जीवन क्या है? उसके स्वरूप को समझा जाना चाहिए और उसके साथ जुड़े हुए तथ्यों को स्वीकार किया जाना चाहिए, भले ही वे कठोर और अप्रिय ही प्रतीत क्यों न होते हों। जीवन एक चुनौती है-एक संग्राम है और एक जोखिम है उसे इसी रूप में अंगीकार करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। जीवन एक रहस्य है, तिलस्म है, भूल-भुलैया और गोरखधन्धा है। गम्भीरता और सतर्कता के आधार पर ही उसकी तह तक पहुँचा जा सकता है और भ्रान्तियों के कारण उत्पन्न होने वाले खतरों से बचा जा सकता है। जीवन कर्तव्य के रूप में अत्यन्त भारी किन्तु अभिनेता की तरह हँसने-हँसाने वाला- हलका फुलका रंग मंच भी है।
जीवन एक गीत है जिसे पंचम स्वर में गाया जा सकता है। जीवन एक स्वप्न है जिसमें अपने को खोया जा सके जो भरपूर आनन्द का रसास्वादन किया जा सकता है। जीवन अवसर है जिसे गँवा देने पर सब कुछ हाथ से गुम जाता है। जीवन एक प्रतिज्ञा है- यात्रा है और कला है। इसको किस प्रकार सफल बनाया जा सकता है जिसने इसे जान लिया और मान लिया, समझना चाहिए कि वह सच्चा रत्न पारखी और उपलब्ध विभूतियों का सदुपयोग कर सकने वाला भाग्यशाली है। जीवन सौन्दर्य है, जीवन प्रेम है, जीवन वह सब कुछ है जो नियन्ता की इस सुविस्तृत सृष्टि में सर्वोत्तम कहा जा सके।
योग का अर्थ है जोड़-मिलना अध्यात्म साधना के क्षेत्र में यह शब्द आत्मा और परमात्मा को मिलाने वाली पुण्य प्रक्रिया के रूप में प्रयुक्त होता है। इसे सद्ज्ञान और सत्कर्म का समन्वय भी कह सकते हैं। ठण्डे गरम तार मिलने से विद्युत धारा प्रवाहित होती है। दोनों तारों में रहती तो वह पहले से ही है पर परिचय तभी मिलता है जब दोनों का मिलन हो। संसार में सबसे बड़ा दुःख वियोग है। प्रिय परिजनों से बिछुड़ जाने पर जितना कष्ट होता है उतना अन्यत्र कहीं भी नहीं होता। आत्मा को अपने परम प्रिय परमात्मा से विलग होने पर अहर्निश पग-पग पर कुकर्म घेरते हैं और शोक सन्ताप दुःख देते हैं। अपहरण घटना के बाद सीताजी को भी दुःख सहना पड़ा और राम भी उद्विग्न ही बने रहे।
मोटे शब्दों में भौतिक और अध्यात्म का समन्वय योग कहा जा सकता है। साधनों की कमी नहीं। निर्धन कहलाने वाले व्यक्ति के पास भी शरीर, मन, बुद्धि, प्रतिभा आदि साधन होते हैं। सहयोग, प्रभाव, सम्पर्क भी हर किसी को न्यूनाधिक मात्रा में उपलब्ध रहता ही है। धन तथा अन्य साधन भी किसी कदर होते ही हैं। यह सब मिलकर इतना हो जाता है कि इतने का ही यदि ठीक प्रकार उपयोग हो सके, उनको उचित रीति से उचित प्रयोजनों में संलग्न किया जा सके तो कुछ ही समय में आश्चर्यजनक प्रतिफल दृष्टिगोचर हो सकते हैं। पर होता अत्यन्त विचित्र है। यह सभी साधन आदर्शवादी लक्ष्य के अभाव में ऐसे ही अस्त-व्यस्त होते रहते हैं और उस अपव्यय के फलस्वरूप चित्र-विचित्र दुष्परिणाम उत्पन्न होते रहते हैं। अपनी ही क्षमता अपने ही विनाश में संलग्न रहें तो इसे अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारना ही कहा जाएगा
साधन और सत् प्रयोजन का समन्वय हो सके तो उसे व्यावहारिक जीवन का योग कहा जाएगा इस सुयोग की व्यवस्था जिनने भी बनाई होगी वे स्वल्प साधनों से भी आशातीत प्रगति कर सकने में समर्थ हुए होंगे।
जिन्हें यह सन्मार्ग नहीं मिला। जो साधनों को बाल क्रीड़ा के मनोविनोदों में गँवाते रहे और दुर्जनों की भाँति उन्हें दुष्कर्मों में नष्ट करते रहे ऐसे मनुष्यों की जीवन सम्पदा सुर दुर्लभ होते हुए भी अभिशाप दुर्भाग्य ही सिद्ध होती रहेगी
मनुष्य जीवन का मूल्य, उत्तरदायित्व एवं सदुपयोग न समझ सकने के कारण ही हेय गतिविधियाँ गले बँधती हैं और सर्वनाश का पथ-प्रशस्त होता है। जन्म-जन्मान्तरों से संगृहीत पशु प्रवृत्तियाँ अपने उन्हीं हेय संस्कारों के अनुरूप गतिविधियाँ अपनाने के लिये आकर्षित करती रहती हैं जो निकृष्ट योनियों में भले ही उपयोगी रही हों पर मनुष्य स्तर में पहुँचने के बाद वे सर्वथा अनुपयुक्त पड़ती हैं। बचपन के कपड़े बड़े होने पर निरर्थक हो जाते हैं। बड़ा आदमी बच्चों की तरह तोतली बोली बोले या खिलवाड़ करे तो उससे मात्र उपहास ही होगा। पशु प्रवृत्तियों से प्रेरणा ग्रहण करते हुए यदि नर बानरों जैसा चिन्तन एवं कर्तव्य अपनाया जाय तो उस रीति-नीति को दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा
योगाभ्यास का आरम्भ चित्त वृत्तियों के निरोध से आरम्भ होता है। पतंजलि योग दर्शन के पाद 1 सूत्र 2 में योग की व्याख्या करते हुए उसे चित्त वृत्तियों को रोकने की प्रक्रिया बताया गया है। आमतौर से इसका अर्थ चित्त निरोध-एकाग्रता का अभ्यास समझा जाता है। यह अभ्यास योग का बहुत छोटा अंश है-इसे योग का भौतिक भाग कह सकते हैं। एकाग्रता अध्यात्म साधकों का ही नहीं ऐसे अनेक संसारी उसमें पारंगत होते हैं जिनका अध्यात्म से दूर का भी सम्बन्ध नहीं है। सरकस के नट-नर्तकों का सारा खेल एकाग्रता की सिद्धि पर ही टिका होता है यदि उनका ध्यान बँटने लगे तो तार पर चलने झूलों पर उछलने, जलती मशालों की शृंखला उछालने जैसे करतब दिखा सकना किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगा। हिसाब किताब सही रखने वाले मुनीमों में अपने काम में समुचित एकाग्रता रखने की ही विशेषता होती है। वैज्ञानिक, कलाकार, चित्रकार मूर्तिकार, साहित्यकार आदि अपने अपने विषयों में तन्मय हो सकने की विशेषता उत्पन्न करते और सफल होते हैं। बन्दूक का सही निशाना लगाना। एकाग्रता की शक्ति पर ही निर्भर है। ऐसे ही अन्य अनेक काम हैं जिनसे लोग एकाग्रता सम्पादित करते हैं और चमत्कारी सफलताएँ प्राप्त करते हैं। इसे एक मस्तिष्कीय कौशल कह सकते हैं। इसे एक मस्तिष्कीय कौशल कह सकते हैं। आध्यात्म प्रयोजनों में भी इस विशेषता की आवश्यकता पड़ती है। इतना होते हुए भी मात्र उसी विशेषता के आधार पर किसी को योगी नहीं कहा जा सकता।
चित्त निरोध का अर्थ है मन की अस्त-व्यस्त उछलकूद को नियन्त्रित करके किसी विशेष प्रयोजन में लगे रहने का अभ्यास। यह आवश्यक है और सराहनीय भी, पर इससे योग साधना का प्रयोजन पूरा नहीं होता। आत्मिक प्रगति के लिए मात्र चित्त की नहीं-गहराई में उतर कर चित्त वृत्तियों के निरोध की बात सोची जानी चाहिए। चित्त निरोध और चित्त वृत्तियों के बची का अन्तर प्रत्येक विचारशील के मन मस्तिष्क में स्पष्ट रहना चाहिए।
कितने ही अध्यात्म क्षेत्र में महामानव ऐसे हुए हैं जिनमें एकाग्रता कम और चंचलता अधिक थी। मीरा, चैतन्य, रामकृष्ण परमहंस, सूरदास आदि भक्त शिरोमणि स्तर के समझे जाने वाले मूर्धन्य अध्यात्मवादियों को एकाग्रता की नहीं वरन् व्याकुलता की सिद्धि थी। लक्ष्य के प्रति व्याकुलता का भी उतना ही मूल्य है जितना एकाग्रता का। स्वामी विवेकानन्द से किसी ने पूछा कि कि ईश्वर प्राप्ति की सम्भावना किस स्तर की मनोभूमि में होती है? इसका उत्तर देने के लिए उन्होंने बात को फिर कभी के लिए टाल दिया। एक दिन वे उस प्रश्नकर्ता को अपने साथ नदी स्नान के लिए कहा। कठ तक पानी में उतर जाने पर उनने जिज्ञासु की गरदन पकड़ ली और उसे बलपूर्वक पानी में डूबो दिया। जब वह घबराया तो उन्होंने उसे छोड़ दिया। इस विचित्र व्यवहार का कारण पूछने पर स्वामी जी ने उत्तर दिया कि यही तुम्हारे उस दिन के प्रश्न का उत्तर है जिसमें ईश्वर को प्राप्त करने की मनःस्थिति के बारे में पूछा गया है। डूबते समय तुम्हें अपनी प्राण रक्षा के लिए उत्कट प्रयत्न करने के अतिरिक्त और किसी बात का ध्यान नहीं था। ठीक यही स्थिति साधक की होनी चाहिए उसे ईश्वर की प्राप्ति के लिए इतनी व्याकुलता ही कि अन्य कोई बात सूझ ही न पड़े। इस प्रसंग में उस एकाग्रता का समर्थन है जो व्याकुलता के कारण उत्पन्न हुई हो।
किन चित्त वृत्तियों का अवरोध करना होगा इसका संकेत पतंजलि योग दर्शन के पाद 1 सूत्र 6 में दिया गया है। कहा गया है-प्रमाण विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृतः प्रायः यही पाँच प्रकार की चंचलताएँ मन पर छाई रहती हैं और उसे उच्च उद्देश्यों के विरत करके पशु प्रवृत्तियों में उलझाती हैं। प्रमाण वृत्ति उसे कहते हैं जो इन्द्रिय विषयों के पूर्वाभ्यास से संबंधित विषयों के प्रसंग सामने आने पर उभरती है। विपर्यय कहते हैं प्रतिकूल ज्ञान को वस्तु स्थिति की, जानकारी न होने से चित्त कस्तूरी के हिरन की तरह मृग तृष्णा में मारे-मारे फिरने वाले मृग की तरह उद्विग्न फिरता है। विकल्प का अर्थ है- भय, आशंका, सन्देह, अशुभ सम्भावना आदि कुकल्पनाओं से उत्पन्न कायरता निद्रा का अर्थ है आलस्य, प्रमाद, उपेक्षा, अवसाद, अनुत्साह। स्मृति के संस्मरण है जो निकृष्ट योनियों में रहते समय अभ्यास में आते रहे-स्वभाव के अंग बने रहे। उनकी छाया मनुष्य योनि में भी छाई रहती है और उसके फलस्वरूप कई बार इतने जोर से उभरती है कि विवेक मर्यादाओं के बाँध तोड़ कर वैसा करा लेती है जिसके संबंध में पीछे पश्चाताप करना ही शेष रह जाता है।
जिस युग में-जिस समाज में-जिस वातावरण में हम रहते हैं उसमें अवांछनीय प्रचलनों की कमी नहीं। उनका आकर्षण मन को अपनी और खींचता लुभाता है। पानी स्वभावतः नीचे गिरता है। अधिकांश लोग अवांछनीय गतिविधियों अपना कर अनुपयुक्त जीवन जीते हैं। इसमें वे तात्कालिक लाभ भी पाते हैं, पीछे भले ही उन्हें दुष्परिणाम भुगतने पड़े। इस तत्काल लाभ की बात सहज ही मन को आकर्षित करती है और दबी हुई दुष्प्रवृत्तियाँ उभर कर उस मार्ग पर घसीट ले जाती हैं जो मनुष्य जैसे विवेकवान प्राणी के लिए अशोभनीय है।
योग साधना का मूल उद्देश्य इन्हीं दुष्प्रवृत्तियों के साथ प्रचण्ड संघर्ष खड़ा कर देना है। जिस महाभारत में कृष्ण और अर्जुन ने सम्मिलित भूमिका निबाही थी वह आत्म परिष्कार में योग साधना के साथ पूरी तरह संबंधित है। कौरव दल इन्हीं कुसंस्कारों का नाम है जो निकृष्ट योनियों से साथ चले आ रहे हैं और वातावरण में घुसी अवांछनीयता के कारण भड़कते हैं। कौरवों ने पाण्डवों की सारी सम्पदा हथिया ली थी। उसे वापिस लेने के लिए युद्ध करना पड़ा। आत्मिक गरिमा पर असुरता आच्छादित हो रही है। उसके इस चंगुल से छुड़ाने के लिए विरोध प्रतिरोध का महाभारत खड़ा करने के अतिरिक्त और कोई उपाय रह नहीं गया था। योगाभ्यास में भी इसी ‘निरोध’ प्रतिरोध का विरोध संघर्ष का उल्लेख है। इसमें आत्मा और परमात्मा का सद्ज्ञान सत्कर्म का-समन्वय करने पर विजय सर्वथा निश्चित हो जाती है।
योग के इस दार्शनिक पक्ष को परिपुष्ट करने के लिए कतिपय वर्षों कृत्यों का अवलम्बन करना पड़ता है। पहलवान बनने के लिए व्यायामशाला में सिखाये जाने वाले दण्ड बैठक आदि कर्मकाण्डों को पूरा करना पड़ता है। साथ ही ब्रह्मचर्य, पौष्टिक आहार, मालिश आदि की विधि व्यवस्था अपनानी पड़ती है। इस अभ्यासों से अन्तरंग में छपी बलिष्ठता उभरती है और मनुष्य कुछ की समय में पहलवान स्तर का बनता चला जाता है। योगाभ्यास की निर्धारित गतिविधियाँ अपनाने का भी ऐसा ही प्रतिफल होता है।
इन अभ्यासों की उपयोगिता भी है और आवश्यकता भी। शास्त्रकारों में योग साधना का महात्म्य भी बताया है और उसके स्वरूप एवं तत्त्व दर्शन को समझाने का प्रयत्न करते हुये कहा है-
अभ्यासात्कादिवर्णानि यथाशास्त्राणि वोधयेत्। तथा योगं समासाद्य तत्वज्ञानं च लम्यते-घेरण्ड संहिता 1। 5
जैसे क ख ग घ से अक्षरारम्भ का अभ्यास करते हुए शास्त्रज्ञ, विद्वान् बन जाते हैं, वैसे ही योग का अभ्यास करते-करते तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जाता है।
ज्ञान और कर्म के अभय युग्मों के समन्वय की शेष से योग की प्राप्ति कहा जाता है।
योगेन योगों ज्ञातव्यो योगों योगोत्प्रवर्तर्त। योऽप्रमत्तस्तु योगे न सयोगी रमते चिरम्-महायोग विज्ञान
योग साधना से ही योग को जानना चाहिए। साधना से ही योग की प्राप्ति होती है। जो सावधानी के साथ योगसाधना में निरत है, वही चिरकाल तक आनन्द पाता है।
तथेति स होवाच- योगेन योगों ज्ञातव्या योगों योगात् प्रवर्घते। योऽप्रमुत्तस्तु योगेन न रमते चिरम्-सौभाग्य लक्ष्म्युपनिषद् 1
उन्होंने कहा-योगाभ्यास से योग की अभिवृद्धि होती है। योग के द्वारा ही योग को जानना चाहिए। योग में ही दत्त चित्त रहने वाला व्यक्ति चिर शान्ति उपलब्ध करता है।
योग न तो कठिन है, न अशक्य है वह सर्वसाधारण के लिए सुलभ है। इस मार्ग पर न्यूनाधिक जितना भी चला जा सके उतना लाभ ही है। हानि को तो आशंका है ही नहीं।
जड़ पदार्थों में 1+1 को जोड़ 2 बनता है। प्राणियों की चेतना का सहयोग समन्वय होने से यह तथ्य भिन्न प्रकार से होता है। 1 और 1 को बराबर रख देने से वे 11 बन जाते हैं। दो सच्चे मित्र सहयोगी मिलकर असाधारण काम करते हैं, दो बैलों की जोड़ी से खेती का सारा काम चलता है। गृहस्थ जीवन में पति-पत्नी का सहयोग छोटे से परिवार में स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देता है। यदि आत्मा और परमात्मा का सद्ज्ञान और सत्कर्म का समन्वय हो सके तो समझना चाहिए इस उच्चस्तरीय योग का परिणाम एक से एक बढ़ी-बढ़ी सिद्धियों और विभूतियों के रूप में सामने उपस्थित होगा।
अन्तः कारण की सबसे प्रबल एवं सबसे उच्चस्तरीय शक्ति ‘श्रद्धा’ है। श्रेष्ठता के प्रति अटूट आस्था रखने को श्रद्धा कहते हैं। यह जब सिद्धान्त एवं व्यवहार में उतरती है। तो उसे निष्ठा कहते हैं। जब वही आत्मा के स्वरूप, जीवन दर्शन एवं ईश्वर भक्ति के क्षेत्र में प्रवेश करती है। तो श्रद्धा कहलाती है। ईश्वर प्राप्ति के लिए आत्मा कल्याण के लिए इस शक्ति का उभार एवं अवलम्बन आवश्यक है। रामायण में श्रद्धा को भवानी और विश्वास को शंकर की उपमा देते हुए कहा गया है कि इनकी सहायता के बिना अन्तरात्मा में बैठा हुआ परमात्मा किसी को मिल नहीं सकता।
श्रद्धा के अभिसिंचन से पत्थर में देवता का उदय होता है। एकलव्य ने मिट्टी की द्रोण प्रतिमा द्वारा उतनी शिक्षा प्राप्त कर ली थी जितनी पाण्डव जीवन्त द्रोणाचार्य से भी प्राप्त न कर सकें। मीरा , सूर, तुलसी का भगवत् दर्शन उनकी गहन श्रद्धा के आधार पर ही सम्भव हुआ था। ईश्वर , कर्मफल, जीवनोद्देश्य, कर्तव्यपालन आत्मा की गरिमा जैसे तथ्यों पर सघन श्रद्धा रखने वाले लोग ही महामानवों की पंक्ति में बैठ सके है।
साधना में श्रद्धा की ही अपरिमेय शक्ति काम करती है। यदि विश्वास न हो तो उपासनात्मक कर्मकाण्डों का उतना ही फल मिलेगा जितना कि उतने समय तक किये गये हलके फुलके शारीरिक परिश्रम का। उसी साधना को करते हुए एक व्यक्ति चमत्कारी फल प्राप्त करता है। पर दूसरे को असफल रहना पड़ता है। इसमें श्रद्धा की मात्रा में न्यूनाधिकता होना ही प्रधान कारण होता है।
अपनी पुस्तक “मैन इन द मोर्डन एज” में कार्ल यार्स्पस ने लिखा है कि “ आज कारखाने का एक श्रमिक या किसी बड़े संस्थान का एक कर्मचारी मशीन का वह पुर्जा होता है, जिसमें अपने विशिष्ट अस्तित्व का कोई भी अर्थ नहीं होता’ तथा जिसे कभी भी वैसे ही दूसरे पुर्जे से बदला जा सकता है”।
मुख्यतः वे विचार-दर्शन जो कि इस बात पर बल देते हैं। कि मानवीय -जीवन का लक्ष्य मात्र पशुवत् पेट एवं प्रजनन के सुखों और संघर्षों में सिमटने रहे आना है, अनास्था को उत्पन्न करते हैं। लेकिन ऐसे विचार दर्शन की काट मात्र ताकि स्तर पर सम्भव नहीं है। जब देखा-पाया यही जाता है। कि कथित विशिष्ट और ‘बड़े’ लोग भी क्षुद्र भोग-लिप्सा अन्धी यश-लिप्सा और उद्धत मिथ्याचार से ही आपादमस्तक सने और सन्तुष्ट हैं, तो लोक-जीवन में आस्था का आधार ढह जाता है। आस्था टिकती है-प्रामाणिकता की नींव पर । प्रामाणिक व्यक्तित्व ही लोक आस्था को दृढ़ एवं दीर्घ जीवी बना सकते हैं।
आधुनिक युग में महात्मा गाँधी इसके प्रत्यक्ष एवं प्रबल प्रमाण हैं। उन्होंने स्वयं अपनी आस्था को हर श्वास में ज्वलन्त जीवन्त रखा। तद्नुरूप आचरण की साधना की । कभी क्षण भर को भी गाँधी जी इस आस्था से विचलित नहीं हुए कि एक सार्वभौम सत्ता है और वही चमत्कार को जन्म दिया। जिसके सामने शास्त्रों अणुबमों की शक्ति भी तुच्छ है।
समर्थ गुरु श्री रामदास ने समाज में जिस आस्था को जन्म दिया, वह शिवाजी के उत्कर्ष का आधार बनी। सन्त-पुरुष वही कहे जाते हैं। जिनमें यह आस्था प्रखर होती है। विलियम जेम्स ने “द वेरायटीज आव् रिलीजस एक्पीरियेन्स “ नामक पुस्तक में लिखा है। कि “विश्व कल्याण हेतु वे सद्गुण नितान्त आवश्यक हैं, जो सन्तों में पाये जाते हैं। “
अतः आज जो आस्थाहीनता की स्थिति उत्पन्न है, उसका एकमेव कारण समाज के विभिन्न क्षेत्रों के प्रतिभाशालियों की स्वयं अपने पर ही आस्था न होता है। यह आत्म पलायन की स्थिति है। जब व्यक्तियों में आम आस्था नहीं होती तो वे हर बात में दूसरों का मुँह जोहने लगते हैं। आत्मा-निष्ठा की कमी वस्तुतः एक बहुत बड़ा दुर्भाग्य है।
वह व्यक्ति के अन्तःकरण को स्पर्श करने में असमर्थ ही रहती है। जबकि कला में यही सामर्थ्य मुख्य है। इमसैन ने कहा है-प्रतिभाशाली की प्रत्येक कृति में हम अपने ही विचारों को पाते हैं।” अपनी कृति “फार्मस् आव् मार्डन फिक्शन” में श्री डब्ल्यू0 बी0 ओ0 कोनार लिखते हैं कि “कभी कभी कवि हमें पहली बार उन तथ्यों से अवगत कराता है, जो कि किसी युग की विशेषताएँ होती है।” इस संबंध में कवि पोप की यह उक्ति सर्वाधिक सुन्दर प्रतीत होती है कि “कला हमें स्वयं अपने ही मन का चित्र पुनः पकड़ा देती है।”
इतिहासकार अर्नाल्ड टायनवी ने कहा है-प्रतिभाशाली जीवन में दो विशेषताएँ होती है-वे अपने को पूरी तरह काट लेते हैं, लेकिन लोकहित उनका सदैव ध्येय बना रहता है और इस रूप में वे समाज से सदा जुड़े रहते हैं। इसका कारण क्या है? श्री डब्ल्यू0 डी0 स्टेस ने “रिलीजन एण्ड द मार्डन माइन्ड” नामक पुस्तक में लिखा है कि “ईसा तथा बुद्ध जैसे नैतिक प्रतिभा सम्पन्न महापुरुषों में यह पाया कि मनुष्य सुखी नहीं हो सकता, जब तक उसके चारों और सब सुखी नहीं है। क्योंकि व्यक्ति सम्पूर्ण मानवता से सशक्त है। मानवजाति के सुख में ही उसका सुख है। यही इन महापुरुषों की सबसे बड़ी खोज थी।”
वस्तुतः मनुष्य एक सहकारी प्राणी है। वह सामाजिक प्राणी, मात्र इसलिए नहीं है कि इससे उसकी पाशविक आवश्यकताएँ पूरी होती है। अपितु इसलिए है कि इससे उसकी सृजनात्मक आवश्यकता पूरी होती है। अर्नाल्ड टायनावी ने “सृजनात्मक व्यक्तियों” की अवधारणा प्रस्तुत कर उन्हें ही मानव-समाज का सर्वश्रेष्ठ अंश बताया है। यह सृजन-सहकारिता द्वारा ही सम्भव है।
जन जीवन में आस्थाओं की कमी होने के कारण ही प्रस्तुत समस्याओं की विविध-विधि उलझने खड़ी हो रही है। आदर्शों और मर्यादाओं की उपेक्षा होने से ही व्यक्तिगत जीवन में दृष्टता और समाज में भ्रष्टता पनपती है। आत्म विश्वास गिर जाने पर मनुष्य बाह्य और अन्तः क्षेत्रों में परावलम्बी-परमुखापेक्षी बनता है। आत्म विश्वास बना रहे तो ही साहस एवं उत्साह जीवित रह सकता है। वैयक्तिक प्रगति के लिए उच्चस्तरीय आस्थाओं की आवश्यकता है। समाज भी वही समृद्ध होगा जिसके नागरिकों में सामूहिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों के निर्वाह की निष्ठा प्रखर बन कर रह रही होगी।
श्रद्धा की गरिमा व्यक्त करते हुए गीता कहती है-
सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषों यो यच्छद्ध स एव सः-गीता 17।3
अर्थात्-व्यक्ति श्रद्धामय है। जिसकी जो श्रद्धा है वह वही है, वहीं बन जाता है।
धर्म एवं अध्यात्म के आदर्शों पर जन-निष्ठा का कितना महत्त्व है इस पर प्रकाश डालते हुए मूर्धन्य मनोवैज्ञानिकों ने कहा है कि चिकित्सा और शिक्षा के सम्मिलित प्रयत्नों में मानव जाति का जितना हित हुआ है उससे अधिक ही आदर्शवादी निष्ठाओं ने मानवी प्रगति एवं सुख शान्ति में सहायता प्रदान की है।
मनोवैज्ञानिक चार्ल्स युग का अभिमत है कि-विश्व के समस्त मनोचिकित्सक मिल कर भी इतने मानसिक रोगियों को स्वास्थ्य एवं सुखानुभूति नहीं प्रदान कर सकते, जितना कि किसी सामान्य-से सामान्य धर्म द्वारा उसके अनुयायियों को प्रदान किया जा सकता है।”
‘सिकनेस आफ सिविलाइजेशन’ में विस्तारपूर्वक मानव-सभ्यता का विश्लेषण करते हुये उसके रोगों-विकृतियों का मुख्य कारण आध्यात्मिक खोखलापन ही निरूपित किया है।
आत्म विश्वास-आत्म निष्ठा-मनुष्य जीवन की अत्यन्त उच्चस्तरीय विभूतियों में से एक है। उसके सहारे मनुष्य आदर्शों के प्रति अपनी श्रद्धा को सुदृढ़ बनाये रह सकता है। प्रलोभन और भंग उसे विचलित नहीं कर पाते। ऐसी दशा में व्यक्तित्व के विकास में आने वाले अन्य सभी अवरोध घटते मिटते रहते हैं। उनके कारण उनका मार्ग रुका नहीं रहता। श्रद्धा की शक्ति को मानवी गरिमा का उत्कृष्ट अलंकार कहा जाना चाहिए।
इमसैन कहते थे। श्रद्धा से बढ़कर कोई शक्ति नहीं। विश्वास से बढ़ कर और कोई साधन नहीं। डब्ल्यू0 बी0 कोनार लिखते हैं-युग की विशेष प्रेरणाएँ प्रायः श्रद्धावान् भावविभोर अन्तःकरणों से ही फूटती हैं’। कवि पोप की उक्ति है कि कला का आश्रय लेकर व्यक्ति अपने ‘दिव्य’ को प्रकट करता है और वातावरण की दिव्यता से भर देता है। प्रख्यात लेखिका हैरियट स्टोकी की एक पुस्तक ने समूचे अमेरिका को झकझोर दिया और उसके प्रभाव से उस देश से दास-प्रथा सदा के लिए उठ गई। उस समय के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन ने लेखिका को सीनेट के समक्ष खड़ा करके कहा था-यही वह महिला है, जिसको लेखनी ने जन-मानस में वर्गभेद की विरोधी ज्वाला जलाई और मानवों सम्वेदनाओं को अपना पुरुषार्थ प्रकट करने का अवसर दिया।’
आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता के प्रति साधन श्रद्धा- आदर्शों के प्रति अटूट निष्ठा और करुणा उदारता, सेवा, प्रेम, परमार्थ की भाव भक्ति का समन्वय जिस भी अन्तःकरण में होगा उसमें सन्तोष और उल्लास भरा रहेगा। ऐसा व्यक्ति सदा आनन्दित रखता है। आनन्दमय कोश की उपलब्धियाँ उपार्जित करने के लिए श्रद्धा तत्त्व को अन्तःकरण की गहराई में प्रतिष्ठापित करने की आवश्यकता है।
तथागत युद्ध राजगृह के वेलुवनाराम में बिहार कर रहे थे। उनका एक शिष्य गृहपति सिंगाल नित्य प्रातः उठकर स्नानादि कर भीगे वस्त्रों के साथ उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम, ऊपर तथा नीचे इन छः दिशाओं को हाथ जोड़कर नमस्कार करता था।
तथागत ने पूछा-सिंगाल तुम ऐसा क्यों करते हो?” गृहपति ने उत्तर दिया-भन्ते ! मृत्युशय्या पर पड़े पिता, प्रतिदिन सभी दिशाओं को नमस्कार करने का निर्देश जो दे गये थे, उसी से ऐसा करता हूँ।”
तथागत ने कहा-सिंगाल आर्य धर्म में दिशाओं को नमस्कार इस प्रकार नहीं किया जाता।”
सिंगाल ने प्रश्न किया-तब तथागत ने समझाया-पूर्व दिशा को नमस्कार का अर्थ है-पूर्वजों एवं माता-पिता के प्रति कर्तव्य का समुचित निर्वाह उनकी गरिमा की रक्षा। पश्चिम दिशा को नमस्कार का अर्थ है अपनी पृष्ठभूमि पत्नी के प्रति निष्ठा एवं कर्तव्य का निर्वाह। दक्षिण दिशा को नमस्कार का अर्थ है आचार्य के निर्देश-पालन को सदा उद्यत रहना, उन्हें सदा दाहिने रखना यानी उनके अनुकूल आचरण करना, उनसे मनोयोग-पूर्वक विद्या ग्रहण करना तथा उन्हें अपना उत्कृष्ट कर्त्तव्य समर्पित कर देना। उत्तर दिशा को नमस्कार का अर्थ है, मित्रों-साथियों से सहयोग-सद्व्यवहार नीचे की दिशा को नमस्कार का अर्थ है-भूत्यों-अनुचरों का समुचित ध्यान रखना, उनके दुःख-दर्द में हाथ बँटाना ऊपर की दिशा को नमस्कार का अर्थ है-श्रवणों-ब्राह्मणों का सत्कार, उनके प्रति श्रद्धा व उनकी सांसारिक आवश्यकताओं का ध्यान रखना।
साधना की सफलता में स्थान, क्षेत्र व वातावरण की असाधारण महत्त्व हैं विशिष्ट साधनाओं के लिए घर छोड़कर अन्यत्र उपयुक्त स्थान में जाने की आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि पुराने निवास स्थान का ढर्रा अभ्यस्त रहने से वैसी मनःस्थिति बन नहीं पाती जैसी महत्त्वपूर्ण साधनाओं के लिए विशेष रूप से आवश्यक है। कुटुम्बियों के परिचित लोगों के साथ जुड़े हुए भले-बुरे सम्बन्धों की पकड़ बनी रहती है। कामों का दबाव बना रहता है। राग द्वेष उभरते रहते हैं। दिनचर्या बदलने पर कुटुम्बी तथा साथी विचित्रता अनुभव करते और उसमें विरोध खड़ा करते हैं। आहार और दिनचर्या बदलने में विग्रह उत्पन्न होता है घरों के निवासी साथी जिस प्रकृति के होते हैं वैसा ही वातावरण वहाँ छाया रहता है यह सभी अड़चने है जो महत्त्वपूर्ण साधनाओं की न तो व्यवस्था बनने देती है और न मनःस्थिति ही वैसी रह पाती हैं। दैनिक नित्य कर्म के रूप में सामान्य उपासना तो घर पर भी चलती रह सकती है, पर यदि कुछ विशेष करना हो तो उसके लिए विशेष स्थान, वातावरण, सान्निध्य एवं मार्ग दर्शन भी चाहिए। यह सब प्राप्त करने के लिए उसके लिए उपयुक्त स्थान का प्रबंध करना वह आधार है जिस पर सफलता बहुत कुछ निर्भर रहती है।
यों यह कार्य घर से कुछ दूर एकान्त वाटिका, नदी तट जैसे स्थानों में भी हो सकता है। पर सुविधा हो तो हिमालय एवं गंगा तट की बात सोचनी चाहिए। बाह्य शीतलता के साथ आन्तरिक शान्ति का भी तारतम्य जुड़ा रहता है हिमालय की भूमि ही ऊँची नहीं है उसकी भूमि संस्कारिता भी ऊँची है। अभी भी इस क्षेत्र के निवासी ईमानदारी और सज्जनता की दृष्टि से प्रसिद्ध है। घोर गरीबी और अशिक्षा के रहते हुए भी उनकी प्रामाणिकता का स्तर बना हुआ है। हिमालय यात्रियों में से कभी कदाचित ही किसी को पहाड़ी कुली से बेईमानी बदमाशी की शिकायत हुई हो।
प्राचीन काल में हिमालय क्षेत्र ही स्वर्ग क्षेत्र कहलाता था। इसके अनेकों ऐतिहासिक प्रमाण अखण्ड-ज्योति में लगातार एक लेख माला के रूप में छप चुके है। देव मानवों की यही भूमि थी। थियोसोफिकल वालों की मान्यता है कि अभी भी दिव्य आत्माएँ वहीं निवास करती हैं चमत्कारों और सिद्धियों की खोज करने वाले प्रत्येक शोधकर्ता को हिमालय की कन्दराएँ छाननी पड़ी है। हनुमान्, अश्वत्थामा आदि चिरंजीवी उसी क्षेत्र में निवास करते हैं। इतिहास साक्षी है कि प्रायः सभी ऋषियों की तपश्चर्याएँ इसी क्षेत्र में सम्पन्न हुई है। सात ऋषियों की तपोभूमि हरिद्वार के उस स्थान पर थी जहाँ आजकल सप्त सरोवर हैं उनके आरमों को बचाने के लिए गंगा ने अपनी धारा को सात भागों में बाँटा, यह कथा कई पुराणों में आती है। पाण्डव, धृतराष्ट्र इसी क्षेत्र में तप करते हुए स्वर्ग सिधारे थे। अयोध्या छोड़कर राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न इसी भूमि में तप करते हुए दिवंगत हुए थे। गुरु वशिष्ठ की गुफा यही थी। व्यास जी और गणेश जी ने मिलकर 18 पुराण इसी क्षेत्र वसोधरा नामक स्थान में लिखे थे। भागीरथ, परशुराम, विश्वामित्र, दधीचि जैसे परम प्रतापी तपस्वियों की साधना हिमालय में ही सम्पन्न हुई थी।
हिमालय शिव का क्षेत्र हैं उनका निवास यहीं माना जाता है उनकी दोनों धर्म पत्नियाँ इसी भूमि में उपजीं। गंगा, यमुना सहित अनेकों पुण्य नदियों का उद्गम यही है। भारत की आध्यात्मिक विभूतियों की उत्पादक भूमि यदि हिमालय को माना जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी। इस मूर्तिमान् देवता की छाया में बैठकर कितनों ने न जाने क्या-क्या पाया है? अभी भी उसकी वह विशेषता अक्षुण्ण हैं जलवायु की दृष्टि से आरोग्य संवर्धक तत्त्वों की विशेषता से भी यह क्षेत्र अपने देश में सर्वोत्तम है। फिर मानसिक शान्ति और आत्मिक प्रगति के लिए जैसा वातावरण चाहिए वैसा यहाँ सदा सर्वदा उपलब्ध रहता है। ब्राह्मी शिलाजीत, अष्ट वर्ग आदि औषधियाँ अन्यत्र भी पाई उगाई जा सकती है पर हिमालय की भूमि पर जो उगता है उसमें अत्यधिक मात्रा में उपयोगी तत्त्व रहते हैं।
हिमालय की छाया-गंगा की गोद और वहाँ का भाव भरा वातावरण-साथ ही यदि शक्तिशाली संरक्षण मार्ग दर्शन मिलता हो तो उसे साधना का सुअवसर एवं साधक का सौभाग्य ही माना जाना चाहिए। ऐसे ही वातावरण में निवास करने का स्वर्गीय दिव्य आनन्द प्राप्त करने के लिए भर्तृहरि बेचैन थे। इसके लिए उन्होंने राजपाट का सारा जंजाल त्याग और योगी का देव जीवन अपना कर उच्चस्तरीय मनोरथ पूरा करने में सफल हुए। जब तक यह स्थिति न आई तब तक वे उसी के मनोरम सपने देखते रहे। भर्तृहरि शतक में उनकी अभिव्यक्ति इस प्रकार है-
गंगातीरे हिमगिरिशिलाबद्धपद्मासनस्य ब्रह्माज्ञानाभ्यसनविधिना योगनि द्रोगतस्त। किं तैभव्यिं मम सुदिवसैयैत्र ते निर्विशंकाः कण्डूँते जरइरिणाः श्रृंगमंगे मदीय॥
‘जीवन का वह सौभाग्य-दिवस कब आएगा, जब मैं गंगा तट की हिमाचल-शिला पर पद्मासन लगाकर ब्रह्मानंद में लीन समाधिस्थ बैठूँगा और वहाँ के बूढ़े हिरन मेरे अंगों को अपने सींगों से खुजलायेंगे।
ब्रह्मवर्चस् तपश्चर्या गायत्री की उच्चस्तरीय साधना हैं इसके लिए उपयुक्त स्थान एवं वातावरण की आवश्यकता थी। इसका ध्यान प्रारम्भ से ही रखा गया हैं यह आश्रम गंगा की धारा से 200 गज से भी कम दूरी पर है। सात ऋषियों की तपोभूमि के तप में यह पौराणिक साक्षी के साथ प्रख्यात हैं गंगा के मध्य सात द्वीप है जिन्हें छोटे-छोटे उपवन कहा जा सकता है उनमें ऐसे सघन वृक्ष उगे हुए हैं प्रयत्न यह रहेगा कि साधक ब्रह्मवर्चस आश्रम में निवास तो करे पर साधना के लिए निर्जन द्वीपों में चले जाया करें जिनमें कभी सप्त ऋषि तप करते थे और वे स्थान अभी जन प्रवेश से वंचित रहने के कारण अपनी मौलिक विशेषता अभी भी बनाये हुए हैं गंगा तट के शहरों का गन्दा, पानी गंगा में ही बहायी जाता है पर ब्रह्मवर्चस तक वैसा कहीं नहीं हुआ है। इससे पूर्व ऋषिकेश, देवप्रयाग, उत्तर काशी आदि जो कस्बे है उनका गन्दा पानी भी गंगा में नहीं गिरा है। इस विशेषता के कारण यहाँ की जल धारा अभी भी अपनी मौलिक विशेषता पूर्ववत् बनाये हुए है।
