जीवन क्षेत्र को ज्योतिर्मय बनाने वाला आत्म प्रकाश

रात्रि में ’टार्च’ का प्रकाश जितने क्षेत्र पर पड़ता है, उतना चमकने लगता है। जहाँ वह रोशनी नहीं पड़ती वह प्रकाश क्षेत्र के अति समीप होते हुए भी अंधकारमय बना रहता है। अँधेरे में भी अनेक वस्तुएँ रखी होती है, पर प्रकाश क्षेत्र की तरह दृष्टिगोचर नहीं होती। प्रकाश क्षेत्र की वस्तुओं के बारे में सब कुछ अविज्ञात एवं रहस्यमय ही बना रहता है। रात्रि के अँधेरे में अपरिचित क्षेत्र डरावने लगते हैं जब कि प्रकाश क्षेत्र में निर्भयता और निश्चिन्ततापूर्वक कही भी जाया जा सकता है। प्रकाश के कारण दिन में सभी प्रकार के कार्य होते रहते हैं, पर रात के अँधेरे में सोते रहने या निरर्थक बैठे रहने की ही बात बनती है। तेज रोशनी में कुछ करना तो एक अपवाद है, उसमें भी श्रेय तो प्रकाश का ही माना जाएगा।

तत्त्व ज्ञान की दृष्टि से प्रकाश का अर्थ है-प्रखर आत्म चेतना। उसका ‘टार्च’ जहाँ भी अपनी रोशनी फेंकता है वही सुन्दर और प्रिय लगने लगता है। क्या सुन्दर और क्या कुरूप है? इसका निर्धारण नहीं हो सकता। अपनी दृष्टि और पसन्दगी के आधार पर ही सुन्दरता-असुन्दरता का निर्णय होता है। कौन प्रिय, कौन अप्रिय है? यह भी अपनी ही मान्यता पर निर्भर है। आज जो प्रिय है, वह कल अप्रिय लगने लग सकता है। उसका शरीर और मन तो वैसा ही है, मात्र उसके व्यवहार की प्रतिक्रिया ने ही मित्रता को उपेक्षा या शत्रुता में बदल दिया। इस परिवर्तन में सामने वाले का व्यक्तित्व नहीं अपनी मान्यताओं की हेरा-फेरी ही है। भले ही वह किसी भी कारण उत्पन्न हुई हो।

लोक-व्यवहार में-सांसारिक परिस्थितियों में जो खिन्नता एवं प्रसन्नता उभरती है उसमें जड़ पदार्थों की उतनी भूमिका नहीं जितनी आत्म चेतना से उत्पन्न होते रहने वाले प्रकाश की है। वह पाषाण पर जा जमे तो उसमें से भगवान प्रकट हो सकते हैं। सामान्य परिस्थितियों में ही स्वर्गीय अनुभूतियाँ हो सकती है। वस्तुतः आत्म प्रकाश की गरिमा ज्योतिर्मय सूर्य से किसी भी प्रकार कम नहीं है।


आत्मबल ही सर्वतोमुखी समर्थता का मूल है

शक्ति के बल पर ही प्रयत्नपूर्वक साधन जुटाये जाते हैं और उनके सहारे सुख सुविधा पाने की अभिलाषा पूर्ण होती है। सामर्थ्य और पुरुषार्थ के अभाव में सुखी सम्पन्न बनने की आकांक्षा पूरी कर सकना कहाँ सम्भव होता है?

शरीर बल से श्रम करके कमाने, खाने और पचाने का लाभ मिलता है। बुद्धि बल से अधिक महत्त्व के उत्तरदायित्व सम्भालना और श्रेय साधन पा सकना बन पड़ता है। धन बल के सहारे ब्याज कमाने से लेकर व्यवसाय चलाने तक की सुविधाएँ मिलती है। समूह बल का प्रभाव हर क्षेत्र में देखा जा सकता है। संघ बल के आधार पर साधन हीन लोग भी मिल जुल कर बहुत कुछ कर गुजरते हैं। इसी प्रकार साधन बल के आधार पर अकुशल व्यक्ति भी बुद्धिमानों और अनुभवियों से भी अधिक सफलता प्राप्त करते देखे जाते हैं। यह सारे चमत्कार शक्ति के हैं। शक्ति की महत्ता समझी भी जाती है और हर क्षेत्र में उसके लिए प्रयत्न भी चलता है।

आश्चर्य यह है कि साधनों का महत्त्व मानने और उन्हें प्राप्त करने की बात भौतिक स्तर तक ही सीमित रखी जाती है और मात्र बलिष्ठता, शिक्षा, कुशलता, सम्पन्नता जैसी क्षमताएँ उत्पन्न करना ही पर्याप्त समझा जाता है। जबकि वास्तविक शक्ति को स्रोत आत्मबल में सन्निहित है।

मनुष्य की मूलसत्ता चेतन एवं आत्मिक है। उसी के तत्त्वावधान में साधनों का उपयोग सम्भव होता है। यदि अंतःप्रेरणा की प्रखरता में न्यूनता हो तो फिर उपलब्ध साधनों का समुचित सदुपयोग ही न हो सकेगा आन्तरिक दुर्बलता अन्यमनस्कता और निष्क्रियता बन कर छाई रहती है ऐसा व्यक्ति बहुत कुछ कर सकने योग्य होते हुए भी कुछ कर नहीं पाता। आलस्य और प्रमाद में ही उनकी बहुमूल्य जीवन सम्पदा गल जाती है। आन्तरिक प्रखरता के प्रभाव से ही शरीर में तत्परता एवं मन में जागरूकता उत्पन्न होती है। अपंग व्यक्तियों द्वारा आश्चर्यजनक पुरुषार्थ करने के अनेक प्रसंग सामने आते रहते हैं, पर निराश और निढाल व्यक्ति तो साधन सम्पन्न होते हुए भी अर्धमृतकों एवं मूर्छितों जैसी दयनीय स्थिति में पड़े हुए मौत के दिन पूरे करते हैं।

पैनी तलवार और मजबूत हाथ होते हुए भी साहस के अभाव में उसका प्रहार सम्भव नहीं हो सकता। अवसर होते हुए भी डरपोक मनुष्य लाभ उठाने के लिए कदम नहीं बढ़ा पाते। उपयुक्त योजनाओं को भी कार्य रूप में परिणित करने में तरह तरह की आशंकाएँ उठा करती हैं और अनिश्चित मनःस्थिति का असमंजस छाया रहता है। अनिर्णीत उथल पुथल चलती रहती है। इस स्थिति से उबरने के लिए मनोबल चाहिए। साहसी ही महत्त्वपूर्ण निर्णय कर सकने और प्राणप्रण से जुटने की तत्परता दिखा सकने में समर्थ होते हैं। सफलता ऐसे ही लोगों के कदम चूमती रही है।

उत्कृष्ट आदर्शवादिता के क्षेत्र में बढ़ चलने और महामानव स्तर की गरिमा प्राप्त करने के लिए जिस साहस की आवश्यकता होती है उसे आत्मबल कहते हैं। यही शक्ति शरीर में 'ओजस्' मनःक्षेत्र में ‘तेजस’ और भावना संदर्भ में ब्रह्मवर्चस् कहलाती है। इसी को पराक्रम संकल्प एवं श्रद्धा के नाम से जाना जाता है। शरीर में बलिष्ठता, मन में बुद्धिमत्ता और अन्तःकरण में सज्जनता के रूप में इसी सामर्थ्य को प्रस्फुटित होते देखा जा सकता है।

आत्मबल के अभाव में मनुष्य संशयी, संकोची और भयभीत बना रहेगा। जिसे अपने ऊपर विश्वास नहीं वह उज्ज्वल भविष्य पर भी विश्वास न कर सकेगा। संचित कुसंस्कारों का उन्मूलन और स्वभाव में सत्प्रवृत्तियों का संस्थापन ही ऐसा व्यक्तित्व विनिर्मित करता है जो अवरोधों को पैरों तले कुचलता हुआ प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँच सकने में सफल हो सके। आत्म-शोधन और आत्म निर्माण का कार्य अति कठिन है। पर जो उसे कर सके उसके लिए प्रगति के दोनों द्वार खुल जाते हैं। भौतिक हो या आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों की सफलता ‘आत्म बल पर निर्भर है। उसका सम्पादन करके ही हम सच्चे अर्थों में समर्थ, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बन सकते हैं।


ईश्वर की दिव्य सत्ता जो श्रद्धा करने योग्य है।

विद्युत एक अदृश्य तत्त्व है। किन्तु अन्धकार दूर करने के लिए एक विशेष प्रक्रिया अपनानी पड़ती है और उस अदृश्य विद्युत का प्रभाव दृश्य प्रकाश के रूप में परिणत हो जाता है। चुम्बकत्व यों एक ऐसी शक्ति है जिसे देखा नहीं जा सकता किन्तु उसे ही एक लोहे की सुई में पिरो दिया जाता है तो वही दिशा बोध कराने वाली कुतुबनुमा बन जाती है। परमात्मा एक अदृश्य तत्त्व है किन्तु अन्तः करण की श्रद्धा और मन का विश्वास एकाकार होते हैं तो उस सत्ता के प्रभाव पुण्यफल देखते ही बनते हैं।

कौरवों की सभा में द्रौपदी का चीरहरण किया जा रहा था, वह अबला असहाय खड़ी थी, मनुष्य की नहीं ईश्वर की सहायता प्राप्त हुई और उसकी लाज बच गई। दमयन्ती बीहड़ वन में अकेली थी, सहायक कोई नहीं। उसकी नेत्र ज्योति में से भगवान प्रकट हुए और व्याध जलकर भस्म हो गया। दमयन्ती पर कोई आँच नहीं आई। प्रहलाद के लिये उसका पिता ही जान का ग्राहक बना बैठा था, बच कर कहाँ जाय? खम्भे में से नृसिंह भगवान प्रकट हुए और प्रहलाद की रक्षा हुई। घर से निकाले हुए पाण्डवों की सहायता करने, उनके घोड़े जोतने भगवान स्वयं आये। नरसी महता की सम्मान रक्षा भगवान ने अपनी सम्मान रक्षा की तरह ही मानी। ग्राह के मुख से गज के बन्धन छुड़ाने के लिये प्रभु नंगे पैरों दौड़े आये थे।

मीरा को विष का प्याला भेज गया और साँपों का पिटारा, पर वह मरी नहीं। न जाने कौन उनके हलाहल को चूस गया और मीरा जीवित बची रही। गाँधी को अनेक सहयोगी मिले और वे दुर्दान्त शक्ति से निहत्थे लड़ कर जीते। भगीरथ की तपस्या से गड़ा द्रवित हुई और धरती पर बहने के लिये तैयार हो गई। शिवजी सहयोग देने के लिये आये गड़ा को जटाओं में धारण किया, भगीरथ की साध पूरी हुई। दुर्वासा के शाप से संत्रस्त राजा अम्बरीष की सहायता करने भगवान का चक्र सुदर्शन स्वयं दौड़ा आया था। समुद्र से टिटहरी के अण्डे वापिस दिलाने में सहायता करने के लिये भगवान अगस्त्य मुनि बनकर आये थे। नल और नील ने समुद्र पर पुल बाँधने का असम्भव दीखने वाला काम सम्भव कर दिया था। हनुमान को समुद्र छलाँगने की शक्ति भी किसी अदृश्य शक्ति से ही उपलब्ध हुई थी।

यह उदाहरण प्राचीन पौराणिक गाथाएँ कहकर झुठलाये जा सकते हैं और उनकी सत्यता से इनकार किया जा सकता है। हमारा देश सदियों से भाव प्रधान और आस्तिक आध्यात्मिक विचारों की जन्मभूमि रहा है अतएव इन घटनाओं को किंवदन्तियों की भी संज्ञा दी जा सकती है। किन्तु सनातन सत्ता तो काल गति और ब्रह्माण्ड से सर्वथा अतीत है जिस तरह वह प्राचीन काल में थी, आज भी है और उसकी अदृश्य सहायताएँ पूर्व से पश्चिम उत्तर से दक्षिण तक आज भी प्राप्त करते रहते हैं। टंग्स्टन तार पर धन व ऋण विद्युत धाराओं के अभिव्यक्त होने की तरह यह ईश्वरीय अनुदान जिन दो धाराओं के सम्मिश्रण से किसी भी काल में प्रकट होते रहते हैं वह है श्रद्धा और विश्वास। यह सत्ताएँ जहाँ कही जब कभी हार्दिक अभिव्यक्ति पाती है परमेश्वर की अदृश्य सहायता वहाँ उभरे बिना नहीं रह सकती। इस तरह के सैकड़ों उदाहरण लेडीवीटर ने अपनी पुस्तक "अनविजिवल हेल्पर्स”(अदृश्य सहायक) पुस्तक में दिये है जिनसे इस युग में भी अतीन्द्रिय सत्ता के अस्तित्व पर विश्वास हुए बिना नहीं रहता और लेडिरुथ मान्ट गुमरी की पुस्तक “सत्य की खोज में” (इन सर्च आफ ट्रुथ) में 20 वीं शताब्दी की सबसे आश्चर्यजनक घटना के रूप में “सराक्यूज की रोती हुई प्रतिमा” (वीपिगं स्टेच्यू आफ सराक्यूज) में दिया है। एक सरल हृदय अपंग किन्तु श्रद्धालु महिला की भाव भरी प्रार्थना से विह्वल होकर उसकी प्लास्टर आफ पेरिस की प्रतिमा की आँखों से आँसू बह निकले। डच विद्वान् फादर ए. सोमर्स ने स्वयं मूर्ति और उसके आँसुओं का परीक्षण करने के बाद उसे विस्तार से समाचार पत्रों में छपाया और एच जोर्गन ने उसका अँगरेजी रूपान्तरण प्रकाशित कराया।

29 मार्च 1953 को कुमारी एण्टोर्निएटा का श्री एँग्लोजेन्यूसी के साथ पाणिग्रहण संस्कार हुआ। इस अवसर पर उपहार की अन्य वस्तुओं में यह छोटी सी प्लास्टर आफ पेरिस की अन्दर से पोली ऊपर एनामिल चढ़ी प्रतिमा भेंट में मिली थी एण्टोर्निएटा को मीरा के गिरधर गोपाल की तरह यह मूर्ति बहुत प्यारी लगी और वह उसकी इष्टदेवी बन गई।

विवाह के बाद एन्टोर्निएटा गर्भवती हुई। गर्भ जैसे जैसे विकसित हुआ वह अत्यधिक दुर्बल होती गई। आँखें धँस गई, मुँह पीला पड़ गया, एक दिन तो मुँह से बोलना और आँख से दिखाई देना भी बंद हो गया। यही नहीं उन्हें मिर्गी के फिट्स भी पड़ने लगे। डाक्टरों ने जाँच करके बताया गर्भ में जहर फैल गया है और लड़की का बचना असम्भव है उस दिन उसे भयंकर दौरा भी पड़ा। दौरा शान्त हुआ उस समय एन्टोर्निएटा अत्यधिक शान्त किन्तु भाव विह्वल थी। भीतर ही भीतर मन व्याकुल था और परमात्मा की गुहार कर रहा था। अन्तः करण से शिकायत उठ रही थी। हे प्रभु ! तू कितना निर्दय है कि अपनी सन्तान को पीड़ित देखकर भी तुझे दुःख नहीं होता। यह भावना उमड़ी ही थी कि मेडेना-उस मूर्ति की आँखों से एकाएक आँसू झर-झर झर उठे। यह दृश्य देखकर सारा वातावरण स्तम्भित हो गया। धीरे धीरे खबर मुहल्ले पड़ोस, नगर और समूचे प्रान्त सराक्यूज तथा अमेरिका में फैल गई। दुनिया भर के अखबारों ने इस अद्भुत घटना का उल्लेख किया। 29 अगस्त से मूर्ति के आँसुओं का निरीक्षण परीक्षण प्रारम्भ हुआ। सर्वप्रथम डा.मारियो मेसीना-जो बाइआ कारसो में रहते थे उन्होंने मूर्ति का भीतर बाहर, ताज हटाकर पूरी तरह निरीक्षण किया। मूर्ति में कहीं कोई नमी नहीं पर आँसू रुकने का नाम ही न लेते थे। जन्यूसो घर से बाहर था। वह घर पहुँचा तो पत्नी की पीड़ा और बदले में मूर्ति का रुदन देखकर दहाड़ मार कर रो उठा। उसी रात पुलिस ने घेरा डाल कर मूर्ति का निरीक्षण किया। अधिकारी गण तक इस घटना से भाव विह्वल हो उठे। किसी की समझ में नहीं आया, मूर्ति में आँसू कहाँ से आ रहे हैं। दूसरे दिन, ”ला सिसीलिआ” दैनिक पत्र के सम्पादक ने स्वयं निरीक्षण कर अपने पत्र में लिखा-आँसू वास्तविक हैं, कहीं कोई छल-छद्म नहीं। परमात्मा की शक्ति विलक्षण है।

श्री मासूमेकी, और 10 पुरोहितों के डेलीगेशन इटालियन क्रिश्चियन लेबर यूनियन के अध्यक्ष प्रोफेसर पावलो अलबानी आदि ने भी तथ्यों की जाँच की और सही पाया। लगातार कई दिनों तक अश्रुपात होते रहने के कारण आश्चर्य और भीड़ एक साथ बढ़ रही थी। समाचार पत्र सात दिन तक इस विस्मयकारी घटना की आँखों देखी खबरें छापते रहे। 1 सितम्बर को एक जाँच आयोग (ट्रिव्यूनल) नियुक्त किया गया जिसके सदस्य थे-(1) जोऐफ ब्रूनो. पी. पी. (२)डा. माइकल कैऐला, डायरेक्टर आफ माइक्राग्रेफिक डिपार्टमेंट (३)डा. फ्रैंक कोटजिया असि डायरेक्टर (4)डा. लूड डी उर्सो।

इसके अतिरिक्त निस सैम्परिसी चीफ कान्स्टेबुल, प्रो. जी. पास्क्विलीनों, डी फ्लोरिडा, डा. ब्रिटनी (केमिस्ट), फैरिगो उम्बर्टो (स्टेट पुलिस के ब्रिगेडियर) तथा प्रेसीडेन्ट आफिस के प्रथम लेफ्टिनेंट कारमेलो रमानो भी थे। पिपेट की सहायता से दोनों आँखों से एक एक सी. सी. आँसू एकत्र किये गये उनका विश्लेषण करने से पता चला कि आँसू वास्तविक है और किसी 3-4 वर्ष के बालक के से ताजे आँसू है पर वह कहाँ से क्यों निसृत हो रहे हैं ? यह कोई नहीं जान सका। स्वयं मूर्तिकार भी विस्मित था। उसकी सैकड़ों मूर्तियाँ बाजार में थी, पर ऐसी अद्भुत घटना का कारण कोई नहीं समझ सका। प्रो. एल. रोजा ने एम. डी. कास्त्रो को इस घटना का विवरण इस प्रकार भेजा-

पू0 श्री एम. डी. कास्त्रो

प्रीस्ट आफ सेन्टिगों डी सूडाड रिकाल स्पेन।

आपकी प्रार्थना पर यह सब लिख रहा हूँ। कमीशन ने आँसू इकट्ठे किये हैं। मूर्ति दो पेंचों से जुड़ी हुई थी। मूर्ति का प्लास्टर बिलकुल रूखा था। आँसुओं का परीक्षण आर्क विशप क्यूरियो द्वारा नियुक्त कमीशन ने किया है। माइक्रो किरणों से देखने पर इन आँसुओं में वह सभी तत्त्व पाये गये है जो तीन वर्ष के बच्चे के आँसुओं में होते हैं यहाँ तक कि क्लोरेटियम के पानी का घोल। प्रोटीन व क्वाटनरी साफ झलक दे रहा था। मेरी पूर्ण जानकारी में मेरे हस्ताक्षर साक्षी हैं-

हस्ताक्षर प्रो. एल. रोज्ञा,

सात दिन तक घटना चक्र चला। बिना किसी चिकित्सा के एण्टोनिपेटा चंगी हो गई पर यह पहेली न सुलझ सकी कि इन आँसुओं का कारण क्या है? अपनी सत्ता को उस परमात्मा के अतिरिक्त कौन समझ सकता है?

सन् 1874 की बात है। इंग्लैण्ड का एक जहाज धर्म प्रचार के सिलसिले में न्यूजीलैण्ड के लिये रवाना हुआ। उसमें 214 यात्री थे। वह विस्के की खाड़ी से बाहर ही निकला था कि जहाज के पेंदे में छेद हो गया। मल्लाहों के पास जो पम्प थे तथा दूसरे साधन थे उन सभी को लगाकर पानी निकालने का भरपूर प्रयत्न किया, पर जितना पानी निकलता था उससे भरने की गति तीन गुनी तेज थी।

निराशा का वातावरण बढ़ता जाता था। जब जहाज डूबने की बात निश्चित हो गई तो कप्तान ने सभी यात्रियों को छोटी लाइफ बोटों में उतर जाने और उन्हें खेकर कहीं किनारे पर जा लगने का आदेश दे दिया। डूबते जहाज में से जो जाने बचाई जा सकती हो, उन्हें ही बचा लिया जाय। अब इसी की तैयारी हो रही थी।

तभी अचानक पम्पों पर काम करने वाले आदमी हर्षातिरेक से चिल्लाने लगे। उन्होंने आवाज लगाई कि जहाज में पानी आना बन्द हो गया। अब डरने की कोई जरूरत नहीं रही। यात्रियों ने चैन की साँस ली और जहाज आगे चल पड़ा। कार्ल्सडाक बन्दरगाह पर उस जहाज की मरम्मत कराई गई तब पता चला कि उस छेद में एक दैत्याकार मछली की पूँछ फँसकर इतनी कस गई थी कि न केवल छेद ही बन्द हुआ वरन् मछली भी घिसटती हुई साथ चली आई।

“अनविजिवल हेर्ल्पस” सी. डब्लू. लेडी बीटर ने लन्दन की हालबर्न स्ट्रीट का एक उदाहरण देते हुए लिखा है- एक बार इस सड़क के कुछ मकानों में भयंकर आग लगी। जिससे दो मकान पूरी तरह जलकर राख हो गये। एक बुढ़िया को छोड़कर शेष सभी को बचा लिया गया किन्तु सामान कुछ भी नहीं बच सका। उस रात जिस दिन आग लगी मकान मलिक के एक मित्र किसी कार्यवश कालचेसटर गये थे वे अपने बच्चे को उन्हीं के पास छोड़ गये थे। मकान पूरी तरह जल गया और सभी लोगों की गणना की गई तब उस बच्चे की याद आयी। उसे अटारी पर सुलाया गया था। उसकी खोज की गई तो यह देखकर सब की आँखें फटी की फटी रह गई कि जिस चारपाई पर बच्चा सोया था उसके चारों ओर एक गोले भाग में आग का रत्ती भर भी प्रभाव नहीं पड़ा था और बच्चा पूरी तरह सुरक्षित इस तरह सो रहा था मानो वह अपनी माँ की ही गोद में सो रहा हो। यह तथ्य देखकर लोगों ने अनुभव किया कि वास्तव में कोई सार्वभौमिक सत्ता है अवश्य जो प्राकृतिक परमाणुओं को भी पूरी तरह अपने नियंत्रण में रख सकती है। इस घटना को देख सुनकर होलिका दहन और उसमें से प्रहलाद को जीवित बचा लेने की, खम्भे को चीर कर नृसिंह भगवान के प्रकट होने की पौराणिक आख्यानों की सत्यता सामने आ जाती है।

नृसिंह पूर्वतापिन्युपनिषद् के एक प्रसंग में देवता ब्रह्मा जी से प्रश्न करते है-है प्रजापति ! भगवान को नृसिंह क्यों कहते है? ब्रह्मा जी उत्तर देते है-सब प्राणियों में मानव का बौद्धिक पराक्रम प्रसिद्ध है। सिंह का शारीरिक पराक्रम दोनों के संयोग का अर्थ है प्रकाश और दृश्य रूप में-बुद्धि और बल रूप में अपने भक्तों की रक्षा में तत्पर रहना। नृसिंह कोई साकार स्वरूप हो या नहीं पर प्रकाश और पराक्रम के रूप में उसका अस्तित्व कही भी अभिव्यक्त देखा जा सकता है।

वकिंघम शायर बर्नहालवीयों के निकट एक किसान के छोटे छोटे दो बच्चे खेत पर से खेलते खेलते दूर जंगल में भटक गये। रात को पता चला। किसान दम्पत्ति बच्चों को बहुत प्यार करते थे। अज्ञात भय से वे बच्चों को खोजने सड़क पर निकले उनने एक अद्भुत नीलवर्ण प्रकाश देखा-वे उधर ही बढ़े, जितना वे आगे बढ़ते प्रकाश भी उस गति से एक ओर जंगल में बढ़ना शुरू हुआ और एक भयानक जीव जन्तुओं से भरे सुनसान में जाकर स्थिर हो गया। किसान अनुमान करता हुआ जैसे ही उस स्थान पर पहुँचा वह यह देखकर चकित रह गया कि दोनों बच्चे वृक्ष की एक जड़ के सहारे इस तरह शान्त और निश्चिन्त सोये हैं मानों कोई उनकी पहरेदारी की रहा हो।

लारेंको मार्क्वोस (मोजाम्बिक) की घटना है। एक पंगु अफ्रीकी को लकवा मार गया। पैर मुड़ जाने से वह घिसट कर चलता था। अर्नेस्टो टिटोस मुल्होव नामक यह अफ्रीकी बड़ा ईश्वर भक्त था। उसकी भक्ति और वर्तमान स्थिति पर उसके मित्र अक्सर टीका टिप्पणी करते रहते। वपूतिस्मा (ईसाई धर्म में दीक्षा का ड़ड़ड़ड़) के दिन उससे रहा नहीं गया वह भाव विह्वल अन्तःकरण से प्रोटेस्टेण्ट चर्च की ओर घिसटता हुआ भागा। जितना वह भागता उसकी प्राण शक्ति उतनी ही सक्रिय होती गई और चर्च तक पहुँचते न जाने किस अद्भुत शक्ति ने उसे खड़ा कर दिया, जिसे डाक्टर भी ठीक नहीं कर सकते थे। अनायास ठीक हो जाने पर लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। ए. एफ. सी. ने यह समाचार देते हुए स्वीकार किया कि सचमुच संसार में कोई अद्भुत अदृश्य शक्ति है अवश्य जो अपनी सर्वशक्तिमत्ता का परिचय देती रहती है।

26 जून 1954 को देहली से छपने वाले दैनिक हिन्दुस्तान में भी इसी तरह की एक अद्भुत घटना छपी है-पत्रा जिले के धर्मपुर स्थान में कच्ची ईंटों को पकाने के लिये एक भट्ठी लगाया गया था। किसी को पता भी नहीं कि ईंटों के बीच एक चिड़िया ने घोंसला बनाया है और उसमें अण्डे सेये हैं। एक सप्ताह तक भट्ठी जलती रही। ईंटें आग में पकती रही आठवें दिन भट्ठी खोला गया तो एक चिड़िया उसमें से उड़कर भागी। आश्चर्यचकित सैकड़ों लोग वहाँ एकत्र हो गये। लोग तब यह मानने को विवश हो गये कि परमात्मा की अदृश्य सत्ता का संरक्षण सर्व समर्थ है जब उन्होंने देखा कि दो अंडे सुरक्षित रखे हुए हैं और जिस स्थान पर घोंसला बना है उसके एक फीट दायरे में आग पहुँची ही नहीं जब कि सारे भट्ठी में इस तरह का एक इंच स्थान भी न बचा था।

ऐसे असंख्य उदाहरण आये दिन हमारे सामने आते रहते हैं जब अनहोनी उस नियामक के अस्तित्व का संकेत करती रहती है पर स्थूल बुद्धि के व्यक्ति उस सूक्ष्म को कहाँ स्वीकारते है? स्वीकार लें तो न केवल आध्यात्मिक अपितु हमारा व्यावहारिक संसार भी सुख शान्ति से ओत प्रोत हो सकता है।


महा याजक शाल्यनेक (kahani)

महा याजक शाल्यनेक का अनायास ही आगमन हुआ। श्रेष्ठि उदयन ने उनका समुचित स्वागत सत्कार किया। दूसरे दिन ज्ञान दीक्षा का क्रम चल पड़ा।

महा याजक ने अपनी अनेक संग्रहित विद्याओं का परिचय देते हुए उदयन से पूछा वे जिसमें भी रुचि रखते हों, उनके सम्बन्ध में पूछे और प्राप्त करें।

श्रेष्ठि ने पूछा-क्या ऐसा सम्भव है-आपने जो जो जाना है, उस सब के मूल आधार को ही मुझे प्रदान करने का अनुग्रह कर दिया जाय ?”

