बहिर्मुखी दृष्टि बाहर का देखती है। जो फैला पड़ा है उसी का मूल्यांकन करती और उसी में रस खोजती है , जब कि अपने भीतर ही उससे अधिक पाया जा सकता है, जो दीखता है। इसे विधि की विडम्बना ही कहना चाहिए कि पैरों के नीचे की जमीन में दबी हुई प्रचुर खनिज सम्पदा की ओर ध्यान नहीं जाता और आसमान के तारों से वैभव खोज लाने के लिए मन उड़ाने भरता रहता है। ब्रह्माण्ड की छोटी प्रतिकृति पिण्ड है। जो बाहर दीखता है उसके बीज भीतर विद्यमान हैं। उन्हें उगाकर अभीष्ट आकांक्षाएँ पूरा कर सकने वाले कल्पवृक्ष जैसे व्यक्तित्व की उपलब्धि प्राप्त कर सकना अपेक्षाकृत सरल है। बाहर का बिखराव विस्तार बहुत व्यापक है। उसे ढूँढ़कर एकत्रित करने में इतना श्रम और समय लगता है, जिसकी तुलना में घर का उत्पादन कहीं सस्ता रहता है।
प्रकृति के विस्तार में से बहुत कुछ खोजा और पाया गया है। यह पुरुषार्थ और मनोयोग का ही प्रतिफल है। यही प्रयास यदि अंतरंग की खोज में नियोजित किया जाय सके तो उससे अधिक मूल्यवान पाया जा सकता है, जितना कि जड़-जगत की समस्त बालू में से तेल निकालने के फलस्वरूप उपलब्ध होती हैं मानवी सत्ता विलक्षण है उसमें जड़-जगत की समस्त विशेषताएँ सन्निहित है। साथ ही विश्व-चेतना की विभूतियों का सार तत्त्व भी संक्षिप्त किन्तु परिपूर्ण मात्रा में विद्यमान है। खोज का क्षेत्र बाहरी जगत भी बना रहे किन्तु यह उचित होगा कि आत्म-सत्ता के कण-कण में ओत-प्रोत उस सम्पदा को भुला न दिया जाय जो अपने लिए सब से अधिक आवश्यक और उपयोगी है।
हम अपने को देखें, परखें, खोजें जो प्रतीत होगा जो हमारे लिए नितान्त आवश्यक है वह भीतर ही मौजूद है। यह वैभव इतना अधिक समर्थ है कि यदि उसे ठीक तरह से सक्षम किया जा सके तो उसे खींच बुलाना तनिक भी कठिन न रहेगा जिसकी तलाश में हमें निरन्तर मृग-तृष्णा में भटकने और खाली रहने का कष्ट उठाना पड़ता है।
देवता अपने गुणों के आधार पर जब-जब उन्नति के शिखर पर पहुँचते, उनकी विलासिता तब तब उनके पतन का कारण बनती जाती। निर्बल तन, दुर्बल मन, देवताओं पर आसुरी शक्तियाँ आक्रमण करती और वे बार-बार परास्त हो जाते हैं। यह देखकर देवताओं के गुरु बृहस्पति को बड़ी चिन्ता हुई। अत्यधिक विचार के पश्चात् वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मृतप्राय देवताओं में पुनः नवजीवन संचार के लिए उन्हें संजीवनी विद्या के प्रशिक्षण की आवश्यकता है, किन्तु अब समस्या यहाँ अटक गई कि यह कार्य सम्पन्न कौन करे?
देव-परिषद की बैठक में इस प्रश्न पर कई दिन तक विचार हुआ। अन्ततः निर्णय सर्वमान्य रहा कि उसके लिये देव गुरु बृहस्पति के पुत्र कच ही सर्वथा योग्य है। यह भी सुनिश्चित था कि इस विद्या में निष्णात, मात्र शुक्राचार्य है।
शिष्य की पात्रता के दो प्रमुख गुण है-अडिग विश्वास और लक्ष्य प्राप्ति के अविचलित तप तितीक्षा की भावना। शुक्राचार्य असुरों के गुरु थे तो क्या? थे तो गुरु-अर्थात् हर प्राणी का कल्याण करने की भावनाओं का शक्ति पुँज। सत्पात्र विजातीय है तो क्या? उसकी पात्रता खरी है तो उसे विद्या क्यों न दी जाये? कच शुक्राचार्य के आश्रम में रहकर संजीवनी विद्या का प्रशिक्षण ग्रहण करने लगे।
शुक्राचार्य अपनी पुत्री को भी विद्याध्ययन करते थे। समान वय होने के कारण उनकी पुत्री देवयानी भी कच के ही साथ अभ्यास करती थी। प्रारम्भिक परिचय धीरे-धीरे घनिष्ठता में परिणत होता गया। दोनों साथ-साथ पढ़ते तथा साथ-साथ दोनों आश्रम की व्यवस्था में हाथ बँटाते । इन अन्तरंग क्षणों ने देवयानी की नारी सुलभ कोमल भावनाओं में प्रणय का रंग उभार दिया, वह कच को सम्पूर्ण हृदय से प्यार करने लगी।
पाठशाला में असुर समुदाय के भी छात्रगण थे। उनके लिए सर्वप्रथम तो कच का विद्यालय में प्रवेश ही असह्य था, उस पर देवयानी का उसकी ओर आकर्षित होना उनके लिए जलती आग में घृत बन गया। उन्होंने सामूहिक रूप से कच को मार डालने के सभी सम्भव उपाय किये किन्तु देवयानी की कृपा भाजन होने के कारण उनकी दाल नहीं गल सकी। उधर अपने गहन अध्यवसाय से कच ने वह सारी विद्या सीख ली जो मनुष्य जीवन के भौतिक और आत्मिक विकास के लिए आवश्यक होती है।
अध्ययन काल समाप्त हुआ। कच वापस लौटने की तैयारी करने लगे उधर देवयानी की अधीरता बढ़ी तो उसने अपने पिता शुक्राचार्य से अपनी पीड़ा कह सुनाई शुक्राचार्य कच की प्रतिभा से पहले ही प्रभावित थे। पुत्री का प्रस्ताव मानने में उन्हें क्या आपत्ति हो सकती थी, किन्तु उसके लिए कच की सहमति भी आवश्यक थी सो उनने एक दिन देवयानी की उपस्थिति में कच को साग्रह देवयानी का हाथ कच को सौंपने की इच्छा व्यक्त की। कच ने उत्तर दिया-गुरुवर मेरे हृदय में देवयानी के लिये असीम स्नेह है। उससे अलग होते मुझे स्वयं बेचैनी अनुभव हो रही है। किन्तु यह प्यार अपनी भगिनी के लिए प्यार के अतिरिक्त कुछ नहीं। पिता, केवल जन्म देने और पोषण करने वाली ही नहीं होता, आत्मिक संस्कार देने और उन्हें शक्ति प्रदान करने वाले आप-गुरुदेव भी मेरे पिता है और देवयानी मेरी सहोदरा के समान है, तब फिर मैं उनसे विवाह किस तरह कर सकता हूँ।
कच के इस उत्तर पर देवयानी का हृदय टूट गया। उन्होंने क्रुद्ध होकर शाप दे या-कच मैंने अगणित बार तुम्हारी जीवन रक्षा की फिर भी तुमने मेरा अपमान किया अतएव मैं शाप देती हूँ तुम मेरे पिता द्वारा दी गई विद्या भूल जाओगे।
कच ने शाप अंगीकार कर लिया किन्तु वे सिद्धान्त से रत्तीभर डगमग न हुए। उनकी यह चरित्रनिष्ठा ही देवों के लिये वरदान और विजय का आधार बन गई।
विज्ञान क्षेत्र के युग ऋषि आइन्स्टीन ने ईश्वर के अस्तित्व सम्बन्धी प्रश्नों का उत्तर देते हुए एक भेंटकर्ता से कहा था-मेरी दृष्टि में ईश्वर इस संसार में सर्व व्याप्त एक महान नियम है। मेरी मान्यता के अनुसार ईश्वर सत्य-अन्तिम सत्य है। यों उसका स्पष्ट रूप निर्धारित कर सकना आज की स्थिति में अत्यन्त कठिन है। इसकी खोज जारी है। अन्तिम सत्य की खोज ही विज्ञान का परम लक्ष्य है। अपने मार्ग पर चलते हुए विज्ञान ने जो तथ्य ढूंढ़े और सत्य स्वीकारे है उन्हें देखते हुए भविष्य में और भी बड़े सत्यों का रहस्योद्घाटन होता रहेगा। यह कार्य वैज्ञानिक शोध-पद्धति से ही सम्भव है।
‘सिद्धान्तों, यन्त्रों और आविष्कारों में विज्ञान झाँकता भर दिखाई देता है। उन्हें उसकी उपलब्धियाँ भर कह सकते हैं। वस्तुतः विज्ञान एक जीवन्त प्रवृत्ति है जो सत्य की शोध को अपना लक्ष्य मानती है। भले ही इसके फलस्वरूप पूर्व मान्यताओं पर आँच आती हो अथवा किसी वर्ग विशेष का हित-अनहित होता हो। सत्य को सत्य ही रहना चाहिए। विज्ञान की दृष्टि में ईश्वर ‘सत्य’ है। उसकी साधना को सत्य की खोज कह सकते हैं। इस प्रकार विज्ञान को अपने ढंग का ‘आस्तिक’ और उसकी शोध साधना को ईश्वर उपासना कहा जा सकता।’
आइन्स्टीन के मतानुसार पदार्थ एवं जीवन का स्वरूप समझना ही नहीं उनका दूरदर्शिता पूर्ण सदुपयोग करने का उपाय सोचना भी विज्ञान क्षेत्र में आता है। तत्त्व-दर्शन को वान की एक शाखा मानते हैं और जीवन क्षेत्र में रुचि रखने वालों को परामर्श देते है-
जिज्ञासा को जीवन्त रखो और सोचो कि तुम क्या कर रहे हो और क्यों कर रहे हो? श्रेष्ठ व्यक्ति बनने का प्रयत्न करो। बिना दिये पाने का प्रयत्न मत करो। श्रेष्ठ व्यक्ति जीवन से अथवा व्यक्तियों से जितना लेता है उसे अनेक गुना उन्हें वापिस करने के प्रयत्न में लगा रहता है।
केनोपनिषद् के ऋषि ने परब्रह्म की व्याख्या आइन्स्टीन से मिलती-जुलती ही की है। उसका प्रतिपादन है-
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म तवं सिद्धि तेदं यदिदमुपासते॥
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूँषि पश्यति। तदेव ब्रह्म त्व विद्धि तेदं यदिदमुपासते॥
यच्छोत्रेण न श्रृणोति येंन श्रोत्रमिदं श्रुतम्। तदेव ब्रह्म त्व विद्धि तेदं यदिदमुपासते॥
यत्प्राणेन न प्राहिणति येन प्राणः प्रणीयते। तदेव ब्रह्म त्व विद्धि तेदं यदिदमुपासते॥
अर्थात् परब्रह्म ऐसा कोई विचारणीय पदार्थ नहीं जिसे मन द्वारा ग्रहण किया जा सके। वह तो ऐसा तथ्य है जिसके आधार पर मन को मनन शक्ति प्राप्त होती है। उस परम तत्त्व की सामर्थ्य से ही मन को मनन कर सकने की क्षमता प्राप्त होती है। वह परब्रह्म ही नेत्रों को देखने की, कानों को सुनने की, प्राणों को जीने की शक्ति प्रदान करता है। परब्रह्म ऐसा नहीं है जिसे इन्द्रियों से देखना और मन से समझाना सम्भव हो सके। वह सर्वान्तर्यामी और निरपेक्ष है। वह कोई देवता नहीं है और न वैसा है जिसकी परब्रह्म नाम से उपासना की जाती हैं।
मुण्डकोपनिषद् के ऋषि का अभिमत भी इसी से मिलता-जुलता है। उनका कथन है-
न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा-नान्यैर्दैवैस्तपसा कर्मणा वा। शानप्रसादेन विशुद्धसत्त्वस्ततस्तु तं पश्यते निष्फलं ध्यायमानः॥
अर्थात् आँखों से, जीभ से अथवा अन्य इन्द्रियों से उसे जाना नहीं जा सकता। मात्र तप और कर्मकाण्ड भी उसकी अनुभूति नहीं कराते। जिसका मन पवित्र और शान्त है वह निर्मल ज्ञान की सहायता से गम्भीर ध्यान का आश्रय लेकर उसकी प्रतीति कर सकता है।
ज्ञान और अन्तर्ज्ञान के अन्तर एवं कार्य क्षेत्र सम्बन्धी पूछे गये एक प्रश्न के उत्तर में आइन्स्टीन ने कहा था-
ज्ञान आवश्यक है। उसी के सहारे दैनिक क्रिया-कलापों का संचालन और निर्णयों का निर्धारण होता है। फिर भी अन्तर्ज्ञान और अपना क्षेत्र और अस्तित्व है। हमारा मस्तिष्क मात्र वहीं तक सहारा देता है जहाँ तक कि उसकी जानकारी है अथवा तर्क की उड़ान उड़ती है। लेकिन एक स्थिति ऐसी भी आती है जहाँ चेतना उछल कर किसी ऐसे स्थान पर जा पहुँचती है जहाँ मस्तिष्क के सहारे पहुँच सकना कठिन है। संसार के महान आविष्कार इसी रहस्यमयी अन्तःप्रज्ञा के आधार पर सम्भव हुए है। वहाँ से उनका प्रकाश मिला है। प्रमाणित करने वाले अन्वेषण का कार्य तो यह प्रकाश मिलने के उपरान्त आरम्भ होता है।
ज्ञान उपलब्धि के तीन प्रसंग है-एक वह जो माता की गोदी से लेकर परिवार एवं सम्पर्क क्षेत्र की गतिविधियों के आधार पर संचित होता है और स्वभाव का अंग बनता है। दूसरा वह जो स्कूली तथा व्यवहार क्षेत्र में अनेकों अध्यापकों द्वारा प्रशिक्षण के रूप में प्राप्त होता रहता है। तीसरा अन्तिम चरण वह है जिसमें आत्मबोध होता है। जीवन का स्वरूप, उद्देश्य एवं उपयोग मस्तिष्क की जानकारी तक सीमित न रहकर जब आस्था बनकर परिपुष्ट होता है तब उसे आत्मबोध कहते हैं। यह वह उपलब्धि है जिसे पाकर एक सामान्य सा राजकुमार महान बुद्ध के रूप में साक्षात् भगवान बन गया था। इस तत्त्व की छोटी मात्रा भी मनुष्य को अपने साथियों की तुलना में कहीं अधिक ऊँचा और कहीं अधिक सफल बनाती है। ज्ञान भूमिका का यह तीसरा चरण आत्म साक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन के रूप में माना गया है। आत्मा का एकाकी अस्तित्व आदर्श विहीन और नीरस ही रह जाता है उसमें सरसता का संचार ईश्वर के समन्वय से ही सम्भव होता है। आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान को एक ही तथ्य का उद्बोधक माना गया है ईश्वर विश्वास के साथ जुड़ा हुआ आत्म-विश्वास जब विकसित होता है तो उस पर उच्चस्तरीय आदर्शवादिता छाई रहती हैं। यह आच्छादन सामान्य दृष्टि से भले ही नगण्य-सा प्रतीत होता हो, पर उसका प्रतिफल क्रमशः अधिकाधिक श्रेय, फलदायक सिद्ध होता चला जाता है।
जीवन की हर परिस्थिति में ईश्वर विश्वास सहायक होता है वह असन्तुलन में बदलता है। निराशा के क्षणों में उसकी वह ज्योति चमकती है जिसे दीनबन्धु, भक्त-वत्सल अशरण-शरण आदि नामों से पुकारते हैं और मातृ तुल्य वात्सल्य प्रदान करने की, अंचल में आश्रय देने की कलपना करते हैं। सफलताओं के साथ-साथ एक उन्मादी अहंकार आता है जिसमें स्वेच्छाचार की प्रवृत्ति पनपती है और मर्यादाओं की नीति-नियमों की चिन्ता न करते हुए स्वार्थ साधना अहमन्यता की पूर्ति के लिए कुछ भी कर गुजरने की उच्छृंखलता अपनाता है तो उसे आस्तिकता की भावना ही डराती हैं वह कहती है यहाँ स्वेच्छाचार की किसी को भी छूट नहीं है। सबक ऊपर एक नियामक शक्ति मौजूद है और कर्मफल की दण्ड व्यवस्था भी मौजूद है जो इतनी कठोर है कि मर्यादा तोड़ने वाले को भली प्रकार सबक सिखा सकती है। भगवान की भयानकता से डर कर उच्छृंखलता पर बहुत कुछ नियन्त्रण होता रहता है आस्तिकता में ईश्वर के गुणानुवादों का कथन, श्रवण, मनन, चिन्तन जुड़ा हुआ है। ईश्वर सद्गुणों का पुँज है। पवित्रता, करुणा, ममता, उदारता जैसी सद्भावनाएँ ईश्वरीय अनुकम्पा के फलस्वरूप उपलब्ध होने वाली विभूतियाँ है। इस मान्यता से ईश्वर सान्निध्य के लिए-उपासना आदि प्रयास करते हुए मनुष्य अधिकाधिक चरित्र निष्ठ और समाज-निष्ठ बनने का प्रयत्न करता है समाज-निष्ठा को धार्मिकता और सभ्यता कहते हैं। चरित्र-निष्ठा को धार्मिकता और सभ्यता कहते हैं। चरित्र-निष्ठा का दर्शन अध्यात्म कहलाता है उसी का दूसरा नाम संस्कृति भी है। इन्हीं के आधार पर मनुष्य प्रामाणिक और पराक्रमी बनता है। प्रगति के यही दो चरण है जिनके सहारे लोग भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्र में आगे बढ़ते हैं। ईश्वर की मान्यता का प्रभाव न्यूनाधिक मात्रा में सदाशयता और शालीनता की अभिवृद्धि में ही दृष्टिगोचर होता है। यों बुराइयाँ तो आस्तिकों में भी पाई जाती है, पर नास्तिकता अपना लेने पर तो मनुष्य उन मर्यादा उल्लंघन के सम्बन्ध में और भी अधिक निर्भय हो जाता है। सम्भावनाओं की दृष्टि से देखा जाय तो आस्तिक की तुलना में नास्तिक के अनाचार मार्ग पर चल पड़ने की अधिक सम्भावना है। श्रेष्ठ मार्ग पर कदम बढ़ाने वाले के लिए ईश्वर विश्वास एवं सुयोग्य एवं सुसम्पन्न साथी की तरह सहायक सिद्ध होता है, वह सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रोत्साहन ही नहीं वरन् सहायता के आश्वासन भी देता है। इन दोनों आन्तरिक उपलब्धियों के सहारे चलने वाले का साहस प्रतिकूलताओं के बीच भी अविचल बना रहता है ऐसी दशा में उसे ऐसी अन्त-स्फुरणा का लाभ नहीं मिलता जो अग्रगमन के लिए अनुकूल साधनों से भी अधिक मूल्यवान होती हैं।
बुद्धि की एक सीमा है। प्रत्येक प्राणी को वह उसकी आवश्यकता के अनुरूप ही मिली है। उसके आधार पर चेतना के परतों को समझना तो दूर पदार्थ के प्रत्यक्ष दर्शन से आगे की-उसकी सूक्ष्म क्षमताओं तक की पूरी जानकारी नहीं हो सकी। प्रकृति के अनेक रहस्यों को जानने में मनुष्य ने आश्चर्यजनक सफलता पाई है, पर अभी जो जाना गया है उसकी तुलना में अविज्ञात का विस्तार अत्यधिक है। प्रकृति के नये-नये रहस्यों का उद्घाटन आये दिन होता रहता है। यह क्रम आगे भी चलता रहेगा किन्तु इस भौतिक जगत की सूक्ष्मतम परिस्थितियों को पूर्णतया जान सकना कभी भी सम्भव न हो सकेगा, क्योंकि प्रकृति के विस्तार की तुलना में मानवी बुद्धि की एक सीमा और मर्यादा है उससे आगे बढ़ सकना उसके लिए सम्भव नहीं है।
इस संदर्भ में दार्शनिक विज्ञानवेत्ता हिटक ने अपनी पुस्तक ‘साइन्टिफिक रोमाँसेज’ में प्राणियों की बुद्धि सीमा-बन्धन के कितने ही उदाहरण दिये हैं। वे आँख से न दीख सकने वाले एक जीव ‘माइक्रोब’ का उल्लेख करते हुए बताते हैं कि उसे केवल लम्बाई-चौड़ाई की दो दिशाओं की ही ज्ञान है। ऊँचाई से वह परिचित नहीं है। उसे समतल फर्श पर रखा जाय तो वह चलता ही रहेगा किन्तु यदि आगे कोई तख्ती खड़ी कर दी जाय तो रुक भर जाएगा उसका कारण न समझ सकेगा और न उससे बच निकलने का कोई उपाय ही करेगा। यदि तख्ती हटा दी जाय तो फिर चलने लगेगा किन्तु उस अवरोध के खड़े होने या हटने से उसकी गति पर क्यों प्रभाव पड़ा इसका कुछ भी कारण न समझ सकेगा। तख्ती खड़ी होने या हटने के क्रिया-कलाप के सम्बन्ध में कोई कल्पना तक कर सकना उसके लिए सम्भव न होगा। इतने पर भी माइक्रोब के अतिरिक्त अन्य प्राणी यह तो स्वीकार नहीं ही करेंगे कि ऊँचाई का कोई आयाम ही नहीं होता। लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई के तीन आयाम बुद्धि का भी है। बुद्धि की भी एक सीमा मर्यादा है। वह न तो असीम है-न निभ्रान्त और न सर्वज्ञ है। हर प्राणी की आवश्यकता को देखते हुए प्रकृति ने उसे कामचलाऊ मात्रा में इस उपहार से सुसज्जित किया है। उसमें घट-बढ़ भी एक सीमित मात्रा में ही हो सकती है। मानसिक अपंगों की बात दूसरी है।
कर्मफल न चाहते हुए भी मिलते हैं। कोई नहीं चाहता कि उसे अशुभ कर्मों के फलस्वरूप दण्ड मिले। कोई नहीं चाहता कि पुरुषार्थ के अनुपात से ही सफलता मिले। हर कोई दुःख से बचना और सुख का अधिकाधिक लाभ पाना चाहता है। पर यह इच्छा कहाँ पूरी होती है ? नियामक शक्ति द्वारा पदार्थों की तरह ही प्राणियों पर भी अंकुश रखा जाता है और जहाँ भी वे आलस्य प्रमाद बरतते हैं वहीं असफलताओं की, पिछड़ेपन की हानि उठाते हैं। व्यवस्था तोड़ते ही ठोकर खाते और दण्ड पाते हैं। विष खाना और पानी में कूदना अपने हाथ की बात हैं, पर उसके दुष्परिणामों से बच सकना कभी-कभी संयोगवश ही होता है। अपनी ही चेतना की सूक्ष्म परतों में ऐसी व्यवस्था ‘फिट’ है कि वह कुविचारों, कुकर्मों का प्रतिफल स्वचालित पद्धति से अपने आप ही प्रस्तुत करती रहती है। इसे झुठलाना या इससे बच निकालना भी किसी के हाथ में नहीं। देर तो होती हैं, पर अन्धेर की तनिक भी गुँजाइश नहीं है। आज के कर्मों का फल कल मिले इसमें देरी तो हो सकती है किन्तु कुछ भी करते रहने और मनचाहे प्रतिफल पाने की छूट किसी को भी नहीं है। उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन की प्रक्रिया से सभी को असुविधा अनुभव होती है। सभी सुविधाजनक स्थिति में स्थिर रहना चाहते हैं, पर सृष्टि क्रम के आगे किसी की मर्जी नहीं चलती। इस व्यवस्था प्रवाह को ईश्वर समझा जा सकता है।
अन्तःकरण में एक ऐसी शक्ति काम करती है जो सन्मार्ग पर चलने से प्रसन्न, सन्तुष्ट हुई दिखाई पड़ती है और कुपंथ अपनाने पर खिन्नता, उद्विग्नता का अनुभव करती है। अन्तरात्मा की इसी परत में ईश्वर झाँकता हुआ देखा जा सकता है।
मानव जीवन में समता, सहयोग, शिक्षा, साहस, चरित्र और सुरक्षा जैसे उच्चस्तरीय तत्त्वों के अभिवर्धन की आवश्यकता है। यह मनन स्थितियाँ भी हैं और परिस्थितियाँ भी। इन्हें आस्थाओं की गहराई में प्रवेश करने के लिए जिस दर्शन की आवश्यकता है वह आस्तिकता का ही हो सकता है। निजी और तात्कालिक संकीर्ण स्वार्थपरता पर अंकुश लगाकर ही सामाजिक और आदर्शवादी मूल्यों का परिपोषण हो सकता है। प्रत्यक्षवाद का दबाव यह रहता है कि अपना सामयिक स्वार्थ सिद्ध किया जाय भले ही उसके फलस्वरूप भविष्य में अपने को ही हानि उठानी पड़े अथवा सार्वजनिक अहित करना पड़े। इस पशु प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने से ही मानवी आदर्शों की नींव रखी जा सकती है। इस स्तर की आस्थाएँ उत्पन्न करने में आस्तिकतावादी दर्शन से बढ़कर और कोई मनोवैज्ञानिक स्थापना हो नहीं सकेगी। देश-भक्ति समाज-निष्ठा अति मानव आदि के कितने ही विकल्प इसके लिए रखे गये और प्रयुक्त होते रहे हैं, पर उनसे बौद्धिकता अधिक और आध्यात्मिकता स्वल्प रहने से आस्था न बन सकी और नीति के रूप में जो जाना माना गया था वह संचित कुसंस्कारों की पशु प्रवृत्ति के सामने ठहर न सका। मानव जीवन की गरिमा और सामाजिक सुव्यवस्था के लिए साधनों की उतनी आवश्यकता नहीं जितनी आस्थाओं की। आस्तिकता का मूलभूत आधार इसी स्तर की आस्थाएँ उत्पन्न करता है।
आचार्य रामानुज मन्दिर की परिक्रमा कर रहे थे। अभी पहली परिक्रमा ही पूरी नहीं हो पाई थी, मार्ग में एक शूद्र आ गया। आचार्य का क्रम टूट गया और वे उत्तेजित हो उठे। कठोर शब्दों में कहा-हट जा चाण्डाल तूने मेरी परिक्रमा खंडित कर दी।’
‘किधर जाऊँ ?’ आचार्य प्रवर! शूद्र ने विनम्र वाणी में पूछा- ‘मेरी चारों ही ओर पवित्रता है फिर अपनी अपवित्रता किधर ले जाऊँ ?’