गंगा तट पर साधना का ही अपना महत्त्व है फिर चारों ओर गंगा घिरी होने के बीचों बीच जन शून्य द्वीपों में बैठ कर साधना करने का तो प्रतिफल और भी अधिक विलक्षण होगा। नित्य गंगा स्नान-मात्र गंगा जल पान टहलना-बैठना गंगा माता की ही गोद में-इन विशेषताओं के कारण ब्रह्म वर्चस साधना के लिए उपयुक्त वातावरण की ही व्यवस्था हुई है। इसे दैवी अनुग्रह एवं सहयोग के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। आत्मनिर्माण के लिए परम सात्विक धन भी भाव भरी श्रद्धा के लिए अपने को सार्थक बनाने के लिए मचलता चला आ रहा है भले ही उसकी मात्रा कितनी ही स्वल्प क्यों न हो। साधना की दृष्टि से गंगा सान्निध्य का महत्त्व शास्त्रकारों ने इस प्रकार बताया है-
यत्र गंगा महाभागा स देशस्तत्तपोवनम्। सिद्धक्षेत्रन्तु तज्ज्ञेय गंगातीरं समाश्रितम-कूर्म पुराण
जहाँ पर यह महाभाग गंगा है वह देश उसको तपोवन होता है। उसको सिद्ध क्षेत्र जानना चाहिए।
स्नातानाँ तत्र पयसि गाँगे ये नियतात्मनाम्। तुष्टिर्भवति या पुँसाँ न सा क्रतुशतैरपि-पद्य पुराण
गंगा के जल में स्नान किये हुए नियत आत्मा वाले पुरुषों को जो तुष्टि होती है वह सौ बसन्त ऋतुओं से भी नहीं होती है।
मुनयः सिद्धगन्धर्वा ये चान्ये सुरसत्तमाः। गंगातीरे तपस्तप्त्वा र्स्वगलोकेऽच्युताभवन्।11
पारजातसमाः पुष्पवृक्षाः कल्पद्रुमोपमाः। गंगातीरे तपस्तप्त्वा तत्रैर्श्वयं लभन्तिहि ।12।
तपोभिर्बहुर्भ्यिज्ञैर्प्रतैर्नानाविधैस्तथा। पुरुदानैर्गतिर्या च गंगा संसेवताँ च सा ॥13 -पद्य पुराण
मुनिगण-सिद्ध लोग-गंधर्व वृन्द और जो अन्य ड़ड़ड़ड़ में परम श्रेष्ठ है वे गंगा के तट पर तपस्या करके स्वर्ग लोक में स्थायी रूप से निवास प्राप्त कर अच्युत होते हुए ही वहाँ रहते हैं।11। गंगा के तट पर तपश्चर्या करके वहाँ पर परम ऐश्वर्य का लाभ लिया करते हैं क्योंकि वहाँ पर जो पुष्पों वाले वृक्ष है वे पारिजात ड़ड़ड़ड़ के समान है और समस्त मनोकामना पूर्ण कर ड़ड़ड़ड़ वाले कल्प वृक्षों के तुल्य होते हैं।12॥ बहुत प्रकार ड़ड़ड़ड़ यज्ञ और नाना प्रकार के व्रतों से तथा अधिक ड़ड़ड़ड़ से जो मनुष्य को गति प्राप्त होती है वही गति भागीरथी गंगा के जल में स्नानादि से प्राप्त होती है। अतः इस गंगा का भली-भाँति सेवन करना चाहिए।13।
नास्ति विष्णुसमं ध्येयं तपो नानशनात्परम्। नास्त्यारोग्यसमं धन्यं नास्ति गंगासभा सरित्-अग्नि पुराण
भगवान के समान कोई आश्रय नहीं उपवास के मान तप नहीं आरोग्य के समान सुख नहीं और गंगा समान कोई जल तीर्थ नहीं है।
येषाँ मध्ये याति गंगा ते देशाः पावना वराः। गतिगंगा तु भूतानाँ गतिमन्वेषताँ सदा।
गंगा तारयते चाभौ वंशौ नित्यं हि सेविता॥ गंगातीर्थसमुद्भूतमृद्धारी सोऽधहाऽर्कवत्॥
दर्षनात्स्पर्षनात्पानात्तगंगेतिकीर्तनाँत् पुनाति पुण्यपुरुषाँछततषोऽथ सहस्रशः-अग्नि पुराण
जिन क्षेत्रों में होकर गंगा जाती है वे पवित्र है। गंगा सद्गति देने वाली हैं जो उसका नित्य सेवन करते हैं वे अपने वंश सहित तर जाते हैं।
गंगा तट की मिट्टी धारण करना। गंगा दर्शन, गंगा स्नान, गंगा जल पान, गंगा नाम का जप करने से असंख्य मनुष्य पवित्र और पुण्यवान हुए है।
‘गंगोत्री महात्म्य में गंगा सान्निध्य का गुणगान इस प्रकार किया गया है।
अर्त्तनामार्तिनाशायः मोक्ष सिद्धयै तदर्थिनाम्। सर्वेषाँ सर्वसिद्धयै च गंगैव शरणं कलौ॥
दुःखियों के दुःख नाश के लिए, मुमुक्षुओं की मोक्ष सिद्धि के लिए और सबको सब प्रकार की सिद्धि के लिए, कलियुग में केवल गंगाजी ही शरण है।
ब्रह्मवैपरमं साक्षा, द्दवरुपेण धावति। पुमर्थकरणार्थ कौ, गंगेति शुभसज्ञया॥
साक्षात् परब्रह्म ही पृथ्वी में ‘गंगा’ इस शुभ नाम से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चार प्रकार के पुरुषार्थ देने के लिए जल रूप से बह रहे है।
गंगाया दर्शनं पुण्यं गंगाया मवगाहनम्। गंगातीरनिवासश्च, गंगानामजपार्चनम्॥
श्री गंगाजी का दर्शन महापुण्य है, गंगाजी में स्नान, गंगातीर निवास, गंगाजी का नाम जप और उसका पूजन सब ही पुण्यप्रद है।
रागादि चित्तदोषाश्र क्षीयनते तदनन्तरम्। दोषक्षये च भगवद् भक्तिर्ज्ञानं च जायते॥
राग, द्वेष आदि चित्त के सब दोष भी उसके पश्चात् क्षीण हो जाते हैं एवं सब दोष भी नष्ट होने पर निर्मल हुए मन में ईश्वर भक्ति तथा ज्ञान भी उदित होते हैं।
सूक्ष्म ज्ञान गंगा की गायत्री कहा जाता है और उसका मूर्तिमान् स्वरूप तारिणी गंगा हैं दोनों एक ही तत्त्व के यह दो रूप है। शिवजी के मस्तिष्क से निसृत हुई यह ज्ञान गंगा ही भागीरथी बन कर प्रकट हुई है। गायत्री ओर गंगा की जन्म जयन्ती भी एक ही दिन है। जेष्ठ सुदी दशमी ही गंगा और गायत्री दोनों की जन्म तिथि है। दोनों एक रूप ही समझी जा सकती है।
एताँ विद्याँ समाराध्य गंगा त्रैलोक्य पावनी। तेन साजान्व्ही पुण्या शान्ति दा सर्वदेहिनाम्। गायऋया संयुता तस्या प्रभावमतुल ध्रुषम्।
यह ब्रह्म विद्या ही त्रैलोक्य पावन गंगा बनकर प्रकट हुई। वह प्राणियों को पवित्रता एवं शान्ति प्रदान करती है। गायत्री युक्त होने पर उसका प्रभाव और भी अतुल हो जाता है।
कुण्डलिनी योग के अंतर्गत शक्तिपात विधान का वर्णन अनेक ग्रन्थों में मिलता है। योग वशिष्ठ, तेज बिंदूपनिषद्, योग चूड़ामणि, नसंकलिनी तन्त्र, शिव पुराण, देवी भागवत्, शाण्डिल्योपनिषद्, मुक्तिकोपनिषद्, हठयोग संहिता, कुलार्णव तन्त्र, योगिनी तन्त्र, घेरंड संहिता, कठ श्रुति ध्यान बिंदूपनिषद्, रुद्र यामत तन्त्र, योग कुण्डलिनी उपनिषद्, शारद तिलक आदि ग्रन्थों में इस विद्या के विभिन्न पहलुओं पर प्रकार डाला गया है। फिर भी वह सर्वांगीण नहीं है। उसे इस ढंग से नहीं लिखा गया है कि उस उल्लेख के सहारे कोई अजनबी व्यक्ति साधना करके सफलता प्राप्त कर सके। पात्रता युक्त अधिकारी साधक और अनुभवी सुयोग्य मार्गदर्शक की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए ही ग्रन्थों में इस गूढ़ विद्या पर प्रायः संकेत ही किये गये हैं।
योरोपीय तांत्रिकों में जोकब बोहम की ख्याति कुण्डलिनी साधकों के रूप में रही है। उनके जर्मन शिष्य जानजार्ज गिचेल की लिखी पुस्तक थियोसाफिक प्रोक्टिका में चक्र संस्थानों का विशद वर्णन है जिसे उन्होंने अनुसंधानों और अभ्यासों के आधार पर लिखा है। जैफरी हडस्वन ने इस संदर्भ में गहरी खोजें की है और आत्म विज्ञान एवं भौतिक विज्ञान के समन्वयात्मक आधार लेकर चक्रों में सन्निहित शक्ति और उसके उभार उपयोग के सम्बन्ध में विस्तार पूर्वक प्रकाश डाला है।
तैत्तिरीय आरण्यक में चक्रों को देवलोक एवं देव संस्थान कहा गया है। शंकराचार्य कृत आनन्द लहरी के 17 वें श्लोक में भी ऐसा ही प्रतिपादन है।
योग दर्शन समाधिपाद का 36 वाँ सूत्र है-
“विशोकाया ज्योतिष्मती”
इसमें शोक संतापों का हरण करने वाली ज्योति शक्ति के रूप में कुण्डलिनी शक्ति की ओर संकेत है।
इस समस्त शरीर को-सम्पूर्ण जीव कोशों को-महाशक्ति की प्राण संभाले हुए हैं उस प्रक्रिया के दो ध्रुव-दो खण्ड हैं। एक को चय प्रक्रिया (एनाबालिक एक्शन) तथा दूसरे को अपय प्रक्रिया (कैटाबाँलिक एक्शन) कहते हैं। इसी को दार्शनिक भाषा में शिव एवं शक्ति भी कहा जाता है शिव क्षेत्र सहस्रार तथा शक्ति क्षेत्र मूलाधार कहा गया है। इन्हें परस्पर जोड़ने वाली, परिभ्रमण शील शक्ति का नाम कुण्डलिनी है।
सहस्रार और मूलाधार का क्षेत्र विभाजन करते हुए मनीषियों ने मूलाधार से लेकर कण्ठ पर्यन्त का क्षेत्र एवं चक्र संस्थान ‘शक्ति’ भाग बताया है और कंठ से ऊपर का स्थान ‘शिव’ देश कहा है।
मलाद्धाराद्धि षट्चक्रं शक्तिस्थान मुदीरितम्। कण्ठादुपरि मूर्द्धान्तं शाम्भवं स्थानमुच्यते-बराहश्रुति
मूलाधार से कण्ठ पर्यन्त शक्ति का स्थान हैं कण्ठ के ऊपर से मस्तक तक शाम्भवी स्थान है। यह बात पहले कही जा चुकी है।
मूलाधार से सहस्रार तक की काम बीज से ब्रह्म बीज तक की यात्रा को ही महायात्रा कहते हैं। योगी इसी मार्ग को पूरा करते हुए परम लक्ष्य तक पहुँचते हैं। जीव सत्ता-प्राण शक्ति का निवास जननेन्द्रिय मूल में है। प्राण उसी भूमि में रहने वाले रज वीर्य से उत्पन्न होते हैं। ब्रह्म सत्ता का निवास ब्रह्मलोक में-ब्रह्मरन्ध्र में माना गया है यह द्युलोक-देवलोक स्वर्ग लोक है आत्मज्ञान का ब्रह्मज्ञान का सूर्य इसी लोक में निवास करता है। कमल पुष्प पर विराजमान् ब्रह्मा जी-कैलाशवासी शिव और शेषशायी विष्णु निवास जिस मस्तिष्क मध्य केन्द्र में है-उसी नाभिक न्यूक्लियस को सहस्रार कहते हैं। आत्म साक्षात्कार की ब्रह्म साक्षात्कार की प्रक्रिया यहीं सम्पन्न होती हैं पतन के-स्खलन के गर्त में पड़ी क्षत-विक्षत आत्म सत्ता जब ऊर्ध्वगामी होती है तो उसका लक्ष्य इसी ब्रह्मलोक तक-सूर्यलोक तक पहुँचना होता है। योगाभ्यास का परम पुरुषार्थ इसी निमित्त किया जाता है। कुण्डलिनी जागरण का उद्देश्य यही है।
आत्मोत्कर्ष की महायात्रा जिस राज मार्ग से होती हैं से मेरुदण्ड या सुषुम्ना कहते हैं उसका एक सिरा मस्तिष्क का -दूसरा काम केन्द्र का स्पर्श करता है। कुण्डलिनी साधना की समस्त गतिविधियाँ प्रायः इसी ड़ड़ड़ड़ को परिष्कृत एवं सरल बनाने के लिए है। इड़ा ड़ड़ड़ड़ के प्राण प्रवाह इसी क्षेत्र को दुहराने के लिए आयोजित किये जाते हैं। साबुन पानी में कपड़े धोये जाते हैं। झाडू झाड़न से कमरे की सफाई होती है। इड़ा पिंगला के माध्यम से किये जाने वाले नाड़ी शोधन प्राणायाम मेरुदण्ड का संशोधन करने के लिए हैं इन दोनों ऋणात्मक और धनात्मक शक्तियों का उपयोग सृजनात्मक उद्देश्य से भी होता है।
इमारतें बनाने वाले कारीगर कुछ समय नींव खोद गड्ढा करते हैं, इसके बाद वे ही दीवार चुनने के काम लग जाते हैं। इसी प्रकार इड़ा पिंगला संशोधन और ड़ड़ड़ड़ का दुहरा कमा करते हैं। जो आवश्यक है ड़ड़ड़ड़ विकसित करने में वे कुशल माली की भूमिका निभाते हैं। यों आरम्भ में जमीन जोतने जैसा ध्वंसात्मक कार्य भी उन्हीं को करना पड़ता है। पर यह उत्खनन निश्चित रूप से उन्नयन के लिए होता है माली भूमि खोदने, पतवार उखाड़ने, पौधे की काट-छाँट करने का काम करते समय ध्वंस संलग्न प्रतीत होता है, पर खाद पानी देने ड़ड़ड़ड़ करने में उसकी उदार सृजनशीलता का भी योग होता है इड़ा, पिंगला के माध्यम से सुषुम्ना क्षेत्र में काम करने वाली प्राण विद्युत का विशिष्ट संचार क्रम ड़ड़ड़ड़ करके कुण्डलिनी जागरण की साधना सम्पन्न की जाती हैं।
मेरुदण्ड को राजमार्ग महामार्ग कहते हैं। इसे धरती स्वर्ग पहुँचने का देवयान मार्ग कहा गया हैं इस यात्रा के मध्य में सात लोक है। इस्लाम धर्म के सातवें आसमान में खुदा का निवास माना गया है। ईसाई धर्म में भी ऐसे ही मिलती जुलती मान्यता है हिंदू धर्म के भूः ड़ड़ड़ड़ सत्यम् यह सात लोक प्रसिद्ध आत्मा और परमात्मा के मध्य इन्हें विराम स्थल माना गया हैं। लम्बी मंजिलें पूरा करने के लिए लगातार नहीं चला जाता। बीच-बीच में विराम भी लेने होते हैं रेलगाड़ी गन्तव्य स्थान तक बीच के स्टेशनों पर रुकती-कोयला पानी लेती चलती हैं इन विराम स्थलों को ‘चक्र’ कहा गया है। चक्रों की व्याख्या दो रूपों में होती है, अवरोध के रूप में दूसरे अनुदान के रूप में। महाभारत में चक्रव्यूह की कथा है। अभिमन्यु उसमें फँस गया था। वेधन कला की समुचित जानकारी न होने से वह मारा गया था। चक्रव्यूह में सात परकोटे होते हैं। इस आलंकारिक प्रसंग को आत्मा के सात चक्रों में फँसा होना कह सकते हैं। भौतिक आकर्षणों की, भ्रांतियों की, विकृतियों की चहार दीवारी के रूप में भी चक्रों की गणना होती है। इसलिए उसके वेधन का विधान बताया गया है। रामचन्द्रजी ने बाली को मार सकने की अपनी क्षमता का प्रमाण सुग्रीव को दिया था। उनने सात ताड़ वृक्षों को एक बाण में बेध कर दिखाया था। इसे चक्रबेधन की उपमा दी जा सकती है। भागवत् माहात्म्य में धुन्धकाली प्रेत का वास की सात गांठें फोड़ते हुए सातवें दिन कथा प्रभाव से देव देहधारी होने की कथा है। इसे चक्रबेधन का संकेत समझा जा सकता है।
चक्रों को अनुदान केन्द्र इसलिए कहा जाता है कि उनके अंतराल में दिव्य सम्पदाएँ भरी पड़ी है। उन्हें ईश्वर ने चक्रों की तिजोरियों में इसलिए बन्द करके छोड़ा है कि प्रौढ़ता पात्रता की स्थिति आने पर ही उन्हें खोलने उपयोग करने का अवसर मिले। कुपात्रता अयोग्यता को स्थिति में बहुमूल्य साधन मिलने पर तो अनर्थ ही होता है। कुसंस्कारी सन्तानें उत्तराधिकार में मिली बहुमूल्य सम्पदा से दुर्व्यसन अपनाती और विनाश पथ पर तेजी से बढ़ती है। छोटे बच्चों को बहुमूल्य जेवर पहना देने से उनकी जान जोखिम का खतरा उत्पन्न हो जाता है। धातुओं की खदानें जमीन की ऊपरी परत पर बिखरी नहीं होती उन्हें प्राप्त करने के लिए गहरी खुदाई करनी पड़ती है। मोती प्राप्त करने के लिए समुद्र में गहरे गोते लगाने पड़ते हैं। यह अवरोध इसलिए है कि साहसी एवं सुयोग्य सत्पात्रों को ही विभूतियों का वैभव मिल सके। मेरुदण्ड में अवस्थित चक्रों को ऐसी सिद्धियों का केन्द्र माना गया है जिनकी भौतिक और आत्मिक प्रगति के लिए नितान्त आवश्यकता रहती है।
चक्रबेधन, चक्रशोधन, चक्र परिष्कार, चक्र जागरण आदि नामों से बताये गये विवेचनों एवं विधानों में कहा गया है कि इस प्रयास से अदक्षताओं एवं विकृतियों का निराकरण होता है। जो उपयुक्त है उसकी अभिवृद्धि का पथ प्रशस्त होता है। सत्प्रवृत्तियों के दमन में यह चक्रबेधन विधान कितना उपयोगी एवं सहायक हैं इसकी चर्चा करते हुए शारदा तिलक ग्रंथ के टीकाकार ने ‘आत्म विवेक' नाम से किसी साधना ग्रंथ का उद्धरण प्रस्तुत किया है। कहा गया है कि-
गुदलिंगान्तरे चक्रमाधारं तु चतुर्दंलम्। परमः सहजस्तद्वदानन्दों वीरपूर्वकः॥
योगाननदश्च तस्य स्यादीशानादिदले फलम्। स्वाधिष्ठानं लिंगमूले षट्पत्रंच क्रमस्य तु॥
पूर्वादिषु दलेष्वाहुः फलान्येतान्यनुक्रमात्। प्रश्रयः क्रूरता गर्वों नाशो मूर्च्छा ततः परम्॥
अवा स्यादविश्वासो जीवस्य चरतो ध्रुवम्। नाभौ दशदल चक्रं मणिपूरसंज्ञकम्॥
सुषुप्तिरत्र तृष्णा स्यादीर्ष्या पिशुतता तथा। लज्जा भयं घृणा मोहः कषायोऽथ विषादिता॥
हृदयेऽनाहतं चक्रं दलैर्द्वादशभिर्युतम्। लौल्यं प्रनाशः कपअं वितर्कोऽप्यनुतापिता॥
आशा प्रकाशश्चिनता च समीहा ममता ततः। क्रमेण दम्भे वैकल्यं विवेकोऽहंक्वतिस्तथा॥
फलान्येतानि पूर्वादविलस्थस्यात्मनों जगुः। कण्ठेऽस्ति भारतीसथानं विशुद्धिः षोड़शच्छदम्॥
तत्र प्रणव उद्गीथो हुँ फट् वषट् स्वधा तथा। स्वाहा नमोऽमृतं सप्त स्वराः षड्जादयों विषम॥ इति पूर्वादिपत्रस्थे फलानयात्मनि षोड़ष॥
(1) गुदा और लिंग के बीच चार पंखुड़ियों वाला आधार चक्र है। वहाँ वीरता और आनन्द भाव का निवास है। (2) इसके बाद स्वाधिष्ठान चक्र लिंग मूल ड़ड़ड़ड़ उसकी छः पंखुड़ियाँ है इसके जागृत होने पर ड़ड़ड़ड़ गर्व, आलस्य, प्रमाद, अवा, अविश्वास आदि गुणों का नाश होता है। (3) नाभि में दश दल वाला मणिपुर चक्र हैं यह प्रसुप्त पड़ा रहे तो तृष्णा, ईर्ष्या, ड़ड़ड़ड़ लज्जा, भय, घृणा, मोह आदि कषाय-कल्मष मन ड़ड़ड़ड़ जड़ जमाये पड़े रहते हैं। (4) हृदय स्थान में अनाहत चक्र है। यह बारह पंखुड़ियों वाला है। यह सोता रहे तो लिप्सा, कपट, तोड़-फोड़ कुतर्क, चिन्ता, मोह, दंभ, अविवेक अहंकार से भरा रहेगा। जागरण होने पर यह सब दुर्गुण हट जायेंगे (5) कण्ठ में विशुद्धाख्य चक्र यह सरस्वती का स्थान हैं यह सोलह पंखुड़ियों वाला है। यहाँ सोलह कलाएँ-सोलह विभूतियाँ विद्यमान् हैं। (6) भ्रूमध्य में आज्ञा चक्र है, यहाँ ‘ऊँ’ उद्गी, हुँ फट, विषद, स्वधा, स्वाहा, अमृत, सप्त स्वर, आदि का निवास है। इस आज्ञा चक्र का जागरण होने से यह सभी शक्तियाँ जाग पड़ती है।
श्री हडसन ने अपनी पुस्तक ‘साइन्स आव सीयरशिप’ में अपना मत व्यक्त किया है। प्रत्यक्ष शरीर में चक्रों की उपस्थिति का परिचय तन्तु गुच्छकों के रूप में देखा जा सकता है। अन्तःदर्शियों का अनुभव इन्हें सूक्ष्म शरीर में उपस्थित दिव्य शक्तियों का केन्द्र संस्थान बताता है कुण्डलिनी के बारे में उनके पर्यवेक्षण का निष्कर्ष है कि-वह एक व्यापक चेतना शक्ति है। मनुष्य के मूलाधार चक्र में उसका सम्पर्क तन्तु है जो व्यक्ति सत्ता को विश्व सत्ता के साथ जोड़ता है। कुण्डलिनी जागरण से चक्र संस्थानों में जागृति उत्पन्न होती है। उसे फलस्वरूप-पराभौतिक (सुपर फिजीकल) और भौतिक (फिजीकल) के बीच आदान-प्रदान का द्वार खुलता है। यही है वह स्थिति जिसके सहारे मानवी सत्ता में अन्तर्हित दिव्य शक्तियों का जागरण सम्भव हो सकता है।
चक्रों की जागृति मनुष्य के गुण कर्म स्वभाव को प्रभावित करती है। स्वाधिष्ठान की जागृति से मनुष्य अपने में नव शक्ति का संचार हुआ अनुभव करता है उसे बलिष्ठता बढ़ती प्रतीत होती हैं श्रम में उत्साह और गति में स्फूर्ति की अभिवृद्धि का आभास मिलता है। मणिपुर चक्र से साहस और उत्साह की मात्रा बढ़ जाती है। संकल्प दृढ़ होते हैं और पराक्रम करने के हौसले उठते हैं मनोविकार स्वयमेव घटते हैं और परमार्थ प्रयोजनों में अपेक्षाकृत अधिक रस मिलने लगता है। अनाहत चक्र की महिमा हिन्दुओं से भी अधिक ईसाई धर्म के योगी बताते हैं। हृदय स्थान पर गुलाब के फल की भावना करते हैं और उसे महाप्रभु ईसा का प्रतीक ‘आईचिन’ कनक कमल मानते हैं। भारतीय योगियों की दृष्टि से यह भाव संस्थान है। कलात्मक उमंगें-रसानुभूति एवं कोमल सम्वेदनाओं का उत्पादक स्रोत यही है। बुद्धि की वह परत जिसे विवेकशीलता कहते हैं। बुद्धि की वह परत जिसे विवेकशीलता कहते हैं। आत्मीयता का विस्तार सहानुभूति एवं उदार सेवा सहकारिता के तत्त्व इस अनाहत चक्र से ही उद्धत होते हैं। कंठ में विशुद्ध चक्र हैं इसमें बहिरंग स्वच्छता और अन्तरंग पवित्रता के तत्त्व रहते हैं। दोष दुर्गुणों के निराकरण की प्रेरणा और तद्नुरूप संघर्ष क्षमता यहीं से उत्पन्न होती है। शरीर शास्त्र में थाइराइड ग्रन्थि और उससे स्रवित होने वाले हारमोन्स के संतुलन असन्तुलन से उत्पन्न लाभ हानि की चर्चा की जाती है। अध्यात्म शास्त्र द्वारा प्रतिपादित विशुद्ध चक्र का स्थान तो यही है।, पर वह होता सूक्ष्म शरीर में है। उसमें अतीन्द्रिय क्षमताओं के आधार विद्यमान् है लघु मस्तिष्क शिर के पिछले भाग में है। अचेतन की विशिष्ट क्षमताएँ उसी स्थान पर मानी जाती है। मेरुदण्ड में कंठ की सीध पर अवस्थित विशुद्धिचक्र इस चित्त संस्थान को प्रभावित करता है। तदनुसार चेतना की अति महत्त्वपूर्ण परतों पर नियंत्रण करने और विकसित एवं परिष्कृत कर सकने के सूत्र हाथ में आ जाते हैं नादयोग के माध्यम से दिव्य श्रवण जैसी कितनी ही परोक्षानुभूतियाँ विकसित होने लगती है।
सहस्रार मस्तिष्क के मध्य भाग में है। शरीर संरचना में इस स्थान पर अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थियों से सम्बद्ध रेटिकुलर ऐक्टिवेटिंग सिस्टम का अस्तित्व हैं । वहाँ से जैवीय विद्युत का स्वयं भू प्रवाह उभरता है। वे धारायें मस्तिष्क के अगणित केन्द्रों की ओर दौड़ती है। इसमें से छोटी-छोटी चिनगारियाँ तरंगों के रूप में उड़ती रहती हैं। उनकी संख्या की सही गणना तो नहीं हो सकती, पर वे है हजारों। इसलिए हजार या हजारों का उद्बोधक ‘सहस्र’ शब्द प्रयोग में लाया जाता है। सहस्रार चक्र का नामकरण इसी आधार पर हुआ है। सहस्र फन वाले शेष नाग की परिकल्पना का यही आधार है। यह संस्थान ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ संपर्क साधने में अग्रणी है इसलिए उसे ब्रह्मरंध्र या ब्रह्मलोक भी कहते हैं। रेडियो एरियल की तरह हिन्दू धर्मानुयायी इस स्थान पर शिखा रखते और उसे शिर रूपी दुर्ग पर आत्म सिद्धान्तों को स्वीकृति किये जाने की विजय पताका बताते हैं। आज्ञा चक्र को सहस्रार का उत्पादन केन्द्र कह सकते हैं।
सभी चक्र सुषुम्ना नाड़ी के अन्दर स्थित है तो भी वे समूचे नाड़ी मण्डल को प्रभावित करते हैं। स्वचालित और ऐच्छिक दोनों ही संचार प्रणालियों पर इनका प्रभाव पड़ता है। अस्तु शरीर संस्थान के अवयवों को चक्रों द्वारा निर्देश पहुँचाये जा सकते हैं। साधारणतया यह कार्य अचेतन मन करता है और उस पर सचेतन मस्तिष्क का कोई बस नहीं चलता है। रोकने की इच्छा करने पर भी रक्त संचार रुकता नहीं और तेज करने की इच्छा होने पर भी उसमें सफलता नहीं मिलती। अचेतन बड़ा दुराग्रही है। सचेतन की बात सुनने की उसे फुर्सत नहीं उसकी मन मर्जी ही चलती है। ऐसी दशा में मनुष्य हाथ-पैर चलाने जैसे छोटे-मोटे काम ही इच्छानुसार कर पाता है। शरीर की अनैच्छिक क्रिया पद्धति के सम्बन्ध में वह लाचार बना रहता है। इसी प्रकार अपनी आदत, प्रकृति, रुचि, दिशा बदलने के मनसूबे भी एक कोने पर रखे रह जाते हैं। ढर्रा अपने क्रम से चलता रहता है। ऐसी दशा में व्यक्तित्व को परिष्कृत करने वाली और शरीर तथा मनःसंस्थान में अभीष्ट परिवर्तन करने वाली आकांक्षा प्रायः अपूर्ण एवं निष्फल ही बनी रहती है। चक्र संस्थान को यदि जागृत तथा नियन्त्रित किया जा सके तो आत्म जगत पर अपना अधिकार हो जाता है। यह आत्म विजय अपने ढंग की अद्भुत सफलता है। इसका महत्त्व तत्त्वदर्शियों ने विश्व विजय से भी अधिक महत्त्वपूर्ण बताया हैं। विश्व विजय कर लेने पर दूरवर्ती क्षेत्रों से समुचित लाभ उठाना सम्भव नहीं हो सकता, उसकी सम्पदा का उपभोग, उपयोग कर सकने की अपने में सामर्थ्य भी कहाँ है? किन्तु आत्म विजय के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है। उसका पूरा-पूरा लाभ स्वयं ही उठाया जा सकता है। उस आधार पर बहिरंग और अन्तरंग क्षेत्रों की सम्पदा का प्रचुर लाभ अपने आप को मिल सकता है।
मेरुदण्ड को शरीर शास्त्री-स्पाइनल कालम कहते हैं। स्पाइन-एक्सिस स्टफ-वरटेब्रेल् कालम-शब्द भी उसी के लिए प्रयुक्त होते हैं। मोटे तौर पर यह 33 अस्थि घटकों से मिलकर बनी हुई एक पोली दण्डी भर है। इन हड्डियों को पृष्ठ वंश-कशेरुका या ‘वार्टिव्री’ कहते हैं। स्थिति के अनुरूप इनका पाँच भागों में विभाजित किया जा सकता है।
(1) ग्रीवा प्रदेश-सर्विकाल रीजन-7 अस्थि खण्ड, (2) वक्ष प्रदेश-डोर्सल रीजन-12 अस्थि खण्ड, (4) त्रिकया वस्तिगव्हगर-लूम्बर रीज-5 अस्ति खण्ड, (5) चेचु प्रदेश कोसिजयल रीजन-4 अस्थि खण्ड।
मेरुदण्ड पोला है। उससे अस्थि खण्डों के बीच में होता हुआ यह छिद्र नीचे से ऊपर तक चला गया है। इसी के भीतर सुषुम्ना नाड़ी विद्यमान् है। मेरुदण्ड के उपर्युक्त पाँच प्रदेश सुषुम्ना में अवस्थित पाँच चक्रों से सम्बन्धित है। (1) मूलाधार चक्र-चेचु प्रदेश (2) स्वाधिष्ठानत्रिक प्रदेश (3) मणिपुर-कटि प्रदेश(4) अनाहत-वक्ष प्रदेश (5) विशुद्ध-ग्रीवा प्रदेश। छठवें आज्ञाचक्र का स्थान मेरुदण्ड में नहीं आता। सहस्रार का सम्बन्ध भी रीढ़ की हड्डी से सीधा नहीं है। इतने पर भी सूक्ष्म शरीर का सुषुम्ना मेरु दण्ड पाँच रीढ़ वाले और दो बिना रीढ़ सभी सातों चक्रों को एक ही शृंखला में बाँधे हुए हैं सूक्ष्म शरीर की सुषुम्ना में यह सातों चक्र जंजीर की कड़ियों की तरह परस्पर पूरी तरह सम्बद्ध है।
यहाँ यह तथ्य-भाँति स्मरण रखा जाना चाहिए कि शरीर विज्ञान के अंतर्गत वर्णित प्लेक्सस नाड़ी गुच्छक और चक्र एक नहीं है। यद्यपि उनके साथ पारस्परिक तारतम्य जोड़ा जा सकता है यों इन गुच्छकों की भी शरीर में विशेष स्थिति है और उनकी कायिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली प्रतिक्रिया होती रहती है।
शरीर शास्त्र के अनुसार प्रमुख नाड़ी गुच्छकों (प्लेक्ससेज) में 13 प्रधान हैं उनके नाम है। (1) हेपाँटिक (2) सर्वाइकल (3) ब्राँचियल (4) कासिजियल (5) लम्बर (6) सेक्रेल (7) कार्डियक (8) इपेगेस्ट्रिक (9) इसोफैजियल (10) फारिन गीयल (11) पलमोनरी (12) लिंगुयल (13)प्रोस्टेटिक।
इन गुच्छकों में शरीर यात्रा में उपयोगी भूमिका सम्पन्न करते रहने के अतिरिक्त कुछ विलक्षण विशेषताएँ भी पाई जाती है उनसे यह प्रतीत होता है कि उनके साथ कुछ रहस्यमय तथ्य भी जुड़े हुए हैं। यह सूक्ष्म शरीर के चक्रों के सान्निध्य से उत्पन्न होने वाला प्रभाव ही कहा जा सकता है।
‘चक्र’ शक्ति संचरण के एक व्यवस्थित, सुनिश्चित क्रम को कहते हैं। वैज्ञानिक क्षेत्र में विद्युत, ध्वनि, प्रकाश सभी रूपों में शक्ति के संचार क्रम की व्याख्या चक्रों (साइकिल्स) के माध्यम से ही की जाती है। इन सभी रूपों में शक्ति का संचार, तरंगों के माध्यम से होता है। एक पूरी तरंग बनने के क्रम को एक चक्र (साइकिल) कहते हैं। एक के बाद एक तरंग, एक के बाद एक चक्र (साइकिल) बनने का क्रम चलता रहता है और शक्ति का संचरण होता रहता है। शक्ति की प्रकृति (नेचर) का निर्धारण इन्हीं चक्रों के क्रम के आधार पर किया जाता है। औद्योगिक क्षेत्र में प्रयुक्त विद्युत के लिए अन्तर्राष्ट्रीय नियम है कि वह 50 साइकिलें प्रति सेकेण्ड के चक्र क्रम की होनी चाहिए। विद्युत की मोटरों एवं अन्य यन्त्रों को उसी प्रकृति की बिजली के अनुरूप बनाया जाता है इसीलिए उन पर हार्सपावर, वोल्टेज आदि के साथ 50 साइकिल्स भी लिखा रहता है अस्तु शक्ति संचरण के साथ चक्र प्रक्रिया जुड़ी ही रहती हैं वह चाहे स्थूल विद्युत शक्ति हो अथवा सूक्ष्म जैवीय विद्युत शक्ति।
नदी प्रवाह में कभी-कभी कहीं भंवर पड़ जाते हैं। उनकी शक्ति अद्भुत होती हैं उनमें फँसकर नौकाएं अपना सन्तुलन खो बैठती है और एक ही झटके में उल्टी डूबती दृष्टिगोचर होती हैं सामान्य नदी प्रवाह की तुलना में इन भँवरों की प्रचंडता सैकड़ों गुनी अधिक होती हैं शरीरगत विद्युत प्रवाह को एक बहती हुई नदी के सदृश माना जा सकता है और उसमें जहाँ तहाँ पाये जाने वाले चक्रों की भँवरों से तुलना की जा सकती हैं।
गर्मी की ऋतु में जब वायुमण्डल गरम हो जाता है तो जहाँ-तहाँ छोटे बड़े चक्रवात-साइकलोन उठने लगते हैं। वे नदी के भँवरों की तरह ही गरम हवा के कारण आकाश में उड़ते हैं। उनकी शक्ति देखते ही बनती है। पेड़ों को, छत्तों को, छप्परों को उखाड़ते उछालते वे बवण्डर की तरह जिधर-किधर भूत-बेताल की तरह नाचते-फिरते हैं। साधारण पवन प्रवाह की तुलना में इन चक्रवातों की शक्ति भी सैकड़ों गुनी अधिक होती है।
शरीरगत विद्युत शक्ति का सामान्य प्रवाह यों सन्तुलित ही रहता है पर कहीं-कही उसमें उग्रता एवं वक्रता भी देखी जाती है हवा कभी-कभी बाँस आदि के झुरमुटों से टकरा कर कई तरह की विचित्र आवाजें उत्पन्न करती है। रेलगाड़ी, मोटर और द्रुतगामी वाहनों के पीछे दौड़ने वाली हवा को भी अन्धड़ की चाल चलते देखा जा सकता है नदी का जल कई जगह ऊपर से नीचे गिरता है-चट्टानों से टकराता है तो वहाँ प्रवाह में व्यक्तिक्रम, उछाल, गर्जन-तर्जन की भय करता दृष्टिगोचर होती है। शरीरगत सूक्ष्म चक्रों की विशेष स्थिति भी इसी प्रकार की है। यों नाड़ी गुच्छकों-प्लेक्सस में भी विद्युत संचार और रक्त प्रवाह की गति क्रम में कुछ विशेषता पाई जाती है। किंतु सूक्ष्म शरीर में तो वह व्यक्तिक्रम कही अधिक उग्र दिखाई पड़ता है पवन प्रवाह पर नियन्त्रण करने के लिए नावों पर पतवार बाँधें जाते हैं उनके सहारे नाव की दिशा और गति में अभीष्ट फेर कर लिया जाता है। पन चक्की के पंखों को गति देकर आटा पीसने , जलकल चलाने आदि काम लिये जाते हैं। जल प्रपात जहाँ ऊपर से नीचे गिरता है वहाँ उस प्रपात तीव्रता के वेग को बिजली बनाने जैसे कार्यों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। समुद्री ज्वार भाटों से भी बिजली बनाने का काम लिया जा रहा है। ठीक इसी प्रकार शरीर के विद्युत प्रवाह में जहाँ चक्र बनते हैं वहाँ उत्पन्न उग्रता को कितने ही आध्यात्म प्रयोजन में काम लाया जाता है।
इस्लाम-साहित्य में एक प्रसंग है-एक थी बुढ़िया। हज की इच्छा प्रबल थी, पर आर्थिक दशा अत्यन्त दुर्बल थी। उसने एक समय का भोजन छोड़ दिया और पैसे बचाकर जमा करने लगी। उपयुक्त राशि संचित हो जाने पर हज यात्रा को तैयारी की। उसी समय पड़ोस से दुर्गन्ध आती प्रतीत हुई। पूछने पर पता चला चूल्हे पर कुछ पक रहा है, वही से दुर्गन्ध दे रहा है।
उत्सुकतावश वह पड़ोसी के घर जा पहुँची। तब जाना, पड़ोस में पन्द्रह दिन से भोजन के लिए कुछ भी नहीं था। आज जंगल से यह पत्ती तोड़ लाई गई है। खाद्य है या अखाद्य, ज्ञात नहीं। खाने के बाद जीवित रहेंगे या नहीं, यह भी विदित नहीं
बुढ़िया की करुणा सदा ही जागृत थी। तीर्थयात्रा के पुण्य प्रयोजन की उसने भक्तिभाव से ही कामना व तैयारी की थी। पड़ोस की यह दशा उसकी करुणा को छू गई। संचित धनराशि से तत्काल अनाज खरीदा व पड़ोस में पहुँचा दिया। स्वयं अल्लाह का स्मरण करती निश्चिन्त सो गई। हज न जाने का कोई पश्चात्ताप मन में उठ ही नहीं रहा था।
वर्ष की समाप्ति पर फरिश्ते एकत्र हुए। चर्चा होने लगी कि इस वर्ष किस-किस का हज कबूल हुआ। सम्बद्ध देवदूतों ने बताया-मात्र उसी एक बुढ़िया का। किसी की शंका थी-बुढ़िया तो हज-यात्रा कर ही नहीं सकी थी।” उत्तर मिला असली हज तो बुढ़िया ने ही की थी। शेष ने तो मक्का शरीफ का पर्यटन भर किया था।”
‘आत्म बोध’ और तत्त्व बोध’ सद्ज्ञान की यह दो धाराएँ हिमालय से निकलने वाली पतित पावनी गंगा और तरण तारिणी यमुना की तरह है। आत्म-बोध का अर्थ है अपने उद्गम, स्वरूप, उत्तरदायित्व एवं लक्ष्य को समझना, तद्नुरूप दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप का निर्धारण करना। तत्त्व बोध का अर्थ है शरीर उसके उपयोग एवं अन्त के सम्बन्ध में वस्तुस्थिति से परिचित होना। साँसारिक पदार्थों एवं सम्बन्धित व्यक्तियों के साथ जुड़े हुए सम्बन्धों में घुसी हुई भ्रान्तियों का निराकरण करना तथा इनके सम्बन्ध में बरती जाने वाली नीति का नये सिरे से मूल्यांकन आत्म-बोध ओर उसके काम आने वाले पदार्थों एवं प्राणियों के साथ उचित तालमेल बिठाने को तत्त्वबोध कहते हैं। यदि इतना भर ठीक तरह जान लिया जाय तो समझना चाहिए कि ज्ञान साधना का उद्देश्य पूरा हो गया।
