सर्वतोमुखी प्रगति के दो आधार- अध्यात्म और विज्ञान

अध्यात्म और विज्ञान का युग्म है। एक के बिना दूसरे का निर्वाह नहीं। भोजन पकाने की विधि विदित न हो तो खाद्य सामग्री सामने रहने पर भी सामान की बर्बादी होती रहेगी, किन्तु पेट न भर सकेगा। इसी प्रकार पाक विद्या में निष्णात व्यक्ति भी पदार्थों के अभाव में अपने को असहाय अनुभव करेगा और भूखा मरेगा।

भौतिक जगत के हर क्षेत्र में ज्ञान और विज्ञान को साथ लेकर चलना पड़ता है। जानकारी और सामग्री का समन्वय ही गति चक्र को अग्रगामी बनाता है। आत्मिक जगत में भी यही तथ्य सुनिश्चित है। चिन्तन में उत्कृष्टता और कर्तृत्व में कुशलता का समावेश हुए बिना परिष्कृत जीवन-क्रम का आधार बन ही नहीं सकता। प्रगति चाहे भौतिक हो, चाहे आत्मिक दोनों के ही लिए अपने-अपने स्तर के ज्ञान और विज्ञान की अनुभव और साधन की आवश्यकता रहेगी ही।

आत्मिक प्रगति के लिए भावनाओं में दिव्य संवेदनाओं और उच्चस्तरीय आस्थाओं को विकसित करना होता है। इसी को श्रद्धा और भक्ति कहते हैं। आदर्शवादी-अध्यात्मवादी उत्कृष्ट प्रतिपादनों के प्रति प्रगाढ़ आस्था परिपक्व करना यही अन्तर्जगत् का ज्ञान पक्ष है। इसे तत्त्व दर्शन एवं ब्रह्म ज्ञान कहते हैं। इसे उपलब्ध करने के लिए काम-काजी ‘अकल’ काम नहीं करती, वरन् ऋतम्भरा, प्रज्ञा का आश्रया लेना पड़ता है।

आत्मिक जगत का विज्ञान पक्ष है-आत्मबल-ब्रह्म तेज। संकल्प की प्रखरता और सघन आत्म-विश्वास के आधार पर विकसित प्रचण्ड साहसिकता से उस प्रसुप्त क्षमता को जागृत होने का अवसर मिलता है जिसे इस विश्व की सर्वोपरि सामर्थ्य और सम्पत्ति कहा जा सकता है। आत्मज्ञान और आत्म तेज के समन्वय से ही समग्र अध्यात्म बनता है। दोनों को साथ लेकर चलने से ही सर्वतोमुखी आत्मिक प्रगति का लाभ मिलता है।


आत्मिक प्रगति के लिए साधना की आवश्यकता

यह शरीर जिसे अज्ञानवश सब कुछ मान लिया गया है, आत्मा का वाहन उपकरण मात्र है। पदार्थों के सम्पर्क से उपलब्ध होने वाली सम्वेदनाएँ भी चेतना की सजगता से ही सम्भव होती है। चेतना ही इच्छा, विचारणा और क्रिया के माध्यम से जीवन की विभिन्न गतिविधियों का संचार संचालन करती है। यों जीवित शरीर रहता है, पर जीवन तत्त्व का समस्त आधार चेतना के-आत्मा के -साथ जुड़ा हुआ है।

मनुष्यों की काया संरचना में कोई बहुत बड़ा अन्तर नहीं होता। मनः संस्थान भी लगभग एक जैसे होते हैं। साधनों और परिस्थितियों में थोड़ा बहुत अन्तर तो रहता है, पर यह सब भिन्नताएँ ऐसी नहीं हैं, जिनके कारण मनुष्य-मनुष्य के बीच आकाश-पाताल जैसा अन्तर दिखाई पड़े। रुग्ण, अपंगों एवं बाल-वृद्धों की बात छोड़ दें और मध्यवर्ती लोगों की स्थिति का तुलनात्मक अध्ययन करें तो विदित होगा कि उनमें से कुछ बुरी तरह पिछड़े हुए, अभावग्रस्त और संक्षोभों में जकड़े हुए दुःखित, असन्तुष्ट और विपन्न स्थिति में रह रहे हैं। कुछ ऐसे है जो न दुःखी हैं, न सुखी। न पतित है, न समुन्नत। किसी प्रकार यंत्रवत जी रहे हैं । कुछ ऐसे हैं जिनकी प्रतिभा चमकती है। वे ऊँचा सोचते हैं और ऊँचा करते हैं। अपनी साहसिकता के बल पर वे जिधर भी चलते हैं सफलताएँ छाया की तरह पीछे चलती है । स्वयं श्रेय, सम्मान पाते हैं और अपने प्रभाव क्षेत्र को समुन्नत बनाने की महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐतिहासिक महामानवों की श्रेणी में गिने जाते हैं और दिवंगत हो जाने पर भी अपनी ऐसी अनुकरणीय परम्पराएँ छोड़ जाते हैं, जिनका अनुगमन करते हुए चिरकाल तक असंख्य लोग प्रगति पथ पर अग्रसर होते हैं।

पतित, यांत्रिक और समुन्नत स्तर के मनुष्यों के बीच पाये जाने वाले अन्तर का एकमात्र कारण चेतना की स्थिति में भिन्नता होना ही है। प्रयत्न करने पर शरीर और पदार्थ का सुखद संयोग मिलता है और भौतिक स्थिति समृद्ध बनती है। यही प्रयत्न चेतना को सुसंस्कृत बनाने के लिए किया गया होता, तो निश्चय ही वहाँ भी प्रगतिशीलता दृष्टिगोचर होती-बलिष्ठता और सम्पन्नता का लाभ मिलता। दुर्भाग्य से चेतना के सम्बन्ध में नितांत उपेक्षा बरती जाती है, उस पर छाई हुई तमिस्रा को निरस्त करने का प्रयत्न किया गया होता तो स्थिति कुछ दूसरी ही होती। दैन्य, उद्वेग और सन्ताप निश्चित रूप से आन्तरिक पिछड़ेपन के ही चिह्न हैं। उसी के कारण ईश्वर के सर्वश्रेष्ठ उपहार-मानव जीवन का लाभ नहीं मिल पाता। जिस शरीर के लिए समस्त जीवधारी तरसते हैं उसे पाकर भी यदि मनुष्य दयनीय दुर्दशा का अभिशाप सहता है तो उसे परले सिरे का दुर्भाग्य ही कहना चाहिए।

चेतना का महत्त्व समझा जा सके, उसकी प्रगति और परिष्कृति को जीवन का सच्चा, लाभ, उपलब्धियों का आधार और आनन्द का उद्गम समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि दूरदर्शिता इसी में है कि आत्मिक प्रगति के उस स्वार्थ साधन पर ध्यान दिया जाय जिसे परमार्थ कहा जाता है। आन्तरिक प्रगति में आत्मिक और भौतिक दोनों ही प्रकार के लाभ मिलते हैं जब कि चेतना को, गई-गुजरी स्थिति में पड़े रहने देने पर, मात्र भौतिक सम्पन्नता की बात सोचते रहने पर- व्यक्तित्व के घटिया रहने के कारण पग-पग पर असफलताएँ ही मिलती हैं और असन्तोष, विक्षोभ ही पल्ले बँधता रहता है।

जीवन तत्त्व के स्वरूप और साफल्य पर विचार किया जा सके तो एक ही निष्कर्ष निकलेगा कि सर्वतोमुखी प्रगति और सुस्थिर प्रसन्नता के लिए चेतना को परिष्कृत एवं परिपुष्ट बनाना- भौतिक सम्पन्नता के लिए की जाने वाली चेतनाओं से भी अधिक महत्त्वपूर्ण है। उस दिशा में ध्यान देने ओर प्रयत्न करने से दोनों लोक सधते हैं जब कि उपेक्षा बरतने से छाया हुआ अन्धकार केवल भटकाव ही देता है और ठोकरों पर ठोकरें खाने-रोने-कलपने के लिए एकाकी छोड़ देता है। समझदारी इसी में है कि इस स्थिति का अन्त किया जाय। दूरदर्शिता इसी में है कि जीवन सम्पदा का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर सकने योग्य चेतना का स्तर ऊँचा उठाने में अत्यन्त प्रयत्न किया जाय। जिसने ऐसा सोचा और किया समझना चाहिए कि वही जीवन क्षेत्र का सच्चा कलाकार है । इसी कलाकारिता को आत्म-साधना कहते हैं।

मानव-सत्ता एक छोटी इकाई है। उसका प्रत्यक्ष और परिचित स्वरूप इतना ही छोटा है जिसे श्रमिक, कृषक, शिल्पी, व्यवसायी, बुद्धिजीवी आदि कहा जा सके। उस स्तर का भरपूर उपयोग कर लेने पर भी मात्र सुख-सुविधा के थोड़े से साधन जुटाये जा सकते हैं। दर्प प्रदर्शित करने का थोड़ा बहुत अवसर मिल सकता है और सस्ती वाहवाही की यत्किंचित् गुदगुदी गुदगुदाई जा सकती है। इतना भी नीतिपूर्वक और औचित्य के आधार पर नहीं बन पड़ता। उसके लिए भी निरन्तर कुचक्र रचने और कुकर्म करने पड़ते हैं। इतने प्रयत्न का यदि आधा-चौथाई भी आत्मोत्कर्ष के लिए-चेतनात्मक परिष्कार के लिए किया जा सके तो उसका प्रतिफल कोयले बीनने की तुलना में मोती ढूँढ़ने जैसा उच्चस्तरीय हो सकता है।

आध्यात्म विज्ञान की गरिमा भौतिक विज्ञान से कम नहीं अधिक महत्त्व की ही है। दोनों के लाभों को देखते हुए एक को महान् दूसरे को तुच्छ कहा जा सकता है। शरीर और चेतना की तुलना में श्रेष्ठता आत्मा की ही है। इसी प्रकार लाभों की दृष्टि से भी भौतिक समृद्धि की तुलना में आत्मिक विभूतियों की ही गरीयसी कहा जाएगा। अस्तु विचारणीय यह है कि हम एकांगी प्रगति की बात न सोचें। भौतिक सुविधाओं के साथ-साथ आत्मिक गरिमा बढ़ाने का भी प्रयत्न करें। शरीर की भूख बुझाना उचित है, पर आत्मा को भी क्षुधा, पिपासा से ग्रस्त-त्रस्त नहीं रहने देना चाहिए। इसी सन्तुलित विवेकशीलता का नाम आध्यात्मिकता है। इस अवलम्बन को अपनाकर हम खोते कुछ नहीं, वरन् उभय-पक्षीय लाभ उठाते हैं। भौतिक समृद्धियों और आत्मिक विभूतियों का लाभ उठाना ऐसी बुद्धिमत्ता है जिसे मानवीय गरिमा के उपयुक्त ही कहा जा सकता है।

स्पष्ट है कि पंच भूतों से बने शरीर की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए भौतिक साधनों और शरीरों का सघन सहयोग इकट्ठा करना पड़ता है। ठीक इसी प्रकार आत्मिक प्रगति के लिए उसी स्तर की सम्वेदनाओं, विचारणाओं और शक्ति साधनों से सम्बन्ध बनाना पड़ता है जो विश्वव्यापी चेतना क्षेत्र में बिखरी पड़ी है। जड़ और चेतन की दो सत्ताओं का अस्तित्व सर्वमान्य है। जड़ इन्द्रियगम्य है और चेतना इन्द्रियातीत। एक को स्थूल दूसरे का सूक्ष्म कहते हैं। सूक्ष्म का अर्थ है वह क्षेत्र जो बुद्धि और अन्तःकरण से तो जाना जा सकता है, पर उसकी सिद्धि प्रयोगशाला में नहीं हो सकती। विज्ञानवेत्ता जानते हैं कि इस विश्व में पदार्थ की मूलसत्ता परमाणुओं के रूप में है और शक्ति रूप एवं व्यापक है। यह अपरा प्रकृति है। ताप, ध्वनि, विद्युत की क्षमताएँ सघन होकर पदार्थों के रूप में सामने आती है। भाप, द्रव और ठोस परिस्थितियों पर पदार्थों का रूपान्तरण होता रहता है। उत्पादन अभिवर्धन और परिवर्तन की प्रक्रिया इस प्रत्यक्ष संसार को गतिशील बनाये रहती है। आत्म-विज्ञानी मानते हैं कि इस निखिल विश्व-ब्रह्माण्ड में चेतना का महासागर भरा पड़ा है। जीव सत्ताएँ उसी की लहरें है। जीव के पास जो कुछ है वह व्यापक ब्रह्मतत्त्व का एक छोटा-सा अंश है। बल्ब में बिजली घर के विपुल शक्ति भण्डार का एक नगण्य-सा अंश ही चमकता है। ठीक इसी प्रकार व्यापक ब्रह्माण्डीय चेतना का एक अति स्वल्प भागी ही मनुष्य अपने उपयोग में ला पाता है। आत्मा की अणुसत्ता परमात्मा की विभुसत्ता का स्वल्पाँश है। इसलिए उसकी चेतना शरीर निर्वाह, परिवार पोषण एवं यत्किंचित् सामाजिक प्रभाव उत्पन्न करने तक ही सीमाबद्ध बनी रहती हैं इतना होते हुए भी यह सम्भावना विद्यमान् है कि प्रयत्न पूर्वक उस ससीम को असीम किया जस सके।

बीज देखने में तुच्छ है, पर उसमें सूक्ष्म रूप से विशाल वृक्ष की समस्त संभावनाएँ विद्यमान् है। शुक्राणु तनिक-सा होता है, पर उसमें एक पूरे मनुष्य का शारीरिक, मानसिक ढाँचा सुरक्षित रहता है, परमाणु की स्थिति एक प्रचण्ड सूर्य जैसी है। उपयोग में न आने पर तो तिजोरी में धन भरा रहने पर भी दरिद्रता का दुःख उठाना पड़ सकता है। सुयोग्य व्यक्ति भी अयोग्यों जैसे दुर्दशाग्रस्त पाये जाते हैं। पर यदि उपलब्ध क्षमता का श्रेष्ठ उपयोग हो सके तो लघु में भी महान् का अवतरण हो सकता है। जीव उस ब्रह्म से सम्बन्ध मिला कर यदि आदान-प्रदान कार द्वार खोल सके तो वर्तमान की अपेक्षा अगले ही दिन उसकी स्थिति में भारी सुधार परिष्कार सम्भव हो सकता है। उसकी क्षमता असंख्य गुनी बढ़ सकती है। जीरो नम्बर का बल्ब तनिक-सी रोशनी देता है, पर यदि उसी ‘होल्डर’ में हजार वाट का बल्ब लगा हो तो तार में चलने वाली बिजली उसी अनुपात से अपनी करेंट देना आरम्भ कर देगी। व्यक्तित्व का स्तर बढ़ा लेने पर व्यष्टि चेतना को समष्टि चेतना के अजस्र अनुदान मिल सकते हैं। भौतिक योग्यता बढ़ने पर पारिश्रमिक और पद की वृद्धि होती है। आत्मिक क्षमता बढ़ने पर ब्रह्माण्डीय चेतना के समुद्र से व्यक्ति चेतना की बहुमूल्य उपहार मिलते रहने का क्रम चल पड़ता है। छोटे बैंक यदि रिजर्व बैंक से सम्बद्ध हैं तो आवश्यकतानुसार अपनी क्षमता के आधार पर भारी आदान-प्रदान का लाभ उठा सकते हैं। इसी प्रकार यदि व्यक्ति की आन्तरिक पात्रता एवं क्षमता बढ़ सके तो उसे संव्याप्त ब्रह्म तत्त्व से ऐसे अनुदान मिल सकते हैं जो उसके स्तर को असंख्य गुना सुसम्पन्न बना सकें। अध्यात्म विज्ञान के अंतर्गत साधना विधान की संरचना इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए की गई है।

आत्म-साधना का तात्पर्य है-व्यक्ति चेतना के स्तर को इतना परिष्कृत करना कि उस पर ब्रह्म चेतना के अनुग्रह का अवतरण सहज सम्भव हो सके। यह मान्यता सही नहीं है कि देवता का मनुहार करने पर वे प्रसन्न होते हैं और भक्त को याचक को कृपापूर्वक मनोवाँछित वरदानों से लाद देते हैं। सच्चाई यह है कि आत्म-साधक अपनी पात्रता विकसित करता है और तद्नुरूप पद वृद्धि के साथ जुड़े रहने वाले अनेकों लाभ प्राप्त करता है। नहर जितनी चौड़ी गहरी होती है उसी अनुपान से नदी का जल उसे उपलब्ध होता है। आत्मिक वरिष्ठता बढ़ाने के प्रयास में जितनी सफलता मिलती है उसी आधार पर दैवी अनुदान बरसने आरम्भ हो जाते हैं। वृक्षों का चुम्बकत्व वर्षा के बादलों को बरसने के लिए विवश कर देता है। व्यक्ति चेतना का चुम्बकत्व सूक्ष्म जगत से ऐसी विभूतियाँ पकड़ लेता है जिनके आधार पर वह सामान्य से असामान्य बन सके। नर-पशु के स्तर का जीवनयापन करने वाले लोग जब नर-नारायण के रूप में परिवर्तित हो रहे हों तो उसका कारण आन्तरिक परिवर्तन को ही समक्ष जाना चाहिए। अध्यात्म साधनाओं का उद्देश्य आत्म-परिष्कार ही है।

कृषि कर्म के लिए खाद, पानी, श्रम, औजार आदि का प्रबन्ध करना पड़ता है। व्यवसाय आदि सभी प्रयोजनों के लिए तद्नुरूप साधन जुटाने पड़ते हैं। आत्म-परिष्कार एवं आत्म-विकास के लिए भी साधनों की जरूरत पड़ती है। बिजली घर की बिजली-हमारे घर के पंखे तक ऐसे ही उछल कर नहीं आ जाती, पर इस फासले में सम्बन्ध सूत्र जोड़ने वाले तार बिछाने पड़ते हैं। ब्रह्माण्डीय चेतना के उपयुक्त अनुदान व्यक्ति चेतना को मिल सके इसके लिए दोनों के क्षेत्रों के बीच आदान-प्रदान सम्भव बनाने वाले सूत्र जोड़ने पड़ते हैं। साधना इसी को कहते हैं। आत्मिक सिद्धियों की उपलब्धि साधना के सहारे ही सम्भव होती है।

यह किसी ने कभी नहीं कहा कि शरीर निर्वाह और साँसारिक उत्तरदायित्व के निर्वाह की उपेक्षा की जाय। उसे निबाहने के बिना तो गति ही नहीं। उसे करते हुए आत्मिक प्रगति के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। कठिनाई एक हर है कि अपनी दृष्टि में हम मात्र शरीर हैं अतएव इच्छाएँ, विचारणाएँ एवं क्रियाएँ भी उसी स्तर तक सीमित रखते हैं जो शरीर सुख प्रदान कर सकें। इस असन्तुलन को सन्तुलन में बदला जाना चाहिए और सोचा जाना चाहिए कि शरीर में आत्मा का भी अस्तित्व है। प्रगति का अवसर आत्मा को भी मिलना चाहिए। बाह्य सुविधाओं की तरह यदि आन्तरिक गरिमा का महत्त्व समझा जा सके तो निश्चित रूप से हम आत्मिक प्रगति की उपयोगिता समझेंगे और उसके लाभों को समझते हुए अपना ध्यान और प्रयास उस दिशा में ही नियोजित करने का प्रयत्न करेंगे। जीवन दर्शन पर जितनी गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय उतना ही आत्म-साधना का महत्त्व स्पष्ट होता चला जाता है।


आत्म परिष्कार की साधना दूरदर्शी बुद्धिमत्ता

परिष्कार की प्रवृत्ति सामाजिक क्षेत्र में सभ्यता और आन्तरिक क्षेत्र में संस्कृति कहलाती है। शिल्पी, कलाकार, चिकित्सक, शिक्षक, विज्ञानी, माली आदि वर्गों के लोग अपने श्रम और मनोयोग का उपयोग सृजनात्मक प्रयोजनों के लिए करते हैं। अनगढ़ को सुगढ़ बनाते हैं । यह धरती जिस पर हम रहते हैं, अपने जन्म काल में ऐसी न थी। इसे प्रयत्नपूर्वक वह रूप दिया गया है, जिसमें कि आजकल रह रहे हैं। प्राणियों के जन्म और जीवन की व्यवस्था बन जाने के समय भी यह धरती खार-खण्डों से, झाड़-झंखाड़ों से, जलाशयों, दलदलों और दुर्लघ्य अवरोधों से पटी पड़ी थी। उस पर किसी तरह वन्य जीवन ही जिया जा सकता था। मनुष्य ने अपने संकल्प, श्रम एवं कौशल के आधार पर उसे समतल किया, रास्ते बनाये, कृषि , पशु-पालन औजार, अग्नि, वाहन आदि के उपाय ढूँढ़े और क्रमशः सामाजिकता, शासन, शिक्षा, चिकित्सा, व्यवसाय, सुरक्षा एवं सुविधा-साधनों के आधार खड़े कर दिये। मनुष्य की सृष्टि का मुकुट-मणि होने का लाभ इसी मार्ग पर चलते हुए मिल सका है। यह परिष्कार की प्रवृत्ति ही मानवी गरिमा और प्रगति का सार तत्त्व कही जा सकती है। पशुओं को प्रशिक्षित करके उन्हें अनुपयोगी से उपयोगी बनाया जाता है। सिंह, रीछ, सर्प जैसे हिंसक प्राणी भी सधा लिए जाने पर सरकस में आश्चर्यजनक करतब दिखाते हैं। वे दर्शकों के लिए मनोरंजन का और मालिकों के लिए आजीविका का साधन बनते हैं जब कि वे मूलतः सर्वथा हानिकारक ही होते हैं। विषों को रसायन बना लेने की कला ने आरोग्य क्षेत्र में नये अध्याय जोड़े हैं। होम्योपैथी, आयुर्वेद, एलोपैथी आदि चिकित्सा प्रणालियों में विषों से अमृत जैसे लाभ उठाने का प्रयत्न किया गया हैं इसे संस्कार साध नहीं कह सकते हैं।

मानव-सत्ता इस सृष्टि की सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई है। उसे ईश्वर के बाद दूसरा नम्बर दिया जा सकता है। उसका परिष्कार कर सकना इतना बड़ा प्रयोग है जिसे भौतिक प्रगति के लिए खड़े किये गये आधारों से कम नहीं अधिक ही महत्त्व दिया जा सकता है। प्रकृति जड़ है। पदार्थों में अपनी-अपनी विशेषताएँ तो हैं, पर वे निर्जीव होने के कारण यथास्थिति ही पड़े रह सकते हैं। उनकी सामर्थ्य एवं उपयोगिता को समुन्नत बनाना मानवी प्रयत्नों से ही सम्भव होता है। अस्तु भौतिक साधनों की प्रगति का श्रेय भी अन्ततः मानवी सत्ता को ही जाता है। सुख-सुविधा की साध सामग्री के अतिरिक्त-पारस्परिक सम्बन्धों में सहयोग एवं सद्भाव का होना भी प्रगति तथा सन्तोष का बहुत बड़ा कारण है। यह तभी कार्य मनुष्य उपलब्ध पदार्थों का अपव्यय और दुरुपयोग करके लाभ के स्थान पर हानि उठाते हैं। सम्पर्क क्षेत्र में मनुष्यों में द्वेष दुर्भाव बढ़ाते और कलह के बीज बोते हैं। ऐसी दशा में दुःख-दारिद्रय और शोक-सन्ताप ही गले बँध सकता है। मनुष्य की निजी कुसंस्कारिता उसके लिए पग-पग पर अवरोध खड़े करती है- असहयोग और आक्रोश बटोरती है, विकृत चिन्तन के कारण शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य भी चौपट हो जाता है। ऐसे लोग पिछड़े, असफल, असंतुष्ट और उद्विग्न ही देखे जाते हैं। मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थितियाँ बनती हैं, इस तथ्य को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता। इसके विपरीत जो आत्मसत्ता को जितना परिष्कृत कर लेते हैं वे अपने सुधरे हुए दृष्टिकोण तथा व्यवस्थित क्रिया-कलाप के आधार पर प्रखरता का परिचय देते हैं। सफलताएँ उनकी ओर खिंचती चली आती हैं। सहयोग और सम्मान उन पर बरसता है। स्तर की ऊँचाई के अनुरूप सन्तोष और उल्लास से उनका अंतःक्षेत्र महकता रहता है जिसकी सुगन्ध से वातावरण में उमंगें भरती चली जाती हैं।

बाह्य जगत से उपयुक्त सम्वेदनाएँ उपलब्ध कर सकना अन्तर्जगत् के चुम्बकत्व पर निर्भर है। पदार्थों की उपलब्धि ही समृद्धि नहीं है। इसके लिए सदुपयोग का कौशल भी चाहिए। सम्पर्क क्षेत्र में वंश का रिश्ते का और स्वार्थों के आदान-प्रदान का उतना महत्त्व नहीं जितना सद्-व्यवहार का। बाह्य जीवन में कितनी ही अनुकूलता क्यों न हो, यदि अन्तःजीवन विकृत स्तर का होगा तो दुःखद परिस्थितियों की काली घटाएँ ही सिर पर घुमड़ती रहेंगी। सुखी जीवन के लिए साधनों की आवश्यकता समझी जाती है और सहयोग की अपेक्षा की जाती है, पर यह भुला दिया जाता है कि इन दोनों ही आकांक्षाओं की पूर्ति आन्तरिक उत्कृष्टता के बिना सम्भव नहीं। भीतर ओछापन भरा हो तो समुन्नत परिस्थितियाँ मिल न सकेंगी। यदि संयोगवश अथवा दुष्ट प्रयासों से मिल भी जाय तो भीतर का पिछड़ापन उनका सदुपयोग न कर सकेगा। दुरुपयोग से तो अमृत भी विष बनता है। सुसम्पन्न लोग सुखी दीखते भर हैं, पर वास्तविक समृद्धि तो सुसंस्कृत लोगों के भीतर ही देखी जा सकती है। हँसता-हँसता और हलका-फुलका जीवन जी सकना केवल उन्हीं लिए सम्भव होता है। आनन्द भोगते और आनन्द बाँटते केवल वहीं पाये जायेंगे जिन्होंने अपनी अन्तः स्थिति को परिष्कृत बनाने में सफलता प्राप्त की है।

भौतिक विज्ञान का कार्य, बाह्य जगत में बिखरी पड़ी पदार्थ सम्पदा को तथा अनुकूलता को बढ़ाना है। इस प्रयास की उपयोगिता सहज ही समझी जा सकती हैं। उसे समुचित श्रेय भी मिला है। प्रगति का कौशल प्राप्त करने की इच्छा भी सभी को रहती है और जिससे जितना बनता है उतना प्रयास भी करता है। यह उचित है और बुद्धिमत्ता पूर्ण भी। यहाँ एक ही कमी अखरती है कि आत्म-चेतना का महत्त्व क्यों नहीं समझा जाता? आन्तरिक उत्कृष्टता के कारण उत्पन्न होने वाले लाभों पर विचार क्यों नहीं किया जाता ? आत्म-परिष्कार की उपेक्षा क्यों होती है? प्रगति की बात बाह्य जीवन एवं बाह्य जगत तक ही क्यों सीमित रखी जा रही हैं ? यह क्यों नहीं विचारा जाता कि जड़ से चेतन महत्त्वपूर्ण है। मनःस्थिति ही परिस्थितियों का निर्माण करती हैं । प्रगति के आधार बाहर तो दीखते भर है वस्तुतः उसकी जड़े व्यक्तित्व के अन्तः क्षेत्र से जुड़ी होती है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माण और भविष्य के निर्धारण करने के लिए स्वयं ही उत्तरदायी है। यह मोटे तथ्य भी यदि समझे न जा सकें और आत्म-निर्माण के प्रति उपेक्षा-अन्यमनस्कता छाई रहे तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।

भौतिक विज्ञान ने आश्चर्यजनक प्रगति की है। किन्तु आत्म-विज्ञान बेतरह पिछड़ गया है। इससे सन्तुलन बना नहीं बिगड़ा है। वैभव के साथ-साथ उत्तरदायी दृष्टिकोण भी विकसित होना चाहिए। अन्यथा बन्दर के हाथ तलवार पड़ने पर अनर्थ ही हो सकता है।

आत्म-विज्ञान का महत्त्व प्राचीन काल में समझा गया था। व्यक्ति चेतना में उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्शवादी कर्तृत्व की सघन स्थापना की गई थी। उत्कृष्ट चिन्तन की पृष्ठभूमि बनाने वाले तत्त्व ज्ञान का नाम है-अध्यात्म और आदर्श कर्तृत्व में निष्ठा उत्पन्न करने की प्रक्रिया धर्म कहलाती है। किसी समय अध्यात्म की-श्रद्धा और धर्म की निष्ठा का गहरा आरोपण जन-मानस में करने के ऋषि प्रयास सफल हुए थे और अपने देश के नागरिक देवोपम जीवन जीने और अपनी सम्पर्क भूमि हो ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ बनाने में समर्थ हुए थे। आज एकांगी प्रगति की ललक गगनचुम्बी हो चली है, पदार्थ ही सब कुछ बन गया है। आदर्शवादी आस्थाओं के आधार पर चेतनात्मक परिष्कार की उपेक्षा की जा रही है । इस असन्तुलन से कुरूपता बढ़ रही है और समस्याएँ उलझ रहीं है। इस विषमता का अन्त होना चाहिए। भौतिक विज्ञान की ही तरह आत्म-विज्ञान को भी महत्त्व मिलना चाहिए।

साधना प्रकृति की जा रही है सो ठीक है, पर चेतन पुरुष को भी परिष्कृत प्रगतिशील बनाने की उपयोगिता पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके बिना उज्ज्वल भविष्य का निर्माण हो नहीं सकेगा। इस तथ्य को जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है।


सद्वाक्य

जो अपने आराम, अपने खून, अपनी दौलत का कुछ हिस्सा दूसरों के भले के लिए नहीं देता, वह कंगाल, कठोर व कमीना है।

— जोना बेली


सद्ज्ञान और सत्सामर्थ्य की समन्वित साधना

अपनी आगामी आध्यात्मिक शिक्षा एवं साधना की प्रक्रिया को ‘ब्रह्मवर्चस्’ नाम दिया गया है।

शरीरबल, शास्त्रबल, बुद्धिबल, धनबल, पदबल, संघबल, प्रतिभाबल आदि से सभी परिचित है। उनके उपार्जन एवं उपयोग के संबंध में लोग बहुत कुछ जानते हैं, पर आंतरिक बल की गरिमा का आभास किसी-किसी को ही होता है। इस तथ्य पर तो इन दिनों कदाचित ही कोई विश्वास करता है कि समस्त बल वैभवों की तुलना में बलवती आत्मा की प्रखरता का मूल्य अत्यधिक है। जिसे यह समर्थता उपलब्ध है, उसके लिए प्रगति के दसों द्वार खुले रहते हैं। उसके मार्ग में आने वाले किसी भी अवरोध को निरस्त ही होना पड़ता है।

‘ब्रह्म’ को ज्ञान, ‘वर्चस्’ को विज्ञान कह सकते हैं। ज्ञान और बल परस्पर एकदूसरे के पूरक हैं। ज्ञान को पंगु और बल को अंध कहा जा है, दोनों के संयोग से ही एक समर्थ इकाई बनती है। द्रोणाचार्य ने हाथों में रहने वाले वेद को ‘ब्रह्म’ और कंधे पर रहने वाले धनुष को ‘क्षात्र’ कहा था और अपने इस धारण को ब्रह्मतेज की संज्ञा दी थी। विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को ब्रह्म विद्या और धनुष विद्या की समन्वयात्मक शिक्षा दी थी। प्राचीन गुरुकुलों को समग्र शिक्षापद्धति में ज्ञान और बल की आत्मिक तथा भौतिक समर्थता प्राप्त करने का समन्वय रहा है।

एकाकीपन सदा अधूरा रहता है। गाड़ी एक पहिये से नहीं दो से चलती है। नर और नारी के संयोग से सृष्टि चल रही है। काम करने में दोनों हाथों की और चलने में दोनों पैरों की आवश्यकता पड़ती है। यों गुजारा तो लँगड़े-लूले भी करते हैं, पर पूरा प्रयोजन उभय-पक्षीय समर्थता ही संपन्न करती है। जीव चेतन है और शरीर जड़। एक ब्रह्म का प्रतिनिधि है दूसरा प्रकृति का प्रतीक। दोनों के संयोग से ही जीवन चलता है। वियोग होने पर दोनों की स्थिति लड़खड़ा जाती है। दोनों ही असमर्थ हो जाते हैं। कोई ज्ञानवान दुर्बलता ग्रसित और कोई बलिष्ठ जड़बुद्धि होकर रह रहा हो तो दोनों की सत्ता गई-गुजरी ही समझी जाएगी। अस्तु ज्ञान और बल की उपयोगिता भिन्न-भिन्न प्रकार की होते हुए भी वे परस्पर एकदूसरे के पूरक ही माने जाते हैं।

भारतीय तत्त्वज्ञान के दो भाग हैं- एक निगम दूसरा आगम। ‘निगम’ को वेद पक्ष कहते हैं। आगम को तंत्र पक्ष। निगम में भावना और विचारणा को परिष्कृत करने वाले तथ्य हैं। तंत्र में समर्थता बढ़ाने और उसका विभिन्न उद्देश्यों के लिए प्रयोग करने की विधा समझाई गई है। भगवान् के अवतरण के दो उद्देश्य होते हैं- (1) धर्म संस्थापनार्थाय (2) विनाशायश्च दुष्कृतान्। धर्म की स्थापना ही नहीं अधर्म का नाश भी अवतारों का कार्यक्रम रहता है। एक ही पक्ष को लेकर चलने से बात सर्वथा अधूरी रहेगी। मनुष्य में दैवी और आसुरी-सतोगुणी और तमोगुणी दोनों ही तत्त्व हैं। सतोगुण का संवर्द्धन धर्म धारणा से होता है। असुरता को-तमोगुण से मात्र सद्भाव से परिवर्तित नहीं किया जा सकता, उसे बदलने के लिए दण्ड नीति अपनाये बिना और कोई चारा नहीं। धृष्टता शक्ति की भाषा ही समझती है। विनय तो उसकी दृष्टि में उपहासास्पद दुर्बलता ही प्रतीत होती रहती है। अस्तु ज्ञान के साथ-साथ बल का उपार्जन भी आवश्यक माना गया है।

आत्मबल और भौतिकबल दोनों ही अपनी-अपनी आवश्यकताएँ पूरी करते हैं। शरीर निर्वाह के लिए भौतिक साधन चाहिए। आत्मोत्कर्ष के लिए भाव संवेदनाओं को विकसित होने का अवसर मिलना चाहिए। न तो भूखा भजन कर सकता है और न पेटू को आत्म शान्ति मिल सकती है। रात और दिन की तरह, सरदी-गरमी की तरह, नमक-शक्कर की तरह, अन्न-जल की तरह ज्ञान और बल का युग्म है। एक की सार्थकता दूसरे के बिना हो नहीं सकती। मध्य काल में अहिंसा का अतिवाद गगनचुंबी बना, फलतः मध्य एशिया से दस्युओं का एक दल भारत पर चढ़ दौड़ा और देखते-देखते इस विशाल देश को पैरों तले रौंद डाला। यदि प्राचीन काल की तरह ज्ञान और कर्म का-दया और पराक्रम का समन्वय सँजोकर रखा गया होता तो वैसी दुर्दशा देखने को न मिलती । माली को पौधों में खाद, पानी लगाने के अतिरिक्त वन्य पशुओं से बगीचे की रखवाली का प्रबंध करना पड़ता है। पौधों की वृद्धि अक्षुण्ण बनी रहे इसके लिए वह खरपतवार को उखाड़ता भी तो रहता है। उद्यान को सुरम्य बनाने के लिए कुशल माली को बेतुकी टहनियों की काट-छाँट भी करनी पड़ती है। अध्यापक एक आँख प्यार की और दूसरी सुधार की रखता है। इस परस्पर विरोधी किन्तु साथ की पूरक नीति को अपनाकर ही विद्यालय में अनुशासन बनाए रख सकना संभव होता है।

ब्रह्मवर्चस् की शिक्षा एवं साधना उभय-पक्षीय है उसमें आत्मिक और भौतिक प्रगति के लिए समग्र साधन-पद्धति को प्रश्रय दिया गया है। भक्ति की अपनी महत्ता है, पर शक्ति की भी तो उपेक्षा नहीं की जा सकती। शक्ति शिवपत्नी है। कहा गया है कि शक्ति के बिना शिव ‘शव’ मात्र रह जाते हैं, प्रकृति के बिना पुरुष के अस्तित्व का प्रकटीकरण ही नहीं हो सकता ।

पिछले दिनों यह समन्वयात्मक ताल-मेल भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्र में बिगड़ गया। न वैभव पर विवेक का अंकुश रहा और न धर्म ने अपनी सुरक्षा के लिए सामर्थ्य का सम्पादन किया। न भावना पर विवेक का नियंत्रण रहा और न बुद्धि ने भावनाओं का वर्चस्व स्वीकार किया।

ब्रह्मवर्चस् प्रशिक्षण का दृष्टिकोण एवं कार्यक्षेत्र व्यापक है। व्यक्ति और समाज का समग्र विकास उसे अपेक्षित है। चिंतन में उत्कृष्टता और कर्तृत्व में आदर्शवादिता के समन्वय के लिए तत्परतापूर्वक प्रयत्न किए जाने चाहिए। श्रद्धा और विवेक का जोड़ा ही उस यथार्थवादी सत्य का सृजन करता है, जिसमें हजार हाथी का बल होने की लोकोक्ति है। अपनी शिक्षण प्रक्रिया के अनुसार न संसार को मिथ्या या स्वप्न बताकर अकर्मण्य शुष्क वेदांती बनने की आवश्यकता अनुभव होगी और न वासना, तृष्णा, अहंता में डूबे हुए नर-पामरों के स्तर का जीवन स्वरूप स्वीकार किया जायेगा। हर व्यक्ति कर्मयोगी बनने का प्रयत्न करेगा। उसे भक्ति और शक्ति की उपयोगिता समान रूप से प्रतीत होगी। दया और करुणा की भाव भरी ममता को सम्वेदनाओं में परिपूर्ण स्थान देते हुए उस शौर्य, साहस को शिथिल न होने देना जो कर्त्तव्यपालन के रूप में प्रबल पुरुषार्थ और दुष्टता को निरस्त करने में प्रचंड पराक्रम के रूप में अनिवार्य रूप से आवश्यक है। तत्त्व दर्शन का व्यावहारिक जीवन में उतारने की कुशलता-सामान्य व्यवहार में कलाकार की सौंदर्य साधना का समावेश कैसे संभव है इस जटिलता को सरलता के रूप में प्रस्तुत कर सकने की शिक्षण शैली ब्रह्म वर्चस् द्वारा अपनाई जाएगी। उसे भौतिक अध्यात्मवाद अथवा आध्यात्मिक भौतिकवाद कहा जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी। सन्त विनोबा के मतानुसार भविष्य में अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय ही जीवित रहेगा। गुरु गोविंदसिंह ने अपने शिष्यों को एक हाथ में माला और दूसरे में भाला लेकर रहने की शिक्षा दी थी। सिख धर्मानुयायियों ने उस परम्परा को अपनाकर युग धर्म का ही निर्वाह किया है। औचित्य के अभिवर्धन परिपोषण की आवश्यकता समझते हुए अनौचित्य का मुँह मोड़ने के लिए साहसिक संघर्ष की भी आवश्यकता है। सरकार को अपनी प्रजा को सुशिक्षित सुविकसित, सुसंस्कृत बनाने के लिए बड़ा बजट और कार्यक्रम बनाना पड़ता है, साथ ही सुरक्षा के लिए सैन्य-साधन से लेकर पुलिस, कचहरी, जेल जैसे प्रबन्ध भी करने पड़ते हैं। कोई सरकार इन उभय-पक्षीय उपायों की आवश्यकता न समझे और एक को ही पर्याप्त मान बैठे तो उसे असफल ही रहना पड़ेगा। व्यक्ति और समाज की सुसंतुलित प्रगति के लिए भी ज्ञान और बल की समान रूप से आवश्यकता है । दोनों ही नीतियुक्त हो, औचित्य के संवर्द्धन-संरक्षण में उनका प्रयोग हो तो इससे मानवी गरिमा तो बढ़ेगी ही विश्व शांति का उज्ज्वल भविष्य का आधार बनेगा ही। ब्रह्मवर्चस् की अध्यात्म शिक्षा एवं साधना इसी स्तर की होगी। उससे खतरा असुरता के अतिरिक्त और किसी को नहीं है।


ब्रह्मविद्या का उद्देश्य -श्रद्धा का संवर्धन

जीवन के दो पक्ष हैं। एक बहिरंग शरीर। दूसरा अन्तरंग चेतन। आत्म-परिष्कार के लिए इन दोनों को ही श्रेष्ठ एवं समुन्नत बनाने की आवश्यकता है। व्यक्ति की मूल सत्ता आस्थाओं के आधार पर अपनी दिशा धारा निर्धारित करती है।

मस्तिष्क की विचारणा और शरीर की क्रिया-पद्धति को न तो दोष दिया जा सकता है और न श्रेय। यह दोनों ही पहिये गाड़ी खींचने वाले बैल की इच्छानुरूप लुढ़कते हैं। शरीर जड़ है, उसकी अपनी न कोई इच्छा है और न गति। उसे मन की मर्जी पर चलना होता है। जिस काम को करने के लिए मन निर्देश देता है, उसी के अनुरूप ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ काम करने लगती, है। मस्तिष्क में सोचने, समझने, जानने, ग्रहण करने की क्षमता तो है, पर दिशा निर्धारण कर सकना उसकी सामर्थ्य से बाहर है। सूत्र संचालन तो आस्थाओं के गहन अन्तराल से होता है। नीति निर्धारण करना ‘हाईकमान’ का -अन्तःकरण का काम है। जीवन सत्ता पर पूरा शासन श्रद्धा रूपी राज्याध्यक्ष का छाया रहता है।

आस्था कामुकता की सरसता को स्वीकार कर चुकी हो तो बुद्धि उसी के अवसर तलाश करेगी, मस्तिष्क में उसी उपलब्धि के लिए ताना-बाना बुना जा रहा होगा और उपाय ढूँढ़े जा रहे होंगे। जिधर आशा और सम्भावना दृष्टिगोचर होगी, उधर ही पैर चल पड़ेंगे, आँखें खोज खबर लेंगी। सारा शरीर तन्त्र और मनःसंस्थान अपनी क्षमता को उसी प्रयोजन में लगा रहा होगा। इसके विपरीत यदि आस्था क्षेत्र में कामुकता को अहित कर होने की मान्यता दे चुकी होंगी उधर अरुचि एवं घृणा की स्थिति बन गई होगी तो बुद्धि का प्रवाह उधर बहेगा ही नहीं- मन उधर चलेगा ही नहीं। इन्द्रियों से वैसी हरकत करने की आशंका रह नहीं सकती । यही बात अन्यान्य बातों के सम्बन्ध में भी है। लोग बाहर से आदर्शवादिता की बक झक करते रहते हैं, पर अवसर मिलते ही ठीक अपने ही कथन के विपरीत आचरण करने लगते हैं।

संसार में कितने ही आदर्शवादी ऐसे हुए हैं जिन्हें भय और प्रलोभनों के बड़े-चढ़े अवसर आने पर भी किसी प्रकार डिगाया नहीं जा सका है। उन्होंने सिद्धान्तों की रक्षा के लिए बड़े से बड़े कष्ट सहे और त्याग किये हैं। यह अंतःक्षेत्र में जमी हुई उच्चस्तरीय श्रद्धा का ही चमत्कार है। जिस प्रकार निकृष्ट आस्थाओं से प्रभावित व्यक्ति बड़े-बड़े खतरे उठा कर भी अपने दुष्ट मनोरथ पूरे करते हैं उसी प्रकार उत्कृष्ट आस्थाएँ भी आदर्शों की रक्षा करने में बड़ी से बड़ी बाजी लगाती देखी जाती है। ऐसे ही लोगों को महामानव कहते हैं। परीक्षा की हर कसौटी पर वे खरे सोने की तरह सही उतरते जाते हैं। इसके विपरीत आस्था क्षेत्र की निष्कृष्टता बनी रहने पर अनैतिक आचरण के कुकृत्य तथा कथित आदर्शवादी उपदेशकों द्वारा भी प्रस्तुत किये देखे जा सकते हैं।

अपने धर्म सम्प्रदायों के सम्बन्ध में प्रायः 5 गहरी आस्था होती है। तर्कों द्वारा उन्हें उस मान्यता के विपरीत कितना ही समझाया जाय, वे निरुत्तर हो जाने पर भी अपने पूर्वाग्रह को बदलने के लिए तैयार नहीं होते। तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण से मस्तिष्क को कुछ समय के लिए प्रभावित किया जा सकता है। सहमति प्राप्त की जा सकती है, इतने पर भी यह आशा नहीं की जा सकती है कि नये विचार कार्य रूप में परिणत हो सकेंगे या उस प्रकार का परिवर्तन सम्भव हो सकेगा। कथा प्रवचनों में रुचि लेने वाले प्रायः धर्म चर्चा सुनते रहते हैं। विचारों की दृष्टि से वे उन बातों से सहमति भी व्यक्त करते हैं, कभी-कभी तो वे उन बातों का दूसरों को भी उपदेश देते हैं। इतने पर भी उनके आचरण ज्यों के त्यों विपरीत बने रहते हैं। धर्म चर्चा और धर्माचरण की इस विसंगति का कारण खोजने पर एक ही तथ्य सामने आता है कि अन्तःकरण की गहराई तक धर्म आस्था का निर्माण न हो सका। मस्तिष्क की ऊपरी सतह तक वे आदर्शवादी प्रतिपादन तैरते भर रह गये। जिनकी आस्थाएँ परिपक्व होती है वे जटायु, शबरी, रीछ, बानर, गिलहरी आदि की तरह अनपढ़-अनगढ़ होने पर भी आदर्शों के लिए सर्वस्व निछावर कर देने से भी पीछे नहीं हटते। व्यक्ति का वास्तविक स्वरूप उसकी श्रद्धा है। गीताकार ने सच ही कहा है -”श्रद्धमयोयं पुरुष यो युच्छुद्धम एव सा स” अर्थात् यह पुरुष श्रद्धामय है जिनकी जैसी श्रद्धा है वह वस्तुतः वैसा ही है।

व्यक्तित्व से बढ़कर और कोई महानता इस संसार में है नहीं। उसके ऊपर कुबेर का वैभव और इन्द्र का वर्चस्व निछावर किया जा सकता है। सप्त ऋषियों के व्यक्तित्व की तुलना में सात द्वीपों और सात समुद्रों की सम्पदा हलकी पड़ती है। उनके प्रतीक अभी भी आसमान में चमकते हैं। ध्रुव, प्रहलाद, हरिश्चन्द्र, दधीचि, व्यास, चरक, बुद्ध, गाँधी जैसे व्यक्तित्वों पर सिकन्दर की सम्पदा सौ बार निछावर की जा सकती है। देवता ओर भगवान के दर्शन हम ऐसे ही महामानवों में करते हैं। उन्हीं के आधार पर देश, समाज और युग धन्य बनते हैं। ऐसे महामानवों का निर्माण मात्र आस्थाओं की उत्कृष्टता के आधार पर ही सम्भव होता है। उनकी शिक्षा, सम्पन्नता प्रतिभा एवं परिस्थिति छोटी हो तो भी वे आन्तरिक गरिमा के कारण जन-मानस पर असाधारण छाप छोड़ते हैं। उनके वचन ऋचाएँ बनते और संस्मरणों का गुणानुवाद लोग प्रभातियों की तरह गाते हैं। स्वयं में तो देवोपम स्वर्गीय आनन्द में विभोर रहते ही हैं, भले ही उनके पास साधन स्वल्प मात्रा में ही क्यों न हो?