जो ज्ञान वेद शास्त्र नहीं दे सके थे, एक शूद्र ने दे डाला- आचार्य बोले- ‘तात् ! तुमने मेरा अद्वैत दर्शन साकार कर दिया, तुमने मेरी आँखें खोल दीं। कहकर उन्होंने उसे प्रणाम किया और पूर्ववत् परिक्रमा में तल्लीन हो गये।
पूर्वाभास का इतिहास मानवीय अस्तित्व जितना पुराना है और आये दिन उसमें एक से एक विलक्षण अध्याय जुड़ते रहते हैं। इटली निवासी अल्बटों अस्करी, जिन्हें तेज कार चलाने की ग्रान्ड प्री कार प्रतियोगिता के वर्ष 1953 तथा 1954 में सर्वप्रथम आने का पुरस्कार मिल चुका था, के जीवन में भी इस तरह का लोमहर्षक क्षण आया जब उनकी मृत्यु उन्हें पूर्व ही आकर दर्शन दे गई। 1955 में जिन दिनों वह पुनः रेस में भाग लेने की तैयारी कर रहे थे। उन्हें 20 वर्ष पुरानी 8 सितम्बर 1935 की एक घटना याद हो आयी। तब अल्बर्टो 16 वर्ष के बालक थे। उन दिनों कार-रेस में उनके पिता एन्टोनियो अस्करी शीर्ष स्थान पर थे। उस वर्ष की प्रतियोगिता में पिता के साथ कार में पुत्र अल्बर्टो भी दौड़ रहे थे। जिस समय कार वायलोन का घना जंगल पार कर रही थी, एकाएक एक काली बिल्ली ने रास्ता काटा। बिल्ली को बचाने के लिए एन्टोनियो ने तेज स्टीयरिंग काटा, किन्तु तीव्र गति से चल रही गाड़ी नियन्त्रण खो बैठी और एक पेड़ से जा टकराई। ऐन्टोनियो का घटनास्थल पर ही देहावसान हो गया। न जाने क्यों उसी क्षण अल्बर्टो जो अब तक सकुशल था, को एकाएक ऐसा आभास हुआ कि 20 वर्ष बाद जब वह 36 वर्ष का होगा, उसकी भी इसी तरह मृत्यु हो जावेगी। यह आभास कुछ ही क्षणों में विश्वास में बदल गया।
दुर्घटना के चार दिन पूर्व जब एकाएक अल्बर्टो की तबियत खराब हुई तब तो उनका विश्वास कतई परिपुष्ट हो गया क्योंकि उनके पिता को भी ठीक चार दिन पूर्व तबियत बिगड़ी थी। उसका मन रेस में भाग लेने का नहीं कर रहा था। किन्तु उसके प्रशिक्षक भूतपूर्व कार रेस चैम्पियन लुई बिल्लोरसी ने उन्हें आश्वस्त किया- ऐसा कुछ नहीं होगा। उन्होंने इस अन्धविश्वास जैसी भीति के लिए अल्बर्टा को फटकारा भी, किन्तु नियति तो जैसे अभेद्य हो, अल्बर्टो ने नियत समय पर प्रतियोगिता के लिए अन्तिम अभ्यास के लिए अपनी कार स्टार्ट की। बिल्लोरसी की कार उसके पीछे थी। जैसे ही कार वायलोन के जंगल में उस स्थान पर पहुँची ठीक वही 20 वर्ष पूर्व का दृश्य-एक काली बिल्ली ने रास्ता काटा। अल्बर्टा ने हर चन्द बचने की कोशिश की, किन्तु कार एक दैत्याकार पेड़ से जा टकराई और अल्बर्टो ने वहीं अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी।
इस घटना से दैवी विधान की निश्चितता सिद्ध की जा सकती है। वस्तुतः बात ऐसी नहीं है। किसी स्थान पर आग लगने से पूर्व धुँआ निकलता है। वह एक प्रकार से इस बात का संकेत होता है कि अभी समय है पानी डाल कर आग लगने के सम्भावित संकट को टाला जा सकता है, किन्तु कोई ध्यान न दे तो ईश्वर-विधान का क्या दोष।
पूर्वाभास की घटनाओं का वस्तुतः पूर्व दैवी चेतावनी के रूप में ग्रहण किया जाना चाहिए। हमारे बाह्य जगत की अपेक्षा, अन्तर्जगत की शक्ति और सक्रियता अदृश्य होकर भी कहीं अधिक प्रखर और प्रभाव पूर्ण होती है। मस्तिष्क में क्या विचार चल रहे होते हैं यह दिखाई नहीं देता पर क्रिया-व्यापार की समस्त भूमिका मनोजगत में ही बनती है। किसी व्यक्ति को किसी के मन की बात का पता चल जाये तो प्रकारान्तर से वह भी लाभ ले सकता है। पूर्वाभासों को इसी रूप में लिया जा सके तो अनिष्टकारी परिस्थितियों से बचना और लाभदायक सम्भावनाओं की तैयारी करना किसी के लिए भी सम्भव हो सकता है।
अन्तर्जगत विशाल और विराट् है उससे एक व्यक्ति ही नहीं बड़े समुदाय भी प्रेरित होते हैं। पूर्वाभास की ऐसी ही एक घटना यों है- अमेरफान वेल्स का एक छोटा कस्बा है। सन् 1975 के वर्षाफल की बात है समूचे कस्बे में एक अजीब खलबली मची। अधिकांश लोगों को या तो रात्रि के स्वप्नों में या दिन में यों अनायास ही पूर्वाभास होता कि उनकी मृत्यु शीघ्र ही हो जायेगी। अमेरफान वासियों की इस बेचैनी ने इस तरह सार्वजनिक चर्चा का रूप ग्रहण किया कि जर्मनी के सुप्रसिद्ध मानस शास्त्री जान मारकर को घटना के अध्ययन के लिए बाध्य होना पड़ा। सर्वेक्षण के मध्य उन्होंने पाया कि कस्बे के अधिकांश व्यक्तियों को इस तरह का पूर्वाभास हो रहा है। यही नहीं लोगों के चेहरे पर भय की रेखाएँ स्पष्ट झलकती थी।
मुश्किल से एक पखवाड़ा बीता था कि सचमुच समीप के पहाड़ से एक दिन ज्वालामुखी फटा-कोयले की राख का भयंकर तूफान उमड़ा और उसने देखते-देखते हजारों व्यक्तियों को मौत की नींद सुला दिया। एक स्कूल की दीवार में हुए भयंकर विस्फोट से तो 100 बच्चे एक ही स्थान पर मृत्यु के घाट उतर गये।
इस विद्यालय की एक नौ वर्षीय बालिका तब तो बच गई थी किन्तु घटना के 10 दिन बाद वह एकाएक अपनी माँ से बोली माँ-मैं मृत्यु से बिलकुल नहीं डरती। क्योंकि मेरे साथ भगवान रहते हैं। माँ ने समझा-बच्ची पूर्व घटना से भयाक्रान्त है इसलिए उसने उसे हृदय से लगाकर समझाया नहीं बेटी अब तो जो होना था हो गया अब तू निश्चित रह।
जान मारकर ने उस बालिका से भी भेंट की और पूछा बेटी तुम ऐसा क्यों सोचती हो? बालिका ने उत्तर दिया-क्योंकि मुझे अपने चारों ओर अंधकार दिखाई देता है। इस भेंट के दूसरे ही दिन मध्याह्न बच्ची का निधन हो गया। संयोग से उसे जिस स्थान पर दफनाया गया वह स्थान कोयले की राख की 5-6 फुट परत से ढका हुआ था। जान मारकर ने इस अध्ययन से यह भी निष्कर्ष निकाला कि समस्त प्राणि जगत एक ही चेतना के समुद्र से सम्बद्ध हैं यह सम्पर्क जितना प्रगाढ़ और निर्मल हो, जानकारियाँ उतनी ही अधिक और लाभ भी वैसा ही लिया जा सकता है। अतएव आध्यात्मिक साधनों द्वारा अन्तर्जगत का क्षेत्र विकसित किया जाना किसी भी भौतिक हित की अपेक्षा अधिक आवश्यक है।
मौन्टे कौसिनों के बिशप बेनेडिक्ट एक बार गिरजाघर की खिड़की के सहारे खड़े आकाश की ओर देख रहे थे। उन्हें लगा कि उनकी बहन श्वेत वस्त्रों में, बादलों में समाती चली जा रही हैं। यह दृश्य देखते-देखते उनके हृदय गति तीव्र हो उठी। वे तीन दिन पूर्व ही बहन स्कोलास्टिका से कौन्वेन्ट में मिलकर आये थे। तब वे पूर्ण स्वस्थ थीं, पर न जाने कैसे उन्हें यह दृश्य देखते-देखते यह आभास हुआ कि उनकी बहन की मृत्यु हो गई। दिन भर विचार आते रहते हैं, पर शरीर संस्थान प्रभावित नहीं होता। इस स्थल पर हृदय का धड़कना विशिष्टता का द्योतक था। सचमुच हुआ भी वैसा ही। जिस क्षण बेनेडिक्ट को यह स्वप्न आ रहा था, ठीक उसी समय उनकी बहन स्कोलास्टिका अपना इहलोक त्याग रही थी। पीछे पता चला कि मृत्यु के समय बहन ने सबसे अधिक अपने भाई बेनेडिक्ट को ही याद किया था। यह घटना इस बात की प्रमाण है कि भावनाओं की शक्ति और सामर्थ्य भौतिक शक्तियों की अपेक्षा बहुत अधिक है। यदि लोग इन्द्रियों के सुखों के छलावे में न आवें अपितु भावनाओं की सूक्ष्म सत्ता और महत्ता को समझ सके तो भौतिक जीवन भी बहुत अधिक सफल और सरस रूप में जिया जा सकता है।
पराविज्ञान की ड्यूक विश्व विद्यालय शाखा ने पूर्वाभास की असंख्य घटनायें संकलित की है। उसमें एक महिला की अनुभूति बहुत भाव भरे शब्दों में इस प्रकार अंकित है-मेरे पति स्नायुविक सन्निपात का लगभग 50 मील दूर एक कस्बे में इलाज करा रहे थे। उनका प्रतिदिन पत्र आता और उससे स्वास्थ्य की प्रगति का समाचार मिल जाता। एक दिन अनायास ही मेरे मन की बेचैनी बहुत अधिक बढ़ गई। मुझे लगा कोई फोन पर बुला रहा है सम्मोहित सी में फोन के पास तक गई पर उन अधिकारी महोदय के भय से फोन न कर सकी जिनका वह फोन था। मैंने यह बात अपनी पुत्री को भी बताई। दूसरे दिन पति का कोई पत्र नहीं मिला। तीसरे दिन एक साथ दो पत्र मिले जिसमें मेरे पति ने अपनी बेचैनी लिखते हुए ठीक उस समय फोन करने की बात लिखी थी जिस समय में फोन करने के लिए अत्यधिक और अनायास भाव-विह्वल हो गई थी। दूसरे पत्र में उन्होंने फोन न करने पर दुःख व्यक्त किया था। पत्र समय पर नहीं आया पर अन्तःप्रेरणा किस तरह मन को झकझोर गई यह रहस्य समझ में नहीं आया।
जीवित आत्मायें ही नहीं, हमारा अन्तरात्मा पवित्र और उत्कृष्ट हो, अन्तःकरण की आस्था बलवान हो और उसकी पुकार को हम सम्पूर्ण श्रद्धा से सुनने को तैयार हो तो, अन्तर्जगत में निवास करने वाली परमार्थ परायण, पितर और देव आत्माओं द्वारा भी आभास अनुभूतियाँ अर्जित की जा सकती है। अमेरिका के इंजन ड्राइवर होरेस एल. सीवर ने तो अपनी इस पूर्वाभास की विलक्षण क्षमता के कारण “किंग आफ दि रोड की सम्मानास्पद उपाधि पाई थी और उसकी गणना सर्वश्रेष्ठ रेल चालकों में की जाती थी। होरेस के जीवन की दो घटनायें इतनी विलक्षण थी जिनने सैकड़ों अमेरिकियों को अतीन्द्रिय सत्ता पर विश्वास करने के लिए बाध्य किया। होरेस धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे। आत्मा के अस्तित्व पर उन्हें आस्था थी। भूत-प्रेतों पर वे पूरी तरह विश्वास करते थे। यही नहीं उनकी यह मान्यता भी थी कि घटनाओं से आगाह कराने का पूर्वाभास भी उन्हें कोई अपने साथ रहने वाली अतीन्द्रिय सत्ता ही कराती है।
घटना सन् 1890 की है-उन दिनों होरेस “बिगफोर” ट्रेन के ड्राइवर थे, जो अमेरिका के कैन्काकी शहर से चलकर इलिनास होती हुई शिकागो पहुँचती हैं एक दिन उन्हें एक मिलिटरी रेजीमेण्ट शिकागो पहुँचाने का कार्य सौंपा गया। गाड़ी 60 मील प्रति घण्टा की गति से चल रही थी। एकाएक उन्हें लगा कि इंजिन कक्ष में किसी की आवाज गूँजी-सावधान खतरा है। आगे पुल जला हुआ है। जबर्दस्त विश्वास के साथ होरेस उठ खड़े हुए और पूरी शक्ति से गाड़ी रोकने का उपक्रम किया गाड़ी बीच में ही रुक जाने से परेशान कमाण्डर नीचे आये और गाड़ी रोकने का करण पूछा तो होरेस ने अपने पूर्वाभास की बात बताई। कमाण्डर बहुत बिगड़ा और गाढ़ी स्टार्ट करने का आदेश दिया किन्तु होरेस ने स्थिति स्पष्ट हुए बिना गाड़ी चलाने से स्पष्ट इनकार कर दिया। पता लगाया गया तो बात सच निकली कमाण्डर ने केवल क्षमा याचना की अपितु हजारों सैनिकों की जीवन रक्षा के लिए होरेस को हार्दिक धन्यवाद दिया किन्तु होरेस कृतज्ञता पूर्वक यही कहते रहे यह तो उन अज्ञात आत्मा की कृपा है जो मुझे ऐसा अनुभव कराते रहते हैं।
एक बार तो शिकागो से लौटते समय बड़ी ही विलक्षण घटना घटी। तब एकाएक उन्हें किसी ने कहा सामने इसी पटरी पर दूसरी गाड़ी आ रही है, गाड़ी तुरन्त पीछे लौटाओ। बड़ी कठिन परीक्षा थी, किन्तु अदम्य विश्वास के सहारे होरेस ने पूरी शक्ति और सावधानी से गाड़ी रोक दी और उसकी रफ्तार पीछे को कर दी। गाड़ी में बैठे यात्री चालक की सनक पर झुँझला ही रहे थे कि सामने से धड़धड़ाता हुआ इंजन इस गाड़ी पर चढ़ बैठा। एक ही दिशा होने और सम्भल जाने के फलस्वरूप किसी भी यात्री को चोट नहीं आई मात्र इंजन को मामूली क्षति पहुँची। पीछे सारी बात ज्ञात होने पर यात्री होरेस के प्रति कृतज्ञता से आविर्भूत हो उठे, साथ ही इस विलक्षण पूर्वाभास पर वे आश्चर्य चकित हुए बिना भी न रह सके।
सन्त सुकरात को भी इसी तरह पूर्वाभास होता था पूछने पर वे कहते थे- कोई ‘डीमन’ उनके कान में सब कुछ बता जाता है। होरेस की स्थिति भी ठीक वैसी ही है।
इस तरह के अतीन्द्रिय प्रत्यक्ष बोध जब कसौटी पर सत्य पाये गये तब वैज्ञानिकों को भी उसके सत्य तक पहुँचने की जिज्ञासा जागृत हुई। इस समय इंग्लैण्ड, अमेरिका, जर्मनी, रूस, चैकोस्लोवाकिया, नीदरलैण्ड आदि अनेक प्रमुख देशों में “परामनोविज्ञान” की शाखाओं का तेजी से विकास हो रहा है जो इस तरह की घटनाओं से विस्तृत अध्ययन और विवेचन द्वारा वस्तु स्थिति तक पहुँचने का प्रयास करती है। अतीन्द्रिय बोध या पूर्वाभास को तीन खण्डों में विभक्त करते हुए रूसी परा मनोवैज्ञानिक की मान्यता है कि मनुष्य के “मन” में कुछ ऐसे तत्त्व विद्यमान हैं, जिनकी जानकारी विज्ञान को तो नहीं है किन्तु यदि उनका विकास और नियन्त्रण किया जा सके तो यह एक नितान्त सामान्य वैज्ञानिक प्रक्रिया के रूप में सामने आ सकता है। उनके अनुसार यह इन्द्रियों को क्षमता विस्तार का एक अति प्रारम्भिक चमत्कार हैं मनीषियों का मत भी यही है कि मन की सामर्थ्य अनन्त और अपार है उसे जितना अधिक पैना, केन्द्रित और सूक्ष्म ग्राही बनाया जायेगा वह उतना ही अधिक विलक्षण और चमत्कारी ज्ञान-विज्ञान अनुभूति और क्षमताओं से विभूषित होता चला जायेगा।
पूर्वाभास की तीन कक्षाएँ है (1) पारेन्देय ज्ञान- (टेलीपैथी) या किसी जीवित व्यक्ति द्वारा घनीभूत स्मृति, अत्यधिक भावुक होकर हृदय से किसी को पुकारना या सन्देश देना (2) अतीन्द्रिय ज्ञान (ड़ड़ड़ड़) जिसमें अपनी स्वतः की क्षमताएँ विस्तृत होकर घटना स्थल से सायुज्य स्थापित करती और अपनी अन्तःस्थिति के अनुरूप स्थिति का बोध करती है। (3) पूर्व संचित ज्ञान-अर्थात् पूर्व जन्मों की स्मृति जो मस्तिष्क में साइनेप्सेस (मस्तिष्क में भूरे रंग का एक पदार्थ होता है।) उसमें कुछ उस तरह की विलक्षण आड़ी टेढ़ी लाइनें होती है। जैसे राख के ढेर में किसी कीड़े के रेंग जाने से पड़ जाती है। इन्हें “साइनेर्प्सस” कहते हैं। इनमें जब मन एक क्षण के लिए एकाकार होता है तो ग्रामोफोन या टेपरिकार्डर पर सुई घूमने से उत्पन्न ध्वनि की तरह पूर्वाभास या भविष्य ज्ञान ऐसा हो सकता है मानसिक संस्थान की रचना जितनी विलक्षण है उतनी ही अद्भुत शक्ति क्षमताओं से वह ओत-प्रोत भी है। बिना तार के तार से भी उन्नत प्रकार से यदि इस तरह प्रकृति के अन्तराल के रहस्य कभी अनायास ही समझ में आ जाये तो इस मानसिक संस्थान को प्रौढ़ बनाकर उसे विकसित करके तो और भी महत्त्वपूर्ण लाभ-योगियों जैसी सिद्धियाँ सामर्थ्य प्राप्त की जा सकती है।
विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर नौका-विहार कर रहे थे। पूर्णिमा की रात्रि। चन्द्रमा की स्निग्ध-शीतल चाँदनी लहरों के स्पर्श-सहयोग से प्रत्येक क्षण एक नवीन सौन्दर्य-दृश्य का सृजन करती, स्वयं को तथा परिवेश को सार्थक कर रही थी।
कविवर एक काव्य संकलन में खोए हुए थे एक मधुर छन्द को पढ़ने में तल्लीन थे। रचना का सौंदर्य उन्हें पुलकित-प्रमुदित कर रहा था। नाव घूमी, हवा का एक तेज झोंका आया और दीप बुझ गया। क्षण भर को कवि व्यग्र हो उठे, सौंदर्य-आस्वादन से वंचित हो जाने के भाव ने चंचल कर दिया। तभी चारों ओर नृत्य कर ही चन्द्रिका की क्रीड़ा-छवियों पर ध्यान गया। वे चौंक उठे-अनन्त सौंदर्य चारों ओर उल्लास बिखेर रहा था। काव्य-पाठ का उल्लास इस असीम उल्लास के सामने कितना फीका है, यह सौंदर्य दृष्टा रवीन्द्र से अधिक कौन जान सकता था? उनके मन में आनन्द, विस्मय, उल्लास और बोध की नई तरंगें छन्दबद्ध होने लगी। वे मन ही मन गा उठे-” हे प्रभु! तुम्हारे इस असीम सौंदर्य की उपेक्षा कर मैं इसी के एक सीमित स्वल्प प्रतिबिम्ब में ही उलझ गया था। विस्मृति का यह दंश अब भविष्य में कभी भूले नहीं। मेरा मन परिमित वाणी की परिधि में ही बन्दी न हो जाय। वह तुम्हारे असीम सौंदर्य, अनन्त विस्तार और उसकी झलक पा सकने की अपनी क्षमता को सदा याद रखे।”
प्रभु अपरिमित आनंद, अनन्त, असीम सौंदर्य हम सभी के चारों ओर सदा ही बिखेरते रहते हैं। हमारे चतुर्दिक् एक एक अनूठे अवसर पुरुषार्थ और उपलब्धि के आते रहते हैं। किन्तु हमारा मन अपनी ही बनाई सीमाओं में बन्दी बना रहता है। वह स्व-निर्मित कल्पना-चित्रों से परे या यथार्थ देखना ही नहीं चाहता। देख सकता तो उसे भी वही अनुभूति होती, जो रवीन्द्र को तथा अन्य महामानवों को होती रही है।
भगवान के इस विश्व उद्यान में जहाँ एक और प्रगति के प्रचुर आधार भरे पड़े हैं और सुख साधनों की भरमार हैं, वहाँ विकृतियों ओर अवाँछनीयताओं की भी कमी नहीं । दैवी सत्प्रवृत्तियों की तरह दुष्टता और दुर्बुद्धि का भी वैभव विस्तार छाया दीखता है। कई बार यह असमंजस होता है कि सृष्टा ने अपनी इस सुरम्य कलाकृति को ऐसी विसंगतियों से क्यों भर दिया कि एक ओर जहाँ श्रेष्ठता की कमी नहीं, दूसरी ओर वहाँ दुष्टता भी सृष्टि सौंदर्य को निगल जाने के मनसूबे बाँधती रहती हैं। जब नीति बनी तो अनीति के अस्तित्व की क्या आवश्यकता थीं? जब देव मौजूद थे तो दैत्यों का प्रकटीकरण किस लिए हुआ?
उपभोक्ता की दृष्टि से हमारा यह सोचना ठीक हो सकता है, पर यदि हम निर्माता की स्थिति में होते तो समस्या दूसरे ही रूप में सामने होती ओर उसका समाधान करने के लिए हमें भी वही करना पड़ता जो परमेश्वर को करना पड़ा है। तथ्य यह है कि अनुदान कितने ही मूल्यवान क्यों न हों उनका महत्त्व समझना ओर उपयोग में सतर्कता बरतना तब तक सम्भव हो नहीं हो सकता जब तक कि अभाव या प्रतिकूलता की स्थिति सामने न हो। मात्र सरलता बनी रहने पर तो कठिनाई की कल्पना ही न होंगी और तुलना करने के लिए कोई मापदण्ड सामने न रहने पर उपलब्धि का न तो कोई मूल्य समझा जा सकेगा और न उसमें किसी प्रकार का आनन्द रह जाएगा । जिन्हें निरन्तर प्रचुर सुविधाएँ मिली रहती हैं उन्हें वे भार प्रतीत होने लगती हैं और वैसा रस नहीं लगता, जैसा कि अभाव ग्रस्त स्थिति वालों को उसी को पाने में स्वर्ग सौभाग्य जैसा आनन्द आता है। रसास्वादन में जितना श्रेय सुख-साधनों को हैं उतना ही महत्त्व उस अभावग्रस्त स्थिति का हैं जिसके कारण उन पदार्थों की आकुल आकांक्षा बनी रहती हैं। कड़ी भूख लगने पर रूखी सूखी रोटी भी अत्यन्त स्वादिष्ट लगती हैं जब कि पेट भरा रहने पर व्यंजनों पर भी नाक-भौं सिकोड़नी पड़ती हैं। भोजन की स्वादिष्टता का जितना मूल्य हैं उससे अधिक कड़ाके की भूख लगने का हैं। अभाव की कठिनाई भाव का मूल्यांकन के कारण ही सन्तोष और आनन्द मिलता है। इस आनन्द के लिए ही आकुल आकांक्षा उत्पन्न होती हैं और उसे प्राप्त करने के लिए कठोर परिश्रम करने का साहस उठता है। प्राणियों को विभिन्न प्रकार की हलचलें करने की प्रेरणा इसी से मिलती हैं। मस्तिष्क को उसके आधार खड़े करने के लिए सोच विचार करना पड़ता है। शरीर की तत्परता और मन की तन्मयता का प्रेरणा केन्द्र अभीष्ट उपलब्धियों की आकांक्षा ही रहती हैं और उन आकांक्षाओं का उभार अभाव की कल्पना से उठता है। दरिद्रता की कठिनाइयों की कल्पना करने से सम्पन्नता संचय करने के लिए उत्साह उठता है। रुग्णता ओर दुर्बलता की स्थिति में शरीर की जो दुर्गति होती हैं उससे भयभीत होकर ही लोग स्वास्थ्य रक्षा की चिन्ता करते हैं। यदि सक्षम स्वास्थ्य की निश्चिन्तता रहे तो फिर आरोग्य साधना के लिए जो किया और सोचा जाता है उसकी किसी को आवश्यकता ही न पड़ेगी। फिर आरोग्य स्वाभाविक रहने से उसका महत्त्व भी प्रतीत न होगा तब किसी को स्वास्थ्य का महत्त्व ही प्रतीत न होगा और उसके लिए प्रयत्नशील रहना तो दूर कोई उस संदर्भ में चर्चा तक करना पसन्द न करेगा। ऐसी दशा में मानव जीवन में सुदृढ़ स्वास्थ्य के कारण जो गर्व गौरव एवं आनन्द प्राप्त होता है उसका भी अन्त हो जाएगा । मरण संसार में से उठ जाय तो फिर जिन्दगी को प्यार करने का कोई प्रश्न ही न रहेगा। कुरूपता कहीं रहे ही नहीं तो सौंदर्य के लिए आँखें आज जिस तरह तरसती हैं और देख कर प्रसन्न होती हैं फिर वैसी स्थिति नहीं रहेंगी । सौंदर्य भी सामान्य घास पात की तरह आये दिन की सामने वाली उपेक्षित वस्तु रह जाएगी । ऐसी दशा में सौन्दर्यानुभूति की सरलता का उससे लिए बन पड़ने वाली उत्साह भरी चेष्टा का कहीं कोई चिह्न दिखाई न पड़ेगा।
रात न हो तो दिन की उपयोगिता समझने का प्रसंग ही न उठेगा। न दिन का महत्त्व प्रतीत होगा और न उन घण्टों में में तत्परतापूर्वक श्रम करने की आवश्यकता प्रबल होगी। ऐसी दशा में मनुष्य नितान्त शिथिल बने रहेंगे। उत्साह तो अतिरिक्त लाभ पाने के लिए अथवा सम्भावित कठिनाई से बचने के लिए उत्पन्न होता है। उत्साह एक उत्तेजना है जो लाभ कमाने एवं भय से बचने की कल्पना के सहारे उठती है। उच्चस्तरीय लोगों में भी जो उत्कृष्ट साहस और पुरुषार्थ प्रकट होता है उनके मूल में भी यही तथ्य काम करते हैं। यह बात दूरी है कि वे लाभ की परिभाषा व्यक्तिगत सुविधा के स्थान पर सामूहिक सुविधा की बात सोचें और परलोक लाभ को प्रधानता दें। इसी प्रकार वे भी सार्वजनिक विनाश और परलोक की नरक जैसे दुखों की विभीषिका को ध्यान में रखते हुए उत्साह उभारते हैं यह स्तर भर का अन्तर है। उत्साह जिसे शक्ति का स्रोत कह सकते हैं बिना किसी लाभ या भय के उभरता ही नहीं और स्पष्ट है कि उत्साह की उत्तेजना ही मूर्छित व्यक्तित्व को जगाती, उभारती है। उसे प्रगति की दिशा में धकेलती और महत्त्वपूर्ण कार्य कराती हैं यदि उमंगें न उभरें तो मनुष्य को शरीर यात्रा की सामान्य क्रिया करते रहने के अतिरिक्त और कुछ न तो करते बन पड़ेगा और न सोचते। ऐसी दशा में वह अर्ध मृतक-अर्ध मूर्छित स्थिति में पड़ा खाने सोने जैसे जीवन चिह्न भर धारण किये रहेगा। उस साहसी मनोभूमि का वरदान पाने से वंचित ही बना रहेगा जिसके सहारे नगण्य से नर-बानर ने सृष्टि का मुकुट मणि कहलाने का अवसर प्राप्त किया है।
अनुकूलता और प्रतिकूलता दोनों के ही अपने-अपने लाभ है। अनुकूलता, सुविधा एवं सफलता प्राप्त होने से मनुष्य को आत्म-गौरव की अनुभूति होती है। सफलता पर गर्व करने के साथ-साथ वह अपने व्यक्तित्व का वर्चस्व भी अनुभव करता है। यह आत्माभिमान, आत्मावलम्बन का विश्वास दिलाता है ओर अपनी क्षमता के बारे में यह मान्यता बनाने का अवसर मिलता है कि आगे भी बड़े काम करने और बड़े लाभ पाने की स्थिति आनी है। यह मान्यता जिस किसी के अन्तराल में आस्था बन कर बैठ जाती है निश्चय ही वह बहुत सामर्थ्यवान सिद्ध होता है। आत्मबल से बड़ा और कोई बल नहीं और वह आत्मबल को ही मनोबल कहते हैं मनस्वी लोग उच्चस्तरीय शक्ति सम्पन्न माने जाते हैं वे साधन हीन होते हुए भी-सहयोग और समर्थन न मिलने पर भी बहुधा ऐसे काम कर गुजरते हैं जिन्हें देखकर आश्चर्य से दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। इसमें मनोबल की सामर्थ्य ही चमत्कार दिखाती हैं। संसार के महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों का बड़े महत्त्वपूर्ण काम कर गुजरने के पीछे यदि आधार तलाश किया जाय, तो उनका मनोबल ही काम करता प्रतीत होगा। उसी की प्रेरणा से शरीर अथक परिश्रम करता है। मस्तिष्क में उमंगें छाई रहती है और अन्तःकरण में सफलता की आशा, उज्ज्वल भविष्य की आस्था सुदृढ़ बनी रहती हैं स्पष्ट है कि मनोबल छोटी-छोटी सफलताएँ प्राप्त करते करते विकसित होता है। वह आसमान से किसी पर नहीं टपकता। छोटे कदम, छोटे प्रयोग, छोटी सफलता का क्रम चलता रहे तो मनुष्य क्रमशः अधिक आत्मविश्वासी बनता जाता है और इस आधार पर विकसित हुई प्रतिभा के सहारे अपने शरीर तन्त्र के-मनःसंस्थान के हर कल पुर्जे को क्रिया कुशल बनाकर सचमुच इस स्थिति में जा पहुँचता है कि उसे अतिरिक्त शक्ति सम्पन्न-असाधारण महत्त्व एवं सामर्थ्य का व्यक्ति समझा जा सके।
यह सुविधा पक्ष हुआ। असुविधा एवं प्रतिकूलता की उपयोगिता इसे भी अधिक हैं पर वह कष्ट कारक रहने से रुचि कर नहीं लगती और आमतौर से लोग उससे डरते बचते ही देखे जाते हैं। इतने पर भी उसका मूल्य किसी प्रकार कम नहीं होता। आवश्यकताओं को आविष्कारों की जननी कहा गया है। प्राणि शास्त्र के ज्ञाता कहते हैं कि जीवधारियों के शरीरों में जो परिवर्तन हुए है उसका कारण उनकी आकांक्षाएँ और आवश्यकताएँ ही रही है। मन जिस वस्तु या स्थिति को पाने के लिए मचलता है उसके लिए भीतर से क्षमताएँ उभरती है और बाहर से साधन जुटते हैं चेतना की अद्भुत शक्ति का इसे प्रत्यक्ष चमत्कार समझ जा सकता है। शाकाहारी प्राणियों ने आत्म रक्षा के लिए और माँसाहारियों ने शिकार पर सफल आक्रमण करने के लिए अपने शरीरों में क्रमशः परिवर्तन किये है। सृष्टि के आरम्भ में प्राणियों के शरीर वैसे नहीं थे जैसे पीछे बनते बदलते चले गये। इस परिवर्तन का एकमात्र कारण जीव शास्त्रियों के शोध निष्कर्ष से यही सिद्ध हुआ है कि उनकी अन्तःचेतना में प्रस्तुत कठिनाइयों के समाधान की अकुलाहट और अधिक अनुकूलता की अभिलाषा उत्पन्न हुई। उसके दबाव से शरीर और मस्तिष्क ने तद्नुरूप ढलना आरम्भ कर दिया। अन्य प्राणियों की तरह मानवी प्रगति का इतिहास भी यही है। यह प्रखरता प्रतिकूलताओं के साथ होने वाली टकराहट की प्रतिक्रियाओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
हथियारों की धार तेज करने के लिए उसे पत्थर पर रगड़ना पड़ता है। रगड़ एक अप्रिय घटना हैं। यदि वह स्वीकार न हो तो फिर हथियारों, औजारों की धार रखने और उन्हें कारगर बनाये रहने की आशा छोड़नी पड़ेगी। व्यायाम क्रियाओं में दबाव पड़ता है और कष्ट होता है। ऐश आराम के आदी लोगों के लिए व्यायाम की कठोरता का सहन करना किसी भारी दण्ड भुगतने की तरह ही कष्ट कारक प्रतीत होगा, पर जिन्हें शरीर की बलिष्ठता अभीष्ट है वे दण्ड-बैठक आदि कष्टकारक क्रियाएँ शरीर के असुविधा अनुभव करने पर भी किये ही चले जाते हैं। शिल्पी और कलाकार अपने विषयों को प्रवीणता पाने के लिए किस कदर मन मार कर अभ्यास करते हैं यह उनके साथ रहकर जाना जा सकता है। जो उस कठोर तत्परता में आनाकानी करते हैं उनकी सफलता उसी अनुपात में अनिश्चित बनती जाती है।
यदि सब कुछ सरलतापूर्वक होता चला जाया करे तो मनोरथ भले ही पूरे हो सकें पर प्रतिभा के विकास का मार्ग एक प्रकार से अवरुद्ध ही होता चला जाएगा । अमीरों की सन्तानें आमतौर से आलसी, मन्दबुद्धि और दुर्व्यसनी होती हैं जबकि कठिनाइयों का सामना करने वाले परिवारों की सन्तानें आश्चर्यजनक प्रगति करते देखी जाती हैं इस प्रकार की घटनाओं में प्रतिकूलताओं से टकराने पर उत्पन्न होने वाली शक्ति की कमी वैसी ही अपनी-अपनी भूमिका निभाती देखी जा सकती हैं
आत्मिक प्रगति के लिए तप−तितिक्षा की साधना करनी पड़ती है। इससे कष्टों और कठिनाइयों को जानबूझकर आमन्त्रित किया जाता है। प्रायः सभी प्रकार की तपश्चर्याएँ शरीर को कष्ट देने वाली और मन को अखरने वाली होती है। उन्हें आमन्त्रित करने का उद्देश्य प्रतिकूलताओं से टकराने पर उत्पन्न होने वाली शक्ति का लाभ उठाना हैं जल प्रपातों की धारा से घूमने वाले पहिये जोड़ दिये जाते हैं। और उतने भर से बिजली घर, पनचक्की तथा दूसरे कल कारखाने चलने लगते हैं। रगड़ से गर्मी, बिजली उत्पन्न होने के सिद्धांत विज्ञान के आरम्भिक विद्यार्थी भी जानते हैं। प्रखरता चाहे भौतिक क्षेत्र की हो या आध्यात्मिकता की। प्रतिकूलताओं के साथ टक्कर लेने से ही उत्पन्न होती है। यह प्रतिकूलता प्रकृति प्रदत्त है या अपने आप उत्पन्न की हुई यह दूसरी बात है। हर हालत में प्रतिकूलता से टकराने पर ही किसी को शूरवीर, साहसी, पराक्रमी, पुरुषार्थी बनने का अवसर मिलता है। यही व्यक्तित्व की समर्थता का मूलभूत उद्गम स्रोत हैं चैन से दिन काटते रहने पर समय तो आराम से बीत सकता है पर उस शारीरिक ओज और मानसिक तेज से वंचित ही रहना पड़ेगा जिसे जीवधारियों का सार तत्त्व ‘प्राण’ कहा जाता है। प्राणवान बनने के लिए ऐसा साहस चाहिए जो व्यावहारिक जीवन में प्रतिकूलताओं से टकराते-टकराते स्वभाव और अभ्यास के साथ पूरी तरह घुल−मिल गया हो। प्राचीनकाल में अपनी सन्तान को दूरदर्शी अभिभावक गुरुकुलों में पढ़ने भेजते थे जहाँ उन्हें असुविधा युक्त जीवनचर्या अपनानी पड़ती थी। सम्पन्न व्यक्ति यदि चाहे तो घर पर अध्यापक नौकर रख कर बालकों की सुख सुविधा का उपभोग करते हुए पढ़ाने का प्रबन्ध कर सकते हैं। अथवा अमीरों के उपयुक्त प्रथम विद्यालयों की व्यवस्था कर सकते थे। पर वे जानते थे कि शौक-मौज के वातावरण में पले हुए बच्चे हर दृष्टि में दुर्बल ही बने रहेंगे और जीवन संग्राम के किसी भी कठिन मोर्चे पर सफलता प्राप्त न कर सकेंगे। अस्तु उचित यही है कि प्रारम्भ से छाती कड़ी करके कष्ट साधना अपनाई जाय ओर पीछे के लिए प्रति के लिए नितान्त आवश्यक प्रखरता का उपार्जन किया जाय। बालकों को आरम्भ में थोड़ी असुविधा भले ही रहे पर दूरगामी ओर चिरस्थायी लाभ तो तपस्वी जीवन के फलस्वरूप ही मिलता है। यह तथ्य जब तक छात्रों, अध्यापकों और अभिभावकों को स्वीकार रहा तब तक गुरुकुलों के छात्र ओजस्वी, तेजस्वी और मनस्वी बन कर निकलते रहे और अपनी प्रतिभा का हर क्षेत्र में परिचय देते रहे।
तथ्यों को सन्तुलित रीति से ही समझना चाहिए, अतिवादिता से नहीं । गरीबी, दरिद्रता, बीमारी, उत्पीड़न, पिछड़ेपन की स्थिति में पड़े रहने से तपश्चर्या होती है, इसलिए कष्टकर स्थिति में पड़े रहना और सन्तोष करना उचित है ऐसा सोच बैठना तो अर्थ का अनर्थ करना हो जाएगा, कष्ट में शक्ति नहीं वह तो उल्टा मनोबल तोड़ता है। शक्ति तो टकराने से उत्पन्न होती है। प्रस्तुत कठिनाइयों से जितनी तीव्रता से टकराया जाएगा उतनी ही सामर्थ्य पैदा होगी। यदि दुर्गति के नीचे शिर झुका दिया गया उन्हें भाग्य का खेल समझकर सहन स्वीकार कर लिया गया तो समझाना चाहिए कि एक प्रकार से मन्द स्तर की आत्महत्या ही अपना ली गई। चूँकि टकराने के लिए प्रतिकूलता ही चाहिए। इसलिए वैसे अवसर जब भी मिलें, रोने खीजने की आवश्यकता नहीं है वरन् यह सोचा जाना चाहिए-मनोबल बढ़ाने और प्रखरता संजोने का एक सुअवसर सामने आया। खोजने वाले विष में से भी अमृत खोज लेते हैं हमारा चिन्तन यह होना चाहिए कि प्रकृति व्यवस्था से जो कठिनाइयाँ सामने आ खड़ी हुई उनसे मल्ल युद्ध करके अपनी वरिष्ठता सिद्ध करने का लाभ कमाया जाय।
तपस्वी किन्हीं आदर्शों की पूर्ति के लिए कष्ट उठाने की पूर्ण क्षमता उपार्जित करने के लिए सन्तुलित मात्रा में ऐसे कष्टों को विचारपूर्वक आमन्त्रित करते हैं जो आत्मिक और भौतिक प्रगति के समान रूप से सहायक हो। वे व्यायाम एवं उपचार स्तर के होते हैं उनकी तुलना गरीबी, बीमारी, अनीति एवं विपत्ति के कारण हुए कष्टों से नहीं की जानी चाहिए। वे तो निरस्त ही किये जाने योग्य हैं उन्हें सहन करने की बात सोचने से तो टकराव का आधार ही नष्ट हो जाएगा और गई गुजरी स्थिति में पड़े रहने से तो रहा बचा मनोबल भी समाप्त हो जाएगा । विपत्ति से असली हानि उसकी उपस्थिति से नहीं होती, जब मनःस्थिति उससे लोहा लेने में असमर्थता प्रकट करती है तभी व्यक्ति टूटता है और हानि सहता है।
मनुष्य की तेजस्विता उभारना सृष्टा को अभीष्ट है। वह अपने पुत्रों को साहसी, पराक्रमी देखना चाहता है। पराक्रम और पुरुषार्थ को ही सफलता का बीज माना गया है। योद्धा के लिए कोई प्रतिपक्ष तो चाहिए ही। अखाड़े में पड़े भारी पत्थरों को उठाने और मुद्गरों को घुमाने से पहलवानों की छाती, कलाई मजबूत बनती है इनमें प्रत्यक्ष कठिनाई और असुविधा तो अवश्य है पर साथ ही यह परोक्ष लाभ है। बालक हनुमान शिला पर गिरे थे और वह उनके प्रहार से टूट गई थी उसी दिन से उनका नाम बजरंगबली - वज्र जैसे अंग वाला पड़ा। हमें प्रतिकूलताओं की ऐसी शिलाओं की प्रतीक्षा में बैठे रहना चाहिए कि उनसे टकराकर अपनी गौरव गरिमा सिद्ध करने का अवसर प्राप्त करें। इनसे प्रत्यक्षतः कुछ हानि भी उठानी पड़ती हो तो हर्ज नहीं। सतर्कता, कुशलता, साहसिकता, दूरदर्शिता जैसी अनेकों विभूतियाँ इस टकराव से मिलती है जो जीवन संघर्ष के समय उठाई गई हानियों की तुलना में कहीं अधिक मूल्यवान है।
सृष्टि में कठिनाइयाँ और प्रतिकूलताएँ देखकर हमें सृष्टा की अदूरदर्शिता का असमंजस नहीं करना चाहिए। हमारे लिए प्रगति के महत्त्वपूर्ण साधन के रूप में उन्हें सृजा गया है। उन्हें उसी रूप में देखा, समझा जाना चाहिए और उनके साथ किसी प्रकार निपटना चाहिए, इसका दूरदर्शिता पूर्ण निर्णय करना चाहिए।
“यह शरीर माटी का पुतला” अब यह कहावत पुरानी पड़ गई है। वैज्ञानिक भी अब धीरे-धीरे इस भारतीय तत्त्वदर्शन की मान्यता के समीप आते जा रहे हैं जिसमें मनुष्य की अन्तःचेतना या उसके प्राण-शरीर की भूरि-भूरि महत्ता प्रतिपादित की और उसके विकास को ही मनुष्य जीवन की सर्वोपरि उपलब्धि माना है। भारतीय तत्त्व विज्ञान की मान्यता यह है कि शरीर के स्थूल पार्थिव तत्त्वों को समावेश होने पर भी शरीर के सूक्ष्म आग्नेय स्फुल्लिंग जिनसे अन्तरङ्ग आत्म-चेतना बनती है अधिक महत्त्वपूर्ण है।
शाँखायन का मत है-
प्राणोऽस्मि प्राज्ञात्या। तं मामायुरमृत भित्यु-प्रमृत भित्युपास्स्वाऽऽयुः प्राणः प्राणोवा आयुः। यावदस्मिच्छरी रे प्राणोतसति तावदायुः। प्राणेन हि एवगस्मिन लोकऽमृतत्त्व माप्नोति।
मैं ही प्राण रूप प्रज्ञा हूँ। मुझे ही आयु अमृत जान कर उपासना करो, जब तक प्राण है तभी तक जीवन है। इस लोक में अमृतत्व प्राप्ति का आधार प्राण ही है।
प्राण के आग्नेय स्वरूप को इस तरह निरूपित किया है-
एषोऽग्निस्तपत्येष सूर्य एषपर्जन्यो मद्यवानष्। एष पृथिवी रयिर्देवः सदसच्चामृतं चयत्॥ प्रश्नोपषिद् 2/5
रासायनिक विश्लेषण से भले ही यह बात सिद्ध न हो, पर जो वस्तु अस्तित्व में हैं वह किसी न किसी रूप में कभी न कभी व्यक्त होती ही रहती है। लन्दन के सुप्रसिद्ध स्नायु रोग विशेषज्ञ डॉ जान ऐश क्राफ्ट को जब यह बताया गया कि उनके नगर में ही एक 11 वर्ष किशोरी कन्या जेनी के मार्गन के शरीर में असाधारण विद्युत शक्ति है कोई भी व्यक्ति उसका स्पर्श नहीं कर सकता तो उनको एकाएक विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि हाड़-माँस के शरीर में अग्नि जैसा कोई तेजस् तत्त्व और विद्युत जैसी क्षमतावान् शक्ति भी उपलब्ध हो सकती है उसके परीक्षण का निश्चय कर वे जेनी मार्गन को देखने उसके घर पर जा पहुँचे। बड़े आत्मविश्वास के साथ जेनी से हाथ मिलाने के लिए उन्होंने अपना हाथ आगे बढ़ाया। जेनी बचना चाहती थी किन्तु डाक्टर के स्वयं आगे बढ़ कर उसके हाथ का स्पर्श किया उसके बाद जो घटना घटी वह डॉ ऐश के लिए बिलकुल अनहोनी और विलक्षण घटना थी। एक झटके साथ वे दूर फर्श पर जा गिरे, काफी देर बाद जब होश आया तो उन्होंने अपने आपको एक अन्य डाक्टर द्वारा उपचार करते हुए पाया। उन्होंने स्वीकार किया कि इस लड़की के शरीर में हजारों वोल्ट विद्युत प्रभार से कम शक्ति नहीं है। सामान्य विद्युत धारा से साधारण झटका लग सकता है किन्तु 150 पौण्ड के आदमी को दूर पटक दे इतनी असामान्य शक्ति इतने से कम विद्युत भार में नहीं हो सकती ।
वास्तव में बात थी भी ऐसी ही। जेनी मार्गन जिस किसी व्यक्ति के सम्पर्क में आई, उन सबने यही अनुभव दोहराया। एक दिन जेनी अपने दरवाजे पर खड़ी थी। उधर से एक ताले बेचने वाला निकला। वह जेनी से ताला खरीदने का आग्रह करने लगा। जेनी के मना करते करते उसने सस्ते ताले का प्रलोभन देकर ताला उसके हाथ में रख दिया। उसी के साथ उसके हाथ का जेनी के हाथ से स्पर्श हो गया, फिर तो जो हालत खाकर ताले वाला पीछे जा गिरा। बड़ी देर में उसे होश आया तो वह अपना सामान समेट कर भागते ही बना। इस तरह की ढेरों घटनाएँ घट चुकने के बाद ही डॉ ऐश ने जेनी के अध्ययन का निश्चय किया था किन्तु शरीर में उच्च विद्युत वोल्टेज होने के कारण का वे भी कोई निष्कर्ष नहीं निकाल सके।
बुरी हालत तो बीती एक युवक पर जो जेनी को प्यार की दृष्टि से देखता था। जेनी जो अब तक अपने इस असामान्य व्यक्तित्व से ऊब चुकी थी । किसी भावनात्मक संरक्षण की तलाश में थी इस युवक को पाकर गदगद हो उठी, किन्तु भय वश स्नेह सूत्र भावनाओं तक ही जुड़े थे। शरीर स्पर्श से दोनों ही कतराते आ रहे थे। एक दिन युवक ने जेनी को एक ओपेरा में काफी की दावत दी । काफी पीकर जेनी जैसे ही उठी फर्श पर पैर फिसल जाने से वह गिर पड़ी। युवक उसे बचाने दौड़ा किन्तु अभी जेनी को समेट भी नहीं पाया था कि स्वयं भी पछाड़ खा कर एक मेज़ पर जा गिरा इससे वहाँ न केवल हड़कम्प मच गया अपितु उस पर एक साथ कई गर्म प्याले लुढ़क गये जिससे वह जल भी गया। काफी उपचार के बाद बेचारा घर तक जाने योग्य पाया। ओपेरा में उपस्थित सैकड़ों लोगों के लिए यह विलक्षण दृश्य था जिससे जेनी की ख्याति दूर-दूर तक फैल गई, पर युवक ने फिर कभी मुड़कर भी उसे नहीं देखा। देखा वैज्ञानिकों ने, पर हुई उनकी भी दुर्गति। इस विद्युत भार का कोई कारण किसी की समझ में नहीं आया। सन् 1950 तक जेनी जीवित बिजली घर रही उसके बाद अपने आप ही उसकी यह क्षमता विलुप्त हो गई।
इस तरह अनायास ही जाग पड़ने वाली शरीर विद्युत की तरह कई शरीरों में प्राण शक्ति अग्नि के रूप में प्रकट होने की भी घटनाएँ है। वास्तव में सभी भौतिक शक्तियाँ परस्पर परिवर्तनीय है अतएव दोनों तरह की घटनाएँ एक ही परिप्रेक्ष्य में आती है।
प्राणाग्नय एवास्मिन् ब्रहापुरे जाग्रति प्रश्नोपनिषद्
इस ब्रह्मपुर अर्थात् शरीर में प्राण ही कई तरह की अग्नियों के रूप में जलता है।
कई बार यह विद्युताग्नि इतनी प्रचण्ड रूप में जागृति हुई है कि वह स्वयं धारण को ही लील बैठी। चेम्सफोर्ड इंग्लैण्ड में 20 सितम्बर 1938 को एक ऐसी घटना घटी। एक आलीशान होटल में आर्केस्ट्रा की मधुर ध्वनि गूँज रही थी। नृत्य चल रहा था तभी एक महिला के शरीर में तेज नीली लौ फूटी। लोग भय वश एक और खड़े हो गये। लपटें देखते-देखते लाल ज्वाला हो गई और कुछ ही क्षणों में युवती का सुन्दर शरीर राख की ढेरी बन गया। 31 मार्च 1908 को हिटले ( इंग्लैंड ) में ही ऐसी ही एक और घटना घटी थी। जोनहार्ट नामक एक व्यक्ति बैठा कोई पुस्तक पढ़ रहा था, सामने कुर्सी पर उसकी बहन बैठी थी, एकाएक उसके शरीर से आग की लपटें निकलने लगीं। जोन ने बहन को तुरन्त एक कम्बल से ढका और दौड़ा डाक्टर को बुलाने। 10 मिनट में ही नीचे स्ट्रीट से डाक्टर वहाँ पहुँचे किन्तु उनके पहुँचने से पूर्व ही बहन, कुर्सी और कम्बल सब एक राख की ढेरी में परिणत हो चुके थे।
अमेरिका में अब तक ऐसी 200 मौतें हो चुकी है। फ्लोरिडा का एक व्यक्ति सड़क पर जा रहा था कि एकाएक उसके शरीर से आग की नीली लपटें फूट पड़ी । सहयात्रियों में से एक ने उसके शरीर पर पानी की बाल्टी उड़ेल दी। आग थोड़ी देर के लिए शान्त हो गई। जब तक डाक्टर और गुप्तचर विभाग वहाँ पहुँचे तब तक पानी सूख चुका था और सैकड़ों दर्शकों की उपस्थिति में ही आग का भभका फिर उठा और वह व्यक्ति वहीं जल कर ढेर हो गया, फ्लोरिडा के मेडिकल जनरल में छपे एक लेख में वैज्ञानिकों ने हैरानी प्रकट की कि मनुष्य शरीर में 90 प्रतिशत भाग जल होता है, उसे जलाने के लिए 5000 डिग्री फारेनहाइट की अग्नि चाहिए वह एकाएक कैसे पैदा जाती है। शरीर के कोषों (सेल्स) में अग्नि स्फुल्लिंग “प्रोटोप्लाज्मा” में सन्निहित रहते हैं, पर वह इतने व्यवस्थित रहते हैं कि शरीर के जल जाने की आशंका नहीं रहती। प्रोटोप्लाज्मा-उच्च प्लाज्मा में बदलने पर ही अग्नि बन सकती है यह सब एकाएक कैसे हो जाता है यह वैज्ञानिकों की समझ में अब तक भी नहीं आया।
टोकियो (जापान) की नेशनल मेडिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने इस तरह की घटनाओं पर व्यापक अनुसंधान किया और कुछ महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले हैं इस संस्था के वैज्ञानिकों का कथन है कि आमतौर पर एक बल्ब 25 वोल्ट से 60 वोल्ट का विद्युत बल्ब जलाने जितनी विद्युत की न्यूनाधिक मात्रा प्रत्येक शरीर में पाई जाती है। ट्रांजिस्टर के “नोब” को हाथ की उँगलियों का स्पर्श देकर बजाये तो ध्वनि की तीव्रता बढ़ जाती है उँगलियाँ हटाने पर आवाज कुछ क्षीण हो जाती है, यह इसी तथ्य का प्रमाण है। विद्युत चिनगारियों के मामले आये हैं उनमें भी विद्युत आवेश अधिकांश उँगलियों में तीव्र पाया गया है, पर असीमित-शक्ति का कोई कारण खोजा नहीं जा सका।
भारतवर्ष की तरह जापान की धार्मिक आस्थाओं योग साधनाओं का केन्द्र है। सामान्य भारतीय की तरह उनमें भी आध्यात्मिक अभिरुचि स्वाभाविक है। एक घटना के माध्यम से जापानी वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष निकालने का भी प्रयास किया है कि शरीर में विद्युत की उपस्थिति का कारण तो ज्ञात नहीं किन्तु जिनमें भी यह असामान्य स्थिति पाई गई उनके मनोविश्लेषण से पता चलता है कि ऐसे व्यक्ति या तो जन्म-जात आध्यात्मिक प्रकृति के थे या कालान्तर में उनमें विलक्षण अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास भी हो जाता है। इस संदर्भ में जेनेवा की एक युवती जेनेट डरनी का उदाहरण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। जेनेट 1948 में जब वह 16-17 वर्षीय युवती थी किसी रोग से पीड़ित हुई। उनका वजन बहुत अधिक गिर गया। अब तक उनके शरीर में असाधारण विद्युत भार था वह काफी मन्द पड़ गया था किन्तु किसी धातु की वस्तु का स्पर्श करने पर अब भी उनकी अंगुलियों से चिनगारियाँ फूट पड़ती थी। अब वह अनायास ही ध्यानस्थ हो जाने लगीं। ध्यान की इस अवस्था में उन्हें विलक्षण अनुभूतियाँ होती वह ऐसी घटनाओं का पूर्व उल्लेख कर देतीं जो कालांतर में सचमुच घटित होतीं। व्यक्तियों के बारे में वह जो कुछ बता देतीं वह लगभग वैसा ही सत्य हो जाता। वे सैकड़ों मील दूर की वस्तुओं का विवरण नितान्त सत्य रूप में इस तरह वर्णन कर सकती थीं मानो वह वस्तु प्रत्यक्ष ही उनके सामने है। पता लगाने पर उस स्थान या वस्तु की बताई हुई सारी बातें सत्य सिद्ध होतीं। काफी समय तक वैज्ञानिकों ने जेनेट की इन क्षमताओं पर अनुसन्धान किये और उन्हें सत्य पाया किन्तु वे कोई वैज्ञानिक निरूपण नहीं कर सके- आया इस अचानक प्रस्फुटित हो उठने वाली आग या विद्युत का कारण क्या है?
