पदार्थ जड़ है। उसमें हलचल उत्पन्न करने का काम शक्ति करती है। जागतिक हलचलों में जो शक्ति झाँकती है उसे विज्ञान की भाषा में एनर्जी—क्षमता कहते हैं। विद्युत के अनेक रूप उसके भेद उपभेदों का परिचय देते हैं। संसार में जो कुछ घटित हो रहा है उसका श्रेय उसी शक्ति को है जिसे विज्ञानी अपने यन्त्रों द्वारा और आत्म−ज्ञानी अपने मन्त्रों द्वारा प्रकट एवं प्रमाणित करते हैं।
जीव चेतना है, पर वह चेतना भी सक्रिय तब होती है, जब उसे शक्ति का सहयोग मिलता है। चेतना के साथ समर्थता का समन्वय होने से ही वह अपने वर्चस्व को प्रकट कर पाती है। अकेली चेतना तो अपने अस्तित्व को बनाये रहने भर में सीमित बनी रहती है। परब्रह्म की मूल−सत्ता का तत्वदर्शियों ने साक्षी, दृष्टा, अचिन्त्य, निर्विकल्प जैसे शब्दों में निरूपण दिया है।
चेतना के प्रकटीकरण और प्रस्फुरण की समस्त सम्भावनाएँ संकल्प शक्ति में केन्द्रीभूत है। संकल्प की शक्ति से अपरिचित होने और उसके उपयोग का अभ्यास अनुभव न होने के कारण ही मनुष्य को अभावग्रस्त अविकसित स्थिति में पड़े रहने का दुर्भाग्य सहन करना पड़ता है। जिन्हें अपने को बढ़ाना और उठाना है उन्हें संकल्पशक्ति को उभारने और उसका सुदृढ़ अवलम्बन ग्रहण करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग है नहीं। संकल्पवान ही अपनी प्रसुप्त क्षमताओं को जगाते हैं और उसके चुम्बकत्व से अभीष्ट साधनों तथा सफलताओं को उपलब्ध करते चले जाते हैं। प्रगति का दार्शनिक इतिहास यही है। द्रुत गति से आगे बढ़ने वालों को संकल्प रथ पर आरूढ़ होकर ही लक्ष्य तक पहुँचने में सफलता मिलती रही है।
परमात्मा को एकाकीपन अखरा- उसने अपने विस्तार और विनोद के लिए अभीष्ट साधनों की आकांक्षा की। संकल्प द्वारा उसने कल्पवृक्ष की भूमिका निवाहा और वह सब कुछ प्रस्तुत हो गया जो सृष्टा को अभीष्ट था। संकल्प का देवता हमारी प्रगति और सुविधा के लिए जो आवश्यक है उसका वरदान देने खड़ा है। आवश्यकता इतनी भर है कि हम उसकी शक्ति को पहचानें और भक्ति की साधना कर सकने का साहस जुटायें।
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मैं भगवान् का राजकुमार−परमात्मा का बेटा कितना भाग्यवान्। मुझे मनुष्य शरीर मिला। ऐसा शरीर जिसमें असीम शक्ति व विकास की अनेक संभावनाएँ निहित। देवता भी ईर्ष्यालु मेरे सौभाग्य पर कि मुझे पुरुषार्थ का कैसा सुनहरा अवसर मिला; परन्तु दुर्भाग्य−
मेरे इस छोटे से जीवन में एक नहीं नौ ऐसे अवसर आए जब अपने आपको मैंने क्षुद्र बनते देखा।
जब मैं संसार में अपनी सफलता, यश, कीर्ति एवं प्रतिष्ठा बढ़ाने के उद्देश्य से इसी परमात्मा के बनाए मनुष्य के सामने दीन−हीन गिड़गिड़ाया व यह समझ उससे याचना करने लगा कि जैसे यही मनुष्य मेरा भाग्य विधाता हो। क्षुद्रता का यह प्रथम अवसर मेरे जीवन में आया।
क्षुद्रता की दूसरी अनुभूति उस अवसर पर हुई जब मैंने अनुभव किया कि मैं अपने से अधिक शक्ति सम्पन्न व्यक्तियों के सामने तो दीन−हीन बनता हूँ, परन्तु अपने से कमजोर एवं अपने पर आश्रित लोगों से अहंकार-घमण्ड की बातें करता हूँ मानो मेरी यह शक्ति मेरे विकास के लिए नहीं अपितु दुर्बलों−निर्बलों पर रौब जमाने का ही एक साधन हो!
अपने कर्त्तव्य निर्वाह हेतु कंटकाकीर्ण मार्ग पर चलते हुए, कष्ट सहकर भी कर्त्तव्य पूर्ति करते रहना अथवा सरल सुगम मार्ग अपनाकर अस्थाई सुख प्राप्त करने के दो मार्गों में से किसी एक मार्ग को चुनने का अवसर आने पर जब मैंने सस्ते सुख का मार्ग चुना व कर्त्तव्यपरायणता को विस्मृत कर दिया तब मुझे तीसरी बार अपनी क्षुद्रता का आभास हुआ।
चौथा अवसर क्षुद्रता का मेरे जीवन में तब आया जब मेरे द्वारा कोई अनैतिक व अनुचित काम एवं अपराध हो जाने पर मैंने उसका पश्चात्ताप व परिमार्जन न करके आत्मा की आवाज को यह कहकर दबा दिया “ऐसा तो चलता ही रहता है, दूसरे भी तो यही करते हैं, यह तो आज की परिस्थिति में एक आम शिष्टाचार बन गया है, इसमें दुःख क्या करना।”
मेरे जीवन की क्षुद्रता का वह पाँचवाँ क्षण था जब मैंने अपने मन की बातों को सहनकर क्षमा कर दिया व मन को बुद्धि पर हावी हो जाने दिया। इतना ही नहीं मैंने मन की बात को ही आत्मा की आवाज मान लिया।
छठी क्षुद्रता मुझसे उस समय हुई जब मैंने कुरूपता को घृणा की दृष्टि से देखा, मैंने यह नहीं जाना कि हमारी घृणा का ही परदा कुरूपता है तथा स्नेह का पर्दा सौन्दर्य है।
किसी के द्वारा प्रशंसित हो जाने पर सचमुच ही अपने आपको जब मैंने बड़ा मान लिया व दूसरों की प्रशंसा ही अपनी अच्छाई की कसौटी मान ली तो वह मेरी क्षुद्रता की सातवीं घड़ी थी।
आठवीं क्षुद्रता उस समय मेरे जीवन में प्रविष्ट हो गई जब मैंने अपने “स्व” का तो ध्यान कम रखा व मैं दूसरों को ही देखता परखता रहा स्वधर्म की चिन्ता किए बगैर परधर्म में ही रुचि लेता रहा।
क्षुद्रता की नवीं घड़ी तब आई जब मैंने विपत्ति आने पर आत्मविश्वास खोकर ‘याचना’ का मार्ग अपनाया।
इस तरह नौ अवसरों पर मैंने अपने आपको क्षुद्र बनते देखा।
सोचता हूँ परमपिता परमेश्वर के दिए इस शरीर से अब तो ऐसा कोई काम न हो जो मुझे और अधिक क्षुद्र बनावे।
—संत फ्रांसिस
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‘धृ’ धातु में ‘मन’ कृदन्त लगाकर “धर्म” शब्द बना है। इसका अर्थ होता है—धारण किये जाने वाला, आचरण करने योग्य! “धार्यते जनैरिति धर्मः”—मनुष्यों द्वारा जिसे धारण किया जाता है, अर्थात् मनुष्य मात्र जिसे अपने आचरण में लाए वह ही ‘धर्म’ कहलाता है। धर्म को धारण करने वाला, धर्म का अपने जीवन में आचरण करने वाला, धर्म के आधार पर अपने जीवन को जीने वाला व्यक्ति “धार्मिक” कहलाता है। इस दृष्टि से “धर्म” वह होगा जिसका आचरण करने से जिसको धारण करने से मनुष्य जीवन सुव्यवस्थित रूप से चलता रहे व जिसके अनुसार चलने से मनुष्य अपने निर्दिष्ट लक्ष्यानुसार जीवन निर्वाह करता हुआ अपने मनुष्य जीवन को सार्थक बनावे।
भगवान् ने जब मनुष्य को बनाया तो उसकी मनुष्य मात्र से यह अपेक्षा थी कि वह अपना स्वयं का ऐसा मर्यादापूर्ण आदर्श जीवन बनाये जिससे स्वयं उसका जीवन तो सफल हो ही साथ ही जिस परिवार, जिस समाज व युग में वह है उस परिवार, समाज व युग को भी अपने कृत्यों−अपने आचरणों से सुव्यवस्थित बनाए रख सके। इस दृष्टि से धर्म का लक्ष्य मनुष्य में शिवत्व का विकास करना है! स्वामी विवेकानन्द ने “राजयोग की टीका” नामक पुस्तक में बताया है कि धर्म का लक्ष्य मनुष्य में देवत्व या ईश्वरत्व की उपलब्धि ही है। धरती का हर मनुष्य इस तरह का आचरण करे कि उसका जीवन सुव्यवस्थित, सुनियोजित बना रहे, वह अपने कर्त्तव्य पथ पर चलता रहे धर्म के विपरीत आचरण व्यवहार न करे तो वह देवत्व तक पहुँच सकता है।
मनुष्य का विकास एवं अभ्युदय तो धर्म का ‘व्यष्टि’ परक तत्व है। धर्म का समष्टिपरक स्वरूप भी निर्धारित है। यदि हर मनुष्य धर्म द्वारा निर्धारित रीति से आचरण करे। अस्तेय, अपरिग्रह, अहिंसा जैसे सद्गुणों को अपने जीवन में अंगीकृत करले तो मनुष्य का यह ‘व्यष्टि’ परक गुण ही ‘समष्टि परक’ हो जाता है। जब सब मनुष्य धर्मानुकूल आचरण करने लगेंगे तो फिर कहीं कोई धर्म विपरीत आचरण न होने से ‘यही धर्म’ समष्टिपरक बन जावेगा। इसीलिए तो हमारे ऋषि मुनियों की यह मान्यता रही है कि यदि व्यक्ति सुधर जाय तो समाज भी बदल जाये। व्यक्ति से ही समाज बनता है, व्यष्टि से ही समष्टि बनती है, अतः यदि हर व्यक्ति अपने आपको धर्मनिष्ठ बनाले तो पूरा समाज व युग भी धर्मनिष्ठ बन ही जावेगा। यही धर्म का लक्ष्य भी है—व्यष्टि रूप में मनुष्य देवतुल्य बने व समष्टि रूप में यह धरती ही स्वर्ग बने।
इस दृष्टि से शायद स्वयं ‘धर्म’ को भी लोक या प्रजा की रक्षा करने वाला माना गया है। “धियते लोकोप्रजाः वा अनेन अथवा धरति लोकं प्रजाः वा इति धर्मः” जो लोक अथवा प्रजा को धारण करता है अर्थात् लोक या प्रजा की स्थिति की रक्षा करने वाला तत्व है वह ‘धर्म’ है। धर्म के इस तरह दो रूप हैं। प्रथम यह कि धर्म मनुष्य को धारण करने, आचरण करने, व्यवहार में लाने का तत्व है यह धर्म का “मानवाचार” का रूप है। धर्म का दूसरा रूप है “सामाजिक”। अपने दूसरे रूप में धर्म सामाजिक स्थिति को आधार बनता है। व्यष्टि रूप में यदि धर्म को मानव मात्र ने अंगीकृत किया व अपना व्यक्तिगत जीवन धर्मानुरूप बनाया तो समष्टि रूप में यही धर्माचरण ऐसी सामाजिक स्थिति का निर्माण करता है कि जिससे मनुष्य का सामाजिक सांस्कृतिक स्वरूप व्यवस्थित बना रहता है व पूरा समाज ही ऐसा बन जाता है जहाँ “एक के लिए सब व सबके लिए एक” का भाव व्याप्त रहता है। धर्म के इसी स्वरूप को राजनैतिक व आर्थिक क्षेत्र में “समता” “समानता” “समाजवाद” के नाम से सुना जाता है। किसी समय विशेष व समाज विशेष में धर्म की मान्यताएँ, मर्यादाएँ, नैतिक मूल्य निर्धारित हो जाने पर यदि उस समाज के सभी घटक ‘धर्म’ का पालन करने लगेंगे तो फिर ‘धर्म’ पूरे समाज की रक्षा भी करेगा ही क्योंकि समाज के किसी एक अंग पर विपत्ति आ पड़ने पर दूसरे घटक इसकी विपत्ति को दूर करना अपना ‘धर्म’ ही मानते हैं। इसी तरह समाज के कमजोर वर्ग को समुन्नत करने विकसित करने के लिए विकसित वर्ग के प्रयास ‘धर्मं’ “कर्त्तव्य” मानकर ही किए जाते हैं। समाज या राष्ट्र पर या इसके किसी अंग पर कोई प्राकृतिक प्रकोप आ जाने पर दूसरे वर्ग के लोग अपनी धार्मिक भावना के वशीभूत होकर ही तो कर्त्तव्य प्रेरित होते हैं कि अपने समाज के अन्य भाइयों के कष्ट निवारणार्थ कुछ त्याग करें। इसी दृष्टि से धर्म का यह स्वरूप सर्वमान्य है कि धर्म प्रजा की व समाज की रक्षा करता है।
धर्म के इन दो तत्वों—मानवाचरण एवं समाज रक्षण को दृष्टि में रखते हुए ही धर्म की धारणा निश्चित रहती है। धारणा से अर्थ वह व्यवहार-जीवन पद्धति, मर्यादा, आचार संहिता है जो “धर्म” स्वरूप मानी जावे तथा तदनुरूप ही उसका आचरण मनुष्य मात्र करे। इस दृष्टि से धर्म के प्रति समाज की जो ‘धारणा’ निश्चित हो वह ऐसी हो जो व्यक्तित्व परिष्कार, व्यक्ति कल्याण के साथ ही सामाजिक परिप्रेक्ष्य में भी अनुकूल हो। यहाँ ‘धर्म’ का अर्थ अपने जीवन निर्वाह के उद्देश्य से किया जाने वाला किसी प्रकार का श्रम ‘धर्म’ नहीं माना जा सकता। दस्यु जीवन बिताने वाले बाल्मीकि अपने परिवार के सदस्यों का पालन करने के लिए लूटपाट करने को ही ‘धर्म’ समझते थे। एकबार उन्होंने धन के लालच में सप्तऋषियों को पकड़ लिया। सप्तऋषियों ने पूछा “भाई असहाय लोगों को इस तरह मारना, लूटना तो पाप है, तुम यह सब क्यों करते हो” इस पर बाल्मीकि ने उत्तर दिया, “यह तो मेरी जीविका है अपने वृद्ध माता-पिता पत्नी व सन्तान का पालन पोषण करना है, मैं इनके प्रति अपने कर्त्तव्य निर्वाह हेतु ही इस कार्य को करता हूँ, यह तो मेरा धर्म है, जो मुझे करना ही पड़ता है। भला अपने पर आश्रित लोगों का पालन पोषण करना क्या पाप है?” इस पर सप्त ऋषियों ने समझाया, “अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए दूसरों के हितों का हनन करना, अपना पेट भरने के लिए दूसरों को भूखों मारना, तड़पाना, अपनी पारिवारिक सुख समृद्धि के लिए दूसरे परिवारों को कष्ट व असुविधा में डालना, बिना श्रम किए दूसरों का श्रमार्जित धन-छीनकर उसका उपभोग करना धर्म नहीं माना जा सकता।” बाल्मीकि को बात समझ में आई वे सोचने लगे यह तो ठीक है कि वे मनुष्यों को मारकर, उनकी सम्पत्ति को छीनकर अपने आश्रितों का पेट भर रहे हैं, परन्तु इससे दूसरों का उत्पीड़न होता है। कोई भी ऐसा कार्य जिससे दूसरों को पीड़ा हो, दूसरे के प्रति अन्यान्य हो, धर्म नहीं माना जा सकता। इस प्रकार की अनुभूति ने बाल्मीकि को दस्यु से महर्षि बना दिया। “धर्म” का तत्व जब उनके जीवन में प्रविष्ट हुआ तो स्वयं उनका व्यक्तिगत परिष्कार तो हुआ ही समाज की भी रक्षा हुई कि जो बाल्मीकि दस्यु के रूप में समाज का उत्पीड़न करते थे वे ही ‘धर्म’ का साक्षात्कार कर धर्म को अंगीकृत कर करोड़ों मनुष्यों के मार्गदर्शक बन गए।
धर्म के विषय में ऐसी ही भ्रान्त धारणा अर्जुन को भी थी। अर्जुन ने तो यहाँ तक कह दिया था कि यदि वह युद्ध में अपने मामा, चाचा, श्वसुर, गुरु, गुरु भाई को मारेगा तो उसका आचरण धर्म विपरीत हो जायगा। अर्जुन की ‘धर्म’ के प्रति यह धारणा उसके मोह का परिणाम था, परन्तु श्रीकृष्ण ने उसके धर्म के प्रति इस धारणा को अनुपयुक्त बताते हुए धर्म का सही स्वरूप बताया तथा उस समय की परिस्थिति में “युद्ध” करने को सत् और असत् वृत्तियों में से किसी एक का वरण करने के लिए प्रायः किंकर्त्तव्य विमूढ़ ही रहता है। मनुष्य की असद् वृत्तियाँ बलवती होती हैं वे मनुष्य को असत् कार्य करने के लिए लालायित व आकृष्ट करती रहती हैं, परन्तु भगवान् कृष्ण रूपी विवेक से हम सत्-असत्, उचित-अनुचित का निर्धारण कर, धर्म तत्व का निर्धारण कर धर्ममान्य सद्वृत्ति को ही स्वीकार करते हैं। भगवान् कृष्ण का “यदा यदाहि धर्मस्य.........” का वचन भी यही संकेत देता है कि अर्जुन की तरह जब मनुष्य सत्-असत् का निर्णय नहीं कर पाता, मोहवश अधर्म को ही ‘धर्म’ मान बैठता है, भ्रमवश अनुचित को ही उचित समझने लगता है तो फिर उसका यह कार्य ‘धर्म’ की परिधि में नहीं रहता, उसका कार्य न तो उसके अभ्युदय-कल्याण में ही सहायक होता और न उसके कार्यों से, उसके चिन्तन से सामाजिक व्यवस्था ही सुरक्षित रहती है, अर्थात् उस समय धर्म के प्रति मनुष्य की धारणा-विचारणा गलत हो जाने से ‘धर्म’ से होने वाले लाभ नहीं होते व इस तरह धर्म के प्रति विषाक्त धारणा बनाकर जो आचरण किया जाता है वह भी ‘श्रेय’ न होकर ‘प्रेय’ ही अधिक रहता है। अतः धर्म की यह एक प्रकार से क्षति ही हुई ऐसे में श्रीकृष्ण ने अपने अवतार लेने की घोषणा कर धर्म संस्थानार्थ के रूप में यही बात कही है कि जब-जब ऐसी स्थिति होती है तब-तब मनुष्य यदि अपने विवेक का उपयोग करे, अपनी ऋतम्भरा प्रज्ञा का उपयोग कर उचित-अनुचित का निर्धारण को तो धर्म की तथा धर्म को ध्येय मानकर किए जाने वाले आचरण की उपयोगिता व्यक्ति परिष्कार व समाज व्यवस्था की बनी रहेगी।
धर्म, मानव समाज और संस्कृति का मूलाधार है। इसी आधार-भूत तत्व के अनुसार संसार का ‘शुभ’ व ‘कल्याण’ टिका हुआ है। विश्व का कल्याण व मानव मात्र का ‘शुभ’ ‘धर्म’ वेष्टित आचरणों में ही निहित है। अपने इस सार्वभौम स्वरूप के कारण पूरे विश्व का ‘धर्म’ तो एक ही है जिसे विश्वधर्म-मानव धर्म कुछ भी संज्ञा दी जा सकती है। सामान्यतया धर्म के इस सार्वभौम स्वरूप की असीमता को नासमझ मनुष्यों ने ‘धर्म को अनेक सम्प्रदायों, जातियों, वर्गों द्वारा पालन की जाने वाली उपासना पद्धति, पूजा पद्धति, कर्मकाण्डों के प्रकार आदि की विविधता के कारण—इन सम्प्रदायों को ही धर्म मान लिया है। वास्तव में ‘धर्म’ तो एक ही है। ‘धर्म’ के लक्ष्यों तक पहुँचने के लिए जो अलग-अलग पद्धतियाँ प्रचलित हैं वे ‘धर्म’ नहीं वरन् सम्प्रदाय हैं। धर्म मानो महासागर है और सम्प्रदाय नदियाँ हैं जो विभिन्न स्थानों और दिशाओं से आकर इस महासागर में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से विलीन हो जाती हैं। यदि इन नदियों को ही भ्रमवश कोई सागर समझ ले व अपने सागर की महत्ता का ही ढिंढोरा पीटने लगे तो पीटने पर नदी सागर तो बन नहीं सकती। धर्म का तो एक ही लक्ष्य हैं—’सत्य’ ‘शिव’ ‘सुन्दर’ अर्थात् ऐसे आचरण जो सत्य हों, शुभ हों, कल्याणकारक हों तथा सुन्दर हों। धर्म के इस लक्ष्य की उपलब्धि के लिए विभिन्न मार्ग-पूजा, उपासना, अनुष्ठान आदि की व्यवस्था विभिन्न सम्प्रदायों में प्रचलित रहती हैं। इनमें से किसी सम्प्रदाय में कोई पद्धति विशेष अधिक प्रभावशाली प्रतीत होती है किसी में कम। इसी से हम इन पद्धतियों के प्रभावी होने न होने की यह मान लेते हैं मानो अमुक धर्म अमुक से श्रेष्ठ अथवा निम्नतर है। वास्तव में धर्म तो अपने स्थान पर स्थिर, अटल, शाश्वत है उस तक पहुँचने के मार्ग अपेक्षाकृत सुविधाजनक अथवा कष्टप्रद हो सकते हैं, परन्तु उनके कारण ‘धर्म’ प्रभावित नहीं होता।
धर्म की प्रति एक भ्रान्ति इसके अँगरेजी के अनुवाद ने उत्पन्न कर दी, अँगरेजी में धर्म को “रिलीजन” कहा गया, वास्तव में शब्द रिलीजन से जो ध्वनि निकलती हैं उससे संकीर्णता का आभास होता है। ‘धर्म’ जब से “रिलीजन” माना जाने लगा तो इसका अर्थ यही लगाया जाने लगा कि यह एक विशेष प्रकार की पूजा-आराधना पद्धति में आस्था-विश्वास रखने वाला तथा एक विशेष प्रकार के मार्ग पर यन्त्रवत् चलने वाला सम्प्रदाय विशेष है। विद्वान बैबूर ने अपनी पुस्तक ‘हिंदुइज्म एट. ए. ग्लान्स’ में लिखा है, “रिलीजन शब्द का अर्थ एक विश्वास और पूजा विधि है। किसी समुदाय विशेष के सिद्धान्तों में विश्वास करना तथा उस सम्प्रदाय द्वारा निर्दिष्ट कुछ विशेष पूजा अनुष्ठान आदि का पालन करना ही पश्चिम की दृष्टि में धार्मिक कह जाने वाले व्यक्ति के लिए पर्याप्त हैं।” शब्द रिलीजन से एक ऐसे संकुचित व अपूर्ण भाव का बोध होता है कि उससे ‘धर्म’ तत्व समाहित नहीं होता। धर्म का अनिवार्य तत्व उसकी उदारता, महानता, सार्वभौम सत्ता में निहित है जबकि ‘रिलीजन’ में इस तरह के भाव प्रकट नहीं होते।
धर्म का अपरिवर्तनशील शाश्वत सत्ता हैं। धर्म सार्वभौम शक्ति है जिसका लक्ष्य ही, “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया” है। धर्म एक ऐसी सत्ता है जिसकी शक्ति व सीमाएँ असीम हैं। वह राजसत्ता से कई गुना अधिक व्यापक व शक्तिमान है। अपने छोटे से भौगोलिक क्षेत्र में निश्चित परिधि में ही राजसत्ता काम करती है, परन्तु धर्म सत्ता का कार्य क्षेत्र समूचा विश्व है व इसकी शक्ति अपरिमेय है। विश्व का हर मानव इस धर्म सत्ता की प्रजा है व हर मानव स्वयं ही शासक भी है। धर्म सत्ता का कार्यक्षेत्र न केवल मानव मात्र के स्थूल शरीर तक ही है वरन् उसके मन, चिन्तन, स्वभाव, गुण व उसकी आत्मा तक विस्तृत है। यदि हर मनुष्य इस सत्ता के अधीन अपने को सम्बद्ध कर ले, इस सत्ता के अनुशासन में रह अपना गुण, कर्म, स्वभाव बना ले तो वह स्वयं सत्तामय हो जाय।
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श्रावस्ती के विशाल वेलुवन में भगवान् बुद्ध का धर्म दीक्षा समारोह आयोजित किया गया। नगरवासी प्रतिदिन उनके धार्मिक प्रवचन में भाग लेते और अमृत वाणी का दिव्य लाभ प्राप्त करते। धर्म जीवन के लिये क्यों आवश्यक है। अभिमुख होने से मनुष्य अपने यथार्थ स्वरूप को कैसे पहचानता है इन पर तथागत की सूक्ष्म मीमांसायें और मार्गदर्शन लोगों के हृदय में नई प्रेरणायें भरते। श्रावस्ती में इस तरह धर्म साकार हो उठा।
स्वार्थ की संकीर्णता और पूर्वाग्रह में ग्रस्त व्यक्ति के पास भगवान् भी पहुँच जायें तो भी उसकी जड़ता में अन्तर नहीं आता। वक्कलि था तो ब्राह्मण किन्तु गुण, कर्म, स्वभाव में ऐसी एक भी बात नहीं थी जिसमें उसका ब्राह्मणत्व झलकता। कई दिनों तक तो वह भगवान् बुद्ध के प्रवचन तो क्या दर्शनों तक के लिये नहीं गया, किन्तु जहाँ सारा नगर उमड़ रहा हो, जनसागर सम्पूर्णतः श्रद्धा से आविर्भूत हो रहा हो, वक्कलि की जिज्ञासा उसे शान्त कैसे बैठने देती? एक दिन नगरवासियों ने वक्कलि को भी वेलुवन समारोह में पाया।
वक्कलि ने भगवान् बुद्ध के प्रथम दर्शन किये। उनके रूप लावण्य, उनकी अद्वितीय तेजस्विता, सुगठित देह यष्टि तथा मुख से प्रकट होने वाली सौम्यता ने वक्कलि का मन मोह लिया। उसका हृदय तथागत के चरणों में लोटने लगा। उसने अनुभव किया यही तो वे मणियाँ थीं, जिनकी उसे खोज थी, उसने किंचित विलम्ब नहीं किया, उसी दिन बौद्ध धर्म की दीक्षा ग्रहण कर ली।
भगवान् बुद्ध ने दीक्षा तो दे दी किन्तु यह बात उनसे छिपी नहीं रह सकी कि वक्कलि ने दीक्षा भले ही ली हो धर्म का एक भी नियम उसने जीवन में धारण नहीं किया। वह नियमित उपासना नहीं करता, आत्मनिरिक्षण आत्म-सुधार की आवश्यकता और उपयोगिता भी उसने नहीं समझी। उसकी परमार्थ-परायणता सक्रिय तो क्या होती अब तक भी स्वार्थ के बन्दीगृह से मुक्त नहीं हो पाई थी। यदि कुछ था तो बस इतना ही कि वह नियमित संघगोष्ठी में सम्मिलित अवश्य होता। वहाँ भी उसकी सांसारिक बुद्धि ही मुखर रहती। भगवान् बुद्ध के प्रवचनों में भी उसकी अभिरुचि नहीं थी, वहाँ भी वह बुद्धदेव के सौन्दर्य की ही चर्चा करता रहता।
समय पाकर एक दिन उसने तथागत से पूछा ही लिया भगवन् मुझे भी ऐसी योग साधना बताइये जिससे मैं भी आप जितना ही सुन्दर हो जाऊँ, ऐसी ही तेजस्विता मुझमें भी आ जाये, आप जैसा नवयौवन मुझमें भी फूट पड़े, जिस दिन यह हो जायेगा, उस दिन मैं आपके धर्म का संसार भर में प्रचार करूंगा, जब तक मेरे पास उक्त आकर्षण नहीं लोग मेरी बात क्यों कर सुनेंगे?
