प्रकृति के रहस्यों को जितनी तत्परता से खोजा रहा है, उसी अनुपात से एक से एक बड़े रहस्यों और शक्ति स्रोतों का पता लगता चल रहा है। आदिम काल में मनुष्य भी अन्य पशुओं की तरह ही मात्र अपने शरीर पर निर्भर था तत्परता पूर्ण शोधों ने अग्नि, विद्युत, अणु, ऊर्जा आदि अनेक शक्तियों को उसके वशवर्ती बना दिया। ज्ञान-विज्ञान की अभिनव, उपलब्धियाँ ही उसे सशक्त और सुसम्पन्न बनाती चली जा रही है। यह सब तत्परता पूर्ण शोधों का ही परिणाम है। वैसा न क पाने के कारण अन्य प्राणी असमर्थ एवं असहाय ही बने हुए है। यों प्रकृति का महान् भण्डार उनके सामने भी वैसे ही खुला पड़ा है, जैसा कि मनुष्य के सामने।
प्रकृति क्षेत्र में अधिक महत्त्वपूर्ण और रहस्य पूर्ण है- चेतना का समुद्र। वह सूक्ष्म जगत के रूप में इस समस्त ब्रह्माण्ड में हिलोरें ले रहा है। समुद्र को रत्नाकर, रत्न भण्डार कहा जाता है, पर वास्तविक सम्पदाएँ और शक्तियाँ चेतना के समुद्र में ही भरी पड़ी है। प्रकृति में तो उसी की कुछ सम्पदाओं और विभूतियों का स्त्रोत, कारण और आधार है। हमारे भीतर और बाहर इतना कुछ है, जिसकी कल्पना करना तक अशक्य है। न तो ब्रह्माण्ड के विस्तार की कल्पना हो सकती है और न चेतना के अन्तरंग बहिरंग स्तरों की गरिमा का मूल्यांकन कर सकना सम्भव है। हम अनंत वैभव के भाण्डागार के बीचों-बीच ही तो निवास कर रहे है।
दरिद्रता, अतृप्ति और अशान्ति दूर करने के लिए जिस वैभव की आवश्यकता है, उसकी उपलब्धि के दो ही पुरुषार्थ करने पड़ेंगे एक तत्परतापूर्वक शोध और दूसरा विज्ञान शक्तियों का पराक्रम पूर्ण उपयोग। जी यह चरण उठा सका उसके लिए ऐश्वर्य और आनन्द की कोई कमी नहीं रह सकती। इसी दिशा में बढ़ चलने का राज-मार्ग साधना पथ कहलाता है।
निम्न योनियों का गुजारा तो सामान्य शरीर निर्वाह भर का होता है- पर खोज, असन्तोष जैसे कोई कारण नहीं होते। इस दृष्टि से विकसित समझा जाने वाला मनुष्य अविकसित कहे जाने वाले प्राणियों से भी अधिक घाटे में रहता है। अन्य प्राणी आत्म-ग्लानि एवं आत्म-प्रताड़ना जैसी पीड़ाएँ नहीं सहते, किन्तु मनुष्य इस जन्म में भी विक्षोभों और पीड़ाओं से संत्रस्त नारकीय जीवन जीता है, और भविष्य भी अन्धकारमय बनाता है।
विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या मनुष्य को भगवान् ने ऐसी ही विडम्बना भरी स्थिति में उलझा कर भेजा है जिसमें वह एक ओर तो सृष्टि का मुकुट-मणि कहलाये और दूसरी ओर अविकसित कहे जाने वाले प्राणियों की तुलना में भी अधिक व्यथा-वेदनाएँ सहते हुए जीवन गुजारे?
खोजने पर एक ही उत्तर निखर कर सामने आता है कि ईश्वर के पास जो कुछ वह सब कुछ उसने बीज रूप से मनुष्य को सौंप दिया है और यह स्वतन्त्रता दी है कि इन साधारण और असाधारण उपलब्धियों में से जो भी- जितनी भी चाहे उतनी प्रसन्नतापूर्वक बिना किसी रोक-टोक के प्राप्त कर सकता है। शर्त एक ही है कि अपनी पात्रता सिद्ध करे और उसी अनुपात से प्रगति पथ पर अग्रसर कराने वाले अनुदान प्राप्त करता चला जाये। सामान्य गृहस्थ में भी ऐसा होता है। साधन सम्पन्न पिता के मन में अपनी सम्पदा सन्तान को देने का निश्चय रहता है किन्तु उनमें विकसित होने और उत्तरदायित्व सम्भालने की क्षमता जैसे-जैसे बढ़ती है, उसी अनुपात से साधन एवं अधिकार हस्तांतरित किये जाने लगते हैं। पागल, आवारा या ऐसी ही अन्य हीनताओं से ग्रसित सन्तान के प्रति समुचित ममता होते हुए भी ऐसा कुछ याँ सौंपा नहीं जाता जो महत्त्वपूर्ण कहा जा सके। इसमें पिता का पक्ष-पात या विद्वेष नहीं, विवेक ही काम कर रहा होता है। स्पष्ट है कि यदि पात्रता विकसित न होने पर भी निर्वाह से अधिक अनुदान दिये जायेंगे तो उनका दुरुपयोग होगा। इसमें प्राप्तकर्ता और दाता दोनों का ही अहित है। बारूद का थैला बच्चों के हाथ में सौंप दिया जाय तो बच्चे उससे फुलझड़ी छुड़ाने का लोभ संवरण कर नहीं सकेंगे और बेतरह जल मरेंगे सौंपने वाला बदनाम होगा और अबोधों को न देने लायक वस्तु देकर उनके विनाश का निमित्त बनने पर पश्चाताप भी करेगा। बारूद तथा समीपवर्ती वस्तुएँ जल जाने की आर्थिक हानि तो स्पष्ट है ही।
भगवान ने मानवी सत्ता में अजस्र अनुदानों के भाण्डागार भर दिये हैं। साथ ही ऐसी स्वसंचालित व्यवस्था भी जोड़ दी है कि जो जितनी पात्रता का प्रमाण दे वह उतनी ही मात्रा में उतने ही स्तर के अनुदान प्राप्त कर सके। सरकारी नियुक्तियों और पदोन्नतियों में भी यही सिद्धान्त काम करता है। योग्यता का प्रमाण देने- कुशलता प्रकट करने और प्रतिस्पर्धा में सफल होने की कसौटियों पर कसे जाने के पश्चात् ही नियुक्तियाँ होती है। पदोन्नति में भी अनुभव काल और क्रिया कौशल को ध्यान में रखा जाता है। वेतन की न्यूनाधिकता-पद-सम्मान आदि का निर्धारण इसी पात्रता की कसौटी पर कसने के उपरान्त ही किया जाता है। कृपापूर्वक किसी को कुछ दिया जाने लगे तो इसमें पक्ष-पात का दोषारोपण किया जाने लगेगा। खुशामद पसन्द और रिश्वतखोर लोग जिस पर अनुपयुक्त कृपा बरसा देते हैं, उसके प्रति तथा अपने प्रति जन आक्रोश ही उभारते हैं। यहाँ न्याय और औचित्य की ही प्रतिष्ठा है। यदि भगवान भी अहैतुकी कृपा बरसाने लगें तो उतने उच्च पद बने रहने के अधिकार से उन्हें भी वंचित होना पड़ेगा विश्व की स्वसंचालित औचित्य गरिमा उनके प्रभुत्व को भी चुनौती देने लगेगी। स्पष्ट है कि विश्व व्यवस्था बनाने वाले भगवान स्वयं ही अव्यवस्था फैलाने के दोषी नहीं बन सकते।
मनोयोग पर अध्ययन करने वाले छात्र ऊँची श्रेणी में उत्तीर्ण होते हैं, परिश्रमी किसान अच्छी फसल काटते हैं, कर्मठ शिल्पी यशस्वी बनते हैं। उत्साही व्यायाम परायण पहलवान कहलाते और कुश्ती पछाड़ते हैं। सूझ-बूझ और तत्परता के बल पर व्यापारिक सफलताएँ मिलती हैं, निष्ठावान् साधकों को सिद्धियाँ उपलब्ध होती है। तन्मय कलाकार दर्शकों का मन मोहते हैं। साहसी योद्धा विजय थी इस का वरण करते हैं। विभिन्न क्षेत्रों की सफलताएँ इस बात पर निर्भर रहती है कि प्रस्तुत प्रयोजनों के लिए कितनी तत्परता एवं तन्मयता बरती गई। कितने धैर्य, साहस और श्रम का नियोजन किया गया?
भौतिक क्षेत्र के सभी पक्षों में योग्यता एवं दक्षता के मूल्य पर प्रगतिशाली उपहार खरीदे जाते हैं। भिक्षुकों तक को दानी लोग इस आधार पर न्यूनाधिक देते हैं कि किस भिक्षुक को कितनी आवश्यकता है और किसे कितना देने पर उसका क्या उपयोग होगा? सब भिक्षुकों को कोई अविवेकी दानी ही समान मात्रा में सहायता देगा। आम-तौर से गिड़गिड़ाहट और आग्रह पर कम और याचक की स्थिति पर ही अधिक ध्यान दिया जाता है।
अध्यात्म क्षेत्र में भी यही सिद्धान्त काम करता है। भगवान् से या देवताओं से अनुनय-विनय के आधार पर वरदान प्राप्त होने की मान्यता भ्रमपूर्ण है। वे शक्तियाँ इतनी उदात्त है कि शब्द जंजाल से अथवा छुट-फूट उपहारों से उन्हें फुसलाना किसी भी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता। जो देव प्रकृति को इतनी घटिया मानते हैं वे परोक्ष रूप से उन्हें ऐसे अबोध बालकों की स्थिति में खड़ा कर देते हैं जिन्हें वस्तुस्थिति से- औचित्य से कोई वास्ता नहीं है। जो प्रार्थना मात्र से प्रभावित होकर मनोकामना पूर्ति का वरदान देने लगे वे पात्रता के सिद्धान्त को ही समाप्त करेंगे। देवता या भगवान् यदि मनुष्यों से अधिक बुद्धिमान और आदर्शवादी है, तो उनसे इस प्रकार के अंधेर की आशा नहीं ही करनी चाहिए।
आत्मिक क्षेत्र की ऐसी असंख्य उपलब्धियाँ है जिनके सहारे मानवी व्यक्तित्व असाधारण रूप से परिष्कृत होता है। उस उपलब्धि के सहारे उन्हें एक से एक बढ़ी-चढ़ी साँसारिक सफलताएँ मिलती है और गुण, कर्म, स्वभाव की विभूतियों से सुसम्पन्न होने के कारण उन्हें महामानवों के स्तर पर पहुँचने का सौभाग्य मिलता है कहना न होगा कि पात्रता अपने अनुरूप सत्परिणाम सुनिश्चित विश्व-व्यवस्था के कारण सहज ही उपलब्ध करती चली जाती है।
पात्रता का विकास है-वह उपलब्धि जिसके लिए ‘साधना’ के आधार पर आत्म-परिष्कार के प्रबल प्रयत्न सम्पन्न किये जाते हैं। ईश्वर की प्रसन्नता इसी उपाय से सम्भव हो सकती है। उन्हें अभीष्ट वरदान देने के लिए एकमात्र इसी शर्त पर सहमत किया जा सकता है। साधना का स्वरूप- विधि-विधान-क्रिया कृत्य समझने से पहले हमें उसके उद्देश्य को समझना चाहिए। तथ्य से विपरीत स्तर की मान्यता बना लेने से नये-नये किस्म की भ्रान्तियाँ उत्पन्न होगी और सफलता न मिलने पर तरह-तरह के संशयों और अविश्वासों के जंगलों में भटकना पड़ेगा।
साधना को बाजीगरों जैसी हाथ की सफाई वाली क्रिया करके तरह-तरह के अजूबे दिखाने, बनाने वाली कौतुक करतूत नहीं मानना चाहिए । आमतौर से लोग साधना के नाम पर प्रयुक्त होने वाले विधि-विधानों को ही सब कुछ समझते हैं और असफलता मिलने पर इन्हीं विधानों में कोई खोट रह जाने की बात सोचते हैं। यह तथ्य भुला दिया जाता है कि वाणी के उच्चारण, अंगों के संचालन एवं पूजा वस्तुओं के उपयोग भर से आध्यात्मिक क्षमताएँ विकसित होने तथा उनके सत्परिणाम सामने आने का लाभ नहीं मिल सकता है। क्रिया-कृत्यों का महत्त्व तो है, पर उनका उद्देश्य व्यक्तित्व के स्तर को उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रेरणात्मक आधार खड़े करना है। यदि निष्कृष्ट चिन्तन और घृणित चरित्र की स्थिति में सुधार, परिवर्तन न हो तो फिर समझना चाहिए कि पूजा-पाठ के उपचार मात्र कौतुक कौतूहल ही बनकर रह गये। घिनौने व्यक्तित्व किसी दैवी शक्ति के प्रिय पात्र नहीं बन सकते । उनका कोई साधन विधान आत्म-शक्ति के अभिवर्धन में सहायक नहीं हो सकता। इसके बिना वे लाभ मिल ही नहीं सकते जो आध्यात्मिक उपलब्धियों के नाम से जाने जाते हैं। धूर्तता के आधार पर जादूगरों
यथा दीपो निवातस्थो नेगंते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचितस्य पुज्जयो योगात्मनः॥
“ जिस प्रकार वायु रहित स्थान स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वही स्थिति परमात्मा के ध्यान द्वारा योगी के जीते हुए चित की होती हैं।”
जीवन का सार तत्त्व प्राण है। यह प्राण ही प्रगति का आधार है। समृद्धि उसी के मूल्य पर खरीदी जाती है। सिद्धियों और विभूतियों का उद्गम स्त्रोत वही है। यह प्राणतत्त्व अपने भीतर प्रचुर परिमाण में भरा पड़ा है। उसका चुम्बकत्व बढ़ा देने पर विश्व प्राण में भी उसे अभीष्ट मात्रा में उपलब्ध और धारण किया जा सकता है। मानवी सत्ता में सन्निहित इस प्राण भंडार को प्राणमय कोश कहते हैं। सामान्यतया यह प्रसुप्त स्थिति में पड़ा रहता है और शरीर निर्वाह भर के काम हो पाते हैं। उसे साधना विज्ञान के आधार पर जागृत किया जा सके तो सामान्य में से असामान्य का प्रकटीकरण हो सकता है। प्राण की क्षमता की असीम है। प्राण साधना से इस असीमता की दिशा में बढ़ चलना- प्रचुर सशक्तता प्राप्त कर सकना सम्भव हो जाता है।
अध्यात्मशास्त्र में प्राण तत्त्व की गरिमा का भाव भरा उल्लेख है। उसे ब्रह्म तुल्य माना और सर्वोपरि ब्राह्मी शक्ति का नाम दिया गया है। प्राण की उपासना करने आग्रह किया गया है यह प्राण आखिर है क्या? यह विचारणीय है।
विज्ञान वेत्ताओं ने इस संसार में ऐसी शक्ति का अस्तित्व पाया है जो पदार्थों की हलचल करने के लिए ओर प्राणियों के सोचने के लिए विवश करती है। कहा गया है कि यही वह मूल प्रेरक शक्ति है जिससे निश्चेष्ट को सचेष्ट और निस्तब्ध को सक्रिय होने की सामर्थ्य मिलती है। वस्तुएँ शक्तियाँ और प्राणियों की विविध विधि हलचलें इसी के प्रभाव से सम्भव हो रही है। समस्त अज्ञात और विज्ञात क्षेत्र के मूल में यही तत्त्व गतिशील है और अपनी गति से सब को अग्रगामी बनाता है। वैज्ञानिकों की दृष्टि में इसी जड़ चेतन स्तरों की समन्वित क्षमता का नाम प्राण होना चाहिए। पदार्थ को ही सब कुछ मानने वाले ग्रैविटी, ईथर, मैगनेट के रूप में उसकी व्याख्या करते हैं अथवा इन्हीं की उच्चस्तरीय स्थिति उसे बताते हैं। चेतना का स्वतन्त्र अस्तित्व मानने वाले विज्ञानी उसे साइकिक फोर्स लेटेन्ट हीट कहते हैं।
ऋषियों का अभिप्राय प्राण से क्या है, इसका परिचय उस शब्द के नामकरण के आधार पर प्राप्त होता है। प्राण शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘अन्’ धातु से होती है। ‘अन्’ धातु जीवन, शक्ति, चेतनात्मक है। इस प्रकार उसका अर्थ प्राणियों की जीवनी शक्ति के रूप में किया जाता है।
अब प्रश्न उत्पन्न होता है कि चेतन की जीवनी शक्ति क्या हो सकती है। यहाँ उसका उत्तर संकल्प बल के रूप में दिया जा सकता है जिजीविषा से लेकर प्रगति शीलता ही तक उसके असंख्य रूप है। अन्तःकरण की आकांक्षा ही विचार शक्ति और क्रिया शक्ति की उत्तेजना एवं दिशा होती है। मात्र आकांक्षा रहने से काम नहीं चलेगा। उसे तो कल्पना या ललक मात्र कहा जा सकता है। आकांक्षा के साथ उसे पूरा करने की साहसिकता भी जुड़ी हुई हो तो उसे संकल्प कहा जा सकेगा। संकल्प में आकांक्षा, निष्कर्ष, योजना और अग्रगम्य के लायक अभीष्ट साहसिकता जुटी रहती है। यह संकल्प ही मनुष्य जीवन का वास्तविक बल है उसी के सहारे पतन उत्थान के आधार बनते हैं। परिस्थितियाँ इसी संकल्प भरी मन संकल्प तत्त्व को चेतन का प्राण कहा जा सकता है। इसी की उपासना करने के लिए अभिवर्धन के लिए तत्त्वदर्शियों ने निर्देश दिये है। प्रज्ञोपनिषद ने प्राण की व्याख्या संकल्प रूप में की है।
यच्चितस्तेनैष प्राणामायति प्राणस्तेजसा युक्तः महात्मना यथा संकल्पितं लोकं नयति।
- प्रश्नोपनिषद् 3।10
आत्मा का जैसा संकल्प होता है वैसा ही स्वरूप संकल्प इस प्राण का बन जाता है। यह प्राण ही जीव के संकल्पानुसार उसे विभिन्न योनियाँ प्राप्त कराता है।
विकासवाद के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में उत्पन्न हुए एककोशीय जीवाणु इसी संकल्प शक्ति की प्रेरणा से क्रमशः आगे बढ़े और विकसित हुए है। अध्यात्म शास्त्र के अनुसार ब्रह्म ने एक से बहुत होने की इच्छा की और ब्रह्म इच्छा शक्ति ही प्रकारान्तर से परा-अपरा प्रकृति बनकर जगत् बन गई। उसी का विस्तार पंचतत्वों और पंच प्राणों में होता चला गया है।
विश्व के अन्तराल में काम करने वाली समग्र सामर्थ्य को व्याख्या के रूप में प्राण कहा जाता है। वह जड़ और चेतन दोनों को ही प्रभावित करती है। उपासना उसके इस एक पक्ष की ही की जाती है। जो मनुष्य को सत्प्रयोजनों की स्थिति में अग्रसर करने ने लिए प्रयुक्त होती है। चेतना की सामर्थ्य तो उभय पक्षीय है। वह दुष्टता के क्षेत्र में दुस्साहस बनकर भी काम करती है। इस निषिद्ध पक्ष को नहीं जीवन को उत्कृष्टता की और अग्रसर करने वाले सत्संकल्पों को उपास्य प्राण माना गया है। उसको जितना मात्र उपलब्ध होता है उसी अनुपात से प्रगतिशील का लाभ मिलता है। इन विशेषताओं को देखते हुए उसे ब्राह्मी शक्ति - ब्रह्म प्रेरणा एवं साक्षात् ब्रह्म कहा गया है। सुविधा के लिए इसे अन्तरात्मा की पुकार भी कह सकते हैं। शास्त्र की दृष्टि में प्राण तत्त्व की व्याख्या इस प्रकार होती है-
प्राणो ब्रहोतिह स्माह कोषीतकिस्तस्य ह वा एतस्य प्राणस्य ब्रहमणो मनो दूतं वाक्परिवेष्ट्री चक्षुर्गात्र श्रोत्रं संश्रावयितृ यो ह वा एतस्य प्राणस्य ब्रहमणो मनो दूतं वेद दूतवान्भवति यश्चक्षु गोप्तृ गोप्तमान्भवति यः श्रोतं संश्रावयितृ संश्रावयितृमान्भवति यो वाचं परिवेष्ट्रीमान्भवति।
- कौषीतकि ब्राहमणोपनिषद् 2।1
यह प्राण ही ब्रह्म है। यह सप्राण है। वाणी उसकी रानी है। कान से द्वारपाल है। नेत्र अंग रक्षक, मन दूत, इन्द्रियाँ दासी, देवताओं द्वारा यह उपहार उस प्राण ब्रह्म को भेंट किये गये है।
प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे।
यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मिन् सर्वप्रतिष्ठितम्-अथर्व-कां ।।
उस प्राण को मेरा नमस्कार है, जिसके अधीन यह सारा जगत है, जो सबका ईश्वर है, जिसमें यह सारा जगत् प्रतिष्ठित है।
प्राणोऽस्मि प्रज्ञात्या। तं मामायुरमृतभित्युपमृतं भित्युपास्स्वाऽऽयुः प्राणः प्राणोवा आयुः। यावदस्मिच्छरीरे प्राणो वसित तावदायुः। प्राणेनहिं एव-गस्मिन् लोकेऽमृतत्व माप्नोति।
- शाँखायन
मैं ही प्राण रूप प्रज्ञा हूँ। प्राण ही आयु और अमृत जानकर उपासना करो। जब तक प्राण है, अभी तक जीवन है। इस लोक में अमृतत्व प्राप्ति का आधार प्राण ही है।
स एष वैश्वानरो विश्वरुपः प्रोणोग्निरुदयते।
प्रश्नो 1।7
वह प्राण रूपी तेजस सूर्य के उदय के साथ समस्त विश्व में फैलने लगता है।
प्राणो भवेत् परब्रहम जगत्कारणमव्यव्ययम्।
प्राणो भवेत् यथामंत्र ज्ञानकोश गतोऽपिवा॥
- ब्रहमोपनिषद्
प्राण ही जगत का कारण परमब्रह्म है। मंत्र ज्ञान तथा पंच कोश प्राण पर आधारित है।
प्राण शक्ति का वही ब्रह्म तेज आँखों में वाणी में चिन्तन और क्रिया में चमकता है। यह चमक ही बौद्धिक क्षेत्र में तेजस्विता और क्रिया क्षेत्र में ओजस्विता कहलाती है। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में यही मनस्विता प्रतिभा बनकर दीप्तिमान होती है। प्राण शक्ति ही सर्वतोमुखी समर्थता कही जाती है।
एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एष पर्जन्यो मद्यवानष्। एष पथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृत। चयत्॥
- प्रश्नो 2।5
यह प्राण ही अग्निरूप धारण करके तपता है। यही सूर्य, मेघ, इन्द्र, वायु, पृथ्वी तथा भूत समुदाय है। सत्-असत् तथा अमृत स्वरूप ब्रह्म भी यही है।
अन्यत्र भी ऐसे ही उल्लेख हैं-
अमृत सुवै प्राणः।
- शतपथ
यह प्राण ही निश्चित रूप से अमृत है।
प्राणोवाब आशाय भूयान्यथा।
- छान्दोग्य
इस प्राण शक्ति की सम्भावना आशा से अधिक है।
प्राणो वैयशोवलम्।
- वृहदारण्यक।
प्राण ही यश और बल है।
प्राणश्च में यज्ञेन कल्पन्ताम्।
- यजुर्वेद
मेरी प्राण शक्ति सत्कर्मों में प्रवृत्त हो।
प्राण को कई व्यक्ति वायु या साँस समझते हैं और श्वास प्रश्वास क्रिया के साथ वायु का जो आवागमन निरन्तर चलता रहता है उसके साथ प्राण की संगति बिठाते हैं। यह भूल इसलिए हो जाती है कि अक्सर प्राण के साथ ‘वायु’ शब्द और जोड़ दिया जाता है यह समावेश सम्भवतः वायु के समान मिलते-जुलते गुण प्राण में होने के कारण उदाहरण की तरह हुआ हो। चूँकि प्राण भी अदृश्य है और वायु भी। प्राण भी गतिशील है और वायु भी। प्राण भी सारे शरीर एवं विश्व में व्याप्त है और वायु भी, इसलिए प्राण की स्थिति मोटे रूप में समझने के लिए उसे वायु के उदाहरण सहित प्रस्तुत किया गया है। किन्तु वास्तविक बात ऐसी नहीं है। वायु पंचतत्वों में से एक होने के कारण जड़ है, किन्तु प्राण तो चेतना का पुंज होने से उनका वस्तुतः कोई सदृश हो नहीं सकता। प्राण को प्रकृति की उत्कृष्ट सूक्ष्म शक्तियों (नेचर्स फाइनर फोर्सेज) में से एक कह सकते हैं। भारतीय योगियों ने इसे मानसिक या इच्छा सम्बन्धी श्वाँस प्रक्रिया (रेशपाइरेशन) के रूप में लिया है। वास्तव में ऐसी ही दिव्य धारा के प्रभाव से उच्च कोटि की आत्मिक शक्तियाँ प्राप्त होनी सम्भव है। श्वास प्रश्वास क्रिया का प्रभाव तो फेफड़ों तक अधिक से अधिक भौतिक शरीर के बलवर्धक तक सीमित हो सकता है।
प्राणोंऽयास्तीति प्राणी।
अर्थात् प्राणवान् को प्राणी कहते हैं। सांख्यकार ने प्राण को तत्त्व नहीं अन्तःकरण का धर्म माना है। सांख्य सारिका में कहा गया है-
स्वालक्षणयं वृत्तिस्त्रयस्य तैषा भवत्य सामान्या।
सामान्यकरण वृत्तिः प्राणद्या वायवः पच्च।
अन्तः करण के चार पक्ष है। चारों का अपना अपना धर्म है। मन का संकल्प, बुद्धि का विवेक, चित्त का धारणा और अहं का अभिमान। इन चारों का सम्मिलित स्वरूप समग्र प्राण है। विभिन्न कार्यों में होने वाले उसके प्रयोगों को देखते हुए प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान भेद से उसे पाँच प्रकार का कहा गया है।
न्याय दर्शन में प्राण को वायु अर्थ में प्रयुक्त किया गया है। सम्भवतः उनका तात्पर्य ‘आक्सीजन’ या वैसी ही किसी अन्य प्रकृति क्षमता से रहा हो। वैशेषिक के अनुसार-
शरीरान्तः संचारी वायुः प्राणः सचैकोऽपि उपाधि भेदात् प्राणायानादि संज्ञां लभते।
शरीर के भीतर संचारित होने वाले वायु प्राण है। वह एक होने पर भी उपाधि भेद से पाँच प्रकार की है। योगदर्शन का अभिमत भी उसी से मिलता जुलता प्रतीत होता है। वेदान्तकार ने इससे अपना मत भेद व्यक्त किया है। ब्रह्म सूत्र में कहा गया है- ना वायु क्रिये प्रथगुपरेशात्। अर्थात् वायु प्राण नहीं है, उनकी क्रिया और सत्ता में भेद है।
छान्दोग्य और प्रज्ञोपनिषद में प्रजापति द्वारा इन्द्रियों की शक्ति परीक्षा के सम्बन्ध में आती है। वे समर्थ भर दीखती तो थी पर प्राण शक्ति के बिना कुछ भी कर सकने में समर्थ न हो सकीं। तब उन सब ने मिलकर प्राण की श्रेष्ठता स्वीकार की और उसे नमन किया।
अधिकांश उपनिषदों ने प्राण को आत्मसत्ता की क्रिया शक्ति माना है और उससे अविच्छिन्न कहा है। आत्मा को ब्रह्म भी कहा जाता है। दोनों की एकता बोधक कितने ही प्रतिपादन मिलते हैं। इस दृष्टि से प्राण को ब्रह्म शक्ति भी कहा गया है।
प्रज्ञोपनिषद में प्राण को व्रात्य ऋषि कहा गया है-
व्रात्यस्त्वं प्राणैकर्षि हे प्राण, तू (व्रात्य) कर्तव्य च्युत तो रहता है फिर भी मूलतः ऋषि ही है। व्याख्याकारों ने अन्य कई ऋषियों के नामों पर प्राण का उल्लेख किया है। उसे गृत्समंद कहा गया है। गृत्स कहते हैं। नियंत्रण कर्ता को मद कहते हैं कामुकता एवं अहंकार को। जो इन पर नियंत्रण कर सके वह गृत्स मद’ सब का मित्र होने से उसे विश्वामित्र कहा गया है। पापों से बचाने वाला-अत्रि पोषक होने से भारद्वाज और विशिष्ट होने से उसकी संज्ञा विशिष्ट बताई गई है।
कषाय कल्मषों और कुसंस्कारों का निराकरण, उन्मूलन इस प्रचण्ड संकल्प शक्ति के सहारे ही सम्भव होता है। ढीले पोले स्वभाव वाले आत्म परिष्कार की बात सोचते भर है, पर वैसा कुछ कर नहीं पाते। कल्पना जल्पनाओं में उलझे रहते हैं। प्रचण्ड संकल्प के बल पर उत्पन्न आत्मिक साहस ही दुर्भावनाओं, दुष्प्रवृत्तियों और कुसंस्कारों से जूझता है। उत्कृष्टता की दिशा में बढ़ चलने के लिए प्रेरणा और अवरोधों से जूझने की क्षमता उसी आत्मबल से मिलती है जिसे प्राण कहा जाता है। प्राण देवता के अनुग्रह से मनोनिग्रह और विकृतियों के उन्मूलन होने की बात बृहदारण्यक उपनिषद् में इस प्रकार कही गई है-
सा वा एषा देवतैतासां देवतानां पाप्मानं मृत्यु-मपहत्य यत्रासां दिशामन्तस्तद्गमयांचकार तदासां पाप्मनो विन्यदधात् तस्मान्न जनमियान्नान्तमियान्ने त्पामानं मत्यमन्ववायानोति।
वृ0अ॰ 1।3।10
प्राण देवता ने इन्द्रियों के पापों को दिगन्त तक पहुँचाकर विनष्ट कर दिया। क्योंकि वह पाप ही इन्द्रियों के मरण का कारण था। इन कल्मषों को इस निश्चय के साथ भगाया कि पुनः न लौट सके।
अथ चक्षुरत्यवहत् तद् यदा।
मृत्युमत्यमुच्यत स आदित्योऽपिवत्।
सोऽसावादित्यः परेण-मृत्युमतिक्रान्तस्तपति वृ0उ॰ 1।3।14
जब प्राण की प्रेरणा से चक्षु निष्पाप हुए तो वे आदित्य बनकर अमर हो गये और तपते हुए सूर्य की तरह अपने तप से ज्योतिर्मय हो उठे
इसी प्राण शक्ति को गायत्री कहते हैं। यों वह क्षमता स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों के कण-कण में संव्याप्त है, पर उसका केन्द्र संस्थान मल मूत्र छिद्रों के मध्य मूलाधार चक्र गहरे में माना गया है। प्राण शक्ति के अभिवर्धन से इसी मूलाधार संस्थान का द्वार खटखटाना पड़ता है। दुर्ग में प्रवेश करने के लिए उसका फाटक खोलना या तोड़ना पड़ता है। मूलाधार चक्र की साधना से यही प्रयोजन पूरा होता है। गायत्री की प्राण शक्ति मूलाधार चक्र से सम्बन्धित होने का उल्लेख गायत्री मंजरी में मिलता है-
यौगिकानां समस्तानां साधनानां तु हे प्रिये!
