उपार्जन का सदुपयोग भी

उपार्जन में उत्साह होना सराहनीय है। इससे पुरुषार्थ जगता है, पराक्रम में प्रखरता आती है, प्रगति सम्भावनाएँ साकार होती है और सफलताओं का आनन्द मिलता है। उपार्जन के लिए उमंग न रहने पर मनुष्य अन्यमनस्क रहने लगता है और उदासीन की प्रतिक्रिया पक्षाघात की अपंगता जैसी हानिकारक सिद्ध होती है।

इतना होते हुये भी और भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जो उपलब्ध है उसका मूल्यांकन किया जाय और यह सोचा जाए कि जो हाथ में है उसका श्रेष्ठतम उपयोग कैसे किया जा सकता है? यह विवेक वृद्धि न हो तो उपार्जन का उत्साह अधिक संचय की सुविधा तो देगा, पर सदुपयोग की बात न रहने पर उपलब्ध वैभव या तो निरर्थक चला जायेगा या फिर अनर्थ मूलक दुष्परिणाम उत्पन्न करेगा।

जितना महत्त्वपूर्ण प्रगति के लिए प्रयत्न करना है, उससे भी अधिक आवश्यक यह है कि हाथ के साधनों पर नये सिरे से विचार करें और यह देखें कि उनका अनावश्यक संचय तो नहीं हो रहा है? इसका अपव्यय या दुरुपयोग तो नहीं चल रहा है? ऐसा कुछ लगे तो उन छिद्रों को बन्द करने की बात सोचनी चाहिए, जिसके कारण अब तक के प्रयत्नों का परिणाम निरर्थक नष्ट होने एवं हानिकारक प्रतिक्रिया उत्पन्न होने का खतरा निश्चित है।

उपार्जन और उपयोग यह दोनों ही तथ्य समान महत्त्व के हैं। दोनों एक दूसरे के पूरक है। एक के बिना दूसरा अपंग है। अस्तु आगे बढ़ने और अधिक कमाने की जागृत आकांक्षा के साथ उस विवेकशीलता को भी जगाना चाहिए, जो उपलब्ध साधनों को सत्प्रयोजनों में लगाने की चेतावनी देती है। छलनी में दूध दुहने से तो प्रगति के लिए किया गया श्रम, मात्र थकान और पश्चाताप ही दे सकेगा।


सुखी जीवन का एक मात्र आधार धर्म

जीवन का अर्थ है संघर्ष, परिस्थितियों का आरोह, अवरोह; जिसे परिवर्तन भी कहा जा सकता है। अर्थात् परिवर्तन ही जीवन है और जीवन ही परिवर्तन। जीवन में दैत्यता, कुटिलता के आकस्मिक एवं अप्रत्याशित आक्रमणों को सहन करना अस्वाभाविक नहीं। परेशानियों, कष्टों और आपदाओं की बाँधी आती है तो मानव शक्ति को कुण्ठित कर देती है, फलस्वरूप बुद्धि निष्क्रिय हो जाती है, नैराश्य पूर्ण मानसिकता मनुष्य को किंकर्तव्यविमूढ़ बना देती है, ऐसी विषय परिस्थिति में असहाय, निस्सहाय व्यक्ति यह चिन्तन करता है कि हमारा सहायक कौन हो सकता है? हमारी रक्षा कौन कर सकता है? हमारा उद्धार कौन कर सकता है? साथ ही सत्पथ ज्ञान कौर करा सकता है? उत्तर एक ही है-धर्म। सुख-शान्ति की परिस्थितियों का जनक भी धर्म की समाप्ति हो जाएगी उस दिन सर्वनाश को कोई न रोक सकेगा। पाश्चात्य मनीषी खामसन अपनी समष्टि दृष्टि से धर्म को परिभाषित करते हुए कहता है कि “सम्पूर्ण विश्व मेरा देश, सम्पूर्ण मानवता मेरा बन्धु है और सम्पूर्ण भलाई ही मेरा धर्म है।”

वर्तमान युग में धर्म के प्रति लोगों की अनास्था बढ़ रही है जिसका परिणाम यह हो रहा है कि नैतिक एवं साँस्कृतिक मूल्यों, मान्यताओं में भी अवमूल्यन निरन्तर होता जा रहा है। ड़ड़ड़ड़ के कारण मनुष्य की सुख-शान्ति भंग होती जा रही है, सर्वत्र असन्तोष का वातावरण व्याप्त है।

चतुर्दिक् भटकने के उपरान्त, दृष्टि में एक ही उपाय परिकरण में सहायक सिद्ध हो सकता है- धर्म। वेद, उपनिषद्, स्मृति, पुराण आदि धर्मशास्त्रों में इसी तथ्य का निरूपण हुआ है। धर्म प्रधान युग अर्थात् सत्प्रवृत्तियों की बहुलता वाला युग ‘सतयुग’ कहलाता है, सतयुग में सुख और सम्पन्नता का आधार धर्म होता है।

भगवान् राज जब वन-गमन के लिए तत्पर हुए तो जीवन रक्षा की कामना से उन्होंने माता कौशल्या से आशीर्वाद की आकांक्षा व्यक्त की। विदुषी माता ने उस समय यह कहा कि-”हे राम ! तुमने जिस धर्म की प्रीति और नियम का पालन किया है, जिसके अनुसरण से तुम बन जाने को तत्पर हुए हो, वही धर्म तुम्हारी रक्षा करेगा।”

“घृयते इति धर्मः” अर्थात् जो धारण किया जाये वही धर्म है। ‘धर्म’ शब्द “ध्वै’ धातु से बना है जिसका अर्थ है-’धारण करना’ अर्थात् जो मनुष्य को धारण करे, शुद्ध और पवित्र बनाकर उसकी रक्षा करे, वही धर्म है। वास्तविक धर्म में व्यक्ति जिन तत्त्व की साधना करता है वह है परोपकार, दूसरों की सेवा, सत्य, संयम और कर्तव्य-पालन आदि। ‘धर्मचर’ का अभिप्राय भी तो यही है कि सदाचरण, धर्माचरण, सत्याचरण आदि मानव जीवन में व्यावहारिक रूप पा सकें।

जो व्यक्ति धर्म का पालक, पोषक होता है वही सच्चा धर्मात्मा कहलाने का अधिकारी है। धर्म-निष्ठ व्यक्ति के अन्तःकरण में वह शक्ति होती है जो असंख्य विघ्न−बाधाओं, प्रतिगामी शक्तियों को पराजित कर देती है। धार्मिक मनुष्य के जीवन में एक विशेष प्रकार का विलक्षण आह्लाद भरा रहता है, वह सर्वत्र सौरभ बिखेरता चलता है, उसकी उमंग एवं उल्लास से आस-पास का वातावरण भी प्रभावित होता है। धर्म की प्रणवता निर्जीव को भी सजीव बनाने में समर्थ होती है। ‘जीवट’ सच्चे धार्मिक का प्रधान लक्षण होता है। वस्तुतः धर्म मनुष्य का वह अग्नि तेज है जो प्रकाश उत्पन्न करता है उसमें क्रियाशीलता एवं जिजीविषा जागृत रखता है। धर्मशील व्यक्ति विभिन्न विपदाओं, विघ्न−बाधाओं में भी हिमालय के समान अटल एवं समुद्र के सदृश धीर गम्भीर रहता है। संक्षेप में कहा जाय तो धर्म जीवन का प्राण और मानवीय गरिमा का पर्याय है उससे ही मानव जाति की सुख-शान्ति और व्यवस्था अक्षुण्ण रह सकती है।


पूर्ण से पूर्ण ही उत्पन्न हुआ

न केवल चेतन समुदाय अपितु सृष्टि का प्रत्येक कण पूर्णता के लिए लालायित और गतिशील है। भौतिक-जीवन में जिसके पास स्वल्प सम्पदा है वह और अधिक की प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील है; पर जो धनाढ्य हैं उन्हें भी सन्तोष नहीं। उसी के परिणाम में वह और अधिक प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील दिखाई देता है। बड़े-बड़े सम्राट तक अपनी इस अपूर्णता को पाटने के लिए आपाधापी मचाते और दूसरे साम्राज्यों की लूटपाट करते पाये जाते हैं तो लगता है सृष्टि का हर प्राणी साधनों दृष्टि से अपूर्ण है इस दिशा में पूर्णता प्राप्त करने की हुड़क हर किसी में चढ़ी बैठी दिखाई देती है।

इतिहास का विद्यार्थी अपने आपको गणित में शून्य पाता है तो वह अपने आपको अपूर्ण अनुभव करता है, भूगोल का चप्पा छान डालने वाले को संगीत के स्वर बेचैन कर देते हैं उसे अपना ज्ञान थोथा दिखाई देने लगता है, बड़े-बड़े चतुर वकील और बैरिस्टरों को जब रोग बीमारी के कारण डाक्टरों की शरण जाना पड़ता है तब तो उनका अपने ज्ञान का-अभिमान चकनाचूर हो जाता है। बौद्धिक दृष्टि से हर प्राणी समिति है और हर कोई अगाध ज्ञान का पण्डित बनने को तत्पर दिखाई देता है।

नदियाँ अपनी अपूर्णता को दूर करने के लिए सागर की और भागती है; वृक्ष आकाश छूने दौड़ते हैं, धरती स्वयं भी अपने आपको नचाती हुई न जाने कि गन्तव्य की और अधर आकाश में भागी जा रही है, अपूर्णता की इस दौड़ में समूचा सौर-मंडल और उससे परे का अदृश्य संसार सम्मिलित है। पूर्णता प्राप्ति की बेचैनी न होती तो सम्भवतः संसार में रत्ती भर की सक्रियता न होती सर्वत्र नरव सुनवार पड़ा होता, न समुद्र उबलता, न मेघ बरसते, न वृक्ष उगते, न तारागण चमकते और न ही वे विराट् की प्रदक्षिणा में मारे-मारे घूमते?

जीवन की सार्थकता पूर्णता प्राप्ति में है, इसका तात्पर्य यह हुआ कि अभी हम अपूर्ण है, असत्य है, अन्धकार में है। हमारे सामने मृत्यु मुँह बाए खड़ी है। अन्धकार असत्य और मृत्यु पर जीत प्राप्त करने के लिए हम प्रकाश, सत्य और अमरता की और अग्रसर होना चाहते हैं। पर हो कोई नहीं पाता। हर कोई अपने आपको अशक्त और असहाय पाता है अज्ञान के अन्धकार में हाथ-पैर पटकता रहता है।

इस अपूर्णता पर जब कभी विचार जाता है तब एक ही तथ्य सामने आता है और वह है “परमात्मा” अर्थात् एक ऐसी सर्वोपरि सर्वशक्तिमान सत्ता जिसके लिए कुछ भी अपूर्ण नहीं है। वह सर्वज्ञ है, सर्वव्यापी, सर्वदृष्टा, नियामक और एकमात्र अपनी इच्छा से सम्पूर्ण सृष्टि में संचरण कर सकने की क्षमता से ओत-प्रोत है।

तैत्तिरीयोपनिषद् की तृतीय बल्ली-भृगु अपने पिता वरुण के पास जाकर कहते हैं। “अधीहि भगवो ब्रह्मोति” हे तात! मुझे ब्रह्मज्ञान की शिक्षा दीजिये। वरुण परीक्षा के लिए अपने पुत्र के रूप, सौंदर्य स्वास्थ्य, अपार सम्पत्ति और सुन्दर स्त्रियाँ माँगने को कहते हैं, पर भृगु प्रश्न करते हैं, क्या अपार सौंदर्य पाने के बाद मैं मृत्यु से बच सकता हूँ? क्या सम्पत्ति मुझे अमर बना सकती है? क्या बनिताधिक भोग मुझे नष्ट होने से बचा लेंगे? यदि नहीं तो यह सब कुछ मुझे नहीं चाहिए, जिससे किसी प्रकार की कामनाएँ शेष न रहे मुझे वह ज्ञान दीजिए।”

इस पर प्रसन्न होकर वरुण कहते हैं-

“यतो वा इतानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति तत्प्रन्त्यमिसं विशति तद्धि जिज्ञासस्वतद् ब्रह्योति।”

अर्थात् हे भृगु! जिससे समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जीवित रहते हैं और अन्त में उसी में विलीन हो जाते हैं।

विकासवाद के जनक डार्विन ने यह सिद्धान्त तो प्रतिपादित कर दिया कि प्रारम्भ में एक कोशीय जीव अमीबा की उत्पत्ति हुई यही अमीबा फिर “हाइड्रा” में विकसित हुआ, हाइड्रा मछली, मेंढक, सर्पणशील पक्षी, स्तनधारी जीवों आदि की श्रेणियों में विकसित होता हुआ वह बन्दर की शक्ल तक पहुँचा, आज का विकसित मनुष्य शरीर इसी बन्दर की सन्तान है। इसके लिए शरीर रचना के कुछ खाँचे भी मिलाये गये। जहाँ नहीं मिले वहाँ यह मान लिया गया कि वह कड़ियाँ लुप्त हैं और कभी समय पर उनकी भी जानकारी हो सकती है।

इस प्रतिपादन में डार्विन और इस सिद्धान्त के अध्येता यह भूल गये कि अमीबा से ही नर-मादा दो श्रेणियाँ कैसे विकसित हुई। अमीबा एक कोशीय या उससे दो कोशीय हाइड्रा पैदा हुआ क्या अन्य सभी जीव इसी गुणोत्तर श्रेणी में आ सकते हैं यदि सर्पणशील जीवनों से परधारी जीव विकसित हुये तो वह कृमि जैसे चोटें, पतिंगे, मच्छर आदि कृमि जो उड़ लेते हैं, वे किसी विकास प्रक्रिया में रखे जायेंगे? पक्षी, जल-जन्तु और कीड़े सभी माँस खाते हैं। स्तनधारी उन्हीं से विकसित हुए तो गाय, भैंस, बकरी, हाथी आदि माँस क्यों नहीं खाते। हाथी के दाँत होते हैं हथनियों के नहीं, मुर्गे में कलगी होती है मुर्गी में नहीं। मोर के रंग-बिरंगे पंख और मोरनियाँ बिना पंख वाली, विकास प्रक्रिया में एक ही जीव श्रेणी में यह अन्तर क्यों? प्राणियों में दाँतों की संख्या, आकृति, प्रकृति में अन्तर पाया जाता है। घोड़े के स्तर नहीं होते बैल के अण्डकोश के पास स्तर होते हैं। पक्षियों की अपेक्षा सर्प और कछुए हजारों वर्ष की आयु वाले होते हैं, यह सभी असमानताएँ इस बात का प्रमाण है कि सृष्टि रचना किसी विकास का परिणाम नहीं अपितु किसी स्वयंभू सत्ता द्वारा विधिवत् रची गई कलाकृति है।

विकासवाद के सिद्धान्त के समर्थक यह कहते हैं कि अपने सुविधापूर्ण जीवन के लिए इच्छा ने उन जीवों के शरीर संस्थानों में अन्तर किया और यह अन्तर स्पष्ट होते-होते एक जीव से दूसरी किस्म का उसी से मिलता हुआ जीवन विकसित होता गया। थोड़ी देर के लिए यह बात मान लें और मनुष्य शरीर को इस कसौटी पर कसें तो भी बात विकासवाद के विपरीत ही बैठेगी। मनुष्य कब से पक्षियों को देखकर आकाश में स्वतंत्र उड़ने को लालायित है, किन्तु उसके शरीर में ही कोई पंख उगा क्या, समुद्र में तैरते जहाज देखकर हर किसी का मन करने लगता है कि हम भी गोता लगायें और मछलियों की तरह कहीं से कहीं जाकर धूम आयें, पर वह डूबने से बच पायेगा क्या?

यह प्रश्न अब उन लोगों की भी विपरीत दिशा में सोचने और परमात्मा-सत्ता के अस्तित्व में होने की बात मानने की विवश करते हैं जो कभी इस सिद्धान्त के समर्थक रहे हैं। राबर्ट ए मिल्लीकान का कथन है-विकासवाद के सिद्धान्त से पता चलता है कि जिस तरह प्रकृति अपने गुणों और नियमों के अनुसार पदार्थ पैदा करती है, उससे विपरीत परमात्मा में ही वह शक्ति है कि वह अपनी इच्छा से सृष्टि का निर्माण करता है। प्रकृति बीज से सजातीय पौधा पैदा करती है आम की बीज से इमली पैदा करने की शक्ति प्रकृति में नहीं है। इस तरह के बीच और ऊपर वर्णित विलक्षण रचनाएँ पैदा करने वाली सत्ता एकमात्र परमात्मा ही हो सकता है। वही अपने आप में एक परिपूर्ण सत्ता है और वही विभिन्न इच्छाओं, अनुभूतियों, गुण तथा धर्म वाली परिपूर्ण रचनाएँ सृजन करता है।

क्रमिक विकास को नहीं भारतीय दर्शन पूर्णता से पूर्णता की उत्पत्ति मानता है। श्रुति कहती है।

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

अर्थात्-पूर्ण परम ब्रह्म परमात्मा से पूर्ण जगत-पूर्ण मानव की उत्पत्ति हुई। पूर्ण से पूर्ण निकाल देने से पूर्ण ही शेष रहता है।

नदी का एक किनारा समुद्र से जुड़ा रहता है और दूसरा किनारा उससे दूर होता है। दूर होते हुए भी नदी समुद्र से अलग नहीं। नदी को जल समुद्र द्वारा प्राप्त होता है और पुनः समुद्र में मिल जाता है। जगत उस पूर्ण ब्रह्म से अलग नहीं। मनुष्य उसी पूर्ण ब्रह्म से उत्पन्न हुआ इस लिए अपने में स्वयं पूर्ण है यदि इस पूर्णता का भान नहीं होता, यदि मनुष्य कष्ट और दुखों से त्राण नहीं पाता, तो इसका एकमात्र कारण उसका अज्ञान और अहंकार में पड़े रहना ही हो सकता है। इतने पर भी पूर्णता हर मनुष्य की आन्तरिक अभिलाषा है और वह नैसर्गिक रूप से हर किसी में विद्यमान रहती है।


अतीन्द्रिय शक्ति और उसकी पृष्ठभूमि

अतीन्द्रिय ज्ञान-एक्स्ट्रा सेंसरी पर्सेप्शन-अब एक वैज्ञानिक तथ्य है। सामान्यतया पाँच ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से ज्ञान सम्पादन होता है, पर अब विश्लेषण का एक विषम छठी इन्द्रिय-सिक्सथ सेन्स-भी बन गया है। मनुष्य कई बार ऐसी जानकारियाँ प्राप्त करता है जो इन्द्रिय ज्ञान की परिधि से सर्वथा बाहर की घात होती है। कान एक सीमित शब्द ध्वनियाँ सुन सकते हैं और आँखों से सीमित प्रकाश किरणों के आधार पर बनने वाले दृश्य देखते हैं। यन्त्रों ने दूरदर्शन और दूर श्रवण को सुलभ बना दिया है तो भी बिना किसी यन्त्र उपकरण से दूरस्थ दृश्यों को देख सकना और शब्दों को सुन सकना आश्चर्य का ही विषय है।

अमेरिका के मन रोग चिकित्सक डा0 एणुरीना पुहरिच ने विचार संसार विद्या पर एक पुस्तक लिखी है- ”बियोण्ड टैलीपैथी”। उसमें उन्होंने ऐसी अनेकों घटनाओं का उल्लेख किया है जिनसे सिद्ध होता है कि कितने ही मनुष्यों को समय-समय पर दूरस्थ स्थानों पर घटित हुई घटनाओं का ज्ञान बिना किसी साधन संचार के अनायास ही होते देखा गया है।

प्रामाणिक इतिहासकार ‘हिरोडोटस’ ने ईसा से पूर्व 546-560 में हुए लीडिया के राजा क्रोशस का विवरण लिखा है। उसमें कहा गया है कि राजा अपने शत्रुओं से आतंकित था। उसने किसी भविष्यवक्ता की सहायता से रास्ता निकालने की बात सोची। प्रामाणिक भविष्यवक्ता को ढूंढ़ निकालने के लिए उनसे तत्कालीन सात प्रसिद्ध भविष्यवक्ताओं के पास अपने दूत भेजे और कहा जिस समय मिले उसी समय वह पूछे कि- अब ड़ड़ड़ड़ क्या कर रहे हैं? इधर राजा ने अपना घड़ी-घड़ी का कार्य विवरण लिखने की व्यवस्था कर दी।

छः के उत्तर तो गलत निकले, पर सातवें उल्फी नामक भविष्यवक्ता की बात अक्षरशः सही निकली उसने दूत के बिना पूछे ही बताया-”क्रोशस इस समय पीतल के बर्तन में कछुए और भेड़ का मिला हुआ माँस भून रहा है।” पीछे राजा ने उस भविष्यवक्ता को बुलाया ओर उसके परामर्श से-कठिनाइयों से त्राण पाया।

इटली के एक पादरी अलोफ्रोन्सस लिगारी ने अर्धमूर्छित स्थिति में दिवा स्वप्न देखा कि “ठीक उसी समय रोम के बड़े पोप का स्वर्गवास हो गया है।”

उन दिनों सन् 1774 में यातायात या डाक-तार का भी कोई प्रबन्ध न था। इतनी दूर की किसी घटना की ऐसी जानकारी जब उनने अपने शिष्यों को सुनाई तो किसी को इसका कोई आधार प्रतीत नहीं हुआ। बड़े पोप बीमार भी नहीं थे फिर अचानक ऐसी यह मृत्यु किसी प्रकार हो सकती है? कुछ ही दिन बाद समाचार मिला कि पोप की ठीक उसी समय वैसी ही स्थिति में मृत्यु हुई थी जैसी कि लिगाडरी ने विस्तारपूर्वक बताई थी।

सन् 1759 की वह घटना प्रामाणिक उल्लेखों में दर्ज है जिसके अनुसार स्वीडन के इमेनुअल स्वीडन वर्ग नामक साधक ने सैकड़ों मील दूर पर ठीक उसी समय हो रहे भयंकर अग्निकाण्ड का सुविस्तृत विवरण अपनी मित्र मण्डली को सुनाया था। उस अग्निकाण्ड में घायल तथा मरने वालों के नाम तक उनने सुनाये थे जो पीछे पता लगाने पर अक्षरशः सच निकले।

खोये हुए मनुष्यों एवं सामानों के संबंध में अतीन्द्रिय चेतना सम्पन्न मनुष्य जब सही अता-पता देने में सही सिद्ध होते हैं तो यही मानना पड़ता है प्रत्यक्ष साधनों एवं इन्द्रिय ज्ञान के सहारे जो कुछ जाना जाता है बात उतने तक ही सीमित नहीं है, मनुष्य की रहस्यमयी शक्तियों के आधार पर वैसा भी बहुत कुछ जाना जा सकता है जो सामान्यतया असम्भव ही कहा जा सकता है।

विज्ञानी डा0 मोरे बर्सटीन ने लेटी वेडर के बारे में एक दिन अपने एक मित्र से सुना। इसके पूर्व विमान-यात्रा में उनका बिस्तर व सामान खो गया था, जिसमें जरूरी कागजातों वाला बक्सा भी था। विमान कम्पनी ने खोए समाना के न मिलने की घोषणा कर दी थी तथा मुआवज़े का प्रस्ताव रखा था, जिसे वर्सटीन ने अस्वीकार कर खोज जारी रखने को कहा था।

अब मित्र से सुन वर्सटीन को अपने सामान की चिन्ता तो जाती रही। भीतर की जिज्ञासा-वृत्ति उमड़ उठी। वे चल पड़े लेडी लेडी वन्डर से मिलने। वहाँ सर्वप्रथम वर्सटीन ने पूछा-बताइये, पेरिस में मैंने जो बिल्ली पाल रखी थी उसका नाम क्या था ? लेडी वंडर ने उसे विस्मित करते हुए बताया-भर्तिनी। फिर वर्सटीन ने अपने सामान की बाबत पूछा। लेडी वन्डर ने बताया-तुम्हारा सामान न्यूयार्क हवाई अड्डे में है।

पहले तो वर्सडीन को अविश्वास हुआ। क्योंकि न्यूयार्क हवाई अड्डा छाना जा चुका था। पर फिर उसने हवाई अड्डे के अधिकारियों को फोन किया-”महोदय, मुझे विश्वस्त सूत्रों से जानकारी मिली है कि मेरा सामान न्यूयार्क हवाई अड्डे के भवन के ही भीतर है। कृपया दुबारा तलाश करें।” तलाशी शुरू हुई और सामान सचमुच मिल गया।

ड़ड़ड़ड़ की आत्मवेत्ता महिला फ्लोरेन्स किसी वस्तु को छूकर उससे संबंधित व्यक्ति के बारे में जो कुछ बताती थी, उसका प्रायः 80 प्रतिशत सच होता रहा। गुमशुदा की तलाश, हत्याओं की जाँच तथा अन्य खोजबीन के मामलों में पुलिस भी उसकी सहायता लेती रही।

अतीन्द्रिय क्षमता विकसित करने का एक क्रमबद्ध विज्ञान है-योग। आज तो हर क्षेत्र में नकली ही नकली की भरमार है। नकली योग भी इतना बढ़ गया है कि उस घटाटोप में से असली को ढूंढ़ निकलना कठिन पड़ रहा है। तो भी तथ्य अपने स्थान पर यथावत् अडिग है। यदि अन्तःचेतना पर चढ़े हुए कषाय-कल्मषों को प्रयत्नपूर्वक धो डाला जाए तो आत्मसत्ता की प्रखरता जग पड़ेगी और उसके साथ-साथ ही अतीन्द्रिय परोक्षानुभूतियों होने लगेंगी। अप्रत्यक्ष भी प्रत्यक्षवत् परिलक्षित होने लगेगा।

प्रयत्नपूर्वक आत्मबल को बढ़ाना और सिद्धियों के क्षेत्र में प्रवेश करना यह एक तर्क और वान सम्मत प्रक्रिया है किन्तु कभी-कभी ऐसा भी देखने में आता है कि कितने ही व्यक्तियों में इस प्रकार की विशेषताएँ अनायास ही प्रकट हो जाती है। उन्होंने कुछ भी साधन या प्रयत्न नहीं किया तो भी उनमें ऐसी क्षमताएँ उभरी जो अन्य व्यक्तियों में नहीं पाई जाती। असामान्य को ही चमत्कार कहते हैं। अस्तु ऐसे व्यक्तियों को चमत्कारी माना गया। होता यह है कि किन्हीं व्यक्तियों के पास पूर्व संबंधित ऐसे संस्कार होते हैं जो परिस्थितिवश अनायास ही उभर आते हैं। वर्षा के दिनों अनायास ही कितने पौधे उपज पड़ते हैं, वस्तुतः उनके बीज जमीन में पहले से ही दवे होते हैं। यही आत उन व्यक्तियों के बारे में कही जा सकती है जो बिना किसी प्रकार की अध्यात्म साधनाएँ किये ही अपनी अलौकिक क्षमताओं का परिचय देते हैं।

भविष्य दर्शन की विशेषता को अतीन्द्रिय क्षमता के अंतर्गत ही गिना जाता है। इस विशेषता के कारण संसार भर में जिन लोगों ने विशेष ख्याति प्राप्त की है उनमें एन्डरसन सेमवेंजोन, पीटर हरकौस, हेंसक्रेजर आदि के नाम पिछले दिनों पत्र-पत्रिकाओं के पृष्ठों पर छाये रहे हैं।

प्रथम विश्व युद्ध के दिन, पहली नवम्बर-आठ वर्षीय एन्डरसन घर की बैठक में खेल रहा था। सहसा वह रुका। माँ के पास पहुँचा और उसका हाथ पकड़ उसे बैठक में ले गया, जहाँ उसके भाई नेल्सन की फोटो लगी थी। नेल्सन कनाडा की सेना का कप्तान था और मोर्चे पर था। एन्डरसन ने भाई की फोटो की और संकेत करते हुये माँ से कहा-”माँ, देखो तो, भैया के चेहरे पर बन्दूक की गोली लग गई है और वे जमीन गिर कर मर गये है।”

“चुप मूर्ख! ऐसी अशुभ बात तेरे दिमाग में कहाँ से आई? अब कभी ऐसे कुछ न बोलना, न ऐसा सोचा करो।” माँ ने झिड़का। पर एन्डरसन तो अपनी बात पर जिद-सी करने लगा। इस घटना के दो-तीन दिन बाद जब तार आया कि-”1 नवम्बर 1918 को गोली लगने के कारण नेल्सन की मृत्यु हो गई है।” तो पूरा परिवार शोक में डूब गया। पर एन्डरसन की बातें याद कर वे सब विस्मय से भी भर उठे।

इसके बाद तो मुहल्ले-पड़ोस में उसने कई बार ऐसी भविष्य संबंधी बातें बताईं कि लोग उसे ‘सिद्ध भविष्यवक्ता’ मानने लगे। घर वालों ने उसका ध्यान बँटाने के लिए उसे शीघ्र ही एक खान की नौकरी में लगा दिया। पर थोड़े ही दिनों में एन्डरसन ने यह कहते हुए इस नौकरी को छोड़ दिया कि-”मैं उन्मुक्त आत्मा हूँ। योग के संस्कार मुझ में है। निरन्तर आत्म-परिष्कार ही मेरा लक्ष्य है। भौतिक परिस्थितियों से पैसे रुपयों के लोभ से मैं बँधा नहीं रह सकता?

इसके बाद एन्डरसन व्यापारी जहाजों द्वारा विश्व भ्रमण के लिए निकल पड़ा। इसी बीच उसने अपने शरीर का व्यायाम, योगाभ्यास, संयम और परिश्रम द्वारा विकास कर अतुलित बल अर्जित किया। लोहे की छड़ कन्धे पर रख उसने 15-20 व्यक्तियों तक को लटका कर चल फिर लेना, कार उठा लेना, शक्तिशाली गतिशील मोटर को हाथ से रोक देना, उन्मत्त और क्रुद्ध सांडों को पछाड़ देना आदि के करतब उसके लिए मामूली बात हो गई। उसने इनके सफल प्रदर्शन किये और ख्याति पाई।

लोग कहने लगे कि यह कोई पूर्व जन्म का योगी है। पूर्व जन्म में किये गये योगाभ्यास का प्रभाव और प्रकाश इसमें अब भी शेष है। 60 वर्ष से अधिक की आयु में भी एन्डरसन लोहे की नाल दानों हाथ से पकड़ कर सीधी कर देते हैं। शारीरिक शक्ति के साथ ही उन्होंने अतीन्द्रिय सामर्थ्य भी विकसित की और वे जीन डिक्सन कीरों तथा टेनीसन से भी अधिक सफल भविष्यवक्ता माने जाते हैं। एन्डरसन भारत आकर योग एवं ज्योतिष संबंधी ज्ञान प्राप्त करना चाहते हैं। यद्यपि उनकी यह आकांक्षा परिस्थितियों वश पूर्ण नहीं हो सकी है।

इंग्लैण्ड में सैमवेंजोन नाम एक व्यक्ति हुआ है। उसे बाल्यावस्था से ही पूर्वाभास हुआ कि बाहर गये पिताजी एक ट्राम से घर आ रहे हैं और वह ट्राम दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से वे घायल हो गये है। माँ को वेंजोन ने यह बताया तो मिली झिड़की। पर जब कुछ समय बाद आहत पिताजी घर आये और उन्होंने बताया कि ट्राम दुर्घटना से ही वे आहत हुए हैं, तो दुखी माँ विस्मित भी हो उठी।

बाल्यावस्था में ही सैमवेन्जोन ने अनेक बार पूर्वाभ्यास की अपनी शक्ति का परिचय दिया। उसके घर में क्रिसमस पर प्रीतिभोज दिया गया। मित्रों, पड़ोसियों, परिजनों ने उपहार दिये। सबके जाने के बाद माँ ने सैमवेजोंन से उपहार का एक डिब्बा दिखाकर पूछा-”तू बड़ा भविष्यदर्शी बनता है, बता इस डिब्बे में क्या है?” डिब्बा जैसा आया था, वैसा ही बन्द था। सैम ने वे सारी वस्तुएं गिन-गिनकर बता दीं जो उस डिब्बे में बन्द थी।

बिना किसी ‘लेन्स’ या यन्त्र के डिब्बे के भीतर की वस्तु का यह ज्ञान उस तथ्य को द्योतक है कि विचारों और भावनाओं की दिव्य तथा सूक्ष्म शक्ति द्वारा बिना किसी माध्यम के गहन अन्तराल में छिपी वस्तुओं को भी देखा-जाना जा सकता है।

अपने एक परिचित पेंटर के बारे में एक दिन ऑफिस में बैठे वेन्जोन ने सहसा चलचित्रवत् दृश्य देखा कि वह एक दीवार की पेंटिंग करते समय सीढ़ियों से लुढ़क कर गिर पड़ा है। तीन दिन के भीतर ही यह दुर्घटना इसी रूप में हुई और मोहल्ले ने एक मकान की दीवार की रंगाई के समय सीढ़ी से फिसल कर गिरने से उक्त पेंटर की मृत्यु हो गईं । वेन्जोन का पूर्वाभ्यास सत्य सिद्ध हुआ।

प्रख्यात भविष्यवक्ता पीटर हरकौस की विलक्षण अतीन्द्रिय शक्ति विश्व प्रसिद्ध है। वह घटनास्थल की किसी भी वस्तु को छूता और उसे उस स्थान से संबंधित अतीत में घटी, वर्तमान में घट रही तथा भविष्य में घटित होने वाली घटनाएँ स्पष्ट दिखने लगती।

पेरिस में कई शीर्षस्थ अधिकारियों की उपस्थिति में हरकावैस का आह्वान किया गया कि वह अपनी अतीन्द्रिय सामर्थ्य का प्रदर्शन करें। पीटर हरकावैस को कंघा, कैंची, घड़ी, लाइटर और बटुआ देकर कहा गया कि आप इनके आधार पर एक मामले का पता लगाएँ। पीटर ने पाँचों को छुआ और ध्यानमग्न हो गया। उसने दो वस्तुओं की अनावश्यक कहकर लौटा दिया। फिर बटुए को हाथ में थाम खोया हुआ-सा बोलने लगा- ”एक गंजा आदमी है। वह सफेद कोट पहने है। एक पहाड़ी के पास छोटे से मकान में वह रहता है, जिसके बगल से रेलवे-लाइन गुजरती हैं। मकान से कुछ दूर एक गोदाम है। दोनों स्थानों के बीच एक शव पड़ा है। यह हत्या का मामला है। यह हत्या किसी निकोला नामक व्यक्ति द्वारा उसे जहर मिला दूध पिलाकर की गई है। लगता है यह सफेद कोट धारी गंजा ही निकोला है-जो इन दिनों जेल में है और वह शव एक महिला का है। निकोला भी मर गया है।

पीटर हरकौसा की सभी बातें तो सही थी। पर जेल में बन्द निकोला जीवित था। तभी अधिकारियों को समाचार दिया गया कि दो घण्टे पहले निकोला ने आत्महत्या कर ली है।

सन् 1950 में जब प्रसिद्ध संग्रहालय ‘वेस्टमिनिस्टर एवे’ से ‘स्कोन’ नामक हीरा चोरी गया, तो पूरे ब्रिटेन में तहलका मच गया। गुप्तचरों और पुलिस की दौड़ धूप व्यर्थ गई। चोरी का सुराग तक नहीं मिला। तब पीटर हरकौस की सहायता ली गई। हरकौस लन्दन पहुँचा। एवे के दरवाजे की एक लोहे की चादर का टुकड़ा अपने हाथ में लेकर पीटर बताने लगा-पाँच लड़कों ने ‘स्कोन’ को चुराया है और कार द्वारा ग्लासगो ले गए हैं। हीरा एक महीने में मिल जाएगा। चोरों के भागने का रास्ता भी हरकौस ने नक्शे में बता दिया। अन्त में एक माह में हीरा मिला और हरकौस की हर बात सत्य निकली।

एसटरडम में एक आर एक फौजी कप्तान का लड़का समुद्र में गिर गया। शव मिल नहीं रहा था। पीटर हरकौस ने अपनी अन्तःदृष्टि से शव को तलाशने का स्थान बताया। वह मिल गया।

वेल्जियम के जार्ज कानेर्लिस के हत्यारों का पता भी हरकौस ने ही लगाया था। अमेरिकी वैज्ञानिकों डा0 अन्डिया पूरिया के आमन्त्रण पर पीटर अमरीका गए। वहाँ उन पर कई प्रयोग किये गये। डा0 पूरिया की संरक्षिका के सहसा देहान्त से वे प्रयोग बीच में ही रोक दिन गया। पर जो हुए वे भी महत्त्वपूर्ण थे।

पीटर हारकौस ने स्वयं ही “साइक” नाम से अपना संस्मरण-संग्रह लिखा व प्रकाशित कराया है; जो उसकी अतीन्द्रिय-शक्तियों पर प्रकाश डालता है।

पूर्वाभ्यास की यह क्षमता कई व्यक्तियों में असाधारण तौर पर विकसित होती हैं द्वितीय महायुद्ध में ऐसे लोगों को दोनों पक्षों ने उपयोग किया था। हिटलर के परामर्श मण्डल में पाँच ऐसे ही दिव्यदर्शी भी थे। उनका नेतृत्व करते थे विलयम क्राफ्ट।

इसी मण्डली के एक सदस्य श्री डी0 व्होल ने तत्कालीन ब्रिटिश विदेश मन्त्री लार्ड हेली फिक्स को सर्वप्रथम एक भोज में अनुरोध किए जाने पर हिटलर की योजनाओं का पूर्वाभ्यास दिया। वे सच निकलीं और श्री व्होल की फौज में कैप्टन का पद दिया गया। श्री डी0 व्होल हिटलर की अनेक योजनाओं की जानकारी अपनी दिव्य दृष्टि से दे देते। ब्रिटेन तदनुसार रणनीति बनाता। फौजी अफसरों की जिम्मेदारियाँ सौंपते समय भी उनके भविष्य बाबत श्री डी0 व्होल से सलाह ली जाती। उन्हीं के परामर्श पर माउन्ट गोमरी की फील्ड मार्शल बनाया गया। उनकी सफलताएँ सर्वविदित है। जापानी जहाजी बेड़े को नष्ट करने की योजना भी श्री व्होल की सलाह से बनी थी। महायुद्ध की समाप्ति बाद श्री व्होल ने ब्रिटिश शासक को परामर्श देने का कार्य छोड़ दिया था और धार्मिक लेखन का अपना पुराना काम करने लगे थे।

प्रत्यक्ष इन्द्रिय शक्ति हमारे सामान्य जीवन निर्वाह में अतीव उपयोगी भूमिका सम्पन्न करती है। वह न हो तो फिर हम जीवित माँस पिण्ड की तरह इधर-उधर लुढ़कते ही मौत के दिन पूरे करेंगे। मानवी प्रगति में उसकी परिष्कृत ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रिय शक्ति है। उस दिव्य-क्षमता को यदि हम उपलब्ध कर सकें तो उस आधार पर खुलने वाला सफलताओं का नया द्वारा हमें देवोपम स्तर तक पहुँचा सकने में समर्थ हो सकता है।


स्थूल शरीर की सूक्ष्म साधना

स्थूल शरीर भी एक देवता है। उसकी साधना की जा सके तो रुग्ण और दुर्बलकाय व्यक्ति चन्दगीराम, सेण्डो जैसे विश्व विख्यात पहलवान बन सकते हैं। पौहारी बाबा की तरह आवश्यक पोषण आहार आकाश से ही आकर्षित करते रह सकते हैं। गंगोत्री के स्वामी कृष्णाश्रम जी की तरह दो सो वर्ष की आयु पा सकते हैं।

