साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष की पूर्णाहुति

प्रस्तुत बसन्त पर्व पर हमारी श्रद्धा का स्तर अधिक उभरे

साधना स्वर्ण-जयन्ती वर्ष गतवर्ष बसन्त पर्व से आरम्भ हुआ और अब उसकी पूर्णाहुति आगामी बसन्त पर्व ता॰ 24 जनवरी 77 सोमवार की होगी। घोषित सामूहिक साधना में प्रायः एक लाख नर-नारियाँ ने अतीव निष्ठापूर्वक भाग लिया। सूर्योदय के 42 मिनट पूर्व निष्ठा के साथ चलती रही है। साधना का विधान उसका उद्देश्य, स्वरूप एवं विवेचन समझाने के लिए गतवर्ष जनवरी के अंक में सब कुछ विस्तारपूर्वक समझा दिया गया था। दोनों नव-नवरात्रियों में इन सभी साधकों को 24 सहस्र गायत्री जप के विशेष अनुष्ठानों के लिए निर्देश था सो थोड़े-से अत्यन्त व्यस्त एवं रुग्ण व्यक्तियों को छोड़ कर सभी ने वह साधना भी सम्पन्न की। प्राप्त सूचनाओं से विदित होता रहा है कि इन एक लाख साधकों में से अधिकांश को चमत्कारी अनुभूतियाँ हुई और अनुभव किया कि वे स्वल्प श्रम में अधिक लाभ देने वाली महत्त्वपूर्ण साधना का सत्परिणाम प्राप्त करने में सफल रहें है।

प्रस्तुत साधना में संलग्न सभी साधकों को इस विशिष्ट साधना की पूर्णाहुति कर लेनी चाहिए। वसन्त पर्व अपने परिवार का सबसे बड़ा त्यौहार है। अपनी समस्त महत्त्वपूर्ण गतिविधियाँ उसी शुभ मुहूर्त से आरम्भ हुई हैं। इस मिशन का जन्म दिन इसी दिन पड़ता है। उसके सूत्र संचालक का जन्म दिन भी वही है। अस्तु पूरा परिवार किसी न किसी रूप से उस दिन अपनी श्रद्धा अभिव्यक्ति का प्रकटीकरण छोटे-बड़े हर्षोत्सव के रूप में सम्पन्न करता है। परिवार के छोटे-बड़े सभी घटक व्यक्तिगत एवं सामूहिक रूप से यह पर्व पूरा होने से इसी अवसर पर इसकी भी पूर्णाहुति होनी है। अतएव स्वभावतः उसका स्वरूप अधिक उत्साहवर्धक बन जाएगा

जिन साधकों ने 45 मिनट की एक वर्षीय साधना में भाग लिया है, उन सभी को सामूहिक गायत्री यज्ञ के रूप में सभा-सम्मेलन की व्यवस्था भी की जानी चाहिए। अधिक लोगों को इसमें सम्मिलित रहने के लिए अभी से आमन्त्रित करना आरम्भ किया जाय, ताकि उस दिन अवकाश निकाल कर आयोजन में योगदान देने के लिए वे पहले से ही तैयार रह सके। प्रभात-फेरी सामूहिक जप, गायत्री यज्ञ यह कार्यक्रम प्रातःकाल के हैं। जिनमें स्वर्ण-जयन्ती वर्ष की साधना में भाग लिया है, वे अनिवार्यतः और शेष साधन प्रिय लोग सामान्यतः इस प्रातः काल के जप, हवन, कार्यक्रम में सम्मिलित रहें। परिवार के प्रत्येक सदस्य के यहाँ ज्ञान-घट स्थापित हो। इसके लिए इस दिन को विशेष दिन माना जाय। एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य देने की शर्त का पालन सभी परिजन अनिवार्य रूप से पालक करें, नये सदस्य बढ़ाये। सदस्यता के संकल्प प्रातः काल यज्ञ की पूर्णाहुति के समय ही कराये जाएँ। पुरानों में नव-चेतना और नये में नया संकल्प इस अवसर पर जितने उत्साह के साथ संपन्न होगा, उतनी ही आप जनों की सफलता मानी जाएगी इस अंशदान को शाखा संगठनों का प्राण माना जाना चाहिए। जहाँ इस सन्दर्भ में तत्परता दिखाई देगी वहीं मिशन की गतिविधियों का जीवन्त बना रहना सम्भव हो सकेगा।

सायंकाल को जुलूस-सभा का आयोजन किया जाय। साधन को उत्सव की जानकारी और उसमें सम्मिलित रहने का निमन्त्रण देने के लिए टोली बनाकर घर-घर जाया जाना चाहिए। संगीत गायन मिशन की विचारधारा के अनुरूप हों। प्रवचनकर्ता सुलझे हुए एवं मिशन की गतिविधियों से पूर्ण परिचित हों। भाषण का उद्देश्य मिशन के प्रति आवश्यक उत्साह उत्पन्न करना होना चाहिए। व्यर्थ की बकवास में सम्मेलन का एक मिनट भी नष्ट न हो, इसकी पूरी सतर्कता रखी जाय।

अगले वर्ष के नये उत्सव निश्चय इसी पुण्य पर्व पर करने की उमंग प्रत्येक परिजन में उत्पन्न की जाय। दिसम्बर की अखण्ड-ज्योति में आह्वान-आमन्त्रण एवं वसन्त पर्व के उपलक्ष में अभीष्ट कर्तव्यों की जानकारी देने वाले लेख छपे हैं। उनके आधार पर हम में से प्रत्येक को विचारे करना चाहिए ओर देखना चाहिए कि इनमें से किस प्रकार’-’ कौन क्या कर सकता है? बसन्त पर्व ऐसी ही प्रेरणा लेखक युग-निर्माण परिवार के सदस्यों के सम्मुख आता है कि उन्हें आदर्शवादी चिन्तन तक ही सीमित नहीं रहना चाहिए, वरन् उस दिशा में अपनी श्रद्धा की गहराई एवं जीवन्त कर्मनिष्ठा का परिचय भी देना चाहिए। यह बसन्त पर्व इतने उत्साह के साथ मनाया जाना चाहिए कि उसे स्वर्ण-जयन्ती साधना वर्ष की उत्साहवर्धक पूर्णाहुति के स्तर का माना जा सके।


अन्तर की गहराई में उतरें

विपत्ति ओर अतृप्ति से भरा नीरस जीवन यह बताता है कि अन्तःकरण की गरिमा सूखने और झुलसने लगी है। जड़ें मजबूत और गहरी हों तो जमीन में से पेड़ के लिए पर्याप्त जीवन-रस प्राप्त और झुलसने लगी हैं और वह हरा-भरा बना रहता है। आन्तरिक श्रद्धा यदि मर न गई हो तो अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी सरसता और प्रफुल्लता खोजी जा सकती है। उल्लास सुख-साधनों पर नहीं, उत्कृष्ट दृष्टिकोण पर निर्भर है।

विलास की सुविधा, सामग्री प्रकृत पदार्थों से और मनचाहे सहयोगियों की सहायता से मिलती है। पर यदि आनन्द की आवश्यकता हो तो उसे बिना पदार्थ या व्यक्ति की सहायता से प्रचुर परिणाम में पाया जा सकता है। उसके लिए अपनी ही अन्तरात्मा का परिशोधन करना पड़ता है। आन्तरिक पवित्रता में इतना सौंदर्य और मिठास भरा पड़ा है कि उसके दर्शन पाने, करने तथा रसास्वादन करने से वह मिलता है, जिसके अभाव में जीव को निरन्तर भटकना ही भटकना पड़ता है।

बाहर दौड़ने में पुरुषार्थ है। पुरुषार्थ कई तरह की सफलताएँ प्रस्तुत करता है। बड़प्पन की प्यास हो तो जल-जंगल छानने ही पड़ेंगे, पर यदि महानता का देवत्व अभीष्ट हो तो उसके लिए भीतर की खोज करनी पड़ेगी तृप्ति किसी पदार्थ में नहीं, दृष्टिकोण की गरिमा में उसका स्त्रोत है। जीवन का आनन्द लेना हो तो उसके लिए अन्तर की गहराई में उतरने का, समुद्र तल से मोती ढूँढ़ लाने वाले जैसा साहस सँजोना पड़ेगा।


एक दृश्य-एक तथ्य

संध्या का समय था। सूर्य अस्ताचल को ओढ़कर अपना मुँह ढाँकने का प्रयत्न कर रहा था। मन्द-मन्द हवा बह रही थी और उसी के साथ भगवती भागीरथी का जल-कल कर बह रहा था। तट पर, एक शिला पर बैठे स्वामी दयानन्द आत्म-चिन्तन में निरत थे- परमात्मा की यह सृष्टि कितनी सुन्दर है और सर्वेश्वर की कृति आनन्दप्रद। पक्षी दिन भर के श्रम से थक कर आये अपने घोंसलों में विश्राम से पूर्व चहक रहे थे। लगता था वे अपने बच्चों के साथ बैठ कर सन्ध्या गीत गा रहे हो।

हे अनन्त के सृष्टा और आनन्द के दाता तुझे कोटिशः प्रणाम-महर्षि प्रणत भाव से बुदबुदा उठे। प्रकृति भी सन्ध्या की मन्द शीतल पवन के हिलोरों से मुदित होकर शयन की तैयारी कर रही थी। चारों ओर एकान्त था। ध्वनियाँ थी तो केवल पक्षियों की चोंच से निकले स्वर व सरिता के बहते हुए नीर की, जैसे आनन्द का संगीत बज रहा हो और ऋषि के हृदय में भी उसी आनन्द की वीणा बज रही थी। वे प्राणायाम करते, दीर्घश्वास सोच्छवास छोड़ते पुनः प्राण ग्रहण करते और समाधिस्थ हो जाते।

ध्यान टूटा तो पास हो कहीं से आती हुई सिसकियों से। लगता था कोई किसी से सदा के लिए बिछुड़ रहा हो और सिसकने वाला जाने वाले को भगवती जाह्नवी को सौंप कर अन्तिम विदा दे रहा हो।

ऋषि ने उस ओर देखा जिस ओर से कि सिसकी आ रही थी। न अधिक दूर और न अधिक समीप। एक दीन-हीन जीर्ण वस्त्र पहने कंगाल मात्र नारी देह अपने शिशु का शव जल समाधि देने के जिए झुकी।

शिशिर की शीत समीर के मन्द झोंके और जाह्नवी के शीतल जल की ठण्डक ने माँ को जैसे कंपकंपा कर रख दिया! उससे भी अधिक पुत्र विछोह ने कँपा कर रख दिया होगा। वह अबला इन्हीं शीतल झोंकों के कारण पानी में लुढ़कते-लुढ़कते बची थी। उसकी एकमात्र ओढ़नी जिसका उपयोग उसने कफ़न के लिए भी किया था भीग चुका था और पुत्र के तैरते हुए शव को किनारे पर बैठी वह फटी-फटी आँखों से निहार रही थी। शव जब आँखों से ओझल हो गया तो दुःख, विलाप ओर विवशता की त्रिवेणी में डूबती हुई वह माँ लौटने लगी।

ऋषि ने समीप जाकर पूछा- देवी क्या इस शिशु का पिता साथ नहीं आया।’

फूट पड़ी वह। बड़ी कठिनता से बोली- वृद्ध पति अभी दो माह पूर्व ही मुझे अकेली छोड़कर चले गये हैं तथा अब वह यह पुत्र भी।’

आयु में तो वह अभी युवती ही दिखाई दे रही थी और अपने पति के साथ वृद्ध का सम्बोधन अनायास ही लगाकर ऋषि हृदय को झकझोर दिया था, अपनी स्थिति का कारण बताकर।

‘हे सर्वेश्वर! अब तू मुझे माताओं का इस रूप में दर्शन करा रहा है- ऋषि के ओष्ठ फड़फड़ाये। वे भाव मग्न से हो गये थे ओर स्त्री जा चुकी थी।

पर ऋषि को एक नयी दृष्टि देकर।

अब वे चैन से नहीं बैठ सके। उन्होंने संकल्प लिया कि- माताओं की यह दुर्दशा करने वाली परिस्थितियों को बदल कर रहूँगा। अकेले अपना कल्याण कर लिया तो मुझ सा स्वार्थी ओर कौन होगा? जिसने माँ का दूध पिया, उसके आँचल की छाया में रहा यह मात्र स्वार्थ ही नहीं कृतघ्नता भी है।

और अतीत बताता है। पहली बार अब से शताधिक वर्ष अनमेल विवाह जैसी कुरीतियों को चुनौती दी तथा उन्हें हटाने के लिए आजीवन संघर्षरत रहे, एक हम हैं जो आये दिन अपनी आँखों से बुराइयाँ देखते हैं, पर उनसे जूझने से कतराते ही रहते हैं।


इस संसार की यथार्थता समझें और तत्त्व-दृष्टि प्राप्त करें।

वेदान्त दर्शन यह कहता है कि अंश और अंशी अविच्छिन्न सम्बन्ध है। मठाकाश और घटाकाश का भेद नहीं है। सर्व-खल्विदं ब्रह्म’ यह सब कुछ ब्रह्म है। दृश्य और दृष्टा के अन्तर को अवास्तविक बताते हुए, तत्त्वदर्शियों ने कहा है, मन ही दृश्य वस्तु के रूप में प्रकट होता है। जो वस्तु हमें जिस रूप में दिखती है, वस्तुतः वह वैसी ही नहीं है। पदार्थ के कम्पन और इन्द्रियों की ग्रहण शक्ति की जो प्रतिक्रिया मस्तिष्क पर होती है, उसी का बिम्ब दृश्य बन कर दिखाई देता है। हर प्राणी को एक ही वस्तु एक ही प्रकार देता है। हर प्राणी को एक ही वस्तु एक ही प्रकार की नहीं, दीखती, उनकी आकृतियों में भारी अन्तर होता है। रंगों के बारे में तो मनुष्य-मनुष्य में ही अन्तर दीखता है। एक मनुष्य को जितने रंग जिस प्रकार के दीखते हैं, दूसरे को उससे न्यूनाधिक दीखते हैं। इसी प्रकार स्वाद में अन्तर रहता है। मनुष्य और पशुओं की इन्द्रियों में स्वाद का भारी अन्तर रहता है। मनुष्य को नीम की पत्तियाँ कड़ुई लगती है, पर ऊँट को उसका स्वाद भिन्न प्रकार का लगता है और वह उसे रुचिपूर्वक खाता है। स्वाद की तरह की दृश्य, श्रव्य, गन्ध एवं स्पर्श की अनुभूतियों का संवेदन और मस्तिष्क तन्त्र का गठन भी बहुत बड़ा कारण होता है। अस्तु किसी वस्तु के वास्तविक स्वरूप में अनुभव किया जाता है, उसमें भारी अन्तर रह सकता है।

इसी तथ्य को वेदान्त ने इस रूप में कहा है कि चेतना ही दृश्य बन कर दीखती है। यह कथन विज्ञान की दृष्टि में भी सही है, वस्तुतः यह सारी सृष्टि परमाणुमयी है। सर्वत्र परमाणुओं के गुच्छक ही पदार्थ बन कर रेत के टीलों की तरह विभिन्न वस्तुओं के रूप में दीख रहे हैं। यदि कोई यथार्थ दर्शन वाला मस्तिष्क और मन्त्र हाथ लग जाएगा, तो प्रतीत कि इस संसार में परमाणुओं की प्रकाश, ताप आदि के विद्युतीय कम्पनों की आँधियाँ भर चल रहीं हैं। जो आँखों को सत्य दीखता है, वह बादलों में बनती, बिगड़ती दिखने बाली अवास्तविक आकृतियाँ मात्र है।

मनुष्यों में से अनेक रंगों के सम्बन्ध में आँशिक अन्धे होते हैं। इन्हें कलर ब्लाइण्ड कहते हैं। हजार पीछे तीस-चालीस आदमियों में यह बीमारी पाई जाती है। प्रख्यात साहित्यकार जार्ज बर्नार्डशा को हरे और पीले रंग का अन्तर दिखाई नहीं पड़ता था। यह कमी उन्हें तब प्रतीत हुई, जब वे अपने हरे सूट के लिए बाज़ार में पीली टाई खरीद रहे थे। दुकानदार ने समझाया कि आप सूट के रंग की टाई खरीदें, वही फबेगी। बर्नार्डशा ने पूछा, तो क्या मैं कोई गलत रंग का चुनाव कर रहा हूँ? इसी पर बात बढ़ी ओर रंगों की पहचान करने की नौबत आ पहुँची। निष्कर्ष यह निकला कि बर्नार्डशा हरे और पीले रंग का अन्तर नहीं देख पाते।

यह संसार वस्तुतः कैसा है, इसके दो ही उत्तर हैं, या तो यह चेतनामय ब्रह्म है, या फिर जड़, निर्जीव निस्तब्ध जड़ और चेतन का जहाँ संयोग है। वहाँ विभिन्न प्रकार की हलचलें हो रही हैं। उत्पादन, अभिवर्धन के संयोग से उत्पन्न होती है।

इन्द्रियों से, मन से संसार में जो प्रिय-अप्रिय अनुभव होते हैं, वे अपने ही दृष्टि कोण की प्रतिक्रिया, प्रतिच्छाया है। किस वस्तु का स्वाद कैसा है, यह पूछना व्यर्थ है। पदार्थ और जिव्हा के रसों के स्पर्श से जो अनुभूति होती है, वही स्वाद है। आवश्यक नहीं कि हर मनुष्य को एक जैसा ही किसी खाद्य पदार्थ का अनुभव हो। हर व्यक्ति की स्वादानुभूति एक ही पदार्थ के सम्बन्ध में अत्यधिक भिन्न हो सकती है। शक्कर की मिठास का स्वाद किस प्रकार का होता है, इसका कोई सही विश्लेषण सम्भव हो सके, तो पता चलेगा कि जिस प्रकार हर, मनुष्य की आकृति में भिन्नता होती है, उसी प्रकार उनकी उनकी स्वादानुभूति में भी सूक्ष्म स्तर पर भिन्नता पाई जा सकती है। यही बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में भी है। दृश्य, श्रवण आदि में भी अन्तर रहता है। काम सेवन के समय की अनुभूतियाँ प्रत्येक पति-पत्नि की दूसरों की तुलना में अन्य ढंग की, अनोखी होती है। किसी की किसी से समता नहीं हो सकती है।

मनुष्यों की इन्द्रियाँ जिस प्रकार अनुभव करती हैं, आवश्यक नहीं कि अन्य प्राणी भी उन पदार्थों को उसी प्रकार का अनुभव करें। रंगों की अनुभूति मनुष्य की तुलना में अन्य प्राणियों को भिन्न प्रकार की होती हैं। करते हैं कि हाथी की आँख में मनुष्य इतना बड़ा दीखता है, जितना कि मनुष्य को हाथी। स्वाद में नीम के कड़ुए पत्ते ऊँट को अति मधुर लगते होंगे, तभी तो वह उन्हें रुचि पूर्वक खाता है। मनुष्य जीवित चूहा दाँतों से कुतर कर खाये तो वह उसे अप्रिय लगेगा। वही बिल्ली को इतना स्वादिष्ट लगता है, जितना हम लोगों को मिष्ठान-पकवान

वेदान्त दर्शन में इस संसार को माया, मिथ्या एवं स्वप्न की संज्ञा दी गई है। यह प्रतिपादन इस अर्थ से सही है, कि प्रिय-अप्रिय की अनुभूतियाँ हमें होती हैं, वे सत्य नहीं है। वर्षा के दिनों इन्द्र धनुष दीखता तो है, पर उसे पकड़ने का प्रयत्न किया जाय, तो निष्फल होगा। क्योंकि दीखते हुए भी, वह सूर्य किरणों पर वर्षा-बिन्दुओं के प्रतिबिम्ब की प्रतिक्रिया मात्र है, वस्तुतः उस प्रकार का कोई पदार्थ वहाँ है नहीं, जैसा कि इन्द्रधनुष दीखता है। मृग मरीचिका में रेत के चमकते कण रात्रि में जलाशय होने जैसा भ्रम उत्पन्न करते हैं। सिनेमा के पर्दे पर घुड़दौड़ के दृश्य देखे जा सकते हैं, जबकि वस्तुतः वहाँ वैसा कुछ हो नहीं रहा है। स्थिर चित्रों को घुमाने की गति बढ़ जाने से आंखें धोखा खाती हैं ओर स्थिर चित्रों को गतिशील अनुभव करती हैं। स्वप्नों का संसार भी ऐसा ही है, वहाँ न प्राणी होते हैं, न पदार्थ। ऐसे ही भ्रम जंजालों की एक नई दुनिया बस जाती है और स्वप्नदर्शी उस समय ठीक ऐसा ही अनुभव करता है, मानों जो कुछ वह देख रहा है, सर्वथा सत्य ही है। जागृति से पता चलता है कि, रात्रि भर जिस सपने के कारण हँसने-रोने के उभार आते रहे, वह अपने ही मस्तिष्क का रचा हुआ इन्द्रजाल भर था।

इस संसार की भी ऐसी ही स्थिति है। यहाँ जड़ पदार्थ निर्जीव होने के कारण किसी को किसी प्रकार की अनुभूति सम्वेदना दे सकने की स्थिति में नहीं है। प्राणि जगत के जीवधारी भी अपने कार्य-कलाप में उलझे हुए हैं। उनकी अपनी समस्याएँ एवं आवश्यकताएँ ही इतनी हैं कि दूसरों के लिए कुछ अधिक सोच या कर सकना सम्भव नहीं है। यही वस्तु स्थिति है। इतने पर भी हमारा प्राणियों के प्रति मोह और पदार्थों के प्रति जो लोभ है, वह अपनी ही मानसिक संरचना है। मकड़ी की तरह हम अपने पेट में धागा निकाल कर जाला बुनते हैं और उसी में उलझ कर समस्या ग्रसित होते हैं। हम चाहें तो इस जाल को स्वयं ही आसानी से समेट सकते हैं ओर रागद्वेष के ज्वार-भाटों में उलझते गिरते रहने की विपन्नता से छुटकारा पाकर शान्ति और विनोद भरा जीवन जी सकते हैं।

यह संसार सत्य इस अर्थ से है कि इसमें ब्रह्म तत्त्व की चेतना ओर उसकी इच्छा-लीला-क्रीड़ा से उत्पन्न प्रकृति इन दोनों का ही सम्मिलित हास-परिहास चल रहा है। इस विराट् ब्रह्म को विशाल विश्व के रूप में देखा जा सकता है। और ईश्वर दर्शन का हर घड़ी लाभ लेते हुए सत्कर्म पूजा की प्रभु आराधना में निरत रहा जा सकता है। सर्व खलु इदं ब्रह्म-ईशावास्यमिदंसर्वं-के प्रतिपादनों से यह समस्त प्रसार ईश्वर की झाँकी की। अयमात्मा ब्रह्म की मान्यता अपना कर हम आत्म परिष्कार और आत्मविकास के परम पुरुषार्थ में संलग्न रह सकते हैं और वह प्राप्त कर सकते हैं, जिसके लिए यह सुर दुर्लभ मनुष्य जीवन मिला है। यही है इस संसार की वास्तविकता, जिसे वेदान्त दर्शन ने सूत्र रूप में किन्तु सारगर्भित व्याख्या समेत समझाया है।


आत्मोत्कर्ष के चार अनिवार्य चरण

आगे बढ़ने का क्रम यह है कि एक कदम पीछे से उठा कर आगे रखा जाय और जो आगे रखा था उसे और आगे बढ़ाया जाय। इसी प्रकार चलने की क्रिया संपन्न होती है और लम्बी मंजिल पार की जाती है। आत्मिक प्रगति का मार्ग भी यही है। पिछड़ी योनियों में रहते समय जो पिछड़े संस्कार चेतना भूमि में जड़ जमाकर जहाँ-तहाँ बैठे हुए हैं उनका उन्मूलन किया जाय और दैवी प्रवृत्तियाँ, जो अभी तक समुचित परिणाम में प्राप्त नहीं हो पाई हैं, उन्हें प्रयत्न पूर्वक अपनाया और बढ़ाया जाय। किसान यही करता है। खेत को जोतता है, उसमें से पिछली फसल के पौधों की सूखी हुई जड़ों को हल चला कर उखाड़ता है। कंकड़ पत्थर बीनता है और नई फसल उगाने में जो भी अवरोध थे, उन्हें समाप्त करता है। इसके उपरान्त उर्वरता बढ़ाने के लिए खाद पानी का प्रबन्ध करता है और बीज बोने के उपरान्त नई फसल अच्छी होने की आशा करता है। आत्मिक प्रगति के मार्ग को कृषि कर्म के समतुल्य गिना जा सकता है। मनुष्य पद के लिए अनुपयुक्त पिछले कुसंस्कारों को उखाड़ कर उन्मूलन करना एक काम है और जो इस पद को सफल सार्थक बना सके ऐसे उत्कृष्ट स्तर के गुण कर्म स्वभावों को अभ्यास में लाना, यही है वह उभय-पक्षीय क्रिया-कलाप जिसमें आत्मिक प्रगति का उद्यान विकसित होते और फलते-फूलते देखा जा सकता है। प्रगतिशीलता अपनाने का उपाय एक ही है कि अवांछनीयताओं को निरस्त करते चला जाय और जो अभीष्ट आवश्यक है उसे अपनाने के लिए पूरे उत्साह का प्रयोग किया जाय। उत्कर्ष के उच्च शिखर पर चढ़ने के लिए इस रीति-नीति को अपनाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग है नहीं।

आत्मिक प्रगति का भवन, चार दीवारों से मिल कर बनता है। इस तख्त में चार पाये हैं। चारों दिशाओं की तरह आत्मिक उत्कर्ष के भी चार आधार हैं। ब्रह्माजी के चार मुखों से निकले हुए चार वेदों में इसी ज्ञान-विज्ञान का वर्णन है। चार वर्ण-चार आश्रमों का विभाजन इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया है। इन्हें (1) आत्म-चिन्तन (2) आत्म-सुधार (3) आत्म-निर्माण और (4) आत्म विकास के नाम से पुकारा जाता है। इन्हें एक एक करके नहीं वरन् समन्वित रूप से सम्पन्न किया जाता है। रोटी, साग, चावल, दाल का आहार मिला-जुला कर करते हैं। ऐसा नहीं होता कि कुछ समय दाल ही पीते रहे-कुछ शाक खाकर रहे, फिर चावल खाया करे और बहुत दिन बाद केवल रोटी पर ही निर्भर रहे। स्कूली पढ़ाई में भाषा, गणित, भूगोल, इतिहास की पढ़ाई साथ चलती है, ऐसा नहीं होता कि एक वर्ष भाषा दूसरे वर्ष गणित तीसरे वर्ष भूगोल और चौथे वर्ष केवल इतिहास ही पढ़ाया जाय। धोती, कुर्ता, टोपी, जूता चारों ही पहन कर घर से निकला जाता है। ऐसा नहीं होता कि कुछ वर्ष मात्र जूता पहन कर रहे और पीछे जब धोती पहनना आरम्भ करें तो उतना ही पर्याप्त समझें तथा जूता, कुर्ता, टोपी को उपेक्षित कर दें। लिखने में कागज, कलम, स्याही और उँगलियों का समन्वित प्रयोग होता है। एक बार में एक ही वस्तु का प्रयोग करने से लेखन कार्य सम्भव न हो सकेगा। शरीर में पाँच तत्त्व मिलकर काम करते हैं और चेतन को पाँचों प्राण मिल कर गति देते हैं। एक तत्त्व पर या एक प्राण पर निर्भर रहा जाय तो जीवन का कोई स्वरूप ही न बन सकेगा। भोजनालय में आग, पानी, खाद्य पदार्थ एवं बर्तन उपकरणों के चारों ही साधन चाहिए। इसके बिना रसोई पक सकना कैसे सम्भव होगा? आत्म-उत्कर्ष के लिए (1) अपनी अवांछनीयताओं को ढूँढ़ निकालना-(2) सुसंस्कारों के प्रति प्रबल संघर्ष करके उन्हें परास्त करना (3) जो सत्प्रवृत्तियाँ अभी स्वभाव में सम्मिलित नहीं हो पाई हैं उन्हें प्रयत्न पूर्वक सीखने का- अपनाने का प्रयत्न करना (4) उपलब्धियों का प्रकाश दीपक की तरह सुविस्तृत क्षेत्र में वितरित करना, यह चार कार्य समन्वित रूप से सम्पन्न करते चलने की आवश्यकता पड़ती है। इन्हीं चारों को तत्त्ववेत्ताओं ने आत्म-चिन्तन आत्म-सुधार आत्म-निर्माण और आत्म-विकास के नाम से निरूपित किया है। इन चारों प्रयोजनों को दो भागो में बाँट कर दो-दो के युग्म बनते हैं। एक को मनन दूसरे को चिन्तन कहते हैं। मनन से आत्म-समीक्षा का और अवांछनीयताओं का परिशोधन आता है। चिन्तन से आत्म निर्माण और आत्म-विकास की प्रक्रिया जुड़ती है।

इन दोनों को आत्म-साधना का अविच्छिन्न अंग माना गया है। प्रातः काल उठते समय अथवा अन्य किसी निश्चिंत, शान्त, एकान्त स्थिति में न्यूनतम आधा घण्टे का समय इस प्रयोजन के लिए निकाला जाना चाहिए। मनन को प्रथम और चिंतन को द्वितीय चरण माना जाना चाहिए। दर्जी पहले कपड़ा काटता है, पीछे उसे सीता है। डाक्टर पहले नश्तर लगाता है। पीछे मरहम पट्टी करता है। यों यह दोनों ही कार्य मिले जुले हैं और तनिक से अन्तर से साथ प्रायः साथ साथ ही चलते हैं, फिर भी यदि प्रथम द्वितीय का प्रश्न हो तो मनन को पहला और चिन्तन को दूसरा चरण कहा जाएगा इस प्रक्रिया के लिए पूजा उपचार की तरह कोई विशेष शारीरिक, मानसिक स्थिति बनाने की या पूजा उपचार जैसी कोई साधन सामग्री एकत्रित करने की आवश्यकता नहीं है। चित का शान्त और स्थान का कोलाहल रहित होना ही इसके लिए पर्याप्त नहीं हैं। प्रातः सायं का समय खाली न हो तो सुविधा का कोई अन्य समय निर्धारित किया जा सकता है। आधा घण्टा की सीमा भी अनिवार्य नहीं है। यह काम चलाऊ मापदण्ड हैं। इसे आवश्यकतानुसार कम या अधिक भी किया जा सकता है, पर अच्छा यही है कि उसमें कम समय का निर्धारण रहे। नियम समय पर नियमित रूप से अपनाई गई कार्यपद्धति अस्त व्यस्त एवं अव्यवस्थित क्रिया प्रक्रिया से कितनी अधिक फलदायक होती है इसे हर कोई जानता है। आत्म चिन्तन अपने आपकी समीक्षा है। अपने दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ निकालने का प्रयास भी इसे कहा जा सकता है। प्रयोगशालाओं में पदार्थों का विश्लेषण वर्गीकरण होता है और देखा जाता है कि इस संरचना में कौन-कौन तत्त्व मिले हुए हैं? शवच्छेद की प्रक्रिया में देखा जाता है कि भीतर के किस अवयव की क्या स्थिति थी, उनमें कहीं चोट या विषाक्तता के लक्षण तो नहीं थे। रोगी की स्थिति जानने के लिए उसके मल, मूत्र, ताप, रक्त, धड़कन आदि की जाँच पड़ताल की जाती है। निदान के उपरान्त ही सही उपचार बन पड़ता है। ठीक यही बात आत्म-समीक्षा का यही उद्देश्य है।

एक सज्जन, शालीन, सम्भ्रान्त, सुसंस्कृत नागरिक का स्वरूप क्या होना चाहिए? उसके गुण, कर्म, स्वभाव में किन शालीनताओं का समावेश होना चाहिए। इसका एक ढाँचा सर्वप्रथम अपने मस्तिष्क में खड़ा किया जाय। मानवी मर्यादा और स्थिति क्या होगी? इसका स्वरूप निर्धारण कुछ कठिन नहीं है। दिनचर्या की दृष्टि से सुव्यवस्थित, श्रम की दृष्टि से स्फूर्तिवान्, मानसिक दृष्टि से सक्षम, व्यवहार की दृष्टि से कुशल, चिन्तन की दृष्टि से दूरदर्शी विवेकवान् आत्मानुशासन की दृष्टि से प्रखर, व्यक्तित्व की दृष्टि से आत्मानुशासन की दृष्टि से आत्मावलम्बी और सम्मानित हर श्रेष्ठ मनुष्य में यह विशेषताएँ होनी चाहिए। चरित्र की दृष्टि से उदार और स्वभाव की दृष्टि से मृदुल एवं हँसते-हँसाते रहने वाला उसे होना चाहिए। सादगी और सज्जनता मिले जुले तत्त्व हैं। आन्तरिक विभूतियाँ और बाह्य साधन सम्पत्तियों का सुव्यवस्थित सदुपयोग कर सकने वालों को सुसंस्कृति कहते हैं। अपने कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों को समझने वाले और उनके पालन को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर चलने वालों को सभ्य कहा जाता है। ऐसी ही विशेषताओं से सम्पन्न व्यक्ति की सच्चे अर्थों में ‘मनुष्य’ कहा जा सकता है। ‘मनुष्यता’ से मानवी सद्गुणों से विभूषित व्यक्ति ही, मानव समाज का सभ्य सदस्य कहला सकता है। ऐसे सद्गुण सम्पन्न मनुष्य को मापदण्ड मान कर उसके साथ तुलना की जाय तो जो कुछ हम हैं वह भी आत्मिक श्रेष्ठता की अनुभूति होगी और यदि अत्यधिक उच्च स्थिति के महामानवों से तुलना की जाय तो सामान्य स्थिति रहते हुए भी अपनी स्थिति असंतोषजनक और गई-गुजरी प्रतीत होती रहेगी। नाप-तोल को बाँटा, गज, मीटर आदि की जरूरत पड़ती है। तुलनात्मक आधार अपनाने पर ही समीक्षा सम्भव होती हैं अन्यथा वस्तुस्थिति कितना रहना चाहिए, यह विदित रहने पर ही बुखार चढ़ने या शीत का ज्ञान रहने नर ही नापने वाला यह बता सकता है कि ब्लड प्रेशर’ घटा हुआ है या बढ़ा हुआ। इसी प्रकार एक सज्जनता एवं मानवतावादी मनुष्य का जीवन स्तर निर्धारित करने और उसके साथ अपने को तोलने में ही अपनी हेय, मध्यम एवं उत्तम स्थिति का विवेचन, विश्लेषण, निर्धारण सम्भव हो सकेगा।

हम जिन दुष्प्रवृत्तियों के लिए दूसरों की निन्दा करते हैं उनमें से कोई अपने स्वभाव में सम्मिलित तो नहीं हैं, जिनके लिए हम दूसरों से घृणा करते हैं वैसी दुष्प्रवृत्तियाँ अपने में तो नहीं हैं? जैसा व्यवहार हम दूसरों से अपने लिए नहीं चाहते वैसा व्यवहार हम दूसरों के साथ तो नहीं करते? जैसे उपदेश हम आये दिन दूसरों को करते रहते हैं वैसे आचरण अपने हैं या नहीं? जैसी कि हम प्रशंसा एवं प्रतिष्ठा चाहते हैं वैसी विशेषताएँ अपने में है या नहीं? ऐसे प्रश्न अपने आप से पूछने और सही उत्तर पाने की चेष्टा की जाय तो अपने गुण, दोषों का वर्गीकरण ठीक तरह हो सकना सम्भव हो जाएगा

यों यह कार्य है अति कठिन। हर मनुष्य में अपने प्रति पक्षपात करने की दुर्बलता पाई जाती हैं। आँखें बाहर पक्षपात को देखती हैं, भीतर का कुछ पता नहीं। कान बाहर के शब्द सुनते हैं, अपने हृदय और फेफड़ों से कितना अनवरत ध्वनि प्रवाह गुँजित होता है, उसे सुन ही नहीं पाते इसी प्रकार दूसरों के गुणों-अवगुण देखने में रुचि भी रहती है और प्रवीणता भी, पर ऐसा अवसर कदाचित ही आता है जब अपने दोषों को निष्पक्ष रूप में देखा और स्वीकारा जा सके। आमतौर से अपने गुण ही गुण दीखते हैं दोष तो एक भी नजर नहीं आता। जिस कार्य को कभी भी न किया हो वह बन ही नहीं पड़ता।

आत्मा-समीक्षा कोई कब करता हैं? अस्तु वह प्रक्रिया ही कुंठित हो जाती है। अपने दोष ढूँढ़ने में काफी कठोरता बरतने की क्षमता उत्पन्न हो जाय तो वस्तुस्थिति समझने और सुधार कि लिए प्रयत्न करने का अगला चरण उठाने में सुविधा होती है।

दोष दुर्गुणों के सुधार के लिए अपने आप से संघर्ष करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। गीता में जिन महाभारत का उल्लेख और जिसमें भगवान ने हठपूर्वक जो कार्य नियोजित किया था वह अन्तः संघर्ष ही था भगवान के अवतरण में अधर्म के नाश और धर्म के संस्थापन की प्रतिज्ञा जुड़ी हुई है। अवतार इसी प्रयोजन के लिए होते हैं अन्तःकरण में जब भी भगवान अवतरित होते हैं तब विचार और व्यवहार के साथ लिपट कर सम्बन्धियों जैसी प्रिय लगने वाली असुरता से लड़ने के लिए कटिबद्ध होना पड़ता है। अवतार को असुरों को परास्त करने और देवत्व को जिताने का कार्य अनिवार्य रूप से करना पड़ा है। इस प्रक्रिया को व्यक्तियों का जीवन की दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण और सत्प्रवृत्तियों का संबोधन कह सकते हैं। ईश्वर की दिव्य ज्योति जिस भी अन्तरात्मा में प्रकट होगी उसमें प्रथम स्फुरणा यही होगी कि जीवन के जिस भी क्षेत्र में दुष्ट-दुर्बुद्धि छिपी पड़ी है और दुष्टकर्मों के लिए ललचाती है उसे ताड़का, सूर्पणखा, पूतना की तरह निरस्त कर दिया जाय।

बुरे विचारों को अच्छे विचारों से काटा जाता है और बुरी आदतों के स्थान पर नई आदतों को अभ्यास में लाना पड़ता है। इस कार्य में एक प्रकार से अन्तःयुद्ध जैसी परिस्थिति उत्पन्न होती है। यह परिवर्तन अनायास ही- इच्छा मात्र से- हो सकना सम्भव नहीं। प्रचण्ड मनोबल और संकल्पशक्ति का उपयोग करने से ही यह हेर-फेर होता है। विष को विष से मारा जाता है- काँटे को काँटे से निकाला जाता है और चाटे का जवाब घूँसे से दिया जाता है। सेना के साथ सेना लड़ती है। टैंक तोड़ने के लिए तोप के गोले बरसाने पड़ते हैं। संघर्ष में समतुल्य बल का प्रयोग करना पड़ता है। मस्तिष्क में भरे हुए कुविचारों की सद्विचारों से काटना पड़ता है। निकृष्टता की और आकर्षित करने वाले वातावरण के प्रभाव को निरस्त करने के लिए उत्कृष्टता के लोक में अपने को पहुँचाना होता है। यह कार्य स्वाध्याय और सत्संग की सहायता से ही यह सम्भव हो सकता है। अपने समीपवर्ती लोग प्रायः स्वार्थपरता और निकृष्टता की दिशा में ही प्रेरणा देते ही दीख पड़ने, ग्रहण करने का प्रयत्न करें। उनके जीवन चरित्र पढ़ें ओर आदर्शवादी प्रेरणाप्रद प्रसंगों एवं व्यक्तियों को अपने सामने रखें। उस स्तर के लोग प्रायः सत्संग के लिए के लिए सदा उपलब्ध नहीं रहते। यदि होते भी हैं तो उनके प्रवचन और कर्म में अन्तर रहने से समुचित प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसी दशा में सरल और निर्दोष तरीका यही है कि ऐसे सत्साहित्य का नित्य-नियमित रुपं से अध्ययन किया जाय जो जीवन की समस्याओं को सुलझाने, ऊँचा उठाने और आगे बढ़ाने में सहायक सिद्ध होता हो। ऐसा साहित्य न केवल पढ़ा ही जाय वरन् प्रस्तुत विचारधारा को व्यावहारिक जीवन में उतारने के लिए उत्साह भी उत्पन्न किया जाय और सोचा जाय कि इस प्रकार की आदर्शवादिता अपने में किस प्रकार उत्पन्न की जा सकती है। इसके लिए योजनाएँ बनाते रहा जाय और परिवर्तन काल में जो उलट-पुलट करनी पड़ेगी उसका मानसिक ढाँचा खड़ा करते रहा जाय। यही है आन्तरिक महाभारत की पृष्ठभूमि प्रत्यक्ष संग्राम तब खड़ा होता है जब अभ्यस्त गन्दे विचारों को उभरने न देने के लिए कड़ी नजर रखी जात है और जब भी वे प्रबल हो रहे हों तभी उन्हें कुचलने के लिए प्रतिपक्षी सद्विचारों की सेना सामने ला खड़ी की जाती है। व्यभिचार की ओर जब मन चले तो इस मार्ग पर चलने की हानियों का फिल्म चित्र मस्तिष्क में घुमाया जाय और संयम से हो सकने वाले लाभों का- उदाहरणों का- सुविस्तृत दृश्य आँखों के सामने उपस्थित कर दिया जाय। यह कुविचारों और सद्विचारों की टक्कर हैं यदि मनोबल प्रखर है और न्यायाधीश जैसा विवेक जागृत हो तो कुविचारों का परास्त होना और पलायन करना सुनिश्चित है। सत्य में हजार हाथी के बराबर बल होता है। आसुरी तत्त्व देखने में तो बड़े आकर्षक और प्रबल प्रतीत होते हैं, पर जब सत्य की अग्नि के साथ उनका पाला पड़ता है तो फिर उनकी दुर्गति होते भी देर नहीं लगती। काठ की हाँड़ी की तरह जलते और कागज की नाव की तरह गलते हुए भी उन्हें देखा जा सकता है।