गाययेव मतालोके मूलाधारा विदो वरै॥
- गायत्री मंजरी
विद्वानों का मत है कि समस्त यौगिक साधनाओं का मूलाधार गायत्री ही है।
प्राणाग्नय एवास्मिन् ब्रहमपुरे जाग्रति।
- प्रश्नोपनिषद्
इस ब्रह्मपुरी में प्राण की अग्नियाँ ही सदा जलती रहती है।
यद्वाव प्राणा जागर तदेवं जागारितम् इति।
- ताण्डय0
प्राण को जागृत करना ही महान् जागरण है।
प्राण को ज्ञान एवं जागरण ही अमृतत्व एवं मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग है। उसी से यह लोक और परलोक सुधरता है। इसी से भौतिक और आध्यात्मिक विभूतियाँ प्राप्त होती है। इसलिए वेद ने कहा है- है विचारशीलों प्राण को उपासना करो- गायत्री महामन्त्र का आश्रय लो और आत्म कल्याण का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आगे बढ़ चलो।
य एष विद्वान्प्राणं वेद रहस्य प्रज्ञा
हीयतेऽमृतो भवति तयेव श्लोकः।
- प्रज्ञोपनिषद
जो ज्ञानी इस प्राण के रहस्य को जानता है उसकी परम्परा कभी नष्ट नहीं होती वह अमर हो जाता है।
मनोदशा पर मनुष्य का स्वास्थ्य निर्भर है। मनोविकारग्रस्त मनुष्य अनेकानेक शारीरिक और मानसिक आधि-व्याधियों से ग्रसित होकर रुग्ण, दुर्बल बनता चला जाता है और अकाल मृत्यु का ग्रास बनता है। अस्त-व्यस्त मनः स्थिति के कारण कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वाह कठिन हो जाता है। सामने प्रस्तुत कामों को ठीक तरह कर सकना बन नहीं पड़ता फलतः पग-पग पर असफलताएँ सामने खड़ी दिखाई देती है। मधुर सम्बन्धों का निर्वाह संपर्क क्षेत्र के व्यक्तियों से शालीनता पूर्वक होता नहीं। अतएव असहयोग, उपेक्षा, खीज़, खींचतान एवं विग्रह की स्थिति बनी रहती है। स्वजनों के बीज ऐसा असामंजस्य परिवार में तथा सम्पर्क क्षेत्र में आये दिन विसंगतियाँ उत्पन्न करता है। चिन्तन की दिशा धारा सही न होने पर अनुपयुक्त सूझ पड़ता है और उपयुक्त क्या हो सकता है? यह तथ्य पकड़ में ही नहीं आता। ऐसे लोगों की विकृत चिन्तन के दुष्परिणाम आये दिन संकटों और विग्रहों के रूप में भुगतने पड़ते हैं।
मस्तिष्क की तीक्ष्णता और शिक्षा सम्पदा से कई तरह की सुविधा सफलता मिलती है, किन्तु व्यक्तित्व की समग्र प्रगति के लिए इतने से ही काम नहीं चलता, उसके लिए मनःक्षेत्र का सन्तुलन और सुसंस्कृत होना आवश्यक है। मनुष्यों के बीच निकृष्टता और वरिष्ठता का जो अन्तर दिखाई पड़ता है उसमें शरीर अथवा साधन कारण नहीं होते, चिन्तन का स्तर एवं दृष्टिकोण ही प्रधान भूमिका प्रस्तुत करता है। मानसिक विकास का मूल्यांकन इसी स्थिति को देखकर किया जाता है। उच्च शिक्षा प्राप्त, क्रिया कुशल, तीक्ष्ण बुद्धि लोगों में से कितने ही कुमार्गगामी देखे जाते हैं, वे अपने और दूसरों के लिए अभिशाप सिद्ध होते हैं। महत्ता मस्तिष्कीय तीक्ष्णता की नहीं मानसिक स्तर के उत्कृष्ट होने की है। उसे परिष्कृत चिन्तन सुसंस्कृत दृष्टिकोण एवं सुसंयत क्रिया-कलाप के रूप में देखा जा सकता है।
मनः संस्थान को सुविकसित करने के लिए स्वाध्याय, सत्संग एवं मनन-चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। इसके अतिरिक्त एक और भी कारगर उपाय है- मनोमय कोश की योग साधना। काम-काजी मस्तिष्क समेत मन-क्षेत्रीय की स्तरीय परतें मनोमय कोश की परिधि में आती है। जिस प्रकार वन्य पशुओं को साधकर पालतू बनाया जाता है। उनसे अनेक प्रकार के लाभ लिये जाते हैं, उसी प्रकार मन के महादैत्य की यदि साधना द्वारा सधा लिया जाय तो ऐसे लाभ मिल सकते हैं जिन्हें देवोपम उपलब्धियाँ प्राप्त करना कहने में अत्युक्ति नहीं मानी जा सकती। मानसिक साधना ऐसे ही चमत्कार उत्पन्न करती है।
व्यक्तित्व और मनःसंस्थान की स्थिति को परस्पर अति घनिष्ठ माना गया है। मनः स्तर ही व्यक्तित्व है। व्यक्तित्व को समुन्नत बनाने के लिए मनः संस्थान की स्थिति ऊँची उठाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। यह कार्य मात्र जानकारियाँ बढ़ाने या समझाने-बुझाने भर से पूरा नहीं हो जाता । इसके लिए ऐसे मनोवैज्ञानिक प्रयोग करने पड़ते हैं जो लोहे को गरम करके उस घन की चोटों से उपयुक्त औजार बनाने जैसा कार्य कर सके। इस प्रकार के प्रयोगों को मनोमय कोश की साधना कहा जा सकता है।
मस्तिष्क की ऊपरी परत जो व्यावहारिक जीवन में काम आती है, समग्र मनः संस्थान का मात्र पाँचवाँ योग है। मानसिक शास्त्रियों ने उसकी संरचना का स्वरूप तो जाना है, पर उसके भीतर काम करने वाली विलक्षण क्षमताओं को देखकर आश्चर्यचकित रह गये है। इन रहस्यमयी गतिविधियों की मात्र 7 प्रतिशत जानकारी अभी तक मिल सकी है। शेष का आभास मिलता है और सोचा जाता है कि यदि इस अद्भुत संयंत्र की क्षमताओं का स्वरूप और उपयोग जाना जा सकता तो फिर मनुष्य की सामर्थ्य का पारापार न रहता।
सामान्य मान्यता यह है कि मन और बुद्धि का सम्मिश्रण ही मस्तिष्क है। ऐसा इसलिए समझा जाता है कि दैनिक जीवन के क्रिया-कलापों में उन्हीं का उपयोग होता है। जो इस क्षेत्र की गहराई में घुसे है उनने देखा है कि ऊपरी परत तो क्रिया कुशलता और सूझ-बूझ के प्रतिफल प्रस्तुत कर पाती है। व्यक्तित्व का निर्माण अचेतन की गहरी परतें ही सम्पन्न करती है। मनोविकार बुद्धि क्षेत्र में नहीं, वरन् स्वभाव के अंतर्गत आदतें बनकर घुस बैठते हैं। मनुष्य उनकी बुराइयों समझता है और छोड़ना भी चाहता है किन्तु संचित अभ्यासों का दबाव इतना अधिक होता है कि अपने ही निर्णय के विरुद्ध रास्ते पर चलने के लिए बाध्य होना पड़ता है। इन आदतों के पीछे अचेतन मन ही काम करता है।
शरीर की अनवरत गतिविधियों में जागृत मस्तिष्क का नगण्य जितना अधिकार होता है। संचालन अचेतन की अभ्यस्त प्रवृत्तियाँ ही करती है। माँस-पेशियों का आकुंचन- प्रकुञ्चन पलकों का निमेष-उन्मेष फेफड़ों का श्वास, प्रश्वास, आहार का ग्रहण और मल का विसर्जन, निद्रा, जागृति असंख्य शारीरिक क्रिया-प्रक्रियाएँ अचेतन मन के नियंत्रण में ही चलती है। हारमोन ग्रन्थियों से लेकर - प्राणों के अवधारण तक पर अचेतन का ही प्रभाव है। मनो-विकारों के कारण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य चौपट हो जाना और सद्भावनाओं के आधार पर व्यक्तित्व के सभी पक्षों का समुन्नत होते चलना इसी संस्थान की संरचना के कारण सम्भव होता रहता है उत्थान और पतन के बीज इसी क्षेत्र में उगते हैं। व्यक्तित्व की सुविस्तृत जड़े इसी भूमि में घुसी होती हैं।
अचेतन को चित कहते हैं। वस्तुतः मस्तिष्क का प्रेरक केन्द्र यही है। यह गई-गुजरी स्थिति में पड़ा रहे तो सचेतन की बुद्धिमतां का उपयोग धूर्तता, दुष्टता जैसे निष्कृष्ट प्रयोजनों के अतिरिक्त किसी रचनात्मक कार्य में सम्भव न हो सकेगा और बुद्धिमान कहलाने वाला मनुष्य भी उज्ज्वल भविष्य का सृजन न कर सकेगा।
मन और बुद्धि को विकसित करने के लिए स्कूली साहित्यिक सम्पर्क जन्य, अनुभव सम्पादन करने जैसी अनेकों विधि-व्यवस्थाएँ प्रचलित है। किन्तु चित्त की चिकित्सा करने में उन्हीं उपचारों को काम में लाया जाता है जिन्हें मनोमय कोश की साधना कहते हैं। यों परामनोविज्ञान एवं मनोविज्ञान के अंतर्गत भी अचेतन की क्षमता को समझने और उसमें अभीष्ट परिवर्तन करने के उपाय खोजे तथा सोचे जा रहे है किन्तु तत्त्वदर्शियों की अनुभूत पद्धति मनः साधना के अतिरिक्त और कोई कारगर मार्ग अभी तक करतल गत हुआ नहीं है।
मानस शास्त्री सर अलेक्जेन्डर केनन का कथन है- मनुष्य इस विश्व की सबसे विलक्षण सत्ता है। उसका सार तत्त्व मस्तिष्क है। मस्तिष्क का नवनीत अचेतन संस्थान है। दुर्भाग्य से इसी केन्द्र की न्यूनतम जानकारी हमें उपलब्ध है। यह नहीं जाना जा सका कि इस संस्थान को प्रभावित, परिवर्तित और परिष्कृत करने के लिए क्या किया जा सकता है? शरीर चिकित्सा में काम आने वाले उपचारों की पहुँच वहाँ तक है नहीं। लगता है स्वसंवेदन स्वसम्मोहन और स्वनिर्देशन जैसे उन्हीं उपायों को काम में लाना पड़ेगा जिन्हें पुरातन योगीजन अपने ढंग से काम में लाते रहे है। जो हो संसार की सुख-शान्ति और मानवी प्रगति के मर्म केन्द्र तक हमें पहुँचना ही होगा। किसी उपाय से अचेतन को नियन्त्रित करने की विधि व्यवस्था हस्तगत करनी ही होगी। इसके बिना समुन्नत व्यक्ति और समृद्ध विश्व की सम्भावना बन न सकेगी।
इस तथ्य को दूरदर्शी आत्म-विज्ञानियों ने चिरकाल पूर्व में ही जान लिया था। उनमें मानवी व्यक्तित्व का आधार केन्द्र मन को ही कहा है। जीवन की भली-बुरी स्थिति का उत्तरदायी उसी को माना है और इस बात पर बहुत बल दिया है कि समृद्धि के अन्यान्य आधारों पर जितना ध्यान दिया जाता है उससे कम नहीं, वरन् अधिक ही
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मानसिक परिष्कार पर दिया जाय। इस क्षेत्र की प्रगति के बिना भौतिक एवं आत्मिक प्रगति की आशा पूरी नहीं हो सकेगी। इन तत्त्वदर्शियों का अभिमत इस संदर्भ में इस प्रकार है-
चित्तमेव हि संसारो रागदिक्लेशदू षतम्।
तदेव तर्विनिमुक्त भवान्त इति कथ्यते॥
- महोपनिषद् 4।66
यह चित्त ही संसार है। चित्त रोगादि दोषों से भर जाने पर क्लेश होते हैं। इन दूषणों से छुटकारे को ही मुक्ति कहते हैं।
पापासक्तं हि बन्धाय पुण्यासंक्त हि मक्तये।
मन एवं मनुष्याणाँ कारणं बन्धमोक्षयोः॥
- स्कन्द पुराण
पाप में आसक्त मन बन्धन का और पुण्य में संलग्न मन मोक्ष का कारण है। वस्तुतः मन ही मनुष्य को बन्धन में डालता और मुक्त करता है।
मन एवं मनुष्याणां कारणं बंध मोक्षयो, बन्धाय विषाय स्क्तं मक्त्यै निर्विषायं स्मृतम्।
- योगवशिष्ठ 4।21।56-57
हे राजन्! यह मन दृढ़ भावना वाला होकर जैसी कल्पना करता है। उसको उसी आकार में उतने समय तक और उसी प्रकार का फल देने वाला अनुभव होता है।
गंगाद्वारश्च केदारं सन्नि हत्माँ तथैवच।
एवानि सर्वतीर्थनि कृत्वा पापैः प्रमुच्चयते॥
- व्यास स्मृति
जिसने अपने मन को जीत लिया उसके लिए गंगा द्वार, केदारनाथ आदि सभी तीर्थों का लाभ अपने पास ही मिल जाता है।
मनो निर्मलसत्वात्म यद्धावयतियादृशम्।
ततथाशु भवत्येव यथाऽवर्तो भवेत्यमः॥
- योग वशिष्ठ 4।17।4
मन यदि शुद्ध है तो जैसे जल भंवर का रूप धारण कर लेता है, वह जिस वस्तु की जैसी भावना करता है। वह अविलम्ब वैसी ही हो जाती है और दूसरे की मन की बात अपने मन में उतर आती है।
मन क्षेत्र पर चढ़े संचित कुसंस्कारों को हटाना और उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों की स्थापना कर सकना। मानव जीवन का सबसे प्रबल पुरुषार्थ है। इसके समान श्रेयस्कर सफलता और कोई हो नहीं सकता। इस महान् उपलब्धि को प्राप्त करने में मनोमय कोश की साधना से बढ़कर और कोई उपाय हो नहीं सकता। इसकी चर्चा शास्त्रकारों ने इस प्रकार की है-
इत्येवमादिभिर्यत्नैः संशुद्ध योगिनोमनः।
शक्तं स्यादति सूक्ष्माणाँ महता मपि भावने-सर्व दर्शन सिद्धान्त
यत्नपूर्वक मन को शुद्ध करने से योगी सूक्ष्म और गम्भीर विषयों को समझने योग्य हो जाता है।
लयविक्षेप रहितं मनः कृत्वा सुनिश्चतम्।
एतज्ज्ञानं च मोक्षं च शेषास्तु ग्रन्थविस्तराः॥
एक एव मनोदवो ज्ञेयः सर्वासिद्धिदः।
अन्यत्र विफलाक्लेशाः सर्वेषाँ तज्जयं बिना॥
विद्यमानं मनो यावत्तावदुःखक्षयः कुतः।
मन को विक्षेपों से मुक्त करके सदुद्देश्य में लय करके स्थिर बना लेना- यही वह उपाय है जिससे स्वार्थों में सिद्धि मिलती है। मन देवता ही परम देव है। उसकी साधना किये बिना क्लेशों और दुःखों की निवृत्ति नहीं हो सकती। मन को जीत लेना ही सबसे बड़ी विजय है।
यह मनोनिग्रह अन्तः सन्तुलन, चित्त परिशोधन समग्र विकास का आधार भूत उपाय है। मनोमय कोश की साधना का सत्परिणाम मनोजय है। इसे प्राप्त कर लेने वाला आत्म विजय को विश्व विजय के लाभ से भी बढ़ कर आनन्ददायक अनुभव करता है।
कुछ समय पहले आस्थाएँ, आकांक्षाएँ एवं सम्वेदनाओं का पृथक अस्तित्व नहीं माना जाता था। उसे विचार पद्धति का ही एक रूप कहा गया था अचेतन मन के पुराने अभ्यासों को उभार कर मनोविज्ञानी उसे मानते थे। पर अब उसका स्वतन्त्र अस्तित्व मान लिया गया है। संवेदनाएँ एवं आस्थाएँ मात्र वातावरण में व्यक्तियों से प्रभावित नहीं होती वरन् उनका सम्बन्ध जीव चेतना की मूल सत्ता से है। परिष्कृत अन्तःकरण को देखकर ही आत्मा की उच्च स्थिति मानी जाती है। जीवात्मा के तीन गुण अध्यात्म शास्त्र के अनुसार गिनाये गये है। 1. सत् 2. शिव 3. सुन्दर। जीवन तत्त्व की व्याख्या ‘सत्यं शिवं सुंदरम्।’ के रूप में की गई है। विज्ञान की भाषा में - सत् को उत्कृष्टता के प्रति आस्था श्रद्धा कहा गया है। शिव का तात्पर्य है विवेक युक्त दूरदर्शी दृष्टिकोण तद्नुरूप आकांक्षाओं का प्रवाह। सुंदरम् सौंदर्य बोध, कलात्मकता, सम्वेदना आत्मभाव का जिस पर भी आरोपण होता है। वह सुन्दर लगने लगता है। कला दृष्टि से सौंदर्य बन कर प्रतिबिम्बित होती है। अन्यथा इस जड़ जगत के पदार्थों में सौंदर्य जैसा कुछ दीखता नहीं।
आस्था, उमंग और सरसता के समन्वय को अन्तः कारण या अंतरात्मा कहा जा सकता है। पुरानी परिभाषा में मन, बुद्धि, चित्त अहंकार को अन्तःकरण चतुष्टय कहा जाता रहा है। अस्तु यदि वस्तुस्थिति समझने में उस नामकरण में भ्रम उत्पन्न होता हो तो अन्तःकरण के स्थान पर अन्तरात्मा शब्द प्रयुक्त हो सकता है। मनः शास्त्र के अनुसार इसे चेतना की अत्यन्त परिष्कृत स्थिति कह सकते हैं। इसमें भौतिक तत्त्वों का कम और आत्मिक उत्कृष्ट का समावेश अधिक है। भौतिकता प्रधान मन पर वासना, तृष्णा अहंता ही छाई रहती है, उसमें स्वार्थ सिद्धि ही प्रधान आधार होती है। अन्तरात्मा का स्वार्थ विकसित होकर परमार्थ बन जाता है। उसकी आत्मीयता शरीर परिवार तक सीमित न रहकर सर्वजनीन बन जाती है। आस्थाएँ वातावरण से सम्पर्क में नहीं- आदर्शों से प्रभावित होती है। आकांक्षाएँ लाभ को दृष्टि में रख कर नहीं, उत्कृष्टता के समर्थन पर केन्द्रित होती रहती है। लाभ की दृष्टि से सौन्दर्य का आरोपण नहीं होता, वरन् पदार्थों के अन्तराल में थिरकने वाली कला का सूक्ष्म दर्शन ही अन्तरात्मा में हुलास उल्लास उत्पन्न करता है। संक्षेप में चेतना की वह उच्चस्तरीय परत जो आत्मा के अति समीप है, जो वातावरण से प्रभावित कम होती है और उस पर अपनी मौलिकता का प्रभाव अधिक छोड़ती है- अन्तरात्मा कही जायेगी। किसी को आपत्ति न हो तो इसी को अन्तः कारण शब्द में भी सम्बोधित किया जा सकता है।
इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति चेतना त्रिवेणी के ही विविध प्रवाह है। इनका उद्गम स्त्रोत अन्तरात्मा है। वहाँ की उमंगें ही इच्छा को दिशा देती हैं, वहाँ के निर्देशों का पालन बिना ननुनच किए शरीर स्वामिभक्त सेवक की तरह करता रहता है। इन तथ्यों पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि आत्मा और संसार का सम्पर्क सूत्र इसी केन्द्र से जुड़ता है। जीवन का स्वरूप यहीं बनता है और उसका प्रवाह यहीं से निसृत होता है। मनोविज्ञान की भाषा में इसे ‘सुपरचेतन’ कह सकते हैं। दार्शनिकों ने इसे अति मानस माना है। यों अरविन्द, नीत्से आदि ने अतिमानस की व्याख्याएँ परस्पर विरोधी की है। तो भी उनका तात्पर्य चेतना के उस स्तर से है जिसे व्यक्तित्व का उद्गम अथवा मर्म-स्थल कहा जा सके। प्रत्येक सूक्ष्मदर्शी व्यक्ति के अस्तित्व में मूल-भूत सत्ता इस अन्तरात्मा की ही काम करती पाई है और उसी की सर्वोपरि गरिमा स्वीकार की है।
साधना विज्ञान में इसी अन्तरात्मा को विज्ञानमय कोश कहा है। उसके परिष्कृत प्रयासों को योगाभ्यास में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। आस्थाओं का परिमार्जन होने से जीवन के बहिरंग स्वरूप में कायाकल्प होते देर नहीं लगती। वाल्मीकि, अंगुलिमाल, अम्बपाली, अजामिल, सूर , तुलसी आदि के जीवन परिवर्तन को एक प्रकार से आध्यात्मिक कायाकल्प ही कह सकते हैं। सामान्य स्थिति के मनुष्य असामान्य स्तर के महामानव बने है। इसमें भी आस्थाओं का उन्नयन ही प्रधान भूमिका निबाहता दृष्टिगोचर होता है। कबीर, दादू, रैदास, रामदास, रामकृष्ण, विवेकानन्द, शंकराचार्य, दयानन्द आदि महामानव परिस्थितियों के हिसाब से कुछ अच्छी स्थिति में नहीं जन्मे थे। लिंकन, वाशिंगटन आदि की प्रगति में उनकी परिस्थिति की नहीं मनः स्थिति की ही प्रधान भूमिका रही है। ध्रुव, प्रहलाद, बुद्ध, महावीर आदि जन्मे तो राज परिवारों में थे, पर व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाने का कोई वातावरण उपलब्ध नहीं था। नारद आदि की प्रेरणा से अथवा स्व सम्वेदनाओं से प्रभावित होकर उनने अपनी आस्थाओं में परिवर्तन किया और उतने ऊँचे जा पहुँचे जितने की सामान्यता कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यह अन्तःकरण के परिवर्तन एवं परिष्कार का ही चमत्कार है। यह विज्ञानमय कोश किस प्रकार परिष्कृत होता है। इसके कितने ही मार्ग एवं उपाय हो सकते हैं। अनायास संयोग, दैवी, अनुग्रह आदि अन्य कारण भी इस क्षेत्र के विकास परिष्कार के कारण हो सकते हैं पर प्रयत्न पुरुषार्थ पर क्रमिक गति से अन्तः कारण का स्तर ऊँचा उठाने की प्रक्रिया विज्ञानमय कोश की साधना ही मानी गई हैं।
विज्ञानमय कोश का यह बहिरंग जीवन पक्ष हुआ। उसकी एक दिशा धारा सूक्ष्म जगत की ओर भी प्रवाहित होती है। हिमालय की दो प्रधान धाराएँ गंगा और यमुना के रूप में प्रवाहित होती है। अन्तःकरण को हिमालय माना जाय तो उसकी एक प्रक्रिया सामान्य मनुष्य को महात्मा, देवात्मा, परमात्मा स्तर तक ऊँचा उठा ले जाने वाली कही जा सकती है। दूसरी वह है जो सूक्ष्म जगत के साथ जीव-सत्ता का संपर्क जोड़ती है। दोनों के बीच महत्त्वपूर्ण आदान-प्रदान सम्भव करती है।
हम जिस दुनिया के सम्पर्क में हैं, वह स्थूल जगत है। यह इन्द्रियजन्य है। इसके भीतर प्रकृति की वह सत्ता है जो पदार्थ की तरह प्रत्यक्ष नहीं-शक्ति के रूप में विद्यमान् है और बुद्धिगम्य है। इस स्थूल जगत का परिचय, इन्द्रियों से, वृद्धि से यन्त्र उपकरणों से मिलता है। पदार्थों और प्रकृति शक्तियों का लाभ उठा सकना भी उपरोक्त स्थूल साधनों से सम्भव हो जाता है। इससे आगे सूक्ष्म जगत का अस्तित्व आरम्भ होता है, जो इन्द्रियजन्य न होने से अतीन्द्रिय या इन्द्रियातीत कहा जाता है। प्रयोगशाला में उसे प्रमाणित नहीं किया जा सकता और बुद्धि ही उनका आधार एवं कारण समझ सकने में समर्थ होती है। इतने पर भी उस सूक्ष्म जगत का आधार अपने स्थान पर चट्टान की तरह अडिग है। उसका अस्तित्व स्वीकार करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं ।
जहाँ तक मानवी बुद्धि का सम्बन्ध है वहाँ अतीन्द्रियं कही जाने वाली ऐसी हलचलों का पता लगता है जो विदित आधारों से सर्वथा भिन्न है। मनुष्य, मनुष्यों के बीच चलने वाले विचार, संचार को टेलीपैथी कहते हैं। दूरवर्ती घटनाओं का अनायास आभास मिलने के असंख्य प्रमाण मिलते हैं। इसे दूर दर्शन कह सकते हैं। भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं का पूर्वाभास मिलना ऐसा तथ्य है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। ऐसे घटनाक्रम यों सर्वदा सब पर प्रकट नहीं होते-फिर भी जब भी जिन्हें भी ऐसी अनुभूतियाँ हुई हैं वे ऐसी है जिनके आधार पर किसी अविज्ञात सूक्ष्म जगत का परिचय मिलता है और विदित होता है कि उसमें भी अपनी ही दुनिया की तरह कुछ न कुछ हलचलें होती अवश्य है। मरणोत्तर जीवन को प्रमाणित करने में भूत प्रेतों के अस्तित्व और पुनर्जन्म के विवरण एक समस्या के रूप में सामने आते हैं। जीवन के उपरान्त जीवात्मा की सत्ता कहाँ रहती है? वहाँ उसका निवास निर्वाह कैसे होता है? इन प्रश्नों का समाधान सूक्ष्म जगत का अस्तित्व स्वीकार किये बिना और किसी तरह हो नहीं सकता। किन्हीं विशिष्ट व्यक्तियों में विचित्र प्रकार की अति मानवी क्षमताएँ देखी गई है। शाप वरदान से लेकर आश्चर्यजनक कृत्य उपस्थित कर देने तक की विचित्रताएँ कैसे, कहाँ से, उत्पन्न होती है इसका उत्तर सूक्ष्म जगत की सत्ता स्वीकार किये बिना और किस प्रकार दिया जा सकता है।?
जन्म जात रूप से किन्हीं बालकों में ऐसी विशेषताएँ पाई जाती है, जिनकी सामान्य विकास क्रम के साथ कोई संगति नहीं बैठती । किन्हीं की स्मृति, सूझ-बूझ ऐसी होती है जिसे विलक्षण कहा जा सकता है भूमिगत जल स्रोतों को बना कर जल समस्या के समाधान के चमत्कार कितने ही सिद्ध पुरुषों ने दिखाये है। बिना अन्न जल के निर्वाह शरीर विज्ञान की दृष्टि से असम्भव है पर पोहरी बाबा जैसे व्यक्तियों ने उस असम्भव को सम्भव होना सिद्ध किया है। पंजाब महाराजा रणजीतसिंह की की निगरानी में हरिदास नामक साधु ने कई महीने की लम्बी भूमि समाधि ली थी। ऐसे चमत्कार अन्यत्र भी दृष्टिगोचर होते रहते हैं। देवताओं का अनुग्रह-मृतात्मा के सहयोग- मन्त्र साधना के प्रतिफल आदि ऐसे अनेकों तथ्य है जिन्हें अन्ध-विश्वास कह कर टाला नहीं जा सकता। मिस्र के पिरामिडों की खोज बीन करने वाले शोधकर्ताओं पर विपत्तियों के पहाड़ टूटते रहे हैं, उन्हें संयोग मात्र कहने से काम नहीं चल सकता। योगियों में पाई जाने वाली कई तरह की विचित्रताएँ अकारण नहीं हो सकती। ईश्वर भक्तों को जो विशिष्टताएँ उपलब्ध होती रही है, वे मूढ मान्यताएँ भर नहीं है, दन्त कथाएँ उनसे जुड़ी तो हो सकती हैं पर वह पूरे का पूरा अन्ध-विश्वास भर है यह कह देना तथ्यों से आंखें मीच लेने जैसा होगा। बुद्धि की समझ में जो न आये वही अप्रामाणिक, वही अविश्वस्त यह दुराग्रह कुछ समय पहले तक तो प्रबल था, पर अब विचारशीलता ने सन्तुलन साधा है और यह गम्भीरता-पूर्वक सूक्ष्म जगत के अस्तित्व की शोध की जा रही है।
सूक्ष्म जगत की एक भौतिकवादी सत्ता ही ऐसी सामने आ खड़ी हुई है जो अध्यात्मवादियों के द्वारा प्रतिपादित सूक्ष्म जगत से भी विचित्र और सशक्त है। यह मान्यता प्रति पदार्थ की-प्रति विश्व की है। एण्टी मैटर -एण्टी यूनीवर्स के तथ्य इस प्रकार सामने आये है कि उनके आधार पर एक अपने साथ सटे हुए विलक्षण विश्व का अस्तित्व जुड़ा देख कर हतप्रभ रह जाना पड़ता है।
तन्त्र विज्ञान में ‘छाया पुरुष’ साधना का उल्लेख है कहा गया है कि मनुष्य की सूक्ष्म सत्ता का प्रतिनिधित्व करने वाला इक जीवित प्रेत होता है। और वह साथ ही रहता है- इसकी देवता या भूत प्रेत जैसी साधना करके उसे आज्ञानुवर्ती बनाया जा सकता है। स्थूल शरीर- स्थूल कार्य करता है और सूक्ष्म शरीर-सूक्ष्म स्तर के काम कर सकता है। छाया पुरुष की सिद्धि में अपना ही एक और शरीर अपने हाथ आ जाता है और इन दोनों शरीरों से दो प्रकार के काम एक साथ करना सम्भव हो जाता है। इस प्रतिपादन में एक ‘प्रति मनुष्य का- छाया पुरुष का अस्तित्व और क्रिया-कलाप बताया गया है। देखा जाता है कि प्रकाश में अपनी ही एक और छाया उत्पन्न हो जाती है और वह साथ-साथ रहती है। सूक्ष्म शरीरधारी छाया पुरुष की स्थिति सजीव छाया जैसी समझी जा सकती हैं। यह नामकरण इसी आधार पर किया गया है।
मूर्धन्य वैज्ञानिकों के सामने एण्टी-एटम-एण्टी मैटर एण्टी यूनीवर्स का अस्तित्व एक चुनौती के रूप में खड़ा है। उसे अस्वीकार करते नहीं बनता। यदि उस अस्तित्व के तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं और उस प्रति-विश्व की गति विधियों से मनुष्य का सम्बन्ध जुड़ जाता है तो निश्चित रूप से एक जादुई दैत्य युग में हम सब जा खड़े होगे प्रति परमाणु की शक्ति अपने जाने माने परमाणुओं की तुलना में अत्यधिक है। अपने परिचित संसार की तुलना में अपरिचित 'एण्टी यूनीवर्स' का महादैत्य अपने प्रत्यक्ष संसार को निगल कर हजम कर सकता है और हिरण्याक्ष की उस पौराणिक कथा का एक प्रत्यक्ष दृश्य उपस्थित हो सकता है। जिसमें वह महादैत्य, उस पृथ्वी को बगल में दबा कर पाताल लोक को भाग गया था।
छाया पुरुष और ‘प्रतिविश्व’ की चर्चा यहाँ यह समझने के लिए की गई है कि सूक्ष्म जगत के समतुल्य अपने ही इर्द गिर्द बिखरे हुए एक सूक्ष्म जगत के अस्तित्व को समझने में सुविधा है। इन्द्रियों की पकड़ में न आने वाली यह दुनिया इतनी विलक्षण है कि उसकी हलचलों का दृश्य संसार पर भारी प्रभाव पड़ता है। पदार्थों प्राणियों और परिस्थितियों पर उस सूक्ष्म जगत की हलचलें आश्चर्यजनक प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। प्रयत्न और पुरुषार्थ के महत्त्व से इनकार नहीं किया जा सकता, पर यह भी एक तथ्य है कि अदृश्य जगत का अति घनिष्ठ और अति प्रभावशाली संपर्क दृश्य जगत से है।
जीवधारी की चेतना ब्रह्माण्ड व्यापी महाचेतना का एक अंश है। अंश और अंशों के गुण, धर्म, समान होते हैं। अन्तर विस्तार के अनुरूप क्षमता का होता है। हम सब चेतना के महासमुद्र में छोटी बड़ी मछलियों की तरह जीवन-यापन करते हैं। महाप्राण - ब्रह्म की सत्ता में ही अल्पप्राण जीव-अनुप्राणित होता है।
मैटर का-सूक्ष्मतम स्वरूप अब परमाणु नहीं रहा। उसके भीतर भी अनेक घटक स्वतन्त्र इकाइयों के रूप में काम करते हैं। वे इलेक्ट्रान आदि के भीतर भी सूक्ष्म तत्त्व है। पदार्थ अन्ततः तरंगें न रह कर ऊर्जा मात्र रह जाता है। यह ऊर्जा इलालाजी विज्ञान के अनुसार जड़ नहीं विवेक युक्त चेतन है। विज्ञान में पदार्थ का सूक्ष्म तम स्वरूप इन दिनों ‘क्वान्टा’ के रूप में निर्धारित किया है इसे चेतन और जड़ का सम्मिश्रित रूप कह सकते हैं। उसकी व्याख्या विचारशील ऊर्जा के रूप में की जाती है। अध्यात्म की भाषा में इसे अर्ध नारी महेश्वर को कह सकते हैं। प्रकृति पुरुष का सम्मिश्रण इस क्वान्टा को कह सकते हैं। अनुमान है कि अगली पीढ़ी के वैज्ञानिक इस ‘क्वान्टा’ का विश्लेषण करते-करते शुद्ध ब्रह्म तक जा पहुँचेंगे और वेदान्त की तरह स्वीकार करेंगे कि सर्वत्र लहलहा सकता सकता है। जड़ पदार्थ- दृश्य जगत तो उसकी हिलोरें मात्र है।
जीव और ब्रह्म के मध्य आदान-प्रदान के सुदृढ़ सूत्र विद्यमान् है। उनमें अवरोध आत्मा पर चढ़े हुए कषाय कल्मषों के कारण उत्पन्न होता है। इन्हें हटाया जा सके तो ब्रह्माण्डीय चेतना और जीव चेतना के मध्य महत्त्वपूर्ण आदान-प्रदान चल पड़ते हैं। भौतिक अंश का भार बढ़ जाने से जीव प्रकृति परक हो जाता है उसकी प्रवृत्ति भौतिक आकांक्षाओं और उपलब्धियों में ही सीमित हो जाती है। फलतः वह स्वल्प, सीमित और दरिद्र दिखाई पड़ता है। यदि जीव सत्ता को निर्मल रखा जा सके तो उसकी सूक्ष्मता- ब्रह्म तत्त्व से, सूक्ष्म जगत से अपना घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित कर सकती है। यह आदान- प्रदान जिसके लिए भी सम्भव हुआ है वह देवोपम स्तर की स्थिति बना सका है। ऐसे लोगों को स्थूल जगत की अपेक्षा सूक्ष्म जगत से अधिक महत्त्वपूर्ण अनुदान अधिक मात्रा में मिलने लगते हैं। वह सम्पदा व्यक्ति को सच्चे अर्थों में समुन्नत बनाती है। इस उपलब्धि के सहारे वह अपने सम्पर्क क्षेत्रों के असंख्यों का तथा समूचे संसार का महत्त्वपूर्ण हित साधन कर सकता है।
सूक्ष्म जगत का अस्तित्व स्वीकार न करने की बात कुछ शताब्दियों पूर्व अनास्थावादियों की आग्रह पूर्वक कह सकने की स्थिति थी। तब विज्ञान और बुद्धि वाद का इतना विकास नहीं हुआ था आज की स्थिति भिन्न हैं एक के बाद एक तथ्य उभरता हुआ सामने आया है और उसने सूक्ष्म जगत का- विश्व चेतना का प्रतिपादन किया है। तत्त्वदर्शी मनीषियों ने तो उसे दृश्य जगत की तरह ही प्रत्यक्ष माना था और उसके साथ
संपर्क बनाने का विशालकाय अध्यात्मवादी ढाँचा खड़ा किया था। लगता है वह दिन दूर नहीं जब अध्यात्म और विज्ञान सूक्ष्मता के क्षेत्र में मिल जुलकर प्रवेश करेंगे और जड़ चेतन के क्षेत्र को एकाकार करके सर्वतोमुखी प्रगति का पथ प्रशस्त करेंगे
छाया पुरुष साधना की तरह हम स्थूल के साथ-साथ सूक्ष्म जगत का भी ज्ञान वृद्धि एवं सुविधा सम्पदा के लिए उपयोग कर सकते हैं। दृश्य प्राणियों की तरह अदृश्य जगत में विद्यमान् अशरीरी समर्थ आत्माओं के साथ सम्पर्क साध सकते हैं। जमीन पर लड़ी जाने वाली लड़ाई की तुलना में वायु सेना द्वारा लड़े जाने वाले युद्ध के परिणाम अधिक दूरगामी होते हैं श्रम से ज्ञान का
महत्त्व अधिक है। परमाणु के दृश्य अस्तित्व का मूल्य नगण्य है किन्तु उसके विस्फोट से उत्पन्न ऊर्जा का मूल्य अत्यधिक ही आँका जाएगा दृश्य शरीर से अदृश्य आत्मा का महत्त्व कितना है- यह सर्वविदित है। स्थूल जगत को प्रभावित करने वाले सूक्ष्म जगत से संपर्क साध सकने की जो क्षमता विज्ञानमय कोश की साधना से मिलती है, उसे महत्त्वहीन नहीं कहा जा सकता।
विज्ञानमय कोश की प्रसुप्त स्थिति को हटा कर उसमें जागृति उत्पन्न कर देने पर मनुष्य सामान्य न रह कर असामान्य बन जाता है। उसे अनेक प्रकार की असाधारण विशेषताएँ प्राप्त कर सकने का अवसर मिलता है। सूक्ष्म जगत का उपयोग कर सकने की सफलताओं को सिद्धियाँ कहा गया है। साधना से सिद्धि की प्रचलित उक्ति को विज्ञानमय कोश की सफलता कहा जाय तो कुछ अनुचित न होगा।
सिद्धियों का वर्णन साधना शास्त्र में स्थान-स्थान पर मिल जाता है। इस प्रकार की सफलता प्राप्त करने के लिए विज्ञानमय कोश के जागरण का प्रयत्न करना पड़ता है। इस संदर्भ में कुछ संकेत इस प्रकार मिलते हैं-
वपुषः कान्तिरुत्कृष्टा जठराग्निविवर्धनम्।
आरोग्यं च पटुत्वं च सर्वज्ञत्वं च जायते॥
भूतं भव्यं भविष्यच्च वेत्ति सर्व सकारणम्।
अश्रुतान्यापि शास्त्राणि सरहस्यं वदेद्ध्रवम्॥
वक्त्रे सरस्वती देवी सदा नृत्यति निर्भरम्।
मन्त्र सिद्धिर्भवेतस्य जपादेव न संशयः॥
- शिव संहिता 87-88-89
आत्म साधना से शरीर में उत्तम कान्ति उत्पन्न होती है। जठराग्नि बढ़ती है, शरीर निरोग होता है, पटुता और सर्वज्ञता प्राप्त होती है तथा सब वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त होता है।
भूत, भविष्य और वर्तमान काल की सब वस्तुओं के कारण का ज्ञान होता है। जो शास्त्र सुने नहीं है उनके रहस्य जानने तथा व्याख्या करने की शक्ति प्राप्त होती है।
उस योग साधक की जिव्हा पर सरस्वती नृत्य करती और मन्त्र आदि सरलता पूर्वक सिद्ध होते हैं।
यथा वा चित्तसामार्थ्य जायते योगिनो ध्रुवम्।
दूरश्रुतिदूर्ररदृष्टिः अणाद्दूरागमस्तथा॥
वाक्सिद्धिः कामरुपत्वमदृश्यकरणी तथा।
- योग तत्वोपनिषद्
जैसे-जैसे चित्त की सामर्थ्य बढ़ती है, वैसे ही वैसे दूर श्रवण, दूर दर्शन, वाक्, सिद्धि, कामना पूर्ति आदि अनेकों दिव्य सिद्धियाँ मिलती चली जाती हैं।
आसनेन रुजो हन्ति प्राणायामेन पातकम्।
विकारमं मानस योगी प्रत्याहारेण सर्वदा॥
धारणाभिर्मनोधर्य ध्यानादैर्श्वयमुत्तमम्।
समाधौ मोक्षमाप्नोति व्यक्तकर्मशुभाशुभः॥
- वशिष्ठ संहिता
आसन से रोग, प्राणायाम से पातक, प्रत्याहार से मनोविकार दूर होते हैं और धारणा से धैर्य, ध्यान से ऐश्वर्य और समाधि से मोक्ष प्राप्त होता है। कर्म बंधन कटते हैं।
ऊहः शब्दोऽध्ययनं दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः
छानं च सिद्धयोऽष्टौ सिद्धेः पूर्वोऽडः्कुशास्त्रिविधः॥
- साँ0 का0 59
ऊह, शब्द, अध्ययन, सुहृद प्राप्ति, दान, आध्यात्मिक दुःख हीन, आधिदैविक दुःख हीन यह आठ सिद्धियाँ है।
1. ऊह सिद्धि अर्थात् पूर्व जन्म के स्वरूप का ज्ञान। 2. शब्द सिद्धि अर्थात्- शब्दों का ठीक तात्पर्य समझना। 3. अध्ययन सिद्धि - अध्ययन में अभिरुचि और उससे प्रकाश ग्रहण करने की क्षमता । 4 सुहृत्प्राप्ति अर्थात् भावनाशील मित्र की प्राप्ति। 5. दान सिद्धि उदार स्वभाव एवं परमार्थ परायण प्रवृत्ति। 6. आध्यात्मिक दुखों का नाश। 7. आधिदैविक दुःखों का नाश। 8. आधि भौतिक दुःखों का नाश जिससे हो सके ऐसी विवेक दृष्टि की प्राप्ति।
करामलकवद्धिश्वं तेन योगी प्रपश्यति।
दूरतो दर्शन दूरश्रवणं चापि जायते॥
भूतं भव्यं भविष्य। च वेत्ति सर्व सकारणम्
ध्यानमात्रेण सर्वेषाँ भूतानाँ च मनोगतम्॥
अंतर्लीनमना योगी जगर्त्सव प्रपश्यति।
सर्वगुप्तपदार्थानां प्रत्यक्षत्वं च जायते।
- योग रसायन।
योगी को अदृश्य जगत दृष्टवान् दीखता है। उसे दूर दर्शन, दूर श्रवण आदि की सिद्धियाँ उपलब्ध रहती है। ध्यान मात्र से योगी भूत, भविष्य, वर्तमान तथा प्राणियों के मनोगत भाव जान लेता है।
अन्तर्लीन मन द्वारा योगी विश्व के गुप्त पदार्थों एवं रहस्यों को प्रत्यक्षतः देख और जन लेता है।
आनन्द जीवात्मा का लक्ष्य है। उसे प्यास इसी की है। कस्तूरी का हिरन जिस प्रकार सुगन्ध की खोज में चारों ओर मारा-मारा फिरता है, उसी प्रकार जीव आनन्द की खोज में विविध कल्पनाएँ करता- विभिन्न योजनाएँ बनाता और अगणित प्रयत्न करता है, पर हर सफलता अपर्याप्त और असम धान कारक ही बनी रहती है। हिरन की नाभि में कस्तूरी होती है और आनन्द का अक्षय भण्डार अन्तः कारण की गहरी परत आनन्दमय कोश में भरा रहता है। जो वस्तु जहाँ है उसे वहाँ तलाश न करके अन्यत्र ढूँढ़ा जाय तो उससे भटकाव और थकान के अतिरिक्त मिलता कुछ नहीं।
आनन्द का मिठास अत्यधिक गहरा है। उसकी प्रतिच्छाया वासना, तृष्णा, अहंता में परिलक्षित होती है और उसकी कल्पना मात्र से पुलकन उठती है। प्रतिध्वनि में जब इतनी मधुरता है तो ध्वनि में कितनी अधिक उत्कृष्टता होगी? आनन्दमय कोश में प्रवेश करके ही जीवात्मा को परम तृप्ति का सन्तोष मिल सकता है। यही जीवन का लक्ष्य है। इसी की आशा पर प्राणी जीवित है। इसी के लिए वह शरीर बन्धन में बँधने को तैयार हुआ है। कहा गया है-
‘एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मत्रामुपजीवन्ति।’
- बृहदारण्यक 4।3।32
इस आनन्द के प्राप्त होने की आशा से ही समस्त प्राणी जीवित रहते हैं।
आनन्दो ब्रहोति व्यजानात्।
आनंदाद्धचेव खाल्विमानि भूतानि जायंते।
आनंदेन जातानि जीवति। आनदं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति।
- तैत्तरीयोपनिषद्
आनन्द से सब प्राणी पैदा होते हैं और आनन्द में ही वे जीवित रहते हैं। अन्त में आनन्द में ही वे जय को प्राप्त होते हैं।
आनंदानुभवस्तत्र जायते योगिनो महान्।
स एवं त विजानातिया वक्तु न शक्यते।
- योग रसायन 114
उस समय योगी की महान् आनन्द का अनुभव होता है, जिसे वही जानता है, मैं वर्णन नहीं कर सकता।
मुच्यमानेषु सत्वेषु ये तो प्रापोद्यसागराः।
तैरेवननुपर्याप्तं मोक्षेणा रसिकेन किम्॥
- बोधिचर्यावतार 8।108
जीव जब दुःख बन्धन से मुक्त होते हैं, तब उससे बोधिसत्व के हृदय में जो आनन्द का समुद्र उमड़ पड़ता है, उतना ही तो पर्याप्त है। रस हीन शुष्क मोक्ष से क्या प्रयोजन?
