सन्त खैयास (kahani)

एक दिन सन्त खैयास अपने शिष्य के साथ घोर निर्जन वन से होकर जा रहे थे। नमाज का समय होने से गुरु शिष्य दोनों चादर बिछाकर नमाज पढ़ने लगे। इसी समय अचानक शेर के दहाड़ने की आवाज आई। शेर के भय से शिष्य डर गया व तुरन्त नमाज छोड़ वह आत्म सुरक्षार्थ पेड़ पर जा बैठा, परन्तु खैयास अविचलित नमाज पढ़ते रहे। शेर आया व इधर-उधर सूँघकर चला गया नमाज पूरी होने पर सन्त चादर उठाकर चलने लगे। शिष्य भी पेड़ से उतरकर उनके साथ चलने लगे। थोड़ी ही दूर गए होंगे कि एक जंगली कुत्ता उधर से निकला। संत खैयास ने अपनी लाठी सम्हाली व कुत्ते के सम्भावित आक्रमण का प्रतिरोध करने की मुद्रा बना ली। शिष्य बड़ा आश्चर्य करने लगा। उसने पूछा- “आप वनराज शेर के आने पर तो तनिक भी विचलित नहीं हुए व इस कुत्ते को देख इतना डर क्यों गए।” सन्त खैयास ने कहा- “उस समय मेरे साथ मेरी रक्षार्थ खुदा था व इस समय तुम (मनुष्य) हो।

शिष्य ने इस बात का मर्म समझा। मनुष्य जब परमात्मा में दृढ़ आस्थावान हो पूर्ण समर्पण भाव से उसकी उपासना में रत रहता है तो उसमें अपूर्व साहस, शक्ति, आत्मशक्ति, आत्मबल का संचार होने लगता है। परन्तु जब मनुष्य अपना तादात्म्य परमात्मा से न रख अपने स्वयं के अहं तक ही सीमित रहता है तो क्षुद्र ही बना रहता है। अपने को बड़ी शक्ति में जोड़ देने से मनुष्य स्वयं भी एक बड़ी शक्ति बन जाता है।

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आस्था ही आस्तिकता

एक समय यह मान्यता थी कि जिसे भगवान् में ‘आस्था’ नहीं वह आस्तिक भी नहीं हो सकता, जो व्यक्ति भगवान् में आस्था न रखता, उसे नास्तिक माना जाता था। परन्तु अब यह मान्यता इस रूप में स्वीकृत की जाती है कि भगवान् में ‘आस्था’ न रखने वाला व्यक्ति ही नहीं, अपितु स्वयं अपने आप में ‘आस्था’ न रखने वाला व्यक्ति भी आस्तिक नहीं माना जा सकता, अपने आप पर जो व्यक्ति अविश्वास व अनास्था रखता है व नास्तिक है।

आस्तिकता का अर्थ केवल मात्र भगवान् में आस्था रखना ही नहीं, अपितु स्वयं अपने आप में आस्था रखना भी होता है। आत्मा ही तो परमात्मा है। अतः अपने आप पर विश्वास रखना, आस्थावान् रहना, उस परमात्मा के प्रति आस्थावान् रहना ही है।

अपने में आस्था रखिए। अपने परिवार के सदस्यों में, पड़ोसियों में, समाज के हर व्यक्ति में “आस्था” रखिए, यदि आप संसार के हर व्यक्ति के प्रति आस्थावान् बने रहे तो सारा संसार आपको ब्रह्ममय प्रतीत होगा।

यदि हमें अपने धर्म, अपनी संस्कृति, अपने गौरवमय इतिहास में “आस्था” है तो हम सदैव कर्मठ बने रहेंगे।

अनेक देशों में विध्वंसकारी आयुधों के निर्माण में हो रही प्रतिस्पर्द्धा, एक-दूसरे पर अविश्वास, एक की दूसरे के प्रति अनास्था के ही तो परिणाम हैं। अपनी “आस्था” गँवाकर आस्तिक बने रहने की बात सोचना एक ढोंग ही है। ‘आस्था’ हीन व्यक्ति आस्तिक हो ही नहीं सकता।

यदि आप मानते हैं कि अनन्त कल्याणकारी परम सत्ता ही विश्व में सर्वत्र काम कर रही है, यदि आप मानते हैं कि वह सर्वव्यापी परम तत्व ही सबमें विराजमान है−ओत−प्रोत है−आपके हमारे मन और आत्मा में व्याप्त है तो फिर एक दूसरे के प्रति अविश्वास को कहाँ स्थान होगा?

और जब हर मनुष्य अपने आप पर व एक दूसरे पर विश्वास करने लगेगा, आस्थावान् बन जायगा तो यह धरती ही स्वर्ग बन जायगी व हर मनुष्य देवता।

−विवेकानन्द

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धर्म हमें अन्तिम सत्य तक ले पहुँचता है।

धर्म किन्हीं विशेष अभिरुचि के या फालतू समय वालों के मन बहलाव का माध्यम हैं अथवा उसका कोई सार्वजनिक उपयोग भी है। इस प्रश्न के उत्तर में हमें धर्म का स्वरूप और उद्देश्य समझने का प्रयत्न करना होगा और यह जानना होगा कि क्या तथाकथित धर्माध्यक्षों द्वारा अपने−अपने ढंग से किया गया बहुमुखी प्रतिपादन ही धर्म है अथवा उसके पीछे व्यक्ति और समाज की उपयोगी मार्गदर्शन की तथ्यपूर्ण क्षमता भी है।

सर जूलियन हेस्कले ने अपने ग्रन्थ ‘रिलीजन विदाउट रिविलेशन’ में धर्म सम्प्रदायों के सम्मिलित सत्य और असत्य की समीक्षा करते हुए लिखा है सत्य, ज्ञान और सौन्दर्य के अभिव्यक्तित्वों से जो धर्म जितना पिछड़ा हुआ है उसे उतना ही झूठा और नीचा समझा जाना चाहिए। सालोमन रीनाइक की यह उक्ति एक खीज भर है, जिसमें उन्होंने धर्म पर “मानवी क्षमताओं पर रोक लगाने” का आक्षेप किया है। वस्तुतः वैसा है नहीं। धर्म की मूल आत्मा न्याय, कर्त्तव्य एवं औचित्य का समर्थन करती है। प्रथा परम्पराएँ तो धर्म के आवरण मात्र हैं। जिन्हें समय−समय पर बदले जाने की आवश्यकता पड़ती है।

देशभक्ति ही सब कुछ नहीं है। विश्व भक्ति उससे भी ऊपर है। समाज का कितना ही महत्व क्यों न हो, बहुमत की मान्यताओं के समर्थन में कुछ भी क्यों न कहा जाता रहे। अन्ततः विवेक ही सबसे ऊपर है। उसे देश भक्ति से भी ऊँचा स्थान मिलना चाहिए। बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय के आधार पर विधान कुछ भी क्यों न बनते रहें, उच्च आदर्शों का स्थान सबसे ऊँचा है, भले ही उनके समर्थन में नीति निष्ठ व्यक्तियों की थोड़ी−सी ही संख्या क्यों न हो?

धर्म दुधारी तलवार है। यदि वह अपरिपक्व दर्शन और संकीर्ण साम्प्रदायिकता का समर्थन भर करता है, तो वह हानिकारक है। किन्तु यदि उससे नीति निष्ठा का समुचित समावेश है तो उसके द्वारा मनुष्य और समाज का हित साधन ही होगा।

विज्ञान और धर्म के शोध विषय पृथक हैं। एक पदार्थ की गहराई को खोजता है, दूसरा चेतना के मर्मस्थल को। इतने पर भी दोनों का मूल प्रयोजन एक है−सत्य की शोध। इसके लिए आवश्यक है कि मस्तिष्क को किन्हीं पूर्वाग्रहों से जकड़ कर न रखा जाय। पिछले लोग क्या सोचते, क्या कहते और क्या करते रहे हैं इसकी जानकारी उत्तम है, उसके सहारे तथ्यों तक पहुँचना सरल पड़ता है, पर यह मानकर नहीं चला जा सकता कि जो जाना या माना गया है उसमें संशोधन या सुधार की गुंजाइश नहीं हैं। तथ्यों को स्वीकार करने की शोध दृष्टि में यह साहस रहता है कि यदि प्रचलित स्वीकृतियों से भिन्न प्रकार के तथ्य सामने आते हैं तो उनके स्वीकार करने में इसलिए असमंजस न करना पड़ेगा कि अब तक के चिन्तन को झुठलाना पड़ेगा।

तर्कहीन मनःस्थिति का नाम धार्मिकता नहीं हैं। आँखें बन्द करके किसी के भी वचन को गले नहीं उतारना चाहिए। अपने लोग कहते हैं या पराये− बात संस्कृत या अरबी भाषा में कही गई है अथवा बोलचाल की भाषा में, इससे कुछ बनता-बिगड़ता नहीं। स्वीकार करने योग्य वही है, जिनमें तथ्य जुड़े हुए हों और जिसे विवेक की कसौटी पर खरा सिद्ध किया जा सके। बिना खोज परख के जो धर्म के नाम पर किसी भी मान्यता या प्रथा को स्वीकार कर ले वह स्वस्थ दृष्टि नहीं है। धार्मिक मन सत्य का उपासक होता है उसे औचित्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं चाहिए। भले ही इसके लिए उन्हें पूर्वजों की अथवा उपदेशकों, ग्रन्थों अथवा साथियों की ही अवहेलना क्यों न करनी पड़े।

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चेतना का हाथी भौतिकी की सुतली से न बाँधे

मानवी सत्ता की व्याख्या भौतिकी नियमों के आधार पर ही प्रस्तुत करने के लिए हमें न तो आतुर होना चाहिए और न आग्रही। पदार्थ विज्ञान का जन्म और अभिवर्धन कुछ शताब्दियों का है जबकि सृष्टि का जीवन अरबों, खरबों वर्षों का। हर्मनवेल के अनुसार, “हम प्रकृति के रहस्यों का परिचय प्राप्त करने की दिशा में क्रमशः बढ़ रहे हैं। इसमें अधीर नहीं हो रहे हैं, फिर चेतना के रहस्यों को जानने के लिए विज्ञान की वर्तमान अपरिपक्व स्थिति को ही क्यों प्रमाण भूत आधार मानें? हमें धैर्य रखना होगा और वैज्ञानिक प्रगति की उस स्थिति के लिए प्रतीक्षा करनी होगी जहाँ पहुँच कर वह चेतना विज्ञान को भी अपने साथ सम्मिलित कर सके और अपने विकसित ज्ञान के आधार पर जीवन तत्व की व्याख्या कर सके।”

शरीर शास्त्री सर चार्ल्स शैरिंगटन ने अपनी पुस्तक ‘मैन आन हिज नेचर’ में लिखा है−”चेतना के स्तर की परीक्षा हम ऊर्जा नापने के उपकरणों से नहीं कर सकते। भावनाएँ और विचारणाएँ किस स्तर की है और व्यक्ति के आदर्श एवं आचरण किस श्रेणी के हैं, यह जानने के लिए किसी शरीर का रासायनिक विश्लेषण करने से क्या काम चलेगा? व्यक्तित्व अपने आप में एक रहस्य है उसकी गहराई में उतरने के लिए वे परीक्षण पद्धतियाँ असफल ही रहेंगी जो कोशिकाओं एवं ऊतकों की संरचना तक ही हाथ लेकर समाप्त हो जाती है। मनुष्य का कलेवर ही पदार्थों से बना है इसलिए इसी का विश्लेषण, वर्गीकरण तत्व परीक्षा द्वारा सम्भव हो सकता है। चेतना एवं उसके स्तर जिस संरचना से बने हैं उनका निरूपण एवं सुधार परिवर्तन करने के लिए भौतिकी के नियम, परीक्षण एवं उपकरण निरर्थक ही सिद्ध होंगे।”

भौतिकी में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो0 ई॰ पी0 बिगनर ने कहा है−”आधुनिक भौतिकी के सिद्धान्तों से चेतना की संरचना−स्थिति एवं उतार−चढ़ावों की व्याख्या नहीं हो सकती। जिन कारणों से चेतना में उभार, उतार, चढ़ाव, परिवर्तन आते हैं और उत्थान पतन के आधार खड़े होते हैं वे तत्व कुछ और ही हैं। वस्तुओं को जिस आधार पर प्रभावित परिवर्तित किया जाता है वे सिद्धान्त चेतना का परखने और सुधारने के लिए किसी प्रकार काम नहीं आ सकते। मस्तिष्क विद्या शरीर के एक अवयव की हलचलों का विश्लेषण तो कर सकती है, पर उस आधार पर किसी के विचार बदलने या सम्वेदनाओं को प्रभावित करने जैसे प्रयोजन बहुत ही स्वल्प मात्रा में हो सकते हैं। भौतिकी के आधार पर चेतना की व्याख्या करने के लिए जो प्रयत्न किये जाते हैं, उनमें विसंगतियाँ ही भरी रह जाती हैं।”

पदार्थ विज्ञान प्रकृति के विवरण प्रस्तुत कर सकता है पर उसकी संरचना एवं हलचलों के पीछे सन्निहित उद्देश्यों पर प्रकाश नहीं डाल सकता। परमाणु, उप−परमाणु, जीन, जीवाणु, कम्पन, ऊर्जा, प्रकाश, विकरण का स्वरूप ही भौतिकी हमें बता सकती है, पर यह नहीं बता सकती कि ब्रह्माण्ड में भरा हुआ पदार्थ किस लिए इतनी द्रुतगति से कहाँ दौड़ता चला जा रहा है? आकाशगंगाओं की विशालता और ग्रह−नक्षत्रों की मध्यवर्ती दूरी को नापने से हमारा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? जब तक यह पता न चले कि उनका अस्तित्व किस उद्देश्य की पूर्ति में संलग्न है। भौतिकी ही यदि सब कुछ है तो उसकी व्याख्या में इतना और जोड़ना चाहिए कि यहाँ सब कुछ निरुद्देश्य है। यदि पदार्थों और हलचलों का कोई उद्देश्य नहीं तो फिर मनुष्य की सत्ता का−उसकी जीवन सम्पदा का ही कुछ प्रयोजन क्यों होगा? उद्देश्य रहित अस्तित्व के लिए न कुछ कर्त्तव्य है और न अकर्त्तव्य। फिर नीति नियम, अनुशासन और आदर्श की बात करना भी व्यर्थ है। भौतिकी ही यदि सब कुछ है और तत्व−दर्शन निरर्थक है तो समझना चाहिए कि हम निरर्थक दुनिया में, निरर्थक जीवनयापन कर रहे है और अपनी उच्छृंखलता पर निरर्थक ही अंकुश लगाने की बात सोच रहे हैं। यदि भौतिकी उन्हीं निष्कर्षों तक हमें पहुँचाती है तो उस उपलब्धि की तुलना में आदिमकाल का पिछड़ापन किसी प्रकार भी बुरा नहीं ठहराया जा सकता।

दार्शनिक कोयरे के अनुसार- “विज्ञान ने अविज्ञान पर से बहुत से पर्दे उठाये हैं और अनजान स्थिति को हटाकर जानकारी की सम्पन्नता प्रदान की है। उस पर भी एक बड़ी हानि यह हुई है कि प्रत्यक्ष मनुष्य, अप्रत्यक्ष होता चला गया है और क्रमशः लुप्त होने के निकट जा पहुँचा है।”

विज्ञान के अनुसार परमाणु और जीवाणु का तो अस्तित्व है, पर चेतना का नहीं। कुछ समय पहले वेदान्ती इस संसार को माया, मिथ्या, स्वप्न और भ्रम बताया करते थे। अब विज्ञान ने उलट कर हमला किया है और यह कहना आरम्भ कर दिया है कि मनुष्य की सत्ता माया, मिथ्या, स्वप्न और भ्रम है। मनुष्य का न कोई अस्तित्व है और न उद्देश्य। जो कुछ है केवल पदार्थ ही है। पदार्थ ही सोचता है, चाहता है, यह कहते भी नहीं बनता फिर जो मनुष्य सामने खड़ा है और विज्ञान को उपार्जित करता है वह स्वयं क्या हैं? क्या वह विज्ञान की उपज है अथवा विज्ञान में ही विलीन होने जा रहा है।

भौतिकी के स्वरूप का निर्धारण और इतिहास को क्रमबद्ध बनाने वाले इर्विन श्रेन्डिगर ने अपनी प्रतिपादित “सीक फार दि रोड” में लिखा है पदार्थ का मूल स्वरूप, कण है या तरंग, यह विवाद उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना कि जड़ और चेतन के पारस्परिक सम्बन्धों की गुत्थी सुलझाना। क्या जड़ ही एक स्थिति में चेतन बन जाता है? अथवा क्या चेतना स्वयं ही जड़ है। क्या मात्र इस संसार में पदार्थ ही पदार्थ हैं? चेतना का कोई स्थायित्व या अस्तित्व भी है या नहीं, यह असमंजस भौतिकी ने उत्पन्न किया है। या तो उसे अपनी बात प्रमाणित करके यह घोषणा करनी चाहिए कि भौतिकी ही सब कुछ है, चेतना ही पृथकता या प्रमुखता की बात व्यर्थ है। अथवा दर्शन को इस स्तर के प्रमाण संचय करने चाहिए कि छाया हुआ असमंजस दूर हो सके और चिन्तन को आस्ति और नास्ति के बीच कोई स्वरूप दिशा धारा मिल सके।

कोयरे ने झल्ला कर कहा है कि−‘‘यह कितनी विचित्र बात है कि विज्ञान ने हर पदार्थ को मान्यता दी है किन्तु मनुष्य का अस्तित्व ही मानने से इनकार कर दिया है। कभी धर्म गुरु कहते थे जो हमारे साथ नहीं चलेगा वह जहन्नुम में जायगा और अब विज्ञानी ने लगभग वैसी ही पहेली प्रस्तुत की है और कहना आरम्भ किया है जो विज्ञान को स्वीकार करेगा वह अपनी हस्ती ही गँवा बैठेगा।”

चेतना के अस्तित्व को अमान्य ठहराना और उसकी अवमानना करना मात्र वैज्ञानिक एवं दार्शनिक विवाद ही नहीं है। उसके निर्णय का प्रभाव मनुष्य की नैतिक, संस्कृति, समाज व्यवस्था पर भी पड़ता है। उतावली में ‘अस्वीकृति’ के प्रति आग्रह जमा लिया जाय तो उसका तात्कालिक प्रभाव यह होगा कि मानवी गरिमा का मूल्यांकन स्वतः मनुष्य की अपनी ही आँखों में हो जायगा। जब वह कुछ है ही नहीं, रासायनिक पदार्थों से बना ढकोसला ही जब उछल−कूद कर रहा है और उसका अस्तित्व क्षण भर का है तो फिर नीति और धर्म का अनुशासन मानकर कष्टसाध्य जीवन जीना निरर्थक है। तब फिर बुद्धिमत्ता इसी में है कि इन क्षणों में जितना अधिक मौज−मजा लूटा जाय उससे वंचित न रहा जाय। भले ही इसके लिए प्रचलित नीति मर्यादाओं का अतिक्रमण ही क्यों न करना पड़े?

आत्म−गौरव का तब कोई महत्व नहीं रह जाता जब अपना अस्तित्व ही संदिग्ध है। ऐसी दशा में समाज व्यवस्था के प्रति अपना योगदान करने को प्रवृत्ति ही क्यों उठेगी। तब देशभक्ति, समाज सेवा, लोकहित, परमार्थ जैसे उन आदर्शों का कोई मूल्य नहीं रह जाता जिनके ऊपर व्यक्ति की श्रेष्ठता का स्वरूप बताने और उसे अपनाने वाले को श्रेय सम्मान देने की परम्परा चलती रही है। नास्तिकता की प्रतिक्रिया चरित्र−निष्ठा और समाज−निष्ठा पर सीधा कुठाराघात करती है। उनका आस्था परक मूल्य समाप्त करती है फिर समाज व्यवस्था के नाम पर जो अनुशासन लादा जाता है वह कोई दर्शन नहीं रह जाता। मात्र व्यवहार रह जाता है। ऐसे व्यवहार को स्वार्थ साधन के लिए तोड़ फेंकने में किसी को कोई संकोच नहीं हो सकता।

आज धर्म और अध्यात्म की सूत्र संचालक आस्था−आस्तिकता− के प्रति लोकश्रद्धा, व्यक्तिवाद और विलासी दृष्टिकोण के कारण स्वतः ही गिरती चली जा रही है फिर यदि नास्तिकता को दार्शनिक और वैज्ञानिक मान्यता भी मिल गई तो उसे शोध की प्रगति या अन्य जो भी नाम दिया जाय, माना और गर्व किया जा सकता है किन्तु उसका दुष्परिणाम उस संचित पूँजी को गँवाने के रूप में ही सामने आवेगा जिसे मानवी प्रयासों की लम्बी शृंखला के उपरान्त बड़ी कठिनाई से गढ़ा गया है। उच्चस्तरीय आस्थाओं का बाँध तोड़ देने के उपरान्त तो रही बची आशा भी समाप्त हो जायगी। तब चरित्र संकट की अराजकता की प्रतिक्रिया मनुष्य को मनुष्य द्वारा फाड़−चीरकर न सही निचोड़ने, चूसने और दबाने के रूप में तो प्रस्तुत होगी ही। तब नीति और न्याय का समर्थन उथले और उपहासास्पद तर्कों के सहारे ही किया जा सकेगा और उसके किसी के गले उतरने की आशा नहीं ही की जायगी।

भारतीय नास्तिकवाद में चार्वाक दर्शन प्रसिद्ध है। उनके मत का संक्षिप्त विवेचन इन दो श्लोकों में हुआ है।

देहस्थौल्यादियोगाच्च स एवात्मा न चापरः। न स्वर्गो नापवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिकः॥ यावज्जीवं सुखं जीवेद्ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥

अर्थात्−काया पंच तत्वों के सम्मिलन से बनी है। यह सम्मिलन ही आत्मा है। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं। स्वर्ग, अपवर्ग, आत्मा, परलोक आदि कहीं कुछ नहीं है।

इस मान्यता का फलितार्थ क्या होता है? इसका स्पष्टीकरण दूसरे श्लोक में देखा जा सकता है। जब आत्मा, कर्मफल, परलोक, पुनर्जन्म आदि कुछ है ही नहीं तो फिर जिस तरह भी हो उसी प्रकार स्वार्थ सिद्ध करने और मौज−मजा लूटने के लिए प्रयत्न करना ही अक्लमंदी है। फिर नीति, धर्म, समाज, सदाचार आदि पर ध्यान क्यों दिया जाय? और उनके बन्धनों में बँध कर अपनी सुविधाओं में कमी क्यों की जाय? दूसरे श्लोक में यही निष्कर्ष है। चार्वाक कहते हैं−

“जब तक जीना सुख से जीना−कर्ज लेकर भी घी पीना। देह तो भस्मी भूत है। फिर आने का तो सवाल ही नहीं।” इसी दिशा में जो मौज−मजा सम्भव हो इसी समय कर लेने की बात ही सही जँचती है। पुण्य परमार्थ, संयम, सदाचार, सेवा आदि के लिए ऐसी मनःस्थिति में कोई स्थान नहीं रह जाता।

चार्वाक की तरह ईसा से 300 वर्ष पूर्व यूनान का दार्शनिक एपीक्यूरस भी इसी मत का प्रतिपादन करता था। इसने भी प्राणी को पदार्थ कहा है और चेतना को काया का उत्पादन कहा है। इतने पर भी वह इस शंका समाधान करने में असमर्थ रहा कि यदि चेतना काया का धर्म है तो मरने के बाद वह काया से अलग क्यों हो जाती है? जबकि प्रत्येक पदार्थ का गुण उसके साथ अविच्छिन्न रूप से बना ही रहता है।

इससे अधिक स्पष्ट निष्कर्ष जर्मन वैज्ञानिक हेकल ने निकाला है। उनने अपने ग्रन्थ ‘दि रिडल आव दि युनिवर्स’ में यह सिद्ध किया है कि परमाणु में मात्र हलचल ही नहीं चेतना भी मौजूद है और वह अपने ढंग से उसी प्रकार आगे−पीछे सोचती है जैसा कि प्राणियों की सत्ता।

मानवी सत्ता की व्याख्या प्रयोगशाला के निष्कर्षों के आधार पर ही की जाय यह आवश्यक नहीं। प्रत्यक्ष ही सब कुछ नहीं हैं। उन भाव सम्वेदनाओं का महत्व तो दूर उनके अस्तित्व का कोई कारण तक सिद्ध नहीं किया जा सका जिनके ऊपर भावनाओं का आधार खड़ा हुआ है। स्पष्ट है कि यदि भाव तत्व हटा दिया जाय तो फिर मनुष्य सचमुच ही एक चलता−फिरता पौधा अथवा सोचने, हँसने वाला यन्त्र भर बनकर रह जायगा।

अधूरा प्रत्यक्षवाद यदि चेतना की व्याख्या करने में अतिशय उतावली करेगा। अपने साधन की अपूर्णता का ध्यान न रखेगा तो यह अत्युत्साह उस मानवी प्रगति की जड़ पर कुठाराघात ही करेगा जिसका एक अंग स्वतः विज्ञान है।

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आत्म-निर्माण के अधिकारी

श्रावस्ती परम्परावादियों का गढ़ है आर्य श्रेष्ठ! आनन्द ने परामर्श दिया−”वहाँ जाने की अपेक्षा यदि राजगृह की परिव्रज्या की जाये तो यह उत्तम रहेगा। अभी संघ का संक्रान्ति काल है जब तक जड़े सुदृढ़ नहीं हो जातीं, संघ−शक्ति समर्थ नहीं हो जाती तब तक संघर्ष की नीति उचित नहीं हैं।”

तात! तुम्हारा कथन ठीक है, तथागत ने समाधान किया−किन्तु युग प्रवर्त्तक के लिए परिस्थितियों से समझौता करने की नीति भी अनुचित है। सिद्धान्त के प्रति अटूट निष्ठा व्यक्त किये बिना प्रामाणिकता सिद्ध नहीं की जा सकती। अस्तु विवाद की चिन्तां किये बिना श्रावस्ती में ही आयोजन रखा जाना ठीक है।

तथागत श्रावस्ती पधार रहे हैं, यह संवाद सर्वत्र फैलते देर न लगी। प्रतिक्रियावादी तत्वों ने यह सुना तो उन्होंने अपना नया मोर्चा खड़ा कर दिया। अश्वलायन के नेतृत्व में कट्टरपंथी ब्राह्मणों ने बुद्ध से शास्त्रार्थ की रूपरेखा बनाई और नियत समय पर वे तथागत के समक्ष आ धमके और उनकी भर्त्सना करते हुए पूछा−‘‘भन्ते! आप चारों वर्णों के उद्धार की बात किस आधार पर करते हैं? क्या ब्राह्मणों के अतिरिक्त धर्म दीक्षा का अधिकार और भी किसी को है।”

तथागत मुस्कराये−उन्होंने स्नेहपूर्वक प्रश्न किया−तात! क्या आप बता सकते हैं कि ब्राह्मणों की सर्वोपरिता का आधार क्या हैं?

अश्वलायन ने गम्भीरतापूर्वक उत्तर दिया−उनका ज्ञान,तप, साधना, ब्रह्मवर्चस् और निर्लोभ निरहंकारिता।

आप सच कह रहे हैं आचार्य प्रवर! भगवान् बुद्ध ने अब और अधिक गम्भीरता धारण करते हुए प्रश्न किया−”क्या आप इस बात की पुष्टि करेंगे कि ब्राह्मण चोरी नहीं करते, झूठ नहीं बोलते, व्यभिचार और दूसरी सामाजिक बुराइयाँ वे नहीं करते?”

मेरा यह तात्पर्य नहीं है भन्ते! यह अवगुण तो ब्राह्मण में भी होते हैं, किन्तु उनमें धार्मिक संस्कारों की बहुलता रहती है इसलिए वे श्रेष्ठ हैं− अश्वलायन ने अपने प्रतिपादन में दृढ़ रहने की चेष्टा की।

किन्तु तभी तथागत ने तूणीर से दूसरा बाण निकाला और यों सन्धान किया− तब फिर आपका कथन यह होना चाहिए कि उक्त अपराध करने पर ब्राह्मण नरक नहीं जायेंगे अर्थात् पतित नहीं होंगे जबकि दुष्कर्म करने के कारण अन्य वर्ग पतित समझे जाते हैं।

गौतम बुद्ध ने हँसते हुए कहा−‘‘ब्राह्मण श्रेष्ठ अश्वलायन! जिस तरह दुष्कर्म का दण्ड भुगतने के लिए हर प्राणी प्रकृति का दास है, उसी तरह सत्कार्य के पारितोषिक का भी अधिकार हर प्राणी को है फिर वह चाहे किसी भी वर्ण का हो। न तो उपनयन धारण करने से कोई संत और सज्जन हो सकता है न अग्निहोत्र से−यदि मन स्वच्छ है, अन्तःकरण पवित्र है तो ही व्यक्ति संत, सज्जन, त्यागी, तपस्वी और उदार हो सकता हैं। यह उत्तराधिकार नहीं साधना है अश्वलायन। इसलिए आत्मोन्नति का अधिकार हर प्राणी को है। इसीलिए हम मानव मात्र को आत्मोत्कर्ष, आत्म−शुद्धि की प्रेरणा और अवसर प्रदान करते हैं। सोचो यदि थोड़े से संत ब्राह्मण धरती को स्वर्ग बना सकते हैं तो हर व्यक्ति के अन्तःकरण में मुखरित ब्राह्मण सृष्टि को सुन्दर बना सकता है। यही तो ब्राह्मण के लिए अभीष्ट है अतएव यदि ब्राह्मण इन पुण्य प्रयत्नों में बाधा डालते हैं तो यह उनकी प्रतिगामिता नहीं हुई क्या?

अब अश्वलायन के पास कोई उत्तर न था, उन्होंने तथागत के आदर्श को न केवल मान्यता प्रदान की अपितु स्वयं धर्म चक्र प्रवर्तन के महान कार्य के सहायक बन गये।

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आत्म प्रगति के आधारभूत साधन योग और तप

अध्यात्म विज्ञान की−ब्रह्म विद्या की दो धाराएं हैं। एक साधना, दूसरी उपासना। साधना का तात्पर्य है अपना चिन्तन उत्कृष्टता के और कर्तृत्व आदर्शवादिता के ढाँचे में ढालना। अनगढ़ जीवन को सुगढ़ बनाना। बैल, घोड़ा, रीछ, बानर, सर्प, सिंह जैसे पशुओं को सधा लेने से वे कितने उपयोगी सिद्ध होते हैं और पालने वालों का कितना हित साधन करते हैं यह स्पष्ट देखा जाता है। कुम्हार साधारण मिट्टी से कितने सुन्दर खिलौने बना देता है। मूर्तिकार पत्थर से देव प्रतिमा गढ़ता है। चित्रकार अपनी कला से सामान्य कागज को हृदयस्पर्शी चित्र का रूप देता है। माली का कौशल सामान्य वनस्पतियों को सुरम्य उद्यान में बदल देता है। शरीर की साधना करके पहलवान−मस्तिष्क की साधना करके विद्वान−श्रम साधना करके धनवान बनते रोज ही देखा जाता है। स्वर्णकार के हाथों में जाकर धातुखण्ड आभूषण के रूप में और सामान्य लोहा औजारों के रूप में परिणत होता है। मनुष्य की हाड़−मांस से बनी काया जीवन साधना के सहारे महामानव, मनीषी ऋषि, देवता एवं परमात्मा के रूप में विकसित हुई देखी जा सकती है। ‘साधन से सिद्ध’ की उक्ति इतिहास के पृष्ठों पर और वर्तमान के पर्यवेक्षण में हम पग−पग पर सार्थक होते देखते हैं।

स्वाध्याय, संयम, सेवा के अतिरिक्त जीवनोत्कर्ष का अति महत्वपूर्ण आधार साधना ही है। अस्त−व्यस्तता को, व्यवस्था में, अनुशासन में बदलने से अपने भीतर से ही ऐसा नया उभार, नया वर्चस् उत्पन्न होता है इसी को अप्रत्याशित दैवी अनुग्रह जैसा चमत्कार समझा जाने लगता है। आत्म चिन्तन द्वारा दोष दुर्गुणों को ढूँढ़ निकालना, आत्मसुधार द्वारा विकृतियों की जड़ें उखाड़ना, आत्म−निर्माण द्वारा सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव का अंग बनाना, आत्मविकास द्वारा आत्मीयता का क्षेत्र सुविस्तृत करते जाना, यही हैं वे चतुर्विधि प्रयोग जिनके सहारे जीवन जाना−यही हैं वे चतुर्विधि प्रयोग जिनके सहारे जीवन साधना सम्पन्न होती है इन्हीं आधारों को अपनाने से आत्मोत्कर्ष के लिए की गई योगाभ्यासी तपश्चर्याओं में उत्साहवर्धक सफलता मिलती है।

उपासना आत्मचेतना की प्रस्तुत क्षमताओं को उभारने का वैज्ञानिक प्रयोग है। रसायन शास्त्री विषैले पारे को अमृतोपम मकरध्वज बना देते हैं। वैज्ञानिक सामान्य रेत से प्रचण्ड अणुशक्ति का उद्भव करते हैं। सामान्य पानी और डिसिल्ड वाटर की उद्भव करते हैं। सामान्य पानी और डिसिल्ड वाटर की क्वालिटी में बड़ा अन्तर होता है। कच्चे लोहे को परिष्कृत करके बहुमूल्य फौलाद बनाया जाता है। इसी प्रकार साधना से व्यक्तित्व का असाधारण विकास होता है। फलतः उसमें अनेकानेक सफलताएं खींच बुलाने की सामर्थ्य उत्पन्न हो जाती है। वृक्षों का चुम्बकत्व आकाश में उड़ते हुए बादलों को खींच लेता है और उन्हें जल बरसाने के लिए विवश करता है। फूल जब खिलता तो भौंरे, मधुमक्खी, तितली, सभी उसका मनुहार करने आते हैं। प्रतिस्पर्धा में जीतने वालों को पुरस्कार मिलता है। अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने वाले छात्रवृत्ति प्राप्त करते हैं। वर्षा चाहे कितनी ही क्यों न होती रहे पल्ले उतना ही पड़ेगा जितना कि अपने बर्तन का घेरा हो। स्वाति वर्षा के जल से कुछ विशिष्ट सीपों में ही मोती उत्पन्न होते हैं, सब में नहीं। आत्म शोधन की धुलाई जितनी अच्छी तरह से हो सकेगी उतनी ही भगवद्भक्ति की साधना उपचारों की रंगाई का प्रभाव दिखाई देगा।

साधना के दो चरण हैं एक ‘योग‘ दूसरा ‘तप’। योग का अर्थ है अपने को लिप्सा और लालसा के भव−बन्धनों से मुक्त करके आदर्शवादिता के प्रति आत्मसमर्पण। ईश्वर को आत्मसमर्पण करना उसी प्रकार होता है जैसा कि नदी अपने आप को समुद्र में, ईंधन आग में और पतंग दीपक में अपनी सत्ता घुला देते हैं। अपनी भौतिक महत्वाकांक्षाओं को लालसा और लिप्साओं को पैरों तले रौंदकर ईश्वरीय संकेतों और आदर्शों का अनुसरण करने का साहस जुटाते हैं। योगी की यही मनःस्थिति होती है। आत्मसमर्पण का यही रूप है। ईश्वर के हाथों अपने जीवन की बागडोर सौंप कर सत्कर्मों, सद्-विचारों एवं सद्भावों को कार्यान्वित करने में जो संलग्न हैं वस्तुतः वही सच्चा भगवत् भक्त और सच्चा योगी है।