अभ्यस्त कुसंस्कार आदत बन जाते हैं और व्यवहार में अनायास ही उभर-उभर कर आते रहते हैं। इनके लिए भी विचार संघर्ष की तरह कर्म संघर्ष की नीति अपनानी पड़ती है। थल सेना से थल सेना लड़ती हैं और नभ सेना के मुकाबले नभ सेना भेजी जाती है। जिस प्रकार कैदियों को नई बदमाशी खड़ी न करने देने के लिए जेल के चौकीदार उन पर हर घड़ी कड़ी नजर रखते हैं वहीं नीति दुर्बुद्धि पर ही नहीं दुष्प्रवृत्तियों पर भी रखनी पड़ती है। जो भी उभरे उसी से संघर्ष खड़ा कर दिया। बुरी आदतें जब कार्यान्वित होने के लिए मचल रही हों तो उसके स्थान पर उचित सत्कर्म ही करने का आग्रह खड़ा कर देना चाहिए और मनोबल पूर्वक अनुचित को दबाने दुर्बल होगा तो ही हारना पड़ेगा अन्यथा सत्साहस जुटा लेने पर श्रेष्ठ स्थापना से सफलता ही मिलती है। घर में बच्चे जाग रहे हों बुड्ढे खाँस रहे हों तो भी मजबूत चोर के पाँव काँपने लगते हैं और वह उलटे पैरों लौट जाता है। ऐसा ही तब होता है जब दुष्प्रवृत्तियों की तुलना में सत्प्रवृत्तियों को साहसपूर्वक अड़ने और लड़ने के लिए खड़ा कर दिया जाता है।

छोटी बुरी आदतों से लड़ाई आरम्भ करनी चाहिए और उनसे सरलतापूर्वक सफलता प्राप्त करते हुए क्रमशः अधिक कड़ी- अधिक पुरानी और अधिक प्रिय बुरी आदतों से लड़ाई आरम्भ करनी चाहिए। छोटी सफलताएँ प्राप्त करते चलने से साहस एवं आत्म-विश्वास बढ़ता है और इस आधार पर अवांछनीयताओं के उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों के संस्थापन में सफलता मिलती चली जाती है। यह प्रयास देर तक जारी रहना चाहिए। थोड़ी-सी सफलता से निरास नहीं हो जाना चाहिए। लाखों योनियों के कुसंस्कार विचार मात्र से समाप्त नहीं हो जाते। वे मार खाकर अन्तःकरण के किसी कोने में जा छिपते हैं और अवसर पाते ही छापामारों की तरह घातक आक्रमण करते हैं। इनसे सतत् सजग रहने की आवश्यकता है। आजन्म यह सतर्कता अनवरत रूप से बरती जानी चाहिए कि कहीं बेखबर पाकर दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति की घातें फिर न पनपने लगें।

आत्म-निर्माण का तीसरा चरण इस प्रयोजन के लिए है कि श्रेष्ठ सज्जनों में गुण, कर्म, स्वभाव की जो विशेषताएँ होनी चाहिए उनकी पूर्ति के लिए योजनाबद्ध प्रयत्न किया जाय। दुर्गुणों की प्रतिष्ठापना भी तो होनी चाहिए। कटीली झाड़ियाँ उखाड़ कर साफ कर दी गई यह तो आधा ही प्रयोग पूरा हुआ। आधी बात तब बनेगी जब उस भूमि पर सुरम्य उद्यान लगाया जाय और उसे पाल-पोस कर बड़ा किया जाय। बीमारी दूर हो गई यह आधा काम है। दुर्बल स्वास्थ्य को बलिष्ठता की स्थिति तक ले जाने के लिए जिस परिष्कृत आहार-बिहार को जुटाया जाना आवश्यक है। उसकी ओर भी तो ध्यान देने और प्रयत्न करने में लगना चाहिए।

आलस्य दूर करने की प्रतिक्रिया श्रम-शीलता में समुचित रुचि एवं तत्परता के रूप में दृष्टिगोचर होना चाहिए। प्रमाद से पिण्ड छूटा हो- लापरवाही और गैर जिम्मेदारी हटा दी तो उसके स्थान पर जागरूकता, तन्मयता, नियमितता, व्यवस्था जैसे मनोयोग का परिचय मिलना चाहिए। मधुरता शिष्टता, सज्जनता, दूरदर्शिता, विवेकशीलता, ईमानदारी संयमशीलता, मितव्ययिता, सादगी, सहृदयता, सेवा भावना जैसी सत्प्रवृत्तियों में ही मानवी गरिमा परिलक्षित होती है। उन्हें अपनाने स्वभाव का अंग बनाने के लिये सतत् प्रयत्नशील रहा जाना चाहिये। आमतौर से लोग धन उपार्जन को प्रमुखता देते हैं और उसी के लिये अपना श्रम, संयम, मनोयोग लगाये रहते हैं। उत्कर्ष के इच्छुकों को सम्मति से भी अधिक महत्त्व सद्गुणों की विभूतियों को देना चाहिए परिष्कृत व्यक्तित्व ही वह कल्प वृक्ष है जिस तक जा पहुँचने वाला भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों की सफलता प्राप्त करता है। धन उपार्जन में जितनी तत्परता बरतनी पड़ती है उससे कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही तत्परता सद्गुणों का, स्वभाव का अंग बनाने में बरतनी पड़ती है। धन तो उत्तराधिकार में- स्वरूप श्रम से- संयोगवश अथवा ऋण अनुदान से भी मिल सकता है, पर सद्गुणों की सम्पदा एकत्रित करने में तो तिल-तिल करके अपने ही प्रयत्न जुटाने पड़ते हैं। यह पूर्णतया अपने ही अध्यवसाय का प्रतिफल है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाये रहने पर यह सम्पदा क्रमिक गति से संचित होती है। चंचल बुद्धि वाले नहीं संकल्प-निष्ठ सतत् प्रयत्नशील और धैर्यवान् व्यक्ति ही इस वैभव का उपार्जन कर सकने में समर्थ होते हैं। चक्की के दोनों पाटों के बीच में गुजरने वाला अन्न ही आटा बनता है। सद्विचार और सत्कर्म के दबाव से व्यक्तित्व का सुसंस्कृत बन सकना सम्भव होता है। अपना लक्ष्य यदि आदर्श मनुष्य बनना हो तो इसके लिए आवश्यक उपकरण अलंकार जुटाये जाते रहेंगे इन्हीं प्रयत्नों का परिणाम समयानुसार आत्म-निर्माण के रूप में परिलक्षित होता दिखाई देगा।

आत्मोत्कर्ष की अन्तिम सीढ़ी आत्म-विकास है। इसका अर्थ होता है आत्मभाव की परिधि का अधिकाधिक विस्तृत क्षेत्र में विकसित होना। जिनका स्वार्थ अपने शरीर और मन की सुविधा तक सीमित है उन्हें नर-कीटक कहा जाता है। जो इससे कुछ आगे बढ़ कर ममता को परिवार के लोगों तक सीमाबद्ध किये हुए हैं, वे नर-पशु की श्रेणी में आते हैं। आमतौर से सामान्य मनुष्य इन्हीं वर्गों में गिने जाने योग्य चिन्तन एवं क्रिया-कलाप अपनाये रहते हैं। उनका स्वार्थ इस परिधि से आगे नहीं बढ़ता। जीवन सम्पदा का इसी कुचक्र में भ्रमण करते हुए कोल्हू के बैल जैसी जिन्दगी पूरी कर लेते हैं। मनुष्य का पद बड़ा है। अन्य प्राणियों की तुलना में ईश्वर ने उसे अनेकों असाधारण क्षमता दिव्य धरोहर की तरह दी है और अपेक्षा की है कि उन्हें इस संसार को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए प्रयुक्त किया जाय। मानवी कलेवर ईश्वर की इस संसार की सबसे श्रेष्ठ कलाकृति है। इसका सृजन उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए हुआ है। इस निर्माण के पीछे जो श्रम लगा है उसमें सृष्टा का यह उद्देश्य है कि मनुष्य उसके सहयोगी की तरह सृष्टि की सुव्यवस्था में संलग्न रह कर उसका हाथ बटाये। यदि इस जीवन रहस्य को भुला दिया जाय और पेट प्रजनन के लिए-लोभ-मोह के लिए-वासना-तृष्णा के लिए ही इस दिव्य अनुदान को समाप्त कर दिया जाय तो समझना चाहिए पिछड़ी योनियों के तुल्य ही बने रहा गया और जीवन का उद्देश्य नष्ट हो गया।

सृष्टि के मुकुटमणि कहे जाने वाले मनुष्य का गौरव इसमें है कि उसकी चेतना व्यापक क्षेत्र में सुविस्तृत हो। शरीर और परिवार का उचित निर्वाह करते हुए भी श्रम, समय, चिन्तन और साधनों का इतना अंश बचा रहता है कि उससे परमार्थ प्रयोजनों की भूमिका निबाही जाती रह सके। आत्मीयता का विस्तार होने से शरीर और कुटुम्बियों की ही तरह सभी प्राणी अपनेपन की भावश्रद्धा में बँध जाते हैं और सबका दुःख अपना दुःख और सबका सुख अपना सुख बन जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम् की विश्व परिवार की आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावनाएँ बलवती होने पर मनुष्य का स्वार्थ-परमार्थ में परिणत हो जाता है। जो अपने लिए चाहा जाता था वही सब को मिल सके ऐसी आकांक्षा जगती है। जो व्यवहार, सहयोग दूसरों से अपने लिए पाने का मन रहता है। उसी को स्वयं दूसरों के लिए देने की भावना उमड़ती रहती है। लोक-मंगल की- जन-कल्याण की- सेवा साधना की इच्छाएँ जगती हैं और योजनाएँ बनती है। ऐसी स्थिति में पहुँचा हुआ व्यक्ति ससीम न रह कर असीम बन जाता है और उसका कार्यक्षेत्र व्यापक परिधि में सत्प्रवृत्तियों को संवर्धन बन जाता है। ऐसे व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकाँक्षाओं को पैरों तले कुचल कर फेंक देते हैं। अपनी आवश्यकताओं को घटाते हैं ओर निर्वाह को न्यूनतम आवश्यकताएँ पूरी करने के उपरान्त अपनी सत्प्रयोजनों में लगाये रहते हैं। देश, धर्म, समाज, संस्कृति के उत्कर्ष के लिए किये गये प्रयत्नों में उन्हें इतना आनन्द आता है जितना स्वार्थ परायण व्यक्तियों को विपुल धन प्राप्त करने पर भी नहीं मिल सकता। संसार के इतिहास में- आकाश में महामानवों के जो उज्ज्वल चरित्र झिलमिला रहें हैं वे सभी इसी आत्म-विकास के मार्ग का अवलम्बन करते हुए महानता के उच्च शिखर पर पहुँचे थे। सन्त सुधारक, शहीद यह तीन सामाजिक जीवन के सर्वोच्च सम्मान है। महात्मा, देवात्मा और परमात्मा यह तीन अध्यात्म जीवन की समग्र प्रगति के परिचायक स्तर हैं। इन्हें प्राप्त करने के लिए आत्मविकास के सिवाय और कोई मार्ग नहीं। व्यक्तिवाद को समूहवाद में विकसित कर लेना विश्वशान्ति को आधार माना गया है। अपनेपन को हम जितने व्यापक क्षेत्र में विस्तृत कर लेते हैं उतने ही विश्वास पूर्वक यह कह सकते हैं कि मनुष्य जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने का सुनिश्चित मार्ग मिल गया।


ऊँचा बनने के लिए मत ललचाओ (kahani)

जब ईसा यरुसलम से वापस लौटे तो उनके शिष्यों ने आवभगत की और अपनी-अपनी मनोभावनाएँ उनके सामने रखीं।

शिष्यों में से दो प्रमुख थे- जेम्स और योहत्रा। उनसे कहा- प्रभु यदि हमें प्यार करते हैं तो हमारा पद अपने समान ही ऊँचा कर दीजिए।

ईसा गम्भीर हो गये और कहा- बच्चों हर कोई स्वर्ग के राज्य में अपने ही प्रयत्नों से प्रवेश करता है। दूसरा कोई दूसरे के लिए कुछ नहीं कर सकता, ऊँचा बनने के लिए मत ललचाओ। छोटे बनकर रहो, विनीत बनो और प्रेम भरी सेवा को अपनी धर्म साधना बनाओ। जो नीचा छोटा बनता है वही तो ऊँचा पद पाता है।


मरने के बाद फिर से जन्म लेना पड़ता है।

आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता का सिद्धान्त भारतीय दर्शन का तो प्राण है ही, अन्यान्य धर्मों एवं दर्शनों ने भी उसे किसी न किसी रूप में स्वीकार किया है। ‘ईसाई, मुसलमान धर्मों में पुनर्जन्म की तो मान्यता नहीं है, पर उनके यहाँ भी आत्मा का अस्तित्व मरने के बाद भी बने रहने और ‘न्याय के दिन’ ईश्वर के सम्मुख उपस्थित होने की बात है। इसका अर्थ कम से कम इतना तो है ही कि मरने के साथ-साथ ही जीव की सत्ता सदा-सर्वदा के लिए समाप्त नहीं हो जाती, वरन् फिर से सचेतन की तरह काम करने का अवसर मिलता है स्वर्ग-नरक की मान्यताएँ भी इसी सिद्धान्त की पुष्टि करती हैं कि अशरीरी आत्मा को भी एक विशेष प्रकार का जीवनयापन करने का अवसर मिलता है।

भूत-प्रेतों का अस्तित्व पिछड़े लोगों में अन्ध-विश्वास की तरह फैला हुआ है। प्रगतिशील लोग उस बात का मजाक बनाते हैं, पर दोनों की मध्यवर्ती भी एक स्थिति है जिसमें कठोर परीक्षणों की कसौटी पर भी मृतात्माओं के द्वारा शरीरधारियों जैसे आचरण होने के प्रमाण मिलते हैं। प्रेत कैसे होते हैं? क्या करते हैं? मनुष्यों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करते हैं? क्या चाहते हैं? इन प्रश्नों पर मत-भेद हो सकता है, पर यह तथ्य अब दिनों-दिन अधिक प्रामाणिक होता जा रहा है जिसमें किन्हीं आत्माओं को मरने के उपरान्त भी अपनी हलचलें प्रत्यक्ष करने की बात विश्वासपूर्वक स्वीकार की जा सकें।

आत्मा की अमरता का एक प्रमाण पुनर्जन्म है। मरने के बाद दूसरा जन्म मिलने का तथ्य हिन्दू धर्म से सदा से माना जाता रहा है। पुराणों में इसका पग-पग पर वर्णन है। धर्म-शास्त्रों में, अगणित आप्त वचनों में आत्मा के पुनर्जन्म लेने की बात कही गई हैं। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के उपरान्त मनुष्य जन्म मिलने, पुण्य और पाप का फल भोगने के लिए फिर से जन्म मिलने की बात को धर्म-ग्रन्थों में अनेकानेक उदाहरणों के साथ बताया गया है।

पुनर्जन्म की मान्यता के साथ कर्मफल का सघन सम्बन्ध है। जिन्हें भले या बुरे कर्मों का फल इस जन्म में तत्काल न मिल सका, उन्हें अगले जन्म में भोगना पड़ेगा। इस सिद्धान्त को स्वीकार करने पर पाप फल से डरने और पुण्य प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में आश्वस्त रहने की मन-स्थिति बनी रहती है। फलतः पुनर्जन्मवादी को अपने कर्मों का स्तर सही रखने की आवश्यकता अनुभव होती है ओर तत्काल फल न मिलने से उद्विग्नता उत्पन्न नहीं होती।

आत्मा को स्वतन्त्र सत्ता न मानने उसे शरीर चेतना भर समझने का नास्तिकवादी दर्शन प्राचीन काल में भी रहा है। चार्वाक इस मत के आचार्य थे। उन्होंने अपने प्रतिपादन की प्रतिक्रिया छिपाई नहीं, वरन् स्पष्ट कर दिया कि आत्मा और परमात्मा की सत्ता से इनकार करने के उपरान्त क्या सोचना ओर क्या करना उचित है? उनने अपनी प्रख्यात घोषणा में कहा है- यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्, ऋण कृत्वा धृतं पिवेत्। भस्मी भूतस्य देहस्य पुनरा गमनं कुतः।” अर्थात् जब तक जीना सुख से जीना-कर्ज लेकर घी पीना। क्योंकि शरीर के साथ ही मृत्यु हो जाती है, फिर लौटकर तो आना नहीं है। इस सिद्धान्त में नीति-अनीति के पचड़े में पड़ कर जैसे भी बने मौज-मजा करने के लिए प्रोत्साहित किया गया है।

पिछले शताब्दियों में भौतिक विज्ञान की प्रगति से उत्पन्न हुए उत्साह ने यह कहना आरम्भ किया कि सत्य केवल उतना ही है जितना कि विज्ञान की मान्यता प्राप्त कर सके, चूँकि चेतना को- प्रयोगशाला में प्रत्यक्ष नहीं किया जा सका। इसलिए घोषित किया गया कि शरीर ही आत्मा है और मृत्यु के उपरान्त उसका सदा सर्वदा के लिए अन्त हो जाता है। मनुष्य को चलता-फिरता पौधा भर कहा गया, जो उगता है और सूख कर समाप्त हो जाता है। यह मान्यता मात्र एक सिद्धान्त या प्रतिपादन मात्र बनकर नहीं रह सकती, उसकी गम्भीर प्रतिक्रिया चिन्तन और चरित्र पर होती है। पुनर्जन्म, परलोक, आत्मा के अस्तित्व की जब कोई बात ही नहीं है तो पाप-पुण्य के पचड़े से क्या लाभ? चतुरता के बल पर जितना भी स्वार्थ सिद्ध किया जा सकता हो करना चाहिए। समाज और शासन के दण्ड से बच निकलने के हथकण्डों से तो भली प्रकार परिचित हैं। अंकुश मात्र परमात्मा के शासन और आत्मा को कर्मफल भोगने भर का था। नास्तिकवादी मान्यता के कारण उसका भी अन्त हुआ। ऐसी दशा में नीति, सदाचार और सामाजिक मर्यादाओं के पालन की उपेक्षा होनी स्वाभाविक थी। इस मान्यता ने उच्चस्तरीय आदर्शों को भारी क्षति पहुँचाई। भविष्य में और भी अधिक नीति संकट उत्पन्न होने और उसके फलस्वरूप व्यक्ति एवं समाज की बुरी तरह विघटन होने की आशंका है।

ऐसी विषम परिस्थितियों में मानव जाति के भविष्य का ध्यान रखने वाले प्रत्येक विचारशील व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह आत्मा की अमरता, ईश्वर का अंकुश, कर्मफल की सुनिश्चितता से गुँथे हुए आध्यात्मवाद के प्रति लोक-निष्ठा बनाये रहने का प्रबल प्रयत्न करे। यह सिद्धान्त जहाँ प्रामाणिकता की कसौटी पर खरे उतरते हैं। वहाँ उनकी प्रतिक्रिया भी होती है। शालीनता और सुव्यवस्था बनाये रहने की दृष्टि से इस आस्था का बने रहना नितान्त आवश्यक है। आस्तिकता का बाँध टूट जाने पर जो बाढ़ आयेगी उसमें वह सब कुछ डूब जाने की आशंका है, जो सभ्यता और संस्कृति के नाम पर अब तक उपार्जित किया गया है।

पुनर्जन्म के सिद्धान्त की पुष्टि में अनेकानेक प्रमाण सामने आते हैं। भारत में तो इस सम्बन्ध में चिर मान्यता होने के कारण यह भी कहा जा सकता है कि पुनर्जन्म की स्मृति बताने वाले, यहाँ के वातावरण से प्रभावित रहे होंगे। किसी कल्पना की आधी-अधूरी पुष्टि हो जाने पर यह घोषित किया जाता होगा कि यह बालक पिछले

जन्म में अमुक था। यों इस आशंका को भी कठोर परीक्षा की दृष्टि से भली-भाँति निरस्त किया जाता रहा है और बच्चे ऐसे प्रमाण देते रहे हैं। जिनके कारण किसी झाँसे पट्टी की आशंका नहीं रह जाती। पिछले जन्म के सम्बन्धियों के नाम तथा रिश्ते बताने लगने-ऐसी घटनाओं का जिक्र करना जिनकी दूरस्थ व्यक्तियों को जानकारी नहीं हों सकती, वस्तुओं के साथ जुड़े हुए इतिहास का विवरण बताना, जमीन में गढ़ी चीजें उखाड़ कर देना-अपने और पराये खेतों का विवरण बताना जैसे अनेक सन्दर्भ ऐसे हैं जिनके आधार पर पुनर्जन्म होने की प्रामाणिकता से इनकार नहीं किया जा सकता। फिर भारत से बाहर उन सम्प्रदाय के लोगों पर तो पूर्व मान्यता का भी आक्षेप नहीं लगाया जा सकता। पुनर्जन्म के प्रमाण तो वहाँ भी मिलते हैं। यह भी किम्वदन्तियों के आधार पर नहीं, वरन् परामनोविज्ञान की शोधकर्ता मण्डली द्वारा उनकी छान-बीन की गई है ओर यह पाया गया है कि यह घटनाएँ मन गढ़न्त, कपोलकल्पित या झाँसा पट्टी नहीं है। इनसे पुनर्जन्म की मान्यता की ही पुष्टि होती है।

दार्शनिक एफ॰ एच॰ विलिस की भी मान्यता है कि पुनर्जन्म व आत्मा के विकास का सिद्धान्त सत्य लेती है। श्री विलिस ने ऐसे कई जोड़े ढूँढ़े हैं, जिनके चिन्तन व कर्म में अपूर्व साम्य था। श्री विलिस इन्हें पुनर्जन्म की ही घटनाएँ मानते हैं। उनके टिमाना के रूप में जन्म लिया। शोपनहावर बुद्ध के अवतार कहें जा सकते हैं। फिश्टे, हीगल कान्ट को भी भारतीय आत्माएँ कहा जा सकता है। श्रीमती बेसेन्ट पहले ब्रूनो थी सिसरो ने ग्लैडस्टोव के रूप में पुनर्जन्म लिया।

अमरीकी पादरी जिमविशप की मान्यता है कि राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने ही राष्ट्रपति जान एफ॰ केनेडी के रूप में पुनर्जन्म ग्रहण किया। उन्होंने दोनों के जीवन का तुलनात्मक अध्ययन कर इन तथ्यों की ओर लोगों का ध्यान खींचा है।

लिंकन व केनेडी दोनों में गहरी धार्मिक भावना थी। व बाइबिल के प्रेमी पाठक भी दोनों थे। दोनों विश्व-शान्ति के उपासक थे। दोनों में 40 वर्ष की आयु में ही राष्ट्रपति बनने की इच्छा हुई। नीग्रो स्वतन्त्रता के लिए दोनों ने निरन्तर प्रयास किया। लिंकन के चार बच्चे थे, दो मर गये थे शेष दो से उन्हें गहरा प्यार था। केनेडी के भी चार बच्चे हुए दो का निधन हो गया। उन्हें भी वैसा ही प्यार था। दोनों अपने बच्चों से विनोद-परिहास बहुत करते थे।

लिंकन की भी प्रथम धर्म-पत्नी फैशनेबल थीं, केनेडी की भी। दोनों लिबरल पार्टी के सदस्य थे। लिंकन 1861 में प्रेसीडेन्ट बने, केनेडी 1961 में। लिंकन के प्राणों की सर्वाधिक चिन्ता केनेडी नामक समकालीन व्यक्ति को रहती थी। केनेडी के सुरक्षार्थ उनका निजी सचिव लिंकन सर्वाधिक सतर्क रहता था। दोनों गोली से मारे गये व शुक्रवार के ही दिन। लिंकन की मृत्यु के बाद उनका पद सम्हाला दक्षिणी उपराष्ट्रपति जान्सन ने और केनेडी की मृत्यु के बाद भी इस जिम्मेदारी को सम्हालने वाले का नाम जान्सन ही था वे दक्षिण से आये उपराष्ट्रपति थे।

क्या यह अद्भुत साम्य मात्र संयोग है? या इसके पीछे कोई सूक्ष्म आत्मिक विधान निहित है?

सन् 1215 में जन्मे फ्रांस के सन्त लुइस एक महान् क्रान्ति द्रष्टा थे। 539 वर्ष बाद सन 1754 में सम्राट् लुइस 16 वें का अन्तर था और दोनों के जीवन काल में 539 वर्ष का अन्तर था और दोनों की देह यानी रूपाकर में भी एकता थी। इसके अतिरिक्त दोनों के जीवन में असाधारण समानताएँ थी।

सन्त लुइस की छोटी बहिन का नाम इसाबेल था, वह उनसे 10 वर्ष बाद पैदा हुई। सम्राट् लुइस की बहिन भी 10 वर्ष ही छोटी थी। नाम था एलिजाबेथ। दोनों के पिताओं की मृत्यु उनकी आयु के 12 वें वर्ष में हुई। 15 वें वर्ष में सन्त लुइस बीमार हुए और सम्राट लुइस भी उसी आयु में उसी रोग से ग्रस्त हुए दोनों का विवाह 17वें वर्ष में हुआ व 21 वर्ष दोनों को बालिग अधिकार मिले।

सन्त लुइस ने 29 वें वर्ष में हेनरी तृतीय से और सम्राट् लुइस ने 29वें जार्ज तृतीय से शान्ति वार्ता की।

दोनों के पास उनकी 34 वर्ष की उम्र में पूर्व के एक राजकुमार का राजदूत, राजकुमार के ईसाई बनने की इच्छा से आया। 35 वर्ष की उम्र में सन्त लुइस क्रान्ति-कारी विचारों के कारण नजर बन्द किये गये। 35 वर्ष की ही आयु में सम्राट लुइस के सभी सत्ताधिकार छिन भी। आयु के उसी वर्ष में यानी 36 वें वर्ष में सन्त लुइस ने ट्रिस्टन की स्थापना की व क्रान्ति का उद्घोष किया। सम्राट लुइस ने भी 36 वे वर्ष वैस्टीन के पतन के साथ क्रान्ति का शुभारम्भ किया। सन्त ने उसी वर्ष जैकन की स्थापना की, सम्राट ने जैको विनस का सूत्रपात किया। सन्त के 36 वे वर्ष में इसावेल ऐन्गुलुम की मृत्यु हुई। सम्राट के 36 वे वर्ष सन्त अवकाश ग्रहण कर जैकोबिन बने। सम्राट ने 39 वें वर्ष में जैकीबिन को जीवन अर्पण किया। उसी वर्ष सन्त मैडेलियपन प्रान्त में वापस पहुँचे। 39 वे वर्ष में ही सम्राट लुइस मैडेलिन के अन्तिम संस्कार में पेरिस में सम्मिलित हुए।

इस तरह दोनों के जीवन की घटनाओं में अद्भुत साम्य है। सभी घटनाएँ 539 वर्ष के अन्तर से मानो स्वयं को दुहराती रही।

वर्जीनिया विश्व-विद्यालय के मनोवैज्ञानिक डाक्टर इवान स्टीवेन्सन ने पुनर्जन्म की स्मृति सम्बन्धी तथ्यों के संकलन हेतु संसार में दौरा किया। उसी शृंखला में भारत भी आये। कन्नौज के निकट जन्मे एक बालक के शरीर पर गहरे घावों के पाँच निशान थे। उसने बताया कि पिछले जन्म में उसकी हत्या शत्रुओं ने चाकू से की थी। जाँच करने पर श्री स्टीवेन्सन ने उसे सही पाया।

डॉ० इवान स्टीवेन्सन ने समस्त विश्व में इस प्रकार के प्रामाणिक विवरण प्राप्त किये। भारत में सर्वाधिक इसलिए पाये गये कि यहाँ की संस्कृति में पुनर्जन्म की मान्यता है। इस कारण पूर्व जन्म की बातें बताने वाले को डाँटा या रोका नहीं जाता है।

ब्रिटेन के प्रसिद्ध साहित्यकार डिक्सन स्मिथ भी काफी समय तक मरणोत्तर जीवन पर विश्वास नहीं करते थे किन्तु प्रामाणिक विवरणों ने उन्हें इसे सत्य मानने के लिए बाध्य कर दिया। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘न्यू लाइट आन सरबाइवल में अनेक तर्कों एवं प्रमाणों को प्रस्तुत किया है।

लेबनान और तुर्की के मुसलिम परिवारों में भी पुनर्जन्म की अनेक स्मृतियाँ सामने आई हैं। जिन्हें स्वयं शोधकर्ताओं ने सही पाया।

लेबनान के एक गाँव कोरनाइल में एक मुस्लिम परिवार में बालक जन्मा, जिसका नाम अहमद था। बच्चा दो वर्ष की उम्र से ही पूर्व जन्म की घटनाओं और सम्बन्धियों के बारे बुदबुदाया करता था। किन्तु किसी ने ध्यान नहीं दिया। बड़ा होने पर अपना पूर्व जन्म का निवास ‘खेरबी ओर नाम बोहमजी बताने लगा।’ फिर भी उस पर किसी ने विश्वास नहीं किया। एक दिन उसने सड़क पर खेरबी के एक आदमी को पहिचान लिया।

पता लगने पर पुनर्जन्म के शोधकर्ता वहाँ पहुँचे और उस बालक को 40 कि० मी० दूर गाँव खेरबी ले गये। बालक ने अपने पूर्व जन्म के नाम इब्राहिम बोहमजी के बारे में जितना बताया था, वह सही निकलता गया। उसकी मृत्यु रीढ़ की हड्डी के क्षयरोग से हुई। उसके पैर उस समय अशक्त थे। इस जन्म में ठीक तरह से चलने पर वह बड़े उत्साह और हर्ष के साथ इस बात को दूसरों के सामने प्रकट करता।

खेरबी में उसने कुटुम्बी, सम्बन्धी, मित्र, परिचितों आदि को पहिचान लिया। ऐसी घटनाएँ भी सुनाई’ जो केवल सम्बन्धित लोग ही जानते थे। उसने अपनी प्रेयसी का नाम भी बताया। मित्र की ट्रक दुर्घटना से मरने की बात कही। मरे हुए भाई भाउद का चित्र पहिचाना। अपनी बहिन ‘हुडा’ को भी पहिचान लिया।

इस्तम्बूल ( तुर्की ) के विज्ञान अनुसंधान परिषद ने पुनर्जन्म की इस घटना की जाँच कर उसे सत्य पाया है। एक चार वर्ष का बालक इस्माइल अतलिट्रालिक पूर्व जन्म में दक्षिण पूर्वी तुर्की के अदना नामक गाँव का आविदसुजुलयुस था। इसकी हत्या की गई। वह अपने पीछे तीन बच्चे-गुलशराँ जैकी ओर हिकमन छोड़ आया था। वह चार साल कर बालक इस्माइल रोते-रोते पूर्व जन्म के अपने बच्चों को पुकारने लगता तथा उनकी स्मृति में रोता भी।

एक दिन उसी इस्माइल ने एक फेरी वाले को आइसक्रीम बेचते देखा। उसने उस अजनबी का नाम-महमूद लेकर पुकारा और उसे कहा कि तुम तो साग-सब्जी बेचते थे, आइस्क्रीम कब से बेचने लगे? महमूद चकरा उठा। पर यह कहकर तो उसके आश्चर्य को कई गुना अधिक बढ़ा दिया कि तुम भूल रहे हो, भई ! मैं तुम्हारा चिर-परिचित आविद हूँ, जिसकी छः वर्ष पूर्व हत्या की गई थी।

पत्र प्रतिनिधि इस्माइल को अदना नगर ले गये वहाँ पहुँचते ही उसने अपने पूर्व जन्म की बेटी गुलशराँ को पहिचान लिया। वह वहाँ भी पहुँचा जहाँ असबल में रमज़ान ने उसकी कुल्हाड़ी से हत्या की थी। उस कब्र पर भी गया जहाँ उसे दफनाया गया था। पुलिस से पूछ-ताछ करने पर मालूम हुआ कि उपरोक्त हत्या काण्ड हुआ था। हत्यारे रमज़ान का फाँसी का दण्ड भी दिया था। आविद की कब्र वही थी, जो इस्माइल ने बताई। बालक इस्माइल का चाचा जब उसके साथ क्रूर व्यवहार करने लगा तो उसने कहा कि तुम भूल गये, मेरे ही बाग में तुम काम करते थे ओर बहुत समय तक तुम्हें मैंने ही रोटी खिलाई थी। जानकारी प्राप्त करने पर यह पाया गया कि आविद के इस व्यक्ति पर, जो अब इस्माइल का चाचा था, कई एहसान थे।

अमेरिका के कोलोराडी प्यूएली नामक नगर में रूप सीमेन्स नामक लड़की ने अपने पूर्व जन्म की घटनाओं को बताकर ईसाई धर्म के उन अनुयायियों को असमंजस में डाल दिया जो पुनर्जन्म के सिद्धान्त को नहीं मानते हैं। इस लड़की को मोरे बर्नस्टाइन नामक आत्म-विशारद ने प्रयोग द्वारा अर्ध मूर्छित करके उसी के पूर्व जन्म की अनेक घटनाओं का पता लगाया। वह 100 वर्ष पूर्व आयरलैण्ड के मार्क नामक नगर में पैदा हुई थी। उसका नाम ब्राइडी मर्फी और उसके पति का नाम मेकार्थी था। इस घटना की जाँच की गई तो सत्य पाई गई।

पुनर्जन्म में पूर्व जन्म के संस्कारों के प्रभाव के प्रमाण लगातार सामने आ रहे हैं। लिंग-परिवर्तन भी संस्कारों का प्रतिफल नहीं है।

ब्राजील वासी श्रीमती इडा लोरेंस को ‘सियान्स’ ( मृतात्माओं के आह्वान सम्बन्धी बैठक ) में तीन बार उनकी पुत्री इमिलिया की मृतात्मा ने सन्देश दिया कि मैं अब तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूँगी इमिलिया को अपने लड़की होने से घोर असन्तोष था। वह अक्सर कहती थी कि यदि पुनर्जन्म सचमुच होता है, तो अगले जन्म में मैं पुरुष बनूँगी। उसने अपने विवाह के सभी प्रस्ताव ठुकरा दिये और 20 वर्ष की आयु में विष खाकर मर गई। बाद में ‘सियान्स’ में इमिलिया ने अपनी माँ से अपनी आत्म-हत्या पर पश्चाताप व्यक्त किया। साथ ही पुत्र रूप में अपने पुनर्जन्म की इच्छा व्यक्त की।

श्रीमती इडा लोरेंस अब तक 12 बच्चों को जन्म दे चुकी थीं और अब सन्तान की उन्हें सम्भावना नहीं थी। पर इमिलिया की मृतात्मा का सन्देश सत्य निकला। अपनी मृत्यु के डेढ़ वर्ष बाद इमिलिया ने पुत्र रूप में पुनर्जन्म लिया। उसका नाम रखा गया-पोलो

पोलो की रुचियाँ इमिलिया जैसी ही थीं। सिलाई में इमिलिया निपुण थीं, तो पोलो भी बिना सीखे ही 4 वर्ष की आयु में सिलाई में दक्ष हो गया। इमिलिया ही तरह पर्यटन पोलो को भी अति प्रिय था। इमिलिया एक खास ढंग से डबल रोटी तोड़ती थी।

पोलो में भी वही अन्दाज पाया गया। पोलो अपनी बहिनों के साथ कब्रिस्तान जाता, तो सिर्फ इमिलिया की कब्र पर फूल चढ़ाता। वह भी यह कहते हुए कि- मैं अपनी कब्र की देख-भाल कर रही हूँ।’ शुरू में पोलो की बातें लड़कियों जैसी ही थीं। उसके व्यक्तित्व में अन्त तक नारी तत्त्वों की प्रधानता रही। अपनी बहिनों के अतिरिक्त अन्य स्त्रियों के प्रति उसमें लगाव नहीं था और वह अविवाहित ही रहा।

मनोवैज्ञानिकों और परामनोवैज्ञानिकों ने उसका परीक्षण किया। उसमें स्त्री सुलभ प्रवृत्तियाँ पाई गई।

इसी तरह श्री लंका की एक बालिका ज्ञानतिलक ने दो वर्ष की आयु में बताया कि पूर्व जन्म में वह लड़की थी। पूर्व जन्म वाले स्थान से एक दिन वह गुजरी तो सहसा उसके दिमाग में कौंधा कि वह पूर्व जन्म में यहीं पर थी। उसने अपने पूर्व जन्म की कई बातें बताई जो सत्य निकलीं। ज्ञानतिलक का पूर्व जन्म का नाम तिलकरत्न था। इमिलिया को लड़का होने की तीव्र इच्छा थी, तो तिलकरत्न में नारी व्यक्तित्व की प्रधानता थी और पुनर्जन्म में वह लड़की ही बनी। साथ ही पुरुष बनी इमिलिया में नारी-प्रवृत्ति अवशिष्ट थी, तो नारी बने तिलकरत्न में पुरुष प्रवृत्तियाँ विद्यमान् थीं

विलियम वाकर एवं केंन्सन ने अपनी पुस्तक ‘रिइकार्नेशन’ में अनेक घटनाओं का विवरण दिया है जिनमें पुनर्जन्म की धार्मिक मान्यता न होने पर भी बच्चों द्वारा प्रस्तुत किये गये विवरणों से इस सिद्धान्त की पुष्टि होती है। बड़ी आयु हो जाने पर प्रायः ऐसी स्मृतियाँ नहीं रहती या धुँधली पड़ जाती हैं, पर बचपन में बहुतों को ऐसे स्मरण बने रहते हैं जिनके आधार पर उनके पूर्व जन्म के सम्बन्ध में काफी जानकारी मिलती है।

मोटे तौर से जीवात्मा के योनि-परिभ्रमण का अर्थ यह समझा जाता है कि वह छोटे-बड़े कृमि-कीटकों-पशु-पक्षियों की चौरासी लाख योनियों में जन्म लेने के उपरान्त मनुष्य जन्म पाता है। पुनर्जन्म की घटनाओं से यह सिद्ध होता है कि मनुष्य को दूसरा जन्म मनुष्य में ही मिलता है। इसके पीछे तर्क भी है। जीव की चेतना का इतना अधिक विकास, विस्तार हो चुका होता है कि उतने फैलाव को निम्न प्राणियों के मस्तिष्क में समेटा नहीं जा सकता। बड़ी आयु का मनुष्य अपने बचपन के कपड़े पहन कर गुजारा नहीं कर सकता। यही बात मनुष्य योनि में जन्मने के उपरान्त पुनः छोटी योनियों में वापिस लौटने के सम्बन्ध में भी लागू होती है। यह हो सकता है कि जीवन-क्रमिक विकास करते हुए मनुष्य स्तर तक पहुँचा हो। इसका प्रतिपादन तो एकबार मनुष्य जन्म लेने के बाद पीछे लौटने की बात तर्क संगत नहीं है। कर्मों का फल भुगतने की बात हो तो दुष्कर्मों का दण्ड जितना अधिक मनुष्य जन्म में मिल सकता है, शोक, चिन्ता, भय, अपमान, घाटा, विछोह आदि से वह तिलमिला उठता है जबकि अन्य प्राणियों को मात्र शारीरिक कष्ट ही होते हैं। मस्तिष्क अविकसित रहने के कारण उनमें भी उतनी तीव्र पीड़ा नहीं होती जितनी मनुष्यों को होती है। ऐसी दशा में पाप कर्मों का दंड भुगतने के लिए निम्नगामी योनियों में मनुष्य को जाना पड़े यह आवश्यक नहीं।

चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण की एक नई वैज्ञानिक मान्यता सामने आई है। भ्रूण काल में जीव शरीर में इतनी तीव्र गति से परिवर्तन होते हैं कि उनकी स्थिति में लगभग इतना ही अन्तर पड़ता जाता है जितना कि अन्यान्य योनियों के प्राणियों में पाया जाता है इस प्रकार माता के उदर में रहते समय ही- नौ महीने की अवधि में जीव को लगभग उतनी ही योनियों का परिधान बदलना पड़ता है कि पुराणों में गिनाया गया है।

वैज्ञानिक हीकल्स, जो स्वयं विकासवाद के समर्थक ही हैं, ने एक महत्त्वपूर्ण भ्रूण-वैज्ञानिक सिद्धान्त दिया है- आन्टोजेनी रिपीट्स फायलोजेनी’। अर्थात् चेतना गर्भ में एक बीज कोष में आने से लेकर पूरा बालक बनने तक समस्त योनियों की पुनरावृत्ति होती है। प्रति तीन सेकेण्ड से कुछ कम समय में ही प्रत्येक भ्रूण की आकृति बदल जाती हैं। स्त्री के ओवम ( प्रजनन-कोष ) में प्रविष्ट होने के बाद पुरुष का स्पर्म ( बीज-कोष ) 1 से 2, 2 से 4, 4 से 8, 8 से 16, 16 से 32, 32 से 64 के क्रम से कोषों में विभाजित होता जाता है और शरीर बनता है। गर्भ धारण की 9 माह 10 दिन की अवधि में लगभग 24192000 सेकेण्ड होते हैं। तीन सेकेण्ड से कुछ कम में आकृति-परिवर्तन होने के क्रम से 80 लाख 60 हजार 666 से अधिक ही आकृतियाँ बदलनी चाहिए, यानी लगभग 84 लाख।

इस तरह जीव के 84 लाख योनियों में भ्रमण का भारतीय मत पुष्ट होता है। ये 84 लाख योनियाँ, जीव जिन-जिन परिस्थितियों में रह आया है, उनका छायाचित्रण है। यह व्यवस्था की गई है कि मनुष्य इन सबके स्मरण द्वारा अपना जीवन-लक्ष्य सुदृढ़ कर ले।

पुनर्जन्म की मान्यता जितनी सत्य है, उतनी ही लोकोपयोगी भी। आत्मा की अमरता और मरणोपरान्त फिर से शरीर धारण करके कार्यक्षेत्र में उतरने की आस्था बनी रहे तो व्यक्ति दूरदर्शी विवेक अपनाये रह सकते हैं और शालीनता तथा सामाजिकता के आदर्श को सहज ही पालन करते रह सकते हैं।


कमजोरों के साथ बर्ताव (kahani)

अरबी के अन्ध दार्शनिक और कवि अवुल आलामाऊरीन् के भोजन में किसी ने भुना हुआ तीतर परोसा। उनका कवि हृदय देर तक विचार मग्न रहा और उन्होंने एक मार्मिक पद्य गाया-

“ऐ तीतर ! तुझे भुनने की सजा इसलिए मिली कि तू तीतर बना, चील नहीं बना। यह संसार सदा से कमजोरों के साथ ऐसा ही बर्ताव करता रहा है।”


योग साधना का उद्देश्य चित्त वृत्तियों का निरोध!