हमें आस्थाओं का मूल्य समझना चाहिए। उनकी प्रतिक्रिया से परिचित होना चाहिए और यह जानना प्रतिक्रिया से परिचित होना चाहिए और यह जानना चाहिए कि अन्तःकरण का स्तर समुन्नत बनाने के उपरान्त आत्म-सन्तोष और लोक-सम्मान का कितना उच्चस्तरीय लाभ मिल सकता है। इस सफलता के सहारे लोग उन्नति के उस उच्च शिखर पर पहुँच सकते हैं, जिसके लिए चतुर और समर्थ कहलाने वाले लोग भी तरसते ही रह जाते हैं। वस्तुतः अन्तःकरण में उत्कृष्ट आस्थाओं की सुसंस्कृत आकांक्षाओं की स्थापना कर लेना जीवन का वह लाभ है जिसे पुरातन भाषा में ईश्वर प्राप्ति-आत्म साक्षात्कार, बन्धन मुक्ति, साधना सिद्धि, स्वर्गानुभूति आदि नामों से कहा जाता रहा है।

ब्रह्म विद्या का उद्देश्य उच्चस्तरीय आस्थाओं का निर्माण करना है। अध्यात्म का विशालकाय तत्त्व-दर्शन इसी प्रयोजन के लिए महामनीषियों ने विनिर्मित किया है। उपनिषदों में उस गूढ़ ज्ञान का निरूपण है जिन्हें हृदयंगम करने के उपरान्त व्यक्तित्व में देवत्व का आत्मा के उभरने का अवसर मिलता है। परिष्कृत दृष्टिकोण ही गुण कर्म स्वभाव की श्रेष्ठता बनकर सामने आता है। सज्जनता दुर्बलता नहीं उसमें प्रचण्ड बलशाली तत्त्व भरे पड़े हैं। समझा जाता है कि सज्जनता के साथ जुड़ी हुई नम्रता में कायरता और भोलेपन के तत्त्व होते हैं। अतएव दुष्ट दुर्जन उन्हें ठगने और सताने में सफल होते रहते हैं। यह मान्यता उथली सज्जनता पर ही लागू हो सकती है। ब्रह्म विद्या की आस्थाओं में न्याय निष्ठा के प्रति अडिग रहने और औचित्य के आग्रह में चट्टान की तरह अडिग रहने के ही नहीं ब्रज के समान टूट पड़ने वाले आदर्श भी पूरी तरह भरे पड़े हैं। किसी भी मूल्य पर झंझट से बचने और अनीति सहते हुए भी शान्ति का लबादा ओढ़े रहने की गुँजाइश उस अध्यात्मवाद में रत्ती भर भी नहीं है, जिसे ब्रह्म विद्या के आधार पर विकसित किया जाता है। उत्कृष्टता में आत्म संयम और उदारता की जितनी मात्रा है उतनी ही न्यायनिष्ठ साहसिकता का भी समावेश है।

अध्यात्म विज्ञान का तत्त्व-दर्शन उच्चस्तरीय आस्थाओं को अन्तरात्मा में अति गहन स्तर तक प्रतिष्ठापित करने के लिए है। इसे अपना कर व्यक्तित्व की गरिमा सामान्य नर-पशुओं की तुलना में हजारों लाखों गुनी बढ़ जाती है। उसकी उपलब्धियाँ भी असाधारण होती हैं। ब्रह्म-विद्या के सहारे आत्म परिष्कार का जो लाभ मिलता है उसी में मानव जीवन की सच्ची सार्थकता है।


सद्वाक्य

अगर तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारी प्रशंसा करें तो आत्म-परशंसा कभी न करो।

— पास्कल


वर्चस् की साधना आत्मबल उभारने के लिये

उपनिषद् का ऋषि कहता है - “नायमात्मा बल हीचेन लभ्यः” यह आत्मा दुर्बलों को मिल ही सकता।

विभिन्न बलों की साधना विभिन्न क्षेत्रों में अपने-अपने ढंग से की भी जाती है। साधन बल भी एक बल है। प्रगति और सुख-सुविधा के लिए साधनों का संचय भी प्रकारान्तर से शक्ति साधना का ही एक रूप है। पर अभाव एक ही बात का रह जाता है उसमें क्रिया और बुद्धि का ही समन्वय रहता है। यदि इसमें उच्चस्तरीय भाव सम्वेदनाओं का भी समावेश रहा होता तो निश्चित रूप से यही प्रयत्न आकाश में टँगे रवि-राशि और तारक मण्डल की तरह चमचमाते-जगमगाते दृष्टिगोचर होते।

ऊपरी सतह पर जो हलचलें होती हैं वे अपने प्रयास साधनों के अनुरूप स्वल्प परिणाम ही उत्पन्न करती है। मोटर का इंजन खराब हो-पेट्रोल की टंकी खाली हो तो भी उसे धक्के लगाते हुए कुछ दूर ले जाया जा सकता है। सवारियाँ उसके भीतर छाया का लाभ ले सकती हैं, पर उस गाड़ी की द्रुतगति का लाभ तो सही इंजन और आवश्यक पेट्रोल होने पर ही सम्भव हो सकता है। शरीर और मन के समन्वित प्रयत्नों से निर्वाह प्रक्रिया तो पूरी होती रह सकती है, पर किसी दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रगति करने के लिए उसमें गहन अन्तराल का संकल्प-शक्ति का, आत्म-विश्वास का, अटूट तत्परता का समावेश होना चाहिए। यह सभी उच्चस्तरीय तत्त्व शरीर और मन के क्षेत्र में ऊपर हैं, वे अन्तःकरण की गहरी परतों में ही भरे हैं और वहीं से उभर कर ऊपर आते हैं यदि वह मर्मस्थल प्रसुप्त स्थिति में पड़ा हो तो फिर हर पराक्रम बहुत ही उथले स्तर का रहेगा और उस प्रयास का परिणाम भी अति स्वल्प निकलेगा।

पैनी तलवार से युद्ध मैदान में लड़ा जाता है और शिर भी उसी से कटते हैं। इस प्रत्यक्ष तथ्य से कोई इंकार नहीं कर सकता। पर इतना ही मान बैठना नासमझी होगी। तलवार चलाने के लिए कलाई की मजबूती और मस्तिष्क की अभ्यस्त क्रिया-कुशलता आवश्यक है। इसके बिना बढ़िया तलवार भी कुछ काम न कर सकेगी। दुर्बल भुजाएँ न तो उसका भार सँभाल सकेंगी और न प्रहार कर सकेंगी। इतना ही नहीं यदि चलाने की कुशलता और सूझ-बूझ अभ्यास में नहीं उतारी गई है तो भी वह शस्त्र निरर्थक ही सिद्ध होगा।

ऊपर की पंक्तियों में तलवार रूप साधन और हाथ रूप मस्तिष्क की मजबूती से युद्ध में सफलता मिलने की बात कही गई है, पर थोड़ा और विचार करने पर एक नया तथ्य और भी उभर कर आता है कि सैनिकोचित्त शौर्य, साहस का अभाव रहा, अन्तःकरण में भीरुता छाई रही, उत्कट देश-भक्ति का स्थान उदासीनता ने ले लिया तो अन्तराल की स्थिति खोखली रह जाएगी। ऐसी दशा में वह दुर्बलता अपने आप में एक संकट बन जाएगी और उसके रहते तलवार की अच्छाई और हाथों की मजबूती भी कारगर सिद्ध न होगी। भीतर से हड़बड़ाया हुआ-डरता काँपता सैनिक युद्ध में विजयी होकर नहीं लौट सकता।

शक्ति का स्रोत अन्तराल है। समर्थता और दुर्बलता का वास्तविक मूल्यांकन इसी स्तर की स्थिति को देखकर किया जा सकता है। बलवान वही है जिसका अन्तरात्मा बलिष्ठ है। इतिहास साक्षी है कि आश्चर्यचकित कर देने वाली अति महत्त्वपूर्ण सफलताएँ न तो साधनों के सहारे मिली है और न बुद्धि कौशल का ही उसमें बहुत बड़ा हाथ रहा है। चमत्कार संकल्प-शक्ति ही उत्पन्न करती है और यह संकल्प-बल उच्चस्तरीय आदर्शों का समन्वय हुए बिना उत्पन्न हो ही नहीं सकता। ललक-लिप्सा के वशीभूत होकर भी लोग उन्नति की दौड़-धूप करते हैं, पर वह न तो स्थिर होती है और न गहरी। अधिक लाभ, बहुत जल्दी मिलने का उत्साह जब तक रहता है तभी तक वे प्रयत्न चलते हैं जैसे ही सफलता श्रम-साध्य समय-साध्य एवं धूमिल दिखाई दी वैसे ही हाथ-पैर फूल जाते हैं। उत्साह ठण्डा होने पर काम को छोड़ बैठने के अतिरिक्त और कोई चारा ही नहीं रह जाता। हर अवरोध से जूझते हुए-बिना थके झुके-प्रयत्नरत रहने की स्थिति अन्तराल की आस्थावान् संकल्प-शक्ति के सहारे ही सम्भव होती है। महत्त्वपूर्ण कार्यों की सफलता पूर्णतया उसी आन्तरिक प्रखरता के आत्मबल के ऊपर निर्भर रहती है। शक्ति का उद्गम स्रोत अन्तःकरण से ही उमड़ता है। शरीर और मस्तिष्क में तो उसका प्रवाह भर चलता दीखता है।

गाँधी जी का शरीर बहुत दुर्बल था। वे मात्र 96 पौंड के थे। शारीरिक दृष्टि से उनकी सामर्थ्य उपहासास्पद ही गिनी जायेगी। उन्हें तो कोई किशोर भी दौड़ने या लड़ने की चुनौती दे सकता था, पर उनकी शक्ति का मूल्यांकन जिनने किया है वे जानते हैं कि पर्वत से ऊँचा और समुद्र से विस्तृत उनका व्यक्तित्व था। उनकी प्रचण्ड सामर्थ्य की टक्कर अंग्रेज सरकार से हुई और इस कुश्ती में वे ही जीते । इतनी बड़ी कुश्ती तो बड़े से बड़ा पहलवान भी नहीं लड़ सकता था। साधन बल से भी यह युद्ध जीतना कठिन था। आत्म-बल ने भारत के स्वतन्त्रता संग्राम की सबसे बड़ी सामर्थ्य यही है। आत्म-बल से बढ़कर और कोई बल इस संसार में है नहीं।

व्यक्तिगत जीवन की गरिमा उस आत्मबल पर आधारित है जिसमें आदर्श और संकल्प का समान रूप से समन्वय होता है। सदुद्देश्य से भाव-भरी श्रद्धा और कर्तव्य पालन में प्रचण्ड निष्ठा का समन्वय होने से इस आत्म-शक्ति का उदय हाता है। उसी के सहारे लोभ और भय के अवरोधों को हटाते हुए उच्चस्तरीय आदर्शों को पूरा कर सकना सम्भव होता है। समाज सेवा की परमार्थ परायणता से ही कोई व्यक्ति यशस्वी होता है। लोक-सम्मान और जन-सहयोग पाकर लोग ऊँचे उठते और सफल बनते हैं। यशस्वी और जन-नायक बनने की आकांक्षा भी बिना आत्म-बल के पूर्ण नहीं हो सकती। परमार्थ प्रवृत्ति गहरी और उच्चस्तरीय होनी चाहिए तभी उसका चिरस्थायी सत्परिणाम निकलेगा। हथकण्डे बाजी से कुछ समय के लिए सस्ती वाहवाही की लूट-खसोट हो सकती है, पर उतने भर से कोई काम बन नहीं सकता । धूर्तता के बल पर समेटी गई प्रशंसा में स्थायित्व कहाँ होता है ? काठ की हाँड़ी में खिचड़ी कहाँ पक पाती है ?

अपने अनुकरणीय आदर्श छोड़ जाने वाले-कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य कर गुजरने वाले -व्यक्तियों का विश्लेषण किया जाय तो उनमें सभी में संकल्प-बल की विशेषता पाई जाएगी। कहना न होगा कि ओछे, दुष्ट स्वार्थी, मन भूमि में वह संकल्प-शक्ति विकसित हो ही नहीं सकती जिसकी गर्मी से पर्वत गलने और पानी की तरह बहने लगते हैं।

आतंकवादी दुष्ट, दुरात्मा भी बलिष्ठता का डंका बजाते और ढिंढोरा पीटते देखे गये हैं। उद्दण्डता से डर कर कई दुर्बल प्रकृति के व्यक्ति डरते, घबराते और उनका लोहा मानते भी देखे गये हैं। इस दुष्ट और दुर्बल संयोग से उत्पन्न अवांछनीय प्रतिक्रिया को प्रायः उद्दण्डता की शक्ति के रूप में माना समझा जाने लगा है। वह दुःखद और अवास्तविक मान्यता है। अनैतिक आतंक में यदि कुछ सामर्थ्य है भी तो वह यत्किंचित् विनाश कर सकने भर की है। सृजन का कोई तत्त्व उसमें रत्ती भर भी नहीं है। उपलब्धियों तो सृजन की होती है। लाभ तो उन्हीं का मिलता है। व्यक्तित्व और कर्तृत्व तो उन्हीं के सहारे निखरता है। ध्वंस को शस्त्र बनाकर चलने वाले वैसा कुछ पा नहीं सकते। वे दूसरों को हानि पहुँचा सकते हैं । प्रथम आक्रमण करने वाला सदा लाभ में रहता है। पर वह लाभ न स्थायी होता है और न फलदायक। अन्ततः वह आक्रमणकारी के लिए ही अभिशाप सिद्ध होता है। माचिस की तीली का अस्तित्व नगण्य है, पर अग्निकाण्ड तो वही रच सकती है। लोहे की एक छोटी-सी कील भी किसी का प्राण हरण कर सकती है। इस ध्वंस सामर्थ्य से आक्रमणकारी का कोई लाभ नहीं होता। तीली अग्नि-काण्ड तो करती है, पर उसी आग में जलकर उसे स्वयं भी समाप्त होना पड़ता है। पागल कुत्ता कइयों को काट सकता है, पर खैर उसकी भी नहीं है। प्रकृति दण्ड अर्थात् दुष्टता के विरुद्ध उभरे आक्रोश से उसे मृत्यु मुख में ही जाना पड़ता है जब कि काटे हुए लोग दवादारु के सहारे अच्छे भी हो जाते हैं।

यहाँ चर्चा वास्तविक और अवास्तविक बलिष्ठता की हो रही थी। आतंक, अनीति और धूर्तता का प्रश्रय लेकर भी यत्किंचित् बलिष्ठता उपार्जित करते हुए लोग देखे गये हैं। इसमें कइयों का मत इस सस्ती उपलब्धि के लिए मचलता है और वे दुष्टता के सहारे बलिष्ठ बनने का प्रयत्न करते हैं। यहाँ यह हजार बाद समझ लिया जाना चाहिए कि यह अवलम्बन न तो सरल होता है और न सफल। दुष्टता अपनाकर सम्मान भी गँवाया जाता है और सहयोग भी। घृणा, तिरस्कार का ताना-बाना अपने चारों ओर बुन डालने वाला व्यक्ति मित्र विहीन बनता चला जाएगा। घिनौने व्यक्ति के दो ही साथी होते हैं एक पतन दूसरा विनाश । आतंकवादी बलिष्ठता के दुष्परिणामों को जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना ही उत्तम है।

कुटिलता के बल पर नहीं, प्रगति-सदाशयता और सज्जनता की नीति अपनाने से ही सम्भव होती है। सृजन की सामर्थ्य ही वास्तविक शक्ति है। उसी को विकसित करके मनुष्य गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता प्राप्त करता है। व्यक्तित्व को निखारने और सुसंस्कृत बनाने के प्रयत्न ही किसी मनुष्य में समर्थ सशक्तता उत्पन्न करते हैं। उसी से गरिमा बढ़ती है। सृजनात्मक प्रयोजनों में यही क्षमता काम आती है। लोकहित उसी से सम्भव होता है। सेवा साधना उसी के सहारे बन पड़ती है। लोक-सम्मान से लेकर आत्म-सन्तोष तक के अनेकानेक वरदान उसी सहारे उपलब्ध होते हैं, भविष्य निर्माण का एकमात्र उपाय आत्म-निर्माण ही माना गया है। संचित कुसंस्कारों से जूझना- उन्हें उखाड़ फेंकना प्रबल पुरुषार्थ कहा जाता है। दूसरों से लड़ने की अपेक्षा अपने से लड़ना-आन्तरिक शत्रुओं को परास्त करना अधिक कठिन है। आत्म-शोधन के मोर्चे पर लड़ना और विजय प्राप्त करना-बाह्य जगत की किसी भी सफलता की तुलना में अधिक श्रेयस्कर है।

यह लड़ाई प्रचण्ड आत्म-बल के सहारे ही लड़ी जा सकती है। ब्रह्म वर्चस् को उपार्जित करके मनुष्य सामान्य से असामान्य और नर से नारायण बनने का पथ-प्रशस्त करता है।

बाह्य जीवन में श्रेय, सहयोग पाने के लिए बीज रूप से स्वयं गलना पड़ता है। परमार्थ प्रयोजनों में सच्चे मन से लग सकना उसी के लिए सम्भव हो सकता है जो अपनी तृष्णाओं पर अंकुश लगा सके। महत्त्वाकाँक्षाओं का दमन करने वाला अपनी क्षमताओं को आदर्शों की साधना में लगा सकता है। जो स्वयं ही आकांक्षाओं की आग में जल रहा है उसे तो दूसरों को ईंधन की तरह उपलब्ध करने का ही मन रहेगा। जो अपने को बादल की तरह निचोड़ सके, वहीं किसी के कुम्हलाये पौधे को नव-जीवन दे सकने में समर्थ हो सकता है। स्वार्थों पर अंकुश लगा सकना-साधु ब्राह्मण जैसा मितव्ययी जीवन-क्रम अपना सकना इस अहंलिप्सा के युग में कितना कठिन है यह किसी से छिपा नहीं। नदी प्रवाह से ठीक उलटी दिशा में केवल साहसी मछली ही छरछराती हुई चल सकती है। हाथी जैसे विशालकाय प्राणी तक उसमें बहते चले जाते हैं । मछली जैसी प्रवाह के विपरीत चलने की साहसिकता निस्सन्देह असाधारण ही कही जा सकती है। ऐसा अद्भुत शौर्य, साहस प्रदर्शित कर सकने वाले ही ऐतिहासिक महामानव कहलाते और युग समस्याओं को सुलझाते हैं। यह गौरव प्राप्त करने की मनःस्थिति और परिस्थिति बना सकना केवल उन्हीं के लिए सम्भव होता है जो आत्मबल का महत्त्व समझते और उसे उपलब्ध करने का प्रयत्न करते हैं। आदर्शवादिता के मार्ग पर चलना, लोक-मान्यता के अनुसार घाटे का काम है। इसलिए तथाकथित स्वजन सम्बन्धी एक स्वर से उधर कदम बढ़ाने से चित्र-विचित्र तर्क गढ़कर रोकते हैं। शत्रुओं का प्रतिरोध सरल है, पर स्वजनों के आग्रह की अनसुना करने वाली एकाग्र आदर्श-निष्ठा का परिचय दे सकना अति दुस्तर है। इस अग्नि परीक्षा में सफल हो सकना आत्म-बल के बिना सम्भव ही नहीं हो सकता । आन्तरिक प्रलोभनों और परिजनों के आग्रहों की उपेक्षा कर सकना जिस प्रचण्ड आदर्शवादिता के सहारे सम्भव होता है वह आत्म-बल का ही दूसरा रूप है।

व्यक्तित्व के परिष्कार और देवात्माओं जैसा लोक-व्यवहार ही मानव जीवन की सफलता का एकमात्र आधार है। वह उत्कृष्टता के प्रति असीम श्रद्धा रख सकने पर ही सम्भव होता है। आये दिन के आँधी-तूफानों से ज्वार-भाटों से आत्मवादी दृष्टिकोण के दीपक को बुझने न देना भँवर से नाव खेकर ले जाने की तरह कठिन है। यह भव-बन्धनों को - लोह शृंखला को अपने ही नाखूनों से काटने जैसी कठिन प्रक्रिया है। इसे अटूट धैर्य और असीम साहस के सहारे ही सम्पन्न किया जा सकता है। मानवी गरिमा को प्राप्त कर सकने की ललक तो बहुतों को रहती है, पर उसे पा सकने में आत्म-बल सम्पन्न शूर-वीर ही सफल होते हैं।

भौतिक जीवन में चिरस्थायी सफलताएँ प्राप्त करने के लिए भी आत्म-बल की, संकल्प बल की आवश्यकता पड़ती है। विद्यार्थियों में से अनेकों को अरुचि और आवारागर्दी की आदत मूर्खता और पिछड़ेपन के गर्त में फेंक देती है। साधन रहते हुए भी कितने ही लड़के पढ़ नहीं पाते और बेकार के बहाने बनाकर शिक्षा लाभ से वंचित रह जाते हैं। इस दुर्भाग्य से जूझ सकना मनस्वी और दूरदर्शी छात्रों के लिए ही सम्भव होता है। व्यायामशाला में क्षणिक उत्साह लेकर कितने ही प्रवेश करते हैं किन्तु उस कठिन कार्य से खिन्न होकर जल्दी ही छोड़ भी बैठते हैं। नित नये कार्य आरम्भ करने वाले और कुछ ही समय में उसे बैठने वाले नर-वानरों की बहुत बड़ी मण्डली सर्वत्र बिखरती देखी जा सकती है।

कृषि, व्यवसाय, शिल्प, कला आदि के सभी क्षेत्रों में अथक परिश्रम, प्रचण्ड-साहस सन्तुलित विवेक और समुचित धैर्य की आवश्यकता होती है। आलसी, प्रमादी, अधीर और आशंकाग्रस्त मनुष्य सामान्य साँसारिक प्रयोजनों तक में सफल नहीं हो पाते। आन्तरिक दुर्बलताएँ अपनी सहेली असफलताओं को निमन्त्रण दे देकर बुला लाती है। व्यक्तित्व का परिष्कार न सही-लोक-श्रद्धा और आत्म-सन्तोश देने वाली महानता न सही- स्वार्थ साधन की दृष्टि से सम्पन्नता और सफलता तो हर किसी को अभीष्ट है ही। उसका आधार भी मनोबल बिना नहीं बनता। जहाँ इसका अभाव होगा वहाँ न स्वार्थ सधेगा और न परमार्थ। आन्तरिक अशक्ति तो बाह्य जीवन में अभिशाप ही बरसाती है। ऐसे व्यक्ति अपंग, असहाय की तरह जीते और रोते-कलपते बेमौत मरते हैं आत्म-बल का अभाव इतना बड़ा दुर्भाग्य है कि इसके कारण पग-पग पर खिन्नता, उद्विग्नता की व्यथा सहन करनी पड़ती है। ऐसे लोगों का न लोक सधता है, न परलोक। उनका न स्वार्थ सिद्ध होता है न परमार्थ बनता है।

परिस्थितियों का अपना कोई अस्तित्व नहीं, वे मनःस्थिति के अनुरूप बनती है। अप्रत्याशित कोई प्रतिकूलता सामने आ खड़ी हो तो भी वह देर तक ठहरती नहीं। रोग कीटाणु अशुद्ध रक्त में ही अपना अड्डा जमा पाते हैं । शुद्ध रक्त तो उन्हें बात की बात में खदेड़ कर बाहर कर देता है। प्रतिकूल परिस्थितियाँ -मनःस्थिति के वृक्ष पर ही अमरबेल की तरह छाई और फलती-फूलती रहती है। महामानवों की जीवन-गाथाओं पर दृष्टि डालने से प्रतीत होता है कि उनमें से कोई भी जन्म-जात एवं परम्परागत अनुकूलता लेकर नहीं जन्मा। हर एक को अपना रास्ता आप बनाना पड़ता है। लोगों ने उनको कन्धे पर नहीं चढ़ाया, वरन् वे स्वयं ही अपनी विशेषताओं के आधार पर हर किस की आँखों के तारे बने और हृदयों में जा विराजे हैं। अनुकूलताएँ बरसी नहीं, वरन् अपने हाथों उनने उन्हें गढ़ा है। चलना अपने ही पैरों पड़ता है, दूसरों के कन्धों पर लद कर चल सकना किसके लिए कब तक सम्भव हो सकता है ?

आत्म-बल की आवश्यकता हर क्षेत्र में है। आत्म-बल उसकी प्रेरणा से उसी तरह उभरते हैं जैसे सौर-मंडल के ग्रह-उपग्रह सूर्य की आभा से प्रकाशवान् दीखते हैं। जीवन को जीवितों की तरह जीना हो-उनमें कुछ रस और आनन्द लेना हो तो आत्म-बल सम्पादित करने की उपेक्षा की नहीं जा सकती । बलिष्ठता की अनुगामिनी ही सम्पन्नता है। अस्तु बलों में परम बल , आत्म-बल के उपार्जन को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए। हम ‘वर्चस्’ की उपासना करें - आत्म-बल सम्पादित करने में जुट जाएँ, इसी में दूरदर्शिता है।


ब्रह्मवर्चस् के ज्ञान-विज्ञान की तात्त्विक पृष्ठभूमि

व्यक्तित्व का वृक्ष जैसा भी कुछ बाहर से दीखता है, उसकी निर्मात्री जड़ें अन्तःकरण में जमी रहती है। विभिन्न कार्यों को किस प्रकार सम्पन्न किया जाता है और उसका लाभ किस प्रकार मिलता है, इस प्रश्न का आधार-भूत उत्तर व्यक्ति की अन्तःचेतना ही दे सकती है। बहिरंग प्रयत्नों की निन्दा, प्रशंसा जो कुछ भी होती है। वस्तुतः वह कर्ता के अन्तरंग की प्रतिक्रिया मात्र होती है।

अन्तरंग न तो पदार्थों से बना है न बौद्धिक प्रशिक्षण का उस पर अधिक प्रभाव रहता है। यदि ऐसा होता तो अमुक आहार खिला कर अथवा अमुक पुस्तकें पढ़ाकर किसी को समुन्नत स्तर का बना सकना सम्भव हो गया होता । मानवी सत्ता का उद्गम मर्मस्थल उसका अन्तःकरण है। यह आस्थाओं का बना है। अचेतन मस्तिष्क तक तर्कों से प्रभावित नहीं होता और समझाने बुझाने वालों को अँगूठा दिखाकर अपने अभ्यस्त ढर्रे को अपनाये रहता है फिर भावों का सम्वेदना संस्थान, जिसे कारण शरीर एवं अन्तःकरण कहते हैं -उससे बहुत ऊपर की वस्तु है। उस पर चढ़े जन्म जन्मान्तरों के पशु संस्कारों को छुड़ा सकना अति कठिन कार्य है। इसके लिए काँटे से काँटा निकालने की नीति अपनानी पड़ती है। आस्थाओं को काटने के लिए आस्थाएँ ही समर्थ हो सकती हैं। लोहे से ही लोहा कटेगा। भावनाओं से ही भावनाओं के क्षेत्र में परिष्कार परिवर्तन का प्रयोजन सिद्ध होगा।

मनुष्य की सत्ता तीन भागों में विभक्त है। (1) स्थूल शरीर (2) सूक्ष्म शरीर (3) कारण शरीर । प्रथम को पंच तत्त्वों से बनी काया-दूसरे को मन और बुद्धि का विचार संस्थान और तीसरे को आस्थाओं, भावनाओं एवं सम्वेदनाओं से विनिर्मित अन्तःकरण कह सकते हैं। भौतिक मनोविज्ञान चिन्तन की चेतन और आदतों की अचेतन के नाम से व्याख्या करता है। उसकी दृष्टि से कारण शरीर-भाव संस्थान-अचेतन की ही एक गहरी परत है जिसे सुपर चेतन-इगो आदि नाम दिये जाते हैं। आध्यात्मिक मनोविज्ञान की दृष्टि से कारण शरीर ही जीव चेतना का केन्द्र है। आस्थाओं की जैसी पर्ते उस पर चढ़ी होती है। वैसी ही गतिविधियों का संचालन मन और शरीर द्वारा सम्पन्न होता रहता है।

जीवन क्रमिक गति से आगे बढा और पहुँचा है। उसकी यह सफलता सराहनीय है, फिर भी एक कठिनाई बनी ही हुई है कि जीवन के आरम्भ से लेकर अब तक की लम्बी यात्रा में जिन स्वभाव संस्कारों के सहारे काम चलता रहा, अब वे ओछे पड़ते हैं। छोटे बच्चे के लिए जो कपड़े उपयुक्त थे, वे ही बड़ी आयु में निरर्थक बन जाते हैं। अस्तु संचित संस्कारों की मानवी गरिमा को ध्यान में रखते हुए छोटा ओछा या खोटा ही कहा जा सकता है। इन्हें अपनाया नहीं जा सकता । अभी तो मनुष्य से आगे की स्थिति तक बढ़ना है। आत्मा को-महानात्मा देवात्मा एवं परमात्मा स्तर तक विकसित होना है।

अन्तःस्थल में परिष्कृत परिवर्तन कैसे सम्पन्न किया जाय ? इसका उत्तर एक ही है- आस्थाओं के सहारे आस्थाओं को सुधारा जाय। दलदल में फँसे हाथी को दूसरे सुशिक्षित हाथी ही चतुरता पूर्वक बाहर निकाल कर लाते हैं। पशु-प्रवृत्तियों के दलदल से जीव चेतना को निकाल सकना मात्र उन उच्चस्तरीय आस्थाओं के लिए ही सम्भव है-जो अध्यात्मवाद के ढाँचे में समाहित की गई है। जीव चेतना को उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर करने में इन आदर्शवादी आस्थाओं को हृदयंगम कराने के अतिरिक्त और कोई मार्ग हो ही नहीं सकता । समाज निष्ठा के अनुरूप व्यक्ति निष्ठा को ढालने के लिए भौतिकवादी दर्शन खड़ा तो किया गया है, पर उसमें उपयोगिता के नाम पर प्रतिपादित सिद्धान्तों के खण्डन का भी विधान है। ऐसी दशा में वे नीति मात्र बनकर रह जाते हैं-आदर्श नहीं। आदर्शों के प्रति आस्था को जब उपयोगिता के नाम पर निरस्त किया जाता है तो आस्थाएँ सामाजिक उपयोग की भले ही रह जाय, उनसे अंतःस्थिति को प्रभावित नहीं किया जा सकता है। फिर भी श्रद्धा विश्वास स्तर की नहीं रह जाती। यही कारण है कि भौतिकवादी समाज निष्ठा दर्शन के उद्घोषक ही आये-दिन कलामुण्डी खाते और समाजद्रोही घोषित किये जाते रहते हैं।

व्यक्तित्व के मर्मस्थल को स्पर्श कर सकने वाला एक मात्र तत्त्व श्रद्धा है। पशु योनियों में जो आस्थाएँ परिस्थिति वंश अंत:करण में जम गई है, वे अभी भी उखड़ने को तैयार नहीं, इससे उनकी समर्थता का पता चलता है। प्रगति के लिए परिवर्तन आवश्यक है। अन्तः श्रद्धा को परिष्कृत किए बिना व्यक्ति चेतना सुसंस्कृत हो नहीं सकेगी और इसके बिना उच्चस्तरीय प्रगति की कोई सम्भावना नहीं है। इस धर्म संकट का समाधान तत्त्व-दर्शियों ने देव स्तर की आस्थाओं का ढाँचा खड़ा करके किया है। यही अध्यात्मवाद है। इसी को अपनाने से अन्तःकरण का उच्चस्तरीय बन सकना सम्भव बताया गया है। चिर-कालीन अनुभव ने इस प्रतिपादन को सही भी प्रमाणित किया है।

मनुष्य में घुसी हुई पशुता के निराकरण और देवत्व के समावेश का आधार जिस तत्त्व दर्शन को-अध्यात्मवाद में बताया गया है। वह चिन्तन और क्रिया के दो भागों में विभक्त है। चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश करने वाले प्रतिपादन को ब्रह्म विद्या कहते हैं। इसमें ईश्वरीय निर्देश देव सन्देश-ऋषि अनुभव के तत्त्व इस प्रकार जोड़े गये हैं कि मानवी भाव सम्वेदना उसे श्रद्धा पूर्वक स्वीकार कर लें। मान्यताओं को मान्यताओं से काटने के लिए शास्त्र का स्वाध्याय सत्संग का चिन्तन, मनन का विधान है। अध्यात्म दर्शन की यही पृष्ठभूमि है।

अध्यात्म का दूसरा पक्ष है-साधना। इसे भौतिक मनोवैज्ञानिक भाषा में स्व संकेत -स्व शिक्षण-आत्म निर्देश आदि कह सकते हैं। आध्यात्मिक मनोविज्ञान की दृष्टि से यह सूक्ष्म जगत से ब्रह्म चेतना से सम्पर्क स्थापित करके उपयुक्त आदान-प्रदान का द्वार खोलना है। इस प्रयार को उपासना साधना के नाम से जाना जात है। भक्ति-भावना के साथ अध्यात्म साधनाओं में निरत रहने की प्रक्रिया अभिनव और उपयोगी आस्थाओं की प्रतिष्ठापना अन्तःकरण के मर्मस्थल में कर सकना सम्भव हो जाता है। स्पष्ट है यह स्थापना पुरानी अनुपयुक्तता का उन्मूलन भी करती है। सुसंस्कारों की अभिवृद्धि से कुसंस्कारों का निरस्त होते जाना स्वाभाविक है। मात्र अवांछनीयता के उन्मूलन का प्रयास सफल नहीं हो सकता उस स्थान पर परिष्कृत स्थापना की नितान्त आवश्यकता रहती है। साधनात्मक क्रिया-कलापों से श्रेष्ठता के प्रति श्रद्धा विकसित करने के साथ-साथ निकृष्टता के उन्मूलन का प्रयोजन भी साथ-साथ सिद्ध होता चलता है।

यह तो समीक्षक का विश्लेषण हुआ। तथ्यों की दृष्टि से अध्यात्म विज्ञान के दोनों पक्ष- (1) चिन्तन पर ब्रह्म-विद्या और (2) साधना परक तपश्चर्या-दोनों ही हर दृष्टि से तथ्यपूर्ण है। वे आस्था की दृष्टि से ही उपयोगी नहीं है वरन् तर्क, तथ्य और प्रमाणों की दृष्टि से भी स्वीकार करने योग्य है। उनके समर्थन में इतना कुछ कहा जा सकता है कि अनास्था के लिए कम ही गुँजाइश रह जाएगी। अनुभवों की कसौटी पर कस कर इसके प्रभाव की स्वयं परीक्षा की जा सकती है। दूसरों से प्रमाण पूछने की अपेक्षा यह आत्म-साक्षी और भी अधिक समाधान कारक हो सकती है।

ब्रह्म शब्द से ब्रह्म विद्या का ज्ञान भाग और वर्चस् शब्द से साधना का विज्ञान भाग जाना जा सकता है। उच्चस्तरीय आस्थाओं को स्वीकार कर सकने की कोमलता जिसमें हो सके उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। साधना को सफलता भी उसी स्तर की मनोभूमि में सम्भव होती है। ऋतम्भरा भाव-भूमिका को अध्यात्म विज्ञान में ‘गायत्री’ कहा गया है। अस्तु गायत्री महाविद्या की पृष्ठभूमि पर हो ब्रह्म वर्चस् विज्ञान का भवन खड़ा किया गया है।


गायत्री का धियः तत्त्व ब्रह्म विज्ञान

गायत्री विद्या का तत्त्वज्ञान मनुष्य की अन्तरंग स्थिति को सुसंस्कृत बनाने में समर्थ है। उसका साधना विज्ञान बहिरंग परिस्थितियों को समुन्नत बनाने की भूमिका प्रस्तुत कर सकता है। दोनों ही दृष्टियों से उसकी गरिमा एवं उपयोगिता को देखते हुए अध्यात्म वेत्ताओं ने उसे ‘परम’ सर्वोपरि-सर्वोत्कृष्ट ऐसा आधार बताया है जिसके सहारे सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सकना सम्भव बनता है। यों अपने-अपने स्थान पर सभी तत्त्व-ज्ञान एवं उपासनात्मक विधि-विधान महत्त्वपूर्ण है, पर तुलनात्मक अध्ययन करने के उपरान्त जिन ब्रह्म-वेत्ताओं ने वरिष्ठता के निष्कर्ष निकाले है, उन्होंने गायत्री को ‘परम’ कहा है और बताया है कि इसकी सार्थकता एवं समर्थता पर सन्देह करने की आवश्यकता नहीं है। शास्त्रकार कहते हैं -

न गाय«याः परंपरम्। (भारद्वाजस्मृति 12!42)

गायत्री परमो मन्त्रः। (अग्निपुराण 28412)

गाय«यास्तु परं नास्ति। (सर्म्वतस्मृति 1।14)

सावि«यास्तु परं नास्ति। (मनुस्मृति 2।83)

सावि«यास्तु परं नास्ति। (वृहद्योगि वा0स्मृ0 2।63)

गाय«यतिगरीयसी। (ब्रहत्पारासर स्मृति 4।16)

न गायत्री समो मन्त्रः (स्कंदपुराण काशीखण्ड 9।52)

गाय«या न परं जप्पम्। (पद्मपुराण स्व0 53।58)

न गाय«याः परं जप्यम्। (कूर्मपुराण, उत्तरार्ध 14।58)

न गाय«याः परं जाप्यम्। (कुशनः संहिता 3।58)

न गाय«याः संग जाप्यम्। (पद्मपुराण पा0 94।50)

न गाय«यी समो जपः। (व्याघ्रपादस्मृति 359)

इन अभिवचनों में गायत्री विद्या की उत्कृष्टता का संकेत किया गया है। अन्य ऋषियों ने भी ऐसा ही कुछ कहा है-

एकाक्षरं परं ब्रह्म प्राणायामः परं तपः। सावि«यास्तु परं नास्ति पावनं परमं स्मृतम्। अग्नि पुराण

ऊँकार एकाक्षर का ब्रह्म है। प्राणायाम परम तप है। गायत्री से बढ़कर पवित्र करने वाला साधन और कोई इस संसार में नहीं है।

यदक्षरैकसंसिद्धेः र्स्पधते, ब्राह्मणोत्तमः। हरिशंकरकंजोत्थ सूर्यचन्द्रहुताशनैः॥ गायत्री तंत्र

“जो सच्चा साधक गायत्री के एक अक्षर की भी सिद्धि कर लेता है, उसकी स्पर्धा हरि, शंकर, ब्रह्मा, सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि से होने लगती है।

ऐहिकायुश्मिकं सर्व गायत्री जपतो भवेत्। अग्नि पुराण

इह लोक और परलोक के समस्त इष्ट फलों की प्राप्ति गायत्री जप से होती है।

गाय«येव तपोयोगः साधनं ध्यान मुच्यते। सिद्धानाँ सामता माता नातः किंचिद् वृहत्तरम्-स्कद पुराण

गायत्री ही तप है। गायत्री ही योग है। गायत्री ही सबसे बड़ा ध्यान और साधन है। इससे बढ़कर सिद्धि दायक साधन और कोई नहीं है।

परासिद्धिमवाप्नोति गायत्री मुत्तमा पठेत्। - शक्ति समुच्पय

गायत्री का जप करने से परा सिद्धि प्राप्त होती है।

यतः साक्षात् सर्व देवतात्मनः सर्वात्म द्योतकः सर्वात्म प्रतिपादकोऽयं गायत्री मन्त्रः-कौडन्य

यह गायत्री मन्त्र साक्षात् देव रूप, सर्व शक्तिमान, सबको प्रकाश देने वाला और सर्वात्म ज्ञान का प्रति-पादक है।

गायत्री को ब्राह्मी शक्ति कहा गया है। वह ब्रह्माण्डीय चेतना का वह भाग है जो मानवी सत्ता को समुन्नत, समृद्ध एवं समर्थ बनाने की दृष्टि से अतीव महत्त्वपूर्ण है। गायत्री विद्या का उद्देश्य आत्मा और परमात्मा के बीच सम्भव हो सकने वाले आदान-प्रदान के सन्दर्भ में अभीष्ट जानकारी प्रदान करना है। इसी प्रकार गायत्री उपासना का प्रयोजन यह है कि मानवी कलेवर के तीनों स्तर स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर-इस योग्य बन सकें कि उन पर दिव्य अवतरण सम्भव हो सके और स्थिर रह सके। तथ्य को ध्यान में रखते हुए गायत्री को ब्राह्मी कहा गया है। उसे ब्रह्म तत्त्व माना गया है। ब्रह्म और गायत्री की एकता के अनेकों प्रतिपादन शास्त्रों में मिलते हैं-

ब्रह्म हि गायत्री । ताण्ड्य 11।11।9

ब्रह्म उ गायत्री। जै, उ॰ 1।1।8

ब्रह्म वै गायत्रीं। ऐत 4।11 कौ0 3।5

ब्रह्म गायत्री। शत॰ 1।3।58

अर्थात् निश्चित रूप से गायत्री ब्रह्म ही है।

देवी दात्री च मोक्त्री च देवी सर्वमिदं जगत्। देवी जयति सर्वत्र यो देवी साऽहमेवच। सर्वात्मना हि सा देवी सर्व भूतेशू संस्थिता। गायत्री मोक्ष हेतुर्वे मोक्ष स्थान म लक्षणम्। -ऋशि श्रृंगं

दिव्य, देने वाली, भोक्ता, सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त, जिसकी सर्वत्र जय ही जय है। ऐसी गायत्री परब्रह्म है। वही मोक्ष का आधार है, वही मोक्ष का स्थान है।

जीव और ब्रह्म के बीच आदान-प्रदान की शृंखला रहने के कारण इस दिव्य-चेतना को ‘ब्रह्म विद्या’ कहते हैं। उसके माध्यम से मनुष्य के अन्तःकरण में ऐसे उच्चस्तरीय आस्था प्रवाह का संचार होता है जिसे ब्रह्म ज्ञान, तत्त्व-ज्ञान आदि नाम दिये जाते हैं। व्यक्ति में गायत्री शक्ति के समावेश होने का परिचय इर सद्ज्ञान की अभिवृद्धि से ही मिलता है।

सर्वे देवा देवी मुपतस्तुः कासित्वं महादेवि। साब्रवीदहं ब्रह्म रूपिणी। -देवी उपनिषद्

सब देवताओं ने महादेवी के सम्मुख जाकर पूछा-आप कौन हैं? तो उनने उत्तर दिया , मैं ब्रह्म रूपिणी हूँ।

सः ब्रह्म विद्या सर्व विद्या प्रतिश्ठितम्। -मुण्डक

सम्पूर्ण विधाओं में ब्रह्म विद्या ही श्रेष्ठ है। पौराणिक गाथाओं के अनुसार ब्रह्माजी ने गायत्री के चार चरणों की व्याख्या चार मुखों से, चार वेदों के रूप में की है। गायत्री का प्राकट्य आकाशवाणी के, ब्रह्म निर्देश के, अंतःप्रेरणा के रूप में हुआ माना जाता है। जीवन की हर समस्या का समाधान और प्रगति के हर क्षेत्र का मार्ग-दर्शन हम इस महामन्त्र के सन्निहित संकेतों के आधार पर प्राप्त कर सकते हैं। भारतीय तत्त्वज्ञान को और भी अधिक सुबोध रीति के कथा प्रमाणों के आधार पर प्रस्तुत करने के लिए अन्यान्य धर्म ग्रन्थों की रचना हुई हैं। यह विशाल वाङ्मय फलतः वेदों का ही सुबोध भाग्य है। वेद ज्ञान की जन्मदात्री होने के कारण गायत्री को सर्वत्र ‘वेद मातरम्’ के नाम से सम्बोधन किया जाता रहा है।

वेदानाँ मातरं सावित्रा सम्पदमुपनिशद मुपास्ते। गो0ब्रा0 1।1।32

सावित्री वेदों की माता है। उस दिव्य विभूति की उपासना की जाती है। सर्व वेद सारभूता गाय«यास्तु समर्थना। ब्रह्मादयोपि संध्या या ता ध्यायन्ति जपन्ति च।

-देवी भागवत् 16।16।15

गायत्री उपासना वेदों का सारभूत तत्त्व है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सभी देव संध्या सहित गायत्री की आराधना करते हैं।

विद्यात्वमेव ननु बुद्धिमत्ता नराणाशक्तिस्त्वमेव किल शक्ति मता सदैव। त्वं कीर्ति कान्ति कमलामल तुश्टि रूपा मुक्ति प्रदा विरति रेव मनुष्य लोके। माय«यसि प्रथम वेदकला त्वमेव स्वाहा स्वाधा भगवती सगुणार्धमात्रा। आम्नाय एवं विहितो निगमो भवत्या संजीवनाय संततं सुरपूर्व जान्तम्।

हे गायत्री, आप ही बुद्धिमानों में प्रज्ञा, शक्तिवानों में शक्ति बनकर निवास करती है। आप ही कीर्ति, कान्ति, तुष्टि एवं मुक्ति दायिनी है। आप ही वेदों का सार है। यज्ञ कर्मों में स्वाहा स्वधा है। आपका ही विस्तार आगम और निगम में हुआ है। आप ही देव पूजित संजीवनी है।

गायत्री सद्ज्ञान की गंगोत्री है। उसे अपनाने से अन्तःकरण में सद्ज्ञान का, ब्रह्म विद्या का, अवतरण होता है। ऐसा ब्रह्म चेता मनुष्य ब्राह्मण कहलाता है। ब्राह्मण अपने ब्रह्म तेज से स्व पर कल्याण कर सकने में समर्थ होता है। उसकी ब्रह्म तेजस्विता इसी स्तर ब्रह्म तुल्य हो जाता है।

ब्रह्म ब्राह्मविदि प्रतिश्ठितम्।

“वह ब्रह्म ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण पर प्रतिष्ठित है।”

यो ह बाएवं वित्स ब्रह्मवित् पुण्याँच कीर्ति लभते सुरभींश्च गन्धान्। सोऽपहत् पाप्मानन्ताँ श्रियमश्नुते य एवं वेद। यश्चैवं विद्वनेवमेता वेदाना-मातरं सावित्री सम्पदमुपनिशद मुपास्त इति ब्राह्मणम्-गायत्री उपनिषद्

“जो इस प्रकार जानता है, वह ब्रह्म वेत्ता ब्रह्मज्ञानी पुण्य-कीर्ति और सुरभि-गन्ध को प्राप्त करता है। उसके समस्त पाप दूर हो जाते हैं। वह अनन्त श्री -ऐश्वर्य वैभव का उपभोग करता है। जो इस प्रकार जानता है और जो इस प्रकार ज्ञान सम्पादन करके समस्त वेदों की माता सावित्री के इस उत्तम सम्पत्प्रद उपनिषद् की उपासना करता है वही ब्राह्मण है।

परब्रह्म स्वरूपा च निर्वाण पद दायिनी। ब्रह्म तेजो मयी शक्ति स्तधिश्ठातृ देवता॥

गायत्री परब्रह्म स्वरूप तथा निर्वाण पद देने वाली है। वह ब्रह्म तेज की अधिष्ठात्री देवी है।

परब्रह्म स्वरूपा च निर्गुण पद दायिनी। ब्रह्म तेजोमयी शक्ति स्तदधिश्ठातृ देवता-देवी भागवत 9।1।42

वह ब्रह्म स्वरूप, निर्विकल्प पद देने वाली, ब्रह्म तेज यही परम शक्ति तथा अधिष्ठात्री देवी गायत्री ही है।

तस्मिस्तज्जने भेदाभावत्। ब्रह्म विद ब्रह्मैव भवति॥

“इस प्रकार सब भेद जाता रहता है। ब्रह्म का जानने वाला ब्रह्म ही हो जाता है।”

सावि«याश्चैव मंत्रार्थ ज्ञात्वा चैव ययार्थतः तस्या ययुक्तं चोपास्यं ब्रह्म भूयाय कल्पते। -योगी याज्ञवल्क्य

गायत्री का गूढ़ मर्म और रहस्य जानकर जो उसकी उपयुक्त उपासना करता है वह ब्रह्म भूत ही हो जाता है।

यश्चैवं विद्वानेव मेता वेदानाँ मातरं सावित्री सम्पद मुपनिशद मुपास्ते इति-गोपथ

वेद माता गायत्री की उपासना करने वाले विद्वान् और श्रद्धावान होते हैं।

ब्रह्म विद्या और ब्राह्मण दोनों अन्योऽन्याश्रित हैं। ब्रह्म विद्या का सही अवगाहन करने वाला सच्चा ब्राह्मण बन कर रहता है। इसी बात को यों भी कह सकते हैं कि ब्राह्मण को ही ब्रह्म विद्या प्राप्त होती है। यहाँ जाति वंश के आधार पर जाने वाले ब्राह्मण कुल की चर्चा नहीं है। ब्राह्मणत्व तो एक मनोभूमि है। जिसमें आत्म-परिष्कार और लोक मंगल के तत्त्व कूट-कूट कर भरे होते हैं। ऐसे ही ब्रह्म परायणों की अवधारणा से ब्रह्म विद्या यशस्विनी होती है। दोनों एक-दूसरे के सहयोग से धन्य बनते हैं।

उपनिषद् में वर्णित ब्रह्म विद्या और ब्राह्मण के बीच यह एक अलंकारिक संवाद इस तथ्य को और भी अधिक स्पष्ट करता है। उस संवाद में बताया गया है कि ब्रह्म परायण, उदात्त दृष्टिकोण युक्त व्यक्ति ही ब्रह्म चर्चा करे तो उत्तम है। वाचालता एवं ड़ड़ड़ड़ उद्देश्यों के लिए उसे प्रयुक्त करने से तो न करना ही उपयुक्त है।

विद्या ब्राह्मण मेत्याह सेवधिस्तेऽसिप रक्षमाम्। असूयकाय माँ मादास्तथा स्याँ वीर्यवित्तम्त॥

विद्या ब्राह्मण के समीप में आकर कहती है कि -”मैं तेरी धरोहर हूँ, मुझे तेरी भली-भाँति रक्षा करनी चाहिए। मुझे किसी भी निन्दक पुरुष को मत देना ऐसा तेरे करने पर मैं अधिक वीर्य-पराक्रम वाली हो जाऊँगी।

विद्या ह वै ब्राह्मण माँ जगाम गोपाय माँ शेवधि स्ते ऽहमस्मि। असूय माया नृजवेऽयताय न माँ व्रूया वीर्यवती तथा स्याम्॥

ब्रह्म विद्या ब्राह्मण के समीप में आकर उससे कहती है कि मेरी रक्षा करो, मैं तुम्हारी निधि हूँ। जो असूया (निन्दा) करने वाला हो, कुटिल हो और संयम से शून्य हो ऐसे पुरुष को मुझे कभी मत देना, तभी मैं वीर्य वाली होऊँगी।

ब्रह्म विद्या की उपहासास्पद स्थिति तब बनती है जब उसका अवगाहन करने वाले व्यक्तित्व की उत्कृष्टता को आवश्यक न मान कर कर्मकाण्डों और विधि-विधानों को ही सब कुछ मान लेते हैं। अग्नि बिना ईंधन ज्वलनशील कहाँ होता है। ज्योति के अभाव में तेल बत्ती युक्त दीपक भी कहाँ प्रकाश दे पाता है उसी प्रकार व्यक्तित्व को निकृष्टता के रहते, उपासनात्मक कर्मकाण्ड भी कब सफल होते हैं। ब्राह्मण की दुर्दशा का -असफलता का एकमात्र कारण उसकी उत्कृष्टता का स्तर गया-गुजरा होना ही है, साधना विधानों में अन्तर रहने की बात इस सन्दर्भ में कोई बड़ा व्यवधान प्रस्तुत नहीं करती । कहा भी है-

अनध्यापन शीलं च सदाचार विलंघनम्। सालसं चे दुन्नादे ब्राह्मणं वाधते यमः॥

स्वाध्याय न करने से , आलस्य से और कुधान्य खाने से ब्राह्मण का पतन हो जाता है।

अनभ्यासेन वेदनामा चार स्य च वर्जनात। आलस्यात् अन्न दोशाच्च मृत्युर्वि प्रान् जिथा सति-मनु 5-4

वेदों का अभ्यास न करने से, आचार छोड़ देने से, आलस्य से, कुधान्य खाने से ब्राह्मण की मृत्यु हो जाती है।

जिह्वादग्धा परान्नेव करौ दग्धौ प्रति ग्रहात्। मनोदग्धं परस्त्री भिः कथं सिद्धि र्वरानने। वादार्थ पठयते विद्या, परार्थ क्रियते जपः। ख्यार्त्यथः दीपते दानं कथं, सिद्धि र्वरानने।

पराया अन्न खाने से जिह्वा की शक्ति नष्ट हो गई। दान-दक्षिणा लेते रहने के हाथों की शक्ति चली गई, पर नारी की ओर मन डुलाने से मन नष्ट हो गया फिर हे पार्वती इन ब्राह्मणों को सिद्धि कैसे प्राप्त हो ?