रहस्य तब और भी गहरा हो जाता जब जीव-जगत इस आश्चर्य से अछूता रह जाता, पर इसे प्रकृति का उपकार ही कहना चाहिए कि मनुष्य जैसी जटिल रचना से जो तथ्य प्रकट नहीं हो पाये वह कुछ-कुछ जीव-जगत में पाई जाने वाली इन्हीं क्षमताओं के विश्लेषण से सामने आने लगे हैं मनुष्यों में तो इस तरह की घटनाएँ कभी-कभी अनायास दिखाई देती है किन्तु जीव-जगत और वनस्पति-जगत में भी ऐसे अनेक उदाहरण है जो इस गुत्थी को सुलझाने में सहायक होने लगे हैं।
वेस्ट इंडीज में ‘ट्रेन इंसेक्ट’ या रेलगाड़ी-क्रीडा पाया जाता है उसके मुँह पर एक लाल रंग का और दोनों बाजुओं में दीपकों की 11-11 की पंक्तियाँ पाई जाती है यह हरा प्रकाश उत्पन्न करती है चलते समय यह कीड़ा रात में चलती रेलगाड़ी की तरह लगता है इसी कारण इसको यह नाम दिया गया है। दक्षिणी अमेरिका में भी यह बहुतायत से पाया जाता है। वेस्टइंडीज में ही ‘कूकूजी’ नामक एक कीड़ा पाया जाता है। इसे मोटर कीड़ा कहते हैं यह जुगनू की ही एक जाति है किन्तु उसके मुँप दो-दीपक होते हैं और वह दोनों पीले रंग का प्रकाश निकालते हैं। स्पेन-अमेरिका के गृह-युद्ध के समय विलियम गोरगास नामक डाक्टर ने इस कीड़ों को एक सफेद शीशी में भर कर उनके प्रकाश में सफल आपरेशन किये थे।
वनस्पति जगत की एक काई भी स्व-प्रकाशित होती है। कटल फिश, दुश्मनों के आक्रमण के समय काले रंग का प्रकाश-बादल फैला देते हैं। झींगा मछलियाँ और अन्य कई जल के जीव अपने शरीरों से प्रकाश, उत्सर्जित करते हैं। जुगनू इस प्रकाश को उपयोग-प्रजनन क्रिया में संकेत के रूप में करते हैं। मादा जुगनू एक बार संकेत करके शान्त हो जाती है तब नर उसे ढूंढ़ता हुआ उस तक आप पहुँच जाता है इस तरह यह जीव किसी न किसी रूप में इस प्रकाश को उपयोग प्रकृति प्रदत्त विभूति के रूप में करते हैं जब कि मनुष्य को उसके लिए वाह्य साधनों का आश्रय लेना पड़ता है।
निर्जीव वस्तु से आग की लपटों का या विद्युत का निकाल लेना इस वैज्ञानिक युग में कोई चमत्कार नहीं रह गया, किन्तु जीवन्त चेतना के यह दृश्य निःसन्देह अचम्भे में डालने वाले है। जुगनू इस मामले में एक बहुत साधारण जीव है जिसकी चमक से किसी को आश्चर्य नहीं होता। समुद्र में बहुत सारे एक कोषीय जीव पाये जाते हैं, जो जुगनू की तरह स्व-प्रकाशित होते हैं दिन में तो उनकी चमक दृष्टिगोचर नहीं होती किन्तु रात में यह जीव रेत-कणों की तरह ऐसे चमकते हैं जैसे अंधेरे आसमान में तारे चमकते हों। बैंजामिन फ्रैंकलिन जो एक प्रसिद्ध विद्युत वैज्ञानिक थे, पहले यह समझते थे कि समुद्र की यह चमक समुद्र के पानी और नमक के कणों से उत्पन्न विद्युत कण है किन्तु पीछे उन्होंने भी अपनी भूल सुधारी और बताया कि समुद्र ही नहीं धरती पर भी सड़ी गली वस्तुएँ खाने वाले अनेक जीव है जो अपने भीतर से विद्युत पैदा करते हैं। कृत्रिम रूप से विनिर्मित विद्युत की मात्रा में ताप की मात्रा उसे कई गुनी अधिक होती है, किन्तु मनुष्य या मनुष्येत्तर जीवों में ऐ क्यों नहीं होता? इस प्रकाश को बैंजामिन ने ठण्डे-प्रकाश (कोल्ड लाइट) को संज्ञा दी है। दो हजार जुगनू एक साथ चमके तो उससे एक मोमबत्ती का प्रकाश उत्पन्न हो सकता है, पर उस प्रकाश को यदि एकत्र किया जाये तो रुई भी नहीं जल सकती, जब कि मोमबत्ती ईंधन को भी जला देगी।
1886 में प्राणि शास्त्रियों ने एक प्रकाश देने वाली सीप के शरीर से ‘लुसिफेरिन’ नामक एक रसायन निकाल कर यह सिद्ध किया कि ऐसे जीवों में यही तत्त्व प्रकाश उत्पन्न करता है यह तत्त्व शरीर की विशिष्ट ग्रन्थियों से निकलता है और आक्सीजन के सम्पर्क में आकर प्रकाश के रूप में परिणत हो जाता है। जुगनू में मैगनेटिक बेल की तरह यह तत्त्व रुक-रुक कर निकलता है इसी से वह जलता बुझता रहता है किन्तु यह तत्त्व किस तरह बनता है इस सम्बन्ध में वैज्ञानिक अब तक कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर सके। सम्भव है जीवन की खोज करते-करते वह रहस्य करतलगत हों जो इन तथ्यों का भी पता लगा सकें और प्राण चेतना की गुत्थियाँ भी सुलझा सकें।
सम्भव है भारतीय योग-विद्या का प्राण विज्ञान इस दिशा में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रकाश डाल कसे। सामान्य मनुष्य के लिए तो प्राणों की मात्रा को इस तरह आश्चर्यजनक रूप में बढ़ा पाना सम्भव नहीं किन्तु “प्राणायाम” आदि के अभ्यास से प्राण मात्रा को इतना विकसित किया जा सकता है कि शरीर में हो रही डिजनरेशन क्रिया को भी नियन्त्रित किया जा सके। अदृश्य रूप से निवास करने वाली इस प्राण शक्ति को शरीर की ऊर्जा के रूप में भारतीय योगी प्रयुक्त कर उस तरह के विलक्षण कार्य करते रहे है जैसे उपरोक्त उदाहरणों में अनायास ही हुए जान पड़ते हैं। अभी कुछ समय पूर्व भौतिक शास्त्रियों ने एक ऐसे कैमरे का विकास किया है जिसके द्वारा प्राणों की किरणों को स्पष्ट देखा और उनका फोटो लिया जा सकता है इसे “किर्लियन फोटोग्राफी” कहते हैं यह विज्ञान की नितान्त प्रारम्भिक गति हैं भारतीय तत्त्वदर्शियों की जानकारियाँ इस संदर्भ में बहुत उच्च कोटि की रही है।
प्रश्नोपनिषद् (4-6) तथा छान्दोग्य उपनिषद् (8-6-3) में प्राण को ही अग्नि अथवा तेजस् कहा है। लय की स्थिति का वर्णन करते हुए छान्दोग्य (6-8-6) में बताया गया है- प्राण की द्रुत चालित अवस्था में ही तेज या अग्नि प्रकट होती हैं वृहदारण्यक में महर्षि उद्दालक के प्रश्नों का उत्तर देते हुए याज्ञवल्क्य ने प्राण को वायु में घुला हुआ तत्त्व बताया है। “वायुः प्राणोभूत्वा” द्वारा एतरेय ने भी उसकी पुष्टि की है जो वैज्ञानिकों की जीवों के प्रकाश सम्बन्धी व्याख्या से मेल खाली है। प्राण-विद्या की शक्ति सामर्थ्य और सम्भावनाएँ अपने आप में एक इतना बड़ा चमत्कार है जिसकी तुलना में उपरोक्त घटनाएँ नितान्त साधारण और तुच्छ है, पर उसकी अनुभूति और विकास को ‘प्राणमय कोष’ की उच्चस्तरीय साधनाओं से ही सम्भव हो सकती है। प्राणों का स्वरूप स्थिति और विज्ञान जान लेने के बाद, आत्मा-परमात्मा और प्रकृति में से जानने के लिए कुछ भी शेष नहीं रह जाता।
वासना, तृष्णा और अहंता-सामान्यतः जन आकांक्षाएँ इन तीन आकर्षणों के ही इर्द-गिर्द घूमती रहती है। शास्त्रकार ने इन्हें ही पुत्रेषणा, वित्तेषणा तथा लोकेषणा कहकर इनकी निन्दा की है और इन्हें आत्मोत्कर्ष की प्रधान बाधा बताकर इनकी निन्दा की है। जन-जीवन में व्याप्त रागद्वेष, कलह, कटुता इन्हीं में आसक्ति का परिणाम होते हैं। जब तक इस संकीर्णता से मुक्ति न मिले, मनुष्य जीवन जैसी देव-दुर्लभ सत्ता कौड़ियों के मोल बिकती रहती है। इन्द्रियों को लुभाने वाला यह जीवन “प्रेय” मार्ग कहा गया है। इसमें शाश्वत अपेक्षाओं और गम्भीर आस्थाओं के प्रति अभिरुचि तो दूर इस मनःस्थिति का प्राणी उन्हें अस्वीकार ने भी लगता है, जिससे सामाजिक जीवन में अशान्ति और अव्यवस्था का ही विकास होता है।
इसके विपरीत एक और भी जीवन वह होता है जो उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, चरित्रनिष्ठा और समाजनिष्ठा के प्रति समर्पित होता है। इसे श्रेय पथ कहते हैं। इसमें इन्द्रियों को सन्तुष्ट करने की हेय प्रवृत्ति का परित्याग होने से भावनाओं का , अन्तःकरण का विकास होता है। जीवन सत्ता मानवीय तथा देवी विभूतियों और क्षमताओं से विभूषित होती चली जाती है। प्रत्यक्ष में यह सौदा घाटे का हो सकता है। यही श्रेय अर्पित जीवन क्रमशः उत्कृष्टता और आत्मिक आनन्द की श्रेणियों में उठाता हुआ मनुष्य को उसके जीवन लक्ष्य परमात्मा तक पहुँचा देता है। अन्तःकरण की पुकार को अनसुनी न करें तो परमात्मा की यह प्रकाश किरण उसकी प्रेरणा-महापुरुषों के माध्यम से, समाज सेवी संगठनों के माध्यम से, मानवीय पीड़ा और पतन के प्रति, सम्वेदना के रूप में हर किसी के पा आती है। यह समर्पण स्वीकार किया जा के तो निःसन्देह मनुष्य जीवन धन्य हो सकता है।
बीत की सत्ता अत्यन्त लघु और नगण्य समझी जाती है। अपने आप में ही सीमित प्रकृति, का नन्हा प्रतिनिधि किसी कीड़े-मकोड़े को भले ही सन्तुष्टि प्रदान कर दे पर उससे अधिक की क्षमता उसमें है नहीं। आपने आप तक सीमित रहने, अपने ही स्वार्थों तक केन्द्री भूत रहने की संकीर्ण मनोवृत्ति कभी भी किसी व्यक्ति को ऊँचा नहीं उठा सकती।
श्रेय सम्पादन, आत्म-विस्तार बड़ी उपलब्धियों के लिये अपनी अहंता का परित्याग आवश्यक होता है। समर्पण इसी भावना का नाम है। वही बीज जो कल तक अत्यन्त तुच्छ घेरे में घिरा हुआ था जब अपने आपको बिना किसी झिझक और असन्तोष के धरती माता की गोद में समर्पित कर देता है तो उसमें से विकास के नन्हे-नन्हे अंकुर फूट पड़ते हैं। सूर्य किरणें उसे शक्ति देती है, पवन उसे दुलारता है, मेह उसका अभिसिंचन करता है। सम्पूर्ण प्रकृति उसकी सेवा में जुट जाती है, बीज नीचे बढ़ता है और अपनी जड़े, अपनी आधार भूमि सुदृढ़ कर लेता है। ऊपर उठता है तो एक विशाल वृक्ष के रूप में परिणत होता चला जाता है। ऐसा वृक्ष जिसके आश्रय में सैकड़ों प्राणियों को फल-फूल आदि के उपयोगी उपहार मिलते हैं। अपने सम्पूर्ण जीवन में वह एक बीज करोड़ों बीजों का जनक होने का गौरव प्राप्त करता है समर्पण की महत्ता अनन्त है, अणु से विभु , लघु से विराट् बनने की प्रक्रिया आत्म-समर्पण के ही साँचे और ढाँचे में परिपूर्ण होती है। इससे इतर कोई सुगम मार्ग नहीं ।
आदान-प्रदान के व्यक्त-अव्यक्त दो ही रूप है एक का नाम है सहयोग-सहकारिता अर्थात् किसी व्यक्ति, संस्था, उद्योग, या मिशन के कार्यों में अपनी उपलब्ध क्षमताओं को मिलाना-अपना कर्त्तृत्व जोड़ना। यह साँसारिकता से ओत-प्रोत भावना है। उसके बदले में भौतिक लाभ, चाहे वह पद-प्रतिष्ठा के रूप में हो, अर्थोपार्जन के रूप में हो या यश और कीर्ति के रूप में हो, जुड़ा हुआ हो तो यह सहयोग या सदृकत्त्व कहा जायेगा। कुटुम्ब के सदस्य आपस में मिलकर काम करते हैं। भौतिक प्रगति के रूप में उन्हें उसका लाभ मिलता है, कल-कारखाने में काम करने वाले मजदूरों से मालिक को लाभ होता है। बदले में उन्हें जीवन यापन के साधन मिल जाते हैं। एक मित्र दूसरे को सहयोग करता तो बदले में उसे भी मित्र का सम-सहयोग मिलता है। परस्पर सहयोग समाज की एक सुसंस्कृत परम्परा और सामुदायिक विकास का आधार है किन्तु समर्पण उसमें हजारों गुने उन्नत तर की आध्यात्म साधना है सहयोग से भौतिक प्रगति के लक्ष्य पूरे किये जा सकते हैं, पारमार्थिक प्रयोजनों को भी एक सीमा तक शक्ति सहायता मिल सकती है। किन्तु महान कार्य, बड़ उद्देश्य समर्पित सेवाओं के बिना सम्भव नहीं हो पाते। श्रेष्ठता के प्रति समर्पण आत्मा की क्षमताओं और सम्भावनाओं को उजागर करके व्यक्ति समुदाय और संसार को प्रगति का मार्ग, नई ज्योति और दाशयी लक्ष्यों की सफलता प्रदान कर सकती है। आध्यात्मिक साधनायें या पारमार्थिक सेवायें तो समर्पण के अभाव में पनप ही नहीं सकती।
उत्कृष्टता के प्रति श्रद्धासिक्त समर्पण एक उदात्त आध्यात्मिक संस्कार है जो किसी भी क्षेत्र के लिए अनवरत शक्ति संचार की प्रेरणा और स्रोत बनकर काम करने लगता है। सहयोग में खण्डावस्था है तो समर्पण में नैरर्न्तय प्रभु समर्पित व्यक्ति का प्रत्येक चिन्तन और कर्तृत्व एक ही -दिशा में नियोजित रहने से अत्यधिक प्रखर और गतिशील हो उठता है। यही नहीं उसके साथ पवित्रता की एक ऐसी भावना सन्निहित रहती है, जो ध्येय को भौतिक प्रवंचनाओं से धराशायी होने से बचाती रहती है।
सन् 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम की एक बहुत महत्त्वपूर्ण घटना ताँत्या-टोपे के जीवन के सम्बन्ध रखती है। अजीजन नाम की एक नर्तकी सेनापति ताँतिया टोपे की ओर आसक्त हो गई। उसने ताँत्या टोपे का मन जीतने के लिए आकर्षणों का जाल बिछा दिया। ताँत्या टोपे इस बात को ताड़ गये उन्होंने एक दिन अजीजन ने कहा मेरे जीवन का एक ही ध्येय है- अंग्रेजों को भारत भूमि से मार भगाना। यदि तुम सचमुच मुझे प्यार करती हो तो मेरे इस श्रेष्ठ लक्ष्य में तुम्हें समर्पित भावना से कार्य करना होगा। अजीजन तैयार हो गई किन्तु समर्पण जिसे इतना महत्त्व दिया जाता है इतनी सरल प्रक्रिया नहीं कि उसे यों ही निबाहा जा सके। अजीजन ने अपनी सारी सम्पत्ति स्वाधीनता संग्राम को सौंप दी। स्वयं को गुप्तचर सेवाओं के लिए समर्पित किया। अंग्रेज छावनियों में जाना वहाँ से सुराग लाना सस्ता कार्य नहीं यह कार्य इतने जोखिम का था जिसे अविचल निष्ठा ही पूरा कर सकती थी। अजीजन को भयंकर संकटों और यातनाओं का सामना करना पड़ा किन्तु वे ध्येय के प्रति मृत्यु तक प्रामाणिक बनी रहीं। उनके इस त्याग ने न केवल उन्हें यशस्वी बनाया अपितु राष्ट्रीय स्वाधीनता के लिए पथ भी प्रशस्त किया।
समर्पण वस्तुतः व्यक्ति की निष्ठा की परख है उस पर खरा उतरने पर ही उसका समर्पण सार्थक होता है। इससे कम में नहीं । अपनी “आत्म दानियों से ..........।” पुस्तक में लोक नायक जयप्रकाश की समर्पण की यह व्याख्या युक्ति युक्त ही है कि-समर्पण का अर्थ है-मन अपना विचार इष्ट के (उसके जिसे आत्मसमर्पण किया गया) हृदय अपना, भावनायें इष्ट की। आपा अपना, किन्तु कर्तृत्व समग्र रूप से इष्ट का।” इस परिभाषा का अर्थ अपनी अहंता से पूरी तरह अवकाश पा लेना है। योग साधनाओं में सिद्धि के गुणों में यह स्थिति अनिवार्य मानी गई है। अतएव समर्पण को आत्म कल्याण की सर्वोपरि साधना के रूप में लिया जाना चाहिये।
समर्थ गुरु रामदास को समर्पित होने के बाद शिवाजी शिवा जी हो गये, शंकराचार्य की आत्म-समर्पण कर मान्धाता जातीय जीवन के गौरव बने। विवेकानन्द ने अपने आपको महर्षि रामकृष्ण परमहंस के चरणों में समर्पित न किया होता और उस समर्पण के प्रति वफादार न रहे होते तो रामकृष्ण परमहंस के दूसरे शिष्यों की तरह वे भी कोई उल्लेखनीय कार्य नहीं कर सके होते। आर्यसमाज संगठन महर्षि दयानन्द के आत्म-समर्पण का पर्याय कहा जा सकता है। भारतीय स्वाधीनता संग्राम बिना किसी युद्ध के जीता गया, उसमें जन नेताओं की समर्पित साधना को ही श्रेय जाता है। तब उसमें से किसी में भी न तो कोई महत्त्वाकाँक्षा थी न पूर्वाग्रह सेवा के फल की कामना थी न यश की। सरफरोशी की तमन्ना अर्थात् सच्चे समर्पण की भावना का जहाँ भी उदय होगा वहाँ उद्देश्य सार्थक होते चले जायेंगे।
समर्पण में आशाओं-आकांक्षाओं के लिये कोई भी स्थान नहीं। पारमार्थिक साधनाओं में या आत्मोपलब्धि, परमात्मा के दर्शन परमगति या मोक्ष की कामना उनमें से किसी भी ध्येय के लिये समर्पित हों, कामनायें सर्वप्रथम नष्ट करनी पड़ती है। मार्गदर्शक या ध्येय की प्रामाणिकता प्रारम्भ में सिद्ध हो जाये तो फिर कर्तृत्व में अवाँछनीयता की गुँजाइश प्रायः रहती ही नहीं।
अन्तःकरण में न कोई छल न छद्म । अपनी बौद्धिक क्षमताएँ यश, सक्रियता, प्रगति सब ध्येय के प्रति अर्पित हो यही समर्पण की सच्ची साधना है। यह सौभाग्य जिन प्रयोजनों को मिल जाते हैं। चाहे वह साँसारिक हों या आध्यात्मिक उनको सफलता की आधी मंजिल तत्काल पूर्ण हो जाती है। साथ उस समर्पित आत्मा को ईश्वरीय सान्निध्य का एक ऐसा दिव्य लाभ इसी साधना से मिल जाता है जिसके लिये योगाभ्यास और जन्म-जन्मान्तरों के दोष परिमार्जन की एक कठिन और लम्बी साधना पूरी करनी पड़ती, सत्प्रवृत्तियों को, उच्चादर्शों को समर्पित जीवन का अर्थ परमात्मा को समर्पित जीवन। ऐसे साधक के लिये ही भगवान् श्री कृष्ण ने गीता में कहा है:-
मध्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धि निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्व न संशयः॥
हे अर्जुन ! तू अपना मन मेरे में (ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में) लगा और मेरे में ही बुद्धि को लगा इसके उपरान्त तू मेरे में निवास करेगा, मेरे को ही प्राप्त करेगा इसमें कुछ संशय नहीं।
सर विश्वेश्वरैया से भारत को समृद्ध बनाने की योजनाएँ बताने के लिए पूछा गया तो उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि देश के हर नागरिक को एक समृद्धि उत्पादक यन्त्र के रूप में विकसित किया जाय। इसके लिये उन्होंने चार सूत्र बतायें।
(1)श्रम के प्रति उपेक्षा की वर्तमान प्रवृत्ति को दूर किया जाय। हर व्यक्ति के मन में श्रम के प्रति सम्मान और उत्साह जगाया जाय
(2) काम निश्चित, नियमित और अनुशासित रीति से करने की आदत डाली जाय! अनियमितता, अस्त-व्यस्तता उपेक्षा और अन्यमनस्कता को स्वभाव का अंग बनने न दिया जाय।
(3) काम का स्तर ऊँचा उठाने की प्रतिस्पर्धा खड़ी की जाय। कार्य दक्षता को यश दिया जाय और पुरस्कृत किया जाय।
(4) मिलजुल कर काम करने के लाभ समझे और समझाये जाएँ । श्रम संगठनों में परस्पर गहरा मेल-जोल और स्नेह सहयोग उत्पन्न किया जाय।
सर विश्वेश्वरैया का कथन था। समृद्धि के लिए पूँजी, साधन और क्रिया प्रक्रिया के आधार खड़े करने के साथ-साथ यह ध्यान रखा जाय कि सम्पत्ति का मूल स्रोत मानवी श्रम शीलता, तत्परता और दक्षता में सन्निहित है, उस उद्गम को सुधारने से सम्पदा बढ़ाने का तथ्य पूरा हो सकेगा।
न जाने क्यों और कैसे मनुष्य में सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने की अहमन्यता विकसित हो गई है। अपने इस पूर्वाग्रह को उसने निरीह प्राणियों पर थोप कर उनका शोषण और मनचाहा उत्पीड़न किया। जो दाँव उसने उन पर चलाया वह धीरे-धीरे उसके स्वभाव का एक अंग बन गया। अब यही प्रयोग वह अपनी जाति पर भी अपनाने लगा है। जिससे मानवीय सम्वेदना का अंश धीरे-धीरे घटता और वैयक्तिक सुख स्वार्थ के शोषण और अत्याचार बढ़ते चले जा रहे हैं। आज व्यक्ति, व्यक्ति के बीच परिवार, परिवार, जातियों, समुदायों और राष्ट्रों के मध्य इस खींच-तान को स्पष्ट देखा जा सकता है।
होना यह चाहिये था कि मनुष्य सभी प्राणियों को जिज्ञासा भरी दृष्टि से देखता और उनकी अनन्त क्षमताओं से कुछ सीखने का प्रयत्न करता तो स्थिति कुछ और ही होती। अभागे कहे जाने वाले इन जीवों की मिले प्राकृतिक उपहार मनुष्य से कम नहीं कुछ अधिक ही हैं। पक्षियों की तरह अकेले किसी भी दिशा और ऊँचाई में उड़ने के लिए सम्भव है मनुष्य को कई सदियाँ लग जायें, मछलियों की तरह दिन-रात भर पानी में तैरना मनुष्य के वश की बात नहीं। मनुष्य को गगनचुम्बी इमारतें और बड़े-बड़े पुल तथा बाँध बाँधने पर गर्व हो सकता है, पर इस कला में तो दीमक-चींटियाँ और मधुमक्खियों की कुशलता कतई कम नहीं। बीवर जैसा चतुर इंजीनियर तो बिना प्रशिक्षण प्राप्त किये अपनी क्षमता प्रदर्शित कर सकता है, ‘मनुष्यों’ में कहाँ मिलेगा। बीवर या ऊदबिलाव अपनी आवश्यकताओं के लिए बहुत सुदृढ़ बाँध बनाते पाये गये हैं।
चींटी अपने भार से 70 गुना अधिक भार सहज ढो सकती है। चींटी की तुलना में मनुष्य का जितना अधिक वजन हैं, उस हिसाब से उसे बिना पहिये की माल गाड़ी का इंजिन जमीन में खींच लेना चाहिए, पर मनुष्य में उतनी क्षमता है क्या, पिस्सू मेढ़क अपनी ऊँचाई से 250 गुना ऊँचा उछल सकते हैं मनुष्य इसी तुलना में उछले तो 4500 फुट आसानी से उछल जाना चाहिए जब कि वह 10 फुट ऊँची दीवार भी फाँद नहीं सकता। मधुमक्खी छत्ता बनाती है। तो ऊपर की डाल पर यदि 20 मधुमक्खियाँ हों तो उन पर नीचे 10000 मधुमक्खियों का लगभग 7 किलो भार होगा इस औसत से एक मनुष्य की टाँगें पकड़ कर 2000 व्यक्तियों का लटक जाना चाहिए, पर कल्पना कीजिये दुनिया का बड़े से बड़ा पहलवान भी ऐसा कर सकेगा क्या ? चील की जितनी तेज आँख होती है उसी अनुपात से कहीं मनुष्य की दृष्टि रही होती तो वह प्लूटो ग्रह में चल रही गतिविधियाँ धरती से ही देख लेता। चमगादड़ जैसी सूक्ष्म श्रव्य शक्ति इंसान को मिल सकी होती तो वह धरती के किसी भाग की किसी कोठरी के अन्दर बैठकर भी सौर मण्डल की घूर्णन की आवाज- सौर घोष आसानी से सुन लेता। जैसी घ्राण शक्ति यदि मनुष्य को मिल जाती तो मंगल से उठ रही अमोनिया गैस का अनुभव उसे हरिद्वार में बैठे-बैठे मिल जाता। एक तितली दिन में जितना उड़ती है यदि वह एक सीध में लगातार उड़े तो वह दिन भर में 10 मील उड़ सकती है। मनुष्य का भार उसकी तुलना में कई हजार गुना हैं इस तुलना में तो उसे एक दिन में अधिक नहीं तो पृथ्वी की एक परिक्रमा तो आसानी से कर ही लेनी चाहिये थी।
किसी को कुत्ता कहना- मानवीय संस्कृति में सबसे बुरी गाली है किन्तु इस प्रकृति के योगी में ऐसी अतीन्द्रिय क्षमताएँ परमात्मा ने विकसित की हैं कि वह आने वाली प्राकृतिक विपदाओं, दैवी आपत्तियों की काफी समय पूर्व सूचना दे देने में सक्षम है। इटली का विसूसियस ज्वालामुखी पहली बार फटा उससे सात दिन पूर्व तक कुत्ते भयानक आवाज में रोने-चिल्लाने और मानवी विनाश की चेतावनी देने लगे थे, किन्तु किसी ने उनकी सम्वेदना को परखा नहीं और लाखों व्यक्ति ज्वालामुखी के लावे में जल मरे। 1961 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध की चेतावनी कुत्तों ने पहले ही कर दी थी। गाँवों, शहरों में किसी की मृत्यु की सूचना उस मुहल्ले के कुत्ते पहले ही दे देते हैं।
वर्षा आने से पूर्व दीमकों के झुण्ड एकाएक विलुप्त हो जाते, मकड़ियाँ जाला समेटने लगतीं, चींटियाँ अपनी खाद्यान्न व्यवस्था सुरक्षित करने लगती हैं। असामयिक वृष्टि की सूचना गौरैया, मिट्टी स्नान द्वारा पहले ही दे देती है। इस अनुपात से मनुष्य को जैसी सूक्ष्म बुद्धि प्राप्त है, उसके अनुसार तो उसे त्रिकालदर्शी से कम नहीं होना चाहिए, पर ऐसे अवसरों पर उसकी दयनीयता देखते ही बनती है। कारण स्पष्ट है वह अपनी इन देव-प्रदत्त क्षमताओं के विकास की बात तो दूर उन्हें पहचानने और अनुभव करने तक का प्रयास नहीं करता। उसकी सम्पूर्ण चेष्टाएँ मात्र इन्द्रियों की क्षणिक खुजली को ही शान्त करने में लगी रहती हैं।
मनुष्य शरीर जटिल रसायनों का विलक्षण भाण्डागार हैं। “हारमोन्स” के रूप में अब जिन स्रावों का वैज्ञानिकों ओर शरीर-शास्त्रियों का ज्ञान हुआ हैं, उससे तो पुराण युग की कपाल-कल्पनायें भी साकार सत्य होने जा रही हैं। आकार वृद्धि में सुरसा एक उदाहरण बन गई तो हनुमान के मशक-समान तथा ‘तब कपि भयउ पर्वतकारा” की कहानियाँ आये दिन सुनने में आती हैं। हारमोन्स ने इन सम्भावनाओं पर अपनी स्पष्ट मुहर लगा दी है। किन्तु आज इन क्षमताओं का कोई उपयोग कर पाता है क्या ? इस दृष्टि से छोटा-सा ‘मिंक’ हो भला जो अपने से कई गुने शक्तिशाली शत्रु को भी अपने शरीर से इच्छानुसार कम या अधिक मात्रा में एक विशेष प्रकार की रासायनिक दुर्गन्ध निकाल कर भगा देता है। यह मिंक वही हैं जिनकी खाल के कोट पहनने के लिए पश्चिमी लोग लालायित रहते और प्रचुर धन व्यय करते हैं। मनुष्य शरीर में जबर्दस्त रोग-निरोधक शक्ति है, पर वह बिगाड़ मच्छर तक का कुछ नहीं पाता।
मनुष्य शरीर परमात्मा का दिया हुआ एक सर्वांग-पूर्ण यन्त्र है। किन्तु उसका मनुष्य कितना सदुपयोग कर पाता है यह एक विचारणीय प्रश्न है। शरीर को मनचाही स्थिति में बदलकर यौगिक क्रियायें करने और सामान्य तन से विशेष लाभ प्राप्त करने की विशेषता थोड़े से भारतीय योगियों को प्राप्त कर सकती है, पर प्रकृति के यह पुत्र उनसे कम क्षमताएँ नहीं रखते। अमरीका के एक जन्तु-शास्त्री ने यह पता लगाया है कि कुछ पक्षियों में इस प्रकार की विशेष क्षमता होती है कि एक क्षण में ही वे अपनी आँखें के लेन्स को दूरदर्शी (टेलिस्कोप) से सूक्ष्मदर्शी (माइक्रोस्कोप) में बदल लेते हैं दूर की वस्तु ताड़ने या समीप की छोटी से छोटी वस्तु को बड़े आकार में करके पहचानने के लिए वे अपनी इस क्षमता का उपयोग करते हैं।
ईल मछली तो विधिवत् मारण मन्त्र का प्रयोग करने में सिद्ध होती है वह अपने शिकार को देखकर अपने शरीर को डायनेमो की तरह नचाकर ऐसी विद्युत शक्ति पैदा करती है कि शिकार कुछ ही क्षणों में मर जाता है, तब वह उसका भक्षण कर लेती हैं।
कबूतर यों प्रति घण्टे 55 मील की गति से उड़ सकता है, पर सामान्यतः वह 40 मील प्रति घण्टे की गति से उड़ता है। कई देशों में इनकी प्रतिस्पर्द्धा उड़ानें होती हैं। स्पेन के बार्सीलोना से लंकाशायर के एटखाम तक 919 मील, रोम से डर्वी तक 1000 मील की उड़ानें कबूतरों ने कुल 3 और 4 घण्टे के बीच की अल्प विधि में पूरी कर द्रुतगति विमानों को भी पीछे छोड़ दिया। अमेरिका के एक कबूतर ने 35 घण्टे में 10010 मील उड़ने का रिकार्ड स्थापित किया। वहीं के एक अन्य कबूतर ने 43 घण्टे लगातार मैनिटोवा (कनाडा) से दक्षिण अमेरिका के टैक्सास तक की 2040 मील की दूरी आने-जाने का रिकार्ड कायम किया।
दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका के ईचाफ द्वीप से उड़ाया गया लन्दन का एक कबूतर 5500 मील की अनवरत यात्रा 15 घण्टे में सम्पन्न कर सभी रिकार्ड ध्वस्त कर दिये। कहीं इस तरह की क्षमता मनुष्य को मिल सकी होती तो उसने अंतर्ग्रहीय दूरियों को ताक पर रख दिया होता। तब तो वह रह धरती पर रहा होता, खेती चन्द्रमा में करता तथा सैर के लिए मंगल और शुक्र से कम में उद्यान नहीं बनता किन्तु उस बेचारे के लिए दिन भर में अधिक से अधिक 30 मील पैदल चलने की क्षमता प्राप्त है। इससे अधिक के लिए तो उसे याँत्रिक सहायता ही लेनी पड़ती है।
