मैंने पूछा- मैं किसे प्यार करूँ तो अन्तरमन से एक आवाज आई-उन्हें जिन्हें लोग दलित और गर्हित समझते हैं, जो निन्दा और भर्त्सना के पात्र हो चुके हैं, उनके मित्र बनकर उन्हें प्यार और प्रकाश दो। तुम्हारा गौरव इस पर नहीं कि तुम्हें संसार में बहुत से लोग प्यार करते हैं, वरन् तुम संसार को प्यार करके गौरवान्वित होगे
मैंने कहा- लोग कहते हैं कि जो त्वचा, वर्ण और शरीर से सुन्दर नहीं हैं, उन्हें देखने से सुख और शान्ति नहीं मिलती।” मेरी प्यारी आत्मा ने कहा- तुम असुन्दर के माध्यम से उस शाश्वत सौंदर्य की खोज करो जो त्वचा, वर्ण और शरीर के धुँधले बादलों में आकाश की नीलिमा के सदृश प्रच्छन्न शान्ति लिए बैठा है। जब बाह्य आवरणों का धुँधला बादल छट जायेगा तो सौंदर्य के अतिरिक्त कुछ रह ही न जायेगा।”
मैंने कहा- माँ ! संसार कोलाहल से परिपूर्ण है। सर्वत्र करुण और कठोर क्रन्दन गूँजते रहे हैं, तुम बताओ मैं सुनाता क्या?”
अविचल और उसी शान्त-भाव से मेरे हृदय में शीतलता जगाती हुई आत्मा की एक और स्वर झंकृत सुनाई दी-वत्स उन शब्दों को सुना करो जिनका उच्चारण न जिह्वा करती है न ओठ और न कण्ठ। निविड़ अन्तराल से जो मौन प्रेरणाएँ और परा-गान प्रस्फुटित होता रहता है, उसे सुनकर तेरा मानव-जीवन धन्य हो जायेगा।”
तब से मैं किसी भी वर्ण, त्वचा और शरीर वाले दीन-दुःखी को प्यार करने में लगा हूँ। तब से मैं हृदय गुहा में आसीत सौंदर्य के ध्यान में निमग्न हूँ, तभी से मौन की शरण होकर उस स्तोत्र को सुनकर आनन्द पूरित हो रहा हूँ, जिसे युगों से नभमण्डल का कोई अदृश्य गायक गीता और प्राणियों का मन बहलाता रहता है।
-खलील जुबान
विपत्तियाँ सभी के जीवन में आती हैं। साहसी व्यक्तियों का उनके द्वारा और अधिक परिष्कार होता है तथा वे अधिक साहस एवं प्रकाश से भर उठते हैं। कायर व्यक्ति विपत्तियों की कल्पना से ही अर्द्धमृत हो जाते हैं। संकटों से भिड़ने का अवसर ही नहीं आ पाता। पहले ही हथियार डाल देते हैं। आन्तरिक दुर्बलता काल्पनिक भय गढ़कर सचमुच ही प्राण-घातक बन बैठती है।
डरने लगें, तो उसका कोई अन्त नहीं। बहुतों को अँधेरा देखते ही डर के मारे पसीना आने लगता है। सुनसान में प्रवेश की कल्पना से ही हाथ-पैर काँपने लगते हैं। मन वहाँ शेर, साँप, बिच्छू, भूत, चोर, डाकू आदि की कितनी ही आशंकाएँ, कल्पनाएँ करने लगता है, दिल की धड़कन तेज हो जाती है, हिम्मत जवाब दे जाती है। उसी सुनसान अँधेरे को उसी समय दीपक लेकर देखने पर डरने योग्य कुछ भी देखने में नहीं आता। चोर, डाकू, साँप, बिच्छू, भूत-पलीत शेर-बाघ होते ही नहीं, ऐसा तो नहीं है। पर उनका आतंक तो दिन-दहाड़े बीच बाज़ार में भी कभी-कभार हो सकता है। इससे बाज़ार जाना नहीं छूटता। तब अँधेरे में ही डरने की कोई विशेष बात है नहीं। दुनिया में करोड़ों लोग अँधेरे में रहते और आते-जाते हैं। जंगली प्रदेशों में दीपक का उपयोग बहुत कम होता है। कृषक रात को खेतों पर अँधेरे में अकेले ही सोते हैं। बहुत से लोग घने वन-प्रदेशों के बीच छोटी झोपड़ियाँ बनाकर मजे से जीवन जीते हैं। मन दुर्बल हुआ, तो ही वह यदा-कदा घटने वाली दुर्घटनाओं की ही विशेष याद रखता तथा तिल का ताड़ बनाता रहता है।
यों, जोखिम तो कूदने-दौड़ने पेड़ पर चढ़ने, तैरने, पर्वतारोहण या व्यायाम प्रतियोगिताओं में सम्मिलित होने, मोटर या स्कूटर चलाने आदि सब में भी है। पर खतरे की आशंका से इन साहसिक कार्यों से लोग विरत नहीं हो जाते। इसलिए संकटों से भी डरने का कोई कारण नहीं।
संकट भयंकर तभी तक लगते हैं, जब तक उनसे भिड़ न जाएँ। जैसे-जैसे संकटों से जूझने का अभ्यास होता जाता है, वे दैनिक कार्यों की तरह सरल-स्वाभाविक प्रतीत होने लगते हैं। संकटों का डर मनोबल तोड़ देता है। जब जो संकट आ पड़ेगा, उससे निपट लेने का साहस सँजो रखा जाए, तो निःशंक , निश्चित जीवन जिया जा सकता है। भयाक्रान्त हो गये, तो चलना-उठना भी कठिन हो जाता है। रक्त ठण्डा पड़ जाता है, मस्तिष्क शिथिल हो जाता है, शरीर निढाल हो जाता है। पुरुषार्थ की शक्ति रहते हुए भी व्यक्ति कुण्ठित हो जाता है। हिरन सिंह को देखते ही भयाक्रान्त हो चौकड़ी मारना भूल जाते हैं, खड़े रह जाते और बेमौत मारे जाते हैं। यदि वे साहस बनाये रखे और छलाँग भरने लगें, तो सिंह से अधिक दौड़ सकने की सामर्थ्य के कारण उसकी पकड़ से बच जाएँ। संकटों के सामने भयभीत हो उठने पर मनुष्य भी इसी तरह अपनी शक्ति भुलाकर अपने को ही क्षतिग्रस्त करते हैं।
ऐसा कहा जाता है कि यमराज ने एकबार पाँच हजार मनुष्यों को मार लाने के लिए महामारी को पृथ्वी पर भेजा। वह आई और अपना काम कर लौट गई। देखा गया कि 15 हजार व्यक्ति मर गये थे यमराज ने डाँटकर निर्दिष्ट संख्या से तिगुना लोगों को मार डालने का कारण पूछा। तब महामारी ने बताया-कि उसने तो पाँच हजार ही मारे हैं। दस हजार तो डर से स्वयं ही मर गये हैं।
अज्ञान और मिथ्या धारणाएँ मनुष्य को भयाक्रान्त रखती हैं। ज्ञान की वृद्धि के साथ अनेक प्रकार के डर स्वयं ही समाप्त हो जाते हैं। संकटों के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान भी उनसे भिड़ने पर ही होता है। तब अनुभव होता है कि जितना अनुमान किया गया था, उससे आधी शक्ति ही इस संघर्ष में व्यय हुई है और संकट से पार पा लिया गया है। अतः आवश्यकता भयभीत होने की नहीं, संकटों का डटकर मुकाबला करने की है।
भौतिक बलों से भौतिक साधन मिलते हैं और आत्म-बल के सहारे आत्मिक प्रगति के साधन बनते हैं। आत्मवादी साधक जिस स्वर्गीय भूमिका में निवास करते हैं और जिन विभूतियों के कारण लोकोन्नति होते हैं वे सभी आत्मबल के सहारे उपलब्ध होती हैं। बल से साधन-साधन से सफलता का सिद्धान्त हर क्षेत्र में लागू होता है आत्मिक प्रगति के लिए भी यही प्रक्रिया अपनानी पड़ती है। साधन का उद्देश्य आत्मबल सम्पादित करना है। यही वह पूँजी है जिसके मूल्य पर दैवी अनुग्रह आकर्षित करना और दिव्य वरदान उपलब्ध करना सम्भव होता है। यदि ऐसा न किया जाय और गिड़गिड़ाने फुसलाने की नीति पर विश्वास किया जाय तो निशित रूपं से आत्मिक क्षेत्र की कोई बड़ी उपलब्धि अर्जित कर सकना सम्भव न हो सकेगा।
शरीर-बल उपार्जित करने के लिए-आहार विहार, संयम, उत्साह जैसे साधन जुटाने पड़ते हैं। धन-बल बढ़ाने में पूँजी, योग्यता, श्रम एवं कुशलता नियोजित करनी होती है। ज्ञान-बल के लिए अध्यवसाय, शिक्षक, शिक्षा संस्थान एवं प्रशिक्षण सामग्री जुटानी पड़ती है। यह सामान एकत्रित न किये जा सके तो शरीर-बल धन-बल ज्ञान-बल में से एक भी संचित न हो सकेगा ठीक इसी प्रकार आत्म-बल सम्पादित करने के लिए- (1) संकल्प (2) संयम (3) विश्राम (4) श्रद्धा इन चार आधारों को खड़े करना आवश्यक होता है। साधना का उद्देश्य इन्हीं साधनों को एकत्रित करना हैं ईश्वर अनुग्रह को घसीट बुलाना इसी चुम्बकत्व के सहारे सम्भव होता है। इसी कुदाली से अन्तः क्षेत्र को खोदने, कुरेदते हुए विभूतियों के मणि− माणिक्य उपलब्ध किये जाते हैं।
संकल्प का तात्पर्य है ऐसा मनोबल जिसके सहारे निश्चय को कार्यान्वित करने की साहसिकता अक्षुण्ण बनाये रखी जाय। आमतौर से घटिया स्तर के लोग बाल-बुद्धि एवं वानरी प्रवृत्ति के होते हैं। चंचलता एवं अस्थिरता उनके स्वभाव में जुड़ी होती है। बन्दर इस डाली से उस डालीं पर उछलता-मचलता रहता है बालकों की चंचलता प्रसिद्ध है, बड़े देर तक एक काम पर टिके नहीं रह सकते हैं किसी कार्य में लगे तो क्षणिक उत्साह के कारण उस पर टिके नहीं रहते ओर एक को छोड़कर दूसरा काम बदलते रहते हैं। सुविचारों और कुकर्मों का आकर्षण सर्वविदित हैं पानी फैलते ही नीचे की ओर बिना किसी प्रयास के बहने लगता है, पर यदि ऊँचा उठाना हो तो अनेकों साधन जुटाने पड़ते हैं निम्नकोटि की गतिविधियों में मन देर तक लगा रह सकता है। क्योंकि उनके फलस्वरूप अधिक मात्रा में और अधिक जल्दी मनोरथ पूरे होने की तृष्णा जुड़ी रहती है। उत्कृष्टता के मार्ग पर चलने पर अदृश्य आन्तरिक सफलता मिलने की बात स्थूल बुद्धि को कुछ से कुछ विशेष आकर्षक प्रतीत नहीं होती। फिर क्षणिक आवेश के रूप में उस दिशा में कुछ कदम बढ़ाये भी जाय तो तत्काल फल मिलने की उतावली में धैर्य टूट जाता है और विलम्ब होते देखकर वह मार्ग छोड़ते ही बनता है। आत्मा-सुधार और आत्मा-निर्माण का मार्ग श्रम-साध्य और समय-साध्य है। वह जादुई छड़ी घुमाने से सम्भव नहीं हो सकता। माली को फले-फूले उद्यान की, विद्यार्थी को उपाधि की ओर व्यवसायी को सम्पदा की प्रतीक्षा धैर्यपूर्वक करनी पड़ती है और अपनी दीर्घकालीन साधना में अटूट धैर्य और मनोबल के साथ लगा रहना पड़ता है। इसी मार्ग पर चलते हुए आत्मोत्कर्ष का जीवन-लक्ष्य प्राप्त कर सकना सम्भव होता है। साधक की प्रथम परीक्षा इसी कसौटी पर होती है।
आत्मिक प्रगति के मार्ग पर चलने वाले को कई व्यवधानों से जूझने के लिए मनोबल की- संकल्प बल की आवश्यकता पड़ती है। संचित कुसंस्कारों का निरस्त करके उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों की स्थापना में खड़ा किया जाने वाला प्रबल संघर्ष प्रचण्ड मनोबल के सहारे ही लड़ा जा सकता है। धैर्यपूर्वक चिरकाल तक बिना उत्साह गिराये निर्धारित मार्ग पर चलते रहने के लिए भी संकल्प शक्ति चाहिए। बहकाने वाले आकर्षण प्रलोभनों से-विरत करने वाले दबावों से-जूझ सकने वाला ही इस लम्बे मार्ग पर बिना विचलित हुए चलता रह सकता। यह दृढ़ता मनस्वी लोगों में ही होती है। इसके लिए शूरवीरों जैसी पराक्रमी मनःस्थिति चाहिए उतना सरंजाम जुटाये बिना किसी के लिए भी यह सम्भव नहीं हो सकता कि हिमालय की चोटी चढ़ने जैसी आकस्मिक प्रगति कीर्तिमान स्थापित करें। चंचलता अग्रिम- बाल कौतुकों के अभ्यस्त और जादुई खेत-तमाशे देखने के आतुर लोग प्रायः इस मार्ग पर देर तक टिक ही नहीं पात। दूसरी ओर कठिन यह है कि बीज को विशाल वट-वृक्ष के रूपं में विकसित कर देने का कोई विधि-विधान भी इस संसार में नहीं है। हथेली पर सरसों जमाने वाले बाजीगर ‘नजर बंध’ की कला भर दिखाते हैं। उस सरसों से घड़ा भर तेल प्राप्त कर सकना उनके लिए भी सम्भव नहीं होगा। ऐसी सरसों तो किसान के खेत में ही उगती है और वह सुनियोजित समय प्रक्रिया के अनुसार ही उगती फलती है। तुर्त-फुर्त की कोई गुँजाइश नहीं है।
चंचलता को ठुकराने वाला-प्रलोभनों और दबावों से बचाने वाला दुष्प्रवृत्तियों से जूझने वाला प्रचण्ड मनोबल आत्म-साधना के पथ पर चलने वाला साधक का सर्व प्रथम आधार है इसके उपार्जन-अभ्यास के लिए उपासना का कर्मकाण्डों में पूरी तरह समावेश किया गया है। प्रातः काल जल्दी उठना, तत्परतापूर्वक नित्यकर्म से निवृत्त होना-नियम स्थान पर-नियत मर्यादाओं का पालन करते हुए-उपासना पर बैठना-सुखासन लगाना मेरु दण्ड का सीधा होना जैसा शारीरिक अनुशासन नियत स्थान ,नियत समय, नियत मात्रा में नियम विधान से उपासना-क्रम सम्पन्न करने की तत्परता बरतने के पीछे संकल्प-क्रम सम्पन्न करने की तत्परता बरतने के पीछे संकल्प-बल के अभिवर्धन की प्रक्रिया जुड़ी हुई है। अस्त व्यस्तता और अव्यवस्था को इसी कठोरता के आधार पर निरस्त किया जाता है। बाल चंचलता को हटाकर दृढ़ निशित प्रौढ़ता उत्पन्नं करने में प्रचण्ड मनोबल की ही प्रधान भूमिका रहती है। व्रत, उपवास, तप, तितीक्षा, मौन, ब्रह्मचर्य आदि के अनेकों विधि निषेध अनुशासन साधना में पालन करते हैं साधना विधि में ढील-पोल नहीं चलने दी जाती, वरन् निर्धारित क्रिया-कृत्यों को राई−रत्ती पूरा करना पड़ता है। इस फौजी अनुशासन को ठीक तरह निभाते चलने पर मनोनिग्रह की सफलता मिलती है और उस आत्म-विजय पर गर्व गौरव अनुभव करता हुआ साधक जीवन -संग्राम में बढ़े-बढ़े आदर्शवादी पुरुषार्थ, पराक्रम, कर सकने में समर्थ होता है।
संकल्प-बल के प्रयोग अभ्यास का सुविस्तृत क्षेत्र संयम के मैदान में करना पड़ता है। परीक्षा स्थल की यह है पूजा-उपासना के समय पर निर्धारित विधिविधान का पालन आत्मानुशासन का प्रथम चरण है उसे व्यायामशाला में होने वाले अभ्यास एवं प्रयोगशाला में किये गये प्रयोग के समतुल्य माना जा सकता है। उसकी प्रौढ़ता , प्रखरता गुण, कर्म, स्वभाव में घुसी हुई अव्यवस्था को सुसंतुलन में बदलने से ही सम्भव होती है। संयम शब्द इसी के लिए प्रयुक्त होता है। इन्द्रियाँ अपने विषयों में अतिवाद बरतने के लिये मचलती है और खुली टूट चाहती है। उस पा अंकुश न लगाया जाय तो फिर वासनाओं के उच्छृंखलता, शरीर, मन, धन और सम्मान में आग लगाते चली जाएगी और जो कुछ हाथ में है उस सब को जलाकर स्वाहा कर देगी। जीभ का चटोरपन किस प्रकार पेट को खराब करता है और पेट की सड़न किस प्रकार चित्र-विचित्र रोग उत्पन्न करती है, यह किसी से छिपा नहीं है। जननेन्द्रिय का असंयम किस प्रकार मनुष्य को निस्तेज और खोखला बना देता है इसके उदाहरणों से यह संसार भरा पड़ा है। तृष्णा के वशीभूत लोग किस प्रकार पाप संचय में लगे है और उसे संकीर्ण दुष्प्रयोजनों में लगाये रखकर किस प्रकार अनर्थ सम्पादन कर रहे है। वह किसी से छिपा नहीं है। अहंकार की उछलता किस प्रकार मिथ्या प्रदर्शन के आडम्बर रचती और कैसे ईर्ष्याद्वेष के विष बीज बोती है, उसका अवांछनीय नग्न नृत्य कही भी देखा जा सकता है। शारीरिक और मानसिक असंयम का ही एक रूप धन का अपव्यय है। व्यसनों में, विलासिता में, ठाट-बाट में, आतंक अनाचार में जितना धन व्यय होता है, उतना यदि रोका जा सका होता और उसे सत्प्रयोजनों में लगाया जा सकना सम्भव हुआ होता तो संकल्प से ही रच पर कल्याण का महत्त्वपूर्ण प्रयोजन संभव हो सकता है।वासना और तृष्णा को- लोभ और मोह को- यदि संयत किया जा सके और इन प्रयोजनों में होने वाली सामर्थ्य की बर्बादी को रोककर योजनाबद्ध रूप से सत्प्रयोजनों में लगाया जा सके तो उसका सत्परिणाम हर दृष्टि से कल्याण कारक प्रतिफल प्रस्तुत करेगा।
फूटे बर्तन में दूध दुहने से दुधारू गाय पालने का सौभाग्य निरर्थक चला जाता है। शरीर और मन में कषाय-कल्मषों के अगणित छिद्र हो रहे हों तो फिर स्वउपार्जित सम्पत्तियों और ईश्वर प्रदत्त विभूतियों का कोई कहने लायक परिणाम न निकलेगा। वे समस्त उपलब्धियाँ निरर्थक चली जायेगी और उलटा अनर्थ उत्पन्न करेगी। समझा जाना चाहिए कि उपार्जन का लाभ तभी है जब उसे संयम पूर्वक अनर्थ प्रवाह से रोका जा सकें। जिस विवेक ने अनर्थ अपव्यय को रोका था यदि उसी को थोड़ा और प्रखर बनाया जा सके तो इतना भी बन पड़ेगा कि उसी बचत को सदुद्देश्यों के लिए लगाया जा सकना सम्भव हो सके। पानी के प्रवाह को रोक कर बाँध बनाये जाते हैं और उस भण्डार का सदुपयोग करके सिंचाई बिजली आदि के कितने ही लाभ प्राप्त किये जाते हैं ठीक यही बात संयम बरतने से होती है। शरीर, मस्तिष्क और धन की तीनों क्षमताएँ भले ही किसी के पास स्वल्प मात्रा में हो, पर यदि वह उन्हें अपव्यय से बचा कर सदुपयोग कर सकने की कला में प्रवीण हो गया है तो उसका प्रतिफल बलवानों, विद्वानों एवं धनवानों की सम्मिलित शक्ति से भी अधिक श्रेयस्कर हो सकता है। इसे संयम का ही चमत्कार कह सकते हैं।
एकाग्रता की शक्ति सर्वविदित है। ध्यान में चिन्तन के बिखराव का केन्द्रीकरण किया जाता है। एकाग्रता की शक्ति का सदुपयोग करने वाले ही अपने अपने विषय में प्रवीण, साहित्यकार, वैज्ञानिक, शिल्पी, व्यवस्थापक, योगी अपने-अपने विषय में उच्चस्तरीय प्रगति मुख्यतया एकाग्रता के अभ्यास से ही कर पाते हैं। एकाग्रता और कुछ नहीं मस्तिष्कीय संयम है। इन्द्रिय संयम, विचार संयम, समय संयम, वाणी संयम, धन संयम आदि के रूपं में यदि अपव्यय को रोकना और सामर्थ्यों का सत्प्रयोजनों में एक निष्ठा भाव से लगाना संभव हो सके तो समझना चाहिए कि प्रगति का राजमार्ग मिल गया। और उस पर चलते हुए आत्मोत्कर्ष का उद्देश्य भी उसी प्रकार संभव हो सकता है जिस प्रकार भौतिक सफलताओं के मार्ग पर चलते हुए उत्साहपूर्वक प्रतिफल प्राप्त किया जाता है। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रहते हुए तत्त्वदर्शी मनीषियों ने आत्मोत्कर्ष की दिशा में बढ़ने के इच्छुकों के लिए संकल्प -बल बढ़ाने के साथ साथ -संयम बरतने में कठोरता अपनाने का निर्देश दिया है। अपने साथ कड़ाई और दूसरों के साथ नरमी यही शालीनता की नीति है। तपश्चर्या, तितीक्षा की अनेकानेक साधनाएँ संयम का ही प्रयोजन पूरा करती है। योग साधना में कितना ही चमत्कारी सिद्धियों का वर्णन है उन सबको प्रकारान्तर से चित्त-वृत्तियों के संयम से उत्पन्न उपलब्धियाँ ही कहा जा सकता है।
संकल्प और संयम यह दोनों शरीर और मन की संयुक्त उपलब्धियाँ है। इन्हें आत्म साधना का पूर्वार्ध कह सकते हैं। कारण यह कि इनका सीधा सम्बन्ध और प्रभाव भौतिक गतिविधियों के साथ जुड़ा रहता है। अस्तु इन दोनों को स्थूल वर्ग में गिना गया है। और इनके सत्परिणामों को उन सिद्धियों के रूपं में देखा जाता है जिनके आधार जिनका प्रभाव लौकिक होता है। और जिन्हें चमत्कारी कहा जाता है। उत्तरार्ध के रूपं में विश्वास और श्रद्धा इन दो भावसंवेदनाओं की गणना होती है। इन्हें अन्तरात्मा के गहन स्तर से निकलते हुए अमृत श्रोत कहा जा सकता है।
विश्वास से अस्थिरता चंचलता, संदेह, आशंका आदि का बिखराव समाप्त होता है और दृढ़ निश्चय की स्थिति उत्पन्न होती है। यह बात इस तरह है इस सम्बन्ध में कोई सुस्थिर स्थापना न हो सके तो मन शंकाशील बना रहता है। ऐसी दशा में उस संदर्भ में कोई स्थिर कदम भी नहीं उठ पाता। विश्वास उस निश्चिंतता का अन्त करता है और पूरे मनोयोग से कुछ करने गुजरने की तत्परता उत्पन्न होती है।
भौतिक मान्यताओं के सम्बन्ध में अनेक कसौटियाँ परीक्षण प्रक्रियाएँ ऐसी है जिनके आधार पर परीक्षण विश्लेषण करके यथार्थता का निश्चय किया जा सकता है, पर मान्यताओं-आस्थाओं के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है। उन्हें तर्क, विवेक, प्रमाण आदि के आधार पर एक सीमा तक ही सिद्ध किया जा सकता है। सन्देह की गुँजाइश फिर भी बनी रहती है प्रतिपक्षी दलीलों और प्रमाणों को भी उतने ही बलपूर्वक प्रस्तुत किया जा सकता है।हिन्दू धर्म उत्तम है या ईसाई धर्म? दोनों में से किसे चुनना चाहिए इसका निर्णय दलीलों के आधार पर न हो सकेगा। दोनों पक्षों से इतने प्रबल तर्क उपस्थित किये जा सकते हैं कि इसको या उसको अपनाने योग्य, चुनने के सामान्य व्यक्ति हतप्रभ रह सकता है। संदिग्ध मन स्थिति में इनमें से किसी एक को अपनाया जाय तो निष्ठा के अभाव में उसे अपनाने की वैसी दिव्य प्रतिक्रिया उत्पन्न न हो सकेगी जैसी कि अगाध विश्वास के आधार पर किसी स्वीकृति या प्रक्रिया की होती है। आध्यात्मिक मान्यताओं को प्राणवान बनने और फलित होने की शक्ति विश्वास से ही उत्पन्न होती है।
विश्वास क्षेत्र में एक बड़ी कठिनाई यह है कि उसमें अन्ध-विश्वास घुस पड़ने की पूरी गुँजाइश बनी रहती है। सामाजिक साम्प्रदायिक अन्ध-मान्यतायें अन्ध-परम्पराएँ लोगों के मस्तिष्कों पर किस बुरी तरह छाई हुई है- दुराग्रह के रूपं में पत्थर की लकीरें बन गई है- और लोगों की शक्ति किस बुरी तरह बर्बाद कर रही है। यह किसी से छिपा नहीं है। अध्यात्म क्षेत्र में भी ऐसा ही हो सकता है। अन्धता तो सर्वत्र दुष्परिणाम ही उत्पन्न करती है। आत्मिक क्षेत्र में अन्धविश्वास भी कम हानिकारक नहीं होते हैं। अस्तु विवेक युक्त विश्वासों को ही मान्यता मिलनी चाहिए, जिन आदर्शों, सिद्धान्तों आस्थाओं को मान्यता दी जानी है। उनके बारे में आवश्यक छानबीन कर ली जाय और यथार्थता एवं उपयोगिता के सम्बन्ध में पक्ष-विपक्ष का मंथन करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाय कि जो स्वीकार किया जा रहा है वह नैतिकता एवं उच्चस्तरीय आदर्शवादिता का तथ्यपूर्ण समर्थन करती है या नहीं रामायण की दो चौपाइयाँ इस सम्बन्ध में उपयोगी मार्ग दर्शन करती है। कहा है-
जाने विनु न होहि परतीती। बिना प्रतीति होहि किमि प्रीती॥ बिना प्रीति किमि भक्ति दृढ़ाई। जिगि खगेश जल की चिकनाई॥
विश्वास पूर्ण वस्तु स्थिति को जानना आवश्यक है। सुनिश्चित विश्वास होने पर ही किसी प्रसंग में उत्साह बढ़ता और लगन लगती है। यही भक्ति है। यदि विश्वास ही न जम सका तो प्रीति और भक्ति का दृढ़ता कैसे सम्भव होगी? इसी तथ्य को तुलसीदास जी ने प्रकट किया है। उच्च आदर्शों की उपयोगिता पर हमें विश्वास नहीं होता और सोचते हैं अनैतिकता अपनाने का लाभ अधिक है। जीवन के अनादि और अनन्त स्वरूप को स्वीकार करने के लिए आस्था तैयार नहीं होती। जो जिया जा रहा है उतना ही सीमित जीवन है यही माना जाता है और उतनी ही परिधि की लाभ-हानि का सब कुछ समझा जाता है। ईश्वर का भजन तो होता है, पर उस पर विश्वास का कोई लक्षण नहीं दीखता। यदि उसके अस्तित्व को सच्चे मन से स्वीकारा जाता तो उसके सुनिश्चित विधि-विधान कर्मफल को भी हृदयंगम किया गया होता और अनीति के मार्ग पर एक कदम भी आगे बढ़ सकना संभव न होता। सर्वव्यापी, न्यायकारी,निष्पक्ष कर्म कसौटी पर खरे खोटे की परख करने वाले परमेश्वर पर जो विश्वास करेंगे और “ सियाराम मय सब जग जानी” की मान्यता अपनाकर हर किसी से सद्व्यवहार करने के अतिरिक्त और कोई चारा ही न रह जाएगा। नगण्य से सत्ताधारियों, सम्पत्ति वालों और कलाकारों के पीछे हम मधुमक्खी की तरह चिपके फिरते हैं, और उनकी मनुहार करते हैं फिर ईश्वर का स्वरूप और अस्तित्व को समझने वाला उसके समीप बिठाने की प्रक्रिया उपासना को निरानन्द और उपेक्षणीय कदापि अनुभव न करता। साधना के सत्परिणामों पर हमारा पक्का विश्वास रहा होता तो अन्य लाभदायक उद्योगों में जितनी तत्परता रहती है उससे भी अधिक इस दिशा में रही होती। उपेक्षा और अन्य मनस्कता के कारण ही हम उखड़ी-उखड़ी साधना करते रहते हैं और विश्वास की परिपक्वता के अभाव में सत्परिणामों से वंचित रहते हैं। विश्वास के फलस्वरूप झाड़ी का भूत, रस्सी का साँप ओर आशंका का आतंक रोमांचकारी भय संचार कर सकता है। तो उसकी उच्चस्तरीय प्रतिष्ठापना से पत्थर में से देवता भी प्रकट हो सकता है। मीरा के गिरधर गोपाल ,रामकृष्ण परमहंस की काली ,एकलव्य के द्रोणाचार्य मात्र उनके गहन विश्वास द्वारा किये गये चमत्कारी उत्पादन भर कहे जा सकते हैं।
मंत्र शक्ति के- ईश्वर भक्ति के जो चमत्कार दिखाई पड़ते हैं उसका प्रादुर्भाव सघन विश्वास के फलस्वरूप ही होता है। यांत्रिक और तांत्रिक अपने कर्मकाण्डों पर, विधानों पर और उनके परिणामों पर असंदिग्ध विश्वास करते हैं फलतः उनकी आस्थाएँ परिपक्व होकर देवताओं के रूपं में न केवल मूर्तिमान् होती है वरन् वरदान भी प्रस्तुत करती है। छाया पुरुष अपनी भीतरी सत्ता की प्रतिच्छवि है और अपनी ही सुदृढ़ आस्था द्वारा विनिर्मित होकर अपने से कम नहीं वरन् अधिक ही समर्थ सिद्ध होती है। अध्यात्म मार्ग के पथिकों को विवेकपूर्वक अपने आदर्शों की यथार्थता और लक्ष्य की प्रखरता के सम्बन्ध में असंदिग्ध मनःस्थिति का अन्त करना चाहिए और लक्ष्य एवं साधन पर इतना प्रगाढ़ विश्वास का प्रचंड चुम्बकत्व उत्पन्न करना चाहिए कि सफलता स्वयं ही खिंचती हुई अपने तक चली आये।
आत्मिक सफलताओं का अन्तिम, सबसे प्रबल और समर्थ ब्रह्म शास्त्र ही श्रद्धा है। श्रद्धा का तात्पर्य है उत्कृष्टता के प्रति इतनी गहन संवेदना और भावभरी उत्सुकता का उच्चभाव जिसके कारण उसके पाने के लिए सब कुछ निछावर कर देना भी कठिन दिखाई न पड़े। यहाँ दीपक और पतंगों का, चन्द्र-किशोर का, पपीहा स्वाति बूँद का उदाहरण ठीक बैठता है। प्यार तो बराबर वालों और छोटों से भी किया जा सकता है। उत्सुकता तो व्यसन और विनोद के लिए भी हो सकती है। उमंग तो दुष्कर्मों के लिए भी उठती है। इन संवेदनाओं से श्रद्धा की तुलना नहीं हों सकती। वह तो मात्र ऐसे उच्चादर्शों के लिए उत्कृष्ट व्यक्तित्वों पर ही केन्द्रित हो सकती है।जिनका अनुसरण करने पर आत्म-कल्याण का पथ-प्रशस्त हो सकता है।
ईश्वर पर, उपासना प्रक्रिया पर, लक्ष्य पर, मार्ग दर्शक पर जितनी गहन श्रद्धा होगी उसी अनुपात से आत्म साक्षात्कार का- ईश्वर प्राप्ति का- उद्देश्य पूरा होगा। श्रद्धा ओर विश्वास अन्तरात्मा की वे दिव्य स्थितियाँ है जिन पर आत्मिक प्रगति की समस्त सम्भावनाओं का आधार खड़ा होता है। लोक शरीर बल, मनोबल, बुद्धि बल और धन बल के आधार पर मिलने वाली लौकिक सफलताओं से ही परिचित है। यदि किसी प्रकार यह जाना जा सके। कि व्यक्तित्व का स्वरूप एवं भविष्य निर्धारण करने में आकांक्षाओं एवं संवेदनाओं की ही सर्वोपरि भूमिका होती हैं तो यह भी समझ में आ जाएगा कि जो बनना है उसके अनुरूप श्रद्धा को ढालने की अनिवार्य आवश्यकता होगी।
मन और शक्ति दोनों ही आन्तरिक आस्थाओं से प्रेरित और संचालित होते हैं। आकांक्षाओं की उमंगें उस उपलब्धि के लिए योजना बनाने का आदेश देती है वह बिना ननुनच के उसी प्रकार का ताना-बाना बुनना आरम्भ कर देती है। शरीर उसी के अनुरूप काम करने में जुट जाता है। शरीर अपने आप में कुछ नहीं जड़ उपकरण मात्र है। मन भी समुचित इन्द्रिय में चेतना का विद्युत प्रवाह चल पड़ने से अपना काम करता है। ट्रांजिस्टर में जिस प्रकार ‘क्रिस्टल मैगनेट’ की शक्ति काम करती है उसी प्रकार व्यक्तित्व के निर्माण, निर्धारण एवं परिवर्तन में एक मात्र श्रद्धा की शक्ति ही काम करती है वह आसुरी प्रयोजनों को अपनाये तो फिर सर्वनाशी अन्त-पतन सुनिश्चित है। यदि उसे उत्कृष्टता के साथ जाड़ दिया जाय तो उच्चस्तरीय प्रगति की दिशा में द्रुतगति से बढ़ते जाना सुनिश्चित है
रामायण ने श्रद्धा विश्वास की उपमा भवानी और शंकर से दी है। ‘भवानी शकरौ वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणी’ का तात्पर्य यही है। गीता का कथन है- “श्रद्धा मयोडयं पुरुष यो यच्छद्धः स एव सः यह पुरुष (आत्मा अथवा परमात्मा) श्रद्धा तत्त्व से ओत प्रोत है। जो जिस स्तर की श्रद्धा अपनाये हुए है वह ठीक उसी प्रकार का है। “श्रद्धावान लभते ज्ञानं” आत्म ज्ञान मात्र श्रद्धावान मिलता है। आत्मिक क्षेत्र की सर्वोपरि शक्ति श्रद्धा हैं। इसको जो जितनी परिष्कृत-विकसित बना सकेगा वह उतनी ही मात्रा में अध्यात्मिक सफलताओं का सामने करबद्ध खड़ा हुई देखेगा।
आत्मोत्कर्ष के चारों शक्ति साधन जुटाये जाने आवश्यक है। संयम से शरीर और संकल्प से मन सधता है। विश्वास से चित्त और श्रद्धा से अहं की- आत्मा की शक्ति निखरती है इसी चतुर्विधि शक्ति संचय के लिए विविध प्रकार के योग साधना एवं तप विधान में विनियमित किये गये है। इन्हीं चारों का तत्त्व दर्शन समझाने के ब्रह्मा जी ने चार मुखों से चार वेदों की सुविस्तृत ब्रह्म विद्या का उपदेश दिया है। इसी अवलम्बन को ग्रहण करते हुए साधकों को जीवन लक्ष्य में हिमालय शिखर पर पहुँच सकने का सौभाग्य प्राप्त होता है।
मातंग मुनि का आश्रम जिस सघन वन में था उसी के एक कोने पर बड़ा सा तालाब था और दूसरे कोने पर छोटा सा झरना। छात्रों समेत महामुनि उन्हीं दोनों से जल प्रयोजन पूरा करते थे। शीत की अधिकता उस पर्वत प्रदेश में बढ़ गई तो छात्रों समेत महामुनि लम्बी पद यात्रा का कार्यक्रम बनाकर निकल पड़े। इसमें मनोरंजन का भी उद्देश्य था और ज्ञानार्जन का भी।
निर्झर के किनारे-किनारे ही उन्होंने लम्बी यात्रा की योजना बनाई। झरना छोटा था पर क्रमशः उसमें अन्यान्य झरने सम्मिलित होते गये अस्तु, वह बड़ी नदी महानदी बनते हुए विशाल विस्तार के साथ समुद्र में जा मिला।
झरने का विकास विस्तार उसका निर्मल जल, प्राणियों द्वारा उसका उपयोग, कृषि उद्यान का उसके द्वारा सिंचन, तट क्षेत्र में घाट, मन्दिर उसकी शोभा मूल उद्गम की तुलना में उसकी शोभा सम्पदा बढ़ाते ही गये। सागर संगम का दृश्य तो और भी मनोरथ था।
महामुनि की शिष्ट मंडली को निर्झर का यह सौंदर्य बहुत भाया सो उसी मार्ग से वे गये और उसी मार्ग से वापिस लौटे। झरने की रीति-नीति उन्हें भली लगी क्योंकि उसमें क्रमिक विकास की सम्मान पद सफलता भी जुड़ी हुई थी।
शीत ऋतु समाप्त हो गई। बसन्त भी बीता। लम्बी तीर्थ यात्रा पूरी करके लौट कर वे आश्रम में पहुँचे तो ग्रीष्म आ पहुँची थीं। आश्रम अस्त-व्यस्त हो गया सो वे उसे संभालने में लगे। जल की आवश्यकता पड़ी। तालाब अपेक्षाकृत निकट था सो वे जल पात्र लेकर वही से पानी लाने के लिए चल पड़े।
देखा तो तालाब की दुर्गति हो रही थी। पानी सूख चुका था। गंदी कीचड़ ही जहाँ तहाँ भरी थी। निराश छात्र खाली हाथों वापिस लौटे और वन के दूसरे कोने पर बहते हुए झरने से पानी लाये। निर्झर ग्रीष्म ऋतु में भी कल-कल ध्वनि से पूर्ववत् प्रवाहित हो रहा था।
रात्रि को महामुनि के समीप छात्रों की मंडली बैठी थी। शंका समाधान का हृदयग्राही क्रम चल रहा था। एक छात्र ने पूछा- देव निर्झर अपनी सम्पदा उन्मुक्त हाथों से लुटाता रहा फिर भी उसका वैभव घटा नहीं। दूसरी ओर तालाब किसी के काम नहीं आया फिर भी वह क्षीण हो गया, इसका क्या कारण है?”