आनन्द जीने में है—शक्तियों का उपयोग करने में है, ज्ञान के उपार्जन में है, अनौचित्य से लड़ने में हैं और उस शौर्य साहस का परिचय देने में है जो आदर्शवादी बनने के लिए प्रस्तुत करना पड़ता है।
—विवेकानन्द
तथागत मुस्कुराये, और बोले—तुम्हारा कथन सत्य है वक्कलि! तुम्हें शरीर को सुडौल बनाने वाले योग आसन बताये जा सकते हैं, लावण्य जिस प्राण का प्रस्फुटन है, उसके विकास के प्राणायाम भी बताये जा सकते हैं किन्तु वक्कलि यह सब भी क्षणभंगुर और नाशवान् हैं। आत्मोत्कर्ष का स्थायी आधार तो धर्म-धारणा है। यदि तुम्हें जीवन का यह मर्म समझ में आ जाये कि धर्म ही हमारी प्रगति और प्रसन्नता का मूल आधार है तो फिर तेजस्विता का वरदान तुम्हें स्वतः मिल जायेगा। धार्मिक आचरण की उपेक्षा करके तुम यदि उसे पा भी जाओ तो देर तक स्थिर न रख सकोगे।
वक्कलि को अपनी भूख का पता चल गया उस दिन से उसने आत्म-निरीक्षण और आत्म-सुधार का यथार्थ क्रम अपनाया तो एक दिन वह महान् भिक्षु बना।
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असुरता को निरस्त करना और देवत्व का अभिवर्द्धन, यह उभय पक्षीय कर्तव्य कर्म प्रत्येक मनुष्य को निवाहने होते हैं। आहार का ग्रहण और मल का विसर्जन दोनों ही क्रिया-कलाप जीवनयापन के अविच्छिन्न अंग हैं। भगवान को उद्देश्य लेकर अवतरित होना पड़ता है— 1-धर्म की स्थापना, 2-अधर्म का विनाश। दोनों का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। माली को पौधों में खाद-पानी लगाना पड़ता है साथ ही बेढंगी टहनियों की काट-छाँट तथा समीपवर्ती खर-पतवार उखाड़ने पर भी सतर्कतापूर्वक ध्यान रखना पड़ता है। आत्मोन्नति के लिए जहाँ स्वाध्याय, सत्संग, धर्मानुष्ठान आदि करने पड़ते हैं वहाँ कुसंस्कारों और दुष्प्रवृत्तियों के निराकरण के लिए आत्मशोधन की प्रताड़ना तपश्चर्या भी अपनानी होती है। प्रगति और परिष्कार के लिए सृजन और उन्मूलन की उभय पक्षीय प्रक्रिया अपनानी होती है। धर्माचरण की तरह ही अधर्म के प्रति प्रचंड आक्रोश प्रकट करने पर ही समग्र धर्म की रक्षा हो सकती है। अनीति के प्रति आक्रोश जागृत रखने को शास्त्रों में ‘मन्यु’ कहा गया है और उस प्रखरता को धर्म का अविच्छिन्न अंग माना गया है। अतिवादी, उदार पक्षी, एकांगी धार्मिकता का ही दुष्परिणाम था जो हजार वर्ष की लम्बी राजनैतिक गुलामी के रूप में अपने देश को अभिशाप की तरह भुगतना पड़ा।
सज्जनता का परिपोषण जितना आवश्यक है उतना ही दुष्टता का उन्मूलन भी, परम पवित्र मानवी कर्तव्य है। यदि यह सनातन सत्य ठीक तरह समझा जा सके तो प्राचीन काल की तरह आज भी हर व्यक्ति को न्याय के औचित्य का पोषण और अन्याय के अनौचित्य का निराकरण हो सकता है। शास्त्र कहता है—
यत्र ब्रह्म च क्षत्रं च सम्यश्चो चरतः सह। तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेयं यत्र देवा सहाऽग्निना॥
जहाँ ब्रह्म शक्ति और क्षात्र शक्ति साथ-साथ रहती हैं, जहाँ पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान कायम रहता है, वही देश पुण्य देश रहता है।
ना ब्रह्म क्षात्रमृघ्नोति ना क्षत्रं ब्रह्मवर्धते। ब्रह्म क्षत्रं च संपृक्तमिह चामुन्न वर्धते॥
—मनु. 6। 322
न बिना ब्रह्मशक्ति के क्षात्रशक्ति बढ़ सकती है, और न बिना क्षात्रशक्ति के ब्रह्मशक्ति बढ़ सकती है, प्रत्युत दोनों के मेल से ही लोक परलोक की उन्नति होती हैं।
ब्रह्म वा इदमग्र आसीदेकमेव, तदेकं सन्नव्य भवत्। तच्छ्रेयो रूपमत्यसृजत क्षत्रं यान्येतानि देवत्रा क्षत्राणिन्द्रो वरुणः सोमो रुद्रः पर्जन्योः यमो मृत्युरीशान इति।
—बृह. उ. 51। 4। 11
सृष्टि के पूर्व—जगत् के जगत् स्वरूप में व्याकृत होने के पहले केवल एक ब्रह्म ही था। उस समय एक था। परन्तु ब्राह्मण जात्याभिमानी एक ब्रह्म से सृष्टि, स्थिति आदि विश्व से समस्त कार्यों का निर्वाह नहीं हो सकता। एक ब्रह्मा सृष्टि, स्थिति आदि निखिल जगत् कार्यों का सम्पादन करने में पर्याप्त समर्थ नहीं हैं। इसी कारथ कर्म करने की इच्छा से परमात्मा प्रशस्त रूप में क्षत्रिय-भाव से युक्त हुए। इन्द्र, वरुण, साम, रुद्र, पर्जन्य, यम, मृत्यु और ईशान रूप में व्यक्त हुए। इन्द्रादि देवगण क्षत्रिय जाति के देवता है।
ब्राह्मणैः छत्रवंधुर हि द्वारपालो नियोजितः।
—भागवत
ब्राह्मण कर्म वालों ने क्षत्रिय कर्म वाले भाइयों को समाज का चौकीदार नियुक्त किया।
शम प्रधानेषु तपोधनेषु गूढं हि दाहात्मकमस्ति तेज।
—कालिदास
“शम प्रधान तपस्वियों में [शत्रुओं को] जलाने वाला तेज छिपा हुआ हैं।”
वीरता ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों के लिए समान रूप से आवश्यक है। ब्राह्मण उसका साहसिकता का परिचय सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन में तन्मय रह कर देता है। क्षत्रिय अपनी शूरता को दुष्टता से जूझने में लगाता है। दोनों का कार्य समान रूप से आवश्यक है। अस्तु दोनों को ही श्रेयाधिकारी कहा गया है।
वेदाध्ययन शूराश्च शूराश्चाध्यापनेरताः गुरु सुश्रूषया शूरा मातृपितृ परायणा आरण्य गृह वासे च शूरा कर्तव्यपालने।
जो वेदाध्ययन में, अध्यापन में, गुरु सेवा में, माता-पिता की सेवा में, कर्तव्य परायणता में शूर है वह चाहे वनवासी बने अथवा घर में रहे समान रूप से प्रशंसनीय है।
प्राचीन काल में युद्ध धर्म युद्ध के रूप में ही होते थे। नीति और न्याय की रक्षा के लिए असुरता के विरुद्ध लोहा लिया जाता था। अनीतिपूर्वक स्वार्थ सिद्धि करने के लिए आक्रमण करने की देव परम्परा कभी रही ही नहीं। जब भी लड़ना पड़ता तब दुष्टता को निरस्त करना ही उसका लक्ष्य रहा। अस्तु भारतीय युद्धों का इतिहास ‘धर्म युद्ध’ के रूप में ही देखा जा सकता है। जिस प्रकार ब्राह्मण तपश्चर्या और लोक सेवा में अपने को तिल-तिल गलाता-घुलाता था। उसी प्रकार क्षत्रिय भी असुरता से जूझने में अपने प्राणों की परवाह न करते थे और जान हथेली पर रखकर अन्याय से जूझते और उसे मिटाकर ही चैन लेते थे। क्षत्रिय धर्म और उनके धर्म युद्ध की शास्त्रों ने भूरि-भूरि प्रशंसा की है और कायरतावश उससे जी चुराने वालों को निन्दनीय ठहराया है।
वेद में भी बताया गया है—
ये युद्धयन्ते प्रधनेषु शूरासो से तनुत्यजः। ये वा सहस्रदक्षिणास्तांश्चिदेवापि गच्छतात्॥
—अ. वे. 18। 2। 17
जो संग्रामों में लड़ने वाले हैं, जो शूरवीरता से शरीर को त्यागने वाले हैं और जिन्होंने सहस्रों दक्षिणायें दी हैं। तू उनको भी प्राप्त हो।
स्वधर्ममपि-चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि। धर्म्याद्धि बुद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते॥
—गीता 2। 31
स्व धर्म को समझकर भी तुझे हिचकिचाना उचित नहीं है, क्योंकि धर्म युद्ध की अपेक्षा क्षत्रिय के लिए और कुछ अधिक श्रेयस्कर नहीं हो सकता।
यतृच्छया चोपपन्न स्वर्गद्वारमगवृतम्। सुखिन क्षत्रियाः पार्थःस्लभन्ते युद्धमीदृशम्॥
—गीता 2। 32
हे पार्थ! यों अपने आप प्राप्त हुआ और मानो स्वर्ग का द्वार ही खुल गया हो ऐसा युद्ध तो भाग्यशाली क्षत्रियों को ही मिलता है।
धर्म्याद्धि यद्धाश्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्॥
हे अर्जुन! क्षात्र धर्मावलम्बी के लिए धर्मयुद्ध से बढ़ कर श्रेयस्कर कोई दूसरी वस्तु नहीं है। धर्मतः एवं न्यायतः प्राप्य पैत्रिक राज्यान्श के लिए यह जो धर्मयुद्ध तुम कर रहे हो, भाग्यवान् क्षात्रधर्मावलम्बीगण ही ऐसे युद्ध का सुअवसर पाते हैं।
यस्तु प्राणान् परित्यज्य प्रविशेदुद्यतायुधः। संग्राममग्निप्रतिमं पतंग इव निर्भयः॥ स्वर्गमाविशते ज्ञात्वा योधस्य गति निश्चयम्॥
—महाभारत
जो अपने प्राणों की चिन्ता छोड़कर पतंग की भाँति निर्भय हो हाथ में हथियार उठाये अग्नि के समान विनाशकारी संग्राम में प्रवेश कर जाता है, और योन्द्वा को मिलने वाली निश्चित गति को जानकर उत्साहपूर्वक जूझता है, वह स्वर्ग लोक में जाता है।
सलिलादुत्थितोवह्निर्येनव्याप्तंचराचरम्। दधीचस्यास्थितो बज्रं कृतं दानवसूदनम्॥
—महाभारत
पानी से आग पैदा हुई जो सारे जगत् को व्याप्त कर रही है। दधीच की हड्डी से सारे दानवों का नाशक वज्र बनाया गया।
भगवान के सभी अवतार धर्म स्थापना और अधर्म का नाश करने के लिए हुए। दुर्गा का अवतार तो विशेषतया असुरता से जूझने के लिए ही हुआ।
इत्थं यदा यदा बाधा दानवोत्था भविश्यति। तदा तदावतीर्याहं करिष्याम्यस्सिंक्षयम्॥
—सप्तशती
जब-जब दानव प्रकृति वाले जोर पकड़ कर सृष्टि कार्य [सामाजिक प्रगति] में रोड़ा अटकायेंगे, तभी मैं प्रकट होकर उनका नाश करूंगी।
भारतीय धर्म और संस्कृति की जननी गायत्री है। उसे ब्रह्मवर्चस् भी कहते हैं। उसमें ब्रह्मज्ञान और ब्रह्म तेज दोनों का समावेश है। उन दोनों ही तत्वों की उपासना करने वाला ब्रह्मतेज सम्पन्न हो जाता है। इन तथ्य को शतपथ ब्राह्मण में इस प्रकार कहा गया है—
तेजो वै ब्रह्मवर्चसं गायत्री। तेजस्वी ब्रह्मवर्चस्वी भवति॥
—शतपथ
“गायत्री ही तेज और ब्रह्मवर्चस् स्वरूप है। उसका सदैव अनुष्ठान करने से तेजस्वी और ब्रह्म वर्चस्वी बनता है।”
हकीम लुकमान बड़े तत्वज्ञानी थे। बचपन में वे गुलाम थे। अपने मालिक की मर्जी के अनुसार ही चला करते थे। वे दिन रात मालिक की सेवा में ही गले रहते थे। मालिक ने एक दिन लुकमान को जानबूझ कर एक कड़वी ककड़ी खाने को दी व कहा, “लो यह ककड़ी खाओ।” मालिक ने सोचा था कि लुकमान इसे चखते ही फेंक देगा व प्रथम ग्रास को थूक देगा। मगर यह क्या? लुकमान वह पूरी कंकड़ी बिना मुँह बनाए खा गए। उनके मुँह के हाव-भाव ने ऐसा भी न महसूस होने दिया कि ककड़ी उन्हें कड़वी लगी।
मालिक ने पूछा, “वह ककड़ी तो कड़वी थी उसे तू पूरी ही खा कैसे गया?” लुकमान ने कहा, “मेरे अच्छे मालिक आप मुझे रोज ही खाने-पीने की कितनी चीजें देते हैं, उन्हीं के सहारे मेरा जीवन चल रहा है व आपके ही अनुदान से मैं इतना सुख प्राप्त करता आ रहा हूँ! आपने मुझे जब सदैव इतनी सारी अच्छी वस्तुएँ दीं व उन्हें मैंने स्वीकार कर अपना जीवन चलाया तो आज यदि कड़वी चीज आ गई तो उसे भी मैं स्वीकार क्यों न करता?” लुकमान ने कहा, “मालिक मुझे तो तेरी बगिया में रहना है मुझे तो तेरे फूलों से भी उतना ही प्यार है जितना तेरे काँटों से।”
मालिक बड़ा उदार हृदय व समझदार था, उसने बात समझी और वह विचार करने लगा “सच है उस मालिक ने हमें जन्म दिया, हमारा पालन किया व तरह-तरह के अनुदान देकर हमें इतने सुख में रखा तो यदि कभी-कभी हम विपत्तियों में पड़ जायें व हमारे जीवन में प्रतिकूलताएँ आवें तो उन्हें प्रभु का प्रसाद मानकर स्वीकार करना चाहिए। मालिक ने लुकमान से कहा, “तुमने मुझे बड़ा सबक सिखाया है कि जो परमात्मा हमें तरह-तरह के सुख देता है, उसके हाथ से अगर कभी दुःख भी मिले तो उसे खुशी से भोगना चाहिए।”
मालिक ने लुकमान का बड़ा सम्मान किया व उसी दिन लुकमान को आजाद कर दिया।
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योग वसिष्ठ में एक महत्वपूर्ण आख्यायिका आती है। लीला नाम की रानी के पति का देहावसान हो जाता है पति के निधन से वह अत्यधिक दुःखी होती है। तब महर्षि नारद आकर कहते हैं, जिसके लिये तुम विलाप कर रही हो वह इसी तुम्हारे उद्यान में एक नया परिवेश धारण कर चुके हैं। वे लीला को अंतर्दृष्टि देते हैं तो वह देखती है कि उसके पति एक कीटक के रूप में विद्यमान हैं, यही नहीं वहाँ भी उनके पास कई रानियाँ हैं वे उनमें आसक्त से दिखे। वह जिनकी याद में घुली जा रही थी उसे उसकी सुध तक नहीं थी। लीला ने अनुभव किया कि यह माया, मोह और आसक्ति मनुष्य का नितान्त भ्रम और अज्ञान है उससे भी बड़ा अज्ञान है—मृत्यु की कल्पना वास्तव में जीव-चेतना एक शरीर से दूसरे शरीर, एक जगत से दूसरे जगत में परिभ्रमण करती रहती है। जब तक वह सत्य लोक या अमरणशील या परमानन्द की स्थिति नहीं प्राप्त कर लेता तब तक यह क्रम चलता ही रहता है।
उक्त आख्यायिका का तत्वदर्शन बड़े ही महत्व का है। महर्षि वशिष्ठ कहते हैं—
सर्गे सर्गे प्रथगरुपं सन्ति सगन्तिराण्यपि।
तेप्वघन्तः स्थसर्गोधाः कदली दलपीठवत॥
—योग वशिष्ठ 3। 18। 16-17
आकाशे परमाण्यन्तर्द्र व्यादेरणु केऽपिच।
जीवाणु यन्त्र तत्रेदं जगद् वेत्ति निजं वपुः॥
अर्थात्—जिस प्रकार केले के तने के अन्दर एक के बाद एक अनेक परतें निकलती चली आती हैं। उसी प्रकार एक सृष्टि में अनन्त सृष्टियों की रचना विद्यमान है। संसार में व्याप्त प्रत्येक परमाणु में स्वप्न-लोक, छाया-लोक और चेतन जगत विद्यमान हैं, उसी प्रकार उनमें प्रसुप्त जीवन, पिशाच गति तथा चेतन समुदाय की सृष्टियाँ ठीक इस दृश्य जगत जैसी ही विद्यमान हैं।
देखने में यह प्रत्यक्ष जीवन और गति अधिक समर्थ और शक्तिशाली दिखाई देते हैं, किन्तु यह अपनी भूल तथा स्थूल दृष्टि मात्र हैं। यदि अपने ज्ञान चक्षु जागृत हो जायें और लीला की तरह अन्तर्सृष्टियों की गतिविधियों, उन अवस्थाओं की समर्थता को समझ पायें तो यह पता चलेगा कि शक्ति और सामर्थ्य की दृष्टि से दृश्य-जगत सबसे कमजोर है उसके आंखें, कान, नाक, हाथ-पाँव पेट आँतों की सामर्थ्य बहुत सीमित है, उससे भी आगे उसका प्रेत या उसका छाया शरीर विद्यमान है यह अपेक्षाकृत अधिक सामर्थ्यवान है वह वायु वेग की तरह गतिशील, पहाड़ तक उठा लेने जितना बलवान् और निमिष भाव में सैकड़ों मील दूर की खबर ले आने वाले अन्तर्दृष्टा है। उससे भी आगे की एक और सत्ता है देव सत्ता-समस्त शक्तियों, साधनों और दिव्य ज्ञान से परिपूर्ण वहाँ न भय है न ईर्ष्या, द्वेष और अभाव। मृत्यु की पीड़ा भी नहीं सताती प्रियजनों का वियोग भी नहीं रुलाता। सृष्टियों और सृष्टिचरों का यह तारतम्य उस परिपूर्ण अवस्था तक पहुँचा देता है, जहाँ न इच्छायें हैं न वासनायें, हैं, न जरा है, न व्याधियाँ, न कर्त्तृत्व है। इसे आनन्दमय स्थिति, तुरीयावस्था, साक्षी, दृष्टा परमानन्द की स्थिति कहा गया है। भारतीय दर्शन इस स्थिति को प्राप्त करने की निरन्तर प्रेरणा देता रहता है और उसे ही परम पुरुषार्थ की संज्ञा देता है यही जीवन लक्ष्य भी माना गया है।
भारतीय दर्शन के इस सत्य को अब भौतिक विज्ञान भी प्रमाणित करने लगा है। पिछले चालीस वर्षों से चोटी के खगोलज्ञ इस खोज में जुटे हैं कि वह यह जान पायें कि यह सृष्टि और यहाँ के निवासी ही अन्तिम हैं या और भी कोई ब्रह्माण्ड हैं। इस खोज में अब तक जो निष्कर्ष निकले हैं वे भौतिक दृष्टि को चकमका देने वाले हैं। स्थूल जगत के अन्दर क्रमशः अधिक सूक्ष्म और समर्थ क्षेत्रों की जैसे-जैसे पहचान होती जा रही है वैसे-वैसे आश्चर्य बढ़ता जा रहा है।
प्रसिद्ध डच व्यापारी एन्टानवान लीवेन हाक को शीशों के कौने रगड़-रगड़ कर उनके लेन्स बनाने का शौक था। एक बार उसने एक ऐसा लेन्स बना लिया जो वस्तुओं की आकृति 270 गुना परिवर्द्धित दिखा सकता था। उसने इस लेन्स की सहायता से जब पहली बार गन्दे पानी को देखा तो उसमें लाखों की तादाद में कीटाणु दिखाई दिये। उसके मन में जिज्ञासा जागृत हुई फलस्वरूप अब उसने शुद्ध जल का निरीक्षण किया। उसने यह देखा कि वहाँ भी जीवन विद्यमान है और वह न केवल तैर रहे हैं अपितु अनेक सूक्ष्म से सूक्ष्म और बुद्धिमान प्राणी की तरह क्रीड़ायें भी कर रहे हैं, वह इस दृश्य से इतना अधिक आविर्भूत हो उठा कि उसने अपनी पुत्री मारिया को भी बुलाया और दोनों घन्टों इस कौतूहलपूर्ण दृश्य को अवाक् देखते रहे। अब तो उससे अनेक गुना शक्ति शाली सूक्ष्मदर्शी बने गये हैं और उनसे दृश्य जगत के निर्माण के आधार परमाणुओं का विस्तृत अन्वीक्षण अन्वेषण और अध्ययन भी सम्भव हो गया है। ब्रह्माण्डों के भीतर अनन्त ब्रह्माण्डों की पदार्थ में विलक्षण अपदार्थ और परम पदार्थ की उपस्थिति जानने के लिये विश्व ब्रह्माण्ड की ईंट परमाणु की अन्तर्रचना का अध्ययन आवश्यक है।
परमाणु की लघुता को नापना हो तो कोई न कोई सापेक्ष सिद्धान्त ही अपनाना पड़ेगा। उदाहरण के लिये एक काँच के गिलास में भरे पानी के परमाणुओं को यदि बालू के कण के बराबर मान लिया जाये तो गिलास की समस्त बालू अटलांटिक महासागर में डाल देने से वह पट कर एक खेल का लम्बा चौड़ा मैदान बन जायेगा। परमाणु पदार्थ की अत्यन्त लघुतम इकाई है यदि 25 करोड़ परमाणुओं 25 करोड़ सैनिकों की एक हथियार बन्द सेना मानकर उन्हें एक पंक्ति में “फालेन” होने का आदेश दिया जाये तो उनके लिये 1 इंच भूमि पर्याप्त है। यह अंश क्षुद्र इतना होता है कि हाइड्रोजन के एक परमाणु का भार कुल 1⁄1000000000000000000000000000 ग्राम से भी कम होगा किन्तु इनकी शक्ति बहुत अधिक होती है उसकी कल्पना करना भी कठिन है।
इलेक्ट्रान, प्रोट्रॉन, न्यूट्रॉन आदि कण अत्याधिक वेग वाले होते हैं, किन्तु तो भी इनकी गति प्रकाश की गति से कम होती है डॉ. सुदर्शन तथा टैक्सास यूनिवर्सिटी अमेरिका के उनके सहयोगी डॉ. विलानिडक ने ऐसे कणों को टाडियान की संज्ञा दी है इन कणों में द्रव्य-भार शून्य से कुछ अधिक मात्रा में विद्यमान रहता है, किन्तु इससे भिन्न प्रकार के कुछ कण वह होते हैं। जिनमें द्रव्य भार बिलकुल नहीं होता किन्तु जिनकी गति प्रकाश की गति 186000 मील प्रति सेकेण्ड या 299792.5 किलोमीटर प्रति सैकिंड होती है। इन्हें “लक्सान” कहा जाता है। इस वर्ग में फोटान, न्यड्रिनों तथा ग्रेवीटोन आते हैं।
“टेकियान” इन दोनों से भी भिन्न कोटि के कण हैं इनमें या तो भार नाम की सत्ता है ही नहीं या है भी तो नाम मात्र के लिये किन्तु इनकी गति प्रकाश की गति से भी बहुत अधिक होती है और अब यह माना जाने लगा है जिस दिन इस वर्ग के कणों की खोज सम्भव हो गई उस दिन सारा ब्रह्माण्ड नंगी आँखों से दिखाई देने वाला एक नन्हा-सा क्षेत्र मात्र रह जायेगा। अर्थात् उस दिन मानवीय चेतना का अस्तित्व अत्यधिक विराट् हो जायेगा।
इस परिकल्पना के कुछ ठोस आधार है इलेक्ट्रान और पॉजीट्रान जो कि टार्डियान किस्म के परमाणविक कण हैं परस्पर मिलने पर गमा किरणें पैदा करते हैं। इन किरणों में प्रकाश की गति होती है अतएव वे “लक्सान” वर्ग में आ जाती है। अब यदि “लक्सान” के घटक न्यूट्रिनों व ग्रेवीटोन आदि मिलकर कोई नई रचना प्रस्तुत करते हैं तो वह निःसन्देह “टेकियान” वर्ग का तत्व होगा और उसे एक ब्रह्माण्ड से दूसरे ब्रह्माण्ड के छोर तक पहुँचने में कुछ सेकेण्ड ही लगेंगे जबकि प्रकाश कणों को वहाँ तक पहुँचने में शताब्दियाँ लग जाती हैं।
परमाणु के भीतर के इन कणों से विनिर्मित सृष्टि बहुत महत्वपूर्ण तथा एक स्वतन्त्र भूखंड ही प्रतीत होता है जिसमें नाभिक सूर्य की तरह चमकता है इलेक्ट्रान तारों की तरह चक्कर लगाते हैं न्यूट्रॉन और प्रोटानों में पहाड़, नदी, नद, वृक्ष, वनस्पति आदि के अद्भुत अनोखे दृश्य दिखाई देते हैं। यह तो रही बात दृश्य की।
अब प्रतिकणों की दुनिया को देखें। प्रत्येक परमाणु में जितनी संख्या इन कणों की होती है, उतनी ही निश्चित रूप से प्रति कणों की। इलेक्ट्रान का प्रतिकण पाजिट्रान कहलाता है। इसी तरह प्रोटान का प्रति प्रोटान, न्यूट्रॉन का प्रति न्यूट्रॉन के मेसान का प्रति के मेसान, पाई मेसान का प्रति पाई मेसान और फोटान को प्रति फोटान। जिस तरह “सब एटॉमिक पार्टिकल” के प्रति कण विद्यमान हैं। ऊपर के हाइड्रोजन के प्रति-हाइड्रोजन (भारी पानी) की खोज का विवरण दिया जा चुका है भविष्य में ऑक्सीजन का प्रति ऑक्सीजन पारद का प्रति पारद सोने का प्रति सोना भी बनेगा और निश्चय ही उसकी शक्ति, वजन, कीमत सब कुछ अधिक से अधिकतम होगा।
अब यह विचार उठना नितान्त स्वाभाविक है कि जिस तरह दृश्य कणों से मिलकर हमारी सृष्टि बनी है उसी तरह प्रत्येक परमाणु में विद्यमान प्रतिकण मिलकर एक प्रति जगत भी बनाते हैं। यह प्रतिकण प्रति ब्रह्माण्ड बनाते हैं, उनका अस्तित्व कहाँ है यह पता लगाना अभी बाकी है, किन्तु तत्वों की निरन्तर खोज से वह गति पकड़ में आ सकती है जो कौशल्या, अर्जुन और काकभुशुंडि की तरह हमें उन प्रति ब्रह्माण्डों के भी दर्शन करा सके जिनमें न तो कोई काल है न दिशा न ब्रह्माण्ड होगा न स्थूल सृष्टि अपितु शास्त्रकार के शब्दों में वहाँ प्रकाश अनन्त घोष और चेतना के स्पन्दन के अतिरिक्त कुछ नहीं होगा पर जो कुछ भी होगा वह हमसे असम्बद्ध नहीं होगा क्योंकि पदार्थ, उनके प्रति कण, उनकी प्रति चेतना की सुसम्बद्धता की तरह ही प्रति पदार्थ, प्रति द्रव्य और प्रति ब्रह्माण्ड भी परस्पर एक दूसरे में ही गुम्फित हैं, इन्हें अवस्थायें कहा जा सकता है जो क्रमशः स्थूल से सूक्ष्म, शक्ति से शक्तिशाली होती चली गई है। भारतीय दर्शन और योग सिद्धियों में छाया प्रेत, कुंडलिनी महाशक्ति और सहस्रार जैसी शक्तियों के विवरण आते हैं वह इन प्रति कणों के ही संसार हैं। हमारी अन्तश्चेतना जिस बिन्दु तक पहुँच जाती है। वैसी ही अनुभूति अहंकार, शक्ति और सामर्थ्य वाली हो जाती है। योगियों का अतीन्द्रिय ज्ञान, अलौकिक क्षमतायें अदृश्य-दृश्य आदि सब विज्ञान की भाषा में प्रति कणों का वशीकरण या विकास ही माना जाना चाहिये।
“मैं उतना ही कमजोर इन्सान हूँ जितना कि हममें से कोई हो सकता है और मुझमें कोई विलक्षणता न पहले कभी थी और न अब है। मैं सीधा सादा आदमी हूँ। तो भी मैं स्वीकार करता हूँ कि इतनी नम्रता मुझमें है कि अपनी गलतियाँ स्वीकार करूं और अपने गलत कदम वापिस लूँ। ईश्वर और उसकी महानता में मेरी अटूट श्रद्धा है साथ ही सत्य और प्रेम में प्रगाढ़ आसक्ति। किन्तु यह आस्था किसी न किसी रूप में हर किसी में विद्यमान है।”
—महात्मा गान्धी
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उस समय और कोई बात तो नहीं हुई किन्तु दो दिनों तक घर में विलक्षण मायूसी छाई रही। तीसरे दिन वह निराशा की स्थिति पूर्ण विहाग में तब बदल गई जब सचमुच जेस्सी के दुर्घटनाग्रस्त होने का तार मिला। आश्चर्य की बात यह थी कि श्रीमती रेमर ने जिस समय यह चीख सुनी वह और जेस्सी के कार ऐक्सीडेंट—जिससे उसका प्राणान्त हुआ—का समय एक ही था।
एक अन्य घटना—फ्रान्स के रियर एडमिरल गैलरी की आत्मकथा से उद्धृत।—आठ घंटियाँ (एट बेल्स) नामक उक्त आत्मकथा में गैलरी महाशय लिखते हैं—मुझे सोमवार को अपनी ड्यूटी पर जान था। रविवार की रात जब मैं सोया तो स्वप्न देखा कि मैं अपने जहाज पर बैठा हूँ, जहाज चलने की तैयारी में हैं। यात्री ऊपर आ रहे हैं, दो युवक आते हैं, मैंने उनसे नाम पूछा—एक ने अपना नाम डिक ग्रेन्स दूसरे ने पाप-कनवे बताया। तभी जहाज में एकाएक विस्फोट होता है और किसी को तो कुछ नहीं होता पर यही दोनों जख्मी होते हैं और पाप मर जाता है। स्वप्न इतनी गम्भीर मनःस्थिति में देखा था कि सोकर उठने के बाद भी वह मानस पटल पर छाया रहा। जबकि आये दिन दिखने वाले स्वप्न जोर देने पर भी याद नहीं आते।
आश्चर्य वहाँ से प्रारम्भ हुआ जब मैंने आफिस जाकर जहाज के यात्रियों की लिस्ट पर दृष्टि दौड़ाई मुझे यह देखकर भारी हैरानी हुई कि जो नाम इससे पहले कभी सुने भी नहीं थे—जो रात स्वप्न में देखे थे वे सचमुच उस लिस्ट में थे। यह देखते ही हृदय किसी अज्ञात आशंका से भर गया। फिर भी जीवन की गति तो कोई न चलाना चाहे तो भी चलती है। जहाज ने ठीक समय पर प्रस्थान किया पर अभी उसने अच्छी तरह बन्दरगाह भी नहीं छोड़ा था कि एक इंजन में विस्फोट हुआ, केवल डिक ग्रेन्स और पाप कनवे दुर्घटनाग्रस्त हुए, जिनमें से पाप कनबे की तत्काल मृत्यु हो गई।
एक तीसरी घटना—डरहम की एक स्त्री से सम्बन्धित है, पैरासाइकोलॉजी संस्थान कैलीफोर्निया के रिकार्ड से ली गई—डरहम की एक स्त्री अपने बच्चों के साथ स्नान के लिये निकली। घर में उस समय उक्त महिला अर्थात् उस स्त्री की सास ही रह गई। अभी वह स्त्री वहाँ से कुछ सौ गज ही मोड़ पार कर गई होगी कि उसकी सास बुरी तरह चिल्लाई—बहू को खतरा है। पास-पड़ोस के लोग दौड़े और इस पागलपन पर हँसे भी। किन्तु दो घंटे बाद ही शेरिफ ने सूचना दी कि रास्ते में ऐक्सिडेन्ट हो जाने से अस्पताल में महिला का प्राणान्त हो गया है।
ऊपर एक ही तरह की तीन घटनायें दी हैं जो न तो भाव-सम्प्रेषण (टेलीपैथी) है और न ही दूरदर्शन (क्लेरवायेन्स)। टेलीपैथी का अर्थ उस आभास से है जिसमें किसी मित्र, परिचित, कुटुम्बी या प्रिय परिजन द्वारा भावनाओं की अत्यधिक गहराई से याद किया गया हो और वह संवेदना इस व्यक्ति तक पहुँची हो। इसी तरह दूरदर्शन का अर्थ तो मात्र भौगोलिक दूरी को किसी अतीन्द्रिय क्षमता से पार कर किसी घटना का आभास पाया गया हो। ऊपर तीन घटनायें प्रस्तुत की गई हैं उनमें एक का सम्बन्ध वर्तमान से है तो शेष दो का अतीत और भविष्य से। जो हो रहा है वह देखा जा सकता है जो हो चुका है उसे भी जाना जा सकता है कि अभी तक जो हुआ ही नहीं यदि उसकी जानकारी हो जाती है तो उसे न तो दूरदर्शन ही कहा जायेगा और न ही दूरसंचार। वास्तव में इस तरह की अनुभूतियाँ आये दिन हर किसी को होती रहती हैं और उनका मानव-जीवन से गहन आध्यात्मिक सम्बन्ध भी है। तथापि उन्हें समझ पाना हर किसी के लिये सम्भव नहीं होता।
वेदान्त दर्शन के अनुसार सृष्टि में एक “ब्राह्मी चेतना” या परमात्मा ही एक ऐसा तत्व है जो सर्वव्यापी है अर्थात् ब्रह्माण्ड उसी में अवस्थित है। वह काल की सीमा से परे है अर्थात् भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों भी उसी में समाहित है। उक्त तीनों घटनाओं का उल्लेख करते हुए “एक्स्प्लोरिंग साइकिक : फेनामेना बियाण्ड एण्ड मैटर” पुस्तक के लेखक श्री डी. स्काट रोगों ने उक्त तथ्य का स्मरण कराते हुए लिखा है कि भावनायें तथा विचार “प्राणशक्ति की स्फुरणा” (डिस्चार्ज आफ वाइटल फोर्स) के रूप में होती हैं। यह स्फुरणा यदि एक ही समय में एक-दूसरे को आत्मसात् करती है तब तो वह दूरसंचार हो सकता है किन्तु यदि वह समय की सीमाओं का अतिक्रमण करता है तो उसका अर्थ यही होगा कि माध्यम को आधार-भूत सत्ता या ब्राह्मी चेतना होती है। इस चेतना की कल्पना आइन्स्टीन ने भी सापेक्षवाद के सिद्धान्त में की है और यह लिखा है कि यदि प्रकाश की गति से भी कोई तीव्र गति वाला तत्व होता है तो उसके लिये बीते कल, आज और आने वाले कल में कोई अन्तर ही न रहेगा। भारतीय शास्त्र पग-पग पर उसी महान् सत्ता में अपने आप घुलाने और परम पद पाने की बात कहते हैं। निस्सन्देह वह एक अति समर्थ अत्यन्त संवेदनशील स्थिति होगी। यह घटनायें इस दिक्कालातीत चिन्मय ब्रह्म सत्ता से अपनी अभिन्नता जुड़ने की अनुभूति ही हो सकती है। क्षणिक सम्पर्क इतना आश्चर्यजनक हो सकता है तो उसकी प्रत्यक्ष अनुभूति कितनी सामर्थ्य प्रदान करने वाली होगी, तब मनुष्य को किसी प्रकार के अभाव वस्तुतः क्योंकर सताते होंगे?
ऋग्वेद में एक ऋचा आती है—”अग्निना अग्नि समिध्यते” अर्थात् अग्नि से अग्नि प्रदीप्त होती है। आत्मज्ञान आत्मानुभूति से ब्रह्म प्राप्ति इसी सिद्धान्त पर होती है। उपरोक्त घटनायें “अन्तः स्फुरणा” तथा “आत्म जागृति” की क्षणिक अनुभूतियाँ हैं। रेडियो घुमाते-घुमाते अनायास कोई अति सूक्ष्म स्टेशन सेकेण्ड के सौवें हिस्से में पकड़ में आ जाता है फिर ढूँढ़ने से भी नहीं मिलता। ये घटनायें वैसा ही तत्व बोध हैं। विस्तृत अनुभूति, ज्ञान प्राप्ति, ईश्वर की शक्तियों को अनुभव करने के लिये तो आत्म परिष्कार की गहराई में ही उतरना पड़ेगा। जो लोग सांसारिकता में ही पड़े रहेंगे वे न तो उस महान् को अनुभव कर सकेंगे न पा सकेंगे। वे तो ऐसी घटनाओं पर भी अटकलें ही लगाते रहेंगे।
भस्मासुर ने तप करके शिवजी को प्रसन्न कर लिया और उनसे वरदान पा लिया कि जिस किसी के सिर पर हाथ रख दे वही भस्म हो जाये।
वरदान पाकर भस्मासुर के अहंकार का ठिकाना न रहा। उसने पार्वती जी के सौन्दर्य को देखा तो उन्हीं को प्राप्त करने की दुष्टता ठान ली और शिवजी पर ही हाथ रखने को लपका। भगवान विष्णु ने देखा तो वे नारी का रूप बनाकर भस्मासुर के पास पहुँचे। कामासक्त को विवेक कहाँ? उसने नारी रूपधारी विष्णु से विवाह का प्रस्ताव किया। विष्णु जी बोले यदि तुम अपने सिर पर हाथ रख कर नाचो तो प्रस्ताव स्वीकार है। कामुक भस्मासुर ने वैसा ही किया और प्राप्त वरदान के कारण आप जल मरा।
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मनुष्य जीवन में क्षण−क्षण पर भले−बुरे कर्म बनते हैं। एक दिन में ही अनेक दण्ड पुरस्कार की सैकड़ों मिशल फाइलें बन सकती हैं। जीवन भर तो वे असंख्यों हो जायेंगी। मनुष्य को जहाँ इच्छापूर्वक भले−बुरे कर्म करने की स्वतन्त्रता मिली है वहाँ उसकी प्रतिक्रिया उत्पन्न करने और परिणाम प्रस्तुत करने की स्वसंचालित प्रक्रिया भी साथ ही जोड़ दी गई है।
समस्त सृष्टी में यही हो रहा है, बीज जमीन में बोया जाता है खाद, पानी मिलते ही वह अंकुरित होता है और पौधा वृक्ष बनने लगता है। ईश्वर सर्वत्र समाया हुआ है, इसलिए यह कार्य ईश्वर करता है यों कहने में भी हर्ज नहीं, पर ईश्वर भी इतना झंझट कहाँ तक सिर पर लादता। उसने स्वसंचालित प्रक्रिया बनाकर अपना कर्मफल सम्बन्धी प्रयोजन सरल कर लिया है।
सदाचार−दुराचार का सम्बन्ध जिस प्रकार व्यक्ति से होता है, उसी प्रकार कुटुम्ब, भावी सन्तति, जाति, देश, समाज तथा समस्त विश्व के प्राणियों के साथ भी होता है। अतएव व्यक्ति तथा समष्टि−(समाज) दोनों के कर्त्तव्या-कर्त्तव्य का विचार करना पड़ता है, इसी विचार में पुण्या−पुण्य की कल्पना का बीज निहित रहता है। इस विषय की आलोचना युगारम्भ से अर्थात् ऋग्वेद के काल से हो रही है। ऋग्वेद में पुण्य के लिए ऋत (मानस सत्य), सत्य (वाचिक सत्य) तथा व्रत (सदाचरण) के पालन का विधान किया गया है तथा इन पुण्य कर्मों के विपरीत, विचार कथन और आचरण को पाप बतलाया गया है।
ऋग्वेद संहिता से ज्ञात होता है कि अति प्राचीन काल में जनसाधारण का आचार−विचार उच्च श्रेणी का था। उस समय चोरी, डाका, व्यभिचार, द्यूत, अनीति, अनाचार, दूषित मन्त्र−तन्त्रों का प्रयोग, माता−पिता आदि गुरुजनों का अपमान, अतिथि का अनादर, असत्य नास्तिकता, कृपणता, मन और इन्द्रियों का असंयम आदि कर्मों को पाप माना जाता था।
दुर्बल मन वाले मनुष्य की प्रवृत्ति सहज ही पापकर्मों में हो जाती है और पापों का संचय होने पर मनुष्य भगवान से दूर चला जाता है। ऋग्वेद में पाप के संस्कारों को भार स्वरूप बतलाया है। इस भार को कम करने में परमात्मा ही समर्थ है।
इससे स्पष्ट हो जाता है कि पुण्यापुण्य का विचार युगारम्भ से ही चला आता है। कर्त्तव्या−कर्त्तव्य का निर्णय करने में सामान्य मनुष्य की बुद्धि में भी यदि भ्रम हो जाय तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। महाभारत के युद्ध में अर्जुन जैसे शास्त्रवेत्ता भी सन्देहग्रस्त हो गये थे। उसके मन में भी ‘युद्ध करूं या न करूं, मेरे लिए ऐसे अवसर पर क्या कर्त्तव्य है। इसका निर्णय वे न कर सके। आधिभौतिकवादियों की बाह्य दृष्टि से न्याय करने पर वह न्याय निर्दोष ही होगा, यह निश्चय पूर्वक नहीं कहा जा सकता है। परन्तु हम कह सकते हैं कि समस्त संसार के वर्तमान और भविष्य काल के सुख तथा पारलौकिक कल्याण को लक्ष्य में रखकर धर्म शास्त्रों ने जिन नियमों का विधान किया है, उनके अनुसार निर्णय करने में ही संचारित हो सकता है।
जिन नास्तिकवादियों ने कर्म का सम्बन्ध सामाजिक नीति के साथ रखा है यह घातक है। बहुत से ऐसे नियमों का विधान हो जाता है, जो दूसरे देशों के लिए रक्त शोषण का काम करते हैं तथा मनुष्येत्तर प्राणियों के लिए क्या नहीं कर दिखलाते?