कबूतर में पायी जाने वाली विलक्षण परीक्षण बुद्धि, स्मरण शक्ति का पता चला तो मास्को के एक इंजीनियरिंग कारखाने के विशेषज्ञों ने उनकी इस अद्भुत क्षमता का उपयोग करने का निश्चय किया। एक बाल-बियरिंग कारखाने में बनने वाले बाल-बियरिंग में से कुछ खरोंच व चोट खाये बियरिंगों को छाँट कर अलग करने की समस्या थी। कुशल से कुशल कारीगर भी उन्हें खोजने में चूक जाते थे किन्तु कुछ कबूतरों को कुल 3 सप्ताह की ट्रेनिंग देकर इस कार्य में लगाया गया तो उन्होंने कुशल कारीगरों को भी एक ओर धकेल दिया। अब इनमें से प्रत्येक कबूतर एक घण्टे में औसत 3500 बाल-बियरिंगों की जाँच कर लेता है, विलक्षण बात तो यह है कि अभी तक उनमें चूक का प्रतिशत शून्य से ऊपर नहीं उठ पाया। मनुष्य के मस्तिष्क में -“न्यूरोन” जिनमें स्मृति के बीज विद्यमान होते हैं, कणों की संख्या अरबों-खरबों होती हैं। कबूतर की तुलना में इस मस्तिष्क का यदि पूर्ण विकास किया जा सके तो सारे संसार की जितनी लाइब्रेरियाँ हैं उन्हें केवल एक ही मनुष्य अपने एक ही जीवन काल में आसानी से कंठस्थ कर सकता है।
स्मरण शक्ति में मधुमक्खियाँ, बर्रे तथा चींटियाँ अद्वितीय सामर्थ्यवान जीव है। इन पर कई प्रयोग करके यह देखा गया है कि वे चाहे जितना भटका दी जावें, उन्हें अपने घर तक पहुँचने में कोई दिक्कत नहीं होती। ध्वनि और गन्ध पहचानने की तो इनमें बहुत ही विचित्र क्षमताएँ पाई जाती हैं। जर्मनी में एक विचित्र प्रयोग किया-टेलीफोन के एक रिसीवर से एक फीट दूर, एक मादा झींगुर और एक मादा टिड्डे को रखा गया। वहाँ से बहुत दूर पहले एक नर झींगुर को ट्रान्समीटर के पास ध्वनि की और वह ध्वनि रिसीवर तक पहुँची मादा झींगुर तुरन्त अपने स्थान से भागकर रिसीवर में जा घुसी, यद्यपि रिसीवर में उसे अपना प्रेमी नहीं मिला, पर अपने प्रेमी की आवाज पहचानने में उसने भूल नहीं की। मादा टिड्डा अभी अपने स्थान पर ही जमा था। दुबारा ट्रान्समीटर के पास टिड्डे की ध्वनि कराई गई तो इस बार रिसीवर में मादा टिड्डा भागकर आई और यह सिद्ध कर दिया कि वे अपने वंश को पहचानने को सूक्ष्म बुद्धि से पूरी तरह ओत-प्रोत हैं।
पानी के अन्दर घण्टों तक बने रहने का वैज्ञानिक आविष्कार मनुष्य अब इस बीसवीं शताब्दी में कर पाया है, पर यह विद्या जल मकड़े को अनादि काल से ज्ञात है वह पानी के अन्दर की शैवाल के सहारे अपना मकान बनाती हैं और उसमें चिरकाल तक आक्सीजन प्राप्त करते रहने के लिए सतह से बुलबुले पकड़-पकड़ कर जमा लेती हैं, यह बुलबुले ही उसे वायु देते रहते हैं और इस तरह मकड़ी वर्षों तक जल के भीतर बनी रहती हैं। मनुष्य ने आज जो जल में रहने की वैज्ञानिक पद्धति का विकास किया है, उसकी मार्गदर्शक यह जल मकड़ी ही है। फिर भी वह एक सीमित अवधि तक ही जल में रह सकता है वहाँ नियमित बस्तियाँ बसाने और आनन्दमय जीवन जीने योग्य परिस्थितियों के विकास में उसे वर्षों लग जायेंगे।
लम्बे समय तक जीव-जन्तुओं के इस तरह सुव्यवस्थित, विवेकपूर्ण और सुसंस्कृत जीवन क्रम का अध्ययन करने के सुप्रसिद्ध जीव शास्त्री हेनरी बेस्टन ने बहुत ही मार्मिक ओर भावपूर्ण समीक्षा प्रस्तुत की है- वे लिखते हैं प्रकृति से परे बनावटी जीवन जीने वाला इंसान इन नन्हे प्रकृति पुत्रों को ज्ञान के चश्मे से देखता, उनकी अपूर्णता पर दया दिखाता, उनकी निम्नतर योनि के जीव होने की विवशता पर तरस खाता है किन्तु यह उसकी भूल ही नहीं-जबर्दस्त भूल है। वह यह भूल जाता है कि वे हमारी दुनिया से अधिक प्राचीन और एक परिपूर्ण जगत के प्राणी हैं वे कहीं अधिक समर्थ, सुव्यवस्थित और इन्द्रिय क्षमताओं से सम्पन्न हैं जो हम या तो खो चुके या जिन्हें प्राप्त करने में मनुष्य जाति को अभी सदियों की साधना करनी पड़ेगी। वे न तो हमसे तुच्छ हैं न दया के भिखारी। इस धरती की शोभा और शान में वे हमारे समान सहचर और सहभागी हैं मनुष्य चाहें तो उनसे स्वयं भी बहुत सीख सकता है।
जीवात्मा ने तीन कलेवर ओढ़ रखे हैं, इन्हें स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर कहते हैं। स्थूल शरीर की शक्ति किया है। इसके माध्यम से विचित्र प्रकार के उपार्जन होते हैं। श्रम का महत्त्व हम सभी जानते हैं। जो कुछ कमाया उगाया जाता है उसका प्रमुख आधार श्रम ही होता है, सक्रियता के अभाव में अभीष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त करना तो दूर-जीवित रह सकना तक सम्भव न हो सकेगा।
दूसरा कलेवर हैं सूक्ष्म शरीर जिसे मनःसंस्थान कहा जा सकता है। चिन्तन इसी की शक्ति हैं। कल्पना, निर्णय, विश्वास के मन, बुद्धि, चित्त के नाम से-चेतना अचेतन, उच्च चेतन के नाम से-इस चिन्तन को चित् शक्ति के नाम से जाना जाता है। शरीर में सक्रियता मन में सूझबूझ यही दो प्रमुख आधार भौतिक जीवन की विभिन्न क्षेत्रों की प्रगतियों ओर समृद्धियों को उपलब्ध करते हैं। श्रम और बुद्धि का ही वह सब उत्पादन हैं, जिसे हम सम्पदाओं और सुखानुभूति के साधनों की तरह देखते हैं। भौतिक उपलब्धियों का रथ इन्हीं दो चक्रों के सहारे घूमता है। इन्हीं की न्यूनता से पिछड़ापन बना रहता है और जब वे पर्याप्त मात्रा में होते हैं तो सफलताओं के अम्बार लगाते चले जाते हैं। इस तथ्य को सभी लोग जानते हैं और क्रियाशक्ति बढ़ाने के लिए शरीर को तथा बुद्धिमत्ता बढ़ाने के लिए मन को परिपुष्ट बनाने के लिए यथा सम्भव प्रयत्न भी करते हैं।
शरीरों में क्रमशः एक के बाद दूसरा अधिक श्रेष्ठ हैं-अति श्रेष्ठ हैं। शरीरगत श्रम से थोड़ा-सा ही पारिश्रमिक प्राप्त किया जा सकता है किन्तु बुद्धि बल के सहारे प्रबुद्ध व्यक्ति प्रचुर परिणाम में धन और यश प्राप्त करते हैं। आलस्य से होने वाली हानि की तुलना में प्रमाद द्वारा प्रस्तुत हानि अत्यधिक होती हैं। इस प्रकार श्रमजीवी की तुलना में बुद्धिजीवी को अधिक श्रेय मिलता है। स्पष्ट है कि स्थूल शरीर का महत्त्व होते हुए भी सूक्ष्म शरीर की क्षमता का मूल्य अधिक हैं। श्रम की तुलना में चिन्तन की गरिमा का स्तर ऊँचा होता है।
तीसरा शरीर कारण शरीर हैं। इसे अन्तःकरण अन्तरात्मा आदि नामों से पुकारा जाता है। भाव सम्वेदनाओं का क्षेत्र यही हैं विश्वास की नींव इसी में जमती हैं। समूचा व्यक्ति इसी क्षेत्र से उद्भूत होने वाली प्रेरणाओं के आधार पर ढलता है। आकांक्षाएँ-अभिलाषाएँ यही से उभरती हैं। व्यक्तित्व को हिला डालने वाली ओर मनुष्य को कहीं से कहीं घसीट ले जाने वाली भाव सम्वेदनाओं की गंगोत्री इसी केन्द्र को कह सकते हैं। व्यक्ति, जैसा कुछ हैं इसी अन्तः करण की प्रतिमूर्ति हैं क्या पिछड़े, क्या क्या प्रगतिशील, क्या सुर, क्या असुर, इसी क्षेत्र की स्थिति के अनुरूप ढालते हैं।
जीवन की दिशाधारा को मस्तिष्क निर्धारित नहीं करता और न शरीर की क्रियाशीलता स्वतन्त्र हैं। इन दोनों को अन्तःकरण का गुलाम कह सकते हैं। उनका अपना अस्तित्व निर्दिष्ट दिशा में चलता रहता है। किधर चलना हैं इसका निर्धारण आकांक्षाओं का क्षेत्र अन्तःकरण ही करता है। जैसी आकांक्षाएँ उभरती हैं। उसी के अनुरूप मस्तिष्क की सारी मशीन सोचने में लग जाती हैं और शरीर के कल पुर्जे इसी निर्देश का पालन करने में जुट जाते हैं। मन और शरीर ही काम करते दिखाई पड़ते हैं, पर वस्तुतः वे यंत्रवत हैं और अपने असली मालिक अन्तःकरण की प्रेरणाओं के अनुरूप उसकी आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए ही निरन्तर काम करते हैं। व्यक्तित्व के मूल में आस्थाएँ ही काम करती हैं। गतिविधियों का संचालन आकांक्षाओं के अनुरूप होता है। यही हैं मानव तत्त्व का सार। मनुष्यों की शारीरिक संरचना लगभग एक जैसी हैं उनके बीच नगण्य सा ही अन्तर पाया जाता है किन्तु पतित-प्रखर और उत्कृष्ट के मनुष्यों के बीच जो अन्तर पाया जाता है, उसे जमीन, आसमान जैसा कहा जा सकता है। सौभाग्य एवं दुर्भाग्य की आधार शिला यहीं रखी जाती हैं। व्यक्तित्व की ढलाई इसी दिव्य संस्थान में होती रहती हैं।
अन्तः करण की उत्कृष्टता को श्रद्धा के नाम से जाना जाता है, उसका व्यावहारिक स्वरूप हैं भक्ति। यों साधारण बोलचाल में दोनों का उपयोग पर्यायवाची शब्दों के रूप में होता है, फिर भी कुछ अन्तर तो हैं ही श्रद्धा अन्तरात्मा की आस्था हैं। श्रेष्ठता के प्रति असीम प्यार के रूप में उसकी व्याख्या की जा सकती हैं। भक्ति उसका व्यावहारिक रूप हैं। करुणा, उदारता, सेवा, आत्मीयता के आधार पर चलने वाली विभिन्न गतिविधियों को भक्ति कहा जा सकता है। देश भक्ति आदर्श भक्ति, ईश्वर भक्ति आदि के रूपों में त्याग-बलिदान के तप-साधना के,अनुकरणीय आदर्शवादिता के अनेकों उदाहरण इसी भक्ति भावना की प्रेरणा से बन पड़ते हैं।
आस्थाएँ आकांक्षाएँ जब परिपक्व स्थिति में पहुँचती हैं और निश्चयपूर्वक अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती हैं। तो उन्हें संकल्प कहते हैं। संकल्प का प्रचण्ड शक्ति सर्वविदित हैं संकल्पों के धनी व्यक्तियों ने ही सामान्य साधनों और सामान्य अवसरों में भी चमत्कारी सफलताएँ उपलब्ध की हैं संकल्प की प्रखरता मस्तिष्क और शरीर दोनों को अभीष्ट दिशा में घसीट ले जाती हैं ओर असंख्य अवरोधों से टकराती हुई उस लक्ष्य तक पहुँचती हैं, जिसे आरम्भ में असम्भव तक समझा जाता था। पुरुषार्थियों की यश गाथा से इतिहास के पन्ने भरें पड़े हैं। वस्तुतः उन्हें संकल्प शक्ति का चमत्कार ही कह सकते हैं। यहाँ इतना और समझने की आवश्यकता है कि संकल्प उभर कर आने से पूर्व विश्वास बनकर मनःक्षेत्र में अपनी जड़े जमाता है या उस बीज का प्रत्यक्ष पौधा संकल्प रूप में प्रकट होता है विश्वास की प्रतिक्रिया ही संकल्प हैं। यही कारण हैं कि अन्तः करण की उच्चस्तरीय आस्थाओं को श्रद्धा विश्वास का रूप दिया गया है। वे उत्कृष्ट स्तर के होने पर शिव पार्वती का युग्म बनते हैं और निकृष्ट होने पर आसुरी क्रूर कर्मों में इस प्रकार निरत दिखाई पड़ते हैं जैसा कि उपाख्यानों में दानवों एवं शैतानों का चित्रण किया जाता है।
जीवात्मा के उच्चतम आवरण कारण शरीर की अन्तःकरण की, स्थिति एवं शक्ति को यदि ठीक तरह समझा जा सके तो मात्र उसी को व्यक्तित्व का सारतत्त्व कहा जाएगा ।
गीताकार ने इस तथ्य को और भी अधिक स्पष्ट शब्दों में कहा है “श्रद्धा मयोयं पुरुष यो यच्छद्धः स एवस” अर्थात् जीव की स्थिति श्रद्धा के साथ लिपटी हुई हैं। जिसकी जैसी श्रद्धा है। यह वैसा ही हैं। क्रिया, विचारणा और भावना यहीं चेतना की तीन शक्तियाँ हैं। श्रेष्ठता की दिशा में जब वे बढ़ती हैं तो सत्कर्म, सद्ज्ञान एवं सद्भाव के रूप में उन्हें काम करते देखते हैं। इन्हें सुविकसित करने के विज्ञान को अध्यात्म कहते हैं। ब्रह्म विद्या का विशालकाय ढाँचा इसी के निर्मित खड़ा किया गया है। चेतना को श्रेष्ठता के साथ जोड़ देने के प्रयास को ही योग कहते हैं। योग साधना की तीन सही प्रमुख धाराएँ हैं-कर्म योग, ज्ञान योग, भक्ति योग इन्हीं के सहारे जीवन लक्ष्य प्राप्त होने की स्थिति बनती हैं। इसी त्रिवेणी में स्नान करने से परम पद की प्राप्ति का लाभ मिलता है।
उपरोक्त विवेचना के सहारे हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। कि मानव -जीवन में सबसे बड़ी, सबसे ऊँची, सबसे समर्थ शक्ति ‘श्रद्धा’ की ही हैं । मनः स्थिति की परिस्थितियों को सृजन कर्ता कहा गया है। शरीर को जन्म तो माता-पिता के प्रयत्न से मिलता है। पर आत्मा को उत्कृष्टता, श्रद्धा और विश्वास रूपी दिव्य-जननी और जनक की अनुकम्पा का फल माना जा सकता है। विधाता द्वारा भाग्य लिखे जाने के अलंकार में तथ्य इतना ही हैं कि अपना अन्तःकरण अपने स्तर के अनुरूप मनुष्य की प्रगति, अवनति आदि का तात्त्विक स्वरूप समझना हो तो उन्हें अन्तःकरण के ही वरदान , अभिशाप कह सकते हैं। लोक व्यवहार में कहा जाता है कि ‘मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप हैं। गीता कहती हैं- आत्मवं-ह्मात्मनः बन्धु-आत्मैव रिपुरात्मनः” अर्थात् मनुष्य स्वतः ही अपना मित्र और शत्रु हैं । उत्थान और पतन की कुँजी पूरी तरह उसे अपने हाथ में हैं और वह सुरक्षित एवं सुनिश्चित रूप में अन्तःकरण में रखी रहती हैं। इसी चाबी को शास्त्रकारों ने आस्था, निष्ठा, श्रद्धा भक्ति, विश्वास, संकल्प आदि के नामों से पुकारा हैं। भावनाओं और आकांक्षाओं के रूप में भी इसी तथ्य की अलग-अलग ढंग से व्याख्या की जाती।
उल्लसित वर्तमान और उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण पूर्णतया सत् श्रद्धा के हाथ में हैं। उसी का महत्त्व, मर्म, उपार्जन, अभिवर्धन सिखाने के लिए भूतकाल की कथा गाथाओं को पुरातन उपाख्यानों में पुराण के नाम से जाना जाता है । भूत भविष्य और वर्तमान की सुखद सम्भावनाओं का निर्माण अन्तःकरण के जिस क्षेत्र में विनिर्मित होता है, उसका स्वरूप समझना हो तो एक ‘श्रद्धा’ शब्द का उपयोग करने से वह प्रयोजन पूरा हो सकता है।
बीज ही वृक्ष बनता है और श्रद्धा ही व्यक्तित्व का रूप धारण करती हैं, मनुष्य जो कुछ बनता हैं-जो कुछ पाता है वह समूचा निर्माण ‘श्रद्धा’ शक्ति के चमत्कार के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। यदि इस ब्रह्म विज्ञान के, आत्म-विज्ञान के गूढ़ रहस्य को जा सके तो प्रतीत होगा कि तत्त्वदर्शियों के वेदान्त प्रतिपादन सनातन सत्य की अध्यात्मा ब्रह्म-प्रज्ञानं, तत्त्वमसि, सोऽहम्, शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम् आदि सूत्र में घोषित किया है। पतन से बचने और उत्थान अपनाने का सुनिश्चित उपाय बताते हुए शास्त्रकार इस उत्तरदायित्व को मनुष्य के अपने कन्धे पर ही लाद देते हैं-वे कहते हैं-उद्धरेत् आत्मनात्मानं-नात्मनं अवसादयेत्” अर्थात् अपना उद्धार आप करो-अपने को गिराओ मत । उनका सुनिश्चित मत हैं कि उत्थान पतन की मुहिम हर मनुष्य स्वतः ही सम्भालता है। परिस्थितियाँ तो उसका अनुगमन भर करती हैं दिशा निर्धारण और प्रगति प्रयास अपना होता हैं- साधन और सहयोग तो उसी चुम्बकत्व के सहारे खिंचते भर चले आते हैं। उत्थान या पतन में से जो भी अपना गन्तव्य हो -व्यक्तियों ,साधनों एवं परिस्थितियों का सरंजाम भी उसी स्तर का जुटता चला जाता है। श्रद्धा की इसी गरिमा को देखते हुए अध्यात्म शास्त्र ने मानवी सत्ता में विद्यमान साक्षात् ईश्वरीय शक्ति के रूप में अभिवन्दन किया है। उसी की उपलब्धि को आत्मोपलब्धि कहा गया है और जीवन लक्ष्य की पूर्ति का केन्द्र बिन्दू माना हैं। न केवल आत्मिक वरन् भौतिक प्रगति का आधार भी सजग और समर्थ व्यक्तित्व ही रहता है। उसका निर्माण भी उसी स्तर की निष्ठाएँ करती हैं। इतना ही नहीं दुष्ट दुरात्मा, क्रूर कर्मी ओर दुस्साहसी समझे जाने वाले लोग भी अपनी दानवी क्षमताओं का विकास इसी श्रद्धा तत्त्व के अहंकारी आसुरी स्तर का सहारा लेकर सम्पन्न करते हैं। ईश्वर ने अपने संसार का स्वामित्व अपने हाथ में रखा हैं, किन्तु एक छोटी दुनिया को निजी व्यक्तित्व के रूप में मनुष्य के हाथ में ही सौंप दिया है। कर्म फल पाने की व्यवस्था में तो वह पराधीन हैं, किन्तु कर्म कुछ भी करते रहने की पूरी तरह छूट ही हैं। इसी स्वाधीनता के सहारे वह अपने भाग्य का विधाता और स्तर का निर्माता बन सकने में पूर्णतया सफल होता है।
एक बार सम्राट सिकन्दर और उनके गुरु अरस्तू दोनों किसी घने जंगल में जा रहे थे। रास्ते में एक उफनता हुआ नाला मिला। दोनों में से उसे पहले कौन पार करे- इस प्रश्न पर विवाद उठ खड़ा हुआ। सिकन्दर ने हठ किया और वही पहले पार हुआ। पीछे अरस्तू उतरे।
पर जाने पर अरस्तू ने कहा बड़ा होने के नाते उतरने की पहल मुझे करनी थी, तुमने उसमें विरोध क्यों किया?
सिकन्दर ने कहा- नाला भयानक था। उसे पार करने में पहले जाने वाले को अधिक और पीछे वालो को कम खतरा था। अरस्तू रहेंगे तो सैकड़ों सिकन्दर बन सकते हैं पर सिकन्दर तो एक भी अरस्तू पैदा नहीं कर सकता।
नास्तिक दर्शन के मूर्धन्य प्रतिपादक ‘नीत्से’ ने अपने प्रबल तर्कों के सहारे आस्तिक बाद का खण्डन किया था। वे कहते थे कि इस संसार में मात्र पदार्थ को ही सत्ता है। मनुष्य भी पदार्थ है। उसे चलता फिरता पौधा समझना चाहिए। आत्मा रासायनिक पदार्थों के सम्मिलन की स्फुरणा मात्र है जो शरीर के मरने के साथ ही समाप्त हो जाती है। ईश्वर का नीत्से ने पूरा मखौल उड़ाया और कहा वैज्ञानिक प्रतिपादनों ने ईश्वर को मार दिया। अब वह कभी भी जीवित न हो सकेगा।
बात बहुत पुरानी नहीं है। नीत्से के तथा तत्समय अन्य अनेक नास्तिकता वादी दार्शनिकों के प्रतिपादन में पिछली शताब्दी में अनीश्वर वाद की प्रचण्ड लहर चली और उस हवा ने अपरिपक्व मस्तिष्कों को पूरी तरह प्रभावित किया। एक बार लगा कि कहीं सचमुच ही ईश्वर मरने तो नहीं जा रहा है। अध्यात्मवाद के प्रतिपादनों का कहीं इसी शताब्दी में अन्त तो नहीं हो जाएगा ।
पर अब समय बदला है। विज्ञान में प्रौढ़ता और परिपक्वता आई है अस्तु शोधों ने नये आधार दिये है। अब ईश्वर की मृत्यु पुराने जमाने की बात हो गई नवीनतम समस्या यह है कि कही पदार्थ की सत्ता ही तो समाप्त होने नहीं जा रही है। विज्ञान पदार्थ के गुण और स्वरूप का निर्धारण करता है, पर जब पदार्थ की सत्ता का ही लोप हो जाएगा तो फिर वान का अस्तित्व किस पर निर्भर रहेगा? आज ईश्वर की मृत्यु की बात विज्ञान के मूर्धन्य मस्तिष्क में ही नहीं वरन् वे इस असमंजस में है कि भौतिकी का सारा ढाँचा जो आँखों के सामने खड़ा है कहीं जादुई महल ही तो नहीं है।
आधुनिक भौतिकी के अनुसन्धानों ने अध्यात्म की उन अनन्त सम्भावनाओं के समर्थन की ही दिशा प्रशस्त की है, जिन्हें उन्नीसवीं शताब्दी से बीसवीं के पूर्वार्ध तक स्वप्निल कुहेलिका मात्र माना जाता था। ‘पदार्थ’ की सत्ता की खोज ने ‘परमाणु’ तक पहुँचाया और परमाणु की खोज बढ़ते-बढ़ते यह तथ्य प्रकाश में आया कि वे विद्युत-तरंगों के संघात मात्र ही है। और अब, अधुनातन अनुसन्धानों द्वारा यही स्पष्ट होता है कि वे विद्युत-तरंगें भी अज्ञान तरंग-समूहों का ही एक अंश मात्र है। इस तरह भौतिकी आज अनन्त अज्ञात तरंग-संघातों के तथ्य तक पहुँचकर अद्वैत वेदान्त की स्थापनाओं के अति निकट आ गई है। आधुनिक भौतिकीविद् इस स्थान पर आकर विस्मय और रहस्य से भर उठे हैं तथा उनमें जिज्ञासा और अन्वेषण का संकल्प और अधिक प्रखर हो गया है। क्योंकि वे स्पष्ट देख रहे हैं कि पदार्थ की मूल सत्त के अन्वेषण क्रम में जिन अज्ञात तरंग-संघातों की जानकारी तक वे आ पहुँचे हैं, वे तरंगें भी अपने मूल रूप में क्या हैं, यह जान सकना बहुत ही कठिन हो गया है, क्योंकि ये तरंग-समूह वस्तुतः मूल सत्ता नहीं कही जा सकती। अपितु इलेक्ट्रानिक कार्य-विधि की हमारी जो जानकारी है, उसी की मानो यह मानसिक संरचना है।
इस तरह वस्तुपरक विश्व तो मानस और आत्मा के क्षेत्र में समाहित एवं विलुप्त होता जा रहा है। आज यदि किसी भौतिकीविद् से पूछा जाय कि यह जगत क्या है, तो वह यही उत्तर देगा कि हम अब तक ऊर्जा और “इलेक्ट्रानिक क्रियाविधि” की जो भी जानकारी प्राप्त कर सके हैं, उसी की कल्पना-सीमा में बाँधने पर हम भले ही विश्व को मूल सत्ता का कुछ तरंग-समूहों का नाम दें, पर सच बात तो यह है कि यह दुनिया ऐसी अज्ञात और अकथनीय तरंगों का संघात मात्र है, जिनके बारे में हम जो कुछ भी जानते हैं, वहीं कह सकते हैं, पर इस निवेदन के साथ कि मूल स्वरूप उसका क्या है, यह हमें स्वयं ज्ञात नहीं। अर्थात् ‘कहत कठिन समुझत कठिन।’
इस प्रकार विज्ञान भी आज अध्यात्म की ही तरह विनम्र है और अपनी सीमाओं की घोषणा कर रहा है। बालबुद्धि का शोर अब थम गया है। यों विज्ञान दुराग्रही कभी भी नहीं रहा। उसकी नास्तिकता अपनी स्थिति का विवरण-प्रतिवेदन मात्र थी, कोई निश्चित निष्कर्ष नहीं। उसने सृष्टि की चैतन्य सत्ता के अस्तित्व की सम्भावना को अस्वीकार कभी भी नहीं किया था। वह तो अपने प्रतिपाद्य विषय के निष्कर्षों को प्रस्तुत कर देता रहा है। उसका प्रतिपाद्य विषय इन्द्रिय-बोध के आधार पर सूक्ष्मदर्शी उपकरणों की सहायता से वस्तुतः सत्ता का विश्लेषण-विवेचन और निष्कर्ष संग्रह रहा है। इस प्रक्रिया में वह ‘मैटर’ को ही अपना अनुसन्धान क्षेत्र बनाए रहा है। ‘मैटर’ की मूलभूत सत्ता का विवेचन वह निष्ठा और श्रम के साथ करता रहा है। किन्तु अब इस ‘मैटर’ की मूलभूत सत्ता ही संदिग्ध और अनिश्चित हो गई है।
भौतिकी वैज्ञानिकों की मान्यता है कि शीशे और काँसे से अधिक भारी परमाणु स्थायी नहीं है। वे टूट जाते हैं। रेडियोसक्रिय द्रव्य से जब विकिरण निष्क्रमित हो जाता है, तो उनकी रेडियो-सक्रियता की शक्ति में कुछ कमी पाई जाती है। यह क्षरण की प्रक्रिया है। इस प्रकार एक परमाणु विसंगठित तथा विसर्जित हो सकता है। परमाणु सम्पूर्णतः स्थायी वस्तु नहीं है, इसके विपरीत वे परिवर्तनशील है, उत्पन्न होते तथा नष्ट होते रहते हैं। इस प्रकार ‘मैटर’ की कोई मूलभूत सत्ता इस रूप में नहीं है। उसका भी जन्म-मरण होता रहता है। द्रव्य की सक्रियता का अर्थ है क्रमशः क्षीण होते जाना और अन्त में समाप्त हो जाना। इसीलिए वैज्ञानिक अब यह मानते हैं कि द्रव्यमय जगत का ह्रास एवं विनाश अनिवार्य है। भौतिकविदों ने खोज की है कि प्रकृति के क्रियाकलापों में प्रत्येक अपव्यय का लेखा-जोखा रहता है। इस प्रकार सन्तुलन क्रमशः कम हो रहा है। एक दिन यह पूरी तरह गड़बड़ा जाएगा और सृष्टि का वर्तमान स्वरूप विघटित हो जाएगा ।
एक सामान्य व्यक्ति के लिए यह संसार रूप, रंग, ध्वनि, ताप आदि का समन्वित स्वरूप है। किन्तु एक आधुनिक वैज्ञानिक की दृष्टि में यह सृष्टि रंग रहित, गन्ध रहित, ध्वनि रहित है। उसकी दृष्टि में प्रकृति में वस्तुतः द्रव्य है ही नहीं। वह सिर्फ दिक्-काल का और विद्युत-प्रवाहों का ऐसा विस्तार है, जिन्हें सम्भावनाओं की अज्ञात तरंगों के द्वारा ही वर्णित किया जा सकता है। अर्थात् ऐसी तरंगों का खेल है यह संसार, जिनमें अनन्त सम्भावनाएँ विद्यमान है और जिनका मूल स्वरूप अज्ञात है। यह ठोस दिखने वाला विश्व जब भली−भाँति विश्लेषित किया जाता है तो एक ऐसे रहस्यमय परिमाण (क्वान्टिटी) का रूप ले लेता है, जिसका वर्णन असम्भव है, कुछ गणितीय प्रतीकों द्वारा जिसका संकेत मात्र किया जा सकता है। इस प्रकार इस भौतिक विश्व का पूरा ढाँचा, नाना रूपों नाना वेशों वाले, नक्षत्र मालाओं, पर्वत शृंखलाओं, नर-नारियों पशु-पक्षियों प्राणियों और वस्तुओं से भरपूर, ध्वनियों और रंगों तापों और गन्ध से भरपूर यह पूरे का पूरा ढाँचा अन्तिम वैज्ञानिक विश्लेषण में मात्र विद्युत प्रवाहों अथवा असीम शून्य आकाश या कि अनन्त सम्भावनाओं से भरी तरंगों का समुच्चय मात्र रह जाता है। ‘मैटर’ रह ही नहीं जाता। ठोस दिखने वाला यह संसार वाष्प की तरह उड़कर अदृश्य हो जाता है और वस्तुएँ विलीन हो जाती है, बहुत्व की और बढ़ता-सा दिख रहा विभिन्न रूपों तथा नामों में अभिव्यक्त हो रहा यह ब्रह्माण्ड एक ही अति सूक्ष्म मूल सत्ता में, शक्ति के उस मूल रूप में समाहित हो जाता है, जहाँ से कि उसका उद्गम होता है।
‘द यूनीवर्स एंड डा आइन्स्टाइन’ के लेखक बर्टन लिखते हैं-जिसे वैज्ञानिक तथा दार्शनिक आभास मय जगत कहते हैं, वह संसार है, जो कि मरणधर्मा मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुरूप अनुभव करता है। जिसे ये वैज्ञानिक दार्शनिक यथार्थ जगत कहते हैं- वह रंग रहित, ध्वनि रहित, अव्याख्यये, कास्मास है। मनुष्य की प्रक्षेपण के तल में यथार्थ जगत प्रतीकों का एक कंकाल-ढाँचा मात्र है।”
‘गाइट टू फिलॉसफी’ नामक पुस्तक में श्री जाड़ ने भी ऐसा ही कुछ कहा है- मेटर दिक् तथा काल में विस्तृत एक रस्सी का ऐंठन की तरह है। वह एक इलेक्ट्रानी कुकुरमुत्ता है। अनन्त सम्भावनाओं की एक ऐसी तरंग है, जो कुछ नहीं जैसा है। ऐसी विद्युतधाराओं का समूह है, जो किसी भी ‘वस्तु’ में प्रवाहित नहीं होती। दिक्काल में घट रही घटनाओं की एक व्यवस्था है, जिसकी विशेषताएँ मात्र गणितीय ढंग से संकेतित की जा सकती है।”
एडिंगटन महाशय भी कहते हैं-मैटर का सारभूत अंश पिघलकर छायावत् बन गया है, वह गया है। वह एक अज्ञात परिणाम मात्र रह गया है, जिसके लिए गणितीय संकेत ‘क्ष’ का प्रयोग किया जा सकता है।
तब क्या आकर्षक रंगों की, सम्मोहक सौंदर्य की, चित्ताकर्षक ध्वनियों और लुभावने संगीत की, पृथिवी पर फैलने वाले प्रकाश की, जीवन उत्पन्न करने वाली ऊष्मा की कोई सत्ता नहीं है? आधुनिक वैज्ञानिकों का निष्कर्ष है कि उनकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है, उसका कोई यथार्थ स्वरूप नहीं है। वे तरंगों और गतियों के विभिन्न समूह मात्र है। ऊष्मा क्या है? अणुओं का कम्पन मात्र। ध्वनि क्या है- वातावरण की तरंगों का संवात। और प्रकाश तथा वर्ण? “इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पैकट्रम” में विभिन्न ‘फ्रीक्वेन्सीज’ की वेवलेंथ के अलग-अलग ‘सेट’ मात्र है। प्रत्येक रंग प्रकाशखण्ड में कुछ निश्चित ‘फ्रीक्वेन्सी’ तथा ‘वेवलेंथ’ की तरंगों का परिणाम है। वस्तुतः है मात्र ये तरंगें। जो रंग हम देखते हैं, वह हमारा ‘आत्मपरक सृजन’ है एडिंगटन कहते है-तरंग है यथार्थ और रंग जो हम देखते हैं, हमारी दिमागी बनावट है।” इस प्रकार जिसे हम वस्तु-सत्य कहते हैं, वह असल में हमारा ही “आत्मपरक सृजन” है। इस प्रकार विज्ञान अध्यात्म के ही निष्कर्षों तक आ पहुँचा। दोनों की आधार-भूमि एक ही चली।