महा याजक असमंजस में पड़े धीरे धीरे शिर हिला रहे थे। उनकी कठिनाई दूर करने के लिए उदयन ने घर में प्रयुक्त होने वाले अनेकों पात्र उपकरण प्रस्तुत कर दिये और फिर पूछा-देव इन सबको क्या एक ही रथ में भर कर नहीं ले जाया जा सकता।” शाल्यनेक की आँखें खुल गई। उन्होंने नव चेतनता अनुभव की और कहा-ऐसा हो सकता है। एक ही आत्म ज्ञान के समुद्र में ज्ञान की समस्त सरिताओं का समावेश हो सकता है। मैं अब उसी को उपलब्ध करूँगा और जब प्राप्त कर सकूँगा तो आपको ज्ञान दीक्षा का साहस करूँगा

महा याजक चले गये। श्रेष्ठि ने श्रद्धापूर्वक उनके इस प्रयाण को मस्तक झुका दिया।


धर्म का उद्देश्य है सदाचार एवं कर्तव्य पालन

मनुष्य जीवन में सुख शान्ति की उपलब्धि के लिए जो सबसे अधिक आवश्यक एवं उपयोगी तत्त्व है उसे लोग धर्म के नाम से जानते हैं। सदाचार एवं कर्तव्य पालन की प्रेरणा, जिओ और जीने दो का सन्देश धर्म की आत्मा के पर्याय है। धर्म का अर्थ किसी वस्तु अथवा व्यक्ति की प्रकृति, गुण, कर्म एवं स्वभाव है। कवीन्द्र रवीन्द्र ने इसकी शाश्वत अनुभूति कर अभिव्यक्त किया है कि-धर्म अन्तः प्रकृति है, वही समस्त वस्तुओं का ध्रुव सत्य है, धर्म की चरम लक्ष्य है जो हमारे अन्दर कार्य करता है।” अतएव यह कहा जा सकता है कि जिस पथ पर चलकर अपने अभीष्ट की उपलब्धि सम्भव हो उसे ही धर्म कहते हैं। क्योंकि धर्म का उद्देश्य मानव जीवन का प्राण ही कहना चाहिए। धर्म का अभाव मनुष्य को पशु से भी गया बीता बना देता है, बल्कि अधार्मिक व्यक्ति को पशु कहना, पशु का अपमान करना है क्योंकि पशु का भी तो अपना धर्म होता है जिसे पाश्व धर्म कहा जाता है। किन्तु मनुष्य यदि मानवीय धर्म का पालन नहीं करता अथवा अपने धर्म कर्तव्य का परित्याग कर देता है तो उसे हेय दृष्टि से ही देखा जाता है। समादरणीय व्यक्ति अथवा सम्मान के अधिकारी व्यक्ति वही है जो धर्म कर्तव्य से विमुख नहीं है। शास्त्रोक्ति है कि “जो धर्म का पालन करता है उसकी धर्म की रक्षा करता है, पर जो उसे नष्ट कर देता है उसका नष्ट किया हुआ धर्म ही नाश कर देता है।” इस सिद्धान्त में दो मत नहीं हो सकते। जो व्यक्ति धर्म से विमुख हो जाता है वह श्री समृद्धियों एवं विभूतियों से वंचित हो जाता है। दुःख दारिद्र एवं दुर्भाग्य धर्म विमुख के संगी सहचर बन जाते हैं। नारकीय यंत्रणा की अग्नि में वे सतत् जलते एवं येन केन, प्रकारेण जिन्दगी के दिन पूरे करते रहते हैं।

धर्म का निवास वहाँ होता है जहाँ सदाचार एवं कर्तव्य पालन का समादर किया जाता है इसलिए सदाचार एवं कर्तव्य पालन को धर्म के प्रधान प्रतीक कहना अतिशयोक्ति न होगी। धर्म की भव्य संरचना हेतु मानवोचित आदर्शों एवं उत्तरदायित्वों को सुचारु रूप से संपादित करने की महती आवश्यकता होती है।

आस्तिकता, उपासना, शास्त्र श्रवण, पूजा पाठ, कथा कीर्तन, सत्संग, प्रवचन, व्रत, उपवास, नियम, संयम, तीर्थयात्रा, पर्व एवं संस्कार आदि समस्त प्रक्रियाएँ धर्म भावना को परिपक्व करने के उद्देश्य से विनिर्मित हुई हैं। ताकि मनुष्य अपने जीवन के महारिपुओं-वासना एवं तृष्णा, लोभ, मोह तथा आकर्षणों एवं प्रलोभनों से मुक्त होकर अपने कर्तव्य पथ पर अबाध गति से अग्रसर हो सके। साथ ही यदि वह इन धर्म के साधनों को साध्य मान बैठने की-गलती कर लेता है तो उसके समस्त धार्मिक कर्मकाण्ड जो धर्म के कलेवर मात्र है-धर्म के प्राण से कोसों दूर ले जाते हैं। कलेवर अपने आप में पूर्ण नहीं है, कलेवर का महत्व प्राण से है और प्राण का कलेवर से। सुस्पष्ट है दोनों एक दूसरे के परस्पर पूरक है। साधन और साध्य का एक दूसरे से अन्योन्याश्रित संबंध है। यदि साधन को मात्र साध नहीं समझा जावे, साधनों चित महत्व ही प्रदान किया जावे।

ईश्वर की सत्ता सर्वव्यापक, निष्पक्ष, न्यायकारी तथा सुनिश्चित कर्मफल प्रदान कर, सृष्टि की नियामक एवं नियन्त्रक है। उसकी अनुभूति अपने इर्द गिर्द करना ही ईश चिन्तन, मनन, ध्यान एवं भजन का उद्देश्य है। पाप कर्मों के दण्ड से भयभीत रहे और मर्यादाओं का उल्लंघन करने पर उसके कठोर प्रतिफल का ध्यान रखते हुए अनीति एवं अन्याय न करे। उपासक अथवा धर्म भीरु के लिए यह अनिवार्य आवश्यकता है कि उसकी ईश्वरीय न्याय और कर्मफल की सुनिश्चितता में आस्था हो, अन्यथा उसकी समस्त भक्ति भावना निरर्थक ही सिद्ध होगी।

धर्म कर्मों से स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, वरदान, देवकृपा, सुख-शान्ति समृद्धि, साक्षात्कार आदि लाभ होते हैं जिन्होंने धर्म के मर्म एवं उसके वास्तविक स्वरूप को भली-भाँति समझ लिया है, साथ ही उसे अपने जीवन में व्यावहारिक रूप प्रदान कर अपने व्यक्तित्व एवं चरित्र को उज्ज्वल बनाया है। समस्त विभूतियाँ भले ही वे लौकिक या लोकोत्तर हों सदाचार द्वारा ही सुलभ होती हैं। यही कारण है कि धर्म को सदाचार का प्रेरणोत्पादक तत्त्व माना गया है। यह निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि धर्म विभूति एवं सुख-शान्ति का जनक है। सदाचार के प्रति अनास्थावान् होकर काई व्यक्ति मात्र बाह्य क्रिया-कलापों से सुख-शान्ति का स्वप्न देखे तो उसे मात्र दिवास्वप्न की संज्ञा दी जायेगी। सदाचार में आस्था, कर्तव्यों, उत्तरदायित्वों और मर्यादाओं का विधिवत् पालन ही धर्म की आधारशिला है। सदाचार को धर्म का मूल कहा जा सकता है। मूलोच्छेदन के बाद किसी वृक्ष में लगने वाले फूलों और फलों की आशा करना निरर्थक है।

मध्य काल के अन्धकार युग में वह भ्रांति फैली कि अमुक धार्मिक कर्मकाण्ड करने मात्र से समस्त पापों से मुक्ति मिल जाती है। लोग भी उसी लकीर के फकीर बने हुए हैं। इस प्रकार की निराधार मान्यताएँ फैलाने में तत्कालीन पुरोहित वर्ग का अपना वर्चस्व बनाये रखने वाला स्वार्थ प्रधान था। जिसके माध्यम से जीविकोपार्जन हेतु दान दक्षिणा और पूजा प्रतिष्ठा यजमानों से सहज रूप में प्राप्त हो जाती थी। जो लाभ सदाचार की कष्टमय कसौटी पर खरा उतर कर उपलब्ध होता है उसे मात्र बाह्य प्रक्रियाओं से पुण्य लाभ के प्रलोभन देकर सत्ता बना दिया।

मनुष्य के उत्थान एवं पतन का कारण उसकी भावना होती है, अतएव भावना स्तर को मानवीय आदर्शों के अनुरूप बनाये रहने में धर्म के समस्त क्रिया कलाप सहायक होते हैं। इसी कारण भावना को प्रधानता मिली हुई है। आदर्श जीवन एवं उत्कृष्ट विचार ही सजीव धर्म की शाश्वत साधना है।

प्राचीन काल में संत, ब्राह्मण और साधु अपरिग्रहशील जीवनयापन करते थे, फलस्वरूप लोकसेवा का उत्तरदायित्व अपने कन्धे पर उठने में समर्थ होते थे। उनकी त्याग भावना उन्हें लोकश्रद्धा का पात्र बना देती थी। दान दक्षिणा से प्राप्त धन को वे अपने व्यक्तिगत कार्य में व्यय न करके लोक कल्याण के कार्य में लगा देते थे। जिस प्रकार आजकल लोकनायकों को रक्षा कोषादि के लिए दी जाने वाली थैलियाँ उनकी व्यक्तिगत निधि नहीं मानी जाती। प्राप्तकर्ता उसे राष्ट्रीय हित के कार्यों में व्यय हेतु समर्पित कर देते हैं। प्राचीन काल में धर्मात्मा, लोकसेवी साधु, ब्राह्मण उदर पूर्ति के उपरान्त शेष राशि को सद्ज्ञान, सद्भाव, सदाचार एवं सद्प्रवृत्तियों के पुण्य प्रसार में लगा देते थे। मन्दिर जन जागरण के केन्द्र थे, किन्तु आज मठों एवं मन्दिर में प्रचुर सम्पत्ति विद्यमान् होने के बाद भी उसका सदुपयोग नहीं हो पा रहा है, जन मानस परिष्कार एवं उत्कर्ष, साँस्कृतिक लोक शिक्षण में यदि यह धर्म निधि सुलभ हो सकी तो आज हमारी स्थिति कुछ और ही होती तब आज का वातावरण ही भिन्न प्रकार का परिलक्षित होता।

मानवीय अन्तःकरण में सन्निहित श्रेष्ठता को विकसित करने मात्र से ही सुधार निर्माण एवं प्रगति का पथ-प्रशस्त हो सकता है। इस पुनीत कार्य में हम जितना सफल हो सकेंगे उसी अनुपात में बहिरंग जीवन की समस्त संसार की असंख्य समस्याओं का हल अपने आप होता चलेगा। साथ ही विकास के अगणित साधना सूत्र सरलतापूर्वक उपलब्ध होते चलेंगे।

धर्म परस्पर प्रेम, दया, करुणा, सेवा, उदारता, संयम, सद्भावना एवं सहयोग को बढ़ाता है। एतदर्थ धर्म का सच्चा स्वरूप सदाचार एक कर्तव्य निष्ठा में निहित है।


स्वप्न और उनका रहस्यवाद

स्वप्नों के सम्बन्ध में चित्र विचित्र मान्यताएँ प्रचलित है। समझा जाता है कि स्वप्नलोक कुछ अलग वस्तु है। कहा जाता है कि सोते समय जीव इस शरीर से निकल कर कहीं अन्यत्र चला जाता है और वहाँ के चित्र विचित्र दृश्य देखकर निद्रा भंग होने तक शरीर में फिर वापिस लौट आता है। एक लोक मान्यता यह भी है कि-स्वप्नों में अदृश्य संकेत रहते हैं, कोई मृतात्माएँ तथा देवता अपना छद्म परिचय देते हैं। ऐसा भी अनुमान लगाया जाता है कि उनमें भविष्य के संकेत रहते हैं। इस प्रकार की अनेकों मान्यताएँ प्रचलित है। स्वप्नों को एक रहस्यवाद तो ही कोई समझता है। और जानना चाहता है कि आखिर वे है क्या? उनका आधार किन तथ्यों पर अवलम्बित है।

अन्य अनेक महत्त्वपूर्ण विषयों की तरह स्वप्न संदर्भ में भी विज्ञान ने शोध प्रयत्न किये है और एक हद तक रहस्योद्घाटन में सफलता पाई है। जो अब तक जाना जा चुका है मनोविज्ञान शास्त्र के अंतर्गत आता है। विशेषतया अचेतन मन की गतिविधियों से उसका सम्बन्ध समझा गया है। यह शोध क्षेत्र परामनोविज्ञान-पैरा साइकोलॉजी के अंतर्गत माना गया है और पिछली एक शताब्दी से विज्ञान क्षेत्र में इसकी काफी खोज बीन हुई है। जो तथ्य सामने आये है उनके आधार पर कुछ प्राथमिक निष्कर्ष निकल आये है और उनके सहारे खोज टटोल करते हुए आगे बढ़ चलने का उपक्रम किया जा रहा है।

नींद को दो भागों में विभक्त किया गया है-(1) शान्त निद्रा (2)क्रियाशील निद्रा। क्रियाशील निद्रा को वैज्ञानिक भाषा में “रेपिड आई मूवमेन्ट” या “रैम” कहा जाता है। स्वप्न सदैव क्रियाशील निद्रा में ही आते हैं। जैसा कि नाम द्वारा स्पष्ट है, इस अवस्था में आँखों की गतिविधि तीव्र होती है। “इलेक्ट्रॉन एसेफेलोग्राफ”(ई॰ ई॰ जी॰) नामक यन्त्र द्वारा जाना गया है कि क्रियाशील निद्रा की स्थिति में व्यक्ति व्यग्र तथा परेशान रहता है। स्वेद ग्रन्थियाँ अधिक सक्रिय हो जाती है।

सोने के बाद पहला स्वप्न घण्टे भर के बाद ही दिखाई देता है। प्रत्येक व्यक्ति प्रति रात्रि स्वप्न अवश्य देखता है। वे उसे याद रहे अथवा नहीं। स्वप्नों की तीव्रता और आवेग के क्रम से नेत्रों की पुतलियाँ भी घूमती चलती है। सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति हर रात 5-6 स्वप्न औसतन देखता है। एक स्वप्न दर्शन की अवधि में व्यक्ति करवट कभी नहीं बदलता। स्वप्न दर्शन के समय पुतलियों की गतिविधि वैसी ही होती है जैसी कोई फिल्म देखते समय।

आधुनिक स्वप्न शास्त्रियों के अनुसार स्वप्न भी दो तरह के है-सक्रिय (2)निष्क्रिय। सक्रिय स्वप्न वे है जिनमें व्यक्ति स्वयं को किसी कार्य में संलग्न देखता है। निष्क्रिय स्वप्न वे है, जिनमें व्यक्ति दर्शन की तरह स्वप्न दृश्य देखता है स्वयं को कोई क्रिया करते नहीं देखता है इसी स्थिति में व्यक्ति को कभी कभी नूतन विचार प्राप्त हो जाते हैं।

स्वप्न देखते समय जो शक्ति व्यय होती है, वह प्राप्त लाभ की तुलना में अत्यल्प होती है। वस्तुतः स्वप्नों के द्वारा हम अवचेतन के तनावों से मुक्ति पा जाते हैं।

स्वप्न के समय भी मस्तिष्क में ‘अल्फा’ तरंगें क्रियाशील होती है, जो कि जागृत एवं अर्द्ध जागृत दशा में ही चलती है, गहरी निद्रा में नहीं। इससे विदित यही होता है कि स्वप्न दशा जागृति की सर्वथा विरोधी दशा नहीं है। जिसे हम जागृति कहते हैं, वह चेतन मस्तिष्क की सक्रियता की स्थिति है। जब कि स्वप्न अवचेतन की सक्रियता अवधि का नाम है। इस सक्रियता के विभिन्न लाभ एवं उपयोग सम्भव है।

सामान्य दैनन्दिन जीवन में अधिकांश काम जो हम करते हैं, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से वे अर्ध निद्रा की ही स्थिति में सम्पादित होते हैं। अनुमानतः प्रति 1 घण्टे में मात्र 1 मिनट ही सामान्य व्यक्ति कोई ऐसा कार्य करते हैं, जिसके लिए पूर्ण एकाग्रता की आवश्यकता पड़ती हो। सोने के 8 घण्टे निकाल दिए जाये, तो दिन रात में शेष रहे सोलह घण्टों में से हम केवल 16 मिनट के ही लिए सच्चे अर्थों में वतन व जागृत रहते हैं। इसी प्रकार अवचेतन का पूर्ण जागरण भी कभी कभी ही होता है।

नोबेल विजेता प्रो0 एडगर एड्राइन के अनुसार सोने के समय हमारे मस्तिष्क का अवचेतन क्रमशः सक्रिय होता है क्योंकि उस पर से दबाव धीरे धीरे हटता जाता है। चेतन मस्तिष्क जिस क्रम से शिथिल होता चलता है, अवचेतन उसी क्रम से सक्रिय।

सोने के लिए लेटने पर आँखें बन्द करने के बाद मस्तिष्क-तरंगों का कंपन क्रम बदलता है-अपेक्षाकृत हल्के स्वर तरंगित होने लगते हैं। जब दिन भर की घटनाओं पर मस्तिष्क तेजी से दौड़ता है, तो मस्तिष्क तरंगें एक विशेष गति से चलती है। थोड़े उतार चढ़ाव के बाद मस्तिष्क की तरंगें तेजी से थर्राने लगती है, यदि उन्हें ई॰ ई॰ जी0 यन्त्र पर अंकित देखा जाए, तो उनकी प्रति सेकेंड आवर्तता बढ़ चुकी होती है। यह प्रारम्भिक निद्रा की स्थिति है। क्रमशः यन्त्र पर मस्तिष्क तरंगें समतल सी अंकित होने लगती है, यह गहरी निद्रा की स्थिति है।

अचेतन मन की शक्ति असीम है। चेतन बुद्धि संस्थान उसकी तुलना में अत्यन्त तुच्छ है। सोचने, समझने, निष्कर्ष निकालने, कल्पनाएँ करने में बुद्धि संस्थान अपना काम करता है। उसी आधार पर कौशल एवं चातुर्य की उपलब्धियाँ प्राप्त होती है। किन्तु आश्चर्य यह है कि इतने पर भी ठोस और स्थिर कार्य कर सकना इस संस्थान के लिए सम्भव नहीं होता। यहाँ विचारों के आधी तूफान चलते रहते हैं। वे प्रायः विसंगत और कभी कभी परस्पर विरोधी भी होते हैं। ऐसी दशा में मनःस्थिति हवा के झोंकों की तरह उड़ते फिरते रहने वाले पत्ते की तरह होती है। उमंगें पानी के बबूले की तरह उठती, उछलती और बात की बात में ठण्डी होती रहती है। अधिकांश मनुष्यों की यही स्थिति होती है। कई बार वे बड़ी ऊँची ऊँची कल्पनाएँ करते और योजनाएँ बनाते हैं। उत्साह आवेश में कुछ कदम भी आगे बढ़ाते हैं। पर जोश देर तक काम नहीं देता। कुछ ही दिन में शिथिलता आने लगती है और आदर्शवादी योजनाएँ ठप्प हो जाती है। जीवन क्रम पुराने ढर्रे की धुरी पर घूमने लगता है। महत्त्वपूर्ण निर्णयों की प्रायः ऐसी ही दुर्गति होती है। उत्कृष्ट जीवन जीने और महत्त्वपूर्ण काम करने की आकांक्षाएँ अनेकों के मन में अनेकों बार उठती है। पर वह कल्पना बनकर रह जाती है। कारण कि कार्य करने-स्थिरता रखने और निरन्तर प्रेरणा देने को क्षमता का केन्द्र अंतर्मन है। उसका स्तर जिस प्रकार का बन गया होगा उसी पटरी पर जीवन रेल के पहिये लुढ़कते चले जाते हैं।

सिंह जब स्वतन्त्र होता है तो वन का राजा कहलाता है। किन्तु जब वह सरकस वालों के चंगुल में फँस जाता है तो दुर्बल से रिंग मास्टर की उंगली के इशारे पर उसे नाचना पड़ता है। यही स्थिति अंतर्मन की है। बुद्धि जागृत रहने पर यह दवा रह जाता है किन्तु जैसे ही सोते समय जागृत मस्तिष्क प्रसुप्ति अवस्था में जाता है वैसे ही उसे स्वतन्त्रता की साँस लेने का अवसर मिल जाता है और स्वेच्छाचारी क्रीड़ा विनोद करने लगता है। यही स्वप्नावस्था है।

चूँकि उस समय सभी इन्द्रियाँ सोई पड़ी रहती है। इसलिए उनके सहारे जागृत अवस्था की तरह अनुभूतियाँ लेने, देखने, सुनने आदि के बुद्धि संगत एवं वास्तविक अवसर तो मिल पाते किन्तु मस्तिष्क क्षेत्र में जो असंख्य कल्पना चित्र छिपे पड़े रहते हैं उनको खिलौना बनाकर अंतर्मन अपनी बाल क्रीड़ा आरम्भ कर देता है। विगत दृश्यों, घटनाओं, स्मृतियों एवं जानकारियों को रंग-बिरंगी गेंदें कहा जा सकता है। खेल इन्हीं की उठक पटक से शुरू होता है और स्वप्नों का सिनेमा दीखना शुरू हो जाता है। उस स्थिति में अंतर्मन निर्भय और निश्चिन्त होकर जो कुछ कर रहा होता है उसे स्वप्न स्थिति समझना चाहिए। अस्तु इस मुफ्त की फिल्मों का विश्लेषण करते हुए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि व्यक्तित्व के अंतरतम स्थल पर क्या कुछ बन या पक रहा हैं। यह जानकारी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। उससे रोग परीक्षा में रक्त, मल, मूत्र आदि का विश्लेषण करके निदान करने की तरह चेतना की परतों के सम्बन्ध में भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। तद्नुरूप आत्म परिष्कार की उपयुक्त पृष्ठभूमि बनाई जा सकती है। शक्ति का केन्द्र अंतर्मन है। वही समूचे व्यक्तित्व का संचालन करता है। यदि स्वप्नों के आधार पर आन्तरिक दुर्बलताओं और क्षमताओं की वर्तमान स्थिति जानी जा सके तो परिशोधन और उन्नयन का द्वार खुल सकता है। इस प्रकार स्वप्न विज्ञान के आधार पर वही लाभ उठाया जा सकता है जो स्वास्थ्य विज्ञान एवं चिकित्सा शास्त्र के आधार पर शरीर की दुर्बलता एवं रुग्णता हटाने के लिए होता रहता है।

रूसी स्वप्न शास्त्री डाक्टर वासिली ने विभिन्न प्रयोगों तथा अध्ययनों के बाद यह पाया है कि हमारे मस्तिष्क में, शरीर में घटने वाली सूक्ष्मतम क्रियाओं को भी जान लेने की सामर्थ्य विद्यमान है। परिवेश और परिस्थितियों की सूक्ष्मता से छानबीन कर वह हमें भारी दुर्घटनाओं-दुःखों से बच सकने के उपाय भी सुझाता है। मस्तिष्क द्वारा स्वप्न में प्रतीकों द्वारा ऐसे उपायों का संकेत किया जाता है। ये संकेत अवचेतन मस्तिष्क द्वारा दिए जाते हैं।

मन का 88 प्रतिशत हिस्सा अवचेतन होता है और मात्र बारह प्रतिशत ही चेतन। चेतन मन भी पूर्ण चेतना के साथ हममें सामान्यतः क्रियाशील नहीं रहता और सामान्यतः व्यक्ति अपने अधिकांश क्रिया कलाप अर्धमूर्छित स्थिति में करते हैं। तब अवचेतन मन की क्रियाओं का ज्ञान भला कैसे हो ?

हमें ज्ञान भले न हो, पर अवचेतन अपना कर्तव्य निभाता है और स्वप्न प्रतीकों द्वारा हम तक अपनी जानकारी सम्प्रेषित करता रहता है। अवचेतन हमारा उदार गुरु है, निर्देशक है।

अनुभवी चिकित्सकों का यह कहना है कि सदी, ज्वर, नजला जुकाम, फोड़े फुंसी जैसे शारीरिक विक्षोभों विकारों की सूचना एक दो रात पूर्व ही रोगी को सपनों द्वारा मिल जाती है। अधिक गम्भीर रोगों जैसे मिरगी, संग्रहणी आदि का पूर्वाभास स्वप्न प्रतीकों द्वारा एक डेढ़ सप्ताह पूर्व ही हो जाता है। तपेदिक, कैंसर जैसे जटिल रोगों के आगमन का पूर्व संकेत तो दो तीन माह पूर्व ही स्वप्नों द्वारा मिल जाता है। पर सामान्यतः रोगी या तो इन प्रतीकों संकेतों को समझ नहीं पाता या इनमें निहित चेतावनियों को भूला देता है।

रोग सम्बन्धी स्वप्न डरावने होते हैं। किन्तु जिस शारीरिक अवयव से सम्बन्धित रोग हो उसी अंग से सम्बन्धित स्वप्न होते हैं। जैसे आँतों के किसी रोग की सूचना-स्वप्न में कच्चा या सड़ा गला भोजन दिखाई पड़ सकता है। किसी श्वास रोग के रोगी को डूबते समय या कि पर्वत पर चढ़ते समय साँस फूल जाने का स्वप्न दृश्य दिख सकता है।

ये तो हुई शारीरिक रोगों की बातें मानसिक रोग तो पूरी तरह मन के विकार मात्र होते हैं। अतः इनका स्वप्नों द्वारा ज्ञान तो हो ही सकता है, उनकी चिकित्सा भी मुख्यतः इसी जानकारी के आधार पर होती है। मनोरोगी को मनोचिकित्सक उसके स्वप्नों की व्याख्या द्वारा ही मानसिक विकृति का स्वरूप समझा देते हैं तथा उसके आधार की भी विवेचना कर देते हैं। रोगी को जब यह ज्ञात हो जाता है कि मेरा यह रोग तो स्वयं मेरी विचार विकृतियों का ही परिणाम है, तो फिर प्रयास पूर्वक उसे रोग मुक्त होने में अधिक समय नहीं लगता।

सामान्यतः व्यक्ति तनाव की दशा में जीते हैं और विक्षुब्ध- विभ्रान्त चित्त स्थिति में अपनी मानसिक क्रियाओं के प्रति जागरूक नहीं रह पाते। तनाव की इस दशा में अवचेतन के विश्लेषण का प्रयास आत्मबल ही सिद्ध होगा। क्योंकि अवचेतन की क्रिया तो इससे सर्वथा विपरीत है। तनावों दबावों से मुक्ति दिलाने में ही तो अवचेतन की धन्यता है। जब हम अपने ही मनस्ताप से श्रान्त क्लान्त हो उठते हैं, तब अवचेतन का विशाल वट वृक्ष हमें अपनी शीतल स्निग्ध छाया में समेट कर, थपकियाँ देकर सुला देता है।

सचेतन मस्तिष्क पर लगने वाले बौद्धिक सम्वेदनात्मक आघातों के लिए गहरी निद्रा और स्वप्न शृंखलाएं मर हम का कार्य करती है, क्योंकि स्वप्नों में अवचेतन क्रियाशील होकर चेतन को विश्राम का अवसर दे देता है और समुचित विश्राम के बाद चेतन मस्तिष्क पुनः स्फूर्ति युक्त हो उठता है।

जिन्हें गहरी नींद नहीं आती और चेतन मस्तिष्क का अवचेतन पर से दबाव नहीं हटता और उनके अवचेतन को उन्मुक्त क्रीडा का जब समय नहीं मिल पाता, तो यह स्फूर्ति उपलब्ध नहीं हो पाती। तब चेतन मस्तिष्क तनावों दबावों के असह्य भार से कुन्द और अस्वस्थ होने लगता है, अवचेतन अपने प्रभाव के प्रदर्शन के लिए आकुल हो उठता है और नींद में मौका पाते ही श्रान्त शिथिल चेतन मस्तिष्क को एक कोने में बैठाकर स्वयं प्रभुत्व जमा बैठता है। जब अवचेतन नींद में इस अस्वस्थ रीति से प्रभावशाली हो उठता है, तो वह “निद्रा भ्रमण” नामक रोग को जन्म देता है। यह एक गम्भीर रोग है। इंग्लैंड के गुप्तचर विभाग स्काटलैंड यार्ड के एक अधिकारी को यह रोग हो गया था, परिणामस्वरूप वे स्वप्न दशा में एक विशेष रीति से हत्या कर आते और जागने पर स्वयं इस तथ्य से सर्वथा अनभिज्ञ रहते। उनके द्वारा की गई हत्याओं की जाँच का काम भी उन्हें ही सौंप दिया गया और उन्हें ज्ञात ही नहीं हो सका कि वे अपने अपराधों की खोज ही कर रहे थे। उनके साथियों ने जो इस खोज में सहयोगी थे, उनने उन्हें पकड़ा, तब मानस शास्त्रियों के परीक्षण से यह ज्ञात हुआ कि अधिकारी महोदय निद्रा भ्रमण रोग से ग्रस्त है।

इसी रोग से ग्रस्त आस्ट्रेलिया की एक प्रौढ़ महिला ने स्वप्न दशा में अपनी 19 वर्षीया पुत्री की हत्या कर दी थी। ऐसे ऐसे निद्राचारी व्यक्ति भी हुए हैं जो सोने के बाद स्वप्न दशा में ही जागृति की अनुभूति कर घर से नदी तट पहुँचते, बँधी नाव खोलते, रात भर नाव खेते हुए किसी तूफानी नदी को पार करते और स्वप्न टूटने पर प्रातः स्वयं ही विस्मित हो उठते कि उन्हें वहां कौन छोड़ गया। जगने पर उन्हें कभी भी यह ज्ञात न होता कि स्वप्न में उन्होंने क्या क्या किया है ? दक्षिण भारत के एक गाँव की एक नव वधू रात सोने के बाद, स्वप्न दशा में ही ससुराल से चलकर मायके पहुँच जाती थी। मानस शास्त्रियों के अनुसार निद्राचारी व्यक्तियों का अवचेतन मन उस समय अर्धचेतन होता है। कुछ निद्राचारियों की आँखें भ्रमण के समय खुली रहती हैं, तो कुछ की आँखें बन्द रहती है और वे उस स्थिति में ही जागृत दशा की तरह कार्य करते हैं।

नेत्र बन्द रखते हुए भी जागृत दशा की तरह चल फिर सकने और कार्य सम्पादित कर सकने की क्षमता से अवचेतन की सामर्थ्य का पता चलता है।

वस्तुतः हममें से अधिकांश व्यक्ति अपने अपने ढंग के निद्राचारी होते हैं। ऐसे काम करते रहते हैं, जिनके लिए विवेक जागृत होने की स्थिति में भारी पश्चाताप होता है और लज्जा आती है। यह स्थिति कुछ समय तो रहती है, पर फिर वह विवेक सो जाता है और पुरानी आदतें खुल खेलने लगती है। नशेबाज दिन में कई बार अपनी आदत से होने वाली हानियों पर सोचते और दुःखी होते हैं किन्तु फिर जब भूत बवण्डर भीतर से उठता है तो पैर सीधे मद्यगृह तक चलते ही चले जाते हैं और जी भर कर पी लेने पर ही चैन पड़ता है। यही बात अन्य दुष्प्रवृत्तियों के बारे में है। यह निद्राचार नहीं तो और क्या है? विवेक के प्रतिकूल होने वाली सभी कार्य इसी श्रेणी में आते हैं।

प्रायः स्वप्न किसी अन्य लोक के भेजे गये उपहार नहीं, वरन् अपनी ही वर्तमान एवं भूतकालीन स्थिति के परिचायक होते हैं। कई बार तो तात्कालिक शारीरिक अनुभूतियों एवं निकटवर्ती परिस्थितियों का ही भला बुरा प्रभाव स्वप्नों की सृष्टि कर देता है। कई बार ऐसा भी होता है कि भूतकाल की स्मृतियों अथवा भविष्य की सम्भावनाओं का आभास उनके द्वारा मिले।

स्वप्नों पर आस पास के वातावरण का, जिनमें व्यक्ति की दैहिक स्थिति भी सम्मिलित है, स्पष्ट प्रभाव इस तथ्य का परिचायक है कि उस समय हमारा सशक्त अवचेतन सक्रिय रहता है तथा वह अपने संस्कारों के अनुरूप उनकी अनुभूति करता है। यदि आहार ज्यादा कर लिया गया हो तो आमाशय एवं मस्तिष्क अधिक रक्त प्रवाह उत्तेजित रहते हैं। यह उत्तेजना स्वप्नों के रूप में व्यक्त होती है और स्वप्नों का स्वरूप व्यक्ति मन के ढाँचे के अनुसार भिन्न भिन्न होता है।

दो महिलाओं के सोते समय एक प्रयोग के अधीन पैर के पास गर्म मोमबत्ती ले जाई गई। एक ने स्वप्न में देखा कि वह तपते रेगिस्तान में सहसा आ पड़ी है, दूसरी ने स्वप्न देखा कि उसका पैर झुलस रहा है।

एक अन्य प्रयोग में कई व्यक्तियों की हथेलियों को रुई से सहलाया गया। फलस्वरूप स्वप्न में किसी ने देखा कि वह अपनी प्रेमिका का शरीर सहला रहा है तो दूसरे ने देखा कि वह मालिश करवा रहा है, तीसरे ने देखा कि वह स्केटिंग कर रहा है यानी बर्फ पर फिसल रहा है, चौथे ने देखा कि उसके शरीर से एक झबरी बिल्ली अपनी देह रगड़ रही है। एक अन्य प्रयोग में एक ही व्यक्ति के हाथ में दो बार अन्तराल से मोमबत्ती रखने पर पहली बार हाकी स्टिक से खेलने काक, दूसरी बार मुगदर घुमाने का स्वप्न देखा। स्पष्ट है कि अवचेतन का कौन सा तार कब झंकृत हो उठा है, यही स्वप्न दृश्यों का आधार बनता है। स्वप्न स्थिति में भी व्यक्ति मन का बाह्य जगत से संपर्क बना रहता है। यह मन चेतन न होकर अवचेतन होता है।

स्वप्न देखे जाते हैं और देखने के लिए चित्रों, प्रतिमाओं, दृश्यों की विधि ही हम अपनाते हैं। हम जो भी देखते, सुनते, बोलते, छूते, सूँघते हैं, उसकी हमारे मस्तिष्क में दृष्टि, श्रवण, स्पर्श तथा गन्ध प्रतिमान बनती और संचित होती रहती है। स्वाद विशेष की स्वाद प्रतिमाएँ और पीड़ा आदि भाव सम्वेदनाओं की भी संवेदन प्रतिमाएँ मस्तिष्क में अंकित संस्कारित होती रहती है। दृश्यात्मक स्वप्न में यही प्रतिमाएँ और प्रतीक चित्रवत् दिखाई पड़ते हैं।

चित्त तल पर यदि उथल पुथल जारी रही तो इन प्रतीकों को समझ पाना सम्भव नहीं होता। अशान्त चित्त दशा में तो व्यक्ति का दिन भी विवश गति चक्र में बँधा सा व्यतीत हो जाता है और क्रिया कलापों की विवेचना का उसे अवसर ही नहीं रहता तथा स्पष्ट स्मृति भी नहीं रहती। ऐसे में स्वप्नों की स्मृति अत्यल्प ही रहे, यह स्वाभाविक ही है।

स्वप्नावस्था में नेत्र, नासिका, कर्ण, रसना आदि सचेतन ज्ञानेन्द्रियाँ निष्क्रिय रहती है। क्योंकि हमारा सचेतन मन उस समय दन्ता रहता है। किन्तु इन इन्द्रियों पर वातावरण के जो प्रभाव पड़ते हैं, उन्हें अवचेतन मन अनुभव करता-जानता रहता है। इसीलिए मोमबत्ती या रुई छुआने कान के पास तीव्र ध्वनि करने आदि का निश्चित प्रभाव उस समय के स्वप्नों पर पड़ता है। स्वप्नों के समय सक्रिय चित्त तल का जितना अंश चेतन भाग को छूता रहता है, उतने अंश में शारीरिक प्रतिक्रियाएँ भी होती है जैसे हँसना, रोना, बड़बड़ाना, मुट्ठियों का खुलना, भिंचना, करवटें बदलना आदि। स्वप्न जब पूर्णतः अवचेतन की अनुभूतियों से सम्बन्धित होते हैं, उस समय व्यक्ति की देह शिथिल, शान्त पड़ी रहती है व्यक्ति विशेष या कि सम्पूर्ण मानव जाति के अतीत अथवा भविष्य के परिचायक स्वप्न व्यक्ति को सदा ऐसी ही स्थिति में आते हैं। यह स्थिति उसी प्रकार विरल होती है जैसे हमारे दैनन्दिन जीवन क्रम में चेतन मन की जागृति विरल ही होती है।