योग का उद्देश्य “ चित्त-वृत्तियों का संशोधन है। महर्षि पतंजलि की योग-परिभाषा यही है। पशु-वृत्तियों को परिवर्तित कर दिव्य आस्थाओं का स्वरूप दे देने की प्रक्रिया योग है। दीर्घकाल से संगृहीत कुसंस्कारों को उच्चस्तरीय आस्थाओं में परिणाम करने के लिए प्रचण्ड पुरुषार्थ अपेक्षित होता है। सद्ज्ञान और सद्भावनाओं का सतत् सम्बोधन ही इस पुरुषार्थ का स्वरूप है।

शरीर को सक्रिय और मन की सन्तुलित रखने पर ही इतना प्रबल पुरुषार्थ सम्भव है। छेनी, हथौड़ा ठीक रहे, तो लुहार ढलाई, गढ़ाई भली-भाँति कर सकता है। नाई हजामत बनाने का काम ठीक से कर सके इसके लिए कैंची, उस्तरे पर धार होनी जरूरी है। शारीरिक सक्रियता तो योगी ही क्यों भोगी के लिए भी जरूरी है और मन की एकाग्रता व सन्तुलन की शक्तियाँ भी दोनों को जरूरी है। आसन, प्राणायाम आदि शारीरिक, मानसिक व्यायामों का यही उपयोग है। इनकी जरूरत तो भोगी-योगी दोनों को ही है। इन क्रियाओं का महत्त्व व उपयोग तो है, पर यही योग नहीं।

एकाग्रता मन-मस्तिष्क की व्यवस्थित चिन्तन विधि है। सभी प्रतिभाशाली अपने काम को मनोयोगपूर्वक करते हैं ओर इस तरह मेडीटेशन की प्रक्रिया को ही अपनाते हैं। मेडीटेशन वस्तुतः मस्तिष्क की अस्त-व्यस्तता और बिखराव पर नियन्त्रण पाने की एक कला है। वह एक मस्तिष्कीय व्यायाम है। उसे आध्यात्मिक साधना का पर्याय बताना अनुचित है। आध्यात्मिक साधना का क्षेत्र इतना संकीर्ण नहीं है। मस्तिष्कीय व्यायाम का महत्त्व तो बताया जाना चाहिए, पर उसे ही रहस्यमयी शैली में योग व अध्यात्म-साधना का समानार्थक नहीं प्रचारित कर दिया जाना चाहिए। मस्तिष्क को साधने की कला का एक अत्यन्त छोटा-सा हिस्सा एकाग्रता है। निस्सन्देह उसका महत्त्व है। पर उस एकाग्रता का उद्देश्य क्या है? अध्यात्म की दृष्टि से यह प्रश्न अधिक महत्त्वपूर्ण है।

ध्यान के अभ्यास में तरह-तरह की आकर्षक प्रतिमाएँ सामने रखकर अथवा उन्हें कल्पना-क्षेत्र में बिठाकर उनके साथ एकाग्रता जोड़ने का अभ्यास किया जाता है। यदि उसमें पूर्ण सफलता मिल जाए और मन उन प्रतिमाओं में पूरी तरह एकाग्र रहने लगे, तो भी आध्यात्मिक प्रगति में इससे कोई सहायता मिलने वाली नहीं। वह तो तभी सम्भव है, जब अपनी चेतना को विश्व-चेतना का घटक मानकर स्वार्थ का परमार्थ में विकास किया जाय।

योग का लक्ष्य है- आत्मा को परमात्मा से जोड़ना। व्यक्तिसत्ता का समष्टिसत्ता में समर्पण ही योग है। यह भावोत्कर्ष की साधना द्वारा ही सम्भव हैं। व्यक्तिवादी, अहंता और स्वार्थवादी महत्त्वाकाँक्षा में परिधिबद्ध मन को सार्वभौम चेतना से जोड़कर अपने चिन्तन और कर्तृत्व को उत्कृष्ट बनाना ही आध्यात्मिक प्रगति है। इससे कम कुछ भी नहीं। सही दिशा में चलने पर मनुष्य में देवत्व के उदय की प्रक्रिया का प्रारम्भ अनिवार्य है। योग वस्तुतः एक भाव विज्ञान है, जो जीव को ब्रह्म से चिरमिलन की भाव भूमिका की और ले जाता है। लघु को महान् बनाने की यह विद्या है। यह मूल लक्ष्य यदि विस्मृत-उपेक्षित रहा, तो फिर आसन, प्राणायाम मेडीटेशन, एक सामान्य व संकीर्ण मन क्रीड़ा के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता।

योग-विज्ञान में प्रगति का प्रमाण यही है कि उसमें प्रवृत्त मनुष्य अनेक दृष्टियों से असामान्य हो जाता है। महामानव, देवदूत, सिद्ध पुरुष, ऋषि, योगी, तपस्वी आदि इसी स्तर के होते है। यों सिंह की खाल ओढ़कर कोई गर्दभराज भी वनराज बनने का स्वाँग कुछ समय तक रचे रह सकते हैं।, पर सम्पूर्ण जीवन-क्रम ही इस प्रगति की वास्तविक कसौटी है।

पेट और प्रजनन की इच्छापूर्ति में दिन-रात जुटे सामान्य नर-कीटकों से सर्वथा मित्र मनोभूमि वाले चरित्रवान्, सन्मार्ग पर चलने का साहस रखने वाले, लोक मंडल के लिए आत्म-समर्पण करने वाले, तत्त्वदर्शी युगान्तरकारी समर्थ व्यक्ति प्रवाह पतित लोगों की भीड़ में अलग ही दीख जाते हैं। धारा को चीरकर उलटी दिशा में चल पड़ने के आमूल परिष्कार और युग-प्रवाह को पलट देने का कार्य अति उच्चकोटि की ऋद्धि-सिद्धि के ही जैसा है। इस कोटि का आत्मबल कोई बौद्धिक सामर्थ्य नहीं है। वस्तुतः वह तो अतीन्द्रिय सामर्थ्य से भी उच्चकोटि की शक्ति है। यह योग-विज्ञान की प्रगति द्वारा ही प्राप्त है।

अनिवार्य तो नहीं, पर योग की किसी-किसी शाखा का आश्रय लेकर अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी विकसित की जा सकती हैं। वे भी चमत्कारी है, जो कि आत्म-विद्या का ही एक अंग है।

चेतन-मस्तिष्क की सक्रियता अचेतन की शक्ति-तरंगों को काटती हैं। इसीलिए चेतन मस्तिष्क ही जब अधिक सक्रिय होगा, अचेतन अविकसित ही पड़ा रहेगा। बौद्धिक संस्थान सक्रियता को शिथिल करने पर अचेतन केन्द्र जाग्रत होता है। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि जैसी साधनाओं द्वारा चेतन मस्तिष्क को शिथिल, निष्क्रिय एवं शून्य स्थिति में ले जाया जाता है। तब ही दूर-दर्शन दूर दृष्टि विचार-प्रेरणा भविष्य ज्ञान, अदृश्य का प्रत्यक्ष आदि अनेक विशेषताएँ प्राप्त की जा सकती हैं। बौद्धिक मस्तिष्क को शिथिल करके इच्छा-शक्ति प्राण-शक्ति को अचेतन के विकास में प्रयुक्त करने पर शरीर में आँखें-जनक परिवर्तन सम्भव है। अति दीर्घजीवी होना, अति शक्तिशाली होना, अदृश्य जगत का ज्ञान प्राप्त करना आदि उसी स्थिति में सम्भव है।

कीड़े-मकोड़े और जीव-जन्तु बौद्धिक दृष्टि से मनुष्य से पिछड़े होते हैं। उनका चिन्तन ओर चेतन क्षेत्र शिथिल रहता है। इसी का लाभ उनके अचेतन को मिलता है। कुत्तों की घ्राण-शक्ति अति सूक्ष्म होती है। चमगादड़ के ज्ञानतन्त्र राडार क्षमता से सम्पन्न होते हैं। उसका अचेतन मस्तिष्क अपने साधारण से शरीर द्वारा ही विभिन्न वस्तुओं से उत्सर्जित तरंग को पहचानने में समर्थ होता है ओर इसी कारण से अँधेरे में भी वह अपने परिवेश का तथा वहाँ की वस्तुओं का स्वरूप एवं स्थान समझकर बिना किसी वस्तु से टकराये, उड़ने का क्रम जारी रखे रहता है।

ह्रंल मछली का अचेतन मस्तिष्क भी बहुत क्रिया-शील होता ओर उसके शरीर में पनडुब्बियों की सभी विशेषताएँ पाई जाती है।

समुद्री झींगे ‘सीएरे’ की शरीर-प्रणाली जेट-विमान की प्रणाली जैसी होती है। उसका अचेतन मस्तिष्क ही इस तीव्र दौड़ में उसे समर्थ बनाता है।

उत्तरी अमरीका की नदियों में रहने वाली व्हील मछली निकलती है। यह विद्युत्-शक्ति व्हील के अचेतन द्वारा ही नियन्त्रित है।

अचेतन-नियन्त्रित एण्टीना तितली के सींग रेडियो और टेलीविजन का काम करते हैं। नर-झींगुर के कामोत्तेजित होने पर उसका अचेतन मस्तिष्क एक विशेष से प्रकार की तान छेड़ने की प्रेरणा देता है, जिसके आकर्षण से मादा झींगुर खिंची चली आती हैं। अफ्रीका का ‘काटन रेल’ जाति का खरगोश हिंसक जन्तुओं का खतरा देखते ही पिछली टाँग एक विशेष विधि से धरती पर पटकता है, इस प्रकार से एक विद्युत धारा उत्पन्न होकर भूमि की ऊपरी परत दूर तक फैल जाती है। दूसरे खरगोश तथा अन्य छोटे जानवर भी इस ‘टेलीफोन’ का सन्देश समझकर सजग हो जाता है और सुरक्षा की व्यवस्था कर लेते हैं। यह भी अचेतन का ही करिश्मा हैं।

अपनी आवश्यकता अनेक जीव जन्तुओं का अचेतन अनेक नई शारीरिक विशेषताएँ पैदा कर लेता है। मेढ़कों की आँखों में पहले चश्मा नहीं होता था, इधर कुछ अर्से से उन्होंने एक विशेष प्रकार का चश्मा विकसित कर लिया है, जो गोताखोर की तरह जल में प्रवेश करने पर आँखों में चढ़ाया है। कछुए ने मगरमच्छों से अपनी सुरक्षा के लिए अपनी चमड़ी को मोटा किया है। तितलियों के बच्चे और रेशम के कीड़े अपने देह रस को निकाल कर उस पर पत्तियाँ चिपकाकर अपनी सुरक्षा, व्यवस्था करते हैं रीवन प्लाण्ट और ग्रेट मुलर पौधों ने आत्म-रक्षा के लिए पिछले दिनों नोकदार काँटे विकसित किये हैं, ताकि पशु उन्हें चर न पाएँ। गिलहरी के गालों में दो जेवें तथा बन्दर के गले में एक थैली खाद्य पदार्थ के संग्रह हेतु होती है। कंगारू के पेट की थैली शिशु रक्षण के काक आती हैं।

अनेक जीव जन्तु मौसम की अग्रिम जानकारी पा लेने में अपनी अचेतन सामर्थ्य द्वारा होते हैं। वर्षा की सम्भावना समीप देख मकड़ी अपना जाला खुले स्थानों से समेटकर सुरक्षित स्थान में फैलाती है। कोई मकान गिरने वाला हो, तो बिल्ली उसमें से थोड़ी ही समय पहले अपने बच्चे समेट कर अन्यत्र चली जाती है। अनुकूल ऋतु की खोज में अनेक पक्षी सहस्रों मील की उड़ान भरते हैं- पहाड़ सागर लाँघते हुए कहीं से कहीं पहुँचते हैं और फिर ऋतु परिवर्तन पर पुनः पूर्व स्थान में बिना भटके वापस आ जाते हैं। कई मछलियाँ प्रसव काल में उपयुक्त स्थान ढूँढ़ती हुई हजारों मील दूर जा पहुँचती है और वापस भी आ जाती है।

हमें गर्मी सर्दी का सही पता थर्मामीटर द्वारा ही चलता है, पर छोटे कीड़ों को अचेतन उन्हें सामान्य स्थिति में ही इसका मान करा देता है। 160 डिग्री फारेनहाइट पर सभी कीटाणु अपना काम बन्द कर देते हैं। 50 डिग्री ताप पर मक्खियाँ अपने लिए सुरक्षित स्थान ढूँढ़ वहाँ छिप जाती है। 55 डिग्री तापमान होने के बाद ही मधुमक्खियाँ काम पर निकलती हैं। टिड्डे 95 डिग्री पर संगीत शुरू करते हैं। भोजन-सामग्री जुटा पाने की दृष्टि से वर्षा की ऋतु आने के पूर्व ही चींटियाँ तथा अन्य कीड़े आहार इकट्ठा कर लेते हैं। ये सभी विशेषताएँ इनके अचेतन मस्तिष्क का ही परिणाम हैं। मनुष्य के चेतन की अति सक्रियता से उत्पन्न ऊष्मा को दबा देती हैं। तब उसका चेतन सामान्य शारीरिक आवश्यकताओं को सुचारु रूप से पूरी करते रहने में ही जुटा रह जाता है। अलौकिक क्षमताएँ तो प्रसुप्त ही पड़ी रहती है।

मात्र शरीर-संचालन तक ही मस्तिष्कीय जागरूकता सीमित रहने पर परिस्थितियों का उतार-चढ़ाव मनः स्थिति को भी प्रभावित करता है। मन हर्ष विषाद के ज्वार भाटे से आन्दोलित होता रहे, तो उसमें उथल पुथल भरी मानसिक ऊष्मा की वृद्धि होती है। इस ऊष्मा से अचेतन मस्तिष्क की दिव्यता पर आघात पहुँचता है, वह क्षीण होती है।

इसीलिए योग में प्रथम चरण के रूप में ‘मानसिक सन्तुलन’ पर बल दिया जाता है। अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियाँ तो आती ही रहने वाली हैं। व्यक्ति, समाज और संस्थाओं का ढाँचा ही कुछ ऐसा है कि उनकी क्रिय प्रतिक्रियाएँ प्रिय-अप्रिय सम्वेदनाएँ पैदा करती ही रहती हैं। प्रकृति-क्रम भी मनुष्य की इच्छानुकूल तो रहता नहीं। अकाल-सुकाल ऋतु-परिवर्तन जरा मरण रीति नीति आदि के घटनाचक्र हमें क्षुब्ध व उत्तेजित करने को पर्याप्त होते हैं। इन स्थितियों में चित्त आन्दोलित रहने का अभ्यास योग का प्रारम्भिक चरण इसीलिए है कि उसमें मानसिक ऊष्मा में अनावश्यक वृद्धि नहीं होती। सन्तुलित मनः स्थिति में सचेतन मस्तिष्क भी अपेक्षाकृत कम शक्ति खर्च कर अधिक काम कर डालता है और अचेतन मस्तिष्क में भी क्षीणता तथा बिखराव नहीं आ पाता।

मानसिक सन्तुलन का प्रथम चरण सध जाने पर, अगला चरण उठाया जाता है। चेतन मस्तिष्क की गति विधियों को कुछ समय के लिए रोककर उस संस्थान में क्रियाशील विद्युत शक्ति को अचेतन क्षेत्र में नियोजित करने पर अतींद्रिय सामर्थ्य विकसित होती हैं।

जब उद्देश्य निश्चित हो और परम तत्त्व की खोज की प्यास प्रबल हो, तब ही इस एकाग्रता का लाभ उठाया जा सकता है। एकाग्रता को आगे बढ़ाते हुए चित्त को जागृत दिशा में ही लय कर देना समाधि है। इसके लिए प्रत्याहार, धारणा, ध्यान की भूमिकाएँ पार करनी पड़ती है। इन साधनाओं के द्वारा सचेतन मस्तिष्क की चिन्तन-शक्ति एवं संकल्प शक्ति को शिथिल करते हुए वहाँ लगे तेजस् को अचेतन में नियोजित किया जाता है, तभी अनुपम दिव्यताएँ प्रकट होना शुरू होती हैं। इस दिशा में जो जितनी अधिक प्रगति करता है वह उतना ही समर्थ सिद्ध पुरुष कहा जाता है। बौद्धिक चेतना नियन्त्रित रहे और वह अचेतन को दबाने की बजाय उसकी सहायता करे, यही योगसाधना की दिशा हैं।

मनोविज्ञानी ड्रमण्ड एवं मैलाने यह मानते हैं कि चिन्तन की प्रखरता भी अचेतन द्वारा ही प्रदत्त होती है, यद्यपि प्रतीत यही होता है कि यह सचेतन मन की दक्षता है। बुद्धिमान विवेकशील, दूरदर्शी और शीघ्रता से सही निर्णय लेने में समर्थ तथा सही ढंग से काम करने वाले व्यक्ति अपने अचेतन की गहरी परतों से ही इन विशेषताओं को प्राप्त करते हैं। अचेतन एक तिजोरी है, हम उससे जिस तरह के रत्नों, आभूषणों को आगे कर लेंगे, उनकी ही आभा सचेतन में दीप्त होती दीखेंगी अचेतन एक समुद्र है, जिसमें सभी तरह के रस एवं विष भरे हैं, हम जिसे उभार ले, वे ही सचेतन पर अधिकार जमाए दीखेंगे

अचेतन में सब कुछ दिव्य और भला ही नहीं है। पाशविक कुसंस्कार वहाँ सत्प्रवृत्तियों की अपेक्षा अधिक ही हैं। जिस तरह कि उद्यान में उपयोगी पेड़ पौधों से खर पतवार की मात्रा ज्यादा ही होती है।

जे० डब्ल्यू० ब्रिज के अनुसार व्यक्तित्व की गहराई में उसे पतनोन्मुख और अस्त व्यस्त बनाने की प्रक्रिया भी भीतर ही भीतर चलती रहती है। अवांछनीयता पर नियन्त्रण न किया जाय, इनके प्रति लापरवाही बरती जाय, तो वे ही बलवती होती है।

न्यूरोलॉजिकल थ्योरी मानने वाले स्नायु सिद्धान्त वादियों के अनुसार शरीरगत स्नायु संस्थान की उत्तेजना से अचेतन मन की स्थिति बनती या बदलती है। उधर साइकोलॉजिकल थ्योरी के पक्षधरों-यानी मनो सिद्धान्त वादियों का कहना है कि मन ही शरीर का नियन्त्रक हैं। वह जिधर चलेगा, शरीर को उधर ही चलना होगा। अतः मनः स्थिति का ही शरीर पर प्रभाव पड़ता है। स्नायविक उत्तेजनाएँ भी मन की स्थितियों का ही परिणाम हैं।

विद्वान् मार्टिन प्रिंस ने अपनी ‘साइको न्यूरोलॉजिकल थ्योरी’ में इन दोनों मान्यताओं का समन्वय किया है। वे दोनों पक्षों को अपूर्ण ठहराते हैं और स्नायु संस्थान तथा अचेतन मन के समन्वय पर ही व्यक्तित्व की कोई दिशा निर्धारित होना मानते हैं।

अचेतन अत्यन्त शक्तिशाली है- यह सत्य है। पर वह स्वनिर्मित नहीं है। उसके भी निर्माता हम ही हैं। दीर्घकालीन मनोयोग एवं क्रियाकलाप ही उसे निर्मित, प्रभावित, परिवर्तित करते हैं। व्यावहारिक जीवन में मनोयोगपूर्वक दीर्घ समय तक अपनाये गए क्रिया कलापों का प्रभाव साकार रूप में अचेतन मन में समा जाता है और उन्हीं संस्कारों की प्रेरणा व्यक्तित्व की विविध धाराओं और क्रियाओं को प्रवाहित-प्रेरित करती रहती है। इसीलिए अचेतन को प्रवाहित-प्रेरित करती रहती है। इसीलिए अचेतन को कुसंस्कारों से मुक्त करने के लिए योग और तप का आध्यात्मिक साधना मार्ग अपनाना पड़ता है।


मनुष्येत्तर प्राणियों की भाषा भी समझी जाय

मनुष्यों के मुख से निकलने वाली भाषा को ही हम लोग आमतौर से समझ पाते हैं। विचारों और भावनाओं का प्रकटीकरण और आदान प्रदान का प्रयोजन भाषा के माध्यम से ही पूरा होता है। शिक्षितों को लिपि द्वारा भी भाषा का आदान प्रदान होता है, पर अशिक्षितों में तो उच्चारण के आधार पर ही एक दूसरे को कुछ बता पाने और समझा पाने का आदान प्रदान चलता है।

अन्य प्राणियों की भी अपनी भाषा है। भले ही वह मनुष्यों जैसी सुविकसित न हो। कीट पतंग गन्ध छोड़ते और सूँघते हैं। उनकी वाणी की अपेक्षा घ्राण शक्ति अधिक विकसित होती है। फलतः एक दूसरे के शरीरों से विभिन्न प्रकार की जो गन्धें समय समय पर निकलती रहती है, उनके सहारे यह जान लेते हैं कि दूसरे सजातीय किस स्थिति में हैं और वे किस प्रकार के सहयोग की अपेक्षा करते अथवा जानकारी देते हैं।

जिन्हें वाणी प्राप्त है वे अपने थोड़े से शब्दों के सहारे ही काम चला लेते हैं। अपने हर्षोल्लास अथवा दुःख दर्द की अभिव्यक्ति वे उतने से उच्चारण में ही कर लेते हैं। इससे उनका जी हलका होता है, उत्साह मिलता है तथा दूसरे उनका जी हलका होता है, उत्साह मिलता है तथा दूसरे साथियों को अपनी ही तरह उत्तेजित करके सम्वेदना उभारना सम्भव होता है। इससे उनका स्नेह, सौजन्य एवं सहयोग निखरता है। इससे उनका स्नेह, सौजन्य एवं सहयोग निखरता है। चिड़ियाँ जब चहचहाती हैं उससे उनके शरीर का अंग संचालन भी होता है। इस उच्चारण और संचालन को देखकर उनके सजातीय यह पता लगा लेते हैं कि उसका अभिप्राय क्या है और उस जानकारी को प्राप्त करने के उपरान्त उन्हें क्या करना चाहिए?

यही बात पशुओं के सम्बन्ध में है। उनके शब्द और भी स्पष्ट होते हैं। यों झींगुर, मच्छर, मक्खियाँ जैसे कीट पतंग भी शब्दोच्चारण करते हैं। मेंढक जैसे छोटे जीव भी कर्णकटु शब्द बोलते हैं। हलकी आवाज तो प्रायः सभी जीवों की होती है। जिव्हा अथवा दूसरे अवयवों के सहारे वे ध्वनि करते और अपनी मनः स्थिति का अन्यों को परिचय देते हैं।

हम मनुष्य यदि अन्य प्राणियों की भाषा समझने का प्रयत्न करें, उनकी अभिव्यक्तियों और आवश्यकताओं को अनुभव करे तो निस्संदेह अपने परिवार का अब की अपेक्षा असंख्य गुना विस्तार हो सकता है और उसी अनुपात से आत्मीयता के क्षेत्र बढ़ सकता है। अभी तो 400 करोड़ मनुष्यों के ही एक मानव समाज से हमारा परिचय है, उसमें भी भाषा की एकता से ही घनिष्ठता एवं सहयोग का द्वार खुलता है। भाषा की दृष्टि से जिनके बीच आदान प्रदान का माध्यम अभी नहीं बना है, वे मनुष्य समाज के सदस्य होते हुए भी एक दूसरे से अपरिचित जैसी स्थिति में पड़े रहते हैं।

मानवी भाषाओं के बीच एकता के क्षेत्र बढ़ाने के प्रयत्न चल रहे हैं। यदि प्राणियों की भाषा को समझने का क्षेत्र बढ़ सके तो जीवधारियों की दुनिया अब की अपेक्षा बहुत बड़ी हो सकती है। विकसित प्राणी अविकसितों के सहयोग का बहुत बड़ा लाभ मनुष्य जैसे विकासवानों को मिल सकता है। प्रयत्न करने पर और ध्यान देने पर हम जीवधारियों की भाषा समझने में बहुत कुछ प्रगति कर सकते हैं।

बछड़े के रँभाने से पता चलता है कि उसकी जननी गाय उससे दूर चली गई है। चिड़ियों के नन्हे बच्चे भी माँ के दूर जाते ही चीं चीं कर उठते हैं। पास आने पर पंख फड़फड़ाकर प्रसन्नता प्रदर्शित करते हैं। कुत्ते का पिल्ला माँ की उपस्थिति में हर्ष सूचक ध्वनि भिन्न रीति से करता है और दूर जाने पर रोने की आवाज भिन्न रूप से। दोनों स्थितियों में उसका स्वर एवं भंगिमा भिन्न भिन्न होती है।

इससे स्पष्ट है कि भाव सम्प्रेषण के लिए पशु पक्षी भी विशिष्ट ध्वनि-क्रमों का निश्चित विधि से उच्चारण व प्रयोग करते हैं। यानी उनकी अपनी एक भाषा है। वे अपने वर्ग के जीव की भाषा ही समझते हैं। कुत्ता-कुत्ते की, गाय अपने बछड़े, बैल व अन्य गायों की, चिड़ियाँ चिड़ियों की भाषा अच्छी तरह समझने में समर्थ हैं।

बाघ की दहाड़ का स्वर औं...............ह’ अथवा ‘ऊ...........घ् .........ह’ जैसा होता है। गुर्राहट ‘गर्र र्र र्र’ जैसी होती है। ऋतुमती शेरनी शेर को बार बार पुकारती है। शेर उसे सुनकर वहीं से प्रत्युत्तर देता है और दोनों एक दूसरे के समीप पहुँचते हैं। प्रणय-केलि के समय दोनों बहुत ही तेज आवाज करते हैं, मानो प्रचण्ड युद्ध हो रहा हो।

बाध, चीते या तेंदुआ बड़ी सतर्क चाल चलते हैं। उनकी पहचान का सर्वोत्तम माध्यम काकड़, चीतल, साँभर और हिरन की उच्च ध्वनियाँ ही हैं। काकड़ की आवाज ‘बोक् जैसी होती है, नर-चीतल भारी, दीर्घ-सी ध्वनि से सतर्क करता है, साँभर तीव्र शंख ध्वनि की तरह पैड की आवाज करता है और श्रोता को सहसा चौंका देता है। बाघ, चीता बघेराख् या तेंदुआ की उपस्थिति का सर्वाधिक प्रामाणिक अनुमान इन्हीं आवाजों से होता है। साथ ही उत्तेजित बन्दरों की ‘खो खो’ या लंगूर की खुर्र-खुर्र भी इन हिंसक प्राणियों की उपस्थिति का संकेत हैं।

यह हुई वन की ‘भाषा’ वन की ‘लिपि को भी समझना आवश्यक है। नरम या आर्द्र मिट्टी पर पशुओं के पद चिह्न ही यह लिपि हैं। उनसे वहाँ से गुजरने वाले पशु का वर्ग, आकार गुजरने का समय तथा दिशा का सूचक होता है। वनवासी इन चिह्नों को पहचानने में प्रवीण होते हैं। पटु शिकारी भी इसमें दक्ष होते हैं। जरा सी दबी घास या टूटी हुई डालें, सूखी कड़ी भूमि में भी पशु के जाने आने की दिशा का पता चल जाता है।

वन में पशु पक्षियों की बोलियों के भी अभिप्राय को समझना आवश्यक है। एक दूसरे को अपनी उपस्थिति की सूचना देने के लिए अथवा मौज की लहर में हाथ जोर दार स्वर में चिंघाड़ते हैं...............धार...........र। जब कि भय या उत्तेजना की स्थिति में वे फटी-सी और तीखी ध्वनि करते है- पै-ऐ ...........ऐ”। कभी कभी हाथी ‘गु र्र र्र र’ ध्वनि से गुर्राते हैं, जो क्रोध का परिचायक है। मानो कोई मोटर इंजिन चालू किया गया हो।

हाथी कभी कभी फुफकारते है- तेजी से। एक-दो फलाँग दूर भी फुफकारते पर लगाता है मानो 15-20 फुट दूर से ही ध्वनि आ रही हो।

शहर और नगरों की होने वाली हलचलों का आभास हवा में गूँजने वाले शोर-वाली हलचलों को आभास हवा में गूँजने वाले शोर–शराबे से लग जाता है। कार, स्कूटर, ट्रक आदि के सड़क पर से यह पता चलता है कि कौन वह गुजरा। ताँगा, इक्का, धकेल, बैलगाड़ी, ऊँट गाड़ी के आवागमन की बात बिना उन्हें देखे ही मात्र ध्वनि के सहारे जानी जा सकती है। अगल–बगल में बच्चों की उछल कूद और बड़ों की भगदड़ में जो अन्तर होता है उसे कमरे में बैठ कर भी बिना देखे जाना जा सकता है। हवा की तेजी-वर्षा की गति आदि की हलचल कान से सुनकर आंखें मीचें मीचें भी जानी जा सकती है। हवा में गूँजने वाली ध्वनियों के सहारे हम सहज ही समीपवर्ती वातावरण का अनुमान लगा सकते हैं।

जंगल की भी अपनी भाषा है। वन्य पशु पक्षियों की उपस्थिति तथा हरकतों का अनुमान उनके संसर्ग से उत्पन्न होने वाली आवाजों के आधार पर सहज ही जाना जा सकता है। वन क्षेत्र के निवासी उनके अभ्यस्त भी होते हैं। शिकारियों को इस भाषा की अच्छी जानकारी होती है। जंगलों में निवास अथवा काम करने वाले यदि जंगल की भाषा न समझें तो उनके सामने प्राण संकट खड़ा रहेगा। अस्तु जिस प्रकार शहर, गाँवों में रहने वालों को उस क्षेत्र के निवासियों से संपर्क साधना के लिए स्थानीय भाषा की जानकारी प्राप्त करनी होती है, उसी प्रकार जिनका वन्य प्रदेशों और उनमें रहने वाले प्राणियों से वास्ता पड़ता है उन्हें “जंगल की भाषा’ जानना भी आवश्यक होता है।

ग्रीष्म ऋतु में ताजे पद चिह्न भी तेज हवा द्वारा धूल से भरकर पुराने लगने लगते और शरद् ऋतु में नरम मिट्टी पर छायादार हिस्से में कुछ पुराने निशान भी ताजे जैसे दिखते हैं। अभ्यास से यही पहचान की क्षमता आती है।

बाघ और तेंदुए के पद चिह्नों का कुत्तों के पद चिह्नों से साम्य होता है। पर बाघ और तेंदुए के पैरों के चिह्न कुत्ते के पग चिह्नों से चौगुने से भी ज्यादा बड़े होते हैं। कुत्ते के पद चिह्नों में पंजों के आगे नाखून के चिह्न दिखते हैं, बाघ तेंदुए के नाखून चलते समय सिमटकर पंजों की गद्दियों में छिप जाते हैं। अतः उनके निशान नहीं होता। बाघ तेंदुए के पग चिह्न गोल से होते हैं, सामने की ओर चार छोटी अंगुलियों के चिह्न तथा पीछे गद्दी का तिकोना सा निशान होता है।

हाथी के पग चिह्न चक्की के पाट से होते हैं। हाथी के पैर के नाखूनों का निशान जिस ओर दिखे, वही उनके जाने की दिशा होता है। घास के पौधे की गिरी हुई या झुकी स्थिति से भी हाथी के जाने आने की दिशा ज्ञात हो जाती है। टूटी घास के हरे या सूखे होने से गुजरने के समय का अनुमान हो जाता है। युवा हाथी हथनियों के तलवे साफ और पद चिह्न भी साफ होते हैं, किन्तु प्रौढ़ वृद्ध हाथियों के पद चिह्नों में उनके पैरों की बिवाइयों का निशान स्पष्ट दिख जाता है।

भालू के पिछले पैरों का निशान मानव पग चिह्नों की ही तरह, किन्तु कुछ कम लम्बा होता है। एड़ी और पंजों के बीच की दूरी भी कम होती है। अगले पैरों के निशान लगभग आयताकार होते हैं। भालू के पग चिह्नों में नाखूनों के निशान भी दिखते हैं।

टूटी शाखाएँ, टूटे या चर्वित घास, पेड़ों की छिली हुई-सी नीचे गिरी छाल आदि से हाथियों के आने जाने के बारे में बहुत कुछ पता चल जाता है।

नमकीन मिट्टी वाले स्थान में ‘चाटन’ के आस-पास छिपकर पशु देखें जो सकते हैं। पशुओं की लीद, मेंगनी इत्यादि से भी उनके बावत कई सूचनाएँ मिल जाती हैं। इसी तरह भालू, चीते, बाघों द्वारा पेड़ों के तनों पर पैना करने के लिए नाखूनों की रगड़ के चिह्नों से भी कई बातें जानी जाती हैं।

जब हाथी किसी शाखा को तोड़ता है, तो ‘कड़ाक’ या ‘करड़ड़’ की लम्बी खिंचती सी ध्वनि होती है। ऐसी ध्वनि की शीघ्र शीघ्र एवं बार बार आवृत्ति हो तो अनुमान होता है कि वहाँ हाथियों का पूरा समूह है। बन्दर जब डाल तोड़ते हैं, तो ध्वनि नीचे से नहीं, पेड़ की ऊँचाई से आती है और वह हल्की तथा छोटी होती है। कुल्हाड़ी से काटी जा रही लकड़ी से ‘खट खट’ आवाज आती है और उसमें नियमितता होती है। कठफोड़वा जब लकड़ी में चोंच मारता है, तो सर्वथा भिन्न खट-खट की ध्वनि होती है।

जैसे जंगल में एक डाल टूटने की ध्वनि होती है- सम्भव है, यह किसी हाथी ने तोड़ी हो या बन्दरों की उछल-कूद से टूटी हो या फिर लकड़हारे ने लकड़ी काटी हो। इसी तरह पेड़ों के हिलने के भी कई कारण सम्भव हैं- कपि समूह की क्रीड़ाएं, चीतल-साँभर आदि का चलना या हाथियों की हलचल।

इन सबकी समुचित जानकारी द्वारा ही चल रही गतिविधियों को समझा जा सकता है और तद्नुकूल प्रतिक्रिया व तत्परता सम्भव है।

पत्तों पेड़ों के हिलने से आने वाली ध्वनियाँ भी भिन्न भिन्न होती हैं। हिरण, चीतल जैसे खुरधारी प्राणियों के चलने से अधिक आवाज निकलती है। कठोर खुरों से पत्ते भी जोर से दबते हैं और अगल बगल की झाड़ियाँ, पत्तियाँ भी हिलती है। हाथी मंदगति तो होता ही है। उसके तलुए भी नरम होते हैं। इसलिए भूमि पर रखे जाने पर उन पैरों से कोई विशेष ध्वनि नहीं होती, पर उसके शरीर की रगड़ से पेड़ पौधे हिलते खूब हैं।

साँप जब घास फूँस या शुष्क पत्तों पर चलते हैं, तो सरसराहट होती है। गोह के चलने पर भिन्न तरह की ध्वनि होती है। खड-खड खड खड क्योंकि उसके पाँव छोटे छोटे होते हैं और दुम जमीन पर घिसटती चलती है।

अन्य प्राणियों की भाषा समझने एवं शब्दों को पहचानने में कठिनाई भी हो सकती है, पर भावों की परख तो और भी सरल है। भाषा में ध्वनि और शब्दों की भिन्नता रहने से उन्हें समझने में कठिनाई हो सकती है, पर भावाभिव्यक्ति तो सार्वभौम है। संसार के किसी भी कोने में जाया जाय कष्ट के अवसर पर प्रायः सभी की विपन्न मुखाकृति होगी। सभी की आँखों में से आँसू टपकेंगे और विषाद की दर्द भरी छाया भर रही होगी। प्रसन्नता के समय सर्वत्र हँसी, मुस्कराहट, आँखों में चमक दिखाई देगी। यही बात अन्य भावनाओं के सम्बन्ध में है। मुखाकृति से अन्तरंग में घुमड़ती हुई शोक, रोष, क्रोध, आवेश, भय, चिन्ता, निराशा, उत्साह उल्लास, कामुकता आदि के भाव सहज ही उभरते देखे जा सकते हैं।

भावाभिव्यक्ति जो स्थिति मनुष्यों की है वही अन्य प्राणियों के सम्बन्ध में भी पाई जाती है। उसमें थोड़ा बहुत ही अन्तर होता है। मनुष्य अधिक संवेदनशील है इसलिए भाषा की सूक्ष्मता की तरह उसे भावों की अभिव्यक्ति भी अच्छी तरह करनी आती है। अन्य प्राणी भाषा की तरह भावों के प्रकटीकरण में पीछे हो सकते हैं, पर ध्यानपूर्वक उनके चेहरे को, आँखों तथा होठों को, अन्य अवयवों को देखा जाय तो उनके भीतर काम कर रही भावनाओं, प्रवृत्तियों एवं सम्वेदनाओं को बहुत हद तक समझा जा सकता है। इस दिशा में यदि हम प्रयास करें तो मनुष्य परिवार से आगे बढ़ कर प्राणि मात्र में अपनी आत्मीयता विकसित कर सकते हैं और आत्मविस्तार का अधिक लाभ उपलब्ध कर सकते हैं।


साधन तो जुटाएँ पर साध्य का स्तर बढ़ाएँ

बहुत से महत्त्वपूर्ण कार्य इसलिए उपेक्षा के गर्त में पड़े रह जाते हैं कि उनकी ओर ध्यान ही नहीं जाता। उपेक्षावृत्ति के कारण न उन कामों की उपयोगिता प्रतीत होती है और न यह पता चलता है कि इसके न करने से कितनी हानि उठानी पड़ेगी। जिनका अभ्यास पड़ जाता है वे निरर्थक काम भी बड़े उत्साह पूर्वक किये जाते रहते हैं और जिनके प्रति उपेक्षा बरती गई है- जिनका महत्त्व नहीं समझा गया है वे कार्य अत्यन्त उपयोगी होते हुए भी हाथ में नहीं लिए जाते। होना यह चाहिए कि हम विवेकपूर्वक यह देखें कि उपयोगिता की दृष्टि से किन कार्यों का कितना महत्त्व है। इसी क्रम से प्रमुखता दी जाने लगे तो यह बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्ण नीति होगी और जितना समय व्यतिक्रम के कारण नष्ट होता है उतने में ही श्रम को सार्थक बनाने वाली उपलब्धियाँ समझी जाती है इसके बाद शारीरिक स्वास्थ्य की तो नहीं इन्द्रिय लिप्साओं की पूर्ति को प्रमुखता मिलती है। यह स्थूल बुद्धि का चिह्न है कि साधनों को महत्त्व दिया जा और साध्य के प्रति उपेक्षा बनी रहे। धन व्यक्तित्व के-उसके साथ जुड़े हुए उत्तरदायित्वों को पूरा करने के लिए आवश्यक होता है। इसलिए उसका उपार्जन उचित है। पर यहाँ भी अतिवाद नहीं बरता जाना चाहिए। सन्तुलन बरता जाना चाहिए और विवेक से काम लिया जाना चाहिए। देखा जाता चाहिए कि उपार्जन में इतनी अधिक ललक तो नहीं बढ़ गई है कि जिन व्यक्तित्व के विकास एवं उत्तरदायित्वों के निर्वाह के लिए यह सब किया जा रहा है उन मूल आधारों को ही तो विस्मृत नहीं कर दिया गया। आमतौर से लोग अर्थ-लोलुपता में अत्यधिक ग्रस्त रहते हैं, उसमें इतने तन्मय रहते हैं कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा वृद्धि तक की बात भुला दी जाती है। धन बढ़ा किन्तु व्यक्तित्व गिर गया तो फिर उस उपार्जन की अतिवादिता को किस प्रकार सराहा जा सकेगा। साधन के साथ साध्य का भी ध्यान रखकर चला जाना चाहिए और दोनों क्षेत्रों में सन्तुलित उत्साह बनाये रहने की समन्वयात्मक नीति अपनानी चाहिए।

व्यक्तिगत सुख साधन की बात सोचने में भी एक मौलिक भूल रह जाती है कि इन्द्रिय लिप्साओं की पूर्ति को ही सुखोपलब्धि मान लिया जाता है। जीभ के चटोरे पन के लिए ढेरों पैसा और ढेरों श्रम, समय खर्च किया जाता है। उसके लिए तरह तरह की योजनाएँ बनती रहती हैं। इसी प्रकार कामुक चिन्तन और आचरण में में इतना समय एवं मनोयोग लगता है कि उतनी सामर्थ्य वैज्ञानिक अनुसंधान जैसे किसी उपयोगी कार्य में लगा देने पर उच्चस्तरीय सफलताएँ प्राप्त की जा सकती हैं। जितनी दिलचस्पी अश्लील यौनाचार के इर्द-गिर्द घुमड़ती रहती है, उतनी को ही कला साधना में नियोजित किया जा सके तो उतने भर से मनुष्य अपनी रुचि की संगीत, साहित्य आदि किसी भी कलाकारिता में प्रवीण एवं पारंगत बन सकता है। यही बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में है। वे अपनी ललक लिप्साओं के रसास्वादन में भटकती रहती है। यह स्मरण ही नहीं रहता कि उपभोग की समर्थता बनाये रहने के लिए इन्द्रिय शक्ति के संयम और सुनियोजन की कितनी अधिक आवश्यकता है। विलासी अतिवाद इन्द्रिय शक्ति को क्रमशः क्षीण करता चला जाता है और एक समय ऐसा आता है कि स्वाद की अनुभूति ह कुण्ठित हो जाती है।

सामान्य स्वाद से जिव्हा की तृप्ति ही नहीं होता। अधिक तीक्ष्ण मसाले एवं गन्ध का समन्वय किये बिना उत्तम आहार भी रुचिकर नहीं लगता। यह जिव्हा इन्द्रिय के स्वाद तन्तुओं की क्षीणता ही है जिसके कारण सामान्य आहार से ही जो प्रसन्नता एवं तृप्ति हो सकती है, उसका आधार ही समाप्त हो जाता है। अति उत्तेजना का साधन जुटाने में भी यदि तीक्ष्णता का अनुपात बढ़ता चले तो ही किसी प्रकार जिव्हा को सन्तोष होगा अन्यथा वह नाक-भौं चढ़ाती रहेगी। कामुकता के सम्बन्ध में भी यही बात है। संयमी दृष्टि रहने और ओजस् का अपव्यय न करने वालों को दम्पत्ति जीवन का सामान्य सहचर ही पर्याप्त उत्साह और सन्तोष देता रहता है, पर लम्पट व्यक्ति समस्त मर्यादाओं का अतिक्रमण कर जाने पर भी अतृप्ति ही अनुभव करते रहते हैं। एक समय आता है कि उनकी क्षमता बेहतर कुण्ठित हो जाती है और फिर मानसिक व्यभिचार के अतिरिक्त और कुछ सम्भव ही नहीं रह जाता। अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में भी यही बात है। उनकी लोलुपता तृप्त करते रहने पर अपव्यय के फलस्वरूप दिवाला निकल जाने का दुष्परिणाम सामने आता है। जिन्हें उपभोग का सुख देने के लिए तरह तरह के समाधान जुटाये गये थे वे उस कुचक्र में अपनी साध्य नष्ट हुआ तो ऐसा बरताव किस प्रकार बुद्धिमत्तापूर्ण ठहराया जाय?