ब्रह्म विद्या परायण-गायत्री उपासक इस दिव्य साधना का आश्रय लेकर सब प्रकार धन्य बनता है इसे कल्प-वृक्ष कामधेनु, अमृत, पारस आदि नामों से सम्बोधन किया गया है। परा विद्या यही है। कूर्म पुराण में उसका गुणानुवाद गाते हुए कहा गया है-

वाग्देवी वरदा वाच्या कीर्तिः सर्वार्थसाधिका। योगीश्वरी ब्रह्मविद्या महाविद्या सुशोभना॥ गुह्यविद्याऽऽत्मविद्या च धर्म्मविद्यात्मभाविता। स्वाहा विश्वम्भरा सिद्धिः स्वधा मेधा धृतिः श्रुति-कूर्म पुराण

‘वाक् देवी, वरदात्री, सर्व अर्थों का साधन करने वाली गायत्री है। उसी योगेश्वरी, ब्रह्म विद्या, महाविद्या, गुह्य विद्या, अध्यात्म विद्या, धर्म विद्या कहते हैं। वही स्वाहा, स्वधा, मेधा धृति, श्रुति आदि है।

एवं विच्छान्तोदान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वाऽत्मनोवात्मानं पश्यति। सर्व्च मात्मानं पश्यति नैनं पाप्मातरति ड़ड़ड़ड पापमानं तरति नैनं पाप्मा तपति ड़ड़ड़ड़ पाप्मान तपति विपापो विरोजोऽविचिकित्सो ब्राह्मणो भवति-वृह्दा 4 अ 4।23

अर्थ- इस प्रकार से जानने वाला शान्त, उपरत, तितिक्षु (और) समाहित होकर आत्मा में ही परमात्मा को देखता है, सब जीवों का जो अन्तरात्मा उसे देखता है। ऐसे ब्रह्म परायण को पाप दया नहीं सकता । वह समस्त पापों का उल्लंघन कर जाता है। उसे पाप तपाता नहीं। वह उलटा पापों को ही तपाता है। पाप रहित-वासना रहित-व्यक्ति निस्सन्देह ब्राह्मण ही होता है।


गायत्री का भर्गतत्व ब्रह्मवर्चस्

गायत्री का एक पक्ष है- ब्रह्म विद्या- दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप का परिष्कार उसका दूसरा पक्ष है-प्रसुप्त अन्तः शक्तियों का जागरण- ब्रह्म तेज का संवर्द्धन पौराणिक गाथाओं में ब्रह्मा जी की दो पत्नियाँ बताई गई हैं- एक गायत्री, दूसरी सावित्री। गायत्री को ब्रह्म विद्या और सावित्री को ब्रह्माग्नि नाम दिया गया है। अग्नि की तेजस्विता सर्वविदित है। अग्नि ऊर्जा से कितने प्रयोजन सधते हैं यह भी जानते हैं। आन्तरिक ब्रह्माग्नि भी अगणित भौतिक और आध्यात्मिक प्रयोजन सिद्ध कर सकने में समर्थ है।

साधना विज्ञान के दो पक्ष हैं- एक योग, दूसरा तप। योग कहते हैं जोड़ने-मिलाने को। जीव जब अपनी भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं का परित्याग करके ईश्वरीय निर्देशों को-आत्म-संकेतों को स्वीकार करता है तब उसे समर्पित, शरणागत, भक्त अथवा योगी कहा जाता है। योग से आत्मा को देवात्मा-परमात्मा स्तर तक विकसित होने का अवसर मिलता है। तप से शक्ति उभरती है। अरणि मंथन से अग्नि उत्पन्न होती है। तितीक्षा के कष्ट-कारक विधि-विधानों से-आत्म-संयम मनोनिग्रह एवं उदात्त सेवा साधनों के लिए कष्ट उठाने से प्रसुप्त अन्तः क्षेत्र को प्रखर बनने का अवसर मिलता है। इस प्रखरता के सहारे विभिन्न स्तर की उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकना सम्भव होता है। तितीक्षा और साधना एक ही तथ्य के दो नाम रूप हैं। साधना से सिद्धि मिलने की मान्यता के पीछे शक्ति सम्पादन का रहस्य ही काम करता है। सशक्तता ही प्रगति, समृद्धि और विभूति के त्रिविध सत्परिणाम उत्पन्न करती रहती है।

गायत्री से शान्ति का-मोक्ष का द्वार खुलता है और सावित्री से सर्वतोमुखी समर्थता उपलब्ध होती है। सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर सफल यात्रा तभी हो सकेगी जब यह दोनों ही रथ-चक्र समान रूप से लुढ़कते रह सकें। गायत्री और सावित्री दो पृथक् सम्प्रदाय या मार्ग नहीं है। समग्र आत्मिक प्रगति के लिए दोनों को एक दूसरे का पूरक यहाँ तक कि अविच्छिन्न भी कहा जा सकता है। ज्ञान की ही तरह विज्ञान भी आवश्यक है। सुसंस्कारों के साथ-साथ पराक्रम की क्षमता भी रहनी चाहिए। अन्यथा एकांगी प्रगति का अधूरापन अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति न होने देगा।

गायत्री के ब्रह्म विद्या स्वरूप का संकेत ‘धियः’ शब्द में किया गया है। ‘भर्गः’ में उसके ‘तेजस्’ का प्रतिपादन है। दोनों के समन्वय से ही गायत्री तत्त्व के यथार्थ स्वरूप का प्रकटीकरण होता है। शास्त्रों में गायत्री की ज्ञान गरिमा के साथ-साथ उसके तेजस्वी पक्ष का भी उल्लेख किया गया है।

ब्रह्मत्व चेदाप्तु कामोऽस्युयास्व गायत्रीं चेल्लोक कामोऽन्यदेवम्। बुद्धेः साक्षी बुद्धिगम्यों जयादौ गाय«यर्थः सोऽनद्यो बेदसारः तद ब्रह्मैव ब्रह्मतोपास-कस्या प्येवं मंत्रः कोऽस्ति तंत्रे पुराणै। -देवी भागवत

ब्रह्म तेज प्राप्त करने की इच्छा हो तो वेदमाता गायत्री की ही उपासना करनी चाहिए। अन्य कामनाओं के लिए अन्य देवताओं को पूजें।

इसी से साक्षी बुद्धि-ऋतम्भरा प्रज्ञा का उदय होता है। यही वेदों का सार है। पापों से निवृत्ति और पवित्रता की सिद्धि इसी से मिलती है। ब्रह्मत्व की उपासना करने वाले के लिए यही साक्षात् ब्रह्म है। यह शिरोमणि मन्त्र है। इससे बढ़कर और कोई मन्त्र-तन्त्र आदि नहीं है।

यो वा अत्राग्निर्गायित्री स निदानेन। -शत॰ 1।8।2।15

गायत्री को ही निदान ( ब्रह्म ज्ञान) और अग्नि ( ब्रह्म शक्ति) का रूप समझना चाहिए।

गायत्री वा इद सर्व भूतं यदिदंकिडडड । छान्दोग्य 3।12।1

इस जड़ चेतन जगत में गायत्री ही शक्ति रूप से विद्यमान् है।

ब्रह्मण्य तेजो रूपा च सर्व संस्कार रूपिणी पवित्र रूपा सावित्री, वाँछतिह्यात्म शुद्धये। -देवी भागवत्

गायत्री ‘ ब्रह्म तेज’ रूप है। पवित्रता एवं संस्कार रूपिणी है। उससे आत्म-शुद्धि होती है।

गायत्री को सोम और सावित्री को अग्नि कहा गया है। यहाँ अग्नि से तात्पर्य है ब्रह्माग्नि, योगाग्नि। साधना क्षेत्र में इसी को जीवनी-शक्ति प्राण-ऊर्जा कुण्डलिनी शक्ति आदि नामों से पुकारते हैं ब्रह्म तेज इसी ब्रह्माग्नि की प्रतिक्रिया है। ओजस्, तेजस् एवं वर्चस् इसी को कहते हैं। ब्रह्माग्नि और ब्रह्म वर्चस् शब्दों में लेखन उच्चारण का ही अन्तर है। तथ्यों की दृष्टि से दोनों को एक ही कहा जा सकता है। ब्राह्मी ऊर्जा उपार्जित कर लेने वाले तपस्वी अपने ढंग के अनोखे शक्तिवान होते हैं। उनकी समर्थता अन्य किसी सामर्थ्य के साथ आँकी नहीं जा सकती है।

ब्रह्माग्नि की चर्चा शास्त्रों में स्थान-स्थान पर हुई है-

द्वयं वा इदं न तृतीयमस्ति। आर्द्रचैव शुश्कं च यदार्द्र तत् सौम्यं यच्छुश्कं तदाग्नेयम्-शतपथ

यह संसार दो पदार्थों से मिलकर बना है - (1) अग्नि, (2) सोम। इनके अतिरिक्त तीसरा कुछ नहीं है।

अग्नि र्वा अहः सोमारात्रिराि यदन्तरेण तद् विश्णु। श0प॰ 3।4।4।15

अग्नि और सोम के मिलन को विष्णु कहते हैं।

इमौ तै पक्षावजरौ पतत्रिणौ याभ्या रक्षास्यपहं-स्यग्ने ताभ्या पतेम सुकृतामु लोकं यत्र ऋशयों जग्मुः प्रथमजाः पुराणाः। -यजु0 18।52

हे अग्नि ! तेरे दोनों पंख फड़फडाते हैं। उनसे पाप और तम का हनन होता है। इन्हीं पंखों के सहारे हम उस पुण्य-लोक तक पहुँचते हैं जहाँ पूर्ववर्ती ऋषि पहुँचे थे।

इन्दुर्दक्षः श्येन ऋतावा हिरण्य पक्षः शकुनो भुरण्युः । महान्तसधस्थे ध्रुव आ निशतो नम ते अस्तु मा मा हिंसी। -यजु0 18।53

हे अग्नि तू सोम रस से परिपूर्ण है । तू दक्ष है। तू ही ऋत युक्त है। तेरे अमृत सिक्त पंख हैं। तू शक्तिशाली है, पोषक हैं, तू मस्तिष्क में ध्रुव केन्द्र बनकर विराजमान् है। तुझे नमस्कार । तू हमें जलाना मत।

अग्निर्ललाटं यमः कृकाटम्। अथर्व 9।7।1

तुम्हारे ललाट में वह अग्नि उत्पन्न हो जो शिव रूप बनकर काम विकृतियों को भस्म कर सके।

ब्रह्म ह्यनिग्न स्तस्मादाह ब्राह्मणेति। शतपथ॰ 1।4।2।1

मनुष्य शरीर में विद्यमान् यह आत्मा रूपी अग्नि ब्रह्म ही है।

येन ऋशयस्तपसा सत्रमायान्निन्धानाँ अग्निं स्वराभरन्तः। तस्मिन्नहं निदधे नाके अग्निं यमाहुर्मनवस्तीर्णवर्हिशम्। यजु0 15।49

इस आन्तरिक अग्नि को ऋषि लोग अपने तप बल से प्रदीप्त करते हैं और उसे स्वर्ग लोक तक पहुँचा कर मस्तिष्क को प्रकाश से भरते हैं। यही दिव्य अग्नि है।

अग्निः पूर्वेभि ऋर्शिभिरीड्यो नूतनैरुत। स देवा एह वक्षति। ऋ॰ 1।1।2

प्राचीन और अर्वाचीन सभी ऋषि अग्नि का आश्रय लेते हैं क्योंकि वही देवताओं को धारण करती है।

तामग्ने अस्मे इशमेरयस्व वैश्वानर द्यमतीं जातवेदः। यया राधः पिन्वसि विश्ववार पृथुश्रवो दाशुशे मर्त्यायं। ऋ॰ 7।5।8

हे अग्नि, हमारे भीतर वे उदात्त आकांक्षाएँ पैदा करो जिनसे प्रभावित होकर तुम प्रसन्न होते हो और कीर्ति एवं सिद्धियाँ प्रदान करते हो।

अग्ने विवस्वदुशसश्चित्र राधो अमर्त्य। आ दाशुशे जातवेदी वहात्वमद्या देवाँ उशर्बुधः॥ ऋ॰ 1।44।

हे अग्नि मेरे जीवन की ऊषा बनकर प्रकटो। अज्ञान के अन्धकार को दूर करो। ऐसा आत्म-बल प्रदान करो जिससे देवों का अनुग्रह खिंचा चला आवे।

त्वदग्ने काव्यास्त्वन्मनीशास्त्वदुक्था जायंते राध्यानि। त्वदेति द्रविणं वीरपेशा इत्याधिये दाशुशे मर्त्याय॥ ऋ॰ 4।11।3

हे अग्नि! आप सत्य को धारण करने वाले उदार व्यक्ति के अन्तःकरण में कवित्व जैसी करुणा भर देते हो। तुम्हारी ऊष्मा से ही साहसी लोग सिद्धियाँ और सफलताएँ प्राप्त करते हैं।

अग्ने तवश्रवो वयो महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो। वृहद्भानो शवसा बाजमुक्थ्यं दधासि दाशुशे कवे॥ ऋ॰ 10।140।1

हे अग्नि! शरीर में संव्याप्त होकर आपकी प्रशंसनीय ज्वालाएँ हर दिशा में चमकती हैं। भाव-विभोर उदात्त व्यक्ति को आप ही उत्थान की प्रेरणा और प्रतिभा प्रदान करती हैं।

यत् ते पवित्रमर्चिशि, अग्ने विततमन्तरा। ब्रह्म तेन पुनीहि नः ॥ ऋ॰ 9।67।23

हे अग्नि देव जो पवित्र और विशाल ब्रह्म तेरी ज्वाला में लस-लस कर रहा है, उससे हमें पवित्र करो ।

इदं वर्चो अग्निना दत्तमागन्, भर्गो यशः सहः ओजो वयो बलम्। त्रयस्त्रिशद्यानि च वीर्याणि, तान्यग्निः प्र ददातु में-अथर्व 19।30।1

मुझे अग्नि द्वारा क्या कुछ नहीं मिल रहा? प्रकाश तेज , यश प्रभाव, पराक्रम और बल-सभी मेरे अन्दर आ रहे हैं। मुझ पर अग्नि की कृपा बनी रहे और मुझे तैंतीस प्रकार के सभी वीर्य प्राप्त होते रहें।

अग्नेऽभ्यावर्तिन्नभि मा निवर्तस्वायुशा वर्चसा प्रजया धनेन सन्या मेधवा रय्या पोशेण। यजु0 12।

हे अग्नि देव आप तू आयु, वर्चस, प्रजा, धन, दान, मेधा, रयि, पुष्ट बनकर अपना अनुग्रह हमें प्रदान करें।

इस ब्रह्माग्नि के - योगाग्नि के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उसे गायत्री का ही ब्रह्म तेजस् कहा गया है।

यो वा अत्राग्नि गायत्री। -शतपथ 8।2।15

गायत्री दिव्य अग्नि है।

गायत्री के 24 अक्षरों में सन्निहित 24 शक्तियों की व्याख्या करते हुए शास्त्र कहता है-

आजश्शक्ति बल प्रभाव सुशमा तेजस्सु वीर्यप्रभा। ज्ञानैर्श्वय महस्सहो जययशस्स्थैर्य प्रतिश्ठाश्रियः॥ विज्ञान प्रतिभा मतिस्मृ तिधृति प्रज्ञाप्रथस्सु ज्वलाः। वर्णास्त्वन्मानुगै स्त्रिरशभि रहो बर्ध्यन्त एवात्रमें॥

“ओज, शक्ति, बल, महिमा, कान्ति, तेज, पराक्रम, प्रकाश, ज्ञान, ऐश्वर्य, विकास, सहनशक्ति, जय, कीर्ति, स्थिरता, प्रतिष्ठा, लक्ष्मी, विज्ञान, प्रतिभा, मति, स्मृति, घृति, प्रज्ञा, ख्याति- यह चौबीस गुण हे माता! तुम्हारे मन्त्र में रहने वाले चौबीसों वर्णों द्वारा मुझमें अभिवृद्धि पा रहे हैं।”

इस सावित्री शक्ति की गरिमा को भगवान् मनु सशक्तता के क्षेत्र में सर्वोपरि मानते हैं।

सावित्र्यास्तु परान्नास्ति-मनु 2।83

सावित्री से बढ़ कर श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।

ज्ञान को ब्रह्म और विज्ञान को क्षात्र कहा गया है। भारतीय धर्म में दोनों को समान महत्त्व दिया गया है और दोनों के उपार्जन में समान प्रयत्न करने का निर्देश दिया गया है-

द्रोणाचार्य के शास्त्र और शस्त्र धारण का कारण-

ब्रह्म और क्षात्र दोनों को समान उपयोगिता के रूप में बताया गया है-

अग्रतः चतुरो वेदा पृश्ठतः सशरं धनु। इदं ब्राह्मं इदं क्षात्र शास्त्रादपि शरादपि-महाभारत

हम वेदों को आगे रखकर लोगों को समझाने और सन्मार्ग पर लाने का प्रयत्न करते हैं। साथ ही पीठ पर धनुष बाण भी रखते हैं। यह धर्म शिक्षा ‘ ब्राह्म’ है और यह शस्त्र धारण ‘क्षात्र’ है। दोनों शक्तियों के समन्वय से ही समस्याएँ सुलझती है।

नाब्रह्म क्षत्रमृघ्नोति नाक्षत्रं ब्रह्म वर्धते।

ब्रह्म-शक्ति के बिना क्षात्र-शक्ति नहीं बढ़ती और क्षत्र-शक्ति के बिना ब्रह्म-शक्ति नहीं बढ़ती । परस्पर मिली हुई ब्रह्म-शक्ति और क्षत्र-शत्रि ही इस लोक और परलोक में वृद्धि को प्राप्त होती है।

यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यंचौ चरतौ सह। तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेशं यत्र देवाः सहाग्निना-यजुर्वेद 20।25

“जहाँ ब्राह्म-शक्ति और क्षात्र-शक्ति साथ-साथ रहती है, वही लोक पुण्यशाली होता है।” इस मन्त्र में आये हुए ‘ ब्रह्म’ और ‘क्षात्र’ पद क्रमशः ज्ञान और कर्म के वाचक है। ये दोनों शक्तियाँ जहाँ होंगी वही प्रगति के आधार बनेंगे।

ब्रह्मणि खलु वै क्षत्रं प्रतिश्ठितम् क्षत्रे ब्रह्म-अथर्व 8।12

ब्रह्म में क्षत्र की स्थिति होती है और क्षत्र में ब्रह्म की।

ब्रह्म च क्षत्रं च संश्रिते-अथर्व 3।11

ब्रह्म और क्षत्र परस्पराश्रित होते हैं।

नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो न च प्रमादात्तपसो वाप्यलिंगात्। एतैरुपायैर्यतते यस्तु विद्वाँस्तस्यैप आत्मा बिशते ब्रह्मधाम-मुण्डकोपनिशद् 3।2।4

वह परमात्मा निर्बल मनुष्य से भी नहीं जाना जाता अथवा पाखण्ड रूप तप से भी वह नहीं मिलता। हाँ जो विद्वान्, बल, कर्म, अप्रमाद आदि उपायों का अभ्यास करता है उसी का आत्मा ब्रह्मलोक में प्रवेश करता है।

ज्ञान को शिव और बल को शक्ति का प्रतीक माना गया है। मात्र ज्ञान ही सम्पादित किया जाय और बल की उपेक्षा होती रहे तो उस एक पक्षीय प्रगति से कुछ का चलने वाला नहीं है। शक्ति पक्ष की गरिमा बताते हुए कहा गया है-

शक्ति बिना महेशानि सदाऽहंशव रुपकः । शक्ति युक्तो महादेवि शिवोऽहं सर्व कामदः॥

शक्ति के बिना महादेव केवल शव मात्र है। शक्ति युक्त होने पर ही वे समर्थ शिव बनते हैं।

शववच्छक्ति हीन स्तु प्राणी भवति सर्वदा। शक्ति हीन प्राणी तो मृतक तुल्य है। रुद्र हीनं विश्णु हीन न वदन्ति जनः किल। शक्ति हीनं यथा सर्वे प्रवदन्ति नराधमम्॥

किसी का तिरस्कार करना हो तो उसे रुद्र हीन, विष्णु हीन नहीं कहा जाता, वरन् उसे शक्ति हीन, अशक्त, निकम्मा कहकर ही तिरस्कृत किया जाता है।

प्रभावेणैव गाय«याः क्षत्रिय कौशिको वशी। राजर्शित्वं परित्यज्य ब्रह्मर्शि पद मीयिवान्॥

सामर्थ्य प्रायचात्युच्चै रन्यद्भुवन सर्जने। किं किं न दयात् गायत्री सम्यगेव मुपासिता-स्कन्द पुराण

क्षत्रिय विश्वामित्र ने राजर्षि पद से उन्नति करते हुए ब्रह्मर्षि पद गायत्री उपासना के बल पर ही प्राप्त किया। दूसरी नई सृष्टि रच डालने की शक्ति भी प्राप्त की थी। भली प्रकार साधना की हुई गायत्री से भला कौन-सा लाभ प्राप्त नहीं किया जा सकता ।

आध्यात्मिक और भौतिक प्रगति गायत्री के ज्ञान और विज्ञान दोनों ही पक्षों को अपनाने से सम्भव होती है। अस्तु उसकी सावित्री तेजस्विता को भी उपलब्ध करने के लिए प्रयत्नशील रहा जाना चाहिए।

तस्या एश तृतीयः पादः स्वर्घियों यो नः प्रचोदयादिति स्त्री चैव पुरुशश्च प्रजयनतः। यो वा एताँ सावित्रीमेवं वेद स पुनमृत्यु जयति-साविश्णु पनिशद् 12।13।14

इस सावित्री देवी की जो स्त्री, पुरुष, गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए उपासना करते हैं, वे श्रेष्ठ सन्तान उत्पन्न करते हैं उनकी बार-बार मृत्यु नहीं होती।

जो इस सावित्री विद्या को जानता है, वह विद्वान् कृत-कृत्य हो जाता है और सावित्री लोक को प्राप्त करता है। यह उपनिषद् है।

यह आत्म-शक्ति दो प्रकार के प्रयोजन पूरे करती है। एक तो उसके सहारे सर्वतोमुखी प्रगति के आधार हस्तगत होते हैं, दूसरे दुष्टता को निरस्त करने के लिए ब्रह्म दण्ड के रूप में इसका प्रयोग हो सकता है। सुसम्पन्नता प्राप्त करने के लिए जिस आन्तरिक बलिष्ठता की आवश्यकता है वह सावित्री उपासनात्मक और साधनात्मक अवलम्बन ग्रहण करने से उपलब्ध हो सकती है। उपासना को व्यायाम और साधना को आहार-विहार की सुव्यवस्था के समतुल्य माना गया है। अन्तःशक्ति के सहारे व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाया जाता है और उस आधार पर अनेकानेक सिद्धियाँ, सरलताएँ प्राप्त करने का पथ-प्रशस्त होता चला जाता है।

ब्रह्मण्य तेजो रूपा च सर्व संस्कार रूपिणी। पवित्र रूपा सावित्री गायत्री ब्राह्मण प्रिया-देवी भागवत्

यह सावित्री ब्रह्म तेज रूप है। इस गायत्री को अपनाने से सुसंस्कारिता, पवित्रता एवं ब्रह्म परायणता प्राप्त होती है।

सावित्री प्रवेश पूर्वकमप्सु सर्व विद्यार्थ स्वरूपा ब्राह्माण्या धाराँ वेदमातरम्-परमहंस परिब्राजकोपनिशद्

सर्व विद्याओं की अधिष्ठात्री, ब्रह्म धारा, वेदमाता गायत्री में प्रवेश करते हुए साधना करनी चाहिए।

तपः संपादिनी सद्यो भारतेशु तपस्विनाम्-देवी भागवत

तपस्वियों में तप शक्ति बनकर तुम्हीं विराजमान् हो।

तपः स्वरूपा तपसाँ फलदात्री तपस्विनाम्। सिद्धिविद्यास्वरुपा च सर्व सिद्धिप्रदा सदा। यया बिना तु विप्रौघो मूको मृतसमः सदाः-देवी भागवत

वह तप स्वरूपिणी है, तपस्वियों को फल प्रदान करती है। उसी को सिद्धि कहते हैं, उसी को विद्या। उसके अभाव में साधक मूक और मृतक तुल्य ही बना रहता है। समस्त सिद्धियों के देने वाली तो वह भगवती ही है।

सद्भावना का संवर्द्धन जिस प्रकार जीवन विकास का महत्त्वपूर्ण तथ्य है, उसी प्रकार दुष्टता का निराकरण भी उतना ही आवश्यक है। अन्यथा आसुरी तत्त्व उपार्जित सज्जनता को भी जीवित नहीं रहने दे सकते । शास्त्रकार ने अहंकार जन्य, क्रोध की निन्दा की है किन्तु अनीति के विरुद्ध तन कर खड़े हो जाने वाले ‘मन्यु’ की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा भी की है। वन्य पशुओं से रक्षा न की जाय तो न कृषि फलीभूत होगी और न उद्यान से कुछ उपार्जित किया जा सकेगा। सुरक्षा के अभाव में तो श्रम उपार्जित आजीविका भी दस्युओं के उदर में चली जाएगी। न्याय की रक्षा के लिए अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करना ही होता है। देवत्व की रक्षा, असुरत्व के उन्मूलन बिना हो ही नहीं सकती ।अस्तु अन्य सुरक्षा साधनों की तरह ब्रह्म शक्ति का उपयोग भी होता रहा है।

राजा विश्वामित्र का आक्रमण महर्षि वशिष्ठ पर हुआ तो उन्होंने प्रतिरोध के लिए अपनी नन्दिनी ब्रह्म-शक्ति का ही उपयोग किया। इस प्रतिरोध से विश्वामित्र का आक्रमण परास्त हो गया। तब उनने भौतिक और आत्मिक बल की तुलना करते हुए आत्म-बल की - ब्रह्म बल की गरिमा को ही श्रेष्ठ माना और राज-पाट छोड़ कर उसी के उपार्जन में जुट गये।

परास्त विश्वामित्र ने भौतिक बल को -क्षत्रिय बल को धिक्-तुच्छ कहा और ब्रह्म-बल की गरिमा को बार-बार स्वीकार करते हुए, उसी को उपलब्ध करने की प्रतिज्ञा की। उनने कहा-

धिग्बलं क्षत्रिय बलं ब्रह्म तेजोबलं बलम्। एकेन ब्रह्म दण्डेन सर्वास्त्राणि हतानि में -महाभारत

राजा विश्वामित्र ने कहा- भौतिक बल तुच्छ है। ब्रह्म बल ही महान् बल है। एक की ब्रह्म दण्ड ने मेरे समस्त शस्त्र बल को निरस्त कर दिया।

लिंग पुराण में राजा क्षुप और दधीचि के मध्य हुए एक कटु प्रसंग का वर्णन आता है। क्षुप अपनी सामर्थ्य की धमकी देते हुए दधीचि से ब्रह्म तेज के संदर्भ में कुछ अपमानजनक शब्द कहने लगे। इस पर दधीचि के ब्रह्म बल के गौरव का स्मरण राजा को दिलाया और बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये राजा की उपेक्षा करते हुए स्वाभिमान प्रदर्शित करते हुए राजा को जहाँ का तहाँ बैठा छोड़कर अपनी कुटिया में चले गये। इस प्रसंग का उल्लेख इस प्रकार हुआ है-

देवैश्च पूज्या राजेन्द्र नृ पैश्च विविधैर्गणैः। ब्राह्मणा एवं राजेन्द्र बलिनः प्रभविश्णुवः॥ इत्युक्त्वा स्वोटजं विप्रः प्रविवेश महाद्युतिः। दधीचमभिवद्यैव जगाम स्वं नृपः क्षयम् ॥ -लिंग पुराण

अर्थात्- “देवों के द्वारा, नृपों के द्वारा तथा अन्य सब व्यक्तियों के द्वारा ब्राह्मण सम्मान के योग्य और अधिक शक्तिशाली होता है। इतना कहकर वे महा तेजस्वी मुनि कुटिया में प्रवेश कर गये और राजा उनकी वन्दना करके अपने नगर को चला गया।”

शत्रु तो न भयं तस्य दस्युतो क्वान राजनः न शस्त्रानल तो यौधा स्दाचित्सं भविष्यति।

ब्रह्म तेज सम्पन्न को न शत्रुओं का भय रहता है न दस्युओं का, न राजा का, न शस्त्र का, न अग्नि का। वह सब प्रकार के भयों से मुक्त होकर निर्भय बन जाता है।

शिव उमा संवाद में भी एक ऐसा ही उल्लेख है-

तक्षकेशापि दंश्टस्य प्रतीकारी हि तत्क्षणात्। ब्रह्म शाप प्रसक्तस्य कल्पान्तेस्यात् प्रतिक्रिया। नरकाग्निश्कृति नास्ति तस्या भावान्न संशयं। एवं तद्वंशजाः सर्वे पीडयन्तेऽहर्निशं प्रिये।

तक्षक सर्प के काटे का उपचार हो सकता है, पर ब्रह्म शाप पीड़ित का नहीं। उन अभिशप्तों को चिरकाल तक नारकीय अग्नि में जलना पड़ता है।

ब्रह्म-शक्ति के तीन अस्त्र गिनाये गये हैं- (1) ब्रह्मास्त्र (2) ब्रह्म दण्ड (3) ब्रह्मशीर्ष। इनका उल्लेख विश्वामित्र कल्प में इस प्रकार हुआ है।

ब्रह्मास्त्रं ब्रह्म दण्डं च ब्रह्मशीर्ष च संयुक्तम्। अर्ध्य त्रियं प्रयोगार्थ एक मेवा युदाहृतम्-विश्वामित्र कल्प

तन्त्र ग्रन्थों में गायत्री की ब्रह्मास्त्र शक्ति का वर्णन ब्रह्म शाप आदि के रूप में आता है। इस सन्दर्भ में कितने ही प्रयोगों की भी चर्चा है। एक गायत्री स्तवन में आता है-

ब्रह्मास्त्रं ब्रह्मशापं च ब्रह्म विद्या सनातची।

हे गायत्री माता-आप ब्रह्म विद्या की ही तरह ब्रह्मास्त्र और ब्रह्म शाप भी हैं।

ब्रह्मास्त्रमिति विख्यातं त्रिशु लोकेशु विश्रुतम्। सत्यात्राय दातव्यं न देयं यस्य कस्य चित्।

यह ब्रह्मास्त्र परम प्रचण्ड है। इसका विधान केवल सत्पात्रों को ही बताया जाय। जिस-तिस को न सिखाया जाय।

ब्रह्मास्त्रारव्यो मनुः पातु सर्वागे सर्व सन्धिशु।

यह ब्रह्मास्त्र समस्त मर्मस्थलों की सुरक्षा रख सकने में समर्थ है।

ब्रह्म शक्ति ने अपनी असुर संहारिणी शक्ति का परिचय देते हुए कहा है-

अहं रुद्राय धनुरातनेमि ब्रह्मद्विशे शर वे हन्तवा उ। अहं जनाय समदं कृणोम्यहं द्यावापृथिवी आविवेश।

“ मैं ब्रह्म ज्ञान विरोधी विनाश योग्य रुद्र (एकादश इन्द्रियों) को हनन करने के लिए धनु में शर का संधान करती हूँ। इस प्रकार मनुष्यों के लिए संघर्ष करती हूँ और स्वर्ग तथा मृत्युलोक में आविर्भूत होती हूँ।”

मोक्षार्थिभिर्मु निभिरस्त समस्त दोशै। विद्यासि सा भगवती परमा हि देवी-महर्शि मार्कण्डेय

“वीतराग योगीजन मोक्ष प्राप्ति के लिए तेरे ब्रह्म विद्या रूप को ही उपासना करते हैं।”

ऋशयो ऋग्यजुः सामाथर्वच्छन्दासि नारद। ब्रह्म रूपा देवतोक्ता गायत्री परमा कला।

तद्बीज भर्ग इत्येशा शक्ति रूपा मनीशिभीः। कीलकं च धियः प्रोक्तं मोक्षाये विनियोजनम्। - देवी भागवत

अर्थात्- ऋषि तत्वमयी, ऋग्, यजुः, अथर्व, साम स्वरूप, ब्रह्म रूप, परम कला गायत्री ही है। उसका बीज भर्ग है, मेधा शक्ति वही है, धियः उसका कीलक है, मोक्ष के लिए इसका विनियोग होता है।


गायत्री का प्राणवान ब्रह्म-ते

जीवन समस्या के साथ उल्लेखित सभी प्रश्न अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए है। (1) पतनोन्मुख कुसंस्कारों को निरस्त करना (2) व्यक्तित्व को सशक्त बनाने वाली सत् प्रवृत्तियों को व्यवहार में उतारना (3) प्रगडडडड के लिए आवश्यक पुरुषार्थ के लिए अभीष्ट साहस संचय करना (4) आगत अवरोधों से जूझने के लिए जीवट का परिचय देना, इन चारों ही प्रयोजनों के लिए मनोबल, संकल्प बल, शौर्य साहस होना चाहिए। अशक्तता, अधीरता और कायरता की मिली जुली प्रतिक्रिया तो आत्मघाती ही होती है। इसके कारण मनुष्य अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारता है। दुःखद परिस्थितियों को निरस्त करते हुए कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्ध कर सकने की दिशा में बढ़ सकना उस जीवट के सहारे ही सम्भव होता है जिसे अध्यात्म की भाषा में आत्मबल एवं ब्रह्म वर्चस् कहते हैं । साँसारिक सहयोग साधन इसी चुम्बकत्व से खिच कर समीप आते और उपलब्ध होते हैं।

ईश्वर उपासना की तरह बल की उपासना भी आवश्यक है। शास्त्रकार ने ‘बल उपास्व’ का निर्देश दिया है और कहा है कि आत्मोत्कर्ष का लाभ बल हीनों को नहीं मिल सकता “नायमात्मा बल हीनेन लभ्यः” सच है बल हीनों को न आत्मा मिल सकेगा और न परमात्मा। भौतिक जीवन में भी उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ता । इस संसार के बाज़ार में सम्पदाएँ-विभूतियाँ और उपलब्धियाँ, समर्थता के मूल्य पर ही खरीदी जाती है।

जीवन की सार्थकता ‘जीवट’ के साथ ही है। जीवनी शक्ति युक्त को ही जीवित कहा जा सकता है। इसके अभाव में मनुष्य को जीवित मृतक ही कहा जा सकता है। खोने, ,सोने की प्रक्रिया को पेड़ पौधे भी पूरी करते हैं। जीवाणुओं में भी गतिशीलता होती है पर उन्हें जीवितों का श्रेय सम्मान तो नहीं मिलता।

चेतना की बलिष्ठता को अध्यात्म शास्त्र में ‘प्राण’ के नाम से पुकार गया है। प्राणवान् होने के कारण ही ‘प्राणी’ कहा जाता है। प्राण निकलते ही शरीर मृत घोषित कर दिया जाता है। यों जीवन तत्त्व की एक स्वल्प मात्रा तो उन पदार्थों में भी है, जिन्हें जड़ कहा जाता है। प्राण से तात्पर्य जीवात्मा की उस आन्तरिक क्षमता से है जो शरीर में ओजस्, चिन्तन में तेजस् और आस्थाओं में ‘वर्चस्’ के नाम से जानी जाती है। इस अन्तः क्षमता को -आत्म शक्ति को -प्राण तत्त्व को अधिकाधिक मात्रा में संचय करने वाला ही जीवन का आनन्द लेता और उसे सार्थक बनाता है।

गायत्री विद्या को प्राण तत्त्व के अभिवर्धन का आधार भूत साधन माना गया है। उसका तत्त्व दर्शन और उपासना माना गया है। उसका तत्त्व दर्शन और उपासना प्रकरण दोनों ही इस आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। भौतिक विज्ञान के सहारे भौतिक साधन बढ़ते हैं। आत्म विज्ञान के सहारे आत्मिक विशिष्टताओं को उभारा और सुदृढ़ किया जा सकता है। आत्मिक क्षेत्र में प्राण शक्ति भर देने की विद्या को गायत्री कहा गया है।

गायत्री शब्द के नामकरण पर दृष्टिपात करने से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि उसका आविर्भाव किस प्रयोजन के लिए हुआ है। ‘गय’ और ‘त्री’ शब्दों से मिल कर यह शब्द बना है। इसका अर्थ प्राण क्षमता का रक्षण संवर्धन करने वाली प्रक्रिया ही होता है।

गै-शब्दे इस धातु से ‘शतृ’ प्रत्यय करने पर ‘गायत्’ शब्द बनता है। ‘गायत्’ शब्द ‘त्रैड् पालने’ धातु से जुड़ने पर स्त्री-प्रत्ययान्त ‘गायत्री’ शब्द बनता है।

शतपथ ब्राह्मण में गायत्री शब्द का अर्थ इस प्रकार बतलाया गया है-

“सा हैशा गयाँस्तत्रे। प्राणा वै गयास्तत् प्राणाँस्तत्रे तद् गयास्तत्रे तस्माद् गायत्री नाम।” (शतपथ ब्राह्मण 14।8।15।7)

अर्थात् - उसने गयों की रक्षा की। प्राण ही ‘गय’ है, उन प्राणों यानी गयों को वाण करने वाली का नाम गायत्री है।

यही निरूपण, इन्हीं शब्दों में वृहदारण्यक उपनिषद् (5।14।4) में भी किया गया है।

निरुक्तकार का कहना है-

“गायत्री गायतेः स्तुतिकर्मणः” (निरक्त 7।12।5)

अर्थात् -स्तुति -कर्म द्योतक गायन के अर्थ में गायत्री नाम पड़ा।

गायन्तं त्रायते इति गायत्री -

जो गान करने वाले का त्राण करती है, वह गायत्री है। गान का अर्थ सम्पूर्ण अन्तश्चेतना में मन्त्र का झंकृत हो उठना-उसमें तन्मय हो जाना है, बैखरी वाणी से हवा में कुछ सतही हलचलें उत्पन्न करना मात्र नहीं।

गायत्री शब्द की ऐसी ही प्राण शक्ति संवर्धक व्याख्या विवेचनाएँ अन्यत्र भी हुई है।

‘गा’ चेति सर्वगा शक्ति, ‘यत्री’ तत्र नियंत्रिका।

‘गा’ अर्थात् सर्वव्यापी शक्ति उसे नियंत्रित करने की विधा ‘यत्री’ अर्थात् सर्वव्यापी चेतना शक्ति को अभीष्ट प्रयोजन के लिए नियंत्रित नियोजित करने की कला ‘गायत्री’।

साहैशा गयाँस्तत्रे प्राणाः वै गयास्त्प्राणाँ स्तत्रे। तद्यद गयाँस्तत्रे तम्ताद् गायत्री नाम-शतपथ 14।8।15।7

अर्थात् गय कहते हैं प्राण की। ‘त्री’ अर्थात् त्राण-रक्षक करने वाली। जो प्राण की रक्षा करे उसका नाम गायत्री हुआ।

गयाः प्राणा उच्यते। गयान् त्रायते सा गायत्री-सन्ध्या भाश्य

गायन्ते त्रायते इति वा गायत्री प्रोच्यते तस्मात् गायन्तं त्रायते यतः-याज्ञवल्क्य

प्राणों का संरक्षण करने वाली होने से उसे गायत्री कहा जाता है।

प्राणो गायत्रंः । -ताण्ड्य 7।1।9

प्राण ही गायत्री है।

प्राणो वै गाय«यः। -कौ0 15।2

प्राण का गायत्री रूप होना निश्चित है।

प्राणो वै गायत्री। -शतपथ 6।4।3।5

प्राणो गायत्री प्रजननम् । ता0 16।14।5, 16।16।16।7।16।5।9,19।7।7

तत्प्राणों वै गायत्रम् । जै0उ॰ 1।37।7

प्राणो वै गाय«यः

प्राणो वै गायत्री।

प्राणो गायत्री।

यो वै स प्राण एशा सा गायत्री।

गायत्री वै प्राणः

सैशा गायत्री प्राणः अतो गाय«या जगत्प्रतिश्ठितम्। यस्मिन् प्राणे सर्व देवा एकं भवन्ति। सर्वेवेदाः कर्माणि तत्फलं च, सैव गायत्री प्राण रूपा सती जगत आत्मा सा हैशा गयाँस्तत्रे-त्रातवती के पुनर्गयाः ? प्राणाः -वागादयो वैभवाः .........................गयत्राणाद् गायत्रीति प्रथिता।

-वृहदारण्यक 5।14।4

यह गायत्री ही प्राण है। अतः वही समस्त विश्व में व्याप्त है। इस प्राण में ही समस्त देवता सन्निहित हैं। सब वेद और समस्त कर्मों का फल उससे प्राप्त होता है। यह प्राण रूपी गायत्री ही जगत की आत्मा है। वाणी नेत्र आदि समस्त इन्द्रियों में समाविष्ट प्राण की संरक्षक होने के कारण उसे गायत्री कहा जाता है।

प्राणो वै बलं। यत्प्राणे प्रतिश्ठितं तस्मादा-हुर्बलं सत्यादोजीयः इत्येवम्नैशा गाय«यध्यात्मं प्रतिश्ठिता। सा ह्यैशा गयाँस्तत्रे। प्राणा वै गयास्तत्प्राणाँस्तत्रे। तद्यद् गयास्तत्रे गायत्री नाम्-शतपथ ब्राह्मण

प्राण ही बल है। बल और प्राण एक ही है। पर- ब्रह्म प्राणों का भी प्राण है। गायत्री का अध्यात्म यह प्राण ही है। प्राणों का परिष्कार करने की शक्ति सम्पन्न होने के कारण उसे गायत्री नाम दिया गया है।

प्राण शक्ति की आत्म बल की -अभिवृद्धि सामान्य मनुष्य में असामान्य क्षमताएँ विकसित करती है। उसे मूर्छित से जागृत बनाती है। आन्तरिक समर्थता से सम्पन्न मनुष्य भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों में सर्वतोमुखी प्रगति कर सकने में सफल बन सकता है। इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए शास्त्र कहता है-

तदाहुः कोऽस्वप्नुमर्हति, यद्वाव प्राणो जागार तदेव जागरितम् इति-ताण्ड्य 10।4।4

कौन सोता है ? कौन जागता है ? जिसका प्राण जागता है, वस्तुतः वही जागता है।

य एवं विद्वान प्राणं वेद रहस्या प्रजा हीयतेऽमृतो पवति तयेव श्लोकः-प्रश्नोपनिषद् 3।11

जो बुद्धिमान् इस प्राण रहस्य को जान लेता है । वह अमर बन जाता है उसकी परम्परा नष्ट नहीं होती।

प्राणाग्नय एवास्मिन् ब्रह्मपुरे जागृति-प्रश्नोपनिशद

इस ब्रह्म पुरी में प्राण की अग्नियाँ ही सदा जलती रहती हैं।

प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्या। तं मामायुरमृत भित्युपा-स्वायुः प्राणः प्राणोवा आयुः। प्राणेन हि एवास्मिन् लोकेऽमृतत्व माप्नोति-साँख्यायन आरण्यक 5।2

मैं ही प्राण रूप प्रज्ञा हूँ। मुझे ही आयु और अमृत मान कर उपासना करो। प्राण ही जीवन है। इस लोक में अमृत की प्राप्ति का आधार प्राण ही है।

यो वै प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः । -साख्यायन

जो प्राण है वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।

प्राण ब्रह्मबल है। इसलिए उसे प्रत्यक्ष ब्रह्म भी कहा गया है। अप्रत्यक्ष ब्रह्म की सत्ता किसी प्राणी पर कितनी मात्रा में अवतरित हुई इसका परिचय उसमें दृष्टिगोचर होने वाले प्राण तत्त्व को देख कर ही लगाया जा सकता है। गायत्री को प्राण और प्राण को ब्रह्म कहा गया है। इस तरह एक प्रकार से गायत्री साक्षात् ब्रह्म भी कही जा सकती है।

कतम एको देव इति। प्राण इति स ब्रह्म तदिव्या वक्षते-वृहदारण्यक

वह एकमात्र देव कौन है? वह प्राण है। उसे ही ब्रह्म कहा जाता है।

बप्राणा ब्रह्म इति हस्याह कौशीतकिः । - ब्रह्म संहिता

प्राण ही ब्रह्म है। ऐसा कौशीतकि ऋषि ने कहा है।

स एव वैश्वानरो विश्व रुपः प्राणोदऽग्नि रुदयते-पिप्पलाद

यह प्राण ही समस्त विश्व में वैश्वानर रूप से उदय होता है।

‘गा’ कारो गतिदः प्रोक्त, ‘य’ कारो शक्ति दायिनी। ‘त्र’ त्राता च, ‘ई’ कार स्वयं परम्।

‘गा’ अर्थात् ‘गति’ । ‘य’ अर्थात् ‘शक्ति’ ‘त्र’ अर्थात् त्राता। ‘ई’ अर्थात् परब्रह्म।

गायत्री विद्या की उच्च स्तरीय साधना से प्राण शक्ति की अभिवृद्धि होती है। अस्तु उसके प्रभाव परिणाम को ब्रह्म वर्चस् कहा जाता है। गायत्री के वरदान ब्रह्म वर्चस् को प्राप्त कर सकने वाला हर क्षेत्र में विभूतिवान् बनता है। इस तथ्य का प्रतिपादन छान्दोग्य उपनिषद् में इस प्रकार मिलता है-

स य एवमेतद्गायत्रं प्राणेशु प्रोतं वेद प्राणी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति महान्प्रजया पशु-भिर्भवति महान्कीर्त्या महामनः स्यात्तद्ब्रतम्॥ -छान्दोग्य 2।10।2

यह 'गायत्री' तत्त्व समस्त प्राणों में विद्यमान् है। जो उसकी उपासना करता है वह विद्वान्, प्राणवान्, दीर्घ-जीवी यशस्वी, सुसम्पन्न, उदार और महा मनस्वी बनता है।


सावित्री शक्ति का महाप्राण सविता

गायत्री का दूसरा नाम सावित्री है। उसका देवता सविता है। सविता और सावित्री का युग्म माना गया है। प्राथमिक उपासना में गायत्री को मातृ सत्ता के दिव्य शक्ति के रूप में नारी कलेवर का निर्धारण हुआ है। मानवी आकृति में उसे देवी की प्रतीक प्रतिमा के रूप में प्रतिष्ठापित किया गया है। यह उचित भी है। इसमें पवित्रता, सहृदयता, उत्कृष्टता, सद्भावना, सेवा साधना जैसे मातृ शक्ति में विशिष्ट रूप से पाये जाने वाले गुणों का साधक को अनुदान मिलता है। इस प्रतीक पूजा से नारी तत्त्व के प्रति पूज्य भाव की सहज श्रद्धा उत्पन्न होती है। सद्बुद्धि, ऋतम्भरा, प्रज्ञा, विवेकशीलता, दूरदर्शिता जैसी सत्प्रवृत्तियों को साहित्य में स्त्री लिंग माना गया है। अस्तु इस चिन्तन के इस दिव्य प्रवाह को यदि अलंकारिक रूप से नारी प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है तो उसे उचित ही कहा जा सकता है।

इस प्राथमिक प्रतिपादन के रूप में प्रस्तुत किये गये नारी विग्रह से भी गायत्री महाशक्ति के उच्च स्तरीय स्वरूप में कोई अन्तर नहीं आता। गायत्री मन्त्र के विनियोग में उसका ऋषि विश्वामित्र और देवता ‘सविता’ होने का उल्लेख हैं सविता का मोटा अर्थ ‘सूर्य’ है। सूर्य मण्डल की आभा को गायत्री के प्रतीक में ध्यान में अनिवार्य रूप से प्रयुक्त किया जाता है। उसे ‘सूर्य’ मण्डल मध्यस्था कहा गया है। अस्तु गायत्री माता के नारी स्वरूप को सूर्य मण्डल के बीच में प्रतिष्ठापित वित्रित किया जाता है। उसके चेहरे पर तेजोवलय के रूप में सूर्य मण्डल का संयुक्त किया जाना तो अनिवार्य रूप से आवश्यक होता है। गायत्री माता का ऐसा चित्र कदाचित ही किसी ने बनाने की भूल की होगी जिसमें सूर्य के तेजो मंडल का उसमें समावेश किया गया हो। गायत्री उपासना के अन्त में ‘सूर्यार्घदान’ के रूप में जप की पूर्णाहुति की जाती है। अनुष्ठान काल में दीपक की-अगरबत्ती की अग्नि स्थापना की आवश्यकता भी सूर्य शक्ति का प्रतिनिधित्व रखने के रूप में ही की जाती है। यज्ञाग्नि में आहुति देने का विधान पुरश्चरणों का अंग है। इसमें भी दूरस्थ सूर्य की निकटस्थ प्रतिनिधि अग्नि की प्रतिष्ठा करने की भावना है। सूर्य को गायत्री का देव-प्राण-मान कर “यन्मंडलं दीप्ति करं विशालं ..................” पुनात माँ तत्सवितुर्वरेण्यम्।” के आठ स्तवन मन्त्रों में सूर्य के साथ-साथ गायत्री को संयुक्त किया गया है।

सविता और सावित्री की युग्म भावना एक कल्पना पर नहीं तथ्यों पर आधारित है। अग्नि तत्त्व से बना दृश्यमान सूर्य तो चेतन सविता देव का स्थूल प्रतीक भर है। प्रतीक पूजा का स्वरूप ही यह है कि जड़ पदार्थों के माध्यम से चेतनात्मक प्रशिक्षण की आवश्यकता पूरी कराई जाय। सविता-चेतन ब्रह्मतेज को कहते हैं। वह अदृश्य है। ब्रह्माण्डीय चेतना के रूप में दिव्य प्रखरता के रूप में सर्वत्र व्यापक और विद्यमान् है। उसी के साथ आत्म चेतना की घनिष्ठता बढ़ाने के लिए प्रतीक रूप से सूर्य का अग्नि पिण्ड, ध्यान साधना में प्रयुक्त किया जाता है। प्रकारान्तर से सूर्य उपासना का तात्पर्य ब्रह्म तेज का अवतरण आत्म चेतना की पृष्ठ भूमि पर सम्पन्न कराना है। आत्मा को पृथ्वी और ब्रह्म तेज को सूर्य की उपमा दी जा सकती है। पृथ्वी पर जो जीवन दृष्टिगोचर होता है वह सूर्य का ही अनुदान है। सूर्य आत्मा जगतस्थुश्च’ सूर्य को जगत् की आत्मा बताया गया है। पृथ्वी पर जिस तरह सूर्य केन्द्र से जीवन बरसता है उसी प्रकार आत्मा रूपी पृथ्वी पर ब्रह्म सत्ता के प्राण तेज की वर्षा होती है। इसी से अन्तः भूमि पर विभूतियों की हरीतिमा उगती और फूलती फलती है। गायत्री के साथ उनके देवता सविता का अन्योऽन्याश्रित सम्बन्ध इसी आधार पर जुड़ा हुआ है। गायत्री का दूसरा नाम सावित्री सविता की शक्ति-ब्रह्मशक्ति होने के कारण ही रखा गया है।

ब्रह्म वर्चस् साधना में उपासनात्मक इष्ट देव सविता रखा गया है। कलेवर की प्रतीक पूजा नारी रूप में करने के साथ ही उच्च स्तरीय ध्यान में स्थापना भी प्राण की करनी पड़ेगी। गायत्री का प्राण सविता है। शरीर को देख लेने के बाद किसी भी वस्तु स्थिति उसके आन्तरिक स्तर को समझने में ही विदित होती है। सविता सम्पर्क के लिये अग्रिम कदम बढ़ाने के पीछे भी यही कारण है। इसमें विरोध विग्रह एवं सामंजस्य जैसी कोई बात नहीं है। इसे क्रमिक प्रगति के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझा जा चाहिए।

गायत्री को प्राण-प्राण को सविता कहा गया है। इस त्रिकोण विवेचन से गायत्री के सवितामय होने का ही निष्कर्ष निकलता है। गायत्री सद्बुद्धि की ऋतम्भरा प्रज्ञा की देवी है। प्राण और सविता को भी इन्हीं प्रयोजनों की पूर्ति करने वाला बताया गया है। शास्त्र वचनों में इस त्रिकोण को रेखा गणित के त्रिभुज की तरह एक दूसरे के साथ जुड़ा हुआ समझा जा सकता है। गायत्री का देवता सविता होने के संदर्भ में कुछ उक्तियाँ इस प्रकार हैं -

दैवतं सविताप्यस्याँ गायत्रं छनद एव च। विश्वामित्र ऋषिश्चैव प्रोच्यते ऋषिसत्तम ॥

हे ऋषि श्रेष्ठ ! इसका देवता सविता है - गायत्र छनद है और विश्वामित्र इसका ऋषि कहा जाता है।

