ति को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इसलिए नागरिक शास्त्र, समाज शास्त्र के सिद्धान्तों को समझना समझाया जाना आवश्यक है। संघबद्धता, सामूहिकता और संगठनों पर जोर दिया जाता है और समाज हित में काम करने के लिए कानूनी बन्धनों में जकड़ा जाता है। अधिनायकवाद में व्यक्ति के मौलिक अधिकार अपंग कर दिये जाते हैं और उसे यांत्रिक स्तर पर समाज व्यवस्था का अनुसरण करने के लिए बाधित किया जाता है। इस प्रयास के औचित्य-अनौचित्य की चर्चा इन पंक्तियों में नहीं हो रही है। यहाँ तो इतना ही कहा जा रहा है कि यदि आन्तरिक महानता न बढ़ सकी-आत्मा की दृष्टि से यदि मनुष्य आस्थावान न हो सका तो उसके यांत्रिक सहयोग का मूल्य पशु श्रम जितना ही रह जाएगा। उतने भर से आदर्शवादी परम्पराओं के लिए भाव भरी उमंगों की पूर्ति न हो सकेगी।
सामाजिकता का दूसरा नाम है- सभ्यता सभ्यता का अपना मूल्य और महत्व है। किन्तु उसका प्राण तो संस्कृति है। संस्कृति का अर्थ है- आदर्शवादी आस्था-उदात्त चिन्तन दृष्टि। संस्कृति को प्राण और सभ्यता को काया कह सकते हैं। उत्कृष्ट आस्थाएँ मनुष्यता का प्राण है और सद्व्यवहार का लोकाचार उसका कलेवर। कलेवर कितना ही सुसज्जित क्यों न हो यदि उसके भीतर निवास करने वाली चेतन सत्ता निष्प्राण है तो फिर उस सुसज्जा से कितना प्रयोजन पूरा हो सकेगा। जीवन स्तर 'लिविंग स्टेंडर्ड' बढ़े इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है, पर यदि जीवन को दिशा देने वाला आस्था परक स्तर गया-गुजरा ही बना रहा तो मात्र जीवनयापन की सुविधायें बढ़ जाने से क्या काम चलेगा ? असली प्रगति तो आस्था क्षेत्र में उत्कृष्टता के समावेश का अनुपात देखकर ही आँकी जानी चाहिए। जब तक व्यक्तित्वों का अन्तराल ऊँचा न उठेगा तब तक यांत्रिक सामूहिकता कुछ विशेष उपयोगी सिद्ध न होगी। मधुमक्खियों में सामाजिकता और सामूहिकता देखने ही योग्य है। इतने पर भी उसका कोई महत्व नहीं। क्योंकि वे प्राणी व्यक्तित्व की दृष्टि से समुन्नत नहीं हैं, मात्र उनका शरीर ही यात्रा की सामूहिकता के नियम पालन करती है। मनुष्यों को भी नागरिक नियमों के पालन का अभ्यस्त बनाया जाता है जैसा कि सभ्यताभिमानी पाश्चात्य देशों में प्रचलन भी है। इसका विरोध कौन करेगा ? बात उस कमी को पूरा करने की है जिसके कारण शिक्षित और सम्पन्न व्यक्ति भी मानवी गरिमा का आनन्द लेने और देने में असमर्थ ही बना रहता है।
आज की परिस्थितियाँ कबाड़ी बाज़ार जैसी हो गई है, उसमें उपयोगी, अनुपयोगी के ढेर लग गये हैं। हमें औचित्य का चुनाव, वरण और संग्रह करना होगा। सौंदर्य अभीष्ट है विलासिता नहीं। विज्ञान अभीष्ट है जड़ता की अभ्यर्थना नहीं, तत्त्वज्ञान चाहिए अन्ध-विश्वास नहीं। ढर्रे में भारी परिवर्तन करना होगा। औद्योगिक क्रान्ति से भी अधिक बड़ी एक और क्रान्ति आवश्यक है- जिसे विचार क्रान्ति कह सकते हैं। ऐसी विचार क्रान्ति जिसमें पुरातन की समस्त श्रेष्ठताएँ सुरक्षित रखते हुए विनाशकारी विकृतियों से विमुख होने का प्राणवान साहस काम करता दृष्टिगोचर हो सके। मनुष्य का जीवन-मरण इसी अभिवर्धन परिवर्तन पर अवलम्बित है।
शरीर की मूल प्रकृति बीमार होने की नहीं है। सृष्टि के असंख्य प्राणियों को अपने अपने ढंग के शरीर मिले हैं वे निर्धारित आयु तक बिना किसी व्यथा बीमारी के जीवित रहते हैं। मृत्यु दुर्घटना आदि तो अपने हाथ की बात नहीं; पर बीमारी का उत्पादन अपना निजी है, उसे अपनी रीति नीति बदलकर आसानी से रोका जा सकता है। स्वास्थ्य सुरक्षा की सर्वविदित नीति यह है कि प्रकृति के अनुरूप अपना आहार विहार, रहन सहन बनाये रखा जाय जैसा कि सृष्टि के सभी प्राणी बनाये रखते और चैन से जीते हैं। इन्द्रियों का संयम बरता जाय, दिनचर्या ठीक रखी जाय, श्रम और आराम का सन्तुलन रहे, मस्तिष्क को उत्तेजनाओं से बचाये रखा जाय, स्वच्छता का ध्यान बना रहे तो इन मोटे नियमों का पालन भर करने से रोगों से बहुत हद तक छुटकारा मिल सकता है। स्व उपार्जित बीमारियों का ही बाहुल्य रहता है- बाहर से तो बहुत कम आती है। मौसम का प्रभाव, वंशगत विकार, छूत, दुर्घटना आदि कारणों से भी अप्रत्याशित रोग हो सकते हैं; पर उनका अनुपात बहुत स्वल्प रहता है। उन्हें अपवाद भर समझा जा सकता है। मूल उत्पत्ति तो अपनी ही उच्छृंखलता से होती है। अव्यवस्थित और विकृत आदतों का शिकार होकर ही मनुष्य बीमार पड़ता है। आमतौर से औषधि उपचार ही रोग निवारण के लिए प्रयुक्त होता है; पर ध्यान रखने योग्य बात यह है कि उसमें लाभ की मात्रा से कम हानि की मात्रा ही है।
मारक औषधियाँ घातक अस्त्र की तरह हैं जिनमें मारकाट मचाने की क्षमता तो है; पर इतनी बुद्धि नहीं है कि कुश्ती लड़ रहे पहलवानों में से एक को बचाने दूसरे को गिराने की भूमिका निभा सकें। उनके लिए मित्र शत्रु का अन्तर करना सम्भव नहीं। आग लगती है तो उपयोगी, अनुपयोगी दोनों को ही जलाती है। शरीर में रोग के कीटाणु किसी एक जगह इकट्ठे बैठे नहीं रहते जहाँ हमला करके उन्हें मार गिराया जा सके, स्वस्थ रक्त कण उन विषाणुओं से गुत्थम गुत्थी करने में जुटे होते हैं। ऐसा कोई उपाय अभी तक नहीं ढूँढ़ा जा सका जो मात्र विषाणुओं को तो मारे पर स्वस्थ संरक्षकों को बचा ले। औषधियाँ पाचन तन्त्र से होकर रक्त में पहुँचती हैं अथवा सुई लगाकर सीधी रक्त में प्रवेश कराई जाती हैं। हर हालत में रक्त में भी ऐसी विषाक्तता का समावेश करना पड़ता है जो रोग कीटाणुओं का संहार कर सके। स्पष्ट है कि इस मरण अनुष्ठान का प्रभाव आक्रमण और संरक्षक दोनों ही पक्षों पर समान रूप से पड़ता है। दोनों की ही हानि समान रूप से होती है। ऐसी दशा में शत्रुनाश के सौभाग्य के साथ साथ मित्रनाश की क्षति भी उठानी पड़ती है। संरक्षण तत्व घट जाने से शरीर की निरोधक सामर्थ्य घट जाती है फिर पुराने शत्रुओं को उभरने और नये को घुस पड़ने के लिए खाली मैदान हाथ लगता है और वे फिर अधिक निश्चिन्तता पूर्वक अपनी विनाश लीला रचते रहते हैं। यहाँ इतना अवश्य होता है कि कम स्वस्थ विजातीय तत्वों को मार भगाने का जो प्रबल प्रयत्न करते थे और जिसकी अनुभूति तीव्र रोगों के रूप में होती थी वह नहीं होती। निरोग से असमर्थ शरीर रोगों के आक्रमण का मन्द प्रतिरोध करता है अस्तु जीर्ण रोगी ऐसे ही कुलमुलाते रहते हैं जोर से रोते चिल्लाते नहीं। किन्तु इससे क्या, जीवनी शक्ति घट जाने से क्रियाशीलता तो नाम मात्र को ही रह जाती है। थका हारा, क्षत विक्षत शरीर किसी प्रकार मरण के दिन पूरे करता है उसमें पुरुषार्थ की क्षमता ही नहीं रहती है। ऐसे लोग पूरी जिन्दगी भी नहीं जी पाते उन्हें अकाल मृत्यु से मरना पड़ता है।
पूरी या अधूरी तरह संज्ञा शून्य करने वाली दवाओं के नाम रूप बढ़ते जाते हैं। इसके लिए अनेकों रसायन ढूँढ़ लिये गये हैं। अब अकेली अफीम ही इस कार्य को पूरा नहीं करती उसकी अनेकों सहेलियाँ मैदान में आ गई हैं जो उसका हाथ बँटाती और बोझ हलका करती हैं। ‘एस्प्रीन’ प्रसिद्ध दवा है जो सिर दर्द को राहत पहुँचाती है। अफीम के सत्व की सुइयाँ लगाकर अभी भी वेदना की अनुभूति को रोक दिया जाता है। निद्रा लाने वाले रसायन भी लगभग यही करते हैं। इस उपचार से रोगी का चिल्लाना तो दूर हो जाता है; पर रोग की विनाश लीला में कोई अन्तर नहीं पड़ता। पीड़ा में जहाँ कष्ट होता है वहाँ एक लाभ भी है कि उससे निवारक संघर्ष तीव्र होता है और रोग की निवृत्ति में भारी सहायता मिलती है। कष्ट की अनुभूति घट जाने से उस मोर्चे पर युद्ध सैनिक भेजने और विकृति को परास्त करने की चिन्ता से मस्तिष्क को छुट्टी मिल जाती है। फलतः रोगों को अपनी जड़ जमाने का अधिक अच्छा अवसर मिल जाता है। इस प्रकार शामक औषधियों से वेदना निग्रह में जितनी राहत मिलती है उतनी ही यह कठिनाई भी बढ़ती है कि प्रकृति का निरोधक संघर्ष शिथिल पड़ जाने से बीमारियाँ अपना अड्डा जमा कर बैठ जाने में सफल हो जाती हैं।
आपत्तिकालीन सुरक्षा के लिए औषधि ली जा सकती है। उन्हें न छूने जैसा दुराग्रह करने की आवश्यकता नहीं है। ध्यान रखने की बात इतनी ही है, मूल समस्या स्वास्थ्य रक्षा के नियमों-उपनियमों का पालन करने की है। उस ओर ध्यान न दिया गया तो औषधि उपचार का लाभ जादू का तमाशा देखने जैसी खिलवाड़ बनकर ही रह जाएगा । मूल समस्या का चिरस्थायी समाधान उतने भर से हो नहीं सकेगा। प्रकृति का अनुसरण करने और आहार विहार के नियमों का कठोरतापूर्वक पालन करने से ही निरोग जीवन जी सकना सम्भव हो सकता है।
स्वास्थ्य संवर्द्धन के लिए टॉनिकों का- पौष्टिक आहारों का- आसरा तकने से काम नहीं चलेगा। यदि उनके सहारे बलिष्ठता सम्भव रही होती तो साधन सम्पन्न लोगों में से एक भी कमजोर दिखाई न पड़ता; वे पैसा खर्च करके प्रचुर परिमाण में पुष्टाई खरीद लिया करते। तब संसार में एक भी धनवान् व्यक्ति दुर्बल दिखाई न पड़ता। इसी प्रकार यदि औषधि उपचार से रोग निवृत्ति सम्भव रही होती तो कम से कम चिकित्सा व्यवसायी और औषधि निर्माता तो बीमार नहीं ही दिखाई पड़ते। वे दूसरों की तो उपेक्षा भी कर सकते थे पर अपनी एवं अपने स्वजनों की रुग्णता क्यों सहन करते। अपने लिए तो अच्छी औषधियाँ बना ही सकते थे और निदान उपचार के सहारे अपने घर से तो बीमारियों को निकाल बाहर कर ही सकते थे पर ऐसा होता कहाँ हैं। सच तो यह है कि चिकित्सकों के घरों में बीमारियाँ सामान्य लोगों की तुलना में कम नहीं कुछ अधिक मात्रा में ही घुसी रहती हैं। दूसरे लोगों को औषधियों पर जितना अविश्वास होता है, डाक्टरों के घरों में उससे कम नहीं अधिक ही अविश्वास पाया जाता है। सामान्य लोग तो औषधियों के स्वाद एवं पैसा खर्च होने के कारण भी उन्हें खाने से आना कानी करते होंगे, पर चिकित्सकों के घर वाले जानते हैं कि मुद्दतों से जेब खाली करते रहने वाले और आये दिन दवाखाने पर खड़े रहने वाले रोगी जब इन औषधियों से कुछ राहत नहीं पा सके तो हमें ही उनसे क्या कुछ मिलने वाला है। इस अविश्वास के कारण ही उन घरों में दवा दारु खाने के सम्बन्ध में उपेक्षा बरती जाती रहती है।
यदि बीमारियाँ सचमुच ही कष्टकारक लगती हों- उनके कारण होने वाली आर्थिक तथा दूसरे प्रकार की हानियाँ अखरती हों और उनसे पीछा छुड़ाना यदि वास्तविक रूप से अभीष्ट हो तो कारण और निवारण पर गम्भीरता पूर्वक विचार करने की आवश्यकता होगी और यह देखना होगा कि अस्वस्थता के विषवृक्ष की जड़ें कहाँ हैं। पत्ते तोड़ने से नहीं जड़ काटने से ही स्थायी निराकरण सम्भव हो सकेगा।