“हर दिन नया जन्म-हर रात नई मौत” का सूत्र आत्म-बोध और तत्त्वबोध की दोनों साधनाओं का प्रयोजन पूरा करता है। प्रातःकाल नींद खुलते ही हर रोज यह भावना जागृत करनी चाहिए कि आज हमारा नवीनतम जन्म हुआ है और वह सोते समय तक एक रोज के लिए ही है। इसे हर दृष्टि से श्रेष्ठतम और आदर्श रीति-नीति अपनाते हुए जिया जाय। इसके लिए शैया त्याग से लेकर रात को सोते समय तक का कार्यक्रम बनाना चाहिए। दिनचर्या ऐसी हो जिसमें आलस्य के लिए तनिक भी गुँजाइश न हो। पूरी तरह व्यस्तता रहे। आजीविका-उपार्जन नित्य कर्म, पारिवारिक उत्तरदायित्वों का निर्वाह, लोक कल्याण के लिए अधिकतम योगदान, उपासना, स्वाध्याय, आदि के क्रिया कलापों का समुचित समन्वय करते हुए इस प्रकार निर्धारण करना चाहिए जिसमें आलस्य प्रमाद के लिए कोई गुँजाइश न रहे। विश्राम के लिए रात्रि का समय ही पर्याप्त है। जल्दी सोने और जल्दी उठने की आदत डाली जानी चाहिए। समय का एक क्षण भी बर्बाद न जाने पावे और उसका उपयोग निरर्थक कामों में नहीं वरन् जीवन को सार्थक बनाने वाले निर्वाह की उचित आवश्यकता पूरी करने वाले कार्यों की ही प्रमुखता रहे। मनोरंजन के लिए-थकान दूर करने के लिए-बीच-बीच में थोड़ा-थोड़ा उचित अवकाश देने के लिए गुँजाइश रखी जा सकती है। किन्तु गपशप, मटरगश्ती, यारबाजी में, आलस्य ऊँघने में बेकार समय न गँवाना पड़े इसकी समुचित सतर्कता बरतनी चाहिए। समय ही जीवन है श्रम ही सम्पत्ति है-इस मंत्र को पूरी तरह ध्यान में रखा जाय। निर्धारित समय विभाजन को अनिवार्य अड़चन आ पड़े तो बात दूसरी है अन्यथा यथा सम्भव पूरा करने का ही प्रयत्न करना चाहिए।
जो काम किया जाय उसमें पूरा-पूरा मनोयोग लगाया जाय। हाथ में लिए काम को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर इस कुशलता के साथ संपन्न किया जाय कि उसका स्तर ऊँचा बना रहे। आधे-अधूरे मन से उपेक्षापूर्वक, बेगार भुगतने की तरह लापरवाही के साथ जो भी काम किये जायेंगे वे फूहड़, भौंड़े, अस्त-व्यस्त और अनगढ़ होंगे। ऐसे काम कर्ता के गयेगुजरेपन के प्रमाण है। काम का स्तर अच्छा रहना इस बात पर निर्भर है कि उसे पूरी मनोयोग के साथ पूरी जिम्मेदारी के लिए-अपनी कुशलता और सतर्कता का समुचित समावेश करते हुए सम्पन्न किया जाय। जिस कार्य को उत्साहपूर्वक तन्मयता के साथ किया जाएगा उसमें समय भी कम लगेगा और चित्त प्रसन्न रहेगा। अन्यथा बेगार भुगतने पर थोड़े से काम में बेहद थकान चढ़ेगी और थोड़े से काम में ढेरों समय लग जाएगा आलस्य और प्रमाद हमारे सबसे बड़े शत्रु है। आलस्य शरीर को अपाहिज की तरह बना देता है और. विक्षिप्त जैसे आचरण वह करता है जिस पर प्रमाद चढ़ा रहता है। ऐसे आदमी पग-पग पर असफल होते हैं और अपनी कर्म हीनता के कारण उपेक्षित रहते और तिरस्कृत बनते हैं।
प्रातः उठते ही हमें अपनी सुसंतुलित दिनचर्या निर्धारित करनी चाहिए। साथ ही इस बात का ध्यान रखा जाय कि उन्हें करते समय आदर्शवादी दृष्टिकोण का समन्वय बना रहे। तृष्णा, लिप्सा, स्वार्थ परता, धूर्तता, अनैतिकता का दृष्टिकोण लेकर किये जाने वाले कार्य भले ही उपयोगी ही क्यों न लगते हों उनमें ऐसी त्रुटियाँ बनी रहेगी, जिनसे समाज का अहित होना और अपना स्तर गिरता स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगे। सामान्य कार्यों को भी यदि लोक हित और आत्म-कल्याण के आदर्शवादी सिद्धान्तों का समावेश करते हुए किया जाय तो वे कर्म-योग की श्रेणी में गिने जायेंगे और प्रत्यक्ष परमार्थ न लगते हुए भी लगभग वैसे ही उद्देश्य की पूर्ति करेंगे। दैनिक कार्यों में यह ध्यान रखा जाय कि जिन पर भी उनका प्रभाव पड़े-सम्बन्ध रहे-वे दुष्टता और दुर्बुद्धि का आक्षेप न लगा सके। अपने हर कृत्य में, ईमानदारी, सचाई, कर्तव्य परायणता और सद्भावना का समावेश होना चाहिए। इस दृष्टि को अपनाते हुए जो कुछ किया जाएगा वह नैतिक भी होगा और लोकोपयोगी भी। जिनके सोचने का ढंग ऊँचा है, वे समाज के लिए अहित कर काम कभी चुनेंगे ही नहीं, भले ही उन्हें भूखा क्यों न मरना पड़े। लोकोपयोगी कार्य करते हुए उचित पारिश्रमिक लेकर यदि भलमनसाहत का जीवनयापन किया जा सके तो उसे क्रिया-कलाप को, कर्मयोग की ही संज्ञा दी जाएगी
दिन भर के उत्तम काम उत्कृष्ट दृष्टिकोण रखते हुए सम्पन्न किये जाते रहें जिन्हें उस दिनचर्या को उस दिन को सार्थक बनाने वाली कहा जा सकता है। बीच-बीच में जब भी कुसंस्कारों की प्रबलता से आलस्य प्रमाद अथवा अनैतिक दृष्टिकोण का समावेश होने लगे तो उसे तत्काल रोका जाय। जिस तरह मुँह पर मक्खी बैठते ही तत्काल उसे उड़ाने का प्रयत्न किया जाता है। उसी प्रकार अवांछनीयता का अपने क्रियाकृत्य एवं चिन्तन में तनिक भी समावेश न होने पाये, इस पर तीखे नजर रखी जाय। जब कुछ ऐसा होता दिखाई पड़े तो उसे रोकने के लिए अपने आपको सजग किया जाय। अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों से हर घड़ी जूझते रहने के लिए जागरूक प्रहरी की हमें भूमिका निबाहनी चाहिए। चोर घर में घुसने न पाये, घुसने का दुस्साहस करे तो मार भगाया जाय इसी में सतर्कता की सराहना है। इस संदर्भ में हमें निरन्तर जागरूक रहना चाहिए। दिन भर यह ध्यान रखा जाय कि आज का दिन हमें श्रेष्ठतम आदर्शवादी रीति-नीति अपनाते हुए- पुण्य परमार्थ से भरा-पूरा बनाना है। उसमें शरीर निर्वाह एवं परिवार पालन के लिए जितना अनिवार्य रूप से आवश्यक है उतना ही संलग्न रहना है। प्रातःकाल इसी आधार पर दिन भर का कार्यक्रम बनाया जाय और उस पर दृढ़तापूर्वक आरूढ़ रहा जाय तो निःसन्देह संकल्प के अनुरूप वह दिन ऐसा ही व्यतीत होगा जिस पर गर्व एवं सन्तोष व्यक्त किया जा सके।
रात्रि को सोते समय यह मानकर निद्रा की गोद में जाना चाहिए कि यह जीवन के एक अध्याय का सन्तोषजनक अन्त हुआ। अब मृत्यु जैसी शान्ति को गले से लगाना है। रात्रि निद्रा को दैनिक मृत्यु माना जाय। इससे अति महत्त्वपूर्ण आध्यात्मिक लाभ मिलता है। हम मृत्यु को एक प्रकार से भूले रहते हैं। अस्तु जीवन का मूल्य और स्वरूप समझ पाना ही हमारे लिए सम्भव नहीं हो पाता। आमतौर से जब तक वस्तु हाथ में रहती है तब तक उसका न तो महत्त्व समझ में आता है और न उपयोग। जब वह छिन जाती है तब पता चलता है कि वह उपलब्धि कितना बड़ा सौभाग्य थी। उसका समय रहते कितना अच्छा सदुपयोग हो सकता था।
प्रगति पथ पर धीरे-धीरे बढ़ते हुए मनुष्य जन्म तक पहुँच सकना सम्भव हुआ है। यह उपहार ईश्वर का सर्वोपरि अनुग्रह है। इसमें जो सुविधाएँ हैं वे किसी भी अन्य योनि में नहीं है। बहुमूल्य अनुदानों का सदुपयोग कर सकने की दूरदर्शिता जिनमें हो उन्हें और भी श्रेष्ठ अवसर मिलने की अपेक्षा करनी चाहिए। यह हमारी अग्नि परीक्षा है कि प्रदत्त मनुष्य जन्म को हम किन प्रयोजनों के लिए किस प्रकार उपयोग में लाते हैं। पेट और प्रजनन में तो सृष्टि के निकृष्ट प्राणी भी संलग्न हैं। मानवी गरिमा की सफलता इसमें है कि इस जन्म को आत्मकल्याण और लोककल्याण के उच्च प्रयोजनों में ईश्वर की इच्छा के अनुरूप लगाये रखा जाय। जो इसके लिए प्रयत्नशील रहते हैं उन्हें महात्मा-देवात्मा के उच्च पद प्राप्त करते हुए अन्ततः परमात्मा बनने का अवसर मिलता है। जो पशु-प्रवृत्तियों में ही उलझे रह जाते हैं, उनके हाथ से यह भी छिन जाता है। पात्रता सम्पादन के लिए उन्हें फिर निम्न योनियों में भटकना पड़ता है। यह बहुमूल्य तथ्य विदित रहने पर भी अविदित जैसे बने रहते हैं। वह जानकारी व्यर्थ है जो क्रिया को प्रभावित न कर सके।
रात्रि को सोते समय, दैनिक निद्रा को चिर-निद्रा-मृत्यु के समतुल्य मान कर चलना चाहिए। शैया पर जाते ही कल्पना करनी चाहिए कि ‘हर दिन नया जन्म- हर रात नई मौत’ जीवन सूत्र के अनुसार अब भरण काल आ गया। एक दिन का जीवन अब समाप्त हो चला। निद्रा रूपी मृत्यु अपने अंचल में प्राण को ढक लेने के लिए निकट आ गई।
इस अवसर के लिए कल्पना यह होनी चाहिए कि शरीर में से जीव निकल कर ऊँचे प्रकाश में उड़ने लगा। मृत शरीर शैया पर पड़ा है। उसके जलने, गलाने, गाड़ने का अन्त्येष्टि होने जा रही है। अपनी जीव सत्ता पृथक है और शरीर कलेवर का अस्तित्व उसके प्रयोग में आते रहने पर भी उससे सर्वथा भिन्न है। शरीर और आत्मा की भिन्नता यों कहने-सुनने में सदैव आती रहती है, पर उसकी अनुभूति कभी भी नहीं होती। किसी मृत को श्मशान में पहुँचाते समय उसके अग्नि-संस्कार के समय शरीर आत्मा की भिन्नता-जीवन की नश्वरता एक हल्की झाँकी की तरह अन्तःकरण में उभरती है किन्तु कुछ ही क्षण में बिजली की कौंध की तरह विस्मृति में विलीन हो जाती है। अपनी स्वयं की मृत्यु का भावना दृश्य यदि गम्भीरतापूर्वक देखा जाय उससे आत्म-ज्ञान का वह प्रकाश उदय हो सकता है जो आध्यात्मिकता का मूलभूत आधार है। मृत्यु को निद्रा के रूप में अपनी नित्य सहचरी होने की बात सोचते हुए शयन किया जाय और उसके फलितार्थों पर विचार करते रहा जाय तो इसकी प्रतिक्रिया आत्मोत्कर्ष का पथ प्रशस्त कर सकती है।
नित्य सोते समय अपनी मृत्यु की अनुभूति करने की भावना यदि गहरी हो तो उसके साथ ही कई प्रश्न उभरते हैं। मनुष्य जीवन ईश्वर का सर्वश्रेष्ठ अनुदान होने और उसके अमानत की तरह विश्व उद्यान को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने के लिए दिये जाने की बात अधिक स्पष्ट रूप से समझ में आती है। शरीर की ही साज-सज्जा में लगे रहने, आत्म-कल्याण का तथ्य भुजा देने की मूर्खता को छोड़ने के लिए व्याकुलता उत्पन्न होती है। शरीर उपकरण मात्र है, वह आत्मा के उच्च क्रियाकलाप पूरे करने भर के लिए मिला है। इन्द्रियों की वासना ओर मनोगत तृष्णा अहंता जैसे क्षुद्र कार्यों में यह अलभ्य अवसर नष्ट हो जाय और आत्मिक लक्ष्य पूरा ही न हो सके तो यह एक भयानक दुर्घटना ही कही जाएगी इस प्रकार सोच सकना तभी सम्भव होता है जब मृत्यु को शिर पर खड़ी देखा जाय। इसके बिना आत्म विस्मृति की खुमारी ही छाई रहती है और मौज मजा करते हुए दिन गुजारने के अतिरिक्त और कुछ सूझ ही नहीं पड़ता लक्ष्य भ्रष्ट जीव के लिए लोभ और मोह की पूर्ति करते रहना ही परम प्रिय बना रहता है।
सोते समय मृत्यु को सहचरी की तरह साथ लेकर सोया जाय तो वह सद्गुरु की तरह जीवन का मूल्य, स्वरूप एवं सदुपयोग इतनी अच्छी तरह समझाती है, जितना कोई अन्य ज्ञानी विज्ञानी भी नहीं समझा सकता। उन घड़ियों में बैरागी की, अनासक्त कर्मयोगी की भावनाएँ मन में भरी रहनी चाहिए। बैरागी, संन्यासी उसे कहते हैं जो सम्बद्ध पदार्थों और प्राणियों पर से स्वामित्व की भावना हटा लेता है। मालिकी छोड़कर माली का पद स्वीकार करता है। इस चिन्तन से विवेक दृष्टि उपलब्ध होती है। कर्तव्य पालन ही अपनी आकांक्षा बन कर रह जाता है। स्वामित्व भगवान का -सेवा धर्म अपना” इतना सोच लिया जाय तो समूचा दृष्टिकोण ही बदल जाता है। तृष्णा- अहंता के कारण जो अकर्म करने पड़ते हैं और अनावश्यक चिन्ताओं के बोझ शिर पर लदे रहते हैं, उन सबसे सहज ही छुटकारा मिल जाता है।
जीवन का आनन्द उसे मिलता है जो उसे खिलाड़ियों द्वारा खेले जाने वाले खेल की तरह जीता है। नाटक के पात्रों को तरह-तरह के अभिनय करने पड़ते हैं, वे उनसे अत्यधिक प्रभावित नहीं होते। विवेकशीलता इसी में है कि अपना प्रत्येक कर्त्तव्य पूरी ईमानदारी और तत्परतापूर्वक सम्पन्न करते रहा जाय और उतने भर को अपने सन्तोष एवं उत्तरदायित्व निर्वाह का केन्द्र बिन्दु मानते रहा जाय। मनोकामनाओं को कर्त्तव्य पालन तक सीमित कर दिया जाय और परिणामों की बात परिस्थितियों पर निर्भर होने को तथ्य स्वीकार कर लिया जाय तो शिर पर चढ़ी रहने वाली भविष्य की अनावश्यक चिन्ताएँ अनायास ही तिरोहित हो जाती है। सफलता और असफलता दोनों का जो समान रूप से स्वागत करने को तैयार हैं, उस सन्तुलित मनःस्थिति के व्यक्ति को तत्त्वदर्शी और विज्ञानी कह सकते हैं। ऐसा व्यक्ति ही जीवन नाटक का आनन्द ले सकता है। स्वयं प्रसन्न रहना व साथियों को प्रसन्न रखना उसी के लिए सम्भव होता है। वैराग्य, संन्यास, इसी मनःस्थिति का नाम है। अनासक्त कर्मयोगी एवं स्थिति प्रज्ञ-प्रज्ञावान् ऐसे ही लोगों को कहा जाता है। रात्रि को सोते समय अपनी मनःस्थिति ऐसी ही बनाकर सोया जाय तो गहरी नींद आयेगी-चित्त बहुत हलका रहेगा और प्रातःकाल ताजगी के साथ उठना सम्भव हो सकेगा।
भारतीय धर्म वर्णाश्रम धर्म है। उसकी मर्यादा है कि जीवन के अन्तिम अध्याय में संन्यासी होकर मरना चाहिए। अब तो वे परम्पराएँ तिरोहित ही होती जाती है। पर जब तब वे मान्यताएँ जीवित थीं तब यह प्रचलन भी था कि यदि कोई व्यक्ति मरने जा रहा है और संन्यास नहीं ले सका है तो उसे ‘त्वरा संन्यास’ दिलाया जाता था। संन्यास लेने की प्रक्रिया कुछ ही समय में चिह्न पूजा की तरह सम्पन्न कर दी जाती थी। वह कृत्य हम प्रतिदिन सोते समय स्वयं ही कर लिया करें, तो इसे एक उच्चकोटि की आध्यात्मिक साधना ही कहा जाएगा दिन भर जिस परिवार की सेवा की गई वह ईश्वर का उद्यान था। उसे सुविकसित बनाने के लिए अपना उत्तरदायित्व निबाहा गया, अब मालिक को सौंपकर छुट्टी पर जाया जा रहा है। धन वैभव जो कुछ भी अपने सुपुर्द था वह ईश्वर की सम्पत्ति थी उसे उसी के हवाले करके स्वयं खाली हाथों विदाई ली जा रही है। शरीर और मन यह औजार-वाहन भी ईश्वर के कारखाने से किराये पर मिले थे, उन्हें भी यथा स्थान जमा करके एकाकी अपने घर लौटा जा रहा है। यह भावनाएँ सोते समय की हैं। उनके कल्पना चित्र मनःक्षेत्र पर उतरते हुए शयन करने को नित्य नियम बना लिया जाय तो संन्यासी, एवं वैरागी की वह कुछ समय के लिए उत्पन्न की गई मनःस्थिति अगले चौबीस घण्टों तक आत्म-जागृति का उत्साह बनाये रह सकती है। दूसरे दिन फिर इसी प्रकार उसे सजग-सजीव किया जा सकता है।
प्रातःकाल उठते ही एक दिन के लिए मिला जीवन रूपी सौभाग्य और उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग की बात मनःक्षेत्र पर भली प्रकार उभारी जाय। आँख खुलने से लेकर शैया त्याग कर जमीन पर पैर रखने तक के नये जीवन की प्रसन्नता और उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग की सुव्यवस्था बनाने की बात ही सोचते रहा जाय। उतने ही समय में दिनचर्या का निर्धारण उसके साथ मनोयोग पूर्वक आदर्शवादी चिन्तन का नियोजन किस प्रकार होगा इसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए। यह कार्य प्रातःकालीन ब्रह्म संध्या की तरह है। इसे अवकाश न मिलने की शिकायत किये बिना, कोई भी बिना किसी कठिनाई, विधि-विधान या साधन उपकरण के अत्यन्त सरलतापूर्वक करता रह सकता है। इसे आत्म-बोध की योग साधना कहा जाता है।
साँय सन्ध्या के लिए रात्रि को सोते समय ‘हर रात नई मौत के सूत्र को अंतःक्षेत्र में भावनापूर्वक चित्रित किया जाना चाहिए, सम्वेदना जितनी गहरी होगी प्रतिक्रिया उतनी ही प्रखरता पूर्वक उभरेगी। वस्त्र साधारण पहनते हुए भी-काम काज गृहस्थों जैसा करते हुए भी संन्यासी की अनासक्त कर्मयोगी की मनःस्थिति इस साधना के आधार पर जितनी सरलतापूर्वक बन सकती है, उतनी अन्य किसी प्रकार नहीं। तत्त्व-बोध की यह-साधना भी ऐसी है। जिसके लिए समय न मिलने, न साधन होने, मन न लगने जैसी शिकायत करने का कोई अवसर नहीं है।
सूर्योदय और सूर्यास्त काल को संध्या कहते हैं। उस पुण्य बेला को आत्म-साधना के लिए सुरक्षित रखे जाने का विधान है। इसी विधान की, निद्रा को रात्रि और जागृति को दिन मानते हुए उनकी सन्धि बेला को संध्याकाल कहा जा सकता है। इस प्रकार उठते समय का आत्म-बोध और सोते समय को तत्त्व बोध’ साधना की व्यावहारिक जीवन को प्रभावित करने वाली उच्चस्तरीय साधना कहा जा सकता है। सरलता और प्रभावोत्पादक क्षमता की दृष्टि से उसे अद्वितीय माना जा सकता है ‘हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत’ का जीवन सूत्र जो जितनी गहराई के साथ हृदयंगम और कार्यान्वित कर सकेगा वह उतनी ही तीव्रतापूर्वक आत्मिक प्रगति की दिशा में अग्रसर होगा, यह निश्चित है।
राजयोग की अष्टांग साधना में ‘यम’ नियम के उपरान्त आसन को स्थान दिया गया है। यहाँ आसन का तात्पर्य मात्र बैठने की विधि से नहीं वरन् उस स्थान एवं वातावरण से है। जहाँ उपासना की जाय। आसन के नाम पर सिद्धासन, सर्वांगासन, पद्मासन आदि पंरो को मोड़ने-तोड़ने के विधि विशेष को शोभित नहीं किया जाना चाहिए, वरन् उस समूचे वातावरण का संकेत सन्निहित समझा जाना चाहिए। जहाँ कि उपासना की जा रहीं है या की जानी है।
स्थान एवं वातावरण का प्रभाव व्यक्ति की शारीरिक एवं मानसिक स्थितियों में रहते हुए चित्त में उद्विग्नता बनी रहेगी और आत्मिक उत्कर्ष के वे प्रयोग संघ न सकेंगे जिनमें शान्त चित्त होने की-मानसिक स्थिरता की शर्त जुड़ी हुई है। साधना में मन न लगने, जी ऊबने , चित्त के चंचल रहने की शिकायत साधकों को प्रायः बनी ही रहती है। इसका कारण मन का अनगढ़ होना और निग्रह में संकल्प-शक्ति का प्रयोग न किया जाना भी होता है। किन्तु बहुत करके वातावरण का प्रभाव भी छाया रहता है। उसके कारण भी मन उचटता रहता है। साधना जिस श्रद्धा, अभिरुचि एवं विश्वासपूर्वक की जानी चाहिए, हो नहीं पाती। स्पष्ट है कि जिसमें गहरी श्रद्धा का मनोबल युक्त संकल्प का समावेश न होगा वह आत्मोत्कर्ष के लिए किया जाने वाला साधन मात्र छुट-पुट कर्मकाण्डों के सहारे सम्पन्न न हो सकेगा। अस्तु आसन की वातावरण की उपयोगिता समझी जानी चाहिए और उसके लिए अच्छे स्थान की अच्छे वातावरण की -ही नहीं अच्छे मार्गदर्शन एवं समुचित संरक्षण की भी व्यवस्था की जानी चाहिए।
किसके लिए कहाँ, क्या, कितना सम्भव है? यह निर्णय करना हर व्यक्ति का अपन काम है। उसे अपेक्षा-कृत अधिक उपयुक्त तलाश करनी चाहिए। घर में यदि बहुत घिचपिच हो तो समीप में कोई सुविधाजनक सज्जनता के वातावरण वाला शान्त स्थान तलाश किया जा सकता है। घर में एक हवादार कोठरी कोलाहल रहित कोने में मिल सकें तो उत्तम है। खुली छत का भी उपयोग हो सकता है। कुछ भी न बन पड़े तो इतनी व्यवस्था तो बनानी ही चाहिए कि जितने समय तक उपासना की जाती है उतने समय तक लोगों का आवागमन न रहें। उपासना में कई व्यक्ति एक साथ बैठ सकते हैं, पर वे सभी रहने आत्म तल्लीन ही चाहिए। एक की हलचलें दूसरों का ध्यान न उचटावें, तभी साथ बैठने की सार्थकता है।
विराध साधना के लिए शान्तिकुञ्ज का ब्रह्मवर्चस् इसी दृष्टि से बनाया गया है। यह वही स्थान है जहाँ सातों ऋषि तप करते थे और गंगा ने पृथ्वी पर अवतरित होते समय उनकी तपश्चर्या में विघ्न डालने की अपेक्षा अपने को ही सात धाराओं में विभक्त कर लेना उचित समझा था। हरिद्वार को हिमालय का प्रवेश द्वारा कहा गया है। इसे शिव लोक की संज्ञा भी दी गई थी दक्ष प्रजापति के घर में सती यहीं जन्मीं और यज्ञ कुण्ड में दग्ध हुई थीं। पार्वती ने तप करके शिव वरण जैसे कठिन संकल्प को यहीं पूरा किया था। वे सभी ऐतिहासिक स्थान इधर ही हैं। वे सभी स्थान हरिद्वार के अति समीप हैं, कुछ ही मील की परिधि में हैं। जहाँ राम, लक्ष्मण, भरत , शत्रुघ्न ने गुरु वशिष्ठ का संरक्षण एवं सामीप्य पाने और पवित्रं वातावरण का लाभ लेने की दृष्टि से अपनी-अपनी कुटिया बनाई थी और अन्तिम जीवन यहीं समाप्त किया था।
यह ऐतिहासिक चर्चा हुई। वर्तमान में भी साधना के उपयुक्त सभी विशेषताएँ और अनुकूलताएँ जुटाने का यहीं वे सभी आधार एकत्रित किये गये हैं, जिनके कारण किन्हीं स्थानों को तीर्थ कहलाने का सौभाग्य मिलता है। गंगा की गोद और हिमालय की छाया होने से सप्त ऋषियों की तपोभूमि होने से स्थान की सनातन गरिमा तो है ही । अब भी यहाँ अखण्ड दीप, नित्य यज्ञ, नियमित जप, ब्रह्म सन्दोह, आरण्यक वातावरण की परम्परा का नवीन संस्करण प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया गया है। पारिवारिक स्नेह-सौजन्य से अधिक गहरा और भाव भरा वात्सल्य, दुलार देने का मातृत्व यहाँ जीवन्त है। व्यक्ति विशेष के लिए उपयुक्त परामर्श दे सकने वाले तपश्चर्या, ज्ञान-सम्पदा और अनुभवों के धनी मार्गदर्शक भी यहाँ अभी तो मौजूद हैं ही, उसका संरक्षण एक ऐसा तथ्य हैं जिससे साधना की सफलता सम्भव होनी ही चाहिए।
स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि इसके प्रत्यक्ष संचालक तो कठपुतली की तरह ही अपनी प्रत्यक्ष हलचलें करते हैं, परोक्ष में इसके पीछे एक अत्यन्त प्रचण्ड आत्म -शक्ति काम करती है। शान्तिकुञ्ज एवं ब्रह्मवर्चस् पर सीधा अधिकार उसी का है। परोक्ष रूप में यहाँ की गतिविधियों का उत्तरदायित्व उसी ने उठाया हुआ है। वही दिव्य सत्ता अपने अनुदान प्रदान करती और साधकों को वह आत्मबल उपहार रूप से देती है जिसके सहारे आत्मोत्कर्ष जैसे महान् उद्देश्य की पूर्ति में सुविधा, सरलता एवं सफलता सम्भव हो सके। इन सब तथ्यों का समावेश होने के कारण इन आरण्यकों को दिव्यलोक, दिव्य-वातावरण दिव्य-संरक्षण से सुसम्पन्न माना जाता है। जिन्हें जितने समय विशेष साधना करती हो उन्हें यहाँ आकर उसे सम्पन्न करने का प्रयत्न करना चाहिए। यों भूमि तो सर्वत्र ही भगवान की है। और सभी जगह भगवान की उपस्थिति है। फिर भी यदि आसन का-वातावरण का महत्त्व सोचा जाय तो अमुक समय तक यहाँ रहने का और साधना करने का प्रयत्न किया जा सकता है। इस क्षेत्र में अपने ही जैसे साथी संगी तपस्वी बने रहने से एक दूसरों को प्रेरणा भी मिलती है। कन्याओं का निवास प्रत्यक्ष कुमारिका देवियों की चलती-फिरती प्रतिमाओं का दर्शन कराता है। अपने समीप में भी यथा सम्भव कुछ ऐसी ही उपयुक्तता तलाश की जा सकती है।
अव आसन की वह परिभाषा आरम्भ की जाती है। जिसको बैठने से सम्बन्ध है। आसन पैरों का ही नहीं समस्त शरीर का होता है। कमर सीधी-आंखें अधोमिलित, शान्त चित्त, स्थिर शरीर यह स्थिति रहनी चाहिए। मात्र ध्यान करना हो तो दोनों हाथ गोदी में रहने चाहिए अन्यथा जप में दाहिने बांये हाथों को इधर -उधर भटकाते नहीं रहना चाहिए वरन् एक निर्धारित क्रम से ही उन्हें व्यवस्थित रखना चाहिए। समस्त शरीर को सुस्थिर रखने की व्यवस्था आसन मुद्रा कहलाती है।
पैरों को किस प्रकार मोड़कर बैठा जाय। इसका भी साधना में महत्त्व है। इस बैठक का भी शरीर पर और मन पर प्रभाव पड़ता है। और उसके सहारे साधना की सफलता में सरलता उत्पन्न होती है। यहाँ इतना और स्मरण रखने योग्य है कि उत्तानपाद शीर्षासन, मत्स्यासन , मयुरासन आदि चौरासी या न्यूनाधिक संख्या में गिनाये जाने वाले आसन एक प्रकार के शारीरिक व्यायाम हैं। आरोग्य रक्षा की दृष्टि से विशेष व्यायामों जैसा ही उनका महत्त्व है। उन्हें आध्यात्मिक साधनाओं के साथ सम्मिलित नहीं किया जा सकता । चित्र-विचित्र ढंग से शरीर के अवयवों को मोड़ने मरोड़ने से शरीरगत लाभ तो हो सकते हैं, पर मन की एकाग्रता पर तो उनके कारण उत्पन्न हुए तनाव से बाधा ही पड़ेगी।
साधना के लिए बैठने में शरीर को सुविधा की स्थिति में रखे रहने वाली मुद्रा होनी चाहिए। इसके लिए सुखासन सर्व-सुलभ है। साधारण रीति से पालथी मार बैठने का नाम- उसकी सुविधा को ध्यान में रखते हुए -सुखासन उपयुक्त ही रखा गया है। इसे किसी भी साधना में किसी संकोच के प्रयुक्त किया जा सकता है। शास्त्रकार आसन का उद्देश्य और स्वरूप समझाते हुए कहते हैं। -
येन केन प्रकारेण सुखं धैर्य च जायते। यत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समाश्रयेत्॥ 12 जावालदर्शनोपनिषद् 3। 12
जिस प्रकार बैठने से शरीर को सुविधा हो , शान्ति में अड़चन न पड़े उसे सुखासन कहते हैं। निर्बल साधकों को ऐसे ही आसन का आश्रय लेना चाहिए।
हठस्यं प्रथमाड़ंत्वादासंन पूर्वमुच्यते। कुर्यात्तदानं स्थैर्धमारोग्यं चाँगलाधवम्॥ हठ.योग.प्रदीपिका 17
हठ योग का प्रथम अंग आसन है। आसन की स्थिरता से शरीर निरोग और जोड़ों में हलकापन रहता है।
सुखेनैव भवेद्यास्मिन्नजस्त्रं बह्मचिन्तनम्। आसनं तद्विजानीयादन्यत् सुखविनाशनम्॥ (तेजबिन्दू0)
योग साधना के लिए सिद्धासन (विधि आगे लिखी जायेगी) श्रेष्ठ होने पर भी जिस आसन से सुखपूर्वक निरन्तर ब्रह्म का चिन्तन हो सके वही आसन योगी को उपादेय है।
मार्ग दर्शक के परामर्श एवं निर्देश के अनुसार विशेष साधनाओं के लिए आसनों का भी प्रयोग हो सकता है। पर ऐसे आसनों की संख्या अधिक नहीं है। उन्हें 2-4 की सीमा के अंतर्गत ही रखा गया है।-
चतुरशीत्यासनानि सन्ति नाना विधानिच। तेभ्यश्चतुष्कमादा मयोक्तानि ब्रवीभ्यहम्॥ सिद्धासनं ततः पद्यासंन चोग्रं च स्वस्तिकम्॥ (शिव संहिता 3।100)
नाना आसनों में चौरासी मुख्य हैं। उनमें भी चार विशेष उल्लेखनीय हैं-(1) सिद्धासन (2) पद्मासन (3)उग्रासन (4) स्वस्तिकासन।
सिद्धं पद्मं तथा सिंह भदंचेति चतुष्टयम्। श्रेंष्ठंतत्रापि च सुखे तिष्ठेन्सिद्धासने सदा॥ हठयोग प्रदीपिका 1॥36॥
अर्थात्-सिद्धासन-पद्मासन सिंहासन तथा भद्रासन-ये चार साधकों के लिए श्रेष्ठ आसन हैं। इन चारों में भी सिद्धासन जागरण प्रयोगों में मूलबन्ध और सिद्धासन का विशेष महत्त्व बताया गया है।
“चतुर शीतिपीठेषु सिद्धमेव सदाम्यसेत्। द्वासप्ताँत सहस्त्राणाँ नाड़ीनाँ मल शोधन।” हठयोग
अर्थः-चौरासी आसनों में से हमेशा सिद्धासन का ही अभ्यास करना चाहिए क्योंकि वह 72000 नाड़ियों के मल को दूर करता है।
चतुरशीतिलक्षाणामेकैफं समुदाहृतम्। ततः शिवेन पीठानाँ षोड़शोनं शंत कृतम्॥9॥
आसनेभ्यः समस्तेभ्यो द्वयमेतदुदाहृतम्। एंक सिद्धासंन प्रोक्तं द्वितीयं कमलासनम्-गेरक्ष
चौरासी लक्ष्य योनियों के कारण आविर्भूत चौरासी लक्ष आसनों का विस्तार मनुष्य समझा न सकेंगे । इसलिए शिव जी ने सर्वसाधारण की सुविधा के लिए 84 आसन मात्र योग शास्त्र में कहे हैं। (1)सिद्धासन (2) पद्मासन
दो मुख्य आसनों में पद्मासन भी सरल है। उसका स्वरूप इस प्रकार बताया गया है-
वामोरुपरि दक्षिंण च चरंण संस्थाप्य वाँन तथा, दक्षोरुपरि मश्चिमेन विधिन धृत्वा कराभ्याँ दृढ़म्। अंगुष्ठौ हृदये निधाय चिबूकं नासाग्रमालोकये-देतव्द्याधिविनाशकारि यमिनाँ पद्यासन प्रोच्यते॥ हठयोग प्रदीपिका 1।44
बाई जाँघ के ऊपर दाहिने रखो और दाहिनी जाँघ पर बांये पैर रखें। पीछे की और दोनों हाथों से दोनों पैरों के अँगूठे पकड़कर और ठोड़ी को कण्ठ से सटाकर नाक के अग्रभाग को देखें यह पद्मासन है। इससे व्याधियाँ नष्ट होती हैं।
पद्मासन की सामान्य प्रचलित रीति में पैरों पर पैर चढ़ाकर हाथ सुविधानुसार घुटनों पर अथवा गोद में रखकर बैठन का क्रम है। पीछे से हाथ ले जाकर अँगूठे पकड़ने पर उसे पद्मासन कहा जाता है।
कुण्डलिनी जागरण प्रयोग में सिद्धासन को प्रमुखता दी जाती है। यह लगातार तो नहीं हो सकता पर जितनी देर शक्तिचालनी मुद्रा एवं सुर्य वेधन प्राणायाम जैसे प्रयोग किये जाते हैं। उतनी देर उसे लगाना लाभदायक है। सिद्धासन का महत्त्व शास्त्रकार इस प्रकार बताते हैं-
किमन्यैर्बहुभिः पीठैः सिद्वे सिद्वासने सति। प्राणनिले सावधान बद्धे केवलकुँभके॥
उत्पद्यते निरायासात्स्वयमेवोन्मनो कला। तथैकस्मिन्नेव दृढे सिद्धे सिद्वासने सति। बंधत्रयमनायासात्स्वयमेवोपजायते॥ हठयोग प्रदीपका 1/43,44
अर्थात्-सिद्धासन के सिद्ध होने पर अन्य अनेक उपासनाओं के अभ्यास की क्या आवश्यकता? प्राणवायु को सावधानीपूर्वक संयमित रखकर ‘केवल कुम्भक’ प्राणायाम का अभ्यास करते हुए सिद्धासन में दृढ़ रहकर साधना करने से उन्मनी कला स्वयमेव सिद्ध होती है और तीनों ड़ड़ड़ड़ भी इस अभ्यास से स्वतः ही सिद्ध हो जाते हैं।
एतत्सिद्वासनं ज्ञंयं सिद्वानाँ सिद्विदायकम्॥ येनाभ्यास वशात् शीघ्र योगनिष्पत्तिमाप्नुयात्। सिद्वासनं सदा सेव्यं पवनाभ्यासिना परम्॥ शिव संहिता 3/102/103
यह सिद्धासन सिद्धि दायक है। इसके अभ्यास से अगुनिष्पति शीघ्र होती है। इसीलिए प्राणवायु के अभ्यासी साधकों को यह सिद्धासन सदा करना चाहिए।
सिद्धासन का मूल प्रयोजन मूलाधार चक्र को प्रभावित एवं उत्तेजित करना है। उसमें पैर की एड़ी का भाव मूलाधार क्षेत्र पर डालना है। इस प्रकार उत्पन्न की गई उत्तेजना कुण्डलिनी कन्द को जागृत करने में शेष रूप से सहायक सिद्ध होती है। सिद्धान्त का रूप इस प्रकार बताया गया है।
निस्थानकमडि ध्रमूलधरितं कृत्वा दृढ विन्यसेत्। ड़ड़ड़ड़ पादमथैकमेव हृदये धृत्वा सम विग्रहम॥
ड़ड़ड़ड़ सयंमितेन्द्रियोचलदृशा पश्यन् भुवोरंतरं॥ ड़ड़ड़ड़ न्यारण्यकपाट भेद जनकं सिद्वासनं प्रोच्यते॥ गेरक्ष सहिता।
योनि स्थान को वाँय पद के मूल देश में दवा और चरण मेढू देश में आबरु करके एवं हृदय में ठोड़ी जमाते हुए देह को सरल रख दोनों भौहों के मध्य में दृष्टि स्थान पूर्वक यानी शिव नेत्र होकर निश्चल ड़ड़ड़ड़ से बैठने का नाम सिद्धासन है।
सिद्धासन का स्वरूप अधिक अच्छी तरह समझने के लिए उसे इस प्रकार जानने और अभ्यास में लाने का प्रयत्न करना चाहिए।
सिद्धासन-कमर सीधी। ध्यान मुद्रा। बायाँ पैर इस प्रकार मोड़े कि उसकी एड़ी का ऊपरी भाग ‘सीवन’ मलमूत्र छिद्रों के मध्यवर्ती भाग के नीचे आ जाय। स्थिति ऐसी रहनी चाहिए कि सीधे बैठने पर एड़ी का दबाव ‘सीवन’ के भीतर चल रही मूत्र नलिकाओं पर पड़े।
दांये पैर को बांये पैर के ऊपर रखकर पालथी जैसी स्थिति बनाई जाय। ऐसा करने से दाहिने पैर की एड़ी नाभि से लगभग चार अंगुल नीचे उसी को सीध में जमी दिखाई देगी।
इस प्रकार दोनों एड़ियाँ शरीर की मध्य रेखा पर रहती है। तथा उनके बीच मूलाधार क्षेत्र आ जाता है।
इस प्रकार बैठने से पैरों पर दबाव पड़ता है और अधिक देर इस तरह बैठ सकने में कठिनाई होती है। अतएव आवश्यकतानुसार पैरों को बदलते रहा जा सकता है। जिस प्रकार आरम्भ में बायाँ पैर नीचे और दाहिना ऊपर रखा गया था उसी प्रकार बदलने पर दाहिना नीचे चला जाएगा और बायाँ ऊपर आ जायेगा।
