भूत न बने रहें - देवत्व की ओर बढ़ें

लगता है मनुष्य भूत की उपासना में निरत रहकर भूत बन चुका या बनने जा रहा है। पंच तत्वों को पंच भूत कहते हैं। भौतिक पदार्थों को भूत की करतूत तब कहा जाता है। जब उसका उपयोग शरीर निर्वाह से आगे बढ़कर आत्मा के क्षेत्र में प्रवेश करने और स्थान पाने लगते हैं।

शरीर भूतों का बना है और उस इंजन को चलाने के लिए पदार्थों का ईंधन आवश्यक है। किन्तु आत्मा शरीर नहीं है। उसको आहार व पोषण विचारणा और भावना की उत्कृष्टता से मिलता है। शरीर को भूत और चेतना को देव कहते हैं।

कहते हैं कि भूत श्मशान में रहते हैं। उन्हें एकाकी खण्डहरों में रहना पसन्द है। भूतकाल की विसंगतियों में ही उलझे खिन्न-विपन्न बने रहते हैं। वे डरते और डराते हैं। जलते और जलाते हैं। चाहते बहुतों से हैं किन्तु दे किसी को कुछ नहीं पाते। देखना होगा कि यह भूत कल्पना कहीं अपने ऊपर ही तो लागू नहीं होती। कहीं हम स्वयं ही भूतों में निरत रहते, स्वयं ही तो भूत नहीं बन गये हैं।

अपने स्वरूप और लक्ष्य देव हैं। देवों की सम्पदा, विचारणा और भावना की उत्कृष्टता होती है। यह सम्पदा जहाँ भी होगी वहीं स्वर्गीय वातावरण बनेगा। सत्कर्मों में सहायता करने के लिए देव निरन्तर दौड़ते हैं। देना ही उनका स्वभाव और क्रिया-कलाप होता है। वे सम्मान पाते और वरदान देते हैं। अमृत पीते और अमृत पिलाते हैं। आनन्द पाते और उल्लास बिखेरते हैं।

भूत या देव में से हमने जो चुना वह सामने है। यदि चाहें तो स्थिति को बदल भी सकते हैं। भूत योनि से निकल कर देव योनि में प्रवेश करना पूर्णतया अपनी इच्छा और हिम्मत पर निर्भर है।

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यह सच या वह सच

मिथिला पर किसी शत्रु नरेश ने आक्रमण कर दिया है। उसकी अपार सेना ने नगर को घेर लिया है। संग्राम छिड़ गया है। मिथिला की सेनायें शत्रु सेनाओं का डटकर मुकाबला कर रही हैं। परन्तु विजय शत्रु के पक्ष में ही जाती हुई प्रतीत हो रही हैं और यह मिथिला की सेनायें हार भी गयी। ........... महाराज जनक पराजित हुए ................. विजयी शत्रु ने आज्ञा दी- “मैं तुम्हारे प्राण तो नहीं लेता किन्तु तुम्हें आज्ञा देता हूँ कि तुम अपने सभी वस्त्राभूषण उतार दो और इस राज्य से निकल जाओ।”

राजा जनक ने अपने राजकीय वस्त्र और तमाम आभूषण उतार दिये। केवल एक छोटा-सा वस्त्र कटि प्रदेश पर रह गया। जनक पैदल ही राजमहल से निकल पड़े। सोचा किसी नागरिक से प्रश्रय माँगेंगे। परन्तु उनके सड़क पर आने से पूर्व ही यह राजाज्ञा सुनाई दी - निर्वासित जनक को जो भी नागरिक आश्रय या आहार देगा उसे प्राणदण्ड दिया जायेगा।

विवश जनक ने उसी स्थिति में मिथिला प्रदेश की सीमा से बाहर जाने का निश्चय किया। फलतः कई दिनों तक अन्न का एक दाना भी पेट में नहीं गया।

जनक अब राजा नहीं एक भिक्षुक हैं .......... राज्य से बाहर एक अन्य क्षेत्र दिखाई देता है ......... जनक वहाँ पहुँच जाते हैं ................. किन्तु अन्न क्षेत्र के द्वार बन्द हो रहे हैं क्योंकि सारी खाद्य सामग्री बंट चुकी है। जनक बड़ी दीनता से याचना करते हैं और अन्नक्षेत्र का अधिपति थोड़ा-सा बचा हुआ चावल लाकर जनक की फैली हथेलियों पर रख देता है। इस दशा में वही वरदान प्रतीत होता है। उसे मुँह में रखने को हाथ आगे बढ़ाते ही हैं कि न जाने कहाँ से एक चील झपट पड़ती है और सारा चावल धूल में बिखर जाता है।

‘हे भगवान्’ - मारे व्यथा के जनक चीख उठते हैं। और चीख के साथ ही उनकी निद्रा टूट जाती है। स्वप्न टूट जाता है। किन्तु शरीर अभी भी पसीना-पसीना हो रहा है। आसपास सोयी रानियाँ और सेवक भी चीख सुनकर जाग उठे। जनक आँखें फाड़-फाड़ कर अपने चारों ओर देखने लगे सुसज्जित शयन कक्ष, स्वर्ण रत्नों से लदा हुआ पलंग, दुग्ध फेन-सी श्वेत कोमल शैय्या। रानियाँ पास खड़ी हैं और सेवक-सेविकायें भी हतप्रभ से उन्हें देख रही हैं।

स्वप्न का प्रभाव इतना गहन हुआ था कि जो भी सामने आते वे उसी से यह प्रश्न करते- ‘यह सच या वह सच?’ योगिराज अष्टावक्र से भी उन्होंने यही प्रश्न किया।

अष्टावक्र ने योग बल से इस प्रश्न के उद्गम को समझा और पूछा- ‘महाराज ! जब आप कटिप्रदेश में एक वस्त्र लपेटे अन्नक्षेत्र के द्वार पर भिक्षुक के वेश में दोनों हाथ फैलाये खड़े थे और अधिपति ने जब आपकी हथेली पर बचा हुआ चावल रखा था, उस समय यह राजभवन, आपका यह राजवेश, ये रानियाँ, मन्त्री और सेवक-सेविकाओं में कौन आपके पास था?’

जनक ने कहा- उस समय तो इनमें से कोई भी मेरे पास नहीं था भगवन्! उस समय तो विपत्ति का मारा मैं अकेला ही था।

‘और राजन्! जागने पर जब आप इस राजवेश में राजभवन के अन्तःपुर में स्वर्ण रत्नों से निर्मित पलंग पर आसीन थे, तब वह अन्नक्षेत्र उसका वह कर्मचारी वह आपका भिक्षुवेश, वह अवशिष्ट खाद्य क्या था आपके पास?’

‘कुछ भी नहीं महात्मन्! मेरे पास कुछ भी नहीं था।’

परन्तु दोनों अवस्थाओं में आप तो थे न?’ -अष्टावक्र ने फिर पूछा। हाँ कहने पर वे फिर बोले- जो क्षणिक और काल के अधीन है वह सच नहीं हो सकता। न यह सच है, न वह सच था, सब अवस्थायें हैं। परन्तु अवस्थाओं से भी परे जो आत्मतत्व साथी रूप से उन्हें देखता वही सच है। अतः राजन् उसी सत्य को जानना, मानना और ग्रहण करना चाहिए।’ और तभी से जनक अनासक्त भाव से अपने कर्त्तव्यों को पूरा करते हुए आत्मदेव की आराधना में लग गये।

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कुछ है, जो इन्द्रिय चेतना से परे है।

शरीर और मस्तिष्क की शक्तियाँ प्रत्यक्ष और सर्वविदित हैं। शरीर में श्रम और मस्तिष्क में सोचने समझने की, विचार करने की शक्तियों को भी सभी कोई जानते, मानते और विश्वास करते हैं। विज्ञान ने इन शक्तियों को अपनी भाषा में अद्भुत और विलक्षण कहा है तथा इन प्रत्यक्ष शक्तियों को ही देखकर प्रकृति के कौशल को अद्वितीय बताया है। भौतिक विज्ञान इतना ही जानता है, परन्तु वह इस बात को नहीं जान पाया है कि मनुष्य और अन्य प्राणियों में अतीन्द्रिय चेतना भी विद्यमान है। भौतिक शक्तियाँ तो स्थूल नियमों से परिचालित होती हैं। विज्ञान उन नियमों की परिभाषा करने में भी सफल हुआ है, पर अतीन्द्रिय शक्तियाँ जिन सूक्ष्म नियमों के अनुसार काम करती हैं, उनकी व्याख्या कर पाना अभी सम्भव नहीं हो सका है।

हाड़-मांस की बनी काया उन्हीं नियमों का पालन करेगी जो उसके लिए निर्धारित है। इसी प्रकार मस्तिष्क भी उतना ही सोचेगा जो उसने सीखा है। परन्तु सामान्य लौकिक ज्ञान की सीमा से परे कई बार ऐसा कुछ भी देखने को मिलता है, जिससे विदित होता है कि स्थूल शरीर और ज्ञात मस्तिष्क से अलग भी शरीर के भीतर अन्तरंग चेतना में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो शारीरिक मर्यादाओं से प्राप्त न हो सकने वाली जानकारी प्राप्त कर लेती हैं। इस जानकारी का आधार मनुष्य और जीवधारियों में विद्यमान उस चेतना को बताया जाता है, जिसे अतीन्द्रिय कहते हैं। उसे झुठलाया नहीं जा सकता।

यदि भौतिक विज्ञान के अनुसार जीवधारी को जड़ प्रकृति का ही एक स्थूल उत्पादन कहा जाय तो अतीन्द्रिय चेतना का कोई आधार नहीं मिल सकेगा। क्योंकि तब तो प्राणी एक ‘चलता -फिरता वृक्ष’ ही ठहरा और उसकी शारीरिक मानसिक हलचलें शरीर के नियमों से बाहर कैसे जा सकती हैं। लेकिन विज्ञान की यह मान्यता भी ध्वस्त होने लगी है। जार्जिया विज्ञान एकेडमी के शरीर शास्त्री डॉ॰ आई॰ एस॰ बेकेताश्विली ने एक काकेशिया-यीकुत्ते ‘त्स्वाला’ की गतिविधियों और क्रियाकलापों का अध्ययन करने के बाद कहा कि प्राणधारियों में एक ऐसी चेतन सत्ता भी है जो शरीर के नियमों से बँधी हुई नहीं है और वह इन्द्रियों का प्रत्यक्ष सहारा लिए बिना भी काम कर सकती है। ऐसे काम, जो आँख-कान के बिना सम्भव नहीं होते, वे भी उस चेतन सत्ता के द्वारा सम्पन्न हो जाते हैं।

‘त्स्वाला’ की कथा जार्जिया (रूस) निवासियों के घर-घर में प्रचलित है। वह इतना स्वामिभक्त और कर्त्तव्यपरायण था कि लोग उसकी तुलना वफादार घरेलू नौकरों से किया करते थे। त्स्वाला कुत्ता अपने मालिक के जानवरों को चराने प्रायः जंगल में अकेला ही जाया करता था। जानवरों को कहाँ चरना है, कहाँ बैठना है, कहाँ पानी पीना है, कोई जानवर झुण्ड से बाहर निकल कर इधर-उधर बिछुड़ न जाय इस बात का पूरा ध्यान रखता। जिस क्षेत्र में वह अपने मालिक के साथ रहता था उसमें भेड़िये और तेंदुए भेड़-बकरियों की घात लगाये रहते थे। त्स्वाला उनसे जूझने के लिए सदैव मुस्तैद रहता था और जब भी ऐसा अवसर आता था तो वह आक्रमणकारी हिंस्र पशु का डटकर मुकाबला करके या तो उसे भगा देता अथवा मार गिराता।

एक बार किसी दूर के पशु फार्म पर ‘त्स्वाला’ की जरूरत पड़ी। मालिक ने उसे वहाँ भेज दिया। त्स्वाला वहाँ जाने में अड़ियलपने से काम ले रहा था इसलिए उसे एक ट्रक में बन्द कर सैकड़ों मील दूर स्थित उस नये फार्म में ले जाया गया। वहाँ उसे बाँधकर रखा गया लेकिन त्स्वाला का बुरा हाल था। न उसने खाना खाया, न कुछ पिया, केवल रोता रहा और एक दिन मौका देखकर रस्सी तुड़ाकर भाग निकला। यद्यपि उसे आँखें बाँधकर एक ट्रक में डालकर लाया गया था फिर भी उसने अन्तःप्रेरणा के आधार पर दौड़ लगायी और सैकड़ों मील दूर अपने मालिक के पास तिब्लिसी क्षेत्र में आ गया।

कुत्ते ने न रास्ता देखा था न वह मार्ग के चिह्नों को ही पहचानता था फिर किस प्रकार वह इतनी दूर आ गया। डॉ॰ बेकेताश्विली को किसी प्रकार इस घटना का पता चला तो उन्हें लगा कि प्राणधारियों में कोई ऐसी अतीन्द्रिय चेतना भी होती है जिसके सहारे वे प्रधान ज्ञानेन्द्रिय आँख का काम बिना आँख के भी कर लेते हैं। इस घटना से तो स्पष्ट ही यह निष्कर्ष निकलता है। फिर भी इसकी पुष्टि के लिए डॉ॰ बेकेताश्विली ने एक बिल्ली पाली और उसका नाम रखा ‘ल्योबा’।

ल्योबा को नियत समय पर खाना दिया जाता। उसके खाने की तश्तरी कमरे के एक कोने पर दूर रख दी जाती। आँख बाँधकर ल्योबा उस कमरे में छोड़ दी जाती। शुरू में तो उसे गन्ध के आधार पर भोजन तक पहुँचने में कुछ कठिनाई होती। पीछे वह बिना किसी कठिनाई के अपने भोजन तक पहुँच जाती थी।

गन्ध के आधार पर ही वह ऐसा कर रही है। यह बात वैज्ञानिक जानते थे। अतः उन्होंने ल्योबा के अतीन्द्रिय ज्ञान की परीक्षा के लिए तश्तरी में कुछ पत्थर के टुकड़े भी रखे। आँखें बाँध दी गयी थीं और सोचा यह गया था कि गन्ध तो सारे प्लेट में से उठती थी, इसलिए बिल्ली उसमें रखी हुई किसी भी चीज को मुँह मार सकती है। लेकिन देखा गया कि ल्योबा ने बहुत ही सम्हलकर अपना खाना खाया और पत्थर के टुकड़ों को चाटा तक नहीं। इसी प्रकार कुछ दिन में ही वह रास्ते में रखी हुई कुर्सी, सन्दूक आदि को बचाकर इस तरह अपना रास्ता निकालने लगी कि उसमें से किसी के गिरकर टूटने या चोट पहुँचने का डर न रहे। स्मरण रहे इन प्रयोगों में भोजन की तश्तरी अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग कमरों में रखी गयी। बिल्ली सभी स्थानों पर पहुँच जाती।

बेकेताश्विली ने यही प्रयोग ‘जिल्डा’ नामक एक कुत्ते पर और किया। जिल्डा की आँखों पर भी पट्टी बाँध दी जाती और उसे प्रयोगशाला में छोड़ दिया जाता। जिल्डा कुछ ही दिनों में सारी बातें ताड़ गया और बिना किसी वस्तु से टकराये बुलाई गयी, आवाज पर पहुँचने लगा।

इन सब प्रयोगों से एक ही निष्कर्ष प्रतिपादित किया जा सकता है कि प्राणधारियों में विद्यमान चेतन सत्ता इन्द्रियों की दास नहीं है। इन्द्रियाँ तो उसके लिए उपकरण मात्र का काम करती हैं, वह उन पर निर्भर नहीं हैं। सामान्य जीवन में भी देखा जा सकता है कि अन्धे व्यक्ति छड़ी के सहारे नेत्रवालों की ही तरह चलने लगते हैं, लंगड़े या अपंग व्यक्तियों की भुजाएँ और लोगों की अपेक्षा बलिष्ठ होती हैं और वे उनके द्वारा लाठी या बैसाखियों का सहारा बड़ी आसानी से लेकर चल लेते हैं। जन्मजात गूँगे, बहरे व्यक्ति किसी के चेहरे और हाव-भाव को देखकर ही उसके मन्तव्य को समझने लगते हैं। यह सब इस बात का प्रतीक है कि चेतना इन्द्रियों की दास या उन पर आश्रित नहीं है। बल्कि इन्द्रियाँ उसके उपकरण हैं, जिनका अभाव होने पर चेतना ज्ञान के लिए दूसरी वैकल्पिक व्यवस्था भी कर लेती है। अतीन्द्रिय ज्ञान का यही आधार भूत सिद्धान्त है। डॉ॰ बेकेताश्विली ने लिखा है कि - ‘यह क्षमता हर प्राणी में विद्यमान रहती है। किसी में कुछ कम तो किसी में कुछ अधिक। कुछ लोग इस तरह की क्षमताएँ जन्म-जात लेकर आते हैं और कुछ प्रयत्न करके उन्हें जगा या बढ़ा लेते हैं।

अमेरिका के विख्यात मौसम विशेषज्ञ डॉ॰ लागन इस दिशा में वर्षों से परिश्रम कर रहे हैं। उनका कहना है कि भूकम्प से पहले पशु-पक्षियों के व्यवहार में आये परिवर्तनों को सही ढंग से पहचान लिया जाय तो घण्टों नहीं दिनों पहले उससे होने वाले नुकसान से बचाव के प्रयास किये जा सकते हैं।

चीन में भी इस विषय में काफी शोधकार्य हुआ है, क्योंकि वहाँ के कई क्षेत्रों में एक वर्ष में पाँच-पाँच, छः-छः बार भूकम्प आते हैं। इन मौसम विशेषज्ञों ने विधिवत् एक चार्ट तैयार किया है जिसमें यह बताया गया है कि कौन-कौन से पशु पक्षी भूकम्प के समय अपना व्यवहार बदल लेते हैं और उनके व्यवहार में किस प्रकार का परिवर्तन होता है। चार्ट में कहा गया है कि- ‘जब भूकम्प आने की सम्भावना होती है तब गाय, भैंस, घोड़े, भेड़, गधे आदि चौपाये बाड़े में नहीं जाते। बाड़े में जाने के स्थान पर वे उल्टे भागने लगते हैं। एकाध तरह का चौपाया तो कभी भी ऐसा कर सकता है, परन्तु जब अधिकांश या सभी चौपाये बाहर भागने लगे तो भूकम्प की सम्भावना रहती है। उस समय चूहे और साँप भी अपना बिल छोड़कर भागने लगते हैं, सहमे हुए कबूतर निरन्तर आकाश में उड़ाने भरने लगते हैं और वापिस अपने घोंसलों में नहीं जाते। मछलियाँ भयभीत हो जाती हैं तथा पानी की ऊपरी सतह पर तैरने लगती हैं। खरगोश अपने कान खड़े कर लेते हैं और अकारण उछलने कूदने लगते हैं।

जापान भी भूकम्पों का देश है और वहाँ किये गये परीक्षणों तथा अध्ययन में भी पशु-पक्षियों के व्यवहार में इसी प्रकार के परिवर्तन नोट किये गये। अमेरिका, इटली तथा ग्वाटेमाला के वैज्ञानिक भी इन परिवर्तनों की पुष्टि करते हैं। उनका कहना है कि भूकम्प आने के पहले पृथ्वी का चुम्बकीय आकर्षण वायु-मण्डल को प्रभावित करने लगता है। हवाओं की गति और तापमान में अन्तर आ जाता है। धरती और आकाश के बीच का दबाव बढ़ जाता है। ये परिवर्तन बहुत सूक्ष्म होते हैं जिन्हें पशु-पक्षी ही पहचान पाते हैं तथा वे अपनी सुरक्षा की व्यवस्था करने लगते हैं।

यह तो सच है कि बहुत सूक्ष्म परिवर्तन स्थूल परिवर्तनों का बोध इन्द्रियों के माध्यम से नहीं होता या सूक्ष्म तरंगें इन्द्रियों की पकड़ में नहीं आतीं उन्हें इन्द्रियाँ पहचानने में असमर्थ होती हैं। इसीलिए जिन व्यक्तियों को इनका आभास होता है वे अतीन्द्रिय सामर्थ्य से सम्पन्न कहे जाते हैं। पशु-पक्षियों में यह सामर्थ्य मनुष्यों की तुलना में अधिक बढ़ी-चढ़ी रहती हैं, क्योंकि वे प्रकृति के समीप रहते हैं, प्राकृतिक जीवन जीते हैं और मनुष्यों की तुलना में कम बुद्धिमान हैं। सम्भवतः इसी कारण प्रकृति ने अपने इन नन्हे लाडलों को यह विशेष सामर्थ्य दी है, जो भी हो, यह तो मानना ही पड़ेगा कि कुछ है जो इन्द्रिय चेतना से परे, अतीन्द्रिय सामर्थ्य से सम्पन्न है।

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जीवन की पहेलियाँ और विचित्रतायें

आयरलैण्ड के कुक हैवेन शहर में एक ही मकान में रहने वाले दो परिवारों में कुछ मिनटों के अन्तर से दो पुत्र हुए। एक दंपत्ति ने अपने बच्चे का नाम एलेनर ग्रेडी रखा, दूसरे ने अपने बच्चे का नाम पैट्रिक रखा। दोनों बच्चे धीरे-धीरे अपने जीवन के स्वाभाविक विकास क्रम की ओर चल पड़े।

पैट्रिक और एलेनर दोनों अलग-अलग खेलते, अलग-अलग रहते। किन्तु एक दिन रोते-रोते घर पहुँचे, दोनों के दाहिने पैर पर एक ही स्थान पर चोट लगी थी। माता-पिता ने पट्टी कर दी, कोई ध्यान नहीं दिया। दोनों बच्चे पढ़ रहे थे तब कई बार ऐसा हुआ कि यदि परीक्षा में पैट्रिक को 300 अंक मिले तो दूसरे स्कूल में पढ़ रहे ग्रेडी को भी उतने ही अंक मिले। जिस दिन एलेनर के विवाह सम्बन्ध की बात चली ठीक उसी दिन पैट्रिक की भी और संयोग की बात यह कि दोनों का विवाह एक ही दिन हुआ। दोनों की शादी एक ही दिन तय हुई और पहला बच्चा भी एक ही दिन हुआ।

बचपन में एक ही मकान में रहे एलेनर और पैट्रिक बड़े होने पर आपस में मिले तब उन्होंने इन समानताओं पर ध्यान दिया और अन्तिम समय भी वे समानता की एक और मिसाल छोड़ गये कि दोनों व्यक्तियों की मृत्यु भी एक दिन एक ही समय पर हुई। उस समय दोनों अपने-अपने खेत में काम कर रहे थे।

यह घटना जीवन की विचित्र रहस्यमयता तो प्रतिपादित करती ही है, यह भी बताती है कि मनुष्य का अस्तित्व शरीर तक ही सीमित नहीं है। बल्कि उसकी मूल सत्ता शरीर से बहुत सूक्ष्म और स्थूल नियमों से परे है। मनीषियों ने उस सूक्ष्म सत्ता को आत्म तत्व जीवन-सत्ता का नाम दिया है और कहा है कि वह काय-कलेवर तक ही सीमित नहीं रहती बल्कि विकसित हो कर विश्व ब्रह्माण्ड की विराट् चेतना से भी जा जुड़ती है।

पैट्रिक और ‘एलिनेर’ के जीवन की समानता से भी अधिक विचित्र समानतायें थीं इटली के सम्राट डम्बर्टों प्रथम तथा वहीं के एक होटल मालिक में। उस होटल मालिक को तो सम्राट का प्रतिरूप ही कहा जाता था। दोनों की सूरत शक्ल और चेहरे मोहरे इस प्रकार मिलते थे कि डम्बर्टों तथा होटल मालिक को एक समान कपड़े पहना कर खड़ा कर दिया जाये तो उनकी पत्नियों के लिए भी पहचानना असम्भव हो कि कौन हमारा पति है। सूरत शक्ल से ही नहीं नाम भी दोनों का एक ही था। पाठक किसी भ्रम में न पड़ जायें इसीलिए यहाँ एक को डम्बर्टों प्रथम तथा दूसरे डम्बर्टों को होटल मालिक कहा जा रहा था।

ये घटनायें सिद्ध करती हैं कि सूक्ष्म चेतना की सत्ता स्थूल सत्ता से महान है और वह मनुष्य को किसी उद्देश्य से इस पृथ्वी पर भेजती है। अपने स्वरूप को भुलाने पर वह इन संकेतों से समझाती भी है।

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चेतना की निस्सीमता को समझें और साधें।

नेपोलियन बोनापार्ट को अपनी माँ से गहरा प्यार था। जिस समय उसकी मृत्यु हुई, उसकी माँ उससे सैकड़ों मील दूर थी। वह फ्रांस में था, माँ रोम में। उस दिन माँ ने देखा - नेपोलियन सहसा आया है। पैर छूकर कह रहा है कि “माँ! अभी ही तो मुझे झंझटों से फुरसत मिल पाई।” थोड़ी देर बाद वह अन्तर्धान हो गया। बाद में पता चला कि उसका उसी दिन उसी समय निधन हुआ था।

प्रख्यात कवि बायरन ने भी एक ऐसे ही अनुभव का विवरण लिखा है। एक फौजी कप्तान ने रेल-यात्रा में रात को सहसा नींद उचटने पर अपने छोटे भाई को पायताने बैठे देखा। वह भाई वेस्टइंडीज में नियुक्त था। कप्तान ने समझा कि कहीं वे स्वप्न तो नहीं देख रहे हैं। उन्होंने अपने जगे होने की आश्वस्ति के लिए हाथ बढ़ाकर भाई को छूना चाहा। उनके हाथ में उसका कोट छू गया तो लगा कि वह कोट पानी से तर है। तभी वह भाई अदृश्य हो गया। बाद में तीसरे दिन खबर मिली कि उसकी उसी दिन उसी समय समुद्र में डूब जाने से मृत्यु हुई थी जब वह वहाँ दिखा था।

परामनोवैज्ञानिकों को अपने अनुसंधानों के दौरान ऐसे अनेक साक्ष्य मिले हैं जिनसे यह पता चलता है कि मृत व्यक्ति सैंकड़ों-हजारों मील दूर स्थित अपने आत्मीयों के पास मृत्यु के तत्काल बाद देखा गया। कई बार व्यक्ति नहीं दिखाई देता उसकी आवाज सुनाई पड़ती है।

इंग्लैंड के चार्ल्स मैथ्यूज समुद्री जहाज सेवा में कर्मचारी थे। एक रात वे ड्यूटी पर गये। उसके कुछ घंटे बाद उनकी पत्नी और उनकी पड़ोसिन दोनों को चार्ल्स की आवाज सुनाई पड़ी। पड़ोसिन ने सुना कि चार्ल्स उससे कह रहे हैं कि इसका यानी उनकी पत्नी का ध्यान रखना। पत्नी को लगा कि वे उसे पुकार रहे हैं। हुआ यह था कि उस रात जहाज डूब गया था और उसी के साथ श्री मैथ्यूज भी।

इससे सर्वथा भिन्न एक अन्य घटना है। कैलीफोर्निया के एक पुलिस अधिकारी को एक बार उसके कुछ ही दिनों पूर्व मृत तक मित्र की छाया देखी। इस छाया ने उससे कहा कि तुम तुरन्त मैक्डॉनल्ड एवेन्यू पहुँचो। वहाँ स्ट्रीम लाइनर से एक ट्रक टकराकर उलट गया है और उसके ड्राइवर की छाती चकनाचूर हो गयी है। पुलिस अधिकारी वहाँ पहुँचा। तब तक वहाँ वैसा कुछ भी घटित न हुआ था। उसे लगा कि मैंने दिवास्वप्न देखा है। वह लौटने को था। तभी वही घटना घटी। स्ट्रीम लाइनर से सामने से आ रहा ट्रक टकराया और ड्राइवर की छाती छलनी हो गई।

इस तरह के प्रमाणों से यह पता चलता है कि मानवीय चेतना जब तक शरीर से ही तादात्म्य अनुभव करती रहती है तब तक तो वह सीमाबद्ध रहती है। पर शरीर से निकलते ही वह सर्वव्यापी हो जाती है। उसकी संचरण और सम्प्रेषण क्षमता फिर निबंध हो जाती है। वह कहीं भी आ जा सकती है। यद्यपि अपने संस्कारों के कारण वह सर्वप्रथम अपने आत्मीय के पास पहुँचती है।

कई बार वह आत्मीय के पास न पहुँचकर सर्वप्रथम वहाँ पहुँचती है जहाँ उसका मृत्यु के तत्काल पूर्व ध्यान जाता है। पूना के एक बड़े वकील को एक बार देर रात में दफ्तर बंद करते समय एक परिचित व्यक्ति दरवाजे पर दिखा। उन्होंने उसके आने का कारण पूछते हुए अंदर आने को कहा। तभी वह अदृश्य हो गया। वे चकरा गये। इसके बाद बिस्तर पर जाकर लेट गये। दो-तीन घंटे बाद उस व्यक्ति के रिश्तेदारों ने दरवाजा खटखटाया। वकील साहब बाहर निकले। तब उन्हें बताया गया कि उस व्यक्ति के घर कुछ लोग गये थे। उन्होंने कहा कि आपको अभी ही वकील साहब ने बुलाया है। नगरपालिका के चुनाव के बारे में कोई खास चर्चा करनी है। सुबह वे जरूरी काम से बम्बई चल देंगे। वहाँ वकील साहब के घर और लोग भी हैं, आपसे भी चर्चा करनी है। वह व्यक्ति चल दिया और अभी तक नहीं लौटा। इसी से वे सब ढूंढ़ने आये थे। लोगों ने समझ लिया कि छल किया गया है। प्रातः पता चला कि रात को उन लोगों ने उसकी हत्या कर दी। इससे यह स्पष्ट हुआ कि मृत व्यक्ति को वकील साहब का नाम लगाकर बुलाया गया था, अतः उसके चित्त में यह बात थी और मृत्यु के तत्काल बाद उसकी आत्मा वहाँ पहुँची थी।

लेखिका शेला आस्ट्रेन्डर को एक बार उनकी एक सहेली मृत्यु तत्काल बाद दिखी। वह सहेली कई मील दूर दूसरे शहर में उसी समय मरी थी। मृत्यु की खबर दूसरे दिन मिली।

इससे चेतना की निस्सीमता का परिचय मिलता है। ऐसा नहीं है कि मृत्यु के उपरान्त ही, मानवीय चेतना इस प्रकार निर्बन्ध होती है। वरन् यदि संकीर्णता के मानसिक बन्धन दूर कर दिये जायें, तो जीवित अवस्था में भी चेतना की इन शक्तियों का अनुभव किया जा सकता है और लाभ उठाया जा सकता है।

अनेक सिद्ध पुरुष अपने दूरस्थ शिष्यों को अपनी सूक्ष्मसत्ता से प्रत्यक्ष मदद पहुँचाते हैं। प्रसिद्ध आर्यसमाजी सन्त स्व0 श्री आनन्द स्वामी के पुत्र लेखक पत्रकार श्री रणजीत ने कुछ समय पहले अपने संस्मरण-लेख में यह बताया था कि किस प्रकार उनके पिता ने उन दिनों, जबकि वे जीवित थे और भारत में थे तथा श्री रणजीत विदेश में प्रवास पर थे, एक बार भयानक खड्ड में गिर पड़ने से चेतावनी देकर उन्हें रोका था। अन्य कई अवसरों पर भी उनकी मदद व मार्गदर्शन का कार्य उनके पिता ने किया था। जबकि वे उस समय उनसे सैकड़ों मील दूर हुआ करते थे।

ये घटनायें विरल या अपवाद नहीं हैं। ऐसे लोगों की कमी नहीं, जो दूरस्थ परिजनों की तीव्र संवेदना से, याद करने पर, उनके पास आभास रूप में देखे जाते हैं। ऐसे भी लोग हैं, जो भावाकुल होकर जब किसी प्रियजन का स्मरण करते हैं, तो वह उन्हें अपने सामने उस स्थिति में दिखता है, जिसमें वह उस समय होता है। बाद में पत्र मिलने पर या प्रत्यक्ष भेंट होने पर इस तथ्य की पुष्टि होती है। विशेषकर नारियों को दूराभास और दूरानुभूति प्रायः होती रहती है।

परामनोविज्ञानी हैराल्ड ने ऐसे अनेक वृत्तांतों का संकलन किया है, जिनमें महिलाओं को दूरस्थ भाई या पति की बीमारी, या मृत्यु का आभास हुआ और वह सत्य निकला। मनःशास्त्री हेनब्रुक ने भी यही कहा है कि यों, ये क्षमताएँ होती मनुष्य मात्र में हैं। नारियों में सौम्यता, मृदुता और सहृदयता के आधिक्य के कारण यह सामर्थ्य अधिक विकसित पायी जाती है।

बीज रूप में यह सामर्थ्य प्रत्येक व्यक्ति में सन्निहित है। आवश्यकता है, मन को संकीर्ण सीमाओं के बन्धनों से मुक्त करने की। ऐसा करने पर पानी में तेल की बूँद की तरह प्रत्येक व्यक्ति की अनुभव संवेदना का क्षेत्र दूर तक फैल जाता है। सामान्यतः अपने शरीर और मन की दीवालों से टकरा-टकराकर ही व्यष्टि-चेतना की तरंगें लौटती रहती हैं। तथा सीमित क्षेत्र में ही हिलोरें लेती रहती हैं। परन्तु यदि अनुभूति और संवेदना के स्तरों पर ये दीवालें हटा दी जायें, तो अनन्त चेतना- समुद्र से उन लहरों का संपर्क हो जाता है। दूरानुभूति, दूर श्रवण, दूरदर्शन जैसी सिद्धियाँ इसी स्थिति का स्वाभाविक परिणाम होती हैं।


Quotation

अश्वः शस्त्रं शास्त्रं वीणा, वाणी, नरश्च नारी च।

पुरुषविशेषं प्राप्ता भवन्त्ययोग्याश्च योग्याश्च॥

अर्थात्- घोड़ा हो, शस्त्र हो या शास्त्र हो वीणा हो अथवा वाणी हो, नर हो अथवा नारी हो, ये सभी व्यक्ति विशेष को प्राप्त होने पर (उस व्यक्ति के अपने गुण-स्वभाव-सामर्थ्य-प्रवृत्ति के अनुसार) योग्य या अयोग्य बन जाते हैं।

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आत्मा न स्त्री है, न पुरुष

संस्कृत में आत्मन शब्द नपुंसक लिंग है। इसका कारण यही है कि आत्मा वस्तुतः लिंगातीत होती है। वह न स्त्री है, न पुरुष।

तब स्त्री या पुरुष रूप में जन्म लेने का आधार क्या है? इस अंतर का आधार जीव से जुड़ी मान्यताएं ही हैं। जीव-चेतना भीतर से जैसी इच्छा करती है, वैसे संस्कार उसमें गहरे हो जाते हैं। अपने प्रति जो मान्यता दृढ़ हो जाती है, वही व्यक्तित्व रूप में प्रतिपादित होती है। ये मान्यताएं स्थिर नहीं रहतीं। तो भी सामान्यतः इनमें एक दिशाधारा का सातत्य रहता है। किसी विशेष अनुभव की प्रतिक्रिया से मान्यताओं में आकस्मिक परिवर्तन भी आ सकता है। या फिर सामान्य क्रम में धीरे-धीरे क्रमिक परिवर्तन भी होता रह सकता है।