सवितुश्चाधिदेवो या मन्त्राधिष्ठातृदेवता। सावित्री ह्यपि वेदानाँ सावित्री तेन कीर्तिता-देवी भागवत

इस सावित्री मन्त्र का देवता सविता (सूर्य) है। वेद मन्त्रों की अधिष्ठात्री देवी वही है इसी से उसे सावित्री कहते हैं।

यो देवः सवितास्माकं धियो धर्मादिगोचरः। प्रेरयेत् तस्य यद भर्गः तं वरेण्यमुपास्महे॥

“जो सविता देव हमारी बुद्धि को धर्म में प्रेरित करता है उससे श्रेष्ठ भर्ग (तेज) की हम उपासना करते हैं।”

सर्व लोकप्रसवनात् सविता स तु कीर्त्यते। यतस्तद् देवना देवी सावित्रीत्युच्यते ततः ॥ -अमरकोश

“वे सूर्य भगवान समस्त जगत को जन्म देते हैं इस लिए सविता कहे जाते हैं। गायत्री मन्त्र के देवता ‘सविता’ है। इसलिए उसकी दैवी-शक्ति को ‘सावित्री’ कहते हैं।”

मनो वै सविता। प्राणधियः। -शतपथ 3।6।1।13

प्राण एक सविता, विद्युरेव सविता । -शतपथ 7।7।9

यो देवः सविताऽस्माकं धियो धर्मादिगोचरः। प्रेरयत्तस्य तर्द्भगस्तध्वरेण्यमुपास्महे॥

“जो देव सविता सूर्य मण्डल के रूप में प्रत्यक्ष होकर धर्माधर्म संस्कारों को देखता हुआ हमारी बुद्धि को प्रेरणा देता है, उसका प्रसिद्ध भर्ग (स्वप्रकाश चेतन रूप तेज) स्पृहा करने योग्य है, उसी की हम उपासना, ध्यान करते हैं।”

यो वैस प्राण एषा सा गायत्री-शत॰ 1।3।5।15

जो प्राण है उसे ही निश्चित रूप से गायत्री जानना।

गायत्री को प्राण कहा गया है और प्राण ही सूर्य है। श्रुति कहती है- ‘प्राण प्रजाना उदयत्येष सूर्यः” अर्थात् यह उदीयमान सूर्य ही जीवधारियों में प्राण शक्ति के रूप में प्रकट होता है।

यह सूर्य ही तेज कहा जाता है। ब्रह्म तेज और सविता एक ही है। गायत्री को तेजस्विनी कहा गया है। सविता तेज का प्रतीक है। अस्तु सविता का तेज और गायत्री के भर्ग को एक ही समझा जाना चाहिए। कहा गया है-

तेनसा वै गायत्री प्रथमं त्रिरात्रं दाधार

पदैद्वितीयमक्षरैस्तृतीयम्। ता0 10।5।3

तेजो वै गायत्री। गो0 उ॰ 5।3

ज्योतिर्वै गायत्री चन्दसाम् । ताँ0 13।7।2

ज्योतिर्वै गायत्री। को0 17।6

दविद्युतती वै गायत्री । ताँ0 12।1।12

गाय«येव भर्गः । गो0पू0 5।15

गायत्री वै रथनतरस्य योनिः॥

ताँ0ब्रा0 15।10।5

तेजो वै गायत्री । -कपि0 सं0 30।2

सविता तेज के सम्बन्ध में किसी प्रकार का भ्रम न रह जाय उसे भौतिक अग्नि प्रकाश न मान लिया जाय इसलिए यह स्पष्टीकरण आवश्यक समझा गया कि यह ‘तेजस्’ विशुद्ध रूप से ब्रह्म तत्त्व का है। सविता तेज के ब्रह्म तेज के अतिरिक्त और कुछ समझ बैठने की भूल किसी अध्यात्म विद्या के छात्र को नहीं ही करनी चाहिए। कहा है -

सविता सर्वभूतानाँ सर्वभावान् प्रसूयते। सवनात् पावनाच्चैव सवितानेन चेच्यते।

सकल भूतों के उत्पादक तथा पावन कर्ता होने से परमात्मा सविता कहलाते हैं।

आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योपव्याख्यानम्। -छान्दोग्योपनिषद् 3प्र019।1

सूर्य ही ब्रह्म है, वह महर्षियों का आदेश है, सूर्य में परमेश्वर की सत्ता को समझने का उपदेश है।

यद्वै तद् ब्रह्मेतीदं वसव तद्योऽयं बहिर्धा पुरुषा-दाकाशो यो वे स बहिर्धा पुरुषादाकाशः ॥ 7॥ - छान्दोग्योपनिषद् 3 प्र0 12।7

जो ही वह ब्रह्म है। यह ही वह गायत्री वर्णित सविता है जो वह पुरुष से बाहर ‘आकाश’ प्रकाशमान है, जो ही वह पुरुष से बाहर ‘आकाश’ प्रकाशमान है।

यौ असौ आदित्य पुरुषः सो असौ अहम्। -यजु040।17

सूर्यमण्डल में जो पुरुष है, वही मैं हूँ।

ब्रह्म सूर्य सम्र ज्योतिः । -यजु0 23।48

ब्रह्म सूर्य ज्योति के समतुल्य है।

युज्जते मन उत युज्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः। विं होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितु परिष्टुतिः॥ -श्वेताश्वतर 2।4

जिस सविता देवता में विद्वान् अपने मन को बुद्धि को लगाते हैं और यज्ञादि शुभ कर्म करते हैं। वह सर्व ज्ञाता एक है। उस सर्व व्यापक सर्व देव की हम स्तुत करते हैं।

तदित्यवाड्ः मनोगम्यं ध्येयं यत्सूर्य मंडले।

उस पर ब्रह्म का ध्यान सूर्य मण्डल में वाक् और मन द्वारा किया जाता है।

गायत्री उपनिषद् से अनेकों उदाहरण देकर यह समझाने का प्रयत्न किया गया है कि वे काया और प्राण की तरह एक दूसरे के साथ सुसम्बद्ध है। दोनों को दो योनि एक मिथुन की संज्ञा दी गई।

गायत्री के भर्ग तेज की उपासना करने से साधक तेजस्वी बनता है। जो तेजवान है वस्तुतः वही बलवान है। मोटी काया बना लेने भर से कोई तेज रहित दुर्बल मनः स्थिति का व्यक्ति बलवान नहीं कहला सकता ह।

तेजोयस्य विराजते स बलवान्। स्थूलेषु कः प्रत्ययः । -नीति

जिसमें तेज है वही बलवान। स्थूल काया के पुष्ट होने से क्या प्रयोजन सधता है।

गायत्री साधना वस्तुतः तेजस्विता की -प्राण शक्ति की ब्रह्मबल की उपासना । इसी से उसकी उच्च स्तरीय साधन प्रक्रिया को ‘ब्रह्म वर्चस्’ विद्या कहा जाता है। इस उपार्जन में संलग्न व्यक्ति को सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर अग्रसर होने का अवसर मिलता है। श्रुति कहती है -

यो हवा एववित् ब्रह्मवित् पुण्याँ च कीर्ति लभते। सुरभीज्च गन्धान्। सोऽपहृतपास्या अनन्ताश्रिय न श्रुते। स एवं वेद यश्चैव विद्वान् एवमेताँ वेदानाँ मातरम्। सावित्री सपदमुपनिषद् मुपास्ते-गोपथ ब्रह्मण

जो गायत्री के गहन तत्त्व को जानता है, वह पुण्य, कीर्ति, लक्ष्मी आदि को प्राप्त करता हुआ परम श्रेय को प्राप्त करता है।


पाँच कोशों की स्थिति और प्रतिक्रिया

गायत्री की उच्च स्तरीय साधना के लिए उसका अलंकारिक स्वरूप पाँच मुख वाला बनाया गया है। इस चित्रण में सूक्ष्म शरीर के पाँच कोशों की प्रसुप्त क्षमता को जागृत करने और इस महाविज्ञान का समुचित लाभ उठाने का संकेत है। ब्रह्म विद्या पंचमुखी है। जीवात्मा का काय कलेवर पाँच भागों में विभक्त माना गया है (1) अन्नमय कोश (2) प्राणमय कोश (3) मनोमय कोश (4) विज्ञानमय कोश (5) आनंदमय कोश । कोश का अर्थ है भण्डार-खजाना इन कोशों के माध्यम से व्यक्तित्व को समृद्धियों और विभूतियों से सुसज्जित कर सकने वाली दिव्य सम्पदायें उपलब्ध की जा सकती हैं और चेतना क्षेत्र में कुबेर जैसा सुसम्पन्न बना जा सकता है। कोश का एक अर्थ आवरण एवं पर्दा भी होता है। परतें उतारते-आवरण हटाते चलने पर वस्तु का असली स्वरूप समाने आ जाता है। पंचकोशों के जागरण से अनावरण से कषाय कल्मषों के वे अवरोध हटते हैं जिनके कारण जीवात्मा को अपने ईश्वर प्रदत्त उत्तराधिकार से वंचित रहकर दुर्दशाग्रस्त परिस्थितियों में गुजारा करना पड़ता है।

पाँच कोशों के विभाजन को तीन के वर्गीकरण में भी प्रस्तुत किया गया है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण यह तीन शरीर बताये गये हैं। उन्हें त्रिपदा गायत्री कहा जाता है। स्थूल शरीर में अन्नमय और प्राणमय कोश आते हैं पंच तत्त्वों और पाँच प्राणों का इसमें समावेश है। सूक्ष्म शरीर में मनोमय कोश और विज्ञानमय कोश सन्निहित हैं। इन दोनों को चेतन मस्तिष्क और अचेतन मानस कह सकते हैं। कारण शरीर में आनन्दमय कोश आता है। विज्ञजनों ने इस विवेचन में यत्किंचित् मतभेद भी व्यक्त किया है पर वस्तु स्थिति लगभग जहाँ की तहाँ रहती है। चेतनात्मक परिष्कार के लिए इन पाँच संस्कारों की आवश्यकता होती है जिन्हें पंचकोशी गायत्री साधना के नाम से जाना जाता है। इसे ‘ब्रह्म विद्या’ पक्ष कहना चाहिए। ऋतम्भरा प्रज्ञा तत्त्व दृष्टि विकसित करने के लिए इस आधार का अवलम्बन करना होता है।

सूक्ष्म शरीर में अवस्थित पाँच कोशों की विवेचना शास्त्रकारों ने स्थान-स्थान पर की है और उनकी गरिमा उपयोगिता से सर्व साधारण को परिचित कराने का प्रयत्न किया है। ऋग्वेद में इन पाँच कोशों को पाँच ऋषियों की संज्ञा दी है और कहा है कि वे जीवन्त स्थिति में ही सारे जीवन उद्यान को पवित्र सुरम्य बना सकते हैं।

अग्निऋर्षिः पयमानः पाँचजन्यः पुरोहितः। तमीमहे महागयम्। -ऋग्वेद 9।66। 20

यह अग्नि ऋषि है। पवित्र करने वाली है। पाँच कोशों की मार्ग दर्शक है। इस महाप्राण की हम शरण जाते हैं।

देवताओं की दिव्य शक्तियों की उपासना-आराधना करके अभीष्ट वरदान प्राप्त करने की आकांक्षा तभी पूरी हो पाती है जब अन्तरंग में अवस्थित दिव्य शक्तियों, वृत्तियों और प्रवृत्तियों को परिष्कृत करने की साधना की जाय। वस्तुतः इन्हीं अन्तः क्षमताओं को अलंकार रूप से दिव्य लोक में निवास करने वाली सत्ता कहा गया है। यह दिव्य लोक अपना ही अन्तः प्रदेश समझा जाना चाहिए और देवी देवताओं के रूप में अंतः क्षमताओं को मान्यता देनी चाहिए।

हृदये व्योममध्ये तु अनन्ताद्यास्तु वासुकिः॥ उदये व्योम मध्ये तु परे नागा वसन्ति हि। गन्धर्वाः किन्नरा रक्षा यिद्याधराप्सरायदयः॥

अनेकतीर्थ वर्णाश्च गुह्यकाश्च वसन्ति हि। प्रकृतिः पुरुषो देहे ब्रह्मा विष्णुः शिवस्तथा॥

अनन्तसिद्धयो बुध्या प्रकाशों वर्त्तते हृदि। ब्रह्माण्डे ये गुणाः सन्ति ते तिष्ठन्ति कलेवरे॥

ब्रह्माण्डे यानि वै सन्ति तानि सन्ति कलेवरे॥ ते सर्वे प्राण संलग्नाः प्राणातीतो निरज्जनः। -महायोग विज्ञान

इसी शरीर में पाँच प्राण, अनन्त शक्तियाँ, महा सर्प, गन्धर्व, किन्नर, राक्षस, विद्याधर, अप्सराएँ, अनेक तीर्थ, वर्ण, गुह्यक, निवास करते हैं। प्रकृति, पुरुष, ब्रह्मा, विष्णु, महेश, अनन्त सिद्धियाँ, अनन्त ज्ञान, अनन्त प्रकाश इसी में विराजमान् हैं और प्रकाश प्रकाशित होते हैं। बाह्य ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी है सो सब कुछ सूक्ष्म रूप से इस शरीर पिण्ड में विद्यमान् है।

शरीर पंच तत्त्वों से बना है। इन्हें पाँच देवता कहा गया है। व्यक्ति सत्ता को इन्हीं पंच देवताओं द्वारा विनिर्मित की गई सृष्टि माना गया है। इन पाँच देवताओं को विकृत दुर्दशा से निकाल कर परिष्कृत स्थिति तक पहुँचाने की प्रक्रिया को पंचीकरण विद्या एवं पंच कोशों की साधना कहते हैं

कपिलतन्त्र में लिखा है –

“अकाशस्याधियो विष्णु रग्नेश्चैव महेश्वरी।” वायोः सूर्यः, क्षितेरीशो जीवनस्य गणाधिपः”

अर्थात् आकाश के अधिपति हैं विष्णु, अग्नि की अधिपति महेश्वरी शक्ति है, वायु अधिपति सूर्य है और पृथ्वी के अधिपति हैं शिव। इस प्रकार पंचदेव शरीर के पंचतत्वों की ही अधिपति सत्ताएँ हैं। उपासना तत्त्व (परिच्छेद तीन) के अनुसार आदित्य, गणेश, देवी रुद्र और विष्णु ये पंचदेव ही समस्त कर्मों में पूजनीय है। जो इन पाँचों का बुद्धिपूर्वक भजन-स्मरण करते हैं, वे कभी भी मलिन नहीं होते-

“आदित्यं गणनाथं च देवी रुद्रं च केशवम्। पंच दैवतमित्युक्तं सर्वकर्मसु पूजयेत्॥

एवं यो भजते विश्णु रुद्रं दुर्गाम् गणाधिपम्। भास्करं च धिया नित्यं स कदाचिन्न सीदति॥”

पाँच देवताओं के नाम तथा स्वरूप अन्यत्र दूसरी तरह ही बताये गये है। पर इससे उनके मूल स्वरूप में कोई अन्तर नहीं आता। दिव्य शक्तियों की गरिमा पाँच कोशों के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई ही मानी जाएगी।

प्रश्नोपनिषद् में जिज्ञासु नचिकेता को यमाचार्य ने पंचाग्नि विद्या का रहस्यमय उपदेश दिया है। यह पाँच अग्नियाँ अग्निहोत्र के लिए काम आती है। अन्तः क्षेत्र में इन्हीं को पाँच कोशों के जागरण का विज्ञान कह सकते हैं।

प्राणग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति। गार्हपत्यो ह वा एशोऽपानो व्यानोऽन्वाहार्यपचनो यद्गाहंपत्यात् प्रणीयते प्रणयमादाहवनीयः प्राणः॥ 3

मनो ह वाव यजमानः इश्टफलमेवोदानः। स एनं यजमानमहरहर्ब्रह्म गमयति-प्रश्नोपनिशद 4।3-4

इस काया नगरी में पाँच अग्नियाँ का निवास है। यह पाँच प्राणों के रूप में प्रज्वलित रहती है। अपान गार्हपत्य अग्नि है। व्यान आह्वनीय। इन गार्हपत्य और आह्वनीय अग्नियों का समन्वय ही प्राण है। श्वासों का आवागमन ही आहुतियों का अविच्छिन्न क्रम है। वायु ऋत्विक् है। मन यममान और इच्छा फल उदान। यही मन और हृदय में ब्रह्म को स्थिर करते हैं।

पाँच कोशों को स्वर्गलोक के पाँच द्वारपाल बताया गया है। इनको अनुकूल बना लेने पर ही उस दिव्य क्षेत्र में प्रवेश कर सकना बन पड़ता है।

तेशाएते पज्च ब्रह्म पुरुशा, र्स्वगस्य लोकस्य द्वारपालस्य एतानेकं पंच ब्रह्म पुरुशात्-छान्दोग्य

यह पाँच ब्रह्म पुरुष स्वर्गलोक के द्वारपाल है। इनको प्रसन्न करके ब्रह्म पुरुष तक पहुँचना संभव होता है।

तैत्तरीयोपनिशद में इन पाँच कोशों का कई पंचकों के रूप में वर्णन किया गया है। स्थूल, सूक्ष्म कारण-आध्यात्मिक आधि दैविक, आधि भौतिक क्षेत्रों में भी इन्हीं पाँच शक्तियों का समावेश बताया गया है।

पृथिव्यन्तरिक्षं द्यौर्दिशोऽवान्तरदिशाः। अग्नि-र्वायुरादित्यश्चन्द्रमा नक्षत्राणि। आप ओशधयो वनस्पतय आकाश आत्मा। इत्त्यधिभूतम्। अथाध्यात्मम्। प्राणो व्यानोऽपान् उदानः समानः। चक्षुः श्रोत्रं मनो वाक्-त्वक् चर्म मा स स्नावास्थिमज्जा। एतदधिविधाय ऋशिरवोचत् पाँक्त वा इदम सर्वम्। पाँक्त नैव पाँक्त स्पृणोतीति॥1॥ (सर्वमेकं च) ॥ - तैत्तरीयोपनिशद-सप्तम अनुवाक-1)

पृथिवी, अन्तरिक्ष, सूर्य लोक, दिशाएँ तथा अवान्तर दिशाएँ यह 5 लोकों का समूह है। अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा और नक्षत्र यह जयोतिपंचक है। जल, औषधियाँ, वनस्पतियाँ, आकाश, आत्मा यह पंचभूतों का समूह है। ये ऊपर के 3 पाँक्त समूह भूतों के सम्बन्ध में है। अब अध्यात्म वर्णन करते हैं। प्राण, व्यान, अपान, उदान, समान यह प्राण पंचक है। आँख, कान, मन, वाणी तथा त्वचा यह इन्द्रिय पाँच (पंचक) है। चर्म, माँस, नाड़ी, हड्डी, नज्जा यह धातु पंचक है। इस प्रकार 5-5 चीजों का समूह कर कर ऋषि कहने लगे कि यह जो कुछ चराचर जगत् है सब पाँक्त है, पाँच-पाँच में विभक्त है, पाँक्त से ही पाँक्त की पुष्टि होती है, अर्थात् इन 5-5 पाँक्तों को जानकर ही मनुष्य आत्म ज्ञानी होता है।

पाँच कोशों की स्थिति पर प्रकाश डालते हुए सर्व सारोपनिषद् में कहा गया है-

अन्नकार्याणाँ कोशानाँ समूहोऽन्नमयकोश इत्युच्यते प्राणदि चतुर्दशं वायुभेदा अन्नमय कोशे यदा वर्तन्ते तदा प्राणमय-कोश इत्युच्यते। उतत्कोश द्वय संसक्तं मन आदि चतुर्दशकरणरात्मा शब्दादि विशय संकल्पादिधर्मान् यदा करोति तदा मनोमय कोश इत्युच्यते। एतंत्कोशत्रयसंसक्त तद्गत विशेशज्ञो यदा भासते तदा विज्ञानमय कोश इत्युच्यते। एतत्कोश चतुश्टयं संसक्तं स्वाकरणा-ज्ञाने वटकनिकायामिव वृक्षो यदा वर्तते तदा आनन्दमय कोश इत्युच्यते। - सर्वसारोपनिशत्

अन्न से, अन्न के स्वरूप एवं शक्तिमत्ता से, प्रत्यक्षतः विनिर्मित कोशों को अन्नमय कोश कहते हैं। इस अन्नमय कोश में संचरित प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान इन पंच प्राणों, पंच उपप्राणों आदि प्राणवायु के सभी शरीरस्थ रूपों का समुच्चय प्राणमय कोश है। मन समेत समस्त इन्द्रियों द्वारा किए जाने और किए जा सकने वाले सूक्ष्म कार्य-क्षेत्र का नाम मनोमय कोश है। इन तीनों कोशों के संयुक्त स्वरूप से आत्मा बुद्धि द्वारा जो कुछ ज्ञानात्मक क्रिया-व्यापार करती है, उसे विज्ञानमय कोश कहते हैं। इन चारों कोशों से संसक्त आत्मा बल अपने कारण रूप के प्रति अनभिज्ञ रहती है और स्वतः में ही रमती है, जैसे बटबीज में वृक्ष रहता है, तब उसे आनन्दमय कोश कहते हैं।

अन्य आप्त वचनों में पंच कोशों की जो व्याख्याएँ की गई हैं जो स्वरूप और कार्य बताये गये हैं वे भी तैत्ररीयोपनिशद के प्रतिपादन से मिलते जुलते ही हैं।

पंच कोशेशु शक्तिर्मे तथा तिश्ठति नित्यशं। न पश्यंति तु ताँ शक्ति मज्ञानोपहता नराः-शिवार्णयः

पाँच कोशों में शिव शक्ति की प्रचंडता सन्निहित है। अज्ञानी लोग उसे देख समझ नहीं पाते।

सूक्ष्मेण दिव्य लोकेन स्थूल लोकस्य देहिनः। संबंध कारको ज्ञेयः कोशः प्राणमयश्ररः॥

स्थूल देह धारियों का संबंध सूक्ष्म दिव्य लोक के साथ जोड़ने का कार्य प्राणमय कोश करता है।

अहन्ताँ ममताँ देहे गेहादौ च करोतियः। कामाद्यवस्थया भ्रान्तो नासावात्मा मनोमयः। 6

जो देह में “मैं” रूप ‘अहन्ता’ बनकर विद्यमान् है। जो वस्तुओं और प्राणियों में ममता रखता है। जो अनेक कामनाएँ करता है और उनकी पूर्ति के लिए भटकता है वह मन है-मनोमय कोश है।

लीना सुप्तौ वयुर्वोधे व्याप्नुयादान खाग्रगा। चिच्छायापेतधीर्नात्मा विज्ञानमय शब्द भाक्।

जो सुशुति में विलीन हो जाता है। जो समस्त शरीर में संव्याप्त है। उस चिदाभास युक्त विवेक बुद्धि को विज्ञान मय कोश कहा गया है।

मनोमयोऽयं पुरुशो भाः सत्यस्तस्मिन्नन्तहृदये तथा व्रीहिर्वा यत्रो वा स एश सर्वस्येशानः सर्वस्याधिपतिः सर्वमिदं प्रशास्ति यदिदं किच॥ वृहदारण्यकोपनिशदं (5,6,1)

यह मनोमय, पुरुष प्रकाशमान सत्य स्वरूप है, वह अर्न्तहृदय में धान अथवा जौ के सदृश चमकता है। वह सबका ईश्वर , सबका अधिपति इस जगत में जो कुछ है सब पर शासन करता है।

या कर्मविशया बुद्धिर्वेदशास्त्रार्थनिश्चिता॥ सतु ज्ञानेन्द्रियाँ साधं विज्ञानमयकोशतः॥

जो कर्म विशयणी बुद्धि और वेदशास्त्र से निश्चित की गई है वह ज्ञान इन्द्रियों के सहित विज्ञानमय कोश में स्थित रहती है।

काचिदन्तर्मुखी वृत्तिकानन्द प्रतिविम्ब भाक्। पुण्य भोगे भोग शान्तौ निद्रा रुपेण लीयते। 9

काया के भीतर एक अंतर्मुखी वृत्ति है। जो ब्रह्म के प्रति बिम्ब को अपने भीतर भास मान देखती है। वही पुण्य भोगती है। शान्ति प्राप्त करती है। और योग निद्रा में लय हो जाती है। उसी का नाम आनंदमय कोश है।

उपनिषद् का तत्त्वदर्शी ऋषि पंच कोश संबंधी जिज्ञासा का समाधान इस प्रकार करता है-

पज्चकोशाः के ? अन्नमयः, प्राणमयः, मनोमयः विज्ञानमयः, आनन्दमय श्रेति।

पाँच कोश कौन-कौन हैं ?

उत्तर- अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश और आनंदमय कोश।

अन्नमयः कः ? अन्न रसे नैव भूत्वा, अन्न रसे नैव वृद्धि प्राप्यान्न रुप पृथिव्याँ यद्विलीयते तदन्नमयः कोशः स्थूल शरीरम।

-अन्न मय कोश किसे कहते हैं ?

-जो अन्न के रस से उत्पन्न होता है। जो अन्न रस से ही बढ़ता है, और जो अन्न रूप पृथ्वी में ही लीन हो जाता है उसे अन्नमय कोश एवं स्थूल शरीर कहते हैं।

प्राणमयः कोशः कः ? प्राणोदि पज्च वायवो बागादीन्द्रियं पज्चकं प्राणमयः कोशः।

-प्राण मय कोश किसे कहते हैं ?

-प्राण, अपान, व्यान, समान, उदान इन पाँच प्राण वायु के समूह और कर्मेन्द्रिय पंचक के समूह को प्राण मय कोश कहते हैं, संक्षेप में यही क्रिया शक्ति है।

मनो मयः कोशः कः ? मनश्चय ज्ञानेन्द्रिय पज्चकं मिलित्वा भवति स मनोमयः कोशः ।

-मनोमय कोश क्या है ?

-मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों के समूह के मिलने से मनोमय कोश बनता है। इसे इच्छाशक्ति कह सकते हैं।

विज्ञानमायः कोशः कः ? बुद्धिर्ज्ञानेन्द्रिय पंचकं मिलित्वा यो भवति स विज्ञान मयः कोशः।

-विज्ञान मय कोश क्या है ?

-बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियों का समन्वय विज्ञान मय कोश है। यह ज्ञान शक्ति है।

आनन्दमयः कः ? एवमेव कारण शरीर भूताविद्यास्थ मलिन सत्वं प्रियादि वृत्ति सहितं सदानन्दमयः कोशः।

-आनन्दमय कोश क्या है ?

-इसी प्रकार कारण रूप अविद्या में रहने वाला, रज और तम के संयोग से मलिन, सत्व के कारण मुदित वृत्ति वाला आनन्देच्छुक कोश आनन्द मय कोश है।

ब्रह्म विद्या समर्थित पंच कोशों के जागरण से उत्पन्न ब्राह्मी शक्ति की पराशक्ति के रूप में अभ्यर्थना की गई है। देवी भागवत् में कहा गया है-

पंचप्राणाधिदेवी या पंचप्राणस्वरुपिणी। प्राणाधिकप्रियतमा सर्वाभ्यः सुन्दरी परा। -देवी भागवत्

पाँच प्राण उसी पंच कोश सम्पदा के पाँच स्वरूप हैं। प्राणों की अधिष्ठात्री देवी वे ही है। सर्वाडडड सुन्दरी है। परा शक्ति हैं। भगवान की प्राणों से प्यारी हैं।


पाँच कोश और उनका अनावरण

मानवी चेतना को पाँच भागों में विभक्त किया गया है। इस विभाजन को पाँच कोश कहा जाता है। अन्नमय कोश का अर्थ है इन्द्रिय चेतना । प्राणमय कोश अर्थात् जीवनी शक्ति। मनोमय कोश-विचार बुद्धि। विज्ञानमय कोश अचेतन सत्ता एवं भाव प्रवाह। आनन्दमय कोश-आत्म बोध-आत्म जागृति।

प्राणियों का स्तर इन चेतनात्मक परतों के अनुरूप ही विकसित होता है। कृमि कीटकों की चेतना इन्द्रियों की प्रेरणा के इर्द गिर्द की घूमती रहती है। शरीर ही उनका सर्वस्व होता है। उनका ‘स्व’ काया की परिधि में ही सीमित रहता है। इससे आगे की न उनकी इच्छा होती है, न विचारणा न क्रिया। इस वर्ग के प्राणियों को अन्नमय कह सकते हैं। आहार ही उनका जीवन है। पेट तथा अन्य इन्द्रियों का समाधान हो जाने पर वे संतुष्ट रहते हैं।

प्राणमय कोश की क्षमता जीवनी शक्ति के रूप में प्रकट होती है। संकल्प बल, साहस आदि स्थिरता और दृढ़ता बोधक गुणों में इसे जाना जा सकता है। जिजीविषा के आधार पर ऐसे प्राण मनोबल का सहारा लेकर भी अभावों और कठिनाइयों से जूझते हुए व्यक्ति रहते हैं जबकि कृमि कीटक ऋतु प्रभाव जैसी प्रतिकूलताओं से प्रभावित होकर बिना संघर्ष किये प्राण त्याग देते हैं। सामान्य पशु-पक्षी इसी स्तर के होते हैं। इसलिए साहसिकता के अनुरूप उन्हें प्राणी कहा जाता है। निजी उत्साह पराक्रम करने के अभ्यास को प्राण शक्ति कहते हैं। यह विशेषता होने के कारण कृमि कीटकों को तुलना में बड़े आकार के पुरुषार्थी जीव प्राणधारियों की संज्ञा में गिने जाते हैं। यों जीवन तो कृमि कीटकों में भी होता है पर वे प्रकृति प्रेरणा की कठपुतली भर होते हैं। निजी संकल्प विकसित होने की स्थिति बनने पर प्राणतत्त्व का आभास मिलता है। यह कृमि कीटकों से ऊँची स्थिति है।

मनोमय स्थिति विचारशील प्राणियों की होती है। यह और भी ऊँची स्थिति है। मननात्-मनुश्यः । मनुष्य नाम इसलिए पड़ा कि वह मनन कर सकता है। मनन अर्थात् चिन्तन। यह पशु-पक्षियों से ऊँचा स्तर है। इस पर पहुँचे हुए जीव से मनुष्य संज्ञा में गिना जाता है। कल्पना, तर्क, विवेचना, दूरदर्शिता जैसी चिन्तात्मक विशेषताओं के सहारे औचित्य-अनौचित्य का अन्तर करना संभव होता है। स्थिति के साथ तालमेल बिठाने के लिए इच्छाओं पर अंकुश रख सकना इसी आधार पर संभव होता है।

विज्ञानमय कोश इससे भी ऊँची स्थिति है। इसे भाव-संवेदना का स्तर कह सकते हैं । दूसरों के सुख-दुख में भागीदार बनने की सहानुभूति के आधार पर इसका परिचय प्राप्त किया जा सकता है। आत्मभाव का आत्मीयता का विस्तार इसी स्थिति में होता है। अन्तःकरण विज्ञानमय कोश का ही नाम है। दयालु, उदार, सज्जन, सहृदय, संयमी, शालीन और परोपकार परायण व्यक्तियों का अन्तराल ही विकसित होता है। उत्कृष्ट दृष्टिकोण और आदर्श क्रियाकलाप अपनाने की महानता इसी क्षेत्र में विकसित होती है। महामानवों का यही स्तर समुन्नत रहता है।

चेतना का यह परिष्कृत स्तर सुपर ईगो, उच्च अचेतन, आदि नामों से जाना जाता है। इसकी गति सूक्ष्म जगत में होती है। वह ब्रह्माण्डीय सूक्ष्म चेतना के साथ अपना सम्पर्क साध सकती है। अदृश्य आत्माओं, अविज्ञात हलचलों और अपरिचित संभावनाओं का आभास इसी स्थिति में मिलता है। अचेतन ही वस्तुतः व्यक्तित्व का मूलभूत आधार होता है। इस अचेतना का अभीष्ट उपयोग कर सकना परिष्कृत विज्ञानमय कोश के लिए ही संभव होता है।

आनंदमय कोश आत्मा की उस मूलभूत स्थिति की अनुभूति है जिसे आत्मा का वास्तविक स्वरूप कह सकते हैं। सामान्य जीवधारी यहाँ तक कि अधिकांश मनुष्य भी अपने आपको शरीर मात्र मानते हैं और उसी के सुख-दुःख में सफलता-असफलता अनुभव करते रहते हैं। आकांक्षाएँ विचारणाएँ एवं क्रियाएं इसी छोटे क्षेत्र तक सीमा बद्ध रहती हैं। यही भव बंधन है। इसी कुचक्र में जीव को विविध-विधि त्रास सहने पड़ते हैं। आनंदमय कोश जागृत होने पर जीव अपने को अविनाशी ईश्वर अंग, सत्य, शिव, सुन्दर, मानता है। शरीर, मन और साधन एवं सम्पर्क परिकर को मात्र जीवनोद्देश्य के उपकरण मानता है। यह स्थिति ही आत्मज्ञान कहलाती है। यह उपलब्ध होने पर मनुष्य हर घड़ी सन्तुष्ट एवं उल्लसित पाया जाता है। जीवन मंच पर वह अपना अभिनय करता रहता है। उसकी संवेदनाएँ भक्तियोग, विचारणाएँ, ज्ञान और क्रियाएँ कर्म योग जैसी उच्च स्तरीय बन जाती हैं।

ईश्वर मानवी सम्पर्क में आनंद की अनुभूति बन कर आता है। रसो वै सः श्रुति में उस परब्रह्म की उच्चस्तरीय सरसता के रूप में व्याख्या की है। सत्,चित्, आनन्द की संवेदनाएँ ही ईश्वर प्राप्ति कहलाती है, अपना और संसार का वास्तविक संबंध और प्रयोजन समझ में बिठा देने वाला तत्त्व दर्शन हृदयंगम होने पर ब्रह्मज्ञानी की स्थिति बनती है। इसी को जीवन मुक्ति, देवत्व की प्राप्ति, आत्म साक्षात्कार, ईश्वर दर्शन आदि नामों से पुकारते हैं। आत्म परिष्कार के इस उच्च स्तर पर पहुँच जाने के उपरान्त अभावों, उद्वेगों से छुटकारा मिल जाता है। परम सन्तोश का परम आनंद का लाभ मिलने लगने की स्थिति आनंदमय कोश की जागृति कहलाती है। ऐसी ब्रह्मवेत्ता अस्थि माँस के शरीर में रहते हुए भी ऋषि, तत्त्वदर्शी, देवात्मा एवं परमात्मा स्तर तक उठा हुए सर्व साधारण को प्रतीत होता है। उसकी चेतना का, व्यक्तित्व का, स्वरूप, सामान्य नर वानरों की तुलना में अत्यधिक परिष्कृत होता है तदनुसार वे अपने में आनंदित रहते और दूसरों को प्रकाश बाँटते हैं।

पंचकोशों का जागरण जीवन चेतना के क्रमिक विकास की प्रक्रिया है। यह सृष्टि क्रम के साथ मंथर गति से चल रही है। यह भौतिक विकासवाद है। मनुष्य प्रयत्नपूर्वक इस विकास क्रम को अपने पुरुषार्थ से साधनात्मक पराक्रम करके अधिक तीव्र कर सकता है और उत्कर्ष के अन्तिम लक्ष्य तक इसी जीवन में पहुँच सकता है। यही पंचकोशी साधना है। कोशों के जागृत होने पर व्यक्तित्व का स्तर कैसा होता है इसकी जानकारी शिव गीता में इस प्रकार दी गई है।

कामक्रोधस्तथा लोभो मोहो मार्त्सयमेव च॥ मदश्रेत्यरिशड्वर्गो ममतेच्छादयोऽपि च॥ मनोमयस्य कोशस्य धर्मा एतस्य तत्र तु । 14

एवं मनः समाधाय संयतो मनसि द्विजः ॥ अथ प्रवर्तयेच्चितं निराकारे परात्मनि॥ 30

काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मात्सर्य यह छः शत्रु और ममता, तृष्णा आदि दुष्प्रवृत्तियाँ मनोमय कोश में छिपी रहती है। कोश साधना से उन सब का निराकरण होता है। मानसिक स्थिरता आने पर चित्त परब्रह्म परमात्मा में लग जाता है।

पाँच कोश आत्मा पर चढ़े हुए आवरण है। प्याज की, केले के तले की परतें जिस प्रकार एक के ऊपर एक होती है उसी प्रकार आत्मा के प्रकाशवान स्वरूप को अज्ञान आवरण से ढके रहने वाले यह पाँच कोश है। उन्हें उतारते चलने पर कषाय कल्मष नष्ट होते हैं और आत्म साक्षात्कार का ईश्वर प्राप्ति का परम लक्ष्य प्राप्त होता है। शिव गीता कहती है -

एवं शान्त्यादियुक्तः सन्नुपास्ते यः सदा द्विजः ॥ उद्धाट्योद्धाटयमेकैकं यथैव कदलीतरोः॥

वल्कलानि ततः पश्चाल्लभते सारमुत्तमम्॥ तथैव पज्चभूतेशु मनः संक्रमते क्रमात्॥ तेशा मध्ये ततः सारमात्मानमपि विन्दति॥

इस प्रकार जो साधक चित्त को समाहित करके पंच कोशों की उपासना करता है-उसके अन्तःकरण पर से केले के तने जैसी-कषाय कल्मषों की परतें उतरती चली जाती है। उसे ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है और सारे तत्त्व आत्मा की उपलब्धि संभव होती है।


नाभिचक्र अन्नमय कोश का प्रवेश द्वार

गर्भाशय में भ्रूण का पोषण माता के शरीर की सामग्री से होता है। आरंभ में भ्रूण, मात्र एक बुलबुले की तरह होता है। तदुपरान्त वह तेजी से बढ़ना आरंभ करता है। इस अभिवृद्धि के लिए पोषण सामग्री चाहिए। उसे प्राप्त करने का उस कोंटर में और कोई आधार नहीं हैं । मात्र माता का शरीर ही वह भण्डार है जहाँ से गर्भस्थ बालक को अपने निर्वाह एवं अभिवर्धन के लिए आवश्यक आहार मिल सकता है। वह मिलता भी है । यह अनुदान शिशु को अपनी नाभि के मुख से प्राप्त होता है। तब न मुँह खुला होता है और न पाचन यंत्र ही सक्षम होते हैं। पका हुआ, पचा हुआ आहार उस स्थिति में उसे अपनी नाभि द्वारा ही उपलब्ध होता है।

प्रसव के समय जब बालक बाहर आता है तो देखा जाता है कि उसकी नाभि में एक नाल रज्जु बँधी है और वह माता को नाभि स्थली के साथ जुड़ी है। उसे काटना पड़ता है तब दोनों अलग होते हैं। यह नाल ही वह द्वार है जिसके द्वारा माता के शरीर से निकल कर आवश्यक रस द्रव्य बालक के शरीर में निरन्तर पहुँचते रहते हैं इस दृष्टि से प्रथम मुख नाभि को ही कहा जा सकता है। दाँत, जीभ, कंठ, तालु वाला मुँह तो जन्म ले चुकने के बाद खुलता है। तब तक नौ मास की अवधि में बालक बहुत कुछ प्राप्त कर चुका होता है। गर्भ काल में बच्चा जितनी तेजी से बढ़ता है वह आश्चर्यजनक है। उसे अपने शरीर के अनुपात से इतनी अधिक खुराक की जरूरत पड़ती है जितनी जन्म लेने के उपरान्त फिर कभी नहीं पड़ती। उन सारी आवश्यकताओं की पूर्ति नाभि मार्ग से ही होती रहती है।

भ्रूण के फेफड़े गर्भावस्था के नौ महीने प्रायः निष्क्रिय ही रहते हैं। श्वास प्रश्वास की आवश्यकता माता और भ्रूण के दो जुड़े हुए अवयव पूरी करते हैं। माता के ‘यूटेरस’ गर्भाशय में स्थित जरायु बच्चे के ‘प्लेसेन्टा’ ही फेफड़े का भी काम करते हैं। जन्म के उपरान्त जैसे ही बालक रोता, हाथ पैर चलाता और साँस लेता है वैसे ही रक्त संचार आरंभ हो जाता है। हृदय से बड़ी धमनी में होकर रक्त फेफड़ों में पहुँचता है आध्र वे अपना काम आरंभ कर देते हैं। नाल काटने पर बच्चे का ‘अम्ब कार्ड’ माता के ‘प्लेसेन्टा’ से कट कर अलग हो जाता है। तब फिर दोनों के बीच बने हुए सम्बन्ध सूत्र का विच्छेद हो जाता है और इस कार्य के सम्पन्न करती रहने वाली ‘अम्ब वेन’ निष्क्रिय हो जाती है बच्चे की कार्य वाहिनी सामर्थ्य अपने बल बूते अपना काम करने लगती है। फेफड़े हृदय आदि ठीक तरह अपना काम करने लगते हैं और उस स्व संचालित प्रक्रिया के सहारे नवजात शिशु की जीवन यात्रा स्वावलंबनपूर्वक अपने ढर्रे पर लुढ़कने लगती है। माता का सहयोग समाप्त हो जाता है। तब उस केन्द्र की उपयोगिता भी समाप्त हो जाती है।

इसके बाद उस महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया का केन्द्र नाभि बाह्य दृष्टि से एक सामान्य गड्ढे के रूप में रह जाती है। स्थूल विज्ञान के अनुसार अन्दर उस स्थान से कुछ सूत्र जिगर से जुड़े रहते हैं। वर्तमान जीवशास्त्री इसे निरर्थक निष्क्रिय सूत्र मानते हैं और उन्हें ‘लीगामैन्ट टेरीस आफ लीवर’ कहते हैं। किन्तु यह सूत्र एकदम निष्प्राण नहीं होते बल्कि स्थूल दृष्टि से सुप्त जैसी स्थिति में पड़े रहते हैं। जब जिगर रोग ग्रस्त हो जाता है तो उस पर पड़ने वाले रक्त के दबाव को कम करने के लिए यह सूत्र पुनः सक्रिय हो उठते हैं। जिगर पर पड़ने वाले रक्त के दबाव से उसे बचाने के लिए रक्त को नाभि क्षेत्र में फैला देते हैं। उस समय नाभि क्षेत्र फूला हुआ, उसमें रक्त शिरायें उभरी हुई स्पष्ट दिखाई देती हैं स्पृश् है कि स्थूल दृष्टि से सुप्त, यह तन्तु सूक्ष्म दृष्टि से सतत् सक्रिय रहते हैं।

शरीर के विकास की दृष्टि से नाभि की भूमिका समाप्त हो जाती है यह एक दृष्टि से उचित भी है। नाभि द्वारा पोषित भ्रूण गर्भ में जिस तीव्र गति से बढ़ता है वह अत्यधिक तीव्र होती है। नाभि की पोषण क्षमता सक्रिय रहे और यदि जन्म लेने के बाद भी उसी क्रम से शरीर की वृद्धि का क्रम चलता रहता तो फिर कदाचित मनुष्य ताल वृक्ष जितना ऊँचा, हाथी जितना विशालकाय बन सकता था और उसकी खुराक जुटाने के लिए दस हाथियों जितने आहार की आवश्यकता पड़ सकती थी। ईश्वर को धन्यवाद है कि भ्रूण की वृद्धि और आवश्यकता की तीव्रता को गर्भ काल तक ही सीमित रखा।

वर्तमान शरीर शास्त्र की दृष्टि से जन्म के बाद मनुष्य के लिए नाभिचक्र निरर्थक कहा भी जा सकता है, किन्तु अध्यात्म विज्ञान की मान्यता इससे भिन्न है। उसने नाभि को ‘नाभिकीय’ केन्द्र माना है। जिस प्रकार परमाणु के नाभिक का महत्त्व सर्वोपरि है, जिस प्रकार सौर मण्डल का सूत्र संचालन सूर्य द्वारा होता है उसी प्रकार शरीर का मध्य बिन्दु नाभि है और उसमें नाभिकीय क्षमता विद्यमान् है। मस्तिष्क का सूक्ष्म शरीर का नाभिक आज्ञाचक्र है। स्थूल शरीर की स्थिति उससे भिन्न है। उसका नाभिक-न्यूक्लियस नाभि है। उसकी क्षमता अपने समीपवर्ती अवयवों को प्राणबल देती है और व अपना काम ठीक तरह कर सकने में समर्थ बनते हैं। प्राकृतिक चिकित्सा तथा योग चिकित्सा के अंतर्गत नाभि को इसी लिए बहुत महत्त्व दिया जाता है। शरीर के अनेक गंभीर रोगों के उपचार की एक रहस्यमय पद्धति अपने देश में बहुत समय से चली आ रही है । उसमें शरीर के कुछ विशिष्ट केन्द्रों को दबाने, सहलाने, बाँधने मलने आदि क्रियाओं द्वारा रोगों का सफल उपचार कर दिया जाता है। यह पद्धति आजकल ‘जौन थैरेपी’ के नाम से एक सुनिश्चित चिकित्सा पद्धति के रूप में विकसित की जा रही है। उसमें भी नाभि को बहुत अधिक महत्त्व दिया जाता है।

शरीर शास्त्र की दृष्टि से भी नाभि के आसपास नौ महत्त्वपूर्ण अंतःस्रावी ग्रंथियाँ (गैग्लियान ) है। गैग्लियान-स्वायत्त नाड़ी संस्थान (आटोनामस नर्वस सिस्टम) के वह केन्द्र है जो शरीर के प्रमुख संस्थानों की गतिविधियों , उनके रक्त संचरण, हारमोन, एन्जाइम आदि अंतः रसों के निस्सरण आदि का नियमन-संचालन करते हैं। नाभि के आसपास चार लम्बर गैग्लियाँन, उन्हीं से लगे हुए चार सेक्रल गैग्लियान तथा उससे नीचे एक कावसीजियल गैग्लियान कुल नौ गैग्लियान होते हैं। स्थूल शरीर के पोषण एवं विकास से सम्बन्धित लगभग सभी स्थूल संस्थानों से इनका सम्बन्ध होता है। आमाशय तथा पाचन संस्थान, गुर्दे तिल्ली, जिगर आदि के महत्त्व सर्व विदित हैं। इनका सबका नियंत्रण- सुसंचालन इन्हीं गैग्लियान केन्द्रों से होता है। नये शरीर निर्माण की प्रणाली, प्रजनन संस्थान भी अपनी अद्भुत क्षमताओं सहित इन्हीं केन्द्रों के नियंत्रण में कार्य करती है। नाभि क्षेत्र के लम्बर गैग्लियानों का हस्तक्षेप हृदय क्षेत्र में भी है। हृदय क्षेत्र में ग्यारह ‘थोरैसिक’ गैग्लियान होते हैं। कई क्षेत्रों में ‘लम्बर’ और ‘थोरैसिक’ दोनों मिलकर भी कार्य करते हैं।

शरीर के महत्त्वपूर्ण संस्थानों का नाभि से सम्बन्ध शरीर शास्त्रियों के लिए रहस्य हो सकता है किन्तु आत्म विज्ञान से विदित है कि नाभिचक्र का वह चुम्बकत्व आजीवन बना रहता है जिसके आधार पर माता के शरीर से आवश्यक अनुदान खींचने में गर्भस्थ शिशु समर्थ रह सका था। ट्राँजेस्टर में छोटा सा ‘क्रिस्टल’ लगा रहता है। उस यंत्र की सारी मशीनरी अपना काम तभी ठीक तरह कर पाती है जब यह ‘क्रिस्टल’ सही स्थिति में हो। नाभि केन्द्र के चुम्बकत्व को भी यही संज्ञा दी जा सकती है। उसमें आदान-प्रदान की उभय पक्षीय क्षमता विद्यमान् है। अनन्त अन्तरिक्ष से आवश्यक शक्ति खींचने और धारण करने और समीपवर्ती अवयवों से लेकर दूरस्थ अंगों तक को वह अदृश्य एवं अविज्ञान सामर्थ्य प्रदान करने का कार्य इस चुम्बकत्व का ही है।

शरीर को अनेक प्रकार की ऊर्जा चाहिए; जिन्हें वह अपनी चुम्बक शक्ति के द्वारा खींचता है। वातावरण का कितना प्रभाव शरीर पर पड़ता है इसे हर कोई जानता है। कहाँ का जलवायु शरीर पर क्या प्रभाव डालता है। इसे हम प्रत्यक्षतः देखते हैं। बहुमूल्य आहार प्राप्त होते रहने पर भी घटिया जलवायु के क्षेत्र में रहने वाले रुग्ण दुर्बल रहते हैं और स्वल्पकाल में ही जीवन समाप्त कर देते हैं। इसके विपरीत, जहाँ का वातावरण सशक्त है वहाँ के निवासी घटिया भोजन मिलने पर भी बलिष्ठ बने रहते हैं।

मोटा तगड़ा शरीर भी सामान्य सा भार वहन करने और दौड़-धूप में संलग्न रहने के अतिरिक्त और कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य न कर सकेगा। प्रगतिशील मनुष्यों के शरीर में स्फूर्ति पाई जाती है। उनका प्रत्येक अवयव प्रशिक्षित कलाकारों की तरह अपना काम करने में कुशल होता है। इन्द्रियाँ काबू में रहती है और नियत निर्धारित क्रम से अपने सुव्यवस्थित क्रिया कौशल का परिचय देती है। यही कारण है कि वे सामान्य मनुष्यों की तुलना में कई गुने परिमाण में उत्कृष्ट स्तर का काम कर पाते हैं। यह उनकी सफलता का बहुत बड़ा कारण होता है।

शरीर के लिए आवश्यक इस प्रकार की सूक्ष्म शक्तियाँ, मात्र अन्न, जल, वायु प्राप्त नहीं हो सकतीं, उसकी पूर्ति ब्रह्माण्ड व्यापी उन शक्ति स्रोतों से भी होती है जो दृश्य रूप में अनुभव में तो नहीं आते पर अपनी महत्ता सिद्ध करते रहते हैं। पृथ्वी का काम अपने भीतरी उत्पादनों से ही नहीं चल जाता, वरन् सूर्य से आने वाली गर्मी और रोशनी से उसे जीन संचार का लाभ मिलता है। न केवल सूर्य से वरन् वह अन्य ग्रहों से भी बहुत कुछ प्राप्त करती है। ग्रहों से ही क्यों उसका अपना उपग्रह चन्द्रमा तक ज्वार-भाटा से लेकर और भी न जाने क्या-क्या सहायता देकर धरती की सजीवता बनाये रहने में सहायता देता है। यदि वे अन्तर्ग्रही अनुदान न मिलें तो पृथ्वी निर्जीव, निस्तब्ध ही नहीं बन जाएगी वरन् अपना अस्तित्व बनाये रहने में भी समर्थ न हो सकेगी। ठीक यही बात मनुष्य शरीर के सम्बन्ध में भी लागू होती है।