तप का अर्थ है तपाना। उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता अपनाने में जो कष्ट उठाने पड़ते हैं उन्हें साहस एवं प्रसन्नता के साथ आमन्त्रित एवं शिरोधार्य करना। ‘चरित्र निष्ठा’ की कसौटी और ‘समाज निष्ठा’ की अँगीठी पर हम अपने आपको तपाकर प्रामाणिकता सिद्ध करने वाले ‘तपस्वी’ ही ईश्वर के साथ अपने आपको जोड़ पाते हैं। जुड़ जाने का अर्थ है उसके आदेशों का अनुसरण करना, पतिव्रता को पति की इच्छानुकूल चलना पड़ता है। भक्त के लिए उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व के रूप में ईश्वरीय आदेशों के अनुरूप अपने दृष्टिकोण एवं क्रिया-कलाप को ढालने का साहस जुटाना पड़ता है। इस साहसिकता को व्यवहार में उतारना ही तप साधन है।

ईश्वर के साथ अपने आपको जोड़ने में जीवन परिष्कार की साधना के अतिरिक्त अन्तःकरण में श्रद्धा तत्व विकसित करने के लिए उपासना का अवलम्ब न लेना पड़ता है। स्थूल शरीर की साधना कर्मयोग से सूक्ष्म शरीर की ज्ञान योग से सम्भव होती है। इसके लिए क्रिया कलाप और दृष्टिकोण में उत्कृष्टता का समावेश करना पड़ता है। जीवात्मा का तीसरा कलेवर ‘कारण’ शरीर है। उसका परिष्कार श्रद्धा के बीजारोपण एवं अभिवर्धन से ही हो सकता है। इसके लिए उपासना की प्रक्रिया अपनाई जाती है। ईश्वर और जीव को परस्पर जोड़ने का कार्य श्रद्धा के सहारे ही सम्भव होता है। आत्मिक पवित्रता एवं प्रखरता बढ़ाने के लिए उपासना को एक प्रकार से अनिवार्य आधार ही माना जाता रहा है। यह तीसरा आधार भक्ति योग है। ज्ञान कर्म और भक्ति का समन्वय होने से त्रिवेणी संगम बनता है। यही त्रिपदा गायत्री का स्वरूप एवं उद्देश्य है।

उपासना को नित्य कर्म में सम्मिलित रखने की शास्त्र मर्यादा है। ऋषियों ने इसे आवश्यक धर्म कर्तव्य माना है। वातावरण में घुमड़ती रहने वाली विकृतियों के अवांछनीय प्रभाव का परिशोधन करने के लिए उपासना द्वारा स्वच्छता व्यवस्था रखी जाती है और अन्तरात्मा का प्रवाह, परमशक्ति की समीपता तक पहुँचने की दिशा में बहता रहता है। ईश्वर के साथ गहरी घनिष्ठता उत्पन्न करने और उस सम्पर्क से सब प्रकार सुसम्पन्न बनने का अवसर मिलता है। समर्थ तत्वों में सर्वोपरि ईश्वर है। उपासना के आधार पर उसके साथ घनिष्ठता उत्पन्न कर लेना परम पुरुषार्थ है। इससे अधिक महत्वपूर्ण एवं लाभदायक दूसरा और कोई प्रयास हो ही नहीं सकता। जीवन को हर दृष्टि से समृद्ध, सशक्त एवं समुन्नत बनाने में ईश्वरीय अनुग्रह की जितनी उपयोगिता है उसकी तुलना और किसी सिद्धि एवं उपलब्धि के साथ हो नहीं सकती।

उपासना को बीज कहा जाय तो साधना को भूमि मानना पड़ेगा। उपासना के क्रिया कृत्यों में संकेत रूप में जीवन साधना का ही मार्गदर्शन है। उपासना को व्यायाम कहा जाय तो साधना को आहार-विहार की उपमा दी जायगी। उपासना उसी की फलित होती है जो उसे साधना के खाद पानी से सींचता है। उपासना को मनुष्य की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता है। इस आधार पर उस अनन्त जीवन−कर्म फल, उत्कृष्टता की सर्वोपरि सत्ता मर्यादा और अनुशासन की सृष्टि व्यवस्था समग्र पवित्रता जैसे महत्वपूर्ण तथ्यों पर आस्था बनी रहती है आत्मा को परमात्मा बनने के लिए उपासना से प्रेरणा मिलती है। ऐसे ही अनेक सत्परिणाम उपासना प्रक्रिया के साथ जुड़े हुए हैं और उसे आवश्यक धर्म कृत्य माना गया है।

इतने पर भी यह तथ्य सुनिश्चित है कि उपासना की प्रेरणा से अथवा स्वतन्त्र रूप से आध्यात्मिक प्रगति के पथिक को आत्म−शोधन एवं आत्म निर्माण की प्रचण्ड संकल्प शक्ति के साथ प्रखर चेष्टा करनी पड़ती है। अभ्यास न होने के कारण उस परिवर्तन में जो कठिनाई अनुभव होती है उसे प्रसन्नता और साहसिकता के साथ स्वीकार करना पड़ता है। इस प्रयत्नशीलता को शास्त्रकारों ने तपश्चर्या नाम दिया है। इसमें शरीर और मन की दिशा धाराओं को उत्कृष्टताओं के साथ जोड़ना पड़ता है। आत्म परिष्कार एवं आत्म विकास के लिए योग साधना की तरह, चिन्तन में उत्कृष्टता के समन्वय की तरह ही कर्म क्षेत्र में आदर्शवादिता को भी अविच्छिन्न बनना पड़ता है। योग और तप दोनों की ही आत्मिक प्रगति के लिए अनिवार्य आवश्यकता है।

तपश्चर्या का मार्ग साहसी शूरवीरों का है। पराक्रमी और पुरुषार्थी ही अपने−अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त करते रहे हैं। अपनी विकृति एवं मूर्छना के रूप में दृष्टिगोचर होने वाले सैकड़ों कुसंस्कार ही दुष्ट कौरव हैं। उन्हीं से अपने मित्र एवं भक्त अर्जुन को लड़ा देने का आग्रह भगवान् कृष्ण कर रहे थे। इसके लिए आवश्यक उद्बोधन और साहस देकर उन्होंने अर्जुन को महाभारत में प्रवृत्त किया था और स्वयं उसका रथ चलाया था। साधना समर के रूप में यही महाभारत हर साधक को लड़ने के लिए अर्जुन जैसी भूमिका निभानी पड़ती है। वासना, तृष्णा, अहंता के शत्रुओं को परास्त कर लेने पर उस दिव्य साम्राज्य का स्वामित्व हाथ में आता है। उसकी तुलना में संसार क्षेत्र के चक्रवर्ती राज्य और कुबेर की धनराशि को भी तुच्छ कहा जा सकता है।

छोटे-बड़े कामों में उनके स्तर के अनुरूप तत्परतापूर्वक आवश्यक प्रयत्न एवं साहस जुटाने वाले ही सफलता प्राप्त करते हैं। आत्मिक जगत की विभूतियों को उपलब्ध करने का भी यही उपाय है। सस्ती पगडण्डी ढूँढ़ना व्यर्थ है। उचित मूल्य चुकाने पर ही आवश्यक वस्तुएं खरीदी जाती हैं। कम श्रम और कम त्याग करने पर मन बहलाने मात्र की नकली वस्तुएं ही हाथ लग सकती हैं। आत्मोत्कर्ष एवं ईश्वरीय अनुग्रह जैसी महान् विभूतियों के लिए तपश्चर्या युक्त योग साधना आवश्यक है। यह कठिन नहीं सरल है। इस मार्ग पर कोई भी बाल−वृद्ध, नर−नारी अपनी−अपनी स्थिति के अनुरूप छोटे या बड़े कदम बढ़ाते हुए बढ़ सकता है। इसमें असफलता का या विपरीत परिणाम का कोई खतरा नहीं है। हाँ, जो जितना श्रम एवं साहस जुटा सकेगा उसे उसी अनुपात की उपलब्धियाँ मिल सकेंगी, इतना तो स्पष्ट है।

भागीरथ ने धरती पर गंगा लाने की, स्वयं श्रेय पाने की और संसार का कल्याण करने की सफलता तप साधना से ही प्राप्त की थी। हिमिराज की मानुषी कन्या पार्वती ने महाशिव की अर्धांगिनी बन सकने की सफलता तप के सहारे ही उपलब्ध की। ध्रुव ने तप का आश्रय लेकर ही परम पद पाया। विश्वामित्र तप बल की सामर्थ्य से ही दूसरे प्रकार की सृष्टि बनाने का साहस कर रहे थे। तपस्वी दधीचि की अस्थियों के बने वज्र द्वारा ही दुर्दान्त दैत्य वृत्तासुर मारा जा सका। ब्रह्माजी ने तप की शक्ति से ही यह सृष्टि बनाई। परशुराम ने अनीति का भार भूतल पर से उतारने की प्रचण्डता तप बल के सहारे ही प्राप्त की। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त से, समर्थ रामदास ने शिवाजी से, परमहंस ने विवेकानन्द से, सन्दीपन ने कृष्ण से, विश्वामित्र ने राम से अनेक महत्वपूर्ण कार्य अपनी तपःशक्ति के अनुदान देकर ही सम्पन्न कराये थे। मनु और शतरूपा ने तप करके भगवान को गोदी में खिलाने और मानवी आचार संहिता बनाने का श्रेय प्राप्त किया था। गौतम बुद्ध ने सामान्य मनुष्य से भगवान बना देते और युगक्रांति का संचालन करने की क्षमता तप साधना से ही प्राप्त की थी। महान् ऋषियों का प्रधान बल उनकी तप सम्पदा ही रही है। भगवान् राम अपने चारों भाइयों समेत अयोध्या छोड़कर हिमालय पर तप करने चले आये थे। पांडवों का अन्तिम जीवन भी इसी प्रयोजन में लगा था। प्राचीन काल की परिपाटी ही यह थी। ब्रह्मचर्य और गृहस्थ में आधा जीवन ही लगता था। जीवन के उत्तरार्द्ध को वानप्रस्थ और संन्यास की तप साधना में ही लगाया जाता था। हिन्दू धर्म वर्णाश्रम धर्म कहलाता है। इस परम्परा में व्यक्ति और समाज को सर्वतोमुखी सुव्यवस्था एवं प्रगति सन्निहित रही है।

चिन्तन की उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए विविध प्रयासों को योग कहते हैं और कर्म को आदर्श बनाने का नाम ही तप है। इसके लिए तप तितीक्षा अथवा भजन पूजन के क्रिया-कलाप जो भी अपनायें जाएं उनका मूल संकेत आत्म परिष्कार ही रहता है। इस दिशा में जितनी प्रगति होती है उसी अनुपात से ईश्वरीय अनुग्रह स्वार्थ मुक्ति एवं सिद्धि चमत्कार जैसी अनेकानेक भौतिक एवं आत्मिक उपलब्धियाँ मिलती चली जाती हैं।


Quotation

बुद्धि की शक्ति उसके उपयोग में है। बुद्धि को विश्राम देने से तो बुद्धि मन्द हो जाती है।

−अलेक्जेण्डर पोप

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मनुष्य क्षमता से नहीं, शालीनता से बड़ा है।

मनुष्य का बड़प्पन उसकी क्षमता पर नहीं, सद्भावना और सुसंस्कारिता पर निर्भर है। यदि शारीरिक और मानसिक दृष्टि से उसकी तुलना अन्य प्राणियों के साथ की जाय तो कितने ही जीवधारी ऐसे हैं जो उससे कहीं अधिक समर्थ और सुयोग्य सिद्ध होंगे।

सबसे लम्बा जन्तु जिराफ है और सबसे बड़ा स्थलीय जन्तु अफ्रीकी हाथी। चीता समस्त प्राणियों से दौड़ने में आगे है। लम्बाई और वजन की दृष्टि से जलचरों में ह्वेल अग्रणी है। मनुष्य इन सबसे बहुत पीछे है।

कुछ समुद्री जल−जन्तुओं को समय का इतना अच्छा ज्ञान होता है कि आश्चर्य से दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। सी−आर्चिन नामक कीड़े जब ऊपर आते हैं तो उनकी स्थिति देखकर यह जाना जा सकता है कि आज किस महीने की कौन तारीख है। प्रशान्त सागर के सेमोओ द्वीप के निकट पाया जाने वाला पैलीलों कीड़ा अक्टूबर और नवम्बर में अर्ध चन्द्र की ठीक तारीखों पर अण्डे देने सतह पर आता है और फिर डुबकी मारकर अपनी जगह चला जाता है। कैलीफोर्निया समुद्र तट पर पाई जाने वाली ग्रुनियन मछली ज्वार भाटों के क्रम से अपना प्रणय एवं प्रजनन कृत्य सम्पन्न करती है। कन्वेहिटा जन्तु वनस्पति और प्राणि वर्ग का सम्मिश्रित स्वरूप है। वह नियत समय पर धूप सेवन करने के लिए जल से बाहर आता है और अलग−अलग महीनों में अलग घण्टे का अपना वह क्रम पूरा करके पुनः पानी में उतर जाता है।

‘रिंग आफ ब्राइट वाटर’ पुस्तक में गैविन मेक्से वेल ने अपने पालतू ऊदबिलाव की समय परिपालन में पूर्ण सतर्क रहने की आदत का उल्लेख किया। यह ऊदबिलाव उनके बिस्तर में पैरों की तरफ साथ−साथ सोता था। उसे ठीक आठ बजकर बीस मिनट पर बिस्तर छोड़ने की आदत थी।

पलामू जिले के वेटला सुरक्षित वन में हाथियों के झुण्ड विचरते हैं। झुण्ड का एक बच्चा कुँए में गिर गया। हाथियों ने मिल−जुलकर उसे निकालने का प्रयत्न आरम्भ कर दिया। दो हथनियाँ बच्चे को सान्त्वना देने के लिए वहीं खड़ी रहीं। अन्य हाथी पैर और सूँड़ के सहारे कुँए के इर्द−गिर्द से मिट्टी खोदने और गड्ढे में धकेलने में लगे रहे। बारह घण्टे के प्रयत्न में उनने उस कुएँ को चौड़ा भी कर दिया और भर भी दिया। तब झुण्ड के हाथी बच्चे तक पहुँचने में सफल हो गये और बुद्धिमत्ता पूर्वक उसे सहारा देकर बाहर निकाल लाये।

क्षमता और बुद्धिमत्ता की दृष्टि से नहीं, मनुष्य की गरिमा जिस सज्जनता और शालीनता पर टिकी है उसी को बनाये रहने और बढ़ाने में उसे दत्तचित्त रहना चाहिए।

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आत्म-निरीक्षण और आत्म−नियंत्रण की आवश्यकता

संसार में क्या प्रिय है, क्या अप्रिय, इसका निर्णय बाह्य विवेचन के आधार पर नहीं अपनी मान्यताओं के आधार पर ही किया जा सकता है। जिस वस्तु या व्यक्ति के प्रति अपनापन जोड़ लिया जाय वही प्राण प्रिय प्रतीत होगा। जब वह आत्मीयता घट या मिट जाती है तो वही पदार्थ या व्यक्ति उपेक्षित अप्रिय बन जाते हैं। अपना मकान, अपने वाहन, अपने उपकरण कितने प्रिय लगते हैं और सदा साज−सँभाल रखने को जी करता है, पर जब उन्हें किसी के हाथ बेच दिया तो अपनापन घट जाने पर उनके टूटने, नष्ट होने का समाचार मिलने पर फिर कोई चिन्ता नहीं होती। इससे स्पष्ट है कि कोई पदार्थ स्वयं में प्रिय-अप्रिय नहीं होता। जड़ वस्तुओं में किसी प्रकार की अनुभूति देने की क्षमता नहीं होती। अपनी आत्मीयता का प्रकाश पड़ने पर ही वह चमकने एवं प्रकाश देने लगती है। यह प्रकाश बुझते ही वह फिर अन्धेरी जड़ नीरस बन जाती है।

यही बात व्यक्तियों के सम्बन्ध में है। जामाता बहुत प्रिय लगता है वह घर आता है तो सम्मान−सहयोग करने का पूरा ध्यान रहता है, पर यदि अपनी लड़की से उसकी पटरी न बैठे और तलाक हो जाय तो फिर वही जामाता अपरिचित जैसा लगता है। उसके मिलने पर तनिक भी प्रसन्नता नहीं होती और मुँह फेर लिया जाता है। व्यक्ति वही है। उसके गुण, दोष ज्यों के त्यों हैं। अन्तर इतना ही आया है कि पहले वह अपना सम्बन्धी था तब प्रिय लगता था। अब वह अपनापन समेट लिया गया तो वह उपेक्षणीय लगने लगा। अपना कुरूप बेटा भी प्रिय लगता है और पड़ोसी का सुन्दर बच्चा भी उपेक्षणीय दीखता है। व्यक्ति के गुण, दोषों का महत्व कम है। अपनापन ही प्रिय लगता है। अपनापन जिस पर हम आरोपित कर दें वही प्रिय लगने लगेगा। इस संसार के जितने अधिक पदार्थों को, प्राणियों को अपना मानेंगे उतना ही प्रियता का क्षेत्र बढ़ता जायगा। यदि पूरे विश्व के साथ अपनी आत्मीयता की परिधि बढ़ा दी जाय तो सर्वत्र आनन्द और उल्लास ही बिखरा पड़ा दिखाई देगा। आनन्द को ईश्वर का स्वरूप माना गया है। ईश्वर दर्शन का अर्थ है आनन्द का दर्शन। आनन्द और कुछ नहीं अपनेपन का प्रत्यारोपण करने की प्रतिक्रिया मात्र है। अपनापन जितना संकीर्ण होगा उतना ही स्वल्प आनन्द मिल सकेगा। शरीर भर को अपना समझें और उसी की तुष्टि−पुष्टि में लगे रहें तो तनिक से आनन्द की अनुभूति सम्भव होगी। यदि उस अपनेपन को पूरे परिवार में फैला दिया जाय तो वह परिकर भी अपनी ही उपार्जित सम्पत्ति लगेगा। एक कदम और आगे बढ़ा कर यदि देश, धर्म, समाज, संस्कृति तक उसे फैला दिया जाय, विश्वव्यापी बना दिया जाय तो धन कुबेर जितना चक्रवर्ती सम्राट्, जितना अपना बढ़ा−चढ़ा वैभव दिखाई पड़ेगा। अपने को सबमें और सबमें अपने को देखना ही तो आत्म−ज्ञान, आत्म−साक्षात्कार, आत्मोत्कर्ष आदि के नाम से वर्णन किया जाता है और उसे ही जीवन−लक्ष्य माना जाता है।

कुकल्पनाएँ हमें इतना अधिक कष्ट देती हैं जितना कि वास्तविक विपत्तियाँ भी नहीं दे सकतीं। चिन्ता, भय, निराशा, आशंका जैसी शरीर को और मन को अर्ध−मूर्छित बना देने वाली कितनी ही कुकल्पनाएँ हमारी प्रसन्नता और प्रगति को बेतरह नष्ट करती रहती हैं। इसी प्रकार अहंकार, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष, प्रतिशोध, कामुकता, लालच जैसी आक्रामक दुर्भावनाएँ हमें आतुर, उद्विग्न और अन्धा आवेशग्रस्त बनाकर ऐसे कृत्य कर डालने पर विवश कर देती हैं जिनके लिए चिरकाल तक पश्चात्ताप करना पड़ता है। आवेश को ज्वार और अवसाद को भाटा कह सकते हैं। यह दोनों ही अवांछनीय मनःस्थितियाँ हमारे मानस समुद्र को अशान्त उद्विग्न बनाये रहती हैं। उनके कारण नाव और जहाज डूबते रहते हैं। जब समुद्र शान्त होता है तभी उसमें रहने वाले जल जीव चैन पाते हैं और नाविकों की सुखद यात्रा चलती है। आवेश रहित मस्तिष्क ही कुछ महत्वपूर्ण सोचने और प्रगति की सुव्यवस्थित योजना बनाने एवं उन्हें सफल बनाने के साधन जुटा सकता है। अवसाद की तुलना ‘लो ब्लड प्रेशर’ से और आवेगों की ‘हाई ब्लड प्रेशर’ से की जाती है। एक से आदमी ठण्डा पड़ जाता है और दूसरे से तनावग्रस्त होकर सिर धुनता, पैर पीटता है। इन दोनों मानसिक अतिक्रमणों के दुष्परिणाम अलग−अलग ढंग के होते हुए भी हानि की दृष्टि से दोनों ही एक दूसरे से बढ़ कर हैं। अति ठण्ड में भी आदमी का खून जम जाता है और अति गर्मी भी झुलसा कर प्राण हरण कर लेती हैं।

कहते हैं कि एक बार यमराज ने मृत्यु को बुलाकर एक हजार आदमी मृतात्माएँ साथ थीं। इस पर यमराज ने नाराज होकर कहा−आज्ञा का अतिक्रमण क्यों किया गया? मृत्यु ने हाथ जोड़कर कहा−देव, मैंने तो उतने ही मारे हैं। शेष तो डर के मारे स्वयं मर कर साथ हो लिए हैं। वस्तुतः होता यही है। वास्तविक विपत्ति से जितनी हानि हो सकती है उसकी तुलना में कई गुना नुकसान लोग भय, आशंका, चिन्ता, निराशा आदि की उद्विग्नता से दुःखी होकर अपना सन्तुलन गँवा बैठते हैं और हड़बड़ी में न केवल शरीर सुखाते, दिमाग जलाते वरन् हाथ के नीचे के कामों को भी अस्त−व्यस्त कर देते हैं। धैर्य, साहस और सन्तुलन कायम रखा जा सके तो इन अनावश्यक हानियों से बचा जा सकता है और वास्तविक विपत्ति से निपटने के लिए विवेकयुक्त उपाय सोचा जा सकता है।

भविष्य के सम्बन्ध में कितने ही लोग अशुभ कल्पनाएँ करते रहते हैं। शनि, राहु, मंगल आदि की ग्रह दशा कोई अनिष्ट करेगी। अमुक व्यक्ति पर अमुक विपत्ति आई है, उसी तरह की अपने ऊपर भी आवेगी। अल्प आयु में अमुक मर गया तो हमें भी मरना पड़ेगा। अमुक संकट में अमुक का सम्बन्धी घिर गया तो हमारे घर में भी वैसा ही झंझट खड़ा हो सकता है आदि कुकल्पनाएँ मस्तिष्क में डरावनी आशंकाओं के चित्र खड़े करती रहती हैं और उन्हें अधिक वास्तविक समझते−समझते मनुष्य निरन्तर भयभीत रहने लगता है और अब मरा तब मरा समझ कर अधमरी आशंकित, आतंकित स्थिति में रहने लगता है। यद्यपि कल्पित कठिनाइयों में कभी कोई एकाध ही आधे−अधूरे रूप में सामने आती है, पर मनुष्य अकारण उनसे अपना रक्त सुखाता रहता है और उपयोगी मानसिक शक्तियों में इन निरर्थक उलझनों में नष्ट करता रहता है। यदि चिन्तन को उज्ज्वल भविष्य की कल्पना में लगाया गया होगा। सुखद कल्पनाओं की−प्रगति और सफलताओं के मानसिक चित्र बनाये गये होते तो उनके कारण उत्साह रहता, आशा बँधती और अधिक सक्रिय रहने की प्रेरणा मिलती, भविष्य में क्या होने वाला है इसकी यथार्थता किसी को भी विदित नहीं है। उसकी मात्र कल्पनाएँ और अटकलें ही लगाई जाती हैं। यदि ऐसा ही है तो कुकल्पनाओं में उलझा कर अपनी मानसिक शक्ति नष्ट करने की अपेक्षा उसे सुखद कल्पनाओं के द्वारा उत्साहवर्धक चिन्तन में लगा कर प्रसन्न रहने का तरीका क्या बुरा है? वस्तुतः बुद्धिमानी का यही मार्ग है।

दूसरों को दुश्चरित्र, विद्वेषी, दुष्ट, दुर्गुणी मान बैठने और उनसे अकारण घृणा, द्वेष करने लगने का कोई कारण नहीं। सतर्कता बरतना बिलकुल अलग बात है, पर किसी पर पूरा विश्वास रखते हुए और ईमानदार मानते हुए भी व्यवस्था की दृष्टि से स्वस्थ परम्परा स्थापित करने की दृष्टि से बरती जा सकती है। पर सन्देह तो एक अन्धविश्वास है जिसके कारण भले को ही बुरा मान लिया जा सकता है। कई पुरुष अपनी स्त्रियों को, कई स्त्रियाँ अपने पुरुषों को तनिक सी आशंका को तिल का ताड़ बनाकर दुश्चरित्र मानते हैं और अविश्वास की खाई पैदा करते हैं। यदि गहराई से पता लगाया गया होता तो प्रतीत होता कि वह मात्र आशंका ही थी। इसी प्रकार की आशंका, भोजन के विषैला होने, ठोकर लगने पर टिटनिस बन जाने, किसी बीमार की छूत लग जाने आदि की। जाती रहती है और हर घड़ी अपने को विपत्ति से घिरा समझा जाता है, यह मानसिक दुर्बलता बहुत ही बुरी हैं। निषेधात्मक चिन्तन मनुष्य का निरन्तर रक्त सुखाता है और उसकी शक्तियों को अकारण ही अनावश्यक रूप से नष्ट करता है हमें इन मानसिक दुर्बलताओं से बचने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। अपने स्वभाव को शौर्य, साहस से भरा पूरा बनाना चाहिए, निर्भयता अपनानी चाहिए और हिम्मत रखनी चाहिए कि यदि कभी कोई विपत्ति आवेगी तो अपने पराक्रम से उसका सामना करेंगे। सज्जनों की सद्भावना तथा ईश्वर की सहायता मिलेगी और बेड़ा पार हो जायगा। इतने पर भी कुछ भुगतना पड़ा तो बहादुरों की तरह उसका हँसते−हँसाते सामना करेंगे। दूसरों से लड़ने मरने वाली बहादुरी की तो कभी−कभी ही आवश्यकता पड़ती है, पर अपने को भीरुता से बचाने और साहसी बनाये रहने वाली वीरता की अपेक्षा तो हर मनुष्य को हर घड़ी रहती है। उसका संचय करना ही चाहिए।

निर्भय मनुष्य स्वयं बहादुरी के साथ शानदार जिन्दगी जीता है और अपने साथियों की भी हिम्मत बढ़ाता रहता है इसके विपरीत डरपोक अपनी कुकल्पनाओं से अपने को भयभीत रखता है और साथियों में भी ऐसी ही भीरुता, आशंका भरी कुकल्पना उत्पन्न करता है। आलस्य, प्रमाद, भय, सन्देह, आशंका, निराशा, चिन्ता जैसी कितनी ही बुरी आदतें मनुष्य को स्वाभाविक शक्ति का बहुत बड़ा अंश नष्ट करके उसे दीन दुर्बल बनाती चली जाती हैं। उन्हें अपने स्वभाव का अंश नहीं ही बनने देना चाहिए और यदि वे आदत में सम्मिलित हो गई हों तो प्रयत्नपूर्वक उन्हें हटा कर साहसिकता, स्फूर्ति, आशा की सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने का अभ्यास करना चाहिए।

उपरोक्त अवसाद संज्ञा की रक्त को ठण्डा करने वाली बुरी आदतों की तरह की उत्तेजित स्वभाव भी भयंकर है। उसके कारण और भी अधिक हानि उठानी पड़ती है। बर्फ जैसी ठण्डक में रहना तो हानिकारक है ही, आग से झुलसना भी कम कष्टकारक नहीं हैं। तनिक−तनिक सी बात पर आपे से बाहर हो जाना, आग बबूला हो जाना दूसरों की दृष्टि में अपना हलकापन सिद्ध करना है। हलकी टीन के बर्तन जरा-सी गर्मी पाकर तप जाते हैं, किन्तु जो भारी भरकम हैं वे बहुत कुछ सहने पर भी अमर्यादित नहीं होते। उथले नाले तनिक−सा पानी बढ़ने पर उफनने लगते हैं, पर समुद्र में इतनी नदियाँ मिलते रहने पर भी बाढ़ नहीं आती। विचारवान मनुष्य को इतना गम्भीर होना चाहिए कि प्रतिकूलताएँ सामने आने पर अधीर न हो उठे और आवेशग्रस्त होकर अपनी स्थिति उन्मत्त विक्षिप्तों जैसी उपहासास्पद न बना ले।

क्रोध एक तरह का मानसिक बुखार है। बुखार आने पर सारा शरीर तपने लगता है, मुँह भी सूखता है, आँखें लाल हो जाती हैं, सिर घूमने लगता है। जी ठिकाने न रहने पर कुछ का कुछ मुँह से निकलता है। लगभग ऐसी ही स्थिति क्रोध या आवेश आने पर बन जाती है। मस्तिष्क शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग है उसे जल्दी−जल्दी बुखार आना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को नष्ट करने वाला भयंकर रोग है। जिस प्रकार बुखार आदि अन्य रोगों से बचने की, उसे दूर करने की चेष्टा की जाती है उससे भी अधिक प्रयत्न आवेशग्रस्त मनःस्थिति को सुधारने की करनी चाहिए।

आपत्ति की आशंका कई बार मानसिक स्थिति को अस्त−व्यस्त कर देती है, ठीक उसी प्रकार कुछ लाभों के लिए भी आदमी इतना अधीर, आतुर हो जाता है कि नीति, मर्यादा, लोक−लज्जा, समाज व्यवस्था, कर्त्तव्य आदि औचित्य के सभी बन्धन तोड़ कर किसी भी प्रकार इच्छा पूर्ति पर उतारू हो जाता है। निर्लज्ज कामुकता के आचरण ऐसी ही स्थिति में बन पड़ते हैं। चोरी, बेईमानी ऐसी ही स्थिति में बनती है। प्रियजनों के साथ पक्षपात करने का, उन्हें अवांछनीय समर्थन देने का स्वभाव ऐसे ही स्वभाव के लोगों का बन जाता हैं। उन्हीं आवेशों को काम, क्रोध, लोभ, मोह कहा जाता है। बड़प्पन पाने का उद्धत आचरण अहंकार कहलाता है। ठाट−बाठ, सज−धज, ऐंठ−अकड़, शेखीखोरी, अशिष्टता, उद्दण्डता जैसे उद्धत आचरण ऐसी ही, अहंकारग्रस्त मनोभूमि के लोगों से बन पड़ते हैं। वे ऐसा करके दूसरों पर अपने बड़प्पन की छाप छोड़ना चाहते हैं, पर होता ठीक उलटा है। वे हर किसी की नजर में गिर जाते हैं ओर उस ऐंठ−अकड़ के कारण हर प्रकार घाटे में रहते हैं। मद और मत्सर को भी काम, क्रोध, लोभ, मोह की तरह की निन्दनीय माना गया है और उन्हें षड्-रिपुओं में गिना गया है। हमें गम्भीरता पूर्वक आत्म निरीक्षण करना चाहिए और जिनमें इस प्रकार के आवेश जन्य उत्तेजनात्मक दुर्गुण हों, उन्हें हटाने, सुधारने के लिए पूरी तत्परता के साथ प्रयत्न करने चाहिए।

इन्द्रियों का चटोरापन देखने में सामान्य−सा दुर्गुण दीखता है, पर उससे भी धीरे−धीरे सर्वनाश का आधार बनता रहता है। सर्वविदित है कि जीभ का चटोरापन पेट पर अवांछनीय वस्तुओं का अनावश्यक भार लादता है और उसके कारण अपच उत्पन्न होता है। भोजन ठीक तरह न पचने पर पेट में सड़ता है और उस सड़न से ही अनेकानेक रोक उत्पन्न होते हैं। जीभ का चटोरापन शारीरिक स्वास्थ्य को नष्ट करने वाला सबसे बड़ा कारण है। मानसिक स्वास्थ्य नष्ट करने में काम-वासना की अमर्यादित आग अत्यन्त भयावह परिणाम उत्पन्न करती है। आरम्भ में जीभ के स्वाद की तरह कामुकता का स्वाद भी बहुत प्रिय लगता है, पर अविवेक-पूर्वक इनका उपभोग करने पर टूट पड़ना मनुष्य को खोखला ही बनाता चला जाता है। अत्यन्त इन्द्रियों के व्यसन भी अपने−अपने तरीके से ऐसी ही हानियां करते हैं। इसलिए तत्वदर्शी लोग सदा से यही शिक्षा देते रहे हैं कि इन्द्रियों की अनियन्त्रित वासनाओं पर कुशल घुड़सवार की तरह काबू रखा जाय। उन्हें उच्छृंखल अमर्यादित न होने दिया जाय। वासना, तृष्णा की निन्दा इसी अर्थ में की जाती है कि वे शरीर एवं मस्तिष्क का असन्तुलित स्थिति में पटक देती है। जबकि समुन्नत, सुसंस्कृत एवं हँसता−हँसाता जीवन जीने के लिए व्यक्तित्व सुसंतुलित बनाये रहने की नितान्त आवश्यकता रहती है।

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व्यवहार से ही ज्ञान की सिद्धि

धनपति के परिवार में अभी तक किसी ने इतनी शिक्षा प्राप्त नहीं की थी जितनी कि उसका पुत्र धर्मकीर्ति प्राप्त कर लौट रहा था। महर्षि याज्ञवलक्य के आश्रम में शिक्षा प्राप्त कर लौट रहे धर्मकीर्ति के स्वागत तथा अभिनन्दन की तैयारियाँ की जा रही थीं। बीस वर्ष तक आश्रम में रहकर धर्मकीर्ति ने व्याकरण, छंदःशास्त्र, ज्योतिष, धर्मशास्त्र, वेद−वेदांत और दर्शनशास्त्र का गहन अध्ययन किया था और उस गाँव का कोई युवक पहली ही बार इतना ज्ञानार्जन कर, इतनी योग्यता प्राप्त कर लौट रहा था सो स्वाभाविक ही गाँव वाले भी धर्मकीर्ति के स्वागत को आतुर थे।

धर्मकीर्ति ने जब गाँव में प्रवेश किया तो सारा गाँव मंगल गान और जयकार से गूँज उठा। इसके बाद कुछ दिन बीते। धनपति ने अपने पुत्र को पैतृक कारोबार सम्हालना चाहा। इधर कई लोग विवाह प्रस्ताव भी लेकर आ रहे थे। पर धर्मकीर्ति तो इन सब बातों को माया जाल समझ कर पारिवारिक तथा लौकिक उत्तरदायित्वों को धोखे की टट्टी ही समझ रहा था। पिता द्वारा पारिवारिक उत्तरदायित्वों का हस्तांतरण तथा विवाह सम्बन्ध को लेकर चल रही चर्चाओं के विषय में मालूम हुआ तो उसने कहा−‘पिताजी मैं विवाह नहीं करूंगा।’

“क्या”−धनपति ने पूछा।

“इसलिए कि यह शरीर नाशवान है। संसार और सम्बन्ध भी नाशवान है। मुझे ऐसे सम्बन्ध चाहिए जो जीर्ण और नष्ट न हों और ऐसा व्यवसाय जिससे मैं मोक्ष साधन कर सकूँ, धर्मकीर्ति ने कहा।

असमय ही इस वैराग्य धारणा ने धनपति को विचलित कर दिया। उन्होंने बहुत समझाया, पर धर्मकीर्ति नाशवान सम्बन्धों को किसी भी प्रकार स्थापित करने के लिए तैयार नहीं हो रहा था। निदान धनपति महर्षि याज्ञवलक्य के पास पहुँचे और अपनी समस्या रखी। महर्षि ने समस्या के मूलकारण को जानते हुए धर्मकीर्ति को वापस अपने आश्रम में बुला लिया और वहीं रहने को कहा।

एक दिन की बात है। महर्षि ने धर्मकीर्ति को फूल चुनने के लिए भेजा। जिस उपवन में धर्मकीर्ति फूल चुन रहा था संयोग से उसका मालिक उधर आ निकला और धर्मकीर्ति को फूल तोड़ते देखकर एकदम आग−बबूला हो उठा। न कुछ पूछा और न ही कुछ कहा। सीधे उसने अपने हाथ की कुल्हाड़ी तानी और धर्मकीर्ति को मारने दौड़ा।

धर्मकीर्ति भागा और आश्रम में पहुँचा तो उपवन का मालिक भी उसके पीछे था। धर्मकीर्ति महर्षि के पास पहुँचा और उनके चरणों में गिर कर जल्दी−जल्दी उसने सारी घटना कह सुनाई। उपवन का स्वामी भी तब तक वहाँ पहुँच गया था और चुपचाप खड़ा था। महर्षि ने सारी बात सुनकर कहा−‘वत्स! यह देह तो नाशवान है। उपवन का स्वामी तुम्हारी इस देह को ही तो नष्ट कर रहा था। तुम्हारी सत्य आत्मा को तो कोई क्षति नहीं पहुँचा रहा था फिर तुम इतने भयभीत क्यों हों?’

