नियति की इच्छा है कि मनुष्य ऊँचा उठे। उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रकृति की शक्तियाँ निरन्तर सहायता करती हैं। ईश्वर के राजकुमार को सुखी और सुसम्पन्न बनाना ही प्रकृति क्रम है। उसे इसी लिए रचा और इसी लिए खड़ा किया गया है।
इतने पर भी यह अधिकार मनुष्य के हाथों ही सुरक्षित रखा गया है कि वह प्रगति किस दिशा में करे। इसमें किसी दूसरे को हस्तक्षेप करने का अवसर नहीं दिया जाता। ईश्वर विश्व नियन्ता है। उसका पुत्र स्वभाग्य निर्माता तो होना ही चाहिए। प्रकृति उसकी सहायता भर करती है।
अन्तःकरण की आकांक्षा का चयन ही मनुष्य का प्रथम पुरुषार्थ है। इसका चुनाव और निर्धारण उसे स्वयं ही करना पड़ता है। यह दिशा निर्धारण होते ही आत्मसत्ता उसकी पूर्ति के लिए जुट जाती है। मनः तन्त्र अपनी विचार शक्ति को और शरीर तन्त्र अपनी क्रिया शक्ति को इसी आदेश के पालन में जुटा देता है। संपर्क क्षेत्र से वैसा ही सहयोग मिलता है और परिस्थितियाँ अभीष्ट मनोरथ की पूर्ति के लिए अनुकूलता उत्पन्न करने लगती हैं। मनुष्य आगे बढ़ता है। उसे निर्धारण और पुरुषार्थ को इस विश्व में चुनौती दे सकने वाला दूसरा कोई है भी तो नहीं।
पतन अभीष्ट है या उत्कर्ष? असुरता प्रिय है या देवतत्व? क्षुद्रता चाहिए या महानता? यह निर्णय मनुष्य स्वयं करता है। पतन के मार्ग पर चलने पर नारकीय दुरूह दुःख सहने पड़ते हैं और उत्कर्ष के पथ पर स्वर्गीय सुख शान्ति मिलती हैं। यह किसी से छिपा नहीं है। चयन में दूरदर्शिता या अदूरदर्शिता का अपनाना यही है मनुष्य की बुद्धिमत्ता का प्रमाण एवं परिचय।
इस संसार के दो महत्वपूर्ण आकर्षण हैं, एक सुख दूसरा सन्तोष। भौतिक दृष्टि सुख का चयन करती है, वैभव समेटती है और उस आधार पर शरीरगत वासना, मनोगत तृष्णा और अंतःक्षेत्र की अहंता की पूर्ति के लिए उस सम्पदा का उपयोग करती है। इस ललक में मनुष्य को स्वार्थी बनना पड़ता है। सुख उपभोग की आकांक्षा जब तक सीमित मर्यादित रहती है, तब तक मनुष्य प्रायः स्वार्थी ही बना रहता है, किन्तु जैसे ही वह अधिक प्रबल होने लगी वैसे ही मनुष्य दुष्ट दुराचरण पर उतारू हो जाता है। इसी आकांक्षा से आतुर व्यक्ति नर पशु से भी आगे बढ़कर नर पिशाच बनते देखे गये हैं।
शान्ति के अभिलाषी व्यक्ति सन्तोष का उपार्जन करते हैं। उन्हें सुखेच्छा पर अधिकाधिक नियंत्रण करना पढ़ता है। इससे शक्तियों की, साधनों की जो बचत होती है, उसे परमार्थ प्रयोजनों में लगाकर बदले में अन्तरात्मा की की शान्ति खरीदनी पड़ती है। जो शान्ति के अभिलाषी है, उन्हें सुखेच्छा सीमित करनी पड़ेगी, जो अमीरों जैसी विलासी सम्पन्नता के लिए आतुर हैं, उनके लिए आत्मशान्ति के लिए अभीष्ट परमार्थ प्रयोजनों के लिए कुछ महत्वपूर्ण साहस कर सकना सम्भव ही नहीं होता ।
सज्जनों की सम्पदा सत्प्रवृत्तियाँ हैं। आदर्शवादी सत्कर्म ही उनका वैभव होता है। श्रेय पथ पर चलते हुए थे निरन्तर आनन्द मग्न बने रहते हैं। ऐसे सत्पुरुषों की मनः स्थिति एवं क्रिया-पद्धति के चित्रण, शास्त्रों में प्रचुर मात्रा में भरे पड़े हैं-
भगवान बुद्ध ने अपनी लोकहित आकांक्षा व्यक्त करते हुए कहा था-
परान्तकोटिं स्थास्यामि सत्वस्यैकस्य कारणात्।
‘एक प्राणी के लिए भी सृष्टि के अन्त तक, कोटि-कोटि वर्षों तक मैं इस जगत में रहूँगा।’ -शिक्षासमुमच्चय 1
ग्लानानामस्मि भैषज्यं भवेयं वैद्य एव च। तदुपस्थायकश्चैव यावद्रोगोअपुनर्भवः॥
क्षुत्पिपासाव्यथाँ हन्यामन्नपानप्रवर्षणैः। दुर्भिक्षान्तरकल्पेषु भवेय पानभोजनम्॥
दरिद्राणाँ च सत्वानाँ निधिः स्यामहमक्षयः-नानोपरकणाकोरेरुपतिष्ठेयम्गत-बोधिचर्यावतार 3/7-9।
जो आतुर है, रोगी है, मैं उनके लिए, औषधि और वैद्य बनूँ, जब तक रोग दूर न हो जाय, मैं तब तक उनका परिचारक बनूँ। अन्न और पान वितरण करके मैं प्राणियों की क्षुधा और पिपासा की व्यथा को दूर करूं। अकाल आने पर मैं सबके भोजन पानी का आश्रय स्थान बनूँ। दरिद्र लोगों के लिए मैं अक्षय धन भण्डार बनूँ। यों नाना प्रकार की सामग्रियों को लेकर मैं उनके सामने उपस्थित रहूँ।
नाथ योनिसहस्त्रेषु येष येषु ब्रजाम्यहम्। तेषु तेष्वच्युला भक्ति रच्युतास्तु सदात्वयि।
या प्रीतिरविवेकानाँ विषयेष्वनपायिनी। त्वामनुस्मरतः सा में ह्नदयान्मापसपंतु-विष्णु पुराण
प्रह्लाद ने कहा- हे नाथ! हजारों योनियों में से मैं जिस जिस योनि को प्राप्त होऊँ, उस उस में ही मेरी भक्ति आप में सदैव अक्षुण्ण रूप से बनी रहे। जैसे अविवेकी जन विषयों में अविचल प्रीति रखते हैं, वैसे ही आप मेरे हृदय से कभी भी पृथक् न हों।
तप्यन्ते लोकतापेन साधवः प्रायशों जनाः। परमाराधनं तद्धि पुरुषस्याखिलात्मनः-श्री मद्भागवत
समदर्शी साधु लोगों के दुःखों को देख कर दुःखी होते हैं। इस अखिल ब्रह्माण्ड में व्यास उस अखिलेश्वर जनता रूपी जनार्दन की सेवा करने के निमित्त दुःख भोगना ही उनकी परम आराधना है।
मनसि वचसि कामे प्रेमपीयूष पूर्णा-स्त्रिभुवनमुपकार श्रेणिभिः प्रीणयन्तः। परगुण परमाणून् पवर्ताकृत्य नित्यं-निज ह्नदि विकसन्तः संति संतः किवन्त-भतृहरिशतक
“जिनका मन प्रेम पीयूष से परिप्लावित हो, जिनकी वाणी प्रेममयी मधुमयी हो, जिनकी शारीरिक चेष्टाओं से प्रेम प्रकट होता हो और जो अपने उपकारों की बाढ़ से त्रिभुवन को बहाते से रहते हों और दूसरों के अणु-समान गुण को पर्वत के समान बना कर अपने हृदय को विकसित करते रहते हों, ऐसे इस धराधाम पर कितने हैं?
प्रत्येक कर्म का कोई अधिष्ठाता, प्रत्येक रचना का कोई कलाकार अवश्य होता है। आगरे का ताजमहल संसार के सर्व प्रसिद्ध सात आश्चर्यों में से एक है। उसके निर्माण में प्रतिदिन 20 हजार मजदूर काम करते थे, इतिहासकारों के अनुमान के अनुसार उसका निर्माण 6 करोड़ रुपये में हुआ। उसके निर्माण में साढ़े अट्ठारह वर्ष लगे। उसमें राजस्थान के आया संगमरमर, तिब्बत की नीलम मणि, सिंहल की सिपास्लाजुली मणि, पंजाब के हीरे, बगदाद के पथराग रत्न लगे हैं। इतनी सारी व्यवस्था और साधन सामग्री जुटाने में एक व्यक्ति की बुद्धि काम कर रही थी। वह था शाहजहां। ताजमहल की रचना के साथ शाहजहां चिरकाल अमर है।
कोरिया का मेमोरियल संसार का दूसरा आश्चर्य । 62 हाथ लम्बी उतनी ही चौड़ी चहारदीवारी के मध्य 40-40 हाथ ऊँचे 36 स्तम्भ जो नीचे मोटे पर ऊपर क्रमशः पतले होते गये हैं। सीढ़ियों पर नीचे से ऊपर तक संगमरमर की बहुमूल्य मूर्तियों की सजावट। प्रसिद्ध कलाकार पाइथिस और माटीराम द्वारा विनिर्मित इस समाधि मन्दिर का निर्माण केवल एक व्यक्ति की इच्छित रचना है वह थीं वहाँ की महारानी “आर्टीमिसिया”।
20 लाख रुपये की लागत से बनी 25 फुट ऊँची ओलम्पिया की जुपिटर प्रतिमा एथेंस के सम्राट् पैराक्लीज की हार्दिक इच्छा का अभिव्यक्त रूप है। इफिसास का डायना मन्दिर चाँदफिन की कल्पना का साकार है तो अजन्ता की 29 गुफाओं में 5 मन्दिरों और 24 बौद्ध विहारों में प्रवर सेन युग के आचार्य सुनन्द का नाम अंकित है। सिकन्दरिया का प्रकाश स्तम्भ सिकन्दर के संकल्प का मूर्तिमान् है। 263 हाथ के घेरों में 22 फुट ऊँचे ठोस घेरे में खड़ा किया गया बेबीलोन का लटकता हुआ बाग (हैंगिंग गार्डन) बेबीलोन साम्राज्ञी ने बनवाया रोम का कोलोसियस, पीसा की मीनार, रोडस की पीतल की मूर्ति मिस्र के पिरामिड चार्टेज गिरजाधर डेविड, मोजेज, सिस्टाइन चैपिल की प्रतिमाएँ, एफिल टावर (पेरिस) हृइट हाउस अमेरिका, लाल किला दिल्ली आदि जितनी भी सर्वश्रेष्ठ रचनाएँ हैं, उनके रचनाकार आला मस्तिष्क और भाव सम्पन्न आत्माएँ रही हैं किसी भी साँसारिक निर्माण को स्वनिर्मित नहीं कहा जा सकता इसी से रचना के साथ रचनाकार का नाम अविच्छिन्न रूप से चलता है।
यह छोटे छोटे उपादान बिना कर्ता के अभिव्यक्ति नहीं पा सके होते तो इतना सुन्दर संसार जिसमें प्रातःकाल सूरज उगता और प्रकाश व गर्मी देता है। रात थको को अपने अंचल में विश्राम देती, तारे पथ प्रदर्शन करते, ऋतुएँ समय पर आतीं और चली जाती हैं। हर प्रकृति का सुव्यवस्थित स्वच्छता अभियान सब कुछ व्यवस्थित ढंग से चल रहा है। करोड़ों की संख्या में तारागण किसी व्यवस्था के अभाव में अब तक न जाने कब के लड़ मरे होते। यदि इन सब में गणित कार्य न कर रहा होता तो अमुक दिन, अमुक समय सूर्य ग्रहण चन्द्र ग्रहण, मकर संक्रान्ति आदि का ज्ञान किस तरह हो पाता। यह सोद्देश्य कर्म और सुन्दरतम रचना बिना किसी ऐसे कलाकार के सम्भव नहीं हो सकती थी जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एकरस देखता हो, सुनता हो, साधन जुटाता हो, नियम व्यवस्थाएँ बनाता हों, न्याय करता हो और जीव मात्र को पोषण संरक्षण प्रदान करता हो।
नियामक के बिना नियम व्यवस्था, प्रशासक के बिना प्रशासन चल तो सकते हैं, पर आधे घण्टे से अधिक नहीं जब कि पृथ्वी को ही अस्तित्व में आये करोड़ों वर्ष बीत चुके। परिवार के वयोवृद्ध के हाथ सारी गृहस्थी का नियन्त्रण होता है। गाँव का एक मुखिया होता है तो कई गाँवों के समूह की बनी तहसील का स्वामी तहसीलदार, जिले का मालिक कलक्टर, राज्य का गवर्नर और राष्ट्र का राष्ट्रपति। मिलों तक के लिए मैनेजर कम्पनियों के डायरेक्टर न हों तो उनकी ही व्यवस्था ठप्प पड़ जाती है और उनका अस्तित्व डावाँडोल हो जाता है फिर इतनी बड़ी और व्यवस्थित सृष्टि का प्रशासक, स्वामी और मुखिया न होता तो संसार न जाने कब का विनष्ट हो चुका होता। जड़ में शक्ति हो सकती है व्यवस्था नहीं। नियम सचेतन सत्ता ही बना सकती है, सो इन तथ्यों के प्रकाश में परमात्मा का विराट् चरितार्थ हुए बिना नहीं रहता।
2 फरवरी 1947 के नेशनल हेराल्ड में एक लेख छपा था-वैज्ञानिक भगवान में विश्वास क्यों करते हैं? इस लेख में विद्वान लेखक ने बताया है कि संसार का हर परमाणु एक निर्धारित नियम पर काम करता है, यदि इसमें रत्ती भर भी अव्यवस्था और अनुशासन हीनता आ जाये तो विराट् ब्रह्माण्ड एक क्षण को भी नहीं टिक पाता। एक कण के विस्फोट से अनन्त प्रकृति में आग लग जाती और संसार अग्नि ज्वालाओं के अतिरिक्त कुछ न होता।
नियामक विधान किसी मस्तिष्कीय सता का अस्तित्व में होना प्रमाणित करता है। हमारे जीवन का आधा सूर्य है। वह 10 करोड़ 30 लाख मील की दूरी से अपनी प्रकाश किरणें भेजता है जो 8 मिनट में पृथ्वी तक पहुँचती हैं। दिन भर में यहाँ के वातावरण में इतनी सुविधाएँ एकत्र हो जाती हैं कि रात आसानी से कट जाती है। दिन रात के इस क्रम में एक दिन भी अन्तर पड़ जाये तो जीवन संकट में पड़ जाये। सूर्य के लिए पृथ्वी समुद्र में एक बूँद का सा नगण्य अस्तित्व रखती है फिर, उसकी तुलना में रूस के साइबेरिया प्रान्त में एक गड़रिये के घर में जी रहीं एक चींटी का क्या अस्तित्व हो सकता है, पर वह भी मजे में अपने दिन काट लेती है।
सूर्य अनन्त अन्तरिक्ष का एक नन्हा तारा है ‘रीडर्स डाइजेस्ट’ ने एक एटलस छापा है उसमें सौर मण्डल के लिए एक बिन्दु मात्र रखा है और तीर का निशान लगा कर दूर जाकर लिखी है-हमारा सौर मण्डल यहाँ नहीं है” यह ऐसा ही हुआ कि कोई कहे मेरी आँख का आँसू समुद्र में गिर गया। सूर्य से तो बड़ा “रीजल” तारा ही है जो उससे 15 हजार गुना बड़ा है। “अन्टेयर्स” सूर्य जैसे 3 करोड़ 60 लाख गोलों को अपने भीतर आसानी से सुला सकता है। जून 1967 के “साइन्स टुडे” में “ग्राहम बेरी” ने लिखा है। पृथ्वी से छोटे ग्रह भी ब्रह्माण्ड में हैं और 5 खरब मील की परिधि वाले भीमकाय नक्षत्र भी। किन्तु यह सभी विराट् ब्रह्माण्ड में निर्द्वन्द्व विचरण कर रहे हैं और यदि कहीं कोई व्यवस्था न होती तो यह तारे आपस में ही टकरा कर नष्ट भ्रष्ट हो गये होते।
सूर्य अपने केन्द्र में 1 करोड़ साठ लाख से0ग्रे0 गर्म है, यदि पृथ्वी के ऊपर अयन मण्डल (आइनोस्फियर) की पट्टियाँ न चढ़ाई गई होती। सूरज अपने स्थान से थोड़ा सा खिसक जाये तो ध्रुव प्रदेशों की बर्फ पिघल कर सारी पृथ्वी को डूबो दे यही नहीं उस गर्मी से कड़ाह में पकने वाली पूड़ियों की तरह सारा प्राणि जगत ही पक कर नष्ट, हो जाये । थोड़ा ऊपर हट जाने पर समुद्र तो क्या धरती की मिट्टी तक बर्फ बनकर जम सकती है। यह तथ्य बताते हैं ग्रहों की स्थिति और व्यवस्था अत्यन्त बुद्धिमत्तापूर्ण की गई है। यह परमात्मा के अतिरिक्त और कौन चित्रकार हो सकता है।
गृह-नक्षत्रों की बातें छोड़ दे। परमाणुओं के जिस तालाब में हम जलचरों की तरह जीते हैं उसके एक परमाणु में ही 27 लाख किलो कैलोरी गर्मी भरी है उसे प्रकृति ‘ने शोषिह तह व प्रसुप्त न रखा होता तो जीवन का अस्तित्व एक दिन भी न ठहर पाता। परमाणु के-इलेक्ट्रान प्रति सेकेण्ड 135000 किलोमीटर की प्रचण्ड गति से चलते हैं यदि यह चार्ज क्रियाशील रहा तो पृथ्वी के समस्त प्राणी 16 सेकेण्ड में ही सूर्य पर जा पटके गये होते। ऐसी विद्युत चुम्बकीय आँधी चलती जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को थर-थराकर रख देती। परमात्मा कभी-कभी अपने अस्तित्व के दिग्दर्शन के लिए अपनी इस संहारक क्षमता का प्रयोग तो करता है, पर मात्र मानव की प्रसुप्त-आध्यात्मिकता को झकझोरने के लिए। जैसे पिता बालक की उद्दण्डता तब तक बर्दाश्त करता है, जब तक और किसी का अहित न हो। डाँटा तो वह कभी-कभी ही डराने, धमकाने और अनुशासन में बनाये रखने के लिए करता है।
यह सब सत्य इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि संसार को बनाने वाला अद्भुत गणितज्ञ, विलक्षण इंजीनियर, सुयोग्य चिकित्साधिकारी, मौसम वेत्ता और परमाणु वैज्ञानिक है, उस सत्ता के अस्तित्व से इनकार करना अपने आप को पतन में धकेलने के बराबर है। उसे प्राप्त करने का प्रबल पुरुषार्थ आवश्यक है। जिसने उसे पा लिया उसने अपना जीवन धन्य कर लिया समझना चाहिए।
सर्व नियामक सत्ता की प्रबन्ध व्यवस्था का पता जीवन का आविर्भाव से ही चल जाता है। जीवन की उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सृष्टि में ऐसा प्रबन्ध है कि वे सरलतापूर्वक पूरी हो जाया करें। साँस के बिना प्राणी एक क्षण को भी जीवित नहीं रह सकता, सो वह प्रचुर मात्रा में सर्वत्र उपलब्ध है। उसके बाद जल की आवश्यकता है उसके लिए थोड़ा प्रयत्न करने से ही काम चल जाता है। तीसरी आवश्यकता अन्न की है सो उसके लिए साधन न जुटा सकने वाले प्राणियों के लिए फल-फूल की प्राकृतिक व्यवस्था हैं वहीं बुद्धिवादी जीव थोड़े प्रयत्न का अपनी आवश्यकता पूरी कर लेते हैं इसके बाद के समस्त उपादान आवश्यकता के अनुपात में प्रयत्न और परिश्रम से प्राप्त होते रहते हैं। इन सार्वभौम आवश्यकताओं की पूर्ति बिना संचालक-व्यवस्थापक के कैसे सम्भव हो सकती थी।
नैतिकता के सर्वमान्य सिद्धान्तों से न केवल जीव समुदाय जुड़ा है अपितु कर्ता ने वह अनुशासन स्वयं पर भी पूरी तरह लागू किया है। भूण जैसी अत्यधिक कोमल संवेदनशील सत्ता को विकसित होने के लिए खुला छोड़ दिया जाता तो प्राण-धारी के लिए उपयोगी वायु, शाप और अन्य प्राकृतिक परिस्थितियाँ ही उसे नष्ट-भष्ट कर डालती सो उसके लिए वातानुकूलित और सर्व सुविधा सम्पन्न निवास माँ के गर्भाशय की व्यवस्था क्या किसी अत्यधिक प्रबुद्ध सत्ता के अस्तित्व का प्रमाण नहीं। जहाँ चारों तरफ से बन्द कोठरी में ही उसे विकास की समस्त सुविधाएँ उचित मात्रा में मिलती रहती हैं। जन्म के पूर्व ही उसके लिए सन्तुलित आहार माँ के दूध जैसा उपलब्ध कराकर उसे अत्यधिक करुणा दरसाई । असहाय असमर्थ शिशु के लिए न केवल भौतिक सहायताएँ अपितु उसके लिए जिन भावनात्मक सुविधाओं की आवश्यकता थी वह समस्त उसे कुटुम्ब में, समुदाय और समाज में मिल जाती हैं । इस तरह जीवन सत्ता परिपक्व रूप में सामने आ जाती है इतने पर भी यह कितने आश्चर्य की बात है कि दूसरों के सहारे बढ़ा विकसित हुआ जीव न केवल सामाजिक कर्तव्यों के प्रति कृतघ्नता का परिचय देने लगता है, अपितु अपने परमपिता , अपनी मूलसत्ता को ही भुला बैठता है।
इतने पर भी वह दयालु पिता उस शिशु के यौवन में प्रवेश करते ही उसकी पितृत्व, कामेच्छा और भावनात्मक सहयोग की पूर्ति के लिए जोड़ी मिलाने, नर को नारी में नारी को नर में अपनी पूर्णता प्राप्त करने की सुविधा जुटाई, रोग निरोध की तथा साँसारिक प्रतिकूलताओं में अपने अस्तित्व की रक्षा की जन्म-जात सुविधाएँ भी प्रदान की हैं । रोगों से लड़ने की शक्ति रक्त कणों में शारीरिक अवयवों की सुरक्षा त्वचा के द्वारा देखने के लिए आँखें, सुनने के लिए कान और विचार करने के लिए बढ़िया मस्तिष्क इतनी सुन्दर मशीन आज तक न कोई बना सका और न बना सकना सम्भव है जो इच्छानुसार हर परिस्थिति में मुड़ने, लचकने, संभालने में सक्षम है। आँख जैसी रेटिना, कान जैसा पर्दा गुर्दे जैसे सफाई अधिकारी, हृदय जैसे पोषण संस्थान और पाँव जैसा सुन्दर आर्क बनाने वाली सत्ता कितनी बुद्धिमान होगी इसकी तलना न किसी इंजीनियर से हो सकती है न डाक्टर से । वह प्रत्येक कला-कौशल का ज्ञाता, सर्व निष्णात और सर्व प्रभुता सम्पन्न दानी केवल परमात्मा ही हो सकता है इससे कम मानना न केवल उस परमात्मा की अवमानना होगी अपितु यह एक प्रकार से स्वयं का ही आत्मघात होगा।
इतने पर ही उसके अनुदान समाप्त नहीं हो जाते अग्नि में चिनगारी, पदार्थ में-परमाणु सूर्य में किरणों की तरह वह स्वयं भी मनुष्य की हृदय गुहा में बैठकर उसे प्रतिपल आत्मोत्कर्ष की प्रेरणा देता रहता है। गलत मार्ग पर चलने से पहले ही उसकी प्रेरणा रोकती है, पर मनुष्य अन्तःकरण की उस पुकार को अनसुनी कर स्वेच्छाचारिता बरतता और उस अपराध का दण्ड, रोग, शोक, क्लेश, कलह और मानसिक सन्ताप के रूप में भुगतता रहता है। फिर भी उसकी वासनाएँ शान्त नहीं होती, वह अपनी वासनाओं की, तृष्णा की, अतृप्त कामनाओं की प्यास बुझाने के लिए मानवेत्तर योनियों में भटकता है, तो भी उसकी दया, करुणा, उदारता एक पल को भी साथ नहीं छोड़ती और उसे निरन्तर ऊपर उठने, कामनाओं से मुक्ति पाकर शाश्वत, सनातन और दिव्य आनन्द की प्राप्ति के लिए प्रेरित करती रहती है। फिर भी इस सता के अजस्र अनुदानों की ओर से आँख फेरकर मनुष्य प्यासा का प्यासा बना रहता है। माया के मूढ़ भ्रमजाल में पड़ा जीवन के बहुमूल्य क्षण मिट्टी के मोल नष्ट करता रहता है।
वैज्ञानिक सृष्टि की नियामक विधि-व्यवस्था प्रत्येक अणु में विद्यमान दिव्य चेतना को नहीं झुठलाती । हर्बर्ट स्पेंसर की दृष्टि में भगवान् एक विराट शक्ति है जो संसार की सब गतिविधियों का नियन्त्रण उसी प्रकार करता है जिस प्रकार घर का मुखिया, गाँव का प्रधान, जिले का कलेक्टर और प्रान्त का गवर्नर । राज्य के नियमों का हम इसलिए पालन करते हैं क्योंकि हमें राज्य दण्ड का भय होता है। नैतिक, नियमों का पालन न करने पर हमें भय लगता है जब कि हम उसके लिए पूर्ण स्वतन्त्र होते हैं। यह बात इस का प्रमाण है कि संसार में कोई सर्वोच्च सत्ता काम करती है इस तथ्य से यह भी स्पष्ट है कि वह प्रजावत्सल और न्यायकारी भी है।
दार्शनिक कान्ट ने इन्पेंसर के कथन को और भी स्पष्ट करते हुए लिखा है- नैतिक नियमों की स्वीकृति ही परमात्मा के अस्तित्व का प्रमाण और पूर्ण नैतिकता ही उसका स्वरूप है। संसार का बुरे से बुरा व्यक्ति भी किसी न किसी के प्रति नैतिक अवश्य होता है। चोर डकैत और कसाई तक अपने बच्चों के प्रति दयालु और कर्तव्य-परायण होते हैं जब कि वे जीवन भर कुत्सित कर्म ही करते रहते हैं। अपने भीतर से नैतिक नियमों की स्वीकृति इस बात का पुष्ट प्रमाण हे कि संसार केवल नैतिकता के लिए ही जीवित है। उसी से संसार का निमार्ण पालन और पोषण हो रहा है। इसलिए परमात्मा नैतिक शक्ति के रूप में माना जाने योग्य है।
हैब्रू ग्रन्थों में ईश्वर को “जेनोवाह” कहा गया है जेनोवाह का शाब्दिक अर्थ हैं -वह जो सदैव सत्य नीति ही प्रदान करता है। दार्शनिक व्लेटो ने उसे-अच्छाई का विचार” कह है। संसार के प्रत्येक व्यक्ति यहाँ तक कि जीव-जन्तुओं में भी अच्छाई की चाह रहती है। अच्छाई में ही आनन्द और आत्म-तृप्ति मिलती है। अच्छाई शरीर और सौंदर्य की जो संयम और सदाचार द्वारा सुरक्षित हो, अच्छाई समाज की जो’ ईमानदारी’ नेकनीयत, विश्वास, सहयोग और परस्पर प्रेम व भाईचारे की भावना से सुरक्षित हो, अच्छाई प्रकृति की जो रंग-बिरंगे फूलों,भाले पशु-पक्षियों के कलरव उनकी क्रीड़ा द्वारा सुरक्षित हो। इस तरह संसार में सर्वत्र अच्छाइयों के दर्शन करके प्रसन्नता अनुभव करते हैं। परमात्मा इस तरह अच्छाई का वह बीज है जो आँखों को दिव्य मनोरम और बहुत प्यारा लगता है।
समझा जाता है कि पदार्थ और पुरुषार्थ के बल पर मनस्वी और श्रमशील व्यक्ति अभीष्ट सफलताएँ प्राप्त कर लेते हैं। यह मान्यता एक अंश तक ठीक भी है और उसे सर्व साधारण के लिए उपयोगी ही घोषित किया जाना चाहिए। सामान्य लोक व्यवहार में उसी प्रतिपादन को लाभदायक और महत्वपूर्ण माना जाता रहा है, जो उचित भी है।
पर जब अधिक गहराई में प्रवेश करते हैं तो कुछ ऐसे नये तथ्य सामने आते हैं, जो स्थूल चेष्टाओं को ही सब कुछ नहीं रहने देते वरन् इससे आगे की ऐसी झाँकी कराते हैं जिनके आधार पर सूक्ष्म तत्व का महत्व अत्यधिक बढ़ा-चढ़ा सिद्ध होता है।
हमारे व्यक्तित्व के दृश्यमान अवयव ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के रूप में जाने जाते हैं। इन्हीं के माध्यम से रसानुभूति होती हैं, जानकारियाँ मिलती हैं और विविध कर्म करना सम्भव होता है। यह जीवन की सामान्य प्रक्रिया हुई। असामान्य स्थिति वह है, जिसमें व्यक्तित्व का आधारभूत ढाँचा खड़ा करने वाले विशिष्ट तत्व का अस्तित्व होता है। उनका नियंत्रण अंतर्मन करता है। सामान्य पुरुषार्थ के बल पर न इन विशिष्ट तत्वों को प्रभावित किया जा सकता है और न अंतर्मन के अभ्यासों को बदलने के लिए सरलतापूर्वक तैयार किया जा सकता है। व्यक्तित्व के इस गहन अन्तराल को प्रभावित, विकसित करना मात्र उसी आधार पर सम्भव होता है, जिसे तत्व ज्ञानियों ने योग विद्या एवं साधना विज्ञान का नाम दिया है।
नेपोलियन बोनापार्ट का पराक्रम प्रसिद्ध है। वाटरलू के युद्ध में वह हार गया। ‘ग्लैण्ड्स आफ डेस्टिनी’ के लेखक डा0 ईवो के अनुसार इस पराजय का कारण यह था कि उसकी पिट्यूटरी ग्रन्थि विकृत हो गई थी, इसी से वह समय पर सही निर्णय न कर पाया; अन्तर्द्वन्द्व में फँसा रह गया और अवसर चूक गया।
हारमोन्स बनाने वाली ग्रन्थियों का महत्व अब स्पष्ट हो चुका है। इन्हें ही अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ कहते हैं।
पीनियल, पिट्यूटरी, थाइराइड, पैराथाइराइड, एड्रीनल, पेन्क्रियाज, गोनड्स, स्प्लीन आदि ग्रन्थियों के स्थान, आकार, स्राव तथा उन स्रावों से शरीर पर प्रभाव परिणाम अब शरीर शास्त्र की किसी भी पुस्तक में विस्तार से पढ़े जा सकते हैं। इन ग्रन्थियों का शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक विकास में भारी योगदान है। मनुष्यों का बौना रह जाना, असाधारण लम्बे हो जाना, मोटापा, पतलापन, नपुंसकता, प्रचण्ड कामवासना, बुद्धि दौर्बल्य, प्रखर-बुद्धि होना, मिताहारी होना, बहुत खाना, बिना सोए काम चलाना, बहुत अधिक सोना, अकारण रोगग्रस्त हो उठना, आदि अनेक शारीरिक मानसिक दशाएँ इन्हीं हारमोन्स-स्रावों से बनती बिगड़ती रहती हैं। व्यक्तित्व के निर्माण में इनका ही योगदान है। प्रेम, उत्साह, उल्लास, आनन्द, चिन्ता, उद्वेग, विषाद आदि भावनाएँ इन्हीं स्रावों की प्रतिक्रियाएँ हैं। मानसिक सन्तुलन और स्वभाव निर्माण इन्हीं पर मुख्यतः अवलम्बित है। शारीरिक सुदृढ़ता, सुन्दरता, स्फूर्ति, इन्द्रिय-क्षमता रोग निरोधक शक्ति, मानसिक प्रखरता और स्वभाव तथा चरित्र का स्तर; इन्हीं से सम्बन्धित पाया गया है। समग्र व्यक्तित्व के विकास में इन स्रावों की अतिमहत्त्वपूर्ण भूमिका है।
अब यह भी ज्ञात हुआ है कि इन्हीं स्रावों के समन्वित प्रभव के परिणामस्वरूप प्रत्येक मनुष्य के शरीर से एक विशेष प्रकार की गन्ध फैलती रहती है। प्रत्येक व्यक्ति की गन्ध दूसरे से भिन्न रहती है। वस्तुतः यह यह गन्ध मनुष्य की हथेलियां ओर तलुवों में स्थित स्वेद-ग्रन्थियाँ
किसी व्यक्ति की गन्ध से युक्त वायु के नमूनों की विशेष पात्रों में लगभग दो वर्ष तक सुरक्षित रखा जा सकता है। प्रत्येक व्यक्ति की एक गन्ध-छाप या गन्ध-प्रकृति तैयार कर ली जा सकती है। अपराधों की खोज के सिलसिले में यह गन्ध-छाप बहुत काम की सिद्ध होगी। अपराध जिस कमरे में घटित हो, उसके वायु-नमूनों को एकत्र कर उन्हें प्रयोगशाला में विश्लेषण किया जा सकता है। संदिग्ध व्यक्ति की गन्ध के साथ इस नमूने की गन्ध का मिलान कर अपराधी की शिनाख्त की जा सकती है।
रूसी वैज्ञानिकों ने इस दिशा में विशेष अनुसंधान किये हैं। इससे ज्ञात हुआ है कि शरीर के पसीने की संरचना में ऐसे अम्ल विद्यमान होते हैं, जिनका कोई अंश कमरे की किसी वस्तु पर, फर्श आदि पर फैल जाता है। यह अम्लाँश पैरों में जूते पहने होने पर भी जूतों को पार कर फर्श आदि पर अपना प्रभाव छोड़ देता है। इसकी गन्ध इतनी पर्याप्त होती है कि खोजी कुत्ता इसकी पहचान करते हुए इसका पीछा कर सकता है।
अब अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ऐसे गन्ध-विश्लेषकों का निर्माण किया है, जो कुत्तों की घ्राण-शक्ति से सहस्रों गुणित अधिक संवेदनशील है। किसी स्थान पर, यदि एक व्यक्ति लगभग 45 मिनट उपस्थित रहे, भले ही वह एक ही स्थान पर न बैठा रहकर वहाँ सीमित क्षेत्र में चलता-फिरता भी रहे, तो वहाँ के वायु नमूनों को शीशे के एक पात्र में एकत्र कर उसका विश्लेषण करके उस निश्चित गन्ध-छाप की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। कुछ अन्य उपकरणों द्वारा यह तक जाना जा सकता है कि उस व्यक्ति ने उस समय कौन-सी चीजें खाई थीं, किन वस्तुओं को छुआ था ।
अंतःस्रावी हारमोन ग्रन्थियाँ ऐसी हैं, जिन्हें शल्य क्रिया द्वारा किसी भी शरीर की फाड़ चीर करके देखा ज सकता है। यह स्थूल शरीर में रहने वाली चमत्कारी विशेषताएँ, जिन पर स्थूल पुरुषार्थ का प्रभाव नहीं पड़ता वरन् अंतर्मन ही उनका नियंत्रण परिवर्तन करता है। यों दवा-दारु और चीर-फाड़ से भी इन संस्थानों को प्रभावित किया गया है, पर सफलता नगण्य ही मिली है। इन प्रत्यक्ष ग्रन्थियों से भी अधिक प्रभावशाली वे ग्रन्थियाँ हैं, जो सूक्ष्म शरीर में विद्यमान हैं और जिन्हें षट्-चक्रों एवं चौबीस उपचक्रों के रूप में जाना जाता है। इनकी अन्तः स्थिति ही व्यक्तित्व के मूलभूत ढाँचे को खड़ा करती है। संस्कार प्रारब्ध आदि इसी को कहते हैं।
वैज्ञानिक व्यक्तित्व की गन्ध के रूप में इन दिनों जिसका विश्लेषण कर रहे हैं, वस्तुतः वह मानवी विद्युत है जा क्रिया और चिन्तन पर अन्तः प्रेरणा उठती है और उसी ऊर्जा के सहारे मनुष्य दिशा निर्धारित करते-उठते एवं गिरते देखे जाते हैं। अंतःस्रावी ग्रन्थियों की स्थिति सुधारने और समूची वैयक्तिक स्थिति में परिवर्तन करने के लिए वैज्ञानिक उपाय सोचे और प्रयोग में लाये जा रहे हैं, पर उनसे अभीष्ट परिणाम निकल नहीं रहा है। कई बार तो उलटे परिणाम भी देखे गये हैं। उपचार ने लाभ के स्थान पर हानि प्रस्तुत की हैं।
मानव शरीर में विद्यमान अंतःस्रावी ग्रन्थियों के क्रिया कलापों की जानकारी का क्षेत्र बढ़ता ही जा रहा है। किन्तु अभी तक यह नहीं जाना जा सका है कि इन स्रावों को कम या अधिक करने अथवा नियंत्रित करने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है? औषधियों की तो वहाँ तक पहुँच अल्प ही होती है। शल्यचिकित्सा और इंजेक्शन आदि द्वारा भी इन्हें नियन्त्रित करने की निर्दोष विधियाँ ज्ञान नहीं हो सकी हैं। छेड़छाड़ करने पर अनेक नवीन समस्याएँ उठ खड़ी होती हैं। उदाहरणार्थ- सौंदर्य वृद्धि की ललक से, स्त्रियों के बढ़े हुए स्तनों को छोटा करने के लिए ‘रिड्यूसिंग क्रीम’ का प्रयोग चला। इसी तरह छोटे स्थानों का बड़ा बनाने के लिए एस्ट्रोजन हारमोन शरीर में पहुँचाए गये। इससे तात्कालिक लाभ तो दृष्टिगोचर हुआ, पर थोड़े दिनों बाद अन्य शारीरिक विकृतियाँ पैदा हो गईं। एक फ्रेंच महिला इसी प्रयोग के चक्कर में दाढ़ी मूँछों वाला बन बैठी और सौंदर्य वृद्धि की साध पूरी होना तो दूर, रहा सहा सौंदर्य भी जाता रहा। विद्युत संचार के प्रयोगों के भी प्रतिकूल परिणाम ही देखे गये हैं।