भारतीय मनीषी सृष्टि के इस मूल स्वरूप से हजारों वर्ष पूर्व से परिचित रहे हैं। वेदान्त की सृष्टि व्याख्याएँ आज भौतिकी के अनुसन्धानों द्वारा भी प्रमाणित-पुष्ट हो रही है।
अगले दिनों विज्ञान के बढ़ते चरण निश्चित रूप से उस स्थान पहुँचेंगे, जहाँ प्रकृति और पुरुष का मिलन होता है। जड़-पदार्थ और चेतन जीवन में बहुत समय से अन्तर माना जाता रहा है। जब बात आगे बढ़ रही है और एक चेतना का अस्तित्व ही उसी रूप में आ रहा है जिसमें पदार्थ का भी सम्मिश्रण है। इसे जीवन कह सकते हैं और जीवन ही निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है।
अध्यात्म और विज्ञान की पिछले दिनों परस्पर विरोधी माना जाता रहा है। नवीनतम शोधें उन्हें पूरक ही नहीं एकीभूत भी सिद्ध कर रही है। ऐसी दशा में यह आशा की जा सकती है कि वेदान्त के उस तत्त्व-दर्शन का विज्ञान द्वारा भी प्रतिपादन होगा, जिसमें अद्वैत की सर्वव्यापी सत्ता का प्रतिपादन किया गया है।
नीत्से ने ईश्वर को विज्ञान के हथियार से मार डालने की घोषणा की थी। अब वह दुधारा उलट गया है और उलटे पदार्थ विज्ञान के अस्तित्व पर ही कुठाराघात कर रहा है। आशा की जानी चाहिए कि प्रहार युग समाप्त हुआ कुछ ही दिन में विज्ञान और अध्यात्म दोनों ही गले मिलेंगे और उस सार्वभौम एकता का प्रतिपादन करेंगे, जिसके सहारे विश्व एकता की मान्यताएँ पनपे और सर्वत्र आत्मीयता भरे व्यवहार से धरती पर स्वर्ग के अवतरण का आनन्द बिखरे।
मैं अनुभव करता हूँ कि कोई अनिर्वचनीय शक्ति इस संसार में संव्याप्त है। इतने पर भी उसे आँखों से देख नहीं पाता। क्योंकि वह इन्द्रिय क्षमता से परे है। यद्यपि तर्क के द्वारा ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध करना एक सीमा तक ही सम्भव है तो भी इस परिवर्तन शील जगत में एक जीवित सर्वव्यापी और अपरिवर्तित शक्ति का सहज आभास मिलता है। यही ईश्वर है।
मैं देखता हूँ कि मृत्यु के बीच में जीवन अमर है। असत्य के घटा टोप में भी वह अपना अस्तित्व संजोये हुए हैं। अन्धकार के बीच भी प्रकाश जीवित है। अतएव मैं इस परिणाम पर पहुँचता हूँ कि ईश्वर जीवन, सत्य और प्रकाश है। उसकी सत्ता आस्था रखने ही योग्य है।
-महात्मा गाँधी
शील के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए पुराणकार ने एक सुन्दर कथा के द्वारा उसे समझाया है। प्रहलाद जब सम्राट बने, तब रात्रि उनके सामने एक ज्योति-प्रतिमा प्रकट हुई। वे लक्ष्मी जी थीं। उन्होंने कहा- मैं एक स्थान पर अधिक समय नहीं रहना पसन्द करती, अतः जाती हैं। प्रहलाद ने प्रणाम कर कहा-जैसी देवी की इच्छा, यहाँ जब चाहें, पुनः आएँ, स्वागत रहेगा। अभी जा रही हैं, तो भी स्वागत है, प्रणाम है। लक्ष्मी जी चली गई। उनके जाने के बाद कीर्ति, प्रतिष्ठा, महिमा आदि कई देवि मूर्तियाँ भी क्रमशः प्रकट हुई। लक्ष्मी के चले जाने पर उनने भी बिदा होने की बात कही और प्रह्लाद ने सभी से विनम्रतापूर्वक प्रणाम करते हुये उन्हें विदा दी। फिर ऐश्वर्य, विभूति, सुख, प्रमोद आदि पुरुष, प्रतिमाएँ भी एक-एक कर प्रकट हुई और विदा हो गई अन्त में एक प्रशान्त आभामण्डल के साथ प्रकट हुए शील। उन्होंने भी जाने की बात कही तो प्रहलाद ने कहा-आप कैसे जा सकते है? क्या में आज तक कभी भी शील से विचलित हुआ हूँ? क्षण भर को भी क्या मैंने आपका स्मरण छोड़ा है?” निरुत्तर ‘शील’ देवता वही रुक गये। थोड़े ही समय बाद एक-एक कर सभी देव व देवी प्रतिमाएँ वापिस आती गईं और “जहाँ शील है, वहाँ से हम जा ही कैसे सकते हैं-कहकर वहीं पुनः वे सब निवास करने लगे। स्पष्ट है कि यह कथा शील के महत्त्व का ही प्रतिपादन करने वाली है।
भौतिक सुख-साधनों की अभिवृद्धि की और तो आज हर किसी का ध्यान केन्द्रित है, पर सदाशयता-शालीनता के विकास की कौन कहे, निरन्तर ह्रास के ही दृश्य आज चारों और देखने को मिलते हैं। अधिकांश लोगों का व्यक्तिगत जीवन आज सौ वर्ष पुरानी स्थिति की तुलना में कहीं अधिक सुविधा-साधनों से भरपूर है , पर घर की अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त शरीर रुग्ण-क्षीण मन अशान्त-विक्षुब्ध पारिवारिक व्यवस्था विघटित विश्रृंखलित ही दिखाई पड़ती है। लोगों को सामाजिक व्यवस्था से शिकायतें ही शिकायतें है। शीर्षस्थ कहे-माने जाने वाले लोगों की चापलूसी-चाटुकारिता तो अत्यधिक की जाती है, पर उनके चरित्र और चिन्तन के स्तर के प्रति जैसे सभी को यही विश्वास है कि वह सामान्य से भी कुछ निष्कृष्ट ही होगा, उत्कृष्ट नहीं। व्यक्तिगत जीवन में जिस दुर्बुद्धि के साम्राज्य में कुंठा, कलह, कुत्सा और कायरता बढ़ रही है, समष्टि क्षेत्र में उसी के विस्तार ने अणु-आयुध जैवीय संहार-पिण्ड घातक गैसें, मृत्यु-किरण प्रक्षेपास्त्र आदि का विशाल सरंजाम जुटा दिया है, जिससे किसी उन्मत्त मूर्ख की एक धृष्टता देखते-देखते इस सुन्दर संसार को महा-श्मशान बनाकर रख दे सकती है।
साधनहीनता और विपत्ति के कारण उठाए जाने वाले कष्टों की बात तो समझा में आती है, पर सुविधाओं के बाहुल्य से उपजी विकृति की क्या व्याख्या की जाए? कारण खोजने पर तो एक ही निष्कर्ष प्राप्त होता है कि विकास की कल्पना पदार्थों से चिपटकर सिमटती ही चली जा रही है। आन्तरिक विपन्नता को अनदेखा ही किया जा रहा है, यद्यपि इससे वह और अधिक उभर आई स्पष्ट दिखती है। चरित्र और चिन्तन के परिष्कार का विचार ही विस्मृति कर दिया गया है, सद्भावनाओं सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की चर्चा भी झण्ट-झमेले जैसी लगने लगी है और शेष रह गया है, उथला, आडम्बरी, छत्रा, शिष्टाचार। जीवन-रस सूख गया है और सामाजिक व्यवहार एक रेतीला विस्तार बनकर रह गया है। इस शुष्क, निष्प्राण वातावरण में मनुष्य को क्या रस मिलेगा? वह अतृप्त और व्यस्त-त्रस्त रहते हुए दुर्वह भार से मनःस्थिति निरन्तर दुर्बलतम होती जा रही है। यों इसके अपवाद भी मौजूद है। सज्जनता पूर्णतया मर गई होती तो यह दुनिया रहने लायक ही न होती। सत्प्रवृत्तियों का घटते जाना और दुष्प्रवृत्तियों का उभरना यही है, अपने युग के चारित्रिक विश्लेषण का दुःखद निष्कर्ष ।
जीवन में आवेशों की अभिवृद्धि वर्तमान वातावरण में स्वाभाविक ही है। जब भीतर स्नेह सौजन्य रहा नहीं, घोर निर्ममता ही छाई है। किसी को किसी के सहारे की आशा रही नहीं और वह रही भी, तो समय आने पर निराशाजनक ही सिद्ध होती है। मनुष्य भीतर बाहर से रिक्त खोखला होता जा रहा है, बाहरी चमक-दमक रीझने रिझाने की चेष्टाएँ स्वयं को भरमाए बहलाए रखने का बहाना बन गई है, पर यह ओछा आधार मन को आश्वस्त नहीं कर पाता। कुंठा और हताशा बढ़ती जाती है, नशे के सहारे या अश्लील उत्तेजनाओं के तरीके खोज खोजकर जिन्दगी की लाश में क्षण दो क्षण की गर्मी पैदा की जाती है। ऐसे में रोष-क्षोभ की ज्वालाओं में झुलसते रहने के अतिरिक्त और चारा ही क्या है? जब सारा ध्यान पदार्थों में केन्द्रित है, तो दूसरों की भावनाओं के सम्मान का किसे वक्त ? शील का अर्थ है-मनुष्यों की विचारधारा, रुचि, प्रकृति एवं मनःस्थिति की प्रकृति प्रदत्त भिन्नता को ध्यान में रखते हुए औरों के विचारों निर्णयों के प्रति भी सम्मान का भाव रखना, उन्हें समझने का प्रयास करना और असहमत होने पर भी सहिष्णुता बरतना। क्रोध-आवेश उसी मनोभूमि में उत्पन्न होते हैं जो अपनी ही मर्जी के अनुसार दूसरों को सोचने करने के लिए बाध्य करना चाहती है। इस मनोभूमि के परामर्श शैली अपनाने का धैर्य और कोमलता बनाए रखने का संयम उत्पन्न ही नहीं हो पाता। परिस्थितियों से धैर्य और औचित्य के आधार पर निपटने का कर्तव्य याद ही नहीं आ पाता।
इस स्थिति को बदला तभी जा सकता है, जब शील की पुनः प्रतिष्ठा हो। भौतिक सम्पन्नता के साथ आन्तरिक शालीनता भी बढ़े। मृदुलता और तृप्ति के भीतरी साधन स्रोतों की ओर भी ध्यान दिया जाय। पदार्थों में भावसंवेदना उत्पन्न करने की सामर्थ्य कहाँ ? जिन रुचिर वस्तुओं के लिए मनुष्य का मन आतुर उद्विग्न बना रहता है, वे वस्तुतः अपनेपन की भाव-सम्वेदना के आरोपण से ही आकर्षक एवं सुखद प्रतीत होती है। अपनत्व के रंगीन चश्मे से देखने पर ही जिस-जिस वस्तु में आकर्षण की प्रतीति होने लगती है। यह तथ्य यदि भली-भाँति समझ में आ जाय, तो वस्तुओं के पीछे भागते फिरने की व्यर्थता और दृष्टिकोण को परिष्कृत करने की आवश्यकता स्पष्ट हो जाय।
परिष्कृत दृष्टिकोण सदा आत्मीयता की परिधि को विस्तृत करता चलता है। इस परिधि विस्तार से ही मनुष्य शील-सम्पन्न बनता है भारतीय विचारकों ऋषियों ने इस तत्त्व को समझा था और सदा आत्म विस्तार पर बल दिया था। अध्यात्म का तत्त्वज्ञान आत्म भाव के विस्तार से ही प्रारम्भ होता है। जिसने जितना आत्मविस्तार कर लिया आध्यात्मिक दृष्टि से उसे उतना ही विकसित माना जाता है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की अनुभूति तथा ‘विश्वबन्धुत्व’ का व्यवहार ही आध्यात्मिक तत्त्व ज्ञान की आचरण परक निष्पत्ति है। यह व्यवहार ही शील है।
वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में शील की प्रतिष्ठा से ही व्यक्तिगत महानता और सामाजिक समस्वरता टिकाऊ बन सकती है। भावनात्मक उत्कृष्टता का महत्त्व समझने पर ही अन्तर्बाह्य सम्पन्नता सम्भव हो सकती है।
महात्मा गाँधी ने शील की व्याख्या करते हुए उसे ‘चरित्र की धारावाहिकता’ कहा है। इसका अर्थ है चरित्र की निरन्तर उत्कृष्टता। उस पुण्य प्रवाह में कभी भी अवरोध न उपस्थित होने देना। प्रतिकूलताओं के बीच भी अपने उच्च चारित्रिक स्तर को बनाए रखना। विश्व जीवन में इसी शील-शालीनता का समावेश करना होगा, तभी सुख शान्ति और आनन्द उल्लास की बढ़ी चढ़ी परिस्थितियाँ उत्पन्न हो सकेंगी।
अंय तु परंमो धर्मो यद् योगनात्मदर्शनम्। योग के द्वारा आत्म साक्षात्कार करना सबसे बड़ा धर्म है। जो लोग धर्म की चर्चा करते हैं और साथ ही उसकी उपासना को भी धर्म के अंगों में महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं जैसा कि देना चाहिए उन्हें इस परम धर्म योग की शरण में आना चाहिए।
जमीन से निकलते समय लोहा मिट्टी मिला होता है। उसे अग्नि संस्कार करके शुद्ध करना होता है। खदान से निकलते समय की लोह मिश्रित मिट्टी अपने मूल रूप में किसी काम की नहीं होती न वह मिट्टी का प्रयोजन पूरा करती है और न लोहे का-जब उसका परिशोधन होता है, तभी शुद्ध लोहे का स्वरूप सामने आता है। उससे आगे उस लोहे को पिघलाकर औजारों, पुर्जों, हथियारों के रूप में ढाला जाता है। उस लोह खण्ड की उपयोगिता और गरिमा इसी प्रकार बढ़ती है। रसायन शास्त्र वेत्ता सामान्य लोहे को लोहासव-लोह भस्म, माण्डूर भस्म आदि का रूप देते हैं और इन औषधियों के सहारे भयंकर रोगग्रस्तों को जीवन दान दिलाते हैं। सामान्य से - महत्त्व हीन-लोह खण्ड को उतना उपयोगी बना देने का श्रेय अग्नि संस्कारों के साथ जुड़ी हुई ढालने, खरादने आदि की प्रक्रिया को ही दिया जा सकता है।
ऊबड़-खाबड़ को समतल, उर्वर, पार्क, उद्यान के रूप में विकसित करने के लिए कृषक को बहुत कुछ करना पड़ता है। जंगलों में उगे पौधे झाड़-झंखाड़ भर रहते हैं पर कुशल माली उन्हें अपनी कलाकारिता से काटते-छाँटते निराते, गोड़ते, कलम लगाते सुरम्य उद्यान की नयनाभिराम स्थिति में पहुँचा देता है। शरीर की साधना करने वाले व्यायाम प्रेमी उसे सुन्दर बलिष्ठ और आकर्षक बना लेते । ऐसे शरीर पहलवान के नाम से प्रख्यात होते और पुरस्कृत होते हैं। विद्वान बनने के लिए मस्तिष्क की साधना करनी पड़ती है। प्रशिक्षण और वातावरण के दबाव से ही मनुष्य सुसंस्कृत बनता और गौरवास्पद होता है। यह सब संस्कार साधना का ही प्रतिफल है।
अनगढ़ स्वर्ण खण्ड स्वर्णकार के हाथों तले जाकर नयनाभिराम आभूषण बनता है। इस विकास में उसे कई प्रकार तपने, पिटने, छिलने की प्रक्रियाओं में होकर गुजरना पड़ता है। अन्य धातुएँ भी अपने भूल स्वरूप में जिस भाव की होती है उसकी तुलना में उनके किसी उपयोगी वस्तु के रूप में परिणित हो जाने का मूल्य अनेक गुना जो जाता है। पत्थर के टुकड़े का मूल्य नगण्य है, पर मूर्तिकार के छैनी, हथौड़े सहते-रहने पर उसका स्वरूप देव प्रतिमा का बन जाता है। कागज पर साहित्यकार की लेखनी चलती है और वह बहुमूल्य पाण्डुलिपि के रूप में बदल जाता है।
वन्य पशु मनुष्य के लिए अनुपयोगी ही नहीं हानिकारक भी होते हैं। किन्तु जब उन्हें पालतू बना लिया जाता है और सधा लिया जाता है, तो पूरा पूरा लाभ उठाया जाता है। गाय, बैल, घोड़े, हाथी आदि के सहारे मनुष्य ने कितनी प्रकार के - लाभ उठाये हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। यह सब अनायास ही नहीं हो गया। वन्य स्थिति से पालतू और प्रशिक्षित बनाने में मनुष्य को धैर्यपूर्वक चिर-साधना में लगा रहना पड़ा है और पशु-पालन शास्त्र विकसित करना पड़ा है। हिंस्र पशुओं को सरकस में कौतूहलवर्धक काम करते देखते हैं तो आश्चर्य होता है। अपनी मूल-स्थिति में जो सिंह बाघ मनुष्य का प्राण हरण ही कर सकते हैं, प्रशिक्षित होने पर वे ही भारी कमाई करते हैं। इसे साधना का चमत्कार ही कहा जा सकता है।
नृतत्व विज्ञान के अनुसार मनुष्य भी एक वन्य पशु है। उसे बानर वर्ग के वंश से विकसित होते-होते वर्तमान स्थिति तक पहुँचा हुआ माना जाता है। इस विकास क्रम में उसने अपनी बौद्धिक क्षमता एवं क्रिया कुशलता विकसित की है। बोलना, लिखना और सोचना सीखा है। शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, कला, कृषि, परिवहन, आदि की कितने ही प्रकार की उपलब्धियाँ अर्जित की है। यह सब अनायास ही नहीं हो गया। यह लाखों वर्षों की विकास साधना का प्रतिफल है। समाज का गठन, शासन तन्त्र, तत्त्व-दर्शन धर्म, सभ्यता, संस्कृति आदि का प्रस्तुत ढाँचा यदि खड़ा न किया जा सका होता तो मनुष्य अपने मूल स्वरूप में वनमानुषों से अधिक कुछ हो नहीं सकता था। अब भी जहाँ सभ्यता का प्रकाश स्वल्प मात्रा में पहुँचा है, वहाँ के मनुष्यों का पिछड़ापन कितना दयनीय प्रतीत होता है।
हाड़ माँस की दृष्टि से-प्रायः सभी मनुष्यों के शरीर लगभग समान स्तर के है। यों तो पत्ते-पत्ते की बनावट में अन्तर होता है। पर मोटी दृष्टि से उन्हें समान ही कहा जा सकता है। यही बात मनुष्य मनुष्य के बीच में है। उनके बीच पाये जाने वाले अन्तर को नगण्य ही कह सकते हैं। समानता की मात्रा इतनी है कि अन्तर को स्वल्प ही माना जाएगा । इतने पर भी देखा जाता है कि एक जैसी परिस्थितियों में जन्मे और पले होने पर भी मनुष्य मनुष्य के बीच भारी अन्तर रहता है। एक उन्नति के उच्च शिखर पर जा पहुँचता है, दूसरा जहाँ का तहाँ पड़ा रहता है, तीसरा दिन-दिन दीन दयनीय बनता जाता है। इसे प्रायः भाग्य आदि का नाम दिया जाता है, पर वस्तुतः यह मनुष्यों की आन्तरिक स्थिति के विकास क्रम की ही प्रतिक्रिया है। आकांक्षा से जीवन विकास क्रम की ही प्रतिक्रिया है। आकांक्षा से जीवन की दिशा धारा बनती है। मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थिति ढलती है। प्रयत्नों के परिणाम उपलब्धियाँ बनकर सामने आते हैं। प्रवाह स्वयं निर्धारित करना पड़ता है। सहयोग उसी प्रकार का मिलता जाता है और साधन वैसे ही जुटते जाते हैं। आरम्भ और अन्त में जमीन आसमान का जो अन्तर दिखाई पड़ता है। उसे मध्यावधि में अपनाये गये चिन्तन एवं कर्म का ही सत्परिणाम कह सकते हैं। साधना से सिद्धि की उक्ति अक्षरशः सत्य है। इस संसार में ने तो कुछ अनायास होता है और न अप्रत्याशित। प्रकृति की विलक्षण घटनाओं से लेकर मानवी उत्थान-पतन तक की समस्त हलचलें किसी क्रमबद्ध प्रतिक्रिया के सुनिश्चित परिणाम है। भले ही हम उस प्रक्रिया से परिचित न होने के कारण भाग्य, दैव आदि का कुछ भी नाम देते रहें। तथ्य ‘साधना से सिद्धि’ के सिद्धान्त की ही पग पग पर पुष्टि करते हैं। विज्ञान की साधना करते करते मनुष्य ने प्रकृति के चमत्कारी वरदान प्राप्त किये है। जब तक वे प्रयास बन नहीं पड़े थे, तब तक प्रस्तुत वैज्ञानिक उपलब्धियों में से एक भी हस्तगत नहीं हुई थी।
देवता बड़े दयालु है और अनुग्रह कर्ता भी। पर पात्रता को परखे बिना अनुग्रह को बरसा देने के दुष्परिणाम भली भाँति समझते हैं इसलिए उनकी कृपा का लाभ भी केवल उन्हीं को मिलता है जो उपयुक्त पुरुषार्थ करके अपनी पात्रता सिद्ध करते हैं। याचना से, चापलूसी से छल छद्म से भी कभी कभी कुछ मिल जाता है, पर उसे अन्यत्र ही स्वल्प एवं अपवाद तुल्य ही कहा जा सकता है। उसमें स्थिरता भी नहीं रहती। पात्रता के अभाव में उत्तराधिकार आदि में मिली प्रचुर सम्पदा भी दुर्व्यसनों में नष्ट होती और दुष्परिणाम उत्पन्न करती देखी गई है। पुरुषार्थ साधना से अभीष्ट साधनों का, सफलताओं का मिलना तो एक गौण लाभ है। असली लाभ है साधक के व्यक्तित्व का-गुण कर्म, स्वभाव का सुविकसित होना। इस उपार्जन के सहारे प्रतिभा निखरती है और उस सामर्थ्य के सहारे किसी भी दिशा में प्रगति की जा सकती है।
‘साधना’ शब्द का प्रयोग योगाभ्यास, तप-साधना पूजा-पाठ के अर्थों में होता है। इसे आत्म साधना कहना चाहिए। प्रसुप्त अन्तः शक्तियों को जगाने, उच्चस्तरीय दृष्टिकोण विकसित करने एवं क्षमताओं को सुनियोजित करने के लिए ही तत्त्वदर्शी महामनीषियों ने अपने दीर्घ कालीन अनुभवों के सहारे आत्म-विज्ञान का आविर्भाव किया है। इस विद्या को संसार की सर्वोपरि विद्या कहा गया है। यह सर्वथा सत्य है। जड़ की तुलना में चेतन की क्षमता असंख्य गुनी बढ़ी-चढ़ी है। शरीर की तुलना में प्राण अधिक महत्त्वपूर्ण है। भौतिक विज्ञान के सहारे पदार्थों को उपयोगी बनाया जाता है। आत्म विज्ञान के सहारे अन्तः चेतना की प्रखरता उभरती है। इस उभार से भौतिक सफलताओं का पथ-द्वार खुलता है। सबसे बड़ी बात यह है कि परिष्कृत आत्मचेतना-इस विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त सृष्टि की सूत्र संचालक ब्रह्म सत्ता के साथ सम्पर्क को अधिकाधिक सघन बनाते चलने का अवसर मिलता है। यह सघनता मनुष्य को सामान्य से असामान्य बनाती है। उसके पशु संस्कार घटते और दैवी तत्त्व बढ़ते चले जाते हैं। इस प्रगति की प्रतिक्रिया अनेकों ऐसे सुखद परिणामों के रूप में सामने आती है जिन्हें ईश्वरीय अनुग्रह एवं दैवी वरदान का नाम देने में किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।
भौतिक प्रगति के उदाहरण आये दिन सामने आते रहते हैं। इसलिए उन्हें सामान्य एवं लौकिक माना जाता है और सफलताएँ कहा जाता है। आत्मिक प्रगति की दिशा में लोगों का ध्यान कम है। उस दिशा में प्रयत्न या तो होते ही नहीं, होते हैं तो अवैज्ञानिक स्तर के, फलतः आकस्मिक विभूतियाँ कभी कभी ही कदाचित किसी के पास दीख पड़ती है। जो असाधारण तथ्य यदा कदा ही दृष्टिगोचर होते हैं वे कौतूहल की तरह देखे और चमत्कार कहे जाते हैं। आत्मिक साधनाओं का फल चमत्कार समझा जाता है और उसे सिद्धि नाम दिया जाता है। वस्तुतः आत्म साधना के आधार पर आत्म चेतना की गहरी परतों को उभारने की प्रसुप्त शक्तियों के जागरण की प्रक्रिया सम्पन्न होती है और उसके सहारे जो असाधारण स्तर के सत्परिणाम उत्पन्न होते हैं उन्हें सिद्धि कहा जाता है।
शब्द को ब्रह्म कहा गया है। ‘शब्द ब्रह्म-नाद ब्रह्म’ शब्दों का उपयोग शास्त्र में अनेक स्थानों पर आया है। यह उक्ति अलंकार नहीं-वरन् यथार्थ है। हाँ, यदि ध्वनि मात्र को यह उपमा दी जाएगी तो उसे उपहासास्पद समझा जाएगा । जिह्वा स्वर यन्त्र है। वाद्य यन्त्र पर उलटी सीधी अंगुली से आघात लगाये जाएँ तो आवाज भर होगी। क्रमबद्ध, तालबद्ध, राग-रागिनी निकालनी हो तो उसके लिए सधे हाथ एवं प्रशिक्षित मस्तिष्क का भी योगदान आवश्यक है। जिव्हा से बोले गये मन्त्र वाद्य-यन्त्र पर जैसे जैसे अंगुली चलाने की तरह है, उतने भर से दीपक राग या मेघ मल्हार जैसे प्रभावोत्पादक परिणामों की अपेक्षा नहीं की जा सकती । जिव्हा से उच्चरित शब्द सामान्यतया जानकारियों के आदान प्रदान का उद्देश्य पूरा करते हैं। एक व्यक्ति शब्द माध्यम से अपनी अनुभूति एवं जानकारी दूसरे तक पहुँचा सकता है। इसमें भी आवश्यक नहीं कि जिससे जो कहा गया है वह उसे उसी रूप में स्वीकार कर ले। कारण कि आजकल वचन छल का दौर दौरा है। लोग एक दूसरे को ठगने की दृष्टि से कपट वचन बोलने की कला में प्रवीण हो चले है। अस्तु सुनने वाले को फूँक-फूँक कर कदम रखना होता है और देखना पड़ता है कि कथन में छल, प्रपंच की दुरभिसंधियाँ तो घुसी हुई नहीं है। कितना कथन संदिग्ध हो सकता है, इसकी खोज करने में सुनने वाला लगता है। जितना अंश गले उतरता है, उतने पर ध्यान देकर शेष को उपेक्षा के गर्त में फेंक देता है। जब सामान्य व्यवहार तक में वाणी की यह दुर्गति हो रही हो। उच्चारण को अविश्वस्त और अप्रमाणिक मानने की परम्परा चल रही हो तो उससे व्यावहारिक आदान प्रदान तक की आवश्यकताएँ पूरी नहीं होती। फिर आध्यात्मिक प्रयोजन तो पूरे हो ही कैसे सकेंगे ।
इस कठिनाई को ध्यान में रखते हुए ही मन्त्राराधन में ‘वाणी’ मात्र से सम्भव हो सकने वाले क्रिया-काण्डों को महत्त्व नहीं दिया गया है। जीभ से तो लोग आये दिन कथा, कीर्तन, भजन, पाठ, जप आदि के माध्यम से तरह तरह के चित्र विचित्र वचन बोलते रहते हैं। यदि उतने भर से धर्मचर्या के उद्देश्य पूरे हो जाया करते तो फिर सरलता की अति ही कही जाती। छोटे छोटे लाभ प्राप्त करने के लिए मनुष्य को कठोर श्रम करने, साधन जुटाने एवं मनोयोग लगाने की आवश्यकता पड़ती है तब कहीं आधी अधूरी सफलता का योग बनता है। अध्यात्म क्षेत्र जितना उच्चस्तरीय है उतनी ही उसकी विभूतियाँ भी बहुमूल्य है। निश्चित रूप से उसके लिए प्रयास भी अपेक्षाकृत अधिक कष्ट साध्य ही होते हैं। यदि उतने बड़े लाभ मात्र जिव्हा से अमुक शब्दावली दुहरा देने भर से प्राप्त हो जाया करते तो उन्हें पाने से कोई भी वंचित न रहता, पर इतना सस्तापन है कहाँ ?
महत्त्व की दृष्टि से हर वस्तु का मूल्य निर्धारित है। अध्यात्म उपलब्धियों में शब्द शक्ति की महत्ता बताई और महिमा गाई गई है। मन्त्राराधन के फलस्वरूप मिलने वाले लाभों का वर्णन विस्तारपूर्वक शास्त्रों में भरा पड़ा है, पर उसे शब्द चमत्कार भर नहीं मान लिया जाना चाहिए। यदि उच्चारण ही सब कुछ रहा होता तो साधन ग्रन्थ पढ़ने वाली से प्रेस कर्मचारी और, पुस्तक विक्रेता पहले ही लाभान्वित हो लेते। पाठक को उनका बचा-खुचा ही शायद कुछ हाथ लगता। शब्दोच्चारण में जप के अति सरल कर्मकाण्ड के लिए थोड़ा-सा संयम लगा देने में किसी को क्या कुछ असुविधा होगी ? उतना तो कोई बालक नासमझ या वृद्ध अशक्त भी कर सकता है, फिर समर्थ व्यक्ति तो उसे उत्साहपूर्वक करते और भरपूर लाभ उठाते। ऐसा कहाँ होता है ? लाभों का महात्म्य विस्तार पढ़ते हुए भी कुछ करने के लिए कहाँ किसी का उत्साह होता है। ?
शब्द ब्रह्म-शब्दों में जो गहन रहस्य छिपा है वह यह है कि अध्यात्म प्रयोजनों में प्रयुक्त होने वाली शब्दावली को उच्चस्तरीय होना चाहिए। वह इतनी परिष्कृत हो कि उसकी पवित्रता, प्रामाणिकता एवं क्षमता को ईश्वर के समतुल्य ठहराया जा सके। इसके लिए कई लोग स्वर विन्यास की बात सोचते हैं और अनुमान लगाते हैं कि मन्त्रों में उच्चारण का जो स्वर क्रम बताया गया है, उसे जान लेने से काम बन जाएगा । यह मान्यता भी तथ्य की दिशा में एक छोटा कदम भर ही है। इस चिन्तन में इतनी सी जानकारी है कि हमारे क्रिया कृत्यों को अनगढ़ नहीं-सुव्यवस्थित होना चाहिए। भले ही वह उच्चारण ही क्यों न हो? वाणी को शिष्टाचार-सन्तुलन सभ्यता का अंग माना जाता है। जो ऐसे ही अण्ड-बण्ड बोलते रहते हैं वे असभ्य कहलाते और तिरस्कार के पात्र बनते हैं। ऐसी दशा में मन्त्र प्रयोजनों में यदि उसके साथ जुड़े हुए व्यवस्था नियमों का पालन किये जाने का निर्देश है तो उसका पालन होना ही चाहिए। इसमें सतर्कता एवं जागरूकता अपनाये जाने की बात दृष्टिगोचर होती है। यह दिशा उत्साहवर्धक है। इससे प्रमाद पर अंकुश लगने और व्यवस्था अपनाने में उत्साह उत्पन्न होने का बोध होता है, यह उचित भी है और आशाजनक भी। मन्त्रों का उच्चारण शुद्ध हो। सही हो। गति का ध्यान रहे। स्वर, लय, क्रम, विराम आदि को जाना माना जाय। यह अनगढ़पन से मन्त्र चार की सभ्यता में प्रवेश करने का कदम है। पूजा, उपचार के अन्य कर्मकाण्डों में भी यह सतर्कता बरती जानी चाहिए। आलसी प्रमादियों की तरह आधी-अधूरी चिह्न पूजा करने की बेगार भुगत लेने से तो अश्रद्धा ही टपकती है। अन्य मनस्कता एवं उपेक्षापूर्वक किये गये नित्य कर्म तक बेतुके बेढंगे होते हैं, इस स्वभाव से तो आजीविका उपार्जन जैसे काम तक असफल जैसे बने रहते हैं, फिर अध्यात्म मार्ग की उपलब्धियों में तो उसका परिणाम अवरोध उत्पन्न करने के अतिरिक्त और कुछ हो ही क्या सकता है ?