तप-तितीक्षा द्वारा सेती हुई शक्ति की जागृत किया जाता है। तपाने से गर्मी बढ़ती है। गर्मी से परिशोधन होता है और दृढ़ता परिपक्वता की अभिवृद्धि होती हैं धातुओं के तपाने से उनका अशुद्ध अंश विलग होता है। कुपाच्य खाद्य पदार्थों को अग्नि पर पकाकर सुपाच्य बनाया जाता है। मिट्टी के बर्तनों और कच्ची ईंटों की भट्टे में पकाने से उनकी मजबूती बढ़ती है। आयुर्वेद की रस, भस्में अग्नि संस्कार में ही विनिर्मित होती है। तप-तितीक्षा को स्थूल शरीर की साधना में ही सम्मिलित किया गया है। ब्रह्मचर्य तप है। अस्वाद व्रत उपवास को तप माना गया है। सर्दी, गर्मी सहन करने के लिए कम वस्त्र, धारण करने, जूते न पहनने, ठंडे पानी से नहाने; जैसी तितीक्षाएँ की जाती है। कोमल शैया का त्याग, भूमि शयन अथवा तख्त पर सोना इसी प्रकार की साधना है। सुविधा का लाभ लेते रहने पर प्रतिरक्षा की शक्ति नष्ट होती है। जो लोग एयरकण्डीशंड कमरों में रहते हैं, उनकी ऋतु प्रभाव सहने की क्षमता चली जाती है। जरा-सी सर्दी-गर्मी लगने पर वे तुरन्त बीमार पड़ते हैं। सहन शक्ति बढ़ाने से बलिष्ठता बढ़ती है। इसलिए तितीक्षा जहाँ आरम्भ में कष्ट कर लगती है, वहाँ उसके परिणाम अन्ततः लाभदायक ही होते हैं। व्यायाम भी एक प्रकार का तप ही है। उसे करने में शरीर पर दबाव ही पड़ता है, पर सर्वविदित है कि इस तप साधना के फलस्वरूप बलिष्ठता बढ़ती है और पहलवान बन जाता है।

सक्रियता ओर स्फूर्ति में जो उत्साह भरती है; उस चेतना को ओजस् कहते हैं। ओजस्वी ऐसे ही व्यक्ति कहे जाते हैं जिन्हें पराक्रम प्रदर्शित करने में सन्तोष और गौरव अनुभव होता है। जिन्हें अपाहिज अकर्मण्यों की तरह सुस्ती में पड़े रहना अत्यन्त कष्टकारक लगता है। सक्रियता अपनाये रहने में, कर्मनिष्ठा के प्रति तत्परता बनाये रहने में जिन्हें आनन्द आता है उन्हें ओजस्वी कह सकते हैं। आलसी के चेहरे पर उदासी, मुर्दनी छाई रहती है और उत्साही की आँखों में तेज चमकता है और चेहरा देखते ही उसकी सक्रियता जन्य चमक सहज ही दीप्तिवान दिखती है। शरीर वही रहता है, पर अकर्मण्यता और कर्मनिष्ठा की-निर्जीवता और सजीवता की-आलस्य और उत्साह की-निराशा और आशा की-प्रखरता और पराभव की परस्पर विरोधी मनः स्थितियों को मनुष्य का चेहरा देखते ही जाना ओर आँका जा सकता है। सौंदर्य, आकर्षण और प्रभाव चुम्बक मात्र शरीर की बनावट पर ही निर्भर नहीं है। उत्साह और कर्मनिष्ठा की प्रवृत्ति उसमें चार चाँद लगा देती है। स्फूर्तिवान कुरूप भी सुन्दर लगने लगते हैं। इसके विपरीत अच्छे रंग रूप वाले भी निर्जीव निष्प्राण, तेजहीन, मलिन, मुर्दनी लादे हुए दीखते हैं तो उनकी और से मुँह फेर लेने को ही जा करता है।

जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सफलता का प्रारूप यह ओजस्विता ही बनाती है। ऐसे लोग जो भी काम हाथ में लेते हैं उसमें विशेषता की छाप छोड़ते हैं। उनके कार्य अपने में ही उत्कृष्टता की साक्षी देते हैं और बताते हैं कि हमें मनोयोग उत्साह एवं उत्तरदायित्व की भावना के साथ सम्पन्न किया गया है। स्वल्प साधनों से पुरुषार्थी लोग अपने कार्यों को अच्छे स्तर के साथ सम्पन्न करते हैं और कम समय में अधिक उत्कृष्टता के साथ निपटाते हैं। फूहड़पन उन्हीं कामों में दृष्टिगोचर होता है जिन्हें अकुशल हाथों से, उपेक्षापूर्वक, अन्यमनस्क भाव से बेगार भुगतने की तरह, भार ढोने की वृत्ति से किया गया होगा। स्थूल शरीर की साधना, मात्र श्रम एवं आहार बिहार की सुव्यवस्था तक ही सीमित नहीं है उसके साथ वह कुशलता, स्फूर्ति एवं प्रसन्नता भी जुड़ी रहनी चाहिए जिसे ओजस्विता के नाम से पुकारा जाता है। जिन शरीरों में ओजस् का समावेश करने की साधना की गई है वे बराबर की दृष्टि से सामान्य होते हुए भी असामान्य कार्य करते और विशिष्ट गौरवान्वित होते हैं।

सक्रियता देखने में तो शारीरिक अवयवों का प्रयास मात्र लगती है; पर वस्तुतः वह आन्तरिक होती है। क्रिया स्थूल है पर स्फूर्ति को सूक्ष्म ही कहा जाएगा। वह शरीर का नहीं अन्तःचेतना का उभार उत्साह एवं गुण है। शरीर तो साधारण उपकरण मात्र है जिसका विनियोग किसी कुशल कारीगर द्वारा होने पर ही कलात्मक चमत्कारी परिणाम उत्पन्न होता है।

इस संसार में प्रकृति की तीन शक्तियाँ भरी पड़ी है। इन्हीं की प्रेरणा से विभिन्न जड़-पदार्थ अपने-अपने ढंग की विविध हलचलें करते दिखाई पड़ते हैं। इन तीन शक्तियों का नाम है-(1) विद्युत (2) ताप (3) प्रकाश। अगणित क्षेत्रों में अगणित प्रकार के क्रिया कृत्यों का संचार इन्हीं के द्वारा होता है। शरीर में भी यह तीन शक्तियों विद्यमान है और अपनी स्थिति के अनुरूप विभिन्न अवयवों में विभिन्न प्रकार के कार्य करती है।

स्नायु मण्डल में ‘विद्युत धारा’ का संचार रहता है। मस्तिष्क उसका केन्द्र है। इन्द्रिय केन्द्रों पर उसी का आधिपत्य है। ज्ञान तन्तुओं के द्वारा केन्द्र तक सूचना पहुँचना और वहाँ से मिले निर्देशों को अवयवों के द्वारा सम्पन्न करना इसी शक्ति का काम है। मन संस्थान की समस्त गतिविधियाँ इसी के द्वारा संचारित होती है।

विकास से संबंधित समस्त हलचलें प्रकाश तरंगों द्वारा सम्पन्न होती है। सूर्य की प्रकाश किरणें वनस्पतियों की अभिवृद्धि एवं प्राणियों में प्राण संचार का प्रयोजन पूरा करती है ओर भी बहुत कुछ उनके द्वारा होता है। आयु के साथ होने वाली अभिवृद्धि को यह प्रकाश तत्त्व ही संजोता है।

आध्यात्मिक अलंकारों में विद्युत को ब्रह्मा, प्रकाश की विष्णु और ताप को शिव माना गया है। मनःक्षेत्र में इनकी हलचलें भावना, इच्छा और क्रिया के रूप में दृष्टिगोचर होती है। यह ब्रह्माण्ड भी विराट पुरुष का एक सुविस्तृत शरीर ही है। इसमें विद्युत तत्त्व संत, प्रकाश रज और ताप को तम रूप में प्रतिपादित किया गया है।

आन्तरिक स्थिति में हेर-फेर करके बाहर की स्थिति बदली जा सकती है। सभी जानते हैं कि मनःस्थिति ही भली-बुरी परिस्थितियों उत्पन्न करती है। अन्तरंग की बदलने पर बहिरंग सहज ही बदला जा सकता है। शारीरिक स्थिति में सुधार परिवर्तन करना हो तो उस उपकरण के अन्तराल में काम कर रही सूक्ष्म क्षमताओं को देखना सम्भालना होगा। कारखानों की मशीनों ठप्प हो तो समझना चाहिए कि विद्युत धारा या भाप-ताप के शक्ति स्रोतों में कहीं कुछ अड़चन उत्पन्न हो गई है। मशीनों की देखभाल करना भी उचित है, पर आधार तो शक्ति स्रोतों पर निर्भर है। शरीर गत दुर्बलता, रुग्णता को दूर करने के लिए आहार-विहार की गड़बड़ियाँ सुधारना और चिकित्सा उपचार पर ध्यान देना आवश्यक है, पर काम इतने से ही नहीं चल सकता। देखना यह भी होगा कि अवयवों के संचार करने के लिए उत्तरदायी सूक्ष्म शक्तियों की प्रवाह धारा ठीक प्रकार चल रही है या नहीं। शरीर तीन फेस पर चलने वाली मोटर है। इन सभी तारों का ठीक स्थिति में होना आवश्यक है। जिससे शक्ति संचार में अवरोध उत्पन्न न होने पाये।

अवयवों को कई प्रकार की बुरी आदतें घेर लेती हैं-इन्द्रियों की उच्छृंखलता बरतने का अभ्यास पड़ जाता है-दुर्व्यसनों को इसी प्रक्रिया के अंतर्गत लिया जा सकता है। आलस्य में अवयवों की अशक्तता का दोष कम और आन्तरिक स्फूर्ति की न्यूनता का कारण अधिक काम कर रहा होता है। इन दोष दुर्गुणों को ठीक करने के लिए मात्र शारीरिक अवयवों को दोष देना अथवा उसी की ठीक पीट करना पर्याप्त न होगा। शरीर में संव्याप्त अन्त चेतना की भी देख भाल करनी होगी। यही स्थूल शरीर का आध्यात्म विज्ञान है। यदि इस स्तर की गहराई तक पहुँचा जा सके और वहाँ सुधारने उभारने का कौशल प्राप्त हो सके तो शरीरगत दोष दुर्गुणों-दुर्बलता एवं रुग्णता को निरस्त कर सकना सरलतापूर्वक सम्भव हो सकता है।

जीवन के हर पक्ष को समुन्नत बनाने में दुष्प्रवृत्तियों का परित्याग और सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। उच्चस्तरीय साधनाओं की सफलता के साथ तो यह तथ्य अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है कि साधक पवित्र जीवन जिये। इसके लिए परिमार्जन-परिष्कार की दिशा में साहसिक कदम बढ़ाये जाने चाहिए। भूतकाल का परिमार्जन और भावी पवित्र निर्धारण की प्रक्रिया प्रायश्चित द्वारा ही सम्भव होती है। अस्तु आत्मिक प्रगति के लिए प्रायश्चित रूपी धुलाई आवश्यक है ताकि जीवन सत्ता पर साधना द्वारा उपयुक्त रंगाई ठीक तरह हो सके।

कर्मफली की अनिवार्यता समझी जानी चाहिए। और उज्ज्वल भविष्य की आकांक्षा यदि वास्तविक हो तो उसके लिए भविष्य की श्रेष्ठता परक गतिविधियों का निर्धारण किया जाना चाहिए।

स्वमलप्रक्षयाद्यद्वादग्नौ धास्यन्ति धावतः। तत्र पापक्षयात्पाँपा नराः कर्मानुरूपतः॥ -शिव पुराण

धातुओं के मैल को हटाने के लिए जैसे उन्हें तीक्ष्ण अग्नि में रखते हैं उसी तरह पापी प्राणियों को पाप-नाश के उद्देश्य से ही अपने कर्मों के अनुसार ही नरकों में गिराया जाता है।

यौनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थानणुमन्ये ऽनुसंयनित यथाकर्म यथाश्रुतम्॥ -गरुड़ पुराण

जिसने श्रवण-मनन द्वारा जैसा मनोभाव प्राप्त किया है उसी के आधार पर अपने-अपने कर्मों के अनुसार कितने ही जीवात्मा देह धारणार्थ विभिन्न योनियों को प्राप्त होते हैं और अनेकों जीवात्मा अपने कर्मानुसार वृक्षलता पर्वत आदि स्थानों पर पदार्थों के यप में ग्रहण कर लेते हैं।

ज्ञानिनस्तु सदा मुक्ता स्वरूपानुभवेन ड़ड़ड़ड़। अतस्ते पुत्र दत्तानाँ पिण्डापनाँ नैव काँक्षिण॥ -महाभारत

ज्ञानी मनुष्य तो अपने सच्चे स्वरूप को समझकर और तद्नुसार आचरण करके सदा ही मुक्त होते हैं। उनको पुत्रों द्वारा दिये गये पिण्डों की आकाँक्षा कभी नहीं होती।”

यमनियमविधूतकल्मषाणामनुदिनमच्युतसक्तमानसानाम्। अपगतमदमानमत्सराणाँ त्यज भेट दूरतरेण मानवानाम् 26॥ -विष्णु पुराण

जिनके पाप समूह यम नियमों के पालन से नष्ट हो गये है। जिन्होंने मत्सर और अहंकार छोड़ दिया है; उन सच्चे भगवद् भक्तों को हे यमराज! नरक में मत ले जाना।

योग वशिष्ठ में शारीरिक रोगों को व्याधि और मानसिक कष्टों को आधि कहा है। यह दोनों ही प्रकार के दण्ड उभय क्षेत्रों में अनाचरण बरतने के परिणाम हैं आन्तरिक विकृतियों को हटा देने पर इन दोनों ही विपत्तियों से छुटकारा मिल सकता है। इस तथ्य का उल्लेख इस प्रकार हुआ है-

देहदुःख विदुर्व्याधिमाध्यख्यं वासनामयम्। मौर्ख्यमूले हिते विद्यात्तत्त्वज्ञाने परिक्षयः॥

भृशं स्फुरन्तीष्विच्छासु मौर्ख्ये चेतस्यानिर्जिते। दुरान्नाभ्यवहारेण दुर्देशाक्रमणेन च॥

क्षीणत्वाद्वा प्रपूर्णत्वान्नाडोनाँ रन्ध्रसंततौ। प्राणे विधुरताँ याते काये तु विकलीकृते॥ दौस्थित्यकारणं दोषाद्वचाधिर्देहे प्रवर्तते॥ -योग वशिष्ठ

दुःख के दो कारण है एक आधि दूसरा व्याधि। मनोविकारों से आधि और शरीरगत विकृतियों से व्याधि उत्पन्न होती है। दोनों मूर्खता से उत्पन्न होती है और तात्त्विक दृष्टि उत्पन्न होने से समाप्त भी हो जाती है।

अनुचित इच्छाओं से, मूर्खताओं से, कुधान्य खाने से, मर्यादाएँ उल्लंघन करने से, शरीर एवं मन क्षीण होते हैं और नस-नस में मलीनता भर जाती हैं इससे प्राण बिकल रहते हैं और शरीर व्याधियों से भर जाता है।

इन मलीनताओं का परिशोधन करने के लिए प्रायश्चित किया जाता है। इसमें जहाँ उपवास आदि की तितीक्षा आवश्यक मानी गई है वहाँ व्यक्ति एवं समाज को पहुँचाई गई क्षति को पूरा करने के लिए इच्छापूर्ति अधीन पुण्य परमार्थ द्वारा खोदे गये गड्ढे को भरना भी आवश्यक माना गया है।

पातकी च तदर्धेन शुध्यते वृत्तवान्यदि। उपपातकिनः सर्वे तदर्धेनैव सुव्रताः। -लिंग पुराण

पातकी पुरुष उसी आधी प्रायश्चित की विधि से भी शुद्ध हो जाता है अगर वह पुरुष चरित्रवान् होता है। हे सुब्रतो! जो उपपातक करने वाले है वे उसके भी आधे प्रायश्चित से शुद्ध हो जाया करते हैं।

प्रहीता हि गृहीतस्य दानाद्वै तपसा तथा। पापसंशोधनं कुर्यादन्यथा रौरवं व्रजेत्॥

जो धन अनीति पूर्वक लिया है उसे दान द्वारा लौटा देना चाहिए और तपश्चर्या द्वारा उस कुकर्म का प्रायश्चित करना चाहिए। ऐसा न करने पर वह संचित पाप रौरव नरक में धकेलता है।

ग्निहोत्रंतपः सत्यंवेदानाँचैवसाधनम्। अतिथ्यवैष्वदेवंइष्टमित्यभिधीयते॥

वापीकूपतडागानिदेवत यतनानिच। अन्प्रदानमर्थिभ्यः पूर्त्तभित्यभिधीयते॥ -मार्कण्डेय पुराण

अग्नि होत्र, तप, सत्य वेदाध्ययन, तथा अतिथि सत्कार यज्ञ कर्म ‘इष्ट’कर्म कहे जाते हैं। कुँआ, बावड़ी, मन्दिर, अन्न, वस्त्र आदि का दान यह पूर्ति कर्म है। इष्ट और पूर्ति कर्म सदा करते रहने चाहिए।

साधना विज्ञान में भी शारीरिक, मानसिक मलीनताओं के निष्कासन पर जोर दिया गया है। आयुर्वेद में विकार-ग्रस्त शरीरों के मल-शोधन की प्रक्रिया के उपरान्त चिकित्सा का समुचित प्रतिफल मिलने की बात कही गई है। हठयोगी नेति, धोति, वस्ति, नौलि, ड़ड़ड़ड़, कपालभाति, आदि क्रियाओं द्वारा मल-शोधन करते हैं। आयुर्वेद में वमन, विरेचन, स्वेदन, नस्व, आदि शोधन कर्म करके संचित मलों का निष्कासन किया जाता है प्राकृतिक चिकित्सा में यही कार्य उपवास एवं एनीमा के द्वारा किया जाता है। राजयोग में यम, नियमों का विधान है। कुण्डलिनी योग में नाड़ी शोधन की अनिवार्यता है। यों उसका वाहन विधान प्राणायामों की विशेष प्रक्रिया पर आधारित है, पर उसका मूल उद्देश्य शारीरिक और मानसिक क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों का निराकरण ही है-

नादाभिव्यक्ति रारोग्यं जीयते नाडी शोधनात्। -हठयोग. प्र0

नाड़ी शोधन से आरोग्य की प्राप्ति होती है और नादानुसंधान की अभिव्यक्ति ठीक तरह होती है।

द्वासाप्तति सहस्राणाँ नाडीनाँ मलशोधने। कुतः प्रक्षालनोयामः कुण्डल्यभ्यसनाहते॥ -हठयोग

नाड़ियों में भरे मल का प्रक्षालन ही कुण्डलिनी जागरण का आधार है।

नाड़ी शुद्धि समासाद्य प्राणायामं समभ्यसेत्। -घेरण्ड संहिता

नाड़ी शोधन के लिए प्राणायाम का अभ्यास करें।

सूर्यभेदन अनुलोम विलोम प्राणायाम को नाड़ी शोधन के लिए मल शोधन के लिए प्रतीक अभ्यास के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। उससे श्वसन संस्थान की शुद्धि एवं शरीर में अन्यत्र भरे मलों के निष्कासन में सहायता मिलती है, पर उतने से ही सब कुछ सम्भव नहीं हो जाता। यह साधन संकेत यह बताता है कि आत्मिक प्रगति के लिए जितनी साधन सम्पदा संग्रह करने के लिए प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता है उतनी ही संचित कुसंस्कारों का निराकरण करने के लिए प्रायश्चित प्रक्रिया की भी। प्रायश्चित विधान वस्तु मल-शोधन नाड़ी शोधन का ही जीवन व्यवहार में प्रयुक्त होने वाला अति महत्त्वपूर्ण प्रयोग है।


प्रेतात्माओं का अस्तित्व विज्ञान की कसौटी पर

जीव चेतना का शरीर मरण के साथ ही अन्त नहीं हो जाता। वरन् उसका अस्तित्व पीछे भी बना रहता है इसके प्रत्यक्ष प्रमाण भी बहुधा मिलते रहते हैं। पिछले दिनों यह तथ्य परम्परागत मान्यताओं एवं कथा पुराणों के प्रतिपादनों पर ही निर्भर था कि मरणोत्तर काल में भी जीवात्मा का अस्तित्व बना रहता है। उसे परलोक में रहना पड़ता है। स्वर्ग-नरक भुगतना पड़ता है एवं पुनर्जन्म के चक्र में भ्रमण करना पड़ता है।

इस बुद्धिवादी युग ने परम्परागत मान्यताओं को अविश्वस्त ठहरा दिया है और हर आधार को प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर करने की बात आवश्यक समझी गई है। अब कोई बात इसी आधार पर गले उतरती है तब उसकी प्रामाणिकता के सन्दर्भ में प्रत्यक्ष की साक्षियाँ प्रस्तुत की जाए। मरणोत्तर जीवन के अस्तित्व के सम्बन्ध में भी इसी प्रत्यक्षवाद की कसौटी प्रस्तुत की जाती है।

इस संदर्भ में अब तक के अन्वेषणों ने कई अनोखे तथ्य प्रतिपादित किये है। मरने के उपरान्त अनेकों को शान्ति मिलती है और वे प्रत्यक्ष जीवन में अहिर्निश श्रम करने की थकान को दूर करने के लिए परलोक की गुफा में विश्राम लेने लगते हैं। इसी निद्रा काल में स्वर्ग नरक जैसे स्वप्न दिखाई पड़ते रहते होंगे। थकान उतरने पर जीव पुनः क्षमता सम्पन्न बनता है और अपने संग्रहित संस्कारों के खिचाव से रुचिकर परिस्थितियों के इर्द-गिर्द मण्डराने लगता है वहीं किसी के घर उनका जन्म हो जाता है।

कभी-कभी कोई मनुष्य प्रेत योनि प्राप्त करते हैं। यह न जीवित स्थिति कही जा सकती है और न पूर्ण मृतक ही। जीवित इसलिए नहीं कि स्थूल शरीर न होने के कारण वे कोई वैसा कर्म तथा उपभोग नहीं कर सकते जो इन्द्रियों की सहायता से ही सम्भव हो सकते हैं। मृतक उन्हें इसलिए नहीं कह सकते कि वासनाओं और आवेशों से अत्यधिक ग्रसित होने के कारण उनका सूक्ष्म शरीर काम करने लगता है अस्तु वे अपने अस्तित्व का परिचय यत्र-तत्र देते फिरते हैं। इस विचित्र स्थिति में पड़े होने के कारण वे किसी का लाभ एवं सहयोग तो कदाचित ही कर सकते हैं, हाँ डराने या हानि पहुँचाने का कार्य वे सरलता पूर्वक सम्पन्न कर सकते हैं। इसी कारण आमतौर से लोग प्रेतों से डरते हैं और उनका अस्तित्व अपने समीप अनुभव करते ही उन्हें भगाने का प्रयत्न करते हैं। प्रेतों के प्रति किसी का आकर्षण नहीं होता वरन् उससे भयभीत रहते और बचते ही रहते हैं। वैज्ञानिक शोध की दृष्टि से-वस्तुस्थिति जानने एवं कौतूहल निवारण की दृष्टि से कोई उस क्षेत्र में प्रवेश करके तथ्यों की जानकारी के लिए प्रयत्न करें तो यह दूसरी बात है।

प्रेतात्माओं द्वारा अपने अस्तित्व का परिचय दिये जाने अमुक व्यक्तियों का अपना माध्यम बनाकर त्रास देने की घटनाओं का वर्णन करना इन पंक्तियों में अभीष्ट नहीं। जन श्रुतियों से लेकर सरकारी रिकार्ड में दर्ज और परामनोविज्ञान के अन्वेषकों द्वारा मान्यता प्राप्त ऐसी असंख्यों घटनाएँ सामने आती रहती है, जिनसे प्रेतात्माओं के अस्तित्व की पुष्टि होती है। यहाँ तो चर्चा यह की जानी है कि क्या प्रेत योनि में सभी को जाना पड़ता है। अथवा किसी विशेष स्थिति में व्यक्ति ही उसमें प्रवेश करते हैं। उत्तर स्पष्ट है। उद्विग्न, विक्षुब्ध, आतुर, अशान्त, क्रुद्ध, कामनाग्रस्त, अतृप्त लोगों को ही प्रायः प्रेत बनना पड़ता है शान्तचित्त सौम्य एवं सज्जन प्रकृति के लोग सीधी सादी जनम मरण की प्रक्रिया पूरी करते रहते हैं।

काल के अनन्त प्रवाह में बह रही जीवनधारा का प्रेत योनि एक नया मोड़ मात्र है। हमारे सीमित बोध-जगत के लिए भले ही वह जीवनधारा खो गई प्रतीत होती हो, पर वह सर्वदा अविच्छिन्न रहती है और हमारा संस्कार-क्षेत्र मरणोत्तर जीवन में सक्रिय रहता है, अन्तःकरण चतुष्टय मृत्यु के उपरान्त भी यथावत् बना रहता है अशान्त विक्षुब्ध मनःस्थिति भी अपना स्वभाव उस रूप में ही बनाए रखती हैं दुष्ट और दुरात्मा जीवनक्रम की यह स्वाभाविक परिणति जीवात्मा को जिस अशान्त दशा में रहने को बाध्य करती है, उसका ही नाम प्रेत दशा है। अपनी दुर्दशा से सामान्यतः प्रेतों को दुःख ही होता है, पर अत्यन्त कलुषित अनाचारी व्यक्तियों की हिंसक मनोवृत्तियाँ प्रेत जीवन पाकर भी अपनी क्रूर आकांक्षाओं की पूर्ति करना चाहती है और लोगों को अनायास सताती रहती हैं पर अपना आतंक वे उन्हीं पर जमा पाती है, जिनका आत्मबल अविकसित हो।

प्यार का अभाव, असुरक्षा की आशंका, मूर्खतापूर्ण कठोरता से भरा नियन्त्रण, आत्यन्तिक चिन्ता, कुसंग से उत्पन्न विकृतियाँ व्यक्ति के विकासक्रम को जब बालकपन से ही तोड़-मरोड़ देती है, तो आत्मबल का सम्यक् विकास नहीं हो पाता। ऐसी विघटित मनःस्थिति ही प्रेतात्माओं को अपना उपयुक्त क्रीड़ा क्षेत्र लगा करती हैं प्रेतात्माएं उसे अपना क्रीड़ा-क्षेत्र न भी बनाएँ तो क्या, मनोवृत्तियों का झुण्ड एकत्र होकर मानसिक रोगों का रूप ले लेता है या अन्य प्रकार से उन्मत्त आचरण के लिए प्रेरित व बाध्य करता है उत्कृष्ट लक्ष्यों के लिए साहस, उल्लास और स्फूर्ति से भरपूर मनःस्थिति जहाँ मनुष्य की सामर्थ्य को अधिकाधिक विकसित एवं ऊर्ध्वगामी बनाते हुए उसे महामानवों-देवमानवों की कोटि में पहुँचा देती है, वहीं दुर्बल-दूषित मनःस्थिति जीवन भर हताशा, आक्रोश और आत्मग्लानि के नरक में तो जलाती ही है, मरणोत्तर जीवन में भी अन्तश्चेतना की अविच्छिन्नता के कारण उसी स्तर की गतिविधियों का क्रम चलते रहने से प्राणी को क्षण भर भी चैन नहीं लेने देती। लेकिन इससे भी महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है ये अशान्त आत्माएँ या मनोदशाएँ उन्हीं लोगों पर अपना त्रास पूर्ण प्रभाव डाल सकने में समर्थ हो पाती है, जिनकी स्वयं की मनःस्थिति दुर्बल-विश्रृंखल हो।

प्रेतात्माएं हर किसी के संपर्क में नहीं आती। वे दुर्बल मनोभूमि के व्यक्तियों को चुनौती देती है और उन्हीं को अपना वाहन बनाती हैं मनस्वी लोग सदा जागरूक रहते हैं। द्विजातीय तत्त्वों से लड़ने के लिए जिस प्रकार रक्त के श्वेत कण अपनी संघर्ष शीलता का परिचय देते हैं, ठीक उसी प्रकार प्रतिभा और प्रखरता के धनी अपनी साहसिकता के बल पर प्रेतात्माओं को समीप नहीं आने देते, आती है तो उन्हें धकेल कर दूर फेंक देते हैं। दुर्बल मनोभूमि के, अथवा प्रेतात्माओं में विशेष रुचि लेने वाले ‘भूत भक्तों’ को उनका वाहन बनते देखा गया है। जिनके शिर पर आये दिन भूत झूमते रहते हैं उन्हें इंग्लिश में ‘मीडियम’ कहा जाता है। साधारणतया उन्हें प्रेत वाहन नाम दिया जय तो अनुपयुक्त न होगा।

प्रेतात्मा प्रमाणिक व्यक्ति के भीतर से एक सूक्ष्म पदार्थ-प्रवाह निकलता है, जिसे ‘टेलीप्लाज्म’ व्यक्ति-चित्त में विद्यमान उस अतीत के व्यक्ति-विशेष या वस्तु-विशेष (जिसे प्रेत कहते है) की छवि के संवेदनात्मक प्रतिबिम्बों के अनुरूप आकार ग्रहण कर लेता है यह माध्यम-व्यक्ति के शरीर से स्वयं को पृथक कर सकता है और इस प्रकार प्रेत की प्रतिच्छाया या छवि स्पष्ट दिखाई दे सकती हैं

डा0सी0डी0 ब्रोड समेत अनेक वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिकों ने ‘मीडियम’ (प्रेत प्रभावित व्यक्ति) के बारे में एक अन्य सिद्धान्त प्रस्तुत किया है उनका कहना है कि मस्तिष्क की संरचना जटिल है। वह शरीर के सम्मिलित संयोग का उत्पादन है, जिसमें एक अभौतिक तत्त्व भी सम्मिलित है, जिसे वे “साइकिक फैक्टर” कहते हैं। जब व्यक्ति मरता है तो उसका शरीर रूपी यह संयोग बिखर कर नष्ट हो जाता है। इस प्रकार उस शरीर में अवस्थित मस्तिष्क का भी अस्तित्व समाप्त हो जाता है। किन्तु “साइकिक फैक्टर” कोई भौतिक द्रव्य (मैटर) नहीं है, अतः वह विनष्ट नहीं हो सकता। यह अवशिष्ट “साइकिक फैक्टर” इधर-उधर भ्रमण करता रहता है। फिर ऐसे व्यक्ति के मस्तिष्क को पाते ही वह प्रविष्ट हो जाता है जो इन पिरब्राजक ‘साइकिक फैक्टर’ के प्रति ग्रहण-शील हो। ऐसा ही व्यक्ति “मीडियम” प्रेत वाहन बना करते हैं। “साइकिक फैक्टर” कोई व्यक्ति तो होते नहीं, वे पूरे मस्तिष्क के भी प्रतिनिधि नहीं होते। अपितु मस्तिष्क का “पदार्थ से परे एक अंश विशेष” होते हैं। अतः “साइकिक फैक्टर” एक पूर्ण मस्तिष्क की तरह काम नहीं कर सकते।

प्रेतात्मा के नाम पर घटित होने वाली अगणित घटनाओं में से प्रायः आधी ऐसी होती हैं, जिन्हें आवेश ग्रस्त मस्तिष्कीय रोग की संज्ञा दी जा सकती है। उन्माद के-स्नायु, दुर्बलता के, भीरुता जन्य, आत्म-हीनता के, दबे असन्तोष की प्रतिक्रिया के कितने ही कारण ऐसे होते हैं जिनसे मनुष्यों की मानसिक स्थिति गड़बड़ा जाती है। उस स्थिति में शरीरगत और मनोगत तनाव बढ़ता है। वह एक प्रकार के कम्पन, रोमांच, ज्वर एवं आवेश जैसा होता है। ऐसा विचित्र रोग पहले अनुभव में नहीं आया था। अस्तु उसकी सीधी तुक प्रेत आक्रमण से लगा ली जाती है। रोगी के मन में यही मान्यता दृढ़ होती है और दर्शकों, सम्बन्धियों में से अधिकांश प्रेत उपचार के सरंजाम इकट्ठे करके रोगी की भ्रम ग्रस्तता को पूरी तरह परिपुष्ट कर देते हैं। आमतौर से प्रेत आक्रमण इसी स्तर के होते हैं।

संस्कार-जगत में प्रेतात्माओं का आतंक अंकित रहा, तो आवेश-ग्रस्त, ड़ड़ड़ड़ व्यक्ति अपनी स्थिति की संगति भूत-प्रेतों, देवी-देवताओं के आक्रमण के साथ बैठाकर उसी प्रवाह में स्वयं को बहाने लगता है। इससे ऐसे लक्षण प्रकट होते हैं, मानो सचमुच ही कोई भूत-बैताल उस व्यक्ति को दबोच बैठा हो। वस्तुतः यह ‘एंक्जाइटी न्यूरोसिस’ तथा ‘हिस्टरिक न्यूरोसिस’ की स्थिति होती है। ‘हैवीफ्रनिक शिजोफ्रेनिया’ की स्थिति भी ऐसी ही रुग्ण मनोदशा का परिणाम है। इस बीमारी में कई व्यक्तियों को लगने लगता है कि उन्होंने सचमुच कुछ आवाजें सुनी हैं। पेट में बैठकर या सिर पर चढ़कर कोई कुछ बोल रहा है। भूत-पलीतों,-देवी-देवताओं के कथित सन्देशों निर्देशों की अनुभूतियों की यही स्थिति है। अपने इष्ट देवों का ‘दर्शन’ करने वाले अनेक भक्त जन भी इसी मनःस्थिति में विभिन्न कौतूहलवर्धक दृश्य देखा करते हैं। जिनके प्रियजन हाल ही में और असमय में मरे हो, उन्हें भी झपकी आते ही मृतात्मा निकट आकर बात करती दिखाई पड़ती है। हैं ये सब मानसिक अस्त-व्यस्तता के ही परिणाम। सुनिश्चित सुनियोजित महत्त्वाकाँक्षाएँ व्यक्तित्व को ओजस्वी, गतिशील, प्रखर और प्रभावी बनाती हैं, तो आकाश-कुसुम वत आकांक्षाओं का अनपेक्षित विस्तार व्यक्तित्व को विभाजित कर देता है। विभाजित व्यक्तित्व मानसिक रोगों का सुरक्षित भण्डार बनता जाता है। व्यक्तित्व का यह विभाजन अनेक बार प्रेत बाधाओं के रूप में भी सामने आता है। जब आकांक्षाएँ शक्ति ने सर्वथा विलग और विसंगत हो जाती हैं तब वे स्वाभाविक न रहकर अस्वाभाविक हो जाती हैं, उनकी पूर्ति सम्भव न होने से उनका दमन करना पड़ता है। दमित आकांक्षाएँ पाप-पिशाच का रूप लेती जाती हैं। वे विकृत और वीभत्स रूप में त्रास एवं दण्ड देती हैं।

भूत बाधाएँ दो तरह से व्यक्ति को अपनी चपेट में लेती हैं-एक प्रकार की बाधा में रोगी के सिर पर भूत ‘आता’ है, वह अनर्गल प्रलाप और असंगत चेष्टाएँ करता है। रोग की इस स्थिति में रोगी की सामान्य चेतना विश्रृंखलित हो जाती है और यह विश्रृंखलित चेतना ही उसके व्यक्तित्व को घेरे रहती है।

दूसरे प्रकार की बाधा में ‘भूत’ रोगी के शरीर में भीतर समा जाता है। वह निरन्तर व्यग्र, त्रस्त, विक्षिप्त सा रहने लगता है। कभी-कभी अंग-विशेष में पीड़ा भी होती है तथा यह पीड़ा अपना स्थान बदलती रहती है। ऐसे रोगों का शारीरिक कारण ढूँढ़ने पर भी मिल नहीं पाता।

भूत-बाधा-पीड़ित व्यक्ति को आकस्मिक रूप से असह्य वेदना का अनुभव होने लगता है, कभी हाथ पैर ठंडे हो जाते हैं, दाँत-बँध जाते हैं और इस तरह की अन्य शारीरिक प्रतिक्रियाएँ स्पष्ट दिखने लगती हैं।

ये सभी प्रभाव मन में बैठी भय और अपराध की ग्रन्थियों के हैं। इसीलिए इनकी चिकित्सा किसी भी औषधि द्वारा नहीं हो पाती।

मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में प्रेत बाधा के अधिकांश मामले ‘हिस्टीरिया’ रोग का ही दूसरा नाम मात्र होते हैं। ऐसे रोगियों का व्यक्तित्व विभाजित होता है तथा उनके सामान्य व्यक्तित्व साथ ही उनमें एक विशेष व्यक्तित्व भी समाहित हो जाता है। मनोवैज्ञानिकों का यह भी निष्कर्ष है कि मानसिक विभाजन को स्थिति संक्रामक होती है। इसीलिए देखा यह गया है कि जब कोई भूत पीड़ित स्त्री झूमने लगती है तो उसके इर्द-गिर्द बैठी स्त्रियों के झुण्ड में से भी दस-पाँच स्त्रियाँ झूमने लगती हैं।

विभिन्न आकृतियों-प्रकृतियों वाले अनेकानेक मानसिक विक्षोभ वस्तुतः मानसिक असन्तुलन के परिणाम हैं। इसके लिए आवश्यक है परिस्थितियों के साथ ताल-मेल बिठाने की सूझबूझ तथा प्रतिकूल परिस्थितियों को परिवर्तित कर डालने का साहस। विकसित मनोबल और परिष्कृत दृष्टिकोण द्वारा ही यह सम्भव है।

प्रेत प्रभाव के दो कारणों की चर्चा ऊपर की जा चुकी है, एक मृतात्माओं की उद्विग्न एवं आक्रामक सत्ता। दूसरे मनोरोगों के सन्दर्भ में प्रेत कल्पना की प्रतिक्रिया। इन दो के अतिरिक्त एक तीसरा कारण और भी है किन्हीं विशिष्ट व्यक्तियों की निजी चेतना में ही ऐसे उभार उत्पन्न हो जाते हैं जो भूतों की करतूत जैसे विलक्षण परिचय देने लगते हैं। यह व्यक्तित्व में विशिष्ट ऊर्जा का आकस्मिक उदय होना कहा जा सकता है। यही अपने समीपवर्ती क्षेत्र को प्रभावित करती है। इससे दर्शकों को लगता है यहाँ कोई प्रेतात्मा विद्यमान हैं और अपने अस्तित्व का परिचय देने के लिए उलट-पुलट कर रही है।

प्रेत बाधाओं के स्वरूप को भी वैज्ञानिकों ने समझने का प्रयास किया है। ऐसे स्पष्ट प्रमाण मिले हैं कि किसी नर या स्थान विशेष में आकस्मिक रूप से घण्टियाँ बज उठेंगी, चीजें इधर-उधर बिखरने लगेंगी, पत्थर, धूलिकण, आदि बरसने लगेंगे, किवाड़ खिड़कियाँ स्वयं ही खुलने बन्द होने लगेंगी और ऐसा बिना किसी भी व्यक्ति या यन्त्र की गतिविधि के होगा। ऐसी घटनाएँ अब भली-भाँति परखी जा चुकी हैं और वैज्ञानिकों द्वारा सत्य पाई गई हैं। इसका अभी तक वैज्ञानिक यही स्पष्टीकरण प्रस्तुत कर सके हैं कि प्रेत बाधा सम्बन्धी समस्त घटनाएँ उस क्षेत्र के आस-पास किसी जीवित देहधारी की ही उपस्थिति में घटित होती हैं। इसका अर्थ है कि उपस्थित व्यक्ति का अवचेतन अपनी आन्तरिक ऊर्जा को वहाँ प्रक्षिप्त करता है, भले ही वह स्वयं सचेतन रूप में इस क्रिया से अवगत नहीं रहता। पर जीवित व्यक्ति की मानसिक ऊर्जा के उपयोग से ही ये घटनाएँ घटित हो पाती हैं। यह सिद्धान्त व्यक्ति में निहित असीम सम्भावनाओं तथा अपार मानसिक ऊर्जा की धारण की ही पुष्टि करता है। इस मानसिक ऊर्जा को ही मनोबल, आत्मबल आदि कहा गया है।