हारमोन्स सम्बन्धी वैज्ञानिक गवेषणाएं हमें इसी निष्कर्ष पर पहुँचाती है कि शरीर संस्थान के विभिन्न अवयवों की अपेक्षा एक छोटी सी ग्रन्थि से स्रवित चन्द बूँदें अधिक महत्वपूर्ण हैं। सफलता और समृद्धि का आधार बाहरी रूपकार की विशालता विराटता पर नहीं, आन्तरिक प्रवृत्तियों पर ही गतिशील है। शक्ति का स्त्रोत चेतना का प्रकृति संस्थान ही है। उसकी की उत्कृष्टता निकृष्टता के आधार पर हमारा वास्तविक उत्थान पतन होता है। इससे अधिक गम्भीर क्षेत्र में उतरना हो तो हमें उन चक्रों और उपचक्रों का अन्वेषण करना पड़ेगा, जिन्हें योग शास्त्र में मनुष्य की आधार शिला माना है।
योग विज्ञान उस रहस्यमयी किन्तु सुनिश्चित प्रक्रिया का नाम है, जिनके आधार पर व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास हो सकता है और उस सफलता को प्राप्त किया जा सकता है, जिसे जीवन लक्ष्य की पूर्ति कहा जाता है।
यह संसार कर्मफल व्यवस्था के आधार पर चल रहा है। जो जैसा बोता है वह वैसा काटता है। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। पेण्डुलम एक ओर चलता है तो लौट कर उसे फिर वापिस अपनी जगह आना पड़ता है। गेंद को जहाँ फेंक कर मारा जाय वहाँ से लौट कर उसी स्थान पर आना चाहेगी जहाँ से फेंकी गई थी। शब्द भेदी बाण की तरह भले बुरे विचार अन्तरिक्ष में चक्कर काट कर उसी मस्तिष्क पर आ विराजते हैं, जहाँ से उन्हें छोड़ा गया है। कर्म के सम्बन्ध में भी यही बात है। दूसरों के हित अनहित के लिए जो किया गया है उसकी प्रतिक्रिया कर्ता के ऊपर तो अनिवार्य रूप से बरसेगी, जिसके लिए वह कर्म किया गया था, उसे हानि या लाभ भले ही न हो। गेहूँ से गेहूँ उत्पन्न होता है और गाय अपनी ही आकृति प्रकृति का बच्चा जनती है। कर्म के सम्बन्ध में भी यही बात है, वेबन्ध्य नपुंसक नहीं होते अपनी प्रतिक्रिया सन्तति उत्पन्न करते हैं। उनके प्रतिफल निश्चित रूप से उत्पन्न होते हैं। यदि ऐसा न होता तो इस सृष्टि में घोर अँधेरा छाया हुआ दिखता। तब कोई कुछ भी कर गुजरता और प्रतिफल की चिन्ता न करता।
आज का बोया बीज कुछ समय बाद फल देता है- आज का जमाया दूध कल दही बनता है-आज का आरम्भ किया अध्ययन, व्यायाम, व्यवसाय तत्काल फल नहीं देता उसकी प्रतिक्रिया उत्पन्न होने में कुछ समय लग जाता है। इसी विलम्ब में मनुष्य की दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता की परीक्षा है। यदि तत्काल फल मिला करते तो किसी के भले बुरे का निर्णय करने की आवश्यकता ही न पड़ती। झूठ बोलने वाले का मुँह सूज जाया करता, कुदृष्टि डालने वालों की आँखें दर्द करने लगतीं, चोरी करने वालों के हाथों में गठिया हो जाता, तो फिर कोई व्यक्ति कुकर्म करता ही नहीं। ईश्वर ने मनुष्य के निजी विवेक और कर्म स्वातंत्र्य को कार्यान्वित होते रहने के लिए कर्म और फल के बीच अन्तर रखा है। इस धैर्य परीक्षा में जो असफल रहते हैं, वे सत्कर्मों की सुखद सम्भावना पर अविश्वास करके उन्हें छोड़ बैठते हैं और कुकर्मों का हाथों हाथ फल न मिलते देख कर उन पर टूट पड़ते हैं। ऐसी ही अदूरदर्शिता के कारण पक्षी बहेलिये के जाल में फँसते हैं, वे दाना देखते हैं फन्दा नहीं। आटे के लोभ में मछली अपनी गला फँसाती है और बेमौत मारी जाती है। चासनी के लाभ में अन्धाधुन्ध घुस पड़ने वाली मक्खी के पंख चिपक जाते हैं और तड़पते हुए प्राण जाते हैं। यह अदूरदर्शी प्राणी दुर्गति के शिकार बनते हैं। कर्मफल के अनिश्चित होने की बात सोच कर ही मनुष्य कुमार्ग पर चलते हैं- कुकर्म करते हैं और दुर्दशा के जंजाल में फँसते हैं।
भगवान ने संसार बनाया और उसके साथ साथ ही कर्म प्रतिफल का सुनिश्चित संविधान रच दिया। अपनी निज की लीलाओं में भी उसने इस लक्ष्य को प्रकट किया है। भगवान राम ने बालि को छिपकर तीर मारा, अगली बार कृष्ण बन कर जन्मे राम को उस बहेलिया के तीर का शिकार होना पड़ा, जो पिछले जन्म में बालि था। राम के पिता दशरथ ने श्रवण कुमार के तीर मारा, उसके पिता ने शाप दिया कि मेरे निर्दोष पुत्र को आहत करने वाले को मेरी तरह ही पुत्र शोक में बिलख बिलख कर मरना पड़ेगा। वैसा ही हुआ भी। राम अपने पिता की सहायता न कर सके और उन्हें कर्म का प्रतिफल भुगतना पड़ा।
चक्रव्यूह में फँस कर अभिमन्यु मारा गया, तो उसकी माता सुभद्रा ने अपने भाई कृष्ण से कहा, तुम तो अवतार थे तो फिर अपने भाँजे और अर्जुन सखा के पुत्र को क्यों नहीं बचाया। कृष्ण ने विस्तार पूर्वक कर्म फल की प्रबलता का वर्णन करते हुए सुभद्रा का समाधान किया कि भगवान से भी प्रारब्ध बड़ा है। कर्म फल भुगतने की विवशता हर किसी के लिए आवश्यक हैं।
कर्म फल की सुनिश्चितता का तथ्य ऐसा है, जिसे अकाट्य ही समझना चाहिए। किये हुए भले बुरे कर्म अपने परिणाम सुख-दुःख के रूप में प्रस्तुत करते रहते हैं। दुःखों से बचना हो तो दुष्कर्मों से पिण्ड छुड़ाना चाहिए, सुख पाने की अभिलाषा हो तो सत्कर्म बढ़ाने चाहिए। ईश्वर को प्रसन्न और रुष्ट करने का कार्य सत्कर्मों एवं दुष्कर्मों के आधार पर ही बन पड़ता है।
शारीरिक एवं मानसिक रोग दुष्कर्मों के फल स्वरूप ही सामने आते हैं। आधि दैविक, आधि भौतिक आध्यात्मिक संकट भी इन्हीं अनाचरणों के कारण उत्पन्न होते हैं। इन विपत्तियों से बचने का एक ही उपाय है कि वर्तमान गतिविधियों का सज्जनतापूर्ण निर्धारण किया जाय। भविष्य में दुष्कर्मों से विरत रहने का सुदृढ़ संकल्प किया और उसे निबाहा जाय। साथ ही भूत काल में जो कुकर्म बन पड़े हैं, उनका साहस पूर्वक प्रायश्चित किया जाय। उज्ज्वल भविष्य के निर्माण का यही कारगर उपाय है। शास्त्रों का अभिमत इस संदर्भ में स्पष्ट है।
यत् करोत्यशुँभ कर्म शुभ वा यदि सत्तम। अवश्यं तत् समाप्नोति पुरुषों नात्र संशयः-महाभारत
मनुष्य जो शुभ या अशुभ कार्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है।
ज्ञानोदयात् पुराअअरब्धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति। यदत्वा स्वफलं लक्ष्यमुदिश्यात्सृष्टवाणवत्-अक्ष्युपनिषद 2।53
ज्ञान का उदय हो जाने पर भी पूर्वकृत कर्मों के प्रारब्ध भोग तो भोगने ही पड़ते हैं। उनका नाश नहीं होता। धनुष से छूटा हुआ तीर प्रहार करता ही हैं।
आत्मापराधवृक्षस्यं फलान्योतानि देहिनाम्। दारिद्रयदुःखरोगानि बन्धनव्यसनानि च-चाणक्य
मनुष्यों को अपने अपराध रूपी वृक्ष के दरिद्रता, रोग, दुःख, बन्धन और विपत्ति आदि फल मिलते हैं।
उभयमेव तत्रोपयुज्यते फलं धर्मस्यैवेतरस्य च-महाभारत उद्योग पर्व॥23॥
राजन्! धर्म और पाप दोनों के पृथक् पृथक् फल होते हैं और उन दोनों का ही उपभोग करना पड़ता है।
आचराल्लभते ह्मायुराचारादीप्सिताः प्रजाः। आचाराद्धनमक्षययमाचारो हन्त्यलक्षणम्॥
दुराचारो हि पुरुषों लोके भवति निन्दितः। दुःखभागी च सततं व्याधितोअल्पायुरेव च-मनु 4।156 से 157
श्रेष्ठ आचरण का जीवन जीने वाला दीर्घजीवी होता है। श्रेष्ठ सन्तान पाता और सम्पन्नता प्राप्त करता है। बुरों को भी सुधार देता है।
दुराचारी निन्दित होता है। दुःख भोगता है। अल्पजीवी होता है। रोगी रहता है।
पुण्यापुण्येहिपुरुषः पर्यायेणसमश्नुते। भुँजतश्चक्षययातिपापंपुण्यमथापिवा॥16॥
नतुभोगाहतेपुण्यपापंवाकर्ममानवः। परित्यजति भोगाच्चपुण्य पुण्येनिबोधमे॥17॥
दुर्भिक्षादेवदुर्भिक्षक्लेशात्वलेशंभयाद्भयम्। मृतेभ्यः प्रमृतायान्तिदरिद्राः पापकर्मिणः॥18॥
गतिंनानाविधाँयान्तिजन्तवःकर्मबन्धनात्-उत्सवादुत्सवयान्तिस्वंगन्स्त्रर्गसुखात्सुखम्-मार्कण्डेय पुराण (कर्मफल)
अपने किये हुए पाप अथवा पुण्य के फल मनुष्यों को भोगने ही पड़ते हैं। भोगने से ही कर्मफल भुगता जाता है। भोगे बिना कोई रास्ता नहीं, भोगे बिना शुद्धि नहीं होती और तभी कर्म बन्धन से छुटकारा मिलता है।
जो पापी हैं वे दरिद्र हैं। क्लेश, भय और संकट, संतापों से घिरे रहते हैं और बेमौत मरते हैं। पुण्यात्माओं के उनके शुभ कर्मों के सत्परिणाम अनेक सुख साधनों के रूप में उपस्थित होते रहते हैं।
आधिक्षयेणाविभवाः क्षीयन्ते व्याधयोअप्यलम् शुद्धया पुण्यया साधो क्रियया साधुसेवया॥
मनः प्रयाति नैर्मल्यं निकषेणेव काँचनम्। आनन्दो वर्धते देहे शुद्धे चेतसि राधवः॥
सत्वशुद्धया वहन्त्येते क्रमेण प्राणवायवः। जरयन्ति तथान्नानि व्याधिस्तेन विनश्यति-योग वशिष्ठ
शरीर के रोग व्याधि और मन के रोग ‘आधि’ कहलाते हैं। इन दोनों के उत्पन्न होने का कारण विवेक की कमी और मूर्खता की प्रबलता ही है।
जब अविवेक के कारण मनुष्य का मन बेकाबू हो जाता है तो नाना प्रकार की तीव्र वासनाएँ उठती हैं। उन्हें पूरा करने के लिये अखाद्य-खाता है, अगम्य गमन (अनुचित काम सेवन) करता है। अनियमितता और अस्तव्यस्तता बरतता है, दुष्ट संग करता है और मस्तिष्क में बुरे विचार भरे रहता है।
इससे उसकी नाड़ियाँ शिथिल हो जाती है, अंग काम करना छोड़ देते हैं। प्राण शक्ति का संचार अस्त−व्यस्त हो जाता है। इन परिस्थितियों में शरीर की स्थिति गड़बड़ा जाती है और नाना प्रकार के दुःखदायक रोग उत्पन्न होते हैं।
मानसिक विकारों से शरीर रुग्ण होता है। उन विकारों के दूर होने से शरीर निरोग हो जाता है।
पादन्यासकृतंदुःखंकण्टकोत्थंप्रयच्छति। तत्प्रभूततरस्थूलशकुकीलकसम्भवम्॥25॥
दुःखंयच्छतितद्वच्चशिरोरोगादिदुःसहम्-अपथ्याशनशीतोष्णश्रमतापादिकारकम्-मार्कण्डेय पुराण (कर्मफल)
पैर में काँटा लगने पर तो एक ही जगह पीड़ा होती है। पर पाप कर्मों के फल से तो शरीर और मन में निरन्तर शूल उत्पन्न होते रहते हैं।
न केचित्प्राणिनः सन्ति ये न यान्ति यमक्षयम्। अवश्यं हि कृतं कर्म भोक्तव्यं तद्विचायर्यताम् -शिव पुराण
अपना किया हुआ कर्म सभी को अवश्य ही भोगना पड़ता है। इसलिये ऐसे कोई भी प्राणी नहीं है जो यमराज के लोक को नहीं जाते हैं। शुभ अशुभ कर्मों का निर्णय वहाँ पर ही होता है।
यावंतो जंतवः स्वर्गे तावंतो नरकौक्रसः। पापकृद्याति नरकं प्रायश्चितपरागमुखः॥
गुरुणि गुरुभिश्चैव लघूनि लघुभिस्तथा। प्रायश्चितानि ह्नयन्येच मनुः स्वायम्भुवोअव्रवीत् -शिव पुराण
जो मनुष्य अपने किये हुए दुष्कर्मों का कोई भी प्रायश्चित शास्त्रानुसार नहीं किया करते हैं वे ही पापात्मा प्राणी नरक में जाया करते हैं। स्वयंभू मनु ने तथा अन्य महर्षियों ने भी बड़े पापों के बड़े प्रायश्चित और छोटे छोटे पाप कर्मों के छोटे प्रायश्चित बतलाते हैं।
पश्चातापः पापकृताँ निष्कृतिः परा। सर्वेषाँ वर्णित सद्भिः सर्वपापविशोधनम्। पश्चातापेनैव शुद्धिः सर्वपापविशोधनम्॥
प्रायश्चितमंधीकृत्य विविधवन्निर्भयः पुमान्। सं याति सुगति प्रायः पश्चात्तापी न संशयः -शिवपुराण
पश्चाताप ही पापों की परम निष्कृति है। विद्वज्जनों ने पश्चाताप से सब प्रकार के पापों की शुद्धि होना कथन किया है। पश्चाताप करने से जिसके पापों का शोधन न हो, उसे प्रायश्चित करना चाहिए। विद्वानों ने इससे सब पापों का शोधन होना कहा है। विधिपूर्वक अनेक प्रकार के प्रायश्चित करने पर भी मनुष्य भय रहित नहीं हो पाता। परन्तु पश्चाताप करने वाले को सुगति की प्राप्ति होती है।
विकर्मणा तप्यमानः पापाट् विपरिमुच्यते। न तद् कुर्या पुनरिति द्वितीयत् परिमुच्यते -महाभारत वन पर्व
जो मनुष्य पापकर्म बन जाने पर सच्चे हृदय से पश्चाताप करता है, वह उस पाप से छूट जाता है, तथा ‘फिर कभी ऐसा कर्म नहीं करूँगा ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेने पर वह भविष्य में होने वाले दूसरे पाप से भी बच जाता है।
शातातपस्मृति में प्रायश्चित्त की आवश्यकता एवं अनिवार्यता का प्रतिपादन इस प्रकार किया हैं-
प्रायश्चित विहीनानाँ महापातकिनाँ नृणाम्। नरकान्ते भवेज्जनम चिन्हाडिंकतशरीरिणाम्॥
पूर्वजन्मकृतं पापं नरकस्य परिक्षये। बाधते व्याधिरुपेण तस्य जप्यादिभिः शमः॥
कुष्ठश्च राजयक्ष्मा च प्रमेहो ग्रहणा तथा। मूत्रकृच्छ्राश्मरीकासा अतीसारभगन्दरौ॥
दुष्टब्रण गण्डमाला पक्षाघातोअक्षिनाशनम्। इत्येवमादयो रोगा महापापोद्भवाः स्मृताः॥
किये हुए पापों के प्रायश्चित न करने वाले, चिन्ह विशेष से अंकित शरीर वाले महान पातक करने वाले मनुष्यों का जन्म नरकान्त में होता है। पूर्व जन्म में किया हुआ पाप नरक के परिक्षय होने जाने पर मनुष्यों को किसी व्याधि के रूप में उत्पन्न होकर सताता है और उसका उपशमन जपादि द्वारा होता है। कुष्ठ, राजयक्ष्मा, प्रमेह, संग्रहणी, मूत्रकृच्छ, पथरी, अतिसार, भगन्दर, दुष्ट व्रण, गण्डमाला, पक्षाघात और नेत्रहीनता इत्यादि रोग महापातकों के कारण ही होते हैं।
जलोदर यकृत् प्लीहा शूलरोगव्रणानि च। श्वासाजीर्णज्वरच्छर्दिभ्रममोहगलग्रहाः॥
रक्तार्वु द विसपद्या उपापापोद्भवा गदाः। दण्डापतानकश्चित्रवपुः कम्पावचर्चिकाः। वाल्मीकपुण्डरीकाद्या रोगाः पापसमुद्भवाः॥
अर्शआद्या नृणाँ रोगा अतिपापाद्भवन्ति हि। अन्ये च बहवों रोगा जायन्ते वर्णसंकराः॥
उच्यन्ते च निरदातानिप्रायश्चितानि वे क्रमात् -शातातपस्मृति 1 से 10
पापों का प्रायश्चित न करने वाले मनुष्य नरक को तो जाते ही हैं अगले जन्मों में उनके शरीरों में उन पापों के चिन्ह भी प्रकट होते हैं।
प्रायश्चित न किया जाय तो अनेकों जन्मों तक वे पाप चिन्ह प्रकट होते हैं। उसका निवारण प्रायश्चित करने पर ही होता है।
महा पापों के चिन्ह सात जन्मों तक, मध्यम पापों के चिन्ह पाँच जन्मों तक, छोटे पापों के चिन्ह तीन जन्मों तक रहते हैं।
दुष्कर्मों से उत्पन्न प्रारब्ध जन्म रोग प्रायश्चित, जप, पूजन, होम, दान आदि से शान्त हो जाते हैं।
कष्ट, राजक्षया, प्रमेह, संग्रहणी, मूत्र कच्छ, पथरी, श्वाँस, भगन्दर, नासूर, गण्ड माला, पक्षाघात, अन्धता जैसे भयंकर रोग महापातकों के फलस्वरूप होते हैं।
जलोदर, तिल्ली, यकृत, शूल, व्रण, श्वास, अजीर्ण, ज्वर, जुकाम, भ्रम, मोह, जलग्रह, रक्तार्बुर विसर्य आदि रोग उप पातकों मध्य पातकों के कारण होते हैं।
दण्ड पतानक, चित्रबपु, कम्प विशूचिंका, पुण्डरीक आदि रोग सामान्य पापों के कारण होते हैं। इनके अतिरिक्त सम्मिश्रित रोग भी होते हैं।
यकृत्वा विहितं कर्म्म कृत्वा निन्दितमेव च। दोषमाप्नोति पुरुषः प्रायश्चतं विशोधनम्॥
प्रायश्चितमकृत्वा तु न तिष्ठेट् ब्राह्मणः क्वचित् यद्ब्रूयुब्रह्मिणाः शान्ताः विद्वाँसस्तत्समाचरेत्-कूर्म पुराण
निन्दित हेय कुकर्म करने पर मनुष्य को पाप लगता है। उनका शोधन प्रायश्चित द्वारा करना चाहिए।
श्रेष्ठ विद्वान् और तपस्वी ब्रह्मवेत्ताओं से प्रायश्चित पूछना चाहिए और तदनुसार व्यवस्था करनी चाहिए।
मनुष्य के किये हुए दुष्कर्म ही साँसारिक सुख और आत्मिक प्रगति में प्रमुख बाधा बनकर खड़े रहते हैं। पैर में काँटा लग जाने पर- सारे शरीर को कष्ट होता है और नींद नहीं आती। जब तक उसे निकाल बाहर न किया जाय तब तक चैन नहीं पड़ता। विषैला पदार्थ खा लेने पर पेट में जलन होती है, भारी कष्ट होता है और मृत्यु संकट सामने आ खड़ा होता है। वमन विरेचन द्वारा उसे जब तक बाहर न निकाल दिया जाय तब तक वह संकट दूर नहीं होता। आँख में तिनका और कान में मच्छर घुस जाय तो बेचैनी उत्पन्न होगी और वह तब तक बनी ही रहेगी, जब तक कि उन्हें निकाल न दिया जाय। पाप कृत्यों के बारे में भी यहीं बात है। वे बन पड़े हों तो उन्हें प्रायश्चित के द्वारा निकाल बाहर करना ही एक मात्र उपाय है।
प्रमुख प्रश्न उन दुष्कर्मों का है जो भूतकाल में बन पड़े है और जिनके लिए आत्मा प्रताड़ना ही शारीरिक, मानसिक रोगों को उत्पन्न करती रहती है। उसी उद्विग्नता में मन चंचल बना रहता है। न उपासना में लगता है न सत्कर्मों में। इस काँटे को निकालना ही चाहिए। भोजन के साथ मक्खी पेट में चली गई हो तो उलटी कर देना ही एकमात्र उपाय है। भूतकाल में बने पड़ें पापों का प्रायश्चित करके ही उनका शमन समाधान किया जा सकता है।
प्रायश्चित का अर्थ है-स्वेच्छापूर्वक दण्ड भुगतना। इसके लिए तैयार हो जाने से यह सिद्ध होता है कि अपराधी को सच्ची सद्बुद्धि उपजी है, उसे वस्तुतः अपनी भूल पर दुःख है। जो किया है उसका दण्ड बहादुरी से भुगतने की तैयारी है। ऐसा बहादुर ही भविष्य में वैसा न करने की प्रतिज्ञा को निभा सकता है। जिसमें इतना साहस नहीं है। मात्र शब्दाडम्बर से ही अपना बचाव चाहता है उसकी सचाई सर्वथा संदिग्ध है। प्रत्याक्रमण से-प्रतिरोध से बचने के लिए कई लोग गिड़गिड़ाते माफी माँगते देखे जाते हैं। नम्रता के शब्द भर कह देने से क्रुद्ध और दुःखित व्यक्ति को शाँत कर देने-आत्मा और परमात्मा को बहका देने की नीति चतुरता पूर्ण तो है, पर उसमें भविष्य के सुधार का कोई विश्वस्त आश्वासन नहीं है। माफी माँगने के साथ साथ भविष्य में न करने की बात आमतौर से जीभ द्वारा कह दी जाती है, पर उसमें गहराई का पुट तभी माना जा सकता है जब पश्चाताप के साथ प्रायश्चित भी जुड़ा हुआ हो। इसके बिना क्षमा याचना का कोई महत्व नहीं रह जाता वह अपराधी का एक और नये रंग रूप का छल भर कहा जाएगा ।
भारतीय संस्कृति में दुष्कर्मों के प्रायश्चित का विधान है। स्वयं दण्ड भुगतने के लिए तैयार होना एक सत्साहस हैं। उसमें व्यक्ति की सचाई और साहसिकता टपकती है। ईश्वर से क्षमा, प्रार्थना करने-किसी नदी, सरोवर से नहाने-देव दर्शन-व्रत उपवास, छुटपुट दान पुण्य के कर्मकाण्डों से अपराधी वृत्ति के मुड़ने बदलने की सम्भावना भर प्रकट होती है। इतने भर से वे गाठें नहीं खुल जातीं जो दुष्कर्मों के फलस्वरूप अंतःक्षेत्र में कैन्सर नासूर के फोड़ों की तरह जड़ जमा कर बैठ गई हैं। इन्हें उखाड़ने के लिए कड़े और गहरे आपरेशन की जरूरत पड़ती है। ग्रह सब उतना ही वजनदार होना चाहिए जितना कि किया गया दुष्कर्म भारी था।
प्रायश्चित के चार चरण हैं-
(1) जीवन भर के दुष्कर्मों की सूची बनाकर उनके द्वारा दूसरों को पहुँची हानि का स्वरूप समझना।
(2) दुष्कर्मों का चिन्तन कर आत्म विश्लेषण करना, उन्हें न दोहराने का संकल्प एवं विज्ञजनों के समक्ष उनका प्रकटीकरण करते हुए प्रायश्चित का संकल्प लेना।
(3) पश्चाताप के प्रतीक रूप में व्रत, उपवास, जप, अनुष्ठान आदि प्रायश्चित कृत्य करना ।
(4) व्यक्ति अथवा समाज को जो हानि पहुँची हो उसकी क्षति पूर्ति करने के लिए यथासम्भव अधिकतम प्रयत्न करना।
यह चारों चरण मिला देने से ही प्रायश्चित का एक समग्र स्वरूप बनता है। इनमें से बातें पूरी कर लेना और भरी से कन्नी काटना इस बात का प्रमाण नहीं कि अपराधी को अपनी भूल पर वस्तुतः दुःख है और वह उसके निराकरण के लिए वस्तुतः इच्छुक है। चतुरता हर क्षेत्र में बरती जाती है। प्रायश्चित के नाम पर भी यत्किंचित् चिन्ह पूजा करके ऐसे ही बला टाली जा रही हो तो भर से बात कुछ बनने वाली नहीं है। अन्तः करण में दबे हुए अनौचित्य को उखाड़ने के लिए प्रायश्चित भी वजनदार होना चाहिए।
इन चारों चरणों का अधिक स्पष्टीकरण यह है कि पाप कर्म इसलिए बनते और बढ़ते रहते हैं कि कर्ता उनके द्वारा होने वाली हानियों पर ध्यान नहीं देता। उन्हें अन्य लोगों द्वारा
भी अपनाई जाने वाली सामान्य क्रिया-प्रक्रिया मान लेता है और ऐसे ही हलके मन से उन्हें करता चला जाता है । बाद में वे अभ्यास बन जाते हैं । धन, अधिकार, आतंक, उपयोग जैसे कई लाभ मिलने लगते हैं तो उनका आकर्षण और भी अधिक बढ़ जाता है। पीछे वह आदत, स्वभाव का अंग बन जाती है और बाहर वालों के समझाने, बुझाने एवं डाँट-डपटने से भी नहीं छूटती। कुमार्ग से विरत होने का एक ही मार्ग है कि उस मार्ग पर चलने वाले को उसकी हानियाँ स्वयं दृष्टिगोचर हों और प्रतीत हो कि इस दिशा में चलकर वह अब तक अपना तथा दूसरों का कितना अहितकर चुका । गतिविधियाँ जारी रहीं तो और भी कितनी हानि हो सकती है।
दुष्कर्मों, दुष्प्रवृत्तियों और दुर्भावनाओं से दूसरों का अहित और अपना हित होने की बात सोची जाती है, पर वस्तुस्थिति इसके सर्वथा विपरीत है। कुमार्ग की कँटीली राह पर चलने से अपने ही पैर काँटों से विंधते हैं, अपने ही अंग छीलते और कपड़े फटते हैं। झाड़ियों को भी कुछ हानि तो होगी, पर इससे क्या? घाटे में तो अपने को ही रहना पड़ता। अपना मस्तिष्क विकृत होने से प्रगति के रचनात्मक कार्यों में लग सकने वाली शक्ति नष्ट हुई। अनावश्यक गर्मी बढ़ाने से यह बहुमूल्य यन्त्र विकृत मनःस्थिति गड़बड़ाने से क्रिया कलाप उलटे हुए और विपरीत परिस्थितियों की बाढ़ आ गई। हर दृष्टि से यह अपना ही अहित है। अस्तु बुद्धिमत्ता इसी में है कि सन्मार्ग पर चला जाय, सत्प्रवृत्तियों को अपनाया जाय और अन्तःकरण को सद्भावनाओं से भरा पूरा रखा जाय।
इस के चिन्तन से ही वह विरोधी प्रतिक्रिया उत्पन्न हो सकती है जिसके कारण दुष्कर्मों के प्रति भीतर से घृणा उपजती है, पश्चाताप होता है। यह घृणा और पछतावा ही वे आधार हैं जिनके सहारे भविष्य में वैसा न होने की आशा की जा सकती है। अन्यथा कारणवश उपजा सदाचरण का उत्साह, श्मशान वैराग्य की तरह ठण्डा हो जाएगा और फिर उसी पुराने ढर्रे पर गाड़ी के पहिये लुढ़कने लगेंगे। प्रथम चरण पश्चाताप की उपयोगिता इसी दृष्टि से है कि अन्तःकरण में अनाचार विरोधी प्रतिक्रिया इतने उग्र रूप से उभरे कि भविष्य में उस प्रकार के आचरण की गुँजाइश ही शेष न रह जाय।
दूसरा चरण मन की गाठें खोल देने का है। इसमें दूसरों का नहीं अपना ही लाभ है। अनैतिक दुराव के कारण मन को भीतरी परतों में एक विशेष प्रकार की मनोवैज्ञानिक ग्रन्थियाँ बनती हैं। उनके कारण केवल शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोग भी उठ खड़े होते हैं। यह प्रकृति निर्मित-स्वसंचालित दण्ड व्यवस्था है जिसके कारण अपना आपा ही न्यायाधीश बनकर अनाचार के दुष्परिणाम प्रस्तुत करता रहता है। यह ग्रन्थियाँ व्यक्तित्व को बुरी तरह लड़खड़ा देती हैं। उसे विकृत, बेढंगा, बेहूदा और बेसिलसिले का बना देती हैं। ऐसा व्यक्ति कुढ़ता कुढ़ाता, खीजता खिजाता देखा जाता हैं- हंसने हंसाने का सहयोग देने, पाने की उसकी स्थिति ही नहीं रह जाती। यदि इस स्थिति से छुटकारा न मिले तो अर्ध विक्षिप्त, अर्ध मृतक, अर्धांगग्रसित रोगी की तरह गया-गुजरा-उपहासास्पद तिरस्कृत जीवन बिताना पड़ता है। विकसित व्यक्तित्व का लाभ यदि समझा जा सके तो उसका मूल्य चुकाने की भी तैयारी करनी चाहिए। खुला ‘मन, स्वच्छ मन, निष्कपट मन, दुराव रहित मन ही व्यक्तित्व को गौरवान्वित स्थिति तक पहुँचाने में समर्थ हो सकता है।
मानसोपचार में रोगी अब तक के जीवन के सामान्य जीवन-क्रम को विस्तारपूर्वक सुनाने के लिए कहा जाता है। चिकित्सक उन संस्मरणों को रुचिपूर्वक सुनता जाता है। उस प्रसंग में उन घटनाओं की भी चर्चा हो जाती है। जितने अचेतन मन पर कोई अवांछनीय छाप डाली और मानसिक स्तर लड़खड़ा गया। मन में चुभा वह काँटा यदि निकल गया तो वह विक्षिप्त व्यक्ति स्वयमेव अच्छा होने लगता है और कष्ट कट जाता है। शरीर में विष का प्रवेश हो जाय तो उसे किसी न किसी उपाय से निकाल बाहर करना ही प्राण रक्षा का एकमात्र उपाय होता है। ठीक उसी प्रकार अनैतिक दुराव की ग्रन्थियों को निकाल बाहर करने से ही वह मनः स्थिति प्राप्त होती हैं जो सुविकसित जीवन-क्रम बनाने के लिए नितान्त आवश्यक है। इस दृष्टि से उन दुरावों को प्रकट करना आवश्यक है।
असत्य को सबसे बड़ा पाप माना गया है। कपट और छल-छिद्र को रामायण में अध्यात्म मार्ग का सबसे बड़ा अवरोध और ईश्वर विरोधी विग्रह माना गया है। व्यभिचार में यों हत्या, अपहरण जैसा कोई अत्याचार नहीं हैं, पर चूँकि उसमें दुराव अपनाना पड़ता है ,अस्तु उतने भर से अतीव हानिकारक परिस्थितियाँ बन जाती हैं और अनिष्टकारक प्रतिक्रियाएँ होने लगती हैं। असत्य के कई विशेष प्रसंगों की अपवाद रूप से समय की आवश्यकता के रूप में अपनाना पड़ता है। किन्तु सामान्यतया उसे इसी कारण पाप ठहराया गया है कि उसमें दुराव का भयंकर दोष छिपा हुआ है और इस कारण विकृतियों की अवांछनीय शृंखला ही चल पड़ती है।
अनैतिक दुरावों के प्रकटीकरण में यह खतरा भी है कि ओछे व्यक्ति उन जानकारियों का अनुचित प्रयोग कहने वाले की बदनामी करने तथा हानि पहुँचाने के लिए कर सकते हैं। अस्तु निस्संदेह उस प्रकटीकरण के लिए ऐसे सत्पात्रों को ही चुनना चाहिए जिनकी उदारता एवं दूरदर्शिता असंदिग्ध हो। चिकित्सक के आगे रोगी को अपने यौन रोगों की वस्तुस्थिति बताती पड़ती है। उदार चिकित्सक उन कारणों को प्रकट करते नहीं फिरते जिनकी वजह से वह रोग उत्पन्न हुए। उनका दृष्टिकोण रोगी की कष्ट निवृत्ति भर होता है। ऐसे ही उदार चेता एवं उपयुक्त मार्ग दर्शन कर सकने में समर्थ व्यक्ति ही इस योग्य होते हैं जिनके सामने अपने मन को दुराव ग्रन्थियाँ खोली जा सकें। हर किसी के सामने इस प्रकार के वर्णन करते फिरने में और भी उलटी और नई झंझट भरी परिस्थितियाँ उठ खड़ी होने की सम्भावना रहती है। अस्तु इस संदर्भ में जहाँ रोगी और चिकित्सक की स्थिति हो वहीं प्रकटीकरण की बात सोचनी चाहिए।
ईसाई धर्म में प्रवेश करने वाले को ‘बपतिस्मा’ लेना पड़ता है। उस संस्कार के समय मनुष्य को अब तक के अपने पाप पादरी के सम्मुख एकान्त में कहने होते हैं। उस धर्म में मृत्यु के समय भी यही करने की धर्म परम्परा है। मरणासन्न के पास पादरी पहुँचता है। उस समय अन्य सब लोग चले जाते हैं। मात्र पादरी और रोगी ही रहते हैं। वह व्यक्ति अपने पापों को पादरी के सामने प्रकट करता है। इस प्रकार उसके मान पर चढ़ भार हल्का हो जाता है। पादरी शान्ति सद्गति की प्रार्थना करता है और रोगी को आश्वस्त करके महा प्रयाण के लिए विदा करता है। बपतिस्मा और मरण काल में इस स्वीकारोक्ति को-कन्फैशन को अत्यन्त पवित्र और आवश्यक माना गया है। मनःशास्त्र के अनुसार यह प्रथा नितान्त श्रेयस्कर ठहराई गई है।
प्रायश्चित में प्रकटीकरण को एक अति महत्वपूर्ण अंग माना गया है। अनैतिक कृत्यों के दुराव को कभी किसी के सामने प्रकट न किया जाय तो मनःक्षेत्र में वह उर्वरता उत्पन्न न हो सकेंगी जिसमें आध्यात्मिक सद्गुणों का अभिवर्धन सम्भव होता है।
प्रायश्चित का तीसरा चरण है-दण्ड स्वरूप ऐसे अपने ऊपर दबाव डालना जिनकी स्मृति देर तक बनी रहे और उस परिवर्तन की छाप को अन्तःचेतना गहराई तक धारण कर ले। बच्चे को कभी-कभी अधिक गड़बड़ी फैलाने पर अभिभावक हल्की चपत जड़ देते हैं या दूसरे प्रकार से धमका देते हैं। उससे बच्चे पर सामान्य समझाने-बुझाने की अपेक्षा अधिक गहरा असर पड़ता है और वह सीख जाता है कि इस प्रकार की गड़बड़ी पर अभिभावक कितने अधिक रुष्ट होते हैं। इस दृष्टि से वह धमकाना थोड़ा कष्टकर होने पर भी परिणाम की दृष्टि से श्रेयस्कर होता है। उससे गड़बड़ी के दुहराये जाने की सम्भावना घटती है।
स्कूलों में भी बच्चों को पैसे का जुर्माना, खड़ा कर देना, परीक्षा से रोक लेना आदि दण्ड दिये जाते हैं ताकि उनकी अनुचित गतिविधियों को रोका जा सके । जेल में जो कैदी गड़बड़ी करते हैं उन्हें बेड़ी, खड़ी हथकड़ी, कड़ा परिश्रम, तनहाई , छूटने में मिलने वाले समय की रिआयत को काट लेना आदि कई तरह के सामयिक दण्ड मिलते हैं। इसका उद्देश्य इतना भर होता है कि जेल व्यवस्था तोड़ने पर अधिकारी वर्ग रुष्ट हैं और दण्ड देने पर उतारू हैं। इससे कैदी के मन पर छाप पड़ती है और भविष्य में उस गलती को दुहराने से डरता है। प्रायश्चित रूप में अपने आपको दण्ड देने में यह पद्धति तप-तितीक्षा के नाम से विनिर्मित की गई है।
व्रत, उपवासों में कई तरह के विधि-विधान हैं। चांद्रायण, कृच्छ चांद्रायण आदि का विशेष रूप से उल्लेख है और भी कई हलके-भारी व्रत-उपवास अस्वाद, आहार, एक समय खाना आदि की विधि-व्यवस्थाएँ मिलती हैं। पैदल तीर्थयात्रा, परिक्रमा इसी प्रकार है जैसे पुलिस फौज में अपराधी सिपाहियों को दौड़ने की ‘दलील’ कराई जाती है। सर्दी-गर्मी का सहना, कम वस्त्र पहनना, नंगे पैर रहना, भूमिशयन, मौन धारण, रात्रि जागरण, खड़े रहना, आदि कितने ही विधानों का शास्त्र में उल्लेख मिलता है। जप, अनुष्ठान, पाठ आदि भी इस संदर्भ में कराये जाते हैं । इन सब में थोड़ी-सी शारीरिक एवं मानसिक कठिनाई सहन करनी पड़ती है। इससे अनीति आचरण के दुष्परिणाम और छोड़ देने के लिए किये संकल्प का ध्यान भविष्य में भी बना रहता है। यह अन्तः चेतना पर परिवर्तन की छाप छोड़ने का अच्छा उपाय है। इसलिए इस तीसरे चरण को प्रायश्चित विधान में समुचित स्थान दिया गया है।
चौथा चरण सबसे महत्वपूर्ण और आवश्यक हैं। प्रथम तीन चरणों को उसका भूमिका माना जा सकता है। असली और प्रभावशाली बात है- क्षति पूर्ति । जो हानि पहुँचाई गई है उसकी पूर्ति होनी चाहिए। सड़क पर गड्ढा खोदकर यदि दूसरों के लिए उसमें गिरने का कष्ट कारक आचरण किया गया है तो उसकी क्षति पूर्ति इसी प्रकार होगी कि जितना श्रम गड्ढा खोदने में किया जाय। गड्ढा पट जाने पर ही उस अनाचार की भरपाई होगी, जिसके कारण अनर्थ होता रहा। विघातक कृत्य के वजन का विधेयात्मक कार्य करने पर ही सन्तुलन बनता है और क्षति पूर्ति सम्भव होती है। पाप के वजन के बराबर पुण्य करने पर तराजू के पलड़े बराबर होते हैं।