नाभि स्थल का शारीरिक दृष्टि से कोई विशेष महत्त्व भले ही न हो पर आध्यात्मिक दृष्टि से उसकी उपयोगिता आजीवन वैसी ही बनी रहती है जैसी कि भ्रूण काल में थी। पृथ्वी ध्रुव क्षेत्र में सन्निहित अपनी चुम्बकीय शक्ति से अन्तर्ग्रही ऊर्जा को आकर्षित करती और उससे अपनी महत्त्वपूर्ण आवश्यकताएँ पूरी करती है। ठीक इसी प्रकार नाभि चक्र का ध्रुव प्रदेश शरीर को समर्थ एवं सुव्यवस्थित बनाये रहने वाली विशिष्ट ऊर्जा को आकाश से खींचता है। यदि व चक्र प्रसुप्त स्थिति में है तो उसकी आकर्षण शक्ति न्यून होगी और मात्र आहार पर ही निर्वाह चलाना पड़ेगा किन्तु यदि नाभि चक्र के चुम्बकत्व को साधना योग द्वारा जाग्रत किया जा सके तो उसकी आकर्षण क्षमता सहज हो बढ़ जाएगी और उसकी प्रखरता के आधार पर इतना कुछ अदृश्य अनुदान प्राप्त किया जा सकेगा जो रक्त माँस आदि स्थूल सम्बन्धों की अपेक्षा कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही उपयोगी है।

अन्नमय कोश का प्रवेश द्वार नाभि चक्र है। इस केन्द्र की समर्थता एवं उपयोगिता सदा बनी रहती है। दिव्य शक्तियों का शरीर में प्रवेश इसी मार्ग से होता है। इस सन्दर्भ में योग ग्रन्थों में कितने ही उल्लेख मिलते हैं। यथा-

पातंजलि योग दर्शन में नाभि चक्र की साधना से काया की भीतरी स्थिति की सूक्ष्म जानकारी मिलने का वर्णन हैं।

नाभिचक्रे काय व्यूह ज्ञानम्-पातंजलि योग सूत्र

नाभि चक्र से संयम करने से काय के चक्र व्यूह का ज्ञान होता है।

ऐसा ही उल्लेख योग रसायन ग्रंथ में भी है-

नाभिचक्रे यदा कुर्याद्धारणाँ योगविद्यदि। शरीराभ्यन्तरे सर्वसंस्थानं तु विलोकयेत्-योग रसायन

जिस काल में योगी नाभि चक्र में धारण करता है, उस समय वह शरीर के सम्पूर्ण अभ्यन्तर शरीर संस्थान को देख लेता है।

केचित्तद्योगतः पिण्डा भूतेभ्यः संभवा क्वचित्। तस्मित्रन्नमय ; पिण्डो नाभिमण्डलस स्थितः॥ त्रिशिख ब्राह्मणोपनिशद्

(रस, रक्त, माँस, मेद, अस्थि मज्जा, वीर्य आदि सप्त ) धातुओं के योग से प्राणी के पिण्डों की उत्पत्ति होती है। उनमें से नाभि मण्डल में अन्नमय पिण्ड है।

तृतीयं नाभिचक्रं स्यात्तन्मध्ये तु जगत् स्थितम्। पंचावर्ता मध्यशक्ति चिन्तयेद्विद्यु दाकृति॥ ता ध्यात्वा सर्वसिद्धीना भाजर्न जायते बुधः-योगराजोपनिशद्

नाभि चक्र में यह भौतिक जगत अवस्थित है। पंचा वृत्त - पाँच तत्त्वों से विनिर्मित विद्युत शक्ति का इससे ध्यान करना चाहिए। ऐसा ध्यान करने में साधक सभी भौतिक सिद्धियाँ प्राप्त कर लेता है।

नाभिकन्दादधः स्थानं कुण्डल्या द्वयंगुलं मुने। अश्टप्रकृतिरुपा सा कुण्डली मुनिसत्तम्-जगत दर्शनोपनिशद्

नाभि कन्द के नीचे कुण्डलिनी शक्ति का निवास है। अष्ट प्रकृति की प्रतीक अष्ट सिद्धियाँ उसमें कुण्डली मारकर बैठी हुई है।

रावण किसी शस्त्र से मर नहीं सकता था क्योंकि उसकी नाभि में अमृत का कुण्ड था। उसे सुखाये बिना यह असुर वध संभव नहीं है। यह भेद राम को विभीषण ने बताया। राम ने वह कुण्ड सुखाकर रावण मारा। इससे प्रकट है कि शरीर की स्थिति सुदृढ़ बनाने के लिए नाभि चक्र के माध्यम से कितनी बड़ी सफलता प्राप्त की जा सकती है। अध्यात्म रामायण में यह प्रसंग इस प्रकार आता है-

नाभि देशेऽमृतं तस्य कुण्डलाकार संस्थितम्। तच्छोशयान अस्त्रेण तस्य मृत्युस्ततो भवेत्॥

विभीशण वचः श्रुत्वा रामः शीघ्र पराक्रमः। पावकास्त्रैण संयोज्य नाभि विव्याव राक्षसः-अध्यात्म रामायण

यह विभीषण की उक्ति है-संकेत है कि रावण की नाभि में कुण्डलाकार स्थित अमृत को अग्निबाण से सुखा दें, तभी उसकी मृत्यु होगी तब राम ने बड़ी फुर्ती से अपने पावकास्त्र से रावण की नाभि को बेध डाला। यह अमृतत्व पतनोन्मुख करके फुलझड़ी की तरह जलाकर तनिक सा विनोद भी खरीदा जा सकता है। उसे मधुमक्खी की तरह संचित करके अपना श्रेय और दूसरों का सुख बढ़ाया जा सकता है। प्रजनन संयंत्र के इर्द-गिर्द अनेकानेक क्षमताओं के दिव्य केन्द्र बिखरे हुए हैं। इनमें शरीर शास्त्री कुछ हारमोन ग्रन्थि स्रावों तथा उत्तेजना परक विद्युत प्रवाहों के संबंध में ही थोड़ी सी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। इतने से भी वे मानते हैं कि मस्तिष्क के बाद अवयवों की दृष्टि से हृदय और स्फुरण की दृष्टि से काम संस्थान की महत्ता है। आत्म-विद्या के अनुसार नाभिचक्र प्राण सत्ता का - साहसिक पराक्रम शीलता एवं प्रतिभा को केन्द्र माना गया है । इस स्थान की ध्यान साधना करते हुए इस प्राण-शक्ति को निग्रहित और दिशा नियोजित किया जाता है। फलतः उसके सत्परिणाम भी ओजस्विता की वृद्धि के रूप में सामने आते हैं।


सद्वाक्य

खेचर्या मुद्रया येन विवरं लम्बिकोर्ध्वतः। न तस्य क्षरते बिन्दुः कामिन्यालिडिडडतस्य च॥ यावद्बिन्दुः स्थितो देहे तावन्मृत्योर्भयं कुतः । यावद्बद्धां नभोमुद्रा तावद् बिन्दुनं गच्छति॥ चलितोऽपि यदा बिन्दुः संप्राप्तश्चय हुताशनम्। व्रजत्यूर्ध्व हृते शक्त्या निरुद्धो योनि मुद्रया॥ — मोरक्ष पद्धति

खेचरी मुद्रा द्वारा जो चन्द्रामत को छिद्राकाश से ही खींच लेता है, उसका नाम समागम में भी बिंदुपात नहीं होता। 68।

जब तक खेचरी मुद्रा दृढ़ है तब तक शुक्र व्योमचक्र से नीचे नहीं गिरता, वह स्व-स्थान में ही अवस्थित बना रहता है।69।

कदाचित वह नाभि से नीचे उतरकर जननेंद्रिय में चला भी जाए, तो भी उसे योनिमुद्रा द्वारा ऊपर उठाकर पुनः अपने ऊर्ध्व स्थान पर लाया जा सकता है।70।


प्राणायाम से प्राणमय कोश का परिष्कार

प्राणमय कोश आत्मा पर चढ़ा हुआ दूसरा आवरण है। अन्नमय कलेवर खाने-पीने काम करने जैसे प्रयोजन पूरे करता है। इसके भीतर जो ऊर्जा, स्फूर्ति, उमंग काम करती है वह प्राण है। प्राण से ही शरीर चलता और जीवित रहता है। जिसका यह कोश जितना समर्थ है वह उतना ही प्रतापी , पराक्रमी, शूर, साहसी प्रतीत होगा। उसका बढ़ा-चढ़ा चुम्बकत्व दूसरों का सहयोग, सद्भाव अनायास ही आकर्षित करता रहेगा। ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी व्यक्तियों में यही प्राण प्रखरता आलोकित रहती है।

स्थूल अन्नमय कोश के कण-कण में प्राण ऊर्जा संव्याप्त है , पर उसका केन्द्र संस्थान प्रवेश द्वार जननेन्द्रिय मूल में अवस्थित मूलाधार चक्र है। इसकी उमंगें कामेच्छा के रूप में मन को और रति कर्म की ललक बनकर शरीर को उत्तेजित करती रहती है। इसी केन्द्र के रस-रज वीर्य के अंतर्गत छोटे-छोटे कीटाणुओं में समूचे मनुष्य की आकृति-प्रकृति बीज रूप से विद्यमान् रहती है। सरसता की विविध-विधि उमंगें यहीं से उठती है। कला केन्द्र इसी को कहा जाता है। सौंदर्य बोध से लेकर उल्लास भरे भविष्य की आशा यहीं से निसृत होती है। डार्विन के अनुसार विकासवाद के मूल तत्त्व कामुकता के विविध रूपों में प्राणी को प्रेरित प्रभावित करते हैं। निस्तेज, निरुत्साही, व्यक्ति को नपुंसक कहा जाता है। यह एक गाली है। जिसका अर्थ मनुष्य को नीरस निराश बनकर रहना होता है।

मूलाधार चक्र की विशेष व्याख्या कुण्डलिनी जागरण के सन्दर्भ में की जाएगी। यहाँ तो इतना ही कहा जा सकता है कि शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य को साधना करते हुए इस प्रचण्ड शक्ति को निग्रहित किया जा सकता है और उसे भक्ति भावना में कला सम्वेदना में, लोक साधना में तथा अन्यान्य उल्लास वर्धक सत्प्रयोजनों में लगाया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त प्राणायाम साधना का अपना महत्त्व है। दैनिक कृत्यों में उसे ऐसे ही रेचक, कुम्भक, पूरक के नित्य कर्म में संयुक्त रखा जाता है। फेफड़ों के व्यायाम के लिए -डीप ब्रीदिंग- लम्बी साँस लेने की कई पद्धतियाँ देश-विदेश में इन दिनों बहुत लोकप्रिय और लाभप्रद सिद्ध हो रही है। शिथिलासन के साथ किया जाने वाला प्राणाकर्षण प्राणायाम अपनी उपयोगिता के लिए प्रख्यात है। चौरासी सामान्य और उनमें से चुने हुए आठ विशिष्टों की चर्चा साधना ग्रन्थों में मिलती है। नाड़ी शोधन, लोम विलोम, सूर्यभेदन साधनाएँ भी प्राण विद्या के अंतर्गत ही आती है। इनमें से पंचकोशी साधना के अंतर्गत प्राणमय कोश के परिष्कार के लिए किसे कौन-सा प्राणायाम करना चाहिए, उसका विधान साधकों की शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक स्थिति को परख करके ही बताया जा सकता है। कोश साधना में सभी को एक लाठी से नहीं हाँका जा सकता ।

इड़ा, पिंगला, सुशुम्ना तीन प्राण नाड़ियाँ प्रधान है। इसके अतिरिक्त दस विशिष्ट है। सामान्यों की संख्या बहुत अधिक है। इन्हें किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार उपयोग में लाकर प्राणमय कोश का कौन-सा पक्ष तीव्र एवं मन्द किया जाना चाहिए इसका उल्लेख यहाँ न करके इन पंक्तियों में इतना ही कहा जा सकता है कि प्राण विद्या के अंतर्गत प्राणायाम प्रक्रिया का सहारा लेकर प्राणमय कोश की समग्र एवं आँशिक साधना की जा सकती है। प्राणायाम दीखने में ही सामान्य लगता है, पर यदि उच्चस्तरीय विधान के आधार पर साधा जाय तो शारीरिक , मानसिक एवं आत्मिक प्रगति के लिए उससे महत्त्वपूर्ण लाभ उठाया जा सकता है।

प्राण तत्त्व का मनःसंस्थान से घनिष्ठ सम्बन्ध है। साहसिकता के अभाव में मन दुर्बल पड़ता है, उसकी चिंतनशीलता व सक्रियता शिथिल पड़ जाती है। शरीर से दुर्बल होने पर भी मनस्वी व्यक्ति सुदृढ़ व्यक्ति भी मनोबल के अभाव में दीन-हीन अकर्मण्य, निराश, भयभीत बना रहता है। प्राण-शक्ति ही साहस बनकर उभरती और मनोबल का आधार बनती है।

मन पर नियन्त्रण कर सकने वाला अंकुश उसके साथी प्राण के ही हाथ में है । मन की चंचलता प्रसिद्ध है, वह क्षण-क्षण में अस्त-व्यस्त बना इतस्ततः उड़ता रहता है। एक स्थान पर न टिक पाने से किसी महत्त्वपूर्ण दिशा में गम्भीरतापूर्वक सोच सकना और तन्मयतापूर्वक प्रस्तुत कार्य कर सकता संभव नहीं होता। एकाग्रता और तत्परता बिना किसी भी कार्य में सफलता नहीं मिल सकती । जीवन के सभी महत्त्वपूर्ण कार्य दत्त-चित्त होकर करने से ही सम्पन्न होते हैं। चंचलता प्रगति पथ को सबसे बड़ी बाधा है। इसके रहते हुए सुयोग्य व्यक्ति भी पग-पग पर ठोकरें खाते और असफल रहते देखे जाते हैं। भौतिक क्षेत्र की भाँति आत्मिक क्षेत्र की सफलताएँ भी चंचलता के निरोध पर निर्भर है। योग का परिभाषा करते हुए महर्षि पतंजलि ने उसे चित्त-वृत्तियों का विरोध बताया है। इस चित्त-प्रवृत्ति को दो रूपों में देखा जाता है- एक तो अस्थिर चंचलता, दूसरे पाशविक कुसंस्कारों की ओर रुझान । इन दोनों ही अवांछनीयताओं पर नियन्त्रण स्थापित करने से चित्त-वृत्ति निरोध की योग-साधना सम्भव होती है।

मन पर नियन्त्रण करने के नियन्त्रण करने के लिए शास्त्रकारों ने प्राणायाम साधना पर बहुत बल दिया है । दोनों की परस्पर घनिष्ठता बताते हुए कहा गया है कि यदि प्राण पर नियन्त्रण स्थापित किया जा सके तो मनोनिग्रह जैसा कठिन कार्य सरल बन जायेगा।

पवनो बध्यते ये मनस्तेनैव बव्यते। मनश्च बध्यते येन पवनस्तेन बध्यते॥

हेतुद्वयं तु चित्तस्य वासना स समीरणः। तथोविनश्ट एकस्िमस्तौ द्वावपि विनश्यतः॥ -हठयोग प्रदीपिक 4।21

जिसने प्राण वायु को जीता उसने मन जीत लिया। जिसने मन जीता उसने प्राण जीत लिया । चित्त की चंचलता के दो ही कारण हैं-एक वासना का दूसरा प्राण वायु का चंचल होना। इनमें से एक के नष्ट हो जाने पर दोनों का नाश हो जाता है।

चले वाते चला बिन्दुर्निश्चले निश्चलो भवेत्। योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुँ निरुंधयेत्-गोरक्ष प0 1।90

प्राण वायु चलायमान रहने से बिन्दु चलायमान रहता है। प्राण निश्चल हो जाने से वीर्य भी निश्चल हो जाता है। समर्थ स्थिरता प्राप्त करने के लिए योगी प्राणायाम करे।

मनो यत्न विलीयते पवनस्तभ लीयते। पवनो लीयते यत्र मनस्तभ विलीयते-ह-प्र 4।23

अर्थ- जिस जगह मन विलीन हो जाता है उस जगह प्राण वायु लीन हो जाता है और जहाँ वायु विलीन हो जाती है वहाँ मन लीन हो जाता है।

दुग्धाम्बुबत्यं मिलिताबुभौ तो तुल्य क्रियौ-मानस मारुती हि। यतो मरुचत्र मनः प्रवृत्तिर्यतो मनस्तत्र-मरुत्प्रवृत्तिः-हठ॰ प्रदी0 4।24

अर्थ- एक क्रिया वाले दोनों मन एवं वायु, दूध और पानी के समान मिले हुए हैं, इसी से जहाँ वायु है वहाँ मन की प्रवृत्ति होती है और जहाँ मन है वहाँ वायु की प्रवृत्ति है।

याव द्वायुः स्थिरो देहे तावज्जीवन मुच्यते। मरणं तस्यनिश्क्राँतिस्ततो वायु निरोधयेत्-ह-प्र 2।3

अर्थ- जब तक शरीर में प्राण वायु विद्यमान् है, तब तक की वह जीवित है और शरीर से प्राण वायु का निकलना ही मृत्यु है इसलिए प्राण वायु का निरोध करना चाहिए।

स यथा शकुनिः सूत्रे प्रबद्धो दिशं दिशं पतित्वा न्यत्रायतनमलब्ध्वा बन्धनमेवोपश्चयते, एवमेव खलु

सोम्यैतन्मनो दिशं पतित्वान्यत्रायतनमलब्ध्वा-प्राणमेवोपश्चयते प्राणबन्धन हि सोम्य मन इति-छान्दो 6।8।2

जिस प्रकार डोरी से बँधा हुआ पक्षी घूमघाम कर अपने मूल आश्रय पर ही आ जाता है, उसी तरह हे सौम्य मन कहीं दूसरी जगह आश्रय न पाने पर घूमघाम कर प्राण का ही आश्रय लेता है। क्योंकि मन प्राण से ही बँधा हुआ है।

नानविधैर्विचारैस्तु न साध्यं जायते मनः। तस्मात्तस्य जयः प्रायः प्राणस्य जय एव हि-योग बीज

अनेकों प्रकार के विचारों से मन साध्य नहीं होता है इससे प्राण वायु के जीतने से ही मन जीता जाता है।

चित्तं न साध्यं विविधैर्विचारैर्वितर्कवादैरपि वेदवादिभिः।

तस्मात्तु तस्यैव हि केवलं जयः प्राणो हि विद्येत न कश्चिदन्यः-योग रहस्य

विविध विचारों, तर्कों और अध्ययन श्रवण आदि से चित्त का समाधान नहीं होता, मनोनिग्रह तो प्राणायाम से ही सम्भव है।

हठिनामधिकस्त्वेकः प्राणायाम परिश्रमः। प्राणायामे मनः स्थैर्य स तु कस्य न सम्मतः ॥ -बोधसार

हठयोगियों का मुख्य साधन श्रम-साध्य प्राणायाम है। यह अन्यान्य योगियों की साधना से अधिक है। परन्तु वह प्राणायाम सिद्ध हो जाने पर मन स्थिर हो जाता है, यह कौन स्वीकार नहीं करेगा।

इन्द्रिय विकार-अनियन्त्रित वासना प्रवाह का कारण शारीरिक नहीं मानसिक ही होता है। इन्द्रियों पर मन का नियन्त्रण है। मन विकारग्रस्त होगा तो इन्द्रियों की चंचलता भी उभरेगी और वे कुकृत्य कर सकेंगी। यदि मन पर नियन्त्रण स्थापित किया जा सके तो वासना पर अंकुश स्वयमेव लग जाता है। प्राणायाम से मनोनिग्रह-से वासनाजन्य विकारों की रोकथाम सम्भव होती है। असंयम के लिए उत्तेजित करने वाले विकृत मन को कुमार्ग त्यागने के लिए सहमत करना प्राणायाम की सुनियोजित साधन-पद्धति अपनाने से सम्भव हो सकता है। इस सम्बन्ध में साधना विज्ञान का मन्तव्य इस प्रकार है-

प्राणायामो भवेदेवं पातकेन्धनपावकः । भवोदधिमहासेतुः प्रोच्यते योगिभि सदा-योग चूडा़मणि उप॰ 108।109

प्राणायाम की अग्नि पाप रूपी ईंधन को जलाकर पार कर देती है और वह सेतु के समान संसार सागर से पार होने का मार्ग खोलता है।

रसस्य मनसश्चैव चंचलत्वं स्वभावतः। रसो वद्धो मनो बद्धं कि न सिद्ध यति भूतले॥

मूर्च्छितो हरते व्याधीन् मृतो जीवयति स्वयंम्। बद्धः खेचरताँ धत्ते रसो वायुश्च पार्वति।

मनःस्थैर्ये स्थिरो वायुस्ततो बिन्दुः स्थिरो भवेत। बिन्दुस्थैर्यात्सदा सत्वं पिण्डस्थैर्य प्रजायते॥ हठ॰ प्रो0 प्रदी0 4।26 से 28

रस और मन यह दोनों ही स्वभावतः चंचल हैं। रस के बँध जाने से मन बँध जाता है। इनके बँध जाने पर भला क्या सिद्धि नहीं मिल सकती । 26।

यह रस और प्राण मूर्छित होने पर समस्त रोगों को हर लेते हैं, मरने पर दूसरों को जला देते हैं, बँधने पर आकाश में गमन करते लगते हैं।27।

मन के स्थिर हो जाने पर प्राण स्थिर हो जाता है और प्राण के स्थिर होने से वीर्य स्थिर होता है। वीर्य के स्थिर होने से शरीर में सदा सत्व स्थिर रहता है।28।

इन्द्रियाणा मनो नाथो मनोनाथस्तु मारुतः। मारुतस्य लयो नाथः स लयो नादमाश्रितः ॥ ह0प्र0 4।29

अर्थ- इन्द्रियों का प्रवर्तक मन है और मन का प्रवर्तक वायु है और प्राण का नाथ मन का लय है और वह मन का लय नाद से आश्रित है।

हेतु द्वयं तु चित्तस्य वासना च समीरणः । तपोर्विनश्ट एकस्मिस्तौ द्वावपि विनश्यतः-ह-प्र 4।22

अर्थ- वित्त की प्रवृत्ति में दो कारण है- एक वासना, दूसरी प्राण वायु। उन दोनों में से एक के नष्ट हो जाने पर दोनों ही नष्ट हो जाते हैं।

अध्यात्म साधना में प्राणायाम की योगाभ्यास का महत्त्वपूर्ण अंग माना गया है। उससे मात्र मनोनिग्रह का लाभ ही नहीं मिलता अन्य सूक्ष्म संस्थानों का भी परिशोधन होता है। शारीरिक आरोग्य का लाभ सर्वविदित है। फेफड़े सुदृढ़ होने अधिक मात्रा में प्राण वायु के शरीर में प्रवेश करने से जीवन तत्त्व भी अधिक मिलते हैं और परिशोधन की गति भी तीव्र होती है। स्थूल और सूक्ष्म शरीरों पर -स्वास्थ्य संवर्द्धन और मानसिक परिष्कार का प्राणायाम का प्रत्यक्ष प्रभाव होता है। कारण शरीर के भाव संस्थान पर भी इस साधना की उपयुक्त प्रतिक्रिया होती है। आत्मिक पवित्रता बढ़ती है। अन्तःकरण में श्रेष्ठ संस्कारों का उभार होने लगता है। ऐसी स्थिति बनती चले तो आत्मिक प्रगति में किसी प्रकार का सन्देह न रह जाएगा। कहा भी है -

दह्यन्ते ध्यायमानानाँ धातूनाँ हि यथा मलाः। तथेन्द्रियाणाँ दह्यन्ते दोशाः प्राणस्य निग्रहात्-मनु

जैसे अग्नि में डालने से धातुओं के मल जल जाते हैं। वैसे ही प्राणायाम करने से इन्द्रियों के विकार दूर हो जाते हैं।

यथा पर्वतधातूनाँ दह्यन्ते धर्मनान्मलाः। तथेन्द्रियकृताँ दोशः दह्यन्ते प्राणधारणात्-अमृतनादोशनिशद्

जिस प्रकार सोने को तपाने से उसके खोट जल जाते हैं उसी प्रकार इन्द्रियों के विकार प्राणायाम से जल कर नष्ट होते हैं

प्राणायामेन युक्तस्य विप्रस्य नियतात्मनः। सर्वे दोशाः प्रथश्यन्ति सत्वस्थश्चैव जायते॥

तपाँसि यानि तप्यन्ते व्रतानि नियमाश्च ये। सर्वयज्ञफलश्चैव प्राणायामाश्च तत्समः ॥ -वायु पुराण

प्राणायाम से युक्त नियत आत्मा वाले विप्र के समस्त दोष नष्ट हो जाया करते हैं और फिर वह केवल सत्वगुण में ही स्थित रहा करता है। जो भी तपस्यायें तपी जाती है, व्रत लिए जाते हैं और नियम ग्रहण किये जाते हैं तथा समस्त यज्ञों के करने का जो भी कुछ फल होता है वह सब प्राणायाम के समान होता है।

तस्माद्युक्तः सदा योगी प्राणायामपरो भवेत्। सर्व पापविशुद्धात्मा परं ब्रह्माधिगच्छति-वायु पुराण

इसलिए योगी को सर्वदा युक्त होकर प्राणायाम में परायण होना चाहिए। वह फिर समस्त पापों से विशुद्ध आत्मा वाला होकर परब्रह्म को प्राप्त कर लिया करता है।

प्राणायामो भवत्येवं पातकेन्धनपावकः। भवोदधिमहासेतुः प्रोच्यते योगिभिः सदा-योग सन्ध्या

प्राणायाम करने से जैसे पातक रूपी काष्ठ को भस्म करने वाला अग्नि होता है तैसे ही संसार रूपी समुद्र से तारने वाला बड़ा पुल योगियों ने प्राणायाम को कहा है।

तपो न परं प्राणायामात् ततो विशुद्धिर्मलानाँ दीप्तिश्च ज्ञानस्य-पज्च शिखाचार्य

प्राणायाम से बढ़कर और कोई तक नहीं। उससे मलों की शुद्धि होती है और ज्ञान का प्रकाश प्रदीप्त होता है।

सुशुम्नायाँ सदेवायं बहेत् प्राणसमीरणः। एतद् विज्ञान मात्रेण सर्व पापैः प्रमुच्यते-गोरखनाथ

यह प्राण वायु सुशुम्ना नाड़ी में सर्वदा ही प्रवाहित होता है। परन्तु जो योगी इसे जान जाते हैं वे समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं।

प्राणायामेन चित्तं शुद्धं भवति सृव्रत। चित्ते शुद्धे शुचिः साक्षात्प्रत्यग्ज्योतिव्यवस्थितः॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः सम्यग्ज्ञानमवाप्नुयात्। मनोजवत्वमाप्नोति पलितादि च नश्यति-जावाल दर्शनोपनिशत् 6।16।19

प्राणायाम से चित्त की शुद्धि होती है। चित्त शुद्ध होने से अन्तःकरण में प्रकाश होता है और उस प्रकाश में आत्म-साक्षात्कार होता है।

प्राणायाम का साधक श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त करता है। मनस्वी और मनोजयी बनता है।

मार्कंडेय पुराण में प्राणायाम के चार स्तर बताये गये हैं और उनके द्वारा उच्चस्तरीय उद्देश्यों की पूर्ति होने का प्रतिपादन किया गया है-

तस्माद्युक्तः सदा योगी प्राणायाम परो भवेत्। श्रूयताँ मुक्ति फलद तस्यावस्था चतुश्टयम्॥

ध्वनिस्तः प्राप्ति स्तथा संवित् प्रसादश्च महीयते। स्वरुपं श्रुणुचेतशाँ कथ्यमान मनु क्रमात्॥

कर्म्मणामिश्टदुश्टानाँजायतेफलसंक्षयं। चेतसोऽपकशायत्वयत्रसाध्वस्तिरुच्यते॥

ऐहिकामुऽमिकान्कामाँल्लोभोहात्मकान्स्वयम्। निरुध्यास्तेसदायोगीप्राप्तिः सासार्वकालिकी॥

अतीतानागतानर्थान्विप्रकृष्टतिरोहितान्। विजानातीन्दुसूर्य्यर्क्षग्रहाणाँज्ञानसम्पदा॥

तुल्यप्रभावस्तुयदायोगीप्राप्नोतिस विदम्। तदासम्विदितिख्याताप्राणायाम स्यसास्थितिः॥

यान्तिप्रसादयेनास्यमनः पंचचवायवः। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्चसप्रसादइतिस्मृतः॥

जैसे सिंह, व्याघ्र और हाथी को सिखा सधा कर नम्र बना लिया जाता है, वैसे ही प्राणायाम से प्राण वश में होते हैं।

जैसे महावत हाथी को अंकुश के बल पर इच्छानुसार चलाता है, वैसे ही योगीजन प्राण से इच्छानुसार काम लेते हैं।

जैसे पाला हुआ चीता मृगों को ही मारता है, पालने वाले को नहीं। उसी प्रकार प्राणायाम से सँभाला हुआ प्राण पापों को नष्ट करता है, जीवन को नहीं।

प्राणायाम की चार स्थिति हैं - (1) ध्वस्ति (2) प्राप्ति (3) सवित् (4) प्रसाद।

जिससे दूषित कर्मों और मनोविकारों का शमन होता है, उसे ध्वस्ति कहते हैं।

जिससे लोभ, मोह आदि से भरी कामनाएँ समाप्त हो जाती हैं उसे प्राप्ति कहते हैं।

जिससे ग्रह-नक्षत्र और सूक्ष्म लोकों से सम्बन्ध जुड़ जाता है तथा दिव्य ज्ञान की ज्योति दीप्तिमान होती है। अतीत अनागत और तिरोहित जान लिया जाता है उसे संवित कहते हैं।

जिस स्थिति में पाँचों प्राण तथा दसों इन्द्रियाँ वश में हो जाती है, चित्त में आनन्द, उल्लास अनुभव होता है उसे प्रसाद कहते हैं।

प्राणायाम की पहुँच अध्यात्म क्षेत्र के अति महत्त्वपूर्ण परतों तक है। उसे शारीरिक , मानसिक, व्यायामों का उपचार मात्र नहीं समझना चाहिए। वरन् उसे उच्चस्तरीय योग साध नहीं मानकर चलना चाहिए। पुरश्चरण अनुष्ठानों की सफलता के लिए पूर्व भूमिका के रूप में प्राणायाम विज्ञान की विशेष साधनाएँ कराई जाती है। कहा गया है-

विना प्राणं यथा देहः सर्व कर्मसु न क्षमः। बिना प्राणं तथा मंत्रः पुरश्चर्याशतैरपि॥

प्राण रहित होने पर जैसे शरीर में काम करने की कुछ भी क्षमता नहीं रहती, उसी तरह मन्त्र की प्राण शक्ति को जब तक जागृत नहीं कर लिया जाता तब तक सैकड़ों पुरश्चरण करने पर भी मन्त्र शक्ति से अभीष्ट लाभ की आशा नहीं की जा सकती ह।

या ते तनूर्वाचि प्रतिश्ठिता या श्रोत्रे या च चक्षुशि। या च मनसि सन्तता शिवा ताँ कुरु मोत्क्रमीः॥ प्राणस्येदं वशे सर्व त्रिदिवे यत्प्रतिश्ठितम्। मातेव पुत्रान् रक्षस्त श्रीश्च प्रज्ञाँ च विधेहि न इति-प्रश्नोपनिषद् 2।12।13

हे प्राण, तेरा ही रूप वाणी में निहित है तू ही श्रोत, नेत्र, मन में विद्यमान् है। तू उन्हें कल्याणकारी बना। इस शरीर में ही विद्यमान् रह। इस ब्रह्माण्ड में जो कुछ है सो सब तुझ प्राण के ही आश्रित है। तू माता-पिता के समान हमारी रक्षा कर और हमें सम्पदाओं तथा विभूतियों से सम्पन्न कर।


मनोमय कोश और आज्ञा चक्र

मस्तिष्कीय क्षमता के चमत्कार सामान्य लोक व्यवहार में पग-पग पर दृष्टि गोचर होते हैं। सूझ-बूझ वाले बुद्धिमान मनुष्य हर क्षेत्र में आगे बढ़ते और सफलता पाते हैं इसके विपरीत मूढ़ मति और मन्द बुद्धि लोग अनुकूल परिस्थितियाँ रहने पर भी पिछड़ी स्थिति में ही पड़े रहते हैं। जीवन की गहन समस्याओं को सुलझाने में , आत्मोत्कर्ष का लाभ प्राप्त करने में भी मनःस्थिति की प्रखरता ही लाभ देती है।

ज्ञान वस्तुओं के माध्यम से यह विकार तत्त्व समस्त शरीर में फैला हुआ है। मस्तिष्क उसका केन्द्रीय कार्यालय है। यह सुविस्तृत ज्ञान-विस्तार अध्यात्म की भाषा में मनोमय कोश कहलाता है। बौद्धिक प्रगति के लिए सामान्यतया प्रशिक्षण के स्कूली तथा दूसरी तरह के उपाय काम में लाये जाते हैं। मनः चेतना के आध्यात्मिक उपचार साधनात्मक है। उनके माध्यम से मनःशक्ति विकसित और परिष्कृत की जाती है । मनः क्षेत्र में प्रवेश का द्वार आज्ञा चक्र माना गया है। इस संस्थान को जागृत करने से चेतना की उन गहरी परतों से सक्रियता उत्पन्न होती है, जो व्यक्तित्व के समग्र विकास की भूमिका बनती है। आज्ञा चक्र का जागरण प्रकारान्तर से मस्तिष्कीय संस्थान की चेतन और अचेतन दोनों ही परतों को प्रभावित करता है। उन्हें इस योग्य बनाता है कि भौतिक सफलताओं और आत्मिक विभूतियों के उपलब्ध होने की सम्भावना बन सके। मनोमय कोश को परिपुष्ट बनाने के लिए आज्ञा चक्र की साधना का विधान आत्म विज्ञान के मनीषियों ने बताया है।

दोनों भवों के मध्य एक तीसरा नेत्र है। जिसे दिव्य दृष्टि का केन्द्र माना जाता है। योग शास्त्र में इसे आज्ञा चक्र एवं दिव्य नेत्र कहा गया है। पौराणिक अलंकारिक चित्रण में इसे तृतीय नेत्र चित्रित किया गया है। शिव तथा दुर्गा की आकृतियों में उनके तीन नेत्र दिखाये जाते हैं। यह तीसरा नेत्र दोनों भवों के बीच है। यह तिरछा न होकर सीधा है। दोनों आँखें तो दाँये-बाँये चौड़ाई में होती हैं, पर यह तीसरा नेत्र ऊपर से नीचे की ओर ऊँचे से नीचे की दिशा में है। इसे दीपक की लौ के सदृश दर्शाया गया है।

आज्ञाचक्र को दूर दर्शन के उपयुक्त ‘टेलीविजन’ स्तर का सूक्ष्म यन्त्र कह सकते हैं। महाभारत के सारे दृश्य संजय ने इसी माध्यम से देखे और धृतराष्ट्र को सुनाये थे। चित्र लेखा द्वारा प्रद्युम्न प्रणय इस दिव्य दर्शन शक्ति के माध्यम से ही सम्भव हुआ था। ऐसे और भी कितने ही कथानक बिना नेत्रों की सहायता के देखे जाने के सम्बन्ध में कथा पुराणों में भरे पड़े है। यह तीसरा नेत्र न केवल दूरदर्शन को वरन् अदृश्य एवं अप्रत्यक्ष को भी देख सकने में पूरी तरह समर्थ है। जिस प्रकार ‘एक्सरेज’ ठोस पदार्थों में होकर पार चली जाती है और आँखों से न दीख पड़ने वाली वस्तुओं के भी चित्र खींचती है उसी प्रकार आज्ञाचक्र के कैमरे का शक्तिशाली लेंस अदृश्य को देख और अविज्ञात को जान सकता है। न केवल पदार्थों की स्थिति वरन् जीवधारियों की मनः स्थिति को भी देख जान सकना इस यन्त्र के माध्यम से सम्भव हो सकता है। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म में जिस वेधक दृष्टि से दूसरों को प्रभावित किया जाता है वह स्थूल नेत्रों की नहीं वरन् आज्ञाचक्र की सूक्ष्म नेत्र की ही क्षमता होती है।

मस्तिष्कीय चेतना में यों अन्य कितने ही शक्तिशाली केन्द्र संस्थानों का अस्तित्व विद्यमान् है पर उनमें अधिक सरलता पूर्वक जगाया जा सकने वाला और अति महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ देने वाला केन्द्र आज्ञाचक्र है। इसमें पाई जाने वाली दिव्य दृष्टि-क्षमता से सम्बन्ध का कई महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों में विवेचन हुआ है। टीन लोवसग रम्पा की “थर्ड आई” सुग्न अल जहीर की दि आकल्ट जर्नी-डेनियल बारे की-दी मैका आफ हैवनली ट्राउजर्स पुस्तकों में आज्ञाचक्र की दिव्य क्षमता की विस्तृत विवेचना है। उनमें अनेक उदाहरणों का उल्लेख है जिनसे सिद्ध होता है कि इन दिव्य संस्थानों की सहायता से ऐसी महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त हो सकती है जो सर्वसाधारण के लिए तो अज्ञात हो रहती है, पर जो उनका आभास प्राप्त कर लेते हैं वे अपना तथा दूसरों का बहुत हित साधन कर सकते हैं।

नव ग्रहों और उपग्रहों के केन्द्र सूर्य है। पृथ्वी का केन्द्र ध्रुव प्रदेश है। परमाणु का शक्ति केन्द्र उसका मध्यवर्ती केन्द्र ‘नाभिक’ न्यूक्लियस कहलाता है। मस्तिष्क मानवी चेतना का केन्द्र है और उसका मध्य बिन्दु आज्ञा-चक्र कहलाता है। इस तनिक से केन्द्र को मस्तिष्क रूपी ताले की ताली कह सकते हैं । उसे जीवन दुर्ग का प्रवेश द्वार कह सकते हैं।

भ्रूमध्य -जहाँ आज्ञाचक्र की स्थिति मानी जाती है, उसी सीध में कपाल के अन्दर एक अस्थि का नुकीला सा भाग है, इसे ‘ग्लेविला’ कहते हैं। इसका कुछ स्पष्ट उद्देश्य स्थूल क्रिया-कलापों के अंतर्गत नहीं मिलता है, किन्तु उस स्थान विशेष पर एक विशेष आकार की स्थिति कुछ सोचने समझने को बाध्य करती है। विज्ञान का नियम है कि नुकीले स्थूल विद्युत चुम्बकीय सूक्ष्म तरंगों के संचारण एवं संग्रहण के लिए उपयोगी होते हैं। रेडियो संकेतों के लिए एरियल-एन्टीना और आकाशीय विद्युत से विशाल भवनों की रक्षा के लिए ‘तड़ित चालक’ (लाइटनिंग कन्डक्टर) इसी सिद्धान्त पर बनाये जाते हैं। इस दृष्टि से नुकीले अस्थि भाग की उपस्थिति उस स्थल में शक्ति संचरण संग्रहण की क्षमता होने का स्पष्ट संकेत करती है।

उसी सीध में दृष्टि संस्थान का एक महत्त्वपूर्ण घटक आता है। जिसे ‘आप्टिक चियाज्मा’ कहते हैं। आँख से दृष्टि संकेतों का संवहन करने वाले विशेष रज्जु (ट्रैक्ट) इसी स्थल पर एक दूसरे को क्रास करके , मुड़ कर मस्तिष्क के दृष्टि केन्द्रों की ओर बढ़ जाते हैं दो भिन्न-भिन्न नेत्र गोलकों में अंकित भिन्न-भिन्न दृश्यों को एक सन्तुलित प्रामाणिक स्वरूप में बदलने में इस स्थल की प्रत्यक्ष भूमिका रहती है। यह स्थल दृष्टि संस्थान का एक सूक्ष्म नियंत्रक कहला सकता है।

इसी ‘आप्टिक चियाज्मा’ से लगी हुई ही एक अति महत्त्वपूर्ण ग्रन्थि ‘पिट्यूटरी’ होती है। अब तक जो खोजें हुई हैं उनके अनुसार इस ग्रन्थि को अति महत्त्वपूर्ण ग्रन्थि माना जाता है। किन्तु वैज्ञानिकों का मत है कि इसके सम्बन्ध में जैसे-जैसे जाना जा सकेगा, इस ग्रन्थि की महत्ता अब की अपेक्षा अनेक गुनी अधिक सिद्ध होगी। इसमें चमत्कारी सम्भावनायें सन्निहित है।

मनोवैज्ञानिक आधार पर शरीर विज्ञान का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि पिट्यूटरी ग्रन्थि को प्रभावित करके कामेन्द्रियों की सक्रियता को समाप्त किया जा सकता है। यह निष्कर्ष शिव के तृतीय नेत्र खोलने से कामदहन के उपाख्यान के सर्वथा अनुरूप है। जागृत आज्ञाचक्र से कामवासना का शमन-दमन सर्वथा सम्भव है।

इस केन्द्र का महत्त्व प्रदर्शित करने वाला एक और तथ्य शरीर विज्ञान के अंतर्गत मिलता है। मस्तिष्क के महत्त्वपूर्ण भागों के चारों ओर तथा मेरुदण्ड (स्पाइनल कार्ड) के अन्दर तथा बाहर एक विशेष द्रव भरा रहता है। इसे ‘सैरिबो स्पाइनल फ्ल्यूड कहते हैं। वैज्ञानिक मान्यता है कि यह द्रव इस सारे संस्थान के संरक्षण एवं पोषण का कार्य करता है। इस द्रव की संचार प्रणाली का एक ध्रुव ठीक भ्रूमध्य की सीध में स्थित है।

मोटी दृष्टि से अन्न भी शरीर को पोषण मात्र देता है किन्तु थोड़ी सूक्ष्म दृष्टि से देखें तो अत्र के सूक्ष्म संस्कारों का सीधा प्रभाव शरीर पर पड़ने की बात भी स्पष्ट रूप से सामने आती है। इस मस्तिष्कीय द्रव में भी मस्तिष्क एवं मेरुदण्ड संस्थान को पोषण देने की क्षमता के साथ-साथ सूक्ष्म संस्कार एवं शक्तियों के संचरण की क्षमता का होना इस दृष्टि से नितान्त स्वाभाविक है। फ्राँसिस ल्यूकेल ने अपनी पुस्तक ‘इन्ट्रोडक्शन टु साइकोलॉजिकल फिजियोलॉजी’ में यह स्वीकार किया है कि मस्तिष्क के ‘हाइपोथैलेमस’ जैसे महत्त्वपूर्ण भाग की सक्रियता पर इस द्रव की आन्तरिक स्थिति का उल्लेखनीय प्रभाव पड़ता है।

स्पष्ट है कि यदि इस पोषक द्रव्य को किन्हीं शक्तियों से प्रभावित किया जा सके तो मस्तिष्क एवं सारे स्नायु संस्थान को संस्कार विशेष प्रदान किए जा सकते हैं। भ्रूमध्य तक उपर्युक्त द्रव की नलिका को पहुँचाने के पीछे प्रकृति का सुनिश्चित उद्देश्य अवश्य है। पिनिपल ग्रन्थि में दृश्याँकन क्षमता है, स्थूल प्रकाश उस तक नहीं जा सकता। किन्तु एक्सरे जैसी सूक्ष्म किरणें तो उस तक सीधी पहुँच ही सकती है तथा वह ग्रन्थि उनके प्रति संवेदनशील होने से उनके आधार पर स्थूल आँख से न दीखने वाले तथ्यों का भी बोध करा सकती है।

चर्म चक्षुओं से बहुत ही मोटी वस्तुएँ देखी जा सकती है। जीवाणुओं एवं परमाणुओं तक को उनके द्वारा देखा नहीं जाता। उसके लिए माइक्रोस्कोप का प्रयोग करना पड़ता है। दूरी की दृष्टि से भी सीमित परिधि की वस्तुएँ ही दिखाई देती है॥ दूरवर्ती वस्तुएँ देखने के लिए दूरबीन के बिना काम नहीं चलता । जब प्रत्यक्ष पदार्थों के सामने होने पर भी इन आँखों से उन्हें देखा जा सकना सम्भव नहीं होता तब सूक्ष्म जगत की परोक्ष हलचलों की जानकारी दे सकने में इन नेत्र गोलकों के सहारे कैसे काम चल सकता है। विशेषतया आत्मिक-चेतनात्मक तत्त्वों की जानकारी तो इनसे मिल ही नहीं सकती। आत्म साक्षात्कार ब्रह्म दर्शन जैसे प्रयोजनों के लिए तो अतिरिक्त दृष्टि ही चाहिए। सूक्ष्म दृष्टि इसी को कहते हैं। यह दिव्य चक्षु में ही सन्निहित रहती है।

भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट् रूप इन्हीं दिव्य चक्षुओं से दिव्य दृष्टि दिखाया था। उनने स्पष्ट कहा है - चर्म चक्षुओं से यह प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता। इसके लिए जिन दिव्य चक्षुओं की आवश्यकता है , उन्हें तुम्हें देते हैं -

न तु माँ शक्यसे द्रश्टुमनेर्नव स्वचक्षुशा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य में योगमैश्वरम्-गीता 11।8

‘परन्तु मुझको तू अपने इन प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसन्देह समर्थ नहीं है, इसी से मैं तुझे दिव्य’ अलौकिक चक्षु देता हूँ, उससे तू मेरी ईश्वरीय योगशक्ति की देख’।

शिव गीता में भी ऐसा ही वर्णन आता है। भगवान शिव अपना दर्शन कराने के लिए साधक को दिव्य चक्षुओं में सन्निहित इस दिव्य दृष्टि का अनुग्रह प्रदान करते हैं-

दिव्यं चक्षुः प्रदास्यामि तुभ्यं दशरथात्मज। तेन पश्य प्यं त्वक्त्व मत्तेजोमण्डलं ध्रुवम्॥

इस कारण उसके देखने को मैं तुम्हें दिव्य नेत्र देता हूँ उन नेत्रों से भय त्याग कर तुम मेरा दिव्य स्वरूप देखो।

न चर्मचक्षुशा द्रश्टुँ शक्यते मामकं महः। नरेण वा सुरेणापि तन्ममानुग्रहं बिना॥

नरेन्द्र वा देवता इस मेरे तेज स्वरूप को मेरे अनुग्रह बिना चर्म चक्षु से नहीं देख सकते ।

दिव्य दृष्टि के केन्द्र यह दिव्य चक्षु भ्रूमध्य भाग में अवस्थित है। इस संस्थान को आज्ञाचक्र कहते हैं। इस तथ्य का प्रतिपादन साधना शास्त्र में स्थान-स्थान पर हुआ है। यथा-

आज्ञाचक्रे तदूर्ध्वे च आत्मनाधिश्ठितं परम्। आज्ञासंक्रमणं तत्र गुरोराज्ञेति कीर्तितम्-रुद्रयामल 27।8

“तालू के ऊर्ध्व में आज्ञाचक्र है। वही आत्मा का परम अधिष्ठान है। इस स्थान में गुरुदेव की आज्ञा सवंमित होती है।

भ्रुवोर्मध्ये ललाटे तु नासिकायास्तु मूलतः। जनीयादमतं स्थानं तद्ब्रह्मायतनं महत्-ध्यानबिन्दु

ललाट में भ्रूयुगल और नासामूल का संयोग स्थल ही अमृत स्थान है। वही विश्व का आधार है। इस स्थान पर मन संयोग होने पर जगत् के सब विषयों का ज्ञान हो जाता है।

भूमध्यनिलयो बिन्दुः शुद्धस्फटिकसंनिभः। महाविश्णोश्च देवस्य तत्सूक्ष्मं रुपमुच्यते-योग॰ शि0 5।34

समाधिक अभ्यास करते समय भ्रूयुगल के मध्य में ललाट के अभ्यान्तर जो शुभ्र बिन्दु देखा जाता है, वही महा विष्णु का सूक्ष्म रूप है।

मानुशं बिन्दुतीर्थ च कालीकुण्डं कलाल्मकम्। आज्ञाचक्र सदा ध्यात्वा स्ताति निर्वाजसिद्धये-रुप्रयामके

मोक्ष का इच्छुक साधक, मनुष्य के शरीर रूपी तीर्थ में स्थित आज्ञा चक्र के ध्यान रूपी काली कुण्ड का स्नान नित्य करता है।

आज्ञा चक्र में दिव्य दृष्टि की अवस्थिति मानी गई है। शिव और दुर्गा के चित्रों में इस स्थान पर तीसरा नेत्र दिखाया गया है जो दाँये-बाँये नहीं-ऊपर नीचे की ओर बना हुआ है। इस नेत्र का एक प्रयोजन उस कथा में बताया गया है जिसमें कामदेव पर कुपित होकर शिवजी ने तीसरा नेत्र खोला था और उससे निकलने वाली ज्वाला में उनका शत्रु कामदेव देखते-देखते जलकर भस्म हो गया था। दमयंती के कोप से व्याथ के जल मरने की कथा में भी ऐसा ही वर्णन है। इससे प्रतीत होता है कि शाप देने जैसी-नष्ट करने के लिए उपयुक्त कोई विशेष शक्ति इस स्थान पर विद्यमान् है।

यह एकांकी वर्णन हुआ। दिव्य दृष्टि में वरदान की भी क्षमता है। वह विनाश और सृजन दोनों ही प्रयोजनों में सामान्य विद्युत शक्ति की तरह काम आती है। तृतीय नेत्र को सामान्य जीवन में दूरदर्शिता का केन्द्र माना जा सकता है। अदूरदर्शी व्यक्ति तात्कालिक लाभ भर को देखते सोचते हैं, उस कदम की भावी प्रतिक्रिया क्या होगी यह उन्हें सूझ ही नहीं पड़ता। असंयमी, आलसी, अपव्ययी, अनाचारी, उच्छृंखल प्रकृति के व्यक्ति मानसिक दृष्टि से परखे जाने पर ‘अदूरदर्शिता’ मनोरोग से ग्रसित माने जायेंगे। भविष्य की कल्पना न कर सकने अथवा उसे महत्त्व न दे पाने के कारण ही लोग ऐसे काम करते हैं जिनमें तत्काल तो थोड़ा लाभ दीखता है पर अन्ततः पश्चाताप करते रहने के अतिरिक्त और कुछ पल्ले नहीं पड़ता।

आयरलैण्ड के प्रो0 वैरेट इस बात के लिए प्रसिद्ध थे कि वे भूमिगत जल स्रोतों तथा खदानों का पता अपनी अन्तः चेतना से देखकर बता देते थे। बिकली पहाड़ी क्षेत्र में दूर-दूर तक कहीं पानी का नाम भी नहीं था। जमीन कड़ी और पथरीली थी। उत्खलन विशेषज्ञों के सामने कई घण्टे वे उस क्षेत्र में घूमे अन्ततः वे एक स्थान पर रुके और कहा- मात्र 14 फुट गहराई पर यहाँ एक अच्छा जल स्रोत है। खोदने पर 15 फुट नीचे पानी का जोरदार स्रोत निकला उसने उसे समूचे क्षेत्र की जल आवश्यकता को पूरा कर दिया।

फौज के साथ टेलिस्कोप रहते हैं और शत्रु की गतिविधियों को उसी के सहारे ऊँचे चढ़ कर देखा जाता है। ग्रह नक्षत्रों की चाल देखने के लिए खगोल विज्ञानी भी ऐसी ही दूरबीन रखते हैं। जहाजों पर भी यह यन्त्र लगा रहता है अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों में भी दूरदर्शन के उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रकार जीवन समस्याओं के समाधान में भी दूरदर्शिता के आधार पर हल निकालने और समाधान खोजने की आवश्यकता पड़ती है। भ्रूमध्य भाग में अवस्थित आज्ञा चक्र को इसी विशेष क्षमता का केन्द्र माना गया है।