रसो वेसः। रसं हयेव लब्धानन्दी भवति।
को हयेवान्यात् कः प्राणयात्? यदेष आकाश आनन्दो न स्यात्। एष हयेवानन्दयति-केन 2।7
भगवान् रसमय या रस स्वरूप है। उसी रस को पाकर मनुष्य आनन्द का अनुभव करता है। यदि वह आकाश की भाँति सर्वत्र ओत-प्रोत आनन्दमय मूलतत्त्व न होता, तो कौन अपना और प्राण रूप क्रियाओं से युक्त जीवन मात्र में आनन्द का अनुभव करता । वास्तव में वही तत्त्व प्रत्येक प्राणी के आनन्द का मूल स्त्रोत है।
परमेश्वर को रस कहा गया है। यह रस भौतिक नहीं आत्मिक है। उसे उल्लास, सन्तोष, तृप्ति शान्ति जैसी दिव्य सम्वेदनाओं में अनुभव किया जाता है। इसकी उपलब्धि उत्कृष्टता के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। अंतरात्मा जितना पवित्र और उदात्त बनता जाता है, उसी अनुपात से यह आनन्द बढ़ता है। यह उत्कृष्ट दृष्टिकोण तथा उच्चस्तरीय कर्म-परायणता पर निर्भर है। निकृष्ट चिन्तन और भ्रष्ट क्रिया-कलाप के रहते अन्य किसी उपाय से इस आनन्द का दर्शन हो नहीं सकता। आनन्द की आकांक्षा करने वाले हर व्यक्ति को आनन्दमय कोश की गहराई में उत्तर कर उस उद्गम स्त्रोत तक पहुँचना पड़ता है जहाँ से दिव्य आनन्द की प्रकाश किरणें फूटती है।
आनन्द का स्वरूप, आधार और सर्वविदित हो जाने पर मान्यता स्थिर होती है। क्या करने से क्या मिलता है? यह निश्चित हो जाना ही भ्रान्ति का निवारण है वस्तु स्थिति का ज्ञान ही तत्त्वज्ञान है। आत्मिक समस्याएँ ही सबसे बड़ी समस्याएँ है। उन्हीं के समाधान से वास्तविक समाधान होता है। अस्तु अन्तरात्मा की उलझनों को सुलझा देने वाले ज्ञान को ही ब्रह्मज्ञान तत्त्वज्ञान, आत्म ज्ञान, सद्ज्ञान आदि के नाम से पुकारते हैं। आनन्द प्राप्ति के लिए सर्वप्रथम इसी आन्तरिक समाधान और दिशा निर्धारण का प्रयत्न करना पड़ता है। समाधि इसी स्थिति का नाम है। आनन्द की उपलब्धि में सर्वप्रथम इसी का प्रयत्न किया जाता है। समाधि से मतलब मूर्च्छित हो जाना माना जाता है। हठयोग के अंतर्गत ऐसे प्रयोग भी हैं जिनमें श्वास क्रिया रुकती और हृदय की धड़कन घटती है। वैसी दशा में चेतना निश्चेष्ट होकर बहुत समय तक पड़ी रहती है। चेतन और अचेतन को गहरी निद्रा में सुला कर पूर्वाग्रहों एवं पूर्व संस्कारों की उत्तेजना शान्त करना इसका उद्देश्य माना जाता है। ऐसा समय हर किसी के लिए सरल नहीं है। उसके लिए नाड़ी-शोधन चक्र-वेधन प्राण साधना जैसी अनेक कठिन मंजिलें पार करनी पड़ती है। वह विशेष लोगों का विशेष कृत्य है। सर्वसाधारण की समाधि वह है जिसमें जीवन की दिशा-धारा अस्त-व्यस्त न रहने देकर एक सुनिश्चित मार्ग पर प्रवाहित की जाती है। वर्षा का पानी मारा-मारा फिरे तो उससे हानि ही होगी। नदी-नाले के माध्यम से उसके बहने में ही लाभ है। चिन्तन की दिशा निर्धारण हो जाना और आकांक्षाओं एवं विचारणाओं का उत्कृष्टता की दिशा में बहने लगना ही समाधि है। समाधि का अभ्यास होने पर बिखराव भटकाव समाप्त होता है और चिन्तन तथा कर्म का समुचित लाभ मिल सकने की स्थिति बन जाती है, इसलिए आनन्दमय कोश की साधना के प्रथम चरण में समाधि परक प्रयोग किये जाते हैं। यह जागृत समाधि है। इसमें मूर्च्छित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती, वरन् प्रलोभन एवं भय की उत्तेजनाओं को शान्त करना पड़ता है। ऐषणाओं के आवेश ठण्डे पड़ने पर मनुष्य अपना लक्ष्य देख पाता है। निर्धारित दिशा में चल पड़ने की बात इससे पूर्व बन ही नहीं पड़ती । आनन्दमय कोश के साधकों को जिस एकाग्रता की आवश्यकता बताई गई है, वह एक केन्द्र पर सोचते रहने की मानसिक विधि नहीं, वरन् लक्ष्य का सुनिश्चित निर्धारण ओर अधोगमन है। ऐसी मन स्थिति को ‘समाधिस्थ’ कहा गया है।
‘सम्यगाधीयत एकाग्री क्रियते
विक्षेपान्परिहत्य मनो यत्र स समाधिः। - भोज
जिसमें मन को विक्षेपों से हटाकर यथार्थ में एकाग्र किया जाता है, वह स्थिति समाधि है।
त्यक्तवां विषयभोगांश्च मनोनिश्चलता गतम्।
आत्मशक्तिस्वरुपेण समाधिः परिकीर्तितः॥
- दक्षस्मृति 7।21
विषय भोगों की चंचलता त्याग कर जिसने स्थिर मनः स्थिति प्राप्त कर ली, आत्म बल प्राप्त कर लिया उसकी स्थिति ‘समाधि ‘की ही है।
सलिले सैन्धवं यद्धत्साम्यं भजति योगतः।
तथाऽऽत्ममनसोरैक्यं समाधिरभि धीयते॥
- हठ0प्र0. 4।5
अर्थ-जैसे लवण जल में मिलने से जल के ही रूप को प्राप्त हो जाता है वैसे ही आत्मा एवं मन का एक रूप होना समाधि कहलाता है।
तत्समं च द्वयोरैक्यं जीवात्मपरमात्मनोः।
प्रनष्टसर्वसंकल्पः समाधिः सोऽभिधीयते॥
- योग संध्या
जीवात्मा और परमात्मा इन दोनों की एकरूपता को ही समता कहते हैं और उस समय नष्ट हुए हैं सम्पूर्ण संकल्प जिसमें सम को समाधि कहते हैं।
समाधिः समतावस्था जीवात्मपरमनों।
संयोगो योग इत्युक्तो जीवात्मपमात्मनोः॥
- याज्ञवल्क्य
जीवात्मा और परमात्मा की इच्छा एवं दिशा जब एक जैसी होती है, वे वियोग से हटकर एकत्व स्थापित करते हैं तो उस स्थिति को समाधि कहते हैं।
यत्समत्वं तयोरत्र जीवात्मा परमात्मनोः।
समस्त नष्ट संकल्पः समाधिरभिधीयते॥
स्वयमुच्चलिते देहे देहीनित्य समाधिना।
निश्चल। तं विजानीयात् समाधिरभिधीयते॥
- सौभाग्य0 उपनिषद्
ललक और लिप्साओं की आकांक्षाएँ नष्ट होने पर जब जीव और ब्रह्म के बीच एक दिशा का- एकता का निर्धारण होता है तो उस स्थिति को समाधि कहते हैं। प्रलोभनों की चंचलता शिथिल होने पर जो आत्म स्थिरता प्राप्त होती है वही समाधि है।
आन्तरिक दिव्य क्षमताओं का विनाश तो तृष्णा जन्य चंचलता से होता है। यदि वह उद्विग्नता न रहे, लक्ष्य की ओर चलने का निश्चित संकल्प बन जाय तो अपव्यय रुकने से आत्म शक्ति का संग्रह और अभिवर्धन होता चलता है। फलतः कितनी ही प्रकार की दिव्य क्षमताएँ उभरती चली जाती हैं इन विभूतियों का परिचय कितने ही रूपों में मिलता रहता है। यथा-
समाध्यभ्यासतो नित्यं जायतेऽर्मनोलयः।
अंतर्दष्टिप्रकाशश्च तस्य संजायते क्रमात्-योग रसायन।
समाधि के नित्य अभ्यास से क्रमश मन अन्तर्लीन हो जाता है और अन्तर्दृष्टि प्रकाशित होती है।
स्वप्नदष्टपदार्थोधो मृषा भवति निश्चितम्।
समाधौ त्वमृषा सर्व वस्तु कार्यकरं तथा॥
- योग रसायनम्
स्वप्न में देखे गये पदार्थ मिथ्या होते हैं, जबकि समाधि स्थिति में अनुभूत बातें सत्य होती है तथा उनके द्वारा समाधि के उपरान्त भी वास्तविक लाभ होता है।
समाधि की आन्तरिक स्थिरता प्राप्त होने पर साधक का दृष्टिकोण परिष्कृत होता है। वह विधेयात्मक और रचनात्मक गुणग्राही चिन्तन पद्धति का अभ्यास करता है। अपने सद्गुणों को बढ़ाता है और दूसरों का सद्गुण प्रधान पक्ष खोजता है सृष्टि में यों कुरूपता भी विद्यमान् है और मनुष्य में तामसिकता के अंश भी मौजूद है, बदलने और सुधारने के लिए रचनात्मक प्रवृत्ति की आवश्यकता है। असहयोग, विरोध और दण्ड जैसे कुकृत्यों का निषेध नहीं है, पर वे द्वेष और घृणा से प्रेरित नहीं, सुधार की हित कामना से होने चाहिए। इस प्रकार संसार के अशुभ पक्ष से निपटते हुए भी आन्तरिक उत्कृष्टता स्थिर रखा जा सकती है। श्रेष्ठता का पक्ष तो अधिक मात्रा में है ही अन्धकार से प्रकाश इस संसार में अधिक है। दुष्टता की तुलना में श्रेष्ठता कम नहीं है। उसी को खोजा, अपनाया जाय, सम्पर्क सम्बन्ध उसी से साधा जाय और उसी के अभिवर्धन-परिपोषण में निरत रहा जाय तो मस्तिष्क में निरन्तर सात्विक उत्साह छाया रहेगा। सौंदर्य दृष्टि विकसित होने पर विश्व-व्यापी सौंदर्य का दर्शन होने लगेगा। पदार्थों और प्राणियों में पाई जाने वाली श्रेष्ठता के
सम्पर्क में आने से शिवत्व की झाँकी मिलती है। इस विश्व के मूल में ब्रह्म सत्ता ही आलोकित है यह समझने वालों को ‘सत्य’ की प्राप्ति होती है। परिष्कृत दृष्टिकोण वालों को सत्यं शिवं सुंदरम् का दर्शन हर घड़ी होता है और सर्वत्र स्वर्ग की उपस्थिति प्रतीत होती है।
सन्त इमर्सन कहा करते थे कि मुझे नरक में भेज दो मैं अपने लिए वहीं स्वर्ग बना लूँगा। इस कथन में परिपूर्ण तथ्य भरा पड़ा है। परिष्कृत दृष्टि से समीपवर्ती वातावरण में भी बहुत कुछ सुधारात्मक अनुकूलता उत्पन्न की जा सकती है, किन्तु स्थिति से अनुकूलता प्रतिक्रिया उपलब्ध कर सकना तो पूर्णतया अपने हाथ की बात है। स्वर्ग इस दिव्य दर्शन का-उत्कृष्ट चिन्तन का नाम है। उसे कोई स्थान विशेष नहीं माना जाना चाहिए, वह वस्तुतः एक दृष्टिकोण भर है। नरक और स्वर्ग को निकृष्ट ओर उत्कृष्ट चिन्तन की अशुभ एवं शुभ प्रतिक्रिया ही समझा जाना चाहिए। हर व्यक्ति इमर्सन की तरह ही अपने लिए अपने सुखद स्वर्ग का सृजन दृष्टिकोण को परिष्कृत करके सहज ही कर सकता है। समाधि से स्वर्ग को अनुभूति और प्राप्ति होना सुनिश्चित है। इसी का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-
वाक् शौचं कर्म शौचं च यंच शौचं जलात्मकम्।
त्रिभिः शौचैरुपेता यः स स्वर्गो नात्र संशयः॥
- महाभारत वन0
वाणी की पवित्रता, कर्मों की पवित्रता, जलात्मक पवित्रता, जो स्थान या अवस्था इन तीन पवित्रताओं से मुक्त हो। वही
स्वर्ग है, इसमें संशय नहीं है।
स्वर्गिणोऽप्येतमिच्छन्ति लोक निरयिणस्तथा।
साधकं ज्ञानभक्तिभ्यामुभयं तद्साधनम्॥
- योग संध्या
स्वर्ग के रहने वाले देवता भी इस मनुष्य देह में जन्म की अभिलाषा करते हैं क्योंकि वह मनुष्य लोक ज्ञान भक्ति द्वारा मोक्ष का साधन होने से श्रेष्ठ है।
किंचन द्वेष्टि तथान किचिदपि काङ्क्षति।
भुङ्क्तेयः प्रकृतान् भोगान् स जीवन्मुक्त उच्चयते॥
- महोपनिषद 2।60
जो केवल प्राप्त भोगों का उपभोग करने वाला आकांक्षाओं से रहित तथा किसी के प्रति ईर्ष्या द्वेष नहीं करता वह जीवन मुक्त है।
भूमौयावद्यस्य कीर्तिस्तावत्स्वर्गें स तिष्ठति।
अकीर्तिरेवनरको नान्योस्ति नरकोदिवि॥
- शुक्रनीति
जिसकी कीर्ति जब तक भूमि में टिकती है तब तक वह स्वर्ग में रहता है अपकीर्ति ही नरक है। दूसरा नरक परलोक में नहीं है।
पराडिववैस्वर्गो लोकः।
- शत॰ 13।1।3।3
स्वर्ग कहीं अन्यत्र नहीं, अपने ही भीतर है।
समाधि और स्वर्ग के उपरान्त आनन्दमय कोश की तीसरी उपलब्धि है-मोक्ष मोक्ष अर्थात् बन्धन मुक्ति। बन्धन अर्थात् पिछड़ेपन का कुसंस्कार कषाय-कल्मष जीव को बाँध सकने वाली संसार की और कोई शक्ति नहीं है। उसकी निज की दुर्बलताएँ और निकृष्टताएँ ही प्रगति के पथ पर बढ़ चलने से रोकने वाली सबसे बड़ी बाधाएँ है। मकड़ी अपना जाल आप बुनती और उसी में फँसी रहती है। रेशम के कीड़े भी अपना बंदीगृह आप बनाते हैं। मनुष्य के भव-बन्धन उसी ने अपने हाथों विनिर्मित किये हैं और स्वयं ने ही उन्हें हथकड़ी बेड़ी की तरह धारण किया है। भेड़ों के झुण्ड में पले सिंह, शावक की तरह ओछेपन का आवरण अपने ही अज्ञान से हमने ओढ़ा है। बन्धनों का कितना कष्ट होता है इसे पशु-पक्षी तक जानते हैं जो विवशता में तनिक भी कमी आने पर बेतरह भाग खड़े होते हैं, भले ही उन्हें कितने ही अभावों और संकटों का सामना क्यों न करना पड़े?
मनुष्य ईश्वर का सबसे बड़ा राजकुमार है। उसकी सम्भावनायें असीम है। उपलब्ध साधनों का सदुपयोग करके वह इसी जीवन में उतनी उच्चस्थिति में पहुँच सकता है जिसे देवात्मा-परमात्मा के समतुल्य कहा जा सके। इस प्रगति में परिस्थिति की नहीं मनःस्थिति की ही प्रधान बाधा है। यदि जीवन की सार्थकता के लिए जो करना है उसे समझ और अपना लिया जाय तो फिर वह स्थिति बन जायेगी जिसे ईश्वर की समीपता कहते हैं। मोक्ष इसी का नाम है।
मोक्ष के सम्बन्ध में विचित्र मान्यताएँ प्रचलित है। कोई उसे जन्म-मारण से आवागमन से छुटकारा बताता है कोई संसार को छोड़कर किसी अन्य लोक में चले जाने की कल्पना करता है। किसी को काम न करने की बैठे-ठाले हर इच्छा पूरी होते रहने की स्थिति मोक्ष प्रतीत होती है। किन्हीं-किन्हीं की उड़ान विचित्र है, वे भगवान् का कोई विशेष नगर, ग्राम, लोक मानते हैं और उनके पास दरबारियों की तरह जा विराजने की कल्पना करते हैं। सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुजय यह चार स्थिति मुक्ति में मिलने की बात बताई जाती है। सालोक्य का मतलब है भगवान के लोक में अपने लिए भी एक फ्लैट बन जाना सामीप्य का मतलब है उनके दरबारी कर्मचारियों में नियुक्त होना। सारूप्य का अर्थ है- भगवान जी की डमी कापी बनकर रहना। सुरक्षा के लिए डिक्टेटर लोग प्रायः अपनी ही शकल-सूरत का एक दूसरा आदमी रखते भी थे जिसे खतरे के स्थान पर भेज कर वे स्वयं सुरक्षित रह सके। सायुज्य का तात्पर्य है साझेदारी उनकी सम्पत्ति अथवा सत्ता में अपनी घुस- पैठ बन पड़ना यह सायुज्य मुक्ति कही जायेगी। यह सभी उपहासास्पद बाल कल्पनाएँ है। इन्हें आलंकारिक वर्णन के रूप में प्रस्तुत किया गया है, पर उदाहरणों को तथ्य मान लेने की भूल अपना ली गई।
मोक्ष का तात्पर्य है- आत्मसत्ता को भौतिक न मानकर विशुद्ध चेतन तत्त्व के रूप में अनुभव करने लगना। सुखानुभूति, प्रसन्नता एवं सफलता भौतिक साधनों से मिलने के स्थान पर आन्तरिक परिष्कार के आधार पर उपलब्ध होने के तथ्य पर विश्वास करना। पशु-प्रवृत्तियों की कुसंस्कारिता से छूटकर मानवी दैवी संस्कृति को व्यवहार में उतारना। उत्कृष्टता ही ईश्वर है। ईश्वर की समीपता अथवा प्राप्ति का मतलब है अपनी आकांक्षाओं, चेष्टाओं, दिशा-धाराओं को उत्कृष्टता के साथ अविच्छिन्न रूप से जोड़ देना। लोक-मानस लोक-प्रवाह जिस स्वार्थ एवं पतन की दिशा में बहता चला जा रहा है। उस विवशता से अपने को मुक्त कर लेना- मछली की तरह धार को चीरते हुए उलटे प्रवाह में तैर सकना। यह अन्तः स्थिति जिसे भी प्राप्त हो उसे बन्धन मुक्त कह सकते हैं। मोक्ष अथवा मुक्ति को जीवन का परम फल बताया गया है। उसका स्वरूप यही है।
मरने के बाद स्वर्ग या मुक्ति का लाभ मिल सकता है। ऐसा सोचना व्यर्थ है। यह उपलब्धियाँ इसी जीवन की है। इनका आनन्द इसी जीवन में- आज ही मिलना चाहिए। यह सब कुछ दृष्टिकोण के- आन्तरिक स्तर के-परिवर्तन पर निर्भर है। मुक्ति जीवित रहने पर ही मिलती है। मरने के बाद जो कुछ जा सकती है। अस्तु आत्मिक प्रबल पुरुषार्थ की सुखद उपलब्धि इसी जीवन में मिलने की बात सोचनी चाहिए। जीवित रहते ही यह स्थिति मिलती है इसलिए उसे 'जीवन्मुक्तिः' भी कहा जाता है। मुक्ति जीवन मुक्ति का ही संक्षेप है। निष्कृष्टता से - ओछेपन से छुटकारा पाने वाला कोई भी व्यक्ति इसी जीवन में मुक्ति का आनन्द ले सकता है इस संदर्भ में शास्त्रकारों का अभिमत इस प्रकार है।
उद्वेगारन्दरहितः समयाः स्वच्छयाध्या।
न शोचते न चोदेति स जीवन्मुक्त उच्चयते॥
- महोपनिषद 2।57
जो उद्वेग और आनन्द से रहित, शोक अथवा हर्षोत्साह से ममत्व एवं स्वच्छ बुद्धि वाला है, वह जीवन मुक्त है।
घृणा शंका भयं लज्जा जुगुप्सा चेति पंचमी कुलं शीलं च शक्ति श्चाष्टौ पाशाः प्रकीर्तिताः पाशबद्धः पशुः प्रोक्तो पाशमुक्तः सदा शिवः।
- तन्त्र कौस्तुभ
घृणा, शंका, भय, लज्जा, जुगुप्सा कुल, शील, शक्ति यह आठ पाश है। जो इनमें बंधा है सो पशु है और जो मुक्त है सो शिव है।
मौनवान् निरहभावो निर्मानो मुक्त मत्सरः।
यः करोति गतोद्वेगः स जीवन्मुक्त उच्चयते॥
- महोपनिषद् 2।50
जिसने अहंकार के भाव का परित्याग कर दिया है, मान-मत्सर के विकार से मुक्त हो गया है, जो उद्वेग रहित होकर कर्म में रत है, उसे ही ज्ञानीजन जीवन मुक्त कहते हैं।
यः समस्तार्थ जालेषु व्यवर्हार्यपि निस्पृहः।
परार्थोष्क्वि पूर्णात्मा स जीवन्मुक्त उच्चयते॥
- महोपनिषद 2।62
विश्व के सभी अर्थ- जालों के मध्य स्थिर होकर भी पराये धन से निस्पृह रहने वाले धर्मात्मा के समान जो पुरुष निस्पृह रहता है, वह आत्मा में ही पूर्णता का अनुभव करने वाला महात्मा जीवनमुक्त है।
द्वे पदे बन्धमोक्षाय निर्यमति ममेति च।
म्मेति बघ्यते जन्तुर्निर्ममेति विमुच्चयते॥
- महोपनिषद् 4। 72
बन्धन और मोक्ष में केवल दो पद का अन्तर है। मेरा है यही बन्धन है। मेरा नहीं है, यही मुक्ति है।
जरा मरणम पच्च राज्यं दारिद्यमेव च।
रम्यमित्येव यो भुड्क्ते स जीवन्मुक्त उच्यते॥
- महोपनिषद 2।55
जो वृद्धावस्था, मृत्यु, विपत्ति, ऐश्वर्य-भोग एवं दारिद्रय में समभाव रखता हुआ सब स्थितियों में सन्तुष्ट रहता है, वह जीवन मुक्त है।
उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणां गतिः।
तथैव ज्ञानकर्मभ्याँ प्राप्त्यते शाश्वती गतिः॥
- योग वशिष्ठ
जैसे पक्षी आकाश में दोनों पंखों से उड़ते हैं, इसी प्रकार ज्ञान और कर्म से मुक्ति प्राप्त होती है।
मोक्षस्य नहि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमेव वा।
अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतः॥
- योग संध्या
किसी स्थान- विशेष में या लोकान्तर में निवास करने का नाम मोक्ष नहीं। अज्ञान रूपी हृदय ग्रन्थि का नाश ही मोक्ष है।
समाहितो ब्रहमपरोऽप्रमादी
शुचिस्तथैकान्तरतिर्यतेन्द्रियः।
समाप्नुयाद्योगामिमं महात्मा
विमुक्तिमाप्नोति ततः स्वयोगतः॥
- मार्कण्डेय पुराण
अप्रमादी, पवित्रात्मा, इन्द्रियजय, सम्यक्, बुद्धि, ब्रह्म परायण व्यक्ति अपने ही पुरुषार्थ से जीवन मुक्त बनते हैं।
नमोक्षे नभसः पृष्टे न पाताले न भूतले।
सर्वाशा सक्षये चेतः क्षयो मोक्ष इतीर्यते-योग वशिष्ठ
मोक्ष का स्थान आकाश, पाताल या भूतल नहीं है। भ्रान्तियों और संशयों का नष्ट हो जाना ही मोक्ष है।
यस्तु शान्त्यादि युक्तः सन्मात्मत्वेन पश्यति।
स जायते पर ज्योतिरद्वैतं ब्रहम केवलम्।
आत्म स्वरुपावस्थानं मुक्ति रित्यभिधीयते।
- शिव गीता
जब अन्तरात्मा का समाधान हो जाता है, शान्ति और समता रहती है तो अपने भीतर आत्म-ज्योति का दर्शन होता है। इसी अन्त स्थिति को मुक्ति कहते हैं।
दुःख जन्म प्रवृति दोष मिथ्याज्ञानाना-
मुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरा पायापदपवर्गः।
- न्याय सूत्र
दुःख, जन्य प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या ज्ञान आदि अवरोधों से छुटकारा पाना ही मोक्ष है।
नित्याऽनित्य विचाराऽनित्य संसार सुख दुःख विषय समस्त क्षेत्र ममता बन्धक्षयो मोक्षः।
- निरात्ववोपनिषद
ममता, शाश्वत और नाशवान् का-सुख और दुःख का-गलत सही निर्धारण हो बन्धन और मोक्ष का कारण है।
आनन्दमय कोश अन्तरात्मा का उच्चतम स्तर है। उसमें पवित्रता एवं उत्कृष्टता की मात्रा बढ़ने से समाधि, स्वर्ग और मुक्ति का दिव्य रसास्वादन सम्भव होता है। इस ब्रह्मानंद को ही परमानन्द कहा गया है। सच्चिदानन्द प्रभु की उपलब्धि अपने ही अन्तःकरण में इसी आन्तरिक प्रगति के आधार पर सम्भव होती है। आनन्द का वास्तविक स्वरूप यही है। आनन्दमय कोश की साधना से इसी चरम उपलब्धि की दिशा में बढ़ चलना सम्भव होता है।
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकमू। ददामि बुद्धि योग तं येन मामुपयान्ति ते॥
तेषांमेवानुकम्पार्थमहमज्ञानज तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥
(गीता 10। 10-11)
जो प्रेम से मेरा सदैव भजन करते हैं उनको मैं ऐसी बुद्धि देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त कर सकें, उन पर अनुग्रह करने के लिए मैं उनकी बुद्धि में वास कर ज्ञान-दीपक की सहायता से अज्ञान मूलक अन्धकार का नाश करता हूँ, ज्ञान भक्ति से अलग नहीं है, ऐसी बात को समझाने के लिए गीता कहती है।
कुण्डलिनी विज्ञान में मूलाधार को योनि और सहस्रार को लिंग कहा गया है। यह सूक्ष्म तत्त्वों की गहन चर्चा है। इस वर्णन में काम क्रीड़ा एवं शृंगारिकता का काव्य मय वर्णन तो किया गया है, पर क्रिया प्रसंग में वैसा कुछ नहीं है। तन्त्र ग्रन्थों में उलट भाषियों की तरह मद्य, माँस, मीन, मुद्रा और पाँचवाँ ‘मैथुन’ भी साधना प्रयोजनों में सम्मिलित किया गया है। यह दो मूल सत्ताओं के संभोग नहीं जोड़ा गया है। यों यह सूक्ष्म अध्यात्म सिद्धान्त रति कर्म पर भी प्रयुक्त होते, दाम्पत्य स्थिति पर भी लागू होते हैं। दोनों के मध्य समता की, आदान-प्रदान की स्थिति जितनी ही संतुलित होगी उतना ही युग्म को अधिक सुखी, सन्तुष्ट समुन्नत पाया जायेगा।
मूलाधार में कुण्डलिनी शक्ति शिव लिंग के साथ लिपटी हुई प्रसुप्त सर्पिणी की तरह पड़ी रहती है। समुन्नत स्थिति में इसी मूल स्थिति का विकास हो जाता है। मूलाधार मल मूल स्थानों के निष्कृष्ट स्थान से ऊँचा उठकर मस्तिष्क के सर्वोच्च स्थान पर जा विराजता है। छोटा सा शिव लिंग मस्तिष्क में कैलाश पर्वत बन जाता है। छोटे सा शिव लिंग मस्तिष्क में कैलाश पर्वत बन जाता है। छोटे से कुण्ड को मान सरोवर रूप धारण करने का अवसर मिलता है प्रसुप्त सर्पिणी जागृत होकर शिव कंठ से जा लिपटती है और शेषनाग के परिक्रमा
रूप में दृष्टि गोचर होती है। मुँह बन्द कली खिलती है और खिले हुए शतदल कमल के सहस्रार के रूप में उसका विकास होता है। मूलाधार में तनिक सा स्थान था, पर ब्रह्मरंध्र का विस्तार तो उससे सौगुना अधिक है।
सहस्रार को स्वर्ग लोक का कल्पवृक्ष- प्रलय काल में बचा रहने वाला अक्षय वट-गीता का ऊर्ध्व मूल अधःशाखा वाला अश्वत्थं- भगवान बुद्ध को महान् बनाने वाला बोधि वृक्ष कहा जा सकता है। यह समस्त उपमाएँ ब्रह्मरन्ध्र में निवास करने वाले ब्रह्म बीज की ही है। वह अविकसित स्थिति में मन बुद्धि के छोटे मोटे प्रयोजन पूरे करता है, पर जब जागृत स्थिति में जा पहुँचता है तो सूर्य के समान दिव्य सत्ता सम्पन्न बनता है। उसके प्रभाव से व्यक्ति और उसका संपर्क क्षेत्र दिव्य आलोक से भरा पूरा बन जाता है।
ऊपर उठना पदार्थ और प्राणियों का धर्म है। ऊर्जा का ऊष्मा का स्वभाव ऊपर उठना और आगे बढ़ना है। प्रगति का द्वार बन्द रहे तो कुण्डलिनी शक्ति कामुकता के छिद्रों से रास्ता बनाती और पतनोन्मुख रहती है। किन्तु यदि ऊर्ध्वगमन का मार्ग मिल सके तो उसका प्रभाव परिणाम प्रयत्न कर्ता को परम तेजस्वी बनने और अन्धकार में प्रकाश उत्पन्न कर सकने की क्षमता के रूप में दृष्टिगोचर होता है।
कुण्डलिनी को प्रचण्ड क्षमता स्थूल शरीर में ओजस् सूक्ष्म शरीर में तेजस और कारण शरीर में वर्चस् के रूप में प्रकट एवं परिलक्षित होती है। समग्र तेजस्विता को इन तीन भागों में दृष्टिगोचर होते देखा जा सकता है। इस अंतःक्षमता का एक भौंड़ा सा उभार और कार्य काम-वासना के रूप में देखा जा सकता है। कामुकता अपने सहयोगी के प्रति कितना आकर्षणात्मा, भाव उत्पन्न करती है। संभोग कर्म में सरसता अनुभव होती है। सन्तानोत्पादन जैसी आश्चर्यजनक उपलब्धि सामने आती है। यह एक छोटी सी इन्द्रिय पर इस अन्तः क्षमता का आवेश छा जाने पर उसका प्रभाव कितना अद्भुत होता है यह आँख पसारकर हर दिशा में देखा जा सकता है। मनुष्य का चित्त, श्रम, समय एवं उपार्जन का अधिकांश भाग इसी उभार को तृप्त करने का ताना बाना बुनने में बीतता है। उपभोग की प्रतिक्रिया सन्तानोत्पादन के उत्तरदायित्व निभाने के रूप में कितनी महँगी और भारी पड़ती है यह प्रकट तथ्य किसी से छिपा नहीं है। यदि इसी सामर्थ्य को ऊर्ध्वगामी बनाया जा सके तो उसका प्रभाव देवोपम परिस्थितियाँ सामने लाकर खड़ी कर सकता है।
मेरी दृष्टि से जननेन्द्रियों को काम वासना एवं रति प्रवृत्ति के लिए उत्तरदायी माना जाता है। पर वैज्ञानिक गहन अन्वेषण से यह तथ्य सामने आता है कि नर-नारी के प्रजनन केन्द्रों का सूत्र संचालन मेरुदण्ड के सुषुम्ना केन्द्र से होता है। यह केन्द्र नाभि की सीध में है। हैनरी आस्ले कृत ‘नोट्स आन फिजयालोजी’ ग्रन्थ में इस संदर्भ में विस्तृत प्रकाश डाला गया है। उसमें उल्लेख है कि - नर नारियों के प्रजनन अंगों के संकोच एवं उत्तेजना का नियन्त्रण मेरुदंड के ‘लम्बर रीजन’ (निचले क्षेत्र) में स्थित केन्द्रों से होता है। इस दृष्टि से कामोत्तेजना के प्रकटीकरण का उपकरण मात्र जननेन्द्रिय रह जाती है।
उसका उद्गम तथा उद्भव केन्द्र सुषुम्ना संस्थान में होने से वह कुण्डलिनी की ही एक लहर सिद्ध होती है। यह प्रवाह जननेन्द्रिय की ओर उच्च केन्द्रों को मोड़ देने की प्रक्रिया ही इस महाशक्ति की साधना के रूप में प्रयुक्त होती है।
नैपोलियन हिल ने अपनी पुस्तक ‘थिंक एन्ड ग्रो रिंच’ में काम शक्ति के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाला है। वे सैक्स एनर्जी को मस्तिष्क और शरीर दोनों को समान रूप से प्रभावित करने वाली एक विशेष शक्ति मानते हैं यह मनुष्य को प्रगति की दिशा में बढ़ चलने के लिए प्रेरणा देती है।
सामान्यतया उसका उभार इन्द्रिय मनोरंजन मात्र बनकर समाप्त होता रहता है। जमीन पर फैले हुए पानी की भाप भी ऐसे ही उड़ती और बिखरती भटकती रहती है, पर यदि उसका विवेकपूर्ण उपयोग किया जा सके तो भाप द्वारा भोजन पकाने से लेकर रेल का इंजन चलाने जैसे असंख्यों उपयोगी काम लिये जा सकते हैं। काम शक्ति के उच्चस्तरीय सृजनात्मक प्रयोजन अनेकों हैं कलात्मक गतिविधियों में- काव्य जैसी कल्पना सम्वेदनाओं में - दया, करुणा एवं उदार आत्मीयता की साकार बनाने वाली सेवा साधना में- एकाग्र तन्मयता से सम्भव होने वाले शोध प्रयत्नों में प्रचंड पराक्रम के रूप में प्रकट होने वाले शौर्य साहस में गहन आध्यात्मिक क्षेत्र से उद्भूत श्रद्धा भक्ति से उसे नियोजित किया जा सकता है।
कामेच्छा एक आध्यात्मिक भूख है। वह मिटाई नहीं जा सकती। निरोध करने पर वह और भी उग्र होती हैं। बहते हुए पानी को रोकने से वह धक्का मारने की नई सामर्थ्य उत्पन्न करता है। आकाश में उड़ती हुई बन्दूक की गोली स्वयमेव शान्ति होने की स्थिति तक पहुँचने से पहले जहाँ भी रोकी जायेगी वहीं आघात लगावेगी और छेद कर देगी। काम शक्ति को बलपूर्वक रोकने से कई प्रकार के शारीरिक और मानसिक उपद्रव खड़े होते हैं इस तथ्य पर फ्रायड से लेकर आधुनिक मनोविज्ञानियों तक ने अपने-अपने ढंग से प्रकाश डाला है और उसे सृजनात्मक प्रयोजनों में नियोजित करने का परामर्श दिया है। एक और से मन हटकर दूसरी और चला जाये। एक का महत्त्व गिरा कर दूसरे की गरिमा पर विश्वास कर लिया जाय, आकांक्षा एवं अभिरुचि का प्रवाह मोड़ने में विशेष कठिनाई उत्पन्न नहीं होती। ब्रह्मचर्य का वैज्ञानिक स्वरूप यही है। अतृप्ति-जन्य अशान्ति से बचने तथा क्षमता का सदुपयोग करके सत्परिणामों का लाभ देने का एक ही उपाय है कि कामेच्छा प्रवृत्ति को सृजनात्मक दिशा में मोड़ा जाय।
कलात्मक प्रयोजनों में संलग्न होने से उसके भौतिक लाभ मिल सकते हैं। अध्यात्म क्षेत्र में उसे भाव संवेदना के लिए ‘भक्ति भावना के रूप में तथा प्रबल पुरुषार्थ की तरह तपोमयी योग साधना में लगाया जा सकता है। दोनों की प्रसुप्त स्थिति को समाप्त कर साहसिक संवेदना उभारना कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया अपनाने से सहज सम्भव हो सकता है।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह जीवन के चार परम प्रयोजन है। काम का अर्थ सामान्यतया रति कर्म समझा जाता है, पर परम प्रयोजनों में उसका अर्थ विनोद, उल्लास आनन्द माना जाता है। यह रसानुभूति दो पूरक तत्त्वों के मिलन द्वारा उपलब्ध होती है। ऋण और धन-विद्युत प्रवाह मिलने से गति उत्पन्न होती हैं रति और प्राणतत्त्व के मिलन से सृष्टि के प्राणि उत्पादनों की सृष्टि होती हैं प्रकृति पुरुष की तरह नर और नारी को भी परस्पर पूरक माना गया है। मानवी सत्ता में भी दो पूरक सत्ताएँ काम करती है इन्हें नर और नारी का प्रतिनिधि मानते हैं। नारी सत्ता मूलाधार में अवस्थित कुण्डलिनी है और नर तत्त्व सहस्रार स्थित परब्रह्म है। इन्हीं को शक्ति और शिव भी कहते हैं। इनका मिल नहीं कुण्डलिनी जागरण का लक्ष्य है। इस संयोग से उत्पन्न दिव्य धारा को भौतिक क्षेत्र ऋद्धि- सिद्धि और आत्मिक क्षेत्र में स्वर्ग मुक्ति कहते हैं। आत्म साक्षात्कार एवं ब्रह्म निर्माण का लक्ष्य भी यही है।
अथर्व वेद में भगवान के काम रूप से जीवन में अवतरित होने की प्रार्थना की गई है।
यास्ते शिवास्तन्वः काम भद्रायाभिः सत्यं भवित
यद्वृषीणे ताभिष्ट्वमस्मां अभिं सवंशास्वयान्यत्रपापी रपवेशयाधियः।
- अथर्व
हे परमेश्वर तेरा काम रूप भी श्रेष्ठ और कल्याण कारक है उसका चयन असत्य नहीं है। आप काम रूप से हमारे भीतर प्रवेश करें और पाप बुद्धि से छुड़ाकर हमें निष्पाप उल्लास की ओर ले चलें।
कुण्डलिनी महा शक्ति को प्रकृति का निरूपण करते हुए शास्त्रकारों ने उसे 'काम बीज’ एवं ‘काम कला’ दोनों शब्दों का प्रयोग किया है। इन शब्दों का अर्थ कामुकता काम क्रीड़ा या काम शास्त्र जैसा तुच्छ यहाँ नहीं लिया गया है। इस शक्ति को प्रकृति उत्साह एवं उल्लास उत्पन्न करना है। यह शरीर और मन की उभय-पक्षीय अग्रगामी स्फुरणाएं है। यह एक मूल प्रकृति हुई। दूसरी पूरक प्रकृति। मूलाधार को काम बीज कहा गया है और सहस्रार का ‘ज्ञान बीज’। दोनों के समन्वय से विवेक युक्त क्रिया बनती है। इसी पर जीवन को सर्वतोमुखी विकास निर्भर है। कुण्डलिनी साधना से इसी सुयोग संयोग की व्यवस्था बनाई जाती है।
प्रत्येक शरीर में नर और मादा दोनों ही तत्त्व विद्यमान् है। शरीर शास्त्रियों के अनुसार प्रत्येक प्राणी में उभय-पक्षीय सत्ताएँ मौजूद है। इनमें से जो उभरी रहती है उसी के अनुसार शरीर की लिंग प्रकृति बनती है। संकल्प पूर्वक इस प्रकृति को बदला भी जा सकता है। छोटे प्राणियों में उभयलिंगी क्षमता रहती है। वह एक ही शरीर से समयानुसार दोनों प्रकार की आवश्यकताएँ पूरी कर लेता है।
मनुष्यों में ऐसे कितने ही पाये जाते हैं जिनकी आकृति जिस वर्ग की है, प्रकृति उससे भिन्न वर्ग की होती है। नर को नारी की और नारी को नर की भूमिका निबाहते हुए बहुत बार देखा जाता है। इसके अतिरिक्त लिंग परिवर्तन की घटनाएँ भी होती रहती है। शल्य क्रिया के विकास के साथ-साथ अब इस प्रकार के उलट-पुलट होने के समाचार संसार के कोने -कोने से मिलते रहते हैं। अमुक नर नारी बन गया और नारी ने नर के रूप में अपना गृहस्थ नये ढंग से चलाना आरम्भ कर दिया।
दोनों में एक तत्त्व प्रधान रहने से ढर्रा तो चलता रहता है, पर एकांगी पर बना रहता है। नारी कोमलता, सहृदयता, कलाकारिता जैसे भावात्मक तत्त्व का नर में जितना अभाव होगा उतना ही वह कठोर, नीरस, निष्ठुर रहेगा और अपनी बलिष्ठता, मनस्विता के पक्ष के सहारे क्रूर, कर्कश बन कर अपने और दूसरों के लिए अशान्ति ही उत्पन्न करता रहेगा। नारी में पौरुष का अभाव रहा तो वह आत्म हीनता की ग्रन्थियों से ग्रसित अनावश्यक संकोच में डूबी, कठ-पुतली या गुड़िया बनकर रह जायेगी। आवश्यकता इस बात की है कि दोनों ही पक्षों में सन्तुलित मात्रा रयि और प्राण के तत्त्व बने रहें। कोई पूर्णतः एकांगी बनकर न रह जाय। जिस प्रकार