इलिच का कथन है- तथाकथित गुणकारी औषधियों का एक हानिकारक पक्ष भी है जिसे प्रकट नहीं किया जाता और गुण ही गुण गाये जाते रहते हैं। दोष अपना काम करते हैं। जहाँ गुण पक्ष से यत्किञ्चित् लाभ होता है वहाँ उसके विषाक्त प्रभाव से होने वाली हानि उतनी बड़ी होती है कि तुलना करने पर औषधि सेवन का लाभ कम और घाटा अधिक रहता है। बहुप्रचलित ‘पेन्सलीन’ के साथ एनर्जी उत्पन्न करने वाले तत्वों पर भी ध्यान दिया जा सके तो उसे प्रयोग करने से पूर्व सौ बार विचार करने और हर कदम फूँक फूँक कर धरने की आवश्यकता पड़ेगी, कुछ समय पूर्व वेदना हीन प्रसव के लिए थियेल्डो-पादट नामक औषधि ने विश्व व्यापी ख्याति कुछ ही समय में प्राप्त कर ली थी । किन्तु जब उसके प्रभाव से विकलांग बच्चे उत्पन्न होने की बाढ़ आई तो उसके निमार्ण एवं प्रयोग पर कानूनी प्रतिबन्ध लगाये गये । इसी प्रकार एक अन्य औषधि क्लोरम फेनिकोल को भी निषिद्ध घोषित किया गया था। सौन्दर्य प्रसाधनों में प्रयुक्त होने वाली ‘हैक्सा क्लोरो फैन’ के कारण उत्पन्न होने वाली हानियाँ सामने आई तो सुन्दरता और कोमलता के नाम पर प्रयुक्त होने वाली इस दवा पर रोक लगाई गई।
रोग मारने वाली दवाओं की बाज़ार में भरमार है। इन के गुणगान तो बहुत किये जाते हैं, पर यह नहीं बताया जाता कि इनके कारण शरीर की प्रकृति प्रदत्त रोग निरोधक शक्ति घटती है और विषाणुओं में मारक औषधि पचाने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। डी0 डी0 टी0 का प्रमाण सामने है। आरम्भ में तो उसके प्रयोग से मच्छर मरे थे। किन्तु जो बच रहे उनने ऐसी पीढ़ियाँ उत्पन्न कर लीं जिन पर डी0डी0टी0 का असर नहीं होता और वे उसे खुराक की तरह पचाते हैं। मलेरिया के फिर वापिस लौटने पर सर्वत्र यह चिन्ता संव्याप्त है कि कहीं चेचक भी फिर से वापिस न लौट पड़े। इसी प्रकार अन्य मारक औषधियों के अन्धाधुन्ध प्रचलन की समीक्षा करते हुए ’न्यू साइन्टिस्ट’ पत्रिका के एक लेख में आशंका प्रकट की गई है कि कहीं ऐसा न हो कि बीमारियों से लड़ने वाले उपचारों का तरकस ही खाली हो जाय और आज की उत्साहवर्धक मारक औषधियाँ भविष्य में निरर्थक सिद्ध होने लगें।
रोग का होना यह प्रकट करता है कि शरीर में विजातीय द्रव्य भर गया है और उसके विरुद्ध जीवनी शक्ति ने खुली लड़ाई आरम्भ कर दी है, साथ ही यह भी जानकारी मिलती है कि आहार विहार में घुस पड़ी विकृतियाँ शरीर के ढाँचे की तोड़ फोड़ कर रहीं हैं। इस स्थिति के निराकरण के ऐसे सौम्य उपाय होने चाहिए जिसमें जीवनी शक्ति बढ़े और विषाणुओं को मिलने वाला परिपोषण बन्द हो गया। इसके लिए संचित मल के निष्कासन एवं अवयवों को विश्राम देने वाले उपाय अपनाये जाने चाहिए। उस ओर उपेक्षा रखी जाय और रोग के ऊपरी लक्षण कष्ट को दबाया जाय तो इससे कुछ स्थायी समाधान न निकलेगा। बाढ़ का पानी मेंड़ के एक रास्ते न सही दूसरे रास्ते वह निकलेगा। एक बीमारी अच्छे होते होते दूसरी नई व्याधियाँ उठ खड़ी होती हैं। इससे प्रकट होता है कि मात्र ऊपर से ही लीपा पोती हुई है विभीषिका का अस्तित्व अपने स्थान पर यथावत मौजूद है।
रोगों की उत्पत्ति कई कारणों की मिली जुली प्रतिक्रिया है। वर्तमान रोगों में से अधिकाँश को साइको सोमेटिक-आधि व्याधि का सम्मिश्रण कह सकते हैं, उनमें शारीरिक और मानसिक दोनों ही विकृतियाँ जुड़ी रहती हैं। उनमें सामाजिक एवं आर्थिक दबाव भी सम्मिलित रहते हैं। परिवार की उलझनों और समस्याओं पर सोचने की शैली भी आन्तरिक सन्तुलन को बिगाड़ती है और उस गड़बड़ी का परिणाम कई प्रकार की चित्र विचित्र बीमारियों में दृष्टिगोचर होता है। प्राचीन काल के रोग निर्धारण, निदान विज्ञान में-बीमारियों के जो लक्षण बताये गये हैं अब उनसे भिन्न प्रकार के रोग दृष्टिगोचर होते हैं। डाक्टर इन्हें कई रोगों का सम्मिश्रण कहकर अपना समाधान कर लेते हैं। किन्तु वास्तविकता यह होती है कि शारीरिक विकृतियों के साथ साथ मानसिक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, बौद्धिक परिस्थितियों में विषमताएँ घुस पड़ने के कारण उन्हें ‘सर्व विकृति सन्निपात’ नाम दिया जा सकता है। उन विचित्र रोगों का इलाज मात्र औषधियों से नहीं हो सकता वरन् उसके लिए मानसिक सहानुभूति, आशा, उत्साह, विश्वास, साहस आदि उभारने से लेकर अन्यान्य समस्याओं के स्थायी अथवा काम चलाऊ समाधान खोजने होंगे। आज जिस प्रकार मलमूत्र रक्त आदि के परीक्षणों को महत्व दिया जाता है उसी प्रकार रोगी की मनःस्थिति एवं परिस्थिति जानने और उसका बहुमुखी समाधान खोजने की आवश्यकता पड़ेगी। यह समाधान जिस हद तक सम्भव हो सकेंगे, रोगी की व्यथा उसी अनुपात से हल्की होती चली जायगी।
जीने का आनन्द और लाभ तब है जब हम वर्तमान में जियें। अनेकों लोग भूत जीवन जीते हैं और डरावने भूत पर सवारी करके ऐसी दुनिया में रहते हैं जिसका अस्तित्व बहुत पहले समाप्त हो गया और अब भविष्य के पंखों पर सवार होकर परलोक में उड़ते रहते हैं। भूतपूर्व एम॰ पी- भूतपूर्व नगर पालिका अध्यक्ष-भूतपूर्व सेशन जज आदि शब्द, लोग अपने परिचय पत्रों पर छपाते रहते हैं और यशगाथा के रूप में भूतकालीन परिस्थितियों एवं सफलताओं की चर्चा करते रहते हैं। कितनों को अपने भूतकाल के प्रसंगों का वर्णन करने की ललक रह-रह कर उठती रहती है। वे उनके मीठे कड़ुए अनुभवों की स्मृतियाँ उभारते हैं। वे यह नहीं सोचते कि इन स्मृतियों के साथ उलझने में अब कोई उपयोगी व्यवस्थाएँ करने और समस्याओं को सुलझाने का प्रयोजन पूरा हो सकता है।
भविष्य में क्या सफलताएँ पाकर क्या-क्या आनन्द उठाया जायेगा इसके कितने ही सुन्दर सपने कई व्यक्ति इतने गहरे गाँठ लेते हैं कि वे यथार्थ जैसे लगते हैं। शेख चिल्ली की कहानी बहुश्रुत है जिसमें तेल ढोने की मजदूरी मिलने से पहले ही उससे मुर्गी, बकरी, बीबी, बच्चे प्राप्त होने के इतना गहरा सपना गाँठ लिया था जिसमें तन्मय होकर वह सिर पर रखे घड़े को ही गवा बैठा और मालिक द्वारा प्रताड़ना सहता फिरा, भविष्य में क्या बना जा सकता है इसका कोई निश्चय नहीं। प्रयत्न करने पर भी परिस्थितियाँ वैसी ही बने जैसा चाहा गया है इसकी कोई गारन्टी नहीं। डाक्टर बनने का सपना देखते रहने वाले छात्रों में से कितने ही सपना पूरा नहीं कर पाते और साधारण क्लर्क रहकर किसी प्रकार गुजारा करते हैं। चाहना ही सब कुछ नहीं है- हर प्रयत्न मन चाही सफलता देगा ही, इसका कोई निश्चय नहीं। परिस्थिति कहीं से कहीं मोड़ ले सकती है और जो सोचा गया था, उससे सर्वथा पृथक जीवन यापन करना पड़ सकता है। सोचना एक बात है और पाना दूसरी। ऐसी दशा में अवास्तविकताओं के स्वप्नलोकों में उड़ते फिरने से किसी का क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है ?
वर्तमान का ही महत्व है। भूत के अनुभवों का इतना ही लाभ है कि जो सीखा है उससे वर्तमान को सुव्यवस्थित बनाने में उपयोग किया जाय। भविष्य चिन्तन की उपयोगिता इतनी ही है कि उसके आधार पर वर्तमान की गतिविधियों को सुनियोजित किया जाय। भूत या भविष्य में उलझे रहने वाले मस्तिष्क को वर्तमान पर समुचित ध्यान देना कठिन हो जाता है। कल्पनाएँ भावुकताएँ इस सीमा तक बढ़ जाती है कि चिन्तन को वर्तमान पर केन्द्रित कर सकना ठीक तरह बन ही नहीं पड़ता।
हमें वर्तमान में जीना चाहिए। उसी को ठीक तरह संजोने और संभालने में दत्त चित्त रहना चाहिए। आगे और पीछे की बातें सोचने में हर्ज नहीं, पर उनकी मर्यादा उतनी ही रहनी चाहिए जो वर्तमान से तालमेल खाती है। आज जो सम्भव है उसी को अधिक अच्छा बनाने का प्रयत्न करें। उसी पर अपनी बुद्धिमत्ता और जागरूकता केन्द्रित करें। तत्परता और तन्मयता जैसे सद्गुणों का अभ्यास करने के लिए यही उचित है कि वर्तमान को त्रुटि विहीन बनायें और उसे इतना अधिक परिष्कृत करें कि उसमें अविवेकपूर्ण ढर्रों का नहीं, जागरूक कलाकारिता का दर्शन होने लगे।
जो भूत के साथ गुँथा हुआ है वह श्मशान का निवासी है। हारे हुए और वृद्ध मनोभूमि के लोग भूत की रंग-बिरंगी तस्वीरें बनाते हुए मन बहलाते हैं। बच्चों के लिए वर्तमान समझने और उसे पकड़ने की क्षमता नहीं होती। इसलिए कल्पनालोक ही उनके लिए आकर्षक होता है। कल्पनाएँ गढ़ने में भावुकता ही पर्याप्त है। मस्तिष्क की उर्वरता तद्नुरूप चित्र गढ़ देती है और अभीष्ट परिस्थितियाँ क्षण भर में चित्रलोक में बन कर खड़ी हो जातीं हैं। बालकों के लिए यह स्वपन् सृजन सरल पड़ता है और वे इतने से ही सन्तुष्ट भी हो जाते हैं, किन्तु वर्तमान को विनिर्मित करने के लिए प्रौढ़ परिपक्वता चाहिए। उसमें तर्कों और तथ्यों का आश्रय लेना पड़ता है और परिस्थितियों, साधनों तथा योग्यताओं को ध्यान में रखते हुए उतना ही अपनाना पड़ता है जिसे आज कर सकना सम्भव है। मात्र निर्णय से भी काम नहीं चलता। निरन्तर सुधार का प्रयास करना होता है। कृतियों में कलात्मकता का समावेश करने की आवश्यकता पड़ती है और उसके लिए संकल्प शक्ति से लेकर नियमितता, श्रमशीलता, तत्परता जैसे सद्गुणों का समावेश करना होता है। बाल चंचलता बार बार नित नये स्वाद चखने के लिए मचलती है और कुछ समय पहले आरम्भ किये गये काम को अधूरा छोड़ कर नया पकड़ने के लिए लपकती है। इन बाल वृत्तियों से निपटना पड़ता है। आलस्य और प्रमाद से पग पग पर जूझना पड़ता है। अधूरे चिन्तन और अधूरे श्रम से हर काम अधूरा और कुरूप रहता है। असफलताएँ प्रायः इस अधूरेपन की ही प्रतिक्रियाएँ होती हैं। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, प्रौढ़ मनःस्थिति का व्यक्ति अपनी समूची जागरूकता और क्रियाशीलता वर्तमान के निरूपण में-नियोजन में केन्द्रित करता है। इससे अंतःक्षेत्र में आत्मशक्ति बढ़ने का और बाह्य क्षेत्र में श्रेय साधन उपलब्ध करने का सुअवसर मिलता है। जे0 कृष्णामूर्ति ठीक ही कहते हैं- जो वर्तमान में जीवित है वही जीवित है अन्य तो अज्ञान में भटकते हैं।”
वर्तमान को तुच्छ न समझा जाय। तो उपलब्ध है उसे अधिक उत्कृष्ट बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया जाय। भविष्य को अधिक अच्छा बनाने के लिए इससे अच्छा और कोई उपाय हो ही नहीं सकता।
कहानी है कि एक मजदूर पहाड़ पर बैठा पत्थर काट रहा था। उसने अधिक अच्छी स्थिति में पहुँचने, अधिक समर्थ बनने की सोची। उस पर्वत पर एक देवी रहती है जो माँगता उसकी इच्छा पूरी करती है। सो मजदूर ने सोचा उसी से वरदान मांगूंगा और अधिक समर्थ बनूँगा। अब प्रश्न था कि क्या वरदान माँगा जाय और क्या बना जाय?