गीता रहस्य में लोकमान्य तिलक ने लिखा है—”वकीलों का वकालत करते समय असत्य बोलना बुरा नहीं है। सबको सत्य का बर्ताव करना चाहिए, यह ठीक है, परन्तु जिन राजपुरुषों को अपनी कार्यवाही गुप्त रखनी पड़ती है तथा जिन व्यापारियों को अपने लाभ का विचार करके ग्राहकों से व्यवहार करना पड़ता है, उनको भी सत्य ही बोलना चाहिए−ऐसा हम नहीं कह सकते। अधिक लोगों को अधिक सुख हो, इस तत्व के आधार पर ही हमारी नीति निर्धारित होनी चाहिए।”
आधिभौतिकवादी लस्ले स्टीकनन भी लिखते हैं कि “इस विचार से किसी कार्य के परिणाम को लक्ष्य में रखकर कर्त्तव्याकर्त्तव्य का निर्णय करना चाहिए। यदि यह निश्चय हो जाय कि मिथ्या बोलने से अधिक हित होता है, तो उस कर्त्तव्य में मैं सत्य बोलने के लिए तैयार न होना। उस समय यह माना जायगा कि असत्य ही कर्त्तव्य है।”
परन्तु इस धर्माधर्म कास विचार करते समय आन्तरिक भावना और बाह्य क्रिया दोनों की ओर ध्यान रखना पड़ेगा। जब तक उद्देश्य की ओर दृष्टि ने डाली जायगी, तब तक न्याय न हो सकेगा।
कभी−कभी सदुद्देश्य से काम करने पर भी हानिप्रद परिणाम देखने में आता है तथा दुष्ट उद्देश्य से दूसरों को हानि पहुँचाने की इच्छा होने पर लाभ देखा जाता है। ऐसे कर्मों में केवल मात्र, फल को देखकर ही कुछ निर्णय नहीं किया जा सकता है, क्योंकि ऐसा करने से बहुधा न्याय की हत्या ही होती है। इसके अतिरिक्त जहाँ समान दुर्भाव से प्रेरित होकर कर्म किये गये हो, वहाँ भी मानसिक स्थिति पर विचार करके ही विधान करना चाहिए। यदि इस बात का ख्याल न किया गया, तो न्याय का अन्याय हो जायगा।
इस प्रकार भावना में भेद होने से सबके कामों में भी विभिन्नता आती है। निष्काम भावना वाला मनुष्य सबको नारायण मानकर सेवा करता है।
यदि भूगोल या खगोल में सर्वत्र प्रचलित सुदृढ़ नियमों के अनुसार सृष्टि−व्यापार की मीमांसा की जाय तो यह स्पष्ट हो जायगा कि कर्म विपाक में ईश्वर का विशेष हाथ है। सूर्य,चन्द्र, पृथ्वी, तारागण समस्त अपनी−अपनी निश्चित सीमा के भीतर ईश्वर के आदेशानुसार परिभ्रमण करते रहते हैं। इसी प्रकार ब्रह्माण्ड के अणु−परमाणु की नैसर्गिक प्रक्रिया तथा जीवों के समस्त कर्मों में प्रभु का शासन निहित है। अतएव शुभाशुभ कर्मों के फलदाता प्रभु ही हैं, इन्हीं सब दृष्टिओं से कर्म का सम्बन्ध धर्मशास्त्रोक्त , धर्मनीति और आचरण के साथ माना गया है। कर्म और अकर्म का रहस्य इसी परिष्कृत परमार्थ बुद्धि और हेय स्वार्थपरता की ललक में सन्निहित है।
महात्मा बुद्ध अपने शिष्यों के साथ संध्या के समय एक उद्यान में घूम रहे थे। उद्यान में ही स्थित एक सुन्दर सरोवर में खिल रहे कमल पुष्पों को देख बुद्ध आनन्द मग्न हो गये, इसी बीच एक शिष्य ने सरोवर के पास जा एक पुष्प तोड़ लिया व भगवान् को भेंट किया बुद्ध ने कहा—”वत्स यह तुमने ठीक नहीं किया किन्हीं अन्य व्यक्तियों द्वारा किये परिश्रम से लगाये गये इन पुष्पों को तोड़ने का तुम्हें क्या अधिकार? यह पाप है।” शिष्य ने अपनी त्रुटि स्वीकार कर क्षमा याचना की।
दूसरों ही क्षण एक व्यक्ति आया, वह निर्दयतापूर्वक पुष्पों को तोड़कर फेंकने लगा, भगवान् ने उस व्यक्ति से कुछ नहीं कहा, वे शान्त बने रहे। शिष्य ने पूछा, “भगवान् आपको अर्पित करने के उद्देश्य से एक फूल तोड़ने पर तो आपने रोका और यह निर्दय व्यक्ति अनेक पुष्पों को तोड़ सरोवर की शोभा बिगाड़ रहा है उससे आप कुछ नहीं कहते?” बुद्ध ने कहा—”वासना तृष्णा में डूबे व्यक्ति कोई अनुचित करते हैं तो यह उनका अज्ञान है, परन्तु धर्म प्राण, विवेकशील व लोकशिक्षण के व्रती यदि ऐसा कार्य करें तो यह पाप ही है। लोकसेवी का आचरण अपने स्वयं के लिए व समाज के लिए श्रेष्ठ व ज्ञान सम्मत रहना अनिवार्य है।
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व्यक्तित्व को समुन्नत बनाने के लिए मुख्यतया चेतनात्मक सामर्थ्यों की आवश्यकता पड़ती है। पदार्थ तो भौतिक सुविधा बढ़ाने के ही काम आते हैं। ईंट गारे से मकान बनते हैं। व्यक्तित्व का भवन निर्माण करने में गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता ही प्रयोग में आती है। साधनों से बड़प्पन मिल सकता है। किन्तु महानता उपार्जित करने में चेतन सम्पदा के अतिरिक्त और किसी साधन से काम नहीं चलता। ये क्षमताएं किसी देवी देवता या सन्त−महन्त से उपहार रूप में प्राप्त नहीं हो सकतीं, इन्हें प्रयत्नपूर्वक भीतर से ही उभारना पड़ता है। बीज रूप से महत तत्व की बड़ी मात्रा विद्यमान है। प्रश्न उसे सुषुप्ति से जागृति में परिवर्तित करने भर का है। अध्यात्म साधनाएँ उसी उद्देश्य के लिए की जाती हैं। अनुग्रह के लिए किसी के आगे गिड़गिड़ाने, मनुहार करने को नहीं, आत्म जागरण एवं आत्म−परिष्कार को ही साधना कहते हैं।
साधना में तप तितीक्षा का स्थान मुख्य है। गरम करने से छिपी सामर्थ्य उभरती हैं। भौतिक जगत में इसी अवलम्बन को अपनाया जाता है। मिट्टी गरम होने पर पत्थर बनती है। पानी भाप के रूप में शक्तिशाली होता है। कच्चे लोहे को फौलाद बनने का अवसर मिलता है। मामूली से धातु खण्ड भस्म रसायनें बन जाती हैं। आग वनस्पतियाँ विकसित होती हैं और शरीर जीवित रहते हैं। अण्डा पकने में पक्षी की छाती की गर्मी ही काम करती है। दूध गरम करने से घी निकलता है। व्यायाम से उत्पन्न गर्मी से शरीर की माँस−पेशियाँ बलिष्ठ बनती हैं। आत्म सत्ता में प्रखर प्रचण्डता उत्पन्न करने के लिए तपश्चर्या का आश्रय लेना पड़ता है। अन्नमय कोश की दबी क्षमतायें इसी आधार पर विकसित होती है। सूर्य की किरणें समुद्र के खारी जल को बादल बनाकर ऊपर आकाश में उड़ा ले जाती हैं और वे अपने मीठे जल से धरती की प्यास बुझाते हैं। तपश्चर्याएँ साधनाएँ जीवन समुद्र में से उच्चस्तरीय विभूतियाँ उत्पन्न करती हैं और उनकी वर्षा से सर्वत्र सुख−शान्ति एवं प्रगति का वातावरण बनता है।
उपवास, ब्रह्मचर्य, ऋतु प्रभावों का सहना, कठोर जीवन यापन, इन्द्रिय संयम मनोनिग्रह जैसे व्रतों का निर्वाह तितीक्षा बन कर तप साधना का उद्देश्य पूरा करता है। सुविधाजनक प्रवाहों में बहते हुए जीवन ऐसे ही निरर्थक व्यतीत हो जाता है। अवरोध उसमें शक्ति भरते हैं। पानी को बाँध में रोक कर उसे छोटी धारा में गिराने से बिजली घर बनते हैं। कितने ही कल कारखाने चलते हैं। यह रोकथाम न की जाय तो बहते पानी की जल धारा एक सुन्दर दृश्य मात्र बनकर रह जायगी। बारूद को मजबूत कारतूस में बन्द करके दागते हैं तो गोली चलती है अन्यथा उसे बिखरी स्थिति में जला देने से चमक भर उत्पन्न होगी, अवरोध की शक्ति सर्वविदित है। हवा के प्रवाह से टकरा कर पन चक्कियाँ चलती हैं और पाल बंधी नावें द्रुतगति से दौड़ती दीखती हैं। सुविधाओं को कठोरता में बदलने से अन्तःशक्ति का प्रचण्ड हो उठना स्वाभाविक है। आत्मिक प्रगति के विभिन्न प्रयोजनों में तपश्चर्या से उत्पन्न शक्ति का उपयोग होता है। तपश्चर्या सुविधाओं को घटाने और उद्देश्यपूर्ण असुविधा बढ़ाने को कहते हैं। इसे तितीक्षा के रूप में भी जाना जाता है।
असुविधाएँ अवैज्ञानिक अति मात्रा में, अनावश्यक और अवांछनीय स्तर की हों तो उनसे हानि पहुँचेगी और प्रगति क्रम रुकेगा। किन्तु यदि इस प्रयोग में विवेकशीलता और सन्तुलन का ध्यान रखा जाय तो उसके चमत्कारी सत्परिणाम उत्पन्न होंगे। उपवास कष्टकारक है, उसमें क्षुधा कष्ट सहना पड़ता है। पर प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान के मर्मज्ञ जानते हैं कि इस संयम के सहारे शरीर में संचित मलों की निवृत्ति होती है और कितने ही कष्ट साध्य रोगों से पिण्ड छूटता है। चान्द्रायण आदि व्रतों से पापों का प्रायश्चित होने और आत्म शुद्धि का लाभ मिलने का लाभ शास्त्र सम्मत है। ब्रह्मचर्य पालन में मन की लिप्सा पर अंकुश लगाना पड़ता है। सामान्यता यह संयम कष्ट कारक ही समझा जा सकता है, पर सर्वविदित है कि इससे शारीरिक ओजस् और मानसिक तेजस् की अभिवृद्धि होती है। विद्यार्थी, किसान, माली, शिल्पी आरम्भ में कष्ट की कष्ट सहते हैं। उन्हें मन मारना पड़ता है और निर्धारित कार्य में तन्मयतापूर्वक लगे रहना होता है। यह असुविधा का प्रत्यक्ष आमन्त्रण है, पर समयानुसार उनके सत्परिणाम सामने आते हैं। यदि ऐसा न होता तो विद्यालयों, व्यायामशालाओं, कारखानों में कठिन श्रम करते एक भी व्यक्ति दिखाई न पड़ता। आज का कष्ट कल सुविधा उत्पन्न करे तो उसे अपनाने में किसी दूरदर्शी को आपत्ति नहीं होती। तपश्चर्या की साधना को इसी स्तर की बुद्धिमत्ता समझा जाना चाहिए।
सुविधाएँ मनुष्य को दुर्बल बनाती हैं और असुविधाओं से टकराते हुए मनुष्य बलवान बनता है। इसके उदाहरण सर्वत्र देखे जा सकते हैं। सर्दी−गर्मी से डरने वाले हीटर, कूलरों के सहारे वातानुकूलित कमरों में निवास करने वाले उस समय तो आराम अनुभव करते हैं पर उनकी सहन शक्ति दुर्बल पड़ जाने से तनिक-सा ऋतु प्रभाव सहन नहीं होता। ऐसे लोगों को तनिक−सी सर्दी में जुकाम और तनिक−सी गर्मी में जलन की शिकायत आ दबोचती है। बहुत कपड़ों से लदे रहने वालों की अपेक्षा वे ऋतु प्रभाव से कम बीमार पड़ते हैं, जो कम कपड़े पहनते हैं और सर्दी-गर्मी सहने की आदत बनाये रहते हैं।
उत्तरी ध्रुव पर बसी ‘एस्किमो’ नामक मनुष्य जाति उस प्रदेश में चिरकाल से रहती है। वहाँ घोर शीत रहता है। सदा बर्फ जमी रहती है। कृषि तथा वनस्पतियों तक का कोई आधार नहीं। सामान्य मनुष्यों को उपलब्ध होने वाले साधन भी वहाँ नहीं हैं फिर भी वे मात्र जलचरों के मांस पर जीवित रहते हैं। जीवित ही नहीं परिपुष्ट भी हैं और सुखी भी। वन्य प्रदेशों के निवासी आदिवासी सभ्य शहरी लोगों की तुलना में अभावग्रस्त दीखने पर भी अधिक निरोग, सुदृढ़ और दीर्घजीवी होते हैं। यह तितीक्षा के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली सुरक्षा, सामर्थ्य का ही सत्परिणाम है। सुविधा भरा जीवन आलसी बनता है। कठिनाइयों से लड़ने का अवसर ही नहीं रहता तो प्रतिभा प्रसुप्त स्थिति में चली जाती है। संघर्ष मय कठिनाई भरे जीवन में अन्य असुविधाएँ कितनी ही क्यों न हों इतना लाभ तो स्पष्ट ही है कि उससे मनुष्य की प्रखरता निखरती है। अमीरी के वातावरण में कदाचित ही कभी कोई प्रतिभाएँ उभरती हैं। संसार भर के महामानवों के इतिहास में यह तथ्य स्पष्ट है कि वे या तो कठिनाइयों की परिस्थिति में जन्मे थे अथवा उनने जानबूझ कर कठिनाइयों से भरा जीवन क्रम अपनाया था।
संयम और सादगी की नीति अपना कर ही मितव्ययिता पूर्वक गुजारा करने वाला ही न्याय निष्ठामय जीवन जी सकता है। विलासी की आवश्यकताएँ इतनी बढ़ी−चढ़ी होती हैं कि अनीति उपार्जन अपनाये बिना उसकी आकांक्षायें पूरी हो नहीं सकतीं। ऐसी दशा में सारा शारीरिक मानसिक श्रम अधिक कमाने और अधिक भोगने के कुचक्र में ही समाप्त हो जाता है। जो यह बचत कर सकेगा उसी के लिए परमार्थ प्रयोजनों में अपना चिन्तन, समय प्रभाव एवं धन का कुछ महत्वपूर्ण अंश लगा सकना सम्भव होगा। धर्म स्थापना का दूसरा पक्ष है अधर्म अन्याय कर्ताओं का आक्रमण आघात सहना पड़ता है। दोनों ही दृष्टि से धर्म और नीति के समर्थकों को पग−पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। आदर्शवादिता का निर्वाह इससे कम मूल्य चुकाये हो नहीं सकता। अस्तु श्रेय पथ पर चलने वालों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे पहले से ही अपनी स्थिति ऐसी बना लें जिसमें पीछे शिकायतें करने या पछताने की आवश्यकता ही न रहे। यह तैयारी तितीक्षा द्वारा सहन शक्ति विकसित करने के रूप में ही करनी पड़ती है। अध्यात्म मार्ग के पथिक यह जानते हैं कि उन्हें किस कठिन मार्ग पर चलना है। इसके लिए उपयुक्त साहस का सम्पादन कठिनाइयों से परिचित और अभ्यस्त रहना आवश्यक है। तपश्चर्या से इसी आवश्यकता की पूर्ति होती है।
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एक समय था जब आधुनिक विज्ञान और आत्मविद्या कभी भी न मिल सकने वाले दो परस्पर विरोधी बिन्दु माने जाते थे। इसी कारण विज्ञान की प्रगति के साथ आध्यात्मिक अवमानना हुई, किन्तु आधुनिक विज्ञान भी बढ़ते−बढ़ते एक ऐसी स्थिति में आ गया है जब उसे यह विचार करना आवश्यक हो गया है कि क्या शरीर ही आत्मा है या आत्मा की अभिव्यक्ति के लिये शरीर अपर्याप्त माध्यम नहीं? मनुष्य की मस्तिष्कीय चेतना की भौतिक परिधि और उसकी विराट् अवस्था दोनों के व्यापक अध्ययन से धीरे−धीरे यह बात स्पष्ट होती जा रही है कि सारे शरीर में मस्तिष्क के विद्यमान् होने की तरह विराट् चेतना सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त है। शरीर उसका एक स्टेशन और मन्दिर मात्र है जिसमें वह अपने अंश या जीव रूप में कुछ क्षण विश्राम के लिये आता है। उसका अन्तिम लक्ष्य विभु या विराट् बनना है। इस उद्देश्य की पूर्ति न होने तक सन्तोष नहीं होता।
मनुष्य की चिन्तन शक्ति, भावनाओं, संवेदनाओं को मात्र रासायनिक संवेग मानकर मनुष्य जीवन को नितान्त भौतिक मानने की भूल थोड़े से वैज्ञानिकों ने की है। अधिकाँश ने या तो तथ्यों को अत्यन्त गूढ़ कहकर निष्कर्ष निकालने का विचार ही त्याग दिया या फिर श्रद्धापूर्वक उनने यही स्वीकार किया कि मानवीय चेतना का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व है। वह भौतिकीय तत्वों का सम्मिलित मात्र ही नहीं अपितु विराट् चेतना का ही अंश है। वह शरीर रूप नाम का पिंड मात्र नहीं, अनादि अनन्त गुण वाला चेतन तत्व है। शरीरों का इन्द्रियों का विकास उसकी इच्छानुसार, उसके संकल्प के आधार पर हुआ है।
भौतिक विज्ञान के जो पण्डित स्नायु−तंत्र (नाड़ी मंडल) को ही आत्मा मानते और उन्हीं से विचारों को उद्भूत हुआ मानते हैं उनमें जर्मनी के शरीर विज्ञानी डॉ. काल ह्यवाक्ट तथा डॉ. टेन्डाल आदि प्रमुख हैं। अपने सिद्धान्त की पुष्टि में उन्होंने अनेक प्रयोग शरीर पर किये। स्नायु−मण्डल की विस्तृत खोज की। उन्होंने उस गति की माप की जो शरीर में किसी अंग पर आघात के बाद उस अंग से भाव संदेश के रूप में मन तक और मन से शरीर के किसी अंग तक पहुँचते हैं। मस्तिष्क बोध की सूक्ष्मता का भी पता लगाया तथा विद्युत आवेश देकर उन संदेशों को घटाने−बढ़ाने में भी सफलता प्राप्त की। विचारों की उत्पत्ति को उन्होंने कहा यह मस्तिष्क की वैसी ही उपज होते हैं जैसे यकृत की पित्त। हालांकि अब तक वैज्ञानिक मस्तिष्क के गहन अन्धकार में झांक कर जितना जान सके हैं वह अधिकतम 13 प्रतिशत है। मस्तिष्क के शेष 87 प्रतिशत भाग की कोई जानकारी नहीं है। इतनी कम जानकारी को पूर्णता की संज्ञा देना वैसे ही अविवेकपूर्ण कहा जायेगा।
ब्लेइस पास्कल ने 12 वर्ष की आयु में ही ध्वनि−शास्त्र पर निबन्ध प्रस्तुत कर सारे फ्रान्स को आश्चर्य में डाल दिया था। जीन फिलिप बेरोटियर को 14 वर्ष की आयु में ही डॉक्टर आफ फिलॉसफी की उपाधि मिल गई थी। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि दिन याद कराने की देर होती थी उस दिन की व्यक्तिगत, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय घटनायें भी टेप की भाँति दुहरा सकते थे। जोनी नाम आस्ट्रेलियाई बालक को जब तीन वर्ष की आयु में विद्यालय में प्रवेश कराया गया तो वह उसी दिन से 8वीं कक्षा के छात्रों की पुस्तकें पढ़ लेता था। उसे हाईस्कूल में केवल इसलिये प्रवेश नहीं दिया जा सका क्योंकि उस समय उसकी आयु कुल 5 वर्ष थी जबकि निर्धारित आयु 12 वर्ष न्यूनतम थी।
कोई भी अल्पबुद्धि व्यक्ति यह स्पष्ट समझ सकता है कि यह असामान्य ज्ञान पूर्व जन्मों के ही संस्कार हो सकते हैं। हमारे मनीषी निरन्तर स्वाध्याय की आवश्यकता अनुमोदित करते रहे और यह बताते रहे कि ज्ञान आत्मा की भूख−प्यास की तरह है। उससे उसका विकास होता है। यह बात समझ में आने वाली है कि चेतना का विकास ज्ञान साधना से ही मिलती है। बालकों के आहार, वातावरण, पोषण आदि की समान सुविधायें होने पर भी बौद्धिक असमानता इन्हीं भारतीय मान्यताओं की समर्थक हैं।
इटली के डॉ.लोम्ब्रोसो जिन्होंने एक समय एक प्रतिष्ठापना दी थी कि रचना विज्ञान की दृष्टि से एक पागल और प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों में समरूपता होती है। इस बात को भौतिकवादियों ने बहुत अधिक उछाला, किन्तु वे यह भूल गये कि देखने में नमक और शक्कर दोनों में समानता दिखाई देने पर भी उनके गुणों में इतना अन्तर होता है कि एक के भाव 5 रु. किलो होते हैं तो दूसरे के 10 पैसे किलो। प्रतिभाशाली व्यक्तियों, आध्यात्मिक, धार्मिक संतों के विचारों में रचनात्मक जागरुकता और मार्गदर्शन की क्षमता होती है। उन्होंने सैकड़ों लोगों के जीवन में शान्ति, सुरुचि और सुव्यवस्था दी जबकि पागल के विचार अस्त−व्यस्त होते हैं। उसे लोग दुत्कारते ही हैं, उसकी सुनता कोई नहीं।
लोम्ब्रोसी के उक्त प्रतिपादन का खण्डन अनेक वैज्ञानिकों तथा मनोवैज्ञानिकों ने भी किया है। डॉ. मोर्शले ने उपरोक्त मत से असहमति व्यक्त की है और लिखा है कि सामान्य मस्तिष्क में दुनियादारी की प्रवृत्ति तो होती है, किन्तु सूक्ष्म चिंतनशक्ति असाधारण लोगों में ही होती है।
मैडल व्लैवटस्की का कथन है कि मस्तिष्क उस वीणा व वायलिन की तरह है जिसके तार को जितना अधिक खींचा व कसा जायेगा, ध्वनि कम्पन उतने ही सूक्ष्म और मोहक होंगे। असामान्य मस्तिष्क की असामान्य उपलब्धियाँ ऐसी ही हैं। तार कसने में उसके टूटने का भय होता है। इसलिये उसे धीरे−धीरे सावधानी से कसते हैं। मस्तिष्क को जिन साधनों (योग विद्या) से सूक्ष्म तत्वग्राही और संवेदनशील बनाया जाता है उनकी भी यही प्रवृत्ति होती है। एकाएक कठोर अभ्यास—पागल और विक्षिप्त कर दे सकते हैं, इसलिये साधना का क्रम मार्गदर्शकों की देख−रेख में धीरे−धीरे बढ़ाया जाता है। शारीरिक अभ्यास, उपवास आदि से ही उच्च क्षमतायें विकसित होती हैं। योगियों पर कोई स्नायविक दबाव नहीं पड़ता, कोई बीमारी नहीं होती। अतएव सूक्ष्म विचारों की महत्ता के साथ−साथ योग साधनाओं की भी प्रामाणिकता सिद्ध होती है। चिन्तन के सूक्ष्मतम होने से ज्ञान चेतना के कोश परस्पर जुड़ते हुए चले जाते हैं और सामान्य मस्तिष्क जो सन्देश, प्रेरणायें अनुभूतियाँ नहीं ग्रहण कर पाते उनके लिये सुलभ हो जाती हैं। सर आलिवर लाज ने भी अपनी बौद्धिक क्षमतायें इसी आधार पर विकसित की थीं और यह माना था हमारी ज्ञान चेतना पदार्थ जन्म न होकर विराट चेतना का ही एक अंश और अंग है। जब तक इस बात को नहीं समझते तब तक हमारे दृष्टिकोण भी भौतिकतावादी बने रहते हैं। तब पाप−पुण्य में कोई अन्तर ही नहीं रहता, नैतिकता का कोई अर्थ ही नहीं होता। आज जो सर्वत्र पीड़ा और पतन के दृश्य हैं, स्वार्थ संकीर्णता ने पुण्यपरमार्थ को दबोच रखा है, वह उसी मान्यता का दुष्परिणाम है।
पूर्वी मनोविज्ञान या भारतीय दर्शन के पीछे शोधों की एक लम्बी विज्ञान सम्मत शृंखला है जबकि पश्चिमी मनोविज्ञान अभी 30−40 वर्ष का बालक मात्र है जो सतह पर खड़ा स्नान करता है, उसमें इतनी क्षमता भी नहीं कि गहरे जाकर गोता लगा सके। इसीलिये वह जितने समाधान प्रस्तुत करता है उतने ही प्रश्न और समस्यायें उठ खड़ी होती हैं। ऊपर मस्तिष्क की जिन अदम्य क्षमताओं का वर्णन किया गया है उन्हें कुछ देर के लिये भूल भी जायें तो भी जब मस्तिष्क सामान्य नहीं होता तब भी चेतन क्रियायें चलती रहती हैं। न केवल जागृत अवस्था में अपितु स्वप्न व सुषुप्ति अवस्था में भी चेतना बनी रहती है उसका भी समाधान आवश्यक है। डॉ. ड्यूप्रेल ने अपनी पुस्तकों में ऐसी घटनाओं का वर्णन किया है जिनसे यह सिद्ध होता है कि समय या अनुभूति के एक सेकेण्ड के करोड़वें भाग में ही महाकाल या अनेक वर्षों में हुए ज्ञान की अनुभूति कैसे सम्भव हो जाती है। इसका अर्थ तो स्पष्टतः यही होता है कि कोई एक ऐसी चेतना है जो विराट है और उसके लघुतम अंश में भी वही सम्भावनायें सन्निहित हैं। अपनी पुस्तक में डॉ. प्रेल ने एक व्यक्ति के स्वप्न का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उस व्यक्ति की गर्दन का एक उँगली से स्पर्श किया गया उसकी नींद टूट गई। जब उससे अनुभव के बारे में पूछा गया तो उसने बताया कि उसने स्वप्न देखा कि मैंने किसी की हत्या कर दी, उस व्यक्ति के घर वालों ने पुलिस को रिपोर्ट लिखाई, पुलिस ने पकड़ा, जेल भेजा, मुकदमा चला, वकीलों की जिरह हुई, मुझे फाँसी की सजा हो गई। नियत समय पर जल्लाद आया, उसने मेरी गर्दन पर चाकू रखा और नींद टूट गई।
डॉ. प्रेल लिखते हैं—जिस तरह ज्ञान के अंश में ही विराट−काल व्याप्त होने का ये उदाहरण हैं उससे भी अधिक आश्चर्यजनक बात है सम्मोहन की अवस्था में (हिप्नोटिज्म) व्यक्ति अचेत हो जाता है, उसे अपनी स्थिति का भी बोध नहीं रहता, आँखें देख नहीं सकतीं, कान सुन नहीं सकते, पलकें तीव्र विद्युत प्रकाश में भी सिकुड़ती हैं, त्वचा स्पर्श ज्ञान से शून्य हो जाती है। हृदय की धड़कन बन्द−सी हो जाती है, कार्बन तत्व अत्यधिक बढ़ जाने से मस्तिष्क संज्ञा शून्य हो जाना चाहिये था। जड़ता, अगति या मृत्यु हो जानी चाहिये थी किन्तु तब ज्ञान की क्षमतायें जागृति से भी अनेक गुनी अधिक बढ़ जाती हैं। सामान्य स्थिति में कोई पुस्तक का एक पैराग्राफ पढ़े तो तीव्र बुद्धि व्यक्ति ही उसके कुछ शब्द दोहरा सकते हैं पर सम्मोहित अवस्था में तो यदि भाषा उसकी पढ़ी हुई नहीं तो भी अक्षर−ब−अक्षर दोहरा सकता है। जागृत अवस्था में आँख की शक्ति सीमित होती है, किन्तु उस स्थिति में कमरे में बन्द रहकर भी सैकड़ों मील दूर की वस्तुयें तक दिखाई देती हैं यह सब कैसे सम्भव है?