बाह्य जीवन में नर-नारी सहयोगी की आवश्यकता रहती है उसी प्रकार अन्तः क्षेत्र में भी दोनों तत्त्वों का समुचित विकास होना चाहिए। तभी एक पूर्ण व्यक्तित्व का विकास सम्भव हो सकेगा। कुण्डलिनी जागरण से उभय-पक्षीय विकास की पृष्ठभूमि बनती है।
मूलाधार चक्र में काम शक्ति को स्फूर्ति, उमंग एवं सरसता का स्थान माना गया है। इसलिए उसे काम संस्थान कहते हैं। जहाँ-तहाँ उसे योनि संबा भी दी गई है। नामकरण जननेन्द्रिय के आकार के आधार पर नहीं उस केन्द्र में सन्निहित रयि शक्ति को ध्यान में रखकर किया गया है।
आधाराख्ये गुदास्थाने पंकजू च चतुर्दलम्।
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवंदिता-गोरक्षा पद्धति
गुदा के समीप मूलाधार कमल के मध्य योनि है। उस कामाख्या पीठ कहते हैं। सिद्ध योगी इसकी उपासना करते हैं।
अपाने मूल कन्दाख्यं काम रुपं च तज्जगुः।
तदेव वहिन कुण्डंस्यात् तत्व कुण्डलिनी तथा॥
- योग राजोपनिषद्
मूलाधार चक्र में कन्द है। उसे काम रूप-काम बीज-अग्नि कुण्ड कहते हैं। यही कुण्डलिनी का स्थान है।
देवी हयेकाऽग्र आसीत्। सैव जगदण्डमसृजत।
कामकलेति विज्ञायते श्रृंगारकलेति विज्ञायतें।
- वृहवृचोपनिषद् 1
उसी दिव्य शक्ति से यह जगत् मंडल सृजा। वह उस सृजन से पूर्व भी थी वही काम कला है। सौंदर्य कला भी उसी को कहते हैं।
यतद्गुहयामिति प्रोक्तं देवयोनिस्तु सोच्यतें।
अस्याँ यो जायते वहिः स कल्याण प्रदुच्यतें॥
- कात्यान स्मृति
गुहम स्थान में देव योनि है। उससे जो अग्नि उत्पन्न होती है उसे परम कल्याणकारिणी समझना चाहिए।
आधारं प्रथम चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम्।
योनित स्थानं द्वयोर्मघ्ये काम रुपं निगद्यते॥
- गोरथ पद्धति
पहला चक्र मूलाधार है दूसरा स्वाधिष्ठान। दोनों के मध्य योनि स्थान है। उसे काम रूप भी कहते हैं।
कामी कलां काम रुपां चिक्रित्वा
नरो जायते काम रुपश्व कामः।
- त्रिपुरोपनिषद्
यह महाशक्ति काम रूप है। उसे काम कला भी कहते हैं। जो उसकी उपासना करता है सो काम रूप हो जाता है। उसकी कामनाएँ फलवती होती है।
सहस्रार को कुण्डलिनी विज्ञान में महालिंग की संज्ञा दी गई है। यहाँ भी जननेन्द्रिय आकार को नहीं वरन् उस केन्द्र में सन्निहित प्राण पौरुष का ही संकेत है।
तत्रस्थितो महालिंग स्वयं भुः सर्वदा सुखी।
अधोमुखः क्रियावांक्ष्य काम बीजो न चलितः।
- काली कुलामृत
ब्रह्म रंध्र में वह महालिंग अवस्थित है। वह स्वयं भू और स्वरूप है। इसका मुख नीचे की और है। वह निरन्तर क्रियाशील है। काम बीज द्वारा उत्तेजित होता है।
स्वयंभु लिंग तन्मध्ये संरंध्र परिश्मावलम्
ध्यायेश्व परमेशक्ति शिवं श्यामल सुन्दरम्॥
- शाक्तानन्द तरंगिणी
ब्रह्म रंध्र के मध्य स्वयंभू महालिंग है। इसका मुख नीचे की ओर है। वह श्यामल और सुन्दर है। उसका ध्यान करें।
काम बीज और ज्ञान बीज के मिलने से जो आनन्दमयी परम कल्याणकारी भूमिका बनती है उसमें मूलाधार और सहस्रार का मिलन संयोग ही आधार माना गया है। इसी मिलाप को साधना की सिद्धि कहा गया है। इस स्थिति को दिव्य मैथुन की संज्ञा भी दी गई है। इस स्थिति को दिव्य मैथुन की संज्ञा भी दी गई है।
सहस्त्रो परिविन्दौ कुण्डल्यां मेलनं शिवे।
मैथुनं शयनं दिव्यं यतीनां परिकीर्तितत्॥
- योगिनी तन्त्र
पार्वती, सहस्रार में जो कुल और कुण्डलिनी का मिलन होता है, उसी को यतियों ने दिव्य मैथुन कहा है।
पर शक्त्यात्म मिथुन संयोगानन्द निर्गराः।
मुक्तात्म मिथुनंतत् स्त्यादितर स्त्री निवेषकाः।
- तन्त्र सार
आत्मा को- परमात्मा को प्रगाढ़ आलिंगन में आबद्ध करके परम रस का आस्वादन करना ही यही यतियों का मैथुन है।
सुषम्नाशक्ति सुदृष्टा जीवोऽयंतु परः शिवः।
तयोस्तु संगमे देवैः सुरतं नाम कीतितम्।
- तन्त्र सार
सुषम्नाशक्ति सुदृष्टा जीवोऽयंतु परः शिवः।
तयोस्तु संगमे देवैः सुरतं नाम कीर्तितम्॥
- तन्त्र सार
सुषुम्ना शक्ति और ब्रह्मरंध्र शिव है। दोनों के समागम को मैथुन कहते हैं।
यह संयोग आत्मा और परमात्मा के मिलन एकाकार की स्थिति भी उत्पन्न करता है। जीव को योनि और ब्रह्म को वीर्य संज्ञा देकर उनका संयोग भी परमानन्ददायक कहा गया है-
एष बीजी भवान् वीज महंयोनिः सनातनः।
- वायु पुराण
जीव ने ब्रह्म से कहा- आप बीज है। मैं योनि हूँ यही क्रम सनातन से चला आ रहा है।
शिव और शक्ति के संयोग का रूपक भी इस संदर्भ में दिया जाता है। शक्ति को रज और शिव को बिन्दु की उपमा दी गई है। दोनों के मिलन के महत्त्वपूर्ण सत्परिणाम बताये गये है।
विन्दुः शिवो रजः शक्ति श्चन्द्रोविन्दु रजोरविः।
अनयोः संगमा देव प्राप्यते परमं पदम्॥
- गोरक्ष पद्धति
बिन्दु शिव और रज शक्ति। यही सूर्य, चन्द्र हैं। इनका संयोग होने पर परम पद प्राप्त होता है।
बिन्दुः शिवो रजः शक्तिभयोर्मिलनात् स्वयम्।
- शिव संहिता 1।100
बिन्दु शिव रूप और रज शक्ति रूप है। दोनों का मिलन स्वयं महाशक्ति का सृजन है ।
योनि वेदी उमादेवी लिंग पीठ महेश्वर-लिंग पुराण
योनि वेदी उमा है और लिंग पीठ महेश्वर।
जतवेदाः स्वयं रुद्रः स्वाहा शर्वार्धकायिनी।
पुरुषाख्यो मुनः शभुः शतरुपा शिवप्रिया॥
- लिंग पुराण
जातवेदा अग्नि स्वयं रुद्र है और स्वाहा अग्नि वे महाशक्ति हैं उत्पादक परम पुरुष शिव है और श्रेष्ठ उत्पादनकर्ती शतरूपा एवं शिवा है।
अहं बिन्दू रजः शक्तिरुभयोर्मेलनं यदा।
योगिनाँ साधनावस्था भवेदिव्यं व पुस्तदा॥
शिव संहिता 4। 87
शिव रूपी बिन्दु, शक्ति रूपी रज इन दोनों का मिलन होने से योग साधक को दिव्यता प्राप्त होती हैं।
ब्रह्म का प्रत्यक्ष रूप प्रकृति और अप्रत्यक्ष भाग पुरुष है। दोनों के मिलने से ही द्वैत का अद्वैत में विलय होता है। शरीरगत दो चेतन धाराएँ रयि और प्राण कहलाती है। इनके मिलन संयोग से सामान्य प्राणियों को उस विषयानन्द की प्राप्ति होती है जिसे प्रत्यक्ष जगत की सर्वोपरि सुखद अनुभूति कहा जाता है। ऋण और धन विद्युत घटकों के मिलन से चिनगारियाँ निकलती और शक्ति धारा बहती है। पूरक घटकों की दूरी समाप्त होने पर सरसता और सशक्तता की अनुभूति प्रायः होती रहती है।
चेतना के उच्चस्तरीय घटक मूलाधार और सहस्रार के रूप में विलग पड़े रहे तभी तक अन्धकार की नीरस गति हीनता की स्थिति रहेगी। मिलन का प्रतिफल सम्पदाओं और विभूतियों के - ऋद्धि और सिद्धि के रूप में सहज ही देखा जा सकता है। इन उपलब्धियों की अनुभूति में आत्म-परमात्मा का मिलन होता है। और उसकी सम्वेदना ब्रहमानन्द के रूप में होती है, इस आनन्द को विषयानन्द से असंख्य गुने उच्चस्तर का माना गया है।
शिव पार्वती विवाह का प्रतिफल दो पुत्रों के रूप में उपस्थित हुआ था। एक का नाम गणेश, दूसरे का कार्तिकेय। गणेश को प्रज्ञा का देवता माना गया हैं और स्कन्द को शक्ति का। दुर्दान्त, दस्यु, असुरों को निरस्त करने के लिए कार्तिकेय का अवतरण हुआ था। उनके इस पराक्रम ने संत्रस्त देव समाज का परित्राण किया। गणेश ने माँस पिण्ड मनुष्य को सद्ज्ञान, अनुदान देकर उसे सृष्टि का मुकुट-मणि बनाया। दोनों ब्रह्मकुमार शिव शक्ति के-समन्वय के प्रतिफल है। शक्ति कुण्डलिनी- शिव सहस्रार दोनों का संयोग कुण्डलिनी जागरण कहलाता है यह पुण्य-प्रक्रिया सम्पन्न होने पर अन्तरंग ऋतम्भरा प्रज्ञा से और बहिरंग प्रखरता से भर जाता है। प्रगति के पथ पर इन्हीं दो चरणों के सहारे जीवन यात्रा पूरी होती है और चरम लक्ष्य की पूर्ति सम्भव बनती है।
गणेश जन्म के समय शिव जी ने उनका परिचय पार्वती को कराया ओर उसे उन्हीं हाथों में सौंप दिया।
इसका विवरण वामन पुराण में इस प्रकार आया है-
यस्माज्जातस्ततौ नाम्ना भविष्यति विनायकः।
एष विघ्नसहस्त्रांणि देवादीनां हनिष्यति॥
पूजयिज्यन्ति देवाश्च देवि लोकाश्चराचरा।
इत्येवमुक्त्वा देवास्तु दत्तवांस्तनयं स हि॥
- वामन पुराण
इस पुत्र ज्ञान पुत्र का नाम विनायक गणेश ही होगा यह देवों के सहस्रों विघ्नों का हनन करेगा। हे देवि! सब चर-अचर लोक और देवगण इसकी पूजा करेंगे। इतना कह कर शिव ने वह पुत्र देवी को दे दिया था।
स्कन्दोऽथवदनाद्वहनेः शुभ्रात्षडवदनोऽरिहा।
निश्चक्रामोद्भूतो बालो रोगशोक विनाशनः॥
पद्य पुराण
तब छः मुख वाले कुमार स्कन्द उत्पन्न हुए। वे अद्भुत और शोक सन्ताप विनाशक थे।
आद्य शंकराचार्य कृत, सौंदर्य लहरी में षट्चक्रों एवं सातवें सहस्रार का वर्णन है और उस परिकर को कुण्डलिनी क्षेत्र बताया हैं। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत और विशुद्ध चक्रों को पाँच तत्त्वों का प्रतीक माना है और आज्ञाचक्र तथा सहस्रार को ब्रह्म चेतना का प्रतिनिधि बताया है। पाँच तत्त्वों का वेधन करने पर किस प्रकार कुण्डलिनी शक्ति की पहुँच ब्रह्मलोक तक होती है और परब्रह्म के साथ बिहार करती है इसका वर्णन 9 वें श्लोकों में इस प्रकार है-
महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवंह
स्थित स्वधिष्ठाने हृदि मरुत माकाशमुपरि।
मनोअपि भ्रु मध्ये सकलमापिभित्वा कुल पथं,
सहस्त्रारे पद्ये सहरहसि पत्या विहरसि॥
अर्थात्-हे कुण्डलिनी, तुम मूलाधार में पृथ्वी को, स्वाधिष्ठान में अग्नि की, मणिपुर में जल का अनहित में वायु को विशुद्ध में आकाश को वेधन करती हुई आज्ञाचक्र में मन को प्रकाश देती हो, तदुपरान्त सहस्रार कमल में परमब्रह्म के साथ बिहार करती हो।
अवाष्य स्वां भूमि, भुजगानिभमध्युष्ट वलयं।
स्वमात्मानं कृत्वां, स्वापिषि कुल कुण्उ कुहरिणि।
- सौंदर्य लहरी 10
सर्पिणी की तरह कुण्डली मार कर तुम्हीं मूलाधार चक्र के कुल कुण्ड में शयन करती हो।
अविद्या नामत, स्तामिरामिहिरोदीपन करो।
जडानाँ चतैन्य, स्तवक मरकन्द श्रुति शिरा॥
दरिद्राणां चिन्ता मणि गुणनिका जन्य जलधौ।
निमग्नानां दुष्ट्रा, मुररि पुवराहस्य भवती॥
- सौंदर्य लहरी
अज्ञानियों के अन्धकार का नाश करने के लिए तुम सूर्य रूप हो, तुम्हीं बुद्धि हीनों में चैतन्यता का अमृत बहाने वाली निर्झरिणी हो, तुम दरिद्री के लिए चिन्तामणि माला और भव सागर में डूबने वालों का सहारा देने वाली नाव हो, दुष्टों के संहार करने में तुम वाराह भगवान् के पैने दाँतों जैसी हो।
सौंदर्य लहरी के 36 से 41 वें श्लोकों में षट्चक्रों के जागरण और कुण्डलिनी उत्थान की प्रतिक्रिया का वर्णन है। इन श्लोकों में कहा गया है कि मूलाधार में ‘विश्व वैभव’ स्वाधिष्ठान में ‘शान्ति शीतलता-मणिपुर में अमृत वर्षा-अनाहत में ऋतम्भरा प्रज्ञा और अठारहों विद्या -विशुद्ध में आनन्ददायी दिव्य ज्योति की सिद्धियाँ भरी है। आज्ञाचक्र में शिवत्व और सहस्रार में महा मिलन का संकेत है। इन उपलब्धियों का समन्वय इतना महान् है जिसे ऋषित्व एवं देवत्व भी कहा जा सकता है। अपूर्णता से आगे चलकर पूर्णता प्राप्त कर सकना इसी मार्ग का आश्रय लेने से सम्भव होने की बात इन श्लोकों में कही गई है।
कुण्डलिनी महाशक्ति के अनुग्रह से स्वयं आद्य शंकराचार्य किस प्रकार सामान्य द्रविड़ बालक से महामानव बन सके इसका उल्लेख करते हुए उन्होंने स्वानुभूति इस प्रकार व्यक्त की है-
तवस्तन्यं मन्ये धरिण धरकन्ये हृदयतः।
पथः पारावारः परिवहति सारस्वतमिव।
दयावत्या दत्त द्रविड शिशुरास्वाद्य तवयत्।
कबीनाँ प्रौढानामजनि कमनीयाः कवयिता।
- सौंदर्य लहरी
तेरे स्तनों से बहने वाले ज्ञानामृत रूपी पय-पान करके यह द्रविण (शंकराचार्य ) शिशु प्रौढ़ कवियों जैसी कमनीय काव्य रचना में समर्थ हो गया।
ब्रह्माण्ड की व्यवस्था के अनुरूप असंख्यों सौर मंडल अपने-अपने काम करते हैं। सौर मण्डल की आचार अपने-अपने काम करते हैं। सौर मण्डल की आचार संहिता का पालन अपनी पृथ्वी करती है। भूलोक के क्रिया-कलाप प्रतीक रूप से जीव सत्ता को प्रभावित एवं संचालित करते हैं। मानवी काया को एक प्रकार से भूलोक माना जा सकता है। उसमें दो महत्त्वपूर्ण केन्द्रों का-ध्रुव प्रदेशों का अस्तित्व समान रूप से है। मस्तिष्क के नाभि न्यूक्लियस-सहस्रार चक्र को सूर्य का प्रतीक कह सकते हैं और पृथ्वी जिस सप सत्ता के आधार पर खड़ी है उसे मूलाधार कह सकते हैं। इन दोनों अति महत्त्वपूर्ण केन्द्रों की तुलना पृथ्वी के दो ध्रुव प्रदेशों से भी की जा सकती है। दोनों के अंतर्ग्रही सम्बन्ध हैं और परस्पर पूरक होकर ही रह हे है। ठीक इसी प्रकार मानवी मस्तिष्क ब्रह्म सूर्य से भी सम्बन्ध बनाये जाते हुए है और काय केन्द्र को आवश्यक अनुदान भी आदान प्रदान करता रहता है।
सूर्य को धन (पाजेटिव ) और पृथ्वी को ऋण (निगेटिव ) धारा का प्रतीक माना गया है। दोनों स्वभावतः एक दूसरे की और दौड़ते हैं। मिलन से शक्ति धारा प्रवाहित होती है। नर और नारी के आकर्षण की तरह ध्रुवों में भी परस्पर आकर्षण क्रम चलता रहता है। दोनों के मध्यवर्ती सम्बन्ध सूत्र को शक्ति दण्ड कहते हैं। विज्ञान की भाषा में इसे ‘कड्मस’ कहा जाता है। यह सूत्र जिन दिनों प्रखर रहता है उन दिनों प्राणियों तथा पदार्थों की हर दृष्टि से उन्नति होती है किन्तु यदि कारण वंश उस शक्तिदण्ड में क्षीणता आ जाय तो फिर पदार्थों, वनस्पतियों, जीवधारियों, परिस्थितियों में भारी अन्तर उत्पन्न हो जाता है। सबमें उदासी छाई रहती है और सब कुछ घटोत्तरी की ओर चलता है। शरीर में मूलाधार को पृथ्वी, सहस्रार को सूर्य एवं शक्तिदण्ड को मेरुदण्ड में सन्निहित माना गया है।
पुरानी पीढ़ी के वैज्ञानिक मानते रहे हैं कि पृथ्वी में अपना निज का गुरुत्वाकर्षण ताप तथा जीवन है। नई पीढ़ी के अन्वेषणकर्ताओं ने उस मान्यता को बदल दिया है। वे कहते हैं पृथ्वी अपेक्षाकृत अधिक परावलम्बी है। उसकी भौतिक सम्पदा तो आकर्षण भर की है। बाकी तो उसने वेश्या की तरह जिधर-किधर से जोड़ बटोर कर ही अपनी पूँजी बढ़ाई है। कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय- सैत्र दिगो- के खगोल विज्ञानी डबल्यू० एक्सफर्ड ने पृथ्वी वाशिंगटन की इण्टर नेशनल मैनमेटोस्फियर कांफ्रेंस में अपना शोध निबन्ध पढ़ते हुए कहा कि सूर्य का अजस्र शक्ति प्रवाह धरती पर उतरता है पर वह सारे भू-मण्डल पर समान रूप से नहीं बरसता। उत्तरी ध्रुव क्षेत्र के एक विशेष स्थल पर वह बन्दूक की गोली की तरह टूटता है वहाँ से वह पृथ्वी के वायु मण्डल में- रेडियो प्रवाह में सम्मिलित होकर पृथ्वी की भीतरी और बाहरी क्षमताओं को अनुदान देता है। वे कहते हैं उत्तरी ध्रुव पर खुली आँख से दृष्टिगोचर होने वाली ध्रुव प्रभा कोई चमत्कार कौतूहल नहीं वरन् पृथ्वी और सूर्य के आदान-प्रदान का परिचय भर है। अनुदान की मात्रा का सन्तुलित रहना पृथ्वी की आवश्यकता भर के लिए ही उसे ग्रहण किया जाना यही वह तथ्य है। जिसके आधार पर ‘सब कुछ ठीक’ ओ.के. चल रहा है। इसमें असन्तुलन उत्पन्न होते ही ठंड से ठप्प हो जाने अथवा गर्मी से भस्म हो जाने का संकट सामने आ खड़ा होगा।
उत्तरी ध्रुव क्षेत्र का प्रायः 50 हजार वर्ग मील क्षेत्र और दक्षिणी ध्रुव का प्रायः 30 हजार वर्ग मील क्षेत्र ऐसा है जहाँ सूर्य की किरणें दर्पण पर टकराने वाले प्रकाश प्रतिबिम्ब की तरह अवतरित होती है और सीमित आदान-प्रदान करके वापिस लौट जाती है। अनुदान का एक बहुत छोटा अंश ही ध्रुव क्षेत्र ग्रहण करते हैं। उतने से ही धरती की गरिमा बनी रहती है।
मानवी सत्ता के मौलिक शक्ति स्रोतों के सम्बन्ध में भी यही बात है। सूक्ष्म जगत एवं निखिल ब्रह्माण्ड में अनन्त वैभव भरा पड़ा है। उसमें से उत्तरी ध्रुव के प्रतीक सहस्रार चक्र पर अनुदान बरसते हैं इस पूँजी से वह सूर्य की भूमिका निभाता है। अपना सूर्य भी तो पृथ्वी को देने वाली सामर्थ्य महासूर्य से ही धरती की ही भाँति माँग कर लाता है। सहस्रार का सूर्य- मूलाधार रूपी पृथ्वी को अपने अनुदान प्रदान करता है, वहाँ से वह शक्ति छोटे केन्द्रों को चक्रों को- उपलब्ध होती है। उसी का वितरण क्रिया और ज्ञान क्षेत्र के विभिन्न केन्द्रों को समर्थ सक्रिय बनाता है।
सूर्य और पृथ्वी का संयोग सुचारु रूप से चलाने का उत्तरदायित्व ध्रुव प्रदेश सम्भालते हैं। मूलाधार और सहस्रार में भी इसी प्रक्रिया का सुसंचालन आवश्यक होता है। इस दिशा में कोई अवरोध उत्पन्न होते हों तो उन्हें हटाया जाना चाहिए। सुसंचालन और परिशोधन की भूमिका कुण्डलिनी जागरण से सम्भव होती है। दोनों केन्द्रों का प्रखर सहयोग होने पर ही भूलोक की सर्वतो-मुखी सुव्यवस्था सम्भव है और उसी आधार पर जीव सत्ता का विकास क्रम अग्रगामी बनते-बनते पूर्णता के लक्ष्य तक जा पहुँचता है।
उत्तरी ध्रुव पर अन्तर्ग्रही विशेषतया सौर ऊर्जा के टकराव को एक विलक्षण प्रकार के ऊर्जा कम्पनों के रूप में देखा जा सकता है। इसकी प्रत्यक्ष चमक उस क्षेत्र में फैली रहने वाली ध्रुव प्रभा या मेरु प्रकाश के रूप में छाई रहती है यह प्रकाश दोनों ध्रुवों पर अपने-अपने निराले रूपों में दृष्टिगोचर होता है। जिन्होंने उसे आरम्भ में देखा वे आश्चर्यचकित रह गये और हतप्रभ रह कर सोचते रहे, अपनी ही धरती पर यह जादुई दुनिया किस प्रकार बस रही है।
ध्रुव प्रकाश सर्चलाइट की तरह होता है। यह उत्तर की अपेक्षा दक्षिण में अधिक तेज है। जीवन दोनों पर हैं उत्तरी ध्रुव पन एस्किमो मनुष्य जाति रहती है। कई प्रकार के रीछ, कुत्ते, मछली जैसे जीव तथा कई तरह की वनस्पति पाई जाती है। दक्षिण ध्रुव पर पेन्गुइन पक्षी और बिना पंख वाला मच्छर भर पाया जाता है। पेन्गुइन की प्रकृति में असीम प्यार भरा है। एस्किमो अत्याधिक साहसी होते हैं। इसे भी नर के पौरुष और नारी के भाव संवेदन के समतुल्य माना जा सकता है।
दक्षिणी ध्रुव पर महीनों अन्धकार छाया रहता है। जबकि उत्तरी ध्रुव पर छः महीने की रात में भी मेरु प्रकाश का अस्तित्व बना रहता है। ध्रुवों पर सूर्य किरणों की अनेकों विचित्रताएँ दृष्टिगोचर होती है। ध्रुव यात्री वायर्ड ने एक बार सूर्य को बिलकुल हरे रंग का देखा सूर्य किरणों की वक्रता के कारण वहाँ ऐसे ही हवा में लटकती जान पड़ती है। टीले जितने होते हैं उससे कई गुने बड़े लगते हैं कई बार अनेक सूर्य एक साथ उगे हुए दीखते हैं। इसी प्रकार चन्द्रमा भी आकाश में बर्फ में- हवा में अलग-अलग निकले हुए दीखते हैं। यह कृत्रिम सूर्य और चन्द्र भी देखने में वास्तविक जैसे ही प्रतीत होते हैं। उत्तरी ध्रुव पर दिन-रात का क्रम भी विचित्र है। रात-दिन छः-छः महीने के भी नहीं होते। 80 दिन की भी रातें होती है और सूर्य वर्ष भर में 16 दिन तक ही चमक पाता है, चन्द्रमा कई बार इतना चमकता है कि उसके प्रकाश से सूर्य की रोशनी जितना ही काम हो सके। मेरु प्रकाश कभी-कभी तो शान्त रहता है। पर कभी-कभी वह किरणों की लम्बाई के रूप में-कभी ज्योति या ज्वाला के रूप में प्रचण्ड रता है। उसके भी दृश्य बदलते रहते हैं। प्रकाश के गुच्छों के रूप में एवं सर्च लाइट की लम्बी फेंक रोशनी की तरह ही वहाँ दृश्य बदलते रहते हैं।
यह प्रकाश परिवर्तन क्यों होते है? इसके कारण सूर्य की स्थिति में परिवर्तन और उसकी प्रतिक्रिया का धरती पर अवतरण माना गया है। सूर्य से तेज चमक बढ़ते ही एक दो दिन में मेरु प्रकाश भी बढ़ जाता है सूर्य में उठने वाले तूफान धरती पर चुम्बकीय विकिरण बखेरते हैं और पृथ्वी की सामान्य गतिविधियों के हर क्षेत्र में भारी उथल-पुथल उपस्थित हो जाती है।
पृथ्वी में चुम्बकीय शक्ति है जिसके कारण वह अपनी आवश्यक वस्तुएँ अनन्त आकाश में से पकड़ घसीट कर ले आती है। ध्रुव प्रदेश के मेरु प्रकाश में होने वाली हलचलों को इसी पकड़-धकड़ का उखाड़-पछाड़ का दृश्य समझा जा सकता है। बिल्ली, चूहे की- हिरन चीते की शिकार प्रक्रिया एवं पहलवानों की कुश्ती में प्रयुक्त होने वाले दाब पेंचों के समतुल्य माना जा सकता है।
ध्रुव प्रकाश का दृश्यमान जितना अद्भुत है उससे भी अधिक रहस्यमय उसका अदृश्य प्रभाव है। यह प्रभाव स्थानीय ही नहीं होता, वरन् समस्त, भूतल को प्रभावित करता है। भू गर्भ में- समुद्र तल में- वायु मंडल में- ईथर के महासागर में जो विभिन्न प्रकार की हलचलें होती रहती है। चढ़ाव उतार आते रहते हैं। उनका बहुत कुछ सम्बन्ध इस ध्रुव प्रभा से होता है। इतना ही नहीं उसकी हलचलें प्राणधारियों की शारीरिक एवं मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करती है। मनुष्यों पर तो उसका प्रभाव विशेष रूप से होता है। पृथ्वी का चुम्बकत्व जो उसके कण-कण में संव्याप्त है और जिसके कारण जीवन तत्त्व गतिशील है-वह पृथ्वी की मौलिक सम्पदा प्रतीत भर होती है वस्तुतः वैसा है नहीं। यह चुम्बकत्व भी अन्तर्ग्रही अनुदान है। मिलों की पूँजी में बैंकों के सहयोग का बड़ा भाग रहता है। इसी प्रकार पृथ्वी रूप मिल भी अन्तर्राष्ट्रीय अन्तर्ग्रही बैंकों के उधार अनुदान से अपना काम चलाती है। उसकी मूल पूँजी तो वह साख भर है जिसके कारण उपयुक्त मात्रा में अनुदान दाता तत्त्व उसकी सीमित सहायता करते हैं।
यहाँ पृथ्वी की स्थिति से जीव सत्ता की तुलना की जा सकती है। उसे ब्रह्माण्ड-व्यापी ब्रह्मसत्ता से अभीष्ट अनुदान मिलते हैं। आवश्यकतानुसार वे बढ़ सकते हैं, पर इसके लिए अपनी साख बढ़नी चाहिए, प्रामाणिकता सिद्ध की जानी चाहिए। यह बताया जाना चाहिए कि जो नये अनुदान माँगे जा रहे है उन्हें सम्भाल कर रखने एवं सदुपयोग करने की प्रामाणिकता पात्रता बढ़ा ली गई है या नहीं? इस सम्बन्ध में आश्वस्त हुए बिना कोई बैंक या ऋण दाता अपनी पूँजी नहीं फँसाता यहाँ तक कि भिक्षुकों के सम्बन्ध में भी यह सोचा जाता है कि दान मिलने पर वे उसका क्या उपयोग करेंगे? उनकी मान्यता में औचित्य है या नहीं? इतना भर सिद्ध कर देने पर अनुदानों का द्वार खुल जाता है और अभाव ग्रस्तता की शिकायत करने का कोई कारण शेष नहीं रह जाता। साधना का पूरा काम आत्म साधना है। देव साधना का तात्पर्य किसी बाहरी सत्ता को रिझाना नहीं, अपनी ही दिव्य विशेषताओं को जागृत एवं परिष्कृत करना है। इस दिशा में जो जितनी सफलता प्राप्त कर सका, उसे विश्व विभूतियों में से उतने ही अनुपात से दिव्य उपलब्धियाँ सिद्धियाँ- मिलती चली जाती है।
सूर्य से आने वाला शक्ति प्रवाह उत्तरी ध्रुव पर अवतरित होता है। टकराने पर उसमें उछाल आता है। जैसे रबड़ की गेंद पूरे वेग से टकराने पर उछल जाती है। उसी प्रकार यह शक्ति प्रवाह भी उछल कर उस स्थान पर जा गिरता है जिसे दक्षिण ध्रुव कहते हैं। उछाल के आकाश मार्ग को हम चाहे तो अपने काय विश्व का उछाल मेरुदण्ड कह सकते हैं। ब्रह्मरन्ध्र से टकरा कर सविता के दिव्य प्राण उछल कर जिस मार्ग से संचय भण्डार में स्थिर होता है उसे मूलाधार कहा गया है। मस्तिष्क गत ऊष्मा को जननेन्द्रिय मूल के काम बीज तक पहुँचाना मेरुदण्ड का काम है।
एक ध्रुव गहरा है दूसरा उभरा लगता है, किसी फल को चीरते समय मध्य भाग में कुछ भूल रह गई है। दोनों टुकड़ों को मिला दिया जाय तो वे फिर एक समूचा फल दिखाई देंगे
सहस्रार और मूलाधार की भी यह स्थिति हैं। मूलाधार एक गहंर है। उसे समुद्र की, सरोवर की, कुण्ड की-उपमा दी जाती है। योनि भी उसका नाम है। इन आकृतियों से गड्ढे का बोध होता है। सहस्रार की उपमा कमल पुष्प से कैलाश पर्वत से दी गई है। शिव लिंग के रूप में भी उसका उल्लेख है। यह उभार है। गड्ढा और उभार रहने से एक ओर खाई दूसरी ओर टीला रहेगा। दोनों के समन्वित कर दिया जाय तो समतल स्थिति बन सकती है। और समस्वरता आ सकती है। इस समस्वरता को ही समाधि कहा गया है। समाधि रस को ब्रह्मानंद कहा गया है। इसका थोड़ा सा परिचय संभोग रस से मिलता है। आत्मा और परमात्मा के बीच चलने वाले आकर्षण को भक्ति , सम्वेदना कहते हैं। मूलाधार और सहस्रार के बीच चलने वाला आकर्षण इसी स्तर का है।
आत्मा और परमात्मा की दिशा धारा एक ही रहने पर परम शान्ति की अनुभूति होती है। जब तक वे दोनों पृथक् रहते हैं दोनों का आमुख प्रतिकूल रहता है तब तक न तो स्थिरता आती है और न शान्ति मिलती हैं। मूलाधार स्थिति भौतिक सामर्थ्य और सहस्रार स्थिति आत्म सम्पदा जब मिल जुलकर एक ही दिशा में चलने लगते हैं तो जीवन का लक्ष्य पूरा होता है। आत्म सत्ता में अन्तरंग बहिरंग की प्रतिकूलता को अनुकूलता में परिणत करने की प्रक्रिया कुण्डलिनी साधना में सम्पन्न होती है।
पृथ्वी के इर्द-गिर्द एक छलनी जैसा सूक्ष्म कवच चढ़ा हुआ है। उसी में से छन कर आवश्यकतानुसार अन्तर्ग्रही क्षमताएँ भीतर प्रवेश करती है। इसी विशेषता के कारण धरती की अद्भुत स्थिति बन सकी और उस पर जीवन सत्ता विकसित हो सकी। अन्य ग्रहों पर यह कवच नहीं चढ़ा है, इसलिए उन पर अन्तरिक्षीय ऊर्जाएं मन माने ढंग से उतरती है। चन्द्रमा का शरीर उल्काओं के आघात से कितना कुरूप बन गया है। उसकी सतह पर जो गहरे खड्डे हैं वे उल्काओं के आघात से बने है। अन्य ग्रहों को अन्तरिक्षीय विकिरण प्रभावित करते रहते हैं। इन्हीं आक्रमणों ने उन्हें निष्प्राण बना रखा है। यदि उन्हें भी धरती जैसे कवच मिला होता तो वे भी पृथ्वी की तरह-सुन्दर सुविकसित और सजीव स्थिति में बने हुए होते।
मनुष्य का सौभाग्य है कि उसकी सत्ता के इर्द-गिर्द संकल्प शक्ति का-प्राण शक्ति का-एक कवच चढ़ा हुआ है। उसकी छलनी में होकर वह आवश्यकतानुसार ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का प्रवेश होने देता है। अविकसित चेतना की इस छलनी में बहुत छोटे और थोड़े छिद्र होते हैं। तद्नुरूप उसे ब्राह्मी अनुग्रह स्वल्प मात्रा में मिलता है। इतने से वह निर्वाह के साधन भर जुटा पाता है । पेट प्रजनन की आवश्यकता पूरी करने के लिए शारीरिक और मानसिक क्षुधाएँ दबाव डालती है। जितना भर साधन मिल सके प्रायः उतने ही बड़े छिद्र सर्वसाधारण कह छलनी में होते हैं। इससे अधिक महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों की आकांक्षा हो तो संकल्प कवच के छिद्र अधिक चौड़े करने पड़ेंगे और उनकी संख्या भी बढ़ानी पड़ेगी इसी के लिए साधना विज्ञान का आश्रय लिया जाता है। दैवी अनुदान अभीष्ट मात्रा में सहज ही प्राप्त किये जा सकते हैं। उस भण्डार में कोई घाटा नहीं, जहाँ से कि प्राप्त किया जाना है। उपलब्धियों के उपयोग का क्षेत्र भी सुविस्तृत पड़ा है। ऊँचा उठने और आगे बढ़ने के लिए भौतिक और आत्मिक क्षेत्र में अनेकों आधार खाली पड़े है। भूमि को जल की आवश्यकता है समुद्र में असीम जल राशि भरी पड़ी है। भूमि प्यासी समुद्र पर भार। दोनों का सन्तुलन मिलाने के लिए वर्षा करने वाले बादलों की आवश्यकता पड़ती हैं बादलों की व्यवस्था चल पड़े तो धरती का भी भला और समुद्र का भी बादलों का प्रबन्ध करने वाली व्यवस्था साधना उपचार से बनती है। आवरण के छिद्रों की संख्या बढ़ाना और चौड़ी करना ही वह कार्य है जिसके आधार पर साधना को सिद्धि में परिणत होते देखा जा सकता है। जो इस परम पुरुषार्थ के लिए साहस जुटा सके, उसने मनुष्य जन्म का सच्चा लाभ पा लिया ऐसा समझा जा सकता है।
ध्रुव क्षेत्र में सूर्य के अस्त हो जाने पर भी एक विशेष प्रभा मण्डल विद्यमान् रहता है। सूर्य चन्द्र के बिना भी यह प्रकाश बहुत आश्चर्यजनक लगता है। यह चुम्बकीय विद्युत कणों की प्रकीर्णता ही है। यह प्रकाश जैसा दीखने वाला, विद्युतीय परिमंडल एक लम्बी रज्जु जैसा होता है उसमें कई रंग की ज्योतियाँ झिलमिलाती सी दीखती है। यह रंग तेजी से अद्भुत परिवर्तित और तिरोहित होते रहते हैं। अलास्का विश्व विद्यालय के शोध कर्ता जब इस रंगीन झिलमिल के चित्र खींच कर लाये और लोगों को उन्हें दिखाया तो रंग बिरंगी प्राकृत फुलझड़ी की बात पर सभी ने भारी आश्चर्य व्यक्त किया। कुण्डलिनी जागरण के लिए किये ऐसे ही रंग-बिरंगे प्रवाह, गोलक एवं स्फुल्लिंग गतिशील दिखाई पड़ते हैं।
कुण्डलिनी उपासना काल में प्रकाश अनुभूतियाँ प्रायः होती रहती है। आग की उड़ती हुई चिनगारियों से लेकर ज्योति ज्वालाओं तक प्रकाश गोलकों से लेकर तन्तु धाराओं तक की अनुभूतियाँ ध्यानावस्था में होती है। आरम्भ में यह कौतुक कौतूहल जैसा ही प्रतीत होता है किन्तु पीछे इस प्रकाश के आलोक में आत्म बोध ब्रह्म बोध से लेकर अदृश्य दर्शन तक के कितने ही ऐसे आधार सामने आते हैं, जिनसे आत्म कल्याण का पथ प्रशस्त हो सके और जीवन को समुन्नत एवं सर्वोपयोगी बनाने का सौभाग्य मिल सके।
प्रतिभा, सौंदर्य, माधुर्य एवं कौशल का आकर्षण सर्वविदित है। इन चुम्बकीय क्षमताओं के आधार पर लोग व्यक्तित्ववान बनते हैं और उससे दूसरों का मन मोह कर उन्हें उपयुक्त मार्ग पर चलाते हैं। आध्यात्मिक आकर्षण इससे अत्यधिक शक्तिशाली है। उससे अपना प्रभाव क्षेत्र विकसित होता है। उसके आधार पर दूसरों का सहयोग पा सकना- सद्भाव सम्पादन करके उन्हें ऊँचा उठाने में सफल होना सम्भव हो सकता है, साथ ही उस चुम्बकत्व के सहारे दैवी शक्तियों को आकर्षित कर सकने में भी सफलता मिल सकती है। गुण कर्म स्वभाव में उत्कृष्टता उत्पन्न करने वाले दिव्य तत्त्व इस निखिल ब्रह्माण्ड में भरे पड़े है। उन्हें सहायता के लिए कुण्डलिनी साधना के आधार पर चुम्बक ज्योति से साधक का व्यक्तित्व भी ज्योतिर्मय एवं विशिष्ट आकर्षण युक्त बन सकता है।
पहली बार जब ध्रुव प्रदेश के अन्वेषक उस प्रदेश में गये तो उन्होंने अनेक ऐसी विचित्रताएँ देखी जिनकी उन्हें कल्पना भी न थी। वहाँ एक मील दूर बैठे मनुष्य से भी उसी तरह बात-चीत की जा सकती हैं मानो वह बिलकुल पास बैठा हो। छोटे विद्युत जनरेटर चलाने पर उसकी आवाज बीस मील तक पहुँचती थी। चलते समय बर्फ पर चरमराते जूते तक की आवाज एक मील दूर से सुनाई पड़ती थी। लेकिन यह सब होता तभी था जब तापमान शून्य से नीचे होता। मस्तिष्कीय संस्थान का ध्रुव केन्द्र सहस्रार उद्विग्नताओं से रहित, शान्त एवं शीतल हो तो दूर श्रवण ही नहीं दूरदर्शन भी सम्भव हो सकता है। अपनी पृथ्वी पर, उसके नीचे, ऊपर क्या हो रहा है? सूक्ष्म जगत में क्या हलचलें उभर रहीं है? इसकी जानकारी सामान्य न रह कर असामान्य स्तर की बन जाती है। सिद्ध पुरुषों जैसी यह विशेषता उत्पन्न करने के लिए साधना द्वारा उत्तरी ध्रुव जैसी शान्ति मस्तिष्कीय क्षेत्र में उत्पन्न करनी पड़ती है। सहस्रार साधना से यह सम्भव हो सकता है।
कुण्डलिनी साधना की सहस्रार चक्र पर असाधारण प्रतिक्रिया होती है। अतीन्द्रिय क्षमताओं के दिव्य संस्थान अपनी मूर्छना छोड़ कर सक्रिय बनते हैं और वह देखने सुनने, जानने लगते हैं जो साधारण स्थिति में असम्भव ही लगता है। दूरदर्शन, दूर श्रवण, अविज्ञात का परिचय, भविष्य का आभास, प्रभाव परिवेषण, जैसी सिद्धियाँ उनके लिए सरल है जिनमें अपनी मन स्थिति ध्रुव प्रदेश की तरह शान्त और शीतल बना ली ह। अन्तरिक्ष की असंख्यों हलचलों को-ध्वनियों एवं प्रकाश किरणों को हमारी भौंड़ी इन्द्रिय क्षमता देख समझ नहीं पाती। काम चलाऊ मोटी जानकारियाँ दे सकने के स्तर पर ही उनका निर्माण हुआ है। यदि अतीन्द्रिय क्षमता विकसित की जा सके तो सृष्टि के रहस्यों को- अविज्ञात को समझ सकना योगाभ्यासी सिद्ध पुरुषों की भाँति ही सम्भव हो सकता है।