धर्मकीर्ति कुछ न कह सका। जैसे उसका स्वप्न टूट गया हो और सत्य सामने खड़ा हो−वह महर्षि की ओर अपलक देख रहा था। तब याज्ञवलक्य ने कहा−‘आत्मा सत्य है। किन्तु देह भी सत्य है और देह के धर्म भी सत्य हैं। इसलिए जाओ और दोनों को साधो। जब तक सागर में प्रवेश नहीं करोगे तब तक तैरना कैसे सीखोगे। सीखे गये ज्ञान को व्यवहार में उतार कर ही तो सिद्ध किया जाता है। जल में रहकर उससे अस्पृश्य रहने वाले कमल की ही तो प्रशंसा होती है। अन्यथा जल में तो बहुतेरे पुष्प अलग रहते हैं। इसलिए जाओ देह और आत्मा दोनों के ही कल्याण की साधना करो तभी पाँचों ऋणों से उऋण होंगे।

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अतीन्द्रिय क्षमताओं में प्रमुख दिव्य दृष्टि

मनुष्य में काम करने और सोचने की क्षमता है। इन्हीं दोनों के समन्वय से अनेकानेक प्रकार की कलाओं और कुशलताओं का स्वरूप सामने आता है। उपार्जनों और उपलब्धियों के पीछे इन्हीं क्षमताओं का संयोग उपयोग काम कर रहा होता हैं। समृद्धि और वैभव के जो कुछ चमत्कार दीखते हैं, उनके पीछे मनुष्य की यह शारीरिक और मानसिक क्षमताएँ ही काम कर रही होती हैं।

अतिरिक्त क्षमताएँ इससे आगे भी भूमिका में उत्पन्न होती हैं। इन्हें विभूतियाँ कहते हैं और इनके पीछे दैवी अनुकम्पा काम करती समझी जाती है। ऋद्धि−सिद्धियों का क्षेत्र यही है। योगाभ्यास−तपश्चर्या, तन्त्र प्रयोग, भक्ति साधना आदि अनुष्ठानों का आश्रय लेकर इन्हें प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है।

चेतना ही गहरी खोजबीन करने पर पता चला है कि यह बाह्य उपार्जन नहीं−आन्तरिक उद्भव है। मानवी सत्ता का बहुत थोड़ा अंश ही प्रयोग में आ सका है। जितना ज्ञात है और जिसका प्रयोग होता है वह बहुत थोड़ा अंश है। इससे कितनी ही गुनी सम्भावनाएँ मानवी सत्ता के गहन अन्तराल में छिपी पड़ी हैं। धरती की ऊपरी सतह पर तो घासपात उगाने की क्षमता ही दिख पड़ती हैं। कहीं धूल, कहीं पत्थर बिखरे दीखते हैं, पर गहराई तक खोदते जाने पर बहुमूल्य खनिजों की परतें उपलब्ध होती जाती हैं। ठीक इसी प्रकार शरीर की श्रम शक्ति और मन की चिन्तन शक्ति से आगे गहराई में उतरने पर उन क्षमताओं का अस्तित्व सामने आता है जिन्हें अतीन्द्रिय या दैवी कहते हैं। वस्तुतः वे भी व्यक्ति की अपनी ही अविज्ञात एवं उच्चस्तरीय सामर्थ्यं ही होती हैं। उन्हें प्रयत्नपूर्वक जगाया या बढ़ाया जा सकता है।

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने जो अतीन्द्रिय क्षमताएँ खोजी हैं वे उन्हें चार वर्गों में विभक्त करते हैं−(1) क्लेयर वायेन्स (परोक्ष दर्शन) अर्थात् वस्तुओं या घटनाओं की वह जानकारी जो ज्ञान प्राप्ति के सामान्य आधारों के बिना ही उपलब्ध हो जायें। (2) फ्रीकॉग्नीशन (भविष्य ज्ञान) बिना किसी मान्य आधार के भविष्य की घटनाओं का ज्ञान। (3) रेट्रोकॉग्नीशन (भूतकालिक ज्ञान) बिना किन्हीं मान्य−साधनों से अविज्ञात भूतकालीन घटनाओं की जानकारी। (4) टेलीपैथी (विचार−सम्प्रेषण) बिना किसी आधार या यन्त्र के अपने विचार दूसरों के पास पहुँचाना तथा दूसरों के विचार ग्रहण करना। इस वर्गीकरण को और भी अधिक विस्तृत किया जाय तो उन्हें 11 प्रकार की गतिविधियों में बाँटा जा सकता है।

चमत्कारी अनुभव मोटे तौर पर निम्न वर्गों में विभक्त किया जा सकता है−

(1) बिना किन्हीं ज्ञातव्य साधनों के सुदूर स्थानों में घटित घटनाओं की जानकारी मिलना।

(2) एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की मनःस्थिति तथा परिस्थिति का ज्ञान होना।

(3) भविष्य में घटने वाली घटनाओं का बहुत समय पहले पूर्वाभास।

(4) मृतात्माओं के क्रिया-कलाप, जिससे उनके अस्तित्व का प्रत्यक्ष परिचय मिलता हो।

(5) पुनर्जन्म की वह घटनायें, जो किन्हीं बच्चों, किशोरों या व्यक्तियों द्वारा बिना सिखाये-समझाये बताई जाती हों और उनका उपलब्ध तथ्यों से मेल खाता हो।

(6) किसी व्यक्ति द्वारा अनायास ही अपना ज्ञान तथा अनुभव इस प्रकार व्यक्त करना, जो उसके अपने व्यक्तित्व और क्षमता से भिन्न और उच्च श्रेणी का हो।

(7) शरीरों में अनायास ही उभरने वाली ऐसी शक्ति जो सम्पर्क में आने वालों को प्रभावित करती हो।

(8) ऐसा प्रचण्ड मनोबल जो असाधारण दुस्साहस के कार्य विनोद की साधारण स्थिति में कर गुजरे और अपनी तत्परता से अद्भुत पराक्रम कर दिखाये।

(9) अदृश्य आत्माओं के सम्पर्क से असाधारण सहयोग सहायता प्राप्त करना।

(10) शाप और वरदान जिससे दीर्घकाल तक व्यक्तियों व वस्तुओं पर प्रभाव बना रहता है।

(11) परकाया प्रवेश या एक आत्मा में अन्य आत्मा का सामयिक प्रवेश सिद्ध होता है।

इनके अतिरिक्त भी कुछ विविध तथा विसंगत बहुवर्गीय क्रम की भी घटनायें हो सकती हैं जिनसे अतीन्द्रिय शक्तियाँ प्रमाणित होती हों जैसे मानवेत्तर जीवों की सामान्य से असामान्य क्षमतायें।

अतीन्द्रिय ज्ञान−एक्स्ट्रा आर्डिनरी सेन्स परएप्शन−की प्राप्ति में यों मस्तिष्क के अचेतन भाग के अन्य केन्द्र भी काम करते हैं, पर आज्ञाचक्र का उपयोग सबसे अधिक होता है। धूमिल स्थिति में तो दर्पण पर अपनी आकृति तक देखना सम्भव नहीं होता, फिर धूमिल आज्ञाचक्र क्या काम करेगा। कैमरे के लैन्स पर धूलि जम रही हो तो साफ फोटो कहाँ आता हैं? आंखें दुखने आ जायँ या पट्टी बाँध ली जाय तो दृश्य कहाँ दिखाई देते हैं। इसी प्रकार धूमिल आज्ञाचक्र अपनी क्षमता का प्रकटीकरण प्रसुप्त स्थिति में नहीं कर सकता। सक्षम बनाने के लिए उसे स्वच्छ एवं जागृत बनाने की आवश्यकता होती है। इस विभाग को अध्यात्म की भाषा में तृतीय नेत्र कहा जाता है। उसमें दिव्य दृष्टि का अस्तित्व पाया जाता है, दिव्य दृष्टि का अर्थ है वह देख पाना जो नेत्र गोलकों की सामर्थ्य से आगे की बात है।

प्रसिद्ध जादूगर गोपियापाशा और प्रो0 सरकार नेत्रों से कड़ी पट्टी बँधवाकर घनी आबादी की भीड़ भरी सड़कों पर मोटर साइकिल दौड़ने के अपने करतब दिखा चुके हैं। इन प्रदर्शनों से पहले विशेषज्ञों ने अनेक प्रकार से यह परीक्षा कर ली थी कि इस स्थिति में आँखों से देख सकने की किसी प्रकार कोई गुंजाइश नहीं है। प्रदर्शनों के समय दुर्घटना घटित न होने देने के यों सरकारी प्रबन्ध भी थे, पर वैसा अवसर ही नहीं आया। प्रदर्शन पूरी सफलता के साथ सम्पन्न हुए और दर्शकों में से सभी को यह विश्वास करना पड़ा कि बिना आँखों की सहायता के भी बहुत कुछ देखा जाना सम्भव हो सकता है।

इसी से मिलती−जुलती एक घटना अमेरिका की भी है। पोद्देशिया नामक महिला घोर अँधेरे में आँखों से पट्टी बाँधकर दृश्य देखने और रंग पहचानने का दावा करती थी। उसकी परीक्षा बर्नार्ड कालेज न्यूयार्क की वैज्ञानिक मण्डली ने की। परीक्षा समिति के अध्यक्ष डॉ0 रिचर्ड यूटस् ने घोषित किया है। वस्तुतः महिला में वैसी ही क्षमता है जैसा कि उसका कथन है। ‘तन्त्र विद्या के विश्व कोश’ ‘एनसाइक्लोपीडिया आफ दि ऑकल्ट’ ग्रन्थ में ऐसे ढेरों उदाहरणों का वर्णन है जिनमें मनुष्य में पाई जाने वाली अतीन्द्रिय क्षमताओं का उल्लेख है। फ्रान्सीसी नाविक फोन्टान जन्मान्ध था, पर वह अपनी उँगलियों से छूकर सब कुछ उसी तरह जान लेता था जैसा कि आँखों वाले नेत्रों से देखकर जानते हैं। फ्रान्सीसी कवि और वैज्ञानिक ‘जूल्स रोमेन्स’ ने परोक्ष दृष्टि विज्ञान में गहरी दिलचस्पी ली थी और अपने शोध प्रयासों से सिद्ध किया था कि नेत्रों के द्वारा मस्तिष्क में दृश्य सूचना पहुँचाने वाले ज्ञान तन्तुओं के समान ही सम्वेदना वाहक धागे शरीर के अन्य अंगों में भी मौजूद रहते हैं। यदि उन्हें विकसित किया जा सके तो दृष्टि प्रयोजन अन्य अवयवों की सहायता से भी पूरा किया जा सकता है।

चैकोस्लोविया से परा मनोविज्ञान संस्थान के प्राध्यापक ‘मैलिन रिज्ल’ और लैनिन ग्राड विश्व विद्यालय के प्राध्यापक ‘वेलिलियेव’ अपनी शोध समीक्षा में उस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मनुष्य में अतीन्द्रिय क्षमता का अस्तित्व मौजूद है। किन्तु वह क्यों विकसित होती है और किस प्रकार उसे बढ़ाया जा सकता है, यह अभी भी रहस्य का विषय है।

इटली के एक पादरी जोसेफ ने अपने समय में हवा में उड़ सकने की क्षमता प्रदर्शित करके अनोखी ख्याति पाई थी। इस सिद्धि की चर्चा तब तो देश भर में फैल गई जबकि उसने मृत्यु से कुछ ही समय पूर्व एक डॉक्टर को भी अपने साथ हवा में उड़ाकर दिखा दिया।

जोसेफ की मृत्यु 1663 में हुई। जब वह मरणासन्न था जो प्रसिद्ध चिकित्सक फ्रांसेस्को थिरयोली को चिकित्सा के लिए बुलाया गया। डॉक्टर ने अपने संस्मरण में लिखा है− मैं देख-भाल कर ही रहा था कि जोसेफ ने मेरा हाथ पकड़ा और हवा में तैरने लगा। उससे जकड़ा हुआ में भी उड़ रहा था इसके बाद वह मुझे भी उड़ाते हुए फ्राँस के गिरजे तक ले गया और वहीं बैठकर प्रार्थना करने लगा। मुझसे कहा−आपके इलाज की जरूरत नहीं रही। मुझे भगवान ने बुलाया है सो मैं जल्दी ही परलोक जा रहा हूँ। डॉक्टर सन्न रह गया और बिना इलाज किये ही वापिस लौट गया। दूसरे दिन उसकी मृत्यु हो गई।

इटली के सरकारी कागजों में जोसेफ के हवा में तैरने के कितने ही प्रसंग है जो पुलिस तथा दूसरे अफसरों ने तथ्य का पता लगाने के लिए जाँच पड़ताल के सम्बन्ध में संग्रह किये थे। किंवदंतियों से लेकर प्रत्यक्ष दर्शियों तक के ऐसे अनेकानेक प्रसंग इटली की जनता में प्रचलित हैं, जिनसे पता चलता है कि वह पादरी ऊँची रखी हुई ईसा की मूर्तियों तक उछल कर जा पहुँचता था और ऐसे ही कुछ देर अधर में लटका रहता था। लोग उसे अलौकिक क्षमताओं से सम्पन्न सिद्ध पुरुष मानने लगे थे।

पादरी जोसेफ का पिता इटली के फेलिक्स डेला नामक गाँव में रहता था और बढ़ई का काम करता था। गरीबी और बेकारी से दुःखी होकर वह अपनी गर्भवती पत्नी को लेकर कहीं गुजारे का आसरा ढूँढ़ने के लिए चल पड़ा। सन् 1603 की बात है दुर्बल हड्डियों का ढाँचा मात्र था। जन्म से ही बीमार रहने लगा और थोड़े दिन में ही पेट की भयंकर व्यथा में ग्रसित हो गया। इलाज के लिए पैसा न होने से बाप ने एक साधु की शरण ली। साधु ने कहा−‘‘इसका शरीर मर चुका केवल आत्मा ही धरती पर बाकी हैं।” इतने पर भी उसने कहा वह बचा लिया जायगा और पादरी होकर जीयेगा। सचमुच ही वह बच गया और बचपन से ही साधुओं जैसा पूजा−पाठ का जीवनयापन करने लगा। उसकी उपासना चलती रही और चमत्कारी ख्याति बढ़ती रही। उसकी विशेषताओं में प्रार्थना के अवसरों पर हवा में तैरने लगने की प्रसिद्धि सर्वत्र फैली हुई थी।

लार्ड अडारे ने अपनी आँखों देखा ऐसा विवरण “रिपोर्ट आफ दि डायलेक्टिकल सोसाइटी आन स्प्रिचुअलिज्म” में प्रकाशित कराया था जिसके अनुसार एक व्यक्ति को उन्होंने हवा में पक्षी की तरह उड़ते और तैरते देखा था। उनके इस विवरण की यथार्थता के लिए ‘दी रायल एस्ट्रोमिकल सोसाइटी’ के अध्यक्ष की साक्षी भी जोड़ी गई थी।

इस विवरण में होम नामक एक ऐसे अद्भुत व्यक्ति का उल्लेख है जिसे कितनी ही तरह की चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त थीं। वह हवा में उड़ सकता था। जलते हुए अंगारे बहुत देर तक हाथों पर रखे रहता था।

इन सिद्धियों की चर्चा हुई तो बहुतों ने अविश्वास किया और इसे अफवाह फैलाकर धोखाधड़ी करने की संज्ञा दी। फलतः प्रख्यात और प्रामाणिक विज्ञान वेत्ता सर विलियम क्रुक्स की अध्यक्षता में एक शोध समिति इसके परीक्षण के लिए बनाई गई। समिति इतना ही बताने में समर्थ हुई कि होम के बारे में जो कहा गया है वह सही है। उसमें कोई चालाकी नहीं है। किन्तु यह बात सकना कठिन है कि यह सब होता कैसे हैं? ब्रिटिश सोसाइटी फॉर साइकिक रिसर्च के प्रतिनिधि एफ0 डबल्यू मेयर्स से इस सम्बन्ध की भेंट वार्ता में प्रो0 क्रुक्स ने अपने परीक्षण, अनुभव और निष्कर्ष का विस्तार पूर्वक वर्णन सुनाया और कहा- चालाकी जैसी कोई बात इसमें नहीं है। अस्तु इस प्रकार की घटनाओं को विज्ञान की नई शोध का विषय माना जाना चाहिए और उन्हें अविश्वस्त न मानकर नये सिरे से खोज का प्रबन्ध करना चाहिए। क्रुक्स ने अपने परीक्षण के समय होम में ऐसी विलक्षण शक्ति भी पाई कि वह अपने प्रभाव से दूर रहते हुए भी बिना छुये वस्तुओं को इधर से उधर हटा सकता था और ऐसी वस्तुएँ प्रस्तुत कर सकता था जो वहाँ पहले से कहीं भी नहीं थीं।

गेविन मैक्सवेल ने दिव्य दृष्टि के अस्तित्व को खोजने में गहरी दिलचस्पी ली है और उन्होंने लम्बी जाँच पड़ताल के बाद यह पाया है कि बहुतों में सहज ही दृष्टि होती है। लगातार प्रयत्न और अभ्यास करने पर उसे बढ़ाया जा सकता है। किन्तु कितने ही बिना किसी अभ्यास के भी उस क्षमता से सम्पन्न पाये जाते हैं, किन्तु वे अपनी अनुभूतियों को प्रकट करने में प्रायः डरते रहते हैं। ढोंगी समझे जाने, किसी को बुरा लगने, सही न होने पर खिल्ली उड़ने, अपनी अनुभूति पर पूर्ण विश्वास न होने जैसे कारणों से भीतर से जो आभास मिलता है उसे प्रकट नहीं कर पाते और छिपाये ही रहते हैं। यदि पूर्वाभासों के प्रकटीकरण की परम्परा चल पड़े तो फिर प्रतीत होगा कि मनुष्यों में बुद्धिमत्ता की ही तरह अपनात्मानुभूति का अस्तित्व भी बड़ी मात्रा में मौजूद है। प्रयत्न पूर्वक विकसित करने पर तो उसे और भी अधिक सक्षम बनाया जा सकता है। अशिक्षितों को शिक्षित बनाकर जिस प्रकार बुद्धि वैभव बढ़ाया जाता है उसी प्रकार यह भी सम्भव है कि जनसाधारण में सामान्यता और कुछ विशिष्टों में विशेषतया पाई जाने वाली दिव्य दृष्टि को समर्थ बनाना और उससे लाभ उठाना सम्भव हो सके।

गेविन मैक्सवेल ने अपने अनुसन्धानों में एक अस्सी वर्षीय अन्धे का वर्णन किया है, जिसने समुद्र में डूबी हुई एक मछुआरे की लाश का सही स्थान बताने और उसे बाहर लाने में सहायता की थी। उन्होंने पश्चिमी पठार के द्वीप समूहों के लोगों में यह क्षमता विशेष रूप से पाये जाने का उल्लेख किया है। शमूस फियारना द्वीप में एक मछुआ पछली पकड़ते समय गाँव के समीप की खाड़ी में डूब गया। उसकी लाश निकालने और विधिवत् दफनाने के लिए सारा गाँव उत्सुक था। सभी नावें कई दिन तक लगातार खाड़ी में चक्कर काटती रहीं पर किसी के काँटे में लाश फँसी नहीं। निराशा छाई हुई थी। तभी एक अस्सी वर्षीय अन्धे कैलम मेकिनन ने कहा आप लोग मुझे नाव में बिठा कर ले चलें और खाड़ी में घुमाते रहें। सम्भवतः मैं लाश को तलाश करा दूँगा। वैसा ही किया गया। सही जगह मिलने पर बुड्ढा चिल्लाया−काँटा डालो लाश ठीक नीचे है। वैसा ही किया गया। फलतः मृतक को बाहर निकाल लिया गया और उसे विधिवत् दफनाया गया।

यह दिव्य दृष्टि भौतिक क्षेत्र में अदृश्य को देखने और अविज्ञान को जानने में काम आती हैं और आध्यात्मिक जगत में दूरदर्शिता एवं विवेकशीलता को विकसित करती है। ऐसे दिव्यदर्शी, तत्वदर्शी कहलाते हैं उन्हें जो सूझता और दीखता है वह बहुत ही उच्च स्तरीय होता है। पदार्थों में चेतना और प्राणियों में आत्मा को देख पाना इसी तत्वदर्शी दृष्टि के लिए सम्भव है। ऋतम्भरा प्रज्ञा के नाम से यही प्रख्यात है, गायत्री महामन्त्र में इसी की आराधना है। इसकी उपलब्धि होने पर सर्वत्र अपना ही आत्मा बिखरा दीखता है और अन्यान्यों के सुख−दुःख अपने ही प्रतीत होते हैं। इन्हीं से आत्म साक्षात्कार और ईश्वर दर्शन का परम लक्ष्य प्राप्त होता है। दिव्यदर्शी भगवान बुद्ध ने कहा था−‘‘जब करुणा के नेत्र खुलते हैं तो मनुष्य अपने में दूसरों को और दूसरों में अपने को देखने लगता है। करुणा की दृष्टि ही माया का उच्छेद होता है और उसके पार पूर्णता की परम ज्योति का दर्शन होता हैं।” इसी परम ज्योति को प्राप्त करना मनुष्य जीवन का परम लक्ष्य है।

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जीवन और मरण की रहस्यमयी पहेली

मृत्यु की परम्परागत मान्यतायें अब क्रमशः अपर्याप्त और अविश्वस्त मानी जाने लगी हैं। मोटे तौर पर नाड़ी न चलना और हृदय का धड़कना बन्द हो ने से मृत्यु मान ली जाती है। पुतलियों की स्थिरता, साँस का न चलना इस बात का प्रमाण मान लिया जाता है कि मृत्यु हो गई। आमतौर से मरण की घोषणा इसी आधार पर कर दी जाती है और लाश को ठिकाने लगाने उपक्रम बनाया जाने लगता है। पर अब समझा जाता है कि यह आंशिक मृत्यु है पूर्ण मरण नहीं। परम्परागत परीक्षण को लक्षणागत क्लीनिकल मृत्यु कह सकते हैं। यह प्रथम और मोटा स्तर है। यों आमतौर से लोग मरते भी इसी स्थिति में हैं, पर अब यह माना जा रहा है कि इस स्थिति में भी जीवन बना रहता है और उसके वापिस लौट सकने की संभावना बनी रहती है।

मरण का दूसरा स्तर है बायोलॉजिकल जैवमृत्यु इसमें रक्ताभिषरण, श्वास−प्रश्वास, आकुंचन −प्रकुंचन जैसी हलचलें समाप्त नहीं मन्द हो जाती हैं। उतनी मन्द जिसका पता साधारण नाड़ी परीक्षा से चल ही न सके। विषाक्तता और दुर्बलता की मात्रा बढ़ जाने से अवयवों की गतिविधियाँ तो शिथिल हो जाती हैं किन्तु जीवकोशों के अन्तराल में जीवन बना रहता है। फलतः सड़न और अकड़न नहीं बढ़ने पाती। हाथ, पैर, गरदन आदि को घुमाने पर वे अकड़े हुए नहीं लगते, मुलायमी दिखाई देती है, साथ ही शरीर में तापमान भी बना होता है। इससे प्रतीत होता है कि कोशाओं को प्राणवायु न मिल पाने से उन्हें मूर्च्छा तो आ गई है, पर अभी भी उनमें सजीवता विद्यमान है।

तीसरा स्तर ही वास्तविक मरण है जिसे कोशीय सेल्युलर मृत्यु कह सकते हैं। उसमें सड़न उत्पन्न हो जाती है। काया फूलने, गलने और बदबू देने लगती हैं। न गर्मी का कोई चिह्न रहता है और न चेहरे के किसी भाग पर जीवन का अस्तित्व सिद्ध करने वाली आभा का कोई लक्षण दिख पड़ता है। मुर्दनी छा गई जैसे शब्द उसी निराशाजनक स्थिति को देखकर कहे जाते हैं।

क्लिनिकल मृत्यु के लक्षण कितनी ही बाद दीख पड़ते हैं किन्तु उसके पश्चात् जीवन के लौट आने की कितनी ही घटनाएँ घटित होती रहती हैं। कृत्रिम रीति से साँस चलाने और हृदय धड़काने की तरकीबें अब निकल आई हैं। इनके द्वारा जैव मृत्यु होने से पूर्व की और क्लिनिकल मृत्यु की मध्य स्थिति में देर तक जीवन बनाये रहा जा सकता है। पानी में डूबने, बिजली के झटके, जहर या नशा आदि की स्थिति में मरे हुए व्यक्तियों के सम्बन्ध में जीवन को लौटाने में अधिक सफलता देखी गई है। उन्हें पुनर्जीवन न मिल सके तो भी काया को बहुत देर तक सड़न से बचाये रहना और जीवन के चिन्ह बनाये रहना सम्भव हो सकता है।

हृदय को लकवा मार जाने से कई बार क्लिनिक मृत्यु हो जाने जैसे लक्षण बन जाते हैं। हृदय के बड़े आपरेशनों में भी प्रायः दो घंटे लगते हैं और उतने समय तक उसकी धड़कन रुक-सी जाती हैं। ऑपरेशन पूरा होते समय ऐसे रोगी मरणासन्न दिखाई पड़ते हैं तब उन्हें गर्म पानी के सहारे फिर से गरमाया जाता है तब फिर अवयवों में सामान्य हलचलें आरम्भ होती हैं।

शरीर का शीतलीकरण हाइपोथमियां पद्धति से जब तापमान समाप्त कर दिया जाता है तब भी मृत्यु जैसी स्थिति ही दीखती है। बाद में आवश्यकतानुसार गर्मी पहुँचाने से जीवन के लक्षण वापस लौट आते हैं। ‘हृदय फेफड़ा मशीन की सहायता से दिन की धड़कन बहुत समय तक कृत्रिम रूप से जारी रखी जा सकती है।

क्लिनिकल मृत्यु के उपरान्त कितने ही मुर्दे अपने आप जी पड़े। ऐसी घटनाएं अविज्ञात रूप से तो न जाने कितनी होती रहती होंगी पर जो शोधकर्त्ताओं ने रिकार्ड की हैं वे भी कम नहीं हैं। मौत के घर जाकर वापिस लौट आने वाली घटनाओं में से अनेक काल्पनिक भी हो सकती हैं पर जो यथार्थ हैं उनकी संख्या भी कम नहीं है।

मैक्सिको की एक घटना है। मृतक को दफनाने की तैयारियाँ चलती रहीं, पर उसका वफादार कुत्ता लाश के पास जमकर ही बैठा रहा और जिसने भी उसे उठाने का प्रयत्न किया उसी को उसने रोका और काटा। बाँध देने के बाद भी वह किसी प्रकार रस्सी तुड़ाकर जो भागा और ताबूत ले जा रहे लोगों पर चढ़ बैठा। ताबूत गिरा और उसके टूटने पर मृतक को जीवित पाया गया।

कैलीफोर्निया की एक घटना है। कालेज की एक छात्रा छात्रावास में मर गई। उसे दफनाने की तैयारी करने वालों को छात्रावास का चौकीदार जोर देकर रोकता रहा। उसके चेहरे पर जीवन के चिन्ह थे। इसी झंझट में लाश तीन दिन रुकी रही और मृत लड़की फिर से साँस लेने लगी और दुबारा जिन्दा हो गई।

भारत के गोवा क्षेत्र में एक पादरी मरा। दफनाने से पूर्व भक्तों ने मिलकर उसका प्रिय भजन गाया। देखा गया कि मृतक के होंठ भी हिल रहे हैं और मुँह से गुनगुनाने जैसी हलचल हो रही है। ध्यान से देखा गया तो पता चला कि उसमें जीवन लौट आया है।

कुस्तुन्तुनिया में एक फटी हुई कच्ची कब्र के सम्बन्ध में मुर्दे के जी पड़ने की आशंका की गई। कब्र खोदी गई तो पता चला कि मृतक ने उठने और कब्र तोड़ने के लिए पूरा जोर लगाकर कोशिश की है और समीपवर्ती वस्तुओं को उलट−पुलट करने की उसने पूरी कोशिश की है। उस प्रयास में उसे कई जगह चोटें भी आयी हैं और खून भी बहा है। खोदने पर निकला तो वह मरा हुआ ही पर यह अनुभव किया गया है कि पूर्ण मृत्यु होने से पहले ही उसे दफना दिया गया है।

चिता पर करवटें बदलने वाले−काठी पर कस पर श्मशान पहुँचने से पहले ही हिलने डुलने वाले मृतकों के फिर से जीवित हो उठने की घटनाएँ भी कितनी ही सुनने को मिलती हैं। पारसी समाज में मृतक को गरम पानी से स्नान कराने और फिर उसे गर्मी देने का रिवाज है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि यदि कहीं जीवन का चिन्ह शेष रह गया हो तो प्रकट हो सके। शंवाई के एक अस्पताल में किसी मृतक का पोस्टमार्टम करने के लिए छुरा चलाते ही उसके उठ बैठने और चिल्लाने लगने की घटना रिकार्ड की गई है।

छिपकली, रीछ, साँप, मेंढक, केंचुए आदि कितने ही प्राणी सर्दियों के दिनों में बहुत समय तक समाधिस्थ हो जाते हैं। उन दिनों उनके शरीर की जाँच पड़ताल करने पर अर्ध मृतक जैसी स्थिति पाई जाती है। योगियों के समाधिस्थ हो जाने पर भी उनके शरीर में जीवन के लक्षण नाम मात्र के ही दिखाई पड़ते हैं।

इन विवरणों से पता चलता है कि तथाकथित मौत के उपरान्त भी मनुष्य तब तक जीवित रहता है जब तक कि उसका मस्तिष्क पूरी तरह शांत या समाप्त न हो जाय। सामान्य मृत्यु के उपरान्त भी यदि मस्तिष्क में हलचल बनी रहे तो कृत्रिम उपायों द्वारा उसे पुनर्जीवित हो उठने की सम्भावना बनी रहती है। इससे प्रतीत होता है कि शरीर के समस्त अवयवों में मस्तिष्क ही प्रधान है। जीवन और मृत्यु से सीधा सम्बन्ध उसी का है।

रूसी नोबेल पुरस्कार विजेता लेबलेण्डो भयंकर मोटर दुर्घटना से घायल हुए थे। वे कई महीने मूर्छित रहे। इस बीच चार बार उनकी धड़कन बन्द हुई। प्रयत्न करके फिर जिलाया गया। अन्ततः उस रस्साकशी में विज्ञान जीता और मौत हारी। लेबलेण्डौ बचा लिये गये और वे छः वर्ष तक जीवित रहकर सामान्य मौत से मरे।

इन दिनों मौत की प्रामाणिकता मस्तिष्क की पूर्ण मृत्यु के साथ जोड़ दी गई हैं। चिकित्सा और न्याय के दोनों ही क्षेत्रों में पूर्ण मृत्यु की परिभाषा यही स्वीकार की गई है कि मनुष्य की मस्तिष्कीय हलचलों में जब निस्तब्धता छा जाय तो समझना चाहिए कि पूर्ण मृत्यु हो गई। हृदय की धड़कन बंद हों किन्तु मस्तिष्क से विद्युत तरंगें उठ रही हों तो काया के पूर्ण निःचेष्ट हो जाने पर भी मृत्यु की स्थिति स्वीकार न की जायगी।

मृत्यु सम्बन्धी तथ्यों का पता लगाने के लिए इन दिनों विज्ञान की एक विशेष शाखा काम कर रही है जिसे ‘थेनाटालाजी’ कहते हैं। इसकी जाँच पड़ताल से पता चलता है कि अधिकांश व्यक्ति मरने से कुछ समय पूर्व संज्ञा शून्य हो जाते हैं। मस्तिष्क की चेतना चली जाती है और मूर्च्छा जैसी परिस्थिति बन जाती है। होश रहता भी है तो बहुत उथला। मृत्यु के क्षण जैसे−जैसे निकट आते जाते हैं वैसे−वैसे यह मूर्च्छा और भी अधिक घनी होती जाती है। अन्ततः जब प्राण निकलता है तो यह पता भी नहीं चलता कि यह विलगाव किस प्रकार हो गया।

मरते समय के अनुभव भिन्न−भिन्न मनुष्यों ने भिन्न−भिन्न प्रकार से व्यक्त किये हैं। विज्ञानी टामस एडीसन ने मरते समय कहा, जो सामने दीखता है वह इससे भी अधिक सुन्दर है।

जर्मनी के डॉक्टर लोअर विट्जल एक मरणासन्न मरीज का हाथ पकड़े हुए थे। दम तोड़ते हुए उसने कहा, मुझे पीछे मत खींचो आगे जाने दो। आगे चलने में मुझे उत्साह है।

दर्शन चुनेह ने कहा था−अब हाथ चल पाते तो लिखता कि मृत्यु कितनी सरल और कितनी सुखद है।

टामस एल्बा ने कहा था−पहले मौत से बहुत डर लगता था, पर अब देखता हूँ कि डर का कहीं कोई नाम भी नहीं है।

दस वर्षीय बालिका डेजीड्राइडन की मृत्यु दस वर्ष का आयु में टाइफ़ाइड से पेट बिगड़ जाने के कारण हुई। बीमारी के कारण वह दिन−दिन कमजोर होती चली गई और अन्ततः मृत्यु के निकट जा पहुँची। मरने से दो तीन दिन पूर्व उसे परलोक के दृश्य प्रत्यक्ष दीखने लगे थे। उसने जो बताया उसके आधार पर ‘जीवन के उस पार’ नाम से अनुभव प्रकाशित हुए हैं। डेजी के कथनानुसार अपनी इसी दुनिया की तरह एक दूसरी दुनिया भी है। जिसमें मृतात्माएँ और देवात्माएँ उसी प्रकार निवास निर्वाह करती हैं जैसे कि अपने इस लोक के निवासी। वे आत्माएँ अशरीरी होने के कारण उन आधि-व्याधियों और सीमा बन्धनों से बँधी रहती हैं जो शरीर धारियों के लिए समस्याएं बनी रहती हैं। उस लोक में पहुँचने के उपरान्त प्राणी अधिक विवेकवान और भावनाशील बन जाता है। वे लोभ और मोह ग्रस्तों की तरह खिन्न उद्विग्न नहीं रहते वरन् सदा प्रसन्न सन्तुष्ट बने रहते हैं। खिन्न तो थोड़ी-सी दुष्ट आत्माएँ ही रहती हैं जो संसार में रहने वाले अनाचारियों की तरह ही प्रेत–पिशाचों जैसी हरकतें करती हुई रोती रुलाती रहती हैं।