तब फिर यही निष्कर्ष निकलता है कि आत्म चेतना विराट चेतना कास ही अंश है जिसमें असीम ज्ञान की शक्ति सन्निहित है। भूत, भविष्य ओर वर्तमान उसी में अवस्थित हैं, वह पदार्थ से परे है, उसे जानने में ही मनुष्य जीवन की सार्थकता है।
“जिस दिन भगवान् भास्कर अपने उदय से अस्ताचल तक जाते हुए तुम्हें कोई अच्छा कार्य करते न देख सकें वह दिन बेकार ही समझो।”
—स्टेन फोर्ड
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“मैं बड़ा धनवान् था, बुद्धिमान और विद्वान भी। एक दिन मैंने अपने कर्मों पर ध्यान दिया तो मुझे मालूम हुआ कि सबसे अच्छा दान, विद्या दान होता है तथा सबसे अच्छा कर्म “लोक शिक्षण” होता है। मैंने अपनी सारी सम्पत्ति को तिलांजलि दे दी और मैं विभिन्न विद्याओं के अध्ययन में लग गया, लेकिन शीघ्र ही मुझे मालूम हो गया कि मैं जिन विद्याओं को पढ़ा रहा हूँ वे आत्मकल्याण की दृष्टि से कोई उपयोगी नहीं हैं तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ व मैंने ऐसी सारहीन विद्याओं को प्राप्त करना छोड़ दिया जिनसे आत्म−कल्याण का मार्ग प्रशस्त न होता हो।
अब मैंने सबसे अच्छे समझे जाने वाले “लोक शिक्षण” का काम करने में अपने आपको लगा दिया।
जब मैंने यह विचार किया कि दूसरों को किसलिए उपदेश देता हूँ। क्या मेरा ध्येय लोक शिक्षण के माध्यम से लोक कल्याण का मार्ग सुझाना है व क्या वास्तव में मेरे उपदेश से लोक विचारधारा कल्याण परक हुई है तो अपना आत्म विश्लेषण करने पर मैंने पाया कि वास्तव में लोक कल्याणार्थ कर्म करने की अपेक्षा मैं अपने यश और कीर्ति के लिए अधिक चिन्तित था व मेरे ‘उपदेश’ इसी कामना से प्रेरित थे। एक ओर सांसारिक तृष्णा मुझे झमेले में डाल रही थी तो दूसरी ओर धर्म की ध्वनि मेरे कानों में गूँजती थी, मेरी अन्तरात्मा मुझे कहती थी—“उठो अब तक तुम जो करते आए वह तुम्हारा मिथ्याभिमान था। अब तक तुम पर कल्याण के लिए नहीं अपनी स्व की तुष्टि के लिए उपदेश देते रहे, तुम्हारा दान व विद्याध्ययन भी व्यर्थ का अभिमान रहा क्योंकि उससे कोई कल्याणकारी मार्ग नहीं बना। तुम्हारे इस बाह्य जीवन का अब अन्त आ गया है, तुम्हें अब लम्बी यात्रा पर निकलना है, आज ही तुम अपने ‘अहं’ के बन्धन काटो। अवसर निकल गया तो तुम पछताओगे।”
अपनी अन्तरात्मा की इस आवाज का मुझ पर बड़ा प्रभाव पड़ा। मैंने धर्माचार्य व उपदेशक का बड़ा पद छोड़ दिया व मैं सीरिया चला आया।
यहाँ मैंने आत्मिक ज्ञान प्राप्त करने का प्रयास किया परन्तु व्यर्थ। अन्त में मैंने सन्तों का सहारा लिया। सन्त हृदय से बड़े निर्मल और निश्छल होते हैं। दूसरों के दुःख देखकर उनकी करुणा छलक उठती है मुझे उनकी इस आत्मीय भावना में आत्मा के दर्शन होते दिखाई दिये तब से मैंने अपना स्वभाव निर्मल बनाना प्रारम्भ किया। छोटे बच्चे से लेकर बड़ों तक, मनुष्यों से लेकर जीवों तक के प्रति कर्त्तव्य भावना, करुणा ओर दया के उद्गार सेवा की लगन—बढ़ी और यह संस्कार बढ़ते ही गये क्योंकि ऐसी तृप्ति मुझे अब तक कभी भी नहीं मिली थी जैसी इस परमार्थ से मिली।
यहीं से मेरी मन शुद्धि का व आत्मा के परिष्कार का कार्य प्रारम्भ हुआ।
मनुष्य के सरल व शुद्ध जीवन, उसकी सदाशयता व शिष्टता से अधिक श्लाघनीय कोई जीवन नहीं।
परमात्मा का प्रवेश शुद्ध व निर्मल मन में ही हो सकता है। विषयों के कठोर बन्धन से मन को मुक्त कर,बुरी वासनाओं और संकल्प विकल्पों से मन को बचाए रखने से हृदय की शुद्धि होती है। हृदय में केवल परमात्मा के निवास एवं आराधना के लिए ही स्थान होना चाहिए, किसी और के लिए नहीं।”
—सूफी सन्त गज्जाली
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एक अंधेरी रात्रि में निकोड़ेमस नामक युवा जिज्ञासु महाप्रभु ईसा के पास पहुँचा और बोला मैं आनन्द और शान्ति की खोज में हूँ कृपया उसका रास्ता बतलाएँ। उत्तर में ईसा ने कहा—‘दोस्त’ इन दोनों वरदानों को पाने से पूर्व तुम्हें अपना वर्तमान जीवन ही बदलना पड़ेगा। ऊँचे दृष्टिकोण अपनाने से, आनन्द और श्रेष्ठ क्रिया−कलाप बरतने से ही शान्ति को पाया जा सकता है।
नव जीवन से तात्पर्य है—ईमानदारी, भलमनसाहत, इज्जत और बहादुरी की जिन्दगी। इसके लिए नैतिकता के आदर्शों को समझने की ही नहीं अपने चिन्तन और व्यवहार में कूट−कूटकर भर लेने की आवश्यकता होती है। नीति का जीवन अपनाने के लिए प्राणवान निष्ठा की आवश्यकता होती है, उसे अपनाना ही पशु जीवन से छूटकर नव जीवन में, मनुष्य जन्म में प्रवेश पाना है।
माना कि अति उच्च कोटि के कार्य कुछ असाधारण व्यक्तियों के ही हिस्से में आते हैं। माना कि उनके लिए विशेष प्रतिभा की आवश्यकता होती है और उनकी सफलताएँ विशेष साधनों तथा विशेष परिस्थितियों के साथ जुड़ी रहती हैं, पर इससे क्या? साधारण नागरिक भी अपने सामने प्रस्तुत सामान्य कार्यों को करते हुए भी अपनी चारित्रिक क्षमता बनाये रह सकते हैं और सामने आये कार्यों में अपनी कुशलता का परिचय दे सकते हैं। इस प्रकार वे न केवल मनुष्यता की गरिमा को स्थिर रखने में वरन् पूरे समाज की समग्र प्रगति में परोक्ष रूप से चिरस्थायी योगदान दे सकते हैं। काम बड़ा करना पड़े या छोटा, यह ऊँचा हो या नीचा इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। महानता कामों में नहीं, व्यक्तित्व में जुड़ी होती है। ऊँचे स्थान पर जा पहुँचने का दावा तो पहाड़ की चोटी पर बैठा हुआ कौआ भी कर सकता है और खजाने की रखवाली करने वाला साँप भी अपने अमीर होने का गर्व कर सकता है। विष की मारक शक्ति से सभी घबराते हैं, आग के पास जाने से सभी डरते हैं, खुली बिजली का स्पर्श कौन कर सकता है, तलवार से भय प्रतीत होता है, साँप को देखते ही घबराहट पैदा होती है। ऐसे ही आतंकवादी अपने उद्दंड आचरणों से आतंक उत्पन्न कर सकते हैं। माचिस की एक तीली साल भर के श्रमपूर्वक कमाये हुए खलिहान को देखते−देखते जलाकर खाक कर सकती है, पर इससे उसका महत्व क्या बढ़ा? आतंक उत्पन्न करना शक्ति की नहीं दुष्टता की निशानी है और यह तथ्य स्मरण रखा जाना चाहिए कि दुष्टता दुर्बलता की निशानी है। जो सबसे अधिक दुर्बल होता है वह दुष्टता पर उतारू होता है। शक्ति तो साहस में सन्निहित रहती है और साहस उस चरित्र निष्ठा का नाम है जो अभावों और कठिनाइयों के बीच भी मानवी गौरव को अक्षुण्ण बनाये रख सके। जो पतन का पराभव अन्तिम सांस चलने तक स्वीकार न करे।
मनुष्य गरीब है या अमीर प्रश्न यह नहीं, वरन् यह है कि क्या उसने सच्चरित्रता बनाये रखने में अपने नैतिक साहस का परिचय दिया? क्या उसने अपने नागरिक कर्त्तव्य निवाहे? क्या उसकी सामाजिकता ऐसी रही जिसको सराहा जा सके। प्रतिष्ठा दिलाने वाले ऊँचे कार्य, ऊँचे पद हरेक के हिस्से में नहीं आते, पर यह हर किसी के लिए सम्भव है कि वह अपनी चारित्रिक दृढ़ता का परिचय देकर सज्जनों की पंक्ति में सीना ताने खड़ा रहे। वस्तुतः यही सच्चे सम्मान की उपलब्धि है जिसे बिना दूसरों की सहायता के मात्र अपने बलबूते, हर भली−बुरी परिस्थिति में निश्चयपूर्वक पाया जा सकता है।
उदात्त परम्परा यह है कि समर्थ लोग अपनी सामर्थ्य का न्यूनतम लाभ अपने लिए रखें और शेष को उन्हें दे दें जिन्हें अपने पैरों खड़े होने के लिए सहायता अपेक्षित है। अपनी सुविधाओं में कटौती करना यह साध्य है, उत्पादन क्षमता बढ़ाते जाना प्रतिभा का चिन्ह है। इसमें संस्कृति का समन्वय होने पर सुविधाओं में कटौती करके बचाया हुआ अंश पतन के पराभव को दूर करने के लिए लगाना पड़ता है। पिछले लोग इस लाभ के बदले कृतज्ञता अनुभव करते हैं और जो सहयोग मिला उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करते हैं। इस प्रकार पारस्परिक सद्भावों के आदान−प्रदान में समर्थ और असमर्थ दोनों ही पक्ष लाभान्वित होते हैं। विग्रह से उत्पन्न ध्वंस को समझा जाना चाहिए और बर्बादी के लिए नष्ट की जाने वाली शक्ति का मिल−जुलकर उभय−पक्षीय प्रगति के प्रयत्नों में जुट जाना चाहिए। शान्ति का वातावरण इसी प्रकार बनेगा। सद्भावजन्य सहयोग का भवन इसी आधार पर खड़ा होगा। लड़कर नहीं हम मिलकर ही भलाई का लाभ ले सकते हैं।
हममें से प्रत्येक की ईमानदारी से अपनी कमियों पर विचार करना चाहिए और उन्हें दूर करने के लिए संकल्प बल का परिचय देना चाहिए। हम सत्य और असत्य के बीच का अन्तर करना सीखें। सन्मार्ग पर चलने के सत्परिणामों और कुमार्ग के दुष्परिणामों के सम्बन्ध में अपनी दृष्टि साफ रखें। अनीति अपनाकर सुखी बन सकने की सम्भावना अधिकांश लोगों के मस्तिष्क पर छाई रहती है। नीति का मार्ग अपनाये रहने पर समयानुसार सत्परिणाम मिलते हैं उस विश्वास को तत्काल लाभ की आतुरता अक्सर डगमगाती रहती है। ऐसी दूरदर्शिता का विकास होना चाहिए जो औचित्य और ईश्वर को समान मानकर चल सके और दोनों के प्रति अटूट श्रद्धा बनाये रह सके।
बाइबिल का एक मन्त्र है- दृष्टि के अभाव में मनुष्य भ्रष्ट हो जाते हैं। हमारी आँखों की ज्योति बुझ रही है और अन्धता गहरी होती जाती है। दृष्टि से यहाँ तात्पर्य दूरदर्शिता से है। उस विवेक से है जो मानवी गरिमा के उपयुक्त आचरण करने के लिए हमें प्रेरित नहीं बाधित भी करता है।
संघर्षों को टालने का एक ही तरीका है- हर व्यक्ति नीति निष्ठा अपनाने के सम्बन्ध में अधिक सुदृढ़ और सुनिश्चित बनता जाय। हरेक को अपनी प्रामाणिकता प्राणों से अधिक प्रिय बने। अपनी ओर दूसरों की आँखों में ओछापन सिद्ध होना मरण तुल्य कष्टकारक प्रतीत होने लगे। दुष्टता के आक्रमणकारी अनाचारों की भर्त्सना होती है और उसके लिए सामाजिक तथा शासकीय दण्ड व्यवस्था भी है। प्रत्यक्ष और परोक्ष छल को भी इसी प्रकार के अनाचार में सम्मिलित किया जाना चाहिए। लोग असत्य व्यवहार और छल प्रपंच के व्यवहार को कुशलता मानने लगे हैं जबकि किसी को विश्वास देकर उसका हनन करना भी पीठ में छुरा भोंकने की तरह ही अपराध है। इन दिनों झाँसे पट्टी की नीति बढ़ रही है। जो विश्वास दिया गया था उसके प्रतिकूल आचरण करने में जिसे हानि हुई है वही पेट पकड़कर रह जाता है उसकी सामूहिक भर्त्सना नहीं होती। चरित्र का यह मूल्यवान ग्रन्थ है कि किसी जानकारी के सम्बन्ध में उसका कथन छल नीति पर आधारित और अप्रमाणिक नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार किसी को किसी प्रकार के नैतिक सहयोग का आश्वासन दिया गया है तो उसका निर्वाह होना चाहिए। शब्द जाल को व्यवहार कुशलता की तरह अपने प्रचलन में घुस नहीं पड़ने देना चाहिए। व्यक्तित्व की गरिमा को सर्वोच्च स्थान मिलना चाहिए। अनेक तरह के वादों में उत्कृष्टतावाद को प्रथम स्थान मिलना चाहिए। उसके अभाव में विभिन्न प्रकार के सैद्धान्तिक प्रतिपादन छूँछ बनकर रह जायेंगे।
सुखी और सन्तुष्ट व्यक्ति अपने आपको “कृत कृत्य” हुआ कहता है। यह सौभाग्यशाली, सफल मनोरथ होने जैसा सुखी मनःस्थिति का आभास कराने वाला शब्द है। ‘कृत कृत्य’ का अर्थ है अपने कर्त्तव्यों को पूरा करके निवृत्त हुआ मनुष्य। जिसने अपने कन्धों पर आये हुए कर्त्तव्यों, उत्तरदायित्वों को ठीक तरह पूरा कर लिया वह सचमुच ही सौभाग्यवान है। उसे सन्तोष पाने और प्रसन्नता अनुभव करने का सहज ही अवसर मिलता है।
निकम्मापन घृणा सूचक है। जो अपने नियत कर्त्तव्यों को पूरा नहीं कर पाता वह अपना प्रामाणिकता एवं प्रतिष्ठा खोता चला जाता है, भले ही वह इधर−उधर की भाग−दौड़ कितना ही क्यों न करता रहा।
हर मनुष्य के जीवन में समय-समय पर कई प्रकार की कठिनाइयाँ आती हैं, कई तरह के अवरोध उत्पन्न होते हैं, लोग कारणवश अथवा अकारण ही शत्रु बन जाते हैं। कई बार परिस्थितियाँ उलट जाती हैं और निकट भविष्य में किन्हीं दुर्घटनाओं की आशंका प्रतीत होने लगती है। ऐसी दशा में दुर्बल मनःस्थिति के व्यक्ति बुरी तरह घबराने लगते हैं और अपना सन्तुलन गँवा बैठते हैं। घबराहट में अपना विवेक खो देते हैं और साथ ही साहस भी। फलतः ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण कदम उठ जाते हैं जिनकी कोई आवश्यकता न थी। बहुत से भय काल्पनिक होते हैं। शत्रुता एवं प्रतिकूलता उतनी बढ़ी-चढ़ी नहीं होती जितनी कि आँकी गई थी। धैर्यपूर्वक व्यवहार कुशलता के सहारे उन्हें संभाला या सुधारा जा सकता था। कुछ कठिनाइयां आतीं तो उसे सहा भी जा सकता था। किन्तु घबराहट में जो निर्णय किये गये उनने इतनी हानि पहुँचाई जितनी कि विपत्ति आ ही जाती तो भी नहीं हो सकती थी।
मनोभूमि में इतनी दृढ़ता और साहसिकता उत्पन्न करनी चाहिए जिसमें प्रतिकूलताओं से जूझने का साहस बना रहे। शूरवीरों और योद्धाओं का मानसिक स्तर बना रहें तो आधी विपत्तियाँ तो इतने भर से ही टल जाती हैं। आक्रमणकारी सदा दुर्बल मनःस्तर वालों को अपना शिकार चुनते और घात लगाते हैं उन्हें जहाँ तक यह प्रतीत होता है कि लोहा लेना पड़ेगा तो वे सहम जाते हैं और झंझट मोल लेने के स्थान पर अपना रास्ता ही बदल देते हैं। यदि टकराव हो ही जाय तो साहसी व्यक्ति अपनी सूझबूझ बनाये रहता है और अभ्यासी पहलवान की तरह दो-दो हाथ करके उनसे निपट लिया जाता है प्रतिकूलताएँ जितनी हानि पहुँचाती हैं, उससे कहीं अधिक भय जन्य दुर्बलता से अहित होता है। साहसी इस अतिरिक्त क्षति से बच जाते हैं। परिस्थितिवश जो थोड़ा बहुत सहन करना पड़ता है उसकी पूर्ति भी सूझबूझ वाले साहसी व्यक्ति कुछ ही समय में कर लेते हैं।
जब मनुष्य हँसता है तो उसके साथ हँसने का लाभ लेने के लिए अनेक आकर सम्मिलित हो जाते हैं। हँसी का मिठास वो वृद्ध सभी को समान रूप से प्रिय हैं, उदासी किसी को प्रिय नहीं। क्योंकि वह प्रत्यक्ष कुरूपता है। जो असन्तुष्ट और रुष्ट है वह किसी को क्या देगा? दुर्भाग्य ग्रसित से किसी को क्या मिलता है? हर किसी को पाने की अपेक्षा है। खोना कोई नहीं चाहता। प्रसन्न रहने वाले के समीप जो आता है वह प्रसन्नता लेकर जाता है किन्तु कुढ़ने वाले के पास तो देने के लिए कुछ होता नहीं। उलटा वह दूसरों को बोझिल करता है। फलतः उसकी घर बाहर सर्वत्र उपेक्षा ही होती है। मुँह लटकाये रहने की आदत वाले व्यक्ति उपेक्षा,उपहास और तिरस्कार के ही भागी बनते हैं। यह उदासीनता के अपराध का सामाजिक दण्ड है।
ईश्वर के अनुपम उपहार मनुष्य जीवन का महत्व और उपयोग समझा जा सके तो उसे पेट प्रजनन के लिए नहीं वरन् आदर्शों से ओत−प्रोत रखने के निर्णय पर पहुँचना पड़ेगा। दिव्य जीवन की रीति−नीति अपनाकर उस दिव्य लोक में निवास करने की अनुभूति मिल सकती है जिसमें परमेश्वर निवास करते हैं।
मार्टिन लूथर का कथन है− मनुष्य का जीवन उस परम विराट् जीवन का प्रवेश द्वार है जिससे सम्बद्ध होने के उपरान्त फिर कोई सन्ताप और अभाव शेष नहीं रह जाता। मैंने अपनी इसी सत्ता में गहराई तक उतर कर उस विराट् के दर्शन किये हैं। मेरी एकमात्र कामना यह है कि मेरे ही आत्मस्वरूप अन्य प्राणी भी अपने भीतर झाँके और अमरता,मधुरिमा और सुन्दरता के असीम आनन्द का रसास्वादन करें।
ईसा के बारे कहा जाता है कि उन्होंने अन्धों को आंखें दीं, कोढ़ियों को शुद्ध किया और मृतकों को जलाया था। इन कथन की पुष्टि उनके एक अभिवचन से होती है। शिष्यों को सम्बोधित करते हुए एक दिन क्राइस्ट ने कहा था−मैं कब्रों में गढ़े हुए लोगों को उबारने आया हूँ।
अन्धे वे हैं जिन्हें जीवन का मूल्य और सदुपयोग दीख नहीं पड़ता। मृतक वे हैं जिनमें आदर्शों को अपनाकर उपलब्ध होने वाले नव−जीवन के लिए उमंग उत्पन्न नहीं होती। अन्धों को आँखें मिलने और मुर्दा को जीवित होने का अवसर अभी भी आ सकता है, यदि उत्कृष्टता अपना कर दिव्य जीवन जीने का साहस जुटाया जा सके।
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सफलता और विश्वास दोनों एक−दूसरे के पूरक हैं। जिसको अपनी शक्ति, सामर्थ्य, क्षमता एवं योग्यता,प्रतिभा पर विश्वास ही न हो वह सफल कैसे हो सकता है? सफलता के लिए विश्वास को जगाना अति आवश्यक है। रोगी को यह विश्वास दिला दिया जाय कि तुम जल्दी ही अच्छे हो जाओगे तो उसके अन्दर नव−जीवन का संचार होता है और वह अपने को स्वस्थ अनुभव करने लगता है। इसी तरह से जीवन की सफलता इस बात पर टिकी हुई है कि हम अपने प्रति कितने विश्वासी हैं।
विश्वासी के बढ़ते हुए कदम कोई रोक नहीं सकता है। क्योंकि व्यक्ति बड़ा ही शक्तिवान है। शक्ति पर विश्वास करके आगे बढ़ने वाले दुनिया के इतिहास में अमर हो गये। गांधी जी आँधी तूफान की तरह बढ़ते चले गये, दुनिया में सुख-शान्ति की स्थापना की और जबरदस्त अंग्रेजों को उन्होंने मार भगाया। क्योंकि उन्हें विश्वास था अपनी अन्तरात्मा पर। आल्प्स पर्वत नेपोलियन बोनापोर्ट के मार्ग पर रोड़ा नहीं बन सका। ऐसे एक नहीं असंख्यों उदाहरण दृष्टिगत होते हैं कि महापुरुषों ने सफलता विश्वास के सहारे पाई और अपने जीवन की बाधाओं को चकनाचूर कर डाला।
सफलता उन्हीं को मिली है जो दृढ़ विश्वास के साथ अपने मार्ग पर डटे रहे और पराजित होने पर भी विजय की आशंका को जगाये रहे। उनके मन की स्थिरता एवं निडरता ने उन्हें सफलता के समीप पहुँचा दिया।
विश्वास के साथ उत्साह भी आवश्यक है किसी कार्य में विश्वास तो खूब हो पर कार्य करने का उत्साह न हो तो भी कार्य में सफलता मिल नहीं सकती है। सफलता के लिए छोटे-छोटे कार्य चुनने तथा करने चाहिए ताकि हम उन्हें अच्छी तरह से कर सकें। अच्छी तरह से सम्पन्न किए गये कार्य से प्रसन्नता एवं सन्तुष्टि होती है। यही सफलता का द्योतक है।
कार्य की सफलता के लिए पुरुषार्थी होना भी आवश्यक है। पुरुषार्थ के अभाव में सिर्फ सोचने मात्र से काम पूरा नहीं जाएगा। किसान पुरुषार्थ के बल पर खेती करता है। दुनिया में पुरुषार्थ के बल पर ही अनेक प्रकार की सफलता की निशानी है।
असफलता योग्यताओं एवं क्षमताओं का विकास करती है। यदि मनुष्य सफलता की सफलता पाता चले तो जब कभी भी असफल होगा तुरन्त हताश हो जाएगा। ऐसे व्यक्ति विश्वासी नहीं होते। उनके जीवन के छोटे से दुःख भी उन्हें विचलित कर देते हैं उनकी क्षमतायें परिपक्व नहीं हो पाती हैं किन्तु असफलता या पराजय व्यक्ति को मजबूत बना देती है। ऐसा मजबूत मनुष्य हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है। असफलता भी स्थिर सफलता चाहने वाले के लिए आवश्यक है।
स्काटलैण्ड के राजा राबर्ट ब्रूस युद्ध में हार जाने के पश्चात शत्रुओं से बचने के लिए एक गुफा में घुस गये वहाँ उन्होंने एक मकड़ी को अपना जाला बनाते हुए देखा, वह बार बार टूट जाता, किन्तु मकड़ी अपने धैर्य एवं साहस के साथ उसे बार बार जोड़ती रही और अन्त में उसने अपना जाला बना लिया। यह देखकर उन्हें फिर से आशा बँधी, साहस जागा और वह पुनः युद्ध के लिए चल पड़े और विजयी हुए।
असफलता को पराजय नहीं सफलता का प्रथम चरण मानना चाहिए। पराजय मनुष्य को अपनी शक्तियों का भान कराती है उसमें सामर्थ्य एवं साहस जगाती है। यह मानकर के नहीं चलना चाहिए कि हमें सदैव सफलता ही सफलता मिलें,क्योंकि सृष्टि हानि−लाभ, सुख-दुःख, दिन-रात, जीवन−मरण आदि के सम्मिश्रण से बनी है।
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मन्त्र शब्द की व्युत्पत्ति कई प्रकार से होती है। निरूक्त में “मन्त्रा मनात्”−मन से संचारित होने वाली प्रक्रिया को मन्त्र कहा है। शतपथ ब्राह्मण में “वाग्वै मन्त्रः” परिष्कृत वाणी से उच्चारित शब्द−शृंखला को मन्त्र बताया गया है। तन्त्र से “मन्त्रि गुप्त भाषणे” रहस्यमय गुप्त संभाषण को मन्त्र कहा गया है। तीनों अर्थों का समन्वय करने से एक बात पूरी होती है। जिसमें मानसिक एकाग्रता एवं निष्ठा का समुचित समावेश हो। परिष्कृत व्यक्तित्व की परिमार्जित वाणी से जिसकी साधना की जाय। जिसकी रहस्यमय क्षमता पर गहन श्रद्धा हो तथा जिसका अनावश्यक विज्ञापन न करके गोपनीय रखा जाय वे प्रयोग मन्त्राराधन की आवश्यकता पूरी करते हैं।
मन्त्रशक्ति में चार तथ्य काम करते हैं- (1) ध्वनि (2) संयम (3) उपकरण (4) विश्वास। शब्द संरचना और उच्चारण की शुद्धतायुक्त ध्वनि ही सार्थक होती है। साधक अपनी शक्तियों को शारीरिक मानसिक असंयम से बचाकर उपासना कृत्य में नियोजित रखे। माला, आसन, मात्र, प्रतीक, उपचार, उपकरण आदि में प्रयुक्त हुए पदार्थों में शुद्धता का ध्यान रखा जाय। मन्त्र−साधना के प्रति श्रद्धा−विश्वास की कमी न हो। यह सभी बातें जहाँ ठीक प्रकार प्रयुक्त हुई होंगी। वहाँ आराधना का प्रतिफल निश्चित रूप से दृष्टिगोचर हो रहा होगा। उपासना के आधारों का स्तर गिर जाने से ही उसकी सफलता संदिग्ध होती चली जाती है।
तन्त्र विज्ञान में हृदय को शिव और जिह्वा को शक्ति कहा गया है। इन दोनों को ‘प्राण और ‘रयि’ नाम भी दिये गये हैं। भौतिकी के अनुसार इन्हें धन और ऋण विद्युत प्रवाह कह सकते हैं। जिह्वा से मन्त्र उच्चारण होता है यह हलचल हुई। इसके भीतर जितनी शक्ति होगी उतना ही बढ़ा चढ़ा प्रभाव उत्पन्न होगा। यह प्रभाव हृदय के बिजलीघर में उत्पन्न होता है। यहाँ हृदय से तात्पर्य उस भावना स्तर से है जो कृत्रिम रूप से नहीं व्यक्तित्व की मूल सत्ता के आधार पर विनिर्मित होता है। हृदय को अग्नि और जिह्वा को सोम कहा गया है। दोनों के समन्वय से चमत्कारी आत्मशक्ति उत्पन्न होती है। भावना और कर्म की उत्कृष्टता से मन्त्र साधना प्राणवान बनती है इस रहस्य को यदि समझा और अपनाया जा सके तो किसी को भी इस क्षेत्र में निराश न रहना पड़े।
मन्त्र शक्ति को फलित करने के लिए उसका उच्चारण एवं विधि −विधान ही पर्याप्त नहीं। साधक के व्यक्तित्व की प्रखरता का समावेश होना भी आवश्यक है। महर्षि जैमिनी ने पूर्व मीमांसा में मंत्रशक्ति के विकास की चर्चा करते हुए उसके चार आधार बताये हैं −(1) प्रामाण्य −अर्थात् मनगढ़न्त नहीं विधि के पीछे सुनिश्चित विधि विधान होना (2) फलप्रद −अर्थात् जिसका उपयुक्त प्रतिफल देखा जा सके (3) बहुलीकरण−अर्थात् जो व्यापक क्षेत्र को प्रभावित करे (4) आयात यामता− अर्थात् साधक के श्रेष्ठ व्यक्तित्व की क्षमता। इन सारे तत्वों का समावेश होने में मन्त्र प्रक्रिया से दैवीशक्ति का समावेश होता है और उसका चमत्कारी प्रतिफल देखा जाता है।
विश्वामित्र, वशिष्ठ, परशुराम आदि ने गायत्री शक्ति की आराधना करके दिव्य प्रतिफल प्राप्त किये थे। किन्तु सामान्य व्यक्ति वैसा नहीं कर पाते। इसमें मन्त्र की श्रेष्ठता एवं उपासना की गरिमा का दोष नहीं। साधक को ओछा व्यक्तित्व अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करने योग्य न होने से ही निराशा हाथ लगती है। खिलौना बन्दूक में रखकर बढ़िया कारतूस चलाने पर भी लक्ष्य बेध में सफलता न मिलेगी। उपयुक्त परिणाम उत्पन्न करने में कारतूस ही सब कुछ नहीं होता, बढ़िया बन्दूक की भी आवश्यकता पड़ती है। दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ का पौरोहित्य करने के लिये अखण्ड व्रतधारी शृंगीऋषि का सहयोग लेना पड़ा था। भारत की कथा है कि अश्वत्थामा और अर्जुन ने मन्त्र चालित ‘सन्धान अस्त्र’ छोड़े। उनकी भयंकरता को देखकर व्यास जी बीच में आ खड़े हुए और दोनों से अपने अस्त्र वापिस लेने को कहा। अर्जुन ने ब्रह्मचारी होने के कारण अपना अस्त्र वापिस कर लिया और अश्वत्थामा असंयमी होने के कारण वैसा कर सकने में असफल रहा।
शतपथ ब्राह्मण में यरुच्देव और नृमेध ऋषियों के विवाद का एक कथानक आता है। दोनों अपने को सफल मांत्रिक सिद्ध करने के लिए अपनी शक्ति का प्रमाण देते हैं। यरुच्देव ने मन्त्रोच्चारण करके गीली लकड़ी में अग्नि प्रकट कर दी जब कि नृमेध के कंठ से धुँआ भर निकल कर रह गया। इस पर यरुच्देव ने प्रतिपक्षी से कहा−आप मन्त्रोच्चार भर जानते हैं, मैंने उसकी आत्मा का साक्षात्कार किया है।
पर ब्रह्म साक्षी,दृष्टा, निर्विकार है, उसे सूत्र संचालक भर कह सकते हैं। संसार में चेतनात्मक हलचलों के उतार−चढ़ाव जिस ब्रह्मा रूप ही कह सकते हैं। इस उक्ति का जहाँ भी वर्णन हो रहा हो समझना चाहिए यह परिष्कृत आत्मसत्ता की इच्छाशक्ति का ही उल्लेख है। मन्त्र तप से साधित परावाक् अपनी विशुद्धता एवं प्रखरता से ब्रह्म इच्छा बन जाती है। उसके स्पंदन विश्व के परमाणुओं और जीवाणुओं को प्रभावित करते हैं। फलतः लोक प्रवाह की दिशा बदल जाती है। देवदूत, अवतारी, महामानव, यही करते हैं। इनके कर्तृत्व ईश्वर की इच्छा कहलाते हैं। उनकी इच्छा के पीछे ईश्वर का विधान काम करता दृष्टिगोचर होता है। सिद्ध और तपस्वी भी अपने स्तर के अवतार ही होते हैं। उनकी परावाक् शक्ति मात्र उच्चारण के ही काम नहीं आती वरन् विश्व के नियन्त्रण, संचालन, अभिवर्द्धन एवं परिवर्तन में भी महत्वपूर्ण योगदान देती है।
ब्रह्माण्ड वृक्ष है −पिण्डाण्ड उसका बीज। बीज में वृक्ष की समस्त सम्भावनाएँ सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहती हैं। इसी प्रकार ब्रह्माण्ड में जो कुछ है उसका सार तत्व पिण्डाण्ड में, मनुष्य में विद्यमान है। प्रश्न प्रसुप्ति को जागृति में परिणित करने का है। बीज को वृक्ष बनाने में माली का श्रम, मनोयोग एवं साधन लगता है। शुक्राणु को बालक रूप में विकसित करने के लिए माता-पिता के अनुदान लगते हैं। इसी प्रकार तुच्छ से पिण्ड की क्षमता को ब्रह्माण्ड को प्रभावित कर सकने योग्य बनाने में ‘साधना’ की आवश्यकता पड़ती है। इस तप−साधना में ‘परावाक्’ शक्ति का प्रयोग अनिवार्य रूप से होता है।
यज्ञ प्रकरण में परावाक् का ही गुणानुवाद गाया गया है वैखरी में तो वायुशोधक अग्निहोत्र भर होता है। नित्यकर्म का विधान भर उससे सम्पन्न होता है। यज्ञाग्नि और परावाक् के संयोग से ज्योति और दीप्ति उत्पन्न होती है। ज्वाला से उसका स्तर भिन्न है। ज्योति की महिमा बताते हुए श्रुति कहती है−उससे शोक−सन्ताप छूटते हैं तथा श्री, समृद्धि, शान्ति एवं प्रगति की उपलब्धि होती है।
गीता में ब्रह्म यज्ञ का वर्णन है ब्रह्म अग्नि में−ब्रह्म हवि देने का वर्णन है। यज्ञ का अर्थ है −परमार्थ यज्ञाग्नि सत्प्रयोजनों में संलग्न सत्प्रवृत्ति को कहा गया है। वाक् उत्कृष्ट व्यक्तित्व का सार तत्व घृत है। दोनों के समन्वय से जो वातावरण बनता है उसमें भौतिक ऋद्धियों और आत्मिक सिद्धियों के भण्डार भरे पड़े है। पानी तो बिना यज्ञ वाले क्षेत्र पर भी बरसते हैं, पर सुख−शान्ति बरसाने वाले पर्जन्य यज्ञ प्रक्रिया के फलस्वरूप ही बरसते हैं।
मन्त्र विनियोग के पाँच अंग हैं−(1) ऋषि, (2) छन्द, (3) देवता (4) बीज (5) तत्व। इन पाँचों को मन्त्र शरीर का आधार स्तम्भ माना गया है। पाँच तत्वों से स्थूल काया बनी है। पाँच प्राणों से सूक्ष्म शरीर का निर्माण हुआ है। कारण शरीर में पाँच तन्मात्राएँ आधार भूत हैं। वनस्पतियों का पंचांग प्रयुक्त होता है पंचगव्य−गो शरीर के पाँच अमृत माने गये हैं। रत्नों में पाँच ही प्रमुख हैं। पाँच देवताओं की उपासना−आराधना प्रख्यात है। पाँच कोशों के जागरण की विधि गायत्री मंत्र के पाँच मुख चित्रित करते हुए समझाई गई है। मंत्रशक्ति को जागृत करने के लिए उपरोक्त पाँच आधारों को उसके विनियोग में समाविष्ट किया गया है।
(1) ऋषि अर्थात् मार्गदर्शक गुरु। उपासना एक महत्वपूर्ण विज्ञान है। उसे एक विशेष शिल्प कह सकते हैं। इसके लिए अनुभवी एवं निष्णात मार्गदर्शक चाहिए। यह मात्र पुस्तक प्रशिक्षण से सम्भव नहीं हो सकता है। ग्रन्थों में हर रोग का निदान एवं उपचार लिखा है तो भी अनुभवी चिकित्सक की आवश्यकता बनी ही रहती है। कारण कि हर रोगी की प्रकृति एवं स्थिति में भिन्नता होती है। उसका तालमेल बिठाते हुए चिकित्सक को स्वतन्त्र बुद्धि का प्रयोग करना पड़ता है और देखना पड़ता है कि उपचार की व्यवस्था किस क्रम से बनाई जाय। नित्य के उतार−चढ़ाव देखते हुए उसे चिकित्सा में नित नये परिवर्तन करने पड़ते हैं। यही बात मन्त्राराधन के सम्बन्ध में भी है। सामर्थ्यवान गुरु−शिष्यों को सामर्थ्य का अनुदान भी देता है और स्थिति के उपयुक्त मार्गदर्शन भी करता है। अस्तु उस प्रयोजन की सफलता के लिए ऋषि स्तर का मार्गदर्शक नियुक्त करना आवश्यक माना गया है।
(2) विनियोग का दूसरा चरण है−छन्द। छन्द अर्थात् स्वर−ताल−लय। मंत्र को किस स्वर में, किस क्रम से, किस उतार-चढ़ाव के साथ उच्चारित किया जाय। उसकी गति कितनी रहे, मंत्र विद्या में यह एक स्वतंत्र शास्त्र है। सितार में तार तो उतने ही रहते हैं और उँगलियाँ शास्त्र है। सितार में तार तो उतने ही रहते हैं और उँगलियाँ चलाने की बात भी हर वादन में रहती है। किन्तु बजाने वाले का कौशल तारों पर आघात करने का क्रम−परिवर्तित होने के कारण विभिन्न राग−रागनियों का ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता है। मानसिक, वाचिक, उपाँशु, उदात्त, अनुदात्त, स्वरित के आधार पर मंत्र की क्षमता में भारी अन्तर पड़ता है और उसकी प्रतिक्रिया भिन्न-भिन्न होती है। सामवेद में लिखित मन्त्रों की कभी एक हजार शाखाएँ थीं। अर्थात् उनमें से प्रत्येक को हजार ध्वनि लय के साथ गाने बजाने का विधान था वह यह मात्र संगीत की दृष्टि से नहीं वरन् शक्ति उत्पादन की दृष्टि से यह सृजन हुआ है। कौन व्यक्ति किस प्रयोजन के लिए, किस मन्त्र की, किस लय में आराधना करे यह विधान जान लेने से उसके प्रभावशाली परिणाम निकलते हैं।