हमारी भावी रीति नीति सज्जनता युक्त होनी चाहिए। इन दिनों मनःक्षेत्र में जो दोष, दुर्गुण भरें हों, उन्हें भविष्य में चरितार्थ न होने देने का निश्चय करना चाहिए। सज्जनता ही हर दृष्टि से लाभदायक नीति है। यदि अनाचार से लड़ना पड़े तो उसे बहादुरी से उस धर्म युद्ध में उतरा जाय, पर उस मोर्चे पर भी शालीनता को हाथ से न जाने दिया जाय। द्वेष के स्थान पर सुधार को लक्ष्य कर कुमार्गगामियों से लड़ा जा सकता है। उसमें अनीति का प्रतिकार भी हो जाएगा और द्वेष की लपट से अपने आपको जलाने की-प्रतिपक्षी की अपेक्षा अपने को ही अधिक हानि पहुँचाने वालो विपत्ति भी सिर पर न बरसने पायेगी। आत्म-रक्षा की आवश्यकता समझी गई हो तो सबसे पहले भीतर घुसे दुर्भावों से और व्यवहार में आने वाले दुष्कर्मों से अपना पिण्ड छुड़ाना चाहिए।
सरकारी खजाने की कोई खजांची रकम लेकर भागे। पीछे वह अपनी भूल स्वीकार करे और प्रायश्चित करना चाहे तो उसे पहला कदम यही उठाना पड़ेगा कि जो रकम उड़ाई गई थी, उसमें से जितना कुछ बचा हो उसे तो तत्काल वापिस जमा करा दिया जाय और शेष के लिए किश्तों में धीरे-धीरे चुका देने की पेशकश की जाय तो समझौता होने की-मुकदमा न चलने और जेल न भुगतने की सम्भावना बन सकती है। जो रकम हड़पी भी गई थी उसे डकार लिया जाय और ऐसे ही व्रत, उपवास करके क्षमा याचना करके दण्ड से छुटकारा पा लिया जाय ऐसा नहीं हो सकता।
प्रायश्चितों के साथ दान पुण्य के विधान जुड़े रहते हैं। इसमें धन दान और श्रमदान दोनों की ही व्यवस्था है। क्षति पूर्ति इसी रूप में ही दो पहलू हैं। क्षति पूर्ति के लिए एक का या दोनों का प्रयोग किया जा सकता है। क्षति यदि शारीरिक, मानसिक की गई है तो आवश्यक नहीं कि उसी रूप में उसे पूरा किया जाय। धन के रूप में भी उसे चुकाया जा सकता है। कारखानों में, दुर्घटनाओं में किसी का अंग भंग हो जाने पर उसकी क्षति पूर्ति मुआवजे का धन दिलाकर कराई जाती है। मान हानि के मुकदमों में बदले में मानहानि नहीं कराई जाती, वरन् अपराधी से कहा जाता है कि वह धन देकर क्षति पूर्ति करे।
यदि धन न हो तो श्रम देकर उसकी पूर्ति हो सकती है। जुर्माना न दे सकने वाले अपराधी को अमुक समय तक जेल में रहकर समाज की क्षति पूर्ति करनी पड़ती है। अपराध व्यक्ति विशेष के साथ किसी संस्थान के साथ हुआ, पर सरकार उसका जुर्माना वसूल करती है। कारण स्पष्ट है। सरकार समाज की प्रतिनिधि है। व्यक्ति विशेष के साथ हुए अपराध भी प्रकारान्तर से समाज के साथ बरता गया अनाचार ही है। अस्तु समाज को अधिकार है कि वह अपने किसी घटक के साथ बरती गई अनीति का प्रतिशोध ले और शासन तन्त्र के माध्यम से उसे दंडित करे।
आवश्यक नहीं कि जिस व्यक्ति को जिस तरह हानि पहुँचाई गई हो उसकी, उसी रूप में पूर्ति की जाय। बहुत बार वैसा सम्भव ही नहीं रहता। यौन सदाचार नष्ट करने पर उसकी क्षति पूर्ति ठीक उसी रूप में सम्भव नहीं हो सकती। जो व्यक्ति मर गये हैं या अविज्ञात स्थान को चले गये हैं उनका उसी रूप में कैसे बदला चुकाया जाय? यहाँ यही मानकर चलना होता है कि सारा समाज एक हैं। व्यक्ति उसी के घटक हैं। शरीर के एक अंग के साथ किया गया दुर्व्यवहार समूचे शरीर को कष्ट पहुँचाता है। गाल पर चपत मार देने से मात्र गाल को ही कष्ट नहीं हुआ, समूचे व्यक्ति का अपमान है। ठीक इसी प्रकार व्यक्ति विशेष के साथ किये गये दुर्व्यवहार को पूरे समाज की क्षति माना जा सकता है और उसका बदला समाज सेवा के रूप में चुकाया जा सकता है। फैलाई गई दुष्प्रवृत्तियों की भरपाई के लिए आवश्यक है कि उतने ही परिमाण में सत्प्रवृत्तियाँ फैलाने वाले लोक मंगल के कार्य किये जाय। इस प्रयोजन में धन एवं श्रम का अधिकाधिक उपयोग करना चाहिए। यदि हानि पहुँचाने के बदले उससे अधिक वजन के सेवा कार्य किये गये तो इसमें भी लाभ ही लाभ है। पुण्य की बढ़ी हुई मात्रा अपने लिए उज्ज्वल भविष्य का आधार बनेगी। चिन्ता तो तब होनी चाहिए जब पाप की तुलना में पुण्य कम परिमाण में बन पड़ रहा हो।
यहाँ यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि पाप तो बहुत भारी किये हैं उनके बदले में उतना पुण्य तो बन नहीं पड़ेगा। इसलिए थोड़ा करने से क्या लाभ? तब न करना ही ठीक हैं। हमें सोचना चाहिए कि जितना चुक सके उतना चुकाने के लिए तो पूरी ईमानदारी और पूरी शक्ति के साथ प्रयत्न किया ही जाय। यदि वस्तुतः विवशता ही होगी तो परमेश्वर परिस्थितियों को समझते हैं वे भावना के अनुरूप निर्वाह भी कर सकते हैं। दिवालिये से एक अंश लेकर ही ऋण देने वाले उसका छुटकारा कर देते हैं। बैंकें भी अपनी पूँजी डूबती देखकर कर्जदार से समझौता करती हैं और कम लेकर भी झगड़ा समाप्त कर लेती हैं। साहूकार जब देखते थे कि आसामी के पास कुछ नहीं है तो जितना वह दे सके लेकर छुटकारा लिख देते थे ताकि भविष्य के लिए लेन देन फिर शुरू हो सके। ऐसी व्यवस्था भगवान के यहाँ तथा समाज के विधान में भी है। यदि प्रायश्चित की क्षति पूर्ति के लिए सच्ची व्याकुलता है और ईमानदारी के साथ शक्ति भर प्रयास किया गया है तो उस सद्भावना की यथार्थता को परखते हुए विधि विधान में भी इतनी लोच लचक विद्यमान है कि उतने भर से पाप कृत्यों का समाधान हो सके और अन्तःकरण के परिमार्जन का वह लाभ मिल सके जो प्रायश्चित विधान का मूलभूत उद्देश्य है।
हमारे स्वजन सम्बन्धियों के द्वारा कई प्रकार के परामर्श आदि दिये जाते रहते हैं। इनमें से किन्हें स्वीकार करें-किन्हें अस्वीकार, इसका निर्णय प्रायः करते नहीं बनता और असमंजस जैसा धर्म संकट सामने आ खड़ा होता है। कई बार तो परामर्श दाताओं का अत्यधिक आग्रह और दबाव भी होता है और वे इतने घनिष्ठ भी होते हैं कि उनका मन रखने की बात भी ध्यान में रखनी पड़ती है। इन्हें अप्रसन्न, असन्तुष्ट, रुष्ट कैसे करें और संकोच उस समय होता है जब बात गले नहीं उतरती, किन्तु आग्रह को अस्वीकार करते भी नहीं बनता।
यही कठिनाई तब पड़ती है जब किसी आदर्शवादी प्रोत्साहन के लिए किसी सुदूर क्षेत्र से आवाज आती है। बात उचित है, पर कहने वाला दूरस्थ होने अथवा घनिष्ठता का नाता न रहने से प्रत्यक्ष प्रभाव डालने की स्थिति में नहीं होता। उसका आग्रह पुस्तकों के पृष्ठों अथवा दूसरे तरीकों से अपने तक पहुँचता है जिसका कोई प्रत्यक्ष अथवा वैयक्तिक दबाव प्रभाव नहीं होता। ऐसी दशा में उसके परामर्श में औचित्य देखते हुए भी उसे अपनाने का साहस नहीं जुटता।
अनौचित्य को अस्वीकार करना और औचित्य को अपनाना हर दृष्टि से हर किसी के लिए लाभदायक है। तात्कालिक लाभ उसमें न हो-कुछ सामयिक हानि दिखती हो तो भी अन्ततः सत्परिणाम औचित्य के अपनाने में ही मिलते हैं। इतने पर भी व्यक्तिगत आग्रह को ध्यान में रखते हुए कई बार अनौचित्य स्वीकार करना और औचित्य को छोड़ने का धर्म संकट सामने आ खड़ा होता है। ऐसे समय में हमें क्या करना चाहिए? इसका कोई सुनिश्चित सिद्धान्त स्थिर कर लिया जाय तो कदम क्या उठना चाहिए? इसका निर्णय सुविधापूर्वक हो सकती है।
हमें औचित्य और आदर्श को ही अपना सबसे बड़ा शुभ चिन्तक, मित्र, सम्बन्धी एवं घनिष्ठ मानकर चलना चाहिए। व्यक्तियों में से हर किसी को उसी अंश में स्वजन मानना चाहिए जितने में कि वह औचित्य का पालन करता है अथवा उस दिशा में चलने का आग्रह करता है। हर मनुष्य के अन्दर देवत्व और असुरता के अंश मौजूद हैं। ज्वार भाटे की तरह दोनों ही तत्व मनुष्यों में समय समय पर उभरते पाये जाते हैं। एक ही व्यक्ति एक समय-एक सीमा तक- एक कार्य के लिए उचित सलाह या सहायता दे सकता है किन्तु यह भी सम्भव है कि वही व्यक्ति दूसरे समय, दूसरे प्रयोजन में विकृत सलाह देने लगे। यह भी हो सकता है कि जिसने एक समय मुसीबत से बचाने और ऊँचा उठाने में सहायता दी, वही दूसरे समय, दूसरे क्षेत्र में, मुसीबत में फँसाने अथवा नीचे गिराने में अपने प्रभाव का उपयोग करने लगे। यह उभय पक्षीय, परस्पर विरोधी संभावनाएं हर समय हो सकती हैं। प्रायः हर व्यक्ति दुहरे व्यक्तित्व से जकड़ा पाया जाता है। इसलिए जान बूझकर अथवा अनजाने उसके आग्रह औचित्य एवं अनौचित्य से भरे हुए हो सकते हैं। इसलिए महत्व परामर्श एवं आग्रह को नहीं उसके पीछे सन्निहित तथ्यों को देना चाहिए और यह देखना चाहिए कि जो कहा जा रहा है वह किस सीमा तक उचित है और किस सीमा तक अनुचित। हमारी स्वीकृति औचित्य वाले अंश को ही मिलनी चाहिए। व्यक्तिगत, घनिष्ठता एवं प्रभावशाली पद या सम्बन्ध रहते हुए भी अनौचित्य को विनयपूर्वक अस्वीकृत कर दिया जाना चाहिए।
अस्वीकृति में सामने वाले को रुष्ट होने का अवसर तब आता है जब परामर्श को मूर्खतापूर्ण, अनैतिक, अनुपयुक्त आदि कहकर उसके अहंकार को चोट पहुँचाई जाती है। इस सीधी टक्कर से बचा जा सके तो उस अस्वीकृति में भी कटुता का अप्रिय प्रसंग न बनेगा। यदि बनेगा भी तो वह बहुत हल्का होगा। जिसे अपना अन्तःकरण और विवेक अनुचित समझता है, उसे स्वीकार करने में क्या कठिनाई पड़ेगी? यह बात यह आग्रहकर्ता को नम्र किन्तु स्पष्ट शब्दों में बता देनी चाहिए। हानियाँ कई तरह की होती हैं, शारीरिक, मानसिक, आत्मिक, आर्थिक, सामाजिक आदि। इनमें से अनुचित आग्रह स्वीकार करने पर किन-किन कठिनाइयों में फँसना पड़ सकता है, इसके लिए तर्क और आधार पहले तो अपने मन में तैयार किये जाय और पीछे सामने वाले को बता दिये जाय। अनैतिक परामर्शों के बारे में धर्म, ईमान, भगवान और अन्तरात्मा की असहमति की बात भी कही जा सकती है। इस संदर्भ में अपने को कमजोर, कायर, दुर्बल भी स्वीकार किया जा सकता है और परामर्शदाता का अहंकार तुष्ट रखा जा सकता है कि आप तो साहसी होने के नाते ऐसा कर और सोच सकते हैं, पर मेरे जैसे धर्म-भीरु के लिए ऐसा कर सकना अति कठिन पड़ेगा। मन को मार कर-आन्तरिक विद्रोह के साथ यदि आपकी सलाह मान भी ली गई तो उस उलझी मनःस्थिति में वह स्वीकृति भी आपके लिए कोई प्रसन्नता की बात न होगी। इस प्रकार अस्वीकृति को नम्रता के साथ अपनी कठिनाई व्यक्त करते हुए समझा दिया जा सके तो वह दबाव आसानी से टल सकता है और सामने वाले को बिना रुष्ट किये अनौचित्य से अपने को बचाया जा सकता है।
ऐसी मूढ़ताएं, रूढ़ियाँ, अन्ध परम्पराएँ जो नैतिक, आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से अहितकर हैं। प्रायः घर के बड़े बूढ़ों या सम्बन्धियों द्वारा सिर पर थोपी जाती हैं। उन्हें अपनाने के लिए दबाव दिया जाता है ऐसे प्रसंगों दर गुजर उनकी की जा सकती है जिनका सम्बन्ध किन्हीं चिन्ह पूजाओं से हो। यों लकीर पीटने में समय, श्रम और पैसा खर्च करने की कोई उपयोगिता नहीं, फिर भी घर में विग्रह उत्पन्न न होने देने के लाभ को ध्यान में रखते हुए उनमें सम्मिलित रहा जा सकता है। किन्तु जिनका प्रभाव महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं करता, उन्हें न मानना ही हितकर है। प्रतिगामी लोग बाल विवाह में अक्सर बहुत रुचि रखते हैं। वे अपने बेटे, पोतों का विवाहोत्सव जल्दी देखने के लिए आतुर रहते हैं। उन्हें यह पता नहीं रहता कि इस गलती का इन बालकों के स्वास्थ्य, शिक्षा एवं भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा। ऐसे आग्रहों को यदि बच्चे स्वयं ही अस्वीकार कर दें तो इसमें कुछ भी बुराई नहीं है। बड़ों का सम्मान करना और उनकी सेवा, सहायता करना पारिवारिक शिष्टाचार है उसका पालन किया जाना चाहिए। पर इस आधार पर इस कारण यह विवशता उत्पन्न नहीं होनी चाहिए कि वे कुछ अनर्थकारी आदेश देंगे उनका भी पालन होता रहेगा। दहेज जैसी कुरीतियाँ परिवार और समाज के आर्थिक एवं नैतिक सन्तुलन को नष्ट किये दे रही हैं किन्तु उन्हें छोड़ने का साहस, परम्परावादी अभी भी नहीं कर रहे हैं। कानूनी बन्धन और सामाजिक असम्मान बढ़ जाने से उन कुरीतियों को प्रत्यक्ष रूप से अपनाये रहना कठिन हुआ तो लोग गुप-चुप रिश्वतखोरी की तरह उस ढर्रे को चला रहे हैं। ऐसे प्रसंगों में घर के विचारशील सदस्य एवं जिनका विवाह हो रहा है वे लड़की लड़के- कड़ा रुख अपनाये और उस कुकृत्य में सहमत सम्मिलित न हों तो यह सब प्रकार उचित ही होगी। देखने में यह बड़ों की अवज्ञा जैसी अशिष्टता लग सकती है, पर न्याय ठहराया जाएगा ।
मित्रों में से कितने ही अपने साथ दुर्व्यसनों में सम्मिलित होने का आग्रह करते हैं। नशेबाजी, आवारागर्दी जैसी अनेकों बुराइयाँ प्रायः तथाकथित मित्र मण्डली द्वारा ही आरम्भ कराई जाती हैं। पीछे वही बुराइयाँ आदतें बनकर आजीवन पतन के गर्त में डुबोती रहती हैं। यदि आरम्भ में ही नम्रता किन्तु स्पष्ट कड़क के साथ मनाकर दिया गया होता तो एक दिन की रुखाई आजीवन विविध प्रकार की हानियाँ उठाते रहने की विपत्ति खड़ी न करती। मित्रता आरम्भ करने में प्रसंग में सबसे अधिक सतर्कता इसी बात की बरती जानी चाहिए कि दुर्गुणी, दुर्व्यसनी, अनाचारी, धूर्त प्रकृति के व्यक्ति मित्रता के जाल में फँसाकर कहीं शत्रुओं से भी बुरी दुर्गति करने तो नहीं जा रहे हैं। इन दिनों यह खतरा मित्रता के क्षेत्र में पग पग पर खड़ा हुआ रहती है। सज्जनों को व्यस्तता अपनानी पड़ती है, उनके पास यारबाजी के लिए समय ही नहीं होता। फालतू आवारा लोग ही अपने साथी, संगी ढूँढ़ने के लिए मित्रता जोड़ने का जाल कन्धे पर लादे फिरते हैं। इसी कुचक्र में फँस कर अनेक उदीयमान व्यक्तित्वों का सर्वनाश हुआ है और भविष्य अन्धकारमय बना है। अस्तु जहाँ तक आग्रह मानने में संकोच करने का सवाल है वहाँ अनुपयुक्त व्यक्तियों की ओर से यदि मित्रता जोड़ने का हाथ बढ़ाया जा रहा हो तो इस संदर्भ में भी उपेक्षा दिखाने की नीति ही अपनाई जानी चाहिए।
कुटुम्बी लोग अपने अपने स्वार्थी के लिए खींच तान करते रहते हैं। कई पत्नियाँ भी बड़ी स्वार्थी प्रकृति की होती हैं, पारिवारिक उत्तरदायित्वों को पूरा करने से पति को रोकती है और उसकी कमाई का पूरा लाभ स्वयं ही उठाना चाहती है मानो परिवार से उसके पति का कोई वास्ता ही न रहा हो। इसी प्रकार बेटे अपनी सुख सुविधाओं के लिए बाप की कमाई पर पूरा कब्जा करना चाहते हैं। मानों बेटे को सब कुछ दे जाने के अतिरिक्त बाप के सामने अन्य कोई कर्तव्य ही न हों। ऐसी परिस्थितियों में इन अधिक घनिष्ठ सम्बन्धी कह जाने वाले पत्नी और सन्तान के प्रति भी एक आँख प्यार की और दूसरी सुधार की रखने की नीति अपनाई जानी चाहिए। उनका आग्रह उतना ही स्वीकार किया जाय जो औचित्य की सीमा के अंतर्गत हो। भले ही इस कर्तव्य पालन में उनके असन्तुष्ट या रुष्ट हो जाने का खतरा ही क्यों न उठाना पड़ें?
बात किस की स्वीकार करें? अपना सच्चा हितैषी कौन है? इसका निर्णय करते हुए यही तथ्य ध्यान में रखा गया चाहिए कि औचित्य, न्याय एवं विवेकी की कसौटी पर कौन से परामर्श खरे उतरते हैं। लोकमत या लोकापवाद की चिन्ता भी औचित्य के आधार पर ही करनी चाहिए। यदि आदर्श अपनाने के कारण उपहास सहना पड़ रहा है तो उस अवसर पर हाथी चलता है कुत्ते भूँकते हैं वाली नीति ही अपनानी चाहिए। किन्तु यदि अनीति अपनाने के कारण लोकनिंदा होती है तो उसे मरण तुल्य मानना चाहिए।
दूरदर्शिता क्या मानने, क्या अपनाने और क्या करने में है? दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुए वर्तमान की कार्य पद्धति अपनाई जाय। इस संदर्भ में वे विचारशील व्यक्ति भी अपने सगे सम्बन्धियों से अधिक हित चिन्तक सिद्ध हो सकते हैं जो स्थान की दृष्टि से दूर रहते हैं और समय की दृष्टि से दिवंगत हो चुके। किन्तु वे अपने उदार दृष्टिकोण के कारण अभी भी समस्याओं को आदर्शवादिता के आधार पर अपनाने में समर्थ हैं।
व्यक्तियों के साथ सामान्य सहयोग का क्रम अनेकों के साथ चलाना पड़ता है। दुकानदार, मजूर, चिकित्सक, धोबी, दर्जी आदि अनेकों से अपना वास्ता पड़ता है उनके साथ कामचलाऊ वार्तालाप करने एवं सामान्य शिष्टाचार व्यवहार चलने का क्रम बनाये रखा जा सकता है किन्तु जहाँ तक जीवन समस्याओं को उलझाने, सुलझाने वाले परामर्श का सम्बन्ध है वहाँ वह कार्य केवल प्रामाणिक व्यक्तियों से ही लेना चाहिए। पूँजी का विनियोग करने में, कारोबार की साझेदारी में, रिश्तेदारी स्थापित करने में, बहुत सोच-विचार से काम लिया जाता है और ठोक पीटकर यह परखा जाता है कि सामने वाला व्यक्ति प्रामाणिक है या नहीं। आयु, शिक्षा, सुन्दरता, कला, चतुरता आदि विशेषताओं की अपेक्षा ऐसे अवसरों पर सदा प्रामाणिकता को ही महत्व दिया जाता है। विचार विमर्श उन सबसे अधिक प्रभावी है। परामर्श में जीवन की दिशा धारा बदल देने की शक्ति है उन आधार पर हमारा भविष्य उज्ज्वल एवं अन्धकारमय बन सकता है। अतएव इस संदर्भ में पूरी पूरी सतर्कता बरती जानी चाहिए। किसकी, किस प्रकार की, कितनी सलाह माननी चाहिए- और कितनी की उपेक्षा करनी चाहिए अथवा असहमति प्रकट करनी चाहिए यह निर्णय सूक्ष्म दृष्टि, विवेकशीलता और दूरदर्शिता के आधार पर करना चाहिए। जो भी संपर्क में आये- जो भी उलटी सीधी सलाह दे उसी से प्रभावित हो चला जाय और बिना काट छाँट किये जिसने जो बताया उसी को अपना लिया जाय तो समझना चाहिए उस उथली दुर्बल मनोभूमि के कारण पथ भ्रष्ट होने ओर कँटीली झाड़ियों में भटकने का संकट ही सहन करना पड़ेगा।
साधना का अर्थ है-अपने आप को साधना। जिन देवी देवताओं की साधना की जाती है वे वस्तुतः अपनी ही विभूतियाँ एवं सत्प्रवृत्तियाँ हैं। इन विशेषताओं के प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहने के कारण हम दीन दरिद्र बने रहते हैं किन्तु जब वे जागृत, प्रखर एवं सक्रिय बन जाती हैं तो अनुभव होता है कि हम ऋद्धि सिद्धियों से भरे पूरे हैं। मनुष्य की मूल सता एक जीवन्त कल्पवृक्ष की तरह है। ईश्वर ने उसे बहुत कुछ-सब कुछ-देकर इस संसार में भेजा है। समुद्र तल में भरे मणि मुक्तकों की तरह-भूतल में दबी रत्न राशि की तरह मानवी सता में भी असंख्य सम्पदाओं के भण्डार भरे पड़े हैं। किन्तु वे सर्वसुलभ नहीं है, प्रयत्नपूर्वक उन्हें खोजना खोदना पड़ता है। जो इसके लिए पुरुषार्थ नहीं जुटा पाते वे खाली हाथ रहते हैं किन्तु जो प्रयत्न करते हैं उनके लिए किसी भी सफलता की कमी नहीं रहती। इसी प्रयत्नशीलता का नाम साधना है। स्पष्ट है कि अपने आप को सुविकसित, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बना लेना ही- देवाराधना का एक मात्र उद्देश्य है। अपनी ही सत्प्रवृत्तियों को अलंकारिक भाषा में देव शक्तियाँ कहा गया है और उनकी विशेषताओं के अनुरूप उनके स्वरूप, वाहन, आयुध, अलंकार आदि का निर्धारण किया गया है।
साधना उपासना के क्रिया कृत्य में यही रहस्यमय संकेत सन्देश सन्निहित है कि हम अपने व्यक्तित्व को किस प्रकार समुन्नत करें और जो प्रसुप्त पड़ा है, उसे जागृत करने के लिए क्या कदम उठाये । सच्ची साधना वही हैं जिसमें देवता की मनुहार करने के माध्यम से आत्म निर्माण की दूरगामी योजना तैयार की जाती और सुव्यवस्था बनाई जाती है।
आरम्भिक दिनों में यह धरती ऊबड़-खाबड़-खार-खड्डों वाली थी। मनुष्य ने प्रयत्नपूर्वक उसे समतल बनाया। झाड़-झंखाड़ों को काटकर सुसंस्कृत बनाये जाने के उपरान्त ही जमीन को कृषि उद्यान, निवास, पशु पालन आदि के योग्य बनाया गया है। नदियों से नहरें निकालने और उन पर पुल बनाने का यदि प्रयास न होता तो वे अति प्राचीन काल की तरह मनुष्य के लिए अवरोध बनकर ही खड़ी रहतीं। वनस्पतियाँ उगती और नष्ट होती हैं, उन्हें औषधि रूप में लाभकारी बनाने में मनुष्यों के शोध प्रयत्नों को ही श्रेय दिया जा सकता है। जप को नियंत्रित करके उससे इंजन चलाने का लाभ उसी ज्ञान साधना का प्रतिफल है जिसे विज्ञान के रूप में विस्तृत क्षेत्र में फैला हुआ देखा जा सकता है। द्रुतगामी वाहन-तार रेडियो, पनडुब्बी, वायुयान एवं अन्तर्गत ही उड़ानों का श्रेय मनुष्य की विज्ञान साधना को ही दिया जा सकता है। ज्ञान साधना के आधार पर ही हम नर पशु से ऊँचे उठकर सृष्टि के मुकुट मणि बने हैं।
पौधे तो जंगल में भी उगते हैं पर उन अस्त व्यस्तता एवं अनिश्चितता ही छाई रहती है। न तो केवल सुन्दर लगते हैं और न सुव्यवस्थित। उन की बेतुकी उत्पत्ति और विकास प्रक्रिया से बन प्रदेश, झाड़-झंखाड़ों से भरा दिखता है। किन्तु जब उन्हें माली यथा क्रम लगाता है, खाद-पानी काट-छाँट निराई-गुड़ाई की सुव्यवस्था बनाता है तो वह उद्यान कैसा नयनाभिराम दिखता है। जंगली पेड़ों की तुलना में उसके फल फूल भी अधिक मात्रा में लगते हैं और सुन्दर समुन्नत दिखते हैं। यह माली द्वारा की गई उद्यान की साधना ही कही जायगी। उसका प्रतिफल प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
किसान अपने खेत की साधना करता है। शरीर को, मिट्टी में मिलाये रहता है। फलतः फसल आने पर धान से कोठे भरता है। लकड़ी की साधना बढ़ई-लोहे की लुहार- स्वर्ण की सुनार, पत्थर की मूर्ति कार करता है। अपने श्रम, मनोयोग एवं कौशल से वे उन अनगढ़ वस्तुओं को बहुमूल्य बना देते हैं। स्वयं गौरवान्वित होते हैं और उन वस्तुओं को उपयोगी एवं दर्शनीय बनाकर रख देते हैं।
पहलवान व्यायामशाला में नियमित रूप से जाकर कठोर परिश्रम के साथ पूरा उत्साह संजोये रहता और शरीर की साधना करके अपने को बलिष्ठ बनाता है। विद्यार्थी बचपन से लेकर पूरी किशोरावस्था शिक्षा साधना में लगाता है और यौवन आने तक उसी में तत्परतापूर्वक संलग्न रहता है, इसका प्रतिफल उसे विद्वान होने के रूप में मिलता है। उस साधना का लाभ धन, पद एवं सम्मान बनकर उपलब्ध होता है।
गायक, वादक अपने विषयों में अनायास ही पारंगत नहीं हो जाते। वे लोग स्वर साधना में वर्षों लगे रहते हैं, वाद्य यन्त्र उनके हाथों में ही लगे रहते हैं। संगीतकार की सफलता उसकी जन्मजात विशेषता पर नहीं, उसके अनवरत अभ्यास पर निर्भर रहती है। जादूगर, नर्तक, अभिनेता, चित्रकार, साहित्यकार, कलाकार बन सकना अनायास ही सम्भव नहीं हो जाता वरन् उसके लिए चिरकाल तक दत्त चित्त से साधना करनी पड़ती है। फौजी सैनिक अपनी युद्ध कला का निरन्तर अभ्यास करते रहते हैं। मोर्चे पर वे जो कौशल दिखाते हैं वह कोई चमत्कार नहीं होता वरन् वर्षों तक किये गये अभ्यास का ही वह प्रतिफल होता है।
वन्य पशुओं की गतिविधियाँ मनुष्य के लिए हानि ही हानि पहुँचाती हैं। वे खेत चर जाते हैं, पेड़ पौधे उजाड़ते हैं, आक्रमण करके भय उत्पन्न करते हैं, किन्तु जब उन्हें पालतू बना लिया जाता है तो मनुष्य भी लाभान्वित होते हैं और वे पशु भी सुविधा एवं निश्चिंततापूर्वक जीवन यापन करते हैं। बैल खेती में काम आते हैं, गायें दूध देती हैं। मनुष्यों का सहयोग भी उन्हें मिलता है। यदि आदान प्रदान का पथ प्रशस्त करने वाली पशु पालन साधना न की गई होती तो दोनों ही पक्ष घाटे में रहते। घोड़े, हाथी, कुत्ते आदि का मनुष्यों के साथ सहयोग लाभदायक ही रहा; पर यदि सिखाने साधने के प्रयत्न करने पर ही सम्भव हुआ है। सरकस में हिंस्र पशु भी कैसे अद्भुत करतब दिखाते हैं कि आश्चर्य से दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। सिंह, व्याघ्र आदि अपने असली रूप में मनुष्य के लिए प्राण घातक ही होते हैं, पर सधा लेने पर वे सरकस मालिक के लिए सम्पत्ति कमाने का साधन बनते हैं। स्वयं प्रशंसा के पात्र बनते हैं और साधने वाले का गौरव बढ़ाते हैं। रीछ-बन्दर नचाने वाले उसी आधार पर अपना परिवार पालते हैं। साँप जैसा, काल पाश तक साधने पर सपेरे की आजीविका का साधन बन जाता है। इन प्रयत्नों में साधना का, सधने की प्रक्रिया का ही चमत्कारी प्रतिफल दृष्टिगोचर होता है।
मानवी व्यक्तित्व में सन्निहित सम्भावनाओं का कोई पारापार नहीं, ईश्वर का जेष्ठ पुत्र होने के नाते उसे अपने पिता से सभी विभूतियाँ उत्तराधिकार में मिली है। व्यवस्था नियन्त्रण इतना ही है कि जब उस रत्नराशि की उपयोगिता आवश्यकता समझ में आ जाय तभी वे मिल सकें । पात्रता के अनुरूप अनुदान मिलने की सुव्यवस्था अनादि काल से चली आ रही है। इसी परीक्षा में खरे उतरने पर लोग एक से एक बढ़कर उपहार प्राप्त करते रहे हैं। साधना के फलस्वरूप सिद्धि मिलने का सिद्धान्त अकाट्य है। देवी-देवताओं को माध्यम बनाकर वस्तुतः हम अपने ही व्यक्तित्व की साधना करते हैं। अनगढ़ आदतों की बेतुकी इच्छाओं और अस्त-व्यस्त विचारणाओं को सभ्यता एवं संस्कृति के शिकंजे में कस कर ही मनुष्य ने प्रगतिशीलता का वरदान पाया है। इसी परम्परा को जो अपने व्यक्तिगत जीवन में जितना क्रियान्वित कर लेता है वह उतना ही श्रेयाधिकारी बनता है।
साधना का प्रयोजन अपने अविवेक और अनाचार का निराकरण करना है। अपनी कामनाओं का परिशोधन एवं दृष्टिकोण भी साधना का उद्देश्य कहा जा सकता है। कर्तृत्व में देवत्व का समावेश करना तथा चिन्तन में घुसी कुत्साओं के उन्मूलन में जुटा देना साधनात्मक व्यायाम प्रक्रिया है जिसके आधार पर आत्मबल बढ़ाया जाता है और देव वर्ग की सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन किया जाता है। इस आत्म परिष्कार के फलस्वरूप उन विभूतियों की चाबी हाथ लग जाती है जो फलस्वरूप उन विभूतियों की चाबी हाथ लग जाती है जो परमेश्वर ने पहले से ही हमारे भीतर रत्न भण्डार के रूप में सुरक्षित कर दी है। साधना अन्तःकरण में वह प्रकाश उत्पन्न करती है, जिससे अपने लक्ष्य और कर्तव्य को समझा जा सके। साधना वह शक्ति प्रदान करती है, जिससे आत्मबल विकसित हो सके और सन्मार्ग पर चलने के लिए पैरों में अभीष्ट क्षमता रह सके। साधना और आकर्षणों को दुत्कारते हुए कर्तव्य की चट्टान पर दृढ़तापूर्वक अग्रसर रहा जा सके और हर विघ्न बाधा का-कष्ट कठिनाई का-धैर्य और सन्तुलन के साथ सामना किया जा सके। साधना का वरदान ‘महानता’ है। साधना जितनी ही सच्ची और प्रखर होती है उतने ही हम महान बनते चले जाते हैं। तब हमें किसी से कुछ माँगना नहीं पड़ता-ईश्वर भी नहीं। तब अपने पास देने को बहुत होता है-इतना अधिक कि उसके आधार पर अपने को-संसार को-और परमेश्वर को सन्तुष्ट किया जा सके।
विश्व युद्धों के सृजन में संलग्न कूटनीति और सर्वनाशी आणविक अस्त्रों की घुड़दौड़ के जिस जमाने में हम लोग रह रहे हैं उसमें मनुष्य के मूल्य और मापदण्ड भी बदल गये हैं, लगता है अब मानवी अस्तित्व अनिश्चित है। उसमें न तो निश्चिंतता रह गई है और न निश्चिन्तता। यायावरों की तरह हम भटक रहे हैं और भविष्य के बारे में आतंकित हैं। आक्रामक शक्तियों की प्रबलता को देखते हुए सुरक्षा के आधार अत्यन्त दुर्बल हैं। एक उन्मादी आक्रमणकर्ता इसे धरती की अद्यावधि संचित सभ्यता को चुटकी बजाते भस्मसात् कर सकता है और समूचे सुरक्षा साधन हतप्रभ रहकर मरण को विवशतापूर्वक अंगीकार कर सकते हैं। आक्रमण के दैत्य का सुरक्षा का बालक किस प्रकार सामना कर सकेगा इस संदर्भ में कोई आशा की किरण न तो राजनीति के क्षेत्र से उदय होती है और न विज्ञान ही कोई संतोषजनक आश्वासन देता है।
विश्व युद्धों की इस गर्मा-गर्मी के साथ-साथ एक ठंडी आग भी सुलग रही है, वह है - मानवी मर्यादाओं का अवमूल्यन। शिक्षा और सुविधा साधनों की दृष्टि से हम प्रगति की दिशा में बढ़ रहे हैं, सूचनाओं से सही सिद्ध होता है। फिर भी पीड़ा और पतन में कहीं कमी होती दिखाई नहीं पड़ती। व्यक्तिवादी संकीर्णता और विलासी अहंकारिता से प्रेरित जन मानव ऐसी मान्यताएँ अपना रही है जिनमें पड़ोसी का शोषण अनिवार्य है। ममता और आत्मीयता का इस जलती मनः स्थिति में किसी प्रकार गुजारा नहीं। जन-मानस अपने जमाने की परम्परा जिस प्रकार प्रभावित कर रहा है उसमें मत्स्य न्याय अपनाने और जंगल का कानून बरतने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं । यही हो भी रहा है। मानवी प्रगति का एक प्रबल पक्ष सामने इस प्रकार आता है जिसमें व्यक्तिगत अथवा वर्ग स्वार्थ ही सब कुछ है। हाँ, यह सब पुराने फूहड़ ढंग से नहीं चतुरता और आवश्यकतानुसार किन्हीं आदर्शों की आड़ लेकर किया जाता है। आक्रामक अपनी दुष्टता स्वीकार नहीं करते वरन् उसे विवशता एवं प्रतिक्रिया सिद्ध करते हैं। अब छद्म ही प्रधान शस्त्र स्वीकार किया जा रहा है तो फिर अनय को भी किन्हीं तर्कों और कारणों से उचित सिद्ध करने में क्या कठिनाई हो सकती है?