धन कमाया सो तो ठीक हुआ, पर अनावश्यक मात्रा एकत्रित करने की ललक में यदि शारीरिक, मानसिक स्वस्थता के लिए आवश्यक सुव्यवस्था भुला दी गई और दुर्बलता, अस्वस्थता के गर्त में गिरते चले गये तो फिर वह धन संग्रह किस काम का रहा? संग्रह का लालच बढ़ता रहा और उसे उपार्जन में व्यक्तित्व के समग्र विकास में न लगाया जा सका तो फिर इस संचय के अतिवाद से क्या प्रयोजन सधा? सदुपयोग की बात न सोची जाय और ऐसे ही उद्धत अपव्यय में पैसा उड़ाया जाता रहे तो उसके फलस्वरूप सर्वनाशी दुष्प्रवृत्तियाँ ही गले बँधेगी आदतें बिगड़ेगी और उसकी छूत से परिवार तथा संपर्क क्षेत्र को दुष्प्रवृत्तियों का शिकार होने के कारण दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा। धन लिप्सा की अति की प्रतिक्रिया आर्थिक अनाचार अपनाने और तरह तरह के क्रूर कर्म करने की प्रवृत्ति बनकर सामने आती है। ऐसे व्यक्ति अपनी प्रामाणिकता खो बैठते हैं। उनके न मित्र शेष रहते हैं न सहयोगी, न प्रशंसक। घृणा, तिरस्कार एवं असहयोग बरसते रहने के कारण ऐसे लोग अन्ततः भारी घाटे में रहते हैं। अनीति की कमाई फुलझड़ी की तरह जलकर थोड़े ही समय में समाप्त हो जाती है और कुकर्मकर्ता के शिर पर लदा हुआ पाप का भार उसके लोक-परलोक को नष्ट करके रख देता है।

प्रसंग यहाँ साधन जुटाने के अत्युत्साह में साध्य की उपेक्षा करने पर उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों का चल रहा है। यह अनात्म बुद्धि की प्रतिक्रिया है। बहिरंग पर आसक्त होकर अन्तरंग को भुला देना-साधनों की लिप्सा से चिपक कर साध्य की उपेक्षा करने लगना-ऐसी अदूरदर्शितापूर्ण नीति है जिसे आमतौर से वही लोग अपनाते हैं जो बुद्धिमान कहलाते हैं और अपनी समझदारी पर दर्प करते हैं। कहने और मानने को तो कुछ भी कहा या माना जा सकता है, पर वस्तुस्थिति का पता तो परिणामों की कसौटी पर कसे जाने के उपरान्त हो चलता है। देखा जाता है कि अधिक उपार्जन और अधिक उपभोग का दावा करने वाले सम्पन्न और विलासी लोग बहिर्मुखी दृष्टिकोण अपनाये रहने के कारण भारी घाटे में रहते हैं। जिस ‘स्व को सुखी समुन्नत बनाने के लिए यह तत्परता बरती गई थी, यदि वह मूलतत्त्व ही उलटा विनाश होने लगा तो इसमें बुद्धिमत्ता कहाँ रही?

तात्कालिक लाभ पाने के लालच में असंख्यों अदूरदर्शी भयंकर दुष्परिणाम भुगतते रहते हैं। यदि वही नीति समझदार कहलाने वाले लोग भी अपनाने लगे तब इसे विवेक का दिवाला ही कहा जाएगा लोभ वश कबूतर जाल में फँसते हैं, मछलियाँ काँटा निगलती हैं, मक्खियाँ चासनी में फँसती हैं, चूहे पिंजड़े में फँसते हैं- आरम्भिक लालच अन्त में उन्हें अत्यन्त महंगा पड़ता है। उसी मार्ग पर यदि मनुष्य भी चलता रहे तो उसे विचारशील कैसे कहा जा सकेगा?

स्वार्थ सिद्धि में निरत रहने वाले आमतौर से बुद्धि मान समझे जा जाते हैं। क्षण भर के लिए ऐसा ही मान लिया जाय, तो भी इतना तो देखना ही होगा कि वह दूर वर्ती और चिरस्थायी परिणाम उत्पन्न करने वाला होना चाहिए। ऐसा स्वार्थ तो अनर्थ ही कहा जाएगा जो क्षणिक लोभ के छलावे में जकड़ कर भविष्य को अन्धकारमय बनाकर रख दे। नशेबाजी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। उस बुरी आदत को अपनाने वाले आरम्भ में कुछ सुरसरी, गुदगुदी अनुभव करते हैं और उस कुटेव पर टूट पड़ते हैं। परिणाम सामने आता जाता है। नशेबाज अपना स्वास्थ्य, धन सम्मान, परिवार दिन दिन क्षीण करते चले जाते हैं और अन्ततः बेमौत मरते हैं। जिसमें दूरगामी परिणामों की उपेक्षा कर दी जाय और क्षणिक आकर्षण को ही सब कुछ मान लिया जाय, उसे बुद्धि नहीं दुर्बुद्धि ही कहा जाएगा स्वार्थ सिद्धि के नाम पर प्रायः ऐसा ही किया जाता रहता है। उसकी संकीर्ण परिधि मात्र तात्कालिक लाभ ही सोच पाती है इसलिए लाभ के लोभ में अत्यधिक हानि उठानी पड़ती है। स्वार्थ यदि अदूरदर्शी हो तो उस संकीर्ण सीमा बन्धन के कारण वह अनर्थ बन जाता है। यदि स्वार्थ के साथ दूरगामी सत्परिणामों को जोड़कर रखा जो सकें, तो उसी का रूप ‘परमार्थ’ जैसा बन जाएगा

लोक व्यवहार में धन उपार्जन शरीर सुख के बाद-तीसरा नम्बर परिवार का आता है। ‘स्व’ की परिधि ‘पर’ तक विस्तृत होने की प्रक्रिया परिवार के रूप में परिणित होती है। इसके लिए प्रकृति प्रेरणा के रूप में कामवासना की ललक को प्राण के स्वभाव में सम्मिलित किया गया है। युवावस्था आते ही जोड़ीदार की तलाश होती है और विवाह बन्धन बँध जाते हैं। बच्चे होने लगते होती है और स्नेह, सहयोग का सिलसिला चल पड़ता है। एक साथ रहने से घनिष्ठता बढ़ती है और आदान-प्रदान है। एक साथ रहने से घनिष्ठता बढ़ती है और आदान-प्रदान लोक मर्यादा एवं उत्तरदायित्वों के समन्वय से परिवार बन जाता है ‘स्व’ की परिधि इस दायरे से फैलती है तो परिवार के सदस्यों का सुख-दुःख भी अपना बन जाता है और उनके उत्थान-पतन सम्मान-असम्मान में भी अपने जैसी सम्वेदना अनुभव होने लगती हैं। अनुलोम में माता-पिता जेष्ठ भ्राता, भवन भुआ आदि बड़ों को गिना जाता है। परिवार में अनुलोम और प्रतिलोम दोनों ही पक्ष के सदस्य सम्मिलित होते हैं। भरण-पोषण तो सभी का होता है किन्तु उनमें से जिनके प्रति जितना ‘स्व’ सघन होता है उनके साथ उतनी ही प्रीति घटती-बढ़ती रहती है। बच्चे अपनी माता को अधिक प्यार करते हैं, पर बड़े होने पर उसका केन्द्र बदल कर पत्नी पर जा टिकता है। इसी प्रकार पिता की उपेक्षा होने लगती और पुत्र के प्रति अधिक आकर्षण रहता है। यह परिवार की संरचना का प्रकृति प्रेरित आधार हुआ। इसमें भी प्रायः संकीर्ण स्वार्थ ही आधार बना रहता है। परिवार के लोगों की शरीर सुख पहुँचाने और मन को प्रसन्न करने की बात ही संचालक के मस्तिष्क में प्रधान रूप से रहती है। दूरगामी हित साधन यहाँ भी उपेक्षित ही पड़ा रहता है। सुविधाएँ जुटाने मात्र की दृष्टि रह जाती है। इस नीति को अपनाये रहते हैं, पर दूरदर्शिता के अभाव में इस नीति के कारण उनकी आदतें बिगाड़ देते हैं। वे बिगड़ी हुई आदतें जो लाड़ दुलार के नाम पर उत्पन्न की गई थीं, अन्ततः उन्हीं परिजनों के लिए दुष्परिणाम प्रस्तुत करती है, जिन्हें लाभान्वित करने की बात सोची गई थी। साधन को प्रमुख और साध्य को गौण मानकर चलने की प्रतिक्रिया अन्ततः ऐसी हो होती है।

परिवार में मनुष्य रहते हैं, मनुष्यों का निर्वाह साधनों से होता है, यह ठीक है, पर व्यक्ति मात्र निर्वाह भर के लिए ही तो नहीं। रोटी खाकर जीवित रहा जाता है, पर रोटी के लिए ही तो जीवन नहीं है। परिवार के लोगों को सुविधाएँ जुटा दी जाएँ, परन्तु उनके व्यक्तित्व का मूल्य बढ़ाने वाले गुण, कर्म, स्वभाव, चरित्र एवं दृष्टिकोण पर निर्भर हैं। शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ और मानसिक दृष्टि से सभ्य मनुष्य ही प्रगति करते, सम्मान पाते और सफल जीवन जीते देखे गये हैं। वे ही अपनी चन्दन जैसी सुगन्ध से सभी पवती वातावरण को सुगन्धित करते हैं। उन्हीं के द्वारा देश, धर्म, समाज एवं संस्कृति की कोई महत्त्वपूर्ण सेवा बन पड़ती है। ऐसे ही लोग नर रत्न कहलाते हैं। परिवार वे ही सराहें जा सकते हैं, जिन्हें नररत्न उत्पन्न करने वाली खदान कहलाने का श्रेय प्राप्त हो सकें।

परिवार को ऐसे ही नर्सरी के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। जिसमें उगाई हुई पौध दूर दूर तक सुरम्य उद्यानों के रूप में विकसित होने का श्रेय प्राप्त कर सकें। परिजनों का सच्चा हित साधन इसी में है कि वे आत्म निर्भर और आत्म सम्मान खरीद सकने जितनी सम्पदा से सुसम्पन्न बनें। सम्पदा के सहारे खड़ा हुआ बड़प्पन अतीव दुर्बल होता है, वह कभी भी बालू की दीवार की तरह ढह सकता है। स्थायित्व तो उनमें है जिनमें प्रचण्ड प्रतिभा, प्रखर पुरुषार्थ और उज्ज्वल चरित्र के तत्त्व अभीष्ट परिमाण में विद्यमान् है। यदि किसी को अपने परिवार से वस्तुतः प्रेम हो-आत्मीयता शुभेच्छा में गहराई हो तो इसी तथ्य पर ध्यान केन्द्रित रखना चाहिए कि कुटुम्बियों का व्यक्तित्व किसी प्रकार अधिकाधिक परिष्कृत होता चला जाय।

यह कार्य श्रम-साध्य और कष्ट-साध्य है। इसके लिए घर के लोगों को जितना सिखाना है, उससे कहीं अधिक अपने को साधना पड़ता है। कहने सुनने की, समझने समझाने की सामर्थ्य अत्यन्त स्वल्प है। किसी को ऊँचा चढ़ाने और आगे बढ़ाने की शिक्षा अपना अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करके ही दी जा सकती है। अपना निज का व्यक्तित्व इस प्रकार ढाला जाना चाहिए जिसमें ठप्पे में ढलने वाले खिलौनों की तरह सम्पर्क क्षेत्र के लोग विशेषतया अपने परिवार के सदस्य अनायास ही ढलते चले जाएँ यह सब संभव तभी हो सकता है जब परिवार संस्था के सदस्यों को आत्माएँ माना जाय और उनके उज्ज्वल भविष्य की झाँकी सुविधा संवर्द्धन में नहीं, वरन् व्यक्तित्व की उत्कृष्टता के साथ सम्बद्ध समझी जाय।

समाज हित के बारे में आमतौर से इतनी ही सोचा जाता है कि गरीबी, बीमारी, अशिक्षा आदि अभावों को दूर करने भर से पिछड़ापन दूर हो जाएगी यहाँ यह समझा जाना चाहिए कि समृद्धि संवर्धन की आवश्यकता स्वीकार करने और उन प्रयासों के प्रोत्साहन का समर्थन करते हुए भी इतने भर को पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। सज्जनता, शालीनता, दूरदर्शिता, सहकारिता जैसी सत्प्रवृत्तियों को सुविकसित न किया जा सका तो फिर भौतिक दृष्टि से कितनी ही अधिक उन्नति कर लेने पर भी कोई देश या समाज सच्चे अर्थों में बलिष्ठ न बन सकेगा। जहाँ चारित्रिक दुर्बलता, संकीर्ण स्वार्थपरता जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ पनप रही होंगी वहाँ सम्पन्नता के रहते हुए भी किसी को चैन न मिल सकेगा और दरिद्रता से भी गई गुजरी स्थिति बनी रहेगी।

लोक-सेवा के लिए साधारण की असुविधाओं को दूर करना एवं सुख साधनों को बढ़ाना आवश्यक तो है, पर उतने मात्र से अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती। लोग वस्तुतः व्यक्तित्वों का समूह भर हैं। व्यक्ति के उत्थान पतन का मूलभूत कारण उसकी मनः स्थिति है। इस क्षेत्र को सँभाले, सुधारे बिना प्रचुर साधन जुटा देने पर भी यदि मनुष्य दुर्बुद्धि युक्त है तो उन साधनों का दुरुपयोग करके और भी अधिक विपत्ति मोल लेगा और दरिद्रता से भी गई गुजरी स्थिति में जा पहुँचेगा। अस्तु साधन जुटाने के साथ साध्य को- व्यक्ति को गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से परिष्कृत, सुसंस्कृत, सद्भाव सम्पन्न बनाने पर ध्यान देना होगा। यहाँ भी साध्य को प्रमुखता देने की आवश्यकता है। यदि चेतना का स्तर बढ़ाने की बात को व्यर्थ समझा जाता रहा और साधनों के लिए दौड़-धूप चलती रही तो असंख्य सुविधाएँ बढ़ जाने पर भी पिछड़ापन दूर न हो सकेगा और वे सुसम्पन्न विपत्तियों में जा फँसेंगे जो अपेक्षाकृत और भी अधिक कष्टकारक सिद्ध होंगे।

यही भूल आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में होती रही है। उपासना परक कितने की चित्र विचित्र कर्मकाण्डों की भरमार की जाती रहती है। साधन का स्वरूप क्रिया कृत्यों तक सीमित रहता है। उतने को ही पर्याप्त मानकर सिद्धि चमत्कार की, स्वर्ग मुक्ति की, आत्म-साक्षात्कार ईश्वर दर्शन की अपेक्षा की जाती रहती है। यहाँ भी साधना परक साधनों को ही सब कुछ मान लिया गया है। साध्य आत्मा है। आत्मा को निर्मल एवं प्रखर बनाया जाय। उसकी भावनात्मक, विचारात्मक एवं क्रियात्मक दिशा धाराओं को उत्कृष्टता के साथ नियोजित करके देवत्व स्तर पहुँचाया जाय, इसकी ओर उपेक्षा बरती जाती है। फलतः वह लक्ष्य प्राप्त नहीं होता जिसके लिए अध्यात्म साधनाएँ की जाती हैं।

हम साध्य को प्रमुखता दें। उसे परिपुष्ट बनाने का ध्यान रखें। साधनों की आवश्यकता साध्य का परिपोषण करने के लिए करें। तो प्रयत्न करते हुए भी कुछ पल्ले न पड़ने की आज की स्थिति का अन्त हो जाएगा और सच्चे अर्थों में प्रगति पथ पर अग्रसर होते हुए उस लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे, जिसे व्यक्ति और समाज की समान प्रगति कहा जा सकता है।


सहकारिता और आदान प्रदान का ब्रह्माण्डव्यापी तथ्य

सामान्य दृष्टि से ऐसा प्रतीत होता है कि ब्रह्माण्ड के ग्रह नक्षत्र अपना अपना अलग अस्तित्व बनाये हुए अपनी कक्षाओं पर भ्रमण करते हुए अपना निर्धारित क्रिया कलाप चला रहे हैं। किसी का किसी से कोई परस्पर सम्बन्ध चला रहे हैं। किसी का किसी से कोई परस्पर सम्बन्ध नहीं है। यह बात मोटी समझ से ही सही हो सकती है। वास्तविकता कुछ और ही है। वस्तुतः यह सारे ग्रह नक्षत्र एक ही सत्ता सूत्र में- धागों में मनकों की तरह पिरोये हुए है और यह ग्रह नक्षत्र की माला एक ही दिशा में- एक ही नियन्त्रण में गतिशील हो रही है, इतना ही नहीं उनका परस्पर भी अति घनिष्ठ सम्बन्ध है। सूर्य और चन्द्रमा के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव को हम प्रत्यक्ष देखते हैं। अमावस्या और पूर्णमासी को आने वाले ज्वार भाटे-कृष्ण पक्ष में वनस्पतियों का कम और शुक्ल पक्ष में अधिक बढ़ना-चन्द्रमा के पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव का परिणाम है। सूर्य के उदय होने पर गर्मी, रोशनी ही नहीं, सक्रियता भी बढ़ती है। हवा की चाल तेज हो जाती है, वनस्पतियों में हलचल शुरू हो जाती है और रात्रि की जो निद्रा सब को सताती थी वह अनायास ही समाप्त हो जाती है। शरीरों की रात्रि वाली शिथिलता प्रातःकाल होते ही क्रियाशीलता में बदल जाती है। ऐसे ऐसे अनेक परिवर्तन सूर्य के निकलने से लेकर अस्त होने के बीच होते रहते हैं। परोक्ष परिवर्तनों को तो कहना ही क्या? उनकी शृंखला को देखते हुए वैज्ञानिक चकराने लगते हैं और सोचते हैं कि जो कुछ इस धरती पर हो रहा है वस्तुतः सूर्य की ही प्रतिक्रिया मात्र है।

यह सूर्य और चन्द्रमा के द्वारा पृथ्वी पर पड़ने वाले प्रभाव की बात हुई। आगे चलकर इसी प्रक्रिया को समस्त ग्रह नक्षत्रों के बीच परस्पर पड़ने वाले प्रभावों के आदान प्रदान के रूप में देखी, समझी जा सकती है। सूर्य की चमक चन्द्रमा पर घटने बढ़ने से वह कितना अतिशय ठण्डा और कितना अतिशय गरम हो जाता है, उसी नवीनतम जानकारियाँ चन्द्र शोधों ने स्पष्ट कर दी है। पृथ्वी पर चाँदनी भेज सकना चन्द्रमा के लिए सूर्य के अनुदान से ही सम्भव होता है। अन्य ग्रह भी परस्पर ऐसे ही आदान प्रदान की व्यवस्था बनाये हुए है। एक दूसरे पर अनेक स्तरों के आकर्षण विकर्षण फेंकते और ग्रहण करते हैं। इसी आधार पर उनका वर्तमान स्तर और स्वरूप बना हुआ है। यदि इस प्रक्रिया में अन्तर उत्पन्न हो जाय तो ग्रहों की वर्तमान स्थिति में भारी अन्तर आ जाएगा और उनका कलेवर मार्ग स्वरूप आदि में अप्रत्याशित परिवर्तन उत्पन्न हो जाएगा यह थोड़ा सा भी अन्तर अपने सौर मंडल की स्थिति ही बदल सकता है और फिर उस हलचल से अन्य सौर मण्डल भी प्रभावित हो सकते हैं और उसका अन्त इतनी बड़ी प्रतिक्रिया के रूप में हो सकता है, जिससे सारा विश्व-ब्रह्माण्ड ही हिल जाय।

अपने सौर-मण्डल के ग्रहों और उपग्रहों का परस्पर क्या सम्बन्ध है और एक दूसरे को कितना प्रभावित करते हैं इसकी थोड़ी बहुत जानकारी खगोलवेत्ताओं को उपलब्ध हो चली है। वे इस अनन्त ब्रह्माण्ड में बिखरे हुए असंख्य सौर मण्डलों के परस्पर पड़ने वाले प्रभाव को भी स्वीकार करते हैं और लगता है एक ही परिवार के सदस्य जैसे मिलजुलकर कुटुम्ब का एक ढाँचा बनाये रहते हैं, उसी प्रकार समस्त ग्रह नक्षत्र एक दूसरे के पूरक बने हुए है और परस्पर बहुत कुछ लेने देने का क्रम चलते हुए ब्रह्माण्ड की वर्तमान स्थिति बनाये हुए हैं। यह सब एक विश्वव्यापी प्रेरक और नियामक सत्ता द्वारा ही सम्भव हो रहा है।

वस्तुतः इस संसार में अकेला नाम का कोई पदार्थ नहीं। यह सब कुछ सुगठित और सुसम्बद्ध है। पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु भी-अपने गर्भ में कितने ही घटक सँजोये हुए एक छोटे और मण्डल परिवार की तरह प्रगतिशील रह रहा है। इलेक्ट्रान आदि घटकों की भी परतें खुलती जा रही हैं और पता लग रहा है कि उनके गर्भ में भी और कितने ही समूह वर्ग विराजमान् है। शरीर एक इकाई है। पर उसे भीतर जीवाणुओं की इतनी संख्या है जितनी इस समस्त संसार में जीवधारियों को भी मिली-जुली संख्या भी नहीं होगी। हर मनुष्य का व्यक्तित्व-असंख्य अन्यों एवं प्रभाव को लेकर विकसित हुआ हैं, उसमें कम और दूसरों का अधिक है।

सृष्टि चक्र में सर्वत्र अन्योऽन्याश्रित का सिद्धान्त काम कर रहा है। जड़ चेतन से विनिर्मित यह सूचना विश्वब्रह्माण्ड एकता के सुदृढ़ बन्धनों में बँधा हुआ है। एक से दूसरे का पोषण होता है और हर किसी को दूसरों का सहयोगी होकर रहना पड़ रहा है। यह पारस्परिक बन्ध नहीं सृष्टि के शोभा सौंदर्य का, उसकी विभिन्न हलचलों का, उत्पादन विकास एवं परिवर्तन का उद्गम केन्द्र है।

पृथ्वी की आकर्षण शक्ति पदार्थ सम्पदा एवं को शान्तिपूर्वक रहने और विकसित होने का अवसर दे रही है। अन्तर्गत ही आकर्षण शक्ति से बँधे हुए ग्रह नक्षत्र अपनी कक्षाओं और धुरियों पर परिभ्रमण कर रहे हैं। यह तो मोटी जानकारी हुई। वास्तविकता यह है कि ग्रहों के बीच इतना अधिक आदान प्रदान चल रहा है, मानो विनिमय बाज़ार की धूम मच रही हो। उत्तरी ध्रुव में होकर अन्तर्ग्रही शक्तियाँ धरती पर अवतरित पचा ली जाती है और अनावश्यक को दक्षिणी ध्रुव के द्वारा अन्तरिक्ष में फेंक दी जाती हैं। उत्तरी ध्रुव के द्वारा अन्तरिक्ष में फेंक दी जाती है। उत्तरी ध्रुव पृथ्वी का मुख है और दक्षिणी ध्रुव मल द्वार। यदि पृथ्वी को अन्तर्ग्रही अनुदानों का आहार न मिले तो उसे भूखे रह कर प्राण त्यागना पड़ेगा।

ध्रुव क्षेत्रों के अतिरिक्त अन्य कितने ही छिद्र भी ऐसे हैं जिनके माध्यम से ग्रहों के बीच आदान-प्रदान होता रहता है, इन्हें रोम-कूप अथवा स्वेद छिद्र कह सकते हैं। हम इन छेदों से भी साँस लेते और भाप छोड़ते हैं। पृथ्वी पर कितने ही ऐसे छिद्र हैं जिनमें होकर सूक्ष्म ही नहीं स्थूल भी धँसता और निकलता देखा जा सकता है।

5 दिसम्बर 1945। 5 टी. बी.-एम. अमरीकी बमवर्षक वायुयान यन्त्रों तथा संचार साधनों से सभी सुसज्जित थे, उड़ाके भी अनुभवी व योग्य थे। उन्हें पहले पूर्व की ओर जाना था, फिर उत्तर की ओर, अन्त में दक्षिण पूर्व होकर लौटना था। पहले जहाज को चला रहे थे स्क्वाड्रन लीडर कण्ट्रोल टावर के निर्देश पर वह उड़ा। 5 मिनट के अन्तर से शेष चार विमान भी उड़ चले। पहले वायुयान में दो लोग थे, शेष चारों में तीन-तीन रेडियो सम्पर्क जारी था। सन्देश लगातार मिल रहे थे- अब हम 200 मील प्रति घण्टा की निश्चित गति से उड़ते हुए अटलांटिक महासागर के पूर्वी तट की ओर बढ़ रहे है। कुछ समय बाद। तीन बजकर 45 मिनट पर सहसा खतरे का संकेत मिला स्क्वाड्रन लीडर का स्वर था-अचानक हम लोग कहाँ आ गये, कुछ पता नहीं चल पा रहा। यन्त्रादि सब ठीक हैं, पर नीचे देखते हैं तो समुद्र है, न जमीन।’

कण्ट्रोल टावर से कहा गया-नक्शा देखकर अपना ‘ग्रिडरिफरेन्स’ दो। उत्तर था-जहाज भौगोलिक स्थिति के बारे में निश्चित रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता”। और सहसा संपर्क टूट गया। जिधर से सन्देश आया था, उसी दिशा में 13 दक्ष कर्मचारियों और उत्तम यन्त्रों से लैस मार्टिन हवाई जहाज खोज के लिए भेजा गया। 5 मिनट तक तो वह अपने सन्देश देता रहा, फिर उसकी भी आवाज आनी बन्द गई। समुद्र रक्षक जहाज को रात भर उसी ओर देखते रहे। सुबह होते ही इक्कीस जहाज सागर में, 300 वायुयान अन्तरिक्ष में मँडराने लगे। चप्पा-चप्पा छान मारा। पृथ्वी तल पर 12 खोजी दल खोज करते रहे। न तो धरती पर किसी भी जहाज का एक भी इंच कोई टुकड़ा मिला, न समुद्र तल पर एक भी बूँद तेल का निशान न कोई शव, न कलपुर्जे, न चिह्न खोजी मार्टिन जहाज जो भेजा गया था, उसका सन्देश प्रसारक यन्त्र अत्यधिक सशक्त था और अन्य देशों को भी उससे सन्देश भेजे जा सकते थे। पर कहीं, भी संकेत तो ग्रहण नहीं किया गया था। अन्त में खोज से थककर अधिकारियों ने रिपोर्ट छापी-हम कुछ कल्पना भी नहीं कर पा रहे कि यह सब क्या हुआ? क्यों हुआ?”

इस स्थान का नाम रखा गया-प्वाइंट आफ नो रिटर्न’ ऐसा बिन्दु जहाँ पहुँचकर आज तक कोई वापस इष्टदेव के साथ अपना भावनात्मक संपर्क प्रगाढ़ करना पड़ता है। प्यार-दुलार मनुहार की- श्रद्धा वात्सल्य की घनिष्ठता और समीपता की- आन्तरिक एकात्मता की इस प्रकार की अनुभूतियाँ उभारनी पड़ती है कि हम दो ही एक शरीर दो प्राण हैं। दाम्पत्य-जीवन में कभी कभी ऐसी घनिष्ठता का बिजली कौंधती है, इस अभिन्न आत्मीयता का प्रगाढ़तम मनोभाव इष्टदेव के साथ सँजोना पड़ता है। इस घनिष्ठता की बिजली कौंधती है, इस अभिन्न आत्मीयता का प्रगाढ़तम मनोभाव इष्टदेव के साथ सँजोना पड़ता है। इस घनिष्ठता को प्रत्यक्ष करने वाले तरह तरह के शारीरिक, मानसिक आदान-प्रदान के कल्पना चित्र के बीच, जो भाव भरे क्रीड़ा विनोद सम्भव है, उनकी अनुभूतियाँ भावलोक में गढ़नी होती हैं। दृश्य की दृष्टि से इष्टदेव का बहिरंग परिकर और भाव की दृष्टि से प्रगाढ़ आत्मीयता के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली अनुभूतियों और सम्वेदनाओं की गहराई इन दोनों स्थल एवं सूक्ष्म तत्त्वों का समन्वय हो जाने से साकार उपासना की ध्यान प्रक्रिया पूर्ण हो जाती है। इससे एकाग्रता का लाभ ही नहीं विश्वव्यापी दिव्य सत्ता के साथ घनिष्ठता बना लेने और उसके साथ संपर्क साध सकने वाले आत्मिक चुम्बकत्व का भी विकास होता है। इस मार्ग पर चलने चलते मनोनिग्रह और मनोमय की स्थिति प्राप्त हो सकती है। समाधि का, आत्म-साक्षात्कार एवं ईश्वर साक्षात्कार का लाभ मिल सकता है।

निराकार उपासना में सूर्य, दीपक अथवा किसी अन्य वर्ण आकार के प्रकाश का ध्यान किया जाता है। वह प्रकाश सुदूर अन्तरिक्ष में उदय हो रहा है और साधक एक छोटे बालक की तरह उसका दिव्य दर्शन कर रहा है। उसकी धूप सेंक कर शरीर को गरम कर रहा है। इष्ट देव की की ऊष्मा और तेजस्विता साधक के शरीर में भीतर प्रवेश करके स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों में नव चेतना का संचार कर रही है, ऐसी भावना की जाती है। प्रकाश ऊर्जा के साधक में प्रवेश करने के साथ-साथ उसके स्थूल शरीर में ओजस्विता, सूक्ष्म शरीर में मनस्विता, कारण शरीर में तेजस्विता, सूक्ष्म शरीर में मनस्विता, कारण शरीर में तेजस्विता की वृद्धि होती अनुभव की जाती है। बल, ज्ञान और भाव के संचार की आस्था जितनी प्रगाढ़ एवं परिपक्व होगी उतनी ही निराकार प्रकाश व्यान की सार्थकता मानी जाएगी भाव रहित ध्यान से तो मात्र एकाग्रता का लाभ मिलता है। आत्मिक प्रगति के लिए ध्यान के साथ भावनाओं का गहरा पुट रहना चाहिए। सूक्ष्म शरीर में मस्तिष्कीय एकाग्रता की ओर कारण शरीर के अन्तरात्मा परत में दिव्य भाव सम्वेदनाओं की विभूतियाँ रहती है। स्थूल शरीर को ध्यान धारणा का उपक्रम बनाते समय यह समझना होता है कि ध्यान चाहे साकार का हो चाहे निराकार का, उसमें भाव सम्वेदना का गहरा पुट लगा रहना आवश्यक है। यदि नीरस मन से उपेक्षापूर्वक प्रकाश अथवा आकृति का दर्शन मात्र किया जा रहा है तो उस स्थिति में सरसता उत्पन्न ही न हो सकेगी और हजार प्रयत्न करने पर भी मन के बार बार उचटने का व्यवधान दूर न हो सकेगा। जीव बँधता तो सरसता के साथ है। ध्यान में यदि भाव सरसता मिली हुई होगी तो फिर मनोनिग्रह से लेकर मनोमय के समस्त प्रगति चरण अनायास ही उठते चले जाएँगे और लक्ष्य तक पहुँचना सरल हो जाएगा

ध्यान-कल्पना और भावना के आधार पर किया जाता है। कल्पना मस्तिष्क करता है और भावना अन्तरात्मा से उठती है। यह दोनों ऊँचे स्तर है। और प्रायः आत्मिक क्षेत्र में वे प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहते हैं। यों साँसारिक कार्यों की कल्पनाएँ तो कितनी ही उठती हैं और लोभ, मोह से सम्बन्धित राग द्वेष के भाव भी उठते रहते हैं। उनका सहज अभ्यास भी होता है, पर आत्मिक क्षेत्र की न तो कल्पनाएँ ही अभ्यास में आती रही होती है और न उस प्रकार की भावनाओं का ही अनुभव होता है। अस्तु इसके लिए प्रतीकों के सहारे चलना पड़ता है। छोटे बच्चों को तीन पहिये की गाड़ी के सहारे अथवा उँगली पकड़ कर चलना सिखाया जाता है। ज्ञान संवर्धन के लिए प्राथमिक कथाओं में वर्णमाला याद कराने के लिए चित्रों, खिलौनों एवं उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। ऐसा ही कुछ करना आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने वाले आरम्भिक छात्रों के लिए भी आवश्यक होता है।

मूर्ति पूजा के माध्यम से प्रतीकों की छवि खुले नेत्रों के सामने रखी जाती है ताकि उसी से मिलती-जुलती जीवन्त आकृति मस्तिष्क में जम सके और ध्यान धारणा के काम आ सकें। देव प्रतिमा की पूजा, आरती करते हुए श्रद्धा, भावना का उद्भव किया जाता है। ध्यान में इष्ट देव की छवि देखते रहने भर से भी तो कुछ काम नहीं चलता उसके साथ श्रद्धा का गहरा पुट रहना ही चाहिए। प्रतिमा पूजन से छवि भी कल्पना क्षेत्र में अपना स्थान बनाती है ओर पूजा उपचार के साथ श्रद्धा की अभिव्यक्ति का जो उपक्रम चलता है उससे भावना क्षेत्र में श्रद्धा सम्वेदना को विकसित होने का अवसर मिलता है। अस्तु प्रतीक पूजा को स्थूल शरीर के क्षेत्र में की जाने वाली ध्यान धारण ही माना गया है।

निराकार ध्यान में प्रकाश धारणा की प्रमुखता है। छोटे बिन्दु से आरम्भ करना हो तो दीपक की लौ के त्राटक को निमित्त बनाते हैं। हर पूजा प्रकरण में दीपक जलाने का विधान इसी दृष्टि से रखा गया है। उसकी ओर बार बार ध्यान जाते रहने से दीपक की लौ आँखों के आगे घूमती रहती है और उस आकृति का कल्पना चित्र मस्तिष्क में उतारना सरल पड़ता है। दीपक पर त्राटक करने का विधान आत्म साधना में प्रचलित है। साधक पालथी मार कर बैठता है। तीन फुट दूर छाती की ऊँचाई से किसी चौकी आदि पर दीपक रखता है। उसे हलकी दृष्टि से दस सेकेण्ड देखता है, फिर आँखें बन्द कर लेता है और मस्तिष्क के मध्य त्रिकुटी स्थान पर उसी दीपक की लौ के जलने की कल्पना करता है। आँखें खोलकर दीपक की लौ देखने और फिर आँख बन्द करके मस्तिष्क के मध्य में जलती लौ की कल्पना करने की प्रक्रिया चलती रहती है। शास्त्रकारों ने चालीस दिन तक इस प्रकार दीपक त्राटक करने का विधान नये साधकों के लिए रखा है। इस आधार पर प्रकाश बिन्दु का ध्यान कर सकने की क्षमता उत्पन्न हो जाती है। छोटे बिन्दु से दिव्य प्रकाश की किरणें निकलती है और वे बाहर फैलती हुई सम्पूर्ण शरीर क्षेत्र में आलोक उत्पन्न करती है। यह भीतर से बाहर की ओर प्रकाश विस्तार का उपक्रम है।

बाहर से भीतर को प्रकाश के प्रवेश का उद्देश्य सूर्य ध्यान से पूरा होता है। सुदूर अन्तरिक्ष में प्रभातकालीन स्वर्णिम बाल सूर्य को ही उपयुक्त समझा गया है। मध्यकालीन सूर्य में प्रचण्डता है और अस्त काल में उसकी आभा धूमिल हो जाती है। अस्तु ध्यान के लिए उसी को उपयुक्त माना गया है। प्रारम्भिक अभ्यास के लिए दीपक की तरह प्रभातकालीन सूर्य पर भी त्राटक करने की आवश्यकता पड़ती है। धारणा इसी से परिपुष्ट होती है और कल्पना इसी से उभरती है। प्रातः काल अरुणोदय के समय कोई ऐसा स्थान नियत करना चाहिए, जहाँ पेड़ों, मकानों आदि की आड़ न हो, तो धरती से ऊपर उभरता हुआ बाल कार्य बिना किसी अड़चन के दृष्टि गोचर हो सके। कुशासन अथवा कम्बल बिछाकर मेरुदण्ड को सीधा रखते हुए पालथी मारकर बैठना चाहिए। आँखें अधखुली रखना, ध्यान मुद्रा है। हाथों को गोदी में रखना चाहिए। बाई हथेली नीचे और दाहिनी ऊपर रहे। बैठने का यही तरीका उत्तम है। यों आँखों को तर्जनी के पोरुओं से लगाकर-हथेली ऊपर रखते हुए-दोनों हाथ दोनों घुटनों पर रखकर ध्यान के लिए बैठने की भी एक परिपाटी है, पर अधिक उपयोगी गोदी में हाथ रखकर बैठने की विधि ही है। शरीर पर लज्जा निवारण के न्यूनतम कटि वस्त्र ही पहने जाएँ, पूरा शरीर नंगा रहे।

सूर्य त्राटक में दीपक त्राटक से अधिक सतर्कता बरतनी होती है। दीपक का प्रकाश मन्द होता है और सूर्य का तीव्र। दीपक को खुली आँख से निहारने की अवधि मर्यादा दस सेकेण्ड की है दीपक को खुली आँख से निहारने की अवधि मर्यादा दस सेकेण्ड की हैं। इससे अधिक समय तक उसे लगातार न देखा जाय। दस सेकेण्ड निहारना और बीस सेकेण्ड मस्तिष्क के मध्य में लौ की कल्पना करना यह दीपक त्राटक का उपक्रम है। सूर्य का तेज प्रचण्ड होता है इसलिए उसका दर्शन एक या दो सेकेण्ड भर का होना चाहिए। खुले प्रकाश को अधिक देर देखते रहने से आँखों को हानि पहुँचती है, इस तथ्य से शरीर विज्ञान का हर विद्यार्थी परिचित है। त्राटक के नाम पर भी उस प्रकृति मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए अन्यथा लाभ के स्थान पर हानि की सम्भावना रहेगी। मन्द प्रकाश होने के कारण दस सेकेण्ड तक दीपक को लगातार देखने से आँखों को हानि नहीं होती। इसी प्रकार प्रभात कालीन सूर्य एक या दो सेकेण्ड खुली आँख से देखा जा सकता है। श्वेत वर्ण सूर्य को देखना सर्वथा निषिद्ध है। पीला रंग समाप्त होते ही सूर्य ध्यान के योग्य नहीं रह जाता। इसी प्रकार लगातार अधिक देर खुली आँख से देखन पर भी सूर्य त्राटक से अहित होता है। मर्यादित मात्रा में ही हर वस्तु का लाभ है। अति बरतने पर तो अमृत भी विष हो सकता है।