महर्षि की आँखें चमक उठी उसने कहा- तात जो देता है उसकी सहायता के लिए ईश्वर के हजार हाथ सहायता करते हैं और जो तृष्णता बरतता है उसकी संगृहीत संपदा भी छिन्न ही जाती है इस जगत का यही सनातन नियम है।
जीवन अपने आपमें इतना समर्थ है कि मृत्यु को चुनौती देते हुए वह अनादिकाल से लेकर अद्यावधि अपना अस्तित्व बनायें हुए है और सर्वभक्षी विभीषिकाओं से जूझते हुए, वह यही उद्घोष कर रहा है कि अनन्त काल तक उसी प्रकार बना रहेगा जैसा कि अत्र है।
परिस्थितियाँ आती है और चली जाती है। विशेषताएँ आस दिखाती है और धमकी देता है कि वे पलट कर या कुचल कर रख देगी। इतने पर भी जीवन-जीवन ही है। वह अपनी गरिमा सिद्ध करते हुए सदा से यही कहता रहा है कि मरण उसका स्वभाव नहीं। कपड़े बदलने से शरीर तथागत बना रहता है परिस्थितियों की विषमता मात्र कलेवर में उलट-पुलट कर सकती है। उससे जीवन की मूल सत्ता पर कोई आँच नहीं आती। मृत्यु और जीवन के युद्ध का परिणाम इतना ही निकलता रहा है कि मौत ने कलेवर की कुछ धज्जियाँ उखाड़ली जीवन खीजा तो, पर नंगा होने का अवसर नहीं आया। उसने पुराना छिनने के साथ ही नया आवरण ओढ़ लिया।
यह विचार सही नहीं है कि सुविधाजनक परिस्थितियों में निर्वाह होता है। असुविधाएँ और प्रतिकूलताएँ आघात कितना ही बड़ा क्यों न लगा दे, पर वह नष्ट करने में कभी सक्षम नहीं हो सकता, मौत जीवन को हरा नहीं सकती। मरण के बाद जन्म का सत्य सुनिश्चित है। जन्मने के उपरान्त मरना पड़ता है, यह तो परिवर्तन चक्र का घुमाव अथवा मोड़ मात्र है।
जीवन मात्र मनुष्य आकृति में ही नहीं, अन्य छोटे-बड़े प्राण-धारियों के रूप में भी विद्यमान् है और उसकी सत्ता उन अदृश्य सूक्ष्म जीवियों में भी विद्यमान् है, जो नेत्रों अथवा अन्य इन्द्रियों से पहचाने नहीं जाते, फिर भी सामर्थ्य और सक्रियता की दृष्टि से इतने बलिष्ठ है कि उनकी तुलना अपने कलेवर के अनुरूप सिंह और हाथी भी नहीं कर सकते हैं। प्रतिकूलताओं से जूझते हुए अपना अस्तित्व हर स्थिति में बनाये रहने की उनमें अद्भुत शक्ति है जबकि बड़े आकार वाले प्राणी तनिक-सी दुर्घटनाओं के कुचक्र में फँस कर मर जाते हैं।
जीवन न केवल अपनी धरती पर ही है, वरन् वह ब्रह्माण्ड के असंख्य ग्रह-पिण्डों पर विभिन्न आकृति ओर प्रकृति अपनाये हुए विद्यमान् है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप उसने अपने निर्वाह का संतुलन बिठा लिया है।
हार्वर्ड विश्वविद्यालय में जीव विज्ञान के प्राध्यापक डॉ. जार्ज वाल्ड् के अनुसार यद्यपि मंगल पहला ग्रह है जहाँ जीवन की खोज पृथ्वी के वैज्ञानिक कर रहे है। तथापि ऐसे एक अरब ग्रह है, जहाँ जीवन होने की सम्भावना है।
हमारी आकाश गंगा में एक अरब ग्रह है। इससे परे एक अरब अन्य आकाशगंगा है जिसमें से प्रत्येक पूरे एक अरब ग्रह है। वैज्ञानिकों का वर्तमान अनुमान यह है कि इन सभी ग्रहों में से एक से पाँच प्रतिशत तक ग्रहों में जीवन अवश्य विद्यमान् है। क्योंकि इतने प्रतिशत तक ग्रह हमारी पृथ्वी के समान है।
पृथ्वी से पृथक् ग्रहों में जीवन की खोज मनुष्य द्वारा जारी है। अमेरिका के मेरीलैंड विश्वविद्यालय के रासायनिक विकास संस्थान के निर्देशक डॉ. सिरित पोन्नेमपेरुमा ने पिछले दिनों भारतीय विज्ञान काँग्रेस में बताया था कि ब्रह्माण्ड से सन्देश प्राप्त करने का प्रयास निरन्तर चल रहा है। अनेक वैज्ञानिकों की मान्यता है कि सिर्फ हमारे ही नभ-मण्डल में 1 लाख सभ्यताएँ अस्तित्व में है। इन उन्नत सभ्यताओं का पता लगाने के लिए भारी संख्या में विशाल टेलिस्कोप लगाए गये है।
ग्रीन बैंक, वेस्ट वर्जीनिया में ‘ओस्मा’ नामक योजना के अन्तर्गत सुदूर नक्षत्र लोकों की सभ्यताओं से रेडियो तरंगों द्वारा संबंध स्थापित करने का कार्य क्रम चलाया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि चार बार इस संपर्क का उत्तर प्राप्त हुआ है। यद्यपि अभी तक उसका अर्थ समझा नहीं जा सकता है। इस प्रयास से यह आशा बँधी है कि अन्य ग्रह-नक्षत्रों के प्राणी निकट भविष्य में न केवल पृथ्वी के मनुष्यों से वरन् अन्य लोकों के निवासी जीवधारियों के साथ संपर्क बनाने और मेल-जोल बढ़ाने में समर्थ हो सकेंगे।
अनुकूलताओं में ही जीवन रह सकता है, यह बात तो कही जाती है। पर वह अनुकूलता क्या हो सकती है। इसकी परिभाषा कर सकना सम्भव नहीं हो पा रहा। अत्यधिक गर्मी से अथवा अत्यधिक ठण्ड से जीवन का अस्तित्व खतरे में पड़ जाता है, यह कहा जाता है, पर अनुभव ने यह बताया है कि बात ऐसी नहीं है। गर्मी और ठण्डक की अतिशय सीमा में भी जीवन की सत्ता बनीं रह सकती है।
वैज्ञानिक इस सम्भावना को देखकर अन्य ग्रहों पर जीवन हो सकने की आशा से भर उठे है, कि जीवन अत्यन्त विषम परिस्थितियों में भी पनप सकता है। खौलते हुए पानी से भी बहुत बधिक तापमान पर और जमी हुई बर्फ से बहुत अधिक ठण्डक में, जीवन-क्रम सहज सम्भव है।
33 वर्ष की आयु में नोबुल-पुरस्कार से सम्मानित जीव वैज्ञानिक डॉ. जोशुओ लेडरवर्ग ने कहा है कि अन्य ग्रहों में भी जीवन की विद्यमानता की खोज के पूर्व हमें यह ज्ञान लेने का प्रयास करना आवश्यक है कि पृथ्वी पर जिस प्रकार जीवन का विकास हुआ है, उससे भिन्न भी कोई क्रम जीवन-विकास का सम्भव है या नहीं? यदि सम्भव है तो वह कौन-सा क्रम है।
वनस्पतियाँ कहाँ उग सकती है, वहाँ नहीं , अब इस प्रश्न पर कोई चिन्ह नहीं लगा सकता है। उत्तरी ध्रुव जैसे शून्य तापमान से भी नीचे के क्षेत्र में शाक-भाजी उगाने में सफलता प्राप्त कर ली गई है तथा खाद्य पदार्थों का उत्पादन ऐसी परिस्थितियों में भी सम्भव हुआ है जहाँ के सम्बन्ध में अब तक जीवन शास्त्रकार यही कहते रहे है कि उनमें उत्पादन नहीं हो सकता।
यूनियन कार्बाइड रिसर्च इंस्टीट्यूट , न्यूयार्क में वैज्ञानिकों में मण्डल ग्रह जैसा वातावरण कृत्रिम रूप से उत्पन्न करने का प्रयोग किया। उस वातावरण में 98 प्रतिशत आर्गन गैस और 2 प्रतिशत आक्सीजन रखी गयी। तापमान शून्य से दस डिग्री सेन्टीग्रेड नीचे रखा गया। इस कृत्रिम वातावरण में कुकरबिटेसी कुल के खीरे, ककड़ी जैसे तीस प्रकार के पौधों के बीज सफलतापूर्वक उगायें गये। यद्यपि आक्सीजन नाम मात्र को थी, तो भी ये बीज यहाँ पनपे। एक अन्य प्रयोग में काँच के एक वर्तन में मिट्टी के कई नमूने लेकर उनमें कुछ जीवाणु रखे गये। बर्तन के भीतर के वातावरण में कार्बन-डाई आक्साइड, नाइट्रोजन और आर्गन गैस रखी गयी, आक्सीजन नहीं रखी गयी। पानी अत्यन्त मात्रा में रखा गया। इन बर्तनों को 16 घण्टे तक शून्य से 25 डिग्री सेन्टीग्रेड नीचे के तापमान पर रखा जाय। फिर आठ घण्टे तक शून्य से 25 डिग्री ऊपर रखा गया। महीनों बाद भिन्न भिन्न अवधियों में इन नमूनों की जाँच की गयी। पाया गया कि कुछ किस्म के जीवाणु इस स्थिति में भी जा लेते हैं। और कुछ तो प्रजनन द्वारा अपनी आबादी भी बढ़ा लेते हैं। शैवाल और फफूँदी के मिले-जुले रूप वाली लाइकेन नामक वनस्पति भी इस वातावरण में खूब पनपी।
एक अन्य प्रयोग में एरोबैक्टर, एरोजीन्स तथा कुछ अन्य जीवाणु कार्बन-डाई-आक्साइड नाइट्रोजन तथा थोड़ा-सा पोषक माध्यम डाल कर सील बन्द कर दिये गये। प्रतिदिन साढ़े उन्नीस घण्टे तक इनको शून्य से 75 डिग्री नीचे के तापमान पर रखा जाता, फिर साढ़े चार घण्टे तक सामान्य तापमान पर। कई दिनों तक सही क्रम चला। प्रयोग के बाद इन सूक्ष्म-जीवियों की संख्या पूर्वापेक्षा चार हजार गुनी हो गयी।
पानी को जीवन का आधार माना जाता है, पर जब ऐसी संभावनाएँ सामने आई है कि पानी के स्थान पर दूसरे विकल्प भी हो सकते हैं, जिनके सहारे जीवन निर्वाह सम्भव हो सके।
वैज्ञानिकों का एक अनुमान यह है कि मंगल एवं अन्य ग्रहों पर पानी का स्थान अमोनिया ले सकता है। वैज्ञानिक एजेंसी के अनुसार अमोनिया में जल से अधिक तरलता होती है। और वह अधिक अच्छा विलायक है। जलीय रसायन (एक्वाकेमिस्ट्री) की तरह अमोनिया रसायन अमोना-केमिस्ट्री के अंतर्गत जल के तुल्य समस्त अभिक्रियाएँ सम्पन्न होती देखी गई है। जल और अमोनिया में बहुत से गुण समानान्तर पाए जाते हैं। प्रोफेसर बर्नाल, एक्सेल, इत्यादि का मत है कि सम्भव है, अन्य ग्रहों पर जीवन का आधार अमोनिया हो। क्योंकि वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी जब अपनी शैशवावस्था में थी। तब इसके वातावरण में हाइड्रोजन, अमोनिया और जल एवं अमोनिया के गुण-साम्य के आधार पर वैज्ञानिक इसी सम्भावना पर विचार कर रहे है कि मंगल आदि के मानव-स्नान-पान आदि के लिए जल के स्थान पर अमोनिया का ही प्रयोग करते होगे।
इस तथ्यों पर दृष्टिपात करने से विदित होता है कि जीवन निश्चित रूप से अमर है। उस अविनाशी को न तो कोई प्रतिकूलता नष्ट कर सकती है और न मृत्यु के लिए ही उनकी सत्ता मिटा सकना सम्भव है।
वयोवृद्ध सन्त को बन्दी बनाकर खलीफा के महल के सामने लाया गया। अन्यायी शासन के अमानवीय अत्याचारों की अनेक घटनाएँ सन्त ने सुन-जान रखी थी। अतः उन क्रूरताओं का स्मरण कर उनके मन में उथल-पुथल सी मच रही थी।
तभी महल के द्वार पर पहरा दे रहा एक सिपाही सन्त के समीप पहुँचा और फुस-फुसाकर कहने लगा-हजरत सच्ची बहादुरी दिखाइयेगा जुल्म से डरिएगा नहीं। मैं एक बार चोरी के जुर्म में पकड़ा गया ! मुझे एक हजार कोड़ों की सजा दी गई। मैंने कोड़े सहन कर लिए , पर जुर्म कबूल नहीं किया और मुझे छोड़ दिया गया। मैंने झूठ के लिए इतनी हिम्मत दिखाई, तो फिर आप तो सच के लिए कष्ट सहेंगे। “डर कैसा?”
वृद्ध सन्त को लगा , जैसे कोई दिव्य-ज्योति पथ-संकेत कर रही है। भावविभोर हो उठे। वे बोले- “मेरे आत्मीय! तूने सही समय पर मुझे जागााया है।
खलीफा के दरबार में सन्त सत्य-पथ पर अडिग रहे। असत्य के अभ्यस्त लोग भला यह कैसे सहते? हजार कोड़ों का दण्ड सन्त को दिया गया। हजरत इमाम अहमद का वृद्ध शरीर इतने बेंत सहने लायक नहीं था। पर उनका मन प्रसन्न-संतुष्ट था। क्रूर प्रहारों से शिथिल उनका शरीर धराशायी हो गया। मृत्यु से मिलने के बेला में भी हजरत को उस चोर सिपाही की बातें याद रही और प्रफुल्ल चित्त से उन्होंने शरीर त्यागा!
दुःख में गम्भीर-शान्त रहने वालों के प्रति सभी के मन में श्रद्धा-आदर का भाव जगता है। चीखने-चिल्लाने वालों के प्रति भी ध्यान आकर्षित होता ही है, सहानुभूति भी व्यक्त की जाती है पर मुख्यतः उसे दयनीय ही माना जाता है अधिक रोने-धोने वालों से तो घृणा ही करने लगते हैं। इसलिए मनुष्य की शोभा तो इसी में है कि वह साहसपूर्वक परिस्थितियों का सामना करे, उन्हें बदलने का प्रयत्न करे और प्रशान्त-गम्भीर बना रहे सुख ओर दुःख की कुछ अनुभूतियाँ तो परिस्थितियों के स्पष्ट प्रभाव की प्रतिक्रिया होती है- जैसे शारीरिक पीड़ाएँ , प्रकृति उत्पीड़न, जीवन-यापन के न्यूनतम के न्यूनतम साधनों का भी अभाव तथा प्रियजनों का आकस्मिक विछोह। ये आपत्तियाँ कभी-कभी सहनी पड़ती है। इनका प्रभाव तो होता ही है। पर उसे भी गम्भीरतापूर्वक सहने में ही शोभा और गरिमा है। शेष अधिकांश सुख-दुःख में ही शोभा और गरिमा है। शेष अधिकांश सुख-दुःख तो मनःस्थिति पर निर्भर रहते हैं। और उनके लिए साहस की ही नहीं , स्वस्थ जीवन-दृष्टि की आवश्यकता होती है।
वास्तविक विपत्तियों का सामना साहस द्वारा ही किया जाता है। विपत्तियों के निवारण और संकटों में उपचार के लिए सामान्य से अधिक ही बुद्धि-कौशल की, सूझ-बूझ की आवश्यकता पड़ती है। साहस ही खो दिया, तो अपेक्षित सूझ-बूझ सम्भव नहीं हो सकती। उपलब्ध साधनों के भी उपयोग की ओर ध्यान नहीं जा पाता। साहस हो तो साधन भी जुट जाते हैं।
साहस ही व्यक्तिगत की वास्तविक सर्वप्रधान पूँजी है। सत्कर्म ही नहीं, दुष्कर्म भी साहस के बिना सम्पन्न नहीं हो पाते। निश्चय ही दुष्कर्मी समयानुसार अपने दुष्कृत्यों का दण्ड पाते हैं, पर जो क्षणिक सफलता के प्राप्त करने है, वह साहस के बल पर ही।
आपत्तियाँ किस पर नहीं आती? महापुरुषों का जीवन तो आपत्तियों-प्रतिकूलताओं से संघर्ष की ही गधा होती है। वे उनमें साहस और धैर्य से उत्तीर्ण होकर ही अपनी छाप इतिहास में छोड़ जाते हैं। साहस ही उनके व्यक्तित्व को उस चुम्बकीय शक्ति से सम्पन्न बनाता है ,जिससे संकटों से मुक्ति दिलाई
विपत्तियों के पीछे ईश्वरीय अनुग्रह छिपा होता है, अनेक ऐतिहासिक घटनाओं से यह निष्कर्ष भी प्राप्त होता है। सन्मार्गगामी जब अपने महत् लक्ष्य के लिए संकट सहते हैं, तो अनेक मौकों पर उन्हें दैवी सहायता मिलती भी सदा स्पष्ट देखी जाती है। इतिहास-पुराणों में इसके असंख्य उदाहरण भरे पड़े है। असम्भव प्रतीत होने वाले कार्यों को करने के लिए संकल्पित-समर्पित महापुरुषों को ईश्वरीय अनुग्रह सदैव ही मिलता रहा है और उसी के आधार पर साधन शून्य स्थितियों तथा प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच वे आगे बढ़ते और सफल होते हैं।
महापुरुषों के विशेष पराक्रम की बात, यदि रहने भी दें, तो भी सामान्य जीवन-क्रम भी साहस के बिना भारभूत हो उठता है। दुःख उपस्थित होते ही आकुल-उद्विग्न हो उठने पर परिस्थितियाँ गंभीरतम हो जाती है। प्रतिकूलताएँ अनियंत्रित रही आती है तथा कष्ट बढ़ता ही जाता है। धैर्य बना रहा तो बड़ी से बड़ी आपत्ति में से मार्ग मिल ही जाता है। संघर्ष से प्राप्त अनुभवों का अमूल्य लाभ अलग से हाथ लगता है और अपने व्यक्तित्व की पूँजी बढ़ ही जाती है, घटती तनिक भी नहीं। इसके विपरीत, अधीर, कायर व्यक्ति विपत्तियों के प्रहार से तो क्षतिग्रस्त होते ही है, साथ ही उस क्षति से उनका भय और बढ़ जाता है, मनोबल में और कमी आ जाती है।, तथा और बढ़ जाता है, मनोबल में और कमी आ जाती है। तथा सभी और से वे घाटे में ही रहते हैं। साहस विहीन जीवन में न तो ऊष्मा होती है न ही गरिमा।
पौराणिक देव प्रतीकों के सम्बन्ध में उनके स्वरूप, आयुध, वाहन, गुण आदि का जो वर्णन किया गया है, उसे वस्तुस्थिति माने बिना भी काम चल सकता है। प्रतीकों का उपयोग उसी तथ्य को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए जिनके लिए कि तत्त्ववेत्ताओं ने उनकी संरचना की है। इस प्रतीक मान्यता के पीछे विश्व की रचना प्रक्रिया से लेकर नीति और सदाचार के व्यवहार वाद तक की समावेश है। इन गूढ़ रहस्यों को समझने का प्रयत्न करने के लिए गहराई में उतरना होगा तभी हम देव पहेलियों में छिपे अति महत्त्वपूर्ण तत्त्वज्ञान का लाभ उठा सकेंगे
आइन्स्टीन की यह उक्ति कि “अन्वेषक को अधिकार है कि वह ऐसी कोई भी नियम-पद्धति एवं व्याख्या सूत्र रच डाले, जो नये वैज्ञानिक परीक्षणों से भी पुष्ट हो सके”, आध्यात्मिक एवं पौराणिक क्षेत्र के लिए भी उतनी ही लागू होती है। पौराणिक कथा-चित्र और प्रतीक निरंकुश कल्पना की मनोरंजक रचनाएँ नहीं हैं, बल्कि जैसा कि जर्मन विद्वान् हेनरिख जीभर ने अपने ग्रंथ मिथ्स एण्ड सिम्बल्स इन इण्डियन आर्ट एण्ड सिविलाइजेशन’ में कहा है- “विष्णु, रुद्र, शिव, ब्रह्म आदि विविध पौराणिक प्रतीक युगों के अनुभूति जीवन तथ्यों तथा सत्य की ही अभिव्यक्तियाँ है।”
भारतीय वेदों ने ब्रह्म की विराट-लीला को, अनन्त सत्य की विभिन्न अभिव्यक्तियों को पुराण प्रतीकों द्वारा अभिव्यक्ति किया हैं। इन अभिव्यञ्जनाओं को समझने के लिए भारतीय दर्शन, सांस्कृतिक चेतना, सौंदर्य दृष्टि, कला-प्रतिमान जीवन-मूल्य सामाजिक गठन और सामाजिक समप्रेषणीयता के विविध स्वरूपं तथा अभिव्यक्तियों के प्रचलित उपकरणों को समझाना होगा।
ब्रह्मा, विष्णु, शिव ओर शक्ति आदि की बहुरंगी मिथक गाथाएँ सृष्टि, स्थिति प्रलय और गति के विराट् यथार्थ की लोक-मानस के अनुकूल भाषा में की गयी अभिव्यक्तियाँ है। इसी अभिव्यक्ति का प्रयास विभिन्न मन्दिरों एवं भित्ति चित्रों आदि द्वारा किया गया है।
भारतीय मेधा की प्रचण्ड सामर्थ्य और प्रखर ऐश्वर्य हर पौराणिक-प्रतीकों में अभिव्यक्त हुआ है। इनकी अभिव्यंजनाएँ एक साथ बहुआयामी है। जब हम इनके यथार्थ स्वरूप को न समझकर इनका सपाट अर्थ निकाल कर सम्भव कल्पनाओं और स्वप्नों के संसार में खोले रहते हैं। हम वस्तुतः इन देव-शक्तियों का भी अपमान करते हैं और भारतीय मेधा का भी, अपने पूर्वज ऋषियों का भी।
उदाहरण के लिए हमें शिव से सम्बन्धित विभिन्न पुरा-कथाओं और प्रतीकों को देखे एक फ्राँसीसी विद्वान् न शिव को “नान डाईमेंशनल मिथ” कहा है यानी सीमातीत पुराण-प्रतीक मिथ्य और पुरा-कथाएँ सम्पूर्ण मिथ्य, उस फ्राँसीसी लेखक के अनुसार ‘नान डाईमेंशनल’ है।”
शिव के मन्दिरों और मूर्तियों के स्वरूप और प्रकार भी अनन्त है। भव्य और विराट शिव-मंदिरों में भी शिव है तथा पत्थर की एक छोटी सी बटिया के रूप में किसी वट-वृक्ष या अन्य किसी वृक्ष के सहारे भी वे उतनी ही मस्ती से खड़े है।
शिव-पूजा भारत में आदिकाल से ही प्रचलित है। लिंग-पूजा तो उत्तर-पाषाण काल में भी होती थी। मोहन जोदड़ो से पशुपति की आकृति प्राप्त हुई है। हड़प्पा में नटराज का धड़ पाया गया है। हजारों वर्ष से शिव-पूजा की परम्परा के प्रमाण मिले है॥
नेपाल के पशुपति नाथ का मन्दिर विश्व प्रसिद्ध है। भूटान में भी शिव-पूजा प्रचलित है। मक्का में मौजूद सगे-असवद भी शिव लिंग का ही प्रतिरूप बताया जाता है। ईरान जैसे मुस्लिम देशों में भी शिव मन्दिर पाये गये है। भारत में उत्तर में बद्रीनाथ-केदारनाथ और दक्षिणी ध्रुव में रामेश्वर तक महादेव की महिमा व्याप्त है।
शिव शब्द ही मंगल का पर्याय है। हेनरिख जी भर के अनुसार सृजन के प्रारम्भिक उपक्रम में, ब्रह्म तत्त्व का मिथक विभाजन नारी तत्त्व तथा पुरुष तत्त्व के रूप में व्यक्त हुआ है यही ब्रह्म-माया शिव-शक्ति विष्णु आदि के रूप में वर्णित हुआ है।
इतिहास मर्मज्ञ विद्वानों के अनुसार शिव एक ऐतिहासिक पुरुष थे। कालान्तर में लोक श्रद्धा एवं लोक प्रवृत्तियों के विभिन्न मान्यताओं शिव के विभिन्न प्रतीक स्वरूपों का विकास हुआ। शिव की पुरा-कथाएँ लोक-संस्कृति की अनूठी अभिव्यंजनाएँ है।
शिव का नटराज स्वरूप सृजन और विध्वंस की परस्पर विरोधी प्रक्रियाओं की संयुक्त अभिव्यक्ति है। बिना विनाश के सृजन अर्थहीन है और बिना सृजन के विनाश अर्थहीन हैं। उन्मुक्त सृजन और निर्द्धनद विनाश, दोनों स्थितियाँ एक आन्तरिक उल्लास पर टिकी है, जिससे मस्त होकर नटराज नृत्य करते हैं उनके ऊपरी दक्षिण हाथ में है, डमरू, जो अपने आप में एक अर्थ गर्भ प्रतीक है। डमरू को ध्वनि का प्रतीक कहा जाता है।
कालिदास ने पार्वती और परमेश्वर शिव को वाक् और अर्थ की तरह संयुक्त एवं अभिन्न कहा है। तथा जगत का माता-पिता कहकर वन्दना की है। यह शिव के अर्द्ध नारीश्वर स्वरूप की ही स्तुति है।
गोस्वामी तुलसीदास ने भवानी और शंकर को श्रद्धा एवं विश्वास का स्वरूप कहा है।
एक ओर शिव-गहन साधना, तपश्चर्या के देवता है, तो दूसरी और अनूठे दाम्पत्य प्रेम के,, अनुपम प्रणय के, प्रेम, सद्भाव और समाज-कल्याण के। वे नृत्य-उल्लास और लालित्य के, भाषा, शास्त्रों, कलाओं के प्रवर्तक हैं, तो विनाशकारी रुद्र भी है, प्रलयंकर शंकर है।
शिव का तीसरा नेत्र विवेक-ज्योति के रूप में प्रसिद्ध है। शिव इसी तीसरे नेत्र के, विवेक-ज्योति के कारण ज्ञान के देवता है।
एलोरा की गुफा में अर्द्ध नारीश्वर की भव्य मूर्ति है। शिव का अर्द्ध नारीश्वर रूप तो भारतीय संस्कृति के सर्वोच्च आदर्श की अभिव्यक्ति है। पुरुष अर्थ है, तो नारी वाणी। बिना वाणी के अर्थ प्रकट ही नहीं हो सकता। बिना अर्थ के वाणी की सार्थकता नहीं दोनों का मेल ही मनुष्य की समस्त प्रवृत्तियों का आधार है।
पुरा-तात्त्विक प्रमाणों से पता चलता है कि शिव-पूजा कभी विश्व-व्यापी थी। मध्य एशिया तथा बृहत्तर भारत में अभी भी उसके अवशेष है।
अठारह पुराणों में से पाँच का शिव के साथ सम्बन्ध है।पुराणों में शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों का वर्णन है। जो सम्पूर्ण भारत में फैले है।
शिव का तांडव नृत्य रौद्र भी है और सुन्दर भी। यह युग-चक्र है, इतिहास-प्रवाह है। नृत्य के पद-चाल में, विभिन्न भाव-भंगिमाओं में इतिहास की बहुरंगी घटनाएँ है, जय-पराजय है, किन्तु इन सबके बीच है निर्विकार सर्वशक्तिमान, विराट् समाधिगम्य शिव निर्दोष और निर्लिप्त है।
शिव-नटराज के कलात्मक निरूपणों में पदार्थ और ऊर्जा की चक्रीय गति का प्रतीक रहता है। मुद्रा में समाधि की शान्ति और ताण्डव का रौद्र भाव संयुक्त है। शिव के नृत्य में अनूठा लालित्य है, निर्मलता है, गहन प्रशान्त गतिशीलता है।
शिव महाकाल है। ऐतिहासिक घटना-चक्र उनमें उठने वाली तरंगें मात्र है। महत्त्वपूर्ण घटनाएँ अनभिज्ञ है। पर दृष्टि घटनाओं में नहीं उलझना चाहिए, बल्कि सदा प्रवाह पर रहनी चाहिए। ऐसा ही डॉ. राममनोहर लोहिया ने भी कहा था- “घटना को नहीं, प्रवाह को देखो।”
शिव का दाम्पत्य प्रेम अद्वितीय और अनिर्वचनीय है। सती ने सहसा मृत्यु-वरण कर लिया, तो शोक संतप्त, दुःख कातर, वियोग-विहल शिव सती का शव कन्धे पर रखकर सम्पूर्ण संसार का अपने सशक्त कदमों से नापते चल दिये। देवगण डर गये ‘शिव को इस तरह डरा भरते देख! उन्होंने सती के शव के खण्ड-खण्ड कर दिया। शिव विचलित हो गये। जहाँ-जहाँ उनके पैर पड़े वही-वही सती के पवित्र शव के खण्ड भी गिरे और वे स्थान पवित्र तीर्थ-स्थल हो गये, शक्ति पीठ हो गये।
शिव एक और करुणा और प्रेम के- सादगी और कोमलता के उद्गम है, तो दूसरी ओर प्रचण्ड उग्रता के संहार के भी। उनके तृतीय नेत्र के, विवेक-ज्योति के दोनों ही पक्ष समान महत्त्व के है।
शैव-दर्शन में रसेश्वर सम्प्रदाय भी आता है। इससे स्पष्ट है कि आयुर्वेद, रसायनशास्त्र में भी शैव विद्वान् पारंगत रहे है। इसी तरह पाणिनि का व्याकरण भी शैव-आगम के ही अंतर्गत माना जाता है। भर्तृहरि ने वाक् के विभिन्न स्तरों-बैखरी मध्यमा व पश्यन्ति की विवेचना की है। इससे पता चलता है कि शिव-उपासक किस तरह ज्ञान-साधक भी होते हैं। लेकिन आज तो वैखरी शिव के उपासक बनते हैं, जबकि शास्त्र का कथन है- शिवों भूत्वां शिवं यजेत्।
शकर नीलकंठ है। हलाहल पान से उनका कण्ठ नीला पड़ गया है। संसार का विष वे कल्याण के लिए चुपचाप पी जाते हैं,? पर सदा प्रसन्न वदन रहते हैं। व समर्थ, अशान्त और अविकसित लोगों भूत-प्रेतों के भी वे आश्रय धाम है। प्राणि मात्र के वे प्रिय है, आराध्य है।
विवेक-ज्योति के कारण वे विगत काम के कर्ता है। उनके मस्तिष्क से ज्ञान की गंगा प्रवाहित होकर निखिल विश्व का कल्याण करती है। सन्तुलन का चन्द्रमा उनके निरद्विग्न मस्तक पर सदा शोभित रहता है।
पौराणिक उपाख्यानों की प्रतीकात्मकता की पुष्टि विश्व भर के पौराणिक प्रतीकों के साम्य से भी होती है।
भारत के शिव और यूनान के डायोनिसस में साम्य है और पुराण-विद् इन्हें एक ही मानते हैं। मिस्र में ओसाइरिस की उपासना का भी इससे ही साम्य पाया जाता है।
शिव और डायोनिसस दोनों को नृत्य का जनक और प्रवर्तक माना जाता है इसी तरह यह साम्य भी विचारणीय है कि यूनान व भारत, दोनों जगह इन नृत्यों तथा संगीत का उद्देश्य सौन्दर्य चेतना की सन्तुष्टि के साथ ही विभिन्न मनोवैज्ञानिक तथा रहस्यात्मक भावनाओं की सन्तुष्टि भी रहा है।
विश्व भर में इन नृत्यों तथा संगीत का प्रयोग मन को एक तीव्र हर्षोन्मादक स्थिति तक पहुँचाने के साथ ही आध्यात्मिक विश्व से संपर्क के लिए भी होता रहा है कि डायोनिसस के सम्मान में गाये जाने वाले ‘डाई थ्राम्स’ और भारत में चण्डी-गीतों के भाव तथा नृत्य-मुद्राओं में भी कई चीजें समान है।
सीरिया, लेबनान, ईरान, यूगोस्लाविया, अल्जीरिया, मोरक्को, तुर्की आदि देशों में ‘जिक्र’ (एक धार्मिक विधि) क्रिया जाता है। इनके संगीत के ढंग व विविध हाव-भाव पूरी तरह भारतीय हाव-भावों से साम्य रखते हैं। ‘जिक्र’ के कई तरीके तान्त्रिक योग के कुछ अभ्यासों से सर्वथा साम्य रखते हैं।
शिव की ही तरह अन्य देवताओं के चित्र-चरित्र रहस्यों से भरे-पूरे है। देववाद के स्वरूप एवं प्रतिपादन के पीछे छिपे हुए रहस्यों को समझने का यदि गम्भीरतापूर्वक प्रयत्न किया जाय तो प्रतीत होगा कि उसमें व्यक्ति के चिन्तन तथा व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाने वाली ऐसी कितनी ही महत्त्वपूर्ण दिशा धाराओं का समावेश है, जिनका अवगाहन करके हम स्वयं देव स्तर पर पहुँच सकते हैं।
भारत के प्राचीन शास्त्रकारों का कथन था कि पृथ्वी में तीन रत्न है- जल, अन्न और सुभाषित। (पृथ्वियाँ श्रीणि रत्नानि, जलात्रं सुभाषितम्)। पर जल और अन्न आज पर्यावरण-प्रदूषण से दूषित हो रहे हैं और सुभाषित भी शायद नकली मुगलों की दुनिया के शोर में खो गये है।
पर्यावरण है क्या? चारों ओर का जल, भूमि, वायु और उसके ऊपर के सजीवन-निर्जीव सब पदार्थ इन्हें मिला कर “बायोस्फियर’ यानी जीव-मण्डल कहते हैं। जीवन मण्डन और मनुष्य के परस्परावलम्बी सम्बन्ध का नाम पर्यावरण है।
पर्यावरण-प्रदूषण के परिणाम क्या होते हैं 1942 में पूरे लन्दन में चार दिन तक धुएँ की धुन्ध छायी रही। इससे प्रायः 4 हजार व्यक्तियों का प्राणांत हो गया। 1945 में अमरीका के डनोरा शहर में इसी तरह की धुँए की धुन्ध (स्माँग) छायी रही, सैकड़ों लोग श्वसन तन्त्र के रोगों से ग्रस्त हो गये। दोनों जगह कारण एक नहीं था-कोयले के उपयोग से -कारखानों से-निकली सल्फर-डाई-आक्साइड गैस।
जापान की राजधानी टोकियो में पुलिस को हर आधे घण्टे बाद आक्सीजन-टैंकों से आक्सीजन का सेवन करना पड़ता है, क्योंकि मोटरों के धूल-धमाके से कार्बन-मोनो-आक्साइड की मात्रा घट जाती है।