(3) विनियोग का तीसरा चरण है −देवता। देवता का अर्थ है −सूक्ष्म जगत् से चलने वाले शक्ति प्रवाहों में से अभीष्ट परत का चयन। आकाश में एक ही समय में अनेक रेडियो स्टेशन बोलते हैं, पर हर एक की प्रसारण ‘फ्रीक्वेन्सी’ भिन्न होती है। ऐसा न होता तो ब्राडकास्टों के सभी शब्द मिलकर एक हो जाते और गड़बड़ खड़ी करते। अभीष्ट प्रसारण सुनने के लिए अपने रेडियो की सुई इसी स्टेशन पर लगानी पड़ती है। आकाश के वायु मण्डल में हवा की कितनी ही परतें हैं। समुद्र जल में भी पानी की परतें और धाराएँ बहती हैं। जमीन खोदने पर भी मिट्टी की भिन्न−भिन्न परतें मिलती है ठीक इसी तरह सूक्ष्म जगत में भी भिन्न-भिन्न स्तर के शक्ति प्रवाह बहते हैं। इन्हें ही देवता कहते हैं। सूर्य किरणों में सात रंग होते हैं रंगीन शीशों के माध्यम से हम जिस रंग का लाभ उठाना चाहें उसे अपने उपयोग के लिए पकड़ सकते हैं। देवाराधन प्रक्रिया का यही उद्देश्य है। मन्त्र को बल देने वाली देव शक्ति से ठीक तरह सम्पर्क किया जा सके तो उसका अभीष्ट परिणाम उपलब्ध होता है।
(4) चौथा चरण है−बीच। बीज अर्थात् उद्गम। स्थूल,सूक्ष्म और कारण शरीरों में अनेक दिव्य केन्द्र हैं। हारमोन ग्रन्थियों की विलक्षणता स्थूल शरीर में प्रत्यक्ष है। नाड़ी गुच्छक प्लेसेस −मस्तिष्कीय ग्रन्थियाँ अपने में कितनी जादुई सम्भावनाएँ दबाये बैठी हैं, उसे शरीर विज्ञानी भली प्रकार जानते हैं। षट्चक्र, तीन ग्रन्थियाँ−108 उपत्यिकाएँ − सहस्रों शक्ति नाड़ियाँ −सूक्ष्म और कारण शरीर में विद्यमान हैं। उन दिव्य शक्तियों के साथ सम्पर्क मिलाने का ‘स्विच’ कह सकते हैं। स्विच दबाने से बिजली जलने लगती है। किस मन्त्र की सफलता के लिए −किस स्विच को किस प्रकार दबाया जाय। इसके लिए अलग विधान है। तन्त्र में इसके लिए ह्रीं श्री, क्लीं और बीजाक्षरों का विधान है। योग में कुछ विशेष ध्यान, नाद, आसन, प्राणायाम, मुद्रा, बंध आदि का निर्धारण है। इस क्रम व्यवस्था को अपनाने से मन्त्र को जागृत एवं शक्ति सम्पन्न बनाया जाता है टेलीफोन डायल के नम्बर बदल देने से अलग अलग स्थानों से बातें होने लगती है। मन्त्रों के साथ बीज एवं सम्पुट बदल देने से उनकी क्षमता एवं दिशा में अन्तर पड़ता है।
(5) विनियोग का पाँचवाँ अंग है−तत्व। तत्व अर्थात् लक्ष्य। किस प्रयोजन के लिए आराधना की जा रही हैं इसका संकल्प, उद्देश्य, निर्धारण ही तत्व है। एक ही वृक्ष के विभिन्न अवयवों में विभिन्न प्रकार के गुण होते हैं। एक ही पदार्थ में कई प्रकार के रासायनिक कण मिल सकते हैं। आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार खाद्य पदार्थों के भी स्थूल, सूक्ष्म और कारण प्रकृति होती है। स्थूल भाग से रक्त−मांस बनता हैं। सूक्ष्म भाग से मन बुद्धि का निर्माण होता है। कारण भाग से गुण,कर्म, स्वभाव, आकांक्षा एवं प्रकृति का निर्माण होता है। योगशास्त्र में यह वर्गीकरण सत, रज, तम के नाम से बताया गया है। मन्त्राराधन में प्रयुक्त उपकरणों में किस तत्व की प्रधानता है इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए उपयोगी सामग्री का निर्धारण करना पड़ता है। विभिन्न मन्त्रों में −स्थान आहार, उपचार आदि का जो अन्तर रहता है। उसे तत्व प्रक्रिया से संबंधित माना जाना चाहिए। मुहूर्त, ऋतु, तीर्थ, सरोवर आदि के अन्तर भी प्रकृति की तत्व स्थिति के साथ साधना का ताल−मेल बिठाने की दृष्टि से किये जाते हैं।
आयुर्वेद शास्त्र में ‘कल्प’ उपचार करने से पूर्व नाड़ी शोधन प्रक्रिया सम्पन्न कराई जाती है। नाड़ी शोधन के पाँच अंग हैं−(1) वमन (2) विरेचन (3) स्वेदन (4) स्नेहन (5) नस्य। इन कृत्य से शरीर में भरे हुए मल निकल जाते हैं और उपचार सफल होने की सम्भावना बढ़ जाती है। राजयोग के पाँच यम और पाँच नियम प्रख्यात हैं। वे ठीक बन पड़े तो समझना चाहिए कि प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि का पथ−प्रशस्त हो गया। तंत्रयोग के पाँच मकार −हठयोग के पाँच प्रयास प्रथमतः किये जाते हैं। सिख धर्म के पाँच प्रतीक प्रख्यात हैं। मन्त्राराधन में जिस आधार पर प्रखरता बढ़ती और सफलता मिलती है उन्हें विनियोग के अन्तर्गत बता दिया गया है। ऋषि, छन्द, देवता, बीज और तत्व यदि इन पाँचों अंगों को ठीक तरह समझते हुए उनका समुचित प्रयोग करते हुए यदि मन्त्र साधन किया जाय तो उसका सत्परिणाम मिलने में फिर कोई विशेष कठिनाई शेष न रह जायगी।
देवता क्या है? उनका तेज मानव शरीर में किस प्रकार प्रवेश करता है और क्या प्रभाव उत्पन्न करता है? इसकी विवेचना करते हुए श्रुति कहती है—
“विष्णुमुख वै देवाइछन्दोभिर्रिमान्लोकानन पजप्यमभ्य जपन्”
अर्थात् देवता विष्णु मुख हैं। वे मन्त्र रूप होते हैं। इन मन्त्र देवताओं ने न हटाये जा सकने वाले अवरोध हटाये हैं और न जीते जा सकने वाले वर्चस्व जीते हैं।
मन्त्र शब्द गुच्छक मन्त्रों की शास्त्रीय विधि से की गई उपासना अपने प्रतिफल उत्पन्न करती है। साथ ही एक तथ्य और भी है कि सद्विचारों को अपनी चेतना ने ओत−प्रोत करके तदनुरूप व्यक्तित्व को ढाल लिया जाय तो यह भी प्रत्यक्ष क्रम में उतरने वाला मन्त्राराधन ही है। सत्प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त की गई—सद्भावना युक्त वाणी भी मन्त्र शक्ति के समान ही फलवती होती है।
सन्त बिनोवा ने पंढरपुर सर्वोदय सम्मेलन के एक प्रवचन में वाणी की उपासना पर प्रकाश डालते हुए कहा था—मेरा बोलना जप के लिए है। जिन विचारों को बोलता हूँ वे दृढ़ होते चले जाते हैं।........ जो किया है, आप लोगों ने किया है। मैंने तो जप किया है। भूदान का जप किया तो भूदान मिला। सम्पत्ति दान का जप किया तो सम्पत्ति दान मिला। न तो मैं यज्ञ करता हूँ, न दान करता हूँ, न तप करता हूँ, मैं तो केवल जप ही करता हूँ और मेरे सारे काम बन जाते हैं।
शतपथ ब्राह्मण की उक्ति है कि “जन समाज का मैल धोने वाला शब्द प्रवाह ही सारस्वत मन्त्र है, जन कल्याण की दृष्टि से किया गया संभाषण एवं प्रवचन इस प्रतिपादन के आधार पर मन्त्र साधना के समतुल्य ही प्रभावोत्पादक होता है।
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संस्कृत का अर्थ है मनुष्य का भीतरी विकास। उसका परिचय व्यक्ति के निजी चरित्र और दूसरों के साथ किये जाने वाले सद्व्यवहार से मिलता है। दूसरों को ठीक तरह समझ सकने और अपनी स्थिति भी उस धैर्यपूर्वक दूसरों को समझा सकने की स्थिति भी उस योग्यता में सम्मिलित कर सकते हैं जो संस्कृति की देन है।
आदान−प्रदान एक तथ्य है जिसके सहारे मानवी प्रगति के चरण आगे बढ़ते−बढ़ते वर्तमान स्थिति तक पहुँचे हैं। कृषि, पशुपालन, शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, उद्योग, विज्ञान, दर्शन जैसे जीवन की मौलिक आवश्यकताओं के सम्बन्धित प्रसंग किसी एक क्षेत्र के लोग परिचित हुए हैं। परस्पर आदान−प्रदान चले हैं और भौतिक क्षेत्र में सुविधा संवर्धन का पथ−प्रशस्त हुआ है। ठीक यही बात धर्म और संस्कृति के सम्बन्ध में भी है। एक ने अपने सम्पर्क क्षेत्र को प्रभावित किया है। एक लहर ने दूसरों को आगे धकेला है। लेन−देन का सिलसिला सर्वत्र चलता रहा है। मिलजुल कर ही मनुष्य हर क्षेत्र में आगे बढ़ा है। इस समन्वय से धर्म और संस्कृति भी अछूते नहीं रहे हैं। उन्होंने एक−दूसरे को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से प्रभावित किया है।
अब दुनिया में कोई नस्ल ऐसी नहीं बची जो पूरी तरह रक्त शुद्धि का दावा कर सके। जातियों के बीच प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से बेटी व्यवहार चलते रहे हैं और नस्लों के मूल रूप में आश्चर्यजनक परिवर्तन हो गया है। भारत वंशी लोगों के रक्त में आर्य और द्रविड़ रक्त का सम्मिश्रण इतना अधिक हुआ है कि दोनों से मिलकर एक तीसरी अथवा संयुक्त जाति बन गई है। इसी प्रकार एक सभ्यता पर दूसरी सभ्यता के निकट आने का भारी प्रभाव पड़ा है। भारत में पिछले एक हजार वर्ष से मुस्लिम और ईसाई सभ्यताएँ आती रहती हैं। उनके पूर्ण अनुयायी कितने बने यह बात पृथक है। सामान्य जनमानस ने उनका बहुत कुछ प्रभाव ग्रहण किया है। प्रचलित भारतीय पोशाक ऐसी नहीं है। जिसे दो हजार वर्ष पुरानी कहा जा सके। इसी प्रकार रीति−रिवाजों एवं मान्यताओं में भी अनजाने ऐसे तत्वों का समावेश होता रहा है जिसे खुले मन में न सही हिचकिचाहट के साथ—समन्वय स्वीकार किया जा सके।
यह सभ्यताओं का समन्वय एवं आदान−प्रदान उचित भी है और आवश्यक भी। कट्टरता के कटघरे में मानवी विवेक को कैद रखे रहना असम्भव है। विवेक दृष्टि जागृत होते ही इन कटघरों की दीवारें टूटती हैं और जो रुचिकर या उपयोगी लगता है उसका बिना किसी प्रचार या दबाव के आदान−प्रदान चल पड़ता है। इसकी रोकथाम के लिए कट्टरपंथी प्रयास सदा से हाथ−पैर पीटते रहे हैं, पर यह कठिन ही रहा है। हवा उन्मुक्त आकाश में बहती है। सर्दी−गर्मी का विस्तार व्यापक क्षेत्र में होता है। इन्हें बन्धनों में बाँध कर कैदियों की तरह अपने ही घर में रुके रहने के लिए बाधित नहीं किया जा सकता। सम्प्रदाओं और सभ्यताओं में भी यह आदान−प्रदान अपने ढंग से चुपके−चुपके चलता रहा है। भविष्य में इस की गति और भी तीव्र होगी।
धर्म और संस्कृति के बारे में तो कुछ कहना ही व्यर्थ है। वे दोनों ही सार्वभौम हैं उन्हें सर्वजनीन कहा जा सकता है। मनुष्यता के टुकड़े नहीं हो सके। शारीरिक संरचना की तरह मानवी अन्तःकरण की मूल सत्ता भी एक ही प्रकार की है। भौतिक प्रवृत्तियाँ भी लगभग एक−सी हैं। एकता व्यापक है और शाश्वत। पृथकता सामयिक है और क्षणिक। हम सब एक ही पिता के पुत्र हैं। एक ही धरती पर पैदा हुए है। एक ही आकाश के नीचे रहते हैं। एक ही सूर्य से गर्मी पाते हैं और बादलों के अनुदान से एक ही तरह अपना गुजारा करते हैं फिर कृत्रिम विभेद से बहुत दिनों तक बहुत दूरी तक किस प्रकार बँधे रह सकते हैं। औचित्य को आधार मानकर परस्पर आदान−प्रदान का द्वार जितना खोलकर रखा जायगा, उतनी ही स्वच्छ हवा और रोशनी का लाभ मिलेगा। खिड़कियाँ बन्द रखकर हम अपनी विशेषताओं को न तो सुरक्षित रख सकते हैं और न स्वच्छ हवा और खुली धूप से मिलने वाले लाभों से लाभान्वित हो सकते हैं। संकीर्णता अपना कर पाया कम और खोया अधिक जाता है।
एकता की दिशा में हम आगे बढ़े तो इसमें पूर्वजों के प्रति अनास्था नहीं वरन् श्रद्धा की ही अभिव्यक्ति है। पूर्वज अपने पूर्वजों की विरासत को कृतज्ञतापूर्वक स्वीकार करते हुए भी अपने बुद्धिबल और बाहुबल से नये अनुभव एकत्रित करते, लाभ कमाते और साधन जुटाते रहे हैं। इसमें पूर्वजों को सन्तोष ही हो सकता है। साथ सही गर्व भी। अपनी सन्तान पर कोई अभिभावक यह बन्धन नहीं लगाता कि हममें अधिक शिक्षा या सम्पत्ति सन्तान को नहीं कमानी चाहिए। हमसे अधिक यश या कौशल अर्जित नहीं करना चाहिए। बन्धन लगाना तो दूर समझदार अभिभावक अपने से अधिक प्रगति करने के लिए अपने उत्तराधिकारियों को उत्साहित और उत्तेजित करते हैं। ऐसी दशा में पूर्वजों की तुलना में एकता के क्षेत्र में हम कुछ कदम और आगे बढ़ सके तो इसमें असमंजस की कोई बात नहीं है। इसमें पूर्वजों की अवज्ञा जैसा कोई प्रश्न उठता ही नहीं। पिताजी यदि 60 वर्ष जिये और बेटा 70 वर्ष जी सके तो इसमें दुःख मानने की कोई बात नहीं है। सदाशयता, शालीनता, एकता और विवेकशीलता की दिशा में प्रगति करना मानवी प्रगति के इतिहास में एक अच्छी कड़ी और जोड़ देना ही कहा जा सकता है।
अब राष्ट्रवाद के दिन लदते जा रहे हैं। देशभक्ति के जोश को अब उतना नहीं उभारा जाता जिसमें अपने ही क्षेत्र या वर्ग को सर्वोच्च ठहराया जाय अथवा विश्व विजय करके सर्वत्र अपना ही झण्डा फहराने का उन्माद उठ खड़ा हो। ऐसी पक्षपाती और आवेशग्रसित देशभक्ति अब विचारशील वर्ग में नापसन्द की जाती है और विश्व नागरिकता की वसुधैव कुटुम्बकम् की बात को महत्व दिया जाता है। विश्व एकता के सिद्धान्त को मान्यता मिली है और राष्ट्रसंघ बना है। इस दिशा में प्रगति के चरण धीमे उठ रहे हैं, यह चिन्ता का प्रसंग है। अपेक्षा यही की जाती है कि संसार की व्यापक समस्याओं का समाधान विश्व एकता के बिना और किसी प्रकार सम्भव न हो सकेगा। एक भाषा, एक राष्ट्र, एक संस्कृति अपना कर ही उज्ज्वल भविष्य की, विश्व शान्ति की स्थापना हो सकती है। यह तथ्य मानवी विवेक ने स्वीकार कर लिया है और विभेद उभारने वाले तत्वों को अमान्य ठहराया जा रहा है। सभ्यता और संस्कृति के क्षेत्र में भी ऐसी ही व्यापक उत्पन्न करने के लिए वातावरण बनाना होगा। राष्ट्रवाद, सम्प्रदायवाद की तरह सभ्यतावाद की कट्टरता को भी अगले दिनों क्रमशः अधिक शिथिल करते चलने की आवश्यकता पड़ेगी। नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की स्थापना के लिए ऐसे एकतावादी विवेक को जागृत करने की आवश्यकता है जिसमें अपने ही पराये का भेदभाव न करने औचित्य, न्याय, तथ्य और विवेक को ही जब मान्यता दी जायगी तो फिर उपयोगिता स्वीकार करने की मनःस्थिति बन जायगी तब जहाँ से भी, जितनी मात्रा में तथ्य दृष्टिगोचर होगा, स्वीकार किया जायगा। इसके लिए किसी को खेद मनाने की आवश्यकता न होगी कि हमारी अमुक मान्यताओं को सर्वांश में जागृत विवेक ने स्वीकार नहीं किया। पिछला पैर उठाकर ही अगला पैर आगे रखा जाता है। लम्बी मंजिल इसी प्रकार पूरी होती है। आगे बढ़ना है तो पीछे का पैर अपने स्थान पर जमे रहने का आग्रह नहीं चल सकता।
अंग्रेजी में संस्कृति का अर्थ बोधक शब्द है ‘कलचर’ इसका तात्पर्य है सभ्यता। रहन−सहन एवं सोचने विचारने का तरीका। अपने नाम, रूप, धन, परिवार, क्षेत्र, भाषा, धर्म आदि की तरह ही अपने रहन−सहन की पद्धति भी लोगों को प्रिय लगती है। यह प्रियता बहुधा पक्षपात के रूप में बदल जाती है। अपने को श्रेष्ठ दूसरों को निकृष्ट मानने की तरह है। अपने परिकर एवं सरंजाम के सम्बन्ध में भी वैसी ही मान्यता बन जाती है। इसमें पूर्वाग्रह और पक्षपात का गहरा पुट रहता है। यद्यपि वह लगना ऐसा है मानो सत्य अपने ही हिस्से में आया है। और दूसरे सभी गलत सोचते और झूठ बोलते हैं। अन्यान्य मतभेदों की तरह संस्कृति सम्बन्धी मतभेद भी एक है जिसके लिए बहुत बार भयंकर युद्ध होते रहे। व्यक्तिगत जीवन में भी विद्वेष, घृणा, आक्रमण, प्रतिरक्षा जैसी विडम्बनाएँ अनेक बार संस्कृति के नाम पर भी खड़ी होती रहती हैं और उनसे मनुष्य जाति को धन, जन नीति सद्भावना, शान्ति और सुरक्षा की दृष्टि से भारी हानि उठानी पड़ी है। इस प्रकार जहाँ संस्कृति का मूल अस्तित्व व्यक्ति और समाज के कल्याणकारी तत्व पर आधारित है वहाँ उसके प्रति अत्युत्साह और दुराग्रह में विद्वेष के विष बीज भी कम मात्रा में भरे हुए नहीं हैं। योरोप में ईसाई धर्म के प्रति और एशिया में इस्लाम धर्म के प्रति अत्युत्साह ने जिस निष्ठुरता का परिचय दिया है, उससे उन संस्कृति प्रेमियों का गौरव बढ़ा नहीं। उन धर्मों की गरिमा अन्तःकरण की गहराई में प्रवेश न कर सकी यद्यपि बहुतों ने भयभीत होकर अथवा लोभ लाभ की दृष्टि से उन्हें स्वीकार अवश्य कर लिया।
संस्कृति शब्द को सभ्यता से पृथक रखा जा सके तो अर्थ का अनर्थ होने से बच सकता है। धर्म और सम्प्रदाय के सम्बन्ध में भी यही बात होनी चाहिए। धर्म एक चीज है और सम्प्रदाय दूसरी। सम्प्रदायवाद—धर्म तत्व के समर्थक ही हों यह आवश्यक नहीं। बहुत−सी रिवाजें एवं मान्यताएं ऐसी हो सकती हैं जो प्राचीन होने के साथ−साथ लोकप्रिय बन गई हों और अनेक व्यक्ति उसके समर्थक, अनुयायी हों, इतने पर भी उनका बहुत−सा पक्ष, धर्म भावना के मूल सिद्धान्तों से मेल न खाता हो। भारतीय समाज को ही लें। जाति−पाँति के नाम पर ऊँच−नीच की भावना और नर−नारी की असमानता की मान्यता गहराई तक लोगों के मनों में उतर गई है। नीति और न्याय की दृष्टि से उसका तनिक भी औचित्य नहीं है। फिर भी परम्परागत अभ्यास के कारण उसकी जड़ें इतनी नीची चली गई हैं जो काटे नहीं काटतीं। इसी प्रकार हिन्दू धर्म में अथवा अन्य धर्मों में ऐसे ही प्रचलन हो सकते हैं। देवताओं के सामने पशु बलि चढ़ाया जाना, धर्म की मूल मान्यताओं से, उच्चस्तरीय आदर्शों से मेल नहीं खाता फिर भी उसे अनेक धर्मों में मान्यता प्राप्त है।
जिस प्रकार सम्प्रदाय को धर्म का कलेवर भर कह सकते हैं वैसे ही सभ्यताओं में संस्कृति के कुछ तत्व झाँकते हुए देखे जा सकते हैं। वस्त्र, आभूषण, वेश−विन्यास देखकर किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में बहुत कुछ जानकारियाँ मिल सकती हैं फिर भी उस आवरण को पूरा व्यक्तित्व नहीं कहा जा सकता। धर्म एक तत्वज्ञान है, जिसमें उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व की दिशा में मनुष्य को अग्रगामी बनाने के लिए कुछ नीति नियमों का निर्धारण है। सम्प्रदाय उस दृष्टिकोण को मानने वाले समुदाय के रहन−सहन का तरीका है। यह तरीका मात्र आदर्शों से ही प्रेरित नहीं होता वरन् परिस्थितियों, साधनों एवं परम्पराओं पर आधारित होता है। उसमें तत्व के सिद्धान्त भी किसी मात्रा में घुले−मिले हो सकते हैं, पर कोई समूचा सम्प्रदाय समूचे धर्म तत्व का प्रतिनिधित्व नहीं करता। उसमें दूसरी चीजों का भी समावेश हो सकता है। किसी सम्प्रदाय का कट्टर अनुयायी सच्चे अर्थों में धर्मात्मा भी होगा यह नहीं कहा जा सकता। ठीक इसी प्रकार अनेकानेक सभ्यताओं में भी मानवी संस्कृति की झलक मिल सकती है, पर कोई सभ्यता पूरी तरह सुसंस्कृत होने का दावा नहीं कर सकती। यदि ऐसा ही होता तो फिर पृथकता से लेकर विरोध तक के ऐसे तत्व कहीं दिखाई न पड़ते जिनसे टकराव की स्थिति पैदा होती हो।
संस्कृति देश और जाति में विभाजित नहीं हो सकती। वह मानवी है और सार्वभौम है। दूसरे अर्थों में उसे मनुष्यता—मानवी गरिमा के अनुरूप उच्चस्तरीय श्रद्धा, सद्भावना कह सकते हैं। इसके प्रकाश में मनुष्य परस्पर स्नेह−सौजन्य के बन्धनों में बाँधते हैं। सहिष्णु बनते हैं। एक−दूसरे के निकट आने और समझने का प्रयत्न करते हैं। विभेद की खाई पाटते हैं, पर सभ्यताओं के सम्बन्ध में ऐसा नहीं कहा जा सकता। वे क्षेत्रों— जातियों, मान्यताओं और परिस्थितियों का कलेवर ओढ़े रहने से स्पष्टतः एक दूसरे से बहुत हद तक पृथक दीखती है और कितनी ही बातों में उनके बीच असाधारण मतभेद भी हैं। सभ्यताएँ टकराती हैं। एक सभ्यता के अनुयायी दूसरे लोगों को अपने झन्डे के तले लाने के लिए उचित ही नहीं अनुचित उपाय भी काम में लाते हैं। अपनी सभ्यता को दूसरों की सभ्यता के आक्रमण से बचाने के लिए लोग सुरक्षा के लिए भारी प्रयत्न करते हैं। ऐसे उपाय सोचते हैं जिनसे परस्पर घुलने−मिलने और आदान−प्रदान के अवसर न आने पावें। धर्मों के बीच कट्टरता इस हद तक देखी जाती है कि दूसरे के पूजा उपचारों में सम्मिलित होने पर भी प्रतिबन्ध रहता है। इसी प्रकार एक सभ्यता वाले अपने लोगों को दूसरी सभ्यता वालों के वेष विन्यास तक को अस्वीकार करते हैं। विचारों की तुलनात्मक समीक्षा करने की तो उनमें गुंजाइश ही नहीं रहती। अपना सो सर्वश्रेष्ठ, दूसरों का सो निकृष्टतम। यही अहंकार बुरी तरह छाया रहता है। सभ्यतानुयायी और धर्मावलंबी कहलाने वाले व्यक्ति ही इस पक्षपात के सर्वाधिक शिकार पाये जाते हैं।
संस्कृति सौंदर्योपासना है। एक भावभरी उदात्त दृष्टि रहे। वन, उपवनों, नदी, तालाबों, प्राणियों, बादलों, तारकों जैसी सामान्य वस्तुओं के जब सौन्दर्य पारखी दृष्टि से देखा जाता है तो वे अन्तरात्मा में आह्लाद उत्पन्न करती है। श्रद्धा के आरोपण से पत्थर में भगवान पैदा होते हैं। सांस्कृतिक चिन्तन से हम इस संसार को भगवान का विराट् स्वरूप और अपने कलेवर को ईश्वर के मन्दिर जैसा पवित्र अनुभव कर सकते हैं। जहाँ ऐसी दृष्टि होगी वहाँ दूसरों से सद्व्यवहार करने और अपने उत्कृष्टता बनाये रखने की ही आकांक्षा बनी रहेगी और उसे जितना कार्यान्वित करना बन पड़ेगा, उतना ही अपना और दूसरों का सच्चा हित साधन बन पड़ेगा। सुसंस्कृत दृष्टिकोण अपनाकर मनुष्य अपने देवत्व को विकसित करने और वातावरण को सुख−शान्ति से भरा−पूरा बनाने में आशाजनक सफलता प्राप्त कर सकता है।
विचारक इलियट ने अपने ग्रन्थ ‘संस्कृति का पर्यवेक्षण’ में लिखा है—संस्कृति का स्वरूप मानवी उत्कृष्टता के अनुरूप आचरण करने के लिए विवश करने वाली आस्था है। जिसका अन्तःकरण इस रंग में जितनी गहराई तक रंग हुआ है वह उतना ही सुसंस्कृत है।
व्यक्तिगत सुख कोई सुख नहीं है। न ही व्यक्तिगत सुख के साधन संग्रहीत कर लेने वाला व्यक्ति संपत्तिवान है। मैं सदैव ही यह स्वप्न देखता रहता हूँ कि एक ऐसा समाज बने जिसमें मनुष्य सुख की नहीं समूचे समाज के सुख और समृद्धि की कामनाएँ हिलोरें लेती रहती हैं। हमारे समाज में श्रम का सम्मान हो, परिश्रम मनुष्य का स्वभाव बन जाय, प्रामाणिकता सामाजिक जीवन का एक अनिवार्य अंग बन जाय, परस्पर सहयोग व सह−अस्तित्व का भाव क्रिया रूप में परिणित होने लगे तो मुझे परम सुख मिले।
प्रायः सभी देशों के विचारक, सन्त, दर्शनशास्त्री, धर्मोपदेशक व साहित्यकार ऐसे समाज की कल्पना करते आए हैं। परन्तु प्रश्न यह है इसे साकार कैसे बनाया जाय। व्यष्टि को समष्टि की अनुभूति कैसे होने लगे, एक के लिए सब व सब के लिए एक का भाव कैसे सबमें उदित हो- यही विचार मैं निरन्तर करता रहता हूँ।
मैं समझता हूँ कोई ऐतिहासिक क्रान्ति प्रक्रिया ही ऐसा कर सकती है। इस स्वप्न को साकार करने के लिए , जन मानस को बदल देने के लिए दृष्टिकोण में परिवर्तन आवश्यक है। जब तक यह कार्य न हो जाय—इसी प्रक्रिया को गति देते रहने में अपने आपको लगा देने में ही मेरा ध्येय सन्निहित रहेगा।
—विवेकानन्द
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मनुष्य के पास यदि कोई सर्वोत्तम सम्पत्ति हो सकती है तो वह भावनाएँ ही है, इससे ही व्यक्तित्व की परख होती और मान सम्मान मिलता है। सम्वेदना परमात्मा से जोड़े रहने वाला ऐसा तत्व है कि वह जिस भी हृदय में रहता है उसी को आत्मिक सन्तोष और गरिमा प्रदान किये रहता है।
जंगल में आग लगती है तो नष्ट जीव जन्तु ही नहीं होते, वृक्ष, वनस्पति, वहाँ बसने वाले गाँव सभी उजड़ जाते हैं। इन दिनों भौतिकता की जो भयंकर दावाग्नि लगी हुई है उसने न केवल सांसारिक यथार्थ, सौन्दर्य को नष्ट किया अपितु सम्वेदनाओं को भी मटियामेट कर दिया है इससे लगता है मनुष्य जड़ पत्थरों का बना पिशाच है जो न किसी का दर्द समझता है,न दुःख न किसी के प्रति दया बरतता है न करुणा। उससे तो पशु पक्षी ही अच्छे जिन्होंने अपनी भावनाओं को तिलांजलि नहीं दी अपितु उन्हें विकसित ही किया है।
हिरनी का वात्सल्य सर्वविदित है। एकबार दिल्ली के सुल्तान सुबुक्तगीन जंगल में शिकार खेलने गये। वहाँ उन्हें हिरण का एक बच्चा मिल गया। सुल्तान उसे घोड़े की पीठ पर लादकर वापस लौटे तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि बच्चे की ममता के वशीभूत हिरणी मृत्यु भय की तिलांजलि देकर पीछे−पीछे चली आ रही है। यह दृश्य देखकर सुल्तान का हृदय उमड़ने लगा उन्होंने करुणावश बच्चे को छोड़ दिया। हिरणी बड़ी देर तक खड़ी अपने बच्चे को चाटती और कृतज्ञता भरी दृष्टि से सुल्तान को देखती रही।
जीवों की सम्वेदना सजातियों तक ही सीमित नहीं रहती अपितु उनका हृदय औरों के प्रति भी सजल होता है इस तरह के उदाहरण सामने आते हैं तो मनुष्य की स्वार्थपरता स्वयं अपना ही धिक्कार करने लगती है। जंगल के जीवन में ऐसे उदाहरण बहुतायत से मिलते हैं। बात उन दिनों की है जब भारत−पाकिस्तान में गृह युद्ध की स्थिति थी। हिन्दू−मुसलमान एक दूसरे के प्राणों के प्यासे घूम रहे थे। एबटाबाद (अब पाकिस्तान में) भी उससे अछूता नहीं था। एक पालतू बंदरिया बुजो जिसका अपना बच्चा मौत की नींद सो गया था, दुःखी बैठी थी। उधर सड़क पर एक कुतिया अपने नवजात पिल्ले को दूध पिला रही थी तभी उधर से एक ट्रक गुजरा। कुतिया ने भागने की कोशिश की, पर शीघ्रता में वह ट्रक की चपेट में आकर अपनी जान गँवा बैठी। पिल्ला किसी तरह बच गया, पर भूख से तड़फड़ाता वह इधर−उधर अपनी माँ को खोज रहा था। यह दृश्य देखकर बुजो की करुणा छलक उठी वह पेड़ से उतरी और पिल्ले को छाती से चिपटाकर भाग गई। लोगों ने पिल्ले को बचाने के लिए उसका पीछा किया, पर जब वे मकान की छत पर पहुँचे तो यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि बुजो लेटी हुई है और पिल्ले को अपना दूध पिला रही है। वह उसके सिर और पीठ पर हाथ भी फेरती जा रही थी उसका वात्सल्य साफ झलक रहा था। यह दृश्य देखकर लोगों का हृदय भर आया। मजहब के नाम पर रक्तपात करने वाली इंसानियत शर्म से पानी−पानी हो उठी। यह चर्चा बिजली की तरह सारे नगर में फैल गई। एबटाबाद, पाकिस्तान में चला गया, पर इस घटना के बाद वहाँ फिर कोई रक्तपात नहीं हुआ।
शहबाजपुर के निकट कलड़ी गाँव। बाज ने तोते पर झपट्टा मारा। वह लेकर उड़ तो न सका, पर उसके खरोंच काफी लगी। रक्त प्रवाहित होने लगा। बाज काफी देर तक आकाश में मंडराता रहा। यह दृश्य पास के वृक्ष पर बैठे कुछ बन्दर देख रहे थे। इनमें से एक मोटा बन्दर तोते के पास आया। तोता समझ गया कि जीवित बचना बहुत कठिन है। भयभीत होकर चें−चें करने लगा।
बन्दर ने दया भाव से उस तोते को धीरे से पकड़ लिया। अपने सीने से लगाया। अब उसका भय दूर हो गया। अपने को सुरक्षित जान उसने चिल्लाना भी बन्द कर दिया। अन्य बन्दरों के मन में भी सहानुभूति जाग उठी वे पके बेर तोड़ लाये और प्रेम से तोते को खिलाने लगे। स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर कुछ घण्टों के पश्चात् तोता उड़ गया।
सन् 1808 ई. में कच्छ में भयानक अकाल पड़ा उस समय वहाँ के सेनापति फतहमुहम्मद थे। अकाल के कारण चारे के अभाव में प्रतिदिन सैकड़ों पशु मर जाते। एक दिन एक छोटा−सा बछड़ा सेनापति के अस्तबल में घुस आया। करुणावश सईसों ने उसे वहीं पाल लिया। बछड़े की घोड़ों के साथ एक परिवार जैसी दोस्ती हो गई।
कुछ दिन बाद फतह मुहम्मद ने जामनगर रियासत पर चढ़ाई कर दी। घोड़े बाहर निकाल लिये गये बछड़े को भीतर ही बन्द कर दिया गया वह इस स्थिति को सहन नहीं कर सका। लातों से पीट−पीटकर उसने दरवाजा तोड़ डाला आखिर उसे भी साथ लेना पड़ा।
युद्ध के दौरान सेनापति की एक तोप दल−दल में फँस गई। सारे घोड़े जोत दिये गये, पर तोप टस से मस न हुई। किसी सैनिक ने कहा यदि बछड़े को इसमें जोता जाये और घोड़ों को आगे बढ़ा दिये जाये तो सम्भव है वह इसे निकाल दे क्योंकि बछड़े को सभी कुछ बर्दाश्त था अपने मित्रों का बिछोह नहीं।
यही किया गया। उसे तोप में जोतकर जैसे ही घोड़े आगे को बढ़ाये गये उसने सम्पूर्ण शक्ति लगा दी आगे बढ़ने के लिए सच ही तोप बाहर आ गई, किन्तु उस बछड़े के प्राण लेकर। फतह मुहम्मद ने यह सुना तो उनका हृदय करुणा से उमड़ पड़ा उन्होंने युद्ध बन्द करा दिया और पशु हृदय की इस मूक अभिव्यक्ति को साकार करने के लिए उन्होंने वहाँ बछड़े की सुन्दर समाधि बनवाई।
जीवों का जीवों से प्यार हो और मनुष्य मनुष्य से घृणा करे तो पशु अपने से अच्छे माने जायेंगे। पशु−पक्षी मनुष्य जाति के साथ उपकार करें और मनुष्य उनके प्रति नृशंसता का आचरण करे तो इसे मनुष्य का अपराध पूर्ण कृत्य माना जायेगा। मानव के प्रति जीवों की उदारता से कई बार मन आविर्भूत हो उठता है।
केरल के मौपला विद्रोह के समय भी सर्पों ने डकैतों के एक समूचे दल पर आक्रमण कर जिस घर में वे निवास करते थे उसके मालिक की रक्षा की थी। इस तरह ये जीव यह शिक्षा देते हैं कि जब तुच्छ प्राणी भी भावनाओं से रिक्त नहीं तो मनुष्य सम्वेदना शून्य हो जाये यह उचित नहीं है।
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प्रदूषण का विष जिस तेजी से वायुमण्डल में घुलता जा रहा है उसका गम्भीर अध्ययन करने के बाद सिलवेट स्मिथ ने कहा—अब धरती में रहकर मनुष्य सुखी नहीं रह सकता यदि उसे शान्ति अभीष्ट हो तो उसे समुद्र में रहने की तैयारी करनी चाहिए।
बात सुनने में अतिरंजित-सी लगती है किन्तु पश्चिमी वैज्ञानिकों ने उक्त बात को गम्भीरता से लिया। उक्त विचार देने के पीछे आधार इतने सशक्त हैं कि कोई भी विचारशील व्यक्ति उनसे इनकार नहीं करेगा। हमारे वातावरण को शुद्ध करने में सबसे बड़ा हाथ सूर्य का है किन्तु यह प्रदूषण जिससे जेट प्लेन रैकेटों का धुआँ भी सम्मिलित है जो सूर्य की शक्ति की एक बड़ी मात्रा ऊपर ही सोख लेता है जिससे पृथ्वीवासियों को 70 प्रतिशत ऑक्सीजन देने वाली “फीटो प्लैन्टान” वनस्पतियाँ नष्ट हो जाती हैं, कैन्सर, हड्डियों की बीमारियाँ, कोल्ड कफ आदि के विस्तार का यह सब से बड़ा कारण है। फैक्ट्रियों, वाहनों, अणु रिएक्टरों का कचरा, आइलडैम्प सब मिलाकर पहले ही पार्थिव ऑक्सीजन को नष्ट करने में तुले हुए हैं। उस पर ऑक्सीजन निर्माण का आधार ही लड़खड़ाया तब फिर कहीं ठिकाना न मिलेगा। मनुष्य समाज घुट−घुट कर मरने को विवश होगा। मनुष्य औद्योगीकरण के इस पिशाच से जितनी जल्दी छुटकारा पा सके उतना ही अच्छा, पर भेड़ियाधसान की प्रवृत्ति वैसा करने देगी, इसमें शक है अतएव आत्मरक्षा के लिये अधिकतम प्राकृतिक जीवन की बात सोचनी चाहिए।
