पिछले दिनों एकांगी अध्यात्म अपनाया गया और आर्ष संस्कृति के उन मूल सिद्धान्तों को भुला दिया गया जिसमें नीति के परिपोषण और अनीति के विरुद्ध प्रचण्ड संघर्ष करने की बात को समान रूप से महत्व दिया गया है और उन दोनों को समान प्रगति के दो अविच्छिन्न रथ चक्र बताया गया है। सज्जनता के उदार पथ भर को देखना और दुष्टता की भयंकरता से आँखें मीच लेना न तो अध्यात्म है और न धर्म । एकांगी चिन्तन अपूर्ण ही नहीं अनुपयुक्त भी है। मध्यकाल में अहिंसा के प्रतिपादन में कुछ सम्प्रदायों ने अतिवाद बरता। किसी से भी बैर न करना−किसी से भी न लड़ना−हर किसी को क्षमा करने जैसी एक पक्षीय मान्यता पनपी तो सज्जनता का पक्ष अति दुर्बल हो गया और दुष्टता को आतंकवादी अनाचार को निर्वाध रूप से बरतते रहने की खुली छूट मिली और सामाजिक अधःपतन सामने आया।
प्राचीन काल में प्रबुद्ध वर्ग को ब्राह्म और क्षात्र दोनों का साथ−साथ निर्वाह करना पड़ता था। परशुराम, विश्वामित्र, द्रोणाचार्य आदि सभी ऋषियों के क्रिया−कलाप में धर्म के दोनों ही पक्ष समान रूप से प्रयुक्त होते रहे हैं। पीछे सुविधा की दृष्टि से इन दो कार्यों के लिए दो पृथक−पृथक वर्ग बना दिये गये । उदार पक्ष ज्ञान पथ का विस्तार करने वाले ब्राह्मण और अनीति से जूझने वाले क्षत्रिय कहलाने लगे। इसमें अपेक्षाकृत सुविधा भी रही। दोनों वर्ग अपने−अपने उत्तरदायित्वों में अधिक तन्मयता तथा तत्परतापूर्वक संलग्न हुए और प्रवीणता प्राप्त करने−पारंगत बनने में सफल रहे। फिर भी माना यही जाता रहा कि एक ही धर्म की यह दोनों धारायें परस्पर पूर्णतया संयुक्त है। एक शरीर के दो हाथ, दो पैर, दो आँखें, दो कान, दो नथुने, दो फेफड़े, दो गुर्दे आदि होते हैं, ठीक उसी तरह धर्म शरीर में ब्राह्म−उदारता और क्षात्र−प्रताड़ना दोनों का समान महत्व है। एक दूसरे की अपूर्णता दूर होती है। बिजली के तारों की तरह उनके समन्वय से प्रखरता की शक्ति धारा प्रवाहित होती है।
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स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, शान्ति सद्गति के लिए प्राथमिक साधना आत्मशोधन की है। आत्म निरीक्षण, आत्म समीक्षा, आत्म सुधार, आत्म निर्माण एवं आत्म विकास की सीढ़ियाँ पार करते हुए ही जीवन लक्ष्य प्राप्ति के उच्च शिखर तक पहुँच सकना सम्भव होता है।
उपासना के रूप में प्रयुक्त होने वाले कर्मकाण्डों के पीछे सद्भावनाओं एवं सत्प्रवृत्तियों को अपनाने की ही प्रेरणा है। साधना में अपने ही कुसंस्कारों का अनगढ़पन दूर करने का प्रयोजन सन्निहित है। जीवन क्रम से लोक व्यवहार की सभ्यता और व्यक्तित्व के परिष्कार की संस्कृति की समाविष्टि के लिए किये जाने वाले प्रयत्न ही आत्मोत्कर्ष का प्रयोजन पूरा करते हैं। योगाभ्यास, तपश्चर्या एवं साधनात्मक धर्मानुष्ठानों के साथ उच्चस्तरीय चरित्र−निष्ठा नितान्त आवश्यक है। इस समावेश के बिना मात्र पूजा−पाठ भर से कोई वास्तविक आत्मिक प्रगति का लाभ नहीं ले सकता। आत्म कल्याण के पथिक को चरित्रवान बनने के लिए संकल्पपूर्वक तत्पर होना चाहिए। इस प्रयास में ही आत्मोत्कर्ष की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। शास्त्र कहता है−
आत्मशुद्धि बिना कर्तुर्जपहोमादिकाः क्रियाः। निष्फलास्तातु विज्ञेयाः कारण श्रुतिनोदितम्॥
−गायत्री तन्त्र