कारखानों से निकल कर हवा में सल्फर डाई-आक्साइड कार्बन-मोनोक्साइड स्माँग रिएक्टैन्ट, कार्बन-डाई-आक्साइड ओजोन और बारीक कण मिलते हैं। साथ ही कार्बन-कण सीसे के कण, धातुओं वाले कारखानों से धातु कण आदि भी शामिल होते रहते हैं।
सल्फर डाई-आक्साइड गैस से एम्फीसिमा, हृदय रोग आदि हो जाते हैं। हवा नम हुई तो इसी गैस से सल्फ्यूरिक अम्ल बन जाता है, जो भवनों और वनस्पतियों को क्षति पहुँचाता है तथा फौलाद को भी बरबाद कर देता है।
कार्बन-मोनोक्साइड गैस रक्त के होमोग्लोबिन में मिलकर रक्त की आक्सीजन धारण क्षमता में कमी ला देती है। इससे मोटर चलाते समय थकान आ जाती है। दुर्बलता, मितली और सिर चकराने की घटनाएँ भी इससे बढ़ जाती है।
फिर इन, जहरीली गैसों से धुएँ के धुन्ध बनते हैं। जिससे कैंसर, श्वसन-तन्त्र के विभिन्न रोग, हृदय रोग आदि फैलते हैं। ओजोन से वनस्पति क्षतिग्रस्त होती है। बारीक कणों से वस्तुएँ मैली हो जाती है। आँखों की देखने की शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और श्वसन-तन्त्र में विकार आता है।
सामान्यतः कीटनाशक दवाओं एवं रासायनिक कचरा द्रव के विषैले तत्त्व तथा धातुओं के कण यह तीन तरह से मनुष्य के शरीर में पहुँचते है- (1) जल द्वारा (2) दूध द्वारा (3) माँस-मछली के भक्षण द्वारा।
रासायनिक अवशिष्ट अथवा फसलों आदि में छिड़की गई कीटनाशक दवाएँ, कई बार बहकर पानी में पहुँच जाती है। ऐसे पानी के प्रयोग से मनुष्य प्रभावित हो जाते हैं।
ऐसे पानी को पीने वाले या कि विषाक्त तत्त्वों से प्रभावित पदार्थों को खाने वाले, गाय, भैंस, बकरी, आदि के दूध से भी ये जहरीले पदार्थ मनुष्य शरीर में पहुँच जाते हैं। कुछ समय पूर्व जापान में, कीटनाशक दवा डाएल्ड्रिन इसी तरह, किसी प्रकार माताओं के शरीर में पहुँच गई और फिर उन माताओं में दूध में जहरीले रसायन पाये गये। यानी माताएँ पिलाती थी दूध, पर बच्चे दूध के नाम पर पी रहे थे मन्द जहर।
डी॰डी॰टी॰, डाइल्ड्रिन, क्लोरेडन्, एनाड्रिन आदि विषाक्त रसायन जल में जितना धुल जाते हैं, वनस्पति में उससे बहुत अधिक अवशोषित होते हैं तथा उस जल व वनस्पति पर जीने वाले, मछली आदि जानवरों से उससे भी कई गुना अधिक उनकी मात्रा होती है। अमरीका में कैलीफोर्निया के ‘क्लियर लेक’ सरोवर में डी॰डी॰टी॰ की सान्द्रता का परीक्षण किया गया। जल में यह मात्रा पी 0.02पी॰पी॰एम॰ अर्थात् 25 करोड़ में एक भाग पी॰पी॰एम॰ का अर्थ होता है- 10 लाख में एक भाग।
इसी झील में कुछ समय बाद वनस्पति तथा मछलियों में भी डी0डी0टी0 सान्द्रता की परीक्षा की गई। वनस्पति में यह मात्रा थी 5 पी॰पी॰एम॰ अर्थात् जल से 250 गुनी ज्यादा। मछलियों में तो इसकी मात्रा 2 हजार पी॰पी॰एम॰ जा पहुँची अर्थात् वनस्पति से चार सौगुनी ज्यादा और जल से 1 लाख गुनी।
कारखानों का कचरा (कार्बोनिक अपशिष्ट), चहबच्चों और मोहरियों की ‘स्युएज’ (गन्दगी) आदि नदी, नालों झील, तालाबों में छोड़ने से भी ये उस जल में आक्सीजन की कमी कर हाइड्रोजन, सल्फाइड तथा मीथेन गैस की प्रचण्ड दुर्गन्ध फैलाते हैं, जीवों -वनस्पतियों को विनष्ट कर देते हैं। अमरीका में ‘ईरी’ सरोवर इसी प्रक्रिया में ‘मर’ चुका है यानी जीवों, वनस्पतियों की पोषक प्राण-शक्ति उसमें बची नहीं।
इसी तरह विशालकाय ताप बिजली केन्द्रों एवं नाभिकीय विद्युत केन्द्रों से समुद्र, नदी या तालाब में गिरने वाला गर्म पानी ‘थर्मल पाल्यूशन’ को जन्म देता है। इससे कारण उस जल की आक्सीजन धारणा, क्षमता कम हो जाती है।
क्षारीय प्रदूषण से युक्त पानी न केवल भूमि की उर्वरा-शक्ति को घटाता है, वरन् उसे दूषित भी करता जिससे वहाँ की फसल जहरीली हो जाती है। टेलीविजन, इलेक्ट्रानिक यन्त्रों, एक्स-किरण उपकरणों व अन्य चिकित्सा-उपकरणों घड़ियों के डायलों आदि के विकिरण का भी मनुष्य व अन्य जीवों पर प्रभाव होता है।
मानव-निर्मित परमाणु बम आदि के परीक्षणों से होने वाले रेडियो क्रिय विकिरण अधिक हो जाने पर समस्त जीवधारियों के विनाश का कारण बनते हैं।
यों, परमाणुजन्य विकिरण यदि कम भी हो, तो भी हानि तो पहुँचाता ही है। अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 1954 में ‘बिकिनी’ नामक एक ‘एटाँल’ (प्रवालद्व्रीप वलय) पर परीक्षणार्थ परमाणु-विस्फोट किया। विस्फोट के बाद सहसा हवा ने रुख बदला और रेडियोसक्रिय विकिरणमय कूड़ा वहाँ से कुछ मील दूर स्थित रोंजेलैप एटाँल की ओर बढ़ने लगा। तुरन्त की अमेरिकी खोजी दल ने रोंजेलैप पहुँच कर वहाँ के सभी 82 निवासियों को वहाँ से हटाया, पर इसमें दो दिन लग गये। क्योंकि हटने वालों को अपना सामान आदि समेटना भी तो जरूरी था।
जो लोग बिलकुल शुरू में हटा लिए गये, उन पर तो कोई प्रभाव नहीं पड़ा। पर देर से हटने वालों में से कई में 10 दिन के भीतर विकिरणजन्य दाह होने लगा। थाइराइड ग्लैड्स में गांठें पड़ने लगी। राजकयुक्त मस्से होने लगे या कि ऐसे ही अन्य लक्षण प्रकट हुए। 10 वर्ष बाद भी उनमें विकिरणजन्य विषाक्तता पाई गई। अब भी इन लोगों में उसका प्रभाव शेफ हो, यह सम्भव है। जब कि यह एक हल्का परमाणु परीक्षण था। फिर विकिरण युक्त कूड़ा समुद्र में गुजरा था, (जिससे अधिकाँश तो वही समुद्र में धुल जाता है) और उसकी सान्द्रता कम हो गई थी।
रेडियोसक्रिय अपशिष्ट का प्रभाव 1 हजार वर्ष तक प्राणियों के लिए हानिकर हो सकता है। रेडियम की आधी विकिरणशीलता 1622 वर्ष में समाप्त होती है। हाँ स्ट्रॉशियन 10 की आँधी विकिरणशीलता 25 वर्षों तक ही रहती है।
अमरीकी चिकित्सक डॉ॰ थेरान जी रैन्डाल्फ के अनुसार तेल शोधक, इस्पात या कि रासायनिक कारखाने के क्षेत्रों में निकलने वाले, कुछ लोक जो उस वातावरण से दूर रहते हों, सिर्फ वहाँ से गुजरने के कारण बीमार पड़ जाते हैं। किसी को दमे का दौरा पड़ जाता है। कोई थक जाता है। किसी को सिरदर्द हो जाता है, तो किसी को है- फीवर-नामक ज्वर। कुछ ऐसे बहकने लग जाते हैं, जैसे नशे में हों। किसी की श्लेष्मा झिल्लियों में क्षोभ हो जाता है। कोई चिड़-चिड़चिड़ाहट से भर उठते हैं और कोई अधीर से हो उठते हैं। इन सबको एलर्जिक-प्रतिक्रियाएँ कहा जाता है और ऐसे कारखानों से निकलने वाले उन पदार्थों को, जो वातावरण में व्यास होकर ऐसा प्रभाव पैदा करते हैं, उन्हें ऐररोएलर्जन पदार्थ कहते हैं।
शोर भी वातावरण-प्रदूषण का एक कारण है शोर वैज्ञानिक ग्राहमबेल के नाम पर शोर नापने की इकाई का नाम बेल रखा गया है। बेल का दशमांश है डेसीबल। जहाँ से ध्वनि सुनाई पड़ने लगती है, उसे शून्य डेसीबल माना जाता है। शून्य ‘डेसीबल’ की स्थिति तो प्रयोगशाला में ही होती है। मानवीय जीवन में तो सामान्य प्रशान्त वातावरण में भी 25 डेसीबल शोर होता रहता है- पत्तों की मर्मर ध्वनि या हल्की-सी हलचल। इससे भी ध्वनि तो उत्पन्न होती ही है।
शरीर-विज्ञानियों के अनुसार शोर का मनुष्य के शरीर पर दुष्प्रभाव पड़ता है। कानों को तो क्षति पहुँचती ही है। अधिक तेज शोर से धमनियों सिकुड़ने लगती है, ब्लडप्रेशर बढ़ जाता है। श्वसन-क्रिया अनियमित हो सकती है, पाचन-क्रिया गड़बड़ा जाती है, इससे आँतों पर असर होता है। कई हारमोनों के सुख पर प्रतिकूल असर पड़ता है पिट्यूटरी ग्रन्थि, एड्रीनल कार्टेक्स, थाइराइड ग्रन्थि और जनन ग्रंथियों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
अधिक तेज शोर से आँखों की ज्योति मन्द पड़ती है, रात में देखने में कठिनाई होने लगती है, रगों का भेद कर पाना मुश्किल हो जाता है। और दूरी का तथा धरातल के ऊँचे-नीचे होने का अनुमान सही-सही लगा पाना कठिन हो जाता है।
शोर के थकान, उदासी और ऊब पैदा होती है, विचारों की शृंखला टूटती है, मस्तिष्क की विद्युत-तरंगों में गड़बड़ी होने लगती है। इससे हिंसा की भावना बल पकड़ सकती है। उत्तेजना-पूर्व जीवन की ओर झुकाव बढ़ सकता है।
जीवन-जगत के अन्तर्सम्बन्ध कार्बन, आक्सीजन, नाइट्रोजन तथा गन्धक के चक्रों से ही पूरी तरह परिचालित है। ये चक्र उस प्रक्रिया के नाम है, जिसके द्वारा मृत कार्बोनिक पदार्थ नये जीवन के निर्माणकारी पदार्थों में परिवर्तित होते हैं।
कार्बन-चक्र से हम सभी परिचित है। कार्बन सभी जीवधारियों में मिलता है। जैव कार्बन सूर्य से प्राप्त ऊर्जा का प्रयोग करते हुए प्रकृति में कोयले तथा पेट्रोलियम के रूप से इकट्ठा होता है उद्योगों में कोयले व पेट्रोलियम का प्रयोग होता है तथा कार्बन-डाई-आक्साइड बनती है। पौधे तथा कुछ सूक्ष्म जीवन वायु से कार्बन-डाई-आक्साइड सोखते हैं व आक्सीजन छोड़ते हैं। मृत पौधों व पशुओं का सूक्ष्मजीवी विघटन करते हैं और कार्बन-डाई-आक्साइड वायु में वापस लौट जाती है।
प्रकृति की पूरी स्वतन्त्र आक्सीजन पृथ्वी के कार्बोनिक पदार्थों की सम्पूर्ण मात्रा के साथ एक सन्तुलन में होती है। तथा कार्बन एवं आक्सीजन के चक्रों में घनिष्ठ अन्तर्सम्बन्ध होता है।
प्रकाश-संश्लेषण तथा विभिन्न जैविक विधियों द्वारा 20 से 30 अरब टन तक कार्बन प्रतिवर्ष वायु से स्थल में पहुँचता है। जीवाणु लगभग 40 अरब टन कार्बन-डाई-आक्साइड हर वर्ष खा जाते हैं। बाद में पशुओं, पौधों व जीवों के विघटन से यह कार्बन-डाई-आक्साइड का अंश बढ़ने लगा है। पिछले सौ वर्ष में ही वह 0.029 प्रतिशत से बढ़कर 0.032 प्रतिशत तक पहुँच गया है। अनुमान है कि सन् 2 हजार तक वायुमण्डल में कार्बन-डाई-आक्साइड की मात्रा 0.04 प्रतिशत और अगले दो-तीन सौ वर्षों में 1 प्रतिशत हो जायेगी।
पर्यावरण-प्रदूषण की आज उपस्थित भयावह स्थिति इन्द्रिय-लोलुप जीवन दिशा की है अनिवार्य परिणति है। औद्योगिक प्रगति में तो चक्रीयक्रम अपनाना आवश्यक है ही लेकिन अधिक महत्त्वपूर्ण है उस सही जीवन दृष्टि को हृदयंगम करना-जो सन्तुलन और चक्रीय-क्रम के अनुवर्तन के आधार पर प्रगति की दिशा व स्वरूप निर्धारित करती है। सही मार्ग वही है। एकांगी प्रयास सदा किसी न किसी असन्तुलन और प्रदूषण का कारण बनते रहेंगे।
आकार की दृष्टि से स्थूलता का ही मूल्यांकन किया जा सकता है। मोटी बुद्धि आकृति को देखती और उसी के आधार पर उसके विस्तार, वजन, उपयोग तथा महत्त्व के सम्बन्ध में अनुमान लगाती है। पर बात वैसी ही नहीं महत्त्व गहराई में छिपा रहता है। प्राणी की आकृति देखकर नहीं, उसकी प्रकृति का स्वरूप जानकार ही यह समझा जा सकता है। कि उसका स्तर क्या है? उससे किस प्रकार का सम्बन्ध रखा और क्या उपयोग किया जा सकता है? मिट्टी के ढेले या पत्थर के टुकड़े का यह महत्त्व नहीं जो परमाणु के मध्य बिन्दु-न्यूक्लियस का। यों उस ढेले या टुकड़ों के असंख्य परमाणु गठित होते हैं पर प्रचण्ड शक्ति तो तभी मिलती है जब गहराई में घुसते-घुसते ऊर्जा के उद्गम केन्द्र तक जा पहुँचे।
अध्यात्म विज्ञान व्यक्तित्व को गहराई में प्रश्न करने और आत्मा को जानने-समझने पर जोर देता है। हाड़−माँस के मनुष्य की शक्ति बैल,घोड़े से कम है। उसका महत्त्व ज्ञान, गरिमा और भाव सम्वेदना में सन्निहित है। यह सूक्ष्मता की अधिकाधिक गहरी परतें है। यदि आत्मा के गहन अन्तराल का स्पर्श किया जा सके तो प्रतीत होगा कि जीवन के उस मध्य बिन्दु में अनन्त शक्तिशाली ब्रह्मसत्ता का आलोक विद्यमान। इस चिनगारी को यदि ठीक तरह सँभाला, सँजोया जा सके तो वह सब कुछ अपने भीतर से ही प्राप्त किया जा सकता है। जिसकी मनुष्य को आकाँक्षा एवं आवश्यकता है।
सूक्ष्मता की शक्ति का थोड़ा आभास प्राप्त करने के लिए होम्योपैथी विज्ञान की औषधि निर्माण प्रक्रिया का लिया जा सकता है। उसका आविष्कार इसी आधार पर हुआ है कि सूक्ष्मता के क्षेत्र में जितना गहरा उतरा जाय उतना ही अधिक प्रभावशाली शक्ति-पुंज करतलगत किया जा सकता है।
किसी भी होम्योपैथिक दवा के निर्माण को गणितीय ढंग से यदि देखा जाय, तो विस्मयजनक तथ्य हमार सामने आते हैं। उदाहरण के लिए सल्फर-30 नामक औषधि की निर्माण-प्रक्रिया पर विचार करें। इसके लिए ऐ ग्राम ‘सल्फर’(गन्धक) लिया जाता है और उसे 99 ग्राम दुग्ध-शर्करा मिल्क-सुगर में घोटा जाता है। इससे बने चूर्ण को ‘सल्फर-1’ कहा जाता है। इस ‘सल्फर-1’ की एक ग्राम मात्रा को पुनः 99 ग्राम दुग्ध-शर्करा में घोंटने पर बना चूर्ण “सल्फर-3” कहा जाता है।
“सल्फर-3” की एक ग्राम मात्रा को तब 87 प्रतिशत अल्कोहल वाले 99 ग्राम द्रव में अनेक बार में घोला जाता है। अर्थात् थोड़े-थोड़े द्रव से एक ग्राम सल्फर-3 को क्रमशः रसार्द्र करते जाते व भली-भाँति घोंटते जाते हैं। इस प्रकार एक ग्राम ‘सल्फर-3’ को पूरे 99 ग्राम अल्कोहल-द्रव में कई चरणों में घोलते-घोटते हैं। इस प्रक्रिया से तैयार ‘टिन्क्चर’ को ‘सल्फर-4’ कहते हैं। इस ‘टिन्वचर’ की 1 ग्राम मात्रा पुनः 87 प्रतिशत अल्कोहल की मात्रा वाले 99 ग्राम द्रव में भली भाँति उपरोक्त विधि से मिश्रित की जाती है। इससे प्राप्त द्रव हुआ “सल्फर-5”। यही प्रक्रिया पुनः दुहराने पर ‘सल्फर-3’ तथा इसी तरह अगले क्रमाँक का द्रव प्राप्त किया जाता है। ‘सल्फर-6’ को जब 24 बार और इसी क्रिया से गुजारा जायेगा, तब जाकर सल्फर-30 प्राप्त होगा। मात्र सल्फर-30’ ही नहीं, लगभग सभी होम्योपैथिक दवाओं को तैयार करने की प्रक्रिया मूलतः ऐसी ही कुछ रहती है। जितनी अधिक ‘पोटेन्सी’ की दवा हो, उतनी ही सूक्ष्मता।
इस प्रक्रिया को भौतिकी के सिद्धान्त के सिद्धान्त पर परखने पर विस्मयकारक तथ्य उभरते हैं। हाइड्रोजन का परमाणु सर्वाधिक हल्का होता है। और हाइड्रोजन की 1 ग्राम मात्रा में हाइड्रोजन-अणुओं की संख्या होती है, 6.02 ग्राम 10 (22) अर्थात् 6.02 में 10 की 23 घात का गुणा करने पर प्राप्त संख्या अर्थात् (6 लाख 2 सौ-शंख यूरेनियम का परमाणु हाइड्रोजन से 238 गुना भारी होता है। अतः जितने परमाणु एक ग्राम हाइड्रोजन में होते हैं।, उतने ही परमाणु 238 ग्राम यूरेनियम में होंगे। गन्धक हाइड्रोजन से 32 गुना भारी होता है। अतः 32 ग्राम गन्धक में भी उतने ही परमाणु होंगे।6.02 ग्राम 10 (23) यानी 6 लाख सौ शंख। सल्फर की 1 ग्राम मात्रा में परमाणुओं की संख्या होगी इसका 32 वाँ हिस्सा अर्थात् 18812 शंख सल्फर-1 की 100 ग्राम मात्रा में होगे, क्योंकि 100 ग्राम सल्फर-1 में सल्फर 1 ग्राम ही विद्यमान रहता है। शेष तो दुग्ध-शर्करा मिल्क-सुगर होती है। सल्फर-2 की 10 हजार ग्राम मात्रा में इतने ही अणु होंगे और सल्फर -3 की 10 लाख ग्राम मात्रा में। सल्फर-30 की 100 (सौ घातें तीस) ग्राम मात्रा में इतने ही अणु होंगे, जिनका अर्थ हुआ कि 1 ग्राम सल्फर-30 में (6 लाख 2 सौ शंक)/32 ग्राम 100 (30) परमाणु की गन्धक के हो सकते हैं। किन्तु परमाणु का परमाणु-रूप में ही विभाजन असम्भव है। इसलिए मात्र यह कहा जा सकता है कि 5 ग्राम 10 (37) अर्थात् 50 शंख शंख ग्राम सल्फर-30 में ही गन्धक का 1 परमाणु विद्यमान होगा। शेष तो अल्कोहल ही प्रमुख है। इसे यों कहा जा सकता है कि सल्फर-30 रासायनिक दृष्टि से तो शुद्ध ‘अल्कोहल’ ही है, क्योंकि 50 शंख ग्राम में गन्धक का मात्र 1 परमाणु होना नगण्य ही है। 50 शंख खुराक (प्रति ग्राम खुराक के हिसाब से) यदि सल्फर-30 की रोगियों को दी जाएँ, तो उसमें से किसी एक खुराक में गन्धक का एक परमाणु विद्यमान होगा। शेष किसी खुराक में गन्धक का एक परमाणु विद्यमान होगा। शेष किसी खुराक में नहीं। निष्कर्ष यही निकला कि ‘सल्फर-30’ रासायनिक दृष्टि से विशुद्ध अल्कोहल है। यही बात कार्बन-30 या कि 30 पोटेन्सी वाली किसी अन्य दवा के बारे में कही जा सकती है। फिर अधिक पोटेन्सी वाली औषधियों का तो कहना ही क्या?
होम्योपैथी के जनक डॉ॰ हनीमैन ने अपने लेखों अनुभवों द्वारा इस बात को कहा कि होम्योपैथिक औषधियों की निर्माण-प्रक्रिया औषधियों की “स्मिरिट” को प्रखर एवं सक्रिय बना देती है। उधर आज आधुनिक भौतिकीविद् भी इसी निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि ‘मैटर’ की कोई मूलभूत सत्ता ‘मैटर’ रूप में नहीं है, वह ऊर्जा या कि अज्ञात तरंगों का ही रूपान्तरण मात्रा है। क्या से तरंगें चेतना-तरंगें है? क्या ‘मैटर’ में चेतना निहित रहती है? ये प्रश्न आज वैज्ञानिकों के सामने ज्वलन्त है।
आयुर्वेद में रसायनों के अनेक पुट लगाने और लगातार बहुत समय तक घोटने की विधि-व्याख्या इसी सिद्धांत के आधार पर की गई है कि औषधि के गठित परमाणुओं का अधिकाधिक विगठन हो सके और उसकी मूल शक्ति का चिकित्सा प्रयोजन के लिए लाभ उठाया जा सकें। स्पष्ट है कि बादाम को ऐसे ही चबाकर खा जाने की अपेक्षा उसे बारीक पीस कर ठण्डाई आदि के रूप में प्रयोग करना बलवर्धक है। यदि उसे धीरे-धीरे घिसा जाय और तब उसे चाटा जाय तो इससे गुणों में और अधिक वृद्धि हो जाती है।
यज्ञ-विज्ञान इन दिनों तो ऐसे ही धार्मिक कर्मकाण्ड प्रक्रिया तक सीमित रह गया है, पर उसमें उपयोगी पदार्थों को अग्नि के माध्यम से सूक्ष्मीकरण का रहस्यमय विज्ञान भी जुड़ा हुआ है, इसे बहुत कम लोग जानते हैं। थोड़ी-सी हवन-सामग्री यों अपने स्थूल रूप में जरा-सी जगह घेरती और तनिक-सा प्रभाव उत्पन्न करती है, पर जब वह वायु भूत होकर सुदूर क्षेत्र में विस्तृत होती है तो उस परिधि में आने-वाले सभी प्राणी और पदार्थ प्रभावित होते हैं। स्वल्प साधनों को अधिक शक्तिशाली और अधिक विस्तृत बना देने का प्रयोग यज्ञ प्रक्रिया में किया जाता है। फलतः उसके प्रभाव क्षेत्र में आने वालों की शारीरिक व्याधियों से ही नहीं मानसिक ‘आँधियों’ से भी छुटकारा पाने का अवसर मिलता है।
शरीर के अवयवों को प्रभावित करने के लिए औषधियों का लेप, खाना-पीना या सुई लेने से उपचार हो सकता है। किन्तु मानसिक रोगों एवं मनोविकारों की निवृत्ति कोषों तक पहुँचने और अपना प्रभाव उत्पन्न करने में समर्थ हो सके। यह कार्य यज्ञ से उत्पन्न हुई शक्तिशाली ऊर्जा से सम्पन्न हो सकता है। वह नासिका द्वारा, रोमकूपों एवं अन्यान्य छिद्रों द्वारा शरीर में प्रवेश करती है। विशेषतया मस्तिष्क के भीतरी जीवाणुओं तक प्रभाव पहुँचाने के लिए नासिका द्वारा खींची हुई वायु ही काम कर सकती है यदि उसमें यज्ञ-प्रक्रिया द्वारा प्रभावशाली औषधियों और ध्वनियों का समावेश किया गया है तो उनका समन्वय विशेष शक्तिशाली बनेगा और मानसिक विकृतियों के निराकरण से अति महत्त्वपूर्ण उपचार की भूमिका सम्पन्न करेगा।
योगाभ्यास में व्यक्तित्व की गहराई में उतरने और उसके सूक्ष्मतम अन्तराल जो जागृत विकसित किया जाता है फलतः दिव्य-शक्तियों का उद्भव होता है और सिद्ध पुरुषों में गिने जाने का अवसर मिलता है सूक्ष्मता की शक्ति के चमत्कार हर क्षेत्र में देखे जा सकते हैं।
निखरे हुए मन में सभी भावात्मक अभिव्यक्तियाँ मुक्त रूप से होती है बच्चे इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। उन्मुख हास्य और उन्मुक्त रुदन, दोनों ही उसमें स्पष्ट देखे जा सकते हैं।
मनुष्य का भावात्मक संवेग प्रभावित करते ही है जीवन-प्रभाव का उतार-चढ़ाव मन को भी स्पन्दित करता है। परमहंस स्थिति की बात भिन्न है। अन्यथा मनुष्य मात्र को भावात्मक उद्वेलनों से गुजरता पड़ता है।
कौन-सी परिस्थितियाँ एक व्यक्ति को अनुकूल प्रतीक होती है कौन प्रतिकूल? इसमें तो भिन्नता होती है। किन्तु अनुकूल परिस्थितियों से प्रसन्नता और प्रतिकूल परिस्थितियों से परेशानी का अनुभव स्वाभाविक है। प्रसन्नता की या आनन्द की अनुभूतियों को हँसी या मुस्कान के साथ अभिव्यक्त कर देने पर वे औरों में से सहचरी भव संचारित करती है और स्वयं का मन भी हलका हो जाता है। यदि हर्ष को गुमसुम रहकर भीतर ही दबा दिया जाय, तो भावनात्मक कोमलता को इससे क्षति पहुँचती है। यही बात रोने, उदास होने के सम्बन्ध में है। मन ही मन घुटते रहने से उदासी अनेक प्रकार की ग्रन्थियों का कारण बनती है। रो लेने पर चित हलका हो जाता है। पर दुःख कातरता उत्कृष्ट मनःस्थिति की प्रतिक्रिया है। भीतर की करुणा व संवेदना दुःख, पीड़ा और पतन के दृश्यों से तीव्रता से आन्दोलित हो उठती है। यह हलचल आवश्यक है। जहाँ यह हलचल दबा दी जाती है, वहाँ इन कोमल संवेदनाओं की आघात पहुँचता है और मन की ग्रन्थियाँ जटिल होती जाती है। असफलता, असन्तोष, आघात किसके जीवन में नहीं आते। उनका आना-जाना यदि खिलाड़ी की भावना से देखा ग्रहण किया जाय, तब तो चित्तभूमि के अधिक उद्वेलन का कोई प्रश्न ही नहीं। ऐसी प्रशांत स्थिति तो परिष्कृत व्यक्ति का चिन्ह है। पर इस प्रशान्त मनोदशा में उल्लास भरपूर होता है। इसीलिए अपने यहाँ प्रसन्न गम्भीर मनःस्थिति को सर्वोत्कृष्ट कहा- माना गया है। पर जब स्थिति ऐसी न हो मनःक्षेत्र, दुःखद घटनाओं को ही गुन-धुन रहा हों, तो उपयुक्त यही है कि भीतर से उठ रही रुलाई को रोका न जाय, नकली बहादुरी के प्रदर्शन का प्रयत्न मन के भीतर की घुटन को तो हल्का करेगा नहीं, मस्तिष्क की क्रियाशीलता को अवश्य क्षति पहुँचाएगा। भारी सदमे के कारण घातक रोग उत्पन्न होते देखे गये है। कई बार तो उनके कारण आकस्मिक मृत्यु भी हो जाती है। यदि फुट-फुट कर रो लिया गया हो ताकि अपना दुःख खोलकर किसी विश्वस्त आत्मीय से विस्तारपूर्वक कह दिया गया हो, तो ऐसी स्थिति कदापि नहीं आती।
संवेदनशील लोगों में चारों ओर की पीड़ा और पतन को देखकर मन में ‘मन्यु’, सहः, सहानुभूति करुणा और संकल्प का वेग फूट पड़ता है। आत्मानुशासित संवेग सक्रिय होकर श्रेष्ठ कर्म का आधार बनता है। काव्य, चित्रकला,संगीत आदि मन की इन्हीं कोमल सम्वेदनाओं की ही तो अभिव्यक्तियाँ है। समाज-निर्माण और लोक मंगल का संकल्प ऐसी ही अनुभूतियों से दृढ़ और प्रखर होता चलता है। चारों ओर बिखरा सहज उल्लास और विराट् सौंदर्य भी इसी प्रकार मन को अभिभूत कर उसमें ऐसी तीव्र हिलोरें उत्पन्न कर देता है कि उसकी अभिव्यक्ति विभिन्न रूपों में होती रहती है।
हँसी या आँसुओं का रासायनिक स्वरूप क्या होता है, यह महत्त्वहीन है। यद्यपि वे भी एक से नहीं होते। प्रा0 स्टुटगार्ड ने भिन्न-भिन्न भावनाओं के निकल पड़ने वाले आँसुओं का अलग-अलग विश्लेषण कर यह जानकारी एकत्र की है कि इनमें से प्रत्येक प्रकार के आँसुओं में प्रोटीन, शर्करा, लवण और कीटाणुनाशक तत्वों आदि का अनुपात भिन्न-भिन्न था। साथ ही कुछ अन्य रासायनिक सम्मिश्रण भी पाये गये। इसके आधार पर उनका दावा है कि किसी व्यक्ति के अश्रुकणों के विश्लेषण द्वारा उसके रोने का कारण उस व्यक्ति से पूछे ही बताया जा सकता है।
हठात् रुलाई रोकने से जुकाम, सिर दर्द ही नहीं, चक्कर आना, अनिद्रा, आँखें जलना, स्मरणशक्ति की कमी आदि रोग हो जाते हैं। अमरीकी मनोवैज्ञानिक जेम्सवाट के अनुसार स्त्रियाँ अपने आँसू बहाने में कंजूसी नहीं करने के कारण ही घुटन से मुक्त रहती है। और अधिक स्वस्थ एवं दीर्घ जीवी रहती है, जबकि पुरुष अपनी कठोर प्रकृति का दण्ड-स्वास्थ्य के क्षरण के रूप में भोगते हैं। मनःचिकित्सक बेनार्ड होल्स ने तो अपने अर्धविक्षिप्त रोगियों को कारुणिक दृश्यों द्वारा रुलाकर उनके चित्त को हलका करते हुए उन्हें रोगमुक्त ही कर दिया।
समुद्र में ज्वार-भाटे की तरह ही हमारे चित्ततल में परिस्थितियों के घात प्रतिघात हर्ष-विषाद उल्लास शोक के उतार-चढ़ावों की सृष्टि करते रहते हैं। उनको सहज, मुक्त रूप से अभिव्यक्त हो जाने देना चाहिए और स्वयं बालकोचित सरलता बनाये रखना चाहिए। अधिक उत्कृष्ट स्थिति तो यही है कि मनोभूमि प्रशान्त उदार हो और द्वंद्वात्मक उभारों को सन्तुलित ही रखा जाय। पर यह स्थिति एक दिन में नहीं बन जाती। जब भीतर वैसी उदात्त मनोदशा नहीं है तब ऊपर से भावोद्वेगों को दबा कर शान्ति बनाये रखना हानिकार ही सिद्ध होगा।
अपने दुष्कर्मों को दबाकर ऊपर से कृत्रिम शान्ति बनाये रखना, तो इन सबसे हट कर एक भिन्न ही प्रवृत्ति है। वह तो अपने सर्वनाश का ही मार्ग है। अपराधी कितना भी वीर और साहसी हो, धीर-धीरे उसके इन गुणों का श्रेष्ठ प्रभाव घटता जाता है। दमित मनोभावनाएं गहरे मानसिक सन्ताप और जटिल रोग का कारण बनती है। हिटलर युवावस्था से धीर-वीर और साहसी था। पर जब अपनी महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति के लिए वह क्रूर कर्मों की राह पर चल पड़ा, तो उसका मानसिक सन्ताप उसे खाने लगा और खाता ही गया। उसे इसी मनःसंताप के कारण अन्तिम दिनों में एक प्रकार का लकवा मार गया और उसे अपने विश्वस्तों पर भी सन्देह होने लगा।
पापकर्मों से उत्पन्न मानसिक सन्ताप तो पश्चाताप प्रक्रिया एवं आत्मस्वीकृति द्वारा ही दूर होती है। भारतीय आचार्यों ने इसी हेतु प्रायश्चित-विधान किया था और चान्द्रायण आदि व्रत कराते समय समस्त पाप स्वीकार करने होते थे।
पश्चाताप तो पापकर्मों का किया गया है। सामान्य जीवन-चक्र में आने वाले उतार-चढ़ावों का पाप से अनिवार्य सम्बन्ध नहीं होता। पर मन की स्वाभाविक प्रतिक्रिया को छिपाने की प्रवृत्ति एक नकली जीवन जीने का बाध्य करती है और मन में गांठें पड़ती जाती है। सहज-सरल जीवन में ये गांठें तो नहीं ही पड़ जाती अनैतिक जीवन की कभी कामना भी नहीं होती। बोझिल में नहीं पापकर्म की ओर प्रवृत्त होता है। मन में ऐसा बोझ न लदने देने के लिए अपने भावनात्मक उद्वेलनों को दमित नहीं करना चाहिए।
भारत में पर्व, उत्सव या प्रसन्नता के प्रत्येक अवसर पर मीठे भोज्य पदार्थ का आयोजन किया जाता है। मीठे पकवानों के बिना हमारी प्रसन्नता अधूरी रहती है और ऐसा लगता है मानों हमने त्यौहार का अधूरा आनन्द लिया। मिठास की स्वाभाविक चाह चीनी से बनी विविध मिठाइयों टॉफी, बिस्किट, शर्बत, कुल्फी और चाय आदि से पूरी होती है। आये दिन होटल और हलवाई की दुकान पर जाकर अनेक प्रकार की मिठाइयाँ खाते रहते हैं, पर हमने कभी यह विचार तक नहीं किया कि स्वास्थ्य निर्माण में इनका क्या योगदान है?