सिद्धासन का अभ्यास आरम्भ में पाँच मिनट से करना चाहिए और जितना अभ्यास हो सके। उठने पर पैरों को कष्ट अनुभव न हो उतनी देर चलाया जा सकता है। प्रायः 15 मिनट से आधा घन्टे तक यह अभ्यास आसानी में बढ़ सकता है। इसका प्रयोग सामान्यतः जप में नहीं सूर्यभेदन प्राणायाम जैसी विशेष साधनाओं में ही करना चाहिए। सामान्य गायत्री जप ध्यान आदि में तो सामान्य पालथी मार कर बैठना ही पर्याप्त होता है। तनाव उत्पन्न करने वाले साधनों से सामान्य साधन में ध्यान बँटता है।
प्रसन्नता पुरस्कार नहीं वरन् सही ढंग सोचने की आदत का स्वाभाविक परिणाम है। इस प्रकार दुःख कोई दंड नहीं वरन् गलत ढंग सोचते रहने की सहज प्रतिक्रिया है।
भौतिक के छात्र जानते हैं कि घर्षण से ऊर्जा उत्पन्न होती है। दियासलाई घिसने से लेकर विशालकाय जनरेटरों द्वारा आग या विद्युत उत्पन्न होने के कारणों में घर्षण ही मुख्य है। निर्जन सुनसान जंगलों में कई बार भयंकर आग लगती है और विस्तृत क्षेत्र के गीले सूखे पेड़ों को जलाकर खाक कर देती है। यह मनुष्यों द्वारा लगाई गई नहीं होती, वह आग सूखे पेड़ों की टहनियों के तेज हवा से हिलने और आपस में रगड़ने के कारण उत्पन्न होती है। इस कार्य में बाँस सब से अग्रणी है। सूखे बाँस आपस में रगड़ खाकर पहले गरम होते हैं फिर चिनगारियाँ निकालने लगते हैं। यह आग बढ़ती फैलती चली जाती है और दावानल का रूप धारण कर लेती है। यह घर्षण के सिद्धान्त का ही चमत्कार है।
चकमक पत्थर के दो टुकड़े आपस में टकरा कर चिनगारियाँ उत्पन्न करने की कला ही आदि मानव ने सीखी थी, पीछे लोहे और पत्थर को टकरा कर भी आग निकालने की तरकीब निकाल ली गई। यज्ञ कार्यों में लकड़ियाँ रगड़कर अग्निमन्थन की क्रिया द्वारा अग्नि उत्पन्न की जाती थी। चेतना और पदार्थ-ब्रह्म और प्रकृति के उद्गम स्त्रोत में देखा गया है कि वे परस्पर टकराते-घिसते है-फलतः शब्द रूप में ऊर्जा उत्पन्न होती है और उसके सहारे सृष्टि क्रम चल पड़ता है। हवा चलती है, विभिन्न पदार्थों से टकराती है। समुद्र में लहरें उठती गिरती हैं-मनुष्य शरीर में श्वास-प्रश्वास और आकुंचन प्रकुञ्चन चलता है फलतः घर्षण चलता है और ऊर्जा उत्पन्न होती है उसी के अपने-अपने प्रयोजन हर स्थान पर चल पड़ते हैं। पदार्थों और प्राणियों में चलती रहने वाली हलचलों की-घर्षण की उत्पत्ति ही कहा जा सकता है।
साधारण श्वास प्रश्वास क्रिया से जीवन चर्या चलती है। पेण्डुलम हिलना बन्द हो जाय तो घड़ी के सारे पुर्जे ठप्प हो जाते हैं। साँस रुकी तो मरण निश्चित है। घर्षण बन्द तो जीवन भी समाप्त। साँस के साथ जीवन जुड़ा हुआ है क्योंकि प्रत्यक्षतः ऊर्जा की उत्पत्ति उसी से होती है, यों गहराई में जाने पर सहस्रार से उठने वाले विद्युत स्फुल्लिंग भी उसके मूल कारण समझे जाते हैं। वहाँ भी रुक-रुककर उछलने की क्रिया ही घर्षण उत्पन्न करती है।
अधिक सशक्तता प्राप्त करने के लिए हमें अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। बड़ा कारखाना चलाने के लिए बड़ी मशीनें गतिशील बना सकने वाली, बड़ी मोटर फिट करनी पड़ती है। छोटी मोटर तो छोटी मशीन ही चला पाती है। महत्त्वपूर्ण शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक कार्य करने के लिए अधिक उच्चस्तरीय ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। यह खाने पीने या आग तपाने जैसे प्रयत्नों से नहीं वरन् वहाँ से प्राप्त करने होती है जहाँ पर चेतना और पदार्थ दोनों को प्रभावित करने वाला क्षमता का उद्गम है। कहना न होगा कि यह आधार ‘प्राण’ ही है। प्राण वह तत्त्व है जो अन्तरिक्ष में जीवन और पदार्थ दोनों की संयुक्त शक्ति के रूप में प्रवाहित रहता है। शुद्ध चेतना ब्रह्म है। प्रशुद्ध प्रकृति ऊर्जा है। दोनों ही अपने मूल रूप में अपूर्ण है। प्राणि जगत का उत्पत्ति इन दोनों धाराओं के मिलने पर ही सम्भव होती है। इसीलिए जीवधारियों को प्राणी कहते हैं। विज्ञान के बढ़ते हुए चरण परमाणु-परमाणु से तरंग-तरंग से ऊर्जा-ऊर्जा से क्वान्टा तक जा पहुँचा है। इकॉलाजी की मान्यताओं ने क्वान्टा को विचारशील होने की मान्यता अब तक मिलने ही वाली है। आकाश आकाश में, हवा -हवा में-ईथर-ईथर में एस्ट्रल तक की मान्यता मिल चुकी । अब विज्ञान प्राण सत्ता के महासमुद्र को इस निखिल ब्रह्माण्ड में लहलहाते देखने की स्थिति में पहुँचने ही जा रहा है।
प्राण तत्त्व का अस्तित्व तत्त्वदर्शी ऋषियों ने बहुत पहले ही जान लिया था। प्रकृति अनुदानों की सीमित ड़ड़ड़ड़ से काम चलते न देखकर विशेष प्रयोजनों के लिए ड़ड़ड़ड़ विशिष्ट मात्रा उपलब्ध करने का मार्ग भी खोज ड़ड़ड़ड़ था। इसे उन्होंने प्राण विज्ञान का नाम दिया ड़ड़ड़ड़ उसके प्रयोग प्राणायाम कहलाये। प्राणायाम का उद्देश्य साँस के मार्ग से अधिक मात्रा में प्राण तत्त्व को आकर्षित करना और आत्म-सत्ता में धारण करके अधिक सशक्त बनना है। यहाँ साँस और प्राण का पारस्परिक सम्बन्ध तनिक और अच्छी तरह समझने की आवश्यकता ड़ड़ड़ड़।
मोटे तौर से हवा एक हलकी गैस है जो अन्तरिक्ष ड़ड़ड़ड़ अपने हल्केपन के कारण तनिक-तनिक से आघातों से ठोकर खाकर इधर से उधर उड़ती-उछलती ड़ड़ड़ड़ है। इस हवा के अन्तराल में बहुत-सी महत्त्वपूर्ण व बहुमूल्य वस्तुएँ समाई हुई है। दूध में घी रहता है और दीखता नहीं वनस्पतियों में प्रोटीन, क्षार चिकनाई आदि घुले रहते हैं। माँस के भीतर ढेरों प्रकार के रासायनिक पदार्थ रहते हैं। इन्हें विशेष विश्लेषण से ही ड़ड़ड़ड़ और विशेष उपायों से ही निकाला जा सकता है। इसी प्रकार हवा के भीतर भी बहुत कुछ भरा पड़ा है। साँस लेते समय आक्सीजन, नाइट्रोजन, आदि का रासायनिक, सम्मिश्रण हमारे भीतर प्रवेश करता है। उसमें जो आवश्यक है उसे शरीर सीख लेता है और भीतर उत्पन्न कचरे को वापिस लौटने वाली साँस में कार्बनडाइआक्साइड गैस के रूप में बहा देता है इस प्रकार ड़ड़ड़ड़ विश्लेषण किया जाय तो प्रवेश करते और ड़ड़ड़ड़ समय की उसकी स्थिति में रासायनिक सम्मिश्रणों की दृष्टि से भारी अन्तर आ जाता है। भिन्न-भिन्न स्थानों की जलवायु में जो स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली स्थिति होती है, उसका कारण इस रासायनिक सम्मिश्रण की मात्रा में न्यूनाधिकता का अन्तर ड़ड़ड़ड़ है। पदार्थ ठोस-प्रवाही और वायु भूत बनता रहता है। पृथ्वी पर ठोस-पानी में प्रवाही और ड़ड़ड़ड़ गैस रूप में पदार्थ की सत्ता बनी है। इतना ड़ड़ड़ड़ के उपरान्त यह जानना सरल पड़ेगा कि हवा आक्सीजन जैसे रासायनिक पदार्थ ही नहीं उसके ड़ड़ड़ड़ अन्तराल में प्राण तत्त्व की प्रचुर मात्रा भी विद्यमान् रहती है। यह साँस के साथ अनायास भी शरीर में प्रवेश करता रहता है। शरीर उसमें में काम चलाऊ मात्रा सोख्ता भी है । साँस के घर्षण से ऊर्जा की उत्पत्ति और हवा के साथ घुले हुए आक्सीजन जैसे रासायनिक पदार्थों की ही नहीं प्राण शक्ति की उपलब्धि का भी लाभ मिलता रहता है। जीवन का आधार साँस पर अवलम्बित कहा जाता है इसके पीछे घर्षण एवं प्राण अनुदान से अभीष्ट ऊर्जा की उपलब्धि का तथ्य ही काम कर रहा होता है।
प्राणायाम में साँस की गति में असामान्य व्यक्तिक्रम निर्धारित हैं इसमें घर्षण का असामान्य क्रम उत्पन्न होता है और उसकी प्रतिक्रिया ‘निर्वाह’ की आवश्यकता पूरी करने से आगे बढ़कर शरीर में विशेष हलचलें उत्पन्न करती है। वे असामान्य हलचलें ऐसे प्रसुप्त संस्थानों को जगाती है जो सामान्यतया निर्वाह क्रम में तो अधिक आवश्यक नहीं होते, पर जागृत होने पर मनुष्य में विशेष स्तर की अतिरिक्त मात्रा में विशेष समता प्रदान कर सकते हैं। प्राणायाम-माँस की गति को तीव्र कना नहीं उसे तालबद्ध और क्रमबद्ध करना है। इस ताल लय और क्रम के हेर-फेर के आधार पर ही अनेक प्रकार के प्राणायाम बने है और उनके विविध प्रयोजनों के लिए विविध प्रकार के उपयोग होते हैं। प्राणायाम के समय साधक को अपनी विशिष्ट संकल्प शक्ति का श्रद्धा भावना का-मनोबल का प्रयोग करना पड़ता है। इसी आकर्षण से साँस में प्राण तत्त्व की अधिक मात्रा अन्तरिक्ष में खिंचती, और धुलती चली आती है। प्राणायाम में श्वास क्रम की विशेष प्रक्रिया और साधक की संकल्प शक्ति का समावेश होने से वह सामान्य साँस लेना न रह कर विशिष्ट ऊर्जा की उपलब्धि की विशेष आधार बन जाता है।
घर्षण के महत्त्व को हमें और भी अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। क्रिया सामान्य है, पर उसकी प्रतिक्रिया से ऊर्जा की उत्पत्ति असामान्य हैं चलती रेल के पहियों की चिकनाई समाप्त हो जाती है। अथवा अन्य किसी कारण उनमें रिसाव पड़ने लगता है, तो उतने भर से उत्पन्न होने वाली गर्मी पहिये के धुरे तक को गला देती है और दुर्घटना की स्थिति बन जाती है। आकाश में कभी-कभी प्रचण्ड प्रकाश रेखा बनाते हुए-तारे टूटते’ देखते हैं यह तारे नहीं उल्का पिण्ड है अन्तरिक्ष में छितराए हुए धातु पाषाण जैसे छोटे-छोटे टुकड़े कभी-कभी पृथ्वी के वायु मण्डल में घुस पड़ते हैं और हवा से टकराने पर जल कर खाक हो जाते हैं। इसी जलने का तेज प्रकाश देखकर ‘तारा टूटने’ का अनुमान लगाया जाता है यह मात्र घर्षण क्रिया का चमत्कार है। ‘रति क्रिया में चुम्बकीय अवयवों का घर्षण विशिष्ट स्तर की ऊर्जा उत्पन्न करता है। उसी की अनुभूति सरस सम्वेदना के रूप में होती है और उसी से उत्तेजित होकर शुक्राणु डिम्बाणु संयोग के लिए दौड़ पड़ते हैं। यह घर्षण ही प्राणियों की उत्पत्ति का कारण बनता है।
दही मथने में ‘रई की रस्सी के दो छोर पकड़कर उलटा सीधा घुमाया जाता है। रई घूमती है। ऊर्जा उत्पन्न होती हैं और उसी उत्तेजना से दही में घुला हुआ घी उभर कर बाहर आ जाता है। दांये-बांये नासिका स्वरों के चलने वाले विशेष प्रकार मेरुदण्ड के इड़ा पिंगला विद्युत प्रवाहों को उत्तेजित करते हैं और उनकी सक्रियता दही मथने जैसी हलचल उत्पन्न करती है। फलतः ओजस् तत्त्व उभर कर ऊपर आता है इसको विधिवत् उत्पन्न और धारण किया जा सके तो साधक को मनस्वी, तेजस्वी और ओजस्वी बनने का अवसर मिलता है। इस उपलब्धि के सहारे प्रखरता की अनेक चिनगारियाँ फूटती हैं साहस, स्फूर्ति, पराक्रम , निष्ठा, आदि अनेकों आन्तरिक विशेषताओं के रूप में इनका प्रभाव उत्पन्न होता है। उनसे लाभान्वित होने पर व्यक्तित्व में अनेकों विभूतियाँ उभरती दिखाई देती है।
कई व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से समर्थ और मानसिक दृष्टि से सुयोग्य होते हैं पर अन्तःकरण में साहस न होने के कारण कोई महत्त्वपूर्ण कदम नहीं उठा पाते। शंका-आशंकाओं से असमंजस में पड़ी मनःस्थिति में न तो कोई साहसिक निर्णय कर सकना बन पड़ता है और न अवसर का लाभ उठा सकना ही सम्भव होता है। इसके विपरीत मनस्वी व्यक्ति स्वास्थ्य, शिक्षा, साधन, सहयोग, अवसर आदि की कठिनाइयाँ रहते हुए भी दुस्साहस भरे कदम उठते और आश्चर्यचकित करने वाली सफलताएँ प्राप्त करते हैं। ऐसे ही व्यक्ति अपने विशिष्ट करते हैं। ऐसे ही व्यक्ति अपने विशिष्ट कर्तव्य और विशिष्ट व्यक्तित्व के कारण कुछ ऐसा कर गुजरते हैं जिनके कारण उन्हें ऐतिहासिक महामानवों की श्रेणी में गिना जाने लगता है इस आन्तरिक समर्थता को दूसरे शब्दों में प्राण कहा जाता है। प्राणवान का अर्थ जीवित ही नहीं साहसी भी होना है। इस उपलब्धि को अन्य साँसारिक सम्पदाओं की तुलना में कम नहीं अधिक ही माना जा सकता है।
प्राण विद्या के अंतर्गत किये जाने वाले प्राणायाम प्रयोगों में जिस अंतःऊर्जा की जागृति होती है उनमें साहसिकता एवं सक्रियता प्रधान है। आलस्य और प्रमाद जैसी जीवन सम्पदा को अपंग बना देने वाली दुःखदायी विडम्बनाओं को निरस्त करने में इस साधना से बड़ी सहायता मिलती है। उत्साह जगता है और स्फूर्ति बढ़ती हैं। क्रिया के साथ मनोयोग जुड़ा रहने से सफलता के समस्त आधार बनते हैं। इसके लिए मन को प्रशिक्षित करना पड़ता है। यह भी सरकस के लिए हिंस्र जानवर साधने की तरह कठिन कार्य है। यह अन्तरंग आत्म बल के बिना और किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता। व्यवहार कौशल की शालीनता-व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय सिद्ध करने वाली सज्जनता एवं संपर्क क्षेत्र की बिखरी पड़ी अवांछनीयताओं से जूझने की वीरता यह सब कुछ आत्मबल से ही सम्भव हो सकता है। प्राण विद्या के आधार पर जो चेतनात्मक ऊर्जा उपार्जित की जाती है। उसे ऐसी ही साहसिकता एवं सक्रियता के सुखद समन्वय के रूप में काम करते हुए देखा जाता है।
अण्डा तब फूटता है जब उसके भीतर के बच्चे की अन्तःचेतना उस परिधि को तोड़कर बाहर निकलने की चेष्टा करती है। प्रसव पीड़ा और प्रजनन की घड़ी तब आती है जब गर्भस्थ शिशु की चेष्टा उस वेधन को तोड़कर उस बन्धन से मुक्ति पाने की होती है। इन गर्भस्थ शिशुओं के संकल्प यदि गिरे मरे हो तो वे भीतर ही सड़ गल कर नष्ट हो जायेंगे। प्रगति के लिए पराक्रम एवं साहस की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है उसके बिना प्रतिकूलताओं के आये दिन होते रहने वाले आक्रमणों से आत्म रक्षा तक कर सकना सम्भव नहीं हो सकता। पराक्रम प्राण का गुण है। इसी की पौरुष एवं शौर्य भी कहते हैं। आत्मबल इसी आन्तरिक ऊर्जा का नाम है। प्राणायाम के विविध प्रयोगों द्वारा विविध स्तर की प्राण ऊर्जा उत्पन्न करने के जो ऋषि प्रणीत प्रयोग बताये गये हैं, उनका साधक की स्थिति के अनुरूप यदि तालमेल बिठाया जा सके तो अप्रत्यक्ष लाभ किसी बड़े प्रत्यक्ष उपार्जन की तुलना में कम नहीं अधिक ही महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगा।
सन्ध्या वन्दन हमारा धार्मिक नित्य कर्म है। उसमें प्राणायाम क्रिया भी सम्मिलित है। आत्म-परिष्कार एवं आत्म-विकास के लिए आत्मबल अभिवर्धन की भी की भी आवश्यकता है। आत्मिक प्रगति इसी आधार पर सम्भव होती है। आत्मबल बढ़ाने के लिए वैचारिक भावना परक और क्रियात्मक प्रखरता उत्पन्न करना आवश्यक है। साथ ही इस प्रयोजन में असाधारण रूप से सहायता करने वाले प्राणायाम जैसे विशिष्ट क्रिया योगों को भी आवश्यकता रहती है। दुर्बलता निवारण के लिए आहार बिहार की सुव्यवस्था तो होनी चाहिए, पर साथ ही चिकित्सा उपचार के साधन जुटाने से भी उस कार्य में सहायता मिलती है। प्राणायाम ऐसा ही विशेष उपचार है जिसके सहारे आत्मिक बलिष्ठता बढ़ाने का पथ-प्रशस्त होता है। संध्या वन्दन के नित्य कर्म में उसका समावेश प्राणबल जर्मन की आवश्यकता उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए ही किया गया है।
संस्कृत में प्राण शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘अन्’ धातु से होती है। अन् धातु (प्राणने) जीवनी शक्ति चेतना वाचक है। इस प्रकार प्राण शब्द का अर्थ चेतना शक्ति होता है प्राण और जीवन प्रायः एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।
यह प्राणतत्त्व, जीवन तत्त्व जब न्यून पड़ता है तो व्यक्ति हर दृष्टि से लड़खड़ाने लगता है और जब वह समुचित मात्रा में रहता है तो समस्त क्रिया कलाप ठीक तरह चलते हैं। जब वह बढ़ता है तो उस अभिवृद्धि को बलिष्ठता, समर्थन, सतर्कता, तेजस्विता, मनस्विता, प्रतिभा आदि के रूप में देखा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति ही महाप्राण कहलाते हैं। वे अपना प्राण अपना प्राण असंख्यों में फूँकने और विश्व का मार्ग दर्शन करने में समर्थ होते हैं। मानव शरीर में विद्यमान् प्राण शक्ति से ही अन्तः संचालन-एफरेन्ट-और नाडी संस्थान-नर्वस सिस्टम-अनुप्राणित होता है मस्तिष्क की कल्पना, धारणा, इच्छा, स्मृति, विवेचना, प्रज्ञा आदि समस्त शक्तियों का उत्पादन अभिवर्धन तथा संचालन होता है। शरीर और मन को दिशा एवं क्षमता प्रदान करने वाली अति उत्कृष्ट एवं अति सूक्ष्म सत्ता को ‘वाइटल फोर्स’- कहा जाता है। श्वास-प्रश्वास क्रिया तो उसका वाहन मात्र है। जिस पर सवार होकर वह महाशक्ति हमारे समस्त अवयवों में प्रवेश करती है और पोषण देती। इसे भौतिक क्षेत्र में गर्मी, रोशनी, बिजली आदि के नाम से जाना जाता है और अंतःक्षेत्र में उसी को प्रखरता कहते हैं। प्राण तत्त्व यही है। जो इस सम्पदा का जितना अधिक अर्जन कर सका, वह उतना ही बड़ा शक्तिशाली सिद्ध होता है।
कुण्डलिनी साधना गायत्री महाविद्या के अंतर्गत एक आत्मशक्ति संवर्धक प्रयोग है। अस्तु उसे गायत्री विज्ञान के अंतर्गत एक विशेष विधान के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
गायत्री एक स्वरूप जप परक है, जिसके आधार पर नित्य जप, अनुष्ठान, पुरश्चरण आदि के विधान सम्पन्न किये जाते हैं। इसका दूसरा स्वरूप है- ‘अजपा’ अजपा अर्थात् वह जप जो बिना प्रयत्न के अनायास ही होता रहता हो। योगियों का मत है कि जीवात्मा अचेतन अवस्था में अनायास ही इस जप प्रक्रिया में निरत रहता है। यह अजपा गायत्री है- सोऽहम् की ध्वनि जो श्वास प्रश्वास के साथ-साथ स्वयमेव होती रहती हैं इसी को प्रयत्नपूर्वक विधि- विधान सहित किया जाय तो वह प्रयास ‘हंस योग’ कहलाता है। हंस योग के अभ्यास का असाधारण महत्त्व है। उसे कुण्डलिनी जागरण साधना का एक अंग ही माना गया है।
बिभर्ति कुण्डली शक्ति रात्मानं हं सयाँश्रिता तन्त्र सार
कुण्डलिनी शक्ति आत्म क्षेत्र में हंसारूढ़ होकर विचरती है।
गायत्री का वाहन हंस कहा गया है। यह पक्षी विशेष न होकर हंस योग ही समझा जाना चाहिए। यों हंस पक्षी में भी स्वच्छ धबलता-नीर क्षीर विवेक मुक्तक आहार विशेषताओं की ओर इंगित करते हुए निर्मल जीवन सत् असत् निर्धारण एवं नीति युक्त उपलब्धियों को ही अंगीकार किया जाना जैसी उत्कृष्टताओं का प्रतीत माना गया है किन्तु तात्त्विक दृष्टि से गायत्री का हंस-वाहिनी होना उसकी प्राप्ति के लिए हंस योग की सोऽहम् की साधना का निर्देश माना जाना ही उचित है।
देहों देवालयः प्रोक्त जीवों नामा सदा शिवः। त्यजेद ज्ञानं निर्मालयं सोहं भावेन पूज्येत्-ड़ड़ड़ड़ तंत्र
देह देवालय है। इसमें जीव रूप में शिव विराजमान् है। इसकी पूजा वस्तुओं से नहीं सोऽहम् साधना से करनी चाहिए।
अन्तः करण में हंस वृत्ति की स्थापना की यह साधना अजपा गायत्री भी कहीं जाती है।
अजपा गायत्री का महत्त्व बताते हुए शास्त्रकार कहते है-
अजपा नाम गायत्री ब्रह्मविष्णुमहेश्वरी। अजपाँ जपते यस्ताँ पुनर्जन्म न विद्यते-अग्नि पुराण
अजपा गायत्री ब्रह्मा, विष्णु रुद्र की शक्तियों से परिपूर्ण है। इसका जप करने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता
अजपा नाम गायत्री योगिनाँ माक्षदायिनी। अस्याः संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते-गोरक्षसंहिता
इसका नाम ‘अजपा’ गायत्री है, जो कि योगियों के लिए मोक्ष के देने वाली है। इसके संकल्प मात्र से सर्व पापों से छुटकारा हो जाता है।
अनया सद्दशी विद्या अनया सद्दशो जपः। अनया सद्दशं ज्ञानं न भूतं न भविष्यति॥- गोरक्षसंहिता इसके समान कोई विद्या है, न इसके समान कोई ज्ञान ही भूत-भविष्य काल में हो सकता है।
अजपा नाम गायत्री योगिनाँ मोक्षदा सदा॥ शिव स्वरोदय
अजपा गायत्री योगियों के लिए मोक्ष देने वाली है।
श्वास लेते समय ‘सो’ ध्वनि का और छोड़ते समय ‘हम’ ध्यान के प्रवाह को सूक्ष्म श्रवण शक्ति के सहारे अन्तः भूमिका में अनुभव करना- यही है संक्षेप में सोऽहम् साधना।
वायु जब छोटे छिद्र में होकर वेगपूर्वक निकलती है तो घर्षण के कारण ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता है। बाँसुरी से स्वर लहरी निकलने का यही आधार है। जंगलों में जहाँ बाँस बहुत उगे होते हैं वहाँ अक्सर बाँसुरी जैसी ध्वनियाँ सुनने को मिलती है। कारण कि बाँसों में कहीं कहीं कीड़े छेद कर देते हैं और उन छेदों से जब हवा वेग पूर्वक टकराती है तो उसमें उत्पन्न स्वर प्रवाह सुनने को मिलता है। वृक्षों से टकरा कर जब द्रुत गति से हवा चलती है तब भी सनसनाहट सुनाई पड़ती है। यह वायु के घर्षण की ही प्रतिक्रिया है।
नासिका छिद्र भी बाँसुरी के छिद्रों की तरह है। उनकी सीमित परिधि में होकर जब वायु भीतर प्रवेश करेगी तो वहाँ स्वभावतः ध्वनि उत्पन्न होगी। साधारण श्वास-प्रश्वास के समय भी वह उत्पन्न होती है, पर इतनी धीमी रहती है कि कानों के छिद्र उन्हें सरलतापूर्वक नहीं सुन सकते। प्राणयोग की साधना में गहरे श्वासोच्छवास लेने पड़ते हैं। प्राणायाम का मूल स्वरूप ही यह है कि श्वास जितनी अधिक गहरी जितनी मन्दगति से ली जा सके लेनी चाहिए और फिर कुछ समय भीतर रोक कर धीरे धीरे उस वायु को पूरी तरह खाली कर देना चाहिए। गहरी और पूरी साँस लेने से स्वभावतः नासिका छिद्रों से टकरा कर उत्पन्न होने वाला ध्वनि प्रवाह और भी अधिक तीव्र हो जाता है। इतने पर भी वह ऐसा नहीं बन पाता कि खुले कानों से उसे अनुभव किया जा सकता है।
चित्त को श्वसन क्रिया पर एकाग्र करना चाहिए। और भावना को इस स्तर की बनाना चाहिए कि उससे श्वास लेते समय ‘सो’ शब्द के ध्वनि प्रवाह की मन्द अनुभूति होने लगें। उसी प्रकार जब साँस छोड़ना पड़े तो यह मान्यता परिपक्व करनी चाहिए कि ‘हम’ ध्वनि प्रवाह विनिसृत हो रहा है। आरम्भ में कुछ समय यह अनुभूति उतनी स्पष्ट नहीं होती किन्तु क्रम और प्रयास जारी रखने पर कुछ ही समय उपरान्त इस प्रकार का ध्वनि प्रवाह अनुभव में आने लगता है। और उसे सुनने में न केवल चित्त ही एकाग्र होता है वरन् आनन्द का अनुभव होता है।
सो का तात्पर्य परमात्मा और हम का जी चेतना-समझा जाना चाहिए। निखिल विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त महाप्राण नासिका द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करता है और अंग प्रत्यंग में जीवकोष तथा नाडी तन्तु में प्रवेश करके उसको अपने संपर्क संसर्ग का लाभ प्रदान कराता है। यह अनुभूति सो शब्द की ध्वनि के साथ अनुभूति भूमिका में उतरनी चाहिए। और ‘हम’ शब्द के साथ जीव भाव द्वारा इस कार्य कलेवर पर से अपना कब्जा छोड़ कर चले जाने की मान्यता प्रगाढ़ की जानी चाहिए।
प्रकारान्तर से परमात्म सत्ता का अपने शरीर और मनः क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित हो जाने की ही यह धारण है, जीव भाव अर्थात् स्वार्थवादी संकीर्णता, काम क्रोध, लोभ, मोह भरी मद मत्सरता- अपने को शरीर या मन के रूप में अनुभव करते रहने वाली आत्मा भी दिग्भ्रान्त स्थिति का नाम ही जीव भूमिका है। इस भ्रम जंजाल भरे जीव भाव को हटा दिया जाय तो फिर अपना विशुद्ध अस्तित्व ईश्वर के अविनाशी अंश आत्मा के रूप में ही शेष रह जाता है। कार्य कलेवर के कण-कण पर परमात्मा के शासन की स्थापना और जीव धारणा की बेदखली यही है सोऽहम् साधना का तत्त्वज्ञान श्वास प्रश्वास क्रिया के माध्यम से- सो और हम ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जागृत किया जाता है कि अपना स्वरूप ही बदल रहा ह अब शरीर और मन पर से लोभ-मोह का वासना-तृष्णा का आधिपत्य समाप्त ही रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी राज्यक्रान्ति जैसी यह भाव भूमिका है जिसमें अनाधिकारी अनाचारी शासनसत्ता का तख्ता उलट कर उस स्थान पर सत्य न्याय और प्रेम संविधान वाली धर्म सत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है। सोऽहम् साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अन्तःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियन्त्रण नहीं रहा उसका समग्र संचालन देव सत्ता द्वारा किया जा रहा है।
श्वास ध्वनि ग्रहण करते समय ‘सो’ और निकालते समय ‘हम’ की धारण में लगने चाहिए। प्रयत्न करना चाहिए कि इन शब्दों के आरम्भ में अति मन्द स्तर की होने वाली अनुभूति में क्रमशः प्रखरता आती चली जाय। चिन्तन का स्वरूप यह होना चाहिए कि साँस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहें है। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है, वरन् प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है। एक एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र की कल्पना करनी चाहिए और अनुभव करना चाहिए उसमें भगवान की सत्ता चिरस्थायी रूप से समाविष्ट हो गई। हृदय फुफ्फुस, आमाशय, आँखों ,गुर्दे जिगर, तिल्ली आदि में भगवान का प्रवेश हो गया। रक्त के साथ प्रत्येक नस नाडी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना-शासन स्थापित कर लिया।
बाह्य अंगों ने पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच ज्ञानेन्द्रियों ने भगवान के अनुशासन में रहना और उनका निर्देश पालन करना स्वीकार कर लिया। जीभ वही बोलेगी जो ईश्वरीय, प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक हो। देखना, सुनना, बोलना, चलना आदि इन्द्रियजन्य गतिविधियाँ दिव्य निर्देशों का ही अनुगमन करेगी। जननेन्द्रिय का उपयोग वासना के लिए नहीं मात्र ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए अनिवार्य आवश्यकता का धर्म संकट सामने आ खड़ा होने पर ही किया जाएगा हाथ-पाँव मानवोचित कर्तव्य पालन के अतिरिक्त ऐसा कुछ न करेंगे जो ईश्वरीय सत्ता को कलंकित करता हो। मस्तिष्क ऐसा कुछ न सोचेगा जिसे उच्च आदर्शों के प्रतिकूल ठहराया जा सके। बुद्धि कोई अनुचित न्याय विरुद्ध एवं अदूरदर्शी अविवेक भरा निर्णय न करेगी। चित्त में अवांछनीय एवं निकृष्ट स्तरीय आकांक्षाएँ न जमने पायेगी। अहंता का स्तर नर कीटक जैसा नहीं नर नारायण जैसा होगा।
यही है वे भावनाएँ जो शरीर और मन पर भगवान के शासन स्थापित होने के तथ्य को यथार्थ सिद्ध कर सकती है। यह सब उथली कल्पनाओं की तरह मनोविनोद भर नहीं रह जाना चाहिए वरन् उसकी आस्था इतनी प्रगाढ़ होनी चाहिए कि इस भाव परिवर्तन को क्रिया रूप में परिणत हुए बिना चैन ही न पड़े सार्थकता उन्हीं विचारों की है जो क्रिया रूप में परिणत होने की प्रखरता से भरे हों, सोऽहम् साधना के पूर्वार्ध में अपने कार्य कलेवर पर श्वासन क्रिया के साथ प्रविष्ट हुए महाप्राण की- परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन चिन्तन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के-प्रत्यक्ष तथ्य के-रूप में प्रस्तुत दृष्टिगोचर होने लगें।
इस साधना का उत्तरार्ध पाप निष्कासन का है। शरीर में से अवांछनीय इन्द्रिय लिप्साओं का- आलस्य प्रमाद जैसी दुष्प्रवृत्तियों का-मन से लोभ, मोह जैसी तृष्णाओं का-अन्तस्तल से जीव भावी अहन्ता का-निवारण निराकरण हो रहा है। ऐसी भावनाएँ अत्यन्त प्रगाढ़ होनी चाहिए। दुर्भावनाएँ और दुष्कृतियां- निष्कृष्टतायें और दुष्टताएँ-क्षुद्रताएँ और हीनताएँ सभी निरस्त हो रही है-सभी पलायन कर रही है यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दीखना चाहिए। उपयुक्तताओं के निरस्त होने के उपरान्त जो हलकापन-जो सन्तोष-जो उल्लास स्वभावतः होता है और निरन्तर बना रहता है उसी का प्रत्यक्ष अनुभव होना ही चाहिए। तभी यह कहा जा सकेगा कि सोऽहम् साधना का उत्तरार्ध भी एक तथ्य बन गया।
सोऽहम् साधना के पूर्व भाग में श्वास लेते समय सो ध्वनि के साथ जीवन सत्ता पर उस परब्रह्म परमात्मा का शासन-आधिपत्य स्थापित होने की स्वीकृति है। उत्तरार्ध में हम को-अहंता को-विसर्जित करने का भाव है। साँस निकली साथ-साथ अहम् भाव का भी निष्कासन हुआ। अहंता ही लोभ और मोह की जननी है। शरीराध्यास में जीव उसी की प्रबलता के कारण डूबता है। माया, अज्ञान, अन्धकार, बन्धन आदि की भ्रान्तियाँ एवं विपत्तियाँ इस अहंता के कारण ही उत्पन्न होती है। इसे विसर्जित कर देने पर ही भगवान का अन्तः क्षेत्र में प्रवेश करना-निवास करना सम्भव होता है।
इस छोटे से मानवी अन्तःकरण में दो के निवास की गुँजाइश नहीं है। पूरी तरह एक ही रह सकता है। दोनों रहे तो लड़ते-झगड़ते रहते हैं। और अन्तर्द्वन्द्व की खींचतान चलती रहती हैं भगवान को बहिष्कृत करके पूरी तरह ‘अहमन्यता’ को प्रबल बना लिया जाय तो मनुष्य दुष्ट-दुर्बुद्धि क्रूर-कर्मों से असुर बनता है अपनी कामनाएँ-भौतिक महत्त्वाकाँक्षाएँ ऐषणाएं समाप्त करके ईश्वरीय निर्देशों पर चलने का संकल्प ही आत्म समर्पण है। यही शरणागति है। यही ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त होते ही मनुष्य में देवत्व का उदय होता है तब ईश्वरीय अनुभूतियाँ चिन्तन में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता भर देती हैं ऐसे ही व्यक्ति महामानव ऋषि, देवता एवं अवतार के नाम से पुकारे जाते हैं। ‘सो’ में भगवान का शासन आत्म-सत्ता पर स्थापित करने और ‘हम’ में अहंता का विसर्जन करने का भाव है। प्रकारान्तर से इसे महान् परिवर्तन का आन्तरिक कायाकल्प की बीजारोपण कह सकते हैं सोऽहम् साधना का यही है भावनात्मक एवं व्यावहारिक स्वरूप
ईश्वर जीव को ऊँचा उठाना चाहता है जीव ईश्वर को नीचे गिराना चाहता है अस्तु दोनों के बीच रस्साकशी चलती और खींचतान होती रहती है। न ईश्वर श्रेष्ठ जीवन क्रम देखे बिना सन्तुष्ट होता है और न अपनी न्याय-निष्ठा क्रम-व्यवस्था तथाकथित पूजा पाठ के कारण छोड़ने को तैयार होता है। वह अपनी जगह अडिग रहता है और भक्त को तरह-तरह के उलाहने देने, शिकायतें करने, लाँछन लगाने की स्थिति बनी ही रहती है। भक्त ईश्वर को अपने इशारे पर नचाना भर चाहता है उससे उचित अनुचित मनोकामनाएँ पूरी कराने की पात्रता-कुपात्रता परखने की आदत छोड़ देने का अग्रह करता रहता है। दोनों अपनी जगह पर अडिग रहें-दोनों की दिशाएँ एक दूसरे की इच्छा से प्रतिकूल बनी रहे तो फिर एकता कैसे हो सामीप्य सान्निध्य कैसे सधे? ईश्वर प्राप्ति की आशा कैसे पूर्ण हो?