‘बिना आत्म शुद्धि के जप, होम आदि समस्त कर्म काण्ड निष्फल हो जाते हैं, यही सत्शास्त्रों का मत है।’
स्वशरीरे स्वयंज्योति स्वरूपं परमार्थिकम्। क्षीणदोषाः प्रपश्यन्ति नेतरे माययाऽऽवृताः॥
−पाशुपत ब्रह्मोपनिषद्
अपने शरीर में अवस्थित, आत्मा की दिव्य ज्योति का साक्षात्कार वे करते हैं जिनके दोष क्षीण हो गये। माया से घिरे लोगों को उसका दर्शन नहीं होता।
नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो ना समाहितः। ना शान्तमानसो वापि प्रज्ञाने नैनमाप्नुयात्॥
−कठोपनिषद्
जो मनुष्य पाप से निवृत्त नहीं हुआ है, अथवा जो केवल इन्द्रिय परायण है एवं जो असमाहित अशान्त है वह कभी आत्मा को प्राप्त नहीं कर सकता।
सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष आत्मा। सम्यज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्॥
−मुण्डक
सत्य, तप, जप, प्रभृति कर्म भी ब्रह्म जिज्ञासु के लिए अनुष्ठेय हैं। अर्थात्−सत्य भाषण, ब्रह्मचर्य और तपस्या के द्वारा यह आत्मज्ञान प्राप्त होता है।
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च सिद्धिं विन्दति मानवः॥
−गीता
जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वर की स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।
एवमाचरतो दृष्ट्वा धर्मस्य मुनयो गतिम्। सर्वस्य तपसोमूल माचारं जगृदुः परम्॥
− वायु पुराण
मुनि आचारवान और धर्मात्मा होते हैं। सदाचार ही तपस्या का मूल है। योगीजन उसे ही अपनाते हैं।
दृढ़कारी मृदुर्दान्तः क्रूराचारैरसंवसन्। अहिंवस्त्रो दमदानाभ्यां जयेत्स्वर्ग तथावृतः॥
-मनु॰
दृढ़ वृत्ति वाला, निष्ठुरता रहित, जितेन्द्रिय, क्रूर आचरण वाले मनुष्यों का साथ छोड़ता हुआ हिंसा रहित पुरुष इन्द्रिय संयम और दान से स्वर्ग को जीतता है।
अवैग येत्वानायासा मैत्री चित्तरताः सदाः। सर्वभूत दयावन्तस्ते नराः स्वर्गगामिनः॥
−महा॰
जो अनायास ही किसी से वैर नहीं करते, जिनके मन सदा मित्रता का भाव रहता है और जो सदा सब प्राणियों पर दया करते हैं, वे पुरुष स्वर्ग को जाते हैं।
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अठारहवीं सदी में फ्रांसीसी दार्शनिक ने ईश्वर के अनस्तित्व के सम्बन्ध में बहुत कुछ कहा और लिखा था। उनने न केवल तर्क ही प्रस्तुत किये वरन् उत्साहपूर्वक बढ़ी−चढ़ी घोषणाएँ भी कीं। वायरिन के संकेतों का नीत्से ने तीखे स्वर से प्रतिपादन किया। उसने घोषणा की−ईश्वर अन्तिम रूप से मर गया। सुनने वालों में से अगणित ऐसे भी थे जिनने इस उद्घोष पर विश्वास किया उनने आश्चर्यचकित होकर महान घटना−‘ए विग ईवेण्ट’ के रूप में स्वीकारा, किन्तु नीत्से का इस खण्डन भर से समाधान न हुआ उसके आस्तिकवादी स्वर फिर मुखर हुए और अपने लहजे में उसने नये शब्दों में कहा− “अब हम सब लोग ही वैसे हीरो बनेंगे जैसा कि अब तक ईश्वर था।” उसका यह संकेत ‘अति मानव’ की नई सृष्टि होने की ओर था। ईश्वर कैसा हो मतभेद इतना भर रहा। काम तो नीत्से का भी ईश्वर के अस्तित्व के बिना न चला उसने जिस अति मानव की कल्पना की वह सर्वथा मौलिक नहीं थी। अवतारों का उल्लेख बहुत पहले से ही होता चला आया है। उसमें और इस नये अति मानव में मौलिक अन्तर नहीं विशेषताओं सम्बन्धी ही यत्किंचित् अन्तर रहा है।