कृत्रिमता जहाँ भी जायेगी, वहीं सत्यानाश करेगी। सिलवेट स्मिथ के सुझाव पर वैज्ञानिकों ने समुद्रों में नगर बसाने की तैयारी भी कर ली है। उनके मॉडल तैयार भी हो चुके हैं। ऐसे नगर जिनमें खेल−कूद से लेकर उत्पादन, विक्रय और प्रशासन आदि की सभी व्यवस्थायें होंगी, बसाने की योजना विचाराधीन है अभी बरात चली भी नहीं कि बिल्ली की ‘छींक’ हो गई। समुद्र विज्ञान वेत्ता डॉ. जेक्विस पीकार्ड ने चेतावनी दी है कि यदि समुद्र से छेड़छाड़ की गई तो उसके गम्भीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
आहार प्रदाय−परम्परा की कुंजी समुद्र है। डॉ. पीकार्ड का कथन है कि वायु प्रदूषण का सीधा प्रभाव समुद्र पर पड़ता है। कैलीफोर्निया से हवाई द्वीप की दूरी 2500 मील दूर है, पर हवाई द्वीप भी पूरी तरह वायु−प्रदूषण से ग्रस्त है इस तरह समुद्री आकाश पर फैलने वाले प्रदूषण विशेषकर समुद्री जहाजों से समुद्र का बड़वानल मन्द पड़ेगा। मंदाग्नि रोग पेट के गुड़गुड़ाने की तरह समुद्र गुड़गुड़ायेगा तो पर उससे भाप पैदा होना बन्द हो जायेगी। बादल छितरे हुए बनेंगे, कहीं अनावृष्टि होगी, कहीं सूखा पड़ेगा। पिछले कुछ वर्षों से ही यह बात स्पष्ट है। जब बिहार में बाढ़ का प्रकोप था तब गुजरात में अकाल, गत वर्ष उत्तरप्रदेश हरियाणा और असम में बाढ़ आई और तमिलनाडु सूखे का शिकार हुआ। यह समस्या इतनी व्यापक होगी कि उसे सम्भालना कठिन पड़ जायेगा। वर्षा का अन्नोत्पादन से सीधा सम्बन्ध है स्पष्ट है कि समुद्र पर पड़ने वाला दबाव हमारी खाद्य−व्यवस्था को नष्ट करेगा। उससे कितनी भयंकर स्थिति पैदा होगी, यह सहज ही अनुमान किया जा सकता है।
कल्पनायें यथार्थ के धरातल पर की जायें तो ही उनकी सार्थकता है। लम्बी−चौड़ी बातें करने की अपेक्षा सृष्टि को बचाने की सीधी सादी बातें विचारी जानी चाहिए अन्यथा यह संकट अपने ही सामने प्रस्तुत हो सकता है।
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पुराणों की अनेक कथाओं में द्वारावती पुरी या द्वारावती नगर का अनेक स्थानों में उल्लेख आता है, इसे श्याम देश की राजधानी बताया गया है। आज का थाई देश (थाईलैंड) इसी श्याम का आधुनिक नाम है जो कभी वृहत्तर भारत का अंग रहा है और आज भी वहाँ की कला संस्कृति रीति-रिवाज एवं परम्पराओं में हमारा आर्ष पुरातन अपना स्वाभिमान प्रतिबिम्बित करता रहता है, दूसरी ओर इस देश के नागरिक हैं जिन्हें अपनी ही संस्कृति में आत्महीनता की गन्ध आती है और हमने जिन्हें उंगली पकड़ कर लिखना सिखाया उनकी टेढ़ी भाषा बोलने में स्वाभिमान दृष्टिगोचर होता है। यह बौद्धिक परावलम्बन है, राजनैतिक दृष्टि से स्वाधीन हो जाने पर भी बौद्धिक दृष्टि से पराधीन रहना व्यक्ति का नहीं समूचे देश और संस्कृति का अनुदान है।
बात विलगाव की नहीं सार्वभौमिक एकता की है। यह न समझा जाय कि इस तरह किसी अन्य देश को छोटा दर्शाया जा रहा था। रामधिपति श्याम के ही सम्राट थे जिन्होंने सुविधानुसार अपनी राजधानी वहाँ से बदलकर अयोध्या बसाई थी यहीं भगवान् राम ने जन्म लिया था। राम मानवीय “मर्यादा” के मूर्तिमान प्रतीक और आदर्श जीवन की जागृत मशाल थे। आज उनके आदर्शों पर चलना तो दूर की हमारे बालकों का उनके गरिमामय इतिहास और जीवन वृत्त तक से वंचित रखा जाता है जबकि थाईलैंड के सामाजिक जीवन में राम पूरी तरह विराजमान है। अपने इन संस्कारों को मुखर रखने के लिए थाइवासियों ने न केवल अपने नाम अपितु शहरों और पार्कों को भी राममय रखा है। राम खम्हेड़ श्रीसूर्यवंश राम, रामराज, रामधिपति, देवनगर राम, महावज्र राम, बुद्ध राम, सुखदेव राम, रामामात्य, रामसुवन, रामपुत्र आदि यह संस्कृति राम तक ही नहीं भारतीय संस्कृति के अन्य उपादानों का भी स्पर्श करती है, यथा, सुखोदय, स्वर्गलोक, इन्द्रपुरी, लवपुरी प्राचीन प्ररा, धर्मराज आदि। वहाँ के मुद्रापत्रों डाक टिकटों तथा बस टिकटों तक में राम के चित्र और नाम अंकित हैं जो उस देश की राम के आदर्शों के प्रति श्रद्धा के प्रतीक माने जाते हैं। कठपुतलियों के नाटकों में जिन्हें वहाँ “नाँग“ कहा जाता है राम के आदर्श जीवन चरित्रों को बड़े चाव से देखा जाता है। बाजार में बिकने वाले मुखौटों में भारतीय देवी−देवताओं की बहुतायत मिलती है।
पुरुषों में राम के प्रति जो आस्था वहाँ के जन−जीवन में है, नारियों में भगवती सीता के प्रति भी। वहाँ की नारियाँ “सीता” को मात्र पुराण पुरुष की अर्द्धांग्नी के रूप में नहीं मानती अपितु उन्हें पति के प्रति अनन्य वफादारी, कष्ट सहकर भी सहयोग देने, उदात्त चरित्र बनाये रखने तथा पारिवारिक जीवन में प्रगाढ़ आत्मीयता की प्रेरणा के रूप में, सम्मान की भावना के रूप में विद्यमान हैं।
बालकों को लव, कुश की कहानियां सुनाकर तपोमय संस्कार पूत, ओजस्वी, धीर−वीर गम्भीर जीवन की प्रेरणा दी जाती है। संसार के दृष्टिकोण में अनेक भौतिक परिवर्तनों में भी इन तत्वों को आत्मिक शान्ति, यश और सामाजिक तथा राष्ट्रीय गरिमा का आधार माना जाता है जबकि अपने ही देश में अब इन्हें मानसिक संकीर्णता के रूप में देखने की दुःखद प्रतिक्रिया उठ रही है। इसे पश्चिमी सभ्यता का मनोवैज्ञानिक प्रहार ही कहना चाहिए जिसके कारण इस देश और जाति का “ओजस” तत्व यहाँ की तेजस्विता, यहाँ का आत्म−बल गिरता चला जा रहा है और अनैतिकताएँ अपने चंगुल में जकड़ती चली जा रही हैं।
प्राचीनता में प्रगतिशीलता की पूरी तरह समावेश है। ऐसा न मानने वाले यह देख सकते हैं कि इन देशों में भरत और राम आदि में अन्ध−भ्रातृत्व नहीं है अपितु बालि और सुग्रीव के उद्धरण भी है जो भाई के प्रति अन्याय करने वाले को दण्डित करने के विधान को भी पूरी तरह स्वीकारते हैं यही नहीं “तारा” के पुनर्विवाह की परम्परा इस बात का भी प्रतीक है कि विधवा विवाह ने केवल शस्त्र सम्मत परम्परा है अपितु उसे सामाजिक “मर्यादा” के एक अभिन्न अंग के रूप में भी प्रतिष्ठा मिली हुई है।
“फालक का लाम” (श्री लक्ष्मण राम) फोक्म चक्क “ब्रह्म जात” आदि नामों से विख्यात लाओस की कथायें (लाओस कभी लवदेश था) “लुआंग प्रवंग” के मन्दिर और मेकांग (मां गंगा) नदी यहाँ की ब्रह्म विद्या पावनता और पवित्रता का निरन्तर उद्घोष करते रहते हैं। अवतारवाद वहाँ की एक ऐसी आस्था है जो निरन्तर उन्हें असत् से सत् की और चलने और नैतिक मर्यादाओं पर दृढ़तापूर्वक आरूढ़ रहने की प्रेरणायें देती रहती हैं।
इन्डोनेशिया में तो “रामलीला” को एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाता है। वहाँ का प्रसिद्ध तीर्थ “प्रवनम” जाकर कोई देखे तो रामायण के सारे आदर्श मूर्ति शिल्प के रूप में बिना पढ़े देखे जा सकते हैं। “नवरात्रि” पर्व स्वास्थ्य को नूतन शक्ति भावनाओं को अभिनव सम्वेदना और सामाजिक जीवन को शुद्धता एवं पवित्रता देने में कोई वैज्ञानिक सूत्र रखता है। इस बात को हम भूल गये हैं, पर इन्डोनेशियनों में उसके प्रति उत्तरोत्तर विश्वास बढ़ता जाता है। नवरात्रि पर्व पर धार्मिक अनुष्ठानों की जप, तप, अस्वाद की वहाँ धूम मच जाती है। सारा देश संस्कारित हो उठता है जबकि हमारा अपना ही देश इस महापर्व के सूक्ष्म वैज्ञानिक लाभों से वंचित बना रहता है।
अन्यायी कितना ही समर्थ क्यों न हों उससे भिड़ने की जटायु परम्परा को इन्डोनेशियाइयों ने जीवित रखा है। लोनतार (ताल पत्रों) पर लिखित महाभारत आज भी यह प्रेरणायें उभारता रहता है कि सर्वनाश स्वीकार किया जा सकता है किन्तु देवमानवों की धरती में अन्याय और अधर्म स्वीकार जाना मनुष्य जाति का सबसे बड़ा अपमान है।
इन्डोनेशिया के महागुरु पूर्व चरक ने कुछ दिन पूर्व स्वर्गीय आचार्य रघुवीर जी संस्थापक सरस्वती विहार, नई दिल्ली को एक ताल पत्र भेंट किया जिसके प्रथम दो श्लोक गीता अध्याय 3 व 4 के क्रमशः 13 व 31 के समानार्थी थे जिनमें बताया गया है—
अपनी सम्पत्ति का एक भाग देवोत्तर कार्यों में उपयोग करने के पश्चात् ही उसका उपयोग करें। जो केवल अपने लिये कमाते हैं, समाज की उपेक्षा करते हैं वे पाप खाते हैं। “परमार्थी की संज्ञा महापुरुष और स्वार्थी की तुलना चोर से की गई है।
हम भारतीय हैं, अपनी भाषा पर हमें उतना ही स्वाभिमान होना चाहिये जितना किसी भी रूसी और जर्मनवासी को अपनी भाषाओं पर रहता है, सामान्य ज्ञान के लिए किसी भी भाषा को पढ़ना और जमाना बुरा नहीं, पर किसी दूसरी विदेशी भाषा का सत्कार और मातृभाषा का तिरस्कार यह तो परले सिरे की दासता है। मुख्य प्रश्न भाषा का नहीं विचार बल का है इस दृष्टि से हमारी मेधा−शक्ति किसी से कम नहीं। सच तो यह है कि जिन बिन्दुओं का स्पर्श हमने किया वहाँ तक अन्य कोई पहुँचा हो यह लगता नहीं फिर अपनी भाषा के इस असम्मान को थोड़े व्यक्तियों का सत्ता−षड्यन्त्र ही कहा जा सकता है। उससे डरना भयंकर आत्महीनता ही होगी।
विशेष कर उन स्थिति में जब कि हिन्दी को समृद्ध बनाने वाला विशाल “संस्कृत” महासिन्धु विद्यमान है और जिससे सारे संसार की भाषायें समृद्ध हुई। मंगोलिया में आज भी संस्कृत के लिए वही सम्मान है। आचार्य मतिध्वज द्वारा प्रणीत मंगोल भाषा के शब्द संस्कृत के ही रूपान्तर हैं शब्द विन्यास और भाव तो पूरी तरह यथावत हैं। इन्डोनेशिया में भी यही स्थिति है। इन देशों में भारत की विशेष उपलब्धियों में ‘गायत्री उपासना’ का आज भी विपुल सम्मान है। तिब्बत में तो “गायत्री मन्त्र” लिखे सद्वाक्यों का वितरण सर्वाधिक शुभ माना जाता है। मंगोलियन विधिवत गायत्री उपासना करते हैं और इस महामन्त्र की सार्वभौमिक प्रतिष्ठा सिद्ध करते हैं जबकि अपने देश में उसे प्रतिबन्धित तथा न जाने क्या-क्या कहा जाता है।
इन तमाम बातों के लिये विश्व में भारत का सर्वाधिक सम्मान रहा है। तुर्की के लेम्पेस्कास संग्रहालय में चाँदी की थाली में भारत माता का ऐसा चित्र है। जिससे यहाँ के ज्ञान, साधना, विज्ञान, कला, वैभव, व्यापार और उदात्त संस्कृति का सम्मान प्रदर्शित है। प्रथम शती इस चित्र में भारत व रोम के व्यापार का दिग्दर्शन है। भारत माता के शीर्ष पर गन्धमुकुट, जो यहाँ के औषधि ज्ञान का प्रतीक है। सिर में गन्ने के दो टुकड़े बीधे हैं जिससे यह बताया गया है कि गन्ने की कृषि भारतवर्ष की देन है। मलमली साड़ी और रोम के सोने का व्यापार जगत विदित है। हाथी दाँत, सागौन, तोते, कुत्ते, चीते आदि भी दिखाये गये हैं इसका तब समुद्री मार्गों से विधिवत निर्यात होता था।
ईरान के सम्राट धारयवसु न यूनान पर आक्रमण किया किन्तु मेराथन युद्ध में धारयवसु की पराजय हुई। इसके बाद उनके पुत्र खषयार्थ ने विशाल भारतीय सेना के साथ आक्रमण किया थर्मोपिली में हुये इस युद्ध में भारतीयों की विजय की ऐसी साख जमी कि उसे अपराजेय सैन्य शक्ति स्वीकार किया गया। इस युद्ध में इस्पात के “फर” लगे धनुष बाणों का प्रयोग हुआ। इस्पात को संस्कृत में “अपस” कहते हैं ग्रीक लैटिन में इसी शब्द से “आइरन” बना इससे पहले पश्चिमी देशों को लौहे तक का ज्ञान नहीं था।
युद्ध तो हमारी अन्तिम शक्ति थी। हमारी संस्कृति देव संस्कृति रही है। हमने संसार को भाई−चारे की, एक ही आत्मा के पवित्र बन्धनों से बाँधा है। श्री लंका में पूर्ण कुम्भधारी द्वारपाल लाओस के उड़नशील गरुड़ भारत से गये हैं। प्रसिद्ध जापानी पुरातत्ववेत्ता प्रो. निकी किमूरा स्वीकार करते हैं कि जापान के देवी−देवता जिनमें भगवती सरस्वती, शिव और चतुर्मुखी ब्रह्मा भी हैं। भारतीय धर्म से मिले हैं पीरु (अमेरिका) ग्वाटेमाला के शिव, गणेश और हनुमान भारतवर्ष से गये। हमारे यहाँ तो मात्र प्रतीक उपासना रह गई पर इन देशों में आज भी इन देवों के आदर्शों को समझा और स्वीकार जाता है। जर्मनी प्लूटार्च का कथन है। “सूर्य पूजा रोम में 67 ई. पूर्व में पहुँची। यह मित्र पूजा शीघ्र सारे संसार में फैल गई” जर्मनी में “सूर्य” की प्रतिमा वही है जो भारतीय संस्कृति में है वहाँ सूर्य क उपासना को वैज्ञानिक अर्थ में लिखा जाता है जब कि इस देश के पढ़े लिखे ही उसे रूढ़िवाद मानते हैं।
इतिहास साक्षी है कि संसार को ज्ञान और विज्ञान हमने दिया। भाषा, संस्कृति हमने दी। नैतिकता हमने सिखाई। व्यापार, स्थापत्य हमने सिखाया है। यह संस्कार भले ही मूर्च्छित हों पर आज भी हममें हैं, हम उन्हें जागृत कर सके तो आज भी हम शिरोमणी हैं। पिछड़े होने की आत्महीनता को तो जितनी शीघ्र हो निकाल फेंका जाना चाहिए हमें औरों पर नहीं अपनी संस्कृति पर स्वाभिमान करना आना चाहिए, तभी हम आगे बढ़ सकेंगे। अपना सिर ऊँचा कर सकेंगे।
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श्रीमद् भगवद्गीता के प्रथम अध्याय का नाम ‘अर्जुन विषाद योग‘ है। क्योंकि अर्जुन के इस विषाद ने अन्ततः उसे कृष्ण की प्रज्ञा से जोड़ा, सम्भवतः इसलिए इस अध्याय को ‘विषादयोग‘ कहा गया है। पर, यों विषाद एक रोग ही है।
यह विषाद रोग मनुष्य को गहरे भावनात्मक आघातों के कारण हो जाता है। जीवन में निरन्तर परिवर्तनशील परिस्थितियाँ, मन के सामने विभिन्न संकल्प−विकल्प उपस्थित करती हैं। जिन परिस्थितियों से जूझ सकने की मन की पूर्व तैयारी हो उनके आ पड़ने पर तो व्यक्ति को मानों अपने बुद्धि कौशल, साहस, संकल्प और आस्था के स्वयं परीक्षण का अवसर मिल जाता है और विभिन्न उतार−चढ़ावों का खट्टा-मिट्ठा रस लेते हुए वह मन में एक स्फूर्ति का अनुभव करता है। संघर्ष जटिल हुआ, तो बीच−बीच में कुछ भय, चिन्ता, निराशा की भी स्थितियाँ आती हैं। पर आस्था प्रचण्ड हुई और धैर्य अडिग रहा तो संघर्ष की समाप्ति उतना ही सन्तोष भी देती है।
किन्तु अप्रत्याशित परिस्थितियाँ पूर्व तैयारी के अभाव में मन को स्तम्भित−सा कर देती हैं। ये परिस्थितियाँ या तो हमारी जानकारी की सीमाओं के कारण अप्रत्याशित लगती है या फिर हमारे विवेक की सीमा के कारण। अर्थात् यह हो सकता है कि हमारी बुद्धि ने जितना कुछ सोचा−समझा और कल्पित−अनुभूत किया हो उससे सर्वथा भिन्न कोई घटनाएँ घट जाएं। या फिर ऐसा हो सकता है कि विवेक से काम न लेते हुए जगत् व्यवहार को नित्य देखते हुए भी, मन अपने बारे में कुछ चित्र−विचित्र कल्पनाएँ कर ले, मोह पाल ले और जब विश्व−गति के अनुसार काल−क्रम से घटनाएँ घटे तो वे एक अप्रत्याशित आघात प्रतीत हों।
कारण चाहे जानकारी का अधूरा रह जाना हो, चाहे विवेक की कमी हो, किन्तु अप्रत्याशित परिस्थितियों से बहुधा व्यक्ति के मन में भावनात्मक आघात पहुँचता है। चोट गहरी हुई तो मन पर गहरा विषाद छा जाता है, जिसका दीर्घकालीन प्रभाव− परिणाम होता है।
जानकारी की कमी, कोई अस्वाभाविक बात नहीं। एक मनुष्य के मस्तिष्क के सक्रिय हिस्से की अपनी सीमाएँ होती हैं और विश्व−व्यापी हलचलों के नियम उनसे बहुत आगे होते हैं। अतः जिसका अनुमान भी न हो पाए, ऐसी परिस्थितियों का उपस्थित हो जाना तनिक भी अचरज की बात नहीं। परिस्थिति की आकस्मिकता से प्रारम्भिक व्यवहार में कुछ कठिनाई का अनुभव हो यह भी स्वाभाविक है। पर, उसमें उद्विग्न हो उठने जैसी बात कुछ नहीं। विषाद−रोग तो मात्र मोह का ही परिणाम होता है।
आज समाज में विषाद−रोग का सर्वव्यापी विस्तार हो रहा है। क्योंकि परिस्थितियों का उतार−चढ़ाव तो आता ही रहता है और उनके लिए मन तैयार रहता नहीं। अज्ञान और मोह के चक्कर में फँसा मन अपनी अलग ही दुनिया बसाए रहता है। इस स्थिति में परिस्थितियों का स्वाभाविक रूप भी उसे नए−नए आघात पहुँचाता है और मन में असन्तोष, हताश, उदासी तथा अवसाद की परतें घनीभूत होती रहती हैं। विषाद−रोग की जड़ें फैलती जाती हैं।
अज्ञान और मोह के जन्म−जन्मान्तरों के कुसंस्कार हमारे चित्त में अंकित रहते हैं। आधुनिक मनोवैज्ञानिक इन्हीं काम, क्रोधादि की चित्तवृत्तियों को ‘प्राइमरी इन्स्टिन्क्ट्स’ (प्राथमिक प्रवृत्तियाँ) कहते हैं। इन्हें प्राथमिक इसी अर्थ में कहा—माना जा सकता है कि ये प्राथमिक कक्षा में प्रविष्ट शिशु की तरह अपरिमार्जित और असंस्कृत होती है। सुसंस्कृत समाज का सदस्य बने रहने के लिए इन प्राथमिक वृत्तियों का परिमार्जन आवश्यक होता है। जब यह परिमार्जन संस्कार—शुद्धि के रूप में होता है तब तो वह सार्थक होता है, पर जब वह एकांगी और विकृत शिक्षा तथा बाहरी परिवेश के दबाव मात्र से होता है, तब बस बाहर ही बाहर यह परिवर्तन घटित होता है। तब भीतर वही असंस्कृत चित्तवृत्तियाँ उफनती रहती हैं और बाहर−भीतर का यह संघर्ष प्रचण्ड अंतर्द्वंद्व को जन्म देता है। इस दीर्घ अंतर्द्वंद्व से ही गहरा विषाद चित्त पर छा जाता है और अनेक मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं।
डॉ. ब्राउन, डॉ. पीले, मैक्डूगल, चार्ल्स जुंग प्रभृति अनेक प्रख्यात मनोवैज्ञानिकों ने माना है कि रक्त −विकार फोड़े−फुँसी, सामान्य चर्मरोग से लेकर आँतों में घाव टी.बी. कैन्सर तक के रोगों का आधार दूषित संस्कारों से उत्पन्न प्रबल अंतर्द्वंद्व और प्रचण्ड मानसिक आघात ही होते हैं।
मैकडोनल्ड ने कहा है—”अमेरिका में कुल रोगियों में से आधे मनोरोगी होते हैं। ईर्ष्या, द्वेष, स्पर्द्धा, दम्भ, छल−छद्म, काम विकार और क्रोध के भाव इन मानसिक रोगियों के भीतर अधिकार जमाए रहते हैं। डॉक्टर इन रोगों का कारण नहीं जान पाता। रोगी मनुष्य भी कई बार स्वयं इन कारणों को बिल्कुल नहीं जान पाता। पर होती हैं ये मन की दूषित हलचलों और दुष्चक्रों के कारण ही।
योग वशिष्ठ में कहा है—
“इदं प्राप्तमिंद नेति, जाड्याद्वा घनमोहदाः। आधयः सम्प्रवर्तन्ते वर्षासु मिहिका इव॥”
—(6।1। 81।16)
यह पा लिया, यह नहीं, आदि के अंतर्द्वंद्व और अज्ञान से मोह में पड़ने पर मानसिक रोग उत्पन्न होते हैं। उनसे फिर शारीरिक रोग इस तरह उत्पन्न होते हैं जैसे वर्षा ऋतु में मेंढक सहसा दिखाई पड़ने लगते हैं।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान तथा मनोविज्ञान की शोधों द्वारा इसे हम अधिक स्पष्टता से समझ सकते हैं। हमारी खोपड़ी के भीतर, मस्तिष्क के नीचे, ‘हाइपोथेल्मस’ के पास “पिट्यूटरी” नामक ग्रन्थि होती है- आकार में बड़े मटर के दाने जैसी। यह पिट्यूटरी ग्रन्थि अन्य सभी नलिकाविहीन ग्रन्थियों के कार्य का नियन्त्रण करती है। इस ग्रन्थि से बाहर प्रकार के ‘हारमोन्स’ निकलते हैं। इन ‘हारमोन्स’ के कार्य भिन्न−भिन्न हैं, जो कल मिलाकर शरीर को स्वस्थ सन्तुलित रखने हेतु सक्रिय रहते हैं।
जब शरीर के लिए प्रतिकूल परिस्थितियाँ सामने आती हैं, तो उन परिस्थितियों के दबाव से शरीर को सन्तुलित रखे हेतु शरीर की विभिन्न नलिकाविहीन ग्रन्थियाँ सक्रिय हो उठती हैं।
असन्तोष, उदासी, व्यथा आदि ऋणात्मक भावनाओं के दबाव से पिट्यूटरी ग्रन्थि से जो हार्मोन्स निकलते हैं, उनमें एक है—”एस. टी. एच. हारमोन्स”। यह शरीर को सीधे भी प्रभावित करते हैं तथा ‘एड्रिनल’ ग्रन्थियों को भी अपने हारमोन्स स्रवित करने की प्रेरणा देते हैं। जब ये निषेधात्मक भावनाएँ अधिक वेगवती होती हैं, तो ये ‘एस. टी. एच. हारमोन्स’ अधिक मात्रा में निकलते हैं। इनकी अधिकता से शरीर में व्यग्रता, अधीरता, बेचैनी बढ़ती है।
इसी तरह चिढ़न, कुढ़न, दमित आक्रामकता आदि से ‘ए—सी—एच’ हारमोन इसी पिट्यूटरी ग्रन्थि से निकलता है, जो एड्रिनल ग्रन्थियों को उत्तेजित करता है। इसकी अधिकता से आँतों में जख्म हो जाता है और तब पाचन सम्बन्धी अनेक रोग घेरे रहते हैं।
अच्छे खासे खाते−पीते घरों के माता−पिता इस बात से व्यथित−चिंतित पाये गए हैं कि उनके बच्चे खूब खाने−पीने के बावजूद क्षीण और निर्बल ही बने रहते हैं। इसका कारण भी यही पाया गया है कि इन खाते−पीते घरों का पारिवारिक वातावरण संस्कार क्षम नहीं होता। वहाँ सभी लोग असन्तुष्ट, विक्षुब्ध, उद्विग्न, अप्रसन्न रहते हैं। ऐसे वातावरण का बच्चों पर गम्भीर दुष्परिणाम होता है और उन्हें दिये गए अच्छे भोजन का सुपरिणाम नहीं दिखाई पड़ता।
मानसिक कुण्ठाओं से त्रस्त व्यक्ति जब मद्यपान का सहारा लेते हैं, तो उनमें पहले से ही अधिक स्रवित ‘ए.सी.टी.एच’ हारमोन्स का और अधिक स्राव, होने लगता है। तब व्यक्ति की स्थिति अधिकाधिक बिगड़ती जाती है।
आज के मानसिक चिकित्सा क्षेत्र में एक विचित्र मान्यता यह प्रतिपादित की जा रही है कि मानसिक रोगियों को इच्छित यौनाचार अथवा दूसरे प्रकार से असामाजिक कार्य करने की एक सीमा तक छूट दी जाय ताकि उनकी दमित इच्छाओं का समाधान हो सके। यह उपचार दूरदर्शिता की कसौटी पर किसी भी प्रकार खरा नहीं उतरता। क्योंकि भूतकाल में जिस प्रकार इच्छाएँ दबाने से कुण्ठाएँ उत्पन्न हुई, उसी प्रकार अब नये सिरे से अनैतिक एवं असामाजिक कार्य करने से आत्म−ग्लानि होगी और नये दुराव के कारण नई कुण्ठाएँ उत्पन्न होंगी। यह तो एक जैसा विचित्र उपचार हुआ। इसमें जिस लाभ की अपेक्षा की गई है वह तो मिलेगा नहीं दूसरी नई बोझिलता शिर पर और चढ़ जायगी और रोगी को नई परेशानी में डालेगी।
मानसिक रोगों का सही उपचार ऐसे रोगियों को प्रेम, सहानुभूति, स्वतन्त्रता एवं हलके−फुलके वातावरण में रखना है। प्राकृतिक सुन्दर दृश्यों का एकान्त स्थान हो तो और भी अधिक उत्तम है अन्यथा स्थान अत्यधिक कोलाहल पूर्ण नहीं है तो सामान्य जगहों पर भी उपयुक्त जल वायु के स्थान में रखा जा सकता है। महत्वपूर्ण बात जलवायु नहीं वातावरण है। रोगी जहाँ अपने लिए स्नेह−सम्मान का अनुभव करे हंसाने−हंसाने की परिस्थितियाँ देखे—और मित्रता का व्यवहार अनुभव करे तो वहाँ बदली हुई परिस्थितियों में मनःस्थिति भी बदल सकती है और मानसिक रोगी बिना किसी उपचार के भी अच्छे हो सकते हैं।
फिडलैंड की एक युवती गर्भाशय के कैंसर से पीड़ित थी। डॉक्टरों ने परीक्षण कर रोग को असाध्य बताया था तथा आपरेशन या किसी भी प्रकार के उपचार की सम्भावना समाप्त घोषित कर दी थी।
वह अविवाहिता युवती जीवन से निराश हो गई। उसने आत्महत्या का प्रयास किया। प्रसिद्ध साहित्यकार गौनर मैटर उसी मुहल्ले में रहते थे। उन्होंने उसे आत्महत्या का प्रयास करते देख लिया तथा दौड़कर उसे बचा लिया। साथ ही अपनी करुणा एवं स्नेहसिक्त संवेदना से युवती के जीवन में आशा की गुदगुदी पैदा कर दी। पर यह आशा प्रारम्भ में क्षीण ही रही। कुछ ही दिनों में युवती को पुनः अपने भविष्य में अनन्त अन्धकार ही होने का स्मरण हो जाता और वह पुनः आत्महत्या का प्रयास करती। गौनर सदा सतर्क रहते अतः वह हर बार उसकी रक्षा कर लेते। साथ ही और अधिक प्रेम एवं करुणा उड़ेलते। युवती के मन में गौनर के प्रति तो श्रद्धा के भाव दृढ़ हो गए। पर अपने जीवन से वह अभी भी निराश थी।
पर एक दिन इस निराशा की जड़ ही उखड़ गई। गौनर ने उस युवती से विवाह का प्रस्ताव किया। स्वाभाविक ही पहले तो युवती ने तीव्रता से अस्वीकार कर दिया। पर गौनर की दृढ़ता से वह जान गई कि इनका प्रेम निश्छल है तथा ये सचमुच मेरी आन्तरिक जरूरत महसूस करते हैं। युवती भाव−विभोर हो गई। उसकी हताशा हर्षोल्लास में बदल गई। दोनों का विवाह हो गया। गौनर ने अपने निश्छल प्रेम से उसके चित्त का सम्पूर्ण विषाद धो दिया। उसे याद ही न रहा कि उसके गर्भाशय में कैंसर जैसा भयानक रोग है। वह तो आनन्द और प्रसन्नता की दुनिया में जी रही थी। कुछ दिनों बाद युवती गर्भवती हो गई। डॉक्टरी जाँच करने पर उसके गर्भाशय में कैंसर के चिन्ह नहीं दिखे। प्रसव−काल आया और युवती ने एक सुन्दर बच्चे को जन्म दिया। जच्चा−बच्चा दोनों पूर्ण स्वस्थ तथा पति गौनर भी।
विषाद रोग के रोगियों—मनोविकारों से ग्रसित व्यक्तियों के लिए उपयुक्त उपचार यह है कि वे मनोबल समेट कर अपनी दुर्दशा के निमित्त स्वयं बने हुए हैं यह सोचें और अनुभव करें कि अपनी मानसिक धारा को साहसपूर्वक बदलने के प्रयास में वे निश्चित रूप से सफल हो सकते हैं। इस प्रकार वे आशा और उत्साह भरा भविष्य बना सकने वाले स्वसंकेतों को अपना कर अपना रोग बहुत हद तक स्वयं ही दूर कर सकते हैं।
अन्य स्वजन सहयोगी यदि वस्तुतः, उनके स्थायी उपचार का सही मार्ग ढूंढ़ना चाहते हैं तो उनकी परिस्थितियाँ बदलें और ऐसे वातावरण में रखें जहाँ वे अपनी बात खुलकर कह सकें और सम्मान सहानुभूति का सहारा मिलता अनुभव कर सकें। कुण्ठाएँ मनुष्य को विक्षिप्त या अर्ध विक्षिप्त बनाती हैं। सन्तोष और उल्लास को पाकर इन गाँठों को खुलने में भी देर नहीं लगती।
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अपने स्वास्थ्य में जो कमी है उसके कारण और निवारण पर विचार करते समय एक भयंकर भूल वह होती रहती है कि बाहरी कारणों को निमित्त माना जाता है और उन्हीं को घटाने या बढ़ाने का प्रयत्न किया जाता है। आमतौर से भोजन के स्तर के साथ स्वास्थ्य घटने−बढ़ने की संगति मिलाई जाती हैं। और सोचा जाता है कि यदि तथा कथित पौष्टिक, बहुमूल्य भोजन मिलने लगे तो स्वास्थ्य सुधर जायगा। यह बात रत्ती भर सत्य और चट्टान भर असत्य है। यदि पाचन तन्त्र बिगड़ा हुआ हो तो तथा कथित पौष्टिक भोजन पचने में और भी अधिक कठिन हो जायगा और आमाशय एवं आँतों पर दबाव डालकर उन्हें और भी अधिक कमजोर करेगा। शुद्ध एवं सुपाच्य खाद्य−पदार्थों की उपयोगिता समझी जा सकती है। शरीर में पाये जाने वाले रासायनिक पदार्थों का सन्तुलन आहार में बना रहे यह सावधानी रखना भी ठीक है, पर इतने भर को ही सब कुछ नहीं समझ बैठना चाहिए साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि पेट और मुँह के पाचक रस सामान्य पदार्थों को भी अपने सम्मिश्रण से अपने काम का बना लेते हैं। यदि ऐसा न होता तो दुम्बे मेंढ़े की पूँछ में और सुअर के पेट में पाए जाने वाले चर्बी भण्डार के उत्पादन का समाधान कैसे होगा? इन बेचारों को घी मलाई कौन खिलाता है? जिसके सहारे वे इतनी चर्बी अपने शरीर में जमा कर सकते। जो खाया जायगा वह शरीर में बढ़ेगा इसमें तथ्य नगण्य और भ्रम पर्वत के सदृश्य है। यदि ऐसा ही रहा उपयुक्त उपचार माना जाता। यह उपहासास्पद प्रयत्न आये दिन चिकित्सक लोग दिखलाते रहते हैं। विटामिन बी की गोलियाँ शरीर की कमजोरी दूर करने के लिए आये दिन खाई खिलाई जाती हैं। उस भार का प्रायः सारे का सारा ही भाग पीले पेशाब के रूप में बाहर निकल जाता है। इस करकट की सफाई में शरीर को जो अतिरिक्त श्रम करना पड़ता है उससे उलटी हानि ही उठानी पड़ती है। यदि यह शक्तिवर्धक−टानिक वस्तुतः वैसे ही रहे होते जैसा कि औषधि निर्माता ढोल पीटते रहते हैं। तब संसार में कदाचित ही कोई कमजोर रहा होता। उन्हें खरीदने के साधन किसी न किसी प्रकार हर कोई प्राप्त कर लेता और हृष्ट−पुष्ट दिखाई पड़ता। यही बात न केवल टॉनिकों के सम्बन्ध में वरन् घी मेवा आदि अन्य पौष्टिक पदार्थों के सम्बन्ध में भी कही जाती है। अमीर लोग इनका सेवन प्रचुर परिमाण में करते हैं। टानिक भी रोज ही पीते हैं फिर भी न दुर्बलता से पिण्ड छूटता है और न रुग्णता से। आमिष भोजन में अधिक पुष्टाई होने की भ्रान्ति भी मनुष्यों के मस्तिष्क पर अपना अँधेरा बखेरती और बढ़ाती ही जा रही है। मांसाहार इसी कारण तेजी से बढ़ रहा है, किन्तु उसका परिणाम भी विपरीत ही हो रहा है। गाँव में रहने वाला प्रोटीन अत्यधिक भारी और विषाक्त होता है। उसमें जितना लाभ सोचा जाता है। उससे अनेक गुनी हानि मांसाहारी उठाते हैं। रक्त में ‘यूरिया’ बढ़ने से उत्पन्न अनेक तरह की बीमारियाँ प्रायः मांसाहारियों को ही होती हैं। दुर्बलों को तो दुष्पाच्य मांस इतना भारी पड़ता है कि उनकी रही बची पाचन शक्ति का भी सफाया करके रख देता है। मछली का तेल, अण्डों का सत जैसे पदार्थ खिलाकर दुर्बलों को सशक्त बनाने की मृगतृष्णा बढ़ती तो अवश्य जा रही है और उस पुष्टाई के लोभ में उस और लम्बी दौड़ में भी अति उत्साह देखा जाता है। किन्तु परिणाम शून्य से अधिक कुछ दिखाई नहीं पड़ यदि वस्तुतः उससे प्रतिपादित लाभ मिल सका होता तो कम से कम सम्पन्न वर्ग में तो कोई दुर्बल दिखाई ही न पड़ता जबकि वस्तुतः उन्हें निर्धनों से भी अधिक अशक्तता और रुग्णता घेरे रहती है।
इन तथ्यों पर विचार करने से बाहरी कारणों में अस्वस्थ का एक बहुत बड़ा आधार टूट जाता है कि पौष्टिक आहार न मिलने से शरीर कमजोर हो गया। यदि यह मान्यता सत्य रही होती तो वनवासियों को कुपोषण वाले आहार पर पीढ़ियों से गुजारा करना पड़ रहा है उनका क्या हाल हुआ होता ? फिर उनमें औसत मनुष्य से अधिक बलिष्ठता और प्रकृति प्रकोपों को सहने की जो अद्भुत क्षमता पाई जाती है वह कहाँ से आती ? उनका आहार तो शरीर शास्त्रियों के द्वारा प्रतिपादित स्तर का नहीं होता फिर उनके बलिष्ठ और दीर्घायुष्य होने का क्या कारण समझा जाय?