डेजी ने परलोक को मनोयोगपूर्वक देखा जो इस दुनिया को छोड़ने और नई दुनिया में प्रवेश करने की उत्सुकता ही प्रदर्शित करती रही और दम तोड़ते समय इतना ही कहा−‘‘मेरी प्यारी और सुन्दर दुनिया, अलविदा! पर मुझे नई यात्रा पर जाने की खुशी में इस सब का छोड़ने का रंज नहीं हैं।”

मृतक समझे गये रोगियों को पुनर्जीवित करने के लिए किये गये प्रयासों का विशिष्ट अध्ययन मनोविज्ञानी स्टेनिस्लाव ग्रोफ और जानहेलिफाक्स ग्रोफ ने किया है। उसने अपने शोध प्रकाशन में ऐसे कई रोगियों का वर्णन किया है जो मरकर जी उठे और मरण क्षणों के मध्यवर्ती अनुभव बता सकने में समर्थ हुए। कैन्सर से मरे डीन नामक एक रोगी ने पुनर्जीवित होने पर बताया कि पहले वह गहरे अन्धकार में डूबा, इसके बाद उसे प्रकाश दीखा और उस पर फिल्म के पर्दे की तरह किये गये भले-बुरे कामों की तस्वीरें फिल्म की तरह दिखाई पड़ीं। उसे लगा कि यह किसी न्यायाधीश का काम है। जो दण्ड पुरस्कार देने से पहले यह दृश्य साक्षियाँ प्रस्तुत कर रहा है।

डॉक्टर रेमण्ड मूडी का शोध विषय ही पुनर्जीवित हुए व्यक्तियों के मरण मध्यान्तर में हुए अनुभवों का संकलन ही था। इस सन्दर्भ में उन्होंने वर्षों तक दूर-दूर जाकर जानकारियाँ प्राप्त की हैं। अपनी खोजों का विवरण उन्होंने ‘लाइफ आफ्टर लाइफ’ ग्रन्थ में 150 घटनाओं का उल्लेख किया है। इनमें से कुछ के अनुभव ऐसे थे कि मरते समय उनके मस्तिष्क में सनसनाहट-सी लगी और मक्खियों के भिनभिनाने जैसे गुंजन सुनाई दिये। इनके बाद सब कुछ ठंडा हो गया और सुध-बुध समाप्त हो गई। एक व्यक्ति ने बताया उसे लगा जैसे किसी घोर अन्धेरे से भरे हुए गहरे खड्ड में गिरा दिया गया हो और नीचे की दिशा में तेजी से डूबता चला जा रहा है। अन्धेरे में धँसने के अनुभव और भी कितनों ने ही सुनाये और इसके बाद क्या हुआ इसकी जानकारी न दे सके।

डॉ0 मूडी द्वारा प्रस्तुत विवरणों में हृदय रोग से अस्पताल में मरी एक महिला का उल्लेख है जिसे मरते समय ऐसा लगा मानो वह रुई के रेशों की तरह हलकी बनकर अस्पताल की छत तक उड़ी जा रही है। उसे डॉक्टर नर्स तथा दूसरे मरीज यथा स्थान दिखाई दे रहे हैं। एक दूसरी महिला ने बताया उसकी आत्मा शरीर से बाहर निकली और देखा कि मृतक सम्बन्धियों में से कितने ही उसका स्वागत करने और साथ ले जाने के लिए खड़े हैं। उन बिछुड़ों की समीपता उसे बहुत अच्छी लगी और मृत्यु का दुःख नहीं हुआ।

इन अनुसन्धानों में ऐसे मृतकों की संख्या अधिक थी, जिन्होंने प्रकाश ज्योति के दर्शन किये। यह ज्योति मात्र रोशनी नहीं थी वरन् उसमें स्नेह और सहयोग का अनुदान झरते हुए अनुभव होता था।

सर आलिवर लाज विलियम क्रुक्स जैसे विज्ञानी क्रमशः अध्यात्मवाद की ओर झुकते चले गए थे और वे यह मानने लगे थे कि मात्र पदार्थ विज्ञान ही नहीं चेतना के सिद्धान्त भी सत्य की शोध में ही सम्मिलित होते हैं। चेतना पदार्थों के समन्वय की प्रतिक्रिया नहीं वरन् एक स्वतन्त्र सत्ता है जो काया की पदार्थ सम्पदा बिखर जाने के उपरान्त भी अपना अस्तित्व बनाये रहती है। इस अनुसन्धान उपक्रम में उन्होंने कितनी ही दिवंगत आत्माओं को सहयोग देने के लिए आमन्त्रित किया था। कई ने उसे स्वीकार भी किया था और सहयोग भी दिया था।

तत्व दर्शन की दृष्टि से मौत और जीवन परस्पर गुंथे हुए हैं और दोनों एक-दूसरे के लिए पूरक एवं अपरिहार्य हैं। जीवन का आरम्भ भी किसी मरण के फलस्वरूप सम्भव होता है और उसका अन्त भी मौत के रूप में होना भी सुनिश्चित हैं। रात्रि और दिन की तरह−ताने और बाने की तरह जीवन और मरण भी एक दूसरे के सहयोगी पक्ष हैं। दोनों के मिलने से ही एक गति चक्र बनता है। शास्त्रों ने मृत्यु को पुराना वस्त्र बदलने और जीवन को नया कपड़ा पहनने जैसा बताया है। जीवन−यात्रा अनन्त है उसके मध्यावधि विराम विश्राम को मरण कहा जा सकता है। इस दार्शनिक दृष्टि को अपनाया जा सके तो मृत्यु किसी के लिए भी डरावनी नहीं रह जाती। वह सरल और सुखद न हो तो भी वह ऐसी स्थिति नहीं है जिसके लिए भय मानने या उद्विग्न होने की आवश्यकता पड़े।


जीवट मानव जीवन की सर्वोपरि सम्पदा

मनुष्य के पास पाई जाने वाली सम्पदाओं में बलिष्ठता, सुन्दरता, बुद्धिमत्ता, सम्पन्नता की जानकारी सभी को है। उन्हीं के आधार पर कई तरह की सुख−सुविधाओं एवं सफलताओं का सुयोग बनता है। इन सर्वविदित सम्पदाओं से भी एक और भी बड़ी क्षमता है, जिसके प्रभाव और परिणाम की जानकारी बहुत थोड़े ही लोगों को होती है। वह क्षमता है−जीवट।

साहस, सन्तुलन और पराक्रम के समन्वय का अभ्यास जब स्वभाव का अंग बन जाता है तो उसे ‘जीवट’ कहते हैं। जीवट वह धन है जिसके आधार पर मनुष्य के व्यक्तित्व की प्रखरता और समर्थता का मूल्यांकन किया जाता है। सफलताएँ ऐसे ही लोगों की चेरी बनती हैं। विजय श्री ऐसे ही लोगों के चरण चूमती है। दूसरे लोग जिन कामों को करने पर विश्वास तक नहीं करते उन्हें असम्भव मानते हैं ऐसे जीवट के धनी उन्हें करने के लिए अतिरिक्त आवेश उत्पन्न करते हैं और अनवरत पुरुषार्थ के सहारे अभीष्ट लक्ष्य तक जा पहुँचते हैं।

शरीर में स्फूर्ति, आँखों में चमक, चेहरे पर दृढ़ता, होठों पर मुसकान, भुजाओं में हिम्मत, छाती पर हिम्मत के चिन्ह वहाँ की मांसपेशियाँ प्रकट करती हैं। यह जीवट का ही चमत्कार है। ऐसे लोगों के चिन्तन में आत्म विश्वास, वाणी में आश्वासन, व्यवहार में प्रामाणिकता का सहज ही परिचय मिलता है। यह जीवट व्यक्ति के आचरण, उद्देश्य और क्रिया-कलाप के कण−कण से प्रकट होती है। वह ओछी या खोखली नहीं होती। उनके निर्णय अनिश्चित और अस्त−व्यस्त नहीं होते। दूरदर्शी सूझबूझ भी ऐसे ही लोगों के पास रहती है। दूरदर्शिता, शालीनता और साहसिकता का समन्वय, जिसके चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में घुला हुआ हो उसे जीवट की सम्पदा से सुसम्पन्न समझा जा सकता है।

टिटहरी अपने अण्डे वापिस लेने के आक्रोश में समुद्र को पाट देने के लिए चोंच में भर−भरकर बालू डालने लगी तो उसके साहस के आश्चर्यचकित अगस्त आगे आये और समुद्र सोख लेने का सहयोग देकर टिटहरी का उद्देश्य पूरा कराया। भागीरथ जब स्वर्ग से धरती पर गंगा उतारने का व्रत लेकर तप करने में जुट गये तो शिवजी ने उनकी सहायता की, इस प्रकार गंगावतरण सम्भव हो गया। जब गाण्डीव चलाने के लिए अर्जुन कटिबद्ध हो गये तो भगवान कृष्ण ने उनका सारथी बनना स्वीकार किया। जो साधन, सहयोग और अवसर ही आशा लगाये बैठे रहते हैं, उन्हें प्रतीक्षा में ही समय गुजारना पड़ता है, पर हिम्मत के धनी जब अपने बलबूते स्वयं ही चल पड़ते हैं तो कोलम्बस की तरह एक नई दुनिया के साथ सम्बन्ध जोड़ लेना सम्भव हो जाता है। राविन्सन क्रूसो है तो उपन्यास का ही एक पात्र, पर उस तरह की अप्रत्याशित सफलताएँ पाने वालों की सूची भी छोटी नहीं है। जीवट हिम्मत एवं सूझबूझ के रूप में दृष्टिगोचर होने वाली प्राण शक्ति सफलताओं का तीन चौथाई हिस्सा पूरा कर देती है।

ऋषियों के आश्रमों में गाय और सिंह शान्ति और सहयोग के साथ निवास करते थे। यह ऋषियों की प्रचण्ड प्राणशक्ति का ही प्रभाव था। संसार के विशिष्ट व्यक्तियों की प्रभावशाली शक्ति के असंख्य उदाहरण और संस्मरण मिलते हैं। यह उनकी तेजस्विता का ही परिणाम था।

यह प्राणशक्ति ही है जो व्यावहारिक जीवन में उत्साह एवं स्फूर्ति के रूप में दृष्टिगोचर होती है। साहस के रूप में उभरती है और दृढ़ता के रूप में निर्धारित लक्ष्य के साथ जुटाये रहती है। आत्म विश्वास इस प्राण शक्ति का ही गुण है। जीवट और जिजीविषा उसी की प्रतिक्रिया है। आत्मबल के धनी अपने ऊपर भरोसा करते हैं। अपने बलबूते किसी उत्तरदायित्व को कन्धों पर उठाते हैं और असीम साहस के साथ संकल्प की पूर्ति के लिए आगे बढ़ते हैं। आगे बढ़ने वाले ही साहसिकता के आगे कठिन परिस्थितियाँ नरम पड़ती हैं और अनुकूल बनती जाती हैं।

भगवान बुद्ध के तेज से आविर्भूत हुए खूँखार अँगुलिमाल डाकू को, जिसे मनुष्य को काटने और गाजर−मूली के टुकड़े कर डालने में कोई अन्तर न दिखाई पड़ता था−अपनी तलवार फेंकनी पड़ी और तथागत के चरणों में गिरना पड़ा। यह आत्म तेज का प्रभाव था। जिसकी शक्ति के आगे अजगर-चूहा, शेर-बकरी और भेड़िया-भेड़ बन जाता है। सरकस में हिंसक पशुओं पर शासन करने वाले रिंग मास्टर में यही शक्ति काम करती है।

नैपोलियन जेल से कूदकर भागा तो बोर्वोर्न सेनाएँ सतर्क कर दी गई। सेनापति ने सैनिकों को आदेश दिया कि जहाँ भी नैपोलियन मिले उसे गोली मार दी जाय, पर हुआ कुछ और ही। नैपोलियन सीधा उधर ही गया जहाँ सन्नद्ध सेना राइफलें लोड किये खड़ी थीं, पर उनके आगे किसी को भी घोड़ा दबाने का साहस नहीं हुआ। सारी सेना फिर नैपोलियन के सेनापतित्व में आ गई।

रोम का राज जूलियस सीजर एक बार समुद्री यात्रा करते समय समुद्री लुटेरों द्वारा कैद कर लिए गया। ‘फिरौती’ का पैसा मिलने तक उन्हें होउस द्वीप में बन्दी बना कर रखा गया। प्लूचार्ड ने लिखा है कि सीजर यद्यपि डाकुओं का बन्दी था तो भी वह सम्राट की तरह की रौब−दौब से रहता था। जिस किसी डाकू को वह डाँट देता था वह सन्न रह जाता था। सब उसकी आज्ञा का पालन करते थे। वह उन्हें धमकाता भी था और कहता था कि जब यहाँ से चला जाऊँगा तो तुम सबको फाँसी के तख्ते पर लटका दूँगा, पर कोई डाकू चूँ तक नहीं करता था। छुटकारा पाने पर उसने वैसा किया भी। यह उसके आत्म−बल की महत्ता थी, जो वह गिरफ्तार होकर भी उस समय के अपने मालिक डाकुओं पर शासन करता था।

कौषीतकि ब्राह्मणोपनिषद् के चतुर्थ अध्याय में अजातशत्रु ने जिज्ञासु गार्ग्य को आत्म तेज की विद्या बताई है। वे कहते हैं कि जैसे काष्ठ में अग्नि, दूध में घृत और गन्ने में मिठास रहता है उसी प्रकार इस शरीर के कण−कण में आत्मा की सत्ता ओतप्रोत है। इसे जो जान लेता है वह तत्व ज्ञानी बनता है और जो इसका उपयोग करना जानता है उसकी सामर्थ्य असीम हो जाती है।

इसी प्रसंग में देवताओं के हारते रहने का समाधान है। इन्द्र से कहा गया है कि आत्म ज्ञान और आत्म-शक्ति गँवा बैठने के कारण ही देवता दुर्बल बने हैं और मनस्वी परि−पक्षियों से हारने लगे हैं। जो आत्मस्वरूप को समझता है उसे शक्ति की कमी प्रतीत नहीं होती। जो शक्तिवान है सो जीतता है।

राजकीय शक्ति का आधार सेना की प्रखरता और शस्त्रों की उत्कृष्टता हो सकती है। पद और अधिकार में अपनी शक्ति है। समर्थन के बलबूते लोग ऊँचे चढ़ते और बहुत कुछ कहते हैं। पैसा भी इस युग की एक शक्ति है, जिससे संसार के सुख−साधनों, प्रवीण मनुष्यों को खरीदा जा सकता है। व्यक्ति की शक्ति उसके शरीर गठन, कला कौशल और शिक्षा समझदारी के आधार पर आँकी जाती है। इतने पर भी जीवट का जीवन में सर्वोपरि स्थान सदा ही बना रहेगा। उसी के आधार पर अपने आपको अनुशासित और परिष्कृत किया जा सकता है। प्रगति के लिए बहुत कुछ करने और बनने की आवश्यकता पड़ती है। यह सारा सरंजाम जुटा सकना ‘जीवट’ के अतिरिक्त और किसी आधार पर सम्भव ही नहीं हो सकता।

रघुवंश काव्य के सर्ग दो में राजा दलीप गुरु की गौ नन्दिनी को चराते हुए वन जाते हैं। सिंह उस गौ पर आक्रमण करता है। दलीप के हाथ धनुष को चिपक जाते हैं। इस दैवी सिंह के सामने अपने को अशक्त अनुभव करते हुए दलीप उससे प्रार्थना करते हैं वह उनका शरीर खाले और गुरु की गौ को छोड़ दे।

इस पर सिंह कहता है−राजन् तुम कैसे मूर्ख हो जो तुच्छ गाय के बदले अपना राज्य, सुख, वैभव और शरीर का त्याग करने के लिए तैयार होते हो। दलीप उत्तर देते हैं− हे सिंह, तुम्हारा कथन ठीक है कि धन, वैभव और शरीर तीनों ही सुखद हैं, किन्तु उनकी स्थिरता का भरोसा कहाँ हैं? दुर्भाग्य के प्रकोप से धन चला जाता है। बुढ़ापा, यौवन को छीन ले जाता है और मृत्यु के मुख से काया भी कहाँ बचती है। इसलिए आप कृपाकर सकें तो हमारे यश शरीर को जीवित रखने की बात सोचें

यह जीवट ही है जो मौत तक को चुनौती देती है और अपने व्यक्तित्व की गरिमा को हर परिस्थिति में सुरक्षित रखे रहती है। यही मानव जीवन की सर्वोपरि सम्पदा है।

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व्यक्तित्व का स्तर गिरायें नहीं, ऊँचा रखें।

अस्थिरता, आतुरता, अव्यवस्था और आशंका की चाण्डाल चौकड़ी मनुष्य की उस क्षमता का बुरी तरह शोषण, अपहरण करती रहती हैं जिसके सहारे कोई भी अभीष्ट प्रगति के उच्च शिखर पर पहुँच सकता है।

अधीरता ओछेपन का चिन्ह है। अपना कुछ निश्चय ही न हो। हवा के साथ उड़ने वाले तिनके की तरह जिस तिस के प्रभाव या प्रवाह में बहते रहा जाय तो बात कुछ बनेगी नहीं। मनुष्य का अपना व्यक्तित्व होना चाहिए और अपना निश्चय सन्तुलन हर दृष्टि से आवश्यक है। उसके बिना न संकटों से उबरना सम्भव हो सकता है और न प्रगति का मार्ग मिलता है। यहाँ तक कि भीतर का खोखलापन सामान्य जीवन को भी कठिन बना देता है। अवास्तविक आशंकाएँ सिर पर छाई रहती हैं और उन्हीं के दबाव से आदमी का कचूमर निकलता रहता है।

परीक्षा काल में छात्रों की मानसिक शक्ति का व्यय किस क्रम से होता है उसका सर्वेक्षण अमेरिका की मिशिगन युनिवर्सिटी में किया गया−उसमें पाया गया कि प्रश्न पात्र पाने पर उसकी कठिनाई, चिन्ता, आतुरता, आशंका आदि के कारण आरम्भ में वे अधिक उत्तेजित रहे और उतने समय तक अधिक मानसिक शक्ति गँवाते रहे। जब उनने प्रश्न पत्र हल करना आरम्भ कर दिया तो उत्तेजना सन्तुलन में बदल गई और उत्तर लिखने में जो मानसिक श्रम करना पड़ा वह उत्तेजित स्थिति की तुलना में कहीं कम था।

अधिक और सही काम कर सकने का मूड लाइमेक्स वस्तुतः सन्तुलित, प्रसन्न और आशांवित मनःस्थिति का ही उत्पादन है। लोग उसे अनायास बरसने वाली दैवी अनुदान जैसा मानते हैं और उसकी प्रतीक्षा में आशा लगाये बैठे रहते हैं। वर्षा होने पर बीज बोने की बात सोचकर जो हाथ पर हाथ रखे बैठे रहते हैं उनसे वे अधिक बुद्धिमान हैं जो कुँए से सिंचाई करके समय पर खेत में बीजारोपण कर लेते हैं। मूड बन जाय या बनाया जाय दोनों ही स्थितियों में मानसिक सन्तुलन और रचनात्मक उभार आवश्यक है। यह उत्पादन निश्चित रूप से अपने प्रयत्न द्वारा भी किया जा सकता है।

कितने ही लोग बातें करने में बहुत कुशल होते हैं। उनके तर्क, लहजे, प्रमाण और उदाहरण ऐसे होते हैं, जिनके सुनने वाले सहज ही प्रभावित हो जाते हैं। कुछ को तो बोलने की ऐसी आदत होती है कि जीभ रोके नहीं रुकती और कैंची की तरह चलती ही रहती है। कई बार ऐसे लोगों से सुनने वाले ऊबने लगते हैं और किसी प्रकार जान छुड़ाने की बात सोचते हैं। दूसरों को कुछ कहने का वे अवसर ही नहीं आने देते। अधिक बक−झक कुल मिला कर मनुष्य के स्तर को घटाती और व्यक्तित्व को गिराती है। बकवास सभ्य आचरण में नहीं गिनी जाती। उसने छिछोरापन टपकता है। कम और सारगर्भित बोलने वाले बुद्धिमान भी समझे जाते और उनकी बात का प्रभाव भी पड़ता है। वार्तालाप का यह कौशल यदि बहिर्मुखी न रहने देकर अन्तर्मुखी बना लिया जाय तो बुद्धिमत्ता की मात्रा में सहज ही आशाजनक अभिवृद्धि हो सकती है।

मन की दो परतें हैं− एक बाजारू बचकाना, दूसरा सम्मानित उपाध्याय। अध्यापक के प्रशिक्षण में छात्र की योग्यता बढ़ती है। बचकाने मन का समुचित प्रशिक्षण करना यदि उपाध्याय को रुचिकर लगे तो यह क्रम हर घड़ी चलता रह सकता है। सोचने का सही तरीका भर यह छात्र यदि ठीक से सीख सके तो उतने भर से मनःसंस्थान की गरिमा अत्यधिक बढ़ सकती है। अस्त−व्यस्त चिंतन से मानसिक शक्तियों का अपव्यय ही नहीं होता, वरन् हानिकारक गतिविधियाँ अपना लेने और पग−पग पर ठोकरें खाने का भी खतरा रहता है। जिस प्रकार बच्चों को शिष्टाचार सिखाया जाता है और बछड़ों को कृषि कार्य के लिए सधाया जाता है उसी प्रकार मन को भी सही सोचने और सही करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। यह कार्य अपना ही उच्चस्तरीय मन कर सकता है। वह मन जिसे अध्यापक उपाध्याय की योग्यता अनायास ही प्राप्त है।

कई परिवारों में संकोचशीलता की कुछ विलक्षण प्रथा चल पड़ती है। एक दूसरे से बहुत कम बोलते हैं और आमने-सामने आने से कतराते रहते हैं। कहने को तो इसे शील संकोच भी कह दिया जाता रहा है, पर वस्तुतः इसे दब्बूपन जैसा ही कुछ नाम दिया जाना चाहिए। परस्पर घुल मिल कर बातें करने से मन हलका ही नहीं होता−घनिष्ठता बढ़ती है, गुत्थियाँ खुलती हैं और कई उपयोगी निष्कर्ष निकलते हैं। यही बात मन के सम्बन्ध में भी है। मन से मन को समझाने की परस्पर शंका−समाधान, विचार-विनिमय और आदान−प्रदान करने की आदतें ऐसी अच्छी हैं कि दृष्टिकोण में आशाजनक सुधार होता है− दुष्प्रवृत्तियाँ छूटती हैं और सर्वतोमुखी प्रगति के कितने ही अप्रत्याशित द्वार खुलते हैं।

परिस्थितियों को सुधारने की बात सभी सोचते हैं किन्तु यह भूल जाते हैं कि मनःस्थिति पर ध्यान देना और भी अधिक आवश्यक है। यदि अपने चिन्तन को परिष्कृत ओर क्रिया-कलाप को व्यवस्थित बना लिया जाय तो परिस्थितियों की प्रतिकूलता बहुत हद तक स्वतः ही सरल हो जायगी। जो बच रहेगी उससे सूझ−बूझ और साहस के सहारे निपट लेना कुछ अधिक कठिन न रहेगा। प्रतिकूलताओं से डरने की अपेक्षा यह अधिक उपयुक्त है कि उनसे निपटने के कौशल को उभारा और परिपक्व किया जाय।

शेक्सपियर कहते थे− ‘‘आपत्तिकाल का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वह हमें संसार की कड़ुई सच्चाइयों से परिचित कराता है। मित्रों और शत्रुओं के वास्तविक रूप को नंगा करके सामने खड़ा कर देता है।” लुकमान ने कहा है− आपत्तिकाल से पार होने का सबसे बड़ा सहारा है उज्ज्वल भविष्य की आशा। अँधेरी रात प्रातःकाल की प्रतीत में सहज ही कट सकती है। आपत्ति में डूबता वह है जिसने अन्धेरे भविष्य का अन्धकार अपने चारों ओर संजोकर रख लिया है।

हर स्थिति में हलके-फुलके बने रहने की आदत उत्पन्न कर लेना जीवन को सरस बनाने की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण कला कौशल है। खिलाड़ी की दृष्टि रखें तो हार−जीत में सन्तुलन बिगड़ने न पायेगा। नाटक के पात्र अपने अभिनय में चूक नहीं करते किन्तु प्रदर्शन के घटना−क्रम में इतने प्रभावित नहीं होते कि आवेशग्रस्त होकर अपनी नींद ही हराम कर बैठें। यही मध्यवर्ती मनःस्थिति हमारी होनी चाहिए।

मेसाचुसेट्स इलाके के ग्रेटवरीग्टन उपनगर का निवासी परसी एच0 व्हाइटिंग नामक एक हंसोड़ ने अपना जीवन वृत्तान्त लिखते हुए बताया है कि उसने जवानी के बीस वर्ष ऐसी बीमारियों से लड़ते हुए बिताये जिन्हें मौत की सहेली माना जाता था। डॉक्टर उसे असाध्य बताया करते थे। इलाज करके बदनामी लेने के लिए बड़े चिकित्सक तो तैयार ही न होते थे। बाप दवाओं की दुकान करते थे। उनकी जान−पहचान बहुत से डाक्टरों से थी। सो चित्र−विचित्र बीमारियों के इलाज और नित नये उपचार पर प्रायः चर्चा होती ही रहती थीं। दवाओं पर खर्च भी बहुत हुआ था। पर उससे नतीजा कुछ नहीं निकला।

अन्ततः उसने अपना इलाज अपने हाथ में लिया। आहार−विहार को सुसंयत करने के अतिरिक्त उसने एक अच्छी आदत सीखी− वह थी मुसकराते रहने और अवसर मिलते ही जी खोल कर हँसने की कला। इस उपचार ने उसका काया-कल्प ही कर दिया। वह बीमारियों से अपने आप छूटा और औसत मनुष्यों की तुलना में अधिक अच्छी तन्दुरुस्ती का जीवनयापन करने लगा। लोग उसके इस आश्चर्यजनक परिवर्तन की बात पूछते तो वह एक ही उत्तर देता−मैंने मरना बन्द कर दिया, फलतः जिन्दगी वापिस लौट आई। वह विषाद को मौत और मुसकान को जिन्दगी की संज्ञा दिया करता था।

आदमी काम से नहीं थकता ‘ऊब’ से मरता है। काम में रस लेने तो वह भार न रह कर विनोद बन जाता है और उसे छोड़ने को मन नहीं करता जब कि भार समझ कर करने वाले तनिक से श्रम और समय में बेतरह थकान अनुभव करते और छूटने के लिए आतुर रहते देखे गये हैं।

अलेग्जेन्ड्रिया−वर्जीनिया के एण्टनी नामक अध्यापक ने आर0 कालेज में पूरे 48 वर्ष तक काम किया। इस बीच उनने एक दिन के लिए भी स्कूल जाना बन्द नहीं किया। रविवार तथा अन्य छुट्टी के दिनों में भी वे स्कूल जाते थे तथा सफाई व्यवस्था आदि के कामों को अपने हाथों निपटाते थे। बीमारी तथा आकस्मिक कार्यों के लिए भी कभी उन्हें एक भी छुट्टी नहीं लेनी पड़ी।

किसी विषय में गहरी दिलचस्पी और अभिरुचि का होना सामान्य क्षमता को असामान्य बनाने के दृष्टि से बहुत ही कारगर सिद्ध होता है। साधनहीन और पिछड़ी स्थिति के लोग भी अपने विषय में गहरी दिलचस्पी उत्पन्न करके उस प्रयास में पारंगत होते देखे गये हैं।

स्काटलैण्ड का प्रख्यात कवि मैकइन्तायर सन् 1724 में जन्मा और 1812 में मरा। इन 88 वर्ष के लम्बे जीवन में उसने हजारों कविताएँ गढ़ी और वे इस देश के साहित्यिक इतिहास में अनुपम मानी जाती हैं। यह कवि निरक्षर था। उसने न तो पढ़ना आता था और न लिखना। इसके लिए उसने प्रयत्न भी नहीं किया। वह कहता था स्मरण शक्ति यदि ठीक काम दे तो पढ़ना और लिखना, सीखने में क्यों समय नष्ट किया जाय?

हमारे जीवन शिथिल और अनियन्त्रित होते चले जा रहे है। भरी जवानी में ही बुढ़ापे की संध्या आ घेरती है। समय से पहले इस प्रकार बुढ़ापे का आगमन चिन्ता जनक है जिसमें बच्चे और युवक भी जवानी का आनन्द न ले पायें। आँधी−तूफान की गति से अपने समाज पर बुढ़ापे का असर बढ़ता जा रहा है। यह शारीरिक नहीं मानसिक दुर्गति है। जो अपने को जवान मानता रहेगा उसकी जवानी बुढ़ापे में भी बनी रहेगी।

अनीति से समझौता का लेना और उसके प्रतिरोध के लिए साहस न कर सकना यह बताता है कि आन्तरिक शौर्य गँवा दिया गया। किसी भी कीमत पर स्वार्थ सिद्ध करने की जहाँ उतावली हो, वहाँ इस बात की परवाह कौन करेगा कि इस प्रकार की उपलब्धियों में अनीति का आश्रय तो नहीं लिया गया है।

कुटिलता मनुष्य का गुण नहीं है। उसे शैतान का षड्यन्त्र कहा गया है, जहाँ कुचक्र रचे जाते हैं, षड्यन्त्रों का आश्रय लिया जाता है। दुरभिसंधियाँ रची जाती हों, वहाँ मानवी गरिमा का दिवाला ही पिट गया समझा जाना चाहिए। ऐसे मनुष्य क्या कमाते, क्या पाते और क्या खाते हैं? प्रश्न इस बात का नहीं है। देखना यह है कि जिन घिनौने तरीकों से इन उपलब्धियों को पाया गया क्या वे मानवी गौरव के अनुकूल थीं? यदि नहीं तो उन सुविधाओं को अत्यधिक महंगे मूल्य पर खरीदा गया समझा जाना चाहिए।

बालकों जैसा सरल सौम्य यह निश्छल जीवन एक दैवी वरदान है जिसके इर्द−गिर्द सम्भावनाएँ निरन्तर मंडराती रहती हैं। न महत्वाकांक्षाओं की आग में जले और न आशंकाओं से मन को भयभीत बनाये रहने की भूल करें। जो सामने है उसका सदुपयोग करना और आनन्द लेना ही सच्चा कर्म कौशल है। इसे अपनाकर हर परिस्थिति का व्यक्ति सुखी और सरस जीवन जी सकता है।

आइन्स्टाइन जब मरने को हुए तो किसी ने उनसे पूछा− ‘‘आपको मरने से डर तो नहीं लगता? उनने शांत भाव से उत्तर दिया− सर्वत्र संव्याप्त चेतना के साथ मैंने इतनी आत्मीयता जोड़ ली है कि मुझे अपनों से अलग होने जैसा आभास ही नहीं हो सकता। साथ ही उनने यह भी कहा था−”परिवर्तन प्रकृति की अनवरत खिलवाड़ है इस सामूहिक क्रीड़ा−विनोद से हल अलग कैसे रह सकते हैं। परिवर्तन की स्वाभाविकता में डरावनापन नहीं, सहज प्रवाह है, जो सरस भी है और सुगम भी।”

जीवन को हलका-फुलका रखने के लिए आवश्यक यह है कि व्यक्तित्व का मूल्य समझा जाय और उसे प्रखर परिष्कृत बनाने के लिए चिन्तन और चरित्र का स्तर गिरने न दिया जाय।

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जीवन काल की मनःस्थिति मरने के उपरान्त भी!