नीत्से ने ईश्वर के मरने की घोषणा तो की पर उसके अन्तरंग का देवदूत इस कुकृत्य पर रो पड़ा। उस फ्रांसीसी दार्शनिक ने इस सिसकते हुए देवदूत को एक अभिव्यंजना का रूपक देते हुए व्यक्त किया है। वह लिखता है- एक पगला, दिन−दोपहर सड़क पर लालटेन लिए दौड़ रहा था−लोगों ने उससे कारण पूछा−तो बोला मैं ईश्वर को ढूँढ़ रहा हूँ। भीड़ को सम्बोधन करते हुए बोला− ईश्वर है नहीं−उसकी हम और आप लोगों ने मिलकर हत्या कर दी है। देखो उसकी कब्र खुद रही है। मृतक की लाश उसी में दफनाई जायेगी। पर इससे किसी को क्या मिला? इतना बड़ा कृत्य कर तो गुजरे, पर क्या उसकी प्रतिक्रिया सहन हो सकेगी? अब इस अभाव की पूर्ति का एक ही रास्ता है कि हम इस लायक बनें कि मृत ईश्वर का कारोबार संभाल सकें।
सृष्टि की गहराई में उतरने पर स्पष्ट हो जाता है कि उसके कण−कण में नियम और नियन्त्रण संव्याप्त है। यहां सब कुछ यों ही अन्धाधुन्ध नहीं चल रहा है वरन् एक ‘सुव्यवस्थित आर्डर’ के आधार पर सारा सूत्र संचालन इस प्रकार हो रहा है मानो किसी बाजीगर की उँगलियों, में बँधे धागे सारी कठपुतलियों को तरह−तरह के नाच नचा रहे हों। छोटे जीवाणु, परमाणुओं से लेकर आकाश में परिभ्रमण करने वाले तारा मण्डलों और नीहारिका समूहों के बीच एक अत्यन्त सजग सुव्यवस्था काम कर रही है। वे सभी अपने−अपने लिए निर्धारित सुनिश्चित नियमों से बँधे हुए है। इन नियमों की जानकारी में ही विज्ञान के प्रयास नियोजित है। विज्ञान अपने को सत्यान्वेषी कहता है। सृष्टि के नियम ही उसके लिए बोध विषय है। इस नियामक सत्ता को −विज्ञान का ईश्वर कह सकते हैं। यह भी प्रतिपादित ईश्वरीय गुणानुवाद का एक पक्ष हो सकता है। इसमें ईश्वर की जानकारी नहीं, वरन् उसकी आंशिक स्वीकृति है। आज इतना मान लेने से भी कल अधिक गहरी जानकारी की अपेक्षा की जा सकती है। आस्तिकता के अगले अध्यायों का अध्ययन पीछे होता रहेगा, आज भी उसकी प्रामाणिकता तो स्पष्ट है ही भले ही उसका नाम “आर्डर” ही क्यों न दिया जाय?
प्रकृति के अन्तराल पर्यवेक्षण के प्रयास में एक नया तत्व सामने आया है−विश्व−चेतना। समझा जा रहा है कि व्यक्ति चेतना उसी का एक घटक है। विज्ञान के क्षेत्र में इन दिनों यह चर्चा जोरों पर है कि यह संसार मात्र पदार्थ नहीं है उसके पीछे एक दूरदर्शी मस्तिष्क भी काम करता है। पदार्थ के पीछे झांकती एक विवेकवान् मस्तिष्क की झांकी अब अधिकाधिक स्पष्ट होती जा रही है। उस चेतना में मात्र बुद्धि ही नहीं आकांक्षा का अस्तित्व झलकता है। उद्देश्य तो ठीक से नहीं समझा जा सका पर इस सृष्टि व्यवस्था में मात्र आणविक हलचलों तक सीमित रहने से समाधान नहीं होता। दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखने जैसी एक चेतना को सृष्टि संचालन की क्रम शृंखला मानने में अब वैज्ञानिक मतभेद बहुत ही कम रह गया है। मैटर के पीछे ‘माइण्ड’ काम करता हुआ प्रतीत होता है और कोई युनिवर्सल विल इस सारे प्रसार−विस्तार को किसी इच्छित दिशा में घसीटे ले जा रही प्रतीत होती है। युनिवर्सल माइण्ड−युनिवर्सल विल का अस्तित्व ‘आर्डर’ के साथ जोड़कर विज्ञान में ईश्वर के अस्तित्व के सम्बन्ध में अर्ध स्वीकृति प्रदान कर दी है, अब वह पिछली शताब्दी की तरह इस सम्बन्ध में कट्टर नहीं रह गया है उसने अर्ध आस्तिकता स्वीकार कर ली है।