यह मान्यता अन्तःकरण से सम्बन्धित होती है। अन्तःकरण के चार अंश हैं- मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। अहंकार का अर्थ है वह अस्मिता भाव जिसके सहारे व्यक्ति सत्ता का समष्टि सत्ता से पार्थक्य टिका है। जब अहं-भाव का सम्पूर्ण नाश हो जाता है, तो समुद्र में बूँद की तरह व्यष्टि का समष्टि में लय हो जाता है। उसकी स्वतंत्र सत्ता नहीं रह जाती। स्वतंत्र सत्ता अहं-भाव पर ही अवस्थित है। इसी अहं-भाव में जो मान्यताएं अंकित संचित हो जाती हैं, वे ही व्यक्तित्व की विशेषताओं का आधार बनती हैं। इन विशेषताओं में लिंग-निर्धारण भी सम्मिलित हैं। जीवात्मा पुरुष रूप धारण करेगी या स्त्री रूप यह इसी अहं-भाव की मान्यता पर निर्भर है। उसमें जैसी इच्छा उमड़ेगी जैसी मान्यताएं जड़ जमा लेंगी, वैसा ही लिंग निर्धारण भी होगा। आधुनिक मनोवैज्ञानिक शब्दावली में अहंकार की अचेतन की अति गहन परत कह सकते हैं। इससे ही ‘ईगो’ और “सुपर ईगो” का स्वरूप निर्धारित होता है।

‘ईगो’ के स्वरूप में रोज-रोज आमूल-चूल परिवर्तन असम्भव है। मान्यताएं आस्थाएं बहुत गहरी जड़ें जमाये रहा करती हैं। उनमें आये दिन ऐसी फेर-बदल नहीं हो सकती कि पूरा ढाँचा ही बदल जाये। परन्तु जब भी मान्यताएं बदलती हैं तो उनका प्रभाव स्वाभाविक ही बहुत गहरा और दूरगामी होता है। बाल्मिकि, अजामिल, अम्बपाली ने अपने बारे में मान्यता बदली तो उनका व्यक्तित्व ही बदलता चला गया। जिस स्तर तक मान्यताएं परिवर्तित होती हैं, उसी स्तर तक व्यक्तित्व में हेरफेर होता। लिंग परिवर्तन भी ऐसे ही गहरे हेर-फेर से सम्भव है। जब कोई आत्मा अपने वर्तमान लिंग के प्रति गहराई से असन्तुष्ट होती है या जब उसकी मूलभूत प्रवृत्तियों की दिशा ही बदल जाती है, तो लिंग परिवर्तन समेत व्यक्तित्व में अनेक परिवर्तन हो सकते हैं। ऐसे परिवर्तन से इस जन्म की नारी अगले जन्म में पुरुष और इस जीवन का पुरुष अगले जीवन में नारी बन सकता है। कीड़े-मकोड़े जिस परिवेश में रहते हैं, उसका प्रभाव उनकी त्वचा के रंग तक पर पड़ता है। हरे पेड़ में रहने पर हरापन बढ़ जाता है, काले या भूरे वृक्षों, वनस्पतियों के बीच उनकी त्वचा का रंग भी वैसा ही हो चलता है। आत्मा भी मान्यताओं के जिस परिवेश में रहती हैं उसका उसके नर या नारी होने पर भी प्रभाव पड़ता है। चीते के शरीर पर घास के प्रभाव से पड़ जाने वाली भूरी-चितकबरी लकीरों-पट्टियों की तरह मान्यताओं और अनुभूतियों का प्रभाव आत्मपटल पर पड़ता रहता है।

व्यक्तित्व में जो प्रवृत्तियाँ प्रधान हो जाती हैं, जीवात्मा का वही लिंग बन जाता है। नारी-प्रवृत्तियों की प्रधानता से कोई लड़का अगले जन्म में लड़की बन सकता है, पुरुष प्रवृत्तियों का प्राधान्य किसी लड़की के अगले जीवन में लड़का बनने का कारण बन सकता है। यों सामान्य क्रम में भी हर व्यक्ति में दोनों ही लिंगों सम्बन्धी कुछ प्रवृत्तियाँ विद्यमान रहती हैं, किन्तु प्रधानता किसी एक की रहती है। ऐसे पुरुषों की कमी नहीं जो पूरी तरह पुरुष होते हुए भी करुणा ‘वात्सल्य’ ममता, मातृ-हृदय की कोमलता से सम्पन्न हों। ऐसी नारियाँ भी कम नहीं, जो नारी की समस्त विशेषताओं के साथ आक्रामकता, लड़ाकूपन जैसी पुरुष-प्रवृत्तियों से भी भरपूर हों।

जब तक ये विशेषताएं सीमित रहती हैं, प्रधानता अपने ही लिंग स्वभाव की बनी रहती है तब तक तो ये व्यक्तित्व के गुण और क्षमताएं ही बनी रहती हैं। इनकी असामान्य वृद्धि होने लगती है, तब वे चर्चा का विषय बन जाती हैं। किसी पुरुष में स्त्री सुलभ वृत्तियाँ अधिक हो जाने पर उसे स्त्रैण कहा जाता है। नारी में पुरुष प्रवृत्ति को प्रधानता दिखने पर इसे मर्दानी कहते हैं। जब बात और आगे बढ़ती है तो दोनों को ही जनखा, हिजड़ा कहा जाता है। यह मनोवृत्तियों के परिवर्तन का परिणाम हैं।

जब यह परिवर्तन मनोवृत्तियों से भी अधिक गहराई तक में होता है, संस्कार और मान्यताएं उलट-पुलट जाती हैं तब पूरा ढाँचा ही बदल जाता है तथा लिंग परिवर्तन हो जाता है।

ब्राजीलवासी श्रीमती इडा लारेन्स 12 बच्चों की माँ बन चुकी थी और अब सन्तान प्रजनन की सम्भावना क्षीण ही हो गई थी। तभी उन्हें “सेयान्स” में उनकी मृत पुत्री इमीलिया ने सन्देश दिया कि मैं पुनः तुम्हारे गर्भ से ही जन्म लेना चाहती हूँ किन्तु इस बार पुत्र रूप में।

अपने सन्देश के कुछ ही दिनों बाद उसने अपनी पूर्व की माँ श्रीमती लारेन्स के गर्भ में प्रवेश किया। यथासमय वह पुत्र रूप में पैदा हुई। माँ-बाप ने उसका पोलो नाम रखा। इस लड़के पोलो ने अनेक प्रवृत्तियाँ अब भी इमीलिया जैसी थीं। लड़का हो जाने पर भी उसके व्यक्तित्व में अनेक नारी सुलभ विशेषताएं विद्यमान थीं। किन्तु था वह पूरी तरह लड़का ही।

श्रीलंका की एक दो वर्षीया लड़की ने बताया कि पूर्वजन्म में वह लड़का थी परामनोवैज्ञानिकों ने उसके बारे में सुना तो संपर्क किया और खोजें की। उसके बताये हुए पूर्वजन्म-सम्बन्धों विवरण प्रामाणिक पाये गये। अपने पूर्वजन्म में ‘तिलकरत्न’ नामक लड़का होने की बात उसने बताई थी। उस लड़के की जो-जो प्रवृत्तियाँ गतिविधियाँ बताई छानबीन पर उनकी पुष्टि हो गई। पता यह चला कि तिलकरत्न में नारी सुलभ विशेषताएं उस जीवन में ही विद्यमान थीं।

यों, विज्ञान का हर विद्यार्थी जानता है कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर उभयलिंगों का अस्तित्व विद्यमान रहता है। नारी के भीतर एक नर सत्ता भी होती है, जिसे ऐनिमस कहते हैं। इसी प्रकार हर नर के भीतर नारी की सूक्ष्म सत्ता विद्यमान होती है, जिसे ऐनिमा कहते हैं। प्रजनन अंगों के गह्वर में विपरीत लिंग का अस्तित्व भी होता है। नारी के स्तन विकसित रहते हैं, परन्तु नर में भी उनका अस्तित्व होता है।

कभी-कभी किसी व्यक्ति के भीतर छिपा यह विपरीत लिंगी व्यक्तित्व प्रबल हो उठता है। ऐसी स्थिति में कुछ शल्य-क्रियाएं किये जाने पर परिवर्तित लिंग वाला व्यक्तित्व पूरी तरह उभर आता है। उसमें कोई भी असामान्यता नहीं शेष रहती।

एरिका खिलाड़ी थी। साहस उसमें भरपूर था। उसने विचार किया कि इस स्थिति में लड़की ही बने रहने पर जीवन में अनेक कठिनाइयाँ आयेंगी। एक कठिनाई तो सामने ही थी। उसे यह कह कर प्रतियोगिता में भाग लेने से रोक दिया गया कि डाक्टरी रिपोर्ट के नतीजों के आधार पर अब तुम्हें लड़कियों वाली प्रतियोगिताओं में सम्मिलित होने के अयोग्य ठहरा दिया गया है।

अपने देश में सोलन शहर के निवासी जियालाल सुनार की तीसरी लड़की सुनीता के चार वर्ष की उम्र में आपरेशन के उपरान्त पुरुष बन जाने की घटना ताजी है। सितम्बर 78 के प्रारम्भ में उसका आपरेशन छः डाक्टरों ने किया। यह लड़की 4 वर्ष की थी। डाक्टरों ने देखा कि उसके मूत्रमार्ग को पुरुषों के मूत्रमार्ग में बदलना एक आपरेशन द्वारा सम्भव है। दूसरे सभी लक्षण उसमें पुरुषों के ही विद्यमान थे। आपरेशन के बाद सुनीता लड़का हो गई।

स्पष्ट है कि आत्मा का कोई लिंग नहीं होता। एक ही जीवात्मा अपने संस्कारों और इच्छा के अनुसार पुरुष या नारी, किसी भी रूप में वैसी ही कुशलता से जीवन जी सकता है। नर-नारी के भेद, प्रवृत्तियों की प्रधानता के परिणाम स्वरूप शरीर मन में हुए परिवर्तनों के भेद हैं। उनमें से कोई भी रूप अधिक श्रेष्ठ या निकृष्ट नहीं। अपने व्यक्तित्व के वजन यानी गुण क्षमताओं विशिष्टताओं के आधार पर ही कोई व्यक्ति उत्कृष्ट या निकृष्ट कहा जा सकता है। लिंग के आधार पर नहीं। व्यक्तित्व का कोई लिंग नहीं होता। उसकी प्रवृत्तियाँ और प्रकृति हुआ करती है। जो अन्तःकरण की मान्यताओं संस्कारों का ही परिणाम होती हैं और जिनमें यथेच्छ परिवर्तन भी सम्भव है।


भारत पर आक्रमण कर दिया (kahani)

पाकिस्तान ने भारत पर आक्रमण कर दिया। न चाहते हुए भी युद्ध की विभीषिका भीषण रूप से फैल गई। अवकाश पर गये सैनिक वापस बुला लिए गये। इनमें भारतीय सेना के ऑफिसर मेजर आशाराम त्यागी भी थे। माँ को प्रणाम कर जब वे युद्ध भूमि के लिए प्रस्थान करने लगे तो माँ ने आशीर्वाद देते हुए कहा- “बेटे! इस समय राष्ट्र रक्षा सर्वोपरि कर्त्तव्य है। जाओ और इस कर्त्तव्य का दृढ़ता से पालन करो। याद रहे अपनी परम्परा सीने पर गोली खाने की है पीठ पर नहीं।

इच्छोगिल नहर का मोर्चा भारतीय सेना के लिए अमेद्य दीवार बन रहा था। इस दीवार को तोड़ने का दायित्व मेजर त्यागी को सौंपा गया। मृत्यु की चिन्ता किये बिना त्यागी मोर्चे पर आगे बढ़े। गोलियों की सनसनाहट और टैंकों की गड़गड़ाहट के बीच मेजर त्यागी टैंकों को ध्वस्त करते आगे बढ़ रहे थे तभी एक साथ कई गोलियाँ पेट, हाथ और गर्दन पर लगीं किन्तु वे हतोत्साहित न हुये माँ का आशीर्वाद ज्वलंत प्रेरणा दे रहा था। इच्छोगिल फतह करीब थी सो वे फिर दुगुने उत्साह से आगे बढ़कर प्रहार करने लगे।

इसी बीच उन्हें पीछे हटने का हुक्म मिला पर उन्होंने समाप्तप्राय मोर्चे को जीवन देना उचित न समझा कदम रुके नहीं गोलियाँ की बौछार हो रही थी, पर उन्होंने शेष बचे टैंक ध्वस्त कर ही दम लिया, पर अब तक उनका सीना पूरी तरह छलनी हो चुका था।

घायल अवस्था में उन्हें अमृतसर सैनिक अस्पताल लाया गया। बुझते हुए चिराग से अधिकारियों ने पूछा - तुम्हारी कोई अन्तिम इच्छा है ? इस पर त्यागी ने कहा - “मेरी माँ तक संदेश पहुँचा देना, तुम्हारे बेटे ने गोलियाँ सीने पर ही खाई हैं पीठ पर नहीं।” दीपक बुझ गया पर उसका प्रकाश अनंत तक बुझने वाला नहीं।

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श्रद्धा सत्यमाप्यते

जीवन को किसी निर्दिष्ट ढाँचे में ढाल देने वाली सबसे प्रबल एवं उच्चस्तरीय शक्ति श्रद्धा है। यह अन्तःकरण की दिव्यभूमि में उत्पन्न होकर समस्त जीवन को हरियाली से सजा देती है। श्रद्धा का अर्थ है- श्रेष्ठता के प्रति अटूट आस्था। यह आस्था जब सिद्धान्त एवं व्यवहार में उतरती है तो उसे निष्ठा कहते हैं। यही जब आत्मा के स्वरूप जीवन दर्शन एवं ईश्वर भक्ति के क्षेत्र में प्रवेश करती है तो श्रद्धा कहलाती है।

आत्म कल्याण चाहने वाले और ईश्वर प्राप्ति के विभिन्न प्रयासों के लिए इस शक्ति का उभार एवं अवलम्बन आवश्यक है। इसके बिना उस महान लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता। अपने अन्तरात्मा में बैठे हुए परमात्मा को देखने, उसे प्राप्त करने का उपाय बताते हुए मनीषियों ने इसी श्रद्धा की गरिमा को प्रस्तुत किया है। रामचरित मानस में श्रद्धा को भवानी और विश्वास को शंकर बताया गया है। इन्हीं दोनों की सहायता से भगवान को प्राप्त किया जा सकता है।

श्रद्धा के अभिसिंचन से पत्थर में देवता का उदय किया जा सकता है। हिन्दू संस्कृति में प्रतिभा प्रतिष्ठापित करने तथा उनका पूजा उपासना करने का दर्शन इसी श्रद्धा तत्व पर आधारित है। अपने इष्ट के प्रति अटूट श्रद्धा आरोपित करके ही उपासक, उसके साथ अनन्य एकता स्थापित कर लेते हैं। ईश्वर, कर्मफल, जीवनोद्देश्य कर्तव्यपालन, आत्मा की गरिमा जैसे सत्य तथ्यों पर सघन श्रद्धा रखने वाले लोग ही सामान्य जीवन से उठकर महामानवों, देवदूतों की पंक्ति में बैठ सके हैं।

आध्यात्मिक क्षेत्र की उच्चस्तरीय साधनाओं में श्रद्धा की ही अपरिमेय शक्ति काम करती है। श्रद्धाहीन कर्मकाण्ड तो सामान्य अंग संचालन के व्यायाम के समान ही लाभप्रद हो सकते हैं। किन्तु वे ही श्रद्धा और विश्वास के आधार पर साधना के लक्ष्य प्राप्ति में सिद्धिदायक सिद्ध होते हैं। श्रद्धा भावना न केवल उपासनात्मक क्षेत्र में वरन् जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण तथा उद्देश्य को भी प्रभावित करती है।

जिन लोगों को आस्था मानवीय जीवन की श्रेष्ठता तथा महानता में नहीं होती वे इसे पशुवत् पेट भरने एवं प्रजनन के सुखों तक ही सीमित रखते हैं। उनकी यह अनास्था मानवीय समाज के प्रति अविश्वास ही उत्पन्न करती है।

आस्थाओं की कमी के कारण ही अगणित समस्याएं तथा विविध-विविधा उलझनें खड़ी होतीं और समाज व्यवस्था को विचलित करती हैं। आदर्शों और मर्यादाओं की उपेक्षा होने से ही व्यक्तिगत जीवन में दुष्टता, उद्दण्डता और सामाजिक जीवन में भ्रष्टता अनैतिकता अव्यवस्था पनपती जा रही है। इस विकट परिस्थिति में समाज में रहने वाला हर व्यक्ति स्वयं को विपन्न तथा असुरक्षित पाता है। साधनाओं की विपुल मात्रा और सुखोपभोग के कुबेर जैसे भण्डार भी उसे तृप्त नहीं कर सकते क्योंकि शरीर की अपनी सीमा मर्यादा है केवल उसके ही सुखों की तृष्णा की पूर्ति में जुट पड़ने वालों का भौतिक जीवन तो व्याधि ग्रस्त बनता ही है, अन्तःकरण क्षेत्र में शुष्क, नीरस, भावना विहीन, चिन्ताग्रस्त, द्वेष और आवेशग्रस्त होता जाता है। इस तरह के व्यक्तियों की स्थिति प्रेत-पिशाच से कम नहीं होती। स्पष्ट है यह स्थिति कितनी भयंकरता उत्पन्न कर सकती है। आज पश्चिमी देशों में यही सब हो रहा है।

मनुष्य स्थूल कम सूक्ष्म अधिक है। वह भावनाओं के सहारे पैदा होता, भावनाओं में ही जीवित रहता और भाव जगत में ही विलीन होता है। भावनाओं के प्रति सम्मान ही श्रद्धा है। यह सम्वेदना जहाँ भी होगी वहीं सन्तोष की निर्झरिणी प्रवाहित हो रही होगी। भगवान् कृष्ण ने कहा है :-

सत्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धा मयोऽयं पुरुषों यो यच्छृद स एव सः॥ गीता 17।3

अर्थात्- हे अर्जुन ! यह सृष्टि श्रद्धा से विनिर्मित है जिसकी जैसी श्रद्धा होती है वह पुरुष वैसा ही बन जाता है अर्थात् बुराइयों के प्रति श्रद्धा व्यक्ति को समस्याओं में कैद कर देती है तो आदर्शों के प्रति आस्था मनुष्य जीवन को सुख-शान्ति और प्रसन्नता से भर देती है।

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॥ मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्ष्यो॥

घटना 21 जनवरी 1793 की है। मादाम लुहरवेट अपने 4 वर्षीय पुत्र आरमण्ड को लेकर फ्रान्स के सम्राट लुई सोलहवें को दिया जाने वाला मृत्युदण्ड देखने गये। लुई सोलहवें की हत्या इतनी नृशंसतापूर्वक की गयी कि वहाँ का वीभत्स दृश्य देखकर आरमण्ड बहुत सहम गया मादाम लुहरवेट अपने बच्चे को लेकर घर लौट आयीं और आरमण्ड खेलने लगा। खेलते-खेलते उसे वह वीभत्स दृश्य याद आया और अचानक बेहोश होकर गिर पड़ा। बेहोश आरमण्ड को अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने जाँच की और बताया कि बच्चे के मन पर किसी घटना का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है।

आरमण्ड होश में तो आ गया पर उस घटना का प्रभाव उसके मन मस्तिष्क पर इस बुरी तरह हावी हो गया कि वह सो नहीं सका। एक दिन, दो दिन, सप्ताह, दो सप्ताह, उपचार किया गया। महीनों तक ट्रैंकुलाइजर्स (नींद की औषधि) दी गयी, मालिश भी की गयी। किन्तु नींद नहीं आयी तो नहीं ही आयी।

माता-पिता को इस बात की चिन्ता हुई कि उनके बेटे के स्वास्थ्य पर न सोने के कारण प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। एक दो दिन ही न सोने से मन उद्विग्न हो उठता है। विक्षिप्तता आने लगती है। सामान्य व्यक्ति यदि आठ घण्टे प्रतिदिन नींद न ले तो उन्हें अपना सामान्य जीवन क्रम भी चलाना कठिन हो जाय। परन्तु आरमण्ड को देखकर यह सारी धारणाएं निर्मूल सिद्ध हुईं।

न सोने के बावजूद भी आरमण्ड नियमित रूप से पढ़े, वे और लोगों की तरह शारीरिक श्रम करते। इतना ही नहीं पढ़-लिखकर वकील बन गये। रात में जब लोग सो जाया करते तब भी वह मुकदमों के मजबून तैयार किया करते। आरमण्ड जैक्विस के नाम से विख्यात उपर्युक्त वकील जीवन के अन्तिम क्षणों तक नहीं सो पाये। 71 वर्ष की आयु में आरमण्ड की मृत्यु सन् 1864 में हुई। इस बीच उन्हें एक क्षण को भी नींद नहीं आयी।

इस तरह की और कई घटनाओं को संकलित करने और उनका अध्ययन करने के बाद डॉ0 सोलेमन ने एक पुस्तक लिखी है- “माइण्ड मिस्ट्रीज एण्ड मिरकल्स।” इस पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि मन एक बहुत ही सूक्ष्म रहस्यमयी और अद्भुत शक्तिशाली सत्ता है। उसके रहस्यों को समझ पाना अति दुष्कर है। भारतीय तत्वदर्शन में तो मन को ही सब सफलता असफलताओं का मूल कहा है। यहाँ तक कि उसे ही बन्धन और मोक्ष का कारण कहा गया- “मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्ध मोक्षयो” अर्थात् बन्धन और मुक्ति का कारण यह मन ही है।

उपरोक्त घटना का विश्लेषण करते हुए डॉ0 सोलेमन ने लिखा है- “लुई को दिये गये मृत्यु दण्ड से आरमण्ड की मनश्चेतना इतनी आतंकित या विचलित हो गयी थी कि उसमें 71 वर्ष की आयु तक आरमण्ड को सोने नहीं दिया। परिस्थितियों और घटनाओं से प्रभावित मन शरीर को किस प्रकार नचाता है इसके उदाहरण तो आये दिन देखने में आते ही हैं। क्षुब्ध स्थिति में लटका हुआ विवर्ण चेहरा, चिन्ता और परेशानी के समय नींद का उड़ जाना, प्रसन्नता के समय खिल उठना आदि बातें मन और शरीर के सम्बन्धों को प्रमाणित करती हैं।

यह तो सामान्य जीवन की छोटी-छोटी बातें हैं जिनमें मन का शरीर पर प्रभाव परिलक्षित होता है। अन्यथा मनुष्य का मन बड़ा समर्थ और बलवान है। भगवान् श्रीकृष्ण ने भी कहा है-

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहंचलम्। (गीता 6।35)

अर्जुन! निस्सन्देह यह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है।

सभी शास्त्रकारों और योगी सिद्ध महापुरुषों ने मन को समस्त शक्तियों का भण्डार निरूपित करते हुए इसको कटा हुआ है। बताया है क्योंकि जीवसत्ता और ब्रह्मसत्ता के बीच यदि कोई चेतन सत्ता काम करती है, उन्हें मिलाती है या विलग करती है तो वह मन ही है।

मन की इस शक्ति को भारतीय महर्षि मुनियों ने पहले ही जान लिया था। आधुनिक विज्ञान भी अब उसकी प्रचण्ड सामर्थ्य को स्वीकार करने लगा है। साइकोलॉजी, पेरा साइकोलॉजी, मेटा फिजिक्स और फेथहीलिंग आदि विज्ञान की धारायें मनःशक्ति के ही अध्ययन और शोध की धारायें हैं। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि जिस तरह मनुष्य ने शरीर को भोग की वस्तु मानकर अपने आपको महान आध्यात्मिक सुख सम्पदाओं से वंचित कर लिया है। उसी प्रकार मन जैसी प्रचण्ड शक्ति का उपयोग भी वह केवल लौकिक स्वार्थों और इन्द्रिय भोगों तक ही सीमित रखकर उसे नष्ट करता रहता है।

मन भौतिक शरीर की चेतन शक्ति है। आई के शक्ति सिद्धान्त के अनुसार एक परमाणु से 3,45,960 लाख कैलोरी शक्ति उत्पन्न हो सकती है वस्तुतः एक परमाणु में कितनी शक्ति है इसका तो अभी ठीक-ठीक पता भी नहीं चलाया जा सका है क्योंकि इस क्षेत्र में नित नये रहस्य खुलते जा रहे हैं। फिर भी पदार्थ को शक्ति में बदलने की जितनी सम्भावनायें सामने आयी हैं उनके अनुसार एक पौण्ड अर्थात् 450 ग्राम पदार्थ की शक्ति 14 लाख टन कोयला जलाने पर प्राप्त होने वाली शक्ति होगी।

यद्यपि पदार्थ को पूरी तरह शक्ति में बदल पाना अभी सम्भव नहीं हुआ है। यदि वह सम्भव हो जाये तो 450 ग्राम कोयले से सम्पूर्ण अमेरिका के लिए एक माह तक चलने वाली बिजली तैयार हो सकती है। विज्ञान के लिए पदार्थ को शक्ति में रूपान्तरित करना भले ही सम्भव न हुआ हो परन्तु परमात्मा ने मनुष्य शरीर को इस प्रकार सृजा है कि उसके पास शरीर की विद्युत शक्ति मन के रूप में पहले से ही विद्यमान है। मन शरीर द्रव्य की विद्युत शक्ति ही है और यदि इसका पूरी तरह उपयोग किया जा सके तो 60 किलोग्राम वाले शरीर की विद्युत शक्ति अर्थात् मन की सामर्थ्य पूरे भारत को 10 वर्ष तक विद्युत देती रह सकती है।

डॉ0 बैनेट ने इसी आधार पर मन के लिए कहा है कि यह एक महान विद्युत शक्ति है। इस शीर्षक से उन्होंने एक पुस्तक भी लिखी है जिसका नाम है ‘माइण्ड ए ग्रेट इलेक्ट्रिकल फोर्स’, इस पुस्तक में उन्हें बहुत सारे तथ्य और आँकड़े दिये हैं तथा बताया है कि इस शक्ति को एक निश्चित दिशा में नियोजित कर दिया जाय तो उसके चमत्कारी परिणाम प्राप्त किये जा सकते हैं।

वेद ने इस शक्ति को “ज्योतिषां ज्योति” कहा है। इसकी प्रचण्ड क्षमता से ही भारतीय योगी ऋषि प्राचीन काल में शून्य आकाश में स्फोट किया करते थे और इसी शक्ति द्वारा समस्त भूमण्डल की मानवीय समस्याओं का समाधान और नियन्त्रण करते थे। शेर और गाय को एक ही घाट पर पानी पिलाने की क्षमता इसी शक्ति में विद्यमान थी।

इस सन्दर्भ में गीताकार ने छठवे अध्याय में एक और महत्वपूर्ण निर्देश दिया है -

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥5॥ बधुरात्मा त्मनस्वस्य यैनात्मौवात्मनाजित अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतस्मैव शुत्रवत्॥6॥

अर्थात्- आत्मचेतना आप ही अपना मित्र हैं और आप ही अपना शत्रु। आत्मसत्ता जिसे यहाँ मन के अर्थ में प्रयुक्त किया गया है उस व्यक्ति का तो आप ही अपना मित्र है जिसने जीत लिया है और जिसने मन पर कोई नियन्त्रण नहीं कर रखा है उसके साथ यह आप ही शत्रु की तरह बर्तता है।

मनुष्य इतनी अतुल शक्ति संपत्ति का स्वामी होते हुए भी केवल उसका नियन्त्रण और नियोजन न कर पाने के कारण परमुखापेक्षी तथा दीन बना रहता है। अनियन्त्रित और अपरिष्कृत मन के दुष्परिणाम शक्ति के दुरुपयोग की तरह के ही तो होंगे। आग से खाना बनाया जाय या आग लगायी जाय। बिजली से रोशनी पैदा की जाय अथवा प्राण संकट खड़ा किया जाय, अणुशक्ति का उपयोग मानव कल्याण के लिए किया जाय अथवा नरसंहार के लिए, यह उपयोग की दिशा पर ही निर्भर है। मनःशक्ति को विकृत और घृणित बनाये रखकर उसके दुरुपयोग दुष्परिणाम का आधार ही खड़ा किया जाता है।

हाल ही में हुए प्रयोगों और परीक्षणों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि रोगों की जड़ शरीर में नहीं मनुष्य के दूषित मन में है। अमेरिका में रोगियों का मनोविश्लेषण करने के बाद यह पाया गया कि यों तो अधिकांश रोगी मानसिक दृष्टि से अस्वस्थ थे किन्तु पेट के मरीज शत-प्रतिशत रूप से दूषित मनोविकारों वाले व्यक्ति थे। डॉ0 केनन ने जिनकी अध्यक्षता में अमेरिका के डाक्टरों और मनश्चिकित्सकों ने यह अध्ययन किया लिखा है आमाशय को सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क के ‘‘आटोनेमिक’’ केन्द्र से होता है। सिंपेथेटिक और पैरासिंपेथेटिक यह ओटोनेमिक केन्द्र के दो भाग हैं जो पेट की क्रियाओं को संचालित करते हैं तथा पाचन रस उत्पन्न करते हैं। यदि व्यक्ति की मनःस्थिति अस्त-व्यस्त और आवेग ग्रस्त होती है तो उसका पेट की क्रियाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और उसका पेट हमेशा के लिए खराब रहने लगता है।

यह तो शरीर पर पड़ने वाले मन के प्रभाव का उल्लेख है। समाज में भी रोग, शोक, संहार, युद्ध, दंगे और लड़ाई-झगड़े दूषित मनःस्थिति और विकृत विचारों वाले व्यक्तियों के कारण ही उत्पन्न होते हैं। जितने भी युद्ध और नरसंहार हुए उनके कारण प्रायः ऐसी मनःस्थिति के व्यक्ति ही होंगे। विकृत मनःस्थिति किस प्रकार के अनर्थ उत्पन्न करती है इसका ताजा उदाहरण द्वितीय विश्व-युद्ध है जिसमें दो करोड़ से भी ज्यादा व्यक्ति मारे गये। एक व्यक्ति की क्रूरता, हिंस्रता और अहंवादिता के कारण ही संसार के लाखों लोग अकाल युद्ध के गाल में कवलित हुए। और एक व्यक्ति की परिष्कृत, शुद्ध सात्विक मनःस्थिति का प्रभाव देखना हो तो वह महात्मा गाँधी, अब्राहम लिंकन, मार्टिन लूथरकिंग आदि पुरुषों के रूप में देखा जा सकता है जिन्होंने अकेले ही अपने समाज व संसार में महत्वपूर्ण क्रान्तिकारी परिवर्तन प्रस्तुत किये।

आणविक शक्ति के सदुपयोग और विध्वंस प्रयोगों की तुलना मनःशक्ति से की जा सकती हैं। संसार में सूखते जा रहे ऊर्जा स्रोतों से पूरी तरह चुक जाने के बाद वैज्ञानिकों की आँखें अणुशक्ति की संभावनाओं पर ही टिकी हुई है। अणुशक्ति का विध्वंसकारी रूप कितना भयावह है, यह संसार पिछले विश्व युद्ध में देख ही चुका है और अब जबकि उस क्षेत्र में काफी विकसित तकनीक उन्नत कर ली गयी है तब तो कहा जा रहा है कि दो-पाँच बम ही इस सारी पृथ्वी का जीवन नष्ट करने के लिए काफी होंगे।

मन की शक्ति अणुशक्ति से किसी प्रकार भी कम नहीं है। बल्कि उससे अधिक ही समर्थ और प्रचंड है। इतिहास पुराणों में वर्णित शाप और वरदान की घटनायें इसी मनःशक्ति के विध्वंस और सृजन उपयोगों के उदाहरण हैं। इस तथ्य को भारतीय तत्वदर्शियों ने बहुत पहले ही लिख दिया है-- “मनः मातस देवी चतुर्वर्ग प्रदायकम्’’ -अर्थात् मन की शक्ति में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष दिलाने वाली सभी शक्तियाँ भरी पड़ी हैं, उसकी शुद्ध, सात्विक और विधेयक शक्ति का ज्ञान होने के कारण ही वे प्रातःकाल प्रार्थना किया करते थे-

यस्मान्न ऋत किंचन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिव संकल्प नस्तु

अर्थात्- जिसके बिना संसार का कोई कर्म नहीं हो सकता, वह मेरा मन शिव संकल्प वाला हो।

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अमृतपान से वंचित

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महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था। महाराज युधिष्ठिर एक छत्र सम्राट के रूप में अभिषित हो गये। शासन व्यवस्था का सुचारु रूप बन गया और प्रजा में सुख-शांति, समाज में सुव्यवस्था तथा परिवारों में सुख सौहार्द्र बढ़ने लगा। इसके बाद श्रीकृष्ण अपने दायित्वों को पूरा हुआ जान द्वारिका की ओर चल पड़े। द्वारिका मार्ग में मीलों लम्बा मरुस्थली क्षेत्र पड़ता था। उसी क्षेत्र में पंचाग्नि तप करते हुए मुनि उत्तंक रह रहे थे।

श्रीकृष्ण ने उत्तंक मुनि की पूजा अर्चना की, उन्हें प्रणाम किया। मुनि ने भी उनका यथेष्ट आदर-सत्कार किया। मुनि ने श्रीकृष्ण से कुशल क्षेम पूछा। अन्त में जब श्रीकृष्ण ने कौरव पांडवों के युद्ध, कौरवों के संहार और महाभारत युद्ध में अपनी भूमिका का उल्लेख किया तो मुनि ने कहा- ‘‘मधुसूदन! एक बात मेरी समझ में नहीं आयी। कौरव तुम्हारे सम्बन्धी और प्रेमी भी। वे सभी पराक्रमी और शूरवीर भी थे। पांडवों के पास अधिक शक्ति भी नहीं थी। फिर कुरुवंश के वीर किन कारणों से नष्ट हो गये।’’

श्रीकृष्ण ने कहा- ‘‘एक तो कौरवों का सद्-विवेक जाता रहा था। राज्यमद में वे अपने दिये हुए वचनों को भूल गये थे और न्याय पथ से विचलित हो गये। मोहग्रस्त मदोन्मत्त उन कौरव वीरों को मैंने न केवल समझाया वरन् उनसे दीनता पूर्वक प्रार्थना भी की। फिर भी वे नहीं माने। न्याय और सत्य की अवहेलना करने के कारण उनका तेज नष्ट हो गया। फलतः पराक्रमी और वीर होते हुए भी उनका पतन हुआ।’’

इसके बाद अध्यात्म तत्व के कई गूढ़ विषयों पर वे देर तक चर्चायें करते रहे। चलते समय श्रीकृष्ण ने पूछा- ‘मेरे योग्य कोई सेवा हो तो बताइये।’

उत्तंक मुनि बोले- इस मरुप्रदेश में एक जल का ही अभाव है। हो सके तो उसे उपलब्ध कराइये।