सूर्य को एक दो सेकेण्ड खुली आँख से देखने के उपरान्त आँखें बन्द कर लेनी चाहिए और तीस सेकेण्ड तक उसी स्थान पर जहाँ सूर्य उगा हुआ है अरुणोदय के दर्शन की कल्पना की जाय। दो सेकेण्ड देखना-तीस सेकेण्ड कल्पना करना यह क्रम प्रायः पन्द्रह मिनट चलता रह सकता है। इतने में सूर्य की स्वर्णलता धूमिल पड़ जाती है और श्वेत वर्ण की प्रौढ़ता आने लगता है। तब उस पर त्राटक करना व्यर्थ है। सूर्य दर्शन त्राटक का यह उपक्रम बीस दिन करने से प्राथमिक आवश्यकता पूरी हो जाती है। दीपक और सूर्य त्राटकों के समय में अन्तर रहना स्वाभाविक है। दीपक अभ्यास चालीस दिन करना पड़ता है और सूर्य अभ्यास बीस दिन ही पर्याप्त होता है। दीपक दर्शन दस सेकेण्ड चलता है और सूर्य दर्शन दो सेकेण्ड दीपक अभ्यास बीस मिनट प्रति दिन चलता रह सकता है किन्तु सूर्य अभ्यास के लिए दस या पन्द्रह मिनट पर्याप्त है।

दीपक को आत्मा का प्रतीक माना गया है और सूर्य को परमात्मा का। इसीलिए दीपक की आभा बिन्दु से विस्तार की ओर चलती है। आत्मा को अपना विकास विस्तार करना पड़ता है। दीपक की लौ मध्य मस्तिष्क में अवस्थित होकर अपना विस्तार करती है और उसके आलोक से शरीर के अंग प्रत्यंगों में आत्म चेतना का संचार होता है। असुर आच्छादनों का कषाय कल्मष घेरा तिरोहित होता जाता है और आत्म भावना को स्थापना होती है। यही दीपक त्राटक की पराचेतना है। सूर्य प्रतीक है। सविता उसका देवता। सविता का अर्थ है- तेजस्वी परमात्मा। ऊर्जा, आभा, गति, जीवन, मर्यादा यह पाँच प्राण सूर्य से निस्सृत होते हैं। उन्हीं को प्राण, अपान, समान उदान, व्यान नामों से पुकारा जाता है। सूर्य त्राटक करते समय साधक की भावना प्रस्तुत प्रकाश पिण्ड के सहारे तेजस्वी सविता-देवता की अभ्यर्थना करने की होनी चाहिए।

सूर्य जड़ है उसमें चेतना एवं भावना का अभाव है। इसलिए मात्र सूर्य के प्रकाश का ध्यान करने भर से आध्यात्मिक प्रगति का उद्देश्य पूरा नहीं होता। चैतन्य सविता ही उपास्य है। उसी में सद्भावनाओं, सत्प्रेरणा और विभूतियों का भाण्डागार सन्निहित है। सूर्य त्राटक करके कुछ समय अन्तरिक्ष से दिव्य चेतना की वर्षा होने का ध्यान करना चाहिए। किरणें वर्षा की जलधारा की तरह साधक के शरीर पर बरसती है और सूखी मिट्टी में जिस तरह वर्षा का जल प्रवेश करता है और उसे गीला बनाता है, उसी प्रकार यह अनुभव किया जाना चाहिए कि सविता-देवता की अनुग्रह किरणें साधक की समग्र सत्ता के ऊपर बरसती हैं और उसके अन्तराल की गहराइयों तक प्रवेश करती चली जाती हैं।

सविता देवता शरीर में बलिष्ठ श्रमशीलता, मन में प्रखर विचारणा और अन्तःकरण में उदात्त सम्वेदनाओं की बौछार करते हैं। एक्सरे की विद्युत शरीरों और पदार्थों में होकर आर पार निकल जाती है, उसी प्रकार सविता के अनुदान साधक के तीनों शरीरों में प्रवेश करते और उन पर अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं। यह भावना यदि सूर्य ध्यान के साथ जोड़कर रखी जाएगी और उस मान्यता को वास्तविकता स्तर की प्रतिष्ठापना की जाएगी तो ही वह समग्र लाभ मिलेगा जो इस महान् साधना के साथ सन्निहित है। प्रकाश दर्शन के साथ साथ अन्त क्षेत्र में दिव्य प्रेरणाओं के अवतरण की बात जितनी गहरी श्रद्धा के साथ हृदयंगम की जाएगी, ध्यान का उद्देश्य उतनी ही मात्रा में उपलब्ध होता चला जाएगा

स्मरण रखा जाय। प्रभातकालीन सूर्य या दीपक का त्राटक आरम्भिक अभ्यास भर है। ध्यान तो कल्पना एवं भावना के सम्मिश्रण से ‘सूक्ष्म’ एवं ‘कारण’ शरीरों के माध्यम से ही सम्भव होता है। अस्तु त्राटकों की आवश्यकता अधिक समय तक नहीं रहती। बीच बीच में कभी ध्यान की प्रखरता में शिथिलता होने लगे तो एकाध सप्ताह के लिए उसका अभ्यास दुहरा लिया जाता है।

कायकलेवर को- शरीर को व्यायाम, संयम, पौष्टिक आहार के माध्यम से परिपुष्ट किया जाता है। अन्तः चेतना को परिपुष्ट करने के लिए किये जाने वाले व्यायामों में ध्यान प्रक्रिया का महत्त्व सर्वोपरि है। जप को भूमिशोधन और ध्यान को बीज बोने की उपमा दी गई है। जप की पुनरावृत्ति से जो रगड़ की जाती है उससे कषाय कल्मषों के परिशोधन का प्रयोजन पूरा होता है। यह सोने को तपाकर खरा बनाने भर की बात हुई है। अलंकार आभूषण बनाने के लिए जो प्रयत्न करना पड़ता है, उसकी तुलना ध्यान से की जा सकती है। ध्यान के फलस्वरूप जो संकल्प शक्ति प्रखर होती है उसी के सहारे अन्तः शक्तियों के जागरण और दिव्य लोक से विभूतियों के अवतरण के दोनों उद्देश्य पूरे होते हैं। ध्यानयोगी व्यक्तित्व सम्पन्न भी बनता है और दिव्य शक्तियों का कृपा पात्र भी। भीतर से सिद्धियाँ उदय होती है और बाहर से ऋद्धियाँ उपलब्ध होती हैं। इन उभय पक्षीय अनुदानों से लाभान्वित होकर साधना क्षेत्र में दूरदर्शी संकल्प लेकर उतरने वाला इतना कुछ प्राप्त करता है जितना अन्य किसी क्षेत्र में किये जाने वाले पुरुषार्थों से सम्भव नहीं हो सकता।

ध्यान को कई भागों में विभक्त किया जा सकता है। (1) अनैच्छिक ध्यान (नान वालेन्टरी अटेन्सन) जिन विचारों की इच्छा या आवश्यकता अनुभव नहीं होती फिर भी वे किसी पूर्व मनः स्थिति या कल्पना के आधार पर आ धमकते हैं। (2) ऐच्छिक ध्यान (वालेन्टरी अटेन्सन) विचारों एवं कल्पना चित्रों को इच्छापूर्वक उत्पन्न करके मस्तिष्क में जमाया जाता है। (3) इच्छा विरुद्ध ध्यान (नान वालेन्टरी फोर्स्ड अटेन्सन) सामान्य इच्छा से प्रतिकूल बलात् किसी दिशा में आकर्षण उत्पन्न करने वाले विचार (4) स्वाभाविक ध्यान (हैविचुअल अटेन्सन) अभ्यस्त गतिविधियों की स्मृति दिलाने वाले ध्यान।

बारीकी में न जाया जाय तो उन्हें दो भागों में भी बाँटा जा सकता है- एक वे जिन्हें उपयोगी आवश्यक समझ कर इच्छानुसार मनःक्षेत्र में उत्पन्न किया जाता है। दूसरे वे जिनकी प्रत्यक्ष इच्छा या आवश्यकता नहीं होती फिर भी मस्तिष्कीय क्षेत्र में घुस पड़ते हैं। साधारण स्तर के हों तो अभीष्ट चिन्तन प्रक्रिया को गड़बड़ाते हैं और ध्यान को कहीं से कहीं उड़ा ले जाते हैं। यह अवांछनीय एवं अनावश्यक विचार कई बार इतने तीव्र होते हैं कि सारे विचार तन्त्र में हलचल खड़ी कर देते हैं और असामान्य प्रबलता के कारण विवेक को विरोध करने तक में असमर्थ कर देते हैं। आवेश की तरह छाते हैं और मनुष्य को कहीं से कहीं घसीट कर ले जाते हैं। ऐसी ही आवेशग्रस्त स्थिति में व्यक्ति कुछ से कुछ अनचाहा कर बैठता है और पीछे उस कृत्य पर पछताता है।

क्रोध और काम के आवेश ऐसे ही उग्र होते हैं। उनके वशीभूत व्यक्ति अक्सर ऐसा कर गुजरते हैं, जिन को सामान्य मनःस्थिति आने पर अपने आप ही लज्जा, दुःख और पश्चाताप का अनुभव होता है।


Quotation

निर्माण में लगे और जो बनाया है उसकी रक्षा करो। घमण्ड मत करो, बुरे मत बनो और न बड़प्पन के लिए ललचाओ। कर्तव्य के पालन का आनन्द लूटो और विघ्नों से बिना डरे जूझते रहो। यही है धर्म का सार तत्त्व

-लाओत्से


मंत्र में शब्द, चरित्र और भावना की समन्वित शक्ति

मन्त्र शक्ति में प्रथम आधार है ध्वनि प्रवाह का सही होना। शब्द वस्तुतः एक तरह की कम्पन-तरंगों ही हैं। मस्तिष्क में यह जानकारी व अभ्यास संचित है कि किन स्वर-यन्त्रों में किस तरह की हलचल करने से बाह्य-जगत में कौन से शब्द तथा विचार सम्प्रेषित होंगे। व्यक्ति की इच्छा-शक्ति से प्रेरित होकर उच्चारण-मन्त्रों में पूर्वाभास के अनुसार उभार पैदा होता है, उस उभार से मुँह में भरी हुई वायु को तथा बाहर की वायु को आघात लगता है और ध्वनि तरंगें पैदा होने लगती हैं। सुनने वाले व्यक्ति के कान इन ध्वनि-तरंगों को सुनकर उनका मस्तिष्कीय जानकारी एवं अभ्यास के आधार पर विश्लेषण कर उन शब्दों का अर्थ व प्रयोजन निश्चित करते हैं। इस तरह इच्छा से गति तथा गति से तरंगों उत्पन्न होती हैं। ये ध्वनि-कम्पन वायु के भीतर रहने वाले एक सूक्ष्म तत्त्व ‘ईश्वर’ से होते हैं। ईश्वर तत्त्व के परमाणु अत्यन्त सूक्ष्म और अति संवेदनशील हैं तथा एक सेकेण्ड में 34 अरब तक कम्पन उत्पन्न कर सकते हैं। यद्यपि हमारे कान एक सेकेण्ड में 32 से 68 तक ही कम्पन सुन समझ सकते हैं। 32 से कम नहीं और 68 से अधिक नहीं। जब ईश्वर तत्त्व के परमाणुओं द्वारा उत्पन्न कम्पन चरम सीमा पर अर्थात् 34 अरब के प्रति सेकेण्ड के आस पास पहुँचते हैं, तो उनसे एक अखण्ड प्रकाश की किरणें प्रवाहित होने लगती है। यही प्रकाश-किरणें एक्सरे कहलाती हैं। ये किरणें अद्भुत गतिशील होती हैं, एक सेकेण्ड में ये प्रायः एक करोड़ मील चल लेती हैं। इसी आधार पर रेडियो, टेलीविजन बने हैं। वायु के कम्पन नष्ट हो जाते हैं, किन्तु ईश्वर के कम्पन कभी भी नष्ट नहीं होते। हाँ, पुराने होने पर वे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण की सतह पर जाकर स्थिर हो जाते हैं। वहाँ वे बलिष्ठ हो जाने पर अपने समानधर्मी अन्य कम्पनों को अपनी ओर खींचते हैं और दुर्बल होने पर समानधर्मी किन्तु शक्तिशाली अन्य कम्पनों की ओर खिंच जाते हैं। इस तरह संघ-शक्ति के आधार पर वे एक चुम्बकत्व का सृजन कर सकते हैं। यह चुम्बकत्व एक चेतना जैसा होता है, जो समानधर्मी चेतना वाले मनुष्यों को प्रभावित करता है। जिन मनुष्यों के मस्तिष्क की स्थिति उन प्राचीन, सुसंगठित शब्दों की कम्पन शक्ति से मिलती जुलती होगी, उन पर इस चुम्बकत्व शक्ति का, इस चेतना का सीधा प्रभाव पड़ेगा। यदि स्थिति समान न हुई, तो समान शब्दों का उच्चारण उस प्रभाव की उपस्थिति का परिचय तो दे सकता है, किन्तु उस पर गहरा प्रभाव नहीं डाल सकता। इसीलिए मन्त्र-जपकर्ता की अन्तश्चेतना का परिष्कार अत्यावश्यक है। सभी पूर्वज ऋषियों की चेतना से उसकी सम्वेदना जुड़ सकती है।

ध्वनि एक प्रत्यक्ष शक्ति है। अणु-शक्ति विद्युत-शक्ति ताप-शक्ति आदि की तरह ही शब्द शक्ति का भी उपयोग सम्भव है।

शब्द से कम्पन होता है। मुख अथवा किसी पदार्थ विशेष में शक्ति का प्रयोग होने से शब्द, प्रवाह निःसृत होता है। इस प्रकार शब्द अपने आप में कम्पन प्रवाह की एक स्थिति विशेष है। बाह्य वायु से आन्तरिक वायु की टक्कर होने से ध्वनि का यह कम्पन प्रवाह प्रारम्भ होता है।

मन्त्रों के शब्द प्रवाह का जो चित्र बनता है, उसी के आधार पर उनके अधियनता देवताओं की आकृति का आकलन किया गया है।

शब्दों की भावोत्तेजक क्षमता सुविदित है। साथ ही उनमें वह सामर्थ्य भी विद्यमान् हैं जो स्वयं को भी तथा अन्यों को- सम्पूर्ण सूक्ष्म जगत को प्रभावित कर सकें। मन्त्र विज्ञान में इसी सामर्थ्य का उपयोग होता है।

जिस प्रकार सितार के तारों पर एक निश्चित क्रम से उँगलियाँ रखने पर सुनिश्चित स्वर लहरियाँ निकलती हैं, उसी प्रकार शब्दों के उच्चारण का एक लयबद्ध क्रम विशिष्ट कम्पनों को उत्पन्न करता है, जो विशेष शक्तिशाली व प्रभावोत्पादक होते हैं।

इसीलिए मन्त्रों में महत्त्व मात्र शब्दार्थ का नहीं। हमारे मुख के तार षट्चक्रों, दिव्य-ग्रन्थियों आदि सूक्ष्म शरीर संस्थानों से जुड़े है। टाइपराइटर की चाबियाँ दबाते चलने से अक्षरों के टाइप होते चलने की ही तरह विशद वैज्ञानिक प्रक्रिया से विनिर्मित मन्त्र गुम्फन मनुष्य के सूक्ष्म शरीर संस्थानों पर सीधा असर डालते हैं और वहाँ एक अतिरिक्त शक्ति प्रवाह उत्पन्न करते हैं। भीतर गूँजते हुए मन्त्र कम्पन स्वयं मन्त्र विज्ञानी को लाभ पहुँचाते हैं और बाहर निकलने पर वे वातावरण को सम्भावनाओं का सृजन करते हैं तथा चाहे जाने पर किसी व्यक्ति विशेष को भी प्रभावित करते हैं।

शब्द शक्ति का चिन्तन मनन उसकी महत्ता व गरिमा का स्मरण कराता है। आज चारों ओर बढ़ रहे शोर से प्रदूषण उत्पन्न होने की चिन्ता चारों और व्यक्त की जा रही है तथा इस शोर को सामाजिक तनाव, बेचैनी और विकृति के कारणों में से एक कहा- बताया जा रहा है। ध्वनियों के अप्रत्याशित आश्चर्यजनक परिणामों की लगातार जानकारी मिल रही है। सभी जानते हैं कि वर्तमान यांत्रिक सभ्यता का शोर सम्पूर्ण मानव जाति पर गहरा दुष्प्रभाव डाल रहा है।

संगीत के प्रभाव पर भी इधर अधिकाधिक खोजे हुई हैं। पशुओं का दूध बढ़ाने, पौधों की विकास, बच्चों में अनुशासन का विकास, समूह में विशिष्ट भावोत्तेजना की सृष्टि आदि के लिए संगीत की प्रभावों की बात अब सर्वविदित है। संगीत वस्तुतः ध्वनि प्रवाह का एक क्रम विशेष मात्र है। उसकी शक्ति शब्द व ध्वनि की ही शक्ति है।

मन्त्र भी इसी शक्ति के पुंज है। उनके अक्षरों का चयन क्रम एवं उच्चारण की अनुशासित व्यवस्था, दोनों का समन्वित प्रभाव साधक को अतिरिक्त विशेषताओं से सम्पन्न बनाता है। उसके आत्मबल को प्रखर प्रबल बनाता है और अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। मन्त्रों के शब्दों का चयन गुँथन विशिष्ट होता है। वे ध्वनि विज्ञान के विशेष नियम-क्रम के अनुरूप गढ़े होते हैं। इसी से उनको देर तक एक ही प्रवाह से उच्चारण करने पर एक विशेष स्तर की ऊर्जा उत्पन्न होती है। यह ऊर्जा विकसित होने पर साधक को उसकी विशिष्ट अनुभूति स्वाभाविक व अनिवार्य है। यह कई तरह की हो सकती है। शरीर मन में स्फूर्ति, उत्साह, विश्वास की वृद्धि होती है। किसी किसी को मन्त्र देवता का साक्षात्कार होता है और सफलता का आशीर्वाद सुनाई पड़ता है। ये अनुभूतियाँ सूक्ष्म इन्द्रियों द्वारा ही होती हैं, तो भी प्रबलता एवं प्रखरता की स्थिति में कई बार स्थूल दर्शन श्रवण जैसे अनुभव हो सकता है, यद्यपि यह हर एक के साथ होना अनिवार्य नहीं। किन्तु विश्वास एवं निष्ठा को परिपक्वता, उत्साह तथा मनोबल की अनुभूति का आधार अवश्य मिलता है। मन्त्र की भाव भूमिका चुम्बकत्व उत्पन्न करती और स्फोट इस चुम्बकत्व को कई गुना विस्तृत एवं सशक्त बनाता है। निष्ठावान् साधक इन उपलब्धियों को प्राप्त कर बढ़ता जाता है।

मन्त्र साधना के साथ-साथ कई प्रकार के व्रत नियमों का पालन करना पड़ता है। साधक को आहार विहार का संयम बरतना पड़ता है। ब्रह्मचर्य से रहना पड़ता है तथा ऐसी मर्यादाओं का पालन करना होता है जो साधक को चरित्रवान, सज्जन, सद्गुणी बनाने के लिए प्रेरणा प्रदान करती है। क्रोध, द्वेष आदि दुर्गुणों का निषेध इसीलिए किया जाता है कि मन्त्र शक्ति उत्पन्न करने वाले शरीर तथा मन को कषाय-कल्मषों से रहित होना चाहिए। मैले कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता। रँगाई से पहले धुलाई आवश्यक होती है। मन्त्र की शक्ति का प्रभाव उत्पन्न करने के लिए साधक के इन्द्रिय समूह तथा अन्तः करण चतुष्टय का परिष्कृत होना आवश्यक है। देखा जाता है कि चरित्रवान साधक स्वल्प जप तप से ही आशाजनक सफलता प्राप्त कर लेते हैं जब कि दोष, दुर्गुणों को चरितार्थ करते रहने वालों की लम्बी और कष्टसाध्य भी निरर्थक चली जाती है।

मन्त्र विज्ञान में जिव्हा के साथ साथ हृदय की शक्ति के समावेश का भी वर्णन है। कहा गया है मन्त्र की प्रखरता के स्त्रोत हृदय से भी उद्भूत होते हैं। यहाँ हृदय से तात्पर्य रक्त संचार करने वाली उस थैली से नहीं है जो अहिर्निशं धड़कती और कण कण को पोषण प्रदान करती है। यों शरीर में जीवन की विभिन्न गतिविधियों के संचालन में प्रयुक्त होने वाली ऊर्जा इसी बिजली घर से मिलती है और उसका प्रभाव अध्यात्म क्षेत्र पर भी पड़ता है। इसीलिए फेफड़ों के माध्यम से हृदय को प्रभावित करने वाले प्राणायामों का विधान बनाया गया है और उसे साधना प्रयोजनों का आवश्यक अंग माना गया है। इतने पर भी मन्त्र शक्ति को प्रखर बनाने में जहाँ हृदय के उपयोग की चर्चा है, वहाँ उसका प्रयोजन भावना शक्ति से है। शरीर विज्ञान में ‘हृदय ’रक्त संचार में संलग्न बाई पसलियों के मध्य अवस्थित मुट्ठी जितने आकार की थैली को कहा जाता है, पर आध्यात्मिक विवेचना में ‘उसे’ भाव संस्थान समझा जाना चाहिए। भावना का- श्रद्धा सम्वेदना का जितना उच्चस्तरीय समावेश मन्त्र साधना में होता है, अश्रद्धा, उपेक्षा और अन्य आमनस्क भाव से बेगार टालने की तरह किसी प्रकार अमुक अक्षरों को रटते रहा जाय तो उससे न तो जिव्हा की शक्ति का उपयोग हुआ माना जाएगा और न हृदय शक्ति का समावेश हुआ कहा जाएगा

जिव्हा की शक्ति को अन्तरिक्ष में बलपूर्वक उड़ाया है, इसका तात्पर्य वाक् शक्ति से है, जो सस्वर, उच्चारण और पवित्र सिंचन से उत्पन्न होती है। पवित्र सिंचन का अर्थ है अनीति उपार्जित अभक्ष्य आहार और कटुभाषण असत्य एवं गिराने वाले परामर्श का परित्याग। जिस जिव्हा से कुधान्य नहीं खाया जाता और पशु प्रवृत्तियों को नहीं भड़काया जाता, उससे उच्चारण की हुई वाणी वाक् कह लाती है और वह प्रत्यक्ष सरस्वती बनकर मन्त्र की शक्ति को प्रचण्ड बना सकने में समर्थ होती है।

हृदय स्थान पर प्रकाश का ध्यान करने-वहाँ न्यास कृत्य करके पवित्रता की आस्था जमाने एवं प्राणायाम के माध्यम से सशक्त बनाने का जो उपक्रम किया जाता है उसे स्थानीय उपचार नहीं समझना चाहिए, वरन् यह तात्पर्य समझ लेना चाहिए कि भावना को उत्कृष्ट बनाने के लिए अंगुलि निर्देश किया जा रहा है। ‘सहृदय’ उसे नहीं कहा जाता जिसकी छाती में हृदय की थैली हो वह तो हर मनुष्य में होती ही है। इससे तो हर व्यक्ति सहृदय कहा जा सकता है। इसी प्रकार ‘हृदय हीन’ का अर्थ निष्ठुर भावना रहित को कहा जाता है, ऐसा तो कोई भी व्यक्ति न होगा जिसके वक्षस्थल में रक्त संचार करने वाली ‘हार्ट’ नामक थैली न हो, वरन् ऐसा भावना के केन्द्र बिन्दु से है। प्रामाणिक उच्चस्तरीय स्तर पर विनिर्मित-स्वर विज्ञान के अनुरूप व्यवहृत-पवित्र जिव्हा द्वारा उच्चरित और सद्भाव सम्पन्न अन्तःकरण द्वारा सुसंस्कारित मंत्राराधन अभीष्ट प्रयोजन में सफल होकर रहता है यह निश्चित है।


विकास और विनाश का गतिचक्र

प्रकृति की मधुर-कटुक-सुन्दर-कुरूप-सुखद-दुःखद क्रिया-प्रक्रिया की विचित्रता ऐसी है जिसे देख कर सहज ही यह समझ सकना कठिन पड़ता है। यह सब क्यों और किस उद्देश्य के लिए हो रहा है? छोटे बच्चे रेत से घर और बालू का महल बनाते हैं, टहनियाँ गाड़ कर बगीचा खड़ा करते और उमंग उठने पर बात की बात में उस सारी संरचना को पैर से ठुकराते और तोड़ फोड़ कर बर्बाद करते देखे जाते हैं। इन परस्पर विरोधी सृजन और विनाश की गति विधियों में समान रूप से उत्साह प्रकट करने वाले बाल स्वभाव का क्या निष्कर्ष निकाला जाय? क्या विवेचन किया जाय? कारण ढूँढ़ न पाने पर भी तथ्य तो यथावत् ही बने रहते हैं। बाल-बुद्धि के साथ जुड़ी हुई यह विचित्र विसंगति बड़ों पर भी यदा-यदा अपना प्रभाव छोड़ती है। वे भी सृजन और तोड़ फोड़ की परस्पर विरोधी प्रवृत्तियों का परिचय देते रहें है। आज की मित्रता कल शत्रुता में परिणत होती देखी जाती है। किसान को एक समय पौधे उगाने और उन्हीं को दूसरे समय काट कूट कर चूरा बना देने की की चित्र विचित्र क्रियाओं के बीच संगति कैसे मिल?

लगता है कि पुरातन को नवीन में बदलने के लिए एक गतिचक्र एक सुनिश्चित विधि विधान के साथ चल रहा है। अभिवृद्धि एक सीमा तक ही प्रौढ़ता है ताकि आरम्भ और अन्त का- और आरम्भ का गतिचक्र अपनी गोलाई एवं धुरी पर अनवरत रूप से अग्रगामी बना रह सके।

जन्म को न तो आदि समझा जाना चाहिए और न मरण को अन्त। चक्र में आदि अन्त कहाँ है इसकी कल्पना भर की जा सकती है। तथ्यतः गोलाई में आदि अन्त कहीं होता ही नहीं। जीवन का अन्त मरण समझा जाता है, यदि उसे नवीन जन्म का आरम्भ कहा जाय तो उसका खण्डन कैसे हो सकेगा? नवीन जन्म का आरम्भ गत जीवन के अन्त के साथ साथ ही होता है, मरण को जन्म का अदृश्य आरम्भ कहने में किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए। पेड़ से फल टूट कर गिरने और उसकी गुठली फेंक दिये जाने को दुर्भाग्यपूर्ण अन्त ही समझा जाता है, पर नये वृक्ष का जन्म शुभारम्भ इस गुठली के छितराए जाने के दुर्भाग्य को क्यों न माना जाय? हर्ष और विषाद की- संयोग और वियोग की अविच्छिन्नता कितनी विचित्र है, इसे समझने में दार्शनिक बुद्धि भी हत-प्रभ हो जाती है।

प्रकृति भी इसी उपक्रम की अभ्यस्त मालूम पड़ती है। उसकी उर्वरता अद्भुत है। वनस्पतियों से लेकर जीवधारियों तक भी कोटि-कोटि जातियाँ किस प्रकार उगती और बढ़ती हैं यह सब देखते हैं। पंच तत्त्वों से बने हुए अगणित आकृति के पदार्थ भी बनने बढ़ने और जीर्ण शीर्ण होकर मरने की धुरी पर ही घूमते रहते हैं।

यह सब अकारण नहीं है। अभिवृद्धि के साथ विकृतियाँ भी घुसती जाती है। उनकी मात्रा में जब तक उपयोगिता का अंश अधिक बना रहता है। तब तक उसमें स्थायित्व बना रहता है, पर जब अनुपयोगिता का भाग बढ़ने लगा तो उसके परिवर्तन का अदृश्य क्रम चल पड़ता है। सामान्य क्रम से चल रहे परिवर्तन तो बहुत प्रभावित नहीं होते, पर जब रूपान्तरण का अन्तिम चरण आता है तो उसकी दृश्य विचित्रता चोंदती, विक्षोभ उत्पन्न करती है।

सम्मति की अपनी उपयोगिता है और विपत्ति की अपनी। सफलता से मिलने वाला प्रसन्नता का जितना है उतना ही असफलता के कारण उत्पन्न हुई तड़पन का भी। प्रशंसा से उमंग, तुष्टि एवं स्फूर्ति बढ़ती है किन्तु निन्दा से भूल सुधार ने की प्रेरणा भी कम नहीं होती। भगवान् के अवतारों के साथ अधर्म के नाश और धर्म के अभिवर्धन का उद्देश्य जुड़ा रहता है। दुष्कृतों का विनाश और साधुता का परित्राण करने की अवतार प्रतिज्ञा के पीछे सृष्टि संतुलन का ही आश्वासन है। भगवान् इसीलिए बार बार शरीर धारण करते और लीलाएँ करते हुए जन साधारण को वस्तुस्थिति समझाने और तदनुकूल गति विधियाँ अपनाने की प्रेरणाएँ देते हैं

पृथ्वी पर प्रकृति की विकास व विनाश लीलाओं का क्रम अनवरत रूप से चलता रहता है। पृथ्वी अपने इर्द-गिर्द वायुमण्डल का एक कवच पहने हुए हैं। उसके तीन आवरण हैं। प्रत्येक से पृथ्वी को, इसके प्राणियों को तथा पदार्थों को बहुत कुछ मिलता है। किन्तु यह भी एक कटु सत्य है कि उसी के कारण अपनी दुनिया को विनाश का कष्ट भी कम नहीं भुगतना पड़ता।

हम सभी मनुष्य वातावरण के अदृश्य सागर के तले निवास करते हैं। प्रायः 99 प्रतिशत वातावरण का भार 5 अरब टन है और वह सिर्फ ऊपर के 30 मील के क्षेत्र में सिमटा है। इस सघनता का लाभ यह है कि वह अन्तरिक्षीय किरणों, उल्कापातों आदि के घातक प्रभावों से पृथ्वी के जीवन की रक्षा करता है। साथ ही प्राणवायु जल रसायन आदि देता है। तापमान को नियन्त्रित रखता है। इस तरह यह घनीभूत वातावरण अपनी पृथ्वी के लिए-हम सब प्राणियों के लिए-एक रक्षा कवच का काम करता है।

इस वातावरण में तनिक-सी भी उथल पुथल पृथ्वी तल पर भयंकर चक्रवातों, प्रलयंकर तूफानों और विक्षुब्ध विनाश लीला का कारण बनती है। सागर की विशाल जल राशि भी निरन्तर उफनती रहती है, धरती के ऊपर का वातावरण भी सदा धधकता रहता है। अभी तक ऐसा कोई यन्त्र नहीं बन पाया है, जो वातावरण की गहराई नाप सके और तथ्यों का सही एवं समग्र पता लगा सकें। धरती की छाती में तो विशाल ज्वालामुखियों का अविराम हाहाकार दबा ही रहता है।

भीतर चल रही उथल पुथल कभी कभी आकस्मिक विस्फोटों के रूप में अभिव्यक्ति होती है। यद्यपि कोई भी विस्फोट वस्तुतः आकस्मिक नहीं होता। वह एक क्रमिक प्रक्रिया की ही अनिवार्य परिणति होता है।

इस परिवर्तन के स्वरूप बहुत तरह के होते हैं सौर मण्डल की गति विधियों की एक दूसरे ग्रह पर भी पारस्परिक प्रतिक्रिया होती है व प्रभाव पड़ता है। ज्वालामुखियों के विस्फोट, तूफान, भूकम्प, ऊपरी वातावरण विषमता से उत्पन्न हलचलें अथवा सौर मण्डल की कोई भी असामान्य गतिविधि ऐसे तीव्र परिवर्तनों का कारण बन जाती हैं। अन्तरिक्ष में आवारागर्दी करने वाली कुछ उल्काएँ भी अपनी दुस्साहसिकता के कारण स्वयं को तो क्षति पहुँचाती ही है, पृथ्वी या कि अन्य ग्रहों को भी उथल पुथल से भर देती है। इन उद्दण्ड उल्काओं की आवारागर्दी की गाथाएँ दुनिया पर के पौराणिक साहित्य में रोचक ढंग से वर्णित हैं।

यूनान की पौराणिक गाथाओं में ‘इकोरस’ नाम के एक युवक की कथा है। यह सूर्य से मिलने की महत्त्वाकाँक्षा रख, नकली, पंख लगाकर चल पड़ा। पंख उसने मोम से चिपका लिए थे।

अधिक ऊँचे जाने पर उसके पंख को जोड़ने वाली मोम गर्मी के कारण पिघल गई और पंख नीचे गिर पड़े, ‘इकोरस’ भी औंधे मुँह नीचे समुद्र में आ गिरा तथा मर गया।

पिछले दिनों इसी युवक की तरह का एक दुस्साहसी उल्का-पिंड भी देखा गया। इसका नाम भी ‘इकोरस’ ही रखा गया। यह ‘इकोरस’ उल्कापिंड कभी सूर्य के अधिक निकट जा पहुँचता है, इतना कि बस थोड़ा और पास जाए, तो भुती ही बन जाए। कभी लगता है वह बुध से कभी मंगल और कभी शुक्र से अब टकराया, तब टकराया। सूर्य के अति निकट पहुँच पहुँच कर वह आग का गोला ही बन जाता है। तो कभी सूर्य से इतनी दूर जा पहुँचता है कि शीत की अति ही हो जाती है। जून 1968 में इस उद्दण्ड क्षुद्र ग्रह के पृथ्वी के ध्रुव प्रदेश से आ टकराने की सम्भावना बढ़ गई थीं। यदि खगोल शास्त्रियों की यह आशंका सत्य सिद्ध होती, तो पृथ्वी में भीषण हिम तूफान आते, समुद्र उफनकर दुनिया का थल-भाग अपनी चपेट में ले लेता, साथ ही लाखों वर्ग मील भूमि में गहरा गड्ढा हो जाने की सम्भावना थी, जहाँ यह उफनता समुद्री जल भर जाता तथा कुल मिलाकर करोड़ों मनुष्यों का सफाया हो जाता। सन् 1908 में मात्र हजार फुट व्यास की एक उल्का साइबेरिया के जंगल में गिरी थी, तो वहाँ अणुबम विस्फोट जैसे दृश्य उपस्थित हो गये थे। इकोरस तो उस उल्का से हजारों गुना बड़ा है, अतः परिणाम का अनुमान किया जा सकता है।

सौभाग्यवश इकोरस पृथ्वी के समीप होकर गुजर गया और एक भीषण दुर्घटना टल गई। सौर मण्डल में ऐसे अनेक क्षुद्र ग्रह हिडालगो, इरोस, अलबर्ट, अलिण्डा, एयोर, अपोलो, एडोरस, हर्मेस आदि चक्कर काट रहे हैं, जो सहसा टकराकर कभी भी धरती के जीवन में उथल पुथल मचा सकते हैं।

वैज्ञानिकों ने अध्ययन कर यह निष्कर्ष निकाला है कि सूर्य पर जो हर 11 वें वर्ष कुछ धब्बे से बन जाते हैं, उनका कारण सौरमण्डल के ग्रहों की गतिविधियाँ ही है। स्पष्ट है कि सौर मण्डलीय ग्रहों की प्रत्येक गतिविधि से सौर मण्डलीय ग्रह प्रभावित होते हैं। सभी ग्रह पश्चिम से पूर्व की ओर-सूर्य की परिक्रमा करते हैं और पृथ्वी की ही भाँति अपनी धुरी पर भी घूमते हैं। इस परिभ्रमण काल में जो अगणित प्रकार की उथल पुथल होती है उनसे पृथ्वी सहित सभी ग्रह उपग्रह प्रभावित होते हैं।

दो अमेरिकी खगोल विदों-जान ग्रिबन और स्टीफेन प्लेगमैन-ने जानकारी दी है कि सन् 1982 में सौर मण्डल के नौ ग्रह यानी मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, पृथ्वी, यूरेनस, नेपच्यून और प्लूटो सूर्य के बिलकुल एक तरफ एकत्र हो जाएँगे। इससे सूर्य पर कई बड़े धब्बे पड़ जाएँगे इनका परिणाम होगा विश्व के विभिन्न हिस्सों में भयानक भूकम्प, प्रलयंकर बाढ़ें, प्राकृतिक विपदाएँ। इन दोनों वैज्ञानिकों के अनुसार सन् 1982 में समुद्री ज्वारभाटे तीव्र प्रबलतर हो जाएँगे कैलीफोर्निया में एक प्रचंड भूकम्प आयेगा, जो कि 1906 में सेन्फ्रांसिस्को में आये भूकम्प से भी प्रबल और विनाशक हो सकता है। प्रकृति में समय समय पर प्रचण्ड उथल पुथल होती ही रहती है।

ऐसी उथल पुथल की स्मृतियाँ मानवीय इतिहास में सुरक्षित हैं। पुराण कथाओं में इनका रोचक वर्णन मिलता है। मात्र क्षुद्र नक्षत्रों के टकराने अथवा सूर्य या किसी बड़े नक्षत्र में व्यापक परिवर्तन होने, उथल, पुथल मचने से ही धरती में जलप्लावन आदि की घटनाएँ नहीं घटती बल्कि धरती के भीतर की हलचलें और उसके सिकुड़ने फैलने की विभिन्न प्रक्रियाएँ भी जल प्रलय आदि के दृश्य उपस्थित करती हैं।

सभी जानते हैं कि कभी भू-मण्डल के सभी महाद्वीप एक दूसरे से जुड़े थे। ग्रहों की हलचलों और आकुंचन प्रसार की प्रक्रियाओं से वे एक दूसरों से दूर हटते गए। हिमालय अभी भी लगातार उत्तर की ओर खिसक रहा है और भू-वैज्ञानिकों का कथन है कि 5 करोड़ वर्ष बाद सम्पूर्ण उत्तरी भारत का अधिकांश इलाका हिमालय के पेट में समा जायेगा। इसी तरह सन् 1966 में मास्को में सम्पन्न द्वितीय अन्तर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सम्मेलन में प्रो० डा० ब्रूस सी० हीजेन और डा० नील यू० डाइक ने घोषणा की थी कि आज से लगभग 2 हजार 32 वर्ष बाद पृथ्वी के चुम्बकीय बल क्षेत्र अपना स्थान बदल देंगे साथ ही पृथ्वी की चुम्बकीय शक्ति घटेगी। इसमें मनुष्यों का आकार व जीवन भी प्रभावित होगा। वृक्ष वनस्पति, कीट पतंग आदि पर भी व्यापक प्रभाव पड़ेगा। प्रशांत महासागर की तलहटी से निकाली गई मिट्ठी और रेडियो सक्रियता एवं ‘लारिया’ नामक एककोशीय जीव में हो रहे क्रमिक परिवर्तन से पता चलता है कि सन् चार हजार तक चुम्बकीय क्षेत्र में परिवर्तन होगा, जिससे ध्रुवों का स्थान भी परिवर्तित होगा। परिणामस्वरूप धरती में खण्डप्रलय की स्थिति हो जाएगी बर्फीले तूफान चारों ओर उठेंगे धरती में बेहद गर्मी और बेहद ठंडक की स्थितियाँ पैदा हुआ करेगी। समुद्रतल भी लगातार ऊपर उठ रहा है। इसका भी परिणाम अवश्य भावी है। ऐसी ही विशिष्ट प्राकृतिक उथल पुथल अतीत में भी जल प्रलय जैसी घटनाओं का कारण बनती रही है।

विश्व की अधिकांश प्राचीन सभ्यताओं के साहित्य में जलप्लावन तथा उनके बाद सृष्टि के नवीन क्रम का वर्णन मिलता है। इसे धार्मिक पुट दिया गया है। लेकिन भूगर्भ शास्त्रियों का भी अनुमान है कि समय समय पर पृथ्वी के विशेष खण्ड टूट जाते थे और धरती पर जल ही जल हो जाता था।

भू-गर्भ डा० ट्रिकलर के अनुसार हिमालय के आस-पास प्राप्त ध्वंसावशेषों से ज्ञात होता है कि जल प्रलय की घटना सत्य है।

यूनानी साहित्य में भी जलप्लावन की चर्चा है। एक कथा के अनुसार ‘अटिका’ जलमय हो गई थी। दूसरी कथा के अनुसार ‘जीयस’ ने अपने पिता की इच्छापूर्ति के लिए ‘ड्यूकालिय’ का विनाश करना चाहा। जब ड्यूकालियन अपनी पत्नी पैरहा के साथ जलयात्रा कर रहा था, जीयस ने भीषण जल-वृष्टि द्वारा पृथ्वी को डूबा दिया। नौ दिन तक ड्यूकालियन और पैरहा पानी में ही अपनी नाव द्वारा तैरते रहे। जब वे ‘पैरासस पहुँचे, तो जलप्लावन कुछ कम हुआ। तब उन दोनों ने अपने अंग रक्षक की देवताओं को बलि दे दी। इससे जीयस प्रसन्न हो गया और उनको सन्तान का वरदान दिया ड्यूकानियन और पैरहा ने वरदान पाकर जीयस पर पत्थरों की वर्षा की। जो पत्थर ड्यूकालियन ने फेंके वे पुरुष हो गये और जो पैरहा ने फेंके, वे नारी हो गए।