मजदूर के मन में आया राजा बना जाय, इतने में दूसरी कल्पना उठी, राजा का राज्य छोटा होता है। सूर्य का यश सर्वत्र है तो सूर्य बनना ठीक रहेगा। इतने में नया विचार यह आया सूर्य को तो बादल ही अपने अंचल में छिपा लेते हैं इस तरह बादल बड़े हुए। जब बड़ा बनना है तो सबसे बड़ा क्यों न बना जाय। सूर्य से तो बादल बनना ही अधिक उत्तम है। पूरी तरह निश्चय हो भी नहीं पाया था कि एक नई सूझ उपजी कि पवन अधिक बलिष्ठ है वह बादलों को बात की बात में उड़ा ले जाता है। इसलिए पवन बनना चाहिए। किन्तु पवन से भी अधिक बलवान पर्वत होते हैं। वे अपनी दृढ़ता और ऊँचाई के कारण हवा को भी रोक देते हैं इसलिए पर्वत बनना अधिक बड़प्पन का चिन्ह माना जाएगा । इतना सोच चुकने के बाद उसके मन में आया कि पर्वत को तो एक मजदूर ही काटकर धराशायी बना देता है फिर मजदूर रहना ही क्या कम बड़प्पन का काम है जो उसे छोड़ कर और कुछ बनने की बात सोचूँ।
देवी से बड़प्पन की स्थिति का वरदान माँगने के लिए जाते समय मजदूर के मन में यह विचार उठते रहे कि अधिक से अधिक ऊँची स्थिति पर पहुँचने की याचना करनी चाहिए। अधिक ऊँची स्थिति क्या हो सकती है उसी की कल्पना में जो विचार उठते गये उनमें से अन्तिम विचार यही अधिक उपयुक्त जँचा कि अपनी जो आज की स्थिति है उसे कम महत्व न दिया जाय उसी को अधिक परिष्कृत एवं कलात्मक बनाने का प्रयास किया जाय। इस निर्णय के उपरांत वह देवी के मठ से इच्छा त्याग कर वापिस लौट पड़ा और मनोयोग पूर्वक अपना पत्थर काटने का काम फिर नये उत्साह और नई सूझ बूझ के साथ करने में जुट गया।
यही है वर्तमान का महत्व समझना और सामने प्रस्तुत कार्य को परिपूर्ण सम्मान देना। जो हाथ में है उसी को समग्र तन्मयता से करने का प्रयत्न किया जाय और उसे अधिक उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रयत्नशील रहा जाय तो उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ स्वयमेव साकार होती चली जायगी ।
“1989 की दशाब्दी विश्व इतिहास में व्यापक उथल पुथल और भयंकर परिवर्तनों के लिए लम्बे समय तक याद की जाती रहेगी। यह क्रम 1980 से प्रारम्भ होगा जब अमेरिका का नगर पनामा तथा जापान का अधिकाँश समुद्री भाग प्रबल भूकम्प के कारण पृथ्वी की गोद में समा जायेंगे । आज रूस और अरब मित्रराष्ट्रों के रूप में दिखाई देते हैं किन्तु धीरे धीर उनमें खाई पड़ेंगी, उग्र विवाद होंगे (उस समय तक तो विवाद की स्थिति नहीं थी जब यह भविष्यवाणी की गई किन्तु इस समय तक निश्चित ही दोनों देशों के मध्य सन्देहजनक परिस्थितियाँ जन्म ले चुकी हैं) और युद्ध हो जायेगा जिसमें रूस वाले बुरी तरह मुँह की खायेंगे। 1985 के लगभग अन्तर्राष्ट्रीय विवादों के अत्यधिक उग्र होने की सम्भावना है एक समय विश्व युद्ध के भी बादल घुमड़ जायेंगे किन्तु भारतवर्ष के अध्यात्मवादी राजनेताओं की सूझ बूझ से न केवल विश्व युद्ध टल सकेगा अपितु भारतीय प्रतिष्ठा उच्च शिखर पर जा प्रतिष्ठित होगी। भारतीय राजसत्ता को यह शक्ति और यश वहाँ के किसी महान् धार्मिक सन्त के आत्मबल से प्राप्त होगी जिसके विचारों को एक समय इस युग के चमत्कार के रूप में माना जायेगा। उसकी पहचान भी अपने तीक्ष्ण विचारों से ही होगी।” अखबारों में समय-समय पर कितनी ही और ऐसी भविष्यवाणियाँ छपती रहती हैं, पर जिन भविष्यवक्ताओं ने लोगों को अत्यधिक प्रभावित किया वह कुछ ही गिने चुने रहे हैं। श्रीमती जीन डिक्सन, प्रोफेसर कीरो, प्रो0 हरार, डा0 जूल वर्न, जेरार्ड क्राइसे और सन्त की बात सच निकली है इसी कारण उन्होंने जो कहा उस पर संसार की दृष्टि अवश्य दौड़ी। इन पंक्तियों में जिस सन्त की भावी भविष्य वाणियों का संकलन किया गया है वह भी जीन डिक्सन की तरह ही अमेरिका की ही एक महिला है उतनी ही पवित्र विचारों वाली और ख्यातिलब्ध। नाम है- जान सैवेज, फलोरिडा (अमेरिका) की निवासिनी हैं किन्तु उनकी मान्यता यह है कि मेरा शरीर मात्र अमेरिकन है। मेरी शिक्षा भी अमेरिकन है किन्तु मेरे संस्कार भारतीय हैं, मेरे मन में भारतीयता की अमिट छाप और मेरी आत्मा में भारतीय दर्शन के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं।
एक बार एक पत्रकार ने उनकी माँ से पूछा-आप बता सकती हैं जान में भारतीय धर्म और दर्शन के प्रति कब और कैसे अभिरुचि पैदा हुई?” इस पर उन्होंने उत्तर दिया-जन्म से। कैसे? यह मैं नहीं जानती। जान को बचपन से ही माँस और अण्डों से अरुचि रही है, उसने कठिन शीत में भी कभी बियर नहीं पी, कभी फिल्मी गीत गाते नहीं सुना, भगवान की भक्ति की प्रार्थनाएँ ही उसे प्रिय रही है। एक बार फ्लोरिडा एक भारतीय महात्मा पधारे- जान स्वयं ही उनसे मिलने गई। उनसे बहुत सारी बातें पूछती रहीं, आज भी वह भारतीय पद्धति से भगवान् की उपासना करती है। इन्हीं सन्त को उसने गुरु मान लिया। एक बार जब यह भारतवर्ष गई तो इसने अपने गुरु से ज्योतिष सम्बन्धी अपनी जिज्ञासा प्रकट की और अपनी हथेली उन्हें दिखाते हुए पूछा- ‘आप मेरे बारे में कोई चमत्कारिक बात बताइये जो मेरे जीवन में निश्चित रूप से घटित होने वाली हो?”
अभी बात का यह क्रम चल ही रहा था कि ‘जान सैवेज’ स्वयं ही वहाँ आ उपस्थित हुई और आगे की घटना का उल्लेख उन्होंने स्वयं ही इन शब्दों में किया-
गुरुदेव बोले-बेटी परमात्मा ने किसी भी व्यक्ति का भाग्य अटल नहीं बनाया। कुछ सिद्धान्त ऐसे हैं जिनके अनिवार्य परिणाम के रूप में कोई बात ध्रुव सत्य हो भी सकती है किन्तु यदि प्रारब्ध ही सब कुछ होते तो मनुष्य जीवन नितान्त असहाय, अकर्मण्य जो जाता। अपने कर्मों, अपने पुरुषार्थ और पराक्रम द्वारा अटल प्रारब्ध भी टाले जा सकते हैं भले ही सामान्य व्यक्ति पर यह सिद्धान्त लागू न हो?”
“तुम्हारे बारे में मैं इतना ही कहूँगा कि जिस तरह तुम मुझसे प्रश्न कर रही हो, एक दिन लोग तुमसे इसी तरह प्रश्न किया करेंगे। तुम्हें एक सफल भविष्यवक्ता और अतीन्द्रिय बोध के लिए सारे विश्व में प्रतिष्ठा मिलेगी।”
उस समय वस्तुतः किसी को इस कथन पर विश्वास नहीं हुआ, किन्तु थोड़े ही समय में जान सैवेज को अपने अन्तःकरण से अलौकिक अनुभूति उभरती दिखाई दी। उनके शरीर में अक्सर सिहरन उठती और पुलकन में बदल जाती, जिसमें वह काफी समय तक विभोर रहती। इसी दिव्य अवस्था में उन्हें व्यक्तियों से सम्बन्धित घटनाएँ चल-चित्र की भाँति दिखाई दे जाती और वे धीरे धीरे सैकड़ों लोगों को अपनी इस पराशक्ति से लाभान्वित करने लगीं। एक दिन पड़ोस की एक महिला घबराई हुई घर आई, पूछने लगी मेरी लड़की (11 वर्षीय ईजोल) तो इधर नहीं आई कल शाम से ही उसका पता नहीं चल रहा। जान सैवेज एक क्षण के लिए तन्मय हुई और बोलीं- “वह इधर तो नहीं आई किन्तु मुझे उसकी लाश जमीन के अन्दर पानी में तैरती हुई स्पष्ट दिखाई दे रही है। वह स्त्री यह सुनकर विचलित हो उठी किन्तु तीसरे दिन जब उसकी लाश सचमुच एक मैनहोल के अन्दर पानी में तैरती मिली तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। लड़की मैनहोल का ढक्कन निकल जाने से घर लौटते समय उसी में गिर गई थी, उस समय उधर किसी के न होने के कारण जीवित न बच पाई।
एक दिन दूसरे मुहल्ले की कुछ महिलाएँ उधर आ निकली। वे किसी उत्सव के लिए चन्दा संग्रह कर रही थीं। वे जान सैवेज के पास भी गईं। जान से एक स्त्री ने चन्दा देने का आग्रह किया तो जान बोली-बहन जी फौरन घर जाइये, तुम यहाँ चन्दा माँग रही हो इधर तुम्हारे घर में चोरी हो रही है। उस समय तक जान को भविष्यवक्ता के रूप में ख्याति नहीं मिली थी। दिन का समय था अतएव महिलाओं ने समझा यह चन्दा न देने का बहाना कर रही है किन्तु दूसरे दिन वही महिला रोते हुए फिर आई और बोली-’ उस समय मैंने आपकी बात पर विश्वास नहीं किया सचमुच ठीक उसी समय घर में चोरी हो गई। चोर लगभग 50 हजार डालर के आभूषण, बर्तन तथा नकदी लूट ले गये।
जान सैवेज ने उस महिला को पुचकार कर पास बैठाया, काफी पिलाई और बताया कि तुम निराशा न हो- यह काम तुम्हारे पति के भाई का है वह किसी दूसरे शहर में रहता है पुलिस को रिपोर्ट करो तो अपना शक उस पर व्यक्त करना।
सचमुच उसका अपने देवर से वैमनस्य था। वह उन दिनों सिनसिनाटी में नौकरी करता था। इतने इत्मीनान से सामान की चोरी उसी ने की थी और वापस अपने शहर लौट गया। पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई और सचमुच ही जिस तरह जान सैवेज ने बताया था उसी तरह सारा सामान बरामद हो गया।
इस तरह की घटनाओं ने जान सैवेज का यश फलोरिडा के बाहर फैलाना शुरू किया। एक ओर उनका यश बढ़ रहा था तो दूसरी ओर वे यह बराबर अनुभव करती जा रही थीं, इससे उनकी प्राण शक्ति में निरन्तर हास हो रहा है। किसी गोपनीय प्रसंग को खोल देने के बाद उन्हें काफी समय तक बेचैनी रहती। तब उसे याद आते गुरु के वह शब्द-अलौकिक अनुभूतियाँ परमात्मा ने जीवात्मा के विकास की पुष्टि व साक्षी रूप में बनाई है उनका सार्वजनिक प्रदर्शन करोगी तो अहंकार बढ़ेगा न केवल अपनी यह क्षमता खो देगा अपितु अध्यात्म विकास के मार्ग में भी बाधाएँ उपस्थित होंगी। यह कथन याद आते ही वह अपने अतीन्द्रिय कथनों पर रोक लगाने लगीं। इसके बाद वह केवल अन्तर्राष्ट्रीय प्रसंगों पर ही जबान खोलती। उनकी कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण भविष्य वाणियाँ जो अखबारों में या तो छप कर या टेलीविजन पर दिखाने के बाद सच पाई गई। उनने उनकी ख्याति बहुत अधिक बढ़ा दी।
उन्होंने 15 नवम्बर 1918 को प्रथम विश्व युद्ध समाप्त होने की घोषणा की जो सच निकली 11 नवम्बर को युद्ध विराम समझौते पर हस्ताक्षर हुए और ठीक चौथे दिन तक सर्वत्र युद्ध विराम लागू हो गया।
उन्होंने भविष्यवाणी की थी कि जापान और अमेरिका में युद्ध होगा। आक्रमण जापान करेगा, पर अत्यधिक क्षति के बाद उसे हारना पड़ेगा और इस युद्ध के बाद अमेरिका की स्थिति संसार के सबसे अधिक समर्थ और शक्तिशाली देश के रूप में हो जायेगी। उक्त दोनों भविष्यवाणियाँ भी निःसन्देह सच निकलीं।
जर्मनी के केसर के बारे में उनकी भविष्यवाणी यह छपी कि उन्हें देश छोड़ना पड़ेगा, उन्हें अपने देश की मिट्टी भी अन्त समय नहीं मिलेगी तो सच ही हुआ। एक दिन उन्हें जर्मनी छोड़नी पड़ी और उनकी मृत्यु भी सचमुच हालैण्ड में हुई। उन्होंने इस तरह की सैकड़ों भविष्यवाणियों से लोगों का मार्ग दर्शन किया। उनकी अतीन्द्रिय अनुभूतियों का मार्मिक अंश भारतवर्ष से सम्बन्धित है। वह कहती हैं- भारतवर्ष के विश्व का आध्यात्मिक गुरु होने तथा उसके आर्थिक और राजनैतिक दृष्टि से समर्थ होने का समय आ गया है, पर यह सब न तो किसी चमत्कार के रूप में होगा न अनायास। धार्मिक मान्यताएँ ही प्रगतिशील रूप में पनपेगी और उसका श्रेय किसी अत्यन्त सामान्य से दिखाई देने वाले गृहस्थ संत को मिलेगा, यहाँ के लोग परिश्रम और अध्यवसाय के बल पर समुन्नत होंगे और सच्चाई, ईमानदारी और मानव अधिकारों की पक्षधर होने के कारण यहाँ की राजनीति को सिरमौर स्थान मिलेगा।