जो, हो, युद्धोन्माद की सामूहिक और योजनाबद्ध चेष्टाओं की तरह वैयक्तिक चिन्तन, रुझान, क्रिया कलाप का और चरित्र का अध पतन भी कम विघातक नहीं है। एक का गरम आग, दूसरी को शीत की थरथराहट कह सकते हैं। विनाश की क्षमता दोनों में लगभग समान है। हाँ एक बिजली की तरह गिर सकती है जब कि दूसरी विपत्ति जलाने की तुलना में गलाने में अधिक धैर्य का परिचय देगी और अधिक समय लेगी।
चक्की के दोनों पाटों के बीच मानवी अस्तित्व लगभग अनिश्चितता की स्थिति में रह रहा है। सुरक्षा कहाँ से मिले? परिवर्तन कौन करे? आश्वासन कहाँ से मिले? इन प्रश्नों के उत्तर खोजने में हमें अपने अन्तरंग का द्वार खट-खटाना पड़ेगा। जीवन जिसे हर दिशा में संकट उतरता दिखता है; उसे नये सिरे से समझना पड़ेगा? क्या सचमुच वह इतना ही दीन दुर्बल है कि परिस्थितियों और प्रवाहों के सम्मुख मरण की मौन स्वीकृति देने के अतिरिक्त और कोई चारा ही उसे दिखाई न पड़े? क्या उसमें अपने निजी सुरक्षा शक्ति सचमुच ही कुछ नहीं है?
हमें अपने उस ‘अस्तित्व’ को समझना और जगाना होगा जिसके सहारे प्रकृति प्रदत्त दुर्बल काया के सहारे नगण्य सा जीवधारी सृष्टि का मुकुट मणि बनने की लम्बी मंजिल पार कर सकने में सफल हो सका। इस धरती की अनगढ़ता को सुघड़ता में बदलने का श्रेय किसे दिया जाय? क्या वह मानवी अस्तित्व से भिन्न कोई और वस्तु है जिसने आदिम काल की तुलना में जीवन का स्वरूप और संसार का ढाँचा ही बदल कर रख दिया? जिस विज्ञान ने मरण की विभीषिकाएँ ला खड़ी की हैं-क्या वह मानवी मस्तिष्क की एक नगण्य सी लहर नहीं है? क्या अपने उत्पादन पर अपना नियन्त्रण हो सकना सम्भव नहीं है? जब हमीं ने चलने की दिशा निर्धारित की है तो क्या उसे उलटने, बदलने या मोड़ने की सामर्थ्य से अपने आपको रहित मानना उचित है।
जीवन इतना दुर्बल नहीं है कि उसे अपनी ही क्रिया-प्रतिक्रिया के सामने मरण की लाचारी स्वीकृत करने के अतिरिक्त और कोई चारा ही दृष्टिगोचर न हो? यदि पतन और विनाश के सरंजाम खड़े करने की जीवन में क्षमता है तो निश्चय ही उत्कर्ष और परिवर्तन की क्षमता भी उसमें होनी ही चाहिए। अपना यही अस्तित्व हम भूल गये या गँवा बैठे हैं। अन्धकारमय दिखने वाले भविष्य में ज्योति उत्पन्न करने के लिए यदि बाहर से प्रकाश नहीं मिल रहा है तो भी निराश होने की कोई आवश्यकता नहीं है। अपने अस्तित्व को अन्तरंग को यदि खोजें तो वहाँ बहुत कुछ मिलेगा। इसी भूमि में विभीषिकाएँ उपजती हैं तो क्यों नहीं आशा की किरणें उसी क्षेत्र में उद्भूत हो सकती है?
हमें जीवन को समझना होगा और अस्तित्व की गरिमा को नये दृष्टिकोण से कुरेदना पड़ेगा। अन्यथा हम जी नहीं सकेंगे। यह शोध यों सदा से उपयोगी रही है, पर आज तो उसकी ऐसी आवश्यकता है जिसकी उपेक्षा करके हम जीवित नहीं रह सकेंगे। यदि मरण से हम असहमत हैं तो फिर साहसपूर्वक जीवन का समर्थन करना होगा। आक्रमण और उपभोग का वर्चस्व स्वीकार करना यही है भौतिकवादी दृष्टि एवं सभ्यता। इसे छाती से चिपकाये रह कर हम आग से झुलसने जैसा ही कष्ट पाते रहेंगे। यदि यह अनुपयुक्त और असह्य लगता हो तो उन स्रोतों को बन्द करना होगा जहाँ से प्रस्तुत विकृतियाँ और विपत्तियाँ उपजती और बढ़ती हैं।
परिस्थितियों में परिवर्तन लाने के लिए मनःस्थिति और दृष्टि का नये सिरे से निर्धारण करना होगा। इसका अर्थ है-जीवन के अस्तित्व के- मूल स्वरूप को समझना और तद्नुरूप अपने आपे को ढालना। इसका और भी अधिक खुलासा करना हो तो कहना चाहिए कि आध्यात्मिक जीवन का अभिनव आरम्भ-धर्म धारणा का पुनर्जागरण । धर्म से तात्पर्य किसी सम्प्रदाय विशेष से, मतान्तर से नहीं वरन् उस दर्शन से है जिसका अभिप्राय होता है- मानवी गरिमा के अनुरूप मर्यादाओं, की स्वेच्छया स्वीकृति। यह आदर्शवादी प्रतिष्ठापना वस्तुतः उस सनातन श्रद्धा का ही पुनर्जीवन है जिसने अतीत में मनुष्य को आदिम युग की विषमताओं को निरस्त करते करते इस प्रगतिशीलता और सुविधा सम्पन्नता से भरी पूरी परिस्थितियों तक पहुँचाया है।
“ हमें जीवन खोजना होगा । अस्तित्व को भ्रान्तियों के भटकाव से उबारना होगा। जीवन बड़ा है। उसकी संभावनाएं बड़ी हैं। अपने अस्तित्व में आशा की वे सभी किरणें विद्यमान हैं ‘जिनके लिए हम आतुरता भरी प्रतीक्षा करते हैं। संकट बड़ा है, पर इतना बड़ा नहीं जिस पर जीवन के लिए विजय प्राप्त कर सकना सम्भव न हो। “ वेरिस पास्तर नाक
सेवाँ बिना जीवनमप्यपार्थ सेवाँ विनान्यत् सुकृतं किमर्थम्। सेवैयव यज्ञश्च तपश्च तीर्थ तस्मान्न सेवाँ-त्यजभोः कदाचित्॥ (मनः प्रवोध)
सेवा के बिना जीवन ही निरर्थक है, सेवा के बिना और सत्कर्म किस काम को सेवा ही यज्ञ है, सेवा ही तप है, सेवा ही तीर्थ है, अतः-हे मन तू कभी सेवा का परित्याग न करना।
मनुष्य के समस्त क्रिया-कलापों प्रयासों एवं उपक्रमों की पृष्ठभूमि में सुख शान्ति का उद्देश्य निहित होता है। बल्कि यह कहना ही उपयुक्त होगा कि मानव जीवन का अभीष्ट ही सुख प्राप्त करना है। वह जो कुछ भी कर रहा है वह किसी न किसी रूप में इसी सुख को उपलब्ध करने के लिए कर रहा है। देखने में तो यहाँ तक आता है कि वह अनेक खतरे भी सुखोपभोग के लिए मोल लेता है।
सुख-शान्ति को प्राप्त करने की अभिलाषा उसकी एक विशिष्ट आकांक्षा कही जा सकती है, सुख शान्ति की आवश्यकता के बीज उसके हृदय से स्वयंभू पाये जाते हैं। हृदय की उर्वरता भूमि में ही सुख शान्ति की बेल पल्लवित एवं पुष्पित होती रहती है, इसे आत्मा की सहज स्वाभाविक जिज्ञासा भी कहा जा सकता है, क्योंकि आत्मा का उन्नयन सुख शान्ति की अवस्था में ही सम्भव हो पाता है। आत्मा का परमात्मोन्मुख होना, अंश का अंशी से तादात्म्य होना भी इसी सुख शान्ति की स्थिति में सहज होता है।
मानव जीवन में व्यवस्था, सन्तुलन एवं संयम स्थापित करने के लिए भी सुख शान्ति की महती आवश्यकता है, इनके अभाव में उसकी शक्तियाँ अस्त व्यस्त रहकर क्षीण होती रहती हैं। शक्ति हीनता अपने आप में अभिशाप है। मानव जीवन का परमलक्ष्य है ईशोपलब्धि। जिस हेतु ईश्वर ने सर्वोत्कृष्ट स्वरूप प्रदान किया, उसमें मानव तब तक सफल नहीं हो पाता जब तक कि वह संसार के बन्धनों, मायाजालों, दुःख द्वन्द्वों तथा शोक संतापों की बेड़ियों से उन्मुक्त नहीं हो पाता।
जीवन में अपेक्षित उत्कर्ष अथवा आध्यात्मिक उत्थान के लिए मानसिक स्थैर्य, मस्तिष्कीय सन्तुलन एवं आत्माल्हाद की परम आवश्यकता होती है। अशान्ति की अवस्था में यह कदापि सम्भव नहीं हो पाती। मानसिक संघर्ष एवं मोह माया में फँसा हुआ तथा संत्रस्त व्यक्ति, कामनाओं एवं वासनाओं से उन्मुक्त हुए बिना, लौकिक एवं पारलौकिक अभ्युदय किसी भी मूल्य पर नहीं कर सकता। किसी भी प्रकार के विकास हेतु शान्तिपूर्ण मनः स्थिति अनिवार्य रूप से अपेक्षित है। ऐसा कोई संयोग नहीं है जिसका अन्त में वियोग न होता हो, ऐसा कोई सुख भोग नहीं है जिसके पीछे दुःख रोग सम्बद्ध न हो। संसार में पर्याप्त रूप से भटकने के उपरान्त यही निष्कर्ष निकलता है कि विषय, भोग वासना, तृष्णा, लोभ मोह की परिणति स्थायी सुख शान्ति से निरन्तर दूर करना ही है।
सुख शान्ति का स्थिर निवास तो केवल उस एक परमात्मा में है जो कण कण में संव्याप्त है, मनुष्य में ईश्वर अंश अविनाशी आत्म तत्व के रूप में अवस्थित है और सचराचर सृष्टि को अपनी विराट्सत्ता द्वारा दीप्त करता है। दीप्त केवल परमात्मा है, उससे ही समस्त जगत ज्योतित हो रहा है।
मनुष्य के समस्त अतीत एवं वर्तमान के शो संतापों, माया मोहों, वासनाओं एवं तृष्णाओं की परिसमाप्ति उस समय होती है, जब वह परमात्मा से तादात्म्य स्थापित करने में सफल हो जाता है।
धर्माचरण वस्तुतः वह उपाय है, वह सुमार्ग है जिसके माध्यम से अक्षय सुख शान्ति प्रदायिनी, ब्राह्मी स्थिति सहज ही प्राप्त की जा सकती है। देशकाल एवं परिस्थिति के अनुरूप धर्माचरण करने वाला साधन निःसन्देह इस स्थिति को प्राप्त करने में अन्ततोगत्वा सफल हो जाता है। वस्तुतः धर्म ब्रह्म का सक्रिय स्वरूप है जो धर्म ज्ञानी है वह ब्रह्मज्ञानी है। धर्म ज्ञान के द्वारा ब्रह्म ज्ञान सहज सुलभ हो जाता है।
ब्राह्मी पद को प्राप्त करने के लिए प्राचीन ऋषि मनीषियों के अनुसार मात्र धर्म धारण एवं धर्माचरण में निष्ठा आवश्यक थी और वे उसमें सफल हुए थे। धर्म निरत रहकर एवं विकार विरत होकर उन्होंने अपने आपको कर्म गति से अप्रभावित एवं दुःख से परे बना लिया था। चन्दन विषधरों से परिवेष्टित रहते हुए भी उनसे अप्रभावित रहता है। चन्दन सदृश जीवन दर्शन जिस ब्रह्मवेत्ता को होगा वह सर्वत्र सुगन्ध एवं सुवास बिखेर कर स्वयं तो तर ही जाएगा, दूसरों को भी तार सकता है।
धर्म के सम्बन्ध में यह मान्यता फैली हुई है कि धर्म दुःसाध्य एवं दुर्बोध है। वस्तुतः यह धारणा भ्रम मूलक है। धर्म सदृश ऋजुः एवं सरल, सुखदायक तथा निरापद मार्ग इस संसार में और कुछ नहीं। वस्तुतः दुर्बल मनः-स्थिति के लोग मानसिक दौर्बल्य के कारण ही उसे असाध्य एवं कष्टकारक समझते हैं। जितनी जिज्ञासा एवं आसक्ति उनकी विषय वासनाओं की ओर है यदि उतनी धर्म की ओर हो जाय तो समस्त समस्याओं का समाधान उनके हाथ लग जाये।
धर्म के दो स्वरूप हैं- एक आन्तरिक, दूसरा बाह्य । एक को हम भावनात्मक कह सकते हैं तो दूसरे को क्रियात्मक। सदाचार धर्म का बाह्य स्वरूप है और सद्भाव उसका आन्तरिक स्वरूप । सज्जनता, सरलता, सादगी, सहानुभूति, सम्वेदना, दया, करुणा, न्याय, औचित्य, विवेक आदि वे दिव्य अनुभूतियाँ हैं जिन्हें धर्म का भावनात्मक अथवा आध्यात्मिक स्वरूप कहा जा सकता है। साथ ही श्रम, संयम, न्याय, सत्साहस आदि धर्म का क्रियात्मक अथवा बाह्य स्वरूप हैं। भावना यदि उपासना है तो क्रिया साधना। सद्भाव और सत्कर्म को जब तक धन ऋण विद्युत के समान सम्बद्ध नहीं करेंगे, तब तक प्रकाश सम्भव नहीं। ज्ञान, कर्म, के अभाव में अपूर्ण है और कर्म ज्ञान के अभाव में अधूरा। एतदर्थ इन दोनों में समन्वय से ही धर्माचरण में पूर्णता आती है। किसी व्यक्ति की दीन हीन, असहाय स्थिति को देखकर यदि हमारे मन में सहानुभूति एवं सम्वेदना के भाव को उत्पन्न होते हैं किन्तु उसकी सेवा एवं सहायता के पर्याप्त उपक्रम एवं उपचार नहीं किये गये तो धर्म का अपूर्ण आचरण माना जाएगा। इसी प्रकार यदि कोई असद्भावना, अहंकार प्रदर्शन एवं नामवरी के लिए किसी की सेवा, सहायता करता। किन्तु दुःखित पीड़ित जन के प्रति सच्ची सहानुभूति नहीं रहती तो इस कार्य को भी धर्म का छद्म आचरण ही कहा जाएगा। वस्तुतः पूर्ण धर्म का आचरण भावना एवं क्रिया के समन्वय से ही सम्भव है। धार्मिक जन यदि वास्तव में धर्म लाभ प्राप्त करने की ड़ड़ड़ड़ हैं तो पूर्ण धर्म का आचरण परमावश्यक है।
धर्माचरण सम्पूर्ण मानवता के लिए मांगलिक निष्कर्ष है। मनुष्य अपने हृदय की निर्मल भावनाओं को यदि परिष्कृत और प्रसारित कर लेता है तो सुख शान्ति उसकी सहचरी के रूप में अपने आप चली जाती है धर्म का संबंध मनुष्य के आस्था ईमान से है। ईमान यद्यपि धर्म का ही पर्याप्त है। ईमानदारी इंसान को ईश्वर के समीप पहुँचा देती है और बेईमानी नरक का द्वार खोलती है। सुख का-परिस्थितियों का निर्माण ईमान एवं धर्म के प्रति आस्था एवं निष्ठा द्वारा ही किया जा सकता है। धर्म की आत्मा मानव निष्ठा एवं आस्था पर टिकी हुई होती है। इसलिए सद्भाव एवं सत्कर्म के प्रति, निष्ठा, श्रद्धा एवं आस्था ही मानव जीवन के लक्ष्य अक्षय सुख शान्ति तक पहुँचाने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
आयुर्वेद विज्ञान में अनेक प्राणघातक विषों को शुद्ध करके उनके द्वारा कठिन रोगों को अच्छा कर सकने वाली रसायनों के निर्माण का विधान है। सामान्य धातुओं का भी जारण मारा करके उनसे आरोग्यवर्धक भस्में बनती हैं। होम्योपैथी में “विषस्य विषमौषधम्” सिद्धान्त के अनुसार प्रायः सभी औषधियाँ विष पदार्थों से ही बनाई जाती हैं। संशोधित विष मारण का नहीं जीवन प्रदान करने का काम करते हैं। वाणी के सम्बन्ध में भी यही बात कही जा सकती है। असंस्कृत वाणी विष है, पर यदि उसे सुसंस्कृत बना लिया जाय तो वही अमृत का काम करती है। कटु, कर्कश, निन्दा, भर्त्सना, व्यंग, उपहास, अपमान तिरस्कार आदि का सम्मिश्रण होने से वाणी इतनी विघातक सिद्ध होती है जिसकी हानि का कोई पारापार नहीं रहता। कहते हैं कि “तलवार का घाव भर जाता है पर जीभ का घाव नहीं भरता।” द्रौपदी की जीभ से निकले थोड़े से कटु शब्दों के फलस्वरूप असंख्यों का सर्वनाश उत्पन्न करने वाला महाभारत खड़ा हो गया था। मधुर भाषा सज्जनता, शालीनता और सद्भावना से युक्त होने के कारण सुनने वालों पर चमत्कारी प्रभाव डालती है। शान्ति और दिशा प्रदान करती है। संसार के महान परिवर्तनों में मनस्वी लोगों की वाणी ने अपनी प्रमुख भूमिका सम्पन्न की है। साधु और ब्राह्मणों ने सत्य और ज्ञान के उद्घोषकर्ताओं ने अपने दिव्य वचनों से असंख्य प्राणियों का कल्याण किया है।
मन्त्र विद्या में शब्द शक्ति की महान् गरिमा प्रकट होती है। पर यह विशेषता मात्र उच्चारण भर की नहीं होती वरन् उसके पीछे अन्तःकरण की ऐसी विशेषताएँ जुड़ी रहती है, जिनके कारण उसमें असाधारण एवं चमत्कारी क्षमता का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। मौन, सत्य, सत्प्रयोजन, सन्तुलन, सद्भाव जुड़े रहने से वाणी की श्रेष्ठता सामान्य व्यवहार से उभरती हुई देखी जाती है। प्याज, मूली, शराब, हींग आदि खाने से मुख से उसी प्रकार की गंध आती है। इसी प्रकार अंतःक्षेत्र में जो कुछ भरा होता है वह वाणी के साथ लिपट कर बाहर आता और प्रभाव उत्पन्न करता है।
चिन्तन, चरित्र, इतिहास, उद्देश्य एवं संस्कार के समन्वय से व्यक्तित्व का निर्माण होता है। यह व्यक्तित्व मुख खोलते ही वाणी के माध्यम से सहज ही निसृत होते देखा जा सकता है। बात जो भी कही गई हो उसका प्रत्यक्ष अर्थ या उद्देश्य कुछ भी होता हो, प्रभाव उतने भर से ही नहीं पड़ता, उसके साथ व्यक्तित्व की एक अनोखी छाप भी जुड़ी होती है, वस्तुतः भला या बुरा प्रभाव उसी का पड़ता है। अनेक प्रसंगों में लम्बे चौड़े अनुरोध या प्रतिपादन तर्क और प्रमाण संगत होने पर भी प्रभावहीन एवं अविश्वस्त ठहरते हैं। उन्हें आशंका की दृष्टि से देखा जाता है और दुरित संधि की गंध सूँघी जाती है। इसके विपरीत किन्हीं के सीधे सादे थोड़े से शब्द ही प्रामाणिक माने जाते और प्रभाव डालते देखे जाते हैं। इस अन्तर में बोलने वाले के व्यक्तित्व की छाप ही सन्निहित रहती है। कहे हुए शब्दों का जो अर्थ है, सुनने वाले उसका प्रभाव वैसा ही अनुभव करें यह आवश्यक नहीं है।
मन्त्र केवल शब्द गुच्छक नहीं है। उसके साथ देवत्व की प्राण धारा जुड़ती है, तब उनका प्रभाव उभरता है। यदि उसके साथ साधक अपने देवत्व को विकसित करके संयुक्त कर सकने में सफल न हो सके तो समझना चाहिए कि उस शब्द समुच्चय का वह प्रभाव उत्पन्न न हो सकेगा जो शास्त्रकारों ने उसका महात्म्य एवं प्रतिफल बताया है। धनुष का चमत्कार उस पर चढ़ाकर चलाये गये बाण से ही उत्पन्न होता है। मनुष्य धनुष है और साधक का व्यक्तित्व बाण। दोनों का स्तर ऊँचा रहे तो ही लक्ष्य बेध की सफलता मिलेगी।
मंत्र साधक को अपना व्यक्तित्व इस स्तर का विनिर्मित करना होता है जिससे जिह्वा से उच्चारण किये गये मन्त्र अक्षरों में प्रयुक्त होने वाली वाणी मात्र ध्वनि न रहकर ‘वाक्’ शक्ति के रूप में प्रकट हो सकें। उसके प्रकट से सूक्ष्म जगत में ऐसी हलचलें उत्पन्न हो सकें जो मन्त्र उद्देश्य के अनुरूप परिस्थिति एवं वातावरण उत्पन्न कर सकने में समर्थ हो सके।
मन्त्र की चमत्कारी क्षमता जिस उच्चारण पर निर्भर रहती है, उसे ‘वाक्’ कहा जाता है। इसमें शब्द का जितना प्रभाव रहता है उससे असंख्य गुना प्रभाव साधक के व्यक्तित्व का रहता है। इसी आधार पर मन्त्रों की विशेषता उभरती है।
मन्त्र साधना में ‘वाक्’ शक्ति को विकसित करने के लिए मन, वचन और कर्म में ऐसी उत्कृष्टता उत्पन्न करनी पड़ती है कि जिह्वा को दग्ध करने वाला कोई कारण शेष न रह जाय। इतना कर लेने के उपरान्त जपा हुआ मन्त्र सहज ही सिद्ध होता है और उच्चारण किया हुआ शब्द असंदिग्ध रूप से सफल होता है। यदि वाणी दूषित, कलुषित, दग्ध स्थिति में पड़ी रहे तो उसके द्वारा उच्चारित मन्त्र भी जल जायेंगे । तब बहुत संख्या में बहुत समय तक जप, स्तवन, पाठ आदि करते रहने पर भी अभीष्ट सत्परिणाम उपलब्ध न हो सकेगा। परिष्कृत जिह्वा में ही वह शक्ति रहती है जिसके बल पर किसी भी भाषा का-किसी भी धर्म सम्प्रदाय का-कोई भी मन्त्र प्रचण्ड और प्रभावशाली हो उठता है। परिष्कृत जिह्वा द्वारा उच्चारित मन्त्र मनुष्यों के अन्तस्तल को- असीम अन्तरिक्ष को-प्रभावित किये बिना नहीं रहता। ऐसी परिष्कृत वाणी को-वाक् को-मन्त्र साधना का प्राण कह सकते हैं। उसे साधक की कामधेनु एवं तपस्वी का ब्रह्मास्त्र कहने में तनिक भी अत्युक्ति नहीं है। इसी को परिमार्जित जिह्वा को ‘सरस्वती’ कहते हैं। मन्त्र का आत्मा वही है। सिद्धियों की उद्गम स्थली उसी को मानना चाहिए।
‘वाक्’ शक्ति की गरिमा की ओर संकेत करने वाले अनेकों ऋचा, प्रमाण तथा शास्त्र वचन उपलब्ध होते हैं।
तीक्ष्णेषवो ब्राह्मणा हेति मन्तो यामस्यन्ति शख्यं न सा मृषा। अनुहाय तपसा मन्युनाचोत् दूरादेव भिन्दत्येनम्-अथर्व 5।18।9
अर्थात्-जिसकी जीभ प्रत्यंचा है। उच्चारण किया हुआ मन्त्र जिसका बाण है। संयम जिसका वाणाग्र है। तप से जिसे तीक्ष्ण किया गया है। आत्मबल जिसका धनुष है, ऐसा साधक अपने मन्त्र बल से समस्त देव द्रोही तत्वों को बेध डालता है।
जिहृ ज्या भवति कुल्मलं वाक् नाडीका दनतास्तपसाभि दग्धाः। तेभिर्ब्रह्मा विध्यति देव्पीयून् ह्नद् वधैर्धनुभिर्देवजूतेः -अथर्व 5।18।9
अर्थात्- आत्म बल रूपी धनुष, तप, रूपी, तीक्ष्ण बाण लेकर तप और मन्यु के सहारे जब यह तपस्वी ब्रह्मवेत्ता मन्त्र शक्ति का प्रहार करते हैं तो अनात्म तत्वों को पूरी तरह बेधकर रख देते हैं।
अस्मानं चिंढ् ये विभिदुर्वचोभिः-ऋग्वेद 4।15।6
उस मंत्र शक्ति ने पत्थरों को भी चूरा बना कर रख दिया।
स योवाचं ब्रह्मेत्वपास्ते यावद्वाचो गतं तत्रास्य यथा कामाचारी भवति -छान्दोग्य 7।2।2
जो वाणी को ब्रह्म समझ कर उसकी उपासना करता है। उसकी गति इच्छित क्षेत्र तक हो जाती है।
वागेब बिश्वा भुबनानि जज्ञे वाच उर्त्सवममृतु यच्च मर्त्यम्-शतपथ
यह ‘वाक्’ ही सृष्टि का मूल तत्व है। यही मनुष्य लोक का अमृत है। इसके द्वारा उच्चारित शब्दों में अद्भुत शक्तियाँ भरी होती हैं।
परिष्कृत चरित्र और चिन्तन के आधार पर साधना की गई वाक् शक्ति की क्षमता असीम है। मंत्राराधन उसी के बलबूते सफल होता है।
‘प्राण’ का अर्थ है-वह जीवन तत्व जो प्रकृत पदार्थों के साथ सम्बद्ध होते हुए प्राणियों के शरीरों से लेकर निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है। इस सम्बन्ध में एक भ्रामक मान्यता यह है कि प्राण सम्भवतः साँस के साथ चलने वाली वायु का नाम है। सम्भवतः यह भ्रम ‘प्राण वायु’ शब्द के प्रचलन से फैला है। वायु में प्राण घुला हो सकता है, पर स्वयं प्राण वायु के सीमा बन्धन में सीमित नहीं है। यों आक्सीजन को भी प्राण वायु कहने का रिवाज है। इस आक्सीजन में जीवन धारण करने वाली क्षमता का संकेत भर है। प्राण को अमुक गैस या वायु में सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता।
जिस प्रकार ‘ईथर’ ताप, विद्युत, प्रकाश विकिरण आदि प्रकृत पदार्थ इस ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं, उसी प्रकार प्राण भी जीवन के रूप में संव्याप्त हैं। उसका परिचय शरीरधारियों में क्रियाशीलता, विचारणा एवं भावनाओं के रूप में कार्यान्वित होते हुए देखा जा सकता है। यह सब कुछ बन्द हो जाय तो समझा जा सकता है कि प्राण निकल गया।
प्राण की व्याख्या करते हुए शास्त्र कहता है- प्राणयति जीवयति इति प्राण।” अर्थात् जो प्राणि मात्र के जीवन का आधार बनकर रहता है वह प्राण है।
वायु और प्राण का परस्पर वैसा ही सम्बन्ध है जैसा शब्द और वायु का। ध्वनि प्रवाह वायु के द्वारा ही होता है। चन्द्रमा पर हवा नहीं है, अस्तु वहाँ दो व्यक्ति अति समीप खड़े होने पर भी परस्पर वार्तालाप नहीं कर सकते। होठ, जीभ आदि सब कुछ चलने और बोलने का पूरा प्रयत्न करने पर भी मुँह से शब्द नहीं निकलेंगे और दूसरे के कानों तक बिना हवा के किसी ध्वनि का पहुँच सकना सम्भव न होगा। रेडियो प्रवाह से बहने वाली विद्युतधारा शब्द को तरंगों में बदल कर सुदूर स्थानों तक ले जाती है और फिर अभीष्ट स्थान पर उसे फिर से शब्द में बदल लिया जाता है वह विज्ञान अलग है। पर सामान्यतया वायु और शब्द की संगति स्पष्ट है। इसी प्रकार वायु के साथ प्राण तत्व के घुले रहने की बात भी स्पष्ट है।
निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त ब्रह्म और प्रकृति के सम्मिश्रण से बनने वाले प्राण की मनुष्य जीवन में अत्यधिक उपयोगिता है। वह शरीर में बलिष्ठता और सुन्दरता के रूप में दृश्यमान होता है। मनःक्षेत्र में उसे साहसिकता, बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता के रूप में देखा जा सकता है। अन्तरात्मा में उसी का आलोक श्रद्धा, सद्भावना और उत्कृष्टता के रूप में विकसित होता है। शक्ति के बल पर ही संसार के सारे क्रिया कलाप चलते हैं। जीवनी शक्ति के बल पर व्यक्तित्व के विकास की संभावनाएं बनती हैं। प्राण इसी जीवनी शक्ति का नाम है। वह शरीर के जिस भी अवयव में-जितनी अधिक मात्रा में विद्यमान रहता है वह उतना ही सक्षम एवं विकसित देखा जाता है। मस्तिष्क में उसकी ज्योति ज्ञान बनकर चमकती है। हृदय में दृढ़ता और पराक्रम उत्पन्न करती है। नेत्रों में प्रतिभा-वाणी में प्रभावशीलता के रूप में उसे देखा जा सकता है। होठों पर मुसकान और ललाट पर आशा की किरणों में उसे प्रकट होते हुए देखा जा सकता है।
प्राण तत्व को अभीष्ट परिमाण में उपलब्ध किया जा सकता है और अपने वर्चस्व को विकसित किया जा सकता है। इसके लिए स्थूल माध्यम में नासिका रंध्र ही होते हैं, पर सूक्ष्म रूप में संकल्प शक्ति का वह चुम्बकत्व काम करता है जिसके आधार पर साँस के साथ प्राण भी अभीष्ट परिमाण में खींच सकना और धारण कर सकना सम्भव हो सकता है।
शरीर यात्रा को चलाते रहने योग्य प्राण तो हर किसी को मिला है। उसे व्यक्तिगत विद्युत, जीवनी शक्ति एवं शक्ति ऊर्जा के रूप में मापा आँका जा सकता है। इस सामान्य से आगे बढ़ कर जब असामान्य मात्रा में उसे ग्रहण और धारण करने की इच्छा होती है तो फिर प्राणायाम विज्ञान का आश्रय लिया जाता है।
प्राणायाम का श्वास-प्रश्वास क्रिया से बहुत थोड़ा सम्बन्ध है। फेफड़ों में अधिक हवा भरना ताकि उनके कुछ भाग जो पूरी साँस न लेने से निष्क्रिय एवं अशक्त पड़े रहते हैं उन्हें क्रियाशील बनाना-गहरी श्वास प्रश्वास क्रिया का प्रधान प्रयोजन है। जल्दी साँस लेने से रक्त संचार की गति में तीव्रता आने से भी थोड़ा लाभ हो सकता है, पर यह सामान्य शारीरिक लाभ है। इन्हें दूसरे व्यायामों में भी किया जा सकता। प्राणायाम की गरिमा का मुख्य कारण यह है कि अखिल विश्व ब्रह्माण्ड में फैले हुए प्राण तत्व (विटल फोर्स) का अधिक मात्रा में आकर्षित करना और उसके द्वारा शरीर और मन के कतिपय शक्ति संस्थानों को समर्थ एवं नियन्त्रित बनाना।
स्वसंचालित श्वास प्रश्वास क्रिया- वेगसनर्व के द्वारा गतिशील रहती है और इस ‘वेगसनर्व’ का सीधा सम्बन्ध अचेतन मन से है। इसे सामान्य इच्छा शक्ति से घटाया, बढ़ाया या रोका, चलाया नहीं जा सकता। इसे प्राणायाम द्वारा आहूत प्राण तत्व ही प्रभावित कर सकता है। कहना न होगा कि इस क्रिया में जितनी सफलता मिलती जाती है उतना ही प्राणतत्त्व का वेगसनर्व के माध्यम से समस्त शरीर पर अधिकार होता चला जाता है। उस सफलता के बाद साँस केवल साँस नहीं रह जाती मात्र वायु का आवागमन और रक्त में से दूषित तत्व छाँटने, निकालने के अतिरिक्त एक नया आधार और मिल जाता है। तब साँस के साथ प्राण तत्व की एक विशेष विद्युत घुली रहती है और उसका प्रभाव किसी भी अंग पर कुछ भी हो सकता है।
स्वसंचालित नाड़ी संस्थान (ओटोनाभिक नर्वस सिस्टम) जो किसी अन्य उपाय से नियन्त्रण में नहीं आता प्राण तत्व का प्रभाव स्वीकार कर लेता है। तब नाड़ी तन्तुओं के सहारे प्राण की एक विलक्षण शक्ति किसी भी प्रत्यक्ष परोक्ष अवयव में भेजी जा सकती है और उससे अभीष्ट प्रयोजन सिद्ध किये जा सकते हैं। शरीर शास्त्री जानते हैं कि शरीर में रहने वाली क्रिया शक्ति से मस्तिष्कीय ज्ञान शक्ति की समर्थता दस गुनी अधिक है और उससे भी दस गुनी अधिक सामर्थ्य स्वसंचालित नाड़ी प्रक्रिया में है। अर्थात् शारीरिक क्षमता की तुलना में स्वसंचालित क्षेत्रों में सौ गुनी सामर्थ्य काम करती है। उसे यदि नियन्त्रण में लेकर इच्छानुसार प्रयुक्त किया जा सके तो मनुष्य सामान्य क्रियाशीलता की अपेक्षा सौ गुनी क्रियाशीलता अपने में विकसित कर सकता है। हारमोन जैसे तत्व जो शारीरिक और मानसिक विकास को जादुई ढंग से प्रभावित करते हैं, अन्य किसी उपाय से भी दवादारू से भी प्रभावित नहीं होते, पर यदि नाड़ी तन्तुओं, श्वास प्रश्वास लहरियों और माँस पेशियों के आकुंचन प्रकुञ्चन द्वारा उन तक प्राण तत्व का प्रभाव पहुँचाया जा सके तो हारमोन, नाड़ी गुच्छक, उपत्यिकाएँ ग्रन्थियाँ, कोशिकाएँ तथा अवयवों की कार्य पद्धतियाँ निश्चित रूप से प्रभावित की जा सकती हैं।
प्राण तत्व को कई बार दैवी शक्ति (कास्मिक एनर्जी) कहा जाता है और कई मानव तत्त्ववेत्ता उसे प्रत्यक्ष जीवन (विजुअल लाइफ) कहते हैं।
प्रत्येक साँस के साथ हम आकाश से हवा ही नहीं खीचते उसके साथ एक विद्युत भी खींचते हैं। यह विशेष विद्युत सामान्य बिजली की तरह जड़ तत्वों के अंतर्गत नहीं आती क्योंकि उसमें जीवन भी भरा रहता है। ऐसा जीवन जो जीवाणुओं की तरह हलचल ही नहीं करता, वरन् उसमें चेतना और विचारणा भी भरी पड़ी है। यह दिव्य विचारकर्ता ईश्वरीय प्रवाह है जो यदि हम उसे ग्रहण कर सकने की स्थिति में हों तो ईश्वरीय सन्देशों तथा उसके द्वारा चल रहे इस जगत या अन्य लोकों में क्रिया कलापों को देखने, सुनने और समझने में समर्थ हो सकते हैं। प्राणायाम हमें प्राण को उन सूक्ष्म तरंगों से
भी सम्बद्ध कर सकता है जिसके माध्यम से विश्व व्यापी हलचलें हो रही हैं। इन सूक्ष्म प्राण तरंगों से सम्बन्ध बनाया जा सके तो इस विश्व के घटना क्रमों तथा व्यक्तियों के आन्तरिक ढाँचों में आश्चर्यजनक हेर फेर प्रस्तुत किया जाना सम्भव हो सकता है।