केबीलोनिया में भी ऐसी ही एक दन्त कथा है। तीन सौ ईस्वी पूर्व वहाँ वेरासस नामक पुरोहित था। उसने लिखा है- आरडेटस की मृत्यु के बाद उसके पुत्र ने 18 ‘सर’ तक राज्य किया। एक सर 36 सौ वर्षों का होता है। इसी अवधि में एक बार भीषण बाढ़ आईं। इसकी सूचना राजा को स्वप्न द्वारा पहले ही मिल चुकी थी। अतः उसने अपने लिए नाव बनवा ली थी। नाव में बैठकर वह जलप्लावन देखता घूमता रहा। जब जलप्लावन का वेग कम हो गया, तो उसने नाव में ही बैठे बैठे तीन बार पक्षी उड़ाए। अन्तिम बार जब पक्षी लौट कर नहीं आये, तो उसने देवताओं को बलि दी। इससे देवता प्रसन्न हुए और शान्ति का वातावरण बना।

बाइबिल के अनुसार-जल देवता ‘नूह’ को खबर मिली कि धरती पर जल प्रलय होगी। फिर ऐसा ही हुआ। चराचर इस भीषण जल प्रलय में समाहित हो गये। जल देवता। ‘नूह’ तथा उनके कुछ साथी नौका में बच निकले। नौका द्वारा आराकान पर्वत पहुँचे। वहाँ दसवें महीने के पहले दिन जल कम होना शुरू हुआ धीरे धीरे पर्वत श्रेणियाँ दीखने लगी। फिर अन्य हिस्से भी। हजरत ‘नूर’ ने ही मानवता का विकास किया। सुमेरियन ग्रन्थों में भी जलप्लावन का विकास किया है। चीनी पुराण-साहित्य में भी जल प्लावन की कथाएँ विद्यमान् हैं।

भारत में तो शतपथ ब्राह्मण से लेकर महाभारत और विविध पुराणों तक जल प्रलय का वर्णन मिलता है। महाभारत के वन-पर्व मत्स्योपाख्यान के अंतर्गत यह कथा है कि विवस्वान् मनु ने दस हजार वर्ष हिमालय पर तपस्या की। उस समय एक मछली की प्रार्थना पर उन्होंने उसकी जीवन रक्षा की। तब मछली ने उनको आगामी भीषण जलप्लावन की अग्रिम जानकारी दी। साथ ही यह कहा कि तुम सप्त ऋषियों के साथ नौका में मेरी प्रतीक्षा करना। अन्य पर्वों में भी इस जलप्लावन का सुविस्तृत वर्णन हैं।

सम्पूर्ण प्राचीन विश्व साहित्य में जल प्रलय की ये कथाएँ निश्चय ही किसी घटित घटना की ही स्मृतियाँ है। अभिव्यक्ति की शैली भिन्न भिन्न सभ्यताओं के परिवेश और साँस्कृतिक चेतना के अनुरूप अलग अलग हैं। किन्तु उनमें एक आन्तरिक अविच्छिन्नता है। जल प्रलय की बात बड़ी है, पर उसके छोटे छोटे रूप अन्य प्रकार से भी दृष्टिगोचर होते रहते हैं। भूकम्प विस्फोट, बाढ़ आना, वृष्टि, अतिवृष्टि, महामारी आदि कारणों से कम विनाश नहीं होता है। आये दिन जहाँ तहाँ होते रहने वाले युद्ध और महायुद्ध भी सम्पत्ति और प्राणियों की कम हानि नहीं करते।

एक ओर यह विनाशकारी घटनाएँ होती हैं दूसरी ओर उत्पादन और अभिवृद्धि का उपक्रम देख कर भी आश्चर्यचकित रहना पड़ता है। वनस्पति के सहारे ही जीव धारियों का आहार निर्वाह होता है उसका खर्च जितना है उसे देखते हुए उत्पादन की मात्रा कम नहीं वरन् बढ़ी चढ़ी ही रहती है। खाने वाले प्राणी और ग्रीष्म जैसी नष्ट करने वाली परिस्थितियों का सामना करते रहने पर भी वन सम्पदा और वनस्पति की सुषमा पृथ्वी पर छाई ही रहती है। हरीतिमा के लिए प्रस्तुत सभी चुनौतियाँ अन्ततः निरस्त ही होती हैं और अपनी धरती की हरियाली में धट भर होता है, पर अन्त उसका कभी भी नहीं होता।

तनिक-सी दीखने वाली भिनभिनाती मक्खी एक ही ग्रीष्म ऋतु में 40 हजार सन्तानें पैदा कर सकती है, यदि उसकी आकस्मिक मृत्यु न हो जाए। इन 40 हजार मक्खियों की तीन पीढ़ी में उत्पन्न सन्तानों को एक कतार में रखा जाय, तो पृथ्वी से सूरज तक की दूरी से कई गुनी लम्बी कतार बन जाए।

एक परिपक्व पोस्त में 3 हजार बीज होते हैं। यदि हर बीज से एक पौधा उगने दिया जाय और फिर उनमें से हर पौधे में कम से कम एक पोस्त लगने पर फिर उनमें से हर एक के कम से कम एक पोस्त लगने पर फिर उनमें से हर एक के तीन हजार बीजों को उपयोग भी पौधे ही पैदा करने के लिए किया जाय, तो इस क्रम से 50 वर्षों में एक ही वृक्ष के वंश विकास द्वारा पूरी पृथ्वी ढक सकती है।

प्रकृति की गतिविधियों का जितना ही अधिक निरीक्षण-विश्लेषण किया जाए, यह ज्ञात होता चलेगा कि वह अत्यन्त दयामयी व कुशल है। किन्तु इस दया में आवश्यक उग्रता व रौद्र रूप भी सम्मिलित है। वस्तुतः सन्तुलन ही प्रकृति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण व सार्वभौम अन्तःसूत्र है। सन्तुलन की यह प्रकृति प्रवृत्ति हमें विभिन्न पशु पक्षियों की प्राकृतिक संरचना में भी दिखाई पड़ती है।

दक्षिणी अमेरिका का ‘स्लाथ’ पक्षी सम्पूर्ण जीवन पेड़ पर औंधे मुँह लटके लटके काट लेता है। उसका आहार हरे पत्ते टहनियाँ आदि है। प्रकृति ने उसे ऐसे बाल दिये है, जिनके कारण वर्षा ऋतु में भी उल्टे लटके रहने पर भी बरसात का पानी नीचे टपक जाता है, यानि उसके बाल भी उल्टे होते हैं, उसके औंधे लटकने पर वे नीचे झूलते रहते हैं। यदि ऐसा न होता तो बरसात का पानी निरन्तर ऊपर टपकते रहने के कारण अपना वंश चलाते रहने के लिए वह बच न पाता।

संसार के गतिचक्र को देखते हुए हम विकास और विनाश के साथ जुड़े हुए प्रकाश को हृदयंगम कर सकते हैं और उससे बहुत कुछ सीख सकते हैं। अनुपयोगिता और अवांछनीयता बढ़ाने वाली विकृतियों को हम अधिक तत्परता पूर्वक स्वयमेव निरस्त करने के लिए प्रयत्नशील रहें ताकि वाहन शक्तियों को बलपूर्वक हमारा असन्तुलन ठीक करने के लिए घायल या विनष्ट करने जैसे कठोर कदम न उठाने पड़े। शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ, मानसिक दृष्टि से संतुलित, आर्थिक दृष्टि से सुसम्पन्न और सामाजिक दृष्टि से सम्मानास्पद बने रहने के लिए आवश्यक है कि अंतःक्षेत्र में जन्मे हुए कषायों और बाह्य क्षेत्र में घुसे हुए कल्मषों के निराकरण के लिए हम स्वयं ही कुल्हाड़ा चलाये यह आत्म-परिशोधन-बाह्य दण्ड-व्यवस्था की तुलना में कहीं अधिक हलका पड़ेगा।

उत्पादन, अभिवृद्धि, सुरक्षा के लिए हम भरपूर प्रयास करें किन्तु साथ ही यह ध्यान रखें कि परिवर्तन और विनाश भी इस सृष्टि की ऐसी अनचाही गतिविधियाँ हैं जिनसे हम बच नहीं सकते। अस्तु तैयार इसके लिए भी रहें कि विक्षोभकारी परिवर्तनों के समय उत्पन्न होने वाली विपन्नता को धैर्य और साहसपूर्वक सहन कर लेने की साहसिकता कभी नष्ट न होने पाये।

जड़ता की यहाँ कहीं गुँजाइश नहीं। नगण्य से परमाणु भी अपनी धुरी एवं कक्ष में सक्रिय है। हम हम अपनी आन्तरिक सजगता और बाह्य सक्रियता को बनाये रह कर ही अपने अस्तित्व को प्रखर बनाये रह सकते हैं। परिवर्तन इस विश्व का अकाट्य तथ्य है। हम परिवर्तन के लिए तैयार रहें। प्रगति के पथ पर आगे बड़े और मार्ग की कठिनाइयों को विकास का साधन मानते हुए उनसे जूझने की तैयारी करते रहे।

प्रकृति हम से निर्माण की अपेक्षा करती है और उसमें सहयोग देने के लिए तैयार हों। किन्तु साथ ही यह भी कहती है कि पकड़ कर कुछ न बैठा जाय, जो वह सभी टूटने और बदलने के लिए है इसलिये जो हाथ में है उसका अति दूर-दर्शिता पूर्वक श्रेष्ठतम सदुपयोग कर लिया जाय, इसी में बुद्धिमानी हैं।


समर्थन और सहयोग

महाभारत के युद्ध की तैयारियाँ हो रही थी। कौरव और पाण्डव अपने अपने पक्ष को मजबूत बनाने के लिए कई राजा-महाराजाओं के पास गये और उनका समर्थन व सहयोग प्राप्त भी किया। समर्थन की दृष्टि से कौरवों का पक्ष अधिक मजबूत था-क्योंकि दुर्योधन ने वाक्पटुता, चातुरी, छत बल और साम-दाम दण्ड-भेद आदि नीतियाँ अपनाकर अपनी ओर अधिकांश राज्यों को कर लिया। उसे समर्थन तो भारी मिल गया, पर कदाचित ही आन्तरिक सहयोग मिला है। क्योंकि सभी जानते थे कि कौरवों का पक्ष अन्यायपूर्ण है और पाण्डव अत्याचार पीड़ित।

महाबली शल्य को भी दुर्योधन ने वाक्चातुरी से अपनी ओर किया। यद्यपि वह चाहता नहीं था कि कौरवों का सहयोग करे, पर वचनबद्ध हो जाने के कारण शल्य को दुर्योधन की बात रखनी पड़ी। फिर भी शल्य ने युद्ध करने के स्थान पर कर्ण का सारथी बनाना और उसकी रक्षा करना पसन्द किया। वह सोचता था पूरी तरह अन्याय को सहयोग देने की अपेक्षा विवशता हो तो किसी भी रूप में समर्थन भर आँशिक रूप से दोषपूर्ण है।

युद्ध जब आरम्भ हुआ तो कर्ण और अर्जुन आमने सामने के प्रतिद्वन्द्वी बने। युद्ध आरम्भ होने से पूर्व शल्य अर्जन के सारथी बने, कृष्ण के पास गये और क्षमा माँगते हुए बोले-भगवन् मैं किसी मूल्य पर कौरवों के पक्ष में जाना नहीं चाहता था। कुछ वचनों से बँध गया हूँ। इसलिए बड़े पश्चाताप पूर्ण हृदय से यह काम कर रहा हूँ। आपकी दृष्टि में यदि अभी भी कोई ऐसा उपाय हो जिससे कि मैं अपने वचनों की रक्षा भी कर सकूँ और हृदय को भी तप्त न होने दूँ तो बताइये।”

कृष्ण क्षणभर को चिन्तन मुद्रा में लीन हुए और फिर बोले-तुम कर्ण का रथ तो हाँक ही रहे हो। वह निश्चय ही बड़ा शूरवीर और शक्ति सम्पन्न है। अर्जुन का उसके सामने टिकना कठिन है। इसलिए तुम युद्ध में कर्ण को निरुत्साहित करते रहना। निरुत्साहित व्यक्ति की आधी सामर्थ्य समाप्त हो जाती है। इससे तुम कौरवों के पक्ष में रहते हुए भी हमारे सहयोग बन सकते हो।

युद्ध में शल्य ने ऐसा ही किया। अर्जुन को सामने देखकर कर्ण ने जब हुंकार भरी और कहा- मैं अर्जुन का आज ही समाप्त कर दम लूँगा।

शल्य हँस दिया।

कर्ण को बड़ा आश्चर्य हुआ, उसने हँसने का कारण पूछा तो शल्य ने कहा- तुम शूर वीर होकर भी बच्चों जैसी बातें करते हो।”

“तो क्या अर्जुन को मारना असम्भव है- कर्ण ने पूछा।

‘असम्भव नहीं तो टेड़ी खीर अवश्य है। अर्जुन ने इन्द्र से युद्ध करना सीखा है और भगवान शंकर से धनुर्विद्या सीखी है। तुम उसे क्या हराओगे?'

कर्ण का आधा उत्साह वहीं ठण्डा हो गया। उधर अर्जुन ने अपने सामने कर्ण को देखकर कहा- ‘भगवन् मैं कर्ण के सामने किस प्रकार टिक सकूँगा?

‘पागल हुए हो-कृष्ण ने फटकारते हुए अर्जन को प्रोत्साहित किया-तुम जानते हो कि कर्ण को शंकर का शाप है कि वह अन्य वीरों के लिए भले ही अजेय हो, पर अर्जुन के सामने उसकी धनुर्विद्या कोई काम नहीं करेगी।

भगवान् कृष्ण से यह बात सुनकर अर्जुन बड़ा उत्साहित हुआ और उसके हौसले बढ़ गये। उसने कर्ण के आक्रमण का करारा उत्तर दिया। उधर शल्य द्वारा कर्ण को हतोत्साहित किये जाने पर प्रत्याक्रमण भी ढीला पड़ गया। पहली बार मिली असमर्थता ने कर्ण की शक्ति ही चौथाई कर दी और एक घड़ी ऐसी आयी कि कर्ण को अर्जुन के हाथों परास्त होना पड़ा।

प्रोत्साहन और हतोत्साह में बड़ी शक्ति है। इससे भी बड़ा तथ्य तो यह है कि वाक्चातुरी और छल बल से व्यक्ति को भले ही अपने वश में कर लिया जाय, पर हृदय अवश ही रहता है। जो और ज्यादा अनर्थ उत्पन्न करता है।

मन की दो सर्वज्ञात विशेषताएँ हैं- चंचलता एवं सुख लिप्सा। बन्दर जैसी उछल-कूद आवारा छोकरों जैसी मटरगश्ती, चिड़ियों की तरह यहाँ-यहाँ फुदकते फिरना, उसकी चपलवृत्ति को सन्तुष्टि पहुँचाते हैं। कल्पना के महलों की सृष्टि, कल्पना लोकों का तीव्र भ्रमण विचारणा, उसकी शक्ति का बड़ा अंश तो इन्हीं भटकनों, जंजालों में नष्ट हो जाते हैं। शक्ति का यह व्यर्थ छाजन रोककर उसे सुनिश्चित एवं सार्थक प्रयोजन में केन्द्रित करना ही योगाभ्यास है। शक्तियों का यह सही उपयोग जीवन में स्पष्ट और आश्चर्यजनक परिणाम सामने लाता है। पिछड़ेपन के स्थान पर प्रगतिशीलता आ जाती है। दरिद्रता समृद्धि में परिणत हो जाती है। भटकाव की जगह प्रचण्ड पुरुषार्थ की प्रवृत्ति पनपने पर परिस्थितियाँ अनुकूल बनने लगती है और साधन संचित होने लगते हैं। लौकिक सफलताएँ भी लक्ष्य केन्द्रित पुरुषार्थ का ही परिणाम होती है। मन की भटकन रोककर ही उसे लक्ष्योन्मुख बनाया जा सकता है।

यही सधा हुआ मन आत्मिक क्षेत्र में लगाये जाने पर सुषुप्त शक्ति केन्द्रों को जागृत व क्रियाशील बनाता है। और दिव्य क्षमताएँ प्रकाश में आती है। अन्तश्चेतना का परिष्कार सामान्य व्यक्ति को महामानव स्तर पर ले जाकर ही रहता है। प्रगति का सम्पूर्ण इतिहास मनःशक्ति के पुञ्जीभूत, लक्ष्य केन्द्रित पुरुषार्थ की ही यशगाथा है। चंचलता की प्रवृत्ति को पुरुषार्थ की प्रवृत्ति में परिवर्तित करने का पराक्रम ही प्रगति का सार्वभौम आधार रहा है।

मन की दूसरी प्रवृत्ति है- लिप्सा शारीरिक सुखों के भोग का माध्यम है- इन्द्रियाँ। उनके द्वारा विभिन्न वासनाओं का स्वाद मिलता है। पेट और प्रजनन से सम्बन्धित सुखों के लिए तरह तरह की चेष्टाओं में ही मन उलझा रहता है और अन्य सुखों की प्राप्ति के प्रयास के लिए प्रेरणा ही नहीं दे बल्कि इनकी मात्र कल्पनाएँ करने में भी बहुत अधिक संयम नष्ट करता है। फिर इन भौतिक सुखों के लिए साधन जुटाने में भी मन को जाने कितने ताने बाने बुनने पड़ते हैं। इन्द्रियों की प्रिय वस्तु या व्यक्ति देखने, सुनने, छूने, सूँघने अथवा स्वाद लेने की लिप्साएं मन को ललक से भर देती है और वह उसी दिशा में लगा रहता है। अहंकार की पूर्ति के लिए मन औरों पर प्रभाव डालने हेतु तरह तरह की चेष्टाएँ करता है और व्यक्ति भाँति भाँति के ठाट बाट बनाता है। संग्रह और स्वामित्व की इच्छाएँ भी अनेक विधि प्रयत्नों का कारण बनती हैं। इन सभी इच्छाओं, आकांक्षाओं की प्यास को व्यक्त करने के लिए ही तृष्णा शब्द का प्रयोग होता है। अहंभावना पर आघात पहुँचते ही प्रतिशोध की उत्तेजना प्रबल हो उठती है। इच्छित विषय पर अपना एक मान लेना और फिर उसके न प्राप्त होने या प्राप्ति में बाधा पड़ने पर भड़क उठना भी, अहंता पर आघात के ही कारण होता है। यह उत्तेजना ही क्रोध है। काम, क्रोध लोभ, मोह, मद, मत्सर आदि सम्पूर्ण विकार समूह वस्तुतः मन में उठने वाली प्रतिक्रियाएँ मात्र है, जो भौतिक सुख की लिप्साओं के कारण उठती रहती है। लिप्सा की इस ललक की दिशा को उलट देना ही ‘तप’ है। वह दूसरी दिशा भौतिक सुखों की वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति से होने वाले क्षणिक सुखों की नहीं है। वरन् आनन्द की है। आनन्द उपभोग से नहीं, उत्कर्ष और उत्सर्ग से प्राप्त होता है। सुख मन का विषय है, जब कि आनन्द और आत्म-सन्तोष आत्मा का। सुख लिप्सा का अभ्यस्त मन आनन्द के अस्वाद को नहीं जान पाता और जिसे जाना ही नहीं, उसके प्रति गहरी स्थायी प्रीति, सच्चा आकर्षण सम्भव नहीं आनन्द की आकांक्षा विषय-लोलुप मन में प्रगाढ़ नहीं होती। उसके लिए तो मन का प्रशिक्षण आवश्यक है। यह प्रशिक्षण-प्रक्रिया ही तप है।

तपस्वी को कष्ट इसी अर्थ में सहना पड़ता है, कि अभ्यस्त सुख का अवसर जाता रहता है। शारीरिक सुख-सुविधाएँ सिमटती है, मानसिक आमोद प्रमोद का भी अवकाश नहीं रहता और आदर्श-निष्ठ आचरण आर्थिक समृद्धि के भी आड़े ही आता है। प्रत्यक्ष तौर पर तो, ऐसे परिणामों के लिए किया जाने वाला प्रयास मूर्खता ही प्रतीत होगा।

लेकिन श्रेष्ठ उपलब्धियों का राज-मार्ग यह है। किसान, विद्यार्थी, पहलवान, श्रमिक, व्यवसायी, कलाकार आदि को भी अपनी प्रगति व उपलब्धियों की प्राप्ति के लिए बाल चंचलता से मन को विरत ही करना पड़ता है और अपने नीरस प्रयोजनों में ही मनःशक्ति नियोजित करनी पड़ती है। शौक-मौज के अभ्यस्त उनके संगी उन लोगों की ऐसी लक्ष्योन्मुख प्रवृत्तियों का मजाक भी उड़ाते हैं। लेकिन सभी जानते हैं कि अन्ततः बुद्धिमान और प्रगतिशील ऐसे ही लोगों को माना जाता है, जो चित्त की चपलता को नियन्त्रित कर उसे अपने लक्ष्य की ओर ही लगाये रहते हैं- वह कृषि का क्षेत्र हो या शिक्षा, का, शरीर सौष्ठव का हो या आर्थिक समृद्धि का, कला कौशल का हो या वैज्ञानिक आविष्कार का अथवा दार्शनिक चिन्तन-मनन का।

मन लक्ष्य की ओर सरलता से नहीं लगता। सरकस का शेर जंगल से पकड़ लाये जाने के प्रारम्भिक दिनों में अपने आक्रामक रुख पर ही अड़ा रहता है। उसे आज्ञाकारी, स्वामिभक्त तथा उत्पादक बनाने में समय लगता है। मन की चंचलता और सुख लिप्सा की अनगढ़ आदतों को छुड़ाने में काफी समय लगता है, इसके लिए कई बार ऊपर से निष्ठुर तथा कठोर दिखाई देने वाले काम करने पड़ते हैं, ताकि वह अपेक्षाकृत नीरस किन्तु उपयोगी प्रवृत्तियों में संलग्न होने का अभ्यास बन सकें। यही तप हैं, जिसके बाह्य स्वरूप में तो निष्ठुरता का दुलार प्यार ही छलकता देखा जा सकता है। मन के प्रिय सुख को, गौण मानकर आत्मा को प्रिय आत्म सन्तोष, आनन्द की प्रधानता समझते हुए तद्नुरूप अपने अभ्यस्त ढर्रे में परिवर्तन लाना ही तपस्वी जीवन कहा जा सकता है। शारीरिक, मानसिक, आर्थिक असुविधाओं का, तितिक्षा का अभ्यास तप का अनिवार्य अंग इसलिए है कि मन के दीर्घ कुसंस्कारों, अनगढ़ आदतों को, लिप्सा और चपलता के छुड़ाया, धोया जा सके। उसकी ललक, अधोगामी, बहिरंग आकांक्षाओं की ओर से परिवर्तित होकर ऊर्ध्वगामी, अन्तरंग आदर्शवादिता की ओर से यह तप साधना का एक मात्र उद्देश्य है। आरम्भिक कष्ट वस्तुतः उज्ज्वल सम्भावनाओं का द्वार है। वे तप की गरिमा से उत्पन्न कष्ट है, जिनकी अन्तिम परिणति श्रेयस्कर ही होने वाली है। तपाने से वस्तुएँ गरम होती है और उनमें संशोधन होता है, दृढ़ता आती है तथा स्तर बढ़ता है। व्यक्ति के साथ भी यही होता है। कच्ची मिट्ठी से बनी ईंटों का मकान है अनगढ़ व्यक्तित्व, जिसका वर्षा के आघातों से गल जाना ही सुनिश्चित है। तप की आग में जब यही ईंटें, व्यक्तित्व के घटक तपा लिए जाते हैं, तो उनसे बना व्यक्तित्व पक्की ईंटों के मकान जैसा मुद्दतों तक टिकने वाला बन जाता है। चूने, सीमेन्ट का उदाहरण भी यही तथ्य सामने लाता है। चूना, सीमेन्ट वस्तुतः कंकड़ पत्थरों का पका हुआ चूरा ही तो है। वे ही कंकड़ पत्थर यदि यों ही पीस लिए जाएँ, तो उनसे भवन निमार्ण का कार्य चल नहीं सकता। उन्हें ही पकाने-संशोधित करने पर उनमें ईंटों को पकड़ रखने और मकान को टिकाऊ बनाने की क्षमता आ जाती है। खदान कसे कच्ची अवस्था, में निकले धातु अयस्क भट्टी में तपाये जाने पर ही शुद्ध व उपयोगी बन पाते हैं। तीक्ष्ण शस्त्रों औजारों की ‘धार’ अधिक गर्मी देकर ही सुस्थिर बनाई जाती है।

आयुर्वेद में भस्मों का विशिष्ट महत्त्व है। लौहभस्म, स्वर्णभस्म, वंगभस्म, प्रवालभस्म, अभ्रकभस्म आदि के गुण प्रख्यात है। भस्मों में कई गुने अधिक गुण आ जाते हैं। ये भस्में इन वस्तुओं को तपाने का ही तो परिणाम हैं बल्ब का तनिक सा “फिलामेन्ट’ तपने पर आलोक बिखरता है। दीपक भी तपकर ह ज्योति दान देता है। रेलगाड़ी के इंजन को तपे हुए पानी की भाप ताकत देती है और वह कई गुनी वज़नी रेलगाड़ी को खींच धकेल ले जाती है। आम को पाल में पकाने की विधि प्रसिद्ध है, जो उसकी खटास को मिठास में बदल देती है। अन्य कई कच्चे फलों को भी भूसे या अनाज की गर्मी में बन्द रखकर पकाया जाता है। सामान्य पानी को तपाकर वाष्पीकरण कर’ डिस्टिल्ड वाटर’ के रूप में औषधि-उपयोगी बनाया जाता।

तितीक्षा इन्हीं कष्टों को सहने का नाम है। सुविधाजीवी व्यक्ति पुरुषार्थ खोते जाते हैं। तप-तितीक्षा द्वारा पुरुषार्थ को प्रबल बनाया जाता है। तीक्ष्णता की रक्षा, वृद्धि रगड़ द्वारा ही होती है। उस्तरे पर धार रखने से ही वह पैना और चमकदार बनता है। स्वर्ण तथा अन्य धातुएँ तपा कर ही कोमल बनाई जाती हैं ओर तभी आभूषण बनने योग्य होती हैं।

फौजी जवानों को नित्य ही परेड करनी होती और दौड़ लगनी होती है। प्राचीनकाल में गुरुकुलों में विद्यार्थियों को दैनिक जीवनक्रम में ही धर्म, कष्ट, सहिष्णुता, अनुशासन, उत्कृष्ट चिंतन तथा सादगी को स्थान देते हुए स्वस्थ शरीर, निर्मल, प्रशांत तथा सहनशील मन और विकसित अन्तःकरण की साधना में उत्तीर्ण होना पड़ता था।

इतिहास, पुराणों के असंख्य आख्यान तप-साधना के गुणगान से भरे पड़े हैं। विशिष्ट मनस्वियों को तप-साधना द्वारा ही विभूतियाँ अर्जित करनी होती थीं। पार्वती का शिव से विवाह, ध्रुव का ब्रह्माण्ड का केन्द्र बन जाना, भागीरथ द्वारा गड़ को पृथ्वी पर लाना, दधीचि द्वारा अपना अस्थि दान तथा उनसे असुर-संहारक वज्र का निर्माण, अगस्त ऋषि द्वारा समुद्र शोषण, विश्वामित्र द्वारा नूतन सृष्टि का सृजन, सात साधारण व्यक्तियों का सप्तर्षि बनना आदि अनेक असामान्य घटनाएँ तप द्वारा ही सम्भव हुई है। ऐसी आख्यायिकाएँ, कथाएँ हमारे प्राचीन वांग्मय में भरी पड़ी हैं। जो तप की ही शक्ति को अभिव्यक्त करती है।

स्वायम्भुव को मनु और शतरूपा को राम जैसा तथा स्वयं कृष्ण व रुक्मिणी को प्रद्युम्न जैसा पुत्र पाने के लिए लम्बी अवधि तक तपस्या करनी पड़ी। कश्यप तथा अदिति की तपस्या ने ही कृष्ण को उनकी गोदी में खेलने का अवसर व सौभाग्य सुलभ बनाया। दिलीप को सुसन्तति प्राप्त करने के लिए अपनी के लिए अपनी रानी के साथ दीर्घकाल तक ऋषि वशिष्ठ की गौयें चराने की तप-साधना करनी पड़ी।

तप ही विशिष्ट सामर्थ्य का स्त्रोत है। प्रसुप्त शक्तियों का जागरण तप द्वारा ही सम्भव है। आत्मसाधना में तप को ही प्रमुखता दी सुदृढ़ बनाता है।

आहार-शुद्धि का महत्त्व सर्वविदित है। आहार का सूक्ष्म अर्थ भी है, पर यदि खाद्य वस्तुओं के ही सम्बन्ध में विचार करें, तो भी हमें उसके लाभ स्पष्ट दीख जाएँगे। अन्न का मन से घना सम्बन्ध है। अन्न किस तरह से प्राप्त किया गया है, यह भी महत्त्वपूर्ण है। नीति से उपार्जित, परिश्रमपूर्वक प्राप्त अन्न ही आध्यात्मिक विकास का आधार हो सकता है। आहार का सात्विक होना भी आवश्यक है। उसे पकाने वाले तथा परोसने वाले शरीर और मन से पवित्र हों तथा भोजन करने वाले की मनोभूमि सात्विक हो, ईश्वर को मन ही मन भोग लगाकर प्रसाद रूप में, औषधि समझते हुए बचा जाय। जूठन के रूप में अन्न देवता की उपेक्षा व अपमान न किया जाय।

दो बार से अधिक भोजन न करने का नियम बना लिया जाए और दूध, छाछ, रस, क्वाथ आदि सात्विक पेय पदार्थ ही बीच में लिए जाएँ। भूख से कम भोजन किया जाए और वह भली-भाँति चबा-चबाकर

सप्ताह में एक दिन अथवा एक जून उपवास करना उचित है इससे पेट को विश्राम मिलता है। अपच दूर होकर पाचनक्रिया तीव्र होती है तथा थकान मिटती है। साथ ही मनोविकारों का भी शमन होता है। व्रत-उपवास का हमारी परम्परा में सदा से महत्त्व है। विभिन्न पुण्यकर्मों शुभ अवसरों पर उपवास का विधान है। कणाद ऋषि शिलौन्य वृत्ति से जंगली धान्य से उदर-भरण करते थे। महाभारत की कथा है कि शरशय्या पर पड़े भीष्म के सदुपदेशों से द्रौपदी के मन में शंकाएँ घुमड़ने लगीं कि इतने सुन्दर विचार तो आज ये व्यक्त कर रहे हैं, पर कौरव जब मुझे भरी सभा में निर्वसन कर रहे थे, तब यह सद्ज्ञान कहाँ चला गया था? उसने भीष्म पितामह से पूछा ही लिया। उत्तर में भीष्म ने यही कहा- कि उन दिनों कुधान्य खाने के कारण मैं धर्मबुद्धि होते हुए भी उसके अनुसार आचरण का साहस नहीं कर पाया। यह अभक्ष्य-भक्षण से मनोबल के ह्रास का ही स्पष्ट प्रमाण है।

प्रत्येक व्यक्तिगत सत्कार्य सामाजिक शुभ की भी साधना होता है। शुद्ध आहार से व्यक्ति-मन की शुद्धि एवं आत्मबल की वृद्धि के कारण जहाँ वातावरण में सात्विकता आती है वहीं सप्ताह में एक दिन के उपवास का क्रम चल पड़े, तो देश की जटिल खाद्य समस्या का भी समाधान-सम्भव है और अपच ही प्रायः सब रोगों की लड़ होने के कारण स्वास्थ्य-संकट में भी बहुत अधिक कमी आ जाए। ‘ अस्वाद व्रत भी आहार-शुद्धि का ही अंग हैं। गाँधी जी ने “सप्त महाव्रत“ प्रतिभा में अस्वाद को प्रथम व्रत माना है। नमक, मसाले, शकर आदि वस्तुओं को अलग से मात्र स्वाद के लिए ही खाया जाता है। अन्यथा अन्न, शाक, फल दूध आदि द्वारा जरूरी शकर व नमक की मात्रा मिल ही जाती है। सप्ताह में एक दिन अस्वाद व्रत करने पर स्वादेन्द्रिय में नियन्त्रण रहता है। स्वादेंद्रिय पर नियन्त्रण से मनोनिग्रह सरल हो जाता है।

मनोनिग्रह ही योग का मार्ग है। मनोनिग्रह का एक महत्त्वपूर्ण व्रत ब्रह्मचर्य है। रतिक्रिया द्वारा बहुमूल्य जीवन रस को क्षणिक सुख में गाँव देने का शौक बहुत ही महंगा पड़ता है। इस दिशा में संयम बरतने पर यही शक्ति शारीरिक-मानसिक सुदृढ़ता के काम आती है और यह संचित शक्ति आत्मिक प्रगति में सहायक होती है। ब्रह्मचर्य मात्र शारीरिक नहीं, मानसिक प्रक्रिया है। मानसिक कामुकता प्रतिपल मनःशक्ति को घटाती है। घटे हुए मनो बल से आत्मोत्कर्ष सम्भव नहीं होता। शारीरिक क्रियाएँ न करते हुए भी कामुक चिन्तन करना मानसिक व्यभिचार है और आत्मिक प्रगति में उससे भारी अवरोध आ उपस्थित होता है।

मन को कामुक चिन्तन से बचाने के लिए प्रतिपक्षी पवित्र भावों को मन में लम्बे समय तक स्थान देना चाहिए। सृजनात्मक शुभ चिन्तन ही मनोविकारों को नष्ट करता है। इसके लिए स्वाध्याय सत्संग, मनन-चिन्तन द्वारा मनः स्थिति में कुविचार फैल ही नहीं सकते। ब्रह्मचर्य व्रतधारी महापुरुषों, हनुमान्, भीष्म, शंकराचार्य, समर्थ गुरु रामदास, विवेकानन्द आदि के उज्ज्वल चरित्रों का स्मरण-चिन्तन-मनोभूमि के पवित्र संस्कारों को सुदृढ़ बनाता है। स्वादेन्द्रिय और कामेन्द्रिय की स्थूल एवं सूक्ष्म लिप्साओं पर नियन्त्रण ही इन्द्रियनिग्रह की दिशा व विधि है।

तपश्चर्या का तीसरा महत्त्वपूर्ण अंग है- प्रायश्चित्त अपने द्वारा की गई भूलों के लिए शारीरिक-मानसिक दण्ड प्रताड़ना ही प्रायश्चित्त रूपी तप है। नैतिक गलतियों के लिए भोजन में व नींद में आँशिक कटौती, अतिरिक्त श्रम, अमुक समय का मौन आदि की, स्वयं ही निश्चय कर प्रायश्चित्त-व्यवस्था सम्भव है। विगत जीवन के बड़े अपराधों के लिए विशेष प्रायश्चित किसी नीतिवेत्ता के परामर्श से किये जा सकते हैं, ताकि मन पाप-भार से निवृत्ति पा सके।

सूक्ष्म शरीर से सम्बन्धित तपश्चर्या की दिशा वैराग्य है अर्थात् तृष्णा-लोभ-मोह का परित्याग। सरलता तथा सादगी से भरा जीवन, श्रेष्ठ विचारों से भरे मन-मस्तिष्कीय द्वारा ही सम्भव है। भौतिक इच्छाएँ व जरूरतें घटाकर ही समय और श्रम में बचत की जा सकती है और वह श्रमशक्ति तथा मनोयोग परमार्थ-प्रयोजनों में लगाया जा सकता है।

श्रेष्ठ जीवन की दिशा में चलने को अनीति के अभ्यस्त लोगों का उग्र विरोध और उसके परिणाम स्वरूप आक्रमण भी झेलना पड़ता है। इस हेतु आवश्यक साहस व सहिष्णुता भी तप ही है।

आलस्य व प्रमाद से मुक्त जीवन ही तपस्वी जीवन हो सकता है। इसके लिए निरन्तर जागरूकता व सत्त अभ्यास आवश्यक है। संघर्षों की रगड़ से मानवीय प्रतिभा तीक्ष्णतर होती चलती है।


मनुष्य की अन्तः शक्ति के विभिन्न प्रयोग

स्थूल के परिणाम स्वल्प हैं। सूक्ष्म की गहराई में उतरते हैं तो एक के बाद एक बहुमूल्य सम्पदाएँ उपलब्ध होती हैं। धरती की ऊपरी परत कूड़े कचरे और कंकड़ पत्थरों से भरी है। उसे जैसे जैसे गहरा खोदते हैं पानी से लेकर अनेकानेक प्रकार की बहुमूल्य खनिज सम्पदाएँ मिलती चली जाती हैं। रेत के अदृश्य जैसे परमाणु का स्थूल मूल्य नगण्य है। उसकी बाजारू कीमत नहीं के बराबर है, पर जब उसकी भीतरी शक्ति को कुरेदा जाता है तो पता चलता है कि उस पदार्थ के तुच्छाति तुच्छ घटक में कितनी महान् शक्ति के अजस्र भाण्डागार भरे पड़े है। विस्फोट के समय परमाणु शक्ति का प्रायः एक लाखवाँ भाग ही विनाशलीला में संलग्न हो पाता है, शेष तो तत्काल अन्तरिक्ष में विलीन हो जाता है यदि एक परमाणु से अन्तः निहित ऊर्जा का केन्द्रीकरण किया जा सके और उसे ध्वंस कृत्य में लगाया जा सके तो उतने से ही इस समस्त भू-मण्डल का विनाश हो सकता है। इसी प्रकार उस शक्ति का सृजन प्रयोजन में उपयोग हो सके तो धरती को प्रायः उतनी ही गर्मी मिल सकती है जितनी कि सूर्य से अपनी दुनिया को उपलब्ध होती है। ‘अणोरणीयान् महतो महीयान् के श्रुति वचन में इसी तथ्य की ओर इंगित किया गया है।

व्यक्ति की रहस्यमयी क्षमताओं को अनगढ़ स्थिति में उवार कर उसे शुद्ध एवं प्रखर बनाना ही योग साधना का उद्देश्य है। जो हमारे लिए आवश्यक एवं उपयोगी है। वह सब कुछ हम अपने ही भीतर से अपने ही पुरुष से आत्म नियन्त्रण की प्रक्रिया अपना कर सहज ही प्राप्त कर सकते हैं। इसी तथ्य को प्रत्यक्ष करना योग साधना का उद्देश्य है।

योग साधना द्वारा कई प्रकार की अलौकिक क्षमताएँ उत्पन्न की जा सकती है और उसका उपयोग सत्प्रयोजनों में करने से उतना हित साधन हो सकता है जितना सामान्य भौतिक क्षेत्र में सम्पन्न किये जाने वाले पुरुषार्थ द्वारा सम्भव नहीं है।

व्यक्तिगत सामर्थ्य की दृष्टि से देखा जाय तो भी प्रतीत होगा कि सामान्य प्रयत्नों से शरीर बल-बुद्धि बल आदि की जितनी वृद्धि हो सकती है उसकी तुलना में साधना विज्ञान का आश्रय लेकर अधिक समर्थ एवं सुविकसित बना जा सकता है।

जापान में बौद्ध सम्प्रदाय की एक योगविद्या-जेन साधना के नाम से प्रख्यात है। इसके अभ्यासियों में कई प्रकार की अलौकिकताएँ पाई जाती है। मानसिक और आत्मिक दृष्टि से तो इस साधना में उच्चस्तरीय सिद्धियाँ पाई जाती है। साथ ही उसके कई अभ्यासी शारीरिक दृष्टि से भी प्रख्यात पहलवानों को भी अवाक् कर देने वाले कार्य कर दिखाते हैं।

जेन-साधना भारतीय योगविद्या का ही एक अंग है। पाँचवीं में बौद्ध भिक्षुओं के जत्थे भारत से जापान पहुँचे थे। उन्होंने धर्म प्रचार के साथ जिस योगविद्या का वहाँ विस्तार किया था उसकी विशेषता उस देश में अभी जेन साधना के रूप में मौजूद है।

मास एक नाटा दुर्बल व्यक्ति था। जन्मा कोरिया में, पला जापान में। वहाँ उसने विशेष जापानी योगविद्या, जने साधना सीखी। इसी के अभ्यास से वह चमत्कारी योद्धा बन गया।

मास एक नाटा दुर्बल व्यक्ति था। जन्मा कोरिया में, पला जापान में। वहाँ उसने विशेष जापानी योगविद्या जेन साधना सीखी। इसी के अभ्यास से वह चमत्कारी योद्धा बन गया।

वह दो पकी हुई मजबूत ईंटें हथेलियों के बीच रख कर उँगलियों के खाँचे भिड़ाकर उन्हें दबाता और उन ईंटों का चूरा बना देता। दर्शक अवाक् रह जाते है

उसने जापान में कई पहलवानों को हरा दिया। तब उन सबने मिलकर उसे साँड से कुश्ती लड़ने की चुनौती दी। मास ने साफ मना कर दिया, पर उसे बार-बार चिड़ाया जाने लगा, तो वह तैयार हो गया। एक अत्यन्त क्रोधी, तेरह मन भारी विशालकाय साँड़ को नशा पिला कर दंगल में लाया गया। विशाल जन समुदाय और डाक्टरों पुलिस वालों के दल भी मौजूद थे। निहत्थे मास पर प्रशिक्षित साँड़ ने पहले प्रहार किया। मास अटल रहा और जवाब में जोरदार घूँसा मारा। घूँसा खाते ही 13 मन भारी साँड़ चक्कर खाकर गिर पड़ा और दम तोड़े दिया।