जर्जिया के सरकारी अभिलेखों में एक ऐसी तान्त्रिकी वृद्धा का उल्लेख है कि केवल चार महीने ही एक क्षेत्र में ठहरी किन्तु उतने ही दिनों में आफत बरसा कर रख गई।

बुढ़िया ने जिस दिन से उस खण्डहर में डेरा डाल उस दिन से पार्क के पक्षियों ने चहचहाना बन्द कर दिया वे गुमसुम घोंसलों में शाम को पहुँचते और उसी खामोशी के साथ बिना पत्ता खड़काये सवेरा होते−होते भाग खड़े होते। दिन भर उस क्षेत्र में कोई पखेरू कहीं भी दीख नहीं पड़ता। एक सप्ताह नहीं बीता कि उस उपवन में सूखी धुन्ध छाई रहने लगी। यह धुन्ध भी अजीब थी न तो उसमें कुहरे जैसी नमी थी और न धुँए जैसी घुटन। लगता था अन्धेरा ही हलकी बदली की शक्ल में इस इलाके पर छा गया है। हर चीज धुँधली दीखती। आँखों में बहुत खराबी आ जाने पर जिस तरह हर वस्तु धुँधली दीखती है ठीक वैसा ही माहौल उस इलाके पर घिरा रहने लगा।

इधर से निकलने वालों ने किसी अज्ञात भय से उधर से आना−जाना बन्द कर दिया जिन्हें जरूरी काम से उधर जाना पड़ता था, उनने एक दिन देखा कि वही बुढ़िया उस धुँध के ऊपर अधर में चल रही है और बिल्लियाँ उसके साथ हैं। अधर में चलना विचित्र था। एक ने दूसरे को दिखाया। सैकड़ों ने उसे देखा। सभी सन्न रह गये। यह सिलसिला कई दिन चला। नियत समय पर दर्शकों की भीड़ इकट्ठी हो जाती। इसके बाद वह बुढ़िया भी गायब हो गई और धुँध भी छट गई। लोगों का अनुमान था वह कोई तान्त्रिकी है और कई तरह की आफतें खड़ी कर सकती है।

चर्चा यह रहती थी कि बुढ़िया तान्त्रिकी का डेरा उसी खण्डहर में है। वह कहीं गुप्त प्रकट होती हुई डेरा डाले पड़ी रहती है। निदान लोगों ने उस खण्डहर को विस्मार कर देने की ठानी और समूह बनाकर कुदाल फावड़े लेकर वहाँ पहुँचे। समूह खण्डहर तक पहुँचने भी नहीं पाया कि एक भयंकर चक्रवात उसी क्षेत्र में प्रकट हुआ जिसने उन सभी को उछाल उलट कर रख दिया। कइयों के भारी चोटें लगीं। पेड़ उखड़ गये और आस−पास के झोंपड़े उजड़ गये। आश्चर्य इस बात का था कि वह तूफान खण्डहर उजाड़ने वाले लोगों के इर्द−गिर्द ही घुमड़ता रहा और पन्द्रह मिनट तक उन्हें त्रास देने के उपरान्त स्वतः समाप्त हो गया।

चार महीने तक यह उथल−पुथल चलती रही। बाद में अपने आप ही उस बुढ़िया और उसकी हलचलों का न जाने कहाँ पलायन हो गया।

यह बुढ़िया जीवितों की तरह दीखती थी किंतु वस्तुतः वह भी अदृश्य प्रेतात्मा। जानकार उसे मरण से पूर्व तान्त्रिक क्रियाकृत्यों से आजीविका कमाने आजीविका कमाने और सदा कुचक्र षड्यन्त्रों में संलग्न रहने वाली प्रकृति की बताते थे। मरने के बाद भी उसकी चेतना उसी प्रकार के डरावने नाटक रचती रही। जीवंत स्थिति जैसी ही गतिविधियाँ मरण के उपरान्त भी चलते रहने का यह एक प्रत्यक्ष उदाहरण सामने हैं।


षट्−चक्र प्रचण्ड प्रवाहों के उद्गम

जीव और ब्रह्म के बीच, पिण्ड और ब्रह्माण्ड के बीच कुछ सुनिश्चित सम्बन्ध सूत्र जुड़े हुए है। किन्तु वे शिथिल मूर्छित, अवरुद्ध, निष्क्रिय, उपेक्षित स्थिति में पड़े रहते हैं। यदि उन्हें सजग सक्रिय किया जा सके तो सम्बन्ध जुड़ जाने से आदान−प्रदान का द्वार खुलता है और फिर किसी प्रकार के अभाव संकट का सामना नहीं करना पड़ता। इन सम्बन्ध सूत्रों को सजग सक्रिय बना लेना ही साधना क्षेत्र का परम पुरुषार्थ माना गया है।

कठपुतली और बाजीगर की उँगलियों के मध्य कुछ धागे जुड़े रहते हैं और वे ही सारे खेल की भूमिका निभाते हैं। आकाश में उड़ने वाली पतंग और उसे उड़ाने वाले के साथ सम्बन्धित किये रहने की प्रक्रिया पतली डोरी द्वारा सम्पन्न होती है। माता और गर्भ के मध्य नाल−नलिका से सम्बन्ध बना रहता है और पोषण उसी से पहुँचता है। टेलीफोन के तार ही आवाज को इधर से उधर पहुँचाने का कार्य करते हैं। इसी प्रकार जीव और ब्रह्म के बीच, पिण्ड और ब्रह्माण्ड के बीच आदान−प्रदान के माध्यम कुछ सम्बन्ध सूत्र हैं। इन्हें चक्र संस्थान कहा गया है। षट्चक्र प्रसिद्ध है। मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञाचक्र के नाम से इन्हें साधना विज्ञान के विद्यार्थी भली−भाँति जानते हैं। इन सबके ऊपर सहस्रार चक्र है। उस समेत यह चक्र संख्या सात हो जाती है। इन्हीं को सात लोक, सात ऋषि, सात द्वीप, सप्त सागर आदि की संज्ञा दी गई है। मेरुदण्ड स्थित छह चक्रों में सूक्ष्म जगत में संव्याप्त आत्मिक और भौतिक विभूतियों के साथ सम्बन्ध जोड़े रहने की क्षमता है। उस क्षमता की क्रियान्वित करने का अवसर सहस्रार के माध्यम से मिलता है। इस चक्र संस्थान को जागृत करने के तन्त्र विज्ञान और योग विज्ञान में कई प्रकार के विधि−विधान बताये गये हैं। साधन उनमें से अपनी रुचि, सुविधा एवं उस परम्परा के अनुसार किसी मार्ग को अपनाने और सफलता के लक्ष्य तक पहुँचाते हैं। सभी जानते हैं कि साधनाओं में चक्रवेधन की चक्र जागरण की साधना प्रमुख है।

षट्चक्रों का स्वरूप क्या है और उनमें सन्निहित सामर्थ्य का आधार क्या है। यह समझने के लिए कुछ भौतिक उदाहरणों की आवश्यकता पड़ेगी। बहते हुए नदी प्रवाह में कई बार भयंकर भँवरें पड़ते देखे गये हैं। इनकी सामर्थ्य इतनी प्रचण्ड होती है कि उधर से गुजरने वाली नावों और जहाज के अस्तित्व को ही खतरा उत्पन्न हो जाता है। जो उनकी चपेट में आता है डूब कर ही रहता है। दूसरा उदाहरण हवा के बहाव में पड़ने वाले चक्रवातों का है। वे भयंकर अन्धड़ के रूप में कई बार तूफानी गति से परिभ्रमण करते हैं और जो कुछ उनकी चपेट में आ जाता है उसे तोड़−मरोड़कर रख देते हैं। यह भंवरों और चक्रवातों की विघातक क्षमता हुई। उनमें उपयोगी उत्पादन की सामर्थ्य नगण्य है, किन्तु काय कलेवर में अवस्थित षट्चक्रों में दोनों ही प्रकार की क्षमता विद्यमान है। वे जीवन क्षेत्र में घुसी हुई अवांछनीयता को तोड़−मरोड़कर फेंक देने, उदरस्थ करने में भी समर्थ हैं और साथ ही ऊँचा उछाल देने की ऐसी क्षमता भी विद्यमान है जिससे उन्नति के सर्वोच्च शिखर तक पहुँच सकना सम्भव हो सके। चक्र साधना का पुरुषार्थ करने वाले ऐसे ही उभयपक्षीय लाभ उठाते हैं।

ब्रह्माण्ड की ही एक छोटी अनुकृति पिण्ड है। जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड में। ब्रह्माण्ड में भी ऐसी शक्ति धाराएँ दौड़ती हुई पाई गई हैं जो अन्तर्ग्रही आदान−प्रदान की व्यवस्था बनाती हैं। समस्त ग्रह नक्षत्र उन शक्ति प्रवाहों के मजबूत रस्सों से परस्पर बँधे हुए हैं और एक दूसरे का सहयोग करके आवश्यक को पहुँचाने और अनावश्यक को हटाने का काम चलाते हैं। यह शक्ति धाराएँ स्थिर नहीं धावमान हैं। उन्हें जल भंवर एवं वायु चक्र वात के समतुल्य समझा जा सकता है। इन अन्तरिक्षीय विद्युत प्रवाहों का परिचय जब कभी मिलता है तब आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।

एक ऐसे ही विद्युतीय चक्रवात की प्रवाह धारा का परिचय पृथ्वी के निकटवर्ती क्षेत्र में से गुजरता हुआ पाया गया है। वह अपनी धरती से बहुत दूर है फिर भी उसका प्रभाव पृथ्वी के एक क्षेत्र को अपने विकरण से प्रभावित करता है। यदि वह निकट होता तब तो पृथ्वी को ही उदरस्थ कर जाता, ईश्वर को धन्यवाद है कि वह धारा आकाश में बहुत दूरी पर बहती है और अपने चुम्बकत्व से थोड़े से ही क्षेत्र को प्रभावित करती है। इस प्रवाह को देखते हुए उन्हें अन्तरिक्ष के सुस्थिर चक्रवात कह सकते हैं। मानवी काया में पाये जाने वाले षट्चक्रों को भी इन्हीं विद्युत चुम्बकीय शक्ति प्रवाहों के समतुल्य माना जा सकता है।

अटलांटिक महासमुद्र में बरमूडा द्वीप समूह के पास एक ऐसा तिकोना क्षेत्र है जिसे जादुई कहा जाता है। उसकी परिधि में प्रवेश करने वालों की खैर नहीं, भले ही वे जलयान से वहाँ पहुँचें या वायुयान से उड़ान भरें। (1) फ्लोरिडा से बरमूडा तक (2) बरमूडा से प्वेर्तोंरिको तक और (3) प्वेर्तोंरिको से सान्तोडोमिंगो क्यूबा के पास होकर क्लोरिडो तक पहुँचने वाली रेखा तक इन तीन भुजाओं से यह त्रिकोण बनता है। इस क्षेत्र की विभीषिकाएँ ऐसी हैं जो मनुष्यों को अपने क्षेत्र से बाहर रखना चाहती हैं और जो उस लक्ष्मण रेखा को तोड़कर भीतर प्रवेश करना चाहते हैं उन्हें निगल जाती हैं। पहले इस प्रकार के घटनाक्रमों की किंवदंती या दैवी कहकर डाल दिया जाता था, पर इन दिनों जो प्रत्यक्ष प्रमाण सामने हैं उन्हें देखते हुए उन पर विचार करना और कारणों को खोज निकालना आवश्यक समझा जाने लगा है। अब तक 100 से अधिक वायुयानों और जलयानों के इस क्षेत्र में गायब हो जाने के विवरण नोट किये गये हैं जिनकी प्रामाणिक जानकारी नहीं मिल सकी ऐसी सच्ची झूठी लोक चर्चाओं में तो वह संख्या और भी कई गुनी हो जाती हैं।

कई अन्य शोधकर्त्ताओं ने इस रहस्यमय क्षेत्र के सम्बन्ध में विभिन्न अनुमान लगाये और निष्कर्ष निकाले हैं। हैराल्ड वाइकिंग इसे अन्तरिक्ष के किसी लोकवासियों के साथ पृथ्वी से सम्बन्ध रखने वाला क्षेत्र है। इस मार्ग में होकर वे लोग आसमान से धरती पर आते हैं और खोज, खबर तथा अभीष्ट पदार्थ लेकर वापिस लौट जाते हैं। अर्जेन्टाइना के विज्ञानी रोमनी ऊंक ने भी इसी से मिलता−जुलता अनुमान लगाया है और कहा है यह क्षेत्र अन्तरिक्षीय आदान−प्रदान का अपने ढंग का विचित्र केन्द्र है। यों आदान−प्रदान तो ध्रुव केन्द्रों से ही प्रधानतया होते हैं, पर ऐसे छुटपुट केन्द्र अन्यत्र भी हो सकते हैं जो अनायास ही बन गये हों अथवा प्रयत्नपूर्वक बनाये गये हों।

अमेरिका ने नासा शोध संस्थान द्वारा अन्तरिक्ष का एक एक्सरे फोटोग्राफ तैयार किया गया है जिससे पता चला है कि ब्रह्माण्ड में कई विचित्र विद्युत प्रवाह सनसनाती हुई तेजी के साथ एक ओर से दूसरी ओर दौड़ रहे हैं। इनकी गति में प्रकाशगति से भी अधिक तेजी है साथ ही चुम्बकीय ऊर्जा की उच्चस्तरीय प्रखरता भी उनमें भरी हुई है। यह कहाँ से आती है और किस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए दौड़े जा रहे हैं। यह तो पता नहीं चला हैं, पर इतना अवश्य देखा गया है कि वे ग्रह-नक्षत्रों के बीच किन्हीं महत्वपूर्ण आदान−प्रदानों का भार वहन करते हैं। वे अपने कन्धों पर कुछ लादकर ले जाते हैं और अन्य ग्रहों तक उनकी आवश्यक सामग्री पहुँचाते हैं। एक से दूसरे को, दूसरे से तीसरे को, उसी प्रकार अन्ततः अन्तरिक्ष में यह प्रेरणा और ग्रहण का सिलसिला चलता रहता है और ग्रह-नक्षत्र पारस्परिक सहयोग से अपने−अपने उपार्जनों को मिल बाँटकर खाते रहते हैं। फालतू का वितरण और आवश्यक का ग्रहण सहकारिता का खुला उद्देश्य है। उसी की पूर्ति का तारतम्य बिठाने के लिए यह विद्युत चुम्बकीय प्रवाह धाराएँ अन्तरिक्ष में दौड़ लगाती रहती हैं।

इन प्रवाहों की असंख्य धाराएँ अन्तरिक्ष में मकड़ी के जाले की तरह फैली हुई देखी जाती हैं। वे समुद्र तल की जल धाराओं की तरह उलटी-सीधी सब ओर गतिशील रहती है। उनका कोई निर्धारित दिशा क्रम नहीं हैं। किस ग्रह की आवश्यकता किससे पूरी होती है उस पूर्ति के लिए निकटतम मार्ग क्या हो सकता है? प्रवाहों के, बिना टकराये किस प्रकार कहाँ पहुँचना सम्भव हो सकता है। सम्भवतः ऐसे ही विकट समाधानों का सामना करते हुए उनका हल निकालते हुए यह अन्तरिक्षीय विद्युत प्रवाह अपना मार्ग निर्धारित हुए यह अन्तरिक्षीय विद्युत प्रवाह अपना मार्ग निर्धारित करते हैं। उनकी दिशा धारा का निर्धारण इसी आधार पर होता हैं। टैक्सास युनिवर्सिटी के अन्तरिक्ष विज्ञानी ज्ञान व्हीलर ने इन धावमान प्रवाहों को क्वासर्स ऊर्जा स्रोत कहा है, उनका कथन है कि संव्याप्त रेडियो तरंगें इसी स्रोत से प्रादुर्भूत होने वाली लहरें हैं। वे उन्हें ग्रहों को परस्पर बाँधने वाले शक्तिशाली रस्से भी ठहराते।

अन्तरिक्ष भौतिकी के प्रो0 हर्बर्ट गर्सकी ने इन प्रचण्ड प्रवाहों का नाम अन्धेरा गर्त ब्लैक होल कहा है। जिसमें गिरने के बाद फिर कोई वस्तु वापिस नहीं लौट सकती वरन् अविज्ञान के प्रवाह में पड़कर अनिश्चित की ओर बहती चली जाती है। वे इन अन्ध गर्तों को ब्रह्माण्ड के ऐसे खम्भों की उपमा देते हैं जिनके कन्धों पर यह विशालकाय ब्रह्माण्ड छत−छप्पर की तरह खड़ा हुआ है।

चक्र संस्थान को ऐसे ही प्रचण्ड शक्ति प्रवाहों के उद्गम केन्द्र माना जा सकता हैं। सुप्त स्थिति तो मृतकवत् होती है। चक्र प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहें तो उनका होना न होना समान है, किन्तु यदि उन्हें जागृत एवं सक्रिय किया जा सके और उन शक्ति धाराओं का महत्वपूर्ण उपयोग किया जा सके तो जीव को भी अपने उद्गम केन्द्र ब्रह्म के समान ही समर्थ बनने का अवसर मिल सकता है। तपस्वी, तत्वज्ञानी उन्हीं शक्ति स्रोतों को प्रचण्ड बनाने और उनके द्वारा आत्म−कल्याण और विश्व कल्याण का प्रयत्न करते रहते हैं। चक्र साधना का यही प्रयोजन हैं।


श्री रायचन्द भाई (kahani)

श्री रायचन्द भाई बम्बई के एक जौहरी थे। उन्होंने एक व्यापारी से एक बार सौदा किया, सौदे में यह निश्चय हुआ कि अमुक दिनाँक को एक अनिश्चित मूल्य के हीरे वह व्यापारी देगा। सौदे की लिखा−पढ़ी भी हो गई।

संयोग की बात हीरों के मूल्य इतने बढ़ गये कि यदि वह व्यापारी सौदे के अनुसार माल दे तो उसकी सारी जमीन जायदाद, घरबार सब बिक जाय।

रायचन्द भाई को बाजार भाव में वृद्धि का पता चला तो वे उस व्यापारी के यहाँ गए, व्यापारी समझा रायचन्द भाई माल लेने आ पहुँचे, सो उसने कहा, “मैं स्वयं चिन्तित हूँ चाहे जो हो मैं घाटे के रुपये आपको अवश्य दूँगा।” रायचन्द भाई ने कहा “ मैं चिन्ता क्यों न करूं, जब तुमको चिन्ता लग गई है तो मुझे भी होनी ही चाहिए। हमारे बीच में हुई लिखा−पढ़ी से ही यह स्थिति बनी है अतः इसे समाप्त कर दिया जाय।” व्यापारी समझा रायचन्द भाई शीघ्र ही लाभ की रकम लेना चाहते हैं अतः वह बोला, “ऐसा नहीं आप मुझे दो दिन का समय दें मैं रुपये चुका दूँगा, लिखा−पढ़ी के उपयोगी की स्थिति न आ पायेगी।” रायचन्द्र भाई समझ गए कि व्यापारी कितना भोला व सच्चा इन्सान है। उन्होंने लिखा−पढ़ी के अपने कागजों को फाड़ते हुए कहा, ‘इस लिखा−पढ़ी से तुम बँध गये थे। बाजार भाव बढ़ने से मेरा तुम पर चालीस−हजार रुपया लेना हो गया, परन्तु मैं तुम्हारी हालत जानता हूँ। ये रुपये तुम कहाँ से दोगे। रायचन्द दूध पी सकता है किसी का खून नहीं।” व्यापारी कृतज्ञता से रायचन्द्र भाई के चरणों पर गिर पड़ा।

इन्हीं रायचन्द भाई को महात्मा गाँधी ने एकबार कहा था, “मैंने कोई गुरु नहीं बनाया लेकिन मुझे कोई गुरु मिला है तो वह तुम हो।”

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अविज्ञात की अनुकम्पा से महान् रहस्यों का प्रकटीकरण

उपनिषद् के ऋषि का अनुभव है कि आत्मा जिसे वरण करता है उसके सामने अपने रहस्यों को खोलकर रख देता है। इस उक्ति का निष्कर्ष यह है कि रहस्यों का उद्घाटन चेतना की गहराइयों से होता है। मानवी संसार की सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जब जितने अनुदान आवश्यक होते हैं उसी अनुपात से कोई अविज्ञात अपने अनुदान इस धरती पर उतारता रहता है। यह अवतरण जिनके माध्यमों से होता है वे सहज ही श्रेयाधिकारी बन जाते हैं।

वैज्ञानिक आविष्कारों का श्रेय यों उन्हें मिलता है जिनके द्वारा वे प्रकाश में आने योग्य बन सके। किन्तु यहाँ यह विचारणीय है कि क्या उसी एक व्यक्ति ने उस प्रक्रिया को सम्पन्न कर लिया? आविष्कर्त्ता जिस रूप में अपने प्रयोगों को प्रस्तुत कर सके हैं उसे प्रारम्भिक ही कहा जा सकता है। सर्वप्रथम प्रदर्शन के लिए जो आविष्कार प्रस्तुत किये गये वे कौतूहलवर्धक तो अवश्य थे, आशा और उत्साह उत्पन्न करने वाले भी, पर ऐसे नहीं थे जो लोकप्रिय हो सकें और सरलतापूर्वक सर्वसाधारण की आवश्यकता पूरी कर सकें। रेल, मोटर, टेलीफोन, हवाई जहाज आदि के जो नमूने पंजीकृत कराये गये थे, उनकी स्थिति ऐसी नहीं थी कि उन्हें सार्वजनिक प्रयोग के लिए प्रस्तुत किया जा सके यह स्थिति तो धीरे−धीरे बनी है उस विकास में न्यूनाधिक उतना ही मनोयोग और श्रम पीछे वालों में न्यूनाधिक उतना ही मनोयोग और श्रम पीछे वालों को भी लगाना पड़ा है जितना कि आविष्कर्त्ताओं को लगाना पड़ा था।

संसार के महान् आन्दोलन आरम्भिक रूप में बहुत छोटे थे उनके आरम्भिक स्वरूप को देखते हुए कोई यह अनुमान नहीं लगा सकता था कि कभी वे इतने सुविस्तृत बनेंगे और संसार की इतनी बड़ी सेवा कर सकेंगे। किन्तु अविज्ञात ने जहाँ उन आन्दोलनों को जन्म देने वाली प्रेरणा की निर्झरणी का उद्गम उभारा, किसी परिष्कृत व्यक्ति के माध्यम से उसे विकसित किया, साथ ही इतनी व्यवस्था और भी बनाई कि उस उत्पादन को अग्रगामी बनाने के लिए सहयोगियों की शृंखला बनती बढ़ती चली जाय। ईसा, बुद्ध, गाँधी आदि के महान आन्दोलनों का आरम्भ और अन्त−बीजारोपण और विस्तार देखते हुए लगता है, यह श्रेय−साधन किसी अविज्ञात के संकेतों पर चले और फले-फूले हैं।

जिन आविष्कर्त्ताओं को श्रेय मिला उन्हें सौभाग्यशाली कहा जा सकता है। गहरे मनोयोग के सत्परिणाम क्या हो सकते हैं इसका उदाहरण देने के लिए भी उनके नामों का उत्साहवर्धक ढंग से उल्लेख किया जा सकता है। गहराई में उतरने की प्रेरणा भी उस चर्चा से कितनों को ही मिलती है। पर यह भुला न दिया जाना चाहिए कि उन आविष्कारों, आरम्भों के रहस्य प्रकृति ही अपना अन्तराल खोलकर प्रकट करती हैं। हाँ, इतना अवश्य है कि इस प्रकार के रहस्योद्घाटन हर किसी के सामने नहीं होते। प्रकृति की भी पात्रता परखनी पड़ती हैं। अनुदान और अनुग्रह भी मुफ्त में नहीं लूट जाते, उन्हें पाने के लिए भी उपयुक्त मनोभूमि तो उस श्रेयाधिकारी को ही विनिर्मित करनी पड़ती है।

आविष्कारों की चर्चा इतिहास पुस्तकों में जिस प्रकार होती है वह बहुत पीछे की स्थिति है। आरंभ कहाँ से होता है यह देखना हो तो पता चलेगा कि उन्हें आवश्यक प्रकाश और संकेत अनायास ही मिला था। इनमें उनकी पूर्ण तैयारी नहीं के बराबर थी। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो यह भी कह सकते हैं कि उन पर इलहाम जैसा उतरा और कुछ बड़ा कर गुजरने के लिए आवश्यक मार्गदर्शन देकर चला गया। संकेतों को समझने और निर्दिष्ट पथ पर मनोयोगपूर्वक चल पड़ने के लिए तो उन आविष्कर्त्ताओं की प्रतिभा को सराहना ही पड़ेगा।

बात लगभग दो हजार वर्ष पुरानी है। एशियामाइनर के कुछ गड़रिये पहाड़ी पर भेड़ें चरा रहे थे। उनकी लाठियों के पेंदे में लोहे की कीलें जड़ी थीं। उधर से गुजरने पर गड़रियों ने देखा कि लाठी पत्थरों से चिपकती है और जोर लगाने पर ही छूटती है। पहले तो इसे भूत-प्रेत समझा गया फिर पीछे खोजबीन करने से चुम्बक का ज्ञान हुआ। चुम्बक का विज्ञान यहीं से आरम्भ हुआ। आज तो चुम्बक एक बहुत बड़ी शक्ति की भूमिका निभा रहा है।

ये गड़रिये चुम्बक का आविष्कार करने का उद्देश्य लेकर नहीं निकले थे और न उनमें इस प्रकार के तथ्यों को ढूँढ़ निकालने और विश्वव्यापी उपयोग के लायक किसी महत्वपूर्ण शक्ति को प्रस्तुत कर सकने का क्षमता ही थी।

न्यूटन ने देखा कि पेड़ से टूट कर सेब का फल जमीन पर गिरा। यह दृश्य देखते सभी रहते हैं, पर न्यूटन ने उस क्रिया पर विशेष ध्यान दिया और माथा−पच्ची की कि फल नीचे ही क्यों गिरा, ऊपर क्यों नहीं गया? सोचते-सोचते उसने पृथ्वी की आकर्षण शक्ति का पता लगाया और पीछे सिद्ध किया कि ग्रह-नक्षत्रों को यह गुरुत्वाकर्षण ही परस्पर बाँधे हुए हैं। इस सिद्धान्त के उपलब्ध होने पर ग्रह विज्ञान की अनेक प्रक्रियाएँ समझ सकना सरल हो गया।

पेड़ से फल न्यूटन से पहले किसी के सामने न गिरा हो ऐसी बात नहीं है। असंख्यों ने यह क्रम इन्हीं आँखों से देखा होगा पर किसी अविज्ञात ने अकारण ही उसके कान में गुरुत्वाकर्षण की सम्भावना कह दी और उसने संकेत की पूँछ मजबूती से पकड़ कर श्रेय प्राप्त कराने वाली नदी पार कर ली।

अब से 300 वर्ष पुरानी बात है। हालैंड का चश्मे बेचने वाला ऐसे ही दो लैंसों को एक के ऊपर एक रखकर उलट−पुलट का कौतुक कर रहा था दोनों शीशों को संयुक्त करके आँख के आगे रखा तो विचित्र बात सी दिखाई पड़ी। उसको गिरजा बहुत निकट लगा और उस पर की गई नक्कासी बिल्कुल स्पष्ट दीखने लगी। दूरबीन का सिद्धान्त इसी घटना से हाथ लगा और अब अनेक प्रकार के छोटे-बड़े दूरबीन विज्ञान की शोधों में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।

चश्मे बेचना एक बात है और दूरबीन दूसरी। दोनों के बीच सिद्धान्त और व्यवहार का कोई सीधा तालमेल नहीं है। फिर भी संकेत देने के लिए इस संगति भर से काम चल गया। प्रकृति ने एक रहस्य उसके ऊपर उड़ेल ही दिया।

अभी पूरे सौ वर्ष भी नहीं हुए सन् 1895 की बात है। प्रो0 राब्टजन अपनी प्रयोगशाला में एक हवा रहित काँच की नली में होकर विद्युत−प्रवाह छोड़ने सम्बन्धी प्रयोग कर रहे थे। संयोगवश उसी कमरे में अन्यत्र फोटोग्राफी प्लेटें बन्द बक्से में रखी थीं। प्लेटें जब काम में लायी गई तो उन पर प्रयोग समय के दृश्य अंकित पाये गये। बन्द बक्से में घटना चित्र कैसे पहुँचे इस खोज से “एक्स−रे” का आविष्कार हो गया। सभी जानते हैं कि आज रोगों के निदान और सर्जरी में एक्स किरणों की सहायता से उतारे जाने वाले चित्रों का कितना अधिक योगदान है।

‘एक्स रे’ के आविष्कार का श्रेय जिस व्यक्ति को मिला उसे सौभाग्यशाली कहने में हर्ज नहीं, पर प्रयोगशाला में ऐसा सुयोग जान-बूझ कर नहीं बनाया था। उस संयोग के पीछे कोई अविज्ञात ही काम कर रहा होगा। अन्यथा ऐसे−ऐसे संयोग आये दिन न जाने कितने सर्वसाधारण के सामने आते रहते हैं। उनकी ओर ध्यान जाने का कोई कारण भी नहीं होता।

बात आविष्कारों की हो या आन्दोलनों की, श्रेय साधनों का शुभारम्भ ‘अविज्ञात’ की प्रेरणा से होता है। इस अविज्ञात को ब्रह्म कहा जाय या प्रकृति इस पर बहस करने की आवश्यकता नहीं। श्रेय लक्ष्य है। प्रगति अभीष्ट है। वह आत्मा के, परमात्मा के, उद्गम से आविर्भूत होता है। एक सहयोगी शृंखला का परिपोषण पाकर विकसित होता है। यश किसे मिले यह सामान्य साधारण और उथली बात है। उद्गमस्रोत किसी गहराई से उगता, उठता और सफल सुविकसित होता है। श्रेयाधिकारी अपनी पवित्रता भर विकसित करते और उसके बदले यशस्वी बनते हैं।

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सिद्धपीठ चलें, शक्ति लेकर आयें।

जीन डिक्शन की तरह पिछले दिनों योरोप और अमेरिका में ऐसे कई स्त्री−पुरुष प्रकाश में आये जो मात्र किसी की वस्तु का स्पर्श करके उसके बारे में न केवल वर्तमान अपितु भूत और भविष्य की घटनायें तक जान लेते और बता देते थे। जर्मनी में 12 वर्ष पूर्व इस सम्बन्ध में कुछ वैज्ञानिकों ने विशेष रुचि ली और यह पाया कि ऐसी घटनायें असत्य नहीं होतीं।

डॉ0 राइन के अनुसार− ‘साइकोमैट्री सिद्धान्त’ से इस तथ्य की पुष्टि होती है कि प्रत्येक वस्तु में मनुष्य शरीर में रहने वाले प्राण और मन की तरह का एक सूक्ष्म प्रभाव (ईथरिक इम्प्रेशन) होता है जो मन को प्रभावित करता है। स्पर्श से मनुष्य के मन के संस्कार उस वस्तु में चले जाते हैं। वह संस्कार पुनः उस व्यक्ति से सम्बन्ध जोड़ लेते हैं इसी आधार पर वह व्यक्ति जानकारी पा लेता है।

मौन्सियन बोविन ने एक यंत्र बनाया जो मनुष्य शरीर के रेडियेशन की माप करता है। उससे जो तथ्य सामने आते हैं उनमें एक तो यह कि उँगलियों व हथेलियों पर यह सबसे अधिक होता है। शेष शरीर का संबंध यहीं से होता है, इसलिए केवल मात्र उँगलियों से ही शरीर की विभिन्न स्थानों वाली विद्युत या जीवन−शक्ति का पता लगाया जा सकता है। अँगूठे का तो सीधे मस्तिष्क से सम्बन्ध होता है। यही नहीं उसमें जागृत ही नहीं सुषुप्ति अवस्था में भी मस्तिष्क की हलचलें प्रभाव डालती रहती हैं। भारतीय संस्कृति में चरण−स्पर्श की परम्परा ने महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। उसमें महापुरुषों, बड़ों, बुजुर्गों, पवित्र नदियों और मूर्तियों को प्रणाम करके उनसे प्राण−पवित्रता, ज्ञान−संस्कार और शक्ति ग्रहण करने का यह रहस्य ही सन्निहित है। एकलव्य ने तो अपनी श्रद्धा मिट्टी के द्रोणाचार्य के चरणों में आरोपित कर दी थी। परिणाम यह हुआ था द्रोणाचार्य को पता भी नहीं चल पाया और एक तरह से उनका सारा ज्ञान चोरी हो गया। “श्रद्धावान्लभते ज्ञान” के पीछे यही मनोवैज्ञानिक नियम काम करता है, जिसे अब वैज्ञानिक मान्यता भी मिल गई है। इन सब में प्रत्येक वस्तु में मन या ईथरिक इम्प्रेशन होने, सारे संसार में एक समान ऊर्जा तत्व (कामन इनर्जेटिक रियेलिटी) होने का सिद्धान्त काम करता है। इन दोनों के संयोग से ही ज्ञान, देश, काल व पदार्थ को प्रभावित करते और इनसे परे की भी जानकारी देते हैं।

प्रकृति विविधा है, पर उसमें एक ही मौलिक तथ्य काम करता है, उसी से उसे ऊर्जा मिलती है। विकास के साधन मिलते हैं, अभिव्यक्ति मिलती है। यदि सभी के कारण की दिशा में लौटें तो एक ही केन्द्र−बिन्दु मिलेगा। इसी तरह सारे विश्व में एक अति चेतन मन भरा है उससे सम्पर्क सम्बन्ध बनाकर लोग प्राकृतिक रहस्यों को जान सकते हैं। कई बार प्राकृतिक रूप से क्षणिक बोध किसी को भी हो सकता है। यहाँ तक कि कुत्ते, बिल्लियों तथा मकड़ी तक को भी भविष्य और अतीन्द्रिय बोध होते पाया गया है। पर किसी सार्थक उपयोग और लोक कल्याण की दृष्टि से मिलने वाली शक्ति सामर्थ्य किन्हीं प्रज्ञावान् व्यक्तियों को ही मिल सकती है।

योगदर्शन के अध्याय 3 सूत्र 53 में महर्षि पातंजलि ने बताया है−

जाति लक्षण देशैरन्यतान वच्छेदात्तू ल्योस्तयः प्रतिपत्तिः

अर्थात्−जाति, लक्षण और देश भेद से जिन दो वस्तुओं का भेद नहीं ज्ञात होता एवं लोगों वस्तु तुल्य मालूम होती हैं, उनके भेद का ज्ञान विवेक ज्ञान से ही होता है। विवेक ज्ञान को स्पष्ट करते हुए आगे यह बताया है कि लोक को तो जाति, लक्षण देश द्वारा पदार्थों का भेद ज्ञान होता है परन्तु योगियों को बिना जाति लक्षण व देश के विवेकज ज्ञान के ही भेद का निश्चय होता है।

जमशेद जी टाटा के आग्रह पर स्वामी विवेकानन्द ने इसी दृष्टि से टाटानगर का स्थान उसके प्लान्ट के लिए उपयोगी बताया था जो आज भी चल रहा है। राजस्थान में एक पानी वाले महात्मा थे। स्वयं तत्कालीन प्रधान मंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू ने दिल्ली के लिए जल सप्लाई हेतु उनकी सेवायें ली थीं। वे कहीं भी चलकर उस स्थान पर जल की उपलब्धि और मात्रा तक की जानकारी देते थे। यह सारी बातें इसी सिद्धान्त का समर्थन करती हैं कि मन की तरह की एक सूक्ष्म सत्ता प्रकृति में सर्वत्र कार्य करती है। इसमें ज्ञान और शक्तियाँ दोनों सन्निहित हैं उनसे सम्बन्ध स्थापित कर कोई भी ज्ञान, शान्ति और शक्ति प्राप्त कर सकता है। इस तथ्य की पुष्टि श्रीमती एनीबेसेण्ट ने भी की हैं।

“न्यू वर्ल्ड आफ माइण्ड” के पृष्ठ 84 पर डॉ0 राइन ने, “इम्प्रिजन्डस्प्लेन्डर” के अध्याय 8 में डॉ0 रेनर जानसन ने, “सुपर नार्मल फैकल्टीज इन मैन” में डॉ0 आस्टी तथा डॉ0 हेटिंगर ने, अपनी पुस्तक “अल्ट्रा परसेट्टिव फैकल्टी” में निम्न निष्कर्ष निकालते हुए “स्पर्श ज्ञान” का समर्थन करते हुए कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष इस प्रकार निकाले हैं−

1- वस्तु का स्पर्श करने वाले को उसके मन के सूक्ष्म संस्कार उस वस्तु में उतर आने के आधार पर पहचाना जा सकता है।

2- एक बार तादात्म्य स्थापित हो जाने पर वस्तु का रहना आवश्यक नहीं।

3- यदि वस्तु से व्यक्ति का सम्पर्क वर्षों पहले हुआ है और अब वह व्यक्ति नहीं भी हो तो भी उसके बारे में न केवल जाना जा सकता है अपितु उसके प्रकाश उसकी क्षमताओं को भी जाना और ग्रहण किया जा सकता है।

4- स्पर्श वाली वस्तु या स्थान में भौतिक व रासायनिक दृष्टि से किसी प्रकार का अन्तर नहीं आता। यदि उसके स्वरूप में कुछ परिवर्तन भी हो जाये तो भी वह संस्कार कहीं नहीं जाते।

5- व्यक्ति जितना प्राणवान या शक्तिसम्पन्न हो उसी अनुपात पर अनुभूति अधिक स्पष्ट होगी।

डॉ0 जॉनसन ने इस साहसिक ईथर सिद्धान्त की जो फल श्रुतियाँ निकाली हैं वे मन्दिरों, पवित्र जल, भस्म, देवालयों और सिद्ध पीठों की उपयोगिता का दर्शन कराते हैं। सिद्धान्त एक ही है कि ऐसे स्थानों में महापुरुषों के मन और उनके संस्कार उस भूमि के कण−कण में बस जाते हैं और उनका चिरकाल तक अस्तित्व बना रहता है। योगी आत्मा या महापुरुष इन वस्तुओं या स्थानों को अपने संकल्प बल से इतना ऊर्जा सम्पन्न बना देते हैं कि वहाँ आने वाले दुर्बल मनोबल के व्यक्ति भी अनुभूतियों की, साधना की सफलता और स्वल्प प्रयास में ही शक्ति पा जाते हैं। यह शक्ति आत्म विकास का तो प्राण ही है, पर उससे शारीरिक मानसिक और सांसारिक कठिनाइयों में भी उपयोग होता हैं। महापुरुषों और सिद्धपीठों की यात्रायें और सत्संग इसी आधा पर आयोजित होते हैं।

“ऐसे स्थानों पर “सम्मिलित मनःशक्ति” “एसोसियेटेड साहसिक ईथर” विनिर्मित हो जाता है। एक ही तरह पवित्रता के, करुणा उदारता और महानता के संस्कार उमड़ते रहने से उस स्थान पर उन संस्कारों का पुंज बन जाता है। जिससे वहाँ पहुँचने वाले दुष्ट और दुराचारी कमजोर मनःस्थिति या भूत-प्रेत आदि बाधाओं से ग्रस्त लोग भी जाकर प्रसन्नता अनुभव करते और शक्ति लेकर लौटते हैं। गायत्री तपोभूमि मथुरा और ब्रह्मवर्चस् को इसी तरह प्रयत्नपूर्वक संस्कारित किया गया है। यह संस्कार सैकड़ों वर्षों तक भी हिलाये नहीं हिल सकते। अपितु ऐसे स्थान पर समर्थ सत्ता की स्फुरणाओं, स्पर्शजन्य पवित्रता का, भावनाओं का चिरकाल तक लाभ लिया और अपनी उपासना को द्रुत किया जा सकता है।