उच्चारण से लेकर विधि-विधान तक में सुव्यवस्था एवं सतर्कता बरती जानी चाहिए किन्तु इतने भर से ही यह नहीं मान लेना चाहिए कि हमारे उच्चारण ‘मन्त्र’ बन गये और उन्हें शब्द ब्रह्म की संज्ञा मिल गई। इसके लिए वाणी को ‘वाक्’ के रूप में परिष्कृत करना होगा। यह स्वर साधना नहीं वरन् जीवन साधना के क्षेत्र में होने वाला प्रयोग है। इसके लिए समूचे व्यक्तित्व को मन, वचन, कर्म को, गुण कर्म स्वभाव को, चिन्तन एवं चरित्र को, उच्चस्तरीय बनाने के भागीरथ प्रयत्न में जुटना होता है। मन्त्रोच्चारण की विधि-व्यवस्था कुछ घण्टों में सीखी जा सकती है। उसका परिपूर्ण अभ्यास कुछ दिनों में हो सकता है। किन्तु व्यक्तित्व की मूल सत्ता का स्तर ऊँचा उठाना काफी कठिन है। उसके लिए प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता पड़ती है। दूसरों को सुधारने में जितनी कठिनाई पड़ती है, अपने को सुधारना उससे भी अधिक कष्ट साध्य और श्रम साध्य है।
जिव्हा उच्चारण तन्त्र है। अन्य वाद्य यन्त्रों की तरह उसका सही होना तो प्राथमिक आवश्यकता है। मन्त्र की शब्दावली शुद्ध हो। भाषा की अशुद्धियाँ न हों। प्रवाह एवं स्वर ठीक हो। इसके अतिरिक्त जिव्हा साधना की दृष्टि से सामान्य व्यवहार में उसके रसना प्रयोजन एवं वार्ताक्रम में साधकों जैसी रीति नीति का समावेश किया जाय। अति की, हराम की कमाई न खाई जाय। परिश्रम और न्याय के सहारे जितना कुछ कमाया जा सके उतने में ही मितव्ययितापूर्वक गुजारा किया जाय। चटोरेपन की बुरी आदत से लड़ा जाय और सात्विक सुपाच्य पदार्थों को औषधि भाव से उतनी ही मात्रा में लिया जाय जितनी कि पेट की आवश्यकता एवं क्षमता है। इस दृष्टिकोण को अपनाने वाले के लिए मद्य, माँस जैसे अभक्ष्य को ग्रहण करने की तो बात ही क्या-उत्तेजक मसाले और नशीले पदार्थों-मिष्ठान्न पकवानों तक से परहेज करने की जरूरत स्पष्ट है। सात्विक आहार से मनः क्षेत्र में सात्विकता बढ़ती है और उससे अनेकों दोष−दुर्गुण जो अभक्ष्य खाते रहने पर छुट नहीं सकते थे, अनायास ही घटते-मिटते चले जाते हैं। अस्वाद व्रत पालन करने वाले के लिए अन्य इन्द्रियों पर काबू रख सकना सरल हो जाता है।
आहार की सात्विकता का वाणी की पवित्रता पर गहरा असर पड़ता है। अभक्ष्य आहार से जिव्हा की सूक्ष्म शक्ति नष्ट होती है और उसके द्वारा उच्चरित शब्द आध्यात्मिक प्रयोजन पूरे कर सकने की क्षमता से रहित ही बने रहते हैं। वाणी का दूसरा कार्य है वार्त्तालाप।
हमारे दैनिक जीवन में वार्तालाप का स्तर उच्चस्तरीय एवं आदर्श परम्पराओं से युक्त होना चाहिए। कटुता घृणा, तिरस्कार, छल, असत्य का पुट उसमें न रहे। दूसरों को भ्रम में डालने, कुमार्ग पर चलने की प्रेरणा देने वाले, हिम्मत तोड़ने वाले शब्द न बोले। यह नियंत्रण मात्र सतर्कता बरतने से नहीं हो सकता है। उपचार में भी बार-बार भूल होती रहती है। वस्तुतः हमारे भीतर सद्भावों का इतना गहरा पुट हो कि वाणी पर नियन्त्रण करने की आवश्यकता ही न पड़े। जो भीतर होता है वही बाहर निकलता है। यदि हमारे अन्तःकरण में सद्भावनाएँ भरी होंगी दृष्टिकोण आदर्शवादी होगा तो स्वभावतः वार्तालाप में उच्चस्तरीय श्रेष्ठता भरी होगी। सद्भाव सम्पन्न मनुष्यों का सामान्य वार्तालाप भी शास्त्र वचन के स्तर का होता है उनके मुख से निकलने वाले वाक्य ‘आप्त वाक्य’ कहलाने योग्य होते हैं। इस प्रकार का वार्ता-अभ्यास जिव्हा को दैवी प्रयोजनों के उपयुक्त बनाता चला जाता है। उसके द्वारा जिन मन्त्रों की आराधना की जाती है वे सफल ही होते चले जाते हैं।
मन्त्र को धीमे जपा जाता है। शब्दावली अस्पष्ट एवं धीमी रहती है। बहुत बार तो वाचिक से भी अधिक महत्त्व मानसिक और उपाँशु का होता है। उनमें तो वाणी नाम मात्र को ही होती है। किन्तु इन मौन जपों में भी मध्यमा, परा, पश्यन्ती, वाणियाँ काम करती रहती है। यह तीनों वाणियाँ मनुष्य के दृष्टिकोण, चरित्र एवं आकांक्षा से सम्बन्धित रहती है। यदि व्यक्ति ओछा, घटिया और दुष्ट है। उसकी आकांक्षाएँ निकृष्ट, दृष्टिकोण विकृत एवं चरित्र भ्रष्ट है तो तीनों सूक्ष्म वाणियाँ निम्नस्तरीय ही बनी रहेंगी और उनका समन्वय रहने में बैखरी वाणी तक प्रभावहीन संदिग्ध एवं अप्रामाणिक बनी रहेगी उसका साँसारिक उपयोग कोई महत्त्वपूर्ण परिणाम उत्पन्न न कर सकेगा फिर उसके द्वारा की गई मन्त्र साधना तो सफल हो ही कैसे सकती है ?
मन्त्र जप की सरल विधि के साथ कठिन साधना यह है कि उसके लिए जिव्हा समेत समस्त उपकरणों का परिशोधन करना पड़ता है। जो तथ्य को समझते हैं वे साधनाओं के विधि-विधान तक सीमित न रह कर जीवन-प्रक्रिया को उच्चस्तरीय बनाने की सुविस्तृत रूपरेखा तैयार करते हैं। उस प्रयास में जिसे जितनी सफलता मिलेगी उसके जप तप उसी अनुपात में सफल होते देखे जा सकेंगे । शब्द ब्रह्म का साक्षात्कार इसी मार्ग पर चलने से सम्भव होता है। समूची आत्मसत्ता को परिष्कृत बनाने से वाणी की परिणित ‘वाक्’ शक्ति में होती है। वाक् शक्ति का प्रभाव असीम है। उसकी सहायता से असम्भव को भी सम्भव किया जा सकता है।
शतपथ ब्राह्मण में शब्द ब्रह्म का विवेचन करते हुए कहा गया है। परा वाक् उसका मर्मस्थल है। परा वाक् का रहस्योद्घाटन करते हुए बताया है-वह हृदयस्पर्शी है प्रसुप्त को जगाती है। स्वर्ग, मुक्ति और सिद्धि का आधार वही है। देवताओं के अनुग्रह वरदान का केन्द्र उसी में है। इस विश्व में जो कुछ श्रेष्ठता है वह वाक् की प्रतिध्वनि एवं प्रतिक्रिया ही समझी जानी चाहिए।
वैखरी वाणी जब साधना सम्पन्न होकर ‘वाक्’ बनती है तो उसका विस्तार श्रवण क्षेत्र तक सीमित न रह कर तीनों लोकों की परिधि तक व्यापक होता है। वाणी में ध्वनि है ध्वनि में अर्थ। किन्तु वाक् शक्ति रूपा है। उसकी क्षमता का उपयोग करने पर वह सब जीता जा सकता है। जो जीतने योग्य है। कौत्स मुनि ने मन्त्र अक्षरों के अर्थ की उपेक्षा होती है और कहा है कि उनकी क्षमता शब्द गुँथन के आधार पर समझी जानी चाहिए। उसमें ‘वाक्’ तत्त्व ही प्रधान रूप से काम करता है। इस ‘परावाक्’ का स्तवन करते हुए श्रुति कहती है।
देवी वाचमजनयन्त देवास्ताँ, विश्वरूपाः पशवो वदन्ति। सा नो मंद्रेष्षमूर्ग दुहाना, धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुवैतु॥
प्रा वाक् देवी है। विश्व रूपिणी है। देवताओं की जननी है। देवता मन्त्रात्मक ही है। यही विज्ञान है। इसे कामधेनु हम बोलते और जानते हैं।
कभी रक्त शुद्धि की बात स्वास्थ्य रक्षा का आधार मानी जाती थी, पर अब विज्ञान उस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि शरीर पर जितना आधिपत्य मस्तिष्क का है उतना अन्य किसी पदार्थ या अवयव का नहीं । मस्तिष्क विक्षुब्ध हो तो उसका प्रभाव समूचे नाड़ी संस्थान को अस्त-व्यस्त करने के रूप में पड़ता है। फलतः अवयव अपने अपने निर्धारित क्रिया कलापों को सही रूप में पूरा नहीं करते। ऐसी दशा में उन्हें रुग्णता घेरती चली जाती है।
विक्षुब्ध मस्तिष्क अपनी चिन्तन प्रणाली का सन्तुलन खो बैठता है और दैनिक कार्य पद्धति के निर्धारण संचालन में चूक पर चूक होने लगती है। अपनी स्थिति का सही मूल्यांकन कर सकना भी संभव नहीं रहता। गिरे ढंग से सोचने पर निराशा छा जाती है और भविष्य डरावना तथा अन्धकारमय दीखने लगता है। ऐसे लोग उदासी, अकर्मण्यता एवं अस्त-व्यस्तता के शिकार हो जाते हैं। यदि आवेश-उत्तेजना का अतिवाद छाया तो फिर दुष्टता, दुस्साहस, आक्रोश एवं विग्रह की घटनाएँ घटित होने लगती है। सम्पर्क में आने वालों के साथ व्यवहार अटपटे हो जाते हैं। फलतः वे लोग भी प्रत्युत्तर कटुता पूर्ण देते हैं और असहयोग, मनोमालिन्य, विद्वेष एवं झंझट भरे आदान प्रदान चल पड़ते हैं। खीज बढ़ती है। प्रत्यक्ष आक्रोश न फूटा तो छिपी हुई दुर्भावना छल, निन्दा एवं दुरभिसंधियों के रूप में अगल-बगल से फूटती है। इस जाल जंजाल में उलझे हुए व्यक्ति की मनःस्थिति अधिकाधिक विपन्न होती जाती है और आन्तरिक अशान्ति की प्रतिक्रिया जीवन के हर क्षेत्र को असफल एवं विक्षुब्ध बनाती चलती है।
मानसिक असन्तुलन का प्रतिफल आधि-व्याधि से समूचे जीवन क्षेत्र को ग्रस लेता है। शरीर रोगों का घर बन जाता है और मस्तिष्क को सनकें, घुटने और अवास्तविक मान्यताएँ जर्जरित बना देती है। ऐसे लोगों को विवेक रहित, अवास्तविक और अवाँछनीय कल्पना लोक में विचरण करते और दीवारों से टकरा कर सिर फोड़ते देखा जा सकता है। व्यक्तित्व क्रमशः अधिक डरावना और घिनौना होता जाता है। आश्रितों को विवशता वश सहानुभूति रखनी पड़े-सेवा करनी पड़े तो बात दूसरी है अन्यथा सम्पर्क क्षेत्र के लोग विरोध या घृणा न करें तो कम से कम दूर रहने और उपेक्षा करने की नीति तो अपनाते ही है। ऐसे लोग अपने को एकाकी पन अनुभव करते-नीरस जिन्दगी जीते, असफल रहते, शिकायतें करते किसी तरह जीवित भर रह पाते हैं। मौत के दिन पूरे करना उन्हें कठिन पड़ता है।
मानसिक विक्षुब्धता के लिए जिम्मेदार घटनाओं और कारणों की एक बड़ी लिस्ट आसानी से बन सकती है। जिन्दगी उतनी सरल नहीं है जितनी कि समझी जाती है। इसमें पग-पग पर संघर्ष चुनौती देते हैं। प्रतिकूलताओं, अभावों, असफलताओं, प्रतिपक्षियों और आक्रमणकारियों का घटा टोप हर किसी के सामने छाया रहता है। चैन की जिन्दगी निर्जीव पत्थर तो जीवित रह सकता है पर जीवित प्राणी के लिए तथा कथित सुख-शांति की कल्पना करते रहना भर ही भाग्य में बंदा है। इस अग्नि परीक्षा में होकर हर जीवित प्राणी को अपने अपने ढंग से गुजरना पड़ता है। कीड़े-मकोड़ों से लेकर मनुष्य वर्ग तक के हर जीवधारी को आत्मरक्षा, निर्वाह की प्रगति के लिए पग-पग पर संघर्षों में जूझना पड़ता । इनसे छुटकारा तो मरने से पहले कदाचित ही किसी को मिल पाता हो।
वस्तुस्थिति यदि समझी जा सके तो प्रतिकूलताओं की सम्भावना और संघर्ष करने की आवश्यकता को जीवन के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ तथ्य मानकर चलना पड़ेगा और उनसे निपटने के लिए आगे बढ़ने, पीछे हटने एवं समझौता करने की युद्ध नीति का आश्रय ले सकने योग्य स्वभाव बनाना पड़ेगा। हर परिस्थिति में हँसते रह सकने में ही जीवन का कलात्मक सौंदर्य है। जो उपलब्ध है उसे असंख्यों से उत्तम समझ कर सन्तोष करना चाहिए और ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए कि अपनी वर्तमान स्थिति जहाँ लाखों से पीछे है वहाँ करोड़ों से आगे भी है। लाखों से पीछे होने की बात सोचते रहा जाय तो दुर्भाग्य पर सिर धुनते रहने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। किन्तु यदि करोड़ों से आगे होने की बात पर ध्यान केन्द्रित रखा जा सके तो सुसम्पन्नों को मिल सकने वाली प्रसन्नता से अधिक गहरी मस्ती अपने ऊपर छाई रहेगी। आगे बढ़ने का प्रयत्न किया जाय- सफलताओं के लिए साहस जुटाया जाय, पर वह सब होना चाहिए, खिलाड़ी की भावना से ही। जीत हार होती तो है, पर खिलाड़ी उसे बहुत महत्त्व नहीं देते। क्रीड़ा-विनोद के आनन्द को ही पर्याप्त मान लेते हैं और हार जीत पर अधिक ध्यान नहीं देते। ताश, चौपड़, शतरंज, कैरम, हाकी, फुटबाल आदि खेलों में रस लेने वाले लोग क्षण क्षण में मात खाने और विजयी होने का खट्टा-मीठा आनन्द लेते रहते हैं। ऐसी ही मनोभूमि रखकर जिन्दगी जीने का आनन्द लिया जा सकता है। तनिक तनिक सी बातों को पहाड़ मान बैठने और प्रतिकूलताओं की कल्पना भर से थरथराने लगने से तो सर्वत्र भयंकरता और निराशा ही छाई दिखाई पड़ेगी। ऐसी बोझिल जीवन अवधि पूरी करने में किसी को भी भारी कठिनाई अनुभव हो सकती है।
प्रतिकूलताओं की छोटी तस्वीरों को फिल्म प्रोजेक्टर पर चढ़ाने से एक ऐसी डरावनी कहानी को आँखों के सामने घुमाना आरम्भ किया जा सकता है, जिसे देखते देखते दम घुटने लगे और पसीना छूटने लगे। सोचा यह जाता है कि हम सुख चैन से जियें। मनोवाँछित परिस्थितियाँ उपलब्ध होती रहें। साधनों की कमी न रहे और जिन व्यक्तियों से सम्पर्क रहे वे सब आज्ञानुवर्ती अनुकूल आचरण किया करें। सपना अच्छा है पर कठिनाई एक ही है कि इस दुनिया का गठन ऐसा करने में विधाता ने भारी चूक कर दी है। उसे चाहिए था कि हर मनुष्य की मर्जी के मुताबिक़ उनकी एक-एक दुनिया ऐसी बनाता जिसमें किसी बात की कमी न रहती। पर कठिनाई यह हो गई कि विधाता की सृष्टि संरचना बहुद्देशीय प्रयोजनों के लिए हुई है। इसमें एक की अनुकूलता दूसरे की प्रतिकूलता बन जाती है। एक को हानि होती है ठीक उसी हेर फेर से दूसरे को लाभ मिलता है। एक जुआरी का हारना ही दूसरे का जीतना है। एक घर में मरण का रुदन दूसरे घर में जन्म का जश्न मनाये जाने का कारण बनता है। एक हारता है तो दूसरा जीतता है। प्रतियोगिता में कुछ को पुरस्कार मिलता है तो शेष को सिटपिटातें, बगलें झाँकते, खेद व्यक्त करते देखा जाता है। वर्षा से एक व्यवसायी को हानि होती है तो दूसरे को लाभ। सब को समान रूप से सुविधा रहती तो कितना अच्छा होता, पर किया क्या जाय। चूक विधाता की-दण्ड अपने मत्थे मढ़ गया। अब इतना ही संभव है कि हम प्रतिकूलताओं को स्वाभाविक मान लें और उनसे आजीवन जूझते रहने के लिए खिलाड़ी जैसी उतार चढ़ावों में समान रूप से क्रीड़ा-विनोद जैसी मनोभूमि ढालने का पूरा पूरा प्रयत्न करें। इस प्रयास में जितनी सफलता मिलेगी उतना ही सन्तुलित एवं सन्तुष्ट, सुखी एवं हँसता-हँसाता जीवन जिया जा सकेगा।
मनःस्थिति और परिस्थिति का तालमेल बिठाते हुए जीवन यात्रा के राजमार्ग पर चलने का दूरगामी कार्यक्रम बनाना चाहिए। प्रयत्न यह किया जा सकता है कि मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थितियाँ बन जाएँ। इसके लिए साहस पुरुषार्थ, श्रम, प्रयास, प्रतिभा, साधन आदि का भरपूर प्रयोग किया जाए, किन्तु साथ ही यह भी ध्यान में रखा जाय कि जो चाहा गया है उसका शत प्रतिशत पूरा हो सकना अति कठिन है। सफलता जितनी मिल जाय उतने की प्रसन्नता अनुभव की जाय। या तो सब कुछ या कुछ नहीं, की नीति गलत है। आँशिक सफलता पर सन्तोष पर सन्तोष करना बुद्धिमत्ता का परिचायक है। कितना नहीं मिला इसका लेखा जोखा रखने की अपेक्षा या सोचना अधिक अच्छा है कि कितना प्राप्त कर लिया गया। मंजिल कितनी दूर है यह सोचते रहकर खिन्न रहने की अपेक्षा सोचने का यह तरीका उत्तम है कि कितनी दूर चल लिये कितनी मंजिल कट गई। अभावों और कठिनाइयों का चिन्तन करते रहने से दिल टूटेगा और जो प्राप्त कर लिया गया उस पर दृष्टि डालने से प्रसन्नता की लहर दौड़ जाएगी । चिन्तन की दिशाधारा बदल कर खिन्नता को प्रसन्नता में बदला जा सकता है तो, यह हर दृष्टि से सस्ता सौदा है। इसमें बेखटके हाथ डाला जा सकता है और स्वल्प प्रयास में बड़ी उपलब्धि का लाभ लिया जा सकता है।
चिकित्सा विज्ञान ने इन दिनों पुराने रोगों में से कितनों के ही कारगर इलाज ढूँढ़ निकाले है और बीमारियों से मरने वालों का अनुपात काफी घट गया है। इतने पर भी कुछ नये रोग ऐसे है जो द्रुतगति से बढ़ रहे है और पूर्ण मृत्यु न सही मनुष्य जाति को अर्ध मृतक स्थिति में रहने के लिए विवश कर रहे है। हृदय रोग, मधुमेह, कैन्सर, क्षय आदि की अभिवृद्धि से सभी को चिन्ता है। अस्पतालों की रिपोर्ट इन रोगों का विवरण देती है और चिकित्सा अनुसंधान का द्वार खोलती है। किन्तु कुछ रोग ऐसे हैं जो बिस्तर पकड़ने के लिए, रोने चिल्लाने के लिए विवश नहीं करते। उनके रहते लोग अपना काम-धन्धा किसी प्रकार करते रहते हैं। अस्तु उनका लेखा जोखा भी नहीं मिलता और चिकित्सा अनुसंधान के लिए भी विशेष प्रयत्न नहीं होता। इतने पर भी वे होते इतने भयंकर है कि मनुष्य तेजी से जीवन रस समाप्त करता चला जाता है और अपने ढंग की विलक्षण व्यथा सहते सहते अकाल मृत्यु के मुख में ग्रास की तरह पिस जाता है। ऐसे रोगों में सर्वप्रथम है-मस्तिष्कीय तनाव और तज्जनित अनिद्रा अभिशाप।
यो ज्वर, अतिश्रम, दुर्घटना, आकस्मिक विपत्ति जैसे कारणों से भी यदा कदा मस्तिष्कीय आवेश आ चढ़ते हैं। और शिर भीतर ही भीतर गरम, उत्तेजित अशान्त दीखता है। उस बेचैनी में विचित्र उद्वेग उच्चाटन होता है। क्या करें, कहाँ जाय? न बैठे-चैन पड़ता है न चलते, न अपना सुहाता है न पराया न बात करने को जी करता और न चुप रहा जाता है। सोचने का तन्त्र इतना अस्त−व्यस्त हो जाता है कि नवागत कठिनाई से छुटकारा पाने का सही उपाय सोच सकना तो बन ही नहीं पड़ता, दैनिक जीवन के सामान्य कार्य और अनिवार्य उत्तर दायित्व निभाने तक कठिन हो जाते हैं। मानसिक तनाव जिस स्तर का होता है उसी अनुपात में विक्षिप्तता छाती है। हलकी बेचैनी से लेकर सिर फोड़ लेने या शिर फोड़ देने की उद्विग्नता तक के छोटे-बड़े दौर आते हैं और उस उन्माद में जो कुछ सूझता है जो बन पड़ता है वह परिस्थितियों को सुलझाता नहीं वरन् अधिकाधिक उलझता ही जाता है।
सामयिक विपत्तियों के कारण उत्पन्न हुए मानसिक तनाव फसली बुखार की तरह समय गुजरने के साथ साथ हलके होते चले जाते हैं। आवेश चिरस्थायी नहीं होते, वे ज्वार की तरह आते तो है पर भाटे की तरह उतर भी जाते हैं। जख्मों को भर देने की विशेषता हमारे रक्त में मौजूद है। विपत्तियों के आघातों की भी भर पाई कर देने की क्षमता कालचक्र में विद्यमान है। बाहरी कठिनाइयों से उत्पन्न हुए मानसिक तनाव बरसाती नाले की तरह उछल उछलकर ठंडे हो जाते हैं। समय के साथ स्मृति-विस्मृति में बदलती जाती है। जिन स्वजनों के बिछोह में जीवन सम्भव नहीं दीखता था, समयानुसार वे विस्तृत होते चले जाते हैं और उनके बिना भी निर्वाह सरलतापूर्वक होता रहता है। इसी प्रकार अमुक सुविधा छिन जाने पर भी नई असुविधाएँ सहन हो जाती है। और फिर विपन्नता भी स्वभाव में सम्मिलित होकर चिर सहचरी की तरह साथ-साथ रहने और गुजर करने लगती है।
तनाव चिरस्थायी जड़ तब जमाता है जब वह चिन्तन तन्त्र की प्रकृति का अंग बन जाता है। विकृत दृष्टिकोण के कारण हर व्यक्ति वस्तु या परिस्थिति का अँधेरा पक्ष देखने लगता है और उजला सूझ ही नहीं पड़ता। ऐसी मनःस्थिति निषेधात्मक कही जाती है और उसमें खीज और निराशा जन्य उद्विग्नता ही पल्ले बँधकर रह जाती है। ऐसे तनाव चिरस्थायी होते हैं, बहुत हुआ तो कभी कभी सन्तुलन की बिजली कौंधी अन्यथा हर दिशा में निराशा छाई और विपत्ति बरसती दीखती है। ऐसे मनुष्यों को कदाचित ही कभी प्रसन्न देखा जा सके। वे सदा असन्तुष्ट, रुष्ट दीखते हैं। छेड़ने पर उनके घाव रिसने लगते हैं और शिकायतों का मवाद बहने लगता है। किसी से उन्हें कुछ मिला भी है, क्या-यह तो स्मरण ही नहीं आता ताकि कृतज्ञता व्यक्त कर सके और उस सहयोग को सौभाग्य अनुभव कर सके। जो उपलब्ध है उसकी श्रेष्ठता जब सोची ही नहीं जा सकेगी तो अभावों के अतिरिक्त और कुछ दीखेगा भी कैसे? जब हर व्यक्ति के दोष ही ढूंढ़ने ठहरे तो फिर पूर्ण निर्दोष व्यक्ति इस संसार में तो है भी नहीं तब अपनी पसन्दगी का आदमी मिलेगा भी कौन और कहाँ ?
असन्तोष और आक्रोश के वास्तविक कारण कम ही होते हैं। वस्तुतः यह लानते, चिन्तन तन्त्र के उलट जाने से उत्पन्न होती है। अच्छा खासा ट्रक उलट जाय तो उस दुर्घटना से जान माल की भारी क्षति होती है। मस्तिष्क उलट जाय तो समझना चाहिए जीवन सम्पदा के द्वारा मिल सकने वाले सुख सौभाग्य का अन्त ही होगा। अब जो कुछ हाथ रह जाएगा वह मस्तिष्कीय तनाव का अभिशाप मात्र ही पाया जाएगा ।
सिर गरम होना एक बात है और तनाव रहना दूसरी। लू लगना, जुकाम, ज्वर, आधा शीशी आदि के कारण सिर गरम हो सकता है और उसके लिए एस्फ्रो जैसी खाने की और आइओडैक्स जैसी लगाने की दवाएँ काम दे सकती है। गीली मिट्टी की पट्टी बाँधने से भी सामयिक सिर दर्द दूर हो सकता है। किन्तु आन्तरिक असन्तोष एवं विक्षोभ के कारण जो आक्रोश उत्पन्न होगा वह धीरे-धीरे स्थायी मानसिक तनाव का रूप धारण कर लेगा। उस रुग्णता के कारण ज्वराक्रान्तों की तरह शिर गरम भले ही न लगे पर भीतर ही भीतर ऐसा लगेगा मानों खोपड़ी चटक रही है-नसें फट रही है और सिर के भीतर अशान्ति की आग सुलगने का धुँआ घुट रहा है। ऐसे तनाव ‘हाइ ब्लड प्रेशर’ जैसे कष्ट कारक लगते हैं, यद्यपि डाक्टर लोग रक्त चाप सामान्य होने की ही घोषणा करते रहते हैं।
मस्तिष्क रुग्ण होगा तो शरीर का स्वस्थ रह सकना असम्भव है। जितनी बीमारियाँ चिकित्सा शास्त्र की पकड़ में आ गई है उनसे सहस्रों गुनी वे हैं, जिनका कोई स्वरूप, निदान एवं उपचार निर्धारित नहीं हो सका। इतने पर भी वे जीवन को नीरस, अस्त-व्यस्त विपन्न एवं असफल बनाने में बढ़ी-चढ़ी भूमिका प्रस्तुत करती है। मस्तिष्क पर छाया हुआ तनाव शरीर को अपंग बनाकर रख देता है। असन्तुलित व्यक्तित्व न परिवार में चैन से रह पाता है और न स्वजन सम्बन्धियों को सन्तुष्ट सहयोगी बना पाता है। सम्पर्क क्षेत्र में उसका व्यवहार अटपटा होता है फलतः उपहासास्पद भी बनना पड़ता है और घृणास्पद भी। ऐसी दशा में न शान्तिपूर्वक निर्वाह सम्भव होता है और न प्रगति का द्वार खुलता दीखता है।
जीवन को सुखी, सन्तुष्ट समुन्नत, सफल बनाना हो तो हमें मस्तिष्कीय सन्तुलन की ओर ध्यान देना चाहिए। यह स्वस्थ चिन्तन की प्रक्रिया अपनाने से ही सम्भव हो सकता है। यथार्थता वादी दृष्टिकोण अपनाया जा सके और हलकी-फुलकी जिन्दगी का महत्त्व समझा जा सके तो सामान्य परिस्थितियों में भी असामान्य लोगों की तरह आनन्दित जीवन जिया जा सकता है। अपने समय के सर्वनाशी महारोग मानसिक तनाव से बचना हो तो इसी विवेकशील दूरदर्शिता को अपनाने की आवश्यकता अनुभव करनी होगी।
मस्तिष्क की गरिमा मानवी शरीर के अवयवों में सर्वोपरि है। इसलिए उसकी अधिकाधिक सुरक्षा के लिए बहुत मजबूत आवरण का प्रबन्ध किया है। यों हृदय की सुरक्षा के लिए भी पसलियों का ढाँचा मौजूद है, पर मस्तिष्क के लिए तो खोपड़ी (क्रोनियम) के मजबूत डिब्बे का प्रबन्ध है। उसमें भीतरी पर्त पर भी माँसल गद्दी ‘पौ मैटर गति पर्त’ लगी हुई है जिसमें चोट ठंड आदि लगने पर मस्तिष्कीय जीवन-सम्पदा को किसी प्रकार की हानि न पहुँचे। खोपड़ी के ऊपर घने और लम्बे बालों का उगना इस बात का प्रमाण है कि ऋतु प्रभावों तथा अन्य प्रकार की कठिनाइयों से बचाने के लिए कैसी अच्छी सुरक्षा पंक्ति खड़ी की गई है।
कुछ समय पहले तक यह माना जाता था कि रक्त ही जीवन की सबसे बड़ी सम्पदा है। उसका संचार करने वाला अवयव हृदय ही सबसे महत्त्वपूर्ण संस्थान है। नाड़ी की धड़कन बन्द होने पर किसी के मरण की घोषणा की जाती थी। अब स्थिति बदल गई है, शरीर शास्त्रियों ने हृदय से अधिक गरिमा मस्तिष्क की स्वीकार की है। न केवल ज्ञान और बुद्धिमत्ता की दृष्टि से वरन् शरीर निर्वाह में भी उसी की प्रथम भूमिका है। नाड़ी संस्थान समस्त शरीर में फैला हुआ है। उसके माध्यम से मस्तिष्कीय ऊर्जा अंग-प्रत्यंग तक पहुँचती है। रक्त संचार आदि समस्त क्रिया कलाप उसी के आधार पर सम्पन्न होते हैं। बिजली कट जाने से बड़े से बड़ा कारखाना ठप्प हो जाता है, इसी प्रकार जीवन तभी तक है, जब तक मस्तिष्कीय विद्युत काम करती है। अब मरण की अन्तिम घोषणा हृदय की गति बन्द होने के आधार पर नहीं मस्तिष्कीय ऊर्जा तरंगों के रुक जाने पर की जाती है।
जीवन में भोजन के अतिरिक्त शिक्षा, अनुभव, ज्ञान, कौशल का-बुद्धिमत्ता एवं कल्पना का जीवन की प्रगति एवं सफलता से कितना बड़ा सम्बन्ध है। इसे सभी जानते हैं। भोजन से अधिक खर्च शिक्षा एवं मनोरंजन पर किया जाता है। इससे भी बड़ी बात है-व्यक्तित्व मूल्य उसी का है। उसी के मूल्य पर परिस्थितियाँ बनती है- सम्मान एवं सहयोग मिलता है। सफलताएँ और असफलताएँ बहुत कुछ इसी आधार पर निर्भर रहती है। यह व्यक्तित्व क्या है ? उसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि दृष्टिकोण, मान्यता एवं अभिरुचि का समन्वय। इन शब्दों में कहना हो तो इसे श्रद्धा कह सकते हैं। यही है वह आधार जिसके आधार पर स्वास्थ्य शिक्षा और साधनों की दृष्टि से लगभग एक जैसी स्थिति में रहने वाले मनुष्यों में से एक उत्कृष्टता के उच्च शिखर पर जा पहुँचता है, आनन्दित जीवन जीता है और दूसरा निकृष्टता के गर्त में जा गिरता है और नारकीय संकटों में सड़ता, दुर्गन्ध फैलाता रहता है।
मस्तिष्क विद्या के ज्ञाता उसकी चेतन-अचेतन क्षमताओं का शरीर शास्त्र और मनःशास्त्र के आधार पर विवेचन विश्लेषण करते रहे है। चेतन और अचेतन की व्याख्याओं और प्रतिक्रियाओं में मनोविज्ञान की सुविस्तृत व्याख्याएँ हुई है। यह सामान्य परतें है। मस्तिष्क का एक अतीव गहरा अन्तराल है जहाँ से चेतना और क्रिया का ताल मेल आरम्भ होता है। इस उद्गम की स्थिति से मस्तिष्कीय संस्थान की चेतन अचेतन परतें प्रभावित होती है। उस प्रभाव की प्रतिक्रिया चिन्तन की दिशा और क्रिया की धारा को प्रभावित करती है। इसी मर्मस्थल से व्यक्तित्व का भला या बुरा निर्माण आरम्भ हो जाता है।
मानवी काया की तुलना पृथ्वी से की जाय तो उसका ध्रुव प्रदेश मस्तिष्क है और उसकी धुरी सहस्रार चक्र। सहस्रार चक्र का अध्यात्म शास्त्र में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण वर्णन है। उसमें समस्त संभावनाएँ सन्निहित बताई गई है। उसकी स्थिति को परिष्कृत एवं विकसित करने के उपाय बताये गये है। सहस्रार साधना के अनेक स्वरूप, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के प्रयोग अभ्यासों के रूप में प्रस्तुत किये गये है। उनकी सफलताओं के फलस्वरूप मिलने वाले सत्परिणामों का आकर्षक वर्णन हुआ है। उस क्षेत्र की सफलताओं का भौतिक और आत्मिक ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में महात्म्य बताया गया है।
मस्तिष्क में विलक्षण शक्ति केन्द्रों की बात वर्तमान वैज्ञानिक भी मानते हैं। मस्तिष्क शास्त्र के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक स्मिथ की शोध के अनुसार शुद्ध बुद्धि प्योर इन्टैलिजेन्स मानवी मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों से नियंत्रित होती है। यह सबकी साझेदारी का उत्पादन है। यही वह सार भाग है जिससे व्यक्तित्व का स्वरूप बनता और निखरता है। स्मृति (मैमोरी) विश्लेषण (एनालिसिस) संरचना (सिन्थैसिस) चयन निर्धारण (सिलैक्टीविटी) आदि की क्षमताएँ मिलकर ही मानसिक स्तर बनती है। इनका सम्मिश्रण एवं उत्पादन कहाँ होता है, वे परस्पर कहाँ गुँथती है, इसका ठीक से निर्धारण तो नहीं हो सका पर समझा गया है कि वह स्थान सैरिबेलम लघु मस्तिष्क में होना चाहिए। यही वह मर्मस्थल है, जिसका थोड़ा भी विकास परिष्कार सम्भव हो सके तो व्यक्तित्व का ढाँचा समुन्नत हो सकता है। इसी केन्द्र स्थान को अध्यात्म शास्त्रियों ने बहुत समय पूर्व जाना और उसका नामकरण सहस्रार किया है।
मस्तिष्क के गहन अनुसंधान में कितनी ही ऐसी परतें सामने आती है जो सोचने विचारने में सहायता देने भर का नहीं समूचे व्यक्तित्व के निर्माण में भारी योगदान करती है। इस तरह की विशिष्ट क्षमताओं का क्षेत्र ‘प्री फ्रंटल लोब्र’ है। इसमें मनुष्य के व्यक्तित्व (पर्सनालिटी कल्पना-इमैजिनेशन आकाँक्षाएँ (एम्बिशन्स) व्यवहार प्रक्रिया, अनुभूतियाँ, सम्वेदनाएँ, आस्थाएँ आदि अनेक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्तियों का निर्माण निर्धारण होता है। इस केन्द्र को प्रभावित कर सकना किसी औषधि उपचार या शल्य क्रिया से सम्भव नहीं हो सकता। इसके लिए ध्यान धारणा जैसी वे साधनाएँ ही उपयुक्त हो सकती है जिन्हें कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया के अंतर्गत प्रायः काम में लाया जाता है।
ऊपर मस्तिष्क के एकाध केन्द्र की सांकेतिक चर्चा भर कर दी गयी है। मस्तिष्क क्षेत्र अगणित रहस्यमय शक्तियों से भरा हुआ माना जाता है। मस्तिष्क के सम्बन्ध में वर्तमान वैज्ञानिक मान्यताओं की संगति इस सम्बन्ध में भारतीय दार्शनिक मान्यताओं से भी बैठती है।
मोटे विभाजन की दृष्टि से मस्तिष्क को पाँच भागों में विभक्त किया जाता है। (1) बृहद् मस्तिष्क (सेरिश्रम) (2) लघुमस्तिष्क (सेरिबेलम)(3) माध्यमिक मस्तिष्क (मिडब्रेन) (4) मस्तिष्क सेतु (पाँन्स) एवं (5) सुषुम्ना शीर्ष (मैडुला आँबलाँगेटा)। इनमें से अन्तिम तीन अर्थात् मिडब्रेन, पाँन्स एव पैडुला को सुँयक्त रूप से मस्तिष्क स्तम्भ (ब्रेनस्टेम) भी कहते हैं।