वस्तुओं तथा व्यक्तियों के सहसा हवा में ऊपर उठ जाने तथा तैरने, व्यक्ति का थोड़े समय के लिए अत्यधिक लम्बा-ऊँचा हो जाने, अन्तर्धान होने, आकाश-संचरण आदि की घटनाएँ भी वैज्ञानिकों द्वारा नियन्त्रित वातावरण में स्पष्ट देखी-परखी गई हैं। सर डगलस होम ने अनेक वैज्ञानिकों के सामने कुर्सी समेत हवा में ऊपर उठ जाने, कई फुट लम्बे हो जाने, मेज आदि को ऊपर उठा देने के अनेक प्रदर्शन किये थे और भी कई प्रयोगकर्ता ऐसे प्रदर्शन कर चुके व कर रहे हैं। इनकी कैसी भी व्याख्या अभी तक वैज्ञानिक नहीं कर पाये हैं।

प्रेतात्मा के अस्तित्व सम्बन्धी जो घटनाएँ सामने आती हैं उनके अधिक गम्भीर अन्वेषण किये जाने की आवश्यकता है। इन शोधों से मानव तत्त्व की कितनी ही विशेषताओं पर प्रकाश पड़ेगा और यह जाना जा सकेगा कि मरणोत्तर जीवन में मनुष्य को किन परिस्थितियों में होकर गुजरना पड़ता है ? इस तथ्य का जितना ही रहस्योद्घाटन होगा उतना ही यह स्पष्ट होता जाएगा कि जीवन अनन्त है और उसकी सम्भावनाएँ असीम हैं। वर्तमान दृश्य जीवन तो उसका एक छोटा-सा अंग मात्र है।


आत्मिक प्रगति के तीन अवरोध

आत्मिक प्रगति के पथ पर अवरोध उत्पन्न करने वाली दुष्प्रवृत्तियों में तीन प्रधान हैं। इन्हें ताड़का, सूर्पणखा और सुरसा की उपमा दी जाती है। इन्हें निरस्त किये बिना असुरता के चंगुल में फँसी हुई सीता का-आत्मा का-उद्धार नहीं हो सकता। इन्हें पुत्रेषणा-वित्तेषणा और लोकेषणा कहा जाता है। वासना-तृष्णा और अहंता की प्रवृत्तियाँ ही सबल होने पर इन एषणाओं के रूप में परिलक्षित होती हैं।

इंद्रिय वासनाओं में यों सभी अपने-अपने ढंग की खींचतान करती हैं। पर उनमें रसना और कामुकता को प्रमुख माना गया है। चटोरपन के कुचक्र में पेट पर अभक्ष्य पदार्थों का अनावश्यक भार लदता है। अपच के फलस्वरूप शरीर में अगणित रोग उत्पन्न होते हैं। दुर्बलता और रुग्णता ग्रसित होकर अकाल मृत्यु का ग्रास बनना पड़ता है। अस्वस्थता की विपत्ति ढाने में जिह्वा का चटोरापन भयंकर शत्रु से भी अधिक आक्रमणकारी और विघातक सिद्ध होता है। वासना की दूसरी प्रवृत्ति है- कामुकता। यौनाचार की कल्पना और क्रिया में उलझा हुआ मस्तिष्क अपनी अति महत्त्वपूर्ण क्षमता को ऐसे जंजाल में फँसा देता है जिसमें, पाना रत्तीभर और गँवाना पहाड़ भर पड़ता है। प्रकृति की चतुरता ही कहिए कि उसने प्राणियों की संख्या बनाये रहने के लिए कष्ट साध्य भार उठाने के लिए यौनाचार की सरसता उत्पन्न कर दी। यदि यह उन्माद न चढ़ता तो कदाचित ही कोई प्राणी प्रजनन की अति कठिन और अतीव बोझिल प्रक्रिया को अपने कंधों पर लादने के लिए तैयार होता।

वासनाओं में जीभ के चटोरेपन पर रोकथाम करना आवश्यक है। पेट में कोई वस्तु तभी पहुँचने दी जाय जब कड़ाके की भूख उसके लिए तीव्रतापूर्वक माँग करती हो। सात्विक सुपाच्य पदार्थ स्वेच्छापूर्वक शान्त चित्त से सीमित मात्रा में ग्रहण किये जायें। जो खाया जाय औषधि रूप हो। स्वाद की उत्तेजना तो नशेबाजी की तरह है, जिसमें हर दृष्टि से हानि ही हानि उठानी पड़ती है।

दूसरे यौनाचार लिप्सा के सम्बन्ध में और भी गम्भीरता पूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। जो जीवन रस, हमारे ओजस्-तेजस् और ब्रह्म वर्चस् का आधार हैं उसे क्षणिक आवेश में ऐसे ही गँवाते रहने की गलती को सुधारना ही समझदारी है।

बच्चे उत्पन्न करने से पहले तो हजार बार विचार किया जाना चाहिए कि अपनी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक स्थिति सुयोग्य और समर्थ नये नागरिक प्रस्तुत कर सकने की है या नहीं। यह एक बहुत बड़ा उत्तरदायित्व हैं जिसे पूरा करने का साहस मात्र समर्थ लोगों को ही करना चाहिए। प्रत्येक बच्चा अपनी माता पर शारीरिक दबाव डालता है, पिता पर आर्थिक बोझ लादता है, राष्ट्र से अपनी आवश्यकताओं के नये साधन जुटाने की माँग करता है। किसी जमाने में जनसंख्या कम थी और उत्पादन बढ़ाने के लिए नये नागरिकों की आवश्यकता अनुभव की जाती थी। आज तो स्थिति बिलकुल उलट गई। बढ़ी हुई जनसंख्या के लिए निर्वाह के साधन जुटाना अति कठिन हो रहा है।

हर समझदार व्यक्ति का कर्तव्य है कि भौतिक सुव्यवस्था एवं आत्मिक प्रगति के दोनों प्रसंगों का ध्यान रखते हुए वासना पर-संतानोत्पादन पर अधिकाधिक नियन्त्रण रखे और उस अपव्यय से सामर्थ्य को बचाकर ऐसे कार्यों में लगाये जिनसे आत्मिक प्रगति और लोक कल्याण का दुहरा प्रयोजन सिद्ध हो सके।

दूसरा अवरोध हैं-तृष्णा-वित्तेषणा। धन की उपयोगिता असंदिग्ध है। उसके उपार्जन का औचित्य सर्वत्र समझा जाता है और हर व्यक्ति अपने-अपने ढंग से उसकी पूर्ति भी करता है। उचित मार्ग से कमाया हुआ और उचित प्रयोजनों में खर्च किया गया धन सराहनीय ही माना जाता है। गड़बड़ी तब उत्पन्न होती है जब वह अनुचित तरीकों से कमाया जाता है और उसका उपयोग विलासिता में, दुर्व्यसनों में, उद्धत प्रदर्शनों में किया जाता है। अनीति उपार्जन की तरह अपव्यय भी निन्दनीय है। जिस समाज के हम अंग हैं उसी की स्थिति के अनुरूप औसत दर्जे का माप दण्ड अपनाते हुए सादगी की रीति-नीति अपनानी चाहिए। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ के सिद्धान्त को भली प्रकार समझा जाना चाहिए। अमीरी का रहन-सहन मनुष्य को उठाता नहीं गिराता है। इससे असमानता की खाई उत्पन्न होती है। दुर्व्यसन बढ़ते हैं और ईर्ष्या-द्वेष भरा कलह संघर्ष खड़ा होता है। अस्तु उचित यही है कि कठोर श्रम पूर्वक कमाएँ और उसमें सादगी से, औचित्य की मात्रा का ध्यान रखते हुए सादगी की निर्वाह नीति अपनाएँ। जो बचता हो उसका कृपणता पूर्वक संग्रह न करें वरन् संसार से पीड़ा और पतन कम करने के लिए उदारता पूर्वक उसका उपयोग मुक्त हस्त से करते रहें। सन्तान को सुयोग्य और स्वावलम्बी बना देना पर्याप्त है। उत्तराधिकार में उनके लिए विपुल सम्पत्ति छोड़ने की बात सोचने का अर्थ है उन्हें अपाहिज और परावलम्बी बनने जैसी हीन वृत्ति का शिकार बनाना। इससे बालकों को अन्ततः हानि ही हानि उठानी पड़ती है। वे परस्पर झगड़ते हैं, आलसी, अहंकारी और दुर्व्यसनी बनते हैं। कमाई वही फलती-फूलती हैं जो नीति पूर्वक कठोर श्रम करते हुए कमाई जाती है। बच्चे इसी मार्ग पर चलते हुए अपना गुजारा करें इसी में औचित्य हैं। उनके लिए सम्पदा छोड़ मरने की कृपणता अपनाने में कोई औचित्य नहीं है। बुद्धिमत्ता इसी में है कि परिवार के भरे निर्वाह से जो कुछ बचता हो उसे समाज का ऋण चुकाने में-लोक मंगल में उदारता पूर्वक हाथों-हाथ व्यय किया जाता रहे। इस अर्थ नीति को अब युग मान्यता मिल चुकी है। साम्यवाद-समाजवाद के अंतर्गत यही व्यवस्था बनने जा रही है। प्रजातन्त्र राष्ट्र भी बढ़ी हुई सम्पत्ति को भारी टैक्सों द्वारा लोक हित के लिए बल-पूर्वक वापिस ले रहे हैं। अध्यात्म मार्ग में तो अपरिग्रह और दान पुण्य की महिमा आरम्भ से ही गाई जाती रही है। साधु, ब्राह्मण वैसी ही निर्वाह पद्धति की सार्थकता अपने ऊपर प्रयोग करते हुए चिरकाल से सिद्ध करते रहे हैं।

वित्तेषणा-तृष्णा की बढ़ी हुई मात्रा अनीति उपार्जन के लिए प्रोत्साहित करती हैं विविध विधि अपराध उसी के कारण होते रहते हैं। यदि निर्वाह के लिए उपार्जन तक सन्तुष्ट रहा जा सके तो श्रम, धन और मनोयोग की पर्याप्त बचत हो सकती है और उसे महान प्रयोजनों में लगाने पर जीवन को धन्य बनाने वाले आधार खड़े हो सकते हैं। इन उज्ज्वल सम्भावनाओं से वित्तेषणा ही हमें वंचित करती है। तृष्णा को सीमित किया जा सके तो दूसरे महत्त्वपूर्ण लक्ष्य सामने आ सकते हैं और उनमें संलग्न रह कर महामानवों जैसी गतिविधियाँ अपनाया जाना सम्भव हो सकता है।

लोकेषणा में श्रेष्ठ सत्कर्म करते हुए लोक श्रद्धा अर्जित करने का उच्चस्तर ही अपनाये जाने योग्य है। शेष नीचे की सभी उद्धत अर्हताएँ हेय मानी जाने योग्य है। अहंकार प्रदर्शन के लिए लोग अनावश्यक ठाठ-बाठ रोपते हैं। अमीरी का सम्मान पाने के लिए जितना समय और धन व्यय किया जाता है, प्रदर्शन का आडम्बर संजोया जाता है, शेखीखोरी का घटा टोप रोपा जाता है, उसे छल प्रपंच भरी विडम्बना के अतिरिक्त और क्या कहा जाय ? इस जंजाल में जितनी शक्ति खपती हैं यदि उसकी चौथाई भी महानता के सम्पादन में लग सके तो वास्तविक उन्नति का विशालकाय भवन निर्माण उतने भर से ही सम्भव हो सकता है।

आपाधापी, छीना-झपटी, लूट-खसोट, जितनी धन के क्षेत्र में होती हैं, उससे भी अधिक सम्मान के लिए मचती है। लोग श्रेय सम्मान पाने के लिए आतुर रहते हैं, पर उसके सीधे मार्ग आदर्श चरित्र और सेवा क्षेत्र में किये जाने वाले त्याग, बलिदान की कष्ट साध्य प्रक्रिया अपनाने में कतराते हैं। सस्ते हथकण्डों से उसे अपनाना चाहते हैं। किसी प्रकार प्रवचन वेदी पर जा बैठने और वहाँ दूसरों को बढ़ी-चढ़ी नसीहतें देने की कला प्रवीणता तो सम्मान पाने का सस्ता तरीका मान लिया गया है। येन−केन प्रकारेण लोगों की आँखों में अपना बड़प्पन और जानकारी में परिचय उतार देने की व्याकुलता में अनेक लोगों को नेतागिरी का ढोंग बनाते और शोक पूरा करते देखा जाता है। ऐसे लोग जिस-तिस संस्था में घुसने और किसी प्रकार उसका बड़ा पद हथियाने के जोड़-तोड़ मिलाते रहते हैं। यह चतुरता जितनी सफल होती है- उतना ही परिचय क्षेत्र बढ़ता है और उस सम्पर्क द्वारा प्रकारान्तर से अनेक प्रकार के परोक्ष लाभ उठाये जाते हैं। चन्दा डकार जाने और हिसाब किताब में गोलमाल करने की संस्थाओं में पूरी गुँजाइश रहती है। व्यक्तिगत हानि न होने से जाँच पड़ताल भी कड़ी नहीं होती। ऐसी दशा में संस्थाओं पर जिनके अधिकार होते हैं उन्हें पैसे सम्बन्धी गोलमाल करने का भी लाभ मिलता रहता है। यश, सम्मान, परिचय का परोक्ष लाभ मिलता रहता है। यश, सम्मान, परिचय का परोक्ष लाभ और पैसा जैसे लाभों को यदि मात्र स्टेज-कौशल, वाचालता, संस्था बाजी, नेतागिरी के आधार पर सस्ते मोल में खरीदा जा सकता है तो उसे कौन छोड़ना चाहेगा। इसी लूट के माल पर आपा-धापी और हाथापाई होती है। गुटबंदी खड़ी होती है। झूठे सच्चे इल्जामों की बाढ़ आती है और उस रस्सा कसी में उपयोगी संस्थाएँ भी बदनाम तथा नष्ट होती देखी गई है। किसी समय जो अमुक संस्था के प्रमुख कार्यकर्ता थे वे ही उसकी जड़ें काटते देखे गये हैं। यह सार्वजनिक जीवन का अभिशाप है। सेवा क्षेत्र को कलुषित करने में सबसे विघातक प्रवृत्ति कार्यकर्ताओं की पद लिप्सा, अधिकार लिप्सा और सस्ती वाहवाही लूटने की हेय मनोवृत्ति ही प्रधान कारण होती है।

लोकेषणा का उन्माद यदि मन पर से उतर सके तो सार्वजनिक जीवन में ऐसे असंख्य लोकसेवी मिल सकते हैं जो नींव के पत्थर बनकर चिरस्थायी ठोस काम कर सकें और साथियों के लिए अपनी नम्र निस्पृहता के कारण प्राण प्रिय बने रह सकें। लोकेषणा ही उन्हें अनेकानेक प्रपंच सिखाती है। जिस प्रकार वित्तेषणा से प्रेरित लोग अनेकानेक दुष्कर्म अपनाकर अनीति की कमाई करते हैं, ठीक उसी प्रकार लोकेषणा प्रेरित तथा-कथित लोक सेवी साथियों को गिराने, उखाड़ने से लेकर अनेकों भ्रष्ट तरीके अपनाते और अपने तनिक से यश, स्वार्थ के कारण सार्वजनिक जीवन में नाक को सड़ा देने वाली दुर्गन्ध गन्दगी पैदा करते हैं।

व्यक्तिगत जीवन में बड़प्पन की छाप छोड़ने के लिए आतुर व्यक्ति उद्धत प्रदर्शनों में ठाठ-बाठ में, सज-धज में, शेखीखोरी में समय और धन का बुरी तरह अपव्यय करते हैं। यदि लोकेषणा का उन्माद मस्तिष्कों पर से उतारा जा सके और नम्रता, सज्जनता, सादगी, शालीनता का महत्त्व समझाया जा सके तो उपयोगी कार्यों में लगाई जा सकते योग्य ढेरों शक्ति बच सकती हैं और उससे ठोस परिणाम प्रस्तुत करने वाले रचनात्मक कार्य सम्भव हो सकते हैं। सादगी और नम्रता से भरा हुआ निरहंकारी स्वभाव हर किसी के प्राण प्रिय लगता है, ऐसे व्यक्ति की प्रशंसा विरोधियों के मुख से भी निकलती है। वे अपने लिए हर किसी के मन में अपना स्थान बनाते हैं। उच्चस्तरीय श्रद्धा, सम्मान एवं सहयोग के अधिकारी बनते हैं। उद्धत प्रदर्शनों से बड़प्पन की धाक जमाने वाले प्रपंचियों की तुलना में विनम्र सज्जनता कितनी सस्ती और कितनी प्रभावशाली सिद्ध होती है; इसे कोई भी दूरदर्शी व्यक्ति दूसरे सज्जनों की गतिविधियों के तथा अपने अनुभव के आधार पर सहज ही जान सकता है।

वासना, तृष्णा और अहंता के क्षेत्र में बरता गया अतिवाद मनःक्षेत्र को कलुषित करने में संक्रामक रोगों की तरह विघातक सिद्ध होता है। पुत्रेषणा, वित्तेषणा और लोकेषणा की दुष्प्रवृत्तियाँ चिन्तन तन्त्र को बुरी तरह लड़खड़ा देती है। यदि जीवन को सार्थक बना सकने के योग्य उच्चस्तरीय मनोभूमि का निर्माण आवश्यक समझा जाय तो उसे इन त्रिविध विनाशकारी विपत्तियों से बचाये रहना ही उचित है।


Quotation

श्रेष्ठ मनुष्यों की मित्रता पत्थर के समान सुदृढ़, मध्यम मनुष्यों की बालू के समान और निकृष्ट मनुष्यों की पानी की लकीर जैसी क्षणिक होती है। इसके विपरीत श्रेष्ठ जनों का बैर पानी की लकीर जैसा, मध्यमों का बालू जैसा और निकृष्ट जनों का बैर पत्थर जैसा होता है।

-भर्तृहरि


शक्तियों का दुरुपयोग रोका जाय

धन और बुद्धि जैसे सर्वोपरि साधनों के दुरुपयोग से जब व्यक्ति और समाज का भारी अहित हो सकता है तो विज्ञान की उपलब्धियों से हस्तगत हुए अति शक्तिशाली साधनों से तो अकल्पनीय हानि की ही सम्भावना उत्पन्न होगी। शक्ति पर विवेक और नीति का नियन्त्रण रहे तभी उसकी उपयोगिता है अन्यथा दुष्टता के साथ उसकी दुरभिसन्धि जुड़. जाने पर तो विकास के स्थान पर विनाश के ही दुष्परिणाम सामने प्रस्तुत होंगे।

विज्ञान की सृजनात्मक उपलब्धियाँ जो मिल चुकीं उन पर सन्तोष किया जा सकता है,जो आगे मिलने की सम्भावना है, उसके लिए हर्ष भी है और उत्साह भी। यह प्रसन्नता का विषय है; किंतु चिन्ता तब होती है जब उसके दुरुपयोग से उत्पन्न विभीषिका सामने आकर खड़ी होती है। सरसरी नजर से घटना क्रम पर उपेक्षा पूर्वक देखने से तो दैनिक जीवन सामान्य ढंग से चलता दिखाई पड़ता है और कोई बड़ी बात ध्यान में नहीं आती; पर गम्भीरतापूर्वक विश्व की वैज्ञानिक हलचलों के विघातक पक्ष पर दृष्टि डालने से प्रतीत होता है कि दुर्बुद्धि और असीम शक्ति का सम्मिश्रण मानवी प्रगति को ही नहीं उसके अस्तित्व को भी संकट में डालेगा। निर्माण कष्ट साध्य और समय साध्य होता है; पर विनाश तो कोई मूर्ख एक माचिस के सहारे भी उत्पन्न कर सकता है। विनाश के बढ़ते हुए साधन किस निमित्त विनिर्मित किये जा रहे हैं; यह हर कोई जानता है। आपसी झगड़े तो न्यायोचित विचार विमर्श और पंच फैसले से भी हल हो सकते है; उस ओर ध्यान देकर जब सर्वनाशी वैज्ञानिक प्रयोगों पर असीम सम्पत्ति झोंकी जा रही हो तो समझना चाहिए कि दुर्बुद्धि के हाथों यह क्षमता बनी रहने पर कभी न कभी इसका प्रयोग होकर रहेगा। यदि ऐसा हुआ तो समझना चाहिए आक्रामक सहित मनुष्य जाति को सामूहिक आत्म हत्या कर लेने के अतिरिक्त और कोई रास्ता शेष ही नहीं रहेगा।

अणु आयुधों को विभीषिका अब बहु-चर्चित और पुरानी बन गई। नये प्रयोग अन्तरिक्ष की हलचलों पर अधिकार पाने और आकाश पर आधिपत्य करने के चल रहे हैं। थल और जल के क्षेत्र भावी महा-युद्ध के लिए अपर्याप्त और झंझट भरे माने जाने लगे हैं और सोचा जाने लगा है कि आकाश जिसके हाथ में होगा वह बिना प्रतिरोधक का आक्रमण कर सके और जिस क्षेत्र पर भी चाहे विनाश बरसाने आधिपत्य जमाने में सफल हो सकेगा। इन दिनों अन्तरिक्षीय शोधों को बड़े राष्ट्र प्रमुखता दे रहे हैं और उस पर इतनी सम्पत्ति, इतनी बुद्धि-खर्च कर रहे हैं कि आश्चर्य से चकित रह जाना पड़ता है। अन्तरिक्ष यानों की धूम है। सोचा जा सकता है,गरीबी, बीमारी, बेकारी, अशिक्षा, पिछड़ेपन जैसे अनेक कष्टों को दूर करने के लिए जब कि साधनों की भारी आवश्यकता है तब अन्तर्ग्रही खोजों पर इतने साधन लगाने की क्या आवश्यकता पड़ गई; जितने से समूची मनुष्य जाति का भाग्य बदलने की उत्साहवर्धक भूमिका निबाही जा सकती थी।

अन्तरिक्षीय शोधों के पीछे आकाश की स्थिति का युद्ध प्रयोजनों के लिए किस प्रकार उपयोग हो सकता है यह जानना भी एक बड़ा उद्देश्य है। यह आशंका सामान्य बुद्धि की भी समझ में अपना स्थान बनाती है। वस्तुतः यह आकाश की परतों का अध्ययन है। जिन पर अधिकार प्राप्त करने के बाद पृथ्वी को-उसके किसी भाग को-इच्छानुसार प्रयोग में लाया जा सकता है। यह एक प्रकार से युद्ध क्षेत्र का नया निर्माण है। अन्तर्ग्रही अन्तरिक्षीय शोधों में जहाँ मानवी ज्ञान क्षेत्र में एक नये अध्याय का समावेश होने की प्रसन्नता हो सकती है वहाँ यह आशंका भी बनी हुई है कि दुर्बुद्धि की दुरभिसंधियाँ इस ज्ञान एवं क्षेत्र का युद्ध प्रयोजनों में उपयोग कर सकती हैं और मानवी अस्तित्व के सामने चुनौती प्रस्तुत कर सकती हैं।

रूसी वैज्ञानिक एवगेनी क्योदोरोव ने ‘न्यू टाइम्स’ पत्रिका में अपने लेख में विश्व-शक्तियों द्वारा की जा रही ‘मौसम युद्ध’ की तैयारी का अति भयंकर निरूपित किया है। तथा इस पर विश्व भर में पूर्ण प्रतिबन्ध लगाने का आग्रह किया है। श्री क्योदोरोव का कहना है कि ऊपरी वायुमंडल के साथ ये छेड़खानियाँ सर्वनाश का कारण बनेगी।

सैकड़ों किलोमीटर ऊपर वायुमण्डल में पदार्थ का घनत्व अत्यल्प होता है और उसकी अवस्था में सौर विकिरण के कारण भारी परिवर्तन होता है। ऋतु वैज्ञानिक स्थितियाँ यहीं विनिर्मित होती हैं, जिनसे कि धरती का मौसम बनता है। यहाँ प्रत्येक क्रिया की तीव्र संवेदनात्मक प्रतिक्रिया धरती पर होती है। तनिक से फेर बदल से मौसमी परिस्थितियों में भारी अन्तर उत्पन्न हो जाता है।

यदि किसी क्षेत्र पर से भाप, रज-कण एवं दूसरे रासायनिक पदार्थों से बने दृश्य-अदृश्य बादलों का प्राकृतिक आच्छादन कृत्रिम वैज्ञानिक प्रयासों द्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया जाए, तो उस क्षेत्र में दिन में पृथ्वी के धरातल तक पहुँचने वाली सौर-ऊर्जा में प्रायः 20 हजार किलोवाट प्रति वर्ग किलोमीटर की वृद्धि हो सकती है। परिणामस्वरूप वहाँ की जलवायु भीषण रूप से विषम हो उठेगी।

प्रयोगों से ज्ञात हुआ है-कि 50 हजार किलोमीटर क्षेत्र में यदि यह गैसीय मेघाडम्बर छिन्न-भिन्न कर दिया जाए, तो वायुमण्डल की निचली तह में ऊष्मा-ऊर्जा का प्रवाह 50 करोड़ किलोवाट से बढ़कर 1 अरब किलोवाट तक पहुँच जाता है। स्पष्ट है कि इससे जीवधारियों का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा और भयंकर विनाश-लीला मचेगी।

इन दिनों सभी महाशक्तियाँ अन्तरिक्षीय पर्यावरण में परिवर्तन का प्रयोग सैनिक उद्देश्यों के लिए कर रही हैं। उपरोक्त रूसी वैज्ञानिक एवगेनी-क्योदोरोव ने इसी लिए इस प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए इस तथ्य का स्मरण दिलाया है कि यह अस्त्र-शक्ति का विकास मात्र नहीं है। माना कि इससे एक नया कारगर अस्त्र प्राप्त हो जाएगा। लेकिन यह अत्यधिक -अमानवीय होगा। इसकी कार्यवाही से जो परिणाम होगा, उसमें शत्रु राष्ट्र के सैनिक ही नहीं मरेंगे, बल्कि भारी पैमाने पर असैनिक आबादी भी नष्ट हो जाएगी।

बोस्टन के लेमिंगटन की वेधशाला में व्रो0 लुई स्मलिन के नेतृत्व में लेजर किरणों की युद्ध में भूमिका का निर्णय पहले ही किया जा चुका है। अंतर्महाद्वीपीय प्रक्षेपणास्त्रों को नष्ट करने में ये किरणें समर्थ हैं और रूस, अमरीका, दोनों ही उन लेजर बन्दूकों का निर्माण कर चुके हैं, जो देखने में तो छोटी हैं, पर किसी भी हवाई आक्रमण की योजना को ‘हवाई’ बना देने में पूर्ण समर्थ हैं। फ्रंकफोर्ड शस्त्रागार की लेजर बन्दूक द्वारा एक सेकेण्ड में धरती के इस छोर में बैठे-बैठे, उस छोर तक कहीं भी अचूक निशाना साधा जा सकता है।

मृत्यु किरण बम बन ही चुके हैं। लेजर किरणों का युद्ध अणु युद्धों से सस्ता पड़ेगा और पलक झपकते ही अभीष्ट क्षेत्र के सैनिक और नागरिक ही नहीं, वृक्ष, फसल, घास-पात सब भस्म हो जायेंगे।

एक ओर तो इन्हीं लेजर किरणों के रचनात्मक उपयोग से कैन्सर जैसे कुटिल रोगों पर काबू पाने में कामयाबी मिल सकेगी, राकेटों को अन्तरिक्ष में इच्छित ऊँचाई पर आसानी से उछाला जा सकेगा, पृथ्वी से ही इन अन्तरिक्षयानों को शक्ति एवं गति दी जा सकेगी। आँख की पुतली में या किसी भी कोने में ट्यूमर आदि होने पर एक सेकेण्ड के हजारवें भाग में आपरेशन द्वारा रोगी को चंगा किया जा सकेगा। दूसरी ओर इन्हीं लेजर किरणों का विध्वंसक उपयोग महाविनाश का मार्ग सरल कर देगा। वह जादुई चिराग है, जो सृजन व विनाश, दोनों क्षेत्रों में विस्मयकारी भूमिका निभाते में सर्वत्र समर्थ हैं। रूस ओर अमेरिका दोनों के हजारों वैज्ञानिक सैकड़ों प्रयोगशालाओं में इस महाशक्ति की साधना में अहर्निश जुटे हैं।

पहले तो लेजर किरणों का उत्पादन अति जटिल प्रक्रिया द्वारा ही सम्भव था, पर अब उन्हें रासायनिक क्रियाओं द्वारा भी उत्पन्न किया जा सकता है। भारी उद्विजन गैस, फ्लोरीन गैस और कार्बनडाइ-आक्साइड गैस के मिश्रण से इनको उत्पन्न किया जाता है। अस्तु उसका उत्पादन सस्ता भी हो गया है। यह तो हुई एक अन्तरिक्षीय किरण की बात। ऐसी अनेक अति महत्त्वपूर्ण शक्तिधाराएँ आकाश में भरी पड़ी हैं, जिन पर अधिकार पाकर प्रकृति के प्रवाह-क्रम को इच्छानुकूल गति एवं दिशा दी जा सकती है। भौतिक विज्ञानी इस दिशा में निरन्तर सचेष्ट हैं।

मद्रास के पगवास विज्ञान सम्मेलन में कृत्रिम प्रकृति प्रकोप उत्पन्न कर सकने की वर्तमान वैज्ञानिक उपलब्धियों की एक लम्बी सूची चर्चा का विषय बनी रही। युद्ध-सेन का यह अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग करने के स्थानों पर मात्र वैज्ञानिक प्रयोगशालाएँ किसी क्षेत्र का सर्वनाश कर सकने में समर्थ रहेंगी और युद्ध के चिह्न भी दृष्टिगोचर न होंगे। समझा यही जाता रहेगा कि यह कोई प्रकृति प्रकोप था। युद्ध में कुछ ठिकाने, कुछ मनुष्य और कुछ साधन ही नष्ट होते हैं, पर प्रकृति आतंक का उपयोग करके तो पूरे क्षेत्र ही मटियामेट किये जा सकते हैं।

एक और प्रकृति विशेषज्ञ वी0एम॰ जसानी के अनुसार भविष्य में सम्भवतः अणु आयुधों का खर्चीला और विकिरण से, अत्यन्त भी हानि फैलाने वाला प्रयोग करने के स्थान पर प्रकृति प्रकोप की शक्ति को काम में लाया जाएगा। यह इतना भयंकर होगा कि प्रतिरोध की परम्परागत क्षमता उसके आगे टिक न सकेगी और समर्थ युद्ध कौशल भी असहाय बन कर रह जाएगा।

अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति शोध अनुसंधान संस्थान के निर्देशक डा0 फ्रेंक वारनेवी ने संसार को चेतावनी दी हैं कि जिस क्रम और उत्साह से प्रकृति विजय के अंतर्गत मारक शक्तियाँ विकसित और उपलब्ध करने की होड़ चल रही है उसके घातक परिणाम उत्पन्न होंगे।

अब तक की उपलब्धियों के अंतर्गत आकाश में चमकने वाली बिजली को किसी भी ठिकाने पर गिराया और उस क्षेत्र को भस्म सात किया जा सकता है। समुद्री और स्थानीय तूफानों का रुख किसी भी दिशा में मोड़कर उन्हें वहाँ तक पहुँचाया जा सकता है जहाँ महाविनाश करना अभीष्ट हो। अदृश्य विद्युत तरंगों का प्रवाह कुछ इस प्रकार का बनाया सकता है, जिससे अमुक क्षेत्र के व्यक्ति अपना मानसिक सन्तुलन खो बैठें और मनोरोग ग्रस्तों की तरह विक्षिप्त करने लगें।

विश्व के मूर्धन्य विज्ञान वेत्ता जोसेफ गोल्ड व्लाट की चेतावनी भी इसी से मिलती-जुलती है। वे कहते हैं। विज्ञान के हाथ में अब ऐसी शक्तियाँ आ गई हैं जिनके सहारे फैक्ट्रियों में विनिर्मित अस्त्र-शस्त्रों का खर्चीला और संदिग्ध प्रयोग करने की अपेक्षा प्रकृति की हलचलों से ही व्यापक क्षेत्र का सर्वनाश किया जा सकता है। अब शत्रु को घुटने टिकाने के लिए शस्त्र प्रहार की योजना बनाना आवश्यक नहीं रहा, यह कार्य तो प्रकृति की सामान्य हलचलों को ही इधर से उधर मोड़ देने भर से सम्पन्न हो जाया करेगा। नित्य उठते रहने वाले तूफानों का उपयोग अब शत्रु के बन्दरगाह समुद्री बेड़े तथा वायुयानों को अपंग बना सकते हैं। हिम नदी का ऐसा प्रयोग हो सकता है, कि पहाड़ी दर्रों में होकर यातायात ही सम्भव न रह सकें। नदियों को सुखाया जा सकता है या उनमें उफनती बाढ़ लाई जा सकती हैं। अदृश्य किरणें किसी भी देश के तार, रेडियो जैसे संचार साधनों को ठप्प करने के लिए प्रयुक्त हो सकती हैं और उनका प्रयोग कहीं भी अग्निकाण्डों के लिए किया जा सकता है कृत्रिम जल, वर्षा में जो सफलता मिली हैं उसके आधार पर यह मार्ग भी मिल गया है कि आकाशीय बिजली की धरती पर भी वर्षा हो सके।

दुर्बुद्धि के साथ वैज्ञानिक उपलब्धियों का सम्मिश्रण होने पर उसके जो सर्वनाशी परिणाम हो सकते हैं वे सामने हैं। मानवी विवेक को इन परिस्थितियों ने चुनौती दी है कि उसे संगठित और प्रबल प्रयत्नों द्वारा इस प्रकार के गठबन्धन को रोकना चाहिए। शक्ति का स्तर और विस्तार कितना ही अधिक क्यों न हो उसका नियन्त्रण सद्भावना के हाथों में ही रहना चाहिए। अन्यथा अति परिश्रम पूर्वक भी जो प्राप्त किया जाएगा वह अन्तरिक्षीय उपलब्धियों की तरह सर्वनाश की चिन्ता और आशंका ही उत्पन्न करेगा। विज्ञान की ही तरह यही तथ्य धन,बल,बुद्धि, प्रतिभा आदि के सम्बन्ध में भी लागू होता है। उपलब्धियाँ बढ़े तो कितनी ही-पर उन्हें दुर्बुद्धि के हाथों न पड़ने दिया जाय। यह आध्यात्मिक तथ्य विज्ञान सहित सभी क्षेत्रों में प्रयुक्त किया जा सके तभी उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ साकार हो सकेंगी।


साधु, ब्राह्मण की परम्परा पुनर्जीवित की जाय

जो स्थान शरीर में हृदय और मस्तिष्क का हैं वही विश्व मानव की स्थिरता के लिए साधु और ब्राह्मण का हैं। साधु हृदय हैं और ब्राह्मण मस्तिष्क । यों दोनों ही एक लक्ष्य के पथिक हैं, पर स्थिति में थोड़ा-सा अन्तर हैं। हृदय भावनाओं का केन्द्र माना जाता है, करुणा, कोमलता, ममता, सेवा जैसे भाव-भरे कृत्य उसी के हैं। इसी लिए उदार, परमार्थ-परायण स्नेह सौजन्य भरे लोगों को सहृदय या सुहृद कहते हैं। साधु का स्वरूप यही हैं। वह भाव-भरा होता है। दूसरों का कष्ट उससे देखा नहीं जाता। पीड़ा और पतन उसे असह्य हैं। उसके पास जो कुछ हैं उसे पीड़ित मानवता की प्यास बुझाने के लिए ले दौड़ता है। वह भूल जाता है कि अपने लिए कुछ बचेगा या नहीं। सन्त एकनाथ ने प्यास से भरते हुए गधे की प्यास बुझाने के लिए अपनी वह गंगाजली उड़ेल दी थी जो रामेश्वरम् पर चढ़ाए जाने के उपरान्त स्वर्ग मिलने की आशा बँधाती थीं प्यासे गधे को मरते देख कर उनकी करुणा तिलमिलाई और स्वर्ग की तुलना में सहृदयता को बना लेना उन्होंने उचित समझा।

साधुता, सहृदयता पर्यायवाची शब्द हैं। करुणार्द्र आत्मा अपने सुख साधनों को पिछड़े, पीड़ित और पतितों पर निछावर करती रही हैं। देवत्व के परिपोषण के लिए दधीचियों को अस्थि दान देने पड़े हैं। विश्वामित्र की युग परिवर्तन प्रक्रिया को सार्थक बनाने के लिए हरिश्चन्द्र ने न केवल राजपाट वरन् अपना परिवार बेचकर भी उस वट वृक्ष को सींचा था, जिसकी छाया में संतप्त जन समाज को तत्कालीन छाया प्राप्त करने का सहारा मिलने वाला था। साधु अपनी शारीरिक वासनाओं को-मानसिक तृष्णाओं को-दुत्कारता हुआ जो मिलता है उस समस्त वैभव को जनता-जनार्दन के चरणों पर चढ़ा देता है। संयम और बलिदान का दूसरा नाम ही तप हैं। तपस्वी ही आदर्शों को सजीव रखने वाले प्रकाश स्तम्भ होते हैं। लोग उन्हीं से श्रेय पथ पर अनुगमन करने का साहस उत्पन्न करने वाली प्रेरणा प्राप्त करते हैं। इन साधु तपस्वियों से-मानवता को-अपने मस्तक ऊँचा करने का अवसर मिलता है। देवत्व उन्हीं के कारण जीवित रहता है।

समाज शरीर का दूसरा आधार हैं-मस्तक-ब्राह्मण। ब्राह्मण और साधु की स्थिति में थोड़ा अन्तर होता है। ब्राह्मण एक स्थान पर रह कर बुद्धि प्रधान कार्य करने को अपने लिए उपयुक्त देखता है इसलिए वह घर परिवार भी बना लेता है। ज्ञान साधन में संलग्न होता है। पढ़ता है और पढ़ाता है। नियत स्थान पर रहकर नियत क्षेत्र में, नियत व्यक्तियों का पौरोहित्य करता है और उस सीमित क्षेत्र में उत्कृष्टता आदर्शवादिता बनाये रहने के लिए सतत् सेवा संलग्न रहता है।

साधु परिव्राजक होता है। घर न तो बनाता है न बसाता है। यदि बस गया या बन गया था तो तब तक उसका निर्वाह करता है जब तक कि आश्रित व्यक्ति स्वावलम्बी न हो जाएँ आरम्भ में ही जिनकी भावनाएँ उमड़ पड़ती हैं वे बिना गृहस्थ में प्रवेश किये सीधे साधु बन जाते हैं और जिनका घर बस गया वे उपयुक्त अवसर आने तक ठहरते हैं। इसके पश्चात वे समस्त विश्व को अपना घर-समस्त मानव जाति को अपना परिवार मानकर ससीमता के बंधन तोड़ते हुए असीमता में प्रवेश करते हैं और जीवन मुक्ति का इसी जन्म में लाभ लेते हैं। लोक मंगल ही उनका लक्ष्य होता है। बादलों की तरह वे हर प्यासी भूमि पर पानी बरसाते हैं। रुकने में न उनकी रुचि होती हैं न आवश्यकता।