इस संसार में दो परस्पर विरोधी शक्तियाँ काम करती है। जीवन और मरण, अन्धकार और प्रकाश, पाप और पुण्य, उत्थान और पतन आदि । यह अपनी−अपनी ओर खींचती है। इनके मध्य सन्तुलन बनाने वाली एक तीसरी शक्ति होनी चाहिए। मुकदमे में वादी और प्रतिवादी पक्ष अपनी−अपनी ओर खींच−तान करते हैं। न्यायाधीश औचित्य और समाधान का उपाय निकालता है। यदि न्यायाधीश न हो तो उस संघर्ष का उचित अन्त कभी होगा ही नहीं और विनाश ही हाथ लगेगा।
पदार्थ का एक ही गुण और एक ही प्रवाह हो सकता है। उसमें पक्ष प्रतिपक्ष की−एक सीमा तक संघर्ष और फिर सहयोग की प्रवृत्ति होने का कोई कारण किसी नियामक शक्ति के बिना सम्भव नहीं। क्रिया और प्रतिक्रिया का क्रम भी इस संसार में अन्धाधुन्ध नहीं सुव्यवस्थित और सन्तुलित रीति से चल रहा है। उसी से स्थिरता, शान्ति और प्रगति का आधार बनता है। विश्व का सौन्दर्य और आनन्द उसी पर निर्भर है। पदार्थ में भिन्नता है− उनकी आकृति और प्रकृति में भारी अन्तर है फिर भी दूरगामी पर्यवेक्षण से सिद्ध होता है कि वे सभी एक दूसरे के पूरक−सहयोगी बनकर रह रहे हैं। इकॉलाजी सिद्धान्त पर जितना विचार किया जाता है उतना ही यह स्पष्ट होता है कि संसार के सभी प्राणी और पदार्थ एक ही किसी विराट् शरीर के अंग−प्रत्यंग, जीवाणु−परमाणु बनकर रह रहे हैं और परस्पर पूर्णतया सुसम्बद्ध ही नहीं एक दूसरे पर निर्भर भी हैं। ऐसी विश्व व्यवस्था बिना नियामक शक्ति के हो नहीं सकती, उस नियामक को ईश्वर कहा जा सकता है।
हम देखते हैं कि वस्तुएँ कितनी ही मूल्यवान क्यों न हों वे अपने आप किसी प्रयोजन की पूर्ति नहीं करती। सोना खदानों में अनादि काल से पड़ा है। उसे मानवी प्रयत्नों से ढूँढ़ा और खोद निकाला जाता है। आभूषण बनाने का प्रयत्न होता है अथवा उसे बाजार में बेच कर सुख साधन खरीदे जाते हैं। यह सब किसी के करने से ही सम्भव हुआ। सोने का अस्तित्व और मूल्य रहते हुए भी उसका उपयोग किसी जीवित प्राणी के बिना सम्भव नहीं। अन्न में भूख बुझाने का गुण है, पर उसे उगाने से लेकर पकाने, खाने तक के सारे प्रयोजन मनुष्यों को ही करने पड़ते हैं। अनेकानेक सुविधा−साधन और उपकरण इस संसार में मौजूद हैं और प्रयोग होते हैं किन्तु उन्हें उपयोगी बनाने तथा उपयोग करने का कार्य चैतन्य मनुष्य ही करते हैं। कर्त्ता के बिना कर्म होते रहे, संसार में अगणित हलचलें हो रही हैं। उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्तन के कौतूहलवर्धक क्रम चल रहे हैं। इस सब सुनियोजित क्रिया-कलाप की कोई चेतनात्मा न हो सब अपने आप ही चलता रहता हो ऐसा हो नहीं सकता। अपने आप जड़ पदार्थ कुछ गति करें भी तो वे सभी अव्यवस्थित होंगी। बाढ़, भूकम्प, महामारी, आँधी−तूफान जैसे प्रकृति प्रवाहों में कहीं व्यवस्था नहीं होती। किन्तु हम देखते हैं प्राणि जगत ओर पदार्थ परिकर में कोई नियम मर्यादाएँ गतिशील रहती हैं और सब कुछ व्यवस्थित बनाये रहती हैं। यह कैसे होता है−इसमें किसी कर्त्ता के अस्तित्व से इनकार करने पर कोई समाधान हो ही नहीं सकता।
मोटी बुद्धि इन्द्रिय ज्ञान पर निर्भर रहती है। जब देखा, सुना, चखा, छुआ जाता है उस पर विश्वास करती है। इसे यह समझने में बड़ी कठिनाई होती है कि इन्द्रिय शक्ति ही किसी तथ्य को प्रमाणित करने का एक मात्र माध्यम नहीं है। ऐसे तथ्यों का भी इस संसार में अस्तित्व है जिन्हें इन्द्रियों से नहीं वरन् बुद्धि से ही जाना जा सकता है। कई बार तो इन्द्रियाँ भ्रान्त अनुभूतियाँ भी करती है और उनके द्वारा प्राप्त ज्ञान संदिग्ध होता है। सिनेमा के पर्दे पर तस्वीरें चलती−फिरती दिखाई पड़ती है, पर