Quotation

सतत् पुरुषार्थ का स्थान न मेधा ले सकती है, न प्रतिभा, न शिक्षा। संसार में ऐसे असंख्य मेधावी, प्रतिभाशाली तथा शिक्षित व्यक्ति भरे पड़े हैं जो जीवन में विफल रहे हैं परन्तु ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं मिलेगा। जिसने सतत् पुरुषार्थ किया हो और वह असफल रह गया हो।

−कालबिन कूलिल

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लूट−खसोट के अवरोध में सूक्ष्म शक्तियों की भूमिका

भूमिगत विशेषता एवं सम्पदा का निर्माण इस ताल−मेल के साथ हुआ है कि उस क्षेत्र के निवासी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रह सकें। अन्न, फल और औषधियों के बारे में प्रसिद्ध है कि जहाँ के जन्मे लोगों को उसी क्षेत्र का उत्पादन अनुकूल पड़ता है। द्रुतगामी साधनों से पदार्थों को सुदूर स्थानों तक भेजा जा सकता है, पर प्राणियों की, पदार्थों की संरचना में जो तत्व घुले रहते हैं उनका तालमेल न बैठ पाने से लाभदायक प्रतीत होते हुए भी हानिकारक बैठते हैं। क्षेत्रीयता की बात ऐसे ही कई दृष्टिकोणों के आधार पर बहुत महत्वपूर्ण तथ्य के रूप में सामने आती है।

खनिज पदार्थों एवं अन्य प्रकृति सम्पदाओं के सम्बन्ध में भी यही बात है। वे उस क्षेत्र के निवासियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर वितरित की गई हैं। उत्तरी ध्रुव के निवासी मनुष्यों और प्राणियों को शारीरिक संरचना तथा उपलब्ध पदार्थ सामग्री को देखते हुए सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रकृति की वितरण व्यवस्था कितनी दूरदर्शितापूर्ण है। खनिज तथा अन्यान्य प्रकृति सम्पदाओं के सम्बन्ध में भी यही बात है।

क्षेत्रीय उपलब्धियों से लाभान्वित होने का प्रथम अधिकार वहाँ के भूमि पुत्रों का है। इसके बाद अन्यत्र के लोगों को उससे लाभान्वित होने का अवसर मिलना उचित है। इसी आधार पर देशों के क्षेत्रीय अधिकारों को मान्यता मिलती रही है। उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद की निन्दा का कारण यही है कि स्थानीय लोगों के लिए दी गई प्रकृति उपलब्धियों का अपहरण अन्यत्र के लोग करते हैं तो उससे अव्यवस्था एवं अनीति का फैलना स्वाभाविक है। ऐसे शोषण अपहरण का जहाँ विश्व न्याय के आधार पर विरोध होता है वहाँ ईश्वरीय व्यवस्था भी उसे निरस्त करने में सहायक होती है। प्रकृति प्रतिरोध का परिचय तब अधिक अच्छी तरह देखा जा सकता है जब समर्थों द्वारा असमर्थों के स्वत्वों का अपहरण करने वाली अनीति का आचरण उभरता है।

अमेरिका की भूमि पर मूल अधिकार उस देश के मूल निवासियों का ही माना जा सकता है। वहाँ की प्रकृति सम्पदा का लाभ भी उन्हीं को मिलना चाहिए। गोरे लोगों ने बलपूर्वक उस भूमि पर अधिकार कर तो लिया है, पर प्रकृति वहाँ के मूल निवासियों के पक्ष में ही अपना समर्थन देती है और लुटेरों को असफल बनाने वाले आधार खड़े करती रहती है। इस सम्बन्ध में वहाँ के स्वर्ण क्षेत्रों में गोरों की असफलता विशेष रूप से विचारणीय है।

अमेरिका के ऐरिजेना प्रान्त में कुछ खाई खड्डों से भरे सघन वन प्रदेश ऐसे हैं जो न केवल अगम्य और डरावने हैं वरन् उनमें रहस्य भरी विशेषताएँ भी पाई जाती हैं। यह रहस्य अलौकिकतावादियों और वैज्ञानिक शोधकर्ताओं के लिए एक पहेली बनी हुई है।

कहा जाता है कि उस प्रदेश में या तो आसमान से सोने के धूल कण बरसते हैं या फिर पहाड़ उसे अदृश्य लावे की तरह उगलते हैं। जो हो उस क्षेत्र की पहाड़ियों को सोने के पर्वत का नाम दिया जाता है और अनेक उस सम्पदा को सहज ही प्राप्त कर लेने के लालच में उधर जाते भी रहते हैं।

सम्पत्ति का लोभ जितना आकर्षक है उतना ही वहाँ के प्रहरी प्रेत पिशाचों के आतंक का भय भी बना रहता है। इस उपलब्धि के लिए अब तक सहस्रों दुस्साहसी उधर गये हैं। इनमें से अधिकांश को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा है। जो किसी प्रकार जीवित लौट आये हैं उनने सोने के अस्तित्व का तो आँखों देखा विवरण सुनाया है, पर साथ ही यह भी कहा है कि वहाँ अदृश्य आत्माओं का आतंक असाधारण है। वे सोना बटोरने के लालच से जाने वालों का बेतरह पीछा करती हैं और यदि भाग खड़ा न हुआ जाय तो जान लेकर ही छोड़ती हैं।

भूमिगत विशेषताओं का अन्वेषण करने जो लोग पहुँचे हैं उन्होंने इस क्षेत्र को रूस के साइबेरिया की ही तरह रेडियो विकिरणों से प्रभावित पाया है। रूसी वैज्ञानिक साइबेरिया के कई क्षेत्रों को किसी अज्ञात विकरण से प्रभावित मानते हैं और कहते हैं कि कभी अन्तरिक्ष या धरती से यहाँ अणु विस्फोट जैसी घटना घटी है। ऐसा किसी उल्कापात से भी हो सकता है। अमेरिकी लोग भी इस क्षेत्र की तुलना लगभग उसी रूसी प्रदेश से ही करते हैं। यहाँ एक 600 फुट गहरा और एक मील लम्बा खड्ड है। समझा जाता है कि यह किसी उल्कापात का परिणाम है। उसे क्षेत्र में से किसी उद्देश्य से जाने वाले व्यक्तियों पर सम्भवतः विद्यमान रेडियो विकरण ही आतंकित करने जैसा प्रभाव उत्पन्न करता होगा और उस अप्रत्याशित प्रभाव को भूत−पलीतों का आक्रमण मान लिया जाता होगा।

रहस्यवादियों का मत है कि योरोपियनों के इस क्षेत्र पर कब्जा जमाने से पहले आदिवासी लोग रहते थे। इनमें से अपैची कबीला मुख्य था। उसके साथ गोरों की झड़पें होती रहीं और इन मार्ग के कंटकों को हटाने के लिए अधिकर्त्ताओं द्वारा क्रूरतापूर्ण नर संहार किये जाते रहे। इन मृतकों की आत्माएँ ही प्रतिशोध से भरी रहती हैं और जो इधर से गुजरता है उस पर टूट पड़ती हैं।

कारण क्या है? यह तो अभी ठीक तरह नहीं समझा जा सका, किन्तु सोना बरसने और आतंक छाये रहने की बात सच है। गाथा और किम्वदन्तियाँ तो बहुत दिनों से प्रचलित थीं। वहाँ जाने और कुछ कमाकर लाने की बात भी बहुतों ने सोची, पर साहस सबसे पहले पाइलीन बीवर ने किया। वह अपने कुछ साथियों के साथ आवश्यक सामान लेकर गया और उस क्षेत्र में डेरा लगाया। दूसरे साथी तो सो गये, पर बीवर को नींद नहीं आई। वह अकेला उठा और कौतूहल में दूर तक चला गया। उस जगह सोने के टुकड़े पाये। ध्यान से देखा तो वे शत प्रतिशत सोने के थे। उसने बहुत से कड़े जमा कर लिये और जितना वजन उठ सकता था उतना साथ लेकर वापिस लौटा। लौटते ही उसकी खुशी आतंक में बदल गई। डेरा जला हुआ पड़ा था और वहाँ सामान्यतया मनुष्यों की राख भर बनी हुई थी। आँख उठाकर पर्वत की चोटी को देखा तो वहाँ से गिद्धों के झुण्ड की तरह भयानक छायाएँ उसकी ओर बढ़ती आ रही दिखाई पड़ी। डर के मारे वह बेहोश हो गया। बहुत समय बाद जब होश आया तो किसी प्रकार भाग चलने का उपाय निकाला और जैसे−जैसे घर वापिस आ गया।

इस घटना की चर्चा तो बहुत हुई, पर दुबारा उधर जाने का साहस किसी में भी नहीं हुआ। इसके 16 वर्ष बाद मैक्सिको का एक दुस्साहसी पैरलटा एक मजबूत और साधन सम्पन्न जत्था लेकर उधर गया। उस दल के प्रायः सभी व्यक्ति उसी प्रयास में मर गये केवल एक ही उनमें से जीवित लौटा, उसने सोने की उपस्थिति और मंडराने वाली विपत्ति के जो विवरण सुनाये उसने कौतूहल तो बहुत बढ़ाया, पर नये जत्थों के उधर जाने का साहस उत्पन्न नहीं किया।

छुटपुट रूप से अनेक व्यक्ति एकाकी अथवा टुकड़ियाँ बनाकर उधर जाते रहे, किन्तु किसी को जान गँवाने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगा। इसके बाद अमेरिका का ख्याति नामा डॉक्टर लवरेन कोमली का अभियान था। वे बहुत तैयारी और चर्चा के साथ गये थे। साधनों और जानकारी की जितनी आवश्यकता थी वह उनने जुटा ली थी। साथी बीच में से ही लौट आये और मायाविनी छायाओं के आतंक के भयानक विवरण सुनाते रहे। लवरेन ने खोज को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था। वे अकेले ही बढ़ते गये। किन्तु सोने के स्थान पर पागलपन साथ लेकर वापिस लौटे। कुछ दिन भयभीत विक्षिप्तता के शिकार रहकर वे भी मौत के मुँह में चल गये।

इस स्वर्ण अभियान में जितने मृतकों की लाशें मिल सकीं इनके देखने से एक ही निष्कर्ष निकला कि वे सभी मौतें शरीर से खून चूस लिये जाने के कारण हुईं। इनमें से किसी भी देह में कहीं छेद नहीं पाये गये और न कहीं कपड़ों पर या जमीन पर रक्त बिखरा हुआ ही पाया गया फिर यह रक्त चूसने की क्रिया किसके द्वारा किस प्रकार की गई यह अभी भी उतना ही रहस्यमय बना हुआ है जितना पहले कभी था।

लगता है सूक्ष्म जगत में ऐसे किन्हीं अदृश्य प्रहरियों की चौकीदारी भी विद्यमान है जो न्याय का समर्थन और लूट−खसोट का प्रतिरोध करने के लिए अपनी जागरुकता का परिचय देते रहते हैं। सम्भवतः उस क्षेत्र की स्वर्ण सम्पदा की रखवाली वे ही करते हों। यह भी अनुमान लगाने की गुंजाइश है कि जिनके स्वत्वों का अपहरण किया गया, जिन्हें निर्दयतापूर्वक मारा गया उनकी आत्माएँ प्रतिशोध की भावनाएँ भरे हुए उस इलाके में निवास करती हों और उनकी रोकथाम से मुफ्त का धन पाने वालों को असफल रहना पड़ता हो। आत्माओं द्वारा न्याय के संरक्षण और अनौचित्य का प्रतिरोध एक तथ्य है। साथ ही प्रकृति व्यवस्था में स्थानीय भूमि पुत्रों के लाभान्वित होने की जो नीति मर्यादा है उसका उल्लंघन में ऐसे कारण उत्पन्न कर सकता है जैसे कि अमेरिका में स्वर्ण उपलब्ध करने वालों को भुगतने पड़े हैं।


यूनान में एक जमींदार (kahani)

यूनान में एक जमींदार था, इन्हें अपनी सम्पत्ति व जागीर का बड़ा अभिमान था, एक बार सुकरात के सामने वह अपने वैभव का बखान करने लगे व बताने लगे कि उसके पास कितनी बड़ी जायदाद है।

सुकरात पहिले तो चुपचाप सुनते रहे फिर उन्होंने दुनिया का नक्शा मँगाया। नक्शा फैला कर उन्होंने उस जमींदार को दिखाया व पूछा कि इस विश्व के नक्शे में वे देखकर बतावे कि यूनान देश कहाँ है। “यह रहा यूनान देश” जमींदार ने नक्शे में अँगुली रखकर दिखा दिया और अपना एटिका प्रान्त सुकरात ने पूछा! थोड़ा प्रयास करके उसने एटिका ढूँढ़ लिया व दिखा दिया।

सुकरात ने फिर पूछा “इसमें आपकी जागीर कहाँ है?” “महाराज आप भी कैसी बातें करते हैं, इतने बड़े विश्व में मेरी छोटी−सी जागीर की क्या बिसात? वह इसमें भला कहाँ दीख पायेगी।” जमींदार ने जवाब दिया तब सुकरात ने कहा−”भाई इतने बड़े नक्शे में जिस जागीर के लिए एक बिन्दु भी न रखा जा सके उस जरा−सी जमीन पर तुम इतना गर्व करते हो! जरा बताओ फिर उस अखिल ब्रह्माण्ड में उस जागीर का स्थान तो अत्यन्त ही क्षुद्र होगा, फिर इतनी क्षुद्रता के लिए कैसा गर्व?”

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प्राचीनता की हठ सत्य के प्रति अत्याचार

अहंकार और व्यामोह का समन्वित रूप बनता है− दुराग्रह। इसमें आवेश और हठ दोनों ही जुड़े रहते हैं। फलतः चिन्तन तन्त्र के लिए कठिन पड़ता है कि वह सत्य और तथ्य को ठीक तरह समझ सके और उचित-अनुचित का भेद कर सके। अभ्यस्त मान्यताओं के प्रति एक प्रकार की कट्टरता जुड़ जाती है। इसे अच्छी सिद्ध करने के लिए परम्पराओं के निर्वाह की दुहाई दी जाती है। उसका समर्थन धर्मशास्त्र, आप्तवचन, देश भक्ति आदि के नाम पर किया जाता है और कई बार तो उसे ईश्वर का आदेश तक घोषित कर दिया जाता है।

अपना धर्म श्रेष्ठ दूसरे का निकृष्ट, अपनी जाति ऊँची दूसरे की नीची, अपनी मान्यता सच दूसरे की झूठ, ऐसा दुराग्रह यदि आरम्भ से ही हो तो फिर सत्य−असत्य का निर्णय हो ही नहीं सकता। न्याय और औचित्य की रक्षा के लिए आवश्यक है कि तथ्यों को ढूँढ़ने के लिए खुला मस्तिष्क रखा जाय और अपने पराये का, नये पुराने का, भेदभाव न रखकर विवेक और तर्क का सहारा लेने की नीति अपनाई जाय। सत्य को प्राप्त करने का लक्ष्य इसी नीति को अपनाने से पूरा हो सकता है। पक्षपात और दुराग्रह तो सत्य को समझने से इन्कार करना है। ऐसे हठी लोग प्रायः सत्य और सत्यशोधकों को सताने तक में नहीं चूकते।

टेलिस्कोप के आविष्कारक गैलीलियो ने जब पृथ्वी को गतिशील बताने का सर्वप्रथम साहस किया तो पुरातन पंथी धर्म गुरुओं ने इसे धर्म विरुद्ध ठहराया। उसे तरह−तरह से सताया गया और जेल में बन्द करके सड़ाया गया। सबसे पहले जब पैरिस में रेलगाड़ी चली तो उस प्रचलन का पुरातन पंथियों ने घोर विरोध किया और कहा जो काम हमारे महान पूर्वज नहीं कर सके उन्हें करना अपने पूर्व पुरुषों के गौरव पर बट्टा लगाना है। रेलगाड़ी के चलाने वाले जोसफ केग्नार को उस जुर्म में जेल में डाला गया कि वह ईश्वर के नियमों के विरुद्ध काम करता है। इटली में शरीर शास्त्र की शिक्षा किसी समय अपराध थी। आपरेशन करना पाप समझा जाता था और कोई चिकित्सक छोटा−मोटा आपरेशन भी करता पाया जाता तो उसे मृत्यु दण्ड सुनाया जाता था।

कारीगर रैगर वेकन ने सर्वप्रथम दो कोनों को जोड़कर सूक्ष्मदर्शी यन्त्र बनाया था। इस आविष्कार की निन्दा की गई। उस कारीगर को इस खतरनाक काम को करने के अभियोग में दस वर्ष की कैद सुनाई गई। बेचारा जेल में ही तड़प−तड़प कर मर गया।

रसायन शास्त्र के कुछ नवीन सिद्धान्तों का प्रतिपादन करने के अपराध में स्वन्ति अरहीनियस को प्राध्यापक के पद से पदच्युत करके एक छोटा अध्यापक बनाया गया और उसे सनकी ठहराकर अपमानित किया गया। विधि का विधान ही समझिये कि वही सिद्धान्त आगे चलकर विज्ञान जगत में सर्वमान्य हुए और स्वन्ति को उन्हीं पर नोबेल पुरस्कार मिला।

डॉ0 हार्ले ने जब सर्वप्रथम यह कहा कि रक्त नसों में भरा नहीं रहता वरन् चलता रहता है तो समकालीन चिकित्सकों ने उसे खुलेआम बेवकूफ कहा। ब्रूनो ने जब अन्य ग्रहों पर भी जीवन होने की सम्भावना बताई तो लोग इतने क्रुद्ध हुए कि उसे जीवित ही जला दिया।

दुराग्रह के अत्याचारों का इतिहास बहुत लम्बा और बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। पिछले दिनों यह हठवादिता बहुत चलती रही है। धर्म परम्परा, देश भक्ति, ईश्वर का आदेश आदि न जाने क्या−क्या नाम इस हठवादिता को दिये जाते हैं और सत्य एवं धर्म की आत्मा का हनन होता रहा है। मानवी विवेक में निष्फलडडडड सत्यशोधक की दृष्टि को ही प्रश्रय मिलना चाहिए।

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अग्निहोत्र में ताप और ध्वनि शक्ति का सूक्ष्म प्रयोग

अग्निहोत्र यों मोटी दृष्टि से देखने में एक धार्मिक कर्मकाण्ड प्रतीत होता है और उसके लाभों में वायु शोधन, रोग निवारण आदि को प्रमुख माना जाता है। देवताओं को प्रसन्न करने और बदले में उपयोगी वरदान पाने की मान्यता भी प्रचलित है।

यदि इतनी−सी ही बात रही होती तो यज्ञ को भारतीय संस्कृति का प्रतीक और गौरव भरी परम्परा का आधार न माना गया होता। अन्य धर्मकृत्यों की तरह ही उसे भी रुचि भिन्नता के आधार पर किये जाने वाले चयनों की तरह ही स्वेच्छा माना गया होता, पर देखा जाता है कि यज्ञ भारतीय तत्व−दर्शन और ज्ञान−विज्ञान के साथ अविच्छिन्न रूप से गुंथा हुआ है। जन्म से लेकर मरण पर्यन्त किये जाने वाले षोडश संस्कारों में यज्ञ की अनिवार्यता है। पर्व, त्योहारों से लेकर देव−पूजन एवं शुभ समारम्भों तक का कोई भी हर्षोत्सव यज्ञ के बिना सम्पन्न नहीं होता। होलिकोत्सव वार्षिक यज्ञ है जो सामूहिक रूप से हर गाँव, मुहल्ले में विस्तार से और घरों में वैयक्तिक रूप से छोटी विधि के साथ मनाया जाता है। राजनैतिक उद्देश्यों को लेकर किये जाने वाले बड़े अश्वमेध यज्ञ और धर्म चेतना को सुव्यवस्थित करने के लिए किये जाने वाले वाजपेय यज्ञों को बढ़ी−चढ़ी महत्ता प्रदान किये जाने से प्रतीत होता है कि भारतीय महान् परम्पराएँ यज्ञ−विज्ञान के साथ गहराई के साथ जुड़ी हुई हैं।

यज्ञ का विज्ञान पक्ष इन दिनों प्रामाणिकता के आधार पर मान्यता प्राप्त करने की स्थिति में नहीं रह गया है तो भी उसके पीछे वे आधार विद्यमान हैं जिनकी शोध की जा सके और प्रयोग परीक्षणों की सहायता से लोकोपयोगी बनाया जा सके तो उसे अध्यात्म विज्ञान की अद्भुत उपलब्धि सिद्ध हो सकते हैं जो अन्य आविष्कारों की तुलना में कम महत्वपूर्ण सिद्ध न होंगे।

यज्ञ के सूक्ष्म आधारों की यहाँ चर्चा न करके केवल भौतिक विज्ञान की दृष्टि से भी देखा जाय तो भी प्रतीत होगा कि उसमें ध्वनि और ताप की दोनों ही शक्ति धाराओं का उच्चस्तरीय उपयोग एवं समन्वय किया गया है। मन्त्रोच्चार में ध्वनि विज्ञान के रहस्यमय सिद्धान्तों का समावेश किया गया है। अग्निहोत्र प्रक्रिया में ताप शक्ति का विशिष्ठ प्रयोग कहा जा सकता है। इन दोनों शक्तियों को भौतिक विज्ञान की प्रधान धारा माना गया है। इनका समन्वय करके अध्यात्म उद्देश्य की पूर्ति के लिए उस संयुक्त शक्ति को लगा दिया जाय तो उसका सत्परिणाम वैसी ही होता है जैसा कि यज्ञ विज्ञान के जन्मदाताओं ने सुविस्तृत फल श्रुति के रूप में प्रस्तुत किया है।

ताप की शक्ति का परिचय मनुष्य को बहुत पहले से मिल रहा है। उसकी जानकारी और उपयोग पद्धति का अनुभव क्रमिक विकास के अनुरूप बढ़ता आया है। इस सन्दर्भ में अब तक बहुत कुछ जानकारी मिल भी चुकी है किन्तु जो जानना शेष है वह प्रस्तुत उपलब्धियों से कहीं अधिक है। घर्षण से अग्नि उत्पन्न करने और ईंधन के सहारे उसे प्रज्वलित करने की विधि अब से लाखों वर्ष पूर्व मनुष्य के हाथ लग गई थी। उससे चमत्कारी प्रकटीकरण के वह नित नूतन लाभ उठाता चला आ रहा है। भोजन पकाने, सर्दी से बचने, धातु पिघलाने, कूड़ा−करकट समाप्त करने, अशक्तता में शक्ति उत्पन्न करने, प्रतिपक्षियों से जूझने, रोशनी का लाभ लेने जैसे असंख्यों उपयोग आग के हैं। यदि यह उपलब्धि हाथ में न आई होती तो आदिमानव की स्थिति से बहुत आगे बढ़ सकना सम्भव न हुआ होता।

अग्नि का ही एक रूप विद्युत है। बल्बों, पंखों और मोटरों में काम करने वाली बिजली तो विद्युत का सामान्य प्रवाह है। एक्सरे, लेसर, कॉस्मिक आदि अनेक अन्य प्रकाश किरणों में उसके अगणित स्तर खोजे और काम में लाये जा रहे हैं। अणु विस्फोट से लेकर विकरण तक के अनेक ऊर्जा प्रवाह विद्युत क्षेत्र में ही गिने जाते हैं। संक्षेप में यह ताप सत्ता है जो सृष्टि के अन्तराल में सर्वत्र संव्याप्त है और उसे समर्थ तथा गतिशील बनाने का सूत्र संचालन कर रही है। यदि इस सृष्टि में से ताप हटा दिया जाय तो न किसी प्राणी के रूप में कहीं जीवन दृष्टिगोचर होगा और न पदार्थों में हलचल शेष रह जायगी। सर्वत्र स्तब्धता निर्जीविता, तमिस्रा और कड़कती ठण्ड का सामंजस्य ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देगा जिसे कल्पना मात्र से उड़ा देने और कँपा देने वाली कहा जा सकता है।

यज्ञ विद्या के रहस्य समझने के लिए ताप की तरह ही दूसरी प्रमुख शक्ति शब्द के और ध्वनि के विज्ञान को भी जानना आवश्यक है। सर्वविदित है कि अन्य प्राणी मात्र प्रकृति प्रेरणा से ही ध्वनि उत्पन्न कर पाते हैं। छोटे जीवधारी शारीरिक हलचलों से ध्वनि उत्पन्न करते हैं और विकसित प्राणी कुछ भावनाओं को व्यक्त कर सकने योग्य थोड़ी−सी नपी−तुली अर्थहीन ध्वनियाँ कर सकते हैं। मनुष्य ही एक ऐसा है जो मुख गह्वर के विभिन्न विन्यास बना कर कितने ही प्रकार के शब्द उत्पन्न करता है और उनसे विचारों के आदान−प्रदान का, अभिव्यक्तियों के प्रकटीकरण का काम लेता है। पदार्थों में टकराव उत्पन्न करके भी उसे कितने ही तरह के संगीत, शोरगुल जैसी आवाजें पैदा करने का अनुभव है। जीभ की संरचना के अनुरूप शरीर से तथा आघातों के अभ्यास से जो ध्वनियाँ उत्पन्न की जा सकी हैं उनमें से भी सब का अनुभव कर सकना मनुष्य के बूते की बात नहीं है। प्रकृति ने कानों की सामर्थ्य बहुत सीमित रखी है। उनसे उसी स्तर की आवाजें सुनी जा सकती हैं जो जीवन निर्वाह के लिए उपयोगी एवं आवश्यक है। यदि इससे अधिक सुन सकना सम्भव रहा होता तो फिर इतनी गड़बड़ी मचती कि वर्तमान स्तर के मस्तिष्क कुछ सुन समझ ही न पाते और कानों में घोर कोहराम मचा रहता।

यह नहीं समझा जाना चाहिए कि हम जितने शब्द सुनते हैं उतने ही ध्वनि प्रवाह इस सृष्टि में उत्पन्न होते हैं। ताप का क्षेत्र अत्यन्त सुविस्तृत है। मनुष्य के परिचय और उपयोग में तो उसका एक बहुत छोटा अंश ही आता है। इसी प्रकार ध्वनि कम्पन का क्षेत्र भी असीम है। इतना असीम जिसे कल्पना से बाहर का कहा जा सकता है। इस विशाल अन्तरिक्ष में हलकी भारी ध्वनियों के अगणित प्रवाह कंपन चलते रहते हैं। इन्हें विज्ञान की भाषा में श्रवणातीत ध्वनियाँ कहा जाता है। आश्चर्य यह है कि इन अविज्ञात ध्वनियों में से कितनी ही इतनी अद्भुत और इतनी सूक्ष्म होती हैं कि उनके स्वरूप की कल्पना मात्र से आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।

ध्वनि विज्ञान के शोध सन्दर्भ में जो तथ्य सामने आये हैं, उनने इन श्रवणातीत ध्वनियों को मानवी उपयोग के अनेक कार्यों में प्रयुक्त कर सकना सम्भव बना दिया है। कुछ प्रवाह सृष्टि की अन्यान्य हलचलों के कारण स्वयमेव उत्पन्न होते रहते हैं। उनके आधार पर प्रस्तुत परिस्थितियों और भावी सम्भावनाओं के सम्बन्ध में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है। अन्तरिक्ष में परिभ्रमण करने वाले मनुष्य प्रेषित राकेटों, गुब्बारों, यानों से मौसम सम्बन्धी कितनी ही जानकारियाँ मिलती हैं। रेडियो, टेलीफोनों का प्रबन्ध बन पड़ता है। आकाश में उड़ने वाले वायुयानों, प्रक्षेपणास्त्र का पता रैडारों पर उतरने वाली प्रतिध्वनि छाया के सहारे पता चल जाता है। तूफान, भूकम्प आदि की जानकारी इन उपकरणों के माध्यम से मिल जाती है।

यह वह क्षेत्र है जिसमें प्रवाहमान सूक्ष्म ध्वनियों के माध्यम से वे जानकारियाँ मिलती है जो सामान्य साधनों के सहारे जानी नहीं जा सकतीं। यह भी एक महत्वपूर्ण एवं उपयोगी उपलब्धि है। ध्वनि विज्ञान के सहारे रेडियो, टेलीफोन ही नहीं, वातावरण को शान्त एवं उत्तेजित करने जैसे प्रयोजन भी इस आधार पर पूरे करने की सम्भावनाएँ सामने आ रही हैं।

नया प्रयोग अपनी शताब्दी का यह है कि अभीष्ट प्रयोजन के लिए अभीष्ट स्तर की श्रवणातीत ध्वनियाँ उत्पन्न की जा सकती हैं और उन स्वनिर्मित कंपनों का आश्चर्यजनक लाभ उठाया जा सकता है। ध्वनि उत्पन्न करके उसकी प्रतिध्वनि से लाभ उठाने का सिद्धान्त तो समुद्र की गहराई में चलने वाली पनडुब्बियों की हलचलों का पता लगाने की विधि हाथ में आ जाने के समय से ही विदित हो गया था, पर उसका अन्य क्षेत्रों में उपयोग कर सकने की विधियाँ अब बहुत शोध संशोधन के उपरान्त प्राप्त हुई हैं। यह प्रयोग चिकित्सा क्षेत्र में बहुत आगे बढ़े और बहुत सफल हुए हैं।

वियना के प्रो0 डसिक ने मस्तिष्क के अन्तराल में चल रही हलचलों और विकृतियों का पता लगाने के लिए श्रवणातीत ध्वनियों का सर्वप्रथम सहारा लिया था। उत्पन्न की हुई ध्वनि रोगी के मस्तिष्क में घुसी और टकरा कर वापिस लौटी तो उसने सारा भेद खोलकर सामने रख दिया। एक्सरे द्वारा जो भोंड़ी तस्वीरें भीतरी स्थिति की खिंचती थीं, उससे औंधे−सीधे अनुमान ही लग पाते थे। इन श्रवणातीत ध्वनियों के विवरण कहीं अधिक स्पष्ट, विस्तृत और सही प्राप्त हुए। शोध और भी अधिक उत्साह के साथ चली। विज्ञानी लेकसल, लैजेविन, हर्ज एडला−मान्ट, हेगेज, डोनाल्ड जैसे मनीषियों ने न केवल मस्तिष्क का वरन् शरीर के प्रत्येक अवयव के अन्तराल की सही स्थिति समझने में श्रवणातीत ध्वनियों को माध्यम बनाया और आशातीत सफलता पाई। पोलैंड में तो गर्भस्थ भ्रूणों की हृदयगत धड़कन और रक्ताभिषरण की अतीव मन्दगामी स्थिति का भी सही−सही लेखा−जोखा प्राप्त कर लिया। सही निदान विदित हो जाने पर चिकित्सा से कितनी सुविधा हो सकती है इसे सहज ही समझा जा सकता है। चिकित्सा उपचार में भी उनका उपयोग किया गया और अत्यन्त गहराई में धँसे हुए रोगों को उखाड़ कर ऊपर लाना और आँख की पुतली जैसे मर्मस्थानों के अति बारीक आपरेशन कर सकना सम्भव हो गया।

ऐसे−ऐसे अनेक आधार हैं जिनके सहारे यज्ञीय क्रियाकृत्य में उच्चारण किये गये मंत्रोच्चार से न केवल उपयोगी ध्वनि तरंगें उत्पन्न होतीं वरन् उस आयोजन में सम्मिलित होने वाले लोगों को लाभदायक सत्परिणाम प्रस्तुत करती हैं। उसमें से बड़ी उपलब्धि श्रवणातीत ध्वनियों की है जो शब्द और ताप दोनों के समन्वय से उत्पन्न होती हैं उनसे सुविस्तृत क्षेत्र का वातावरण प्रभावित होता है। फलतः प्राणवान मेघवर्षा से लेकर अन्यान्य कई प्रकार के ऐसे आधार खड़े होते हैं जो सर्वतोमुखी सुख−शान्ति में सहायता कर सकें। सूक्ष्म वातावरण के परिशोधन और उसके फलस्वरूप सुख−शान्ति की परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाले वातावरण का सृजन भी यज्ञ विद्या का अति महत्वपूर्ण प्रतिफल है। ऐसे ही कारणों को ध्यान में रखते हुए भारतीय धर्म में यज्ञ को उच्चकोटि का श्रेय सम्मान दिया गया है।


महात्मा अफलातून (kahani)

यूनान के महात्मा अफलातून ने मरते समय अपने बच्चों को बुलाया व कहा−”मैं तुम्हें चार−चार रत्न देकर मरना चाहता हूँ, आशा है तुम इन्हें सम्हाल कर रखोगे व इन रत्नों से अपने जीवन सुखी बनाये रहोगे।” बच्चों ने रत्न प्राप्ति के लिए हाथ फैलाए तो अफलातून ने एक−एक करके रत्न बच्चों को इस प्रकार दिये।

“पहला रत्न मैं क्षमा का देता हूँ−तुम्हारे प्रति कोई कुछ भी कहे तुम उसे विस्मृत करते रहो व कभी उसके प्रतिकार का विचार अपने मन में न लाओ।

निरहंकार का दूसरा रत्न देते हुए समझाया कि अपने द्वारा किये गये उपकार को भूल जाना चाहिए।

तीसरा रत्न है विश्वास−यह बात अपने हृदय पटल पर अंकित किये रखना कि मनुष्य के बूते कभी कुछ भला−बुरा नहीं होता जो कुछ होता है वह सृष्टि के नियन्ता के विधान से होता है।

चौथा रत्न है वैराग्य− “यह सदैव ध्यान में रखना कि एक दिन सबको मरना है”

सांसारिक सम्पत्ति पाकर तो पता नहीं उनका क्या बनता है, पर इन गुणों का अनुसरण कर ये बच्चे निहाल हो गये।

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यज्ञ की महिमा धर्मशास्त्र की दृष्टि में

अहन्यहन्यनुष्ठानं यज्ञानां पार्थिवेत्तिम।

उपकार करं पुंसां क्रियमाणं फलार्थिनाम्॥

−पद्म पुराण

सुख पाने की इच्छा करने वालों को नित्य अग्निहोत्र करना चाहिए। इससे निश्चित रूप से कल्याण होता है।

‘जय होमोपहारेज्यांजलिनसंस्कार तपोनियम दयादा नदीक्षाम्युपगम देवता ब्राह्मण गुरुपरैभ वितव्यम्।’ −सुश्रुत, सूत्र 6। 2

अर्थात्− जप, हवन, तप, व्रत, नियम, नदी तट सेवन, देव, गुरु ब्राह्मण आदि के सहारे स्वास्थ्य रक्षा होती है।

अग्निहोत्रात्परंनान्यत्ववित्रमिहपठयते। सुकृतेनाग्निहोत्रेणांप्रशुद्धयंतिभुवि द्विजाः॥ पंथानोदेवलोकस्यब्राह्मणैदर्शितास्त्वमी। एकोऽग्नि सर्वदाधार्योगृहस्थेनद्विजन्मना॥ −पद्मपुराण

अग्निहोत्र से बढ़कर कोई पवित्र कर्म नहीं। अच्छी प्रकार से किये गये अग्निहोत्री के द्वारा द्विजों का अन्तःकरण पवित्र हो जाता है।