ब्राह्मणत्व सुविधाजनक हैं, साधुता बाह्य दृष्टि से कष्ट कारक। ब्राह्मण यथा शक्ति चलता है और साधु दुस्साहस का आदर्श प्रस्तुत करता है। इसलिए साधु को ब्राह्मण से श्रेष्ठ माना गया है और ऊँचा सम्मान दिया गया है। यह ऊँचा दर्जा न केवल साधु की तपस्या को देखते हुए दिया गया हैं, वरन् यह भी देखा गया है कि उनकी सेवा साधना की उपयोगिता भी अत्यधिक हैं। न्यूनतम निर्वाह में वे अधिक व्यापक अधिक महत्त्वपूर्ण सेवाएँ कर सकते हैं जो कि सीमा क्षेत्र में बँधे हुए के ब्राह्मण के लिए सम्भव नहीं हैं।

आज साधु और ब्राह्मण की दोनों ही परम्पराएँ नष्ट हो गई। प्रायः दोनों का ही वंश नाश हुआ दिखाई पड़ता है। यों वंश के ब्राह्मण और वेश के साधु दोनों मिलकर एक करोड़ के लगभग जा पहुँचे हैं। पर इनसे कुछ बनता नहीं उपहास ही होता है। स्वार्थ सिद्धि के लिए मुक्त खोरी ही जिनका लक्ष्य होगा, वे स्वयं भी गिरेंगे और उन्हें पकड़े होगे उन्हें भी साथ ले गिरेंगे। पंडा पुरोहित धन लूटने में और साधु बाबा स्वर्ग,मुक्ति और चमत्कार सिद्धि लूटने में लगें हैं। दोनों को ही सम्मान चाहिए, पैसा चाहिए। बदले में अपने शिष्य यजमानों को कुछ ऐसे जादू मन्त्र ही सिखा सकते हैं जिनसे उन बेचारों का समय और धन नष्ट होने वाला हैं। इस वर्ग में देश धर्म समाज संस्कृति के लिए दर्द होता तो वे अपना कार्य क्षेत्र प्राचीन काल के ऋषि मुनियों की तरह लोकमंगल का बनाते-जन कल्याण में जुटते। अपने को उसका अधिकारी बनाने पर उस स्तर की इच्छा तक उन्हें छूकर नहीं गई हैं। ऐसी दशा में यह आशा करना व्यर्थ हैं कि इन वेश और वंश के आधार पर पूजने वाली निर्जीव प्रतिमाओं से कोई प्रयोजन सिद्ध हो सकेगा। जन मानस में सद्विचारणाएँ भरने वाले ब्राह्मण और लोक अन्तःकरण में सद्भावनाएँ विकसित करने वाले साधु यों देश में कुछ तो होंगे ही पर उनकी संख्या जलते तवे पर पड़ने वाली थोड़ी-सी पानी की बूँदों से अधिक नहीं हो सकती।

प्रत्येक दुर्भिक्ष प्राणघातक संकट उत्पन्न करता है। वर्षा न होने से सूखा पड़ता है, अनाज और चारा न उपजने से, पीने का पानी कम पड़ने से अगणित मनुष्य पशु एवं वन्य प्राणी भूख प्यास से तड़पते हुए प्राण त्यागते हैं। सद्ज्ञान की वर्षा न होने से इससे भी बड़ा दुर्भिक्ष पड़ता है। शरीर भूखा मरे तो भी आत्मा के स्तर को आँच नहीं आती। किन्तु यदि सद्ज्ञान की वर्षा बन्द हो जाए तो मनुष्य की आत्मा ही मरती हैं। विचारणा और भावना का स्तर गिर जाने का स्वाभाविक परिणाम कुकर्मों का-दुष्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन होता है। इस दुर्भिक्ष से पीड़ित जनमानस संकीर्ण स्वार्थ भरे व्यक्तिवादी दल-दल में फँसता है। अनाचारों और अपराधों में लाभ देखता है और प्रकट-अप्रकट रूप से ऐसी गतिविधियाँ अपनाता है जिससे मनुष्य को असुर रूप में देखा जा सके और सामाजिक जीवन में नारकीय परिस्थितियाँ उफन चलें। आज यही दृश्य सामने हैं। इस दुर्गति के लिए गरीबी अशिक्षा आदि को दोष देना व्यर्थ है। यह सब तो चिन्तन भ्रष्टता की, विष बेल पर लगने वाले छोटे-छोटे फल मात्र हैं।

इस तथ्य को हमें हजार बार समझना चाहिए कि मनुष्य, हाड़-माँस का पुतला नहीं हैं। वह एक चेतना हैं। भूख चेतना की भी होती हैं। विषाक्त आहार से शरीर मर जाता है और भ्रष्ट चिन्तन से आत्मा की दुर्गति होती हैं। प्रकाश न होगा तो अन्धकार का साम्राज्य ही होना हैं। सद्ज्ञान का आलोक बुझ जाएगा तो अनाचार की व्यापकता बढ़ेंगी ही। भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट कर्तव्य का परिणाम व्यक्ति और समाज की भयानक दुर्दशा के रूप में ही सामने आ सकता है। यह सिद्धान्त मात्र नहीं -प्रत्यक्ष तथ्य हैं। आज हम चारों और आँख उठाकर यही सब देख रहे हैं। रोटी कपड़े के बिना कोई नहीं मर रहा हैं-निर्वाह की आवश्यकता किसी की भी रुकी नहीं पड़ी हैं फिर भी हर व्यक्ति वैसा सोच रहा हैं-वैसा कर रहा हैं जिससे मनुष्यता का गौरव नहीं बढ़ता। समाज में शान्ति का वातावरण नहीं बनता। इस विपत्ति का कारण मानवी चेतना को सद्ज्ञान का पोषण न मिलना ही एक मात्र कारण हैं। यदि यह दुर्भिक्ष न पड़ा होता तो भौतिक साधनों की इतनी कमी नहीं होती, जिसके कारण दसों-दिशाओं में त्राहि-त्राहि गुँजाने वाला करुण क्रन्दन उठ रहा है।

अपने युग की इस महान विपत्ति की दूर करने के लिए सद्ज्ञान की गंगा का अवतरण पुनः करना होगा। अब 60 हजार नहीं 60 करोड़ सगर पुत्र नरक की आग में जल रहे हैं। इन्हें शान्ति देने के लिए स्वर्ग से धरती पर गंगा अवतरण वाली पौराणिक गाथा की जीवन्त पुनरावृत्ति होनी चाहिए। इसके लिए भाव-भरे भागीरथों को कठोर तप साधन के लिए आगे आना चाहिए। इससे कम में वृभ वेदना को शान्त न किया जा सकेगा। विनाश का सर्वभक्षी वृत्तासुर दधीचियों की अस्थियों के वज्र के अतिरिक्त किसी शस्त्र से मरेगा नहीं।

साधु और ब्राह्मण की परम्पराओं का पुनर्जीवन हमारा प्रधान लक्ष्य है। मनुष्य की गरिमा को सुस्थिर बनाये रहने और ऊँचा उठाते चलने के लिए यही दो भुजाएँ दैवी प्रयोजन पूरा करती रही हैं- कर सकती हैं।

अखण्ड-ज्योति प्रयत्न यह भी करती रही है कि वंश और वेश धारण करने वाले लोगों को उनके कर्तव्य उत्तरदायित्वों का बोध कराया जाय और उन्हें कर्तव्य पालन करने के लिए कहा जाय जिसके नाम पर उन्हें पीढ़ियों से प्रचुर धन सम्मान मिलता चला आ रहा है। ऋण चुकाने के नाम पर भी उन्हें कुछ करना चाहिए था, देव लक्ष्य पूरा करने की भावना जगती तब तो बात ही क्या थी; पर हमें अत्यन्त दुःख के साथ अपनी असफलता स्वीकार करनी पड़ती हैं कि परम्परा गत साधु ब्राह्मणों के दरवाजे पर पूरी तरह लम्बे समय से सिर फोड़ते रहने पर भी उन्हें पिघलाना सम्भव न हो सका। जिन्हें मुफ्त का धन और मान मिल रहा है उन्हें ऐसे झंझट में पड़ना जरा भी नहीं सुहाया जिसमें उन्हें स्वयं कष्ट साध्य आदर्शवादी अपनाना पड़ता और लोक सेवा पथ पर चलते हुए पग-पग पर तप-तितीक्षा का परिचय देना पड़ता।

नव युग-निर्माण के लिए नये सिरे से अपने प्रयत्न आरम्भ हुए है। इस भवन का निर्माण साधु और ब्राह्मणों के ईंट-चूने से ही सम्भव होगा। इनकी आवश्यकता कहीं से भी-किसी भी मूल्य पर पूरी करनी पड़ेगी। युग की इस महती आवश्यकता के साधन जुटाने के लिए हम कितने प्यासे फिर रहे हैं- कितने छटपटाते हैं इसे कोई भी हमारे समीप आकर हमारे भीतर घुस कर देख सकता है।

अपने 40 वर्षों के प्रयास में अखण्ड-ज्योति ने ब्राह्मण संस्था का एक छोटा ढाँचा खड़ा करने में थोड़ी सफलता प्राप्त की है। युग निर्माण परिवार के कर्मठ कार्यकर्ता सद्ज्ञान सम्पदा के निर्माण एवं वितरण की आवश्यकता समझते हैं। वे संयमी ब्राह्मणों की तरह अपनी निजी सुख-सुविधा में कटौती करके जो समय, मनोयोग, पैसा बचाते हैं उसे ज्ञान देवता के युग यज्ञ में भावनापूर्वक झूमते रहते हैं। यही है वह आलोक जिसे देखकर हमारी आँखों में आशा की ज्योति जलती रहती है।

ब्राह्मण घर परिवार में रहता है और अपनी गृहस्थी के निर्वाह में न्यूनतम शक्ति नियोजित करने के पश्चात् जो कुछ बचता है उसे लोक मंगल में लगा देता है। अपने कर्मठ कार्यकर्ता यही करते हैं। पेट पालने के लिए परिवार पोषण के लिए जितनी न्यूनतम शक्ति खर्च करने से काम चलता है; उतने से ही काम चलाते हैं। अमीर बनने, दौलत जमा करने और बड़े आदमी होने की लिप्सा छोड़ देने और किसी प्रकार निर्वाह चलने से सन्तुष्ट रहने की, मनोभूमि बना लेने के उपरान्त ही उनके लिए इतना कुछ कर सकना संभव हुआ है जिससे नवयुग का अरुणोदय होता हुआ दिखाई पड़ रहा है। इसे इन कर्मवीर युग निर्माताओं के तप त्याग का-ब्राह्मणत्व का-अनुदान ही कहा जा सकता है।

आपत्ति धर्म के रूप में ब्राह्मणत्व और साधु परम्परा को पुनर्जीवित कराने के लिए अपने प्रयास सामयिक हैं। इससे कुछ तो काम चलता ही है, पर वह बात नहीं बनती जो पूरा समय लगाने वाले साधु ब्राह्मणों द्वारा बनती थी-बन सकती है। हमारे अगले प्रयास इसी दिशा में होने चाहिए और साधु ब्राह्मणों की गरिमा को मूर्तिमान करने में अपना समूचा जीवन समर्पित करने वाले उदाहरण आगे आने चाहिए। यह प्रयोजन अखण्ड-ज्योति परिवार के लोगों को ही पूरा करना होगा। अब उसमें इतनी भावना और क्षमता उत्पन्न होनी चाहिए कि साधु और ब्राह्मणों को आधे अधूरे नहीं पूरे परिपक्व प्रतीकों को युग देवता के चरणों में प्रस्तुत कर सकें। अपने परिवार ने बालपन समाप्त करके प्रौढ़ता में प्रवेश पा लिया; इसका यही प्रमाण हो सकता है-कि वह साधु और ब्राह्मणों की युग आवश्यकता को पूरा करके दिखाये।


यश और धन तब भयंकर दैत्य बन जाते हैं

भावनात्मक सन्तुलन और मानसिक सन्तोष यदि प्राप्त न किया जा सके तो अपार सम्पदा और दिगन्त व्यापी प्रसिद्धि भी अभीष्ट सुख नहीं दे सकती। समझा जाता है कि सभी कठिनाइयों का हल और कष्टों का निदान सम्पत्ति है। यदि पास में पैसा हो तो उससे दुनिया की हर चीज खरीदी जा सकती हैं और प्रसिद्धि से मनुष्य अपने नाम को अमर करने का उद्देश्य पूरा कर सकता है। लेकिन ये उपलब्धियाँ भी मनुष्य को सुखी नहीं बना सकती हैं यदि आन्तरिक क्षेत्र में सन्तुलन न लाया जा सके तो उल्टे मुसीबत का पहाड़ टूट पड़ता है। जो जिन्दगी सामान्य ढंग से बिताई जा सकती थी और अभावों को सहन किया जा सकता था, अपमान बर्दाश्त हो सकता था, उपेक्षा बर्दाश्त की जा सकती थी वही जिन्दा या समृद्धि और प्रसिद्ध के बावजूद भी नरक की यातनाओं में झुलसने लगती है और आदमी के सामने आत्म-हत्या जैसा कृत्य करने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं रह जाता।

घटना सन् 1962 की है। क्या अमरीकी और क्या गैर अमरीकी सभी फिल्म दर्शकों की जबान पर मर्लिन-मनरो की चर्चा थी। उस वर्ष 5 अगस्त को यह अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने वाली, फिल्म प्रेमियों की चहेती अभिनेत्री प्रातःकाल अपनी कोठी में मृत पायी गयी थी। इस अभिनेत्री के पास बताते हैं कि इतनी दौलत थी, जिससे वह विश्व के सर्वाधिक सम्पन्न व्यक्तियों की गणना में आ जाती थी। उनसे भी अधिक महत्त्व था उसका। क्योंकि दुनिया का हर अमीर तो धनवान होने के साथ-साथ रसिक स्वभाव का भी था मर्लिन पर अपनी जान छिड़कता था। अमीर से अमीर और गरीब से गरीब व्यक्ति जो भी उनकी चर्चा सुनता उसकी एक झलक पाने के लिए बेचैन हो जाता। इस स्थिति को देखते हुए जब लोगों ने देखा कि मर्लिन अपनी कोठी में मृत पायी गयी हैं तो बिना सोचे समझे कह उठे उससे ईर्ष्या रखने वाली अभिनेत्रियों ने अथवा उसके निकटवर्ती लोगों ने उसकी सम्पत्ति प्राप्त करने के लिए मार डाला।

लेकिन वास्तविकता और ही थी। इस बात की पुष्टि कई प्रमाणों से हो गयी थी कि मर्लिन को किसी ने मारा नहीं है, वरन् उसने आत्म-हत्या कर ली है। कोई अभाव, कोई मानसिक आघात या कोई ऐसी घटना नहीं घटी थी जिससे दुखी होकर वह आत्महत्या कर ले पर उसने आत्महत्या की थी- यह सच है। आत्महत्या के कारणों को लेकर कई अनुमान लगाये गये। उनमें सबसे अधिक तर्क संगत कारण यह बताया गया है कि मर्लिन अपनी मानसिक उलझनों में इतनी अधिक ग्रसित हो गयी थी कि उसके सामने उनसे छुटकारा पाने के लिए आत्महत्या के अतिरिक्त कोई और चारा नहीं रहा।

मरलिन का बचपन बड़ी कठिनाइयों में गुजारा था। उसकी माँ आर्थिक तंगियों और पारिवारिक उलझनों के कारण इतनी दुःखी रही कि पागल हो गयी। मरलिन जब सात-आठ वर्ष की थी तो उसकी माँ पर पागलपन का भयानक दौरा पड़ा और इस कारण उसे पागल खाने भेज दिया गया। सात-आठ वर्ष की बालिका मरलिन अकेली रह गयी, न उसके खाने का कोई ठिकाना रहा न रहने का। कुछ लोगों ने दया के वशीभूत होकर उसे अनाथालय भेज दिया। विडम्बना तो यह कि तब उस बालिका का कोई निश्चित नाम भी नहीं था। उसे नारमा के नाम से अनाथालय में भर्ती करवाया गया। अनाथालय में वह करीब एक साल तक रही। साल भर बाद ठीक होकर नारमा की माँ आ गयी और अपनी लाड़ली को अपने साथ रखने लगी। नारमा की माँ ग्लैडिशबेकर ने एक फिल्म स्टूडियो में रील काटने की नौकरी कर ली थी। इसके बदले जो भी मिलता उससे माँ बेटी अपना गुजारा करतीं।

अभी माँ के संरक्षण में रहते नारमा को एक वर्ष भी नहीं हुआ था कि माँ फिर पागल हो गयी। ग्लैडिशबेकर को पुनः अस्पताल भेज दिया गया। नारमा फिर अनाथ हो गयी। इस बार ग्लैडिशबेकर के एक मित्र ने नारमा को अपने घर पर रखा लिया। उसे अनाथालय नहीं जाने दिया। श्री गोडार्ड ने अपनी पत्नी से इस बच्ची को बेटी के समान समझने और उसी तरह रखने के लिए कहा। तथा इस मित्र परिवार में जैसे नारमा को अपना खोया हुआ माता-पिता का प्यार मिल गया।

किशोरावस्था की ही एक घटना ने उसे यह मानने के लिए मजबूर कर दिया कि दुनिया में स्वार्थी लोग भरे पड़े हैं और अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए किसी की भावनाओं से क्रूर मजाक कर सकते हैं ।इस अनुभव ने उसे पैसा कमाने तथा प्रसिद्धि प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया ताकि वह भी इस स्वार्थी संसार में इज्जत के साथ जी सके। मरलिन ने अपने लिए रास्ता चुना अभिनेत्री बनने का। उस समय हालीवुड की अभिनेत्रियाँ ठाट-बाट और शान-शौकत से रहने लगी थीं ।मरलिन को भी उनकी चमक-दमक ने प्रभावित किया। सुन्दर तो वह थी ही। अपनी सुन्दरता का अहसास भी उसे इतना जबर्दस्त था कि उसी के बल पर उसने फिल्म जगत में प्रवेश पाने और चमकने को स्वप्न संजोया।

गोर्डाड परिवार ने उसे पढ़ा लिखाकर योग्य बनाने के लिए स्कूल में भर्ती करवाया, पर वह अपनी सुन्दरता का जादू चलाने में ही व्यस्त रहती। यहीं से गलती आरम्भ हुई। सन् 1942 में उसने 16 वर्ष की आयु में एक स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट नवयुवक से शादी की। मरलिन चाहती थी कि उसका पति उसकी सुन्दरता के ही गुणगान किया करे, उसकी तारीफों के पुल बाँधा करे; जबकि उसका पति कामकाजी आदमी था, और मरलिन के सौंदर्य को इतना नहीं सराह पाता था जितना कि वह चाहती थी। इसी बात पर मरलिन ने अपने सम्बन्धों में तनाव पैदा किया और वर्ष बाद ही तलाक ले लिया। काश मरलिन अपने सौंदर्य को पूजने वाले के स्थान पर एक जिम्मेदार पति को गुणों की कद्र करने वाला समझती तो भले ही वह अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त करने वाली अभिनेत्री नहीं बनती, पर एक शान्त और सुस्थिर जीवन तो व्यतीत कर ही सकती थी।

स्वयं उसे अपनी सुन्दरता का महत्त्व नहीं मालूम था। उसे तो मरलिन एक बिकाऊ उपलब्धियाँ समझती थी जिसकी अधिक से अधिक कीमत प्राप्त करनी चाहिए। अपने पहले पति से तलाक लेकर मरलिन ने लासएंजिल्स की एक फोटोग्राफर एजेंसी में नौकरी कर ली। जो व्यापारिक विज्ञापनों के लिए लड़कियों की तस्वीरें खींचती और उन्हें व्यापारिक कम्पनियों को उनके उत्पादनों की बिक्री बढ़ाने हेतु विज्ञापनों के लिए बेच देती। इस तरह मरलिन मनरो मॉडल गर्ल्स का काम करने लगी।

सुनहरे बालों वाली, छरहरी, गठीली और सुन्दर देह-यष्टि की इस स्वामिनी ने अपनी सुन्दरता के बल पर शीघ्र ही मॉडल गर्ल के रूप में ख्याति प्राप्त कर ली। एक वर्ष में ही विज्ञापन एजेन्सियों के लिए उसका चेहरा जाना पहचाना हो गया। उसकी सुन्दरता का सम्मोहन अमेरिकी नागरिकों पर इस तरह छाया कि प्रत्येक वह चीज जिसके विज्ञापन में मरलिन का चेहरा होता था बेतहाशा लोकप्रिय होने लगी।

यह लोकप्रियता मरलिन की लोकप्रियता ही थी। इसी से प्रभावित होकर हालीवुड की एक फिल्म कम्पनी ने मरलिन की ओर हाथ बढ़ाया। यह तो वह चाहती ही थी। कुछ समय पहले उसने स्वयं फिल्म जगत में प्रवेश पाने के लिए हाथ-पैर मारे थे पर असफलता ही मिली थी। इसीलिए उपयुक्त अवसर की प्रतीक्षा करते हुए उसने मॉडलिंग का पेशा अपना लिया था। संयोग से वह अवसर वर्ष भर में ही आ गया जब ‘ट्रवण्टियथ सेन्चुरी फोक्स’ ने उसे फिल्मों में काम करने के लिए निमन्त्रित किया। मरलिन वहाँ पहुँची और स्क्रीन टेस्ट दिया। जिस कैमरा मैन ने उसके चित्र खींचे थे, उसने मरलिन के चित्रों को देखकर यह सम्मति दी थी कि यह अभिनेत्री शीघ्र ही फिल्म दर्शकों की हृदय सामग्री बन जाएगी। उस समय मरलिन की आयु 22 वर्ष की थी। स्क्रीन टेस्ट में सफल हो जाने के बाद मरलिन को ‘स्काड हू’ नामक फिल्म के लिए अनुबन्धित कर लिया गया।

इससे पूर्व एक और घटना, उसे प्रसिद्धि दिलाने में बड़ी सहायक हुई थी। कोलम्बिया की एक कम्पनी ने उसका चित्र 50 डॉलर में खींचा था। उस कम्पनी ने मरलिन का चित्र एक कैलेण्डर छापने वाली कम्पनी को 500 डॉलर में बेच दिया। यह कैलेण्डर और उसमें चित्रित चेहरा लोगों ने इतना पसन्द किया कि उक्त कम्पनी ने इससे साढ़े सात लाख डॉलर का मुनाफ़ा कमाया। समझा जा सकता है कि फिल्म के रूपहले पर्दे पर आने से पहले मरलिन ने अपनी सुन्दरता के बल पर कितने लोगों को अपना प्रशंसक बना लिया था।

जब उसकी फिल्म बनकर तैयार हुई और प्रदर्शित हुई तो सारे सिनेमाहॉल जिनमें कि वह फिल्म चल रही थी आदि से अन्त तक दर्शकों से खचाखच भरे रहे। अपनी पहली फिल्म से ही इतनी लोकप्रियता प्राप्त कर लेने वाली मरलिन दिनों दिन ऊंचाइयों चढ़ती गयी। लेकिन जैसे-जैसे वह प्रसिद्ध होती गयी जैसे-जैसे उसके पास सम्पत्ति का अम्बार जुटने लगा, उसकी भावनाएँ असन्तुलित होने लगीं। फिल्म-जगत में रहते हुए उसने दो और विवाह किये; पर उसकी यही शिकायत रही कि मुझे सच्चा प्यार देने वाला कोई नहीं मिला। वह हमेशा ही यह कहती रहती कि मेरे पास जो भी आया और जिसने भी प्रेम करना चाहा वह या तो मेरी दौलत की ओर देखता था अथवा मेरी सुन्दर और कमनीय देह को देखकर आकृष्ट होता था।

प्रश्न उठता है कि जो शिकायत मरलिन को रही उसका कारण क्या है ? जिस सुन्दरता को मरलिन ने अभिशाप समझा उसे अभिशप्त बनाने के लिए किसी दूसरे की अपेक्षा मरलिन ही अधिक उत्तरदायी है। यदि वह प्रारम्भ में अपनी सुन्दरता को बेतहाशा दौलत कमाने का तरीका नहीं बनाती और केवल कलाकार की तरह ही जीने का प्रयत्न करती तो सम्भवतः उसके पास वह आत्मिक पूँजी भी एकत्र हो सकती थी, जिसका कि उसके पास अभाव था। यद्यपि वह कलाकार भी अच्छी थी, पर उसने अपनी कला को निखारने के स्थान पर सुन्दरता को प्रचारित करने पर अधिक ध्यान दिया। एक के बाद एक कर मरलिन ने तीन विवाह किए। पर उसे अभीष्ट सुख तीनों विवाह से नहीं मिल सका। तीसरा विवाह तो उसने प्रसिद्ध कथाकार और नाटककार आर्थर मिलर से किया था। मिलर से विवाह करने के बाद उसने स्वयं कहा था कि-जीवन में पहली बार मुझे प्रेम और सुरक्षा का आभास मिला है जिसके लिए मैं बचपन से भूखी थी। पर वह विवाह भी नहीं चल सका और शीघ्र ही दोनों में तलाक हो गया। कारण कि मरलिन ने भले ही अपना साथी बदल लिया हो और उसे पहले की अपेक्षा अच्छा साथी मिल गया हो, पर उसका अन्तःकरण तो वही था। उसकी मान्यताएँ तो सौन्दर्याभिमान से प्रेरित थीं।

36 वर्ष की आयु में बताते हैं उसने अपने चेहरे पर कहीं एकाध झुर्री देखी और यह झुर्री ही उसके लिए जानलेवा सिद्ध हुई है। उसके निकटवर्ती लोगों का कहना था कि अक्सर वह निराशावादी बातें किया करती थी और कहा करती थी कि मैं बूढ़ी हो जाऊँगी तब क्या होगा। जो लोग मेरा सौंदर्य देखकर रीझते हैं, आहें भरते हैं मेरी वृद्धावस्था के कारण वे ही लोग मेरी ओर से मुँह मोड़ लेंगे। तथा मुझे किसी एकान्त में अपना बुढ़ापा गुजारना पड़ेगा। यह स्थिति में कैसे सहन करूँगी। इन आशंकाओं से उसका भावुक हृदय घिरा रहता था। कई बार तो वह घण्टों तक शीशे के सामने बैठी रहती थी।

इस प्रकार भावनाओं का सन्तुलन बनाये रखने में असफल होने के कारण उसने अपने आसपास काल्पनिक भय के कई भूत पैदा कर लिये। वह उन भूतों को देखकर दिन-रात डरा करती, चौंक जाया करती थी। इन आशंकाओं के भूत से भयभीत होकर ही मरलिन ने एक रात ढेरों नींद की गोलियाँ खा लीं और चिर निद्रा में सो गयी। विचारशीलों का कहना है कि इतनी दौलत और इतनी ख्याति अर्जित कर मरलिन ने क्या पाया ? सिवा यातनाओं और आशंकाओं से उद्विग्न हृदय के। इससे बेहतर तो यह है कि वह अपने पास कीर्ति और सम्पत्ति के विष इकट्ठे ही नहीं करती और इकठ्ठा करना ही था तो किसी उद्देश्य के लिए उनका उपयोग करती।

सच है; सम्पत्ति और ख्याति हो पास में तथा उसके उपयोग का कोई रास्ता न हो तो ये भयानक दैत्य बन जाती हैं। आवश्यक है कि अर्जन के साथ विसर्जन की भी रूपरेखा बनायी जाय और अपनी भावनाओं को सन्तुलित साधा जाय। अन्यथा किसी विष की तरह जो विवेकपूर्वक उपयोग करने से औषधि बन जाता है, वही अविवेकपूर्वक उपयोग करने से घातक भी बन सकता है।


शब्द ब्रह्म की साधना के दो चरण!

स्थूल जगत में चल रही ध्वनि धाराओं के लाभ हानि से विज्ञान के विद्यार्थी परिचित हैं कि अवांछनीय कोलाहल से अन्तरिक्ष कितना विक्षुब्ध होता है और उसका भयानक प्रभाव प्राणियों और पदार्थों पर किस प्रकार विपत्ति बरसाता हैं? बड़े शहरों और कारखानों से उत्पन्न कोलाहल के दुष्परिणामों को अब भली प्रकार समझा जाने लगा हैं और उसकी रोकथाम के लिए गम्भीर विचार हो रहा है। दूसरी ओर उपयोगी ध्वनियों को लाभ उठाने के लिए भी एक से एक बढ़े-चढ़े आविष्कारों की शृंखला सामने आ रही हैं। रेडियो जैसे उपकरणों से संवाद प्रेरणा आदि के कार्य लिए जा रहे हैं। इस प्रकार ध्वनियों को समझने,पकड़ने रोकने एवं प्रेषण के लिए भी भरपूर प्रयत्न हो रहे हैं। लाउडस्पीकर, टेपरिकार्डर जैसे यन्त्रों की भरमार होती चली जा रही हैं। संगीत के प्रभाव से मनुष्यों की शारीरिक मानसिक विकृतियों के उपचार होते हैं। उनसे सुखद सम्वेदनाएँ उभारने का काम लिया जाता है। इतना ही नहीं दुधारू पशुओं का दूध बढ़ाने-बागवानी एवं कृषि कार्य के क्षेत्र में अधिक अच्छी सफलताएँ पाने के लिए लय और ताल बद्ध ध्वनि प्रवाहों का उत्साहवर्धक उपयोग हो रहा है। ध्वनि की शक्ति बारूद, भाप, बिजली, अणु शक्ति से अधिक ही आँकी गई हैं। प्रयत्नपूर्वक ऊर्जा उत्पन्न करना महंगा भी हैं और कष्ट साध्य भी। प्राकृतिक ऊर्जा जो ध्वनि प्रवाह के रूप में सर्वत्र संव्याप्त हैं उसको पकड़ने और उपयोग में लाने की आशा विज्ञान क्षेत्र में पुलकन उत्पन्न कर रही है। समझा जा रहा हैं कि इस क्षेत्र में जिस दिन विज्ञान को कुछ कहने लायक सफलता मिल सकेगी उस दिन वह अब की अपेक्षा असंख्य गुणी शक्ति का अधिपति बन जाएगा।

यह तो हुई स्थूल में चलने वाले ध्वनि प्रवाह की क्षमता एवं उपयोगिता की तनिक-सी झाँकी। इसके ऊपर सूक्ष्म जगत हैं। उसमें चलने वाले ध्वनि प्रवाह और भी अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। यद्यपि वे मशीनों की पकड़ में नहीं आते तो भी उनके अस्तित्व को चेतनात्मक उपकरणों की सहायता से समझा जा सकता है। समझा ही नहीं उपयोग में भी लाया जा सकता है। यन्त्रों से तो अब तक परमाणु का स्वरूप तक नहीं देखा जा सका। उसकी प्रतिक्रियाओं को देखते हुए उसका स्वरूप कल्पित किया गया है। कल्पना की यथार्थता इसलिए मान्य की गई कि परमाणु से शक्ति उत्पादन की सफलता ने उसके समर्थन में साक्षी प्रस्तुत कर दी। सूक्ष्म जगत की ध्वनियों का विज्ञान भौतिक क्षेत्र की शब्द विद्या से कम नहीं अधिक ही महत्त्वपूर्ण हैं। शरीर से प्राण की क्षमता अधिक ही महत्त्वपूर्ण हैं। शरीर से प्राण की क्षमता अधिक होने का तथ्य सर्व स्वीकृत हैं। स्थूल जगत की तुलना में सूक्ष्म जगत की गरिमा को भी ऐसी ही वरिष्ठता देनी होगी। ध्वनि प्रवाह के सम्बन्ध में भी यही बात हैं। श्रवणातीत ध्वनियाँ विज्ञान जगत में अपनी गरिमा का प्रभाव समझा चुकी हैं। मनुष्य उनसे संपर्क जोड़ने के लिए बेतरह लालायित भी हो रहा है। सूक्ष्म जगत की ध्वनि सम्वेदनाओं का महत्त्व श्रवणातीत ध्वनियों से उच्चस्तरीय हैं। भौतिक जगत की ध्वनियों से मात्र भौतिक प्रयोजन ही सिद्ध हो सकते हैं सूक्ष्म जगत के ध्वनि प्रवाह यदि मनुष्य की समझ एवं पकड़ की सीमा में आ सके तो उसके चेतनात्मक लाभ प्रचुर मात्रा में उठाए जा सकते हैं।

तत्त्वज्ञानी महामनीषियों को मात्र धर्मोपदेशक नहीं मानना चाहिए। वे सूक्ष्म जगत के स्वरूप को समझने और उसके साथ सम्बन्ध जोड़कर अतीन्द्रिय ज्ञान विकसित करने के प्रयास में संलग्न रहे हैं। इस कल्याण और सूक्ष्म विज्ञान के अधिकरण का दुहरा प्रयास कहा जा सकता है। हमारे ऋषि ज्ञानी भी थे और विज्ञानी भी। उनकी साधनाएँ आत्म-साक्षात्कार के लिए भी थीं और सूक्ष्म जगत में प्रवेश एवं अधिकार पाने के लिए भी। योग साधना के साथ स्वर्ग मुक्ति की भावनात्मक और ऋद्धि-सिद्धि की शक्ति परक सफलताएँ जुड़ी हुई हैं।

योग साधनाओं में सूक्ष्म ध्वनि क्षेत्र से संपर्क बनाने और लाभ उठाने के दो प्रयोग रहे हैं। शब्द विद्या की दो धाराएँ मानी गई हैं, एक तो पकड़ने , समझने और उनके सहारे अविज्ञात सम्भावनाओं से परिचित रहने की हैं जिसे नादयोग कहा गया है। नादानुसंधान की महिमा योग शास्त्र में विस्तार पूर्वक बताई गई हैं। उनके सहारे सूक्ष्म जगत की हलचलों की जानकारी प्राप्त करने का लाभ बताया गया है। यह कहने सुनने में छोटी किन्तु व्यवहार में बहुत बड़ी बात हैं। स्थूल जगत की वस्तु स्थिति से जो जितना परिचित हैं, उसे उतना ही बड़ा ज्ञानवान कहा जाता है। इस जानकारी के आधार पर ही लोग विभिन्न क्षेत्रों में आशातीत सफलताएँ पाते हैं। जिसकी जानकारियाँ जितनी सीमित हैं वे उतने ही पिछड़े समझे जाते और घाटे में रहते हैं। सूक्ष्म जगत की अद्भुत जानकारियों से परिचित रहने वाले नादयोगी अति महत्त्वपूर्ण वस्तु स्थिति समझ लेते हैं और उनके सहारे खतरों से बचने एवं अवसरों से लाभ उठाने का प्रयत्न करते हैं। यह लाभ वे अपने लिए भी लेते हैं और दूसरों का भी हित साधन करते हैं। नादयोग के सहारे देव तत्त्वों से परब्रह्म से जो सीधा सम्बन्ध बनता है उसका अंतःक्षेत्र के परिष्कार में कितना बड़ा योगदान मिलता है, यह अनुभवों का विषय हैं। नादानुसंधान के प्रवीण अभ्यासी इस क्षेत्र में प्रवेश पाने से मिली सफलताओं से चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करते देखे गये हैं।

नादयोग की-सूक्ष्म जगत की दिव्य ध्वनियों के साथ संपर्क बनाने की विद्या का महत्त्व बहुत सी हैं। इस विज्ञान का लाभ , स्वरूप एवं प्रयोग समझाते हुए ऋषियों ने बहुत कुछ कहा है।

नादबिन्दूपनिषद में वर्णित हैं-

ब्रह्म प्रणव सन्धानं नादो ज्योतिर्मयः शिवः। स्वयमाविर्भवेदात्मा मेघापार्येऽशुमानिव॥

यत्र कुत्रापि वा नादे लगति प्रथमं मनः। तत्र तत्र स्थिरीभूत्वा तेन सार्ध विलीयते॥

सर्वविन्ताँ समुत्सृज्य सर्वचेष्टा विवर्जितः। नाद मेवानुसन्दध्यात्रादे चित्तं विलीयते॥

नियामन समर्थोऽयं निनादो निशिताड़्कुशः। नादोऽन्तरंगसारंगबन्ध्ने वागुरायते॥

अर्थात्- नादयोग ज्योतिर्मय शिव हैं। वेदात्मा है। अशुभों का निवृत्ति कर्ता है। जब नाद के आधार पर मन स्थिर हो जाता है तो वह परमात्मा में विलीन हो जाता है। इसलिए समस्त चिन्ताओं और हलचलों से छुटकारा पाकर शान्ति से नादानुसंधान करना चाहिए। इस प्रयास के फलस्वरूप जो दिव्य शब्द श्रवण की अनुभूतियाँ होती होती हैं उससे अंतःक्षेत्र की दुर्बलताओं और विकृतियों की निवृत्ति होती हैं। दिव्य क्षमता जगती हैं।

वायवीय संहिता में नाद को शक्ति का उद्भव कर्ता बताते हुए कहा गया हैं-” नादाच्छक्ति समुह्णवः”।

अन्तःकरण को निर्विषय बना लेने से उसकी दिव्य क्षमताएँ उभरती हैं मन को निर्विषय बनाने के लिए नादयोग का अभ्यास अतीव श्रेयस्कर सिद्ध होता है। कहा गया है।-

मकरन्दं पिबन् भृगों गन्धं नापेक्षते यथा। नादा सक्तं तथा चित्तं विषया हि काँक्षते॥ -हठयोग

अर्थ-जिस प्रकार पुष्पों के मकरन्द को पाने करने वाला भ्रमर दूसरे गन्ध को नहीं चाहता, उसी प्रकार नाद में आसक्त हुआ अन्तःकरण अन्य विषयों की अभिलाषा नहीं करता है।

शब्द की नाद की, अनुभूति यदि ठीक तरह होने लगे तो उसके सत्परिणाम भौतिक और आत्मिक दोनों ही क्षेत्र के मनोरथों को पूरा करते हैं-

एकःशब्दः सम्सग्ज्ञातः सुष्टु प्रयुक्तः स्वर्गे लोके च काम धुग भवति। -श्रुति

एक ही शब्द की तात्त्विक अनुभूति हो जाने से समस्त मनोरथों की पूर्ति हो जाती हैं।

यह नादानुसंधान श्रवण पक्ष हुआ। शब्द विद्या का दूसरा पक्ष है-ध्वनि का अभीष्ट उद्देश्य के अनुरूप उत्पादन एवं प्रयोग। इसे मन्त्र योग कहते हैं। नादयोग से ग्रहण और मन्त्र योग से प्रेषण की क्षमता उत्पन्न होती है। दोनों को मिला देने से ही एक ऐसा स्वर विज्ञान बनता है जो सूक्ष्म जगत की ध्वनि परिस्थितियों का उभय-पक्षीय उपयोग कर सके। घरों में रहने वाले रेडियो यन्त्र मात्र ध्वनि को पकड़ते हैं। इससे एकांगी प्रयोजन पूरा होता है। टेलीफोन की तरह ग्रहण प्रेषण की उभय-पक्षीय व्यवस्था जहाँ होती है वहीं पूर्णता मानी जा सकती है। नादयोग और मन्त्र योग की दोनों ही धाराएँ मिलकर शब्द ब्रह्म की समग्र क्षमता प्रस्तुत करती है। सुने जाने वाले प्रवाह को शब्द ब्रह्म और कहे जाने वाले को परब्रह्म की संज्ञा दी गई है-

आगमोक्ता विवेकाच्यं द्विघा ज्ञानं तथोच्यते। शब्दब्रह्मा ऽऽगमयं परं ब्रह्म विवेकजम्। -अग्निपुराण

एक शब्द ब्रह्म है दूसरा परब्रह्म। शास्त्र और प्रवचन से शब्द ब्रह्म और विवेक, मनन, चिंतन से परब्रह्म की प्राप्ति होती है।

शब्द ब्रह्म, परब्रह्म भार्गेम्याँ शाश्वती तनु। -भागवत

शब्द ब्रह्म और परब्रह्म यह दोनों ही भगवान के नित्य और चिन्मय शरीर हैं।

कुण्डलिनी जागरण में मन्त्राराधन एवं नादानुसंधान के रूप में इस शब्द शक्ति का ही प्रयोग करना पड़ता है। इन दोनों ही धाराओं का उपयोग करने से अन्तः ऊर्जा का प्रखरीकरण-कुण्डलिनी जागरण सम्भव होता है।

चैतन्यं सर्व भूतानाँ शब्द ब्रहमेति में मतिः। तत्प्राप्य कुण्डली रूपं प्राणिनाँ देह मध्यगम्॥ -योग वशिष्ठ

समस्त प्राणियों में यह शब्द ब्रह्म चेतना बनकर विद्यमान है। उसे कुण्डलिनी जागरण द्वारा पाया जाता है।

मन्त्र शक्ति का महात्म्य असीम बताया गया है। उसके उपयोग से आत्मोत्कर्ष और लोक कल्याण के उभय पक्षीय प्रयोजन पूरे होते हैं। अनुभवी साधना विज्ञानियों ने प्रामाणिक शास्त्र साक्षियों ने मन्त्र की गरिमा समान रूप से प्रतिपादित की है। इससे उच्चस्तरीय शब्द विज्ञान द्वारा उत्पन्न ध्वनि की महत्ता पर प्रकाश पड़ता है-

अस्मानं चिद् ये विभिदुर्वचोंभिः। -ऋग्वेद 4।16।6

उन शक्ति सम्पन्न उच्चारणों ने पत्थरों को भी फोड़ डाला।

तामेताँ वाचं यथा धेनुँ वत्सनोपसृज्य प्रत्ताँ। दुहीतैवमेंव देवा वाचं सर्वान् कामान् अदुहृन्॥ -जैमिनीयोपनिषद् ब्राह्मण

जिस प्रकार बछड़ा गया का दूध पीता है उसी प्रकार देव पुरुष दिव्य वाणी का आश्रय लेकर समस्त कामनाएँ पूर्ण करते है।

जिहृा ज्या भवति कुल्मलं वाड्, नाड़ीका दन्तास्तपसाभिदिग्धाः। तेभिब्रंह्या विध्यति देवपीयन्, हृद्बलैर्घनुभि देंवजूतैः॥ -अथर्व 1।18।5

आत्मबल रूपी धनुष, तप रूपी तीक्ष्ण बाण, लेकर तप और मृत्यु के सहारे जब यह तपस्वी ब्राह्मण मन्त्र शक्ति का प्रहार करते हैं तो अनात्म तत्त्वों को दूर से ही बेध कर रख देते हैं।

वाक्य सिद्धिद्धिधा प्रोक्ता शपानुग्रह कारिका। -शक्ति पंचकम्

वाक् सिद्धि दो प्रकार की होती है एक शाप देने वाली दूसरी वरदान देने वाली।

यत् त आत्मनि तम्वाँ घोरमस्ति सर्वं तद्वाचापहन्मो वयम्। -अथर्व 1।18।3

तेरे शरीर में जो अनिष्ट हैं उन्हें मंत्रपूत वाणी से हम नष्ट करेंगे।

साधना द्वारा सधा हुआ शब्द साक्षात् ब्रह्म ही है। उसके सहारे ब्रह्म संपर्क सरलतापूर्वक सम्भव होता है। शत पथ ब्राह्मण की श्रुति है-

“शब्द ब्रह्माणि निष्णान्तः पर ब्रह्माधि गच्छति।’

अर्थात्-शब्द ब्रह्म का निष्णात परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।

योग विभूति में शब्द साधना से प्राणियों की अविज्ञात अन्तः स्थिति का परिचय प्राप्त करने की सिद्धि मिलने का उल्लेख है। कहा गया है-

“शब्दार्थ प्रत्ययानामित रेतराध्यासात् संकरस्त म्प्रतिभाग संयनात् सर्व भूतरुत ज्ञानम्।’

अर्थात् शब्द के तत्त्व का अभ्यास करने से अभेद भासता है और प्राणियों के शब्दों में निहित भावनाओं का ज्ञान होता है।

मन्त्राराधन में प्रयुक्त होने वाली वाणी मुख यन्त्र की हलचलों से उत्पन्न होने वाली शब्द शृंखला नहीं है। इतने भर से कुछ बड़ा प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता। कुछ न कुछ अन्ड-बन्ड उच्चारण तो जीभ दिन भर करती रहती है। उससे जानकारियों का आदान-प्रदान विनोद मनोरंजन जैसे सामान्य कार्य ही बन पड़ते हैं। मन्त्र साधना जिह्वा संचालन द्वारा कुछ शब्दों की पुनरावृत्ति करते रहने भर से सम्भव नहीं हो सकती। उनके लिए परिष्कृत वाणी चाहिए; जिसे ‘वाक्” कहते हैं। वाक् से शब्दोच्चार के कलेवर का उत्कृष्ट व्यक्तित्व और प्रचण्ड मनोबल जुड़ा रहता है। गहन श्रद्धा और पवित्र अन्तरात्मा के समन्वय की शक्ति ही मन्त्र की शब्द शृंखला में प्राण भरती हैं और उसकी के सहारे मंत्र का प्रहार शब्द बेध की-लक्ष्य बेध की भूमिका सम्पन्न करता है। इसी समन्वय से साधा हुआ शब्द ‘ब्रह्म’ शक्ति से सुसम्पन्न बनाता है।

मन्त्र शक्ति की महत्ता ‘वाक्’ शक्ति पर निर्भर है। इस वाक् का स्वर भी कहते है-साम भी और सरस्वती भी। यदि इसे शुद्ध कर लिया गया तो फिर मन्त्र के चमत्कार का प्रकट होना सुनिश्चित है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए मन्त्र से भी बढ़कर ‘वाक्’ की प्रशंसा की गई है। कारण स्पष्ट है । परिष्कृत वाक् ही मन्त्रों की सार्थकता बनाता है। भ्रष्ट वाणी से किये हुए मन्त्रानुष्ठानों को सफलता कहाँ मिलती है?