वे वस्तुतः स्थिर होती हैं। तेजी से घूमने के कारण आँखें उनकी वास्तविक स्थिति समझने में भ्रमित हो जाती हैं और स्थिर तस्वीरें चलती−फिरती दिखाई पड़ती है। मृग मरीचिका−उड़न तश्तरियां जैसी कितनी ही भ्रान्तियां आँखों के आगे से गुजरती हैं। पानी में रहने वाले जीवाणु तक मात्र इन्द्रियों से नहीं देखे जाते उनके लिए भी सूक्ष्मदर्शी उपकरण ही काम आते हैं। अन्तरिक्ष के ग्रह−नक्षत्रों की गतिविधियाँ समझने के लिए यन्त्र ही काम करते हैं। इन्द्रिय शक्ति अपर्याप्त पड़ती है। प्रकाश तरंगें, ध्वनि तरंगें इन्द्रियों की पकड़ में कहाँ आती है।
फिर भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, द्वेष, प्रेम, सुख−दुःख जैसी अनुभूतियों का अस्तित्व होते हुए भी वे आँखों से नहीं देखी जाती हैं। मनुष्य का अपना अस्तित्व− आत्मा ही इन्द्रियों से कहाँ दिखाई पड़ता है। इस विश्व में बहुत कुछ ऐसा है जो बुद्धि से ही जाना जा सकता है। ईश्वर इन्द्रियों से तो प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता, पर उसकी क्रिया−प्रक्रिया को देखते हुए अस्तित्व पर विश्वास किया जा सकता है। पदार्थ की सूक्ष्मतम स्थिति भी बुद्धिगम्य है। यन्त्रों से भी उसकी मूल सत्ता नहीं देखी जा सकती। उसके क्रिया−कलापों को देखते हुए ही यह अनुमान लगाया जाता है कि उसका अस्तित्व किस प्रकार का होना चाहिए। ईश्वर का परिचय एवं प्रमाण भी इसी आधार पर उपलब्ध हो सकता है।
न्याय दर्शन (तर्क शास्त्र) में प्रमाण के पाठ आधार बताये गये हैं। (1) प्रत्यक्ष, (2) अनुमान, (3) उपमान, (4) शब्द, (5) अर्थोत्पत्ति, (6) ऐतिह्य, (7) सम्भव, (8) अभाव। इनमें से एक प्रत्यक्ष ही इन्द्रियगम्य है। शेष सात के लिए बुद्धि पर निर्भर रहना पड़ता है। जब भौतिक जगत की जानकारियाँ प्रत्यक्ष के आधार पर नहीं मिल पातीं। तो ईश्वर जैसे अति सूक्ष्म तत्व को आँख से देखने पर ही विश्वास करने का आग्रह करना बालहठ जैसा ही कुछ कहा जा सकता है।
मीमांसाकार ने अपने प्रबल तर्कों के आधार पर ईश्वर का खण्डन किया है साथ ही उस प्रतिपादन को समाप्त करते हुए ‘ॐ नमो पुण्डरीकाक्षाय’ लिखकर उस निषेध पाप का प्रायश्चित भी कर लिया है।
परमाणु को बहुत पहले पदार्थ का सबसे छोटा कण कहा जाता था। पीछे उसके कितने ही घटकों का एक समूह समन्वय माना गया। अब वह ठोस, तरल या वाष्प की उन तीनों स्थितियों से भिन्न हैं जो पदार्थ के स्वरूप एवं आस्तित्व की जानकारी देते हैं। अब परमाणु मात्र शक्ति एवं गति भर है− उसकी विवेचना एनर्जी और प्रोसैस के रूप में की जाती है। यहां एक आगे का प्रश्न खड़ा होता है कि शक्ति या गति किसकी? उसकी दिशा और प्रकृति का निर्धारण कैसे होता है? वह बिना टकराये सहयोग के सिद्धान्त को किस प्रकार क्रियाशील रखती है। उसके भण्डार का अक्षय रहना किस प्रकार सम्भव होता है? उसका उद्गम स्रोत और उपयोग प्रयोजन पूरा होने की व्यवस्था किस प्रकार बनती है। अपने आप यहां नहीं कुछ हो रहा है ऐसा कहा जा सकता है, पर इतने भर से कदाचित ही किसी के अन्तःकरण का समाधान होता हो। इतना सुनकर जिज्ञासा की तृप्ति हो सकेगी ऐसा लगता नहीं है।