ध्रुव प्रदेश में कभी-कभी इससे ठीक विपरीत स्थिति भी उत्पन्न होती देखी जाती है। जब हवा की परत आकाश में सघन हो जाती है तो शिर पर उड़ते वायुयान की आवाज भी कानों तक नहीं पहुँचती। यदि अपना मन क्षेत्र तपश्चर्या की-योगाग्नि की गरम पट्टी विनिर्मित कर ले तो साँसारिक आकर्षण, प्रलोभन, कौतूहल, भय, मनोविकार आदि के ढोल ही क्यूँ न बजते रहें, उनका एक भी शब्द कान में नहीं आता। घोर कोलाहल भरे वातावरण में रहते हुए भी चित्त को समाधिस्थ जैसा बना कर रखा जा सकता है। कहने सुनने में तो यह सामान्य सी बात लगती है, पर है इतनी महत्त्वपूर्ण कि उस आधार पर हर घड़ी आनन्द मग्न रहने और लक्ष्य की दिशा द्रुतगति से आगे बढ़ चलने के उभय पक्षीय महान् प्रयोजन पूरे हो सकते हैं।
लकड़ी के जहाज लेकर जब सर्वप्रथम ध्रुव प्रदेशों के शोधकर्ता वहाँ गये तो जहाजों में ली मजबूत कीलें भी उनमें से अपने उखड़ कर आकाश में उड़ गई। मस्तिष्कीय ध्रुव केन्द्रों का चुम्बकत्व व्यक्ति की वर्तमान आन्तरिक और बाह्य परिस्थितियों में भारी अन्तर उपस्थित कर सकते हैं। अवांछनीयताएँ कीलों की तरह उखड़ती उड़ती दृष्टिगोचर हो सकती है। नवोदित चुम्बकत्व से पुराने ढर्रे में परिवर्तन होने और नई गति चल पड़ने की सम्भावना साकार हो सकती है। सहस्रार चक्र की साधना का प्रभाव मात्र ईश्वर उपासना का आनन्द देने भर के लिए नहीं, वरन् मनः स्थिति परिस्थिति एवं अस्तित्व स्थिति में इस विकास परिवर्तन का आश्चर्यजनक परिणाम दृष्टिगोचर हो सकता है। उससे कुसंस्कारों की वे कीलें उखड़ सकती है, जो साधारणतया बहुत गहरी और मजबूत मालूम पड़ती है।
ध्रुव केन्द्रों की परिस्थितियों में अन्तर पड़ने से इस पृथ्वी पर भयंकर परिवर्तन प्रस्तुत होते रहे है। हजारों वर्षों तक चलने वाले हिमयुग एक प्रकार से खण्ड प्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न करते रहे है। चुम्बकीय तूफानों से लेकर ज्वालामुखी फटने और भूकम्प आने की बड़ी घटनाओं के सम्बन्ध सूत्र ध्रुव प्रदेशों में पाये गये है। आज से कोई दो करोड़ वर्ष पूर्व रेडियो लारिया नामक जीव अस्तित्व में आया है पीछे वह ध्रुवीय संचार में परिवर्तन आने पर इस धरती से ही तिरोहित हो गया। ऋतुओं के प्रभाव एवं समय में भी अन्तर होता रहा है। ध्रुवों पर जो ब्रह्माण्डीय किरणों की बौछार होती है यदि उनकी मात्रा भू-लोक में न्यूनाधिक मात्रा में होने लगे तो इससे प्राणियों की आकृति प्रकृति में और पदार्थों की संरचना एवं उपयोगिता में भारी उलट-पुलट हो सकता है। शक्ति संचार बढ़ जाने से लाभदायक और घट जाने से हानिकारक परिणाम सामने आते हैं।
यह तो हुई इस धरातल पर काम करने वाली व्यापक कुण्डलिनी की बात। व्यक्तिगत मानवी सत मैं इसे मूलाधार और सहस्रार के अंतर्गत काम करने वाली, मेरुदंड मार्ग से दौड़ने वाली दिव्य विद्युत की संज्ञा दी जाती है और उसे कुण्डलिनी कहा जाता है। इस ऊर्जा में शिथिलता एवं विकृति आने पर शरीर दुर्बल एवं अशक्त बनता है। मनोबल गिरता है। सन्तुलन बिगड़ा रहता है अवसाद, आवेश छाये रहते हैं। भटकाव और असन्तोष का दौर चलता रहता है। दूसरों के प्रति विरक्ति उपेक्षा, ईर्ष्या के भाव उठते हैं। आत्म-ग्लानि निराशा, खीज़ आशंका की बढ़ी हुई मात्रा चित्त को खिन्न रखती है। डाँवाडोल स्थिति में कई स्पष्ट निर्णय ले सकना कठिन पड़ता है। तनिक से अवरोध पर्वत जैसे भारी लगते हैं। विपत्ति अब तब सिर पर टूटती ही प्रतीत होती है। भविष्य अन्धकारमय दीखता है। विश्वास न अपने पर होता है और न स्वजनों पर, यह सर्वतोमुखी असमर्थता कुण्डलिनी शक्ति में कमी पड़ जाने के ही चिह्न हैं।
नवनीत घृतं क्षीरं दधितक्र मधूनिच॥
द्राक्षारसच्च पीयूषं जायते रसनोदकम्।
मनोलयं यदा याति भ्रूमध्ये योगिनां नृणाम्।
जिव्हामलेऽमृतेस्त्रावो भ्रूमध्ये चात्मदर्शनम्॥
- महायोग विज्ञान
खेचरी मुद्रा द्वारा जिव्हा को तालु में लगा कर जो चन्द्रामृत पान किया जाता है उसमें आरम्भ में नमक खारी, खट्टा तीखा, कसैला, रस प्रतीत होता है। मध्य काल में मक्खन, घी, दूध दही, छाछ जैसा और साधना आगे बढ़ने पर अन्त में मधु, द्राक्ष रस जैसा अमृत सरीखा यह रसास्वादन होता है। साथ ही आज्ञाचक्र में आत्म दर्शन भी होता है।
उपासना का प्रथम चरण है- आत्म शोधन कोई भी धर्म-कृत्य करने से पूर्व पवित्रीकरण, आचमन, प्राणायाम न्यास आदि कृत्य करने होते हैं। इनका उद्देश्य आत्मिक पवित्रता की आवश्यकता को प्राथमिकता देने के तथ्य पर ध्यान आकर्षित करना हैं। गन्दे नाले में थोड़ा सा गंगा जल डाल देने पर उसकी शुद्धि नहीं होती हैं। अन्तरंग और बहिरंग जीवन में निकृष्टता भरी रहे तो उपासना साधना का लक्ष्य पूरा न हो सकेगा। आत्म-परिष्कार कपड़े की धुलाई और साधना रंगाई हैं बिना धुले कपड़े पर ठीक तरह रंग कहाँ चढ़ता है? आत्म -शोधन के बिना उच्चकोटि की साधनाएँ भी निष्फल चली जाती है। अतएव सर्वप्रथम वर्तमान और भावी जीवन को पवित्र परिष्कृत बनाने की योजना बनानी चाहिए और पिछले पापों के कारण आत्मिक प्रगति पथ पर अवरोधों की तरह अड़े रहने वाले दुष्कृतों का परिमार्जन प्रायश्चित प्रक्रिया द्वारा करना चाहिए।
यही साधना की सुव्यवस्थित प्रक्रिया हैं प्रारम्भ आत्म-शोधन एवं आत्म-परिष्कार से होना चाहिए। साथ ही गायत्री की सामान्य साधना तथा उच्चस्तरीय साधना का नियोजन करना चाहिए। उज्ज्वल चरित्र ह वह भूमि है जिस पर साधना के बीज उगते और पल्लवित होते हैं। अच्छी बन्दूक ही कारतूसों का लक्ष्य पूरा करती है। घटिया व्यक्तित्व घटिया बन्दूक की तरह है, जिनमें बढ़िया उपासना के बढ़िया कारतूस भी समुचित प्रतिफल उत्पन्न नहीं कर सकते।
ब्रह्मवर्चस को उच्चस्तरीय उपासनाओं में पंचकोशों के अनावरण तथा कुण्डलिनी जागरण मुख्य है। इनकी तैयारी करते समय सर्वप्रथम पाप परिमार्जन और आत्म शोधन के लिए साहसपूर्वक कदम बढ़ाने चाहिए। इस आधार पर खड़ी की गई साधना तपश्चर्या के सफल होने में कोई अड़चन शेष नहीं रह जाती।
आस्तिकता-साधना विज्ञान का प्राण है। आस्तिकता को कर्म फल के प्रति अटूट विश्वास ही कह सकते हैं। धार्मिक कर्मकाण्डों और पूजा विधानों का महत्व इसी दृष्टि से है कि मनुष्य ईश्वर के प्रति- उसकी कर्म व्यवस्था के प्रति गहरी आस्था बनाये रखे। चिन्तन का स्तर उत्कृष्ट रखे और क्रिया कलाप में आदर्शवादिता के समावेश का अधिकाधिक प्रयत्न करे। धर्म और अध्यात्म का ढाँचा इसी लिए खड़ा किया गया है। आज तो इन चरित्र निर्माण और सामाजिक सहयोग के आधार भूत तन्त्र का उपयोग ठीक उलटे प्रयोजनों में हो रहा है। सत्कर्मों से जो फल मिलता है उसे छूट-पुट कर्मकाण्डों से ही सम्भव बना कर उस दिशा में कष्ट सहने और त्याग करने की उमंग को ही मटियामेट किया जा रहा है। इसी प्रकार दुष्कर्मों के प्रति निर्भयता उत्पन्न करने के लिए सस्ते पाप नाशक उपायों का प्रतिपादन किया जा रहा है। यह आस्तिकता के नाम पर प्रच्छन्न नास्तिकता का प्रतिपादन हैं। धर्म और अध्यात्म की आत्मा को जीवित रखने के लिए इन प्रचलित भ्रान्तियों को निरस्त ही किया जाना चाहिए।
कर्मफल की सुनिश्चितता के सम्बन्ध में शास्त्रकारों ने पग-पग पर जन-साधारण को प्रशिक्षित और सचेत किया है। स्पष्ट शब्दों में यह कहा है कि दुराचरण से बचा जाय और सदाचरण की मर्यादाओं का पालन करने में तत्परता का परिचय दिया जाये। कर्मफल सुनिश्चित हैं। फलित होने में थोड़ा विलम्ब हो जाये तो भी उस सम्बन्ध में अनास्था अपनाने की आवश्यकता नहीं है। ‘कर्म रेख मिटनी नहीं’ उक्ति का तात्पर्य इतना ही है भले या बुरे कर्मों की प्रतिक्रिया सम्मुख आने में किसी प्रकार का सन्देह करने की गुँजाइश नहीं है। शास्त्रकार कहते है-
स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयन्तत्फलमश्नुते।
स्वयं भ्रमति संसारे स्वयन्तस्माद्धिमुच्चयते॥
- चाणक्य
जीव आप ही कर्म करता है, उसका फल भी आप ही भोगता है, आप ही संसार में भ्रमण करता है और आप ही उससे मुक्त भी होता है इसमें उसका कोई साक्षी नहीं।
न तेऽत्र प्राणिनः संति ये न यांति यमक्षयम्।
अवश्यं हि कृतं भोक्तव्यं तद्धिधारितम्॥
- भाष्य
यहाँ पर ऐसे कोई भी प्राणी नहीं है जो यमराज के घर में नहीं जाते हैं अर्थात् एक बार तो वहाँ सभी प्राणियों को जाना ही पड़ता है। उनका जो कुछ भी किया हुआ कर्म है वह अवश्य ही उन्हें भोगना ही पड़ता है।
कर्मफल अकाट्य है, पर उनका परिमार्जन स्वेच्छापूर्वक किये गये प्रायश्चित से हो सकता है। इसमें सदाशयता, साहसिकता तो है ही सरलता भी है। चोर को राज दण्ड कड़ा मिलता है। पर यदि वह अपने दोष स्वीकार करने और चुराई वस्तु लौटाने का साहस कर सके तो राजदण्ड, की अपेक्षा कम त्याग करने में काम चल जायेगा, साथ ही निन्दा और घृणा के स्थान पर दूसरों का सद्भाव, सम्मान भी मिल सकेगा। जो पाप बन पड़ा वह छोड़े हुए तीर की तरह वापिस लौट नहीं सकता। किन्तु यह उपाय पीछे भी सम्भव रहता है कि प्रायश्चित करके उस दंड भारी को काफी हलका कर लिया जाय। इसका एक लाभ तो प्रत्यक्ष ही अन्तःकरण पर चढ़ा हुआ दुराव और आत्म-धिक्कार का भार हल्का हो जाता है। पाप कृत्यों के फलस्वरूप उत्पन्न आत्म-ग्लानि और आत्म प्रताड़ना से छुटकारा पा सकना प्रायश्चित के अतिरिक्त और किसी प्रकार सम्भव नहीं हो सकता। भारतीय धर्म शास्त्रों में पाप निवारण का एकमात्र उपाय प्रायश्चित ही है।
प्रायश्चित का प्रथम चरण है-पश्चाताप दुष्कर्मों के फलस्वरूप अपनी आत्मा को अनीति पीड़ित को-तथा परोक्ष रूप में जो क्षति पहुँचती है उस पर विचार करने से हर विवेकशील के मन में दुःख होता है यह दुःख ही पश्चाताप हैं यदि ऐसा दुःख नहीं उपजा। उलटे पाप के स्पर्शन की धृष्टता बरती जाती रही- अनुचित को उचित सिद्ध किया जाता रहा तो समझना चाहिए ऊपर से ही लीपा-पोती की जा रही है। पाप की जड़े जहाँ की तहाँ है। वे अवसर पाते ही फिर फलेगी-फूलेगी और पुनरावृत्ति होती रहेगी।
पश्चाताप का स्वरूप है सच्चे मन से दुःखी होना भूल की भयंकरता का अनुभव करना और भविष्य में इस प्रकार के आचरण न करने के लिए सच्चा संकल्प करना और उसे कठोरतापूर्वक निबाहना इतना कर चुकने पर ही प्रायश्चित की यथार्थता सामने आती है।
प्रायश्चित का अगला चरण है-पाप का प्रकटीकरण । इससे कई लाभ होते हैं। मन के भीतर जो दुराव की गाठें बँधी रहती है वे खुलती है। मनोविज्ञान शास्त्र का सुनिश्चित मत है कि मनोविकारों के-दुष्कर्मों के-दुराव से मानसिक ग्रन्थियाँ बनती है और वे अनेकों शारीरिक और मानसिक रोगों के रूप में उभरती रहती हैं। मनः चिकित्सा शास्त्री, मानसिक रोगियों से उसके पिछले जीवन के घटना-क्रम को विस्तारपूर्वक बताने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसमें अप्रकट दुरावों का यदि प्रकटीकरण हो गया तो रोग का निराकरण सरल हो जाता है आरोग्य शास्त्र की नवीनतम शोधों ने बताया है कि रोग कष्ट तो शरीर को अनुभव होता है, पर उनकी जड़े मानसिक विकृतियों के रूप में जमी रहती है। चिकित्सा में औषधि उपचार का जितना महत्त्व है उससे कहीं अधिक मानसिक परिशोधन का है। मनः शुद्धि के बिना आहार-विहार ठीक रखने पर भी स्वास्थ्य रक्षा का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। रोगों की जड़े काटने के लिए मानसिक चिकित्सा के रूप में आन्तरिक अन्तःशुद्धि भी आवश्यक है। यह कार्य पिछले किये हुए-दुष्कर्मों की जड़े काटने के रूप में प्रायश्चित की प्रकटीकरण प्रक्रिया के सहारे ही सम्भव हो सकते हैं।
ईसाई धर्म में दो अवसरों पर पापों का प्रकटीकरण आवश्यक माना गया हैं। एक ईसाई धर्म की दीक्षा-बपतिस्मा लेते समय। दूसरे मरण काल के पूर्व। मृत्यु की सम्भावना निश्चित होने पर पादरी बुलाया जाता है। रोगी और पादरी दो ही होते हैं। एकान्त में वह जीवन के प्रमुख पाप कर्मों को प्रकट करता है। पादरी उनके समाधान की प्रार्थना करता है। इस प्रकार जी हलका करके मरने का निश्चित रूप से सत्परिणाम होगा और उससे आत्मा को शान्ति, सद्गति मिलेगी। हिन्दू धर्म में भी श्रावणी पर्व पर हेमाद्रि संकल्प के साथ इसी प्रकार का प्रकटीकरण हर साल करते रहने का विधान है। इससे अतिरिक्त जब कभी पाप बने, तभी उसके प्रकटीकरण एवं प्रायश्चित का विधान सम्पन्न करने की परम्परा है। उन्हें जितने समय तक छिपाये रखा जाता है उतना ही चक्रवृद्धि दर से उसका भार बढ़ता चला जाता है।
‘प्रकटीकरण’ में पुरातन काल में कोई कठिनाई नहीं थी। उन दिनों सभी लोग सद्भाव सम्पन्न थे। प्रकटकर्ता के भूत कालीन पाप की तुलना में वर्तमान की प्रकटीकरण सद्भावना को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते थे और जो हो चुका उस पर धूलि डाल कर आगे का सद्भाव सम्पन्न मार्ग-दर्शन करते थे। आज स्थिति ठीक उल्टी है। मीठी बातें करके- तरह-तरह के आश्वासन देकर- पूछ तो लेते हैं, फिर उन बातों के आधार पर उससे घृणा करते , निन्दा फैलाते, हानि पहुँचाते हैं। पत्नियाँ अपने पिछले जीवन की घटनाएँ पतियों को सद्भावनापूर्वक बता देने के उपरान्त कितने अधिक घाटे में रहती है। इसके असंख्यों उदाहरण सामने आते रहते हैं। वे पछताती है और सोचती है कि इस कहने की अपेक्षा न कहना अधिक श्रेयस्कर रहता। आज का सामान्य मनुष्य इतना ही ओछा है कि उसके सामने नंगे होने में जोखिम ही जोखिम है। अस्तु प्रकटीकरण के लिए सत्पात्र तलाश करना नितान्त आवश्यक है। इसके लिए तथाकथित मित्र नहीं सद्भाव सम्पन्न, उदार हृदय तत्त्वदर्शी ही उपयुक्त हो सकते हैं। सुधार सद्भावना- उदार क्षमाशीलता और चिकित्सक जैसी उदार सहृदयता जिनके भीतर हो मात्र वे ही पाप प्रकटीकरण के अधिकारी हो सकते हैं। वे ही पिछली दुःखद घटनाओं की उचित समीक्षा कर सकते हैं। उन्हीं से प्रायश्चित का स्वरूप निर्धारित करने में भी सहायता मिल सकती है।
प्राचीन काल में पाप विवरण अधिक लोगों को बताये जाते थे ताकि उन सबको बताने वाले की दुर्बलता का ध्यान रहे। भविष्य में वैसी पुनरावृत्ति न होने पाये इसके लिए कड़ी दृष्टि रखें। संदिग्ध चरित्र वाले पर सहज ही अन्य लोग सतर्कता की दृष्टि रखते हैं। वह व्यक्ति स्वयं भी दूसरों की सतर्कता का ध्यान रखते हुए पकड़े जाने का डर करता है। छिपे पाप तो तब चलते हैं जब बाहर से मनुष्य विश्वस्त बना रहता है और भीतर से अप्रामाणिकता बरतता रहता है। इस लिए प्राचीन काल में पाप का प्रकटीकरण अधिकाधिक लोगों की जानकारी में होता था। आज की स्थिति में घटना-क्रम तो उच्चस्तरीय मनीषियों को ही प्रायश्चित पूछने के लिए बताये जाये किन्तु स्वभाव की दुर्बलता और बन पड़े पापों की मोटी जानकारी अधिक विश्वस्त लोगों को बनी रहे तो इससे दूसरों को सतर्कता और अपने में पकड़े जाने की आशंका बनी रहेगी। मन की ग्रन्थियाँ खुलना और उससे शारीरिक, मानसिक आत्मिक स्वास्थ्य का सुधार तो उससे निश्चित ही है। प्रकटीकरण की महत्ता बताते हुए शास्त्र कहता है-
तत्समात् पापं गूहेत गुहमानं विवर्धयत्।
कृत्वा तत् साधुष्वखमेयं ते तत् शमयन्त्युत॥
- महा0अनु0
अतः अपने पाप को छिपाये न, छिपाया हुआ पाप बढ़ता है, यदि कभी पाप बन गया हो तो उसे साधु पुरुषों से कह देना चाहिए वे उसकी शान्ति कर देते हैं।
“ तद् यदिह पुरुषस्य पापं कुतम्भवति तदा-विष्करोति यदि हैनदपि रहसीव कुर्वन्मन्यतेऽथहैन- दाविरेव करोति। तस्माद्वाव पाप न कुर्यात्।”
- जैमिनीयोपनिषद ब्राहमण
जब मनुष्य में दिव्य वाणी प्रकट होती है तब वह अपने पाप प्रकट करती हैं। मनुष्य ने जो पाप नितान्त गोपनीय रखे थे उन्हें भी वह प्रकट कर देता है।
प्रकटीकरण के उपरान्त प्रतीकात्मक दण्ड व्यवस्था का चरण है। यह सांकेतिक है। बच्चे के गलती करने पर उसे कान पकड़ने, कोने में खड़ा होने, बैठक करने आदि के हलके दण्ड दिये जाते हैं यह लाक्षणिक है। उनका महत्त्व इतना भर है कि इस प्रताड़ना की स्मृति-गलती की भयंकरता और उसकी पुनरावृत्ति न करने की आवश्यकता की छाप अन्त- चेतना पर अधिक अच्छी तरह छोड़ सके। वास्तविक समाधान तो कान पकड़ने पर कहाँ होता है? चोरी करना कान पकड़ना-चोरी करना कान पकड़ना यदि यही क्रम चलने लगे तो बात उपहासास्पद बन जायेगी यदि बच्चा किसी की कापी चुरा लाया है तो कान पकड़ने भर से उसका प्रायश्चित नहीं हुआ वह तो स्मृति को झकझोरना भर है। जिसकी कापी चुराई गई थी, उसकी क्षति पूर्ति इतने भर से कहाँ हुई? उसकी तो कापी वापिस मिलनी चाहिए, प्रायश्चित का असली भाग वही है जिसमें ऋण मोचन किया जाता है।
प्रायश्चित का तीसरा चरण है- तप तितीक्षा। इसमें अपने को शारीरिक, मानसिक यत्किंचित् कष्ट देकर स्मृति पटल पर दुर्घटना का स्वरूप और दुष्परिणाम अंकित किया जाता है। इससे भावी पुनरावृत्ति की आशंका बहुत हद तक घट जाती है। ऐसी तितीक्षाओं में कई तरह के व्रत-उपवास सम्मिलित है। चांद्रायण, कच्छ चांद्रायण, सन्तापन व्रत, पश्चगव्य प्राशन, अस्वाद व्रत आदि इसी प्रकार के है। मौन, ब्रह्मचर्य, भूमिशयन, शीतसहन, ग्रीष्मसहन जैसी तितीक्षाएँ भी अमुक समय तक करने का विधान बनाया जाता है। केश मुण्डन, तीर्थ स्नान जैसे उपचार भी ऐसे ही है, जिनमें शारीरिक, मानसिक कष्ट सहने पड़ते हैं। इस संदर्भ में शास्त्रकारों के अनेकों परामर्श, उपचार भरे पड़े है।
प्रतिग्रह को भी पातकों की श्रेणी में गिना गया है। प्रतिग्रह का अर्थ है-मुफ्त का माल। जिसका बदला न चुकाया गया हो, ऐसे समस्त अनुदान प्रतिग्रह हैं। बाप-दादों के उत्तराधिकार से मिला धन-जुआ सट्टा, लाटरी, हरामखोरी का उपार्जन इसी श्रेणी का है। चोरी, रिश्वत मुनाफाखोरी, करचोरी बेईमानी आदि से कमाया हुआ भी प्रतिग्रह है। ईमानदारी, औचित्य और परिश्रम का समुचित समावेश करने पर जो कुछ मिलता है वही फलता फूलता है अन्यथा मुफ्त का धन पाप बनकर शिर पर छाया रहता है और व्यक्तित्व के परिष्कार एवं आत्मोत्कर्ष के मार्ग में भारी अवरोध उत्पन्न करता है। साधु ब्राह्मणों को मिलने वाली दान-दक्षिणा तभी उचित है जब वे लोग उसका प्रतिदान लोकसेवा के रूप में उपलब्धि की तुलना में अत्यधिक करते रहें। अन्यथा भजन करने के बहाने दान-दक्षिणा बटोरते रहना-मुफ्त में खाते रहना- पाप बन कर रहेगा और उस स्थिति में की गई साधना निष्फल चली जायेगी। साथ ही अन्तरात्मा भी पाप भार से लदता, बोझिल होता चला जायेगा।
साधु ब्राह्मणों में से किसी ने यदि मुफ्त का धन प्रतिग्रह लिया हों। बदले में समुचित सेवा श्रम न किया हो तो उसका भी प्रायश्चित किया जाना चाहिए।
प्रति ग्रहेण विप्राणां ब्रहम तेजःप्रणस्यति।
अन्तः प्रतिग्रहे कृत्वा प्रायश्चितै समाचरेत्।
- अरुण स्मृति।
प्रतिग्रह लेने वाले का ब्रह्मतेज नष्ट हो जाता है। ऐसा ग्रहण करने वाले का प्रायश्चित करना चाहिए।
सद्वृत्तात्कारण्वाद् विप्राः प्रायश्चित भयात्खग ।
प्रतिग्रहे कृते चैव प्रायश्चित समाचरेत॥
- अरुण स्मृति।
सद्वृत्तियों के उपार्जन में लगा हुआ व्यक्ति भी इस भय से प्रतिग्रह न ले कि उसका प्रायश्चित करना पड़ेगा। यदि कभी ले ही लिया गया हो तो उसका प्रायश्चित करना चाहिए।
यह बात मात्र ब्राह्मण, साधु के दान-दक्षिणा लेने तक सीमित नहीं। वरन् उन सब पर लागू होती है जो बिना परिश्रम का धन ग्रहण करते हैं। न्यायपूर्वक समुचित परिश्रम के साथ कमाये हुए धन के अतिरिक्त अन्य सभी उपार्जनों को प्रतिग्रह माना गया है, भले ही वे उत्तराधिकार रूप में ही प्राप्त क्यों न हुए हो? जिन्हें इस प्रकार की उपलब्धियों हस्तगत हुई हो उन्हें उनका जितना सम्भव हो उतना लोकहित के लिए वापिस लौटाने से अपनी सदाशयता का परिचय देना चाहिए। यही बात दूसरों से मिले स्नेह, सहयोग आदि के सम्बन्ध में भी है। यह स्मृति उपकारी के प्रति मन में सघन कृतज्ञता भरे रहने के रूप में तो होनी ही चाहिए। प्रतिदान चुकाने की बात सोचते रहना भी आवश्यक है।
प्रायश्चित का अन्तिम चरण है-ऋण विमोचन। जो लिया है उसे वापिस लौटाना। बैंक से धन लेकर कोई खजांची भाग खड़ा हो, तो मात्र कान पकड़ने गिड़गिड़ाने, क्षमा माँगने, उपवास करने से काम नहीं चलेगा इतना तो करना ही चाहिए इसके अतिरिक्त जो धन लिया गया था उसमें से जो बचा हो उसे तो तत्काल वापिस जमा करना ही चाहिए। बैंक अफसरों और पुलिस का रुख उदार बनाने- कड़े दण्ड से बचने के लिए यह वापसी आवश्यक है। जो कमाया वह हलम-गिड़गिड़ाहट कर छुटकारा। ऐसा कहाँ होता है? पातकों के दण्ड से-निवृत्त होने में भी ऐसी धाँधली नहीं चल सकती कि व्रत, उपवास, मौन आदि के प्रतीकों से छुटकारा मिल जाय और अवांछनीय लाभ की क्षतिपूर्ति कराने वाली बात गोल कर दी जाय। वापसी ही प्रायश्चित का प्राण है। उसका जितना पूरा-अधूरा अंश सम्भव हो उसके लिए साहस जुटाया ही जाना चाहिए।
यहाँ यह स्मरणीय है कि सारा समाज एक शरीर है। उसके किसी भी अंग को क्षति पहुँचाई गई हो पूरे शरीर की हानि मानी जायेगी। आवश्यक नहीं कि हानि जिस रूप में पहुँचाई गई हो उसे रूप में वापिस लौटाई जाय। लोकहित के किसी भी श्रेष्ठ काम में उस वापसी को लगाया जा सकता है। जिसका लिया उसे उसी रूप में वापिस कर सकना कई बार तो सर्वथा अशक्य और अव्यावहारिक भी होता है। रास्ते में पैसा पड़ा मिला- किसी की जेब कटी अब उसी व्यक्ति को ढूँढ़ निकालना कैसे सम्भव हो सकता है? किसी का शील नष्ट किया अब उसे उसकी क्षति कैसे पूरी की जाय? कई बार तो इसमें उलटी नई समस्याएँ खड़ी हो सकती है। जो लोग साथी सहयोगी रहे वे भी लपेट में आते हैं और सद्भावना उत्पन्न करने का उद्देश्य भयंकर विग्रह का रूप धारण कर सकता है।
अनीति से उपार्जित उपलब्धियों को जिस-तिस रूप में लोक मंगल के सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के किसी श्रेष्ठ काम में लगा दिया जाना चाहिए। अशोक, अंगुलिमाल अम्बपाली आदि ने अपना अनीति उपार्जन बौद्ध धर्म के प्रसार विस्तार में समर्पित कर दिया था। जिसकी जो हानि की उसी को तलाश करना और उसी रूप में वापिस करना उनके लिए सम्भव भी न था।
धन या श्रम के रूप में अनीति मार्ग से उपार्जित की गई समस्त उपलब्धियों की वापसी की बात सोची जा सकती है। प्रायश्चित प्रकरण में अनेक प्रकार के दानों का उल्लेख हुआ है। उस समय साधु ब्राह्मण दान और उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग की प्रामाणिक एजेन्सी थे। उन पर अविश्वास करने का कोई कारण भी न था। ऐसी दशा में साधु-ब्राह्मण को प्रायश्चित दान देने का उल्लेख है आज तो वैसी स्थिति नहीं रही। सत्प्रवृत्ति संवर्धन कर सकने वाले श्रेष्ठ कर्मों में ही ऐसे प्रायश्चित दान नियोजित किये जाने चाहिए।
धन का स्थानापन्न श्रम भी हो सकता है। वस्तुतः श्रम ही धन है। यों धन से श्रम भी खरीदा जा सकता है। पर मूल आधार श्रम है। व्यक्ति की यही मौलिक सम्पदा है और यह सभी को समान रूप से उपलब्ध है। अस्तु प्रायश्चित प्रयोजनों में धन लौटाने की ही तरह श्रम के द्वारा उसकी क्षतिपूर्ति करने का भी विधान है। पाप कर्मों के द्वारा समाज की नैतिक, आर्थिक, एवं अन्य प्रकार की क्षति हुई है उसकी भरपाई सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन से उतना ही श्रम लगाकर की जा सकती है। दूसरों के गिराने के लिए जो खाई खोदी गई थी, उसे पाटने के लिए समतल बनाने वाला श्रम नये सिरे से लगाने पर ही सन्तुलन बनेगा और प्रायश्चित सम्भव होगा।
प्रायश्चित की आवश्यकता और उसके लिए उठाये जाने योग्य चरण क्या होने चाहिए? इसकी चर्चा तत्त्व दर्शियों ने इस प्रकार की है-
अकृत्वा विहितं कर्म्भ कृत्वा निन्दितमेव च।
दोषमाप्नोतिः पुरुषः प्रायश्चित विशोधनम्॥
प्रायश्चितमकृत्वा तुन तिष्ठेद ब्राहमणः क्वचित्
यद्बूयुर्ब्राहमणाः शान्ताः विद्वाँसस्तत्समाचरेत्।
- कर्म पुराण
निन्दित हेय कुकर्म करने पर मनुष्य को पाप लगता है। उसका शोधन प्रायश्चित द्वारा करना चाहिए। श्रेष्ठ विद्वान् और तपस्वी बहमवेताओं से प्रायश्चित पूछना चाहिए और तदनुसार व्यवस्था करनी चाहिए।
आसम्बत्सरं प्रायश्चिताकरणें पापद्वेगुण्यम्।
(प्रायश्चितेन्दु0 शे0)
इनके अनुसार एक वर्ष तक पाप का प्रायश्चित न किया जाय तो पाप दुगुना हो जाता है। अतः पाप का प्रायश्चित यथा समय करना चाहिए।
तपसा कर्मणा चैव प्रदानेन भारत्।
पुनाति पापं पुरुष पुनश्चेत्र प्रवर्तते॥
- महाभारत शान्ति पर्व
भरतनन्दन्! मनुष्य तप से यज्ञ आदि सत्कर्मों से तथा दान के द्वारा पाप को धो- बहाकर अपने आपको पवित्र कर लेता है।
धनजंय कृतं पापं कल्याणें नोपहन्यते।
ख्यापनेनानुतापेन दानेनतपसापि वा॥
- महा0 शान्ति पर्व
धनंजय किया हुआ पाप कहने से, दान करने से और तपस्या से नष्ट हो जाता है।
श्रम के द्वारा प्रायश्चित करना हर किसी के लिए सम्भव है। सत्प्रवृत्ति संवर्धन में लगाया हुआ समय इस आवश्यकता की पूर्ति करता है। साथ ही धन के रूप में भी जो लौटाया जा सकना सम्भव है उसके लिए पूरी ईमानदारी से प्रयत्न करना चाहिए।
इस दृष्टि से धर्म प्रचार के लिए की गई पदयात्रा, तीर्थयात्रा सर्वश्रेष्ठ है। जन-मानस में सत्प्रवृत्तियों की प्रेरणा भरना ही प्राचीन काल में तीर्थयात्रा का उद्देश्य रहा है। उसे महत्त्व भी इसीलिए मिला और माहात्म्य भी इसी आधार पर बताया गया। आज की स्थिति में सर्वत्र सद्भावनाओं का ही दुर्भिक्ष पड़ा हुआ है। उसी के अभाव के कारण सम्पदा और शिक्षा, कुशलता एवं अन्यान्य क्षमताएँ भी सुख-शान्ति बढ़ाने के स्थान पर विपत्ति बढ़ा रही है। सद्भाव विस्तार के लिए जन-मानस का परिष्कार आवश्यक है। यह कार्य धर्म-प्रचार के लिए नियोजित की जाने वाली तीर्थयात्रा, पदयात्रा के लिए निकलने वाली टोलियाँ, मण्डलियाँ जितनी अच्छी तरह कर सकती है उतना और किसी प्रकार सम्भव नहीं। प्रायश्चित के ऋण विमोचन चरण को पूरा करने के लिए अन्यान्य सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन प्रयत्नों के साथ-साथ तीर्थयात्रा पर निकलने की बात भी ध्यान में रखी जानी चाहिए।
यथाहिकानकंखण्डमपद्रव्यवदग्ना। दग्धदोषंद्वितीयेनखण्डेनैन्क्यं ब्रजेन्नृप॥
नविशेषमवाप्नोततद्वद्योगाग्निनायतिः। निर्दग्धदोषस्तेनैक्यप्रयातिब्रहमाणसह॥
यथाग्निरग्नौसंक्षिप्तः समानत्वमनुव्रजेत्। तदाख्यस्तमन्योभूनोगगृहयेतविशेषतः॥
परेण ब्रहमणाद्वत्प्राप्यैक्यंदग्धकिल्बिषः। योगीयतिपृथग्भावंनकदाचिन्महीपते॥
यथाजलंलेनैक्यंनिक्षिप्तमुगच्छति। तथात्मासाम्यभ्येतियोगिनः परमात्मनि॥
- मार्कण्डेय पुराण
हे राजन् जिस प्रकार सोने को अग्नि में डालने से उसमें मिले हुए मलीन तत्त्व जल जाते हैं, उसी प्रकार योग की अग्नि में राग-द्वेष आदि दोष नष्ट हो जाते हैं।
जैसे एक अग्नि को दूसरी अग्नि में डालने से दोनों मिलकर एक हो जाती है, उसी प्रकार योग साधना से जीव और ब्रह्म की एकता हो जाती है।
जिस प्रकार जल में जल डाल देने से वे परस्पर अभेद होकर मिल जाते हैं, उसी प्रकार योगाभ्यास से आत्मा भी परमात्मा बन जाती है।
धार्मिक श्रेष्ठ सत्कर्मों में तीर्थ यात्रा को अग्रणी माना गया है। उसके दो प्रतिफल माने गये है। 1. पाप नाश 2. पुण्य फल की प्राप्ति। पाप नाश का अर्थ है दुष्कर्मों कर प्रायश्चित। प्रायश्चित का अर्थ है किये हुए पापों का स्वेच्छा पूर्वक दंड भुगत लेना मात्र किसी नदी, सरोवर में शरीर को स्नान करा लेन का इतना ही उद्देश्य है कि शरीर को स्नान करा लेने का इतना ही उद्देश्य है कि शरीर की तरह अन्तःकरण एवं आचरण को भी पवित्र बनाने की उमंग उठे। यह उमंग जितनी व्यवहार में उतरेगी उतनी ही पवित्रता बढ़ेगी, पुण्य सम्पादित होगा। उससे जो लोक हित होता है उसके फलस्वरूप पिछले पापों का भुगतान होता है। समाज की जो क्षति पहुँचाई थी उसकी क्षति पूर्ति किये हुये पुण्य कर्मों से होती है। इस दिशा में नदी, सरोवरों के स्नान से, देव दर्शन से, तीर्थ यात्रा से जो प्रेरणा मिलती है उसकी प्रतिक्रिया पाप वृत्ति का परित्याग करने के रूप में होती है। पाप नाश का अर्थ यह है कि पाप प्रवृत्ति का परित्याग किया जाय। किये हुए दुष्कर्मों की भरपाई करने के लिए उसी अनुपात से लोक हितकारी सत्कर्म करके पिछले दिनों जो हानि की है, उसका सन्तुलन बनाने के लिए कष्ट सहा जाय, श्रम किया जाय और त्याग बलिदान की उदार साहसिकता का परिचय दिया जाय।
तीर्थ यात्रा की दूसरी प्रेरणा है जीवन क्षेत्र में पवित्रता का अभिवर्धन उदारता पूर्वक परमार्थ प्रयोजनों में संलग्न होने से सत्कर्मों की पूँजी बढ़ती है, पुण्य संचय होता है। तीर्थ यात्रा के साथ इस स्तर की जो उमंगें उठती है वे यदि प्रखर हुई तो पुण्य कर्मों में लगाकर ही छोड़ती है। इस तरह प्रकारान्तर से तीर्थ यात्रा का प्रतिफल पुण्य कर्मों द्वारा पुण्य फल संचित कराने में सहायक होता है। यह प्रेरणा ही तीर्थ यात्रा का पुण्य फल सम्पादन का निमित्त बनती हैं इसीलिए उसका वैसा ही माहात्म्य बताया गया है।
तीर्थ यात्रा का वास्तविक स्वरूप धर्म प्रचार के निमित्त की गई पद यात्रा है। इसमें विराम स्थल प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक स्थान भी रहते थे। यह मंडलियों सन्त सत्पुरुषों से मार्ग दर्शन भी प्राप्त करती थी। तीर्थों में वैसी सुविधा रहती ही थी। इसलिए विराम, विश्राम, निवास सत्संग के लिए उन विशेष स्थानों में वे टोलियाँ रहती थी। जन मानस का परिष्कार धर्म धारणाओं का विस्तार संसार का सबसे बड़ा पुण्य है। ब्रह्म ज्ञान से, ज्ञान दान से बढ़कर और कोई परमार्थ नहीं माना गया। धर्म प्रचार के निमित्त किया गया यह श्रम, त्याग निश्चित रूप से स्व पर कल्याण का माध्यम और पुण्य फल संचय का साधन बनता था। ऐसा सत्साहस करने वालों के पाप कर्मों का प्रायश्चित होता ही है। पाप नाश और पुण्य फल संचय का जो माहात्म्य तीर्थ यात्रा के साथ जुड़ा हुआ है उसका यही कारण है।
धर्मशास्त्रों में इसी कारण तीर्थ यात्रा के इन दोनों ही माहात्म्यों के प्रतिफलों का स्थान-स्थान पर वर्णन किया है। कहा गया है कि-
अनुपातकिनस्त्वेते महापातकिनो यथा।
अश्वमेधेन शुद्धयन्ति तीर्थानुसरणेन च॥
- विष्णु स्मृति।
पापी, महापापी सभी अश्वमेध से तथा तीर्थानुसरण तीर्थ यात्रा से शुद्ध हो जाते हैं।
नृणाँ पापकृताँ तीर्थे पापस्य शमनं भवेत्।
यथोक्त फलदं तीर्थ भवेच्छुद्धात्मनाँ नृणाम्॥
पापी मनुष्यों के तीर्थ में जाने से उनके पाप की शान्ति होती हैं जिनका अन्तःकरण शुद्ध है, ऐसे मनुष्यों के लिए तीर्थ यथोचित फल देने वाला है।
तीर्थान्यनुसरन् धीरः श्रध्यानः समाहित।
कृतपापो विशुद्धचेत कि पुनः शुद्ध कर्मकृत्॥
जो तीर्थों का सेवन करने वाला, धैर्यवान्, श्रद्धायुक्त और एकाग्र चित है, वह पहले का पापाचारी हो तो भी शुद्ध हो जाता है, फिर जो शुद्ध कर्म करने वाला है, उसकी तो बात ही क्या है?