भगवान श्रीकृष्ण ने तत्काल कहा- ‘‘जब भी आपको जल की आवश्यकता हो मेरा स्मरण कीजिये, आपको जल उपलब्ध हो जायेगा।’’

यह कह कर श्रीकृष्ण द्वारिका की ओर चल पड़े। पंचाग्नि तप का एक अनुष्ठान पूरा करने के बाद उत्तंक मुनि को प्यास लगी। पानी के लिए वे चारों ओर घूमने लगे। तभी उन्हें श्रीकृष्ण की बात स्मरण हो आयी। उन्होंने श्रीकृष्ण को स्मरण किया।

स्मरण के कुछ क्षणों बाद उत्तंक मुनि ने देखा कि कृष्णवर्ण, मलीन वस्त्र पहने, कुत्तों से घिरा हुआ एक चाण्डाल चला आ रहा है। उसकी आकृति से ही वीभत्सना फूटी पड़ रही थी। चाण्डाल उत्तंक मुनि के कुछ समीप आ गया तो मुनि ने देखा कि उसके हाथ में पानी से भरा एक घट है। चाण्डाल ने मुनि से कहा- ‘महर्षि! आपको प्यास से व्याकुल देखकर नन्दन ने मुझे प्रेरित किया है कि मैं आपकी सेवा में जल लेकर पहुँचूँ।’ सुनते ही उत्तंक उत्तेजित हो उठे। चाण्डाल- जन्मना शूद्र और उस पर भी यह वेष वसन्। छिः छिः- उत्तंक ने चाण्डाल को दुत्कार दिया तो जिस रास्ते वह आया था उसी रास्ते वापस चला गया। भगवान कृष्ण ने आश्वासन तो दिया था पर इसका अर्थ यह तो नहीं है कि तिरस्कृत चाण्डाल के हाथों का जल पीया जाय। यह सोचते हुए उत्तंक मुनि श्रीकृष्ण को भी बुरा-भला कहने लगे।

तभी आश्रम में श्रीकृष्ण भी प्रकट हुए। उनको देखते ही उत्तंक मुनि ने कहा- ‘केशव! प्यासे ब्राह्मण को इस प्रकार जल देना आपके लिए शोभनीय नहीं है।’

श्रीकृष्ण ने बड़े ही मधुर शब्दों में कहा- महात्मन् आप तो तपःपूत सिद्ध आत्मा हैं। आपके लिए कौन व्यवहार्य और कौन त्याज्य। सबके प्रति समदृष्टि रहनी चाहिए। यही आत्मसिद्धि का आधार है। सबके प्रति आत्मभाव और समता की दृष्टि ही अमृत आनन्द की पात्रता उपलब्ध कराती है आप में वह पात्रता विकसित हुई है अथवा नहीं यही जानने के लिए देवराज इन्द्र इस वेष में आपके सामने अमृत घट लेकर उपस्थित हुए थे। किन्तु समदृष्टि के अभाव में आप अमृतपान के सौभाग्य से वंचित रह गये। पहले तो देवराज इन्द्र अमृत देने के लिए तैयार ही नहीं हो रहे थे। बार-बार अनुरोध करने पर इस ढंग से परीक्षा लेने के बाद वे इस शर्त पर तैयार हुए। खेद है कि आपने अमृत ग्रहण नहीं किया।’

वस्तुस्थिति से अवगत होकर उत्तंक मुनि को भी अपनी अपात्रता पर ग्लानि हुई। श्रीकृष्ण ने उन्हें वर दिया कि जिस समय आप पानी की इच्छा करेंगे उसी समय बादल मरुभूमि में पानी बरसा कर आपको स्वादिष्ट जल देंगे।


Quotation

हे परमसत्ता! तू तेजस्विता का स्त्रोत है, केन्द्र है, हमें तेजस्वी बना। तू पराक्रम का अनन्त भण्डार है, हमें पराक्रम सामर्थ्य दे। तू स्वयं बल है, हमें बलवान बना। तू ओजस है, हमें भी ओजस्वी बना। अन्याय के प्रति तू सदैव क्रुद्ध रहती है, हमें भी अन्याय के प्रतिकार की प्रेरणा दे। तू सहनशील है, हमें भी सहिष्णुता-वृत्ति दे।

आयुर्वेद 19।9

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चाहे जो बन जायें, इतनी भर ही छुट्टी है।

मानवी सत्ता, असुरता और देवत्व दोनों से मिलकर बनी है। परमात्मा ने यह छूट केवल मनुष्य को ही दी है कि वह चाहे तो दिव्य दैवी प्रवृत्तियाँ अपनाये अथवा आसुरी-पाशविक वृत्ति अपनाकर नरपशु से नर पिशाच बन जाये, यह चयन सुविधा मनुष्य के विवेक की परीक्षा के लिए ही मिली है। वह कौन-सी प्रवृत्ति अपनाता है यह उसकी मनमर्जी की बात है। परन्तु जिस किसी भी वृत्ति को वह अपनाता है उसका पुरस्कार या दण्ड निश्चित रूप से मिलता है।

मनुष्य की प्रकृति में दोनों तत्व विद्यमान हैं। जिस पक्ष को समर्थन, अवसर और पोषण मिलता है वही पक्ष सुदृढ़ हो जाता है। सद्गुण -सद्भाव और सद् विचारों की दिव्य भावनाओं का अभ्यास मनुष्य को देवता बना देता है और इनकी पुष्टि होती जाती है तो व्यक्ति नर से नारायण बनता जाता है। इसके विपरीत यदि वह दुष्ट संगति दुराचरण आसुरी क्रियाकलाप और पाप प्रवृत्तियों को अपनाता है तो धीरे-धीरे निकृष्ट से निकृष्टतम बनता चला जाता है। पशु से भी बढ़कर पिशाच का रूप धारण करता है और जघन्य कृत्य करके ही उसके भीतर बैठा असुर मोद मनाता है। ऐसे कुकृत्य जिन्हें सुनकर ही एक सुहृदय व्यक्ति काँप उठे वह उन नृशंस कृत्यों को अपने अहंकार को पूर्ति समझने लगता है।

1430 ई॰ में ट्रान्सलवानिया के पहाड़ी प्रदेशों के राज्य सिंहासन पर आरुढ़ होने वाला काउण्ट ड्राक्युला ऐसा ही नर पिशाच था। उसने 1476 तक राज्य किया। 46 वर्षों के इस शासन काल में उसने ऐसी ऐसी अमानवीय क्रूरतायें बरतीं कि उसे इतिहासकारों ने ‘लाद दि इम्पेलर’ अर्थात् आदमी के शरीर छेदने वाला कहा। जिस किसी भी व्यक्ति पर वह अप्रसन्न हो जाता उसे सजा देने के लिए वह क्रूरतम तरीका अपनाता था। वह लोगों को लकड़ी के बड़े-बड़े आदम कद खूँटों पर कीलों से ठोकवा देता और उनकी पीड़ा तथा तड़प को देख कर प्रसन्न होता था।

यह उसका मनोरंजन भी था। वह प्रायः अपने महल में प्रीतिभोज दिया करता। भोज की मेज के चारों ओर काठ की बनी सूलियों पर जीवित मनुष्यों के शरीर कीलों से टंगे होते थे। लोग यातना और पीड़ा से चीखते चिल्लाते रहते और उन्हें देख कर ड्राक्युला बड़ा आनन्द विभोर होता हुआ भोजन करता रहता। सड़ती लाशों और और बासी खून की सड़ांध भरी बदबू में ड्राक्युला को जैसे महक-सी आती थी।

दरबार में भी वह इसी प्रकार सूलियों पर जीवित लोगों को कीलों से ठुकवा देता और शासन प्रबन्ध के विभिन्न पहलुओं पर विचार करता रहता। दरबारी बड़े सहमे और डरे रहते थे क्योंकि इससे जरा भी विरोध या अरुचिदर्शा का अर्थ था उनकी भी वही दशा। एक बार किसी नये दरबारी ने ड्राक्युला से कह दिया इन लाशों में बहुत बदबू आती है। उसने ड्राक्युला को यह कार्य कहीं एकांत में करने की सलाह दी ताकि दरबार में आने वालों को दुर्गन्ध का सामना न करना पड़े। ड्राक्युला ने इस सुझाव को सुनकर जोरों से अट्टहास किया और बड़ा उल्लास व्यक्त करते हुए उसने तुरन्त आदेश दिया कि इस आदमी को भी एक खूँटे पर ठोक दिया जाय। वह दरबारी घबरा कर माफी माँगने लगा जीवन दान की दया याचना करने लगा तो ड्राक्युला ने इस पर दयाभाव जताते हुए इतना भर किया कि उसका खूँटा कुछ ऊंचा गढ़वाया और उसे ऊंचे खूंटे पर जड़वा दिया। इस दया को जताते हुए उसने कहा था- ‘‘अब तुम्हें कभी भी दूसरों की बदबू नहीं मिलेगी। घबराने की जरूरत नहीं थी।

ड्राक्युला ने इस प्रकार क्रूरता पूर्वक नृशंस हत्याएं करने के नये-नये ढंग ईजाद किए थे। इससे उसे बड़ा आनन्द आता था। हत्याओं के एक ही तरीके से जब वह ऊब जाता तो दूसरे तरीके भी अपनाने लगा। कई बार वह दूध पीते हुए बच्चों को उनकी माताओं के सामने ही कील से जड़वा देता। माँ बाप के सामने ही उनके अबोध और प्यारे-प्यारे बच्चों को मारकर उन्हें अपने बच्चों का मांस खाने के लिए मजबूर कर देता। एक बार उसने अपने राज्य के सभी गरीब, बूढ़े और बीमार लोगों को सेना द्वारा इकट्ठा कराया तथा उन्हें जिन्दा जलवा दिया।

ड्राक्युला के नाम और आतंक का इतना दबदबा था कि उसकी चर्चा आज भी ट्रांसलवानियां में होती है तो लोग मारे दहशत के चर्चा वहीं बन्द करने का आग्रह करने लगते थे। इतिहासकारों ने ड्राक्युला को अब तक के विश्व का सर्वाधिक क्रूर, नृशंस और अत्याचारी शासक माना है।

कार्पजे ने औसतन प्रतिदिन पाँच व्यक्तियों को फाँसी पर चढ़वाया और फाँसी देखने वह स्वयं वध स्थल पर पहुँचता। फाँसी लगने का दृश्य देखने में उसी बहुत रस आता था। उसके साथ ही वह यह व्यवस्था भी देखता कि मृतकों का मांस खाने के लिए शिकारी कुत्ते तथा दूसरे जानवर यथा समय पहुँचे हैं अथवा नहीं। दया या क्षमा शब्द तो जैसे कार्पजे ने कहीं सीखा ही नहीं था फिर भी वह अपने आपको धार्मिक कहता था।

निष्ठुर नृशंसता के ये दो इतिहास प्रसिद्ध उदाहरण हैं जिनमें केवल, आदमी को मरते हुए देखने का आनन्द लिया जाता रहा। व्यक्तिगत जीवन में भी यह नृशंसता समय-समय पर घुसती रहती है और सामाजिक जीवन में भी विष घोलती रहती है। लेकिन एक बात तय है कि जो व्यक्ति इस प्रकार की अमानवीय क्रूरता को छोटे या बड़े किसी भी रूप में अपनाते है वे जीवन में कभी भी चैन से नहीं बैठ पाते हैं।

इस शताब्दी में नृशंस सामूहिक हत्याओं के लिए हिटलर का नाम बड़ी घृणा और तिरस्कार के साथ लिया जाता है। उसने लाखों निरपराध व्यक्तियों को मरवाया। परन्तु वह जीवन भर चैन से नहीं बैठ सका यहाँ तक कि अपनी छाया से, अपने पदचाप की प्रतिध्वनि तक से डरता रहा। कहते हैं कि वह इतना सशंकित रहता था कि रात में चार-पाँच घण्टे की नींद लेते समय तीन-चार बार उठ बैठता और अपने सिरहाने रखी रिवाल्वर तथा अन्य सुरक्षा प्रबन्धों की जाँच करके देखता।

ऐसे व्यक्ति मरने के बाद भी उसी प्रकृति के बने रहते हैं। अशान्त, व्यक्ति और आत्म प्रताड़ना से आन्दोलित उनका जीवन नाटकीय बन जाता है। बजाय अपनी गलतियों को सुधारने के वे मरने के बाद भी प्रेत पिशाच बन कर लोगों को अपने दुष्ट आचरण द्वारा सताते रहते हैं।

इटली के तानाशाह मुसोलिनी के सम्बन्ध में विख्यात है कि वह मरने के बाद प्रेत बनकर अपने खजाने की रखवाली करता रहा है। युद्ध में हारने के बाद वह अपनी जान बचाकर स्विट्जरलैण्ड की तरफ भागा था। अरबों रुपये की संपत्ति, सोने की छड़ें हीरे, जवाहरात, पौण्ड, पेंस और डॉलरों के रूप में उसके पास जमा थी। लेकिन वह भागने में सफल नहीं हुआ और कम्युनिस्ट सेनाओं द्वारा गोली से उड़ा दिया गया।

इसके बाद उसने प्रेत, पिशाच का रूप धारण कर लिया और अपने खजाने की रखवाली करने लगा। अशरीरी होने के कारण खुद तो वह खजाने का लाभ उठा नहीं सकता था, लेकिन वह दूसरों को भी उसका लाभ नहीं उठाने देना चाहता था। कहा जाता है कि उसी ने प्रेत पिशाच बनकर खुद अपना खजाना छुपाया और उसकी रखवाली करने लगा। जिनने भी उसका पता लगाने की कोशिश की, मुसोलिनी के प्रेत ने उनके प्राण लेकर ही छोड़े। उस खजाने को ढूँढ़वाने और प्राप्त करने के लिए सरकार ने कितनी ही समितियाँ गठित कीं परन्तु सभी खोजी दल अकाल कवलित हो गये।

मरने के बाद उस प्रेत पिशाच पर क्या बीतती होगी यह तो कहा नहीं जा सकता परन्तु व्यक्ति के अपने नृशंस क्रूर कर्म उसे स्वयं तड़पा-तड़पा कर मारते हैं। ट्रांसलवानिया के शासक काउण्ट ड्राक्युला ने अपने जीवनकाल में जिस प्रकार लोगों की नृशंस हत्या की उससे भी भयंकर तरीके से उसे मारा गया। तुर्की सेनाओं ने जब ट्रांसलवानिया को जीतकर ड्राक्युला को बन्दी बना लिया तो उसके शरीर से रोज माँस का एक टुकड़ा काट लिया जाता और वही उसे कच्चा चबाने के लिए मजबूर किया जाता।

जर्मनी के नृशंस-क्रूर न्यायाधीश कार्पेज को कुछ ऐसे लोगों ने पकड़ लिया जिनके सम्बन्धियों को निरपराध होते हुए भी उसने सजा दी थी और फाँसी पर चढ़वाया था। उन लोगों ने कार्पेज एक ऐसे कमरे में छोड़ दिया जहाँ हजारों बिच्छू पहले से ही रख दिये गये थे। कोई तीन दिन में उसकी मृत्यु हुई। उस कोठरी में से कार्पेज की आवाज आना बन्द हुई तब लोगों ने उसे बाहर निकाला। उसके शरीर पर ऐसा कोई स्थान नहीं बचा था जहाँ बिच्छुओं ने दंश नहीं लिया हो।

यह तो हुई बाहरी दण्ड व्यवस्था-प्रतिशोध परक वृत्तांत। इनसे बचा भी जा सकता है। परन्तु परमात्मा ने एक ऐसा न्यायाधीश इसी शरीर में बिठा दिया है जो व्यक्ति के कर्मों को देखता रहता है और यथा समय दण्डित भी करता है। कहते हैं कि मृत्यु के समय अपने जीवन भर के कर्मों की याद आती है और वे स्मृतियाँ व्यक्ति को दग्ध करने लगती हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि पराभव के समय व्यक्ति को अपने सारे क्रूर कर्म याद आते हैं और वह अपने ही कर्मों के प्रेत से डर कर अपने आपका उत्पीड़न करने लगता है।

सेण्ट पीटर्स वर्ग से कुछ मील दूर ग्रेनाइट पत्थरों से बनी एक काटेज में उन्होंने शरण ली। उन लोगों के साथ उनका एक पुराना सेवक बूढ़ा मल्लाह भी था। इवान ने अपनी वासना पूर्ति के लिए सैकड़ों महिलाओं के साथ अनाचार किया था, उनमें से कइयों ने तो आत्महत्या कर ली थी, अनेक अबोध बालिकाएं इस क्रूर कर्म को सहन न कर पाने के कारण मर गयी थीं। यही हाल अन्ना का था, अपने चरित्र पर परदा पड़ा रहे इसलिए उसने अपने बाप और भाई तक को मरवा डाला था।

इसके अलावा भी जागीरदार ने हजारों निरपराध व्यक्तियों को मरवा डाला था। इस काटेज में दोनों को अपने अतीत की याद आने लगी। संयोग की बात यह कि जिस काटेज में उन्होंने शरण ली, वह काटेज कभी इवान का विलास महल रह चुका था। वहाँ का एक पत्थर इवान के क्रूर कर्मों का साक्षी था। ये क्रूर कर्म इतने वीभत्स और भयावह रूप में याद आ रहे थे कि वे सब लोग जिन्हें उसने सताया था, प्रेत बनकर उससे बदला लेने के उतारू लगने लगे। इस स्थिति में इवान ने अपने पत्नी बच्चों को बूढ़े मल्लाह के साथ रवाना कर दिया। रास्ते में अन्ना इतनी विक्षिप्त हो उठी कि अपने कपड़े फाड़ने लगी, बाल नोंचने लगी और नदी पार करते समय नाव में से कूद पड़ी।

इवान का भी यही हाल हुआ। उसने भी आत्म प्रताड़ना या अतीत में किये गये क्रूर कर्मों की स्मृति से बुरी तरह भयभीत होकर नेवा झील में कूदकर आत्म हत्या कर ली। स्मरणीय है दोनों पति-पत्नी अपनी क्रूरता के शिकार व्यक्तियों को नदी, झील में ही फेंका करते थे। शासन और सेना से भले ही वह बच गये परन्तु अपनी अन्तरात्मा में बैठे न्यायाधीश से बचना कहाँ सम्भव रहा ?

तत्वविदों का कथन है कि मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र है। वह, चाहे तो देवता भी बन सकता है और यदि चाहे तो नर पिशाच भी। परन्तु इनके परिणामों में चुनाव की कोई सुविधा नहीं हैं। जिन्होंने भी असुरता पकड़ी और नृशंसता अपनायी उन्हें अन्ततः उसका दण्ड भुगतना ही पड़ा। भले ही वे तत्काल अपने अहंकार को सन्तुष्ट कर सके हों पर परिणाम में उससे भी भयंकर यातना तथा इति में उनकी दुखद स्मृतियों के अलावा और कुछ भी नहीं मिल पाया है।

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प्रार्थना का अर्थ माँगना नहीं है।

ईश्वर सर्वशक्तिमान है और उस सर्वशक्तिमान सत्ता से मनुष्य इसीलिए सम्बन्ध सम्पर्क जोड़ना चाहता है कि वह उसका लाभ अपने स्वार्थ को पूरा करने में उठा सके। यही कारण है कि इस सर्वशक्तिमान सत्ता के अति निकट रहते हुए भी जैसा का तैसा ही बना रहता है और अपना मूल्य ईश्वर की दृष्टि में गिरा देता है।

किसी बड़े और प्रतिष्ठित व्यक्ति की गरिमा के अनुरूप ही उससे सहयोग प्राप्त करने की आशा की जाती है और उसके सामने वैसा ही प्रार्थना प्रस्ताव लेकर प्रस्तुत हुआ जाता है। परन्तु लोग अपनी क्षुद्र कामनाओं तथा तुच्छ इच्छाओं को लेकर ईश्वर के पास पहुँचने की बात सोचते हैं तथा उन्हें पूरी करने की प्रार्थना करते हैं।

प्रार्थना- ईश्वर से कुछ माँगना नहीं है परन्तु लोग यही समझते हैं कि प्रार्थना के द्वारा ईश्वर से पुत्र-कलत्र, धन-वैभव, यश-मान मांगा जा सकता है। यह विपर्यय प्रार्थना का अर्थ न समझ पाने के कारण ही होता है। ईश्वर अपने प्रिय पुत्र को जो कुछ दे सकता था, वह श्रेष्ठतम रूप में दे चुका अब वह देखना चाहता है कि उसके पुत्र ने उन उपहारों का मूल्य समझा अथवा नहीं। वह उपलब्ध साधन और शक्तियों का श्रेष्ठतम उपयोग करने में समर्थ हो सका है या नहीं। उसके बाद भी वह अपने पुत्र को रोते, गिड़गिड़ाते, मनुहार करते देखता है और इससे उसे कोई क्षोभ होता होगा तो यही होता होगा कि सृष्टि में अन्य प्राणियों की तुलना में उसे दिये गये सारे उपहार व्यर्थ ही गये। क्योंकि वह उनका मूल्य नहीं पहचान सका।

किसी भक्त के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है कि उसके गुरु ने उसे कुछ समय के लिए पारस पत्थर देकर यह कहा था कि वह इससे अपनी गरीबी दूर कर ले। भक्त जानता नहीं था कि पारस पत्थर का क्या उपयोग किया जाय। इसलिए साल भर तक वह पत्थर से तौलने का काम ही लेता रहा। साल भर बाद जब गुरु लौटा तो वह सोचता था कि मेरा शिष्य अब तो काफी सम्पन्न हो गया होगा। परन्तु उसे देख कर निराशा ही हुई कि भक्त अभी भी मैली कुचैली दुकान पर बैठा चीजें तौल रहा है और अपनी गरीबी का रोना रो रहा है। यह पूछा जाने पर कि पारस पत्थर का क्या किया? शिष्य का उत्तर था- उस से कोई वस्तु तौलने में बड़ी सुविधा हो रही। इससे पहले वह ईंट पत्थर के टुकड़ों से ही चीजें तौला करता था, अतः कठिनाई होती थी। यह पत्थर आ जाने से उसे तौलने में बड़ी सुविधा होने लगी है।

देख कर गुरु को अपने शिष्य की बुद्धि पर बड़ा तरस आया। और वैसा ही तरस परमात्मा को भी मनुष्य पर आता होगा जब वह इतनी श्रेष्ठतम वस्तुएं, समर्थ साधन और प्रचुर सामर्थ्य देने के बाद भी मनुष्य को रोता झींकता देखता है। निश्चित ही ये सुविधा साधन इसलिए मिले हैं कि इनके सहारे वह अपना जीवन सरलता पूर्वक चलाये और सृष्टि उपवन की-शोभा सुन्दरता भी बढ़ाये।

प्रार्थना इस आत्मिक दैत्य के निवारण और परम-पिता परमात्मा से निकट सम्पर्क, सम्बन्ध सान्निध्य स्थापित करने के लिए ही की जानी चाहिए जिसका कि वह सनातन अंश हो। जिसका वह अंश है, उससे तादात्म्य स्थापित कर वह भी उसी के समान समर्थ बन सकता है। छोटे-छोटे नाले, नदियों में मिल कर स्वयं भी नदी स्वरूप हो जाते हैं। आग में पड़कर ईंधन अग्नि स्वरूप हो जाता है, नदियां सागर में मिल कर सागर ही हो जाती हैं। नालों का नदी से संयोग, नदी का सागर से मिलन और ईंधन का अग्नि में प्रवेश, उन्हें उसी रूप में परिणत कर देता है। ठीक उसी प्रकार प्रार्थना भी मनुष्य को उसके अन्तिम लक्ष्य से मिला देती है। विराट् से क्षुद्र को संयोग गति के माध्यम से ही होता है। प्रार्थना को भी गति कहा जा सकता है जो क्षुद्र से महान्, अणु से विराट् तथा जीव से ब्रह्म की ओर चलती है। यही प्रार्थना का अर्थ है याचना नहीं है।

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प्रार्थना के सही स्वरूप से अभीष्ट प्राप्ति

प्रार्थना जीवन के वास्तविक आधार के स्मरण का अभ्यास क्रम है। सामान्यतः लोग अपनी दैनिक व्यस्तता के बची उस चेतन-सत्ता को भुलाये रहते है, जिसका एक स्फुल्लिंग ही इन समस्त क्रिया-व्यापारों को सम्भव बना रहा है। मनुष्य अपने उस सनातन स्त्रोत को स्मरण रखे, ईश्वर के साथ अपने सम्बन्ध को ठीक तरह से समझ सके, सही प्रार्थना का प्रयोजन है।

वह सर्वव्यापी दिव्य चेतना, जो प्रत्येक क्षण हमारे अन्तःकरण में श्रेष्ठता की प्रेरणा देती रहती हैं, उत्कृष्ट जीवन, आदर्श क्रिया कलाप का बोध एवं भाव भरती रहती है, उससे अपने सम्बन्धों को जितनी ही गहराई से और स्पष्टता से समझा जा सके, जीवन को उतना ही प्रार्थनामय समझना चाहिये।

प्रार्थना के इसी अर्थ को जानने के कारण महात्मा गाँधी ने कहा था ‘‘मैं विद्वान नहीं हूँ। परन्तु मैं प्रार्थना-परायण मनुष्य होने का विनम्र दावा करता हूँ।’’

महत्वपूर्ण प्रार्थना की पद्धति नहीं प्रेरणा और प्रकाश है। पद्धति का महत्व तो है, पर वह प्रेरणा और प्रकाश दे सकने के रूप में ही। जहाँ प्रार्थना की वास्तविक प्रेरणा और उसका दिव्य आलोक नहीं है, वहाँ कोई भी पद्धति फलप्रद नहीं हो सकती।

इंजील में कहा गया है- ‘‘जो तुम माँगते हो, सो पाते नहीं। क्योंकि तुम गलत माँगते हो।’’

डाकखाने में जाकर जलेबी और दर्जी की दुकान पर किताबें माँगने पर निराशा ही हाथ लगेगी। ईश्वर सर्व-समर्थ दाता है, यह तो ठीक है, पर वह दाता भर नहीं, विज्ञाता और पिता भी है। हमारी आवश्यकताएं वह हमसे अधिक जानता है। अतः देते समय वह विवेक से काम न लेगा, यह कल्पना करना हास्यास्पद तो है ही, खुद ईश्वर को मूढ़ या चापलूसी-पसन्द मानना है।

अतः प्रार्थना के पूर्व दो बातें तो समझ ही लेनी चाहिए। पहली यह कि ईश्वरीय अनुग्रह सत्प्रवृत्तियों, सद्भावनाओं के रूप में ही हम पर बरस सकता हैं। ईर्ष्या-द्वेष-लोलुपता-व्यसन, अहंकार, रोग-विकार को बढ़ाने वाली प्रवृत्तियाँ और सुविधाएं ईश्वर क्यों कर देगा?

दूसरी यह कि ईश्वर ने किसी एक या कुछ-एक व्यक्तियों को ही नहीं बनाया हैं। सम्पूर्ण सृष्टि की नियामक-संचालक शक्ति ही ईश्वरीय सत्ता है वह शक्ति ऐसी कोई व्यवस्था नहीं कर सकती, जिसमें नीति-न्याय की उपेक्षा हो, पक्षपात हो या दूसरों के साथ अन्याय हो। अतः इस विश्व-व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर देने वाली प्रार्थना से अनुदान नहीं ईश्वर की अप्रसन्नता ही प्राप्त हो सकती है। मैं अनीति कर रहा हूँ तो भी मुकदमे में जीत जाऊँ, दूसरे चाहे जितना परिश्रम और पुरुषार्थ करें, पर मुझसे सदा पीछे ही रहें, मैं आलस्य-प्रमाद-दुर्व्यसन में लिपटे-डूबे रहकर भी आपकी कृपा से सबसे आगे रहूँ, सदा सफलता प्राप्त करूँ, ऐसी प्रार्थनाएँ स्वीकार करने वाले ईश्वर को क्या कहा जायेगा? स्पष्ट है कि ऐसे किसी वास्तविक ईश्वर की कोई सम्भावना नहीं है। वह तो अपने ही ओछेपन और खोटेपन से गढ़ा गया काल्पनिक ईश्वर ही हो सकता है।

प्रार्थना से यदि अनैतिक कामनाएँ भी पूरी होने लगें, तो फिर उन्हें समदर्शी कैसे कहा जायेगा? चोरी, डकैती से मुकदमे में निर्दोष छूट जाना, सट्टे, जुए में बिना कमाई का धन मिल जाना आदि आये दिन देखने को तो मिलता है और इस तरह के लाभ पाने वाले भी उसे मानते प्रभु का अनुग्रह ही हैं, किन्तु वह तो भ्रष्ट व्यवस्था में सफल हो सकने वाली कुटिलता-धूर्तता और तिकड़म का फल है, प्रभु-कृपा का नहीं। यदि बिना पढ़े, धूपबत्ती जलाकर प्रसाद चढ़ाने और हाथ जोड़ने से प्रभु या देवता प्रसन्न होकर प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करा दिया करें तो फिर पुरुषार्थ और अध्यवसाय की आवश्यकता ही क्या रह जायेगी? यदि इतनी सरलता से मनोकामनाएं पूरी होने लगें, तो कर्मफल-सिद्धान्त पूरी तरह गलत ही हो जाय।

क्या दशरथ को प्रार्थना करनी नहीं आती थी? फिर क्यों उन्हें श्रवण कुमार को मारने का फल पुत्र-शोक में बिलख कर मरने के रूप में भोगना पड़ा? भगवान राम को तो प्रार्थना की जरूरत भी न थी, इच्छा मात्र ही पर्याप्त सिद्ध होती। परन्तु छिपकर बालि को बाण मारने के फल से बचने की इच्छा उन्होंने नहीं की और द्वापर में उसी बालि द्वारा बहेलिया रूप में श्रीकृष्ण के पैर में तीर मार कर बदला लिया गया। उस विधि-व्यवस्था को दूसरों के लिए ही वे क्यों टाल देंगे?

इसका यह अर्थ नहीं कि ईश्वरीय सहायता कभी प्राप्त ही नहीं होती। निश्चय ही दैवी अनुदान प्रार्थना से अनायास ही मिलते भी देखे जाते हैं, पर तभी जब वह प्रार्थना परिष्कृत व्यक्तित्व द्वारा सदुद्देश्य से की जाय।

गज जब अपनी पूरी शक्ति लगा चुकता है और उसकी अपनी सारी सामर्थ्य समाप्त दिखने लगती है, तभी हरि उसका ग्राह उद्धार करने दौड़ते हैं।

निस्सन्देह प्रार्थना से रोग-मुक्ति, बाधाओं की समाप्ति जैसे लाभ भी मिलते हैं, पर तभी जब प्रार्थना करने वाला शुद्ध चित्त हो और उसने अपने परिश्रम-पुरुषार्थ में कोई कसर न छोड़ी हो। अपनी हर छोटी आवश्यकता की पूर्ति के लिए धूप-दीप, नैवेद्य, आरती का सहारा लेने दौड़ पड़ना और प्रार्थना के प्रत्येक अवसर पर भौतिक उपलब्धियों की कामनाएँ करते रहना प्रार्थना का स्तर गिराता और उसे अप्रभावी बनाता हैं। अनैतिक, अवांछनीय कामनाएँ प्रार्थना का अंग बनाये जाने पर, वह प्रार्थना भी प्रभु प्रार्थना नहीं, कल्पना मात्र रह जाती है। ऐसी निकृष्ट आकांक्षाओं की पूर्ति की रट ईश्वरीय - सत्ता तक पहुँच ही नहीं पाती। वह तो यों ही हवा के साथ उड़कर आकाश में अस्त-व्यस्त हो जाती है।

सदुद्देश्य प्रार्थना की आवश्यक शर्त है। आत्म कल्याण और लोकमंगल के उच्च प्रयोजनों के लिए ही दैवी-सहयोग मिल सकता है। प्रत्येक युग में महामानवों ने ऐसे ही उद्देश्यों के लिए प्रार्थना कर दैवी अनुदान प्राप्त किये हैं और भारी कठिनाइयों के बीच भी आगे बढ़ते हुए आश्चर्यजनक सफलताएँ प्राप्त की हैं। श्रेष्ठ आदर्श के लिए चाही गई सद्-बुद्धि, सद्-विवेक, सत्प्रवृत्तियाँ प्रार्थना से सहज ही प्राप्त होती रहती हैं और वही उच्च उद्देश्यों की दिशा में प्रगति का आधार बनती हैं।

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प्रकृति-उपभोग्य ही नहीं उपास्य भी

मनुष्य की बुद्धि ने जाने वह कौन-सी अभिशापित घड़ी थी जब यह मान लिया प्रकृति जड़ है, उसे चाहे जब जिलाने और चाहे जब सर्वनाश कर डालने का अधिकार है सेवा, सद्भावना, परिपोषण के रूप में प्रकृति को दिये गये अनुदान किस तरह प्रतिफलित होते हैं यह किसी को देखना हो तो बानमुड़ा के राल्फ सेन्डर का इतिहास पढ़ कर देख ले। जिसने केवल मात्र पौधों के प्रति असीम प्यार दुनिया भर के फल−फूल एकत्र करने रोपने की कठिन साधना से भौतिक समृद्धि का शिखर पार कर लिया पर यदि उसके साथ दुर्भावना व्यक्त की जाये तो प्रकृति में इतनी जबर्दस्त सामर्थ्य है कि मनुष्य को परास्त करके ही छोड़ देती है फिर उसे अपने आपमें चाहे जितना शक्तिशाली और सामर्थ्य होने का ही अभिमान क्यों न हो?