यही मास अमेरिका गया और वहाँ के प्रख्यात पहलवानों को चुनौती दी। अमरीका की तत्कालीन चैम्पियन पहलवान डिकरियल के साथ दंगल रखा गया। डिकरियल था 6 फुट 7 इंच ऊँचा और मास सिर्फ 4 फुट 1 इंच अखाड़े में दोनों की जोड़ी कतई नहीं जम रही थी। कई लोग देखते ही उठने लगे यह मानकर कि नतीजा तो साफ व निश्चित है, पर थोड़ी ही देर में मास ने डिकरियल को चित्त कर दिया और 1 हजार डालर का इनाम जीत लिया।

अमेरिका जनता इस बेतुकी-सी बात को हजम न कर सकी। मास पर आरोपों की बौछार होने लगी। मास खिन्न हो गया। अन्ततः उसने विज्ञापन द्वारा चुनौती दी कि उसे हटाने डालर सहर्ष लौटा देगा। दूसरा दंगल रचा गया। एक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति का पहलवान जो कि अमेरिकी पुलिस अफसर था मुकाबले में था, पर मास ने उसी भी ऐसी पटकारी मारी कि उसकी दो हड्डियाँ ही टूट गई, अमेरिकी विक्षुब्ध और उत्तेजित हो उठे।

मास अपनी इस शक्ति का कारण योगसाधना को बताता था। उसने जेन साधना में निष्णात महाभिक्षु फुना कोशी से दीक्षा ली और उनका अन्तेवासी बन योगाभ्यास करता रहा। पर्वतों की निर्जन गुफाएँ, बर्फ से ढकी कन्दराएँ उसका साधना स्थल थीं और वनस्पतियाँ उसका आहार। कई बाद वह जेन साधना में सिद्ध पुरुष बन कर लौटा।

तन्त्र ग्रन्थों के प्रख्यात लेखक और कलकत्ता के तत्कालीन प्रधान जज सरजान बुडरफ ने अपने एक संस्मरण में लिखा है, वे ताजमहल होटल के लाउँज पर बैठे थे उनके साथ एक भारतीय मित्र थे। संकल्प शक्ति की चर्चा चल रही थीं। उन मित्र ने इसकी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए कहा- इतना तो मैं भी कर सकता हूँ कि सामने जो बीस के लगभग मनुष्यों का झुण्ड बैठा है उसमें से आप जिसे कहें उठा देने और बिठा सकने का जादू दिखा सकूँ। बुडकफ ने उनमें से एक व्यक्ति को चुन दिया। मित्र ने अपनी शक्ति का प्रयोग किया। फलतः ठीक वही व्यक्ति अकारण उठ खड़ा हुआ-चला और फिर अपने स्थान पर वापिस बैठ गया।

फ्राँस की एक लड़की एनेट फ्रेलन की विचित्रता भी अपने समय में बहुत प्रख्यात रही। जब वह बारह वर्ष की थी तभी वह अविज्ञात प्रश्नों के उत्तर देती थी। यह उत्तर उसकी चमड़ी पर इस तरह उभरते थे, मानो किसी ने कागज पर स्याही से लिखे जाने की तरह उन्हें लिख दिया हो। यह अक्षर अपने आप ही उभरते थे और कुछ ही मिनट में गायब हो जाते थे।

28 जुलाई 1969 को दक्षिण अफ्रीका के न्यूकेसिल नगर में असंख्य जन समूह के सम्मुख योगविद्या का चमत्कार प्रदर्शन अन्तर्राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना रहा।

बात यह थी कि एक चाय का होटल चलाने वाला साधारण सा युवक-पीटरवान डेनवर्ग-योगविद्या के चमत्कारों के बारे में बहुत कुछ सुनता, पढ़ता रहा था। उसने भारत को योगियों के देश के नाम से जाना था। अस्तु अपनी सारी जगा पूँजी समेट कर भारत चल पड़ा और तिब्बत हिमालय क्षेत्र में भ्रमण करके चमत्कारी विद्याएँ बहुत समय तक सीखता रहा।

जब वह अपने देश वापस लौटा तो लोगों ने उसे चमत्कार दिखाने के लिए विवश कर दिया। अन्ततः वैसे प्रदर्शन की व्यवस्था की गई। एक लम्बे चौड़े चबूतरे पर पत्थर के दहकते कोयलों की लपटों में डेनवर्ग को देर तक चहलकदमी करनी थी। प्रदर्शन के लिए जोरदार विज्ञापन किया गया। अस्तु उसे देखने के लिए दूर दूर से भारी संख्या में एकत्रित हुए लोगों से प्रदर्शन का विस्तृत मैदान खचाखच भर गया। नियत समय पर प्रदर्शन हुआ और ज्वालाओं के बीच युवक नंगे पैरों बहुत समय तक टहलता रहा। निकला तो उसके शरीर पर कहीं एक छाला भी नहीं था।

मंत्र साधना के नाम पर चल रही ठगी भी कम नहीं है। उस आड़ में धूर्तों का काला बाज़ार भी खूब पनपता है, इतने पर भी यह नहीं मान बैठना चाहिए कि इस क्षेत्र में तथ्य कुछ नहीं है। यदि गहराई उतरा जाय तो प्रतीत होगा कि साधना विज्ञान की भी अपनी उपलब्धियाँ हैं और उनके सहारे दिव्य क्षमताओं के अभिवर्धन की दिशा में बहुत कुछ किया जा सकता है।

एक अँगरेज शिकारी डेविड लेजली ने अपने अफ्रीकी शिकार यात्राओं के विवरणों की एक पुस्तक लिखी है "जंतुओं के बीच” उसमें एक घटना यह है कि उसके साथी हाथियों की शिकार के लिए घेराबंदी करते हुए कहीं गायब हो गये और बहुत ढूँढ़ने पर भी उनका कहीं कुछ भी पता न चला। इस तलाश में एक ‘जुलु’ तान्त्रिक की सहायता ली गई। उसने उन सभी साथियों की शक्लें। वस्तुएँ आदि का ब्यौरा बताते हुए यह भी कहा कि वे इस समय अमुक स्थान पर है। बताये हुए स्थान पर जाकर उन्हें खोज लिया गया।

मनुष्य शरीर की सामान्य विद्युत शक्ति से दैनिक जीवन का क्रिया कलाप चलता है किन्तु यह नहीं मान बैठना चाहिए कि मानवी ऊर्जा की मात्रा इतनी ही सीमित है। यदि वह किसी प्रकार बढ़ सके तो मनुष्य शरीर चलते फिरते बिजली घर के रूप में परिणत हो सकता है। इस शक्ति को योगीजन भले कार्यों में और दुष्ट प्रकृति के लोग दुष्प्रयोजनों में लगाते हैं। आग का भोजन बनाने और घर जलाने में कुछ भी प्रयोग हो सकता है। यही बात साधना द्वारा उत्पन्न हुई आत्म शक्ति के सम्बन्ध में भी हैं।

एक अन्य रूसी महिला ‘नेल्या भिखायलोक’ में सहसा असामान्य इच्छा शक्ति उस समय विकसित हो गई, जब वह युद्ध के दिनों में सैनिक के रूप में मोर्चे पर लड़ते हुए शत्रु के गोले से गम्भीर रूप में आहत होकर अस्पताल में आरोग्य लाभ कर रही थी।

मास्को विश्वविद्यालय के जीवविज्ञान शास्त्री एडवर्ड नोमोव ने नेल्या का परीक्षण विश्लेषण किया। प्रयोगशाला में उसने मेज पर बिखरी माचिस की तीलियों को बिना छुए, तनिक ऊपर से हाथ घुमा कर जमीन पर गिरा दिया। फिर वही तीलियाँ काँच के डिब्बे में बन्द कर दी गई। नेल्या ने शब्द के ऊपर हाथ घुमाया, तो तीलियों में हलचल मच गई।

इसी तरह सोवियत लेखक बदिममारीन के साथ भोजन करते समय नेल्या ने मेज पर थोड़ी दूर पड़े रोटी के टुकड़े पर अपना ध्यान एकाग्र किया, तो वह टुकड़ा खिंचकर नेल्या के पास आ गया। फिर उसने झुककर मुँह खोला, तो वह टुकड़ा नेल्या के मुँह में उछलकर समा गया। नेल्या का परीक्षण भली-भाँति रूसी वैज्ञानिकों ने किया और पाया कि उसके मस्तिष्क में विद्युत शक्ति सी कौंधती है और देह से चुम्बकीय शक्ति निकलती है।

बिजली के भले बुरे परिणाम सभी को विदित हैं। तान्त्रिक वर्ग के लोगों में से कितने उसका दुष्प्रयोजनों में व्यय करते और अपने प्रति पक्षियों को हानि पहुँचाते भी देखे गये है।

युगाँडा के एक भूमिगत संगठन ‘दिनी बा मसाँब्बा के कार्यों की जानकारी के लिए नियुक्त एक ब्रिटिश गुप्तचर अधिकारी ने अपनी संस्मरण पुस्तक में विभिन्न घटनाओं का उल्लेख किया है। ये ब्रिटिश अफसर जान क्राफ्ट प्रगतिशील अन्धविश्वासों से सर्वथा मुक्त, कुशाग्र बुद्धि साहसी व प्रशान्त मस्तिष्क से काम करने वाले हैं। उन्हें जादू टोना पर तनिक भी विश्वास नहीं था, पर जब वे गुप्त संगठन का पता लगाने में सक्रिय हुए, तो उन्हें चेतावनी दी गई कि वे इस काम से हाथ खींच लें। जब वे न माने, तो उनके ऊपर सर्वथा अप्रत्याशित व अस्वाभाविक तौर पर महाविषैले सर्पों से आक्रमणों की योजना बनाई गई। वे एक भोज में गए। वहाँ से लौटते समय, आगे अनेक अतिथि तो निरापद चले गए, पर जब जानक्रिफ्ट सीढ़ियों पर उतरने लगे, तो वह भयंकर विषधर घात लगाए बैठा था। भेजवान ने जानक्रिफ्ट को एकदम से धक्का देते बने, न ठेल दिया होता, वह उन्हें डसने ही वाला था।

एक बार वे अकस्मात् एक सहयोगी के यहाँ पहुँचें, तो वहाँ भी एक भयंकर फणिधर ने तीखी विषधार उनकी आँखों की और छोड़ी। सहकर्मी सतर्क व चुस्त था, उसने उन्हें तत्काल नीचे गिरा दिया और जहरीली धार ऊपर निकल गई। अन्यथा उनका प्राणान्त हो जाता या फिर वे जन्मभर के लिए अन्धे हो जाते।

फिर एक बार मोटर के दरवाजे के पास दूसरी बार बिस्तर पर ही भयंकर विषैले सर्प दिखे एकबार क्रिफ्ट के दफ्तर के अँधेरे कोने में दुबका बैठा था। घटनाओं का विश्लेषण स्पष्ट बताता था कि यह संयोग मात्र नहीं हो सकता। उनके अकस्मात् दूर कहीं पहुँचने की सूचना उनके शत्रुओं को भी नहीं मिल सकती थी, अतः यह सम्भावना भी नहीं मानी जा सकती थी कि वे लोग चुपके से ये सर्प छोड़ जाते रहे होंगे। फिर भोज में आये अनेक नागरिकों में से सिर्फ क्रिफ्ट पर ही प्रहार की चेष्टा सर्प ने क्यों की? घटनाएँ इस तथ्य को मानने को विवश करती है कि वहाँ प्रचलित यह मान्यता सही हो सकती है कि वहाँ प्रचलित यह मान्यता सही हो सकती है कि वहाँ के तांत्रिक सर्पों को वंश में कर उनका इस तरह मनचाहा प्रयोग करते हैं।

नवभारत टाइम्स के 30 जून 1976 के अंक में प्रकाशित की राजकुमार मिश्र के एक लेख के अनुसार-” मध्यप्रदेश में सरगुजा में सन् 1934-35 में सरगुजा-नरेश के दरबार में एक महिला की पेशी हुई, जिस पर आरोप थे कि दरबार में एक महिला की पेशी हुई, जिस पर आरोप थे कि मारण-मन्त्र प्रयोग था।

उस आदिवासी युक्ती ने भरे दरबार में अपना अपराध स्वीकार कर लिया। क्योंकि यह आदिवासियों की स्वाभाविक प्रवृत्ति रही है कि वे अपने द्वारा किये कामों को स्पष्ट स्वीकार कर लेते हैं। जब महाराजा ने मारणं मन्त्र की शक्ति का प्रदर्शन देखना चाहा तो एक स्वस्थ हृष्ट-पुष्ट मुर्गा एक राज-कर्मचारी के हाथ में रखा गया। युक्ती ने एक निश्चित दूरी पर खड़े होकर एक तिनका टूटने के साथ ही राज-कर्मचारी के पास रखा स्वस्थ मुर्गा सहसा ऐंठा, छटपटाया और निष्प्राण हो गया।

इस घटना से यह भी स्पष्ट है कि उसका मारण मन्त्र एक निश्चित सीमा के भीतर ही प्रभावी हो सकता था। उक्त युवती ने बताया भी कि जब ग्रामीणों को उस पर शक हो गया और वे उससे दूर-दूर ही रहने लगे तो उसने छटपटाकर मरते प्राणी को देखने में आनन्द की अनुभूति होने की अपनी प्रवृत्ति को परितुष्ट करने के लिए अपने पति, अपने ससुर और डेढ़ वर्षा के अपने मासूम बच्चे पर ही मारण-मन्त्र का प्रयोग किया। स्पष्ट है कि अविकसित मस्तिष्क को प्राप्त यह विलक्षण शक्ति भी उसके लिए नशा बन गई थी। उसमें आत्म-नियन्त्रण नहीं था और अपनी शक्ति के प्रभाव को देखने के लिए उसमें उन्माद जगा करता था।

शक्ति एवं सम्पत्ति का भला या बुरा उपयोग करना प्रयोक्ता के लिए ही प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है। इससे इन क्षमताओं की उपयोगिता किसी प्रकार कम नहीं होती, उनका उपार्जन एवं अभिवर्धन होना ही चाहिए


Quotation

निस्सन्देह मनुष्यों में अत्याधिक पशुता, दुष्टता और कुरता है।, आचरण-है विचार-दर्शन और विधि-व्यवस्थाएँ हैं। जब धर्म की इतने रूपों में उपस्थिति के बावजूद मनुष्यों की यह स्थिति और प्रवृत्ति है तो धर्म की अनुपस्थिति में उनकी क्या दशा होती या हो सकती है?

-फ्रेंकलिन


उज्ज्वल भविष्य के लिये सुविकसित सन्तान की आवश्यकता

अच्छा बीज अच्छी जमीन में बोया जाय तो उससे मजबूत पौधा उगेगा और उस पर बढ़िया फल-फूल आवेंगे इस तथ्य से क्या शिक्षित, क्या अशिक्षित सभी परिचित हैं। जिन्हें कृषि एवं उद्यान से अच्छा प्रतिफल पाने की आकांक्षा है वे इस तथ्य पर आरम्भ से ही ध्यान रखते हैं जुटाया जाय और उनका स्तर ऊँचा रखा जाय।

यों विवाह एक निजी मामला समझा जाता है और संतानोत्पादन को भी व्यक्तिगत क्रिया-कलाप की परिधि में सम्मिलित करते हैं। पर वस्तुतः यह एक सार्वजनिक सामाजिक एवं सार्वभौम प्रश्न है। क्योंकि भावी पीढ़ियों के निर्माण की आधारशिला यही है। राष्ट्र और विश्व का भविष्य उज्ज्वल एवं सुसम्पन्न बनाने की प्रक्रिया धन समृद्धि पर टिकी हुई नहीं हैं, वरन् इस बात पर निर्भर है कि भावी नागरिकों का शारीरिक, बौद्धिक एवं चारित्रिक स्तर कैसा होगा? धातुएँ, इमारतें या हथियार नहीं, किसी राष्ट्र की वास्तविक सम्पदा वहाँ के नागरिक ही होते हैं। वे जैसे भी भले या बुरे होंगे, उसी स्तर का समाज, समय एवं वातावरण बनेगा इसलिए भावी प्रगति की बात सोचने में हमें सुसंतति के निर्माण की व्यवस्था जुटाने की बात भी ध्यान में रखनी चाहिए।

घरेलू पशुओं यहाँ तक कि पालतू कुत्ते, बिल्लियों तक के बारे में हमारे प्रयास यह होते हैं कि पुरा करने में रुग्ण, दुर्बल अथवा अयोग्य समझते हैं उनका प्रजनन प्रतिबन्धित कर देते हैं। इस प्रतिबद्धता प्रोत्साहन में उचित वंश-वृद्धि की बात ही सामने रखी जाती है। क्या मानव प्राणी की नस्लें ऐसे ही अस्त-व्यस्त बनने दी जानी चाहिए, जैसी कि इन दिनों बन रहीं हैं? क्या इस संदर्भ में कुछ देख-भाल करना या सोचना-विचारना समाज का कर्तव्य नहीं है? क्या बच्चे मात्र माता-पिता की ही सन्तति हैं।

क्या उनका स्तर समाज को प्रभावित नहीं करता? इन बातों होगा कि किसी राष्ट्र या समाज का भविष्य उसकी भावी पीढ़ियों पर निर्भर हैं। यदि सुयोग्य नागरिकों की जरूरत हो तो भोजन, चिकित्सा अथवा शिक्षा का प्रबन्ध भर कर देने से काम नहीं चलेगी। इस सुधार का क्रम सुयोग्य जनक-जननी द्वारा सुविकसित सन्तान उत्पन्न करने का उत्तरदायित्व निबाहने से होगा। यह तैयारी विवाह के दिन से ही आरम्भ हो जाती है। यदि पति-पत्नी की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक स्थिति सुयोग्य सन्तान के उत्पादन तथा भरण-पोषण के उपयुक्त नहीं है तो उनके द्वारा की जाने वाली वंश-वृद्धि अवांछनीय स्तर की ही बनेगी और उसका दुष्परिणाम समस्त समाज को भुगतना पड़ेगा।

वंशानुक्रम विज्ञान की चर्चा इन दिनों जोरों पर है। जनम से पाये जाने वाले गुण-सूत्रों को भावी पीढ़ियों के निर्माण का सारा श्रेय दिया जा रहा है। इन जीव कणों में हेर-फेर करके ऐसे उपाय ढूँढ़े जा रहे हैं जिनके आधार पर मनचाहे आकार-प्रकार की सन्तानों को जन्म दिया जा सके। इस अत्युत्साह में अभी तक आँशिक सफलता ही मिली है। क्योंकि गुणों सूत्रों ने आकृति तक में अभीष्ट परिवर्तन प्रस्तुत नहीं किया फिर प्रकृति के परिवर्तन की तो बात ही क्या की जाय?

प्रयोगशालाओं में- रासायनिक पदार्थों की अथवा विद्युत उपचार की ऐसी विधि-व्यवस्था सोची जा रही है जिससे अभीष्ट स्तर की सन्तान पैदा की जा सकें। इस दिशा में जी तोड़ प्रयत्न हो रहे हैं और सोचा जा रहा हैं कि बिना माता का स्तर सुधारे अथवा बिना वातावरण की चिन्ता किये वैज्ञानिक विद्या के आधार पर सुसन्तति उत्पादन की व्यवस्था यांत्रिक क्रिया-कलाप द्वारा सम्पन्न कर ली जाएगी

जनन-रस में पाये जाने वाले गुण-सूत्र में एक व्यक्ति रूप डामिनेंट है। दूसरा अव्यक्त रूप है- रिसेसिव व्यक्त भाग को भौतिक माध्यमों से प्रभावित किया जा सकता है और उस सीमा तक भले या बुरे प्रभाव सन्तान में उत्पन्न किये जा सकते हैं। पर अव्यक्त स्तर को केवल जीव की निजी इच्छा-शक्ति ही प्रभावित कर सकती है। महत्त्वपूर्ण परिवर्तन इस चेतनात्मक परिधि में ही हो सकते हैं इसके लिए रासायनिक अथवा चुम्बकीय माध्यमों से काम नहीं चल सकता इसके चिन्तन को बदलने को बदलने वाली अन्तः स्फुरणा अथवा दबाव भरी परिस्थितियाँ होनी जाने लगा है कि माता-पिता का स्तर सुधारे बिना सुसन्तति की समस्या प्रयोगशालाओं द्वारा न हो सकेगी। वनस्पति अथवा पशुओं में सुधार उत्पादन सरल है, पर मनुष्यों में पायें जाने वाले चिन्तन तत्त्व में उत्कृष्टता भरने की आवश्यकता यांत्रिक पद्धति कदाचित ही पूरी कर सकेंगी।

गुण-सूत्रों में हेर-फेर करके तत्काल जिस नई पीढ़ी का स्वप्न इन दिनों देखा जा रहा है, उसे मेडीटेशन के संदर्भ में पिछले दिनों पैवलव, मैकडुगल, मारगन, मुलर, प्रकृति जीव विज्ञानियों ने अनेक माध्यमों और उपकरणों से विविध प्रयोग किये हैं। जनन रस को प्रभावित करने वाली उनने विद्युतीय और रासायनिक उपाय अपनाये सोचा यह गया था कि उससे अभीष्ट शारीरिक और मानसिक क्षमता सम्पन्न पीढ़ियाँ उत्पन्न होंगी, पर उनसे मात्र शरीर की ही दृष्टि से थोड़ा हेर-फेर हुआ। विशेषतया बिगाड़ प्रयोजन में ही सफलता अधिक मिली, सुधार की प्रगति अति मन्द रही। गुणों में पूर्वजों की अपेक्षा कोई अतिरिक्त सम्भव न हो सका।

एक जाति के जीवों में दूसरे जति के जीवों की कलमें लगाई गई और वर्णशंकर सन्तानें उत्पन्न की गई। यह प्रयोग उसी जीवधारी तक अपना प्रभाव दिखाने में सफल हुए। अधिक से अधिक एक पीढ़ी कुछ बदली-बदली सी जन्मी इसके बाद वह क्रम समाप्त हो गया। घोड़ी और गधे के संयोग से उत्पन्न होने वाले खच्चर अगली पीढ़ियों को जन्म देने में असमर्थ रहते हैं।

वर्णशंकर सन्तान उत्पन्न करके पूर्वजों की अपेक्षा अधिक सशक्त और समर्थ पीढ़ियाँ उपजाने का उत्साह अब क्रमशः घटता चला जा रहा है। इस संदर्भ में प्रथम आवश्यकता तो यही रहती है कि प्रकृति एक ही जाति के जीवों में संकरण स्वीकार करती है। मात्र उपजातियों से ही प्रत्यारोपण सफल हो सकता है। यदि शरीर रचना में विशेष अन्तर होगा तो संकरण प्रयोगों में सफलता न मिलेगी, दूसरी बात यह है कि काया की दृष्टि से थोड़ा सुधार इस प्रक्रिया में हो भी सकता है। गुणों में नहीं वर्णशंकर गायें मोटी, तगड़ी तो कोई, पर अपने पूर्वजों की अपेक्षा अधिक दुधारू न बन सकीं। इन प्रयोगों विकास-क्रम के साथ जुड़ी हुई है, वह बाहरी उलट-पुलट करके विकसित नहीं की जा सकती।

सुसन्तति के सम्बन्ध में वैज्ञानिक प्रयोग अधिक से अधिक इतना ही कर सकते हैं कि रासायनिक हेर-फेर करके शारीरिक दृष्टि से अपेक्षाकृत थोड़ी मजबूत पीढ़ियाँ तैयार कर दें, पर उनमें नैतिक, बौद्धिक एवं सामाजिक उत्कृष्टता भी होगी इसकी गारण्टी नहीं दी जा सकती। ऐसी दशा में उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकने वाले नागरिकों का सर्वतोमुखी सृजन कहाँ सम्भव होगा?

उस चला है और सोचा जा रहा है कि अभिभावकों को ही सुयोग्य बनाने पर ध्यान दिया जाय। एक ओर अयोग्य व्यक्तियों को अवांछनीय उत्पादन से रोका जाय, दूसरी ओर सुयोग्य, सुसंस्कृत एवं समुन्नत लोगों को प्रजनन के लिए प्रोत्साहित किया जाय। विवाह निजी मामला न रहे, वरन् सामाजिक नियन्त्रण इस बात का स्थापित किया जाय कि समर्थ व्यक्तियों को विवाह बन्धन में बँधने और सन्तानोत्पादन के लिए स्वीकृति दी जाय।

जर्मनी के तीन प्रसिद्ध जीव विज्ञानियों ने वंशानुक्रम विज्ञान पर एक संयुक्त ग्रन्थ प्रकाशित कराया है नाम है- “ह्यूमन हैरेडिटी’। लेखकों के नाम हैं डा० आरवेन वेवर, डा० अयोजिन फिशर और डा० फ्रिट्ज लेंज। उन्होंने वासना के उभार में चल रहे अन्धाधुन्ध विवाह सम्बन्धों के कारण सन्तान पर होने वाले दुष्प्रभाव को मानवी भविष्य के लिए चिन्ताजनक बताया है। लेखकों का संयुक्त मत है कि- अनियन्त्रित विवाह प्रथा के कारण पीढ़ियों का स्तर बेहतर गिरता जा रहा है, उनने इस बात को भी दुःखद बताया है कि निम्न वर्ग की सन्तानें बढ़ रही हैं और उच्चस्तर के लोगों की संख्या तथा सन्तानें घटती चली जा रही है।

पीढ़ियों में आकस्मिक परिवर्तन म्यूटेशन-के विशेष शोधकर्ता टर्नियर का निष्कर्ष यह है कि मानसिक दुर्बलता के कारण गुण सूत्रों में ऐसी अशक्तता आती है जिसके कारण पीढ़ियाँ गई-गुजरी बनती है। इसके विपरीत मनोबल सम्पन्न व्यक्तियों की आन्तरिक स्फुरणा उनके जनन रस में ऐसा परिवर्तन कर सकती है जिससे तेजस्वी और गुणवान् ही नहीं शारीरिक दृष्टी से भी परिपुष्ट सन्तानें उत्पन्न हों। वशं परम्परा से जुड़े हुए कष्ट, उपदंश, क्षय, दमा, मधुमेह आदि रोगों की तरह विधेयात्मक पक्ष यह भी है कि मनोबल के आधार पर उत्पन्न चेतनात्मक समर्थता पीढ़ी आगे बढ़े और उसका सत्परिणाम शरीर, मन अथवा दोनों पर प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो सके। चमत्कारी आनुवंशिक परिवर्तन इसी आधार पर सम्भव है मात्र रासायनिक परिवर्तनों के लिए भौतिक प्रयास इस प्रयोजन की पूर्ति नहीं कर सकते। यह तथ्य हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि जिस प्रकार परिवार नियोजन के द्वारा अवांछनीय उत्पादन रोकने का प्रयास किया जाता है उसी प्रकार समर्थ और सुयोग्य सन्तानोत्पादन के लिए आवश्यक ज्ञान, आधार-साधन एवं प्रोत्साहन उपलब्ध कराया जाय।

अनियन्त्रित विवाह व्यवस्था के सम्बन्ध में दूरदर्शी विचारशील व्यक्ति भारी चिन्ता व्यक्त कर रहे है और यह सोच रहे है कि इस सम्बन्ध में विवेक सम्मत नियन्त्रण व्यवस्था किये बिना काम नहीं चलेगा। हिन्दू समाज में इन दिनों विवाह व्यवस्था कितनी भौंड़ी क्यों न हो गई हो, उस पर समाज का आधा-सीधा नियन्त्रण अवश्य है। नियन्त्रण का स्वरूप क्या हो, यह अलग प्रश्न है, पर भौतिक समस्या का हल हिन्दू समाज में अभी भी विद्यमान् है कि विवाह प्रक्रिया पर समाज का नियन्त्रण होना चाहिए। इस भारतीय परम्परा की ओर विश्व के विचार शील वर्ग का ध्यान गया है और यह सोचा जा रहा है कि विवाह पर सामाजिक नियन्त्रण का अनुकरण समस्त संसार में किया जाना चाहिए।

बीमा कम्पनियाँ इस बात की पूरी पूछ ताछ करती है कि बीमा कराने वाले के पूर्वज किस आयु में मरे थे। क्योंकि अन्वेषण से यही पाया जाता गया है कि पूर्वजों की आयु से मिलती जुलती अवधि तक ही सामान्यतः उनकी पीढ़ियाँ भी जिया करती हैं। डा० रेमण्ड पर्ल ने बहुत शोधों के उपरान्त इस बात पर जोर दिया है कि सन्तान का दीर्घजीवन यदि अभीष्ट हो तो उसका प्रयोग जनक जननी को पहले अपने ऊपर से प्रारम्भ करना चाहिए।

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जे० बी० हाल्डेन ने आशा व्यक्त की है कि अगले दो सौ वर्षों के भीतर योरोप और अमेरिका में भी हिन्दुओं की तरह वर्ण व्यवस्था स्थापित होगी और विवाहों के संदर्भ में उसका विशेष रूप से ध्यान रखा जाएगा जापान में वंश परम्परा के आधार पर जोड़ो का चुनाव कराने में सहायता देने वाली एक सुगठित संस्था स्थापित हुई है- ग्राण्ड यूजेनिक कौसिक।

वंशानुक्रम विज्ञान के आधार पर वर्ण व्यवस्था समाज व्यवस्था बनाने की रूप रेखा प्रस्तुत करने के लिए विज्ञान की एक स्वतन्त्र शाखा का विकास हुआ है, जिसका नाम है- यूजेनिक

मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य का प्रश्न बहुत कुछ सुसन्तति निर्माण की प्रक्रिया पर निर्भर है। इसके विभिन्न पक्षों पर विचार पड़ेगा और आवश्यक आधार जुटाना पड़ेगा। उपयुक्त जोड़े ही विवाह बन्धन में बँधे और उपयोगी उत्पादन करें। इस संदर्भ में विवाह बन्धन में बँधे और उपयोगी उत्पादन करें। इस संदर्भ में विवाह पद्धति पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सामाजिक नियन्त्रण रहना चाहिए। यौन विनोद के लिए विवाह की छूट और अरोग्य उत्पादन की स्वतन्त्रता को अवरुद्ध करने के लिए भी कुछ तो करना ही पड़ेगा।


औषधि सेवन में सतर्कता की आवश्यकता

जूलबर्न का एक उपन्यास है- फ्राम द अर्थ टू द मून।’ इसका पात्र एक प्रचण्ड संहार गोला बना लेता है। ठीक उसी अवधि में दूसरा पात्र इस गोले से बचने लायक सुदृढ़ रक्षा-कवच बना चुकता है।

एलोपैथी दवाओं के संसार में भी जूलेबर्न के इसी उपन्यास की- सी दशा देखी जा रहो है। रोगाणुओं को निस्तेज और नष्ट कर डालने के लिए नित नूतन दवाओं की खोज जारी है और कुछ ही समय में रोगाणु अपने भीतर इन दवाओं की प्रतिरोधी-क्षमता विकसित कर लेते हैं, जिससे कि ये दवाएँ उनके लिए बेअसर हो जाती हैं फिर ज्यादा असरदार दवाएँ तैयार की जाती हैं, फिर रोगाणु और अधिक प्रतिरोध-शक्ति अर्जित कर उन नई दवाओं को भी बेअसर कर देते हैं।

सल्फा औषधियों से शुरू में कई तरह के जीवाणु मरते देखे गये। एण्टीबायोटिक दवाइयों का और जोरदार प्रभाव परिलक्षित हुआ। पेन्सिलीन के प्रभाव से पहले तो अंत्रिका शोथ, न्यूमोनिया, रक्तदोष आदि अनेक रोगों पर नियन्त्रण सम्भव हुआ, पर कुछ ही वर्षों में ऐसे जीवाणु सक्रिय पाये गये जो इन पेन्सिलीन आदि के विरुद्ध पर्याप्त प्रतिरोध क्षमता से सम्पन्न थे। इधर नित्य नवीन औषधियों की खोज, उधर जीवाणुओं में और अधिक ओज के साथ प्रतिरोध सामर्थ्य का विकास।

यह ठीक है कि सामूहिक-टीका अभियान ने बच्चों को विभिन्न रोगों से बचाया। पर इससे एलर्जी की नई समस्या पैदा हो गई। शरीर में इन टीकों के प्रति अति संवेदन शीलता की प्रवृत्ति पैदा होने लगी।

डिपथीरिया, कुकरखाँसी, अधरंग, टेट्नस, चेचक, प्लेग आदि अनेक संक्रामक रोगों में कमी आई है। लेकिन श्वास तथा अन्तरीय संक्रमणों के लगभग 1 लाख मामले अभी भी प्रति वर्ष सामने आ रहे है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अधिकांश देश लाक्षणिक रोगों की लपेट में हैं। इन्फ्लुएञ्जा, संक्रामक हैपेटाइटिस आदि से सम्बन्धित प्रभावपूर्ण पगों की दिशा में आज भी नई खोजो की जरूरत है।

“आस्ट्रेलियन साइन्स न्यूज़लेटर नामक पत्रिका के अनुसार एस्पिरिन का अधिक प्रयोग गैस्ट्रिक अल्सर (पेट का फोड़ा ) का कारण बनता है।

इस रोग से ग्रस्त 17 रोगियों का अध्ययन किया गया। इन सभी ने एस्पिरिन का अत्यधिक मात्रा में सेवन किया था।

न्यू साउथ वेल्स के रायल न्यू कैसिल अस्पताल के जोन ड्रगन ने पेट के फोड़े के 30 रोगियों का अध्ययन किया। इसमें से 349 के रोग का कारण एस्पिरिन का अति सेवन पाया गया।

आमाशय-ग्रहिणी के रक्तस्राव से पीड़ित 568 रोगियों में से 29 प्रतिशत भी एस्पिरिन दवाओं के नियमित प्रयोगकर्ता पाये गये।

दवाएँ जिन पदार्थों से बनती है वे हमारे स्वाभाविक खाद्य नहीं है। उनमें मानवी प्रकृति के प्रायः प्रतिकूल तत्त्व ही भरे रहते हैं। उत्तेजना उत्पन्न करने और अन्धे हाथी के तरह अपनी तथा शत्रु की सेना को कुचल डालने की क्षमता भर उनमें होती है। आवश्यकतानुसार दवाओं के मारण मन्त्र का प्रयोग इस मान्यता के साथ किया जा सकता है कि जहाँ उनसे रोमांच मरेगा वहाँ जीवन-रस को भी समान रूप से क्षति पहुँचेगी। अस्तु आपत्ति धर्म की तरह यदि दवाओं का उपयोग भी करना पड़े तो अनिवार्य आवश्यकता के समय, सीमित मात्रा और सीमित समय यह ध्यान रखा जाय कि रोगों की जड़ काटने के लिए संगृहीत मलों को बाहर निकालने वाले उपवास, वस्ति जैसे शोधक उपाय ही स्थायी समस्या हल करते हैं। आहार-विहार का संयम अपनाकर ही हम खोये स्वरूप को वापिस ला सकते हैं। औषधि सेवन तो संकट कालीन आपत्ति धर्म मात्र है उसे आदत में सम्मिलित न किया जाय।


भले ही थोड़ा करें, पर उत्कृष्ट

भौतिक लालसाओं में लिपट कर मनुष्य ‘विस्तार’ के ओर खिंचा जा रहा है। ‘विस्तार’ भौतिकता का ही प्रतिफल हैं। लोभी मनःस्थिति अगणित चीजों की ओर दौड़ती दौड़ती रहती है। अधिक, अधिक और अधिक की कामना का अन्त जीवनान्त तक नहीं हो पाता। आध्यात्मिक रुचि शुचिता की विशेषता के कारण दूषित वृत्तियों का शमन करती है। आध्यात्मिकता की देन सदा उत्कृष्ट ही होती है। दिव्यता के गुण से प्रभावित मनः स्थिति द्वारा प्रेरित कर्म उत्कृष्ट होते हैं। अध्यात्म मनुष्य में दिव्यता का उदय करता है, उसे उत्कृष्ट बनाता है। अपने आन्तरिक भावों की छाप ही हमें बाहर के पदार्थों में अलग अलग झलकती दिखाई देती है। इन्हीं मनोभावों के अनुरूप हम बाहर के पदार्थों में सरलता, कोमलता तथा सुन्दरता आदि गुणों के दर्शन करते हैं और इन्हीं की प्रेरणा दृष्टि हमें वही पदार्थ क्लिष्ट, कठोर तथा कुरूप दर्शाती है। अपनी अपनी मनः स्थिति के आधार भूत ही हम पदार्थों में गुण अवगुण देखते, उनकी ओर आकर्षित होते अथवा उनकी उपेक्षा करते हैं।

उस बड़ी हवेली की जिसके हर कोने में जाला-कीड़े फर्श में गन्दगी की तहें, दीवारों में धुँआ की धुँध और नालियों में सड़ाँध हो तो कोई सुखकर न मानेगा। उसकी अपेक्षा छोटी, स्वच्छ लिपि-पुती झोंपड़ी का निवास आनन्द देने वाला हो सकता है। उत्तम रेशम के महँगे कपड़ों के मैले कुचैले स्वरूप को सभी घृणा से ही देखेंगे उनकी अपेक्षा सस्ते सादे, निर्मल कपड़ों का परिधान आदर पायेगा यह मानवीय-प्रकृति का मूल है कि स्वच्छता, तथा सरलता को सदा ही सबने स्वीकारा है। थोड़े-थोड़े जल से दिन में बार-बार बिना शरीर का मैल और दुर्गन्ध दूर किए ही स्नान करते-रहने एक बार शरीर को मल मल कर स्वच्छ तथा दुर्गन्ध रहित स्नान कराने की सभी सराहना करते हैं। कहावत हैं कि ‘सन्तान एक हो, पर उत्तम’। आकाश के अगणित तारे एक चन्द्रमा के सन्मुख नकार दिए जाते हैं। सन्तानों की संख्या बढ़ाने के बाद, उनकी उचित स्वास्थ्य शिक्षा आदि की व्यवस्था पर ध्यान न देना, संसार में व्यर्थ का भार बढ़ाना ही है। हम इतनी सन्तानों के पिता है, अतः भाग्यवान हैं, ऐसा गर्व कोरा दम्भ है, मिथ्या है।

संसार का सारा वैभव-यश हम अपने लिए ही मान लें और उसकी प्राप्ति में, संचय में सारी शक्ति लगा दें, तो क्या हम सफल हो सकेंगे? अधिक से अधिक की प्राप्ति की लालसा सुरक्षा के मुख की भाँति बढ़ने वाली है, वह बढ़ती ही जाती है। उससे तो श्री रामदूत हनुमान् जैसे सूक्ष्मता ग्रहण करने वाले सशक्त मनुष्य ह छुटकारा पा सकते हैं। लम्बी आयु कौन नहीं चाहत, पर यदि लम्बी आयु पाकर भी जीवन के प्रयोगों को अनुकरणीय अथवा उत्कृष्ट न बना पाए, तो हमसे वह आठ वर्ष का बालक श्रेष्ठ सिद्ध होगा, जिसने आती हुई रेलगाड़ी को दुर्घटना से बचा लिया। संसार के अनेक महापुरुष अल्प आयु में ही देह त्याग गए, किन्तु आज विश्व उनके बताए मार्ग का अनुसरण करते हुए, उनके प्रति अपने को पूर्ण ऋणी मानता है। जगद्गुरु स्वामी शंकराचार्य केवल बत्तीस वर्ष के जीवन काल में ही विश्व को हिन्दुत्व का अद्भुत दर्शन देकर गए। स्वामी रामतीर्थ न अल्प आयु में ही साधना, तप तथा जागरण का अनूठा उदाहरण विश्व के सम्मुख उपस्थित किया और चले गए। गुरु गोविन्दसिंह के बच्चों ने अति छोटी आयु में ही धैर्य, दृढ़ता और श्रद्धा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करके मुगलों का सिर झुका दिया था। आयु का छोटा या बड़ा होना कोई महत्त्व नहीं रखता यदि हमारी जीवन पद्धति में उत्कृष्टता नहीं है। सौ वर्षों के जीवन की कामना श्रेष्ठ जीवन के लिए है, कीड़ों-मकोड़ों की तरह साधारण मूल्य-रहित जीवन के लिए नहीं।

धन की वृद्धि सभी को सुख देती है। जिसके पास धन बढ़ता है, वही सुख का अनुभव करता है। इस अपने सुख के साथ साथ यदि हम इस धन की वृद्धि को समयानुकूल परिस्थितियों के अनुसार जन हित, समाज-हित राष्ट्र-हित तथा विश्व हित में त्यागने की भावना रखते हैं, साथ ही ऐसे माध्यमों से उसका उपयोग भी कर रहे है, तो हमारा धनी होना सार्थकता की श्रेणी में आकर अनुकरणीय बन जाता है। भामाशाह क्या अकेला धनवान् व्यक्ति था? राणा प्रताप के समय कितने ही अति धनवान् भी तो थे, पर हमें किसी का नाम तक नहीं मालूम। ऐसे ही अनेक उदाहरण हैं। इस भूमण्डल पर पग-पग पर अनेक गुणवान्, विद्वान्, कला-निधान है, एक से बढ़ कर एक हैं। यदि यह सब अपने निजी सुख-साधनों तक ही अपनी विशेषता की उपयोगिता सीमित कर दें, तो उनकी शक्ति-सामर्थ्य का कोई उत्कृष्ट प्रयोग तो हुआ नहीं, वरन् पशुवत् पेट पालन और सुखी बनने की सीमा में ही उनका मनुष्यत्व भी नष्ट हो गया।