आज्ञा चक्र को सूर्य चक्र भी कहा गया है। प्रकाश का केन्द्र सूर्य है। संसार में जितना भी प्रकाश है वह विभिन्न मार्गों से सूर्य देवता द्वारा ही धरती पर अवतरित होता है। मनुष्य के नेत्र प्रकाश में ही कुछ देख पाते हैं अन्धकार रहने पर जो पलक खुले रहने पर भी वे असहाय ही सिद्ध होते हैं। नेत्रों की ज्योति प्रकारान्तर से सूर्य की ज्योति से प्रभावित और परिचालित है। सूक्ष्म शरीर का तृतीय नेत्र ज्योतिर्मय होने पर प्रत्यक्ष और परोक्ष क्षेत्र को अपनी दिव्य दृष्टि से सुखी समुन्नत बनाता है।

स्थूल नेत्रों की दृष्टि सीमित है। बढ़ी-चढ़ी क्षमता वाले यन्त्रों की सहायता से दूरवर्ती वस्तुओं को बिना कठिनाई के देखा जाना सम्भव है। राडार यन्त्र से आकाश में उड़ने वाले वायुयानों की हलचलों का ठीक तरह पता चलता रहता है। रेडियो-दूरबीन आकाशीय, ग्रह नक्षत्रों की चाल तथा स्थिति की सही जानकारी देती है। वेधशालाएँ अपना काम इन्हीं यन्त्रों के सहारे चलाती है।

दिव्य दृष्टि को जगा सकना- दिव्य चक्षु को खोल सकना मानव जीवन का बहुत बड़ा पुरुषार्थ है। आज्ञा चक्र साधना में व्यावहारिक जीवन में काम आने वाली दूरदर्शिता और सूक्ष्म जगत के अंतर्गत हो रही हलचलों को समझ सकना उसी उपलब्धि के सहारे सम्भव होता है। इतना ही नहीं उस जागृत दिव्य क्षमता से व्यक्तियों को-पदार्थों को-परिस्थितियों को प्रभावित कर सकना भी सम्भव होता है। आज्ञा चक्र को जागृत कर सकना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।


विज्ञानमय कोश का केन्द्र संस्थान हृदय चक्र

विज्ञानमय कोश आस्थाओं, आकांक्षाओं और संवेदनाओं को केन्द्र माना गया है। व्यक्तित्व वहीं बढ़ता और ढलता है। जीवन प्रवाह की दिशा धारा उसी उद्गम स्रोत से निर्धारित, नियंत्रित होती है। अस्तु उत्कृष्टता के अनुपात से उसे अन्नमय कोश -प्राण मय कोश -मनोमय कोश से ऊपर स्थान दिया गया है। इस स्तर की साधना करने से स्थूल और सूक्ष्म जगत पर समान रूप से अधिकार मिलता है। भौतिक और आत्मिक सिद्धियों का दिव्य संस्थान इस विज्ञानमय कोश को ही माना गया है।

अन्य कोशों की तरह विज्ञान मय कोश की सत्ता भी समूचे कार्य कलेवर में संव्याप्त है। किन्तु उसका प्रवेश द्वार हृदय संस्थान माना गया है इसी को ब्रह्म-चक्र कहते हैं।

थोड़ी गहराई से देखने पर शरीर विज्ञान के अनुसार भी हृदय केन्द्र की महत्त्वपूर्ण स्थिति सिद्ध हो जाती है। यह केन्द्र हृदय के दांये भाग में स्थित पेस मेकर कहा जा सकता है। यह स्थूल हृदय के दांये भाग में अवस्थित है। अतः वक्ष के मध्य में ही इसका स्थान आ पड़ता है। पेस मेकर क्या है ? इसे समझने के लिए हृदय की रचना तथा कार्य पद्धति पर थोड़ा सा ध्यान केन्द्रित करना होगा।

मान्यता यह है कि रक्त संचार हृदय से होता है और उसके कारण शरीर का अस्तित्व बना रहता है। हृदय के आकुंचन एवं प्रसारण की क्रिया के कारण उसके द्वारा सारे शरीर में रक्त पम्प किया जाना सम्भव होता है। सामान्य भाषा में इस क्रिया को हृदय की धड़कन कहते हैं। हृदय की धड़कनों एवं रक्त को संचारित करते रहने के लिए 20 वाट विद्युत शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। यह विद्युत शक्ति हृदय में ही पैदा होती है, तथा यही हृदय की धड़कन का कारण बनती है। विद्युत स्पन्दन (इलेक्ट्रिक इम्पल्स) हृदय के जिस भाग में पैदा होता है वह हिस्सा ही हृदय का मुख्य पेस मेकर कहलाता है।

पेस मेकर हृदय के दांये एवं ऊपरी प्रकोष्ठ के मध्य में होता है। इसमें से जैसे ही विद्युत स्पन्दन पैदा होता है उसे संचरित करने वाले विशेष तन्तु उसे हृदय में संचरित करते हैं। पूरे हृदय के उस स्पन्दन को संचरित होने में औसतन 0.8 सेकेंड का समय लगता है। इतने ही समय में हृदय की एक धड़कन पूरी होती है। अस्तु मनुष्य के जीवन का मुख्य आधार हृदय की धड़कन नहीं उसे पैदा करने वाला यह विद्युत स्पन्दन कहा जा सकता है। इसे ही कारण शरीर का अथवा विज्ञानमय कोश का केन्द्र कहा जा सकता है। शास्त्रीय परिभाषाओं की अनेक संगतियाँ इसके साथ बैठ जाती है।

कारण शरीर के केन्द्र के रूप में इसकी व्याख्या के अंतर्गत कहा गया है कि वह अंगुष्ठ मात्र आकार वाला प्रकाशमान अंग है। इसी प्रकार विज्ञानमय कोश के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वह ब्रह्माण्ड व्यापी चेतना से जुड़ा है तथा उससे सीधा आदान-प्रदान करने में समर्थ है। यह दोनों संगतियाँ भी इस केन्द्र के साथ ठीक बैठ जाती है।

योगियों ने ‘कारण शरीर’ को हृदय स्थित प्रकाशमान अंगुष्ठमात्र देह भी कहा है। स्वप्रकाशित वस्तु में से प्रकाश तरंगें नियमित रूप से विकीरित होती रहती है। प्रकाशमान का अर्थ यहाँ रोशनी देने वाला नहीं है । कारण शरीर से ‘जैवीय विद्युत स्पन्दन’ पैदा होकर सारे शरीर में जीवन संचार करते रहते हैं , यही उसके प्रकाशमान कहलाने का कारण है। योगियों ने जीवन स्पन्दनों के मुख्य ‘कारण’ को जब अपनी योग दृष्टि से खोजा होगा तो उन्हें मुख्य पेस मेकर के स्व स्पन्दित क्षेत्र का बोध हुआ होगा। वैज्ञानिक मान्यतानुसार भी वह क्षेत्र आकार में 5 मि.मी. से 20 मि.मी का है। इसे अँगूठे के बराबर कहना सर्वथा उचित है। ‘अंगुष्ठ मात्र’ प्रकाशमान शरीर की घोषणा योगियों ने इस स्वस्पन्दित क्षेत्र को देखकर ही की होगी।

यह केन्द्र किसी सूक्ष्म चेतना से संचालित है यह तथ्य वैज्ञानिक भी स्वीकार करते हैं। पेस मेकर में विद्युत स्पंदन कैसे, कहाँ से उत्पन्न होते हैं यह वैज्ञानिकों को पता नहीं। इसे वे विश्व नियन्त्रक सत्ता के ही स्पन्दन मानते हैं । पेस मेकर के विद्युत स्पन्दन जिन विशेष तन्तुओं द्वारा हृदय में फैलते हैं वह प्रारम्भ में एक समूह (बण्डल) के रूप में निकलते हैं। वैज्ञानिकों ने इस तन्तु समूह का नाम ‘बण्डल आफ हिज’ रखा है। इसका अर्थ होता है ‘उसके’ तन्तु समूह। उल्लेखनीय यह है कि इस नाम में ‘हिज (अंग्रेजी में ) जब ‘हिज’ कैपिटल अक्षरों से लिखा जाय तो उसे ईश्वर के लिए किया गया सम्बोधन माना जाता है। पेस मेकर के विद्युत स्पन्दन को लेकर चलने वाले तन्तु समूह को ईश्वर के तन्तु समूह कहने का सीधा अर्थ यही होता है कि इस केन्द्र को महत-चेतना द्वारा संचालित स्वीकार कर लिया गया है।

यह विद्युत स्पन्दन पैदा करने वाली सत्ता, उस स्थूल को बनाने वाले स्थूल तन्तुओं से भिन्न है यह तथ्य भी चिकित्सा विज्ञान के अंतर्गत प्रमाणित हो जाता है। यदि उस स्थूल विशेष के तन्तुओं का यह सहज गुण होता तो या तो स्पन्दन वहीं से पैदा होते अथवा एकदम समाप्त हो जाते। लेकिन देखा यह जाता है कि कई बार स्पन्दन पैदा होने का केन्द्र बदल जाता है। जब मुख्य पेस मेकर के तन्तु पैदा करने में किसी कारण अक्षम हो जाते हैं तो वह संचालक शक्ति उसी के सहयोगी निकटतम तन्तु समूह के किसी भाग से उन स्पन्दनों का संचरण करने लगती है। मुख्य पेस मेकर में व्यवधान आ जाने पर उसके थोड़े नीचे अवस्थित सहायक पेस मेकर अथवा ‘बण्डल आफ हिज’ के किसी भाग से यह कार्य लिया जाने लगता है। चिकित्सा शास्त्री इस प्रक्रिया को ‘ट्राँस्फर आफ पेस मेकर एक्टिविटी’ (पेस मेकर प्रक्रिया का स्थानान्तरण ) कहते हैं । इस यों भी समझा जा सकता है कि यदि किसी विद्युत मोटर का स्टार्टर खराब हो जाय तो कुशल मिस्त्री उसे छोड़ कर लाइन के तार मेन स्विच से सीधे मोटर के तारों से जोड़ देता है। और भी मोटा उदाहरण लिया जा तो यदि साइकिल की सीट टूट जाय तो कुशल चालक पीछे कैरियर या आगे डंडे पर बैठ कर भी साइकिल को गतिशील बनाये रखता है। दोनों ही स्थितियों में काम तो किसी प्रकार चलता रहता है किन्तु सन्तुलन बिगड़ने का भय हमेशा बना रहता है। किसी भिन्न स्थान से जब हृदय के स्पन्दन संचरित होने लगते हैं तो दिल की गति में गड़बड़ी पैदा होने लगती है।

चिकित्सा की दृष्टि से वह स्थिति क्या होती है यह बात भिन्न है। परन्तु उपर्युक्त दोनों तथ्यों से यह सिद्ध हो जाता है कि हृदय में विद्युत स्पन्दन पैदा करने वाली चेतनसत्ता उसके स्थूल घटकों से भिन्न है जो कुशल आपरेटर की तरह उनका उपयोग करती रहती हैं। उसके संकेत पर ही स्थूल शरीर के उपकरण जीर्ण शीर्ण हो जाने पर भी हृदय स्पन्दित होता रहता है। दूसरी ओर शरीर के सारे अवयव ठीक रहने पर भी जब वह चेतना अपना कार्यालय समेट लेती है तो शरीर निष्प्राण हो जाता है।

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि अदृश्य चेतना द्वारा संचालित यह विद्युत स्पन्दन शरीर के रक्त परिभ्रमण संस्थान से परे भी अस्तित्व रखते हैं। कहा गया है कि हृदय विज्ञानमय कोश का केन्द्र तो है किन्तु उसकी सत्ता उसका अस्तित्व सारे शरीर में फैला है। पेस मेकर द्वारा संचरित विद्युत स्पन्दन हृदय में धड़कन तो पैदा करता ही है, किन्तु उसके अस्तित्व के प्रमाण सारे शरीर में भी मिलते हैं। शरीर रचना की दृष्टि से तो उस विद्युत स्पन्दन के संवाहक तन्तु केवल हृदय में ही फैले हैं, उसके बाहर शरीर में वे नहीं है। किन्तु हृदय रोगों का अंकन करने वाले यन्त्र ई.सी.जी. पर कायिक विद्युत का जो वोल्टेज हृदय के आस-पास अंकित होता है वही कंधों, हाथ की कलाइयों तथा पैर के टखनों तक पर भी अंकित होता है। स्पष्ट है कि हृदय केन्द्र में उस महत् सत्ता से सीधे सम्पर्क रखने की क्षमता तो है ही, उससे प्राप्त संकेतों-स्पन्दनों को सारे शरीर में संचरित करने की क्षमता तथा उसके लिए व्यवस्थित तन्त्र भी अवश्य हैं

यहाँ स्मरण रखना चाहिए कि स्थूल विज्ञान के आधारों पर यौगिक सूक्ष्म सिद्धान्तों की शत प्रतिशत व्याख्या नहीं की जा सकती । चूँकि सूक्ष्म सीधा हमारे पकड़ में नहीं आता इसलिए उसे स्थूल के माध्यम से प्राथमिक स्तर पर समझने-समझाने का प्रयास भर किया जा सकता है। विज्ञानमय कोश की अतीन्द्रिय क्षमताओं तथा इसके केन्द्र की अद्भुत महत्ता की झलकमात्र -स्थूल विज्ञान के आधार पर पायी जा सकती है। चिकित्सा विज्ञान ने तो केवल रोगों के कारण और निवारण का लक्ष्य रखकर ही अध्ययन एवं शोध क्रम आगे बढ़ाया है फिर उसके आधार पर हृदय केन्द्र में विशिष्ट क्षमताओं तथा उससे सम्बद्ध शरीर व्यापी एक तन्त्र का होना तो सिद्ध हो ही जाता है। ईश्वर प्रदत्त इस सुविधा का लाभ कैसे उठाया जाय, इस क्षमता को किस सीमा तक बढ़ाया जा सकता है। उसका परिमार्जन आदि कैसे किया जा सकता है, यह सब विषय अभी स्थूल विज्ञान के कार्य क्षेत्र के बाहर है। योगियों ने इन प्रकरणों में पर्याप्त गहराई से खोज की एवं उपलब्धियाँ प्राप्त की है। विज्ञानमय कोश को अतिशय सक्रिय करने से लेकर समाधि स्थिति में उसे एकदम शान्त बना देने तक की सफलताएँ वे पा सके हैं। इस सफलता के साथ वे उपलब्धियाँ भी जुड़ी हुई हैं जिन्हें साधना की सिद्धि के रूप में जाना जाता है।

हृदय चक्र को गुफा या गुहा भी कहा गया है। जिस प्रकार योगीजन विशिष्ट साधनाओं के लिए गुफा में प्रवेश करके सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं उसी प्रकार इस हृदय गुफा में प्रवेश करके दिव्य उपलब्धियाँ प्राप्त की जाती है। बोलचाल की भाषा में हृदय शब्द का उपयोग संवेदनाओं के लिए किया जाता है। सहृदय का अर्थ कोमल भावनाओं वाला। हृदयहीन अर्थ निष्ठुर। यह रक्त फेंकने वाली थैली के गुण नहीं वरन् उस सचेतन हृदय तत्त्व के गुण हैं जिसे अध्यात्म की भाषा में हृदय चक्र , ब्रह्म चक्र कहा जाता है। विज्ञानमय कोश का प्रवेश द्वार है। इसी केन्द्र को ध्यान धारणा के सहारे जागृत करके अति मानस को जगाया जाता है। अतीन्द्रिय क्षमता की दिव्य सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिए साधना की आधारशिला यही है। अन्तःकरण एवं अन्तरात्मा का केन्द्र संस्थान भी यही माना गया है। आत्म परिचय देते हुए प्रायः लोग छाती ठोक कर अपने वर्चस्व का परिचय देते हैं और वे क्या करने जा रहे हैं इस संकल्प का परिचय देते हैं।

हृदय गुहा में प्रवेश करके आत्म साधना करने का निर्देश साधना शास्त्रों में इस प्रकार मिलता है-

संत्यज्य हृर्द्गुहशानं देवमन्यं प्रयान्तिये। ते रत्नमभिवाछन्ति त्यक्त हस्तस्थ कौस्तुभा-योग वशिष्ठ

हृदय रूपी गुफा में निवास करने वाले भगवान को छोड़कर अन्यत्र ढूँढ़ता फिरता है वह हाथ की कौस्तुभ मणि छोड़कर काँच ढूँढ़ते फिरने वाले मूर्ख के समान है।

सूक्ष्मातिसूक्ष्मं कलिकस्यमध्ये विश्वस्य स्रश्टा रमनेकरुपम्। विश्वस्यैकं परिवेश्टितारं ज्ञात्वाशिवं शान्ति मत्यन्तमेति-श्वेताम्श्रतरोपनिशद्

जो सूक्ष्म से भी अत्यन्त सूक्ष्म , हृदय गुहा रूप गुह्य स्थान के भीतर स्थित सम्पूर्ण विश्व की रचना करने वाला, अनेक रूप धारण करने वाला तथा समस्त जगत् को सब ओर से घेरे रखने वाला है, उस एक अद्वितीय करुणा स्वरूप महेश्वर को जानकर मनुष्य सदा रहने वाली शान्ति को प्राप्त होता है।

एश देवो विश्वकर्म्मा महात्मा स्दा जनानाँ हृदये सन्निविष्टः। हृदा मनीशा मनसाभिल्कृप्तो य एतहिदुरमृतास्ते भवन्ति॥ -श्रैताश्रतर 4।17

यह देवता विश्व के बनाने वाले और महात्मा हैं, सदा लोगों के हृदय में सन्निविष्ट हैं। हृदय, बुद्धि और मन के द्वारा पहिचाने जाते हैं, जो इसे जानते हैं वे अमृत होते हैं

सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म। यो वेद निहितं गुहाया परमे व्योमेन्। सोऽश्नुते सर्वान् कामान्सह ब्रह्मणा विपश्रितेति-तैज्ञरीय

जो हृदय गुहा में अवस्थित, ज्ञानस्वरूप व्यापक परमेश्वर को जानता है वह ब्रह्म के साथ ही सब भोगों का उपभोग करता है।

निहितं गुहायाममृतं विभ्राजमानगानन्दं त पश्यन्ति विद्वासस्तेन लयेन पश्यन्ति-सुवालोपनिशद्

परब्रह्म हृदय रूपी गुफा में रहने वाला है, वह अविनाशी और प्रकाश स्वरूप है। ज्ञानी उसे ‘आनन्द रूप में अनुभव करते हैं और उसी में लीन हो जाते हैं

पुरुष एवेदं विश्वं कर्म तपो ब्रह्म परामृतम्। एतद्यो वेद निहितं गुहायाँ सोऽविद्याग्रन्थि विकिरतीह सोम्य॥ -मुण्डकोपनिशद्

महर्षि अंगिरा ने कहा कि वे प्यारे शौनक! क्रिया, ज्ञान और नित्य वेद तथा सारा जगत् उसी परब्रह्म के आधार से ठहरा हुआ है। बस जो मनुष्य उस ब्रह्म को अपनी हृदय-रूपी गुहा में स्थित जानता है वह अज्ञान की गाँठ को काट देता है, अर्थात् मुक्त हो जाता है।

न पातालं न च विवरं गिरीणाँ नैवान्धकारं कुक्षयो नोदधीनाम्। गुहा यस्यां निहितं ब्रह्म शाश्वतं बुद्धिवृत्तिविशिश्टा कवयो वेदयन्ते-व्यास भाष्य

जिस गुफा में ब्रह्म का निवास है वह न तो पाताल है, न पर्वतों की कन्दरा, न अन्धकार है, न समुद्र की खाड़ी । चेतन से अभिन्न जो चित्त वृत्ति है, ज्ञानवान लोग उसे ही ‘ब्रह्म गुहा’ कहते हैं।

ईश्वरः सर्व भूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥ तमेव शारणं गच्छ सर्व भावेन भारत। तत्प्रसादात् परा शान्ति स्थानं प्रापस्यसि शाश्वतम्-गीता 18।61, 62

ईश्वर सब प्राणियों के हृद् देश में रहता है। वह अपने कौशल से सब प्राणियों को चलाता है। सर्व प्रकार से उसी की उपासना करो। उसकी कृपा से परम शान्ति, परम पद मिलता है।

हृदय चक्र की उपमा कमल पुष्प से दी गई है। इसे हृदय कमल भी कहते हैं। कमल का तात्पर्य यहाँ आकृति से कम और संवेदना से अधिक है। कमल-कोमलता का, सौंदर्य का, सुगन्ध का, सात्विकता का प्रतीक है। उसे पुष्पों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अस्तु चक्र को कमल की संज्ञा भी दी गई है।

आविः संनिहितं गुहाचरत्राम महत्पदमत्रैतत्समर्पितम्-मुण्डकोपनिष्द्

वह ज्ञानियों के हृदय रूपी गुफा में प्रकट है, सदा सब के समीप रहता है, ज्ञानियों की बुद्धि में वर्तमान रहता है, वह सबसे बड़ा परम धाम है ।

हृदिस्था देवताः सर्वा हृदि प्राणाः प्रतिष्ठिता: । हृदि ज्योतीशि भूय हृदि सर्व प्रतिष्ठितम्-शंख संहिता

हृदय में सब देवताओं का, सब प्राणों का निवास है। हृदय में ही परम ज्योति है। सब कुछ उसी में विद्यमान् है।

यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते-कठोपनिषद्

जब मनुष्य के हृदय की सारी कामनाएँ नष्ट हो जाती हैं तब यह मरणधर्मा मनुष्य मुक्त हो जाता है और मुक्ति दशा में ब्रह्म को प्राप्त करता है।

दूरात्सुदूरे तदिहान्तिके च पश्यत्स्विहैव निहितं गुहायाम्-मुण्डकोपनिषद्

वह दूर से भी दूर है तो भी वह बहुत पास है, ज्ञानी योगियों के लिए वह यही हृदय गुफा में विराजमान् है।

अंगुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति। ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सत एतद्वै तत-कठोपनिषद्

वह सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मा शरीर के हृदय स्थान में भी जहाँ अंगुष्ठमात्र स्थान में लिंग शरीर सहित आत्मा रहता है। योगी जन उसकी प्राप्ति के लिए इसी स्थान पर ध्यान लगाते हैं। वह ईश्वर भूत और भविष्य सबका स्वामी है, जो मनुष्य उसको वहाँ जान लेता है वह फिर ग्लानि को प्राप्त नहीं होता।

हृत्पद्यकर्णिकामध्ये स्थिरदीपनिभाकृतिम्। अंगुष्ठमात्रमचलं ध्यायेदोंकारमीश्वरम्-विन्दू पनिशद

अर्थात् ‘ हृदयकमल की कर्णिका में जो स्थिर दीपशिखा के समान ज्योतिर्मान अंगुष्ठमात्र आकार वाला ओंकार रूप ईश्वर है, उसका ध्यान करें।

हृदय चक्र में ध्यान करते समय अंगुष्ठ आकार की प्रकाश ज्योति का दर्शन साधकों को होता है। दीप शिखा जैसी जलती प्रतीत होती है। इस दिव्य दर्शन का आत्म साक्षात्कार एवं ब्रह्म दर्शन का प्रतीक माना गया है। चक्रों की स्थिति सामान्यतया नदी में पड़ने वाले भँवरों की तरह है। ग्रीष्म ऋतु में उठने वाले भँवरों -चक्रवातों के समतुल्य भी उन्हें माना जाता है। इस स्थिति को कमल पुष्पपत् चित्रित करने में भी कोई विसंगति नहीं है। विज्ञानमय कोश के आधार केन्द्र ब्रह्म चक्र- हृदय चक्र के सम्बन्ध में साधना शास्त्र में कही कमल पुष्प तुल्य और कहीं अंगुष्ठ आकार की प्रकाश ज्योति के सूक्ष्म दर्शन का उल्लेख है। कहा गया है-

अंगुश्ठमात्रः पुरुशो ज्योतिरिवाधूमकः। ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः एतद्वै तत्-कठोपनिषद्

हृदय स्थान में विशेष रूप से जानने के योग्य वह व्यापक आत्मा धूम रहित प्रकाश के समान निर्मल है। वही भूत भविष्यत् का स्वामी है, वही आज मालिक है वही कल रहेगा, यही वह ब्रह्म है जिसकी जिज्ञासा तूने की थी।

विश्वरुपस्यदेवस्यं रुपं यत्किचिदेव हि। स्थवीयः सूक्ष्ममन्यद्वा पश्यन्हृदयपंकजे॥ ध्यायतो योगिनो यस्तु साक्षादेव प्रकाशते-शिवस्वरोदय

विश्वरूप देव का जो कुछ भी स्थूल सूक्ष्म रूप मान कर अपने हृदय कमल में ध्यान करने वाला साधक उन्हीं देव स्वरूप जैसा दिखाई पड़ता है

हृत्पुडरीकमध्ये तु भावयेत् परमेश्वरम्। साक्षिंणं बुद्धिन् त्तस्य परम प्रेय गोचरम्-मैत्रेयुपनिशद

हृदय कमल पर विराजमान् परमेश्वर को साक्षी बुद्धि के सहारे भाव पूर्वक ध्यान धारणा करें।

अंगुश्ठमात्रंः पुरुषोंऽन्तरात्मा सदा जनानाँ हृदये सन्निविष्टः। त स्वाच्छरीरात्प्रवृहेन्मु दिवेशीका धैर्येण॥ तं विद्याच्छुक्रमतृतं त विद्याच्छुक्रममृतमिति-श्वेताश्ररोपनिषद्

हृदय के अंगुष्ठ मात्र स्थानों में रहने वाला जीवात्मा है। योगी को चाहिए कि प्रयाण काल में धैर्य के साथ उसे अपने शरीर से ऐसे निकाले जैसे मूजे के पूले में से सींक खींची जाती है। उस आत्मा को शुद्ध पवित्र और अमृत जाने।

तस्ये मध्यं महानर्चिर्विश्वर्चिर्विश्वतोमुखमे। तस्य मध्ये वह्नि शिखा अणीयोर्ध्वा व्यवस्थिता तस्याः शिखाया मध्ये पुरुशः परमात्मा व्यवस्थिः स ब्रह्मा स ईशानः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट-महोपनिषद 1।13, 14

उस हृदय के मध्य में ही एक ज्वाला प्रदीप्त है। वही ज्वाला दीप शिखा के समान दसों दिशाओं में प्रकाश को बाँट कर विश्व को प्रकाशित करती है। उसी ज्वाला के मध्य में कुछ ऊपर उठी हुई एक क्षीण वह्नि शिखा है। उसी कक्षा में परमात्मा निवास करते हैं। वही परमात्मा ब्रह्मा, ईशान, इन्द्र है तथा वे अविनाशी एवं परम विराट् है।

अंगुश्ठ मात्र मात्मानमेधूम ज्योति रुपकम्। प्रकाशयन्तमन्तस्थ ध्यायेत्कूटस्थ भव्ययेम्-योग कुण्डल्युपनिषद

ध्रूम रहित शुभ्र प्रकाश ज्योति अंगुष्ठ आकार की हृदय में दीप्तिमान है। उसी का ध्यान करना चाहिए।

हृदयकुहरमध्ये केवलं ब्रह्ममात्रं। ह्यहमहमिति साक्षादात्मरुपेण भाति॥ हृदि विश मनसा स्वं चिन्त्रता मज्जता वा। पवन चलन रोधदात्मनिष्ठो भव त्वम्-धीरमणगीता

“ हृदय की गुफा के भीतर केवल मात्र ब्रह्म ही है, जो अहम्’ इस साक्षात् आत्म रूप से प्रकाशित होता है। इस हृदय में मन में प्रवेश करो, अपने आपको ढूंढ़ो या गहरे में गोता लगाओ या प्राण निरोध करके आत्मा में स्थित हो जाओ।”

यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्क सदाशुचिः। सतु तत्पदमास्नोति यस्माद् भूयो न जायते-कठ

विज्ञान साधना सम्पन्न मनुष्य सदा पवित्र रहता है॥ मनस्वी बनता है। उसे परम पद मिलता है। पुनर्जन्म नहीं होता।

तस्माद्वा एतस्मान्मनोमयात्। अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः। तेनैश पूर्णः। स वा एश पुरुषविध एव-तैतीरीयोपनिषद्

मनोमय कोश के पश्चात् विज्ञानमय कोश है। उसी में पूर्ण पुरुष का निवास है।

स यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते विज्ञानवतो वैस लोकाडडज्ञानवतोऽभिसिद्धंयति यावद्विज्ञानस्य गतं तत्रास्य यथाकामचारो भवति यो विज्ञानं ब्रह्मेत्युपास्ते-छान्दोग्योपनिषद

जो जन विज्ञानमय कोश को महान् जान कर उपासना करता है, वह विज्ञान वाले और ज्ञान वाले लोकों को सिद्ध कर लेता है।

हृदय चक्र के विकसित परिष्कृत होने का प्रत्यक्ष प्रति फल सहृदयता संवर्धन के रूप में सामने आता है। यह कोमलता दया, करुणा, ममता, श्रद्धा, सद्भावना, उदारता के रूप में उभरती और सम्पर्क क्षेत्र पर बरसती देखी जा सकती है। इस अमृत वर्षा से शुष्क मरुस्थल हरे भरे होते हैं। साथियों को स्नेह-सद्भाव और सहयोग का लाभ मिलने से वे उच्चस्तरीय अनुदान पाने का आनन्द लेते हैं और उस आधार पर अपनी सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त करते हैं। यह सद्भाव सम्पदा बाँटने वाला स्वयं अपने आप में उत्कृष्ट कलाकारिता का गर्व गौरव और सन्तोष अनुभव करता है। सहृदयता को देवत्व का पर्यायवाची ही मानना चाहिए। सज्जनता और शालीनता इसी अन्तः स्थिति की परिचायक है। महामानवों में यही विशेषता उभरी होती है।

हृदय की परिपुष्टि उच्चस्तरीय आदर्शों में अगाध आस्था के रूप में दृष्टिगोचर होती है। क्षणिक उत्साही तो पानी के बबूले की तरह कई ऊँची कल्पनाएँ करते हैं किन्तु अन्तः परिपक्वता के अभाव में झाग की तरह उनके बैठ जाने में भी देर नहीं लगती । हृदय चक्र को जागृत किया जा सके तो आदर्शवादी उमंगें चिरस्थायी बन सकती हैं और उस प्रेरणा के सहारे उत्कर्ष के पथ पर अनवरत गति से बढ़ते चलना सम्भव हो सकता है।

भगवान् हृदय में विराजते हैं। “दिल के आइने में है तस्वीरें यार” के अनुसार हृदयवान व्यक्ति अपने ही मन मन्दिर में हर घड़ी भगवान के दर्शन करते हैं और उनके अजस्र अनुदान अपने ऊपर बरसने का अनुभव करते आनन्द लेते हैं।


अनावश्यक धन को विकेन्द्रित करने में संलग्न (kahani)

देवता वरदान बाँटने धरती पर आये तो झुण्ड के झुण्ड लोग अपनी मनोकामना पूर्ति की प्रार्थनाएँ लेकर जमा हो गये।

किसी ने यश माँगा, किसी ने धन, किसी ने कुछ किसी ने कुछ। देवता सबकी वाँछाएँ पूरी करते चले गये।

एक व्यक्ति हाथ जोड़े कोने में खड़ा था। देवता ने पास बुला कर कहा-तात तुम्हें भी जो माँगना हो माँग लो।”

उसने कहा- “मेरी याचना छोटी सी है। जिन लोगों ने धन माँगा है, उनके पते मुझे बता दीजिए। फिर मैं अपनी मनोवाँछा स्वयं पूरी कर लूँगा।’

देवता ने आश्चर्य से पूछा- आखिर तुम हो कौन ? उस व्यक्ति ने कहा ‘चोर’। अनावश्यक धन को विकेन्द्रित करने में संलग्न आपका अनन्य भक्त ।


आनंदमयकोश का अमृत कलश

आनंदमयकोश जीवात्मा पर चढ़ा अंतिम आवरण है। अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय के उपरांत इसी एक की साधना करनी शेष रह जाती है। इस आवरण के हटते की आत्मा को परमात्मा रूप में परिष्कृत होने का अवसर मिल जाता है। तब उसकी स्थिति वैसी हो जाती है जैसी कि वेदांत में ‘अयमात्मा ब्रह्म’ तत्त्वमसि, सोहमस्मि, सच्चिदानन्दोऽहम्, शिवोऽहम् आदि उद्घोषों के अंतर्गत प्रतिपादित की गई है।

शिर, विवर को दो दिव्य सत्ताओं का निवास दुर्ग माना गया है। उसका चेतन-अचेतन मनःसंस्थान मनोमयकोश कहलाता है। इसका सूत्र-संचालन भ्रू-मध्य भाग में अवस्थित आज्ञाचक्र से होता है। दूसरा चेतना का सर्वोच्च आनंदमयकोश है। मस्तिष्क में जानकारियों और आदतों का समन्वय है, इसलिए उसे इंद्रिय वर्ग में गिना जाता और भौतिक तत्त्वों से घिरा माना जाता है। तात्त्विक विवेचना में मन को ग्यारहवीं इंद्रिय माना गया है। इंद्रियाँ अपने-अपने छोटे क्षेत्रों को सँभालती हैं। मन उन पर मानीटर जैसा अनुशासन बनाए रखने में सहायता करता है। यों है उसकी भी गणना छात्र वर्ग में ही। मनोमयकोश की साधना से इसी मस्तिष्कीय क्षमता की मनोविज्ञान और परा मनोविज्ञान क्षमताओं की चर्चा-विवेचना होती है। आनंदमयकोश की स्थिति भिन्न है उसमें जीव और ब्रह्म के मिलने का संपर्क साधने वाले अति उच्चस्तरीय सूत्र हैं। शरीर क्षेत्र में ईश्वर का निवास कहाँ है ? इसका उत्तर साधारणतया समूची सत्ता में सव्याँस कहा जा सकता है, पर यदि उसका अन्य कोशों जैसा प्रवेश द्वार या केंद्र संस्थान पूछना हो तो उसे ब्रह्मरंध्र में अवस्थित सहस्रारचक्र कहना पड़ेगा।

ब्रह्मरंध्र मस्तिष्क का मध्य भाग है। परमाणु के मध्य भाग को ‘नाभिक’ या ‘न्यूक्लियस’ कहते हैं। अणु सत्ता का उद्गम केन्द्र वही है। शेष भाग में तो उसका सहायक संरक्षक सरंजाम भरा पड़ा है। जीवाणु से लेकर ग्रह-नक्षत्रों तक में यह न्यूक्लियस ही सारे भाग और शक्ति स्रोत होता है। मस्तिष्कीय राश्ट्र की राजधानी इस मध्य केन्द्र ब्रह्मरंध्र में है। ब्रह्मसत्ता का अवतरण इसी स्थान पर होता है। वायुयान हवाई अड्डे पर ही उतरते हैं। मन संस्थान का सारा नियन्त्रण संचालन मस्तिष्कीय विद्युत के माध्यम से होता है। यह विद्युत संकेत नाड़ी संस्थान द्वारा विभिन्न अंगों तक भेजे जाते हैं। यह विलग-विलग केन्द्र भी परस्पर जुड़े हुए हैं। उनमें भी परस्पर आदान-प्रदान होता है। जैसे आँख के सामने स्वादिष्ट वस्तु आई तो आँख का नियन्त्रक केन्द्र तुरन्त जीभ के केन्द्र को सूचना दे देता है। और वह जीभ ‘लार’ प्रवाहित करने लगती है।

मस्तिष्कीय संचार सूत्रों का भी एक मध्य केन्द्र है। वही से अगणित धारा प्रवाह उठते हैं और उनके द्वारा अनेक विद्युत उन्मेष सक्रिय होते देखे जाते हैं। उन्हीं के द्वारा विभिन्न महत्त्वपूर्ण मस्तिष्कीय केन्द्रों को उत्तेजना मिलती है। सक्रियता इसी उत्तेजना से उत्पन्न होती है।

यदि मस्तिष्क की इस प्रक्रिया को सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो मस्तिष्क के मध्य भाग से सहस्रों विद्युत स्पन्दन सतत् प्रस्फुटित होते दीख सकते हैं। इसी को अलंकारिक रूप से सहस्र धारों वाले चक्र अथवा सहस्र पंखुड़ियों वाले कमल के नाम से सम्बोधित किया जाता है।

स्थूल विज्ञान चूँकि स्थूल की सीमा में ही सारे हल खोजना चाहता है इसलिए उसकी गति यहाँ आकर रुक जाती है। मस्तिष्क के मध्य से यह विद्युत स्पन्दन कैसे उत्पन्न होते ? कैसे इन्हें बढ़ाया या नियन्त्रित किया जा सकता है, यह सब वर्तमान वैज्ञानिकों के लिए रहस्य ही है। फिर भी उन्होंने इन विद्युत उन्मेषों को ‘रेटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम’ ‘स्पैसिफिक थैलैमिक प्रोजैक्शन सिस्टम’ डिफ्यूज थैलैमिक प्रोजैक्शन सिस्टम जैसे नाम दिये है। यह भी स्वीकार किया है के इन स्पन्दनों को इच्छानुकूल नियन्त्रित किया जा सके तो उसके प्रभाव से मस्तिष्क के किसी भी नियन्त्रण केन्द्र को इच्छानुरूप सक्रियता अथवा शिथिलता की स्थिति में लाना तथा असम्भव जैसी उपलब्धियों को भी सम्भव बनाया जा सकता है।

योग विज्ञान सहस्रार चक्र के सम्बन्ध में विशिष्ट साधनाओं को आवश्यक मानता है। उसके जागरण का अर्थ केवल उसकी तीक्ष्णता तथा सक्रियता को बढ़ा देना नहीं है, उसे व्यवस्थित, सुनियंत्रित तथा सुनियोजित भी करना आवश्यक है। वर्तमान वैज्ञानिक उसके विधेयात्मक पक्ष को भले ही न समझ सके हो किन्तु निषेधात्मक पक्ष का अध्ययन रोगों के अंतर्गत अवश्य कर सके हैं। हिस्टीरिया तथा इपीलिप्सी जैसे विभिन्न प्रकार के रोगों की तह में मस्तिष्कीय विद्युत का ही खेल पाया जाता है। जब कोई भाग अस्वाभाविक अथवा अवांछनीय रूप से विद्युत स्पन्दन छोड़ने लगता है तो वह किन्हीं केन्द्रों की स्वाभाविक संचार व्यवस्था में व्यतिक्रम ला देते हैं। उसी के फलस्वरूप तरह-तरह के मानसिक तथा शारीरिक रोग पैदा हो जाते हैं। कहाँ क्या गड़बड़ी है ? इसका अन्दाज वैज्ञानिक लोग ई॰ ई॰ जी॰ नामक यन्त्र द्वारा विभिन्न स्थानों पर मिलने वाले विद्युतीय कंपनों को नाप कर ही लगाते हैं। इससे भी निषेधात्मक पक्ष में ही सही यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि इन विद्युतीय धाराओं द्वारा असाधारण शारीरिक एवं मानसिक क्रियाएँ- प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करना कराना सम्भव है।

मनःसंस्थान के केन्द्र बिन्दु विद्युतीय भाण्डागार को अध्यात्म की भाषा में सहस्रार चक्र या सहस्र दल कमल कहा गया है उस तक पहुँच मानसिक उपचारों की नहीं है किन्तु योग विद्या के अंतर्गत ध्यान धारणा द्वारा उसे अभीष्ट दिशा में मोड़ा, सुधारा एवं अभ्यस्त किया जा सकता है। इस प्रकार व्यक्तित्व के सर्वोच्च शक्ति केन्द्र पर अधिकार प्राप्त करके मनुष्य अभीष्ट आत्म निर्माण में सफल हो सकता है। कहना न होगा कि यह आत्म-विजय अपने लिए तो विश्व विजय के समान ही लाभदायक सिद्ध हो सकती है।

ब्रह्मरंध्र की रासायनिक संरचना को देखते हुए उसे कमल पुष्प की आकृति से मिलता-जुलता देखा जाता है। शरीर शास्त्र के अनुसार भी उस स्थान पर एक अणु गुच्छक पाया जाता है। सूक्ष्म दृष्टि से -सूक्ष्म शरीर में उसकी स्थिति और भी अधिक स्पष्ट होती है। वहाँ कमल पुष्प की आकृति में प्रायः हजार या हजारों पंखुड़ियाँ बिखरी दीखती है, साथ ही प्रकाश-ज्योति का आभास भी होता है। इस स्थान में उठने वाली भाव सम्वेदना को कमल पुष्प और ज्ञान प्रखरता को प्रकाश-ज्योति नाम दिया गया है। इस स्थिति का चित्रण कमल पुष्प के दीपक में जलने वाली प्रकाश-ज्योति के रूप में किया गया है। इस ब्राह्मी स्थिति की प्रतीक प्रतिमा अखण्ड-ज्योति के रूप में की गई है। निरन्तर जलने वाला घृत दीप इस ब्रह्मरंध्र का ब्रह्मलोक का प्रतीक प्रतिनिधि मानकर पूजा उपचार में प्रतिष्ठापित किया जाता है।

देव सम्प्रदायों ने इस केन्द्र का चित्रण अपने-अपने ढंग से किया है। विष्णु उपासकों को ब्रह्मलोक व्याख्या में विस्तृत क्षीर सागर-सहस्र फन वाले शेषनाग की शैया उस पर भगवान विष्णु का शयन का वर्णन है। क्षीर सागर मस्तिष्क गडडड में विद्यमान् मज्जा पदार्थ -ग्रेमैटर है। सहस्रार कमल सहस्रार चक्र है। उस पर अवस्थित ब्रह्म चेतना भगवान विष्णु है। साधारणतया यह सारा ब्रह्म चेतना भगवान विष्णु है। साधारणतया यह सारा क्षेत्र प्रसुप्त स्थिति में निष्क्रिय पड़ा रहता है। इसलिए विष्णु भगवान सोते हुए दर्शायें गये हैं। शिव भक्तों ने इसी ब्रह्मरंध्र को शिवलोक कहा है। मानसरोवर मध्य में कैलाश, उस पर समाधिस्थ शिव-गले में महासर्प यह चित्रण में प्रकारान्तर से विष्णु व्याख्या के समतुल्य ही है। ग्रेमैटर, मानसरोवर, सहस्रार-कैलाश प्रकाश ज्योति शिव। शिर पर चन्द्र-प्रकाश किरणें। गले में सर्प-शेषनाग शिव के मस्तिष्क के गंगा का उद्गम -ब्रह्मज्ञान का अवतरण । विष्णु के चरणों में से गंगा निकलती है शिव के मस्तक में से। दोनों ही स्थिति में उस केन्द्र को दिव्य ज्ञान का गोमुख कहा जा सकता है।

गुरु भक्तों ने सहस्रार कमल पर गुरु तत्त्व की स्थापना करके अपनी व्यान आवश्यकता के अनुरूप प्रतीक प्रतिष्ठा की है। शक्ति उपासक इसी सहस्रार कमल को अपनी-अपनी इष्ट देवियों के साथ जोड़ते हैं। लक्ष्मी कमलासन पर विराजमान् है। ब्रह्म जी की भाँति ही गायत्री भी कमलासन पर विराजती है। सरस्वती, दुर्गा आदि अन्य देवियों में से किसी के हाथ में ,किसी के गले में कमल पुष्प जोड़ने की चेष्टा की गई है।

सहस्रार चक्र कनपटियों की सीध में भ्रूमध्य भाग के पीछे मस्तिष्क के मध्य केन्द्र में माना गया है। तन्त्र ग्रन्थों में इसे ‘महाविवर’ की संज्ञा दी गई है। यही लययोग का ब्रह्मरंध्र है। निराकार उपासना में इसे दशम द्वार माना गया है। नौ द्वार तो इन्द्रिय छिद्र हैं ही। उन्हें दो नथुने, दो कान, दो आँखें , एक मुख , दो मल-मूत्र छिद्र इस प्रकार उनकी गणना सर्वविदित है। दसवाँ द्वार यह ब्रह्मरंध्र है, इसी झरोखे में होकर आत्मा और परमात्मा की मिलन झाँकी -प्रणय केलि एवं समर्पण पाणिग्रहण का सरस शृंगारिक वर्णन मिलता है। योगी लोग इसी केन्द्र में प्राण को अवस्थित करके ब्रह्माण्ड का विचरण एवं नियन्त्रण करने जैसी सफलताएँ प्राप्त करते हैं। शरीर त्याग के समय प्राण इस दशम द्वार से निकलें तो प्राणी की पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त हुआ समझा जाता है।

सहस्रार की स्थिति का वर्णन अनेक ग्रंथों में हुआ है। उनका स्वरूप और विवरण प्रायः एक दूसरे से मिलता-जुलता ही है। उल्लेख इस प्रकार मिलते हैं -

स्व मूर्धनि सहस्रार पंकजा सीन मव्ययम्। शुद्ध स्फटिक संकाशं शरच्चन्द्र निभाननम्-शक्ति बीज

अपनी मूर्धा में सहस्रार कमल के मध्य शुद्ध स्फटिक वत् शरतचन्द्र जैसे प्रकाश का ध्यान करना चाहिए।

ब्रह्मजयोतिर्वसुधा मा ब्रह्मास्थानीय उच्यते। ततो यः पावको नाम्ना यः सडिडडयोग उच्यते-मत्स्य पुराण

ब्रह्म -ज्योति अग्नि ब्रह्मरंध्र स्थान में निवास करती है। यह साधकों को पवित्र करने वाली हैं । यही योगाग्नि है।

सहस्र दल पंकजा सकल शीतरस्मि प्रभा। वराभय कराम्बुजा वितुल गन्ध पुश्पामबराम्-विश्वामित्र कल्प

गायत्री महाशक्ति का चित्रण सहस्र दल-कमल पर विराजमान् हाथ में कमल, गले में कमलमाला धारण किये हुए रूप का ध्यान करने का विश्वामित्र कल्प में निर्देश है।

सहस्र दल मध्यस्थ मन्तरात्मान मुत्तपम्। तस्योपरि नादविन्दोर्मध्ये सिहासनो ज्वलम्। तास्मिन् निज गुरुं नित्य शुद्ध बुद्ध अवस्थितम्। -कंकाल भगवती तन्त्र

सहस्र दल-कमल में स्थिति अन्तरात्मा के ऊपर नाद विद के बीच में नित्य शुद्ध-शुद्ध सद्गुरु (शिव) अवस्थित है।

शिरः पद्ये महादेव स्तथैव परमोगुरुः । तत्समो नास्ति देवेशि पूज्यो हि भुवनत्रये । -निर्वाण तन्त्र

शिर पद्य (सहस्रार कमल) में परम गुरु महान् देव अवस्थित है। उसके समान तीनों लोकों में और कोई पूज्य नहीं।

शिरःपद्ये शुक्लं दश शत दले केसर गते। ततः त्रीण कल्पे परम शिव रुपं निभगुरुम्-निर्वाण तन्त्र

सहस्र दल शिर पद्य के बीच शिव रूप परम गुरु का निवास है।

अत ऊर्ध्व दिव्य रुपं सहस्रारं सरोरुहम्। ब्रह्माण्डारव्यस्य देहस्य बाह्ये तिश्ठति मुक्तिदम्। कैलाशो नाम तस्यैव महेशो यत्र तिश्ठति-शिव संहिता

(तालु के) ऊपरी भाग रूपी सरोवर में दिव्य स्वरूप वाला सहस्रार है, यह इस ब्रह्माण्ड रूपी देह के बाहर विद्यमान् रहता है। इसी सहस्रार स्थान का नाम कैलाश है। महेश यहीं निवास करते हैं

शिरः कपाल विवरे ध्यायेद् दुग्ध महोदधिम्ः। तत्र स्थित्वा सहस्रारे पद्ये चन्द्र विचित्त येत्-शिव संहिता

शिर के कपाल विवर में क्षीर सागर भरा हुआ है। उस पर सहस्रार कमल चन्द्रमा की तरह प्रकाशवान होने का ध्यान करें।

श्रुति में इस परम पुरुष को ‘सहस्र शीर्शा पुरुष' कहा गया है। उसे ‘सहस्र आँख, पाँव, भुजा वाला बताया गया है। परब्रह्म को सहस्र संख्या के साथ सम्बन्धित किया है। यह सहस्रार चक्र की ओर ही अंगुल निर्देश है-

र्येन देवाः पवित्रेण आत्मानं पुनते सदा। तेन सहस्रं धारेण पावमान्यः पुनन्तु मा॥

प्राण-शक्ति की जिस पवित्रता से देवगण अपनी आत्मा को सदा पवित्र करते रहते हैं, वही पावमान प्राण हजार धाराओं से मुझे शुद्ध करे।

अग्ने सहस्राक्ष शतमूर्धज्छतं ते प्राणः सहस्रं व्याना। त्वं साहस्रस्य राय ईशिशे तस्मैं ते विधेम-वाजाय स्वाहा-वा-य॰ 17।7

हे सहस्र नेत्र वाले अग्ने ! तेरे सैकड़ा प्राण, सैकड़ों उदान और सहस्र व्यान हैं। सहस्रों धनों पर तेरा प्रभुत्व है। इसलिए शक्ति के लिए हम तेरी प्रशंसा करते हैं।

पुरुशो वै सहस्रस्य प्रतिमा-शत 7।5।2।17

यह पुरुष सहस्र (चक्र) की प्रतिमा है। सहस्रार साधना का प्रतिफल उस आत्म-ज्ञान की-ब्रह्मबोध की उपलब्धि बताया है जिसे प्राप्त करने के उपरान्त समस्त साँसारिक क्लेशों से छुटकारा मिलता है और अंतःक्षेत्र के भव-बन्धनों से मुक्ति मिलती है। मोक्ष की प्राप्ति, ब्रह्म प्राप्ति, दिव्य समाधि, जीवन-मुक्ति जैसी परम सिद्धि इस सहस्रार महाकेन्द्र से ही उपलब्ध होती है । यथा -

स्थाने परं हंस निवास भूते कैलाशनाम्नी ह निविश्टचेताः । योगी हृतव्याधिरधः कृताधिर्वायुश्चिरं जीवति मृत्युमुक्तः ॥ -शिव सं0 5।189

अर्थ- इस कैलाश नामक स्थान में परमहंस का निवास है जो साधक सहस्र दल कमल में मन को स्थिर करता है, उसकी सकल व्याधि नाश हो जाती है और मृत्यु से छूट कर अमर हो जाता है।

आनन्दमय कोश का तात्पर्य है -आनन्द का भण्डार ।

सहस्रार कमल उसका केन्द्र संस्थान है। इसे अमृत कलश भी कहते हैं। यह जागृत स्थिति में हो तो उससे अपने को आनन्दित रखने वाला और दूसरों में पुलकन उत्पन्न करने वाला प्रवाह निसृत होता रहेगा। यह ज्ञानमय है। आत्म-बोध एवं तत्त्वबोध की ज्ञान धारा जीवन के हर क्षेत्र का सिंचन करती और उसे हरितमा, शोभा , सुषमा युक्त बनाती हैं । इस आनन्द को आत्म-विस्तार को सरसता के रूप में अनुभव किया जाता है। परमेश्वर की विवेचना ‘रसो वै सः के रूप में की गई है। यह ‘रस’ इन्द्रिय उत्तेजना से मिलने वाले उन्माद जैसा नहीं, वरन् ‘प्रेम’ जैसा सौम्य एवं सात्विक है। इसे भक्ति-रस भी कहा जा सकता है। व्यवहार में इसे आत्म-भाव का विस्तार कह सकते हैं। दया, करुणा, ममता, उदारता, सेवा आदि सुकुमार सम्वेदनाएँ इसी आत्म-विस्तार वृत्ति के सहारे उठती, उमंगती और पनपती है। इस सरसता को अध्यात्म शास्त्रों से सोम-रस के नाम से पुकारा गया है। देवताओं को अमृत पान यही है। इसका रसा -स्वादन ब्रह्मानन्द कहलाता है। इसी विशेषता के कारण परमात्मा को ‘सच्चिदानन्द’ कहा जाता है।

सहस्रार कमल में परिपूर्ण अमृत कलश से उपलब्ध होने वाले सुधारस, सोमरस की चर्चा इस प्रकार मिलती है-

तन्निर्गतामृतरसै रभिशिच्य गात्र-मार्गेण तेन विलयं पुनरण्यं वाप्ता । येशा हृदि स्फुरति जातु न ते भवेयु-र्म्मातर्महेश्वर कुटुम्बिनि गर्भभाजः-तन्त्र सार

हे माता ! तुम सहस्र दल कमल से निकलते हुए सुधारस से देह को अभिषिक्त करती हुई सुशुम्ना के मार्ग में जाकर लीन हो जाती हो। जिस मनुष्य के हृदय पद्य में तुम्हारा उदय नहीं होता, वह मनुष्य बारम्बार गर्भ धारण का दुःख उठाता है

व्योम पंकजानिश्यन्द सुधापानरतो भवेत्। मद्यपानमिदः प्रोक्तमितरे मद्यपायिनः॥

ब्रह्मरंध्र में स्थित सहस्रार कमल से जो रस टपकता है वही मद्य-पान है । नया पीने वाले तो शराबी मात्र हैं

“नूनव्य से नवीय से सूक्तायं साधया पथः। प्रत्नवद्रोचया रुचः । पवमान महिश्रवो गामश्वं रासि वीरवत्। सना मेधा सना स्वः॥ ऋ॰ 9।9।8-9

यह सोम जिसके अन्तःकरण में प्रतिष्ठित होता है उसे आत्म-विकास और सुख समुन्नति की अलौकिक प्रेरणाएँ अन्तःकरण से स्वतः प्रस्फुटित होती है।

पुमन् सोम नः तमासि योध्या। तानि पुनान जंघनः॥ -ऋ॰ 9।9।7

यह सोम पाप और अन्धकार से लड़ने की प्रेरणा देते हैं और अपने साधक को वीर बनाते हैं।

सेमेन पूर्ण कलशं विभर्शि। -अथर्व

सोम से भरा शीर्श कलश इसी शरीर में है।

दिवः पीयूशमुत्तमं सोमं। -अथर्व

यह सोम द्युलोक में रहता है

प्रत आश्विनीः पवमान धीजुबो दिव्या। असृग्रन् पयसा धरीमणि। प्रान्तऋशयः। स्थावरी रसृक्षत येत्वा मृजन्त्य शिशाण वेधसः-ऋग्वेद

हे सोम तेरी दिव्य धाराएँ मस्तिष्क में दिव्य रस को प्रवाहित करती है। ऋषित्व को प्रदान करती है। जो उसे अपने में धारण कर लेता है वह निरन्तर भाव प्रवाहों से भरा रहता है।

शिर एवास्य हविर्धान वैश्णवं देवतयाथ यदस्मिन् सोमो भवति हर्विर्व देवानाँ सोमस्तस्माद्धविर्धानं नाम-शतपथ

यह मस्तिष्क ही देवलोक है। जहाँ इन्द्रिय संचालक केन्द्रों के रूप में देवता विराजते हैं। यहीं सोम को हवि दी जाती है। यहीं देवता सोमपान करते हैं।

स्पष्ट है कि यह सारे संकेत सहस्रार चक्र स्थित अमृत कलश की ओर ही है। वहाँ से निकलने वाली ज्ञान गंगा जीवात्मा को पवित्र और परितृप्त करती है। आत्मिक आनन्द इसी स्थिति में मिलता है। आनन्दमय कोश की सार्थकता इसी अमृत की अधिकाधिक मात्रा में वर्षा कर सकने में है।

सहस्रार चक्र की साधना के लिए दो मार्ग है-एक ब्रह्मरंध्र में प्रकाश-ज्योति का ध्यान, दूसरा खेचरी मुद्रा द्वारा तालु दंश से जिह्वा मूल को लगाकर इस अमृत रस का पान करना । खेचरी मुद्रा के स्वरूप, सन्दर्भ एवं प्रतिफल के सम्बन्ध में मिलने वाले उल्लेखों में से कुछ इस प्रकार है-

कपालकुहरे जिह्ना प्रविश्टा विपरीतगा। भ्र वोरर्न्तगता दृश्टिर्मुद्रा भवति खेचरी॥

न रोगो मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृशा। न च मूर्छा भवेत्तस्य यो मुद्रा वेत्ति खेचरीम्॥

पीड्यते न च रागेण लिप्यते न स कर्मभिः। बध्यते न च केनापि यो मुद्रा वेत्ति खेचरीम्-योग चूड़ामण्युपनिशद्

जिह्वा को उलट कर कपालकुहर में प्रविष्ट कराने तथा भूमध्य में दृष्टि स्थिर रखने से खेचरी मुद्रा सिद्ध होती है। जो खेचरी मुद्रा जानता है, वह रोग , मृत्यु , निद्रा, भूख-प्यास व मूर्च्छना से मुक्त रहता है। उसे रोग पीड़ा नहीं पहुँचा पाते, कर्म लिप्त नहीं कर पाते और कोई भी विवश नहीं कर पाता।

यत्प्रालेयं प्रहितसुशिरं मेरुमूर्धान्तरस्यं। तस्मिन्तत्वं प्रवदति सुधीस्तन्मुखं निम्गाम्॥

चंद्रात्सारः स्रवति वपुशस्तेन मृत्युर्नराणा। तद्वध्नीयात्सुकरणमथो नान्यथा कार्य सिद्धिः॥

मेरु पर्वत जैसी सुशुम्ना नाड़ी के ऊर्ध्व भाग में चन्द्रामृत स्थित है। उसी में आत्म तत्व का निवास है। तालु में छिद्राकाश में जो गंगा-यमुना सरस्वती, इडा, पिंगला, सुशुम्ना आदि नदियों का मुख है। यही चन्द्रसार टपकता है। इसका खेचरी मुद्रा द्वारा जो पान करता है उसकी काया लावण्य युक्त वज्र जैसी बलवान हो जाती है। इस साधना के बिना कार्य सिद्धि कैसे हो ?