अध्ययन शास्त्र के अनुसार मस्तिष्क रूपी स्वर्ग लोक में यो तो तैंतीस कोटि देवता रहते हैं, पर उनमें से पाँच मुख्य है। इन्हीं का समस्त देव संस्था पर नियन्त्रण है। मस्तिष्कीय पाँच क्षेत्रों को पाँच देव परिधि कह सकते हैं। इन्हीं के द्वारा पाँच कोशों की पाँच शक्तियों का संचार संचालन होता है। गायत्री की पंचमुखी साधना में इन पाँचों को समान रूप से विकसित होने का अवसर मिलता है। तदनुसार इस ब्रह्मलोक में, देवलोक में निवास करने वाला जीवात्मा स्वर्गीय परिस्थितियों के बीच रहता हुआ अनुभव करता है।
यह एक प्रकार के विभाजन की बात हुई। अनेक विद्वान एक ही तथ्य के बारे में भिन्न भिन्न प्रकार की विवेचनाएं प्राचीन काल में भी करते रहे है और आज भी करते हैं। मस्तिष्क के विभाजन तथा सहस्रार चक्र के सम्बन्ध में भी इसी प्रकार एक ही तथ्य के भिन्न भिन्न विवेचन मिलते हैं।
सहस्रार चक्र को अमृत कलश भी कहा गया है। उसमें से सोम रस स्रवित होने की चर्चा है। देवता इसी अमृत कलश से सुधापान करते और अमर बनते हैं।
वर्तमान वैज्ञानिक मान्यतानुसार मस्तिष्क में एक विशेष द्रव “सैरिब्रो स्पाइनल फ्ल्यूड भरा रहता है। यही मस्तिष्क के भिन्न भिन्न केन्द्रों को पोषण और संरक्षण देता रहता है। मस्तिष्क की झिल्लियों से यह झरता रहता है। और विभिन्न केन्द्रों तथा सुषुम्ना में सोखा जाता है।
अमृत कलश के सोलह पटल गिनाये गये है। इसी प्रकार कहीं कही सहस्रार की 16 पंखुड़ियों का भी वर्णन है। यह मस्तिष्क के ही 16 महत्त्वपूर्ण विभाग विभाजन है। शिव संहिता में भी सहस्रार की 16 कलाओं का वर्णन है-
शिरः कपाल विवरे ध्यायेत् षोडसी कला। तंत्र स्थित्वा सहस्रारे पद्येचन्द्र विचित्रयेत्-योग भजूषा
कपाल के मध्य चन्द्रमा के समान प्रकाशवान् सोलह कला युक्त सहस्रार चक्र का ध्यान करें।
सहस्रार की यह सोलह कलाएँ मस्तिष्क के “सैरिब्रोस्माइनल फ्ल्यूड” से सम्बन्धित प्रमस्तिष्क के सोलह विभाग है। पूर्वोक्त पाँच स्थूल विभागों को अधिक विस्तार से व्यक्त किया जाय तो उसके निम्नाँकित 16 विभाग होते है-
(1)बृहद्मस्तिष्क (सैरिब्रम) (2) लधुमस्तिष्क (सैरिवेलम) (3) सुषुम्ना शीर्ष (मैडुला आँबलागेटा) (4) सेतु (पाँन्स) (5) मध्य मस्तिष्क (मिडब्रेन) (6) महासंयोजक (कौर्पस कलोसम) (7) रखी पिण्ड (कौपर्स स्ट्रेटम) (8) पीयूष ग्रन्थि (पिट्यूटरी ग्लैण्ड) (9) शीर्ष ग्रन्थि (पीनियल ग्लैण्ड) (10) चेतक (थैलोमस) (11) अधःचेतक (थैलोमस) (12) उपचेतक (सब थैलेमस) (13) अनुचेतक (मैटा थैलेमस) (14) ऊर्ध्व चेतक (एपी थैलेमस) (15) संचार जालिकाएँ (काराडप्लैक्सैसेज) (16) प्रकोष्ठ (वैन्ट्रिक्लस)।
इन सभी विभागों में शरीर को संचालित करने वाले एवं अतीन्द्रिय क्षमताओं युक्त अनेक केन्द्र है। सहस्रार अमृत कलश को जागृत करके उन्हें अत्यधिक सक्रिय बना कर असाधारण लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। शास्त्रों में इस संदर्भ में स्पष्ट उल्लेख किया गया है-
इदं स्थानं ज्ञात्वा नियतनिजचितो नरवरो, नंभूयात् संसार पुनरपि न बद्धस्त्रिभुवने। समग्रा शक्तिः स्यात्रियतमनसस्तस्य कृतिनः सदा कतुँ हतुँ खगतिरपि वाणी सुविभला-षट्चक्र निरूपणम्
इस सहस्रार कमल की साधना से योगी चित्त को स्थिर कर आत्मभाव में लीन हो जाता है। भवबन्धन से छुट जाता है। समग्र शक्तियों से सम्पन्न होता है। स्वच्छन्द विचरता है और उसकी वाणी विमल हो जाती है।
शिरःकपालविवरे ध्यायेद्दुग्धमहोदधिम्। तत्र स्थित्वा सहस्रारे पद्ये चन्द्र विचिन्तयेत्॥ शिव संहिता
कपाल की गुफा में क्षीर सागर समुद्र का तथा सहस्र दल कमल में चन्द्रमा जैसे प्रकाश का ध्यान करें।
तस्माद् गलित पीयूषं पिवेद्योगी निरन्तरम्। मृर्त्योमृत्यु विधायाशु कुलं जित्वा सरोरुहे॥ अत्र कुण्डलिनी शक्तिर्लयं याति कुलभिधा। तदा चतुर्विधा सृष्टिर्लीयते परमात्मनि-शिव संहिता
जो योगी सहस्रार से स्रवित हो रहे पीयूष का निरन्तर पान करता है। वह मृत्यु की ही मृत्यु का विधान रचने में समर्थ होता है। अर्थात् मृत्यु उसे मृत्यु के समान नहीं प्रतीत होती, वह मृत्यु से परे का जीवन जीता है। यहीं इसी सहस्रार में कुण्डलिनी शक्ति का लय होता है और तब चारों प्रकार की सृष्टि परमात्मा में ही लीन हो जाती है, सभी कुछ परमात्मा मय हो जाता है।
येन पूता ऋचःसामानि यजुर्ब्राह्मणं यह येन पूतम्। तेना सहस्त्रधारेण पवमानः पुनातु मास-यजु
जिससे ऋचाएँ, साम, यजुः और ब्राह्मण पवित्र हुए उस सहस्र धारा वाले सोम से पवमान मुझे पवित्र करे।
सहस्रार क्या है? इसका उत्तर शरीर शास्त्र के अनुसार अब इतना मात्र जाना जा सका है कि मस्तिष्क के माध्यम से समस्त शरीर के संचालन के लिए जो विद्युत उन्मेष पैदा होते हैं, वे आहार से नहीं वरन् मस्तिष्क के एक विशेष संस्थान से उद्भूत होते हैं। वह मनुष्य का अपना उत्पादन नहीं वरन् दैवी अनुदान है। आमाशय, हृदय आदि अवयव तो उसी ऊर्जा से अपने काम कर सकने की क्षमता प्राप्त करते हैं। रक्त से शरीर के अवयवों को पोषण मिलता है यह सत्य है। फेफड़े साँस का और पाचन तन्त्र आहार का साधन जुटाते हैं यह भी सही है पर देखना फिर भी शेष रह जाता है कि यह सारी मशीन निर्वाह की आवश्यकता पूरी करने में जुटी हुई है, वह अपने लिए मूल ऊर्जा कहाँ से पाती है। ? यह समाधान सही नहीं है कि आहार एवं साँस आदि से ही जीवन ऊर्जा मिलती है। यदि ऐसा रहा होता तो भूख या दम घुटने के बिना किसी की मृत्यु हो न होती।
मस्तिष्क में मध्य भाग से यह विद्युत उन्मेष रह रहकर सतत् प्रस्फुटित होते रहते हैं। उसे एक विलक्षण विद्युतीय फव्वारा कहा जा सकता है। वहाँ से तनिक तनिक रुक-रुककर एक फुलझड़ी सी जलती रहती है। हृदय की धड़कन में भी ऐसे ही मध्यवर्ती विराम रहते हैं। ताप ध्वनि आदि की प्रवाह मान तरंगों में उतार चढ़ाव होते हैं। मस्तिष्कीय मध्य बिन्दु में अवस्थित ऊर्जा उद्गम की गतिविधि भी ठीक उसी प्रकार की है वैज्ञानिक इन उन्मेषों को मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों की सक्रियता-स्फुरण का मुख्य आधार मानते हैं। भारतीय योग ग्रन्थों में भी इसी बात को अपने ढंग से व्यक्त किया गया है।
मस्तिष्के मणिवद् भिन्न यो जानाति स योगवित्॥ तप्तवामी कराकार तडिल्लेखव विस्फुरत-ध्यानबिन्दु उपनिषद्
मस्तिष्क के मध्य मणिवत् प्रकाश है। उसमें से तप्त स्वर्ण के समान विद्युत धाराओं का स्फुरण होता है। जो इस रहस्य को जानता है वह योगी है।
ब्रहाज्योतिवसुधा या ब्रह्मस्थानीय उच्यते। ततो यः पावाको नाम्नायः सद्रिर्योग उच्यते-मत्स्य पुराण
ब्रह्म ज्योति-अग्नि रूप से ब्रह्मरन्ध्र में निवास करती है। वह साधक को पवित्र करती है। यही योगाग्नि है।
इस मस्तिष्कीय ऊर्जा उद्गम को शरीर शास्त्र के अनुसार सहस्रार चक्र कहा जा सकता है। सहस्र का अर्थ यो ‘हजार’ होता है। पर यहाँ उसका तात्पर्य हजारों से अगणितों से है परब्रह्म को सहस्र पुरुष-सहस्राक्षः सहस्र पाद” कहा गया है इसका तात्पर्य पूरे एक हजार आँख, हाथ, पैर वाला नहीं वरन् हजारों अगणितों वाला समझा जाना चाहिए। मस्तिष्कीय उद्गम से उभरने वाली फुलझड़ी की पूरी एक हजार नहीं वरन् अगणित चिनगारियाँ उड़ती है। उस फव्वारे की बूँदों की संख्या पूरी एक हजार नहीं वरन् हजारों असंख्यों है। इस सहस्र प्रतिपादन के आधार पर ही उस उद्गम को सहस्रार कहा गया है।
मस्तिष्क में मस्तिष्कीय विद्युत की अगणित धारायें प्रवाहित होने की बात वर्तमान विज्ञान मानता है। आवश्यकतानुसार यह धारायें अगणित दिशाओं में अगणित विशिष्ट तन्तुओं द्वारा प्रवाहित होती है। इन्हें वैज्ञानिकों ने उनको प्रवृत्ति के अनुसार अनेक वर्गों में विभाजित कर रखा है। जैसे-ऊर्ध्वमुखी मस्तिष्कीय स्फुरण (एसैब्डिगरैटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम) अधोमुखी म॰ स्फु0 (डिसैन्डिग रैटि0 एक्टि0 सि0) विशिष्ट चेतन स्फुरण (स्पैसिफिक थैलैमिक प्रोजैक्शन) प्रस्तुत चे0 स्फ0 (डिफ्युज्ड थै 9 प्रो0) स्तम्भिक स्फुरण (ब्रेनस्टैम रेटि0 फार्मेशन) आदि। इन स्फुरण संस्थानों का संयुक्त प्रभाव योग दृष्टि से मस्तिष्क में विद्युतीय उन्मेष की सहस्र धाराओं के रूप में दीखना स्वाभाविक है।
सहस्र दल कलम तथा शेषनाग के सहस्र फन माने जाने की उक्ति का आधार भी वही है। ब्रह्मलोक एवं क्षीरसागर के मध्य विष्णु भगवान का कुण्डली भरे हुए शेष नाग पर शयन करना, यह आकृति भी सहस्रार की स्थिति समझाने की दृष्टि से ही बनी है। क्षीरसागर अर्थात् मस्तिष्कीय मज्जा। कुण्डलाकार सहस्रकार सहस्रमुख सर्प अर्थात् सहस्रार चीरने के आरे में दाँत है। पहिये में भी आरे होते हैं। चक्र, सुदर्शन जैसे अस्त्र भी दाँतेदार होते थे। ‘सहस्रार’ नामकरण की संगति इन्हीं सब बातों के साथ मिलती है।
सहस्रार को सूर्य (सहस्ररश्मि) की उपमा दी गई है। सूर्य की ऊर्जा से पूरा सौर मण्डल प्रकाशवान् एवं गतिशील है। मानवी सत्ता का प्रत्येक घटक मस्तिष्कीय ऊर्जा से अनुप्राणित होता है। अस्तु उसी पिण्ड रूपी भूलोक का अधिष्ठाता सूर्य कहा जाय तो यह रूपक सर्वथा उपयुक्त ही माना जायेगा। सहस्रार की ब्रह्म सत्ता को सूर्य की उपमा दी गई है-
सहस्रारे महापद्ये कर्णिकामुद्रितश्चरेत्। आत्मा तत्रंव देवोशि केवलः पारदोपमः॥ सूर्य कोटि प्रतीकाशः चन्द्रकोटि सुशीतलः। अतीव कमनीयश्च महाकुण्डलिनो युत्-स्कन्द पुराण
“हे देवेशि ! सहस्र दल महापद्य में मुद्रित कर्णिका के अन्दर पारद की भाँति आत्मा का निवास है। यद्यपि उसका तेज करोड़ों सूर्यों के समान है, परन्तु स्निग्धता में वह करोड़ों चन्द्रमाओं के तुल्य है। यह परम पदार्थ अतिशय मनोहर तथा कुण्डलिनी शक्ति समन्वित है।
ब्रह्म सूर्यस्त्रम ज्योतिः -यजुः 23,48
यह सूर्य ब्रह्म तत्त्व ही है, जिसका भौतिक प्रतीक स्थूल सूर्य है।
‘य आदित्ये तिष्ठन्ना दित्यादन्तरों यमादित्यों न वेद यस्यादित्यः शरीर य आदित्यमन्तरो यमयत्येष त आत्मान्तर्याभ्यमृतः -वृहदारण्यक
‘जो सूर्य में रहने वाला सूर्य का अंतर्वर्ती है, जिसे सूर्य नहीं जानता, सूर्य जिसका शरीर है और जो भीतर रहकर सूर्य का नियमन करता है, वह तुम्हारा आत्मा अन्तर्यामी अमृत है।’
देवोऽयं भगवान भानुरन्तर्यामी सनातनः-सुर्य पुराण
यह सूर्य देवता अन्तर्यामी सनातन भगवान ही है। जिस प्रकार सूर्य से सौर मण्डल को ऊर्जा मिलती है, उसी प्रकार सहस्र धारा वाले ऊर्जा उद्गम से मस्तिष्कीय संयंत्र को गतिशील बनने की क्षमता उपलब्ध होती है। मील, कारखानों में अनेकों मशीनें चलती है। उन्हें चलाने के लिए बिजली की मोटर लगी होती है। मोटर चलती है और उसकी ताकत से मशीनें सक्रिय होती है। किन्तु मोटर को चलाने वाली बिजली उसकी अपनी कमाई नहीं है। वह कहीं अन्यत्र से आती है। मस्तिष्क को मोटर और शरीर के अवयवों को छोटी बड़ी मशीनें कहा जा सकता है। इस सारे मिल, कारखाने की चलाने के लिए आवश्यक शक्ति अन्यत्र आती है। इसे ध्रुवीय क्षेत्र से पृथ्वी को मिलने वाले अनुदान प्रवाह के समतुल्य माना जा सकता है। यह अन्तर्ग्रही ऊर्जा का ही अनुदान है। व्यक्तियों स्वतन्त्र है, स्वभाग्य निर्माता है। फिर भी व्यक्ति को व्यक्तित्व प्रदान करने वाली ऊर्जा को ब्राह्मी अनुदान ही माना जाएगा । वह धारा जिस क्षण रुकती है, तत्काल मरण सामने उपस्थित होता है। हृदय की धड़कन पूर्णतया बन्द हो जाने पर भी उसे कृत्रिम उपायों से पुनः क्रियाशील बनाया जा सकता है। किन्तु जब सहस्रार का विद्युत उभार अपना उछलना बन्द कर दे तो समझना चाहिए कि अन्तिम मृत्यु हो गई। कनेक्शन कट जाने पर फिटिंग और बल्ब सही होने पर भी अँधेरा छा जाता है। अवयवों के सही सलामत होने पर भी मस्तिष्कीय उत्पादन के बिना जीवित नहीं रहा जा सकता।
जीवन का आरम्भ और अन्त स्थूल विवेचना के अनुसार जिस भी तरह बताया जाय, सूक्ष्म विज्ञान के अनुसार उसका समूचा आधार ‘सहस्रार’ की सक्रियता पर अवलम्बित है। इतना ही नहीं आगे की बात भी यहीं से चलती है। सहस्रार मात्र जीवन का ही उद्गम नहीं है, वरन् व्यक्तित्व का स्वरूप एवं स्तर की दिशा धारा भी यहीं से निर्धारित होती है। ढलान का तनिक सा अन्तर होने पर वर्षा का जल अपने बहाव की दिशा बदलता है। एक स्थान की ढलान जिस वर्षा जल को किसी नदी में पहुँचाती है, तो उसके समीप की ढलान दूसरी और होने के कारण वर्षा जल को किसी अन्य नदी में ले जाकर पटकती है। ढलान के आरम्भ में कुछ इंचों का अन्तर था, पर बहते हुए वर्षा जल को भिन्न नदियों में जा पहुँचने का अन्तर सैकड़ों, हजारों मील का बन जाता है। जंक्शन स्टेशन पर एक ही लाइन में खड़ी गाड़ियाँ लीवर बदलने के आधार पर भिन्न भिन्न दिशाओं में चल पड़ती है। लीवर का अन्तर कुछ इंचों का ही होता है, पर चल पड़ने वाली गाड़ियों में दूरी का अन्तर निरन्तर बढ़ता जाता है। सहस्रार उद्गम में राई रत्ती अन्तर रहने से व्यक्तित्व के बाहरी और भीतरी ढाँचे में आश्चर्य जनक अन्तर उपस्थित हो जाता है।
पृथ्वी के अन्तर्ग्रही अनुदानों में न्यूनाधिकता करने की बात सोचना भी वैज्ञानिकों के लिए डरावनी आशंकाएँ और विभीषिकाएँ सामने ला खड़ी करता है। वे उस दिशा में कदम बढ़ाने की कल्पना करते ही काँपने लगते हैं। तनिक भी उलटा पुलटा होने पर सर्वनाश का अनर्थ खड़ा हो सकता है। जो अनुकूल उपाय बन पड़े तो पृथ्वी निवासियों को उसका असीम लाभ भी मिल सकता है। तब हम अकल्पनीय सुविधा साधनों के अधिपति बन सकते हैं। आवश्यक ज्ञान के अभाव में वैज्ञानिक कोई बड़े कदम उठाने का साहस नहीं कर रहे है, केवल वे धीमे पैरों ध्रुवीय क्षेत्र की खोजकर रहे हैं, पृथ्वी की धुरी न तो अभी उन्हें मिली है और न उसके लिए गम्भीरतापूर्वक प्रयत्न ही हुआ है।
मानवी सत्ता के ध्रुव केन्द्र मस्तिष्कीय धुरी संस्थान सहस्रार के सम्बन्ध में वैसा कोई जोखिम नहीं है। भौतिक शक्ति दैत्य है। बिजली का, आग का तनिक भी असावधानी से प्रयोग करने पर प्राण संकट सामने आ उपस्थित होगा किन्तु माता और बच्चे के बीच व्यवहार की कोई भूल चूक बन पड़ने पर भी कोई बड़ा विग्रह उत्पन्न नहीं होता, मामूली ही अनबन भी देर तक नहीं टिकती। आत्म चेतना और प्रकृति चेतना में यही भौतिक अन्तर है। सहस्रार में आत्मा और परमात्मा का मिलन संस्थान है। यह चेतनात्मक आदान प्रदान है। इसमें उच्चस्तरीय भाव सम्वेदनाएँ भरी पड़ी है। अध्यात्म, साधनाओं का स्वरूप सद्भाव सम्पन्नता के साथ जोड़कर बनाया गया है, अस्तु उनमें श्रेष्ठताओं के दैवी अनुदान ही मिलते हैं।
सहस्रार चक्र का सम्बन्ध रन्ध्र से है। ब्रह्मरन्ध्र को दशम द्वार कहा गया है। नौ द्वार तो दो नथुने, दो आँखें, दो कान, एक मुख, दो मल-मूत्र छिद्र सर्व विदित है। दसवाँ द्वार ब्रह्मरन्ध्र है। योगी जन इसी से होकर प्राण त्यागते हैं। मरणोपरान्त कपाल क्रिया करने का उद्देश्य यही है कि प्राण का कोई अंश शेष रह गया हो तो वह उसी में होकर निकले और ऊर्ध्व गति प्राप्त करे।
नवजात शिशु की खोपड़ी के मध्य भाग में थोड़ा सा खाली स्थान होता है। जिसमें हड्डी न होकर झिल्ली होती है। यह स्थान पीरिटल और आस्सीविटल हड्डियों के बीच में है। शरीर वृद्धि के साथ साथ बगल की हड्डियाँ बढ़ती है और इस स्थान को ढक लेती है। योग शास्त्र का कथन है कि ब्रह्म सत्ता का ब्रह्माण्डीय चेतना का मानव शरीर में प्रवेश इसी मार्ग से होता है।
शरीर रचना की दृष्टि से इस स्थल पर केवल हड्डियों का जोड़ ही नहीं होता उसी सीध में नीचे अन्य संगतियाँ भी बैठती हैं। कपाल की हड्डियों के नीचे मस्तिष्क को आच्छादित किए हुए एक ब्राह्मक (सैरिब्रल कार्टेक्स) होते हैं। इसमें खेत में हल चलाने से बने हुए चिह्न जैसे होते हैं। जो उसे विभिन्न भागों में विभाजित करते हैं। इन्हें सीता (सल्कस) कहते हैं। ब्राह्मक (कार्टेक्स) को लम्बाई में बीच से विभाजित करने वाली धार के लाम्बिक सीता (लौंगी ट्यूडिनल फिमर) तथा चौड़ाई में बीच से विभाजित करने वाली को केन्द्रीय सीता (सैन्ट्रल सल्कस) कहते हैं। इन दोनों जोड़ों का केन्द्र (क्रासिंग) ठीक उसी स्थल पर होता है, जहाँ ब्रह्मरन्ध्र कहा गया है। इसी रन्ध्र की सीध में मस्तिष्क की सबसे ऊपरी रहस्यमय कही जाने वाली शीर्ष ग्रन्थि ( पीमियल ग्लैण्ड) का स्थान है।
यह ब्रह्मरन्ध्र कार्य स्थित सत्ता को महत् चेतना से सम्बद्ध करने का विशिष्ट मार्ग-द्वार है। योगी अन्त समय में इसी मार्ग से प्राण का निष्कासन करके ब्रह्मलीन होते हैं। स्पष्ट है कि जीवन काल में यह ब्रह्मरन्ध्र मस्तिष्क के सहस्रार चक्र के माध्यम से दिव्य शक्तियों तथा दिव्य अनुभूतियों के आदान-प्रदान का कार्य करता है। सहस्रार चक्र और ब्रह्मरन्ध्र मिलकर एक संयुक्त इकाई-यूनिट के रूप में कार्य करते हैं। अतः योग साधनों में भी इन्हें संयुक्त रूप से प्रयुक्त प्रभावित करने का विधान है।
अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते। पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठैष्वेनुत्तमेषु चोकेषु। इदं वाव यद्यदस्मित्रन्तः पुरुषे ज्योतिः-छान्दोग्य
एक परम ज्योति है। जो सब वस्तुओं और लोकों से परे है। वही सर्वत्र जगमगा रही है। वही दिव्य ज्योति मनुष्यों के हृदय में विद्यमान है।
कुण्डलिनी जागरण में सूर्यभेदन प्राणायाम की प्रमुखता है। उसमें लोम-विलोम क्रम से एक बार बाएँ स्वर से साँस लेकर दाहिने से निकालने की और दूसरी बार दाहिने से लेकर बांये से निकालने की क्रिया लगातार करने पड़ती है। साथ ही इस मंथन का ‘प्रहार’ मूलाधार में प्रसुप्त महा अग्नि पर प्रसुप्त सर्पिणी पर करना पड़ता है। आक्सीजन के संयोग से अग्नि भड़कती है। प्राण की अभीष्ट मात्रा प्रसुप्त अग्नि चिनगारी को मिलते रहने से उसके भड़कने और दावानल का रूप धारण करने में देर नहीं लगती। यही प्राण प्रहार प्रक्रिया सूर्य भेदन प्राणायाम का मुख्य प्रयोजन है।
अग्नि और प्राण के संयोग एवं प्रहार क्रम को प्रहार प्रताड़ना आदि नाम दिये गये है। जागरण के इस प्रयोग का उल्लेख इस प्रकार मिलता है-
चक्र मध्ये स्थिता देवाः कम्पतिवायु ताडनात्। कुण्डल्यपि महामाया कैलाशे सा विलीयते -शिव संहिता
प्राणवायु के आघात से चक्रों के मध्य रहने वाले देवता जागते हैं और महामाया कुण्डलिनी कैलाश पति शिव से जा मिलती है।
योगाभ्यासेन मरुता साग्निना बोधिताँ सती। स्फुरिता हृदयाकाशे नागरूपा महाज्ज्वला -हत्रिशिखब्रहाह्मणोपनिषद्
योगाभ्यास द्वारा प्राण वायु तथा अग्नि से प्रदीप्त यह महासती कुण्डलिनी ऊपर उठकर हृदयाकाश में पहुँचती है। और वहाँ अत्यन्त प्रकाश वर्ण नाग के रूप में स्फुरित होती है।
येन मार्गेण गन्तव्यं ब्रह्मस्थानं निरामयम्। मुखेनाच्खद्य तद्द्वार प्रसुप्ता परमेश्वरी। प्रबुद्धा बहिनयोगेन मनसा मरुता सह॥
सूचिवद्गुणमादायं प्रजत्यूर्ध्व सुपुम्नया। उद्धाटयेत्कपाट तु यथा कुँचिकया हठात्॥ कुण्डलिन्या तथा योगी मोक्षद्वार विभदयेत्-ध्यानबिन्दुपनिषद
जिस मार्ग से ब्रह्म स्थान तक सुगमता से जाया जा सकता है, उस मार्ग का द्वार परमेश्वरी कुण्डलिनी अपने मुँह से ढके सोयी हुई है। अग्नि तथा मन प्रेरित प्राणवायु के सम्मिलित योग से वह जागृत होती है। और जैसे सुई के साथ धागा जाता है, उसी प्रकार प्राणवायु के साथ वह कुण्डलिनी सुषुम्ना पथ से ऊपर जाती है। जैसे कुञ्जी से हठात् द्वार खोल दिया जाता है, वैसे ही योगी कुण्डलिनी शक्ति से मोक्ष द्वार को भेदते हैं।
ज्वलनाधातपवना धादोरुन्निद्रितोऽहितोऽहिराट्। ब्रह्मग्रन्थि ततो भित्वा विष्णुग्रन्थि भिनत्यतः। रुद्रग्रन्थि च भित्वैव कमलानि भिनत्ति षट्।
सहस्रकमले शक्ति शिवेन सह मोदते॥ सैवावस्था परा ज्ञेका सैव निवृतिकारणा -योगकुण्डल्युपनिषद्
अग्नि और प्राणवायु दोनों से आघात से सुप्त कुण्डलिनी जाग पड़ती है और ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि, रुद्रग्रन्थि तथा षट्चक्र का भेदन करती हुई सहस्रार कमल में जा पहुँचती है। वहाँ यह शक्ति शिव के साथ मिलकर आनंद की स्थिति में निवास करती है। वही श्रेष्ठ परा स्थिति है। यही मोक्ष का कारण है।
प्राण स्थानं ततोवन्हिः प्राणापानौ च सत्वरम्। मिलित्वा कुण्डली याति प्रसुप्ता कुण्डलाकृतिः। तेनाग्नाच संतृप्ता पवने परिचालिता। प्रसाय स्व शरीरे तु सुषुम्नावदनान्तरे-योग कुण्डल्युपनिषद्
प्राण और अपान के संयोग से महा अग्नि दीप्तिमान होती है। और कुण्डलिनी जगती है। प्राणवायु में तीव्रता आने से वह अग्नि भी तीव्र होती जाती है और अपना क्षेत्र विस्तार करती है।
ततो वन्हि प्रतापेन प्राणसंधर्षणेन च। दन्डाहता भुजंगीव कुण्डली संप्रबुद्धचते-योगरसायनम्
अग्नि के ताप तथा प्राण के संघर्षण से उत्पन्न ऊर्जा से कुण्डली प्रबुद्ध होकर वैसे ही सीधी हो जाती है जैसे दण्ड से आहत सर्पिणी।
तदानिल शिखा दीर्धा जायते वायुनाहता। तेन कुण्डलिनी सुप्ता संतप्ता सप्रबुध्य ते-हठयोग प्रदीपिका
प्राणवायु के प्रहार से अग्नि शिखा प्रदीप्त होती है और उसकी गर्मी से प्रसुप्त कुण्डलिनी जाग पड़ती है। सूर्यभेदन प्राणायाम द्वारा अग्नि उत्पन्न करने के लिए उपकरणों से रगड़ उत्पन्न करती पड़ती है। वे इड़ा और पिंगला नामक दो प्राण प्रवाह है। जो सुषुम्ना के-मेरुदण्ड के मध्य में रहते हैं। सामान्यतया उनकी गतिशीलता इतनी ही रहती है कि शरीर निर्वाह के लिए जितनी आवश्यक है उतनी ऊर्जा उत्पन्न होती रहें। अधिक मात्रा में प्राण उत्पादन अभीष्ट हो तो इन प्रवाहों को अधिक सक्रिय करना पड़ता है। मन्दी आग पर कुछ पकाना हो तो चूल्हे में सामान्य गर्मी बनाये रहने से काम चल जाता है किन्तु यदि खौलाने योग्य ताप की आवश्यकता हो तो अधिक ईंधन डालने के लिए हवा धोंकने का प्रबन्ध करना पड़ता है। इस प्रयोजन के लिए इडा और पिंगला को अधिक गतिशील बनाने के लिए सूर्यभेदन प्राणायाम का आश्रय लिया जाता है। इडा पिंगला का महत्त्व बताते हुए कहा गया है।
शक्तिरूपः स्थितश्चन्द्रो वामनाडी प्रवाहकः। दक्षनाडी प्रवाहश्च शम्भुरूपो दिवाकरः-श्वि स्वरोदय
वाम नाड़ी का प्रवाह करने वाला चन्द्रमा शक्ति रूप से और दक्षिण नाड़ी को प्रवाहक सूर्य शिव रूप से स्थित रहता है।
मेरोर्बाहन्यप्रदेशे शशिमिहिरशिरे सव्यदक्षे निषण्णे मध्ये नाड़ी सुषुम्णा त्रितयगुणमयी चन्द्रसूर्याग्निरूपा। धुस्तुरस्मेरपुष्पग्रथिततमवपुः कन्दमध्याच्छिरःस्था वज्राख्या मेढ्रदेशाच्छिरसि परिगता मध्यमेऽस्या ज्ज्वलन्ती-षट्चक्र निरूपणम-2
मेरुदण्ड के बाहर बाईं और चन्द्रमा के प्रकाश के समान इड़ा नाड़ी, सूर्य के प्रकाश के समान पिंगला नाड़ी है। इड़ा से शक्ति रूप और पिंगला से शिव रूप का बोध होता है। मेरुदण्ड के भीतर अग्नि रूप सुषुम्ना है। भ्रू मध्य भाग में इन तीनों का संगम होता है। यह तीनों नाड़ियां जननेन्द्रिय मूल में स्थित धतूरे के पुष्प के समान कन्द से उत्पन्न होकर ऊपर मस्तक तक जाती है।
प्राणायाम में श्वास को खींचना फेंकना भर ही नहीं होता वरन् उसके आवागमन की गति को नियन्त्रित रखना होता है। उनकी चाल एक जैसी रहनी चाहिए। कुम्भक के प्रहार रुकने का समय और वापसी की प्रवाह प्रक्रिया इन सब में समय एवं गति की क्रमबद्धता बनी रहनी आवश्यक है। मस्त व्यस्तता से अनियमितता और नियन्त्रण न रहने से प्राण योग का आधार ही नष्ट हो जाता है और वह मात्र गहरी साँस लेने की डीप ब्रिदिंग की- सामान्य व्यायाम परिपाटी मात्र बन कर स्वल्प फलदायक रह जाती है।
तात्त्विकी प्राणायामों में श्वास क्रिया की एक सुनिश्चित क्रम व्यवस्था बना कर उसमें ‘ताल’ उत्पन्न किया जाता है। संगीत शास्त्र के जानकार समझते हैं कि ‘ताल’ किसे कहते हैं ? उसके आधार पर ही ताल वाद्य बजाने की शिक्षा दी जाती है और स्वर लहरी का सौंदर्य निखरता है। ताल का ज्ञान न होने पर ढोलक, तबला, मजीरा, करताल आदि बजाये जाएँ तो उससे कर्ण कटु कर्कशता ही उत्पन्न होगी और सुनने वालों के कानों को अखरेगी। महत्त्वपूर्ण उद्देश्यों के लिए की गई प्राण योग की साधना में जहाँ श्रद्धा विश्वास भरी संकल्प शक्ति का समावेश करना है वहाँ उसकी तालबद्धता का अभ्यास करना भी आवश्यक होता है।
ताल से कितनी प्रचण्ड शक्ति उत्पन्न होती है उसे विज्ञान वेत्ता भली प्रकार जानते हैं। पुलों पर से सेना को लैफ्ट राइट करते हुए नहीं निकलने दिया जाता है। उन पर से गुजरते हुए वे चाल को अस्त व्यस्त रखते हैं।
ताल बद्ध कदम पड़ने से उत्पन्न सूक्ष्म तरंगें पुल में दरारें डाल सकती है। एक भारी गर्डर छत में लटका दिया जाय और उस पर कार्क जैसी हलकी वस्तु के तालबद्ध आघात पड़ते रहने की यांत्रिक व्यवस्था कर दी जाय तो उन स्वल्प आघातों से भी उत्पन्न प्रचण्ड शक्ति के फलस्वरूप गर्डर में थरथराहट दृष्टिगोचर होने लगेगी।
एक नियत गति से काँच के गिलास के पास ध्वनि की जाय तो वह उन आघातों से टूट जाएगा । संगीत का शारीरिक और मानसिक प्रभाव होता है उसका स्वास्थ्य संवर्द्धन के लिए-रोग निवारण के लिए सफल प्रयोग हो रहा है। पशुओं का दूध ओर पक्षियों की प्रजनन क्षमता बढ़ाने में क्रमबद्ध संगीत के लाभ देखे गये है। पेड़ पौधों को कृषि उपज को बढ़ाने में भी संगीत का उत्साहवर्धक उपयोग होता है।
‘स्टोन हैन्ज्स’ के पुराने अवशेष में यह विशेषता है कि मध्यम स्वर लहरी के ध्वनि प्रवाह से वे काँपने लगते हैं अस्तु उस क्षेत्र में न केवल बजाना वरन् गाना भी मना है। चेतावनी के रूप में वहाँ यह सूचना टँगी है कि तालबद्धता इन अवशेषों को गिरा सकती है इसलिए यहाँ वैसा कुछ न किया जाय।
लोम विलोम प्राणायाम क्रम में यह ताल प्रक्रिया विशेष रूप उत्पन्न होती है। एक ही क्रम बना रहने से घुमावदार ‘सर्किट’ बनता है। पर उलट पुलट का क्रम दुहराने से ताल की उत्पत्ति होती है। सूर्यवेधन प्राणायाम में तालबद्धता का उत्पन्न करना स्थूल शरीर गत ऊर्जा को एकत्रित, प्रज्वलित और प्रखर बनाता है। संकल्प शक्ति के आधार पर खींचा हुआ दिव्य प्राण आत्म प्राण की मूलाधार स्थिति को प्रज्वलित करता है। इसी आधार पर प्रसुप्ति जागृति में परिणित होती है और साधक को आत्म सत्ता के अंतर्गत दिव्य ऊर्जा का अभिवर्धन दृष्टिगोचर होता है। योग शास्त्र में दिव्य प्राण को देवता-कुण्डलिनी अग्नि को दिव्य अग्नि कहा गया है और उसके जागरण से अनेकों दिव्य लाभ मिलने की बात कही गई है।
अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्। स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आवरीवर्ति भुवनेष्वन्तः -एतरेय आरण्यक
मैंने प्राण को देखा है- साक्षत्कार किया है। यह प्राण सब इन्द्रियों का गोपा (रक्षक) है। यह कभी नष्ट नहीं होने वाला है। यह भिन्न भिन्न मार्गों अर्थात् नाड़ियों के द्वारा आता और जाता है। मुख तथा नासिक के द्वार क्षण-क्षण में इस शरीर में आता है तथा फिर बाहर चला जाता है यह प्राण शरीर में अध्यात्म रूप में-वायु के रूप में है, परन्तु वस्तुतः यह आधि देव रूप में सूर्य है।
ब्रह्मादयोऽपि त्रिदशाः पवनाभ्यासतत्पराः। अभूवत्रन्त कभया तस्मात्पवनमभ्यसेत्-योग सन्ध्या पृ0 62
ब्रह्म, विष्णु, महेश आदि भी सदा प्राणवायु के द्वारा ही कार्य करते हैं, इसलिए इस वायु को संयमित करने का अभ्यास करना ही चाहिए।
जागृत प्राण ऊर्जा स्थूल शरीर एवं सूक्ष्म शरीर के जिस भी भाग में पहुँचती है वहीं की प्रसुप्ति दिव्य सामर्थ्य सजग एवं सक्रिय होने लगती है। कुण्डलिनी का प्रभाव एवं प्रकाश पहुँचने से जो विभूतियाँ उभरती है उनका उल्लेख कुण्डलिनी स्तवन के रूप में इस प्रकार किया गया है-
हृत्पद्यस्था प्राण शक्तिः कण्ठस्था स्पप्न नायिका। तालुस्था त्वं सदा धारा विन्दुस्था विन्दु मालिनी। मूले त्वं कुण्डली शक्तिर्व्यापिनी केश मूलगा॥
हृदय चक्र में प्राण शक्ति, कण्ठ चक्र में दिव्य दृष्टि, तालु में धारणा, बिन्दु में बिन्दु मालिनी केश मूल में व्यापिनी और मूलाधार चक्र में तुम्हीं कुण्डलिनी शक्ति हो।