अस्थि वा ऋक्। -शतपथ 7।5।2।25

मन्त्र तो हड्डियाँ मात्र है।

तथ्य को और भी स्पष्ट करते हुए कहा गया है-

वाक् वै विश्व कर्मर्षि वर्चाहीदं सर्व कृतम्। शतपथ,

वाणी जब उच्चारण मात्र से ही सब कुछ उत्पन्न और सम्पन्न करती है तब वह विश्वकर्मा ऋषि बन जाती है।

स यो वाचं ब्रह्मेत्वपास्ते यावद्धाचों गत तत्रास्य यथा कामचारी भवति। -छन्दोग्य

जो वाणी को ब्रह्म समझकर उपासना करता है उसकी वाणी की गति इच्छित क्षेत्र तक हो जाती है।

सक्तुमिव तित्तउना उनन्तो,यत्र धीराँ मनसा वाचमक्रत। अन्नासखायः सख्यानि जानते, भद्रैषाँ लक्ष्मी र्निहिताधि वाचि॥ -ऋग्वेद0

जिस तरह चलनी से सत्तू को शुद्ध करते हैं, उसी तरह जो विद्वान ज्ञान से वाणी को शुद्ध कर उसका प्रयोग करते हैं, वे लोक से भिन्न होते हैं। भिन्नता का सुख पाते हैं, उनकी वाणी में कल्याणमयी रमणीयता रहती है।

शास्त्र में जिस ‘वाणी’ शब्द का मंत्र साधना में प्रयोग किया है वह परम पवित्र ‘वाक्’ शक्ति ही है। वह अन्तःकरण के गहन अन्तराल से निकलती है। जिह्वा तो उसका संचार भर करती है। मुख का उपयोग तो उसके परिप्रेषण यंत्र की तरह ही अकिंचन होता है। संकल्प बल द्वारा ही सम्भव होता है। ऐसी वाणी को ही ब्रह्मतुल्य कहा गया है उसकी गरिमा मुक्त कंठ से गाई गई है। उसी का उत्पादन और प्रयोग कर सकने पर मन्त्र साधना सफल बनती है। ऐसी ही वाणी अभिनन्दनीय और शक्तिशाली होती है।

इस संदर्भ में अन्यत्र भी श्रुति वचन उपलब्ध होते हैं।

वाचा हीदं सर्व कृतम्।

इस वाक् से ही विश्व की रचना हुई है।

आयो वागेवेद सर्वम्।

यह समस्त संसार वाक् ही है।

वचीमा विश्वा भुयनान्यर्पिता।

यह समस्त विश्व वाक् से समर्पित है।

वाच इत्सव्रममृतं यच्चमर्त्यम।

वाक् ही अमृत है तथा जो अमर है वह भी है।

यावद् ब्रह्म विष्ठितं तावती वाक्।

जितना ब्रह्म का विस्तार हैं। उतना ही वाक् का भी है।

वागेव विश्वा भुवनानि जसे।

यह समस्त लोक वाक् से ही विनिर्मित हुआ है।

तद्यत किंचार्वाचीनं ब्रह्मणस्तद् वागेव सर्वम्। --जै0 उ॰ 1।13।1।3

ब्रह्म के पश्चात् जो कुछ है सो वाक् ही है।

वाग् वै त्वष्टा। -ऐत0, 2।4

वाक् ही त्वष्टा देवता है।

वाक् वैविश्वकर्मषिः वाचाहीदं सर्व कृतम्। -शतपथ 8।1।2।9

यह वाक् ही विश्वकर्मा ऋषि है। इसी से यह सारा संसार रचा गया।

यो वै ताँ वाचं वेद यस्मा एब विकारः स सम्प्रतिविदकारी वै सर्वा वाक्। -ऐ0ब्रा0 2।3।6

जो उस आदिमूल वाक् को जानता है वह सम्पत्तिविद् सिद्ध पुरुष कहलाता है।

प्रजापतिर्वा इदमेंक आसं तरु वागेव स्वामासीत् वाग् द्वितीया स ऐक्षतेनामेव वाच विसृजा। इयं वा इदं वा सर्वं विभवन्त्येष्यतीति। -ता0 ब्रा0 20।14

प्रजापति अकेले थे। उनके पास वाक् ही एक सम्पत्ति थी। उनने विचार किया मैं इस वाक् को ही प्रखर करूँ। यही सब कुछ बन जाएगी।

यामाअर्वाचं कवयो विराजम् । -अथर्व 7।2।5

समस्त संसार का निर्माण करने वाला यह विराट् वाक् ही है।

विराट् वाक्। अथर्व0 9।15।24

यह वाक् विराट् है।

स्वरूप ज्योति रेवान्तः परग्वागत् तपायिनी। -महाभारत

यह वाक् ज्योति रूप में परिलक्षित होती है।

तिस्रो वाचो प्रवद ज्योति राभा। -ऋग॰ 7।101।1

उस वाक् का ज्योति रूप में दर्शन होता है।

यावद् ब्रह्म विष्ठितं तापती वाक्। -ऋग॰ 10।114।8

जहाँ तक ब्रह्म विस्तृत है, उतना ही वाक् भी विस्तृत है।

यह ‘वाक्’ शब्द शृंखला एवं ध्वनि प्रवाह भर न होकर साधन के व्यक्तित्व का प्रतिनिधि रहती है। इसलिए किसकी वाणी क्या काम करेगी इसका निश्चय करते समय उच्चारणकर्ता के व्यक्तित्व को देखना होता है।

कोषीतकि उपनिषद् में कहा गया है-

न वाचं विजिज्ञासीत्। वक्तारं विद्यात्।

वाणी के उच्चारण को मत देखो। उच्चारण कर्ता के व्यक्तित्व को समझो।

शब्द विद्या के दो आधार, दो साधन नादयोग और मन्त्र योग के नाम से प्रसिद्ध है। दोनों विधि-विधान और कर्मकाण्ड सुविदित, सर्वसुलभ और अभ्यास में अति सरल है। किन्तु बहिरंग आवरण ही समझा जाना चाहिए। इनमें प्राण संचार जीवन साधना द्वारा उपार्जित की गई उत्कृष्ट अन्तः स्थिति से ही सम्भव होती है। मस्तिष्क में दुर्बुद्धि-अचिन्त्य चिन्तन-विकृत विचार प्रवाह का निराकरण करने से उत्पन्न हुई चित्त स्थिरता से नादानुसंधान में सफलता मिलती है। व्यावहारिक जीवन में सत्कर्म परायणता-सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन एवं आदर्श वादी चरित्रनिष्ठा से उस वाक् शक्ति का उदय होता है जो मन्त्रों को लक्ष्य बेधी बाण की तरह सामर्थ्यवान बनाती है। साधना विधियाँ सरल हैं, कठिन तो वह प्रक्रिया है जिसमें क्रिया, विचारणा और भावना को परिष्कृत परिमार्जित करने के लिए निरन्तर आत्म संघर्ष करना पड़ता है। शब्द विद्या का लाभ उठाने के लिए उसके लिए उपयुक्त यन्त्र उपकरण अपना परिष्कृत व्यक्तित्व ही होता है। शब्द को शब्द-ब्रह्म बना सकना ऐसे ही व्यक्तित्व सम्पन्न साधकों के लिए सम्भव होता है।


जीवन का लक्ष्य स्वरूप और उद्देश्य

महामनीषी टॉलस्टाय जब जीवन के अन्तिम दिनों में साहित्य से विराग लेकर धार्मिकता की गोद में-ईश्वर चिन्तन में अपने को लीन कर देने के लिए लालायित हो रहे थे तब उनके अभिन्न मित्र तुर्गनेव ने एक पत्र लिखकर यह अनुरोध किया था कि ‘ओ’ सरस्वती साधक मेरी अन्तिम इच्छा यह है कि आप अपनी परिपक्व प्रतिभा के निर्णायक बरस धार्मिकता में बरबाद न करें, क्योंकि यह वर्तमान दुनिया के लिए निरर्थक एवं अनुपयोगी है। मेरी बार-बार प्रार्थना है कि आप पुनः साहित्य के क्षेत्र में लौट आयें। “टॉलस्टाय ने उनकी बिनती सुनी हो या न सुनी हो परन्तु इसका उत्तर देने से पहले ही तुर्गनेव इस संसार से कूच कर गये थे।

टॉलस्टाय ने इसका उत्तर देना भी उचित नहीं समझा क्योंकि किसी दम्भ या आवेश से प्रेरित होकर वह ईश्वर चिन्तन की और नहीं झुके थे। संसार के इन्द्रिय भोगों को जितना उसने भोगा शायद ही किसी दूसरे का वह सौभाग्य मिला हो। आत्म विश्वास और निश्चिन्तता का जीवन व्यतीत करने वाले उस लेखक को कौन सा ऐसा आघात लगा, जिसने उसकी जीवन दिशा को ईश्वर-चिन्तन की और मोड़ दिया। अब तक वह ‘जीवन’ का क्या उद्देश्य है?” इन प्रश्न को नहीं समझ सके थे।

शापेनहार, प्लेटो कान्ट और पास्कल के दार्शनिक सिद्धांत भी उनके इन प्रश्नों का उत्तर न दे सके कि “ मैं क्यों जी रहा हूँ?” “मुझे कैसे जीवित रहना चाहिए?” अन्त में महात्मा टॉलस्टाय ने भगवान से प्रार्थना की थी-हे ईश्वर! मुझे धर्म प्रदान करो और मुझे शक्ति दो ताकि मैं दूसरे लोगों को भी सुख-शान्तिमय जीवन व्यतीत करने में सहायता कर सकूँ?

क्या ईश्वरीय शक्ति के ग्रहण करने की क्षमता हमारे अन्दर है? यदि वह शक्ति हमारे अन्दर पहले ही विद्यमान है तो उसका स्वरूप क्या है? आदि प्रश्नों के उत्तर पाने की जिज्ञासा न केवल महात्मा टॉलस्टाय के अन्दर उत्पन्न हुई वरन् संसार के दूसरे विचारकों ने भी उसे अपनी अपनी तरह से सोचा परन्तु उस चिन्तन का व्यावहारिक उपयोग न होने के कारण वह युग धर्म न बन सका।

जीव के अन्दर ईश्वरीय अनुदान ग्रहण करने की क्षमता उसकी आत्मा में है। आत्मा इस शरीर रूपी रथ का रथी है जिस प्रकार रथ को चलाने के लिए अश्वों की आवश्यकता होती है उसी प्रकार हमारी पाँचों कर्मेन्द्रियाँ और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ कुल दस इस शरीर रूपी रथ के घोड़े है। विधा और कर्म ये दोनों इस रथ के पहिये है, क्योंकि संसार में आत्मा की जो कुछ गति हमें दिखाई देती है वह सब कर्म के द्वारा ही सम्भव है। जीना, मरना, सन्तान उत्पन्न करना, खाना-पीना आदि कर्म आत्मा के बहिरंग स्वरूप को व्यक्त करते हैं। सद्विचारों से आत्मा को बल प्राप्त होता है तथा कुविचारों एवं कुकर्मों से उसकी शक्ति का ह्रास होता है।

“आत्मा की ज्योति” के सम्बन्ध में योगिराज अरविन्द के निम्न विचार दृष्टव्य है।

“सतर्कता, जागरूकता और चैतन्यता आत्मा की त्रिकुटी ज्योति है जिसके प्रकाश में मानव जीवन का लक्ष्य दृष्टिगोचर होता है। आत्मा की त्रिमूर्तिमयी ज्योति को जागृत करने वाला अनायास ही परमात्मा का साक्षात्कार कर लेता है।”

इसके विपरीत संशय, अविश्वास और अन्ध विश्वास मानव मन की त्रिधा तमसा है जिसकी उपस्थिति में ठीक मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति भी पय-भ्रान्त होकर अपने लक्ष्य से दूर जा पड़ता है।

संसार के समस्त दुःखों की जड़ बन्धन है और यह बन्धन माया जन्य है। जिस प्रकार बँधा हुआ पानी दुर्गन्ध से युक्त होकर अपनी गतिशीलता खो बैठता है, उसी तरह संसार के प्रलोभनों में बँधा हुआ यह मनुष्य जड़ और शक्तिहीन हो जाता है। उसके लिए बाह्य बन्धन उतने घातक नहीं है जितने कि आन्तरिक बन्धन। व्यक्ति स्वयं अपने को न बाँधे तो किसी में भी इसे बाँध कर रख सकने की क्षमता नहीं है। क्योंकि जीवन चैतन्य स्वरूप है और उसके सारे बन्धन जड़ है। जड़ चैतन्य को बाँध ही कैसे सकता है? जब तक स्वयं अपने को न बँधाये।

मनुष्य स्वयं ही ममता, अज्ञान, अहंकार या भय वश अपने को बाँध लेता है। फलस्वरूप साँसारिक कष्टों से ऊबकर वह फिर मृत्यु की याचना करता हुआ देखा जाता है। जीवन का अर्थ या जीने की कला का सम्यक् ज्ञान न होने से ही उसे यह सब दुःखद अनुभव होने लगते हैं।

इस बन्धन से मुक्ति प्राप्त करना जब मनुष्य का लक्ष्य निर्धारित हो जाता है तब उसे सभी कुछ बेकार और निरर्थक लगने लगता है। झूठे ममत्व का मोह इस प्रकार विलुप्त होने लगता है, जिस प्रकार के सूर्य के निकलने पर अन्धकार। पूर्णता प्राप्त करने वाले साधक को सभी बन्धन तोड़ देने चाहिए। उसे ने किसी जाति का मोह, न परिवार का मोह, न किसी संघ या संस्था का मोह अपने मार्ग से विचलित कर सकता है। यदि वह किसी व्यक्ति विशेष के साथ अपना अविवेकपूर्ण लगाव अधिक रखता है, तो यह उसका हृदय- दौर्बल्य ही कहा जायेगा। उसके लिए तो प्राणी मात्र समान है। सभी के अन्दर एक ही ब्रह्म शक्ति का वास होने के कारण न कोई उसके लिए छोटा है और न बड़ा।” “आत्मवतृ सर्वभूते षुयः पश्यति सः पश्यति।” के आधार पर तो वह जीवन विश्व मानव की एक इकाई बनकर रह जाता है। ऐसा व्यक्ति समस्त विश्व के कल्याण के लिए अपने को बलिदान करके ही चैन की साँस लेता है। यदि उसकी यह कामना इस जीवन में पूरी न हुई, तो चाहे इसके लिए अनेक जन्म धारण करना पड़े, उसकी लगन और कार्य-निष्ठ में कोई कमी नहीं आ सकती है। इस प्रकार की तपस्या का नाम ही ‘अध्यात्म ‘ है। जो किसी के साथ छल नहीं करता, प्राणिमात्र के साथ समान व्यवहार करता है वही वास्तव में आत्मा के सच्चे स्वरूप को पहचान लेता है और मैं क्यों जीवित हूँ? इस प्रश्न का सही उत्तर प्राप्त कर लेता है।

उपर्युक्त भावना को बदलती बनाने के लिए उसके पास दृढ़ संकल्प शक्ति का होना अनिवार्य है। संकल्प शक्ति में समाहित बल का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है। संकल्प के बल पर ही भगवान ने इस सृष्टि की रचना की है, ऐसा हमारे आर्ष ग्रन्थों में उल्लेख है।

तृष्णा, वासना की और निशि दिन दौड़ लगाने वाले मन पर विवेक बुद्धि से अनुशासन बनाये रखने से ही जीवन की अधिकांश समस्याओं का हल निकाला जा सकता है। अपने ऊपर स्वयं का जितना कठोर अनुशासन होगा उतना ही श्रेष्ठ और विकसित जीवन बना रहेगा।

मानसिक नियमन के उच्च सन्तुलन के द्वारा मनुष्य की शक्तियाँ संगठित हो जाती है। एकाग्रता अथवा ‘तन्मयता’ से उत्पन्न होने वाली शक्ति का अन्दाज नहीं लगाया जा सकता है। एकाग्रता का बल, संयम, इन्द्रिय निग्रह और अपने ऊपर कठोर अनुशासन रखने से ही प्राप्त होता है।

मानसिक दुर्बलता, आन्तरिक अस्त-व्यस्तता के कारण ही मन सदैव इधर-उधर दौड़ता रहता है यदि हमारी इच्छाएँ, वासनाएँ विवेक बुद्धि के कठोर नियन्त्रण में बनी रहें तो निश्चय ही हमारी उन्नति होगी अन्यथा शक्तियों के ह्रास होने पर ‘जीवन का कोई अर्थ नहीं रह जाता है।

जीने की कला सीखने के पहले हमें सद्गुण चिन्तन कारी एवं स्वाध्यायी बनना चाहिए। हमें अपने विचार दृढ़ बनाना चाहिए, “मैं मन, वचन तथा कर्म से पवित्र हूँ। दूसरों के सुख-दुःख मेरे ही सुख दुःख है, संसार की सभी दिशाओं से मुझे प्यार ही मिल रहा है।” ऐसे विचार जब मन में दृढ़ होंगे तब हमें संसार में कोई दूसरा दिखाई ही नहीं पड़ेगा और “आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की भावना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की और ले जाने में समर्थ होगी। यही है ‘जीवन का अर्थ’ जिसके लिए महात्मा टॉलस्टाय का हृदय विक्षुब्ध हुआ था और उन्होंने साहित्य से विरत होकर ईश्वर’-चिन्तन में ही आत्म-कल्याण करने की प्रेरणा प्राप्त की थी।


ध्यान-योग द्वारा आत्म-बल का संवर्द्धन

ध्यान योग के पीछे कितने अति महत्त्वपूर्ण प्रयोजन छिपे हुए है। इस पुण्य-प्रक्रिया को अपना कर मनुष्य अन्तर्जगत में प्रवेश करना और उसकी खोज-बीन करना सीखता है बहिरंग जगत में जो कुछ भी प्रिय लगता है, रसानुभूति होती है वह अन्तरंग की प्रतिक्रिया मात्र है। जिव्हा के रस तन्तु संवेदनशील हों तो ही भोजन में स्वाद की अनुभूति होगी। पेट ठीक हो, तो ही आहार का आनन्द मिलेगा। यही बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में भी है। नेत्र ज्योति शिथिल हो गई हो तो फिर सौंदर्य की अनुभूति कैसे होगी? कान जबाब दे चुके हो तो मधुर गायन और सारगर्भित श्रवण में क्या कुछ रस रह जायेगा? नपुंसकता घेर ले तो फिर काम सेवन के सारे साधन निरर्थक है। इन्द्रियों की तरह ही ही मन की प्रखरता और संवेदनशीलता के कारण ही सामान्य परिस्थितियों में स्वर्ग जैसा उत्साह अथवा नरक जैसा असन्तोष देखा जा सकता है एक ही स्थिति, एक व्यक्ति को एक प्रकार की और दूसरे को उससे ठीक विपरीत दूसरे तरह की लगती है। यह चिन्तन और दृष्टिकोण का अन्तर ही है जिसके कारण वस्तुओं और व्यक्तियों से चित्र विचित्र प्रकार की अनुभूतियाँ होती है।

अंतर्जगत को सुव्यवस्थित बना लिया जाय तो बाह्य जगत में जो विपन्नताएँ घिरी रहती है वे देखते-देखते सामान्य एवं सुखद बन जाती है। अपना व्यवहार बदलते ही दूसरों के स्नेह सद्भाव की प्रतिक्रिया उभरने लगती है। अपना चिन्तन सुलझ जाने पर सन्तुलन बनते और तालमेल बैठते देर नहीं लगती। आत्मीयता के व्यापक होती ही सर्वत्र अपनापन फैला दीखता है और हर वस्तु अपनी दीखने के कारण रुचिकर और सुखद लगने लगती है। कण-कण में ईश्वर की झाँकी का ब्रह्मानन्द मिलने में अपनी चिन्तन विकृति के अतिरिक्त और कोई बाधा नहीं है।

अंतरंग को देखने, परखने, सुधारने-सुविकसित और सुसंस्कृत बनाने का परम पुरुषार्थ तभी बन पड़ता है जब भीतर प्रवेश करने का द्वार खुले। इसका प्रथम चरण ध्यान हैं। ध्यान द्वारा अंतर्मुखी होने की आदत पड़ती है। तत्त्वदर्शन के सम्बन्ध में मनन और चिन्तन कर सकना सम्भव होता है आत्म सत्ता की स्थिति, आकांक्षा एवं आवश्यकता को समझने और तद्नुरूप साधन जुटाने की बात तभी बनती है, जब अन्तर्जगत को ठीक तरह देख और समझ सकना सम्भव हो सके। यह कार्य ध्यान में तीक्ष्णता उत्पन्न होने पर ही बन पड़ता है

ध्यान का दूसरा लाभ एकाग्रता सम्पादन का है। चित्त वृत्तियाँ प्रायः अनियन्त्रित और उच्छृंखल बनी अव्यवस्थित रूप से अस्त-व्यस्त परिभ्रमण करती रहती है। इस बिखराव में बहुमूल्य मानसिक शक्तियों का अपव्यय ही होता है। बहुत करके तो चिन्तन की इस विश्रृंखलता के साथ-साथ अवांछनीय तत्त्व ही लिपट पड़ते हैं। कहते हैं कि “खाली दिमाग शैतान की दुकान।” यदि विचारों को व्यवस्थित एवं उपयोगी कार्यों में न लगाया जायेगा, तो उसके अभाव का लाभ आसुरी तत्त्व उठावेंगे और पतनोन्मुख पशु प्रवृत्तियों का मनःक्षेत्र पर अधिकार सघन होता चला जाएगा। एकाग्रता से बिखराव सिमटता है और उससे शक्ति उत्पन्न होती है। सभी जानते हैं कि छोटे से आतिशी शीशे पर फैली हुई सूर्य किरणें एक बिन्दु पर एकत्रित कर दी जाएँ तो आग जलने लगती है। बारूद की नली में सीमाबद्ध करके एक दिशा विशेष में लगाया जाय तो लक्ष्य बेध का चमत्कार उत्पन्न होता है भाव की सीमित धारा के प्रयोग से इंजन में पूरी रेलगाड़ी खींचने की शक्ति उत्पन्न होती है। सरकस के नट एकाग्रता की शक्ति से आश्चर्य भरे करतब दिखाते हैं। ध्यान से एकाग्रता का लाभ मिलता है मस्तिष्कीय बिखराव का केन्द्रीकरण मनुष्य में अद्भुत प्रतिभा एवं क्षमता का विकास करता है।

अनियन्त्रित विचार शोक, क्रोध, व्यामोह, विलाप, ईर्ष्या, चिन्ता, भय, निराशा आदि निषेधात्मक गलियों में भटकते रहते हैं और स्वल्प कारणों को लेकर भयंकर मानसिक विक्षोभ उत्पन्न करते हैं। फलतः जीवन का सारा आनन्द नष्ट हो जाता है और पग-पग पर जलने झुलसने जैसा कष्ट सहना पड़ता है। ध्यान द्वारा विचारों को पकड़ने और एक दिशा से हटाकर दूसरी में नियोजित करने की क्षमता उत्पन्न होती हैं यह कहने-सुनने में छोटी किन्तु व्यवहार में अति महत्त्वपूर्ण विशेषता है। यदि कोई व्यक्ति अपनी प्रचण्ड मनस्विता के सहारे क्रोध, शोक, कामुकता जैसे उभारों को वशवर्ती करने और चिन्तन की धारा तत्काल किसी उपयोगी प्रयोजन में लगा देने की विशेषता प्राप्त कर ले तो समझना चाहिए कि उसने भव-बन्धनों को काट लिया और स्वर्गीय आनन्द को करतल गत कर लिया।

हर कोई जानता है कि असफलताओं का कारण साधनों की कमी अथवा परिस्थितियों की प्रतिकूलता उतनी बाधक नहीं होती जितनी कि चित्त की चंचलता। आधे अधूरे मन से उपेक्षा और अन्य मनस्कता के साथ किये गये कार्य प्रायः अस्त-व्यस्त ही रहते हैं ओर उनकी प्रतिक्रिया, भर्त्सना एवं असफलता के रूप में ही सामने आती हैं यदि तन्मयता और तत्परता के साथ कार्य किये जाय तो कालिदास, वरदराज जैसे मन्द बुद्धि लोग भी उच्चकोटि के विद्वान बन सकते हैं। शारीरिक क्षमता के प्रति उदासीनता का अर्थ है-आलस्य। मानसिक दक्षता का उपयोग न करने की प्रवृत्ति को कहते है-प्रमाद। सर्व विदित है कि मनुष्य की दरिद्रता और दुर्दशा का बहुत कुछ उत्तरदायित्व आलस्य और प्रमाद का ही होता है। इन दोनों महा शत्रुओं की जननी चित्त की चंचलता है। ध्यान का उद्देश्य चंचल चित्त को मजबूत रस्सों से कसकर नियत प्रयोजन में लगा देने की दक्षता प्राप्त कर लेना है। मनोनिग्रह इसी को कहते हैं।

योग विद्या में मनोनिग्रह का बहुत महत्त्व बताया गया है। मन को वश में कर लेने पर सब कुछ वश में हो जाता है। निग्रही मन को कल्पवृक्ष कहा गया है और उसकी चमत्कारी उपलब्धियों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि मूर्धन्य स्तर के लोग-वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार, साधन-सम्पन्न, प्रगतिशील, श्रेयाधिकारी महामानव-मनोनिग्रह के सहारे ही ऊँचे उठे और सफलता के शिखर तक पहुँचे हैं भौतिक आत्मिक अथवा दोनों क्षेत्रों की समन्वित सफलता मानसिक दक्षता को अभीष्ट प्रयोजन में नियोजित किये रह सकने की विशेषता पर निर्भर है। यही आत्म-नियन्त्रण धैर्य, साहस, संकल्प-बल, दृढ़ चरित्र आदि के रूप में सद्गुण बन कर प्रकट परिलक्षित होता है। सफलताएँ इसी मनन स्थिति के चरण चूमती रही है और यही क्रम अनन्त काल तक बना रहेगा।

ध्यान का तीसरा लाभ है-संकल्प शक्ति की परिपक्वता। शब्द, रूप, रस, गंध, स्पर्श के विभिन्न उपचारों से कई प्रकार के अभ्यास साधकों को कराये जाते हैं। माहात्म्य तो देवताओं, मन्त्रों दृश्यों, आवाजों को बताया जाता है ओर उनके साथ तन्मयतापूर्वक मनःचेतना को लपेटे रहने का निर्देश गुरुजनों द्वारा दिया जाता है। इसके पीछे मूल लाभ एक ही है कि विचार प्रवाह की अस्त-व्यस्तता रोक सकने वाली-सीमित बिन्दु पर ध्यान जमाने रहने वाली प्रचण्ड-संकल्प शक्ति का उद्भव किया जाय। साधारणतया विचारों की दौड़ बेलगाम होती है, जंगली हिरनों की तरह वे किसी भी दिशा में दौड़ते हैं और किसी का अंकुश स्वीकार नहीं करते। इन्हें नियन्त्रित करने के लिए ध्यान धारणा के चित्र अथवा शब्द गढ़े जाते हैं। देवताओं के तथा प्रकाश आदि के चित्रों पर अथवा नादयोग के आधार पर चित्र-विचित्र ध्वनियों पर विचार शक्ति को-कल्पना एवं भावना को-गहन श्रद्धा के साथ नियोजित किया जाता है। इसमें उतनी ही सफलता मिलती है जितनी कि विचारों पर हावी हो सकने वाली संकल्प शक्ति प्रचंड होगी। वस्तुतः ध्यान धारणा का सारा उपक्रम उस संकल्प शक्ति को प्रबल बनाना है जो रिंग मास्टर द्वारा सरकस के जानवरों को हन्टर के बल पर नचाने की तरह विचारों को किसी भी केन्द्र पर केन्द्रित कर देने में सफल हो सकती है।

यह संकल्प-बल ही प्राणबल, आत्मबल, ब्रह्मवर्चस आदि नामों से पुकारा गया है। इसी विद्युत धारा को अन्तरंग की प्रसुप्त क्षमताओं के ऊपर फेंका और उन्हें जागृत किया जाता है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में एक से एक अद्भुत शक्ति संस्थान छिपे पड़े है इन्हें ढूंढ़ निकालना और परिष्कृत कर सकना इसी संकल्पों की केन्द्रीय शक्ति के लिए सम्भव है। अतींद्रिय क्षमता जगाने का यही एक मात्र उपकरण हैं एक ही बन्दूक से अनेक शत्रुओं को धराशायी बनाया जा सकता है। एक ही कलम से विभिन्न स्तर के लेख लिखे जा सकते हैं। एक ही खेत में कई प्रकार की फसलें उग सकती है। एक ही रुपये से कई वस्तुएँ खरीदी जा सकती है। एक ही मनुष्य कई तरह के कृत्य कर सकता है। ठीक इसी प्रकार एक ही प्रचण्ड संकल्प-शक्ति से अन्तर्जगत के कितने ही शक्ति संस्थानों को जगाया-उठाया जा सकता है। एक ही क्रेन कितने ही भारी भरकम पार्सलों को उठाती-चढ़ाती रहती है। मनोबल के सहारे वजनदार षट्चक्रों उपत्यिकाओं तथा अंतर्मन की गहरी दबी-गढ़ी परतों को उभारा उठाया जाता है। सूर्य उदित होता है तो प्राणधारियों में सक्रियता का संचार होता है। मनोबल का सूर्य जिस भी क्षेत्र में अपनी प्रकाश किरणें फेंकता है उसी की आभा निखरने लगती है।

मनुष्य में जन्मजात रूप से ईश्वरीय अंश उतना ही जागृत रहता है जिससे पेट प्रजनन का सामान्य निर्वाह क्रम सरलतापूर्वक चलता रह सके। शेष दिव्य क्षमताओं के भण्डार प्रसुप्त स्थिति में पड़े होते हैं, उन्हें प्रयत्नपूर्वक जागृत करना पड़ता है। अतीन्द्रिय क्षमताओं की आये दिन चर्चा होती रहती है। बहुत से व्यक्तियों में कितने ही प्रकार की अलौकिकताएँ पाई जाती है। यह उनके साधना प्रयासों द्वारा अथवा पूर्व संचित जागरण प्रयत्नों का प्रतिफल होता है। जीवात्मा क्रमशः महात्मा, देवात्मा परमात्मा स्तर पर विकसित होती है और लघु से महान बनती है। यह सफलताएँ किसी दूसरे का दिया हुआ अनुग्रह उपकार नहीं होता वरन् आत्म-सत्ता के क्रमिक विकास की प्रतिक्रिया ही होती है। जिस उपकरण के माध्यम से यह प्रगति क्रम अग्रसर होता है उसे मनोबल ही कह सकते हैं इस पेट्रोल के बिना कोई मोटर किसी भी सड़क पर दौड़ लगाने में असमर्थ रहती है।

मनुष्य के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों में एक से एक अद्भुत शक्ति केन्द्रों के समुच्चय विद्यमान है। अल्पज्ञ जीव सर्वज्ञ बन सके और असमर्थ दीखने वाला व्यक्ति सर्व समर्थ स्तर तक पहुँच सके ऐसी सम्भावनाएँ। मौजूद है। प्रश्न प्रसुप्ति को जागृति में बदलने का है। इसी प्रयत्न पुरुषार्थ को योग साधना कहते हैं। योग साधना की प्रधान क्षमता मनोबल है। संकल्प बल के प्रहार से शक्ति संस्थानों का समुद्र मन्थन होता है और उसी में से सिद्धियों की रत्न राशि निकल कर ऊपर आती है।

ध्यान एक प्रकार का व्यायाम है जिसमें प्रत्याहार और धारण के उभय पक्ष पूरे करने पड़ते हैं। प्रत्याहार का अर्थ है-अनुपयुक्त चिन्तन का बलपूर्वक प्रतिरोध करना और धारणा का तात्पर्य है जो अभीष्ट है उसे अंगीकार करने के लिए अतिशय आग्रह करना। यह सरकस में वन्य पशुओं को प्रशिक्षित करने जैसी प्रक्रिया है। ताड़ना और प्रलोभन की उलटी-सीधी चालें चलकर उद्दण्ड पशुओं को साधना पड़ता है। चित्त वृत्तियों की स्थिति भी लगभग वैसी ही है। साधने की सफलता में उन पशुओं को भी यश मिलता है और शिक्षक की कुशलता भी सराही जाती है। इन साधकों और सिद्धों की उपयोगिता बढ़ती है और उनका बढ़ा-चढ़ा मूल्यांकन होता है। यह ध्यान का ही चमत्कार है कि प्रत्याहार और धारणा की दण्ड-बैठक करते हुए साधक को मनोबल सम्पन्न बनने का अवसर मिलता है। चक्र-वेधन ‘कुण्डलिनी जागरण, अतीन्द्रिय उन्नयन, व्यि आभास, शक्ति संचरण जैसी आध्यात्मिक उपलब्धियों का आधार बढ़ा हुआ संकल्प बल ही होता है। ध्यान साधना का यही सबसे बड़ा लाभ है।

ध्यान के यह प्रमुख लाभ है। व्यायामशाला में जाकर शरीर बल उपार्जित किया जाता है और फिर उससे निरोग काया, दीर्घ-जीवन, प्रतियोगिता विजय अधिक उपार्जन, प्रभाव, वर्चस्व जैसे कितने ही लाभ मिलते रहते हैं। ठीक इसी प्रकार ध्यान की मानसिक व्यायाम प्रक्रिया से संकल्प-शक्ति प्रखर एवं परिपक्व होती है और उससे चेतना की विशिष्टता का परिचय देने वाले अनेकानेक सत्परिणाम सामने आते हैं। समृद्धियों और विभूतियों के जीवन को सुख-सम्पदा से-शान्ति-सन्तोष से-वैभव-वर्चस्व से भर देन वाले अवसर जिस आधार पर मिलते हैं, उनमें शरीर बल से भी बढ़कर मनोबल का स्थान है कहना न होगा कि इस महान उपलब्धि के अभिवर्धन में ध्यान साधना से बढ़कर और कोई दूसरा सरल एवं सफल उपाय नहीं है।