जर्मन रसायन शास्त्री बैडिल ने चीनी के प्रयोग कुत्तों पर किये। उन्होंने सात प्रतिशत चीनी मिले जल के इन्जेक्शन कुत्तों को दिये तो उन्होंने देखा कि शरीर की श्लेष्मिक कलाओं में जलन पड़ने लगती है, उनका रंग लाल हो जाता है। चीनी की मात्रा की वृद्धि करने पर उनकी लालिमा और बढ़ जाती है। इस प्रयोग के समय बेचैनी के कारण कुत्ते की छटपटाहट इतनी बढ़ गई कि चिकित्सक को अपना प्रयोग रोकना पड़ा।
इसी तरह का एक प्रयोग डा॰ ओगटा ने भी कुत्तों पर किया उन्होंने माँस के साथ एक तोला चीनी मिला कर खिलाई। इसका परिणाम यह निकला कि कुछ दिनों में एक चौथाई पाचन शक्ति घट गई।
एचिसन टाबर्टसन नामक चिकित्सक ने वायु व नेत्र रोग से पीड़ित रोगियों को 100 ग्राम चीनी का शर्बत ढाई सो ग्राम पानी में बनाकर दिया तो थोड़ी ही देर में रोगियों की हालत बिगड़ने लगी। अधिकतर लोगों को उल्टियाँ हुई। पेट के दर्द और छाती में जलन पड़ने लगी, दाँत खट्टे हो गये। इन्हीं रोगियों को जब फल की शर्करा पिलाई गई तो कोई कष्ट नहीं हुआ। डाक्टर टावटंसन ने यह भी देखा कि नाश्ते में चीनी का अधिक उपयोग करने से आमाशय की श्लेष्मिक कलाओं से श्लेष्मा इतना अधिक निकलता है कि पाचन तन्त्र को ही कमजोर बना देता है।
टमेरिका में मिशीगन विश्व-विद्यालय के दाँत विशेषज्ञ का कहना है कि चीनी का सबसे अधिक कुप्रभाव दाँतों का पड़ता है। उन्होंने देखा कि जिन बालकों के आहार में मिठाइयों को स्थान दिया गया था उनके दाँत शीघ्र ही खराब होने लगे और जब मीठी चीजें निकाल दी गई तो उनके दाँत पुनः स्वस्थ हो गये। संसार के विभिन्न देशों में चीनी की अधिक खपत करने वाला देश अमेरिका ही है इसीलिए दाँतों के रोगियों संख्या भी सबसे अधिक है। एक जाँच से पता चला कि वहाँ 4 लाख बच्चे हृदय रोग से, 10 लाख कान के रोग से 40 लाख पोषक तत्त्वों के अभाव से, 60 लाख टान्सिल बहने से 1 करोड़ दंत रोगों से और डेढ़ करोड़ अन्य रोगों से पीड़ित है। रोगी बच्चों की इतनी बड़ी संख्या का मुख्य कारण चीनी से बनी मिठाइयों का उपयोग करना है।
चिकित्सकों ने जब यह देखा कि चीनी के अत्यधिक प्रयोग से लोगों के दाँत समय से पूर्व ही गिर जाते हैं और नाना प्रकार के रोग होते हैं तो उसकी रोकथाम पर विचार विमर्श हेतु देहली में एक सेमिनार का आयोजन किया गया। जिसमें डेन्टल काउंसिल ऑफ इण्डिया के अध्यक्ष कर्नल एन॰एन॰ बेरी ने बताया कि यदि दाँत की बीमारियों की रोक-थाम के लिए प्रयास ने किये गये तो सौ वर्ष वाद यह स्थिति आ जायेगी कि प्रत्येक व्यक्ति 20 वर्ष की उम्र में ही बिना दाँतों का हो जाया करेगा।
आज से 14 वर्ष पूर्व नार्थ कैरोलिया (अमेरिका) चिकित्सक सैन्डसर ने सन्धियों की सूजन का रोग जिन बच्चों को था उनका इलाज करने से पूर्व मिठाई बिलकुल बन्द करा दी। कुछ दिनों बाद उन्होंने देखा कि मीठा खाने वाले बच्चों की अपेक्षा इनका स्वास्थ्य शीघ्र अच्छा गया।
जब चीनी का प्रयोग अधिक मात्रा में किया गया है तो उसका विशेष अंश दाँतों के एकत्रित होने लगता है जिससे पेट में वायु बनने लगती है। मधुमेह, आँव, मंदाग्नि, अजीर्ण, आँतों में जलन, जीभ पर दाने तथा हृदय रोग जैसे अनेक बीमारियाँ इसी शकर की देन है। चीनी के उपयोग से सम्पूर्ण शरीर ही विषाक्त हो जाता है। शरीर की अस्थियाँ दुर्बल, माँस-पेशियाँ अशक्त तथा शरीर में लौह एवं अनेक जीवन तत्त्वों की कमी हो जाती है।
अनेक रोगों को जन्म देने के कारण चिकित्सक चीनी को स्वास्थ्य का शत्रु मानने लगे है। चीनी के तैयार करने का ढंग ही इतना दोष-पूर्ण है कि अन्तिम में सिवाय मिठास के और कुछ शेष ही नहीं रहता। फिर भी इस मीठे विष को लोगों को चाव से खाता देख आश्चर्य होता है। शरीर शास्त्रियों ने शर्करा को कार्बोहाइड्रेट की तरह उपयोगी माना है। भोजन में प्रयुक्त होने वाली शर्करा को हम चार रूपी में देख सकते है-
अन्न के पाचन से बनी।
फलों की मिठास से प्राप्त।
दूध से मिलने वाली।
गन्ने की बनी।
इन चार प्रकार की मिठास से अधिकतर लोग गन्ने से बनी शकर से ही अधिक परिचित है, पर शरीर इसका उपयोग सामान्य रूप से अन्य शर्कराओं की तरह नहीं कर पाता। इसीलिए गाँधी जी ने सफेद चीनी को मनुष्य के लिए अप्राकृतिक खाद्य-पदार्थ माना है। गुड या खाँडसारी शकर में जो तत् पाये जाते हैं वह चीनी में नहीं मिलते। चीनी के बदले में मिठास की पूर्ति हेतु गुड, शहद, छुहारे,खजूर, मुनक्का और किशमिश आदि का प्रयोग किया जा सकता है। यह खाने से भी स्वादिष्ट लगते हैं और साथ ही कैल्शियम, प्रोटीन और लौह जैसे तत्त्वों की भी प्राप्ति हो जाती है।
गुड़ में जो क्षार है वह शकर में कहाँ मिलते हैं। फलों की प्राकृतिक मिठास की जितनी प्रशंसा की जाये उतनी ही कम है क्योंकि यह माँस-पेशियों तथा रक्त को बढ़ाने और हड्डियों को मजबूत करने का काम करती है। मौसमी फल सस्ते और सुविधा से प्राप्त भी हो जाते हैं।
स्वस्थ जीवन की प्राप्ति तथा रोगों से मुक्त होने के लिए यह आवश्यक है कि खाद्य-पदार्थों शकर की मात्रा जहाँ तक सम्भव हो घटाई जाये।
अन्य यात्रियों के साथ नाव में बैठे हुए तीन- विद्वान भी नदी पार कर रहे थे। इनमें एक थे दार्शनिक, दूसरे वैज्ञानिक और तीसरे राजनेता।
रास्ते में मल्लाह ने धर्म-जिज्ञासा की और पूछा कि क्या उसके जैसे अशिक्षित के लिए भी धर्म-पालन सम्भव है।
तीनों विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से व्यंग किया और कहा- दर्शन-शास्त्र जाने बिना, ज्ञान-विज्ञान समझे बिना और समाज-नीति-राजनीति जाने बिना धर्म का रहस्य कैसे जाना जा सकता है? तुम्हारे लिए उसे जान सकना असम्भव है।’ मल्लाह चुप हो गया
थोड़ी दूर आगे चलकर नाव भंवर में फँस गई। डूबना निश्चित था। मल्लाह ने चिल्लाकर कहा- आप लोगों में से जो तैरना जानते हों वे नदी में कूद पड़े और अपने प्राण बचा ले।
जौ तैरना जानते थे, वे कूद कर पार जाने लगे, पर वे तीनों विद्वान डूबते चले गये।
मल्लाह भी नाव छोड़ कर तैरने लगा। उसने सोचा ज्ञान के साथ कर्म जुड़ा न हो तो उससे न जीवन की रक्षा हो सकती है और न धर्म की।
इन्द्रियों की संरचना कुछ इस प्रकार हुई है कि वे समीपवर्ती चीजों को ही देख, समझ सकती है। जो उनके स्पर्श, संपर्क की परिधि में आता है वही उन्हें विदित होता है और उतनी ही जानकारी से मस्तिष्क परिचित रहता है। इस सीमाबद्धता के कारण व्यक्ति चेतना को समीपवर्ती व्यक्तियों और वातावरण से घिरा रहना पड़ता है। फलतः यही सीमा बन्धन अभ्यास में आ जाता है और मनुष्य का चिन्तन, स्वभाव एवं मनोरथ उतने तक ही सीमित बनकर रह जाता है। यह स्थिति शरीर निर्वाह के कामचलाऊ प्रयोजन तो पूरे कर देती है, पर जीवन महत्त्वपूर्ण समस्याओं को सुलझाने एवं प्रगति का पथ-प्रशस्त करने में असफल रहता है।
समीपवर्ती वातावरण की घेराबंदी और तात्कालिक प्रत्यक्ष लाभ को ही लाभ समझने की मनःस्थिति को विचारशील लोगों ने निन्दनीय ठहराया है। संकीर्णता एवं अदूरदर्शिता कहकर उसकी निन्दा की है। बाल-बुद्धि इसी प्रकार की होती है। बच्चे तात्कालिक इच्छापूर्ति के लिए मचलते हैं, उनके इतना विवेक नहीं होता कि जिसके लिए मचल रहे हैं वह परिणामतः हानिकारक तो सिद्ध नहीं होगा। विकसित चिन्तन एवं संग्रहित अनुभव के आधार पर ही दूरगामी परिणामों के सम्बन्ध में सोचा जा सकता है वे साधन जिसके पास जितने कम होंगे वह भावी परिणामों के सम्बन्ध में उतना ही अनजान बना रहेगा। तात्कालिक इच्छाएँ लोलुपता की तरंगें भी होती है। वे कभी-कभी आँधी-तूफान की तरह उठती है। इनमें से अनेकों अशोभनीय और अवांछनीय होती है। इतने पर भी उनमें प्रबलता रहती है। और वेग इतना रहता है कि दूरगामी परिणामों के बारे में सोच सकना भी कठिन पड़ जाता है। लिप्साएँ और ललकें मनुष्य के विवेक पर हावी होती देखी गई है और उस छाये उन्माद में ऐसे काम हो जाते हैं जिन्हें अनर्थ ही कहा जा सकता है। उसके दूरगामी दुष्परिणामों पर पीछे पश्चाताप की पश्चाताप हाथ रह जाता है। ऐसी उठक-पटक छोटे रूप में प्रायः होती रहती है और बड़े रूप में कभी-कभी दुर्घटना का रूप धारण कर लेती है ऐसे ही प्रसन्न मनुष्य जीवन को विकृत, विनष्ट, हेय और असफल बनाने के लिए पर्याप्त होते हैं।
सुव्यवस्थित, सुसंस्कृत और समुन्नत जीवन जीने की आकाँक्षा जिन्हें भी हो, उन्हें अपनी दूरदर्शिता को जगाना चाहिए, विवेकशीलता को उभारना चाहिए। आज कि क्रिया का कल क्या परिणाम होगा? इसे स्थिर चित्त से समझ सकने की क्षमता को बुद्धिमानी कहते हैं। मूर्ख वे है जो उठती ललकों को ही सब कुछ समझ लेते हैं और उन्हीं के पीछे दौड़ना आरम्भ कर देते हैं। एकाँगी चिन्तन की आदत से बढ़ कर व्यक्ति के लिए दुःखद दुर्भाग्य दूसरा नहीं हो सकता। जो सोचा या चाहा जा रहा है उसमें कितना औचित्य है? इस मार्ग पर चलने से कोई खतरा तो नहीं है? यह पगडंडी कही कँटीली झाड़ियों में तो नहीं भटका देगी? ऐसी आशंकाएँ मन में न उठें और जो भी भली-बुरी उमंग जी में उठे उसी को चरितार्थ करने को मन मचलने लगे तो समझाना चाहिए अनिष्ट की घटाएँ सिर पर घुमड़ रही है और विपत्ति के बादल बरसने ही वाले है। दुष्प्रवृत्तियाँ अनेकों है और उनके दुष्परिणाम भी सर्वविदित है किन्तु यह अनुभव नहीं किया जाता कि निर्दोष दीखने वाली अदूरदर्शिता से बढ़कर अन्य कोई अभिशाप मनुष्य के लिए हो नहीं सकता। यह ऐसा दुर्भाग्य है जिस अपने हाथों की गढ़ा और अपने ही सिर पर पटका जाता है। अपने हाथों अपनी कुल्हाड़ी अपने पैरों में मरने वाली कहावत अदूरदर्शिता के सम्बन्ध में ही पूरी तरह चरितार्थ होती है।
चिन्तन की परिपक्वता एवं प्रौढ़ता की परख इस आधार पर होती है कि आज की गतिविधियों के परिणाम भविष्य में क्या हो सकते है? खुली आँखों से स्वल्प सीमा तक ही दृश्य दीख पड़ता है यदि बहुत दूर की वस्तुएँ देखनी हों तो दूरबीन का सहारा लेना पड़ता है। उस उपकरण से दूरवर्ती दृश्य दीखने लगते हैं और जो सामान्यतः अविदित था, उसकी प्रत्यक्ष जानकारी मिल जाती है। जिसके उपयोग से लगता है कि दूरबीन कितना महत्त्व पूर्ण उपकरण है।युद्ध क्षेत्र में शत्रुओं की गतिविधियों पर नजर रखने और अपनी मोर्चाबन्दी सही बनाने के लिए इस दूरदर्शन से बड़ी सहायता मितली है। ठीक इसी प्रकार आज के कदम कल क्या परिणाम उत्पन्न करेंगे? इसकी सम्भावना को समझ सकने की क्षमता विकसित होने से गतिविधियों का सही निर्धारण सम्भव हो जाता है कहना न होगा कि मंगलमयी सभी सफलताएँ दूरदर्शिता की रीति-नीति अपनाने का ही परिणाम होती है। बालकों की तरह जो भी आकर्षक लगे उसी के लिए मचल पड़ना- आगा पीछा न सोचना-ऐसा दुःस्वभाव है जिसके फलस्वरूप व्यक्ति का अपार हानि उठानी पड़ती है।
हमारे चिन्तन में विवेक को स्थान मिलना चाहिए। औचित्य की कसौटी पर कसने के पश्चात् ही किसी इच्छा का समर्थन करे और उसे कार्यान्वित करने के लिए तभी कदम उठाये जब हर दृष्टि से ठोक-बजाकर यह देख लिया जाय कि जो किया जा रहा है। उसमें उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ पूरी तरह सन्निहित है। इसके लिए पथ और विपक्ष दोनों की ओर से सभी पहलू प्रस्तुत किया जाने चाहिए और बुद्धि का इतना अवसर देना चाहिए कि वह शान्त-चित्त से उपयुक्त निर्णय करने में समर्थ हो सके। न्यायालयों में यही नियम अपनाया जाता है। पथ और विपथ के दोनों वकील अपने-अपने समर्थन और दूसरे के विरोध में सभी प्रमाण और तर्क न्यायाधीश के सामने प्रस्तुत करते हैं। इस बहस से यह लाभ है कि न्यायाधीश को दोनों पक्षों की बात सुनने, समझने और किसी उचित निष्कर्ष पर पहुँचने में सुविधा पड़ती है। यह बहस न होती तो सम्भव है न्यायाधीश का मानसिक प्रवाह अविज्ञात रूप से किसी पथ के विरोध-समर्थन में फँस जाता है और ऐसी दशा में न्यायोचित निर्णय कर सकने में बाधा उत्पन्न होती। बहस से पथ-विपक्ष की जो काट-छाँट चली उस मंथन से उभय-पक्षीय प्रतिपादन सामने आया और सही निर्णय पर पहुँचने का मार्ग खुला। यही तरीका अपनी जीवन नीति बनाने और गतिविधियाँ अपनाने में भी अपनाया जाना चाहिए।
आदर्शवादी उमंगें भी कई बार अविवेक युक्त होने से हानिकारक परिणाम उत्पन्न करती है। उदारता बहुत अच्छी वृत्ति है। दान परोपकार को कौन बुरा कहेगा? किन्तु यदि निठल्ले, धूर्तों की चालबाजीयों में फँसकर उदारता के नाम पर जेब कटाई जाती रहे तो उससे अनाचार का ही पोषण होगा। ऐसी स्थिति में वह दान पुण्य भी निष्ठुरता से बढ़कर हानिकारक सिद्ध होगा। प्रेम-निर्वाह और मित्रता के आदर्शों को सर्वत्र सराहा ही जाता रहा है किन्तु यदि कोई धूर्त किसी भोले व्यक्ति को मित्रता के जाल में फँसाकर प्रेम की दुहाई देकर उसे कुमार्गगामी बनाने या ठगने, गाँठ काटने में लगा हुआ हो तो उस मित्रता को कैसे उचित ठहराया जा सकेगा? मित्र पर विश्वास करने, उसकी सलाह मानने और सहायता करने की कोमल भावनाएँ सहज ही स्नेह सम्बन्धों के कारण उभरती है। यदि उन्हें अति भावुकता का आश्रय मिल और सतर्कता को- आशंका को उठाकर ताक में रख दिया जाय तो वह मित्रता परिणाम में शत्रुता से भी अधिक भयंकर सिद्ध होगी। इन दिनों शत्रु सामने आकर उतना अनिष्ट नहीं करते, जितना कि मित्र बनकर अहित कर जाते हैं। छल,छल को इन दिनों लड़ने, आक्रमण करने की अपेक्षा अधिक चतुरतापूर्ण और सफल रणनीति मान लिया गया है। अस्तु घात-प्रतिघात का शस्त्र मित्रता के रूप में ही चलाया जाता है। इन दिनों शत्रुओं से उतना डरने की जरूरत नहीं जितना कि मित्रों से सावधान रहने की। इस सतर्कता को केवल उभय-पक्षीय चिन्तन से- पक्ष-विपक्ष के मंथन से ही उत्पन्न किया जा सकता है अन्यथा अन्धी भावुकता भोले व्यक्ति को किसी धूर्त द्वारा बेमौत मारने वाला शिकार ही बनाकर छोड़ती है। प्रेम और उदारता के दुरुपयोग की तरह अन्य सत्प्रवृत्तियों के अदूरदर्शी प्रयोग से हानिकारक परिणाम उत्पन्न हो सकते हैं। अस्तु आदर्शों को अपनाने और कार्यान्वित करने में भी प्रथम स्थान विवेक एवं औचित्य को देना चाहिए। श्रद्धा की सराहना की जा सकती है, किन्तु अन्ध-श्रद्धा अपनाने से तो मनुष्य ठगा ही जाता रहोगे और उससे धूर्तता को ही परिपोषण मिलता रहेगा।
बच्चे पढ़ने से कतराते हैं और आवारागर्दी में उत्साह दिखाते हैं यदि उन्हें पढ़ने की महत्ता और बेकार भटकने की हानि समझाई जा सके तो वे अपनी गतिविधियाँ बदल सकते हैं अनपढ़ मन भी एक प्रकार का बच्चा होता है उसे दूरगामी सत्परिणामों को ध्यान में रखते हुए आज नियन्त्रित गतिविधियाँ अपनाने में बड़ा अनोखा लगता है। स्वच्छन्दता सब को प्रिय लगती हैं मनमौजी उच्छृंखलता अपनाने में कुसंस्कारी आदतों को सन्तोष मिलता है। सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ अपनाने में कई तरह के अंकुश लगाने पड़ते हैं और अनुशासन की रीति-नीति अपनाने का अभ्यास करना पड़ता है। उसे मन स्वीकार नहीं करना चाहता जो अनपढ़ को सुगढ़ बनाने के लिए आवश्यक है यदि आत्मानुशासन स्वीकार न किया जा सका तो किसी व्यक्तित्व का सुयोग्य एवं सुसंस्कारी बन सकना सम्भव नहीं हो सकता। स्पष्ट है कि इससे बिना समुन्नत स्तर का जीवन नहीं जिया जा सकता और उस स्थिति में किसी प्रकार दिन गुजार लेने के अतिरिक्त किसी महत्त्वपूर्ण सफलता की आशा नहीं की जा सकती।
किसान को लगातार कृषि कर्म में निरत रहना पड़ता है उस अवधि में उसे कठोर श्रम भी करना पड़ता है और खाद, बीज आदि के लिए संचित पूँजी भी लगानी पड़ती है। यह कार्य प्रत्यक्षतः अप्रिय ही हो सकता है। किन्तु बुद्धिमान किसान जानता है कि समय पर फसल पकेगी और वह उसका समुचित सत्परिणाम प्राप्त करेगा। दूरदर्शिता उसे विश्वास दिलाती है कि उचित प्रयोजन के लिए निष्ठापूर्वक किया गया श्रम अपने सत्परिणाम प्रस्तुत करता है। इसी विश्वास के आधार पर संसार में खेती हो रही हैं। यदि प्रत्यक्ष और तात्कालिक लाभ ही सब कुछ समझा गया होता और भविष्य चिन्तन की बात सामने न होती तो पशुओं की तरह मनुष्य भी भविष्य निर्माण की कोई योजना न बना पाते। व्यापारी पूँजी लगाते हैं। शिल्पी सृजन में संलग्न रहते हैं। कलाकार अभ्यास में तन्मय रहते हैं। उन्हें तत्काल क्या मिलता है? सवेरे से शाम तक कठोर श्रम में संलग्न रहने पर भी तत्काल कोई लाभ नहीं मिलता। इतने पर भी उनकी यह मान्यता अडिग ही रहती है कि इस प्रयत्न का लाभ उन्हें यथासमय मिल ही जायेगा। विद्यार्थियों का प्राथमिक पाठशाला से लेकर विश्व-विद्यालय तक की पढ़ाई पूरी करने में चौदह वर्ष का राम वनवास एवं पाण्डव बन गमन जैसा तप करना पड़ता है। उनका प्रत्येक शुभ चिन्तन इसी प्रयास में प्रवृत्त रहने के लिए प्रोत्साहित करता है। दूरदर्शिता का यही मार्ग है जो जीवन के हर क्षेत्र में अपनाया जाना चाहिए।
अदूरदर्शिता की हानियाँ स्पष्ट है। नशेबाज, दुर्व्यसनी, आवारागर्दी अपनाने वाले, विलासी, अपव्ययी, आलसी तत्काल मौज-मजा देखते हैं और उसी में बेतरह चिपक जाते हैं। अन्धी होकर चासनी पर टूट पड़ने वाली मक्खी को प्राण गँवाना पड़ता है वही दुर्गति इन तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ मान बैठने वालों की होती हैं दाने को देखने वाले और फँदे से बेखबर रहने वाले पक्षी बहेलियों की हाँड़ी में पकते हैं। आटे के लिए आतुर मछली अप्रत्यक्ष काँटे का विचार नहीं करती और मछुआ की टोकरी में जान गँवाती है। रोशनी की चकाचौंध पर टूट पड़ने वाला पतंगा दीपक से जलने वाली आग से नहीं देखता और उसी आतुरता में बेमौत मारा जाता है। अदूरदर्शिताजन्य असावधानी से हर किसी को दुष्परिणाम ही भुगतने पड़ते हैं।
अनीति अपनाकर तत्काल लाभ उठा लेने की प्रवृत्ति ही अनाचार अपनाने की प्रेरणा देती हैं। दुष्ट दुराचारी यही नीति अपनाते हैं और यह भूल जाते हैं कि इस मार्ग पर चलते हुए वे अपनी सारी प्रामाणिकता गँवा देंगे। अविश्वस्त ठहराये जायेंगे और सम्मान गँवा बैठने के कारण सर्वत्र उपेक्षा एवं असहयोग के भागी बनेंगे। विश्वास सम्मान और साहस यह तीन सम्पत्तियाँ ही व्यक्ति को प्रामाणिक बनाती है और उन्हीं के आधार पर समाज में स्थान बनाते हैं। प्रगति के मार्ग पर एकाकी नहीं चला जा सकता, उसके लिए सहयोग की आवश्यकता अनिवार्य रूप से रहती है। स्पष्ट है कि सच्चा सहयोग प्रामाणिकता के अभाव में कही भी किसी को भी नहीं मिल सकता।
अनाचार पर उतरने वाले आतंक के बल पर जो कमाते हैं। उसकी तुलना में उन्हें उज्ज्वल भविष्य की सभी सम्भावनाओं से हाथ धोना पड़ता है। निन्दित और हेय जीवन आत्म-प्रताड़ना से और विश्वास की आग से जल-भुनकर नष्ट ही होता रहता है।
दूरदर्शी व्यक्ति धैर्यवान होता है। तत्काल सफलता के लिए आतुर नहीं होता, वरन् वट-वृक्ष को बोने से लेकर छाया पाने के लिए जितने धैर्य की आवश्यकता पड़ती है उतना ही अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाने वाले सदाचरण को दृढ़तापूर्वक अपनाये रहता है। इस तप साधन का समुचित फल मिलता है। छोटी परिस्थिति में पैदा हुए असंख्य व्यक्ति इतिहास में जगमगाने वाले उज्ज्वल नक्षत्र बने है, उन्हें यह उपहार करके चरित्र एवं कर्तृत्व की उत्कृष्टता द्वारा ही उपलब्ध हो सका है। लोकसेवी, तपस्वी, विद्वान इसी मार्ग पर चले है। साधु ओर ब्राह्मणों की परम्परा यही रही है। उन्होंने आदर्शों को अपना कर आरम्भिक घाटा सहा है। और स्वल्प सन्तोष का निर्वाह किया है। किन्तु जब उन्हें परख लिया गया तो फिर सर्वत्र सिर आँखों पर ही बिठाया गया है। लोक-श्रद्धा के सुमन उनके चरणों पर अनायास ही चढ़ते चले गये है।
वह भ्रम कितनों को ही कितने समय तक बना रहता है। कि छपछिप सकता है ओर लोगों की आँखों में धूलि झोंक कर अप्रामाणिक रहते हुए भी लोगों की आँखों में प्रामाणिक रहा जा सकता है। कुछ समय तक कुछ लोगों को भ्रम में डाले रहा जा सकता है पर धूर्तता देर तक सज्जनता के पर्दे में छिपी नहीं रह सकती। हींग रखने पर भी उसकी महक बाहर फैलती है कहते हैं कच्चा पारा खाकर उसे पचाया नहीं जा सकता, वह शरीर में जहाँ-तहाँ से फूटकर निकलता है। ठीक इसी प्रकार अनाचारों का आभास समीपवर्ती लोगों को लगता है और फिर बुराई दो से दस हजार के कानों तक पहुँचती है। सज्जनता का प्रमाण देने में देर लगती है, पर दुर्जनता की दुर्गन्ध तो देखते-देखते हवा में छा जाती है। मुँह सामने भले ही लोग कुछ कहें, पर भीतर से जो घृणा उत्पन्न होती है। उस पर अंकुश लगा सकना किसी के बस की बात नहीं है। बात छिपी रहेगी यह सोचकर जो लोग अनाचार बरतते रहने और छल-छेल की नीति अपनाते रहने के लिए प्रयत्न करते हैं वे पूर्णतया असफल ही रहते हैं। कुटिलता की नीति अपनाते हुए सज्जनता का विश्वास और सम्मान प्राप्त करने में आज तक किसी को भी सफलता नहीं मिली है और न भविष्य में वैसा होने की आशा की जा सकती है।
असंयमी लोक तात्कालिक इन्द्रिय लोभ में आतुर होकर अपना स्वास्थ्य नष्ट करते, बीमारियों के कराहते और अकाल मृत्यु के मुख में जाते देखे गये है। आहार बिहार का असंयम जवानी में ही बुढ़ापे को निमन्त्रित करके ले आता है। आलसी और प्रमादी तत्काल तो परिश्रम ओर तत्परता के झंझट से बचे रहते हैं। पर पीछे प्रतीत होता है कि यह आरामतलबी और दीर्घसूत्रता उन्हें पिछड़ेपन के गर्त में कितना गहरा गिराने वाली सिद्ध हुई हैं और कितनी महँगी पड़ी है।
सुरदुर्लभ मनुष्य जन्म को नर-वानरों जैसे निरर्थक क्रिया-कलापों में नष्ट करते रहने वाले-जीवन लक्ष्य की उपेक्षा करने वाले- हम लोग कितने अदूरदर्शी सिद्ध हुए यह पता तब चलता है जब मृत्यु का दिन सामने आ खड़ा होता है। ईश्वर ने अपनी सारी कलाकारिता नियोजित करके मनुष्य प्राणी का सृजन इस उद्देश्य से किया था कि वह इस विश्व उद्यान को सुविकसित बनाने में उसका योगदान करेगा। उस आशा को रौंदते हुए मनुष्य लोभ मोह और अहंकार जैसी दुष्प्रवृत्तियों के परिपोषण में सारा समय गँवा देता है और खाली हाथ ईश्वर के दरबार में पहुँचकर तिरस्कार का भाजन बनता है। तब उसे पता चलता है कि संगी-साथियों में बुद्धिमान समझा जाने पर भी वह वास्तविकता की कसौटी पर कितना मूर्ख और अदूरदर्शी सिद्ध हुआ। इस सर्वभक्षी अदूरदर्शिता से जो कोई अपना पिण्ड छुड़ा सके उसकी बुद्धिमत्ता सार्थक है।
धर्म क्या है? ईश्वर तथा मनुष्य के प्रति गहरा प्रेम। इससे पृथक् कुछ भी नहीं।
विलियम पेन
स्वप्नों को मोटे तौर पर तीन वर्गों में रख सकते हैं।- (1) शारीरिक दशाओं से प्रभावित स्वप्न (2) मानसिक स्थिति के प्रतिक्रिया स्वरूप स्वप्न (3) आध्यात्मिक स्वप्न।
अपच, उदर, विकार,शीतोष्णता का आधिक्य, भूख-प्यास शरीर में किसी वस्तु विशेष के स्पर्श, सोते समय वातावरण के विशेष परिवर्तन आदि के कारण देखे गये स्वप्न दृश्य प्रथम वर्ग के स्वप्नों की कोटि में आते हैं। इसमें अतिरंजना और विकृति का प्राधान्य होता है।
मन-मस्तिष्क पर पड़ने वाले विभिन्न दबावों, इच्छाओं, वासनाओं के आघातों-प्रतिघातों से उत्पन्न स्वप्न दृश्य द्वितीय श्रेणी के स्वप्नों की कोटि में आते हैं। स्वप्न शास्त्री कार्ल-शरेनल का कथन है कि- शरीर या मन का प्रत्येक विक्षोभ एक विशिष्ट स्वप्न को उत्पन्न करता है। स्वप्न तथ्यों पर ही आधारित होते हैं, पर वे तथ्यों की सीमा में बन्धे नहीं होते। उनमें कल्पनात्मक उड़ान भी भरपूर होती है।
प्रख्यात, वैज्ञानिक एवं मनःशास्त्री हैवलाक एलिस के अनुसार “प्रत्येक स्वप्न अतीत की अनुभूतियों और दैहिक संवेदनों, विकारों का संयुक्त परिणाम होता है। स्वप्न यह स्पष्ट करते हैं कि हमारा चेतन-मन हमारी भावनाओं के हाथ का खिलौना मात्र है।”
मनोवैज्ञानिक फ्रायड की स्वप्न सम्बन्धी वे मान्यताएँ अब पुरानी पड़ चुकी है जिनके अनुसार व्यक्ति के अवचेतन को किन्हीं सामान्य और संकीर्ण ‘फार्मूलों’ द्वारा समझ सकने का दावा किया जाता था और उन्हें अतृप्त इच्छाओं की अभिव्यक्ति मात्र माना जाता था। फ्रायड ने पहले जिन स्वप्नों को “इडीपुस काम्प्लेक्स” के द्वारा प्रेरित और दमित इच्छाओं के आधार सिद्ध हो रहे हैं। विभिन्न अनुसंधानों, प्रयोग से यह भली-भाँति स्पष्ट हो चुका है कि स्वप्न मात्र दमित यौन-आकांक्षाओं अथवा कल्पित क्लिष्ट यौन-विकृतियाँ के दायरे में नहीं समेटे जा सकते। उनके विविध वर्ग एवं स्तर है।
अवचेतन की फ्रायडीय व्याख्या तो युँग ने ही त्रुटि पूर्ण सिद्ध कर दी, अधुनातन खोजे अवचेतन के रहस्य के स्पष्ट प्रमाण देने वाले विभिन्न स्वप्नों की वैज्ञानिक छान-बीन से यही संकेत मिल रहे हैं कि व्यक्ति का अवचेतन मनुष्य के सामूहिक अवचेतन का ही एक अंग है। उसका विस्तार विराट् और महत् है। उसके एक लघुतम अंश का भी यदि हम उपयोग कर पाते हैं, तो वह चमत्कार सिद्ध हो जाता है। विश्व के अनेक आविष्कार अवचेतन के इसी उपयोग का परिणाम है। हेनरी फार डेसकार्टिस डन पाइनकेयर जैसे गणितज्ञों का स्वप्नों से मार्ग-निर्देश पाने की घटनाएँ सर्वविदित हैं सिलाई की मशीन की सुई से लेकर अणुबम तक सैकड़ों वैज्ञानिक आविष्कार की सफलता का आधार स्वप्न-प्रेरणाएँ रही है विश्व-विख्यात संगीतकार मोजार्ट को एक ललित संगीत-धुन एक बग्घी में झपकी लेते समय सूझी। वायलिन-वादक तारातिनी को ‘द डेविल्स सानेट’ नामक धुन पूरी की पूरी स्वप्न में सुनाई पड़ी। चौपीन भी अपने संगीत-सृजन की प्रेरणा सपनों से पाते थे। नृत्य-पारंगता प्रसिद्ध महिला मेरी विगमैन ने “पास्तोरेल” नामक एक नृत्य की कल्पना स्वप्न- दृश्य के आधार पर की। हेनरी मूर, पाब्लो पिकासो, एन्ड्रयू वेथ, बान गाँग, सल्वाडोर डाली आदि शीर्षस्थ चित्रकारों की सृजन-चेतना में स्वप्नों का बड़ा हाथ रहा है। साहित्यकारों का तो कहना ही क्या? पुश्किन, टॉलस्टाय,गेटे, शेक्सपियर, समेत असंख्य साहित्यकारों ने स्वप्न में प्रदत्त अवचेतन के संकेतों, संदेशों तथा प्रेरणाओं, परामर्शों का लाभ प्राप्त किया है।
प्रख्यात यूनानी लेखक होमार, अँग्रेज लेखक काँलरिज, एडगर एलर पो आदि ने अर्ध चेतन स्थिति में स्वप्न लोक में विचरण कर, उन्हीं प्रेरणाओं के आधार पर अनेक रचनाओं का सृजन किया। नीत्शे, दान्ते, बैगनर, विलियस ब्लेक, विलियस बटलर यीट्स, क्यूबिन आदि को विभिन्न कृतियों की प्रेरणाएँ स्वप्नों से मिली थी। कई आधुनिक लेखक अवचेतन के ऐसे संकेतों की प्राप्ति के लिए एल0एस0डी0 का सेवन करते हैं।
इस प्रकार जिस अवचेतन की झलकियों के सहारे गणितज्ञों ने जटिल ‘प्राब्लम्स’ सुलझाई है , वैज्ञानिकों ने महत्त्वपूर्ण आविष्कार किये है, कवियों ने अमर काव्य कृतियाँ रची है। कथाकारों और नाटककारों ने रचनाओं के आधार प्राप्त किये है। उसका विश्लेषण कोई सामान्य बात नहीं है। हर किसी के लिए यह सम्भव भी नहीं होगी।
अनेक वैज्ञानिक आविष्कारों के मूल में स्वप्नों की प्रेरणा होने तथा विभिन्न साहित्यिक कृतों का आधार स्वप्न होने की बात भी पाठक पढ़ चुके होगे। अनेक विश्व विख्यात गणितज्ञों ने स्वप्नों में ही गणित की जटिल गुत्थियों को सुलझाने का मार्ग पाया। प्रख्यात भाषा वैज्ञानिक श्रीबज का महत्त्वाकाँक्षाओं को साकार करने में एक स्वप्न का विशेष हाथ रहा। इन सभी विख्यात तथा विश्लेषित घटनाओं से एक ही तथ्य ज्ञात होता है कि स्वप्न में हमारे मस्तिष्क का अधिक व्यापक ओर सशक्त हिस्सा जिसे कि अवचेतन कहते हैं, जागृत और क्रियाशील रहता है। तथा व्यक्ति-मन की संरचना के अनुसार वह विश्व-व्यापी गतिविधियों की गहराई से सम्बद्ध हो सकता है।
सन् 1883 में “बोस्टन ग्लोब” नामक अमरीकी समाचार-पत्र के संवाददाता द्वारा “ प्रालेप” द्वीप में भयंकर ज्वालामुखी-विस्फोट का स्वप्न-दृश्य देखने और खबर के रूप में उसके एक प्रकाशित होने से सम्बन्धित घटना प्रख्यात है। स्वप्न द्वारा उसी समय किसी सुदूर स्थान में घट रही घटना की जानकारी प्राप्त होने, भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का आभास प्राप्त करने आदि के सैकड़ों प्रसन्न अब विश्व प्रसिद्ध हो चुके है और उनकी वैज्ञानिकों द्वारा बारीकी से छान-बीन की जा चुकी है। तथा उन्हें सत्य पाया गया है।
आध्यात्मिक स्वप्न उन्हें कहा जाता है, जो अतीन्द्रिय अनुभूतियों से सम्बन्धित हो, इनके भी कई वर्ग है। सर्व सामान्य व्यक्तियों में से भी किसी को कभी-कभी ऐसी अनुभूतियाँ स्वप्नों में ही जाती है। व्यक्ति का अवचेतन मन अनन्त सम्भावनाओं और सम्वेदनाओं का भण्डार है, अतः उसे सामान्य रीति से समझना दुष्कर है।
योगनिद्रा इन्हीं सम्भावनाओं की उपलब्धि का एक मार्ग है। पाठक डेलियल वेयर नाम के रूसी लेखक की कृति “द मेकर आव् हैविनली ट्राउजर्य” के विषय में पढ़ चुके है। जिसमें उन्होंने एक तिब्बती लामा की अपने द्वारा देखी गयी उस सच्ची कहानी का उल्लेख किया है कि वह लोगों को योगनिद्रा में सुलाकर, उन्हें मनचाहे स्वप्न दिखलाता था।
योगनिद्रा वस्तुतः अवचेतन पर से चेतन का दबाव हटा लेने की विद्या है, ऐसी स्थिति में व्यक्ति का मन अनन्त ब्रह्म-सत्ता की तरंगों की गतिविधियाँ देख-पकड़ पाने में समर्थ हो जाता है और तब वह अतीत अथवा भविष्य की वास्तविक घटनाओं का साक्षी बन जाता है।
जिस व्यक्ति का अन्तः करण जितना ही शुद्ध-बुद्ध होगा और जो अपनी आन्तरिक शक्तियों को जितना ही अधिक विकसित होने देगा, उन पर से चेतन-मस्तिष्क के दबावों को हटाने रहेगा, तथा ब्रह्माण्ड-व्यापी चेतना से तादात्म्य का जितना प्रयास करेगा, वह आध्यात्मिक अनुभूतियों का उतना ही अधिकारी बनता चला जाएगा। स्वप्न अवचेतन की जागृति मात्र है और संस्कार शुद्ध व्यक्ति का अवचेतन भी शुद्ध होने से उसके स्वप्न यथार्थ की ही अभिव्यक्तियाँ होते हैं। यह यथार्थ सुदूर वर्तमान का भी हो सकता है तथा सूक्ष्म स्तर पर सुनिश्चित हो चुके भविष्य का भी।
स्वप्नावस्था में प्रशिक्षण की इन दिनों एक नवीन विधि का प्रयोग हो रहा है उसमें शिक्षार्थी को प्रत्यक्ष’ कुछ भी सिखाया समझाया नहीं जाता वरन् वातावरण में ऐसे संकेतों की गर्मी उत्पन्न की जाती है जिसका प्रभाव उस क्षेत्र के निद्रित लोगों पर पड़े ओर वे अनायास ही उस प्रभाव से प्रशिक्षित होने लगे। इस पद्धति का नाम- “हिप्नोपेडिया’ है।
यूरोप-अमरीका में “हिप्नोपेडिया” नाम की पद्धति का इन दिनों भरपूर उपयोग भाषा-शिक्षण अभिनय प्रशिक्षण आदि में किया जा रहा है। शिक्षा शास्त्री इस पद्धति में गहरी रुचि ले रहे हैं और अगले कुछ ही वर्षों में यही प्रणाली शिक्षा में लोकप्रिय हो जाये, तो आश्चर्य नहीं। इस हेतु इस प्रणाली में निहित खतरों की सम्भावना को दूर करना होगा। रूस के विख्यात स्वप्न शास्त्री श्रीपावलोव एवं सोवियत आयुविज्ञान अकादमी के प्राध्यापक एम॰ सुमार -कोवा तथा ई॰ उशाकोवा का कथन है कि जब तक नींद की प्रत्येक अवस्था का सूक्ष्म एवं विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन नहीं हो जाता ‘हिप्नोपेडिया’ की आँशिक उपयोगिता ही रहेगी। उनका यह भी कहना है कि अप्रशिक्षित प्रयोगकर्ता इस विधि से जाने या अनजाने छात्र-छात्राओं तक गलत सन्देश भेज सकता है तथा इस प्रकार विभ्रान्त कर सकता है।
ज्ञानिक इन खतरों के प्रति सावधान है तथा उनसे बचे रहने की दिशा में खोज-कार्य कर रहे हैं।
स्वप्नों द्वारा अध्यापन के प्रयोग रूस में भी जोरों से चल रहे हैं। अमरीका में भी इस पद्धति का प्रचलन बढ़ रहा है। ‘हिप्नोपेडिया’ की एक पद्धति में आत्म-सम्मोहन का अभ्यास किया जाता है, दूसरी में सामान्य शिक्षण विधि का आत्मसम्मोहन वाली पद्धति में छात्र-छात्राओं को स्वप्नावस्था में आत्मनिर्देश सुनाये जाते हैं। एक स्कूल के बीस छात्र-छात्राओं को नाखून कुतरने की आदत थी। मानस शास्त्री डॉ॰ लारेन्स लोशन ने उनकी आदत छुड़वाने का दायित्व ओढ़ा। इन सबको सोने के बाद, ‘हिप्नोपेडिया’ पद्धति से एक रिकार्ड सुनवाया जाता था। रिकार्ड में इस एक ही पंक्ति का निरन्तर दुहराव होता था कि “मेरे नाखून बहुत कड़ुवे है।” कुछ ही दिनों में सभी छात्र-छात्राओं पर इसका समुचित प्रभाव पड़ा और उन्होंने अपनी वह आदत छोड़ दी।
चैकोस्लोवाकिया में अंग्रेजी-शिक्षण हेतु “हिप्नोपेडिया” की दूसरी पद्धति अपनाई गई है। लगभग दस हजार छात्र-छात्राओं के घर वायरलैस (बेतार के तार ) द्वारा रेडियो स्टेशन से जुड़े है। पाठ्यक्रम दस पाठों में विभाजित है। एक पाठ की अवधि बारह घण्टे है। दो-दो सप्ताह के अन्तर से एक-एक पाठ सिखाया जाता है पाँच माह में पूरे दस पाठ याद करा दिया जाते हैं।
रात्रि आठ बजे से रेडियो-स्टेशन से पाठ का प्रसारण प्रारम्भ होता है। तीन घण्टे तक यह प्रसारण चलता है। इस अवधि में ही छात्र-छात्रा चुपचाप अपना खाना भी खा सकते हैं, आराम-कुर्सी पर विश्राम भी कर सकते हैं। एक ही नियम है कि ध्यान प्रसारित पाठ की ओर ही केन्द्रित रहे, ग्यारह बजे से रेडियो स्टेशन से लोरी ‘रिले’ होने लगती है और छात्र-छात्राओं को सुला दिया जाता है। फिर दो बजे तक वही पाठ लोरी के स्वर में धीरे-धीरे दुहराया जाता है। बाह्य मन निष्क्रिय बना रहता है, पर चेतन मस्तिष्क के वे अंश तो दिन की थकान से शान्त हो चुके है,नींद के बाद खुलकर नई स्फूर्ति के साथ दी जा रही सूचनाएँ संग्रहित करते रहते हैं।
योग साधना में शिथिलता, शून्यावस्था, समाधि, शवासन आदि को बहुत महत्त्व दिया जाता है यह अर्धतन्द्रा की स्थितियाँ है। इन्हें योगनिद्रा कहा जाता है। स्नायु संस्थान पर से तनाव, दबाव, हटाकर यदि उसे शान्त, विश्रान्त, सौम्य, मनःस्थिति को एक प्रकार से जागृत निद्रा के समतुल्य माना जा सकता है। धारणा और ध्यान के चरण पूरे करते हुए समाधि स्थिति पर पहुँचना साधना विज्ञान की चरम प्रक्रिया है। स्वप्नावस्था में तो मनुष्य का अपने ऊपर नियन्त्रण नहीं रहता और स्वसंकेत देना एवं अपने बलबूते अपने को इच्छित दिशा में मोड़ सकना संभव नहीं। इसलिए आवश्यक समझा गया कि कृत्रिम योगनिद्रा की स्थिति लाने का अभ्यास किया जाय इस स्थिति में मन और बुद्धि तो तंद्राग्रस्त हो जाते हैं। पर चित्त में संकल्प ज्वलन्त रखे जा सकते हैं। इन संकल्पों से अचेतन मन को प्रभावित एवं प्रशिक्षित किया जाता है। आत्म परिष्कार को प्रधान ध्यान तन्मयता में- वित में उच्चस्तरीय संकल्प जागृत रखे जाते हैं। जो अन्तःकरण को परिष्कृत करने के लिए आवश्यक है। इन प्रयोगों को यदि सही उद्देश्य समझकर सही रीति से कार्यान्वित किया जाय तो परिणाम निश्चित रूप से अतीव आशाजनक होते हैं।
निद्रित स्थिति में प्रेरणात्मक स्वप्नों का इन दिनों विज्ञान क्षेत्र में उत्साह के साथ प्रयोग किया जा रहा है। यह स्वप्न सृजन दृश्यों के रूप में संभव नहीं हो सकता क्योंकि अंतर्मन बहुत हठी है जब वह अपनी पर उतरा होता है तो बाहरी अंकुश मानने के लिए सहज ही तैयार नहीं होता। वैज्ञानिकों को स्वप्न सृजन के लिए जानकारियाँ, मान्यताओं, आदतों एवं इच्छाओं में हेर-फेर करने की गुँजाइश दिखी है सो वे स्वप्न प्रशिक्षण की गतिविधियाँ इसी आधार पर विनिर्मित कर रहे हैं। भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने इस सन्दर्भ में योगनिद्रा एवं समाधि के विभिन्न स्तर-सामान्य-असामान्य लोगों की मनोभूमि में खप सकने योग्य बनाये है। इसमें सचेतन का तंन्द्रित करने- चित्त में संकल्प जीवन रखने और अंतर्मन को प्रशिक्षित करने के तीनों ही उद्देश्य पूरे होते हैं। इस दिशा में जितनी सफलता मिलती है उतने ही सामान्य स्वप्नों में भी अति महत्त्वपूर्ण ऐसी जानकारियाँ मिलने लगती है जिन्हें सूक्ष्म दर्शन एवं अतीन्द्रिय प्रतिभा के नाम से पुकारा जा सके।
रेलगाड़ी तेज रफ्तार से दौड़ रही थीं। तृतीय श्रेणी के छोटे से कम्पार्टमेंट में खद्दर का कुरता और खद्दर की ही धोती पहने एक सज्जन बड़ी तन्मयता से अख़बार पढ़ रहे थे। उनके सामने की सीट पर एक मुल्ला जी बैठे थे। उन्हें जोर की खाँसी आई, खखार कर बाहर थूकने की तकलीफ न कर अन्दर के फर्श को ही गंदा कर दिया।
‘यदि आपने बाहर थूका होता तो कितना अच्छा रहता। कोई यात्री यहाँ आकर बैठेगा तो उसका पैर बिना सने नहीं रह सकता। जब हम देश को स्वतंत्रता दिलाने के लिये जी जान से प्रयत्न कर रहे हैं तो कम से कम साधारण से शिष्टाचार के नियमों का पालन तो करना ही चाहिए। उस भद्र पुरुष ने अख़बार पर से अपनी दृष्टि हटाकर बड़े विनम्र शब्दों में समझाते हुए कहा।
मुल्ला जी किसी का उपदेश सुनने की स्थिति में कहाँ थे। उन्होंने चुनौती की भावना से सामने बैठे व्यक्ति की ओर देखा। उनकी आँखों से झलक रहा था- तुम्हारी ऐसी जुर्रत। तुम मेरा बिगाड़ ही क्या लोगे”?
वह भद्र पुरुष उठा। उसने अपने अखबार का एक कोना फाड़ा और मौलाना का थूक पोंछकर खिड़की से बाहर फेंक दिया। मौलाना जी मन ही मन तिलमिलाये उन्हें लगा यह काँग्रेसी मेरी तौहीन कर रहा है। उनकी नफरत फिर भीतर से बाहर प्रकट हुई। उनको फिर खाँसी आई। और जान बूझकर उन्होंने दो तीन बार फर्श पर ही थूक दिया
उन सज्जन ने सोचा जब व्यक्ति एक बार समझाने पर समझने का प्रयास नहीं करता तो दुबारा कुछ कहने से लाभ भी क्या है? वे फिर उठे उन्होंने थूक पोंछकर बाहर फेंका। जितनी बार मौलाना ने अपनी हठधर्मी दिखाई उतनी ही बार उन सज्जन ने उसे साफ करके बारह फेंका। जब दुष्ट अपनी दुष्टता छोड़ने को तैयार नहीं फिर सज्जन ही उसे क्यों छोड़े?