मोटे तौर पर नाक से साँस खींचने की, छोड़ने की और रोकने की विधि विशेष को प्राणायाम कहते हैं। खींचने को पूरक, रोकने को कुम्भक और छोड़ने को रोचक कहा जाता है। रोकने के दो तरीके हैं-एक साँस को भीतर भर कर रोके रहना जिसे अन्तः कुम्भक कहते हैं। दूसरा साँस को निकाल देने के बाद बाहर की हवा को भीतर प्रवेश करने से रोकना-बिना साँस लिए काम चलाना इस बाह्य कुम्भक कहते हैं। दो प्रकार का कुम्भक और एक एक प्रकार के पूरक रेचक, इस प्रकार प्राणायाम को चार भागों में विभक्त किया जा सकता है। यों यह, चारों ही क्रियाएँ अपने ढंग से स्वतः ही होती रहती हैं और उनका ध्यान भी नहीं रहता। पर जब उसी प्रक्रिया को विशेष क्रम से, विशेष ध्यानपूर्वक, विशेष भावना और उत्कंठा के साथ सम्पन्न किया जाता है तो उसे प्राणायाम कहा जाता है।
प्राणायाम के अनेकों भेद उपभेद हैं। साधारणतया 84 प्राणायाम की चर्चा होती रहती हैं। उनमें से शीतली, सीत्कारी, उज्जयी, भस्त्रिका आदि आठ मुख्य हैं। उनके भिन्न भिन्न विधान, प्रयोजन तथा परिणाम हैं। पर सभी में एक बात समान यह विश्वास विकसित किया जाता है कि नाक के साथ अन्दर प्रवेश करने वाली वायु के साथ प्रचुर परिमाण में प्राण तत्व भरा पड़ा है और वह प्राणायाम क्रिया करते समय उद्दीप्त हुई संकल्प शक्ति के सहारे भीतर खिंचता चला आ रहा है और उसकी प्रतिष्ठापना शरीर के रोम रोम में होती चली जा रही है। यह अभिव्यक्ति जितनी ही प्रखर होगी उसी अनुपात से उभरा हुआ संकल्प संव्याप्त प्राण को अधिक मात्रा में खींचने और धारण करने में सफल हो सकेगा।
साँस खींचते समय प्राण तत्व का प्रचुर परिमाण में खिंचना, रोकते समय उसका रोम रोम में बस जाना, छोड़ते समय अन्तर की विकृतियों को अपने साथ घसीटते हुए ले चलना और ऐसे सुदूर क्षेत्र में फेंक देना जहाँ से फिर लौटने की सम्भावना न हों। यही तीन संकल्प पूरक, कुम्भक और रेचक के साथ साथ किये जाते हैं। संकल्प में जितनी प्रखरता होगी प्राणायाम उतना ही सफल रहेगा। यदि ऐसे ही उथले मन से साँस खींचते, छोड़ते रहा जाय तो उसके क्रमबद्ध होने पर मात्र फेफड़ों का व्यायाम भर हो सकता है। प्राणायाम का वह लाभ नहीं मिल सकता जिसकी साधना विज्ञान में बढ़ी चढ़ी महिमा बताई गई है।
व्यायाम विज्ञान के शरीर के विभिन्न अवयवों की परिपुष्टि के लिए अनेक साधना बताये गये हैं। उनमें से फेफड़े को मजबूत बनाने के लिए गहरी साँस लेने (डीप ब्रीदिंग) का विधान भी है और इसकी शरीर शास्त्रियों ने कई विधियाँ बताई हैं। साधारणतया लोग हल्की साँस लेते हैं और उससे फेफड़ों का मध्य भाग ही प्रभावित होता है। उनके ऊपर नीचे के भागों में थोड़ी सी ही हवा पहुँचती है, अस्तु वहाँ एक प्रकार से निष्क्रियता ही छाई रहती है। जहाँ निष्क्रियता होगी वहाँ स्वभावतः दुर्बलता रहेगी। सफाई का अवसर कम मिलने से वहीं रोग कीटाणुओं के जाम बैठने का अवसर मिलता है। फेफड़े सम्बन्धी रोगों की संख्या तथा स्वरूप अब बढ़ता ही जा रहा है। क्षय, खाँसी, दमा, प्लूरिसी, साँस फूलना, व्रोंकाइटिस आदि रोग फेफड़ों की दुर्बलता के कारण ही बढ़ते हैं और यह दुर्बलता फेफड़ों के पूरे भाग को पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन की कमी तथा समुचित श्रम करने का अवसर न मिलने से उत्पन्न होती है। इस विपत्ति बचने के लिए गहरी साँस लेने के जो तरीके खोजे गये हैं, आरोग्य विज्ञान के क्षेत्र में उन्हीं को प्राणायाम कहा जात है। इस दृष्टि से भी उनकी उपयोगिता है, पर अध्यात्म क्षेत्र में प्राणायाम को जिस आधार पर महत्व दिया जाता है वह जीवनी शक्ति का सम्बन्ध ही है। इसमें अंतरात्मा के विकास का अवसर मिलता है और बढ़ती हुई प्रखरता के आधार पर आत्मोत्कर्ष का वह द्वारा खुलता है जिसमें प्रवेश करने के उपरान्त ही जीवन लक्ष्य को प्राप्त कर सकना सम्भव होता है।
अपने इस धूर्तता के युग में उत्कृष्टता की आड़ में निकृष्टता छिपा कर घात करने की कला का जितना विकास हुआ है, उतनी कदाचित ही और किसी क्षेत्र में उन्नति हुई है। पुराने समय में भी मनुष्य दुष्ट तो रहे होंगे, पर उम्र दुष्टता में धूर्तता मिली हुई नहीं थी। जो शत्रु सो शत्रु- जो मित्र सो मित्र। जो भीतर सो बाहर- जो बाहर सो भीतर। इस मनःस्थिति में वास्तविकता समझने का अवसर मिलता था और मनुष्य सहयोग की अपेक्षा एवं आक्रमण की सतर्कता के सम्बन्ध में अपना मस्तिष्क साफ रखता था। आज की स्थिति इस दृष्टि से भारी उलझन भरा हो गई है। शत्रु भी अपनी शालीनता की रक्षा करेंगे ऐसी आशा नहीं रही। किसी समय सूर्य अस्त होते ही युद्ध विराम हो जाते थे और दोनों पक्ष के सैनिक परस्पर बिना किसी खतरे की आशंका किये परस्पर मिलते-जुलते और जी खोल कर बातें करते थे। सूर्योदय होने के उपरान्त रणभेरी बजती थी। तब परस्पर लड़ते-कटते थे। रात्रि में सभी निश्चिंततापूर्वक गहरी नींद सोते थे।
आज मित्रता की आड़ लेकर शत्रुता बरतने का प्रचलन बढ़ता जाता है। इसे चतुरता, कुशलता समझा जाता है और इस प्रयास में सफल व्यक्ति आत्मश्लाघा भी बहुत करते हैं। साथी को मित्रता के जाल में फँसाकर उसकी बेखबरी का भोलेपन का अनुचित लाभ उठा लेना-यही आज तथाकथित ‘चतुर’ लोगों की नीति बनती जा रही है। असंख्यों की जिन्दगी कुसंग में बर्बाद होती है।
बढ़ती हुई बीमारियों के फैलने से होने वाले दुष्परिणामों को ध्यान में रखते हुए रोकथाम तथा उपचार के उपाय बरते जाते हैं। मित्रता की आड़ में शत्रुता बरतने का छद्म इन दिनों सर्वत्र खतरे की आशंका उत्पन्न कर रहा है। ऐसी दशा में मित्र और शत्रु की कसौटी हर घड़ी साथ रखने की आवश्यकता है। यह कसौटी रामायणकार ने बहुत पहले ही प्रस्तुत कर दी है। इस पर उन सभी को निरन्तर परखते रहना चाहिए जो मित्रता का दावा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी भी प्रकार करते हैं। रामायण मित्र के लक्षण बताते हुए कहती है-
जे न मित्र दुःख होंहि दुःखारी। तिनहिं विलोकत पातक भारी॥
निज दुःख गिरि सम रज करि जाना। मित्र दुःख रज मेरु समाना॥
कुपथ निवार सुपन्थ चलावा। गुन मकर्ट अव गुनहिं दुरावा॥
देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥
विपति काल कर सत गुन नेहा। श्रुति कह सन्त मित्र गुन ऐहा॥
इस उक्ति में (1) मित्र के प्रति उदार सहयोग (2) अपने लाभ उपार्जन में संकोच (3) कुमार्ग का निराकरण (4) सन्मार्ग के लिए प्रोत्साहन (5) गुणों का प्रकटीकरण (6) दुर्गुणों के सम्बन्ध में सार्वजनिक मौन किन्तु एकान्त में भर्त्सना तथा छोड़ने का परामर्श (7) उपयोगी आदान प्रदान (8) सामर्थ्य भर हित साधन (9) विपत्ति काल में संरक्षण । इन सब कसौटियों पर मित्रता की वास्तविकता परखी जाती रहनी चाहिए। पति पत्नी परस्पर सघन मित्र माने जाते हैं। उनकी मैत्री इन सिद्धान्तों के अनुरूप होना चाहिए। मित्र जब अति दीनता, आवश्यकता, कठिनाई का बनावटी बहाना बनाकर समर्थ मित्र के शोषण का जाल बुन रहा हो तब तो अत्यधिक सतर्कता की आवश्यकता है। वस्तुतः सच्चे मित्र लेने की बात सोचते तक नहीं, देने ही देने का चिन्तन और प्रयास उनके मन में चलता रहता है। अधिकार का उपयोग वे नहीं करते मात्र कर्तव्य का पालन करते रहने से ही वे अपनी मित्रता की यथार्थता प्रमाणित करते रहते हैं।
व्यक्ति स्थूल और सूक्ष्म दो भागों में विभक्त है। स्थूल भाग वह है जिसमें शरीर और मन आते हैं। इन्द्रिय समूह इसी के अंतर्गत है। मन भी ग्यारहवीं इन्द्रिय है। मस्तिष्क स्पष्टतः शरीर का ही एक भाग है। इस क्षेत्र की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं को भौतिक कहा जाता है। इनकी पूर्ति औचित्य की सीमा तक आवश्यक भी है। निर्वाह के लिए हर किसी को इस व्यवस्था में भागीदार रहना पड़ता है।
व्यक्ति का दूसरा भाग आन्तरिक एवं आत्मिक है। आत्मा सत् चित् आनन्द है। ईश्वर का अंश होने के कारण उसकी प्रकृति मूलतः उच्चस्तरीय है। उसमें दैवी गुणों का समावेश है। उत्कृष्ट आकांक्षाएँ एवं आस्थाएँ अन्तः करण में जिस मात्रा में विद्यमान रहती हैं, समझना चाहिए कि ईश्वरीय तेजस् यहाँ उतनी ही मात्रा में अवतरित हो रहा हैं। यह आत्मिक पवित्रता जब स्वच्छ दर्पण सदृश बन जाती है तो उसी में आत्म साक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन का पुण्य प्रतिफल प्राप्त होता है।
जीव का एक मात्र लक्ष्य अपूर्णता एवं विकृतियों के भवबन्धनों से मुक्त होकर ईश्वर प्राप्ति के चरम सुख को प्राप्त करना है। पशु प्रवृत्तियों से छुटकारा पाने का नाम ही मुक्ति अथवा मोक्ष है। स्वर्ग के उस परिष्कृत दृष्टिकोण का नाम है जिसमें संकीर्ण स्वार्थपरता के व्यक्तिवादी नरक का कहीं दर्शन भी नहीं होता और पवित्रता एवं परमार्थ परायणता अपनाने वाले को मिलने वाला अनवरत सन्तोष तथा उल्लास मिलता रहता है।
मनुष्य में जहाँ असंख्यों विशेषताएँ हैं वहाँ यह एक दुर्बलता भी है कि वह जैसे वातावरण में रहता है उसी के अनुरूप ढलने लगता है। ऐसे मनस्वी बहुत कम होते हैं जो अपनी प्रचण्ड प्रतिभा से वातावरण को बदल देने में समर्थ होते हैं। वातावरण से स्वयं प्रभावित नहीं होते। सामान्य जन-प्रक्रिया यही है कि व्यक्तित्व दुर्बल सिद्ध होता है और वातावरण उसे अपने रंग में रंगता और ढाँचे में ढालता चला जाता है। बच्चे पहले सुनते हैं फिर उन शब्दों का अर्थ समझने एवं बोलने में सफल होते जाते हैं। भाषा जो अभिभावक बोलते हैं उसी को बच्चा सीख जाता है। धर्म और संस्कृति के बारे में भी यही बात है। जिस वातावरण में पैदा होते हैं यही परम्पराएँ अन्तःकरण में जड़े जमा लेती हैं और स्वभाव का अंग बन जाती हैं। संसार में विभिन्न प्रकार के विश्वासों का प्रचलित होना और लोगों का उन पर कट्टर बने रहना यही सिद्ध करते हैं कि मनुष्य पर वातावरण का कितना गहरा प्रभाव पड़ता है। अनुपयुक्त समझी जाने वाली बातों को अपनाये रहते हैं, और अभ्यस्त बने रहते हैं। इसका कारण औचित्य अपनाने की तुलना में वातावरण के प्रभाव की ही गरिमा सिद्ध होती है।
जीवन लक्ष्य की पूर्ति के लिए उत्कृष्ट, चिन्तन एवं परिष्कृत कर्तृत्व अपनाकर व्यक्तित्व को ‘सुसंस्कृत बनाने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। इसी प्रयोजन की सिद्धि के लिए पूजा, उपासना, जप, तन आदि के विधि-विधान बनाने गये हैं। आत्म-निमार्ण ही ईश्वर प्राप्ति का एक मात्र उपाय है। परिष्कृत आत्मा ही परमात्मा बनकर सामने आ खड़ा होता है। भगवान को लुभाने-फुसलाने की सारी तिकड़म निरर्थक सिद्ध होती हैं। आत्म-शोध नहीं ईश्वर प्राप्ति की महान उपलब्धि का प्रतिफल उत्पन्न करता है।
इसके लिए क्या किया जाय? इस प्रश्न के उत्तर में जीवन साधना की योजना बना कर अपने इर्द-गिर्द ऐसा दिव्य वातावरण बनाना है जिसके संपर्क में जीवात्मा को दिव्य विभूतियों का रस मिलने लगे। होता यह है कि संसार की अवांछनीय गतिविधियाँ ही अपने चारों ओर बिखरी दीखती हैं। जन समूह, वासना, विलासिता, तृष्णा, अहंता को जीवन में सर्वोपरि स्थान देता है। इन्हीं प्रयोजनों के लिए दौड़ धूप करता है। साहित्य और परामर्श भी आमतौर से इसी दिशा में प्रोत्साहन देने वाले मिलते हैं। स्वजनों जोर मित्रों का परामर्श भी यही उद्देश्य लिये होता है कि लोभ, मोह में अधिकाधिक गहराई तक ग्रसित रहा जाय। संग्रह और उपभोग जो जितना कर सकता है दुनिया वालों की दृष्टि में वह उतना ही सफल और सुखी है। प्राचीन काल में लोक मान्यता ऐसी न थी, प्रचलन भी ऊँचे थे और परम्पराओं में भी आदर्शवादिता का समावेश था’, पर अब तो उपयोग और अहंता की तृप्ति के अतिरिक्त कुछ सूझता ही नहीं। आदर्शवाद की डींगें जहाँ-तहाँ हाँकी जाती हैं पर वहाँ भी ढोल में पोल ही भरी रहती है। जिधर भी दृष्टि पसार कर देखते हैं, पतन और प्रलोभनों का ही घटा टोप छाया दीखता है।
वातावरण की इस विषाक्तता का प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है और वह अनजाने ही इस प्रवाह में सम्मोहित की तरह बिना आगा पीछा सोचे बहने लगता है। यही क्रम चलता रहें तो अन्त पतन के गहरे गर्त में गिर पड़ते के रूप में ही हो सकता है। हिमालय के धवल शिखरों से नीचे उतर कर बहने वाली नदियाँ क्रमशः गंदली होती जाती है और अन्ततः समुद्र में गिर कर खारी अपेय बन जाती है। पतन का यही क्रम है। उसी में क्रमशः तीव्रता आती हैं। वही ढर्रा अभ्यास का अंग बन कर मन भावन बन जाता है। न उसमें परिवर्तन करने की इच्छा होती है और न आत्मोत्कर्ष का द्वार खुल पाता है।
पतन क्रम को उत्कर्ष में किस प्रकार परिणय किया जाय ? इस प्रश्न का सुनिश्चित उत्तर एक ही हो सकता है कि वातावरण बदला जाय । हम अपने लिए ऐसी परिस्थितियाँ विनिर्मित करें जो ऊँचा उठाने का आधार बन सकें और उत्कर्षों में सहायक सिद्ध हो सके। कहा जा चुका है कि ऐसा दिव्य लोक, कहीं है नहीं, उसे अपने अनुरूप स्वयं ही विनिर्मित करना होता है। यदि इस प्रयास में सफलता मिल सके तो समझना चाहिए कि लक्ष्य प्राप्ति का पथ-प्रशस्त हो गया। जब तक ऐसी स्थिति न आये तब तक समझना चाहिए कि ओस चाटने और मृग तृष्णा में भटकने के अतिरिक्त और कुछ पल्ले नहीं पड़ने वाला है। किसी के अनुग्रह से यह कार्य जादू की छड़ी घुमाने जैसी क्रिया-प्रक्रिया द्वारा सम्पन्न नहीं हो सकता। अपने लिए दिव्य लोक की परिष्कृत वातावरण का सृजन तो अपने हाथों स्वयं ही करना पड़ता है। ब्रह्माजी ने भी अपनी सृष्टि अपने हाथों ही विनिर्मित की थी। हमें अपने उपयुक्त सृजनात्मक वातावरण से भरा पूरा लोक स्वयं ही बनाना होगा।
कहा जा चुका है कि स्वाध्याय, सत्संग और मनन चिन्तन की चतुर्विधि साधन सामग्री से अपने मनःक्षेत्र को घेरे रहने वाला उपयोगी वातावरण बनता है। इसके अतिरिक्त आत्म बलवर्धक व्यायामों में सर्वसुलभ एवं सर्वश्रेष्ठ उपाय है-ध्यान ध्यान मग्न होकर हम अपना इष्ट आराध्य स्वयं विनिर्मित करते हैं और उसके साथ श्रद्धासिक्त घनिष्ठता स्थापित करके तादात्म्य की दिशा में बढ़ते चले जाते हैं। ध्यान लोक वस्तुतः स्वनिर्मित ऐसा स्वर्गीय नन्दन वन है, जिसका सृजन, संवर्द्धन, परिपोषण हम स्वयं ही करते हैं। इसे परिपक्व बनाते हैं। पत्र, पल्लवों से सजाते हैं और फल फूलों से लदा हुए परम मंगलमय उद्यान के रूप में विकसित कर लेते हैं। इसी में रमण करते समय आनन्द उल्लास की अनुभूति करते हैं और अन्ततः उसी में लय होकर पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करते हैं। ध्यान की परिभाषाएँ इस ऊबड़-खाबड़ बेढंगी-बेतुकी दुनिया को बहुत ऊँची बहुत अच्छी, बहुत सुन्दर, बहुत सुसंस्कृत परिस्थितियों से भरी पूरी एवं नई दुनिया बनाती है। इसे अपना ही प्राण भरना पड़ता है और सुरम्य चित्र की तरह हर्षोल्लास से परिपूर्ण बनाना पड़ता है। ध्यानयोग यदि दिव्य तथ्यों और आदर्शों के अनुरूप सम्पन्न किया जा सके तो समझना चाहिए कि एक ऐसा दुर्ग बना लिया जिसमें बैठकर माया के दुष्ट अनुचरों से सहज ही बचा जा सकता है और अपनी आत्मिक विशिष्टता को सुरक्षित रखा जा सकता है,
ध्यान यों सामान्य जीवन में घर गृहस्थी का-आजीविका का उद्योग का-सुविधा साधनों का एवं अन्यान्य विषयों का अन्तर ही रहता है। ध्यान के आधार पर ही हम वस्तुओं और व्यक्तियों की साज संभाल रख पाते हैं। प्रगति की योजनाएँ बनाने से लेकर जीवनयापन की गतिविधियाँ सम्भालने तक के सारे कार्य इसी आधार पर ही हम वस्तुओं और व्यक्तियों की साज संभाल रख पाते हैं। प्रगति की योजनाएँ बनाने से लेकर जीवनयापन की गतिविधियाँ सम्भालने तक के सारे कार्य इसी आधार पर चलते हैं। किन्तु आध्यात्मिक प्रगति के लिए जो ध्यान किया जाता है उसकी स्थिति भिन्न है। उसके दो चरण हैं, पहला यह कि अपने आपको-संसारी प्रभाव के पृथक् होने ऊँचे उठने की मनःस्थिति बनानी पड़ती है ताकि पशु प्रवृत्तियों से कुछ समय स्वतन्त्र रहने का अवसर मिल सके। घेरा-बन्दी से निकल कर ही आत्म चिन्तन-ब्रह्म वन्दन सम्भव हो सकता है। साधना उपचार में ‘एकान्त’ की चर्चा बहुत होती है उसे आवश्यक माना जाता है। यहाँ एकान्त से मतलब किसी गुफा, कुटी आदि में अकेले रहने से नहीं वरन् संसारी प्रभावों से मुक्त होकर विशुद्ध अध्यात्म लोक में जा पहुँचना है।
ध्यान का दूसरा चरण है दिव्यता का सामीप्य सान्निध्य, ऐसी स्थिति जब गहन हो जाती है और चेतना उसमें रमण करने का रसास्वादन करने लगती है तो फिर समझना चाहिए कि जीवन मुक्ति की- समाधि की-भूमिका बन चली । उच्चस्तरीय तत्वों का दर्शन संसार में तो कभी-कभी ही दिखाई पड़ता है। उन्हें ध्यानावस्था में स्वयं ही विनिर्मित करना पड़ता है। स्वयं ही अपने इस निमार्ण में रस लेना पड़ता है और फिर अन्ततः उसी में आत्मसात् होकर आत्मा द्वारा आत्मा को प्राप्त करने का- आत्मा से आत्मा का उद्धार करने का तत्व दर्शन व्यवहार में उतारना पड़ता है। ध्यान की यही उभय पक्षीय पृष्ठभूमि है। इस आधार पर आत्मा निमार्ण का पुण्य प्रयोजन पूरा करने में अत्यधिक सहायता मिलती है।
स्वर्ग लोक ऊपर है और नरक नीचे। इस पौराणिक मान्यता का यथार्थवादी अर्थ यह है कि उत्कृष्ट चिन्तन के समय का-तथा उसे व्यवहार में लाने की स्थिति का-जो दिव्य आनन्द है उसका महत्व और मूल्य समझा जाय । निकृष्ट चिन्तन एवं घृणित कर्तव्य अधोगामी, दुष्प्रवृत्ति का परिणाम है नरक। उसमें द्वेष, क्रोध, असन्तोष, रोष आदि मानसिक विक्षोभ भरे पड़े हैं। साथ ही मानसिक विपन्नता से शारीरिक रोगों की सृष्टि होती है और व्यवहार में असन्तुलन आ जाने से हर कार्य में असफलता ही मिलती चली जाती है। यही नरक है।
ध्यान को ऊर्ध्वलोक गमन कह सकते हैं। उसमें इष्ट आराध्य होता है उच्चस्तर का। राम, कृष्ण, गणेश, महेश , गायत्री, सरस्वती, सूर्य आदि भगवान का कोई भी रूप क्यों न हो ? उसे उपास्य ठहराकर भाव भरे दिव्य नेत्रों से पूजन अभिनन्दन किया जाता है। यह साकार ध्यान हुआ । निराकार ध्यान में प्रकाश पुँज का ध्यान किया जाता है। शब्द रूप, रस, गन्ध, स्पर्श की सहायता से अन्य प्रकार की दिव्य सम्वेदनाओं का ध्यान करते हैं। कई गुरु चरणों का भी स्मरण करते हैं। यह सब इसी प्रयोजन के लिए होता है कि दिव्य विभूतियों से सुसम्पन्न ईश्वरीय सत्ता के साथ दिव्य लोक में पहुँच कर संपर्क बनाया जाय और उसकी कृपा अनुकम्पा के रूप में उन विशेषताओं को अपने में अवतरित किया जाय।
ध्यान के समय जो भावनाएँ आकांक्षाएँ आस्थाएँ रखी जाती है वे लौकिक नहीं-पारलौकिक आध्यात्मिक उच्चस्तरीय होती हैं। यों संकीर्ण स्वार्थपरता से घिरे बाल बुद्धि व्यक्ति इस उपासना काल में भी तरह तरह की भौतिक कामनाएँ करते रहते हैं और उनकी पूर्ति के लिए देवी देवताओं के सामने गिड़गिड़ाते रहते हैं। ऐसी पूजा पत्री में भी ध्यान योग की मौलिकता में सर्वथा दूर एवं भिन्न ही समझना चाहिए। अन्तःकरण को पशु प्रवृत्तियों से छुड़ाना मानव कहलाने योग्य बनाना और अन्ततः देवोपम स्थिति तक उतनी ही अंतःक्षेत्र की खदान में छिपी हुई रत्न राशि करतलगत होती जाती है। जन साधारण में यह भ्रम है कि साधना की विलक्षणता से जादुई सिद्धि मिलती है। इसमें से एक मध्यवर्ती आधार बिन्दु भुला या हटा दिया जाता है कि सच्ची साधना का प्रत्यक्ष प्रतिफल अतिमानव स्तर का उपलब्ध होता है। साधक महात्मा और देवात्मा बनता है और अन्ततः परमात्मा की भूमिका तक जा पहुँचता है यही आत्मोत्कर्ष का सुनिश्चित पथ है। ऐसा कभी हुआ ही नहीं व्यक्ति गुण, कर्म स्वभाव की दृष्टि से तो हेय स्तर का बना रहे पर पूजा पाठ की किन्हीं क्रिया प्रक्रियाओं को अपनाकर अपने में दिव्य विभूतियाँ एवं चमत्कारी सिद्धियाँ उत्पन्न कर ले। बीज बोने से पौधा पौधे को विकसित होने पर फल। यह सनातन नियम है। बीज से सीधे फल निकलते कहीं नहीं देखे जाते। साधना बीज है। परिष्कृत व्यक्तित्व उसका पौधा । इसी के परिपुष्ट होने पर आत्मोत्कर्ष की वे उपलब्धियाँ मिलती हैं, जिनके आधार पर जीवन सच्चे अर्थों में धन्य बनता है।
ध्यान के सहारे जीवन के चरम लक्ष्य की प्रतिष्ठापना की जाती है, उसे मान्यता दी जाती है और उसी में भक्ति भाव के साथ तन्मय समर्पित हो जाने की तैयारी की जाती है। राम भरत का मिलन, दीपक पर पतंगे का समर्पण यज्ञ कुण्ड में घृत वसोधरा, सूर्य के सम्मुख जल अर्घ्य जैसे ध्यान करते हुए दिव्य सत्ता के साथ तादात्म्य होने की-सर्वतोमुखी आत्म समर्पण की मनः स्थिति बनाई जाती है। यह सारा सरंजाम इसलिए है कि अन्तःचेतना की भव बन्धनों की जकड़न ढीली करने और दिव्य वातावरण के साथ अपना संपर्क बनाने का अवसर मिले। जितना रस वासना और तृष्णा की पूर्ति में आता है उतना ही यदि उत्कृष्टता और आदर्शवादिता में आने लगे तो समझना चाहिए साधना का उद्देश्य पूरा होने लगा। भारी चीजों को उठा कर ऊपर पहुँचाने का कार्य ‘क्रेन’ करती है। पशु प्रवृत्तियों की जकड़न से-लोभ मोह की विषमता से- ऊँचा उठ सकना माया ग्रस्त प्राणी के लिए अति कठिन है। इस कठिनाई को, समानान्तर सन्तुलन बनाने से ही हल किया जा सकता है। ध्यान लोक का सृजन इसी उद्देश्य के लिए किया जाता है कि वह दृश्य जगत में निरन्तर उठने वाली विकृतियों के दुष्प्रभाव से टक्कर ले सके। पतनोन्मुख रीति नीति अपनाये रहने से स्वभाव उसी ढाँचे से ढल जाता है, आदतें वैसी ही बन जाती हैं, आकांक्षायें वैसी ही उठती हैं और क्रिया ही अभ्यस्त ढर्रे पर लुढ़कती रहती है। इस प्रवाह को रोकने के लिए बाँध बनाने का कार्य ध्यानयोग से ही सम्भव होता है। अस्तु ध्यान की गरिमा अध्यात्म क्षेत्र में सदा से बताई, गाई जाती रही है। उसे सही ढंग से तात्त्विक पृष्ठभूमि पर आरम्भ किया जा सके तो समझना चाहिए जीवन को सच्चे अर्थों में सार्थक बनाने वाला एक अति महत्वपूर्ण आधार करतलगत हो गया।
बच्चों से कोई उत्तर न बन पड़ा तो उन्होंने उसकी बराबर एक बड़ी लकीर खींच दी और कहा-लो अब यह छोटी हो गई। इसके बाद उन्होंने बड़ी को मिटा कर उसके स्थान पर छोटी लकीर खींच दी और कहा देखो कुछ समय पहले जो छोटी थी वह बड़ी हो गई।
लकीरों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बच्चों को समझाया यदि तुम किसी से बड़े बनना चाहते हो तो उसे मिटाने की जरूरत नहीं है। अपने को उससे अधिक श्रेष्ठ बनाओ स्वयं ही बढ़ जाओगे किन्तु यदि पिछड़े रहे तो सामने वाले के कारण नहीं-अपनी ही क्षुद्रता की वजह से छोटे और घटिया दिखाई दोगे।
कुछ भौतिकवादी मानसिक उपचारकों का विचार है कि काम प्रवृत्ति मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति होने से, उसके प्रकाशन और तृप्ति की प्रक्रिया में तब तक रोक नहीं लगाई जानी चाहिए, जब तक कि उससे समाज के किसी अन्य घटक को कोई क्षति या पीड़ा न पहुँच रही हो। उनकी मान्यता है कि कामोत्तेजना का दमन स्नायविक तनाव का कारण बनता है और इससे विभिन्न शारीरिक मानसिक रोगों की उत्पत्ति होती है।
इस संदर्भ में अनेक ऐसे लोगों का परीक्षण किया गया जो कि बुद्धि और हृदय से काम-वासना सम्बन्धी उपरोक्त मत को ही सत्य मानते थे और स्वयं डाक्टर थे तथा शरीर की भली-भांति जानकारी रखते थे। पाया यह गया कि उच्छृंखल काम-सेवन या कि काम-चिन्तन से इन लोगों को भी शारीरिक थकावट, निराशा, चिन्ता वृद्धि, शंकालुता के अकारण उदय आदि से ग्रस्त-त्रस्त होना पड़ा। अधिक समय तक इसी में लगे रहने वाले ऐसे डाक्टरों को भी औरों की तरह ‘न्यूरेस्थेनिया’ का रोग हो गया। “साइकालाजी एण्ड मारल्स” नामक पुस्तक में मनोविज्ञानवेत्ता प्रोफेसर हेडफील्ड ने लिखा है कि स्वच्छन्द यौनाचरण का परामर्श देना, व्यक्ति को विनाश के मार्ग में ले जाने की विधि है।
तब क्या यह सही नहीं है कि काम-वासना का दमन रोगों को जन्म देता है? वस्तुतः सही यह है कि जब किसी तरह के भय के कारण काम-वासना दमित की जाती है, तो वह मात्र चेतन मन में दमित होती है । अचेतन मन में उसकी आग धधकती ही रहती है और वह काम कुटेवों तथा शारीरिक-मानसिक विकृतियों के रूप में फूटती है।
एक ओर-काम-क्रीड़ा के प्रति जब व्यक्ति मन में प्रबल पाप-भावना घर कर लेती है और दूसरी ओर अचेतन मन के प्रशिक्षण की विधियाँ जाने बिना मन की स्वाभाविक कामोत्तेजनाएँ बार-बार उभरकर उद्विग्न-उद्वेलित करती रहती हैं, तो एक प्रचण्ड संघर्ष का जन्म स्वाभाविक हैं। इस संघर्ष के बावजूद अनियन्त्रित-अप्रशिक्षित मन में कामोद्वेग तो उठेगा ही, इससे आत्मग्लानि की भावना उत्पन्न होने लगती है। साथ ही दमन की अस्वाभाविक आकांक्षा दुराग्रही और हठी बनती की स्थिति होती है। परिणाम स्पष्ट है-क्षति स्वयं की ही होती है। दमित भावना अचेतन मन में चली जाती हैं, और असामान्य यौन-रोगों तथा शारीरिक-मानसिक विकृतियों का कारण बनती है।
किशोरावस्था में ऐसा हो जाता है कि अपनी किसी तरुण विरुद्ध लिंग सम्बन्धी के प्रति आकर्षण में काम वासना का समावेश हो जाये। मन की नैतिक मान्यताएँ जब इस हेतु स्वयं को धिक्कारती हैं, तब व्यक्ति इन भावनाओं का दमन करने लगता है। इससे सर्वप्रथम स्वप्नदोष आदि के रूप में ये दमित भावनाएँ फूटती हैं। फिर स्वप्नदोषों के प्रति भी यदि अस्वाभाविक भय ग्रन्थियाँ मन में घर कर गई हों, तो हीन भावना की वृद्धि होती जाती है, चित्त की एकाग्रता नष्ट हो जाती है और शक्तियों का बिखराव दिनानुदिन असफलता का बोध कराता है। मन में हताशा, कुंठा और पराजय की वृत्तियाँ घनीभूत एवं प्रचंड होती जाती है।
काम कुटेवों का भी यही परिणाम होता है। काम कुटेव का अर्थ है-सामान्य विधि एवं पात्र को छोड़कर, किसी अस्वाभाविक विधि तथा अनुपयुक्त पात्र द्वारा यौनेच्छा की सन्तुष्टि। परपीड़क काम-क्रीड़ाएँ, काममूलक आत्मप्रपीड़न प्रदर्शन स्पर्श विचित्र वेष धारणा या विवस्त्र प्रियता, इतरेतर वस्त्र प्रियता, सयौनवृत्ति से लेकर अत्यन्त घृणित तथा वीभत्स रूपों में विभिन्न काम चेष्टाएँ करना, यौन सन्तुष्टि की भ्रान्ति से प्रेरित हो अकरणीय कर्म और अचिन्त्य तक काम कुटेवों के विचित्र विकृत रूपों की पराकाष्ठा शवयौनवृत्ति, कामैषणा-हत्याएँ (लस्ट मर्डर) तथा पशुयौनवृत्ति आदि रूपों में देखी जाती है।