जान सैवेज की तरह ही अमेरिका में ही एक अन्य महिला हैं आपरीन ह्मूजेज उन्हें भी भविष्य दर्शन और कथन के लिए “एक जीवित आश्चर्य” के रूप में यश मिला है। जिस पूर्वाभास ने उन्हें सर्वाधिक प्रभावित किया है वह भारतवर्ष से ही सम्बन्धित होने के कारण बहुत महत्वपूर्ण है। वे लिखती हैं- मैं जब जब संसार की भलाई के लिए चिन्तित होती हूँ तब तब मुझे यह अनुभूति होती है कि अवतार कही जाने वाली सत्ता का प्राकट्य भारतवर्ष में हो चुका है। उनका वर्ण गौर है, केश शुभ्र श्वेत, मस्तक पर चन्द्रबिन्दू और एक सामान्य भारतीय की सादी वेष भूषा। यह शक्ति विधिवत् एक अभियान चला रही है जिसका उद्देश्य “धरती” पर स्वर्ग और मनुष्य ने देवत्व” का अभ्युदय है। मुझे उस अभियान की स्पष्टता इतना अधिक भासति है कि मुझे स्वयं ही उस दिशा में काम करने की प्रेरणा मिलने लगती है, पर यह श्रेय मुझे नहीं मिलेगा यहाँ के लिए यह श्रेय एक अमरीकी नवयुवती को ही मिलेगा। पर मैं उसके कार्य में योगदान से वंचित रहना नहीं चाहती इसीलिए मैंने गोल्डन-पाथ नामक संस्था का निर्माण किया है।
ईश्वरीय सता के कार्यों को सरल बनाने के लिए ह्नयूजेज ने यह संस्था उनके आदर्शों की अनुभूति की प्रतिकृति के रूप में ही बनाई है। यह संस्था लोगों को ईश्वर की उपासना, पवित्र और प्राकृतिक जीवन, आत्मा को जानने और प्रकाश का ध्यान करने, जीवों का वध न करने, माँस न खाने आदि मानवतावादी शिक्षाएँ देती है। इसके आदर्श सिद्धान्तों से प्रभावित होकर अब तक वहाँ हजारों लोग उसकी सदस्यता ग्रहण कर चुके हैं।
यह श्रीमती ह्नयूजेज वही हैं जिन्होंने 1967 में अरब इज़राइल युद्ध और इजराइल की विजय की घोषणा की थी। यह बात अक्षरशः सच निकली। जब उन्होंने भविष्यवाणी की कि राष्ट्रपति कैनेडी की हत्या कर दी जायेगी तब उनकी धर्म पत्नी जैक्लिन अपने पिता से अधिक की आयु के एक बूढ़े से विवाह कर लेंगी। उस समय सारे अमेरिका में उनका मजाक उड़ा किन्तु वस्तुतः 198 में जब कैनेडी की हत्या कर दी गई तो कुछ ही दिन बाद धन के लालच में जैक्लिन ने अरब पति ओनसिस जो 69 वर्षीय बूढ़ा था उससे शादी कर ली।
इन दिनों ह्नयूजेज अपना अधिकाँश समय अपनी संस्था के विकास में लगाती हैं उनका विश्वास है कि इस तरह वे युगान्तर सता का काम कुछ हलका कर सकेंगी। उनका यह भी विश्वास है कि यह भारत में जागी दिव्यात्मा एक न एक दिन अमेरिका भी आयेगी।
यह संसार अपूर्ण है। उसके सम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि वह अपूर्णता से पूर्णता की ओर चल रहा है। मनुष्य भी अपूर्ण है और उसकी क्रमिक प्रगति पूर्णता की दिशा में हो रही है। इतना मानकर ही संतोष किया जा सकता है और आगे बढ़ने का उत्साह संजोये रखा जा सकता है।
प्रकृति मनुष्य से बड़ी है और पुरानी भी। फिर भी उसे पूर्णता का सौभाग्य प्राप्त नहीं है। हर साल वर्षा आती है और धरती को हरी भरी बनाकर चली जाती है किन्तु ग्रीष्म आते आते वह सारी हरीतिमा सूख जाती है जिसे वर्षा ने जमीन पर कोमल कालीन की तरह बिछा दिया था। वर्षा एक हाथ से जमीन को देती है दूसरे हाथ से उसकी मिट्टी और खनिज सम्पदा को बहा कर समुद्र में धकेल जाती है। धरती यदि वर्षा के अनुदानों को सौभाग्य मानती होगी तो सुखी रहती रहेगी और यदि उसने उपकार वाले पक्ष को प्रधानता दी तो फिर उसका रोना कल्पना बन्द नहीं हो सकेगा।
सुखी मनुष्य वह है जो अपनी वर्तमान उपलब्धियों पर सन्तोष करके ईश्वर को धन्यवाद देता है और साथ ही अधिक पाने तथा अधिक बढ़ने के लिए खिलाड़ी जैसे प्रयत्न जारी रखता है। कौन ऐसा है जिसे सदा सफलता ही मिलती हो? कौन ऐसा है जिसे प्रियजनों का विछोह न सहना पड़ा हो। किस की सब मनोकामनाएँ पूरी हो सकी है? चैन की जिन्दगी किसने काटी है? जीवन का स्वरूप ही ऐसा है कि उसमें खोने और पाने का सिलसिला चलता बने। अगला कदम आगे बढ़ता है तो पीछे वाला अपनी जगह खाली करता है। इसे खोने और पाने की ही गति कहते हैं। लम्बी मंजिलें इसी तरह पूरी होती हैं। जिसे पाने की खुशी मनाने की आदत नहीं-जो गया उसी पर पश्चाताप करना जिसे आता है, वह प्रगति के हर कदम पर अपेक्षाकृत खिन्न ही होता चला जाएगा ।
भविष्य के गर्भ में क्या है? कौन जानता है? विपत्ति के पहाड़ टूट सकते हैं और सफलताओं के सुख साधन भी जुट सकते हैं। जब सब कुछ अनिश्चित ही है तो भयानक विभीषिकाओं की कल्पना करके उद्विग्न रहने की क्या आवश्यकता? फिर सुखद सम्भावनाओं के सपने गढ़ने में ही क्या हानि है? उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशावान् रहना, यही है सुख का सबसे बड़ा स्त्रोत। वर्तमान की समीक्षा करते समय यदि उसे करोड़ों से अच्छा अनुभव कर सके तो वह यथार्थता ही सदा मुसकान बनाये रह सकती है। इसके विपरीत यदि सर्वतोमुखी होने पर शान्ति पाने के लिए आकुल रहेंगे तो खिन्नता और उद्विग्नता के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगेगा।
कुरूपता से तुलना करने पर ही सौंदर्य की उत्कृष्टता प्रकट होती है। सर्दी के कारण ही गर्मी की-महत्ता का बोध होता है, अभावों के कारण भावों का सुख मिलता है। रात्रि से तुलना करने पर दिन का आनन्द मिलता है। विछोह के कष्ट की अनुभूति ही मिलन को सरस बनाती है। असफलताओं की स्मृति में ही सफलता के महत्व का पता चलता है। यदि प्रतिकूलता और अनुकूलता में से एक ही रह जाय तो फिर यहाँ सरसता और आनन्द जैसी कोई वस्तु शेष न रह जायगी।
श्रेष्ठता के प्रति श्रद्धा रखें, प्रगति की आशा करें, प्रभात की कल्पना करें, उज्ज्वल भविष्य पर विश्वास रखें तो ही जीवन को सुखी बनाने वाली किरणें उमंगों को जीवित रख सकेंगी। निराशा तो मृत्यु है। वर्तमान को दुःखपूर्ण और भविष्य को अंधकारयुक्त मानकर हम केवल दुःख पाते हैं, विनाश को न्यौता देते हैं और आग्रहपूर्वक अकाल मृत्यु के मुख में घुसते हैं।
शतपथ ब्राह्मण 5।5।2।2 की श्रुति है- "का भेद मनुष्यस्य?” अर्थात्-इस मनुष्य को भला कौन जानता है? वस्तुतः मानवी सत्ता इतनी रहस्यमय है कि उनका ठीक तरह समझ सकना अत्यन्त कठिन है। कठिनाई की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि मनुष्य अपनी गरिमा पर स्वयं विश्वास नहीं करता। उसे अपनी बहुमूल्य क्षमताओं और उज्ज्वल सम्भावनाओं पर स्वयं विश्वास नहीं। यह रहा होता तो वह प्रगति और सुविधा के लिए दूसरों के आगे क्यों गिड़गिड़ाता - अपने साधनों के सहारे आप ही उत्कर्ष के उच्च शिखर तक अपने ही पैरों क्यों न चढ़ दौड़ता है। आत्म ज्ञान और आत्म विश्वास के अभाव में वह अपने को दीन दरिद्र और हेय मानता है। तद्नुसार उसकी समूची सत्ता मान्यता के अनुरूप उसी निकृष्टता के ढाँचे से ढल जाती है जिस पर अपनी मान्यता के अनुसार गई गुजरी स्थिति में पहुँचा हो। उसी प्रकार संकल्प और पुरुषार्थ के सहारे ऊँचा भी उठ सकता है पर इसके लिए आवश्यक प्रयास और पराक्रम जुट कहाँ पाता है?
महर्षि व्यास ने महाभारत लिखते लिखते एक अत्यन्त गुह्य रहस्य को प्रकट कर दिया है वे लिखते हैं-
गुह्य व्रत्याँ तदिदं ब्रवीमि। नहि मनुष्यात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्।’
एक गुप्त रहस्य बताता हूँ। मनुष्य से बढ़कर श्रेष्ठतर इस संसार में और कुछ नहीं है।
जिन देवताओं से वह तरह तरह के वरदान पाने की मनुहार करता है वे वस्तुतः उसी की श्रद्धा एवं विश्वास के छैनी हथौड़े से गढ़े हुए मानस पुत्र हैं। ‘भावो हि विद्यते देव’ की उक्ति से यह स्पष्ट कर दिया गया है कि पत्थर के टुकड़े को देवता के समतुल्य समर्थ बना देने वाला चमत्कार भावना के आरोपण से ही सम्भव होता है। उसे उठा लिया जाय तो देव प्रतिमा में पत्थर के अथवा धातु खण्ड के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। मनुष्य देवताओं को गढ़ता है और स्वयं भी देवता बनता है- भजन्ते विश्वे देवत्वं नामऋर्त सर्पन्तो अमृत मेवैः। -ऋग्वेद
ईश्वर का अविनाशी अंश होने के कारण आत्मा के देव मन्दिर-इसी शरीर में समस्त देवताओं की बीज माताएँ विद्यमान हैं। अंग प्रत्यंगों में उच्चस्तरीय श्रेष्ठता विद्यमान है। उपेक्षा एवं अवज्ञा के कारण वे मूर्छित स्थिति में मृतक तुल्य पड़े हैं। उन्हें जगाने का प्रयास योग और तप द्वारा किया जाता है। अपने भीतर देवसत्ता के विद्यमान होने का प्रसंग इस प्रकार आया है-
ता एता देवताः सृष्टा अस्मिन् महर्त्यणवे प्रापतंस्तमशनायापिपासाभ्यामन्बवार्जत् ता एनमब्रु वन्ना यतनै नः प्रजानीहि यस्मिन् प्रतिष्ठता अन्नमदा मेति॥1॥
ताभ्यो गामानयता अब्रु वत्र वै नोउयमलमिति ताभ्योअश्वमानयत्ता अब्रु वत्र वै नोअयमलमिति॥2॥
ताभ्यः पुरुषमानयता अब्रु वन् सुकृतं बतेति। सुरुषोबाव सकृतम्। ता अब्रवीद्यथायतनं प्रविशतेति॥3॥
अग्निर्वाग्भूत्वाँ मुखं प्राविशद्वायुः प्राणों भूत्वा नासिके प्राविशंदादित्यश्चक्षूर्भू त्वाक्षिणी प्राविशद्दिशः श्रोत्रं भूत्वा कर्णौ प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वचं प्राविशंश्चंद्रमा मनो भूत्वा ह्नदयं प्राविशन्मृत्युरपाना भूत्वा नाभि प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्नं प्राविशन्-एतरेय 2।1 से 4
परमात्मा ने देवताओं को इस संसार में भेजा। उनमें भूख, प्यास और अनुभूति उत्पन्न की। देवताओं ने परमात्मा से कहा- हमारे लिए शरीर निर्माण करो। जिसमें रहकर हम अपनी आवश्यकताएँ पूर्ण करें। परमात्मा ने उन्हें गौ, अश्व आदि के शरीर दिखाये, जिसे उन्होंने अनुपयुक्त बताया। तब परमात्मा ने उन्हें मनुष्य देह दिखायी। देवताओं ने कहा-हाँ यही बहुत ठीक और सुन्दर है। तब परमात्मा ने कहा-अपने अपने उपयुक्त स्थानों में घुल जाओ । तब अग्नि वाणी बनकर मुख में, वायु प्राण बनकर नासिका में, सूर्य ज्योती बनकर नेत्रों में, दिशाएँ कानों में, वनस्पति औषधि बनकर त्वचा में, चन्द्रमा मन बनकर हृदय में, स्वयं अपान बनकर नाभि में और वरुण रेतस् बनकर जननेन्द्रियों में प्रविष्ट हुआ।
पुरुषों वान गौतमाग्निस्तिस्य वागेव समित्प्राणी धूमो जिहार्चिश्वक्षुरड्ऱाराः श्रोत्रं विस्फुलिंगा। तस्मिन्नेतस्मित्रग्नो देवा अत्रं जुहति तस्या आहुते रेतः सम्भवति।
यह पुरुष की अग्नि है। वाणी समिधा है। प्राण धुँआ है। जिव्हा ज्वाला है। नेत्र अंगार है। कान चिनगारियाँ। इस अग्नि में देवगण हवन करते हैं और उससे पराक्रम उत्पन्न होता है।