छान्दोग्य उपनिषद् के सप्तम अध्याय के छठे और सातवें खण्ड में ध्यानयोग को उपासना की उच्च कक्षा कहा गया है। नामोच्चार से बढ़कर वाक्, वाक् से भी बड़ा मन, मन से अधिक महत्त्वपूर्ण संकल्प और संकल्प से बलवत्तर चित्त को कहा गया है चित्त से भी बढ़कर ध्यान का बताया गया है। नाम, जप, वाक्-संयम, मनोनिग्रह, संकल्पोद्भव, चित्त निरोध, ये सब उपासना की क्रमिक भूमिकाएँ हैं ध्यान इन सबसे ऊपर है।

मन को एक विशेष परिधि में दौड़ाने के लिए साधना ध्यान है। निर्धारित परिधि के अंतर्गत ही ध्यान-चेष्टाएँ केन्द्रित रहना साधना क्रम की सही दिशा का संकेत है। मन की चंचलता से यदा-कदा उल्लंघन तो होगा, पर सतत् प्रयत्न से यह उल्लंघन घटता जायेगा ओर मन सधता जायेगा।

आवश्यकता नहीं है कि ध्यान साधना देवी-देवताओं और मंत्र-तंत्रों के आधार पर ही की जाय। यह सार्वभौमिक एवं सर्वजनीन प्रक्रिया है। आस्तिक-नास्तिक सभी इसे अपनाकर समान रूप से अपना मनोबल बढ़ा सकते हैं। चित्त की चंचलता का समाधान, एकाग्रता का अभिवर्धन जिस उपाय से बन पड़े उसे ध्यान कहा जा सकता है अंतःक्षेत्र में घुसी हुई पशु-प्रवृत्तियों के स्थान पर दैवी तत्त्वों की स्थापना के लिए जो प्रयत्न किया जाय उन्हें धारणा वर्ग का कहा जाएगा। इसके लिए किसी पुरुष को भी माध्यम बनाया जा सकता है। देवताओं के स्थान पर किन्हीं महामानवों के व्यक्तित्व एवं चरित्र को ध्यान धारणा के लिए चुना जा सकता है।

एकान्त कोलाहल रहित स्थान में जहाँ शान्ति हो, ध्यान का अभ्यास किया जाता है प्रारम्भ में ध्यान का आधार किसी भौतिक माध्यम को भी बनाया जा सकता है। हम गुलाब के फूल से शुरू कर सकते हैं। एक चौकी पर हरे या नीले रंग का कपड़ा बिछाएँ। उस पर खिला हुआ गुलाब का फूल रखें। फूल की पंखुड़ियों की बनावट तथा रंगों के उतार-चढ़ाव और मध्यवर्ती पराग को गहराई के साथ देखते हुए बारीक विश्लेषण जैसा करते हुए एक-एक चीज मस्तिष्क में स्थिर करते जाएँ, मानों थोड़ी देर बाद परीक्षा में ये सब विवरण पूछे जाने वाले है। जब फूल देखते-देखते मन ऊबने लगे तो फिर गुलाब से बनने वाली वस्तुओं की बाबत सोचें-गुलाबजल, इत्र, गुलकन्द, फूलमाला आदि के बनने की विधि एवं इनके स्वरूप का स्मरण-मनन करें। गुलाब पुष्प कोमल शीतल, सुगन्धित, कब्ज निवारक, वायु विकार नाशक आदि गुणों का स्मरण करें, विचार करें। गुलाब की खेती, उसे लाभ, गुलाब की आध्यात्मिक प्रकृति-काँटों के बीच सन्तोषपूर्वक रहना, हँसना-हँसाना, खिलना खिलाना, परिवेश का सौंदर्य बढ़ाना, सुगन्ध और पराग का दान, प्रभु चरणों में समर्पण आदि का विचार करें। तात्पर्य यह कि घंटों गुलाब पुष्प पर ही सोचते रहें। उद्देश्य है-मन की अस्त-व्यस्त घुड़दौड़ को परिधिबद्ध व व्यवस्थित करना। अभ्यास से एकाग्रता बढ़ेगी, मन की भाग दौड़ घटेगी।

यही अभ्यास किसी महापुरुष के जीवन-वृत्तांत को चिन्तन की परिधि बनाकर किया जा सकता है। किसी गीत या श्लोक के भावार्थ, संगीत की किसी धुन के विवेचन, किसी गुण विशेष जैसे ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा, संयम, उदारता आदि का सुदीर्घ विश्लेषण-मनन आदि कोई भी आधार लिया जा सकता है।

आत्मोत्कर्ष साधना में ईश्वर भक्ति का अति महत्त्वपूर्ण स्थान है। ‘परिपूर्ण व्यक्तित्व’ के रूप में ईश्वर की अन्तःकरण में प्रतिष्ठापना की जाती है और फिर उसमें आत्म-सात होने का भावभरा उपक्रम चलता है। इष्टदेव का अर्थ हे-अपने विकास का अन्तिम लक्ष्य। हम राम, कृष्ण, हनुमान, सूर्य, आदि नर रूपकों में अथवा गायत्री, सरस्वती, लक्ष्मी आदि नारी कलेवरों में इष्टदेव का निर्धारण करते हैं और आत्मोत्कर्ष की उस शिखर तक पहुँचने का संकल्प करते हैं। इष्टदेव के साथ तन्मय अविच्छिन्न-एकाकार हो जाने की साधना ‘लय-योग कहलाती है। भक्ति मार्ग में इसी दिशा में बढ़ा जाता है। द्वैत को मिटाकर अद्वैत बन जाने की आकांक्षा को आत्म-समर्पण, ईश्वर प्राप्ति कहा जाता है। दीपक पतंगों का उदाहरण इसी प्रयोजन को समझाने के लिए प्रयुक्त किया जाता है।

आत्म समर्पण स्तर की साधना में अपने अस्तित्व को भगवान की सत्ता में समर्पित होने का ध्यान करना होगा। परमेश्वर के विराट् रूप का चिन्तन-विवेचन इसमें सहायक होगा। विराट् ब्रह्म को इस चराचर जगत का शरीर मानते हुए कल्पनाएँ की जाए। इस विराट ब्रह्म का एक क्षुद्रतम घटक है अपना ‘अहम्’। इसका स्वतन्त्र क्या अस्तित्व? हमारी सत्ता ब्रह्म सत्ता कह ही एक इकाई है। अतः विराट ब्रह्म-विश्वमानव के लिए हमें अपने अस्तित्व का समर्पण करते हुए ही जीवन यापन करना चाहिए। विराट् ब्रह्म की ध्यान-धारणा का यही निष्कर्ष है। आत्मा की शरीर से भिन्न सत्-चित् आनन्द स्वरूप मानना और शरीर तथा आत्मा की भिन्नता की गहराई से अनुभूति करना तथा मात्र शारीरिक सुविधाओं में जुटे रहने की व्यर्थता का स्मरण कर आत्मकल्याण का सोत्साह संकल्प भी ध्यान-प्रक्रिया का एक प्रयोजन है।

प्राणि-जगत तथा पदार्थ मात्र में एक ही चेतन-तत्त्व परिव्याप्त है। समस्त विश्व चेतना-तत्त्व परिव्याप्त है। समस्त विश्व चेतना-सत्ता का स्वरूप है। व्यापक चेतना के साथ एकाग्रता होने पर ऐसी अनुभूति का सातत्य ही भागवत्-प्राप्ति का स्वरूप है।

इस समस्त विश्व को ईश्वर का विराट् रूप मानकर उसमें अपने आपको समर्पित कर देना साधु और ब्राह्मण जीवन की परम्परा है। विश्व पीड़ा की अपनी पीड़ा मानना और अपनी सुख-सम्पदा को लोक हित में होम देना लोक-सेवियों की परमार्थ साधना रही है। संकीर्ण स्वार्थपरता की छोड़कर अपने को विश्व परिवार का सदस्य मानना-वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना से ओत-प्रीत रहकर लोकहित के क्रिया-कलापों में निरत रहना भी आत्म-समर्पण का ही एक अति महत्त्वपूर्ण योग साधना है।


आलस और परावलम्बन (kahani)

तब देवताओं का युग था। मनुष्य नया-नया ही गढ़ा गया था। उन दिनों प्राणी और पदार्थ देव अवस्था के अनुरूप अपने काम चलाते थे।

आदमी ने लकड़ी काटी और उनका गट्ठा बाँधा। शाम हो चली थी, आदमी ने गट्ठे से कहा चलो घर चलें, सो वह पीछे-’पीछे चलने लगा।

कुछ दूर चलने के बाद आदमी सोचने लगा। क्यों न मैं इस बोझ पर सवारी गाँठ लूँ और बिना परिश्रम क्यों न घर जा पहुँचूँ ?

आदमी ने वैसा ही किया, वह गट्ठे को सवारी बना कर उस पर लद बैठा।

गट्ठे ने चलने से इंकार कर दिया। फिर उसने ऐसी हठ पकड़ी कि पीठ पर बिठा कर चलना तो दूर वह पीछे-पीछे जाने के लिए भी रजामंद न हुआ और अड़कर बीच रास्ते में बैठा गया।

आदमी को क्रोध आ गया। उसने कहा-’ठहर, मूर्ख! अभी तेरी अकल दुरुस्त करता हूँ।’ सो उसने एक डंडे से बोझ को पीटना शुरू कर दिया। बाँधने वाली रस्सी टूट गई और सारी लकड़ियाँ इधर-उधर छितरा कर बिखर गई।

झंझट बढ़ा तो हंगामा सुनकर देवता लोग जमा हो गये। पूरी बात समझने में उन्हें देर न लगी। फैसला यह हुआ कि आलसी आदमी इस योग्य नहीं कि गट्ठा उसका कहना मानें और सहायता कर। भविष्य में आदमी को ही गट्ठा शिर पर रखकर चलना पड़ा करेगा।

कहते हैं तभी से आदमी को  गट्ठे सिर पर ढोने पड़ रहे हैं। आलस और परावलम्बन की लत फिर भी उससे छूटी नहीं है।


हम अपना देवत्व विकसित कर सकते हैं।

कहते हैं कि विधाता ने मनुष्य का निर्माण करने से पहले राक्षसों और देवताओं की सृष्टि की। इसके बाद उसने सब प्राणियों को रचा। देवों ओर दानवों सहित समस्त प्राणियों की सृष्टि कर लेने के बाद भी विधाता को सन्तोष नहीं हुआ और उसने मनुष्य के शरीर का निर्माण किया। फिर देवों और दानवों दोनों से कहा कि तुम लोग इस शरीर में प्रवेश कर जाओ। देव और दानव अब मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर गये ओर मनुष्य का निर्माण पूरा हो गया तो विधाता ने सन्तोष की साँस ली और मनुष्य को संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी घोषित किया।

इस कथा का निष्कर्ष यह है कि मनुष्य में देवत्व का भी निवास है ओर असुरत्व का भी। वह देवता भी है और दानव भी। जब वह आदर्शों के प्रति निष्ठावान, सद्भावना-सम्पन्न, परहित के कार्य में निरत और दूसरों के कल्याण का चिन्तन कर रहा होता है तो वह देवोपम बन जाता है। तथा जब वह आत्यन्तिक स्वार्थ के वशीभूत होकर दूसरों के लाभ-अलाभ की परवाह किये बिना अपने ही भले की बात सोचता और कतरा है तो उसमें असुरता के लक्षण प्रकट होते हैं। देवताओं का जैसा चित्रण शास्त्र-पुराणों में मिलता है वह पढ़ सुनकर हर किसी का मन लुभा जाता है। स्वतः ही यह आकांक्षा उठने लगती है कि काश हम भी देवता हुए होते।

देवताओं की आकृति, सुविधा एवं शक्ति का आलंकारिक वर्णन पुराणों में हुआ है। यह देवत्व की फल श्रुति है। वस्तुतः देवत्व एक वृत्ति है जो मनुष्य के अन्तरंग में रहती है। अग्नि जहाँ रहेगी वहीं गर्मी पैदा करेगी। देवत्व का आनन्द व्यक्ति के अन्तःकरण की गरिमा के अनुरूप उसे स्वतः ही मिलता रहता है। सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों की सुगंध कस्तूरी के हिरन की तरह सर्वप्रथम उत्पादन कर्ता को ही मिलती है। इसके उपरान्त संबंधित लोग उससे प्रभावित होते हैं। विकसित व्यक्तित्वों को साँसारिक सुविधाओं की भी कमी नहीं रहती, भले ही वे उन उपलब्धियों को अपने काम न लाकर दूसरों को बाँटते रहें। उपभोग की उपेक्षा सत्प्रयोजनों के लिए वितरण करने में कितना आनन्द होता है इसे वर्षा के बादलों जैसा उदार अन्तःकरण रखने वाले ही जानते हैं। देवत्व की सत्प्रवृत्तियाँ स्वर्गीय सुखद परिस्थितियों उत्पन्न करे तो इसे उचित एवं उपयुक्त ही समझा जा सकता है।

वस्तुतः देवता बनना जरा भी कठिन नहीं है। कठिन है तो यह विश्वास करना कि बना जा सकता है। देवताओं का जिस तरह वर्णन किया जाता है और उनके संबंध में जो बातें कही जाती है उन्हें प्रत्यक्षतः किसी ने नहीं देखा। वे बातें या वे विवरण ही आँखों के सामने ऐसा चित्र खींचते हैं जिससे मन में यह लालसा उत्पन्न होती है कि सम्भव हो तो देवता बनना चाहिए। ऐसी कौन-सी विशेषताएँ है जो देवताओं को मनुष्य से श्रेष्ठ और ऊँचा सिद्ध करती हों, उनके जो भी विवरण पढ़ने और सुनने में आते हैं उनसे यह स्पष्ट होता है कि कुछ विशेषताएँ ही देवताओं को मनुष्य से ऊँचा सिद्ध करती है। उन विशेषताओं में कुछ इस प्रकार हैं-(1) देवता अमर होते हैं (2) वे कभी वृद्ध नहीं होते सदा युवक बने रहते हैं (3) देवता स्वर्ग में रहते हैं (4) जन-साधारण उनके प्रति श्रद्धा रखता है तथा (5) वे अपनी शक्तियों और साधनों से लोगों को लाभान्वित करते हैं।

ये पाँचों विशेषताएँ अर्जित करना मनुष्य के लिए जरा भी असम्भव नहीं है। सर्वप्रथम हम इस बात की ले कि देवता अमर होते हैं तो मनुष्य भी क्या अमर हो सकता है? वह ऐसी स्थिति प्राप्त कर सकता है जिससे मृत्यु उसका स्पर्श न कर सके। मनुष्य का शरीर तो मरणधर्मा है, उसे मरने से बचाया नहीं जा सकता। जो चीज नष्ट होने की है, जराजीर्ण हो जाती है उसे बनाये रखने से फायदा भी क्या? उदाहरण के लिए वस्त्र पुराने हो जाते हैं, फटने लगते हैं तो उन्हें बदलना ही पड़ता है। फटे हुए, पुराने और जीर्ण कपड़ों को तो आदमी बदलने के लिए तैयार रहता है। फिर शरीर को हमेशा चलाते रहने की इच्छा क्यों? शरीर के प्रति यह मोह तभी तक रहता है जब तक आत्म-ज्ञान का प्रकाश नहीं होता। आत्म-ज्ञान का प्रकाश होते ही अपनी अमरता के प्रति व्यक्ति आश्वस्त हो जाता है और फिर शरीर को अमर रखने की आकांक्षा नहीं उठती। क्योंकि मनुष्य यह समझ जाता है कि अपना चेतन-आत्मा, मूल अस्तित्व तो मृत्यु से अछूता है ही।

देवता अपने व्यक्तित्व के साथ अमर रहते हैं। हम भी चाहें तो अपने व्यक्तित्व सहित अमर हो सकते हैं। जिस व्यक्ति की सत् कीर्ति अमर है वह शरीर को छोड़ देने पर भी अपने व्यक्तित्व और कर्तव्य के बल पर अमर हो जाता है। बुद्ध और ईसा के हुए लगभग दो-ढाई हजार साल हो गये, पर व अब भी जीवन्त है। आगे हम सब नहीं रहेंगे तब भी वे अमर होंगे। वे अपने सत्कार्यों, उच्च मानवीय आदर्शों और लोकसेवी क्रियाओं के कारण अमर है। उनकी कीर्ति अक्षय है। यदि हम भी अपने व्यक्तित्व का विकास करें और सत्कर्मों में प्रवृत्त हो तो देवत्व का यह गुण आसानी से प्राप्त कर सकते हैं। वस्तुतः तो मरते वे हैं जो शरीर के लिए जीते हैं, जो शरीर के सुख और इन्द्रिय वासनाओं की तृप्ति के लिए रात-दिन खपते रहते हैं, उन्हीं की मृत्यु होती है।

दूसरी विशेषता जो देवताओं के साथ जुड़ी हुई है वह यह कि वे कभी वृद्ध नहीं होते सदा युवक की बने रहते हैं। चिर-यौवन उनकी विशेषता है। यौवन और वार्धक्य किसी अवस्था विशेष का नाम नहीं है। इस कल्पना ने हमें बड़ी हानि पहुँचायी है कि इस उम्र के बाद आदमी की ढलती अवस्था शुरू होती है और जीवन शक्ति कम होने लगती है। बुझा हुआ दिन, गिरा हुआ मन, निस्तेज मुख ओर अशक्त शरीर हो जाने से बुढ़ापा आकर घेर लेता है। यह धारणा ही मनुष्य को असमय बुढ़ापे में धकेलती है। नियमित व्यायाम, शारीरिक और मानसिक उन्नति के लिए समुचित प्रयास तथा अपने कार्यों को ईमानदारी एवं मनोयोग कसे करने की निष्ठा व्यक्ति के यौवन को चिरस्थायी बनाती है। यदि उत्साह में शिथिलता, प्रयत्नों में प्रमाद और आलस्य के कारण अपने कामों में थकान आने लगे तो समझना चाहिए यही वृद्धावस्था है।

देवता स्वर्ग में रहते हैं। स्वर्ग अर्थात् ऐसी परिस्थितियाँ जिनमें मनुष्य आनन्द निमग्न और सुखी रहे। सुख और आनन्द परिस्थितियों पर निर्भर हो तो वे चिरस्थायी रह ही नहीं सकते। क्योंकि परिस्थितियों का अर्थ ही है जो स्थिति परिवर्तनशील हो। सुख और आनन्द का आधार मनःस्थिति है। देवताओं की परिस्थितियाँ निरन्तर बदलती रहने पर भी वे अपना मनःस्थिति को इस प्रकार का बना लेते हैं कि उनमें भी सुख-सन्तोष और आनन्द का रसपान कर लें। देवता अपनी मनः स्थिति में परिवर्तन करते हैं या नहीं यह तो नहीं मालूम पर मनुष्य अपनी मन स्थिति को इस तरह ‘ढाल’ कर निश्चित रूप से सुखी और आनन्दित बने रहते हैं।

एक और विशेषता है देवताओं की-वह यह कि वे लोगों के श्रद्धास्पद बने रहते हैं तथा उन्हें निरन्तर अपनी शक्तियों और क्षमताओं द्वारा लाभ पहुँचाया करते हैं। मनुष्य अपनी स्थिति वैसी नहीं होने का बहाना कर कुछ देना भी नहीं चाहता और मुफ्त में लोगों के सम्मान भी प्राप्त कर लेने की इच्छा करता है। ये दोनों बातें एक साथ नहीं बनती कि कुछ देने की उदारता भी न बरती जाए और लोगों का श्रद्धा पात्र भी बना जाए। यदि हम देना चाहें तो अकिंचनतम स्थिति में भी बहुत कुछ दे सकते हैं। देववृत्ति स्थूल साधनों से मजबूर नहीं है। सेवा, ज्ञानदान, सत्परामर्श, सहयोग के सैकड़ों अवसर हमारे सामने आते रहते हैं जिनका उपयोग कर हम भी लोगों के श्रद्धा केन्द्र बन सकते हैं। इस प्रकार मनुष्य के लिए देवता बन पाना कोई असम्भव नहीं है। वह देवताओं के समान साधन और क्षमताएँ सरलता से प्राप्त कर सकता है, यदि प्राप्त करना चाहें तो।


विकृत चिन्तन से शरीर ओर मन की अपार क्षति

विजातीय द्रव्य, विषाणु जलवायु को प्रदूषण, घटिया अहार, ऋतु प्रभाव, दुर्घटना जैसे कारण शरीर को रुग्ण बनाने के लिए उत्तरदायी ठहराये जाते रहे हैं। उन्हीं को दूर करने के लिए उपाय सोचे गये हैं तथा उत्पन्न बीमारियों से निपटने के लिए चिकित्सा परक प्रयत्न हुए है। स्वास्थ्य समस्या के संदर्भ में एक नया तथ्य सामने यह आया है कि मस्तिष्कीय तनाव आरोग्य नष्ट करने का सबसे बड़ा कारण है। नवीनतम शोधों ने अपना निष्कर्ष यह प्रस्तुत किया है कि यदि मनः संस्थान उत्तेजित आवेशग्रस्त एवं अस्त-व्यस्त रहे तो फिर स्वास्थ्य रक्षा के सारे साधना व्यर्थ हो जायेंगे और अन्य कोई कारण न होने पर शरीर के भीतरी अवयव अपना काम ठीक तरह पूरा न कर सकेंगे। फलतः दुर्बलता ओर रुग्णता अकारण ही बढ़ती चली जायगी।

सुपाच्य वस्तुओं से पोषण के साधन बनते हैं; पर यदि पाचन तन्त्र ही गड़बड़ा जाए, पाचक रसों की मात्रा न्यूनाधिक हो जाए, स्नायु संस्थान लड़खड़ाने लगें, हारमोन ग्रन्थियाँ कुछ का कुछ टपकाने लगें तो यकृत, वृक्क आँतें, हृदय, फुफ्फुस जैसे महत्त्वपूर्ण अवयव अपनी ड्यूटी ठीक तरह पूरी न कर सकेंगे। फलतः रस, रक्त, माँस, अस्थि का निर्माण घटिया स्तर का होगा, उसमें विषाक्तता घुली रहेगी और स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होगा।

शरीर पर पूरी तरह नियन्त्रण करने वाला एक ही अवयव है-मस्तिष्क। शक्ति का स्रोत यही है। पिछले दिनों हृदय को सर्वोपरि माना जाता था। अब उसकी प्रमुखता अस्वीकार कर दी गई है और प्रमुख के पद पर मस्तिष्क को आसीन कर दिया गया है। अब डाक्टर लोग हृदय की धड़कन बन्द होने पर किसी को मृत घोषित नहीं करते वरन् यह देखते हैं कि मस्तिष्कीय विद्युत प्रवाह चल रहा है या नहीं। मस्तिष्क जीवित हो तो हृदय की धड़कन को उपचारों के सहारे पुनः गतिशील किया जा सकता है। कितने ही मृतकों के श्मशान से वापिस लौट आने एवं कब्र से निकल कर पुनर्जीवित होने के जो समाचार मिलते रहते हैं उन सब के पीछे एक ही बात पाई गई है कि लोगों ने नाड़ी चलना, हृदय, धड़कना, साँस रुकना देखकर मृत्यु मान ली, यह नहीं जाना जा सका कि मस्तिष्क के किसी कोष्ठक में चेतना तो विद्यमान नहीं है। समाधि लगाने वाले योग मृतक अथवा अर्धमृतक स्थिति में महीनों पड़े रहते हैं। उस अवधि में हृदय की धड़कन नाम मात्र को रह जाती है। उतने भर से शरीर यात्रा का चल रुकना विस्मयजनक माना जा सकता है; पर प्रत्यक्ष देखा जा सकता है कि मस्तिष्क जीवित रहने की स्थिति में अपने ही संकल्प बल से शरीर को अर्धमृतक बना देने से लेकर पुनर्जीवित कर देने तक के सारे क्रिया-कलाप सम्भव हो सकते हैं। इच्छा शक्ति के चमत्कार संकल्प-बल के जादू विभिन्न क्षेत्रों में आश्चर्य चकित करने वाले प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। जीवन के उत्थान पतन में शरीर का अन्य कोई अवयव उतनी बड़ी भूमिका नहीं निभाता जितना कि मस्तिष्क। दीर्घजीवन से लेकर प्रतिभावान बनने तक की समस्त विकासोन्मुख प्रक्रियाओं के पीछे मानसिक शक्तियों के ही कौतूहल दृष्टिगोचर होते हैं।

देखने में तो लगता है कि हृदय, पाचन तन्त्र आदि अवयवों के बलबूते पर शरीर यात्रा चल रही है; पर गहराई में प्रवेश करने पर कुछ दूसरे ही तथ्य सामने आते हैं। मस्तिष्क के पिछले भाग में अवस्थित अचेतन मन के नियन्त्रण में शरीर की अति महत्त्वपूर्ण गतिविधियाँ अपने ढर्रे पर लुढ़कती है ओर स्वसंचालित यन्त्र की तरह विभिन्न संस्थान अपना-अपना काम करते रहते हैं। रक्त संचार, श्वास-प्रश्वास, आकुंचन-प्रकुंचन, निमेष-उन्मेष, निद्रा-जागृति, क्षुधा-पिपासा, ग्रहण-विसर्जन जैसी अनवरत रीति से आजीवन चलती हरने वाली गतिविधियाँ अपने आप ही नहीं चलती रहती। इनका क्रमबद्ध सुसंचालन अचेतन मस्तिष्क के केन्द्र संस्थानों से सम्भव होता है। ज्ञानेन्द्रियाँ अपने-अपने काम करती है। यह इन छिद्रों की क्षमता नहीं है, वरन् मस्तिष्क के विशेष केन्द्रों तक इन्द्रिय सम्वेदनाओं की सूचना पहुँचाने के उपरान्त वह अनुभूति होती है, जिसे हम इन्द्रिय चेतना के नाम से पुकारते हैं। तरह-तरह के रसास्वादन, जिह्वा, जननेन्द्रिय, नेत्र, कर्ण, नायिका आदि के होते हैं, पर वस्तुतः उस अनुभूति से मस्तिष्कीय अमुक केन्द्रों को ही सम्वेदना एवं क्षमता प्रकट हो रही होती है। मस्तिष्क स्तब्ध कर दिया जाए तो इन्द्रिय यथावत् बनी रहने पर भी किसी प्रकार की अनुभूति सम्भव न हो सकेगी। कष्ट रहित आपरेशनों के अवसर पर यह सब आसानी से देखा जा सकता है। सुँघा कर मस्तिष्क को स्तब्ध कर देने वाली अथवा नाड़ी संस्थान को सुन्न अमुक अवयवों की सूचना मस्तिष्क तक न पहुँचने देने का अवरोध उत्पन्न करके आपरेशन किये जाते रहते हैं। इससे स्पष्ट है कि इन्द्रियजन्य अनुभूतियाँ मस्तिष्क की ही करामात है।

विचारणाएँ, भावनाएँ, सम्वेदनाएँ, आस्थाएँ, आकांक्षाएँ, आदतें इन्हीं को मिलाकर व्यक्तित्व बनता है और विभिन्न प्रकार की गतिविधियाँ सम्भव होती है। यह क्रिया-कलाप मस्तिष्कीय स्थिति का ही कौतूहल है। संक्षेप में प्रकट और अप्रकट व्यक्तित्व की जैसी भी कुछ स्थिति है उसके लिए मस्तिष्क को ही श्रेय या दोष दिया जा सकता है।

मस्तिष्क ठीक काम करे दो शरीर की विपन्न परिस्थितियों में भी मनुष्य बढ़े-चढ़े काम करता रह सकता है। आद्य शंकराचार्य को लम्ब समय तक भयंकर फोड़े से पीड़ित रहना पड़ा पर वे उसी स्थिति को सहन करते हुए थोड़ी सी आयु में इतना काम कर सके जितना कि सौ वर्ष स्वस्थ रहने वाले इस मनुष्य मिलकर भी काम नहीं कर सकते। यह मानसिक स्थिरता और प्रखरता का चमत्कार था। जो शरीर की रुग्णता को तुच्छ मानते हुए भी अतिमहत्त्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करा सकने में समर्थ हो सका। संसार के इतिहास में ऐसे अगणित उदाहरण विद्यमान है जिससे स्पष्ट है कि अष्टावक्र, सूरदास जैसे शारीरिक दृष्टि से अक्षम किन्तु मानसिक दृष्टि से समर्थ व्यक्तियों ने आश्चर्यजनक पुरुषार्थ प्रस्तुत किये हैं। इसके विपरीत ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो शारीरिक दृष्टि से स्वस्थ ही नहीं साधनों की दृष्टि से सम्पन्न होते हुए भी गया गुजरा, हेय एवं निरर्थक जीवन जीते हुए किसी प्रकार मौत के दिन पूरे कर सके।

दृष्टिकोण की विकृति मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी क्षति एवं असफलता है इस विपन्नता को यदि संभाला सुधारा जा सके तो समझना चाहिए कि मनुष्य जन्म को सफल सार्थक बनाने वाला आधार हाथ लग गया। इस कार्य में यों दूसरों से भी सहायता मिल सकती है पर प्रधानतया अपना ही साहस एवं अध्यवसाय जुटा कर आत्म-निर्माण का अभिनव प्रयत्न करना पड़ता है। अपने ऊपर अधिकार तो अन्ततः मात्र अपना ही है-दूसरे तो परामर्श दाता भर ही हो सकता है। अधिक से अधिक इतना हो सकता है कि यथा सम्भव यत्किंचित् सहायता कर दें; पर वह सहयोग तो मन समझाने और आँसू पोंछने जितना ही कारगर सिद्ध होता है अपने दृष्टिकोण और क्रिया-कलाप को सुव्यवस्थित करने के लिए काम तो अपना ही साहस एवं अपना ही प्रयत्न आता है।

मस्तिष्कीय विकृति का प्रत्यक्ष चिह्न है तनाव। देखा जाता है कि कितने ही व्यक्ति बाहर से सामान्य कार्य करते दीखने पर भी भीतर ही भीतर उद्विग्न पाये जाते हैं। खिन्न, उदास, चिन्तित, निराश, भयभीत, कातर, शोकाकुल, रोते, कलपते, लोग अपंगों, विक्षिप्तों की तरह अस्त-व्यस्त काम करते हैं। लंघन में उठे रोगी की तरह उनकी क्रिया-शक्ति अति न्यून होती हैं। तनिक सा श्रम करते ही थकान चढ़ दौड़ती है। कई व्यक्ति भीतर ही भीतर आवेशों से ग्रसित पाये जाते हैं। खीज, झुँझलाहट, क्रोध, द्वेष, ईर्ष्या की आग में जलते हैं और अपने कल्पित शत्रुओं से प्रतिशोध लेने, बर्बाद करने, नीचा दिखाने के कुचक्र रचते रहते हैं। बन पड़ता है तो दूसरे को हानि पहुँचाने वाले आक्रमण करते या प्रपंच रचते हैं। उतना न बन पड़ा तो आत्म-हत्या गृह त्याग जैसे आत्म-घात पर उतारू होते हैं। यह विक्षिप्त एवं उद्विग्न मनःस्थिति के लक्षण है। यों पूर्ण विक्षिप्त तो असामाजिक और व्यवहार की दृष्टि से अव्यवस्थित हो जाते हैं; पर अर्ध विक्षिप्तों की दशा उनसे कुछ बहुत अच्छी नहीं होती। अक्सर इतना ही होता है कि विक्षिप्तों को अटपटापन देखते ही प्रकट हो जाता है किन्तु उद्विग्नों की उपहासास्पद मनःस्थिति का पता निकट सम्पर्क में रहने के उपरान्त चलता है। वे खाते, बोलते, करते, धरते, सोते जागते तो सामान्य मनुष्यों की तरह ही हैं, पर आन्तरिक खोखलापन ऐसी विचित्र स्थिति में डाले रहता है कि जिस काम में हाथ डालें उसी में असफलता हाथ लगे। लगातार संपर्क में आने वाले को इस अर्ध विक्षिप्त स्थिति का आभास मिलता रहता है; पर इतना न्याय वे भी नहीं कर पाते कि मानसिक रोगी मानकर उनसे सहृदयता एवं उदारता बरतें। होता उलटा है इस विपन्नता को अवज्ञा, उद्दंडता आदि गिन लिया जाता है और फिर विरोध विग्रह खड़ा करके क्षति पहुँचाने का प्रयास होने लगता है। इस प्रकार आन्तरिक अशान्ति बाहर से असफलताओं और दुर्व्यवहारों की दुहरी विपत्ति सिर पर ला पटकती है। फलतः विपन्नता की आग में ईंधन पड़ता जाता है और खीज घटने की अपेक्षा बढ़ती ही जाती है।

मस्तिष्क पर ज्वर आने, चोट लगने, अपच रहने जैसे कारणों से भी शिर दर्द जैसी स्थिति हो सकती है। कोई आकस्मिक विपत्ति एवं तिलमिला देने वाली घटना भी मस्तिष्क को उत्तेजित करके तनाव, अनिद्रा, शिर दर्द जैसे कष्ट खड़े कर सकती है। यह सामयिक कारण है जो आते और चले जाते हैं। यों बारह घण्टे बुखार ओर एक घण्टा उद्वेग की क्षति समान मानी गई है अस्तु सामयिक आवेश असन्तुलन भी कम क्षति नहीं पहुँचाते उनकी प्रतिक्रिया भी विघातक ही होती है। उथले अधीर व्यक्ति ही छोटे कारणों पर अत्यधिक उत्तेजित होते हैं। गम्भीर धैर्यवान व्यक्ति बड़ी कठिनाइयों को भी छोटी मानते हैं और उद्विग्न होने के स्थान पर समाधान सोचने में लगते हैं। सार्थक काम सामने होने पर निरर्थक जंजालों से स्वयं ही मन हट जाता है। प्रस्तुत समस्या का हल खोजने की मानसिक सन्तुलन की अनिवार्य आवश्यकता स्वीकार की जाए तो फिर विषम परिस्थितियों में विशेष रूप से सतर्कता बरतनी पड़ेगी और उस दूरदर्शिता का परिचय देना पड़ेगा, जिसके सहारे विवेकवान व्यक्ति घोर संकट के समय स्थिर चित्त दिखाई पड़ते हैं।

मस्तिष्क में सीमित तापमान सह सकने की सामर्थ्य है। उद्विग्नता की आग इतनी तीखी होती है कि कपाल के भीतर भरी हुई सज्जा उससे गढ़ाव में उबलते तेल की तरह खोलने लगती है। इसी असह्य तापमान को मानसिक तनाव के रूप में देखा जा सकता है। तनाव के लक्षण सर्वविदित हैं-शिर भारी रहना, चकराना, जी उचटना, किसी काम में मन न लगना, पदार्थों से रुचि हट जाना, किसी से सघन आत्मीयता की अनुभूति न होना, उदासी छाई रहना; खोपड़ी चटकने, सिर के भीतर नसें फटने जैसा लगना, नींद अल्प और अधूरी आना, स्वभाव में चिड़चिड़ापन बढ़ जाना, जैसे लक्षणों ने मनःक्षेत्र को आच्छादित कर लिया। मोटे तौर पर इसे शिर दर्द जैसी स्थानीय व्यथा के समतुल्य माना जा सकता है; पर बात ऐसी ही नहीं। तनाव का कारण जटिल है। विकृत चिन्तन जब सारे मानसिक संस्थान को आँधी, तूफान की तरह तोड़-मरोड़कर रख देने जितना प्रचण्ड होता है तो ही उससे तनाव उत्पन्न होता है। सामान्य स्थिति में तो औंधे-औंधे विचार आते-जाते रहते हैं। उनका प्रभाव न गहरा होता है और न स्थायी।

मोटे लक्षण में शिर का भारीपन, बेचैनी, उत्तेजना, घुटन, अनिद्रा जैसी कठिनाइयाँ ही सामने होती हैं, पर उनके कारण कार्य दक्षता, मनोयोग एवं अभिरुचि का तारतम्य ही गड़बड़ा जाता है, फलतः जो भी काम हाथ में होते हैं वे बेगार की तरह बन पड़ते हैं और आधे-अधूरे कुरूप असफल बन कर रह जाते हैं। स्वभाव में चिड़चिड़ापन बढ़ जाने से सम्पर्क क्षेत्र में अपेक्षा असहयोग एवं मनोमालिन्य बढ़ता जाता है। इस प्रकार तनाव की प्रतिक्रिया न केवल मानसिक उद्विग्नता तक सीमित रहती है वरन् उसका प्रभाव कार्य कुशलता एवं पारिवारिक सामाजिक जीवन पर भी पड़ता है और कठिनाइयों पर कठिनाइयाँ बढ़ती चली जाती है। इन तथ्यों पर ध्यान दिया जा सके तो प्रतीत होगा कि तनाव सामान्य जैसी व्यथा दीखते हुये भी जीवन के हर क्षेत्र में जटिलताएँ उत्पन्न करने वाला अति विघातक रोग है। इसके निवारण का यदि समय रहते उपाय न किया जाए तो वह स्वभाव का एक अंग बन जाता है और कोई वास्तविक कारण न होने पर भी अभ्यस्त आदतों की तरह अपनी जड़े जमाये बैठा रहता है। नशेबाजी, गाली देना, उँगलियाँ चटकाना जैसी आदतें आरम्भ में कारणवश होती है; पर पीछे वे आवश्यकता न रहने पर भी अनजाने ही कार्यान्वित होती रहती है। तनाव जब आदत का अंग बन जाय तब समझना चाहिए कि अब इससे पिण्ड छुड़ाना कष्ट साध्य बन गया है।

मानसिक तनाव का समूचे शरीर पर प्रभाव पड़ता है और अन्य कारण न होने पर भी मात्र अकेले इसी विग्रह के कारण शरीर के भीतरी और बाहरी अवयव अपनी स्वाभाविक क्रियाशीलता गँवाते चले जाते हैं। घड़ी के पुर्जों की तरह शरीर के अवयवों का पारस्परिक सहयोग एवं तालमेल ही जीवन रथ को अग्रगामी बनाता है। एक पुर्जा गड़बड़ी फैलाने लगे तो सारी मशीन का सन्तुलन बिगड़ जाता है और बढ़िया घड़ी भी अपना काम ठीक तरह कर सकने में असमर्थ हो जाती है। तनाव यों स्थानीय रोग दीखता है; पर उसकी जड़ें मस्तिष्क रूपी जीवन संचार केन्द्र में घुस जाती है इसलिए वहाँ की विकृति हर कल पुर्जे को प्रभावित करती है। फलतः चिकित्सक कोई कारण ढूंढ़ नहीं पाते-निदान में कोई प्रत्यक्ष संकट दृष्टिगोचर नहीं होता फिर भी शरीर गलता ही जाता है। दुर्बलता बढ़ती और बढ़ती ही चली आती है। साथ ही चित्र-विचित्र रोगों की आये दिन फुलझड़ियाँ अपने-अपने कौतूहल दिखाती हुई सामने आती रहती है।

मानसिक तनाव की शारीरिक प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में वैज्ञानिक क्षेत्रों में सुविस्तृत शोध कार्य हुआ है और उसकी बारीकियों पर आगे और भी अधिक तत्परतापूर्वक अनुसंधान चल रहा है। रीडर्स डाइजेस्ट पत्रिका में विद्वान जे0 डी0 राटल्कीपर का एक लेख कुछ वर्ष पूर्व छपा था। शीर्षक था ‘तनाव रोगों का सबसे बड़ा कारण’ उसमें उन्होंने विश्व भर में इस सन्दर्भ में हुए शोध कार्यों पर प्रकाश डाला था और बताया था कि कुछ समय पर तनाव को जुकाम, खुजली जैसा उपेक्षा योग्य रोग माना जाता था, पर गम्भीर अनुसन्धानों ने यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि यदि मस्तिष्क उद्विग्न बना रहे तो फिर शरीर के अन्य अवयवों से अपना स्वाभाविक कार्य करते रहने की अपेक्षा नहीं की जा सकती । वे लड़खड़ाने लगेंगे, तो अस्वस्थता इस या उस खिड़की से शरीर में घुस ही पड़ेगी।