इस कठिनाई का समाधान 'सोऽहम्' साधना के साथ जुड़े हुए तत्त्वज्ञान में सन्निहित है। दोनों एक-दूसरे से गुँथ जाय-परस्पर विलीनीकरण हो जाय। भक्त अपने आपको अन्तःकरण आकांक्षा एवं अस्तित्व को पूरी तरह समर्पित कर दे और उसी के दिव्य संकेतों पर अपनी दिशा धाराओं का निर्धारण करे। इस स्थिति की प्रतिक्रिया द्वैत की समाप्ति और अद्वैत की प्राप्ति के रूप में होती है। जीव ने ब्रह्म को समर्पण किया है ब्रह्मा की सत्ता स्वभावतः जीवधारी में अवतरित हुई दृष्टिगोचर होने लगेगी। समर्पण एक पक्ष से आरम्भ तो होता है, पर उसकी परिणति उभयपक्षीय एकता में होती है। यह प्रेम योग का रहस्य है। यही भक्त के भगवान बनने का तत्त्वज्ञान है। ईंधन जब अग्नि को समर्पण करता है तो वह भी ईंधन न रहकर आग बन जाता है। बूँद जब समुद्र में विलीन होती है तो उसकी तुच्छता असीम विशालता में परिणत हो जाता है। नमक और पानी-दूध और चीनी जब मिलते हैं तो दोनों की पृथकता समाप्त होकर सघन एकता बनकर उभरती है। यही है वेदान्त अनुमोदित जीवन लक्ष्य की पूर्ति-परम पद की प्राप्ति। इसी स्थिति को ‘अद्वैत’ कहते हैं। शिवोऽहम्-सच्चिदानंदोऽहम्-तत्त्वमसि-अयमात्मा ब्रह्म-की अनुभूति इसी सर्वोत्कृष्ट अंतःस्थिति पर पहुँचे हुए साधक को होती है। इसी को ईश्वर प्राप्ति, आत्म साक्षात्कार एवं ब्रह्म निर्वाण आदि नामों से पूर्णता के रूप में कहा गया है।
नैवायं चक्षुषाग्राह्य नापदैरिन्द्रियैय रपि। मनसैव प्रदीहोन महानात्मावसीयते॥
तित्नेषुवायथा तैलं दध्निवा सर्पिरर्पितम। यथायः स्रोतसि व्याप्तो यथारण्याँ हुताशतः॥
एवमेंव महात्मान मात्मन्यात्म विलक्षणम्। सत्येन तपसाँ चैव नित्ययुक्तोऽनुपश्यति-शिव पु0 वायु राँ0अ04
न तो वह भगवान आँखों से देखा जा सकता है न अन्य इन्द्रियों से ग्रहण किया जा सकता है, प्रकाशित मन से ही वह महानता प्राप्त की जा सकती है, जैसे तिलों में तेल व दही में घृत छुपा रहता है, जैसे पानी श्रोत में तथा जैसे अरणि में अग्नि छुपी रहती है, वैसे ही विलक्षण परमात्मा आत्मा में छिपा रहता है, उसको योगी सत्य और तप, से नित्य अपनी आत्मा में देखा करता है।
कुण्डलिनी जागरण के लिए प्रयुक्त होने वाली सोऽहम् साधना-अजपा गायत्री के विज्ञान एवं विधान के समन्वय को हंसयोग कहते हैं। हंसयोग साधना का महत्त्व और प्रतिफल बताते हुए योगविद्या के आचार्यों ने कहा है-
सर्वेषु देवेषु व्याप्त वर्तते यथा ह्यग्निः कष्ठेषु तिलेषु तैलमिव। त दिवित्वा न मृत्युमेति-हंसोपनिषद्
जिस प्रकार काष्ठ में अग्नि और तिलों में तेल रहता है। उसी प्रकार समस्त देहों में ‘हंस’ ब्रह्म रहता है। जो उसे जान लेता है सो मृत्यु से छूट जाता है।
सोऽहम् ध्वनि को निरन्तर करते रहने से उसका एक शब्द चक्र बन जाता है जो उलट कर हंस सदृश प्रतिध्वनित होता है। इसी आधार पर उस साधना का एक नाम हंसयोग भी रखा गया हैं।
हंसो हंसोहमित्येवं पुनरावर्तन क्रमात्। सोहं सोहं भवेन्नूनमिति योग विदो विदुः-योग रसायनम्
हंसो, हंसोहं-इस पुनरावर्तित क्रम से जप करते रहने पर शीघ्र ही सोह-सोह ऐसा जप होने लगता है। योग वेत्ता इसे जानते हैं।
अभ्यासानंतरं कुर्याद्गच्छंस्तिष्ठन्स्वपन्नति। चितनं हंसमंत्रस्य योगसिद्धिकरं परम्-योग रसायनम् 303
अभ्यास के अनन्तर चलते, बैठते और सोते समय भी हंस मन्त्र का चिन्तन, (साँस लेते समय ‘सो’ छोड़ते समय ‘ह’ का चिन्तन) परम सिद्धिदायक है। इसे ही ‘हंस’, ‘हंसो’ या ‘सोह’ मंत्र कहते हैं।
हंससयाकृतिविस्तारं भुक्तिमुक्तिफलप्रदमः। सर्वेषु देहेषु व्याप्त वर्तते यथा ह्यग्निः काष्ठेषु तिलेषु तैलमिव। तं दिवित्वा न मृत्युमेति।
अग्नीषीमौ पक्षावोंकारः शिर उकारों बिन्दुस्त्रिनेत्रं मुखं रुद्रो रुद्राणि चरणौ द्विविधं कण्ठतः कुर्यादित्युन्माः अजपोपसंहार इत्याभिधीयते।
तस्मान्मनों विलीने मनसि गते संकल्पविकल्पे दग्धे पुण्यपापे सदाशिवः शक्त्यात्मा सर्वत्रावस्थितः स्वयं ज्योति शुद्धो बुद्धों नित्यों निरंजनः शान्ततमः प्रकाशयतीत वेदानुवचनं भवतीत्युपनिषत्-हंसोपनिषद्
‘हंस’ तत्त्व का आकार विस्तार भुक्ति और मुक्ति दोनों ही देने वाला हैं यह तत्त्व सम्पूर्ण देहधारियों में उसी तर व्याप्त हैं जैसे काष्ठ में अग्नि एवं तिलों में तेल समाया रहता है।
अग्नि और सोम इस हंस के पंख है। ओंकार मस्तक, बिन्दु नेत्र, रुद्र मुख, रुद्राणी चरण, काल भुजाएँ, अग्नि बगलें, तथा सगुण-निर्गुण ब्रह्म उसके दोनों पार्श्व है।
जब मन उस हंस तत्त्व में लीन हो जाता है तो मन के संकल्प-विकल्प समाप्त हो जाते हैं और शक्ति रूप, ज्योति रूप, शुद्ध-बुद्ध नित्य निरंजन ब्रह्म का प्रकाश, प्रकाशवान होता है।
प्राणिनाँ देहमध्ये तु स्थितो हंसः सदाऽच्युतः। हंस एव परं सत्यं हंस एवंत सत्यकम्॥
हंस एव परं वाक्यं हंस एवंत वैदिकम्। हस एवं परो रुद्रो हंस एवं परात्परम्॥
सर्वदेवस्य मध्यस्थो हंस एवं महेश्वरः। हंसज्योतिरनूपम्यं देवमध्ये व्यवस्थितम्-ब्रह्मा विद्योपनिषद्
प्राणियों की देह में भगवान ‘हंस’ रूप अवस्थित हैं हंस ही परम सत्य हैं हंस ही परम बल है।
समस्त देवताओं के बीच ‘हंस’ ही परमेश्वर हैं हंस ही परम वाक्य है, हंस ही वेदों का सार है, हंस परम रुद्र है, हंस ही परात्पर है।
समस्त देवों के बीच हंस अनुपम ज्योति बनकर विद्यमान् है।
सदा तन्मयतापूर्वक हंस मन्त्र का जप निर्मल प्रकाश का ध्यान करते हुए करना चाहिए।
नभस्स्थ निष्कलं ध्यात्वा मुच्यते भवबन्धनात्। अनाहतध्वनियुत हंसं यो वेद हृद्गतम॥
स्व प्रकाशचिदानन्द स हसं इति गीयते। नाभिकन्दे समं कृत्वा प्राणापानौ समाहितः मस्तकस्थामृतास्वादं पीत्वा ध्यानेन सादरम्॥
हंसविद्यामृते लोके नास्ति नित्यत्वसाधनम्। यो ददाति माहविद्या हंसाख्याँ पावनीं पराम्॥
हंसहंसेति यो ब्रू याद्धं सो ब्रह्मा हरिः शिव। गुरु वक्रात्तु लभ्येत प्रत्यक्षं सर्वतोमुखम्-ब्रह्म विद्योपनिषद्-
जो हृदय में अवस्थित अनाहत ध्वनि सहित प्रकाशवान चिदानन्द ‘हंस’ तत्त्व को जानता है सो ‘हंस’ ही कहा जाता है।
जो अमृत से आय सिंचन करते हुए ‘हंस’ तत्त्व का जप करता है उसे सिद्धियों और विभूतियों की प्राप्ति होती है।
इस संसार में ‘हंस’ विद्या के समान और कोई साधन नहीं। इस महाव़ा को देने वाला ज्ञानी सब प्रकार सेवा करने योग्य है।
जो ‘हंस’ तत्त्व की साधना करता है वह त्रिदेव रूप है। वह सर्वव्यापी भगवान को जान ही लेता है।
मनसो हंसः सोऽहं हंस इति तन्मयं यज्ञो नादानुसंधानम्-पाश्पत ब्रह्मोपनिषद्-
मानस ब्रह्म का रूप-हंस है। यही सोऽहम् है। यह हंस बाहर भ्रमण करता है भीतर भी। यह परमात्म स्वरूप है। इसका तन्मयता यज्ञ-नादानुसन्धान है।
हंसात्ममालिका वर्णब्रह्माकालप्रचोदिता। परमात्मा पुमानिति ब्रह्मसंपत्तिकारिणी-पाशुपत ब्रह्मोपनिषद्
हंस यह वर्ण ब्रह्म है। इसी से ब्रह्म की प्राप्ति होती है। पुरुष और परमात्मा यही है।
हंसविद्यामविज्ञाय मुक्तो यत्र करोति यः । स नभोभक्षणेनैव क्षुन्नितृर्ति करिष्यति-सूत संहिता
हंसयोग को जान कर जो प्रयत्न करता है वह सब प्रकार की क्षुधाओं से निवृत्त हो जाता है।
पाशान् छित्वा यथा हंसो निविशकं खमुत्पतेत्। छिन्नपाश्स्तथा जीवः संसार तरते सदा-क्षूरिकोपनिषद्
जिस प्रकार हंस स्वच्छन्द होकर आकाश में उड़ता है उसी प्रकार इस हंसयोग का साधक सर्व बन्धनों से विमुक्त होता है।
‘ह’ और ‘स’ अक्षरों की पृथक्-पृथक् विवेचना भी शास्त्रकारों ने अनेक प्रकार से की है। इन अक्षरों से कई प्रकार के अर्थ निकलते हैं और दोनों के योग से ‘साधक’ को एक उपयुक्त दिशा धारा मिलती है।
हकारो निर्गमे प्रोक्तः सकारेण प्रवेशनम्। हकारः शिवरुपेण सकारः शक्तिरुच्यते-शिव स्वरोदयं
श्वास के निकलने में ‘हकार’ और प्रविष्ट होने में सकार होता है। हकार शिव रूप और सकार शक्ति रूप कहलाता है।
हकारेण तु सूर्यः स्यात् सकारेणेन्दुरुच्यते। सूर्य चन्द्रमसोरै क्यं हठ इव्भिधीयते॥
हठेन ग्रस्यते जाडद्य सर्वदोष समुद्भवम्। क्षेत्रज्ञः परमात्मा च तपोरैक्य तदाभवेत्-योग शिखोपनिषद्
हकार से सूर्य या दक्षिण स्वर होता है और प्रकार से चन्द्र या बाम स्वर होता है। इस सूर्य चन्द्र दोनों स्वरों में समता स्थापित हो जाने का नाम हठयोग है। हम द्वारा सब दोषों की कारणभूत जड़ता का नाश हो जाता है और तब साधक क्षेत्रज्ञ (परमात्मा) से एकता प्राप्त कर लेता है।
जीवात्मा सहज स्वभाव सोऽहम् का जप श्वास-प्रश्वास क्रिया के साथ साथ अनायास ही करता रहता है। यह संख्या औसतन चौबीस घण्टे में इक्कीस हजार छः सौ के लगभग हो जाती है।
हकारेण बहिर्यात सकारेण विशेत्पुनः। हंस हंसेत्यसु मन्त्र जीवो जपति सर्वदा॥
शट् शतानि त्वहोरात्रे सहस्राष्येकविंशतिः। एतत्संख्यान्वित मन्त्र जीवो जपति सर्वदा-गोरक्षसंहिता 1,41,42
यह जीव (प्राणवायु) हकार की ध्वनि से बाहर आता और सकार की ध्वनि से भीतर जाता है। इस प्रकार व सदा हंस हंस मन्त्र का जप करता रहता है।
इस भाँति वह एक दिन रात में जीव इक्कीस हजार छः सौ मन्त्र सदा जपता रहता है। संस्कृत व्याकरण के आधार पर सोऽहम् का संक्षिप्त रूप ‘ऊँ’ हो जाता है।
सकारं चहकारं च लोपयित्व प्रयोजनत। संधि च पूर्व रुपाख्याँ ततोऽसौ प्रणवो भवेत्॥
सोऽहम् पद में से सकार और हकार का लोप करके सन्धि की योजना करने से वह प्रणव (ऊँ कार) रूप होता है।
खेचरी मुद्रा की साधना के लिए हठयोगी जीभ को लम्बी करके ‘काकं चंचु’ तक पहुँचाने के लिए जिव्हा पर कालीमिर्च, शहद, धृत का लेपन करके उसे थन की तरह दुहते, खीचते हैं और लम्बी करने का प्रयत्न करते हैं। जीभ के नीचे वाली पतली त्वचा को काट कर भी अधिक पीछे तक मुड़ सकने योग्य उसे बनाया जाता है। यह दोनों ही क्रियाएँ सर्व साधारण के उपयुक्त नहीं है। इनमें तनिक भी भूल होने से जिव्हा तन्त्र ही नष्ट हो सकता है अथवा दूसरी विपत्तियाँ आ सकती है। अस्तु यदि सर्व जमीन एवं जोखिम रहित उपासनाएँ अभीष्ट हों तो शारीरिक अवयवों पर अनावश्यक दबाव न डालकर सारी प्रक्रिया को ध्यान परक-भावना मूलक ही रखना होगा।
खेचरी मुद्रा का भावपक्ष ही वस्तुतः उस प्रक्रिया का प्राण है। मस्तिष्क मध्य को-ब्रह्मरंध्र अवस्थित सहस्रार को-अमृत-कलश माना गया है और वहाँ से सोमरस स्रवित होते रहने का उल्लेख है। जिव्हा को जितना सरलतापूर्वक पीछे तालु से सटाकर जितना पीछे ले जा सकना सम्भव हो उतना पीछे ले जाना चाहिए। ‘काक चंचु’ से बिलकुल न सट सके कुछ फासले पर रह जावे तो भी हर्ज नहीं है। तालु और जिव्हा को इस प्रकार सटाने के उपरान्त ध्यान किया जाना चाहिए कि तालु छिद्र से सोम अमृत का-सूक्ष्म स्राव टपकता है और जिव्हा इन्द्रिय के गहन अन्तराल में रहने वाली रस तन्मात्रा द्वारा उसका पान किया जा रहा है। इसी सम्वेदना को अमृत पान पर सोमरस पास की अनुभूति कहते हैं। प्रत्यक्षतः कोई मीठी वस्तु खाने आदि जैसा कोई स्वाद तो नहीं आता, पर कई प्रकार के दिव्य रसास्वादन उस अवसर पर हो सकते हैं। यह इन्द्रिय अनुभूतियाँ मिलती हों तो हर्ज नहीं, पर वे आवश्यक या अनिवार्य नहीं है। मुख्य तो वह भावपक्ष है जो इस आस्वादन के बहाने गहन रस सम्वेदना से सिक्त रहता है। यही आनन्द और उल्लास की अनुभूति खेचरी मुद्रा की मूल उपलब्धि है।
देवी भागवत् पुराण में महाशक्ति की वन्दना करते हुए उसे कुण्डलिनी और खेचरी मुद्रा से सम्बन्धित बताया गया है-
तालुस्था त्वं सदाधारा विंदुस्था विंदुमालिनी। मूले कुण्डलीशक्तिर्व्यापिनी केशमूलगा॥
-देवी भागवत्
अमृतधारा सोम स्राविनी खेचरी रूप तालु में, भ्रू मध्य भाग आज्ञाचक्र में बिन्दु माला और मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी बनकर आप ही निवास करती है और प्रत्येक रोम कूप में विद्यमान् है।
शिव संहिता में प्रसुप्त कुंडलिनी का जागरण करने के लिए खेचरी मुद्रा का अभ्यास आवश्यक बताते हुए कहा गया है-
तस्मार्त्सवप्रयत्नेन प्रबोधपितुमीश्वरीम्। ब्रह्मरन्ध्रमुखे सुप्ताँ मुद्राभ्यासं समाचरेत्-शिव संहिता
इसलिए साधक को ब्रह्मरन्ध्र के मुख में रास्ता रोके सोती पड़ी कुण्डलिनी को जागृत करने के लिए सर्व प्रकार से प्रयत्न करना चाहिए और खेचरी मुद्रा का अभ्यास करना चाहिए।
कभी कभी खेचरी मुद्रा के अभ्यास काल में कई प्रकार के रसों के आस्वादन जैसी झलक भी मिलती है। कई बार रोमांच जैसा होने लगता है, पर यह सब आवश्यक या अनिवार्य नहीं। मूल उद्देश्य तो भावानुभूति ही है।
अमृतास्वादनं पश्चाज्जिव्हाग्रं संप्रवर्तते। रोमाँचश्च तथानन्दः प्रकर्षेणोपजायते-योग रसायनम् 255
जिव्हा में अमृत-सा सुस्वाद अनुभव होता है और रोमांच तथा आनन्द उत्पन्न होता है।
प्रथमं लवण पश्चात् क्षारं क्षीरोपमं ततः। द्राक्षारससमं पश्चात् सुधासारमयं ततः-योग रसायनम्
खेचरी मुद्रा के समय उस रस का स्वाद पहले लवण जैसा, फिर क्षार जैसा, फिर दूध जैसा, फिर द्राक्षारस जैसा और तदुपरान्त अनुपम सुधा, रस-सा अनुभव होता है।
आदौ लवण क्षारं च ततस्तिक्त कषायकम्। नवनीतं धृत क्षीर दधित क्रम धूनि च। द्राक्षा रसं च पीयूषं जप्यते रसनोदकम-पेरण्ड संहिता
खेचरी मुद्रा में जिव्हा को क्रमशः नमक, क्षार, तिक्त, कषाय, नवनीत, धृत, दूध, दही, द्राक्षारस, पीयूष, जल जैसे रसों की अनुभूति होती है।
अमृतास्वादनाछेहो योगिनो दिव्यतामियात्। जरारोगविनिर्मुक्तश्चिर जीवति भूतले-योग रसायनम्
भावनात्मक अमृतोपम स्वाद मिलने पर योगी के शरीर में दिव्यता आ जाती है और वह रोग तथा जीर्णता से मुक्त होकर दीर्घकाल तक जीवित रहता है।
एक योग सूत्र में खेचरी मुद्रा से अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति का उल्लेख है-
तालु मूलोर्ध्वभागे महज्ज्योति विद्यतें तर्द्दशनाद् अणिमादि सिद्धिः।
तालु के ऊर्ध्व भाग में महा ज्योति स्थित है, उसके दर्शन से अणिमादि सिद्धियाँ प्राप्त होती है।
ब्रह्मरन्ध्र साधना की खेचरी मुद्रा प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में शिव संहिता में इस प्रकार उल्लेख मिलता है-
ब्रह्मरंध्रे मनोदत्वा क्षणार्ध मदि तिष्ठति । सर्व पाप विनिर्युक्त स याति परमाँ गतिम्॥
अस्मिल्लीन मनोयस्य स योगी मयि लीयते। अणिमादि गुणान् भुक्तवा स्वेच्छया पुरुषोत्तमः॥
एतद् रन्ध्रज्ञान मात्रेण मर्त्यः स्सारेऽस्मिन् बल्लभो के भवेत् सः। पपान् जित्वा मुक्तिमार्गाधिकारी ज्ञानं दत्वा तारयेदद्भुतं वै॥
अर्थात्-ब्रह्मरन्ध्र में मन लगाकर खेचरी मुद्रा की साधना करने वाला योगी आत्मनिष्ठ हो जाता है। पाप मुक्त होकर परम गति को प्राप्त करता है। इस साधना में मनोलय होने पर साधक ब्रह्मलीन हो जाता है और अणिमा आदि सिद्धियों का अधिकारी बनता है।
धेरण्ड संहिता में खेचरी मुद्रा का प्रतिफल इस प्रकार बताया गया है-
न च मूर्च्छा क्षुधा तृष्णा नैव लस्यं प्रजायते। न च रोगो जरा मृत्युर्देव देहः स जायते॥
खेचरी मुद्रा की निष्णात देव देह को मूर्च्छा, क्षुधा, तृष्णा, आलस्य, रोग, जरा, मृत्यु का भय नहीं रहता।
लवण्यं च भवेद्गात्रे समाधि जयिते ध्रुवम। कपाल वक्त्र संयोगे रसना रस माप्नुयात-धेरण्ड
शरीर सौंदर्यवान बनता है। समाधि का आनन्द मिलता है। रसों की अनुभूति होती है। खेचरी मुद्रा का प्रकार श्रेयस्कर है।
ज्रामृत्युगदध्नो यः खेचरी वेत्ति भूतले। ग्रन्थतश्चार्थतश्चैव तदभ्यास प्रयोगतः॥ तं मुने सर्वभावेन गुरु गत्वा समाश्रयेत्-योगकुन्डल्युपनिषद
जो महापुरुष ग्रन्थ से, अर्थ से और अभ्यास प्रयोग से इस जरा मृत्यु व्याधि-निवारक खेचरी विद्या को जानने वाला है, उसी गुरु के पास सर्वभाव से आश्रय ग्रहण कर इस विद्या का अभ्यास करना चाहिए।
खेचरी मुद्रा से अनेकों शारीरिक, मानसिक, साँसारिक एवं आध्यात्मिक लाभों के उपलब्ध होने का शास्त्रों में वर्णन है। इससे सामान्य दीखने वाली इस महान् साधना का महत्त्व समझा जा सकता है। स्मरणीय इतना ही है कि इस मुद्रा के साथ साथ भाव सम्वेदनाओं की अनुभूति अधिकतम गहरी एवं श्रद्धा सिक्त होनी चाहिए।
जिव्हा का उलट कर तालु से लगाना और अनुभव करना कि इसके ऊपर सहस्रार अमृत कलश से रिस-रिस कर टपकने वाले सोमरस का जिव्हग्र भाग से पान किया जा रहा है-यही खेचरी मुद्रा है। तालु में मधुमक्खियों के छत्ते जैसे कोष्ठक होते हैं। सहस्रार को , सहस्र दल कमल की उपमा दी गई है। तालु सहस्र धारा है। उसके कोष्ठक शरीर शास्त्र की दृष्टि से उच्चारण एवं भोजन चबाने निगलने आदि के कार्यों में सहायता करते हैं। योगशास्त्र की दृष्टि से उनसे दिव्य स्राव निसृत होते हैं। ब्रह्म चेतना मानवी सम्पर्क में आते समय सर्वप्रथम ब्रह्मलोक में-ब्रह्मरंध्र में अवतरित होती है। इसके बाद वहाँ मनुष्य की स्थिति, आवश्यकता एवं आकांक्षा के अनुरूप काया के विभिन्न अवयवों में चली जाती है। शेष अंश अन्तरिक्ष में विलीन हो जाता है।
जिव्हा को तालु से स्पर्श कराने के कई उद्देश्य है। मुख गह्वर में रहने वाली रसेन्द्रिय, रयिशक्ति सम्पन्न-ऋण विद्युत सदृश होती है। उसे मुखर कुण्डलिनी कहते हैं सर्पिणी की तुलना भी उस पर सही रीति से लागू होती है। अनगढ़ कुसंस्कारी प्रसुप्त स्थिति में वह स्वाद के नाम पर कुछ भी-कितना ही-बिना विवेक के खाती है। पेट को दुर्बल और रक्त को विषाक्त करती है। फलतः दुर्बलता और अस्वस्थता की चक्की में पिसते हुए आधा अधूरा कष्ट पूर्ण जीवन जी सकना सम्भव होता है। शेष तो अकाल मृत्यु की तरह-आत्म हत्या की तरह ही नष्ट होता है। यह सर्पिणी के काटने सदृश ही दुखदायी है। इसी प्रकार जिव्हा द्वारा कटु वचन, हेय परामर्श, छल प्रपंच आदि द्वारा अपने को गर्हित अधःपतित और दूसरों को कुमार्ग अपनाने के लिए उत्तेजित किया जाता है। यह भी सर्पिणी का ही काम है। द्रौपदी की जीभ ने महाभारत की पृष्ठभूमि बनाई थी, यह सर्वविदित है। यह अनगढ़ प्रसुप्त-स्थिति हुई। यदि यह जिव्हा कुण्डलिनी जागृत हो सके-सुसंस्कृत बन सके तो आहार संयम के लिए जागरूक रहती है। बोलते समय प्रिय और हित का अमृत घोलती है। फलतः सम्भाषणकर्ता को श्रेय एवं सम्मान की अजस्र उपलब्धियाँ होती है। सुसंस्कृत जिव्हा के अनुदानों में कितनों को न जाने किन-किन वरदानों से लाद दिया है। प्रामाणिक और सुसंस्कृत वक्रता के आधार पर ही तो लोग अनेक क्षेत्रों में नेतृत्व करते और उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचे दिखाई पड़ते हैं। ऐसी ही अभ्य विशेषताओं के कारण जिव्हा को मुखर कुण्डलिनी कहा गया है और मुख को ऊर्ध्व मूलाधार बताया गया है। निम्न मूलाधार में कामबीज का और ऊर्ध्व मूलाधार मुख में-ज्ञान बीज का निर्झर झरता है। जननेन्द्रियों की और मुख की आकृति को समतुल्य बताना-कहने सुनने में तो भौंड़ा लगता है, पर योगशास्त्र की दृष्टि से दोनों की वस्तुस्थिति में बहुत कुछ समाता है। इन्द्रियों में कामुकता और स्वादेन्द्रिय यह दो ही प्रधान मानी गई है। संयम साधना में जिव्हा का संयम होने पर कामेन्द्रिय का संयम सहज ही सध जाने की बात नितान्त तथ्यपूर्ण है। इसमें दोनों के बीच की घनिष्ठता प्रत्यक्ष है। काम क्रीडा में भी यह दोनों ही गह्वर अपने अपने ढंग से उत्तेजित रहते और अपना अपना पक्ष पूरा करते हैं।
जिव्हा में ऋण विद्युत की प्रधानता है। मस्तिष्क धन विद्युत का केन्द्र है। तालु मस्तिष्क की ही निचली परत है। जिव्हा को भावना पूर्ण तालु से लगाने पर आत्मरति जैसा उद्देश्य पूरा होता है। जिव्हा और तालु की हलकी भावना पूर्ण रगड़ से एक विशेष प्रकार के आध्यात्मिक स्पन्दन आरम्भ होते हैं। उनसे उत्पन्न उत्तेजना से ब्रह्मानंद की अनुभूति का लाभ मिलता है। यह सूक्ष्म होने के कारण कायिक विषयानन्द से अत्यन्त उच्चकोटि का कहा गया है। इस अनुभूति को योगीजन अमृत निर्झर का रसास्वादन कहते हैं।
खेचरी मुद्रा की साधना ब्रह्मलोक से-ब्रह्मरंध्र से- सामीप्य साधती है और उस केन्द्र के अनुदानों को उसी प्रकार चूसती है जैसे छोटे बालक का मुख माता का स्तन चूसता है। यह भावना एवं कल्पना सूक्ष्म शरीर में एक विशेष प्रकार की सुखद एवं उत्साहवर्धक गुदगुदी उत्पन्न करती है। उसका रसास्वादन देर तक करते रहने को जी करता है। यह तो हुआ भावनात्मक पथ जिससे अन्तःचेतना के अमृत से सम्पर्क बनता है और अन्तर्मुखी होकर अंतर्जगत में एक से एक बढ़ी चढ़ी दिव्य सम्वेदनाओं की अनुभूति का द्वारा खुलता है। पर बात इतने तक ही सीमित नहीं है। जिव्हा की ‘ऋण’ विद्युत ब्रह्म लोक से-ब्रह्मरंध्र से अन्यान्य अनुदानों की सम्पदा के ‘धन’ भण्डार को अपने चुम्बकत्व से खींचती, घसीटती है और उसकी मात्रा बढ़ाते-बढ़ाते अपने अन्तः भण्डार को दिव्य विभूतियों से भरती चली जाती है। इन्हीं उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए खेचरी मुद्रा के द्वारा उत्पन्न लाभों का सुविस्तृत वर्णन योग ग्रन्थों में लिखा और अनुभवियों द्वारा बताया मिलता है।
तालु और जिव्हा के हलके स्पर्श स्थिर नहीं, वरन् हलकी रगड़ जैसे होते रहते हैं। इसमें घड़ी के पेण्डुलम जैसी गति बनती है। गाय को दुहते समय भी इसी से मिलती जुलती क्रिया पद्धति कार्यान्वित होती है। रति कर्म की प्रक्रिया भी इसी प्रकार की है। रगड़ से ऊर्जा स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को प्रभावित करती है। उन्हें बल देती-उत्पन्न होना सर्वविदित है। यह ऊर्जा स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को प्रभावित करती है। उन्हें बल देती-सक्रिय करती और समर्थ बनाती है। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोशों के अनावरण में इससे सहायता मिलती है। षट्चक्रों को जागृत करने में भी खेचरी मुद्रा से उत्पन्न ऊर्जा की एक बड़ी भूमिका रहती है। इन्हीं सब कारणों को देखते हुए कुण्डलिनी जागरण में खेचरी मुद्रा को महत्त्व दिया गया है। क्रिया साधारण सी होते हुए भी प्रतिक्रिया की दृष्टि से उसका बहुत ऊँचा स्थान ज्ञान के विकास विस्तार में उससे असाधारण सहायता मिलती है।
परमात्मा का आत्मा के साथ निरन्तर पेण्डुलम गति से ही मिलन संपर्क चलता रहता है। इस स्पर्श की अनुभूति (1) आनन्द और (2) उल्लास के रूप में होती रहती है। सामान्य स्थिति में तो इसकी प्रतीति नहीं होती पर खेचरी मुद्रा के माध्यम से उसे अनुभव किया जा सकता है। भगवान की मनुष्य को दो प्रेरणाएँ है जो उपलब्ध हैं, उसकी गरिमा को समझते हुए-संसार के सुखद पक्ष का मूल्यांकन करते हुए-सन्तुष्ट प्रसन्न और आनन्दित रहता यह है आनन्द का स्वरूप उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की दिशा में साहस भरे कदम उठाने से लिए अदम्य उत्साह का-भावभरी उमंगों को उठना यह है उल्लास। भगवान इन्हीं दो प्रेरणाओं को निरन्तर पेण्डुलम गति से प्रदान करते रहते हैं। मानव जीवन जैसी सृष्टि की अनुपम उपलब्धि को पाकर यदि अन्तःकरण आनन्दित रहे और छोटे मोटे अभावों की और अधिक ध्यान न देकर चारों और बिखरी हुई सदाशयता का अनुभव करते हुए सन्तुष्ट सन्तुलित रहे तो समझना चाहिए आनन्द की उपलब्धि हो रही है हर्षातिरेक में उछलने कूदने या बढ़ चढ़कर शेखीखोरी की बातें करने का नाम आनन्द नहीं है। उस स्थिति में दृष्टिकोण परिपक्व हो जाता है और परिष्कृत, इसलिए जिन अभावों और असफलताओं में दूसरे लोग उद्विग्न उत्तेजित हो उठते हैं, उन्हें वह विनोद कौतुक भर समझते हुए अपनी मनःस्थिति को सुसंतुलित बनाये रहता है। जिनकी मनोभूमि ऐसी हो उसे आनन्द की प्राप्ति हो गई ऐसा कहा जा सकता है।
आनन्दित, सन्तुष्ट या प्रसन्न होने में एक दोष यह है कि अपूर्णता से पूर्णता की और चलने के लिए जिस कठोर कर्मठता की जरूरत पड़ती है उसे प्रायः भुला दिया जाता है। ऐसी भूल करने वाले अध्यात्मवादी प्रायः निकम्मे, अकर्मण्य, आलसी, प्रमादी और बुराइयों, बुरी परिस्थितियों से समझौता कर लेने वाले भाग्यवादी पलायनवादी बन बैठते हैं। उससे उनकी अपनी समग्र प्रगति का द्वार तो वन्द हो ही जाता है, साथ ही समाज के लिए प्रखर कर्त्तव्य पालन के लिए जा महान् उत्तरदायित्व मनुष्य के कन्धों पर होते हैं। वे भी अवरुद्ध हो जाने से लोकमंगल के लिए मानवी योगदान में भी भारी क्षति पहुँचती है। मनुष्य का अवतरण जिन महान् कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों का प्रचण्ड प्रयत्नशीलता के साथ निर्वाह करने के लिए हुआ। यदि उनमें शिथिलता आ गई तो समझना चाहिए कि जीवित ही मृतक बन जाने जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई। यदि आनन्द या सन्तोष की प्राप्ति किसी अध्यात्मवादी में इस प्रकार की अकर्मण्यता उत्पन्न कर दे तो समझना चाहिए कि बिलकुल उलटा हो गया और अर्थ का अनर्थ बन गया।
खेचरी मुद्रा की साधना से उपलब्ध होने वाला दूसरा दिव्य अनुदान उल्लास माना गया है। यह उभरता उल्लास इस प्रकार की अवांछनीय मन स्थिति बनने की गुँजाइश नहीं छोड़ता। भगवान निरन्तर आनन्द के साथ-साथ उल्लास भी प्रदान करते हैं और उच्चस्तरीय प्रयत्नों एवं उमंग उत्पन्न करते हैं। उल्लास जब अपनी प्रौढ़ावस्था में होता है तो वह इतना प्रखर होता है कि प्रस्तुत कठिनाइयों, अभावों, अवरोधों की चिन्ता न करते हुए ईश्वरीय सन्देश के अनुरूप अपनी रीति नीति निर्धारण करने के लिए मचल उठता है। किसी के रोके नहीं रुकता। लोभ और मोह के भव बन्धन यों सहज नहीं टूटते और कुसंस्कार तथा स्वार्थ सम्बन्धी शुभचिन्तक ऐसी भावनाओं को क्रियान्वित होने में पग पग पर विरोध उत्पन्न करते हैं, पर जिसे उल्लास प्राप्त है वह आत्मकल्याण और ईश्वरीय निर्देशों के पालन की दिशा में ही अग्रसर होता है। कठिनाइयाँ क्यों आती है और रोकथाम कौन कौन करते हैं इसकी चिन्ता नहीं करता। फलस्वरूप जहाँ चाह वहाँ राह वाली बात बन ही जाती है। जिसे उल्लास की उपलब्धि मिल गई उसे महापुरुषों जैसे महान् कर्त्तव्य पालन करते रहने के अनवरत अवसर निर्बाध गति से मिलते ही रहते हैं।
आनन्द और उल्लास भरी मनःस्थिति उत्पन्न करने में खेचरी मुद्रा को जो योगदान मिलता है उसके फलस्वरूप साधक को हर स्थिति में हँसते हँसाते रहने और हलकी फुलकी जिन्दगी जीने का अभ्यास करना पड़ता ह। कर्मठता की जागरूकता से सामान्य जीवन क्रम में पग पग पर सफलताएँ मिलती और सफलताएँ उत्पन्न होती है। इन लाभों को भी सामान्य नहीं समझना चाहिए। ब्रह्मलोक के अन्य दिव्य अनुदान पाकर तो मानवी सत्ता ऋषिकल्प देवतुल्य बनने के लिए अग्रसर होती है। खेचरी मुद्रा का वह विशिष्ट लाभ भी आनन्द उल्लास की उपलब्धि की तरह है साधक के लिए हर दृष्टि से श्रेयस्कर सिद्ध होता है।
कुण्डलिनी जागरण में मूलाधार से प्रसुप्त कुण्डलिनी को जागृत करके ऊर्ध्वगामी बनाया जाता है। उस महाशक्ति की सामान्य प्रवृत्ति अधोगामी रहती है। रति क्रिया में उसका स्खलन होता रहता है। शरीर यात्रा की मल मूत्र विसर्जन प्रक्रिया भी स्वभावतः अधोगामी है। शुक्र का क्षरण भी इसी दिशा में होता है। इस प्रकार यह सारा संस्थान अधोगामी प्रवृत्तियों में संलग्न रहता है।
कुण्डलिनी शक्ति के जागरण और उत्थान के लिए इस क्षेत्र को ऊर्ध्वगामी बनने का अभ्यास कराया जाता है। ताकि अभीष्ट उद्देश्य की सफलता में सहायता मिल सके। गुदा मार्ग को ऊर्ध्वगामी अभ्यास कराने के लिए हठयोग में ‘वस्ति क्रिया’ है। उसमें गुदा द्वारा से जल को ऊपर खींचा जाता है फिर संचित मल को बाहर निकाला जाता है। इसी क्रिया को ‘वस्ति’ कहते हैं। इसी प्रकार मूत्र मार्ग से जल ऊपर खींचने और फिर विसर्जित करने की क्रिया वज्रोली कहलाती है। वस्ति और वज्रोली दोनों का ही उद्देश्य इन विसर्जन छिद्रों को अधोमुखी अभ्यासों के साथ ही ऊर्ध्वगामी बनने का प्रशिक्षण दिया जाता है। इन अभ्यासों से कुण्डलिनी को ऊर्ध्वगामी बनाने में सहायता मिलती है।
वस्ति और वज्रोली काफी कठिन है। हठयोग की साधनाएँ सर्वसुलभ नहीं है। उन्हें विशेष मार्ग दर्शन से विशेष व्यक्ति ही कर सकते हैं। उन अभ्यासों में समय भी बहुत लगता है और भूल होने पर संकट उत्पन्न होने का खतरा भी रहता है। अस्तु सर्वजनीन सरलीकरण का ध्यान रखते हुए ‘शक्तिचालनी मुद्रा’ को उपयुक्त समझा गया है।
शक्तिचालनी मुद्रा में गुदा और मूत्र संस्थान को संकल्प बल के सहारे संकोचन कराया जाता है। संकोचन का तात्पर्य है उनकी बहिर्मुखी एवं अधोगामी आदत को अंतर्मुखी एवं ऊर्ध्वगामी बनाने के लिए प्रशिक्षित करना। इसके लिए दोनों ही इन्द्रियों का - उसके सुविस्तृत क्षेत्र को संकोचन कराया जाता है। कभी कभी मुँह से हवा खींची जाती है, पानी पिया जाता है। इसमें मुख को खींचने को क्रिया करनी पड़ती है। पिचकारी में पानी भरते समय भी ऐसा ही होता है। मल और मूत्र छिद्रों से ऐसा ही वायु खींचने का, छोड़ने का, खींचने छोड़ने का प्राणायाम जैसा अभ्यास करना संक्षेप में शक्तिचालनी मुद्रा का प्रयोग है।
इस प्रयोग का पूर्वार्ध मूलबन्ध कहलाता है। मूलबन्ध में मात्र संकोचन भर होता है। जितनी देर मल मूत्र छिद्रों को सिकोड़ा जाता रहेगा उतनी देर मूलबन्ध की स्थिति मानी जाएगी यह एक पक्ष है। आधा अभ्यास है। इसमें पूर्णता समग्रता तब आती है जब प्राणायाम की तरह खींचने छोड़ने के दोनों ही अंग पूरे होने लगें। जब संकोचन-विसर्जन संकोचन-विसर्जन का-खींचने ढीला करने, खींचने ढीला करने का-उभय पक्षीय अभ्यास चल पड़े तो समझना चाहिए शक्तिचालनी मुद्रा का अभ्यास हो रहा है।
कमर से नीचे के भाग में अपान वायु रहती है। उसे ऊपर खींचकर कमर से ऊपर रहने वाली प्राणवायु के साथ जोड़ा जाता है। यह पूर्वार्ध हुआ। उत्तरार्ध में ऊपर के प्राण को नीचे के अपान के साथ जोड़ा जाता है। यह प्राण अपान के संयोग की योग शास्त्रों में बहुत महिमा गाई है-यही मूलबन्ध है। यह साधना की महिमा बताते हुए कहा गया है-
आकुँचनेन तं प्राहुमूँलवंधोऽयमुच्यते। अपानश्चोर्ध्वगो भूत्वा वन्हिना सह गच्छति-योग कुण्डल्योपनिषद
मूलबन्ध के अभ्यास से अधोगामी अपान को बलात् ऊर्ध्वगामी बनाया जाय, इससे वह प्रदीप्त होकर अग्नि के साथ साथ ही ऊपर चढ़ता है।
अभ्यासाद् बन्धनस्यास्य मरुत्सिद्धिर्भवेद् ध्रुवम्। साधयेद् यत्नतो तर्हि मौनी तु विजितालसः॥ (धेरण्डसंहिता 3,17)
मूलबन्ध के अभ्यास से मरुत् सिद्धि होती है अर्थात् शरीरस्थं वायु पर नियन्त्रण होता है। अतः आलस्य विहीन होकर मौन रहते हुए इसका अभ्यास करना चाहिए।
प्राणापानौ नादबिन्दु मूलबन्धेन चैकताम्। गत्वा योगस्य संसिद्धि यच्छतो नात्र संशयः-हठयोग प्रदीपिका
प्राण और अपान का समागम नाद बिन्दु की साधना तथा मूलबन्ध का समन्वय, यह कर लेने पर निश्चित रूप से योग की सिद्धि होती है।
अपान प्राणयों रैक्यं क्षयोमूल पुरीष्योः। युवाभवति वृद्धोऽपि सतनं मूलबन्धनात्-हठयोग प्रदीपिका
निरन्तर मूलबन्ध का अभ्यास करने से प्राण और अपान के समन्वय से-अनावश्यक मल नष्ट होते हैं और बद्धता भी यौवन में बदलती है।
विलं प्रविष्टेव ततो ब्रहनाहयंतरं व्रजेन्। तस्मान्नित्यं मूलबंधः कर्तव्यों योगिभिः सदा-हठयोग प्र0
मूलबन्ध से कुण्डलिनी का प्रवेश ब्रह्म नाड़ी-सुषुम्ना-में होता है। इसलिये योगी जन नित्य ही मूलबन्ध का अभ्यास करें।
सिद्वये सर्व भूतानि विश्वाधिष्ठानमद्वयम्। यस्मिन सिर्द्धि गताः निद्धास्तासिद्धासनमुच्यते॥ यन्मूलं सर्वलोकानाँ यन्मूलं चित्तबन्धनम्। मूलबन्ध सदा सेव्यो योग्योउसौ ब्रह्मवादिनाम्-तेजबिन्दु
जो सर्वलोकों का मूल है। जो चित्त निरोध का मूल है, सो इस आत्मा का ही ब्रह्मवादियों को सदा सेवन करना चाहिए। यही मूलबन्ध है। अन्यजुदा संकोचन रूप मूलबन्ध जिज्ञासुओं के लिए सेव्य नहीं है।
विलं प्रविष्टे ततो बह्मनाडयन्तरं ब्रजेत्। तस्मा त्रितयं मूलबंधः कर्तव्यो योगिभिः सदा-हठयोग प्रदीपिका 3,69
फिर जिस प्रकार सर्पिणी बिल में प्रविष्ट होती है, उसी प्रकार यह उद्दीप्त कुण्डलिनी ब्रह्मनाड़ी में प्रविष्ट होती है। इसीलिए योगियों को सदा ही मूलबन्ध का अभ्यास करना चाहिए।