खेचरी योग तो योगी शिरश्चंद्रादुपागतम्। रसं दिव्यं पिशेन्नित्यं सर्व व्याधि विनाशनम्-योग रसायन

खेचरी-साधना में योगी शिरश्चन्द्र से झरने वाले उस दिव्य रस को पीता है जो सब व्याधियों का नाश करने वाला है।

चित्तं चलति नो यस्माज्जिह्ना चरित खेचरी। तेनेयं खेचरी सिद्धा सर्वसिद्धै नर्मस्कृता-गोरक्ष सहिता 1।65

जिस योगी का चित्त चंचल नहीं होता और जिसकी जिह्वा खेचरी में रमण करती है, उनके लिए यह सभी सिद्धों द्वारा नमस्कार की हुई खेचरी मुद्रा सिद्ध हो जाती है।

पीड्यते न च शोकेन न च लिप्यते कर्मणा। बाध्यते न स केनापि यो मुद्रा वेत्ति खेचरीम्-गोरक्ष संहिता

जो खेचरी मुद्रा को सिद्ध कर लेता है, उसे भव-बन्धन में नहीं पड़ना होता। न तो उसे शोक होता है और न वह कर्म में ही लिप्त होता है।

अपवित्रो पवित्रो वा सर्वावस्था गतोऽपि वा। खेचरी यस्य सिद्धा तु स शुद्धो नात्र संशयः ॥ -शिव संहिता

जिसे खेचरी मुद्रा सिद्ध है वह अपवित्र या पवित्र कैसी भी परिस्थिति में स्वयं शुद्ध, स्वस्थ प्रफुल्ल ही रहता है।

खेचरी मुद्रिकाभ्यासादनदः स्याहिनेदिनंः । सर्व संकल्प सत्यागायज्जगद्विस्मरणं भवेत्-योग रसायनम्

खेचरी मुद्रा के अभ्यास से दिन-प्रतिदिन आनन्द बढ़ता है, विश्व प्रपंच का मोहपूर्ण स्मरण फिर नहीं होता तथा उससे सम्बद्ध सभी संकल्प भी छूट जाते हैं।

मृत्यु व्याधि जराग्रस्तो दृश्ट्वा विद्यामिमा मुने। बुद्धि दृढ़तरा कृत्वा खेचरीं तु समभ्यसेत्-कुण्डल्युपनिशद्

मनुष्य को मृत्यु, व्याधि और बुढ़ापे से ग्रस्त देखकर मननशील साधक को सुदृढ़ बुद्धि से इस खेचरी विद्या का अभ्यास करना चाहिए।

सिद्धीना जननी ह्येशा मम प्राणाधिकप्रिया। निरन्तर कृताभ्यासात् पीयूशं प्रत्यहं पिवेत्-शिव संहिता

यह खेचरी मुद्रा मुझ शिव को प्राण प्रिय है। यह सिद्धियों की जननी है। इसका निरन्तर अभ्यास करने वाला अमृत पान का लाभ प्राप्त करता है।


Quotation

मिलर कहते थे संसार जिन्हें दुश्चरित्र कहता रहा समीप जाकर मैंने देखा उनमें भी कितनी ही अच्छाइयाँ थीं। लोग इन्हें सच्चरित्र कहते रहे उनके पास से परख कर मैंने पाया उनमें भी ढेरों कमजोरियाँ थीं। इसलिए मैंने लोगों को सच्चरित्र और दुश्चरित्र के रूप में वर्गीकरण करना बन्द कर दिया है और सोचता हूँ आदमी न देवता है न दैत्य। वह एक मध्यवर्ती सत्ता है जिसमें नेकी और बदी दोनों ही मौजूद हैं यह परिस्थितियों पर निर्भर है कि किसका क्या पक्ष उठा और किसका गिरा ? समय-समय पर उस उठाव और गिराव में भी परिवर्तन आते रहते हैं। इसलिए किसको क्या काना जाय यह कहते नहीं बनता ? तो भी एक कसौटी तो रखी है कि मूर्खों को पिछड़े लोगों के साथ कौन किस प्रकार व्यवहार करता है ? इसे देखकर उसके श्रेष्ठ और निकृष्ट होने का किसी हद तक पता लगाया जा सकता है।


कुण्डलिनी महाशक्ति का स्वरूप और रहस्य

योग साधनाओं के अन्तर्गत कुण्डलिनी जागरण की फल श्रुतियों के सम्बन्ध में -समस्त संसार में लगभग एक जैसी ही मान्यताएँ प्रचलित है। इस साधना की सफलता से साधक में अनेकों दिव्य क्षमताएँ विकसित होने काक विश्वास किया जाता है। समझा जाता है कि ऐसा व्यक्ति सामान्य स्थिति से ऊँचा उठकर विशिष्ट सिद्ध पुरुषों की स्थिति में जा पहुँचता है। शरीरबल और मनोबल से भी ऊँची शक्ति आत्मबल की है। इसके आधार पर स्व पर कल्याण की अति महत्वपूर्ण दिव्य उपलब्धियाँ करतलगत होती है। इस विशेषता से दैवी शक्तियाँ आकर्षित होती है और साधक की पात्रता के अनुरूप अपनी अनुकम्पा बरसती है। आत्मतेज सम्पन्न मनुष्य का व्यक्तित्व ऐसा होता है जिससे दूसरों की मनःस्थिति को प्रभावित और परिस्थिति में भी परिवर्तन कर सकना सम्भव हो सकता है।

कुण्डलिनी जागरण के महत्त्व की योगशास्त्रों में जितनी चर्चा हुई है उतनी और किसी साधना के सम्बन्ध में सार्वभौम स्तर पर नहीं मिलती। उसके विधानों और विवरणों में तो थोड़ा बहुत अन्तर है, पर यह मान्यता सर्वविदित है किन्तु आन्तरिक आत्मिक शक्तियों को प्रसुप्ति से जागृति में बदलने -जागृत को प्रचण्ड बनाने में कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया से असाधारण सहायता मिलती है।

कुण्डलिनी साधक की जागृत होती है, पर यह नहीं कहा जाता कि वह साधक की अपनी उपार्जित पूँजी है। यह एक प्रचण्ड विश्व-व्यापी शक्ति है जिसे उपयुक्त सत्पात्र अपनी साधना प्रक्रिया द्वारा आकर्षित करके अपनी आत्मिक सम्पदा सशक्तता बढ़ाते हैं । इस उपार्जित सम्पदा के आधा पर साँसारिक वैभव और आत्मिक वर्चस्व का दुहरा लाभ मिलता है।

कुण्डलिनी क्या है ? इसके सम्बन्ध में शास्त्रों और तत्त्वदर्शियों ने अपने-अपने अनुभव के आधार पर कई अभिमत व्यक्त किये हैं। ज्ञानार्णव तन्त्र में कुण्डलिनी को विश्व जननी और सृष्टि संचालिनी शक्ति कहा गया है -”शक्ति कुण्डलिनी विश्व जननी व्यापार बद्धोद्यता।” विश्व व्यापार एक घुमावदार उपक्रम के साथ चलता है। परमाणु से लेकर ग्रह-नक्षत्रों और आकाश गंगाओं तक की गति परिभ्रमण परक है। हमारे विचार और शब्द जिस स्थान से उद्भूत होते हैं-व्यापक परिभ्रमण करके वे अपने उद्गम केन्द्र पर लौट आते हैं। यही गति चक्र भगवान के चार आयुधों में से एक है। महाकाल की परिवर्तन प्रक्रिया इसी को कहा जा सकता है। जीव को चक्रारूढ़ मृतिका पिण्ड की तरह यही घुमाती है और कुम्हार जैसे अपनी मिट्टी से तरह-तरह के पात्र उपकरण बनाता है, उसी प्रकार आत्मा की स्थिति को उठाने, गिराने की भूमिका भी वही निभाती हैं। कुण्डलिनी सृष्टि सन्दर्भ में समष्टि और जीव सन्दर्भ में -व्यष्टि में शक्ति संचार करती है।

अध्यात्म ग्रन्थों में -विशेषता उपनिषदों में कुण्डलिनी शक्ति की चर्चा हुई है। पर उतने को ही पूर्ण पक्ष नहीं मान लेना चाहिए। उतने से आगे एवं अधिक भी बहुत कुछ कहने, जानने और खोजने योग्य शेष रह जाता है। इन अपूर्ण घटकों को मिलाकर हमें वस्तु स्थिति समझने-अधिक जानने के लिए अपना मस्तिष्क खुला रखना चाहिए।

कठोपनिषद् के यम नचिकेता संवाद में जिस पंचाग्नि विद्या की चर्चा हुई है । उसे कुण्डलिनी शक्ति की पंच विधि विवेचना कहा जा सकता है। श्वेताश्रवर उपनिषद् में उसे ‘योगाग्नि’ कहा गया है-

न तस्य रोगो न जरा न मृत्युः प्राप्तस्य योगाग्नि मयं शरीरम्।

दैनिक योग प्रदीपिका में उसे ‘स्पिरिट फायर’ नाम दिया गया है। जानबुडतरफ सरीखे तन्त्रान्वेशी उसे ‘सर्पवत् वलयान्विता सर्पेन्ट पावर’ नाम देते रहे हैं।

ऋषि शिष्या मैडम व्लैवेटस्की ने उसे विश्व-व्यापी विद्युत शक्ति -’कास्मिक इलेक्ट्रिसिटी’ नाम दिया है। वे उसकी विवेचना विश्व विद्युत के समतुल्य चेतनात्मक प्रचण्ड प्रवाह के रूप में करती थीं। उन्होंने वायस आफ दि साइलेन्स’ ग्रन्थ में अपना अभिप्राय इस प्रकार व्यक्त किया है- सर्पवत् या वलायान्विता गति अपनाने के कारण इस दिव्य शक्ति को कुण्डलिनी कहते हैं। इस सामान्य गति को योग साधक अपने शरीर में चक्राकार बना लेता है। इस अभ्यास से उसकी वैयक्तिक शक्ति बढ़ती है। कुण्डलिनी विद्युतीय अग्नियुक्त गुप्त शक्ति है। यह वह प्राकृत शक्ति है जो सेन्द्रिय एवं निरीन्द्रिय प्राणियों एवं पदार्थों के मूल में विद्यमान् है।

ब्रह्माण्ड में दो प्रकार की शक्तियाँ कार्य करती हैं- एक लौकिक सेकुलर, दूसरी आध्यात्मिक स्प्रिचुअल। इन्हें फिजीकल और मैटाफिजीकल भी कहते हैं। लोग प्रत्यक्ष शक्तियों का प्रमाण प्रत्यक्ष उपकरणों से प्राप्त कर लेते हैं, अस्तु उन्हीं की सत्ता स्वीकार करते हैं। जो उपकरणों की पकड़ में नहीं आती उनकी सत्ता अस्वीकार करना अतिवाद है। सृष्टि के आरम्भ में मनुष्य से -प्रकृति से बहुत ही स्वल्प काम चलाऊ परिचय था। वन्य पशु जितने ज्ञान और जितने साधनों से शरीर यात्रा चलाते हैं प्रायः उतना ही मनुष्य को भी उपलब्ध था। प्रकृति के रहस्यों का परिचय और उस जानकारी का लाभदायक उपयोग क्रमशः ही सम्भव हुआ है। अग्नि को प्रकट करना और उसका उपयोग जानना, मनुष्य की उससे भी बड़ी उपलब्धि है जो आज बिजली जैसी शक्तियों के सहारे सम्भव हुई है। ज्ञान और विज्ञान का क्षेत्र क्रमशः ही बढ़ा है। आदिम मनुष्य अपनी उन दिनों की जानकारियों को ही समग्र मानता और कहता कि जो कुछ उसने जान पाया है उसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। उसका वह दुराग्रह आज की स्थिति में उपहासास्पद ही माना जाता है। ठीक इसी प्रकार प्रत्यक्ष भर को अन्तिम मान लेने से शोध और प्रगति का मार्ग ही बन्द हो जाएगा। दुराग्रह के कारण ही सब कुछ भौतिक ही है मानकर चेतना की सत्ता को भी भौतिक स्फुरण मात्र कहने लगते हैं । विकास पर आगे बढ़ते हुए अब यह अनुभव किया जा रहा है कि चेतना की स्वतन्त्र सत्ता है और उसकी क्षमता एवं सम्भावना भौतिक पदार्थों और सामर्थ्यों से न्यून नहीं, अधिक ही है।

पिछले दिनों कुण्डलिनी दिव्य शक्ति की सत्ता तो स्वीकार की गई, पर वैज्ञानिक क्षेत्रों में उसे किन्हीं शारीरिक क्षमताओं का एक रूप देने का प्रयत्न किया है शरीर विज्ञानियों ने उसे नाड़ी संस्थान से उद्भूत -नर्वस् फोर्स कहा हैं। डा0 रेले ने अपने बहुचर्चित ग्रंथ ‘मिस्ट्रीरियस कुण्डलिनी’ में उसकी बेगस नर्व’ के रूप में व्याख्या की है। माँस-पेशियों और नाड़ी संस्थान के संचालन में काम आनी सामर्थ्य को ही अध्यात्म प्रयोजनों में काम करने पर कुण्डलिनी संरक्षक बनने का वे प्रतिपादन करते हैं उनके मतानुसार यह शक्ति जब नियंत्रण में आ जाती है तो उसके सहारे शरीर की ऐच्छिक और अनैच्छिक गतिविधियों पर इच्छानुसार नियन्त्रण प्राप्त किया जा सकता है। यह आत्म-नियन्त्रण बहुत बड़ी बात है। इसे प्रकारान्तर से व्यक्तित्व के अभीष्ट निर्माण की तदनुसार भाग्य निर्माण की सामर्थ्य कह सकते हैं। वे इसी रूप में कुण्डलिनी का गुण-गान करते और उसकी उपयोगिता बताते हुए उसके जागरण का परामर्श देते हैं।

डाक्टर रेले की उपरोक्त पुस्तक ‘रहस्मयी कुण्डलिनी की भूमिका तन्त्र मर्मज्ञ सर जानबुडरफ ने लिखी है। जिसमें उन्होंने रेले के इस अभिमत से असहमति प्रकट की है कि वह शरीर संस्थान की विद्युत धारा मात्र है। उन्होंने लिखा है- “वह एक चेतन और महान् सामर्थ्यवान शक्ति -’ग्रान्ड पोटेन्शियल’ है जिसकी तुलना अन्य किसी पदार्थ या प्रवाह से नहीं की सकती । मेरी राय में नाड़ी शक्ति कुण्डलिनी का एक स्थूल रूप ही है, वह मूलतः नाड़ी संस्थान या उसका उत्पादन नहीं है। वह न कोई भौतिक पदार्थ है और न मानसिक शक्ति । वह स्वयं ही इन दोनों प्रवाहों को उत्पन्न करती है। स्थिर सत्य स्टेटिक-रियल गतिशील सत्य (फैनामिक रियल) एवं अवशे शक्ति (रैजीहुअल पावर) के समन्वित प्रवाह की तरह इस सृष्टि में काम करती है। व्यक्ति की चेतना में वह प्रसुप्त पड़ी रहती है। इसे प्रयत्नपूर्वक जगाने वाला विशिष्ट सामर्थ्यवान बन सकता है।”

विज्ञान की भाषा में कुण्डलिनी को जीवन शक्ति अथवा चुम्बकीय विद्युत कहते हैं। इसका केन्द्र मस्तिष्क माना गया है तो भी यह रहस्य अभी स्पष्ट नहीं हुआ कि मस्तिष्क को अपनी गतिविधियों के संचालन की क्षमता कहाँ से मिलती है। योगशास्त्र इसका उत्तर उस काम शक्ति की ओर संकेत करते हुए देता है और बताता है कि अव्यक्त मानवी सत्ता को व्यक्त होने का अवसर इसी केन्द्र से मिलता है। वही कामतन्त्र के विभिन्न क्रिया-कलापों के लिए आवश्यक प्रेरणा भी देती है। यह वही चुम्बकीय ‘क्रिस्टल’ है जो काया के ‘ट्रांजिस्टर’ को चलाने वाले आधार खड़े करता है। काम-शक्ति के प्रकटीकरण का अवसर जननेन्द्रिय के माध्यम से मिलता है, अस्तु उस स्थान पर अवस्थित मूलाधार चक्र को कुण्डलिनी केन्द्र एवं संक्षेप में ‘कुण्ड’ कहते हैं।

हठयोग में व्याख्याकारों ने वस्ति क्षेत्र के गह्वर में अण्डे की आकृति वाले ‘कन्द’ के साथ उसका सम्बन्ध जोड़ा है। कइयों ने उसे माँस-पेशी कुछ ने जननेन्द्रिय और कुछ ने उसे पौरुष ग्रन्थियों के साथ जोड़ने का प्रयत्न किया है। रीढ़ की हड्डी के निचले तिकोने भाग को ढकने वाले आवरण को भी किसी-किसी ने कुण्डलिनी का स्थान एवं उद्गम कहा है। एक व्याख्याकार ने ‘गैग्लियन इम्पार’ को कुण्डलिनी का स्थान माना है। ऐसी ही भ्रान्तियों के कारण कतिपय शारीरिक व्यायाम , आसन, बन्ध, मुद्रा आदि को कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया के साथ जोड़ा गया है। नाड़ी संस्थान के उत्तेजित होने पर शक्ति उत्पन्न होती है वह सामयिक एवं क्षणिक ही अपने प्रभाव का परिचय दे सकती है। किन्तु कुण्डलिनी चिरस्थायी है। ऐसी दशा में उसे स्नायविक या नाड़ी शक्ति की संज्ञा देना उपयुक्त नहीं हो सकता।

कुण्डलिनी चेतनात्मक शक्ति है। उसे जीवनी शक्ति के -जिजीविषा के रूप में, शरीर में, अन्तःकरण चतुष्टय के रूप में सामान्य काम करने में संलग्न देखा जा सकता है। उससे आगे के स्तर प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहते हैं । यह विद्युत शक्ति तो हैं, पर जनरेटर, डायनेमो, बैटरी, चुम्बक आदि के सहारे काम करने वाली भौतिक बिजली से उसकी कोई तुलना नहीं हो सकती । जिसके कारण आत्म-स्वरूप के सम्बन्ध में आस्था-आकांक्षाओं का केन्द्र लोक -व्यवहार का दृष्टिकोण काया-कल्प की तरह बदल जाता हो उसे भौतिक सामर्थ्य नहीं कह सकते। आत्मा और परमात्मा के एकीकरण-आनन्द उल्लास के अभिवर्धन एवं चमत्कारी दिव्य क्षमताओं के उत्पादन में जिसकी असाधारण भूमिका प्रस्तुत होती है वह कुण्डलिनी भौतिकी नहीं, आत्मिकी ही मानी जाएगी।

कुण्डलिनी महाशक्ति की चर्चा विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार से हुई है। इनमें लगती तो भिन्नता है, पर वस्तुतः उसे परस्पर पूरक ही समझा जाना चाहिए। ईश्वर का भी समस्त वर्णन नहीं हो सका, उसके असंख्य पक्षों में से आत्म-प्रगति के लिए उपयोगी अंशों की ही चर्चा ब्रह्म विद्या के अन्तर्गत की जाती है। उसे समग्र नहीं माना जा सकता। ईश्वर के उसी पक्ष भी तो है। पदार्थ विज्ञानी अपने ढंग से ईश्वर के उसी पक्ष का अनुसंधान करते हैं। प्रत्येक प्राणी और पदार्थ पर जो चेतन तत्त्व की प्रतिक्रिया होती है उसका वर्णन किया जाने लगे तो असंख्यों अनुसन्धान करते हैं। प्रत्येक प्राणी और पदार्थ पर जो चेतन तत्त्व की प्रतिक्रिया होती है उसका वर्णन किया जाने लगे तो असंख्यों अनुसन्धान शास्त्र विनिर्मित करने पड़ेंगे। ईश्वर की भाँति ही जीवसत्ता और प्रकृति सत्ता का सूक्ष्म-अतिसूक्ष्म स्थूल-अतिस्थूल विस्तार-विवेचन हो सकता है। अणोरणीयान् महतो महीयान् की उक्ति सर्वथा सत्य है। जो हम जानते हैं वह किसी भी प्राणी, पदार्थ या परिस्थिति के सम्बन्ध में एक अत्यन्त तुच्छ भाग है। हमारा अविशात अज्ञान ज्ञान-विज्ञान से कहीं अधिक बड़ा है। हम ज्ञानोपार्जन की दिशा में क्रमशः बढ़ रहे हैं।

प्रो० हडसन का कथन है कि आमतौर से जीवन शक्ति का प्रयोग, मात्र शरीर साधना में ही होता रहता है, पर यदि उसके प्रसुप्त पक्ष को जागृत किया जा सके और उस जागरण को महत्त्वपूर्ण आत्मिक उद्देश्यों में लगाया जा सके तो चेतना क्षेत्र की चमत्कारी शक्तियाँ हस्तगत हो सकती है।

कुण्डलिनी को ‘सार्वभौमिक, जीव तत्त्व भी कहते हैं। इसके भीतर आकर्षण (अट्रेक्शन) और विकर्षण (रिपल्शन) की दोनों ही धाराएँ विद्यमान् हैं। भौतिक विज्ञान की दृष्टि से उन प्रवाहों को जैवीय विद्युत एवं चुम्बकत्व वायो ‘इलेक्ट्रिसिटी एण्ड मैगनेटिज्म’ कह सकते हैं। दार्शनिक हर्वर्ट स्पेन्सर के अनुसार इसे जीवन सार-ऐसेन्स आफ लाइफ’ कहा जा सकता है। बाइबिल के अनुसार यही तत्त्व महान् सर्प है।

अध्यात्म शास्त्र इसे ब्रह्माग्नि कहते हैं और उसका केन्द्र संस्थान ब्रह्मरंध्र को मानते हैं। वहाँ से वह मूलाधार की ओर दौड़ती और वापिस आती है। सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्माजी को अपने आसन से नीचे की जल राशि तक कमल नाल के सहारे असंख्य बार चढ़ना-उतरना पड़ा तब यह सृष्टि बनी। इस गाथा में सहस्रार शक्ति को मूलाधार तक आते-जाते रहने का संकेत समझा जा सकता है।

आर्थर एवलन ने भी कुण्डलिनी को संगृहीत शक्ति बताया है। उनका कथन है कि - “जो महत् ब्रह्म सत्ता (ग्रेट कास्मिक पावर्स) ब्रह्माण्ड का सृजन एवं धारण करती है उसकी व्यक्ति देह में अवस्थित प्रतिनिधि सत्ता का नाम कुण्डलिनी शक्ति है।

स्वामी विवेकानन्द ने अपनी पुस्तक राजयोग में लिखा है - “वह केन्द्र जहाँ समस्त अवशिष्ट सम्वेदनाएँ (रेजिडुअल सेन्सेशन्स) संचित संगृहीत है, मूलाधार चक्र कहलाता है। वहाँ पर कुण्डलित क्रिया शक्ति (क्वाइल्ड अप एनर्जी आफ एक्शन्स) को कुण्डलिनी शक्ति कहा जाता है।

अवशिष्ट सम्वेदनाओं (रेजिडुअल सेन्सेशन्स) को सामान्य बची-खुची शक्ति नहीं समझनी चाहिए। वस्तुतः यह महाशक्ति के उद्भव का मूल कारण बीज है। यह क्या है तथा कैसे इसके द्वारा महाशक्ति का उद्भव हो सकता है ? इसके लिए विद्युत शक्ति उत्पादक यन्त्र (इलेक्ट्रिक जनरेटर) के सिद्धान्त से समझा जा सकता है।

जनरेटर में चुम्बकीय क्षेत्र में सुचालक धातु के तारों की कुण्डली (क्वाइल्स) घुमाने से उनमें विद्युत संवाहक शक्ति (ई०एम०एफ॰ अर्थात् इलैक्ट्रोमोटिव फोर्स) पैदा होती है। चुम्बकीय क्षेत्र बनाने के लिए अच्छे जनरेटरों में स्थाई चुम्बकों का प्रयोग नहीं किया जाता, उनमें विद्युत चुम्बकों का प्रयोग नहीं किया जाता, उनमें विद्युत चुम्बक (इलेक्ट्रो मैगनेट) प्रयुक्त होते हैं। चालू जनरेटर में उत्पादित विद्युत शक्ति का एक अंश इन विद्युत चुम्बकों को सशक्त बनाये रखने के लिए प्रयुक्त किया जाता रहता है। किन्तु जब जनरेटर बन्द होता है तो उससे कोई विद्युत प्रवाह प्राप्त नहीं किया जा सकता। समस्या उठती है कि विद्युत प्रवाह उपलब्ध न हो तो विद्युत चुम्बक कैसे कार्य करें ? और चुम्बकीय क्षेत्र के अभाव में विद्युत उत्पादन कैसे हो? इस समस्या का समाधान ‘रैजिडयल मैगनेटिज्म’ (अवशिष्ट चुम्बकत्व) से ही निकलता है। लोहे का गुण है कि उसके चारों ओर एक बार विद्युत प्रवाह पैदा किया जाय तो विद्युत प्रवाह की सबलता के अनुपात में उसके अन्दर चुम्बकत्व पैदा होता है। किन्तु यदि विद्युत प्रवाह रोक दिया जाय तो भी चुम्बकत्व एकदम समाप्त नहीं होता -थोड़ी मात्रा में बना ही रहता है। जब जनरेटर चालू किया जाता है तो यही काम मात्र का अवशिष्ट चुम्बकत्व थोड़ी-सी विद्युत शक्ति पैदा करता है। उसे बाहरी उपयोग की ओर न ले जाकर चुम्बकीय क्षेत्र बनाने वाली कुण्डलियों (क्वाइल्स) में ही प्रवाहित करते हैं। इससे चुम्बकीय क्षेत्र सबल होता चलता है तथा उसके प्रभाव से विद्युत शक्ति भी अधिक मात्रा में पैदा होने लगती है। यही क्रम थोड़े समय तक चलने से विद्युत को चुम्बक को विद्युत क्रमशः अधिकाधिक सशक्त बनाते हुए -जनरेटर को पूर्ण समर्थ उत्पादन की स्थिति में पहुँचा देते हैं

मूलाधार स्थित अवशिष्ट सम्वेदनाएँ जनरेटर के ‘रैजिडुल मैगनेटिज्म’ के समकक्ष कही जा सकती है तथा कुण्डलित क्रिया शक्ति- कुण्डलिनी शक्ति तार की कुण्डलियों क्वाइल्स में उत्पादित हो सकने वाली ई०एम॰ एफ॰ (विद्युत संवाहक शक्ति) के रूप में समझी जा सकती है। योग साधनाओं को जनरेटर चलाने की क्रिया विधि कहा जाना युक्ति संगत है। इनका सम्यक् प्रयोग मूलाधार क्षेत्र में सन्निहित शक्ति बीज को प्रचण्ड कुण्डलिनी ऊर्जा के रूप में विकसित कर सकता है।

प्राण शक्ति की व्याख्या कई रूपों में की जाती है। विभिन्न मनीषियों एवं संशोधकों द्वारा उसे (1) मानव विद्युदाकर्षण- ह्यूमन मैगनेटिज्म (2) जीव शक्ति-मेटाबोलिज्म (3) जीवन रस-प्रोटोप्लाज्म (4) जीवन रस एक्लोप्लाज्म (5) ब्रह्माण्डीय चेतना -कास्मिक एनर्जी आदि नाम दिये गये हैं। वस्तुतः यह सभी व्याख्याएँ प्राण शक्ति द्वारा उत्पन्न होने वाली प्रतिक्रियाओं की है- स्वयं प्राण की नहीं।

जीवन क्षार- एनिमो ऐसिड के परमाणुओं को एक सिरा ऋण विद्युत और दूसरा धन विद्युत के आवेशों से युक्त होता है। इनके द्वारा जो आकर्षण डडडड बनता है उससे नये विद्युत अणु निकलते हैं। उन्हीं के आधार पर मानव शरीर में पाई जाने वाली विद्युत शक्ति का संचार होता है । एनिमो ऐसिड की मूल प्रकृति में सन्निहित, रहस्यमयी क्षमता को वैज्ञानिक परिभाषा में ‘प्राण’ कहा गया है।

डा० हेनरी लिंडाल के अनुसार ब्रह्माण्ड में काम करने वाली अनेकों शक्तियों के मूल में प्राण शक्ति की प्रेरणा काम कर रही है। ईश्वर के परमाणुओं की अपेक्षा प्राण परमाणु कहीं अधिक सूक्ष्म है। विश्वव्यापी स्वाश्ट्रयुनिवर्मल ईथर की क्षमता को क्रियाशील करने का प्रयोजन प्राणशक्ति पूरा करती है।

डा० कार्रिगटन के ग्रन्थ ‘आधुनिक मनोविज्ञान और दृश्य’ में तथ्यों समेत यह बताया है कि मानवी चेतना का चिरस्थायी रूप ‘प्राण परमाणुओं से बना है और वह मरने के बाद भी बना रहता है। हेंग के डा० माल्ब की शोधों में इस प्राणमय शरीर को जानकारियों पर और भी अधिक प्रकाश पड़ता है।

सिलवान जे मुलडोन और हेरेबार्ड फैरिगटन द्वारा संयुक्त रूप से लिखित ‘दि प्रोजेक्शन आफ एस्ट्रल बाडी’ में प्राणमय शरीर और उसके स्वरूप एवं गतिविधियों का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वह भी पूर्ण सत्ता सम्पन्न हैं। “चाइनाज बुक आवदि डेय’ में उस देश की प्राचीन मान्यताओं एवं आधुनिक पर्यवेक्षकों का विवरण प्रस्तुत करते हुए बताया गया है कि स्थूल शरीर ही नहीं प्राणमय शरीर का भी आवरण जीवात्मा को उपलब्ध है। डा० मैकडुगल ने प्राणमय शरीर का भार और विस्तार नापने में भी एक सीमा तक सफलता प्राप्त की है। फ्रांसीसी विज्ञान वेत्ता डुराबेल ने अपने ग्रन्थ में ऐसे चित्र छापे हैं जिनमें प्राणमय शरीर की स्थिति का अच्छा खासा परिचय प्राप्त होता है। प्रो० मुलडोन द्वारा लिखित ग्रन्थ ‘प्रोजेक्शन आफ एस्ट्रल वाडी’ ग्रन्थ में प्राण सत्ता के अस्तित्व के विश्वस्त और अकाट्य प्रमाणों की भरमार है।

शरीर शास्त्र के अनुसार सुशुम्ना और इडा, पिंगला की संगति कुछ प्रत्यक्ष नाडियों के साथ बिठाने का प्रयत्न किया गया है। मेरुदण्ड की पोल में सुशुम्ना संचार है। सुशुम्ना के दोनों और स्नायु कोशों की जंजीरें ऊपर से नीचे तक फैली हुई है। दाहिनी ओर की जंजीर-राइट सिम्पैथिक कार्ड का पिंगला और बांये ओर की जंजीर लैफ्ट सिम्पैथिक कार्ड को इड़ा कहा गया है।

डा० राखाल दास राय की अपनी पुस्तक “रीजनल एक्स पोजिशन आफ भारतीय योग दर्शन’ में सुशुम्ना को उन्होंने -”स्पाइनल कार्ड’ बताया है। पिंगला को ‘राइट नर्बस् टर्मिनेल और इडा को लेफ्ट नर्वस टर्मिनेल नाम दिया है।

डा० व्रजेन्द्र नाथ सील ने अपनी पुस्तक ‘दि पॉजिटिव साँइसेज आब एनसियेन्ट हिन्दूज’ में प्राचीन और अर्वाचीन शरीर शास्त्र की विसंगतियों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि दोनों प्रतिपादन शैलियों में ही अन्तर है। तथ्य लगभग मिलते-जुलते ही हैं। उसमें उनने बताया है कि योग शास्त्र के चक्र यद्यपि अदृश्य क्षमताओं के प्रतीक हैं तो भी उनका आधार स्थान प्रत्यक्ष नाडी गुच्छकों को मानने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए। वियोसोकिस्ट पत्रिका में मेजर वी०डी० वस्तु का एक लेख प्रकाशित हुआ था। “एनाटोमी आव तंत्राज” उसमें उनने योग संस्थानों को शरीर में पाये जाने वाले प्रत्यक्ष अवयव ही सिद्ध किया है और कहा है उन्हें अदृश्य या सूक्ष्म मानने की आवश्यकता नहीं है। से अवयव सामान्यतया शरीर यात्रा पूरी करते हैं पर असामान्य रूप से विकसित कर लिये जाने पर वे असाधारण कार्य भी कर सकते हैं जैसे कि मस्तिष्क और नेत्रों की परिष्कृत शक्ति से कई प्रकार के आश्चर्यजनक कार्य सम्पन्न किये जाते रहते हैं महा-महोपाध्याय गणनाथ सेन ने अपने ग्रन्थ प्रत्यक्ष शरीरम् तथा शरीर परिवेश में योग शास्त्र में वर्णित संस्थानों को इसी शरीर में विद्यमान् बताया है।

सरजन बुडरफ ने तन्त्र ‘पादुका पंचक और “षट्चक्र निरूपण’ की व्याख्या विवेचना पर एक विशद ग्रन्थ सर्पेन्ट पावर’ लिखा है। इसमें चक्रों की उपस्थिति प्रस्तुत शरीर में प्रत्यक्ष ही बताई गई है। वुडरफ ने इस ग्रन्थ के आधार पर एम०पी० पंडित ने एक छोटी पुस्तक कुण्डलिनी योग ‘अंग्रेजी में लिखी थी। इसमें वे चक्रों की उपस्थिति प्रत्यक्ष मानते हैं। थियोसोफी के आदि संचालकों में सी डब्ल्यू लेडवीटर का भी नाम है। उनके ग्रन्थ ‘चक्राज’ में चक्रों के अस्तित्व को मानवी काया में ही दृश्यमान बताया है। सूक्ष्य तो वे उनकी प्रसुप्त शक्तियों भर को कहते हैं।

कुण्डलिनी शक्ति को प्रायः जीवन अग्निफायर आफ लाइफ के रूप में ही प्रतिपादित किया गया है। उसकी अभिवृद्धि जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार से परिलक्षित होती है। शरीर क्षेत्र में उसके समर्थ आरोग्य के रूप में -मन में सन्तुलित विवेकशीलता के रूप में उसे देखा जा सकता है। काय कलेवर में वह बलिष्ठता-निरोगिता-स्फूर्ति क्रियाशीलता, उत्साह, तत्परता के साथ दृष्टिगोचर होती है। मस्तिष्क में उसका परिचय तीव्र बुद्धि, दूरदर्शिता, स्मरण शक्ति सूझ-बूझ कल्पना, निर्णय, क्षमता, कुशलता, व्यवस्था आदि के रूप में देखा जा सकता है। भावना क्षेत्र में वही श्रद्धा, निष्ठा, आस्था भाव संवेदन, करुणा, आत्मीयता, सौन्दर्यानुभूति के रूप में उभरती हैं। सब मिला कर उसे उच्चस्तरीय उत्कृष्टता को दिशा में जीव चेतना को धकेलते हुए देखा जा सकता है

जब वर्षा ऋतु आती है तो सूखे बीहड़ भी हरियाली से भर जाते हैं। ग्रीष्म ऋतु में जिनका कोई अस्तित्व दृष्टिगोचर नहीं होता, ऐसे दबे हुए बीज तथा सूखी जड़ इस प्रकार हरी भरी हो जाती हैं मानो किसी चतुर माली ने प्रयत्न पूर्वक इस वनस्पति सम्पदा को पावस का आगमन कह सकते हैं। मनुष्य शरीर एक विशाल उर्वर भूखंड कहा जा सकता है। इसमें एक से एक बहुमूल्य बीज दबे पड़े हैं। वर्षा न होने तक उनका अस्तित्व छिपा पड़ा रहता है किन्तु जैसे ही जागृत कुण्डलिनी का श्रावण बरसता है वैसे ही विशेषताओं और विभूतियों की सम्पदा अनायास ही अंकुरित और पल्लवित होने लगती है।


गृहस्थ साधक (कहानी)

गृहस्थ साधक गुरु के पास पहुँचा। अपनी पीड़ा व्यक्त की। कष्ट यह था कि ध्यान का अभ्यास करते समय मन गुरु द्वारा उपदिष्ट निर्दिष्ट दिशा में सक्रिय रहने के स्थान पर दिन भर के गतिविधियों के जाल-जंजाल में उलझ जाता था। गुरु ने साधक को 10 दिन वहाँ आश्रम में रहने को कहा और उसे एक कुत्ते को पालने का निर्देश दिया। साधक चकराया । कुत्ते के पालन-पोषण का भी साधना से कोई संबंध हो सकता है भला। किंतु गुरु-आज्ञा थी।

साधक उस कुत्ते को रोज स्नेहपूर्वक रोटी खिलाता, पुचकारता। उस पर एक पट्टा भी बाँध दिया। एक सप्ताह बीत गया। आठवें दिन गुरु ने साधक को बुलाया। कहा— "कुत्ते को ले जाकर आश्रम के बाहर छोड़ दो; भगा दो उसे।" साधक कुत्ते को बाहर ले गया, पट्टा खोला और दुत्कार कर भगाया। ‘आश्रम वापिस पहुँचा।” थोड़ी देर में देखा, कुत्ता भी वहीं आ गया है। पुनः बाहर ले गया। थोड़ी देर में कुत्ता फिर हाजिर। बीसों बार यही क्रिया-प्रक्रिया दुहराई गई।

हार मानकर साधक गुरु के पास पहुँचा। स्थिति निवेदित की। गुरु मुस्करा उठे— “बेटे! अपने जिन विचारोंरूपी कुत्तों का तेरा मन दिन भर खिलाता-पिलाता रहता है; जिनमें तादात्म्य भाव स्थापित कर लेता है; उन्हें ही उपासना के समय भगाना चाहता है। यह कैसे हो सकता है। जो विचार और भावबोध तुझे अभीष्ट तथा श्रेष्ठ प्रतीत होते हैं, उनका दिन भर स्मरण रख। उसी पात-भूमिका के साथ सभी काम कर। यही साधना है। ऐसा करने पर ही उपासनाकाल में भी अभीष्ट भावभूमि बनी रह सकती है। जीवन-साधना के अभाव में उपासना भी सार्थक बन पड़ेगी।


कुण्डलिनी जागरण से आत्मिक और भौतिक सिद्धियाँ

कुण्डलिनी आत्म शक्ति की प्रकट और प्रखर स्फुरणा है। यह जीव की ईश्वर प्रदत्त मौलिक शक्ति है। प्रसुप्त स्थिति में वह अविज्ञात बनी और मृत तुल्य पड़ी रहती है। वैसी स्थिति में उससे कोई लाभ उठाना संभव नहीं हो पाता। यदि उसकी स्थिति को समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि अपने ही भीतर वह भण्डार भरा पड़ा है जिसकी तलाश में जहाँ-जहाँ भटकना पड़ता है। वह ब्राह्मी शक्ति अपने ही अन्तराल में छिपी पड़ी हैं, जिसे कामधेनु कहा गया है। आत्मसत्ता में सन्निहित इस महाशक्ति का परिचय कराते हुए साधना शास्त्रों ने यह बताने का प्रयत्न किया है कि अपने ही भीतर विद्यमान् इस महती क्षमता का ज्ञान प्राप्त किया जाय और उससे सम्पर्क साधने का प्रयत्न किया जाय। कुण्डलिनी परिचय के कुछ उद्धरण इस प्रकार हैं -

मल-मूत्र छिद्रों के मध्य मूलाधार चक्र में कुण्डलिनी का निवास माना गया है। उसे प्रचंड शक्ति स्वरूप समझा जाय। यह विद्युतीय प्रकृति की है। ध्यान से वह कौंधती बिजली के समान प्रकाशवान दृष्टिगोचर होती है। कुण्डलाकार है। उसका स्वरूप प्रसुप्त सर्पिणी के समान है।

यह उसका स्थानीय परिचय हुआ। अब उसका आधार, कारण, स्वरूप एवं प्रभाव समझने की आवश्यकता पड़ेगी। बताया गया है कि यह ब्राह्मी शक्ति हैं । स्वर्ग से गंगा अवतरित होकर पृथ्वी पर आई थी और इस लोक को धन्य बनाया था । इसी प्रकार यह ब्राह्मी शक्ति सत्पात्र साधकों की आत्म-सत्ता पर अवतरित होती है और उसे हर दृष्टि से सुसम्पन्न बनाती है। कहा गया है कि -

ज्ञेयाशक्तिरियं विश्णोर्निर्भया र्स्वगभास्वरा। सत्वं रजस्तमश्चेति गुणत्रय प्रसूतिका॥

मूलाधारस्थ वन्ह्यात्मतेजो मध्ये व्यवस्थिता। जीव शक्तिः कुण्डलाख्या प्राणाकाराय तेजसी।

महाकुण्डलिनीप्रोक्ता परब्रह्मस्वरुपिणी। शब्दब्रह्ममयी देवी एकानेकाक्षराकृतिः।

शक्ति कुण्डलिनी नाम विसतन्तु निभा शुभा-महायोग विज्ञान

यह स्वर्ण समान आभा वाली महा शक्ति कुण्डलिनी निर्भयता प्रदान करने वाली है। वहीं वैष्णवी है। सत, रज, तम तत्त्वों को उत्पन्न करने वाली है। मूलाधार के मध्य में आत्म तेज रूपी अग्नि पुंज होकर विराजमान् है। जीवनी शक्ति वही है। तेजस्वी प्राण ही उसका आकार है। यह परब्रह्म स्वरूपिणी है। यह शब्द ब्रह्म मय है। इसकी अनेक आकृतियाँ हैं। इन शुभ कामनाओं को पूर्ण करने वाली शक्ति का नाम कुण्डलिनी है।

स्वयं भू शिवलिंग में तीन लपेटे लगाकर सुप्त सर्पिणी की तरह पड़े होने की उपमा में यह संकेत है कि उसमें वे तीनों ही क्षमताएँ विद्यमान् हैं जो मानवी अस्तित्व को विकसित करने के लिए मूल भूत कारण समझी जाती है। आकांक्षा विचारणा, क्रिया एवं साधन सामग्री के आधार पर ही मनुष्य आगे बढ़ता, सफलता पाता और प्रसन्न होता है॥ इन तीनों के बीज अन्तरंग में कुण्डलिनी शक्ति के रूप में विद्यमान् है। इन्हें विकसित करने पर यह तीनों क्षमताएँ भीतर से उमड़ती हैं तो बाहर के स्वल्प साधन मिलने पर भी उनको समुन्नत बनने का सहज अवसर मिल जाता है तो अन्तः क्षमता प्रसुप्त हो तो बाहर के विकास उपचार सफल नहीं होते किन्तु भीतर के स्रोत उमंगों का बाह्य क्षेत्र में उभरना कठिन नहीं है। गायत्री के तीन चरण कुण्डलिनी के तीन लपेटे हैं और उन्हें मानव जीवन की मूलभूत क्षमताओं के रूप में माना गया है।

प्रकृतिः निश्चला परावग्रूशिणी पर प्राणवात्मिका कुण्डलिनी शक्तिः। -प्रपंच सार मन्त्र

यह कुण्डलिनी महाशक्ति, अविचल प्रकृति और परावाणी है। यह पर ब्रह्म है।

इच्छाशक्तिश्च भूःकारः क्रिया शक्तिर्भुवस्तथा। स्वः कारः ज्ञान शक्तिश्र भूर्भुवः स्व स्वरुपकम्।

भूः - इच्छा शक्ति; भुवः- क्रिया शक्ति; स्वः -ज्ञान शक्ति , यह तीन व्याहृतियों का स्वरूप है।

सात्विकस्य ज्ञान शक्ति राजसस्य क्रियात्मिका। द्रव्य शक्तिस्तामसस्य तिस्रश्रामथिताभव-देवी भागवती

सात्विक ज्ञान शक्ति, राजस क्रिया शक्ति और तामस द्रव्य शक्ति यह तीन शक्तियाँ कही गई हैं।

ज्ञानेच्छाक्रियाणा तिमृणा व्यश्टीना महासरस्वती महाकाली महालक्ष्मीरित।

ज्ञान शक्ति इच्छा शक्ति और क्रिया शक्ति यह तीन ही शक्ति की प्रकृति हैं । इन्हें ही महा सरस्वती, महा कला और महा लक्ष्मी कहते हैं।

केचित्ताँ तप इत्याहुस्तमः केचिज्जडं परें । ज्ञानं मायाँ प्रधानं च प्रकृति शक्तिमप्यजान्। आनन्दरुपता चास्याः परप्रेमास्पदत्वतः । -देवी भागवत्

कोई मुझे तपः - शक्ति कहते हैं। कोई जड़। कोई ज्ञान कहते हैं कोई माया कोई प्रकृति । मैं ही परम प्रेमास्पद तथा आनन्द रूपा हूँ।

अहमेंव स्वयमिदं वदामि जुश्टं देवेभिरुत भानुशेभिः। य यं कामये तं तमुग्रं कृणोभि तं ब्रह्माण तमृशि तं सुमेधाम्॥ ऋ10125 ।5

देवताओं और मनुष्यों को अभीष्ट-प्राप्ति का मार्ग मैं ही बतलाती हूँ। जो मेरी विवेक-शक्ति की) उपासना का मुझे प्रसन्न करता है, उसे ही मैं प्रखर बनती हूँ। ब्राह्मण, ऋषि तथा मेधावी बनाती हूँ।

अपने में ही विद्यमान् परम वैभव के सम्बन्ध में अपरिचित रहना यही अध्यात्म की भाषा में अज्ञान या अन्धकार है। इसकी निवृत्ति को ही आत्म ज्ञान की आत्म साक्षात्कार की महान् उपलब्धि कहा गया है। प्रसुप्ति की जागृति में बदल देना खोये को तलाश कर लेना यही परम पुरुषार्थ है। आत्म साधनाओं को परम पुरुषार्थ कहा गया है। सामान्य पुरुषार्थों से धन, बल थोड़ी सी भौतिक उपलब्धियाँ स्वल्प मात्रा में उपार्जित की जा सकती है। वे भी अस्थिर होती है और मिलने के बाद उलटी अतृप्ति, भड़काती चलती हैं। किन्तु आत्मिक विभूतियों को उपार्जित करने की दिशा में बढ़ने पर प्रत्येक चरण क्रमशः अधिक उच्चस्तरीय प्रस्तुत करता चलता है। वे स्थायी भी होते हैं और तृप्ति कारक भी । उनसे अपना भी कल्याण होता और दूसरों का भी । इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आत्म साधना को परम पुरुषार्थ कहा गया है।

सोता हुआ मनुष्य मृत तुल्य निष्क्रिय पड़ा रहता है। जागृति होते ही उसकी समस्त क्षमताएँ जाग पड़ती हैं प्राण शक्ति कुण्डलिनी शक्ति के सम्बन्ध में भी यही बात है। जिसकी अन्तः शक्ति मूर्छित है समझना चाहिए कि वह तत्त्वतः सोया हुआ ही है। जिसका अन्तराल जग पड़ा उसकी महान् सक्रियता को कार्यान्वित होते हुए देखा जा सकता है। सोने की जागृति की , स्थिति में जितना अन्तर होता है उतना ही आत्म शक्ति के प्रसुप्त और जागृत होने की स्थिति में समझा जा सकता है। इसी प्रसुप्ति और जागृति के अन्तर की चर्चा ताण्डय ब्राह्मण में इस प्रकार हुई है-

कुण्डलिनी की प्रसुप्ति को जागृति में बदलने के लिए ‘साधना’ का उपाय अपनाना पड़ता है। इस जागरण प्रयास में लगने के लिए जो साहस करते हैं वे भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्रों में समुन्नत स्थिति प्राप्त करते चले जाते हैं। इस महान् जागरण के लिए प्रोत्साहित करते हुए शास्त्रकार कहते हैं-

तदाहुः कोऽस्वप्नु यर्हतिः यद्वाव प्राण जागीत् देव जागरिम् इति। -ताण्ड्य

कौन सोता है? कौन जागता है ? जिसका प्राण जागता है, वस्तुतः वही जागता है ?