सात्विक आचरण द्वारा व्यक्ति का चेतना स्तर ज्यों ज्यों बढ़ता है, उसका अवचेतन भी उसी रूप में प्रखर एवं उत्कृष्ट बनता जाता है। सामान्यतः तो हम मूर्च्छना की ही स्थिति में जीवन व्यतीत कर देते हैं। नर वानर की इस चित्त दशा में अवचेतन की अठखेलियों का अर्थ भी समझ में नहीं आ पाता और स्वप्न संकेत व्यर्थ चले जाते हैं।

यदि स्वप्न विज्ञान पर शास्त्रीय ढंग से विचार किया जाय और उनके आधार पर मिलने वाली जानकारियों के सहारे आन्तरिक स्तर को सुधारने, संभालने का प्रयत्न किया जाय तो यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। उसे शारीरिक स्वास्थ्य सुधार एवं संवर्द्धन में भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है क्योंकि शरीर से मस्तिष्क की क्षमता अधिक है। मस्तिष्क में भी शक्ति केन्द्र अंतर्मन है। स्वप्न हमें उसी क्षेत्र का परिचय देते हैं और चेतनात्मक परिष्कार का द्वार खोलते हैं।


आत्मा को उत्कृष्ट वातावरण का लाभ दिया जाय

आमतौर से भौतिक जीवन ही व्यवहार में आता हे और उसी की भली बुरी प्रतिक्रियाएँ मन पर छाई रहती है। संसारी लोगों की प्रमुख अभिरुचि शारीरिक वासना के उपभोग तथा मानसिक संग्रह तृष्णा में जकड़ी रहता है। अहंकार का परिपोषण ही महत्त्वाकांक्षाओं का केन्द्र होता है। निर्वाह की आवश्यकताएँ स्वल्प होते हुए भी मनुष्य वासना, तृष्णा और से प्रेरित होकर निरन्तर व्यस्त रहता है। इनकी पूर्ति के साधन जितने जुटते हैं, अहंता आकांक्षाओं की आग उतनी ही तीव्र होती जाती है। फलतः मनुष्य जीवन जैसे सुर दुर्लभ अवसर का अधिकांश सार तत्व इसी की भगदड़ एवं आपाधापी में लग जाता है। स्वजन सम्बन्धियों से लेकर मित्रों और हितैषियों का सारा परिकर अपने विविध विधि दबाव डालकर इसी रीति नीति को अपनाये रहने के लिए बाध्य करता है। चारों ओर का घटनाक्रम, अप्रत्यक्ष रूप से अन्तः चेतना पर वही संस्कार डालता है कि शौक मौज के साधन जुटाना ही एक मात्र जीवन लक्ष्य है। पूजा पाठ की कुछ चिह्न पूजा चलती है तो उसका उद्देश्य भी इतना भर होता है कि किसी प्रकार इन सस्ते कर्मकाण्डों की उलट पुलट करके देवी देवताओं को रिझाया जाय और उनसे मनोकामना पूर्ति का वरदान पाया जाय। इस प्रकार नैतिक, अनैतिक, क्रिया कलापों द्वारा आकांक्षा और चेष्टा मात्र भौतिक सुख साधन सम्पादित करते रहने की ही होती है। भौतिकता की प्रवृत्ति स्वभाव का अंग बन जाती है। इसलिए उससे ऊँचे उठकर आत्मा की समस्याओं एवं आवश्यकताओं को समझ सकना सम्भव ही नहीं हो पाता।

यदि व्यक्तित्व का वह अश् जिसे अन्तरात्मा कहते हे-को भी महत्व दिया जाय और उसके परिष्कार एवं परिपोषण की भी आवश्यकता समझी जाय तो फिर नये वातावरण में अपने को रखते रहने के साधन जुटाने पड़ेंगे। बहिरंग जीवन बाह्य परिस्थितियों और व्यक्तियों से ही बनता, ढलता है। आमतौर से मनुष्य का व्यक्तित्व, गुण, कर्म, स्वभाव उसी ढाँचे में ढला होता है- जैसा कि वातावरण उसे मिला है। यदि आध्यात्मिक जीवन का महत्व समझा गया है और उसकी उपलब्धियों के प्रति आकर्षण उत्पन्न हुआ है तो उसका एकमात्र उपाय यही है कि उच्चस्तरीय वातावरण में रहने का भी साधन जुटाया जाय। ऐसी प्रभावोत्पादक परिस्थितियों का निर्माण किये बिना मात्र पढ़ने सुनने से व्यक्तित्व को भौतिकता की प्रगाढ़ जकड़ से छुड़ा कर आत्मिक चेतना उभारने की दिशा में प्रगति कर सकना किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगा।

कठिनाई यह है कि प्रभावोत्पादक आध्यात्मिक वातावरण कही ढूँढ़े नहीं मिलता। तथाकथित योगाश्रमों का बाह्य स्वरूप भर आध्यात्मिक लगता है। भीतर घुसते ही वहां भी वे ही प्रवृत्तियाँ नये परिवेश में काम कर रही होती है जिनसे छूटने के लिए इन आश्रमों का सहारा लिया गया था। एकान्त गुफा में रहने की कल्पना और भी जटिल है। वहां निर्वाह की सामान्य आवश्यकताएँ भी स्वावलम्बन पूर्वक नहीं जुट सकती। इसके लिए किन्हीं का सहारा तकना पड़ता है। फिर सामान्य जीवन में अनेक काम परिवार के लोग कर देते थे अथवा पैसा देकर दूसरों से करा लिये जाते थे। पर एकान्त जीवन में वह सारे अनभ्यस्त झंझट स्वयं ही ओढ़ने पड़ते हैं। शरीर यात्रा की आवश्यकताएँ ही इतनी बढ़ी बढ़ी होती है कि एकाकी जीवन का अधिकांश समय उसी का ताना बाना बुनने में लग जाता है। इससे उस प्रयोजन में भारी अड़चन उत्पन्नं होती है। जिसके लिए कि घर छोड़ने और एकान्त में रहने का जोखिम उठाया गया था। प्राचीन काल की परिस्थितियाँ अब नहीं रही, ऋषि मुनियों के समय वाले सुविधाजनक वन जंगल नहीं रहे और न वैसी स्वल्प संतोषी कष्टसाध्य क्रम अपनाकर भी प्रसन्न रह सकने की मन स्थिति है। ऐसी दशा में आत्मिक वातावरण प्राप्त करके अन्तःचेतना के परिष्कार का उपयुक्त साधन जुटा पाना बड़ा कठिन पड़ता है।

कुछ सन्त, सज्जन, मनीषी, तत्व ज्ञानी संसार में है तो, पर उनकी एक कठिनाई अत्यधिक व्यस्तता होती है। स्पष्ट है कि जिसने जीवन का मूल्य समझा है वह अपनी श्वाँसों में से प्रत्येक को रत्न राशि से बढ़कर मानेगा और एक एक क्षण का श्रेष्ठतम उपयोग करने के लिए योजनाबद्ध रीति नीति अपनाये होगा। उसे निश्चित रूप से समय की कमी रहेगी। कम से कम इतना अवकाश उसे किसी भी प्रकार न मिलेगा जब किसी अध्यात्म मार्ग के जिज्ञासु की सुविधा एवं इच्छा के अनुरूप अपना समय देता रह सके। ऐसे महामानवों के दर्शन, प्रणाम, आशीर्वाद, जितने स्वल्प संपर्क से ही जनसाधारण को सन्तोष करना पड़ता है। कभी सामूहिक प्रवचन का लाभ भी मिल सकता है, पर प्रभावोत्पादक वातावरण तो निरन्तर एकाकी संपर्क से ही सम्भव होता है।

आत्मिक प्रगति के आवश्यक साधनों में ऐसा प्रभावोत्पादक संपर्क एवं वातावरण आवश्यक है जिसके सहारे लगभग वैसे ही संस्कार बन सके जैसे कि संसारी वातावरण ने अन्तःचेतना को भौतिकता के रंग में सराबोर कर दिया है, और लोभ मोह के बन्धनों में मजबूती के साथ जकड़ दिया है। सच्चा आत्मोत्कर्ष इस प्रकार की सुविधा जुटाये बिना और किसी प्रकार सम्भव हो ही नहीं सकता।

इस दिशा में प्रथम चरण स्वाध्याय का है। महामानवों , तत्त्वदर्शियों के साथ संपर्क मिलाना और उनके अन्तःकरण के साथ चाहे जिस समय चाहे जितनी देर तक लिपटे रहना इसी सरल उपाय से सम्भव हो सकता है, जिसे स्वाध्याय के नाम से जाना जाता है। मृतक अथवा जीवित निकटस्थ अथवा दूरस्थ मनीषियों के साथ चाहे जिस विषय पर खुले मन से विचार विनिमय करते रह सकना इसी उपाय से सम्भव हो सकता है। इसलिए शास्त्रकारों ने स्वाध्याय का महत्व भजन से कम नहीं वरन् बढ़कर बताया है। स्वाध्यायान्मा प्रमदतव्य श्रुति वचन में सदुद्देश्य रीति नीति अपनाने वालों के प्रति कठोर अनुशासन निर्दिष्ट किया है कि किसी भी कठिनाई में स्वाध्याय से प्रमाद मत करो। जिस प्रकार नित्य स्नान, मंजन, कपड़े धोना, बुहारी लगाना, बर्तन साफ करना नित्य कर्म में सम्मिलित रहते हे, उसी प्रकार स्वाध्याय को भी अध्यात्म परिष्कार का दैनिक अनिवार्य धर्म कृत्य माना जाना चाहिए।

मूढ़ता हर उपयोगी तत्व को निरर्थक बना देती है। गुड गोबर होने की उक्ति को मूढ़ मति ही चरितार्थ करती है। स्वाध्याय के नाम पर कथा पुराणों के पन्ने उलटते रहने वालों की भी कमी नहीं। ऐसे विवेकवान कम है जो यह समझकर स्वाध्याय करते हैं कि आज की अपनी आन्तरिक विकृतियों और समस्याओं का समाधान करने के लिए युग के अनुरूप आदर्शवादी विचार प्रक्रिया क्या हो सकती है? हर युग का अपनी स्थिति होती है। अब से हजारों वर्ष पूर्व जो परिस्थितियाँ थी उसके अनुरूप कथा, पुराण बने है। अब न तो वे परिस्थितियाँ है और न उन समाधानों से कोई काम चलता है। ऐसी दशा में स्वाध्याय के लिए सामयिक समाधान प्रस्तुत करने वाले साहित्य को बुनने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं। घिसी पिटी लकीर पीटते रहने और अमुक पुस्तक को बार बार घोंटते पीसते रहने से स्वाध्याय का लाभ तो मिलेगा नहीं समय की बर्बादी भर होगी। इतने से ही कोई आत्म प्रवंचना करके सन्तुष्ट हो ले तो बात दूसरी है।

अन्तरात्मा को उच्चस्तरीय भाव सम्वेदना उत्कृष्ट विचारणा एवं आदर्शवादी क्रिया कलाप अपनाने की प्रेरणा देने वाले तीनों तत्व जिसमें अन्न, जल और वायु की तरह मिले हुए हो तो समझना चाहिए आत्मिक क्षुधा निवृत्ति और समीचीन प्रगति के साधन जुटे। यह कार्य सत्साहित्य के सहारे जितनी अच्छी तरह हो सकता है उतना और किसी प्रकार नहीं। स्वाध्याय का एक तरह पाठन और दूसरा श्रवण है। कथा, प्रवचन, सत्संग का प्रवचन इसी प्रयोजन के लिए हुआ है। अशिक्षा की कठिनाई एवं स्वयं निष्कर्ष निकालने में असमर्थता की कठिनाई का हल इन उपायों से सरलतापूर्वक निकल आता है। इसलिए कथा, प्रवचनों का पुण्य एवं माहात्म्य पूरे उत्साह के साथ बताया गया है। अभी धर्म क्षेत्र में कथा पुराणों का पठन, श्रवण श्रद्धापूर्वक पुण्य फलदायक माना जाता है और उस प्रकार के प्रयोजनों में बहुत समय तथा धन लगाया जाता है स्वाध्याय दृश्य प्रक्रिया है। उसमें नेत्रों के सहारे पुस्तक पढ़ी जाती है। कथा श्रव्य है। उसमें सद्विचारों को कान के सहारे मस्तिष्क तक पहुँचाया जाता है। दोनों का प्रतिफल एक ही है-मानसिक चेतना को उत्कृष्ट वातावरण प्रदान करना विकृतियों और दृष्प्रवृत्तियों का परिमार्जन करना। दोनों ही उपायों से चेतना पर सुसंस्कार डाले जाते हैं, प्रस्तुत परिस्थिति में जो पतनोन्मुख प्रेरणाएँ अनवरत रूप से अनायास ही मिलती रहती है उन्हें काटने के लिए इस उपाय को तीखी तलवार की तरह काम में लाया जा सकता है।

स्वाध्याय स्थूल है। वह पुस्तकों के रूप में सम्पन्न होता है। सत्संग भी स्वाध्याय की श्रेणी में ही आता है। इन दोनों के लिए साहित्य एवं व्यक्ति विशेष की आवश्यकता पड़ती है। सुविधा का समय भी चाहिए और शिक्षा इतनी होनी चाहिए कि इन दोनों का लाभ उठाया जा सकना सम्भव हो सके। मनन और चिन्तन इन दोनों से सूक्ष्म है। इनके सहारे आत्म समीक्षा और आत्म निर्माण के दोनों महा प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं। इसके लिए यों तो प्रायः चारपाई पर से उठने का समय और रात्रि को बिस्तर पर जाने के बाद का समय अत्युत्तम है, पर रोक किसी भी समय नहीं है। उन्हें किसी भी समय और किसी भी परिस्थिति में कितनी ही देर किया जा सकता है।

मनन में आत्म समीक्षा मुख्य विषय रहता है। उसमें गुण अवगुण दोनों पर बारीकी से, निष्पक्ष भाव से विचार किया जाता है। अब तक के जीवन क्रम की अवांछनीय गतिविधियों पर दो चार दिन में ही दृष्टि डाली जा सकती है। उन पर पश्चाताप किया जा सकता है और दण्ड स्वरूप दुष्कर्मों से समाज को पहुँचाई गई क्षति की पूर्ति करने के लिए अपराधों को तोल के अथवा न्यूनाधिक मात्रा में पुण्य कर्म किये जा सकते हैं। दण्ड प्रायश्चित इसी प्रकार सम्भव होता है। दो चार दिन व्रत उपवास,गंगा स्नान, थोड़ा सा कथा कीर्तन करने जैसे कर्मकाण्डों से पापों का भार कटता नहीं। उसके लिए क्षति पूर्ति के रूप में समाज को अनुदान देना आवश्यक होता है। प्रायश्चित इसी को कहते हैं। इसे कर लेने से दुराव की पाप ग्रन्थियाँ कट जाती है और उनके कारण जो चित्र विचित्र मनोरोग एवं शारीरिक कष्ट उठते रहते हैं उनसे छुटकारा मिल सकता है। किन्तु यह प्रक्रिया सदा तो नहीं चल सकतीं भूतकाल का चिन्तन और उसका समाधान यह कार्य उन्हीं दिनों पूरा हो जाता है जिस समय कि आत्म समीक्षा आरम्भ की जाती है। दण्ड प्रायश्चित अनुदान वाली प्रक्रिया समय साध्य होती है। वह कार्य एक दिन में नहीं हो जाता वरन् प्रायश्चित अनुदानों को चिरकाल तक जारी रखना होता है। इससे पाप कटते हैं और पुण्य बढ़ते हैं। इस प्रकार लगी हुई ठोकर भी अच्छी चेतावनी तथा सुधार प्रक्रिया में सहयोग देने वाली बन जाती है। विष को अमृत बना लेना इसी को कहते हैं।

आत्म समीक्षा, मनन, दैनिक कृत्य कर दिया जाना चाहिए। शरीर से दुष्कर्म मन से अशुभ चिन्तन और अन्तःकरण से दुर्भाव की अवांछनीयता तो नहीं बरती जा रही है। इसका निरन्तर ध्यान रखा जाय। जब भी इन तीनों क्षेत्रों में जो गड़बड़ी उत्पन्न हो रही हो उसे तत्काल अत्यन्त कठोरतापूर्वक रोक दिया जाय। मन में संचित कुसंस्कार प्रायः उठते रहते हैं कभी कभी वे अत्यधिक प्रबल हो उठते हैं। विवेक खो जाता है और शिर पर चढ़ा कुसंस्कारों का भूत मनुष्य को कठपुतली की तरह नचाने लगता है। ऐसी स्थिति का सामना करने के लिए पहले से ही तैयार रहना चाहिए। प्रातःकाल ही अनुमान लगाना चाहिए कि आज किस समय, किस प्रसंग में क्या अवांछनीयता सिर पर चढ़ सकती है। उसकी काट पहले से ही तैयार रखनी चाहिए। बचने और लड़ने के दोनों शस्त्र संभाल कर रखने चाहिए। यह सारा प्रसंग मनन प्रक्रिया के अंतर्गत आता है।

चिन्तन वह पक्ष है जिसमें दुर्बलताएँ हटाने और विभूतियाँ बढ़ाने की क्रमबद्ध योजना बनती है और उत्कृष्टता को कार्य रूप में परिणत करने का ढाँचा खड़ा किया जाता है। दोष दुर्गुणों को छोड़ देना तो फूटे बर्तन के छेद बन्द करने के बराबर है। इससे अपव्यय और अनर्थ रुकता हो किन्तु आत्मोत्कर्ष के लिए जिन दिव्य विभूतियों की, गुण कर्म स्वभाव की, उत्कृष्टता की आवश्यकता पड़ती है उनका अभाव ही बना रहा तो छेद बन्द करने से भी तो लक्ष्य पूर्ति के लिए आवश्यक क्षमता का संग्रह न हो सकेगा। अस्तु चिन्तन में अपने सुधार, कायाकल्प, की योजनाएँ रहनी चाहिए। सुधार परिवर्तन किस क्रम से लाया जाय और उसके लिए वर्तमान गतिविधियों में रीति नीतियों में आदत अभ्यासों में रुचि आकांक्षाओं में किस प्रकार है हेर फेर किया जाय? यह विचार योजनाबद्ध रीति से किया जाना चाहिए। महामानवों ने जिस स्तर का उत्कृष्ट, चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाया है, उसी के अनुरूप अपने को ढाला जाय। इसके लिए सर्व प्रधान आवश्यकता इस बात की है कि श्रेष्ठ सज्जनों की प्रकृति में जिन सद्भावनाओं, सत्प्रवृत्तियों का समावेश होता आया है उसी के अनुरूप आकांक्षाओं को जगाया और आदतों को बढ़ाया जाय। चिन्तन इसी योजना प्रक्रिया का नाम है।

आत्मिक प्रगति के लिए उपासनात्मक व्यायाम है-ध्यान यह भी अन्तःचेतना को एक विशेष वातावरण में रखने की शिक्षा प्रक्रिया है। इसके कई चरण और कई प्रकार है जिन्हें साधक की मनःस्थिति एवं परिस्थिति के अनुरूप बताया और कराया जाता है। इसमें अनुभवी मार्ग दर्शन की आवश्यकता पड़ती है।


अतीन्द्रिय क्षमता में जैव ऊर्जा का योगदान

विज्ञानमय कोश की विशिष्ट क्षमताओं का एक केन्द्र उच्च चेतन मन है। दूसरा एक और भी आधार है-प्राण विद्युत। यह एक चुम्बक है जो साँसारिक जीवन में प्रभावोत्पादक शक्ति एवं प्रतिभा के रूप में दृष्टिगोचर होता है। यह आकर्ष तत्व यदि अधिक सक्षम हो सके तो उसके माध्यम से कई तरह की ऐसी विशेषताएँ उत्पन्न हो सकती हे जिनसे व्यक्तित्व के उभरने के असाधारण अवसर उत्पन्न हो सकें। इस ऊर्जा में यह शक्ति भी है कि सूक्ष्म जगत के प्रवाहों को अपनी ओर मोड़ सकना और उनके संपर्क से कई महत्त्वपूर्ण कार्य सिद्ध करना भी सम्भव हो सकता है। साधक अपने व्यक्तित्व को साधना मार्ग पर चलते हुए जिस प्रखरता को प्राप्त करता है उससे पक्षीय लाभ मिल सकते हैं।

मनःशक्ति जड़ जगत और चेतन सत्ता के बीच का एक घटक है इसलिए ज्ञात जीवन में उसका सर्वोपरि महत्व है। जीव विज्ञान (जेनेटिक साइन्स) की नवीनतम जानकारियाँ यह बताती है कि शरीर जिन कोशिकाओं से बना है वह तथा शरीरगत परमाणु पूरी तरह मनःशक्ति के नियन्त्रण में है। यही नहीं वंशानुक्रम में भी उसकी गतिशीलता रहता है तथा मरणोत्तर जीवन में भी उसकी गतिशीलता समान रूप से बनी रहती है। फ्रायड के सुपरइगो और सेन्सेज की परिधि वाले मन को जर्मन मनोवैज्ञानिक हेन्सावेन्डर अतीन्द्रिय क्षमता तक ले जाने में सफल हुए। इसके लिए उन्होंने अनेक प्रमाण तक उपलब्ध कराये। टेलीपैथी पर अत्यधिक खोजबीन करने वाले रेने वार्कोलियर ने कहा है-मन की व्याख्या पदार्थ विज्ञान के प्रचलित सिद्धान्तों द्वारा सम्भव नहीं।

मस्तिष्क की स्थिति जीवनयापन के सामान्य क्रियाकलाप पूरे करने जितनी सीमित नहीं है अपितु उसमें एक से एक विलक्षण संभावनाएँ प्रतीत होती है। वैज्ञानिक परमाणु में भार, घनत्व, विच्छेदन तथा चुम्बकीय क्षेत्र आदि भौतिक परिचय देने वाले तत्त्वों की खोज करते हुए एक ऐसे सूक्ष्म विद्युतीय कण के संपर्क में आये है जिनमें भौतिक परमाणु में पाये जाने वाले उपरोक्त एक भी लक्षण नहीं। यह विद्युत कण शरीरों के पोले भाग तथा समस्त आकाश में निर्बाध विचरण करते हैं। ये भौतिक परमाणुओं को भी भेदकर पार निकल जाते हैं, पर अभी तक कोई ऐसी यन्त्र प्रणाली या विज्ञान विकसित नहीं हो पाया जो इन विद्युत कणों को कैद कर सके। जब तक वह पकड़ में न आये उनकी अन्तःसंरचना का अध्ययन कैसे हो?

इन कणों की उपस्थिति का बोध भी उन्हीं के परस्पर टकराव की स्थिति में ही हो पाता है। गणित शास्त्री एड्रिया ड्राब्स ने इनको न्यूट्रिनो नाम दिया है। कुछ वैज्ञानिकों ने इसी तरह के कणों साइट्रोन नाम दिया है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जब मस्तिष्क के न्यूरान कण विचारों और भावनाओं के प्रवाह के रूप में इन कणों से संपर्क स्थापित करते हैं तो उस क्षणिक संपर्क से ही पूर्वाभास जैसी घटनाओं की अनुभूति होती है। इससे दो सत्य उद्घाटित होते हैं। (1)पहला यह कि ब्रह्माण्ड व्यापी घटनाओं का मूल उद्गम एक है यह उद्गम काल, दिशा और पदार्थ से अतीत है। संसार का नियमन और नियन्त्रण इसी के अधिकार में है।(2)मानवीय चेतना का सम्बन्ध किसी न किसी रूप में इस उद्गम से निश्चित है।

न्यूट्रिनो कणों का मनुष्य की मस्तिष्कीय चेतना तथा तन्तु समूह पर क्या और किस तरह प्रभाव पड़ता है, इस पर गम्भीर शोधें चल रही है वैज्ञानिक एक्सेल फरसेफि का कथन है कि यह कण जब मानसिक चेतना पर प्रभाव डालते हैं तो नयी जाति के माइन्जेन नामक ऊर्जा कणों का जन्म होता है। यह अनुमान है कि इस तत्व की व्यापक प्रक्रिया मस्तिष्क में चल पड़े तो मनुष्य सहज ही ब्रह्माण्ड व्यापी ऊर्जा के साथ सम्बन्ध स्थापित करने लगेगा और अपनी ज्ञान परिधि को इतना असीम बना लेगा कि उसकी कल्पना करना भी कठिन हो। उस स्थिति में मनुष्य धरती की एक बन्द कोठरी में ही वह सारे दृश्य फिल्म की भाँति देख सकेगा जो चन्द्रमा या मंगल पर जाकर कोई मनुष्य या उपकरण देख सकता है और उतना ही स्पष्ट।

इन समस्त अलौकिक क्षमताओं के केन्द्र व्यक्ति मस्तिष्क में विद्यमान है। किन्तु वे केन्द्र ही चेतना नहीं है। चेतन सत्ता उससे भिन्न और सर्वव्यापी है। व्यक्ति मस्तिष्क उसकी अनुभूति और अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकने में समर्थ है। कोट खूँटी पर टाँगा जा सकता है। खूँटी के गिर जाने पर उस पर टँगा कोट भी गिर जाएगा। किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि खूँटी ही कोट है या कि कोट ही खूँटी है। मानव शरीर से निरन्तर विद्युत चुम्बकीय, इन्फ्रारेड, अल्ट्रावायलेट आदि विकिरण होते रहते हैं। इसी से विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र बनता है। शरीर के भीतर के कार्बन, पोटैशियम, सोडियम, रेडियम, थोरियम, स्वर्ण, सीजियम, कोबाल्ट, आयोडीन आदि तत्व विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र तथा अन्य क्षेत्रों के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं। मनुष्य की सम्पूर्ण त्वचा से पीजोइलेक्ट्रिक इफेक्ट, पाइरोइलेक्ट्रिक इफेक्ट, विद्युत चुम्बकीय विकिरण आदि प्रसारित भी होते रहते हैं तथा बाहर के ऐसे ही विकिरणों एवं प्रभावों (इफेक्ट्स) को मनुष्य की त्वचा ग्रहण भी करती रहती है। इन्हीं विकिरणों तथा प्रभावों के फलस्वरूप क्वाण्टम फील्ड तैयार होता है अर्थात् इनकी समन्वित प्रक्रिया का क्षेत्र। उस क्षेत्र की किरणों को क्वांटम किरणें कहते हैं। क्वाण्टम किरणें प्रकाश की गति से चलती है और उनका तरंगदैर्ध्य (वेवलेंथ) प्रायः 1 सेंटीमीटर होता है। उनकी फ्रीक्वेंसी एक अरब हर्ट्ज तक होती है। इसका अर्थ यह हुआ कि क्रमशः क्षीण होते जाने पर भी वे लाखों मील की दूरियाँ पार कर लेती है। अभी इनकी विस्तृत खोज सम्भव नहीं हो सकी है। इन क्वाण्टम किरणों द्वारा ही मनुष्य दूरस्थ नक्षत्र पिण्डों का प्रभाव ग्रहण करता है। साथ ही उसका प्रभाव दूर दूर तक बिखरता भी रहता है।

भौतिक विज्ञान परमाणु सत्ता की सूक्ष्म प्रवृत्ति का विश्लेषण करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँच रहा है कि एक ही अणु में सक्रिय दो इलेक्ट्रानों को पृथक् दिशा में खदेड़ दिया जाये तो भी उनके बीच पूर्व सम्बन्ध बना रहता है। वे कितनी ही दूर रहें दर्पण में प्रतिबिम्ब की तरह अपनी स्थिति का परिचय एक दूसरे को देते रहते हैं। एक इलेक्ट्रान को किसी तरह प्रभावित किया जाय तो इतनी दूर चले जाने पर भी दूसरा पहले इलेक्ट्रान के समान ही प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। इस सत्य का प्रतिपादन करते हुए आइन्स्टीन, रोजेन, पाटोल्स्की जैसे महान् वैज्ञानिकों ने भी यह माना है कि इस छोटे से घटक की यह गति निःसन्देह एक विश्वव्यापी ड्रामे का ही छोटा रूप हो सकता है।

डा0 एफ केफ्रा ने तो यहाँ तक स्वीकार कर लिया कि परमाणु का प्रत्येक घटक विश्व ब्रह्माण्ड का परिपूर्ण घटक है अर्थात् प्रत्येक अणु में ब्रह्माण्ड सत्ता ओत प्रोत है। अणु में ही विराट ब्रह्माण्ड के दर्शन किये जा सकते हैं। यह पारस्परिक सम्बन्ध इतने प्रगाढ़ है कि इन्हें कभी निरस्त नहीं किया जा सकता। जहाँ इस तरह का प्रयास होता है वही भयंकर दुष्परिणाम उपस्थित हो उठते हैं।

वैज्ञानिक गेटे ने ब्रह्माण्डीय चेतना के अस्तित्व को कटु सत्य के रूप में स्वीकार किया है। रुडोल्फ स्टीनर ने भी गेटे के तथ्यों का पूर्ण समर्थन ही नहीं किया अपितु उसके आधार भी प्रस्तुत किये है। टामस हक्सले ने एक कदम आगे बढ़कर स्वीकार किया है कि ब्रह्माण्ड में एक मूलभूत चेतना काम कर रही है जो जीवाणुओं में तथा परमाणुओं में पृथक् पृथक् ढंग से काम करती है। भारतीय दर्शन में ब्रह्मा की परा और अपरा दो शक्तियाँ इसी तथ्य का निरूपण करती है। इस की पुष्टि उन्होंने अपनी हेवेन एण्ड हेल पुस्तक में विस्तार से की है।

परमाणु की इलेक्ट्रान प्रक्रिया को यन्त्रों से जितना जाना जा सकता है, वह अत्यल्प है अधिकांश की जानकारी गणितीय सिद्धान्तों पर होती है उसी तरह जीवाणुओं की मूलभूत प्रक्रिया के लिए जो यन्त्र बनाया गया है उसका नाम है” मस्तिष्क। इस यन्त्र की योग पद्धति से सर्वांग पूर्ण जानकारी कर लेने के कारण भारतीय दर्शन वेद वेदान्त के उस अलभ्य ज्ञान तक पहुँच गया, पर विज्ञान अभी तक मस्तिष्क के बारे में बहुत ही सीमित जानकारी ही प्राप्त कर सका है शेष अविज्ञात को अन्धकार क्षेत्र डार्क एरिया-घोषित किया हुआ है। इसी कारण ब्रह्माण्ड व्यापी सूक्ष्म सत्ता से अभी तक उसका तालमेल नहीं हो पाया। परमाणुओं की इलेक्ट्रानिक प्रक्रिया का भी अधिकांश हल गणित के रूप में यह मस्तिष्क ही करता है। अतएव ब्रह्माण्डीय चेतना का स्वरूप पहचानने से पूर्व मस्तिष्क की अर्थ इंगित जानकारी होनी आवश्यक है। ज्ञात रहे कि जो अतीन्द्रिय घटनाएँ प्रकाश में आती है उनमें भी प्रधान माध्यम मस्तिष्कीय बोध ही होता है चाहे वह पूर्व जन्म का ज्ञान हो, पूर्वाभास या भूत-प्रेतों के दर्शन।

मानवीय काया में सन्निहित विलक्षण अति समर्थ अतीन्द्रिय क्षमताओं की उपलब्धि यद्यपि कठिन योगाभ्यास से ही सम्भव है तथापि रेडियो की सुई घुमाते घुमाते कई बार अनायास ही किसी प्रिय स्टेशन में लग जाती है जब कि उसका साइकिल नम्बर अथवा फ्रीक्वेंसी का पता नहीं होता। उसी प्रकार दुनिया भर में ऐसे सैकड़ों उदाहरण है जिनमें ऐसी क्षमताओं के अयाचित उपलब्ध हो जाने के विवरण मिलते रहते हैं। यह घटनाएँ इस बात की प्रमाण है कि मनुष्य उतना ही नहीं जितना वह स्थूल आँखों से हाड़ माँस के पिण्ड रूप में दिखाई देता है अपितु उसकी सूक्ष्म और सनातन सत्ता तो अपने परमपिता की सर्वज्ञ, सर्वदर्शी सर्वसमर्थ सत्ता से ओत प्रोत है।

‘ट्रू एक्स्पीरियसेंस इन प्रोफेन्सी” में ऐसी अनेक घटनाएँ संग्रहित हैं जो उपरोक्त सत्य का समर्थन करती हैं। उसी में वाल्टर जे0 मैसी की “स्टाॅर्म इन ए कप आफ टी-चाय के प्याले में तूफान) शीर्षक लेख में अनुभूति छपी है। एक दिन श्रीमती मैसी (वाल्टर जे. मैसी की पत्नी) अपने घर आये मेहमान मिस्टर हाफमैन के लिए चाय बना रही थी। चाय प्याले में छानी ही थी कि गजब हो गया जिस प्रकार त्राटक सिद्ध अपनी वेधक दृष्टि से अपने दोनों अँगूठों के नाखूनों में दूर के दृश्य देख लेते हैं उसी तरह उन्हें प्याले में फिल्म की तरह विलक्षण दृश्य दिखाई दिया। उन्होंने देखा एक होटल में एक क्रूर मनुष्य घुसा, सेकेण्डों में उसने उसके मैनेजर को गोली मार दी, रुपये पैसे छीने वापस कार में बैठा और भाग खड़ा हुआ। कार के बाहर निकलते ही दो मोटर साइकिलें उसका पीछा करती दिखाई दी। हत्यारे ने उन पर भी गोली चलाई फलस्वरूप एक उनमें से भी मर गया। हत्यारा भाग कर एक अधबनी झोपड़ी में घुस गया जहाँ उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