मूलबन्ध एवं शक्तिचालिनी मुद्रा को विशिष्ट प्राणायाम कहा जा सकता है। सामान्य प्राणायाम में नासिका से साँस खींचकर प्राण प्रवाह को नीचे मूलाधार तक ले जाने और फिर ऊपर की ओर उसे वापिस लाकर नासिका द्वारा से निकालते हैं। यही प्राण संचरण की क्रिया जब अधोभाग के माध्यम से की जाती है तो मूलबन्ध कहलाती है। नासिका का तो स्वभाव साँसें लेते और छोड़ते रहना है। अतः उसके साथ प्राण संचार का क्रम सुविधापूर्वक चल पड़ता है। गुदा अथवा उपस्था इन्द्रियों द्वारा वायु खींचने जैसी कोई क्रिया नहीं होती अतः उस क्षेत्र के स्नायु संस्थान पर खिचाव पैदा करके सीधे ही प्राण संचार का अभ्यास करना पड़ता है। प्रारम्भ में थोड़ा अस्वाभाविक लगता है किन्तु क्रमशः अभ्यास में आ जाता है।
मूलबन्ध में सुखासन, (सामान्य पालथी मार कर बैठना) पद्मासन (पैरों पर पैर चढ़ाकर बैठना) सिद्धासन (मल मूत्र छिद्रों के मध्य भाग पर एड़ी का दबाव डालना) इनमें से किसी का भी प्रयोग किया जा सकता है।
मल द्वार को धीरे धीरे सिकोड़ा जाय और ऐसा प्रयत्न किया जाय कि उस मार्ग से वायु खींचने के लिए संकोचन क्रिया की जा रही है। मल का वेग अत्यधिक हो और तत्काल शौच जाने का अवसर न होता उसे रोकने के लिए मल मार्ग को सिकुड़ने और ऊपर खींचने जैसी चेष्टा करनी पड़ती है। ऐसा ही मूलबन्ध में भी किया जाता है। मल द्वार को ही नहीं उस सारे क्षेत्र को सिकोड़ने का ऐसा प्रयत्न किया जाता है कि मानो वायु अथवा जल को उस छिद्र से खींच रहे है। वज्रोली क्रिया में मूत्र मार्ग से पिचकारी की तरह जल ऊपर खींचने और फिर निकाल देने का अभ्यास किया जाता है। मूलबन्ध में जल आदि खींचने की बात तो नहीं है, संकल्प बल से गुदा द्वार ही नहीं मूत्र छिद्र से भी वायु खींचने जैसा प्रयत्न किया जाता है और उस सारे ड़ड़ड़ड़ को ऊपर खींचने का प्रयास चलता है। गुदा मार्ग से वायु खींचकर नाभि से ऊपर तक घसीट ले जाने की चेष्टा आरम्भिक है। कुछ अधिक समय तक रुकना सम्भव होता है, तो अपान को नाभि से ऊपर हृदय तक पहुँचाने प्रयत्न किया जाता है। यह खींचने का ऊपर ले जाने पूर्वार्ध हुआ।
उत्तरार्ध में प्राणवायु को नाभि से नीचे की ओर या जाता है और अपान अपनी जगह आ जाता है। का व्यावहारिक स्वरूप यह है कि खींचने सिकोड़ने की प्रक्रिया को ढीला छोड़ने, नीचे उतारने, खाली करने का ही प्रयत्न किया जाता है। जैसा कि प्राणायाम के लिए साँस छोड़ी जाती है।
मौटे तौर से उसे गुदा मार्ग को, मूत्र मार्ग को ऊपर और सिकोड़ने की-पूरा संकोचन हो जाने पर कुछ रोके रहने की अन्ततः उसे ढीला छोड़ देने की गुदा से होने वाली प्राणायाम क्रिया कहा जा सकता है।
स्मरण रहे कि यह क्रिया वायु संचार की नहीं प्राण ड़ड़ड़ड़ की है । नासिका द्वारा तो वायु संचार क्रम चलता रहता है, अतः उसके साथ प्राण प्रक्रिया जोड़ने में कठिनाई नहीं होती। मूलाधार क्षेत्र में श्वास लेने जैसा अभ्यास किसी इन्द्रिय को नहीं है, किन्तु प्राण संचार की ड़ड़ड़ड़ उस क्षेत्र में ऊर्ध्व भाग से किसी भी प्रकार कम ड़ड़ड़ड़ मूलबन्ध द्वारा प्राण को ऊर्ध्वगामी बनाना प्रथम है। दूसरे चरण में शक्तिचालनी मुद्रा के अभ्यास ड़ड़ड़ड़ अपान आदि शरीरस्थं प्राणों को इच्छानुसार ड़ड़ड़ड अनुपात में एक दूसरे से जोड़ा, मिलाया जाना ड़ड़ड़ड़ होता है। ऐसा करने से शरीरस्थं पंच प्राण ड़ड़ड़ड सं सम्बद्ध हो जाते हैं।
ड़ड़ड़ड़ में योग साधक द्वारा प्राण को अपान में तथा अपान को प्राण में होमने का उल्लेख इसी दृष्टि से किया जाता है। यथा-
अपाने जुहृति प्राणः प्राणोऽपान तथा परे। प्राणवान गर्ति रुद्ववा प्राणायाम परायणाः॥
अर्थात् कोई साधक अपान में प्राण को आहुति देते हैं, कुछ प्राण में अपान को होमते हैं। प्राण और अपान की गति नियन्त्रित करके साधक प्राणायाम परायण होता है।
नासिका द्वारा प्राण संचार करके उसे मूलाधार तक ले जाना प्राण को अपान में होमना है, और मूलबन्ध एवं शक्तिचालिनी मुद्रा आदि द्वारा ‘अपान’ की उत्थान करके उसे प्राण से मिलना-अपान को प्राण में होमना कहा जाता है। प्राण और अपान दोनों की ही सामान्य गति को नियन्त्रित करके उसे उच्च लक्ष्यों की और प्रेरित करना ही प्राणायाम का उद्देश्य है।
शक्तिचालनी मुद्रा का महत्त्व एवं लाभ योग शास्त्रों में इस प्रकार बताया गया है-
शक्तिचालनमेवं हि प्रत्यहं यः समाचरेत्। आयुवृद्धिर्भवेत्तस्य रोगाणाँ च विनाशनम-शिवसंहिता
शक्तिचालनी मुद्रा का प्रतिदिन जो अभ्यास करता है, उसकी आयु में वृद्धि होती है और रोगों का नाश होता है।
कुण्डली कुटिलाकारा सर्पवत परिकीर्तिता। सा शक्तिश्चालिता येन स युक्तो नात्र सशसः-हठयोग प्रदीपिका
कुण्डलिनी सर्पिणी की तरह कुटिल है, उसे शक्तिचालनी मुद्रा द्वारा जो चलायमान कर लेता है वही योगी है।
शक्तिचालनी की महत्ता में जो कुछ कहा गया है वह अतिशयोक्ति नहीं। यह विज्ञान सम्मत है। शक्ति कहीं से आती नहीं, सुप्त से जागृत, जड़ से चलायमान हो जाना ही शक्ति का विकास कहा जाता है। बिजली के जनरेटर में बिजली कही से आती नहीं है। चुम्बकीय क्षेत्र में सुक्वायल घुमाने से उसके अन्दर के इलेक्ट्रान विशेष दिशा में चल पड़ते हैं। यह चलने की प्रवृत्ति विद्युत सब्राहक शक्ति (ई॰ एम॰ एफ॰) के रूप में देखी जाती है। शरीरस्थं विद्युत को भी इसी प्रकार दिशा विशेष में प्रवाहित किया जा सके तो शरीर संस्थान एक सशक्त जनरेटर की तरह सक्षम एवं समर्थ बन सकता है। योग साधनाएँ इसी उद्देश्य की पूर्ति करती है।
मानवी विद्युत का अत्यधिक प्रवाह नेत्रों द्वारा ही होता है, अस्तु जिस प्रकार कल्पनात्मक विचार शक्ति को सीमाबद्ध करने के लिए ध्यान योग की साधना की जाती है, उसी प्रकार मानवी विद्युत प्रवाह को दिशा विशेष में प्रयुक्त करने के लिए नेत्रों की ईक्षण शक्ति को सधाया जाता है। इस प्रक्रिया को त्राटक का नाम दिया गया है।
सरसरे तौर से और चंचलतापूर्वक उथली दृष्टि से हम प्रति क्षण असंख्यों वस्तुएँ देखते रहते हैं। इतने पर भी उनमें से किन्हीं विशेष आकर्षक वस्तुओं की ही मन पर छाप पड़ती है। अन्यथा सब कुछ यो ही आँख के आगे से गुजर जाता है। देखने की क्रिया होते रहने पर भी दृश्य पदार्थों एवं घटनाओं का नगण्य सा प्रभाव मस्तिष्क पर पड़े, इसका कारण देखते समय मन की चंचलता , उथलापन, उपेक्षा, अन्यमनस्कता आदि कारण ही मुख्य होते हैं। यदि गम्भीरता और स्थिरतापूर्वक किसी पदार्थ या घटना का निरीक्षण किया जाय, तो उसी में से बहुत महत्त्वपूर्ण तथ्य, उभरते हुए दिखाई देंगे।
त्राटक साधना का उद्देश्य अपनी दृष्टि क्षमता में इतनी तीक्ष्णता उत्पन्न करना है कि वह दृश्य की गहराई में उतर सके और उसके अन्तराल में अति महत्त्वपूर्ण घटित हो रहा है उसे पकड़ने और ग्रहण करने में समर्थ हो सके। वैज्ञानिकों, कलाकारों, तत्त्वदर्शियों में यही विशेषता होती है कि सामान्य समझी जाने वाली घटनाओं को अपनी तीक्ष्ण दृष्टि से देखते हैं और उसी में से ऐसे तथ्य ढूँढ़ निकालते हैं जो अद्भुत एवं असाधारण सिद्ध होते हैं।
पेड़ पर से फल टूट कर नीचे ही गिरते रहते हैं। यह दृश्य बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक सभी देखते हैं। इसमें कोई नई बात नहीं। किन्तु आइज़ैक न्यूटन ने पेड़ पर से सेव का फल जमीन पर गिरते देखा तो उसकी सूक्ष्म दृष्टि इसका कारण तलाश करने में लग गई और अन्ततः उसने पृथ्वी में आकर्षण शक्ति होने का क्रान्तिकारी सिद्धान्त प्रतिपादित करके विज्ञान जगत में एक अनूठी हलचल उत्पन्न कर दी। इस आधार पर आगे चलकर विज्ञान की भावी प्रगति का पथ-प्रशस्त होता चला गया है। कलाकारों और तत्त्वदर्शियों की दृष्टि भी ऐसी ही होती है। महर्षि चरक ने जमीन पर उगती रहने वाली सामान्य जड़ी-बूटियों के ऐसे गुण धर्म खोज निकाले जिनके सहारे आरोग्य विज्ञान की प्रगति में भारी सहायता मिली। मनीषियों ने एक से एक बढ़कर विज्ञान क्षेत्र में रहस्योद्घाटन किये है। इस सूक्ष्म अवलोकन में दिव्य दृष्टि तो काम करती है, पर उसके उत्पादन अभिवर्धन में चर्म चक्षुओं में उत्पन्न होने वाली वेधक दृष्टि की भूमिका भी एक महत्त्वपूर्ण नहीं होती। त्राटक इसी विभूति विशेषता के उत्पादन को ध्यान में रखते हुए किया जाता है।
बुद्धि का महत्त्व सर्वविदित है। पर मानवी विद्युत जिसे प्रतिभा का स्रोत माना जाता है, व्यक्तित्व के निर्माण एवं प्रयत्नों की सफलता में किसी भी प्रकार कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। मनुष्य शरीर एक अच्छा-खासा बिजली घर है। उससे लोहे की मशीनें नहीं चलाई जातीं, पर शरीर यन्त्र में जो एक से एक अद्भुत कलपुर्जे लगे है उनके सुसंचालन में यही शक्ति कितना काम करती है, इसे देखते हुए भौतिक विद्युत की क्षमता को तुच्छ ही कहा जा सकता है। मानवी विद्युत का वस्तुओं और प्राणियों पर कितना भारी प्रभाव पड़ता है-उससे वातावरण का निर्माण किस तरह उभरता है और व्यक्तित्व के विकास में कितनी सहायता मिलती है, इस सबको यदि क्रमबद्ध किया जा सके तो प्रतीत होगा कि मनुष्य शरीर में काम करने वाली बिजली कितनी सूक्ष्म और कितनी महत्त्वपूर्ण है।
यों तो मनुष्य शरीर के रोम रोम में विद्युत प्रवाह काम करता है, पर नेत्र, जननेन्द्रियाँ, वाणी यह तीन द्वार मुख्य है जिनमें होकर वह प्रवाह बाहर निकलता है और परिस्थितियों को प्रभावित करता है। मस्तिष्क का ब्रह्मरंध्र भाव उत्तरी ध्रुव की तरह निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त महाप्राण को खींचकर अपने में धारण करता है। इसके उपरान्त उसके प्रयोग के आधार नेत्र, जिव्हा एवं जननेन्द्रिय छिद्रों में होकर बनते हैं।
जिव्हा की वाक् साधना के लिए जप, पाठ, मौन जैसे कितने ही अभ्यास है। जननेन्द्रिय में सम्बन्धित काम शक्ति को ब्रह्मचर्य से संयमित किया जाता है और कुण्डलिनी जागरण के रूप में उभारा जाता है। इनका उल्लेख यहाँ अभीष्ट नहीं। त्राटक द्वारा नेत्र गोलकों से प्रवाहित होने वाली विद्युत शक्ति को किस प्रकार केन्द्रीभूत एवं तीक्ष्ण बनाया जाता है। यहाँ तो इसी प्रसंग पर चर्चा की जानी है। मनुष्य का अंतरंग नेत्र गोलकों में होकर बाहर झाँकता है। उन्हें अन्तरात्मा की खिड़की कहा गया है। प्रेम, द्वेष एवं उपेक्षा जैसी अंतःस्थिति को आँख मिलाते ही देखा समझा जाता है। काम-कौतुक का सूत्र संचार नेत्रों द्वारा ही होता है। नेत्रों के सौंदर्य एवं प्रभाव की चर्चा करते-करते कवि कलाकार थकते नहीं, एक से एक बड़े उपमा, अलंकार उनके लिए प्रस्तुत करते रहते हैं। दया, क्षमा, करुणा, ममता, पवित्रता, सज्जनता सहृदयता जैसी आत्मिक सद्भावनाओं को अथवा इनके ठीक विपरीत दुष्ट दुर्भावनाओं को किसी के नेत्रों में नेत्र डालकर जितनी सरलतापूर्वक समझा जा सकता है उतना और किसी प्रकार नहीं।
कहा जा चुका है कि दिव्य चक्षुओं से सम्भव हो सकने वाली सूक्ष्म दृष्टि और चर्म चक्षुओं की एकाग्रता युक्त तीक्ष्णता के समन्वय की साधना को त्राटक कहते हैं। इसका योगाभ्यास में अति महत्त्वपूर्ण स्थान है।
छोटे बच्चों को नजर लग जाने, बीमार पड़ने-नये सुन्दर मकान को नजर लगने से दरार पड़ जाने जैसी किम्वदन्तियाँ अक्सर सुनी जाती है। इनमें प्रायः अन्धविश्वासों का ही पट रहता है फिर भी मानवी विद्युत विज्ञान की दृष्टि से ऐसा हो सकना असम्भव नहीं है। वेधक दृष्टि में हानिकारक और लाभदायक दोनों तत्त्व यह तो सामान्य स्तर के त्राटक उपचार का किया कौतुक हुआ। अध्यात्म क्षेत्र में आगे बढ़ने वाले इसी प्रयोग की उच्च भूमिका में प्रवेश करके दिव्य दृष्टि विकसित करते हैं और उस अदृश्य को देख पाते हैं जिसे देख सकना चर्म चक्षुओं के लिए सम्भव नहीं हो सकता।
दृष्टि के स्थूल भाग की भी विशेषता है, पर वस्तुतः उसकी वास्तविक शक्ति सूक्ष्म दृष्टि पर निर्भर रहती है। प्रेम, द्वेष, घृणा, उपेक्षा आदि के भाव आँखों की बनावट या पुतली संचालन क्रम में अन्तर नहीं करते। वह स्थिति तो सदा एक सी ही रहती है। अन्तर पड़ता है उस भाव सन्दोह का जो आँखों में सूक्ष्म प्रक्रिया बनकर झाँकता है और सामने वाले को अपने अन्तरंग के सारे भेद बताकर स्थिति से अवगत कर देता है। स्थूल दृष्टि के पीछे सूक्ष्म दृष्टि ही अपना काम कर रही होती है। अस्तु भारतीय योगदर्शन ने त्राटक के माध्यम से सूक्ष्म दृष्टि को एकाग्र एवं प्रभावशाली बनाने का उद्देश्य सामने रखा है जब कि पाश्चात्य शैली में चर्म चक्षु ही सब कुछ है और उन्हीं की दृष्टि से वेधक क्षमता उत्पन्न करके अभीष्ट प्रयोजन सम्पन्न किये जाते हैं।
त्राटक का वास्तविक उद्देश्य दिव्य दृष्टि को ज्योतिर्मय बनाता है। उसके आधार पर सूक्ष्म जगत की झाँकी की जा सकती है। अन्तः क्षेत्र में दबी हुई रत्न राशि को खोजा और पाया जा सकता है। देश, काल, पात्र की स्थूल सीमाओं को लाँघ कर अविज्ञात और अदृश्य का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। आँखों के इशारे तो मोटी जानकारी भर दी जा सकती है, पर दिव्य दृष्टि से तो किसी के अन्तः क्षेत्र को गहराई में प्रवेश करके वहाँ ऐसा परिवर्तन किया जा सकता है जिससे जीवन का स्तर एवं स्वरूप ही बदल जाय। इस प्रकार त्राटक की साधना यदि सही रीति से सही उद्देश्य के लिए की जा सके तो उससे साधक को अन्त चेतना के विकसित होने का असाधारण लाभ मिलता है साथ ही जिस प्राणी या पदार्थ पर इस दिव्य दृष्टि का प्रभाव डाला जाय उसे भी विकासोन्मुख करके लाभान्वित किया जा सकता है।
ब्रह्माण्डीय चेतना एवं सशक्तता का उद्गम स्रोत कहाँ है। इसकी तलाश करते हुए तत्त्वदर्शी ऋषि अपने गहन अनुसन्धानों के सहारे इस निष्कर्ष पर पहुँचे है क यह समस्त हलचलें जिस आधार पर चलती है। वह शक्ति स्रोत शब्द है। अचिन्त्य, अगम्य, अगोचर, परब्रह्म को जगत चेतना के साथ अपना स्वरूप निर्धारित करते हुए शब्दब्रह्म के रूप में प्रकट होना पड़ा। सृष्टि पूर्व यहाँ कुछ नहीं था। कुछ से सब कुछ को उत्पन्न होने का प्रथम चरण शब्दब्रह्म था। उसी को नाद-ब्रह्म कहते हैं। उसकी परमसत्ता का आरम्भ अवतरण इसी प्रकार होता है। उसके अस्तित्व एवं प्रभाव का परिचय प्राप्त करना सर्वप्रथम शब्द के रूप में ही सम्भव हो सका।
यह विश्व अनन्त आकाश के गर्भ में-पलने वाला और उसी की गोदी में खेलने वाला बालक है। ग्रह-नक्षत्र का-निहारिकाओं का-प्राणि और पदार्थों का निर्वाह इस आकाश की छत्र छाया में ही रहा है। सृष्टि से पूर्व आकाश ही था। आकाश में ऊर्जा रूप में हलचलें उत्पन्न हुई। हलचलें सघन होकर पदार्थ बन गई। पदार्थ से पश्व तत्त्व और पश्व प्राण बने। इन्हीं के सम्मिश्रण से विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ बनी और प्राणी बने। सृष्टि के इस आरम्भ क्रम से आत्म विज्ञानी और भौतिक विज्ञानी प्रायः समान रूप से सहमत हो चले।
आरम्भिक हलचल शब्द रूप में हुई होगी इस कल्पना को अब मान्यता के रूप में स्वीकार कर लिया गया है। आकाश की तन्मात्रा शब्द ही है। शब्द और आकाश का पारस्परिक घनिष्ठ सम्बन्ध है। स्थूल आकाश ईथर के रूप में जाना जाता है। ध्वनि प्रवाह उसे भी कहते हैं। प्रकाश भी भौतिक जगत की एक बड़ी शक्ति है। विद्युत चुम्बक आदि का नम्बर इसके बाद आता है। शक्ति का प्रथम ध्वनि है। ध्वनि से प्रकाश। प्रकाश और ध्वनि के संयोग वियोगं से तत्त्वों, प्रवाहों एवं चेतनाओं का उद्भव। सृष्टि का आधार कारण इसी प्रकार समझा जा सकता है।
शब्द का आरम्भ जिस रूप में हुआ उसी स्थिति में वह अनन्त काल तक बना रहेगा। आरम्भ शब्द 'ऊँ' माना गया है। यह काँस्य पात्र पर हथौड़ी पड़ने से उत्पन्न झनझनाहट थरथराहट की तरह का प्रवाह है। घड़ियाल पर लकड़ी की हथौड़ी मार कर आरती के समय जो ध्वनि उत्पन्न की जाती है उसे ॐ कार के समतुल्य माना जा सकता है। जो शब्द का आरम्भ और उसके प्रवाह में अर्ध अनुस्वार की शृंखला जोड़ दी जाय तो यही ‘ऊँ’ बन जाएगा उसके उच्चारण का स्वरूप समझाते हुए ‘ओ’ शब्द के आगे 3 का अंक लिखा जाता है-तदुपरान्त आधा ‘म’ लिखते हैं। 3 का अंक लिखने का अर्थ है उसे अपेक्षाकृत अधिक जोर से बोला जाय। ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत के संकेतों में 3 गुनी शक्ति से बोले जाने वाले अक्षर को प्लुत कहते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि ओं शब्द को सामान्य की अपेक्षा तीन गुनी क्षमता से बोला जाय। तदुपरान्त उसके साथ अर्ध ‘म्’ की अर्धबिन्दु अर्थ अनुस्वारों की एक कड़ी जोड़ दी जाय यही ‘ऊँ’ का उच्चारण है। ‘ओं’, 3, म्’ इन तीनों का संक्षिप्त स्वरूप मोनोग्राम -ऊँ के रूप में लिखा जाता है। यह वह स्वरूप है जिसका सृष्टि आरम्भ के लिए उद्भव हुआ और उसी की पुनरावृत्ति परा प्रकृति के अन्तराल में यथावत होती आ रही है। जागृतिक समस्त विधि-व्यवस्थायें उसी उद्गम से आरम्भ होती और गतिशील रहती है।
घड़ी में पेण्डुलम हिलता है। उसमें अनायास ही एक स्वसंचालित प्रवाह बनता है जिसके आधार पर न केवल पेण्डुलम की अपनी क्रिया प्रक्रिया चलती है वरन् घड़ी के अन्य पुर्जों को गतिशील बनने के लिए अभीष्ट क्षमता की आवश्यकता पूर्ति होती है। परा और अपरा, चेतन और जड़ प्रकृति को यदि एक घड़ी यन्त्र माना जाय तो उसके संचालन की उद्गम व्यवस्था बनाने वाली शक्ति को ॐ कार का ध्वनि प्रवाह कह सकते हैं, यह अनवरत रूप से होता रहता है। एक के बाद दूसरे आघात का क्रम चलता रहता है। इन आघातों को प्रकृति पुरुष के संयोग समागम की उत्पत्ति कहा गया है। शृंगारिक अलंकारों में इस काम क्रीडा को विविध प्रवृत्तियों के रूप में भी सरस वर्णनों के साथ समझाने का प्रयत्न चलता रहा है। इसे दार्शनिकता और कवित्व का सम्मिश्रण कह सकते हैं।
शक्ति की धाराएँ अनेक है, पर यदि उनके उद्गम केन्द्र तक पहुँचा जा सके तो उन सभी धाराओं पर अधिकार प्राप्त किया जा सकता है जो उस केन्द्र संस्थान से उद्भूत होती है। राजधानी पर, राजा के किले पर कब्जा हो जाने से उस प्रभाव में चलने वाले सारे क्षेत्र पर अधिकार हो जाता है। सहस्रार चक्र की साधना में सफलता मिलने पर समूची जीवन सत्ता वशवर्ती हो जाती है। सृष्टि का उद्गम केन्द्र शब्द ब्रह्म ॐ कार यदि सिद्ध किया जा सके तो समूचे सृष्टि प्रवाह के साथ तारतम्य मिलना सम्भव हो जाता है। तब इस विश्व वैभव का अभीष्ट सत्प्रयोजनों के लिए उपयोग कर सकने में कठिनाई नहीं रहती। विशेषतया आत्म विश्वास पर तो पूरी तरह अधिकार हो ही जाता है। विश्व नियन्ता परमात्मा के लिए विश्व व्यवस्था की बात जितनी महत्त्वपूर्ण है, आत्म नियन्ता-आत्मा के लिए उतनी ही गरिमा मय आत्म सत्ता के क्षेत्र में सुव्यवस्था बना सकना है।
शब्द ब्रह्म-प्रकृति और पुरुष का मध्यवर्ती सम्बन्ध सूत्र है। इस पर अधिकार होने से दोनों ही क्षेत्रों में घनिष्ठता सध जाती है। प्रकृति क्षेत्र की शक्तियाँ और ब्रह्म क्षेत्र की चेतनाएँ करतलगत हो सकें तो ऋद्धियों और सिद्धियों का- सम्पदाओं और विभूतियों का उभय पक्षीय वैभव उपलब्ध हो सकता है।
ऊँ कार साधना नादयोग की उच्चस्तरीय साधना है। आरम्भिक अभ्यासी की प्रकृति प्रवाह से उत्पन्न विविध स्तर की आहत-परिचित ध्वनियाँ सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय से सुनाई पड़ती है। इनके सहारे मन को वशवर्ती बनाने तथा प्रकृति क्षेत्र में चल रही हलचलों को जानने तथा उन्हें मोड़ने मरोड़ने की सामर्थ्य मिलता है। आगे चलकर ‘अनाहत’ क्षेत्र आ जाता है। ड़ड़ड़ड़ भू-ध्वनि प्रवाह-जिसे परब्रह्म का अनुभव में आ सकने वाला स्वरूप कह सकते हैं यदि किसी के सघन संपर्क में आ सके तो उसे अध्यात्म क्षेत्र का सिद्ध पुरुष भी कह सकते हैं।
भगवान का सर्वश्रेष्ठ नाम ओम् है। यह स्वयं भू है। पेट भरा होने पर जब डकार लेते हैं तब पूर्णता का प्रतीक ओम् शब्द अनायास ही निकलता है जिसकी ध्वनि नाभि देश के आरम्भ होकर कंठमूल और मुखाग्र तक चली आती है। यह ॐ साढ़े तीन अक्षरों का विनिर्मित है- (1) ओ (2) 3 (3) म् ओं के उच्चारण में जो अर्धबिन्दु लगा हुआ है उसे चन्द्र बिन्दु अथवा अर्ध मात्रा कहते हैं। उसे आधा अक्षर माना गया है। इस प्रकार साढ़े तीन अक्षर का मन्त्रराज ओं कहलाता है। इसका उच्चारण कण्ठ, होठ, मुख, जिव्हा से होता है पर इसका बीच कुण्डलिनी में सन्निहित है। जब ध्वनि और प्राण दोनों मिल जाते हैं तब उसका समग्र प्रभाव उत्पन्न होता है।
मांडूक्योपनिषद् में परमात्मा के समग्र रूप का तत्त्व समझाने के लिए उनके चार पादों की कल्पना की गई है। नाम और नामी की एकता प्रतिपादन करने के लिए ड़ड़ड़ड़ और नाद शक्ति के परिचय रूप में अ, उ और म इन तीन मात्राओं के साथ और मात्रा रहित उसके अव्यक्त रूप के साथ परब्रह्म परमात्मा के एक एक पाद की समता दिखलाई गई है और ओंकार को ही परमात्मा का अभिन्न स्वरूप मान कर यह बताया गया है-
ओमित्येतदक्षरमिद सर्व तस्योप व्याख्यानं भूतं भवद्भविष्यदिति सर्वमोकाँर एव। यच्चन्यत् त्रिकालतीत तदप्योकाँर एव-माण्डूक्योपनिषद् 1
‘ओम’ यह अक्षर ही पूर्ण अविनाशी परमात्मा है। यह प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला जड़ चेतन का समुदाय रूप जगत् उन्हीं का उपाख्यान अर्थात् उन्हीं की निकटतम महिमा का निर्देशक है जो स्थूल और सूक्ष्म जगत् पहले उत्पन्न होकर उसमें विलीन हो चुका है, जो वर्तमान है, जो भविष्य में उत्पन्न होगा, वह सब का सब ओंकार (ब्रह्म का नाद-स्वरूप ही है। तीनों कालों से अतीत इससे भिन्न है, वह भी ओंकार ही है।
स्थूल, सूक्ष्म और कारण जो कुछ भी दृश्य, अदृश्य है, उसका संचालन ‘ओंकार’ की स्फुरणा से ही हो रहा है। यह जो उनका अभिव्यक्त अंश और उससे अतीत भी जो कुछ है, वह सब मिलकर ही परब्रह्म परमात्मा का समग्र रूप है। परब्रह्म की प्राप्ति के लिए। अतएव उनकी नाद शक्ति का परिचय प्राप्त करना आवश्यक है।
परमात्मा के नाद रूप के साक्षात्कार के लिए किये गये ध्यान के सम्बन्ध में नाद बिंदूपनिषद् के 33 से 41 वें मन्त्रों में बड़ी सूक्ष्म अनुभूतियों का भी विवरण मिलता है। इन मन्त्रों में बताया गया है जब पहले पहल अभ्यास किया जाता है तो ‘नाद’ कई तरह का और बड़े जोर जोर से सुनाई देता है। आरम्भ में इस नाद की ध्वनि नागरी, झरना, भेरी, मेघ और समुद्र की हरहराहट की तरह होती है, बाद में भ्रमर, वीणा, वंशी औरिककणी की तरह गुंजन पूर्ण और बड़ी मधुर होती है। ध्यान को धीरे धीरे बढ़ाया जाता है और उससे मानसिक ताप का शमन होना भी बताया गया है। तैतरीयोपनिषद् के तृतीय अनुवाद में ऋषि ने लिखा है-वाणी में शारीरिक और आत्म विषयक दोनों तरह की उन्नति करने की सामर्थ्य भरी हुई है, जो इस रहस्य को जानता है, वह वाक्-शक्ति पाकर उसके द्वारा अभीष्ट फल प्राप्त करने में समर्थ होता है।
ओंकार ध्वनि से प्रस्फुटित होने वाला ब्रह्म इतना सशक्त और सर्वशक्तिमान् है कि वह सृष्टि के किसी भी कण को स्थिर नहीं होने देता। समुद्रों को मथ डालने से लेकर भयंकर आँधी तूफान और ज्वालामुखी पैदा करने तक-परस्पर विचार विनिमय की व्यवस्था ले लेकर ग्रह-नक्षत्रों के सूक्ष्म कम्पनों को पकड़ने तक एक सुविस्तृत विज्ञान किसी समय भारतवर्ष में प्रचलित था। नाद-ब्रह्म की उपासना के फलस्वरूप यहाँ के साधक इन्द्रियातीत क्षमताओं के अधिपति और स्वर्ग सम्पदा के अधिकारी देव मानव कहलाते रहे है।
अनाहत नाद की उपासना का प्रचलन विश्व-व्यापी है। पाश्चात्य विद्वानों तथा साधकों ने उसके वर्णन के लिए इन शब्दों का प्रयोग किया है-वर्ड लोगोस, हिस्पर्स फ्राम द अननोन, इनर हृयस, द लेग्वेज आफ सोल, प्रिमार्डियल साउन्ड, द व्हायस फ्राम हैवन, द व्हायस आफ सोल आदि।
गणितज्ञ-दार्शनिक पाइथागोरस ने इसे सृष्टि का संगीत (म्यूजिक आफ द स्फियर्स) कहा है। व्यष्टि (माइक्रो काज्म) को समष्टि (मेक्रोकाज्म) से जोड़ने में नाद-साधना अतीव उपयोगी सिद्ध होती है।
स्वामी विवेकानन्द ने ॐ शब्द को समस्त नाम तथा रूपाकारों की एक जननी (मदर आफ नेम्स एण्ड फार्म्स) कहा है भारतीय मनीषियों ने इसे प्रणव ध्वनि, उद्गीथ, स्फोट आदि नाम अनाहत, ब्रह्मनाद आदि अनेक नामों से पुकारा है।
बाइबिल में कहा गया है-आरम्भ में शब्द था। शब्द ईश्वर के साथ था और शब्द ईश्वर था। इन दि विगर्लिंग वाज दि वर्ड, दि वर्ड वाज विद गौड, दि वर्ड वाज गौड।’
शिव पुराण के उमा संहिता खण्ड के 26 वें अध्याय में अनाहत नाद सम्बन्धी विशेष विवरण और माहात्म्य मिलता है। भगवान् शिव पार्वती से कहते है-अनाहत नाद कालजयी है। इसकी साधना करने वाला इच्छानुसार मृत्यु को जीत लेता है। उसकी सूक्ष्मता बढ़ जाती है और भव सागर के बन्धन कट जाते हैं। जागरूक योगी शब्द ब्रह्म की साधना करे। यह परम कल्याणकारी योग है।’
नादयोग के दस मंडल साधना ग्रन्थों में गिनाये गये है। कहीं-कहीं इन्हें लोक भी कहा गया है। एक ॐ कार ध्वनि और शेष नौ शब्द इन्हें मिलाकर दस शब्द बनते हैं। इन्हीं की श्रवण साधना शब्द ब्रह्म की नाद साधना कहलाती है।
सन्त मत के मध्यकालीन आचार्यों ने नाद ब्रह्म की साधना को ‘सुरति’ शब्दयोग कहा है। कबीर, रैदास, नानक, पलटू और राधास्वामी एवं नाथ सम्प्रदाय में इसका विशेष रूप से प्रचलन है। सुरति का एक अर्थ प्रकृति पुरुष के बीच अनवरत क्रम से चलने वाली दिव्य मिलन-बिछुड़न क्रिया की ओर संकेत करता है। दूसरा अर्थ स्रोत शब्द के अपभ्रंश रूप में भी ‘सुरत’ को ले सकते हैं। शास्त्रों में अध्यात्म स्रोत अनवरत शब्द प्रवाह को माना गया है। यह सूक्ष्म नाद प्रकृति के अन्तराल में सर्वव्यापी बनकर गूँज रहा है उसे अपने काय घट में भी सुना जा सकता है। इसकी श्रवण विधियाँ साधना शास्त्र में विभिन्न प्रकार से बताई गई है।
कुण्डलिनी साधना को प्रणव विद्या भी कहा गया है। उसके जागरण में जहाँ अन्यान्य विधि-विधानों का प्रयोग होता है वहाँ उस सन्दर्भ में प्रणव तत्त्व की प्रायः प्रमुखता ही दी जाती है।
प्रकृतिः निश्चला परावाग्रू पिणी पर प्रणबालिका कुण्डलिनीशाँक्तः-प्रपंच सार तन्त्र
कुण्डलिनी शक्ति को ही निश्चल प्रकृति, परावाक् और प्रणव विद्या कहते हैं।
कुण्डलिनी जागरण प्रयोग गायत्री महाविद्या के अंतर्गत ही आता है। पंचमुखी गायत्री में पंचकोशों की साधना पंचाग्नि विद्या कही जाती है। यही गायत्री के पाँच मुख है। गायत्री का प्राण साधना का नाम सावित्री विद्या है। सावित्री ही कुण्डलिनी है। गायत्री मन्त्र में-गायत्री साधना में-प्रणव तत्त्व का अविच्छिन्न समावेश है। कहा गया है-
ऊँकारं पितृरुपेण गायत्री मातरं तथा।
पितरौ यो न जानाति ब्राह्मणः सोऽन्यवीर्यजः-योग संध्या
ओंकार रूपी पिता और गायत्री रूपी माता को जो ब्राह्मण नहीं जानता है वह वर्णसंकर है।
गायत्री ही क्या किसी भी स्तुति का वेद मन्त्र का शक्ति जागरण ॐ कार का समावेश किये बिना सम्भव नहीं होता। हर वेद मन्त्र के उच्चारण में पहले ओंकार संयुक्त करना पड़ता है तभी वह जागृत होता है। अन्यथा वह निर्जीव ही बना रहेगा।
न मामनीरयित्वा ब्राह्मणा ब्रह्म वदेयुः। यदि वदेयुः अब्रह्म तत् स्यात्-गोषथ पूर्व0 23
ओंकार ने कहा कि मुझको उच्चारण किये बिना ब्राह्मण वेद न बोलें। यदि बोलें तो वह वेद न रहे।
साधना मार्ग पर जिस लक्ष्य बेध के लिए चला जाता है उसमें ॐ कार का धनुष की तरह और आत्मा का बाण की तरह प्रयोग किया जाता है। आत्मा का अग्रगम्य प्रणव धनुष की सहायता से ही होता है। कहा गया है-
प्रणबोधनुः शरोहृयात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते। अप्रमत्ते न वेद्धव्यं शरवत्तन्मयों भवेत्॥
ऊँ कार रूपी धनुष में आत्मा का बाण चढ़ा कर स्फूर्ति पूर्वक ब्रह्म-लक्ष्य में बेध देना चाहिए।
कुण्डलिनी प्रणव रूपिणी-शक्ति तन्त्र
महा कुण्डलिनी प्रोप्ता परब्रह्म स्वरुपिणी। शब्द ब्रह्ममयी देवी एकाननेकाक्षराऽकृतिः-योग कुण्डलि उपनिषद्
अर्थात्-कुण्डलिनी प्रणव रूप है। महा कुण्डलिनी को परब्रह्म स्वरूपिणी कहा गया है। यह शब्द ब्रह्ममय है। एक ही ॐ से अनेक अक्षरों की आकृतियाँ उत्पन्न हुई है।
कुण्डलिनी का आकार सर्पिणी जैसा बताया गया है। वह गुँजलक मारे सोती हुई पड़ी है और पूँछ को अपने मुँह में दबाये हुए है। इस आकृति को घसीट कर बनाने से ॐ शब्द बन जाता है। अस्तु प्राण और उच्चारण सहित समर्थ प्रणव को कुण्डलिनी ही कहा गया है और उसी सजीव ॐ के उच्चारण का पूरा फल बताया गा है, जिसमें कुण्डलिनी की जागृत शक्ति का समन्वय हुआ है।
नादयोग की साधना के दो रूप है। एक तो अन्तरिक्ष से सूक्ष्म जगत से आने वाली दिव्य ध्वनियों का श्रवण, दूसरा अपने अन्तरंग के शब्द ब्रह्म का जागरण और उसका अभीष्ट क्षेत्र में अभीष्ट उद्देश्य के लिए परिप्रेषण। यह शब्द उत्थान एवं परिप्रेषण ॐ कार साधना के माध्यम से ही बन पड़ता है।
साधारण रेडियो यन्त्र ग्रहण करते हैं वे मूल्य की दृष्टि से सस्ते और संरचना की दृष्टि से सरल भी होते हैं। किन्तु परिप्रेषण यन्त्र-ब्रोडकास्ट-ट्रान्समीटर महँगे भी होते हैं और उनकी संरचना भी जटिल होती है। उनके प्रयोग करने की जानकारी भी श्रम साध्य होती है जबकि साधारण रेडियो का बजाना बच्चे भी जानते हैं। रेडियो की संचार प्रणाली तभी पूर्ण होती है जब दोनों पक्षों का सुयोग बन जाय। यदि ब्रोडकास्ट की व्यवस्था न हो तो सुनने का साधन कहाँ से बन पड़ेगा? जिस क्षेत्र में रेडियो का लाभ जाना है वहाँ आवाज ग्रहण करने की ही नहीं आवाज पहुँचाने की भी व्यवस्था होनी चाहिए।
नादयोग की पूर्णता दोनों ही प्रयोग प्रयोजनों से सम्बद्ध है। कानों के छिद्र बन्द करके दिव्य-लोक से आने वाले ध्वनि प्रवाहों को सुनने के साथ साथ यह साधन भी रहना चाहिए कि साधक अपने अन्तः क्षेत्र से शब्द शक्ति का उत्थान कर सके। इसी अभ्यास के सहारे अन्यान्य मन्त्रों की शक्ति सुदूर क्षेत्रों तक पहुँचाई जा सकती है। वातावरण को प्रभावित करने-परिस्थितियाँ बदलने एवं व्यक्तियों को सहायता पहुँचाने के लिए मन्त्र शक्ति का प्रयोग परावाणी से होता है। चमड़े की जीभ से निकलने वाली बंखरी ध्वनि तो जानकारियों का आदान प्रदान भर कर सकती है। मन्त्र की क्षमता तो परा और प्रशान्ति वाणियों के सहारे ही प्रचण्ड बनती और लक्ष्य तक पहुँचती है। परावाक् का जागरण ॐ कार साधना से सम्भव होता है। कुण्डलिनी अग्नि के प्रज्ज्वलन में ॐ कार को ईंधन की तरह प्रयुक्त किया जाता है-
अन्तपंगतरंगस्य रोधे वेलायतेऽपि च। ब्रह्मप्रणवसलग्ननादो ज्योतिर्मयात्मकः॥ मनस्तत्र लयं याति तद्विष्णोः परम् पद्म-नादविन्दोपनिषद्
नाद के प्रणव में संलग्न होने पर वह ज्योतिर्मय हो जाता है उस स्थिति में मन का लय हो जाता है। उसी को भगवान् विष्णु का परम पद कहा जाता है।
योग साधना में चित्त वृत्तियों का निरोध और प्राणशक्ति की प्रखरता यह दो ही तत्त्व प्रधान है। इन दोनों ही प्रयोजनों के लिए ॐ कार की शब्द साधना से अभीष्ट उद्देश्य सरलतापूर्वक सिद्ध होता है-
ओंकारोच्चारणसान्तशब्दतत्वानुभावनात्। सुषुप्ते सविदो जाते प्राणस्पन्दो निरुध्यते-योगवासिष्ठ
ऊँचे स्वर से ओंकार का जप करने पर सान्त में जो शेष तुर्यमात्रा रूप शब्द-शब्द तत्त्व की अनुभूति होती हैं, उसका अनुसन्धान से बाह्य चित्त वृत्तियों का जब बिलकुल उपराम हो जाता है तब प्राणवायु का निरोध हो जाता है।
नादयोग की साधना में प्रगति पथ पर दोनों ही चरण उठने चाहिए। यहाँ नाद श्रवण के साथ साथ नाद उत्थान को भी साधना क्रम में सम्मिलित रखना चाहिए। कुण्डलिनी जागरण साधना में नाद श्रवण में ॐ कार की ध्वनि पकड़ने तक पहुँचना पड़ता है। अन्य शब्द तो मार्ग के मील पत्थर मात्र है। अनाहत ध्वनि को ‘सुरति’ तुरीयावस्था, समाधि आदि पूर्णता बोधक आस्थाओं के समतुल्य माना गया है और अनाहत ध्वनि ‘ऊँ’ कार की श्रवण अनुभूति ही है। ॐ कार ध्वनि का नादयोग में इसीलिए उच्च स्थान है।
नव शब्द परित्यज्य ॐ कारन्तु समाश्रयेत्। सर्वे तत्र लयं यान्ति ब्रह्म प्रणव नादके-महायोंग विज्ञान
नौ शब्द नादों की उपेक्षा करके ॐ कार नाद का आश्रय लेना चाहिए। समस्त नाद प्रणव में ही लीन होते हैं। ॐ कार की ध्वनि का नाद का आश्रय लेने वाला साधक सत्यलोक को प्राप्त करता है।
शब्द ब्रह्म के-ऊँ कार के उत्थान की साधना में हृदय आकाश से ॐ कार ध्वनि का उद्भव करना होता है। जिव्हा से मुख ॐ कार उच्चारण का आरम्भिक अभ्यास किया जाता है। पीछे उस उद्भव में परा और पश्यन्ति वाणियाँ ही प्रयुक्त होती है और उस ध्वनि से हृदयाकाश को गुंजित किया जाता है।