विज्ञान ने मात्र इतना कहा है कि उसके वर्तमान साधनों से ईश्वर के अस्तित्व का परिचय नहीं मिल पाया। यह कभी नहीं कहा कि जो उसका वर्तमान ज्ञान है वही अन्तिम है और आगे जानने या खोज करने के लिये और कुछ नहीं है। विज्ञान की दृष्टि खुली है वह स्वभावतः दुराग्रही नहीं है। भविष्य में आगे की खोजों के लिए उसमें पूरी−पूरी आशा और आस्था रखी गई है। विज्ञान का बचपन जैसे−जैसे किशोरावस्था में विकसित होता जा रहा है वैसे−वैसे उसे अपनी प्राथमिक जानकारियों की तुलना में इतना अधिक विवरण मिला है जिसकी तुलना करने पर लगता है कि आरम्भिक प्रतिपादन अधूरे ही नहीं भ्रमपूर्ण भी थे। समयानुसार उनका परिशोधन होता चला गया है। इसमें न प्राचीन खोजों को लाँछित होना पड़ा है और न आधुनिक उपलब्धियों को अपनी पूर्णता का अहंकार है। जिस प्रकार आरम्भिक शोधें आज झुठला दी गईं, ठीक इसी प्रकार यह भी गुंजाइश है कि भविष्य में आज के प्रतिपादनों में भी भारी हेर−फेर करने पड़े। विज्ञान की दृष्टि विशुद्ध अन्वेषक की है। सत्य की शोध उसका लक्ष्य है। उसमें साम्प्रदायिक दुराग्रह या परम्परा मोह नहीं है। विज्ञान के क्षेत्रों से मात्र इतना ही कहा गया है वर्तमान साधनों से ईश्वर पकड़ में नहीं आता। ऐसे−ऐसे असंख्यों प्रसंग है जो अभी पकड़ में नहीं आये, पर उनके अस्तित्व की पूरी पूरी सम्भावना है। इस अपने विश्व का प्रतिद्वन्दी एक प्रति विश्व सम्भावना के क्षेत्र में स्वीकार कर लिया गया है, पर उसका स्वरूप निर्धारण शेष है जिसकी खोज चल रही है। खोज के ऐसे असंख्य विषय हैं जिनके भविष्य में ढूँढ़ लिए जाने की पूरी आशा की जाती है। इन्हीं प्रसंगों में एक ईश्वर का अस्तित्व भी है।
आल गुडनेस−आल नालिज एण्ड आल ब्यूटी के रूप में सत्यं शिवं सुन्दरम् के रूप में जिस समग्र चेतना शक्ति का मानवी अन्तरात्मा के साथ स्पर्श होता है−उसे ब्रह्म कहा जाता है। इसका आस्थाओं के रूप में अनुभव करना हो तो ईमानदारी, सज्जनता, कर्त्तव्य−निष्ठा और उदारता के रूप में उसकी सम्वेदनाओं को कभी भी कोई भी अपने भीतर ढूंढ़ सकता है। यह तत्व जिसमें जितने हों समझना चाहिए कि उसके भीतर उतना ही हल्का या भारी ईश्वर काम कर रहा है। सदाशयता अपनाने और उसे व्यापक बनाने के रूप में−मलीनता और दुष्टता को हटाने के रूप में −जितना उत्साह, जितना आवेश उभर रहा हो उसी अनुपात से अपने में ईश्वर तत्व के अवतरण झाँकी देखी जा सकती है।
एथीस्ट−नास्तिक अब उतना कट्टर नहीं रहा जितना पिछली शताब्दी में था−अब वह क्रमशः एग्नोटिस्क−प्रत्यक्षवादी बनता जा रहा है। दुराग्रह यदि शोध निष्कर्ष को स्वीकार करने के लिए सहमत हैं तो समझना चाहिये कि सत्य तक पहुँचने की अभी पूरी आशा है। यदि ईश्वर है− जैसा कि वह है ही− तो हमें धैर्य रखना चाहिए और प्रतीक्षा करनी चाहिए कि बचकाने विज्ञान से न सही प्रौढ़ विज्ञान से वह अवश्य ही सिद्ध हो जायगा। पदार्थ की हलचलों के पीछे कोई शक्ति प्रवाह काम करने की बात अब प्रत्यक्ष हो गई। पदार्थ का अस्तित्व शक्ति तरंगों के रूप में जाना गया है। अब इस सम्भावना को प्रत्यक्ष भर करना शेष है कि विश्व के अन्तराल में काम करने वाला शक्ति प्रवाह ज्ञान युक्त ही नहीं−न्याय और औचित्य के तथ्यों से भी ओत−प्रोत है।
महाभारत का युद्ध समाप्त हो गया था, पितामह भीष्म शरशैय्या पर पड़े−पड़े पाण्डवों को उपदेश दे रहे थे इसी बीच द्रौपदी को हठात् हँसी आ गई।