निश्चित स्टेशन आ गया। प्लेटफार्म सैकड़ों स्वयं सेवकों, कार्यकर्ताओं और दर्शकों से खचाखच भरा हुआ था। ‘महात्मा गाँधी की जय’ और भारत माता की जय’ से आकाश गूँज उठा। कार्यकर्ता हाथों में तिरंगा ध्वज लिये उनके स्वागत को दौड़ पड़े। गाड़ी रुकी। लोग अपने प्रिय नेता को उसी डिब्बे में देख, घेर कर खड़े हो गये। मौलाना को भी यहीं उतरना था। अब उन्हें समझते देर न लगी कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं वरन् विश्व बंधु बापू हैं।
ऊँचा उठना-आगे बढ़ना जीव का स्वभाव है। उसका प्रगति क्रम इसी आधार पर चला है। पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाने में ही प्रवृत्ति प्रेरणा बनकर काम करती और क्रमशः आगे-आगे धकेलती है। एक कोशीय जीवाणु से लेकर विशालकाय और बुद्धिमान प्राणियों तक की प्रगति यात्रा में जहाँ प्रकृति-प्रक्रिया सहायक रही है वहाँ चेतना के साथ जुड़ी हुई अग्रगामी प्रवृत्ति का योगदान भी कम नहीं रहा है।
अग्रगमन की यह मूल प्रवृत्ति न तो त्याज्य है और न हेय। गड़बड़ी तब पड़ती है, जब उस असन्तोष को पूरा करने के मार्ग और प्रकार के चुनाव में भूल होती है। भटका हुआ पथिक सारे दिन चलते रहने पर भी थकान के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त नहीं करता, कई बार तो वह इस दिग्भ्रान्ति के कारण आगे बढ़ने की अपेक्षा और पीछे चला जाता है भूल-भूलैयों में उलझा हुआ मनुष्य अपने परिश्रम को सार्थक कहाँ कर पाता है और जहाँ पहुँचता था। उधर प्रगति कहाँ हो पाती है।
महत्त्वपूर्ण प्रश्न उस चुनाव का है जिसके आधार पर आगे बढ़ने और ऊँचे बढ़ने और ऊँचे उठने में से एक की प्रधान और दूसरे को गौण मानकर चलना होता है। आमतौर से मानवी चेतना का व्यवहार भौतिक पदार्थों से पड़ता है। इन्द्रियाँ उन्हीं में उलझी रहती है। और शरीर को पदार्थों के उपभोग और व्यक्तियों के सहयोग से ही अपनी गाड़ी आगे चलानी पड़ती है। अस्तु उसका अपना आप इसी बहिरंग में रंग और खप जाता है। वह अपने आप को भी पदार्थ मानने लगता है और सोचता है कि असन्तोष की तृप्ति के लिए भौतिक साधन सामग्री को अधिक मात्रा में जुटाने की आवश्यकता है। यहाँ मात्रा के साथ -साथ स्तर बढ़ाने की भी आवश्यकता अनुभव होती है। कारण कि उससे दूसरों की तुलना में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का अवसर मिलता है। दूसरे लोग सस्ता कपड़ा पहनते हैं, इनकी तुलना में यदि अपनी स्थिति महँगाई वस्त्र पहनने की है तो उसका प्रदर्शन करने से मन को बड़प्पन का आभास होगा, फलतः अग्रगमन की अनुभूति से उतनी तृप्ति मिलेगी। अमीरी के प्रदर्शन इसीलिए होते हैं। ठाट-बाट इसीलिए रोपे जाते हैं। सस्ते में गुजर हो सकना सम्भव और सरल है, पर लोग उपयोगिता की दृष्टि से नहीं अहंता की पूर्ति के लिए महँगे सरंजाम इकट्ठे करते हैं।उनकी मात्रा का अधिक होना, अधिक धनी होने का चिन्ह है। इस मान्यता के कारण अमीरी का प्रदर्शन करते के लिए अनेक तरह की पोशाकें रखी और बदली जाती है। आभूषण, श्रृंगार, साधन आदि की साज-सज्जा में उपयोगिता का नहीं अहंता के परिपोषण का ही भाव रहता है।
विलासी अपव्यय का अर्थशास्त्र की दृष्टि से कोई समर्थन नहीं हो सकता। स्पष्ट है कि श्रृंगार-सज्जा एवं ठाट-बाट रोपने में जो धन खर्च होता है उससे स्वास्थ्य को कदाचित् ही कोई लाभ पहुँचता हो। फिर भी लोग उस पर अनाप-शनाप खर्च करते रहते हैं। विवेक सहज ही यह निर्णय देगा कि इस अपव्यय को रोक कर उस धन का ऐसा सदुपयोग हो सकता है जिससे अपने-अपने सम्बन्धित व्यक्तियों की वे आवश्यकता पूरी की जा सकती है जो व्यक्तित्वों की सर्वतोमुखी प्रगति के लिए आवश्यक है। किन्तु आमतौर से विवेक दबा रहता है और अहंता के उभार खर्चीले ठाट-बाट इकट्ठे करने की प्रेरणा देते रहते हैं संग्रह की वृत्ति के मूल में भी यही कारण काम करता है। आवश्यकता पड़ने पर संग्रह से सेहत ही सुविधाएँ पाई जा सकती है, यह पक्ष संग्रह का समर्थन करता है, पर उससे प्रेरित होकर नहीं, अमीरी इसलिए बढ़ाई जाती है कि दूसरों की तुलना में अपनी अधिक सफलता का प्रदर्शन करके-साथियों पर छाप डालने और अपने अहंता को सन्तोष देने का अवसर मिले।
मनुष्य अपने को शरीर भाव में अत्यधिक गहराई से ओत-प्रोत कर लेता है, इसीलिए उसके अग्रगमन की दिशा भी पदार्थों के संग्रह एवं उपभोग को बढ़ाती जाती है। वासना और तृष्णा के रूप में ही यह आकाँक्षा उभरी रहती है। उसी के लिए सिर तोड़ परिश्रम किया जाता है। स्थिति के अनुरूप सफलता भी मिलती है। पर कठिनाई एक ही है कि उससे तृप्ति नहीं मिलती। आग पर ईंधन पड़ते जाने से लपटें और भी अधिक तीव्र होती है। इसी प्रकार गरीबी से अमीरी की ओर बढ़ते चलने पर भी राहत नहीं मिलती। अतृप्ति और बेचैनी का समाधान होना तो दूर और उलटे सफलताओं के साथ-साथ अतृप्ति का दौर बढ़ता चला जाता है गरीबी से अधिक असन्तुष्ट अमीर पाये जाते हैं।
उपयोगिता का जहाँ तक सम्बन्ध है वहाँ हर व्यक्ति के उपयोग की एक सीमा है, उससे अधिक मात्रा का प्रयोग भी नहीं हो सकता। संग्रह पड़ा रहता है और बढ़ता रहता है उसे देखकर अपनी सफलता पर गर्व तो किया जा सकता है पर उपभोग नहीं हो सकता। उसे उत्तराधिकारी मुक्त की लूट की तरह प्राप्त करते हैं। स्पष्ट है कि जिसे कठोर परिश्रमपूर्वक कमाया नहीं गया है उसके उपभोग का सही तरीका भी विदित नहीं होता। हराम की कमाई दुर्व्यसन में ही नष्ट होती देखी गई है। यही कारण है कि अमीरों की सन्तानें आमतौर से अपव्ययी होती है। और उत्तराधिकार में मिले प्रचुर धन को अपव्यय में नष्ट करने के साथ-साथ अपने व्यक्तित्व को भी नष्ट करती पाई जाती है।
जब तक नैतिक मर्यादाओं में भौतिक बड़प्पन बना रहता है तब तक उसे स्वार्थ-परता तो कहा जा सकता है, पर उससे कोई बड़ा विग्रह उत्पन्न नहीं होता। व्यक्त स्वयं कमाता, खाता और इतराता, इठलाता रहता है। किन्तु जब यह ललक आतुरता बन जाती है और सामाजिक मर्यादाओं को चुनौती देने लगती है तब यह अपराधों का रूप धारण करती हैं लोभ के लिए छल से लेकर हत्या तक के कुकर्म किये जाने लगते हैं। इन्द्रिय भोग के लिए नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं को उठाकर ताप पर रख दिया जाता है। तथा अहंता प्रदर्शन के लिए उद्दण्डता, उत्पीड़न अनेक आततायी कृत्य किये जाने लगते हैं। नर-पशु से भी नीचे उतर कर नर-पिशाच के रूप में मनुष्य को अनर्थरत होते ऐसी ही स्थिति में देखा जाता है।
यह भी उन्नति का क्रम है पर दिशा उसकी पतनोन्मुख है इसकी प्रतिक्रिया आत्म-प्रताड़ना से लेकर सामाजिक दण्ड भुगतने और सम्पर्क क्षेत्र में अविश्ररत घृणित समझे जाने के रूप में सामने आती है। ऐसी उन्नति को अवनति या पतन कह सकते हैं गिरने की भी एक दिशा है चला तो उस पर भी जा सकता है, पर उससे वह लाभ नहीं मिल सकता जिसे प्राप्त करने के लिए अन्तःकरण में अग्रगामी और गौरवशाली बनने की ललक उठती है। यदि सीमा में रहकर भी भौतिक उन्नति करते रहा जाय तो उससे मात्र शरीर सुख मिल सकता है मन की अहंता की आँशिक पूर्ति हो सकती है अथवा सम्पर्क क्षेत्र के लोगे को मुफ्त की सम्पत्ति मिलने का लाभ मिल सकता है। जहाँ तक जीवात्मा की मूलसत्ता को परिष्कृत बनने का प्रश्न है वहाँ तक उस सारे प्रयास से कोई परिणाम नहीं निकलता। सुरदुर्लभ कहा जाने वाला मनुष्य जीवन व्यर्थ की विडम्बनाओं में भटकते हुए ऐसे ही नष्ट हो जाता है। क्या खोया? क्या पाया का हिसाब लगाने पर जीवन के अन्तकाल में यही पश्चाताप रहता है कि जीवन-लक्ष्य की पूर्ति का स्वर्णिम अवसर ऐसे ही हाथ से निकल गया।
फिर जीवात्मा की वह मूल-भूत प्रवृत्ति किस प्रकार चरितार्थ एवं सार्थक हो जिसे पूरा करने के लिए अन्तः क्षेत्र में अनवरत रूप से उत्कण्ठा उठती रहती हैं इसका उत्तर प्राप्त करने से पूर्व अपनी स्थिति पर विचार करना होगा ओर ‘स्व’ को शरीर नहीं आत्मा के रूप में देखना होगा। शरीर सुख से आत्मिक आनन्द को भिन्न माना जा सकें तो वह दिशा मिलेगी जिस पर चलते हुए आत्मोत्कर्ष का प्रकाश मिलता है। शरीर उपकरण एवं वाहन है। उसकी सुरक्षा और समर्थता के लिए जितने साधनों की आवश्यकता है उतने जुटाने में भौतिक उपार्जन को सीमाबद्ध किया जाय और बची हुई क्षमता का उपयोग अन्तरात्मा का स्तर ऊँचा उठाने में किया जाय तो बात बने। जीवन नीति में इस प्रकार सुधार परिवर्तन करने से दृष्टिकोण परिष्कृत होता है और उस आधार पर वह सूझ-बूझ विकसित होती हैं जो आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है। उस स्थिति में अमीरी नहीं महानता जीवन लक्ष्य बन जाती है और उसी के लिए किये गये प्रयासों की सार्थकता प्रतीत होती है।
आगे बढ़ना’ भौतिक प्रगति के अर्थ में समझा जा सकता है और ऊँचा उठना आत्मिक उन्नति के अर्थ में प्रयुक्त होना चाहिए। शरीर को वस्तुएँ चाहिए। अनुकूल व्यक्तियों का सम्पर्क तथा सुविधाजनक परिस्थितियाँ चाहिए। यह सब सुयोग मिलते रहना और उनका स्थिर बने रहना सम्भव नहीं। संसार चक्र अपने ढंग से चलता है उसमें इस बात को कोई निश्चय नहीं कि व्यक्त की मनःस्थिति के अनुकूल ही परिस्थितियाँ बनी रहेगी। प्रतिकूलताओं और असफलताओं और सफलताओं के। ऐसा दशा में प्रसन्नता एवं तृप्ति भौतिक सम्पन्नता को आधार मानकर चलने पर न तो सम्भव हो सकती है और न स्थिर रह सकती है। फिर एक कठिनाई यह भी है कि जितने सुख-साधन मिलते हैं, वे क्रमशः अपर्याप्त लगने लगते हैं और अधिक मात्रा तथा अधिक ऊँचे स्तर की ललक उठने लगती है। और असन्तोष घटने की अपेक्षा उलटा बढ़ता ही चला जाता है उपलब्धियाँ एवं सफलताएँ कितनी ही बढ़-चढ़ क्यों न हो तो भी तृष्णा की तुलना में कम ही रहेगी और व्यक्ति सदा अपने को अभावग्रस्त ही अनुभव करता रहेगा
शरीर को सुविधा-मन को अहंता चाहिए। इनका उचित रीति से परिपोषण आत्मिक उत्कृष्टताओं के लिए प्रयत्नशील रहने पर भी सम्भव हो सकता है। महामानव न तो भूखे-नंगे रहे हैं और न श्रेय, सम्मान की कमी रही है। लोलुप और मोहग्रस्त व्यक्ति जितना श्रेय,संतोष उपलब्ध कर पाते हैं उसकी तुलना में आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने वाले व्यक्ति घाटे में नहीं, लाभ में ही रहते हैं।
आत्मा चेतन है, उसकी प्रगति सम्वेदनाओं, सद्भावनाओं एवं शुभेच्छाओं के रूप में ही सम्भव हो सकती है। आत्मिक सम्पदा है, इसी को प्राप्त करके व्यक्ति की मूलसत्ता, परिष्कृत और सन्तुष्ट होती है। गुण, कर्म, स्वभाव में श्रेष्ठता के सतोगुणी तत्त्व जितने बढ़ते जाते हैं उसी अनुपात से आत्मिक प्रगति का मूल्याँकन किया जा सकता है।
धन उपार्जन, इन्द्रिय उपभोग एवं अहंता प्रदर्शन में जितनी शक्ति लगाई जाती है, इससे आधी भी यदि अपने चिन्तन ओर क्रिया-कलापों में समाये हुए कुसंस्कारों के उन्मूलन तथा सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में लगाई जाय तो वह आत्म-निर्माण का प्रयास तथा व्यक्तित्व में काया-कल्प प्रस्तुत कर सकने वाली चमत्कारी सिद्ध हो सकती है। आत्मिक विभूतियों को बढ़ाने के लिए ऐसे कर्म करने पड़ते हैं जिन्हें परमार्थ एवं जन-कल्याण के नाम से जाना जाता है ऐसे कार्यों में रुचि लेने-समय श्रम एवं चिन्तन लगाने से लगता है, पर कुछ ही समय में प्रतीत होने लगता है कि यह घाटा उच्चस्तरीय लाभ प्राप्त करने की भूमिका भर था। बीज के गलने में आरम्भिक घाटा भर है कुछ ही समय में वह अंकुर पौधा और वृक्ष बनकर जल फलता-फूलता है तो उससे विशाल आकार एवं वैभव को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि यह आरम्भिक त्याग भावी उत्कर्ष का आधार सिद्ध हुआ ओर इसका आयोजन दूरदर्शी बुद्धिमत्ता सिद्ध हुआ।
आत्मोत्कर्ष के लिए विशिष्ट उपचार रूप से किन्हीं योगाभ्यासों की आवश्यकता हो सकती है और जीवन-क्रम के क्रान्तिकारी परिवर्तन करने के लिए उन्हें भारी उलट-पुलट के लिए उपयोगी कहा जा सकता है, पर मात्र इतने भर से ही काम नहीं चल सकता। करना यह होता है कि सामान्य जीवन-चक्र के प्रत्येक क्रिया-कलाप से उत्कृष्ट आदर्शवादी सिद्धान्तों का समावेश किया जाता रहे। दैनिक जीवन में निर्वाह एवं कौटुम्बिक उत्तरदायित्वों के लिए लोगों को जो करना पड़ता है उसे योग-साधना माना जाय और इसी क्रिया-कलाप में उत्कृष्ट आदर्शवादिता को सँजोये रखने का अभ्यास किया जाय। आरम्भ में यह अभ्यास कुछ कठिन, जटिल और असुविधा उत्पन्न करने वाला लगता है पर जब उसकी आदत पड़ ताजी है तो प्रतीत होता है कि आदर्शवादी जीवन कितना सरल और कितना सुखद है।
उत्कर्ष की मूलभूत प्रवृत्ति शारीरिक नहीं आत्मिक है। उसे भौतिक साधनों से नहीं आन्तरिक सद्भावनाओं के संवर्द्धन से पूरा किया जा सकता है। इसका मार्ग-दर्शन दिव्य आलोक के सहारे ही सम्भव हो सकता है चारों ओर घिरे हुए पशु-प्रवृत्तियों के वातावरण की धुन्ध में कर्तव्य-अकर्तव्य का कुछ बोध ही नहीं हो पाता। आदर्शवादिता कल्पना-लोक की ऐसी उड़ान भर लगता है, जिसका कहना सुनना भर पर्याप्त है, उसे कार्यान्वित किया जा सकना शक्य नहीं। यही वह भ्रान्ति है जिसके कारण अध्यात्म की उत्कृष्टता को व्यावहारिक जीवन में उतारते नहीं बनता। इसके लिए ऐसे स्वाध्याय की आवश्यकता पड़ती है। जो जीवन-क्रम में उत्कृष्टता के समावेश का क्रान्तिकारी आधार खड़ा कर सकें। दुर्भाग्य से अध्यात्म और धर्म-क्षेत्र में भी शास्त्रों के नाम पर ऐसा जाल-जंजाल भी उपलब्ध होता है जो स्पष्ट दिशा निर्देश करने की अपेक्षा उलटे भ्रान्तियों में उलझा देता है। इसी प्रकार सत्संग के नाम पर होती रहने वाली बकवास को प्रगतिशीलता के स्थान पर प्रतिगामिता के पत्थर गले से बँध जाते हैं। इतने पर भी यदि जाँच-परख की कसौटी हाथ में हो तो साहित्य अथवा व्यक्तियों के माध्यम से ऐसा परामर्श मार्ग’दर्शन मिल सकता है जो जीवन समस्याओं को सुलझाने और उत्कृष्टता की दिशा में सही रीति से बढ़ चलने का उपयुक्त मार्ग-दर्शन कर सके।
आदर्श और व्यवहार में रहने वाले अन्तर की खाई पाटने के लिए एकान्त में शान्त-चित्त से मनन, चिन्तन किया जाना चाहिए। यह आत्म-निरीक्षण जितना गहरा होगा उतने ही ऐसे तथ्य उभर कर आवेंगे, जिन पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है परिशोधन की आवश्यकता समझी जा सके और उसके सत्परिणामों का मूल्यांकन किया जा सके तो पुरानी अभ्यस्त अवाँछनीयताओं के विरुद्ध संघर्ष करने की साहसिकता जाग सकती है। इस प्रकार के देवासुर संग्राम को आत्मोत्कर्ष का प्रथम चरण माना गया है। गीता में जिस महाभारत को वर्णन किया गया है और अर्जुन को जिस युद्ध में प्रवृत्त किया गया है वह वस्तुतः अन्तःक्षेत्र में घुसी हुई अवांछनीयता के उन्मूलन में प्रवृत्त शौर्य, साहस ही कहा जा सकता है यह स्थिति बन पड़े तो समझना चाहिए कि अवरोधों को चीर कर ऊँचाई की ओर अग्रसर हो सकने का आधार उपलब्ध हो गया।
जीवन निर्वाह के क्रिया-कलाप प्रायः सामान्य ही होते हैं। ऐतिहासिक महत्त्व की घटनाएँ तो कभी-कभी किसी-किसी के ही सम्मुख आती हैं उनकी प्रतीक्षा में बैठे रहने अथवा चौंकाने वाले उद्धत कर्म करने की आवश्यकता नहीं समझी जानी चाहिए। सामान्य जीवन-अनैतिक कृत्यों में संलग्न नहीं है, इतना ही ध्यान रखना पर्याप्त है। फिर परिस्थिति वश जिस प्रकार का जीवनयापन करना पड़ रहा है उसी के कृत्यों में आदर्शवादी, चिन्तन एवं व्यवहार का पुट लगाते चलने से बात बन जाती हैं सामान्य कामों के कर्मयोग बनाया जा सकता है यदि उनमें उद्देश्य, स्वरूप, चिन्तन एवं व्यवहार का उच्चस्तरीय समावेश किया जाय। महत्त्व क्रिया का नहीं, उसके पीछे काम करने वाली मनोवृत्ति एवं विचारणा का है। यदि सदुद्देश्य रखकर शालीनता पूर्वक सामान्य समझे जाने वाले कृत्यों में भी संलग्न रहा जाय तो आत्मोत्कर्ष का द्वार खुला रह सकता है और उस पर चलते हुए चरम लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव हो सकता है।
सदुद्देश्य ओर सत्कर्मों के समन्वय से जो भावनात्मक प्रतिक्रिया होती है- उसे सुसंस्कार कहते हैं यह सुसंस्कार ही वह सम्पत्ति है। जिन्हें उपार्जित करने पर अन्तरात्मा को अपना वैभव और वर्चस्व बढ़ता हुआ प्रतीत होता है। आत्मोत्कर्ष का यही सरल और सीधा मार्ग है। इस पर चलते हुए उस महानता का वरण किया जा सकता है जिससे ऊँचा उठने के साथ-साथ आगे बढ़ने का भी, रसास्वादन हर घड़ी मिलते रहना सम्भव हो सके।
आद्य शंकराचार्य ने एक शास्त्रार्थ प्रयोजन के काम-शास्त्र का अनुभव प्राप्त करने के लिए अपने शरीर में से आत्मा को निकाल कर मृत सुधन्वा के शरीर में प्रवेश किया था। परकाया प्रवेश की इस प्रक्रिया का उद्देश्य पूरा होने पर वे पुनः अपने शरीर में वापिस लौट आये थे।
रामकृष्ण परमहंस ने अपनी आत्मा को विवेकानन्द में प्रवेश कर दिया था। परमहंस जी के स्वर्गवास के अवसर पर विवेकानन्द को भान हुआ कि कोई दिव्य-प्रकाश उनके शरीर में घुस पड़ा ओर उनकी नस-नस में नहीं शक्ति भर गई।
शंकराचार्य के उदाहरण से मृत शरीर पर किसी अन्य जीवात्मा का आधिपत्य हो सकने की बात प्रकाश में आती है और परमहंस जी के परकाया प्रवेश से जीवित मनुष्य में किसी समर्थ व्यक्तित्व के प्रवेश कर जाने का लक्ष्य सामने आता है। परकाया प्रवेश की अध्यात्म सिद्धियों के संदर्भ में चर्चा होती रही है यह आँशिक समान रूप से पारम्परिक विनियोग की तरह सम्भव है। शक्ति-पात दीक्षा में गुरु अपना एक अंश शिष्य के व्यक्तित्व में हस्तान्तरित करता है।
आत्मा स्वामी है और शरीर सेवक। आत्मा यात्री है और शरीर वाहन। स्वामी की अपनी दुर्बलताएँ ही सेवक के श्रम सहयोग से वंचित रह सकती हैं। स्वेच्छा चार बरतने वाले सेवकों को देखकर यही अनुमान लगाया जा सकता है। कि स्वामी को अपने पद का ध्यान नहीं रहा। वाहन रहते हुए भी यदि सवार को पैदल चलना पड़े तो समझना चाहिए कि उसे अपने साधन के उपभोग की समुचित जानकारी नहीं है।
अपने शरीर पर तो आत्मा का आधिपत्य होता ही है, यदि उसकी सामर्थ्य सबल है तो वह दूसरों के शरीर का भा अपने लिए उपयोग कर सकता है। ऐसा जीवित अवस्था में भी हो सकता है और प्रेतात्माएँ भी वैसा कर सकती है।
दो अमरीकी प्रोफेसरों ने मिलकर एक किताब लिखी है “बीसवीं सदी में, अचेतन मनोविज्ञान की खोज।” इसमें आत्मा की स्वतन्त्र सत्ता तथा पुनर्जन्म को सिद्ध करने वाले अनेकों प्रमाण दिये गये है। इसी पुस्तक में परकाया प्रवेश सम्बन्धी कई घटनाओं-तथ्यों का संकलन किया गया है। उनमें से कुछ से है-
एक बर्तन विक्रेता घर से टहलने निकला ओर गायब हो गया। जाकर मशीनों की मरम्मत का काम करने लगा दो वर्ष बाद सहसा घर की सुधि आई जैसे गहरी नींद टूटी हो। घर वापस पहुँचा। पता चला, मशीनों की मरम्मत का वही काम एक अन्य व्यक्ति करता था जो कुछ ही समय पहले भरा था। बर्तन विक्रेता दो वर्ष तक उसी व्यक्ति की तरह काम करता रहा। वहाँ सभी कर्मचारियों के नाम-व्यवहार सराय, होटल सब उसे याद थे। घर लौटकर धीरे-धीरे आते वह सब भूल गया और पूर्ववत् अपना पुराना कसेरे का धन्धा करने लगा। डॉ॰ आसबन ने इस घटना को विस्तार से प्रकाशित किया। अनुमान यह किया गया कि मशीनों की मरम्मत करने वाले व्यक्ति की आत्मा ने कसेरे की आत्मा को दो वर्ष तक अपने कब्जे में रखा। जब वह आत्मा कब्जा छोड़कर चली गई, तो पुरानी आत्मा अपनी स्वतन्त्र सत्ता का परिचय पुनः दे सकी। इस बीच वह दबी रही।
कभी-कभी ऐसे घटनाक्रम भी प्रकाश में आते हैं कि किसी मृतात्मा ने किसी दूसरे जीवित मनुष्य के शरीर पर आधिपत्य जमा लिया और उसका उपयोग मन मर्जी से करती रही। भूत प्रेतों के आवेश की चर्चा झाड़-फूँक के क्षेत्र में आये दिन होते रहती है। उनमें अधिकतर तो मानसिक दुर्बलता, मूढ़, मान्यता, अर्ध व्यक्तियों द्वारा छोड़ी गई छाप ही प्रमुख कारण होती हैं, फिर भी ऐसे तत्त्वों की कभी नहीं जिनमें मृतात्माओं के अन्य शरीर पर अधिकार जमा लेने की बात सिद्ध होती हैं इस प्रकार के अधिकार प्रायः अस्थायी होते हैं। आत्माएँ अपना उद्देश्य पूरा करके उस आधिपत्य को अनायास ही छोड़कर चली जाती हैं अथवा उदासीन हो जाती हैं।
किन्हीं विशिष्ट आत्माओं ने दूसरों के शरीर में प्रवेश करके उनसे कुछ विशिष्ट काम कराये ऐसी घटनाएँ संसार के अनेक भागों में घटित होती रही है।
विश्व विख्यात कलाकार गोया की आत्मा ने अमेरिका की एक विधवा हैनरोट के शरीर में प्रवेश करके उनके द्वारा गवालन नामक एक अद्भुत कलाकृति का सृजन कराया था। यह समाचार उन दिनों अमेरिका में अनेक पत्रों में प्रकाशित हुआ था।
रोडस नगर के एक नागरिक ऐसेलवर्न बैक से दस हजार का चैक भुनाकर निकले और सहसा गायब हो गये। घर वाले ढूंढ़- ढूंढ़कर थक गये। ऐसेलबर्न सैकड़ों मील दूर एक नगर में जाकर वहाँ चीनी का व्यापार करने लगा। नाम बताया अपना ए0से0बाउन। उसने पहले यह व्यापार कभी भी नहीं किया था। दो माह बाद जैसे स्वप्न टूटा। वह चौका। यह चीनी का व्यापार मैंने तो कभी नहीं किया और मेरा घर भी यहाँ नहीं। वह भागा और पुराने घर जा पहुँचा। इस घटना का भी निष्कर्ष यही निकाला कि किसी मृत व्यापारी की आत्मा ने उसे वंशीवर्ती कर लिया था।
1864 में डॉक्टर डामा के पास एक सुशिक्षित बेहोश रोगी आया। वह चंगा हो गया। पर शिशुवत् आचरण व चिंतन करने लगा। पढ़ना-लिखना भूल चुका था। कई महीनों तक यही दशा रही। फिर उसे जैसे कुछ याद आया और वह पुनः प्रौढ़ व्यक्तित्व का स्वामी बन गया।
बोस्टन के डॉ॰ नार्टन प्रिंस के पास आई एक महिला की भी कुछ यही स्थिति थी। वह प्रतिदिन कुछ घण्टे तक एक अन्य ही व्यक्तित्व बन जाती। व्यवहार क्रिया-कलाप उच्चारण, सब भिन्न। वह एक स्वस्थ पुरुष जैसा आचरण करती। अपना नाम भी किसी पुरुष का नाम बताती। फिर अपने महिला व्यक्तित्व में लौट आती।
15 अप्रैल 1867 को एक पादरी मोटर दुर्घटना ग्रस्त हो गये। बेहोशी में अस्पताल ले जाये गये। होश आया तो एक छोटे बालक का ही आचरण करने लगे। पिछला नाम, पता, व्यवसाय सब भूल गये। शिक्षा भी भूल गये पहले ये यहूदी भाषा नहीं जानते थे। शिशु रूप में अब यहूदी बोलते। परेशान होकर डाक्टरों ने उन्हें लन्दन से न्यूयार्क भेजा। वहाँ चिकित्सा चली। धीरे-धीरे सुधार हुआ लम्बे समय तक कभी बालक व्यक्तित्व मुखर रहता, कभी पादी-व्यक्तित्व अरसे बाद अन्ततः वे असली व्यक्तित्व में लौट सके।
मृतात्माएँ दूसरों के शरीर पर किस स्थिति में? किस पर? और किस लिये आधिपत्य स्थापित करती है। इसका सही उत्तर दे सकना तो आज की स्थिति में कठिन है,? पर अनुमान यह लगाया जा सकता है कि कोई मनस्वी आत्मा अपने से दुर्बल पड़ने वाले व्यक्तित्वों पर छा जाने में अधिक सफल होता है। पूर्व परिचय एवं स्नेह-सौहार्द्र भी एक कारण हो सकता है। अतृप्त आत्माएँ साँसारिक जीवन का आनन्द लेना चाहती है, अथवा ऊपरी अभिलाषाएँ पूरी करने के लिए आतुर होती है। यह इन्द्रिय क्षमता से युक्त स्थूल शरीर से ही सम्भव है। सूक्ष्म शरीर मानसिक अनुभूतियाँ तो ले सकता है, पर स्थूल इन्द्रियों के अभाव से भौतिक वस्तुओं का उपभोग उसके लिए शक्य नहीं होता। अस्तु इस प्रयोजन के लिए वे दूसरों के शरीरों पर आधिपत्य जमाते हैं और अपना मनोरथ पूरा करते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कारण भी हो सकते हैं।
यह आधिपत्य थोड़े समय के लिए आवेश, उन्माद स्तर का भी हो सकता है और उसका एक रूप यह भी सम्भव है कि शरीर का असली स्वामी जीवात्मा मूर्छित अवस्था में जा पड़े और उस शरीर का उपयोग कोई अधिकार जमाने वाली सत्ता मन चाहे ढंग से करती रहे।
हारवर्ड विश्व विद्यालय अमेरिका के डाक्टर आसवन ने अपनी मनोवैज्ञानिक खोजों में नई सच्ची घटनाओं का उल्लेख दिया है, जो किसी व्यक्ति में किसी अन्य आत्मा का प्रवेश हो जाना सम्भव बताती है। उन्होंने एक कारीगर का उदाहरण प्रस्तुत किया है। एक दिन अनायास ही वह अपने औजार फेंक कर चिल्लाया कि मैं यहाँ कैसे आ गया और यह बेकार काम कैसे करने लगा? सही यह है कि दो वर्षों से उसने अपना असली धर छोड़ दिया था। किसी आत्मा के प्रभाव में आकर ही उसने घर छोड़ा और वह काम करने लगा जिसका उसे अभ्यास नहीं था। जब तक वह उस आत्मा के प्रभाव में रहा तब तक वह अपना नाम व असली घर भूला हुआ था।
सम्मोहन विद्या एक प्रकार से परकाया प्रवेश का ही दूसरा रूप है। प्रयोक्ता अपने प्रचण्ड मनोबल का प्रहार करता है। और जिस पर प्रयोग किया गया है। उसके बाह्य मस्तिष्क की चेतना को पीछे अंतर्मन के धकेल देता है। यह अर्ध मूर्छित स्थित हुई। सोचने समझने वाला मस्तिष्क निद्राग्रस्त हो गया और उसकी जगह प्रयोक्ता का मनोबल काम करने लगा। सारे मस्तिष्क तंत्रों का उपयोग तब तक वही करता है जब तक कि उस बलात् निद्रा से मुक्ति नहीं मिल जाती। प्रयोक्ता को प्रहार और उपभोक्ता की सहज स्वीकृति का समन्वय ही सम्मोहन की स्थिति उत्पन्न करता है। दोनों में से एक पक्ष भी दुर्बल न हो तो प्रयोग सफल न हो सकेगा।
स्व सम्मोहन का स्तर अधिक ऊँचा है उसमें प्रबल आत्म शक्ति के द्वारा ही अपने चेतन मस्तिष्क को अर्ध तन्द्रा में धकेल दिया जाता है और अचेतन को सामान्य जीवन संसार क व्यवस्था जुटाते रहने के लिए सीमित कर दिया जाता है। इसे योग-निद्रा या समाधि कहते हैं। इसमें अहिर्निशि श्रम संलग्न रहने वाले बाह्य मस्तिष्क की कृत्रिम शक्ति साथ ही दिव्य निद्रा का आनन्द मिलता है। इस विश्रान्ति के उपरान्त एक नई स्फूर्ति का लाभ मिलता है। साथ ही चेतना को अनावश्यक परतों को- दुर्बल एवं आवश्यक परतों को सबल बनाने का अवसर मिलता है। योगी लोग आत्मोत्कर्ष के अन्यान्य उच्चस्तरीय लाभ भी इस योग-निद्रा द्वारा प्राप्त करते हैं। सामान्यतया प्रचलित स्व सम्मोहन भी अपना मनोबल बढ़ाने आदतें छुड़ाने एवं उपयोगी निष्ठाएँ जमाने के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध हो रहा है।
स्व सम्मोहन कठिन है। आत्मबल को प्रखर बनाने के उपरान्त ही उसमें इतनी क्षमता उत्पन्न होती है कि जागृत मस्तिष्क को शिथिल बना सके और उस स्थिति का लाभ लेकर अनावश्यक को हटाने एवं आवश्यक को जमाने का कार्य पूरा कर सके। आमतौर से जागृत मस्तिष्क ही सबल होता है, और वह अपनी सर्वोपरि सत्ता को चुनौती दी जाना स्वीकार नहीं करता। तर्क और सन्देह के आधार पर वह अपने ऊपर होने वाले आक्रमण को पूरी शक्ति के साथ रोकता है। फलतः स्व सम्मोहन की अभीष्ट गहराई उत्पन्न होने से भारी कठिनाई उत्पन्न होती है। इतने पर भी शान्त चित्त से, श्रद्धापूर्वक किन्हीं विचारों को बार बार दुहराने से भी कुछ तो प्रभाव पड़ता ही है और उपयोगी मानसिक परिवर्तन के लिए प्रयासों से कुछ तो सफलताएँ मिलती ही है। यह कुछ-कुछ भी बूँद-बूँद करके घड़ा भरने की उक्ति के अनुरूप लाभदायक ही सिद्ध होता है।
“कान्शस ऑटोसजैशन” ग्रन्थ में फ्राँस के मनोविज्ञान विशारद प्रो0 इमाइल कू ने अनेक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए बताया है कि किस प्रकार इच्छा शक्ति का प्रयोग करके अपने आप में तथा दूसरों में असाधारण परिवर्तन किया जा सकता है। ये प्रयोग शारीरिक और मानसिक रुग्णता को दूर करने में भी बहुत प्रभावशाली सिद्ध हुए है।
स्व सम्मोहन आत्म साधना है, सम्मोहन वैज्ञानिक प्रयोग। मानसिक चिकित्सा जैसे महत्त्वपूर्ण कार्य एक व्यक्ति द्वारा दूसरे को अर्ध-मूर्च्छित करने की प्रक्रिया द्वारा ही सम्पन्न होता है। इस प्रकार उत्पन्न हुई योगनिद्रा इतनी गहरी होती है कि उसमें छोटे बड़े आपरेशन भी आसानी से हो सकते हैं। पाश्चात्य देशों में यह विज्ञान अब बहुत आगे तक बढ़ गया है और दन्त चिकित्सक तो आमतौर से इस प्रक्रिया का उपयोग करके बिना सुन्न किये ही दाँत उखड़ते रहते हैं, और रोगी को किसी प्रकार ही दाँत उखड़ते रहते हैं, और रोगी को किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता।
हिप्नोटिज्म का हिन्दी अनुवाद ‘सम्मोहन’ है। उसे सामान्यतः एक विशेष प्रकार की सुझाई हुई नींद ‘नर्वस निद्रा’ कहा जा सकता है। साधारण नींद में मनुष्य सुधि-बुधि खोकर अचेत हो जाता है। पर सम्मोहन निद्रा में मनुष्य का आधा सचेतन मस्तिष्क भर सोता है। उसके स्थान पर अचेतन अधिक सक्षम हो जाता है और आदेश कर्ता के निर्देशों के प्रति पूर्ण सजगता का परिचय देता है इसे चेतना की सामान्य स्थिति का असामान्य प्रत्यावर्तन कहा जा सकता है। सक्रिय मस्तिष्क की सुषुप्ति और निष्क्रिय की जागृति इस कहा जाय तो भी बात बनती नहीं है। क्योंकि सक्रिय की निद्रा वाली बात तो सही है, पर जिसे निष्क्रिय कहा जा रहा है वह अपने क्षेत्र में सक्रिय से भी अधिक सक्रिय रहता है और व्यक्तित्व के निर्माण में ज्ञानवान चेतना से भी कही अधिक बढ़ी-चढ़ी भूमिका का निर्वाह करता है।
शरीर को सुन्न करने में सम्मोहन प्रयोग बहुत सफल हुए है। प्रथम महायुद्ध के दिनों रूसी डाक्टर पोडियापोलेस्की ने 30 घायलों के शरीर बिना क्लोरोफार्म के ही सुन्न करके दिखाये थे और उनके पीड़ा रहित आपरेशन सम्पन्न किये थे। ब्रिटिश डाक्टर एस्टल ने इस प्रयोग के आधार पर लगभग 200 आपरेशन सम्पन्न किये थे। योरोप के अनेक देशों में दन्त चिकित्सक बिना कष्ट दाँत उखाड़ने में इस पद्धति का प्रयोग करते हैं। दन्त ही में न प्रसव के लिए भी प्रसूति ग्रहों में यह प्रक्रिया बहुत उपयोगी सिद्ध हो रही है। अमेरिका की मेडिकल ऐसोसिएशन ने चिकित्सा विज्ञान के एक प्रामाणिक पद्धति के रूप में सम्मोहन को सन् 1958 से ही मान्यता दे रखी है। इसी प्रकार ‘ब्रिटिश एण्ड अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन ने भी उसे उपयोगी चिकित्सा विधि के रूप में प्रामाणिकता प्रदान की है।