इस वीभत्स दृश्य को देखकर श्रीमती मैसी अत्यधिक घबड़ा गई और मूर्छित होकर गिर पड़ी होश आने पर उनने सभी को यह घटना सुनाई तो सभी ने इसे मात्र वहम कहा। किन्तु श्रीमती मैसी के मस्तिष्क में यह घटना कई दिन तक छायी रही। सन्तोष न हुआ तो उनने पुलिस में लिखित फाइलों में दाब दी गई।

पूरे दो सप्ताह भी नहीं बीते थे कि एक दिन अखबारों में कैलीफोर्निया में एक होटल मैनेजर की हत्या का हूबहू समाचार छपा। इस पर पुलिस अधिकारियों ने वह रिपोर्ट निकाली तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि हत्यारे के वस्त्रों के रंग, हुलिया, वेष भूषा ठीक वैसी थी जैसी उस रिपोर्ट में दर्ज थी। पीछा करने वाले सवार दो पुलिस के जवान थे। हत्यारा ठीक एक अधबनी झोपड़ी में ही पकड़ा गया।

डयू मारियर की पुस्तक “पटेर टूबेट एन” तथा डा0 किपलिग की “व्रश ब्रुड ब्वाप” पुस्तकों में इस तरह की घटनाओं तथा मान्यताओं का विस्तृत संकलन है। इनमें भवितव्यताओं के पूर्वाभास की सत्यता का समर्थन तो है कारणों की विज्ञता से असमर्थता प्रकट की गई है। अमेरिका के मनोवैज्ञानिक डा0 नेलसन वाल्ट का मत कि-मनुष्य के अन्दर एक शक्तिशाली आत्म चेतना काम करती है जिसे जिजीविषा तथा प्राणधात्री शक्ति कहते हैं। इस शक्ति में रोग निरोधक शक्ति तथा अन्य आत्म रक्षा जैसे अस्तित्व संरक्षण की क्षमताएँ भी सन्निहित है। परामनोविज्ञानवेत्ता हेरल्ड के कथनानुसार पूर्वाभास जागृत अवस्था में भी होते हैं जिनका सामयिक परिस्थितियों से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता। उन्होंने लिखा है कि एक विज्ञान चालक की बहन को यह पूर्वाभास जागृत अवस्था में ही हुआ कि अमुक दिन उसके भाई की मृत्यु विमान दुर्घटना में हो जायेगी। उसने यह तिथि नोट कर ली और ठीक उसी दिन यह दुर्घटना सचमुच घटित हुई।

विज्ञानवेत्ता जे0 वी0 राइन की धर्म पत्नी को स्वप्नों में अनेक बार आश्चर्यजनक पूर्वाभास मिले। स्वयं वैज्ञानिक राइन ने पूर्वाभास स्वप्नों को सत्य पाया तो उन्होंने अपने शोध की दिशा परामनोविज्ञान की दिशा में मोड़ दी। उन्होंने 4000 ऐसी घटनाएँ संकलित की जो स्वप्नों में हुए पूर्वाभास की सत्यता प्रतिपादित करती थी। डा0 राइन उनका कोई वैज्ञानिक आधार तो न पा सके, पर उन्होंने जो निष्कर्ष निकाले वह है-मनुष्य के अन्दर कोई अविज्ञात चेतना विद्यमान है जो सुदूर क्षेत्रों से सम्बन्ध बनाये हुए हैं। वह उपयुक्त अवसरों पर रहस्यमयी घटनाओं का उद्घाटन करती हैं। (2)परस्पर घनिष्ठ व्यक्तियों में सहज ही तथा मनस्वी व्यक्ति मन और भावनाओं की एकाग्रता द्वारा प्रयत्नपूर्वक भी इस तरह की घटनाएँ जान सकते हैं। (3)पुरुषों की अपेक्षा भावुक होने के कारण स्त्रियों में धार्मिक अभिरुचि की प्रधानता भी इसका कारण हो सकती है। मनःशास्त्री हेनब्रुक ने भी इस तथ्य का समर्थन किया है। उन्होंने इसके लिए नारी की कोमलता , सहृदयता और सौम्य गुणों के आधिक्य को कारण माना है।

भारी शरीर को अणुमात्र बना लेने की “अणिमा” सिद्धि, समाधिस्थ होकर जीवन चेतना को मस्तिष्क में धारण कर लेने की सिद्धि, प्राणायाम द्वारा शरीर के किसी भी अंग में वज्र की सी शक्ति धारण करने की सिद्धियाँ अब भ्रान्त प्रलाप कही जा सकती है क्योंकि न तो इनके योगी अभ्यासी रहे न सिद्ध समर्थ किन्तु पिछले 6 अप्रैल सन 74 को 100 वर्ष पूरे हो जाने पर भी इंग्लैण्ड के राबर्ट हडची की इस तरह की क्षमताओं की सारे इंग्लैण्ड में चर्चा रही। हडची ने एकबार सार्वजनिक प्रदर्शन में हाथ में मजबूती से बाँधी गई हथकड़ियों को धागे की तरह तोड़ दिया। उन्हें एक कमरे में बन्द कर ताला लगा दिया गया। अधिकारियों ने ताले को विधिवत् सील किया, किन्तु वे अभी अपना काम पूरा ही कर पाये थे कि हडची पीछे से आ प्रकट हुए और बोले श्रीमान जी इसकी क्या आवश्यकता? इसी तरह उन्हें एक सुरंग में दबा दिया। और कई दिन तक भी उसी में बन्द रहने दिया गया। नियत समय पर हडची निकाले गये तो हडची ऐसे लग रहे थे मानों वे अभी अभी सो कर उठे हों।

शरीर को जिन पदार्थों से पोषण मिलता है वे भौतिक और दृश्य रूप में तो प्राकृतिक साधनों प्राकृतिक प्रक्रिया से उपलब्ध होती है, पर ऐसे सभी पदार्थ वायुभूत अवस्था में अपार मात्रा में उपलब्ध होते हैं। अपनी अतीन्द्रिय चेतना को सक्षम बनाकर योगीजन इन वायवीय तत्त्वों से ही पोषण पा सकते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने अपने समय के सिद्ध योगी पौहारी बाबा में ऐसी क्षमता का उल्लेख कर लिखा है कि उन्होंने मुद्दतों तक न जल पिया न अन्न खाया तथापि उनका शरीर कतई क्षीण नहीं हुआ। इस स्थिति में मल मूत्र विसर्जन, सोने, उठने आदि की भी कोई आवश्यकता नहीं होती। उन पर ताप और असह्य शीत का भी कोई प्रभाव नहीं होता।

पाण्डिचेरी के चीफ जस्टिस (ब्रिटिश शासन काल) जेकालियट ने लिखा है- एक बार एक साधु ने मुझे कुछ लिखकर अपने पास रखने को कहा-मैंने एक कागज पर लिखकर जेब में रखा । थोड़ी देर में साधु ने एक कागज पर वही लिख दिया जो मैंने लिखा था।

ड्यूक विश्व विद्यालय के डा0 जे0 वी0 राइन ने अपनी पुस्तक "न्यू फ्रंटियर्स आफ माइंड” में मस्तिष्कीय विलक्षणता पर गम्भीर प्रकाश डाला है और यह संकेत दिया है कि मस्तिष्क की सम्पूर्ण संरचना तथा क्रिया प्रणाली के ज्ञात हो जाने से मनुष्य के लिए संसार में कुछ भी असम्भव न रह जायेगा। यहाँ तक कि हथेली में सरसों उगाना तथा हवा में खेती करना भी।

मन चेतना की उच्चस्तरीय परत को-विज्ञानमय कोश को यदि जागृत समर्थ और परिष्कृत बनाया जा सके तो निःसंदेह उसके सत्परिणाम इतने महत्त्वपूर्ण हो सकते हे जिनकी तुलना में बड़ी चढ़ी भौतिक सामर्थ्य को भी तुच्छ सिद्ध किया जा सके।


स्थूल से परे शरीर और भी है।

भौतिकवादी जीवन दर्शन इसलिए भ्रान्त और अपूर्ण है कि वह पंच तत्त्वों से बने शरीर को ही सब कुछ समझता है और खाओ , पीओ मौज करो की रीति नीति को ही जीवन का मूल मंत्र मानता है। जबकि असलियत कुछ और है। बाह्य दृष्टि हिम पर्वत के उसी भाग को देखती है, जो समुद्र की सतह से ऊपर रहता है। जबकि उसका तीन चौथाई भाग समुद्र के पानी में रहता है। भौतिक विज्ञान इस बाह्य स्वरूप, जो आँखों से देखा जाता और इन्द्रियों से अनुभव किया जाता है तक ही पहुँच कर रह जाता है। वास्तविकता तो इससे अधिक अदृश्य और इन्द्रियों के अनुभव से परे है।

मान्य किया जाय या न किया जाय इससे क्या होता है ? सचाई तो सचाई है और ज वह सामने आती है। तो भौतिक दृष्टि से सोचने वाले हक्के बक्के रह जाते हैं और आत्मा के अस्तित्व को, चेतना की शक्ति को न समझने के कारण हतप्रभ हो उठते हैं। घटना 7 नवम्बर 1918 की है। तब पहला विश्व युद्ध चल रहा था। एक फ्रांसीसी लड़का टैड जिसका पिता फ्रांस के मोर्चे पर लड़ रहा था, खेलते खेलते एक दम चिल्लाया-मेरे पिता का दम घुट रहा है। वे एक तंग कोठरी में बन्द हो गये है ओर उन्हें कुछ भी नहीं दिखाई दे रहा है। घर के लोग कुछ भी नहीं समझ पाये। टैड इतना कह कर बेहोश हो गया था। कुछ देर बेहोश रहने के बाद उसे होश आया ओर बोला-अब वे ठीक हो जायेंगे घर के लोगों ने टैड के बेहोश होने से पूर्व कहे गये शब्दों और बाद में होश आने पर कहे शब्दों से इतना ही अन्दाज लगाया कि टैड ने अपने पिता के सम्बन्ध में कोई दुःस्वप्न देखा होगा। बात जहाँ की तहाँ समाप्त हो गयी।

प्रथम विश्वयुद्ध, जब समाप्त हुआ और टैड के पिता घर लौटे तो स्वजनों को उस दिन की घटना याद आ गयी, जब टैड के पिता ने बताया कि 7 नवम्बर को मैं मरते मरते बचा। पूछा गया कि क्या बात हुई थी तो उन्होंने बताया कि मैं उस दिन एक गैस चैम्बर में फँस गया था, जिसमें मेरा दम घुटने लगा था। मुझे दिखायी देना भी बन्द हो गया था। तभी मैंने देखा कि टैड जैसा एक लड़का उस युद्ध की विभीषिका में न जाने कहा से आ पहुँचा और उसने चैम्बर का मुँह खोल कर, मुझे हाथ पकड़ कर बाहर खींचा। तभी मेरी यूनिट के सैनिकों की दृष्टि मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे अस्पताल पहुँचाया। यह विवरण सुन की ही घर वालों को उस दिन टैड के चीखने, बेहोश होने तथा होश में आने पर आश्वस्त ढंग से बात करने की घटना याद आयी।

इटली के एक पादरी अलफोन्सेस लिगाडरी के साथ 21 सितम्बर 1974 को ऐसी ही घटना घटी। उस दिन वे ऐसी गहरी नींद में सोये कि जगाने की बहुत कोशिशें करने के बाद भी न जगायें जा सकें। यह भ्रम हुआ कि कही वे मर तो नहीं गये है। इस भ्रम की परीक्षा के लिए उनकी जाँच की गयी तो पता चला कि वे पूरी तरह जीवित हैं। कई घण्टों तक वे इसी स्थिति में रहें। उन्हें जब होश आया तो देखा कि आसपास लगभग सभी साथी सहयोगी खड़े हुए हैं। उन्होंने अपने साथियों से कहा-मैं आपको एक बहुत ही दुःखद समाचार सुना रहा हूँ कि हमारे पूजनीय पोप का अभी अभी देहान्त हो गया है।” साथियों ने कहा-आप तो कई घण्टों से अचेत है, आपको कैसे यह मालूम हुआ।

लिगाडरी ने कहा-मैं इस देह को छोड़ कर रोम गया हुआ था और अभी अभी वहीं से ही लौटा हूँ। उनके साथियों ने समझा कि वे कोई सपना देख कर उठे है और सपने में ही उन्होंने पोप की मृत्यु देखी होगी। चार दिन बाद ही यह खबर लगी कि पोप का देहान्त हो गया है और वह उसी समय हुआ जब कि लिगाडरी अचेत थे तो उनके मित्र साथी चकित रह गये।

एक स्थान पर रहते हुए भी मनुष्य अपनी आत्मा की शक्ति द्वारा दूरवर्ती क्षेत्रों में सन्देश पहुँचा सकता है। उपरोक्त घटनाओं में जाने अनजाने सूक्ष्म शरीर ही सक्रिय रहा है। यदि सूक्ष्म शरीर की शक्ति की जागृत कर लिया जाय तो उससे जब चाहे तब मन चाहे करतब किये जा सकते हैं। 1929 में अल्जीरिया में कैप्टन दुबो के साथ ऐसी ही घटना घटी, जिससे सूक्ष्म शरीर के अस्तित्व ओर उसकी शक्तिमत्ता का प्रमाण मिलता है। कैप्टन दुबो जय अल्जीरिया के एक छोटे से गाँव का मुखिया अब्दुल उन्हें धन्यवाद देने के लिए उनके साथ साथ आया, बातों ही बातों में अब्दुल ने कैप्टन से सूक्ष्म शरीर के अनेक चमत्कारों का उल्लेख कर दिया। दुबो ने अब्दुल की बातों में कोई रुचि नहीं दिखाई और उल्टे इसे गप्पेबाजी कहा। इस पर अब्दुल ने कहा कि मैं इसे प्रमाणित कर सकता हूँ। कैप्टन ने जब उसकी यह बात सुनकर भी अविश्वास से सिर हिलाया तो अब्दुल कुछ देर के लिए ध्यानस्थ हुआ ओर फिर आँखें खोलकर बोला-आप अपने पीछे मुड़कर देखिए। जैसे ही उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो उन्होंने दीवार पर एक ऐसी कलाकृति टंगी पायी जो उन्हें बहुत प्रिय थी और इस समय वहाँ से हजारों मील दूर पेरिस में उनके घर पर थी।

उस दिन कैप्टन दुबो के पिता पियरे ने पेरिस की पुलिस में रिपोर्ट लिखाई कि उनके घर से 10 लाख रुपये मूल्य की एक अद्वितीय कलाकृति चोरी चली गयी। पुलिस कमिश्नर पियरे के अच्छे मित्र थे, उन्होंने शिकायत मिलते ही अपने सर्वश्रेष्ठ गुप्तचर कलाकृति की खोज में लगा दिये। कई दिन तक लगातार खोज चली, पर कलाकृति की खोज न की जा सकी। जिस कमरे में कलाकृति टंगी थी, उसमें किसी के जबरन प्रवेश करने या उँगलियों के निशान नहीं मिले थे। पियरे ने इस कलाकृति की चोरी की खबर अपने पुत्र को भी दी। तब सारी बात जान कर कैप्टन दुबो, पुलिस कमिश्नर और अन्य अधिकारियों को भी बड़ा आश्चर्य हुआ।

इन घटनाओं के कारण जो अनेक देशों एवं अनेक लोगों के साथ घटी है, वैज्ञानिकों का ध्यान भी इस और जाने लगा है। विज्ञान भी यह सोचने के लिए विवश हुआ है कि क्या स्थूल शरीर से परे भी मनुष्य का कोई अस्तित्व है, जो उसके संदेशों को सुदूर क्षेत्रों में पहुँचाता है। तथा ऐसे ऐसे काम कर डालता है जो शरीर द्वारा ही किये जा सकते हैं। बिना किसी स्थूल माध्यम के एक मनुष्य के विचारों और संदेशों को पहुँचाने की इस प्रक्रिया का नाम है, विश्वविद्यालय में फिजियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रो0 लियोनिद वासिलयेन ने अभी कुछ समय पूर्व एक अनूठा प्रयोग किया है। स्मरणीय रूस का शासनतंत्र धर्म, ईश्वर और आत्मतत्त्व की मान्यता को न केवल अनावश्यक मानता है वरन् उसे अफीम भी बताता है। फिर भी इस तरह की घटनाओं के कारण वास्तविकता की ओर उनका ध्यान गये बिना नहीं रहा। प्रो0 वासिलयेन ने टेलीपैथी द्वारा कई मील दूर स्थित एक प्रयोगशाला में कार्यरत अनुसंधानकर्ताओं को सम्मोहित कर दिया और वे लोग जो प्रयोग कर रहे थे, उनसे वह प्रयोग स्थूल शरीर से परे मनुष्य के सूक्ष्म शरीर का अस्तित्व अब विज्ञान द्वारा भी प्रभावित होने लगा है। सन 1963 से अब तक रूस के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में कई सफल प्रयोग किये हैं। वहाँ के एक इलेक्ट्रान विशेषज्ञ से मयोन किर्लियान ने अपनी वैज्ञानिक पत्नी बेलिण्टाना के सहयोग से फोटोग्राफी एक विशिष्ट प्रविधि का आविष्कार किया। इस विधि द्वारा सजीव प्राणियों के आस पास होने वाले सूक्ष्म कम्पनों और देह ऊर्जा के क्रिया कलापों का छायांकन किया जा सकता है।

एक दूसरे प्रयोग में किर्लियान दम्पत्ति ने एक रुग्ण पत्नी की फिल्म खींची इसमें प्रकाश कणों का वह वलय आरम्भ से जीर्ण था और वह शीघ्र ही समाप्त भी हो गया। अगले प्रयोग में किर्लियान दम्पत्ति ने एक मनुष्य के पास से उसके शरीर के चित्र इसी विशेष विधि से लिये । ये छाया चित्र उसके शरीर के विभिन्न भागों के लिये गये थे। गर्दन, हृदय और उदर प्रदेश के अत्यन्त निकट से खींचे गये इन चित्रों में बहुत ही सूक्ष्म धब्बे दिखाई दिये, जो इन अंगों से विसर्जित होने वाली विद्युतीय ऊर्जा के द्योतक थे। इन छाया चित्रों से वह निष्कर्ष निकाला गया कि प्रत्येक प्राणी के दो शरीर होते हैं। पहला प्राकृतिक अथवा भौतिक जो आँखों से दिखाई देता है। और दूसरा सूक्ष्म शरीर जिसकी सब विशेषताएँ प्राकृतिक शरीर जैसी होती है, पर जो दिखाई नहीं देता। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह सूक्ष्म शरीर ऐसे सूक्ष्म पदार्थों से बना होता है जो इलेक्ट्रान की अपेक्षा अधिक तीव्र गति से चलायमान होते हैं। उनके अनुसार सूक्ष्म शरीर, भौतिक शरीर से अलग होकर कही भी विचरण कर सकता है।

रूस के अतिरिक्त अमेरिका में भी इस विषय पर काफी वैज्ञानिक खोजे चल रही हैं। न्यूयार्क राज्य विश्व विद्यालय ने परामानसिक तत्त्वों की खोज के लिए एक स्वतंत्र विभाग ही खोला है जिसके अध्यक्ष डा0 राबर्ट बेफर हैं। अधिकांश लोगों का दृष्टि केन्द्र चर्मचक्षुओं से दिखाई पड़ने वाला भौतिक शरीर है और वे इसी की सुख सुविधा के लिए सारे जोड़ तोड़ बिठाते रहते हैं। सूक्ष्म शरीर के अस्तित्व और उसकी आवश्यकताओं पर भी ध्यान दिया जाय तो काफी उपयोगी सिद्ध हो सकता है। क्योंकि जब मनुष्य केवल इस शरीर को ही सुखी बनाने के लिए प्रयत्न नहीं करेगा वरन् वह अपनी आध्यात्मिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील होगा। भारतीय अध्यात्म इस क्षेत्र में पहले ही काफी आगे बढ़ चुका है। कहना न होगा, प्राचीन कालं में जन सामान्य का सदाचार निष्ठ और सत्य परायण होना अध्यात्म के गहन आधारों पर अवलम्बित रहने का सुपरिणाम ही था।


Quotation

त्रिवेणी योगःसा प्रोक्ता तत्र स्नान महा फलं। यह योग ही त्रिवेणी है। इसी में स्नान करने का महाफल होता है। जीव, प्रकृति और परमेश्वर इन तीनों को अलग अलग रहने से ही सर्वत्र अभाव ओर अपूर्णता दीख रही है। यदि ईश्वर और जीव मिल जाय और छाया की तरह उनके साथ प्रकृति अर्थात् सिद्धियाँ और विभूतियाँ भी रहे, तो फिर कमी किस बात की रह जाय।


भगवान की रोटी (Kahani)

कथा में एक युवक ने सुना भगवान सबको रोटी देते हैं। युवक को बात जँच गई। उसने काम पर जाना बन्द कर दिया। जो पूछता यही उत्तर देता-भगवान जब रोटी देने ही वाले है तो मेहनत क्यों करूं ?

एक ज्ञानी उधर से निकले मतिभ्रम से ग्रस्त लड़के की हालत समझी, और प्यार से दूसरे दिन सवेरे उसे अपने पास बुलाया। और कुछ उपहार देने को कहा।

युवक भावुक था। सवेरे ही पहुँच गया। ज्ञानी ने पूछा-कैसे आये ? उसने उत्तर दिया पैरों से चल कर।

ज्ञानी ने उसे मिठाई उपहार में दी और कहा-तुम पैरों से चल की मेरे पास तक आये। तभी मिठाई पा सके। ईश्वर रोटी देता तो है, पर देता उसी को है, जो हाथ पैरों के पुरुषार्थ से उसे कमाने और पाने के लिए चलता है। जब मेरा उपहार मिष्ठान, तुम बिना पैरों से चले प्राप्त नहीं कर सके तो भगवान द्वारा दी जाने वाली रोटी कैसे प्राप्त कर सकोगे?

बात समझ में आ गई। दूसरे दिन से युवक अपने काम पर जाने लगा।


अपने रहने की अपनी दुनिया आप बनायें

जिस दुनिया में हम रहते हैं उसमें श्रेष्ठता प्रयत्नपूर्वक तलाश करनी पड़ी है। निकृष्टता के तो हर दिशा में पहाड़ खड़े दिखाई देंगे। नैतिक, पराभव और पतन की परिस्थितियाँ मक्खी, मच्छरों की तरह उपजती , बढ़ती रहती है, पर उपयोगी प्राणियों को तो प्रयत्नपूर्वक ढूँढ़ना और पालना पड़ता है। सुसंस्कृत मनुष्य सदा अल्पमत में रहे हैं फिर श्रेष्ठता का प्रभाव क्षेत्र भी उतना विस्तृत नहीं होता जितना निकृष्टता का। पानी नीचे की ओर धकेलती ही नहीं, पृथ्वी की आकर्षण शक्ति की तरह अपनी ओर घसीटती भी है। सामान्य बुद्धि को साँसारिक विकृतियाँ ही प्रभावित करती है।

संकीर्ण स्वार्थपरता का इन दिनों दौर है। आदर्शों की ओर कदम बढ़ाने की अपेक्षा लोग निकृष्ट क्रिया कृत्यों की ही बात सोचते हैं। उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने की अपेक्षा लोगों को तात्कालिक लाभ कमाने में अधिक रुचि है भले ही उसके लिए अनीति का मार्ग ही क्यों न अपनाना पड़ता हो। परिस्थितियाँ कुछ ऐसी है कि धूर्तों में से कितने ही सफल और सुसम्पन्न भी दीखते हैं। अस्तु सहज ही सामान्य बुद्धि का रुझान नीतिमत्ता की दूरदर्शिता अपनाने की अपेक्षा किसी भी उपाय से तुरन्त लाभान्वित होने की ओर ही होता है। दृष्टि पसार कर हम अपने चारों ओर ऐसा ही वातावरण छाया देखते हैं। उसका प्रभाव भी पड़ता है। बहुमत का अनुकरण मनुष्य की एक ऐसी दुर्बलता है जिसे कठिनाई से ही रोकना और बदलना सम्भव हो पाता है।

श्रेष्ठता की दिशा में चलना हो, यदि उत्कृष्टता और आदर्शवादिता को लक्ष्य बनाना हो तो भी उसके लिए प्रेरक वातावरण बनाना पड़ेगा। ऐसा परिकर जहाँ हो वहाँ रहने का भी प्रभाव पड़ता है। श्रेष्ठ व्यक्तियों का निकटवर्ती वातावरण संपर्क में आने वालों को प्रभावित करता है और उनकी गतिविधियों में उपयोगी परिवर्तन प्रस्तुत करता है। पर ऐसा वातावरण हर जगह हर किसी के लिए कहाँ उपलब्ध होता है, फिर उसमें रह सकने की परिस्थितियाँ कितनों की होती है। जनसाधारण को तो आजीविका उपार्जन एवं परिवार पोषण के क्रियाकृत्यों में ही व्यस्त रहना पड़ता है। दो पाँच दिन कहीं चले भी जाय तो उतने भर से काम भी क्या बनेगा ? अधिक दिन सत्संग का लाभ लेने के लिए जा सकना आर्थिक तथा दूसरे कारणों से कहा बन पाता है।

ऐसी दशा में श्रेष्ठता की दिशा में अग्रसर कर सकने वाला प्रभावोत्पादक वातावरण अपने आप ही बनाना पड़ता है। मस्तिष्क पर छापा छोड़ने वाला एक ऐसा समानान्तर संसार विनिर्मित करना होता है जो स्वयं संलग्न दुनिया के प्रभाव को निरस्त कर सके। यह निर्माण प्रत्यक्ष नहीं परोक्ष ही हो सकता है। स्वाध्याय और चिन्तन के सहारे यह निर्माण खड़ा किया जा सकता है। अपनी रुचि के भविष्य का मार्गदर्शन कर सकने वाले जीवन चरित्रों का संग्रह करना चाहिए। उन्हें ध्यान पूर्वक पढ़ना चाहिए और उनमें जो प्रेरक प्रसंग हो अपनी वर्तमान परिस्थितियाँ कार्यान्वित हो सकते योग्य हो, उन्हें अलग से नोट कर लेना चाहिए। जब भी अवकाश मिले उन प्रसंगों के कल्पना चित्र मस्तिष्क में एक सुनियोजित फिल्म का तरह प्रस्तुत करने चाहिए। श्रेष्ठ मार्ग पर चलते हुए समुन्नत स्थिति तक पहुँचे हुए महामानवों की जीवनियाँ, गतिविधियाँ, नीतियाँ आदि अपने कल्पना लोक में दृढ़तापूर्वक जड़े जमा सके और अनायास ही स्मरण आती रहे तो समझना चाहिए कि बाहरी दुनिया के पतनोन्मुख प्रभात को निरस्त कर सकने वाला स्वनिर्मित वातावरण बनकर तैयार हो गया।

अपनी मानसिक दुर्बलताएँ, अभ्यस्त आदतें, विकृत अभिरुचियाँ, निकृष्टता की ओर खींचती हैं। कुटुम्बियों के स्वार्थ, मित्रों के दबाव तथा चालू लोक प्रवाह अपनी संयुक्त शक्ति से सामान्य मनुष्य को वैसी ही गतिविधियाँ अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं जैसी कि दुनियादारों ने अपना रखी है। श्रेष्ठता को प्रेरणा भर देने वाले और उत्कृष्टता की ओर बढ़ चलने का मार्ग दर्शन करने वाले प्रेरक प्रसंगों को तो इतिहास के पृष्ठो पर ही खोजा जा सकता है। आज भी वैसे जो लोग है उनके साथ मानसिक सम्बन्ध ही बनाया जा सकता है। न तो अपने लिए उनके पास निरन्तर रहना सम्भव है और न वे ही अपना निवास अपने पड़ोस में बना सकते हैं। व्यावहारिक मार्ग एक ही है कि अपनी एक भावनात्मक दुनिया अलग ही बसाई जाय जिसमें श्रेष्ठ महामानवों को ही निवास करने के लिए आमन्त्रित किया जाय। उसमें प्रेरणाप्रद घटनाओं की हलचलें ही दृष्टिगोचर होती रहे, भले ही वे आज की न होकर भूतकाल में ही घटित क्यों न हुई हो। यही बात परमार्थ के सम्बन्ध में भी है। श्रेष्ठ सज्जनों से वार्तालाप कर सकना उनके साहित्य द्वारा बड़ी सरलता पूर्वक सम्भव हो सकता है। जीवित लोगों से परामर्श करने के लिए उनके पास जाने और उन्हें अवकाश होने न होने की भी कठिनाई आती है , पर स्वाध्याय के माध्यम से तो यह सुविधा हर घड़ी उपलब्ध हो सकती है। जिस भी महामानव से कुछ पूछताछ करनी हो उसके साहित्य में से अपने काम के प्रसंग ढूँढ़ने और पढ़ने का कार्य कठिन नहीं सरल है। यह अपनी सुविधा के समय कभी भी किया जा सकता है।

प्रस्तुत समस्याओं का समाधान और प्रगति पथ पर अग्रसर होने का पथ प्रदर्शन कर सकने वाली पुस्तकें खरीदने के लिए कुछ बजट नियत रखना चाहिए। शरीर ओर परिवार पर ढेरों समय और धन खर्च किया जाता है। यदि मन और अन्तःकरण का भी मूल्य महत्व समझा जा सके तो उनके परिपोषण पर कुछ खर्च करते रहना भी आवश्यक प्रतीत होगा। अनुपयोगी समझी जाने वाली बातें की उपेक्षा भी करनी पड़ती है और उन्हीं के लिए पैसे तथा समय की कमी बहाना खोजना पड़ता है। महत्त्वपूर्ण समझे जाने वाली आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तो प्राथमिकता एवं प्रमुखता ही मिलती है। यदि बौद्धिक एवं भावना क्षेत्र का महत्व समझा जा सके और उसके परिष्कृत होने पर मिलने वाले लाभों की कल्पना की जा सके तो निश्चय ही उस प्रयोजन के लिए नियमित रूप से कुछ धन और समय लगाते रहने में तनिक भी कठिनाई प्रतीत न होगी। स्वाध्याय को आहार के समतुल्य ही महत्त्वपूर्ण समझा जाना चाहिए।

ऐसा सत्साहित्य समीपवर्ती पुस्तकालयों में भी मिल सकता है। थोड़ी नासिक फीस देते रहने पर उसकी सुविधा हो सकती है। सही रूप में वापिस लौटाने का विश्वास दिलाया जा सके तो अन्य उदार स्वाध्यायशील व्यक्ति भी अपनी पुस्तकें पढ़ने दे सकते हैं। सरसरी नजर से पढ़ने और पुस्तकें एक ओर पटकते जाने से बहुपठित होने का दावा तो किया जा सकता है, पर वह लाभ नहीं मिल सकता जो स्वाध्यायशीलों को मिला करता है। आवश्यक है कि प्रेरक प्रसंगों और संदर्भों की नोट बुक बनाकर रखी जाय और जो हृदयग्राही लगा हो उसे उसमें नोट करते चला जाय। यह सकल निश्चय ही समुद्र मन्थन के फलस्वरूप निकले हुए रत्नों की तरह बहुमूल्य होगा। इस संग्रह को अवकाश के समय बहुत ध्यानपूर्वक पढ़ा जाय और यह सोचा जाय कि इन प्रसंगों के अनुरूप कदम बढ़ा सकना किस प्रकार सम्भव हो सकता है। सद्विचारों को व्यवहार में उतारने में क्या कठिनाई पड़ेगी और उसका किस तरह किस सीमा तक निराकरण सम्भव हो सकता है।

स्वाध्याय से मार्ग दर्शन मिलता है। घटनाएँ सामने आती है और परामर्श मिलते हैं। पर बात इतने भर से ही नहीं बन जाती। सोचना यह भी होगा कि प्रगति पथ पर चलना आज को स्थिति में कितना और किस प्रकार सुलभ हो सकता है योजना तो हर काम की बनानी पड़ती है। उसके बिना तो छुट पुट दैनिक कार्य भी नहीं हो पाते । कृषि व्यापार आदि में योजनाबद्ध कदम उठाते हैं। सरकारें तो योजना निर्माण विभाग पर ढेरों साधन खर्च करती है। जीवन विकास की प्रक्रिया भी अनायास ही नहीं बन जाती और इस दिशा की प्रगति जादू की छड़ी घुमाने भर से सम्भव नहीं हो सकती। अनभ्यस्त को अभ्यास में उतारना निश्चय ही एक बड़ी बहादुरी का काम है। ढर्रे को बदल कर नये सिरे से कोई नये आधार खड़े करने में सुदृढ़ संकल्प शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। इस परिवर्तन में आने वाली कठिनाइयों की कल्पना करनी पड़ती है और उनके निवारण करने के उपाय खोजते होते हैं किस क्रम से, क्या कदम कब उठाये जाय और किस तरह लम्बी मंजिल को निश्चय और साहस के साथ पूरा किया जाय, इसकी सुव्यवस्थित रूप रेखा बनाकर चलने से ही अभीष्ट मनोरथ सिद्ध होता है।