ब्राह्मणों ने विश्व को यज्ञ करने की प्रक्रिया बताकर सबों के लिए स्वर्ग को पाने का निश्चित पथ बता दिया है, अतः हे गृहस्थों! यज्ञ को प्रतिदिन करते रहना ही गृहस्थों का धर्म है।

सम्पतकरी तथा ज्ञेया सायमग्न्ययाहुतीर्द्विजाः। प्रायुष्यकरीति विज्ञेया प्रातः सूर्य्याहुतिस्तथा। −शिवपुराण

सन्ध्या काल में अग्नि में आहुति सम्पत्ति दिलाती है और सूर्योदय के समय की आहुति, आयु को बढ़ाने वाली होती है।

मनुश्चसगरोराजामरुत्तोनहुषात्मजः। एतेतेपूर्वजाः सर्वेयज्ञं कृत्वापदंगताः॥ −पद्म महापुराण

शेषजी कहते हैं हे राम! राजा मनु, सगर, नहुष के आत्मज मरुत, ये सब आपके पूर्वज यज्ञ करने से ही परमपद को प्राप्त हुए हैं।

आयुष्यश्चापि भक्तानां त्रयाणां विधि पूर्वकम्।

यजेत जुहुयाग्नौ जपेद्यद्याज्जितेन्द्रिय॥ −कूर्म पुराण

जो भक्त जितेन्द्रिय रहकर जप और यज्ञ करते हैँ, उनकी आयु बढ़ती हैं।

देव सविता प्रसुव यज्ञ प्रसुवयज्ञपति भगाय। दिव्योगन्धर्वः केतपूःकेतनः पुनातु वाचस्पतिर्वाच नः स्वदतु॥ −यजु0

मन, वाणी, बुद्धि की उन्नति तब होगी जब यज्ञ एवं यज्ञ पति की उपासना की जाय।

स्वाहा युक्तं च मन्त्रं च यो गृहणाति प्रशस्तकम्। सर्वसिद्धर्भवेत्तस्य ब्रह्म ग्रहण मात्रतः॥ −ब्रह्म वैवर्त पुराण

जो स्वाहा युक्त, अग्निहोत्र करते हैं उन्हें समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

अग्निहोत्रात् परोधर्मों द्विजानां नेह विद्यते। तस्मादाराधयोन्नित्यं मग्निहोत्रेण शाश्वतम्॥ कूर्म पुराण

इस लोक में अग्निहोत्र से बढ़कर और कोई धर्मकृत्य नहीं। उसकी आराधना नित्य ही करनी चाहिए।

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उच्च रक्तचाप की महाव्याधि का संकट

क्रोध के आवेश या भय के आतंक से मनुष्य का मस्तिष्क जब उत्तेजित होता है तब उसकी मुखमुद्रा कैसी भयानक लगती है उसे बहुतों ने बहुत बार कहीं न कहीं देखा होगा। आपत्ति काल की वर्तमान कठिनाइयों और भावी आशंकाओं से उद्विग्न मनुष्य कातर, असन्तुलित और उद्विग्न बना हुआ अर्धविक्षिप्त जैसा दीखता है। उससे कुछ ही कम बेचैनी, बढ़े हुए रक्तचाप की स्थिति में पाई जाती है।

जीवन सम्पदा की सार्थकता उसे धारण करने वाले जीवधारी को सुखी समुन्नत बनाये रहने में है। पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकने में ईश्वर प्रदत्त इस सौभाग्य भरे सुअवसर का सदुपयोग है। किन्तु रुग्णता का व्यवधान तो इस लाभ से वंचित ही किये रहता हैं। रुग्णता के अनेक भेद-उपभेद हैं। उनमें देखने में सरल किन्तु भुक्त भोगी के लिए अति कठिन बनकर रहने वाला नागपाश जैसा रोग बढ़ा हुआ रक्तचाप है। उसे तथाकथित सभ्यता का अभिशाप कह सकते हैं। प्रकृति प्रकोप की गणना में अन्य रोग तो सरलता से गिने जा सकते हैं, पर रक्तचाप की उत्पत्ति का बहुत कुछ दोष मनुष्य की अपनी ही अस्त−व्यस्तता पर निर्भर है। यदि आहार−विहार और स्वभाव दृष्टिकोण को सुव्यवस्थित बनाये रहकर अपनी जीवनचर्या को सुसंतुलित और चिन्तन प्रक्रिया रखा जा सके तो इस महाव्याधि से बच रह सकना सरल है। साथ ही जो इस कुचक्र में फँस गये हैं उनको छुटकारा पाना भी कुछ कठिन नहीं है।

बढ़ी हुई बेचैनी, दिल का अधिक धड़कना, आवेश ग्रस्तता, प्यास, सिर दर्द जैसे लक्षणों से बढ़े हुए रक्तचाप का आरम्भिक परिचय दर्द जैसे लक्षणों से बढ़े हुए रक्तचाप का आरम्भिक परिचय प्राप्त होता है। विश्वस्त सूचना तो मापक यन्त्र से ही मिल सकती है। बेचैनी के आधार पर दबाव की वृद्धि और शिथिलता के लक्षणों को देखकर उसकी न्यूनता का पता चल सकता है। निम्न चाप में कमजोरी तो बहुत सताती है और लंघन अथवा प्रसूता जैसे स्थिति मालूम पड़ती है फिर भी उसमें उतना जोखिम नहीं है जितना कि बढ़े हुए चाप में। रक्तचाप यदि पुराना हो जाय और काबू से बाहर रहने लगे तो उससे दिल का दौरा पड़ने एवं पक्षाघात होने जैसी भयंकर दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। ज्वर ग्रसित रहने जैसी स्थिति में रोगी को कुछ पुरुषार्थ तो करते धरते बन ही नहीं पड़ता। उसकी गणना एक प्रकार से आशक्त एवं अपंग जैसी रहने लगती है। न तो गहरी नींद आती है और न थकान दूर होती है। ऐसी दशा में जीवनी शक्ति का अपव्यय होते−होते अकाल मृत्यु की सम्भावना ही बनती चली जाती है।

इस बढ़ती हुई महाव्याधि के विस्तार का क्रम जिस तेजी से चल रहा है उसे देखते हुए भय होता है कि कहीं इसकी चपेट में अधिकांश मनुष्य समाज को निकट भविष्य में फँस न जाना पड़े।

पिछले दिनों ऑल इण्डिया इन्स्टीट्यूट आफ मेडीकल साइन्स ने जो सर्वेक्षण किया है उससे पता चला है कि केवल दिल्ली नगर में उस समय 40 हजार रोगी इलाज करा रहे थे जिनमें 15 प्रतिशत उच्च रक्तचाप के मरीज थे।

औद्योगिक क्षेत्रों में फैली हुई रुग्णता का अन्वेषण करने वाले शोध संस्थानों का कथन है कि क्या ग्रामीण क्या शहरी दोनों ही क्षेत्रों श्रमिक वर्गों में रक्तचाप का आक्रमण जोरों से हो रहा है और उसका अनुपात न्यूनतम 4 और अधिकतम 15 प्रतिशत तक जा पहुँचा है। पिछले वर्षों की तुलना में इस सन्दर्भ में चिकित्सा के साधन बढ़ने पर भी कमी नहीं आई वरन् बढ़ोत्तरी ही हुई है।

सम्पन्नता और सुविधा की कमी के कारण पौष्टिक आहार का न मिल पाना, कठिनाइयों से जूझना, अधिक श्रम करना आदि कारणों को स्वास्थ्य की गिरावट का आधार बताया जा सकता है। यह किसी हद तक सही भी है। पोषण और विश्राम का अभाव रहने, उपार्जन के लिए सामर्थ्य से अधिक परिश्रम करने तथा प्रस्तुत कठिनाइयों से जूझने से जो दबाव उत्पन्न होता है उसका कुप्रभाव शरीर और मस्तिष्क पर होना स्वाभाविक है। गरीबी के कारण दुर्बलता और रुग्णता उत्पन्न होने की बात स्वीकार करने में और रक्तचाप जैसे रोगों में उसे भी कारण मानने में किसी को कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

किन्तु जब सुसम्पन्न स्तर के लोगों को भी ऐसे ही रोगों से ग्रसित देखा जाता हैं तो आश्चर्य होता है। सुविधा और विश्राम की कमी न रहने पर यह वर्ग क्यों अपेक्षाकृत अधिक रुग्ण पाया जाता है।

रक्तचाप सम्बन्धी आँकड़े बताते हैं कि दरिद्रता की भाँति ही सम्पन्नता भी अभिशाप है और उससे भी रुग्णता की अभिवृद्धि में सहायता ही मिलती है। अमेरिका की सम्पन्नता में दो मत नहीं हो सकते। भौतिक दृष्टि से समुन्नत देशों से वह अग्रणी है। पोषण और चिकित्सा के समुचित साधन होते हुए भी वहाँ बढ़े हुए रक्तचाप की बीमारी 10 से 15 प्रतिशत लोगों को है। इनमें अधिकांश युवक−युवतियाँ हैं, वयोवृद्ध नहीं। वृद्धों की शारीरिक जीर्णता से इस प्रकार की व्यथाएँ उठ खड़ी होना समझ में आता है, पर भरी जवानी के दिनों नये रक्त में भी इस प्रकार की विपत्तियों के आ धमकने का क्या कारण हो सकता हैं?

योरोप के समृद्ध देशों में यह व्यथा 15 प्रतिशत लोगों को अपने शिकंजे में कस चुकी है, ऐसा समझा जाता है। अधिकांश की शारीरिक जाँच पड़ताल ठीक से हो नहीं पाती। वे स्वयं ही सामान्य गिरावट के अतिरिक्त वास्तविक कारण समझ नहीं पाते। फिर इलाज कैसे हो? डाक्टरों के द्वार तक जो पहुँच पाते हैं वे व्यथित रोगियों में से प्रायः एक तिहाई ही होते हैं। इन तिहाई लोग में से अच्छी चिकित्सा सुविधा पाने वाले और सतर्कता पूर्वक चिकित्सा कराने वाले कम ही होते हैं। फलतः चिकित्सा के उपरान्त भी व्यथा से छुटकारा पाने वाले लोगों की संख्या बहुत ही कम होती है। अधिकांश तो कठिनाई बढ़ने पर इलाज की बात सोचते हैं और कुछ कमी आ जाने पर उसे ओर से ध्यान हटा लेते हैं।

शोधकर्त्ता इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि उच्च रक्तचाप का एक बड़ा कारण गुर्दों की खराबी है। ठीक तरह छनने की क्रिया सम्पन्न हो जाने के कारण अशुद्ध रक्त धमनियों में पहुँचता है और रक्ताभिषरण का सन्तुलन बिगाड़ता है। मूत्र नली की खराबी मूत्राशय में शोष्य ऐसे रोगियों को पाया गया है। इससे अनुमान लगाया जाता है कि यही उसका प्रधान कारण होना चाहिए। किन्तु यह मानने की भी पूरी गुंजाइश है कि रक्त का दबाव बढ़ने से मूत्र संस्थान को अपेक्षाकृत अधिक क्षति पहुँचती है और वह दबाव किसी अन्य कारण से उत्पन्न होकर गुर्दों की व्यवस्था अस्त−व्यस्त करता हो।

मारक औषधियों का उपयोग जटिल रोगों के विषाणुओं को निरस्त करने के लिए किया जाता है। इनका सेवन बहुत समय तक चलता रहे अथवा व्यक्ति विशेष की सहन क्षमता से उसकी मात्रा अधिक हो जाय तो फिर उसकी प्रतिक्रिया स्वास्थ्य संरक्षक प्रणाली पर बहुत बुरी होती हैं। एन्टीबायोटिक्स औषधियों का अन्धा धुन्ध प्रचलन इन दिनों बढ़ रहा है। चिकित्सकों का अत्युत्साह होता तो रोगों को अच्छा करने के लिए है, पर मात्रा और प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में समुचित सतर्कता न रहने का परिणाम रक्तचाप जैसे रोगों के रूप में सामने आता है। गर्भ निरोधक गोलियाँ खाने वाली महिला को तो इस विपत्ति में जान−बूझकर फँसना पड़ता है। आरम्भ में वे निरापद कही जाती थीं, पर अब उनकी हानि रक्तचाप बढ़ने के रूप में स्पष्टतः सामने आती चली जाती हैं।

रक्तवाहिनी धमनियों के सिकुड़ जाने या कठोर हो जाने से उस मार्ग में शरीर को विभिन्न अवयवों तक उचित मात्रा में यथा समय रक्त पहुँचाने में कठिनाई पड़ती है। जीवाणु पोषण के अभाव में दुर्बल होते जाते हैं; उधर हृदय को किसी कारणवश कठोर हुई नाड़ियों द्वारा यथा स्थान रक्त पहुँचाने के प्रयास में अतिरिक्त श्रम करना पड़ता हैं। ऐसे ही कुछ अन्य कारणों के मिल जाने से रक्तचाप बढ़ जाता है। क्रोध, भय जैसे मानसिक और उत्तेजक खाद्य, अधिक श्रम जैसे शारीरिक कारणों से भी शरीर में उष्णता और उत्तेजना भर जाती है। यह भी एक कारण है।

रक्तचाप की विपत्ति का आक्रमण रोकने की सतर्कता योजना बनाने अथवा उसके चंगुल से छुटकारा पाने का प्रयत्न करते हुए, यह जानना भी आवश्यक है कि रक्तचाप आखिर है क्या? वह कभी अवांछनीय रूप से ऊँचा या नीचा हो क्यों जाता है? इस सन्दर्भ में रक्त संचार तन्त्र की गतिविधियों की थोड़ी−सी जानकारी प्राप्त कर लेना आवश्यक है।

हृदय एक पम्प है जो देखने में छोटा होते हुए भी इतनी तेजी से और इतनी बड़ी मात्रा में पम्प करता है कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। वह 24 घण्टे में 10 हजार लीटर रक्त पम्प करता है। इसे समस्त शरीर में पहुँचाने के लिए जो छोटी−बड़ी नाड़ियाँ−पाली नालियों की तरह बिछी हुई हैं वे इतनी होती हैं कि उन्हें एक लाइन में बिछा दिया जाय तो वह लम्बाई साठ हजार मील होगी। यह लम्बाई पृथ्वी की ढाई बार परिक्रमा करने जितनी हो जाती है।

आमतौर से बढ़े हुए रक्तचाप को घटाने के लिए रावलफिया डिरोवेटिक्स (केसर पाइन) हाइड्रोलेजीन (अप्रेसेग्नलइन वेनेथाइडाइन (स्मेलिन) अल्फायेथाडीपा (अल्डोमेट) प्रोप्रालालीन (इन्डेरेल) आदि औषधियाँ दी जाती हैं। इनके प्रभाव से धमनियाँ की दीवारों में मुलाइमी आती है और अकड़न के कारण जो उन पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा था वह घट जाता है। इस प्रयोजन के लिए केमिस्टों की दुकानों पर ड्यूकेरिल, क्लारोथमाझाईट, हाइड्रोक्लोरोथायाइट, वेडीफ्लूथायाजइड क्लोरथाली डोन आदि औषधियों की बिक्री भी बहुत बढ़ रही है।

जड़ी बूटी वर्ग की सर्पगन्धा की−भी इन दिनों बहुत चर्चा है। उसकी जड़ों से निकला हुआ ‘रसक पीन’ बढ़े हुए रक्तचाप को गिराने के लिए उपयोगी माना गया है। भारतीय बूटी सर्पगन्धा का वैज्ञानिक नाम ‘राकैल्फिया सर्पेन्टिन’ है। उसे अन्य हृदय रोगों में भी प्रयुक्त किया जाता है। इसकी बड़े पैमाने पर उत्पादन करने तथा अनेक प्रकार के सम्मिश्रण करके रक्तचाप जैसी हृदय सम्बन्धित बीमारियों के लिए प्रयुक्त करने के लिए आवश्यक परीक्षण किये जा रहे हैं।

उपचार की अनेकानेक पद्धतियाँ निकली हैं और नई−नई दवाएँ खोजी गई है, पर उनसे सामयिक राहत मिलने के अतिरिक्त व्यथा के स्थायी निराकरण में कोई कहने योग्य सहायता नहीं मिली है। मिलने की आशा भी नहीं है क्योंकि रोग उत्पन्न होने के मूल कारण को निरस्त किये बिना उसके उत्पादन स्रोत खुले ही रहेंगे और एकबार की चिकित्सा का लाभ प्राप्त होने से पूर्व ही नये कुपथ्य से संकट के नये पर्वत फिर से सामने खड़े दीखने लगेंगे।

संसार प्रसिद्ध स्वास्थ्य पत्रिका ‘लासेट’ के अब से प्रायः 50 वर्ष पूर्व के एक स्वास्थ्य अन्वेषण संस्थान का विवरण छपा था। जिसमें कहा गया था कि उन दिनों अफ्रीका के अस्पतालों में भर्ती मरीजों की जाँच पड़ताल करने पर उनमें से एक भी रक्तचाप का मरीज नहीं था। किन्तु अब स्थिति बिगड़ती जा रही है। वहाँ भी हृदय रोगों और रक्तचाप से पीड़ितों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वंश परम्परा और जलवायु की दृष्टि से ऐसे रोगों से दूर रहने वाले अफ्रीकी अमेरिका में बस गये तो उनने इन बीमारियों में वहाँ रहने वाले श्वेत लोगों से भी बाजी मार ली। पूरे अमेरिका में सरकारी जानकारी के अनुसार वहाँ ढाई करोड़ व्यक्ति उच्च रक्तचाप से पीड़ित है जिनमें से एक चौथाई अश्वेत है। अनुपात के हिसाब के अश्वेतों को यह अभिशाप कहीं अधिक संत्रस्त कर रहा हैं।

प्रश्न देश, समाज, रंग, वर्ण, शिक्षित, अशिक्षित और गरीब-अमीर का नहीं है। इस दृष्टि से न्यूनाधिक मात्रा में बीमारियों के कृपा पात्र दोनों ही वर्ग लगभग समान हैं। अशिक्षितों का अज्ञान और दरिद्रों का अभाव, उन्हें दुर्बल और रुग्ण बनाता है तो शिक्षितों एवं अमीरों को उनकी आपाधापी और उद्विग्नता के कारण लगभग उतनी ही हानि पहुँच जाती है। सुविधा सम्पन्न जीवन और चिकित्सा साधनों की उपलब्धि की आवश्यकता समझी जा सकती है, पर यह भूल नहीं जाना चाहिए कि जीवन के सद्व्यय का संयम, सन्तुलन का ध्यान रखे बिना ऐसी रीति नीति अपनाई न जा सकेगी जो उच्च रक्तचाप सहित अन्यथा रुग्णताओं के लिए मूलतया उत्तरदायी है।

बढ़े हुए रक्तचाप के प्रत्यक्ष कारणों में, भोजन में अधिक चिकनाई और मसालों का होना−बिना भूख लगे तथा ठूँस−ठूँसकर खाना, सिगरेट, खराब आदि नशों का सेवन, बहुत ठण्डे अथवा पेय पदार्थों का सेवन प्रमुख है।

विलासिता, आपाधापी, खीज, आवेश चिन्ता, शोक, एकाकीपन, व्यस्तता, आशंका, भय चिन्ता, निराशा जैसे मानसिक तनाव उत्पन्न करने वाले विचार भी रक्तचाप को जन्म देते और अनैतिक, छली, निष्ठुर, अहंकारी प्रकृति के मनुष्य उत्तेजित रहते हैं और उस व्याधि के शिकार बन जाते हैं। आमदनी से अधिक खर्च करने वाले, ईर्ष्या, द्वेष की आग में जलने, वाले, अपने आपको हर घड़ी विषाक्तता से घिरा हुआ अनुभव करते हैं और उच्च रक्त के शिकार बन जाते हैं। कई बार दरिद्रता−कुपोषण, अधिक श्रम, कलह जैसे कारण भी मनुष्य की मनःस्थिति को लड़खड़ा देते हैं और उसके कारण हृदय तथा रक्त प्रवाही नलिका संस्थान की सामान्य गतिविधियों में अवांछनीय अवरोध उत्पन्न होकर इस प्रकार की गड़बड़ियाँ प्रस्तुत करते हैं।

लिप्साएँ और लालसाएँ शरीर और मन दोनों पर ही अनावश्यक दबाव डालती हैं। हृदय और उससे सम्बन्धित नाड़ी संस्थान भी उसी दबाव की चपेट में आकर एक विचित्र संकट में फँस जाता है। उसी की चीख पुकार उच्च रक्तचाप है। सामयिक उपचार जो भी हो−ठीक है, पर जड़ काटनी हो तो संयम, सदाचरण की हलकी−फुलकी जिन्दगी जीने की दूरदर्शितापूर्ण नीति ही अपनानी पड़ेगी।


कवि अलेक्जेंडर पोप (kahani)

प्रख्यात अँग्रेज कवि अलेक्जेंडर पोप की आर्थिक स्थिति उतनी अच्छी नहीं थी, तथापि एक बार उन्होंने अपने मित्र हास्य व्यंग लेखक स्विफ्ट जोनाथन से बताया मुझे दूसरों को देने में अत्यधिक खुशी होती है, अतएव मैं चाहता हूँ कि प्रतिवर्ष 100 पौण्ड किसी जरूरतमन्द को देने का क्रम बनाऊँ।

लेकिन आपकी तो आर्थिक स्थिति नहीं है− जोनाथन ने प्रतिवाद करते हुए पूछा। इस पर पोप ने कहा, “आप यह क्यों नहीं देखते कि मेरे पास कुछ तो है, पर सैकड़ों ऐसे हैं जिनके पास कुछ भी नहीं है।”

पोप ने यह परम्परा प्रारम्भ की और मृत्युपर्यन्त जारी रखी। वे जब मरे तब उनके पास एक पाई भी शेष नहीं रही थी जबकि उस वर्ष के पौण्ड वे नियमानुसार दान कर चुके थे।

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ध्यान धारण का आत्म-निर्माण में योगदान

ध्यान की गहराई से शारीरिक और मानसिक हलचलों में शिथिलता आती है। फलतः ऑक्सीजन की खपत और कार्बनडाई ऑक्साइड की उत्पत्ति घट जाती है। इससे जीवन यन्त्र चलाने में शरीर के कलपुर्जों को जो शक्ति खर्च करनी पड़ती है उसका अनुपात कम होने से विश्राम का लाभ मिलता है। यह विश्राम थकान दूर करता है। रोग निरोधक क्षमता और जीवनी-शक्ति बढ़ाता है। फलतः अभ्यास करने वाले को शारीरिक और मानसिक दृष्टि से अधिक स्वस्थ एवं समर्थ बनने का अवसर मिलता है। इस आधार पर उपलब्ध हुई ताजगी एक ऐसी सम्पदा है जिसका किसी भी क्षेत्र में उपयोग करके उपयुक्त लाभ उठाया जा सकता है।

नींद का अपना लाभ है। उसकी आवश्यकता उपयोगिता से सभी परिचित है, पर जब अचेतन मन पर अवलम्बित है। जब चाहें तब उसे बुला लें, ऐसा नहीं हो सकता। किन्तु कई परिस्थितियों में ऐसी आवश्यकता होती है कि जागृत-स्थिति में शरीर और मन पर छाये हुये अतिरिक्त दबाव को हटाने या घटाने के लिए तत्काल निद्रा का लाभ मिल जाय। किसी प्रकार वह मिल जाता है तो, थकान और तनाव से उत्पन्न कष्ट से राहत मिल जाती है। श्रम करते समय बीच-बीच में विश्राम लेने से बहुत बड़ी राहत इस प्रकार की मिल जाती है। शिथिलीकरण मुद्रा में शरीर को ढीला करके भी ऐसा ही कुछ प्रयास किया जाता है, पर इनसे लाभ सीमित ही मिल पाता है। आराम शरीर को ही तो मिला मन पर इसका सीधा प्रभाव तो बहुत कम ही हो पाता है। ध्यान की प्रत्यक्ष विशेषता यह है कि मन की उत्तेजना को शान्त करने में उसका प्रयोग बड़ी अच्छी तरह हो सकता है। ध्यान से उत्पन्न मानसिक शिथिलता की, हलकी स्थिति को योगनिद्रा और गहरी स्थिति को समाधि कहते हैं। हिप्नोटिज्म स्तर के सभी प्रयास योगनिद्रा पद्धति के अन्तर्गत होते हैं। गहरी परतों की सघन विश्रान्ति समाधि के अनेक स्तरों में उसके स्तर के अनुरूप मिलती है। इसके लाभ मानसिक तनावों और दबावों से छुटकारा पाने के रूप में साधनकर्त्ता को मिलता है।

योगसाधना का वैज्ञानिक दृष्टि से क्या महत्व हो सकता है इसकी शोध करने के लिए फ्रांस की हारवर्ड इन्स्टीट्यूट फॉर साइकिक एण्ड कल्चरल रिसर्च की ओर से डॉ0 घेर से ब्रोसे की अध्यक्षता में एक मण्डली ने विश्वव्यापी परिभ्रमण किया था। वह टोली भारत भी आई थी। परीक्षणों के उपरान्त इस शोध प्रयास ने यह स्वीकार किया कि ध्यान अभ्यास से श्वास-प्रश्वास एवं हृदय की सिकुड़न को संकल्पपूर्वक अभीष्ट मात्रा में घटाया जा सकता है। मानसिक उद्वेग भी घटाते-घटाते सघन निद्रा की स्थिति में पहुँचा जा सकता है। यह दोनों ही उपलब्धियाँ शारीरिक और मानसिक दृष्टि से बहुत उपयोगी है।

ध्यान की सघनता से मानसिक विश्राम की बात उतनी बड़ी नहीं हैं जितनी की कोशाओं, ऊतकों से लेकर छोटे-बड़े सभी अवयवों को उनकी अभ्यस्त शक्ति व्यय प्रक्रिया को सुधार देने या घटा देने से। इन घटकों में कारणवश उत्तेजना भर जाती है और शक्ति का अनावश्यक, अपव्यय होने लगता है। इस कारण संचित जीवनीशक्ति का भण्डार अनावश्यक रूप से खर्च होता चला जाता है। फलतः समूचे व्यक्तित्व पर क्षरण और आवेश के लक्षण दृष्टिगोचर होने लगते हैं। यह स्थिति चिन्ताजनक है। इसमें दुर्बलता, रुग्णता एवं अकाल मृत्यु का संकट उत्पन्न होता है।

ध्यान द्वारा उपलब्ध होने वाली विश्रान्ति इस संकट को दूर करती है। सामयिक आवेशों को हटाने में तो उसकी सफलता तत्काल देखी जा सकती है। पर यह तो हलका, उथला और सामयिक लाभ है, असली लाभ तो वह है जिसके अनुसार शक्ति के अपव्यय के अभ्यस्त ढर्रे की रोकथाम होती है और स्वास्थ्य संकट की, मानसिक विक्षेप की जड़ जमा कर बैठी हुई विपत्ति से छुटकारा पाने का अवसर मिलता है। विश्राम के बाद नये सिरे से नया कार्यक्रम बनाना सरल पड़ता है। छोटे-बड़े अवयव भी इसी आधार पर राहत प्राप्त करते हैं और नव-जीवन का नई ताजगी का लाभ लेते हैं।

भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली के परीक्षण यूनिट ने पिछले दिनों तक प्रायः 600 ध्यानस्थ योगियों के शरीरों की जाँच-पड़ताल की है। इस परीक्षण में मस्तिष्कीय विद्युत प्रवाह स्नायु संस्थान का आवेश तथा अन्यान्य स्वसंचालित गतिविधियों में शिथिलता लाने की बात असंदिग्ध रूप से देखी गई हैं। हृदय की सामान्य धड़कन एक मिनट में 72 बार को घटा कर 30 बार कर देने वाले प्रमाण तो कितने ही मिले हैं। कई तो भूमिस्थ समाधि में मृतक तो नहीं होते, पर लगभग उसी स्तर की शिथिलता उत्पन्न कर लेते हैं। जीवन प्रवाह के क्रम में शिथिलता आने के फलस्वरूप मिलने वाले विश्रान्ति का अपना महत्व है।

बार-बार उसका अभ्यास चलता रहे तो शरीर के अन्तराल में काम करने वाली गतिशीलता पर नियन्त्रण और सुधार परिवर्तन करना सम्भव हो सकता है। सामान्यता यह बहुत कठिन है। कहने भर को ही यह कहा जाता है कि मनुष्य अपना स्वामी आप है, पर यह उथली दर्पोक्ति है। वस्तुतः शरीर अचेतन की आदतों और मस्तिष्क संचित संस्कारों का गुलाम है। इस गुलामी से छूटने को ही मुक्ति कहा गया है। मुक्ति का आकर्षक और अलंकारिक वर्णन अध्यात्म शास्त्रों में अति विस्तारपूर्वक किया गया है। इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए आत्म-नियंत्रण की क्षमता चाहिए, तभी आदतों और संस्कारों के प्रगाढ़ बन्धनों को ढीला करना और अन्तराल स्थिति तथा गति को बदलना सम्भव हो सकता है। यह सब कैसे सम्भव हो सकता है? यह जटिलता को सरलता में बदलने की ध्यान धारण का अभ्यास बहुत ही कारगर हो सकता है।

कैवल्यधाम, लीनावाला में योग द्वारा रोग चिकित्सा के प्रयोग बहुत समय से चल रहे हैं, उस प्रयोग परीक्षण के परिणाम उत्साहवर्धक माने जाते हैं। योगाभ्यासों के बाहरी विधि-विधानों में आसन, प्राणायाम, बन्ध, मुद्रा जैसे क्रिया-कलाप ही आँखों से परिलक्षित होते हैं फलतः मोटी दृष्टि से उन्हें उतने तक ही सीमित मान लिया जाता है। वस्तुस्थिति इससे कहीं आगे तक चली जाती है। इन सभी गतिविधियों के साथ ध्यान धारण का-विचारणा, मान्यता और भावना का समावेश करने पर ही उपयुक्त लाभ मिलते हैं। यह ध्यान को ही प्रक्रिया है। एकाग्रता मात्र ही ध्यान नहीं है। मानसिक स्थिरता ही उसका स्वरूप नहीं है। निग्रहीत मन को किधर घुमाया जाय, किस कार्य में लगाया जाय यही है समग्र ध्यान धारणा। हर योगाभ्यास में किसी न किसी रूप में ध्यान धारण का समावेश करना होता है। शरीर द्वारा किये जाने वाले अभ्यासों से जो चमत्कारी परिणाम देख पाते हैं, वे अंग संचालन या श्रम साधना के नहीं, वरन् उनके साथ गुंथे हुये मनोयोग के हैं। मनोयोग का इच्छित नियोजन कर सकने की सामर्थ्य उत्पन्न करना ही ध्यान धारणा का उद्देश्य है। इस प्रकार उसे आत्म-नियन्त्रण, आत्म-परिवर्तन और आत्म-विकास की कुंजी भी कह सकते हैं। ध्यानयोग की गरिमा ऐसे ही अनेकानेक लाभों के साथ जुड़ी हुई है।


Quotation

प्रत्येक आत्मा ही अव्यक्त ब्रह्म है। वाह्य एवं अन्तः प्रकृति, दोनों का नियमन कर इस अन्तर्निहित ब्रह्म स्वरूप को अभिव्यक्त करना ही जीवन का ध्येय है। कर्म, भक्ति, योग या ज्ञान के द्वारा इसमें से किसी एक के द्वारा या एक से अधिक के द्वारा, या सबके सम्मिलन के द्वारा यह ध्येय प्राप्त कर लो और मुक्त हो जाओ। यही धर्म का सर्वस्व है। मत मतान्तर, विधि अनुष्ठान, ग्रन्थ, मन्दिर-ये सब गौण हैं।

-स्वामी विवेकानन्द

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प्रशिक्षण और मार्ग-दर्शन की स्वयंभू शक्ति

सृष्टि के लाखों जीव-जन्तुओं में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जिसे बहुत लम्बे समय तक पराश्रित रहना पड़ता है। अनुभव और निष्कर्षों की दृष्टि से तो वह आजीवन परावलम्बी ही रहता है, पर खान-पान जैसे सामान्य जीवन व्यवहार के लिए भी उसे बहुत दिनों तक माता-पिता की सेवाओं की आवश्यकता रहती है। कुत्तों और बिल्लियों के बच्चे जन्म लेते ही माँ का दूध आप ढूँढ़ लेते हैं, मनुष्य के बच्चे की माँ स्वयं मुँह में स्तन न डाले तो बेचारा भूखों मर जाये। चलना-फिरना, टट्टी, पेशाब और भोजन की अपनी सुविधाएँ अन्य जीव जल्दी ही विकसित कर लेते हैं, पर मनुष्य के बच्चे को लम्बी अवधि तक इनके लिए भी पराश्रित रहना पड़ता है। मनुष्य इस तरह एक प्रशिक्षणशील प्राणी-ढाला जाने वाला प्राणी है। अभिभावक अपने इस दायित्व को भली प्रकार समझकर ही अच्छी तरह निभा सकते हैं।

यदि आने वाली पीढ़ी को पैदा करने का तो ध्यान रहे उसे नियम, व्यवस्था, अनुशासन, रीति-नीति और सामाजिक मर्यादाओं का प्रशिक्षण न मिले तो उसकी रचनात्मक प्रवृत्तियों का बहक जाना नितान्त स्वाभाविक है। मनुष्य जिस मिट्टी का बना है उसमें स्वभावतः अधोमुखी प्रवृत्ति अधिक ऊर्ध्वगामी चिन्तन और कर्तृत्व कम ही है। खुला छोड़ने का ही परिणाम है कि वर्तमान पीढ़ी असभ्य, उद्दण्ड और उच्छृंखल होती चली जा रही है। अनेक ऐसे उदाहरण हैं जब हम जंगली जानवरों को यहाँ तक कि खूँखार जन्तुओं को भी प्रशिक्षित कर उन्हें मनोरंजक सहिष्णु और उपयोगी बना लेते हैं तो मनुष्य तो गीली मिट्टी का बना है उसे तो किसी भी इच्छित दिशा में मोड़ा, सजाया-सँवारा जा सकता है।

पश्चिमी आस्ट्रेलिया में विल्मा नाम की एक महिला ने पशु उद्यान बनाया है इसमें 6 कंगारू भी हैं इन्हें जिस काम से भोजन पाने की व्यवस्था कर दी गई है ये उसी क्रम में गृह स्वामिनी का दरवाजा खटखटाते हैं और अपनी बारी का भोजन पाकर प्रसन्न हो जाते हैं।

जंगली बतख अपने मालिक से इतना प्यार करने लगती हैं कि उन्हें कोई और पुकारता रहे तो वह उधर कान भी न करेंगी, किन्तु यदि उनका मालिक पुकारे तो वह दौड़कर वहाँ पहुँच जाती हैं। इसी तरह घर के बच्चों में भी समय पर न केवल भोजन अपितु प्रत्येक काम समय पर डालने की प्रवृत्ति डाली जा सकती है। हमें शिकायत रहती है कि बच्चे माँ-बाप का कहना नहीं मानते, पड़ोसियों के बहकावे में आ जाते हैं, यदि उन पर अपना प्यार भरपूर रहे उनका कल्याण सच्चे मन से चाहें तो बच्चे आजीवन माता-पिता के होकर रह सकते हैं।

वैज्ञानिक डॉ0 कैलाग, डॉ0 हेगे, डॉ0 निवाड़ा विश्वविद्यालय अमेरिका के गार्डनर दंपत्ति ने चिंपैंजिओं को मानवीय प्रकृति में ढालने के लम्बे अर्से तक प्रयोग किये। इस प्रशिक्षण से उनमें मनुष्यों की तरह रहने, खाने, कपड़े पहनने की आश्चर्यजनक प्रवृत्ति का विकास हुआ। बोलने में पूरी सफलता तो शायद इसलिए न मिल पाई कि उनकी शारीरिक संरचना मनुष्य से भिन्न कोटि की होती है, पर सतत् अभ्यास से यह चिंपैंजी मामा, पापा, अप, कम, गिव मी ड्रिंक, प्लीज, खोला (ओपेन) फूड (खाना) वाटर (पानी) आदि 30 शब्द तक यह थोड़े ही प्रयास से सीख गये।