बात अमेरिका के एक छोटे से नगर की है। कोरेफोर्ड नामक व्यक्ति के घर के साथ लगा हुआ एक सुन्दर बगीचा था। बगीचे की देख-रेख के लिए उसके पिता ने टोनी नामक एक माली नियुक्त रखा। टोनी उस बगीचे की पूरी तरह देखभाल नहीं करता था तो भी चीकू, अमरूद, आम, नासपातियाँ सभी फल देते थे, तब आज तक की तरह रासायनिक खादों का प्रचलन नहीं हुआ था, गोबर की साधारण खाद और थोड़े बहुत पानी से ही बाग में लगाई जाने वाली सब्जियां उतनी सब्जी देती थीं जिससे पूरा परिवार भरपेट सब्जी खाता था, फल फूल मित्रों और सम्बन्धियों में भी बाँटते थे। सब ओर बड़ी प्रसन्नता बिखेर रखी थी थोड़ी-सी मिट्टी के इन थोड़े से पौधों ने।

दरवाजे के सहन पर उन्हीं दिनों एक पौधा उग आया। यह पौधा मिश्र जाति का था उससे घर की शोभा निखर उठती थी, दरवाजे पर सघन छाया के अतिरिक्त उसमें नन्हें-नन्हें पक्षी बैठ कर प्रातः सायं चहचहाते तो वहाँ प्राकृतिक संगीत का आनन्द प्रवाहित होने लगता। बसंत ऋतु में उसमें फूल लद जाते तो उसके आकर्षण से मधुमक्खियाँ, तितलियाँ दूर-दूर से दौड़े चली आयीं।

अन्याय की सीमा यहीं तक नहीं रही इन लोगों ने उसके नीचे आग जलाना, खाना पकाना भी प्रारम्भ कर दिया जिससे पक्षीगण वहाँ से भाग गये। आत्मीयता की भावना से ओत-प्रोत वृक्ष ने अपनी डालें बढ़ाकर उनके आँगन में भी छाया कर दी तो उन लोगों ने न केवल डालें ही छाँट दी अपितु उसे जड़ से सुखा डालने की गरज से उसकी तमाम सारी जड़ें भी काट डालीं। जिस तरह संत और सज्जन गाली देने वाले के प्रति भी विनम्र हितैषी और मृदुभाषी बने रहते हैं उसी तरह उस वृक्ष ने इतनी व्यथा सहकर भी अपनी प्रवृत्ति रोकी नहीं। उसे न जाने किस शक्ति का बल था जो निरन्तर बढ़ता ही रहा।

इस बीच विलक्षण दुर्घटना घटी, अब तक जो वृक्ष वनस्पति पेड़-पौधे इस परिवार के प्रति आत्मीयता उदारता और सहयोग का भाव रखते थे अपने एक सजातीय के प्रति दुर्व्यवहार देखकर क्रुद्ध हो उठे। अर्थात् उन सब ने असहयोग प्रारम्भ कर दिया। चीकू के पौधे कुम्हला कर सूख गये, अँगूर की बेलों ने फल देना बन्द कर दिया, अमरूदों में कीड़े पड़ने लगे और सब्जियों तक ने फल देने से इनकार कर दिया। लॉन में लगी दूब ने अपने भाइयों का साथ दिया वह भी पीली पड़ गई।

फोर्ड परिवार को बड़ी चिन्ता हुई उसने समझा कि पोषण तत्वों के अभाव में ऐसा हो रहा होगा अतएव मिट्टी की जाँच कराई गई, बोतलों में से नया प्लाज्मा तत्व संग्रहीत किया गया। कीटनाशक छिड़के गये, अच्छी बढ़िया खाद दी गई तो भी परिणाम शून्य रहा। न केवल वनस्पति शास्त्री अपितु रसायनज्ञों, फिजीशियनों तक की सहायता ली गई उनने जो भी उपाय सुझाये सब प्रयोग में लाये गये किन्तु समस्या अपने स्थान से टस से मस नहीं हुई।

कोरेफार्ड ने उस समय की अपनी व्यथा व्यक्त करते हुए लिखा है- उस समय मैं बगीचे में आता तो मुझे हर पौधा नाराज और बीमार प्रतीत होता, यहाँ तक कि झाड़ियाँ जो मेरे लिए निरर्थक थी वह तक अप्रसन्न दीखती। शायद यह किसी विषाणु (वायरस) के कारण हो, उसकी भी जाँच कराई गई पर था रोग शरीर में नहीं प्रकृति के मन में ही, लगता था अन्यथा वैज्ञानिकों के इतने प्रयत्नों का कोई तो प्रतिफल निकलता। प्रकृति के सम्मुख पराजय का इतना बड़ा दृश्य अन्यत्र देखने में नहीं आया यह बात सम्पर्क में आये प्रत्येक वैज्ञानिक ने स्वीकार की जो पौधे ठीक वैसी ही मिट्टी में अन्यत्र फलते-फूलते उन्हें नर्सरी से लाते ही यह मनोव्यथा लग जाती और पौधा दो दिन में ही कुम्हला कर अपने भाइयों के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में सम्मिलित हो जाता। प्रकृति में इतना घनिष्ठ सहयोग यदि कहीं सर जान स्टुअर्ट मिल को देखने को मिल गया होता तो वे ‘प्रकृति में उपयोगिता बाद’ के सिद्धान्त का प्रतिपादन न करते। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है यह लिखने की अपेक्षा वह छोटे-छोटे लोगों में भी सहयोग की प्रवृत्ति है यह प्रतिपादित करते।

इस बीच पूर्व जन्म के किसी भयंकर अपराध के प्रतिशोध की तरह उस बड़े वृक्ष की जड़ों ने भीतर ही भीतर ऐसा विकास किया कि दरवाजे के खम्भों को ही फाड़ दिया। उससे मकान की चूलें-चरमरा गईं। प्रकृति के इस भयंकर प्रतिशोध के कारण फोर्ड परिवार बुरी तरह भयभीत हो उठा। उन लोगों ने अन्यत्र मकान ले लिया और वह घर ही छोड़ कर चले गये।

उन्होंने देखा कल तक जो पेड़ पौधे कुम्हलाए पड़े थे उन सबमें हर्ष की लहर थी, सब में नूतन चेतनता थी, पौधे बढ़ने लगे फूलने फलने लगे, पक्षी फिर लौट आये, गिलहरियाँ फिर कुतर-कुतर करने लगी, प्रातः सायं पुनः कलख गान होने लगा।

कुछ धार्मिक व्यक्तियों ने कहा फोर्ड! लगता है तुम पिछले जन्मों में कोई पूँजीपति थे और श्रमिकों का शोषण करते थे या कि मिलावट का, कम तौल का, घटिया माल बेचने वाले दुकानदार थे यह इसका प्रतिफल है, कुछ ने इसे बड़े वृक्ष का शाप बताया जो भी हो प्रकृति ने यह दिखा दिया कि मनुष्य के लिए वह अपनी इच्छा से ही उपभोग्य हो सकी है उसकी बर्बरता से नहीं वह इतनी समर्थ है कि मनुष्य उसे जीत नहीं सकता उसकी उपासना से चाहे जितने लाभ ले लें।

प्रकृति परमात्मा को व्यवस्थापिका शक्ति है। यह भूल नहीं करनी चाहिए कि परमात्मा नहीं देखता तो कुछ भी किया जा सकता है। प्रकृति का प्रत्येक तिनका उसका प्रतिनिधि, उसकी सहायक शक्ति है यह मानकर कहीं भी कुछ भी पाप करने से डर कर ही रहना चाहिए उसको उपासना के तो और भी सात्विक परिणाम उपलब्ध किये जा सकते हैं।

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पेड़ तो चल पड़े, पर मनुष्य बैठा है।

‘नेचर मैगज़ीन’ के सितम्बर के 61 वे अंक में श्री हेनरिक हाज ने मेन ग्रोव नामक एक ऐसे वृक्ष का उल्लेख किया है जो यायावर जिन्दगी बिताता है, परिव्राजकों की तरह धूम-धूम कर लोगों में कौतूहल, सौन्दर्य और जीवन का मात्र प्रवास मानने की प्रेरणा देता रहता है।

‘दि ट्री बैट बाक्स’ शीर्षक से लिखे इस लेख को पढ़ने के बाद कुछ क्षणों के लिए ‘कैटर पिलर’ जीव की बात याद आये बिना नहीं रही, यह जीव जब लाख की स्थिति में होता है तो उसकी आँखों के ऊपर से सींग की तरह बर्रो की मूँछ के समान दो बाल फूटते हैं। धीरे-धीरे यह बाल ऊपर बढ़ने शुरू होते हैं और कीड़ा एक पौधे की शक्ल में बदल जाता है। वृक्षों में जीवन और प्रकृति में चेतना का दिग्दर्शन कराने वाला यह बहुत ही कौतूहलवर्द्धक उदाहरण है। चेतना शरीर छोड़ कर बाहर जाने की अपेक्षा अन्तर्मुखी होकर एक वृक्ष का रूप ग्रहण कर सकती है तो शरीर छोड़कर कुछ समय चेतन शरीर, परमाणुओं से बने शरीर, जीन्स प्रसुप्त स्थिति में रहकर नव जीवन धारण की शक्ति संग्रह का वृक्ष वनस्पति का रूप धारण करते हों तो उसमें आश्चर्य क्या? भारतीय योग दर्शन में जीवन की जड़ अवस्था को ही वृक्ष का रूप बताया है, आत्म चेतना की दृष्टि से मानव सत्ता और वनस्पति सत्ता में कुछ अन्तर नहीं हैं। यह वृक्ष उस प्रतिपादन की अगली शृंखला को भी पूरा कर देता है। अर्थात् आत्म सत्ता वाली वस्तु को गतिशील होना चाहिये। वृक्षों के गतिशील होने का यह प्रत्यक्ष उदाहरण है।

इस घुमक्कड़ वृक्ष मैन गाँव की जन्मभूमि मियामी, फ्लैरिड तथा बिस्कैनी की खाड़ी हैं। फ्लैरिडा के कुछ वृक्ष वहाँ से 1000 मील का समुद्री सफर तय करके पेनिनसुला तक तथा कैरेबियन समुद्र से होकर प्रशान्त और हिन्द महासागर के तट तक फैलकर इन्होंने चरैवैति-चरैवैति के शास्त्रीय अभिमत का पालन किया हैं। सम्भवतः अपने इस गतिशील स्वभाव के कारण की यह रोग-शोक से मुक्त परमात्मा की सृष्टि के मात्र दृष्टा होने का आनन्द लेते रहते हैं।

जिन दिनों भारत वर्ष में वानप्रस्थ परम्परा थी, सामान्य गृहस्थ उन्हें अत्यधिक सम्मान दिया करते थे उसके पीछे उनका तपस्वी और जन प्रवाह के विपरीत नैसर्गिक जीवन की साधना जुड़ी रहती थी। पेट और प्रजनन का जीवन पीने और मनुष्य जीवन की चादर को दाग धब्बों से गन्दी कर लेने वालों को यह तपस्वी ही सच्ची शान्ति का आध्यात्मिकता का पाठ पढ़ाते थे और स्वयं सांसारिक रोग-शोक और प्रकृति की प्रतिकूलता से पड़ने वाली कठिनाइयों में भी आनन्द भरा जीवन जिया करते थे। यह विशेषताएं अब मनुष्य समाज से तो नष्ट हो गई है, पर इस वृक्ष के जीवन में परिव्राजक की इस पवित्रता का ही प्रभाव है कि वह तूफानों, ज्वार-भाटों में भी अपनी सत्ता-सामर्थ्य को बनाये रखता है, विलक्षण साम्य यह है कि न तो भरण-पोषण का कोई आधार परिव्राजक के पास होता है और न ही, इस वृक्ष के पास। क्योंकि चलने वाले वृक्ष की जड़ें स्थिर हो ही नहीं सकती। समाज अपनी सेवा के बदले, सन्त के निर्वाह की व्यवस्था आप करता है। इसी तरह समुद्र का सौन्दर्य बढ़ाने वाले इस मैनग्रोव के लिए जीवन व्यवस्थाएं समुद्र से उसे स्वयं मिल जाती हैं। खारे पानी में अन्य वृक्ष उसी तरह नहीं पनप सकते जिस तरह हर क्षण सुविधाओं के परावलम्बी थोड़ी-सी कठिनाइयों से ही घबरा उठते हैं दूसरी ओर उसी पानी में यह वृक्ष अपना गुजारा आसानी से कर लेते हैं शुद्ध पानी की कमी को यह पौधे अपनी पत्तियों से संचित जलकणों से उसी तरह पूरी कर लेते हैं। जिस तरह मरुस्थल के ऊँट शरीर में बनी थैली में संचित जल से।

यह वृक्ष प्रारम्भ में तट के कीचड़ वाले भागों में पैदा होता है विचारवान् व्यक्तियों के द्वारा इन्द्रिय लिप्सा और सांसारिक सुखों से विरक्ति की तरह यह पौधे ठंडक में ठिठुरते रहने की अपेक्षा परिव्राजन की उष्णता का आनन्द लेते हुए वहाँ से समुद्र की ओर चल देते हैं। इनकी जड़ों में एक विलक्षण प्रक्रिया होती है ऊपर से हवा कीचड़ के भीतर जड़ को जाती है जिससे जड़ों में उस तरह की क्रिया होती है जिस तरह रेंगने वाले कीड़े अपनी पीठ वाले हिस्से को उठा कर चिमटी की-सी आकृति बना लेते हैं। फिर सिर की तरफ का भाग आगे बढ़ाते हैं। इसी तरह वे एक लम्बी यात्रा करते रहते हैं। सामान्य अवस्था में मैनग्रोव की जड़ें जहाज द्वारा लंगर डाल लेने के समान कीचड़ को पकड़े रहती है और वायु द्वारा कीड़े की तरह जड़ें आगे भी बढ़ती रहती हैं। यह गति यद्यपि मन्द होती है, पर कुछ ही समय में वे जाने कहाँ से कहाँ चले जाते हैं। बुद्ध द्वारा आपातकालीन प्रव्रज्या आन्दोलन के लिए सैकड़ों परिव्राजक एक साथ धर्म चक्र प्रवर्तन के लिए झोंक देने का परिणाम यह हुआ कि उस समय विकराल रूप धारण किये अश्रद्धा अन्धविश्वास, अधार्मिकता और अपवित्रता का असुर वहीं रोक दिया गया। इस वृक्ष ने भी एक बार द्वितीय विश्व युद्ध के समय अमरीकी सैनिकों को बर्बर आक्रमण से रोक दिया। जिस समय अमरीकी नौ सैनिक आग बढ़े इन वृक्षों की पूरी की पूरी कालोनियाँ आगे सामना करने के लिए उसी तरह डटी पाई गईं जिस तरह युग निर्माण मिशन के परिव्राजक युग की अन्ध तमिस्रा से जूझने के लिए उठ खड़े हुए हैं।

परिव्राजन के विकास का अपना विलक्षण इतिहास है। मैनग्रोव वृक्ष की वंश वृद्धि भी वैसी ही प्रेरणाओं से भरी हुई है। कोई यह न समझ ले कि यह पौधे बौने होते होंगे। इनकी पूरी ऊँचाई सौ-सौ फुट तक होती हैं। ज्ञान से परिपक्व परिव्राजक जब क्षेत्रों में जाते हैं तो उन प्रतिभाओं और विभूतियों को जो, क्षमतावान् होकर भी युग के अन्धे प्रवाह में बहते रहते हैं, झकझोर कर जगा देते हैं और उन्हें लोक मंगल की दिशा में चल पड़ने के लिए विवश कर देते हैं। यह कार्य वे उनके हृदयों में परमात्मा द्वारा सौंपी गई मानवीय गरिमा के बोध और मानवीय पतन व पीड़ा के प्रति संवेदना के अंकुर जगा कर करते हैं। ऐसे ही यह वृक्ष भी हैं। पीले रंग के फूलों से आच्छादित इस वृक्ष के फल जब पकते है तो उन फलों में अंकुर भी डाल में लगे-लगे ही फूट पड़ते हैं। जब तक यह अंकुर आठ दस फुट के नहीं हो जाते तब तक पौधे की डाल से उसी तरह लगे रहते है जिस तरह परिव्राजक योग्य व्यक्तियों को आत्मोत्कर्ष के संदेश देकर तब-तक पकाते रहते है, जब तक उनकी घनिष्ठता, श्रद्धा और निष्ठा में परिणत नहीं हो जाती। इस तरह अंकुरित फल एक धड़ाके के साथ टूटता है और 10-12 इंच का नुकीला अंकुर तेजी से समुद्र की गहराई में धँसता चला जाता है। यदि उसने धरती पाली तो वही से नये वृक्ष के रूप में पनपना प्रारम्भ कर देता है। कदाचित ऐसा न हुआ तो वे फिर जल की ऊपरी सतह में आकर तैरना प्रारम्भ कर देते हैं। तैरते-तैरते वे एक संगठन बना कर काम करने की तरह कई ऐसे अंकुरित फल मिलकर कालोनी बना लेते हैं और जहाँ कहीं उचित स्थान मिला वहीं अपनी जड़ें जमाकर आत्म विकास प्रारम्भ कर देते हैं।

हजारों की संख्या में इस तरह यह वृक्ष पैदा होते, आगे बढ़ते हुए मनुष्य को अध्यात्म की, गतिशीलता की, पवित्रता की, कर्त्तव्य-निष्ठा की प्रेरणा देते रहते हैं। पर मनुष्य अपने कर्त्तव्यों से इतना निष्ठुर हो गया है कि युग की पीड़ा सुनकर भी जागता नहीं। जड़ बना बैठा है।


Quotation

गुणों के विकास का परिणाम ही सौभाग्य और उनकी कमी का प्रतिफल ही दुर्भाग्य बनकर सामने आता है। जैसे तेल और बाती जुटने पर ही दीपक प्रकाश फैलाता है, वैसे ही गुणों और क्षमताओं का समन्वय मनुष्य के भाग्य को प्रकाशित करता है।

- ला रोश फूको

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वानप्रस्थ नव-युग का प्रमुख आधार

प्राचीन काल में वानप्रस्थ की सामान्य योग्यता दो बातों पर निर्धारित थी एक यह कि आधा आयुष्य पूरा हो गया हो। दूसरा यह कि पारिवारिक उत्तरदायित्व से निवृत्ति मिल गई हो। यह दोनों की शर्तें सामान्य और सौम्य परिस्थितियों की दृष्टि से सही है, पर इन्हें पत्थर की लकीर नहीं समझा जाना चाहिए। विशेष परिस्थितियों के विशेष नियम भी बन जाते हैं आपत्ति काल के लिए शस्त्रों में आपत्ति धर्म का निरूपण हैं। वह सामान्य परिस्थितियों से सर्वथा भिन्न है। महामारी, भूकम्प, अग्निकाण्ड आदि की विशेष परिस्थितियाँ सामने आ जाने पर लोग अपने घरों के सामान्य काम-काज छोड़कर उस विपत्ति से ग्रसित लोगों की सहायता करने दौड़ पड़ते हैं, कोई दुर्घटना घटित हो जाने पर नई आपत्ति का सामना करने की व्यस्तता में स्नान, भोजन, निद्रा जैसे सामान्य नित्य कर्मों की भी उपेक्षा कर दी जाती है। यह आपत्ति धर्म है।

शत्रु का देश पर आक्रमण होने की दशा में सभी नागरिकों को अनिवार्य रूप से सेना में भर्ती होना पड़ता है। सामान्य नियम यह है कि जिसकी इच्छा हो वह अर्जी देकर सेना में भर्ती हो। वे नियम आपत्ति काल में नहीं चलते। सैनिक की निर्धारित आयु से न्यून या अधिक रहने पर भी उन दिनों भर्ती के लिए दबाव दिया जाता है और युद्ध मोर्चे पर जाने की ट्रेनिंग करने की अवधि पूरी न होने पर भी बन्दूक चलाने आदि की थोड़ी सी जानकारी देकर उन रंगरूटों को रण क्षेत्र में भेज दिया जाता है। आपत्तिकाल में, विशेष परिस्थितियों में, ऐसी ही उतावली करनी पड़ती है। विवशता में ऐसी उलट-पुलट का होना आश्चर्यजनक नहीं माना जाता।

भगवान बुद्ध ने स्वयं किशोरावस्था पूरी होते-होते परिव्रज्या लेली थी। उनकी पत्नी भी नव-वधू थी और उसकी गोदी में एक ही नवजात शिशु था। गृह प्रबन्ध सम्भालने का उत्तरदायित्व भी किसी दूसरे को विधिवत् नहीं सौंप सके थे। समय ने उन्हें पुकारा और वे बिना आगा पीछा सोचे चल पड़े। वानप्रस्थ की निर्धारित परम्परा का पालन करने के लिए उन दिनों उतना अवसर ही नहीं था। आपत्ति धर्म का पालन ही उन्हें उपयुक्त लगा। सामान्य प्रचलन के अनुसार समय की प्रतीक्षा करने से असंख्यों का अहित होता था नियम के व्यतिक्रम में तो एक ही परिवार के थोड़े से व्यक्तियों को असुविधा सहनी पड़ती थी। बहुत के लिए थोड़े का त्याग करना ही उस स्थिति ने, विवेक ने सही बताया सो अन्तरात्मा की पुकार पर वे बिना आगा पीछा सोचे युग की आवश्यकता पूरी करने के लिए आत्माहुति लेकर बढ़ ही गये।

न केवल अपने लिए वरन् अन्य सभी भावनाशील लोगों के लिए उन्होंने वह रास्ता खोल दिया न केवल रास्ता खोला वरन् आह्वान भी किया। एक लाख से अधिक भिक्षु और भिक्षुणी उनके जीवनकाल में ही परिव्रज्या की दीक्षा ले चुके थे। वे सभी नव यौवन में प्रवेश कर रहे थे। वानप्रस्थ की निर्धारित तिथि आने में देर थी। उतनी प्रतीक्षा की नहीं जा सकती थी। समय की गुहार कानों को फोड़ती और हृदय को चीरती थी। सामान्य नियम पालन--असामान्य समय में कैसे बन पड़ता? यदि बुद्ध ने इस मर्यादा का व्यतिक्रम न किया कराया होता तो उन दिनों का नैतिक और सामाजिक संकट अपनी सर्व भक्षी विनाश लीला में शालीनता के रहे बचे तत्वों को भी समाप्त कर देता।

गाँधी ने सत्याग्रही सेना में भर्ती होने के लिए स्कूली छात्रों तक का पढ़ाई छोड़कर चले जाने का आमन्त्रण किया। वैसा ही हुआ भी। नियमानुसार लोक सेवा के लिए परम्परागत आयु अधेड़ों की ही होती है। यदि उन्हीं के लिए प्रतीक्षा की गई होती तो सत्याग्रही सेना में जो दो तिहाई नव युवक थे उनमें से किसी को भी प्रवेश न मिलता। ठंडे रक्त वाले वानप्रस्थी जब उस आपत्तिकालीन आवश्यकता को पूरा कर भी न पाते और स्वतन्त्रता संग्राम जीतना तो दूर प्रखर जन शक्ति के अभाव में उनका सरंजाम भी खड़ा न हो पाता। सम्भवतः भगवान बुद्ध के सामने भी ऐसा ही धर्म संकट रहा होगा अगति को प्रगति में बदलने के लिए धर्मचक्र का प्रवर्तन आवश्यक था। उसके लिए समर्थ भुजबल-मनोबल ही अपेक्षित था। वह जहाँ भी दृष्टिगोचर हुआ वहीं उन्होंने अपना अंचल जा पसारा।

समर्थ गुरु रामदास विवाह की वेदी पर कंगन बँधी वधू को बैठी छोड़कर भग दिये थे। आद्य शंकराचार्य की माता पुत्रवधू लाने और पोता गोदी में खिलाने के लिए मचल रही थी, युवक शंकर ने परिवार वालों की इच्छापूर्ण करने के लिए अपने बहूमूल्य जीवन को नष्ट करने से स्पष्ट इनकार कर दिया। ऐसे-ऐसे असंख्य उदाहरण इस संदर्भ के मौजूद हैं कि असामान्य परिस्थितियों का सामना करने के लिए सामान्य परिपाटी काम नहीं आई तो गुरुगोविन्द सिंह जैसे पिताओं ने अपने पुत्रों को बलिदान होने के लिए स्वयं प्रोत्साहित करके भेजा। पतियों को पत्नियों ने तिलक लगाकर रण क्षेत्र में विदा किया है। राजस्थान के एक इलाके में यह प्रथा थी कि घर का एक सदस्य सेना में बना ही रहता था। एक के निवृत्त होने पर उस घर का दूसरा सदस्य उस स्थान को जा संभालता था। युद्ध क्षेत्र में जूझने वाले के स्त्री-बच्चों को परिवार के अन्य सदस्य सँभालते थे।

आयुष्य कितनी है इसका ठिकाना प्राचीन काल के सौम्य जीवन क्रम में तो कुछ था भी। आज का असंयमी और असंतुलित रीति-नीति अपनाकर चलने वाला मनुष्य कब तक जीवित रहेगा। जीवित रहने पर भी मृतक तुल्य अशक्त तो नहीं बन जायगा इसका कुछ ठिकाना नहीं। फिर आधी आयु कितने वर्ष की मानी जाय? कब से परमार्थ की बात सोची जाय? यह प्रश्न उलझा हुआ ही रह जाता है।

आज की परिस्थिति में आज के अनुरूप हल सोचने होंगे। जागृत आत्माएँ यदि वर्तमान आपत्ति काल में परमार्थ प्रयोजनों के लिए अग्रसर होने का अपना उत्तरदायित्व समझती है और उसके लिए सचमुच ही कुछ करने की इच्छुक है तो समस्याओं के समाधान दूसरे ढंग से सोचने होंगे जिनके बच्चे स्वावलम्बी हो गये, उनके सामने और कोई बड़ी अड़चन ऐसी नहीं है जो उन्हें परमार्थ परायण जीवन क्रम अपनाने से रोके। यदि कुछ छोटे बच्चे अभी अपरिपक्व है तो यह देखना चाहिए कि उनके अग्रज क्या उनका दायित्व सँभालने की मन स्थिति में है। यदि हो तो उन्हें पितृऋण चुकाने का अवसर देना चाहिए कि अभिभावकों का उत्तरदायित्व बालकों को स्वावलम्बी बनाने भर का होता हैं इसके बाद संतान को अपना पितृऋण चुकाना पड़ता हैं। आवश्यक नहीं कि वह ऋण सीधा माँ-बाप को ही वापिस किया जाय। छोटे बहिन भाइयों को सँभालने के रूप में भी अभिभावकों का कर्जा चुकाया जा सकता है। यह धर्म परम्परा यदि अपनाई जा सके तो अधेड़ आयु में कुछ बच्चों का उत्तरदायित्व रहते हुए भी युग की पुकार के अनुरूप अनुदान प्रस्तुत करने का अवसर मिल सकता है।

जिनके पास गुजारे लायक संचित पूँजी चल-अचल सम्पत्ति है उसे अनुपयोगी स्थिति में पड़ी न रहने देकर बैंक में जमा कर सकते हैं और उसकी ब्याज से परिवार की निर्वाह व्यवस्था बनाकर निश्चिंततापूर्वक लोक-मंगल के पुण्य प्रयोजनों में लगे रह सकते हैं।

जिन्हें रोज कुँआ खोदना और रोज पानी पीना पड़ता है आवश्यक समय आजीविका उपार्जन तथा शरीर निर्वाह एवं परिवार व्यवस्था में लगाने के उपरान्त भी परमार्थ प्रयोजनों के लिए कुछ न कुछ समय बचा ही सकते हैं। इतना अंशदान भी यदि नियमित रूप से चलता-अवकाश के दिनों को युग धर्म की पुकार को पूरी करने के लिए लगाया जाता रह सके तो उतने भर से भी बहुत कुछ हो सकता है। बूंद-बूंद जमा करने से घड़ा भर सकता है।

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क्षुद्र प्राणियों का विशाल अंतःकरण

स्वार्थ और आत्म रक्षा की प्रवृत्ति सभी प्राणियों में पायी जाती है। यह प्रवृत्ति जीवन को प्रेम करने के फलस्वरूप ही विकसित हुई। यह बात दूसरी है कि उन प्रवृत्तियों का विकास कितने परिष्कृत अथवा विकृत रूप में होता है परन्तु यह सच है कि प्रत्येक प्राणी में एक ऐसी चेतन सत्ता विद्यमान है जो निरन्तर ऊंचा उठने की प्रेरणा देती है। स्वार्थों की पूर्ति के साथ-साथ उच्च आदर्शों को जीवन में आत्मसात् करने की प्रेरणा देने वाली इस चेतन सत्ता का नाम ही अन्तरात्मा है।

मनुष्य समाज में तो कितने ही लोग-उच्च आदर्शों की पूर्ति के लिए अपने तुच्छ स्वार्थों को बलि देते देखे जा सकते हैं। समाज भी ऐसे व्यक्तियों को महामानव देवात्मा आदर्श पुरुष कहकर सम्मानित करता और श्रद्धा से शीश नवाता है। अन्तरात्मा के रूप में सम्बोधित की जाने वाली यह चेतना केवल मनुष्य के पास ही नहीं है वरन् अन्य पशु पक्षियों में भी, जिनके पास बुद्धि का अभाव है, सोचने समझने की क्षमता नहीं है इन आदर्शों के प्रति अगाध प्रेम देखा गया है। अमरीकी लेखक एच॰ ए॰ जेज ने पशु पक्षियों के आपसी व्यवहार का लम्बे समय तक अध्ययन किया और अपने निष्कर्षों को ‘विजडम ऑफ एनिमल्स’ नामक पुस्तक में लिखा। इस पुस्तक में एच॰ ए॰ जेज ने कितनी ही ऐसी घटनाओं का उल्लेख किया जो यह प्रमाणित करती है कि पशु-पक्षियों में भी नैतिक चेतना तथा आदर्शों के प्रति प्रेम होता है और वे इन आदर्शों को प्राण पण से निवाहते भी हैं।

एच॰ ए॰ जेज ने अपनी पुस्तक ‘विजडम ऑफ एनिमल्स’ में एक पालतू बिल्ली तथा एक तोते की दोस्ती का उल्लेख किया है। सामान्यतः बिल्ली तोते को देखते ही झपटने की कोशिश करती है परन्तु उक्त पुस्तक में जिस बिल्ली और तोते का उल्लेख किया गया है, वे परस्पर एक-दूसरे को बहुत प्रेम करते थे। घर में जब कोई नहीं होता तो बिल्ली तोते को इस प्रकार खिलाती रहती थी जैसे कोई बच्चा खिला रहा हो। एक दिन उनकी मालकिन रसोई में कोई चीज पकाने के लिए चूल्हे पर रखकर ऊपर कमरे में चली गई और वहाँ किसी काम में व्यस्त हो गयीं। बिल्ली और तोते दोनों ही रसोई में खेलने लगे। खेलते-खेलते तोता पकने के लिए चढ़ाये गये बर्तन में गिर पड़ा। बिल्ली तुरन्त ऊपर वाले कमरे में दौड़ी गयी और मालकिन के कपड़े खींच कर, उछल कर व्याकुलता प्रदर्शित करने लगी। मालकिन ने झल्ला कर कहा, क्या बात है? तो बिल्ली ने उसकी ओर कातर भाव से देखा तथा रसोई की ओर चल पड़ी। पता नहीं उसकी आँखों में क्या भाव थे कि मालकिन ऊपर वाले कमरे से निकलकर रसोई की ओर बिल्ली के पीछे-पीछे चल दी। वहाँ जाकर उसने देखा कि तोता चूल्हे पर चढ़ाये गये बर्तन में गिर पड़ा है और बुरी तरह छटपटा रहा था। मालकिन ने उसे बाहर निकाला। यदि बिल्ली उस समय अपनी मालकिन को बुलाने नहीं जाती तो निश्चय था कि तोते के प्राण निकल गये होते।

पशु अपने सजातीय प्राणियों-परिवार के सदस्यों, बच्चों से तो प्रेम करते ही हैं, उन्हें साथ लिए घूमते और स्नेह का परिचय देते हैं। परन्तु दूसरे पशुओं से भी प्रेम सम्बन्ध बनाने, स्नेह सौहार्द्र बढ़ाने और मैत्री करने के उदाहरण बहुत कम देखने को मिलते हैं लेकिन मिलते अवश्य हैं। बरमिंघम (ब्रिटेन) में सर सैमुअल गुडवीईयर के यहाँ एक टट्टू था उसकी एक खच्चर से अच्छी दोस्ती हो गयी थी और दोनों बाड़े से निकलकर देर तक घूमा करते थे। टट्टू को एक बाड़े में रखा जाता था बाड़े का फाटक अन्दर से एक चटखनी से बन्द होता था और बाहर से कुंडी द्वारा टट्टू अपना सिर फाटक के ऊपर तो कर सकता था किन्तु वह बाहरी कुंडी तक नहीं पहुँच सकता था फिर भी वह अक्सर बाड़े के बाहर खुले में घूमता देखा जाता था। यह एक रहस्य ही था कि बाड़े का फाटक कैसे खुल जाता था?