जर्मनी के मौन्ट्रियल विश्व विद्यालय के रसायन प्राध्यापक डाक्टर हेन्स सैले ने अपने दीर्घकालीन अनुसंधान में तनाव को दमा, हृदय रोग, क्षय सदृश भयानक रोगों के समतुल्य हानिकारक बताया है और उसे कितने ही छोटे-बड़े रोगों का जन्म दाता कहा है। वे कहते हैं तनाव की सीधी प्रतिक्रिया हारमोन ग्रन्थियों पर होती है और उनके महत्त्वपूर्ण स्रावों में असन्तुलन आ जाने से तरह-तरह की शारीरिक अस्वाभाविकताएँ दृष्टिगोचर होने लगती है। रक्तचाप का घटना या बढ़ना प्रायः इसी असन्तुलन के कारण उत्पन्न होता है। अनिद्रा कोई सीधा रोग नहीं है। मानसिक उत्तेजना नींद में अत्यधिक बाधा पहुँचाती है। उद्विग्न रहने वाले मनुष्य आधी अधूरी नींद ही ले पाते हैं, फलतः शारीरिक क्षति पूर्ति न होने से थकान और खीज निरन्तर चढ़ी रहती है।

बुढ़ापे के कारण शारीरिक उत्पादन घट जाते हैं और उतने भर में क्षति पूर्ति सम्भव नहीं हो पाती। फलतः वृद्ध व्यक्ति रासायनिक पदार्थों से क्षुधा ग्रस्त रहता है। अवयव कड़े पड़ते जाते हैं। अक्षमता बढ़ने से बढ़ी हुई विकृतियाँ अन्ततः मृत्यु का ही रूप धारण कर लेती है।यदि क्षतिपूर्ति का सन्तुलन ठीक तरह बना रहे तो मानवी काया की प्राकृतिक संरचना इस योग्य है कि इस यन्त्र को कई सौ वर्षों तक समक्ष रखा जा सके। बुढ़ापा कब आयेगा यह ठीक से नहीं कहा जा सकता है। हो सकता है कि दाँत और केश पक जाने पर भी स्फूर्ति बनी रहे और अधिक आयु हो जाने पर भी युवावस्था जैसा उत्साह बना रहें। इसके विपरीत यौवन आरम्भ होने से पूर्व ही बुढ़ापे की छाया चन्द्र ग्रहण की तरह चढ़ती देखी जा सकती है। यह रासायनिक उत्पादनों की ही न्यूनाधिकता है जो यौवन में बुढ़ापा उत्पन्न करती है और बुढ़ापे में यौवन बनाये रहती हैं।

डा0 शैले के सुविस्तृत अनुसन्धानों का विवरण अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के जनरल में प्रकाशित हुआ था। जिसमें उन परीक्षणों का उल्लेख था जो तनाव की भयंकर प्रतिक्रिया और उसमें होने वाली क्षति का जानकारी देते हैं। उन अनुसन्धानों के आधार पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि मस्तिष्कीय उत्तेजना बनी रहने से शरीर के भयंकर क्षति होती है। उसे न हटाया जा सका तो फिर अशक्तता बढ़ती ही जायेगी। विकृतियाँ अपना प्रभाव दिखाएँगी और अशान्त व्यक्ति तेजी से मृत्यु मुख में घुसता चला जाएगा।

एक दूसरे क्षुब्ध प्रतिष्ठ अनुसंधान कर्ता डॉ0 फ्रेडरिक वनटिंग ने चूहे, बन्दर, कुत्ते तथा अन्य प्राणियों पर यह परीक्षण किये कि मानसिक उत्तेजना बनी रहने से शरीर पर क्या प्रभाव पड़ता है? उनने पाया कि इसकी प्रतिक्रिया वैसी ही होती है जैसी कि शरीर को तोड़-मरोड़ कर रख देने वाले अन्य भयंकर रोगों की। लगातार दस दिन तक मस्तिष्क उत्तेजित रहें और नींद न आये जो मनुष्य का पागल हो जाना बेमौत मर जाना निश्चित हैं।

प्रश्न उठता है कि क्या तनाव कोई अपने हाथ बुलाता है? क्या उससे छुटकारा पाना अपने बस की बात है? इन दोनों प्रश्नों का उत्तर हाँ में ही दिया जा सकता है। सामान्य घटनाक्रमों को अति महत्त्वपूर्ण मान बैठने की आदत बचकाने दृष्टिकोण की प्रतिक्रिया है। यदि जिन्दगी को एक मनोरंजक खेल माना भर जाय और उसमें आते रहने वाली अनुकूलता, प्रतिकूलताओं की आँखमिचौनी को एक खिलवाड़ भर माना जाय तो कोई भी अप्रिय घटना बहुत भारी प्रतीत न होगी और उतार-चढ़ावों को कौतूहल मात्र अनुभव किया जा सकेगा। इसके विपरीत यदि डरपोक अधीर प्रकृति होगी, छोटी कठिनाई को बड़ा-चढ़ा कर सोचेंगे और उसी से भयभीत होकर पैरों पर कुल्हाड़ी ही नहीं मस्तिष्क को चूरा कर देने वाली हथौड़ी भी मारेंगे।

बात को बढ़ाकर सोचना ही यदि सुखद लगता हो तो दसों दिशाओं में बिखरे हुए प्राकृतिक सौंदर्य को, इस संसार की कलात्मक संरचना को, मानव जीवन के साथ जुड़ी हुई अगणित विभूतियों को, समाज की सुव्यवस्थित संरचना को,सहयोग एवं सद्भाव के आधार पर मिलने वाले अनुदानों को, अब तक मिली सफलताओं को, उज्ज्वल भविष्य की आशा सम्भावनाओं को, विपत्तियों के ग्रहण की अस्थिरता को विचारा जाना चाहिए और उनके चित्र जितने बढ़ा-चढ़ाकर देखे जा सकते हों देखने चाहिए। हर मनुष्य के सामने कुछ अनुकूलताएँ रहती है कुछ प्रतिकूलताएँ। निश्चय ही उनमें प्रिय अधिक और अप्रिय कम होती है। अन्धकार से प्रकाश की सत्ता बढ़ी चढ़ी है। असफलताओं की तुलना में सफलताओं की गणना अधिक है। शत्रुओं से मित्रों की संख्या कई गुनी होती है। अपनी स्थिति लाखों से बुरी है तो करोड़ों से अच्छी है। यदि इस प्रकार सोचा जा सके तो मस्तिष्क को उत्तेजित करके कष्टकारक तनाव की स्थिति से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है। यदि परिष्कृत दृष्टिकोण विकसित किया जा सके तो तथाकथित प्रतिकूलताएँ उपेक्षणीय लगें तो उनका खट्टा-मीठा स्वाद लेते हुए सन्तुलन को यथावत बनाये रखा जा सके।

तनाव दूर होने का एक उपाय तो यह है कि मनोवाँछित परिस्थितियाँ बनी रहें। कल्पवृक्ष आँगन में लगा हो और जो चाहा जाय वही तत्काल उपस्थित होता रहे। संसार के सभी प्राणी अपने वशवर्ती और अनुचर रहें। स्वर्ग जैसे किसी तथाकथित लोक में निवास रहें और सर्वत्र अनुकूलता ही अनुकूलता पाई जाय। यदि यह दिवास्वप्न सम्भव न दीखता हो और विश्व रचना में अँधेरे-उजाले का पेंडुलम हिलना कटु सत्य समझ में आता हो तो फिर एक उपाय है कि हम प्रतिकूलताओं से डरें नहीं वरन् उन्हें विनोद के लिए आवश्यक उतार-चढ़ाव स्वीकार कर लें। ताल-मेल बिठाकर चलने वाली समझौता वादी नीति ही व्यावहारिक है। प्रतिकूलताएँ भी अनुकूलताओं की तरह श्वास, प्रवास कम की तरह बनी ही रहने वाली है यदि यह मान लिया जाय तो जूझना, सहना और हँसना इन तीनों की समन्वित रीति-नीति अपनानी पड़ेगी।

तनाव परिस्थितिवश भी हो सकता है, पर उस स्थिति में वह अस्थायी रहता है और समय प्रवाह में वह बहता हुआ अन्यत्र चला जाता है। दृष्टिकोण की विकृति ही चिरस्थायी तनाव उत्पन्न करती है और उसी से जीवन का वरदान एक अभिशाप के रूप में परिणत होता है। अध्यात्म तत्त्व-दर्शन यदि हृदयंगम किया जा सके तो न केवल तनाव जैसी व्यथा से वरन् अन्यान्य आपदाओं से बचते हुए सन्तोष, आनन्द एवं उल्लास के साथ अभावग्रस्त विपन्न समझा जाने वाला कुसमय; सुखद सौभाग्य में सहज ही परिणत हो सकता है।


तीर्थ यात्रा उच्च स्तरीय पुण्य परमार्थ

धार्मिक पुण्य कृत्यों में यों अनेकों कर्मकाण्डों की गणना हैं, पर उनमें सर्वोपरि महत्त्व तीर्थयात्रा को यदा गया है। यों तीर्थयात्रा की महिमा सभी धर्मों में हैं, पर हिन्दू धर्म में तो उसे अत्यधिक महत्त्व दिया गया है। मुसलमान धर्म में हज यात्रा को आवश्यक धर्म कृत्यों में गिना गया है और कहा गया है जिनके लिए सम्भव हो वे दूरवर्ती होते हुए भी जीवन में एकबार काबा पहुँचने का प्रयत्न करें। बौद्ध धर्मावलम्बी भगवान बुद्ध के तपः क्षेत्रों का दर्शन करने के लिए संसार के कोने-कोने से आते रहते हैं। यरूसलम आदि तीर्थों की यात्रा ईसाई धर्मावलम्बी भी बड़ी श्रद्धापूर्वक करते हैं। हिन्दू धर्म में ऋषियों, देवताओं, अवतारों एवं महामानवों के कार्यक्षेत्र तीर्थों के रूप में श्रद्धास्पद बने हुए हैं। उनके दर्शन स्नान का पुष्प-फल प्राप्त करने के लिए हर वर्ष लाखों यात्री उनमें पहुँचा करते हैं। पर्यटन में लगने वाले,धन श्रम एवं समय का प्रायः आधा भाग तीर्थयात्रा का होता है। इससे प्रतीत होता है कि अपने देश में-विशेषतया हिन्दू जनता में-इसे कितना बड़ा पुष्प कार्य माना गया है। उसके लिए कितनी श्रद्धा रहती हैं और उस प्रयोजन के लिए कितना कुछ प्रयत्न एवं त्याग किया जाता है।

विचारणीय यह हैं कि तीर्थयात्रा को इतना महत्त्व क्यों मिला? उससे किस प्रकार धर्म प्रयोजन की पूर्ति होती हैं? यात्रा प्रसंग को किस कारण पुण्य गिना गया? किसी प्रतिमा के दर्शन अथवा नदी, सरोवर में स्नान करने से परमार्थ सिद्धि कैसे हो सकती हैं? आत्म-कल्याण में यह यात्रा किस प्रकार सहायक हो सकती हैं? ईश्वर की प्रसन्नता-भगवत् कृपा का लाभ इस परिभ्रमण के साथ क्यों कर सम्बन्ध हो सकता हैं? ऐसे-ऐसे अनेक प्रश्न किसी जिज्ञासु के मन में उठ सकते हैं। अन्ध विश्वास और मूढ़ मान्यता के सहारे तो संसार में न जाने, क्या-क्या अनगढ़ प्रथा, परम्पराएँ चल रही हैं। उन्हें लकीर पीटने की तरह छाती से चिपकाए भी रहते हैं। पर विचारशीलता का उदय होते ही बुद्धि प्रत्येक कार्य एवं प्रचलन के सम्बन्ध में यह जानना चाहती हैं कि उनकी उपयोगिता क्या हैं? इसका समाधान होने पर ही बात बनती हैं अन्यथा मात्र प्रचलनों के आधार पर चल रहें ढर्रे से विवेकशीलता का समाधान नहीं होता। ऐसी दशा में उपहास से लेकर विरोध तक की प्रतिक्रिया उभरती हैं। आज भी यही स्थिति हैं। जहाँ लाखों व्यक्ति तीर्थयात्रा पर प्रचुर परिमाण में धन और समय लगाते हैं वहाँ ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो इसे अन्ध विश्वास और अपव्यय की संज्ञा देते हैं। और कहते हैं कि इतनी शक्ति यदि किसी उपयोगी कार्य में लगती तो कितना अच्छा होता?

तीर्थयात्रा को इतना श्रेय धर्मशास्त्रों और मनीषियों ने क्यों दिया? इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है। उसका प्रयोजन समझे बिना संशय की स्थिति ही बनी रहेगी।

मोटी बुद्धि से यह समझा जाता है कि किन्हीं देव प्रतिमाओं में कोई जादुई शक्ति होती हैं। उनका दर्शन करने मात्र से दर्शनार्थी का कल्याण हो जाता है। जादुई होने के कारण ही उन प्रतिमाओं के विशाल मंदिर बने हैं और यात्रियों का प्रवाह इसी शक्ति का लाभ लेने के लिए पहुँचता है। यह मान्यता नदी, सरोवरों के सम्बन्ध में भी हैं। समझा जाता है कि उनके जल में भी कोई जादुई विशेषता है जिससे स्नान करने मात्र से पाप कटते और पुण्य फल मिलते हैं। किन्हीं विशेष पर्वों पर इनकी जादुई शक्ति और अधिक बढ़ जाती हैं, इसलिए उन दिनों का दर्शन स्नान सामान्य समय की अपेक्षा और भी अधिक लाभदायक रहता है, जिन देवताओं की प्रतिमा प्रतीकों का दर्शन किया जाता है, वे इस तीर्थयात्रा को यात्री की भक्ति भावना का प्रमाण मानते हैं और उसे अपना कृपा-मात्र बनाते पुण्य-फल प्रदान करते हैं। मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए भी कितने ही लोग यात्रा करते हैं। इच्छापूर्ण होने की शर्त पर कई तरह की मनौतियाँ मनाते और भेंट-पूजा चढ़ाते हैं। कई सोचते हैं कि मुण्डन विवाह आदि के उपरान्त कुल देवता का दर्शन आवश्यक हैं अन्यथा वे रुष्ट होकर कोई हानि पहुँचा देंगे। ऐसे ही ऐसे कुछ कारण हैं जिनके कारण तीर्थ यात्रा करने के लिए लोगों की भावना उठती हैं। पर्यटन का मनोरंजन साथ में जुड़ा रहने से उस सन्दर्भ में उत्साह की मात्रा और भी बढ़ जाती है। साथी संगियों की देखा-देखी दूसरों का भी मन चलता है ओर यात्रा की टोलियाँ निकल पड़ती हैं। आज की तीर्थ यात्रा का स्वरूप एवं आधार जिनके कारण इस परिभ्रमण में इतना धन ओर समय लगता है।

किसी विचारशील व्यक्ति की दृष्टि में उपरोक्त सभी बातें तथ्य रहित प्रतीत होती हैं। प्रतिमाओं का दर्शन स्नान भाव से देवताओं का प्रसन्न होना और वरदान देना ऐसी बातें हैं जिन्हें तर्क या तथ्य के आधार पर हृदयंगम नहीं कराया जा सकता । अन्ध श्रद्धा के आधार पर तो पशुबलि, नरबलि, शिशुबलि जैसे जघन्य कृत्यों की भी धर्म कृत्यों में ही गणना होती रही हैं। बुद्धिवाद की बढ़ोत्तरी ने यह माँग प्रस्तुत की हैं कि प्रचलनों की औचित्य के आधार पर समीक्षा की जाय और उनमें से उतना ही अंश स्वीकार किया जाय जो तथ्यों की कसौटी पर खरा सिद्ध हो सके।

भारतीय धर्म विवेकशीलता को प्रश्रय देने में सदा अग्रणी रहा है। उसका तत्त्वदर्शन संसार भर के बुद्धि वादियों ओर भावनाशीलों को समान रूप से प्रभावित करता रहा है। ऋषियों ने श्रद्धा को आत्म की उत्कृष्टतम विभूति तो कहा हैं, पा साथ ही उसके साथ विवेक के समन्वय पर भी पूरा जोर दिया है विवेक-विहीन श्रद्धा मूढ़-मान्यता बनती और अनर्थ उत्पन्न करती हैं। श्रद्धा रहित बुद्धि उससे भी भयानक हैं। जिससे आदर्शों और भावनाओं का समन्वय न हो ऐसी बुद्धि साक्षात् पिशाचिनी की भूमिका उत्पन्न करती हैं। उसका परिणाम घिनौनी स्वार्थ परता कुचक्री छल-छद्मता और क्रूर दुष्टता के अतिरिक्त और कुछ निकलता ही नहीं । अपराधी कारागार बन्दियों में प्रायः सभी की बुद्धि असाधारण रूप से प्रखर रही होती हैं। बुद्धि-कौशल और दुस्साहस का समन्वय हुए बिना क्रूर कर्म बन ही कहाँ पड़ते हैं। मानवी मनः तंत्र की संरचना को ध्यान में रखते हुए मनीषियों ने श्रद्धा और विवेक के समन्वय का पूरा-पूरा ध्यान रखा हैं। भारतीय धर्मशास्त्र और अध्यात्म विज्ञान का पूरा ढाँचा इन दोनों महान आधारों के समावेश सहित ही खड़ा किया गया है। तीर्थ यात्रा को इतना महत्त्वपूर्ण स्थान अकारण नहीं दिया गया है उस प्रतिपादन के पीछे श्रद्धा ओर विवेक का समुचित समन्वय रखते हुए ही इस सन्दर्भ का महात्म्य बताया और प्रसंग चलाया गया है।

तीर्थयात्रा एक पुण्य प्रक्रिया है जिसका मूल प्रयोजन हैं-”विचारशील सज्जनों का सर्वसाधारण से संपर्क बनाना और आदर्शवादी प्रशिक्षण से लोकमानस को परिष्कृत बनाना।” इससे बढ़कर लोक हित दूसरा नहीं हो सकता । इससे बड़ा दान इस पृथ्वी पर दूसरा नहीं हैं। ब्रह्म दान से-सद्ज्ञान से श्रेष्ठ वस्तु इस धरती पर और कोई हैं नहीं। वृक्ष अपने फल उदारतापूर्वक बाँटते हैं। बादल धरती की प्यास बुझाने के लिए अपना सर्वस्व समर्पण करते और धन्य बनते हैं। दीपक अपने को जलाते और अन्धकार में भटकने वालों को प्रकाश देते हैं। पुष्प अपनी शोभा से दर्शकों के नेत्र तृप्त करते हैं। चन्दन की सुगन्ध पवन को मिलती हैं और उस सार्थकता उन्हें इसी प्रकार नियोजित किये जाने में हैं। जीवन को धन्य बनाने वालों के लिए यही एक मात्र राजमार्ग निर्धारित हैं। तीर्थयात्रा की महत्ता इसी महान वितरण के साथ जुड़ी हुई हैं।

ज्ञानी जन तीर्थ यात्रा के लिए मण्डली बना कर निकलते थे। यह यात्राएँ पैदल होती थीं । वाहन का उपयोग साधनों को ढोने के लिए भले ही होता रहा हो-उनका माहात्म्य पद यात्रा के द्वारा ही सम्भव होता था। पद यात्रा के असंख्य लाभ हैं। स्वास्थ्य संवर्द्धन की दृष्टि सके उसका असाधारण महत्त्व है। इससे श्रेष्ठ, सन्तुलित, सरल और सर्वोपयोगी व्यायाम दूसरा नहीं है। टहलने की प्रक्रिया को अब्राहम लिंकन महात्मा गाँधी जैसे अत्यन्त व्यस्त व्यक्ति भी अपनी दैनिक जीवन-चर्या में सम्मिलित रखे रहे हैं। रोग चिकित्सा में यदि रोगी को टहलाने का उपचार भी सम्मिलित रखा जा सके तो उसे बहुमूल्य टानिकों और जीवाणुनाशी रसायनों से अधिक लाभदायक पाया जाएगा। यह टहलने का संकल्पित और क्रमबद्ध अनुष्ठान पैदल तीर्थयात्रा से सम्भव होता है और गये गुजरे स्वास्थ्य के लोग भी आश्चर्यजनक सुधार करके लौटते हैं। भिन्न भिन्न स्थानों के जलवायु का सेवन शरीर की सहन शक्ति को परिपुष्ट करता है जो एक ही जगह अड़े गढ़े रहते हैं उन्हें कहीं अन्यत्र जाने या भिन्न परिस्थितियों में रहना पड़े तो उस परिवर्तन आघात को सहन कर सकना उनसे बन नहीं पड़ेगा। आये दिन बीमार पड़ेंगे जलवायु और ऋतु प्रभाव को सहन करने से वह जीवनी शक्ति सुदृढ़ होती है जिसके सहारे प्रतिकूलताओं से निपटना और रोगों के आक्रमण को निरस्त कर सकना सम्भव होता है।

मानसिक स्वास्थ्य संवर्द्धन में मनोरंजन का विनोद उल्लास का कितना महत्त्व है, इसे सिद्धांततः न समझते हुए भी व्यवहार में सभी स्वीकार करते हैं। मनोरंजन के लिए सबका जी करता है। इसके लिए व्यस्तता होते हुए भी समय निकाल लिया जाता है। तंगी रहते हुए भी पैसा खर्च कर दिया जाता है। सड़क पर रीछ,बन्दरों का तमाशा आते ही बच्चे स्कूल की पढ़ाई छोड़कर देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ने का कारण वहाँ जाकर कुछ क्रिय विक्रय करना नहीं मनोरंजन ही प्रधान कारण होता है। सरकस,सिनेमा,नाचा,नाटकों में बिना बुलाये अप्रत्याशित भीड़ जा पहुँचती है। यह सब विनोद के आकर्षक प्रभाव का ही दिग्दर्शन है। प्रदर्शनियाँ इसी निमित्त लगती है। दर्शनीय सीन बनाने में यह उद्देश्य रता है कि लोग आकर्षित होकर वहाँ दौड़े और निर्माण कर्ता की स्मृति बनाये रखें। अधिकांश स्मारक इसी निमित्त बनते हैं। वहाँ मेले ठेले इसी उद्देश्य के लिए लगाये जाते हैं कि निर्माण कर्ता की स्मृति उस दर्शनीय कौतूहल के साथ जुड़ी रहने के कारण चिरकाल तक गतिचक्र के साथ लुढ़कती रहे। सौंदर्य शृंगार, शोभा, सज्जा, के अनेक साधन अपने और दूसरों का चित्त प्रसन्न करने के लिए बनाये जाते हैं। संगीत साहित्य, कला के सरंजाम खड़े करने में लोक-मंगल का गौण और लोक रंजन का प्रधान उद्देश्य रहता है। आखिर विनोद भी मनुष्य की एक भौतिक आवश्यकता और भूख है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के चार जीवन लाभों में एक ‘काम’ भी है। काम का अर्थ रति कर्म नहीं क्रीड़ा या विनोद है। ओछे लोगों में विनोद का रास्ता और उथला कारण रति कर्म बन गया है इसलिए प्रचलन में काम शब्द अश्लील अर्थ में प्रयुक्त होने लगा हैं वस्तुतः यह मनुष्य की विनोद आवश्यकता की मान्यता देने की ही बात है।

विनोद के महँगे सस्ते उपायों में से परिभ्रमण का महत्त्व सर्वोपरि है। यही कारण है कि पर्यटन हर देश का एक महत्त्वपूर्ण उद्योग रहता है। सरकारें पर्यटन विभाग स्थापित करती है और दर्शकों को उसके लिए आकर्षित उत्तेजित करने के लिए विभिन्न उपाय बरतती है। अफ्रीका के क्रोनिया जैसे देश तो विदेशी पर्यटकों के आधार पर ही अपना अर्थ सन्तुलन बनाये हुए है। वे बन जन्तुओं प्राकृतिक दृश्यों को आकर्षित स्थिति में बनाये रखने के लिए प्रचुर पूँजी लगाते हैं। और उससे इतना लाभ उठाते हैं जितना अन्य किसी भी उद्योग से उपार्जित नहीं किया जा सकता। प्राचीन ऐतिहासिक स्थानों खण्डहरों की सुरक्षा के पीछे इतिहास के प्रति निष्ठा का ही नहीं दर्शकों का उधर आने का आकर्षण उत्पन्न करना भी एक कारण रहता है। सर्व विदित है कि पर्यटन उद्योग के सहारे कुर्सी, मजूर, व्यापारी वाहन मालिक, शिल्पी आदि की आजीविका लाभ मिलता है। रेलें, बसें किराये में लाभ कमाती है। यात्री कर उत्पादन कर, विक्रय कर के रूप में सरकार को लाभ मिलता है। विचारणीय है कि इतना लाभदायक पर्यटन उद्योग आखिर चल किस आधार पर रहा है। स्पष्ट है कि इसके पीछे मनुष्य प्राणी की मनोरंजन प्रवृत्ति को परितृप्त करने का उत्साह ही प्रधान के रूप में काम करता है। कहना न होगा कि विनोद, मनोरंजन में पर्यटन से बढ़कर सात्विक, सरल और सर्वोपयोगी आधार और कोई हो नहीं सकता। इसमें दृश्यों एवं परिस्थितियों की भिन्नता को देखने से कौतूहल के अतिरिक्त ज्ञान वृद्धि का भी अवसर मिलता है। अनुभव सम्पादन में पर्यटन की उपयोगिता स्वीकार करते हुए ही विद्यालयों के छात्रों की टोलियाँ परिभ्रमण के लिए निकलती है। शिक्षा विभाग उसके लिए प्रोत्साहित भी देता है और सहयोगी भी।

तीर्थ यात्रा में शारीरिक स्वास्थ्य-संवर्द्धन और मानसिक मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान सम्पादन जैसे अनेकों लाभ जुड़े हुए हैं। आर्थिक दृष्टि से यह पूँजी का वितरण, परिभ्रमण और उत्पादन के लिए सुसंयत उपयोग है। इससे अनावश्यक संचय को वितरण का अवसर मिलता है। पैसा घूमने से अनेकों का उत्पादन एवं श्रम नियोजन के आधार खड़े होते हैं। इससे सार्वजनिक समृद्धि बढ़ती है।

मनुष्य कूप मंडूक बना बैठा रहे तो शिक्षा सम्पन्न होते हुए भी अनुभवहीन ही बना रहेगा। अपने सीमित क्षेत्र की परिस्थितियों तक ही उसका मानसिक ढाँचा विनिर्मित होगा, ऐसी दशा में बहुमुखी दूरदर्शी चिन्तन के लिए मन चेतना प्रशिक्षित ही न हो सकेगी। बुद्धिमत्ता के विकास साधनों में व्यवस्थित परिभ्रमण को भी उच्चस्तरीय स्थान प्राप्त है। पठन-पाठन से उसका महत्त्व किसी भी प्रकार कम नहीं है। अनुभव वृद्धि कुशलता सम्पादन में यात्रा प्रसंगों का बहुत महत्त्व है। इन दिनों यात्री बसों, यात्री रेलों या जोन टिकटों के सहारे जल्दी-जल्दी मन्दिरों या दार्शनिक स्थानों को आँख से देखने भर की भगदड़ मची रहती है। इसमें थकान बहुत आती है और ज्ञान लाभ अति स्वल्प होता है। दृश्यों का ऊहापोह और परिस्थितियों का सूक्ष्म निरीक्षण विवेचन साथ-साथ होता चले तो ही इन यात्राओं का वह लाभ मिल सकेगा जिनके लिए इन प्रचलनों का आरम्भ किया गया और बढ़ा-चढ़ा माहात्म्य बताया गया था।

प्राचीन काल में तीर्थ यात्राएँ तमाशबीनी के उथले दृष्टिकोण से नहीं वरन् दूरदर्शी सत्परिणामों को ध्यान में रखते हुए होती थी। जल्दी जल्दी लम्बी यात्रा करने और बहुत देख लेने का लोभ किसी को नहीं होता है। खाने और पचाने की समन्वयात्मक नीति ही अपनाई जाती थी। ग्रास थोड़ा लेते हैं और उसे बार-बार चबा कर उदरस्थ करते हैं, तभी उसका रस रक्त बनता है। एक साथ मुँह में बहुत सार भर लेने और बिना चबाए निगल जाने की नीति अपनाई जाए तो वह आहार लाभ देने के स्थान पर हानिकारक बना जायेगा। यात्रा के संबंध में भी यही बात है। द्रुतगामी वाहनों के सहारे नहीं उसकी सार्थकता धीरे चलने, थोड़ा देखने, निष्कर्ष निकालने और हृदयंगम करने की प्रक्रिया अपनाने से ही सम्भव हो सकती है। प्राचीन काल की तीर्थ यात्रा का यही स्वरूप था, धर्म प्रचार के उद्देश्य से मण्डलियाँ निकलती थी। कुछ उनमें सत् वक्ता और कुछ शौनक साथी श्रोता होते थे। अनेक ऋषियों के गुरुकुल भी उसी चल पद्धति के आधार को अपनी व्यवस्था बनाते थे। गौ समूह के साथ छात्र गण अपने गुरुजनों के साथ निकलते थे। मार्ग में स्काउटों के कैंप फायर की तरह पड़ाव डालते-गौएं चराते हुए ठहरते और आगे बढ़ते थे। साथ-साथ अध्ययन अध्यापन भी चलता रहता था। वास्तविक शिक्षा में गधे की तरह छात्र पर पुस्तकों का अनावश्यक भार लाद देने का भोंडापन नहीं सर्वतोमुखी अनुभव सम्पादन का आधार जुड़ा रहता है। छात्रों को उस परिभ्रमणकारी शिक्षा में बहुमुखी लाभ मिलते थे। उपाध्याय गण स्थानीय लोगों को भी अपने धर्मोपदेशों से लाभान्वित करते रहते थे। नये छात्रों का प्रवेश भी उस मण्डली में होता रहता था। जो लोग गुरुकुल शिक्षा पद्धति का महत्त्व नहीं समझते थे उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन से प्रेरणा मिलती थी और वे भी अपनी सन्तान का उसमें प्रवेश कराते थे। इसे तीर्थ यात्रा स्तर का गुरुकुलीय प्रशिक्षण कहा जाता था। लगातार ऐसा परिभ्रमण न हो सके तो भी प्रत्येक गुरुकुल को कुछ-कुछ समय के लिए शिक्षण सत्रों की छोटी-छोटी टोलियाँ विभिन्न दिशा में भेजनी होती थी। इसमें छात्र अध्यापकों को ही नहीं संपर्क में आने वाले क्षेत्रों तथा जन-साधारण को भी बहुमूल्य ज्ञान सम्पादन का अवसर मिलता रहता था, तीर्थ यात्रा का कितना महत्त्वपूर्ण और कितना सार्थक स्वरूप या वह।

सन्तों की मण्डलियोँ प्रायः इसी प्रकार परिभ्रमण करती रहती है। आश्रम बनाकर एक ही स्थान पर जमे रहने वाले आचार्य तो केवल वे ही होते थे जो शोध कार्य चलाते थे, ग्रन्थ लेखन करते थे या अन्य किसी योजनाबद्ध कार्य में निरत रहते थे। उन्हीं के लिए स्थान विशेष पर अपना अन्वेषण केन्द्र, प्रयोग परीक्षण चलाने की सुविधा मिलती थी। शेष सभी सन्त, धर्म प्रचारक की भूमिका निभाते थे। परिव्राजक स्तर का ही उनका स्वरूप और कार्यक्रम रहता था। भक्ति काल के प्रायः सभी सन्तों की जीवनचर्या प्रायः इसी प्रकार की रही है। सन्त ज्ञानेश्वर, चैतन्य महाप्रभु, कबीर, दादू रैदास, नामदेव, तुकाराम, रामदास, नानक, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, माध्वाचार्य आदि किसी भी सन्त की धर्म सेवा को जीवन चरित्र उठाकर देखा जा सकता है उसमें धर्म प्रचार की तीर्थ यात्रा पद्धति अविच्छिन्न रूप से जुड़ी होगी। बुद्ध और महावीर एक स्थान पर नहीं बैठे स्थान-स्थान पर पड़ाव डालते और परिभ्रमण ही करते रहे। मीरा के घर से बाहर निकलने के आग्रह से स्पष्ट होकर उनके कुटुम्बियों ने बहुत त्रास दिये थे तो भी उन प्रतिबन्धों को तोड़कर वे परिव्रज्या के लिए अन्ततः निकल ही पड़ी थी।

बौद्ध धर्म में परिव्रज्या को आत्मा साधना में सर्वोपरि महत्त्व दिया गया था। विहारों में परिव्राजकों को प्रशिक्षित करने की ही व्यवस्था थी। नालन्दा, तक्षशिला आदि के विश्व विद्यालयों में अर्थ उपार्जनी शिक्षा का नहीं लोक शिक्षण के लिए प्रतिभाएँ विनिर्मित करने वाली उच्चस्तरीय ब्रह्म विद्या पढ़ाने का ही प्रबन्ध था। तपस्वी और तेजस्वी बनाने के लिए योगाभ्यास और तपश्चर्या को भी उसी प्रशिक्षण को अंग बनाकर रखा गया था। जैन धर्म के चैत्य भी उसी पृष्ठ भूमि पर बने और चले। इन संस्थानों से निकली हुई महान प्रतिभाओं ने अपने समय में भारत के कोने-कोने को सद्ज्ञान के आलोक से प्रकाशवान बनाया था। वे इस दिशा की सीमाएँ पार करके एशिया भूखण्ड के प्रायः सभी देशों में ज्ञान विज्ञान की सम्पदा बरसाने के लिए बादलों की तरह उड़ते हुए पहुँचे और घटाओं की तरह बरसे थे। उनने इस पृथ्वी को कोई भाग ऐसा नहीं छोड़ा था जहाँ दुर्गम पथों की पार करते हुए वे महाभाग न पहुँचे हों और अपनी सेवा साधना से असंख्य पिछड़े क्षेत्रों की समुन्नत न बनाया हो।

अवतारों के-महामानवों के प्रेरक घटनाओं के स्मारक स्थान-स्थान पर अभी भी तीर्थ स्थानों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं। वहाँ नदी, पर्वत, देवालय आदि के स्मारक विद्यमान है। पर धर्म और संस्कृति के प्राण समझे जाने वाले ऋषियों के आश्रमों एवं गुरुकुलों के भग्न खण्डहर कही भी दिखाई नहीं पड़ते। बौद्ध काल में विहारों की परम्परा चली तो जनता ने उसके लिए प्रचुर धन दिया। इतने बड़े भवन बने कि उनके संसार भर में फैले हुए खण्डहर अभी भी आश्चर्यचकित करते हैं, फिर क्या कारण है कि ऋषियों की लाखों वर्षों तक चलती रही ज्ञान साधना का परिचय देने वाले स्थानों या खण्डहरों के कोई अवशेष कहीं नहीं है। ऋषियों की गरिमा उनकी शिक्षा की प्रखरता-प्रशिक्षण की व्यापकता से इनकार नहीं किया जा सकता। वही तो अपनी संस्कृति की रीढ़ रही है। फिर उसका स्थान परिचय क्यों नहीं मिलता? इस असमंजस का उत्तर एक ही है कि उन दिनों सन्तों और ऋषियों को क्रिया पद्धति में ‘परिव्रज्या’ अनिवार्य अंग थी। जितने दिन जहाँ ठहराना हुआ वहाँ उतने दिन के लिए पड़ाव पड़ गये। आगे चल तो वह घास फूँस के आच्छादन समाप्त हो गये। फिर स्मारक कहाँ से बनते?

यह सनक तो आज के तथाकथित सन्तों पर ही सवार है कि उनमें से प्रत्येक का एक अलग आश्रम बनना चाहिए। इसके बिना किसी सन्त को चैन नहीं। जब गृहस्थ लोग अपने निवास के लिए निजी मकान बनाते सजाते हैं तो सन्त उनसे पीछे क्यों रहें? आश्रमों में हलचल चलाने तथा सुविधा सुरक्षा जुटाने, वहाँ की शोभा बनाये रहने के लिए कितने अधिक साधन जुटाने पड़ते हैं, कितनों की कितने प्रकार मनुहार करनी पड़ती है यह सर्वविदित है। सन्तों को एक भरे-पूरे गृहस्थ की भूमिका निभानी पड़ती है और साधना का-वैराग्य का-धर्म सेवा का उद्देश्य भी पीछे छूट जाता है। प्राचीन काल में तीर्थ यात्रा भी सामान्य सन्तों की क्रिया-पद्धति थी। उनके सूत्र संचालन, मार्गदर्शन, आधार निर्धारण के शोध कार्य, ग्रन्थ लेखन के लिए उँगलियों पर गिनने लायक ही संस्थान बनते थे। व्यास, चरक, सुश्रुत नागार्जुन, पापिनी, पातंजलि, जैसे कुछ ही दार्शनिक तत्त्वदर्शी अपने शोध संस्थान स्थिर रूप से चलाते थे। तीर्थ यात्रा ही हर सन्त की क्रिया-पद्धति थी। तीन-तीन वर्ष में एक बार उनके विशाल सम्मेलन कुम्भ पत्रों के रूप में होते रहते थे जहाँ उन सबका मिलन और विचार विनियम हो जाता था इसके बाद वे जन-संपर्क के लिए फिर बिखर जाते थे। कुम्भ पर्व अभी भी तीन, तीन वर्ष बाद उज्जैन, नासिक, हरिद्वार एवं प्रयाग में मनाये जाते हैं। पर उनने मेले ठेले का रूप ले लिया है। भूल प्रेरणा और दिशा धारा का दर्शन उनमें कहाँ होता है।

तीर्थ यात्रा में कुछ स्थानों का महत्त्व बताया गया है और वहाँ केन्द्र देवालय बनाये गये है। निर्माताओं का लक्ष्य इस निर्माण में यह राह है कि तीर्थ यात्रा मंडलियों को उन स्थानों पर कुछ समय विराम, विश्राम का अवसर मिले और जो साधन कम पड़ जायें वे वहाँ से उपलब्ध हो सके। श्रद्धालु लोग इन तीर्थों के देवालयों पर धन दान के रूप में श्रद्धांजलि चढ़ाते थे। वह राशि, तीर्थ, मण्डलियों कि लिए सुविधा साधन जुटाने के लिए निर्धारित रहती थी। वस्त्र, पात्र, ग्रन्थ, औषधि आदि जो भी साधन धर्म प्रचारक टोलियों को आवश्यक होते थे इन तीर्थ देवालयों से मिल जाते थे और धर्म प्रचार की व्यापक व्यवस्था यथावत् चलती रहती थी। धर्मशालाएँ तीर्थों में या अन्यत्र बनाई जाती थी, वे धर्म प्रचारकों के लिए आश्रय स्थल होती थी। ‘धर्मशाला’ नामकरण ही धर्म प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त होने वाले स्थान के लिए हुआ है। आज तो वे हर ऐरे-गैरे के लिए मुफ्त की सराय होटलों का रूप बनी हुई है। आरम्भ में उनका निर्माण धर्म प्रचार के निमित्त ही हुआ था।

तीर्थों में धर्म शिक्षा की सत्संग व्यवस्था रहती थी किन्हीं न किन्हीं तत्त्वदर्शी ऋषि का पड़ाव वहाँ बना ही रहता था ऐसी दशा में उन स्थानों पर अपनी सुविधा के समय जा पहुँचते और उपयुक्त प्रकाश पा सकने की सुविधा रहती थी प्राचीन काल की किसी प्रेरणाप्रद घटना की स्मृति उन स्थानों के साथ जुड़ी रहने से तीर्थों की महिमा और भी बढ़ जाती थी। प्राकृतिक दृश्य-यातायात के सुविधा साधन, धर्म प्रचार क्षेत्रों का भौगोलिक विभाजन आदि को ध्यान में रखते हुए मनीषियों ने तीर्थ केन्द्रों का निर्धारण एवं निर्माण किया था।

भारत भूमि के चारों सिरों को तीर्थ यात्रा सूत्र में बाँध कर देश-व्यापी साँस्कृतिक एकता बनाये रहने की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए भगवान आद्य शंकराचार्य ने चारों धामों का जीर्णोद्धार कराया और उन्हें अभिनव स्वरूप दिया था। बद्रीनाथ-जगन्नाथ, रामेश्वर और द्वारिका यह चार धाम भारत में चार दिशाओं के चार कोनों पर अवस्थित है। चारों धाम की यात्रा करते का अर्थ है-पूरा भारत भ्रमण। सुविस्तृत मातृभूमि के प्रति एकनिष्ठ श्रद्धा बनाये रहने में इन चारों धाम ने महती भाव भूमिका सम्पन्न की है। क्षेत्रीय विभेद के आधार पर पनपने वाली विलगता और विश्रृंखलता को रोकने में इस धाम स्थापना ने उनकी परिभ्रमण परिक्रमा ने दूरगामी सत्परिणाम प्रस्तुत किये है।

तीर्थयात्रा के इन मूल भूत प्रयोजनों को ध्यान में रखते हुए, उनका समावेश करते हुए यदि उस पुण्य प्रक्रिया को गतिशील रखा जा सके तो उसे धर्म धारणा के फलवती होने का अवसर मिलेगा। तदनुसार तीर्थ यात्री को उसका शास्त्रोक्त पुण्य प्रतिफल भी मिलेगा। इसके बिना निरुद्देश्य पर्यटन से तीर्थ यात्रा का न तो उद्देश्य पूरा होता है और न पुण्य फल मिलता है। हिन्दू धर्म में ही नहीं, संसार के अन्य धर्मों में भी जिस तीर्थ यात्रा को उच्चस्तरीय महत्त्व दिया गया है उसके पीछे छिपी हुई धर्म भावनाओं को जन-मानस में जागृत एवं समुन्नत बनाने की योजना को प्रमुखता मिलनी चाहिए। इसमें पैदल यात्रा को-संपर्क को महत्त्व दिया जाना चाहिए। जो जन-मानस को परिष्कृत करने की प्रवचन शैली से परिचित हो-उन आदर्शों का व्यावहारिक जीवन में समावेश कर चुके हों, वे उस मंडली के प्रवक्ता बन कर चलें। मण्डली के शेष सदस्य कीर्तन आदि में सहयोग दें। स्वयं श्रवण मनन करें और धर्म प्रचारक का प्रशिक्षण प्राप्त करें। यह यात्राएँ आज की स्थिति में और भी अधिक आवश्यक है। उनसे यात्री की तपश्चर्या और युग की माँग पूरी करने के दोनों ही उद्देश्य समान रूप से पूरे हो सकते हैं।


मुस्कान, वैज्ञानिक क्या कहते है?