1613 में मास्को (रूस) की श्रीमती कोत्ज, 1668 में अमेरिका के क्लार्क नामक एक व्यक्ति ने ओरेंग जाति के बन्दरों और चिंपैंजिओं को पेंटिंग सिखाई। कुछ ही समय के प्रशिक्षण से वह कुर्सी में बैठकर विधिवत् पेंटिंग का अभ्यास करने लगे। क्लार्क ने सन् 1671 ओक्लहोम की पेंटिंग प्रतियोगिता में तो अपने बन्दर जिम को विधिवत भाग दिला था, जिसमें अच्छी पेंटिंग के लिए 5 हजार डालर का पुरस्कार भी मिला।

वाणी विहीन, साधन विहीन जीव-जन्तुओं में भी जब सूक्ष्म ग्रहणशीलता का अभाव नहीं तो मनुष्य के बच्चों में प्रतिभा की कमी की कल्पना करना न्यायोचित नहीं। यदि अपने दायित्वों का निर्वाह माता-पिता परिवार वाले पूरी निष्ठा, पूरे मन से करें तो हर घर में इंजीनियर, वैज्ञानिक, कलाकार, साहित्यकार जो भी कुछ हम चाहते हैं वह सब हो सकते हैं। खुला छोड़ देने से तो बालू क्या सीमेंट की दीवारें भी ढह जाती हैं, पर यदि प्रयत्नपूर्वक उठाया जाये तो मिट्टी से भी मजबूत दीवार खड़ी की जा सकती है।

प्रशिक्षण मिलने पर कुत्ते मनुष्य की अनेक प्रकार की सेवाएँ करते हैं। बाणभट्ट ने लिखा है कि तत्कालीन भारतीय शासक युद्धों में कुत्तों का प्रयोग करते थे। ईसा से पूर्व 101 सन् में ट्यूटन्स ने कुत्तों की सहायता से ही रोमन सेना पर आक्रमण किया और विजय पाई। द्वितीय महायुद्ध में जर्मनी ने इस कार्य के लिए 2 लाख कुत्ते प्रशिक्षित किये। नैपोलियन की अपनी विजय में कुत्तों का बड़ा योगदान रहा है। 1604 में रूस, जापान के युद्ध में भी कुत्तों ने महत्वपूर्ण भूमिका निबाही। मलय देश के शासकों ने पिछले दिनों अफ्रीका के माऊ-माऊ के विरुद्ध तथा भारत पाक युद्ध के समय भारतीय सेना के कुत्तों ने भारी योगदान दिया। यह कुत्ते जासूसी के लिए अत्यन्त निष्णात पाये गये। अपनी गन्ध से अपराधी तथा दुश्मन का पता लगा लेना इनके लिए बहुत सरल होता है।

कुत्तों की तरह घोड़े व खच्चर भी सेना के बहुत महत्वपूर्ण अंग है। प्रशिक्षित घोड़ों तथा खच्चरों के कारनामों में बड़े आश्चर्यजनक होते हैं। अपने स्वामी को सकुशल बचा ले जाने में। दुश्मन पर प्रहार तथा छिपकर घात लगाने में वे अत्यन्त कुशल होते हैं। पहाड़ी युद्ध तो लड़ा ही खच्चरों के बल पर जाता है। हवाई आक्रमण के समय खच्चर मोर्टार तोपों सहित इस तरह दुबक कर छिप जाते हैं कि दूरबीन लगे जहाज भी इन्हें पहचान नहीं पाते। जर्मनी का चतुर हैन्स घोड़ा तो जोड़, बाकी, गुणा, भाग तक लगा लेता है। यह कार्य खुर से खट-खट की साँकेतिक भाषा में करता है, वैज्ञानिकों ने भी इसकी जाँच की और उसकी अद्भुत बौद्धिक क्षमता व दक्षता पर आश्चर्य प्रकट किया है। मनुष्य का कौशल और उसकी दक्षता तो बहुत ही उच्च श्रेणी की हो सकती है यहाँ कार्तिकेय जैसे सेनापति, नागार्जुन जैसे रसायनज्ञ, आर्यभट्ट जैसे गणितज्ञ और बाराहमिहिर जैसे ज्योतिषाचार्य घर-घर पैदा हो सकते हैं, पर यह सब तभी संभव है जब प्रशिक्षण पूर्ण मनोयोग भावना, तत्परता और कोई लक्ष्य बनाकर दिया जाये।

हैम्बर्ग चिड़िया घर के एक चिंपैंजी में ऐसी आकांक्षाएँ पायी गई कि उसमें मनुष्य की- सी जिज्ञासाएँ हैं। वह मनुष्यों के क्रिया-कलाप विशेष कर साइकिल चलाने की क्रिया को बड़ी तन्मयता से देखता। चिड़ियाघर के अधिकारियों ने उसके लिए उसे छोटे पहियों वाली एक साइकिल मँगा दी। उसे बैठाना और पैडल मारना सिखाया गया। थोड़ी देर के अभ्यास से ही चिंपैंजी पैडल मारने लगा और अब वह अपनी गैलरी में बखूबी साइकिल चलाकर दर्शकों को मनोरंजन करता है। उसकी बुद्धि कौशल का इससे भी उन्नत उदाहरण तब देखने में आया जब उसकी गैलरी में केलों का एक गुच्छा लटका दिया गया। चिंपैंजी कुछ देर तक उछल-उछलकर उसे पकड़ने का प्रयत्न करता रहा, पर जब गुच्छा हाथ न लगा तो कोठरी में पड़े एक लकड़ी के बक्से को उठाकर गुच्छे के नीचे रखा और उसके ऊपर खड़ा होकर गुच्छे को पकड़ने का प्रयास किया। इस पर भी गुच्छे तक हाथ नहीं पहुँचा, कुछ देर सोचने के बाद उसने क्रमशः दूसरा और तीसरा बक्सा रखा और अन्ततः गुच्छा पाने में सफलता प्राप्त कर ली।

मनुष्यों के सामने कई ऐसे लक्ष्य हैं जिन्हें समझने में ही असामान्य सूक्ष्म बुद्धि चाहिए। बुद्धि ही नहीं प्रौढ़ और परिपक्व चिन्तन चाहिए। वह हिम्मत और मनोबल भी चाहिए जो उसे इस कठिन साधना से विचलित होने और आकर्षणों से बचाने में सहायक हो, मनुष्य जीवन के रहस्यों, आत्मा पर पड़े हुए पर्दे, सृष्टि रचना का आधार और उसकी नियम व्यवस्था जानना सभी कुछ सम्भव है, पर इस दिशा में मिलने वाला संरक्षण और मार्गदर्शन उतना ही प्रौढ़, सूक्ष्म, सम्वेदनशील और कल्याण की भावना से ओत-प्रोत होना चाहिए। इन जीवों में ऐसी अकल्पित क्षमताएँ हो सकती हैं तो मनुष्य की विवेचन शक्ति का तो कहना ही क्या? पर उसका विकास स्वतः कभी-कभी ही हो सकता है अधिकांश में प्रशिक्षण आवश्यक होता है। वातावरण आवश्यक होता है, जिसकी व्यवस्था बड़ों को ही करनी पड़ती है।

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अपनों से अपनी बात-


रजत जयन्ती वर्ष के कुछ महान कार्यक्रम

युग-निर्माण योजना का वर्तमान रजत जयन्ती वर्ष हर्षोत्सवों के, खुशी बधाइयों के, धन्यवाद अभिनन्दनों के रूप में नहीं मनाया जायगा। वरन् उसमें कुछ ऐसे ठोस कदम उठाये जायेंगे जिनके आधार पर नवयुग के अवतरण की गति में तीव्रता आ कसके। योद्धाओं को रणभूमि में फाग खेलने और शिल्पियों को सृजन चुनौती को स्वीकार करने के लिए अपना कौशल दिखाने में ही आनन्द आता हैं। जागृत आत्माओं का हर्षोत्सव तो सृजन कार्यों में भाव भरे अनुदान प्रस्तुत करने के रूप में ही बन सकता है। रजत जयन्ती ऐसे ही उद्बोधन और आमन्त्रण साथ लेकर अपना आलोक बिखेरती चली आ रही है।

इस वर्ष जो विशेष रचनात्मक कार्य हम सबको मिल जुलकर करने हैं उनकी पंच सूत्री योजना का संकेत पिछले अंक में दिया जा चुका है।

1- संख्या में थोड़े किन्तु प्रभाव की दृष्टि से अत्यन्त ज्योतिर्वान युग-निर्माण सम्मेलनों का आयोजन। यह 25 कुण्डी गायत्री यज्ञों के रूप में क्षेत्रीय परिधि बनाकर किये जायेंगे। योजना इस प्रकार की है कि संख्या की दृष्टि से कम रहते हुए भी इनका दूरगामी और चिरस्थायी प्रभाव सम्भव हो सकेगा।

2- ‘युग-शक्ति गायत्री’ मासिक पत्रिका को दस भाषाओं में प्रकाशित करने का दुस्साहस जैसा कदम उठाया जा रहा है। नव-निर्माण जिस सामर्थ्य के बलबूते सम्भव हो सकेगा उसे आत्म-शक्ति ही कहा जा सकता है। अध्यात्म ज्ञान-विज्ञान का बीज तत्व गायत्री विद्या में केन्द्रित इसका तत्वज्ञान, साधना विधान और युग परिवर्तन के लिए प्रयोग विनियोग का त्रिविधि शिक्षण इस नवीन पत्रिका द्वारा भली प्रकार सम्भव हो सकेगा। युग-निर्माण योजना मासिकों का नाम युग-शक्ति गायत्री बदल दिया गया है और अन्यान्य भाषाओं में इसी नाम से नई पत्रिकाएँ प्रकाशित की जा रही हैं। भाषाई सीमा बन्धन की खाई को पीटते हुए इस प्रयास के आधार पर युग-चेता को देश-व्यापी, विश्व-व्यापी बनाया जा सकेगा। इन पत्रिकाओं में कीर्तिमान स्थापित किया जा रहा है। (1) पंजाबी (2) बंगाली (3) आसामी (4) अंग्रेजी (5) कन्नड़ (6) तेलगू में नई पत्रिकाएँ प्रकाशित होने जा रही हैं (7) हिन्दी (8) गुजराती (9) मराठी (10) उड़िया में इन पत्रिकाओं का प्रकाशन पहले से ही चला आ रहा है उनमें तो नाम भर बदला गया है।

3- तीसरा चरण है भारत की महान् सांस्कृतिक परम्परा ‘प्रव्रज्या’ का पुनर्जीवन। तीर्थयात्रा के नाम से धर्म प्रचार की पदयात्रा प्राचीन काल में अतीव लोकप्रिय रही है और उसे धर्मानुष्ठानों में अग्रणी माना गया है। जन-मानस में धर्म चेतना बनाये रखने के लिए प्राणवान परिव्राजक अपनी टोली मण्डलियों के साथ परिभ्रमण के लिए निकलते थे और बादलों की तरह बरसते शुष्क जन मानस में भाव भरी धर्म चेतना को सुरम्य हरियाली की तरह उगाते थे।

आज इस पुण्य परम्परा का ध्वंसावशेष मात्र शेष है। पर्यटन का नाम ही तीर्थयात्रा बन गया है। यात्री को प्रवास विनोद का, वाहनों और दुकानों को अर्थोपार्जन का, धर्म व्यवसायियों को आजीविका का लाभ तो मिलता है, पर उस महान् प्रक्रिया की पूर्ति किसी भी प्रकार नहीं होती, जिसे धर्म प्रचार की पदयात्रा का रूप देते हुए दूरदर्शी महामनीषियों ने प्रारम्भ किया था।

समय की आवश्यकता यह है कि उस महान् परम्परा को पुनर्जीवन दिया जाय। प्राणवान परिव्राजक तैयार किये जायें और जन जागरण के लिए प्रव्रज्या को जीवन्त अभियान का रूप दिया जाय।

रजत जयन्ती वर्ष के यह तीन संकल्प ही प्रधान हैं। यों गत वर्ष के ज्ञानरथ, जन्म-दिवस, प्रज्ञा मन्दिर, टोली संगठन और वर्ष में पाँच धर्मानुष्ठानों का ज्ञान यज्ञ के रूप में उपयोग यह पाँच कार्य भी ऐसे हैं जिनका आरम्भ तो पुनर्गठन वर्ष में किया गया था, पर परिपोषण आगे भी चलते रहना है। इन पाँचों कार्यक्रमों को अधिकाधिक प्रखर और व्यापक बनाना भी इस वर्ष का एक काम है। पिछले वृक्षारोपण को सींचना भी उतना ही महत्वपूर्ण कार्य है जितना नये पौधे लगाना।

जिन्हें नवयुग की चेतना उत्पन्न करने में अपने उत्तरदायित्वों का भान है वे सभी इन दिनों सेतुबन्ध बाँधने वाले रीछ, वानरों की सृजन सेना में अपनी भाव भरी भूमिका प्रस्तुत कर रहे हैं। रजत जयन्ती वर्ष उनके लिए चुनौती जैसा है जिसमें अधिक कुछ कर गुजरने के लिए आह्वान किया जा रहा है, आमन्त्रण दिया जा रहा है। जीवन जहाँ भी होगा वहाँ उपयुक्त अवसर पर उपयुक्त भूमिका निभाने में उपेक्षा बरत सकना सम्भव ही न हो सकेगा। इन दिनों समूचे परिवार में नव-जीवन का उभार प्रत्यक्ष परिलक्षित हो रहा है और समय की माँग को पूरा करने में प्रायः सभी अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार जुटे हुए हैं।

‘युग-शक्ति गायत्री’ की सदस्य संख्या इन्हीं दिनों बढ़ाने के लिए कहा गया है। जुलाई अंक छप गया है। कलेवर, मूल्य और लेख सामग्री की सृष्टि से पत्रिकाएँ अनुपम मानी गई हैं। जिनने उन्हें देखा, पढ़ा है वे उत्साह से भर गये हैं और सदस्य संख्या बढ़ाने के लिए अपने सम्पर्क क्षेत्र में टोली बनाकर परिभ्रमण कर रहे हैं। जिस तेजी से इन पत्रिकाओं के सदस्य बन और बढ़ रहे हैं उसे देखते हुए लगता है उनकी ग्राहक संख्या 2,50,000 (ढाई लाख) तक पहुँच जाना पूरी तरह सम्भव हैं। जहाँ इस सन्दर्भ में शिथिलता बरती गई है वहाँ झकझोरने और आग्रह करने का क्रम चलाया गया है। आशा की गई है कि इस प्रयास से युग चेतना का आलोक सुविस्तृत क्षेत्र में फैलता चला जायगा।

अन्य भाषाओं के क्षेत्र में, अपरिचित क्षेत्र में प्रवेश पाना सचमुच ही बहुत कठिन हैं। इसे नये सिरे से किया गया नवीन प्रयास कह सकते हैं। इस कार्य में कन्धा देने के लिए उनसे कहा गया है जिनके सम्पर्क में अन्य भाषाओं के शिक्षित लोग आते हैं। उन्हें पत्रिकाएँ पढ़ने देना, वापिस लेना, अभिमत पूछना, परामर्श देना यदि क्रमबद्ध रूप से चल पड़ा तो निश्चय ही इस सम्पर्क प्रयास से अन्याय भाषाओं की पत्रिकाओं के इतने सदस्य बन जायेंगे कि उनका प्रकाशन सुनिश्चित रूप से होते रहने की कठिनाई पार कर ली जाय। इसके लिए उन क्षेत्रों के परिजनों से विशेष अनुरोध किया गया है जहाँ अन्य प्रान्तीय कर्मचारियों की विशेषता है। टाटा नगर, राँची, भिलाई, राउरकेला, दुर्गापुर, बरौनी, भोपाल जैसे नगरों में बड़े कारखाने हैं और उनमें देश के सभी प्रान्तों के शिक्षित लोग काम करते पाये जाते हैं। इनसे सम्पर्क बनाने और उनकी भाषा में छपे नये साहित्य का परिचय कराने की योजना जहाँ भी वर्तमान परिजन बना सकेंगे वहाँ सहज ही आशाजनक सफलता मिलती चली जायेगी। इन भाषाओं के प्रेस कर्मचारी, क्लर्क आदि की भी मथुरा में आवश्यकता पड़ेगी। उन भाषाओं में अनुवाद कर सकने वाले सुशिक्षितों का भी सहयोग लेना होगा। इसके लिए अपने वर्तमान परिजनों ने ही ढूंढ़, खोज शुरू कर दी है। इस आधार पर किये गये शुभारम्भ का परिणाम कुछ ही समय में ऐसा होगा कि हिन्दी की तरह ही अन्य भाषाई क्षेत्रों में भी नव जागरण का प्रकाश सुविस्तृत होता चला जायेगा।

तीसरा कार्य परिव्राजकों की सृजन सेना का गठन है। लेखनी वाणी के माध्यम से चल रहे विचार क्रान्ति अभियान को अब तक जो सफलता मिली है उसका श्रेय भी जन-सम्पर्क के रूप में चलने वाले प्रयासों को ही दिया जा सकता है। भावी प्रगति का मध्य बिन्दु भी इसी को माना जायेगा। बौद्ध कालीन विचार क्रान्ति की व्यापकता और सफलता का श्रेय उस मिशन के लिए समर्पित परिव्राजकों को ही दिया जा सकता है। उन्हीं के प्रयास से भारत, एशिया और समस्त संसार को धर्म चक्र प्रवर्तन के महान अभियान से लाभ लेने का अवसर मिला था। ज्ञान-यज्ञ की लाल मशाल भी उसी प्रक्रिया का उत्तरार्ध सम्पन्न कर रही है, अस्तु माध्यमों के सन्दर्भ में भी उसी प्रक्रिया का अनुकरण करना होगा। सुयोग्य परिव्राजकों का सुगठित परिवार ही घर-घर में पहुँच कर जन-जन के मन-मन में युग चेतना का संचार कर सकेगा। जन-जागरण का अलख जगाना प्राणवान परिव्राजकों के लिए ही सम्भव हो सकता है।

अपने मिशन की सामयिक आवश्यकताओं में से कितनी ही ऐसी हैं जिनकी पूर्ति इन्हीं दिनों की जानी चाहिए। (1) वर्तमान शाखा संगठनों में हर साल दस-पन्द्रह दिन के शिक्षण सत्र चलने चाहिए, जिससे दूरवर्ती परिजनों को हरिद्वार पहुँच कर लाभ लेने का आंशिक लाभ अपने स्थान पर ही मिल सके (2) इस वर्ष सम्मेलन आयोजन संख्या की दृष्टि से तो थोड़े ही हैं, पर उनके साथ जुड़े हुए उत्तरदायित्व अनेक हैं और भारी भी। उन्हें ठीक तरह सम्पन्न करने के लिए सहयोग और परामर्श देते रहने के लिए उपयुक्त व्यक्ति वहाँ पहुँचने चाहिए, यह दोनों ही कार्य सामयिक आवश्यकता की दृष्टि से अतीव महत्वपूर्ण हैं इनकी पूर्ति अनुभवी परिव्राजकों से ही हो सकती है।

3- हिंदी की परिधि में सीमाबद्ध अपने मिशन को देशव्यापी बनाया जाना है। भाषाई खाइयों को पाटने के लिए अन्य भाषाओं में साहित्य प्रकाशन तो आरम्भ कर दिया गया है, पर उन क्षेत्रों के जन-समुदाय के सम्पर्क साधे बिना यह प्रयास न तो आगे बढ़ सकेगा और न आशा के अनुरूप सफल हो सकेगा। बौद्ध परिव्राजकों ने देशों और भाषाओं की सीमा पार करके एशिया ही नहीं अन्य भू-खण्डों में अपने खेमे गाड़े थे और वहाँ उस आलोक से स्थानीय जन-समाज को प्रभावित किया था। पश्चिमी देशों के ईसाई मिशनरी अभी भी संसार के कोने-कोने में पहुँचते और अपने धर्म का प्रकाश अपरिचित क्षेत्रों में फैलाते हैं। अपने पास उसी स्तर के प्राणवान परिव्राजक हों तो ही युग सन्देश का उद्बोधन विश्व-व्यापी बनाया जाना सम्भव हो सकता है।

4- प्रवासी भारतीयों की भाव भरी माँग रहती है कि उनकी सांस्कृतिक निष्ठा बनाये रहने के लिए भारत के धर्मनिष्ठ मार्ग-दर्शकों की महती आवश्यकता है। इसकी पूर्ति उनकी सांस्कृतिक मातृभूमि को करनी चाहिए। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि इस माँग को पूरा करने के लिए आज तक कोई ठोस प्रयास न हो सका। धर्म और योग पर लेक्चर झाड़ कर इन प्रवासियों की धर्म श्रद्धा का दोहन करने वाले लुटेरे तो निरन्तर पहुँचते रहते हैं। और जीभ की कलाबाजी दिखाकर-आश्रमों और संस्थाओं के नाम पर धन बटोर लाते है। मुद्दतों से ही सिलसिला चल रहा है। प्रवासी भारतीय इस स्थिति में खीजे, झल्लाये और निराश बने दीखते हैं। वे स्थायी निवास करने वाले निस्पृह लोकसेवियों और साथी मार्ग-दर्शकों की अपेक्षा करते हैं। लुटेरे सैलानियों बकवासियों के प्रति तो अब उनकी श्रद्धा प्रायः समाप्त जैसी हो चली है वे उनका चोगाचोचला देखते ही वस्तुस्थिति तो ताड़ जाते हैं और उपेक्षा भरा व्यवहार करते हैं। इस स्थिति को बदलने के लिए मात्र प्राणवान परिव्राजक ही समर्थ हो सकते हैं।

यह चार काम तो ऐसे हैं जिन्हें युग-निर्माण मिशन की तात्कालिक आवश्यकता कह सकते हैं। ऐसे तो शाश्वत और सुविस्तृत कार्य, लोक-जागरण का ही है उसके लिए तीर्थयात्रा की टोली, मण्डली बनाकर प्रव्रज्या करने की विधा पूर्वकाल के सन्त ब्राह्मणों की तरह अपनाई ही जानी चाहिए। उसके लिए देश के 8 लाख गाँवों में बसी हुई 60 करोड़ जनता के साथ भाव भरे सम्बन्ध मिलाना और उन्हें उज्ज्वल भविष्य के अनुरूप ढालने के लिए मार्गदर्शन एवं सहयोग देना नितान्त आवश्यक है। यह सनातन धर्म परम्परा तो ऐसी है जिसका पुनर्जीवन-पुनर्गठन किया ही जाना चाहिए। इस पुण्यपरम्परा को प्राणवान बनाने में धर्म धारण के लिए समर्पित परिव्राजकों के अतिरिक्त और कोई कर ही नहीं सकता। इसी में साधु और ब्राह्मण परम्परा का सन्तुलित समन्वय भर है।

‘‘टूटे को बनाना और रूठे को मनाना’’ यह रचनात्मक दूरदर्शिता का तकाजा है। अतीत का गुणगान करते रहने या कोसते रहने से कुछ काम नहीं चलेगा, हमें बिगड़ी को बनाने ओर सोये को जगाने में बिना समय गँवाये जुट जाना पड़ेगा। इस सन्दर्भ में तीर्थयात्रा की प्रव्रज्या में नव-जीवन का संचार करना आवश्यक है। रजत जयन्ती वर्ष में प्रधानतया इसी कार्य को हाथ में लिया गया है और युग-निर्माण परिवार की सभी जागृत आत्माओं का आह्वान किया गया है कि उनमें से जिनकी भी स्थिति प्रव्रज्या अभियान में, जिस भी रूप में सम्मिलित होने की हो, वे उस संदर्भ में पत्र-व्यवहार कर लें और भावी कार्य-पद्धति की सुनिश्चित रूपरेखा बनालें। तदनुरूप मिल-जुलकर काम करना और निश्चित लक्ष्य की दिशा में क्रमबद्ध रूप से बढ़ सकना सम्भव हो सके।

1 सितम्बर से 30 सितम्बर तक एक महीने का प्रव्रज्या प्रशिक्षण सत्र शान्ति-कुंज में चलेगा। जिन्हें इस अभियान में सम्मिलित होने की अपनी योग्यता एवं परिस्थिति दिखाई पड़ती हो वे उस प्रशिक्षण में सम्मिलित होने का आवेदन पत्र भेजें और आने से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करलें। जो मात्र कौतूहलवश ही आना चाहते हैं जिनकी मनःस्थिति या परिस्थिति अनुकूल नहीं है, वे अभी न आवें। इस सन्दर्भ की सामान्य जानकारी के सत्र भी जब कभी चलेंगे तब उन्हें आना चाहिए। अभी तो उन्हीं को बुलाया गया है जो रजत जयंती वर्ष में उत्साहवर्धक समय दान कर सकते हैं। कई आवश्यक प्रयोजनों के लिए जिन्हें अगले ही दिनों बाहर भेजना पड़ेगा। सितम्बर सत्र में तो प्रायः उन्हीं को प्राथमिकता दी जाती है। गत वर्ष वार्षिकोत्सवों में कितने ही समय दानियों ने अपना समय दिया था। इस वर्ष के अधिकांश कार्यक्रम दिवाली से लेकर होली की मध्यावधि में चार महीने तक चलेंगे। जो इस बार फिर गत वर्ष की तरह समय दे सकने की स्थिति में हों उन्हें भी प्रव्रज्या अभियान के अन्तर्गत पुनः आमन्त्रित किया जा रहा है। उन्हें भी सितम्बर सत्र में सम्मिलित होकर नई परिस्थितियों के अनुरूप-नई कार्य पद्धति को क्रियान्वित करने के लिए आवश्यक प्रशिक्षण प्राप्त कर लेना चाहिए।

जो बाहर जाने की स्थिति में नहीं है। अपने घरों पर रहकर समीपवर्ती क्षेत्रों में जन-सम्पर्क बनाने के लिए समय दान देते रहे हैं, देते रहेंगे। उनके लिए झोला पुस्तकालय, चल पुस्तकालय, दीवारों पर वाक्य लेखन, जोड़ीदार के साथ सम्पर्क साधन और शिथिलता को सक्रियता में परिणत करने के प्रयास, नई पत्रिकाओं के नये सदस्य बनाना, विचारगोष्ठियों, जन्मदिवस जैसे कार्यक्रमों में भाग लेकर धर्म प्रचार की पदयात्रा का कोई रूप अपनाकर तीर्थयात्रा उद्देश्य की पूर्ति के लिए कुछ न कुछ करते रहना सम्भव हो सकता है।

सितम्बर सत्र में सम्मिलित होने वाले शिक्षार्थियों के लिए भोजन व्यय जमा करना अनिवार्य नहीं है। जो दे सकेंगे वे ही स्वेच्छा से जमा करेंगे। प्रव्रज्या पर निकलने के समय का भोजन, वस्त्र, मार्ग व्यय आदि का भार मिशन ही वहन करेगा। जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी है वे अपना खर्च भी कर सकेंगे, पर सामान्यतः यही सोचकर चला जा रहा है कि परिव्राजकों का निर्वाह व्यय वहन करने का उत्तरदायित्व मिशन को ही वहन करना है।

रजत जयन्ती वर्ष के कार्यक्रम यों सभी एक से एक बढ़कर महत्वपूर्ण हैं और उन सभी की युग अवतरण के भूमिका में असाधारण उपयोगिता है, पर परिव्राजकों के समर्थ धर्म शृंखला खड़ी कर देना और उसे कार्य क्षेत्र उतार देना तो इतना बड़ा काम है जिसकी तुलना किसी अन्य रचनात्मक कार्य से हो नहीं सकती।

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नास्ति जीवन्ते सनातनाः

श्मशान घाट पर अनेक बार करुणाजनक चीत्कारें सुनी गई हैं, किन्तु यह दृश्य तो इतना हृदय विदारक था कि दर्शकों ने नेत्र छलछलाये बिना नहीं रहते। अभी कुछ ही दिन तो हुए श्रावस्ती के अत्यन्त कुलीन वंश में जन्मी उब्बिरी का कौशल नरेश के साथ पाणिग्रहण हुआ था। उब्बिरी के सौन्दर्य के सम्मुख शची और रती ऐसी ही थीं जैसे पूर्णिमा के चन्द्रमा के समक्ष टिमकते खद्योत। न केवल कौशलपुर अपितु स्वयं अधिपति ने उब्बिरी को पाकर अपने पूर्व जन्मों के पुण्यों को सराहा था। आज वही उब्बिरी श्मशान घाट में जब अम्म जीवे! अम्म जीवे!! ओ जीवन्ती तुम कहाँ हो? ओ जीवन्ती तुम कहाँ हो?? की पुकार के साथ प्रलाप करतीं तो सारे वातावरण में हाहाकार छा जाता, मनुष्य तो मनुष्य जीव-जन्तु और वृक्ष वनस्पति तक उब्बिरी के शोक में डूबे हुए थे। श्मशान घाट करुणा की साक्षात् मूर्ति बना हुआ था। दर्शन की समस्त परिभाषा इस परिवर्तन में ही तो सन्निहित है। नियति अपनी बलवत्ता, परमात्मा अपना अस्तित्व और प्रकृति अपनी महामाया, यदि यह परिवर्तन न होते तो, कैसे अभिव्यक्त कर पाते?

उब्बिरी को अन्तःपुर में आये एक वर्ष ही हुआ था। उनका अपना अनिन्द्य सौन्दर्य, कौशल राज की अनन्त श्री और राज प्रसाद के संस्कार लेकर उनकी कोख से एक कन्या ने जन्म लिया जो अप्रतिम सुन्दर और अद्भुत संस्कारवान थी। उसे पाकर कौशल नरेश फूले न समाये। उन्होंने उब्बिरी को राज महिषी का पद-प्रदान किया। उस दिन जो शोभा यात्रा निकाली गई वैसी प्रजाजन ने पहले कभी नहीं देखी थी। मनुष्य अपने भाग्य पर इतराता है, पर उस महान चक्र को भूल जाता है, जो आज नहीं तो कल आने को मानता नहीं, यही तो जीवन की विडम्बना है। यदि लोग उन विभीषिकाओं का पूर्ण स्मरण रखें तो आधे से अधिक औद्धत्य, अपकर्म और अवांछनीयताएँ मात्र इस मान्यता से ही दूर हो जायें शेष आधी आध्यात्मिक आस्थाओं का प्रकाश दूर कर दे।

बालिका का नाम जीवन्ती रखा गया। बालिका ने अपनी सुन्दरता और चपलता से राज-दम्पत्ति को पूरी तरह मोह लिया। यह आसक्ति कितनी कठिन है कि मनुष्य को क्षणिक जीवन के क्रिया व्यापार में तो लगाये रखती है, पर जीवन के सनातन उद्देश्य आत्म-कल्याण की ओर ध्यान भी नहीं बंटने देती। वह उब्बिरी के साथ भी हुआ। एक वर्ष ही कठिनाई से बीता था एक दिन हँसते-खेलते जीवन्ती ने अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी। राज परिवार शोक-सागर में डूब गया।

अम्म जीवे- जीवन्ती तुम कहा हो अम्म जीवे! जीवन्ती तुम कहा हो! की आर्त्त पुकार श्मशान घाट में गूँजते कई मास बीत गये। राजमहिषी ने अपनी स्मरण शक्ति खो दी, बहुत प्रयत्न करने पर भी वे न तो राज प्रासाद में टिकीं और न कहीं अन्यत्र। शोक विह्वल क्षत-विक्षत देह वे श्मशान में ही पड़ी चिल्लाती रहतीं।

आज तथागत का उधर ही आगमन हुआ है। उन्होंने भी उब्बिरी की दारुण-गाथा सुनीं। वे सीधे श्मशान घाट पहुंचे, उनका अपूर्व तेजस देखते ही राजमहिषी स्तम्भित हो उठीं। तथागत ने उन्हें शान्त करते हुए पूछा- देवी! इस श्मशान में अब तक कितने लोगों का दाह हुआ होगा तुम उनकी संख्या बता सकती हो?

नहीं देव! उब्बिरी ने सिर हिलाया।यदि वह सभी लोग बिछुड़ों हुओं की याद में यों ही रुदन करें तो यह सृष्टि कितने दिन चलेगी?

उब्बिरी मौन थीं।

पुत्री! बिछुड़ तो मनुष्य की आत्मा भी उसी से गई है, पर तुमने कभी उसे पाने के लिए इतना दुःख किया क्या? क्या तुम अपने स्वरूप को पहचानती हो, यहाँ से चले गयी जीवन्ती के आत्म तत्व को तुम ढूंढ़ सकती हो क्या?

नहीं! नहीं!! नहीं!!! देव! मैं नहीं जानती वहाँ तक पहुँचने का मार्ग क्या है?

तो उठो और उस सनातन गरिमा आत्म-तत्व को ढूंढ़ने का प्रयास करो जहां भूत भविष्य और वर्तमान सभी कुछ एकाकार हैं।

उब्बिरी की आंखें खुल गईं, मोह माया का परित्याग कर वे आत्म साधना में निरत हुईं तो पूर्णता प्राप्त करके ही लौटीं।

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करनी कुछ दिखलाओ


करनी कुछ दिखलाओ (kavita)

कागज पर मत आदर्शों के नक्शे अधिक बनाओ। कथनी का युग बीत गया अब करनी कुछ दिखलाओ॥

हर चौराहे पर प्रचार का जमघट इतना घोर है। अर्थ हो गया शून्य, हवा में बस ध्वनियों का शोर है॥

भाषाओं की भाव-भंगिमा अन्तस्तल से दूर है। हर अक्षर बैखरी गिरा कर थककर चकनाचूर है॥

मूर्छित शब्दों को जीवन की संजीवनी पिलाओ। कथनी का युग बीत गया अब करनी कुछ दिखलाओ॥

सूर्य डूबने पर प्रकाश का हुआ खूब गुणगान है। फिर भी कोसों दूर क्षितिज से कल का नया विहान है॥

जी भर कोसा अन्धकार को, किन्तु न बनती बात है। अग्नि-परीक्षाएँ लेकर ही जाती काली रात है॥

दीपक बन जल सको कहीं पर इतना स्नेह जुटाओ। कथनी का युग बीत गया अब करनी कुछ दिखलाओ॥

धर्ममंच को कर्म-पंथ से सदियों का वैराग्य है। बन्द अँगूठी के खाँचे में बिकता सस्ता भाग्य है॥

सुना रहे पिंजरे के पंछी तरह-तरह के मन्त्र हैं। जीवित प्राणी से भी ज्यादा बोल रहे जड़ यन्त्र हैं॥

पग-पग पर दिग्भ्रान्ति गर्त हैं चिन्तन-शकट बचाओ। कथनी का युग बीत गया अब करनी कुछ दिखलाओ॥

छलता रहा सहज श्रद्धा को अब तक वाग्विलास है। पायी प्रगति बुद्धि ने, लेकिन खोया-जन-विश्वास है॥

डूब गयी निष्ठा की नौका उपदेशों की बाढ़ में। छिपकर जा बैठी निष्क्रियता भजन-भक्ति की आड़ में॥

गीता है कंठस्थ समूची, अर्जुन तो उपजाओ। कथनी का युग बीत गया अब करनी कुछ दिखलाओ॥

-डॉ0 हर गोविन्द सिंह

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*समाप्त*