हृद्यविच्छिन्नमोंकार घण्टानाँद विसोर्णवत्। प्राणोनोदीर्य तत्राथ पुनः संवेशयेत् स्वरम्॥
ध्यानेनेत्थं सुतीव्रेण युँजतो योगिनो मनः। संपास्यत्पाशु निर्वाण् द्रव्यज्ञान क्रियाभ्रमः-भागवत 11,14,34,46
हृदय में र्घटा नाद की तरह ओंकार का अविच्छिन्न पद्य नालवत् अखण्ड उच्चारण करना चाहिए। प्राण वायु के सहयोग से पुनः पुनः “ऊँ” का जप करके बारम्बार हृदय में गिराना चाहिए। इस तीव्र ध्यान विधि से योगाभ्यास करने वाले का मन शीघ्र ही शान्त हो जाता है और सारे साँसारिक भ्रमों का निवारण हो जाता है।
नादारंभे भवेर्त्सवगात्राणाँ भंजनं ततः। शिरसः कंपनं पश्चात् सर्वदेहस्य कंपनम्॥ योग रसायनम् 254
नाद के अभ्यास के दृढ़ होने पर आरम्भ में पूरे शरीर में हलचल सी मचती है। फिर शिर में कंपन होता है, पश्चात् सम्पूर्ण देह में कंपन होता है।
क्रमेणाभ्यासतश्चैवं श्रू यतेऽनाहतो ध्वनिः। पृथग्विमिश्रितश्चापि मनस्तत्र नियोजयेत्-योग रसायनम् 253
क्रमशः अभ्यास करते रहने पर ही अनाहत ध्वनि पहले मिश्रित तथा बाद में पृथक् स्पष्ट रूप से सुनाई पड़ती है। मन को वहीं नियोजित करना चाहिए।
नाद श्रवण से सफलता मिलने लगे तो भी शब्द ब्रह्म की उपलब्धि नहीं माननी चाहिए। नाद ब्रह्म की उपलब्धि नहीं माननी चाहिए। नाद ब्रह्म तो भीतर से अनाहत रूप में उठता है और उसे ओंकार के सूक्ष्म उच्चारण अभ्यास द्वारा प्रयत्न पूर्वक उठाना पड़ता है-
बाहरी शब्द वाद्य यन्त्रों आदि के रूप में सुने जाते हैं। पर ॐ कार का नाद प्रयत्नपूर्वक भीतर से उत्पन्न करना पड़ता है-
नादः संजायते तस्य क्रमेणाभ्यासतश्च चः-शिव सं0
अर्थ-अभ्यास करने से नाद की उत्पत्ति होती है। यह शीघ्र फलदाता है।
अनाहतस्य शब्दरुप् ध्वनिर्य उपलभ्यते। ध्वनेरर्न्तगत ज्ञेयं ज्ञेयस्यार्न्तगत मनः॥ मनस्तय लयं यादि तद्विष्णोः परमपदम्-हठ॰ प्र0
अनाहत ध्वनि सुनाई पड़ती है उस ध्वनि के भीतर स्वप्रकाश चैतन्य रहता है और उस ज्ञेय के भीतर मन रहता है और वह मन जिस स्थान में लय को प्राप्त होता है उसी को विष्णु का परमधाम कहते हैं।
नादयोग की महिमा बताते हुए कहा गया है कि उसके आधार पर दृष्टि की चित्त की, स्थिरता अनायास ही हो जाती है। आत्म कल्याण का परम अवलम्बन यह नादब्रह्म ही है।
दृष्टि स्थिरा यस्य विना सदृश्यं, वायुः स्थिरों यस्य विना प्रयत्नम्। चित्तं स्थिरं यस्य विनावलम्बम्, स ब्रह्म तारान्तरनादरुप॥
जिससे बिना दृष्टि स्थिर हो जाती है, जिससे बिना प्रयत्न के प्राण वायु स्थिर हो जाती है। जिससे बिना अवलम्बन के चित्त का नियमन हो जाता है। वह अन्तर नाद रूपी ब्रह्म ही है।
नाद क्रिया के दो भाग है-बाह्य और अन्तर। बाह्य नाद में बाहर की दिव्य आवाजें सुनी जाती हैं और बाह्य जगत की हलचलों की जानकारियाँ प्राप्त की जाती हैं और ब्रह्माण्डीय शक्ति धाराओं को आकर्षित करके अपने में धारण किया जाता है। अन्तः नाद में भीतर से शब्द उत्पन्न करके-भीतर ही भीतर परिपक्व करते और परिपुष्टि होने पर उसे किसी लक्ष्य विशेष पर किसी व्यक्ति के अथवा क्षेत्र के लिए फेंका जाता है और उससे अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति की जाती है। इसे धनुषबाण चलाने के समतुल्य समझा जा सकता है।
अन्तःनाद के लिए भी बैठता तो ब्रह्मनाद की तरह ही होता है, पर अन्तर ग्रहण एवं प्रेषण का होता है। सुखासन में मेरुदंड को सीधा रखते हुए षडमुखी मुद्रा में बैठने का विधान है। षडमुखी मुद्रा का अर्थ है-दोनों अँगूठों से दोनों कान के छेद बन्द करना। दोनों हाथों की तर्जनी और मध्यमा अंगुलियों से दोनों नथुनों पर दबाव डालना। नथुना पर इतना दबाव नहीं डाला जाता कि साँस का आवागमन ही रुक जाय।
होठ बन्द, जीभ बन्द मात्र भीतर ही पराशन्ति वाणियों से ॐ कार का गुँजार प्रयास यही है अन्तःनाद उत्थान। इसमें कंठ से मन्द ध्वनि होती रहती है। अपने आपको उसका अनुभव होता है और अन्तः चेतना उसे सुनती है। ध्यान रहे यह ॐ कार का जप या उच्चारण नहीं गुँजार है। गुँजार का तात्पर्य है शंख जैसी ध्वनि धारा एवं घड़ियाल जैसी थरथराहट का सम्मिश्रण। इसका स्वरूप लिखकर ठीक तरह नहीं समझा समझाया जा सकता। इसे अनुभवी साधकों से सुना और अनुकरण करके सीखा जा सकता है।
साधना आरम्भ करने के दिनों दस-दस सेकेण्ड के तीन गुँजार बीच-बीच में पाँच-पाँच सेकेण्ड रुकते हुए करने चाहिए। इस प्रकार 40 सेकेण्ड का एक शब्द उत्थान हो जाएगा इतना करके उच्चार बन्द और उसकी प्रतिध्वनि सुनने का प्रयत्न करना चाहिए। जिस प्रकार गुम्बजों में, पक्के कुओं में, विशाल भवनों में, पहाड़ों की घाटियों में जोर से शब्द करने पर उसकी प्रतिध्वनि उत्पन्न होती है, उसी प्रकार अपने अंतःक्षेत्र में ॐ कार गुँजार के छोड़े हुए शब्द प्रवाह की प्रतिध्वनि उत्पन्न हुई अनुभव करनी चाहिए और पूरी ध्यान एकाग्र करके इस सूक्ष्म प्रतिध्वनि का आभास होता है। आरम्भ में बहुत प्रयत्न से, बहुत थोड़ी-सी अतीव मन्द-रुक रुककर सुनाई पड़ती है, किन्तु धीरे धीरे उसका उभार बढ़ता चलता है और ॐ कार की प्रतिध्वनि अपने ही अन्तराल में अधिक स्पष्ट एवं अधिक समय तक सुनाई पड़ने लगती है। स्पष्टता एवं देरी को इस साधना की सफलता का चिह्न माना जा सकता है।
ओंकार की उठती हुई प्रतिध्वनि अंतःक्षेत्र के प्रत्येक विभाग को-क्षेत्र को - प्रखर बनाती है। उन संस्थानों की प्रसुप्त शक्ति जगाती है। उससे आत्मबल बढ़ता है। और छिपी हुई दिव्य शक्तियाँ प्रकट एवं परिपुष्ट होती है।
समयानुसार इसका उपयोग शब्दबेधी बाण की तरह-प्रक्षेपास्त्र की तरह हो सकता है। भौतिक एवं आत्मिक हित-साधन के लिए इस शक्ति को समीपवर्ती अथवा दूरवर्ती व्यक्तियों तक भेजा जा सकता है और उनको कष्टों से उबारने तथा प्रगति पथ पर अग्रसर करने के लिए किया जा सकता है। वरदान देने की क्षमता-परिस्थितियों में परिवर्तन कर सकने जितनी समर्थता जिस शब्द ब्रह्म के माध्यम से सम्भव होती है उसे ॐ कार गुँजार के आधार पर भी उत्पन्न एवं परिपुष्ट किया जाता है।
पुरानी परिपाटी में षडमुखी मुद्रा का उल्लेख है। मध्यकाल में उसकी आवश्यकता नहीं समझी गई और कान को कपड़े में बँधे मोम की पोटली से कर्ण छिद्रों का बन्द कर लेना पर्याप्त समझा गया । इससे दोनों हाथों को गोदी में रखने और नेत्र अर्धोन्मीलित रखने की ध्यान मुद्रा ठीक तरह सधती और सुविधा रहती थी। अब अनेक आधुनिक अनुभवी शवासन शिथिलीकरण मुद्रा में अधिक अच्छी तरह ध्यान लगने का लाभ देखते हैं। आराम कुर्सी का सहारा लेकर शरीर को ढीला छोड़ते हुए नादानुसन्धान में अधिक सुविधा अनुभव करते हैं। कान बन्द करने के लिए ठीक नाप के शीशियों वाले कार्क का प्रयोग कर लिया जाता है। इनमें से किससे, किसे, कितनी सरलता एवं सफलता मिली यह तुलनात्मक अभ्यास करके जाना जा सकता है। इनमें से जिसे जो प्रयोग अनुकूल पड़े वह उसे अपना सकता है। सभी उपयोगी एवं फलदायक है।
तपश्चर्या की महत्ता के वर्णन-दिग्दर्शन की दृष्टि से शास्त्रकारों ने कहा है कि ईश्वर भी तप के ही प्रभाव से सृष्टि-रचना में समर्थ हुआ है-
यः पूर्व तपसो जातमद्म्यः पूर्वमजायत्। गुहा प्रविश्य तिष्ठनतं यो भूतेभिर्व्यपष्यत्-एतद्वैतत क॰ 2,1,6
अर्थात् उस परमेश्वर ने सर्वप्रथम तप किया। उस तप के श्रमस्वेद से जल उत्पन्न हुआ।
सोऽकामयत्। बहुस्याँ प्रजायेयेति। स तपोऽतप्यत्। स तपस्त्वप्त्वा इद सर्वमसृजत यदिकिच। सत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशित्-तैत्तरीय ब्रह्मवल्ली 6
अर्थात् उस परमात्मा ने प्रकट होने की इच्छा की। उस हेतु तप किया। तप की शक्ति से जगत रचा और उसी में प्रविष्ट हो गया।
तस्मै स होवाच प्रजाकामो वे प्रजापतिः से तपोऽतप्यत् स तपस्तप्त्वा स मिथुनवमुत्पादयते। ययिं च प्राणं चेत्येतौ में बहुधा प्रजाः करिष्यत इति ।4।
आदित्यो ह वै प्राणो रयिवेव चन्देमा रयिर्वा एतत् सर्व यन्भूर्त चामूर्त च तस्मान्मूर्तिरेव रयि-प्रश्नोपनिषद् 1।4।5
अर्थात् प्रजा उत्पन्न करने की कामना वाले प्रजापति ने तप किया। तप द्वारा प्राण और रयि ये दो तत्त्व उत्पन्न किये। संसार में जो मूर्तिमान् है, वह प्राण है और जो अमूर्तिमान् है वह रयि है।
तपश्चचार प्रथममराणं पितामहः। आविर्भूतास्ततो वेदाः साँगोपाँगपदक्रमाः-मत्स्य पुराण
अर्थात् सर्व प्रथम तो देवों के पितामह ने तप किया। तब सब वेदों का आविर्भाव हुआ, जो अपने अंग शास्त्र उपांग तथा पद एवं क्रम से संयुक्त थे।
अथैष ज्ञानमयेन तपसा चीपमानोऽकामयत बहुस्याँ प्राजायेयेति। अथैतस्मात् तप्यमानात् सत्यकामात् भीण्यक्षराण्य जायन्त। तिस्त्रो व्याहृतयस्त्रिपदा गायत्रीं वेदास्त्रयो देवास्त्रयों वर्णास्त्रयोऽनयश्च जायन्ते-शांडिल्योपनिषद् 3।1
ब्रह्म ने ज्ञानमय तप से वृद्धि प्राप्त की ।तब एक से अनेक होने की इच्छा की और इस हेतु पुनः तप किया। तब तीन अक्षर, तीन आवृत्ति, त्रिपदा गायत्री, तीन वेद, तीन देव, तीन वर्ण, तीन अग्नि प्रकट हुए।
स्पष्ट है कि तप साधना ही शक्ति और सिद्धि का माध्यम एवं स्रोत है। ईश्वर द्वारा तप के ये वितरण स्पष्ट करते हैं कि मनुष्य के लिए अभीष्ट उपलब्धियों का यही एकमात्र मार्ग है।
दूध तपाया जाता है, तो मलाई और घी निकलता है। धातुएँ तप कर बहुमूल्य रसायन एवं भस्म बनती है। सामान्य अन्न तपाये जाने पर स्वादिष्ट आहार बनता है। कच्ची मिट्टी तपाने पर दृढ़ पाषाण बन जाती है। कच्चा लोहा पक कर इस्पात बनता है। स्वर्ण अग्नि संस्कार द्वारा आभामय हो जाता है।
तपता हुआ सूर्य अपनी आत्मा और ऊष्मा से समस्त विश्व में प्राण वर्षा करता हुआ ग्रह-परिवार को अपने साध बाँधे रहता है। हिमालय की बरफ तप कर गंगा यमुना का प्रवाह बनती है। खारा और भारी सागर जल तप कर हलके मीठे जल वाले बादल बन जाता और दूर-दूर की यात्राएँ करता है।
व्यायामशाला में तपने वाला पहलवान, खेतों में तपस्या करने वाला किसान और पाठशाला का तपस्वी ही विद्वान् बनता है। मूर्तिकार का तप अनगढ़ पत्थर को प्रतिमा की और चित्रकार का तप फलक और रंग के अस्त व्यस्त संयोग को चित्र की गरिमा देता है।
लौकिक जीवन हो या आध्यात्मिक, पुरुषार्थ, श्रम, साहस, मनोयोग की ड़ड़ड़ड़ बनाते हैं। तप ही सम्पूर्ण प्रगति का आधार है देवताओं के वरदान तपस्वियों को ही सुलभ होते हैं। भिखारियों को नहीं भारतीय धर्मशास्त्र व पुराण तप की महत्ता के वर्णनों से भरे पड़े है। ऐतिहासिक महामानवों, ऋषियों, तत्त्वदर्शियों, देवदूतों की प्रसिद्धि और सिद्धि का आधार तप का प्रकाश ही रहा है। मनुष्य की अन्तर्निहित दिव्य शक्तियाँ तपस्या द्वारा ही प्रकाशित होती है। कठोर पुरुषार्थ द्वारा समुद्र मंथन किया गया, तभी 14 रत्न प्राप्त हुए। देवताओं को तप द्वारा ही गौरवशाली पद प्राप्त हुए। भौतिक उन्नति के लिए प्रचण्ड पुरुषार्थ, अखण्ड मनोयोग, अनवरत श्रम और असीम साहस की आवश्यकता है। आध्यात्मिक प्रगति के लिए तो और अधिक मूल्य चुकाना ही पड़ता है। तप द्वारा ही आध्यात्मिक शक्तियाँ और सिद्धियाँ आज तक उपलब्ध होती आई है और भविष्य में भी वही एकमेव मार्ग रहने वाला है।
भृगु ने कहा-ब्रह्म का ज्ञान कराइए तब वरुण बोले-तप के द्वारा ब्रह्म को जानों तप ही ब्रह्म है। यह सुनकर भृगु तप करने चले गये।
अवीहि भगवो ब्रह्मोति। तं होवाच ब्रह्म विजि सासस्व । तपो ब्रह्मेति।स तपोऽतप्तवा-तैत्तिरीय भृगुवल्ली
बीज तप कर वृक्ष बनता है, नर तप कर नारायण बनता है। पुरुष से पुरुषोत्तम और आत्मा से परमात्मा बनने का यही मार्ग है।
तपोमूलमिदं सर्व यन्माँ पृच्छसि क्षत्रिय। तपसा वेदविद्वाँसः परंत्वमृतमाप्नुयुः-महा भारत
अर्थात् हे राजन ! तुम जिस तपस्या के विषय में मुझसे पूछ रहे हो वही सारे जगत का मूल है। वेदवेत्ता विद्वान् तप द्वारा ही परम अमृत को, मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
तपसा र्स्वगगमन भोगो दानेन जायते। ज्ञानेन मोक्षो विज्ञयस्तीर्थस्नानादधक्षयः॥
अर्थात् तप से स्वर्गलोक में जाने का सौभाग्य प्राप्त होता है। दान से भोगों की प्राप्ति होती है। ज्ञान से मोक्ष मिलता है तथा तीर्थस्थान से पापों का क्षय होता है।
मनु ने भी कहा है-
अद्धिर्गात्राणि शुद्धयन्ति, मनःसत्येन शुद्धयति। विद्या तपोभ्याँ भूतात्मा, बुद्धिर्ज्ञानेन शुद्धयति॥
अर्थात् शरीर जल से और मन सत्य से शुद्ध होता है। आत्मा विद्या एवं तप शुद्ध होती है तथा बुद्धि ज्ञान से।
न विद्यया केवलया तपसा चाऽपि पात्रता। यत्र वृत्तमिमे चोभे तद्धि पात्रम्प्रचक्षते-स्कन्द
अर्थात् न केवल विद्या से और न ही केवल तपश्चर्या से पात्रता हुआ करती है। जहाँ सच्चरित्रता है और ये दोनों (तप और विद्या) भी विद्यमान् है, वहीं वस्तुतः पात्र है।
तपसा स्वर्गमवाप्नोति-अत्रि
तप से ही स्वर्ग मिल सकता है।
तपस्विनः पूजनीयाः-याज्ञवल्क
तपस्वी पूजनीय होते हैं।
चेत्युच्चतं एतदप्यक्त नातपस्कस्यात्मज्ञानेऽधिगमः कर्मशुद्धिर्वेत्येव हयाह। तपसा प्राप्यते सत्वं सत्वात् संप्राप्यते मनः मनसा प्राप्यते त्वत्मा, हयात्मापत्या निवर्तते-मैत्रायण्युपनिषद् 4,3
अर्थात् तपश्चर्या बिना आत्मा में ध्यान नहीं लगता। न कर्म शुद्धि ही होती है। तप से सत्व प्राप्त होता है। सत्व (ज्ञान) से मन का निग्रह होता है। मन स्थिर होने पर आत्मा की प्राप्ति होती है और बन्धन छुट जाते हैं।
इसीलिए अथर्ववेद में कहा गया है-
अग्ने ! तपस्तप्यामह अपतप्यामहे तपः। श्रुतानि श्रृण्वन्तो वयम् आयुष्मन्तः सुमेधरुः-अथर्व 7,62,2
हे अग्निदेव ! हम तप रहें। प्रचण्ड तप से हम तपते रहें तथा सद्बुद्धि सम्पन्न और दीर्घजीवी बनें।
यदग्ने तपसा तप, उपतप्यामहे तप। प्रियाः श्रुतस्य भूयास्मा, डऽयुष्मन्त सुमेधरुः-अथर्व 7,61,1
हे देव ! हम आपकी कृपा से तप करेंगे। तीव्र तप करेंगे विद्वान् और तपस्वी होकर हम जिएँ।
ऋषीन्तपस्वतो यमतपोजाँ अभिगच्छतात्-अथर्व 18,2,15
तप से उत्पन्न, तपश्चर्या करते हुए ऋषियों को शरण में जाओ
भद्रमिच्छत् ऋषयः स्वर्विदस्तपों दीक्षः मुपनिषेदुरग्रे। ततो राष्ट्र बलमोजश्च जात तदस्यै देवा उपसंनमन्नु-अथर्व ॰ 19,41,1
उन शिव संकल्पी ऋषियों ने व्रतों में दीक्षित होकर तप का अनुष्ठान किया। इससे राष्ट्र का जन्म हुआ। तप द्वारा ही उन्होंने इस राष्ट्र में बल और ओज का विकास किया। आइये, तप के द्वारा हम सब भी इस सामर्थ्य का सम्वर्धन करें।
तपश्चर्या के बहिरंग कलेवर का प्रयोजन समझा जाना आवश्यक है। मात्र तप के लिए तप नहीं किया जाता। वैसा होने पर तो यह शारीरिक उत्पीड़न की मूर्खता मात्र ही मानी जाएगी आत्मपीड़न एक अपराध ही है। यदि लक्ष्य का ध्यान रहे तो तप आत्मपीड़न ही कहे जायेंगे
वस्तुतः तप साधना के बहिरंग उपचारों, व्यायामों का लक्ष्य है आदर्शवादी जीवन प्रक्रिया को सहज रीति से अपना सकने का अभ्यस्त बन जाना। नीति, न्याय से उपार्जित धन की मात्रा सीमित ही रहती है। आजीविका के निर्वाह के साथ ही उसी में से सत्प्रयोजनों हेतु भी एक अंश निकालना होता है। सीमित आजीविका और ऊपर से परमार्थ प्रयोजनों का अतिरिक्त भार ये दो कारण आदर्शवादी को प्रायः औरों की तुलना में आर्थिक दृष्टि से तंगी में ही रखते हैं। विलासिता का व्यसन तो अत्यधिक धन साध्य है। अनीतिपूर्वक उपार्जित कर निष्ठुर संकीर्णता के साथ उसे अपनी ही इन्द्रिय लिप्साओं को तुष्ट करने हेतु लगाने के लिए सुरक्षित रखने की प्रवृत्ति ही विलासी रहन सहन के उपयुक्त होती है। अन्यथा उस हेतु पर्याप्त पूँजी जुट ही नहीं जुटती। इसीलिए आदर्श वादी व्यक्ति को आरम्भ से ही मितव्ययिता एवं सादगी का अभ्यस्त होना पड़ता है। “सादा जीवन उच्च विचार” इसीलिए अध्यात्म का प्रथम सिद्धान्त माना गया है। पूर्वाभ्यास द्वारा मनोभूमि एक शारीरिक स्थिति अनुकूल बन जाने पर आदर्शवादी को धारा के प्रतिकूल चलने पर उत्पन्न कठिनाइयाँ क्लेशमय नहीं प्रतीत होती। तपश्चर्या के अभ्यासों के प्रमुख प्रयोजनों में से यह भी एक है।
साथ ही लोकार्पित जीवन-दृष्टि सदा ही औरों के प्रति भी संवेदनशील होती है तथा समाज की पीड़ा और पतन के प्रति उदासीन नहीं रहती। परमार्थ और श्रम लगाने के साथ साथ जरूरी होता है। तपश्चर्या का उद्देश्य अपनी सीमित नीति उपार्जित आजीविका का एक अंश सहज भाव से परमार्थ प्रयोजनों हेतु लगा सकने की मनोभूमि तैयार करना भी है।
व्रत, उपवास आदि का अभ्यास स्वल्प, सस्ते, सादे भोजन में ही सन्तुष्ट हो जाने की वृत्ति तो दृढ़ करता ही है, नमक, शक्कर, मसाले आदि की स्वादिष्टता के प्रति इन अभ्यासों के कारण आकर्षण न रह जाने पर इन्द्रिय लिप्सा को नियन्त्रित करने की भूमिका भी शुरू हो जाती है। अस्वाद व्रत ब्रह्मचर्य व्रत में सहायक है। ब्रह्मचर्य का तप-साधनाओं में विशिष्ट स्थान है। राई-रत्ती वासना का क्रमशः इतना विस्तार होता जाता है कि मनुष्य की सम्पूर्ण शक्ति उसी में व्यय होती जाती है, फिर भी तनिक भी सन्तोष प्राप्त नहीं हो पाता। कामुकता की प्रेरणा, पत्नी ढूँढ़ने की प्रेरणा बन जाती है। पत्नी, बच्चे और परिवार का आधार बनती है। बच्चों के उत्तरदायित्व गर्दन तोड़ कर रख देते हैं। अपनी शत प्रतिशत शक्ति इसी जंजाल में झोंकते रहने पर भी सन्तोषजनक स्थिति को परिवार व्यवस्था जुट नहीं पाती और अन्त में मनुष्य रोता कलपता इस संसार से एक गहरी विफलता की टीस मन में लिए विदा होता है। यदि कामुकता पर नियन्त्रण रखा जा सके, तो जीवन की उस अनन्त सम्पदा का स्वामी बना जा सकता है जिसकी आजीवन परिवार के कोल्हू में पीसते हुए एक एक बूँद तेल निकालते हुए गृहस्थी का दीपक जलाये रहना होता है। यह सम्पदा आत्म कल्याण एवं विश्व-कल्याण के लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक हो सकती थी। ब्रह्मचर्य जैसे तप-अभ्यास यही महान् प्रयोजन पूरा करते हैं।
वाणी समय का तप, समाज में सद्भाव वृद्धि और उसके द्वारा सत्प्रयोजन की पूर्ति में सहायक बनता है। मौन आदि का अभ्यास यही सुफल लाता है। आत्मिक ऊर्जा का संचय भी मौन का सत्परिणाम होता है।
निरुद्देश्य तप व्यर्थ होते हैं। शरीर को बलिष्ठ बनाने का लक्ष्य लेकर निर्धारित रीति व क्रम से व्यायाम करने पर अभीष्ट परिणाम होता है, किन्तु अत्युत्साह के आवेश में किन्हीं निश्चित व्यायाम, अभ्यासों को ही चमत्कारी मान बैठा जाए और सब कुछ भूलकर उन्हीं में जुट जाया जाए, तो शरीर का बलिष्ठ होना तो दूर, अनेक शारीरिक कष्ट अवश्य पैदा हो सकते हैं। व्यायाम मात्र शारीरिक बल की अर्जन विधि नहीं है। आहार विहार, रहन सहन का भी तद्नुरूप होना जरूरी है। ठीक यही भूल तप-साधनाओं के अभ्यास में भी हो जाती है। किसी साधना प्रक्रिया मात्र को चमत्कारी मान बैठने से लाभ तो सम्भव नहीं, समय शक्ति और बुद्धि विवेक का अपव्यय तथा क्षरण अवश्य होता है।
ब्रह्मचर्य, व्रत, उपवास, शीत-जल स्नान, धूप-आतप सहना, धूनी तापना, नंगे पाँवों चलना, देर तक खड़े रहना, कठोर आसन लगाकर बैठना, कम सोना, सवारी का उपयोग न करके पैदल चलना, स्वल्प वस्त्र धारण करना, केश न कटाना, मौन रहना, भूमिशयन, नमक, शक्कर आदि के स्वादों का त्याग जैसे क्रिया-कलाप जो तप कहे जाते हैं, इन्हीं प्रयोजनों की पूर्ति के लिए है इन उपचारों को करने वाले तपस्वी कहे जाते हैं। तपस्वी के प्रति सहज ही लोक श्रद्धा उमड़ती है। सुख-सुविधाओं के सरंजाम जुटाने में संलग्न लोगों की भीड़ में इनसे विरक्त रहकर स्वतन्त्र निर्णय शक्ति और प्रवाह के प्रतिकूल चलने की सामर्थ्य का परिचय देना स्वाभाविक ही आकर्षण और श्रद्धा का कारण बन जाता है।
लेकिन यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि निजी जीवन में इन तप-साधनाओं का बहिरंग अभ्यास मात्र विशेष उपयोगी नहीं। अपनी सम्पदाओं और विभूतियों का विस्तार करके उन्हें लोक मंगल के लिए समर्पित करते हुए सृष्टि उद्यान को अधिक सुरम्य समुन्नत बनाना ही मानवीय जीवन की सार्थकता है। कठोरताओं को सहन करने का अभ्यास मात्र पर्याप्त नहीं। इस अभ्यास के आधार पर लोक जीवन में मनुष्य की सुख लिप्सा तथा उन लोगों का तो तप-साधना से कोई वास्ता नहीं माना जाना चाहिए, जो अपने पहाड़ जैसे परिग्रह में से राई रत्ती दान करते रहने का प्रदर्शन करते रहते हैं अथवा अपनी निरंकुश विलासिता की निष्ठुर पशु-चेष्टाओं को अनदेखा बनाने के लिए छोटे छोटे अनुष्ठानों में शारीरिक कष्ट सहने का प्रदर्शन करते रहते हैं। वस्तुतः वे आत्म-प्रवंचक और ठग है। तपस्वी होने का तो प्रश्न ही नहीं।
तप साधना से निखरा व्यक्ति अनिवार्य निर्वाह के अतिरिक्त अपनी समस्त सम्पत्तियाँ और विभूतियाँ लोककल्याण के लिए समर्पित कर देता है। यही प्रभु समर्पित जीवन है। ऐसा जीवन जीने वाला ही तपस्वी तथा देवोपम सिद्ध पुरुष कहलाने का अधिकारी है।
माँसमूत्रपुरीशास्थिनिर्मितेऽस्मिन्कलेवने। विनश्वरे विहायास्थाँ यशः पालय मित्र में॥
हे मित्र! माँस, मल-मूत्र तथा हड्डी से बने हुए विनाशी शरीर में आस्था को छोड़कर मेरे यश को बढ़ाओ।
यह संसार कर्म व्यवस्था के आधार पर चल रहा है। भगवान् ने दुनिया बनाई और उसके सुसंचालन के लिए कर्म विधान रच दिया। जो जैसा करता है। वह वैसा भोगता है, सिद्धान्त अकाट्य है। लोग भ्रम में इसलिए पड़ते हैं कि कई बार कर्मों का तत्काल फल नहीं मिलता। उसमें विलम्ब हो जाता है। यदि शुभ अशुभ कर्मों का फल तत्काल मिल जाया करता तो फिर दूरदर्शिता, विवेकशीलता की आवश्यकता ही न पड़ती। आग छूने से हाथ जल जाता है इस प्रत्यक्ष तथ्य के कारण कोई आग में हाथ डालने की मूर्खता नहीं करता। किन्तु सुकृतों और दुष्कृतों का परिणाम तत्काल नहीं मिलता। उसके परिपाक में देरी हो जाती है। इतने में ही बाल बुद्धि के लोग आदी हो जाते हैं। पुण्य के सम्बन्ध में निराश और पाप के सम्बन्ध में निर्भय हो जाते हैं। जो करणीय है उसे छोड़ बैठते हैं और जो न करना चाहिए उसे करने लगते हैं। यही है वह माया जिसके बन्धनों में जकड़े हुए लोग दिग्भ्रान्त होते, भूलभुलैया में उलझते तथा भटकावों में खिन्न, उद्विग्न बने दिखाई पड़ते हैं।
आज का जमाया हुआ दूध कल दही बनता है-आज का बोया बीज बहुत समय में वृक्ष बनता है-आज का अध्ययन, व्यायाम, व्यवसाय आज ही कहाँ फल देता है, परिणाम में देर लगने पर बालक निराश हो सकते हैं, पर विचारशील लोग अपनी निष्ठा विचलित नहीं होने देते और आशा, विश्वास के साथ काम करते रहते हैं। असंयम बरतने पर उसी दिन शरीर रुग्ण नहीं हो जाता-जिस दिन चोरी की जाय, उसी दिन जेल भुगतनी पड़े ऐसा कहाँ होता है? तो भी समझदारी सुझाती है कि कल नहीं, परसों परिणाम मिलकर ही रहेगा। यही दूरदर्शिता सत्कर्म, दुष्कर्मों के सुनिश्चित परिणाम को ध्यान में रखते हुए अपनाई जानी चाहिए। पर लोग भ्रमग्रस्त होकर कर्मफल के सम्बन्ध में विश्वास छोड़ बैठते हैं। इसी इनकार को वास्तविक नास्तिकता कहना चाहिए।
दुष्कर्मों का प्रतिफल कई रूपों में भुगतना पड़ता है। लोक-निन्दा होती है। ऐसे व्यक्ति दूसरों की आँखों में अप्रामाणिक अविश्वस्त ठहरते हैं। उन्हें किसी का सघन विश्वास एवं सच्चा सहयोग नहीं मिलता। श्रद्धा और सम्मान तो उसी को मिलता है, जिसकी प्रामाणिकता असंदिग्ध होती है। जन विश्वास एवं सहयोग के आधार पर कोई व्यक्ति प्रगति करता और सफल होता है। संदिग्ध चरित्र व्यक्तियों को इस लाभ से वंचित रहना पड़ता है। और वे मित्र विहीन एकाकी नीरस जीवन जीते हैं। घनिष्ठता का लाभ तो उन्हें स्वजनों से भी नहीं मिलता। वे भी सदा आशंका की ही दृष्टि से देखते हैं और दिखावे का सहयोग दे पाते हैं। आत्म प्रताड़ना का दुरूह दुःख ऐसे ही लोगों को सहना पड़ता है। दूसरों को झुठलाया जा सकता है, वह दुष्कर्मों से स्वयं खिन्न रहती है। आत्म धिक्कार से आत्मबल निरन्तर गिरता जाता है।
समाज तिरस्कार, असहयोग, विरोध, उपेक्षा से प्रत्यक्ष हानि है। जिसके ऊपर घृणा और तिरस्कार बरसता है। उसके अन्तरात्मा को पत्थर बरसने से भी अधिक अन्तः पीड़ा सहनी पड़ती है। धन छिन जाना उतनी बड़ी सहनी पड़ती है। धन छिन जाना उतनी बड़ी हानि नहीं है जितना कि विश्वास, सम्मान और सहयोग चला जाना। दुष्कर्मों का यह सामाजिक दण्ड हर कुमार्गगामी को भुगतना पड़ता है। पाप और पारा छिपता नहीं। वह फुट फुटकर देर सवेर में बाहर निकलता ही है। सत्कर्म छिप सकते हैं, दुष्कर्म नहीं।
हींग की गन्ध कई थैलियों में बन्द करके रखने पर भी फैलती है और दुष्कर्मों की दुर्गन्ध हवा में हम तरह उड़ती है कि किसी के छिपाये नहीं छिपती। समाज दण्ड असहयोग बहिष्कार के रूप में तो बरसता ही है। कई बार वह प्रतिशोध और प्रत्याक्रमण के रूप में भी सामने आता है। लोग अनीति के विरुद्ध उबल पड़ते हैं तो दुरात्मा का कचूमर ही निकाल कर रख देते हैं।
राजदण्ड की व्यवस्था इसीलिए है कि दुष्कर्मों की आवश्यक रोक थाम की जा सके और अनीति बरतने वालों को उनकी करतूतों का मजा चखाया जा सके। पुलिस, कचहरी बल र्फोसों आदि की शासकीय दण्ड व्यवस्था का अस्तित्व मौजूद है। चतुरता बरतने पर भी लोग अक्सर उसकी पकड़ में आ जाते हैं और आर्थिक शारीरिक, मानसिक दण्ड भुगतते हैं। बदनामी सहते और नागरिक अधिकारों से वंचित होते हैं।
इतने पर भी पीछा नहीं छूटता शारीरिक व्याधि और मानसिक व्याधि उन्हें घेरती है और तिल-तिल करके रेतने, काटने जैसा कष्ट देती है। शरीर पर मन का अधिकार है। अचेतन मन के नियन्त्रण में आकुंचन-प्रकुञ्चन निमेष-उन्मेष श्वास-प्रश्वास रक्त-संचार ग्रहण विसर्जन आदि अनेकों स्वसंचालित समझी जाने वाली गतिविधियाँ चलती है। चेतन मन की शक्ति से ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ काम करती है। शरीर तभी तक जीवित है जब तक उसमें चेतना का अस्तित्व है। प्राण निकलते ही शरीर सड़ने और नष्ट होने लगता है। चेतना का केन्द्र संस्थान मस्तिष्क है। मन के रूप में ही हम चेतना का अस्तित्व देखते एवं क्रिया कलाप का अनुभव करते हैं। यह संस्थान-मनोविकारों से पाप ताप एवं कषाय−कल्मषों से विकृत होता है तो उसका प्रभाव शारीरिक आरोग्य पर भी पड़ते हैं और मानसिक सन्तुलन पर भी। नवीनतम वैज्ञानिक शोधों का निष्कर्ष यह है कि बीमारियों का केन्द्र पेट या रक्त में न होकर मस्तिष्क में रहता है। मन गड़बड़ाता है तो शरीर का ढाँचा लड़खड़ाने लगता है। बीमारियों की नित नई शोध होती है और उनके लिए अपने दिन एक से एक प्रभावशाली उपचार ढूँढ़े जाने की घोषणाएँ होती है। अस्पताल तेजी से बढ़ रहे है और चिकित्सकों की बाढ़ आ रही है। आधुनिकतम उपचार भी खोजे जा रहे है, इतने पर भी स्वास्थ्य समस्या का कोई उपयुक्त समाधान निकल नहीं रहा है। तात्कालिक चमत्कार की तरह दवाएँ अपना जादू दिखाती है पर दूसरे ही क्षण रोग अपना रूप बदल कर नई आकृति में फिर सामने आ खड़े होते हैं। ह स्थिति तब तक बनी ही रहेगी जब तक कि मानसिक विकृतियों के फलस्वरूप नष्ट होने और अगणित रोग उत्पन्न होने के तथ्य को स्वीकार नहीं कर लिया जाता।
न केवल शारीरिक वरन् मानसिक रोगों की भी इन दिनों बाढ़ आई हुई है। सिरदर्द, आधाशीशी, जुकाम, अनिद्रा, उन्माद, बेहोशी के दौरे आदि तो प्रत्यक्ष और प्रकट मस्तिष्कीय रोग है। चिन्ता, भय, निराशा, आशंका, आत्म हीनता जैसे अवसाद और क्रोध, अधीरता, चंचलता, उद्दण्डता, ईर्ष्या द्वेष, आक्रमण जैसे आवेग मन संस्थान को ज्वार-भाटों की तरह असन्तुलित बनायें रहते हैं। फलतः मानसिक क्षमता का अधिकांश भाग निरर्थक चला जाता है। एवं अनर्थ बुनने में लगा रहता है। अपराधी दुष्प्रवृत्तियों से लेकर आत्म हत्या तक की अगणित उत्तेजनाएँ विकृत मस्तिष्क के उपार्जन ही तो है। तरह की सनकों से कितने ही लोग सनकते रहते हैं और अपने तथा दूसरों के लिए संकट खड़े करते हैं। दुर्व्यसनों और बुरी आदतों से ग्रसित व्यक्ति अपना तथा अपने साथियों का कितना अहित करते हैं, यह सर्वविदित है। पागलों की संख्या तो संसार में तेजी के साथ बढ़ ही रही है। मनोविकार ग्रसित, अर्धविक्षिप्त लोगों की गणना की जाय तो आधी से अधिक जनसंख्या इसी चपेट से आई हुई दिखाई पड़ेगी शारीरिक रोगों का विस्तार भी तेजी से हो रहा है। दुर्बलता और रुग्णता से सर्वथा अछूते व्यक्ति बहुत ही स्वल्प संख्या में मिलेंगे। जिन्हें शारीरिक एवं मानसिक रोगों से सर्वथा मुक्त-पूर्णनिरोग कहा जा सके, ऐसे लोगों को ढूँढ़ निकालना इन दिनों अतीव कठिन है।
‘एटम एण्ड सोल’ ग्रंथ की सुप्रसिद्ध लेखिका श्रीमती जे0 सी0 ट्रस्ट, एक क्रान्तिकारी धार्मिक सन्त के रूप में प्रख्यात रही है। उनने न केवल आत्मसत्ता का प्रतिपादन किया है, वरन् यह भी बताया है कि दुष्कर्मों की परतें किस प्रकार आत्मा को पतित और अविकसित स्थिति में डाले रहने का कारण बनती है। उनने शारीरिक और मानसिक रोगों के उपचार की अपनी निजी पद्धति को विकसित किया और लाभ पहुँचाया। अपने जीवन काल में उन्होंने असंख्यों को रुग्णता से मुक्ति दिलाई और ऐसे रोगी अच्छे किये जिन्हें असाध्य घोषित कर दिया गया था उनके उपचार में पापों का प्रकटीकरण और उनका प्रायश्चित ही प्रमुख विधान था। मन की दुराव, ग्रंथियाँ खोल देने पर मनुष्य अपने आपको बहुत हलका अनुभव करता है और न केवल मानसिक भार से वरन् रोगों के कष्ट से भी छुटकारा प्राप्त कर लेता है।
रंगाई से पूर्व धुलाई आवश्यक है। यदि कपड़ा मैला कुचैला है तो उस पर रंग ठीक तरह न चढ़ेगा। इस प्रयास में परिश्रम, समय और रंग सभी नष्ट होंगे। कपड़े को ठीक तरह धो लेने के उपरान्त उसकी रंगाई करने पर अभीष्ट उद्देश्य पूरा होता है। ठीक इसी प्रकार आध्यात्मिक प्रगति के लिए की गई साधना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए उन अवरोधों का समाधान किया जाना चाहिए जो दुष्कर्मों के फलस्वरूप आत्मोत्कर्ष के मार्ग में पग-पग पर कठिनाई उत्पन्न करते हैं। दीवार बीच में हो उसके पीछे बैठा हुआ मित्र अति समीप रहने पर भी मिल नहीं पाता। कषाय कल्मषों की दीवार ही हमें अपने इष्ट से मिलने में प्रधान अवरोध खड़ा करती है।
उपासना का समुचित प्रतिफल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि आत्म शोधन की प्रक्रिया पूर्ण की जाय। यह प्रक्रिया प्रायश्चित विधान से ही पूर्ण होती है। हठयोग में शरीर शोधन के लिए नेति-धोति वस्ति, न्यौली, वज्रोली, कपाल भाँति क्रियाएँ करने का विधान करना पड़ता है। भोजन बनाने से पूर्व चौका, चूल्हा, बर्तन आदि की सफाई कर ली जाती है। आत्मिक प्रगति के लिए भी आवश्यक है कि अपनी गतिविधियों का परिमार्जन किया जाय। गुण, कर्म, स्वभाव को सुधारा जाय और पिछले जमा हुए कूड़े-करकट का ढेर उठाकर साफ किया जाय। आयुर्वेद के काया कल्प विधान में वमन, विरेचन, स्वेदन, स्नेहन आदि कृत्यों द्वारा पहले मल शोधन किया जाता है तब उपचार आरम्भ होता है। आत्म-साधना के सम्बन्ध में भी आत्म शोधन की प्रक्रिया काम में लाई जाती है।
प्रायश्चित विधानों ड़ड़ड़ड़ड में भरे पड़े है। ड़ड़ड़ड़ड के बगीचे से बिना पूछे ड़ड़ड़ड़ड उतने राजा के पास जाकर ड़ड़ड़ड़ड दण्ड व्यवस्था कराई और उसे ड़ड़ड़ड़ड रखने वाली आँखों को ही नष्ट कर लिया था इस पर वे सूरदास बने। सती ने शिव जी का आदेश न माना और वे बिना बुलाये पिता गृह चली गई। भूल में समझ में आने पर उनने आत्म हत्या कर ली। धृतराष्ट्र और गान्धारी ने अपनी यह भूल स्वीकार की कि उनने अपने पुत्रों को अनीति से रोकने में आवश्यक कड़ाई नहीं बरती और महाभारत का महाविनाश उत्पन्न हो गया। दोनों ने प्रायश्चित तप करने की ठानी और वे मरण पर्यन्त वनवास में रहकर तपश्चर्या करते रहे। कुन्ती ने भी अपनी भूले स्वीकार की और वे भी धृतराष्ट्र गान्धारी की सेवा करने तथा अपना तप करने के लिए उन्हीं के साथ बन चली गई। भूलें मात्र कौरवों की ही नहीं उसमें जुआ खेलने और पत्नी को दाँव पर लगाने जैसे अनेक दोष पाण्डवों के भी थे, अस्तु उन्हें भी हिमालय में शीत से गल कर प्राण त्यागने का प्रायश्चित विधान अपनाना पड़ा।