श्रेष्ठता के मार्ग पर चलने के सत्परिणामों की कल्पना करने से उत्साह बढ़ता है और उस दिशा में उत्कंठा प्रबल होती है। मात्र कठिनाई और हानि की बात सोचते रहने से मन छोटा पड़ता है ओर अचेतन उसे टालने या अस्वीकार करने की भूमिका बना देता है, फलतः सपने ज्यों के त्यों धरे रह जाते हैं। कल्पनाएँ तो उठती है, पर ऐसे ही पानी के बुलबुलों की तरह दूसरे ही क्षण समाप्त हो जाती है। महामानवों ने आदर्शवादिता को दृढ़तापूर्वक अपनाये रहने पर अन्ततः जिन सत्परिणामों को प्राप्त किया है उन पर विचार करने और अपनी स्थिति भी कभी उन्हीं जैसी हो जाने का कल्पना चित्र यदि मनःक्षेत्र पर अधिक स्पष्ट रूप से उतारा जा सके तो उससे निश्चय ही उत्साहवर्धक प्रेरणा और उधर कदम उठाने का साहस बढ़ेगा।

तत्काल थोड़ा सा लाभ उठाने के प्रलोभन में भविष्य को अन्धकारमय बना लेने वाले लोगों के वृत्तांत तो अपने इर्द गिर्द ही खोजे जा सकते हैं। उनके लिए इतिहास पढ़ने या साहित्य पढ़ने की आवश्यकता नहीं है। कितने ही व्यक्ति ऐसे है, जिन्होंने जिस तिस तरह कमाया तो बहुत पर वह दुर्व्यसनों में गँवाते रहे। जो बचा उसे कुपात्रों ने हड़प लिया। इन कुपात्रों में ठग, तस्कर भी हो सकते हैं और तथा कथित प्रिय जन भी। उपभोग वह जिससे हित साधन हो सके। अनुदान वह जिससे सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ सके। इन कसौटियों पर जो खरा नहीं उतरा वह उपयोग और अनुदान अबुद्धिमत्ता पूर्ण ही माना जाएगा। ऐसी ही विडम्बनाओं में उलझा और नष्ट हुआ जीवन किस प्रकार सफल कहा जायेगा। ओछा, हेय एवं निष्कृष्ट जीवन व्यतीत करते हुए किसी प्रकार मौत के दिन पूरे कर लेने में क्या समझदारी रही ? उचित और उपयुक्त यही है कि इस सुर दुर्लभ अवसर का ऐसा उपयोग किया जाय जिससे आत्म गौरव बढ़े अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत हो लोकश्रद्धा बरसे और ईश्वर की प्रसन्नता का आनन्द मिले। यह सार्थकता श्रेष्ठता के सम्मान पर चलने से ही सम्भव हो सकती है। स्पष्ट है कि ऐसे आदर्शवादी प्रेरणाओं से भरा पूरा भावनामय संसार अपने ही हाथों से गढ़ा और खड़ा किया है।


अतृप्त आकांक्षाओं से पीड़ित भूत-प्रेत

जो मनुष्य जितनी अधिक वासनाएँ ओर आकांक्षाएँ अपने साथ लेकर मरता है उसके भूत होने की सम्भावना उतनी ही अधिक रहती है। अमृत आकांक्षाओं का उद्वेग मरने के बाद भी प्राणी को चैन नहीं लेने देता और वह सूक्ष्म शरीरधारी होते हुए भी यह प्रयत्न करता है कि अपने असन्तोष को दूर करने के लिए कोई उपाय, साधन एवं मार्ग प्राप्त करे। साँसारिक कृत्य या उपयोग शरीर द्वारा ही हो सकते हैं। मृत्यु के उपरान्त शरीर रहता नहीं। ऐसी दशा में उस अतृप्त प्राणी की उद्विग्नता उसे कोई शरीर गढ़ने की प्रेरणा करती है। अपने साथ लिपटे हुए सूक्ष्म साधनों से ही वह अपनी कुछ आकृति गढ़ पाता है जो पूर्व जन्म के शरीर से मिलती जुलती किन्तु अनगढ़ होती है। अनगढ़ इसलिए कि भौतिक पदार्थों का अभीष्ट अनुदान प्राप्त कर लेना, मात्र उसकी अपनी इच्छा पर ही निर्भर नहीं रहता। उसके लिए प्रकृति का सहयोग ओर ईश्वरीय विधि व्यवस्था का समर्थन भी चाहिए। तीनों तथ्य मिलने पर ही परिपूर्ण शरीर मिलता है। किन्तु मृतक को एकाकी प्रयत्नों तक ही सीमित रहना पड़ता है, अस्तु वह एक अपनी छोटी सामर्थ्य के अनुसार अनगढ़ शरीर ही रच सकता है। वह इतना ही बन पाता है कि बहुत प्रयत्न करने पर थोड़े समय के लिए दृश्य बन सके और कुछ हरकतें कर सके अन्यथा स्थिति में ही अपना निर्वाह करता रहे।

‘भूत’ अपनी इच्छा पूर्ति के लिए किसी दूसरे के शरीर को भी माध्यम बना सकते हैं। उसके शरीर से अपनी वासनाओं की पूर्ति कर सकते हैं अथवा जो स्वयं करना चाहते थे वह दूसरों के शरीर से करा सकते हैं। कुछ कहने या सुनने की इच्छा हो तो वह भी अपने वशवर्ती व्यक्ति द्वारा किसी कदर पूरी करते देखे गये है।

इसके लिए उन्हें किसी को माध्यम बनाना पड़ता है। हर व्यक्ति माध्यम नहीं बन सकता। उसके लिए दुर्बल मनःस्थिति का-आदेश पालन के लिए उपयुक्त मनोभूमि का व्यक्ति होना चाहिए। प्रेतों के लिए सवारी का काम ऐसे ही लोग दे सकते हैं। मनस्वी लोगों की तीक्ष्ण इच्छा शक्ति उनका आधिपत्य स्वीकार नहीं करतीं।

ब्राजील के अति प्रतिष्ठित दैनिक पत्र ओ क्रूजीरों के प्रतिनिधियों ने आँखों देखा और जाँचा हुआ समाचार छापा था कि साओपाअलो राज्य के इटापिका नगर के एक किसान सिडकान्टो के घर पर न जाने कहाँ से पत्थर बरसते थे और घर में रहने वालों को घायल करते थे। भूत उपचारकों से लेकर अन्य सभी प्रकार के उपाय जब इसकी रोकथाम में असफल हो गये तो पुलिस को सूचना दी गई। वे लोग भी रहस्य पर से पर्दा न उठा सके तो विषय सर्वसाधारण की चर्चा का बन गया और ब्राजील ही नहीं योरोप के अन्य विशिष्ट व्यक्ति भी तथ्य का हर दृष्टि से पता लगाने के लिए पहुँचे, पर न तो घटना क्रम को झुठलाया जा सका और न उसका रहस्योद्घाटन किया जा सका।

इंग्लैण्ड के सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी और दार्शनिक सी0 ई0 एम0 जोड ने बी0 बी0 सी0 पर एक परिसंवाद में भाग लेते हुए कहा था-मैं भूतो पर विश्वास नहीं करता था, पर एक दिन जब मेरे ऊपर प्रयोगशाला में बैठे बैठे चारों ओर से साबुन की टिकिया बरसनी आरम्भ हो गई और खोज करने पर उसका कोई आधार नहीं सूझ पड़ा तो मेरा विश्वास बदल गया और मैं अब भूतो के अस्तित्व को मानता हूँ।

कैंब्रिज विश्वविद्यालय में प्रेतात्माओं सम्बन्धी शोध कार्य करने के लिए एक विशेष विभाग ही खुला हुआ है।

अमेरिका की साइकिल रिसर्च फाउण्डेशन द्वारा अनेक वैज्ञानिकों और बुद्धिजीवियों के सहयोग से सुनियोजित शोध कार्य चल रहा है।

महाकवि विलियम ब्लैक के बारे में कहा जाता है कि वे माइकेल ऐजिलो भोजेज क्लीओ पेट्रा की स्वर्गीय आत्माओं के साथ रात्रि के एकान्त में वार्तालाप करते थे। वे आत्माएँ आकर उनके साथ महत्त्वपूर्ण विषयों पर वार्तालाप करती थीं।

कोई बीस वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड में पोर्टस साउथ उसमें बन्दूक की गोली इस तरह लगती कि शीशे , छत या दरवाजे पर एक इंच का छिद्र साफ, सीधा, गोल और व्यवस्थित होता। मानो किसी मशीन से किया गया हो। ऐसी घटनाएँ लगातार होती रही। क्षेत्र में आतंक फैल गया।

पुलिस की छानबीन तथा स्काटलैंड यार्ड की वैज्ञानिक जाँच इस घटना का सुराग न लगा सकी। यहाँ तक कि नगर पालिका ने पुलिस के विरुद्ध प्रस्ताव पास किया कि पुलिस जाँच करने में असफल रही है। सुरक्षाएँ की गई किन्तु वे बेकार रही। धीरे धीरे आवागमन ठप्प होने लगा।

यह भी कहा जाने लगा कि इस क्षेत्र में मृत्यु किरणें छिटक कर ऐसा कर रही है। किन्तु वैज्ञानिकों ने इसका खण्डन किया। कुछ समय पश्चात् ऐसी घटनाएँ अपने आप बन्द हो गई। पर खोज तो वही की वही है।

परोक्ष जीवन और अदृश्य जगत पर विश्वास करने वाले इस घटना का सम्बन्ध भूत काल से जोड़ते हैं। क्लेयर माउण्ट स्टेट पूर्व थी। उसने विलिथ केन्ट नामक ठेकेदार से एक झील तैयार करवाई। तैयार होने पर ड्यूक ने उसका पैसा दबा लिया और उसे मार कर उसी झील में फिंकवा दिया। वह किसी भी प्रकार झील से निकल आया, पर दो दिन बाद उसकी मृत्यु हो गई। शायद वही क्षुब्ध आत्मा ड्यूक मोटर मालिक के प्रति घृणा करने लगी हो। ड्यूक के साथ साथ मोटरों से भी घृणा करने लगी है। ड्यूक तो रहा नहीं, पर मोटरों से वह आत्मा इस प्रकार का वैर ले रही हो।

एक अन्य किम्वदन्ती यह है कि यह लार्ड क्लाइव की विक्षुब्ध आत्मा है जिसे मोटरों का शोर नापसन्द है। लार्ड क्लाइव ईस्ट इण्डिया कम्पनी की ओर से हिन्दुस्तान गया। वहाँ उसने छल, कपट द्वारा अंग्रेजी राज्य बढ़ाया तथा अपना व्यक्तिगत स्वार्थ भी सिद्ध किया। वह इंग्लैण्ड गया तब करोड़ों की सम्पत्ति यहाँ से साथ ले गया। उससे उसने क्लेवर माउण्ट का इलाका खरीद कर उस जंगल में एक महल बनवाया। उसमें वह अनेक खानसामा, रसोइयों, नौकरों, वैश्याओं के साथ रहने लगा। वहाँ वह पूर्व के कुकृत्यों को बार बार स्मरण करके अर्धविक्षिप्त सा हो गया। उसे मोटरों की आवाज नापसन्द थी। उसने सनक में आकर उस सड़क को खतम करवा दिया और मोटरों के लिए 12 मील दूर रास्ता बनवा दिया।

क्लाइव भारत में किये गये कुकर्मों की गाथाओं को स्वयं को ही सुनाया करता। एक दिन असह्य मानसिक तड़पन में उसने आत्म हत्या कर ली।

सम्भव है, वही क्लाइव की आत्मा उन मोटरों से द्वेष रखने के कारण अनोखे शस्त्र से मोटरों पर आक्रमण करती हो। परोक्ष जीवन और अदृश्य पर विश्वास करने वाले ऐसा ही मानने लगे है।

अब्राहम क्यूमिग्ज 18 वीं सदी के अन्तिम चरण से 19 वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक क्रियाशील एक पादरी थे। सन 1826 में उन्होंने एक किताब छपवाई। सतहत्तर पृष्ठीय इस पुस्तिका का नाम है-इम्मार्टलिटि प्रुब्ड वाइ द टैस्टीमोनी आफ साइन्स।”इसमें एक कप्तान बटलर की मृत पत्नी की प्रेत छाया के बारे में प्रामाणिक विवरण है। इस ग्रन्थ की मूल प्रति न्यूयार्क पब्लिक लाइब्रेरी में सुरक्षित है। पादरी क्यूमिग्ज ने इस पुस्तिका में 30 व्यक्तियों की शपथपूर्वक की गई घोषणा छापी है कि उन्होंने उस मृतात्मा को देखा व सुना था। स्वयं पादरी ने उसे कई बार देखा व सुना था।

अमरीका के कैलीफोर्निया शहर के इन्डोवरी मुहल्ले में एक भुतहा मकान था। वहाँ कोई भी रहने को तैयार न होता। चार साहसी छात्रों ने एक बार उसे किराये पर लिया। वे भूत प्रेतों की मान्यता को निरी भ्रान्ति मानते थे। पर एक दिन सहसा आँगन में कुर्सियों पर बैठे बैठे उन्होंने पाया कि उनकी कुर्सियाँ वायु में ऊपर उठकर सात आठ फुट की ऊँचाई पर स्थिर हो रही। फिर एक रात सहसा पत्थर वर्षा होने लगी। खोजबीन से मालूम हुआ। वहाँ एक डाक्टर 4-5 वर्ष पूर्व आत्महत्या कर चुका है, उसी की प्रेतात्मा का यह करिश्मा है। छात्रों ने मकान छोड़ दिया।

धर्मयुग के 1 दिसम्बर 1963 के अंक में श्री दामोदर अग्रवाल ने भी ऐसी ही एक आपबीती ही सुनाई है। उनके घर में सफाई के बावजूद दुर्गन्ध आने, अल्मारी में ताले में बन्द पूरियाँ रात को गायब हो जाने ओर ताला ज्यों का त्यों बन्द रहने, धुले बर्तन सुबह जूठे मिलने , आँगन में रखें लड्डुओं की जगह गीली मिट्टी बचे रहने,मिठाइयों के रात भर में सड़ जाने, रसोईघर में अजनबी पंजों के निशान अंकित होने और दीवारों आदि पर उँगलियों के चिन्ह दिखने तथा दूध का भरा गिलास पल भर में गायब होने की घटनाएँ घटती थी।

नवनीत (हिन्दी डाइजेस्ट) में सितम्बर 1969 में भी एक घटना छपी थीं अमरीका के श्री रोजेनहीम एडवोकेट के घर में सहसा टेलीफोन की घण्टियाँ टनटना उठती, ट्यूबलाइट बिना स्विच दबाए जल उठती, बल्ब जलकर फूट जाते, टेलीफोन उठाने पर गोलियाँ की बौछार सुनाई पड़ती। लगातार छानबीन व चौकसी के बावजूद शरारती व्यक्ति या समूह का पता न चला।

“फ्रीवर्ग इन्स्टीट्यूट आफ पैरासाइकोलाजी” के अध्यक्ष परामनोवैज्ञानिक प्रो0 ह्मस बेन्डर ने मामले की पड़ताल की और पाया कि मामला साइकोकाइनेसिस यानी मनोगति क्रम का है। मनोगति क्रम का अर्थ है, ऐसी सूक्ष्म मानसिक शक्तियाँ, जो भौतिक पदार्थों को नियन्त्रित निर्देशित कर सके। प्रो0 बोल्डर के अनुसार भूत प्रेत के रूप में भी ऐसी मानसिक अवस्था सम्भव है।

किसी जमाने में अफ्रीकी देश नाइजीरिया अंग्रेजों का गुलाम था। उसी क्षेत्र में एक अंग्रेज अफसर फ्रैंक हाइव्स कार्यवश इसुइन्गु गया। वहाँ उसने एक टूटे फूटे डाक बंगले में ठहरने का निश्चय किया। इस पर इसुओर गुकवीले के आदिवासियों ने समझाते हुए उसमें ठहरने के लिए मना किया ओर उसमें एक प्रेत का निवास होना बताया।

किन्तु अफसर ने इसे अन्धविश्वास समझा कर उसी डाक बंगले में रात बिताने का निर्णय लिया। यों तो मजदूरों ने खण्डहर की सफाई आदि की व्यवस्था कर दी किन्तु रात में वहाँ ठहरने के लिए कोई राजी नहीं हुआ। अंग्रेज अफसर ने अकेले ही वहाँ रात बिताने का निर्णय किया।

अर्द्ध रात्रि तक अफसर आराम से सोया। किन्तु इसके बाद उसकी मच्छरदानी खिंचनी प्रारम्भ हो गई। असह्य दुर्गन्ध फैलने लगीं। तेज हवा के झोंकों से खिड़कियाँ खुल गई। मेज पर रखी हुई प्लेटें नीचे गिर गई। ऐसा आभास होने लगा कि कोई आकृति टहल रही है। पिस्तौल लेकर अफसर बाहर निकल आया।

बाहर कोई नहीं था अफसर ने कटु शब्द कहे, चारों ओर आवाज दी किन्तु कोई उत्तर नहीं मिला। तब वह पुनः भीतर जाकर लेट गया। तभी फिर वह आकृति दिखी ओर उसकी शकल स्पष्ट होने लगी। उसका चेहरा भयानक था। अफसर भयभीत और स्तब्ध हो गया। धीरे धीरे वह आकृति पीछे हटती हुई जाकर खम्भे पर चढ़ने लगी। तभी अफसर ने दनादन दो गोलियाँ दागीं। किन्तु उस पर कोई असर नहीं हुआ। छाया तो ओझल हो गई, पर भयाक्रान्त अफसर चीख के साथ बेहोश हो गया। आदिवासी आस पास ही थे। चीख सुनते ही वे दौड़ आये और बेहोश अफसर को उठाकर चौपाल में ले गये।

दूसरे दिन होश में आने पर अफसर ने रात वाली घटना के तारतम्य में डाक बगलें का पिछला इतिहास आदिवासियों से पूछा। उन्होंने बताया कि इस डाक बगलें के स्थान पर एक जजू देवता का टीला था। जहाँ नर बलि और पशु बलि दी जाती थी। किन्तु अंग्रेजों ने इन मूर्तियों को हटाकर टीला साफ करवाकर इसके स्थान पर डाक बंगला बनवा दिया। इसका भयंकर विरोध देव पुरोहित ने किया। अंग्रेजों के जाने के बाद देव पुरोहित ने गाँव वालों से कहा कि इस डाक बंगले को साफ करके पुनः जजू देवता की स्थापना कर दी जावे और पुनः नर बलि और पशु बलि प्रारम्भ कर दी जावे। किन्तु भयभीत आदिवासी ऐसा न कर सके। पुरोहित बड़बड़ाता रहा और विक्षिप्त स्थिति में बोलता भी कि तुम इस डाक बंगले को आज साफ मत करो परन्तु एक दिन इसे कोई न कोई जलाकर नष्ट करेगा ही। अक्सर वह मन्त्र पढ़ते पढ़ते उस बंगले का चक्कर काटता रहता। एक दिन वही पुरोहित उसी बंगले में फाँसी लगाकर मर गया। तब से वही प्रेत बनकर इस बंगले में किसी को नहीं ठहरने देता है। इस बंगले में जो भी ठहरता है, विचित्र प्रकार की दुर्गन्ध, कभी भीषण उष्णता, कभी अति ठण्डक, हवा बन्द होते हुए बंगले के अन्दर आँधी तूफान आदि का अनुभव करता है। फ्रैंक हाइव्स ने अपने अनुभव के आधार पर इन घटनाओं को भी सत्य माना।

उसने उस डाक बंगले को जलाकर भस्मी भूत करवा दिया। इस तरह पुरोहित की भविष्य वाणी सत्य हुई।

विश्वविख्यात नर्तकी अनापावलोवना की मृत्यु स्मृति में उसकी शिष्या ने एक नृत्य समारोह आयोजित किया तो उसकी मृतात्मा भी साथ साथ नृत्य कर रही थी। दर्शकों ने उसे अपनी आँखों से देखा।

इटली के प्रसिद्ध वायलिन वादक पागगिनी की मृत्यु स्मृति में आयोजित समारोह में मृतात्मा का प्रिय वायलिन स्वयं ही बज उठा और आवाजें आई कि मैं पागगिनी हूँ-मैं पागगिनी हूँ। दर्शकों ने इसे प्रेतात्मा समझा।

यह सर्वविदित था कि नील नदी की घाटी में अवस्थित तूतन खामन की समाधि सबसे अधिक रहस्यमय और संपत्ति से भरी पूरी है। इसको लोक खोजी लोग नहीं छोड़ पा रहे थे। इतनी मौतें देखते देखते हो जाने के कारण इंग्लैण्ड वासियों में आतंक छा गया और प्रेतात्माओं पर अविश्वास करने वाले विश्वास करने के लिए बाध्य हो गये।

यह खुदाई हावर्ड कारटर (पुरातत्व विभाग सम्हालने वाले विद्वान्) तथा लार्ड कार्नावन (उत्साही धनपति ) के साझेदारी में हुई थी। इसमें उन्हें सर्वाधिक हानि उठानी पड़ी।

कतिपय अमेरिकी और अंग्रेज सम्मिलित रूप में मिश्र की समाधियों की खोज करके पुरातत्व के रहस्यों, स्वर्ण सम्पदा तथा उन प्रेतात्माओं का पता लगाने गये, जो इन समाधियों की रक्षा कर रही थी। एक समाधि पर स्पष्ट लिखा हुआ था-

“जो पुरानी कब्रों से छेड़छाड़ कर मृतात्माओं की शान्ति भंग करेगा उसे अकाल मृत्यु ख जायेगी।”

लार्ड कार्नार्वल ने अपने परिवार एवं सहचारी मंडल सहित समाधियों की खुदाई प्रारम्भ की। इसका विपरीत परिणाम सामने आया कि लगभग 22 व्यक्ति कुछ ही समय में काल कवलित हो गये। लार्डवेस्टरी अचानक ही छत पर चढ़कर कूदें ओर मर गये। उनका पुत्र जो खुदाई का इञ्चार्ज था। रात्रि को भली भाँति सोया था, प्रातः मरा हुआ मिला। डा0 अर्चिवाल्ड डग्लस रीड एक मनी का एक्सरे करते हुए हार्ट फेल के कारण मर गये। आर्थर बाइगाल को मामूली बुखार सदा के लिए ले गया। आव्रेहर्वर्टन अचानक ही पागल होकर आत्महत्या कर बैठे। लार्ड कार्नार्वल की पत्नी लेडी एलिजाबेथ तुच्छ कीड़े की शिकार होकर मर गई।

व्हाइट हाउस (अमरीकी राष्ट्रपति का निवास स्थल) तो प्रसिद्ध ही इसके लिए है कि वहाँ अधिकांश स्वर्गीय अमरीकी राष्ट्रपतियों की रूहें जब तब दिखाई पड़ती है। परिणाम स्वरूप जब भी कोई नया राष्ट्रपति निर्वाचित होकर व्हाइट हाउस में रहने आता है, तब उसकी पत्नी को निवर्तमान राष्ट्रपति की पत्नी परम्परानुसार व्हाइट हाउस के बारे में जानकारी देती है। उस समय वह भूतों के अस्तित्व व स्थलों की जानकारी निश्चित तौर पर देती है। 18 एकड़ भूमि पर विनिर्मित यह भव्य प्रासाद व्हाइट हाउस, जो भौतिक दृष्टि से विश्व के सर्वाधिक समृद्ध व विकसित देश के राष्ट्रपति का निवास स्थान है, मरणोत्तर जीवन की सत्यता का, भूतों के बहने, मानो बरबस ध्यान दिलाता रहता है।

व्हाइट हाउस में अब तक स्वर्गीय अब्राहम लिंकन को लोगों ने विभिन्न मुद्राओं में देखा है। कभी राष्ट्रपति एडास की स्वर्गीय पत्नी कपड़े सुखाती देखी गई है। कभी राष्ट्रपति क्वीक्लैंड की स्वर्गीय पत्नी हँसती या चीखती सुनी गई है,

तो कभी राष्ट्रपति मैडीसन की स्वर्गीय पत्नी अपने गुलाब के बगीचे के आस पास खड़ी या टहलती देखी गई है।

प्रसिद्ध भूतपूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का भूत तो वहाँ सैकड़ों बार देखा गया। राष्ट्रपति ट्रूमैन सहम गये। चुपचाप द्वार बन्द किए और बिस्तर पर जा लेटे।

हालैंड की साम्राज्ञी बिल्हेल्मिना अमरीका भ्रमण के समय विशिष्ट अतिथि के नाते व्हाइट हाउस में ही ठहराई गईं। रात उनके दरवाजे पर सहसा दस्तक हुई। द्वार खोलने पर उन्होंने सामने श्री लिंकन के भूत को स्पष्ट देखा। दिन में साम्राज्ञी ने अपने मेजबान अमरीकी राष्ट्रपति रुजवेल्ट को यह घटना बताई। रुजवेल्ट ने बताया कि लिंकन के भूत के कारण ही श्रीमती रुजवेल्ट को अपना शयनकक्ष बदलना पड़ा, क्योंकि वहाँ लिंकन महोदय अकसर रात में आ धमकते। श्री रुजवेल्ट की सेक्रेटरी कुमारी मेरी ने भी लिंकन को विभिन्न मुद्राओं में अनेक बार देखा।

श्री अब्राहम लिंकन का मृत्यु के बाद भी व्हाइट हाउस से लगाव क्यों? भूत रूप में वे क्यों वहाँ दिखते है? भारतीय दर्शन के अनुसार इसका कारण यह है कि श्री लिंकन में व्हाइट के प्रति गहरी आसक्ति शेष थी।

इसी तरह भूतपूर्व राष्ट्रपति क्वीक्लैंड की स्वर्गीय पत्नी की रूह भटकती पाई गई है। उनका एक बच्चा वही जन्म लेकर कुछ दिनों बाद मर गया। माना जाता है कि श्रीमती क्वीक्लैंड को उसी बच्चे का मोह भटकाता है। उनकी हँसी और चीखें वहाँ कई बार सुनी गई है।

भूत प्रेतों पर विश्वास न रखने वाली राष्ट्रपति विल्सन की पत्नी ने एक बार व्हाइट हाउस के गुलाब के बगीचे का स्थान बदलना चाहा। यह उद्यान राष्ट्रपति मैडीसन की स्वर्गीय पत्नी ने अपने समय में लगवाया था। श्रीमती विल्सन ने उद्यान का स्थान बदलने का माली को निर्देश दिया और माली उद्यान के पास पहुँचा तो वहाँ स्वर्गीय श्रीमती मैडीसन उसे खड़ी दिखी। भयभीत माली ने जाकर श्रीमती विल्सन को घटना बताई तो वे स्वयं वहाँ पहुँची। उन्होंने भी वहाँ श्रीमती मैडीसन का भूत देखा। उन्हें ऐसा भी लगा मानो श्रीमती मैडीसन उनसे कर रही है कि बगीचे की जगह बदली, तो अच्छा न होगा। श्रीमती विल्सन ने वह योजना रद्द कर दी।

भूतों के अस्तित्व से किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है। वे भी मनुष्यों की तरह ही जीवनयापन करते हैं। मनुष्य धरती पर स्थूल शरीर समेत रहते हैं, भूत सूक्ष्म शरीर से अन्तरिक्ष में रहते हैं। तुलनात्मक दृष्टि से उनको सामर्थ्य और साधन जीवित मनुष्यों की तुलना में कम होते हे इसलिए वे डराने के अतिरिक्त और कोई बड़ी हानि नहीं पहुँचा सकते। डर के कारण कई बार घबराहट, चिन्ता, असन्तुलन जैसी कठिनाइयाँ उत्पन्न हो जाती है। भूतोन्माद में यह भीरुता और मानसिक दुर्बलता ही रोग बनकर सामने आती है। वे जिससे कुछ अपेक्षा करते हैं उनसे संपर्क बनाते हैं और अपनी अतृप्तिजन्य उद्विग्नता के समाधान में सहायता चाहते हैं। संपर्क समय का अनभ्यस्त अजूबापन ही प्रायः डर जाने का मुख्य कारण होता है।

भूतो के अस्तित्व को सिद्ध करने वाली घटनाओं से एक तथ्य तो स्पष्ट होता है कि मरने के पश्चात् जीवन का अन्त नहीं हो जाता है जैसा कि भौतिक विज्ञानी पिछले दिनों आत्मा के अस्तित्व को अस्वीकार करते हुए कहते रहे हैं। शरीर के साथ ही आत्मा मर नहीं जाता, वरन् अपनी सत्ता आगे भी बनाये रहता है इस सत्य को यदि स्वीकार कर लिया जाय तो भौतिकवाद और अध्यात्मवाद के बीच की एक बहुत बड़ी खाई पट सकती है। भूतो का अस्तित्व स्वीकार करने पर इस खाई के पटने में सहायता ही मिलती है।


मोह सीमाबद्ध होता है, प्रेम नहीं

भौतिकता के प्रवाह ने आज साँस्कृतिक धरातल को बौना और भ्रष्ट कर दिया है। प्रेम जैसे विशुद्ध आत्म-तत्व का भी अर्थ आज संकीर्ण हो गया है। आज प्रेम का अर्थ युवा नर-नारियों के बीच चल रही वासनात्मक गतिविधियाँ हो गया है। कला के सभी वर्तमान रूपों में-चित्र काव्य, कथा, उपन्यास, सिनेमा आदि में प्रेम को वासनात्मक माँसलता, यौनावेग तथा उच्छृंखल मनस्तरंगों के ही रूप में चित्रित किया जाता है। यह ऐसा ही है, जैसे कोहरे को धुँआ समझ लिया जाय, या मरुभूमि में प्रकाश की झिलमिलाहट को जल समझ बैठा जाय! काम वस्तुतः प्रेम का आभास तथा भ्रम है। दोनों में बहुत अन्तर है। प्रेम के विकास के साथ साथ काम संकीर्ण होता जाता है। काम सृजनात्मक शक्ति की पतनोन्मुख प्रक्रिया है। प्रेम सृजनात्मक शक्ति का ऊर्ध्वीकरण है। पूर्ण प्रेम में काम शून्य ही रह जाता है। बीच की स्थितियाँ भी इसी क्रम से उच्च या निम्न होती है। जहाँ काम जितना ही न्यून होगा, वहाँ प्रेम उतना ही अधिक होगा। लेकिन काम की यह न्यूनता दमन द्वारा नहीं लाई जा सकती। दमित काम से प्रेम नहीं प्राप्त होगा, कुंठाएँ और रोग ही प्राप्त होगे।

प्रेम और काम दोनों है-मन की ही स्थितियाँ। अतः मन के प्रशिक्षण पर ही दोनों का स्वरूप निर्भर है। प्रेम का विकास अपने परिवार से भी प्रारम्भ हो सकता है। प्रेम का अर्थ है-जिससे प्रेम किया जाय उसकी जीवन प्रक्रिया में स्वयं भी सहभागी बनने की प्रचण्ड आकांक्षा उसके जीवन स्पन्दन से स्वयं भी स्पन्दित होने की इच्छा। इस प्रकार प्रेम का अर्थ हुआ अपनापन। आत्मीयता। यह अपना आपा जितना अधिक विस्तृत होता जाएगा, उतने तक ही प्रेम की परिधि फैलती जाएगी।

प्रेम के अंकुर परिवार के माध्यम से भी पल्लवित विकसित हो सकते हैं। किशोर को अपने ही मजे मौज की चिन्ता होती है। बड़े होने पर मात्र अपनी नहीं, पत्नी के भी शोक मौज की चिन्ता वैसी ही होने लगती है। फिर यह क्षेत्र बच्चों में फैलता है। अपने को दूध न मिले, कोई बात नहीं, बच्चों को मिलना ही चाहिए। खुद सस्ते, फटे पुराने कपड़े पहनेंगे, पर बच्चों की ड्रेस, फीस पुस्तकों का खर्च जुटाना ही चाहिए। इस प्रकार परिवार प्रेम प्रशिक्षण की प्राथमिक पाठशाला बन जाता है। शौक, मौज से फैलकर बात अपने व परिवार के सदस्यों के व्यक्तित्व परिष्कार तक जा पहुँचती है।