एक दिन सर सैमुअल ने देखा कि टट्टू पहले भीतरी चटखनी को झटके देकर खांचे से अलग करता और फिर रेंकना शुरू कर देता। उसकी आवाज सुनकर बाहर एक खच्चर आ जाता। खच्चर अपनी नाक से धकेल कर कुंडी खोल देता फिर दोनों साथ-साथ घूमते।

‘वेजल’ नामक एक जर्मन पत्रिका में एक कुत्ते और बिल्ली की मित्रता का वर्णन छपा है। कुत्ते और बिल्ली जन्मजात शत्रु होते हैं परन्तु यह कुत्ता और बिल्ली साथ-साथ खाते पीते, उछलते कूदते और साथ-साथ उठते बैठते थे। इनके मालिक ने कुत्ते और बिल्ली की मैत्री को परखना चाहा। वह केवल बिल्ली को अपने कमरे में ले गया और उसे खाना दिया उसने बड़े मजे में खाना खाया। ऐसा लगा कि कुत्ते की अनुपस्थिति बिल्ली को जरा भी नहीं खली है। फिर एक तस्तरी में खाना रखकर वह तस्तरी आलमारी में रख दी गयी। अलमारी में ताला नहीं लगाया गया और बिल्ली को खुला छोड़ दिया गया। बिल्ली तुरन्त कमरे से बाहर गयी और थोड़ी देर में वह अपने साथी कुत्ते को वहाँ बुला करले आयी। दोनों उस अलमारी तक गये फिर बिल्ली ने धक्के से अलमारी का दरवाजा खोला तथा उछलकर कुत्ते को वह तश्तरी दिखाने लगी। कुत्ते ने तश्तरी देख ली और उसने अपने पंजों से दबाकर तश्तरी को बाहर निकाल लिया। पहले उसने बिल्ली की ओर भी तश्तरी खिसकाई परन्तु बिल्ली पीछे हट गई जैसे वह कह रही हो, मैं तो खा चुकी हूँ कुत्ते ने भी जैसे बिल्ली का आशय समझ लिया और तश्तरी को अपने पंजे में दबाकर सारा खाना खा गया। जब तक कुत्ता खाना खाता रहा तब तक बिल्ली उस स्थान पर ऐसे बैठी रही जैसे वह पास बैठकर खिला रही है।

एक दूसरे के प्रति प्रेम और कोमल भावनाओं का प्रदर्शन तो ठीक है। पशु पक्षी अपनी मित्रता में अवरोध उत्पन्न करने वाले कारणों को भी दूर करते हैं। दूसरों की इच्छा या अनिच्छा अथवा बहकने पर जुड़ने-टूटने वाली मित्रता का आधार स्वार्थ ही हो सकता है क्योंकि मित्रता सच्चे हृदय से की जाती है और बाहरी कारणों से स्थिर बनती अथवा टूटती नहीं है। प्रसिद्ध अंग्रेजी साप्ताहिक ‘स्टेट्स मेन’ में एक पिल्ले और सूअर की ऐसी ही मित्रता का वर्णन छपा था। वे दोनों साथ-साथ घूमते थे। उनके स्वामी को यह पसन्द न था इसलिए उसने पिल्ले के गले में लकड़ी का एक छोटा-सा किन्तु वजनदार टुकड़ा बाँध दिया। ताकि वह भाग न सके किन्तु उसने पहले ही दिन देखा कि उस पिल्ले के गले में पड़ी रस्सी कट गई थी और वह सूअर के साथ स्वतंत्र घूम रहा था। दूसरे दिन पिल्ले के गले में चमड़े का मजबूत पट्टा डाला गया और उसमें लकड़ी का टुकड़ा जंजीर से लटकाया गया। लेकिन उस दिन भी पट्टा कट गया और लकड़ी का वह टुकड़ा कहीं गिर पड़ा। पिल्ला अपने पट्टे को स्वयं कदापि नहीं काट सकता था। फिर वह कैसे कट जाता है यह देखने के लिए निगरानी की गई तो पाया गया कि यह काम उसके दोस्त सूअर का ही है।

यह तो हुई सामान्य मैत्री धर्म की बातें, साथ-साथ रहने उठने बैठने के कारण आपस में इस तरह की घनिष्ठता को स्वाभाविक भी कहा जा सकता है परन्तु पशु पक्षी में कर्तव्य भावना, विपत्तिग्रस्तों के प्रति सहयोग सद्भाव तथा पीड़ित जनों से सहानुभूति और आततायी के प्रति आक्रोश की भावनायें भी खूब पाई जाती हैं। युद्ध में घोड़ों के उपयोग की चातुरी, कुत्ते की स्वामिभक्ति और दूसरे घरेलू जानवरों का प्रेम तो आये दिन देखने को मिलता ही है। इस तरह की कई घटनायें इतिहास प्रसिद्ध भी है ऐसा नहीं है कि ये पशु इस तरह का विशेष व्यवहार अपने मालिक के साथ ही करते हों। उनके अपने साथियों के प्रति भी उनका व्यवहार कई बार इतना सूझ-बूझ भरा होता है कि देख-सुन कर दंग रह जाना पड़ता है।

कुछ दिन पर्व अमेरिका के प्रसिद्ध पत्र ‘लाइफ’ में व्यक्ति की आँखों देखी घटना का वर्णन छपा था। हुआ यह कि एक भेड़ का बच्चा किसी तरह काँटेदार झाड़ी में उलझ गया था। उसने झाड़ी से निकलने की बहुतेरी कोशिश की परन्तु बेचारा अंततः असफल रहा और थका कर निराश हो गया। पास ही उसकी माँ भेड़ भी चर रही थी। झाड़ियों में खड़खड़ाहट सुनकर उसे न जाने क्या शंका हुई कि वह वहाँ देखने आयी। सामान्यतः इस प्रकार की आहट पाकर भेड़ बकरियाँ भाग जाती हैं परन्तु वह मादा भेड़ पास आई और अपने बच्चे को झाड़ियों में फँसा देखकर उसे निकालने की कोशिश करने लगी। वह भी विफल ही रही। निराश होने के बाद वह खेतों के पार चर रही दूसरी भेड़ों के पास गई। कुछ ही देर बाद वह एक नर भेड़ के साथ वापस लौटी। मेढ़े ने अपने सींगों से काँटेदार टहनियों को खींचना शुरू किया और कुछ ही देर में मेमना झाड़ियों से मुक्त हो गया। झाड़ियों से निकलने के बाद उसकी माँ और नर मेढ़ा उस मेमना का चाट-चाट कर जिस प्रकार प्रेम प्रदर्शित कर रहे थे लगता था उसे विपत्ति से छूट जाने के लिए आश्वस्त कर रहे हों और उसका भय मिटा रहे हों।

आततायियों के प्रति रोष-आक्रोश की भावना केवल मनुष्यों में ही नहीं होती वरन् पशु पक्षी भी अनीति का डटकर मुकाबला करते हैं। सामान्यतः कमजोर जानवर ताकतवर जानवर से डर जाते हैं और डरकर या तो भाग जाते है अथवा आत्मसमर्पण कर देते हैं। परन्तु कई बार वे गजब की साहसिकता तथा समझदारी का परिचय देते हुए आततायी का डटकर मुकाबला करते हैं। जे0 जे0 रीमेन्स ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है कि-- डबलिन में उनके मकान की खिड़की के पास अबावीलों के एक जोड़े ने घोंसला बनाया और उसमें रहने लगे। उन्हें रहते हुए कुछ ही दिन हुए थे कि एक गौरैया ने उनके घोंसला पर कब्जा कर लिया। अबावील दंपत्ति को यह देखकर बड़ा गुस्सा आया।

उन्होंने गौरैया की घोंसले से निकालने की जी तोड़ कोशिश की परन्तु गौरैया अपने शक्ति मद में जाकर घोंसले पर अड्डा जमाये ही रही। अन्त में अबावील दम्पत्ति अपने कुछ साथियों को ले आयी। उन्होंने गौरैया को घोंसले से बाहर निकालने की अपेक्षा उसकी उद्दण्डता का मजा चखाने का निश्चय कर लिया था। सभी अबावीलें मिलकर अपनी चोंचों में कीचड़ भर कर लाने लगी और उससे घोंसला का मुँह बन्द कर दिया। गौरैया अब भीतर ही बन्द हो गई थी कुछ दिन बाद जब वहाँ से घोंसला हटाया गया तो गौरैया मरी पाई गई। बेचारी को अपने किये की सजा जीवन से हाथ धोकर भोगना पड़ी थी।

पशु पक्षियों द्वारा किया जाने वाला यह विशेष व्यवहार आकस्मिक ही नहीं कहा जा सकता। मानवी बुद्धि की दृष्टि से इस तरह के सम्बन्धों की रीति-नीति नैतिक चेतना की जागरण से ही विकसित होती है। मनुष्य के भीतर भी अपने मित्रों व साथियों के प्रति निर्दोष निस्वार्थ त्याग भावना का उदय होता है। बुरे से बुरे और दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति में भी कई अवसरों पर विपत्ति ग्रस्तों से प्रति करुणा का भाव जाग उठता और कमजोर से कमजोर व्यक्ति भी अपने से बलवान आततायी से भिड़ जाने का साहस जुटा लेता है। कहने का अर्थ यह कि नैतिक चेतना अथवा अन्तरात्मा की प्रेरणा सभी प्राणियों में होती है, वह पशु-पक्षी हो या मनुष्य देवता। यह नैतिक चेतना अथवा अन्तरात्मा की प्रेरणा इस बात का प्रतीक है कि किसी भी प्राणी का जन्म और जीवन निपट उसका अपना मात्र ही नहीं है। बल्कि प्रत्येक प्राणी की समष्टिगत उपयोगिता है। प्रकृति ने उसे निजी स्वार्थों को पूरा करने के अलावा समष्टिगत उपयोगिता सिद्ध करने की भी भरपूर प्रेरणा प्रदान की है। मनुष्य को मिले अतिरिक्त साधन और विशेष सुविधायें तो इन प्रयोजनों को पूरा करने के लिए विशेष दायित्वों का बोध कराते हैं।


घोड़े पर नमक (kahani)

एक व्यापारी एक घोड़े पर नमक और एक गधे पर रूई की गाँठ लाद कर कहीं जा रहा था। रास्ते में एक नदी पड़ी। पानी में धंसते ही घोड़े ने डुबकी लगाई और काफी नमक पानी में घुलकर बह गया। गधे ने घोड़े से पूछा, यह क्या कर रहे हो तो घोड़े ने जवाब दिया- वजन हल्का कर रहा हूँ।

अपना वजन भी हल्का हो जायगा यह सोचकर गधे ने दो डुबकियाँ लगा लीं। पर उससे गाँठ भीग कर इतनी भारी पड़ गयी कि उन्हें ढोने में गधे की जान पर आफत आ गयी। बिना जाने समझे नकल इसी कारण तो हानिकारक होती है।

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प्रतिगृह का दान

महर्षि शांखल्यायन तथा महर्षि आत्रेय मुनि अपनी पत्नियों के साथ एकबार पर्यटन करते हुए राजा वृषादर्भि के राज्य में गये। साधना, तपश्चर्या द्वारा सिद्धि प्राप्त कर लेने के बाद इन ऋषियों ने परिव्रज्या ही अपना नित्यकर्म बना लिया था। वे न एक स्थान पर तीन दिन से अधिक रुकते और न ही संध्या के बाद बचने लायक धान्य ही अपने पास संग्रहीत रखते थे।

राजा वृषादर्भि के राज्य में उस वर्ष भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा। जिस देश में अन्न का अभाव हो वहाँ भिक्षा नहीं मांगनी चाहिए-महर्षियों ने यह भी अपना नियम बना रखा था। इसलिए वे क्षुधार्त होकर ही घूमते रहे। उन्होंने विचार किया कि कहीं कन्द-मूल मिल जायं तो उन्हें ही आहार रूप में ग्रहण कर क्षुधा शांत की जाय। परन्तु वर्षा के अभाव में कन्दमूल भी कहाँ मिलते? जो थे भी वह लोगों ने खा-पीकर समाप्त कर दिये।

अपने राज्य में महर्षियों के आगमन की बात सुनकर राजा वृषादर्भि उनके पास पहुँचा। साथ में महर्षियों को भेंट में देने के लिए राजा ने पर्याप्त मात्रा में अन्न, स्वर्ण मुद्रायें तथा मूल्यवान रत्न भी ले लिये थे। वृषादर्भि ने महर्षियों से जब यह भेंट स्वीकार करने का आग्रह किया तो आत्रेय मुनि ने कहा- ‘‘राजन्! हमारा नियम है कि हम अगली प्रातः तक के लिए धान्य नहीं रखते और पर्यटन करते हैं। इस रत्नराशि और सम्पत्ति का क्या करेंगे।’’

‘‘भगवन्! आप इन्हें स्वीकार कर लें, मैं इन्हें आपके लिए सुरक्षित स्थान पर रखवा दूँगा और भविष्य में आपको भिक्षाटन की भी आवश्यकता नहीं पड़ेगी। आप जहाँ भी रहेंगे मेरे अनुचर, आपके द्वारा स्वीकृत इस राशि से आपके लिए निर्वाह साधन पहुँचाते रहेंगे।’’-वृषादर्भि ने विनीत भाव से कहा।

‘‘आपका दान और विनय देवानुशासित है राजन् परन्तु हमारी भी विवशता है। हम अपने व्रतों से बँधे हुए हैं’’- अत्रि ने समझाया।

वृषादर्भि ने कहा- ‘‘मैं इसे अपना दुर्भाग्य समझूँगा भगवन् कि आपने मुझे सेवा के अवसर से वंचित किया।’’

संताप मत करो आर्य श्रेष्ठ- शांखल्यायन ऋषि ने कहा- ‘‘यों मान सकते हो कि हमने इसे स्वीकार कर लिया है और फिर, तुम्हें वापस लौटा दिया है।’’

‘‘लेकिन दी हुई वस्तु का प्रतिग्रहण तो नहीं होता इसलिए इसे आप ही रख सकते हैं।’’

‘‘प्रतिग्रहण नहीं होता यह तो ठीक है। परन्तु दान के बाद दक्षिणा भी तो दी जाती हैं।’’

उसके लिए भी प्रस्तुत हूँ! महात्मन्! वृषादर्भि ने कहा।

उस दक्षिणा में हम आपसे एक वचन माँगते है।

‘‘यह छोड़कर कि मैं इसे वापस स्वीकार कर लूं आप कुछ भी आज्ञा दे सकते हैं।’’

‘अस्तु!’ शांखल्यायन ने कहा- ‘‘अपने कुछ योग्य कर्मचारियों को बुलाओ और उन्हें यह धन-धान्य, रत्न राशि सौंपकर इस बात की व्यवस्था करो कि इस राज्य के दुर्भिक्ष पीड़ितों के लिए अन्न-वस्त्र की व्यवस्था हो सके।’’

वृषादर्भि की कल्पना भी नहीं थी कि महर्षि उसे इस प्रकार वाग्जाल में उलझा लेंगे। वह बोले, परन्तु यह तो राजा का दायित्व है। मैं अपनी ओर से दुर्भिक्ष निवारण की व्यवस्था करूँगा।

तुम ठीक कहते हो राजन्! तुम भी अपनी ओर से प्रयास करो परन्तु सेवा पर तो किसी का अधिकार नहीं है। हम तापस हैं- सेवा ही हमारा धर्म है और सेवा की कोई सीमा नहीं हैं। जब जैसी सामर्थ्य हो तब वैसी ही सेवा करना हमारा भी दायित्व है। तुम अपना दायित्व पूरा करो और साथ ही हमें भी अपना दायित्व पूरा करने में सहयोग दो।

अन्ततः वृषादर्भि को ही झुकना पड़ा। और कहते हैं धर्मसत्ता और राजसत्ता के इस संयोग सम्मिलन से प्रसन्न होकर इन्द्रदेव ने वरुण को तुरन्त दुर्भिक्ष निवारण के लिए कहा।

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प्रेम और करुणा का चुम्बकीय आकर्षण

‘‘चारों तरफ घटाटोप छाये जंगल से हम लोग मौन जा रहे थे। धनी गहरी झाड़ियों और पत्तों शाखाओं से लदी लता बेलियों के बीच राह, जैसी कोई चीज नहीं थी परन्तु हमारे मार्गदर्शक इस जंगल में ऐसे जा रहे थे मानो वर्षों से दिन में कई बार आते जाते रहे हों। इस अतल अविभाज्य मौन में जो हस्तक्षेप होते थे, वे उन जीव जन्तुओं द्वारा ही होते थे, जो मार्ग में हमारे पास से निकल जाया करते-थे। इनमें कई जानवर तो बहुत खूंखार भी थे परन्तु वे हमें देखकर कुछ नहीं कहते। हमारे मार्गदर्शक नीची गर्दन किये हुए चुपचाप आगे चलते जा रहे थे। मार्ग में मिलने वाले सर्प, बिच्छू और भयानक हिंसक जन्तुओं की ओर वे आँख उठाकर भी नहीं देखते। हम उन जीव जन्तुओं को देखकर भयभीत हो उठते परन्तु उनके कारण यात्रा में कोई व्यवधान नहीं होता।’’

ये पंक्तियां हैं मिस्र के योगी पर्यटक सुग्र-अल-जहीर के यात्रा वृत्त की, जो उन्होंने मंगोलिया के घने जंगलों में एक लामा गुरु के साथ सम्पन्न की थी। घने जंगलों में घुसते हुए भी इसलिए डर लगता है। कि वहाँ रहने वाले हिंस्र जीव जन्तुओं का खतरा रहता है। और मंगोलिया के उस वन में जहाँ लता-बेल, पेड़-झाड़ी से कब कौन कीड़ा, साँप टपक पड़े अथवा कौन-सा हिंसक जानवर निकल कर आक्रमण कर दे- कोई ठीक नहीं, यह यात्रा निश्चित ही रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। परन्तु सुग्र-अल-जहीर तथा उनके गुरु भाई के पास साँप पैरों में गिर कर भी चुपचाप चले गये। क्या सचमुच ऐसे खतरनाक स्थानों में जाकर और हिंसक जानवरों के बीच पहुँचकर भी सुरक्षित रहा जा सकता है ?

इस सम्बन्ध में महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र में स्पष्ट कहा है- अहिंसा में दृढ़ स्थिति हो जाने पर उसके निकट सब प्राणियों का बैर छूट जाता है (साधना पाद 35)। इसी कारण प्राचीन काल में महर्षि आश्रमों में गाय और सिंह, भेड़िया और बकरी एक ही स्थान पर रह लेते थे, सबमें आत्मदर्शन और किसी को किसी प्रकार कष्ट न पहुँचाने की दृढ़ स्थिति अन्तःकरण में ऐसी सात्विक धारा इतने तीव्र और प्रबल वेग से प्रवाहित कर देती है कि उसके निकटवर्ती तामसी अन्तःकरण भी उससे प्रभावित होकर हिंसक वृत्ति का परित्याग कर देता है। कई बार ऐसा भी होता है कि दूसरे प्राणियों के आक्रमण की अत्यन्त उग्र भावना होती है परन्तु ऐसी स्थिति में भी अहिंसक व्यक्ति का कुछ नहीं बिगड़ता।

सुग्र-अल-जहीर ने अपनी पुस्तक ‘सहस्र सिद्धों का मठ’ में लिखा है- ‘‘हम ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गये हमारा मार्ग और भी बीहड़ होता गया। खाई और घाटियाँ कदम-कदम पर आने लगीं। इसी समय रीछों का एक झुण्ड आया और हमें तीन दिशाओं से घेरकर जीभें लपलपाता खड़ा हो गया । हम सबके भयाक्रांत कण्ठों से अकस्मात चीखें निकल पड़ी। वास्तव में इतने बड़े रीछ मैंने पहले कभी नहीं देखे थे।’’

‘‘हमारे मार्गदर्शक लामा ने दोनों हाथ उठाकर हमें आश्वस्त किया और हमारी ओर देखा, जैसे वे हमें हिम्मत बंधा रहे हों। फिर लामा उन भालुओं की ओर टकटकी बाँधकर देखने लगे। उनके नेत्रों से करुणा की धारा बह रही थी। चेहरे पर शान्ति और स्निग्धता के भाव थे। होठों पर मन्द स्मिति मुस्कान थी। लामा उस समय प्रेम और शान्ति की प्रति मूर्ति लग रहे थे। कुछ क्षणों तक ही उन्होंने लपलपाती जीभ वाले भालुओं की ओर देखा होगा कि वे भालू एक एक कर तीनों ओर से हट गये तथा आस-पास की झाड़ियों में चले गये। मैं समझ नहीं पाया कि यह क्या हुआ।’’

हालैण्ड निवासी एक वन संरक्षक दंपत्ति ने अपने व्यवहार से सिंह जैसी खूनी और क्रूर प्रकृति के प्राणी को स्नेह सौजन्य के बंधनों में इस प्रकार बाँधा कि वे स्वयं मृदुलता और सौजन्य की प्रतिमूर्ति बन गये। हालैण्ड निवासी मि0 जार्ज वहाँ के नेशनल पार्क में वरिष्ठ जन्तु संरक्षक के पद पर काम करते हैं। उनका निवास अधिकतर इन्हीं जन्तुओं के साथ रहा। मि0 जार्ज एडम्सन की पत्नी का नाम था- जाय एडम्सन। दोनों पति पत्नी अधिकांशतः वन्य जीवों के साथ रहते-रहते उनसे इतने प्रेम करने लगे कि जाय एडम्सन की वनदेवी तथा एडम्सन को वन मित्र कहा जाने लगा।

जिस सुरक्षित वन में वे काम करते थे उसका नाम है सिरमनेटी। इस वन का क्षेत्रफल 4500 वर्गमील है। वन जीवों के लिए बने इस उन्मुक्त उद्यान को देखने के लिए संसार भर से लाखों लोग लम्बी यात्रायें करके आते हैं। कुछ समय पूर्व इसमें रहने वाले वन्य जानवरों की संख्या करीब 4 लाख आँकी गयी थी। एक दिन पार्क का वन रक्षक कर्मचारी को किसी सिंह ने मार डाला।

सर्वविदित है कि मनुष्य के रक्त का चस्का लग जाने के बाद सिंह प्रायः नरभक्षी हो जाते हैं। बहुत सम्भावना थी कि वह शेर जिसने वन रक्षक कर्मचारी को मारा था, वह भी नरभक्षी हो जाये। जार्ज को यह काम सौंपा गया कि वे उस नरभक्षी का अन्त कर डालें और उन्होंने ऐसा कर भी दिया वह नरभक्षी सिंह मादा शेरनी थी। और उसकी मांद में तीन सिंह शावक पाये गये।

जार्ज को न जाने क्या सूझी कि वे तीनों सिंह शिशुओं को ले आये और उन्हें लाकर पत्नी को भेंट किया। जाय सिंह शावकों को देखकर पहले डरी, पीछे उसने इन बच्चों को पालने का निश्चय किया। उन्हें पालते समय ही जाय के हृदय में वात्सल्य का स्रोत उमड़ पड़ा और वह उन्हें चाव दुलार से पालने लगी। आरम्भ में उन्हें दूध पीना सिखाना तक बड़ा कठिन था। मुँह में रबड़ की नली डालकर दूध पिलाया गया। कुछ ही महीनों में बच्चे उछलने कूदने लायक हो गये।

तब तीन सिंह शिशुओं में से दो को तो चिड़ियाघर भेज दिया गया और एक मादा शिशु को जाय ने अपने पास ही रख लिया। उसका नाम था ऐल्सा। जाय ने ऐल्सा को अपनी पुत्री की तरह पालना, लाड़ दुलार करना आरम्भ कर किया। वे अपने हाथों से उसे भोजन कराती, उसी के लिए बनायी गयी चारपाई पर उसे सुलातीं। मच्छरों से बचाने के लिए मसहरी लगातीं। सर्दी न लग जाय इसलिए रजाई ओढ़ातीं।

एल्सा भी इस प्रेम व्यवहार से प्रभावित हुए बिना न रहा सकी। वह अपनी इस नर शरीर धारी मौसी के हाथ पैर चाटकर अपने ढंग से प्रेम प्रदर्शित करती। जाय की गोदी में जा बैठती और सिर खुजलाये जाने का आनन्द लेती। बिल्ली की तरह वह पीछे-पीछे लगी रहती इन दोनों के प्रेम सम्बन्ध इतने सघन हो गये कि ऐल्सा जाय एडम्सन की गोदी में सिर रखकर घण्टों निद्रामग्न रहती। जाय भी कभी-कभी ऐल्सा की पीठ पर सिर रखकर चुपचाप पड़ी रहती थी।

यह स्नेह सद्-भावना का ही चमत्कार था कि क्रूरता और हिंसक स्वभाव को भूलकर वह सिंह शाविका इतनी मृदुल हो गयी, उसके स्वभाव में ममता और आत्मीयता के अंकुर इतने गहरे जमते गये कि उसकी भयंकरता और आक्रामकता एक दम तिरोहित ही हो गयी। घर में रहते-रहते ऐल्सा बहुत से शब्दों और इशारों का अर्थ भी समझने लगी। वह धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। होते-होते प्रौढ़ हो गयी और साथी की आवश्यकता अनुभव कर व्याकुलता प्रदर्शित करने लगी। जार्ज ने उसकी मनःस्थिति को समझ कर जंगल के उस क्षेत्र में छोड़ दिया जिधर सिंह रहते थे।

यौवन गंध के आकर्षण ने उसे सिंह साथी भी मिला दिया और फिर वह उधर ही रहने लगी। लेकिन वह अपने मायके को सर्वथा भुला न सकी। जब कभी वह एडम्सन दंपत्ति के निवास पर आ जाया करती और हफ्तों वहाँ रहती। लोग तो ऐल्सा को देखकर सहम से जाते परन्तु उसने कभी किसी पर आक्रमण नहीं किया और न ही कभी किसी की ओर गुर्रा कर देखा ही। उन्मुक्त वातावरण में स्नेह और प्रेम द्वारा सिंह को बोलने और उसकी क्रूरता निरस्त कर उसमें सौम्य स्वभाव उत्पन्न करने की कुशलता के लिये एडम्सन दंपत्ति को सर्वत्र सराहा गया। स्नेह वात्सल्य, प्रेम, ममता और आत्मीयता ऐसे चुम्बकीय गुण हैं जो किसी को भी अपनी ओर आकर्षित कर उसमें भी चुम्बकत्व उत्पन्न कर देते है फिर क्या कारण है कि अहिंसा, प्रेम तथा करुणा की धाराओं से अयाचित व्यक्तित्व के संरक्षण में हिंसक पशु अपना स्वभाव न भूल सके और शेर तथा मेमने के एक साथ रहने की बात कपोल कल्पना लगे।

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दिलदार पत्थर और संगीतकार रेत

विज्ञान की अधुनातन प्रगति और चन्द्रमा तथा मंगल पर विजय जैसे अभियान-निस्संदेह, यह सिद्ध करते हैं कि मनुष्य संसार का सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिशील प्राणी है। यह बात सदा से स्वीकार भी की जाती रही है, परन्तु इसी कारण वह सृष्टि की सर्वोच्च सत्ता सामर्थ्यवान इकाई नहीं हो जाता। फिर भी मनुष्य का स्वभाव, प्रकृति आचार-विचार और संस्कृति पर दिनों-दिन यह दम्भ छाता जा रहा है कि उसकी बराबरी दूसरा कोई प्राणी तो क्या प्रकृति भी नहीं कर सकती। इस दम्भ के कारण ही उसमें स्वार्थ, अनुदारता, अहंकार, अनास्था और अश्रद्धा के बीज दिनों-दिन विकसित होते जा रहे हैं। उदाहरण के लिए यही विचार आम होते जा रहे हैं कि मनुष्य से बड़ा कोई, नहीं है और वह दिनों-दिन और अधिक समर्थ सशक्त होता जायगा।

इसे दम्भ नहीं तो और क्या कहा जायगा कि विपुला प्रकृति के थोड़े से रहस्य हाथ लग जाने पर मनुष्य अपने आपको प्रकृति और ईश्वर से भी बड़ा समझने लगे यह दम्भ ठीक उसी स्तर का है जैसे अनपढ़ लोगों के गाँव में कोई साधारण पढ़ा-लिखा व्यक्ति पहुँच जाय और यह दावा करने लगे कि मैं दुनिया का सबसे बड़ा विद्वान हूँ।

यह दावा दूसरे लोगों की दृष्टि से नितान्त हास्यास्पद ही होगा। कोई व्यक्ति उसके सामने एक जटिल सवाल कर दे और वह उस सवाल को हल न करने के कारण खिसिया उठे, उसी तरह की स्थिति मनुष्य की तब हो जाती है जब प्रकृति उसके सामने ऐसे सवाल कर देती है, जिन्हें वह सुलझा न सके। उस दशा में मनुष्य की अपनी क्षूद्रता और अल्प सामर्थ्य का आभास होता है।

प्रकृति के ऐसे ही रहस्यपूर्ण सवाल जहाँ-तहाँ बिखरे पड़े हैं और उनका हल आज तक कोई भी वैज्ञानिक या बुद्धिशील मेधावी नहीं कर सका। एक ऐसा ही सवाल प्रकृति ने ब्रिटेन के कुछ क्षेत्रों में किया है, ‘पत्थर’ शब्द का उच्चारण करते ही मन में कठोरता, अनभ्यता और अडिगता की कल्पना उभरती है। कठोर, संवेदनहीन और किसी को कष्ट कठिनाई में देखकर भी प्रभावित न होने वाले व्यक्ति को पाषाण हृदय भी कहा जाता है। परन्तु कुछ पत्थर ऐसे भी होते हैं जो कठोर होते हुए भी मुलायम और नभ्य होते हैं। ब्रिटेन के कुछ क्षेत्रों के अलावा ये पत्थर भारत में हरियाणा के चरखी दादरी क्षेत्र में भी पाये जाते हैं।

इन पत्थरों की नभ्यता और लचकीलेपन को देखकर लोगों ने इन्हें ‘दिलदार’ पत्थर नाम दिया है। दिल शब्द का उच्चारण करते ही लोचपन और संवेदनशीलता की कल्पना उभरती है। इस तरह का लचीलापन और कोमलता उन दिलदार पत्थरों में पायी जाती है। इन पत्थरों का कोई रंग नहीं होता और ये सामान्य पत्थरों की तरह अपारदर्शी भी होते हैं परन्तु लचक होने के कारण इनका उपयोग किन्हीं निर्माण कार्यों में नहीं होता।

इन पत्थरों का गठन लाखों कोशों के संघटन से होता है और ये कठोर होते हुए भी हवा, पानी के प्रभाव से छलनी की तरह छिद्रदार बन जाते हैं। इनमें हवा पानी के आने जाने के लिए पर्याप्त स्थान भी होता है। दोनों सिरों को पकड़ कर इन्हें हिलाया जाय तो ये रबड़ की तरह लहराने भी लगते है किन्तु फिर भी ये ठोस होते हैं। इस प्रकार के लोचदार और ठोस पत्थर कैसे बनते हैं, विज्ञान अभी इसको नहीं समझ पाया है।

इसी प्रकार का एक और प्रश्न प्रकृति ने बोलने वाले पत्थर, गाने वाली रेत और गुर्राने वाले टीलों का निर्माण कर दिया है। विज्ञान का सर्वसामान्य सिद्धान्त है कि शब्द की उत्पत्ति प्राकृतिक परमाणुओं के सधान के अतिरिक्त कभी नहीं हो सकती है। दो वस्तुएं टकराती हैं तभी ध्वनि होती है। सृष्टि के जीव-जन्तु अपनी मनमर्जी से सुख यन्त्र द्वारा इच्छानुसार बोल सकते हैं। जीवों का यह बोलना उनकी इच्छा, महत्वाकांक्षा, आवश्यकता और चेतनता का प्रतीक भी कहा जा सकता है।

बच्चों के लिए यह क्षेत्र निषिद्ध घोषित है क्योंकि यह आवाज सुनकर बच्चे डर जाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि पास के किसी गाँव में कोई कुत्ते ही भौंकते हो और उनकी प्रतिध्वनि आती हो। इस पहाड़ी के आसपास मीलों दूर तक कोई गाँव नहीं है। आज तक कोई भी वैज्ञानिक उस कारण की खोज नहीं कर पाया कि इस टीले से भौंकने की आवाज क्यों आती है। सदियों से रहस्य ज्यों का त्यों बना हुआ है और अपने विश्लेषण की लम्बे समय से प्रतीक्षा कर रहा है।

इन भौंकने वाले टीलों का विवरण ‘वण्डर बुक आफ द स्ट्रेज फेक्ट्स’ नामक पुस्तक में सविस्तार दिया गया है। इसी पुस्तक में नील नदी के किनारे स्थित कारनक के खण्डहरों में दो घूरती हुई प्रतिमाओं का उल्लेख भी किया गया है ये दोनों प्रतिमाएं लगभग डेढ़ कि॰मी॰ के फासले पर जमी हुई है तथा उनके पास जाने पर ऐसा लगता है जैसे कोई विशालकाय दैत्य घूर रहा हो। इनमें एक प्रतिमा तो पत्थर की तरह चुप खड़ी रहती है पर दूसरी से अक्सर कुछ बोलने की आवाज आती रहती है। पत्थर की मूर्ति क्यों और कैसे बोलती है इसका पता लगाने की हर सम्भव कोशिश की गयी किन्तु अभी तक तो कुछ भी ज्ञात नहीं हो पाया। मूर्ति में कोई रेडियो भी नहीं है जिससे यह अनुमान किया जा सके कि वह अदृश्य शब्द प्रवाहों को पकड़ लेते हों और ध्वनि में परिवर्तित हो जाते हों।

ब्रिटेन के उत्तरी वेल्स प्रदेश के सागर तट पर ऐसी बालू रेत दूर-दूर तक बिखरी पड़ी है जिस पर चलने से मधुर संगीत ध्वनि सुनाई पड़ती है। इस संगीत को सुनकर न कोई भयभीत होता है और न किसी भूत-प्रेत, की आशंका करता है। विपरीत इसके सैकड़ों लोग सुबह शाम जिनमें अधिकांशतः युवा दंपत्ति होते हैं इस रेतीय संगीत का आनन्द प्राप्त करने के लिए आते हैं तथा रेत पर टहलते हैं।

लन्दन विश्व विद्यालय के प्रसिद्ध रसायन शास्त्री डॉ0 कैनेथे रिजवे इस रेतीय संगीत का कारण जानने के लिए उत्तरी वेल्स प्रदेश गये और उन्होंने भी यह संगीत सुना। रेतीय संगीत सुनकर वे भी स्वाभाविक ही विस्मित हुए। उन्होंने इस बालू की अनेक बोरियां भराई और अपनी प्रयोगशाला में ले आये। डॉ0 रिजवे ने इस रेत का अध्ययन करने के बाद यह तो कह दिया कि पैर के दबाव के कारण बालू के रेत आगे पीछे सरकते हैं और ये कण अधिकांशतः समान आकर वाले होते हैं इसलिए उनमें से संगीतमय ध्वनि निकलती है। परन्तु उसी रेत ने प्रयोगशाला में गाने से इन्कार कर दिया। प्रश्न उठता है कि यदि यही कारण था तो वही रेत जो समुद्र तट पर संगीत सुनाती थी, लाख प्रयत्न करने के बावजूद प्रयोगशाला में चुप क्यों हो गयी।

अरब के विशाल मरुस्थल में कई जगह रात के समय ऐसी ध्वनि सुनायी देती है जैसे कोई व्यक्ति रेत के अंधड़ से बने टीले में दब गया हो और कराह रहा हो। उन ध्वनियों को टेप किया गया और प्रयोगशालाओं में सुना गया तो बु-ड-म-बु ड-म-हा ऽऽऽ य ऽऽऽ। की स्पष्ट आवाज सुनायी देती थी।

मध्य एशिया के आठ लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले हुए गोबी मरुस्थल के तकला मारान अचल के पश्चिमी छोर पर स्थित अन्दास पादशा नामक स्थान में करुण संगीत सुनायी देता है। यह संगीत कभी-कभी ही सुनाई देता है और अधिक से अधिक पन्द्रह मिनट तक चलता है। अमेरिका की एक रेडियो कम्पनी ने इस करुण संगीत को टेप कर सुनाया तो कुछ ही दिनों में आकाशवाणी केन्द्र को हजारों श्रोताओं ने पत्र लिखे और बताया कि इस संगीत को सुनकर उनका हृदय व्यथा वेदना से भर आया। एक टी0 वी0 कम्पनी ने इस स्थान की टी0 वी0 फिल्म भी उतारी और अपने दर्शकों को बिना किसी कमेंट्री के सुनायी तो दर्शक रोने भी लगे।

प्रश्न यह है कि इस क्षेत्र में जहाँ भूले-भटके ही कोई जाता हो, कौन इतना कारुणिक संगीत सुनाता है। यह संगीत कभी इस टीले से तो कभी उस टीले से सुनाई देता है। वैज्ञानिक इसका कारण भी नहीं खोज पाये हैं।

अफगानिस्तान में काबुल के पास के एक रेतीले मैदान में घोड़ों के दौड़ने और नगाड़ों के पीटने की आवाज आती है जैसे कहीं से घुड़सवार अपने घोड़े दौड़ाते हुए एक नगाड़े को पीटते आ रहे हों।

इसराइल के सिनाई अंचल की तलहटी में स्थित एक पर्वत से घण्टियाँ बजने की आवाज आती है। इसी कारण वह ‘वेल माउण्टेन’ भी कहकर पुकारा जाने लगा है। ईरान के मरुस्थल में कई स्थानों से स्पष्टतः ऐसा संगीत सुनाई देता है जैसे वहाँ कोई बीन बजा रहा हो।

इन स्थानों पर रेत के ऊपर न कोई चलता है न दौड़ता है। फिर यह संगीत कहाँ से आता है। क्या यह भी मृग मरीचिका की तरह कोई संगीत मरीचिका है? लेकिन फिर तो सभी स्थानों पर एक जैसा संगीत सुनाई देना चाहिए जिस प्रकार कि एक जैसी ही मृग मरीचिका दिखाई देती है।

प्रकृति के रहस्य अगम हैं और उससे भी अगम्य रहस्यपूर्ण है चेतन संसार। प्रकृति जब तब मनुष्यों के सामने इस प्रकार के चुनौती भरे प्रश्न खड़े करती रहती है। जिन्हें लाख प्रयत्न करने पर भी बुझा नहीं जा सकता। यह नहीं कहा जा रहा है कि इन रहस्यों को कभी सुलझाया ही न जा सकेगा। सम्भव है आगे चलकर दिलदार पत्थर और संगीतकार रेत का रहस्य सुलझा लिया जाय परन्तु फिर भी ऐसी कितनी ही विचित्रतायें हैं जिन्हें पूरी उम्र तो क्या एक पूरा युग कल्प लगाकर भी नहीं समझा जा सकता। अभी तो यही ठीक से जान पाना सम्भव नहीं हुआ है कि प्रकृति में क्या-क्या है? उसके सम्पूर्ण रहस्यों को समझ पाना तो दूर की बात रही।