मनुष्य और मनुष्य के बीच बाहरी दृष्टि से कोई विशेष भेद नहीं दिखाई देता। खाना, सोना, हँसना, रोना, कमाना और परिवार बनाना समान क्रम से लगभग सब के लिए एक सा है। देह की बनावट, अभिरुचि आदि भी विशेष अन्तर न रखकर लगभग एक सी ही है। इतने पर भी यदि गम्भीरता से देखा जाए, तो उसमें आकाश-पाताल जैसा अन्तर दिखाई देता है। हमारे समाज में क्रूर, घृणित निकृष्ट मनुष्य भी हैं और किसी प्रकार जीवन बिता डालने वाले आलसी तथा असंस्कृत पुरुष भी। हम उनका नाम लेना भी अच्छा नहीं समझते, चाहे वे ऐश्वर्ययुक्त कंचन धाम में ही क्यों न रहते हों? हम अपने समाज के उन दिव्य देवत्व प्राप्त शरीरों को सिर-आँखों पर रखते हैं और उनका नाम लेते हमारी जवान कभी नहीं थकती, जिनका जीवन सर्व-भूत हिते रता” “वयं राष्ट्रे जाग्रयाम प्रेमराहिताः” से प्रेरित है। उनके सद्विचार, कार्य दूर-दूर तक प्रकाश एवं सुगन्ध के वातावरण का निर्माण करके कितने ही अँधेरे एवं दुर्गन्ध में भटकते हुए मनुष्यों का उद्धार करते हैं। मनुष्य और मनुष्य के बीच का यह अन्तर उनकी विद्या, बुद्धि, चतुरता तथा सम्पन्नता के कारण न होकर जीवन के प्रति उनके अलग अलग दृष्टिकोण के कारण हैं

एक वस्तु को भिन्न कोणों से चित्रित करने पर रूपों की भिन्नता तो प्रदर्शित होगी ही। यही बात जीवन के प्रति दृष्टिकोण की है। जीवन के प्रति जैसा दृष्टिकोण अपनाया जाएगा वैसा ही जीवन-दर्शन प्रस्तुत होगा, जिसे कोई देखना न चाहेगा। उत्कृष्ट दृष्टिकोण आकर्षक के साथ-साथ अनुकरणीय स्वरूप प्रस्तुत करेगा, जो सबको प्रिय लगेगा घटिया चिन्तन, घटिया रुचि, घटिया बातों तथा पदार्थों का संचय, घटिया लोगों का संसर्ग संपर्क हमारे जीवन के प्रति घटिया दृष्टिकोण के परिचायक हैं। ये सब हमें निश्चय ही एक दिन शोचनीय अधोगति तक पहुँचा देंगे इस महानाश से बचने के लिए हमें अपने जीवन लक्ष्य सम्बन्धी दृष्टिकोण में उत्कृष्टता लानी होगी। सदा ध्यान से देखते रहना पड़ेगा कि उत्कृष्टता के प्रति ईमानदारी कहीं पर घट तो नहीं रही है। यदि भूल से रंच-मात्र भी हमारा दृष्टिकोण घटियापन से प्रभावित हो गया तो हम क्षमा की पात्रता खो सकते हैं। आगे आने वाली पीढ़ी द्वारा निन्दनीय बन सकते हैं।

आध्यात्मिकता का प्रतिफल ‘उत्कृष्टता’ के रूप में ही उदय होता है। वास्तव में उत्कृष्टता ही अध्यात्म की प्रधानता सहित जीवन की कला अपनाना आध्यात्मिक व्यक्ति का उद्देश्य है। वह बाह्य रूपों की, अन्तस् की शुद्ध अनुभूतियों द्वारा दिशा प्रदान करता है। वह विस्तार की भौतिकतामय परिकल्पना से दूर सुसंस्कारों के आधार पर साँस्कृतिक परिमार्जन करता हुआ युग बोध कराता है। संयोगवश उसका कार्य क्षेत्र आधिक से अधिक बढ़ सकता है, पर उसमें विस्तार की भावना का लेशमात्र भी स्पर्श नहीं होता। पूर्णता में ही उसकी आस्था का मूल स्थिर रहता है, अतः वह सदा एक पूरे-कार्य की पूर्ति का पक्षधर होता है। ‘कम परणूर्ण’ का पाठ उसके द्वारा स्व तो पढ़ा जाता ही है, दूसरे भी उससे यही पढ़ते हैं। पूर्णता ही उत्कृष्टता परिलक्षित करती है। पूर्णता स्वयं उत्कृष्टता है। अधूरी बात, अधूरा काम तथा अधूरी कल्पना का भी उत्कृष्ट नहीं कही जा सकती।

जीवन के हर क्षेत्र में हमें यह मानकर चलना है कि हम अधिक के जाल में न फँसकर एक को पकड़े ओर उसी लक्ष्य को पूरा करने में अपनी सारी शक्ति को केन्द्रीभूत कर दें। किसी भी लक्ष्य की पूर्णता ही मनुष्य का गौरव हैं। प्रशंसा या प्रतिष्ठा उसी की होती है, जो कुछ पूरा कर दिखाता है, लक्ष्य को पूर्णता तक पहुँचा देता है। यह प्रशंसा उसके उत्कृष्ट दृष्टिकोण की ही तो है, जिसके आधार पर कार्य सिद्धि हुई, कार्य में सुन्दरता आई। पूरा कार्य ही सुन्दर कहा जाता है। किसी अधूरे काम को आप सुन्दर कैसे कह सकते हैं? सुन्दरता कल्याणमयी भावना के साथ उत्कृष्ट हो जाती है। वह सत्यता को सार्थक करती युगों तक प्रेरणा मूलक रूप लिए कोटि-कोटि मनुष्यों का पथ प्रदर्शन करती हैं। अध्यात्म तत्त्व के मूल में बैठी यही उत्कृष्ट भावनामय दृष्टि नये युग के निर्माण को अभिप्रेरित करती हैं। हम जहाँ कहीं भी रहें, जिस किसी मूलक दृष्टिकोण होना चाहिए। इसी में हमारे जीवन की सार्थकता तथा श्रेष्ठता सन्निहित है।


ब्रह्म वर्चस् सत्र-साधकों के अनुभव

समस्याओं का समाधान-समस्याओं से घिरा था। उनके समाधान को गुरुदेव का आशीर्वाद, वरदान पाने की आशा से ब्रह्मवर्चस् सत्र में गया था। नौ दिन उस दिव्य वातावरण में रहने से नई दृष्टि मिली। समस्याएँ किसी की बाहर से उत्पन्न नहीं हुई हैं। वे अपनी ही भूलों की प्रति क्रियाएँ है। इस नयी मान्यता के अनुसार ही प्रयास चालें किया है, सोचने का तरीका बदला है और क्रिया-कलाप में परिवर्तन किया है। फलतः तीन चौथाई समस्याएँ और चिन्ताएँ दूर हो गई। जो बची है उनसे जूझने और सहन करने का साहस जगा हैं। यह नया दृष्टिकोण ही गुरुदेव का अनुग्रह और सत्र का वरदान है। इस आधार को अपनाकर सुखी और समुन्नत जीवन जी सकने की सम्भावना सामने खड़ी दीखती है।

-विद्या प्रकाश तिवारी, आजमगढ़

ध्यान में आनन्द-जप के साथ ध्यान करने का अभ्यास आरम्भ से ही सीखा और किया है। ध्यान का महत्त्व भी जाना और माना है, पर ध्यानयोग कितना प्रेरक हो सकता है, यह पहली बार ही जाना है। ब्रह्म वर्चस् सत्र में गुरुदेव अपने सान्निध्य और संरक्षण में ध्यान कराते रहे हैं। उस समय वे सर्व प्रथम सब का संयुक्त मन बनाते हैं। इससे साधकों के मन गुरुदेव के मन में जुड़ जाते हैं और ध्यान का वैसा ही आनन्द आता है, जैसा कि वे स्वयं के ध्यान में आनन्द अनुभव करते हैं। सुना अवश्य था कि महर्षि रमण के मौन सत्संग में उपस्थित साधक एक दिव्य मन के साथ जुड़कर दिव्य अनुभूति पाते थे। प्रत्यक्ष में वैसा अनुभव ब्रह्म वर्चस् सत्र में मिला। चित्त को एकाग्रता, अद्भुत शान्ति और दैवी स्फूर्ति का ऐसा आभास इससे पहले कभी भी नहीं हुआ। दिव्य संरक्षण और दिव्य सहयोग में साधना की सफलता किस प्रकार होती होगी, इसका प्रत्यक्ष अनुभव मैंने इस सत्र में सम्मिलित होकर किया।

-मानकचन्द गुप्ता, राधनपुर।

दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा-स्वभाव में ढेरों बुराइयाँ थी। कई ऐसी आदतें थी, जिन्हें लिखने में लज्जा आती है। छोड़ने के विचार कितनी ही बार आए, संकल्प भी किए, पर वे छूटी नहीं। स्वभाव प्रबल सिद्ध हुआ और संकल्प अनेक ‘बार हारा। पर इस बार तो चमत्कार ही हो गया है। ब्रह्म वर्चस् सत्र से लौटने बाद उन आदतों से स्वतः ही घृणा हो गई है और जिनका छूट सकना असम्भव लगता था उनसे अनायास ही छुटकारा मिल गया है।

बुरी आदतों से समय, धन और स्वास्थ्य की जो बर्बादी हो रही थी, उसकी बचत से जो लाभ होने चाहिए, वह प्रत्यक्ष दिख रहे हैं। लगता है इसी बचत पूँजी के बल पर निकट भविष्य में आत्मिक सम्पदा सम्पन्न बन जाना सम्भव होगा-रमाकान्त साहित्यकार

दिव्य वातावरण और दिव्य संरक्षण-अपने पैरों चल कर लम्बा सफर करना एक बात है और किसी द्रुत गामी वाहन पर सवार होकर बिना थके स्वल्प काल में बहुत दूर आसानी से पहुँच जाना दूसरी। स्वयं तैर कर भी नदी पार की जा सकती है, पर नाव में बैठ कर पार होना अधिक सरल और अधिक सुनिश्चित होता है। यह बातें जानी तो पहले भी थी, पर प्रत्यक्ष ब्रह्म वर्चस् सत्र में ही देखी। अनुभव हुआ कि दिव्य वातावरण और दिव्य संरक्षण प्राप्त करने से आत्मिक उन्नति में कितनी सहायता मिलती है। भौतिक उन्नति में परिस्थितियों और साधनों का जो महत्त्व है, वह आत्मिक उन्नति में वातावरण और संरक्षण का है, वह आत्मिक उन्नति में वातावरण और संरक्षण का है, अब इस तथ्य पर मेरा अटल विश्वास हो गया है। ब्रह्म वर्चस् सत्र से मैं कितना कुछ लेकर लौटा हूँ, इसे व्यक्त कर सकना सम्भव नहीं है।

-सोवरनसिंह राठौर, पंचमढ़ी

दिशा धारा में परिवर्तन-ब्रह्म वर्चस् सत्र में सम्मिलित होना एक वरदान सिद्ध हुआ। साधना का समय साध्य है और उसका प्रतिफल देर में मिलता है, यही सुनता रहा हूँ। किन्तु इस बार भिन्न प्रकार का अनुभव हुआ। उपयोगी सहायता मिल जाने से देर का काम जल्दी भी हो सकता है। सत्र में जो सीखा, जो किया, वह तो उपयोगी था ही, पर जो अनुदान पाया, उसे तो परम सौभाग्य ही मानता हूँ। चिन्तन की दिशा धारा ही बदल गई है। अब जिस तरह सोचता हूँ और जिस नीति को अपना रहा हूँ, यदि वह प्रेरणा अब से पहले ही मिल गई होती, तो इतना जीवन व्यर्थ के कार्यों में नष्ट न होता।

और आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में अग्रसर हुआ हूँ। पर इस बार ब्रह्म वर्चस् सत्र में सम्मिलित होकर तो मैंने ऐसा अनुभव किया, जैसे काया-कल्प ही होने जा रहा है। प्रेरणाओं ने बुद्धि को ही मार्ग दर्शन नहीं दिया वरन् अन्तः करण को ही झकझोर दिया। पिछले दिनों ऐसा लगा करता था, मानों गुरुदेव कहते हैं और कराना चाहते हैं इस बार की स्थिति बिलकुल भिन्न हैं भीतर वाला मेरे सौभाग्य का सूर्य ही ब्रह्म वर्चस् सत्र के रूप में उदय हुआ, ऐसा अनुभव हो रहा है।

-गोपाल दत्त पाण्डेय, सिमरी कला

सर्वतोमुखी काया-कल्प-गुरुदेव के द्वारा आयोजित कई प्रशिक्षण सत्रों में सम्मिलित होता रहा हूँ। हर बार कुछ न कुछ प्रकाश और उत्साह मिला। जीवन शोधन की नई दिशा मिली है और उस पर चलते हुए क्रमशः भौतिक अन्तरात्मा ही बेचैन हो गया है। लगता है इस बार के ब्रह्म वर्चस् सत्र की प्रेरणा मेरा सर्वतोमुखी काया-कल्प ही करके रहेगी।

शान्तिलाल-ठाकुरलाल जोशी उमर गाँव

उपासना से अभिनव आनन्द-कई वर्ष से गायत्री उपासना कर रहा था। नित्य कर्म की तरह उसे अपनाये हुए था। पर कभी ऐसा अनुभव न हुआ कि इसके फलस्वरूप कोई विशेष अनुभूति होती हो। इसका कारण साधना विधि की कोई कमी ही सोचता था, जिसके कारण माता का अनुग्रह प्राप्त नहीं होता। ब्रह्म वर्चस् सत्र से लौटने के बाद स्थिति बदल गई। अन्तःकरण की धुलाई और मंजाई का जो विशेष कार्य हुआ है उससे सरसता के द्वार खुल गये हैं। अब उपासना के समय ऐसा अनुभव होता है, मानो भगवान की प्रत्यक्ष समीपता से मिलने कला आनन्द और माता का पय-पान करने जैसा सन्तोष मिल रहा है। अब यह विश्वास दृढ़ हो गया है कि जीवन का परम लक्ष्य पाने का सही आधार मिल गया और अभीष्ट सफलता मिल कर रहेगी।

-रघुवर प्रसाद वडोले, गोसाई गंज

स्वभाव बदला-स्वभाव बदलना कठिन होता है। संगृहीत संस्कार सहज ही नहीं मिटते, उनसे पीछा छुड़ाने के लिए भारी संघर्ष करना पड़ता है। यह तथ्य भी है और सत्य भी। मनस्वी व्यक्ति ही अपने को सुधार और बदल पाते हैं। आमतौर से यही बात सही है, पर इसमें एक सरल पगडंडी मार्ग दूसरा भी मिला कि शक्ति सम्पन्न सहयोग से वह कठिन कार्य सरल भी हो सकता है। ब्रह्म वर्चस् सत्र ने मेरा स्वभाव और चिन्तन दोनों ही बदल दिये। कुसंस्कार जो जीवन क्रम में सघन बन कर सम्मिलित हो गये थे, अब पतझड़ में गिरने वाले पत्तों की तरह झड़ते चले जा रहें हैं। अगले दिनों बसंती पुष्प-पल्लवों से अपना जीवन वृक्ष शोभायमान होगा, ऐसी आशा प्रबल हो रही है।

-सीताराम शरण, रामनगर

प्रगति का द्वार खुला-मनुष्य मात्र को उन्नति की इच्छा होती है। मुझे भी रही है। पर इसका उपाय किन्हीं बड़ों की सहायता से प्राप्त करना या साधन इकट्ठे करना समझता रहा हूँ। इसी के लिए निरन्तर प्रयत्न भी किया है। इतने पर भी सफलता नगण्य मिली। ब्रह्म वर्चस् सत्र में नई दिशा धारा मिली। अवरोध भीतर हैं, उन्हें हटाया जाय। वरदान बाहर हैं उन्हें पाया जाय। यह बात पहले कभी सुनी, सोची थी, इस बार यह दृढ़ मान्यता ही नहीं बनी, उसके लिए अद्भुत साहस भी पैदा हो गया। अब किसी की सहायता माँग कर अस्थायी लाभ पाने की जगह आत्म सुधार एवं विकास से स्थायी उन्नति के लिए स्वयं से लड़ पड़ा हूँ। इस प्रयास से उल्लेखनीय सफलता मिल रही है ओर उसी अनुपात से उन्नति की परिस्थितियाँ भी रही हैं। आत्म सुधार के लाभ तो पहले भी विदित थे, पर उसको प्रबल प्रेरणा ब्रह्म वर्चस् सत्र से ही मिली।

-कृष्णाकुमार कुलश्रेष्ठ, बुलन्दशहर


ब्रह्म वर्चस् आरण्यक के लिए (kahani)

ब्रह्म वर्चस् आरण्यक के लिए बिलकुल गंगा तट पर एक सुन्दर जमीन खरीद ली गई है। पानी के लिए इन दिनों उस भूमि पर कुँआ बन रहा है। बसन्त पर्व से इमारत बनने का कार्य आरम्भ हो जाएगा आशा है गायत्री जयन्ती या गुरुपूर्णिमा से उसमें साधकों के निवास करने जितना स्थान बन जाएगा निर्माण कार्य के लिए परिजनों के अनुदान आने भी आरम्भ हो गये है।

अभी दस-इस दिन के ब्रह्म वर्चस् सत्र शान्तिकुञ्ज में ही चलेंगे। इनमें (1) स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरों के परिष्कार (2) अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोशों के जागरण (3) कुण्डलिनी जागरण की त्रिविध प्रशिक्षण प्रक्रिया चल रही है। इनमें प्रकाश प्रशिक्षण के अतिरिक्त साधनात्मक प्रेरणा की प्रमुखता रखी गई है। यह सत्र बहुत ही उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं

ब्रह्म वर्चस् पत्र में दी जाने वाली शिक्षा एक कराई जाने वाली साधना का विज्ञान, स्वरूप, लक्ष्य एवं समझाने के लिए मार्च 77 की अखण्ड ज्योति का अंग एक विशेषांक के रूप में होगा। उस अति महत्त्वपूर्ण संग्रहणीय एवं अभिनव पाठ्य-सामग्री को विज्ञान ओर अध्यात्म का समन्वय प्रयास समझा जा सकता है। पाठक उसकी प्रतीक्षा करें।


सब कुछ नहीं-उपयोगी और सीमित ही

प्रकृति अनन्त है। उसके अन्तराल में जो कुछ भरा पड़ा है वह सबका सब मनुष्य के लिए उपयोगी एवं आवश्यक ही नहीं है। उसमें विनाशकारी और पतनोन्मुख तत्त्व भी प्रचुर परिमाण में विद्यमान् है। रोग कीटाणुओं को ही लें, उनकी जातियाँ और क्षमताएँ विचित्र हैं, पर उन्हें समेटने में नहीं, वरन् बचने और भगाने में ही बुद्धिमत्ता है। मक्खी, मच्छर, पिस्सू, खटमल, जुए, उदरस्थ कृमि आदि सहोदरों की तरह निवास करते हैं, पर उन्हें पालने की चेष्टा कोई नहीं करता। ठीक इसी प्रकार ज्ञान और विज्ञान के अनेक क्षेत्र ऐसे हैं जिन्हें उपयोगिता की कसौटी पर बिना कसे ही जो मिले उसे पकड़ने की नीति अपनाई तो उससे हानि ही होगी।

यह संसार केवल मनुष्य के लिए ही नहीं है, इसकी साधन सामग्री ऐसी भी है जो मनुष्य विरोधी तत्त्वों के लिए काम की है। उत्थान के साधन बहुत हैं, हमें ओर संकट उत्पन्न करने वाले तत्त्व भी कम नहीं हैं। हमें उत्पादन एवं संकलन का श्रम करने से पूर्व औचित्य का सर्व प्रथम ध्यान रखना चाहिए। अन्यथा किये गये प्रयत्न आत्मघात की तरह महा विनाशक सिद्ध होंगे।

प्रकृति का जो अंश अपने लिए उपयोगी है, उसी की वैज्ञानिक खोज की जाय और उपयोगी से ही सन्तुष्ट रहा जाय, तो यह बुद्धिमत्ता पूर्ण हैं। इन दिनों असीम शक्ति लिप्सा ने ऐसे शोध क्षेत्र में दिलचस्पी पैदा कर दी जिसके किये गये प्रयत्न निकट भविष्य में अब तक की मानवी प्रगति का सर्वनाश कर सकते हैं।

ऐसी शोधों में एक है ब्रह्माण्ड का एक अंश खोया हुआ माना जाना और उसकी तलाश करना। समझा जाता है कि इस निखिल ब्रह्माण्ड में जितना कुछ पदार्थ संसार देखता है, वह सृष्टि के आरम्भ में जो कुछ था उसका एक अंश ही है। लगभग आधा अंश उसमें से गायब है? इसका क्या हुआ? यह कहाँ चला गया? इसका अता-पता क्यों नहीं लगता? यदि यह कहीं छिपा है तो वहाँ चुप-चाप बैठा है या कुछ कर रहा है? यह प्रश्न आज के नवीनतम और उच्चस्तरीय खोज-बीन का मूर्धन्य प्रश्न बना हुआ है। उस सम्बन्ध में कुछ दिन पूर्व तक सम्भावना ही व्यक्ति की जाती थी और अनुमान भर लगाया जाता था कि एक अविज्ञात दुनिया हमारे ही इर्द-गिर्द कहीं छिपी है। उसकी क्षमता और चाल प्रस्तुत प्रचलन से उलटी है। अब वह कल्पना अनुसंधानों के आधार पर तथ्य बनकर सामने आ गई है और यह स्वीकार कर लिया गया है कि एक ऐसे अविज्ञात का अस्तित्व इस संसार में मौजूद है जो विज्ञान के न केवल समतुल्य है, वरन् अधिक शक्तिशाली भी है। इतने पर भी इसकी खोज में फूँक-फूँक कर कदम बढ़ाया जा रहा है क्योंकि आशंका यह भी है कि यदि यह आग्नेय सम्पदा उभर पड़ी और नियन्त्रण से बाहर हो गई तो फिर न केवल मनुष्य को वरन् सम्पूर्ण प्राणियों को महा विनाश का सामना करना पड़ेगा। इतना ही नहीं इस ब्रह्माण्ड की प्रचलित गतिविधियाँ भी उलट सकती हैं। आधुनिक सृष्टि का एक अंश विलुप्त-सा है, उसका पता नहीं लग पा रहा है, जिससे कि सृष्टि-सम्बन्धी जानकारी में एक बड़ी अपूर्णता विद्यमान् थी।

पिछले दिनों भारतीय वैज्ञानिक संस्थान, बेंगलोर के तीन नक्षत्र विज्ञानियों प्रो० के० पी० सिन्हा, डा० सी० शिवराम और प्रो० ई० सी० जी० सुदर्शन ने इस दिशा में नई खोज की।

सृष्टि-विज्ञानी यह कहते रहें हैं कि एक नक्षत्र पिण्ड से दूसरे को पृथक् करने वाला जो ‘शून्य’ है, वह वस्तुतः रिक्त नहीं है। अपितु उसी में यह अज्ञात सृष्टि-अंश समाया हुआ है।

19 वीं सदी में यह स्थापना की गई थी कि इस ‘शून्य’ में ‘ईथर’ नामक तत्त्व विद्यमान् है। यह ‘ईथर’ प्रकाश के संचरण के लिए वैसा ही अनिवार्य है, जिस प्रकार कि ध्वनि के लिए वायु।

किन्तु आइन्स्टीन के बाद से ‘ईथर’ का यह सिद्धान्त अस्वीकृत किया जा चुका था। अब इन तीन भारतीय वैज्ञानिकों ने अपनी खोज के अनुसार यह प्रतिपादित किया है कि ईथर का अस्तित्व वास्तविक है। यह ईथर, इलेक्ट्रान और प्रोटान जैसे कणों तथा उनके प्रतिकणों का समुद्र है। इसी समुद्र में सृष्टि का वह “खोया हुआ” अंश छिपा हुआ है। यह अंश उपरोक्त कणों तथा प्रतिकणों के ही रूप हैं। ये कण तथा प्रतिकण जोड़े में इस समुद्र में तैरते रहते हैं और कण-प्रतिकण में इस संयुक्त प्रभाव से यह समुद्र अदृश्य द्रव’ बन गया है, जिसे विज्ञान में ‘सुपरफल्यूडिटी’ की स्थिति कहते हैं। यह ‘सुपरफल्यूडिटी’ इलेक्ट्रान की ही तरह के एक अन्य प्रकार के कणों की विशेषता है, जिन्हें ‘फर्मियान्स’ कहते हैं। ईथर का यह समुद्र जिन कणों तथा लक्षणों से भरपूर है, वे सृष्टि विकास के पुष्टि करते हैं, जिसका प्रतिपादन प्रख्यात भारतीय वैज्ञानिक डा० जयन्त विष्णु नार्लीकर एवं अमरीकी वैज्ञानिक श्री फ्रेड हायल ने किया है।

खोये हुए पदार्थ का अता-पता लगाने के सन्दर्भ में 15 वर्ष पूर्व कुछ वैज्ञानिकों में इस धारणा को बल मिला कि हमारे प्रत्येक कण का प्रतिकण, परमाणु का प्रतिपादित हुआ कि प्रकृति में सर्व व्यापी सन्तुलन है। इस सर्व व्यापी सन्तुलन के आधार पर कहा जा सकता है कि मानव-ब्रह्माण्ड में काल की गति अतीत से वर्तमान तथा वर्तमान से अतीत की ओर दौड़ रहा होगा। यहाँ प्रति पिण्ड, प्रति आकाशगंगाएँ, प्रति निहारिका यूथ, प्रतिप्राणी, प्रतिजी तथा प्रतिमानव विद्यमान् होगे। वे हमारे लिए वर्तमान में अनुभूतिगम्य नहीं हो सकते हैं।

कैंब्रिज विश्व-विद्यालय के प्राध्यापक डिराक ने इंग्लैंड की रायल सोसाइटी के सामने प्रस्तुत अपने शोष प्रबन्ध में आइन्स्टीन के सापेक्षता सिद्धान्त और क्वान्टम भौतिकी का हवाला देते हुए सिद्ध किया था कि जिस तरह क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, । उस समय तो इस प्रतिपादन पर विस्मय मात्र ही व्यक्त किया गया, था, पर अब प्रति न्यूट्रान, आदि के अस्तित्व की जानकारियाँ मिली हैं। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने, जिनका नेतृत्व डा० सैम्युडालठिंग तथा डा० लियन एम॰ लेडरमैन कर रहे थे, प्रतिड्यूटिकियम की खोज की। प्रति हीलियम, प्रति न्यूरेनियम आदि की सम्भावना भी स्पष्टतर हो रही है। अमरीका की ब्रूक हेवेन प्रयोगशाला के अन्वेषी वैज्ञानिक इस सम्भावना के प्रति बहुत ही उत्साही हैं कि प्रति पदार्थ से आधुनिक भौतिक में क्रान्तिकारी परिवर्तन आयेगा। वैज्ञानिकों की प्रारम्भ में उद्धृत नई खोज से यह स्पष्ट होता है कि प्रतिविश्व ईथर का ही अंश है। वैज्ञानिक इस प्रतिविश्व की यात्रा हेतु सम्भव उपकरणों पर गम्भीरतापूर्वक विचार कर रहे है।

वैज्ञानिकों की परिकल्पना है कि प्रति परमाणुओं और प्रति ब्रह्माण्ड में काल की गति भविष्य से भूत की ओर है। साथ ही वहाँ प्रकाश का अवशोषण होता है। जबकि हमारे ब्रह्माण्ड में प्रकाश का विकिरण या उत्सर्जन होता है। जबकि हमारे ब्रह्माण्ड में प्रकाश का विकिरण या उत्सर्जन होता है।

प्रति-विश्व की यात्रा के लिए प्रति-केमेसान्-राकेट बनाये जायेंगे। अभी हमारे इस ब्रह्माण्ड में यात्रा के लिए फोटान-राकेटों की योजना बन रही है। फोटोन करणों की गति प्रकाश वेग के तुल्य रहती है। अतः उन पर काल-गति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता यानी अतीत वर्तमान और भविष्य में फोटो कणों के लिए कोई अन्तर नहीं है। फोटोन राकेटों पर सवार होने पर अन्तरिक्ष-यात्रा करते समय-समय का कोई व्यवधान ही नहीं आयेगा।

इसी तरह प्रति-केमेसान-राकेटों पर सवार होने पर हम प्रतिविश्व में पहुँच जायेंगे, जहाँ समय भविष्य से भूत की ओर भाग रहा होगा, अतः मृत्यु का कोई भय नहीं रहेगा।

केमेसान तथा प्रति-केमेसान कणों की खोज हो चुकी है। केमेसान कणों की गति प्रकाश से थोड़ी कम होती है। प्रतिकेमेसानों की भी गति वैसी ही होती है, पर उनमें समय का प्रवाह भविष्य से वर्तमान और वर्तमान से अतीत की और होता है। केमेसान तथा प्रतिकेमेसान कणों की एक विशेषता यह है कि वे विशेष परिस्थितियों में एक दूसरे में रूपांतरित होने की क्षमता रखते हैं। अतः कल्पना यह है कि इनसे बने वाहनों में यात्रा करते समय मनुष्य इच्छानुसार दृश्य या अदृश्य हो जाएगा तथा फिर इसका विपरीत भी हो सकेगा।

वैज्ञानिकों की एक नई खोज यह भी है कि शरीर में द्रव्यों के साथ प्रतिद्रव्य भी है। उनका अन्योऽन्याश्रित सम्बन्ध, परस्पर प्रतिक्रिया लेने पर, बिना किसी वाहन या कैप्सूल में बैठे ही मनुष्य शरीर अदृश्य हो सकता है। न्यूट्रिनों, केमेसानों, एण्टी केमेसानों तथा अन्य अद्भुत कणों, ब्रह्माण्डीय विकिरणों और ईथर का पूरा-पूरा भेद खुलने पर ही मानव-शरीर के लिए सूक्ष्म अदृश्य रूप धारण करना सरल हो सकेगा।

इस परिकल्पना पर विचार करते-करते हुए वैज्ञानिकों के सम्मुख एक नई शंका आ उपस्थित हुई है। यह मान लिया गया है कि अदृश्य सूक्ष्म शरीरधारी प्रति मानव हमारे शरीर में घुसता हुआ उसके आर-पार जा सकता है। साइग्रेस और विगों नीहारिकाओं से जो सन्देश धरती पर आ रहें हैं, उनसे ज्ञात होता है कि उन क्षेत्रों में पदार्थ और प्रति पदार्थ के बीच देवासुर संग्राम जैसा रोमांचक युद्ध छिड़ा हुआ है। तब क्या यह भी हो सकता है कि प्रति मानव हमारे शरीर में घुसकर अभी भी आर-पार चले जाते होगे और हम जान भी न पाते होंगे? यहाँ पर आकर वैज्ञानिक अभी कोई उत्तर ढूँढ़ नहीं पा रहें हैं

प्रतिविश्व में हमारे शरीर के परमाणु प्रति परमाणु के रूप में क्रियाशील हो चुकेंगे, तभी तो हम वहाँ पहुँच और ठहर पायेंगे अब आशंका यह है कि वे प्रति परमाणु जो भविष्य से भूत की और भाग रहें होंगे, हमारे अस्तित्व को सुरक्षित ही रहने देंगे, इसकी तो सम्भावना नहीं ही माननी चाहिए। हम मृत्यु से जन्म की ओर भाग रहे होगे, अभी इतनी ही कल्पना वैज्ञानिक कर पा रहे है। पर जन्म से पूर्वजन्म, पूर्वयोनि पूर्वदशा और वनस्पति, जड़-जगत (प्रतिद्रव्य) के रूप में नहीं पहुँच जाएँगे, इसका क्या ठिकाना है?

शक्ति के अनेक स्त्रोत हमारे हाथ लग चुके है। यह भी स्पष्ट है कि प्रकृति के अन्तराल में अभी ज्ञात से असंख्य गुनी अधिक अविज्ञात शक्तियाँ सन्निहित हैं। मानवी प्रयासों में वे संभावनाएँ विद्यमान् है, जिनके आधार पर उनमें से भी बहुत कुछ और सब कुछ पाया जा सकता है। अग्रगामिता सदा ही सराही जानी चाहिए। पर प्रगति की इस तत्परता और तन्मयता का पूरक तत्त्व कर्तव्य निर्वाह और उत्तरदायित्वों का पालन भी भुलाया नहीं जाना चाहिए।

आज पदार्थ विज्ञान की धूम है और प्रत्यक्ष को ही मान्यता मिल रही है, पर प्राचीनकाल के तत्त्वदर्शियों ने इन्द्रिय बोध से आगे की चेतना को भी तथ्य माना था और उस सन्दर्भ में अनेक अनुसन्धान किये थे। खोये हुए ब्रह्माण्ड का प्रति पदार्थ भी उनके ध्यान में था और उसका सीमित उपयोग करने की भी उन्होंने चेष्टा की थी। योग शास्त्र के दक्षिण और वाम दो मार्ग प्रसिद्ध है। दक्षिण मार्गी साधनाएँ वे है जो प्रस्तुत प्राणियों, पदार्थों एवं परिस्थितियों को परिष्कृत करते हुए उन्हें जीवन विकास के लिए प्रयोग करने का पथ प्रशस्त करती हैं वाममार्गी साधनाएँ वे है जिनकी विज्ञान और विधान का परिचय करने के लिए तन्त्र विज्ञान की रचना की है। इसमें विघातक तत्त्व उभरते हैं। कहना न होगा हक संसाधनों की अभिवर्धन की तरह ही अवांछनीयताओं का उन्मूलन भी आवश्यक है। वाममार्गी तन्त्र साधनाओं द्वारा जो उन्मूलन परम कार्य होते थे उनके मूल में प्रकृति का वह खोया पदार्थ की संज्ञा दी गई है। कार्य कुछ भी क्यों न हो-कदम किसी भी दिशा में क्यों न बढ़े, पर उसमें औचित्य और उपयोगिता का समुचित ध्यान रखा ही जाना चाहिए।


अपनों से अपनी बात - शान्तिकुञ्ज में महिला सत्रों की व्यवस्था

शान्तिकुञ्ज की सत्र-शिक्षण व्यवस्था में एक नया कदम यह जोड़ा गया है कि पुरुष शिक्षण के साथ-साथ महिला शिक्षण के सत्र भी उसी अवधि के साथ-साथ चला करेंगे

दस दिवसीय साधना सत्रों के साथ उतने ही समय के महिला सत्र चला करेंगे वानप्रस्थों के एक मास की शिक्षा के साथ साथ भी उतने ही समय का महिला सत्र चलेगा। दोनों की शिक्षण प्रक्रिया अलग-अलग रहेगी। जप, हवन, साधना, एवं गुरुदेव के प्रवचनों में तो दोनों ही वर्ग समान रूप से सम्मिलित रहेंगे किन्तु शोध शिक्षा में पृथकता रहा करेगी।

महिलाओं का कार्य प्रधानतया परिवार है। उन्हें अपने व्यक्तित्व एवं परिवार को इस प्रकार ढालना चाहिए ताकि वे गृह-लक्ष्मी की भूमिका निभा सके और परिवार में स्वर्गीय वातावरण उत्पन्न कर सकें। साथ ही महिला जागृति अभियान में भी प्रत्येक भावनाशील नारी को किसी न किसी रूप में सम्मिलित रहने तथा योगदान करने की स्थिति में रहना चाहिए। यह दोनों कार्य एक साथ बड़ी सरलता के साथ सम्पन्न होते रह सकते हैं। यह सब किस प्रकार सम्भव है? इस संदर्भ में क्या जानना और क्या करना आवश्यक है। इसी की शिक्षा इन महिला सत्रों में रहा करेगी। समय के अनुपात से दस दिवसीय प्रशिक्षण में स्वल्प और एक मास में अधिक शिक्षा हो सकने की बात तो स्पष्ट है ही।

महिला जागरण अपने युग की सबसे महान् और प्रभावोत्पादक समस्या है। इसके समाधान में प्रबुद्ध नारियों की ही प्रधान भूमिका होगी। अस्तु उन्हें आगे लाना आवश्यक है। महिला पत्रिका, नारी जागरण साहित्य, कन्या सत्र, महिला सम्मेलन आदि उपायों से भी यह कार्य निरन्तर अग्रसर हो रहा है। इस प्रयास में महिला सत्रों की, अनवरत शृंखला की एक नई प्रक्रिया का समावेश किया गया हैं। स्वल्प समय में गृह-लक्ष्मी निर्माण तथा महिला जागरण की उभय-पक्षीय प्रक्रिया का समुचित प्रशिक्षण कठिन है तो भी प्रयत्न यह किया गया है कि इस अल्प समय में हो प्रतिभावान महिलाएँ आवश्यक प्रकाश एवं ऐसा उपयोगी मार्ग दर्शन प्राप्त कर सकें जिसके सहारे उभर-पक्षीय गतिविधियों को अपने जीवन में उद्भव रहने तथा दूसरों को इस दिशा में बढ़ा सकने की आवश्यक क्षमता उन्हें उपलब्ध हो जाय।

महिला जागरण अपने युग की सबसे महान् और प्रभावोत्पादक समस्या है। इसके समाधान में प्रबुद्ध नारियों की ही प्रधान भूमिका होगी। अस्तु उन्हें आगे लाना आवश्यक है। महिला पत्रिका, नारी जागरण साहित्य, कन्या सत्र, महिला सम्मेलन आदि उपायों से भी यह कार्य निरन्तर अग्रसर हो रहा है। इस प्रयास में महिला सत्रों की, अनवरत शृंखला की एक नई प्रक्रिया का समावेश किया गया हैं। स्वल्प समय में गृह-लक्ष्मी निर्माण तथा महिला जागरण की उभय-पक्षीय प्रक्रिया का समुचित प्रशिक्षण कठिन है तो भी प्रयत्न यह किया गया है कि इस अल्प समय में हो प्रतिभावान महिलाएँ आवश्यक प्रकाश एवं ऐसा उपयोगी मार्ग दर्शन प्राप्त कर सकें जिसके सहारे उभर-पक्षीय गतिविधियों को अपने जीवन में उद्भव रहने तथा दूसरों को इस दिशा में बढ़ा सकने की आवश्यक क्षमता उन्हें उपलब्ध हो जाय।

महिला जागरण अभियान को अग्रगामी बनाने के लिए अपने घरों की संपर्क क्षेत्र की ऐसी महिलाएँ शान्तिकुञ्ज के इन सत्र शिविरों में लाने का प्रयत्न किया जाना चाहिए जिनमें कुछ बन सकने और कर सकने की आवश्यक प्रतिभा पहले से ही मौजूद है। सड़े-गले व्यक्तित्व कूड़े करकट की तरह लाकर यहाँ गन्दगी बढ़ाने के लिए यह आमन्त्रण नहीं है, इस तथ्य को भली-भाँति ध्यान में रखा जाय तभी इस नई महिला सत्र-व्यवस्था की उद्देश्य पूर्ति हो सकेगी।

जिन्हें साधना सत्रों एवं वानप्रस्थ सत्रों में आने की स्वीकृति मिलें वे अपने साथ महिला प्रशिक्षण के लिए ऐसी महिलाओं को लाने की भी चेष्टा करें जो शिक्षण के लिए तथा प्रतिभावान हो। स्मरण रहे अशिक्षित, वयोवृद्ध, झगड़ालू, रोगी तथा बाल-बच्चे लेकर आने वाली महिलाओं को इन सत्रों में प्रवेश न मिल सकेगा। उन्हें लाकर यहाँ की व्यवस्था में गड़बड़ी उत्पन्न नहीं करनी चाहिये

सत्र की स्वीकृति प्राप्त पुरुष जिन महिलाओं को साथ लाना चाहें। उन्हें उपरोक्त शर्तें पूरी करने वाली महिलाओं को साथ लाने की छूट तो दी गई है, पर इसके लिए पहले से ही नाम नोट करा देने का नियम रखा गया है ताकि यहाँ उतने स्थान की पहले से ही व्यवस्था रखी जा सके। सर्वविदित है कि यहाँ ठहरने का स्थान सीमित होने के कारण स्वीकृति पाने पर ही शिक्षार्थी के आने का नियम चलता है।


हमारा संकल्प


हमारा संकल्प (kavita)

हर प्यासे को जल, हर दुखिया को स्नेह-रस-धारा-पहुँचाये बिन चैन न पायें, यह संकल्प हमारा॥

आतप से तापित धरती के लिए बने हम पावस।

कलामयी पूर्णिमा बने, मटें जड़-अज्ञ अमावस॥

चमक बनकर सूर्य-भेंट दें जगती का अँधियारा।

यह संकल्प हमारा॥

अंकुर-अंकुर के हित, पोषक रस बनकर हम सरसें।

बने स्नेह निझर हम, लोग न सहृदय को तरसें॥

हृदय-हृदय में फैलादें, शुचि प्यार भरा उजियारा।

यह संकल्प हमारा॥

अंधे की लाठी गूँगे की वाणी हम बन जाये।

शक्ति हीन का कर थामें थकितों के कारण दबाएँ॥

आशा से हमको देखे, प्रत्येक श्रमित-पथ-हारा-यह संकल्प हमारा।

मरुथल के सूने आँगन में, सुरसरि हम लहरा दे।

सूख रहे मानव तल में श्रद्धा की धारा बहा दें॥

अश्रु कहीं भी बहे-सुखाया जाय हमारे द्वारा।

यह संकल्प हमारा ॥

*समाप्त*