पर यहीं तक सीमित रह जाना तो प्यार को सड़ाना है। प्रेम का आन्तरिक अक्षय प्रवाह सीमित कर दिए जाने पर पक्षपात से जुड़ जाता है। फिर ध्यान प्रेम पर नहीं-प्रिय पदार्थ या व्यक्ति पर जा टिकता है। यह विस्मृत कर दिया जाता है कि प्रेम का अमृत निर्झर तो अपने चित्त में सदा प्रसन्नता प्रफुल्लता ही उत्पन्न करता है। साथ ही वह प्रिय पात्र को भी पवित्र उत्कृष्ट बनाता है। प्रिय पात्र के दोषों को यह प्रेम प्रवाह परिमार्जित करे, तभी वह प्रेम है। यदि दोषों दुर्गुणों को धोने के स्थान पर, उन्हें बढ़ाने की इच्छा होने लगी, तब वह प्रेम की सड़न ही कहलायेगी। इसे ही मोह कहते हैं। इस मनोदशा में न तो स्वयं का चित्त प्रसन्न मुक्त रहता है न ही प्रियपात्र की आन्तरिक प्रसन्नता बढ़ती है। दोनों ओर जहाँ गन्दगी, दुर्गुण ही बढ़े, वह मोह का गन्दा नाला ही हो सकता है, प्रेम गंगाजल कदापि नहीं। अवांछनीयताओं के साथ समझौता मोह कर सकता है, प्रेम का तो संकल्प और उद्देश्य अवांछनीयताओं को धो बहाना ही होता है। किसी वस्तु से भी यदि प्रेम किया जाता है, तो उसे स्वच्छ, सुन्दर, सुरक्षित और सुव्यवस्थित रखने के लिए सदा जागरूक रहा जाता है। फिर व्यक्ति तो वस्तु से बहुत अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। उसकी श्रेष्ठताएँ बढ़ाने के प्रयास क्यों नहीं किए जायेंगे? यदि दोषों को ही बढ़ाया गया। तब तो यही अर्थ निकला कि उस व्यक्ति को हम जिन विशेषताओं के आधार पर तौलते हैं तथा याद करते हैं, वे उसकी उत्कृष्टताएँ नहीं, अपितु वे मलिनताएँ ही हैं, जिन्हें हम बढ़ा रहे

हैं। गहरे अर्थों में यह उस व्यक्ति का भी तिरस्कार ही है, स्वयं अपना तिरस्कार तो है ही। इसे प्रेम कदापि नहीं कहा जा सकता। प्रेम प्रगतिशील होता है आगे बढ़ता तथा बढ़ाता है। प्रतिगामी नहीं हो सकता। ऐसी मैत्री प्रेमतत्व को कलंकित ही करती है, जो प्रियपात्र को पतन के गर्त से न निकाल सके। सघन मित्रता एवं सद्भाव रखते हुए भी प्रेम की अवांछनीयताओं को सहयोग देना तो दूर, उन्हें सहने से भी इंकार किया जा सकता है। यदि प्रेम सच्चा हुआ, तो सम्बद्ध व्यक्ति उससे वंचित होने की तुलना में अपने बड़े से बड़े दुर्गुण से वंचित होने का साहस दिखलाना ही अधिक पसन्द करेगा। यदि ऐसा नहीं होता, तो उसे मैत्री और प्रेम नहीं, पारस्परिक सन्तुष्टि का छलावा मात्र ही माना जाना चाहिए।

सच्चा प्रेम कभी भी असफल नहीं होता क्योंकि वह प्रतिदान पर टिका ही नहीं होता। प्रेम अपने आप में परिपूर्ण है। सेवा-सहायता ही उसका प्रयोजन है।

प्रेम वस्तुतः आदर्शों से किया जाता है। मनुष्य उसके माध्यम हो सकते हैं। पर प्रेम होता आदर्शों से ही है। इसीलिए वह निःस्वार्थ होता है। उसमें न तो असफलता की सम्भावना है, न शिकायतों का अवसर। वह किसी व्यक्ति से आरम्भ तो हो सकता है, पर वही सीमाबद्ध नहीं रह सकता। सीमित तो मोह ही रहता है।

यह मोह स्वयं को त्रास ही देता है। उल्लास नहीं। आन्तरिक उल्लास प्रेम से उत्पन्न होता है, मोह से नहीं। मोह एक तरह की ग्रन्थि है, मन की कुटिल जटिल दशा है। प्रारम्भ में उसमें भी आनन्द की ही अनुभूति होती है, क्योंकि है वह प्रेम का ही विकृत प्रतिबिम्ब। जन्मजात परिवेश में पारिवारिक सदस्य ही अधिक समीप होते हैं। फिर जीवनक्रम में अन्य अनेकों वस्तुओं-व्यक्तियों से भी सम्बन्ध के अवसर आते हैं। सम्बन्ध हुए, तो उनके प्रति ममत्व जुड़ता है। अनुकूल प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर यही ममत्व घनीभूत होता जाता है। यह घनीभूत ममत्व जब उचित अनुचित की मर्यादा और विवेक को भुला बैठता है तो वह राग ओर मोह बन जाता है। राग अपने भीतर पक्षपात की दुष्प्रवृत्ति को फैलाता है। साथ ही दूसरों के मन में द्वेष का कारण बन जाता है। जिसके प्रति राग या मोह होता है, उसकी विकृतियों को व्यक्ति सहता है। इस तरह राग मोह प्रियपात्र में विकृतियों के ही उभार का कारण बनता है। फिर जब उस प्रियपात्र से की गई अपेक्षाएँ पूरी नहीं होती, तो स्वयं को निराशा एवं ग्लानि का अनुभव करना पड़ता है। इस प्रकार मोह अविवेक एवं असंतुलन से उत्पन्न मानसिक प्रतिक्रिया है। जबकि प्रेम सर्वत्रव्यापी सर्वोच्च सत्ता की अविकल अनुभूति है। वह आत्मा का स्वाभाविक गुण है और आत्मीयता की निश्छल सम्वेदना है। आत्मा आनन्द का स्रोत है। इसलिए आत्मीयता की परिधि जितनी अधिक विस्तृत की जायेगी, आनन्द का अनुपात उतना ही बढ़ता जायेगा। घट घट में व्याप्त आत्मसत्ता से एकाकार हो जाने पर आनन्दमात्र ही जीवन व्याप्त विस्तृत हो जाता है। आत्मा का प्रकाश पड़ते ही सभी कुछ सुन्दर व आनन्दप्रद दीखने लगता है। सर्वत्र आलोक उल्लास ही बिखरा दिखाई पड़ने लगता है। आनन्द का मूल स्रोत प्रेम ही है।

प्रेम सर्वोत्कृष्ट साधना है। साधना का अर्थ है स्तरोन्नयन। धन की साधना का अर्थ आज जितने धनी है, कल उससे भी अधिक धन सम्पन्न होना। स्वास्थ्य साधना तथा अन्य सभी साधनाओं की भी यही स्थिति है। प्रेम की साधना का भी अर्थ है- प्रेम के क्षेत्र का निरन्तर विस्तार। जिसने अपनी प्रेमभावनाओं का विकास कर लिया, उसके जीवन में उल्लास, उत्साह, उमंग, सक्रियता, सहयोग सेवा ओर आनन्द भरा रहता है। अहिर्निशि प्रेम भावनाओं में डूबी अंतर्दशा ही सच्ची आस्तिकता है।


प्रकृति के अनुदान अन्य प्राणियों को भी मिले है?

मनुष्य को अन्य प्राणियों की तुलना में बुद्धि की मात्रा अधिक मिली है। फिर भी ऐसा नहीं समझना चाहिए कि अन्य जीव जन्तु सर्वथा असहाय हैं। उनमें से अनेकों को ऐसी विशेषताएँ प्राप्त हैं जिनके लिए मनुष्य को ईर्ष्या हो सकती है। निस्सन्देह कितनी ही विशेषताएँ अन्य प्राणियों को ऐसी उपलब्ध है कि यदि वे मनुष्य शरीर के अनुपात से उसे भी मिली होतीं तो वह कल्पित देव दानवों जैसा सामर्थ्यवान होता है।

विभाजन में मनुष्य के हिस्से में बुद्धि की मात्रा अधिक आई, यह ठीक ही हुआ, पर इतने भर से ईश्वर पर यह आक्षेप नहीं लगाया जा सकता कि उसने दूसरों को कुछ दिया ही नहीं है। अपनी स्थिति में सुविधापूर्ण जीवन यापन करने की दृष्टि से जो आवश्यक था, उसे उन्हें देने में भी सृष्टा ने कोई कमी नहीं रखी है।

रेगिस्तान का जहाज कहा जाने वाला ऊँट एक बार में 70 लीटर जल पी जाता है और तीन चार दिन तक मरुभूमि में बिना पानी के रह जाता है। सहारा रेगिस्तान जैसे शुष्क प्रदेश में ऊँट जैसे प्राणी को ही वाहन बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वहाँ पानी का इतना अभाव है कि मनुष्य को भी दुर्लभ है तो ऊँट को कहाँ से उपलब्ध करवाया जावे ? किन्तु ऊँट एक ही समय में 70 लीटर तक पानी पीकर अपने भीतर की थैली में सुरक्षित रखे रहता है। जिसका उपयोग वह कड़ी धूप में किया करता है। वनराज शेर यों तो किसी का भी शिकार कर लिया करता है। किन्तु जिराफ़ उसे 5 मील दूर भी दीख जावे तो वह पास के अन्य शिकार को छोड़ कर उसे पहले मारने का प्रयत्न करेगा, जिराफ़ शेर को गुलाब जामुन सा स्वादिष्ट और प्रिय है। किन्तु प्रकृति ने जिराफ़ की रक्षा के लिए उसकी खाल इस प्रकार की बनाई कि वे पेड़ों के बीच ऐसे छिप जाता है कि पास ही होने पर भी शेर उसे पहचान नहीं पाता।

सामान्यतः जीवों का आकार ही उनकी शक्ति का द्योतक माना जाता है। नेवला इसके कुछ अपवादों में से एक है। वह अपने आकार से बहुत अधिक शक्ति रखता है। सांभर जैसे बड़े जीव पर भी वह कभी कभी घातक आक्रमण कर बैठता है।

कुछ वर्गों के नेवले साँप के साथ युद्ध कर, उसे समाप्त कर डालते हैं। इसमें भी उनका कौशल अधिक काम आता है। सर्प के आक्रमण के समय नेवला सतर्कता से एक ओर हट जाता है। और फिर साँप के दुबारा आक्रमण करने पर भी ऐसा ही करता है। बार बार ऐसा कर साँप को थका डालता है। थके साँप की गर्दन पकड़ नेवला उसकी खोपड़ी कुचल देता है।

जुगनू की जगमगाहट सर्वविदित है। पर बहुत से सूक्ष्म जीवाणुओं में भी ऐसा ही प्रकाश पाया जाता है। अधिकांश स्वयं प्रकाशित जीवों के पास ऐसे विशेष अवयव हैं कि वे प्रकाश को आत्म नियन्त्रित रखते हैं, जैसे हम टार्च को इच्छानुसार जला बुझा सकते हैं, उसी तरह ऐसे प्राणियों में विशेष ग्रन्थियाँ होती हैं। जो लुसिफेरिन नामक प्रकाश रसायन में आक्सीजन के द्वारा जगमगाहट पैदा करते हैं। दक्षिणी अमेरिका में रेलगाड़ी नामक एक दो इंच लम्बा कीड़ा होता है, जिसके मुँह में लाल दीपक होता है और दोनों ओर 11-11 हरे दीपक होते हैं।

वेस्टइंडीज के मोटर कीड़ा के उदर से पीतवर्ण प्रकाश निकालता है। उसके मुँह में दो दीपक होते हैं।

सागरवासी अनेक जलचर स्वयं प्रकाशित होते हैं। इस प्रकाश का उपयोग वे खाद्य प्राप्ति एवं प्रणय व्यापार के लिए करते हैं।

अपने अण्डों के संरक्षण के लिए मछलियों द्वारा सरिताओं, सरोवरों या जल स्रोतों की सतह पर बनाए गए भवन उनकी वैज्ञानिक जानकारियों के प्रमाण होते हैं।

स्ट्रीकलबैक नामक मछलियों के नर मई जून में रस्सी के छोटे टुकड़ों तथा समुद्री सेवार लेकर अपने भीतर से निकले गए धागों से उन्हें बुनते हैं और घर बनाते हैं।

क्वीन्सलैंड की वरनेट नदी में इयिस नामक मछलियाँ 20 इंच व्यास वाला एक गहरा वृत बनाती हैं। वहीं अण्डे देती हैं। अभियाकाभा नामक मछलियाँ प्रजनन ऋतु में गहरे पानी से उथले में जाकर सेवार के कोमल पौधे ढूँढ़ती हैं तथा उन्हें ही तोड़कर घोंसले जैसा बनाकर वहीं अंडे देती हैं। अंडे घोंसले से चिपटे रहते हैं और जब तक अण्डों से बच्चे नहीं निकलते, नर अभियाकाभा उनके संरक्षण का दायित्व सम्भालते हैं। ट्राइनकोस्टर मछलियाँ छोटे पौधों को तोड़कर, हवा के बुलबुलों के साथ, एक तैरता हुआ टापू तैयार करती हैं। मादा इसी टापू में अण्डे देती है। यदि वजन से अण्डे नीचे जाने लगते हैं, तो नर नीचे से फूँक मारकर उन्हें टापू के भीतर कर देते हैं। भारतीय मछली गरई भी अपने घर छोटे पौधों , हवा के बुलबुलों तथा अपने मुँह की लार से बनाती हैं।

व्हेल एक भयानक मछली है। वह अपने प्रचण्ड प्रहार से बड़े बड़े जलयानों को भी हिला देती है। नौकाओं को उलटना तो मामूली बात है। मनुष्य उसके करीब पहुँचा कि वह उसे चिथड़े चिथड़े कर दे सकती है।

आक्टोपस आठ दस भुजाओं वाला विशालकाय जीव है। गहरे जल में चट्टान तले यह छिपा रहता है और शत्रु पर घात लगाकर आक्रमण करता है। दसों भुजाओं से एक साथ प्रबल प्रहार कर वह अपने शिकार को नीचे गहरे में खींच ले जाता है।

शार्क मछली भयानक होती है। उसके दाँत तीक्ष्ण तलवार की धार जैसे होते हैं। लेकिन कछुए के खोल पर उन दाँतों का कोई असर नहीं होता।

समुद्र में दस मुँह वाला एक घोंघा होता है। यह अपने शरीर में हवा भर लेता है। फिर दौड़ लगाता है, तो पानी को जेट इंजन की सी तेजी से चीरता जाता है।

गाएँ, बैल, भैंसें आदि घास पात चरने वाले जीव किसी घास के पौधे या कि किसी झाड़ी को चरते समय तेजी से अपनी ओर खींचते हैं। गेंडा भी झाड़ियों को चरते हैं। पर वे उन्हें तेजी से ऊपर की ओर खींचते हैं, जैसे उखाड़कर फेंक देंगे कारण ? बात यह है कि गेंडे प्रायः कंटीली झाड़ियों को चरते हैं। उन्हें अपनी ओर खींचें, तो काँटे आँखों में आ घुसें।

प्रत्येक जीव जन्म से मृत्यु तक निरन्तर संघर्षरत रहता है। संघर्ष के दो पहलू है, आक्रमण और सुरक्षा। प्रत्येक जीव अपनी सुरक्षा के लिए सतर्क रहता है। विभिन्न जीव जन्तु अपने बचाव हेतु स्फूर्ति, छल, कौशल, चातुर्य आदि का आश्रय लेते हैं। प्रकृति ने आत्म रक्षा की अनेक विशेषताएँ प्राणियों को दी हैं। साथ ही आहार प्राप्ति में वे पिछड़ न जायें इसके लिए भी उन्हें आवश्यक सामर्थ्य एवं कुशलता प्रदान की है।

गिरगिट अपना रंग इसलिए बदलता है कि यह विपत्ति से बचने के लिए छिपने का प्रयास करता है। प्लूरोनैटिक्स नामक मछलियाँ और सीपियाँ भी रंग परिवर्तन में पटु होती हैं। सागरवासिनी कटिल नामक मछली विपत्ति का आभास पाते ही, अपने वातावरण, व निवासस्थान जैसा ही अपना रंग बदल लेती है।

यों कुछ जीवों का प्रकृति प्रदत्त रंग भी उनकी इस काम में सहायता करता है। तोतों को हरे वृक्ष की शाखाओं के बीच, सफेद भालू को बर्फीले विस्तार के मध्य तथा टिड्डों को हरी घास या हरी टहनियों के बीच पहचान पाना कठिन होता है। सूखी घास का वाशिंदा यूसस कीड़ा उसी रंग का होता है।

अमरीका का आजरो और आस्ट्रेलिया का डिंगों नामक कुत्ते आपत्ति आने पर मरने का अभिनय करते हैं। वे भूमि पर शवासन में लेट जाते हैं। कांचिल हिरण भी मृत्यु अभिनय में प्रवीण होते हैं। खटमल तथा अन्य कई कीड़े भी इसमें निपुण होते हैं। वे सिर पर खतरा देख सहसा शव- वत हो जाते हैं, खतरा टल जाने का अनुमान कर पूर्ववत् चलने लगते हैं।

छिपकली तो विपत्ति आते ही अपनी पूँछ को तोड़कर अलग कर देती है। वह पूँछ कुछ देर तक उछलती कूदती रहती है, जिससे कि शत्रु उसे ही छिपकली समझ भ्रम में पड़ सकता है।

कुछ केकड़े तथा समुद्री तटों पर चट्टानों आदि के तले रहने वाला रिवनवर्म नामक जीव भी, आपत्तिकाल में अपने को कोई हिस्सों में बाँट देते हैं यानी अपने अंगों को अलग अलग कर डालते हैं।

बन्दर घुड़की प्रसिद्ध है। विपत्ति की आशंका से बन्दर शत्रु को डराते धमकाते हैं। लामा नामक एक अमरीकी जीव शत्रु पर तेजी से थूकता है। स्कडंक नामक एक अन्य जीव दुर्गन्ध भरा द्रव्य छोड़ता है।

आत्मरक्षार्थ सर्प फन फैला कर शत्रु पर फुसकारते हैं। अमरीका की होनर्ड लिआर्ड नामक छिपकली का शरीर आपत्तिकाल में फूल जाता है, फिर वह नेत्रों से रक्त की तेज धार छोड़ती है। मेंक नामक जीव भी शत्रु को भगाने के लिए तीव्र गन्ध वाला द्रव्य छोड़ते हैं।

लोमड़ी अपनी रक्षा के लिए चकमा देती है। कभी इधर भागती है, कभी उधर। साही अपने शरीर के काँटों को सख्त व खड़ा कर लेती है। पेगोलिन नामक प्राणी भी ऐसा ही करता है। कछुआ अपने हाथ पैर अपने खोल के भीतर समेट लेता है। आर्मडेलो नामक जीव जिसके उदर की त्वचा कोमल और पृष्ठ भाग कठोर होता है, आपत्तिकाल में अपने आपको गोल बना लेता है। आत्मरक्षा के साथ ही कई जीव अपने सहयोगियों को भी संकट से सतर्क कर देते हैं। गिलहरी, कौए ऊँचे चढ़ कर अपने स्वर से खतरे के संकेत दे देते हैं। चीतल, काकड़ और बन्दर आदि शेर या किसी अन्य खतरनाक जीव को देखकर चीख चीख कर सबको सतर्क कर देते हैं। खरगोश विपत्ति देखते ही अपने पिछले पैरों पर खड़ा होकर जमीन खोद कर आवाज करता है, इससे सभी खरगोश बन्धु चौकस हो जाते हैं। बबून नामक बन्दरों में एक बन्दर खेतों की मेंड़ पर सन्तरी बनकर बैठा रहता और खतरा देखते ही समूह को सतर्क कर देता है। एक जंगली गधा, तिब्बत में होता है, वह विपत्ति देखते ही तेजी से रेंक-रेंककर साथियों को सूचना दे देता है। एक दक्षिण अफ्रीकी मेंढक रुदन ध्वनि द्वारा संकेत भेजता है।

हिंसक पशुओं से अपने स्वामी कि या रखवाले की रक्षा के निमित्त गायें कई बार सामूहिक प्रतिरोध करती हैं। शेर तक का भी गायों द्वारा मुकाबला किये जाने की कई घटनाएँ प्रकाश में आ चुकी हैं।

गौ का वात्सल्य प्रसिद्ध है। बछड़े को जन्म देते ही गाय के थनों में स्फूर्ति व सक्रियता आ जाती है। घास पचने से बना हुआ रक्त, जब इन सक्रिय हो उठे थनों के भीतरी कोषों से गुजरता है, तो उस ग्रन्थि के सेल्स उस रक्त को दूध में बदल डालते हैं।

हँसी खुशी की अभिव्यक्ति मनुष्यों के ही हिस्से में नहीं आई है उनका आनन्द पशु पक्षी और कीड़े मकोड़े भी उठाते हैं। सच तो यह है कि आनन्दानुभूति को व्यक्त करने वाले, भाव भरे नृत्य अभिनय मनुष्य ने इस अन्य जीवों से ही सीखे हैं। इस प्रकार के भावों में इन प्राणियों का नामोल्लेख भी किया जाता है। मयूर नृत्य, भ्रमर गीत, कोकिल तान, झींगुर लय, आदि की चर्चा कला क्षेत्र में होती रहती है और उनका अनुकरण किया जाता है।

मेघ दर्शन से विभोर मयूर का मयूर नृत्य प्रसिद्ध हैं और नृत्य कला का एक अंग भी है।

मेफ्लाई नामक मक्खी का नृत्य संगीत विश्व प्रसिद्ध है युवा मेफ्लाई युवती मेफ्लाई को तरह तरह की आकर्षक मुद्राओं में नृत्य दिखाता है।

मादा मछली डैने फैलाकर नाचती है, जो परिधान का छोर पकड़ कर तैरने की सी मुद्रा में किए जाने वाले नृत्यों का प्रेरणा स्रोत है।

बिच्छू आकर्षक बाल डांस करते हैं। मकड़े का नृत्य भी तालमय होता है आठ दस मकड़े मिलकर ट्विस्ट भी करते हैं।

बरसात में जंगली बतखें नर मादा मिलकर दिन भर नाचती हैं और दिन ढले घर लौटती हैं।

दक्षिण अफ्रीका की डान्सर मैना संगीत की सुमधुर धुनों के साथ सामूहिक नृत्य करती है। न्यूजीलैण्ड की बर्ड आफ पैराडाइज भी नृत्य निपुण होती है और तो और युवा घोंघा भी गुनगुनाहट के साथ विभोरावस्था में नृत्य करता है।

सारस प्रणय याचना के समय परों और पैरों को एक निश्चित ताल के साथ पटकते हुए, गोलाकार घूमते हैं। उनका स्वर भी ताल के अनुरूप होता है। जियरे गणतन्त्र के वत्सुई समाज में तो इस नृत्य के आधार पर बने पारस्परिक नृत्य का नाम ही सम्मानित सारसों का नृत्य है। पशु पक्षी भी नृत्य के समय किसी अनिवर्चनीय आनन्द का अनुभव करते हैं।

मधु मक्खियों के नाच तो अत्यधिक अर्थपूर्ण होते हैं। नृत्य ही उनकी मुख्य भाषा है, विचार सम्प्रेषण का यही माध्यम उनके पास सर्वाधिक विकसित है।

मधु मक्खी की प्रत्येक नृत्य मुद्रा का विशिष्ट अर्थ होता है। भोजन भण्डार पास ही मिल जाए, तो छत्ते के ऊपर घूमती जैसा नाचेंगी। यदि भंडार अधिक दूर हो तो सीधे उड़ती हुई ऊपर जाएगी और फिर जिस दिशा में भोजन हो, उधर उड़ेंगी। वे दूरी को भी नृत्य द्वारा सांकेतिक करती हैं। उनके संकेत इतने सही होते हैं कि मधु-मक्खियाँ निर्दिष्ट दिशा में ही उड़ती हैं।

पशुओं को अपने परिवेश से भी गहरा लगाव हो जाता है तथा वहाँ की स्मृति उनमें भीतर सुरक्षित रहती है। रूस में ब्लादिमिर दुरोब एक प्रसिद्ध पशु प्रशिक्षक हैं वे अफ्रीका से माइयस नामक एक बन्दर लाए। एक रूसी महिला एक बार अपने नीग्रो पति के साथ दुरोव के घर गई। बन्दर अपने अफ्रीकी देश के निवासी जैसे उस नीग्रो सज्जन को देखते ही झूम उठा, लपककर जा लिपटा। स्नेह प्रदर्शन करता रहा और जब तक वे वहाँ रहे, वह उन्हीं के पास बना रहा।

क्रीमिया में डान क्विग्जोट पर फिल्म बनने के दौरान बोरिस एडर ने लेनिनग्राड चिड़ियाघर के एक शेर वास्पा का भी सहयोग लिया। डेढ़ वर्ष बाद एडर लेनिनग्राड गया और वास्पा से मिला। वास्पा एडर को देख खिल उठा। फिल्म के समय दिखाए गए करतब दुहराने लगा।

यूनान की, एन्ड्रोक्लीस और शेर की, कथा प्रसिद्ध है। एक शेर के पाँवों में चुभे काँटे को देखकर उसकी सहज करुणा जाग उठी थी और निडर भाव से शेर के पास जा उसने वह चुभा शूल निकाल दिया था। शेर ने गहरी आत्मीयता से, एन्ड्रोक्लीस को देखा। एन्ड्रोक्लीस ने आहत शेर का उपचार भी किया। शेर ने एन्ड्रोक्लीस को स्मृति पटल पर आँक लिया।

कालान्तर में एन्ड्रोक्लीस से क्रुद्ध राजा ने उसे दण्ड दिया और कई दिनों से भूखे शेर के पिंजरे में एन्ड्रोक्लीस को फेंक दिया। शेर जो माँस की गन्ध के लिए तड़प रहा था, एन्ड्रोक्लीस को देखते ही पहचान गया और उसने एन्ड्रोक्लीस को खरोंच तक नहीं पहुँचाई। प्यार भरे नेत्रों से उसे देखता रहा।

कुत्ते की स्वामी भक्ति प्रसिद्ध है। हाथी और घोड़े अपने मालिकों के प्रति भारी सद्भावना रखते हैं और विपत्ति के समय प्राण प्रण से उनकी रक्षा करते हैं। प्यार, दुलार और सहयोग के वातावरण में हिंस्र पशु भी बछड़े जैसे पालतू बन जाते हैं। अफ्रीका में जान एडम्स नामक महिला ने दर्जनों सिंह, चीते पाले और उन्हें बच्चों की तरह लाड़ दुलार देते हुए लम्बा जीवन बिताया। यह हिंस्र जन्तु उसके आस पास बैठे रहते और कई बार बिस्तर पर आ लेटते थे। कितने ही पशु पक्षियों में यह स्नेह, सहयोग एवं वफादारी की इतनी अधिक प्रबलता होती है कि मनुष्य उनकी तुलना में पिछड़े ही कहे जा सकते हैं।

प्रकृति के अनुदानों में मनुष्य को ही सब कुछ नहीं मिला, अन्य प्राणी भी अपनी अपनी आवश्यकता के अनुरूप लाभान्वित हुए हैं। मनुष्य अपने स्थान पर महत्त्वपूर्ण हो सकता है, पर अन्य प्राणी तुच्छ एवं नगण्य हैं, ऐसा नहीं सोचा जाना चाहिए।


Quotation

फरिश्ते ने जैसे ही इंसान को देखा तो आश्चर्य से चकित रह गया। इंसान के मस्तक पर छिटकी पसीने की प्रत्येक बूँद में भगवान विराजमान् थे।

महाकवि नागोची।

सोते रहने का नाम कलियुग -आलस्य में पड़े रहने का द्वापर -अनिश्चय की स्थिति में खड़े रहने का नाम त्रेता और निरन्तर गतिशील रहने का नाम सतयुग है।

ऐतरेय ब्राह्मण


मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा

एक सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य अपनी शान्ति, सुस्थिरता और सन्तुलन के लिए बहुत कुछ समाज पर निर्भर करता है। व्यक्ति न तो स्वतः बुरा होता है और न ही कष्ट तोषी। फिर भी समाज में भिन्न भिन्न वृत्ति और अलग अलग प्रकृति के लोगों के संपर्क में आने से वह व्यथित तो होता ही रहता है। बाहरी परिस्थितियाँ, लोगों के व्यवहार, उनकी प्रवृत्ति का कष्टदायी पहलू देख देखकर वह उत्पीड़ित होता रहता है। इसलिए कहा गया है कि जो संसार में रहते हुए भी उससे अलग रहे, जल में कमल के पत्ते के समान अछूता रहे वह सुख और शान्ति को प्राप्त कर सकता है।

समाज में रहते हुए भी अपने आस पास के लोगों से अप्रभावित रहना बहुत कठिन है। इस स्थिति को हर कोई प्राप्त नहीं कर सकता। पर ऐसे नियम हैं जरूर जिन्हें अपनाकर बाहरी व्यक्तियों से अछूता रहा जा सकता है। इसी व्यवहार का स्वर्णिम सूत्र लिखते हुए महर्षि पातंजली ने अपने ग्रन्थ योगदर्शन में कहा है-

मैत्री करुणा मुदितोपेक्षणां सुखदुःख पुण्यापुण्य विषयाणां भावनात्पश्चित प्रसादनम्।

अर्थात् सुखी दुःखी पुण्यात्मा और दुष्टात्मा लोगों के प्रति मैत्री, करुणा ,प्रफुल्लता ओर उपेक्षा का भाव रखने से चित्त को अखण्ड प्रसन्नता मिलती है।

स्वामी विवेकानन्द ने इस सूत्र का अर्थ खोलते हुए लिखा है-मन को इस प्रकार के विभिन्न भावों को ग्रहण करने में असमर्थता के कारण हमारे दैनिक जीवन में अधिकांशतः गड़बड़ी एवं अशान्ति होती है। मान लो, किसी ने मेरे प्रति कोई अनुचित व्यवहार किया तो मैं तुरन्त उसका प्रतिकार करने के लिए उद्यत हो जाता हूँ और इस प्रकार बदला लेने की यह भावना दर्शा देती है कि हम चित्त को दबा रखने में असमर्थ हो रहे हैं। वह उस वस्तु की ओर तरंगाकार में प्रवाहित होता है और बस हम अपनी मन की शान्ति खो बैठते हैं। हमारे मन में घृणा अथवा दूसरों का अनिष्ट करने की प्रवृत्ति के रूप में जो प्रतिक्रिया होती है वह मन की शक्ति का क्षय मात्र है। दूसरी ओर यदि किसी अशुभ विचार या घृणा प्रसूत कार्य अथवा किसी प्रकार की प्रतिक्रिया की भावना का दमन किया जाय तो उससे शुभकारी शक्ति उत्पन्न होकर हमारे ही उपकार के लिए संचित रहती है।"

चित्त का प्रधान गुण है प्रतिक्रिया करना। वह एक फोटोग्राफ की भाँति है जिसमें भले बुरे भावों की वैसी ही फोटो आती है। फोटोग्राफर अच्छी तरह जानते हैं कि किस कोण पर खड़ा होने से तस्वीर अच्छी आयेगी और किस कोण पर भद्दी फोटो आयेगी। इस कोण को समझने और वहीं से चित्र लेने के कारण वे कुरूप से कुरूप वस्तु का भी अच्छा और सुन्दर चित्र खींच लेते हैं। चित्त के सम्बन्ध में भी यही सत्य है। उसे जिस कोण पर सामने रखा जाएगा वहाँ से वह उसी तरह की तस्वीर खींचेगा। फोटोग्राफर को तो तस्वीर खींचने के लिए फिर भी कैमरे का बटन दबाना पड़ता है। पर मन तो सामने आते ही तस्वीर खींच लेता है और चित्त पर अंकित कर देता है।

प्रतिक्रियाओं से रहित हो जाना उन्हीं के लिए सम्भव है जो चित्त क्षय की आध्यात्मिक भूमिका में पहुँच चुके हों। पर सामान्य व्यक्तियों के लिए अपने कैमरे को ठीक कोण पर रखना ही एकमात्र उपाय है जिससे बाहर की घटनाओं का चित्त पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। तत्त्ववेत्ताओं का कहना है कि मनुष्य मूलतः राग और द्वेष के द्वन्द्वों में जीता है। ये दोनों ही प्रवृत्तियाँ अनर्थकारी कही गयी है। जिसके प्रति हमें राग हो, वह आयु पूरी कर लेने के बाद समाप्त हो जाता है, तो राग भंग होने का अवसाद मिलता है। प्रतिकूल परिस्थितियाँ या घटनायें व्यक्ति को अप्रिय होती हैं। वह उनके संपर्क में नहीं रहना चाहता। इसलिए उनसे घृणा होती है और यह घृणा ही द्वेष बन जाती है। संयोगवश उनका संपर्क होता है तो भी दुःख मिलता है।