देहेडस्मिन् वर्तते मेरुःसप्तदीप सन्वितः। सरितः सागरःशैलाःक्षेत्राणि क्षेत्रपालकः॥ ऋषियोँ मुनयः सर्वे नक्षत्राणि प्रहास्तथा। पण्यतीर्थानि पोठानि वर्तन्ते पीठ देवताः॥
इसी शरीर में सप्त दीपों सहित सुमेरु पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पर्वत शिखर, क्षेत्र, क्षेत्रपाल, ऋषि-मुनि समस्त नक्षत्र-ग्रह पुण्य तीर्थ, पीठ और उन पीठों के देवता सभी विद्यमान हैं।
मानवी संकल्प शक्ति की क्षमता असीम है। उसको जागृत करना और सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त कर रखना सम्भव हो सके तो कुछ भी बन सकना और कुछ भी कर सकना सम्भव हो सकता है।
फलं ददाति कालेन तस्य मस्य तथा तथा। तपोवा देवता वापि भूत्वा स्वैव चिदन्यथा। फलं ददात्यथ स्वैरं नभः फल निपातवत् -योगवासिष्ठ
जीव अपनी इच्छा से ही देवता, तपस्वी बनता रहता है। प्रगति और अवनति का आधार मनुष्य का अपना कर्तृत्व ही है।
यह विधि की विडम्बना ही है कि आँख आदि इन्द्रियों के छिद्र बाहर की ओर बनाये। वे बाहर का तो बहुत कुछ देखती है, पर आन्तरिक सम्पदा को समझने उसका सदुपयोग करने से वंचित ही रह जाती है। हमारी बुद्धि जीवन के स्वरूप, लक्ष्य एवं उपयोग को जानने में असमर्थ रहती है।
पराञिच खानि व्यतृणत् स्वयम्भूस्तस्माद् पराड्पश्यति नान्तरात्मन्। कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मान मैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन्॥
विधाता ने छेदों को बाहर की ओर छेदा (अर्थात् इन्द्रियों को बहिर्मुखी बनाया) अतएव मनुष्य बाहर ही देखता है। अन्तर को नहीं देखता। अमृत की आकांक्षा करने वाला दूरदर्शी बिरला मनुष्य ही अन्दर की ओर देखता है।
गायत्री की उच्चस्तरीय साधना में सप्त चक्रों का जागरण प्रमुख है। यह सप्त चक्र और पंचकोश परस्पर सम्बद्ध हैं। दोनों की साधना एक साथ ही सम्पन्न होती है। इसी में देव-साधना-ऋषि उपासना, समग्र उत्कर्ष जीवन-लक्ष्य सर्वतोमुखी विकास उल्लास के समस्त तत्वों का समावेश है। कहा गया है-
मूलादि ब्रह्म रंध्रान्ता गीयते मननात् यतः। मननात् त्राति षट्चक्र गायत्री तेन कथ्यते-तन्त्र कौमुदी
मूलाधार से लेकर ब्रह्मरन्ध्र तक विस्तृत षट्चक्र को जिसके आह्वान से जागरण होता है उसे गायत्री कहते हैं।
आत्मसत्ता में सन्निहित विश्व की समस्त विभूतियों को यदि खोजा और जगाया जा सके तो जीवात्मा को देवात्मा एवं परमात्मा बनने का अवसर मिल सकता है। इस अन्वेषण प्रयास को ब्रह्म विद्या और जागरण प्रक्रिया को ब्रह्मतेज सम्पादन कहते हैं। इस सन्दर्भ में सप्तऋषियों को जीवन्त करने और उनके ब्रह्म-बल से उच्चकोटि का लाभ उठाने की प्रक्रिया चक्रबेधन’ के रूप में समझी जा सकती है।
सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे, सप्त रक्षन्ति सर्व अप्रमादम्-यजु
शरीर में सप्त ऋषि निवास करते हैं। वे सतर्कतापूर्वक निरन्तर उसकी रक्षा करते हैं।
परमात्मा अध्यात्मवेत्ता चेतना के सात शरीर मानते हैं। एक प्रत्यक्ष छः अप्रत्यक्ष। (1) भौतिक शरीर को वे फिजीकल बॉडी कहते हैं। (3) सूक्ष्म शरीर एस्ट्रल बॉडी (4) मनस् शरीर - मेन्टल बॉडी (5) आत्म शरीर स्प्रिचुअल बॉडी (6) ब्रह्म शरीर- कास्मिक बॉडी (7) निर्वाण शरीर इसे वे शरीर कहते हुए भी आत्मसत्ता कहते हैं और शरीर न कहकर वीइंग एण्ड नान वीइंग की संज्ञा देते हैं। यह अनिवर्चनीय जैसा शब्द है।
(1) मूलाधार (2) स्वाधिष्ठान (3) मणिपुर (4) अनाहत (5) विशुद्ध (6) आज्ञाचक्र यह षट्चक्र वर्ग में आते हैं। सातवाँ सहस्रार इनका अधिपति एक सूत्र संचालक है। मानवी काया में अवस्थित यही परम तेजस्वी सप्त ऋषि है । जिनकी पीठ पर- जिनके समर्थन में-सात ऋषि होंगे उन्हें किसी प्रकार का अभाव अनुभव न होगा। निद्रित स्थिति में तो मनुष्य भी मृत तुल्य पड़ा रहता है। ऋषियों का अस्तित्व आत्मसत्ता के अंतर्गत होते हुए भी यदि वे प्रस्तुत स्थिति में पड़े हैं तो उनका समुचित लाभ मिल सकना सम्भव न होगा।
आत्मसूर्य के सप्त अश्व प्रमुख चेतना केन्द्रों के रूप में वर्णन किये गये है- (1) प्राण (2) ऋषि (3) जिव्हा (4) त्वचा (5) कान (6) मन (7) बुद्धि इन सातों को अश्व संज्ञा दी गई है।
दिव्य जीव सत्ता में इन सातों का वर्णन इस प्रकार मिलता है (1) देव (2) ऋषि (3) गंधर्व (4) पत्रक (5) अप्सरा (6) यक्ष (7) राक्षस। वैदिक देवताओं में इन्हीं का दूसरे रूप में वर्णन है- (1) प्रजापति (2) अर्यमा (3) पूषा (4) त्वष्टा (5) वरुण (6) इन्द्र (7) मित्र। छंद शास्त्र की दृष्टि से इनका उल्लेख जिन सात छन्दों में किया गया है वे (1) गायत्री (2) उष्णिक् (3) अनुष्टुप् (4) वृहती (5) पंक्ति (6) त्रष्टुप (7) जगती है।
गान विद्या के सप्त स्वर प्रसिद्ध है- सा, रे, ग, म, प, ध, नि के नाम से इन्हें संगीत शास्त्र के आरम्भिक छात्र भी जानते हैं। सूर्य की सात किरणें (1) बैगनी (2) जामुनी (3) नीले (4) हरे (5) पीले (6) नारंगी (7) लाल रंग की है। इन्हीं रंग के प्रभाव से पदार्थों और प्राणियों में तरह-तरह के उभार, उतार चढ़ाव आते रहते हैं।
आयुर्वेद के अनुसार अपने प्रत्यक्ष शरीर में सप्त धातुएँ है।- (1) रस (2) रक्त (3) माँस (4) मज्जा (5) अस्थि (6) भेद (7) शुक्र। इन्हीं के सहारे काया का क्रिया-कलाप चलता है। सूक्ष्म शरीर का ढाँचा भी सात आधारों पर ही खड़ा है। (1) पाँच तत्व (2) पाँच प्राण (3) पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (4) पाँच कर्मेन्द्रियाँ (5) पाँच तन्मात्राएँ (6) अन्तः करण चतुष्टय (7) आकांक्षा संस्कार ।
स्थूल शरीर के आधारों को प्रत्यक्ष आँखों से देखा जा सकता है। सूक्ष्म शरीर के आधार भी सूक्ष्म होते हैं। अस्तु वे दृष्टिगोचर तो नहीं होते, पर अस्तित्व उन सब का बना रहता है। भाप बनकर आकाश में उड़ जाने पर भी पदार्थ बना ही रहता है, पर उसका अस्तित्व दृष्टिगोचर नहीं होता। सूक्ष्म शरीर की सत्ता भूत-प्रेतों के रूप मे, स्वप्न में, छाया पुरुष में, स्वर्ग-नरक भाजन में स्थूल शरीरधारियों की तरह ही काम करती है, पर उसका अस्तित्व स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर नहीं होता। दिव्यात्माएँ भी ऐसा ही सुहुम कलेवर धारण करके इतना काम करती है जो स्थूल शरीर की तुलना में अत्यधिक होता है।
षट्चक्रों का नाम भ्रामक है। वस्तुतः उन्हें सप्तचक्र ही कहना चाहिए। सहस्रार को इन चक्र शृंखला से अलग नहीं किया जा सकता। प्रत्येक चक्र भी सात आधारों से बना है। उनके स्वरूप निर्धारणों की जो व्याख्या विवेचना है उसमें प्रत्येक के सात-सात विवरण दिये गये है- (1) तत्व-बीज (2) वाहन (3) अधिदेवता (4) दल (5) यन्त्र (6) शब्द (7) रंग। इन्हीं विशेषताओं की भिन्नता से उनके अलग-अलग विभेद किये गये है। अन्यथा बाहर से तो उनकी आकृति एक जैसी ही है। उनकी क्षमताओं, विशेषताओं और प्रतिक्रियाओं का विवरण इन्हीं सात संकेतों के रूप में समझा जा सकता है।
शरीर एक समूचा ब्रह्माण्ड है। जो कुछ इस विस्तृत ब्रह्माण्ड में है उसे बीज रूप में मानवी पिण्ड में सँजो दिया गया है। साधना द्वारा इन बीजों को अंकुरित और पल्लवित किया जाता है। ब्रह्माण्ड और पिण्ड की सत्ता एक जैसी बताते हुए कहा गया है।
ब्रह्माण्ड संज्ञके देहे यथा देहं व्यवस्थितः -शिव संहिता
यह शरीर ब्रह्माण्ड संज्ञक है। जो ब्रह्माण्ड में है वही इस शरीर में भी मौजूद है।
नदी, पर्वत, समुद्र, द्वीप आदि भी सात सात ही गिनाये गये है। भूगोल के हिसाब से इनकी संगति नहीं बैठती। संसार में हजारों नदियाँ हैं इसी प्रकार पर्वत भी सैकड़ों हैं। पृथ्वी पर महाद्वीप पाँच हैं। छोटे द्वीपों की संख्या तो लाखों तक पहुँचेगी। समुद्र भी सात कहाँ है। इस प्रकार भौगोलिक गणना के आधार पर यह ब्रह्माण्ड विवरण सही नहीं बैठता। किन्तु पिण्ड ब्रह्माण्ड की प्रमुख शक्तियों को इन रूपकों के माध्यम से समझाने वाले अलंकारित संकेत का रहस्य समझा जा सके तो यह सभी सप्तक सही बैठते हैं।
सात पर्वत यही हैं- (1) बिद्रुम (2) हिमिशैल (3) घुतिमान (4) पुष्पवान (5) कुशेशय (6) हरिशैल (7) मन्दराचल।
सात नदियों के नाम हैं- (1) जलधर (2) टैबत (3) श्यामक (4) उद्रक (5) अम्बिकेय (6) रभ्य (7) केशरी।
सात चक्रों की सप्त अग्नियाँ तथा सात सोम संस्थाओं के रूप में भी वर्णन हुआ है। सोम संस्थाओं के नाम ब्रह्माण्ड ग्रन्थों में इस प्रकार गिनाये गये है- (1) आत्माग्नि स्टोम (2) उष्टवक्य (3) थोडसी (4) वाजपेयक (5) अति रात (6) आप्त (7) याम।
अग्नि पुराण में सात चक्र यज्ञ एवं सात हविश यज्ञों का वर्णन है। चक्र यज्ञ हैं (1) पुरोष्टक (2) पार्यण (3) श्रावणी (4) अग्रहायणी (5) चैत्र (6) अश्व (7) युजी
हविश यज्ञ भी सात है- (1) अग्न्याधेय (2) अग्निहोत्र (3) दर्श (4) पौर्णमास (5) चातुर्मास्य (6) आग्रहायण (7) निरुढ।
सात अग्नियाँ है- (1) ब्रह्माग्नि (2) आतग्नि (3) योगाग्नि (4) कालाग्नि (5) सूर्याग्नि (6) वैश्वानर (7) आतप।
मुण्डक उपनिषद् के अनुसार देव की सात जिह्वाएँ है।- (1) काली (2) कराली (3) मनोजबा (4) लोहिता (5) धूम्रवर्णा (6) स्फुल्लिगिनी (7) विश्वरुचि।
सात समुद्रों और सात द्वीपों के नाम मार्कण्डेय पुराण में इस प्रकार गिनाये गये हैं।
समुद्र- (1) लवण सागर (2) इक्षुसागर (3) सुरा सागर (4) दुग्ध सागर (5) दधि सागर (6) धूत सागर (7) जल सागर ।
द्वीप- (1) जम्बू द्वीप (2) प्लक्ष द्वीप (3) शाल्मलि द्वीप (4) कुश द्वीप (5) क्रौच द्वीप (6) शाक द्वीप (7) पुष्कर द्वीप।
इन सभी प्रतिपादनों में यह संकेत है कि हर स्तर की क्षमता बीज रूप में अपने भीतर विद्यमान है यदि उन्हें जागृत करने का प्रयत्न किया जाय तो व्यक्ति उच्चस्तरीय स्थिति तक निरन्तर बढ़ता चल सकता है और प्रगति के उच्चतम शिखर तक पहुँच सकता है। बीज का अस्तित्व और फल का परिणाम सुनिश्चित है। आवश्यकता उस कृषि कर्म की-बागवानी की रीति नीति जानने अपनाने की है जिसे अध्यात्म की भाषा में साधना कहते हैं।
प्राणायाम मन्त्र में गायत्री के साथ सात व्याहृतियों का प्रयोग होता है। भूः भुवः स्वः महः जनम् तपम् सत्यम्। यह सात व्याहृतियाँ है। इन्हें सात ऋषि एवं सात लोक भी कहा गया है।
अग्नि पुराण में सात ऋषियों के नाम इस प्रकार गिनाये गये हैं।
वशिष्ठः काश्योडतथात्रिर्जमदग्निः स गौतमः विश्वामित्र भरद्वाजो मुनयः सप्त साम्प्रतम्।
(1) वशिष्ठ (2) काश्यप् (3) अत्री (4) जमदग्नि (5) गौतम (6) विश्वामित्र (7) भारद्वाज
इन सातों की सत्ता सप्त चक्रों में विद्यमान है। इन सातों की शक्ति इन्द्रियों के रूप में भी दृष्टिगोचर होती है।