कामक्रोध च लोभं चयो जित्वा तीर्थभाविशेत्।
न तेन किचिदप्राप्तं तीर्थाभिगमनाद् भवेत्॥
जो काम, क्रोध और लोभ को जीतकर तीर्थ में प्रवेश करता है, उसे तीर्थ यात्रा से कोई भी वस्तु अलभ्य नहीं रहती ।
तीर्थानि च यथोक्तेन विधिना संचरनित ये।
सर्वद्वन्दसहा धीरास्ते नराः र्स्वगगामिनः॥
जो यथोचित विधि से तीर्थ यात्रा करते हैं, सम्पूर्ण द्वन्द्वों को सहने करने वाले वे धीर पुरुष स्वर्ग में जाते हैं।
यावंत स्वस्थोऽस्ति में देहो यावन्नेद्रिय विक्लवः तावतस्वश्रेयसां हेतु तीर्थयात्रां करोम्यहम्॥
जब तक मेरा शरीर स्वास्थ्य है, जब तक आँख, कान आदि इन्द्रियाँ सक्रिय है तब तक श्रेय प्राप्ति के लिए तीर्थ यात्रा करते रहने का निश्चय करें।
तीर्थानि च यथोक्तेन विधिना संचरन्ति ये।
सर्वद्वन्द्व सहा धीरास्ते नराः र्स्वगगामिनः॥
- नारद पुराण
जो यथोक्त विधि से तीर्थ यात्रा करते हैं, सम्पूर्ण द्वन्द्वों को सहन करने वाले वे धीर पुरुष स्वर्ग में जाते हैं। विचारणीय यह है कि क्या तीर्थ यात्रा, मात्र नदी, सरोवरों, का स्नान, देव प्रतिमाओं का दर्शन या क्षेत्र विशेष का पर्यटन की प्रक्रिया भर है या उसके पीछे कोई लक्ष्य विशेष भी सन्निहित हैं। यदि कोई पुण्य फल दायक और पाप निवारक क्रिया कलाप- सन्निहित न हों तो पर्यटन दृश्य या स्पर्श मात्रा के आधार पर आत्म-कल्याण जैसे महान् प्रयोजन की पूर्ति कैसे हो सकती थी? यदि परमार्थ इतना ही सस्ता रहा होता तो फिर कोई तप तितीक्षा का कष्ट साध्य मार्ग अपनाने के लिए क्यों तैयार होता। स्पष्ट है कि तीर्थ यात्रा के पीछे वे तत्त्व सन्निहित होने चाहिए जो व्यक्तिगत जीवन को परिष्कृत करने तथा लोक कल्याण की सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की भूमिका निभा सके। यह नितान्त भ्रम ही है कि किसी स्थान विशेष में जैसे तैसे जा पहुँचने में तीर्थ यात्रा का पुण्य फल मिल सकता है। इस भ्रम का निवारण करते हुए शास्त्रकार कहते है-
न तोय पूतदेहस्य स्नानामित्यमिधीयते।
स स्नातो यस्यं वै पुसः सुविशुद्धं मनोमतम्॥
- स्कन्द पुराण
जल से ऊपरी भाग को धो लेना ही स्नान नहीं है, स्नान तो उसका नाम है, जिससे बाहरी शुद्धि के साथ हम अपनी अन्तःशुद्धि भी कर लें।
न जलाप्लुतदेहस्य स्नानमित्य मिधीयते।
स स्नातो यो दमस्नातः शुचिः शुद्ध मनोमलः॥
जल में शरीर को डूबो लेना ही स्नान नहीं कहलाता जिसने दम रूपी तीर्थ में स्नान किया है- मन इन्द्रियों को वंश में कर रखा है उसी ने वास्तव में स्नान किया है। जिसने मन का मल धो डाला है, वही शुद्ध है।
जायनते च म्रियन्ते च जलेष्वेव जलौकसः।
न च गच्छन्ति ते र्स्वगमविशुद्ध मनोमलाः॥
जल में निवास करने वाले जीव जल में ही जन्मते और मरते हैं, पर उनका मानसिक मल नहीं धुलता इससे वे स्वर्ग को नहीं जाते।
न शरीर मल त्यागान्नरो भवति निर्मलः।
मानसे त मूलत्यक्ते भुवत्यन्तः सुनिर्मलः॥
- महाभारत
केवल शरीर के मैल को उतार देने से ही मनुष्य निर्मल नहीं हो जाता। मानसिक मल का परित्याग करने पर ही वह अत्यन्त निर्मल होता है।
जिसके पीछे सत्प्रवृत्ति संवर्धन जैसा कोई उद्देश्य न हो, मात्र दर्शन पर्यटन तक ही जिसे पूर्ण मान लिया गया हो, ऐसी तीर्थ यात्रा पर व्यंग करते हुए महाभाष्यकार उसे निरर्थक भी बताता और निषेध भी करता है।
समान तीर्थेवासी-
- अष्टाध्यायी 4।4।107
जो छात्र एक गुरु से पढ़ते हैं उन्हें सतीर्थ कहते हैं यथा-
स्माने तीर्थ गुरों वसतीति सतीर्थ्यः।
आचाय गुरु ही तीर्थ है।
वृहर्द्वम पुराण के पूर्व खण्ड में तीर्थ- प्रादुर्भाव नाम के कुछ अध्याय ही हैं। उनके अन्त में यह भाव व्यक्त भी हुआ है-
वनवास गतो रामो यत्र तत्र व्यवस्थितः तानि चोक्तानित तीर्थानि शतमष्टोतरं क्षितौ॥
- वृहर्द्वमद्ध पूर्व खण्ड 14।34
भगवान राम वनवास के समय जहाँ जहाँ रुके वे 108 स्थान तीर्थ कहे गये।
व्रजेवाप्यथवारण्ये यत्रसन्ति बहुश्रुताः
ततन्नगरमित्याहुः पार्थ तीर्थ च तद्भवेत्।
- महा0 वन0
नगर में अथवा वन आरण्यक में जहाँ भी ज्ञानी लोग रहते हैं वहीं स्थान तीर्थ बन जाता है।
भवद्विधा भागवतास्तीर्थी भूताः स्वयं विभो।
तीर्था कुवन्ति तीर्थानि स्वान्तस्थेन गबा मृताः।
- भागवत 1। 13
तीर्थ दो प्रकार के एक दृश्यमान दूसरे अदृश्य। तीर्थ स्वरूप अन्तःकरण स्थान रूपी तीर्थों को पवित्र करते हैं।
दुर्योधन को उपदेश देते हुए उसके शुभ चिन्तक भगवान् कृष्ण को तीर्थ कहते हैं और उनके सम्पर्क से कुल की रक्षा करने का उपदेश देते हैं।
तदलं ते विरोधने शमगच्छ नृपात्मज।
वासुदेवेन तीर्थे न कुलं रक्षितुमर्हसि।
- महा0 उद्योग0
हे राजकुमार! विरोध छोड़ शान्ति ग्रहण कर तू कृष्ण रूपी तीर्थ की शरण में जा और अपने कुल की रक्षा कर।
उपरोक्त उदाहरणों में तीर्थ स्थानों को श्रेय देने वाले ऋषि कल्प महामनीषी ही होते हैं। स्थानों की गरिमा वहाँ निवास करने वाले उन्हीं महा-मानवों की लोकोपयोगी सत्प्रवृत्तियों के कारण नहीं है।
तीर्थ यात्रा के समय भावनाएँ उच्चस्तरीय होनी चाहिए। उस अवधि में आत्म-निर्माण और लोक कल्याण के लिए क्या करना चाहिए? किस प्रकार करना चाहिए? यहाँ चिन्तन, मनन अंतःक्षेत्र में चलता रहे। उस अवधि में अपने गुण कर्म स्वभाव को श्रेष्ठ बनाने का अभ्यास किया जाय। वैसी गतिविधियाँ अपनाई जाये जिससे भविष्य में व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश स्थायी तथ्य बन जाय। इन यात्राओं में चिन्तन और क्रिया-कलाप उच्चस्तरीय रखने से ही तीर्थ यात्रा का फल मिलता है वस्तुतः यह आचरण बन्ध नहीं पुण्यफल का प्रधान कारण है-
जो धनोपार्जन के लिए अनर्थ नहीं करता, जो मिताहारी, जितेन्द्रिय और निष्काम है उसे तीर्थ का फल मिलता है। जो क्रोध रहित है और शुद्ध बुद्धि युक्त है, सत्य बोलने वाला, धार्मिक नियमों का दृढ़ता पूर्वक पालन करने वाला तथा प्राणिमात्र के सुख-दुःख को अपनी आत्मा के समान देखने वाला है, उसे तीर्थ का फल मिलता है।
जिसके हृदय में ईश्वर , देवता, धर्म, तीर्थ आदि पर श्रद्धा नहीं है, जो दुराचारी और नास्तिक है, जिसके हृदय में सन्देह भरे हुए है और जो व्यर्थ की तर्क करता है। ऐसे मनुष्य को तीर्थ का फल नहीं मिलता।
यस्य हस्तौ च पादौ च मनश्चव सुसंयतम्।
विद्यातपश्या कीर्तिश्च सतीर्थ फलमश्नुते॥
प्रतिग्रहा पुण्यावृतः सन्तुष्ठो एव केनचित्।
अंहकार विमुक्तिश्च सतीर्थ फलमश्नुते॥
आदाम्भिको निराम्भो लब्धाहारो जितेन्द्रियः।
जिसके हाथ, पैर और मन वश में है, जिसमें विद्या और तप है, एवं जिसका यश है, अर्थात् जिसने परोपकार करके यश पाया है उस पुरुष को तीर्थ का फल मिलता है।
जो दान लेने से बचा है, जिसको भाग्यानुसार मिले हुए में सन्तोष है और अभिमान नहीं है उसे तीर्थ का फल मिलता है जिसमें पाखण्ड नहीं है।
क्रिया क्रमेण महता तपसा नियमेन च।
दानेन तीर्थयात्राभिश्चिर कालं विवेकतः॥
दुष्टकृतैः क्षयमापन्ने परमार्थ विचारणे।
काकतालीय योगेन बुद्धिर्जन्तोः प्रवर्तते॥
बहुत दिनों तक यज्ञ दानादि करने कराने से, कठिन तपस्या, नियम, तीर्थ, यात्रा आदि द्वारा विवेक बढ़ता है और इनके द्वारा बुरे कर्मों का नाश हो जाने पर काकतालीय न्याय से मनुष्य में परमार्थ बुद्धि प्रस्फुटित हो जाती है।
जो लोग सैर सपाटे के उद्देश्य से तीर्थ यात्रा में परिभ्रमण तो करते हैं परन्तु अपने दोष दुर्गुणों को छोड़ने की आवश्यकता नहीं समझते। उनके परित्याग की प्रेरणा नहीं लेते और न आत्म सुधार का इस अवसर पर कोई विशेष साहस करते हैं उनकी यह यात्रा एक प्रकार से निरर्थक निष्फल ही चली जाती है। कहा भी है-
मनो वाक् काय शुद्धानां राजस्तीर्थ पदे पदे।
तथा मलिन चिताना गंडािप कीकधिका॥
है राजन्! मन, वाणी और काया से शुद्ध हुये मनुष्यों के लिये पग-पग पर तीर्थ है किंतु मलिन चित्त वालों के लिए गंगा भी एक तलैया है।
यो लुब्धः पिशुनः क्रूरो दाम्भिको विषयात्मकः।
सर्वतीर्थेष्वपि स्नातः पापो मलिन एव सः॥
जो लोभी है, चुगलखोर है, निर्दय है दम्भी है और विषयासक्त है, वह सब तीर्थों में स्नान करके भी पापी और मलिन ही रह जाता है।
दाममिज्या तपः शौच तीर्थ सेवा श्रुतं तथा।
सर्वाण्ये तान्यतीर्थानि यदि भावो न निर्मलः॥
भीतर का भाव शुद्ध न हो तो दान, यज्ञ, तप, शौच तीर्थ सेवन, शास्त्र श्रवण और स्वाध्याय ये सभी अतीर्थ हो जाते हैं।
चित्तमर्न्तगतृ दुष्टंतीर्थ स्नानान्न शुद्धयति ।
शतशोऽपि जलैतंद्यौ मुराभाण्डमिवाशुचि॥
चित के भीतर यदि दोष भरा है तो वह तीर्थ स्नान से शुद्ध नहीं होता जैसे मदिरा से भरे हुए घड़े को ऊपर से सैकड़ों बार धोया जाय तो भी वह पवित्र नहीं होता। उसी प्रकार दूषित अन्तः कारण वाला मनुष्य भी तीर्थ स्नान से शुद्ध नहीं होता।
गंगदितीर्थेषु वसन्ति मत्स्या देवालये पक्षिगणाश्र सन्ति
भावोज्झेतास्ते न फलं लभन्ते तीर्थाच्च देवायनाच्च मुख्यात् भावं ततो हुत्कले निधाय
तीर्थनि सेवेत समाहितात्मा।
- नारद पुराण
गंगादि तीर्थों में मछलियाँ निवास करती हैं, देव मन्दिरों में पक्षीगण रहते हैं, किन्तु उनके चित भक्तिभाव से रहित होने के कारण उन्हें तीर्थ सेवन और देव मन्दिर में निवास करने से कोई फल नहीं मिलता। अतः हृदय कमल में भाव का संग्रह करके एकाग्र चित्त होकर तीर्थ सेवन करना चाहिए।
अश्रद्धानः पापात्मा नास्तोऽकोऽछिन्न संसयः।
हेतुनिष्ठश्च पच्चैते न तीर्थफल भागिनः॥
- स्कन्द पुराण
जो अश्रद्धालु है, पापात्मा (पाप का पुतला पाप में गौर बुद्धि रखने वाला ) नास्तिक, संशयात्मक और केवल तर्क में ही डूबा रहता है- ये पाँच प्रकार के मनुष्य तीर्थ के फल को प्राप्त नहीं करते ।
वस्तुतः सत्प्रवृत्तियाँ ही तीर्थ है। उन्हें उभारने की जिन स्थानों पर विशेष व्यवस्था एवं संभावना है वे स्थान तीर्थ बन जाते हैं। तीर्थ की आत्मा उत्कृष्टता की आस्था ही है। इसलिए शास्त्रकारों ने मानस तीर्थों का भी वर्णन किया है और सत्प्रवृत्तियों को तीर्थ ठहराते हुए उनका सुनिश्चित पुण्य फल भी बताया हैं।
सर्वभूत दाय तीर्थ तीर्थ मार्जवमेव च॥
दानं तीर्थ क्षमा तीर्थ सन्तोषस्तीर्थ मुच्यते।
ब्रहमचयर्य परं तीर्थ च प्रियवादनम्॥
ज्ञानं तीर्थ धुतिस्तीर्थं तपस्तीर्थ मुदाहृतम्।
तीर्थानामपित ततीर्य विशुद्धिर्मनसः परा-स्कन्द पुराण 6-30-32
अर्थात् सत्य, क्षमा, इन्द्रिय, निग्रह प्राणी मात्र पर दया, ऋजुता, दान मनोनिग्रह सन्तोष ब्रह्मचर्य प्रिय भाषण विवेक धृति और तपसा (कष्ट सहन)। इनमें सबसे बड़ी मन की परम शुद्धि ही हैं। बस यह तीर्थयात्रा एक प्रकार का मन बहलाता है, जिसके द्वारा यात्री को इन उत्तम गुणों को अपने मन में अपने जीवन में सम्पादन करने का अवसर मिलता है।
आत्मा नदी संयम पुण्य तीर्था
सत्योदका शीलतटा दयोर्मि।
तत्रावगांह कुरु पाण्डुपंत्र।
न वारिणा शुद्धयाति चान्तरात्मा॥
- महा0 उद्योग पर्व0
आत्मा नदी है, जिसमें संयम का पुण्य घाट है, सत्य की जल है, शील किनारा है तथा दया की लहरें उठती रहती है । युधिष्ठिर ! तुम उसी में गोता लगाओ, (भौतिक ) जल से (शरीर तो घुल जाता हैं) अन्तःकरण नहीं धुलता।
निगृहीतेन्द्रियग्रामों यत्रेव च वसेन्नरः।
तत्र तस्य कुरुक्षेत्र नैमिषं पुष्कराणि च॥
- स्कन्द
जिसने इन्द्रिय- समूह को वश में कर लिया है, वह मनुष्य जहाँ भी निवास करता है, वहीं उसके लिए कुरुक्षेत्र, नैमिषारण्य और पुष्कर आदि तीर्थ है।
ब्रहम ध्यानं पर तीर्थ तीर्थमिन्द्रिय निग्रहः।
दमस्तीर्थस्तु परमभावं शुद्धि पर तथा॥
ज्ञान हृदे ध्यान जले राम-द्वेषमलापहे-यः स्नाति मानेस तीर्थे स याति परमागतिम्।
- गरुड़ पुराण
ब्रह्म का ध्यान परम तीर्थ है। इन्द्रियों का निग्रह तीर्थ है, मन का निग्रह तीर्थ है, भाव की शुद्धि परम तीर्थ है। ज्ञान
रूप तालाब में, ध्यान जल में जो मन के तीर्थ में स्नान करके राग-द्वेष रूप मल को दूर करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।
तीर्थांना हृदयं तिर्थशुचिना। हृदय शुचि।
- महा0 शा0
समस्त तीर्थों में हृदय (अन्तरात्मा) ही परम तीर्थ है, सारी पवित्रताओं में अन्तरात्मा की पवित्रता ही मुख्य है।
मानसा च प्रदीप्तेन ब्रहमज्ञान जलेन च।
स्नाति यो मानसे तीर्थें तत् स्नानं तत्वदर्शिनाम्।
- महाभारत अनु0
अन्तःकरण में प्रकाशित ब्रह्मज्ञान रूपी जल से मानस तीर्थ में जो स्नान होता है। तत्त्वदर्शियों का वही परम स्नान है।
योगिक स्नान माख्यात् योगेनहरिचिन्तनम्।
आत्मतीर्थ मिति ख्यात। सेवित ब्रहमवादिभिः’॥
- गरुड़ पूर्व0
ईश्वरराधन योगियों का परम स्नान है। ब्रहमवादी आत्म-तीर्थ का सेवन करते हैं।
मनोविशुद्ध पुरुषायं तीर्थ, वाचां तथा चेन्द्रिय निग्रहश्च। एतानि तीर्थानि शरीरजानि र्स्वगस्य मार्ग प्रतिवोधयन्ति॥
चित्तमर्न्तगतं दुष्ट तीर्थ स्नानैचं शुध्यातिं शतशोपि जलधौतं सुरा भाण्डाभिवा शुचि।
इन्द्रियाणि वशे कृत्वा यत्र यत्र वसेन्नरः।
तत्र तत्र कुरुक्षेत्र प्रयाग पुष्करतथा
-ब्रहम पुराण।
मनुष्य का विशुद्ध मन ही महान् तीर्थ है। वाणी और इन्द्रियों का निग्रह यह सद्गुण शरीर में निवास करने वाला तीर्थ है। इसी मार्ग से स्वर्ग पहुँचता जाता है।
यदि चित्त दृष्ट है तो तीर्थ स्नान से भी शुद्धि नहीं होती। सुरा भरा पात्र बार-बार धोने पर भी शुद्ध नहीं होता ।
इन्द्रियजय मनुष्य जहाँ भी निवास करता है। वहीं कुरुक्षेत्र, प्रयाग, पुष्कर आदि तीर्थ वन जाते हैं।
ध्यानपूते ज्ञानजले रागद्वेषमलापहे।
यः स्नाति मानसे तीर्थे स याति परमाँ गतिम्-स्कन्द पुराण
ध्यान के द्वारा पवित्र तथा ज्ञान रूपी जल से भरे हुए, राग-द्वेष रूप मल को दूर करने वाले मानस-तीर्थ में जो पुरुष स्नान करता है, वह परमगति मोक्ष को प्राप्त होता है।
तीर्थयात्रा का उद्देश्य आत्म-शोधन और परमार्थ परायणता की पुण्य प्रवृत्तियों को निखारना है। धर्म-प्रचार यात्राओं से ही यह उद्देश्य पूरा होता है। मेंहदी पीसने वाले के भी हाथ लाल होते हैं। सुगन्ध निर्माताओं के वस्त्र अनायास ही महकने लगते हैं। धर्म
तत्त्व का प्रसार -विस्तार करने के उद्देश्य से निकले हुए व्यक्ति उन विचारों एवं क्रियाओं में संलग्न रहने के कारण स्वयं भी उस रंग में रंगते चले जाते हैं।
ऐसी तीर्थ यात्राएँ पैदल ही होनी चाहिए। ताकि अधिक लोगों के साथ सम्पर्क साधने-विराम स्थलों पर कथा, सत्संग करने का अवसर मिलता चले। पदयात्रा एक तप भी है, जिससे शारीरिक एवं मानसिक विकृतियों का परिशोधन होता है। शास्त्रकारों ने तीर्थयात्रा में वाहन के उपयोग का निषेध किया है। पदयात्रा ही तीर्थयात्रा हैं। सामान लादने भर के लिए वाहन का भले ही प्रयोग किया जाय पर नर्मदा परिक्रमा, ब्रजयात्रा, गोवर्धन परिक्रमा, शिव त्रयोदशी के जल काँवर की तरह उसे पैदल ही किया जाना चाहिए।
ऐर्श्वय लोभान्मोहाद् वागच्छेद यानेन यो नरः।
निष्फलं तस्य तत्तीर्थ तस्माद्यान विवर्जयेत्-मत्स्य पुरा0 ब्रह्यी सं0
तीर्थयात्रा में यान वर्जित है। ऐश्वर्य के गर्व से, मोह से या लोभ से जो यानारूढ़ होकर तीर्थयात्रा करता है, उसकी तीर्थ यात्रा निष्फल हो जाती है।
यानमर्धफलं हन्ति तदद्धै छत्र पादुके।
वाणिज्यं त्रीस्तथा भागान् सर्व हन्ति प्रतिग्रह-स्कन्द पुराण
सवारी तीर्थयात्रा का आधा फल, अपहरण कर लेती है। उसका आधा छत्र तथा पादुका अपहरण कर लेते हैं। व्यापार पुण्य का तीन चतुर्थांश अपहरण करता है तथा प्रतिग्रह तीर्थ के सारे पुण्य को नष्ट कर देता है।
सर्वेषामेव वर्णानां सर्वाश्रमनिवासिनाम्।
तीर्थ तु फलदं ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा।
तीर्थानुगमने पद्भ्यां तपः परमिहोच्यते।
तदेव कृत्वा यानेन स्नामात्रफलं लभेत।
सभी वर्णों तथा सभी आश्रमों के लोगों को तीर्थ फलदायक होता है- इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं करना चाहिए। जो पैरों से पैदल चलकर तीर्थ जाते हैं, वे परम तप करते हैं। जो सवारी से यात्रा करते हैं, उन्हें स्नान मात्र का ही फल मिलता है।
गायत्री को उच्चस्तरीय साधना का क्रम ब्रह्म वर्चस् शिक्षण प्रक्रिया के अंतर्गत आरम्भ किया गया है। अन्य महत्त्वपूर्ण शिक्षा विधानों की तरह इस प्रक्रिया के भी सिद्धान्त , शिक्षण एवं व्यवहार अनुभव दो पक्ष है। शिल्प, कला , विज्ञान, इंजीनियरिंग, मेडिकल आदि महत्त्वपूर्ण विषयों की शिक्षा प्राप्त करने के लिए इन दोनों ही पक्षों को महत्त्व देना पड़ता है। ज्ञान और अभ्यास के दोनों ही चरणों के सहारे प्रगति पथ पर चला जाता है।
ब्रह्म विद्या और ब्रह्म तेज की समन्वित साधना ब्रह्म वर्चस् के नाम से आरम्भ की गई है । इसकी सैद्धान्तिक पृष्ठभूमि से परिचित होना उन सबके लिए आवश्यक है जो इस विषय में रुचि रखते हैं। आवश्यक जानकारी के उपरान्त ही यह निर्णय ठीक तरह हो सकता है कि इस दिशा में कदम उठाने की आवश्यकता है भी या नहीं। यदि है तो उसके लिए क्या करना पड़ेगा? इसी जिज्ञासा का समाधान करने के लिए अखण्ड-ज्योति के प्रस्तुत मार्च, अप्रैल, मई के अंकों में आवश्यक जानकारी प्रस्तुत की गई है। यह जानकारी क्रमशः आगे भी चलती रहेगी। इन तीनों अंकों में ब्रह्म वर्चस् विज्ञान की संक्षिप्त पृष्ठभूमि प्रस्तुत की गई है। आगे इस संदर्भ के अन्यान्य ज्ञातव्य पढ़ने समझने को मिलते रहेंगे। पत्रिका में ‘विज्ञान और अध्यात्म’ के समन्वय वाले लेख पूर्ववत् जून अंक से फिर चलने लगेंगे।
गायत्री की सामान्य उपासना एक सर्व सुलभ एवं सर्वजनीन नित्य कर्म है। उसे साँस लेने, जल पीने, भोजन करने, टहलने आदि के समतुल्य माना जा सकता है। उसे सहज भाव बिना किसी विशेष प्रशिक्षण के भी किया जा सकता है। पर उच्चस्तरीय साधनाओं में उतनी सरलता नहीं है। उन्हें विशेष व्यायामों एवं चिकित्सा उपचारों के समान समझना चाहिए। जिन्हें विशेष मार्ग-दर्शन एवं प्रत्यक्ष प्रशिक्षण के साथ किया जाना चाहिए। एक ही रोग की सभी रोगियों की चिकित्सा एक ही प्रकार की नहीं होती। चिकित्सक उन सबकी स्थिति का परीक्षण करते हैं और उनकी स्थिति के अनुरूप भिन्न-भिन्न औषधियों, तथ्यों एवं परिचर्याओं का निर्धारण करते हैं। गायत्री का उच्चस्तरीय साधना क्रम किसके लिए क्या उपयुक्त पड़ेगा? इसका निर्धारण साधक की शारीरिक, मानसिक, आत्मिक एवं साँसारिक परिस्थितियों का अध्ययन, विश्लेषण करके ही किया जा सकता हैं
प्रस्तुत उच्चस्तरीय साधन प्रक्रिया आरम्भ करने के इच्छुकों को ब्रह्म वर्चस् में आकर अपनी स्थिति का परीक्षण कराया जाना आवश्यक है। इसी प्रकार विशेष साधनाओं में से किसका किस प्रकार का क्रम बनाया जाना है। इसका निर्धारण पारस्परिक विचार विनियम के साथ किया जाना चाहिए। जिन्हें (1) पंचकोशों का अनावरण एवं (2) कुण्डलिनी जागरण की क्रिया-प्रक्रियाओं में रुचि है, उन्हें वह शुभारम्भ हरिद्वार आकर ही निर्धारण कराना चाहिए। ब्रह्म वर्चस् आरण्यक का निर्माण इसी उद्देश्य के लिए किया गया है। दस दिवसीय सत्र अति व्यस्त व्यक्तियों के लिए और एक मासीय सत्र थोड़ी फुरसत वालों के लिए चलाये जा रहे हैं। गत अंक में सन् 77 के सत्रों की घोषणा की जा चुकी है। आरण्यक की जितनी इमारत बन जायेगी उतनी ही संख्या में जुलाई 77 से विधिवत् उच्चस्तरीय साधना क्रम चल पड़ेगा यों उसका सामान्य परिचय तो वर्तमान सत्रों में भी कराया जा रहा है। जुलाई और अक्टूबर में 1 से 10-11 से 20 और 21 से 30 तक के दस-दस दिवसीय सत्र चलेंगे और अगस्त, सितम्बर तथा नवम्बर , दिसम्बर में एक-एक महीने के सत्र हैं। इन उच्चस्तरीय साधनाओं में से किसे क्या साधना किस प्रकार करनी है उसका प्रत्यक्ष अनुभव और भावी क्रम निर्धारण करने के लिए इन सत्रों में सम्मिलित होना आवश्यक है।
आर्ट विषयों की परीक्षाएँ प्राइवेट पढ़ कर भी दी जा सकती हैं । साइंस , मेडिकल , इंजीनियरिंग आदि की पढ़ाई में प्रेक्टिकल अनुभव प्राप्त करने के लिए कालेज में दाखिला लेना आवश्यक है। श्रीगणेश शुभारम्भ करने के लिए तो यह प्रवेश अतीव आवश्यक हैं । पीछे तो पूछताछ परामर्श से भी घर रह कर प्रगति क्रम जारी रखा सकता हैं
उच्चस्तरीय साधना के सिद्धान्तों की जानकारी देने वाली पाठ्य सामग्री पिछले पृष्ठों पर तथा गत दो अंकों में प्रस्तुत की गई है। अब यह जानना, समझना शेष है कि प्रस्तुत साधना क्रम में क्या करना होगा। इस दिशा में प्रथम चरण आत्म-शोधन का है? साधक को शारीरिक , मानसिक और आत्मिक क्षेत्रों का आचार परक , चिन्तन परक और भाव परक परिष्कार करने के लिए साधकों -चित जीवन प्रक्रिया का निर्धारण करना चाहिए। भूमि की उर्वरता पर बीज का उगना और फलित होना निर्भर रहता है। साधना अपने आपे को साधने से-व्यवस्थित एवं परिष्कृत होने के साथ आरम्भ होती है। इसके लिए प्रस्तुत दोष दुर्गुणों का-पिछले दिनों की अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों का विवरण प्रस्तुत करना और उनके निराकरण के लिए जीवन प्रक्रिया में किस प्रकार परिवर्तन किया जाय यह निर्धारण आवश्यक है। वन पड़े पापों का लेखा जोखा सामने हो तो उसके प्रायश्चित परिमार्जन का रास्ता निकलेगा। प्रगति के लिए किन सत्प्रवृत्तियों का गुण, कर्म, स्वभाव में समावेश किया जाना है यह जानना और उसे व्यवहार में परिणत करने के लिए भावी जीवन का सुव्यवस्थित क्रम निर्धारित किया जाना आवश्यक हैं इस आधार भूमि पर ही आत्मिक प्रगति का विशाल भवन खड़ा होता है।
ब्रह्म वर्चस् साधना में योगाभ्यास एवं तपश्चर्या की क्रिया-प्रक्रिया भी सम्मिलित है। कहा जा चुका है कि ब्रह्म विद्या के तथ्यों को हृदयंगम करने के लिए पंच कोशों के अनावरण की साधना है। ब्रह्म तेज उपार्जन के लिए कुण्डलिनी जागरण के अभ्यास करने होंगे। इन्हें इस प्रकार समझा जा सकता है-
पंचकोशी साधना के अंतर्गत (1) मूर्धा त्राटक (2) सोहंसाधना (3) खेचरी मुद्रा (4) नादानुसंधान (5) ध्यान में सविता शक्ति का संचरण।
कुण्डलिनी साधना के अंतर्गत (1) सिद्धासन युक्त मूल वेध (2) शक्ति चालनी मुद्रा (3) सूर्य वेधन प्राणायाम (4) हृदि त्राटक (5) अग्नि मन्थन -ऊर्जा उन्नयन ध्यान।
इन पाँचों को योग परिपाटी के अनुसार वर्गीकृत किया जाय तो (1) मूर्धा एवं हृदि त्राटकों को-बिन्दु योग (2) सोहंसाधना एवं सूर्यभेदन प्राणायाम को-प्राणयोग (3) खेचरी मुद्रा एवं शक्ति चालनी को लय योग(4) नादानुसंधान को-नादयोग (5) सविता संचरण एवं ऊर्जा उन्नयन धारणा को ध्यानयोग कहा जा सकता है। इन्हीं पाँचों के अंतर्गत पंचकोशी और कुण्डलिनी साधना की समस्त साधनाएँ आ जाती है॥ पंचमुखी गायत्री साधना का इन पाँचों समावेश हो जाता है।
तृतीय नेत्र आज्ञा चक्र की दिव्य दृष्टि बढ़ाने वाली साधनाओं में ‘त्राटक’ प्रमुख है। इसे बिन्दुयोग भी कहते हैं । अस्त-व्यस्त इधर-उधर भटकने वाली बाह्य और अन्तः दृष्टि को किसी बिन्दु विशेष पर- लक्ष्य विशेष पर एकाग्र करने को बिन्दु साधना कह सकते हैं। त्राटक का उद्देश्य यही है। त्राटक में बाह्य नेत्रों एवं दीपक जैसे साधनों का उपभोग किया जाता है। इसलिए उसकी गणना स्थूल उपचारों में है। बिन्दुयोग में ध्यान धारणा के सहारे किसी इष्ट आकृति पर अथवा प्रकाश ज्योति पर एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है । दोनों का उद्देश्य एवं अन्तर केवल भौतिक साधनों के प्रयोग करने की आवश्यकता रहने न रहने का है। आरम्भिक अभ्यास की दृष्टि से त्राटक को आवश्यक एवं प्रमुख माना गया है। बिन्दुयोग साधना की स्थिति आ जाने पर बाह्य त्राटक की आवश्यकता नहीं रहती।
त्राटक के स्वरूप का वर्णन करते हुए हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है-
निरीक्षे त्रिश्चलदृश्या सूक्ष्म लक्ष्यं समाहितः
अश्रु संपात पर्यन्तं आचार्ये स्त्राटय स्मृतम्॥
अर्थात् एकाग्र चित्त होकर निश्चल दृष्टि द्वारा सूक्ष्म लक्ष्य को तब तक देखता रहे जब तक आँखों में से आँसू न आ जाय। इस साधना को त्राटक कहते हैं।
प्राचीन काल में योग साधकों के नेत्र स्थिति दृष्टि बहुत प्रबल होती थी इसलिए उन पर अश्रुपात पर्यन्त देखते रहने का कोई विशेष बुरा प्रभाव नहीं पड़ता था। इसलिए वैसा करने का निर्देश दिया गया था । आज की स्थिति में नेत्र शक्ति दुर्बल रहने से वैसा न करने की बात कही गई है। तो भी एकाग्र दृष्टि के उद्देश्य की पूर्ति प्राचीन और अर्वाचीन दोनों ही मान्यताओं के अनुसार आवश्यक है।
त्राटक की प्रतिक्रिया नेत्र रोगों को-आलस्य प्रमाद को- निरस्त करने के रूप में मानी गई है-
मोचनं नेत्र रोगाणां तन्द्रादीनां कपाटकम्।
यत्रतस्त्राटके गोप्यं यथा हाटक षेटकम्-हठयोग प्रदीपिका
नेत्र रोगों को दूर करने एवं आलस्य तन्द्रा आदि विकारों को हटाने वाला त्राटक है। उसे गुप्त रखना चाहिए।
गुप्त रखने से तात्पर्य इतना ही है कि उपयुक्त मार्ग-दर्शन के बिना यदि ऐसे ही लोग कहे-सुन आधारों पर योग क्रियाएँ करने लगेंगे तो पात्रता के अनुरूप साधना की परम्परा न रह सकेगी ओर उससे समुचित लाभ प्राप्त न हो सकेगा।
योग साधना में एकाग्रता का अत्यधिक महत्त्व है। मनःशक्तियों का बिखराव ही उस मनोबल के उत्पन्न होने में सबसे बड़ी बाधा है जिस पर साधनाओं की सफलता निर्भर है। सभी जानते हैं कि बिखरी भाप, बारूद, धूप आदि से सामान्य प्रयोजन ही सधते हैं, पर जब उनमें केन्द्रीकरण होता है तो चमत्कार देखे जा सकते हैं। लक्ष्य बेध जैसी एकाग्रता उत्पन्न ही जा सके तो भौतिक एवं आत्मिक सभी प्रयोजनों में सफलता मिलती है।, त्राटक से इसी उपलब्धि का अभ्यास होता है।
यथा धन्वी स्वकं लक्ष्यं वेधयत्यं चलेक्षणः।
तथैव त्राटकाभ्यासं कुर्मादेकाग्रमानसः-योग रसायनम्
जैसे धनुर्धर मात्र अपने लक्ष्य को ही लक्ष्यबेध के क्षण में देखता है, वैसे ही त्राटक का अभ्यास एकाग्र मन से करना चाहिए।
त्राटक के माध्यम से किया गया एकाग्रता का अभ्यास बढ़ते-बढ़ते समाधि की स्थिति तक जा पहुँचता है। समाधि के साथ दिव्य दृष्टि का-अतीन्द्रिय चेतना का जागृत होना सर्वविदित है। त्राटक का प्रतिफल समयानुसार समाधि के रूप में सामने आता है। कहा गया है-
त्राटकाभ्यासतश्चापि कालेन क्रमयोगतः।
राजयोगसमाधिः स्यात् तत्प्रकारोऽधुनोच्यते-योग रसायनम्
नाटक के अभ्यास से भी समयानुसार राजयोग की समाधि का लाभ सम्भव है।
नाटक विधियाँ अनेक प्रकार की हैं। मैस्मरेजम के अभ्यासी सफेद कागज पर काला गोला बनाते हैं। उसके मध्य में स्वेत बिन्दु रहने देते हैं। इस पर नेत्र दृष्टि और मानसिक एकाग्रता को केन्द्रित किया जाता है। अष्टधातु के बने तश्तरीनुमा पतरे के मध्य में ताँबे की कील लगा कर उस मध्य बिन्दु को एकाग्र भाव से देखते रहने का भी वैसा ही लाभ बताया जाता है। कहते हैं कि धातु के माध्यम से बेधकदृष्टि की शक्ति और भी अधिक बढ़ती है।
भारतीय योग शास्त्र के अनुसार इसके लिए चमकते प्रकाश का उपयोग करना उपयुक्त माना गया है। सूर्य, चन्द्र, तारक आदि प्राकृत प्रकाश पिंडों को तथा दीपक जैसे मानव कृत प्रकाश साधनों को काम में लाने का विधान है।
सूर्य की ज्योति अत्यन्त तीव्र होती है। खुली आँखों से उसे देखने में हानि होती है, इसलिए सूर्य त्राटक मात्र ध्यान द्वारा ही किया जा सकता है। खुले नेत्रों से नहीं। लगभग यही बात चन्द्रमा के सम्बन्ध में भी है। उसका प्रकाश यों सूर्य के समान तीखा तो नहीं होता फिर भी नेत्र विज्ञान के अनुसार किसी भी प्रकाश को लगातार देखते रहना हानिकारक है। प्राचीन मान्यताओं और आधुनिक शोधों में यह मौलिक अन्तर सामने आया है। खुले नेत्रों से लगातार अश्रु पर्यन्त देखते रहने की बात शरीर शास्त्री स्वीकार नहीं करते और हानिकारक बताते हैं। तारागणों को प्रकाश का माध्यम बनाकर त्राटक साधना करने में भी कई कठिनाइयाँ है। तारे मात्र रात्रि को निकलते हैं। बदली , कुहरा, धुन्ध, धुँआ छा जाने पर वे रात्रि में भी नहीं दीखते । जिन्हें खुला आसमान उपलब्ध है वे ही तारों को देखने का लाभ ले सकते हैं । उन्हें लेटकर या तिरछे होकर ही देखा जा सकता है जब कि साधनाओं में मेरुदण्ड सीधा रखने का विधान है। साधक को सुविधा का समय दिन में हो तो तारे कहाँ मिलेंगे? फिर तारे कितने ही होते हैं। त्राटक के लिए एक ही प्रकाश बिन्दु चाहिए कई बिन्दु होने पर दृष्टि भटकती है। इन सब कारणों को देखते हुए सिद्धांतत भले ही सूर्यः चन्द्र तारकों की बात कही जा सके
व्यवहारतः वे तीनों ही अनुपयुक्त है। यदि इन्हीं का उपयोग करना हो तो एक सेकेण्ड तक उन्हें देखने के उपरान्त तत्काल नेत्र बन्द कर लेने और फिर ध्यान धारणा से ही प्रकाश पर एकाग्रता का अभ्यास करना चाहिए।
त्राटक के अभ्यास में दीपक का प्रयोग ही अधिक उपयुक्त है। धृत दीप का उपयोग कई दृष्टि से अधिक उपयुक्त माना गया है। पर यह होना शुद्ध ही चाहिए, मिलावटी या नकली घी की अपेक्षा शुद्ध तेल अधिक उत्तम है। मोमबत्ती का उपयोग भी किया जा सकता है। कम पावर के रंगीन बल्ब भी इस प्रयोजन की पूर्ति कर सकते हैं।
इनमें से जो भी उपकरण काम में लाना हो, उसे छाती की सीध -चार से दस फुट तक की दूरी पर रखना चाहिए। पीछे काला, नीला या हरा पर्दा टँगा हो अथवा इन रंगों से दीवार रंगी हों । प्रकाश ज्योति के इर्द-गिर्द न्यूनतम वस्तुएँ हों अन्यथा ध्यान उनकी ओर बिखरेगा।
त्राटक के लिए प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम है। यों उसे रात्रि को भी किया जा सकता है॥ दिन में सूर्य का प्रकाश फैला रहने से यह साधना ठीक तरह नहीं बन पड़ती हैं । यदि दिन में ही करनी हो तो अँधेरे कमरे का प्रबन्ध करना होता है।
साधना के लिए कमर सीधी, हाथ गोदी में, पालथी सही-रखकर बैठना चाहिए। वातावरण में घुटन दुर्गन्ध, मक्खी, मच्छर जैसे चित्त में विक्षोभ उत्पन्न करने वाली बाधाएँ नहीं हो। यह अभ्यास दस मिनट में आरम्भ करके उसे एक-एक मिनट बढ़ाते हुए एक दो महीने में अधिक से अधिक आधे घण्टे तक पहुँचाया जा सकता है। इससे अधिक नहीं किया जाना चाहिए ।
खुले नेत्र से प्रकाश ज्योति को दो से पाँच सेकेण्ड तक देखना चाहिए और आँखें बन्द कर लेनी चाहिए। जिस स्थान पर दीपक जल रहा है उसी स्थान पर उस ज्योति को ध्यान नेत्रों से देखने का प्रयत्न करना चाहिए। एक मिनट बाद फिर नेत्र खोल लिए जाय और पूर्ववत् कुछ सेकेण्ड खुले नेत्रों से ज्योति का दर्शन करके फिर आँखें बन्द कर ली जाय। इस प्रकार प्रायः एक-एक मिनट के अन्तर से नेत्र खोलने और कुछ सेकेण्ड देखकर फिर आँखें बन्द करने और ध्यान द्वारा उसी स्थान पर ज्योति दर्शन की पुनरावृत्ति करते रहनी चाहिए।
मिनटों और सेकेण्डों का सही निर्धारण उस स्थिति में नहीं हो सकता। घड़ी का उपयोग कर सकने की वह स्थिति होती ही नहीं। अनुमान पर ही निर्भर रहना पड़ता है। अलग समय में अनुमान के सही होने का अभ्यास घड़ी के सहारे किया जा सकता है। मोटा आधार यह है कि जब नेत्र बन्द कर लेने पर प्रकाश ज्योति का दर्शन झीना पड़ने लगे तो स्मृति को पुनः सतेज करने के लिए आँख खोलने और ज्योति देखने का प्रयत्न किया जाय। आमतौर ने नेत्र खोल कर देखने के उपरान्त जब पलक बन्द किये जाते हैं तो ध्यान में प्रकाश अधिक स्पष्ट होता है। धीरे-धीरे वह झीना धुँधला होता है। उसे फिर से सतेज करने के लिए ही खुली आँख से ज्योति देखने की आवश्यकता पड़ती है। हर मनुष्य की मस्तिष्कीय संरचना अलग-अलग प्रकार ही होती है। किसी को एक बार का प्रत्यक्ष दर्शन बहुत देर तक ध्यान में प्रकाश की झाँकी कराता रहता है। किसी की स्मृति जल्दी धुँधली हो जाती है। स्थिति का निरीक्षण स्वयं करना चाहिए और आवश्यकतानुसार जल्दी-जल्दी या देर-देर में आँखें खोलने बन्द करने का क्रम निर्धारण करना चाहिए। उद्देश्य यह है कि त्राटक के साधना काल में ध्यान भूमिका को लगातार प्रकाश ज्योति की झाँकी होती रहे। धुँधलेपन का हटाने के उद्देश्य से ही नेत्रों को खोलने, बन्द करने की प्रक्रिया अपनाई जाय।
त्राटक का उद्देश्य दीपक पूजा नहीं वरन् ध्यान भूमिका में प्रखरता उत्पन्न करना है ताकि चिन्तन के आधार पर प्रकाश बिन्दु देव प्रतिमा की स्पष्ट झाँकी कर सकना सम्भव हो सके। मंद एवं भोंथरे चिन्तन प्रक्रिया में कोई ध्यान प्रतिमा स्पष्ट रूप से नहीं उभरती। कल्पना चित्र स्पष्ट नहीं होते। तब एकाग्रता का एक महत्त्वपूर्ण मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। ऐसी दशा में नादयोग आदि से किया जाने वाला शब्दयोग एवं ध्यान धारणा के आधार पर किया गया बिन्दुयोग में से एक भी सफल नहीं होता। तब मात्रा प्रत्यक्ष प्रतिमाओं को देखकर- कीर्तन गायन तथा श्रवण सत्संग आदि स्थूल उपायों में मन की भगदड़ रोकने के मोटे प्रयोग किये जाते हैं । जप, पाठ की जिह्वा प्रक्रिया तो पूरी होती रहती है, पर ध्यान के अभाव में उनमें भी रस उत्पन्न नहीं हो पाता। त्राटक द्वारा चिन्तन तन्त्र को कल्पना संस्थान को प्रखर बनाने में जितनी सफलता मिलती है उतना ही आत्मिक प्रगति के लिए की जाने वाली साधनाएँ सरल एवं सफल होने लगती है। अस्त त्राटक को - ध्यानयोग को प्रथम प्रक्रिया माना गया हैं।
‘योग रसायन’ में त्राटक के विधान एवं प्रगति क्रम पर प्रकाश डालते हुए कहा है-
दृश्यते प्रथमाभ्यासे तेजो बिदु समीपगम्।
चक्षषो रश्मिजातानि प्रसंरति समंततः॥
नाटक के अभ्यास से प्रथम तेजोमय बिन्दु पास आया दीखेगा। फिर नेत्र से रश्मियाँ निकलती दीखेंगी
तेजसा संवृतं लक्ष्यं क्षणं लुप्तं भवेत्ततः।
क्षणं दृष्टिगतं भूत्वा पुनलुप्तं भवेत्क्षणात्॥
फिर वह तेजपूर्ण बिन्दु कभी लुप्त दीखेगा, कभी प्रकट हुआ दीखेगा । ऐसा ही क्रम बार-बार चलेगा।
दृष्ट्या समं मनश्चापि लक्ष्यस्थाने प्रवेशयेत्।
लक्ष्यं विहाय नैवान्यच्चितयेन्नवलोकेयत।
मन भी उसी ओर लगा रहे। लक्ष्य के अतिरिक्त और कुछ न देखे, न सोचे।
प्रकाश ज्योति को आधार मानकर मन की एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है। अस्तु प्रत्यक्ष या सूक्ष्म प्रकाश की झाँकी करने के साथ ही इस बात का भी प्रयत्न रहना चाहिए कि मन की तन्मयता भी इसी लक्ष्य पर बनी रहे। चंद्र-चकोर दीप-पतंग के उदाहरण की तरह त्राटक साधना की ज्योति के प्रति तन्मयता का भाव रखते हुए उसमें एकाकार हो जाने की भाव भूमिका बनानी चाहिए।
ध्यान के दो रूप हैं-एक साकार, दूसरा निराकार। दोनों को ही प्रकारान्तर में दिव्य नेत्रों से किया जाने वाला त्राटक कहा जा सकता है। देव प्रतिमाओं की कल्पना करके उनके साथ तदाकार होने-भाव भरे मनुहार करने को साकार ध्यान कहते हैं। निराकार उपासना में मनुष्याकृति की देव छवियों को इष्टदेव मानने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उस प्रयोजन के लिए प्रकाश ज्योति की स्थापना की जाती है। रूप की दृष्टि से छवि-श्रवण की दृष्टि से नाद और श्वसन प्रक्रिया की दृष्टि से प्राणायाम का उपाय काम में लाया जाता है। निराकार साधना के यह तीनों ही उपाय एकाग्रता और भाव कल्पना को प्रखर परिपक्व बनाने के उद्देश्य से की जाती है। साकार उपासना का भी यही उद्देश्य है।
ध्यान अभ्यास के प्रथम चरण में साकार की और द्वितीय चरण में निराकार की आवश्यक होती है। अल्हड़ मन एक बिन्दु पर टिकने को तैयार नहीं होता । उसकी घुड़दौड़ पर धीरे-धीरे नियन्त्रण पाने के लिए देव छवि का उपयोग किया जाता है। इष्टदेव के शरीर का सौन्दर्य उनके वस्त्र, आभूषण, आयुध, वाहन आदि का एक सुविस्तृत ढाँचा खड़ा किया जाता है और मन से कहा जाता है कि वह बन्दर की उछल कूद करने की अपनी आदत छोड़ नहीं सकता तो इतने सीमित क्षेत्र में ही जारी रखे। देव छवि के अंग-प्रत्यंगों को -उपकरणों को देखने, सोचने में संलग्न रहने का क्षेत्र काफी बड़ा रहता है। उतने में वह चाहें तो चिड़ियाघर के जानवरों की तरह थोड़े क्षेत्र में गुजारा कर सकता है। इसमें आरम्भिक साधक को सरलता पड़ती है और एकाग्रता की साधना सरलतापूर्वक चलने लगती है।
निराकार में इष्टदेव को और भी अधिक सीमित केन्द्रित करना पड़ता है। ज्योति के साथ अन्य घटक नहीं होते। उसकी एक ही सत्ता होती है। उसमें मन की एकाग्रता की लगा सकना परिपक्व मनःस्थिति से ही सम्भव होता है। ज्योति के साथ आत्म-भाव जोड़कर रस उत्पन्न करना यहाँ भी आवश्यक है। प्रकाश को ब्रह्म का प्रतीक माना गया है। ज्योति दर्शन को ब्रह्म दर्शन समझा जा सके उसके साथ एकाकार होकर स्वयं भी प्रकाश पुत्र प्रकाश पिण्ड बन जाने की भाव-भरी श्रद्धा उभारी जा सके तो यह बिन्दुयोग की अगली भूमिका समुचित सत्परिणाम दे पाती है। इस अभ्यास में दीप, पतंग एवं चन्द्र-चकोर की सरस कल्पना उभरने से ध्यानयोग का उद्देश्य पूरा होता है। चित्त-वृत्तियों के निरोध को ही योग कहते है॥ त्राटक साधना से उसी उद्देश्य की पूर्ति होती है।
हसन ने अपनी सिद्धि का चमत्कार दिखाते हुए बहती नदी के ऊपर मुसल्ला (नमाज पढ़ने का आसन) बिछाया और महिला सन्त राबिया से कहा-आओ हम दोनों यहाँ नमाज पढ़े।’
राबिया उनका अहंकार ताड़ गई। उसने अपना मुसल्ला हवा में अधर फैला दिया और कहा-नदी से यह बेहतर है। क्यों न हम दोनों आसमान में नमाज पढ़े? ‘
हसन का अहंकार गल गया। वे अपनी सिद्धि का प्रभाव राबिया को दिखाकर उसे चमत्कृत करना चाहते थे, पर बात उलटी हुई राबिया की सिद्धि उनसे भी बढ़ी-चढ़ी निकली।
सटपिटाये हसन को सान्त्वना देते हुए राबिया ने कहा-देखो , हसन तुमने जो किया वह तो एक मछली भी कर सकती है और मैंने जो किया वह तो एक मक्खी के लिए भी सरल है। सच तो यह है कि हम दोनों का जो असली काम है वह चमत्कार प्रदर्शन की अपेक्षा कहीं अधिक ऊँचा है।
बाह्य एवं प्रत्यक्ष त्राटक के लिए दीपक, मोमबत्ती, बल्ब आदि की आवश्यकता पड़ती है। पाश्चात्य वेधक दृष्टि के साधक कागज पर काला गोला बना कर उसके मध्य बिन्दु पर ध्यान करते हुए उस प्रक्रिया को पूर्ण करते हैं । अंतःत्राटक में इन उपकरणों की आवश्यकता नहीं पड़ती । उसमें प्रकाश ज्योति का मानसिक एवं भावनात्मक ध्यान करने से ही काम चल जाता है।
प्रातःकालीन उदीयमान सूर्य जब तक स्वर्णिम रहे तब तक कुछ-कुछ सेकेंड के लिए उसका प्रत्यक्ष आँखों से दर्शन और फिर नेत्र बन्द करके उसका ध्यान करने से अन्तः त्राटक की आधार भूमिका बन जाती है। यही कार्य पूर्णिमा का पूर्णचन्द्र देखने और आंखें बन्द करने से भी हो सकता है। अन्य तारकों की ओर ध्यान न जाय और शुक्र, गुरु जैसे किसी अधिक प्रकाशवान तारे को भी इस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। मोमबत्ती, दीपक, बल्ब आदि का प्रयोग जब तक होता रहेगा तब तक उसे बाह्य त्राटक ही कहा जाता रहेगा जब उपकरणों की आवश्यकता नहीं रहती और मात्र ध्यान से ही प्रकाश की अनुभूति होने लगती है तो उसे अन्तः त्राटक कहा जाने लगता है।
अंतःत्राटक आरम्भ करते हुए कुछ समय प्रकाश की स्थापना वहीं रहने देनी चाहिए वहाँ से उसे देखा गया था। प्रभात कालीन स्वर्णिम सूर्य सुदूर पूर्व में उगते हुए जहाँ देखा गया था आरम्भिक दिनों से उसे वहीं सूक्ष्म दृष्टि से देखना चाहिए और भावना करनी चाहिए कि उस प्रकाश पुञ्ज की ज्योति किरणें अन्तरिक्ष में होकर उतरती है और अपनी उत्कृष्टता को स्थूल शरीर में बल, सूक्ष्म शरीर में ज्ञान एवं कारण शरीर भाव बन कर प्रवेश करती है। शरीर संयमी, सक्रिय, स्वच्छ बनता है। मन में उसी प्रकार की किरणें सन्तुलन, विवेक, शालीनता, सद्ज्ञान बन कर बरसती है। कारण शरीर में अन्तःकरण में सद्भावना, सम्वेदना, श्रद्धा भक्ति के रूप में उन प्रकाश किरणों को अवतरण होता है और समूचा व्यक्तित्व दिव्य प्रकाश से ब्रह्म ज्योति से जगमगाने लगता है।
अंतःत्राटक का यह प्रथम चरण है। बाहर से भीतर की ओर ज्योति का प्रवेश करने की प्रक्रिया प्रथम भूमिका कहलाती है, क्रमिक विकास में इसी की सुविधा रहती है । यह स्थिति अधिक परिपक्व परिपुष्ट हो चलने पर प्रकाश की स्थापना भीतर की जाती है और उस आत्म-ज्योति की ब्रह्म-ज्योति की आग भीतर से निकल कर बाहर की ओर प्रकाशवान होती है। बल्ब का फिलामेन्ट भीतर भी ज्योतिर्मय होता ही है-अपनी आभा से संपर्क क्षेत्र को भी प्रकाशवान बना देता है। अन्तर्ज्योति के प्रकटीकरण में भी ऐसी ही स्थिति बनती है। अंतःत्राटक का साधक आत्म-सत्ता को प्रकाश से परिपूर्ण तो देखना ही है-साथ ही अपने प्रभाव क्षेत्र में भी आलोक बखेरता है।
अंतःत्राटक के लिए ध्यान मुद्रा में बैठना पड़ता है। अधखुले नेत्र , दोनों हाथों की उँगलियों मिली हुई, हथेलियाँ ऊपर की ओर करके उन्हें गोदी में रखना-यही है ध्यान मुद्रा-भगवान बुद्ध के चित्रों में प्रायः यही स्थिति चित्रित की जाती है। इस स्थिति में स्थित होकर भूमध्य भाग में अवस्थित प्रकाश पुँज की धारणा और अधिक प्रगाढ़ की जाती है । बिजली के बल्ब का मध्यवर्ती तार फिलामेन्ट-जिस प्रकार चमकता है और उसकी रोशनी बल्ब के भीतरी भाग में भरी हुई गैस में प्रतिबिम्बित होती है। इससे बल्ब का पूरा गोला चमकने लगता है और उसका प्रकाश बाहर भी फैलता है। ठीक ऐसी ही भावना बिन्दुयोग में करनी होती है।
भ्रूमध्य भाग में आज्ञाचक्र अवस्थित है। इसी को दिव्य नेत्र या तृतीय नेत्र कहते हैं। शंकर एवं दुर्गा के चित्रों में इसी स्थान पर तीसरा नेत्र दिखाया जाता है। पुराण कथा के अनुसार इसी नेत्र को खोलकर भगवान शिव के अग्नि तेजस् उत्पन्न किया था और उससे विघ्नकारी मनोविकार कामदेव को जलाकर भस्म किया था। यह नेत्र हर मनुष्य में मौजूद है। शरीर शास्त्र के अनुसार इसे पिट्यूटरी ग्रन्थि कहते हैं। इसमें नेत्र जैसी सूक्ष्म संरचना मौजूद है। सूक्ष्म शरीर के विश्लेषण में यह केन्द्र विशुद्ध -भूत भविष्य सभी कुछ देखा जाना जा सकता है। एक्सरे द्वारा शरीर के भीतर की टूट-फूट अथवा किसी बन्द बक्से के भीतर रखे आभूषणों का चित्र खींचा जा सकता है। इस दिव्य नेत्र को भी एक्सरे यन्त्र से तुलना की जा सकती है। यदि वह प्रदीप्त हो उठे तो घर बैठे महाभारत के दृश्य टेलीविजन की भाँति देखने वाले संजय जैसी दिव्य दृष्टि प्राप्त की जा सकती है और वह सब देखा जा सकता है जिसका अस्तित्व तो है, पर चमड़े से बने नेत्र उसे देख सकने में समर्थ नहीं है।
इस नेत्र में अदृश्य देखने की ही नहीं ऐसी प्रचण्ड अग्नि उत्पन्न करने की भी शक्ति है जिसके आधार पर अवांछनीयताओं को अवरोधों को जलाकर भस्म किया जा सके। शंकर जी ने इसी नेत्र को खोला था तो प्रचण्ड शिखायें उद्भूत हो उठी थीं। विघ्नकारी कामदेव उसी में जल-बल कर भस्म हो गया था। बिन्दुयोग की साधना को, यदि इस तृतीय नेत्र को ठीक तरह ज्योतिर्मय किया जा सके तो उसमें उत्पन्न होने वाली अग्नि शिखा मनोविकारों को- अवरोधों की जलाकर भस्म कर सकती है। उसकी शक्ति व्याख्या है। यदि दार्शनिक व्याख्या करनी हो तो उसे विवेकशीलता एवं दूरदर्शिता का जागरण भी कह सकते हैं। जिसके आधार पर लोभ , मोह, वासना तृष्णा अहंता जैसे मनोविकारों के कारण उत्पन्न हुए अगणित शोक, संतापों और निग्रह उपद्रवों को सहज ही शमन या सहन किया जा सकता है।
पौराणिक गाथा के अनुसार पुरातन काल में जब यह दुनिया जीर्ण-शीर्ण हो गई थी- उसकी उपयोगिता नष्ट हो गई थी-तब भगवान शिव ने अपना तीसरा नेत्र खोल कर प्रलय दावानल उत्पन्न किया था और ध्वंस के ताण्डव नृत्य में तन्मय होकर भविष्य में अभिनव विश्व के नव-निर्माण की भूमिका सम्पादित की थी। उस प्रलयंकारी ताण्डव नृत्य का बाह्य स्वरूप कितना ही रोमांचकारी क्यों न रहा हो उसकी चिनगारी शिवनेत्र से ही प्रस्फुटित हुई थी। बिजली जीवन क्रम में तथा समाज गत समष्टि जीवन में भी ऐसी आवश्यकता पड़ सकती है कि प्रचलित ढर्रे में आमूल-चूल परिवर्तन आवश्यक न हो जाय-जो चल रहा है उसे उलटना अनिवार्य बन जाय। यह महा परिवर्तन भी तृतीय नेत्र से-दूरदर्शी विवेक सम्भव विचार क्रान्ति से ही सम्भव हो सकता है। शिवजी के द्वारा ताण्डव नृत्य के समस्त तृतीय नेत्र खोले जाने के पीछे महाक्रान्ति की सारभूत रूपरेखा का दिग्दर्शन है।
अतः त्राटक के अंतर्गत भ्रूमध्य में दीप्त ज्योति का ध्यान करते हुए यह धारणा करनी पड़ती है। प्रत्येक जीवाणु में कण-कण और रोम-रोम में प्रकाश आलोक की आभा प्रदीप्त होती है। अन्धकार किसी भी कोने में छिपा नहीं रहा उसे पूर्णतया बहिष्कृत कर दिया गया है।
प्रत्येक कोशिका एवं तन्तु को आलोकित देखा जाता है। मस्तिष्क के चार परत माने गये हैं मन, बुद्धि, चित, अहंकार इन चारों को प्रकाश पुँज बना हुआ अनुभव किया जाता है। अपनी सत्ता के प्रत्येक पक्ष को भूमध्य केन्द्र से निकलने वाले प्रकाश प्रवाह में आलोकित अनुभव करना लगभग उसी स्तर का है जैसा कि प्रभात कालीन सूर्य निकलने पर अन्धकार का हर दिशा से पलायन होने लगता है और समस्त संसार आलस्य अवसाद छोड़ कर आलोक, उल्लास, स्फूर्ति एवं सक्रिय उमंगों के साथ कार्यरत हो जाता है। बिन्दुयोग की साधना जीवन सत्ता के कण-कण में प्रकाश उद्भव की अनुभूति तो कराती ही है। साथ ही उन अभिनव स्तर की हलचल भी उभरती दृष्टिगोचर होती है।
अध्यात्म की भाषा में प्रकाश शब्द का उपयोग मात्र चमक के अर्थ में प्रयुक्त नहीं होता, वरन् उसका अभिप्राय ‘ज्ञान युक्त क्रिया’ में सम्मिश्रित उल्लास भरी भाव तरंगों में होता है । पंचभौतिक जगत में गर्मी और रोशनी के सम्मिश्रण को प्रकाश कह सकते हैं। किन्तु अध्यात्म क्षेत्र में गर्मी का अर्थ सक्रियता और प्रकाश का अर्थ दूरदर्शी उच्चस्तरीय ज्ञान ही कहा जाता है। प्रकाश की प्राप्ति की चर्चा जहाँ कहीं भी होगी वहाँ रोशनी चमकने जैसे दृश्य खुला या बन्द आँखों से दीखना भर नहीं हो सकता वहाँ उसका अभिप्राय गहरा ही रहता है। आत्मोत्कर्ष की भूमिका स्पष्टतः विवेक युक्त सक्रियता अपनाने पर ही निर्भर है-भौतिक गर्मी या रोशनी से वह महान् प्रयोजन कैसे पूरा हो सकता है?