व्यवहार क्षेत्र में हम राग और द्वेष को व्यक्तियों के सम्बन्ध में भी देख सकते हैं। कुछ व्यक्ति होते हैं जो प्रिय होते हैं, कुछ के सान्निध्य में रहने पर आकर्षण होता है, कुछ को देखने का मन नहीं करता और कुछ से वित्त बुरी तरह क्षुब्ध हो उठता है। योग दर्शनकार ने इन्हें ही सुखी, पुण्यात्मा,दुःखी और दुष्ट कहा है। छोटे छोटे वर्गीकरण न किये जाय तो हमारे आस पास यह चार तरह के व्यक्ति ही भरे पड़े हैं। एक वे होते हैं जो हमारी अपेक्षा अधिक साधन सम्पन्न, बुद्धिमान, प्रतिभाशाली और सुखी होते हैं। उनकी स्थिति हमसे अच्छी होने के कारण प्रिय तो लगती है, पर चूँकि वही स्थितियाँ हमारे साथ नहीं होती इसलिए उन व्यक्तियों से ईर्ष्या होती है।

ईर्ष्या दाहकारी मनोविकार है। इस मनोविकार से ग्रस्त व्यक्ति स्वयं उत्कर्ष करने के स्थान पर अपनी मानसिक शान्ति को ही नष्ट भ्रष्ट करता रहता है। ऐसा होना नहीं चाहिए। अच्छा तो यह हो कि उन व्यक्तियों को भी प्रेम किया जाय और प्रेरणा ग्रहण की जाय। पर अहं कहता है कि उस स्थिति के पात्र हम हैं और उस पर हमारा ही अधिकार रहना चाहिए। प्रगति का नियम है कि जो परिश्रम करता है और पुरुषार्थी बनने के रास्ते पर चलता है वही तरक्की करता है। ईर्ष्या से कभी किसी की प्रगति नहीं हुई है और न ही चाहने पर किसी का पतन होता है। उल्टे ईर्ष्या स्वयं अपने लिए ही हानिकर बन जाती है। शास्त्रकारों ने उन्नति के रास्ते में रोड़ा अटकाने वाले इस विकार को दूर करने का उपाय बताया है-मैत्री मैत्री का अर्थ है सद्भावनापूर्ण आत्मीयता। आत्मीयता के सम्बन्ध जिससे भी स्थापित किये जाये वह सहयोगी बन जाता है और सहयोग व्यक्ति के विकास में सहायक ही बनता है। देखा जाय तो दुनिया में जितने भी लोग आगे बढ़े ओर ऊँचे उठें उन्होंने जितना स्वयं के उत्कर्ष हेतु प्रयत्न किया उतना ही प्रयत्न अपने से अच्छी स्थिति वालों का सहयोग प्राप्त करने के लिए भी किया।

प्रगति की मंजिल इतनी दूर है और साधन तथा समय इतने स्वल्प होते हैं कि व्यक्ति अपने पुरुषार्थ से ही मंजिल तक नहीं पहुँच सकता। स्वयं के द्वारा ही यदि कोई व्यक्ति मोटर चलाना सीखना चाहे, किसी की मदद लेना पसन्द न करे तो उसे मोटर की रचना प्रक्रिया समझने से लेकर उन्हें ड्राइव करना सीखने तक इतनी मेहनत करनी पड़ेगी तथा इतना समय लगाना पड़ेगा कि सारा जीवन ही लग सकता है। इससे हासिल कुछ नहीं होता। अगर होता भी है तो बड़ी मुश्किल से। इसलिए अनुभवी प्रशिक्षकों की मदद लेनी पड़ती है। अपने से अच्छी स्थिति वाले लोगों की मैत्री का अर्थ है उनसे सहयोग प्राप्त करने ओर उनके अनुभवों का लाभ उठाने का मार्ग तलाशना।

दूसरे प्रकार के लोग वे होते हैं जो कष्टकारी स्थिति में हैं, दुःखी हैं। गिरे हुए अवनति में पड़े और पिछड़े लोगों का कष्ट देखकर मन में पीड़ा होती है। यह पीड़ा ही घनीभूत होकर घृणा में भी बदल जाती है। जो लोग दुःखी, दरिद्रों को देखकर नाक भौं सिकोड़ते हैं इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें दुःखी जनों से वैर है। इसका कुल कारण यही है कि मन में होने वाली पीड़ा घनीभूत होकर घृणा में बदल गयी है। शरीर में लगे घावों को देखकर, उसकी सड़न, बदबू पीव और मवाद देखकर भी आँखें फेर लेने को जी चाहता है। पर इसीलिए तो लोग उस अंग को कष्ट नहीं देते। यह नाक भौं सिकोड़ना तो इसी बात का प्रतीक है कि वह स्थिति सहन नहीं हो रही है, उसे देखने का साहस नहीं जुट पा रहा है।

शरीर के सड़े हुए घाव की चिकित्सा करना जिस तरह हम आवश्यक समझते हैं, उसी तरह यह भी आवश्यक है कि समाज में जहाँ कही भी कष्ट और पीड़ा दिखाई दे उसके निवारण का भी उपाय करें। इसलिए शास्त्रकार ने दुःखीजनों के प्रति करुणा का दृष्टिकोण अपनाने का निर्देश दिया है। शरीर के किसी अंग विशेष में पीड़ा होने पर हाथ, आँखें, मस्तिष्क और पाँव जिस तरह उसे दूर करने में लग जाते हैं। उसी प्रकार दुःखी लोगों की सेवा सुश्रूषा में भी तत्परता बरतनी चाहिए। जुगुप्सा करने और नाक, भौं सिकोड़ने से तो हमारे चित्त में भी वह अवसाद निःसृत होकर आ जाता है। जबकि कष्ट निवारण के लिए किये गये प्रयत्नों के फलस्वरूप हार्दिक सन्तोष अनुभव होता है।

अपने आस पास दृष्टि डालने पर ऐसे लोग भी दिखाई पड़ते हैं-जो प्रगति के लिए प्रबल प्रयत्न करने में जुटे हुए हैं। ऐसे भी हैं जो समाज के लिए अपनी शक्तियों और क्षमताओं का उपयोग करने में प्रवृत्त हैं। उनके प्रयासों को सराहनीय मानकर प्रमुदित होना तथा उन्हें प्रोत्साहित करना एक ऐसा गुण है जो अन्धकार के वातावरण में भी आशा की ज्योति जलाता है। संसार में अच्छाइयाँ भी है और बुराइयाँ भी। ईमानदार लोग भी हैं तथा बेईमान भी। इन दोनों तरह के लोगों में से किसी भी एक वर्ग पर ही दृष्टि गड़ाई जा सकती है और प्रफुल्लित होने के साथ साथ खिन्न तथा निराश भी हुआ जा सकता है। यह ठीक है कि दुनिया में बुरे तत्व भी हैं पर न उनसे निराश होने की आवश्यकता है और न ही भयभीत होने की । महर्षि पातंजली ने दोनों तरह के लोगों के बीच निर्द्वन्द्व रहने और अच्छाई का सहयोग देने की प्रेरणा देते हुए कहा है-अच्छाइयों को देखकर प्रसन्न होओ, उन्हें प्रोत्साहन दो, व बुराइयों की उपेक्षा करो उन्हें निरुत्साहित करो। अच्छाइयों को देखकर प्रसन्न होने पर यह चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं पड़ती कि दुनिया में बुराई बहुत बढ़ गयी है। अच्छे लोगों का जीना भी दूभर हो गया है। ऐसे में किस प्रकार शान्त रहा जाय।”

जहाँ भी शुभ दृष्टि रखेंगे वही अच्छे तत्व जरूर मिल जायेंगे। बुरे लोगों में भी कुछ न कुछ अच्छाइयाँ जरूर होती हैं। उन्हीं का उपयोग कर लोग कुशल संगठन कर्ता बनकर महामानव तक बन जाते हैं और अशुभ दृष्टि से ही सब जगह देखा जाय तो न कहीं आशा बँधती दीखती है और न ही प्रकाश दिखाई देता है। अच्छाई जहाँ भी हो उसे उभारकर सुखप्रद परिस्थितियाँ निर्मित की जा सकती है। यदि बुराई को देख देखकर ही चिन्तित होते रहा जाय तो जो थोड़ी बहुत सम्भावना रहती है वह भी जाती रहती है।

सामाजिक दृष्टि से जो भी परिणाम हो पर व्यक्तिगत रूप में भी शुभ की उपेक्षा और अशुभ को तिल का ताड़ बनाकर देखने की आदत से अपनी ही शान्ति भंग होती है। इस प्रकार मैत्री, करुणा और मुदिता उपेक्षा द्वारा हम व्यक्तिगत जीवन में शान्ति सन्तुलन बना सकते हैं तथा सामाजिक सुव्यवस्था के निर्माण में भी सहयोगी बन सकते हैं।


दीनबन्धु ऐंड्रूज (kahani)

दीनबन्धु ऐंड्रूज भारत जाने की तैयारी में व्यस्त थे। घर में सारा सामान बिखरा पड़ा था। किसी के द्वार खटखटाने की आवाज सुनाई पड़ी। उन्होंने दरवाजा खोला।

अरे! आप आ गये। इस समय बहुत आवश्यक कार्य था। ऐंड्रूज ने अन्दर आ जाने का संकेत करते हुए कहा।

पर आपने यह समय घूमने के लिए निर्धारित किया था और मुझे बुलाया भी इसी उद्देश्य से था। आगन्तुक ने पास ही पड़ी एक कुर्सी पर बैठते हुए कहा।

दीनबन्धु जैसे पूर्व निश्चित कार्यक्रम को भूल ही गये हो। कुछ विचारते हुए बोले अब चलना सम्भव नहीं है। आपको जो कष्ट हुआ उसके लिये मैं क्षमा चाहता हूँ। मुझे भारत शीघ्र ही पहुँचना है। बात यह है कि मैं जब वहाँ होता हूँ तो इंग्लैण्ड की याद आती है और यहाँ आ जाता हूँ तो ऐसा प्रतीत होता है मानो सात समुद्र पार बैठे भारत के दीन दुःखियों का स्वर मेरे कानों से टकरा रहा है।

उन्हें मेरी सेवाओं की आवश्यकता है यहाँ तो मेरी कुछ जरूरत भी नहीं है।


अगले दिनों ब्रह्माण्ड भर के प्राणी एक होंगे

कई वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ब्रह्माण्ड में कम से कम 10 लाख सभ्यताएँ हमारी पृथ्वी की इस सभ्यता जैसी ही विकसित हैं। उनमें से अनेक सभ्यताएँ हमसे बहुत अधिक विकसित हैं।

इस सुविस्तृत ब्रह्माण्ड में पृथ्वी निवासी ही एकमेव बुद्धिमान प्राणी हो, यह बात वैसे भी तर्क सम्मत नहीं प्रतीत होती।

मनुष्य चन्द्रमा तक पहुँच चुका ओर मंगल की भी खोज खबर ला रहा है। मंगल में जीवन के लक्षणों की पुष्टि हुई है, यद्यपि उस सम्बन्ध में विस्तृत जानकारी अभी नहीं मिल सकी है। यद्यपि लावेल आदि अनेक विख्यात खगोलविदों की यह धारणा है कि मंगल ग्रह पर पृथ्वी से ज्यादा उन्नत जीवन है, सही सिद्ध नहीं हुआ है। पर यह अनुमान अवश्य है कि वहाँ ऐसे प्राणी हो सकते हैं, जिनकी जैव तत्व रचना हमारी जैव तत्व रचना से सर्वतः भिन्न प्रकार की होगी। अन्तरिक्षीय अभियान से संचित ज्ञान मानव कल्याण की दिशा में प्रगति में अत्यधिक सहायक सिद्ध होगा, अभी भले ही इन प्रयासों का प्रत्यक्ष लाभ कुछ न दिखाई देता हो।

जिस प्रकार अन्य ग्रहों की खोज खबर में हमें दिलचस्पी है, स्वाभाविक ही है कि अन्य विकसित ग्रह नक्षत्रों के सुसंस्कृत समुन्नत निवासी उसी तरह हमारी पृथ्वी की जाँच पड़ताल करने के लिए यहाँ अपने यान भेजें। अब तक कई ऐसे यान अपने आकाश में उड़ते और पृथ्वी तल पर उतरते देखे-पाये गये हैं। परीक्षण के बाद इन्हें सचाई के रूप में स्वीकार किया गया है। इन अन्तरिक्षयानों को उड़न तश्तरी ही कहा जाता है।

सन 1930 में प्लूटो ग्रह की खोज करने वाले अन्तरिक्ष विज्ञानी क्लाइड डब्ल्यू टाम्बा ने भी पिछले दिनों कहा था-मैंने व मेरी पत्नी ने उड़न तश्तरियाँ आकाश में उड़ती देखी हैं। इंग्लैण्ड के अन्तरिक्ष वैज्ञानिक एच॰ पर्सी विल्किस ने 50 फुट व्यास की उड़न तश्तरियाँ देखने का विवरण दिया था। वैज्ञानिक सिल्यार हेस ने एरिजोना क्षेत्र में धातु निर्मित और ईंधन चालित एक उड़न तश्तरी देखने की बात कही। जर्मनी के राकेट विशेषज्ञ हरमन ओवर्थ ने भी उड़न तश्तरियों की बाबत महत्त्वपूर्ण जानकारियों के संचित होने की घोषणा की थी।

ब्राजील की वायुसेना द्वारा 1955 में सार्वजनिक रूप से प्रकाशित प्रतिवेदन के अनुसार भी उड़न तश्तरियों को देखा, परखा गया था। कनाडा सरकार की ओटावा स्थित अनुसन्धानशाला के निर्देशक विल्वर्ट स्मिथ ने उड़न तश्तरियों के ठोस प्रमाण होने की बात कही थी।

अर्जेन्टीना के वैज्ञानिक मार्क्स तथा कई अफसरों ने कारडोवा विमानतल के पास दो उड़न तश्तरियाँ देखीं। दो रूसी वैज्ञानिक कैजेन्त्सेव तथा एग्रेस्त भी उनके अस्तित्व की घोषणा कर चुके हैं। स्वीडन के अनेक लोगों ने उड़न तश्तरियाँ देखीं, जिनका विवरण 11 जुलाई 1946 के अंक में रेजिस्तेन्स नामक फ्रेंच अख़बार ने छापा था और स्टाक होम के ल-माद अखबार ने भी इसके विवरण छापे थे। प्रख्यात ब्रिटिश पत्र डेलीमेल के प्रतिनिधि ने स्वीडन व डेनमार्क का दौरा कर, पाया कि- इन देशों में अनेक सम्भ्रान्त नागरिकों ने उड़न तश्तरियाँ प्रत्यक्ष देखी हैं तथा यहाँ के फौजी अफसर भी इस बात को लेकर चिन्तित थे कि कहीं इन उड़न तश्तरियों से कोई खतरा पैदा न हो।

अमरीकी कमाण्डर मैक्लाफलिंन के प्रतिवेदन के अनुसार उड़न तश्तरियाँ किसी अन्य ग्रह के बुद्धिमान प्राणियों द्वारा प्रेषित विमान है। इनका औसत आकार 40 फुट चौड़ा और 100 फुट लम्बा पाया गया है, गति 25 हजार मील प्रति घण्टा तथा उड़ने की ऊँचाई 2 लाख फुट देखी गई। अमरीकी वैज्ञानिकों के एतद् विषयक सम्मेलन में जनरल ममफोर्ड ने इस उड़न तश्तरियों को अत्यन्त शक्तिशाली निरूपित किया।

1961 में केपकेनेडी अन्तरिक्ष केन्द्र से पोलारिम नामक राकेट उड़ने के तुरन्त बाद उस पर एक अज्ञात वस्तु ने भयंकर झपटा मारा। यह प्रहार राडार ने नोट किया। राकेट का वैज्ञानिकों से संपर्क ही इस प्रहार के कारण टूट गया। बहुत प्रयास के बाद 14 मिनट पश्चात् उसे खोजा, देखा जा सका। इसी तरह का एक झपटा ब्यूनस आयर्स के एजेजिया विमान अड्डे के पास पैनिग्रा डी. सी. 8 नामक जेट वायुयान पर मारा गया। सरकारी विज्ञप्ति में इन घटनाओं पर पर्दा डालने के प्रयास किये गये, पर प्रत्यक्षदर्शी तथ्य जानते ही थे। न्यू मैक्सिको के प्रक्षेपणास्त्र अधिकारी श्री स्टोक्स ने ऊलामागोर्दो के पास एक भीमकाय यन्त्र अपनी कार के पास से उड़ते हुए देखा। 18 जून 1963 को कैलीफोर्निया में जेट विमानों का एक उड़न तश्तरी ने पीछा किया। केनबरा(आस्ट्रेलिया) में अनेक लोगों ने एक लड़खड़ाता सा लाल रंग का प्रकाश पिण्ड देखा। लिस्बन की वेधशाला ने एक बार उड़न तश्तरियों का आक्रमण नोट किया। ऐसे ही अनेक प्रामाणिक विवरण उड़न तश्तरियों की वास्तविकता पर प्रकाश डालते हैं।

अखबारों में समय समय पर छपने वाले ये विवरण भी महत्त्वपूर्ण हैं-

(1)4 अक्टूबर 1967 को हजारों लोगों ने कनाडा के समुद्री तट 'शाका हार्वर' पर एक विशालकाय अग्नि पिण्ड को आकाश से उतरते देखा। यह पिण्ड समुद्र में प्रविष्ट हो गया।

(2) ब्रिटेन के विक्टोरिया जलयान के नाविकों द्वारा माल्टा के पास तीन चमकदार उड़न तश्तरियाँ समुद्र से निकल कर अन्तरिक्ष में उड़ती, जाती देखी गई।

(3) पादरी विर्कर लौरिया ने आकाश से प्रकाश विमान द्वारा एक देवदूत आता देखा। कैथोलिक चर्च ने इस तथ्य की पुष्टि की।

(4) पेरिस के पास एक अँधेरी रात में पौन घण्टे तक एक नीली रोशनी वाला प्रकाश पिण्ड घुमड़ता रहा। अनेक लोगों ने इसे स्पष्ट देखा।

(5) लिस्बन के निकट फातिमा में और न्यूगिनी में 6 बार बच्चों ने देव मानवो के साथ भेंट की। इसके विवरण छपे।

(6) क्वारोबल के पास एक उड़न तश्तरी उतरी और समुद्री पोशाक जैसे वस्त्रों वाले दो व्यक्ति उसमें से निकले। हजारों लोगों ने उन्हें देखा।

(7) कोइम्क्रा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक अलमीदा गैरत के इस विवरण की 7 हजार दर्शकों ने समर्थन करते हुए साक्षी दी कि एक भयंकर अन्तरिक्षयान वहाँ से गुजरा।

(8) अमेरिकी जलयान अलास्का पर सवार वैज्ञानिक राबर्ट एस॰ क्राफर्ड ने सेतल के समीप समुद्र से 250 फुट व्यास का एक पिण्ड निकल कर अन्तरिक्ष में उड़ते देखा। इस पिण्ड पर तोपें दागने की भी सतर्क नाविकों ने तैयारी कर ली थी।

(9) अन्तरिक्ष शोधक एन्डयू ब्लाजम की प्रकाशित डायरी में अनेकों प्रकाश पिण्डों के धरती पर आवागमन के विवरणों का संग्रह ।

(10) रेवरेन्ड विलियम वूथ गिल, डा0 के0 हाउस्टन मेजर डोनाल्ड की हो, जैसे प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा उड़न तश्तरियों की आँखों देखी गतिविधियों का वर्णन।

इनके साथ ही विश्व भर में हजारों लोगों ने उड़न तश्तरियों से सम्बद्ध प्रत्यक्ष दर्शन पर आधारित विवरण दिए हैं, जो उड़न तश्तरियों के आकार प्रकार एवं गतिविधियों पर प्रकाश डालते हैं।

फेट नामक प्रतिष्ठित पत्रिका में मार्शल ने वर्जीनिया के मैनबोरो नामक स्थान में एक ऐसे ही आकाशयान के अपने पास से गुजरने का विवरण लिखा है।

'उड़न तश्तरियों' की खोज नामक पुस्तक में लेखक एम॰ के0 जसप ने ऐसी अनेक घटनाएँ साक्षियों के साथ प्रस्तुत की है-

(1) लेनिनग्राड के जंगली नाले के पास ही तीन प्रकाश पिण्डों का देखा जाना।

(2) चीन सागर में ब्रिटिश जलपोत कैरोलीन के कप्तान नारकाक द्वारा दो प्रकाश नौकाएँ दो घण्टे तक देखा जाना।

(3) स्काटलैंड में इववनिस नगर में घनी अँधेरी रात में दो प्रकाश गोलकों की धमा चौकड़ी।

(4) वेल्सड्रीप में तीव्र वेग से दो आलोक प्रवाहों की परिक्रमा।

(5) वेनिस नगर में रात्रि में एक घण्टे तक बादलों के बीच दो प्रकाश पुंजों की लगातार भाग दौड़।

(6) जान फिलिप वेसर द्वारा देखी गई उड़न तश्तरियों का वर्णन।

(7) ब्रिटिश जलपोत लिएन्डर के नाविकों द्वारा सात घण्टे तक समुद्री सतह पर एक प्रकाश पिण्ड का परिभ्रमण देखना।

पहले तो इन उड़न तश्तरियों के विवरण उपेक्षित ही रहे। पर जब डेली मिरर तथा न्यूयार्क टाइम्स जैसे प्रख्यात पत्रों ने इसके विवरण विस्तार से छापे, तो दुनिया भर में हलचल मच गई। विश्व भर में उड़न तश्तरियों के अस्तित्व के सम्बन्ध में विभिन्न पहलुओं की सत्यता की परख के लिए एक संस्था वाशिंगटन में गठित की गई-निकैप (नेशनल इनवेस्टीगेशन कमेटी आन एरियल फिनामिना’) ।इसमें इस विषय से सम्बन्धित विशिष्ट जानकारी रखने वाले दुनिया के 5 हजार व्यक्ति सदस्य हैं। इस कमेटी ने विशाल सामग्री सम्बद्ध विषयों पर एकत्रित की है। ये प्रामाणिक विवरण हैं और हजारों प्रतिष्ठित व्यक्तियों की साक्षियाँ है। इनमें से मुख्य ये हैं-

(1) कप्तान विलियम ने अमरीकी पत्रकारों को जानकारी दी कि 24 फरवरी 1959 की रात्रि जब डी0 जी0 6 विमान पेन्सिलवेनिया से डिट्राएट की ओर उड़ता जा रहा था, तीन तश्तरियाँ सहसा उसके सामने आई और देर तक विमान के चारों ओर चक्कर काटती रहीं।

मानो अध्ययन कर रही हो। सहसा एक तीव्र झटके के साथ वे विलीन हो गई उसी अनन्त आकाश में जहाँ से आती दिखी थीं। कई अन्य हवा बाजों ने भी यह घटना देखी।

(2) अमरीका में मेडिसन विल केन्टुकी की पुलिस को जुलाई 1948 में एक दिन खबर मिली कि गाडमैन विमान तल के आस पास एक विशालकाय उड़न तश्तरी उड़ रही है। कप्तान थामस मेन्टल के नेतृत्व में तीन एफ॰ 51 लड़ाकू विमान उड़न तश्तरी का पीछा करने भेजे गए। कप्तान रेडियो संपर्क द्वारा लगातार सूचना देते रहे कि उड़न तश्तरी दिख रही है। वह हमें पीछा करते जान गई और तेजी से भाग रही है। हम उनका पीछा 360 मील की गति से कर रहे हैं। यदि 20 हजार फुट की ऊँचाई तक भी वे पकड़ में न आई तो हम लौट पड़ेंगे।

पीछे के दो विमान तो लौट आये, पर कप्तान मेन्टल का विमान जो आगे था, नहीं आया। दो साथी विमान चालाकों ने लौटकर यह खबर दी कि कप्तान का विमान भी उड़न तश्तरियों के साथ ही गायब हो गया। इस घटना पर अमरीकी सरकार ने दो वर्ष तक कोई टिप्पणी नहीं की। फिर मौन तोड़ा और मात्र यह कहा-मेन्टल सन्तुलन खो बैठे और उनका विमान नष्ट हो गया।

(3) 23 नवम्बर 1953 सुपीरियर लेक के ऊपर एक विशाल उड़न तश्तरी के उड़ने की राडार से जानकारी मिली। किनरास हवाई अड्डे से मौन्कला किल्सन एफ॰ 89 जेट के साथ उसका पीछा करने उड़ा। राडार पर दिखता रहा कि जेट तेजी से उड़न तश्तरी का पीछा कर रहा है और उसके पास पहुँच रहा है। फिर सहसा दृश्यांकन बन्द हो गया। न उड़न तश्तरी दिख रही थी, न जेट। खोजी दल गये, जेट का मलबा तलाशने की कोशिश की, पर कही भी कोई सुराग नहीं मिला। इस रहस्य पर पर्दा ही पड़ा रहने दिया गया।

(4)मई 1967 में कालरैडो हवाई अड्डे के राडार ने भी उड़न तश्तरी की उड़ान की सूचना दी। अमरीकी सरकार द्वारा स्थापित अनुसन्धान समिति के एक सदस्य ने इन यानों की सम्भावना के समर्थन में एक पुस्तक लिखी है-उड़न तश्तरियाँ? हाँ।'

‘नेचर पत्रिका में अमरीकी रेडियो खगोलवेत्ता प्रो0 कोनाल्ड ब्रैस वैल का एक लेख छपा है, जिसमें यह सम्भावना व्यक्त की गई है कि उड़न तश्तरियाँ किसी विकसित सभ्यता वाले तारे से सूचना यान के रूप में आई हों और यहाँ के विवरण अपने केन्द्रों को भेज रही हो।

अन्तरिक्ष भौतिकी के वैज्ञानिक श्री वै वैलेस सलीवान ने एक पुस्तक लिखी है-वी आर नाट एलोन'- हम अकेले नहीं। इसमें ब्रह्माण्ड व्यापी संचार साधन पर बल देते हुए एक नई वेवलेंथ प्रस्तुत की है, जो प्रकाश गति से कई गुनी तीव्र होगी। यह वेवलेंथ पद्धति 21 से. मी. अथवा 1420 मेगा साइकिल वेवलेंथ के रेडियो कम्पनों पर आधारित है। अणु विकिरण की यह स्वाभाविक कम्पन गति है। उनके अनुसार अन्तरिक्ष संचार व्यवस्था में इसी गति को अपनाने से अन्य लोकों के प्राणियों से संपर्क साधा जा सकता है। हमारे लिए जो दूरी पार करनी कठिन या असम्भव लगती हे, सम्भव है अन्य लोक कर लेते हों, ऐसा श्री सलीवान का अनुमान है।

इस धरती पर उल्लेखनीय प्रगति तो विगत तीन वर्षों में ही हुई है। उसके पूर्व तो हमारे यहाँ भौतिक पिछड़ापन अत्यधिक था। विचार, आदर्श और समाज व्यवस्था की दृष्टि से तो अभी भी व्यापक पिछड़ापन ही है। ऐसी स्थिति में अन्य लोकों के वे निवासी जो सचमुच प्रगतिशील होंगे, हमारी दयनीय दशा के प्रति आकर्षित क्योंकर होंगे? यहाँ से संपर्क साधने का प्रयास वो क्योंकर करेंगे ?

यह तो सम्भव है कि वे अनेक अन्य लोकों का अध्ययन करने के साथ ही इस पृथ्वी लोक की भी छान बीन करते हों, किन्तु यहाँ के लोक जीवन से उनके आकर्षित होने और संपर्क साधने की-इच्छा करने की सम्भावना अत्यल्प ही है।

उधर 'साइन्स' और 'द न्यू साइन्टिस्ट' पत्रों के स्तम्भ लेखकों का कहना है कि ये उड़न तश्तरियाँ निश्चय ही अन्य ग्रहों से आने वाले सन्देश वाहक हैं। अन्य लोकों के प्राणी भी ब्रह्माण्ड में प्रगतिशीलता के संवर्द्धन की दृष्टि से संपर्क के लिए उत्सुक हो सकते हैं।

डा0 एस॰ मिलर और डा0 विलीले की मान्यता है कि इस विशाल ब्रह्माण्ड में एक लाख से अधिक ग्रह पिण्डों पर प्राणियों के अस्तित्व की सम्भावना है। इनमें से सैकड़ों हम पृथ्वीवासियों से अधिक विकसित हो सकते हैं।

अन्तरिक्ष विज्ञानी डा0 फानवन का कथन है कि इस विशाल ब्रह्माण्ड में ऐसे प्राणियों का अस्तित्व निश्चित रूप से विद्यमान है, जो मनुष्यों से बहुत अधिक समुन्नत है।

अन्य ग्रहों के निवासी मनुष्यों जैसी आकृति प्रकृति के ही हों, यह भी कतई जरूरी नहीं। वे वनस्पति,कृमिकीटक, झाग, धुँआ जैसे भी हो सकते हैं और विशाल दैत्यों जैसे भी। हमारे पास जो इन्द्रियाँ हैं, उनसे सर्वथा भिन्न प्रकार के ज्ञान तथा कर्म साधन उनके पास हो सकते हैं।

कैलीफोर्निया के रेडियो एस्ट्रानामी इन्स्टीट्यूट के निदेशक डा0 रोनाल्ड एन॰ ब्रेस्वेल ने विभिन्न आधारों द्वारा अन्य ग्रह तारकों में समुन्नत सभ्यताओं का अस्तित्व सिद्ध किया है और कहा है कि वे पृथ्वी से संपर्क स्थापित करने का सतत् प्रयास कर रहे हैं एवं इस हेतु संचार उपग्रह भेज रहे हैं। उनके अनुसार फुटबाल जैसे इन उपग्रहों में अनेक रेडियो यन्त्र एवं कम्प्यूटर लगे रहते हैं। और इनमें सचेतन जीव सत्ता भी उपस्थित रहती है। इन उपग्रहों द्वारा हमारे लिए विशेष रेडियो सन्देश भी भेजे जाते हैं। इन्हें अभी तक सुना तो गया है, पर समझ पाना सम्भव नहीं हो सका है बहरहाल उड़न तश्तरियों के संचालकों ने पृथ्वी वासियों की छेड़छाड़ को पसन्द नहीं किया है।

दस वर्षों में 137 उड़न तश्तरी वैज्ञानिकों को प्राण गवाने पड़े हैं। कभी किसी विज्ञान क्षेत्र के शोधकर्ताओं की मृत्यु दर इतनी नहीं रही।

अन्तरिक्ष में लेसर व क्वासर यन्त्रों की स्थापना द्वारा लोकान्तरों के संकेतों का ग्रहण विश्लेषण तथा उन तक संकेत सम्प्रेषण का कार्य सहज हो सकता है। तब अन्तरिक्ष में विकसित सभ्यताओं का पता लगने की सम्भावना बढ़ जायेगी।

ऐसी स्थिति में विश्व ब्रह्माण्ड के सुविकसित प्राणियों में पारस्परिक एकता एवं आत्मीयतापूर्ण आदान प्रदान विकसित होने की सम्भावना है। तब क्षुद्र संकीर्णताओं की आपा धापी का घटियापन स्पष्ट हो जायेगा और मात्र इसी शरीर को जीवन का रूप, सर्वत्र मानकर भौतिक सुखों के संचय एवं उपयोग की उन्मत्त दौड़ लज्जाप्रद प्रतीत होगी। विश्व बन्धुत्व का विकास होगा और विज्ञान अध्यात्मवाद से प्रभावित होगा। मनुष्य मनुष्य के बीच स्नेह सौहार्द में सम्बन्ध सुदृढ़ होंगे।


विचारों में क्रम व्यवस्था एवं एकाग्रता बनाये रहें।

यह बात सही है कि मन स्वभावतः ही बड़ा चंचल और प्रमथनशील है। उसकी एक दिशा में ही देर तक गति बनाए रखना बहुत कठिन होता है। ऐसा कर सकना ही एकाग्रता कहलाता है। अभ्यास द्वारा तथा कुछ उपायों द्वारा एकाग्रता सम्भव होती है।

मन एक बार में एक ही काम कर सकता है, इस तथ्य को सदा ध्यान में रखा जाय, तो फिर यह बात भी समझ में आ जाएगी कि तमाम निरर्थक और निरुपयोगी बातों में उलझे रहने से कोई प्रयोजन सिद्ध होने वाला नहीं तथा संसार की उन अनेक छोटी मोटी बातों में जिनका जीवन में कोई उपयोग नहीं, व्यर्थ उलझे रहने से हानि ही है। अतः इन सबसे मन को हटा कर एक निश्चित लक्ष्य और प्रयोजन में लगाये रहना ही सार्थक है।