“अपनी हँसी का क्या कारण है बेटी?” पितामह ने पूछा। द्रौपदी ने पहले तो “कुछ नहीं वैसे ही हँसी आ गई थी। कहकर टालने का प्रयास किया,” परन्तु जब भीष्म कारण जानने को अड़ ही गये तो द्रौपदी ने नम्रतापूर्वक कहा−“पूज्यवर आप हमारे पितामह हैं अपनी धृष्टता के लिए क्षमा चाहती हूँ, आपके उपदेश सुन−सुनकर मुझे बार−बार यह ख्याल आता है कि इतना ज्ञानी व विद्वान व्यक्ति उस समय ‘मौन’ क्यों बैठा रहा जब भरी सभा में कौरवों ने मेरी लाज हरने का दुस्साहस किया था। क्या ज्ञान सिर्फ देने के लिए है? करने कराने के लिए नहीं−यह सोचकर ही आपके उपदेशों की निस्सारता पर मुझे हँसी आ गई थी।” भीष्म बोले−“बेटी तू सच कहती है ज्ञान चर्चा का ही विषय नहीं व्यवहार का भी विषय है।” मुझे धर्म ज्ञान तो उस समय भी था, परन्तु उस समय दुर्योधन का अन्यायपूर्ण अन्न खा−खाकर मेरी बुद्धि इतनी मलीन हो गई थी कि मैं अपने ज्ञान को व्यवहार्य न बना सका। अब अर्जुन के बाण लगने से शरीर से उस दूषित अन्न से बना सारा रक्त निकल गया है अब मैं निर्विकार हूँ इसी से बुद्धि शुद्ध और शान्त है।
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जिस प्रकार प्रत्यक्ष शरीर के पीछे परोक्ष जीवात्मा का निवास है। काया पर जीवात्मा का अधिकार है उसी प्रकार इस पंच भौतिक संसार के पीछे एक चेतन जगत की सत्ता विद्यमान है। स्थूल जगत के विभिन्न पदार्थ यों अलग−अलग आकृति प्रकृति के हैं और उनके निवास स्थान पृथक−पृथक हैं, फिर भी वे सब एक ही शरीर के मध्य रहने वाले असंख्य कोशाओं की तरह मिल-जुलकर निवास करते हैं। एक-दूसरे के पूरक हैं और परस्पर जुड़े हुए हैं। आकाश में ग्रह−नक्षत्रों का स्थान दूर−दूर है तो भी वे एक दूसरे के साथ आकर्षण शक्ति के रस्सों से जुड़े हुए और जोड़े हुए हैं।
इस समूचे ब्रह्माण्ड में ईश्वर तत्व भरा हुआ है उसी के माध्यम से शब्द और प्रकाश की लहरें बहती और एक स्थान से दूसरे तक पहुँचती हैं। ग्रह−नक्षत्रों की खोज खबर लेने के लिए जो राकेट भेजे जाते हैं उनकी प्रेषित सूचनाएँ धरती तक आती हैं। यह परिप्रेषण ईथर की उपस्थिति से ही सम्भव हो पाता है। चन्द्रमा पर हवा न होने से शब्दों को बोलना और सुनना सम्भव नहीं हो सकता। किन्तु ईथर वहाँ भी मौजूद है। इसलिए रेडियो प्रणाली को अपना कर चन्द्र तल पर खड़े हुए दो मनुष्य परस्पर वार्त्तालाप कर सकने में समर्थ हो सकते हैं। विशाल समुद्र के मध्य अनेक टापू होते हैं, जल जीव रहते हैं, इसी प्रकार ब्रह्माण्ड−व्यापी प्रकृति सत्ता के अन्तराल में जो स्थूल शक्तियाँ काम करती है उससे पदार्थ जगत परस्पर बँधा हुआ है और आदान−प्रदान का लाभ उठाता है।
स्थूल पंच भौतिक जगत की तरह ही उसके अन्तराल में एक प्राणवान चेतना जगत है। उसमें ब्रह्म तत्व भरा हुआ है। इसी व्यापक ब्रह्माण्डीय चेतना में जीवधारियों के अनेक घटक स्वतन्त्र रूप से विचरण करते हैं। इतने पर भी वे सब एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं और आदान-प्रदान का लाभ ले रहे हैं। यह पारस्परिक सम्बन्ध सूत्र इतने पतले हैं कि उन्हें देख और समझ सकना मोटेतौर से हर किसी के लिए सम्भव नहीं हो सकता। लोग तो अपने आपको भी शरीर भर मानते हैं और उसी के पोषण−तोषण में लगे रहते हैं। आत्मा की प्रतीति तक नहीं होती, यदि होती तो उसके लिए भी कुछ तो करने की बात सोची ही जाती। इतनी गहरी खुमारी में ब्रह्म सत्ता को समझना और उसके साथ सम्पर्क मिलाना अति कठिन है, फिर भी योगाभ्यास और तप साधना के द्वारा उसे प्रयत्नपूर्वक जागृत किया जा सकता है। इस जागृति के फलस्वरूप जो कुछ इन्द्रियातीत है वह इन्द्रियगम्य बन सकता है। जो बुद्धि की सीमा से बाहर है वह उसकी पकड़ में आ सकता है। जानने और करने के मार्ग में जो व्यवधान है वे दूर हो सकते हैं।