अंतःत्राटक को ही बिन्दुयोग भी कहते हैं। उसमें प्रकाश दर्शन के साथ-साथ यही धारणा करनी पड़ती है कि प्रकाश रूप परमात्मा का आलोक अंग-प्रत्यंग के कण-कण में -अन्तःकरण के प्रत्येक कक्ष परत में प्रकाशवान होता है। दिव्य चेतना की किरणें काय कलेवर की प्रत्येक लहर पर प्रतिबिम्बित हो रही हैं। विवेक की आभा फूटी पड़ रही है-सतोगुण झिलमिला रहा है-सत्साहस प्रखर प्रचण्ड बन कर सक्रियता की ओर अग्रसर हो रहा है। अज्ञान के आवरण तिरोहित हो रहे हैं। भ्रमाने वाले और डराने वाले दुर्भाव, संकीर्ण विचार अपनी काली चादर समेट कर चलते बने, प्रकाश भरे श्रेय पथ पर चल पड़ने वाले का शौर्य सबल हो उठा, अशुभ चिन्तन के दुर्दिन चले गये। सर्वत्र आनन्द और उल्लास ही आलोकित हो रहा है। ईश्वरीय प्रकाश शरीर में सत्प्रवृत्ति ओर मन की सद्भावना बन कर ज्योतिर्मय हो चला। अँधेरे में भटकने वाली काली निशा का अन्त हो गया, भगवान की दिव्य ज्योति ने सर्वत्र अपना आधिपत्य जमा लिया।
अंतःत्राटक की उच्च भूमिका में सूर्य, चन्द्र, दीपक, बल्ब आदि के प्रकाश को बाह्य क्षेत्र से हटाकर अन्तरंग में स्थापित किया जाता है इसके लिए भ्रूमध्य भाग का आज्ञाचक्र मुख्य माना गया है। इसके उपरान्त इसी ज्योति की स्थापना हृदयचक्र विशुद्धिचक्र से सम्बन्धित है अस्तु साधना के क्रमिक मार्ग पर चलते हुए प्रथम आज्ञाचक्र के पश्चात् हृदयचक्र को त्राटक साधना के अनुसार प्रकाशवान बनाया जाता है।
हृदयचक्र को अन्तरात्मा का स्थान माना गया है और वहीं ईश्वर मिलन एवं आत्म साक्षात्कार का लाभ मिलने की बात कही गई है। गीता का वचन है- “ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति।” यहाँ हृदय स्थान में ही ईश्वर का निवास कहा गया है। इसकी ध्यान प्रक्रिया “हत्पुण्डरीक मध्यस्थाँ प्रातः सूर्य समप्रभाम्” हृदय कमल पर प्रातःकालीन सूर्य के समान परब्रह्म का दिव्य दर्शन करने के रूप में बताई गई है।
हृदयचक्र को हृत पद्य भी कहा गया है। “हृत पद्यकोशे विलसत् तड्गि प्रभम्” वर्णन में उसे विद्युत प्रवाह युक्त कमल की संज्ञा दी गई है। ईसाई धर्म के साधन विज्ञान में इस संस्थान को ‘माइस्ट्रिक रोज-रहस्यमय गुलाब कहा गया है। यही दैनिक स्वर्ण कमल आईचिन है।
मृद्येष आत्मा।
वह आत्मा हृदय में अवस्थित है।
कतम आत्मेति? योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तेर्ज्योतिः पुरुषः।
-वृहदारण्यक
आत्मा कौन है? वह जो विज्ञान ज्योति बन कर हृदय में निवास करता है
कुण्डलिनी योग साधना के अंतर्गत हृदयचक्र में प्रज्वलित अग्नि ज्योति को उसी महाशक्ति का स्वरूप माना गया है। हृदयचक्र में ज्योति रूप बनकर कुण्डलिनी ही परिभाषित होती है।
चन्द्राग्निरविसंयुक्तो आद्या कुण्डलिनी माता।
हृत्प्रदेशे तु सा ज्ञया अंकुराकारसंस्थिता-अग्नि पुराण
चन्द्र और सूर्य की शक्ति से भरी हुई प्रकाशवान कुण्डलिनी शक्ति हृदय प्रदेश में रहती है। उनकी ज्योति अंकुर के आकार की है
योग कालेन न मरुता साग्निता वोधिता सती।
स्फुरिता हृदयाकाशे नागरुपा महोज्ज्वला-त्रिशिख ब्राह्मणोपनिषद्
योगाभ्यास द्वारा यह कुण्डलिनी शक्ति पवन द्वारा जागृत अग्नि के समान हृदयाकाश में नाग रूप में अत्यन्त उज्ज्वल स्फुरित होती है।
कुण्डलिनी जागरण और नादयोग का परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध बताते हुए कहा गया है-
कला कुण्डलिनी चैव नाद शक्ति समन्विता-षटचक्र निरूपण।
कला कुण्डलिनी नाद शक्ति से संयुक्त है।
कुण्डल्येव भवेच्छक्स्तां तु संचालयेत् बुधः।
स्वश्थनादाभ्रु वोर्मध्यं, शक्तिचालन मुच्यते-योग कुण्डलयुपनिषद
बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह उस सोयी हुई अपनी आत्म-शक्ति को चैतन्य करें, गतिशील करें। मूलाधार से स्फूर्ति तरंग उठकर भ्रूमध्य में दिव्य नाद की अनुभूति (श्रवण) कराने लगे, तभी समझना चाहिए कि कुण्डलिनी शक्ति जागृत-संचालित हो गई है।
कुण्डलिनी साधना में लययोग का महत्त्वपूर्ण स्थान है। लय का अर्थ-विलीन है। आत्मसत्ता का परमात्म सत्ता में विलीनीकरण ही परम लक्ष्य है। इसे प्राप्त करने पर आत्मा को -परमात्मा स्तर का बन सकना सम्भव हो जाता है। ‘लय’ के लिए नादयोग की साधना करनी पड़ती है। इसी आधार पर कुण्डलिनी जागरण का उद्देश्य भी पूरा होता है।
भ्री आदिनाथेन सपाद कोटिलय
प्रकाराः कथिता जयन्ति।
नादानुसंधान कमेकमेव मन्माहे
मुख्यतं लयानाम्-हठयोग प्रदीपिका
श्री आदिनाथ के बतलाये हुए सवा करोड़ ‘लय’ के प्रकार सर्वोत्कर्ष से विद्यमान् हैं, हम उन सब लयों में से नादानुसन्धान को ही मुख्य मानते हैं।
लय नादे यदा चित्तं रमते योगिनो भृशम्।
विस्मृत्य सकले वाह्यं नादेन सह शाम्पति-शिव सं0
अर्थ-जब योगी का चित्त उस नाद में निरन्तर रमण करेगा तब सब प्रकार के विषय से स्मरण रहित होकर चित्त समाधि में ‘लय’ हो जायेगा।
एतदभ्यासयोगेन जित्वा सम्यक गुणान् बहून।
सर्वारम्भपरित्यागी चिदाकाशे विलीयते-शिव सं0
अर्थ-इस प्रकार अभ्यास द्वारा सर्व गुणों को जीत कर और सब कार्यों के आरम्भ को त्याग कर योगी का चित्त आनन्दपूर्वक चैतन्य स्वरूप हृदयाकाश में ‘लय’ हो जाता है।
इन्द्रियाणां मनोनाथो मनोनाथस्तु मारुतः।
मारुतस्य लयो नाथः सलयो नादमाश्रितः-हठयोग प्रदीपिका
अर्थ-मन ही इन्द्रियाँ का स्वामी है, क्योंकि मन का संयोग न होने से कोई भी इन्द्रिय काम करने में समर्थ नहीं रहती। फिर मन, प्राण वायु के अधीन है, अतः वायु वशीभूत होते ही मन का ‘लय’ हो जाता है। मन लय होकर नाद में अवस्थान करता है।
नासनं सिद्धसदृशं न कुम्भसदृशं बलम्।
न खेचरीसमा मुद्रा न नादसदृशो लयः-शिव संहिता 5।45
सिद्धान्त के समान कोई आसन नहीं, कुम्भक के समान कोई बल नहीं, खेचरी के समान मुद्रा नहीं और नाद के समान लय नहीं।
भगवान् शंकराचार्य ने भी “योग तारावली” में नाद-तत्त्व की प्रशंसा की है-
“सदा शिवोक्तानि सपादलक्ष-लयावधामानि वसन्ति लोके।
नादानुसन्धान समाधिमेकं
मन्यामहे मान्वरमं लयानाम्॥
नादानुसन्धान नमोऽस्तु तुभ्यं
लामन्महे तत्वपदं लयानाम।
भवत्प्रसादात् पवनेन साधं
विलीयते विष्णुपदे मनों में॥
भगवान शिव ने मन के लय के लिए सवा लक्ष साधनों का निर्देश किया है, परन्तु उन सब में नादानुसन्धान सुलभ और श्रेष्ठ है। हे नादानुसन्धान! आपको नमस्कार करता हूँ। आप परम पद में स्थिति लाभ कराते हैं । आपकी कृपा से मेरे प्राण और मन दोनों विष्णु के परम पद में लीन हो जायेंगे।
न नादेन विना ज्ञानं न नादेन विना शिवः।
नादरुपं पर ज्योतिर्नाद रुपी परो हरिः ॥
-योग तरंगिनी
नाद के बिना ज्ञान नहीं होता-नाद के बिना शिव नहीं मिलते, नाद के बिना ज्योति का दर्शन सम्भव नहीं, नाद ही परब्रह्म है।
योग साधनों में नादयोग की गरिमा अत्यधिक है। उसकी विधि सरलता एवं श्रेष्ठ सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली प्रतिक्रिया को देखते हुए नादयोग को जो प्रमुखता मिली है वह उचित ही है-
यत्किचिन्नादरुपेण श्रूयते शक्तिरेव सा।
यस्तत्त्वान्तो निराकारः स एव परमेश्वरः-हठयोग प्र0
जो कुछ नाद रूप से सुना जाता है वह शक्ति ही है और जिसमें तत्त्वों का लय होता है वह निराकार परमेश्वर है।
अशक्य तत्वबोधानां मूढ़ानामपि संमतम्।
प्रोक्तं गोरक्षनाथेन नादोपासन मुच्यते-हठयोग प्र0
अर्थ-जिनको तत्त्वज्ञान नहीं हो सकता ऐसे मूर्ख लोगों के लिए भी उपयोगी, गोरखनाथ जी द्वारा वर्णित नाद की उपासना कही जा रही है। यह नादोपासना शास्त्रों के जानने वाले एवं मूढ़ दोनों लोगों के लिए उपयोगी हैं।
“सर्वचिन्तां परित्यज्य सावधानेन चेतसा।
नाद एवानुसन्धेयो योगसाम्राज्यमिच्छता-बाराहोपनिषद
सब चिन्ताएँ छोड़कर-मन को स्थिर करना नाद योग की साधना में लगना चाहिए। यह योग साधनाओं का सम्राट है।
हठयोग प्रदीपिका में नादयोग का महत्त्व एवं प्रतिफल बताते हुए उसे साधनाओं में अत्यन्त ऊँचा स्थान दिया है। निम्न श्लोक उसी पृष्ठों के लिए गये है-
नादश्रवणतः क्षिप्रमन्तरंग भुजडंम्।
विस्मृत्य सर्वमेकाग्रः कुमचिन्न हि धावति।
यह मन रूपी सर्प नाद को श्रवण करने से शीघ्र ही सम्पूर्ण संसार को भूलकर एकाग्र होकर फिर विषयों की तरफ नहीं जाता है।
बद्धं विमुक्त चाज्चल्यं नादगन्धक जारणात्।
मनः पारदभाप्नोति निरालम्बाख्यखेऽटनम्॥
नाद रूपी गन्धक द्वारा भस्म किये जाने से बँधा हुआ और चंचलता है विमुक्त हुआ मन रूपी पारा निराश्रय होने पर ब्रह्मरूपी आकाश में भ्रमण करता है।
सदा नादानुसन्धानात्क्षीयन्ते पापसंचयाः।
निरंजने विलीयते निश्चितं चित्तमारुतौ॥
अर्थ- सदा नाद के अनुसन्धान करने से वंचित पापों के समूह भी नष्ट हो जाते हैं और उसके अनन्तर निर्गुण एवं चैतन्य ब्रह्म में मन व प्राण दोनों निश्चय ही विलीन हो जाते हैं।
नादोऽन्तरंगसांगबन्धने वागुरायते।
अन्तरडंकुरडंस्य वधे व्याधायतेऽपि च॥
जैसे व्याध मृग बन्धन के जाल में मृग को हठता है । इसी प्रकार अपने में आसक्त हुए मन को नाद भी हतता है अर्थात् मन के जो संकल्प वैकल्पिक धर्म हैं वे नष्ट हो जाते हैं।
काष्ठे प्रवर्तितो वह्निः काष्ठेन सह शाम्यति ।
नादे प्रवर्तितं चित्तं नादेन सह लीयते॥
काष्ठ में प्रवेश हुई अग्नि काठ को जलाकर ही शान्त होती है। इसी प्रकार नाद में प्रवृत्त हुआ अन्तःकरण नाद में ही विलीन हो जाता है।
अभ्यस्यामानो नादोऽयं बाह्यमातृणुते ध्वनिम्।
पक्षाद्विपक्षेपमखिलं जित्वा योगी सुखी भर्वेत्॥
अर्थ- अभ्यास किया गया यह नाद बाहर की ध्वनि को भी ढक देता है, इस प्रकार एक पक्ष में ही योगी चित्त की समस्त चंचलता को जीत कर सुखी हो जाता है।
चित्तानन्द तदा जित्वा सहजानन्द सम्भवः।
दोष दुःख जरा व्याधि क्षुधा निद्रा विवर्जितः॥
अर्थ-तब नाद के वशीभूत अन्तःकरण की वृत्ति से प्राप्त सुख को जीतकर स्वाभाविक आत्मा के सुख का आविर्भाव होता है। बात, पित्त, कफ़, रूप, दोष, दुःख, वृद्धावस्था, ज्वरादिक व्याधि, भूख, प्यास, निद्रा इन सबसे रहित वह आत्म-सुखी हो जाता है।
दिव्यदेहश्च तेजस्वी दिव्यगंधस्त्व रोगवान्।
सम्पूर्णहृदयः शून्य आरम्भो योगवान्भवेत्॥
हृदयाकाश में नाद के आरम्भ होने पर प्राण वायु से पूर्ण हृदय वाला योगी रूप, लावण्य आदि को से युक्त दिव्य देह वाला हो जाता है। वह प्रतापी हो जाता है और उसके शरीर से दिव्य गन्ध प्रकट हुआ करती है तथा वह योगी रोगों से भी रहित हो जाता है।
अन्तरंगस्य यमिनो वाजिनः परिधायते।
नादोपास्तिरतो नित्यमवधार्या हि योगिना॥
अर्थ-नादयोगी के मन रूपी घोड़े के लिए अश्वशाला के दरवाजे के अंगला के समान है। इसलिए योगी को प्रतिदिन नाद की उपासना करनी चाहिए।
बुद्धं तु नादबन्धेन मनः सत्यक्त चापलम्।
प्रयाति सुतरां स्थैयं छिन्नपक्षः खगोयथा॥
अर्थ-नाद रूपी बन्धन से बँधा हुआ जिसने चंचलता का त्याग कर दिया है, ऐसा मन जिस पक्षी के पंख कट गये हों उस पक्षी के समान अत्यन्त स्थिर होकर रहता है।
इन्द्रियाणां मनोनायो मनोनाथस्तु मारुतः।
मारुतस्य लयोनाथः स लयोनादमाश्रितः॥
इन्द्रियों का स्वामी मन। मन का स्वामी प्राण। प्राण का स्वामी लय और यह लय-नाद के आश्रित हैं
अथं नादानुसंधानं प्रवक्ष्यामि यथाक्रमम्।
यस्यानुष्ठानतो योगी परं ब्रह्माघिगच्छति-योग रसायनम्
अब नादानुसन्धान का यथाक्रम वर्णन करते हैं, जिसके अनुष्ठान से योगी परं ब्रह्म को प्राप्त होता है।
नादश्रवणतो योऽसावानंदो योगिनो भवेत्।
शक्यते स गिरा वक्तुँ मया नात्र कथंचन्-योग रसायनम्
नाद-श्रवण से यह जो आनन्द योगी को होता है, उसका वाणी से वर्णन सम्भव नहीं।
अथवा नादयोगेन शरीरे कृशतां गते।
सर्वागेभ्यो भवेत्तूर्ण प्राणस्याकर्षणं ध्रुवम्।
तत्रैव स्थिरताँ नीत्वा समाधिस्यो भवेन्नरः-योग रसायनम्
अथवा नादयोग से शरीर कृश हो जाता है और प्राणाकर्षण सहज होता है। ध्यान से इस प्राण को ऊपर से जाकर ब्रह्मरन्ध्र में प्रविष्ट कर वहीं स्थिर करना चाहिए। इससे व्यक्ति समाधिस्थ हो जाता है।
उक्तात्ममानतः पूर्व पश्चात् च विविधः कपे।
अभिव्यजन्त एतस्य नादास्तत्सिद्धि सूचकाः॥
अनाहृतमनुच्चयां शब्दब्रह्म परं शिवम्।
ब्रह्मरन्ध्रंगतेवायौ नादश्चोत्पद्यतेऽनध।
शंख ध्वनि निभश्चादौ मध्ये मेघध्वनिर्यथा॥
पवने व्योम सम्प्राप्ते ध्वनिरुत्पद्यते महान्।
घण्टादीनां प्रवाद्यानां ततः सिद्धिरदूरतः-महायोग विज्ञान
जब अन्तर में ज्योति स्वरूप आत्मा का प्रकाश जागता है तब साधक को कई प्रकार के नाद सुनाई पड़ते हैं। इसमें से एक व्यक्त होते हैं, दूसरे अव्यक्त। जिन्हें किसी बाहर के शब्द से उपमा न दी जा सके, उन्हें अव्यक्त कहते हैं यह अन्तर में सुनाई पड़ते हैं और उनकी अनुभूति मात्र होती है। जो घण्टा आदि की तरह कर्मेन्द्रियों द्वारा अनुभव में आवें उन्हें व्यक्त कहते हैं। अव्यक्त ध्वनियों को अनाहत अथवा शब्दब्रह्म भी कहा जाता है।
नादयोग के अभ्यास से मनोनिग्रह जैसा कठिन कार्य सरल हो जाता है। मन के एकाग्र होने पर योगाभ्यास की सफलता निर्भर है। चित्त की चंचलता ही साधना की प्रगति में प्रमुख बाधा है। नादानुसन्धान से यह बाधा सरलतापूर्वक हल हो जाती है।
नाद मेवातुसन्दध्यान्नादे चितं विलीयते।
नादासक्तं सदा चितं विषयं नहि कांक्षति-नाद विन्दोपनिषद
नादानुसन्धान से चित्त शान्त हो जाता है । उस साधना में लगा हुआ चित्त विषयों की आकांक्षा नहीं करता।
मकरन्दं पिबन्भृगो गन्धान् नापेक्षते यथा।
नादासक्तं सदा चित्तं विषयं न हि काड्क्षति।
बद्धः सुनादगन्धेन सद्यः संत्यक्त चापलम्।
नादग्रहणतश्रित्तमन्तरंग भुजगम्॥
विस्मृत्य विश्व मेकाग्रं कुत्रचिन्न हि धावति।
मनोन्मत्तगजेन्द्रस्य विषयोद्यानचारिणः॥
नियामनसमथोंऽयं निनादो निशिताडंकुशः-नाद विन्दोपनिषद
भ्रमर जिस तरह फूलों का रस तो लेता है, परन्तु पुष्पों की गन्ध की अपेक्षा नहीं करता। उसी तरह नाद से रुचि लेने वाला चित्त विषय-वासना के दुर्गन्ध की इच्छा नहीं रखता। जिस तरह सर्प नाद को सुनकर मस्त हो जाता है, उसी प्रकार चित्त नाद में आसक्त हो जाने पर सभी प्रकार की चपलताएँ भूल जाता है। संसार की चपलताएँ भूलने पर उसमें एकाग्रता आन लगती है और वह इधर-उधर विषयों की ओर नहीं भागता। विषय-वासनाओं के वन में घूमने वाला मन रूपी हाथी नाद के अभ्यास रूपी तेज अंकुश से ही काबू में आ पाता है। यदि हम मन को हिरन और तरंग की संज्ञा दे तो यह नाद उस हिरन को फाँसने के लिए जाल का और तरंग को रोकने के लिए तट का काम देता है।
नादयोग का अभ्यास कैसे करना चाहिए? इसका उत्तर देते हुए-शिव संहिता और हठयोग प्रदीपिका में दोनों कान, दोनों नेत्र एवं दोनों नासिका छिद्र बन्द करने की विधि बताई गई है। ऐसी दशा में साँस मुख से ही लिया जा सकता है। कहा गया है-
अंगुष्ठाभ्यामुभे श्रोत्रे तर्जनीभ्यां द्विलोचने।
नासारन्ध्रे च मध्याभ्याम नामाभ्याँ सुखं दृढ़म॥
निरुध्य मारुतं योगी यदैव कुरुते भृशम।
तदा तत्क्षणमात्मानं ज्योति रुपं स पश्यति-शिव सं0
अर्थ-दोनों हस्त अँगूठों से दोनों कर्ण बन्द करें और दोनों तर्जनी से, दोनों नेत्रों को दोनों मध्यमा अंगुलियों से, दोनों नासारंध्र को बन्द करें और दोनों अनामिका अंगुली और कनिष्ठिका से मुख को बन्द करें। यदि इस प्रकार योगी वायु को निरोध करके इसका बारम्बार अभ्यास करे तो आत्मा ज्योति स्वरूप न हृदयाकाश में भान होता है।
कर्णेपिधाय हस्ताभ्यां यं श्रृणोति ध्वनि मुनिः।
तत्र चित्तं स्थिरीकुर्याद्यावत्स्थिरं पदं व्रजेत्-हठयोग
अर्थ- मननशील योगी दोनों हाथों से दोनों कानों को बन्द कर जिस ध्वनि को सुनता है, जब तक स्थिर पद को प्राप्त न हो जाय, तब तक उस ध्वनि में चित्त को स्थिर करें।
श्रवणपुटनयन युगल घ्राण मुखानां निरोधनं कार्यम्।
शुद्ध सुषुम्नासरणौ स्फुटममलः श्रूयते नादः-हठयोग
अर्थ- दोनों कान, आँख, नासिका और मुख इन सबका निरोध करना चाहिए, तब शुद्ध सुषुम्ना नाड़ी के मार्ग के शुद्ध नाद प्रकट रूप से सुनाई पड़ने लगता है।
‘योग रसायन’ में सभी छेद बन्द करने की आवश्यकता नहीं समझी गई। मात्र कान के छेद बन्द करने को ही कहा गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि यदि साधक चाहे तो छेदों को बीच-बीच में खोलता भी रह सकता है। लगातार बन्द रखने की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार एक दक्षिण कान से ही नाद श्रवण का भी परामर्श दिया गया है।
पद्यासनं समास्याय स्वस्तिकं वा यथासुखम्।
कर्णरंध्रयुगं पश्चादगलिभ्याँ निरोधयेत्-योग रसायनम्
पद्मासन या स्वस्तिक आसन में सुखपूर्वक बैठकर दोनों कर्णरन्ध्रों को अंगुलियों से बन्द कर ले।
कर्णयोस्त्वेकतानेन रोधनं नैव कारयेत्।
त्यवक्वात्यक्त्वांगुर्लिमध्येनादाभ्यासं समाचरेत-योग रसायन्
दोनों कानों को लगातार बन्द नहीं किये रहना चाहिए। अंगुली बीच-बीच में छोड़ते रहकर नाद का अभ्यास करना चाहिए।
निमील्य नयने चित्तं कृत्वैकाग्रमनन्यधीः।
श्रृणुभाद्देक्षिणे कर्णे नादमंतर्गत शुभम्-योग रसायनम्
नयन निमीलित कर चित्त को एकाग्र कर अनन्य बुद्धि से दाहिने कान में शुभ नाद सुनना चाहिए।
आहत ध्वनियाँ वे हैं जो किन्हीं पदार्थों या प्राणियों की हलचलों के कारण उत्पन्न होती है। अनाहत वे हैं जो प्रकृति प्रवाह एवं सूक्ष्म जगत से सम्बन्धित है। इन्हें सुनने से परा और अपरा प्रकृति के संकेत सन्देशों को सुनने, समझने की क्षमता उत्पन्न होती है। नाद को ब्रह्मवाणी, आकाश वाणी भी कहा गया है इनको पकड़ने, पहचानने का अभ्यास होने पर दिव्य लोकों से सम्पर्क साधना एवं आदान-प्रदान करना सम्भव हो जाता है। वे ध्वनियाँ किस प्रकार की होती है इसका उल्लेख इस प्रकार है-
ब्रह्मरन्ध्रं चते वायौ नादश्चोत्पद्यतेऽनघ।
शंखध्वनिनिभश्चादौ मध्ये मेघध्वनिर्यथा॥
शिरोमध्यगते वायौ गिरिप्रस्रवण यथा।
पश्चात्प्रीती महाप्राज्ञः साक्षादात्मोन्मुखो भवेत्-जाबाल दर्शनोपनिषद्
जब ब्रह्मरन्ध्र में प्राणवायु का प्रवेश हो जाता है, तब प्रथम शंख ध्वनि के समान नाद सुनाई पड़ता है। फिर मेघ ध्वनि की तरह मन्द, गम्भीर नाद सुन पड़ता है। जब यह प्राणवायु शिर के मध्य में स्थित होती है, तब ऐसा लगता है मानो पर्वत से कोई झरना कल-कल नाद करता स्रवित हो रहा है। तदुपरान्त अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव होता है और साधक सूक्ष्म आत्म-तत्त्व की ओर उन्मुख हो जाता है।
शिव पुराण में ॐ कार के अतिरिक्त नौ ध्वनियाँ इस प्रकार गिनाई गई हैं।
घोषं, कास्यं तथा श्रृंग, घंटा, वीणादिवंशजम्।
दुन्दुर्भि, शंख शब्दं तु नवमं मेघगर्जितम्-शिव पुराण
अर्थात्-(1) समुद्र गर्जन जैसा घोष (2) काँसे की थाली पर चोट लगाने जैसी झनझनाहट (3) शृंग अर्थात् तुरही बजने जैसी आवाज (4) घण्टे बजने जैसी (5) वीणा बजने जैसी (6) वंशज वंशी जैसी (7) दुन्दुभि नगाड़े बजने के समान (8) शंख ध्वनि (9) मेघ गर्जन जैसी नौ ध्वनियाँ नादयोग में सुनी जाती है।
कहीं-कहीं पायल बजने, बुलबुल की चहचहाहट जैसी मधुर ध्वनियों का भी वर्णन है यह वीणावादन से मिलती-जुलती हैं । सिंह गर्जन का उल्लेख मेघ गर्जन जैसा है।
मत्तभृंग वेणु वीणा सदृशः प्रथमो ध्वनिः।
एवमभ्यासतः पश्चात् संसार ध्वान्तनाशनम्॥
घण्टा नादसमः पश्चात् ध्वनिर्मेघरवोपमः।
ध्वनौ तस्मिन्मनो दत्वा यदा तिष्ठति निर्भरः।
तदा संयाते तस्य लयस्य मम बल्लभे-शिव सं0
अर्थ- योगाभ्यास द्वारा प्रथम मत्त भ्रमर की नाई शब्द वेणु और वाणी के समान शब्द उत्पन्न होगा। इस प्रकार योगाभ्यास संसारतम नाशक से फिर घण्टा, नाद समान शब्द होगा, फिर मेघ गर्जना के समान ध्वनि होगी। इस ध्वनि में यदि मन निश्चल स्थित हो जाय, तब मोक्ष का दाता लय उत्पन्न होगा।
घंटानादसमः पूर्व ततः शंखसमो ध्वनिः।
वीणारवसमः पश्चात् तालनादोपमस्ततः-योग रसायनम्
पहले घण्टा नाद-सी ध्वनि आती है, फिर शंख के समान, फिर वीणा ध्वनि के समान और तब तालमय ध्वनि सुनाई पड़ती है।
वंशीशब्दनिभश्चाथो मृदंगसदृशो ध्वनिः
भेरीरवसमः पश्चान्मेघगर्जनसनिभः-योग रसायनम्
फिर वंशी ध्वनि सी, तदुपरान्त मृदंग सदृश इसके आगे भेरी रव जैसा और तत्पश्चात् मेघ गर्जन के समान नाद सुनाई पड़ता है।
श्रयूते प्रथमाम्या से ध्वनिर्नादस्य मिश्रितः।
ततोम्यासे स्थिरी भूते श्रूयते तु पृथक-पृथक्-योग रसायनम् 250
प्रथमतः अभ्यास के समय ध्वनि-नाद को मिश्रित रूप में ही सुनना चाहिए। जब अभ्यास दृढ़ हो जाय, तो पृथक्-पृथक् सुनना चाहिए।
नाद श्रवण की पूर्णता अनाहत ध्वनि की अनुभूति में मानी गई है। साधक अन्य दिव्य ध्वनियों को सुनते-सुनते अन्त में अनाहत लक्ष्य तक जा पहुँचता है।
प्राणे मूर्धनि संप्राप्ते नादध्वनिरनुत्तमः।
श्रूयते योगिनो वके संस्रवेदमृतं तथा-योग रसायनम्
प्राण के मस्तक में पहुँचने पर योगी को सुन्दर अनाहत नाद की ध्वनि सुनाई पड़ती है।
ध्यान बिन्दूपनिषद् में नादयोग के सम्बन्ध में लिखा है-
अनाहतं तु यच्छब्दं तस्य शब्दस्य यत्परम्।
तत्परं विन्दते यस्तु स योगी छिन्नसशयः॥
अनाहत शब्द-उससे परे और उससे परे जो है उसे प्राप्त करके योगी समस्त संशयों से मुक्त हो जाता है।
कानों से सुनी जाने वाली ध्वनियाँ इतनी उथली और हलकी होती हैं कि उनका किसी प्राणी या पदार्थ पर जानकारी देने के अतिरिक्त और कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता है। यों श्रवण ध्वनियों के साथ जुड़े हुए घटना क्रम एवं घुले हुए भाव प्रवाह अपना
महत्त्व रखते हैं और यत्किंचित् प्रभाव भी डालते हैं, पर वह सब मिला कर भी श्रवणातीत ध्वनियों की क्षमता के समतुल्य नहीं हो सकता । प्रकृति का अनुग्रह है कि वे सूक्ष्म ध्वनियाँ हमारे कानों की जीव सत्ता को बिना प्रभावित किये ही अन्तरिक्ष में उड़ती रहती है। यदि वे सुनाई देने लगतीं तो कोलाहल से कान बहरे हो जाते। यदि वे प्रभावित करने लगतीं तो उनके प्रहार से शरीर सत्ता का अस्तित्व ही संदिग्ध बन जाता।
कानों की ग्रहण शक्ति बहुत ही भौंड़ी और थोड़ी है। हमारे कान मात्र एक सेकेण्ड में 20 से लेकर 20 हजार तक कम्पन उत्पन्न करने वाली ध्वनियों को सुन सकते हैं इससे न्यूनाधिक कम्पनों की ध्वनियाँ पकड़ में नहीं आतीं श्रवणातीत अति स्वन ध्वनियाँ 10 लाख से लेकर 1000 करोड़ कम्पनों तक की तरंगें हर सेकेण्ड उत्पन्न करने वाली पाई गई हैं इनकी सामर्थ्य उनकी सूक्ष्मता के आधार पर अधिकाधिक होती चली जाती है॥
श्रवणातीत ध्वनियों का उपयोग जब से वैज्ञानिकों ने जाना है तब से वे उनके अत्यन्त प्रभावशाली उपयोग करने लगे हैं। शल्य चिकित्सा, कीटाणु संहार, ऋतु परिवर्तन, मोटे धातु खण्डों को गला देना, जैसे प्रचण्ड कार्य उनसे लिये जा रहे हैं। कल कारखानों के लिए तो उन्हें बिजली एवं अणु शक्ति की तरह काम में लाया जा रहा है।
वैज्ञानिक सोचते हैं कि भविष्य में मानवी आवश्यकता की अभीष्ट ऊर्जा, श्रवणमात्र ध्वनि तरंगों से उपलब्ध की जा सकेगी। तब मनुष्य को परम शक्तिशाली कहला सकने का अवसर मिल जायेगा।
धरती पर हो रही हलचलों से जो ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं उनके अतिरिक्त ऐसी तरंगें भी पाई गई हैं, जिनका जागतिक हलचलों से सीधा सम्बन्ध नहीं है। उनका स्तर, स्वरूप एवं प्रभाव अलौकिक है। विज्ञानी सोचते हैं कि यह विलक्षण अन्तर्ग्रही ध्वनि प्रवाह ब्रह्माण्ड के किसी अज्ञात केन्द्र से धरती पर आता है और उसी की सामर्थ्य से अपने भूलोक के विभिन्न पदार्थों एवं क्रिया-कलापों को सूत्र संचालन होता है।
शब्द की महत्ता को अध्यात्म शास्त्र आरम्भ से ही प्रतिपादित करते रहे हैं। नादयोग का पूरा ढाँचा इसी निमित्त खड़ा किया गया है कि सूक्ष्म शरीर के संयंत्र को विकसित करके दिव्य ध्वनियों को पकड़ने , समझने में सफलता प्राप्त की जा सके। इस आधार पर प्रकृति गत उन भौतिक हलचलों को जाना जा सकता है । जो सामान्य मनुष्य के ज्ञान क्षेत्र से ऊपर की है। इसके अतिरिक्त परा प्रकृति से सम्बन्धित सूक्ष्म जगत की वे सचेतन हलचलें हैं जो ध्वनि रूप में परिभ्रमण करती हैं और समस्त प्राणि जगत को प्रभावित करती है॥ नादयोग के अभ्यास से आत्म चेतना को परिष्कृत और सूक्ष्म शरीर की कर्णेन्द्रिय तन्मात्रा शब्द को परिष्कृत किया जाता है। इस आधार पर अदृश्य एवं अविज्ञात से सम्पर्क साधा जाता है और अतीन्द्रिय ज्ञान प्राप्त करने का लाभ उठाया जाता है।
नादयोग के द्वारा सुनी जाने वाली यह दिव्य ध्वनियाँ अनन्त अन्तरिक्ष में बिना किसी प्रकृतिगत हलचल का आश्रय लिए स्वयमेव विनिसृत होती रहती है। ये चेतन हैं दिव्य हैं, अलौकिक, अभौतिक और अतीन्द्रिय है। इसलिए उन्हें देववाणी भी कहते हैं। उन्हें ध्यान योग के माध्यम से हमारा चेतन अन्तःकरण सुन सकता है। श्रवण का सम्बन्ध कर्णेन्द्रिय से हैं, अस्तु सूक्ष्म एवं चेतन श्रवण भी शब्द संस्थान के इसी प्रतिनिधि केन्द्र का सहारा लेकर सुना जाता है।
नादयोग के कान को सूक्ष्म चेतना की दिव्य ध्वनियाँ सुनाई पड़ती है। कई बार ये अति मन्द होती है। कई बार कुछ प्रखर। इनमें प्रायः कृष्ण की वंशी जैसी-सर्प पकड़ने में काम आने वाले बीन जैसी ध्वनियाँ रहती हैं। रास लीला में कृष्ण का वंशी वादन और गोपियों का ताल नृत्य आत्मा और परमात्मा के बीच चलने वाला वेणुनाद ही समझा जा सकता है। कुमार्गगामी-भौतिक तृष्णा और वासना का विष पिण्ड मन -एक प्रकार से विषधर सर्प है। उसे भी आनन्द उल्लास की , दिव्य प्रेरणाओं के अनुगमन के रूप में लहराने का अवसर इस बीन की ध्वनि सुनने से मिल सकता है। सपेरा विषधर सर्पों को पकड़ने के लिए बीन बजाता है। जब वह लहराने लगता है तो उसे चुपके से पकड़कर पिटारे में बन्द कर लेता है। मन के निग्रह में -प्राणों के निरोध में-नादयोग का ध्वनि प्रवाह बहुत सफल रहता है।
वंशी और बीन के अतिरिक्त और भी कई प्रकार की ध्वनियाँ नादयोग के साधकों को सुनाई पड़ती है। इनकी संगति इस प्रकार बिठाई जा सकती है-भगवती सरस्वती आनी वीणा झंकृत करते हुए ऋतम्भरा प्रज्ञा और अनासक्त भूमा के मृदुल मनोरम तारों को झनझना रही है और अपनी अन्तः चेतना में वही दिव्य तत्त्व उभर रहे है। भगवान शंकर का डमरू बज रहा है। उससे प्रलय के-मरण के संकेत आ रहे हैं और सुलझाया जा रहा है कि इस नश्वर काया का अन्त करने वाला ताण्डव किसी भी क्षण सम्मुख आ सकता है इसलिए प्रमोद से न उलझा जाय, लक्ष्य की प्राप्ति में आलस्य एवं अपेक्षा भाव न बरता जाय। माया मोह छोड़कर यथार्थता को समझा जाय। शंखनाद की ध्वनि को महाभारत के पाँच जन्य का महाकाल के भैरवनाद का- उद्घोषक माना जाय और अनुभव किया जाय कि अब महाप्रयाण का ऐसा समय आ पहुँचा जिसमें आनाकानी या सोच-विचार करने की गुँजाइश नहीं है। युग के कर्तव्य की पुकार गूँज रही है और उभर रही है कि अविलम्ब जीवनोद्देश्य की दिशा में कदम बढ़ाया जाय। बिजली की कड़क-दावानल की धू-धू-बादलों का गर्जन- समुद्र का तर्जन इस संकेत को लेकर आते हैं कि अपनी गतिविधियों का कायाकल्प होना ही चाहिए। पशु स्तर को निरस्त करके दिव्य स्तर अपनाया ही हो जाना चाहिए और उस उलट-पुलट में जो उफान-तूफान प्रस्तुत होते हैं उनका सामना किया ही जाना चाहिए। कभी झिल्ली की झंकार कभी चिड़ियों की चहचहाट के शब्द सुनाई पड़ते हैं इन्हें छोटे जीवों द्वारा मानवी प्रमाद को हिला देने वाला उद्बोधन समझा जाय। जब इतने छोटे जीव अपने नियत-नियमित आनन्द बिखेरने वाले क्रिया-कलाप में निरत रहते हैं तो मनुष्य के लिए यह कैसे शोभनीय होगा कि वह जीवनोद्देश्य के साथ जुड़े हुए अपने महान् कर्तव्य का परित्याग करके मात्र, पेट और प्रजनन के लिए जीवन सम्पदा को कौड़ी मोल गँवा देने की मूर्खता अपनाये?