प्राणः वा ऋषिः । इमौ एव गौतम भरद्वाजौ।
अयमेव गौतमः अयं भारद्वाज । इमौ एव विश्वामित्र जमदग्नि। अयमेव विश्वामित्रः अयं जमदग्निः। इमौ एव वशिष्ठ कश्यप अयमेव वशिष्ठः अयं कश्यपः। वागेवात्रिः-श्रुति
सात प्राण ही सात ऋषि हैं। दो कान गौतम और भारद्वाज हैं दो आँखें विश्वामित्र और जमदग्नि हैं। दो नासिका छिद्र वशिष्ठ और काश्यप् हैं। वाक् अत्रि हैं।
सात लोक आकाश में ढूँढ़ना व्यर्थ है। वे किसी ग्रह नक्षत्र के रूप में नहीं हैं।, वरन् आत्म सत्ता में सप्त चक्रों के रूप में ही उनका अस्तित्व है। कहा गया है।
मूलाधारे तु भूलोके स्वाधिष्ठाने भुव स्ततः स्वर्गलोके नाभि देशे च हृदयं तु महस्तथा। जन लोके कंठ देशे, लोक ललाटके। सत्य लोक महारन्ध्रे इति लोका पृथक् पृथक्। -महायोग विज्ञान
(1) भू लोक मूलाधार में (2) भुवः लोक स्वाधिष्ठान में (3) स्वः लोक नाभि स्थान में (4) महः लोक हृदय में (5) जल लोक कंठ में (6) तप लोक ललाट में (7) सत्य लोक ब्रह्मरंध्र में विद्यमान हैं जहाँ स्थान मात्र गिना दिये गये है वहाँ उन स्थानों में अवस्थित चक्रों का ही संकेत समझा जाना चाहिए।
उपनिषद् कार ने मानवी काया को ‘छः अरे’ एवं ‘सात चक्र’ लगा हुआ विलक्षण रथ कहा है- यह षट् चक्रों को सात चक्रों का ही संकेत है।
“ऊथेमे अन्य उपरे विलक्षणं सप्त चक्रे शब्दर आहुरर्पितम।
अन्य लोक उस विलक्षण को सात चक्र और दो अरों वाला कहते हैं।
पद्य पुराण में भागवत् माहात्म्य वर्णन सन्दर्भ में धुन्धकारी प्रेत की मोक्ष उस कथा श्रवण के फल स्वरूप होने का उल्लेख है। यह प्रेत बाँस की गाठों को फोड़ता हुआ नीचे से ऊपर चला था और गाठें तोड़कर प्रेत योनि से छूटा तथा परम पद का अधिकारी बना था। अध्याय 5 श्लोक 64 में यह बाँसों की गाँठ भेधे जाने का रहस्योद्घाटन करते हुए इसे यौगिक ग्रन्थि भेद बताया है। कहा गया है।
जडस्य शुष्क वंशस्य यत्र ग्रन्थि विभेदनम्। चित्रं किमु तदा चित्त ग्रन्थिभेदः कथा श्रवात्॥
इसमें सूखे और जड़ बाँस की गाठें फटने का तात्पर्य चित की ग्रन्थियाँ खुलना बताया गया है।
भागवत् पुराण के स्कन्ध 2 अध्याय 2 के 19,2,21 श्लोकों में महर्षि शुक्राचार्य ने विहंगम मार्ग से ब्रह्मनिष्ठ योगियों के प्राण त्याग का विधान बताया है। इस में षट्चक्र वेधन विधान की ही प्रक्रिया है। छहों चक्रों का वेधन करते हुए अन्त में सहस्रार चक्र में प्राण को लय करते हुए प्राण त्याग करने की विधि समझाई गई है।
यह सप्त ऋषि जिस पर अनुग्रह करते हैं उन्हें सद्गुणों की सात विभूतियाँ प्रदान करते हैं। स्पष्ट है कि सद्गुण ही वे देव अनुग्रह हैं जिनके मूल्य पर भौतिक और आत्मिक, सम्पदाएँ सफलताएँ खरीदी जाती हैं। यह भ्रान्तियाँ निरस्त की जानी चाहिए कि उपासना के फलस्वरूप सीधी सम्पदाएँ मिलती हैं। सच्ची साधना के फलस्वरूप अन्तरंग में उत्कृष्टता उभरती है और सज्जनोचित सद्भावों का विस्तार होता है। बहिरंग के सत्प्रवृत्तियाँ सक्रिय होती हैं और क्रिया-कलापों में महामानवों जैसी प्रतिभा व्यवस्था एवं शालीनता की मात्रा बढ़ती है। जहाँ आत्मविकास का यह स्वरूप दृष्टिगोचर हो समझना चाहिए कि यहाँ सच्ची साधना की गई और उसके फलस्वरूप व्यक्तित्व निखरने के स्वरूप ही भौतिक और आत्मिक सफलताओं के-ऋद्धि-सिद्धि के रूप में वे प्रतिफल प्राप्त होते हैं जिनका माहात्म्य साधनाओं की सफलता के रूप में वर्णन किया गया है।
न देवा दण्ड मादाय रक्षनित पशुपाल वत्। यस्तु रक्षितुमिच्छन्ति बुद्धया संयोजयन्तितम्-महाभारत
ग्वाला जिस प्रकार लाठी लेकर पशुओं की रक्षा करते हैं उस तरह देवता किसी की रक्षा नहीं करते। वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं, उसकी बुद्धि को सन्मार्ग पर नियोजित कर देते हैं।
सप्त ऋषियों का अनुग्रह सात लोकों, सात द्वीपों, सात समुद्रों, सात पर्वतों, सात नदियों का स्वामित्व उपलब्ध होने के रूप में मिलता है। तात्पर्य यह हुआ कि ब्रह्माण्ड सत्ता को प्रतीक आत्मसत्ता पर अपना अधिकार आधिपत्य मिलता है। अपनी क्षमताओं को समझने, उन्हें उभारने और उपभोग करने का अर्थ कौशल प्राप्त होता है। जिसे यह सफलता मिल सकी समझाना चाहिए उसे ब्रह्माण्ड का आधिपत्य मिल गया।
सात यज्ञ, सात अग्नि, सात सोम आदि की उपासना से जो प्रतिफल मिलने बताये गये हैं उन्हें भी सात ऋषियों के वरदान समझना चाहिए जो अपने आत्मसत्ता के रूप में हिमालय में निरन्तर निवास और तप करते हैं। इन्हीं शक्ति धाराओं को साधना विज्ञान में सात चक्र कहा गया है, प्रत्येक चक्र प्रत्येक ऋषि का एक एक वरदान एक एक सद्गुण के रूप में प्राप्त होता है। वे ही ऋद्धि-सिद्धियों साथ में जीवन को देवमय बनाते हैं और स्वर्गीय उपलब्धियों से सुसम्पन्न करते हैं।
सात चक्रों के सात सद्गुण इस प्रकार है- (1) मूलाधार (2) स्वाधिष्ठान (काश्प्य) (3) मणिपुर (अत्रि) (4) अनाहत (जमदग्नि (5) विशुद्ध (गौतम) (6) आज्ञाचक्र (विश्वामित्र) (7) सहस्रार (भारद्वाज) उल्लास।
यों पौराणिक गाथाओं में ऋषि, व्यक्ति-विशेष थे। महामानवों के रूप में योग और तप में निरत-स्व पर कल्याण में संलग्न जीवनयापन करते हुए उनका वर्णन किया गया है। परमात्म विज्ञान में ऋषि तत्व जागृत एवं प्रखर प्राणसत्ता को कहा गया है। वे सूर्य के समान एक कहे जा सकते हैं। अथवा सप्त किरणों के रूप में उनके सात नाम दिये जा सकते हैं और सुविधा के लिए सात वर्गों में विभाजित करके सात व्याख्याएँ की जा सकती हैं। सृष्टि के आदि में जब जीवसत्ता प्रकट हुई तो उनका स्वरूप ‘ऋषि प्राण्’ के रूप में था। यह जीवात्मा का शुद्ध स्वरूप है। उसी स्थिति में पहुँचने पर आत्मा को देवात्मा एवं परमात्मा के रूप में परिष्कृत बनने का अवसर मिलता है। शत पथ में इस रहस्य का इस प्रकार उल्लेख हुआ है-
असद्वा इदमग्न आसीत् तदाहुः कि तदसदासी दित्यृष्यों, वा व ते ड में उ सदासीतु तदाहुः के ते ऋषय इति, प्राणा बा ऋषय -शतपथ
पहले सृष्टि से पूर्व में यह असत् था। तब कहा- यह असत् क्या था? उत्तर- वे ऋषि ही थे। वे सृष्टि से पूर्व में असत थे। तब कहा- वे ऋषि क्या थे? प्राण ही ऋषि थे।
पद्ब्रहम च तपश्च सप्तऋषय उपजीवन्ति ब्रह्म वर्चस्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद-अथर्व
पद्ब्रहम च तपश्च सप्तऋषय उपजीवन्ति ब्रह्म वर्चस्युपजीवनीयो भवति य एवं वेद-अथर्व
आत्मनों वै शरीराणि बहूनि भरतर्षर्भ। योगी कुर्याद् बलं प्राप्य तैश्च सर्वेर्मही चरोत्॥ प्राप्नुयाद् विषयान् कैश्चित् कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत्॥ संक्षिपेच पुनस्तानि सूर्यो रश्मिगणानिव॥
अर्थात्-हे राजन्! योगबल को प्राप्त करके योगी सहस्रों शरीर धारण कर सकता है और उन सबके द्वारा पृथ्वी पर विचरण कर सकता है। किसी शरीर से विषयों को प्राप्त करता है तो किसी शरीर के द्वारा उग्र तप करता है और फिर उन शरीरों को अपने भीतर इस प्रकार समेट लेता है जैसे सूर्य अपनी रश्मियों को बटोर लेता है।
पुनर्गठन योजना के अंतर्गत समस्त आत्मीय परिजनों को एक सुव्यवस्थित सूत्र शृंखला में बाँध दिया गया है। इस सघन संबद्धता का एक मात्र उद्देश्य इस परिवार के प्रत्येक सदस्य के व्यक्तित्व का सर्वतोमुखी विकास करना है। इसके लिए यह बताया जाना आवश्यक होगा कि किस परिस्थिति में किसे, किस प्रकार अपने दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप में हेर-फेर करना चाहिए। प्रत्यक्ष मार्ग-दर्शन और परोक्ष शक्ति संवर्धन के उभयपक्षीय अनुदान परिजनों को मिलते रह सके। यह प्रयोजन पुनर्गठन का रहा है। इस दिशा में प्राथमिक कार्य आश्विन नवरात्र तक पूरा हो भी गया है। परिजनों की परिस्थिति एवं मनःस्थिति की पर्याप्त जानकारियाँ केन्द्र के पास संग्रहित हो गयी है तदनुसार उनकी अधिक सेवा-सहायता सम्भव हो गयी है।
आत्म-निर्माण परिवार-निर्माण और समाज-निर्माण के लिए सामान्य गृहस्थ जीवन में किस प्रकार क्या किया जा सकता है, प्रस्तुत कठिनाइयों का समाधान क्या हो सकता है, इसका स्पष्ट मार्गदर्शन एवं परामर्श परिजनों को अगले ही दिनों मिलने लगेगा। यह कार्य साप्ताहिक युग-निर्माण योजना के माध्यम से चलेगा। इस परामर्श मार्गदर्शन को गुरुदेव स्वयं ही लिखेंगे। जिस प्रकार अखण्ड-ज्योति के पृष्ठो पर उनकी निजी लेखनी से लिखा गया उनका तत्त्वदर्शन पाठकों के पास पहुँचता है ठीक उसी प्रकार ये स्वयं ही परिजनों के व्यावहारिक जीवन में उत्कृष्टता का ऐसा समावेश करेंगे जो सर्व साधारण के लिए सरल एवं सम्भव हो सके। कठिन और अति उच्चस्तरीय गतिविधियाँ तो कुछ विशिष्ट व्यक्ति ही अपना सकते हैं। व्यस्त और अनभ्यस्त व्यक्तियों के तो सरलता ही व्यवहार में उतर पाती है। प्रस्तुत मार्गदर्शन में सर्वसाधारण की स्थिति को ध्यान में रखकर ही परामर्श दिये जाते रहेंगे।
गायत्री उपासना में आरम्भिक और उच्चस्तरीय साधकों के लिए हर अंग में पृथक-पृथक परामर्श रहेगा। मार्ग में आने वाली कठिनाइयों के कारण एवं निराकरण भी छपते रहेंगे। इसके अतिरिक्त शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक सामाजिक एवं आध्यात्मिक प्रगति के लिए किसको, किस प्रकार क्या करना चाहिए यह भी सुझाया जाता रहेगा। इस प्रकार साप्ताहिक पत्रिका में भविष्य में गुरुदेव का प्रत्यक्ष और व्यावहारिक मार्गदर्शन समझा जा सकेगा। इसके अतिरिक्त परिवार के अन्य वरिष्ठ साधकों के अनुभव परामर्श एवं विचार भी इस पत्रिका में छपते रहेंगे। यह एक नई उपलब्धि पाठकों के लिए पुनर्गठन वर्ष का अनुपम उपहार समझी जा सकती है गुरुदेव का कार्यकाल जब तक है यह क्रम अनवरत रूप से चलता रहेगा।
इन पंक्तियों को प्रत्येक परिजन के लिए एक आग्रह पूर्ण परामर्श समझा जाय और साप्ताहिक पत्रिका को पढ़ना अखण्ड-ज्योति की तरह ही आवश्यक माना जाय। पाक्षिक युग निर्माण में 20 पृष्ठ अर्थात् महीने में कुल 40 पृष्ठ रहते थे। अब 1 नवम्बर से साप्ताहिक के हर अंग में 6 पृष्ठ महीने में 64 पृष्ठ रहेंगे। 40 पृष्ठ के 16) तो 64 पृष्ठ के 5) रुपये होने चाहिए। यह लागत मूल्य है। किन्तु गुरुदेव का अभिनव मार्गदर्शन सभी परिजनों के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक समझकर चन्दा नगण्य ही बढ़ाया गया है उसमें स्पष्ट घाटा देना स्वीकार किया गया है। अब साप्ताहिक का चन्दा 20) वार्षिक होगा। पिछले चार महीने से उसमें पृष्ठ 12 रहते रहे हैं। अब नवम्बर से 16 पृष्ठ रहने लगेंगे । साप्ताहिक को यदि सभी पाठक न मँगा सकें तो कई मिल-जुलकर उसे मँगा लिया करें और बारी-बारी से उसे पढ़ लिया करे। जो मँगा सकते हों वे उसे तुरन्त ही मँगाना आरम्भ कर दें और जो नहीं मँगा सकते हैं उन्हें पढ़ाते रहने का उत्तरदायित्व स्वयं अपने कन्धों पर उठाये।