मात्र भर्त्सना से काम कुटेवों से मुक्ति असम्भव है। यह भर्त्सना गुरुजनों परिजनों प्रियजनों या समाज द्वारा की जाये अथवा स्वयं अपने ही द्वारा। अपराध के बोध से भर्त्सना का भाव जगे, तो प्रायश्चित स्वरूप अपराधी वृत्ति से मुक्ति का संकल्प ही प्रबल हो उठे तथा इस संकल्प को क्रियान्वित करने की अपनी शक्ति पर आस्था हो, यही श्रेयस्कर और सही मार्ग है। यही आत्म सम्मान भी है। आत्मसम्मान से ही संयम की शक्ति आती है। समय द्वारा प्रतिगामी बन रही मनःशक्तियों को पुरोगामी, प्रगतिशील बनाया जाता है। यदि आत्मनिन्दा और आत्मधिक्कार की ही भावना घर करती जाए, तो इच्छाशक्ति क्षीण होती जाती है। इच्छाशक्ति की दुर्बलता मनुष्य में विभिन्न रोगों के उद्भव और विकास का कारण तथा आधार बन जाती है। मात्र चेतन मन के स्तर पर उपचार के प्रयास से रोग दूर नहीं हो पाते। चेतन मन में उभरी वृत्तियाँ तो हमारे संस्कारों के दर्पण में उभरे प्रतिबिम्ब मात्र हैं। परिष्कार का क्षेत्र तो वह संस्कार जगत ही है।
यह सही है कि कामवासना के दमन से विकृतियाँ ही पनपती बढ़ती हैं। लेकिन यह ‘काम’ की प्रचण्डता का नहीं, ‘मन’ की ही प्रचण्डता का परिणाम है।
हमारी स्वसंचालित गतिविधियों का सूत्र संचालन अचेतन मस्तिष्क से ही होता है। आकांक्षाओं के वेग को हठात् रोकने अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों के भावात्मक आघातों या अपमान के अनुभवों से अचेतन मन में कई तरह के अवरोध विकार उत्पन्न होते रहते हैं। “काम” सम्बन्धी आकांक्षा से उत्पन्न विकृतियाँ भी इसी का एक अंग हैं।
काम को मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों में से एक मान लेना एक हास्यास्पद भ्रान्ति ही है। युग ने फ्रायड की इस स्थापना पर कि “मानवीय इच्छाएँ-चेष्टाएँ प्रधानता काम वासना से प्रेरित निर्देशित है’, अपनी टिप्पणी यह की थी कि-फ्रायड का यह कथन, अन्तः करण और व्यवहार के बीच की एक धुँधली सी परत की चर्चा भर है। यह मन की वास्तविक स्थिति नहीं, उसकी काली कुरूप छाया मात्र है। मन में अनेक लहरें उठती रहती हैं। क्रिया प्रतिक्रिया की इन्हीं तरंगों में एक कामवासना की तरंग भी है। उसे चेतना की मूल प्रेरणा मानना भ्रान्ति ही है।”
मनोविज्ञान में किसी व्यक्ति की ही स्थापना को प्रमुखता देने वाले व्यक्तियों के भी मन का विश्लेषण अनिवार्य है। आज मनोविज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है; फिर भी अपनी आन्तरिक कुरूपता दुर्बलता को गरिमा मंडित करने की निर्लज्ज चेष्टा में निरत लोग फ्रायड की उक्त स्थापना की ही दुहाई दिए चले जाते हैं, जबकि स्वयं फ्रायड ने जीवन के अन्तिम दिनों में अपनी कई मान्यताओं का परिशोधन परिमार्जन किया था। हाव्स, एडम स्मिथ, मैक्ड्रगल, जेम्स, किल पेट्रिक, ड्रेवर, थार्नडाइक, वुडवर्थ आदि ने मूल प्रवृत्तियों का भिन्न भिन्न रीति से विभाजन किया है। बेब्लोनस्की का कथन है कि “मनुष्य की मूल प्रवृत्तियाँ अनन्त आकाश के समान गुणातीत हैं।”
‘जीन्सवर्ग’ ने कहा है कि-मूल प्रवृत्तियाँ मनुष्य के अपनी और आकर्षित तो करती हैं, किन्तु वे ऐसी प्रचण्ड कदापि नहीं होती कि रोकने मोड़ने पर कोई अनर्थमूलक विग्रह खड़ा कर दें।”
अपनी पुस्तक “साइकोलॉजी एण्ड साइकोथेरेपी” में डा0 विलियम ब्राउन ने कहा है- “रियलिटी’ समय से परे है। वह समय से बाहर नहीं, समयातीत है। ‘रियलिटी’ की यह कालातीत होने की विशेषता ही हमें वह ‘स्वतन्त्रता’ देती हैं, जिसके कारण हम अपनी मूल-प्रवृत्तियों को नियन्त्रित कर सकते हैं। भौतिक विज्ञान की शब्दावली से मूल प्रवृत्तियों के नियन्त्रण की बात समझ में ही नहीं आ सकती। जहाँ तक भौतिक विज्ञान की वर्तमान पहुँच है, वहाँ तक ‘डिटर्मिनिज्म’ बिल्कुल सही है, उसके अनुसार मूल प्रवृत्ति का प्रकाशन अनिवार्य है। इसमें अन्यथा हम कुछ नहीं कर सकते। लेकिन ‘रियलिटी’ दिक्कालातीत है और स्वरूप आध्यात्मिक (या चेतनात्मक स्प्रिचुअल) है। हम इसी ब्रह्माण्ड-व्यापी चेतना के अंश हैं और इसी रूप में हम स्वतंत्र हैं। मनुष्य की इच्छाशक्ति स्वतन्त्र है, पर कैसे है, यह निरी भौतिक-विज्ञानी विधियों तथा शब्दावलियों द्वारा हम न समझ सके हैं, न कभी समझ सकेंगे
काम-कुटेवों समेत समस्त स्वेच्छाचारिता की प्रेरणा अचेतन मन से होती है। अचेतन मन पर अधिकार पाने के लिए इच्छा-शक्ति की महत्ता तथा स्वरूप को समझना आवश्यक होता है। हमारी सचेत मन का विस्तार इससे बहुत अधिक है।
स्नेह-प्रेम अभाव तथा जीवन में विफलता के गहरे बोध से व्यक्ति की जीवनी-शक्ति का प्रभाव सहज नहीं रह जाता और वह विकृत रूपों में व्यक्त होता है। यह विकृति चेतन मन के समक्ष जब पहली बार आती है, तो व्यक्ति की नैतिक मान्यता उसे सहन नहीं कर पाती और उसे ग्लानि होती है। यह ग्लानि संकल्प से जुड़ने पर सृजनात्मक हो सकती है। दिशा-निर्देश के अभाव में यह आत्मविश्वास हीनता को जन्म देती और इच्छाशक्ति से विकृतियाँ रुकती नहीं बढ़ती ही जाती हैं।
कामावेश जन्य विकृतियों से बचने के लिए एक उपाय यह भी सुझाया जाता है कि नैतिक मान्यताएँ ही इसके स्वच्छन्द प्रकाशन को अनुचित ठहराती तथा ग्लानि उत्पन्न करती हैं, अतः उन्हें ही ध्वस्त कर दिया जाये। किन्तु नैतिक मान्यताएँ इतनी मामूली वस्तु नहीं। वे हमारी प्रगतिशीलता का आधार हैं। वे विवेकपूर्ण हों, तभी नैतिक मानी जाएँगी और विवेक से उत्पन्न नैतिक मान्यताओं की अस्वीकृति का अर्थ है विवेक की अस्वीकृति । विवेक के बिना व्यक्ति विचित्र गतिविधियों का पिटारा मात्र बनकर रह जाएगा। उसे किसी भी कार्य में न तो बौद्धिक आस्वाद प्राप्त होगा, न ही हार्दिक उल्लास । तब जीवन में आनन्द की भी स्पष्ट अनुभूति न हो सकेगी ।
नैतिक मान्यताओं का क्षेत्र अध्यात्म का क्षेत्र है। वे मात्र नियन्त्रण नहीं, प्रेरक-निर्देशक भी हैं। उनके बिना जीवन में किसी भी क्षेत्र में सार्थक क्रियाशीलता ही सम्भव न हो सकेगी। यह बात भारतीय विचारकों ऋषियों को अनादिकाल से स्पष्ट ज्ञात है। मनु ने कहा है -
“ध्यानिक ‘सर्वमेव एतद् यद् एतद्-अभिशब्दितम् न हि अनघ्यात्मवित्कश्चित् क्रियाफलं उपाक्षुते॥
अर्थात्-यह सम्पूर्ण ‘दृश्य जगत्’ आत्मा के ध्यान से ही प्रयोजित है। इसीलिए जो अध्यात्म को नहीं जानता, वह किसी भी क्रिया का सत्परिणाम नहीं प्राप्त कर सकेगा।’
अतः आवश्यकता काम वासना के दमन की नहीं, शमन का है। शमित काम शक्ति को पुण्य प्रयोजनों में नियोजित करने पर ही प्रचंड पुरुषार्थ सम्भव हो पाता है। मनुष्य की विभिन्न मनःशक्तियों का उत्कर्ष काम शक्ति के नियन्त्रण तथा संचय से ही हो पाता है। काम का अर्थ है विनोद, उल्लास, आनन्द। मैथुन उसका एक अत्यल्प, नगण्य सा अंग या माध्यम हो सकता है, अनिवार्य नहीं। मन ने इसे ही स्पष्ट किया है-
“अकामस्य क्रिया काचित्, दृश्यते नेह कर्हिचित्। काम्यो हि वेदाधिगमः, कर्मयोगश्च वैदिकः॥”
अर्थात्-काम रहित जीव की कोई क्रिया कदाचित कहीं देखने में नहीं आती। वेदाध्ययनादि सभी कुछ काम्य या इच्छा प्रेरित ही हैं।
अग्नि और सोम का प्राण तथा रयि का ऋणात्मक तथा धनात्मक विद्युतप्रवाह समन्वित होकर सृष्टि संचरण को अग्रगामी बनाता तथा उल्लास का निरन्तर विस्तार करता है। यह आनन्दोल्लास काम में शमित, शान्त सौम्य स्वरूप और शक्ति के सदुपयोग द्वारा ही उपलब्ध होता है। आवश्यकता ‘काम’ के अस्वाभाविक हठात् दमन को नहीं विकार और व्यभिचार के स्रोतों को बन्द करने की है। ताकि उस महाशक्ति का संगीत साहित्य, कला, के रूप में विकसित किया जा सके। धर्म से अविरुद्ध काम को गीता में भगवान ने अपना स्वरूप बताया है। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष इन चार फलों में एक काम भी है। अस्तु उसे घृणित नहीं कहा जा सकता। इस बात की भी आवश्यकता नहीं कि उसे निरन्तर धिक्कारने और दबाने में ही लग रहा जाय। विवेक का नियन्त्रण भर रखने से काम चलाऊ हल निकल आता है और उच्छृंखलता की सीमा तक बढ़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती। किन्तु इस ‘महाशक्ति को निरर्थक भी क्यों जाने दिया जाय? उसे परिष्कृत किया जाना चाहिए। उल्लास के रूप में परिणत करने के कितने ही सौम्य प्रयोजन हैं, जो हमें हास-विलास विनोद, क्रीड़ा कौतुक के रूप में न केवल आनन्द देते हैं वरन् उत्साह, साहस और कौशल की वृद्धि भी करते हैं। काम भावना को इसी दिशा में परिष्कृत किया जा सके तो वह न तो विनाशकारी बनेगी और न अनैतिक रहेगी। उसे जीवन का उत्कृष्ट और आनन्दित बनाने के लिए बुद्धिमत्ता पूर्ण रीति से मोड़ा जाय तो वह हर दृष्टि से लाभदायक सिद्ध होगा।
दो सहोदर भ्राता। पर स्वभाव में जमीन आसमान का अन्तर। बड़ा भाई धार्मिक विचारों के प्रति निष्ठावान् और दूसरा दुर्व्यसनों का दास। दोनों ही एक मुनि के पास पहुँचे। मुनि थे भूत और भविष्य की जानकारी रखने वाले। मुनि को प्रणाम कर पास से बिछे आसन पर बैठ गये।
मुनि ने आशीर्वाद दिया और बताया कि एक माह बाद बड़े भाई को फाँसी की सजा मिलेगी और छोटे भाई को राज सिंहासन। यह तो दोनों ही जानते थे कि मुनि की वाणी कभी भी असत्य को स्पर्श नहीं करती। अतः बड़े भाई ने अपने जीवन के शेष दिन प्रभु चिंतन और शुभ कार्यों में लगाने का निश्चय किया। प्रत्येक क्षण का उपयोग बड़ी कृपणता के साथ करता।
छोटा भाई वेश्या गामी, शराबी और जुआरी था। उसने अपने हिस्से की सारी पूँजी इन दुर्व्यसनों में ही लगा दी थी। पत्नी और बच्चों के पालन पोषण की उसे तनिक भी चिन्ता नहीं थी। कभी वेश्या के कोठे पर दिखाई देता तो कभी मदिरालय में झूमता हुआ दिखता। उसने सोचा एक माह बाद तो राजसिंहासन मिल ही जायेगा। उस समय जनता के सम्मुख अपना आदर्श रखने के लिए यह सारी बुराइयाँ छोड़नी ही पड़ेंगी। अब थोड़ा समय है तो क्यों न ऐश और आराम से जिन्दगी बिताई जाए? महीने का अन्तिम दिन था। बड़ा भाई सुबह मन्दिर में पूजा करने गया हुआ था। जैसे ही मन्दिर की सीढ़ियों से नीचे उतरा कि उसके पैर में अचानक काँटा लग गया। पूजा की थाली उसने अलग रख दी और बैठकर काँटा निकालने लगा। काँटा काफी अन्दर घुस गया था। बड़ी कठिनाई से निकला, खून भी छलका आया। सोचने लगा अभी तो सन्ध्या दूर है। सबेरे ही यह शूल घुस गया।
छोटे भाई ने वह रात वेश्या के यहाँ ही बिताई थी। वह बड़ा प्रसन्न था कि आज तो राजसिंहासन मिलने का योग है। वह कोठे से जल्दी जल्दी उतर रहा था। जैसे ही सड़क पर आया उसे एक मैली कुचैली थैली दिखाई दी। उसमें एक सहस्र स्वर्ण मुद्रायें मिलीं।
शाम हो गई। बड़े भाई को न फाँसी की सजा मिली और न छोटे भाई को राजगद्दी। छोटा भाई झुँझला उठा। सुबह ही अपने बड़े भाई को लेकर वह जहाँ साधु ठहरे हुए थे, पहुँच गया।
मुनि को अभिवादन कर छोटे भाई ने कहा-महाराज सन्तों की वाणी कभी व्यर्थ नहीं जाती। एक माह का समय निकल गया न मुझे राजगद्दी मिली और न अग्रज को फाँसी? इसका क्या रहस्य है?’ मुनि बोले तुम दोनों ने एक माह की अवधि में पाप और पुण्य के फल को घटा दिया है। बड़े भाई ने अपना पूरा समय आत्म चिन्तन और लोक मंगल के कार्य में लगाया जिससे उसकी शूली शूल मात्र रह गई। और छोटे भाई ने दुष्कार्यों के परिणाम स्वरूप राजगद्दी के लाभ को सवर्ण मुद्राओं तक सीमित कर दिया’
जन्म के समय हमारी बन्द मुट्ठियों में भौतिक दृष्टि से क्या होता है? कुछ नहीं। फिर वह कौन सी ज्योति है, जो एक शिशु अपने नन्हे से हृदय में धारण किए इस संसार में विनोद उल्लास की अभिवृद्धि करता रहता है। एक ही ज्योति, ऊष्मा की एक ही किरण उसके पास होती है, आशा, उल्लास और आत्म विश्वास की। शिशु की सक्रियता देखते ही बनती है।
पर बड़े होने पर वही व्यक्ति, सही स्वस्थ दृष्टिकोण एवं समुचित प्रशिक्षण के अभाव में, जहाँ एक ओर महत्त्वाकाँक्षाओं के नाम पर ऊँची कल्पनात्मक उड़ानों का अम्बार लगा लेता है, वहीं दूसरी ओर काल्पनिक चिन्ताओं के भयंकर नागों और प्रचण्ड महासर्पिणियों को पाल पोसकर उनकी वंश−वृद्धि करता जाता है।
अधिकांश व्यक्ति अधिकतर समय किसी न किसी चिन्ता के तनाव से व्यग्र बेचैन रहते और तड़पते रहते हैं। चिन्ता सदा बड़ी या विशेष बातों को ही लेकर नहीं होती। कई बार, तो बहुत ही मामूली, छोटी छोटी बातों को लेकर लोग चिन्ता पालते रहते हैं। मन तो है, जैसा अभ्यास डाल दिया जाए, बेचारा वफादार नौकर की तरह वैसा ही आचरण करने लगता है। जब अपनी चिन्ता नहीं होती, तो पड़ोसियों के व्यवहार विश्लेषण और छिद्रान्वेषण द्वारा चिन्ता के नए नए आधार ढूँढ़ निकाले जाते हैं। या फिर समाज के बिगड़ जाने, लोगों में भ्रष्टाचार फैल जाने, खाद्य पदार्थों में मिलावट की प्रवृत्ति बढ़ने, दो लड़के लड़कियों द्वारा अन्तर्जातीय प्रेम विवाह कर लेने, मुहल्ले की किसी बारात की व्यवस्था ठीक न होने, किसी नवविवाहित दम्पत्ति का ‘पेयर’ ठीक न होने आदि की गम्भीर चिन्ताएँ, प्रसन्नता और एकाग्रता को चाट जाने के लिए पर्याप्त ही सिद्ध होती हैं। मोटर में बैठे हैं, तो चिन्ता लगी है कि कहीं मोटर के सामने से आ रहे किसी ट्रक या बस की भिड़ंत न हो जाए, अथवा चालाक निद्राग्रस्त न हो जाए, वायुयान में जा रहे हैं, तो चिन्ता हो गई है कि कहीं यह विमान सहसा नीचे न गिर जाए।
धर्म पत्नी किसी से सहज सौम्य वार्तालाप कर रही है, तो पति महोदय को चिन्ता हो गई है कि कहीं यह व्यक्ति इस वार्तालाप को अपने परिचितों के बीच गलत रूप में न प्रचारित करे। या कि पत्नी कहीं उससे मेरी बुराई न करती हो अकेले में। कहीं धर्मपत्नी स्वभाव से मितभाषी हुई, तो चिन्ता है कि लोग इसे मूर्ख या घमण्डी न समझ बैठे। इसी तरह पति महोदय कार्यालय से देर से आए तो पत्नी चिंतित है कि कहीं मेरे प्रति इनका प्रेम घट तो नहीं रहा। ऐसे भी लोग हैं, जिन्हें उनके परिचित यदि व्यस्तता में या कि अन्यत्र ध्यान दिए होने के कारण किसी दिन नमस्कार करना भूल जाए, तो उन्हें चिन्ता होने लगती है कि कहीं मेरे प्रति इसकी भावना तो परिवर्तित नहीं होगी
है तो चिन्ता एक काल्पनिक उड़ान मात्र। किन्तु व्यक्ति उसे यथार्थ की तरह मानकर तनाव और भय से भर उठते हैं। यह बैठे ठाले अपने शरीर संस्थान को एक अनावश्यक श्रम में जुटा देने तथा कष्ट में फँसा देने वाली क्रिया है। इसके परिणामस्वरूप सर्वप्रथम होता है अपच। क्योंकि उदर संस्थान स्वाभाविक गति से कार्य नहीं कर पाता। फिर अनिद्रा, सिर दर्द, सर्दी जुकाम आदि का जो क्रम प्रारम्भ होता है वह हृदय रोग तक पहुँचकर दम लेता है। मनःशक्ति के अपव्यय से एकाग्रता और मनोबल का ह्रास होता है, स्मरणशक्ति शिथिल होती जाती है, और जीवन में विषाद ही छाया रहता है।
चिन्ता करने का अभ्यस्त मन सोते में देखे गए चित्र विचित्र स्वप्न दृश्यों का मुफ्त के सिनेमा के रूप में आनन्द लेना तो दूर, उनकी अजीबोगरीब व्याख्याएँ ढूँढ़ता पूछता रहता और अन्धविश्वास संत्रास तथा मतिमूढ़ता कि एक निराली ही दुनिया रचता रहता है वह हताश और भयभीत रहता है तथा अपनी वास्तविक क्षमता का एक बड़ा अंश अनायास ही गँवा बैठता है । विपत्तियों के सामना करने में, शत्रुओं से संघर्ष में जो शक्ति व्यय की जाने पर सफलता और आनन्द प्रदान करती, वह काल्पनिक भय के दबाव से क्षत-विक्षत होती है। ऋण पाटने के लिए, किए जाने वाले पुरुषार्थ में यदि वही शक्ति नियोजित की गई होती, जो कर्ज के भार से लदे होने की चिन्ता में बहायी जा रही है, तो मस्तक ऊँचा होता और चित प्रफुल्ल। चोर-लुटेरों की, काल्पनिक विपदाओं की चिन्ता व्यक्ति की शक्ति को निगलती रहती है। असफल रह जान की चिन्ता भी कई लोगों को मृत्यु के समान दुःखदायी प्रतीत होती है। वे इस सामान्य तथ्य को भुला बैठते हैं कि असफलता और सफलता तो सभी के जीवन में आती-जाती रहती हैं।
अपने दुराचरण और अपराध पर तो ग्लानि स्वाभाविक है। पर उसकी भी चिन्ता करते रहने से मनःक्षेत्र में कुंठा और विषाद की ही वृद्धि होगी। आवश्यक है वैसे आचरण की अपने भीतर विद्यमान जड़ों को तलाश कर उन्हें उखाड़ फेंकना तथा प्रायश्चित के रूप में समाज में सत्प्रवृत्ति के विस्तार में अपना योगदान देना, कोई सृजनात्मक विधि अपनाना जिससे मन का वह भार हल्का हो सके।
चिन्ता सदैव भय उत्पन्न करती और आत्मविश्वास का हरण करती है। भविष्य में आने वाली कठिनाइयों, उपस्थित होने वाले अवरोधों- उपद्रवों आ पड़ने वाली विपत्तियों- प्रतिकूलताओं और प्राप्त होने वाली विफलताओं को कल्पना-जल्पना आशंका-कुशंका चित्र-विचित्र रूप धारण कर व्यक्ति को भयभीत करती और साहसहीन बनाती रहती है। आत्मविश्वास नहीं रहे, तो अपने को ही प्राप्त सफलताओं तक का स्मरण नहीं जुट पाता, जबकि प्रगति-पथ पर अग्रसर होने के लिए आत्मविश्वासजन्य साहस की सर्वोपरि आवश्यकता है। चिन्तन तो अनिवार्य है। किसी रास्ते या कार्य-विशेष को चुनने के पहले उसके सभी पहलुओं पर भली-भांति चिन्तन, मनन करना आवश्यक है, पर निर्णय लेने के बाद अभीष्ट प्रयोजन के लिए तत्परतापूर्वक जुट जाना होता है। चिन्ता का तब अवकाश ही नहीं रहना चाहिए। चिन्ता तो निष्क्रियता की उत्पत्ति भी है और उत्पादक भी। चिन्ता से विक्षुब्ध मन, शक्ति का कितना ह्रास करता है, यह यदि लोग जान जाए तो कभी भी उद्विग्नता और तनाव की जननी चिन्ता को प्रश्रय न दें। अधिकाँश लोग प्रतिकूल परिस्थितियों में चिन्ताग्रस्त होकर हताशा के गहन अन्धकार के विवर्तों, में फँसकर अपना सब कुछ गँवा बैठते हैं। किन्तु मनस्वी, विवेकी व्यक्ति ऐसी विषम स्थितियों में अधिक साहस और सक्रियता के साथ आगे बढ़ते हैं तथा विजय प्राप्त करते हैं। आशा और उल्लास मनुष्य-जीवन के चिरन्तन सुरभित पुष्प हैं। चिन्ता की काली छाया से इन्हें कुम्हलाने न देने पर ही मानव-जीवन सुगन्धित - प्रमुदित रह सकता है और अन्यों से भी सुरभि-सुषमा वितरित कर सकता है।
चिन्ता इस सुरभि-सुषमा को समाप्त कर डालती है इसलिए चिन्ता को चिता से भी बढ़कर कहा गया है। चिता यों मृत्यु के पश्चात् जलाती है पर चिन्ता-ज्वाला जीवित व्यक्ति को ही जलाना आरम्भ कर देती है। मस्तिष्क चिन्ता से झुलस कर निस्तेज और धंआ से भरा रहता है। उसे चारों ओर धुँआ-धुँआ ही नजर आता है, ज्योति और उल्लास तो कहीं दिखता ही नहीं।
एक जर्मन मनोवैज्ञानिक ने चिन्ताग्रस्त लोगों का सर्वेक्षण किया। ज्ञात हुआ कि मात्र 8 प्रतिशत चिन्ताएँ ऐसी थीं, जिन्हें वजनदार कहा जा सकता था। 10 प्रतिशत ऐसी थीं, जो थोड़े प्रयास से सुलझ गईं। 12 प्रतिशत स्वास्थ्य सम्बन्धी सामान्य चिन्ताएँ थीं, जो सामान्य उपचार से ही सुलझ गईं। 30 प्रतिशत ऐसी थीं, जो थीं तो वर्तमान से ही सम्बन्धित 40 प्रतिशत चिन्ताएँ काल्पनिक समस्याओं और आशंकाओं से सम्बन्धित थीं।
ओसा जान्स का कथन है- यदि मैं सतत् सृजनात्मक चिन्तन एवं कर्म में संलग्न रहने की विधि न सीख पता तो औरों की तरह मुझे भी चिन्ता में घुल-घुलकर मरना होता । “
व्यस्तताओं-विषमताओं से भरे संसार में चिन्ता के झोंके यदाकदा आते रहते हैं, पर उन्हें कभी भी चित पर अपना प्रभाव अंकित नहीं करने देना चाहिए। मानव -जीवन एक सुरम्य उद्यान है।
इसमें आनन्द-उल्लास की सुन्दर कोमल सम्वेदनाओं के रूप में रंग-बिरंगे पुष्पों की नहीं है। इन हँसते-मुस्कराते फूलों को चिन्ता की ज्वाला से झुलसने से बचाए रहने की कला का अभ्यास सभी को करना ही चाहिए।
पृथ्वी को सूर्य से कितना अनुदान मिलता है यह सभी जानते हैं। रोशनी और गर्मी के साथ साथ जीवन भी उसी केन्द्र से बरसता है। यह सूर्य और पृथ्वी का सम्बन्ध टूट जाय तो यहाँ सर्वत्र निर्जीविता, निस्तब्धता और अंधतमिस्रा के अतिरिक्त और कुछ शेष न रह जाएगा । न केवल सूर्य से वरन् असंख्य ग्रह नक्षत्रों के साथ पृथ्वी के भौतिकी आदान प्रदान चलते हैं। हम साँस लेते और छोड़ते हैं। साँस के साथ साथ अनावश्यक कचरा बाहर फेंकते रहते हैं। पृथ्वी भी इसी प्रकार साँस लेती और ब्रह्माण्ड से अति महत्वपूर्ण अनुदान समेटती है। इसके लिए उसका नासिका भाग ध्रुव है। उत्तरी ध्रुव से यह अनुदान उपलब्ध होते हैं। इसमें से जो आवश्यक अंश है वह ग्रहण-धारण कर लिया जाता है और कचरा दक्षिणी ध्रुव से होकर अन्तरिक्ष में फेंक दिया जाता है। ध्रुव प्रदेशों को अति महत्वपूर्ण क्षेत्र माना गया है। यदि वहाँ तनिक सा भी हेर फेर होने लगे तो उसका प्रभाव सारे भू-मण्डल पर पड़ेगा। अभी भी ध्रुव प्रदेश की यात्रा करने वाले वहाँ की परिस्थितियों को अति विचित्र बताते हैं और कहते हैं वहाँ की तुलना साधारण भू-क्षेत्र करने पर प्रतीत होता है कि धरती पर ही कोई जादुई प्रेतलोक बसा हुआ है।
मानवीयता के दो ध्रुव प्रदेश हैं। उत्तरी मस्तिष्क का मध्य ब्रह्मरन्ध्र। दक्षिणी-जननेन्द्रिय मूल में अवस्थित मूलाधार। सामान्यतया हृदय, मस्तिष्क, जिगर, गुर्दे आदि महत्वपूर्ण अवयव माने जाते हैं, पर विशेष निरीक्षण से ऊर्ध्व लोक ब्रह्मरन्ध्र और अन्धःलोक- काम बीज की महिमा अधिक गरिमामयी दृष्टिगोचर होती है। इन्हीं दो केन्द्रों के माध्यम से लघु का विराट् से सम्बन्ध बनता और अति महत्वपूर्ण आदान प्रदान का सिलसिला चलता है। इस क्रम में यदि अवरोध उत्पन्न हो जाय तो घुटन जीवन को न तो सन्तुलित रहने देगी और न सम्भव। सूक्ष्म सता पर विश्वास करने वाले इस परिस्थिति को भली प्रकार जानते हैं। स्व उपार्जित रक्त, माँस से निर्वाह का ढर्रा तो लुढ़कता है, पर महत्वपूर्ण क्षमताएँ तो आदान प्रदान के आधार पर ही उपलब्ध होती हैं। पृथ्वी सूर्य से आदान प्रदान न कर सके तो उस एकाकीपन से-स्वावलम्बन से-कैसी विभीषिका उत्पन्न हो जायगी, इसकी कल्पना करने मात्र से सिर चकरा जाता है।
मस्तिष्क की तीक्ष्णता के सहारे प्राप्त होने वाली उपलब्धियों से सभी परिचित हैं। बुद्धिमान सुशिक्षित व्यक्ति हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त करते हैं। इस तथ्य से परिचित होने के कारण लोग शिक्षा साधना से मुक्त हस्त से धन और समय लगाते हैं। मस्तिष्क के अन्तराल में उसका नाभिक-न्यूक्लियस-ब्रह्मरंध्र है। जिसके सहारे न केवल मस्तिष्क का स्तर प्रभावित होता है, वरन् सूक्ष्म जगत के साथ वैसे ही आदान प्रदान का द्वार खुलता है जैसा कि पृथ्वी का सूर्य एवं अन्यान्य गृह नक्षत्रों के साथ चलता है।
मानवी काया की धुरी ब्रह्मरंध्र स्थित जिस अति सूक्ष्म केन्द्र नाभिक में सन्निहित है उसे सहस्रार चक्र कहते हैं। यह अपने क्षेत्र को- मस्तिष्क को प्रभावित करता है, उसके स्तर का निर्धारण करता है साथ ही ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ संपर्क बनाकर आदान प्रदान का पथ प्रशस्त करता है। भौतिकी ऋद्धियाँ और आत्मिकी सिद्धियाँ जागृत सहस्रार के सहारे निखिल ब्रह्माण्ड से आकर्षित की जा सकती हैं। वृक्ष अपने चुम्बकत्व से वर्षा को आकर्षित करते हैं। धातु खदानें अपने चुम्बकत्व से सजातीय धातु कणों को खींचती और जमा करती रहती हैं। सहस्रार में जैसा भी चुम्बकत्व हो उसी स्तर का अदृश्य विश्व वैभव खिंचता और एकत्रित होता रहता है। यही जीवन का अदृश्य उपार्जन उसके स्तर एवं व्यक्तित्व का सूक्ष्म निर्धारण करता है। चेतन और अचेतन मस्तिष्कों द्वारा जो इन्द्रियजन्य और अतीन्द्रिय ज्ञान उपलब्ध होता है उसका केन्द्र यही संस्थान है। ध्यान से लेकर समाधि तक और आत्म-चिन्तन से लेकर भक्तियोग तक की समस्त आध्यात्मिक साधनाएँ यहीं से फलित और विकसित होती हैं। ओजस्, तेजस् और ब्रह्मवर्चस् के रूप में पराक्रम, विवेक एवं आत्मबल की उपलब्धियों का अभिवर्धन यहीं से उभरता है।
इस तथ्य को पौराणिक गाथाओं में ब्रह्मलोक, विष्णुलोक और शिवलोक के रूप में अलंकृत चित्रित किया गया है। ब्रह्माजी प्रलय जलराशि में-कमल पुष्प पर, विष्णु क्षीर सागर में शेष शैया पर और शिव मानसरोवर में कैलाश पर्वत पर विराजते हैं। ब्रह्म के कमलासन में सहस्र पंखुड़ियाँ हैं। विष्णु सहस्र फन वाले शेषनाग पर सोये हैं। शिव के शरीर पर सहस्र सर्प और सान्निध्य में सहस्र भूतगण रहते हैं। इन अलंकारों में मस्तिष्क स्थित सहस्रार चक्र का ही चित्रण है। खोपड़ी के मध्य भरा हुआ हृइट और गेर मैटर ही क्षीर सागर, कैलाश, दिव्य सागर है। सर्प, कमल, भूतगणों का सहस्र की संख्या युक्त होना मस्तिष्कीय नाभिक सहस्रार चक्र समझा जाता है। उसी पर त्रिदेव अपने अपने ढंग से विराजते हैं। ब्रह्मसत्ता की उपस्थिति अवस्थितियों यों तो समूची काया में है, पर पूरी लाइन में दौड़ने वाली बिजली का नियन्त्रण करने वाले ‘प्लक’ की तरह इस सहस्रार चक्र को माना जा सकता है। इस केन्द्र को ब्रह्म बीज, ज्ञान बीज आदि के नाम से भी पुकारा जाता है।
दूसरा महत्वपूर्ण केन्द्र दक्षिणी ध्रुव के समतुल्य जननेन्द्रिय मूल में अवस्थित ‘काम बीज’ है। इसी को साधना शास्त्र में मूलाधार चक्र कहा गया है। इसकी उपयोगिता और गरिमा अपने स्तर की है। मस्तिष्क ज्ञान की और काम बीज सामर्थ्य का उद्गम है। आत्मिक बल ऊपर है और भौतिक बल नीचे। भावनाएँ, विचारणाएँ, आस्थाएँ ऊपर से उतरती है। ऊर्ध्व केन्द्र को ब्रह्म का-अधः केन्द्र को प्रकृति का-संपर्क द्वार कह सकते हैं। अपने-अपने स्तर के आदान-प्रदान इन्हीं केन्द्रों से सम्भव होते हैं।
ऊर्ध्व क्षेत्र ग्रहण करता है और अधःक्षेत्र विसर्जन। शिरो भाग में मुख है जिससे अन्न जल ग्रहण किया जाता है। नाक है, जिसमें से साँस ग्रहण की जाती है। कान सुनते, नेत्र देखते हैं। इनसे मस्तिष्क की ज्ञान सम्पदा बढ़ती है। यह शिर भाग ग्रहणकर्ता होने के कारण उत्तरी ध्रुव है। उसकी धुरी सहस्रार में है।
अधःक्षेत्र से विसर्जन होते प्रत्यक्ष देखा जाता है। मल, मूत्र, वीर्य का क्षरण इसी क्षेत्र से होता है। कामुकता यहीं से उठती है और मस्तिष्क की सरसता का प्रलोभन देकर अपने चंगुल में जकड़े रहती है। विवाह सन्तान का ताना बाना इसके चरखे कंधे पर तैयार होता है। इन्हीं दो प्रयोजनों में जीवन सम्पदा का अधिकाँश भाग खर्च हो जाता है। दक्षिणी ध्रुव से विसर्जन प्रक्रिया काम केन्द्र द्वारा किस प्रकार होती हैं यह प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। ओजस् का दिव्य उपार्जन शरीर में होता है उसे क्रमशः अधिक सूक्ष्म और विकसित करते रहा जाय तो मानसिक तेजस् और आत्मिक वर्चस् की अभिवृद्धि करते करते मनुष्य प्रचण्ड पराक्रमी हो सकता है, पर वे सभी दिव्य विभूतियाँ इसी काम क्षेत्र के उभारो में होकर अस्त व्यस्त हो जाती हैं। शारीरिक और मानसिक ब्रह्म-अस्त-व्यस्त हो जाती हैं। शारीरिक और मानसिक ब्रह्मचर्य साधन और इस संचय को कलात्मक एवं भावनात्मक दिव्य प्रयोजनों में लगा कर मनुष्य क्या नहीं बन सकता? किन्तु क्षरण के कारण तो वह खोखला ही बनता जाता है। सामान्य निर्वाह तक में कमी कठिनाई पड़ती है, तब महत्वपूर्ण प्रगति के लिए साधन सामग्री कैसे जुटे?