नादयोग में कितने प्रकार की ध्वनियाँ सुनाई पड़ सकती हैं इनकी कोई सीमा नहीं प्रायः परिचित ध्वनियाँ ही सुनाई पड़ती है सो सूक्ष्मदर्शी साधक उनके पीछे उच्च संकेतों की विवेक बुद्धि के द्वारा सहज संगति बिठा सकते हैं। कोयल की कूक-मुर्गे की बाग-मयूर की पीक, सिंह की दहाड़, हाथी की चिंघाड़, शब्द सुनाई पड़ें तो उनमें इन प्राणियों को उच्चारण समय की मनःस्थिति की कल्पना करते हुए अपने लिए प्रेरक संकेतों का ताल-मेल बिठाया जा सकता है । कई बार रुदन, क्रन्दन, हर्षोल्लास, अट्टहास, उच्छ्वास जैसी ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं उसे अपनी अन्तरात्मा का सन्तोष-असन्तोष समझा जा सकता है। कुमार्गगामी गतिविधियों से असन्तोष और सत्प्रवृत्तियों का सन्तोष स्पष्ट हैं। आत्म निरीक्षण करते हुए आत्मा को समय-समय पर अपनी भली बुरी गतिविधियों से सन्तोष-असन्तोष प्रकट करने के अवसर आते हैं इन्हीं की प्रतिध्वनि, हर्ष क्षोभ व्यक्त करने वाले स्वरों में सुनाई पड़ती रहती है। किस ध्वनि के पीछे क्या संकेत, सन्देश, तथ्य हो सकता है उसे नादयोगी की सहज बुद्धि ही समयानुसार निर्णय करती चलती हैं। उसको विस्तृत चर्चा यहाँ अभीष्ट नहीं। तथ्य इतना भर है कि इन दिव्य ध्वनियों में किसी न किसी स्तर की उच्च प्रेरणाएँ होती है और उन सब का प्रयोजन एक ही रहता है कि हमें आत्मा की स्थिति से ऊपर उठकर उच्च भूमिका के लिए द्रुतगति से अग्रसर होना चाहिए-साहस पूर्ण कदम बढ़ाना चाहिए।
कानों के छिद्र बन्द करके अन्तर्गत की दिव्य ध्वनियाँ सुनने की साधना जब परिपक्व होने लगती है तो भावोत्कर्ष क्षेत्र से आगे बढ़ कर सुविस्तृत अन्तरिक्ष में संव्याप्त हलचलों को समझने का अवसर मिलता है। इस संसार को प्रभावित करने वाली अगणित ब्रह्म प्रेरणाओं के प्रवाह बहते रहते हैं । उनके स्पन्दन हमारी कर्णेन्द्रिय से शब्दरूप में टकराते हैं। उन्हें पहचानने और पकड़ने की सफलता, साधना में परिपक्वता आने के साथ-साथ सहज ही बढ़ने लगती है और यह प्रतीत होने लगता है कि सूक्ष्म जगत में क्या हो रहा है और क्या होने जा रहा है? किसी व्यक्ति विशेष क्षेत्र, देश अथवा लोक के सम्बन्ध में इस प्रकार की सही स्थिति का पूर्वाभास होने लगता है। अविज्ञात को ज्ञात स्तर पर उतारने में नादयोग की साधना बहुत ही उपयोगी एवं प्रभावशाली होती है।
नाद संकेत के सूत्र है जिनके सहारे परमात्मा के विभिन्न शक्ति स्रोतों के साथ हमारे आदान-प्रदान सम्भव हो सकते हैं। टेलीग्राम, टेलीफोन, वायरलैस, टेलीविजन पद्धतियों का आश्रय लेकर हम दूरवर्ती व्यक्तियों के साथ अनुभूतियों का आदान-प्रदान करते हैं
योगशास्त्र के साधना विधानों में एक महत्त्वपूर्ण धारा नादयोग की भी है। कानों को उँगलियों से, शीशी वाले कार्क से, कपड़े की गोली से इस प्रकार बन्द किया जाता है कि बाहर की वायु या स्थूल आवाजें भीतर प्रवेश न कर सकें। इस स्थिति में कानों को बाहरी ध्वनि आधार से विलग किया जाता है और ध्यान को एकाग्र करके यह प्रयत्न किया जाता है कि अतीन्द्रिय जगत से आने वाले शब्द प्रवाह को अन्तः चेतना द्वारा सुना जा सके। यों इसमें भी कर्णेन्द्रिय का उसकी छनद तन्मात्रा का योगदान तो रहता है पर वह श्रवण है, वस्तुतः उच्चस्तरीय चेतन जगत की ध्वनि लहरी सुनने के लिए, कर्णेन्द्रिय और अन्तःकरण का इसे संयुक्त प्रयास भी कह सकते हैं ।
सूक्ष्म और कारण शरीरों में सन्निहित श्रवण शक्ति को यदि विकसित किया जा सके तो अंतरिक्ष में निरन्तर प्रवाहित होने वाली उन ध्वनियों को भी सुना जा सकता है जो चमड़े से बने कानों की पकड़ से बाहर है। सूक्ष्म जगत की हलचलों का आभास इन ध्वनियों के आधार पर हो सकता है।
कराहने की आवाज सुन कर किसी के शोकग्रस्त होने, दर्द से छटपटाने, सताये जाने आदि की स्थिति का-दूरी का-नर-नारी का-बाल-वृद्ध का अनुमान लगा लिया जाता है उसी प्रकार कर्णेन्द्रिय की पकड़ से बाहर की सूक्ष्म ध्वनियों को यदि सुना जा सके तो विश्व में विभिन्न स्थानों पर विभिन्न स्तर की घटित होने वाली घटनाओं का विवरण जाना जा सकता है। सम्भावनाओं का पता लगाया जा सकता है, तथा लोक लोकान्तरों में हो रही हलचलों को समझा जा सकता है। सर्वसाधारण के लिए अविज्ञात जानकारियाँ सूक्ष्म शरीर की कर्णेन्द्रिय के विकास द्वारा नितान्त सम्भव है।
न्यूजर्सी अमेरिका की बेल टेलीफोन प्रयोगशाला के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों ने एक ऐसे ‘भवन’ का निर्माण किया जो पूरी तरह शब्द प्रूफ था अर्थात् उसके अन्दर बैठने वाले को बाहर की कैसी भी कोई भी ध्वनि सुनाई नहीं पड़ सकती थी। वैज्ञानिकों को अनुमान था कि उस समय निस्तब्ध नीरवता का आभास होगा, पर जब एक व्यक्ति को प्रयोग के तौर पर उसके अन्दर बैठाया गया तो उसे यह सुनकर अत्यन्त आश्चर्य हुआ कि विचित्र प्रकार की ध्वनियाँ उसके कानों में गूँजने लगीं। एक ध्वनि किसी के सीटी बजाने की थी, एक ध्वनि प्रेस मशीन चलने की तरह धड़-धड़ की थी, एक ध्वनि चटाचट चटखने की सी। पहले तो वह व्यक्ति डरा पर पीछे ध्यान देने पर मालूम हुआ कि सीटी की आवाज नसों में दौड़ने वाले रक्त प्रवाह की ध्वनि थी। आमाशय में पाचन रसों की चट-चट और हड्डियों की कड़कड़ाहट की ध्वनियाँ भी अलग-अलग सुनाई पड़ने लगी मानो शरीर न हो पूरा कारखाना ही हो।
सामान्यतः यह ध्वनि हर व्यक्ति के शरीर से होती है पर अपने कानों की बहिर्मुखी संवेदनशीलता और एकाग्रता की कमी के कारण कोई भी उन्हें सुन नहीं पाता। पर यदि अभ्यास किया जाये और सूक्ष्म कानों की शक्ति जगाई जा सके तो अनन्त ब्रह्माण्ड में होने वाली हलचल पृथ्वी के चलने की आवाज, सौर घोष, उल्काओं की टक्कर के भीषण निनाद मन्दाकिनियों के बहने का स्वर, जीव जन्तुओं के कलरव सब कुछ किसी भी स्थान में बैठकर उसी प्रकार सुने जा सकते हैं जिस प्रकार बेल टेलीफोन, लैबोरेटरी के प्रयोग के समय।
योगी पतंजलि ने लिखा है- ‘ततः प्रतिभ श्रावण जायन्ते’ अर्थात् ‘स्वार्थ संयम के अभ्यास से प्रतिभा अर्थात् भूत और भविष्य ज्ञान दिव्य और दूरस्थ शब्द सुनने की सिद्धि प्राप्त होती हैं ।’ योग विभूति में लिखा है-
‘शब्दार्थ प्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्त-स्प्रतिभाग संयमात् सव्र भूतरुतज्ञानम्’।
अर्थात् शब्द अर्थ और ज्ञान के अभ्यास ये अभेद भासता है और उसके विभाग में संयम करने से सभी प्राणियों के शब्दों में निहित भावनाओं का भी ज्ञान होता है।’ -यह सूत्र सिद्धान्त सूक्ष्म कर्णेन्द्रिय की महान् महत्ता का प्रतिपादन करते हैं और बताते हैं कि जब तक मनुष्य के पास ऐसा क्षमता सम्पन्न शरीर है। जिसके अन्दर विद्यमान् विभूतियों का उपयोग करके वह उसे प्राप्त कर सकता है जिसके लिए उसे प्रायः तरसते ही रहना पड़ता है।
नादयोग सूक्ष्म शब्द प्रवाह को सुनने की क्षमता विकसित करने का साधना विधान है। कानों के बाहरी छेद बन्द कर देने पर उनमें स्थूल शब्दों का प्रवेश रुक जाता है। तब ईथर से चल रहे ध्वनि कम्पनों को उस नीरवता में सुन समझ सकना सरल हो जाता है। नाद योग के अभ्यासी आरम्भ में कई प्रकार की दिव्य ध्वनियाँ कानों के छेद बन्द करके मानसिक एकाग्रता के आधार पर सुनते हैं। शंख, घड़ियाल, मृदंग, वीणा, नफीरी, नूपुर जैसी आवाजें आती हैं और बादल गरजने, झरना झरने, आग जलने, झींगुर बोलने जैसी क्रमबद्ध ध्वनियाँ भी सुनाई पड़ती हैं। आरम्भ में यह शरीर के अन्तरंग में हो रही हलचलों की ही प्रतिक्रिया होती है पर पीछे दूरवर्ती घटनाक्रमों के संकेत प्रकट करने वाली अधिक सूक्ष्म आवाजें भी पकड़ में आती है। अनुभव के आधार पर उनका वर्गीकरण करके यह जाना जा सकता है कि इन ध्वनि संकेतों के साथ कहाँ किस प्रकार का- किस काल का घटना क्रम सम्बद्ध है। आरम्भिक अभ्यासी भी अपने शरीरगत अवयवों की हलचल, रक्त प्रवाह, हृदय की धड़कन, पाचन संस्थान आदि की जानकारी उसी भाँति प्राप्त कर सकता है जिस तरह की डाक्टर लोग स्टेथिस्कोप आदि उपकरणों से हृदय की गति, रक्त चाप आदि का पता लगाते हैं अपने ही नहीं दूसरों के शरीर की स्थिति का विश्लेषण इस आधार पर हो सकता है और तदनुकूल सही निदान विदित होने पर सही उपचार का प्रबन्ध हो सकता है।
‘सूक्ष्म शरीर’ की कर्णेन्द्रिय को विकसित करके संसार में घटित होने वाले घटनाक्रम को जाना जा सकता है। कारण शरीर का सम्बन्ध चेतना जगत से है। लोगों की मनःस्थिति के कारण उत्पन्न होने वाली अदृश्य ध्वनियाँ जिसकी समझ में आने लगें वह मानव प्राणी की पशु-पक्षियों और जीव-जन्तुओं की मनःस्थिति का परिचय प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार बिना उच्चारण के एक मन से दूसरे मन का परिचय , आदान-प्रदान होता रह सकता है। विचार संचालन विद्या के ज्ञाता जानते हैं कि मनःस्थिति के अनुसार भावनाओं के उतार-चढ़ाव में एक विचित्र प्रकार की ध्वनि निसृत करते हैं और उसे सुनने की सामर्थ्य होने पर मौन रह कर ही दूसरों की बात अन्तः करण के पर्दे पर उतरती हुई अनुभव की जा सकती है और अपनी बात दूसरों तक पहुँचाई जा सकती है।
‘कारण शरीर’ की कर्णेन्द्रिय साधना, दैवी संकेतों के समझने, ईश्वर के साथ वार्तालाप और भावनात्मक आदान प्रदान करने में समर्थ हो सकती है। साधनात्मक पुरुषार्थ करते हुए अपने इन दिव्य संस्थानों को विकसित करना -अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ना यही नादयोग साधना का उद्देश्य है।
प्राण तत्त्व एक है वही ब्रह्माण्ड में व्यापक रूप से संव्याप्त है और ब्रह्माग्नि कहा जात है। वही पिण्ड सत्ता में समाया हुआ है और आत्माग्नि कहलाता है। इस प्रकार एक होते हुए भी विस्तार भेद से उसके दो रूप बन गये। आत्माग्नि लघु है और ब्रह्माग्नि विभु। तालाब में जब वर्षा का विपुल जल भरता है तो वह परिपूर्ण हो जाता है। यह अनुदान न मिलने पर तालाब सूखता और घटता जाता है। पानी में मलीनता भी आ जाती है। जिस प्रकार तालाब को भरा-पूरा और स्वच्छ रखने के लिए नये वर्षा जल की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार आत्माग्नि में ब्रह्माग्नि का अनुदान पहुँचाना पड़ता है इसी का नाम प्राणायाम ।
यों गहरी साँस लेकर फेफड़े के व्यायाम को भी आरोग्यवर्धक प्राणायाम कहते हैं। शरीर शास्त्र की दृष्टि से उसकी उपयोगिता तथा विधि व्यवस्था बताई जाती है साथ ही महिमा का गुण-गान भी किया जाता है। इससे अधिक आक्सीजन मिलती है और श्वास यन्त्रों का व्यायाम होता है, पर अध्यात्म शास्त्र का योग प्राणायाम उससे भिन्न है। उसमें ब्रह्माण्ड व्यापी प्राण की अभीष्ट सफलताओं और आत्मिक विभूतियों के समस्त अवरुद्ध मार्ग खुल जाते हैं
ब्रह्म-प्राण को आत्म-प्राण के साथ संयुक्त करने के लिए जहाँ जीवन-क्रम में शालीनता एवं उदारता की सत्प्रवृत्तियों का अधिकाधिक समावेश करने का प्रयास करना होता है वहाँ उपासनात्मक उपक्रमों को अपनाना भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। आहार-विहार से स्वास्थ्य वृद्धि होती है साथ ही दुर्बलता और रुग्णता को निरस्त करने के लिए विशेष चिकित्सा उपचार एवं व्यायाम आदि भी अपनाने की आवश्यकता पड़ती है। प्राण शक्ति के अभिवर्धन में -कुण्डलिनी जागरण में सूर्य वेधन जैसे प्राणायामों की भी आवश्यकता होती है। योगशास्त्र में व्यक्ति-प्राण और ब्रह्म-प्राण के सम्बन्ध और समन्वय की चर्चा इस प्रकार की है-
प्राणा वै द्विदेवत्याः एक मात्रा गृह्यतें तस्मात् प्राणा एक नामात्ता द्विमात्र हूयन्ते तस्मात्प्राण द्वन्द्वम्-एते 2।27
प्राण एक है। पर वह दो देवताओं में -दो पात्रों में भरा हुआ है।
अगर्भश्च सगर्भश्च प्राणायामों द्विधा स्मृतः ।
जपं ध्यानं विनागर्भः सगर्भस्तत्समन्वयात्-शिव पुराण
“प्राणायाम अगर्भ और सगर्भ दो प्रकार का होता है। जप और ध्यान से युक्त प्राणायाम सगर्भ होता है और इनके बिना अगर्भ कहा जाता है।”
तत्साधनं द्वयं मुख्यं सरस्वत्यास्तु चालनम्।
प्राणरोधमाधाभ्यासाहज्वी कुण्डलिनी भवेत्-योग कुण्डल्युपनिषद् 1।8
उसके दो साधन मुख्य हैं- (1) सरस्वती (सुषुम्ना) का चालन (2) प्राणरोध । अभ्यास से यह कुण्डली मारे बैठी कुण्डलिनी सीधी हो जाती है।
आध्यात्मिक प्राणायाम वे हैं जिनमें ब्रह्माण्डीय चेतना को जीव चेतना में सम्मिश्रित करके जीव सत्ता का अन्तःतेजस जागृत किया जाता है। कुण्डलिनी साधना में इसी स्तर के प्राणयोग की आवश्यकता रहती हैं सूर्य-वेधन इसी स्तर का है। उसमें ध्यान धारणा अधिकाधिक गहरी होनी चाहिए ओर प्रचण्ड संकल्प शक्ति का पूरा समावेश रहना चाहिए। श्वास खीचते समय महाप्राण को विश्वप्राण को-पकड़ने और घसीट कर आत्मसत्ता के समीप लाने का प्रयत्न किया जाता है। श्वास के साथ प्राण तत्त्व की अधिकाधिक मात्रा रहने की भाव-भरी मान्यता रहनी चाहिए। साँस में आक्सीजन की जितनी अधिक मात्रा होती है उतनी ही उसे आरोग्यवर्धक माना जाता है। आक्सीजन की न्यूनाधिक मात्रा का होना क्षेत्रीय प्रकृति परिस्थितियों पर निर्भर है। किन्तु प्राण तो सर्वत्र समान रूप में संव्याप्त है। उसमें से अभीष्ट मात्रा संकल्प शक्ति के आधार पर उपलब्ध की जा सकती है। सूक्ष्म जगत में -अध्यात्म क्षेत्र में श्रद्धा को ही सबसे प्रबल और फलदायक माना गया है। साधनात्मक कर्मकाण्डों का फल परिपूर्ण मिलना न मिलना अथवा स्वल्प मिलना कर्मकाण्डों के विधि-विधानों पर नहीं साधक की श्रद्धा पर निर्भर रहता है। श्रद्धा की न्यूनता ही साधनाओं के निष्फल जाने का प्रधान कारण होता है। जो इसे सुनिश्चित तथ्य को जानते हैं वे सभी साधना उपचारों में गहनतम श्रद्धा का समावेश करने के लिए प्रचण्ड संकल्प शक्ति का उपयोग करते हैं।
साँस खीचते समय प्राण ऊर्जा का वायु के साथ प्रचुर मात्रा में समावेश होना, उसका सूक्ष्म शरीर में प्रवेश करना- सुषुम्ना (मेरुदंड) मार्ग से इड़ा धारा (बाम भाग के ऋण विद्युतीय शक्ति प्रवाह) द्वारा मूलाधार तक पहुँचना -वहाँ अवस्थित प्रसुप्त चिनगारी को झकझोरना, थपथपाना जागृत करना यह सूर्य-वेधन प्राणायाम पूर्वार्ध है। उत्तरार्ध में प्राण को पिंगला मार्ग से (मेरुदंड से दक्षिण भाग के धन विद्युत प्रवाह) में होकर वापिस लाया जाता है। जाते समय का अन्तरिक्षीय प्राण शीतल होता है, ऋण धारा भी शीतल मानी जाती है इसलिए इड़ा को -पूरक को चन्द्रवत् कहा गया है। चन्द्रनाड़ी कहने से यही प्रयोजन है। लौटते समय अग्नि उद्दीपन -प्राण प्रहार की संघर्ष क्रिया से ऊष्मा बढ़ती और प्राण में सम्मिलित होती है। लौटने का पिंगला मार्ग धन विद्युत का क्षेत्र होने से उष्ण माना गया है । दोनों ही कारणों से लौटता हुआ प्राण वायु उष्ण रहता है इसलिए उसे सूर्य की उपमा दी गई है। इड़ा, चन्द्र और पिंगला सूर्य है। पूरक चन्द्र और रेचक सूर्य है। ऐसा ही प्रतिपादन साधना विज्ञान के आचार्य करते रहे है।
सोई हुई शक्ति का जगाना-लेटी हुई गिरी पड़ी क्षमता को सक्रिय बनाना शक्ति चालन है। यों मुद्रा प्रसंग में एक शक्तिचालिनी मुद्रा भी है और उसका प्रयोग भी कुण्डलिनी जागरण उपचार में किया जाता है। साथ ही शक्ति चालन का अर्थ वह भी है जो कुण्डलिनी जागरण शब्द से प्रति ध्वनित होता है । प्रसुप्त स्थिति की मूर्च्छना जब दूर हो जाती है और प्राण शक्ति प्रखर एवं सक्रिय होती है तो सारे अवसाद अभाव दूर हो जाते हैं । अन्तः स्थिति में उभरी हुई प्रखरता का बाह्य क्षेत्र की बढ़ी हुई तेजस्विता के रूप में परिचय मिलने लगता है। शक्ति के चल पड़ने पर प्रगति के समस्त आधार अग्रगम्य करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं-
आधारकरले सुप्तां चालयेत्कुण्डलीं दृढाम्।
अपानवायुनारुह्य बलादाकृष्य बुद्धिमान्।
शक्तिचालनमुद्रेयं सर्वषक्तिप्रदायिनी॥ शिव सं0
मूलाधार चक्र में स्थित प्रसुप्त पड़ी हुई कुण्डलिनी शक्ति को प्राण वायु द्वारा चलाने और जगाने वाली शक्ति चालन क्रिया सर्व शक्ति प्रदायिनी है।
विहाय निद्रा भुजगी स्वयमूर्ध्व भवेत्खलु।
तस्मादभ्यासनं कार्य योगिना सिद्धिगिच्छता॥
यः करोति सदाभ्यासं शक्तिचालनमुक्तमम्।
येन विग्रहसिद्धिः स्याद् अणिमादिगुणप्रदा-शिव संहिता
जो योगी सिद्धि की इच्छा से शक्ति चालन का नित्य अभ्यास करता है, उसके शरीर में सो रही सर्पिणी कुण्डलिनी जागृत होकर स्वयं ही ऊर्ध्वमुख हो जाती है । सदा अभ्यास करने पर उसे सिद्धि मिलती है तथा अणिमादि विभूतियाँ प्राप्त हो जाती हैं।
कुण्डल्येव भवेच्छक्तिस्तां तु ‘चालयेद्बुधः।
स्वस्थानादाभ्रुवोर्मध्यं शक्तिचालनमुच्यते॥
तत्साधने द्वयं मुख्यं सरस्वतयास्तु चालनम्।
प्राणरोधमधाभ्यासादज्वीकुण्डलिनी भवेत्-योग कुण्डल्युपनिषद
कुण्डली ही मुख्य शक्ति है, ज्ञानी साधक उसका चालन करके दोनों भौहों के मध्य में ले जाता है तो वही शक्ति चालन है। कुण्डलिनी को चलाने के दो मुख्य साधन हैं, सरस्वती का चालन और प्राण निरोध, अभ्यास द्वारा लिपटी हुई कुण्डलिनी सीधी हो जाती है।
तस्माडडड चालयेन्नित्यं सुखसुप्त्तामरुधतीम्।
तस्याः संचालनेनैव योगी रोगैः प्रमुच्यते॥
येन संचालिता शक्तिः स योगी सिद्धिभाजनम्।
किमत्र बहुनोक्तेन कालं जयति लीलया-हठयोग प्रदीपिका
इसलिए सुखपूर्वक सो रही अरुन्धती (कुण्डलिनी) का नित्य संचालन आवश्यक है। इस शक्ति चालन से योगी रोगों से मुक्त हो जाता है। जिसने शक्ति-संचालन कर लिया, वह योगी सिद्धि-भाजन है। वह कालजित् कहा जा सकता है।
प्राण के प्रहार से अग्नि के उद्दीपन प्रज्ज्वलन का उल्लेख साधना ग्रन्थों में जगह-जगह पर हुआ है। यह वही अग्नि है जिसे योगाग्नि, प्राण ऊर्जा, जीवनी शक्ति या कुण्डलिनी कहते हैं । आग में ऐसा ही ईंधन डाला जाता है जिसमें अग्नि तत्त्व की प्रधानता वाले रासायनिक पदार्थ अधिक मात्रा में होते हैं। कुण्डलिनी प्राणाग्नि है उसमें सजातीय तत्त्व का ईंधन डालने से उद्दीपन होता है। प्राणायाम द्वारा इड़ा-पिंगला के माध्यम से अन्तरिक्ष से खींचकर लाया गया प्राण-तत्त्व मूलाधार में अवस्थित चिनगारी जैसी प्रसुप्त अग्नि तक पहुँचाया जाता है तो वह भभकती है और जाज्वल्यमान लपटों के रूप में सारी जीवन सत्ता को अग्निमय बनाती है। यही कुण्डलिनी जागरण है। अग्नि का उल्लेख मूलाधार स्थित प्राण ऊर्जा के लिए ही हुआ है-
आदेहमध्यकटयन्तमग्निस्थानमुदाहृतम्।
तत्र सिन्दूरवर्णोऽग्निर्ज्वलनं दषपज्च च-त्रिषिखोपनिषद
कटि से निम्न भाग में अग्नि स्थान है। वह सिन्दूर के रंग का है। उसमें पन्द्रह घड़ी प्राण को रोक कर अग्नि की साधना करनी चाहिए।
नाभेस्तिर्यगधोर्ध्व कुण्डलिनीस्थानम्। अष्टप्रकृति रुपाऽष्टधा कुण्डलीकृता कुण्डलिनी शक्तिर्भवति।
यथावद्वायुसंचार जलान्नादीनि परितः स्कन्धपाष्वषु निरुध्यैनं मुखेनैष समावेष्ट्यं ब्रह्मरन्ध्र योगकालेऽपानेनाग्निना च स्फुरति-षाण्डिल्योपनिषद
नाभि से नीचे कुण्डलिनी का निवास है। यह आठ प्रकृति वाली है। इसके आठ कुण्डल है। यह प्राण वायु को यथावत करती है। अन्न और जल को व्यवस्थित करती है। मुख तथा ब्रह्मरन्ध्र की अग्नि को प्रकाशित करती है।
तडिल्लेखा तन्वी तपन शषि वैष्वानर मयी।
तडिल्लता समरुचिबिद्युल्लेखेनं भास्वती॥
बिजली की बेल के समान, तपते हुए चन्द्रमा के समान, अग्निमय वह शक्ति दृष्टिगोचर होती है।
मूलाधारादा ब्रह्मरन्ध्र पर्यन्तं सुषुम्ना सूर्यभा।
तन्मध्ये तडित्कोटि समा तृणाल तन्तु सूक्ष्मा कुण्डलिनी। तत्र तमोनिवृत्ति। तर्द्दषनार्त्सव पाप निवृत्तिः-मण्डल ब्राह्मणोपनिषद
मूलाधार से लेकर ब्रह्मरन्ध्र तक सूर्य के प्रकाश जैसी सुषुम्ना नाड़ी फैली हुई है। उसी के साथ कमल तन्तु से सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति बंधी हुई है। उसी के प्रकाश से अन्धकार दूर होता है और पापों की निवृत्ति होती है।
देहमध्ये ब्रह्मनाड़ी सुषुम्ना सूर्यरूपिणी पूर्ण-चन्द्राभा वर्तते। सा तु मूलाधारादारभ्य ब्रह्मरन्ध्रा-गामिनी भवति। तन्मध्ये तटकोटिसमानकान्त्या मृणालसूत्रवत् सूक्ष्माङ्गी कुण्डलिनीति प्रसिद्धाऽस्ति तां दृष्टा मनसैव नरः सर्वपापविनाशद्वारा मुक्तो भवति।
देह में ब्रह्मनाड़ी सुषुम्ना परम प्रकाशवान है। वह मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक जाती है। उसके साथ सूक्ष्म तन्तु में जुड़ी अति ज्वलन्त कुण्डलिनी शक्ति है। उसका भावनात्मक दर्शन करने से मनुष्य सब पापों से और बंधनों से छुटकारा प्राप्त कर लेता है।
आधार चक्रनिलयां विसन्तुतन्वी
विद्युत्प्रभां सकलमन्त्रमयीं पवित्राम्।
योगैकगम्यपरमामृतवर्षधारां
सरां महेशसखिकुण्डलिनीं नमामि।
मूलाधार चक्र में निवास करने वाली अग्नि रूप , बिजली के समान प्रकाशवान, तन्तु रूप, परम पवित्र, योगियों के लिए गम्य, अमृत वर्षा करने वाली, शिव सहचरी, कुण्डलिनी को नमस्कार।
मूलाधारस्थ ब्रह्मयात्मतेजोमध्ये व्यवस्थिता।
जीवशक्तिः कुण्डलाख्या प्राणाकाश तैजसी-रुद्र तन्त्र
मूलाधार में निवास करने वाली आत्म तेजरूपी अग्नि, जीव शक्ति है। प्राण रूपी आकाश में प्रकाशवान कुण्डलिनी है।
जब वह दिव्य अग्नि ऊपर जाती है तो उसकी अनुभूति अन्तः उत्साह के रूप में तो होती ही है साथ-साथ शरीर में भी ऐसा लगता है कि मेरुदंड के निकटवर्ती भाग में अथवा शरीर के अन्य किसी अवयव में स्फुरण जैसी विचित्र हलचलें होती हैं-
यथा कुण्डलिनी देहेस्फुरत्यब्ज इवालिनी।
तथा संविदुदेत्यन्त मृदुर्स्पशवयोदया-महायोग विज्ञान
जब कुण्डलिनी देह में स्फुरण करती है तो त्वचा पर भ्रमर, कमल विचरने जैसे मृदुल दिव्य स्पर्श का अनुभव होता है।
अंगे पिपीलिकारोहे यथार्स्पशः प्रतीयते।
मेरुदंडे तथा वायोः स्पर्शः स्यादूर्ध्व रोहणो-योग रसायनम्
जैसे किसी अंग में चींटी के चढ़ने का स्पर्श प्रतीत होता है, वैसे ही मेरुदण्ड में ऊपर चढ़ने वाले प्राण का स्पर्श प्रतीत होता है।
दिनैः कतिपयैरेवभ्यासं कुर्वतो ध्रुवम्।
मेरुदंडे विशेत्प्राणों वंशरंध्र यथानिलः-योग रसायनम्
कुछ दिन तक इस प्रकार अभ्यास करने पर निश्चय ही प्राण मेरुदंड में उसी प्रकार प्रविष्ट होते हैं, जिस प्रकार बाँस की पोल में हवा।
प्राण का अग्नि पर प्रहार-यही है कुण्डलिनी जागरण की प्रधान प्रक्रिया। मेरुदंड के वाम भाग के विद्युत प्रवाह को इडा कहते हैं। नासिका से वायु खींचते हुए उसके साथ प्रचंड प्राण प्रचुर मात्रा में घुला होने की भावना की जाती है। खींचे एक श्वाँस को मेरुदंड मार्ग से मूलाधार चक्र तक पहुँचने की संकल्पपूर्वक भावना की जाती है। यह मान्यता परिपक्व की जाती है कि निश्चित रूप से इस प्रकार अन्तरिक्ष से खींचा गया और श्वाँस द्वारा मेरुदण्ड मार्ग से प्रेरित किया गया प्राण मूलाधार तक पहुँचता है और उस पर आघात पहुँचा कर जगाने का प्रयत्न करता है। बार-बार लगातार प्रहार करने की भावना श्वास-प्रश्वास के द्वारा की जाती है। मेरुदंड मार्ग से मूलाधार तक इडा शक्ति के पहुँचने का विश्वास दृढ़ता पूर्वक चित्त में जमाया जाता है।
प्रहार के उपरान्त प्राण को वापिस भी लाना पड़ता है। यह वापसी दूसरी धारा पिंगला द्वारा होती है। पिंगला मेरुदंड में अवस्थित दक्षिण पक्ष की प्राण धारा को कहते हैं। इड़ा से गया प्राण मूलाधार की प्रसुप्त सर्पिणी महा अग्नि पर आघात करके -झकझोर कर -पिंगला मार्ग से वापिस लौटता है। यह एक प्रहार हुआ।
दूसरा इससे उलटे क्रम से होगा। दूसरी बार दाहिनी ओर से प्राण वायु का जाना और बाई ओर से लौटना होता है। इस बार पिंगला से प्राण का प्रवेश और इडा से वापिस लौटना है। प्रहार पूर्ववत्। एकबार इडा से जाना-पिंगला से लौटना। दूसरी बार पिंगला से जाना इडा से लौटना । यही क्रम जब तक प्राणायाम प्रक्रिया चलानी हो तब तक चलना चाहिए। इसे अनुलोम-विलोम क्रम कहते हैं। यही कुण्डलिनी जागरण के लिए प्रयुक्त होने वाला सूर्यभेदन प्राणायाम ।
सूर्यभेदन प्राणायाम का महत्त्व माहात्म्य बताते हुए हठयोग प्रदीपिका में कहा गया है-
कपाल शोधनं वात दोषघ्नं कृमि दोषंत्हृतम्।
पुनः पुनरिदं कार्य सूर्यवेधन मुत्तमम्।
यह कपाल शोधन, वात रोग निवारण, कृमि दोष विनाशक है। इस सूर्यभेदन प्राणायाम को बार-बार करना चाहिए।
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*समाप्त*