वस्तुतः एकाग्रता सिद्धि का सर्वोत्तम उपाय यही है कि मन को व्यर्थ की उलझनों समस्याओं से दूर रखा जाए। जिनसे अपने लक्ष्य का सीधा सम्बन्ध हो ऐसी ही बातों और विचारों तक सीमित रहा जाए। अधिकांश लोग घर, परिवार ,मुहल्ले, समाज, देश ,राष्ट्र आदि की ऐसी छोटी छोटी बातों में अपने को व्यस्त बनाए रखते हैं, जिनका न तो स्वयं के मुख्य प्रयोजन से कोई सम्बन्ध होता और न ही घर, परिवार ,मुहल्ले, देश ,आदि की ही गति व्यवस्था में उनका कोई उल्लेखनीय योगदान होता है। ऐसी व्यर्थ की बातों में उलझने की वृत्ति निरर्थक उत्सुकता की वृत्ति कही जाती है। यह निरर्थक उत्सुकता की वृत्ति विचारधारा को संकीर्ण एवं विश्रृंखल बनाती है। इसमें उलझने से मन अस्त व्यस्त, छिन्न भिन्न और चंचल ही बना रहता है तथा उसकी एकाग्रता शक्ति विकसित नहीं हो पाती। वाचाल और गप्पी लोगों की दुनिया भर की बातें सुन-सुन की उन्हीं में उलझे रहना मनःशक्ति का अपव्यय ही है। ऐसे लोगों का संग करने से धीरे-धीरे स्वयं का विचार स्तर बनता जाता है।

विचारधारा का प्रकार एवं स्तर संगति तथा साहित्य से ही विनिर्मित होता है। जैसे लोगों के साथ व्यक्ति रहता है और जिस तरह का साहित्य वह पढ़ता है, वैसी ही उसकी विचारधारा बनती चलती है। अखबारों में ढूँढ़कर सनसनीखेज बातें और विचित्र समाचार पढ़ना, जासूसी कहानियाँ उपन्यास कामोत्तेजक साहित्य पढ़ना यह सब मन की चञ्चलता को बढ़ाता है। एकाग्रता वस्तुतः वैचारिकता द्वारा ही सम्भव है। गम्भीर, शालीन, उच्चकोटि के लोगों का साथ और श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन वैचारिक स्तर को क्रमशः निखारता चलता है और उसी क्रम से मन की एकाग्रता का भी अभ्यास बढ़ता जाता है। वस्तुतः एकाग्रता का अर्थ गहराई तक प्रवेश करने की प्रवृत्ति ही है। एकाग्रता का यह अर्थ न समझकर कई लोग मन को एक जगह बाँध कर रखने का अभ्यास करने में जुट जाते हैं। निश्चय ही वैसी एकाग्रता का भी उपभोग और लाभ है,पर वह आरम्भ की नहीं, बाद की सीढ़ी है और उस विशेष एकाग्रता में दिन रात उपयोग की जरूरत भी कभी किसी को नहीं पड़ती। विशेष योग साधनाओं में वैसी एकाग्रता अपेक्षित हो सकती है, उस स्तर तक पहुँच जाने पर वैसी एकाग्र साधना कुछ कठिन भी नहीं होती। पर वैसी एकाग्रता में कुछ ऊल-जलूल चमत्कार पढ़

सुनकर प्रारम्भ में ही उसे पाने का प्रयास करने लगने पर विफलता, निराशा और तनाव से उत्पन्न अस्त व्यस्तता ही साथ लगने वाली है।

जिस एकाग्रता का नित्य प्रति के जीवन में समावेश सफलता की ओर ले जाता है। वह दार्शनिकों वैज्ञानिकों डाक्टर, कवियों, कलाकारों, गणितज्ञों, लेखकों की एकाग्रता ही है। एक ही निश्चित विषय क्षेत्र में गहराई तक तीव्रता से विचारशील रहे आना ही वह एकाग्रता शक्ति है, जिससे वैज्ञानिक जटिल गूढ़ वैज्ञानिक गुत्थियाँ सुलझाता और नई खोजे करता है, कवि काव्य सृजन करता है, लेखक एक ही विषय पर लम्बे लेख लिखता है, कलाकार एक ही भाव दशा का चित्रण प्रस्तुतीकरण कर पाता है, संगीतज्ञ राग की गहराई को छू पाता है, दार्शनिक गम्भीर ऊहापोह कर निष्कर्ष निकालता है, डाक्टर शल्यक्रिया या निदान एवं चिकित्सा में निपुण बनता है। मन की एकाग्रता का अर्थ विचारों की यह एकतानता, एक दिशाधारा ही है।

इसके लिए सर्वप्रथम तो अपने विचारों के प्रति जागरूक रहने की आवश्यकता है। मन में विचार तरंगें निरन्तर उठती ही रहती है। पर वे सदैव उठती रहती है, अपने पास सहज ही विचार शक्ति है, इसीलिए उसकी उपेक्षा नहीं कर देना चाहिए। ये विचार तरंगें कोई व्यर्थ की वस्तु नहीं है। कर्म जो आँखों से दिखाई देता है, वह इन अदृश्य किन्तु अतिसमर्थ विचारों का ही तो दृश्य रूप है। अतः इस बात के प्रति पूरी तरह सतर्क रहना आवश्यक है कि हमारे मन मस्तिष्क में किस प्रकार के विचार आ जा रहे हैं, अन्यथा गन्दे और निरुपयोगी विचार मन मस्तिष्क में उठकर ही नहीं रह जाने वाले है वे वैसे ही गन्दे, निरुपयोगी कामों में भी मनुष्य को नियोजित करा कर रहेंगे।

ऐसे विचारों को रोकने और निकाल फेंकने में प्रारम्भ में तो कठिनाई अवश्य होगी, किन्तु थोड़े से ही अभ्यास से यह कार्य सरल हो जाता है। सावधान रहने और सक्रिय रहने का कुछ दिनों तक लगातार अभ्यास करने पर मनुष्य का स्वभाव ही ऐसा बन जाता है कि उसकी चिन्तनधारा में अनावश्यक विचारों का प्रवेश नहीं हो पाता। सतर्कता और क्रियाशीलता, निरुपयोगिता और अस्तव्यस्तता की विरोधी स्थितियाँ है। मन दोनों स्थितियों में एक साथ नहीं रह सकता। विचार ही विचारों को बुलाते और भगाते रहते हैं। सतर्कता क्रियाशीलता में विचार गन्दे निरुपयोगी विचारों को भगाकर ही रहते हैं, ठहरने नहीं दे सकते । इसके विपरीत यदि सस्ती संगति में रहा गया, अस्त व्यस्त मनोदशा रहने दी गई और सस्ता साहित्य पढ़ा गया तो मन में प्रमाद ओर शरीर में आलस्य तथा पतनोन्मुखता की वृद्धि होती जाएगी। सतर्कता क्रियाशीलता कम होती जाएगी। चंचलता मन को अस्त व्यस्त बनाती है और इससे उसकी स्फूर्ति समाप्त होती जाती है। स्फूर्ति नाम है शक्ति के सही और व्यवस्थित उपयोग का। शक्ति को निखर जाने दिया जाय, तो उसकी उतनी ही मात्रा लगा देने पर भी एक भी प्रयोजन पूरा न हो पाएगा, जितनी लगाने पर कई कार्य सम्पादन हो सकते हैं। इस व्यर्थ के बिखराव से ढीलापन आता है। यही स्फूर्ति हीनता की स्थिति है। जब मनःशक्ति को एक ही दिशाधारा में केन्द्रित रखते हैं, तब उस दिशा विशेष में जो प्रत्यक्ष प्रगति होती है, वह मन में स्फूर्ति और उल्लास को अधिकाधिक बढ़ाती जाती है। इससे मनुष्य के अन्दर सोई शक्तियाँ जाग उठती है और वह असम्भव दीखने वाले कामों को भी सम्भव कर दिखाता है। बिखरे मन और विश्रृंखल शक्ति से विश्व का कोई कार्य पूरा नहीं हो पाता। इसीलिए कार्यसिद्धि कि एक ही विधि है- मन की एकाग्रता। मन की एकाग्रता से सुव्यवस्था संभव होती है सुव्यवस्था से ही नए-नए कार्य संभव होते हैं। चित्र-पटल में भिन्न भिन्न रंगों के ब्रश से पोत दिया जाय, तो उनका वैसा प्रभाव न होगा, जैसा कि उन्हीं रंगों को एक विशेष क्रम में व्यवस्थित कर सजा देने पर पड़ा करता है। यह सुव्यवस्था ही तो चित्रकला है। केनवास पर बिखरे रंगों को कोई चित्रकला नहीं कहेगा। उन्हीं रंगों को एक व्यवस्थित क्रम में किसी निश्चित प्रयोजन से सजा दिया जाय, तो सभी चित्र कृति को देखकर प्रसन्न होंगे और प्रशंसा करेंगे।

कोई व्यक्ति भले ही संगीत जानता हो किन्तु यदि वह सरगम के भिन्न भिन्न स्वरों का यदा कदा यों ही आलाप करता रहे, तो उस ओर या तो कोई ध्यान न देगा, या फिर ध्यान दिया तो उपहास करेगा। उन्हीं के स्वर को सुव्यवस्थित क्रम से किसी निश्चित लय ताल में बाँध देने पर राग सम्वेदनाओं की अनुभूतियाँ श्रोताओं में उत्पन्न होने लगेंगी और लोगों को उससे आनन्द प्राप्त होगा।

मन में उठने वाली विचार तरंगें भी स्वर लहरियों और रंगों जैसी ही हैं। उन्हें एक निश्चित प्रयोजन से निश्चित क्रम में सुव्यवस्थित कर देने पर वे सफलता, सन्तोष और सुख का आधार बन जाती हैं। अव्यवस्थित रहने देने पर उपहास उपेक्षा ही दिलाती है। रंगों और स्वर लहरियों के बिखराव से कई गुना अधिक हानिकारक होता है, मन का बिखराव पतन और पीड़ा का कारण बनता है। प्रमोद और पाप बिखरे मन में ही पनपते फूलते हैं। मन का उपजाऊपन इतना अधिक होता है कि वह कोई न कोई परिणाम उत्पन्न करता ही रहता है। यह परिणाम सीधे शरीर एवं व्यक्तित्व पर पड़ता है।

अनियन्त्रित मन प्रयोग रूप में अनेकों आकांक्षाएँ बनाता बिगाड़ता रहता है। पहलवान बनने, नेता बन जाने, प्रतिष्ठा पाने, धनी होने, भोग भोगने, विद्वान् होने आदि की तरह तरह की कल्पनाएँ आकांक्षाएँ उसमें उठती मिटती रहती हैं। ये कल्पनाएँ आकांक्षाएँ सुव्यवस्थित हो, स्थिर हो, तो कोई बात भी बने। औरों के जीवन की प्रतिक्रिया स्वरूप होने से ये अस्थिर व्यवस्थित होती है। उनके क्रम निर्धारण और उन्हें योजनाबद्ध रूप देने के लिए तो गम्भीरता की आवश्यकता होती है। अनियंत्रित मन में ऐसी गम्भीरता का अभाव ही होता है। अतः ऐसी समस्त आकांक्षाएँ लालच भरे सपने बनकर रह जाती हैं।

अभीष्ट प्रगति के लिए अपनी समस्त आकांक्षाएँ को परस्पर पूरक बनाना आवश्यक होता है। इच्छाएँ जीवन के विशिष्ट पहलुओं और परिस्थितियों से बँधी होती हैं। उनमें परस्पर पूरकता लाने पर ही वे शक्ति का आधार बन सकती हैं। परस्पर विरोधी इच्छाएँ व्यक्ति को कही का नहीं रहने देतीं।

इसीलिए मन को साधने की आवश्यकता सर्वोपरि है। सधा हुआ मन रुचिपूर्वक लक्ष्य पूर्ति में लगा रहता है, तो कठिनाइयाँ सरल होती जाती हैं , मार्ग निकलता जाता है और मनुष्य अभीष्ट सफलता प्राप्त कर लेता है।


हर्वर्ट टूवर (kahani)

हर्वर्ट टूवर ने इंजीनियरिंग की डिग्री प्राप्त कर ली। अब उसे नौकरी की तलाश थी। जिस बड़े कारखाने की इज्जत उसके मन में जमी हुई थी, पहले वह उसी में काम तलाश करने पहुँचा।

कारखाने के मालिक ने बताया इंजीनियर की तो कोई जगह खाली नहीं है, हाँ एक टाइपिस्ट की जरूरत अवश्य है, यदि वह उस काम को जानता हो तो जगह मिल जाएगी। टूवर ने हाँ कर ली। और चार दिन बाद ड्यूटी सम्भाल लेने का वायदा करके चला गया। उसे काम तो उसी कारखाने में करना था, चाहे जगह कुछ भी क्यों न मिले ?

चार दिन बाद जब उसने काम सम्भाला तो मैनेजर ने पूछा, आप तो तत्काल काम पाने के लिए आतुर थे, फिर चार दिन क्यों गँवाये ?

टूवर ले उत्तर दिया, उसे टाइप करना आता न था। किराये का टाइप राइटर लेकर उसने चार दिन अभ्यास किया और अब वह उस काम में पूरी तरह अभ्यस्त हो गया।

जिस काम को करना उसे प्राण-प्रण से करने की आदत वाला वह युवक अपनी इसी तन्मय श्रम निष्ठा के कारण क्रमशः उन्नति करता चला गया और अन्ततः अमेरिका का राष्ट्रपति बना।


मंत्रशक्ति के आधार स्रोत

मन्त्र विज्ञान के अनेक आधार हैं जिनमें सर्वप्रथम है उसका शब्द गुँथन और उच्चारण का सम्यक् विधान। कविता की तरह मन्त्र का निर्माण भाव प्रधान या अर्थ प्रधान नहीं है। वरन् उस आधार पर है कि अक्षरों को किस क्रम से संजोया जाय ताकि उनके क्रमबद्ध उच्चारण से वह ध्वनि प्रवाह निसृत हो जो अभीष्ट प्रयोजन के लिए आवश्यक माना गया है। सितार में तारों का गुँथन एक क्रम विशेष को ध्यान में रखते हुए नियत निर्धारित रहता है। किसी किस्म का तार कही भी फिट कर देने से उनसे ध्वनियाँ एक जैसी निकालेंगे और विभिन्न प्रकार की राग रागनियाँ निकालना कठिन पड़ जाएगा। इसी प्रकार शब्दों के ध्वनि प्रवाह को-उनकी पारस्परिक संगति को ध्यान में रखते हुए तत्व दृष्टाओं ने मन्त्रों का गुँथन किया है।

उनके उच्चारण का भी विशेष विधान है। सितार के तारों का क्रम ही पर्याप्त नहीं, बजाने वाले की उँगलियाँ किस प्रकार थिरकती है यह भी महत्त्वपूर्ण है। रागों में अन्तर इस अंगुलि संचालन पर भी निर्भर है। मात्र तारों का गुँथन ही सब कुछ नहीं है। मन्त्र का शब्द संधान और साधक की विधिवत् उच्चारण प्रक्रिया इन दोनों का समन्वय अन्तरिक्ष में एक विचित्र प्रकार की स्वर लहरी प्रवाहित करते हैं उनके प्रभाव से सूक्ष्म जगत में वे परिस्थितियाँ बनने लगती है जो मन्त्रानुष्ठान के फलस्वरूप उपलब्ध होती मानी गई हैं।

गायत्री मन्त्र को ही ले। उसके अर्थ में भगवान से सद्बुद्धि की याचना भर है। इस प्रयोजन के लिए अन्य ढेरों मन्त्र वेदों से भरे पड़े हैं। अन्य भाषाओं में भी ऐसी कविताएँ मौजूद हैं। यदि अर्थ मात्र की ही बात रही होती तो उन कविताओं में और गायत्री में कोई अन्तर न होता। कविता की दृष्टि से गायत्री मन्त्र में छन्द दोष बताया जाता है। आठ आठ अक्षर के तीन चरण होने पर शुद्ध गायत्री छन्द बनता है, पर प्रख्यात गायत्री मन्त्र में 23 अक्षर है। चौबीसवाँ तो 'ण्यं' को णियम् उच्चारण करके खींच तान के सहारे बनता है। रचयिताओं को इस त्रुटि का ध्यान रहा होगा फिर भी उन्होंने शब्द गुंथन से उत्पन्न होने वाले ध्वनि प्रवाह को ही महत्व दिया और उस रूप में रचा जैसा कि अब है।

ध्वनि अपने आप में एक शक्ति है। कभी उससे जानकारी प्राप्त करने भर का प्रयोजन पूरा होता था, पर अब वैज्ञानिक विकास ने उसे बहुत ही उच्चस्तरीय एक शक्ति के रूप में सिद्ध कर दिया है। कानों से सुनी जाने वाली ध्वनियाँ हमें विभिन्न प्रकार से प्रभावित करती हैं। निन्दा सुनकर क्रोध आता है और प्रशंसा की वार्ता हमें प्रसन्नता प्रदान करती है। अपमानजनक चिन्ता उत्पन्न करने वाले, शोक संवाद शब्द हमें विक्षुब्ध कर देते हैं किन्तु सफलता, सुखद सम्भावना के समाचार सुनते ही मन में प्रसन्नता की लहर दौड़ जाती है और चेहरे पर मुसकान छा जाती है। मन ही नहीं, शरीर भी उस शब्द श्रवण की प्रतिक्रिया स्वरूप अपनी गतिविधियों में हेर फेर कर लेता है। द्रौपदी के शब्दों की कटुता ने महाभारत खड़ा करा दिया था। नम्र और भावना पूर्ण शब्दों से मनुष्य तो क्या भगवान तक पिघल जाते हैं।

मन्त्रोच्चार से उत्पन्न ध्वनि प्रवाह साधक की समग्र चेतना को प्रभावित करता है और उसके कम्पन अन्तरिक्ष में बिखरते हुए परिस्थितियों को अनुकूल बनाते हैं। कंठ, हाथ, जिह्वा, तालु आदि मुख्य अवयवों को विभिन्न शब्दों के उच्चारण में भिन्न भिन्न प्रकार की हलचलें करनी पड़ती है। इनका प्रभाव स्थूल एवं सूक्ष्म शरीर के कतिपय अवयवों पर पड़ता है। उपत्यिकाओं, नाड़ी गुच्छकों, विद्युत भँवरों पर इस मन्त्र ध्वनियों का प्रभाव पड़ता है और सूक्ष्म शरीर के चक्र एवं इडा पिंगला सुषुम्ना जैसे विद्युत प्रवाह प्रभावित होते हैं। साधक के स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों में होने वाले इस मन्त्र ध्वनि प्रवाह से कई प्रकार के उपयोगी परिवर्तन होते हैं व्यक्तित्व में नये प्रकार के सुधार उत्पन्न होते हैं। कोई भी शक्ति सबसे पहले अपने उत्पादन स्थल को प्रभावित करती है फिर उसकी क्षमता अगले क्षेत्र पर अपना अधिकार जमाती हुई आगे बढ़ती है। आग जहाँ जलेगी पहले वही स्थान गरम होगा बाद में उस गर्मी का विस्तार अगले क्षेत्र में फैलता चला जाएगा। मन्त्र साधना से सबसे अधिक प्रभावित साधक का व्यक्तित्व ही होता है।

मात्र शब्द प्रवाह ही नहीं मन्त्र साधना में अन्य विविध उपचारों का विधान रहता है। प्रयुक्त पदार्थों एवं हलचलों का, विधि विधानों का, कर्मकाण्डों के क्रियाकलापों का अपना महत्व है। उनकी सम्मिलित प्रतिक्रिया का मन्त्र साधना में अद्भुत योगदान रहता है। इस संयुक्त प्रभाव से मन्त्र साधना अपना चमत्कारी प्रतिफल प्रस्तुत कर सकने में समर्थ होती है। साधक की सत्ता को प्रभावित करती हुई यह ध्वनि धारा रेडियो तरंगों की तरह अन्तरिक्ष में दौड़ना आरम्भ करती है। शब्दबेधी बाण की तरह उसका प्रवाह सूक्ष्म जगत के उन संस्थानों से टकराता है जिन्हें प्रभावित करना साधना का उद्देश्य रखा गया था।

ध्वनि का वह क्षेत्र तो बहुत स्वल्प है जो हमारे कानों की पकड़ में आता है और जिसे हम सुन सकते हैं। जिन ध्वनियों के कम्पन प्रति सेकेंड 20 से लेकर 20 हजार तक होते हैं उन्हें ही मनुष्य के कान आसानी से सुन सकते हैं। किन्तु ध्यान कम्पन तो इससे बहुत कम और बहुत अधिक सामर्थ्य के भी होते हैं। उन्हें अनसुनी ध्वनियाँ कहा जाता है। इससे उनकी सामर्थ्य में कमी नहीं होती वरन् सच तो यह है कि यह कर्णातीत-अनसुनी ध्वनियाँ और भी अधिक सामर्थ्यवान होती हैं। सुपर सोनिक रेडियो मीटर की सहायता से अन्तरिक्ष में संव्याप्त अगणित ध्वनि प्रवाहों को सुना जाना जा सकता है। मन्त्र साधना में इन श्रवणातीत ध्वनियों का उत्पादन अतिरिक्त रूप से होता है और वे अपने क्षेत्र में असाधारण प्रभाव डालती हैं।

विज्ञान ने श्रवणातीत ध्वनियों को एक अति प्रभावोत्पादक शक्ति माना है और उनसे अनेक प्रकार के महत्त्वपूर्ण काम लेने की व्यवस्था बनाई है। इन दिनों वस्तुओं की सही मोटाई, गहराई नापने में-धातुओं के गुण, दोष परखने में इनका प्रयोग होता है। कार्बन ब्लैक का उत्पादन, वस्त्रों की धुलाई, रासायनिक सम्मिश्रण वस्तुओं की कुटाई, पिसाई, गीली वस्तुओं को सुखाना, धातुओं की ढलाई, प्लास्टिक धागों का निर्माण जैसे अनेकों उद्योग ध्वनि तरंगों की सामर्थ्य का उपयोग करके चल रहे हैं।

अयोवा स्टेट कालेज, अल्ट्रा सोनिक कारपोरेशन, वी0 एफ॰ गुडरिच कम्पनी आदि कितने ही व्यापार संस्थानों ने ऐसे यन्त्र बनाये हैं जिनमें श्रवणातीत ध्वनियों की सामर्थ्य का उपयोग होता है और उससे महत्त्वपूर्ण लाभ कमाये जाते हैं।

रेडियो तरंगें, माइक्रो लहरें, टेलीविजन और राडार तरंगें, एक्स किरणें, गामा किरणें, लेसर किरणें, मृत्यु किरणें, इन्फ्रारेड तरंगें, अल्ट्रा वायलेट तरंगें आदि कितनी ही शक्ति धाराएँ इस निखिल ब्रह्माण्ड में निरन्तर प्रवाहित रहती हैं। ध्वनि तरंगों में अल्ट्रा सोनिक और सुपर सोनिक तो औद्योगिक प्रयोजनों में भली प्रकार काम में आने लगी है। इन प्रवाहों में से अन्य असंख्यों को निकट भविष्य में ही मानवोपयोगी बना लिया जायेगा। हानिकारक कीटाणुओं को मारने, दूध से मक्खन निकालने, धोने, रगड़ने, पीसने-कोहरा हटा देने जैसे सामान्य कार्यों में उनका प्रयोग जिस सफलतापूर्वक इन दिनों हो रहा है उसे देखते हुए वैज्ञानिक उनका उपयोग अन्य उपयोगी कार्यों में करने की विशालकाय योजना बना रहे हैं। पौधों को खाद, पानी देने की तरह ही अब मधुर ध्वनि प्रवाह से भी उनकी अभिवृद्धि का उद्देश्य पूरा हो रहा है। यूगोस्लाविया के किसानों ने कृषि कार्य में इन ध्वनियों का उत्साहवर्धक उपयोग किया है और अच्छा लाभ उठाया है। हालैण्ड के पशु पालक दूध दुहते समय विशेष प्रकार की ध्वनि करते हैं और अधिक दूध पाते हैं। पशुओं की श्रम शक्ति, बलिष्ठता एवं प्रजनन शक्ति को भी इन ध्वनियों के सहारे बढ़ाने में भारी सफलता मिली। अमेरिकी कृषक जार्ज स्मिथ को मक्का की फसल संगीत प्रवाह के आधार पर अत्यधिक बढ़ा लेने में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हुई है।

ध्वनियों को आकाश से पकड़ कर उन्हें ऊर्जा के रूप में परिणत करने की तैयारियाँ जोरों से हो रही है। उन्हें ताप, प्रकाश, चुम्बक एवं बिजली के रूप में परिणत किया जा सकेगा और इस आधार पर ईंधन का एक सस्ता और सुविस्तृत स्रोत हाथ में आ जाएगा। कान के माध्यम से मस्तिष्क में ध्वनियाँ पहुँचती हैं और हमें शब्द श्रवण का लाभ मिलता है। जिनके कानों की झिल्ली खराब हो गई है उन्हें बहरे लोगों की दृष्टि मार्ग से ध्वनि तरंगों को मस्तिष्क तक पहुँचने और सुनने का लाभ देने के लिए चल रहे प्रयोग अब सफल होने के निकट पहुँचते जा रहे हैं। इसी प्रकार नाक, कान, आँखें और मुँह के छिद्रों का मस्तिष्क से सीधा सम्बन्ध होने के कारण यह माना जा रहा है कि एक में गड़बड़ी होने पर दूसरे के द्वारा मस्तिष्क को आवश्यक जानकारी मिलने का मार्ग मिल जाएगा। इस प्रकार गूँगे, बहरे, अन्धे व्यक्ति भी अपनी आवश्यकता अन्य छिद्रों के सहारे पूरा कर लिया करेंगे। राडार जैसे यन्त्र अभी बहुमूल्य जानकारियाँ ध्वनि प्रवाह को पकड़ कर ही संग्रह करते हैं। भविष्य में यह क्षेत्र और भी व्यापक होने जा रहा है।

मधुर, संयत और सुसंस्कृत वाणी को वशीकरण यन्त्र बताया गया है। उसके आधार पर पराये अपने हो जाते हैं। दूसरों का स्नेह, सम्मान एवं सहयोग अर्जित करना सम्भव होता है। प्रगति के असंख्य द्वार खुलते हैं। वाणी के परिष्कृत प्रभाव का लौकिक जीवन की प्रगति एवं प्रसन्नता में कितना अधिक योगदान होता है इस पर जितना अधिक विचार किया जाय उतनी ही अधिक उसकी गरिमा स्पष्ट होती जाती है। स्कूली शिक्षा तो अध्यापकों और छात्रों के वाणी विनिमय आधार पर चलती ही है। ब्रह्म विद्या कर आधार भी वही है। सत्संग, प्रवचन, कथा, कीर्तन, पाठ, स्तोत्र से लेकर जप साधन तक वाणी के माध्यम से ही सम्भव होते हैं। लौकिक क्षेत्र में दूसरों को प्रभावित करके उन्हें ऊँचे उठाने, आगे बढ़ाने के प्रयोजन पूरे होते हैं। औरों का सद्भाव सहयोग अर्जित करके व्यक्ति स्वयं भी लाभान्वित होता है। आत्मिक क्षेत्र में मन्त्र विद्या के आधार पर अनेक उच्चस्तरीय विभूतियाँ प्राप्त होती है और आत्म कल्याण के लक्ष्य तक पहुँच सकना सम्भव होता है। परिष्कृत वाणी के समान मनुष्य के पास और कोई उत्कृष्ट शक्ति नहीं है। मन्त्र विद्या का जो कुछ भी चमत्कार कहा, सुना और देखा जाता है उसे उस वाक् का ही प्रतिफल कह सकते हैं जिसका परिशोधन, सत्य, मौन, व्रत आदि माध्यमों से किया जाता है। उसकी उद्भूत शक्ति जड़ जगत को हिला सकने और चेतन जगत में व्यापक भाव प्रवाह उत्पन्न कर सकने में समर्थ होती है। इसलिए वाक् साधना को आत्म विद्या का प्रधान आधार माना गया है। इसके लिए मन, वचन और कर्म से ऐसी उत्कृष्टता का समन्वय करना पड़ता है कि वाणी को दग्ध करने वाला कोई कारण शेष न रह जाय। इतना करने के उपरान्त ही जपा हुआ-बोला हुआ-कोई भी मन्त्र असंदिग्ध रूप से सिद्ध होता है। यदि वाणी दूषित, कलुषित दग्ध स्थिति में पड़ी रहे तो उसके द्वारा जप किये गये जप, स्तवन, पाठ आदि करते रहने पर भी अभीष्ट फल न मिल सकेगा। परिष्कृत वाणी वाक् को अध्यात्म का प्राण कह सकते हैं उसे साधक की कामधेनु और तपस्वी का ब्रह्मास्त्र कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। इसी परिमार्जित वाणी को सरस्वती भी कहा गया है। देवी सरस्वती के अनुग्रह से जो वरदान प्राप्त हो सकते हैं परिष्कृत वाक् शक्ति भी वे सारे चमत्कार उत्पन्न कर सकती है।

ब्रह्म देवता के चार मुख हैं। उन्होंने उन चारों से चार वेदों का सृजन प्रवचन किया। यह चतुर्धा प्रकटीकरण वस्तुतः वैखरी, मध्यमा, परा और पश्यन्ति इन चार वाणियों के ऊर्ध्वगामी उभार का अलंकारिक वर्णन हैं। यह कार्य ब्रह्म देवता ने किया सो उसे आत्म देवता भी सम्पन्न कर सकता है। पुराणों की कथा है कि विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल नाल पर ब्रह्म जी कई बार उतरे और ऊपर चढ़े। मन्त्र साधना में यही होता है। उच्चारित होने के उपरान्त स्थूल शब्द अन्तःकरण के मर्मस्थल की गहराई में उतरता है और उस शक्ति स्रोत की ऊर्जा से सम्पन्न होकर ऊपर आता है। जब वह ऊपर आता है तो वैखरी में पश्यन्ति का वैसा ही प्रभाव होता है जैसा कि बिजली के संपर्क से धातु के तार में। वह मन्त्रवत् शब्द समस्त सृष्टि में हलचल उत्पन्न करता है। सूक्ष्म जगत को स्पन्दित करता है और व्यक्ति को सामान्य न रहने देकर उसे दैवी शक्ति से सम्पन्न बना देता है।


अपनों से अपनी बात


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कोई विशेष योग्यता हो तो उसका उल्लेख करें..............दैनिक उपासना का विवरण................

परिवार के सदस्यों का परिचय........... ..............................................................

मिशन की किन किन पत्रिकाओं के , कब से ग्राहक हैं। उनके वर्तमान ग्राहक नम्बर क्या हैं?

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यदि व्रतधारी हैं तो नियमित अंशदान का उल्लेख करे.................................................

यदि मिशन के किन्हीं शिविरों में शिक्षण प्राप्त किया हो तो उनका ब्यौरा.............................

अब तक के जीवन की भली बुरी महत्त्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख.....................................

पत्रिकाओं के अन्य पाठक

आपके पास आने वाली किन पत्रिकाओं को जो सज्जन नियमित रूप से पढ़ते हैं। उनका (1)पूरा नाम पता (2)व्यवसाय (3)शिक्षा (4)जन्म तिथि एवं (5)जन्म वंश का उल्लेख

(1) ..........................................................................................

(2) ..........................................................................................

(3) ..........................................................................................

(4..........................................................................................

(5) ..........................................................................................

ज्ञातव्य-

(1) हर सदस्य को फार्म की दो प्रतियाँ भरकर युग निर्माण योजना मथुरा के पते पर भेजनी हैं।

(2) फार्म में स्थान की कमी के कारण पूरा विवरण न लिखा जा सके तो उसे अलग कागज पर लिखकर संलग्न करें।

(3) यदि आवश्यकता हो तो फार्म की हाथ से नकल करके भी भेजे जा सकते हैं।


जलन-दर्द


जलन-दर्द (kavita)

था जिसे दर्द, वह दीप जलता रह, दर्द जिसको न था, दीप वह बुझ गया। वह जला है, जहाँ स्नेह रिसता रहा, बुझ गया वह, जहाँ स्नेह ही चुक गया।

था जिसे दर्द यह ‘तुम मिटाकर रहूँ , स्नेह के स्रोत को वह उबलता रहा। देह अपनी जलाता रहा रात-दिन-और तम के इरादे निगलता रहा

बस उसी दीप की ज्योति को देखकर, तम उसी के चरण के तले झुक गया। दर्द जिसको न था, स्नेह से हीन वह-दीप बुझकर तिमिर का सगा हो गया।

और जलते हुए दीपकों को, वही-लक्ष्य से पूर्व ही तो दगा दे गया। वह जलन को नहीं सह सका अब अधिक, और जलते हुए एक दम रुक गया।

आज चारों तरफ है अंधेरे बहुत, दीप का दर्द लेकर, चलो ! हम चलें। है मनुजता कि आशा लगाये हुए, बीच में बुझ, न विश्वास उसका छलें।

मुक्ति तम से मनुज को वही दे सका-स्नेह-रिसते हुए, प्राण जो फूँक गया।

-मंगल विजय

सम्पादक- भगवती देवी शर्मा, प्रकाशक व मुद्रक-मृत्युञ्जय शर्मा, अखण्ड ज्योति संस्थान, मथुरा द्वारा जन-जागरण प्रेस, मथुरा 281003 में मुद्रित।

*समाप्त*