‘सम्मोहन किसी समय जादुई करिश्मा समझा जाता था और उसके समर्थकों और विरोधियों के पक्ष में अपनी अपनी बातें इतने जोर-शोर से कहते थे कि जन-साधारण के लिए उस सम्बन्ध में कोई स्पष्ट अभिमत बना सकना सम्भव न हो पाता था, पर ऐसी बात नहीं है। उसे विज्ञान की एक तथ्यपूर्ण धारा के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। अब सम्मोहन को कला नहीं विज्ञान के रूप में प्रतिपादित किया जाता है। इसे आश्चर्यजनक प्रदर्शनों के रूप में नहीं मनुष्य के लिए उपयोगी सत्परिणाम प्रस्तुत कर सकने वाली ‘विद्या’ के रूप में प्रयुक्त किया जाता है।
डाक्टर बार्बर की तरह अन्य लोगों को भी यह सन्देह था कि सम्मोहन प्रदर्शनों में कोई पद्य-शिष्य बाजीगर को सफल सिद्ध करने के लिए जान-बूझ कर ढोंग बनाता है। किन्तु आशंका क्रमशः निर्मूल होती चली गई है। जब तक बाजीगरी के कौतुक प्रदर्शनों का सम्मोहन विद्या का प्रयोग होता था, तब तक उस पर अंगुली उठने की काफी गुँजाइश थी पर अब वैसा कदाचित ही होता है। अब यह विद्या मानसोपचार के क्षेत्र में सम्मिलित हो गई है और प्रायः इसी के लिए इसका उपयोग होता है। मस्तिष्क में तर्क शक्ति, इच्छा शक्ति एवं निष्कर्ष क्षमता के कुछ अपने क्षेत्र है। सम्मोहन निद्रा में उसी को निष्क्रिय बना दिया जाता है और सम्मोहित व्यक्ति इस स्थिति में पहुँच जाता है मानो उसकी अपनी निजी विचार बुद्धि का अन्त हो गया।
विज्ञानी एस्क्शिन ने सम्मोहित व्यक्ति की रंग पहचानने की क्षमता बदल देने-पानी को ही शराब बताकर उसमें नशे के लक्षण उत्पन्न कर देने में सफलता पाई है। इसी प्रकार जनरल आफ साइकेटरी में मनः शास्त्री के उलमैन के प्रयोग विवरण लेख में उन सफलताओं का वर्णन है, जिनमें शरीर के विभिन्न अवयवों पर विभिन्न परिवर्तन सम्भव कर दिखाये थे। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति का हाथ ठंडे पानी में उलवाया गया और उसे अत्यधिक उष्ण मनवा लेने पर हाथ में छाले उठ आना सम्भव हो गया था। ऐसे ही अनेक विवरण रूसी मानसोपचारक प्लेटोनोव ने अपनी पुस्तक दि वर्ल्ड एज ए फिजियोलॉजिकल एण्ड थैराट्यूटिक फैक्टर में प्रकाशित कराये है।
रूसी मनःशास्त्री पावलोव के अनुसार सम्मोहन में जादू जैसी कोई बात नहीं वह मनोविज्ञान सम्मत सहज प्रक्रिया है जिसमें कुछ मस्तिष्कीय कणों की अन्तःक्षमता को कृत्रिम रूप सुला देने और जगा देने की प्रक्रिया को संकल्पशक्ति के आधार पर सम्पन्न कर दिया जाता है।
सम्मोहन से शरीर की सामान्य स्थिति में भी अन्तर आ जाता है। यह अन्तर शरीर परीक्षा में सहज ही देखा जा सकता है। जैसे हृदय की गति 82 बढ़कर 143 तक हो जाना-रक्त का बढ़ाव 105 से उठकर 136 तक जा पहुँचना-ताप मान 99 सेन्टीग्रेड से 101 तक देखा जाना। इतना होने पर भी रक्त में जिन तत्वों का समावेश है उनके अनुपात में अन्तर नहीं आता। लवण, शंकर आदि की जो मात्रा रक्त में विद्यमान थी उसका परिणाम नहीं बदला जा सका। इसी प्रकार बीमारियों के कारण होने वाले कष्ट की अनुभूति तो उतने समय के लिए रुक सकती है, और रोगी अपने को अच्छा अनुभव कर सकता है। इतने पर भी उस बीमारी की जड़ कट जाना सम्भव नहीं होता। हाँ सुधार का धीमा सिलसिला चल पड़ सकता है।
पूर्व निर्धारित नैतिक मान्यताओं को बदलने के प्रयोग यदि करने ही हों तो उनमें बहुत समय लगेगा और सफलता बहुत धीरे-धीरे मिलेगी। लड़ाइयों में पकड़े गये शत्रु पक्ष के सैनिकों को पहले की अपेक्षा भिन्न मत का बनाने के लिए सम्मोहन विज्ञान के आधार पर प्रयोग होते रहे हैं। उन्हें ‘ब्रेन वाशिंग’ कहा जाता रहा है। इनमें आँशिक सफलता ही मिली है, क्योंकि यह उनकी परिपक्व देशभक्ति की मूल धारा को बदल देने के लिए किये गये अति कठिन कार्य थे। इनकी तुलना में किसी अनाचारी व्यक्ति का अनाचार छुड़ा देना सरल पड़ता है। क्योंकि उस अनाचार की आदत होते हुए भी अन्तःकरण में उसके लिए विरोधी भावना पहले से ही बनी हुई थी।
सम्मोहित व्यक्ति में उसके विनिर्मित व्यक्तित्व की सीमा के अंतर्गत ही कार्य कराये जा सकते हैं। अचेतन की गहरी परतें अपने भीतर कुछ नैतिक और आत्मिक मान्यताएँ अत्यन्त सघन होकर जमाये रहती है। उन्हें सम्मोहित प्रयोगों में नहीं छुआ जाता। सामान्य कामकाजी बातों को ही शरीर और मस्तिष्क द्वारा पूरा कराया जा सकता है। किसी व्यक्ति की आन्तरिक आस्था जीव दया पर आधारित है। उसे सम्मोहित स्थिति में माँस खाने के लिए कहा जाय तो मन की गहरी परतें उसका विरोध करेंगी और वह व्यक्ति उस आदेश को पालन करने से इनकार कर देगा। इसी प्रकार किसी का धन या शील हरण करने, किसी की हत्या कराने, जैसे कुकृत्यों के लिए सम्मोहन कर्ता कोई प्रयोग करे तो अन्त करण की अस्वीकृति होने पर वे प्रयोग सफल न हो सकेंगे। इसी प्रकार यह भी सम्भव नहीं कि किसी व्यक्ति की मूल भूत क्षमता से बाहर के काम कराये जा सकें। हिन्दी पढ़े व्यक्ति से अंग्रेजी बोलने के लिए कहा जाय तो वह न बोल सकेगा। इसी प्रकार इतना वजन उठाने के लिए कहा जाय और उसकी शारीरिक क्षमता से बाहर हो, तो भी वह इन प्रयोगों में न बन पड़ेगा। आत्म हत्या कर लेने जैसे आदेश भी सम्मोहित व्यक्ति को स्वीकार्य नहीं होते। इसका तात्पर्य इतना ही है कि प्रदर्शनों में इतनी ही सफलता मिलेगी जितनी कि किसी अनुशासित व्यक्ति से जीवित अवस्था में सहमत करके कराया जा सकता है। प्रकारान्तर से इन्हें काम काजी सहमति से लादी हुई सफलता भर कह सकते हैं।
सत्संग और कुसंग का प्रभाव सर्वविदित है। ऋषियों के आश्रमों में सिंह और गाय एक घाट पानी पीते थे। यह उस आत्म-चेतना का ही प्रभाव था जो प्रचंड होने के कारण अपने क्षेत्र में एक प्रकार से सम्मोहन का वातावरण उत्पन्न किये रहती थी। नारद जी के थोड़े से सम्पर्क से ही प्रहलाद, ध्रुव, पार्वती, बाल्मीकि आदि अनेकों को दिशा मिली और जीवन क्रम उलट गये। भगवान बुद्ध के सम्पर्क में आने वाले अंगुलिमाल, आम्रपाली जैसी अगणित अधम जन उच्चस्तर पर पहुँचे। गाँधी जी के प्रभाव से अगणित व्यक्ति त्याग और बलिदान के क्षेत्र में उतरे और बढ़े चढ़े आदर्श उपस्थित करते रहे। इसे प्राण तत्त्व की प्रखरता का- सुविस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ आलोक ही कह सकते हैं। परकाया प्रवेश एवं सम्मोहन विज्ञान के अनुसार भी इस प्रभाव प्रक्रिया की व्याख्या की जा सकती है।
परकाया प्रवेश उच्चस्तरीय अध्यात्म विज्ञान की परिधि में आने वाली महत्त्वपूर्ण विधि व्यवस्था है। इसका उपभोग सदुद्देश्य के लिए-सज्जनता सम्पन्न आत्माओं द्वारा-सद्भावना पूर्वक किया जा सके तो उसका प्रभाव उसी प्रकार श्रेयस्कर होगा जैसा कि चिकित्सा विज्ञान आदि के द्वारा सम्भव होता है।
समुद्र की लहरें अपनी हलचलों के कारण बिजली उत्पन्न करती है। ज्वार भाटों से विद्युत प्रवाह निसृत होता है। वैज्ञानिक इस खोज में है कि यह अन्तरिक्ष में छितराती रहने वाली बिजली किस प्रकार रोक थाम कर रखी जाय और उसे किस तरह मानवी उपयोग के कार्यों में लगाया जाय? निकट भविष्य में इस दिशा में महत्त्वपूर्ण सफलताएँ मिलने की भी आशा की जाती है।
मनुष्य शरीर को भी एक प्रकार का समुद्र कहा जा सकता है जिसमें असंख्य नस-नाड़ियाँ नदी, नालों की तरह बहती है, श्वांस-प्रश्वास के ज्वार भाटे उठते हैं। मस्तिष्क का जनरेटर और हृदय का पम्पिंग स्टेशन मिल जुलकर जिस स्तर की ऊर्जा उत्पन्न करते हैं उसे मानवी विद्युत का नाम सहज ही दिया जा सकता है। इस बिजली से शरीर और मन मस्तिष्क की अगणित हलचलों का- सृजन-विसर्जन का क्रम चलता है। आवश्यक क्रिया कलापों के लिए क्षमता इसी विद्युत उत्पादन के क्रिया कलाप द्वारा सम्भव होती है।
शरीर विज्ञान क्षेत्र में सर्वविदित इस मानवी विद्युत के अतिरिक्त एक चेतन बिजली भी मानवी सत्ता के साथ जुड़ी हुई है इसे प्राण कहते हैं। ब्रह्म के अंशधर जीव का चिन्तन परक एवं संवेदनात्मक गतिविधियों का उभार एवं अवसाद इसी प्राण शक्ति की स्थिति पर निर्भर रहता है। इस प्राण शक्ति की प्रखरता ही शरीर में संव्याप्त होकर उसे ओजस्वी बनाती है। मन संस्थान में उभरती है, जिससे व्यक्ति मनस्वी दीखता है और अन्तःकरण में उसका समुचित समावेश होने पर मनुष्य तेजस्वी बनकर अपने आत्म तेज से समीपवर्ती वातावरण को प्रकाशित करता है।
शारीरिक काम करने वाला आणविक ऊर्जा प्रवाह तथा चेतना में संव्याप्त प्राण तत्त्व के सम्मिश्रण से जो ब्रह्म वर्चस् उत्पन्न होता है उसे मानवी सत्ता की सबसे बड़ी सशक्त क्षमता कहा जा सकता है। सम्पदाओं और विभूतियों की दृष्टि से उसका मूल्यांकन किया जाय तो फिर उसे ऋद्धि सिद्धि कह सकते हैं। योगियों और देवताओं में इसी स्तर की विशेषताएँ पाई जाती है। देवताओं के प्रतीक चित्रों में उनके चेहरों पर तेजोवलय छाया हुआ अंकित किया जाता है। अंग्रेजी में उसे “औरा” कहते हैं। वैज्ञानिक भाषा में इसे प्राणि चुम्बक शब्द से सामान्य ‘मैगनेट’ का अर्थ लिया जाता है, पर उसकी चर्चा जब प्राणि संदर्भ में होती है तो उसे ऐसी सचेतन विद्युत के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है जो न केवल पदार्थ परमाणुओं को वरन् वातावरण में अपने प्रवाह को फेंकती और सजातीय जीवधारियों को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करती है।
इस व्यक्ति चुम्बक की क्षमता विचार शक्ति के द्वारा अपने ऊपर-सम्पर्क क्षेत्र में तथा समस्त ब्रह्मांड में उत्पन्न होने वाले संक्षोभों के आधार पर अनुभव की जाती है। इसी शक्ति के सहारे अतीन्द्रिय क्षमताएँ उभरती है और ब्रह्मांडीय चेतना के साथ सम्पर्क मिलाते हुए सूक्ष्म जगत की गतिविधियों को समझ सकना तथा उनको अपने पक्ष में झुका सकना होता है।
साधना का उद्देश्य इसी चुम्बकत्व का- ब्रह्मवर्चस् का अभिवर्धन है। इसी से सामान्य मनुष्य को राजर्षि ब्रह्मर्षि और देवर्षि स्तर तक पहुँचने का अवसर मिलता है। जीवात्मा को क्रमशः महात्मा देवात्मा और परमात्मा स्तर तक ऊँचा उठा ले जाने वाले प्रचण्ड ईंधन के रूप में इसी आत्म-विद्युत का- प्राण चुम्बक का प्रयोग करना पड़ता है। संयम ब्रह्मचर्य से, मनोनिग्रह से, मौन-व्रत उपवासों से, ध्यान धारणा से तथा अनेक सरल कठोर विधि विधानों से इस या उस प्रकार से साधना मार्ग के पथिकों को इसी प्राण ऊर्जा के अभिवर्धन, नियन्त्रण एवं उच्चस्तरीय प्रयोजनों में संलग्न करने की विधि व्यवस्था से अवगत कराया जाता है। वैज्ञानिक क्षेत्र में कुछ हलके स्तर पर इसी प्राण विद्युत की खोज बीन सम्भव हुई है। क्रमशः इस संदर्भ में उपयोगी निष्कर्ष भी निकल रहे हैं।
जैविक विद्युत शास्त्र के प्रवर्तक डॉ॰ एच॰ ए॰ वर के अनुसार प्राणिज विद्युत का आधार भी भौतिक विद्युत से भिन्न होता है और उसका क्रिया कलाप भी। प्राणिज विद्युत में, डॉ॰ वर के अनुसार इच्छा और बुद्धि भी सूक्ष्म रूप में होती है। इसी के चलते प्राणिज विद्युत अपने क्षेत्र में विशिष्ट परिस्थितियों एवं साधनों की संरचना करती है। किस प्राणी के डिम्ब से किस आकृति-प्रकृति का जीव उत्पन्न हो, यह मात्र उस प्राणी की रासायनिक संरचना पर निर्भर नहीं। अपितु रज और शुक्र कीटों के अन्दर भरी चेतना ही इसका मुख्य निर्धारक तत्त्व है। यदि ऐसा न होता, तो मात्र रासायनिक अन्तर के बल पर कोटि कोटि वर्ग के प्राणियों की उत्पत्ति व उनकी वंश परम्परा का प्रवाह क्रम कायम नहीं रह पाती। जीव जातियों की संख्या सीमित ही होती।
मानव शरीर की कोशिकाओं की आन्तरिक संरचना का एक महत्त्वपूर्ण आधार है- माईटो कोन्ड्रिया। भोजन का स्वरूप रस, रक्त, माँस, अस्थि आदि क्रम से इस संस्थान तक पहुँच कर ऊर्जा का रूप लेता है। ऊर्जा ही कोशिका को सक्रिय रखती है। एक माईटी कोन्ड्रिया में केन्द्रित ऊर्जा को लघुत्तम प्राणाँश कह सकते हैं। सम्पूर्ण काय कलेवर में इसका सम्पुन्जन महाप्राण कहलाता है तथा वही ऊर्जा ब्रह्माण्ड व्यापी रूप में विराट् प्राण कही जाती है। विराट् प्राण है- ऊर्जा सिन्धु और कोशिकागत ऊर्जा है- ऊर्जा बिन्दु। यह दोनों परस्पर अन्योन्याश्रित है। मनुष्य की अतीन्द्रिय सामर्थ्य एक शक्तिशाली चुम्बकत्व है। असम्भव कार्य भी उसके द्वारा सहज सम्भव है। आँखों से न देख पाने वाले स्थानों की वर्तमान में घट रही घटनाएँ स्पष्ट देख पाना और उनका सचित्र वर्णन कर पाना, एक स्थान से दूसरे स्थान को परस्पर संवादों का आदान-प्रदान सूक्ष्म जगत में पक रही भावी घटनाओं की सूक्ष्म क्रियाओं के संकेतों को समझ कर भविष्य कथन जो कि स्थितियों के सर्वथा अप्रत्याशित परिवर्तन की स्थिति में ही गलत सिद्ध हो तो अन्यथा जिनका सही होना सुनिश्चित है, आदि सभी असामान्य कार्य इसी चुम्बकत्व के द्वारा सम्पन्न होते हैं। तप, साधना द्वारा प्रेरक शक्ति प्राप्त कर लेने वाले दूसरों को उपयोगी व सार्थक प्रेरणा देकर उन्हें लाभान्वित कर सकते हैं।
प्रत्येक व्यक्ति एक अच्छा खासा चुम्बक है। चुम्बक की एक विशेषता है आकर्षण। दूसरी विशेषता है एकरसता की। तीसरी स्थिर दिशा की।
व्यक्ति अपनी चुम्बकीय शक्ति का सायास विकास कर सकता है। विकसित सामर्थ्य स्पष्ट दिख जाती हैं यद्यपि सामान्यतः वह होती सभी में है। पर अल्पप्राण मनुष्यों को सामर्थ्य प्रकट नहीं हो पाती।
चुम्बक की ही तरह यदि मनुष्य अपने मन की प्रवृत्तियों रूपी, चुम्बकीय कर्णों को सही ढंग सुव्यवस्थित व क्रमबद्ध कर ले तो उसकी शक्तियाँ विकसित हो जाती है। ऐसे महान व्यक्तित्वों में प्रबल आकर्षण होता है और वे जहाँ भी हों, लोग चारों ओर से उनकी ओर खिंचे चले आते हैं।
जिस तरह चुम्बक में एकरसता होती है और कितने भी विखंडित रूप में होने पर भी उसमें आकर्षण-क्षमता बनी ही रहती है, उसी तरह कभी बाह्य रूप में दब जाने या छोटे हो जाने पर भी महापुरुषों के व्यक्तित्व में एकरसता बनी रहती हैं उसमें क्षुद्रताएँ और विसंगतियाँ नहीं आ पाती तथा अनेकों लोगों से एक साथ सम्बन्ध रखने पर भी उनके व्यक्तित्व में अपने-पराये के पक्षपात की रंच मात्र प्रवृत्ति नहीं होती।
‘दिशा की स्थिरता’ का गुण तो महापुरुषों की सदा ही विशेषता होती हैं वस्तुतः लक्ष्य केन्द्रित व्यक्ति ही महान बन सकते हैं। परिष्कृत व्यक्तित्व अपने जीवन मूल्यों को कभी भी खोते नहीं, क्योंकि ये उनके अस्तित्व और उनकी अस्मिता का ही पर्याय बन जाते हैं। अपनी इस अविचल निष्ठा द्वारा वे औरों को सदा सही प्रेरणा देते रहते हैं।
यों चुम्बक को बार-बार पटका जाय और ऊपर -नीचे ऊल-जलूल ढंग से उलटा-पलटा जाये, तो उनकी आकर्षण शक्ति लुप्त ही हो जाती हैं। अपनी पुण्य-पूँजी , शक्ति सामर्थ्य और सद्गुण-सम्पदा का दुरुपयोग करने वाले तथा पतित क्रियाओं, विचारणाओं को किसी मानसिक दुर्बलता वश अपना लेने वाले मनुष्य अपनी सारी विशेषताओं और महान् गणों के बावजूद भी पतन के खड्ड में गिर जाते हैं।
पृथ्वी अपने चतुर्दिक् व्याप्त चुम्बकीय क्षेत्र के सहारे समस्त समस्त ब्रह्माण्ड में फैली विशेषताओं में से अपने लिए आवश्यक विशेषताएँ संचित करती रहती हैं। अन्यथा उसका अक्षय भण्डार भी एक दिन रिक्त ही हो जाय और साधन-सम्पन्न धरती विपत्रा-दीना ही बन जाय।
मनुष्य भी अन्तरिक्ष से बरसने वाले अनेक अनुदानों को अपनी आन्तरिक स्थिति के अनुरूप स्वीकार-अस्वीकार करता रहता है। ब्रह्म-चेतना से तादात्म्य ही आध्यात्मिक महापुरुषों को अनन्त सामर्थ्य देता है। अन्यथा उनको मुख्यतः घटिया अन्तः करण वाले लोगों से भरी इस धरती में शीघ्र ही अपनी पूण्य-पूँजी लुटाकर कंगाल हो जाना पड़े। प्रत्येक व्यक्ति जैसा होता है, विश्व ब्रह्माण्ड की वैसी ही सूक्ष्म धारा के प्रवाह से अनायास ही जुड़ जाता है। और अपने चुम्बकत्व को बढ़ाता रहता है॥
जड़ अणुओं का गति से एक तरह की विद्युत उत्पन्न होती हैं। उसमें चेतना सत्ता का समावेश होने पर जीवन का -जीवधारियों का आविर्भाव होता है। ध्रुवीय क्षेत्रों में उठने वाले चुम्बकीय तूफानों का प्रकाश ‘अरोरा बोरीलिस’ तेजोवलय के रूप में छाया रहता है। पृथ्वी के अन्य ग्रहों से संयोग की हलचलों का यह स्वरूप संकेत हैं। समुद्र का खारा जल नौकाओं , जलयानों से टकराने पर विद्युत तरंगें पैदा करता है।
मानवीय शरीरगत जीवाणु भी ईथर एवं वायुमण्डल में भरें विद्युत प्रवाह से टकराकर विद्युत ऊर्जा उत्पन्न करते हैं जीवकोषों में पर्याप्त मात्रा में विद्यमान विभिन्न रसायन तथा धातुएँ इन आघातों से उत्तेजित हो विद्युत प्रवाह पैदा करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में ऊष्मा तो होती ही हैं। विभिन्न स्तरों की विद्युत धाराएँ भी होती हैं। अब तो इन्हें यन्त्रों द्वारा भली-भाँति देखा, परखा जाने लगा हैं। उत्पन्न विद्युत ऊर्जाओं को प्रकाश-वलय प्रत्येक व्यक्तित्व के चतुर्दिक् व्यास रहता है, ध्रुवीय क्षेत्रों में चुम्बकीय तूफानों से उत्पन्न -अरोरा बोरीलिस ‘ की ही तरह। यह प्रकाश-वलय आन्तरिक चुम्बकत्व व विद्युत प्रवाहों के अनुरूप भिन्न-भिन्न होता है। तत्त्वदर्शी मनीषी किसी व्यक्ति के चतुर्दिक् व्याप्त इसी तेजोवलय से उसका आन्तरिक चेतना स्तर व अन्तःकरण की प्रवृत्तियाँ भाँप लेती हैं
तपस्वी तेजस्वी बनता है। तपस्या का उद्देश्य तेजस्विता उत्पन्न करना हैं यहाँ किसी को चेहरे की चमक के साथ इस आत्मिक आलोक की संगति नहीं जोड़नी चाहिए। स्वास्थ्य और सौंदर्य शारीरिक विशेषताएँ हैं। नव-यौवन में सभी के चेहरे चमकते हैं। प्रौढ़ता के साथ रुक्षता आती हैं और क्यों वृद्ध होने पर चेहरे पर तथा अन्यत्र झुर्रियाँ पड़ने लगती हैं। इसी मौसमी परिवर्तन नापी जाने लगी तब तो अनर्थ उत्पन्न हुआ ही समझा जायेगा। ब्रह्मा तेजस् का रूप समझने के लिए संकल्प, धैर्य ,दृढ़ता, श्रद्धा, निर्धनता, चरित्र, साहस, निश्चय जैसे गणों को टटोलना पड़ेगा और देखना होगा कि भय ओर प्रलोभनों को छोड़कर -लोकमान्यता एवं आग्रहों की उपेक्षा करने मनुष्य किस सीमा तक सत्य का आग्रही होने और उसे अपनाने के लिए तैयार हो सका।
महा मानवों का उदात्त विनियोग, समर्थों का वैभव पुरुषार्थियों का पराक्रम, नैष्ठिक का चरित्र हम ब्रह्मतेजस् के रूप में देख सकते हैं। ईश्वर भक्ति इसी अक्षय वट के नीचे बैठकर होती हैं। आत्म-साक्षात्कार और ब्रह्म-साक्षात्कार का प्रयोजन पूरा करने के लिए हमें इसी उपार्जन को सुदामा की पोटली की तरह-शबरी के बेरों की तरह-गोपियों की छाछ की तरह सँजोना पड़ता है।
शारीरिक और मानसिक रोगों की शृंखला में इन दिनों जिस भयंकर व्यथा की अभिवृद्धि हैं वह हैं- तनाव हम में से अधिकाँश व्यक्ति मानसिक तनाव से पीड़ित रहते हैं।, और उसी दबाव से अशान्त एवं विक्षुब्ध मनःस्थिति में समय गुजारते हैं। यह एक प्रकार का मानसिक ज्वर हैं। ज्वर-पीड़ितों को कितनी शक्ति उस व्यथा को सहन करने तथा निपटने में खर्च करनी पड़ती हैं, यह किसी से छिपा नहीं हैं। मानसिक तनाव से भी प्रायः उसी स्तर की क्षति होती हैं। जीवन रक्षा के लिए प्रकृति ने हमारे भीतर एक ऐसी विशेष-व्यवस्था बना रखी हैं, जो प्रतिकूलताओं से निपटने के लिए शारीरिक सक्रियता एवं मानसिक स्फूर्ति के रूप में काम करती हैं और उपलब्धों को एकत्रित करके आगत संकट का सामना करने के लिए जुट जाती हैं। इसे अनुकूल प्रणाली कहते हैं। उस ऊर्जा के सहारे ही मानवी क्षमता की रक्षा होती हैं और उसे महत्त्वपूर्ण प्रयोजनों में संलग्न करके उच्चस्तरीय सफलताएँ प्राप्त करना सम्भव होता है। यह अनुकूलन ऊर्जा तनाव जैसी प्रतिकूलताओं से निपटने में अत्यधिक क्षीण होती चली जाती हैं और अन्ततः विक्षुब्ध मनुष्य उन्मादियों और दरिद्रों की तरह मौत के दिन पूरे करता है।
यों इस व्यस्तता के युग में तृष्णा और वासना की अतृप्त आकाँक्षाएँ, जटिल परिस्थितियाँ आर्थिक कठिनाइयाँ पारिवारिक कलह, प्रति-स्पर्धा सामाजिक विकृतियाँ छल प्रपंच, दुष्ट दुर्व्यवहार जैसे संक्षोभ उत्पन्न करने वाले कारण भी बढ़े हैं। उनने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को दुर्बल किया हैं। इतने पर भी यह कहा जा सकता है कि तनाव जैसी भयंकर विपत्ति का प्रधान कारण चिन्तन में अधीरता, उत्तेजना एवं भ्रान्तियों का भर जाना ही सबसे बड़ा कारण हैं। स्पष्ट हैं कि तनावग्रस्त मनुष्य उन समस्याओं के समाधान में अपंग, असमर्थ सिद्ध होता है, जिन्हें इस दबाव का कारण समझा और माना जाता है। उलटे अति महत्त्वपूर्ण जीवन रस उसी व्यर्थ की उलझन को समेटने में नष्ट होता चला जाता है, जिसे प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए आवश्यक साधन के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता था। तनाव स्वाभाविक कम और अस्वाभाविक अधिक हैं। उसे प्राकृतिक कम और कृत्रिम अधिक कह सकते हैं। कठिनाइयों से रहित किसी का भी जीवन नहीं। उलझनें जिसमें हों ही नहीं ऐसी जिन्दगी पत्थर की तो हो भी सकती हैं, पर जीवधारी उनसे बचा नहीं रह सकता। बुद्धिमान अवरोधों से हँसते-खेलते जूझते रहते हैं, जो नहीं हट सकते उन्हें सहन करते और तालमेल बिठाते हैं। इसके विपरीत अधीर लोग तनिक सी बात पर तुनकते और सन्तुलन बिगाड़ते देखे जाते हैं। इसी गड़बड़ी का नाम तनाव हैं।
तनाव के कारण भिन्न-भिन्न हो सकता है। लेकिन व्यक्ति मन पर उसकी जो प्रतिक्रिया होती हैं, वह जीव रासायनिक दृष्टि से एक-सी ही होती हैं, फिर वह ठंड, भूख या अत्यधिक थकाऊ शारीरिक श्रम जैसे शारीरिक दबावों से उपजा तनाव हो, किसी बीमारी के कारण हो अथवा मनोवैज्ञानिक तनाव हों।
कनाडा के प्रख्यात शरीर वैज्ञानिक हैं एक थी हंससेल्ये। इन्होंने कई वर्षों तक तनावों और उससे सम्बन्धित समस्याओं का गम्भीर अध्ययन किया हैं। उनका कहना हैं। कि एक व्यापारी जब व्यापार सम्बन्धी विचार तथा कार्य करता है। और योजनाएँ बनाता है, अथवा एक खिलाड़ी खेल में भाग लेता है और खेल के प्रति सतर्क रहता है अथवा एक वैज्ञानिक जब वैज्ञानिक समस्या से जूझता है, परिकल्पना और प्रयोग करता है, तब इन सभी की बाह्य परिस्थितियाँ यद्यपि भिन्न-भिन्न होती हैं, किन्तु इन क्रियाओं के कारण लोगों को जो अतिरिक्त मानसिक और शारीरिक प्रयास करना होता है, उससे भीतर जो प्रतिक्रियाएँ पैदा होती हैं, उनका शरीर वैज्ञानिक रूप एक-सा होता है। इन सभी लोगों की अधिवृक्क ग्रन्थि कार्टेक्स अधिक सक्रिय हो जाती है, रक्त से हारमोन अधिक स्रावित होने लगते हैं और छाती की इन्डोक्रीन ग्रन्थि, जिसे ‘थाइमस’ कहते हैं, सिकुड़ जाती है।
इन क्रियाओं में फर्क इस बात से नहीं पड़ता कि तनाव किस कारण पड़ रहा हैं- वैज्ञानिक क्रिया-कलाप से या कि व्यापारिक गतिविधि से या क्रीड़ा-स्पर्धा से या कि किसी अन्य कारण से।
तब क्या सदा बिलकुल एक-सी ही प्रतिक्रिया होती हैं? प्रतिक्रियाएँ तो एक तरह की ही होती हैं, पर तनाव की तीव्रता के अनुसार उनमें भिन्नताएँ होती हैं। यानी यदि तनाव अधिक तीव्र हुआ तो यही क्रियाएँ-कार्टेक्स की सक्रियता, हारमोनों का स्रवण और थाइमस का सिकुड़ना-अधिक तेज हो जायेंगी; कम तनाव हुआ तो कम हो जायेंगी।
आज के उत्तेजक वातावरण में हमें अत्यधिक तनाव का सामना करना पड़ता है और इसलिए अनुकूलन-ईंधन की हमारी आन्तरिक माँग अत्यधिक बढ़ गई है।
अत्यधिक तनाव की स्थिति में शरीर की अनुकूलन-प्रणाली संकट का संकेत पाकर तेजी से क्रियाशील हो उठती है और पूरी शक्ति से संकटग्रस्त मोर्चे पर डट जाती है। सेल्ये का कहना है कि यही कारण है कि विशेष संकट के समय कई व्यक्ति असाधारण काम कर डालते हैं। जैसे प्राण संकट में पड़ने पर भागने की जरूरत होने पर, लम्बी कूद का कभी भी अभ्यास न करने वाला व्यक्ति कोई काफी चौड़ी खाई पार कर जाये, अथवा कोई वैज्ञानिक किसी असाध्य सी समस्या का समाधान पा जाये।
लेकिन ऐसी स्थिति में, जबकि सम्पूर्ण अनुकूलन-ऊर्जा मुख्य मोर्चे पर डटी हो, तो शेष हिस्से में अनुकूलन-क्रियाएँ शिथिल पड़ जाती हैं, इससे भीतरी अंगों की सामान्य कार्य क्षमता पर प्रभाव पड़ता है। इसी का नाम थकान है। अधिक तनाव से थकान आने की यही प्रक्रिया है। थकान से शरीर की विभिन्न माँस-पेशियों की कार्य क्षमता घट जाती है, क्योंकि उन्हें पर्याप्त अनुकूलन-ऊर्जा नहीं मिल पाती। इसका शरीर पर अवश्यम्भावी परिणाम होता है।
जैसे कि तेज मानसिक थकान से हृदय के पेशियों वाले भाग ‘मायोकार्डियम’ में स्नायविक सन्तुलन बिगड़ जाता है; इससे जैव-रासायनिक परिवर्तन होते हैं और रक्त के आवागमन नियन्त्रण में बाधा पहुँचती हैं।
कई बार आग से व्यक्ति की चमड़ी बहुत जल जाती है। ऐसे कई लोगों की डाक्टरी जाँच किए जाने पर उनके पेट में तथा आँतों में छाले पाये गये। इसका कारण भी यही है कि उनकी कुल अनुकूलन-ऊर्जा जले हुए स्थानों की मरम्मत में लग जाती है। तब पाचन-क्रिया की ‘होमोस्टेटिक’ नियन्त्रण प्रणाली को जितनी अनुकूलन-ऊर्जा चाहिए, वह नहीं मिल पाती। लम्बे समय तक इस कमी से पेट और आँतों में छाले पड़ जाते हैं।
हंससेल्ये ने एक और महत्त्वपूर्ण तथ्य गिनाया है। यदि दिनोंदिन जीवन में तनाव अधिकाधिक बढ़ता जाये, तो हमारी अनुकूलन-ऊर्जा भी अधिकाधिक खर्च होती हैं। प्रकृति बनिया है और उसने एक निश्चित मात्रा में ही हर व्यक्ति को अनुकूलन-ऊर्जा का भण्डार सौंपा है। यदि हमने उस भण्डार को तेज गति से लुटाया, तो उतनी ही तेजी से हमारा सन्तुलन डिगता जाएगा और हम भयानक बीमारियों की चपेट में आते जाएँगे। आधुनिक समाज-जीवन में ये भयानक रोग भयानक-गति से बढ़ रहे हैं- ये हैं हृदयरोग, कैंसर, मादक द्रव्यों का व्यसन, आतंककारी गतिविधियाँ-मारपीट आत्महत्याएँ, और तरह-तरह की रहस्यमयी बीमारियाँ। ये रोग औद्योगिक रूप से विकसित देशों में बेतहाशा बढ़ रहे हैं। हंससेल्ये इन्हें “अनुकूलन के रोग” कहते हैं।
मानसिक थकान की समस्याओं पर वर्षों अनुसंधान करने वाले रूसी चिकित्सक इवान सेम्योनोविक खोरोल ने आधुनिक सभ्य समाज के लोगों की एक नौका-दौड़ में जुटे नाविकों की संज्ञा दी है, जो पूरी ताकत के साथ नाव खे रहे हैं- तेज और तेज। नाव निश्चित ही आगे बढ़ रही है, पर नाविकों की भीतरी ऊर्जा निचुड़ती जा रही है, निचुड़ चुकी है।
शारीरिक थकान में वस्तुतः माँस-पेशियों के अतिरिक्त खिंचवा में ऊर्जा खर्च होती है। यह ऊर्जा माँस-पेशियों में रहने वाले ‘ग्लूकोनेट’ से मिलती है। यह ‘ग्लूकोनेट’ माँस-पेशियों की क्रियाशीलता के समय आक्सीजन के साथ संयोग करता है और लैक्टिक-एसिड तथा कार्बन-डाई-आक्साइड गैस बनाता है। इसीलिए शारीरिक श्रम में अधिकाधिक आक्सीजन खर्च होती है, जिसके लिए तेज साँस जरूरी होती है।
इसी तरह कार्बन-डाई-आक्साइड तो साँस द्वारा बाहर चली जाती हैं, पर लैक्टिक-एसिड को ग्लूकोनेट में पुनः बदलने के लिए भी आक्सीजन चाहिए। हमारे अधिकाँश तनाव मानसिक होते हैं, जिन्हें हम स्वयं पैदा करते और आमन्त्रित करते हैं। इन तनावों के तीन मुख्य प्रकार हैं- (1) पहला है अनावश्यक आवेगमयता आज के जीवन में व्यर्थ की हड़बड़ी और अत्यधिक भाग-दौड़ (2) दूसरी प्रकार है प्रारम्भिक पालन-पोषण एवं शिक्षा के दौरान विकसित एवं प्रकल्पित आदर्शों से वास्तविक जीवन का अन्तर होने पर दैनिक जीवन में पैदा होने वाले तनाव। (3) तीसरे किस्म के तनाव उपभोगों की दौड़ में अपने पिछड़े होने की अहिर्निशि चिन्ता की उपज है।
पहले किस्म के तनावों के सन्दर्भ में हमें हंससेल्ये की यह बात भी याद करनी होगी कि एक पीड़ादायक प्रहार और एक वासनात्मक आवेग से भरपूर चुम्बन दोनों बराबर का तनाव पैदा कर सकते हैं।
इस तनाव से बचने का हंससेल्ये की दृष्टि में कोई उपाय नहीं। पर स्पष्ट है कि आवेश और असंयम के स्थान पर विवेक और संयम का दैनिक जीवन में समावेश होने पर इन तनावों में भारी कमी हो सकती है।
दूसरे प्रकार के तनावों ( जो आदर्श और वास्तविकता के बीच के अन्तर को देखकर पैदा होते हैं) को कम करने के लिए इवान खोरोल दो उपाय गिनाते हैं- (पहले और तीसरे किस्म के तनावों की बाबत खोरोल अथवा हंस सेल्ये ने कोई उपाय नहीं बताया है।)
तनाव से बचने का सरल तरीका यह है कि वास्तविकता को आदर्शों के अनुकूल ढालने के लिए संघर्ष किया जाय। हमारा जीवन कृत्रिमता, दंभ, छल, शेखीखोरी जैसे बड़प्पन प्रदर्शनों में तथा छल-प्रपंच शोषण, उत्पीड़न जैसे क्रूर-कर्मों में न लगे। भीतर और बाहर से सज्जनता ही जीवन-नीति बनकर रहे।
मनुष्य अपने आदर्शों को वास्तविकताओं के अनुरूप बदल दें। यह रास्ता ऊपर से सरल प्रतीत होता है, लेकिन व्यक्ति जब एक के बाद एक अपने आदर्शों तथा नैतिक सिद्धान्तों से पीछे हटता है, तो ऐसे हर समझौते में भी उसकी अनुकूलन-ऊर्जा खर्च होती है। मानव जीवन के अधिकाँश तनाव ईर्ष्याजन्य होते हैं। अभावग्रस्तता की कल्पना करके कितने ही लोग दुःखी और उद्विग्न रहते हैं। अपने इन कथित अभावों से हर व्यक्ति आकुल और अशाँत है। उपभोगों के साधनों की पड़ोसी के पास अधिकता से पता नहीं कितनों का खाना, सोना हराम रहता है।
ये तनाव जितने जटिल और भयंकर हैं, समाधान उतना ही छोटा व सहज है। वह है मात्र दृष्टिकोण परिवर्तन, विचार शैली को बदल देना। औरों की तुलना में अपने अभावों का स्मरण आते ही अपने से भी अधिक अभावग्रस्तों की ओर ध्यान ले जाया जाये, तो बदली स्थिति में अपने को प्राप्त वैभव बहुत अधिक तथा अभाव अत्यल्प प्रतीत होंगे। तब अपनी साधनहीनता के प्रति आत्म-हत्या के स्थान पर अपनी सम्पदाओं के सदुपयोग की सतर्कता की आत्म-चेतना का उदय होगा।
कठिनाइयों से जूझते-जूझते कभी असहायता की अनुभूति हो तो प्रचण्ड पुरुषार्थियों का स्मरण सहायक होता है। मिल्टन अन्धा था, पर महाकवि के रूप में आज विश्व प्रसिद्ध है। महानतम संगीतकारों में से एक बीथो-वेन बहरा था, आज भी वह अमर संगीत-धुनों का अनूठा सृष्टा माना जाता है। ऐसे असंख्य उदाहरण इतिहास तथा समाज में सर्वत्र बिखरे पड़े हैं।
क्या अधिक श्रम और सतत् संघर्ष से सदा अनुकूलन ऊर्जा का अधिक व्यय ही होता है? तब ऐतिहासिक महामानव जो कि शरीर-विज्ञान की दृष्टि से सामान्य मानवों जितनी ही अनुकूलन-ऊर्जा से सम्पन्न होते हैं, संघर्षों के प्रबल थपेड़ों को सहते तथा प्रतिकूलताओं के झंझावात झेलते हुए भी सदा प्रफुल्ल-प्रसन्न क्यों रहते हैं?