कीर्ति कान्तिश्च नैरुज्यं सर्वेषाँ प्रियताँ व्रजेत् विख्यातं चपि लोकेषु मुक्त्वःन्ते मोक्ष माप्नुयात्॥
उस महा शक्ति की कृपा से कीर्ति क्रान्ति, आरोग्य, लोक प्रियता, सत्कार आदि मिलते हैं और अन्त में मोक्ष लाभ होता है।
प्राचीन काल में ब्राह्मण ज्ञान के लिए क्षत्रिय राज्य के लिए, यात्रा करते थे। वैश्य व्यापार के लिए यात्रा करता था। यात्रा के महत्त्व से इंकार नहीं किया जा सकता - 15 वीं, 16 वीं सदी से ही यूरोप के विविध देशों में ज्ञान पिपासा, नये नये देशों की खोज और ज्योतिष, भूगर्भ शास्त्र, भौतिक विज्ञान, रसायन तथा चिकित्सा आदि विविध क्षेत्रों में अनुसंधान की होड़ सी लग गई है। सत्य के ज्ञान और प्रकृति के रहस्यों के उद्घाटन के लिए वैज्ञानिकों और दूसरे यात्रियों ने अपने प्राण संकट में डालकर दुस्साहस के अनेक कार्य किये थे। साहसी यात्रियों की गौरव गाथाएँ सर्वत्र गाई जाती है।
प्रगतिशीलता का दूसरा नाम यात्रा है। वस्तुतः जीवन की की पुकार ही “ चरैवेति , चरैवेति” चलना है चलना है, सब चलते हैं, जीवन गतिमान है।
यात्रा से मनुष्य की दृष्टि विस्तृत होकर उदार होती है। यात्रा से मस्तिष्क विराट होता है और हृदय विशाल।
प्राचीन काल में इसी दृष्टि से 12 वर्ष गुरुकुल में अध्ययन करने के बाद 2 वर्ष देश भ्रमण करने की व्यवस्था रहती थी। प्रकृति की विविधता उसके सौंदर्य और भयानकता से जहाँ यात्री आनन्द प्राप्त करता है। वहाँ ज्ञान की वृद्धि भी होती है। इस प्राकृतिक आदान प्रदान से मनुष्य में आध्यात्मिकता की शक्ति एवं सत्यं शिव सुंदरम् की भावना जागृत होती है।
वैदिक ऋषि ने गाया है- “जो व्यक्ति चलते रहते हैं। उनकी जंघाओं में फूल खिलते हैं। उन की आत्मा में फलों के गुच्छे लगते हैं। उनके पाप थककर सो जाते हैं, इसलिए चलते रहो, चलते रहो।” तीर्थ यात्रा मातृभूमि के प्रति उत्कट प्रेम की सर्वथा अभिव्यक्ति है। यह देश पूजा की ऐसी विधि है जिससे धार्मिक भावों को बल मिलता है। साथ ही भौगोलिक चेतना बढ़ती है। तीर्थ यात्रा से मिलने वाले पुण्य लाभ के पीछे और भी कितने ही लाभ छिपे है।
यात्रा केवल चरणों से ही नहीं की जाती वरन् मन, बुद्धि, चित्त सभी यात्रा करते हैं। यह सृष्टि का विकास है। तन, मन सब धुल कर निखर जाते हैं।
स्कन्द पुराण के काशी खण्ड में कहा गया है कि तीर्थों के दो भेद है। मानस तीर्थ और भौम तीर्थ। जिनके मन शुद्ध है जो आचारवान, ज्ञानी और तपस्वी है ऐसे लोग मानस तीर्थ है, जितेन्द्रिय जहाँ रहते हैं वही वे तीर्थ बनाते हैं। भौम तीर्थ चार प्रकार के है-
(1) अर्थ तीर्थ-नदियों के तट और संगम पर व्यापार केन्द्र। (2) धर्म तीर्थ- प्रजाओं के धर्म पालन के निमित्त पवित्र धर्म नीति के केन्द्र (3) काम तीर्थ-कला और सौंदर्य साधना के केन्द्र (4) मोक्ष तीर्थ-विद्या ज्ञान और अध्यात्म के केन्द्र।
जहाँ इन चारों का समुदाय हो और जीवन की बहुमुखी प्रवृत्तियों के सूत्र मिलते हों, वे बड़े तीर्थ महा पुरियों के रूप में प्रसिद्ध हो जाते हैं। जैसे काशी, प्रयाग, मथुरा, उज्जयिनी आदि।
महाभारतकार ने बन पर्व 80।34-40 में कहा है कि ऋषियों ने वेदों में बहुत से यज्ञ कहे है। उनका फल जीते जी और मरकर लोगों को मिलता है। लेकिन दरिद्र जनता को वह फल कैसे मिल सकता है ? यज्ञों हेतु विद्वान, विधि विशेषज्ञ एवं साधन सामग्री की आवश्यकता होती है, निर्धन लोग अकेले बिना बहुत व्यय के यज्ञों का फल पा सके इसकी युक्ति तीर्थ यात्रा है। तीर्थों में जाने का पुण्य यज्ञों से भी अधिक है।
इस प्रकार जनता को साँस्कृतिक आन्दोलन में सम्मिलित करने हेतु तीर्थ यात्रा बड़ी सहायक हुई। सुदूर क्षेत्रों, ग्रामों, जंगलों में रहने वाले लोग जो धर्म, संस्कृति, क्रिया सदाचार की प्रवृत्तियों से अपरिचित रहते थे वे भी तीर्थयात्रा के निमित्त स्वेच्छा से तीर्थ केन्द्रों में आते और उनके संस्कार ले जाते थे।
ऋषियों की जीवन प्रक्रिया का अध्ययन करने से प्रतीत होता है कि उनका अधिकांश समय परिभ्रमण में बीता। यही कारण है कि जहाँ अन्य वर्ग के महापुरुषों के स्थान, स्मारकों के चिह्न मिलते हैं वहाँ ऋषियों के इतने महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व होते हुए भी न तो किसी स्थान विशेष पर टिके और न उनके स्थान बने। मध्यकालीन सन्तों में से प्रायः प्रत्येक की क्रिया प्रक्रिया यही रही है। उन्होंने अध्ययन एवं विशिष्ट तप साधना के लिए जितने समय जहाँ रुकना आवश्यक समझा वहाँ रुके और इसके पश्चात् परिभ्रमण के लिए निकल पड़े । सिखाना और सीखना यही उनकी प्रधान प्रवृत्ति रही है।
तीर्थयात्रा का पुण्य उस प्रयोजन के लिए बने नगरों, देवालयों एवं नदी सरोवरों से जोड़कर भूल की गई है। वस्तुतः तीर्थ यात्रा धर्म प्रचार की एक सुव्यवस्थित योजना है। जिसमें विराम विश्राम के लिए प्राकृतिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व के स्थानों को चुना गया है। इन यात्रियों के लिए कई तरह की सुविधाएँ यहाँ साधन सम्पन्न लोग जुटा दिया करते थे। भोजन, वस्त्र, पात्र, मार्ग व्यय, पुस्तक, पूजा उपकरण, औषधि, आदि जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती वे सभी तीर्थ मठों में संचित रहती थी। धर्म प्रचारकों को आवश्यकतानुसार वे साधन सरलतापूर्वक मिल जाते थे। सत्संग, शिक्षण और अन्य ज्ञातव्य साधन यहाँ रहते थे और आगे की यात्रा के लिए साथियों, सहयोगियों का हेर फेर भी यहीं बन जाता था। इन्हीं कारणों से अमुक स्थान तीर्थ घोषित किये गये। उन विराम स्थलों पर प्रचारकों का पारस्परिक मिलन, सम्पर्क एवं कई तरह का आदान प्रदान भी होता रहता था। जंक्शन की तरह कितने ही मार्गों के यात्री उधर से गुजरते और अनेक प्रकार के पारस्परिक सम्पर्क साधते हुए लाभान्वित होते थे। स्थानों को महत्त्व मिलने के ऐसे ही कुछ कारण है। इतने पर भी स्थान विशेष पर जाकर कुछ देखने करने को नहीं, धर्म प्रचार के लिए पैदल यात्रा को ही तीर्थ यात्रा का लक्ष्य एवं प्रयोजन माना गया है। व उद्देश्य यहाँ न बन पड़े तो समझना चाहिए कि मात्र प्राण विहीन कलेवर ही लटक रहा है।
प्राचीन काल की तीर्थ यात्रा मण्डलियों में दो वर्ग के लोग रहते थे। एक वे मनीषी जो अपने साथियों तथा सम्पर्क क्षेत्रों को अपने ज्ञान तथा अनुभवों का लाभ पहुँचाते चलते थे। दूसरे वे जिज्ञासु जो मण्डली के वातावरण में अपने को श्रेष्ठता के लिए प्रशिक्षित करते थे, ताकि भविष्य में वे वे इस आधार पर उपार्जित किये चरित्र ज्ञान एवं कौशल के आधार पर प्रचारकों की अगली भूमिका निभा सकें। यात्रा में कई व्यक्ति रहने से सुविधा भी रहती है और शोभा भी। भोजन आदि की दैनिक व्यवस्था और किसी के रुग्ण हो जाने पर परिचर्या, सुविधा का लाभ भी मण्डली में ही बन पड़ता है। सम्पर्क में कई प्रकार के कितने ही लोगों से वार्त्तालाप आदान प्रदान करना पड़ता है इसमें कई व्यक्तियों का होना ही उपयुक्त रहता है। एक या दो व्यक्ति हों तो निजी व्यवस्था एवं सम्पर्क जन्य समस्याओं का निपटारा कठिन पड़ जाय। ऐसे ही अनेक कारणों को ध्यान में रखते हुए तीर्थयात्रा एकाकी नहीं वरन् टोलियों के रूप में निकलती थी। यो निषेध एकाकी का भी नहीं है। द्रुतगामी वाहनों के उपयोग से शारीरिक सुविधा तो रहती है पर अधिक लोगों से अधिक सम्पर्क उस जल्दबाजी में बन ही नहीं पड़ता है। पैदल चलते हुए तो मार्ग में भी कितनों से ही बातें होती चलती है। वाहनारूढ़ व्यक्ति के लिए वैसा कर सकना सम्भव नहीं है।
नदियों, पर्वतों, पुण्य क्षेत्रों की परिक्रमाएँ अभी भी होती है नर्मदा के उद्गम से लेकर अन्त तक की परिक्रमा हर साल निकलती है। गिरनार और गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का पुण्य है। ब्रज चौरासी कोस, प्रयाग की पंचकोशी परिक्रमाएँ प्रसिद्ध है। शिवरात्रि पर लोग कन्धों पर गंगाजल की ‘काँवरें’ उठाते हैं और अमुक शिवालय पर उन्हें चढ़ाते हैं। मार्ग में यह यात्री लोग भजन कीर्तन गाते हुए चलते हैं ताकि चलते चलते भी उद्बोधन का प्रयोजन पूरा होता चले। अब चिह्न पूजा प्रधान और लक्ष्य तिरोहित हो गया है। यदि लक्ष्य को प्रधान और चिह्न पूजा को आवश्यकतानुरूप बना लिया जाय तो तीर्थ यात्रा की पुण्य परम्परा अपने युग की आवश्यकता पूरी करने में भी प्राचीन काल की तरह ही अतीव श्रेयस्कर सिद्ध हो सकती है।
भक्ति और तीर्थ यात्रा प्राचीन काल में परस्पर सघनतापूर्वक जुड़ी रही है। तपश्चर्याओं में उसे प्रधान माना गया है। तितीक्षा के अन्य साधन भी तप के रूप में बताये गये है, पर तीर्थ यात्रा के साथ जो व्यक्ति एवं समाज का विविध विधि हित साधन होता है उसे ध्यान में रखते हुए इसका प्रचलन बहुत हुआ है और महत्त्व अधिक मिला है। प्रख्यात धर्म पुरुषों में से अधिकांश ने अपनी कार्य पद्धति में तीर्थ यात्रा तप को प्रधान रूप से सम्मिलित रखा है। छोटे या बड़े सन्तों की जीवन चर्या पर दृष्टिपात करने से यह तथ्य स्पष्ट रूप से सामने आ खड़ा होता है।
देवर्षि नारद जी निरन्तर यात्रा निरत रहे। कहते हैं दो घड़ी से अधिक कहीं न ठहरने का उन्हें अभिशाप था। नित्य परिव्राजक है, उनका काम ही है अपनी वीणा की मनोहर झंकार के साथ भगवान के गुणों का गान करते हुए सदा यात्रा करना। भक्ति सूत्र निर्माता नारद जी के सम्बन्ध में यह भी कहा जाता है कि उन्होंने प्रतिज्ञा की थी-सम्पूर्ण पृथ्वी पर धर धर में एवं जन जन में भक्ति की स्थापना करना।
दक्षिण में असुरों के बढ़ते हुए अत्याचार को रोकने के लिए अगस्त्य ऋषि ने दक्षिण की यात्रा कर वहाँ अपना आश्रम बनाया। लक्ष्मण को अगस्त्याश्रम का परिचय देते हुए राम कहते है:-
यदा प्रभृति चक्रान्ता दिगियं पुण्य कर्मणा। त्दा प्रभृति निर्वेराः प्रशान्ता रजनी चराः॥ वाल्मी0 रामा0
उन पुण्यकर्मा महर्षि अगस्त्य ने जब से इस दक्षिण दिशा में पदार्पण किया है, तब से यहाँ के राक्षस शान्त हो गये है तथा उन्होंने दूसरों से बैर विरोध करना छोड़ दिया है।
भगवान श्री राम का तीर्थ यात्रा प्रेम अद्भुत था। उनकी तीर्थ यात्रा के बारे में स्कन्ध, पद्म, अग्नि ब्रह्म, गरुड तथा वायु आदि पुराणों में विस्तार से बताया गया है।
योग वाशिष्ठ में राम के बचपन में ही वशिष्ठ आदि ब्राह्मणों के साथ अनेकों नदियों तथा प्रयाग, धर्मारण्य गया, काशी, श्री शैल, केदार, पुष्कर तथा मानसरोवर आदि तीर्थों में भ्रमण करने का विस्तार से वर्णन है।
आनन्द रामायण में भगवान राम की अपने अनुचरों के साथ की गई तीर्थ यात्रा का “यात्रा काण्ड” में विस्तार से वर्णन किया गया है। इस यात्रा में भगवान राम सारे जीवन, यात्रा ही करते रहे। इस यात्रा में पुराने तीर्थों का उद्धार, नये तीर्थों की स्थापना धर्म प्रचार, दुष्टता का उन्मूलन आदि अनेक उद्देश्य निहित थे।
चौदह वर्ष के वनवास काल में भगवान जहाँ जहाँ गये वे स्थान तीर्थ बन गये।
वनवास गतो रामो यत्र यत्र व्यवस्थितः। तानि चोक्तानि तीर्थानि शतभष्टोत्तर क्षितों-कूर्म पुराण
वनवास के समय राम जहाँ जहाँ रहे वहीं तीर्थ बन गये, ऐसे तीर्थों की संख्या 108 हो गई थी।
लोक कल्याण के व्रती महात्मा बुद्ध ने लगातार 45 वर्ष तक देश भर में भ्रमण करके जनता को सत्य धर्म का उपदेश दिया और उन्हें अनेकों कुरीतियों और अन्धविश्वासों से छुड़ाकर कल्याणकारी मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।
सम्राट अशोक ने तेईस वर्ष तक राज्य करने के उपरान्त ईसा पूर्व 249 में उन ने अपने राज्य के तीर्थ स्थानों का भ्रमण किया। पाँच लाटों में अंकित वृत से यह पता चलता है कि वे मुजफ्फरपुर और चम्पारन होते हुए हिमालय की तराई तक गये और वहाँ से पश्चिम की और मुड़कर लुम्बिनी बन पहुँचे जहाँ तथागत का जन्म हुआ था। अपनी यात्रा के स्मारक के रूप में उन्होंने लुम्बिनी वन में भी एक लाट स्थापित की थी। आचार्य उपगुप्त के साथ फिर कपिलवस्तु, सारनाथ श्रावस्ती, गये। इस प्रकार बौद्ध तीर्थों की यात्रा करते करते सम्राट अशोक कुशीनगर पहुँचे। तीर्थयात्रा के उपरान्त अशोक ने संन्यास धारण कर लिया एवं सारा समय धर्म चर्या एवं धर्मोपदेश में बिताया।
जगद्गुरु आद्य शंकराचार्य ने दिग्विजय का समारम्भ किया। अनन्तशयनद्व अयोध्याद्व इन्द्रप्रस्थपुर, उज्जयिनी, कर्नाटक, काँची, चिदम्बर, बदरी, प्रयाग आदि तीर्थ क्षेत्रों और महानगरों में आत्मज्ञान और धर्म का प्रचार किया। काश्मीर से रामेश्वर तक की विद्वत्मण्डली ने उनकी विद्वत्ता का लोहा मान लिया। उन्होंने पदयात्रा के अंतर्गत दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में जगन्नाथपुरी में गोवर्धन, पश्चिम द्वारिका में शारदा और उत्तर बदरिकाश्रम में ज्योतिर्मठ की स्थापना की।
सन्त ज्ञानेश्वर ने अलन्दी से, नेवा से वापिस आने पर पन्द्रह वर्ष की आयु में सं0 1647 वि0 में ‘ज्ञानेश्वरी गीता’ का प्रणयन किया तदुपरान्त तीर्थयात्रा आरम्भ की। उनके साथ निवृत्तिनाथ सोपानदेव, मुक्ताबाई, नरहरि सोनार, चोखामेंला आदि तत्कालीन सन्त थे। वे पण्ढरपुर गये। वहाँ से सन्त नामदेव उनके साथ हो गये। फिर उक्त सन्त मण्डली ने उज्जैन, प्रयाग, काशी अयोध्या, गया, गोकुल, वृन्दावन, गिरिनार आदि तीर्थ क्षेत्रों की यात्रा की। लोगों को अपने सत्संग से सचेत कर जागरण का सर्वत्र सन्देश सुनाया। सन्त ज्ञानेश्वर की इस ऐतिहासिक, लोक-शिक्षण परक तीर्थयात्रा की बड़ी ख्याति सुदूर क्षेत्रों में फैल गई। वे मारवाड़ और पंजाब की और भी गये। तीर्थयात्रा से लौटने पर पण्ढरपुर में सन्त नामदेव ने इस यात्रा-यज्ञ की पूर्ति स्वरूप एक विशाल उत्सव का आयोजन किया।
सन्त एकनाथ अपने अनुष्ठान की पूर्ति के बाद गुरु आज्ञा से तीर्थयात्रा के लिये निकल पड़े । उनकी तीर्थयात्रा में जनार्दन पन्त ने नासिक त्र्यम्बकेश्वर तक उनका साथ दिया। ब्रह्मगिरि की परिक्रमा के उपरान्त गोदावरी ताप्ती, गंगा और यमुना का स्नान किया। आठों विनायक और बारह ज्योतिर्लिंग के दर्शन किये। वृन्दावन, काशी, प्रयाग, गया, बदरिकाश्रम एवं द्वारका की यात्रा की। सन्त एकनाथ ने 13 साल तक यात्रा की। 21 वर्ष की अवस्था में वे पैठठा लौट आये।
चैतन्य महाप्रभु ने भी सामूहिक एवं एकाकी रूप से अनेक स्थलों का परिभ्रमण किया। गया गये, फिर नील्काचल के उपरान्त दक्षिण की यात्रा की। अपने भक्त, और अनुचर गोविन्द को लेकर वे हाजीपुर मिदनापुर होते नयनगढ़ गये। चैतन्य ने अलौकिक प्रेम भाव का ही उपदेश दिया। ढलेश्वर, जलेश्वर, हरिहरपुर, बलशोर होते हुए नीलगढ़ गये। अपनी तीर्थयात्रा में उन्होंने जनमानस का परिष्कार किया। सत्याबाई और कमलाबाई वेश्यायों का हृदय परिवर्तन किया। महाप्रभु काँचीपुरम गये, शिव काँची, पक्षी तीर्थ, काल तीर्थ, सन्धि तीर्थ आदि पवित्र तीर्थों के दर्शन करते हुए वे तिरुचिरापल्ली पहुँचे। तज्जाबूर, कुन्ती, कर्ण पड़ा, पद्यकोट, त्रिपत्र, श्रीरंगम, रामेश्वर आदि दक्षिण भारत के अनेक तीर्थों का महाप्रभु ने भ्रमण किया। महाराष्ट्र के बाद गुजरात। द्वारका, सोमनाथ, जूनागढ़ प्रभास क्षेत्र होते हुए मध्यभारत के अनेक स्थलों के दर्शनार्थ गये। अन्त में उत्तर भारत की यात्रा अकेले पैदल की। मथुरा वृन्दावन, प्रयाग, काशी गये। काशी का मन जीत श्री चैतन्य ने भारत का मन जीत लिया। मात्र 48 वर्ष के आयु पाकर ही। उन्होंने तीर्थ यात्रा द्वारा लाखों पतित पददलितों का उद्धार किया। जो समाज में पदच्युत थे उन्हें नई हैसियत दी। समग्र समाज को जीने के लिए एक नहीं आस्था प्रदान की।
गोस्वामी तुलसीदास ने 14 वर्ष तक तीर्थ यात्राएँ की। वे प्रयाग, जगन्नाथ, रामेश्वर, द्वारिका, बदरिकाश्रम आदि पावन स्थलों के दर्शनार्थ गये । तीर्थयात्रा के बाद वे काशी में रहकर सन्तों का संग और राम की कथा कहने लगे।
सन्त तुकाराम ने तत्कालीन महाराष्ट्र को ही नहीं सम्पूर्ण भारतीय राष्ट्र को आत्मदर्शन एवं भगवद् दर्शन प्रदान किया। पण्ढरी की यात्रा का उन्होंने आजीवन पालन किया।
गुरु नानक जी लगभग तीस वर्ष की आयु में साँसारिक बन्धनों से मुक्त होकर भटकती हुई मानवता को सत्य मार्ग का उपदेश देने निकल पड़े । गुरु नानक ने देश विदेश की व्यापक यात्राएँ की। उन्होंने 15 वर्ष तक भारतवर्ष की चारों दिशाओं में सभी प्रमुख स्थानों की यात्राएँ की और अन्त में अफगानिस्तान, ईरान, अरब, और ईराक तक गये।
समर्थ गुरु रामदास ने 12 वर्ष के तप के उपरान्त 12 वर्ष तक तीर्थयात्रा की एवं सं0 1701 के वैशाख मास में कृष्णा नदी के तट पर आये। तीर्थ यात्रा के प्रसंग में श्री समर्थ जहाँ जहाँ गये, वहाँ वहाँ इन्होंने मठ स्थापित किये। लोक कल्याण की भावना से धर्म स्थापनार्थ उस युग में जब रेल, तार, जहाज, अखबार, प्रेस आदि का सर्वथा अभाव था, समस्त देश में घूमे। वे सर्वप्रथम काशी गये। फिर मथुरा-वृन्दावन से पंजाब, श्रीनगर एवं काश्मीर पहुँचे। वहाँ से चलकर हिमालय में केदारनाथ बद्रीनाथ की यात्रा की। उत्तराखण्ड के उपरान्त जगन्नाथ गये। लंका से वापिस होते हुए केरल, मैसूर, फिर महाराष्ट्र आ गये। यहाँ उन्होंने गोकर्ण, वैक्टेश, मल्लिकार्जुन बालनरसिंह, पालन नरसिंह का दर्शन किया, इसके बाद पठद्यसर, शिष्यमूक, करबीर क्षेत्र पंढरपुर आदि होकर पंचवटी लौट आये।
पुष्टीमार्गी सन्त गोस्वामी विट्ठलनाथ ने गुजरात तथा दक्षिण और मध्यभारत के तीर्थों की यात्रा की। बादशाह अकबर, मानसिंह, बीरबल, महारानी दुर्गावती, राजा आसकरण आदि उन्हे बड़े सम्मान एवं आदर की दृष्टि से देखते थे।
कृष्णोपासक सन्त दयारामभाई ने तीर्थ यात्रा सम्पादित की। दयाराम भाई श्रीनाथ द्वारा से काँकरीली गये। काँकरोली से मथुरा, वृन्दावन, गोकुल आदि की यात्रा की। उन्होंने सम्पूर्ण व्रज मण्डल चौरासी कोस की परिक्रमा की। तीर्थयात्रा से लौटने पर दयाराम भाई ने बड़ौदा के गोस्वामी श्रीवल्लभ लाल जी महाराज से ब्रह्म सम्बन्ध लिया।
सन 1888 में स्वामी विवेकानन्द देश भ्रमण के लिए निकले उन्होंने लगातार कई वर्ष तक देश व्यापी यात्रा परिभ्रमण किया। इस यात्रा से उन्होंने भारतीय विभिन्न वर्गों की अच्छी जानकारी प्राप्त की। राजस्थान में पहले वे अलवर गये। घूमते-घूमते ज्ञानोपदेश करते लिम्बड़ी काठियाबाड़ गये। फिर मैसूर पहुँचे। फिर वे रामेश्वर होकर कन्याकुमारी पहुँचे। वाद में अमेरिका इंग्लैण्ड एवं अन्य पाश्चात्य देशों की यात्रा की।
स्वामी रामतीर्थ ने अपनी देश विदेश की यात्राओं में अध्यात्म का सच्चा स्वरूप प्रतिपादित किया। सनातन धर्म सभा के प्रसिद्ध उपदेशक दीनदयाल शर्मा के साथ उन्होंने ब्रज, प्रयाग, और काशी की तीर्थयात्रा की। उत्तराखण्ड की भी यात्रा की। हिमालय के अंचल से मैदान में उतर कर उन्होंने, मथुरा, फैजाबाद, लखनऊ, आदि की यात्रा कर वेदान्त पर महत्त्वपूर्ण भाषण दिया। स्वामी रामतीर्थ ने अमेरिका, जापान तथा मिश्र आदि देशों की जनता को सत्य, शान्ति और प्रेम का सन्देश दिया।
स्वामी दयानन्द विद्याध्ययन के उपरान्त प्रायः परिभ्रमण ही करते रहे। आर्य समाजों की स्थापना, उन्हें गति देना, शास्त्रार्थ, साहित्य लेखन आदि सभी कार्य उन्होंने अपने प्रवास कार्य के साथ ही सम्पन्न किये थे।
कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ टैगोर ने विलायत से लौटकर तीर्थ यात्रा की। उन्होंने देश के गरीबों की स्थिति का अध्ययन करने हेतु कलकत्ते से पेशावर तक बैलगाड़ी में यात्रा की। यद्यपि उस समय रेलगाड़ी चल निकली थी किन्तु रेल यात्रा से पिछड़े हुए गाँवों और भूखे-नंगे कृषकों की अवस्था का क्या पता लग सकता था ?
अफ्रीका से लौटने पर गाँधी जी ने एक वर्ष तक समस्त देश का भ्रमण किया। एक वर्ष तक देश की यात्रा करने के उपरांत गाँधी जी अहमदाबाद लौटे और वहाँ साबरमती नदी के किनारे उन्होंने अपने सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की। उनकी डाँडी नमक सत्याग्रह यात्रा एवं नोआखाली की साम्प्रदायिक सद्भाव यात्रा तो प्रसिद्ध ही है।
सन्त विनोबा ने पूरे देश में पैदल घूम घूमकर लाखों गरीबों की जीविका की व्यवस्था करने के साथ भारतीय जनता की दशा का निरीक्षण किया और उसकी समस्या को समझा। पाकिस्तान की भी पदयात्रा की। चौदह वर्ष सन् 1951 से 1934 तक लगभग 43 लाख मील की पैदल यात्रा करके विनोबा ने जब पुनः अपने आश्रम में प्रवेश किया तो उस समय उनको 4,236-827 एकड़ जमीन भूदान में मिली ओर 7560 ग्राम दान में मिले।
ईसामसीह ने अपनी आध्यात्मिक जिज्ञासा की पूर्ति के लिए विदेशों की यात्रा की थी। डाँ0 नोटोविच की कृति ईसामसीह का अज्ञात जीवन चरित्र के अनुसार चौदह वर्ष की आयु में ईसा सौदागरों के एक दल के साथ भारत (सिंध) आ पहुँचे। इसके बाद वे जगन्नाथ गये। वहाँ उन्होंने वेद शास्त्र का अध्ययन किया। फिर बनारस आदि स्थानों की यात्रा में 6 वर्ष व्यतीत हो गये। फिर कपिल वस्तु पहुँचे। बौद्ध शास्त्रों का भी उन्होंने अध्ययन किया। उसके पश्चात वे नेपाल और हिमालय से होते हुए ईरान पहुँच गये। तदुपरान्त स्वदेश पहुँचकर स्वजातीय भाइयों में उस आध्यात्मिक ज्ञान का प्रचार करने लगे जो उन्होंने इतने वर्ष के अध्ययन और स्वानुभव से प्राप्त किया था।
अन्यान्य धर्म संस्थापकों ने भी यही किया है। इस्लाम धर्म के पैगम्बर हजरत मुहम्मद साहब ने अपनी धर्म प्रचार यात्रा जारी रखी। पारसी, यहूदी, ताओ आदि संसार के प्रधान धर्म सम्प्रदायों के ‘संस्थापकों एवं प्रचारकों को अपना अधिकांश समय धर्म प्रचार को तीर्थ यात्राओं में ही व्यतीत करना पड़ा है। यह तो कुछ उदाहरण मात्र है। इसी गणना की जाय और सूची बनाई जाय तो ऐसे प्रख्यात धर्मात्मा कहे जाने वाले प्रायः सभी लोग धर्म प्रचार की तीर्थ यात्रा को अपनाये हुए मिलेंगे। जिन्हें एक स्थान पर बैठकर शोध, लेखन शिक्षण आदि कार्य करने पड़े है उसने भी कभी न कभी लम्बी तीर्थयात्राओं का पुण्य सम्पादित किया है। सामान्य गृहस्थ भी अपनी व्यस्तता में से भी अवकाश निकाल कर एक पुण्य लाभ के लिए समय निकालते रहे है। स्व-पर कल्याण का इससे अच्छा रोचक एवं उपयोगी धर्म कृत्य दूसरा कोई भी नहीं है।
तीर्थ यात्रा के नाम पर स्थान दर्शन को आज महत्त्व मिल गया है। इस भगदड़ में मात्र निहित स्वार्थों को ही धन बटोरने का अवसर मिलता है। पर्यटन अपनी जगह पर कायम रहे, पर तीर्थ यात्रा का नाम न मिले। इन विडम्बनाओं को बदला जा सके और युग की आवश्यकता पूरी कर सकने वाली तीर्थयात्रा प्रक्रिया को योजनाबद्ध रीति से सुनियोजित किया जा सके तो यह महान धर्म परम्परा आज की स्थिति में भी पूर्व काल की तरह ही व्यक्ति और समाज के लिए सब प्रकार हित कारक सिद्ध हो सकती है।
एक पिता की इकलौती लाड़ली नन्ही-सी बिटिया बीमार पड़ी। इलाज और उपाय की सीमा पार कर लेने पर भी उसे बचाया न जा सका। बाप का कलेजा टूट गया। व्यथा के आँसू रुकते न थे। सो उसने एकान्त साधा। संसार से उसे बुरी तरह विरक्ति हो गई।
रोते रोते वह एक रात गहरी नींद में सो गया। सपना आया-वह देव लोक जा पहुँचा है ओर वहाँ श्वेत वस्त्र धारी नन्हे बालकों का अत्यन्त लम्बा जुलूस निकल रहा है। सभी बच्चे प्रसन्न है और हाथ में जलती मोमबत्ती लिये आ रहे है।
सपने को वह बहुत ही रुचिपूर्वक देखता रहा। उस पंक्ति में उसकी प्यारी बिटिया भी आ गई। वह उससे लिपट गया और हिचकियाँ ले ले कर रोने लगा। जब धीरज बँधा तो देखा और सब बच्चों की मोमबत्ती जो जल रही है वह अकेली उसी बिटिया की बुझी हुई है।
आदमी ने पूछा-बेटी तुम्हारी मोमबत्ती क्यों बुझी हुई है। बच्ची ने उदास होकर कहा-पापा साथ वाले बच्चे उसे बार-बार जलाते हैं पर आपके आँसू टपक-टपक कर उसे हर बार बुझा देते हैं।
आदमी की नींद खुल गई। उसने आँसुओं से बिटिया का हास प्रकाश बुझने न देने का निश्चय किया और फिर पहले की तरह सामान्य जीवन जीने लगा।
अपनी कमजोरियाँ और बुराइयों को स्वीकार करना साहस का काम है और उससे बड़ी हिम्मत यह है कि उन्हें छोड़ने का निश्चय किया जाय साथ ही उन्हें दूर करने के लिए तत्परतापूर्वक जुट जायें। असफलताएँ मिलने पर लोग हताश हो बैठते हैं और उपयुक्त दिशा में चलने का भी हौसला छोड़ बैठते हैं। उन्हें बहादुर ही कहा जाएगा जो हर असफलता के बाद दूनी हिम्मत और दूसरी सतर्कता के साथ लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कदम बढ़ाते हैं।
अपने साथ पक्षपात की आदत से प्रायः सभी लोग घिरे रहते हैं दूसरों की आलोचना करने के लिए काफी तथ्य संग्रह कर लिए जाते हैं, पर अपनी खामियाँ खराबियाँ ढूंढ़ने के लिए किसी की रुचि नहीं होती। इतना ही नहीं कोई वैसा सुझाता है तो बुरा लगता है। इस स्वभावगत दुर्बलता से लोहा लेकर जो अपनी कमजोरियों को स्वयं ढूंढ़ते हैं उन्हें स्वीकार करते हैं और सुधारने के लिए बार-बार असफल होने पर भी धैर्यपूर्वक जुटे रहते हैं उन्हें बहादुर ही कहा जाएगा ।
साहस हर किसी के भीतर मौजूद है कई उसे प्रयत्न पूर्वक बढ़ा लेते हैं। संकल्प करने और उसके पूरा होने तक जुटे रहने से साहस बढ़ता है। कठिनाइयों को निमन्त्रण देने, उनके साथ खिलवाड़ करने और टकराने से हिम्मत खुलती है। अखाड़े में उतरने का अभ्यास करने वाले दंगलों में कुश्ती पछाड़ते हैं।
आलस इस प्रकार की कायरता है काम को देखकर डर जाना- उसका मुकाबला करने की अपेक्षा कल पर खिसका देना यह बताता है कि आदमी डरपोक है। काम के साथ जो जिम्मेदारी और कठिनाई जुड़ी होती है उसे पूरा कर सकने से जो घबराते हैं वे काल के आँचल में अपना मुँह छिपाते हैं। अच्छा यह है कि जो काम आज हो सकता है उसे कल पर न टालें। यदि अभी समय है तो पीछे के लिए उसे छोड़ने की आवश्यकता नहीं। काम अपना आत्मीय मित्र है जो प्रशंसा, सम्पदा, सम्पत्ति, सफलता, योग्यता आदि न जाने क्या-क्या देने आता है? ऐसे मित्र के सामने आने पर उसका हार्दिक स्वागत सत्कार करना ही योग्यता है। उसके साथ रहने और साथ रखने में ही बुद्धिमानी हैं इस शुभागमन की घड़ी में जो नाक, भौं सिकोड़ते हैं, उदासी खाते हैं समझना चाहिए वे अपने आगत सौभाग्य का तिरस्कार ही करते हैं।
शूरवीर वे नहीं जो हर घड़ी लड़ाई-झगड़े पर उतारू रहते हैं और हर किसी को ताल ठोक कर चुनौती देते हैं। वीरता सिद्ध करने के लिए किसी को गिराने की जरूरत नहीं पड़ती। वीरता बनाने में है। ध्वंस का कार्य तो माचिस की तीली भी कर सकती है। बड़प्पन बनाने में है। जिन्होंने सृजन की बड़ी योजनाएँ बनाई और पूरी की उन्हें लड़ाई में कितनों को ही परास्त करने वालों से कम नहीं वरन् अधिक शूरवीर ही गिना जाएगा ।
किसी को कुछ देने की इच्छा हो और देते बन पड़े तो सर्वोत्तम उपहार आत्म-विश्वास जगाने वाला प्रोत्साहन देना ही हो सकता है। आदमी के भीतर सब कुछ तो नहीं है-पर इतना अवश्य है जिसके सहारे वह सुखी और समुन्नत रह सके। अपने बलबूते ही लोग प्रगति करते हैं। दूसरे तो उनका समर्थन, सहयोग भर कर देते हैं। पराश्रय में कोई ऊँचा नहीं उठ सका, यात्रा अपने ही पैरों से चलकर पूरी होती हैं दूसरे तो हारा भर देते हैं परावलम्बन से दूर हटकर स्वावलम्बन अपनाने का यदि आत्मविश्वास पैदा किया जा सके तो यह बहुत बड़ी बात है। यह सदा सर्वदा के लिए समस्याओं का समाधान है।
यह मानना गलत है कि हम दुर्भाग्यग्रस्त है और पिछड़े रहने के लिए ही बने हैं यह सोचना भी निरर्थक है कि सहयोग और साधनों के अभाव में ऊँचा उठने की सम्भावना नहीं है। वास्तविकता इतनी है कि भीतर से वे उमंगें नहीं उठती जो अपनी प्रस्तुत क्षमताओं का बिखराव रोक कर उन्हें केन्द्रित करती और एक दिशा में लगाती हैं यदि साहस जागे तो साथ ही वे सत्प्रवृत्तियाँ भी उभरे जिनके सहारे छोटे मनुष्य बड़े बनते हैं और पिछड़े हुओं को उन्नति के उच्च शिखर पर जा पहुँचने का अवसर मिलता है।
मनुष्य वह सब कुछ है जिसे सराहा जा सके, जिसे श्रेय और सम्मान मिल सके। मनुष्य सफलताओं के लिए बनाया गया है। उसमें ऐसे तत्त्व कूट-कूटकर भरे है जिनके सहारे छिपी हुई महानता को उजागर कर सकना सम्भव हो सके। आवश्यकता उस साहस की है जिसके झटके से महानता को प्रसुप्त स्थिति से उबार कर जागृत और समुन्नत किया जाता है।
*समाप्त*