इन पंक्तियों में प्रत्येक परिजन को दिया गया एक आवश्यक परामर्श और अनुरोध समझा जाये और साप्ताहिक को मँगाना व पढ़ना पढ़ाना आवश्यक समझा जाये। झोला पुस्तकालय, ज्ञानरथ में उसे संजो रखा जाये। जो नहीं मँगा सकते हैं उन पर पहुँचाने और पढ़ाने की व्यवस्था भी परिजनों को ही करनी होगी। परिवार के विचारशील परिजन उसे तुरन्त मँगाना प्रारम्भ कर दें ताकि 1 नवम्बर से आरम्भ होने वाले मार्गदर्शन समूचे परिवार को नियमित रूप से पहुँचने प्रारम्भ हो जायें।
-भगवती देवी शर्मा
बसन्त पर्व भगवती सरस्वती का जन्म दिन है। उनके अवतरण ने निर्मम नर-पशु के वन्य जीवन में संस्कृति का आधार किया। भाव सम्वेदनाएँ उभारी। करुणा, मैत्री मुद्रिता, ममता जैसी सौम्य कोमलताओं का उदय हुआ। संगीत साहित्य कला के रूप में मनः चेतना को और श्रद्धा, निष्ठा, उदारता के रूप में अन्तः चेतना में परिष्कृत होने का अवसर मिला।
जड़ प्रकृति में उनके अवतरण के रस सन्धार कर दिया, वृक्ष पादपों ने नवीन पल्लव धारण किये और मन्द मुसकान के साथ फल-फूलों से लद गये। पवन ने मादक सुगन्ध भर-भर कर सभी दिशाओं में मुक्त हस्त से बिखेरी । पशु-पक्षी कीट-पतंग तक उस वासन्ती उभार उल्लास का अनुभव करके अपने उत्साह का परिचय देने लगे। प्रणय लिए असन्तोष से प्रेरित हर मनुष्य अपने-अपने स्तर के अनुरूप कुछ सोचना, कुछ खोजना और कुछ करता दृष्टिगोचर होता है। ऐसा है यह नव-जीवन का सन्देशवाहक बसन्त पर्व। भगवती सरस्वती का जन्म दिन।
सामान्य जड़ चेतन की तरह ही विशिष्ट आत्माओं में भी उनके अनुरूप दिव्य सन्देशों की एक नई किश्त हर वर्ष उपलब्ध होती है। महानता के उदय और कार्यान्वयन के इतिहास का सूक्ष्म पर्यवेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि संसार भर में श्रेष्ठता ने सर्वत्र इन्हीं दिनों लम्बी-लम्बी कुलाचें लगाई, छलाँगे भरी और उड़ाने उड़ी हैं। शक्ति जहाँ भी पहुँचती है, वहाँ सक्रियता उत्पन्न करती और प्रगति के द्वार खोलती है। यह बात दूसरी है कि वह निकृष्टता से जुड़कर विनाश के सरंजाम खड़े करे। चाकू
बसन्त पर्व का नव-जीवन सन्देश
क्रीड़ा की अभिलाषा इन्हीं दिनों उग्र होती है और वंश वृद्धि का प्रयोजन पूरा करती है। सरलता की उमंग हर जड़ चेतन को प्रभावित करती है। बसन्त पर्व भगवती सरस्वती के सन्देशवाहक का कर्तृत्व निभाता है और सर्वत्र नव-जीवन का संचार करता है।
बसन्त एक उभार है उत्साह है, नशा है, साहस है और ऐसा कुछ है कि आगे बढ़ने के लिए-ऊँचा उठने के लिए-ड़ड़ड़ड़ दीखता है चेतना को उसी का अनुगमन करना होता है। मनुष्यों में भी यह सहज उभार सर्वत्र संव्याप्त जैसा देखा जा सकता है। वे हर्षोल्लास प्रकट करने के लिए-मोद विनोद के अवसर ढूँढ़ने के लिए कुछ खोजते और कुछ करते दिखाई पड़ते हैं। सामान्य से उन्हें भी सन्तोष नहीं होता। असामान्य के से कलम भी बन सकती है और रक्त पात भी हो सकता है। यह उपयोगकर्ता एवं उपयोग प्रसंग की बात है। शक्ति अपना काम करती है। विद्या, धन, बल, बुद्धि, कला आदि की क्षमताएँ सज्जनों या दुर्जनों के पास पहुँचती है वही स्थिति में दृढ़ता एवं सफलता उत्पन्न करती है। बसन्त पर्व से दुष्टता का कहाँ कितना अभिवर्धन हुआ इसका विवरण तो विदित नहीं है, पर श्रेष्ठता का इतिहास सुनिश्चित है कि बसन्त पर्व की पुण्य बेला में अन्तः-करण हुलसते हैं, उभरते हैं। भाव-तरंगित होकर वे कुछ महत्वपूर्ण संकल्प करते और कदम बढ़ाते हैं। इसमें व्यक्ति का जितना श्रेय है उतना ही नियति व्यवस्था का भी। एक बार वह तकाजा, उपहार, प्रसाद, उत्साह लेकर आते अवश्य है यदि उसको ठुकरा न दिया जाये तो उस दिव्य अनुदान का सत्परिणाम मिलता अवश्य है।
अपने निजी जीवन में दैवी अनुग्रह की किश्तें एक-एक करके बसन्त पर्व पर ही उपलब्ध होती रही है। आम की फसल भी तो वर्ष में एक बार ही मिलती है। वार्षिक अनुदानों का जहाँ भी विधान है वहाँ सर्वत्र ऐसा ही होता है। भगवान उसी पर अनुकम्पा करते हैं तो उसे श्रेष्ठता की दिशा में बढ़ चलने की प्रेरणा, हिम्मत तथा परिस्थिति प्रदान करते हैं। उनका कार्य इतना ही है और यही समाप्त हो जाता है। परिस्थितियाँ उत्पन्न करना मनुष्य के अपने पुरुषार्थ के ऊपर निर्भर है। ईश्वर अपने हिस्से का काम अर्जुन के घोड़े चलाने जितना ही करता है शेष गाण्डीव चलाने जैसा पुरुषार्थ अर्जुनों के जिम्मे रहता है। वे अपना काम न करें तो फिर दैवी कृपा का लाभ प्राप्त करने से वंचित ही बने रहेंगे। प्रेरणा दैवी-सक्रियता मनुष्य को-इन दोनों के समन्वय से ही महत्वपूर्ण उच्चस्तरीय आध्यात्मिक सफलताएँ मिलती है। इस तथ्य को प्रमाणित करने वाले साक्षियाँ सबसे निकट ढूँढ़नी हों तो परिजन हमारी जीवन पुस्तिका के पृष्ठो के उलट कर जो कुछ कहने लायक बन पड़ा है उसका पर्यवेक्षण कर सकते हैं बसन्त पर्व पर हर वर्ष जो अंतः स्फुरण के रूप में भगवान के सन्देश संकेत प्राप्त होते रहे है उन्हें ‘करिष्ये वचनं तत्र’ की आत्म-समर्पण की मनःस्थिति में किया जाता रहा है। जिस गहन श्रद्धा से संकल्प किए उसी समर्थ सफलता के साथ वे सम्पन्न भी हुए हैं। इस विधि-विधान का -दिव्य अनुदान क्रम का लाभ हमारी ही तरह कोई भी उठा सकता है। यह द्वार सबके लिए समान रूप से खुला है। यह अवसर हर किसी के लिए समान रूप से उपलब्ध है।
हमारे जीवन-क्रम की कुछ घटनाएँ सर्वविदित है और शेष ऐसी है जिन्हें समय से पूर्व प्रकट करना आवश्यक न समझ कर गोपनीयता के पर्दे में छिपाये रखा गया है। उसमें कोई दुर्बलता, दुरभिसंधि या कुटिलता नहीं है वरन् उतना ही उद्देश्य है कि जिस दिशा में लोक-प्रवाह को बहाना इन दिनों अभीष्ट है उससे भिन्न दिशा में जनमानस का बहाव न बढ़ जाय। साधना और उसकी सिद्धि का विषय ऐसा है जिसे कुछेक अधिकारी व्यक्तियों तक के लिए सुरक्षित रखा जाय तो ठीक है। उसके चमत्कारी सत्परिणामों का लाभ उतने ही छोटे परिकर तक सीमित रहने में ही लोकहित है। अनाधिकारी उसे तुर्त-फुर्त प्राप्त करने और मन चाहे उपयोग के लिए भारी उछल-कूद मचाते हैं। इन अपरिपक्व हाथों में कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु लग जाये तो वे अपना और समग्र का अनर्थ ही करते हैं। गोपनीयता का उच्चस्तरीय प्रयोजन यही है। बाप तिजोरी की चाबी अपने पास रखता है और उसमें क्या है उसकी जानकारी घर के उत्तरदायी लोगों तक ही सीमित रहती है। सबको वह जानकारी मिले तो उस धन को पाने और मनमानी उपयोग करने की खींच-तान आरम्भ हो जायगी। गोपनीयता की शपथ शासकीय मन्त्रिमण्डल में इसी आधार पर दिलाई जाती है। हमने भी उसी प्रकार की शपथ ली है और साधना प्रकरण के कुछ विशिष्ट रहस्यों और प्रसंगों को अधिकारी व्यक्तित्वों तक के लिए सुरक्षित रख कर शेष को सर्वविदित होने दिया है। इस विज्ञात विवरण से भी यह पता चल सकता है कि बसन्त पर्व की विशिष्ट अमृत वर्षा का जल आदि जीवन-कलश में एकत्रित कर लिया जाय तो उससे कितना बड़ा हित साधन हो सकता है।
हमारे व्यक्तिगत जीवन की कुछ प्रमुख और सर्वविदित घटनाएँ इस प्रकार है- (1) 24 वर्ष 24 गायत्री महापुरश्चरणों की कष्ट साध्य तपश्चर्या का श्रीगणेश (2) अखण्ड दीपक की स्थापना (3) अखण्ड-ज्योति पत्रिका का प्रकाशन (4) गायत्री तपोभूमि का शिलान्यास (5) सहस्र कुण्डीय गायत्री यज्ञ से देश भर के अध्यात्म प्रेमियों का एकत्रीकरण (6) गायत्री परिवार की स्थापना (7) वेद शास्त्र आदि आर्ष ग्रन्थों का अनुवाद प्रसारण (8) विचार क्रान्ति अभियान के लिए युग-निर्माण योजना का शत-सूत्री आन्दोलन (9) अज्ञातवास घटनाएँ (10) शान्ति कुँज की स्थापना (11) युगान्तरीय चेतना के लिए सत्र-शिक्षण योजना का आरम्भ (12) महिला जागृति अभियान (13) ब्रह्म वर्चस् आरण्यक (14) अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का वह प्रयास जिसके आधार पर उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित सम्भावना है। समुद्र मंथन से 14 रत्न निकले थे, दैवी प्रेरणा और समग्र समर्पण के साथ किये गये पुरुषार्थ का प्रतिफल इतना ही है जो सर्वविदित है। इनमें प्रत्येक क्रिया का शुभारम्भ बसन्त पर्व के दिन की हुआ है दिव्य प्रेरणाओं को क्रियान्वित करने का यह मुहूर्त जितना उत्तम है उतना हमारी दृष्टि में कदाचित ही कोई हो सकता है। यही कारण है कि हमारा आध्यात्मिक जन्म दिन बसन्त पर्व को ही घोषित किया हुआ है। यों शरीर का जन्म आश्विन मास में हुआ था। महत्व और मूल्य तो आध्यात्मिक जीवन का ही है। शरीर तो कृमि-कीटकों का भी जन्मता-मरता रहता है।
अपना अध्यात्म परिवार ही अखण्ड-ज्योति पत्रिका के सदस्यों के रूप में बिखरा पड़ा है। कुछ समय पूर्व तक हम लोग परस्पर बिखरे हुए एक दूसरे से अपरिचित थे। जिस सूत्र से यह मणिमाला के दाने परस्पर इतनी सघनता पूर्वक गुँथ गये उसे अखण्ड-ज्योति पत्रिका कहा जा सकता है। अखण्ड-ज्योति क्या है? बसन्त पर्व की एक स्फुरणा। प्रकारान्तर से हम लोगों को नितांत दूरवर्ती और अपरिचित होते हुए भी एक-दूसरे के अधिकतम निकट सच्चे शब्दों में सघन आत्मीय बना देने का श्रेय इस स्फुरणा को ही है जो बसन्त पर्व के उपहार स्वरूप उमगी और जिसके बन्धनों में बँध कर हम एक कारवाँ के रूप में किसी महान लक्ष्य की ओर कन्धे से कन्धा मिलाकर चल पड़े। इस प्रकार लोगों की मैत्री आत्मीयता का कारणभूत जन्म दिन बसन्त पर्व ही कहा जा सकता है। भले ही वह प्रत्यक्षतः आरम्भ किसी भी वर्ष- किसी भी महीने या दिन से क्यों न हुआ हो? हम लोगों में से प्रत्येक का यह अधिकार है कि अखण्ड-ज्योति परिवार को जोड़ने वाली कड़ी का जन्म दिन-मैत्री जन्म दिन बसन्त पर्व को मनाएँ । परिवार के सूत्र संचालक से उनका जो परिचय एवं सद्भाव है उसका उद्गम गोमुख भी बसन्त पर्व को ही माने और उस पर्व को भावनापूर्वक मनाये । पिछले 40 वर्ष से होता ही ऐसा रहा है। अखण्ड-ज्योति के प्रकाशन से लेकर अब तक जो भी अपने निकट संपर्क में आये हैं उन्होंने इस मिशन के पीछे दैवी अनुदान का रहस्य झाँकता देखा है। इस झाँकी उन्होंने बसन्त मुसकराता देखा है। फलतः बसन्त पंचमी को किसी न किसी रूप में परिजनों में अपना श्रद्धा केन्द्र माना है और उसे व्यक्तिगत एवं सामूहिक आयोजनों के रूप में किसी न किसी रूप में मनाया है। जैसे-जैसे परिवार का गठन सुदृढ़ होता गया और उसकी हलचलों में तेजी आती गई वैसे-वैसे बसन्त पर्व का महत्व अधिक समझा जाने लगा है और उसके आयोजन समारोह भी प्रायः हर जगह अधिक उत्साह समारोह और धूमधाम के साथ मनाये जाने लगे हैं। अब युग-निर्माण अभियान जन्म दिवसोत्सव के रूप में उसे सर्वत्र मनाया जाता है।