इस प्रश्न का उत्तर प्रख्यात रूसी शरीर विज्ञानी इवान पवलोव की स्थापना से मिल सकता है। पवलोव के अनुसार “लक्ष्य की प्रतिक्रिया किसी व्यक्ति की अत्यावश्यक स्फूर्ति का मूल रूप है।”
इसका यह अर्थ कि जिन प्रतिभाशाली नर-नारियों में लक्ष्य की प्रतिक्रिया असाधारण बौद्धिक क्रियाशीलता के रूप में होती है, जो लोग अपने आदर्शों के लिए असामान्य बौद्धिक सक्रियता से गतिशील रहते हैं, उनमें प्रखर स्फूर्ति होती है और यह स्फूर्ति अनुकूलन-प्रणाली के अनुकूल होती है। इसलिए ऐसे लोगों में असाधारण क्रियाशीलता से भी तनाव नहीं पैदा होता, बल्कि स्फूर्ति ही रहती है। तनाव न पैदा होने से अनुकूलन-ऊर्जा का अनावश्यक उपभोग नहीं होता।
आजकल वैज्ञानिक खोजों का क्षेत्र भी बढ़ा है और अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिक की संख्या भी बढ़ी है। वैज्ञानिकों की संख्या अधिक ही बढ़ी है। इस प्रकार जो खोजें हो रही हैं, वे सामूहिक कार्यों का परिणाम हैं। नूतन ज्ञान-भण्डार में प्रति व्यक्ति योगदान का औसत पहले से लगातार कम होता जा रहा है। ऐसा विशेषज्ञों का कहना है। इसका कारण वे यह बताते हैं कि वैसे असाधारण प्रतिभाशाली नर-नारी इन दिनों अपेक्षाकृत कम हो रहे हैं, जिनमें अपने लक्ष्य के प्रति प्रचण्ड उत्साह और उसके कारण प्रखर आन्तरिक स्फूर्ति से काम करने वाले लोगों की संख्या बढ़ जाए तो प्रति व्यक्ति योगदान का औसत भी बढ़ जाएगा और खोजों का विस्तार-क्षेत्र तब बहुत अधिक बढ़ जाएगा। मानविकी विद्याओं के अन्य क्षेत्रों में भी यही स्थिति है।
प्रगति के नाम पर हम अनेक क्षेत्रों में इन दिनों आगे बढ़े हैं, पर आदर्शवादी प्रतिभाओं की दृष्टि से मानव समाज दिन-दिन अधिक दरिद्र होता चला जा रहा है। इसका एक बड़ा कारण है- हमारा भोगवादी, स्वार्थरत एवं आदर्श विहीन दृष्टिकोण। इसके कारण मनुष्य की सारी क्षमता आकर्षक किन्तु पतनोन्मुख प्रयोजनों में लगी रहती है स्पष्ट है कि ओछे स्तर का जीवन-क्रम अन्तःक्षेत्र विविध-विधि विक्षोभ उत्पन्न करता है। उसकी प्रतिक्रिया से निपटने में ही वह जीवन-रस सूख जाता है, जिसके सहारे महामानव ऊँचे उठने और आगे बढ़ने में समर्थ हुए हैं। तनाव हमारे जीवन को नीरस, जटिल और स्वल्प बनाता है। ऐसी स्थिति में कोई बड़ी सफलता पा सकना तो दूर उलटे तनाव का दबाव ही आधि-व्याधिग्रस्त दीन-दुःखी लोगों की तरह-रोते कलपते दिन गुजारने के लिए विवश करता है।
मोटेतौर से आँखों का पथरा जाना, शरीर का ठण्डा पड़ जाना, नब्ज़ बन्द हो जाना, साँस रुक जाना, किसी को मृतक घोषित करने के लिए पर्याप्त माना जाता रहा है। यह सारे चिन्ह हृदय की गति बन्द हो जाने के है। अस्तु मृत्यु और हृदय की निष्क्रियता को पर्यायवाची समझा जाता था।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के तत्वावधान में शरीर विशेषज्ञों की एक गोष्ठी हुई जिसमें मृत्यु की व्याख्या करने को कहा गया। लम्बे विचार-विमर्श के बाद हृदय के साथ जुड़े हुए मृत्यु सम्बन्ध को निरस्त करके उसे मस्तिष्क के साथ जोड़ा गया और कहा गया कि- मस्तिष्क का पूरी तरह निष्क्रिय हो जाना, उसका शेष शरीर से सम्बन्ध अट जाना, माँस-पेशियों का निश्चेष्ट हो जाना, रक्त का दाब शून्य हो जाना और श्वाँस लेने में असमर्थ हो जाना मृत्यु का चिन्ह है।”
इस परिमाण में मानवी सत्ता का केन्द्र मस्तिष्क को घोषित किया है। हृदय की धड़कन बन्द हो जाने पर भी यदि मस्तिष्क सक्रिय हो तो उसे मृत्यु नहीं जीवित ही माना जायेगा।
तीन शरीरों का संवर्धन, पंचकोशों का आवनावरण एवं कुण्डलिनी जागरण
ब्रह्म वर्चस् प्रशिक्षण साधना प्रधान है। पिछले पाँच वर्षों में जीवन-साधना सत्र चले थे। उसके बहिरंग जीवन के परिशोधन को प्रधानता दी गई थी। भूमि को जोत कर खाद पानी देकर उपजाऊ बनाने का प्रयत्न किया जाता है। बीज बोने और फसल उगाने का अध्याय इसके बाद ही आरम्भ होता है। बहिरंग में-व्यवहार में-अध्यात्म तत्त्व का प्रवेश सरल भी है और आवश्यक भी। उसके प्रत्येक लाभ मिलते हैं। सुखी और समुन्नत बनने के लिए जीवन व्यवहार में अध्यात्मवादी आदर्शों का समावेश आवश्यक है। गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता अपनाये बिना शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक क्षेत्र में समृद्ध बन सकना सम्भव नहीं हो सकता। लूट-खसोट की वस्तुएँ ठहरती नहीं, ठहरती है तो सर्वनाश करती हुई विदा होती है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए गत पाँच वर्षों में जीवन-साधना का ‘प्रकाश’ प्रशिक्षण दिया जाता रहा है। शान्ति-कुंज के पिछले सत्र इसी प्रयोजन के लिए चलते रहे हैं।
अब द्वितीय पंच वर्षीय प्रशिक्षण प्रक्रिया ‘ब्रह्म वर्चस्’ नाम से आरम्भ होती है। इसे प्रशिक्षण का दूसरा-अध्याय कहना चाहिए। यह ‘प्रेरणा’ प्रधान रहेंगे। प्रकाश का अर्थ है- मार्ग-दर्शन प्रेरणा के पीछे ‘अनुदान’ जुड़ा रहते हैं। बहिरंग जीवन को सुविकसित बनाने का मार्ग जान लेने के उपरान्त ही अन्तरंग को परिष्कृत एवं समुन्नत बनाने का कार्य हाथ में लेना उचित था। सो ही किया भी गया है।
बसन्त पर्व 77 से आगे के सभी सत्रों को ब्रह्म वर्चस् स्तर का कहा जायेगा। यह दस-दस दिवसीय रहेंगे। जिन्हें अवकाश अधिक है और शान्ति-कुँज के तत्वावधान से अपनी साधनाएं अधिक समय चलाना चाहते हैं। उनकी इच्छा एवं सुविधा के अनुरूप वैसा प्रबन्ध विशेष रूप से कर दिया जाया करेगा। महिलाओं के दस-दस दिवसीय सत्र साथ ही चला करेंगे। वे प्रातः काल के ध्यान और मध्याह्न प्रवचन में तो सम्मिलित हो सकेंगी, पर शेष समय उनकी अतिरिक्त कक्षाएँ गृह-लक्ष्मी एवं नारी जागरण के लिए सेवा-साधना करने की योग्यता बढ़ाने की दृष्टि से चला करेंगी। एक-एक महीने के वानप्रस्थ सत्रों में भी अब ‘ब्रह्म वर्चस्’ साधना का समावेश रहा करेगा। साथ ही एक महीने के महिला सत्रों के ध्यान प्रवचन के अतिरिक्त वे भी महिला समस्याओं के संबंधित अतिरिक्त कक्षाओं में शिक्षा प्राप्त करेंगी।
‘ब्रह्म वर्चस’ साधना सत्रों के तीन आधार है- (1) स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर में छाई, तन्द्रा का निवारण और जागृति का प्रखरता का अभिवर्धन (2) अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोशों का अनावरण करने वाली गायत्री की उच्चस्तरीय पंचमुखी-पंचकोशी साधना (3) कुण्डलिनी जागरण की अन्त ऊर्जा का उभार। ओजस् तेजस् एवं आत्मबल का प्रचण्ड उन्नयन। साधना में इन्हीं तीन तत्त्वों का सन्तुलन समावेश रखा गया है।
तीन शरीरों के प्रखरता का अभिवर्धन-
स्थूल शरीर यह है जो आँखों से दीखता है। चलता फिरता, सोता-खाता और काम करता है। इसकी मान्य गतिविधियाँ सर्वविदित है। जीवन-यात्रा के नित्यकर्म ज्ञानेन्द्रियाँ द्वारा-विविध अनुभूतियों, क्रिया-कलाप द्वारा- अभीष्ट सफलताओं का उपार्जन-इन तीन कृत्यों में यह देह लगी रहती है। पेट की भूख और यौनाकर्षण की की उमंग यह दो प्रेरणाएँ ऐसी हैं जिनके लिए शरीर की सामान्य गतिविधियाँ चलती रहती है। इस चक्र में परिभ्रमण करते हुए सामान्य मनुष्यों का जन्म बीतता है।
सूक्ष्म शरीर का केन्द्र मस्तिष्क है। मन, बुद्धि, चित्त अहंकार की विभिन्न गतिविधियाँ इसमें चलती रहती है। कल्पना, विचारणा, पक्ष-विपक्ष के तर्क-वितर्क अनुभव, निष्कर्ष, निर्णय आदि का निर्धारण इसी क्षेत्र में होता है।
मूर्खता चतुरता के केन्द्र यही है। शिक्षा का प्रभाव इसी पर पड़ता है। आदतें यहीं जमी रहती है। ज्ञान की विभिन्न भूमिकाओं का संग्रह इसी में रहता है। स्वप्न यही देखता। मरने के बाद भूत-प्रेत की योनि में आत्मा का यही कलेवर जीवन रहता है।
कारण शरीर में भावनाएँ, आस्थाएँ, आकांक्षाएँ, मान्यताएँ रहती है। व्यक्तित्व का उद्गम केन्द्र यही है। दिशा धाराएँ यही से उद्भूत होती है। विचारणाओं, क्रियाओं की हलचलें यही के निर्देश पर निर्धारित होती है। उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की- पतन और पराभव की- भली-बुरी आस्थाएँ इसी में जड़ जमाये रहती है। आध्यात्मिक उत्कर्ष इसी परत का होता है। महानात्मा, देवात्मा एवं परमात्मा का स्तर मनुष्य इसी क्षेत्र को विकसित करने पर प्राप्त करता है। वेदान्त में आत्मा को ही परमात्मा कहा गया है यह इसी स्तर की परिष्कृत स्थिति की व्याख्या है। स्वर्ग मुक्ति, सिद्धि, ईश्वर प्राप्ति जैसी दिव्य विभूतियों का भण्डागार यही है और इसी केन्द्र से उन्हें उपलब्ध किया जाता है। सामान्य स्थिति में यह केन्द्र वासना, तृष्णा और अहंता के कषाय-कल्मषों से आच्छादित रहता है। प्राणी उन्हीं की मृग-तृष्णा में भटकता रहता है। उद्वेग और विक्षोभ यहीं उठते हैं। यदि इसी क्षेत्र को परिष्कृत कर लिया जाए तो तत्वदर्शी स्थितिप्रज्ञ परमहंस एवं जीवन मुक्त की दिव्य स्थिति इसी जन्म में प्राप्त हो जाती है।
सामान्यतया यह तीनों शरीर साँसारिक माया-मोह के जंजाल में फँसे रहते हैं। व्यर्थ, अनर्थ करते और शोक−सन्ताप सहते हैं। इन तीनों के भीतर एक से एक बढ़ी-चढ़ी दिव्य क्षमताएँ विद्यमान है। पर वे प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती है। यदि उन्हें जगाया जा सके तो सत्प्रवृत्तियाँ, सद्विचारणाएँ और सद्भावनाएँ उभरती है। फलस्वरूप व्यक्तित्व देवोपम बनता चला जाता है। सामान्य परिस्थितियों में रहते हुये भी अन्त चेतना परिष्कृत होने के कारण स्वर्गीय अनुभूतियों का आनन्द मिलने लगता है। गायत्री को त्रिपदा कहा गया हैं तीनों शरीरों की जागृति में वह तीन पदों या तीन चरण देखे जा सकते हैं। भूर्भुवः स्वः की तीन व्याहृतियाँ भी तीनों शरीर के परिष्कार की और इंगित करती है।
पाँच कोशों का अनावरण-
गायत्री के पाँच मुख की चित्रित किये गये हैं। यह पाँच मुख अन्त चेतना पर चढ़े हुए पाँच आवरण हैं जिन्हें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोश कहा जाता है। जमीन खोदने पर ‘बहुमूल्य खनिज मिलते हैं। समुद्र में डुबकी लगाकर खोजने से मणि मुक्तकों की रत्न राशि मिलती है। जीवात्मा के साथ परमपिता ने बहुमूल्य खजाने सँजोकर रखे हैं, वे उपरोक्त तिजोरियों में बन्द है। यदि इन्हें खोलना आ सके तो एक व्यक्ति अपने पाँच स्तरों को पाँच देवताओं की तरह सहायता करते और सिद्धियाँ देते हुए अनुभव कर सकता है।
षट्चक्र वेधन से ऋद्धि-सिद्धियों के चमत्कारी प्रतिफल मिलने की फल श्रुति शास्त्रकारों ने बताई है। इसमें से एक चक्र ‘मूलाधार’ तो कुण्डलिनी शक्ति का उद्गम केन्द्र है। उसकी साधना स्वतन्त्र रखी गई है। शेष पाँच चक्रों को पाँच कोशों का केन्द्र कहा जाता है इन कोशों का ध्यान पद्धति से ‘अनावरण’ ही हठयोग ग्रन्थ से हठयोग पद्धति में “चक्र वेधन” बताया गया है। अन्नमय कोश को केन्द्र ‘स्वाधिष्ठान’ चक्र-प्राणमय कोश का मणिपुर-मनोमय कोश का अनाहत-विज्ञानमय कोश का विशुद्धि और आनंदमय कोश का केन्द्र सहस्रार चक्र हैं इनका अनावरण वेधन या जागरण होने पर वे दिव्य क्षमताएँ जागृत होती है। वह होती तो प्रत्येक मनुष्य में हैं, पर प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहने के कारण वह अपने को दीन-दरिद्र अनुभव करता रहता है। इस कोश अनावरण को ही ‘आत्म जागृति’ नाम दिया गया है। आत्मबोध होने पर इस जगत के सारे रहस्य खुल जाते हैं। तदुपरान्त और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता।
कुण्डलिनी जागरण-
हठयोग के माध्यम से प्रायः कुण्डलिनी जागरण के प्रयोग चलते हैं। नेति, धौति, नौलि, वस्ति, वज्रोली, कपालभाति क्रियाओं द्वारा नाड़ी शोधन और विशिष्ट प्राणायामों एवं बंध मुद्राओं द्वारा हठयोगी कुण्डलिनी जागरण करते हैं। मल-मूत्र छिद्रों के मध्य में मूलाधार चक्र अवस्थित कुण्डलिनी शक्ति जब जगाती है, तब सर्पिणी की तरह फुफकारती हुई और अग्नि लपटों की तरह लपलपाती दीखती है। उसके आकस्मिक जागरण के सहन न कर पाने पर कई हठयोगी साधक खतरा भी उठाते हैं। अपनी ध्यानयोग पद्धति में सब कुछ सौम्य है। उसमें बाल-वृद्ध सभी के लिए समान रूप से सरलता एवं किसी प्रकार के विग्रह, उपद्रव की पूर्णतया सुरक्षा है।
मूलाधार चक्र को अग्नि कुण्ड माना गया है उसमें एक त्रिकोण अणु है, जिसे कूर्म रूप में चिह्नित किया गया है। समुद्र मन्थन की कथा मूलाधार चक्र की स्थिति का ही अलंकारिक चित्रण है। पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मन्थन देव-दैत्य सहयोग से सम्भव हुआ था। कूर्म भगवान आधारशिला ड़ड़ड़ड़ थे। मदिराचल पर्वत की मंथनी रई बनाई गई थी। वासुकि सर्प की रस्सी थी इस मन्थन के फलस्वरूप 14 दिव्य रत्न निकले थे। यह मूलाधार स्थिति अन्तःऊर्जा-कुण्डलिनी कुण्ड समुद्र हुआ। उसका आधार त्रिकोण अणु-कूर्म कच्छप है। यह ब्रह्म सत्ता है। मदिराचल प्रकृति वैभव का प्रतीक। सर्प है जीव। ईश्वर प्रकृति और जीव का समन्वय सम्पर्क जिस केन्द्र में रहता है, जिसमें ऊर्जा और सम्पदा का भण्डार भरा पड़ा है वह उसी स्थान का सूक्ष्म समुद्र है। देव आत्मिक और दैत्य भौतिक शक्तियाँ है। भावनात्मक और क्रियात्मक प्रयोगों के सम्मिलित प्रयत्न में ही यह समुद्र मन्थन की कुण्डलिनी जागरण कि क्रिया-प्रक्रिया सम्पन्न होती है। इसी प्रयास से सर्वतोमुखी प्रगति में सहायता करने वाली विभूतियाँ उपलब्ध होती है जैसी कि लक्ष्मी, अमृत-कलश कौस्तुभ मणि, धन्वन्तरि, सूर्य, चन्द्र आदि के रूप में पौराणिक कथाकारों ने आलंकारिक चित्रण किया है।
गायत्री मंत्र के वामपक्षी प्रयोगों में ब्रह्मस्त्र, ब्रह्मदन्ड ब्रह्मबल आदि शब्दों का प्रयोग हुआ है। यह कुण्डलिनी जागरण से उत्पन्न प्रचण्ड ऊर्जा के उस भाग का वर्णन है, जो जीव और जगत् को प्रभावित करता है, जिसमें शाप-वरदान देने की सामर्थ्य सन्निहित रहती है। सामान्यतया मनुष्य की सामर्थ्य मूलाधार में सन्निहित क्रीड़ा कामुकता की लिप्सा लालसा में ही भटकती नष्ट होती रहती है। यह शक्ति का अधःपतन-वासनात्मक क्षरण है। वासना को कामना, अभिरुचि एवं आकाँक्षा को अर्धगामी बनाना कुण्डलिनी जागरण है। मस्तिष्क को ब्रह्म लोक कहा गया है। पतनोन्मुख-लिप्सा निरत अन्तःऊर्जा को सद्भावों के सोमरस तक-उत्कृष्ट चिन्तन तक पहुँचा दिया जाय तो मनुष्य जीवन की सार्थकता के समस्त आधार बन जाते हैं। कुण्डलिनी जागरण साधना से आत्मा को ऊर्ध्वगामी बनाने वाली प्रबल प्रेरणा मिलती है। यदि इस उद्भव को चिरस्थायी बनाया जा सके और सदुपयोग हो सके तो समझना चाहिए कि साधना कि सिद्धि मिलने का उद्देश्य प्रत्यक्ष रूप से पूर्ण हो गया।
सुगम किन्तु प्रभावशाली साधनाक्रम
यह तीनों धाराएँ सदैव से अति महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावशाली मानी जाती रही है। इनके माध्यम से सत्रज् तम का सन्तुलन, कारण, सूक्ष्म, स्थूल का नियमन, ब्रह्म जीव प्रकृति का प्रत्यक्षीकरण अधिदैविक, आध्यात्मिक अधिभौतिक क्षमताओं का विकास, ब्रह्मवर्चस तेज, ओजस् एवं विभूति ऋद्धि-सिद्धि आदि को प्राप्ति होती है। हाँ! उन्हें कठिन एवं दुःसाध्य अवश्य कहा जाता रहा है। किन्तु जिस प्रकार जिस दिव्य सत्ता की स्फुरणा तथा कृपा से गायत्री साधना जैसी दुरूह और गुह्ममानी जाने वाली प्रक्रिया को वर्तमान परिस्थितियों में भी अपनाया जाने योग्य व्यावहारिक, सुगम रूप दिया जा सका, उसी प्रकार इन साधनाओं को भी सर्वसुलभ बनाया जा रहा है। उनका प्रभाव यथावत् बनाये रखकर भी उनकी साधना विधि का जन-साधारण द्वारा अपनाये जाने योग्य बनाया गया है। सीमित साधनों एवं सीमित समय में भी इन साधनाओं को उत्साही साधक कर सकते हैं तथा पर्याप्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
यह साधन क्रम शांतिकुंज में चलने वाले सभी साधना एवं प्रशिक्षण सत्रों में जोड़ दिया गया हूँ। क्षेत्रों साधना एवं प्रशिक्षण सत्रों में जोड़ दिया गया है। क्षेत्रों में भी परिजन इसे प्रारम्भ कर सकते हैं। शांतिकुंज में जप, तप, उपासना, हवन आदि के क्रम में साथ-साथ प्रतिदिन दो बार इन साधनाओं का अभ्यास कराया जाता है। दस दिवसीय शिविरों में तीन-तीन दिन तक एक-एक साधना का क्रम चलता है। प्रातः 45 मि0 ध्यान साधना एवं सायंकाल क्रियायोग सहित साधना का प्रशिक्षणात्मक अभ्यास कराया जाता है। साधक दिये जाने वाले निर्देशों का अनुसरण करते हुए साधना की गहराइयों में उतरते और दिव्य अनुभूतियाँ प्राप्त करते हैं।
प्रातःकालीन ध्यान साधना के अंतर्गत तीनों साधनों का आरम्भ में उपस्थित साधकों को निर्देश दिया जाता है कि वे कमर सीधी-हाथ को गोदी में-बाँया हाथ नीचे दाहिना ऊपर-शान्तचित्त-नेत्र बन्द की ध्यान मुद्रा में बैठें। मन को एकाग्र रखें। निर्धारित निर्देशों के अनुरूप कल्पना क्षेत्र में भाव चित्र बनायें। उन चित्रों से मन स्पष्ट और प्रखर करने का प्रयत्न करें। अनुभूतियाँ जो बताई गई हैं, उन्हें उभारने के लिए तन्मयता एवं श्रद्धा का परिपूर्ण समावेश करें।
चलना व्यष्टि से समष्टि की और है। इसलिए उपस्थित सभी साधकों को अपनी सत्ता पृथक रखने की अपेक्षा-सामूहिकनभ एकता की- समष्टि समग्रता की बनानी चाहिए। हम उपस्थित लोगों का मन एक है। संयुक्त मन ही हमारा वास्तविक मन है। ध्यान उसी सामूहिक चेतना के आधार पर किया जा रहा है। जिस प्रकार सूर्य एक और किरणें अनेक होती है- जिस प्रकार समुद्र एक और लहरें अनेक होती हैं- उसी प्रकार हम सब की व्यक्ति-सत्ता अलग दीखते हुए भी, वस्तुतः हम सब एक-अभिन्न और अविच्छिन्न है। संयुक्त अस्तित्व ही वास्तविकता है। हम विराट् के एक घटक है। विलगाव अवास्तविक और एकत्व यथार्थ है। पृथकता से विरत होकर हम एकता की और चल रहे हैं। साधना संयुक्त मन से सर्वजनीन लोकमंगल के लिए हो रही है। यह ध्यान आरम्भ से पूर्व की प्रथम भूमिका है जिसे कुछ समय शान्त चित्त से करना होता है। इससे अनेकता में एकता की अनुभूति होने लगती है।
साधना स्थल एवं वातावरण के सम्बन्ध में उच्चस्तरीय भावनाएँ लेकर चलना पड़ता है। तप की परम्परा में हिमालय पिता की गोद तथा गंगा माता के आँचल को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधनाओं का इतिहास इसी भूखण्ड के साथ जुड़ा हुआ है। राम लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न चारों भाई वृद्धावस्था में अयोध्या छोड़कर इसी भूमि में तप करने के लिए आये थे। भगवान कृष्ण ने रुक्मिणी सहित इसी भूमि में तप किया था। पाण्डव स्वर्गारोहण की साधना करने यहीं आये थे। सप्त ऋषियों का तप यहीं सम्पन्न हुआ था। भागीरथ ने गंगावतरण की और परशुराम ने शक्ति पुँज दिव्य परशु प्राप्त करने तथा सफलता प्राप्त करने की दिव्य साधनाएँ इसी भूमि पर तप करते हुए सम्पन्न की थी। इस वातावरण में तपश्चर्या के उपयुक्त ऐसे दिव्य आधार मौजूद है, जिनके कारण अन्यत्र जन्म भर तप साधना करने की अपेक्षा यह प्रयोजन स्वल्प-काल में ही अधिक सरलता और सफलता के साथ सम्पन्न हो जाता है।
हिमालय की गोद और गंगा के अंचल में विनिर्मित शान्ति कुंज प्रस्तुत साधना के लिए अत्यन्त उपयोगी स्थान है। यहाँ अखण्ड दीपक, नित्य जप, नित्य हवन एवं साधनाओं का दिव्य वातावरण बना रहता है। यह केन्द्र वस्तुतः किसी महान अध्यात्म शक्ति के संरक्षण में चल रहा है। आचार्य दम्पत्ति जो उसका प्रबन्ध कार्यवाहक के रूप में करते हैं। इसलिए इस क्षेत्र में ‘दिव्यता’ अनायास ही छाई रहती है। फिर प्रत्यक्ष मार्ग-दर्शन और स्पष्ट अनुदान देने के लिए-तथा स्नेह दुलार की दिव्य संवेदनाएँ उभारने के लिए दो प्रत्यक्ष प्रतिमाएँ भी यहाँ मौजूद है। गायत्री माता और यज्ञ पिता के प्रतीक यहाँ गायत्री मन्दिर एवं विनिर्मित यज्ञशाला की पूजा अर्चा एवं हवन-प्रक्रिया में ही नहीं-जीवन्त रूप से अनुभव की जा सकती हैं। इन सबको मिलाकर यह अनुभूति होती है कि यह साधना-स्थल दिव्य-लोक के रूप में है। दिव्य वातावरण और दिव्य संरक्षण की अद्भुत सुविधा यहाँ मौजूद है।
समष्टि मन-दिव्य वातावरण -की अनुभूतियों के साथ-साथ त्रिविधि ध्यान आरम्भ करने से पहले-योगनिद्रा और आत्म-जागृति की अनुभूति उभारनी पड़ती है। इससे मनःस्थिति ऐसी बन जाती है। जिसमें ध्यान के बीजारोपण और अंकुर उगने का कार्य भली प्रकार सम्भव हो सकें। योगनिद्रा का अर्थ है बहिरंग की सुषुप्ति शिथिलता एवं शान्ति। इसके लिए चिन्तन करना होता है कि शरीर अर्ध निद्रित जैसी स्थिति में शिथिल हो रहा है। मन में भगदड़ बन्द कर दी और वह शान्ति, स्थिरता तृप्ति एवं सरसता का अनुभव करते हुए अर्धतंद्रित बन रहा है। शरीर शिथिल-मन शान्त की स्थिति उत्पन्न कर लेना ध्यान साधन की पृष्ठभूमि बनाने के लिए आवश्यक है। वासना, तृष्णा और अहंता की उत्तेजनाएं ही शरीर को दुष्प्रवृत्तियों में मन को कुकल्पनाओं में और अन्तःकरण को दुर्भावनाओं में घसीटती रहती है। ध्यान के पूर्वाभ्यास में इन तीनों के शान्त होने का संकल्प एवं विश्वास जमाना पड़ता है। ब्रह्मवर्चस् साधना में इसी की स्थिति में उत्पन्न करने के लिए निर्देश दिये जाते हैं। साधक अनुभव करता है कि वह वस्तुतः शरीर शिथिल और मन में समाहित होकर गम्भीर शान्ति अनुभव कर रहा है। यह योग निद्रा प्रकरण हुआ।
ध्यान की पृष्ठभूमि बनाने में बहिरंग की सुषुप्ति ही नहीं अन्तरंग की जागृति भी आवश्यक होती है। इस अभ्यास का नाम आत्म-जागृति दिया गया है। अन्तरात्मा में आत्म-ज्ञान जगने एवं आत्म-बल बढ़ने की भावना की जाती है। आत्मा का वास्तविक स्वरूप और जीवन का परम लक्ष्य उभारना पड़ता है। आत्मा ईश्वर का जेष्ठ पुत्र, उसी की अभिलाषी अंश हैं अपने पिता की सभी दिव्य सम्भावनाएं बीज रूप में उसमें विद्यमान हैं सत्य, शिव ओर सुन्दर का आधार उसकी सत्ता में पूर्णतया समावेश है। अपूर्णता के भव-बन्धनों से छुटकारा पाना, पूर्णता की मुक्ति सम्पदा को उपलब्ध करना जीवन का लक्ष्य है। सृष्टि के प्राणियों की तुलना में अद्भुत अनुदान उसे इसलिए मिले है कि ईश्वरीय इच्छाओं की पूर्ति के लिए वह कारगर प्रयत्न कर सके। इस सृष्टि को सुन्दर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाना ही उसे सौंपा गया कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व हैं वह उसे निबाहने में पूर्णतया समर्थ हैं इन भावनाओं को अन्तःक्षेत्र में जागृत करने की आत्म-जागृति कहते हैं। आत्मज्ञान एवं आत्मबल का अभिवर्धन इसी भाव शृंखला को अन्तःक्षेत्र में उभारने से सम्भव होता है।
यह बात प्रातःकालीन ध्यान प्रक्रिया से पहले की पूर्व भूमिका हैं इसे साधना की पृष्ठभूमि कहा जा सकता है। साधना के लिए निर्धारित 45 मिनट से पहले 15 मिनट इस लिए सुरक्षित है। शेष आधा घंटा ध्यान करना होता है। तीन साधनाओं के लिए तीन-तीन दिन की- आधा-आधा घण्टे की- ध्यान धारणा निर्धारित है। उस अवधि में तीन दिन तीनों शरीरों सम्बन्धी, तीन दिन पाँच कोशों सम्बन्धी तथा तीन दिन कुण्डलिनी जागरण सम्बन्धी ध्यान विशेष निर्देशों के साथ कराया जाता है।
ब्रह्म वर्चस् साधना सत्रों की प्रक्रिया में यह प्रातः कालीन ध्यान धारणा मुख्य हैं परन्तु इन तीनों ही साधनाओं में से हर एक के साथ ध्यान सहित कुल पाँच-पाँच क्रियाएं रखी गई है। (1) आसन, (2) मुद्रा, (3) प्राणायाम, (4) जप, (5) ध्यान।
औषधियों को प्रभावशाली बनाने के लिए जड़ी-बूटियों की पंचाँग सहित लिया जाता है पूजन में पंचोपचार, पंचामृत, पंचगव्य आदि का महत्त्व सर्वविदित हैं ज्योतिष में भी पंचांग का ही सहारा लेना पड़ता है। उपर्युक्त क्रियाओं को भी साधना पंचांग, साधना पंचक, अथवा साधना पंचापचार कह सकते हैं।
हर साधना के साथ, उसके विज्ञान के अनुरूप इन क्रियाओं के भिन्न-भिन्न रूप रखे गये है। तीनों ही साधनाओं में प्रमुख भूमिका ध्यान की ही है, अन्य क्रियाएं उसी की सहयोगी क्रियायें है। ध्यान को प्रधान मानने का अर्थ अन्य को निरर्थक मान लेना नहीं है। सभी क्रियाएं अपना-अपना महत्त्व रखती है, और प्रकारान्तर से ध्यान को प्रखर तथा सुनियोजित बनाती है। इनके सहारे साधक का ध्यान भटकता नहीं है तथा साधना प्रवाह अबाध चलता रह सकता है।
यह पाँचों क्रियाएं उभय-पक्षीय है। एक तो उनकी क्रिया विधि है- दूसरा उनका दर्शन एवं प्रेरणा पक्ष है। दोनों के संयोग से ही हर क्रिया पूर्ण बनती है। प्रस्तुत साधना क्रम में उन दोनों का ही उल्लेख है, ताकि उनका सही प्रयोग-उपयोग किया जा सके।
आसन-सर्वमान्य व्यायाम तो है ही। उसका शरीर के अन्तरंग स्थानों पर योग साधना के अनुकूल प्रभाव पड़ता है। साथ ही आसन का अर्थ आधार स्थिति नींव भी होता है। आधार गलत हो तो अगली रचना ही बिगड़ जाती हैं साधनाओं के साथ जोड़ा गया आसनों का दर्शन पक्ष साधक को उपयुक्त आधार की दिशा और प्रेरणा देता है। उसे तो अनिवार्य रूप से तुरन्त हृदयंगम करना ही चाहिए। क्रिया पक्ष का भी अभ्यास चालू रखना चाहिए। प्रारम्भ में आसन थोड़े समय ही करें। साधना में केवल मुद्रा-अथवा मुद्रा एवं प्राणायाम उसके लिए नियुक्त विशेष आसन में की जाय। अभ्यास से जब वह सहज हो जाय तभी से जप एवं ध्यान के समय उसका उपयोग किया जाय, अन्यथा सामान्य सुखासन में ही जप ध्यान करना उचित है।
मुद्राओं के भी दोनों पक्ष है। क्रिया पक्ष का अपना प्रभाव है, और प्रेरणा पक्ष का अपना। मुद्रा का अर्थ होता है, रुख, स्थिति। योग साधना के लिए सही आधार आसन के साथ-साथ साधक की दिशा, रुख भी ठीक हो तभी लाभ होता है। मुद्रा के अभ्यास से वृत्तियाँ एक दिशा विशेष की ओर मोड़ी जाती है। हर मुद्रा के साथ उसके दर्शन को इसीलिए हृदयंगम करना होता है।
प्राणायाम द्वारा योग साधना के लिए आवश्यक हलचल एवं ऊष्मा शरीर एवं अन्तःकरण में पैदा की जाती हैं योग साधना का प्राणायामक वल श्वास-प्रश्वास नहीं होता, उसके साथ संकल्प युक्त प्राण प्रयोग होता है। संकल्प एवं चिन्तन की प्रखरता के अनुरूप ही प्राण संचरण में सबलता आती है।
जप में मात्र शब्दोच्चार नहीं उसमें मनोयोग युक्त मंत्र-शक्ति की तरंगें पैदा करनी होती हैं उपाँशु जप, जिसमें कण्ठ, औठ, जीभ आदि चले तो पर स्वर बाहर न सुनाई पड़े। अन्दर उसकी तरंगें संचरित होती रहे, यह क्रम जप में चलाया जाता है।
आसन के साथ क्रमशः मुद्रा एवं प्राणायाम करना चाहिए। जप एवं ध्यान के समय श्वास स्वाभाविक ही रहती है। सारी शक्ति ध्यान प्रक्रिया पर ही केन्द्रित कर देनी होती है। अन्य क्रियाएं स्वचालित ढंग से चलती रहे तो चले ध्यान के समय उनको लक्ष्य न बनाया जाय।
(1) तीन शरीरों की साधनाएँ
इस साधना क्रम में (1) स्वतिस्तकासन (2) खेचरी मुद्रा (3) सोऽहं प्राणायाम (4) तीन प्रणवयुक्त गायत्री मंत्र का जप एवं (5) सविता देवता के प्रकाश का ध्यान, यह पाँच क्रियाएं सम्मिलित है।
विधिः- यह आसन सामान्य पालथी लगाकर बैठने (सुखासन) से मिलती-जुलती है। सामान्य रूप से बैठें। बांये पैर की जाँघ और पिंडली के बीच दबायें, फिर दाँये पैर का पंजा बांये पैर की पिंडली तथा जाँघ के बीच में जमा दे। दोनों पंजे पूरे अन्दर दबे रहें, केवल अंगूठे ऊपर झाँकते रहे। कमर सीधी रखें।
(2) खेचरी मुद्रा- स्वाभाविक आसन में बैठें। शरीर सीधा, नेत्र हलक से बन्द, जीभ को पलट कर तालू से लगाये। ‘णं’ शब्द के उच्चारण के लिए जीभ तालू से जिस रूप में लगानी पड़ती हैं उसी स्थिति में उसे स्थिर रखें। जीभ की स्थिति पर ध्यान केन्द्रित करें, जम्हाई आने अथवा थूक निगलने में अथवा अन्य कारण से जीभ अपने स्थान से हट जाय तो उसे पुनः वही लगा लें।
जीभ हमारी रसानुभूति प्रवृत्तियों, इन्द्रियों की प्रतिनिधि, उसे पलटना, अर्थात् उपर्युक्त प्रवृत्तियों को अधोगामी, बहिर्मुखी से पलटकर ऊर्ध्वगामी, अन्तर्मुखी बनाना। तालु से लगाना अर्थात् मस्तिष्क स्थिति अमृत-कलश अम्त-निर्झर से जोड़ना। दिव्य तुष्टि प्रदान करता है इसे प्राप्त करके साँसारिक विकृत रसों का आकर्षण तथा उनके पीछे भटकना स्वतः रुक जाता है।
(3) सोऽहं प्राणायाम विधि- शान्त स्थिति में सीधे बैठें। धीरे-धीरे गहरी श्वास खींचे। श्वास नली में वायु की रगड़ से स्वर पैदा होता है ‘सो’ पूरी श्वास खींच लेने पर बिना झटके के धीरे से श्वास को पलटें, अन्दर रोकने की आवश्यकता नहीं, जिस गति से श्वास खींची गयी थी, उसी गति से उतने ही समय में उसे निकाल दें। श्वास निकालते समय वायु-घर्षण से स्वर पैदा होता है- हं बाहर पूरी श्वास निकल जाने पर धीरे से श्वास पलटें तथा पुनः खींचना प्रारम्भ करें। यही क्रिया बार-बार दोहराएं।
श्वास के साथ ‘सो’ एवं प्रश्वास के साथ ‘हं’ के स्वर पर ध्यान केन्द्रित। सोऽहं स्वर की झनकार सारे शरीर संस्थान में अनुभव होने लग। ‘सो’ का अर्थ वह-परमात्मा ‘हं’ का अर्थ अहम्-आन्तरिक विकार। प्राण रूप परमात्मा का प्रवेश, अहंकार जनित विकारों का निष्कासन। अपने अन्दर क्रमशः प्राण रूपी प्रकाश, परमात्मा की सत्ता बढ़ना। ‘सोऽहं’ अर्थात् हम भी वही है- परमात्मा और हम एक है- की अनुभूति।
(4) जप- तीन शरीरों को प्रभावित करने के लिए तीन प्रणव युक्त गायत्री मंत्र का जप। क्रम- ॐ ॐ ॐ, भूर्भुवः स्वः, तत्सवितुर्वरेण्यं, भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।
मनोयोगपूर्वक मंत्रजप, उसकी तरंगों का सारे शरीर में प्रसारण, क्रमशः तीनों शरीरों के केन्द्रों पर ध्यान के साथ मंत्र शक्ति की तरंगों का आघात, उनमें प्रवेश, शरीरों में हलचल स्पन्दन पैदा करके उन्हें सविता देवता के स्वर्णिम प्रकाश में ओत-प्रोत होने में मंत्र शक्ति का सहयोग।
(5) तीनों शरीरों की ध्यान साधना
पूर्ण दिशा, प्रातःकाल उदय होता हुआ स्वर्णिम सूर्य-सविता देवता-गायत्री शक्ति के अधिष्ठाता, अपने इष्ट देव, लक्ष्य, आराध्य; उपास्य इस ध्यान धारणा को इष्ट दर्शन कहा गया है। नेत्र बन्द करके इसी का चिन्तन किया जाता है। आँखें बन्द रहती है, पर अनुभव यही होने लगता है कि किसी निर्जन प्रदेश में हम उपस्थित हैं और उदीयमान सविता देवता की इष्टदेव के रूप में भाव भरी झाँकी कर रहे हैं।
सविता देव-ज्ञान के, तेज के, ऊष्मा के, ऊर्जा के, जीवन के, मर्यादा के, सामर्थ्य के, परमार्थ के प्रतीक हैं। उनकी स्वर्णिम आभा में भौतिक स्वर्ण की सभी विशेषताएँ विद्यमान हैं। सोना अन्य धातुओं की तुलना में बहुमूल्य, भारी, सुन्दर, निर्मल,एवं नरम होता है। अपने इष्टदेव में भी यह विशेषताएँ, अध्यात्म स्तर की मौजूद हैं। इन दिव्य विशेषताओं से सुसम्पन्न अपने इष्टदेव हैं। उनके सान्निध्य में स्वभावतः यही अनुदान वरदान अपने को भी मिलने वाले हैं। इस भावना के साथ सविता देव का भावनात्मक दिव्य दर्शन किया जाता है।
इष्ट दर्शन का दूसरा चरण है उनमें मिलन, घुलन, लय, समर्पण। समीपता एवं शरणागति में द्वैत भाव रहता है। यह ध्यान में उससे आगे की ‘अद्वैत’ स्थिति उत्पन्न करनी होती है। साधक को साध्य से मिलकर एक बन जाने की अनुभूति उभारनी होती है। जिस प्रकार दीपक के साथ पतंगा एकता का प्रयास करता है। नाला अपना अस्तित्व गँवाकर नदी में विलीन होता है। अग्नि के साथ ईंधन तद्रूप बनता है। दूध, चीनी, नमक, पानी मिलकर जिस तरह एक हो जाते हैं। वैसी ही एकता अपने और इष्टदेव के बीच उत्पन्न हो रही है। इसी अनुभूति को इष्ट दर्शन का अगला कदम इष्ट-मिलन या दिव्य आत्म-समर्पण कहते हैं। एकत्व भावना साथ ही आत्म साक्षात्कार एवं ईश्वर मिलन की संवेदनाएँ उभरती हैं और परमानन्द का, सच्चिदानन्द का रसास्वादन होता है।