प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक व चिकित्सक डाक्टर पैस्किड ने अपनी प्रयोग शाला में दसियों प्रयोग किये। प्रयोग करने का उद्देश्य यह था कि चिन्ता, थकान, आवेग और शोकादि मनोविकारों का शरीर पर क्या प्रभाव होता है? इस प्रयोग के अंतर्गत एक ऐसा व्यक्ति भी उनके परीक्षण में आया जो खुशमिज़ाज और सदाबहार था। उसके शरीर में मिलने वाली विचित्र क्षमताओं को देख कर डाक्टर वैस्किड को बड़ा आश्चर्य हुआ और उन्होंने ऐसे ही कई व्यक्तियों पर अपने प्रयोग और निरीक्षण किये। इन प्रयोगात्मक निरीक्षणों के परिणाम स्वयं कुछ अद्भुत तथ्य देखने में आये।

साधारण श्रमिक आरम्भ में मनुष्य शरीर की कंकाल पेशियाँ सक्रिय हो उठती है जिससे शरीर का रक्त प्रवाह बढ़ जाता है और पेशियों तक आक्सीजन अधिक मात्रा में पहुँचने लगती हैं उसी मात्रा में उसकी खपत भी बढ़ जाती है। परिणामस्वरूप रक्त में आक्सीजन की मात्रा न्यून होने लगती है यही कारण है कि थकान भी आने लगती है। थकान का एक कारण मज्जा तन्तुओं में स्फूर्ति और सजीवता का अभाव भी हो जाना है। लेकिन यह देखने में आया है कि हँसते और मुस्कराते रहने वाले व्यक्तियों के मज्जा तन्तु गम्भीर और उदास रहने वाले व्यक्तियों के मज्जा तन्तुओं की अपेक्षा शीघ्र सक्रिय और स्फूर्त हो उठते हैं। परिणामस्वरूप उनकी थकान भी बड़ी जल्दी मिट जाती है।

हँसी और मुस्कान से होने वाले शरीर पर अन्य प्रभावों का विश्लेषण करते हुए डाँ0 पैस्किड ने लिखा है-क्रोध और आवेशग्रस्त स्थिति में रहने वाले व्यक्तियों की माँस-पेशियों पर अनुचित तनाव पड़ता है और हँसने से तनाव शीघ्र मिट जाता है। मुस्कान-आन्तरिक अवयवों और माँस पेशियों और मज्जा तन्तुओं को एक राहत देती है।

श्री एस0ए॰ सूमेकर ने भी मुस्कान को थकान दूर करने का अचूक उपाय माना है। एक और पाश्चात्य वैज्ञानिक का कहना है कि हँसना-स्वभाव की एक ऐसी विशिष्टता है जो केवल मनुष्यों ही पायी जाती है। मनुष्येत्तर अन्य प्राणियों को किसी ने हँसते कब देखा है? हालाँकि प्रसन्नता और आह्लाद व्यक्त करने, हर्षित होने का सब जीवों का अपना एक अलग-अलग ढंग है परन्तु, हँसी और मुस्कान मनुष्य को मिले हुए ऐसे ईश्वरीय वरदान कह जा सकते हैं जो मेधा-प्रतिभा के क्रम में आते हैं।

विख्यात मनोविज्ञानवेत्ता ह्यूम का कहना था कि चिन्ता, आवेग और शोक तथा अन्य मानसिक विकृतियाँ मनुष्य मन पर ही आक्रमण करती हैं इसलिए उनके मुकाबले में मानवीय स्वभाव की उपज हँसी भी केवल उसी की उपलब्धि है ताकि वह इस अस्त्र से मानसिक तनाव को परास्त कर सके।

‘मनोविज्ञान की दृष्टि से हँसने को एक दवा’ घोषित करते हुए जे0 गिलबर्ट ओकले ने लिखा है कि मानवीय हृदय की संवेदनशीलता उसे स्वाभाविक ओर प्राकृतिक घटनाक्रमों के संपर्क में असामान्य रूप से प्रभावित करती है। परिणामस्वरूप अन्य प्राणियों की अपेक्षा मनुष्य ही अधिक चिन्ताग्रस्त, शोकाकुल और आवेगवान रहता है। लेकिन प्रकृति की विशेषता यह है। कि विकारों के साथ-साथ उनके निष्कासन का प्रबन्ध भी वह तत्काल ही कर देती हैं इसलिए दिल खोलकर हँसना मुस्कराते रहना चित्त को प्रफुल्ल रखने की एक अचूक औषध हैं।

खेद है कि बिना मूल्य और सहज ही मिले इस वरदान को नित्य उपलब्ध रहते हुए भी हम लाभ उठाने से वंचित रह जाते हैं।


कन्द-कुण्ड की ज्योति-ज्वाला कुण्डलिनी

कुण्डलिनी महाशक्ति का परिचय,स्थान ओर स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा गया है। कि वह मूलाधार चक्र के अग्नि कुण्ड में निवास करती है। अग्नि स्वरूप है। सुप्त-सर्पिणी की तरह सोई पड़ी हैं। स्वयंभू महालिंग से शिवलिंग से लिपटी पड़ी हैं। इसी स्थिति की झाँकी शिव प्रतिमाओं में कराई जाती है। योनि क्षेत्र में एक सर्पिणी शिव लिंग से लिपटी हुई प्रदर्शित की जाती हैं। शिव पूजा में इस प्रतिमा पर जल धार चढ़ाने का विधान है। रुद्राभिषेक में जल कलश के पेंदे में छिद्र करके उसे तीन टाँग की तिपाई पर स्थापित करते हैं। और उसमें से एक-एक बूँद पानी शिव लिंग पर टपकता रहता है। यह कुण्डलिनी का ही समग्र स्वरूप हैं।

सहस्रार चक्र को अमृत कलश कहा गया है। उससे सोमरस टपकने का उल्लेख हैं। खेचरी मुद्रा में इसे ‘अमृत स्राव’ बताया गया है। यह स्राव अधोमुख हैं। नीचे की दिशा में रिसता टपकता रहता है। कुण्डलिनी मूल तक जाता है।

कुण्डलिनी महाशक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाने और अमृत सोम का आस्वादन कराने का लाभ ब्राह्मी एकता के माध्यम से ही सम्भव हैं। यही कुण्डलिनी जागरण का उद्देश्य है। सुप्त सर्पिणी अग्नि कुण्ड में पड़ी-पड़ी विष उगलती रहती है और उससे जलन ही जलन उत्पन्न होती हैं। वासना की अग्नि शान्त नहीं हो सकती, वह शरीर और मन की दिव्य सम्पदाओं का विनाश ही करती रहती है। इसका समाधान अमृत रस को पान करने सोम संपर्क से ही सम्भव होता है। यह तथ्य जन-साधारण को समझाने के लिए तीन टाँग की तिपाही पर कलश स्थापित करके शिव लिंग पर अनवरत जल धार चढ़ाने की व्यवस्था की जाती हैं। और इस आध्यात्मिक आवश्यकता का परिचय कराया जा सकता है कि जलन का समाधान मानसिक एवं आत्मिक अमृत रस पीने से बौद्धिक एवं भावनात्मक उत्कृष्टता का रसास्वादन करने से ही सम्भव हो सकता है।

रुद्राभिषेक में जल कलश के नीचे तीन टाँग की तिपाई रखी जाती है वह इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का प्रतीक हैं। इन्हीं तीन आधारों के सहारे कुण्डलिनी जागरण की पुण्य प्रक्रिया सम्पन्न होती हैं। अग्नि और सोम के मिलन की आवश्यकता और उसके फलस्वरूप उत्पन्न होने वाले देवत्व का ही प्रत्यक्षीकरण रुद्राभिषेक के कर्मकाण्डों में किया जाता है।

कुण्डलिनी परिजप में स्नान-स्नान पर स्वयंभू लिंग की चर्चा हैं। बहुत स्थानों पर उसे कन्द’ भी कहा गया है। यह क्या है? इसे जानने के लिए स्थूल शरीर से सम्बन्धित शरीर शास्त्र और सूक्ष्म शरीर से सम्बन्धित अध्यात्म शास्त्र का पर्यवेक्षण किया जा सकता है। शरीर में यह घटक सुषुम्ना का-मेरुदण्ड का-नीचे वाला अन्तिम छोर है। प्रत्यक्ष हलचलों की दृष्टि से इस संस्थान का इतना विद्युत शक्ति का जो इस समूचे क्षेत्र के अति महत्त्वपूर्ण संस्थानों को प्रभावित एवं अनुप्राणित करती हैं। कंद का स्थूल शरीर में प्रतीक प्रतिनिधि तलाश करना हो तो दृष्टि “कार्डा इक्वाइना” पर जाकर टिकती हैं। मेरुदण्ड मस्तिष्क से प्रारम्भ होकर चेचु की अन्तिम कशेरुका तक जाती हैं ओर उसके बाद रेशमी धागों की भाँति शुण्डाकृति हो जाती हैं उसके अन्त में अगणित पतले -पतले धागे से पैदा हो जाते हैं, जिससे नाड़ी तन्तुओं का एक सघन गुच्छा तैयार हो जाता है। इसी गुच्छक को “कार्डा इक्वाँइना”कहते हैं। सूक्ष्म शरीर के ‘कन्द’ का इसे प्रतिनिधि कहा जा सकता है। शरीर शास्त्र की दृष्टि से वही स्वयंभू लिंग है। मूलाधार चक्र में ‘आधार’ शब्द इसी स्थान के लिए व्यवहृत हुआ है। रीढ़ की अन्तिम चार अस्थियों के सम्मिलित समुच्चय को भी कई मनीषियों ने ‘कन्द’ बताया है। मल मूत्र छिद्रों के मध्य स्थान पर मूलाधार बताया गया है। उसे चमड़ी की ऊपरी सतह नहीं मान लेना चाहिए वरन् उस स्थान की सीध में ठीक ऊपर प्रायः तीन तीन अंगुल ऊँचाई पर अवस्थित समझना चाहिए। मस्तिष्क में आज्ञाचक्र भी भ्रूमध्य भाग में कहा जाता है पर यह भी ऊपरी सतह पर नहीं तीन अंगुल गहराई पर हैं ब्रह्मरंध्र भी खोपड़ी की ऊपरी सतह पर कहाँ है? वह भी मस्तिष्क के मध्य केन्द्र में है। ठीक इसी प्रकार मूलाधार को भी मल-मूत्र छिद्रों के मध्य वाली सीध पर अन्तः गह्वर में अवस्थित मानना चाहिए।

यहाँ एक बात हजार बार समझ लेनी चाहिए कि आध्यात्म शास्त्र में शरीर विज्ञान विशुद्ध रूप से सूक्ष्म शरीर का वर्णन है। स्थूल शरीर में तो उसकी प्रतीक छाया ही देखी जा सकती है। कभी किसी शारीरिक अंग को सूक्ष्म शरीर से नहीं जोड़ना चाहिए। मात्र उसे प्रतीक प्रतिनिधि भर मानना चाहिए। शरीर के किसी भी अवयव विशेष में वह दिव्य शक्तियाँ नहीं है जो आध्यात्मिक शरीर विज्ञान में वर्णन की गई है। स्थूल अंगों से उन सूक्ष्म शक्तियों का आभार मात्र पाया जा सकता है।

मूलाधार शब्द के दो खण्ड है। मूल+आधार। मूल अर्थात् जड़-बेस। आधार अर्थात् सहायक-सपोर्ट। जीवन सत्ता का मूल-भूत आधार होने के कारण उस शक्ति संस्थान को मूलाधार कहा जाता है। वह सूक्ष्म जगत में होने के कारण अदृश्य है। अदृश्य का प्रतीक चिह्न प्रत्यक्ष शरीर में भी रहता है। जैसे व्यि दृष्टि के आज्ञा चक्र को पिट्यूटरी और पिनीयल रूपी दो आँखों में काम करते हुए देख सकते हैं। ब्रह्मचक्र के स्थान पर हृदय को गतिशील देखा जा सकता है नाभिचक्र के स्थान पर योनि आकृति का एक गड्ढा तो मौजूद ही है। मूलाधार सत्ता को मेरुदण्ड के रूप में देखा जा सकता है। अपनी चेतनात्मक विशेषताओं के कारण उसे वह पद, एवं गौरव प्राप्त होना हर दृष्टि से उपयुक्त है। प्राण का उद्गम मूलाधार पर उसका विस्तार, व्यवहार और वितरण तो मेरुदण्ड माध्यम से ही सम्भव होता है।

मूलाधार के कुछ ऊपर और स्वाधिष्ठान से कुछ नीचे वाले भाग में शरीर शास्त्र के अनुसार ‘प्रास्टेट ग्लेण्ड’ है। शुक्र संस्थान यही होता है। इसमें उत्पन्न होने वाली तरंगें काम प्रवृत्ति बन कर उभरती हैं इससे जो हारमोन उत्पन्न होते हैं, वे वीर्योत्पादन के लिए उत्तरदायी होते हैं स्त्रियों का गर्भाशय भी यही होता है। सुषुम्ना के निचले भाग में लम्बर और सेक्रल प्लैक्सस नाड़ी गुच्छक है। जननेन्द्रियों की मूत्र त्याग तथा कामोत्तेजन दोनों क्रियाओं पर इन्हीं गुच्छकों का नियन्त्रण रहता है। यहाँ तनिक भी गड़बड़ी उत्पन्न होने पर इनमें से कोई एक अथवा दोनों ही क्रियाएँ अस्त-व्यस्त हो जाती हैं बहुमूत्र, नपुंसकता, अतिकामुकता आदि के कारण प्रायः यही से उत्पन्न होते हैं।

गर्भाशय की दीवारों से जुड़े हुए नाड़ी गुच्छक ही गर्भस्थ शिशु को उसके नाभि मार्ग से सभी उपयोगी पदार्थ पहुँचाते रहते हैं इन गुच्छकों को यह पहचान रहती है कि कितनी आयु के भ्रूण को क्या-क्या पोषक तत्त्व चाहिए। गर्भाशय के संवेदनशील नाड़ी गुच्छक उस अनुपात का-मात्रा का-पूरा-पूरा ध्यान रखते हैं और बिना राई रत्ती व्यतिक्रम किये शिशु की आवश्यकता पूरी करते रहते हैं

जीवन की आवश्यकता पूरी करने के लिए सब से प्रथम और सबसे आवश्यक क्रिया चूसने की होती है। बच्चे में यह प्रवृत्ति रिफलेक्स-उसे माता का स्तन पान करने की उत्तेजना देता है। यही प्रवृत्ति प्रौढ़ता आने पर यौनेच्छा-सेक्स रिफलेक्स के रूप में विकसित होती है। बिना किसी प्रशिक्षण के यह दोनों ही प्रवृत्तियाँ अपने-अपने ढंग से हर प्राणी में अन्तः प्रेरणा से ही उठती और प्रयोग में आती है। इन जीवनोपयोगी प्रेरणाओं का केन्द्र यही स्थान है जिस कन्द, कुण्ड या काम बीज कहते हैं।

कन्द का एक नाम कूर्म भी है। इसे कच्छपावतार का प्रतिनिधि बताया गया है। उसके पैरों को सिकुड़ने, फैलाने वाला बहन को वहाँ से निसृत होने वाली शक्ति धाराओं की ओर संकेत किया गया है। कन्द की आकृति अण्डे के समान मानी गई है। उसे कछुए की उपमा भी दी गई है। समुद्र मंथन की कथा में रई मंदराचल पर्वत बनाई गई थी। उस पर्वत के नीचे भगवान कूर्मावतार के रूप में कच्छप बनकर बैठे थे और उस भार को अपनी पीठ पर उठाया था। यह कर्म या कन्द की ही आलंकारिक व्याख्या है।

नाड़ी गुच्छकों के अतिरिक्त कन्द की व्याख्या मेरुदण्ड की अन्तिम चार अस्थियों ओर उस स्थान पर बिखरे पड़े नाड़ी संस्थानों के रूप में भी की जाती है। इसे समझने के लिए मेरुदण्ड की अस्थि संरचना को समझना होगा।

शरीर विज्ञान के अनुसार मेरुदण्ड छोटे बड़े 33 विरूपस्थि खण्डों या कशेरुओं-कट्रीब्री से मिल कर बना है। आकृति में वह सर्पाकार है। प्रत्येक दो कशेरु के मध्य में एक माँस निर्मित गद्दी सी रहती है। जिस पर प्रत्येक कशेरु टिका और सूत्रों से कसा हुआ है। इसी कारण यह लचीला है ओर अपनी धुरी पर हर दिशा में धूम सकता है। उसे पाँच भागों में बाँटा जा सकता है। (1) ग्रीवा-सरवाइकल-7 कशेरु (2) पीठ-थारेक्स-12 कशेरु (3) कटिप्रदेश-लम्बर-5 कशेरु (4) वस्ति गह्वर-त्रिक प्रदेश-सेक्रल-5 कशेरु (5) पुच्छिकास्थि-चचु-काकीक्स 4 कसेरु। सब मिला कर इन तैंतीस खण्डों की तैंतीस देवता कहा गया है। इनमें से प्रत्येक में सन्निहित दिव्य क्षमता को देवोपम माना गया है।

मेरु दण्ड पोला तो है पर ढोल की तरह खोखला नहीं उसमें मस्तिष्कीय मज्जा भरी हुई है। प्रत्येक कशेरु के पिछली और दाँए-बाँए अर्ध वृत्ताकार छिद्र होता है जिसमें से छोटे नाड़ी सूत्रों से निर्मित बड़ी नाड़ियाँ बाहर निकलती है। मेरुदण्ड का निचला भाग शंकु के आकार का है जिसे- फाइलम टर्मिनल कहते हैं।

चंचु प्रदेश के कशेरु जितने छोटे हैं, इतने ही चौड़े है। वे अन्दर से पोले भी नहीं है और एक-दूसरे से जुड़े हुए है। ये चार कशेरु मिल कर अण्डे की आकृति वाला अथवा फूल का तद कली के सदृश आकार बनता है। इसे ‘काकीक्स’ कहते हैं। इस गोलक को कुण्डलिनी योग में ‘कन्द’ एवं स्वयं भू लिंग के नाम से पुकारा गया है। कुण्डलिनी शक्ति इसी के इर्द-गिर्द सर्पिणी की तरह लिपटी मानी गई है।

नाड़ी गुच्छकों एवं मेरुदण्ड के निम्न भाग के अस्थि समूहों के ऊपर एक सूक्ष्म शक्ति छाई हुई है उसी को मूलाधार का, नाभिक-न्यूक्लियस समझा जाना चाहिए। उसी के प्रभाव से उस क्षेत्र में बिखरे पड़े अनेक संस्थान अपना-अपना काम कतरे और एक से एक बढ़े-चढ़े प्रभाव उत्पन्न करते देखे जा सकते हैं। कमर से लेकर पेडू और जननेन्द्रिय मूल तक का पूरा क्षेत्र दक्षिणी ध्रुव के समतुल्य माना गया है और वहाँ किसी भी क्षेत्र में जो कुछ होता है उस सब पर मूलाधार का प्रभाव आँका जा सकता है। नाभि, गुर्दे, मूत्राशय, यौन संस्थान, पौरुष ग्रन्थियाँ आदि की समस्त गतिविधियों को-प्रजनन प्रक्रिया को उसी दिव्य केन्द्र को अनुदान एवं चमत्कार कह सकते हैं। जीवनी-शक्ति का, क्रियाशक्ति का उमंग उत्साह का, केन्द्र इसी को कहा गया है। कन्द के स्वरूप और महत्त्व का वर्णन अध्यात्म शास्त्रों में इस प्रकार हुआ है-

कन्दौध्वें कुण्डलीशक्ति शुभमोक्षप्रदायिनी। बन्धनाय च मूढ़ाना यस्ताँ वेत्ति स वेद्वित्॥ -गोरक्ष पद्वति

मंगलमय मोक्ष प्रदायिनी कुण्डलिनी शक्ति ‘कन्द’ के उर्ध्व भाग में अवस्थित है। वही प्रसुप्त होने पर मूढ़ मति लोगों को बन्धन में बाँधे हुए है। इस मर्म को जो जानता है वही वास्तविकता को जानने वाला ज्ञानवान है।

गुदाद्वय गुलतश्चोर्ध्व मेढैकाँगुलस्त्वधः। एव चास्ति समं कन्दं समता चतुरंगुलम्॥ -शिव संहिता

गुदा एवं शिश्न के मध्य में जो योनि है वह पश्चिमाभिमुखी अर्थात् पीछे का मुख है उसी स्थान में ‘कन्द’है और इसी स्थान में सर्वदा कुण्डलिनी स्थित है।

तन्मध्ये लिगडरूपी द्रतुकनककलाकोमलः पश्चिमास्यो। ज्ञानध्यानप्रकाशः प्रथम, किसलयाकाररूपः स्वयम्भुः।

विद्युत्पूणेन्दुबिम्बुप्रकरचयम्निग्धसन्तानहासी काशो। वासी विलासी विलसति,सरिदावत्त रुर्प प्रकारः।

तस्योर्द्धंवे विसतन्तुसोदरलसत्सुक्ष्मा जगन्मोहिनी ब्रह्मद्वारमुख मुखेन मधुरं,सछादयन्ती स्वयम्।

शखाँवर्त्त निभा नवीनचपला-मालाविलासास्पदा सुप्ता सर्पसमा शिवोपरि,लसत्सार्द्धत्रिवृत्ताकृतिः॥ षट्चक्र निरूपण

अर्थात्-”त्रिकोण के भीतर स्वयंभू लिंग है जिसका वर्ण स्वर्ण के समान है और जिसका सिर नीचे की ओर है। उसे नूतन किसलय के समान देव का प्रकाश ज्ञान-ध्यान द्वारा ही सम्भव है। विद्युत और पूर्ण चन्द्रमा के समान ही वह स्निग्ध सौंदर्य युक्त है। इस स्वयंभू लिंग पर कमल-तन्तु के समान अति सूक्ष्म कुण्डलिनी शक्ति सो रही है। वह जगत को मोहित करने वाली है और ब्रह्मद्वार के मुख को अपने मुख से ढके हुए है। शंख की चक्रवत रेखाओं के समान उसकी चमकीली सर्पाकार आकृति शिव लिंग के चारों ओर साढ़े तीन फेरे लिये हुए है।

कुण्डलिनी की तुलना विद्युत शक्ति, ऊर्जा एवं आभा से की गई है। “तडिल्लता समरुचिर्विद्युल्लेखेव भास्वरा” सूत्र में उसे बिजली की लता रेखा जैसी ज्योतिर्मय बताया गया है। उसी प्रकार अन्यत्र उसका उल्लेख “तडिल्लेखा तन्वी तपनशशि वैश्वानारमयी” के रूप में किया गया है। उसे प्रचण्ड अग्नि शिखा एवं दिव्य वैश्वानर के समतुल्य कहा गया है।

मूलाधारस्य ब्रह्मयात्म तेजो मध्ये व्यवस्थिता। जीव शक्तिः कुण्डलाख्या प्राणाकाराय तैजसी॥ -योग कुण्डलल्पुपनिषद्

मूलाधार के मध्य वह आत्म तेज, ब्रह्म तेज रूपी कुण्डलिनी निवास करती है। वही जीव शक्ति, प्राण शक्ति है। वह तेज रूप है।

आधार शक्त्याबधृतः कालाग्निरयमूर्ध्वंगः। तथैव निम्नगः सोमः शिवशक्ति पदास्पदः॥ -वृहज्जावालोपनिषद्

मूलाधार (चक्र) की शक्ति से धारण की हुई यह कालाग्नि ऊर्ध्वगामी है और उसी प्रकार सोम निम्नगामी है, जो शिव शक्तिमय कहलाता है।

मूलाधारस्थ वहवयात्म. तेलो मध्ये व्यवस्थिता। जीवशक्तिः कुण्डलाख्या प्राणाकारण तैजसी॥ -योग कुँडक उपनिषद्

कुण्डलिनी मूलाधार चक्र में स्थित आत्माग्नि तेज के मध्य में अवस्थित है। वह जीव की जीवनी शक्ति है। तेजस और प्राणाकार है।

मूलाधाराभिधं चक्रं प्रथमं समुदीरितम्। तत ध्येयं स्वरूप तु पावकाकारमुच्यते॥

स्वाधिष्ठानाभिधं चक्रं द्वितीय चोपरिस्थितम्। प्रवालाड्.कुर तुल्यं तु तत्र ध्येयं निगद्यते॥

तृतीयं नाभिचक्रे तु ध्येयं रूपं तडिन्निभम्। तुर्यें हृदयचक्रे तु ज्योतिलिंगा कृतीर्यते॥

पन्चमें कण्ठचक्रेतु सुषुम्ना श्वेतवर्णिनी। ध्येय षष्ठे तालुचक्रे शून्यचित्तलयार्थकम्॥

भ्रू चक्रे सप्तमे ध्येयं दीपाड्. गुष्टप्रमाणकम्। आज्ञाचक्रेऽष्टमे ध्येय रूपं धूम्रशिखाकृतिः॥

आकाशचक्रे नवमे परशुः स्वोद्ध्व शक्तिकः। एव क्रमेण चक्राणि ध्येयरूपाणि विद्धिचं॥

अखण्डैकरसत्वेन ध्येयस्यैक्येऽप्युपाधितः। आकारा विविधायुक्ता नोपाधिश्रवेतरः स्वतः॥

विद्याशक्ति विलासेन पावकात् विस्फुलिगंवत्। अकस्मात् ब्रह्मणोऽखण्डात् विविधाकृतयोऽभवन्॥ -महायोग विज्ञान

मूसलाधार चक्र में आत्म ज्योति अग्नि रूप दीखती है। स्वाधिष्ठान चक्र में वह प्रवाल अंकुर-सी प्रतीत होती है। मणिपुर में विद्युत जैसी चमकती है। नाभिचक्र में वह बिजली जैसी चमकती है। हृदय कमल के अनाहत चक्र में वह लिंग आकृति की प्रतीत होती है। कठ चक्र में वह श्वेत वर्ण, तालु चक्र में शून्याकार एकरस अनुभव में आती है। भू चक्र में अंगूठे के प्रमाण जलती हुई दीप शिखा जैसी भागती है। आज्ञाचक्र में धूम्र शिखा जैसी और सहस्रार चक्र में चमकते हुए परशु जैसी दीखती है।

यह सभी ज्योतियाँ एक ही है। सभी आत्म ज्योति हैं। सभी परम आनन्ददायिनी हैं। विद्या शक्ति कुण्डलिनी की क्रीड़ा से एक ही अग्नि की अनेक चिनगारियों की तरह यह अनेक तरह की प्रतीत होती हैं।

अपाने चोर्ध्वगे गाते संप्राप्ते वहृनमण्डले। ततोऽनलशिखा दीर्घा वर्धते वायुना हत्ता॥

ततो यातौ वहृनयपानौ प्राणमुष्णस्वरूपकम्। तेनात्यन्तप्रदीप्तेन ज्वलनो देहजस्तथा॥

तेन कुण्डलिनी सुप्ता संतप्ता सप्रबुध्यते। दन्डाहतभुजंगीव निश्वस्य ऋजुताँ ब्रजेत्॥ -योग कुण्डल्युपनिषद् 1।43,44,45

उस अग्नि मण्डल में जब अपान प्राण जाकर मिलता है तो अग्नि की लपटें और तीव्र हो जाती हैं। उस अग्नि से गरम होने पर सोई हुई कुण्डलिनी जागती है और लाठी से छेड़ने पर सर्पिणी जिस प्रकार फुफकार कर उठती है वैसे ही यह कुण्डलिनी भी जागृत होती है।

प्राणस्थानं ततो वह्नि प्राणापानौ च सत्वरम्। मिलित्वा कुण्डली यति प्रसुप्ता कुण्डलाकृतिः॥

तेनाग्निना च सतप्ता पवनेनैव चालिता। प्रसाय स्वशरीरं तु सुषुम्नाबदनान्तरे॥ -योग कुण्डल्युपनिषद् 1।65,66

अग्नि स्थान में प्राण के पहुँचने से उष्णता से संतप्त कुण्डलिनी अपनी कुण्डली छोड़कर सीधी हो जाती है और सुषुम्ना के मुख में प्रवेश करती है।

योगिनाँ हृदयाम्भोजे नृत्यन्तौ नित्यमञजसा। आधारे सर्व्वभूतानाँ स्फुरन्ती विद्यदाकृतिः॥ -शारदा तिलक

वह कुण्डलिनी शक्ति योगियों के हृदय में नृत्य ही नृत्य करती हैं। बिजली की तरह स्फुरण करती है। वही सम्पूर्ण प्राणियों का आधार है।

मूलाधारे स्मरेद्दिव्यं त्रिकोणं तेजसाँ निधिम्। शिखा आनीय तस्याग्नेरथ त्ध्य व्यवस्थिता॥

तस्याः शिखाया मध्ये परमात्मा व्यवस्थितः। स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोक्षरः परमः स्वराट्॥

स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः। इति कुण्डलिनी ध्यात्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ -कलिकोपनिषद्

मूलाधार में दिव्य त्रिकोण तेज-पुंज, ऊर्ध्वगामी तेज-शिखा के मध्य, परब्रह्म अवस्थित है। वह तेज ही ब्रह्म, विष्णु, शिव, इन्द्र, अक्षर, काल, अग्नि, चन्द्रमा, प्राण आदि है। ऐसा कुण्डलिनी ध्यान करना चाहिए।

ध्यात्वैतन्मूलचक्रान्तरविवरलसत्कोटिसूर्यप्रकाशाँ वाचामीशो नरेन्द्रः स भवति सहसा सर्वविद्याविनोदी। आरोग्यं तस्य नित्यं निरवधि च महानन्दचित्तान्तरात्मा वाक्यैः काव्यप्रबन्धैः सकलसुरगुरुन् सेवते शुद्धशीलः। -षटचक्र निरूपणम 14

मूलाधार चक्र में कोटि सूर्य जैसे प्रकाश से युक्त कुण्डलिनी शक्ति का ध्यान करने पर वाणी की सिद्धि होती है, वह मनुष्यों का नेतृत्व करता है। विद्यावान् बनता है। आरोग्यवान् बनता है। चित्त में आनन्द रहता है। ऐसा शीलवान साधक देवताओं द्वारा पूजित होता है।

निर्वाणाभ्यन्तरगता वह्निं रूपा निवोधिता। नारोऽव्यक्तस्त दुपरिकोट्यादित्य सन्निमा। अत्रैव कुण्डली शक्ति विहरेत विश्वव्यापिनी॥ -कौलामृत

वह कुण्डलिनी शक्ति अग्नि रूप है। कोटि सूर्य के समान चमकती है। वह परम शक्ति है। विश्व में विस्तृत विहार करती है।

मूलाधारे मूल विद्याँ विद्युत्कोटि सम प्रभाम्। -ज्ञानाणंव तन्त्र

मूलाधार चक्र में वह मूल विद्या कोटि विद्युत के समान चमकती है।

कोटि सौदामिनीभासाँ स्वयंभू लिंग वेष्टिनामू। -तन्त्रसार

स्वयंभू लिंग में लिपटी हुई वह कुण्डलिनी शक्ति कोटि विद्युत की तरह चमकती है।

हिमाचल प्रदेश में ज्वालामुखी पर्वत पर निकलने वाली अग्नि शिखा को देव स्थान की शक्ति पीठ माना गया है। वहाँ आराधना, उपासना के लिए दूर-दूर से भक्त जना जाते हैं। अग्नि ज्वाला को दैवी शक्ति मानने के पीछे यह कुण्डलिनी अग्नि का ही तारतम्य है। यज्ञाग्नि में अग्निहोत्र करने, धृत धारा चढ़ाने के पीछे भी अग्नि एवं सोम के संयोग की आवश्यकता का प्रतिपादन है। ब्रह्माग्नि और आत्माग्नि के संयोग को कुण्डलिनी साधना कहा गया है।

अग्नि की उत्पत्ति का स्कन्द पुराण में एक मनोरंजक उपाख्यान आता है। सनत्कुमार की अग्निजन्य जिज्ञासा का समाधान करते हुए महर्षि व्यास कहते हैं-प्रजापति ने सृष्टि के आदि में दिव्य शत वर्षों की अवधि तक महान तप किया। इसमें ‘भूः भुवः स्वः शब्द उत्पन्न हुआ। इसका मन के साथ समावेश होने से अग्नि उत्पन्न हुई। वह नीचे गिरा तो भूमि जलने लगी, ऊपर उठी तो आकाश जलने लगा। वह शब्द रूप स्फुल्लिंगों से युक्त, स्वर्णिम आभा वाला परम दिव्य था।

अग्नि ने ब्रह्माजी से कहा-’मैं भूख से स्वयं जला जा रहा हूँ। मुझे आहार दीजिए।’ ब्रह्माजी ने अपने शरीर के एक-एक करके सभी अवयव उसे खिला दिये। तो भी उसकी तृप्ति नहीं हुई और भूखा-भूखा ही चिल्लाता रहा। कोई और उपाय न देखकर ब्रह्माजी ने अग्नि से कहा-जो व्यक्ति कामुकता से अभिभूत हो तो उनकी देह में घुस जा और उनकी समस्त धातुओं का भक्षण किया कर।

रोरुयमणि चाग्नौ तु पुनर्ब्रह्मा कृपान्वितः आह कामाभि भूतानाँ भुक्ष्व त्वं देह धातवः। ते काले लब्ध कामस्य सावृत्तिः सम्प्रकल्पिता। -स्कन्द पुराण

रुदन करते हुए अग्नि से ब्रह्माजी ने कृपा पूर्वक कहा तू कामुकों के शरीर में घुल कर उनके धातु संस्थान को खालिमा कर।

अग्नि ऐसा ही करने लगा किन्तु तो भी उसकी तृप्ति न हुई। इस पर ब्रह्माजी ने उसे मुनियों और देवताओं के अन्तःकरण में प्रवेश करने के लिए कहा। तब कहीं अग्नि की तृप्ति हुई और शान्ति मिली।

ब्रह्मातमाहत्वमपि यथेष्टाँ वृत्तिमाश्रय। देवमध्ये वहिर्वापि मुनीनामश्रयेष च। इत्येव मुक्त स्तेनाशु वृत्ति मेताम रोचयेत्॥

तब ब्रह्माजी ने अग्नि से कहा- तू ऋषियों के आश्रम में रह। देवों के भीतर और बाहर निवास कर। इस आदेश को प्राप्त कर अग्नि प्रसन्न हुआ और सन्तोष पूर्व रहने लगा।

यही जीवन सत्ता में ओत-प्रोत प्राण शक्ति-कालाग्नि एवं कामाग्नि है। इसको अधोगामी बनाने से मनुष्य जलता और गलता है। किन्तु यदि उसे ऊर्ध्वगामी बना लिया जाय तो वही ब्रह्म तेजस् बन कर योगाग्नि एवं प्राणाग्नि बनकर प्रज्वलित होती है। जीव को परम तेजस्वी बनाती है उसे लौकिक, भौतिक एवं आत्मिक विभूतियों से सुसम्पन्न बनाती है। महाशक्ति कुण्डलिनी का स्तवन करते हुए शक्ति उपासक तत्त्ववेत्ता की अभिव्यक्ति हैं-

मेरुदण्डे वह्निना शब्दात् पदं तेजोमयोति च। सिद्धिः प्राप्ति पदात् सिद्धिः सर्वकाम पदात् पुनः। सर्वेशा परिपूरेति चक्र स्वामिनीति च। अबु्रवन् परुषं किचद् असतोऽनर्चयंस्तथा॥

सर्व मन्त्रमयीत्युक्ता सर्व द्वन्द्व क्षयकारी। सर्व सौभग्यदाचेति सर्व विघ्न निवारिणी। सर्वज्ञानमयो त्युक्तत्त्वा सर्व व्याधि विनाशिनी। सर्व नन्दमयी देवि, सर्व रक्षा स्वरूपिणी। महाशक्ते महागुप्ते ततश्रवैव महा-महा। कुल कुण्डलिनी देवि, कन्दे मूले निव सिनी। -स्तोत्र समुच्चय

मेरुदण्ड में अग्नि रूप, शब्द पद, तेजोमयी, सिद्धि प्रदान करने वाली, काम पद, सर्वव्यापक, चक्र संस्थानों की स्वामिनी, गुप्त योनि, काम शक्ति, अनग मेखला, समस्त मन्त्रों की शक्ति युक्त, समस्त द्वन्द्वों का क्षय करने वाली, आनन्दमयी संरक्षक, महाशक्ति, रहस्यमयी, महानतम कुल कुण्डलिनी देवी, कन्द मूल में निवास करती है।

‘समाप्त’