इस बार भी सर्वत्र बसन्त पर्व अखण्ड-ज्योति परिवार के सदस्यों द्वारा मनाया जाएगा । पुनर्गठन आह्वान से परिजनों की विचार-निष्ठा प्रत्यक्ष सक्रियता के रूप में उभरी है और सर्वत्र जागरूकता के, क्रियाशीलता के, उत्साह के, अधिकाधिक तत्परता के समाचार आ रहे हैं। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का लक्ष्य पूरा करने के लिए चल रही ज्ञान-ग्रह की लपटें अधिक ऊँची उठी हैं। विचार-क्रान्ति अभियान की जली मशाल का प्रकाश अधिक तीव्र हुआ है। उसके आलोक ने अपना दायरा बहुत बड़े क्षेत्र तक विस्तृत कर लिया है। टोलियों का गठन एक प्रकार से वरदान सिद्ध हुआ है। उससे जन-जागृति का उद्देश्य असाधारण रूप से पूरा हुआ है संगठन का नया रूप निखरा है। जन्म दिवसोत्सव हर सदस्य का मनाया जाता रहे यह एक उपयोगी परम्परा बनने जा रही है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा की चार सूत्री आत्मोत्कर्ष साधना में प्रायः सभी परिजन संकल्पपूर्वक निरत हो गये हैं। मात्रा में न्यूनाधिकता भले ही रही हो, पर वे संकल्प और निष्ठा के साथ अपनाया सर्वत्र गया है। झोला पुस्तकालय में नया उत्साह आया है और जहाँ भी शाखा संगठन जीवित है वहाँ चल पुस्तकालय आरम्भ हो गये या होने जा रहे हैं। इस प्रयोजन के लिए प्रायः सभी समर्थ शाखाओं ने एक एक स्थायी कार्यकर्ता की नियुक्ति कर ली है और क्रियाकलाप इस तरह चलाया है जिससे भविष्य में कभी भी शिथिलता आने की आशंका न रहे। व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण-नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति की- लक्ष्य पूरा करने के लिए जिस भावना और कर्मनिष्ठा की आवश्यकता है वह अखण्ड-ज्योति परिवार के परिजनों में इन दिनों पहले की अपेक्षा अनेक गुनी अधिक दृष्टिगोचर हो रही है। इस बार देश भर में आश्विन नवरात्र आयोजन सर्वत्र सामूहिक रूप से मनाये गये हैं। यह पहला प्रयोग है। लगता है भविष्य में नवरात्र आयोजन और गायत्री अनुष्ठान पर्यायवाचक बन जायेंगे। प्रातःकाल सामूहिक जप, ध्यान-साधना, रात्रि का गायत्री साहित्य के कथा प्रवचन-अन्तिम दिन गायत्री यज्ञ और अन्त में विसर्जन जुलूस का कार्यक्रम पूरे उत्साह के साथ सम्पन्न हुए हैं। इतने कम खर्च में इतने प्रभावोत्पादक आयोजन हो सकने का यह पहला अनुभव है। चैत्र की नवरात्र और भी अधिक उत्साह में मनाये जाने की सम्भावना है। इन उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर यह अनुमान लगाने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं है कि बसन्त पर्व भी अखण्ड-ज्योति परिजनों द्वारा पहले की अपेक्षा अधिक उत्साहपूर्वक मनाया जाएगा । मिशन के प्रति निष्ठावानों की सघन श्रद्धा उसके जन्म दिन पर उभरेगी ही। वे उसके प्रकटीकरण के लिए कुछ किये बिना चैन से रह भी न सकेंगे। उभरता हुआ उत्साह उनसे कुछ कराये बिना रह ही नहीं सकेगा।
हर वर्ष बसन्त पर्व के अवसर पर प्रातः सामूहिक जप, हवन, रात्रि को प्रवचन, दीपदान का सामान्य आयोजन हर जगह छोटे-बड़े रूप में होता रहा है। वह प्रतीक पूजा उचित भी है और आवश्यक भी। सबसे बड़ी बात यह है कि बसंती उमंगें हम सब के अन्तः करण में उमगे और जीवन-लक्ष्य की पूर्ति के लिए प्रेरणा देने वाले ऐसे संकल्प लें, ऐसा व्रत धारण करें, ऐसे कदम उठाये जिसे आत्म-कल्याण और लोग-मंगल के दोनों उद्देश्य पूरे होने की सम्भावना बढ़ चलें। इस बार यह संकल्प इस रूप में होना चाहिए कि आत्मोत्कर्ष के मूलभूत आधारों का अवलम्बन परिपूर्ण निष्ठा के साथ होता रहेगा और उसमें आलस्य, प्रमाद बरतने का अवसर न आने दिया जाएगा । साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के चारों चरणों में से किसी को भी छोड़ा जा सके और एक भी ऐसा नहीं है जिस अकेले के बल पर आत्मोत्कर्ष का उद्देश्य पूरा हो सके। इस सन्दर्भ में अखण्ड-ज्योति के पृष्ठो पर चिरकाल से विभिन्न रूपों में कहा जाता रहा है।
इस बसन्त पर्व से हममें से प्रत्येक को सामान्य जीवनक्रम के साथ असामान्य उत्कृष्टता का समावेश जितना सम्भव हो सके उतना करने का प्रयत्न करना चाहिए। दिनचर्या में अर्थोपार्जन के समतुल्य ही आत्मोत्कर्ष को स्थान मिलना चाहिए। जिस प्रकार जीवित रहने के लिए आहार, निद्रा, श्रम, मल त्याग की कृषि के लिए भूमि ,बीज, खाद, पानी रखवाली की-इमारत बनाने के लिए ईंट, चूना, लोहा, लकड़ी की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार आत्मोत्कर्ष के लिए साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चारों चरणों को समान महत्व मिलना चाहिए। इन चारों के लिए जिससे जितना बन पड़े उसे उतना प्रयत्न अवश्य ही करना चाहिए। हममें से एक भी ऐसा न रहे जो आत्मिक प्रगति को कम महत्व दे और उसके लिए इन ठोस आधारों की अपेक्षा करता रहे। स्मरण रखने योग्य बात यह है कि मात्र मन्त्र जपने भर से आत्मिक प्रगति का लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए आत्मशोधन और आत्म-परिष्कार के लिए तत्पर होना होगा। इसी प्रयोजन की पूर्ति उपरोक्त चार आधार अपनाने पर सही रूप से बन पड़ती है यदि यह बसन्त पर्व परिजनों में आत्मिक प्रगति की उत्कण्ठा उत्पन्न कर सके और उस मार्ग पर चलने के लिए इन आधारों को जीवनचर्या में समाविष्ट करने की प्रेरणा दे सके तो समझना चाहिए कि इस बार को बसंती पर्व साक्षात् सरस्वती की तरह अपने अन्तःकरणों में अवतरित हो गई। इसी के लिए हमने इस बार सर्व शक्तिमान सत्ता से प्रार्थना की है, परिजनों से इसी दिशा में कदम बढ़ाने का अनुरोध किया है और हर साल पूरा मन इसी कार्य में लगाने का निश्चय किया है कि अखण्ड-ज्योति परिवार के प्रत्येक परिजन को किसी न किसी रूप में साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चतुर्विध प्रयोजनों में संलग्न करने के लिए भरपूर प्रयत्न करेंगे और आशा रखेंगे कि इन सिद्धान्तों को-गतिविधियों को अपनाने के लिए जिससे जितना बन पड़ेगा वह उसके लिए प्रयत्न करेगा। जो अब तक इस दिशा में प्रयास नहीं कर सके हैं वे शुभारम्भ करेंगे और जो कुछ करते रहे है वे इसमें अभिवृद्धि का साहस जुटाएँगे। सर्वथा विरत अपने परिवार का एक भी व्यक्ति न रहने पावे। इस वर्ष का यही बसंती लक्ष्य हम लोगों के सामने रहना चाहिए और बसन्त पर्व के दिन इसी के संकल्प सामूहिक रूप से किये जाने चाहिए। इस वर्ष बसन्त पर्व 12 फरवरी रविवार का है। इसके लिए लगभग दो महीने शेष रहते हैं। यह अवधि इसी तैयारी में लगनी चाहिए कि उस दिन उत्साहपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने वाला समारोह सम्पन्न हो सके और उसमें उपस्थित परिजनों में आत्मोत्कर्ष के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक इन चार आधारों को अपनाने के लिए कुछ ठोस कार्यक्रम बनाने के लिए संकल्प लेने पर सहमत किया जाय। यह सब कैसे किया जा सकता है इसके लिए फरवरी की पूरी अखण्ड-ज्योति को ही मार्गदर्शिका के रूप में प्रस्तुत किया जाएगा।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि जिस अखण्ड-ज्योति पत्रिका ने परिजनों को स्नेह सूत्र में बाँधा और अपरिचितों को आत्मीय बनाया है उसके प्रति भाव भरी कृतज्ञता हम सब के मन में स्वभावतः रहती ही है। आवश्यकता इस बात की भी है कि उस श्रद्धा, सद्भावना का इस रूप में प्रकटीकरण हो सके जिससे इस ‘बोधि वृक्ष’ का सिंचन भी सम्भव हो सके। संस्कृति की सीता को वापिस लाने के लिए अपना वानर परिवार जिस दिशा में चल रहा है उसकी पथ-प्रदर्शक अखण्ड-ज्योति को समझा जाय तो उसके प्रकाश को जीवन्त रखने के लिए तेल बाती का प्रबन्ध भी सोचना ही होगा। यह महान प्रयोजन हम में से प्रत्येक थोड़-थोड़े श्रमदान द्वारा सम्पन्न कर सकता है। सेतुबंधनं के समय ऐसा ही श्रमदान रीछ, वानरों ने किया भी था। उनने अपने श्रम साधन से पत्थरों के ढेर लाकर जमा किये थे। ठीक यही कार्य अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या बढ़ाने से पूरा हो सकता है। लागत की दृष्टि से प्रायः हर साल की कागज, छपाई पोस्टेज का मूल्य पूरा करने में कमी रह जाती है। इसकी पूर्ति ग्राहक संख्या बढ़ने से ही पूरी हो सकती है। साथ ही मिशन की प्रेरणाओं का विस्तार भी इसी आधार पर हो सकता है कि उसके अधिक पाठक बनें। इसके लिए अपने मित्र, परिचितों पर दबाव डाला जाय तो यह उनके हित में ही होगा जिन्हें इसका सदस्य बनने के लिए समझाया, उकसाया या दबाया गया होगा। इसमें सच्ची मैत्री का निर्वाह भी है। ‘कुपथ निवारा-सुपथ चलावा’ के उद्देश्य की पूर्ति निश्चित रूप से हो सकती है यदि आग्रहपूर्वक किन्हीं स्वजन को इस प्रकाश स्तम्भ के साथ सम्बन्ध जोड़ने के लिए सहमत किया जा सके। सच्चे मन से प्रयत्न किया जाय। दो-दो की टोलियाँ बनाकर निकल पड़ा जाय तो पुराने ग्राहकों से चन्दा वसूल करने और नयों को बढ़ाने के दोनों कार्य साथ-साथ हो सकते हैं। बसन्त पर्व पर तो इस सन्दर्भ में जिन भावनाशील परिजनों से जितना श्रम बन पड़े उसके लिए भरपूर प्रयत्न किया जाना चाहिए। अखण्ड-ज्योति के प्रति-उसके सूत्र संचालक के प्रति यह सबसे महत्वपूर्ण और आनन्ददायक श्रद्धांजलि बसन्त पर्व के अवसर पर हो सकती है।
जिनके पास पत्रिका पहुँचती है वे सभी नोट करें कि हर पत्रिका के कम से कम पाँच पाठक होने चाहिए। घर के, पड़ोस के, संपर्क के लोगों को इसके लिए प्रोत्साहित किया जाय उन्हें दो-चार पुराने अंग पढ़ा कर चस्का लगाया जाय जो निश्चित रूप से फिर वे हर महीने पढ़ने के लिए स्वतः लालायित रहने लगेंगे। न्यूनतम यह कार्य तो प्रत्येक परिजन को बसन्त पर्व पर करना ही चाहिए। यह न्यूनतम सुझाव है। वस्तुतः यह महान पर्व भगवती सरस्वती का जन्म दिन है, साथ ही नवयुग अवतरण की ईश्वरीय इच्छा का उद्घोषक दिन भी। इस पुण्य पर्व पर अन्तरात्मा से परामर्श करना चाहिए यदि वहाँ ईश्वर बोलता हो तो उसके संकेतों पर कुछ ऐसा करने का साहस जुटाना चाहिए जिससे अपना जीवन धन्य बन सके और युग की पुकार पूरी करने में चिरस्मरणीय योगदान मिल सके।
उस मनुष्य के लिए अग्नि, जल के समान हो जाती है, समुद्र तत्काल नहर के समान हो जाता है, मेरु पर्वत छोटे से पत्थर के समान हो जाता है, सिंह का झुण्ड मृग के समान हो जाता है, सर्प माला की डोर के समान हो जाता है- जिस मनुष्य के शरीर में सम्पूर्ण प्राणियों के लिए अत्यन्त क्रियाशील, सदाचार चमकता रहता है।
-भर्तृहरि
*समाप्त*