मूलाधारे आत्मशक्ति5 कुण्डलिनी परदेवता। शीयिता भुजगाकारा सार्द्धत्रय बलयान्विता॥

यावत्सा निद्रिता देहे तावज्जीवः पशुर्यथा। ज्ञान न जायते तावत् कोटियोग विधेरपि॥

आधार शक्ति निद्राया विश्वं भवति निद्रया। तस्या शक्तिप्रबोधेन त्रैलोक्यं प्रति बुध्यते॥ -महायोग विज्ञान

आत्म शक्ति कुण्डलिनी मूलाधार चक्र में साड़े तीन कुण्डलिनी लगाये हुए सर्पिणी की तरह शयन करती है। अब तक वह सोती है तब तक जीव पशुवत् बना रहता है। बहुत प्रयत्न करने पर भी तब तक उसे ज्ञान नहीं हो पाता। जिसकी यह आधार शक्ति सो रही है उसका सारा संसार ही सो रहा है, पर जब वह जागती है तो उसका भाग्य और संसार ही जाग पड़ता है।

विद्युल्लता परा जाता पंचानामातृ रूपिणी। अभ्यासा मार्ग योगात् सैका षोढा प्रजायते। पराचेत्तया ज्ञानाक्रिया कुण्डलिनि नीति च।

बिजली जैसी चमक वाली, पंचतत्वों एवं पंच प्राणों की माता, परम चेतना ज्ञान शक्ति तथा क्रिया शक्ति कुण्डलिनी, योग साधना से उपलब्ध होती है।

प्रत्येककर्मसाफल्यं यत्प्रबोधे प्रजायते। अतस्तस्याः प्रबोधाय शक्तेर्यत्नवान भवेत्-महायोग विज्ञान

प्रत्येक कर्म की सफलता उस कुण्डलिनी के जागने से प्राप्त होती है। अतएव उस महाशक्ति को जगाने के लिए प्रबल प्रयत्न करना चाहिए।

मूलाधारे कुण्डलिनी भुजंगाकार रूपिणी। जीवात्मा तिश्ठति तत्र प्रदीप कलिकाकृतिः। बहुभाग्यवशाद्यस्य कुण्डली जागृता भवेत्-घरेण्ड संहिता 6।16।18

मूलाधार चक्र में सर्पिणी आकार की कुण्डलिनी शक्ति है जो दीपक की लौ वैसी दीप्तिमान है। वहीं जीवात्मा का निवास है।

हे चण्ड, जिसकी कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो जाए उसे बड़ा भाग्यशाली मानना चाहिए।

सुप्ता नागोपमाह्येश स्फुरन्ती प्रभवा स्वया। अहिवत् संधि संस्थाना वाग्देवी बीज सज्ञका। ज्ञेया शक्तिरियं विश्णोर्निभया र्स्वण भास्करा-शिव संहिता

यह कुण्डलिनी शक्ति सुप्त सर्पिणी के समान है। वही स्फुरणा, गति, ज्योति एवं वाक् है। यह विष्णु शक्ति है। स्वर्णिम सूर्य के समान दीप्तिवान् है।

सो यथा योज्यते यत्र तेन् निर्यात्यलं तथा॥ संवित्तिः सेव यात्यडं रसाद्यन्तं यथाक्रमम्। रसेनापूर्णतामेति तंत्रीभार इबाम्बुना॥ रसापूर्णा यमाकारं भावयत्याशु तत्तथा। धन्ते चित्रकृतो बुद्धो रेखा राम यथा कृतिम्-योग वशिश्ठ

यह कुण्डलिनी शक्ति रस भावना से ओत प्रोत है। उसके जागृत होने पर मनुष्य रस भावनाओं से ऐसे भर जाता है जैसे पानी भरने से चमड़े का चरस। यह रसिकता अनेक कलाओं के रूप में विकसित होते हुए जीवन को रससिक्त बना देती है।

इच्छा-ज्ञान क्रियात्मासौ तेजोरुपा गुणत्मिका। क्रमेणानेन सृजति कुण्डली पर देवता। विश्वात्मना प्रबुद्धा सा सूते मंत्रमयं जगत्॥ एकधा गणिता शक्तिः सर्व विश्वप्रवर्तिनी-महायोग विज्ञान

तेज स्वरूप कुण्डलिनी जागृत होने पर इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति को प्रखर बनाती है। सम्पूर्ण शरीर पर उसका प्रभाव दीखने लगता है। प्रसुप्त मन्त्रमय जगत जागृत हो उठता है। विश्वात्मा ज्ञान जागृत होता है। विश्व का प्रवर्तन करने वाली कुण्डलिनी साधक को अनेक गुण शक्ति सम्पन्न बना देती है।

कुण्डलिनी जागरण के प्रतिफल से परिचित होने पर साधक उसके लिए साधना प्रयास आरम्भ करता है और उस परम पुरुषार्थ का समुचित लाभ प्राप्त करता है कहा गया है कि -

शक्ति कुण्डलिनोति विश्व जनन व्यापार ब्रद्धोद्यमा ज्ञात्वे यं न तुनर्वशान्ति जननागर्मेकत्वं नराः-शक्ति तंत्र

कुण्डलिनी महा शक्ति के प्रयत्न से ही यह सारा संसार व्यापार चल रहा है जो इस तथ्य को जान लेता है वह शोक संतप्त भरे बंधनों से बँधा नहीं रहता ।

योग के आधार पर आध्यात्मिक और तन्त्र के आधार पर भौतिक उन्नति का पथ प्रशस्त होता है। कुण्डलिनी जागरण में उभय पक्षीय संभावनाएँ सन्निहित है। यह दोनों ही प्रयोजन उससे सिद्ध होते हैं। गाड़ी के दो पहिये-पक्षी के दो पंख, मनुष्य के दो हाथ मिलकर जिस तरह उनकी क्षमता को मूर्तिमान् बताते हैं ; उसी प्रकार कुण्डलिनी जागरण की प्रतिक्रिया जीवन के दोनों पक्षों को समुन्नत बनाती है। हठ योग प्रदीपिका में इसी तथ्य को इस प्रकार प्रतिपादित किया गया है।

सशैलवन धात्रीणाँ यथाधीराऽहिनायकः। सर्वेशा योगतन्त्राणा तथा धारोहि कुण्डली॥ सप्ता गुरुप्रसादेन यथा जागति कुण्डली। तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यते ग्रंथयोऽपि च-हड योग प्रदीपिका

जिस प्रकार सम्पूर्ण वनों सहित जितनी भूमि है, उसका आधार शेष नाग है उसी प्रकार समस्त योग साधनाओं का आधार भी कुण्डली ही है, जब गुस् की कृपा से सोयी हुई कुण्डली जागती है, तब सम्पूर्ण पद्य (षट्चक्र) और ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं।

योगिना हृदयाम्बुजे नृत्यन्ती नृत्यमज्जसा। आधारे सर्व भृताना स्फुरन्ति विद्युताकृति॥

अर्थात्- “योगियों के हृदय देश में वह नृत्य करती रहती है। यही सर्वदा प्रस्फुटित होने वाली विद्युत रूप महाशक्ति सब प्राणियों का आधार है।

सुप्ता सर्वोपमा मौला पाति साधकमीश्वरी। चैतन्या कुण्डलीशक्तिर्वायवी बलतेजसा। चैतन्या सिद्धिहेतुस्था ज्ञानमात्रं ददाति सा॥ ज्ञानमत्रेण् मोक्षः स्याद्वायवी ज्ञानमाश्रयेत्-महायोग सूत्र

अनन्त शक्तियों की भण्डार सुप्त सर्पिणी कुण्डलिनी अपने साधक का पालन और रक्षण करती है सो मुक्ति के आकांक्षी उसी की साधना करते हैं। प्राण वायु के द्वारा जागृत हुई यह कुण्डलिनी साधक के लिए सिद्धियों का आधार बनती है और उसे परम ज्ञान प्रदान करती है।

वेदाधीनं महायोगं योगाधीनं च कुण्डली। कुण्डल्यधीन् चित्तंतुचित्तासधीनं चराचरम्। मनसः सिद्धि मात्रेण शक्तिसिद्धिर्भवेद् ध्रुवम्। यदि शक्तिवशीभूता त्रैलोक्यं स्यात्तदा वशे॥

वेद के आधीन योग है। योग के आधीन कुण्डलिनी। कुण्डलिनी के आधीन चित्त है और चित्त के आधीन चराचर जगत्।

मन की सिद्धि होने से शक्ति की सिद्धि हो जाती है और जिसने शक्ति को वश में कर लिया तीनों लोक उसके वश में होते हैं। -महायोग विज्ञान

उद्घाटयेत्कपाटं तु यथा कुडिडडचकया हठात्। कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वारं विभेदयेत्॥

येन मार्गेण गंतव्यं ब्रह्मस्थानं निरामयम्। सुखेनाच्छाद्य तद्द्ववारं प्रसुप्ता परमेश्वरी॥

कदोर्ध्व कुण्डली शक्तिः सुप्ता मोक्षाय योगिनाम्। बंधनाय च मूढ़ाना यस्ता वेत्ति स योगवित्-हठ योग प्रदीपिका 3।105 से 107

अर्थात् जिस प्रकार कुँजी से किवाड़ खोले जाते हैं, वैसे ही योगी कुण्डलिनी द्वारा मोक्ष द्वार को खोलते हैं।

निरामय ब्रह्म स्थान को जाने वाले मार्ग को अपने मुख से ढाँके कुण्डलिनी परमेश्वरी सोती रहती है। कन्द के ऊर्ध्व में सोयी पड़ी यह कुण्डलिनी ही (जागने पर) योगियों के मोक्ष का साधन बनती है और (सोती रहने पर) मूँ के बन्धन का कारण बनी रहती है। इस रहस्य को जानने वाला ही योगी होता है।

नमस्ते देवदेवेशि योगीश प्राणवल्लभे। सिद्धिदे वरदे मातः स्वयम्भूलिंगवेश्टिते॥

प्रसुप्तभुजगाकारे सर्वदा कारणप्रिये। कामकलान्विते देवि! मनोऽभीश्टं कुरुश्व च ॥

असारे घोरसंसारे भवरोगान्महेश्वरि। सर्वदा रक्ष माँ देवि! जन्मसंसाररुपकात्॥ इति कुण्डलिनीस्तोत्रं ध्यात्वा यः प्रपठेत्सुधीः-योग सार

योगियों की प्राण बल्लभा सिद्धि दायिनी, वरदायनी, स्वयं भू लिंग के साथ लिपटी हुई, सोई सर्पिणी के रूप वाली, काम कलाविन्त, अभीष्ट फलदायक है। हे देव देवेशि आपको नमस्कार। इस सार रहित घोर कष्ट दायक भव रोगों से घिरे, जन्म मरण रूपी संसार में हे देवि, मेरी रक्षा कीजिए। इन भावनाओं के साथ प्रज्ञावान साधक कुण्डलिनी महा शक्ति का ध्यान एवं स्तवन करें।


आत्मशोधन और प्रायश्चित प्रक्रिया

आत्मिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा कुसंस्कारों की है। इन्हीं की प्रेरणा से मनुष्य कुकर्म करते हैं। यह कर्म ओर कर्म फल के अकाट्य सिद्धान्त की धुरी पर परिभ्रमण कर रहा है। प्राणी कर्म करते और उसका फल भोगते हैं। सत्कर्म सुख-शान्ति लाते हैं और दुष्कर्मों का प्रतिफल शोक संतापों के रूप में सामने आता है। कर्मों को फलित होने में थोड़ा बहुत समय लग जाता है, इसी से भ्रमित होकर लोग यह सोचने लगते हैं कि अपनी चतुरता से सहारे शासन, समाज और भगवान को चकमा दे सकने में वे सफल हो गये।

कर्म फल पर अविश्वास करना ही विश्व व्यवस्था पर ईश्वर पर अविश्वास करना है। इसी को नास्तिकता कहते हैं। तत्काल कर्म फल नहीं मिलते, इसी से लोग पाप कर्मों को करने में निर्भय बनते और सत्कर्मों में उपेक्षा उदासीनता बरसते हैं। यही है वह प्रमुख अवरोध जिस चट्टान से टकरा कर आत्मिक प्रगति चूर-चूर होती रहती है। उपासना की कमाई इन्हीं कुसंस्कारों और कुकर्मों के गर्त में गिर कर नष्ट हो जाती है।

साधना के मार्ग पर चलने का साहस करने वालों को चरित्र-निष्ठ और समाज-निष्ठ बनना पड़ता है। उर्वर भूमि में ही बीज उगते हैं। खाद पानी के सहारे ही पौधे बढ़ते और फलते-फूलते हैं। साधना के बीज अंकुर निर्मल चरित्र और उदार व्यवहार का पोषण प्राप्त कर सकें तो ही वे समुन्नत और फलित होते हैं। निकृष्ट चिन्तन और घृणित कर्तृत्व बना रहे तो किसी भी पूजा पाठ से दैवी अनुग्रह प्राप्त नहीं हो सकता। उपासना कपड़े को रंगने के समान है। इससे पूर्व धुलाई होनी चाहिए। मैले कपड़े पर रंग कहाँ चढ़ता है। दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति अपनाये रहने पर साधना फलवती नहीं होती। साधक को जितना श्रम उपासनात्मक उपचारों में करना पड़ता है उससे अधिक प्रयत्न आत्म परिष्कार के लिए आत्मशोधन के लिए करना पड़ता है।

आत्मोत्कर्ष के लिए आत्मशोधन की अनिवार्य आवश्यकता रहती है। इसके लिए वर्तमान और भावी जीवन को चरित्र निष्ठ एवं समाज निष्ठ बनाने की-पवित्र और परिष्कृत रखने की सुव्यवस्थित योजना बनानी पड़ती है। लोक मंगल के लिए सत्प्रवृत्तियों का विकास विस्तार करने के लिए उदार अनुदान प्रस्तुत करने पड़ते हैं। साधु ब्राह्मण की परम्परा को जितना सम्भव हो उतना जीवन क्रम में उतारना पड़ता है। भौतिक महत्त्वाकाँक्षाओं को जितना घटाया जा सके और अपनी क्षमता का जितना अधिक उपयोग परमार्थ प्रयोजनों में किया जा सके समझना चाहिए कि साधना के फलित होने का उतना ही सुनिश्चित आधार उपलब्ध हो गया। उपासना के विधि-विधान भले ही गायत्री की उच्चस्तरीय साधना जैसे ही क्यों न हो। भले ही पंच कोशों को ज्योतिर्मय बनाने की- कुण्डलिनी जागरण की -महान् साधनाओं का सुअवसर मिल रहा हो- हर हालत में व्यावहारिक जीवन का परिष्कार-परिशोधन तो अनिवार्य रहेगा ही।

वर्तमान और भावी गतिविधियों का परिष्कृत निर्धारण साधना का अविच्छिन्न अंग माना जाना चाहिए और जितना महत्त्व विधि विधानों को, साधनात्मक कर्मकाण्डों को दिया जाता है उतनी ही जीवन क्रम के सर्वांगीण परिष्कार की क्रमबद्ध योजना बनानी चाहिए। और निश्चयात्मक बुद्धि से उसी सन्मार्ग पर अनवरत गति से बढ़ना चाहिए।

यहाँ एक तथ्य और भी विचारणीय है कि अभ्यस्त कुसंस्कारों और इस जीवन में किये गये दुष्कर्मों का परिशोधन भी किया जाय। जो अवांछनीय बन पड़ा हो उसके निराकरण के लिए उसका बदला चुकाया जाना आवश्यक है। इसे धर्मशास्त्रों में प्रायश्चित प्रक्रिया कहा गया है। गायत्री की उच्चस्तरीय साधना आरम्भ करते हुए पंच कोशों के परिष्कार एवं कुण्डलिनी जागरण की महान् साहसिकता का परिचय देते हुए-सर्व प्रथम पाप परिमार्जन की प्रायश्चित प्रक्रिया सम्पन्न की जानी चाहिए।

साधक को अब तक के जीवन में बन पड़े पाप कर्मों की सूची तैयार करनी चाहिए। उनका प्रायश्चित क्या हो सकता है ? इसके लिए किसी तत्त्वदर्शी मनीषी से परामर्श करना चाहिए। ब्रह्म वर्चस साधना के शिक्षार्थियों को इस संदर्भ में हमारा परामर्श, मार्ग दर्शन प्राप्त हो सकता है। प्रायश्चित्त का प्रथम चरण जी खोल कर बिना लाग लपेट और दुराव के दुष्कर्मों के समय की मनः स्थिति एवं परिस्थिति का विवरण बताना चाहिए। यह विवरण थोड़ा बड़ा हो जाय तो हर्ज नहीं। संक्षेप में घटना तो बताई जा सकती है पर पाप के वजन का मूल्यांकन करने के लिए इसकी पृष्ठ भूमि समझाई जानी आवश्यक है। जी खोल कर अपने दुष्कर्म को किसी ऐसे व्यक्ति के सम्मुख कहा जा सकता है, जिससे उसके प्रकटीकरण की -प्रतिष्ठा नष्ट किये जाने या किसी प्रकार की हानि पहुँचाये जाने की आशंका न हो । इस प्रकार के प्रकटीकरण से मन की गाँठें खुलती हैं। चित्त हलका होता है और मनः संस्थान में अड़े हुए अवरोध टूटते हैं।

प्रकटीकरण के साथ-साथ उन दुष्कर्मों के प्रति लज्जित और दुखी होने की वृत्ति का उभरना ‘पश्चाताप’ है। पश्चाताप में भविष्य में वैसा न करने का संकल्प भी रहता है। अन्यथा ‘कह देने और फिर करने लगने’ से तो बात ही क्या बनेगी। निश्चय किया जाना चाहिए कि जिस प्रकार के पाप बन पड़े हैं वैसे अथवा अन्य प्रकार के दुष्कर्मों का साहस पूर्वक परित्याग किया जा रहा है। भविष्य में पवित्र और परिष्कृत जीवन ही जीना है।

जो दुष्कर्म बन पड़े हैं, उनका बदला चुकाया जाना आवश्यक है। इसी को प्रायश्चित कहते हैं। कर्म का फल अनिवार्य रूप से भुगता जाना है। मात्र क्षमा प्रार्थना -गंगा स्नान, व्रत उपवास जैसे छुट-पुट कर्मकाण्डों को प्रायश्चित का प्रतीक कह सकते हैं-आधार नहीं । प्रतीकों से प्रेरणा मिलती है। भार तो उतारने और चुकाने से ही उतरता है। शासन या समाज की ओर से पापों के दंड दिये जाते हैं। यदि उन्हें स्वेच्छा पूर्वक स्वीकार किया जाये और दंड भुगतने का साहस दिखाया जाय तो उस सचाई का प्रमाण और सच्चा प्रायश्चित कहा जाएगा। गड्ढा खोद कर दूसरों को गिराने का उपक्रम किया गया तो उसे भरने का, समतल बनाने का नया परिश्रम करने से ही प्रायश्चित होगा। प्रत्येक पाप कर्म की एक शृंखला होती है। तालाब में उठने वाली लहरें पूरी सतह तक दौड़ती हैं। पापों की शृंखला पूरे समाज को परोक्ष रूप से प्रभावित करती है। प्रायश्चित का स्वरूप यही है कि जितने वजन की समाज को हानि पहुँचाई है उतने ही मूल्य का लाभ दिया जाय। पाप के समतुल्य पुण्य कर्म किये जाय। इसमें जो समय, श्रम, धन, आदि लगा, इसमें जो हानि उठानी पड़ी, उसे पाप का दंड कहा जा सकता है। पुण्य को समतुल्य करने पर ही पाप कटते हैं।

ब्रह्म वर्चस सत्र के साधकों को अपने दुष्कर्मों का विस्तार पूर्वक विवरण देना पड़ता है। यह जानकारी तीसरे तक प्रकट न होगी। यह निश्चित आश्वासन सूत्र संचालक देते हैं। अस्तु लाग लपेट की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती । प्रायश्चितों में ऐसे विधान चुनने होते हैं जिससे अपराधी को क्षति उठाने का दंड तो मिल जाय पर वह निरर्थक न जाये।

सभी क्षेत्रों में फैली मूढ़ताओं और विडम्बनाओं की तरह तीर्थ यात्रा का महात्म्य भी किन्हीं क्षेत्रों, प्रतिमाओं नदी, सरोवरों में पहुँचने देखने, नहाने आदि तक सीमित हो गया है। इससे तो मात्र पर्यटन विनोद का उद्देश्य पूरा होता है। वास्तविक तीर्थ यात्रा धर्म प्रचार के लिए पदयात्रा के रूप में होती है। यही उनका ऋषि प्रणीत सनातन स्वरूप था। जन मानस का परिष्कार धर्म प्रेरक लोकशिक्षण ही तीर्थ यात्रा का उद्देश्य है। मंडलियाँ बना कर स्थित समय तक नियत क्षेत्र में योजनाबद्ध धर्म प्रचार के लिए निकला जाना यही युग निर्माण योजना द्वारा प्रतिष्ठापित तीर्थ यात्रा है।

ब्रह्म वर्चस् साधना के साधकों को प्रायः ऐसी ही तीर्थ यात्राओं के रूप में प्रायश्चित कराये जाते हैं। इसमें पाप निवारण और पुण्य सम्पादन के दोनों ही तत्त्व प्रचुर परिमाण में सन्निहित रहते हैं। इसे भी साधना में ही सम्मिलित रखा गया है। यह करने पर आत्मिक प्रगति द्रुत गति से होने लगती है।


अपनों से अपनी बात

शान्ति-कुँज की प्रशिक्षण प्रक्रिया का प्रथम पाँच वर्षीय कार्यक्रम सम्पन्न हो गया। उसमें प्रत्यावर्तन सत्र और जीवन साधना सत्र चले। उनमें प्रायः 10 हजार शिक्षार्थी सम्मिलित और लाभान्वित हुए। अब द्वितीय पंच वर्षीय प्रशिक्षण योजना आरम्भ होती है। इसे गायत्री की उच्चस्तरीय साधना समझा जाना चाहिए।

आरम्भिक छात्रों की कालेज स्नातकों की शिक्षा का उद्देश्य तो समान रहता है, पर उसकी व्यवहार पद्धति के स्वरूप में भारी अन्तर रहता है। गायत्री महामन्त्र की साधना का पूर्वार्ध आत्मिक है। उसमें वाचिक, मानसिक, उपाँशु पद्धति के अनुष्ठान पुरश्चरण करने पड़ते हैं। उनकी पूर्णाहुति होमात्मक होती है। ब्रह्मभोज; कन्याभोज जैसे दान-पुण्य भी साथ में जुड़ते हैं। इन साधनाओं में उपवास ब्रह्मचर्य आदि की तितीक्षाएँ भी करनी पड़ती है। जो इतना सब नहीं कर सकते उनके लिए भी द्वार बन्द नहीं है। वे किसी भी स्थिति में -रास्ता चलते -चारपाई पर पड़े -बिना स्नान किये भी गायत्री का मानसिक जप कर सकते हैं। गायत्री के 24 अक्षरों में सन्निहित शिक्षाओं का अवगाहन करते हुए धर्म-शास्त्र और अध्यात्म विज्ञान के सारतत्त्व को हृदयंगम कर सकते हैं। यह सुलभ मार्ग सदा ही आरम्भिक साधकों के लिए खुला रहेगा।

स्नातक शिक्षा उनके लिए उपयुक्त है जिन्होंने प्रारम्भिक कक्षाओं में गति प्राप्त कर ली है। पहला प्रवेश कालेज में नहीं मिलता, प्रवेशिका की योग्यता प्राप्त कर लेने के उपरान्त ही उसमें स्थान मिलता है। गायत्री की उच्चस्तरीय साधना उन्हीं के लिए अभीष्ट है जो पहले से ही गायत्री उपासना करते रहे हैं अथवा अन्य प्रकार से अपनी आत्मिक स्थिति को ऊँची उठा चुके है। गायत्री विद्या का योग पक्ष और ब्रह्म तेज का तपश्चर्या पक्ष दोनों ही समन्वित है। सविता का भर्ग तत्त्व ब्रह्म तेज है और धियः तत्त्व की प्रेरणा ब्रह्म विद्या कहलाती है। इन दोनों का समन्वय ब्रह्म वर्चस् है।

उच्चस्तरीय साधना के लिए उपयुक्त वातावरण एवं साधन जुटाने की आवश्यकता पड़ती है। ब्रह्म वर्चस् आरण्यक नाम से जो नया आश्रम इन दिनों बन रहा है उसमें इसी प्रकार की व्यवस्था की गई हैं। यह स्थान बिलकुल गंगा तट पर है। कुछ ही गज दूरी पर भगवती जाह्नवी की पुनीत धारा बहती है। उसी में स्नान, उसी का जल-पान सातों ऋषियों ने जिस भूमि पर बैठकर तप किया था, गंगा ने उनके व्यक्तित्व और प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए स्वयं ही मार्ग छोड़ दिया था और सात धाराओं में बहने लगी थीं। इस आख्यायिका का कई पुराणों में वर्णन है। अभी भी ऋषियों के वे तप स्थान छोटे-छोटे टापुओं के रूप में गंगा के मध्य विद्यमान् है। उन पर वृक्ष भी हैं। प्रयत्न यह किया जाएगा कि साधकों को उन द्वीपों में जाकर साधनाएँ करने का अवसर मिले। इसके लिए एक नाव का प्रबन्ध भी किया जाएगा जो साधकों को उनमें पहुँचाने और लाने के काम आती रहे। सप्त ऋषियों से लेकर अन्यान्य अध्यात्म साधक चिरकाल से इसी दिव्य वातावरण का लाभ लेते और लक्ष्य में सफल होते रहे हैं । देवताओं , ऋषियों और महामानवों ने इस भूमि से महत्त्वपूर्ण अनुदान पाये हैं। ब्रह्म वर्चस् आरण्यक का निर्माण भी ऐसे ही श्रेष्ठतम स्थान पर किया गया है। संस्कारवान भूमि का प्रभाव साधना की प्रगति में दृष्टिगोचर होकर रहता है। जिस दिव्य संरक्षण, मार्ग-दर्शन प्रकाश और अनुदान की इसमें व्यवस्था रहेगी उससे इस साधना स्थल का महत्त्व और भी बढ़ा है।

ब्रह्म वर्चस् आरण्यक का निर्माण कार्य इन दिनों चल रहा है। आर्थिक तंगी के कारण निर्माण की गति धीमी है। सुविधा होती तो निर्माण और भी जल्दी हो सकता था। जैसे जितने साधन हैं उस क्रम से काम हो रहा है। आशा की गई है कि जून के अन्त तक एक सीमित संख्या में साधकों के निवास का प्रबन्ध वहाँ हो जाएगा और क्रमबद्ध ‘ ब्रह्म वर्चस्’ प्रशिक्षण 1 जुलाई 77 से उसी भूमि से चल पड़ेगा। तब तक के सत्र शान्ति-कुँज में ही चलते रहेंगे। इनमें साधना प्रशिक्षण और अनुदान की विविध धाराएँ बहेंगी। हर साधक को निर्धारित साधना करनी पड़ेगी। मार्ग-दर्शन प्रशिक्षण की कक्षाएँ चलेंगी। साथ ही अतिरिक्त सहयोग के रूप में आध्यात्मिक अनुदानों का भी समन्वय रहेगा। इस प्रकार ब्रह्म वर्चस् प्रक्रिया को तीन धाराओं के संगम की त्रिवेणी ही कहना चाहिए। यह अपने ढंग का अनोखा अवसर है।

एक समय में 100 साधकों की साधना चलती रह सके ऐसी व्यवस्था बनाई जा रही है। गत साधना स्वर्ण जयन्ती वर्श के साधक एक लाख है। इसके अतिरिक्त भी अन्य अधिकारी सत्पात्र है जिन्हें इस साधना का लाभ उठाने का अवसर दिया जाना है। स्थान और संख्या का सन्तुलन मिलाते हुए यह व्यवस्था बनाई गई है कि व्यस्त व्यक्तियों के लिए दस-दस दिन के और थोड़ी अधिक सुविधा वालों के लिए एक-एक महीने के सत्र चलें। इसके लिए सन् 77 के शेष 6 महीनों का कार्यक्रम अभी घोषित किया जा रहा है। सन् 78 के लिए स्थिति के अनुरूप कार्यक्रम निर्धारित किया जायेगा।

सन् 77 में अप्रैल, मई, जून के लिए पूर्व घोषित कार्यक्रम शान्ति-कुंज में ही चलेंगे। अप्रैल में 1 से 10 , 11 से 20 , 21 से 30 तक के दस-दस दिवसीय सत्र हैं। मई, जून में एक-एक महीने के वानप्रस्थ सत्र हैं। उन्हें भी ब्रह्म वर्चस् साधना युक्त कर दिया गया है। सभी शिक्षार्थियों को सचेत कर दिया गया है कि अपने साथ दर्शनार्थियों , पर्यटकों, सैलानियों, आशीर्वाद-इच्छुकों बाल-बच्चों को लेकर न चलें। इस प्रकार के साधना महत्त्व से अपरिचित लोग यहाँ धर्मशाला की तरह आ ठहरते हैं और वे थोड़े से व्यक्ति ही यहाँ के अनुशासन एवं वातावरण का सर्वनाश कर देते हैं। पिछले दिनों हर सत्र में दो-चार व्यक्ति ऐसी गड़बड़ी उत्पन्न करते रहे हैं। अब की बार अत्यन्त कठोरतापूर्वक इस प्रकार की घुस-पैठ को रोक दिया गया है। स्पष्ट कर दिया गया है कि जो मात्र कठोर साधना की दृष्टि से आना चाहें वे ही पूर्व स्वीकृति प्राप्त करने का प्रयत्न करें। अन्य लोग अन्यत्र ठहरें और दोपहर बाद जैसा कि सामान्यतः मिलने-जुलने का समय निर्धारित हो, मिलकर चले जाय। धर्मशाला और होटल की सुविधा पाने की दृष्टि से इन सत्रों में घुस-पैठ करने वालों को इस बार निश्चित रूप से रोक दिया जाएगा। भले ही नाराजी या वापिस लौटाने का कटु प्रसंग ही क्यों न आ जाय। वातावरण को विशुद्ध साधनात्मक बनाये रहने की दृष्टि से परिजनों की नाराजगी की जोखिम उठाते हुए भी इस बार यह कठोर व्यवस्था बना दी गई है और भविष्य में भी वह बनी ही रहेगी।

जुलाई 77 में दस-दस दिवसीय सत्र चलेंगे। (1) 1 से 10 तक (2) 11 से 20 तक (3) 21 से 30 तक। अगस्त और सितम्बर में एक-एक महीने के सत्र रहेंगे। अक्टूबर में फिर दस-दस दिन के सत्र रहेंगे। 1 से 10, 11 से 20 , 21 से 30 । नवम्बर और दिसम्बर फिर एक-एक महीने के सत्र है। वे पहली तारीख से लेकर तीस तक चला करेंगे। आगन्तुकों को सत्र आरम्भ होने से एक दिन पूर्व सायंकाल तक शान्तिकुञ्ज आ जाना चाहिए, ताकि रात्रि की गोष्ठी में सारे नियमोपनियम समझ सकें और दूसरे दिन प्रातः चार बजे से ही कार्यक्रम में सम्मिलित रह सकें। कई दिन पहले आ जाना अथवा साधना-क्रम चल पड़ने के बाद पहुँचना अनुपयुक्त हैं। इससे अनुशासन बिगड़ता है और साधना का महत्त्व घटता है। इन प्रतिबन्धों से परिजनों को थोड़ी असुविधा तो रहेगी पर साधना के उपयुक्त वातावरण भी और किसी प्रकार यहाँ बन नहीं सकेगा। व्यक्तिगत मैत्री के आधार पर अव्यवस्था फैलाने की छूट नहीं ही माँगी जानी चाहिए।

ब्रह्म वर्चस् साधना गायत्री पुरश्चरणों के साथ जुड़ी रहेगी। दस-दस दिन वालों को 24 हजार का एक पुरश्चरण करना होगा और एक-एक महीने वालों को 24-24 हजार के तीन अनुष्ठान करने होंगे। सोऽहम् उपासना जप, ध्यान, खेचरी मुद्रा की चतुर्विधि उपासना की जो पद्धति गत वर्श काम में लाई जाती रही है। वह तो यथावत् रहेगी ही। साथ ही त्राटक और प्राणायाम के दो प्रयोग अतिरिक्त रूप से सम्मिलित रहेंगे। पंचकोशों को प्रकाशवान् बनाने के लिए घृत दीप के माध्यम से त्राटक को और कुण्डलिनी जागरण के सन्दर्भ में अनुलोम-विलोम सूर्य वेधन प्राणायाम की क्रिया कराई जायेगी। एक घण्टे का विशेष ध्यान, विशेष निर्देशनों के साथ-साधक और शिक्षक साथ-साथ सम्पन्न करेंगे। अनुदान का आदान-प्रदान का माध्यम यह विशेष ध्यान होगा।

योगाभ्यास में नाड़ी शोधन प्रक्रिया प्रधान हैं। इसे आत्म-शोधन भी कहा जा सकता है। जीवन में अब तक हुए पाप कर्मों का विवरण बताना और तद्नुरूप प्रायश्चित का उपाय जानना ब्रह्म वर्चस् साधना का अविच्छिन्न अंग हैं। धुलाई के बिना रँगाई कहाँ हो पाती है ? साधना रँगाई है और प्रायश्चित प्रक्रिया धुलाई। यह सब व्यक्तिगत परामर्श के उपरान्त ही निर्धारित होगा। साधनाएँ भी सब की एक जैसी नहीं हो सकती। सभी मरीजों को एक दवा नहीं दी जा सकती उनकी स्थिति के अनुरूप ही साधना प्रक्रिया निर्धारित होती है। साधकों को शान्तिकुञ्ज बुलाने की आवश्यकता का एक कारण यह व्यक्तिगत पर्यवेक्षण भी है। वातावरण एवं संरक्षण की विशेषता वाली बात तो पहले ही कही जा चुकी है।

मन की स्थिरता- साधना का मूल आधार है। मन अन्न से बनता है। अस्तु ब्रह्म वर्चस् साधना काल में साधकों के आहार का विशेष निर्धारण रहेगा। वह उपवास स्तर का होगा। हमें भी जो की रोटी और छाछ पर अपनी लम्बी उपासना अवधि पूरी करनी पड़ी है। ब्रह्म वर्चस् साधकों को भी इस प्रकार की तपश्चर्या के लिए तैयार होकर आना चाहिए। एक दिन दाल-चावल शाक-दूसरे दिन दलिया, दाल-चावल आँवला, शंख-पुष्पी ब्राह्मी, गोरखमुण्डी, तच, शतावरी की चटनी दोनों समय। यही सामान्य आहार रहेगा। प्रातःकाल पंचगव्य। उपरोक्त भोजन बनाने, पकाने का उत्तरदायित्व माता जी निर्वाहेंगी। ताकि आहार की सात्विकता का प्रभाव साधना काल में परिलक्षित होता रहे।

दिनचर्या प्रातः 4 बजे से आरम्भ होकर रात्रि के नौ बजे तक चलेगी। इसी बीच तीन घण्टे का मौन भी रहा करेगा। आश्रम से गंगा तट तक का ही आवागमन रहेगा। ऋषिकेश आदि देखने की-बाज़ार से खरीद फरोख्त की व्यवस्था साधना काल में नहीं बनेगी। इससे आगे या पीछे ही वह सब करना होगा। बाज़ार में कुछ भी चाटते पीते रहने की छूट किसी को भी न मिलेगी। इसलिए चटोरे, अनुशासन हीन व्यक्तियों को या तो नहीं ही आना चाहिए अन्यथा साधना काल में अपने ऊपर अंकुश रखे रहने की बात सोचनी चाहिए। तपश्चर्या का महत्त्व और गौरव जो समझ सके उसमें समुचित श्रद्धा बनाये रह सके उन्हीं के लिए इस साधना की सार्थकता है। अव्यवस्था फैलाने में तो साधक, शिक्षक तब सभी निंदित होते हैं।

जो लोग पिछले पाँच वर्षों में किसी सत्र में सम्मिलित हो चुके हैं । साधनारत रहे । स्वर्ण जयन्ती वर्श में सम्मिलित हुए हैं उन्हें ब्रह्म वर्चस् सत्रों में प्राथमिकता दी जाएगी। यों प्रतिबन्ध किन्हीं भी सत्पात्रों पर नहीं है। हर हालत में -किस सत्र में आना है इसका आवेदन पत्र भेजते हुए पूर्व स्वीकृति के कोई न आवे। आवेदन पत्र में (1) प्रवेशार्थी का पूरा नाम पता (2) आयु (3) जन्मजाति (4) शिक्षा (5) व्यवसाय (6) मिशन से परिचय एवं सम्बन्ध का विवरण (7) अब तक की साधनाओं का परिचय (9) साधना काल में अनुशासन पालन करने का आश्वासन इन सभी बातों का विस्तृत विवरण लिखकर भेजा जाना चाहिए।


साधना स्वर्ण-जयंती वर्ष और उसकी पूर्णाहुति

साधना का सही स्वरूप समझा जा सके और उसे सही ढंग से सही व्यक्तियों द्वारा अपनाया जा सके तो उसके सत्परिणाम सुनिश्चित हैं । यह तथ्य साधना स्वर्ण जयंती वर्श में सर्व साधारण को समझाने का प्रयत्न किया गया और उसमें समुचित सफलता भी मिली। बसन्त पर्व 76 से बसंत 77 तक के एक वर्श में प्रायः एक लाख साधकों का नियमित रूप से साधना क्रम संकल्पपूर्वक संपन्न हुआ । इसमें 2400 करोड़ सामूहिक गायत्री जप अनुष्ठान संपन्न हुआ।

साधना स्वर्ण जयंती वर्ष का पिछला वर्श जपात्मक था। उसे पूर्वार्ध कहना चाहिए। पुरश्चरणों का उत्तरार्ध होमात्मक होता है। वर्तमान वर्ष में इस पक्ष को पूरा किया जा रहा है। हमारे 24 वर्श के 24 गायत्री महापुरश्चरणों की पूर्णाहुति गायत्री तपोभूमि के सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ में संपन्न हुई थीं। उसकी आहुतियाँ उस महायज्ञ में संपन्न हुई थीं और शेष आधे देश के कोने-कोने में संपन्न हुए एक हजार यज्ञों में पूर्ण हुई थीं। तब 24 महापुरश्चरणों में प्रायः 6 करोड़ जप हुआ था। इस बार सामूहिक पुरश्चरण में 2400 करोड़ जप हुआ है। उसकी पूर्णाहुति के लिए भी आहुतियाँ आवश्यक हैं। यह आयोजन एक स्थान पर नहीं होगा। जप जब विकेंद्रित रूप में हुआ है तो उसकी आहुतियाँ भी उसी प्रकार होंगी। इस वर्श गायत्री परिवार की समस्त शाखाओं, प्रतिभाशाली व्यक्तियों द्वारा अपने-अपने स्थान पर पाँच कुण्डी, नौ कुण्डी छोटे गायत्री यज्ञ संपन्न होंगे। इनके साथ ज्ञान यज्ञ की आवश्यकता पूर्ण करने वाले युग-निर्माण सम्मेलन अनिवार्य रूप से जुड़े रहेंगे। इन आयोजनों द्वारा व्यक्ति, परिवार और समाज के परिष्कार की प्रेरणाएँ जन-मानस में उभारी जानी है। बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में प्रखरता संपन्न करने के लिए प्रबल प्रयत्न किये जाते हैं। मनुष्य का जीवन दर्शन उत्कृष्ट होने पर ही व्यक्ति और समाज की आये दिन उलझने वाली अगणित समस्याओं का समाधान हो सकता है। अध्यात्म क्षेत्रों की यही पृष्ठभूमि रही है। राजतंत्र सामयिक विकृतियों के निराकरण एवं आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन जुटाते हैं। उनकी योजनाएँ सामयिक होती हैं। धर्म-तंत्र स्थायी आधारों को हाथ में लेता है और स्थायित्व प्रदान करने वाले प्रयत्नों में जुटा रहता है। हमें विनम्र धर्म-सेवी के रूप में अपने उत्तरदायित्व निबाहने हैं। इसके लिए लोक-शिक्षण आवश्यक है। इस वर्ष जो 1000 आयोजन होने हैं उन्हें छोटे गायत्री यज्ञों और बड़े युग-निर्माण आयोजनों का सम्मिलित स्वरूप ही समझना चाहिए। इससे सूक्ष्म वातावरण में दिव्य चेतना भरने और जनमानस में सद्भावना भरने के उभय-पक्षीय प्रयोजन पूर्ण होंगे। जहाँ जिसके लिए जिस प्रकार संभव हो रहा है अपने-अपने यहाँ इस साधना वर्श की पूर्णाहुति उत्तरार्र्द्ध की तैयारी कर रहे हैं। यह हर्श और सन्तोश की बात है। इन प्रयत्नों का इन पंक्तियों द्वारा अभिवादन और प्रोत्साहन किया जा रहा है। इस दिशा में प्रस्तुत किये गये अनुदान बीज के रूप में गलेंगे तो सही पर उनके प्रतिफल सुविकसित अक्षय वट के रूप में पल्लवित होंगे यह भी निश्चित है। इन आयोजनों की तिथियाँ निर्धारित करने एवं प्रचारक भेजने के संबंध में गायत्री तपोभूमि मथुरा से ही संपर्क स्थापित करें।

अपने जीवन का प्रायः समूचा भाग गायत्री मंत्र के निखार एवं प्रसार में लग गया है जो बचा-खुचा है वह भी इसी के लिए समर्पित रहेगा। साधना स्वर्ण जयंती वर्श में भूतकाल की समीक्षा और भविष्य की रूपरेखा निर्धारित करने का अवसर मिला है। इससे हमारा उत्साह और प्रयास बढ़ना ही चाहिए। परिजनों का जो सहचरत्व सहगमन पिछले दिनों मिलता रहा है, भूतकाल की अपेक्षा भविष्य में उसकी अभिवृद्धि ही होगी ऐसी आशा और अपेक्षा की गई है।


नई पीढ़ी को सुसंस्कृत बनाने की एक वर्षीय शिक्षा

नई पीढ़ी को सुयोग्य और सुसंस्कृत बनाने के उद्देश्य से छोटी प्रयोगशाला के रूप में कई वर्ष से एक प्रशिक्षण प्रक्रिया चलाई जा रही है। इस प्रयोग की सफलता पर हम सबको गर्व और संतोष ।

गायत्री तपोभूमि में युग-निर्माण विद्यालय लगभग दस वर्ष से चल रहा है। उसमें किशोरों एवं युवकों को आजीविका उपार्जन की क्षमता के साथ-साथ प्रतिभाशाली व्यवहारकुशल एवं सुसंस्कृत व्यक्तित्व बनाने की शिक्षा दी जाती है। स्थान की कमी के कारण प्रायः पचास छात्रों को ही प्रवेश मिल पाता है। पर उतने ही जैसे कुछ बन कर निकलते हैं उसमें उन्हें स्वयं को, अपने अभिभावकों को, तथा शिक्षा-व्यवस्था करने वालों को असाधारण संतोष रहता है। शिक्षण में लगा एक वर्ष हर दृष्टि से सार्थक हुआ माना जाता है।

युग-निर्माण विद्यालय का एक वर्षीय पाठ्यक्रम 1 जुलाई से आरंभ होता है। उसमें 18 वर्ष से अधिक आयु के छात्र लिए जाते हैं। शिक्षा मैट्रिक के समकक्ष होनी चाहिए। शारीरिक और मानसिक दृष्टि से निरोग, अनुशासन प्रिय एवं चरित्र निष्ठ छात्र ही लिये जाते हैं । शिक्षण में स्वास्थ्य रक्षा, मानसिक संतुलन, लोक-व्यवहार, पारिवारिक उत्तरदायित्व, अर्थ-व्यवस्था, सामाजिक कर्त्तव्य, धर्म, दर्शन और अध्यात्म जैसे जीवनोपयोगी अनेकों आवश्यक विषय पढ़ाए ही नहीं, हृदयंगम भी कराए जाते हैं। कहना न होगा कि यह शिक्षा जीवन में सर्वतोमुखी विकास की दृष्टि से अतीव उपयोगी सिद्ध हुई हैं। अब तक निकले हुए छात्रों में से अधिकांश ने अपने क्षेत्र में असाधारण कर्मठता और सज्जनता का परिचय दिया है।

इस प्रशिक्षण में स्वतंत्र आजीविका उपार्जन के कितने ही महत्त्वपूर्ण उद्योगों की शिक्षा सम्मिलित रखी गई है। (1) रेडियो, ट्रांजिस्टर नए बनाना तथा पुरानों की मरम्मत करना (2) बिजली का फिटिंग, मोटरो की बाइडिंग तथा पंखा, हीटर आदि यंत्रों की मरम्मत (3) प्रेस उद्योग की कंपोज, छपाई, वाइडिंग, व्यवस्था, संचालन, संबंधित कानून आदि की समान जानकारी (4) लघु उद्योग-सर्फ, धूपबत्ती, मोमबत्ती , मंजन, रबड़, स्टैंप तथा प्लाईवुड की तस्वीरें।

1 जुलाई से आरंभ होने वाले सत्र में जिन्हें प्रवेश पाना हो, वे युग-निर्माण विद्यालय मथुरा के पते पर अपने आवेदन पत्र यथासंभव जल्दी ही भेज दें। स्थान पूरे हो जाने से देर में आवेदन करने वालों को प्रायः हर वर्ष निराश ही रहना पड़ता है।

शान्तिकुञ्ज हरिद्वार की कन्या शिक्षण सत्र व्यवस्था भी एक वर्ष की है। उसमें 16 से अधिक आयु की, मैट्रिक के समकक्ष शिक्षा प्राप्त, निरोग एवं अनुशासन प्रिय लड़कियों को ही प्रवेश मिलता है। गृह प्रबंध, पारिवारिक सद्भावना बनाए रहने का ऐसा पाठ्यक्रम इस वर्ष में पूरा कराया जाता है, जिससे वे भावी जीवन में सुयोग्य गृह लक्ष्मी की भूमिका संपन्न कर सकें। संगीत में कई वाद्य यंत्रों की प्रवीणता-भाषण कला की कुशलता यह दो पाठ्यक्रम ऐसे हैं, जिनके आधार पर छात्रा नारी जागरण एवं अन्य क्षेत्रों में सुयोग्य समाज सेविका सिद्ध हो सकती है। गृह उद्योगों में (1) कपड़ा बुनना (2) सिलाई, कढ़ाई (3) स्वेटर , मोजे, बनियान आदि मशीनों से बुनना (4) प्रेस उद्योग की समग्र शिक्षा (5) टूट-फूट की मरम्मत (6) शाक वाटिका (7) डबल रोटी, बिस्किट आदि बनाना (8) खिलौना उद्योग(9) साबुन, सुगंधित तेल, शरबत, मोमबत्ती तरह-तरह की स्याही (10) रबड़ की मुहरें बनाना। इनके अतिरिक्त भी अन्य कई उद्योग छात्राओं को एक वर्ष में ही सिखा दिए जाते हैं

कन्याओं का एक वर्षीय शिक्षण 1 जुलाई से ही आरंभ होता है। आवेदन पत्र जल्दी ही शान्तिकुञ्ज हरिद्वार के पते पर भेजें जाएँ। सीमित स्थान भर जाने पर प्रवेश संभव न होगा।

*समाप्त*