इष्ट दर्शन एवं इष्ट मिलन के उपरान्त तीनों शरीरों में सविता देवता के प्रवेश का आत्म सत्ता को ब्रह्म तेज से ओत-प्रोत होने का, दिव्य अनुभव होता है। पहले स्थूल शरीर में, पीछे सूक्ष्म शरीर में और अन्त में कारण शरीर में, सविता तेज के प्रवेश एवं विस्तार आधिपत्य की भाव संवेदना उभारनी होती है।
(क) स्थूल शरीर- प्रवेश द्वार नाभि केन्द्र, अग्नि चक्र, शक्ति भ्रमर, चक्रवात, रुदग्रन्थि। इस अनुभूति के उपरान्त इस केन्द्र में सविता देव के प्रवेश का, समस्त स्थूल शरीर में उनका प्रकाश सुविस्तृत हो जाने का ध्यान करना होता है। अनुभव होता है कि समस्त स्थूल शरीर अग्नि पिंड बन गया- अग्नि पुँज हो गया। यह अनुभव जितना ही प्रखर होता है उतना ही अपने में असीम आत्मबल के उभरने और सामर्थ्य से ओत-प्रोत होने का भान होता है।
स्थूल शरीर में सविता देव की ऊर्जा ‘ओजस्’ शक्ति बनकर प्रवेश करती है। इसे बलिष्ठता, कर्मनिष्ठा एवं साहसिकता के रूप में अनुभव किया जा सकता है। लगता है यह विशेषताएँ सविता देव के स्थूल शरीर में प्रवेश करने की भावना के साथ ही उठती, उमड़ती चली आ रही हैं। शरीर की स्थिति कर्मयोग साधना में ढलने के उपयुक्त बन गई। उससे सत्कर्ष ही बन पड़ेंगे। क्रिया क्षेत्र में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियाँ उस दिव्य ऊर्जा के अवतरण से सहज ही जल-भुनकर नष्ट होंगी। पुरुषार्थ और वर्चस्व निखरेगा।
(ख) सूक्ष्म शरीर-दोनों भावों के मध्य आज्ञाचक्र, तृतीय नेत्र-सूर्य चक्र, विष्णु ग्रन्थि-सूक्ष्म शरीर का प्रवेश द्वार शक्ति भ्रमर-चक्रवात; इस द्वार से सविता देव का सूक्ष्म शरीर में प्रवेश मस्तिष्क क्षेत्र के कण-कण में दिव्य-ज्योति का समावेश, पूरा मनः क्षेत्र आलोकमय, मन की कल्पना शक्ति, बुद्धि की निर्णय शक्ति, चित्त की आदतें, अह के संस्कार सभी अग्निमय, ज्योतिर्मय, आलोकमय, सूक्ष्म शरीर को सविता देव का अनुग्रह, अनुदान ‘तेजस्’ शक्ति के रूप में उपलब्ध, तेजस् की प्रतिक्रिया, विवेक-शीलता दूरदर्शिता, ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में विकसित। इस ध्यान धारणा को
साधना स्वर्ण-जयन्ती की पूर्णाहुति बसन्त पर्व-24 जनवरी को सम्पन्न हुई। उसी दिन यह ‘पंक्तियाँ लिखी जा रही है। जीवन को साधनामय बनाने के- आदर्श के प्रति निष्ठा व्यक्त करने के- लिए यह योजना बनाई गई थी कि जनसाधारण का विशेषतया अपने घनिष्ठ परिजनों का ध्यान इस ओर आकर्षित किया जाय कि जीवन को साधनामय बनाना कितना सार्थक और कितना बुद्धिमत्ता पूर्ण है? एक वर्ष तक 45 मिनट की साधना का कार्यक्रम देकर यह चेतना उत्पन्न करने का प्रयास किया गया था कि मनुष्य जीवन का मूल्य महत्त्व स्वरूप, लक्ष्य एवं उपयोग समझा जाय। ईश्वर के इस सर्व श्रेष्ठ उपहार को सार्थक बनाया जाय।
साधना वर्ष पूर्ण हुआ। 45 मिनट की उपासना का जो क्रम अपनाया गया था उसकी पूर्णाहुति आज हो जायेगी। अग्निहोत्र तथा मिलन सम्मेलन कार्यक्रमों के साथ वह साधनाक्रम आज समाप्त हो जायेगा। जो लोग उसे आगे भी जारी रखना चाहें, रखे रहे। वह साधन प्रक्रिया अपने आप में बहुत ही सारगर्भित है और इस योग्य है कि उसे आजीवन अपनाये रहा जाय। सूर्योदय से पूर्व 45 मिनट का समय बन्धन इसलिए था कि उस समय शक्ति संचार का विशेष लाभ मिल सके वैसी व्यवस्था की गई थी। प्रसन्नता की बात है कि वह शक्ति संसार क्रम ठीक उसी समय साधना करने न करने का कोई आग्रह प्रतिबंध नहीं हैं सुविधानुसार वह साधना आगे या पीछे भी की जा सकती है। हाँ शक्ति संचार का विशेष लाभ सूर्योदय से 45 मिनट पूर्व से लेकर ठीक सूर्योदय की अवधि तक ही मिल सकेगा। उपासना की कर्मकाण्ड परक-प्रक्रिया को ‘जादुई’ मानकर चलने की भूल किसी को भी नहीं करनी चाहिए। उपासना में मात्र जीवन-क्रम के निर्धारण के संकेत सूत्र सन्निहित रहते हैं। वास्तविक साधना तो जीवन की दिशा धारा को आदर्शवादी प्रयोजनों के साथ जोड़ने से सम्बन्ध रखती है। चमत्कार उसी से मिलते हैं। सिद्धियों का स्रोत इसी केन्द्र के साथ जुड़ा हुआ है। संसार भर के महामानवों को अपनी जीवन प्रक्रिया को ऐसी बनाकर चलना पड़ा हैं जिसमें उनके व्यक्तित्व में उत्कृष्टता भरी रहे साथ ही लोक-मंगल के लिए किये जाने वाले प्रयासों का उत्साहवर्धक बाहुल्य जुड़ा रहे। इससे कम में नैतिक एवं आत्मिक प्रगति सम्भव नहीं, और न वे लाभ किसी को मिल सकते हैं जो ‘साधना की सिद्धि’ के रूप में शास्त्रकारों ने विस्तारपूर्वक वर्णन किये है।
जीवन साधना के पंचशील
साधना वर्ष के ध्यान, आकर्षण प्रयास की सफलता को देखते हुए यह विश्वास होता है कि परिवार के भावनाशील परिजनों में से अधिकांश को जीवन साधना में संलग्न होने की प्रेरणा मिलेगी। ठोस कदम यही होगा।
जीवन साधना को पाँच सूत्रों में विभक्त किया जा सकता है। आध्यात्मिक जीवन के इन्हें पंचशील कहा जाय तो भी अत्युक्ति न होगी। पंच-रत्न पंच-गंव्य पंच-देव पंचाँग, पंच कोश आदि प्रसिद्ध है। गायत्री माता की प्रतिमा भी पंच मुखी बनाई जाती है। व्यावहारिक जीवन को साधना में-देव पूजन में प्रयुक्त होने वाले पंचोपचार के, धूप, दीप, नैवेध, अक्षत, पुष्प के समतुल्य माना जा सकता है। अगले दिनों हममें से प्रत्येक की यह प्रयत्न करना चाहिए कि इनका पालन अपने व्यक्तिगत जीवन व्यवहार में अधिकाधिक मात्रा में होता रहे। हमने आजीवन इन्हें निबाहने का प्रयत्न किया है। चाहते यह है कि परिजनों में से प्रत्येक को इन्हें अपनाने के लिए उत्साह उमड़े और वे इसके लिए इसी बसन्त पर्व से साधना स्तर का प्रयत्न आरम्भ कर दें।
(1) बसायें एक नया संसार
जिस दुनिया में हम रहते हैं, उसका दर्शन, चिन्तन, व्यवहार ही यदि अपने को प्रभावित करता रहे तो फिर आदर्शवादी क्रिया कलाप अपनाने की आशा नहीं के बराबर ही रहेगी। लोग तो वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के अतिरिक्त और किसी उद्देश्य के लिए न तो कुछ सोचते हैं और न करते हैं। उनका प्रभाव और परामर्श अपने ही प्रभाव में घसीटता है यदि उत्कृष्टता की दिशा में बढ़ना है तो अपना प्रेरणा स्रोत बदलना पड़ेगा। परामर्श के नये आधार अपनाने पड़ेंगे। अनुकरण के नये आदर्श ढूँढ़ने होंगे।
क्रिया यह होनी चाहिए कि अपना आध्यात्मिक परिवार-परामर्श मन्त्री-मंडल अलग से नियुक्त किया जाय। महामानवों का शरीर न रहे तो भी वे जीवित रहते हैं। हमें जिनका अनुकरण आकर्षक लगता हो ऐसे आदर्श व्यक्तित्वों के जीवन-चरित्रों को बार-बार पढ़ते रहा जाय, उनके घटनाक्रमों एवं संस्मरणों को मस्तिष्क में घुमाते रहा जाय। महत्त्वपूर्ण समस्याओं पर नीति-निर्धारण करने के लिए महान व्यक्तित्वों के चिन्तन एवं दर्शन का सहारा लिया जाय। इसलिए भाव भरा एवं गम्भीर स्वाध्याय एवं चिन्तन-मनन आवश्यक है। उसे नित्य कर्म में सम्मिलित रखा जाय। मस्तिष्क में ऐसी कल्पना फिल्में घूमती रहनी चाहिए जिनमें उत्कृष्ट चरित्रों के घटनाक्रम एवं संस्मरण भरे पड़े हों। जीवन समस्याओं के सुलझे हुए समाधान प्रस्तुत करने वाली पुस्तकें हमारी सच्ची मित्र हो सकती है। इस स्वाध्याय के लिए सत्साहित्य को उपलब्ध करने के साधन जुटाये जाएँ। आवश्यक खर्चों में यह भी एक गिना जाय और आत्मा की भूख बुझाने का महत्त्व समझते हुए उसके लिए भी समय एवं धन का समुचित समावेश किया जाय। जब भी अवकाश मिले, मस्तिष्क में आदर्शवादी विचारणाओं एवं प्रेरणाओं का ताना-बाना बुनने का कार्य चल पड़े।
कैदी जेल में रहता है, पर उसका मन अपने घर व्यवसाय आदि में पड़ा रहता है। समय तो जेल में काटता है और निर्धारित काम भी करने पड़ते हैं, पर दिलचस्पी का केन्द्र अपना घर परिवार रहता है। ठीक इसी प्रकार शरीर निर्वाह एवं पारिवारिक उत्तरदायित्वों के लिए प्रयत्नरत तो रहा जाय, पर आकांक्षाएँ उस मंडली के साथ जुड़ी रहें जिसे अपने भावनात्मक दिव्य घर-परिवार के रूप में विनिर्मित किया गया है। साथी प्रेरणा देते हैं। और अपने चुम्बकत्व से प्रभावित करके सहचरत्व के लिए खींचते हैं। चोर, जुआरी, व्यभिचारी, नशेबाज आदि की संगति में बैठकर देखा जा सकता है कि उनने मन को अपनी ओर किस तरह झुका लिया। यह चुम्बकत्व महामानवों की संगति में भी होता है। उन्हें अपना सहचर बनाया जाय तो स्वभावतः ऊँचा उठने की प्रेरणा मिलेगी। कठिनाई एक ही है कि दुर्जनों की संख्या बहुत है और समीपता सरल है किन्तु श्रेष्ठ सज्जनों के सम्बन्ध में वैसी सुविधा नहीं है। उस व्यवस्था को भावना कल्पना, विचारणा एवं आकांक्षा के आधार पर अपने अन्तःकरण में स्वयं ही बनाना पड़ता है। अपन निजी लोक, निजी संसार, निजी परिवार यदि आदर्शवादी तत्त्वों और व्यक्तित्व के सहारे विनिर्मित किया जा सके, उसी में अधिक अभिरुचि से-अधिक समय तक निमग्न रहा जाय तो समझना चाहिए कि उत्थान की सही राह मिल गई। उज्ज्वल भविष्य के लिए एक अति महत्त्वपूर्ण आधार हाथ आ गया।
(2) आकाँक्षाओं का परिष्कार
मनुष्य तत्त्व में सबसे प्रबल है- आस्था अभिरुचि, आकाँक्षा। इसी की प्रेरणा से मन की विचारणा और शरीर की क्रियाशीलता को दिशा मिलती है। मन और शरीर की क्रियाशीलता को दिशा मिलती है। मन और शरीर वफादार नौकर भर है। स्वामित्व आस्था, आकाँक्षा का है। इसी को अन्तःकरण कहा जा सकता है। उस मर्मस्थल में से जिस स्तर की उमंग उठेंगी, जैसी आस्थाएं जमेंगी- जो आकांक्षाएं मचलेंगी, उसी के अनुरूप, मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ शरीर काम करने लगेगा। उसी तरह के साधन जुटेंगे और सहयोग मिलेगा। अपने भाग्य का निर्माण आप करने का तथ्य इसी अन्तःकेन्द्र के साथ जुड़ा हुआ है।
हमारी आकांक्षाओं को केन्द्र बड़प्पन से हटकर महानता के साथ जुड़ना चाहिए। अमीर और विलासी बनने की आकुलता त्यागी जाय। निर्वाह के लिए जितना श्रम और धन अनिवार्य हो, उतने का सादगी और सन्तोष के साथ प्रबन्ध करने को ही पर्याप्त माना जाय। तभी महानता उपार्जित कर सकने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण प्रयास सम्भव होगा। लोभ और मोह का नशा उतरे तो उत्कृष्टता के अभिवर्धन के लिए कुछ कारगर कदम उठे। हेय स्तर के व्यक्ति पेट और प्रजनन में उलझे रहते हैं। और वासना, तृष्णा ही रात-दिन सताती है। अहंकार प्रदर्शन के लिए उद्धत आडम्बर रचते रहते हैं। व्यक्तित्व में उत्कृष्टता का समावेश होते ही यह तुच्छताएं पतझड़ के पतों की तरह गिर जाती है और जीवन की सार्थकता जीवन-मुक्ति स्वर्गानुभूति ईश्वर प्राप्ति जैसी उमंगें उठने लगती है। हमें अपनी आकाँक्षाएं बड़प्पन की तृष्णा से समेट कर महानता की उपलब्धि के साथ जोड़नी चाहिए। इस श्रद्धा की स्थापना से ही जीवन की सार्थकता सम्भव होती हैं
(3) कर्त्तव्य पालन का गौरव
‘मालिकी’ असाधारण रूप से बोझिल होती है। उतना भार उठा सकने की गरिमा न हो तो उस बोझ से ही सामान्य व्यक्ति पिस जाता है। मालिकी छोड़कर माली बनने से जीवन हल्का फुल्का बनता है, संतोष और शान्ति के साथ समय कटता है, जी प्रसन्न रहता और सन्तुलन बना रहने से अपने कामों को अधिक मनोयोगपूर्वक कर सकना सम्भव होता है। अस्तु वे आनन्ददायक भी बने रहते हैं और सफल भी होते हैं। मालिनी का अहंकार, एक प्रकार का उन्माद उत्पन्न करता है। तथाकथित बड़े आदमी किस कदर ऐठे-अकड़े फिरते हैं, प्रदर्शन के लिए कैसे-कैसे कौतुक खड़े करते हैं, ठाट-बाट में कितना समय और धन खर्च करते हैं, इसे देखकर यह तथ्य सहज ही समझ में आता है कि अहंता ने मालिकों ने इनका चिन्तन कितना विकृत और कर्तव्य कितना उद्धत बना दिया हैं। विग्रह और विद्वेष में-कलह और संघर्ष में-वास्तविक कारण कम रहते हैं और अहंकार की प्रधान रूप से उबलता है।
महत्वाकांक्षाएं खड़ी की जाती है। वे पूरी नहीं होती तो भारी निराशा और खीज उत्पन्न होती है। पूर्ति में देरी सहन नहीं होती। जो चाहा है वह तुरन्त पूरा होना चाहिए इस आतुरता में ही अपराधी आचरण अपनाये जाते हैं जो मन काम में लगना चाहिए वह इच्छित परिणाम के तुरन्त ही उपलब्ध होने की आकुलता में डूबा रहता है। इच्छाओं की पूर्ति में बाधक दीखने वाले व्यक्तियों या परिस्थितियों की कल्पना भर से सन्तुलन बिगड़ जाता है और ऐसा कर बैठते हैं कि जिसे अनर्थ ही कहा जा सकता है। जीवन का आधा आनन्द नष्ट कर देने वाले मालिकी उसी की है। हमें नियत कर्म करने के लिए माली की तरह नियुक्ति किया गया हैं। उपलब्ध शरीर का परिवार का वैभव का वास्तविक स्वामी परमेश्वर है। हम उसकी सुरक्षा एवं सुव्यवस्था भर के लिए उत्तरदायी है ये सोचने से जी हलका रहेगा और अनावश्यक चिन्ताओं, आशंकाओं की आग में न जलना पड़ेगा। खिलाड़ी की तरह नाटक के पात्रों की तरह अपनी भूमिका पूरी जिम्मेदारी और ईमानदारी के साथ निबाही जाय। हम सामर्थ्य भर अपना कर्तव्य पालन सही रीति से कर रहे हैं, इतने भर से सन्तोष किया जा सकता है और हर घड़ी हर स्थिति में प्रसन्न रहा जा सकता है।
हम न भूतकाल की शिकायत करें और न भविष्य के लिए आतुरता व्यक्त करें। वर्तमान का पूरा जागरूकता एवं तत्परता के साथ सदुपयोग करें। न हानि में सिर पटकें और न लाभ में हर्षोन्मत्त बनें। विवेकवान, धैर्यवान, कर्मयोगी की भूमिका अपनायें। मालिक बनने का प्रयत्न न करें। जो बोझ कन्धे पर है उसे जिम्मेदारी के साथ निबाहें और प्रसन्न रहें। कर्तव्य ही अपने हाथ में है- परिणाम तो परिस्थितियों पर निर्भर है। जो अपने हाथ की बात नहीं है उनके लिए विक्षुब्ध क्यों हो? ऐसा सन्तुलन बनायें रहने वाला व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में अध्यात्मवादी बन सकता है और हर परिस्थिति में प्रभदित रह सकता है। नैतिक जीवन जी सकना और महान कार्य कर सकना कर्मयोगी के लिए सम्भव हो सकता है।
(4) अपव्यय को भी अनर्थ समझें-
अनर्थ कृत्यों में सामर्थ्य को लगाने के उग्र दुष्परिणाम सर्वविदित है। कुकर्मी, दुष्ट, दुराचारी बदनाम होते हैं, घृणित तिरस्कृत बनते हैं, सहयोग से वंचित रहते हैं। आत्म-प्रताड़ना सहते हैं।, दण्ड पाते हैं ओर पतन के गर्त में गिरते हैं। अपनी ही तरह वे दूसरों की भी हानि करते हैं। अपने सम्पर्क में परिचितों को या प्रभावित लोगों को वे आग की तरह जलाते हैं। इन दुरात्माओं को आतंक जमाने की आसुरी अहंता की तृप्ति का- पहले हमले में ही जो समेट लिया उतने का- का यत्किंचित् लाभ भले ही मिल जाता हो, पर अन्ततः असीम हानि ही उठाते हैं। बाद में वे पछताते हैं कि क्यों हमने दुष्टता का मार्ग चुना और क्यों इतना घाटा उठाया?
अनर्थ अपनाने को दुष्टता कहते हैं उससे कुछ ही हलके दर्जे का पाप है- व्यर्थ में शक्तियों को गँवाते रहने की मूर्खता। देखने में यह कोई बहुत बड़ी बुराई नहीं लगती, पर हानि इसमें भी लगभग उतनी ही जा पहुँचती है, जितनी अनर्थमूलक दुष्टता से होती है। (1) शारीरिक श्रम-शक्ति को व्यर्थ में गंवाना ‘आलस्य’ (2) मन को अभीष्ट प्रयोजनों में न लगाकर इधर-उधर भटकने देना ‘प्रमाद’ (3) समय का, वस्तुओं का, धन का, क्षमता का बेसिलसिले उपयोग करना, उन्हें बर्बाद करना, ‘अपव्यय’ (4) तत्परता, जागरूकता, साहसिकता, उत्साह का अभाव-अन्यमनस्क मन से बेगार भुगतने की तरह, कुछ उलटा-पलटा करते रहना ‘अवसार।’ इन चारों दुर्गुणों की चतुरंगिणी जिस पर भी आक्रमण करती है वह जीवित मृतक जैसी स्थिति में जा पहुँचता है। उसके द्वारा कुछ पुरुषार्थ बन ही नहीं पड़ता। जो थोड़ा बहुत काम होता है वह भी अस्त-व्यस्त और अव्यवस्थित रहने से ऐसा रहता है जिसकी अपेक्षा न करना अधिक अच्छा समझा जाता है।
इन चारों में से जहाँ एक होगा वहाँ क्रमशः दूसरे साथी भी घुसते चले जायेंगे। पक्षाघात, पीड़ित, अपंग, असहाय की तरह वह अपने लिए और दूसरों के लिए भार भूत होकर रहेगा। अस्तु इन दुर्गुणों के निवारण, निराकरण के लिए भी वैसा ही प्रबल प्रयत्न करना चाहिए जो कि अवाँछनीयताओं, अनैतिकताओं, असामाजिकताओं के विरुद्ध संघर्ष करना आवश्यक माना गया है तथा बौद्धिक क्रान्ति , नैतिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्राँति के लिए प्रयत्नशील। मूढ़ मान्यताएं, अनैतिकताएं तथा सामाजिक भ्रष्टताएं हमें सहन नहीं। ठीक उसी प्रकार आलस्य, प्रमाद, अपव्यय एवं अवसाद के असुरों से भी जूझा जाना चाहिए। न हम अनर्थ होने दें और न व्यर्थ की बर्बादी सहन करें। श्रमनिष्ठा, कर्म-परायणता उत्साह, स्फूर्ति, सजगता, व्यवस्था, स्वच्छता आपने स्वभाव के अंग होने चाहिए। भीरुता, आत्महीनता, दीनता, निराशा, चिंता जैसी मनुष्यता को लज्जित करने वाली एक भी दुष्प्रवृत्ति अपने में रहने न पायें। हर समय सैन्य प्रहरियों की तरह सुव्यवस्थित, सजग, कर्मनिष्ठा का परिचय देने वाला हमारा व्यक्तित्व होना चाहिए।
(5) अंशदान में कृपणता न करें-
जीवन को आत्मा और शरीर का सम्मिलित व्यवसाय माना जाय। उसके लिये का बँटवारा दोनों में समान रूप से होता रहे, इसके लिए सही रीति-नीति अपनाई जाय। शरीर निर्वाह और पारिवारिक उत्तरदायित्व यह दोनों ही कार्य भौतिक जीवनचर्या से सम्बन्धित है। आत्मिक प्रगति के लिए उन कर्त्तव्यों को पूरा करना आवश्यक है जिनके लिए ईश्वर ने मनुष्य शरीर जैसा अनुपम उपहार सौंपा है। विश्व उद्यान को सुन्दर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए हम सहयोगी बने, हाथ बँटायें यही ईश्वर की आकाँक्षा रही हैं इन प्रयोजनों में हमारी सामर्थ्य जितनी अधिक लगेगी, आत्मा को उतना ही सन्तोष होगा। आत्मिक प्रगति पूर्णता के लक्ष्य की प्राप्ति इसी आधार पर सम्भव होती है। पुण्य परमार्थ के लिए-लोक-मंगल के लिए-लगने वाला अनुदान ही सच्ची ईश्वर भक्ति और जीवन की सार्थकता कही जा सकती है।
शरीर की माँग है कि उसे निर्वाह के साधन चाहिए। परिवार से शरीर को बहुत-सी सुविधाएँ मिलती हैं, इसलिए आश्रित परिजनों का भरण-पोषण भी कर्तव्य है। यह दोनों ही काम शरीर यात्रा के- भौतिक जीवन के आधार है। इनमें आधी सामर्थ्य लगे तो पर्याप्त है। शेष आधी श्रम, समय, मन, प्रभाव एवं साधन का उपयोग आध्यात्मिक प्रयोजनों में-अपनी और दूसरों की श्रेष्ठता बढ़ाने में लगनी चाहिए। लोक कल्याण के- सद्प्रवृत्ति संवर्धन के कार्यों में संलग्न रहने से अपनी श्रेष्ठता, उत्कृष्टता अनायास ही बढ़ती है। परमार्थ साधना में ‘स्व’ पर कल्याण समान रूप से सन्निहित है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए शरीर यात्रा की भाँति ही परमार्थ प्रयोजनों को भी नितान्त आवश्यक मानना चाहिए। उपलब्ध साधनों का विभाजन इन दानों के लिए समान मात्रा में करना चाहिए। उत्तमता तो इसमें है कि शरीर को कम और आत्मा को अधिक भाग दिया जाय। शारीरिक आवश्यकताएं स्वल्प रखी जाएँ, परिवार बढ़ाया न जाय, जो है उसी को स्वावलम्बी बनाने की अपनी सामर्थ्य जीवनोद्देश्य की पूर्ति में लगाने की तैयारी की जाय। भारतीय संस्कृति का वर्णाश्रम धर्म प्राण है। आधा जीवन ब्रह्मचर्य और गृहस्थ के रूप में शरीर परिवार के लिए शेष आधान वानप्रस्थ एवं संन्यास के रूप में समाज सेवा के लिए-निर्धारित किया गया हैं। इस विभाजन पर आरूढ़ न रहना एक प्रकार से आध्यात्मिक बेईमानी ही समझी जायेगी।
आधा विभाजन न बन पड़े तो भी जितना अधिक अंशदान आत्म-कल्याण के लिए-लोक कल्याण के लिए बन पड़े उतना लगाने की उदारता बढ़ाई जाती रहे। न्यूनतम अंशदान एक घण्टा समय और दस पैसा ज्ञान यज्ञ के लिए लगाते रहने का है। महीने में एक दिन की कमाई लगाने से निष्ठा की प्रौढ़ता झलकती है। यह अंश -दान ज्ञान-यज्ञ के लिए-विचार क्रान्ति के लिए-लगाना चाहिए। मनुष्य को यदि सद्बुद्धि, सत्प्रेरणा और सही दिशा मिल जाय तो वह अपने ही साधनों से अपनी समस्त सम्पदाएँ हल कर सकता है। अस्तु परमार्थ का केन्द्रबिन्दु ज्ञान-यज्ञ को ही माना जाना चाहिए।
उपरोक्त पाँच आध्यात्मिकशील जीवन-साधना के पाँच प्रमुख अंग समझे जाएँ और इन्हें जीवन-क्रम में उतारने के लिए सतत् प्रयत्न करते रहा जाय तो कुछ ही समय में सामान्य परिस्थितियों में रहते हुए भी आत्मिक दृष्टि से असामान्य एवं असाधारण बनना सम्भव होगा। हमारी जीवन-यात्रा सड़क पर चलते हुए लक्ष्य, पूर्ति के निकट स्थल तक जा पहुँची है। हम चाहते हैं कि अपने परिवार का प्रत्येक सदस्य इन्हें हृदयंगम करें। जीवन व्यवहार में उतारे। पंचकोशों के अनावरण का- पंचमुखी गायत्री साधना का- इसे उच्चस्तरीय प्रयास कहा जा सकेगा। ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में अगले दिन विभिन्न स्तर की योग तप उपासनाओं का अभ्यास कराने के साथ-साथ इन पंचशीलों को अपनाने पर भी जोर दिया जायेगा और व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए यह बताया जायेगा और व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए यह बताया जायेगा और व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए यह बताया जायेगा कि इस मार्ग में किसे क्या कठिनाई आ सकती है और उसका निराकरण किस प्रकार सम्भव हो सकता है?
प्रातःकाल आँख खुलते ही “हर दिन नया जन्म” हर रात नई मौत” के स्वर्ण सूत्र का सघन आस्था के साथ निदिध्यासन करना चाहिए। उठते समय आत्मबोध और सोते समय तत्त्वबोध का चिन्तन, मनन नित्य का संध्या वन्दन समझा जा सकता है। इसमें फुरसत न मिलने जैसा कुछ बहाना करने की भी गुँजाइश नहीं है। आँख खुलते ही जीवन का महत्त्व, उद्देश्य, स्वरूप एवं उपयोग स्मरण किया जाय। इस अनुदान के पीछे ईश्वर की अपेक्षा तथा अपने कन्धे पर आई जिम्मेदारी को यदि समझा जा सके तो एक-एक क्षण का- क्षमताओं के एक-एक कण का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की बात ही सामने होगी। उठने से लेकर सोने तक के समय विभाजन, चिन्तन तथा सतर्कताओं का क्रम बना लेना चाहिए। उस निर्धारित कार्यक्रम पर दिन भर आरुढ रहना चाहिए। रात्रि को सोते समय, मृत्यु की गोद में जाने की स्थिति अनुभव करनी चाहिए। संन्यासी, वैरागी, निस्पृह खिलाड़ी की तरह निश्चित होकर सोया जाय। अपने मन का भार ईश्वर को सौंपकर सोने से चित्त कितना हलका और शान्त रहता है, उसकी दिव्य अनुभूति का लाभ हर दिन उठाना चाहिए।
आवाहन आमन्त्रण की उपेक्षा न करें-
दिसम्बर अंक में परिजनों से कुछ अपेक्षाएँ की गई है, जीवन के अन्तिम अध्याय में हम अपने घनिष्ठ आत्मीयजनों को कन्धों से कन्धा-कदम से कदम मिलाकर साथ-साथ चलते हुए देखने के इच्छुक हैं समय कम बचा और कार्य अधिक करने को पड़ा है। अच्छा होता इसमें वे लोग खुद हाथ बंटाते जिनकी परिस्थिति एवं मनःस्थिति इस योग्य है। वस्तुतः बात परिस्थिति की नहीं मनःस्थिति की है। मन हो तो साधन बन जाते हैं और अवसर निकल आते हैं। मन पर उपेक्षा छाई रहे तो समय न मिलने, आर्थिक तंगी पड़ने झंझट रहने आदि के हजार बहाने बने ही रहेंगे। जहाँ इच्छा होती है वहाँ रास्ता निकल आता है इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता। अगले दिन कितने महत्त्व के है इसे यदि समझा जा सके तो घरेलू झंझटों का समाधान में परिवार के अन्य लोग भी सहायता कर सकते हैं और अवकाश, अवसर, साधन बिलकुल भी न निकलने की आज जो स्थिति बनी हुई है उसका पलक मारते समाधान हो सकता है।
प्रतिभाशाली परिजन किस प्रकार क्या कुछ कर सकते हैं इसकी रूप-रेखा दिसम्बर अंक में मौजूद हैं प्रत्येक परिजन उसे बार-बार पढ़े ओर अपने आप से पूछे कि इस आवाहन आमन्त्रण की चुनौती को वह किस प्रकार किस हद तक स्वीकार कर सकते है? उससे क्या कुछ बन पड़ सकता है? उत्तर में अनेक ऐसी सम्भावनाएं उभर कर आवेंगी, जिनको अन्यमनस्क मन रहते कभी सम्भावना ही नहीं थी। आन्तरिक उत्साह जागने भर से ऐसे समाधान निकल सकते हैं जिनके सहारे नव-निर्माण के अति महत्त्वपूर्ण प्रयोजनों में अगले दिनों ऐसा कुछ कर सकना सम्भव हो सके, जिसे असाधारण, स्मरणीय, प्रशंसनीय, अनुकरणीय एवं ऐतिहासिक स्तर का समझा जा सके।
व्यक्तिगत भौतिक लाभों की तरह ही यदि आत्मिक कर्तव्यों को महत्त्व दिया जा सके तो व्यस्तता अभावग्रस्तता एवं कठिनाइयों की समस्या रहते हुए भी युग कर्तव्यों को पूरा करने के लिए कुछ न कुछ कर सकने का अवसर हर किसी को मिल सकता है। नव-निर्माण के लिए हमें क्या करना चाहिए इस सम्बन्ध में दिसम्बर अखण्ड-ज्योति के ‘अपनों से अपनी बात’ स्तम्भ में बसन्त पर्व का उद्बोधन भी पाक्षिक युग-निर्माण योजना में छपते रहे हैं। यदि उपेक्षा टूटे और श्रद्धा उमड़े तो हर व्यक्ति अपने लिए-नव निर्माण के लिए कुछ न कुछ कर सकने का मार्ग खोज सकता है।
प्रबुद्ध परिजन अपने सम्पर्क क्षेत्र पर नये सिरे से दृष्टिपात करें। छाई हुई उपेक्षा को श्रद्धा भरे उत्साह में परिणत करें। कर्त्तव्यों का उद्बोधन करने के लिए हमारे प्रतिनिधि के रूप में घर-घर जाने और जन-जन से सम्पर्क साधने का प्रयत्न करें। दिसम्बर की अखण्ड-ज्योति के ‘अपनों से अपनी बात’ तथा आवाहन आमंत्रण वाले पृष्ठ पढ़ने के लिए विशेष रूप से अनुरोध करें। इसके बाद चर्चा-परिचर्या में कुछ बदलने और कुछ करने का उत्साह उत्पन्न करें। यदि इतना बन पड़े तो अपने ही सम्पर्क क्षेत्र में अभिनव उत्साह उमड़ता देखा जा सकता है। साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष के अन्त में अपने प्रत्येक प्रबुद्ध परिजन से हमें इस प्रकार उद्बोधन सम्पर्क के लिए एकाकी या टाली बाँधकर निकलने की अपेक्षा करेंगे।
महिला जागरण का शाखा संगठन-
एक सरल कार्य ऐसा ही इस युग की महती आवश्यकता की पूर्ति करने वाला होते हुए भी करने में अति सरल हैं महिला जागृति अभियान हमारे जीवन की अन्यतम साध है। इसमें युगान्तरीय चेतना सन्निहित है। व्यक्ति और समाज के बीच की कड़ी परिवार है। परिवार संस्था की काया-कल्प प्रबुद्ध नारी ही कर सकती है। घरों में स्वर्गीय वातावरण का सृजन, प्रखरता सम्पन्न नई पीढ़ी का निर्माण, सुयोग्य एवं स्वावलम्बी नारी के पुरुषार्थ से सक्तामुखी समृद्धि का अभिवर्धन, प्रगति रथ के दोनों पहियों का समानीकरण, लिंग भेद की अनीति, असमानता का निराकरण, आत्म -सम्पदा राम्पत्र वर्ग की नेतृत्व क्षमता का विकास जैसे अनेक अति-महत्त्वपूर्ण प्रयोजन नारी आन्दोलन से सम्बन्धित हैं। इस अभियान की सफलता के साथ नवयुग के अवतरण की सम्भावनाएँ पूरी तरह जुड़ी हुई हैं। हम चाहते हैं कि परिवार के प्रत्येक सदस्य की दिलचस्पी इस कार्य में हमारी ही तरह हों
इस दिशा में प्रथम किन्तु प्रमुख चरण यह हो सकता है कि हम लोग अपने घरों की महिलाओं को आगे करके उनका एक संगठन बना दें। उनमें से एक की कार्य संचालिका बना दें। उस संगठन की तब तक पूरी-पूरी देखभाल करें जब तक कि उनके साप्ताहिक संगठनों का क्रम ठीक प्रकार व्यवस्थित रूप से न चलने लगें। परस्पर मिलने, जुटने से घनिष्ठता बढ़ती हैं, शक्ति उत्पन्न होती हैं और उन रचनात्मक कामों का आधार बनता है। जो नारी जागरण की दृष्टि से नितान्त आवश्यक हैं। इस सन्दर्भ सदस्यता के आवेदन-पत्र प्रमाण-पत्र सदस्यों के टिन बैज, शाखा का साइन बोर्ड, शाखा संचालन की कार्य-पद्धति तथा अन्य उपयोगी पुस्तकें तथा वस्तुएँ हरिद्वार एवं मथुरा से मंगाई जा सकती हैं।
जहाँ भी युग-निर्माण शाखाएँ हैं- जहाँ भी अखण्ड ज्योति के दस सदस्य हैं- वहाँ महिला जागरण अभियान की शाखा अत्यन्त सरलतापूर्वक स्थापित हो सकती हैं। आन्दोलन को आरम्भ करने से लेकर उसे आगे बढ़ने तथा प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँचने का मार्ग-दर्शन “महिला जागृति अभियान” मासिक पत्रिका में बराबर प्रकाशित होता रहता है। पत्रिका शान्ति कुंज हरिद्वार से छपती हैं और वार्षिक चन्दा 6) मात्र हैं। जहाँ वह अभी तक न पहुँचती हो वहाँ माँगना आरम्भ किया जाय और महिला जागरण आन्दोलन को अग्रगामी बनाने के लिए -व्यवहारिक मार्ग -दर्शन प्राप्त किया जाय।
फरवरी की महिला जागृति अभियान पत्रिका को संगठन अंग के रूप में छापा जा रहा है॥ इस अभियान को अपने परिवार से आरम्भ करके देश-व्यापी विश्व -व्यापी बनाने के लिए हमें क्या सोचना और क्या करना चाहिए? इस दिशा में आवश्यक मार्ग-दर्शन इस अंग में दिया जा रहा हैं। उसे ध्यानपूर्वक पढ़ा और पढ़ाया जाय- तो यह रूप रेखा सहज ही मस्तिष्क में प्रेरक फिल्म की तरह भ्रमण करेगी, जिसमें थोड़े से प्रयत्न से इस महान् कार्य में महत्त्वपूर्ण योगदान करने की रूप रेखा सामने होगी। जो लोग अभी तक महिला पत्रिका के सदस्य न बने हो वे शान्ति -कुंज उसका चन्दा भेजकर अपनी सदस्यता चालू करा लें आन्दोलन के स्वरूप और मार्गदर्शन को परिजनों के सम्मुख प्रस्तुत करने के लिए इस पत्रिका का शुभारम्भ किया गया हैं। महिला जागरण शाखा का गठन-नारी उत्कर्ष की हलचलों का आरम्भ एक ऐसा कार्य समझा जायेगा जिसे स्वर्ण जयन्ती वर्ष का स्मारक स्तम्भ कहा जा सकें। जहाँ भी स्वर्ण जयन्ती वर्ष के लिए उत्साह रहा हो वहाँ उसकी स्मृति को चिर स्थायी बनाने के लिए महिला संगठन खड़ा कर देने और उसे चलाने रहने की ठोस योजना बनाने के रूप में श्रद्धा की अभिव्यक्ति होनी चाहिए।
साधना स्वर्ण जयन्ती का आयोजन परक स्वरूप उत्साहवर्धक रीति से सम्पन्न हो गया। अब उसके प्रकाश एवं प्रभाव को रचनात्मक दिशा में लगाने में प्रबल प्रयत्न किया जाना चाहिए। (1)उपासना में सघन श्रद्धा, उसके लिए नित्य समय लगाने का निश्चय (2) जीवन साधना के पंचशीलों का पालन (3) दिसम्बर अखण्ड ज्योति के आह्वान आमन्त्रण एवं अपनों से अपनी बात को अपने लिए व्यक्तिगत सब मानकर कुछ करने का साहस (4) अपने संपर्क क्षेत्र में इस प्रेरणा का विस्तार। उपेक्षा को उत्साह में परिवर्तन करने के लिए जन-संपर्क का कार्य क्रम (5) महिला जागरण शाखा संगठन का आरम्भ और उसे अग्रगामी बनना। यह पाँचों कार्य करने के लिए इस बसन्त पर्व पर हमारा विशेष आग्रह हैं इस दिशा में जो जितना कर सकें उसकी सूचना शान्ति-कुँज पहुँचा दें।
नया भोर हँसता आता है, मुस्काती आती ऊषायें। चलो समय का शंख बजाकर, युग की नयी आरती गाये॥
मधु अमृत उमड़े पड़ते हैं, भर्गः तेज तरल हो आया! प्राची का सूरज, हिमगिरि के शिखरों पर चढ़कर मुस्काया! भागीरथी भावनाओं की उमड़ी, कण-कण प्राण नहाया!
जगे वेद मन्त्र, ऋषि जागे, जाग रही है नयी ऋचायें। नया भोर हँसता आता है, मुस्काती आती ऊषायें॥
गायत्री के अमृत छन्द में, महा प्राण की क्षमता उतरी! सबका मंगल लिए हृदय में, मानवता की ममता उतरी! जीवन उतरा श्वास-श्वास में, जन-मानस में समता उतरी!
तप उतरा मंगल-घट साधे, उतरी भू-पर कल्प-लतायें-नया भोर हँसता आता है, मुस्काती आती ऊषायें॥
केशर बिखर रही कन-कन में, तन-मन में नव-जीवन उतरा-स्वर्ग-सिद्धियाँ उतरी भू-पर शान्ति-कुञ्ज वन नन्दन उतरा! उतरा नया तेज जीवन में, जीवन में रस चेतन उतरा!
सम-गान-संगीत गंजाती, अँगड़ाती है चेतनायें। नया भोर हँसता आता है, मुस्काती आती ऊषायें॥
आँसू उतरा, अमृत उतरा, उतरा है भू-पर मधु गायन-अधर-अधन पर फिर से उतरे, निर्माणी गीता रामायण! करुणा उतरी प्राण-प्राण की, रस की किरणें लिए रसायन!
नये प्राप्त की नयी प्रभाती, गाती आती दसों दिशायें। नया भोर हँसता आता है, मुस्कराती आती ऊषायें॥
लाखनसिंह भदौरिया ‘सौमित्र’
*समाप्त*