आहार की ही तरह अन्य कारण भी स्वास्थ्य खराब होने के सोचे जा सकते हैं। जलवायु का प्रभाव तो होता है, पर इतना नहीं कि उसमें निर्वाह हो न सके। अमुक वस्तु अनुकूल नहीं पड़ती — अमुक गाँव मुहल्ला या घर फला नहीं जैसे प्रतिपादन खड़े करके दूसरों को दोषी ठहराने का प्रयत्न किया जाता है ताकि अपनी भूलों को प्रस्तुत संकटों का कारण समझने पर उत्पन्न होने वाली आत्म−ग्लानि से बचा जा सके। बाहरी अवांछनीयताओं के प्रति सतर्क रहना और जो अनुपयुक्त जँचे उसे सुधारना बदलना भी उचित है। इतने पर भी यह मानकर नहीं बैठ जाना चाहिए कि बाहरी सुधार मात्र ने अनुकूलता उत्पन्न हो सकती है। वस्तुतः अधिकांश विग्रह अन्दर से ही उत्पन्न होते हैं और संकट बन कर बाहर आ खड़े होते हैं। स्वास्थ्य संकट भी प्रायः इसी आधार पर उत्पन्न होता है।
बिगड़े स्वास्थ्य का बहुत बड़ा दोष आहार सम्बन्धी आदतों में विकृतियों का घुस पड़ना है। आहार का स्तर ऊँचा हो इसमें मतभेद की गुंजाइश नहीं है। सुविधानुसार इस दिशा में हर कोई प्रयत्न करता है और करना भी चाहिए किन्तु उस भ्रम जंजाल को क्या कहा जाय जिसके कारण भोजन के स्तर की परख बन पड़ती है और खाने सम्बन्धी आदतों का पर्यवेक्षण सम्भव होता है। खाद्य पदार्थों से भी अधिक महत्व इस सन्दर्भ में अपनाई गई आदतों का ही है। उदाहरण के लिए अत्यन्त मोटा सर्वविदित सर्वमान्य तथ्य यह है कि कहीं भूख लगने पर खाया जाय। भूख का तात्पर्य यह है कि पेट ने पिछला पाचन कार्य निपटा लिया और नये को पचाने के लिए तैयार है। यदि भूख नहीं लगी है— पेट हलका नहीं है तो उसका सीधा अर्थ यह है कि पिछले आहार का पाचन नहीं हो सका हैं। अभी उसके निपटने में देर है। नया काम लदने का अभी समय नहीं आया। प्रकृति के यह संकेत इतने स्पष्ट होते हैं कि कोई बच्चा भी उसे समझ सकता है। कड़ी भूख और भोजन का तालमेल यदि बिठाये रहा जाय तो पाचन तन्त्र खराब होने और आहार से उत्पन्न रस रक्त के विषैले होने की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा। किसी मजूर की गरदन पर बोझ लदा हो, उसे ढो रहा हो। जब तक वह उतरे नहीं तब तक नया लाद दिया जाय तो उस बेचारे की दुर्गति ही होगी। ठीक इसी प्रकार पेट ने जब तक पिछले लदान को पार करके साँस लेने जितना छुटकारा नहीं पाया है उससे पहले ही नई लादी लाद देना, विशुद्ध रूप से निर्मम अत्याचार है। एकाध दिन की बात हो तो सहन भी किया जाय पर जब इस निष्ठुरता को एक अधिकार ही मान लिया गया और छोड़ने बदलने की बात सोचने तक की गुंजाइश नहीं रखी गई, तो फिर कौन, किससे क्या कहें? पेट बेचारा बोलता नहीं, दरबार फरियाद भी नहीं कर सकता, पर सुपक−सुपक कर रोता अवश्य है। इसी रुदन को हलके पेट दर्द के रूप में देखा जा सकता है। कभी−कभी वह इस निर्मम अत्याचार से पीड़ित होकर मूर्छितों की तरह चित्त−पट्ट लेट जाता है। इसी को पेट का भारीपन कह सकते हैं। लगता है कि उदर में पत्थर जैसे जम गये। अल्सर, उलटी, मितली, मुँह के छाले, खट्टी डकारें, साँस के साथ आने वाली बदबू शिर दर्द आदि के रूप में आमाशय का अपच प्रकट होता है। थोड़ा आगे खिसक कर यदि वही आँतों में जा जमा तो पेट फूलना, दस्त, संग्रहणी, छोटे कीड़े, बवासीर, टट्टी साफ न होना, अपान वायु की अधिकता जैसे विकार बनकर वह सामने आता है। इन बीमारियों के और भी अनेक भेद−उपभेद हैं। जो मात्र अपच के कारण उत्पन्न होते हैं। अपच का सबसे बड़ा कारण है बिना भूख लगे खाना।
पेट भरा होने पर सिंह जैसे हिंसक पशु−सामने घूम रहे शिकार पर आक्रमण नहीं करते। बीमार कुत्ते के सामने रोटी डाली जाय तो वह उससे मुँह फेर लेगा। बहुत हुआ तो पंजे से छोटा गड्ढा बना कर फिर कभी के लिए उस टुकड़े को गाड़ तो देगा, पर खायेगा नहीं। इतनी समझ यदि मनुष्य को भी रही होगी। लदे को लादने की नादानी करे पालतू जानवरों को मार डालने वाले कदाचित ही कहीं देखे जाते हैं, पर हम हैं जो ऐसा ही अनर्थ आयें दिन करते हैं और बेचारे पेट को रेत−रेत कर काटते हैं। गोली से मार देने या कुत्तों से बोटी नुचवा कर मारने से पुराने मृत्युदंड की तुलना अब अधिक मानवी मानी जाने लगी है, पर हमारे तौर−तरीके अभी भी वही पुराने हैं। पेट को कुत्ता फाँसी के जंगली कायदे के अनुसार ही अर्ध मृत्यु का दंड देते हैं। अच्छा होता एक दिन ही पूरी शत्रुता निभा ली जाती और सताने और सताये जाने का सिलसिला एक दिन में ही निपट कर सदा के लिए समाप्त हो जाता है।
भरे पेट कर खाते रहने की आदत हमें अखरती तनिक भी नहीं। हमारे तथाकथित मित्र कुटुम्बी इसके लिए उत्साहपूर्वक उकसाते रहते हैं। भरे−पेट की बात कहने पर भी उनका आग्रह बना ही रहता है। तरह−तरह के स्वादिष्ट व्यंजनों का प्रलोभन देकर− स्नेह भरे आग्रह की दुहाई देकर वे दबाव डालते हैं कि बिना भूख ही नहीं− थैले की गुंजाइश से भी अधिक भरा जाय। प्रकृति की दयालुता है कि पेट का थैला असाधारण रूप से सिकुड़ने फैलने वाली किसी विचित्र वस्तु से बनाया है अन्यथा आये दिन उसके फटने सिलाने का सिलसिला साइकिल के टायर ट्यूबों की तरह चलता रहता।
प्यास बुझते ही हम पानी पीना बन्द कर देते हैं ऐसा नहीं सोचते कि पेट की राई रत्ती जगह पानी से भर लें भले ही उसकी आवश्यकता न हो। पेट में जल भरते समय हमारी समझ ठीक काम करती है, पर वही न जाने क्यों भोजन करते समय नादानी में बदल जाती हैं। भूख शान्त होते ही खाना बन्द कर दिया जाय यही औचित्य की मर्यादा है किन्तु होता कुछ विचित्र ही है। ग्रास निगलने का सिलसिला तब तक चलता ही रहता है जब कि हवा पानी कि लिए सुरक्षित रहने वाला स्थान भी खाद्य−पदार्थों द्वारा अपहरण न कर लिया जाय। लगता है हम मात्र ठोस पदार्थों की ही उपयोगिता समझते हैं। पानी और हवा की भी आवश्यकता है यह पाठ पढ़ा ही नहीं गया। अन्यथा पेट भरते समय यह ध्यान रखा जाय कि आहार को उस क्षेत्र का आधा स्थान घेरने की ही छूट है। शेष एक चौथाई पानी के लिए और एक चौथाई हवा के लिए खाली रहने देना चाहिए। अन्यथा साँस लेना कठिन हो जायगा और पकाने−पचाने के लिए खाने से कुछ ही देर बाद पानी पीने की आवश्यकता पड़ेगी उसके लिए स्थान कहाँ से आवेगा? हांडी को गरदन तक भर दिया जाय तो पकने के लिए खाली जगह कहाँ रहेगी और खिचड़ी का ठीक तरह पकना कैसे सम्भव होगा? इस मोटी बात को हर चूल्हा पकाने वाला जानता है, एक हम हैं जो बुद्धिमान कहलाते हुए भी मूर्खता का परिचय देते हैं। खाद्य−सामग्री की बर्बादी,पेट पर अनावश्यक दबाव और इस ठूँस−ठाँस की प्रतिक्रिया से दुष्परिणाम यह तीनों हानियाँ लगातार उठाते रहते हैं। जानते हुए भी जो अनजान बना रहे, समझते हुए भी नासमझी बरते, उससे क्या कहा जाय? क्यों कहा जाय? अपनी स्थिति ऐसी विचित्र है।
“वह व्यक्ति सम्मान का पात्र नहीं जो धनी व संपत्तिवान हो, अपितु वह सम्मान का पात्र है जो अपनी सम्पत्ति का सदुपयोग कर उत्पादन व कल्याण कार्य में लगाता हो।
श्रेष्ठ बुद्धि व सद्विचार करने वाला विद्वान भी सम्मान का पात्र नहीं, यदि वह अपनी बुद्धि विचारों व आचरणों से लोगों को सद्कर्मों की प्रेरणा न देता हो।”
-वेली
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अरब में एक पहुँचे हुए फकीर रहते थे− नाम था अल्लामा इंशा। प्रख्यात था कि उनके इलाज से कठिन रोगों के रोगी अच्छे हो जाते हैं।
बगदाद के एक सरदार सिर दर्द की बीमारी से बहुत दुःखी थे। उन्हें चारपाई पर छटपटाते हुए ही दिन गुजारना पड़ता था। बहुत इलाज कराने पर भी जब कोई लाभ न हुआ तो लोगों न उसे अल्लामा इंशा की ही दवा लेने के लिए कहा।
सामन्त ने अपने गुमाश्ते बढ़िया सवारी लेकर फकीर के पास भेजे और प्रारम्भिक भेंट धन देने के अतिरिक्त इलाज का भारी इनाम मिलने का भी सन्देश भिजवाया।
गुमाश्ते नियत स्थान पर पहुँचे तो वहाँ एक हृष्ट−पुष्ट ऊँट चराने वाले के अतिरिक्त और कोई दिखाई न पड़ा। उनने उसी से सन्त अल्लामा का पता पूछा। ऊँट चराने वाले ने कहा− मैं ही वह फकीर हूँ। इस पर उन्हें बहुत अचम्भा हुआ। इतना बड़ा सन्त और चिकित्सक ऊँट चराने जैसा काम करे, इस जिज्ञासा को उन्होंने प्रस्तुत किया तो अल्लामा ने इतना ही कहा− “ मैं पैदल चलने को शरीर और मन की श्रेष्ठ साधना के रूप में ही अपनाये हुए हूँ।”
सरदार के इलाज के लिए चलने का अनुरोध जब गुमाश्तों ने किया तो उनने इतना ही उत्तर दिया। मैं किसी मरीज के घर नहीं जाता। उन्हें ही मेरे यहाँ पैदल चल कर आना पड़ता है। दूत निराश होकर वापिस लौट गये।
सरदार के पास जब कोई और चारा न रहा तो उसने पैदल चल कर फकीर तक पहुँचने का निश्चय किया और कई हफ्तों में उतनी दूर की मंजिल पार करके चिकित्सक तक पहुँचा।
अल्लामा ने मरीज को भली प्रकार देखा परखा और उसे एक कीमती दवा की पुड़िया देते हुए कहा इसकी एक सौ खुराकों का प्रयोग करने पर आपका मर्ज जरूर अच्छा हो जायगा। उस दवा के प्रयोग की विधि यह बताई कि जब माथे पर पसीना आवे तब एक पुड़िया खोल कर उसे सिर पर मल लिया जाय।
निर्देश के अनुसार सरदार को वापिस भी पैदल ही लौटना पड़ा। पसीना सिर पर निकले इसका एक ही उपाय था तेज चाल से यात्रा करना। उसने वही किया घर लौटने में उसे बीस दिन लगे। जब तक सिर पर पसीना न निकलना तब तक उसे चलते ही रहना पड़ता। आखिर दवा का प्रयोग तो तभी होना था जब सिर पर पसीना निकले।
घर लौटने तक सरदार का सिर दर्द पूरी तरह अच्छा हो गया। बची हुई दवा का क्या किया जाय? इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिए उसने अपने गुमाश्ते फिर सन्त के पास भेजे। अल्लामा ने हँसते हुए कहा। — “ वह दवा मामूली मिट्टी भर थी, उसे फेंक दिया जा सकता है। असली इलाज तो लम्बा पैदल सफर करना और उसी तरह वापिस लौटना था।
फकीर ने गुमाश्तों को पैदल चलने के लाभ समझाये और कहा अपने सरदार तथा उनके साथियों से कहना पैदल चलने की आदत छोड़ देने से ही लोग मरीज बनते हैं यदि उन्हें अपना शरीर और मन निरोग रखना है तो मेरी तरह पैदल चलने की आदत डालें और सदा के निरोग रहने का लाभ उठायें।
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‘आत्मवत् सर्व भूतेषु’ के तत्व ज्ञान में प्रत्येक प्राणी की मूल चेतना में आत्मा की उपस्थिति दीखने, सबको समान सुख−दुःख होने और प्रत्येक को न्याय का अधिकारी होने की मान्यता है। किसी सभ्य राष्ट्र में प्रत्येक प्रजाजन को समान नागरिक अधिकार प्राप्त होता है। जीवात्मा की इसी मौलिक स्थिति को समता के तत्वज्ञान से स्वीकार किया गया है। इसका फलितार्थ ‘जिओ और जीने दो’ के रूप में सामने आता है। दूसरों से वही व्यवहार करें जो दूसरों से अपने लिए चाहते हैं। हमें कोई कष्ट पहुँचावे तो कितना दुःख होता है और दूसरों की उदार आत्मीयता से कितनी प्रसन्नता होती है। इसे ध्यान में रखकर दूसरों के साथ अपने व्यवहार की नीति अपनायें।
आततायी को सुधार की कठोर शिक्षा देने की इस सिद्धान्त में पूरी−पूरी छूट है। एक आँख प्यार की दूसरी सुधार की रखे बिना सन्तुलन रह ही नहीं सकता। प्यार के आधार−स्नेह सहयोग देकर व्यक्ति की उत्कृष्टता उभारना, प्रगति का पथ−प्रशस्त करना कर्तव्य है, किन्तु इस उदारता का उपयोग दुष्टता के अभिवर्धन में होने लगा तो समझना चाहिए अर्थ का अनर्थ हो गया। दुष्ट दुराचारियों को भी सन्त−सज्जनों जैसा सम्मान सहयोग दिया जाने लगे तो समझना चाहिए कि प्रतिपादित आदर्श द्वारा सर्वनाश की भूमिका खड़ी कर दी गई। समानता का यह अर्थ नहीं कि उपकारी और आततायी को एक ही समान समझा जाय। ऐसा अन्धा साम्यवाद तो कम्युनिस्ट देशों में भी नहीं है। वहाँ अर्थ विवरण में समानता के सिद्धान्त को मान्यता दी गई है किन्तु अधिक उपयोगी और अधिक परिश्रमी की विशेषता स्वीकार की गई है और उसे कुछ अधिक सुविधा भी दी गई है। इसी प्रकार हरामखोर और कामचोरों की सामान्य सुविधाओं में कटौती भी की गई है। इसका औचित्य भी है। भावना और कर्म कौशल के आधार पर वहाँ लोगों को सम्मानित भी किया जाता है और नीति मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले कठोर दण्ड भी प्राप्त करते हैं। दण्ड या सम्मान सब को समान मिले, श्रेष्ठता और दुष्टता का अन्तर न किया जाय ऐसा तो कदाचित ही किसी के लिए सम्भव हो। जीवन मुक्त ऋषि, मनीषी और देवता भी व्यक्ति भेद को ध्यान में रखकर किसी को वरदान से पुरस्कृत और अभिशाप देकर दण्डित करते हैं। ईश्वर को समदर्शी कहा गया है वह भी किसी को स्वर्ग किसी को नरक भेजता है। ऐसी अन्धी समता जो श्रेष्ठ, निकृष्ट सभी को एक लाठी से हाँके, विवेक शून्य स्थिति में ही सम्भव हो सकती है। औचित्य और न्याय को तिलांजलि देकर ही ऐसी अन्धी समता व्यवहार में लाई जा सकती है।
सम्भवतः इस प्रकार की माँग दुरात्माओं द्वारा की गई होगी और उसका समर्थन किन्हीं निहित स्वार्थों के परिपोषक धर्माचार्यों ने कर दिया होगा। इसमें आततायी लोगों को दोहरा लाभ है। वे अनीतिपूर्वक अवांछनीय लाभ भी उठाते हैं और सबको समान सद्भावना मिलने के नाम पर दण्ड से भी बेदाग बच जाते हैं। इसमें सज्जनता को दोहरी हानि है। एक तो वह पहले ही आक्रमण की शिकार हुई दूसरे भविष्य की रोकथाम के लिए जिन तीखे प्रतिरोध का आवश्यकता थी उसका भी क्षमा के नाम पर पत्ता कट गया। अब यह उदार क्षमा उसके रहे बचे अस्तित्व का भी सफाया करेगी। समानता का यदि यही अर्थ निकलता है कि उससे पाप और पुण्य को देव और दानव को एक समान माना जाय और दोनों के प्रति समान एक-सा व्यवहार किया जाय तो वह धर्म मूल धारण के अनुकूल नहीं प्रतिकूल पड़ता है।
भगवान को समय−समय पर अवतार लेने पड़े हैं। उस अवतरण के दो उद्देश्य रहते हैं एक अधर्म का विनाश दूसरा धर्म की प्रतिष्ठापना। यह दोनों कार्य एक समान नहीं वरन् एक−दूसरे के सर्वथा प्रतिकूल हैं। एक में कठोर प्रताड़ना और दूसरे में उदार अनुकम्पा जुड़ी हुई है। इसमें तात्विक समता देखी जा सकती है। सबकी अन्तरात्मा में समान रूप से श्रेष्ठता की स्थापना उद्देश्य है। यह किसे किस प्रकार मिले इसके व्यवहार में अन्तर तो रहेगा ही। एक बच्चे को मिठाई दी जाती है, दूसरे को उससे वंचित रखा जाता है और कड़वी दवा पिलाई जाती है। अभिभावकों को दोनों बालकों पर समान प्यार होते हुए भी उनकी शारीरिक स्थिति को देखकर अन्तर करना पड़ता है। स्वस्थ को कड़वी दवा खिलाने और बीमार को मिठाई देने में कोई औचित्य नहीं। ऐसी समानता बरतने वाले अभिभावक अपने बालकों के साथ अनर्थ ही बरतेंगे।
पिछड़ेपन को दूर करने और पीड़ा का निराकरण करने के लिए उदार सहयोग देना उचित है। यह मानवी सद्भावना, सहृदयता और सज्जनता के सर्वथा अनुकूल है कि समर्थ व्यक्ति अपने पिछड़े लोगों को ऊँचा उठाने के लिए के भरपूर प्रयत्न करें। करुणा और सद्भावना का परिचय देकर उन्हें ऊँचा उठाने और आगे बढ़ाने का प्रयास करें। इस उदारता का बढ़ा−चढ़ा परिचय देना सन्त परम्परा और सज्जनोचित, सद्भावना का अंग रहा है। इससे पिछड़े वर्ग को ऊँचा उठने का अवसर मिलता है और उच्च वर्ग को आदर्शवादी उत्कृष्टता का परिचय देकर आत्म−सन्तोष का श्रेय प्रतिफल का लाभ मिलता है। महामानवों के जीवन क्रमों में यह परमार्थ भावना अविच्छिन्न रूप से जुड़ी रही है। इस अवलम्बन को अपनाकर वे महानता की उपलब्धि प्राप्त कर सके हैं।
भगवान की उदारता प्रसिद्ध है। वे प्राणियों को सुख−सुविधा के अनेक साधन प्रदान करते हैं। पुकार सुनकर सहायता के लिए दौड़ते हैं। गज को विपत्ति से उबारने और द्रौपदी की लाज रखने वाले भगवान न्याय पक्ष का सदा समर्थन करते हैं। वे अर्जुन के सारथी बने थे। सुग्रीव, विभीषण, नरसी, सुदामा, प्रह्लाद, आदि भक्त जनों की उन्होंने सदा सहायता की है।
सन्त चरित्रों में उदार, सेवा, सहायता के असंख्य प्रसंग भरे पड़े हैं। अम्बरीष, पुण्डरीक, रुक्मांगद, रन्तिदेव, राजशिवि आदि की जीवन गाथाओं को देखने से प्रतीत होता है कि वे उपासना एवं ज्ञान−साधना के लिए जितने तत्पर रहे, उतना ही उन्होंने लोक सेवा में भी रस लिया है। सत्परम्पराओं की स्थापना ने पीड़ितों सहायता एवं छोटों को बड़ा बनाने में भी भरपूर प्रयास किया है।
भागवत कथा के अनुसार रन्तिदेव कहते हैं− पीड़ितों की सहायता करते रहना ही मेरी एक मात्र कामना है। पद्मपुराण के राजा महीरथ का कथन है— समर्थ होते हुए भी जो दुखियों की सहायता नहीं करता वह पापी है। दूसरों का उपकार करने से विरत करने वाले स्वर्ग से तो सेवा निरत रह कर नरक में निवास करना उत्तम है। कबूतर की रक्षा के लिए अपना मांस देते हुए महाभारत के राजा शिवि कहते हैं, पर हित चिन्तन न करने वाला मनुष्य तो पशु से भी गया बीता है। लंकावतार सूत्र के अनुसार भगवान बुद्ध का वचन है— जब तक संसार का एक भी प्राणी बन्धन में बँधा है, तब तक मैं मोक्ष को स्वीकार न करूँगा। मुझे तो पिछड़ों की सेवा ही अभीष्ट है। स्कन्द पुराण के भक्त प्रह्लाद की भावना है—दुखियारों में ही मुझे भगवान दीखते हैं। पीड़ितों की सेवा में मुझे भजन का आनन्द मिलता है। ऋषि की कामना है−मुझे राज्य, सुख, स्वर्ग, मुक्ति और कुछ नहीं चाहिए मेरी तो दुखियों के दुःख दूर करते रहने की ही कामना है।
यह साभ्य योग हुआ। समर्थ व्यक्ति अपनी समर्थता− असमर्थों को बाँटे। ज्ञानवान, अज्ञानियों को अपने समतुल्य बनायें। धनी अपनी सम्पदा द्वारा दूसरों को अर्थ संकट से उबारें। सज्जन स्वयं ही सज्जन बने रहने में सन्तुष्ट न रहें वरन् अन्यान्यों को भी सज्जन बनाने के प्रयत्न में संलग्न रहें। इस प्रकार एक ऊँचा दूसरा नीचा न रहेगा। टीले और खाई को पाट कर समतल बनाने के प्रयासों को समता कहा जा सकता है। इसी समता सिद्धान्त का तत्वज्ञान में प्रतिपादन किया गया है। छोटों और बड़ों का, पत्नी और भगिनी का, दुष्ट और सन्त का भेदभाव छोड़ कर सबके साथ एक−सा व्यवहार करने लगना तो मूढ़ता है। मूढ़ता और समता एक बात नहीं है।
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अपनों से अपनी बात-
विगत आषाढ़ी गुरु पूर्णिमा से पुनर्गठन वर्ष के प्रयास आरम्भ हुए थे। तब से अब तक आठ महीने पूरे हो गये। पिछले वर्ष का न्यूनतम कार्यक्रम प्रत्येक पत्रिका को पाँच द्वारा पढ़ा जाना— अखण्ड−ज्योति परिजनों का दस−दस की टोलियों में गठित होना— सदस्यों के जन्म दिवसोत्सव मनाया जाना था। प्रसन्नता की बात है कि वह संकल्प बहुत हद तक पूर्ण हो चुका।
इस अवधि में अखण्ड−ज्योति परिजन दस−दस की टोलियों में गठित हो गये हैं और वे टोलियाँ अपनी स्थिति के अनुरूप आत्म निर्माण और लोकनिर्माण के रचनात्मक कार्यों में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा खड़ी कर रही हैं और एक दूसरे से आगे निकलने की शर्त लगा रही हैं। टोली नायकों के जिम्मे दो कार्य प्रारम्भिक रूप में सौंपे गये थे। हर पत्रिका कम से कम पाँच अन्य लोगों द्वारा भी पढ़ी जाने लगे और प्रत्येक सदस्य का जन्म दिन एक सस्ते किन्तु भाव−भरे पारिवारिक आयोजन के रूप में सम्पन्न किया जाने लगे। प्रसन्नता की बात है कि वह दोनों अनुरोध पूरे उत्साह के साथ पूर्ण किये गये हैं और ये प्रयास लगभग पूर्ण सफलता के लक्ष्य तक पहुँच चुके हैं।
यह नगण्य से लगने वाले दो कार्य जब अपनी प्रतिक्रिया प्रस्तुत करने लगे हैं तो समझ में आता है कि गाँधी जी के चरखा चलाने और नमक बनाने जैसे दो छोटे कार्य किस प्रकार अन्ततः लम्बी पराधीनता से मुक्ति दिलाने का चमत्कार उत्पन्न कर सके। अखण्ड−ज्योति और उसकी सहयोगिनी पत्रिकाओं का परिवार इन दिनों पाँच लाख मस्तिष्कों का स्पर्श करता है। पाठकों का यह परिवार इस वर्ष के आग्रह के अनुरूप पाँच गुना बढ़ गया है। बिना अतिरिक्त प्रकाशन किये, बिना नये आधार खड़े किये अपना प्रभाव क्षेत्र की व्यापकता का यह क्रम अखण्ड−ज्योति के पिछले 40 वर्ष के जीवन−काल में कभी भी देखने को नहीं मिला।
जन्म दिवसोत्सव आन्दोलन देखने में एक छोटे से पारिवारिक हर्षोत्सव जैसा प्रतीत होता है। आये दिन तीज−त्यौहार, विवाह शादी, दावत, प्रीतिभोज का सिलसिला घरों में चलता रहता है। उन्हीं में से एक यह भी है कि किसी का जन्मदिन मना लिया जाय। हवन पूजन गीत वाद्य, स्वागत सत्कार का छोटा-सा आयोजन कोई ऐसी बड़ी बात नहीं है जिसे किसी बड़ी की संज्ञा दी जा सके। किन्तु जिस उद्देश्य के लिए, जिस तथ्यपूर्ण आधार को लेकर यह आन्दोलन खड़ा किया गया है उस पर गहराई से विचार करने के उपरान्त प्रतीत होता है कि यह तथ्यपूर्ण शुभारम्भ अभी से अपनी प्रगतिशीलता का परिचय देने लगा है। निकट भविष्य में तो इसकी महान प्रतिक्रिया इतनी बड़ी होने की सम्भावना है जिसकी कल्पना भर से ही आज हर्षातिरेक का रोमांच हो आता है।
मनुष्य की दृष्टि बहिर्मुखी है। वह वस्तुओं और प्राणियों के साथ सम्पर्क से उत्पन्न परिस्थितियों में उलझा रहता है। अन्तरंग की विभूतियों को जगाने और मनःस्थिति में प्रखरता भर देने का महत्व ही उसकी दृष्टि से ओझल रहता है। आत्म−निर्माण के सहारे इस संसार में जो कुछ श्रेष्ठ और सुन्दर है उसे सहज ही पाया जा सकता है, यह तथ्य अनजाना ही पड़ा रहता है। जीवन के सदुपयोग की समस्या अनबूझ पहेली ही बनी रहती है। इन उपेक्षित क्षेत्र का नये सिरे से पर्यवेक्षण करने और पुनर्निर्माण की योजना बनाने का जैसा अवसर जन्मदिन मनाने के आधार पर मिलता है। जिसका जन्मदिन है उसे अपनी आन्तरिक स्थिति का लेखा−जोखा लेने, भावी प्रगति का ढाँचा खड़ा करने के लिए गम्भीरतापूर्वक चिन्तन की प्रेरणा मिलती है। उत्सव के अवसर पर इसी दृष्टि से प्रवचन उद्बोधनों का क्रम चलता है। आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण और आत्म विकास के चारों पक्ष मिलकर समग्र आत्मिक प्रगति का ढांचा खड़ा करते हैं। उस हर्षोत्सव के समय प्रस्तुत दुर्गुणों में से एक को घटाने और जिनकी कमी है उन सद्गुणों में से एक को बढ़ाने की प्रतिज्ञा ली जाती है।
यह प्रतिपादन नहीं वरन् सुनिश्चित तथ्य है जो पिछले आठ महीनों से सुव्यवस्थित रीति से अपनाये जाने के कारण व्यक्ति निर्माण का कार्य द्रुतगति से सम्पन्न करने लगा है। सूक्ष्म पर्यवेक्षण से पता चला है कि जिनके जन्मदिन मने हैं उनके जीवनक्रम में उत्कृष्टता के अंश निश्चित रूप से बढ़े हैं। इतना सरल, इतना सस्ता, इतना प्रभावोत्पादक और इतना दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाला रचनात्मक कार्य अभी तक सोचा नहीं जा सका। अखण्ड−ज्योति परिवार के सदस्यों से इस वर्ष प्रारम्भ हुई यह पुण्य परम्परा समूचे प्रबुद्ध वर्ग में आँधी तूफान की तरह फैलती और लोकप्रिय बनती देखी जा सकती है। इसके सहारे विसंगठित भाव−भरे संगठन के रूप में परिणत हो रहा है। मित्र मण्डलियाँ बढ़ रही हैं और उनमें सृजनात्मक चर्चाओं, प्रेरणा और योजनाओं का उपक्रम चल रहा है। इस अभियान को इसी उत्साह के साथ आगे बढ़ाया जाता रहा तो व्यक्ति निर्माण के कार्य में आशातीत सफलता मिलने की सुनिश्चित सम्भावना है।