काम केन्द्र का यह एक अद्भुत चमत्कार है कि वहाँ से नये मनुष्य का जन्म अवतरण सम्भव होता है। प्राणियों उत्पादक परमात्मा है, पर जब जीव को अपने ही समतुल्य नया जीव बनाते देखा जाता है तो जी चाहता है कि उसे भी सृष्टा कहा जाय? अपने शरीर में से अपने जैसे नये नये शरीर बना कर खड़े करते जाना अनोखे किस्म का जादू है। जादूगर अपनी झोली, हथेली, मुख आदि से अन्य वस्तुएँ तो निकालते हैं, पर अपने जैसा मनुष्य निकाल सकना उनमें से किसी के लिए भी सम्भव नहीं हो सका। यह जादू मनुष्य काया में स्थित काम केन्द्र का ही है जो ऐसा अद्भुत उत्पादक सम्भव बना देता है।
काम केन्द्र मात्र रति प्रेरणा ही नहीं उभारता। उसमें कला, सौंदर्य, उत्साह, उल्लास, साहस जैसी अनेकों सृजन सम्वेदनाएँ उफनती रहती हैं। नपुंसक शब्द एक प्रकार की गाली माना जाता है। ऐसे व्यक्ति राजकीय सेवा में स्वास्थ्य की दृष्टि से ‘अनफिट’ कर दिये जाते हैं। सेना, पुलिस जैसे साहसिक कार्यों में उनको प्रवेश नहीं मिलता। श्राद्ध और यज्ञ का संचालन करने में नपुंसक आचार्यों को बहिष्कृत ठहराया गया है। गीता में कृष्ण ने अर्जन को ‘क्लीव’ कहकर प्रकारान्तर से गाली ही दी थी। अध्यात्म क्षेत्र की नपुंसकता, नीरसता, निराशा, निष्क्रियता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इन प्रवृत्तियों में उभार या उतार की स्थिति बनने के लिए काम केन्द्र की स्थिति को उत्तरदायी माना गया है। सन्तानोत्पादन से लेकर सृजनात्मक क्षमताओं तक सम्बन्ध इसी केन्द्र से जुड़ता है। ऐसे ऐसे अनेकों तथ्य मिलाकर यह सिद्ध करते हैं कि भौतिकी क्षमताओं और सफलताओं की दृष्टि से काम संस्थान का-मूलाधार चक्र का कितना महत्व है। जीव विकास विज्ञानियों ने तो प्रगति प्रेरणाओं को मनोविज्ञान के क्षेत्र में ‘सेक्स’ संज्ञा दी है। यहाँ रति कर्म को नहीं उत्साह और आनन्द के समन्वय को ही ‘सेक्स’ संज्ञक कहा गया है।
काम बीज का प्रत्येक मूलाधार और ज्ञान बीज का प्रतिनिधि सहस्रार चक्र है। इन्हें मानवी सता के दो अति महत्वपूर्ण शक्ति केन्द्र कहा जा सकता है। यहाँ तक बात विशेष रूप में स्मरणीय है कि इन्हें शरीर शास्त्र के अनुसार कोई प्रत्यक्ष अवयव नहीं मानना चाहिए यह सभी सूक्ष्म शरीर में रहने वाली सत्ताएँ हैं। स्थूल शरीर में-सूक्ष्म शरीर से मिलते जुलते अवयव पाये जाते हैं और उनके सहारे स्थूल एवं सूक्ष्म शरीरों के बीच आदान प्रदान भी होते रहते हैं। इतने पर भी दोनों के अस्तित्व एक दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। रक्त संचार की थैली भी हृदय है और सहृदयता एवं हृदय हीनता के रूप में विद्यमान अन्तरात्मा भी हृदय कहलाती है। हृदय गुफा में व्यान करने के लिए कहा गया है। यह हृदय रक्त शोधक थैला नहीं, वरन् सूक्ष्म शरीर में अवस्थित विशिष्ट चेतना केन्द्र है। ठीक इसी प्रकार मूलाधार एवं सहस्रार को प्रत्यक्ष शरीर का कोई अवयव विशेष नहीं मानना चाहिए। हाँ, उनसे मिलते जुलते अवयवों का अस्तित्व किसी औंधे-तिरछे रूप में अवश्य पाया जा सकता है। उनका इतना ही महत्व है कि उन्हें झकझोरने से अधिष्ठात्री सूक्ष्म शक्ति को किसी कदर प्रभावित किया जा सकता है। साधना प्रयोजनों में इन अवयवों से भी कुछ न कुछ काम लिया जाता है। प्रगति पथ प्रशस्त होने में इससे सहायता भी मिलती है।
कुण्डलिनी जागरण में मूलाधार और सहस्रार में अवस्थित भौतिक एवं आत्मिक शक्तियों के पारस्परिक शिथिल सम्बन्ध को सघन बनाया जाता है। दोनों के बीच आदान प्रदान की गति तीव्र की जाती है। इन दोनों सरोवरों के बीच सम्बन्ध मार्ग है-मेरुदण्ड इसी को महा मार्ग कहा गया है। महा प्रयाण की, ऊर्ध्वगमन की देवयान प्रक्रिया यही है। पाण्डवों के स्वर्गारोहण को-- इसी प्रयास का अलंकारिक कथा प्रसंग कहना चाहिए।
पतित लोग अधोगामी, नर्कगामी होते हैं। यह पौराणिक मान्यता इस तथ्य को प्रतिपादित करती है कि प्रगति का अर्थ ऊर्ध्वगमन है और पतन को अधोगमन कहा जाता है। मूलाधारगत शरीर चेतना साधन शक्ति जब ऊर्ध्वगमन की इच्छा करती है तो उसे सहस्रार की ओर उठाना, चलना पड़ता है। काम बीज का ज्ञान बीज में परिवर्तन, विसर्जन, समर्पण करने की प्रक्रिया ही आत्मिक प्रगति का-लक्ष्य प्राप्ति का-एकमात्र मार्ग है।
इस आत्मिक उत्कर्ष के अनेकों मार्ग हो सकते हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता के भव बन्धनों को शिथिल रहने और तोड़ने का प्रत्येक प्रयास इसी स्तर का माना जाएगा । जिन विचारों, योजनाओं और गतिविधियों में आदर्शवादी सिद्धान्तों को अपनाने की बात बनती हो उन्हें आत्मोत्कर्ष की साधना का एक स्वरूप माना जा सकता है। ऐसे ही अनेक प्रसंगों में एक वैज्ञानिक परिपाटी कुण्डलिनी जागरण की भी है। इसमें शरीर विज्ञान और मनोविज्ञान दोनों के महत्वपूर्ण आधार जुड़े हुए हैं। भौतिकी और ब्रह्म विद्या के दोनों तत्वों का इसमें समान रूप से समावेश है।
जीवसत्ता सामान्यतया शरीराध्यास में डूबी रहती है। इसी वस्तुस्थिति का चित्रण कुण्डलिनी ज्ञान में इस प्रकार किया गया है कि मूलाधार क्षेत्र में एक महासर्पिणी किसी लिंग प्रतीक से साढ़े तीन लपेटे मार कर सोई हुई है। उसका मुख नीचे की ओर है और उससे विष झरता है। यह लिंग कन्द-संसार का आकर्षण है। जीव-सत्ता सर्पिणी है। वह आत्मबोध के सम्बन्ध में प्रसुप्त स्थिति में पड़ी है। न उसे अपने स्वरूप का ज्ञान है न लक्ष्य का । मोह मदिरा पीकर वह अज्ञान की मूर्च्छा से ग्रसित हो रही हैं। साड़े तीस फेरो में तीन तो वासना, तृष्णा और अहंता के पूरे हैं। बीच-बीच में कभी-कभी आत्म-कल्याण की बात भी हलके फुलके ढंग से उभरती हैं । अन्तरात्मा की यह पुकार पूरी तरह कोई भी कुचल नहीं सकता । वह अपनी माँग करती ही रहेगी। भले ही उसे पग-पग पर अनसुनी किया जाता रहे । यही है आधा लपेट जिसे मिलकर साड़े तीन फेरे बनते हैं। सप्त-प्रसुप्त कुण्डलिनी का मुख नीचे की ओर अधःपतन की ओर है। हमारी निकृष्ट आकांक्षाएँ और प्रवृत्तियाँ आत्म-कल्याण से नीचे ही धकेलने वाली बन गई हैं। शक्तियों का क्षरण-अधोमुखी बना हुआ है। वीर्यपात से लेकर अर्र्रन्य कार्य भी उठाने वाले नहीं , गिराने वाले ही बने हुए हैं। उनके दुष्परिणाम विष तुल्य होते हैं। जीवसत्ता की दुर्गति का चित्रण प्रसुप्त सर्पिणी के रूप में किया गया है तो यह उचित ही है। हमारी सत्ता इस विश्व वसुधा में सर्पिणी के समतुल्य ही हेय बनकर रह रही है। हमारे उत्पादन विष तुल्य ही हैं। विष बीज बोने और विषाक्त प्रदूषण फैलाने वाली ही तो अपनी जीवन प्रक्रिया बन रही है। मोह-मदिरा पीकर उन्मत्त बने दुर्भाग्यग्रस्त मनुष्यों की तरह ही अपनी स्थिति बनी हुई है।
कुण्डलिनी जब जागती है तो प्रसुप्ति छोड़ती है। लपेटे खोल देती है। तन कर खड़ी हो जाती है। मेरुदण्ड मार्ग से ऊपर की ओर चढ़ना प्रारम्भ करती है। उसके मुख से विषाक्त दुर्गन्ध के स्थान पर अमृतमयी सुगन्ध के श्वास निकलने लगते हैं। यह दृश्य आत्मोत्थान की ओर उन्मुख होने का है। कुण्डलिनी मेरुदण्ड मार्ग से ऊपर चलती है और सहस्रार अवस्थित महासर्प से जा लिपटती है। इसे शिव-पार्वती विवाह की कथा-गाथा के रूप में समझाने का प्रयत्न किया गया है। सती - शिव से विमुख होकर पिता घर गई थी और खिन्न होकर अग्निकुण्ड में जल मरी थीं । यह आत्मा का परमात्मा से विमुख होकर नारकीय यातनाओं के कुण्ड में जल मरना है। स्थिति बदलती है। सती नया जन्म पार्वती के रूप में लेती हैं। तप करती हैं और शिव की अर्धांगिनी बन जाती हैं। यह जीवसत्ता का योग तप की साधना अपनाकर अपना पात्रता को विकसित करना और ऊर्ध्वगामी बनकर परमात्मा में समन्वित हो जाने का विकास क्रम है। कुण्डलिनी जागरण साधना का तत्त्वदर्शन इन कथनों के माध्यम से अधिक अच्छी तरह समझा जा सकता है।
समुद्र मंथन की कथा भी प्रकारान्तर से कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया का ही दिग्दर्शन है। जो समुद्र मथा गया था वह यह अपना खारी पानी वाला सागर नहीं, वरन् अग्नि समुद्र- शक्ति समुद्र था। उसका मंथन देव असुर सहयोग से हुआ था। अपना निज का जीवन अथवा यह विशाल संसार ऐसा ही दिव्य समुद्र है जिसे अन्तरंग एवं बहिरंग पुरुषार्थों के सहारे मथा जा सकता है। निष्क्रिय व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में कुछ नहीं पा सकते । लड़ने-झगड़ने में मात्र बर्बादी ही है। मिल-जुलकर सृजनात्मक प्रयत्नों में संलग्न होने पर अनिष्ट मनोरथ पूरे किये जा सकते हैं। यही समुद्र मंथन या जीवन मंथन है। हमारी भौतिक और आत्मिक रुचियाँ भिन्न दिशाओं को चलती हैं। उनमें सहयोग होना तो दूर उलटा विग्रह चलता रहता है। देवासुर संग्राम लम्बे समय तक चलता रहा है और उससे दोनों ही पक्ष हानि उठाते रहे हैं। दोनों का सहयोग सम्भव हुआ तो परिस्थितियाँ ही बदल गई और सृजनात्मक प्रयोग के रूप में समुद्र मंथन का आधार खड़ा हो गया। हमारी भौतिक शक्तियाँ आध्यात्मिक आस्थाओं का सहयोग करने लगें तो गतिविधियों का स्वरूप ऐतिहासिक महामानवों जैसा बन सकता है। फलस्वरूप एक से एक बड़ी उपलब्धियाँ सामने आ सकती हैं। समुद्र मंथन से अमृत, कौस्तुभ मणि, ऐरावत, धन्वन्तरि, लक्ष्मी जैसे उपहार उपलब्ध हुए थे। मानवीसत्ता भी उच्चस्तरीय पुरुषार्थ के फलस्वरूप, स्वास्थ्य, सन्तोष, उल्लास, सन्तुलन, यश, वैभव, सहयोग, सम्मान, नेतृत्व, स्वर्ग, मोक्ष जैसे श्रेष्ठ जीवन को धन्य बना देने वाले अनुदान प्राप्त कर सकती है।
समुद्र मंथन की कथा में जीव की वस्तुस्थिति और कुण्डलिनी जागरण साधना से उसकी प्रगति सद्गति का अच्छा−खासा चित्रण है। कूर्म अर्थात् भगवान्-पैर समेटे गई ’गुजरी स्थिति में सबसे नीचे। मंथन के लिए लाया गया मंदराचल पर्वत उनकी पीठ पर। मथने के कार्य में प्रयुक्त होने वाली वासुकी सर्प की रज्जु। देवता और असुरों द्वारा उसका मंथन। यही है समुद्र मंथन का दृश्य चित्र। हमारे दैनिक जीवन में ईश्वर का स्थान सबसे नीचे है। वह कुछ करा सकने की स्थिति में नहीं है। कछुए की तरह सिकुड़ा-सिमटा ज्यों-त्यों करके मानवीसत्ता का भार वहन कर रहा है। मंदराचल- वैभव। मदिरा (मादक) अचल (संग्रहित)। अपना धन, वैभव, उद्धत अहंता की तृप्ति में तथा अचल (संग्रह) करने के लिए प्रयुक्त होता है। वासुकी सर्प-विषधर जीव। साड़े तीन लपेटों से मंदराचल के साथ लिपटा है और दोनों दिशाओं में देव-दानवों द्वारा घसीटें के कारण दुर्दशाग्रस्त हो रहा है। हड्डी-पसलियों का कचूमर निकला जा रहा हैं। इस चित्रण में हम अपनी दुर्दशा का चित्र तथा भावी प्रगति का उपाय आभास देखने का दुहरा लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
जीवन-क्रम में संव्याप्त जड़ता को - पशु-प्रवृत्तियों के अभ्यस्त प्रवाह को निरस्त किया जाना चाहिए। चिंतन में समुद्र मंथन जैसी प्रखरता उत्पन्न की जानी चाहिए। प्रसुप्ति को जागृति में - मूर्छना को क्रान्तिकारी परिवर्तन में परिणत करने की आवश्यकता है। जीवन मंथन कर डाला जाय काया-कल्प के लिए कटिबद्ध हुआ जाय । पशु-प्रवृत्तियों से छुटकारा पाकर देवयान के पथ पर चलने का साहस जुटाया जाय तो अपने लिए भी समुद्र मंथन से उपलब्ध हुए बहुमूल्य रत्नों की तरह अति महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ करतलगत हो सकती हैं। व्यामोह की, प्रलोभनों की, उन्मादों की सनकें यदि अन्तः चेतना पर छाई ही रही । अन्तर्द्वन्द्वों में क्षमता का अपव्यय होता रहा तो इस जीवन व्यापार में कमाया कुछ न जा सकेगा। जो पूँजी साथ लेकर आये थे वह भी गँवा कर ऋण भर लाद कर वापिस जाना पड़ेगा। इस स्थिति से बचने के लिए जीवन मंथन आवश्यक है। क्रान्तिकारी परिवर्तन अभीष्ट है। समुद्र मंथन की कथा को मंथन प्रक्रिया-कुण्डलिनी जागरण पद्धति के साथ सहज भाव से जोड़ा जा सकता है।
कामनाएँ भावनाओं में परिणत होने के लिए संकल्प करती हैं तो उनकी स्थिति गंगा के समुद्र में विलय होने की आतुरता जैसी वन जाती है। हिमालय से निकल कर गंगा आतुरतापूर्वक समुद्र मिलन के लिए लम्बा मार्ग पार करती हुई दौड़ती है। कुण्डलिनी को गंगा-मेरुदण्ड मार्ग को प्रवाह पथ और सहस्रार को समुद्र कहा जा सकता है। अपने प्रियतम को पाकर गंगा ने अशान्ति से छुटकारा पाया और महान् से मिलकर महान् बन गई । आत्मसत्ता कामनाओं के काम बीज से निकल कर सुविस्तृत जीवन -यात्रा में असंख्यों की शान्ति तृप्ति प्रदान करती हुई परमात्मसत्ता में जा मिलती है। यही काम बीज का और ज्ञान बीज का, मूलाधार और सहस्रार का मिलन है। यह महा मिलन सम्भव होने पर नर-नारायण बनता है और आत्मा की स्थिति परमात्मा जैसी बन जाती है। इसी लक्ष्य प्राप्ति को सरल सम्भव बनाना कुण्डलिनी जागरण साधना का उद्देश्य है।
हमारे तनाव तीन तरह के होते हैं -शारीरिक (मस्क्यूलर) मानसिक (मेन्टल) और भावनात्मक (इमोशनल) इन्हें ही आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक ताप कहते हैं।
दीर्घ काल तक लगातार एक ही प्रकार का और अत्यधिक श्रम करने से ‘प्रस्क्यूलर टेन्शन’ होता है। इसके मुख्य कारण दो हैं-अनिच्छापूर्वक काम करना (2)मैं परिश्रम कर रहा हूँ। (या कर रही हूँ), यह भावना होना। यदि मनुष्य ‘श्रम किया, की यह भावना, इस रूप में कि मैंने बहुत श्रम किया , भूल जाए, तो वह तीन घण्टे का विश्राम तथा एक या दो बार भोजन कर लगातार 20 घण्टे से अधिक काम कर सकता है ।
”मस्क्यूलर टेन्शन” -अधिक सोने , दिन चढ़े तक सोते रहने, अधिक खाने और व्यायाम नहीं करने से भी होता है। तामसिक भोजन भी तनाव ले आता है।
‘मस्क्यूलर टेन्शन’ -दूर करने का सरल तरीका योगासन है। मनुष्य काम करते-करते जब थक जाता है, तो अंगड़ाई लेता है। लिखते-लिखते हाथ दुखने लगे, तो हाथ को झटकारता है, विपरीत स्थिति लेता है। एक काम को छोड़कर दूसरा काम करता है - मन बहलाने का प्रयास करता है, पर मनोविनोद के प्रचलित साधनों से वस्तुतः न तो ‘मस्क्यूलर टेन्शन’ दूर होते न ‘मेन्टल’ और न ‘इमोशनल,।
मेन्टल टेन्शन ‘ बहुत अधिक सोचने से होता है। सोचना सिर्फ वही चाहिए , जिस विषय में सोचना जरूरी हो। परन्तु प्रायः सभी मनुष्य काम की बातें बहुत ही कम तथा बेकार ऊल-जलूल या कि जिनसे वर्तमान का कोई सम्बन्ध ही नहीं ऐसी बातें बहुत अधिक सोचते रहते हैं। पिछली बातों और घटनाओं पर हम बहुत अधिक सोचते हैं। किसी से लड़ाई हो गई , किसी ने गाली दे दी, कोई दुर्घटना हो गई कि बस,सोचना चालू। यह सोचना सर्वतः व्यर्थ होता है। सोचने से मानसिक तनाव पैदा होता है। अत्यधिक मानसिक तनाव बढ़ जाने पर “मेन्टल रिटार्डेशन” (मस्तिष्कीय शक्ति का सुन्न-सा हो जाना होता है।) इन दिनों दुनिया में “मेन्टल रिटार्डेशन” के लाखों मामले प्रकाश में आ रहे हैं। शारीरिक तनाव रात्रि-विश्राम से दूर भी हो जाते हैं, पर मानसिक तनाव तो नींद में भी बने रहते हैं, टैंरक्विलाइजर लेने से वे समाप्त नहीं होते। इनके लगातार बने रहने पर ‘डिप्रेशन’ आता है। ‘डिप्रेशन’ को दूर करने के लिए लोग सुरा-सुन्दरी की शरण में जाते हैं।
मानसिक तनाव बढ़ जाने पर शिराएं फटने-सी लगती हैं। आँखें कमजोर हो जाती हैं। कब्ज रहती है । डकारें आती हैं। धूम्रपान का इच्छा होती है चाय की याद आती है। शारीरिक व मानसिक तनाव मिलकर काम व क्रोध के आवेग बार-बार पैदा करते हैं।
तीसरा है भावनाओं का तनाव। मनुष्य निरन्तर भावनाओं के थपेड़े खाते रहते हैं। भावनाएँ बहुधा यथार्थ पर आधारित रखते हैं, उन्हीं से चिपटे रहते हैं। भावनाओं पर चोट लगती है तो तीखी प्रतिक्रिया होती है, जिनसे रोग पैदा होते हैं। ‘इमोशनल टेन्शन, हार्ट-अटैक-को जन्म देते हैं। किसी का प्रिय मित्र, पुत्र, पति, या पत्ती अथवा रिश्तेदार कल आने वाला है, तो रात भर उसे नींद नहीं आयेगी। एक घण्टे बाद परीक्षाफल घोषित होने वाला है, दिल की धड़कन बहुत बढ़ गई। दूर कहीं प्रवास पर हैं, रात में सहसा घर की याद आ गई है, नींद गायब। यही है भावनात्मक तनाव।
ये भावनात्मक तनाव हमारे अनजाने व्यवहारों में प्रकट होते हैं। कुछ लोग कंधे उचकाते रहते हैं, कुछ गुनगुनाते रहते हैं, कुछ सीटी बजाते रहते हैं। कोई बारबार पलकें झपकाते हैं, तो कोई नाक से खूँ-खूँ की आवाज करते हैं। ये सब भावनात्मक तनाव के परिणाम हैं।
तनावों से नाड़ियों में रक्त, प्रवाह अधिक ही जाता है। इससे हाइपर टेन्शन’ पैदा होता है। समय पर तनावों पर नियन्त्रण नहीं किया गया था अधिक तनाव के कारण दूर नहीं किए गए, तो ब्लडप्रेशर एवं पैरालिसिस हो जाते हैं।
बीमारी कभी ‘मस्क्यूलर टेन्शन’ से होती है, कभी ‘मेन्टल’ और कभी ‘इमोशनल’ से। कभी तीनों के मिश्रित कारणों से।
थकान से भी क्रोध आता है, चिन्ता से भी। दिमागी उलझन में फँसे व्यक्ति को सिर दर्द, हृदय पीड़ा, अम्लता, कब्ज आदि तंग करते रहते हैं। जब व्यक्ति अपने को उपेक्षित समझता है और उसकी भावनाएँ अतृप्त अतृष्ट रही आती है, तो उसे टी0 वी0, दमा, आर्थराइटिस, कुष्ठरोग आदि पैदा हो जाते हैं।
तनाव किसी भी क्षेत्र में संव्याप्त क्यों न हो जीवनी शक्ति का अत्यधिक क्षरण करता है। शारीरिक और मानसिक श्रम से भी थकान आती, पर वह उथली रहती है और विश्राम करने एवं बलवर्धक आहार उपचार लेने से इसकी क्षति पूर्ति थोड़े ही समय में हो जाती है। किन्तु भावनात्मक तनाव ऐसे होते हैं जिनकी आधार, भिति किसी गहरे आघात से सम्बन्धित होती है। ये घाव नासूर बन जाते हैं और समय-समय पर उभरते फूटते रहते हैं। ईर्ष्या, विद्वेष, प्रतिशोध जैसे मनस्ताप किसी भी कारण उत्पन्न हुए हों, अचेतन में जम कर बैठ जाते हैं और पुरानी घटनाओं को याद करके अंतःक्षेत्र को उद्वेलित करते रहते हैं। किन्हीं असाधारण महत्त्वाकाँक्षाओं की पूर्ति में व्यवधान उत्पन्न हो जाने पर भी ऐसा ही होता है। कल्पित सुनहरी स्वप्नों को आघात लगने तक से मनुष्य टूट जाता है फिर प्रत्यक्ष हानि का तो कहना ही क्या? प्रियजनों का बिछोह, अपमान, घाटा, अपयश आदि के घाव भी गहरे होते हैं और समय के साथ-साथ वे झीले पुराने भी होते जाते हैं-पर पूर्णतया समाप्त तब तक नहीं होते जब तक कि उन्हें प्रतिरोध के तीव्र विचारों से प्रयत्नपूर्वक काटा न जाय।
शारीरिक स्वास्थ्य को नष्ट करने वाले कारणों में आहार विहार की अनियमितता ही नहीं होती। मानसिक स्वास्थ्य नष्ट करने में प्रतिकूल परिस्थितियाँ निमित्त नहीं होती, वरन् उनका वास्तविक कारण अंतर्मन की संवेदनात्मक परतों के साथ जुड़ा होता है। बड़े बड़े संकट सामने होने पर भी कितने ही मनस्वी लोग उसे सामयिक चुनौती भर मानते हैं और उसका मुकाबला खेल के मैदान में गेंद से जूझने वाले खिलाड़ियों की तरह करते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग विपत्ति की कल्पना भर से घबरा जाते हैं और इतने असन्तुलित होते हैं मानो आपत्तियों का पर्वत ही उनके ऊपर टूट पड़ा हो।
तनावजन्य दुष्परिणामों को जितना विघातक माना जाय कम है। उसके कारण उस जीवनी शक्ति का भण्डार बेतरह समाप्त होता है, जिसके ऊपर शारीरिक स्वास्थ्य-मानसिक सन्तुलन और आन्तरिक आनन्द निर्भर रहता है। तेल चुक जाने पर, दीपक को मात्र, रुई बत्ती आदि के सहारे ज्वलन्त नहीं रखा जा सकता। जीवनी शक्ति को तेल भण्डार कहा जा सकता है। तनाव का सीधा आक्रमण उसी जीवन कोश पर होता है और वह क्षति इतनी तेजी से होती है कि सही ढंग से कुछ सोचने और व्यवस्था पूर्वक कुछ करने की दोनों ही संभावनाएं अस्त व्यस्त होती चली जाती हैं। ऐसी विपन्नता में फँसा हुआ व्यक्ति खोखला बन कर रह जाता है। शरीर की बनावट में भले ही अन्तर न आये पर स्थिति अर्धविक्षिप्त जैसी बन जाती है। ऐसे व्यक्ति न केवल स्वयं संतप्त रहते हैं वरन् संपर्क वालों को भी अपनी बेतुकेपन से उद्विग्न किये रहते हैं।
असावधान और दुर्बल मनःस्थिति के व्यक्ति पर छोटे छोटे कारण भयंकर तनाव उत्पन्न कर सकते हैं। अस्तु कोई प्रतिकूल स्थिति उत्पन्न न होने पाये यह चाहने की अपेक्षा सोचना यह चाहिए कि हर परिस्थिति में सन्तुलन बनाये रखने की दूर-दर्शिता अपनाई जायगी और प्रतिकूलताओं के साथ खिलाड़ी की भावना से आँख मिचौनी खेली जायगी। ऐसा साहस सँजोकर रखा जाय तो फिर कोई भी कठिनाई ऐसी नहीं रह जाती जो प्रयत्नपूर्वक हल अथवा धैर्यपूर्वक सहन न की जा सकती हों। तीन, चौथाई कठिनाइयाँ तो आशंका मात्र होती हैं। भविष्य में अमुक कारण से अथवा अमुक व्यक्ति द्वारा अमुक कठिनाई उत्पन्न की जा सकती है, कोई दैवी विपत्ति आ सकती है या दुर्घटना घटित हो सकती है। ऐसा सोच सोचकर ही कितने व्यक्ति अधमरे होते रहते हैं जबकि वस्तुतः वह काल्पनिक कठिनाई कभी भी सामने नहीं आती।
मनुष्य को जागरूक रहना चाहिए और सुखद सम्भावनाओं की आशा लगाने की तरह दुःखद दुर्घटनाओं एवं प्रतिकूलताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए। सजग रहने भर से ढेरों कठिनाइयों से बचा जा सकता है। सजगता का होना उत्तम है; पर उसी अकेली के बल पर मनोबल बनाये नहीं रखा जा सकता। शौर्य, साहस की निर्भयता और पराक्रम की भावनाएँ प्रखर रखी जानी चाहिए। हँसने हँसाने की आदत डाली जाय और हलका फुलका दृष्टिकोण अपनाकर जिन्दगी का खेल, नाटक के पात्रों अथवा खिलाड़ियों की तरह खेला जाना चाहिए। अच्छी से अच्छी आशाएँ रखें, पर साथ ही बुरी से बुरी सम्भावनाओं का सामना करने के लिए शूर वीर सैनिकों की तरह अपना मनोबल संजोये रखें।
श्रम सन्तुलन और आहार विहार की सुव्यवस्था बनाये रह कर शारीरिक तनाव से बचा जा सकता है। मानसिक श्रम को अदलते बदलते रहा जाय और प्रस्तुत काम में दिलचस्पी रखने तथा उसे सुव्यवस्थित बनाने पर कला कौशल प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति रखने से मानसिक तनावों से बचा जा सकता है। हँसने, मुस्कराने और बालकों जैसा निश्छल मन रखने से अनिद्रा जैसे तनावों से बचा जा सकता है। सबसे कठिन और जटिल है भावनात्मक विकृतियाँ और भीरुताजन्य तनाव। इसे आत्म बल सम्पादित करके ही दूर किया जा सकता है। उच्चस्तरीय दृष्टिकोण और आदर्श क्रिया कलाप अपनाने की जीवन साधना द्वारा ही आत्म बल बढ़ता है और यही वह दिव्य वरदान है जिसके सहारे मनुष्य तनाव मुक्त जीवन जी सकता है और जिन्दगी का सच्चा आनन्द ले सकता है।
बड़प्पन पाने की वितृष्णा में कुछ काम मैं ऐसे कर रहा था जो सम्भवतः सामयिक सफलता तो दे सके होंगे, पर रहा बहुत घाटे में। इन प्रयासों में मेरी आत्मा मुझे क्षुद्रता अपनाने और आत्म गौरव गँवाने का दोषी ठहराती रही। ऐसे अवसर सात प्रकार के थे। जैसे-
-जब मैं दरिद्रता ओढ़े दूसरों की अनुकम्पा पाने के लिए इस आशा से गिड़गिड़ाते हुए पहुँचा कि किसी की कृपा पाकर मैं निहाल हो सकूँगा।
-जब मैंने निर्बलों के सामने अपना बड़प्पन और गर्व इस प्रकार प्रदर्शित किया मानों मेरी शक्ति विकास का एक भाग न होकर दुर्बलों से स्पर्धा करने के लिए ही मिली हो।
-जब कठिनाइयों से भरी कर्मठता और सरलता से मिलने वाली विलासिता में से मैंने कठिनता से मुँह मोड़ा और सस्ते सुख पर टूट पड़ा।
-जब मैंने अपराध तो किया किन्तु पश्चाताप की आवश्यकता न समझ परिमार्जन के बदले मैंने पाप का समर्थन किया और कहा कि ऐसा तो चलता ही रहता है। दूसरे भी तो वैसा करते हैं।
-जब मैंने अपनी दुर्बलताओं से समझौता कर लिया और उन्हें बनाये रहने तथा छिपाये रहने की योजना बनाई।
-जब मैंने कुरूपों से घृणा की किन्तु यह नहीं जाना कि घृणा भी तो कुरूपता ही है।
-जब मैंने दूसरों के मुँह से प्रशंसा उगलवाने की तरकीब सोची, इतना ही नहीं प्रशंसा और अच्छाई को एक मान लेने की नासमझी भी अपनाई।
-खलील जिव्रान
युग-निर्माण परिवार के परिचितों, सहयोगियों, समर्थकों की संख्या बहुत बड़ी है। वह आधे करोड़ से ऊपर लोग अपने साथ किसी न किसी प्रकार बंधे हुए हैं। इनमें घनिष्ठ, कर्मठ नियमित और सुव्यवस्थित कितने परिजन हैं इसकी परख इस कसौटी पर की जाती है कि जो पत्रिकाओं के नियमित ग्राहक है। हर महीने उत्सुकता और आतुरता पूर्वक नये विचारों की प्रतीक्षा करते हैं। दो चार दिन भी लेट हो जाने पर आकुल हो उठते हैं-उन्हें घनिष्ठ परिजन माना जाय । जिन्हें विचारधारा से उतना लगाव नहीं है-मात्र पूजा उपासना में या अन्य परामर्शों के कारण ही संपर्क बनाना, बढ़ाना और ढोला करना पड़ता है उन्हें न तो घनिष्ठ माना गया है और न अपनी किसी योजना में उनके सहयोग की जाना हर दृष्टि से आशा से -अधिक सफल रहा है। व्यक्ति निर्माण , परिवार निर्माण और समाज निर्माण के व्यापक अभियान का शुभारम्भ इन्हीं आत्मीय जनों से आरम्भ हुआ और चिनगारी के दावानल बनने की तरह सुविस्तृत होता चला गया है।