जब प्रकृति ही इतनी रहस्यपूर्ण और विचित्र है तो सूक्ष्म चेतना कितनी रहस्यमय होगी? चेतन तत्व कितना गूढ़ होगा? आत्मसत्ता और परमात्म सत्ता के रहस्यों का क्या अनुमान लगाया जा सकता है? और मनुष्य अपनी छोटी सी बुद्धि से उसे समझने तथा उसकी सत्ता की कपोल कल्पना सिद्ध करने का दावा किस आधार पर कर सकता है।


अधिक लाड़-प्यार करता था (kahani)

थॉमस अपनी लड़की पर अधिक लाड़-प्यार करता था। एक दिन वह बीमार पड़ गयी। थॉमस ने उसका काफी इलाज कराया, परन्तु सारे प्रयत्न व्यर्थ गये। थॉमस की लाडली मर गयी। वह दिन रात रोता रहता-न जीवन में कोई रुचि न मित्रों से कोई सम्पर्क।

एक दिन स्वप्न देखा .................. वह स्वर्ग में पहुँच गया था। वहाँ उसे छोटे-छोटे बाल देवदूतों का जुलूस दिखाई दिया। एक श्वेत सिंहासन के पास से उनकी पंक्ति चली जा रही थी। श्वेत वस्त्र पहने सभी बच्चों के हाथ में जलती हुई मोमबत्ती थी। परन्तु उसने देखा कि एक बच्चे के हाथ की मोमबत्ती बिना जली हुई है। ध्यान से देखने पर पता चला कि यह तो उसी की लाडली है।

उसने अपनी बेटी को बाहों में भर लिया, प्यार से सहलाया और पूछा- बेटी सिर्फ तुम्हारी ही मोमबत्ती क्यों बुझी हुई है।

पिताजी, ये लोग तो बार-बार इसे जलाते हैं, पर आपके आँसू इसे बार-बार बुझा देते हैं।

.....और तभी थॉमस की नींद खुल गयी। उसने सारी उदासी और विरक्ति को मिटा देने का संकल्प कर लिया तथा हर बच्चे में अपनी लाडली को देखने लगा।

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चिरयौवन का रहस्य

“युवक अमेरिका चला गया और वहाँ उसने तीन वर्ष तक रोजगार किया। इस अवधि में उसे एक मुकदमे में फँसना पड़ा। उसे मुकदमे से निपटने में 15 वर्ष लग गये। इस बीच वह अपनी प्रेयसी को बराबर पत्र लिखता रहा था। युवती इस बात के लिए कटिबद्ध थी कि वह विवाह करेगी तो उसी युवक से। 15 वर्ष तक वह अपने प्रियतम की प्रतीक्षा करती रही। 15 वर्ष बाद जब वह लौटा तो उसकी प्रेयसी 34 वर्ष की हो चुकी थी। इस अवस्था में युवती को अधेड़ हो जाना चाहिए था परन्तु जब युवक अपनी प्रेयसी से मिला तो उसके स्वास्थ्य, नाक नक्श में जरा भी अन्तर नहीं आया था। लगता था उन्हें मिले 15 वर्ष नहीं 15 दिन ही हुए हों। दोनों का विवाह सम्पन्न हुआ। परन्तु युवक को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि उसकी पत्नी 15 वर्ष बाद भी अपने शरीर को उसी प्रकार का कैसे बनाये रह सकी है जबकि अधिकांश युवतियाँ 15 वर्ष से 34 वर्ष की होते होते अधेड़ हो जाती हैं। एक दिन उसने कारण पूछ ही लिया।

इस घटना का उल्लेख करते हुए डॉ0 बैनेट ने लिखा है कि- मनुष्य का शरीर प्रतिदिन बदलता रहता है। उसके जीर्ण और पुराने कोश मरते रहते हैं तथा नये कोश उनका स्थान ले लेते हैं। इस प्रकार 80 दिन बाद शरीर का एक भी कोश पुराना नहीं रह जाता। सारे कोश नये हो जाते हैं। जिस तरह जीर्ण और पुराना हो जाने पर मकान को बदल दिया जाता है और उस मकान को अधिक पक्की ईंटों से बना कर नया कार देते हैं उसी प्रकार परमात्मा ने शरीर की व्यवस्था की है। हर पुराना कोश बदल जाता है और प्रकृति उसके स्थान पर नये कोश स्थापित कर देती है।

जीर्णता के निष्कासन और नवीन के स्थापन का क्रम नियमित रूप से चलता रहता है तो फिर क्या कारण है कि मनुष्य बूढ़ा हो जाता है। डॉ0 बैनेट ने वर्षों तक इस विषय पर विचार किया। परीक्षण और प्रयोग किये तथा इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मनुष्य का मन जैसा होगा वैसा ही वह बनेगा। शरीर में होने वाले रासायनिक परिवर्तन उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं, जितने कि मनःस्थिति के परिवर्तन। देखा जा सकता है कि स्वतन्त्र व्यवसाय में लगे लोग जीवन के अन्तिम क्षणों तक क्रियाशील और समर्थ सक्षम बने रहते हैं।

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संकल्प शक्ति का उपार्जन उपयोग

सामान्य जीवन में आने वाली छुटपुट असफलताओं का दोष दुर्भाग्य, दैव और दूसरों को देते रहने वाले लोग जीवनभर असफलताओं को ही आमंत्रित करते रहते हैं। क्योंकि सफलता प्राप्ति के लिए उनमें न अभीष्ट मनोबल होता है और न ही संकटों से जूझने का साहस। जबकि कितने ही व्यक्तियों ने सामान्य से भी गिरी नितांत दुर्दशाग्रस्त स्थिति में रहते हुए भी असाधारण सफलताएं प्राप्त कर दिखाई हैं।

कितने ही व्रत शील उच्च उद्देश्यों को लेकर कार्य क्षेत्र में उतरे और तुच्छ सामर्थ्य के रहते हुए भी महान कार्य कर सकने में सफल हुए हैं। उन्हें निरन्तर आगे बढ़ने और अवरोधों को गिराने की सामर्थ्य आन्तरिक मनोबल से ही मिली है। बिहार के हजारी बाग जिले के हजारी नामक किसान ने इस प्रदेश के गाँव-गाँव में आम के बगीचे लगाने का निश्चय किया था। यदि दृढ़ संकल्प प्रबल आकांक्षा बन कर उभरे तो फिर मस्तिष्क को उसका सरंजाम खड़ा करने और शरीर को उसे व्यवहार में परिणित करते देर नहीं लगती। यही सदा से होता रहा है यही हजारी किसान ने भी कर दिखाया। उसने उस सारे इलाके में आम के दरख्त लगाये और अन्ततः उन आम्र उद्यानों की संख्या एक हजार तक जा पहुँची। वही इलाका इन दिनों बिहार का हजारी बाग जिला कहलाता है। सत्संकल्पों की परिणिति सदा इसी प्रकार से व्यक्ति और समाज के लिए महान उपलब्धियाँ प्रस्तुत करती रही हैं।

नर हो या नारी, बालक हो या वृद्ध स्वस्थ हो या रुग्ण, धनी हो या निर्धन परिस्थितियों से कुछ बनता बिगड़ता नहीं, प्रश्न संकल्प शक्ति का है। मनस्वी व्यक्ति अपने लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ बनाते और सफल होते हैं। समय कितना लगा और श्रम कितना पड़ा उसमें अन्तर हो सकता है, पर आत्म-निर्माण के लिए प्रयत्नशील अपनी आकांक्षा में शिथिलता एवं प्रखरता के अनुरूप देर-सवेर में सफल होकर ही रहता है। नारी की परिस्थितियाँ नर की अपेक्षा कई दृष्टियों से न्यून मानी जाती हैं किन्तु यह मान्यता वहीं तक सही है जहाँ तक कि उनका मनोबल गया-गुजरा बना रहे। यदि वे अपनी साहसिकता को जगा लें, संकल्प शक्ति का सदुद्देश्य के लिए उपयोग करने लगें तो कोई कारण नहीं कि अपने गौरव गरिमा को प्रभाव देने में किसी से पीछे रहें।

मैत्रेयी याज्ञवलक्य के साथ पत्नी नहीं धर्मपत्नी बन कर रही। रामकृष्ण परमहंस की सहचरी शारदा मणि का उदाहरण भी ऐसा ही है। सुकन्या ने च्यवन के साथ रहना किसी विलास वासना के लिए नहीं उनके महान लक्ष्य को पूरा करने में साथी बनने के लिए किया था। जापान के गान्धी कागावा की पत्नी भी दीन दुखियों की सेवा का उद्देश्य लेकर ही उनके साथ दाम्पत्य सूत्र में बँधी थी। नर पामरों को जहाँ दाम्पत्य जीवन में विलासिता के पशु प्रयोजन के अतिरिक्त और कोई उद्देश्य दृष्टिगोचर ही नहीं होता वहाँ ऐसी आदर्शवादी नर-नारियों की भी कमी नहीं जो विवाह बन्धन की आवश्यकता तभी अनुभव करते हैं जब उससे वैयक्तिक और सामाजिक प्रगति का कोई उच्चस्तरीय उद्देश्य पूरा होता हो।

कुन्ती भी सामान्य रानियों की तरह एक महिला थी। जन्मजात रूप से तो सभी एक जैसे उत्पन्न होते हैं। प्रगति तो मनुष्य अपने पराक्रम पुरुषार्थ के बल पर करता है। कुन्ती ने देवत्व जगाया- आकाश वासी देवताओं को अपना सहचर बनाया और पाँच देव पुत्रों को जन्म दे सकने में सफल बन सकी। सुकन्या ने आश्विनी कुमारों को और सावित्री ने यम की सहायता करने के लिए विवश कर दिया था। उच्चस्तरीय निष्ठा का परिचय देने वाले देवताओं की ईश्वरीय सत्ता की सहायता प्राप्त कर सकने में भी सफल होते हैं। टिटहरी के धर्म युद्ध में महर्षि अगस्त सहायक बन कर सामने आये थे। तपस्विनी पार्वती अपने व्रत संकल्प के सहारे शिव की अर्धांगिनी बन सकने का गौरव प्राप्त कर सकी थी। पति को आदर्श पालन प्रेरित करने वाली लक्ष्मण की पत्नी उर्मिला स्वयं भी वनवास जैसी साधना घर रह कर करती रहीं। इन महान गाथाओं में आदर्शवादी संकल्प ही अपनी गरिमा प्रकट करते दिखते हैं।

बंगाल के निर्धन विद्वान प्रताप चन्द्र राय ने अपनी सारी शक्ति और सम्पत्ति को बाजी पर लगा कर महाभारत के अनुवाद का कार्य हाथ में लिया। वे उसे अपने जीवन में पूरा न कर सके तो उनकी पत्नी ने अपना संस्कृत ज्ञान पूरा करके उस अधूरे काम को पूर्ण करके दिखा दिया ऐसी साहसिकता वहाँ ही दिखाई पड़ती है जहाँ उच्च स्तरीय आदर्शों का समावेश हो।

विद्वान कैयट व्याकरण शास्त्र की संरचना में लगे हुए थे। उनकी पत्नी भारती मूंज की रस्सी बट कर गुजारे का प्रबन्ध करती थी। साम्यवाद के प्रवर्तक कार्लमार्क्स भी कुछ कमा नहीं पाते यह कार्य उनकी पत्नी जैनी करती थी, वह पुराने कपड़े खरीद कर उनमें से बच्चों के छोटे कपड़े बनाती और फेरी लगा कर बेचती थीं। आदर्शों के लिए पतियों को इस प्रकार प्रोत्साहित करने और सहयोग देने में उनका उच्चस्तरीय संकल्प-बल ही कार्य करता था।

जहाँ सामान्य नारियाँ अपने बच्चों को मात्र सुखी सम्पन्न देखने भर की कामना संजोये रहती हैं। वहाँ ऐसी महान महिलाएं भी हुई हैं जिन्होंने अपनी सन्तान को बड़ा आदमी नहीं महामानव बनाने का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए अपनी दृष्टि और चेष्टा में आमूल-चूल परिवर्तन कर डाला। ऐसी महान महिलाओं में बिनोवा की माता आती हैं जिन्होंने अपने तीनों बालकों को ब्रह्मज्ञानी बनाया। शिवाजी की माता जीजाबाई को भी यही गौरव प्राप्त हुआ। मदालसा ने अपने सभी बालकों को बाल ब्रह्मचारी बनाया था। शकुन्तला अपने बेटे भरत को, सीता अपने लव−कुश को सामान्य नर वानरों से भिन्न प्रकार का बनाना चाहती थीं। उन्हें जो सफलताएँ मिलीं। वे अन्यान्यों को भी मिल सकती हैं। शर्त एक ही है कि आदर्शों के अन्तःकरण में गहन श्रद्धा की स्थापना हो सके और उसे पूरा करने के लिए अभीष्ट साहस संजोया जा सके। संकल्प इसी को कहते हैं।

पुरुष महिलाओं की आत्मिक प्रगति में सहायक बनें। महिलायें, पुरुषों, छोटे बच्चों को संस्कारवान बनाने का व्रत लें, तो इस पारस्परिक सहयोग से राष्ट्र जागरण, आध्यात्मिक चेतना का विकास तथा आदर्शवादी आस्थाओं की स्थापना जैसे महान कार्य सहज ही किये जा सकते हैं।

वंश परम्परा या पारिवारिक परिस्थितियों की हीनता किसी की प्रगति में चिरस्थायी अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकी है। इस प्रकार की अड़चनें अधिक संघर्ष करने के लिए चुनौती देने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकती। सत्यकाम जाबाल वेश्या पुत्र थे। उनकी माता यह नहीं बता सकी थी कि उस बालक का पिता कौन था। ऐतरेय ब्राह्मण के रचयिता ऋषि ऐतरेय -इतरा रखैल के पुत्र थे। महर्षि वशिष्ठ, मातंगी आदि के बारे में भी ऐसा ही कहा जाता है। रैदास, कबीर, वाल्मीकि आदि का जन्म छोटे कहे जाने वाले परिवारों में ही हुआ था। पर इससे इन्हें महानता के उच्च पद तक पहुँचने में कोई स्थायी अवरोध उत्पन्न नहीं हुआ। मनुष्य की संकल्प शक्ति इतनी बड़ी है कि वह अग्रगमन के मार्ग में उत्पन्न होने वाली प्रत्येक बाधा को पैरों तले रौंदती हुई आगे बढ़ सकती है।


तीन प्रसिद्ध चित्रकारों को (kahani)

राजा ने तीन प्रसिद्ध चित्रकारों को बुलाकर उनसे अपना चित्र बनाने को कहा। सर्वश्रेष्ठ चित्र पर बड़ा इनाम था।

राजा की एक आँख थी। एक चित्रकार ने सोचा कि एक आँख दिखाना राजा के क्रोध का कारण बन सकता है। उसने एक सुन्दर, दोनों आँखों वाला चित्र बना डाला।

दूसरे ने सोचा, चित्र पूर्णतः वास्तविक होना चाहिए। अतः एक आँख वाला ही चित्र बनाया। तीसरे ने सूझबूझ से काम लिया। चित्र में राजा को धनुष ताने दिखाया। लक्ष्यबेध की मुद्रा में एक आँख ओट में आ गई। तीनों चित्र सुन्दर थे। पर सर्वश्रेष्ठ होने का पुरस्कार तीसरे को ही मिला। क्योंकि उसने तथ्य को मृदुल बनाने का प्रयत्न किया था।

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मृत्यु अर्थात् जीवन का अन्त नहीं

महाभारत के यक्ष प्रश्न प्रसंग में यह पूछे जाने पर कि आश्चर्य क्या है? युधिष्ठिर उत्तर देते हैं- ‘‘मृत्यु निश्चित है और रोज-रोज कितने ही व्यक्तियों को मरते हुए देख कर लोग अपनी मृत्यु का विचार भी नहीं करते। जीवन से सम्बन्धित किसी भी घटना पर विचार उत्पन्न होना स्वाभाविक है और जो घटना समूचे वर्तमान से सम्बन्ध तोड़ देती है उसका विचार तो और भी ज्यादा आवश्यक व स्वाभाविक है। परन्तु लोग उसी घटना को भुलाने की कोशिश करते हैं जो उनके पूरे अस्तित्व को ही झकझोर देती है।’’

इस तथ्य को भूलने या भुला देने की कोशिश करते रहने का कारण मृत्यु के प्रति मन में समाया हुआ भय है। यह एक तथ्य है कि मनुष्य जिस चीज को पसन्द नहीं करता या जिससे दूर रहना चाहता है उसके बारे में सोचना भी नहीं चाहता। मृत्यु के बारे में न सोचने या इससे भयभीत होने का कारण जीवन के प्रति मोह ही हो सकता है। लेकिन यदि यह समझ में आ जाय कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है तो मृत्यु का भय कम हो सकता है। मृत्यु के बाद जीवन का अस्तित्व बना रहता है, यह बात अब तक केवल दर्शन शास्त्र का विषय थी। विज्ञान और भौतिक सत्ता, पदार्थ सत्ता में विश्राम करने वाले लोग मनुष्य को अभी तक यन्त्र मात्र समझते थे, जिसका संचालन केन्द्र हृदय और मस्तिष्क भर समझा गया। इन केन्द्रों के क्षीण होने, दुर्बल और अक्षम पड़ जाने पर ही मनुष्य का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, यह मान लिया गया।

परन्तु विज्ञान भी जीवन के गूढ़ रहस्यों को सुलझाने की ओर उन्मुख हुआ है तथा आधुनिक वैज्ञानिकों द्वारा मृत्यु का विश्लेषण करने के लिए किये गये प्रयास तथा उनके निष्कर्ष भारतीय मनीषियों की इसी धारणा को पुष्ट करते हैं कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है। संयुक्त राज्य अमेरिका के डॉ0 रेमण्ड ए॰ मूडी ने इस विषय पर वर्षों तक शोध की। अपनी शोध में उन्होंने तीन प्रकार के व्यक्तियों का अध्ययन किया। इन तीन प्रकार के व्यक्तियों में एक तो वह थे जो किसी रोग या दुर्घटना के कारण मृत्यु के एकदम समीप पहुँच गये। जिनके लिए कहा जा सकता है कि उन्हें नयी जिन्दगी मिली। दूसरे वह व्यक्ति जो मरणासन्न स्थिति में थे और अपने अनुभव आसपास के व्यक्तियों को बता रहे थे। तीसरे प्रकार के व्यक्तियों में वह थे, जो डाक्टरों द्वारा मृत घोषित कर दिये जाने के बाद किसी प्रकार जी उठे थे।

इस प्रकार के सैकड़ों से बातचीत, उसके कथनों का अध्ययन और अन्य व्यक्तियों के अनुभवी से संगति बिठाते हुए डॉ0 रेमण्ड ए॰ मूडी ने कई ऐसे निष्कर्ष निकाले जो आधुनिक संसार के लिए तो वास्तव में ही चौंका देने वाले हैं। इस शोधों से प्राप्त निष्कर्षों को उन्होंने ‘लाइफ औफ्टरलाइफ’ नामक पुस्तक में संकलित किया है। निष्पक्ष ढंग से लिखी गयी इस पुस्तक में यही धारणा पुष्ट होती है कि मृत्यु के बाद भी जीवन का अस्तित्व है और यह कि मृत्यु एक दुखद घटना होते हुए भी एक रोमांचकारी यात्रा है।

डॉ0 मूडी ने उपरोक्त प्रकार के जितने भी व्यक्तियों के अनुभव एकत्र किये, उनमें सबने एक बात स्पष्ट रूप से बतायी कि मृत्यु के समय यह भले ही लगता रहा हो कि अब सब कुछ समाप्त हो जायगा या हम कुछ भी देखने, सुनने, समझने में असमर्थ हो जायेंगे अथवा अब हम समाप्त ही हो जायेंगे परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। सब कुछ ज्यों का त्यों रहा, अनुभूति शरीर से पृथक अस्तित्व के रूप में होने लगी।

मरने के बाद पुनः जीवित हो उठी एक महिला मिसेज मार्टिनका ने डॉ0 मूडी को बताया- ‘‘मैं अस्पताल में थी, पर डाक्टरों को मेरे रोग का कुछ पता ही नहीं लग रहा था। मेरे चिकित्सक डॉ0 जेम्स ने मुझे छानबीन के लिए नीचे की मंजिल पर रेडियोलॉजिस्ट के पास भेजा। उसने एक खास दवा दी, परन्तु मैंने अनुभव किया कि मेरी साँस रुक गयी है। लेकिन इसके बावजूद मैं सब कुछ देख सुन और समझ रही थी। डॉक्टर मुझे कृत्रिम उपायों से श्वांस दिलवाने की कोशिश कर रहे थे मेरे लिए कोई खास दवा लाने का आदेश दिया गया। वे मुझे छू रहे थे, मेरी बाँहों में सुई भी चुभा रहे थे, मैं यह सब देख रही थी, परन्तु मुझे कुछ महसूस नहीं हो रहा था।”

कार दुर्घटना का शिकार हुए एक नवयुवक को, जिसे मृत घोषित कर दिया गया था, परन्तु वह पुनः जी उठा, अनुभव हुआ कि कोई महिला पूछ रही है- क्या इसका दम निकल गया? “दूसरे व्यक्ति ने उत्तर दिया था- हाँ, मर गया, पूरी तरह मर गया। इस नवयुवक ने बताया कि ऐसा सुनते समय वह उन बातचीत करने वाले और आस-पास खड़े दूसरे व्यक्तियों को ही नहीं देख रहा था बल्कि अपने शरीर, चेहरे, सिर में लगे घाव, उनमें से रिसा हुआ खून और टूटी हुई हड्डियों के बारीक-बारीक टुकड़े भी देख रहा था जैसे किसी दूसरे व्यक्ति का शव देख रहा हो।”

डॉ0 रेमण्ड ए॰ मूडी के अतिरिक्त प॰ जर्मनी के डॉ0 श्मिटने भी ऐसे व्यक्तियों से सम्पर्क किया, उन्हें डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था। उन्होंने भी लगभग उसी प्रकार के अनुभव बताये। निष्कर्षतः उनमें रेमण्ड ए॰ मूडी से पूर्णतः साम्य है कि मृत्यु के बाद अपना अस्तित्व शरीर से अलग अनुभव होता है। इसका अर्थ है कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है। मनुष्य या जीवन का अस्तित्व शरीर से सर्वथा भिन्न बात है, शास्त्रकारों ने इसी अस्तित्व को जीव कहा है।

जीवन को शरीर से सम्बन्ध मान लेने को देह भ्राँति करते हुए ‘योग वाशिष्ठ’ के निर्वाण प्रकरण में महर्षि वशिष्ठ ने कहा है- ‘‘यह जीव अस्थि, मांस और रक्त से बने स्थूल हाथ, पैर वाले शरीर को जो जन्म, कर्म और कामना का केन्द्र तथा परिणाम रूप से मरणशील है- ही अपना अस्तित्व मान लेता है और देह भ्रांति में पड़ जाता है। तब वह बाल्य, युवा, वृद्धावस्था, जरा-रोग, मरण, भ्रमण, व्यवहार आदि का ज्ञान भी कल्पित करता है।’’

अपने अस्तित्व को शरीर तक ही सीमित मानने अथवा महर्षि वशिष्ठ की भाषा में देह भ्रान्ति का शिकार होने के कारण ही सुख-दुःख, पीड़ा-व्यथा और कष्ट-वेदना का अनुभव होता है। मृत्यु के बाद जब देह से सम्पर्क टूट जाता है और किसी सीमा तक यह भ्रम दूर होता है कि जीवन शरीर तक ही सीमित नहीं था तो उन दैहिक कष्टों से भी मुक्ति मिल जाती है। ‘लाइफ इन द वर्ल्ड अनसीन’ में एन्थोनी बौर्गिया ने लिखा है कि आकस्मिक दुर्घटना के शिकार व्यक्तियों को पीड़ा या व्यथा वेदना का अनुभव नहीं होता।

भारतीय दर्शन की यह मान्यता है कि इस शरीर में स्थित जीवात्मा ही सब सुख-दुःख कष्ट सुविधा और लाभ-हानि का भोक्ता है। शरीर से जीवात्मा का सम्पर्क टूट जाने के बाद शरीर पर होने वाले प्रभावों की भी कोई संवेदना या अनुभूति प्रतिक्रिया नहीं होती। युद्ध में मारे गये एक सैनिक की अनुभूतियों का उल्लेख ‘फ्रण्टियर्स आफ द आफ्टर लाइफ’ उसी सैनिक के शब्दों में इस प्रकार किया गया है- ‘‘गोली लग जाने के कारण मैं मूर्च्छित सा हो गया था। कुछ समय बाद मैं मूर्च्छा से जगा तो उस समय मैंने देखा कि मैं अपने शरीर से अलग हूँ और भौचक्का-सा खड़ा हूँ। मैंने देखा मेरे शरीर के आस-पास और भी कई शरीर पड़े हैं। मुझे लड़ाई की बात याद आ गयी परन्तु इस बात की मुझे कोई स्मृति नहीं है कि गोली लगने के बाद क्या हुआ था। हाँ, इतना अवश्य याद है कि उस समय मुझे भयंकर पीड़ा हो रही थी, परन्तु अब उस पीड़ा का लेशमात्र भी अनुभव नहीं हो रहा था। ऐसा प्रतीत होता था कि शरीर से विलग होने के बाद मैं सारी पीड़ाओं से मुक्त हो गया हूँ।”

प्रायः लोग दुर्घटना के समय मूर्च्छित हो जाते हैं और उस स्थिति में ही उनकी मृत्यु हो जाती है। दुर्घटना में मृत घोषित कर दिये गये परन्तु बाद में जीवित हो उठे व्यक्तियों से सम्पर्क कर, उनके अनुभवों का अध्ययन करने के बाद एस॰ बेडफोर्ड ने अपनी पुस्तक ‘डेथ एण्ड आफ्टर डेथ’ में लिखा है- दुर्घटनाओं के कारण घटित होने वाली मृत्यु की घटना बड़ी तीव्र गति से घटती है और जीव को शरीर से विलग हो जाने का अहसास भी न होता। ये आकस्मिक दुर्घटनायें बड़ी निर्मम, भीषण और दर्दनाक होती हैं परन्तु जो मर जाते हैं उनके लिए मृत्यु बड़ी विस्मयपूर्ण घटना होती है। दुर्घटना के तत्क्षण बाद मर जाने वाले व्यक्तियों को किसी पीड़ा का आभास इसलिए नहीं होता कि जीवात्मा की चेतना हमारे भौतिक शरीर की चेतना से बहुत आगे होती है और उसे यह पहले ही मालूम हो जाता है कि अगले क्षण आकस्मिक मृत्यु होनी है। क्योंकि इस दुर्घटना के कारण यह शरीर जीवात्मा के रहने योग्य नहीं रह जायगा। इसलिए जीवात्मा स्थूल शरीर के दुर्घटनाग्रस्त होने से पहले ही उसे छोड़ देता है। यही कारण है कि दुर्घटना ग्रस्त व्यक्ति मृत्यु और दुर्घटना जनित पीड़ा का अनुभव नहीं करता।

डॉ0 रेमण्ड ए॰ मूडी जिनकी ‘लाइफ आफ्टर लाइफ’ पुस्तक का उल्लेख आरम्भ में ही किया जा चुका है- के निष्कर्ष भी उपरोक्त निष्कर्ष से ही मिलते-जुलते हैं। इन परामनोवैज्ञानिकों के अतिरिक्त दूसरे कई परामनोवैज्ञानिकों तथा शोध संस्थाओं ने ऐसे व्यक्तियों के अनुभव संकलित किये हैं जो मृत्यु के उस पार जा कर ‘लौट’ आये। इन विवरणों में भिन्नताएं मिली हैं, परन्तु कुछ समानतायें भी पायी गयी हैं। पहली समानता तो यही है कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है, उसके बाद भी जीवन का अस्तित्व रहता है। इसका अर्थ है कि जीवन का अस्तित्व शरीर जन्म और सत्य के बीच तक ही नहीं है। बल्कि जीवन उसके पूर्व भी है और बाद में भी है।

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में यही बात अर्जुन से हजारों वर्ष पूर्व कही है-

न त्वे वाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः। न चैव न भविष्यामः सर्वे वयामनः परम्॥

अर्थात्- न तो ऐसा ही है मैं किसी काल में नहीं था अथवा तू नहीं था अथवा यह राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है, कि हम सब लोग इससे आगे नहीं रहेंगे।

अविनाशितु तद्विद्वि येन सर्वमिन्दततम्। विनाशम व्ययस्यास्य न कश्चित कर्तुमर्दति॥ अन्त बन्त इमे देहा नित्यसकोक्ताशरीरिणः।

अर्थात्- जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है उस (चेतन सत्ता) को तू नाश रहित जान। उस अविनाशी का नाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है। इस नाश रहित जीवात्मा के यह सब शरीर ही नाशवान् कहे गये हैं जबकि यह आत्मा किसी काल में भी जन्म नहीं लेती है और न यह मरती ही है अथवा कभी होकर दुबारा होने वाली भी नहीं है। क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के नाश होने पर भी उसका नाश नहीं होता।

प्राप्त विवरणों में शरीर और चेतना की भिन्नता के अतिरिक्त दूसरी समानता चेतना की प्रधानता सम्बन्धी है। शरीर इस चेतन शक्ति के कारण स्पर्श, ग्रहण, संवेदन, स्पन्दन और क्रियाशीलता ग्रहण करता है। अर्थात् शरीर अपनी सार्थकता के लिए आत्मतत्व पर निर्भर है जबकि आत्मचेतना शरीर की शक्ति सामर्थ्य या स्थिति पर रंचमात्र भी निर्भर नहीं है। फटे हुए वस्त्र को व्यर्थ और अनुपयोगी जान कर जिस प्रकार उतार फेंक दिया जाता है उसी प्रकार जीवात्मा भी जीर्ण-अशक्त शरीर को अपने रहने योग्य न समझ कर उसका परित्याग करता है। भारतीय मनीषियों के अनुसार यह प्रतीति जीवन को विभाजित और खण्ड में देखने की दुर्बल दृष्टि के कारण ही होती है। अन्यथा जीवन तो शाश्वत और सनातन है- एक अन्तहीन यात्रा है। मृत्यु उस यात्रा का एक पड़ाव भर है। इसलिए मृत्यु से भयभीत होने का कोई कारण नहीं है।

यक्ष प्रश्न प्रसंग में युधिष्ठिर ने हमेशा मृत्यु की घटनायें घटती देख कर भी उससे भयभीत होने और पलायन करने की प्रवृत्ति को संसार का आश्चर्य कहा है। जान लिया जाय कि मृत्यु कोई विचित्र, दुखद और भयावह घटना नहीं है तथा उसे समझने और स्वीकार करने की मनःस्थिति बना ली जाय तो मनुष्य में एक अद्भुत परिवर्तन की सम्भावना बन जाती है।

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शक्तियों का क्षरण रोका जाय

पहला सुख-निरोगी काया-सुख शान्तिमय जीवन साधना का पहला सूत्र है, और वही शरीर निरोग, रह सकता है जो सामान्य जीवन क्रम व्यतीत करते हुए शरीर में उत्पन्न होने वाले दोषों का निवारण कर सके, दैनिक जीवन में खर्च होने वाली शक्ति को पुनरार्जित कर सके और प्रतिकूलता जनित विकारों का संशोधन कर सके।

विकारों के निष्कासन और शक्ति के पुनरार्जन का कार्य सशक्त और बलवान शरीर द्वारा ही हो सकता है। अतः स्वास्थ्य साधकों को शरीर शास्त्रियों ने वलमुण्मन्य का उपदेश दिया है, बल की उपासना का अर्थ है संयमित जीवन क्रम अपना कर अपनी शारीरिक शक्ति के अनावश्यक क्षरण को रोकना। जहाँ जीवनी शक्ति का अपव्यय होता रहेगा वहाँ पौष्टिक आहार और स्वास्थ्यप्रद वायु का भी सत्परिणाम प्राप्त नहीं हो सकेगा। जर्मनी के स्वास्थ्य विज्ञानी डॉ0 ग्रेफ का कहना है कि दुर्बलता उपयुक्त शक्ति के अपव्यय का परिणाम है इसी कारण से व्यक्ति आहार के पोषक तत्वों को पूर्णतया समीकृत नहीं कर पाते। दुबला पतला व्यक्ति जितना अधिक प्रोटीन खायेगा उसकी श्वसन क्रिया भी उतनी ही शीघ्रता से होने लगेगी।

इंग्लैण्ड के चार वैज्ञानिकों ने डॉ0 ग्रेफ के इस दावे की प्रामाणिकता का सूक्ष्म अध्ययन करने के लिए और दुर्बलता सम्बन्धी अन्य कारणों की खोज के लिए अनुसंधान किये। इसके लिए तीन दुबले पतले युवकों को परीक्षण का विषय बनाया गया। उन्हें एक अस्पताल में रखा गया और उनके भोजन तथा रहन सहन पर पूर्ण नियन्त्रण रखा गया, ये तीनों युवक शारीरिक रूप से स्वस्थ थे और पिछले तीन वर्षों से बीमार नहीं हुए थे।

डाक्टरों द्वारा निर्धारित दिनचर्या का पालन करते तीनों ने चार दिन में 2100 कैलोरी ऊर्जा प्राप्त की। अगले दस से चौदह दिन तक 4 हजार कैलोरी ग्रहण की। इस बीच प्रतिदिन चार-चार घण्टे बाद एक विशेष मशीन द्वारा इन व्यक्तियों की साँस की गति नापी गयी। दोनों प्रकार की आहार अवधियों में मशीन ने शक्ति के व्यय में कोई परिवर्तन नहीं आँका। निष्कर्षतः डाक्टरों ने इस बात की पुष्टि की- दुर्बलता का कारण आहार में पोषक तत्वों के अभाव की अपेक्षा अनुपयुक्त रहन-सहन और असंयमित जीवन अधिक है।

आयु के अनुसार मनुष्य शरीर के कई घटक बदलते, बनते-बिगड़ते रहते हैं। इन परिवर्तनों को वही शरीर सहन कर सकता है जो सशक्त हो, बलशाली हो। क्योंकि मनुष्य शरीर की आवश्यकताएं उनके भीतर होती रहने वाली आक्सीकरण को निरन्तर प्रक्रिया में पूरी होती रहती है। एक शरीर शास्त्री के अनुसार-” मनुष्य शरीर में निरन्तर जो रासायनिक परिवर्तन होते रहते हैं उनमें सर्वाधिक महत्व औषजन के कार्यों का है-औषजनीकरण की क्रिया से जीवन का क्षय और शरीर का नाश होता रहता है जिसकी पूर्ति ग्रहण किये हुए आहार के द्वारा हुआ करती है। ग्रहण और विसर्जन की प्रक्रिया जब मंद पड़ने लगती है, अथवा इसे सम्पन्न करने वाले अंग क्षीण होने लगते हैं तो जीवनी शक्ति का क्षरण ही क्षरण होता रहता है उसकी पूर्ति नहीं हो पाती।