भीष्म शरशय्या पर पड़े थे। मृत्यु सामने थी। उनने प्रयत्न किया कि मृत्यु टल जाय और वे उसी कष्टकर स्थिति को देर तक सहन करें ताकि अनीति समर्थन के पाप का प्रायश्चित सम्भव हो सके। बाल्मीकि पहले डाकू थे पीछे ईश्वर भक्ति के मार्ग पर चले। इस परिवर्तन बेला में उनने पापों का प्रायश्चित करने के लिए तप साधना को आवश्यक समझा। वर्णन है कि वे अविचल साधना को आवश्यक समझ। वर्णन है कि वे अविचल साधना में बैठ गये। उनके शरीर पर दीमक ने धर बना लिया। ब्रह्म जी ने आकर दीमक छुड़ाई और पाप मुक्ति का वरदान दिया। इसी घटना के आधार पर उनका नाम बाल्मीकि पड़ा बाल्मीकि संस्कृत में दीमक को कहते हैं। ऐसी ही कथा सुकन्या की है। उसने महर्षि च्यवन के तप संलग्न शरीर पर जमी हुई मिट्टी को मात्र टीला समझा और उसमें से चमकती आँखों को कोई अद्भुत वस्तु। जानने की दृष्टि से आँख वाले छेदों में लकड़ी डाली तो आंखें फूट गई और रक्त बहने लगा। सुकन्या को जब इस अनर्थ का पता लगा कि उसकी भूल से कितनी बड़ी दुर्घटना हो गई इसका अनुमान लगाया तो निश्चय लिया कि वह उनकी सेवा आजीवन करेगी और अपनी आँखों का ही नहीं पूरे शरीर का लाभ उन्हें देगी। आग्रहपूर्वक सुकन्या च्यवन ऋषि की पत्नी बनी और उसके इस प्रायश्चित तप से न केवल च्यवन को आरोग्य प्राप्त हुआ वरन् सुकन्या का यश भी अमर हो गया।
अंगुलिमाल ने चोरी, डाके से मुँह मोड़कर बुद्ध की शरणागति प्राप्त की। साथ ही प्रायश्चित रूप दुष्कृत्यों से कमाया धन धर्मप्रचार के लिए समर्पित कर दिया। अम्बपाली भी इसी राह पर चली। भक्ति मार्ग पर चलने का निश्चय करने के साथ ही उसने न केवल वेश्यावृत्ति छोड़ी वरन् उस आधार पर कमाई हुई विपुल सम्पदा भी बौद्ध विहारों के लिए दान कर दी। ऐसा ही प्रसंग पिंगला वेश्या का है। उसने भी भक्ति मार्ग अपनाने के साथ साथ जीवन परिवर्तन की वास्तविकता सिद्ध करने के रूप में प्रायश्चित किया था और अपना उपार्जन सत्कर्म में लगाया था सम्राट अशोक ने भी यही किया था। उन्हें ‘चण्ड’ कहा जाता था। चण्ड अर्थात् क्रोधी। उनने अपने यौवन काल में अनेकों क्रूर-कर्म किये थे। जब मुड़े बदले तो उन्होंने साधु की तरह निर्वाह रीति अपनाई और अपनी समस्त राज्य सम्पदा बौद्ध-धर्म के प्रचार कार्य में लगा दी। इस प्रकार के सर्वमेध की प्रेरणा उन्हें सम्राट हर्षवर्धन के चरित्र से मिली थी। कुमारिल भट्ट ने प्रायश्चित्त स्वरूप ही अपने शरीर को अग्नि धूम्र में नष्ट किया था।
मोटे तौर से चोरी, व्यभिचार, छल, क्रूरता आदि को ही पाप समझा जाता है और जिनने वैसा कुछ नहीं किया है वे अपने आपको निर्दोष निष्पाप मानते हैं। यहाँ यह समझने योग्य है कि अपराधों की श्रेणी में गिने जाने वाले दुष्कर्म तो सामाजिक पाप है। आत्मिक पाप उससे भिन्न है जिन्हें लोग अनुभव तक नहीं करते। जीवन सम्पदा ईश्वर प्रदत्त विशुद्ध अमानत है जिसे इस विश्व उद्यान को सुरम्य, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने के लिए दिया गया है। यदि उस पुण्य प्रयोजन की उपेक्षा की गई है और पेट प्रजनन की पशु प्रवृत्तियों में ही उसे बर्बाद कर दिया गया है तो यह प्रत्यक्ष परब्रह्म परमात्मा की अवज्ञा है। उसे रुष्ट करने वाली ब्रह्म हत्या है। इसी प्रकार यह भी समझा जाना चाहिए कि मात्र मनुष्य योनि ही एक ऐसी है जिसमें आत्म कल्याण का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। अपूर्णता को पूर्णता में बदल सकना- बन्धन से मुक्त हो सकना-नरक से निकल कर स्वर्ग में प्रवेश कर सकना मनुष्य योनि में बन पड़ने वाले पुरुषोत्तम, अणु से विभु, आत्मा से परमात्म बन सकने का अवसर एक असाधारण, अनुपम सुअवसर है। इस सौभाग्य को उन प्रयोजनों में लगाया जाना ही बुद्धिमत्ता है जिनके सहारे आत्मोद्धार सम्भव होता है। यदि इस दिशा से विमुख रहा जाय-वासना तृष्णा की लोभ, मोह की क्षुद्र प्रवृत्तियों में उलझे रहकर हेय जीवन बिताया जाय तो समझना चाहिए कि यह एक प्रकार से आत्मघात ही हुआ। इसे तात्त्विक आत्म हत्या भी कहा जा सकता है।
ब्रह्म-हत्या और आत्म-हत्या के पातकों को सर्वोपरि बताया गया है। चोरी, ठगी आदि सामाजिक पापों से उनका वजन बहुत भारी है। तद्नुरूप दण्ड भी अन्य सब पातकों से इनका अधिक है। जिनने अपराध वर्ग में गिने जाने वाले दुष्कर्म नहीं किये है उन्हें अपने को निर्दोष नहीं मान बैठना चाहिए, वरन् यह देखना चाहिए कि जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग करके वे आत्म कल्याण और ईश्वर सन्तोष का आधार बना रहे है या नहीं। यदि नहीं तो, फिर निर्दोष कहाँ रहे? आत्म हनन और ब्रह्म हनन के अपराधों से छुटकारा पाने के लिए प्रत्येक आत्मिक प्रगति के इच्छुक को अपनी दिशा धारा में आमूलचूल परिवर्तन करना होता है। उच्चस्तरीय प्रायश्चित इसी आधार पर सम्भव हो सकता है।
प्रायश्चित्त के लिए तीर्थयात्रा प्रक्रिया का निर्धारण अपनी साधना के अंतर्गत रखा गया है, इस एक ही प्रक्रिया की पाँच महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ है-पापों का प्रायश्चित (2) सद्ज्ञान प्रसार-ब्रह्मदान का पुण्य संपादन (3) धर्म धारणा से ओत-प्रोत जीवनयापन की तपश्चर्या (4) जनमानस परिष्कार के युग परिवर्तन आधार की पूर्ति (5) तीर्थयात्रा परम्परा के वास्तविक स्वरूप का पुनरुद्धार इन पुण्य प्रयोजनों का संयुक्त स्वरूप सम्मिलित करते हुए हमें धर्म प्रचार मंडलियों के रूप में चिर प्राचीन एवं चिर जीवन-साँस्कृतिक अभियान का सूत्र-पात्र करना चाहिए। ब्रह्म वर्चस साधना तपश्चर्या का यह एक अति महत्त्वपूर्ण अंग रहना चाहिए।
तप साधना के विभिन्न प्रयोग विभिन्न समय में होते रहे है। व्यक्तिगत त्याग तितीक्षा-धार्मिक जीवन से आत्म-शोधन का उद्देश्य पूरा होता है। साथ ही यह प्रक्रिया परमार्थ प्रयोजन के साथ जुड़ी रहे तो दूना लाभ है। परमार्थ में सद्ज्ञान संवर्द्धन-धर्म प्रचार सर्वोपरि है। इसके प्रभाव से सामान्य मनुष्य भी ऋषि कल्प बन सकते हैं। दोष, दुर्गुणों से मुक्ति पाकर गुण, कर्म, स्वभाव की श्रेष्ठता प्राप्त कर सकना मनुष्य जीवन की सार्थकता और सुख-शान्ति का प्रधान आधार है। तीर्थयात्रा यदि उद्देश्य पूर्ण रीति-नीति अपनाकर योजनाबद्ध रूप से सम्पन्न की जाये तो उससे इन तीर्थयात्रियों को-उनके संपर्क में आने वालों को-तथा देश धर्म, समाज, संस्कृति के प्रत्येक पक्ष को समर्थ बनने का आशातीत लाभ मिल सकता है।
तीर्थ अर्थात् श्रद्धा। यात्रा अर्थात् प्रगति। श्रद्धा, सद्भावना, आत्मीयता, शालीनता, चरित्र-निष्ठा समाजनिष्ठा जैसी सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन के लिए किये गये पदयात्रा प्रयासों को सच्चे अर्थों में तीर्थयात्रा कह सकते हैं। इस यात्रा से स्वास्थ्य सुधारक, सात्विक, मनोरंजन अनुभव अभिवर्धन, जन-संपर्क परिचय-विस्तार ड़ड़ड़ड़ दृष्टिकोण का विकास जैसे अनेक लाभ मिलते हैं। ड़ड़ड़ड़ ही उन सत्प्रवृत्तियों के विकास विस्तार का अवसर मिलता है जिनके ऊपर मानवी गरिमा की आधारशिला रखी हुई है। इस महान् परम्परा में घुस पड़ी विकृतियों का निराकरण और उसके वास्तविक रूप का प्रस्तुतीकरण करके वस्तुतः हम अपनी महान् संस्कृति की असाधारण सेवा करते हैं।
ब्रह्म वर्चस साधना के अंतर्गत गायत्री की उच्चस्तरीय साधना करने वालों को आत्म-शोधन और परमार्थ संचय के उभय पक्षीय उद्देश्य से कुछ समय के लिए तीर्थयात्रा पर निकलने का कार्य-क्रम बनाना चाहिए। प्रायश्चित की यह सर्वोत्तम प्रक्रिया है। इस साँस्कृतिक महान् परम्परा का वास्तविक स्वरूप प्रस्तुत करने और उसे अभिनव प्रचलन का रूप देने में यह यात्राएँ धर्म को एक अभिनव मार्ग दर्शन कर सकती है।
यह तीर्थयात्रा मण्डलियाँ अपने अपने परिचित कार्य क्षेत्रों में निकालना सरल है। यों उन्हें अपरिचित क्षेत्रों तक ले जाने और व्यापक बनाने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं है, पर भाषा, प्रथा, परम्परा आदि से परिचित रहने के कारण सुविधा परिचित क्षेत्रों में ही रहेगी। प्राचीन ऐतिहासिक स्थानों को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए। संयोग वश कोई दर्शनीय स्थान रास्ते में आते हो तो वहाँ विराम रखने में कोई हर्ज नहीं। पर महत्त्व पिछड़े क्षेत्रों में उपयोगी सद्ज्ञान वर्षा को ही दिया जाना चाहिए। लक्ष्य को प्रधानता दी जाय-दर्शनीय या ऐतिहासिक स्थानों को नहीं
तीर्थयात्रा पर एकाकी निकलने से न तो सुविधा रहेगी और न उद्देश्य सधेगा। इसलिए मंडली बनाकर ही चलना चाहिए। ड़ड़ड़ड़ दो पर्याप्त हैं शेष सहायक रहें। सेवाभावी, परिश्रमी, सद्गुणी और अनुशासन प्रिय सभी को होना चाहिए। दुर्गुणी व्यक्ति धर्म प्रचारकों की भूमिका नहीं निभ सकेंगे जहाँ जायेंगे वहाँ स्वयं निन्दति होगे, टोली का उपहास करावेंगे, इसलिए चुने और परखे लोगों को लेकर ही चलना चाहिए न्यूनतम चार-पाँच और अधिकतम दस की मण्डली हो सकती है। सभी के पीत वस्त्र रहें। धर्म प्रचारक तीर्थ यात्रियों की एक निश्चित एवं निर्धारित ऐसी पोशाक होनी चाहिए जो धर्म प्रचारकों के लिए उपयुक्त हो यात्रा पैदल हो। आवश्यक सामान साथ ले चलने के लिए साइकिल या बैलगाड़ी का उपयोग हो सकता है। भारत की 70 प्रतिशत जनता छोटे देहातों में रहती है। उन तक पहुँचने के लिए ऐसे ही भारवाही साधन चाहिए जो कच्चे रास्तों पर चल सकें। टट्टू या गधे से भी काम चल सकता है। जहाँ जैसी सुविधा हो वहाँ वैसा प्रबन्ध कर लेना चाहिए। जितने दिन की यात्रा निकलनी हो, उसको ध्यान में रखते हुए विराम स्थल बनाने चाहिए। जहाँ से चला जाय वहीं वापिस लौट आने के लिए इस प्रकार कार्यक्रम बनाना चाहिए कि जाना एक रास्ते और लौटना दूसरे रास्ते हो। यह कार्यक्रम पहले से ही बन जाने पर उन स्थानों के निवासियों को इस आगमन की पूर्व सूचना दी जा सकती है। इससे ठहरने एवं वहाँ के निवासियों से संपर्क बनाने की पूर्व व्यवस्था रह सकेगी।
भोजन का भार किसी पर न डाला जाय। अपना प्रबन्ध साथ रखकर चला जाय। कहीं अति आग्रह हो तो उसे अस्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है। पर सामान्यतया कहीं यह अनुभव नहीं होना चाहिए कि यह लोग पेट भरने के लिए निकले है। इसलिए सामान में भोजन पकाने के उपकरण तथा राशन साथ रहना चाहिए। खाने वालों की रुचि और पकाने की सरलता का तालमेल बिठाते हुए यह व्यवस्था ऐसी रहनी चाहिए जिसमें समय और धन कम खर्च हो। पकाने की कला टोली वालों को आनी चाहिए और किस स्थिति में इस संदर्भ में किस प्रकार क्या कर लेना चाहिए? इसकी स्पष्ट रूप रेखा मस्तिष्क में रहनी चाहिए। पहनने, बिछाने-ओढ़ने के वस्त्र, पूजा उपकरण, प्रचार साधन, रस्सी बाल्टी खाने पकाने के बर्तन, साबुन मंजन जैसी दैनिक उपयोग की सामग्री पहले से ही सम्भाल लेनी चाहिए। मार्ग व्यय की व्यवस्था धर से ही करके चलना चाहिए ताकि कहीं याचना की आवश्यकता न पड़े माँग जाँच प्राचीन काल में तो उचित थी, पर आज की परिस्थिति में वैसा करने से मण्डली का आधा सम्मान अश्रद्धा में बदल जाएगा
टोली का दैनिक कार्यक्रम प्रातः नित्यकर्म से निवृत्त होकर चल पड़ना होना चाहिए। अगले पड़ाव तक जो गाँव रास्ते में पड़ने वाले हो, उनके गली, मुहल्लों में गीत गाते, शंख बजाते, धर्म फेरी लगाना आवश्यक है। इन गीतों में नवयुग का सन्देश, उद्बोधन भरा रहे। जो लोग रास्ते में मिलें उन्हें अन्तिम स्थान पर एकत्रित होने के लिए साथ साथ बुलाते भी चलें। जो इकट्ठे हो जाय उन्हें छोटे से प्रवचन में तीर्थयात्रा और उसके इस स्वरूप का-यात्रा उद्देश्य का-परिचय दिया जाय। इसी उद्देश्य के लिए छपी ‘पेमोपहार’ पुस्तिकाएँ वितरित की जाय या बेची जाय वितरण कर्ताओं का नाम छपा देने से यह पुस्तिकाएँ मुफ्त में भी दिये जाने के लिए पर्याप्त संख्या में मिल सकती हैं। धर्म फेरी-अन्त में प्रवचन के साथ साथ रास्ते के गाँवों में दीवारों पर आदर्श वाक्यों का लेखन क्रम भी चलना चाहिए, इसके लिए गेरू का रंग ब्रश आदि साथ रखा जाय। एक दिन में न्यूनतम पाँच मील और अधिकतम दस मील की यात्रा रखी जाय। रास्ते में कितने गाँव पड़ते हैं। और उनमें कितनी देर रुकना होता है, इसे ध्यान में रखते हुए ही यह निर्धारित किया जाना चाहिए कि हर दिन कितने मील चलना है। यह दूरी स्थिति के अनुरूप न्यूनाधिक भी हो सकती है। पर उसका निर्धारण पहले ही कर लेना चाहिए ताकि विराम स्थल पर ठीक समय पर पहुँचा जा सके।
विराम स्थल पर पहुँचने पर आने आगमन की सूचना उस गाँव में धर्म फेरी घुमाते और शंख बजाते हुए करनी चाहिए। साथ ही भोजन व्यवस्था बनाने पर जुट पड़ना चाहिए। कुछ लोग धर्म फेरी में चलें, कुछ भोजन प्रबन्ध करे ऐसा भी हो सकता है। भोजन दिन में एक बार ही बनाया जाय। दूसरे समय के लिए बनाकर रख लिया जाय। जाय ताकि आवश्यक समय व्यर्थ बर्बाद न हो। यह कार्य प्रातःकाल यात्रा आरम्भ करते समय भी पूरा किया जा सकता है। प्रातः या सायं जब भी सुविधा हो एक बार ही भोजन बनाने का क्रम चलाना चाहिए। वाहन यदि बैल घोड़ा आदि है तो उसके लिए चारा माँगा भी जा सकता है। जहाँ ड़ड़ड़ड़ या उपेक्षा दिखे वहाँ वह भी खरीद लेना चाहिए।
तीर्थयात्रा मण्डली कितने दिन चलनी है। इसी आधार पर विराम स्थानों की, राशन की, खर्चे की उन गाँवों में पूर्व सूचना पहुँचाने की व्यवस्था करनी चाहिए। उन गाँवों में पर्चे, पोस्टर पहुँचाने-कपड़े के बड़े बड़े पोस्टर गली, चौराहों पर लटकाने का भी प्रबन्ध हो सके तो स्थानीय जनता टोली की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा भी करेगी और प्रस्तुत कथा प्रवचन में भाग भी देगी।
रात्रि को विराम स्थान पर प्रायः ढाई घण्टे का प्रचार कार्यक्रम रखा जाय। इसके लिए उपयुक्त स्थान एवं रोशनी, लाउडस्पीकर, बिछावन, मंच आदि का प्रबन्ध पहले से ही कर लिया जाय। लाउडस्पीकर साथ लेकर चला जाय। सहगान कीर्तन एवं कथा यह दो कार्यक्रम रहने चाहिए। संगीत ज्ञाता हो तो बाजे, ढोलक आदि का प्रबन्ध कर लिया जाय। अन्यथा बिना उसके भी कीर्तन हो सकता है। कथा की दृष्टि से उत्तर भारत में रामायण की भी कथा कही जा सकती है। रामचरित्र एवं कृष्णचरित्र में वे सभी आधार मौजूद है जिन्हें नवयुग के अवतरण को ध्यान में रखते हुए उभारा जा सकता है। कीर्तन कथा शैली, वाक्य लेखन, धर्म फेरी एवं तीर्थ यात्रा के समय यात्रियों के नियम कर्त्तव्य आदि से भली प्रकार अवगत होने की दृष्टि से यात्रा मण्डली निकलने से पूर्व ही उसका प्रशिक्षण एवं रिहर्सल कर लिया जाय। इसकी व्यवस्था ब्रह्म वर्चस आरण्यक में भी रखी गई है।
जहाँ लम्बे समय की यात्राएँ सम्भव न हों। वहाँ एक सप्ताह या जितना सम्भव हो उतना समय सुविधानुसार निकाला जा सकता है। गर्मी के दिनों में प्रायः सभी का अवकाश रहता है। किसान, छात्र, अध्यापक तो प्रायः उन दिनों छुट्टी ही मनाते हैं। ऐसे लोग उन दिनों का उपयोग तीर्थयात्रा में कर सकते हैं। यह धर्म प्रचार के साथ-साथ खासा पिकनिक भी है। साप्ताहिक अवकाश में दुकानें, दफ्तर कारखाने सभी बन्द रहते हैं। उस एक दिन का उपयोग भी इस कार्य के लिए किया जाता रहे तो साल में 52 दिन तीर्थयात्रा के लिए मिल सकते हैं। बड़े नगरों को एक पूरा प्रचार क्षेत्र ही माना जा सकता है। उसके गली मुहल्लों को ही गाँव मानकर बहुत दिन तक उसी क्षेत्र में परिभ्रमण करते रहा जा सकता है। इस प्रकार दूसरी, तीसरी फेरी होती रह सकती है। इस प्रकार बड़े शहरों में तीर्थयात्री उतने क्षेत्र में लगी हुई देहातों को सम्मिलित करके ऐसा कार्यक्रम बना सकते हैं जिसमें धर छोड़ने, भोजन व्यवस्था करने एवं छुट्टी लेने की भी आवश्यकता न पड़ेगी काम पर जाने से पूर्व के प्रातः कालीन तीन घण्टे और काम से लौटने के बाद के तीन घण्टे इस प्रकार छः घण्टे हर दिन लगाने पर यह तीर्थयात्रा वहाँ निरन्तर जारी रखी जा सकती है। दोनों समय के लिए सम्भव न हो तो सायंकाल का समय तो बहु ही सरलतापूर्वक मिल सकता है। कुछ काम तो सवेरे भी हो सकते हैं।
एकाकी स्थानीय तीर्थयात्रा तो हर किसी के लिए ही स्थिति में सम्भव हो सकती है। झोला पुस्तकालय हाथ में लेकर अपने परिचितों के यहाँ जाय जाय और उन्हें मिशन की पुरानी पत्रिकाएँ एवं पुस्तक देने, वापिस देने का क्रम चलाया जाय। चल पुस्तकालय की धकेल गाड़ी लेकर गली, मुहल्लों और बाजारों में जाया जाय। साहित्य पढ़ाने, वापिस लेने एवं बेचने का क्रम रखा जाय। दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन करते रहा जाय यह कार्य ऐसे है जो एकाकी-समीपवर्ती क्षेत्र में अत्यन्त सरलता पूर्वक किये जा सकते हैं। इन्हें भी हलकी तीर्थयात्रा का ही एक स्वरूप माना जा सकता है। महत्त्व समझा जाय और आवश्यक साहस संकल्प हो तो तीर्थयात्रा का पुण्य फल सम्पादित करना ही स्थिति के हर व्यक्ति के लिए सम्भव हो सकता है। जिन्हें अवकाश न हो वे पैसा देकर अपने स्थान पर अन्य यात्रियों को इस प्रयोजन के लिए भेजने की व्यवस्था बना सकते हैं।
गायत्री उपासना के तीन चरण है-(1) नित्य कर्म, सन्ध्या वंदन (2) संकल्पित अनुष्ठान पुरश्चरण (3) उच्चस्तरीय योग साधना। नित्य कर्म को अनिवार्य धर्म कर्तव्य माना गया है। आये दिन अन्तःचेतना पूरे वातावरण के प्रभाव से चढ़ते रहने वाले ड़ड़ड़ड़ अंकुश लगता है।
संकल्पित पुरश्चरणों से प्रसुप्त चेतना उभरती है और फलतः साधक ओजस्वी, मनस्वी, तेजस्वी बनता है। साहस और पराक्रम की अभिवृद्धि आत्मिक एवं भौतिक क्षेत्र में अनेकानेक सफलताओं का पथ-प्रशस्त करती है। विशेष प्रयोजनों के लिए किये गये पुरश्चरणों की सफलता इसी संकल्प शक्ति के सहारे उपलब्ध होती है जिसे प्रतिज्ञाबद्ध, अनुशासित एवं आत्म निग्रह के विभिन्न नियमोपनियम के सहारे सम्पन्न किया जाता है।
नित्य कर्म को स्कूलों की प्राथमिक और पुरश्चरणों को माध्यमिक शिक्षा कहा जा सकता है। जूनियर, हाईस्कूल, मैट्रिक-हायर सेकेन्डरी का प्रशिक्षण माध्यमिक विश्वविद्यालय की पढ़ाई का क्रम आरम्भ होता है। इसे उच्चस्तरीय साधना कह सकते हैं। योग और तप स्तर के साधकों को क्रियान्वित होते हैं। योग में जीव चेतना को ब्रह्म चेतना से जोड़ने के लिए स्वाध्याय, मनन से लेकर ध्यान धारणा तक के अवलम्बन अपनी मनःस्थिति के अनुरूप अपनाने पड़ते हैं। विचारणा, भावना एवं आस्था की प्रगाढ़ प्रतिष्ठापना इसी आधार पर सम्भव होती है। तपश्चर्या के औजारों से जमे हुए कुसंस्कारों को उखाड़ना पड़ता है। तप की अग्नि में तपा कर आत्मसत्ता में आर्द्रता उत्पन्न करना और उसे देवत्व के साँचे में ढालना सम्भव होता है। योग को सृजनात्मक और तप को शोधनात्मक ध्वंसात्मक प्रक्रिया कह सकते हैं। योग को जल और तप की अग्नि की संज्ञा दी जा सकती हैं दोनों के समन्वय से भाप बनती है और उसके बादल बनने से लेकर रेलगाड़ी चलने जैसे असंख्य प्रयोजन हो सकते हैं। उपयोगिता के संवर्धन की तरह अवांछनीयताओं का निवारण भी आवश्यक है। धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश दोनों के समन्वय से ही परिपूर्ण धर्म तत्त्व सामने आता है। उनमें से किसी एक को ही अपनाया जाय तो अपूर्णता ही बनी रहेगी। बिजली के दोनों तार मिलने पर ही तो विद्युत धारा प्रवाहित होती है। आत्मिक प्रगति के लिए योग और तप का अन्योऽन्याश्रित सम्बन्ध है। ज्ञान और कर्म की तरह इस युग्म का भी समन्वय रहना चाहिए। गाड़ी के दोनों पहिये सही होने पर ही सर्वतोमुखी प्रगति रथ गतिशील होता है।
आत्मिक प्रगति के लिए प्रचलित अनेकानेक उपायों और विधानों में गायत्री विद्या अनुपम है। भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने आत्म विज्ञानियों के प्रधानतया इसी का अवलम्बन लिया है और सर्वसाधारण को इसी आधार को अपनाने का निर्देश दिया है। भारतीय धर्म के दो प्रतीक है। शिखा और यज्ञोपवीत दोनों को गायत्री की ऐसी प्रतिमा कहा जा सकता है। जिसकी प्रतीक धारणा को अनिवार्य धर्म चिह्न बताया गया है। मस्तिष्क दुर्ग के सर्वोच्च शिखर पर गायत्री रूपी विवेकशीलता की ज्ञानध्वजा ही शिखा के रूप में प्रतिष्ठापित की जाती। यज्ञोपवीत की गायत्री का कर्म पक्ष-यज्ञ संकेत है। उसकी तीन लड़े गायत्री के तीन चरण और नौ धागे इस महामन्त्र के नौ शब्द कहे गये है। उपासना में संध्या वन्दन नित्य कर्म है। वह गायत्री के बिना सम्पन्न नहीं होता। चारों वेद भारतीय धर्म और संस्कृति के मूल आधार है और उन चारों की जन्म दात्री वेदमाता गायत्री है। वेदों की व्याख्या अन्यान्य शास्त्र पुराणों में हुई है इस प्रकार आर्ष वांग्मय के सारे कलेवर को ही गायत्रीमय कहा जा सकता है। गायत्री और भारतीय धर्म संस्कृति को बीज और वृक्ष की उपमा दी जा सकती है।
यह सर्वसाधारण के लिए भारतीय संस्कृति के-विश्व मानवता के प्रत्येक अनुयायी के लिए सर्वजनीन प्रयोग उपयोग हुआ। गायत्री के 24 अक्षरों में बीज रूप में भारतीय तत्त्व ज्ञान के समस्त सूत्र सन्निहित है। इस महामन्त्र के विविध साधना उपचारों में तपश्चर्या को श्रेष्ठतम आधार कहा जा सकता है। उनमें बाल, वृद्ध रोगी, नर-नारी शिक्षित अशिक्षित सभी के लिए छोटे-बड़े प्रयोग मौजूद हैं सरल से सरल और कठिन से कठिन ऐसे विधानों का उल्लेख हैं। जिन्हें हर स्थिति का व्यक्ति अपनी-अपनी स्थिति एवं पात्रता के अनुरूप अपना सकता है।
यह सर्वजनीन सर्वसुलभ उपचार चर्चा हुई। गायत्री की उच्चस्तरीय साधना से धर्म शास्त्र विकसित होकर ब्रह्म विद्या का तत्त्वदर्शन बन जाता है। वैदिक दक्षिण मार्ग यही हैं। इसके सामान्य और असामान्य दो पक्ष हैं। एक कामकाजी लोगों का गृहस्थोपयोगी चरित्र निष्ठा एवं समाजनिष्ठा का नैतिक सामाजिक प्रशिक्षण । विरक्त स्तर अपनाने वाले साधु ब्राह्मण स्तर के महामानवों के लिए उदात्त विश्व हित के अनुरूप आत्म-विस्तार एवं लोककल्याण का तत्त्वदर्शन । यह चिन्तन प्रक्रिया हुई। शक्ति संवर्धन के लिए व्यक्तिगत जीवन में इन्द्रिय निग्रह एवं मनोनिग्रह के द्वारा अपव्यय के छिद्र बन्द किये जोते हैं। दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन कर सकने योग संकल्प साहस शौर्य एवं पराक्रम उभारना पड़ता है। ड़ड़ड़ड़ तप इसी धुरी के इर्द-गिर्द परिभ्रमण करते हैं। दूसरों की सहायता कर सकने, वातावरण को सुधारने ड़ड़ड़ड़ अवांछनीयताओं को निरस्त करने के लिए भागीरथ दधिची, च्यवन, विश्वमित्र जैसे और विशिष्ट तप करने पड़ते हैं। उनमें उग्रता लानी हो, और संघर्ष उन्मूलन की विशिष्ट आवश्यकता पड़ जाती हैं। उसके लिए उग्र उपचारों का अवलम्बन लेना पड़ता है। ऐसी उग्रता का समावेश तन्त्र साधनाओं में मिलता है। ड़ड़ड़ड़ और निगम दक्षिण ओर वाम मार्ग दोनों ही अपने-अपने ढंग से अपने-अपने उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। ब्रह्मास्त्र, ब्रह्म दण्ड, ब्रह्मास्त्र एवं ब्रह्म तेज का उल्लेख उपयोग प्रायः ऐसे ही प्रयोजनों के लिए होता रहा हैं। गायत्री साधना यों प्रकृतिः सौम्य सतोगुणी हैं, पर आवश्यकतानुसार उसका उपयोग अवांछनीयताओं के उन्मूलन में प्रतिरोध शक्ति की तरह सुरक्षात्मक प्रयोजनों के लिए भी किया जा सकता है।
गायत्री विद्या का ड़ड़ड़ड़ गायत्री उपासना का प्रचारात्मक और साधनात्मक प्रयोग और भी एक बड़ा प्रयास सामूहिक रूप से करने की दृष्टि से ही गत वर्ष साधना धर्मानुष्ठानों के इतिहास में अभूत पूर्व ही समझा जाना चाहिए। एक लाख नैष्ठिक साधकों द्वारा पूरे एक वर्ष तक नियमित एवं अनुशासित रूप से जो सामूहिक गायत्री जप हुआ। इस वर्ष उसका उत्तरार्ध सम्पन्न किया जा रहा हैं। छोटे-छोटे हजारों गायत्री यज्ञों के साथ बड़े-बड़े युग निर्माण सम्मेलनों को जोड़कर नवयुग का सन्देह सुनाने तथा उपयुक्त वातावरण बनाने की दृष्टि से इसे अपने ढंग की अनोखी प्रक्रिया ही समझा जाना चाहिए।
विश्वास किया जाना चाहिए कि साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष अनुपम सामूहिक गायत्री महा पुरश्चरण के सत्परिणाम भी अनोखे ही होंगे। राजनीति के क्षेत्र में जो काली घटाएँ छा गई थीं उन्हें टालने और लोकतन्त्र का सदुपयोग होने की प्रकाश किरणें सामने आई हैं। इसके अतिरिक्त जन-जीवन तथा सामूहिक वातावरण में उत्साह भरे सुख परिवर्तनों की आशा बँध रही हैं। उज्ज्वल भविष्य का अरुणोदय प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होता है। इन सम्भावनाओं के अनेक कारणों का एक कारण ऐसी सामूहिक परिचर्याओं को भी समझा जा सकता है जैसी कि साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष के अवसर पर सम्पन्न की गई। ठीक ऐसा ही एक सामूहिक अनुष्ठान हम लोगों ने बंगाल देश की क्रान्ति के अवसर पर भी किया था। उन दिनों भी ड़ड़ड़ड़ सूक्ष्मदर्शियों ने उस सफलता को आध्यात्मिक शक्तियों के चमत्कार रूप में देखा था। आज दृष्टिगोचर हो रहे परिवर्तनों और भावी सम्भावनाओं के पीछे दैवी शक्तियों का अनुग्रह देखा जा सके तो उसे अमृत वर्षा के लिए पृष्ठभूमि बनाने वाले आधारों में एक अपने स्वर्ण जयन्ती वर्ष के अभूतपूर्व महापुरश्चरण को भी एक गिना जा सकता।
उच्चस्तरीय गायत्री उपासना के प्रति उत्साह उत्पन्न करने-उसके कारण और आधार समझाने तथा व्यावहारिक मार्ग दर्शन ड़ड़ड़ड़ की अपनी आकांक्षा बहुत समय से हो रही हैं जब कि जीवन का कार्यकाल बहुत ही स्वल्प रह गया है तब तो यह और भी आवश्यक हो जाता है कि इस आकांक्षा को पूरा करने के लिए कुछ आधार जल्दी ही खड़ा कर दिया जाय। अन्यथा एक अत्यन्त उपयोगी विज्ञान का परिचय और प्रयोग जानने से लोगों को वंचित ही रह जाना पड़ेगा। ड़ड़ड़ड़ साधनाक्रम का शुभारम्भ, ब्रह्मवर्चस आरण्यक का निर्माण इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया गया हैं साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष की इसे महानतम स्मृति एवं उपलब्धि कहा जाय तो उसमें तनिक भी अत्युक्ति न होगी।
उच्चस्तरीय गायत्री उपासना दो पक्ष है। एक सावित्री दूसरी कुण्डलिनी। सावित्री की प्रतिमाओं में पाँच मुख चित्रित किये गये है। यह मानवी चेतना के पाँच आवरण है। इन्हें पाँच आवरण कह सकते हैं। जिनको उतरते चलने पर आत्मा का असली रूप प्रकट होता है। इन्हें पाँच कोष-पाँच खजाने भी कह सकते हैं। अन्तः चेतना में एक से एक बढ़ी-चढ़ी विभूतियाँ प्रसुप्त अविज्ञात स्थिति में छिपी पड़ी है। इन्हें जगाने पर अंतर्जगत के पाँच देवता जग पड़ते हैं और उनकी विशेषताओं के कारण मानवी सत्ता देवोपम स्तर पर पहुँची हुई जगमगाती हुई दृष्टिगोचर होने लगती है। चेतना में विभिन्न प्रकार की उमंगें उत्पन्न करने का कार्य प्राण, ड़ड़ड़ड़ । अग्नि, वरुण, वायु अनन्त और पृथ्वी यह पाँच तत्त्व, पाँच देवता ही काय-ड़ड़ड़ड़ बिखरे पड़े दृश्यमान पदार्थों और अदृश्य प्रवाहों का संचालन करते हैं। समर्थ चेतना इन्हें प्रभावित करती है। इस विज्ञान को तत्त्व साधना अथवा परतन्त्र विज्ञान’ कहा गया हैं। ड़ड़ड़ड़ उपासना से चेतना पंचक और पदार्थ पंचक के दोनों ही क्षेत्रों को समर्थ परिष्कृत बनाने का अवसर मिलता है। सावित्री साधना यही है। इसका देवता सविता है। सावित्री और सविता का युग्म है। इस उपासना में सूर्य को प्रतीक और तेजस्वी परब्रह्म को ड़ड़ड़ड़ सर्वोपरि शक्ति है।
उच्चस्तरीय गायत्री उपासना की दूसरी प्रक्रिया है कुण्डली। इसे जड़ और चेतन को परस्पर बाँधे रहने वाली सूत्र ड़ड़ड़ड़ प्रकारान्तर से यह प्राण प्रवाह है ड़ड़ड़ड़ की समस्त हलचलों का संचालन करता ड़ड़ड़ड़ और नर नारी अपनी जगह पर अपनी स्थिति में ड़ड़ड़ड़ भी अपूर्ण हैं। इन दोनों को समीप लाने और ड़ड़ड़ड़ में एक अविज्ञात चुम्बकीय शक्ति काम करती रहती है। इसी के दबाव से युग्मों का बनना और प्रजनन क्रम चलना सम्भव होता है। उदाहरण के लिए इस नर और नारी के बीच घनिष्ठता उत्पन्न करने वाले चुम्बकीय धारा प्रवाह को कुण्डलिनी की एक चिनगारी कह सकते हैं। प्रकृति और पुरुष को घनिष्ठ बनाकर उनसे सृष्टि संचार की विभिन्न हलचलों का सरंजाम खड़ा करा लेना इसी ब्रह्माण्ड व्यापी कुण्डलिनी का काम है। व्यक्ति सत्ता में भी काया और चेतना की यहीं तक है कि मस्तिष्कीय विभूतियाँ उत्पन्न होने पर बिजली के झटके पूर्ण अपूर्ण निद्रा उत्पन्न करने वाले उपचार किये जाय मानसिक चिकित्सा के नाम पर कुछ संकेत निर्देश देने की भी परिपाटी है। यह सब अपूर्ण है। मानसिक रोगों में अनैतिक एवं अवांछनीय इच्छाओं लिप्साओं और मान्यताओं को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए और स्वस्थ शरीर की तरह स्वस्थ मस्तिष्क के लिए एक ऐसा समूचा शास्त्र विकसित किया जाना चाहिए जिसमें शिक्षण ही नहीं उपचार भी सम्मिलित हो। योग साधना के कुछ चरण एकाग्रता, ध्यान के सहारे प्रयोग में आने लगे है और उनसे तनाव, रक्त चाप, अनिद्रा जैसे मानसिक रोगों पर अनुकूल प्रभाव देखा जाता है। आवश्यकता इस मानसोपचार को आध्यात्मिक साधनाओं के सहारे इस सीमा तक विकसित करने की है कि उन्मादों एवं सनकों को ही नहीं विकृत चिन्तन प्रवाह एवं अभ्यस्त कुसंस्कारों का परिशोधन भी सम्भव हो सके। चिन्तन और चरित्र को परिष्कृत बना सकने में समर्थ साधना पद्धति ही उपचारात्मक मन शास्त्र कह सकते हैं। विश्व के मूर्धन्य मनोविज्ञानवेत्ता मात्र विवेचनाएँ और व्याख्याएँ कर सके है उसके एक कदम आगे बढ़ कर हमें विकृतियों के निराकरण का कारगर उपाय भी खोजना है। निस्संदेह यह कार्य अब कभी भी सम्पन्न होगा तब उसमें योग साधना के ही आधारों को अपनाना पड़ेगा। मान्यताओं के गहन मर्मस्थल का स्पर्श इसी आधार पर सम्भव हो सकता है। ब्रह्मवर्चस् आरण्यक से इस स्तर की शोधें करने का विचार है। यदि उसमें कुछ कहने लायक सफलता मिली तो समझना चाहिए कि पदार्थ विज्ञान व्यवसाय विज्ञान, शिल्प विज्ञान, शिक्षा विज्ञान-आरोग्य विज्ञान की ही तरह यह अध्यात्म अवलंबी मनोविज्ञान भी विश्व मानव की सर्वोपरि आवश्यकता को पूर्ण कर सकने में समर्थ होगा। इस सफलता के पीछे हम समग्र मानव जाति की एक असाधारण अनुदान दे सकने की आशा अपेक्षा कर सकते हैं।
ब्रह्म वर्चस आरण्यक का नियमित साधना प्रशिक्षण सम्भवतः 1 जुलाई से चलाने की बात सोची गई थी पर इमारत बनने में विलम्ब होने के कारण सम्भवतः वह तिथि कुछ और आगे टलेगी एक कमरे में एक साधक एकान्त चिन्तन मौन आहार तप प्रत्याहार धारणा ध्यान निदिध्यासन, सहित जप हवन वस्तु, मुद्रा, प्राणायाम जल के नाम पर मात्र गंगाजल का उपयोग त्राटक आदि की साधनाएँ साधक की व्यक्तिगत स्थिति को देखते हुए पृथक् पृथक् बताई जायेंगी। हर साधक का एक जैसा क्रम न रहने से उन्हें सामूहिक कराया न जाएगा वरन् हर साधक की साधना उसी की स्थिति के अनुरूप होगी और प्रतिक्रिया को गम्भीरतापूर्वक देखते हुए आवश्यकतानुसार परिवर्तन किये जाते रहेंगे यह सब नये आरण्यक आश्रम में ही सम्भव है। शान्ति कुँज में चल रहें ब्रह्म वर्चस सत्र तो उसकी पूर्वभूमा मात्र है। आरण्यक बन तो रहा है पर आर्थिक कारणों से निर्माण की गति धीमी है। जब भी उसमें निवास की स्थिति बन जाएगी तभी उपरोक्त साधना क्रम आरम्भ कर दिया जाएगा तब तक साधकों के नाम नोट किये जाते रहेंगे और आरम्भ होते ही उन्हें बुलाने में प्राथमिकता रखने के आश्वासन भेजे जाते रहेंगे। बन रहे आरण्यक का निर्माण कार्य जिस दिन में साधकों के रहने योग्य बन जाएगा उसी दिन से निर्धारित प्रशिक्षण चलने लगेगा आशा की जानी चाहिए कि उसमें भी अनावश्यक विलम्ब नहीं लगेगा।
ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में 100 साधकों के लिए स्थान बनाया गया है। यह अस्पताल में भरती होकर विशेष उपचार की तरह है। अपने से सम्बद्ध परिवार में 1 लाख तो वे नैष्ठिक साधक ही है जिनने गत वर्ष स्वर्ण जयन्ती साधना में सम्मिलित रहने का व्रत निबाहा इससे कई गुने वे लोग है जो प्रतिज्ञा बद्ध रूप से तो नहीं पर साधना के नियमित रूप से साधना करते हैं। विचार यह है कि इन्हें भी ब्रह्म वर्चस साधना का आभास कराया जाय। अन्यथा वे पीछे कभी हरिद्वार आते तो रहेंगे, पर वैसा स्वच्छ मार्ग दर्शन शायद कठिन पड़े। इधर हमारी भी इच्छा है कि जिस प्रकार गायत्री साधना की दिशा में प्रोत्साहित करने से लेकर सफल बनाने तक में व्यक्तिगत सहयोग करने में साधकों की सहायता की उसी प्रकार ब्रह्म वर्चस की उच्चस्तरीय साधना में अपना सहयोग सम्मिलित रह सके। इसलिए सोचा यह गया है कि इस अभिनव
*समाप्त*