पुनर्गठन वर्ष के शेष महीनों में परिवार के सभी प्राणवान परिजनों को यह कहना चाहिए कि यह दोनों ही प्रवृत्तियाँ पूरी प्रौढ़ता प्राप्त कर लें। एक भी पत्रिका ऐसी न बचे जो कम से कम पाँच पाठकों द्वारा न पढ़ी जाती हो। एक भी परिजन ऐसा न बचे जिसका जन्म दिवसोत्सव न मनाया गया हो। यह दोनों कार्य संगठित रूप से, एक दूसरे के सहयोग और प्रोत्साहन देने पर ही ठीक तरह चल सकते हैं। इसके लिए आवश्यक है कि दस−दस की टोलियाँ गठित कर ली जाय। यह छोटी संस्था अपने स्वभाव सम्पर्क के लोगों में से ही बनती हैं। इनमें पद लिप्सा—आर्थिक गड़बड़ी जैसी उन विकृतियों के लिए कोई स्थान नहीं है जिनके कारण संगठनों में कलह उत्पन्न होते हैं और अवांछनीयताएँ पनपती हैं। भविष्य में अपने संगठन का रूप ही टोली पद्धति पर चलेगा। युग निर्माण का विशालकाय ढाँचा इन छोटी−छोटी इकाइयों के सहारे ही खड़ा किया जाता है। ईंटें मिलकर भवन बनाती हैं और जीवकोषों की संगठता से काया खड़ी है। अखण्ड−ज्योति के परिवार के परिजन अपना संगठन दस−दस की टोलियों में बना लें यह हमारी हार्दिक इच्छा है। वह संगठन दो कार्य करने लगे, एक तो पाँच पाठकों को पत्रिका पढ़ाने का—झोला पुस्तकालय, विचार विस्तार करने लगे। दूसरा जन्म दिवसोत्सवों की आयोजन व्यवस्था। यह कार्य नितान्त सरल है। थोड़ा−सा ध्यान, मुड़ने, महत्व समझने और राई रत्ती प्रयत्न कर लेने भर से सम्पन्न हो सकता है। जहाँ भी अखण्ड−ज्योति पहुँचती हो—जो भी उसे रुचि पूर्वक पढ़ते हों उन्हें हमारे इस अनुरोध पर ध्यान देना चाहिए कि पुनर्गठन वर्ष की अपेक्षा (1) दस की टोलियाँ गठित करने (2) पत्रिका पाँच व्यक्तियों द्वारा पढ़ी जाने (3) जन्म दिवसोत्सव की सुनियोजित योजना बन जाने, की है। यह तीनों कार्य जहाँ न हो पाये हों वहाँ आरम्भ किये जायँ और जहाँ चल रहे हो वहाँ उनका कार्य क्षेत्र विस्तृत किया जाय। अपने समीपवर्ती क्षेत्र में जहाँ भी अखण्ड−ज्योति पहुँचती हो—प्रबुद्ध परिजनों को मिशन के प्रतिनिधि के रूप में वहाँ पहुँचना चाहिए और इन तीनों ही प्रचलनों के आरम्भ एवं अभ्यस्त कराने के लिए भाव−भरा प्रयत्न करना चाहिए। गायत्री जयन्ती जेष्ठ सुदी 10 गंगा दशहरा के दिन पड़ती है। उस दिन अँग्रेजी महीने के हिसाब से 16 जून पड़ती है तब तक पुनर्गठन वर्ष के अन्तर्गत आरम्भ किये इस छोटे से बीजारोपण को अंकुरित होने और हरे−भरे पौधे के रूप में विकसित होने का अवसर मिल ही जाना चाहिए।
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मानवी चेतना की सबसे प्रचण्ड और सबसे अद्भुत शक्ति ‘संकल्प’ है। निरर्थक तो कल्पनाएँ और कामनाएँ जाती हैं। ‘संकल्प की सिद्धि’ में सन्देह करने की गुंजाइश नहीं है। विवेकपूर्वक किये गये सुनियोजित निश्चय जब प्रतिज्ञापूर्वक कार्यान्वित किये जाने की मनःस्थिति का रूप धारण करते हैं तो उन्हें संकल्प कहते हैं। सूर्य जब उदय होता है तो उसका प्रकाश कोई रोक नहीं सकता। प्रचण्ड संकल्प मनुष्य की सारी शक्ति को किसी लक्ष्य विशेष पर केन्द्रित कर देते हैं। ऐसी दशा में अवरोध मात्र आँख−मिचौली खेलने आते हैं। प्रगति पथ को रोके रह सकने की क्षमता उनमें होती नहीं है। संकल्पवानों ने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उचित मूल्य चुकाया है और वे सफल होकर रहे हैं। इस तथ्य को इतिहास के प्रत्येक पन्ने पर स्वर्णाक्षरों में लिखा हुआ पाया जा सकता है। सत्संकल्पों की शक्ति ही नव−निर्माण की आधारभूत क्षमता का काम देगी। आध्यात्मिक शक्ति यही है। प्राण ऊर्जा इसी को कहते हैं। दुष्ट, दुराग्रही तक अपनी दुरभिसन्धियों को पूरा कर लेते हैं तो कोई कारण नहीं कि निष्ठावान व्यक्ति अपने सत्संकल्पों को पूरा करने में समर्थ न हो सकें। संकल्पों का चमत्कारी सत्परिणाम हमें इस वर्ष प्रत्यक्ष सिद्ध करना है और दिखाना है कि चेतना की इस अद्भुत क्षमता का सृजन प्रयोजनों में उपयोग हो सके तो उसके कितने बड़े सत्परिणाम सामने आ सकते हैं। सत्संकल्पों का उभारना इस वर्ष का अपना प्रधान कार्यक्रम है। उसके लिए तीन न्यूनतम कार्यक्रम निर्धारित किये गये हैं। जो आत्म−निर्माण, परिवार निर्माण और समाज−निर्माण के तीनों ही क्षेत्रों को समान रूप से प्रभावित करते हैं।
(1) आत्म−निर्माण के लिए नियमित उपासना, प्रातः उठते ही उत्कृष्ट दिनचर्या का निर्धारण, रात्रि को सोते समय दिनभर के कार्यों का पर्यवेक्षण, जीवन के आदि और अन्त का तत्व चिन्तन, दैनिक गतिविधियों पर कड़ी दृष्टि रखना और उनमें अव्यवस्था और अवांछनीयता का समावेश न होने देना। यही छोटा सूत्र आत्म−निर्माण का आधारभूत सिद्धान्त है। इसका आरम्भ कितने ही छोटे रूप में क्यों न किया जाय, पर उस निर्धारण को कार्यान्वित अवश्य किया जाना चाहिए।
(2) परिवार निर्माण के लिए घरों में पूजा कक्ष की स्थापना, नमन वंदन का प्रचलन, चौके में अग्नि होत्र की चिन्ह पूजा, सामूहिक आरती प्रार्थना, कथा−कहानी के मोटे क्रिया−कृत्यों के सहारे अध्यात्म तत्वों का पारिवारिक जीवन में प्रवेश कराया जाना चाहिए। घरों में स्वाध्याय की परम्परा नियमित रूप से चलती रहे, इसके लिए घरेलू ज्ञान−मन्दिरों का, स्वाध्याय साहित्य का, पारिवारिक पुस्तकालय का, संस्थापन होना चाहिए। पढ़ने और सुनाने का क्रम चलता ही रहे। घरों में श्रमशीलता, सहकारिता, सुव्यवस्था, शालीनता और मितव्ययिता की प्रवृत्तियों को पनपने के लिए इन पारिवारिक पंचशीलों को मिलजुल कर कुछ न कुछ किया जाता रहे। हमारे परिवारों को व्यक्तित्वों के निर्माण की प्रयोगशाला की भूमिका निभानी चाहिए। इसके लिए कुछ न कुछ शुभारम्भ इन्हीं दिनों चल पड़ना चाहिए और उसे नियमित रूप से जारी रखे रहना चाहिए। हमारे घर परिवारों को अब प्रज्ञा मन्दिर के रूप में विकसित होना चाहिए।
(3) समाज निर्माण का एक ही प्रमुख आधार है—’जन मानस का परिष्कार’। ज्ञान−यज्ञ का, विचार क्रान्ति का आधार इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया गया है। इस सत्प्रवृत्ति के सम्वर्धन में प्रत्येक जागृत आत्मा को बढ़−चढ़कर योगदान, अनुदान प्रस्तुत करना चाहिए। युग निर्माण परिवार की आरम्भिक शर्त एक घन्टा समय और दस पैसा नित्य इस पुण्य प्रयोजन के लिए देते रहना है। ज्ञान घटों की स्थापना और झोला पुस्तकालयों का प्रचलन इसी उद्देश्य के लिए चलाया जाता है कि इस अनुदान की बूँद−बूँद से नवयुग की प्रेरणा जन−जन तक पहुँच सके। अब इस दिशा में हमारे अंशदान बढ़ने चाहिए। समय और साधनों की कितनी अधिक मात्रा इस पुण्य−प्रयोजन के लिए नियोजित की जा सकती है। यह देखना और सोचना चाहिए। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह बना लेने और उतने भर से सन्तोष कर लेने पर हर जागृत आत्मा अब की अपेक्षा कहीं अधिक अंशदान युग देवता के चरणों पर प्रस्तुत कर सकता है। वानप्रस्थ परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए हमारी आकांक्षा जागनी चाहिए और उसी की पूर्व तैयारी के लिए आज की स्थिति में जितना सम्भव हो उतना अभ्यास आरम्भ कर देना चाहिए। युग निर्माण की अनेकानेक प्रवृत्तियाँ इसी प्रयोजन के लिए हैं, उनमें से जिसमें जितना सहयोग बन पड़े उसके लिए अधिक समय और धन लगाने के लिए उदारता का नियोजन अभिवर्धन करना चाहिए। आत्म−विकास की कसौटी यही है। आत्मिक प्रगति की परीक्षा लोक−मंगल के लिए उदारता के अनुपात पर अवलम्बित रहती है।
उपरोक्त तीन आध्यात्मिक कर्तव्यों की ओर हमारा ध्यान इस वर्ष अधिक जाना चाहिए। वर्तमान परिस्थिति में जितना अधिक सुव्यवस्थित और सुनिश्चित रूप से कर सकना सम्भव हो उसके लिए संकल्प लेना चाहिए। मात्र सोचते रहने से कोई बात बनती नहीं। निष्कृष्टता तो संचित कुसंस्कारों के सहारे अनायास ही सिर पर आ चढ़ती है, पर उत्कृष्टता की दिशा में ऊँचा उठने के लिए तो संकल्प की शक्ति ही चाहिए। जो निश्चय किया जाय उसे मन में न रखकर अपने सम्पर्क क्षेत्र को अवगत करा दिया जाय, घोषित कर दिया जाय। इससे उसकी पूर्ति करना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। पूरा न करने पर उपहास होता है उसके सफलता पाने पर आत्म−गौरव का लाभ मिलता है। इसलिए सत्संकल्पों का उद्घोष करने की परम्परा को हमें भी निर्वाह करना चाहिए।
सन् 78 संकल्प वर्ष है। इस वर्ष आत्म−निर्माण परिवार निर्माण और समाज निर्माण के लिए कुछ साहसिक कदम बढ़ाने के संकल्प किये जाने चाहिए। जो किये जायं उनकी पूर्ति के लिए योजनाबद्ध कार्य पद्धति बनाई जानी चाहिए और उसके निर्वाह में तत्परता दिखाई जानी चाहिए। निश्चय चाहे छोटे हों या बड़े पर उन्हें पूरा करके ही रहेंगे, इसके लिए उत्साह, साहस और प्रयास के तीनों ही प्राणवान तत्वों का समुचित समावेश रहना चाहिए।
अन्न, जल और वायु का विविध समन्वय सन्तुलित आहार की आवश्यकता पूरी करता है। आत्मिक प्रगति के लिए आत्म−निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण की तीनों धाराओं का समावेश रहना चाहिए। इन तीनों में से एक भी तथ्य ऐसा नहीं है जिसे छोड़ा जा सके और अकेला कोई भी ऐसा नहीं है जिसे अकेले के सहारे समग्र आत्मिक प्रगति का लक्ष्य पूरा हो सके। अखण्ड−ज्योति परिजनों को सन् 78 में वैयक्तिक, पारिवारिक और सामाजिक क्षेत्रों की आदर्शवादी नई प्रगति के लिए कुछ अधिक करने की योजना बनानी चाहिए और उसका निर्धारण इन्हीं दिनों संकल्प रूप में अपने सम्पर्क क्षेत्र को विदित करा देना चाहिए।
ऐसे संकल्प पत्र शान्ति कुंज हरिद्वार के पते पर मँगाये जा रहे हैं ताकि उनमें अभीष्ट संशोधन और आवश्यक मार्ग−दर्शन तथा सफलता के लिए उपयुक्त सहयोग दे सकना सम्भव हो सके। जिनके मन में ऐसा उत्साह उत्पन्न हों, वे उसे संकल्प रूप में परिपक्व कर लें। यह उपयुक्त है।
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हर शाखा अपने यहाँ से एक शिक्षार्थी ही भेजने का प्रयत्न करे :−
अशिक्षित एवं पिछड़े हुए भारत की बहुसंख्यक जनता छोटे देहातों में रहती है। असली भारत यही है। इस वर्ग के ऊँचा उठाने पर ही देश की वास्तविक प्रगति निर्भर है। लोकशिक्षण तो सभी वर्गों का करना है, पर हमारा विशेष ध्यान पिछड़ेपन को दूर करने पर केन्द्रित होना चाहिए। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति की लाल मशाल का प्रकाश इन क्षेत्रों को आलोकित कर सके तो आज का पिछड़ापन कल प्रगतिशीलता में परिणित हो सकता है और समुन्नत देशों की तरह हमारा ग्रामीण क्षेत्र भी अपनी शोभा सुषमा से समृद्धि और सुख−शान्ति से भरा पूरा दिखाई दे सकता है।
जिनका बौद्धिक स्तर ऊँचा है उन शिक्षित लोगों को राजनीति, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र आदि के सिद्धान्तों के सहारे सारगर्भित प्रवचन दिये जा सकते हैं और सामयिक समस्याओं के समाधान का पथ प्रदर्शन किया जा सकता है; किन्तु शिक्षा से शून्य मस्तिष्कों में तो धर्म परम्परा के सहारे ही उपयोगी परिवर्तन किये जा सकते हैं और आवश्यक सुधारों की शिक्षा दी जा सकती है। अस्तु युग निर्माण के मिशन का ढाँचा धर्म−तन्त्र से लोकशिक्षण प्रक्रिया के सहारे खड़ा किया गया है। यहाँ एक बात और समझने योग्य है कि विवेचनात्मक प्रवचनों की अपेक्षा सरस और मधुर संगीत के सहारे छोटे−छोटे प्रसंग प्रस्तुत करते हुए सर्वसाधारण को जितनी अच्छी तरह अभीष्ट परिवर्तन के लिए प्रशिक्षित और सहमत किया जा सकता है, उतना और किसी उपाय से नहीं। बाल, वृद्ध, एवं नारी वर्ग की बौद्धिक स्थिति और भी कमजोर होती है, उनके लिए वह उपाय है जिससे अल्पशिक्षित एवं अविकसित वर्ग को सरलतापूर्वक उपयोगी प्रेरणा देकर प्रभावित एवं अनुप्राणित किया जा सकता है।
शिक्षित वर्ग को भी भावभरे संगीत में कम अभिरुचि नहीं होती। भावनाओं का उभार और स्वर लहरी का रसास्वादन रूखे और नीरस लोगों में भी सरसता उत्पन्न करता है। सर्प और हिंसक जैसे प्राणी तक स्वर लहरी पर मन्त्र मुग्ध रह जाते हैं। दुधारू पशु अधिक दूध देते और पेड़ पौधे अपेक्षाकृत अधिक बढ़ते तथा फलते फूलते हैं। मानसिक एवं स्नायविक रोगों में तो संगीत एक अमोघ उपचार की तरह उपयोगी सिद्ध हुआ है। भक्ति प्रयोजनों में गीत कीर्तन की महिमा अधिक अच्छी तरह समझी गई है और धर्म प्रचार में उसका अत्यधिक प्रयोग होता है। रामायण के लोकप्रिय होने का एक बड़ा कारण उसका छन्द बद्ध—लय बद्ध होना भी है। वेदशास्त्र ही नहीं कथा और चिकित्सा ग्रन्थ तक संस्कृत भाषा में कविता रूप में, गायन के उपयुक्त बनाकर लिखे गये हैं।
युग परिवर्तन की पृष्ठभूमि है—जनमानस का परिष्कार। ज्ञानयज्ञ का, विचार−क्रान्ति अभियान इसी प्रयोजन के लिए अपनी ऊर्जा का वितरण कर रहा है। इसे घर−घर में जन−जन तक पहुँचाना है। इसके लिए लेखनी एवं वाणी के अतिरिक्त तीसरा अत्यन्त प्रभावोत्पादक माध्यम है—संगीत। इसके लिए पिछले दिनों प्रयोग होते रहे हैं वे अपने उद्देश्य की पूर्ति में सफल भी हुए हैं और लोकप्रिय भी बने हैं। ग्रामोफोन के रिकार्ड और टेपरिकार्डों द्वारा युग संगीत ने अपना प्रभाव मिशन के क्षेत्रों में दूर−दूर तक पहुँचाया है। देव कन्याओं के संगीत ने जनमानस में असाधारण हलचल उत्पन्न की है। इन दिनों शाखाओं के वार्षिकोत्सवों में इसका समुचित उपयोग न होने के कारण कुछ फीकापन रहा। अस्तु गर्मियों में इन्हीं दिनों हो रहे क्षेत्रीय सम्मेलनों को अधिक प्रभावोत्पादक बनाने के लिए देव कन्याओं के पाँच जत्थे पाँच मोटरों द्वारा देश भर में भेजे गये हैं। 1 अप्रैल से 15 जून तक के अधिकांश कार्यक्रमों में देव कन्याओं के संगीत पहुँचाने का प्रबन्ध किया गया है। शान्ति कुँज के एक वर्षीय कन्या प्रशिक्षण में संगीत शिक्षा अनिवार्य रखी गई है। इसका कारण कला कौशल, या गायन वादन का मनोरंजन नहीं वरन् लोकरंजन द्वारा लोकमंगल ही प्रधान उद्देश्य है। इस माध्यम से हुए युग संगीत का प्रभाव देखकर उसकी उपयोगिता सर्वत्र एक स्वर से स्वीकार की गई है।
मिशन का विस्तार जिस तूफानी गति से हो रहा है उसे देखते हुए यह निश्चय किया गया है कि विचारक्रांति के लिए युग संगीत को भी उतना ही महत्वपूर्ण स्थान दिया जाय जितना कि अब तक वाणी और लेखनी को दिया जाता रहा है। इस प्रयोजन के लिए शान्ति कुंज में युग संगीत का प्रशिक्षण देने और युग गायक तैयार करने की योजना बनाई गई है। कन्याओं की संगीत शिक्षा एक वर्ष की है, किन्तु युग गायकों का प्रशिक्षण छह−छह महीने का रखा गया है। इसके वर्ष में दो सत्र हुआ करेंगे। प्रचार वर्ष 1 अक्टूबर से आरम्भ होता है। वर्षा समाप्त होते ही शाखाओं के वार्षिकोत्सवों, गायत्री यज्ञों एवं युग निर्माण सम्मेलनों का कार्य आरम्भ हो जाता है। इस बार भी वही क्रम चलेगा। अक्टूबर में युग गायक तैयार मिल सकें इसके लिए प्रथम सत्र नवीन विक्रमी सम्वत्सर चैत्र नवरात्रि 8 अप्रैल 78 से प्रारम्भ किया जा रहा है। चूँकि निश्चय देर से किया गया और सूचना स्वल्पकालीन दी जा रही है इसलिए शिक्षार्थियों की भर्ती पूरी अप्रैल तक चलती रहेगी।
सूचना न मिल पाने या समय उपलब्ध न होने से जो लोग अप्रैल के प्रथम सत्र में प्रवेश न ले पायें उन्हें दूसरे सत्र के लिए आवेदन पत्र भेजकर स्थान सुरक्षित करा लेना चाहिए। दूसरा सत्र अक्टूबर 78 से प्रारम्भ होगा और मार्च 79 तक चलेगा। प्रथम सत्र में प्रशिक्षितों को अक्टूबर में क्षेत्रीय कार्यक्रमों में भेजने की रूपरेखा बनाई जायेगी।
न्यूनतम 18 वर्ष और अधिकतम 40 वर्ष की आयु के स्वस्थ सच्चरित्र एवं अनुशासन प्रिय शिक्षार्थी इसमें भर्ती किये जा सकेंगे। भोजन व्यय शिक्षार्थियों को स्वयं ही वहन करना होगा जो 70) मासिक है। निवास, रोशनी, सफाई फर्नीचर आदि की, वाद्य यन्त्रों की, शिक्षकों की निःशुल्क व्यवस्था है। कन्या विद्यालय की जो छात्राएं अपने हारमोनियम तबले स्वयं खरीद लेती हैं वे पूरे समय अपना अभ्यास कर लेती है और अपेक्षाकृत अधिक जल्दी अधिक प्रवीणता प्राप्त कर लेती हैं। जो नहीं खरीद पातीं उन्हें नम्बर से बाजे मिल पाते हैं। फलतः उनके अभ्यास में उतनी ही कमी रह जाती है। हर छात्र को वाद्य यन्त्रों का एक−एक पूरा−पूरा सैट दे सकना विद्यालय की वर्तमान व्यवस्था में सम्भव नहीं है। अतः जो छात्र अपने हारमोनियम तबले की स्वतन्त्र व्यवस्था कर सकेंगे वे अधिक प्रगति कर सकेंगे। अन्य वाद्य यन्त्र सस्ते होने के कारण यहाँ पर्याप्त संख्या में उपलब्ध हैं।
एक बात स्मरण रखने योग्य है—संगीत हर किसी को नहीं आ सकता। जिनके गले मधुर हैं—जिनके मस्तिष्क में स्वर ताल को पकड़ सकने के बीजांकुर है उन्हें ही सफलता मिलती है। अन्यथा परिश्रम बेकार चला जाता है। अस्तु भर्ती के लिए आवेदन उन्हीं को करना चाहिए जिनकी संगीत में पूर्ण रुचि रही है, जिनका कण्ठ मीठा है, जिन्हें पहले से भी थोड़ी बहुत जानकारी है। जो प्रयोगात्मक रूप से आना चाहें वे अपनी स्थिति का परीक्षण करके देखने के लिए एक महीना उसके लिए ठहरें। यदि गाड़ी आगे चले तो रुकें तो अन्यथा वापिस चले जायें।
इस संगीत शिक्षा को प्राप्त करने वाले छात्रों से युग निर्माण शाखाओं को स्थानीय आयोजनों में अच्छी सहायता मिलेगी। उन्हें गायक बाहर से नहीं ढूँढ़ने पड़ेंगे। कन्या−विद्यालय की छात्राएँ तो हर जगह नहीं जा पातीं और उनके विवाह भी जल्दी ही हो जाते हैं। अस्तु शाखाओं को उनका उतना लाभ नहीं मिल पाता जितना कि प्रस्तुत योजना के अन्तर्गत प्रशिक्षित शिक्षार्थियों द्वारा मिल सकेगा। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए हर शाखा को अपने यहाँ से इस उद्देश्य को पूरा कर सकने वाले शिक्षार्थी भिजवाने का प्रयत्न करना चाहिए।
कुशल युग गायकों का केन्द्र को भी बड़ी संख्या में आवश्यकता पड़ेगी अस्तु जो अपना समय इसी प्रयोजन के लिए देना चाहें उनके निर्वाह आदि का प्रबन्ध भी मिशन की ओर से किया जा सकेगा। इस प्रश्न पर तब विचार होगा, जब छः महीने की शिक्षा अपने खर्च से पूरी कर ली जायगी और उनकी सत्पात्रता का सन्तोष हो जायगा।
नया सत्र जल्दी आरम्भ होने जा रहा है। अस्तु इस सत्र में जिन्हें आना हो, जिन्हें भेजा जाना हो उनकी शारीरिक मानसिक, पारिवारिक, शिक्षा, स्वभाव, आयु, पिछला जीवनक्रम शान्तिकुंज भेजकर स्वीकृति जल्दी ही प्राप्त कर ली जाय। बिना स्वीकृति के कोई न आवे।
संगीत शिक्षा के अतिरिक्त युग गायक शिक्षा के छात्रों के व्यक्तित्व एवं दृष्टिकोण को परिष्कृत करने का, मिशन की गतिविधियों से परिचित करने का, सेवा क्षेत्र में अधिक प्रखरता परिचय दे सकने का शिक्षण क्रम भी साथ साथ ही चलना रहेगा। गायन के साथ−साथ भाषण कला की कक्षाएं भी चलेंगी।
आशा की जानी चाहिए कि इस प्रशिक्षण को प्राप्त छात्र एक अत्यन्त प्रभावोत्पादक कला का अभ्यास करके आत्मोल्लास एवं जन−कल्याण का दोहरा लाभ प्राप्त कर सकने में सफल बन सकेंगे।
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(1) गत अंक में ‘जागृत आत्माओं को युग आमन्त्रण’ छपा था। उस पर परिवार के विचारशील व्यक्तियों ने गम्भीरतापूर्वक विचार किया है और कितने ही भावनाशील परिजन उस पुण्य प्रयोजन के लिए अपने को समर्पित करने की अपनी तैयारी का समाचार भेज रहे हैं। ऐसे सभी लोगों से अनुरोध है कि वे भावावेश में कोई निर्णय न करें। स्थिति की गम्भीरता और भविष्य का सुविधाओं तथा कठिनाइयों पर गम्भीरता पूर्ण विचार कर लें। इस प्रकार का विचार विमर्श पत्र व्यवहार द्वारा सम्भव नहीं। इसके लिए व्यक्तिगत रूप से स्थिति के हर पक्ष पर विचार करने के लिए कुछ समय के लिए हरिद्वार आना ही नहीं यहाँ ठहरना भी आवश्यक है।
ऐसे सभी लोगों को अप्रैल, मई के ब्रह्म वर्चस सत्र में बुलाया गया है। जिन्हें सूचना विलम्ब से मिले वे एक महीने के लिए मई में भी आ सकते हैं। सत्र शिक्षा और विचार विनिमय तथा स्थिति का अध्ययन करने के उपरान्त ही किन्हीं का कोई कदम उठाना उचित होगा।
(2) बढ़ते हुए प्रचार कार्य की आवश्यकता पूरी करने के लिए इस वर्ष से युग गायकों की छह-छह महीने की नई शिक्षण प्रक्रिया आरम्भ की गई है। प्रशिक्षण 8 अप्रैल से आरम्भ होगा, पर दाखिला पूरे अप्रैल खुला रहेगा। कण्ठ और स्वर बोध की प्रारम्भिक परीक्षा में उत्तीर्ण होने वाले छात्र ही इसमें स्थान पा सकेंगे जो अनुत्तीर्ण होंगे उन्हें वापस लौटना होगा।
(3) कन्या प्रशिक्षण के अतिरिक्त ऐसी शिक्षा परित्यक्ताओं एवं विधवाओं के लिए आरम्भ की गई है, जिनकी गोदी में बच्चे नहीं हैं। उनकी शिक्षा में कमी को पूरा करने तथा शिल्प उद्योग द्वारा स्वावलम्बी बनाने के लिए अतिरिक्त कक्षाएँ चलेंगी। एक वर्ष का शिक्षा व्यय तो उनके अभिभावकों को ही देना होगा। दूसरे वर्ष यदि उनकी इच्छा या उपयोगिता हुई तो शान्ति कुंज की सेवा प्रवृत्तियों में संलग्न रहने के लिए भी अनुमति मिल सकती है। ऐसी छात्राओं का निर्वाह मिशन की ओर से होता रहेगा। इस वर्ग की छात्राओं का प्रशिक्षण भी जुलाई से ही आरम्भ होगा। आवेदन भेज कर स्वीकृति उन्हें भी प्राप्त करनी चाहिए।
(4) युग निर्माण अभियान का सूत्र संचालक परिचय, प्रचार एवं मार्ग-दर्शन साप्ताहिक युग निर्माण द्वारा ही होता है। जिन्हें मिशन की गतिविधियों में रुचि है, उन्हें उसे नियमित रूप से पढ़ना तथा साथियों को पढ़ाना आवश्यक है। साप्ताहिक पढ़ने माँगने की उपयोगिता अखण्ड-ज्योति से कम नहीं समझी जानी चाहिए। उसके ग्राहक बनने में प्रत्येक परिजन में समुचित उत्साह होना चाहिए।
(5) सन् 78 संकल्प वर्ष है। गत वर्ष के तीन न्यूनतम कार्यक्रमों में जहाँ जो कमी रह गई हो उसे इन्हीं दिनों पूरा कर लिया जाना चाहिए। संकल्प वर्ष में जिनने जो करने का निश्चय किया हो उसकी जानकारी हरिद्वार भेजनी चाहिए। अखण्ड-ज्योति के प्रत्येक पाठक से आत्म-निर्माण, परिवार-निर्माण और समाज निर्माण के लिए ऐसे संकल्प करने की अपेक्षा की गई जिसमें एक का ही नहीं वरन् तीनों पक्षों का न्यूनाधिक समन्वय होता हो।
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तूफानों ने अलसाये-नाविक का शौर्य जगाया। झंझावातों ने दीपक की जीवट को उकसाया॥ चलीं आंधियां तो पेड़ों ने कुछ हिम्मत दिखलाई। तभी उन्हें अस्तित्व प्रमाणित करने की सुध आई॥ सहन-शक्ति जागी सुमनों की, बर्फीले-झोंकों से। चरणों में आ गई सजगता, शूलों की नोकों से॥ हर बाधा, विपदा ने तो पौरुष का पाठ पढ़ाया। झंझावातों ने दीपक की जीवट को उकसाया॥
आने वाले विघ्न और बाधा अभिशाप नहीं हैं। संकट हरगिज भी पहले ही वाले पाप नहीं हैं॥ संघर्षों को शत्रु मानना, मात्र हमारा भ्रम है।
यह तो जीवन को जीवन को जीवट से जी लेने का क्रम है॥ संकट की सीढ़ियां चढ़ा जो, शिखरों पर चढ़ पाया। झंझावातों ने दीपक की जीवट को उकसाया॥ सुप्त-शक्तियां जागा करती हैं तो, आघातों से। बात नहीं बनने पाती, चिकनी-चुपड़ी बातों से॥ बाधाएँ आकर क्षमताओं को चुनौतियाँ देतीं। जीवन को निष्क्रियता को, नीरसता को हर लेतीं॥ जीवन का महत्व वह समझा, जिसने मूल्य चुकाया। झंझावातों ने दीपक की जीवट को उकसाया॥ सुख का क्या है मूल्य, बता सकता है दुःख का मारा। समझा सकता है प्रकाश की महिमा को, अँधियारा॥ असफलता कहती है, मूल्य सफलता का पहचानो। चेताने वालों का भी उपकार तनिक तो मानो॥ विपदाओं ने ही जीवट से जीना तुम्हें सिखाया। झंझावातों ने दीपक की जीवट को उकसाया॥
-मंगल विजय
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*समाप्त*