शरीर का क्षरण कोई ऐसी प्रक्रिया नहीं है जिसकी रोक-थाम न की जा सके। जीवन का आरम्भ लुगदी जैसा एक पदार्थ जिसे जिलेटन कहते हैं, होता है। और यह जिलेटन वृद्धावस्था तक अस्थि के रूप में विकसित होता रहता है। सम्यक् आहार-विहार परिष्कृत आचार विचार द्वार इस प्रक्रिया को लम्बे समय तक जारी रखा जा सकता है।

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अकेलेपन को पहचानिये

परमात्मा ने मनुष्य को इस सृष्टि में अकेला ही भेजा है। जब उसका जीवन समाप्त होता है, मृत्यु सिर आ खड़ी होती है तो उसे यह महायात्रा भी अकेले ही पूरी करनी पड़ती है। जन्म से मृत्यु तक कितने ही संगी साथी बनते हैं। उनसे मित्रता बनती बिगड़ती है। प्रत्येक साथी के साथ बिताये गये क्षणों की जीवन भर से तुलना करें तो अधिकांश जीवन एकांकी ही-उस साथी के बिना ही व्यतीत हुआ प्रतीत होगा।

इस ध्रुवसत्य को जानने के बाद भी अधिकांश व्यक्ति अकेलेपन से डरते हैं। प्रायः लोग एकाकीपन की शिकायत करते रहते हैं। सच्चे मित्रों, अच्छे साथियों का अभाव बताते रहते हैं। कई व्यक्ति जिन्हें कार्य वश घर से दूर जाना पड़ा हो, अक्सर कहते हैं मुझे घर की याद आ रही है, कोई भी तो नहीं जिससे मैं मन की बात कर सकूँ। अपने किसी प्रियजन के विछोह में भी लोग एकाकी महसूस करते हैं। यहाँ तक कि बच्चे भी अपना खिलौना टूट जाने या खो जाने पर वैसा ही अकेलापन अनुभव करते हैं। अपने मालिक या संगी के चले जाने पर पशु भी उदास हो उठते हैं। कहने का अर्थ यह है कि कुछ लोगों को छोड़कर अकेलेपन से सभी घबराते हैं। जबकि अकेलेपन को वरदान की भाँति भुलाया जा सकता है।

एकाकी रह कर कई व्यक्तियों ने आध्यात्मिक, बौद्धिक भावनात्मक और शारीरिक प्रगति की है। कितने ही राजनैतिक कैदियों ने जेल में एकाकीपन का अनुभव नहीं किया वरन् अपने जीवन के महत्वपूर्ण कार्य तथा मूल्यवान अनुभव प्राप्त किये। महर्षि अरविन्द को अलीपुर जेल की कोठरी में कई आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हुई थीं। और उन्होंने खाली समय का उपयोग अपने आत्मविकास के लिए योग अभ्यास में किया था। जवाहरलाल नेहरू ने ‘विश्व इतिहास की झलक’ तथा ‘हिन्दुस्तान की कहानी’ नामक पुस्तकें लिखी थीं।

अकेलेपन के कारण ऊबकर कई लोगों के व्यक्तित्व में अनेकानेक कमजोरियाँ भी आ जाती हैं। अकेलापन अनुभव करने के कारण ही प्रायः अतीत की कई दुखद स्मृतियाँ मानस पटल पर उभरने लगती हैं, वर्तमान की कई समस्यायें सामने आने लगती हैं और भविष्य की चिन्ताएं सालने लगती हैं। एकान्त में व्यक्ति अपने आपसे इतना ऊबने घबराने लगता है कि वह अपने आपको भूलने के लिए कई उपाय सोचने अपनाने लगता है। अपनी कमजोरियाँ और व्यक्तित्व की त्रुटियों से लोग इतने हैरान परेशान हो उठते हैं कि मादक द्रव्यों की लत से लेकर एकान्त से भाग कर भीड़ में खोने तक कई अनुचित अवाँछनीय आयामों प्रवृत्तियों में गिरने पड़ने लगते हैं। ये एकाकीपन के कारण उत्पन्न दुष्परिणाम हुए।

एकान्त में चूँकि व्यक्ति अपने आपसे सामने होता है। यदि वह स्वयं को सचमुच अकेला अनुभव करता है तो इस अकेलेपन का मनवांछित दिशा में उपयोग किया जा सकता है। इसलिए महर्षि अरविन्द ने कहा है कि- ‘‘महत्वपूर्ण यह नहीं कि आप अकेले हैं। महत्वपूर्ण यह है कि आप अकेलेपन का क्या उपयोग करते हैं। अकेले होकर आप दुष्टता की सीमा तक भी जा सकते हैं और महानता के शिखर को भी छू सकते हैं।’’

अकेलेपन के प्रति यह संतुलित भाव ही व्यक्ति को एकान्त के क्षणों का सदुपयोग करने की शक्ति प्रदान करता है। इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि अकेलेपन का सही विश्लेषण किया जाय और उससे जो भी हो सके लाभ उठाया जाय। अकेले होने का अर्थ यहीं तक सीमित नहीं है कि व्यक्ति के आस-पास कोई नहीं है। यह तो मात्र शारीरिक रूप से अकेला होना ही हुआ जबकि वह चेतना की एक अवस्था है जो शारीरिक रूप से भी हो सकती है और आत्मिक रूप से भी। यह आवश्यक नहीं है कि दूसरों के साथ संगत न होने पर ही व्यक्ति एकाकी हो। कहा जा चुका है कि अकेलापन एक अवस्था है जिसमें किसी की भी उपस्थिति का अनुभव आभास नहीं होता है। अरविन्द ने इसी एकाकीपन को दिव्य की खोज का एक अवसर कहा है।

वृद्धावस्था में अथवा किसी प्रियजन के विछोह के समय अकेलेपन का ज्यादा आभास होता है। वृद्धजन जब अपने व्यवसाय से निवृत्त हो चुकते हैं तब और युवाजन अपने किसी दोस्त या संगी से बिछुड़ते हैं तब और राजनेता या सामाजिक नेता अपने अनुयायियों के विमुख होते हैं तब अपने आपको एक दम एकाकी और विपन्न अनुभव करते हैं। यह विपन्नता इस तथ्य के स्पष्टतः साकार करती है कि हमारा व्यक्तित्व बहिर्मुखी है। यह बात प्रकट करती है कि व्यक्ति साहचर्य का इतना अभ्यस्त हो गया है कि उसके बिना उसका निज का अस्तित्व ही नगण्य प्रतीत होता है।

इन स्थितियों पर विधेयात्मक ढंग से विचार किया जाय तो जीवन और व्यक्तित्व में एक महत्वपूर्ण क्रान्ति आ सकती है। उस समय व्यक्ति अपने सामने नितांत निज के रूप में होता है और अनुभव होता है कि अकेलापन ही सत्य है। सब ओर के आश्रम अवलम्बन मिट जाते हैं तब व्यक्ति को अपने पैरों की शक्ति का आभास होता है और वह निज के बल को ही अन्तिम तथा शाश्वत मान कर आत्मावलम्बी बनने की प्रेरणा प्राप्त कर सकता है- यदि अकेलेपन का विधेयात्मक चिंतन किया जाये तब। सेण्ट जोन ने इसी अकेलेपन की व्याख्या इस प्रकार की है- “यह न समझो कि मुझे यह कहकर डरा सकोगे कि तुम अकेले हो, फ्रान्स अकेला है, पृथ्वी अकेली है, चन्द्रमा अकेला है, सूर्य अकेला है यहाँ तक कि ईश्वर भी अकेला है। मेरा अकेलापन इन सबकी तुलना में ही है क्या?”

स्वामी विवेकानन्द ने कहा है- ‘‘महापुरुष सर्वाधिक शक्तिमान तभी होते हैं जब वे अकेले खड़े होते हैं।” ईसा के सम्बन्ध में विख्यात है कि वे जीवन के अन्त तक बारह-तेरह शिष्य खोज सके थे। उनमें से भी एक ने कुछ सिक्कों के बदले अपने गुरु को पकड़वा दिया था और जब उन्हें फाँसी दी जा रही थी तो बाकी के शिष्य भी उन्हें छोड़ कर चले गये थे। उनका अकेलापन ही उनका सर्वाधिक शक्तिशाली साथी रहा जिसका प्रभाव अभी भी फैलता जा रहा है। कहा जाता है कि -” उनके जीवन भर के कार्य उन्हें अमर बनाने में असमर्थ थे किन्तु सूली ने उन्हें अमर कर दिया।

भगवान बुद्ध से भी किसी ने यही प्रश्न किया था कि- ‘‘आप दिन रात धर्मोपदेश करते हैं। कितने लोग आपकी बात मानते हैं? आपके शिष्यों की संख्या भी तो कुछ नहीं के बराबर है।’’ बुद्ध का उत्तर था- ‘‘न माने मेरी कोई बात और न कोई हो मेरा अनुयायी, परन्तु मेरे लिये इतना ही पर्याप्त है कि मैं स्वयं तो अपने कर्तव्य का अनुगमन कर रहा हूँ।”

आत्मिक रूप से एकाकी होने का आभास व्यक्ति को दिव्य की ओर प्रेरित करता है। वस्तुतः अकेलेपन का पीड़ादायक अनुभव किसी ऐसे साहचर्य की आवश्यकता बताता है कि प्रत्येक व्यक्ति को सनातन, शाश्वत और सुदृढ़ स्थिर साहचर्य चाहिए। अबोध शिशु को भूख लगती है तो वह भूख की आवश्यकता व्यक्त न कर पाने के स्थान पर रोने लगता है। अकेलापन क्यों सालता है! यह न जानने के कारण ही व्यक्ति उद्विग्न, परेशान और व्यथित होता है, इसलिए उसकी चेतना, उसका अस्तित्व किसी दिव्य साहचर्य की मांग कर रहा है। परन्तु लोग उस मांग को न समझ पाने के कारण मिथ्या उपायों में पड़ते हैं। स्मरण रखा जाय कि अकेलापन कोई विपदा नहीं बल्कि एक अवसर है, संकेत है कि हमें दिव्य साहचर्य की आवश्यकता है। उसका सर्वोत्तम उपचार है कि अपने भीतर व चारों और ईश्वरीय अस्तित्व का अनुभव करें, ईश्वर को अपना शाश्वत सहचर और सखा मान लें, जो हमें कभी छोड़ कर न जाये।

श्रीमाताजी ने कहा है- ‘‘कभी न भूलो-तुम अकेले नहीं हो। ईश्वर तुम्हारे साथ है। तुम्हारी सहायता और मार्गदर्शन कर रहा है। वह कभी साथ न छोड़ने वाला साथी है।” अरविन्द का यह कथन कि-अकेलेपन में व्यक्ति या तो संत हो जाता है अथवा दुष्ट। इसी सन्दर्भ में ठीक बैठता है। अकेलेपन के सत्य को पहचाना जाय तो व्यक्ति दिव्य साहचर्य को प्राप्त कर सकता है और उसे उथले ढंग से लिया जाय तो क्षुधार्त अबोध शिशु द्वारा कुछ भी उठा कर मुँह में डाल लेने वाली बात बनती है।

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युग-क्रान्ति में गायत्री यज्ञों की भूमिका

किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए भले ही व्यक्तिगत हो, अथवा सामूहिक, केवल चिन्तन भी एकांगी है और केवल कर्म भी अपूर्ण। उसके लिए चिन्तन और कर्म दोनों का ही समन्वित स्वरूप सम्पूर्ण होता है। बिजली के दोनों तार अलग-अलग हों तो विद्युत धारा का प्रवाह उत्पन्न नहीं होता है। दोनों तारों के जुड़ने पर ही विद्युत धारा प्रवाहित होना सम्भव है।

इसके साथ ही यह भी स्मरण रखना चाहिए कि संसार में जब भी कोई बड़े परिवर्तन होना अभीष्ट होते हैं तो उसमें ईश्वरीय शक्तियाँ मानवी चेतना के रूप में ही सक्रिय भाग लेती हैं। अकेले राम ने लंका विजय, आसुरी आतंक की समाप्ति और दिव्य सत्प्रवृत्तियों की स्थापना नहीं की थी, उसके साथ रीछ-बानरों का सहयोग संगठित किया था। कंस के संहार, कौरव-अनीति के उन्मूलन में भी अकेले कृष्ण ने ही भाग नहीं लिया था बल्कि उसके लिए ग्वाल-बालों को संगठित किया था। वर्तमान परिस्थितियों में परिवर्तन अभीष्ट है- यह स्पष्ट है। उसकी दिव्य चेतना युगशक्ति के रूप में अवतरित हुई है- यह भी अनुभव किया जा सकता है। उसके लिए रीछ बानरों की तरह ग्वाल-बालों की तरह सामान्य व्यक्ति किस प्रकार सहयोग कर सकते हैं यह समझना और समझाया जाना चाहिए।

युग-परिवर्तन का प्रयोजन सामूहिक सहयोग से ही पूरा किया जाना चाहिए। इसके लिए गायत्री साधना के द्वारा चिन्तन परिष्कार और यज्ञ अभियान के द्वारा कर्म शोधन की प्रक्रिया को जन-जन तक पहुँचाना चाहिए। युग शक्ति के रूप में जिस गायत्री चेतना के अवतरण की बात कही जाती रही है उसके दो रूप हैं। पहला है परोक्ष, जिसे चिंतन परक कहा जा सकता है। तथा दूसरा है प्रत्यक्ष, जिसे कर्म परक कहा जाना चाहिए। परोक्ष स्वरूप में जप, ध्यान धारणा, लय तथा तत्वज्ञान, योगाभ्यास का समावेश किया गया है तथा कर्म परक-प्रत्यक्ष अभियान में यज्ञ आन्दोलन का।

इस तरह के प्रयास व्यक्तिगत रूप से तो लम्बे समय से किये जाते रहे हैं-परन्तु अब इनमें सामूहिकता का समावेश किया गया है, जिसे अपने युग की नवीनता और विशेषता कहा जा सकता है। गायत्री और यज्ञ का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। दोनों एक दूसरे के पूरक है। बिजली के दोनों तारों की तरह दोनों का सम्मिलित समन्वित स्वरूप ही अभीष्ट युग चेतना उत्पन्न करने में समर्थ हो सकेगा। गायत्री और यज्ञ को भारतीय संस्कृति का माता-पिता कहा गया है इसका भी यही अर्थ है कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।

अभी से नहीं अनादिकाल से ही यह सम्बन्ध चला आ रहा है। शास्त्रों में द्विजों के लिए संध्यावंदन के साथ नित्य यज्ञ का भी निर्देश दिया गया है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए वह सम्भव नहीं रहा तो बलि वैश्वदेव का विधान किया गया। बलिवैश्वदेव अर्थात् भोजन से पहले पाँच ग्रासों की अग्नि में आहुति।

नित्य कर्मों में गायत्री और यज्ञ को रूप में सम्मिलित करने के अतिरिक्त शक्ति अर्जन के लिए किये जाने वाले अनुष्ठानों की पूर्णाहुति में यज्ञ अनिवार्य है। भारतीय धर्मानुयायी के जीवन की कोई भी महत्वपूर्ण घटना गायत्री और यज्ञ के बिना आयोजित नहीं की जाती। बालक का विद्यारम्भ संस्कार कराते समय उसे यज्ञ भगवान की साक्षी में गुरुमन्त्र के रूप में गायत्री मन्त्र दिया जाता है, सिर पर शिखा स्थापन के समय ऋतम्भरा प्रज्ञा की ही प्रतिष्ठापना की जाती है और सत्कर्मों की प्रतिमा धारण करने के रूप में यज्ञोपवीत संस्कार कराया जाता है। इन संस्कारों में भी गायत्री यज्ञ किये जाते हैं तथा गायत्री और यज्ञ को प्रतीक रूप में अपने शरीर पर धारण किया जाता है, उन्हें जीवन क्रम में सम्मिलित करने का संकल्प लिया जाता है।

षोडश संस्कारों में कोई भी संस्कार सम्पन्न किया जाता है तो उसमें यज्ञ अनिवार्य रूप से आयोजित किया जाता है। गर्भाधान पुंसवन सीमांतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारम्भ, विवाह, समावर्तन, वानप्रस्थ, संन्यास और अन्त्येष्टि में से एक भी संस्कार यज्ञ के बिना पूरा नहीं किया जाता।

यही नहीं सार्वजनिक पर्व-आयोजनों में भी यज्ञ की प्रधानता रहती है। होली तो सामूहिक रूप से किया जाने वाला यज्ञ ही है। आज उसका चाहे जो स्वरूप बन गया है पर नवधान्न सस्योष्टि के रूप में नयी फसल आने पर उसका उपयोग आरम्भ करने से पूर्व उसे यज्ञ संस्कारित करने की ही परम्परा विशुद्ध रूप में बनी और चली है। युगान्तरीय चेतना के व्यापक विस्तार में गायत्री उपासना की तरह यज्ञ आयोजनों का भी व्यापक प्रचलन किया जाना चाहिए। गायत्री साधना में जिस प्रकार सामूहिक जप का अभिनव प्रयोग है उसी प्रकार यज्ञ आयोजनों में भी सामूहिक सहयोग की, सामूहिकता की नीति अपनायी जानी चाहिए।

पहले कोई एक व्यक्ति अपने स्वयं के व्यय और प्रयासों से छोटे बड़े यज्ञ कराते रहे हैं। पर युग शक्ति के विस्तार में सामूहिक यज्ञों की पद्धति ही अपनायी जानी चाहिए। इससे जन साधारण में भी आयोजन के प्रति अपनेपन का भाव रहेगा, क्योंकि उनमें उसका भी सहयोग रहता है। सामूहिक जप से, जैसे वातावरण की आवश्यकता पूरी होती है वैसे ही सामूहिक यज्ञों से जनमानस के परिष्कार की। अपने यज्ञों के साथ जुड़े हुए लोक शिक्षण के कार्यक्रम-जिन्हें युग निर्माण सम्मेलन भी कहा जाता है इसी आवश्यकता की पूर्ति करते हैं और इससे सामूहिक सहयोग जुटाया ही जाना चाहिए। सामूहिकता का यह समावेश भी अपने आप में लोकशिक्षण का एक प्रभावशाली कार्यक्रम बन जाता है।

सामूहिक श्रमदान से यज्ञशाला का निर्माण, प्रचार व्यवस्था आदि कार्य किये जाते हैं। इनसे उत्पन्न हुई समस्वरता, अनुशासन की भावना नवयुग में भौतिक प्रगति के मूलभूत आधार हैं। युग शक्ति के अवतरण में सृजन सेनानियों को अपनी भूमिका सामूहिक जप में भाग लेकर उसकी अंश आहुति के लिए सामूहिक यज्ञों में करनी चाहिए तथा इसके लिए कुण्ड निर्माण से लेकर व्यवस्था, आयोजन, कार्यक्रम सबमें सामूहिकता, समस्वरता, अनुशासन का परिचय देना चाहिए।

वैसे भी महायज्ञ जैसे बड़े कार्यक्रम एकाकी प्रयासों से असम्भव हैं, उसका व्यय भार भले ही कोई एक व्यक्ति ग्रहण कर ले पर यज्ञशाला, कुण्ड निर्माण, समिधा चयन के लिए तो दूसरों का सहयोग प्राप्त करना ही होगा। माना कि यह कार्य भी स्वयं सम्पन्न कर लिए गये पर यजमान, यजमान पत्नी, अध्वर्यु, उद्गाता, ब्रह्मा, आचार्य आदि की नियुक्ति के लिए तो दूसरों का सहयोग प्राप्त करना ही पड़ेगा। इसके बिना काम चलाना तो किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है।

महायज्ञों में समस्वरता और एकरूपता बनाये रखने के लिए ब्रह्मा, आचार्य की नियुक्ति की जाती है। अस्तव्यस्तता को निरस्त करने वाले सतर्कता अधिकारी के रूप में ब्रह्मा आचार्य अपना दायित्व निवाहते हैं। सब लोग समवेत स्वरों में मन्त्र पाठ करें, एक साथ आहुतियाँ डालें, एक समान वेश हो, किसी के पास कोई सामग्री कम तो नहीं पड़ रही है आदि बातों की देख−रेख के लिए इस प्रकार के कार्यकर्ता नियुक्त करने चाहिए। यह सारी व्यवस्थाएं यज्ञ करने वालों को और प्रदक्षिणा करने वालों को अनुशासन की शिक्षा देती हैं। कर्मकाण्डों की एकरूपता रखने की एक ही प्रेरणा है-अनुशासन।

यज्ञ शब्द के तीन अर्थ हैं (1) दान, उदारता (2) संगतिकरण-संगठन (3) देवपूजन-उत्कृष्टता का वरण समर्थन, दान उदारता को दूसरे शब्दों में त्याग बलिदान भी कहा जा सकता है। प्रकृति का स्वभाव यज्ञ परम्परा के अनुरूप है। समुद्र बादलों को उदारता पूर्वक जल देता है, बादल उसे एक स्थान से ढोकर दूसरे स्थान तक ले जाते हैं और बरसाते हैं। नदी नाले वह कर भूमि को सींचते तथा प्राणियों की प्यास बुझाते हैं। वृक्ष वनस्पतियाँ अपने अस्तित्व का लाभ पुष्प, फल के रूप में दूसरों को ही देते है। पशुओं का दूध, चर्म बाल एवं सन्तान का लाभ मनुष्यों को ही मिलता है। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र आदि की गतिशीलता उनके अपने लाभ के लिए वरन् दूसरों के लिए है। शरीर का प्रत्येक अंग अपने निज के लिए नहीं समाज शरीर के लाभ के लिए ही अनवरत गति से कार्य करता है। जिधर भी देखिये दान, उदारता, त्याग, बलिदान की यज्ञ परम्परा ही विद्यमान है।

यज्ञीय कर्मकाण्डों में भी इसी की प्रेरणा छिपी पड़ी है। अपने प्रिय खाद्य पदार्थों तथा पौष्टिक द्रव्यों को अग्नि एवं वायु के माध्यम से समाज, संसार के लिए वितरित किया जाता है। उसमें जड़ी बूटियों से बनी हवन सामग्री की आहुति वायुभूत होकर वायुशोधन द्वारा सबको आरोग्यवर्धक श्वांस लेने का अवसर देती हैं। कर्मकाण्डों में प्रयुक्त किये जाने वाले वेद मन्त्र अपनी पुनीत शब्द-ध्वनि से आकाश में व्यापक हो जनमानस को शुद्ध सात्विक बनाते हैं।

यज्ञ का दूसरा अर्थ है संगतिकरण। संगतिकरण अर्थात् संगठन। यज्ञ का एक प्रमुख उद्देश्य धार्मिक प्रवृत्ति के लोगों को संगठित कर उन्हें सत्प्रवृत्तियों में नियोजित करना भी है। इस युग में संघ शक्ति ही प्रमुख है। कहा भी गया है। संघे शक्ति कलियुगौ। परास्त देवताओं को पुनः विजयी बनाने के लिए ब्रह्मा ने उनकी शक्तियों को संगठित कर दुर्गा का प्रादुर्भाव किया था जिसके बल पर देव शक्तियाँ पुनः विजयी हो सकीं तथा उनके संकट दूर हुए। मानव जाति की हर समस्या का हल सामूहिकता में है। और यज्ञ अपने माध्यम से उसी तथ्य की प्रेरणा देता है, फिर अपने यज्ञों में तो सामूहिकता का समावेश करने के लिए विशेष प्रयास किये जाते हैं।

कर्मकाण्डों और अतिरिक्त कार्यक्रमों के माध्यम से दिये जाने वाले शिक्षण का बारीकी से अध्ययन किया जाय, उनका विश्लेषण किया जाय तो यज्ञ से बढ़कर लोक शिक्षण का दूसरा कोई माध्यम नहीं जिसके बल पर देव वृत्तियों को प्रोत्साहन दिया जा सके। अग्निहोत्र के एक-एक कर्मकाण्ड में अमूल्य शिक्षायें भरी पड़ी हैं। इसीलिए ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र में अग्नि को पुरोहित कहा गया है।

यह तो हुआ यज्ञ का शिक्षण -पक्ष, ज्ञान-पक्ष जिसके लाभ त्रिवेणी संगम में स्नान के वर्णित लाभों से जरा भी कम नहीं है। कहा गया है- मज्जन फल देखिय तत्काला। काक होहिं पिक बकउ मराला। अर्थात् उसमें स्नान का फल तत्काल देखा जा सकता है कि कौआ कोयल और बगुला हंस बन जाता है। यज्ञ दर्शन को भली भाँति समझने से वृत्तियों का तुरन्त रूपान्तरण एकदम सहज सम्भव है। उपरोक्त तीनों अर्थों में व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण, समाज निर्माण, बौद्धिक-क्रान्ति, नैतिक क्रांति, सामाजिक-क्रान्ति, भाव-ज्ञान-कर्म का प्रगतिशील लोक शिक्षण किया जा सकता है।

यज्ञ के ज्ञान पक्ष की तरह उसका विज्ञान पक्ष और भी अधिक सामर्थ्यवान है। एक तरह से यह पक्ष विलुप्त ही हो गया है। जिसकी शोध की जाती है, पर प्रत्यक्ष रूप से मन्त्र शक्ति के प्रभाव, विशिष्ट शाकल्यों से आहुति और रहस्यमय विधि-विधान की प्रतिक्रिया सत्प्रयत्नों की परिणति के रूप में देखी जा सकती है। गीता में इस विज्ञान पक्ष का एक संकेत इस प्रकार किया गया है।

सह यज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्यमेव वोऽस्तिष्ट कामधुक्॥ अन्नाद्भवति भूतानि पर्जन्यादन्न संम्भव। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्ववः॥

अर्थात्- ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजा को रचकर कहा कि इस यज्ञ द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों की इच्छित कामनाओं को देने वाला हो।

सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं और अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है, वृष्टि यज्ञ से होती है तथा वह यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होता है।

यज्ञ के ज्ञान और विज्ञान पक्ष के अपने लाभ हैं। यह अवश्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि सूक्ष्म जिनकी विस्तार से चर्चा करने का समय यहाँ नहीं है। जगत के परिशोधन में यज्ञों का असाधारण महत्व है और युगशक्ति के अवतरण में, उसके विस्तार में यज्ञ के ज्ञान तथा विज्ञान पक्ष का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।

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कर्म यज्ञ से सिद्धि

जबाला पुत्र सत्यकाम ने गौतम ऋषि के आश्रम में समित्पाणि होकर कहा- पूज्य वर मैं गुरुकुल में रहकर विद्याध्ययन करना चाहता हूँ।

गौतम ने पूछा-’ तुम्हारा कुल गोत्र क्या है ?

‘यह तो मैंने मातुश्री ने नहीं पूछा। पिता के दर्शन तो मैं अपने जीवन काल में कर ही नहीं सका।

तो जा और अपनी माँ से कुल गोत्र पूछ कर आ, महर्षि की आज्ञा पाकर सत्यकाम अपनी माँ के पास गया।

जबाल से जब उसने पूछा तो माँ ने बताया- बेटा, ‘यह तो मैं भी नहीं जानती कि तेरा पिता कौन है। मुझे कभी यह पूछने का समय भी नहीं मिला। क्योंकि मैं अहर्निश अतिथियों की सेवा में लगी रहती थी।’

‘तो फिर मैं आचार्य प्रवर से क्या कहूँ?’

‘कहना कि मेरे पिता के बारे में मेरी माँ भी नहीं जानती। बस इतना ही कहना कि मैं जबाला का पुत्र हूँ और सत्यकाम मेरा नाम है।

सत्यकाम ने आचार्य प्रवर के पास जाकर ऐसा ही कहा। अज्ञात कुल और गोत्र के सत्यकाम की सत्यवादिता को देखकर गौतम ने कहा-वत्स! ब्राह्मण को छोड़कर दूसरा कोई भी इस प्रकार सरलभाव से सत्य नहीं कह सकता। जा थोड़ी-सी समिधा ले आ। मैं तेरा उपनयन संस्कार करूंगा।

समिधा लाकर सत्यकाम ने आचार्य श्रेष्ठ के चरणों में रख दी। उपनयन संस्कार सम्पन्न होने के बाद महर्षि गौतम ने सत्यकाम से कहा-आश्रम में इस समय चार सौ गायें हैं। वे बहुत ही कृश और दुर्बल हैं। तुम उन्हें वन ले जाओ और उनकी सेवा करो। जब तक वे एक सहस्र न हो जायें तब तक तुम वन से मत लौटना।’

गुरुदेव की आज्ञा को शिरोधार्य कर सत्यकाम उन दुर्बल व कृश गायों को लेकर चल पड़ा। गुरुदेव की साक्षी में सत्यकाम ने संकल्प लिया कि जब तक ये गायें एक सहस्र नहीं हो जायेंगी तब तक मैं वापस नहीं लौटूंगा।

सत्यकाम गायों को लेकर वन में चला गया तथा वहाँ एक कुटिया बना कर रहने लगा। प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में ही उठ जाता और सन्ध्योपासनादि नित्यकर्मों से निवृत्त होने के बाद गायों की सेवा सुश्रूषा में लग जाता। नित्य कर्मों से निवृत्त होने के बाद जो वह निकलता तो सन्ध्या समय ही लौटता। इस बीच वह गायों को नहलाता, कौन गाय अधिक रुग्ण है और किस पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है, आदि बातों का ध्यान रखता।

गुरु द्वारा सौंपा गया कार्य ही साधना व तपश्चर्या बनी गयी थी तथा उसे पूरा करना ही जीवन। इस कार्य के अलावा सत्यकाम को किसी दूसरी बात का विचार भी नहीं आता था। धीरे-धीरे कृश गायें पुष्ट होने लगीं। गौओं ने उस यूथ में वृषभ भी थे। गायों की संख्या भी बढ़ती जा रही थी। एक दिन सत्यकाम को पता चला कि गायों की संख्या एक सहस्र हो गयी है।

तब सत्यकाम ने आश्रम लौट जाने के उद्देश्य से वापस प्रस्थान किया। मार्ग में वृषभ ने ब्रह्मतत्त्व के एक चरण का उपदेश दिया और कहा अगला चरण अग्नि बतायेगा। इस प्रकार क्रमशः वृषभ, अग्नि, हंस और मुद्ग ने ब्रह्म के चारों चरण प्रकाश स्वरूप, अनन्त लक्षणात्मक, ज्योतिष्मान तथा आयतन स्वरूप का उपदेश दिया।

आश्रम लौटने पर आचार्य ने सत्यकाम की तेजपूर्ण दिव्य और ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न मुख कांति को देखा तो कहा-‘वत्स तू ब्रह्मज्ञानी के सदृश्य दिखलायी पड़ता है।’

सत्यकाम ने कहा- ‘भगवन्! मुझे मनुष्येत्तरों से विद्या प्राप्त हुई है।’

‘नहीं पुत्र तुमने कर्मयज्ञ से ब्रह्मतत्त्व की लब्धि की है- आचार्य ने कहा और फिर ब्रह्मतत्त्व का विधिवत उपदेश दिया।

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भावना क्षोभ से मुक्ति अर्थात् रोग से छुट्टी

अमेरिका के न्यूजर्सी शहर में अपनी प्रैक्टिस करने वाले डॉ0 नारमन वीसेण्ट पीले एक चिकित्सक होने के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक भी थे। इसके साथ ही वे न्यूजर्सी के एक चर्च में प्रवचन के लिए भी जाया करते थे। एक दिन वे प्रवचन समाप्त कर चर्च की सीढ़ियों से नीचे उतर ही रहे थे कि एक बेचैन युवती उनके पास आ गयी और खड़ी होकर कहने लगी- ‘‘डॉक्टर! क्या मेरे रोग का इस संसार में कोई इलाज ही नहीं है?”