अब पुनर्गठन योजना के अनुरूप अपने इस देव परिवार को व्यक्तित्वों को अधिक व्यवस्थित रीति से सुविकसित बनाने के लिए अधिक तत्परता पूर्वक प्रयत्न आरम्भ कर रहे है । व्यक्ति की श्रेष्ठता ही समाज की उन्नति कहलाती है। कर्मठ नागरिक ही किसी राष्ट्र की सच्ची सम्पदा कहलाते हैं। मनुष्यों का समुदाय ही विश्व कहलाता है। युग बदलने का अभिप्रायः व्यक्तियों अपेक्षा की गई है। यों उनमें भी समय-समय पर कई प्रकार के उपयोगी सहयोग समर्थन मिलते रहते हैं। पत्रिकाओं के नियमित सदस्यों की संख्या लगभग दो लाख जा पहुँचती है। इन्हें हम परिजन कहते हैं। विचारों के प्रति इतनी उत्सुकता आस्था को देखते हुए यह आशा करते हैं कि इन्हें विचारों के अनुरूप सक्रियता अपनाने के लिए कहा और सहमत किया जा सकता है। अब तक होता भी यही रहा है। स्वतन्त्रता संग्राम में विजय प्राप्त होने के दिन ही युग निर्माण परिवार की नींव रखी गई है। इन तीस वर्षों में नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति की दिशा में विज्ञापन बाजी से दूर रहते हुए इस समुदाय ने अति महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न की है। धर्म मंच को लोक शिक्षण का माध्यम बनाया का स्तर ऊँचा उठाने से है। मनुष्य की गरिमा उसकी शिक्षा, समृद्धि या वैभव से नहीं उसकी अन्तःस्थिति के अनुरूप आँकी जाती है। यह आन्तरिक गरिमा ही मनुष्य की वास्तविक सामर्थ्य का स्त्रोत है। उसी के सहारे वह प्रगति की अभीष्ट दिशा में आगे बढ़ता और सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचता है। अखण्ड-ज्योति का आरम्भ से ही यह प्रयास रहा है कि परिजनों के चिंतन में मनुष्यता को गौरवान्वित करने वाली विचारणा और क्रिया-कलापों में आदर्शवादी गतिविधियों का समावेश हो। पिछले चालीस वर्ष में इस उत्कृष्टता सम्बन्ध प्रयास में जो सफलता मिली है। उसने यह उत्साह उत्पन्न किया है कि परिवार के सदस्यों को केवल दिशा देते रहने से सन्तोष न किया जाय, वरन् प्रत्येक के व्यक्तिगत जीवन का स्पर्श एक व्यवस्थित योजना के अनुसार किया जाय। विचारों से प्रभावित होकर कोई अपनी विशेषता के कारण आदर्शवादी गतिविधियाँ अपनाने लगे, यह संयोग एवं सौभाग्य ही कहा जा सकता है। अपना श्रेय इस बात में है कि सभी परिजनों को योजनाबद्ध रूप से व्यक्तित्वों के परिष्कार की शिक्षा और प्रेरणा दी जाय। सोचा यही गया है। कि पत्रिकाओं के दो लाख सदस्यों से सीधा संपर्क साधा जाय और उन्हें आत्मोत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ चलने के लिए क्रियात्मक शिक्षण ,परामर्श, प्रोत्साहन और भव भरा अनुदान प्रदान किया जाय। इस गुरु पूर्णिमा से परिवार का पुनर्गठन इसी उद्देश्य के लिए किया गया है। आत्मोत्कर्ष की दिशा में हर परिजन को अभिनव प्रकाश देने और इस दिशा में उन्हें अधिक सक्रिय बनाने का प्रयास अब और भी अधिक क्रमबद्ध रूप से आरम्भ कर दिया गया है। ध्यान रहे कि व्यक्तिगत सर्वतोमुखी प्रगति का मूल केन्द्र अन्तः चेतना में सन्निहित है। जड़े गहरी और मजबूत होती हैं तो पेड़ का तना और परिकर भी परिपुष्ट और सुरभित दीखता है। भीतर से टूटा हुआ मनुष्य बाहर से हजार प्रयत्न करने पर भी न विकसित हो सकता है और न सुखी रह सकता है। जो भीतर से सुदृढ़ है उसे बाहर के अभाव एवं अवरोध दबोच नहीं सकते। आन्तरिक प्रखरता हर असुविधा से टकराती हुई दूने उत्साह से उछलती मचलती चलती है और अन्ततः अपना लक्ष्य पूरा करके रहती है। आन्तरिक बल ही वास्तविक बल हैं। आन्तरिक तेजस्विता ही बाह्य क्षेत्र की अगणित सफलताओं में झाँकती है! यदि इस मर्म तथ्य को समझा जा सके तो आत्मोत्कर्ष को ही सर्वोपरि प्रधानता देनी होगी। उस क्षेत्र में जो जितना आगे बढ़ सकेगा वह उतना ही सुसंस्कृत , सम्मानित , समृद्ध एवं सफल दिखाई देगा। भीतर की विभूतियाँ ही सफल बाह्य जीवन की अनेकानेक सिद्धियाँ बनकर सामने आती हैं।
गत अंक में इस तथ्य पर सुविस्तृत प्रकाश डाला गया है कि आत्मिक प्रगति कोई जादू नहीं है जो अमुक मन्त्र-तन्त्र देवी-देवता या किसी सिद्ध महात्मा की कृपा से मिल सके, तो तुर्त-फुर्त चमत्कार दिखा सके। यह अन्यान्य उत्पादनों की तरह एक समय साध्य एवं श्रम साध्य क्रिया-प्रक्रिया है, जिसमें अपनी अनगढ़ता को सुगढ़ता में बदलने के लिए भागीरथी प्रयत्न करना पड़ता है। इस मंजिल को अपने ही पैरों से चलकर पूरा करना पड़ता है । मार्गदर्शन अथवा यत्किंचित् सहयोग तो दूसरों से भी मिल सकता है, पर ‘स्वर्ग अपने मरने पर ही दीखता है’ वाली उक्ति तथ्य का सहज ज्ञान कराती रहती है। अपने मुँह चलाने से ही पेट भरता है- अपने पढ़ने से ही विद्या आती है। पहलवान बनने के लिए स्वयं ही व्यायाम करना पड़ता है, यही बात अपने कुसंस्कारों से आप लड़ने और सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाने का अभ्यास करने के परम पुरुषार्थ द्वारा आत्म विकास का महान प्रयोजन सिद्ध करने के सम्बन्ध में कही जा सकती है। आत्मोत्कर्ष के लिए जो तपश्चर्या करनी पड़ती है उसके साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा चार अंग हैं। यह सभी एक दूसरे के पूरक हैं। इनमें से एक की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। भवन निर्माण में ईंट चूना लकड़ी लोहा चारों ही चाहिये। जीवन निर्वाह में भोजन, शयन, मल, विसर्जन और उपार्जन में से एक भी छोड़ने से कठिनाई उत्पन्न होगी। कृषि में बीज, भूमि, खाद और पानी की समान उपयोगिता है। कल्पना लोक के आकाश कुसुम तोड़ने हों तो किसी जादू चमत्कार के फेर में पड़े रहने से भी काम चल सकता है। यदि यथार्थ अभीष्ट हो तो आत्म निर्माण के लिए भवन निर्माण स्तर का उद्यान खड़ा करने, कारखाना चलाने जैसे सूझ बूझ भरे प्रबल पुरुषार्थों की आवश्यकता होगी। पुनर्गठन की वर्तमान रूपरेखा इसी आधार पर बहुत विचारपूर्वक टोलियों की छोटी किन्तु जीवन्त इकाइयों को आधार बनाकर तैयार की गयी है। उसे पूरा करने के लिए हर परिजन को चार चरण बढ़ाने ही होगे।
प्रथम चरण टोली निर्धारण-
बड़े प्रयास सदा संगठित रूप से ही सम्पन्न हुए हैं और बड़े जन समुदायों का सुव्यवस्थित प्रशिक्षण, निर्माण, निर्धारण छोटे टोली विभाजनों के आधार पर ही सम्भव होता है। पिछले दिनों काम हलका था। इसलिए एक स्थान पर एक शाखा संगठन बना देने से काम चलता रहा है अब चूँकि प्रत्येक सदस्य को सक्रिय करने के साहसिक कदम के कार्य भार को अनेक गुना बड़ा कर दिया है ऐसी दशा में गठन की इकाइयों को छोटा कर देने के अतिरिक्त और कोई व्यावहारिक उपाय रह नहीं गया है। अगस्त अंक में परिजनों के व्यक्तिगत परिचय संग्रह करने का तात्पर्य यह है कि उनकी स्थिति को ध्यान में रखते हुए वैसा ही प्रयास परामर्श किया जाय जैसा कि चिकित्सक हर रोगी की पृथक् स्थिति को ध्यान में रखते हुए उन्हें भिन्न भिन्न स्तर के पथ्य, उपचार बताते हैं।
हृदय शरीर के समस्त तन्तुओं को स्वच्छ रक्त प्रदान करता है और उस क्षेत्र की विकृतियों को समेट कर वापिस बुलाता है। इस कार्य का मध्यवर्ती प्रयोजन बड़ी नाड़ियाँ करती हैं। रक्त को ले जाने और वापिस लाने में उन्हीं की बढ़ी चढ़ी भूमिका रहती है। परिजनों में से प्रत्येक का अपने साथ आदान प्रदान का ऐसा ही सम्बन्ध बनाने की आवश्यकता अनुभव की गई है और उसमें मध्यवर्ती इकाइयाँ टोली नायकों की बनाई गई हैं।
अब पुनर्गठन का रूप यह है कि पुराने शाखा संगठन कार्यवाहक यथावत् बने रहेंगे। उनकी स्थिति में कोई उलट फेर न होगा। हाँ कार्य के विस्तार को देखते हुए उन्हीं के अंतर्गत छोटे घटक दस दस के मंडल अवश्य गठित कर दिये जायेंगे । हर सशक्त संगठन छोटी छोटी प्रामाणिक इकाइयों के आधार पर ही बनाया जाता है। सेना होती तो बहुत बड़ी है, पर उसका गठन छोटी छोटी इकाइयाँ में होता है। दस दस की टुकड़ियों में वह बंटती है। वे टुकड़े मिलते हुए बड़ी सेना के रूप में विकसित होते हैं। स्काउटों की टोलियाँ भी इसी प्रकार होती हैं। दस दस के जत्थे बनते हैं उन्हीं में से एक को नेता बनाते हैं। विद्यालयों में पढ़ते तो हजारों छात्र हैं, पर वे क्लासों और सेक्शनों में बंटे रहते हैं। खेलों में भी इसी प्रकार की छोटी छोटी टोलियाँ मिलकर बड़ी टीम बनती है। बड़ी भीड़ को सुव्यवस्थित रखने का यह तरीका कारगर भी है और सुविधाजनक भी।
अपने गठन के मूल में पारिवारिक भावना के विकास करने का उद्देश्य सन्निहित रहा है। व्यक्ति और समाज की मध्यवर्ती कड़ी परिवार है। उसी खदान से नर रत्न निकल सकते हैं और उन श्रेष्ठ व्यक्तियों से मिल जुलकर बना समुदाय देव समाज कहला सकता है। परिवार इन दोनों छोरों को परस्पर मिलाने वाली कड़ी है। अपने परिवार का गठन पहले गायत्री परिवार के नाम से हुआ था, पीछे उसे युग निर्माण परिवार नाम दिया गया। दोनों में ही गठन को परिवार पद्धति पर विकसित करने की भावना रही है। संयुक्त परिवारों को ‘लार्जर फैमिली’ स्वरूप में विकसित करने का हम समर्थन करते रहे हैं और वसुधैव कुटुम्बकम् की- विश्व परिवार की भावना के स्वप्नों को साकार करने का ताना बाना हमारा विचार तन्त्र निरन्तर बुनता रहता है। इसी पारिवारिकता को पुनर्गठन की टोली पद्धति में देखा जा सकता है। सुविधा को दृष्टि से बड़े कुटुम्बों को छोटी छोटी इकाइयों में बाँट कर व्यवस्था सम्बन्धी सुविधा उत्पन्न की जाती है। बड़े खेत की छोटी क्यारियों की तरह परिजनों की टोलियाँ बनाई जा रही हैं। ताकि इस छोटे समुदाय के व्यक्तित्वों के विकास में-अन्तःचेतना के परिष्कार में-अधिक सक्रियता, अधिक तत्परता का समावेश हो सके। बड़े समुदाय में पारस्परिक घनिष्ठता की, विचार विनिमय की-उतनी सुविधा नहीं रहती जितनी छोटी छोटी इकाइयों में। ऐसे ही अनेक लाभों को ध्यान में रखते हुए विभाजन का यह पुनर्निर्धारण किया गया है। टोली पद्धति की प्रतिक्रिया के अनेक सुखद सत्परिणाम हमारे मस्तिष्क पर इन दिनों छाये हुए हैं। अनेक महत्वपूर्ण प्रयोगों की तरह अपने जीवन का यह अन्तिम प्रयोग है कि टोली निर्धारण की कौटुम्बिक परिपाटी-व्यक्तियों के नव निर्माण में- युग परिवर्तन में किस हद तक सफल हुई। विश्वास यह रहता है कि गठन के समस्त प्रकारों की तुलना में यह प्रयोग अत्यधिक कारगर होना चाहिए।
एक एक नगर में सैकड़ों सैकड़ों की संख्या में पत्रिकाओं के सदस्य हैं। इन्हें दस दस की टोली में किस आधार पर वर्गीकृत किया जाय इसके मूल में सदस्यों की सुविधा और समानता को प्रमुखता देनी चाहिए। एक मुहल्ले में रहने वाले- एक कारखाने, दफ्तर में काम करने वाले जितनी आसानी से आये दिन मिलते जुलते रह सकते हैं उतनी सुविधा दूर दूर रहने वालों के बीच नहीं रहती। यह स्थान सम्बन्धी सुविधा हुई। व्यवसाय, शिक्षा, स्वभाव आदि की समानता भी स्तर को समतल बनाये रहती है। अध्यापकों की अध्यापकों से और वकीलों की वकीलों से अधिक अच्छी तरह पटरी खा सकती है। इसका अर्थ यह नहीं है कि यह निर्धारण व्यवसायों के आधार पर होगा। यह तो मोटा संकेत है। मूल तथ्य बौद्धिक और सामाजिक एकता की यथा सम्भव पटरी बिठाना है। यों दलील यह भी है कि बड़े और छोटे स्तर मिलेंगे तो बड़ों को नम्र बनने और छोटों की ऊँचा उभरने का अवसर मिलेगा। इन सब तथ्यों को अनेक दृष्टियों से ध्यान में रखते हुए जहाँ जैसी परिस्थिति हो वहाँ उस प्रकार सूझ-बूझ का परिचय देने के लिए कहा गया है। पत्थर पर लकीर नहीं खींची गई है। संकेत इतना भर ड़ड़ड़ड़ स्तर में बहुत अधिक असमानता रहने पर मिलने घुलने में जो असमंजस बना रहता है, वह अपने टोली के कार्य संचालन में बाधक नहीं होना चाहिए। इतना ध्यान रखने पर आगे का रास्ता साफ हो जाता है।
टोली नायक कौन हो? इसका निर्धारण, योग्यता, शिक्षा, पदवी, सम्पन्नता, बड़प्पन आदि के आधार पर नहीं, वरन् इस दृष्टि से होना चाहिए कि समय देने में- मिलन सारी में-व्यवहार कुशलता में-चरित्र प्रभाव में- कौन व्यक्ति आगे रहता है। ऐसा व्यक्ति शिक्षा, आजीविका आदि की दृष्टि से अन्यों की अपेक्षा हलका पड़ने पर भी संचालन का कार्य अधिक अच्छी तरह कर सकता है। जिनके पास समय का अभाव है- उत्साह भी उतना नहीं है- उन्हें मान देने की दृष्टि से यदि टोली नायक बना दिया गया तो समझना चाहिए कि इस शिष्टाचारी अदूरदर्शिता के कारण टोली की प्रगति अवरुद्ध होकर ही रह जायगी। दस सदस्यों की टोली होना भी एक मोटा नियम है। स्थानीय आवश्यकता को देखते हुए इसमें कमीवेशी भी की जा सकती है। आठ या बारह के घटक कहीं बनाने पड़ें तो वैसा न करने जैसा भी कोई प्रतिबन्ध नहीं है। फिर सदस्यों की संख्या घटने बढ़ने पर उस गठन में हेरा फेरी भी होती रह सकती है। पटरी न बैठने पर टोली सदस्यों का परिवर्तन एक से दूसरी में भी हो सकता है। ऐसी हेरा फेरी स्वाभाविक भी है और आवश्यक भी। कोई गठन न तो अन्तिम है और न सदा सर्वदा के लिए। स्थिति के अनुरूप उनमें होने जैसे कारणों से टोली नायकों में भी परिवर्तन होते रहेंगे।
आशा की गई है कि इसी वर्षा ऋतु में अपने दो लाख परिजनों का टोली विभाजन पूर्ण हो जाएगा । इस कार्य में विशेष उत्साही कर्मठ कार्यकर्ताओं को आगे आकर यह आवश्यकता पूर्ण करा देनी चाहिए। वे अकेले ही अथवा अन्य प्रभावशाली साथियों की टोली बनाकर सभी स्थानीय सदस्यों से संपर्क बनायें। अगस्त की पत्रिकाओं में जो फार्म लगे हैं वे जिनने अभी तक भर कर मथुरा नहीं भेजे हैं उनसे अपने सामने ही वह कार्य सम्पन्न करा लें और फार्म को स्वयं भिजवा दें। इसी प्रकार प्रस्तुत शाखा संचालन कर्ता-कार्यवाहक ही-इस कार्य को अधिक अच्छी तरह पूरा करा सकेंगे कि किन-किन सदस्यों की टोलियाँ बनें और उनका टोली नायक किसे नियुक्त किया जाय। इस प्रक्रिया को पूरी कराने का उत्तरदायित्व वर्तमान कार्यवाहकों और कर्मठ कार्य-कर्ताओं को मिलजुल कर पूरा कराना चाहिए। जब तक टोलियाँ अपना-अपना काम सुचारु रूप से न करने लगें तब तक उन्हें परामर्श, प्रोत्साहन और सहयोग देने में वर्तमान शाखा के मूर्धन्य व्यक्तियों को ‘दूने चौगुने उत्साह से काम करना होगा। इन दिनों मूर्धन्य सदस्यों और अनुभवी कार्यकर्ताओं में तनिक भी शिथिलता दृष्टिगोचर सहमति से हो और उसका नियुक्ति पत्र मथुरा से मँगा लिया जाय।
वर्तमान दो लाख सदस्यों के दस दस में विभक्त होने पर बीस हजार टोलियाँ बनाती हैं और इतने ही टोली नायक बनते हैं। इन छोटे छोटे परिवारों में नेतृत्व की क्षमता उभरेगी। स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से एक टोली दूसरे से अधिक सक्रिय होने और अपनी प्रखरता सिद्ध करने का प्रयत्न करे तो इससे उत्साह बढ़ेगा ही। सदस्यों की विचार निष्ठा को देखते हुए उनमें आत्मोत्कर्ष की दिशा में अधिक सक्रियता उत्पन्न करने की दृष्टि से ही यह पुनर्गठन किया गया है। गठन पूरा होते ही सक्रियता हिलोरें लेने लगे-हर सदस्य में नया उत्साह ही, हर टोली नायक अपनी कुशलता सिद्ध करने में आतुर दिखाई दे तो ही हमारा मनोरथ पूरा होगा।
द्वितीय चरण-एक से पाँच
पुनर्गठन का प्रथम चरण सदस्यों के पंजीकरण और टोली निर्धारण का कार्य पूरा होने के साथ साथ सम्पन्न हो जाता है। दूसरा चरण यह है कि सदस्यों की पत्रिकाओं के पाँच पाँच नियमित पाठक बनें। कोई भी पत्रिका ऐसी न रहे जो कम से कम पाँच अन्यों के द्वारा पढ़ो न जाती हो। बिना पढ़े उन्हें इधर उधर पटक देना अथवा अपने तक ही उस पठन को सीमित रखना, इस सृजन के प्रति उपेक्षा एवं अनास्था बरतने के समतुल्य है। नवयुग के आलोक का विस्तार करना प्रत्येक परिजन का परम पवित्र कर्तव्य है। इसमें आलस्य नहीं होना चाहिए, अवसाद नहीं बरता जाना चाहिए। हर व्यक्ति का इतना प्रभाव तो होता ही है कि घर या बाहर के अपने संपर्क क्षेत्र में पाँच व्यक्तियों का इस अमृतोपम साहित्य का महत्व समझाने और उसे पढ़ने के लिए सहमत करने में सफलता प्राप्त कर सके। यह राई रत्ती प्रयत्न से ही सम्भव हो सकता है। न चलाने वाला गरुड़ भी बैठा रहता है और चलने वाली चींटी भी पहाड़ पर जा चढ़ती है। यदि संपर्क क्षेत्र में पाँच पाठक उत्पन्न करने का संकल्प हो तो उसकी पूर्ति में रत्ती भर भी सन्देह की गुञ्जाइश नहीं है। यह किया जाना चाहिए। टोली नायकों को सदस्यों के साथ लगकर कार्यवाहकों को सहयोग देकर ‘एक से पाँच’ का द्वितीय चरण पूरा कराना चाहिए। दस सदस्यों को, टोली के पाँच पाँच पाठकों को मिला कर पचास अनुसदस्य बनते हैं। दस सदस्य पचास अनुसदस्य इस प्रकार यह मंडली वस्तुतः साठ की होनी चाहिए। दस पचास को पटाये और पचास पकने पर ढाई सौ तक उस प्रकाश को आगे बढ़ायें। इस प्रकार चार पाँच प्रचार पीढ़ियों में ही समस्त विश्व को अपने प्रभाव क्षेत्र की लपेट में लेने का उद्देश्य आज असम्भव दिखने पर भी कल पूर्णतया सम्भव हो सकता है।
तृतीय चरण- आत्मोत्कर्ष के प्रयास
टोली का हर सदस्य यह प्रयत्न करेगा कि वह अपने निजी जीवन में साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा के चारों चरणों को किसी न किसी प्रकार न्यूनाधिक मात्रा में समाविष्ट किये ही रहे। थोड़ा शुभारम्भ ही भविष्य में सुविस्तृत हो सकता है। बीजारोपण इन चारों का ही किया जाय। कौन, कितना, किस, प्रकार, क्या कर सकता है? यह व्यक्तिगत सुविधा, और श्रद्धा का प्रश्न है। आज तो बात शुभारम्भ की और जो चल रहा है; उसमें अभिवर्धन की है। गाड़ी चल पड़े तो देर सवेर में लक्ष्य तक पहुँचेगी ही। आज गति का लेख जोखा नहीं लिया जायेगा । जोर शुभारम्भ पर दिया जायेगा । हर व्यक्ति को उसकी स्थिति के अनुरूप इन चारों ही चरणों को उठाने के लिए कुछ न कुछ करने का निश्चय करना चाहिए, भले ही वह न्यूनतम ही क्यों न हो। टोली सदस्य इसके लिए स्वयं आगे बढ़े और साथियों को आगे बढ़ायें टोली नायक इस प्रगति के लिए प्रोत्साहन देने तक सीमित न रहें वरन् स्नेह भरे अनुरोध से सदस्यों की सक्रियता उभारने में लगे ही रहें। थोड़ी सफलता मिलने पर भी निराश न हों। अपने में सक्रियता होंगी तो उस से अन्य साथी भी बच नहीं सकेंगे। अटूट धैर्य और सुनिश्चित विश्वास के साथ प्रयत्न रत रहने वाले अपना कर्तव्य और उत्तरदायित्व पूरा कर सकने में सफल होकर ही रहते हैं। है में भी ऐसी ही परिस्थितियों और कठिनाइयों में से गुजरते गुजरते इस स्थिति तक पहुँचने का अवसर मिला है, जिस पर आज हैं। यही अनुकरण समस्त टोली नायकों और सदस्यों और अनु सदस्यों को करने की मनोभूमि बनानी चाहिए।
आत्मोत्कर्ष के चारों आधारों की उपयोगिता और प्रगति की विधि व्यवस्था समझाने के लिए- मिशन की कार्य पद्धति, रूपरेखा और भावी योजना समझाने के लिए इन्हीं दिनों हमने दस पुस्तिकाएँ लिखी हैं। उन्हें सभी परिजनों को पढ़ना चाहिए और अनुसदस्यों को पढ़ाना चाहिए। इससे अपने वैयक्तिक और सामूहिक कार्यक्रमों का उद्देश्य एवं क्रिया कलाप समझने में सुविधा रहेगी। इन दिनों का झोला पुस्तकालय यही समझा जाना चाहिए। इन दस पुस्तकों को अगले तीन महीनों में सभी सदस्य और अनुसदस्य पढ़ ले यह योजना पुनर्गठन के तृतीय चरण के रूप में अपनायी जानी चाहिए।
युग निर्माण परिवार के प्रत्येक सदस्य अनुसदस्य, सहयोगी प्रेमी को मिशन का उद्देश्य, स्वरूप और क्रिया कलाप विदित रहना चाहिए। इसके बिना उनके लिए उन प्रेरणाओं को ग्रहण कर सकना और समुचित सहयोग दे सकना सम्भव न होगा। इस संदर्भ में लिखा और बताया तो समय समय पर बहुत कुछ गया है, पर वह सब क्रमबद्ध नहीं है। इस कमी की पूर्ति इन्हीं दिनों की जा रही है। हम इन दिनों परिवार के लक्ष्य के साथ परिजनों के दृष्टिकोण तथा क्रिया कलाप का ताल मेल बिठाने वाले मार्ग दर्शन को लिपिबद्ध करने में लगे हुए हैं। इस प्रयोजन के लिए दस पुस्तकों को प्रथम सैट 1 अक्टूबर को प्रकाशित हो जाएगा । इसमें दस पुस्तकें होंगी-
(1) अपने देव परिवार का पुनर्गठन (2) गुण निर्माण का सत्संकल्प (3) उपासना की महत्ता और विधि व्यवस्था (4) जीवन साधना प्रयोग और सिद्धियाँ (5) आत्मोत्कर्ष का सम्बल स्वाध्याय (6) शक्ति संचय का स्त्रोत संयम (7) सेवा साधना और उसके सिद्धान्त (8) सेवा, धर्म और उसका स्वरूप (9) धर्म तन्त्र की शक्ति और सामर्थ्य (10) युग परिवर्तन की पृष्ठ भूमि और रूपरेखा ।
दसों चौसठ, चौसठ पृष्ठ की और एक एक रुपया मूल्य की हैं। छपाई, सफाई, कवर एवं सस्तेपन की दृष्टि से प्रस्तुत साधनों के अनुरूप उन्हें आदर्श बनाने का प्रयत्न किया गया है। यह सभी गायत्री तपोभूमि, मथुरा से उपलब्ध हो सकेंगी। टोली नायक इन्हें अपने दसों सदस्यों और पचास अनुसदस्यों को पढ़ाने की क्रमबद्ध योजना बनायें। कितने सैट खरीदने की आवश्यकता एवं सुविधा है इसे ध्यान में रखते हुए उस साहित्य को मँगा लिया जाय और उसे अपने-अपने यूनिट को सभी सदस्यों को पढ़ा दिया जाय। इस प्रकार उन्हें प्रशिक्षितों की श्रेणी में गिने जा सकने की स्थिति बन जायगी। यह साहित्य प्रकाशन क्रम आगे भी जारी रखने का प्रयत्न है। अगले दिनों ऐसी ही दस पुस्तकें व्यक्ति निर्माण पर, दस परिवार निर्माण पर और दस समाज निर्माण पर लिखने का मन है। बन पड़ा तो यह कार्य सन् 77 में ही पूरा करने का प्रयत्न करेंगे।
ब्रह्म वर्चस् में यों उच्चस्तरीय गायत्री उपासना के पंचकोश अनावरण एवं कुण्डलिनी जागरण की साधना पद्धति की ही प्रधानता रहेगी, पर साथ-साथ बीस हजार टोली नायकों को भी नवयुग के अग्रदूत बनने के लिए आवश्यक चेतना और क्षमता देने के लिए दस दस दिवसीय शिक्षण सूत्रों को भी क्रम चलता रहेगा। पुनर्गठन के समुद्र मन्थन से जो रत्न उभर कर आवेंगे उन्हें साधना सत्रों में बनाकर युग निर्माताओं की अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो सकने योग्य बनाना भी तो एक काम है। आगामी सत्र योजना में इस तथ्य को पूरी तरह ध्यान में रखा जाना है।
चतुर्थ चरण- जन्म दिन मनाना
पुनर्गठन का चौथा चरण है सदस्यों के जन्म दिन मनाया जाना। यह छोटे घरेलू धर्मोत्सव हर परिवार में मिशन के प्रवेश करने और जड़े जमाने का वातावरण बना सकेंगे। जिसका जन्म दिन मनाया जा रहा है वह उस दिन अपने को हीरो अनुभव करने का सुयोग प्राप्त करेगा। उस दिन उसे जीवन सम्पदा को गरिमा समझने और शेष समय का श्रेष्ठतम योजनाबद्ध सदुपयोग करने के लिए उत्साहित किया जा सकता है। अभ्यस्त कुसंस्कारों में से कुछ को छोड़ने और सत्प्रवृत्तियों में से कुछ को बढ़ाने के लिए नया प्रयत्न करने के संकल्प कराये जा सकते हैं। ऐसे भाव भरे वातावरण में किये गये संकल्प अधिक स्थिर भी रहते हैं और क्रियान्वित बन सकते हैं। जन्मोत्सव अन्ततः सस्ते और अत्यधिक प्रभावशाली होने की दृष्टि से सर्वत्र लोक प्रिय हो चुके हैं। उनके माध्यम से उस परिवार में नवयुग के अनुरूप आस्थाओं की जड़े जमती है और पास पड़ोस के संपर्क परिचय के जो लोग एकत्रित होते हैं उन तक मिशन का आलोक पहुँचने का नया मार्ग खुलता है। टोली के सदस्य ऐसे उत्सवों पर एक दूसरे के यहाँ आते जाते रहते हैं तो उनमें सहज ही आत्मीयता और घनिष्ठता बढ़ती है। इस भावनात्मक सघनता की प्रतिक्रिया आदर्शवादी प्रयासों में एक दूसरे को अधिक सहयोग करने के रूप में देखी जा सकती है। ऐसे ऐसे अनेकों लाभ जन्मदिवसोत्सव मनाये जाने की प्रक्रिया के हैं। आरम्भ में तो यह क्रम दस टोली सदस्यों तक ही सीमित रखा जाय, पर जब व्यवस्था बन पड़े तो पचास अनु सदस्यों में से जिन्हें उपयुक्त समझा जाय उनके जन्मोत्सव मनाने के लिए कदम बढ़ाये जा सकते हैं। होली सामूहिक रूप में भी जलाई जाती है और उसकी आग को लाकर घर के आँगन में भी छोटी होती जलाने का रिवाज है। शाखा के वार्षिकोत्सव गुरुपूर्णिमा पर्व बसन्तोत्सव जैसे आयोजन बड़े रूप में मनाये जाये, पर घर-घर में धर्मोत्सवों का प्रचलन जितनी अच्छी तरह जन्मोत्सवों के माध्यम से हो सकता है, उतना और किसी उपाय से सम्भव नहीं है। घर-घर में-जन-जन तक-नवयुग का-जन जागरण का सन्देश पहुँचाने की प्रतिज्ञा का निर्वाह हम जन्मोत्सवों की प्रेरणा प्रदा प्रक्रिया को एक स्वस्थ परम्परा के रूप में प्रचलित करने के सहारे ही पूरी कर सकते हैं। राष्ट्र की नस नाड़ियों में नव जीवन का संचार करने के लिए उसके हर घटक में प्राण भर देने के लिए इस योजना के सहारे हम आशा से भी अधिक सफल हो सकते हैं। अस्तु इसे विनोद मनोरंजन के रूप में नहीं लेना चाहिए, वरन् गम्भीरतापूर्वक दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुए एकबार पूरी शक्ति से धक्का लगाने जैसा प्रयत्न करना चाहिए ताकि उसे स्वस्थ सामाजिक परम्परा का रूप मिल जाय। पीछे तो अन्य प्रथाओं की तरह वह भी स्वसंचालित हो जायगी और अपनी धुरी पर ग्रह उपग्रहों की तरह स्वयं ही परिभ्रमण करने लगेगी।
इन्हें पूरा करने कराने का आग्रह
पुनर्गठन का यह चार सूत्री कार्यक्रम बिना आवश्यक विलम्ब किये हमें इन्हीं दिनों पूरा कर लेना चाहिए। परिवार को सुगठित और सुविकसित बनाने के लिए इन छोटे आधारों को अत्यधिक महत्वपूर्ण मानकर चलना चाहिए। नवयुग के अवतरण का स्वप्न साकार करने के लिए जिस प्रचंड प्राण शक्ति की आवश्यकता है वह इस दिशा में संकल्पपूर्वक बढ़ते चलने पर निश्चित रूप से प्राप्त किया जा सकेगा। इन दिनों युग निर्माण परिवार के प्रत्येक निष्ठावान् परिजन को पुनर्गठन की इस चार सूत्री योजना को पूरा करने के लिए भागीरथी प्रयत्न करने चाहिए और प्राण प्रण से जुटना चाहिए। दस सदस्यों और पचास अनुसदस्यों के साठ साठ कल्पवृक्षों के उद्यान आरोपित और विकसित करने को ठीक यह शुभ मुहूर्त है। इस आरोपण को यदि कुशल माली ठीक तरह सींचते रहे तो अपनी इसी धरती पर नन्दन वन जैसा सुशोभित और मलयज सुगन्ध से भरा पूरा वातावरण बनाने में सफलता मिल कर ही रहेगी। उज्ज्वल भविष्य की सुखद सम्भावनाओं को साकार करने के लिए हमें आज की घड़ी में प्रबल पुरुषार्थ करने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। पुनर्गठन की पीछे जो सुखद संभावनाएं छिपी पड़ी हैं उन्हें जीवन्त करने के लिए ही कर्मठ परिजनों से अधिक प्रयत्न रत होने का इतना आग्रह करना पड़ रहा है।
तुम जहाँ भी हो, वहीं पूरी तरह डटो। चित्त को हाथ के काम में रस लेने के लिए मनाओ । जो काम सामने है उसी पर अपना सारा ध्यान केन्द्रित कर दो। उसे अधूरा मत छोड़ो। जिस उत्साह से आरम्भ किया था उसे अन्त तक बनाये रहो। परिणाम जो भी हो काम में ईमानदारी सावधानी और सुरुचि का ऐसा समावेश करो कि वह तुम्हारी प्रतिष्ठा में चार-चाँद लगा सके। इस प्रकार की गई कर्म देवता की उपासना किसी को भी विश्वस्त और प्रगतिशील बनाने का वरदान देती है।
-स्वेट माईन
आने ही वाला है, मुस्कानों को लिये विहान॥1॥ बचे खुचे इस अन्धकार से मान न जाना हार।
आशा की किरणों से करते जाना सतत् प्रहार॥ उगने ही वाला है अब तो नवयुग का दिन मान।
मुरझाने मत दो, मन-माली आशा का उद्यान।
अन्धकार की गहन घुटन में धर कुछ क्षण धीर। नव प्रभाव का बहने ही वाला है स्वस्थ समीर॥
स्वयं प्रफुल्लित होंगे कलियों के, फूलों के प्राण। आने ही वाला है मुस्कानों को लिये विहान॥3॥
जीवन क्या? उल्लास, उमंगों का ही तो है नाम। उदासीनता और निराशा का इसमें क्या काम॥
जीने के शिव-संकल्पों को ही मिलता है अनुदान। मुरझाने मत दो, मन-माली आशा का उद्यान।
उगते हैं जीवन बगियों में श्रम, संयम के बीज फूलों का संसार संजोती, बीजों सी ना चीज॥
साहस ही सौरभ बिखराता, आशाएँ मुस्कान। आने ही वाला है मुस्कानों को लिये विहान॥5॥
तुम्हें लोक मंगल के पथ पर बिखराना है फूल। चुभें न गति को, घोर निराशाओं के नीरस-शूल
आशा और उमंग बनायें, जन जीवन गतिमान। मुरझाने मत दो, मन-माली आशा का उद्यान।
जीवन का हर फूल, सँवारे जन मंगल का थाल। जीवन सुमन सुशोभित कर दे मानवता का माल॥
हो समष्टि के लिये समर्पित, सहज व्यष्टि उत्थान। आने ही वाला है, मुस्कानों को लिये विहान॥7॥
-मंगल विजय
*समाप्त*