प्रश्न, इतनी हड़बड़ाहट से किया गया था कि एक वारगी तो डॉ0 पीले भी चौंक उठे। फिर उन्होंने पूछा- ऐसी क्या बीमारी है तुम्हें।

युवती ने कहा कि जब भी वह चर्च में आती है तो उसकी बाँहों में बड़ी तेज खुजली से वह बेहाल हो जाती है। उसने अपनी बाँहों को उघाड़ कर बताया, उन पर लाल-लाल चकत्ते उभरे हुए थे। उस युवती ने यह भी कहा कि-यही हालत रही तो वह चर्च में आना बन्द कर देगी।

डॉ0 पीले ने कहा-हो सकता है तुम जिस कुर्सी पर बैठती हो उसमें कोई ऐसे रासायनिक पदार्थ प्रयुक्त किये गये हों जो तुम्हारे शरीर के अनुकूल न पड़ते हों।

अगर यही बात है तो मैं जब किसी दूसरे गिरजे में जाती हूँ अथवा दूसरी कुर्सी पर बैठती हूँ तब तो खुजली नहीं होनी चाहिए न। लेकिन तब भी ऐसा ही होता है-युवती ने अपनी समस्या का विश्लेषण किया।

डॉ0 पीले एक सहृदय और प्रत्येक रोगी के प्रति सहानुभूति रखने वाले चिकित्सक थे। उन्होंने युवती को यह आश्वासन बंधाते हुए कि संसार में ऐसी कोई समस्या नहीं जिसका समाधान न हो, कहा- मैं तुम्हारे फैमिली डॉक्टर से बातचीत करूंगा। शायद उनसे बातचीत के दौरान ऐसा कोई सूत्र निकल आये जिससे कि तुम्हारी समस्या का समाधान हो सके।

युवती के फैमिली डॉक्टर का पता लेकर डॉ0 पीले ने उनसे संपर्क किया तो पता चला कि उस युवती को इन्टर्नल एग्जिमा था, यह खुजली किसी रोगाणु के संक्रमण से नहीं वरन् अपने आप से भीतर ही भीतर उलझते रहने के कारण उठती है प्रायः देखा जाता है कि जब कोई बात समझ में नहीं आ रही हो या बहुत कोशिश करने पर भी कोई याद नहीं आ रही हो तो हाथ अपने आप उठ कर कनपटियों को खुजलाने लगते हैं। जब रुपये पैसों की बेहद तंगी हो और उनकी सख्त आवश्यकता अनुभव हो रही हो तो हथेलियाँ खुजलाने लगती हैं। यह खुजलाहट दिमाग में होने वाली उथल-पुथल के परिणाम स्वरूप ही उठती है जब व्यक्ति मानसिक रूप से किसी द्वन्द्व या संघर्ष से गुजर रहा हो तो भी जोरों की खुजली मचती है और व्यक्ति खुजाते-खुजाते चमड़ी को लाल कर लेता है। इस तरह की खुजलाहट के कुछ विशिष्ट लक्षण होते हैं जिसके आधार पर डॉक्टर इन्टर्नल एग्जिमा को पहचानते हैं।

गिरजे में आकर ही उस युवती को इस तरह की खुजली क्यों परेशान करती है-यह जानने के लिए डॉ0 पीले ने रोगिणी को कुरेदा। आत्मीयता, स्नेह और सहानुभूति से प्रभावित हो कर उक्त युवती ने अपना सारा अतीत खोलकर रख दिया। वह किसी बड़ी फर्म में एकाउंटेन्ट के पद पर कार्य करती थी और प्रायः गोलमाल कर थोड़ा धन चुराती रहती थी। उसी युवती के अनुसार चोरी की शुरुआत बहुत छोटी रकम से की गयी थी और हर बार वह यह सोच कर पैसे चुराती थी कि वह जल्द ही इन चुराये गये पैसों को वापस रख देगी परन्तु वह ऐसा नहीं कर पायी थी।

डॉ0 पीले ने इस घटना का विश्लेषण करते हुए कहा है कि इस प्रकार उस युवती के मन में अपराध भावना घर कर गयी। जब यह चर्च में आती तो वहाँ के पवित्र वातावरण में यह भावना और उग्र हो उठती थी। परिणामस्वरूप उसकी रक्तवाहिनी की पेशियों में ऐंठन होने लगती और खुजली शुरू हो जाती।

मनः संस्थान में जमी हुई इस रोग की जड़ों को पहचान कर डॉ0 पीले ने उक्त युवती को सलाह दी कि वह फर्म के मालिक के सामने सब कुछ स्वीकार कर ले साथ ही चुराई गयी रकम को अदा करना भी शुरू कर दे। युवती ने नौकरी छूटने का डर बताया तो डॉ0 पीले ने ढाढ़स बंधाया-हो सकता है तुम्हारी फर्म का मालिक तुम्हारी ईमानदारी और सच्चाई से प्रभावित होकर तुम्हें नौकरी से न हटाये, पर एक क्षण को यह मान भी लें कि तुम्हें नौकरी से हटा दिया तो तुम्हें अन्यत्र भी नौकरी मिल सकती है। नौकरी खो देने से उतनी क्षति नहीं होगी जितनी की अपनी आत्मा और आदर्श को खोने से हो रही है।

बात समझ में आ गयी और युवती ने अपने मालिक के पास जाकर सब कुछ कह दिया। वही हुआ जिसकी सुखद सम्भावना डॉ0 पीले ने बतायी थी। अर्थात् मालिक ने उसकी सच्चाई, ईमानदारी और नैतिक मूल्यों के प्रति उदित हुई दृढ़ निष्ठा से प्रभावित होकर उसके खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की। इस क्षमा से युवती का हृदय और पश्चात्ताप विदग्ध हुआ तथा उसने स्वयं ही वह पद छोड़ दिया। इस पश्चात्ताप और प्रायश्चित के परिणामस्वरूप आयी भावनाओं में शुद्धि के कारण युवती को दुबारा फिर कभी खुजली नहीं उठी। इसका कारण यह था कि उसका भावना-जन्य क्षोभ समाप्त हो चुका था।

शरीर की तमाम पेशियाँ स्नायु मण्डल द्वारा संचालित होती हैं। छोटी-मोटी स्नायुओं का एक पूरा जाल मनुष्य शरीर में फैला हुआ है जिसका नियन्त्रण मस्तिष्क से होता है। कुछ स्नायु ऐच्छिक होते हैं, जिनका इच्छानुसार उपयोग होता है जैसे चलना-फिरना या कोई वस्तु पकड़ना छोड़ना। यह कार्य यद्यपि पेशियों द्वारा ही होते प्राप्त करती हैं। इन ऐच्छिक स्नायुओं के अतिरिक्त एक दूसरे प्रकार के स्नायु भी होते हैं जिन्हें अनैच्छिक कहा जाता है। इन पर मनुष्य का कोई अधिकार नहीं होता और ये हृदय के धड़कने, नाड़ियों के फड़कने तथा आँतों के कंपने जैसा कार्य सम्पन्न करते हैं।

इन अनैच्छिक स्नायुओं का नियन्त्रण मस्तिष्क के उस केन्द्र से होता है जिसे ‘हायपोथैल्मस’ कहते हैं। इसी केन्द्र से एक नलिकाविहीन ग्रन्थि भी सम्बन्धित रहती है जिसे पिट्यूटरी ग्रन्थि कहते हैं। यह ग्रन्थि शरीर रक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा और मानसिक संतुलन को बनाये रखने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका प्रतिपादित करती है। पिट्यूटरी ग्रन्थि का आकार यद्यपि एक चने के दाने के बराबर होता है परन्तु यह अन्य नलिकाविहीन ग्रन्थियों का भी नियन्त्रण करती है। डॉ0 पीले ने जिस युवती का मानसोपचार कर ‘एन्टर्नल एग्जिमा’ ठीक किया था वह स्नायुजन्य विकार के कारण ही उत्पन्न हुआ था और भावनाक्षोप समाप्त होते ही स्वतः ही ठीक भी हो गया।

शरीर के स्वास्थ्य संरक्षण का दायित्व पिट्यूटरी ग्रन्थि ही मुख्य रूप से सम्हालती है। डॉ0 एच॰ सैले ने अपनी शोधों द्वारा यह पता लगाया। यह ग्रन्थि खास तौर से उस समय ज्यादा कमजोर हो जाती है जब व्यक्ति के भीतर भावनात्मक द्वन्द्व मानसिक उथल-पुथल मची हुई हो और ऐसी स्थिति में पेशियों की ऐंठन से लेकर त्वचा विकार, हृदय रोग, पाचन विकार, रक्तचाप से लेकर हमेशा बना रहने वाला सिर दर्द तक पैदा हो सकता है। यह तो सभी जानते हैं कि शरीर के समीप अंग-प्रत्यंगों का संचालन मस्तिष्क द्वारा भेजे गये निर्देशों से ही होता है। भावनाओं के कारण मस्तिष्क पर अवांछनीय दबाव बना रहेगा तो यह निश्चित ही है उसकी प्रतिक्रिया शरीर पर भी हो। अधिकांश रोगों के मूल में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से भावना क्षोभ ही पाया गया है, भले वह कोई दुराव छुपाव का भाव हो अथवा आक्रोश क्रोध का भाव।

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अपनों से अपनी बात-


अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का समग्र अनुसंधान

मनीषियों के परामर्शों का सार एक ही है कि ‘‘मनुष्य सद्भाव सम्पन्न बने-सद्ज्ञान का वैभव बटोर, सत्कर्मों का पुण्य कमाये और सज्जनोचित जीवन जिये।’’ यह सब कैसे बन पड़े- इसके उत्तर में एक ही बात कहीं जा सकती है कि अध्यात्म दर्शन की आस्थाएं अन्तःकरण में जमाई जाय और धर्म धारणा को स्वभाव अभ्यास का अंग बनाया जाय। दो पहियों की गाड़ी इन्हीं दो पटरियों पर ठीक तरह लुढ़कती है। सम्पदा और सुविधा को जितना महत्व दिया जाता है उतना ही चेतना का स्तर परिष्कृत करने के लिए अध्यात्म और धर्म को जीवन की दिशा धारा माना जाय और उन्हें प्रगति एवं प्रसन्नता के लिए अनिवार्य माना जाय।

इस संदर्भ में अपने समय की दो कठिनाइयाँ हैं एक तो धर्म और अध्यात्म में इतनी अधिक विकृतियाँ भर गई हैं कि उनका मूलस्वरूप ही अस्त व्यस्त हो गया है। जो है वह न तो अपनी उपयोगिता सिद्ध कर पाता है और प्रामाणिकता के सम्बन्ध में जन सन्देहों का निवारण। ऐसी दशा में विवेकबुद्धि उसे कैसे अपनाये? दूसरी कठिनाई यह है कि विज्ञान के साथ पनपा हुआ भौतिक दर्शन, अपना मन्तव्य भोगवाद के पक्ष में प्रस्तुत करता है। प्रत्यक्षवाद के अनुसार शरीर ही सब कुछ है, इसलिए इसी की सुविधाओं को प्रधानता मिलनी चाहिए। ईश्वर, आत्मा का अस्तित्व विज्ञान ने स्वीकार नहीं किया। ऐसी दशा में पुण्य परमार्थ की जड़ें भी खोखली हो जाती हैं और आदर्शवादिता अपनाकर प्रत्यक्ष स्वार्थों में कमी करने की बात भी बेतुकी ठहरती है। चार्वक ने ‘ऋणं कृत्वा धृतं पिवेत्’ की नीति को बुद्धिमत्ता बताया था और येन-केन प्रकारेण ‘यावज्जीवेन्’ सुखजीवेन् की नीति अपनाने के लिए कहा था। उस समय एक दार्शनिक की ही यह उक्ति थी और आस्था युग में मान्यता प्राप्त न कर सकी। किन्तु आज तो विज्ञान का राजकुमार बुद्धिवाद पूरे बल समर्थन से उसी नीति को सही बताता है। जब प्रत्यक्षवाद के अन्यान्य प्रतिपादन सर्वमान्य हो रहे हैं तो जीवन दर्शन के क्षेत्र में भी स्वार्थवादिता को प्रश्रय क्यों न मिले? परिणाम सामने है-हर क्षेत्र में संकीर्ण स्वार्थ परता बढ़ रही है फलतः अनुदारता और निष्ठुरता की प्रवृत्ति लोक नीति बनती जा रही है। शोषण, उत्पीड़न, अपहरण, अनाचार, अत्याचार और अपराधों की अभिवृद्धि इतनी तेजी से हो रही है कि वातावरण का विषाक्त प्रदूषण मनुष्यता के लिए प्राण घातक घुटन पैदा किये दे रहा है। मत्स्यन्याय और जंगली कानून से संत्रस्त मानव समाज को आज जितना त्रास मिल रहा है उतना भूतकाल में कदाचित कभी भी नहीं मिला था। इसके लिए राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक कारणों को दोषी ठहराया जाता है, पर वस्तुतः आस्था संकट ही युग विभीषिकाओं का एकमात्र कारण है। उसी उद्गम से अनेकानेक विग्रहों और संकटों की उत्पत्ति हो रही है।

हर क्षेत्र में बढ़ती हुई समस्याओं और विपत्तियों के निवारण में मूर्धन्य प्रतिभाएं जुटी हुई हैं। अनेकानेक उपाय-उपचार भी हो रहे हैं, पर जितना जोड़ते हैं उससे भी अधिक टूटने का दुर्भाग्य ही पल्ले पड़ता है। शान्ति के समाधान आज निकले या हजार वर्ष बाद उनका स्वरूप एक ही होगा कि जनमानस पर छाये हुए आस्था संकट का निराकरण किया जाय। इस निराकरण के दो ही उपाय हैं-चिन्तन में अध्यात्म तत्वज्ञान का और व्यवहार में धर्मधारणा का समावेश। इस प्रयास की उपेक्षा जब तक होती रहेगी तब तक उज्ज्वल भविष्य की आशा मृगतृष्णा ही बनी रहेगी।

धर्म और अध्यात्म की पुनः प्राण प्रतिष्ठापना के मार्ग में दो बाधाएं ही इन दिनों प्रमुख हैं। इस महान तत्व ज्ञान का विकृत स्वरूप और प्रत्यक्षवाद द्वारा उत्कृष्टता वादी दर्शन की अवमानना। इन दो मोर्चों पर जूझा जा सके तो ही आगे का पथ प्रशस्त होगा अन्यथा अवरोधों की चट्टानें रास्ता रोक कर ही खड़ी रहेंगी। इन्हें कैसे हटाया जाय? इस प्रश्न का उत्तर एक ही है कि दोनों ही क्षेत्रों की भ्रांतियों का निराकरण करने के समर्थ तन्त्र खड़ा किया जाय। दर्शन का उत्तर दर्शन से, तर्क का उत्तर तर्क से और विज्ञान का उत्तर विज्ञान से ही दिया जा सकता है। आज की परिस्थितियों में शास्त्र प्रमाण एवं आप्त वचन पर्याप्त नहीं रहे। उनके पीछे समर्थ प्रतिपादन चाहिए। ऐसे समर्थ जिनके तर्क, तथ्य, विज्ञान की साक्षी एवं पुष्टि उपलब्ध हो।

अपने समय का यही सबसे बड़ा काम है। इसके लिए ऐसा अनुसंधान तन्त्र खड़ा करना होगा जो धर्म और दर्शन के शाश्वत स्वरूप को प्रस्तुत कर सके और उसकी उपयोगिता एवं प्रामाणिकता से बुद्धिवाद को पुनर्विचार के लिए विवश कर सके। अध्यात्म विज्ञान के तीन अंग है। (1) परोक्ष सत्ता का अस्तित्व (2) आस्थावादी तत्व-दर्शन (3) साधना विज्ञान का प्रतिफल। इन तीनों को विज्ञान क्षेत्र में पिछले दिनों मान्यता नहीं दी है। फलतः नास्तिकवाद का पथ सबल हुआ है और अनास्थावादी आचरणों ने जोर पकड़ा है। नया अनुसंधान तन्त्र ऐसा खड़ा होना चाहिए जो प्रत्यक्षवाद के प्रत्येक अनास्थावादी प्रतिपादन को चुनौती दे सके और उस क्षेत्र में छायी हुई भ्रान्तियों को परास्त कर सके। आज इन प्रतिद्वन्द्वी प्रयत्नों की इतनी आवश्यकता है जिसे मानवी भविष्य को बनाने-बिगाड़ने की दृष्टि से सर्वोपरि महत्व का माना जा सकता है।

इसके लिए समर्थ अनुसंधान तन्त्र खड़ा करना होगा। दर्शन और विज्ञान के प्रस्तुत प्रतिपादनों का पुनः निरीक्षण उसका एक पक्ष होगा, दूसरा होगा प्राचीन प्रगतिशीलता के उन आधारों को खोज निकालना जिनके सहारे अपनी महान उपलब्धियाँ समस्त संसार पर सुख समृद्धि के उपहार बिखेरती रही हैं। अनुसंधान का दूसरा पक्ष वह है जिसमें धर्मानुष्ठानों और साधना प्रयोगों के सम्बन्ध में यह जाँच पड़ताल की जा सके कि उन पर किया गया श्रम अभीष्ट परिणाम उत्पन्न करता है या नहीं। व्यायाम से लेकर कृषि कर्म तक की हर श्रम साधना का जब प्रतिफल सामने आता है तब आत्म साधना पर किया गया श्रम ही क्यों संदिग्ध रहना चाहिए? साधना का प्रतिफल यदि अनिश्चित रहता है तो उसके कारण दो ही हो सकते हैं या तो वह विधि विज्ञान ही कीलतडडडडड है अथवा उन उपचारों को कार्यान्वित करने में कहीं भूल है। इस संदर्भ में ऐसे निष्कर्ष सामने आने चाहिए जो अनिश्चितता के कारण उत्पन्न अश्रद्धा का, अपेक्षा उदासीनता का अन्त कर सकें।

प्राचीनकाल की ऋषि परम्परा में शोधन, सृजन और शिक्षण की त्रिवेणी का संगम था। एकान्त वास, विशुद्ध शोध प्रयोजनों के लिए होता था। ताकि बिना ब्राह्म विक्षोभ के एकाग्र मनःस्थिति में अनुसंधानों का क्रिया-कलाप ठीक तरह सधता रहे। भौतिक विज्ञान में भी अन्वेषणकर्त्ताओं को ऐसी ही सुविधा दी जाती है। सृजन में लोकोपयोगी सभी सत्प्रवृत्तियों का स्वरूप निर्धारण आता है। साहित्य सृजन से लेकर चिकित्सा-उपचार, कला-शिल्प, उपकरण-रसायन आदि के अनेक प्रयोजन विनिर्मित करना ऋषि परम्परा का दूसरा आधार रहा है। तीसरा कार्य था-शिक्षण। इसमें बालकों के लिए गुरुकुल, प्रौढ़ों के लिए आरण्यक, सर्व साधारण के लिए तीर्थाटन जैसे उपाय काम में लाये जाते थे। पर्वों पर विशालकाय आयोजनों की व्यवस्था इसी प्रयोजन के लिए जाती थीं। लोक-शिक्षण के और भी कितने ही कथा-प्रवचन, सत्संग जैसे प्रकार थे, जिनके आधार पर जन साधारण तक उत्कृष्टता का आलोक पहुँचता रहता था। यही वह ऊर्जा थी जिसके कारण इस देश का प्रत्येक नागरिक कमल पुष्पों की तरह खिलता और महकता देखा जाता था।

युगान्तरीय चेतना उत्पन्न करने के लिए जिस अनुसंधान की आवश्यकता है उसके भी तीन पक्ष ही होंगे। शोध, सृजन और प्रशिक्षण। इन तीनों ही प्रयोजनों को पूरा करने के लिए ब्रह्मवर्चस् आरण्यक के रूप में ऋषि परम्परा को पुनर्जीवित किया गया है। अखण्ड-ज्योति ने विज्ञान और अध्यात्म के अनुसंधान का कार्य सन् 65 से हाथ में लिया है। एक व्यक्ति के द्वारा किये गये अध्ययन अनुसंधान का ही वह प्रतिफल है जो पत्रिका के पृष्ठों पर अनवरत क्रम से प्रकाशित होता रहा है। उससे बुद्धिवादी पक्ष को एक नई दिशा, चेतना और प्रेरणा मिली है। इन प्रतिपादनों से बढ़ती हुई अनास्था पर अंकुश लगाने में छोटी, किन्तु महत्वपूर्ण सफलता मिली है। प्रस्तुत प्रतिपादनों से तर्क प्रमाण और प्रत्यक्ष को ही सब कुछ मानने वाले वर्ग को नये सिरे से सोचने के आधार मिले हैं और उन्होंने यह अनुभव किया है कि पिछली पीढ़ी के तथ्यान्वेषी धर्म और अध्यात्म के सम्बन्ध में जिस तरह सोचते थे वह तरीका अब उपयुक्त नहीं रहा। विज्ञान बहुत आगे बढ़ गया है, उसने बचपन से आगे बढ़कर प्रौढ़ता में प्रवेश पाया है, फलतः चेतना का अस्तित्व और उसकी सामर्थ्य के सम्बन्ध में उपलब्ध नये तथ्यों को ध्यान में रखना होगा। अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर छपने वाली सामग्री ने न केवल भारत वरन् समस्त विश्व के बुद्धि जीवियों के सामने अधिक प्रमाण सामग्री उपस्थित की है जिसे न तो उपेक्षित किया जा सकता है और न अप्रामाणिक ठहराया जा सकता है। इस प्रस्तुतीकरण से उन लोगों का पक्ष सबल हुआ है जो आस्तिकता को उसके साथ जुड़ी हुई आध्यात्मिकता और धार्मिकता को मनुष्य के लिए उतनी आवश्यक बताते हैं जितनी कि आहार-विहार एवं शिक्षा आदि दैनिक प्रयोजनों में प्रयुक्त होने वाले सुविधा साधन।

अखण्ड-ज्योति के संचालक सूत्र एक व्यक्ति के साथ गुँथे हुए हैं। मनुष्य आखिर मनुष्य ही है। उसकी सामर्थ्य सीमित और अस्तित्व, काल के सीमा बन्धनों में प्रतिबन्धित। ऐसी दशा में युग की आवश्यकता पूरी कर सकने योग्य समर्थ तन्त्र ऐसा होना चाहिए जो व्यक्ति की सत्ता तिरोहित हो जाने पर भी अपने प्रयासों को निर्वाध गति से अग्रगामी बनाये रह सके। भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में कितनी ही प्रतिभाओं का उदय अस्त होता रहा है वे अपना अपना योगदान देकर अनुसंधान की धारा को अग्रगामी बनाती रही हैं। उपलब्धियों का सिलसिला अनवरत गति से चलता रहा है और वहाँ आ पहुँचा है जहाँ प्रकृति पर अधिकार पाने और आधिपत्य जमाने के मनसूबे बहुत हद तक पूरे होते दीखते हैं। अध्यात्म अनुसंधान की ऋषि परम्परा का पुनरुत्थान अब नये सिरे से आरम्भ हुआ है। छुट-पुट प्रयास अन्यत्र भी होते हैं, पर जिस सुनियोजित आधार को अपना कर अध्यात्म तत्वज्ञान के अनेकानेक पक्षों का ऊहापोह करने के लिए अखण्ड-ज्योति ने कदम उठाया है उसे अपने ढंग का अनुपम, अभूतपूर्व एवं अद्भुत ही कहा जा सकता है। उसके छोटे से प्रयास को भी विज्ञ समाज में एक स्वर से सराहा गया है।

समय आ गया है कि इस शुभारम्भ को, एकाकी प्रयत्न तक सीमित न रहने देकर एक शोध तन्त्र के कन्धे पर डाला जाय। इन दिनों यही हो रहा है। हरिद्वार का ब्रह्मवर्चस् इस महान उत्तरदायित्व को अपने कन्धों पर उठाने जा रहा है। अब तक अध्यात्म दर्शन के पक्ष में संसार भर में बिखरे हुए प्रमाणों का एकत्रीकरण करके उसे सुसंबद्ध रूप से जन साधारण के सन्मुख प्रस्तुत किया जाता रहा है और बताया जाता रहा है कि आस्तिकवादी मान्यताओं के पक्ष में मात्र श्रद्धा ही आधार नहीं है तथ्यों का समर्थन भी इतना है कि उथली नास्तिकता की उछल-कूद को चुनौती दी जा सके।

यह सुखद समाचार पूरे अखण्ड-ज्योति परिवार में बहुत ही उत्साह और आनन्द के साथ सुना जायगा कि ब्रह्मवर्चस् आरण्यक अध्यात्म तत्व ज्ञान के दार्शनिक एवं प्रयोगात्मक दोनों ही पक्षों का उत्तरदायित्व वहन करने की स्थिति में पहुँच रहा है। संसार भर में आस्तिकवाद की अनेक धाराओं के पक्ष-विपक्ष में जो कुछ कहा जाता रहा है तुलनात्मक रूप से उसका अध्ययन किया जायगा और देखा जायगा कि ऋषि परम्परा के साथ उसकी संगति कहाँ खाती है। प्रत्यक्षवादी तथ्य अध्यात्म आस्थाओं की उपयोगिता, अनुपयोगिता के सम्बन्ध में किस आधार पर, किस नतीजे पर पहुँचते हैं?

विश्वास किया जाना चाहिए कि आत्मवादी तत्व सत्य की सुदृढ़ आध्यात्मिक भित्ति पर खड़े हैं। और वे उथले अनास्तित्ववाद के आक्रमण को निरस्त करने में पूरी तरह समर्थ हो सकेंगे। जिस पथ का प्रस्तुतीकरण और समर्थन करने वाला कोई हो ही नहीं, उसे हारा हुआ ठहराने में क्या लगता है? बुद्धिवाद की अदालत में अस्तित्ववाद को हारा हुआ इसलिए ठहराया जाने लगा है कि उसके पक्षधरों ने समय की चुनौती स्वीकार करने में कन्नी काट ली और पुरातन श्रद्धावाद की ही आत्मरक्षा कर सकने की बात सोच ली। जबकि तर्क का तर्क से तथ्य का तथ्य से, प्रमाण का प्रमाण से, प्रत्यक्ष का प्रत्यक्ष से उत्तर देना आवश्यक था। ‘विषास्य विष मौषधम्’ और ‘शठें शाष्ठं समाचरेत्’ की उक्तियाँ भी निरर्थक नहीं है। सोचा यह भी जाना चाहिए था।

सही कदम देर से उठे तो भी उन पर सन्तोष किया जा सकता है। जो कार्य आज से दो सौ वर्ष पूर्व आरम्भ होना चाहिए था, वह अब हो रहा है। यह विलंब अखरा तो बहुत और उसने हानि भी बहुत पहुँचायी पर यह भी अच्छा ही है कि देर-सवेर में सही कदम उठा लिए गए और अखण्ड-ज्योति के शोध-प्रयत्न चल पड़े। ब्रह्मवर्चस् के रूप में उसकी सुनियोजित प्रगति हर दृष्टि से सन्तोषप्रद है। इन प्रयत्नों के अन्तर्गत अध्ययन और अनुसन्धान के प्रयत्न दार्शनिक पृष्ठभूमि पर चलेंगे। इसके लिए उपयुक्त व्यक्ति, साहित्य एवं साधन जुटाये जा रहे हैं।

अनुसंधान का दूसरा पक्ष है- प्रत्यक्ष परीक्षण। इसके लिए एक प्रयोगशाला स्थापित की जा रही है, जिसमें प्रस्तुत प्रयोजन के लिए अन्वेषण करने में जिन यन्त्र उपकरणों की आवश्यकता है उन्हें मंगाया जुटाया जा रहा है। ‘यज्ञ चिकित्सा’ को इस शोध प्रयत्न में प्राथमिकता दी गयी है। यज्ञ की किस प्रक्रिया का मानवी स्वास्थ्य पर, मस्तिष्क संस्थान पर एवं अन्तराल पर क्या प्रभाव पड़ता है। उसका कारण और आधार क्या है? इसका अन्वेषण मशीनों द्वारा किया जायगा। वनस्पति के गुण स्वभाव में सामर्थ्य एवं बुद्धि में यज्ञोपचार की क्या प्रतिक्रिया होती है? पशु-पक्षी और कीट-पतंग उस विशिष्ट ऊर्जा में किस प्रकार, कितनी मात्रा में प्रभावित होते हैं, वातावरण पर उसकी क्या प्रतिक्रिया होती है? जीवाणुओं और विषाणुओं की यज्ञीय ऊर्जा से क्या लाभ, क्या हानि होती है? जैसे अनेक शोध प्रयत्नों को उसी आधार पर किया जायगा, जिन पर वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं अपने अन्वेषण कार्य चलातीं हैं और अनेक उलट-पुलट करने के उपरान्त किसी निष्कर्ष पर पहुँचती हैं।

उपासना के अनेक पक्ष हैं, जिनमें ध्यान प्रक्रिया अतीव शक्तिशाली मानी जाती है। प्रत्याहार से लेकर समाधि तक के अनेक स्तर ध्यान योग के अन्तर्गत ही आते हैं शरीर के समस्त अवयवों पर जिस प्राण चेतना का नियन्त्रण है उसे प्राणायाम द्वारा इस योग्य बनाया जा सकता है कि किस प्रकार शरीर के सूक्ष्म संस्थानों के उससे प्रभावित एवं परिवर्तित किया जाय। मस्तिष्क की जादुई पिटारी में इतने अद्भुत क्षेत्र हैं, जिन्हें अच्छा, खासा ‘तिलस्म’ कह सकते हैं। मानसिक शक्तियों के विकसित करने में ध्यान योग की असाधारण भूमिका है। व्यक्तित्व में अनेक निकृष्टताएं एवं उत्कृष्टताएं उत्पन्न करने वाले कोष्टक हैं। उन तक शल्य उपचार की पहुँच भी नहीं हो सकती और औषधि उपचार भी उतना काम नहीं करता। इन संस्थानों का शमन एवं उत्तेजन ध्यान उपचार द्वारा ही सम्भव है।

त्राटक, खेचरी मुद्रा, नादानुसंधान, बंध, मुद्रा आदि के माध्यम से ऐसी उपलब्धियां पाई जा सकती हैं जो मानवी चेतना के विकास परिष्कार की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका प्रस्तुत कर सकें। हठयोग, लययोग, प्राणयोग, ध्यानयोग, राजयोग, ऋजुयोग आदि की कितनी ही ऐसी साधनाएं हैं जिनका उल्लेख उपासन ग्रन्थों में तो मिलता है पर उनकी व्यावहारिक अभ्यास पद्धति के अनुभवी मार्गदर्शक कहीं खोजे नहीं मिलते, ऐसी दशा में एकमात्र उपाय यही रह जाता है कि नये सिरे से उनका अनुसंधान किया जाय और देखा जाय कि इनमें से किस साधना से, किस स्थिति के व्यक्ति को, क्या प्रयोजन पूरा कर सकने में कितनी सहायता मिलती है? भूतकाल के अनुभवी आचार्य भी किसी निष्कर्ष पर शोध प्रक्रिया के सहारे ही पहुँचे होंगे। अब यदि वे परम्पराएं लुप्त हो गई तो क्यों न उसी अनुसन्धान प्रक्रिया को पुनः अपनाया जाय जिसे अपना कर शास्त्रकारों ने उपयोगी निष्कर्ष निकाले थे।

तन्त्र विज्ञान का भी योग की है तरह अपना स्वतन्त्र क्षेत्र है। योग में मानसिक शक्तियों के सहारे संकल्प बल का उपयोग करके उपयोगी उपलब्धियाँ प्राप्त की जाती हैं। तन्त्र में वही कार्य शरीरगत प्राण-ऊर्जा के माध्यम से सम्पन्न किये जाते हैं। तन्त्र वह भौतिकी है जिसमें आत्म बल का कम और स्नायु संस्थान में प्रवाह मान विद्युत शक्ति का अधिक उपयोग किया जाता है। मध्यकाल के अज्ञानान्धकार युग में तन्त्र द्वारा उद्भूत शक्ति का उपयोग मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि जघन्य उद्देश्यों के लिए किया जाने लगा और उसके साधक अमर्यादित होकर अघोर एवं अनैतिक आचरण करने लगे, फलतः उस अशुभ उपचार ने पूरे विज्ञान को निष्कृष्ट, निंदित बना दिया। वस्तुतः वह एक अत्यन्त शक्तिशाली विज्ञान है। दुरुपयोग करने पर तो आग, बिजली जैसी उपयोगी शक्तियाँ भी अनिष्ट कर सकती हैं। लाभ तो सदुपयोग से उठाया जाता है। यही बात तन्त्र विज्ञान के सम्बन्ध में भी है। प्राण ऊर्जा के सहारे भौतिक प्रयोजनों को और संकल्प शक्ति के उत्कृष्ट उपचार से आत्मिक उत्कर्षों को उपलब्ध किया जा सकता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। प्राचीन काल में आगम और निगम का योग और तन्त्र का वैसा ही समान सम्मान था जैसा कि इन दिनों मनोविज्ञान एवं पदार्थ विज्ञान का उपयोग अपने-अपने ढंग से अपने-अपने क्षेत्रों में बिना किसी टकराव के होता रहता है। आज तो सब कुछ दल-दल में फंसा हुआ है कुछ भी निभ्रान्त नहीं रहा, ऐसी दशा में शोध अनुसन्धान के सहारे अति महत्वपूर्ण तथ्यों का नये सिरे से पर्यवेक्षण करना ही वह उपाय है जिसके सहारे गुमे हुए को प्राप्त कर सकना फिर से सम्भव हो सकता है।

शोध के इन विषयों से भी आगे बढ़कर है ‘यज्ञ विज्ञान’। उस उपचार के अनेकानेक प्रयोग और अनेकानेक पक्ष प्रयोजन हैं। शरीर पर, मन पर, अन्तःकरण पर, स्वभाव पर, चरित्र पर उनका असाधारण प्रभाव पड़ता है। रोगों का निवारण और आरोग्य का अभिवर्धन, मनोविकारों का शमन, बौद्धिक प्रतिभा का सम्वर्धन जैसे व्यक्तित्व को सुगठित करने वाले कितने ही कार्य यज्ञ से हो सकते हैं।

वातावरण के परिशोधन, अनुकूलन की उसमें विशिष्ट क्षमता है। विशेष प्रयोजन की पूर्ति के लिए उनके अपने प्रयोग हैं। प्राचीनकाल में तो उससे वर्षा तक अनुसंधान किया जाता था। उपयोगी वनस्पतियों और प्राणियों का उन्नयन उनके द्वारा सम्भव होता था। अब उस प्रसंगों की नये सिरे से खोज करनी होगी। उन दिनों के प्रयोक्ता हव्य, मन्त्र, विधान आदि इन दिनों अलम्य हैं जो कुछ हैं उनके सहारे कुछ तो प्राप्त किया जा सकता है। प्रयत्नशीलता के सहारे क्रमिक प्रगति की दिशा में आगे तो बढ़ा जा सकता है।

शोध प्रयत्नों में यह समग्र अनुसंधान के उपयुक्त साधन जुट सकें तो इस बात की पूरी संभावना है कि यज्ञ पैथी संसार भर में प्रचलित अर्वाचीन चिकित्सा पद्धतियों में सर्वोत्तम सिद्ध हो सकती है, न केवल शारीरिक वरन् मानसिक विकृतियों का भी उसके सहारे समाधान हो सकता है। शरीर से निरोग, मन से संतुलित, अन्तःकरण से सुसंस्कृत मनुष्य वैसा ही हो सकता है, जैसा कि अध्यात्म की भाषा में ‘देव’ शब्द के अन्तर्गत उल्लेख किया गया है। नवयुग में मनुष्य में देवत्व के उदय की आशा की गयी है। यदि यज्ञोपचार सफल होता है तो उस प्रकार के नव निर्माण में कोई सन्देह नहीं रह जायगा।

ब्रह्मवर्चस् के अन्तर्गत अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय को जो शोध प्रक्रिया आरम्भ की जा रही है उसमें अध्ययन और अनुसंधान, तत्वदर्शन और पदार्थ विज्ञान का परिपूर्ण समन्वय है। शुभारम्भ इसी बसन्त पर्व से किया जा रहा है। मिशन के जन्म से लेकर अब तक हर बसन्त पर्व विश्व मानव के लिए हर बार एक नया अनुदान लेकर अवतरित होता रहा है। इस बार के इस शुभारम्भ को अब तक के समस्त दुस्साहसों में अग्रणी कहा जा सकता है। इसकी उपलब्धियों की दूरगामी सम्भावनाओं का स्वर्णिम चित्र जब सामने आता है तो उल्लास की ज्योति से दोनों आँखें चमकने लगती हैं।

इन शोध निष्कर्षों के निष्कर्ष अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर प्रस्तुत होते रहेंगे। इस दृष्टि से पत्रिका की उपयोगिता और गरिमा अगले दिनों पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ जायगी। यह प्रसंग प्रेमी परिजनों के लिए हर दृष्टि से उत्साहवर्धक और आनन्ददायक ही होगा।

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अनुदान

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अनुदान (kavita)

अर्चन, पूजन तो बहुत हुए, पर मिला न अब तक परिष्कार!

पत्थर की पूजा से भी क्या, संशोधित होते संस्कार?

जब तक श्रद्धा के फूल न हों, निष्ठा गंगा के कूल न हों!

इस अखिल विश्व की पीड़ा से, उठता अन्तर में शूल न हो!!

कैसे पा जाओगे प्रज्ञा? मनु सत! सुन लो हो सावधान!

पौरुष विहीन को भिक्षा में-मिलता न कभी भी दिव्य दान!!

भिक्षा से किसको शक्ति मिली, क्यों मांग रहा फिर व्रतीदान? पौरुष प्रतीक! पुरुषार्थ करो, बन सकते हो, हिमगिरि समान!

दीनता त्याग, करके अपनी रे! छेड़ पुनः भैरवी राग, सागर के अन्तर में भर दे श्रम से, नव युग का सस्मित-सा विहान!

पौरुष विहीन को भिक्षा में-मिलता न कभी भी दिव्य दान!!

झुकता न यहाँ पर शीश व्यर्थ, श्रम गौरव शीश झुकाते हैं!

युगधारा को जो बदल सकें, वह मानव पूजे जाते हैं!!

वह काल पुरुष कहलाता है, शिव बन विष को जो पीता है!

प्रत्यक्ष देवता तो वह है, जग हित, जग में जो जीता है!!

उसके ही लिए विशेषण हैं ‘‘युग कान्ति’’ ‘‘महामानव’’ महान!

पौरुष विहीन को भिक्षा में, मिलता न कभी भी दिव्य दान!!

-राजेन्द्र कुमार पाण्डेय

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*समाप्त*