कई बार ऐसे प्रसंग भी आते हैं कि बिना प्रयत्न के अनायास ही यह शक्तियाँ किन्हीं विशेष व्यक्तियों में जागृत पाई जाती हैं। इसका कारण प्रायः पूर्वसंचित संस्कारों और अभ्यासों का प्रतिफल होता है, पर इस विवाद में न पड़ा जाय तो भी इन चमत्कारी असाधारण कही जाने वाली घटनाओं से इतना तो पता चलता ही है कि मनुष्य में अतीन्द्रिय क्षमता के स्रोत विद्यमान हैं। उन्हें आध्यात्मिक साधना में अथवा भौतिक उपाय उपचारों से विकसित अवश्य किया जा सकता है। कठिनाई यह रही है कि शोध में समर्थ, सुयोग्य एवं साधन सम्पन्न व्यक्तियों को ऐसे तथ्यों पर विश्वास नहीं हुआ जो व्यक्ति और विश्व में प्रकृति नियमों से ऊपर ही किन्हीं अलौकिक सामर्थ्यों को प्रतिपादित करते हैं। जिन्हें विश्वास था, वे शोध एवं विकास के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठा सकने की स्थिति में नहीं थे।
पिछले दिनों ऐसी अनेक घटनाएँ सामने आई हैं जिनके आधार पर चेतना की स्वतन्त्र सत्ता−ब्रह्माण्ड व्यापी चेतन जगत और अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का पता चलता है। विचारशील लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ है और प्रयत्नपूर्वक यह खोज-बीन की जा रही है कि क्या सचमुच ही चेतना का अपना अस्तित्व, क्षेत्र और बल होता है? यदि होता है तो उसको विकसित करके किस उपयोग में लाकर क्या लाभ उठाया जा सकता है। पिछले बीस वर्षों में जो जानकारियाँ मिली हैं, वे इसके लिए विवश करती हैं कि विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय, मनुष्य को अधिक समर्थ एवं संसार को अधिक सुखी बनाने वाले नये आधार खड़े किये जा सकते हैं।
चैकोस्लोवाकिया के एक शिल्पी ब्रोतिस्लाव काफ्का में दूर−दर्शन की अद्भुत क्षमता थी। उसके द्वारा उत्तरी ध्रुव की ऋतु परिस्थितियों एवं महायुद्ध के समय मोर्चे की हलचलों के जो वर्णन किये गये वे आश्चर्यजनक रूप से खरे सिद्ध होते रहे।
तन्त्र विद्या के विश्वकोश एवं ‘साइक्लोपीडिया आफ दि आक्ल्ट’ में एन्टीन मेसयर नामक एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन है जो पेट के माध्यम से अप्रत्यक्ष वस्तुओं का विवरण बताने में समर्थ था। फ्रांसीसी वैज्ञानिक और कवि जूल्स रोमेंस ने अपने शोध निष्कर्षों से त्वचा में रहने वाले नेत्र कोषाणुओं की उपस्थिति बताई है जो स्पर्श के आधार पर देखने का बहुत कुछ प्रयोजन पूरा करते हैं।
अमेरिकी जीव विज्ञानी क्लीव बैवस्टेर ने प्राणि मात्र के बीच काम करने वाले एक चेतना प्रवाह की खोज की है जिसके कारण वे परस्पर एक पतले धागे में बँधे रहते हैं और एक−दूसरे की सुख−दुःख की अनुभूति करते हैं। यह निष्कर्ष उन्होंने समुद्री केकड़ों में से एक के मारे जाते समय उस क्षेत्र के अन्य केकड़ों को ही नहीं दूसरे जीवों को भी कष्टकर अनुभूति होती है। इस अनुभूति प्रवाह को रोकने के लिए शीशे की दीवारें खड़ी की गईं जिसमें कष्ट पाने वाले प्राणी का सूक्ष्म सम्पर्क उस क्षेत्र के अन्य प्राणियों से न रहे, फिर भी वह प्रवाह रुका नहीं और एक कष्ट पीड़ित की प्रतिक्रिया अन्यान्यों को प्रभावित करती रही। एक−दूसरे शोध अधिकारी प्रो॰−गार्डनर मरफी का प्रतिपादन भी ठीक क्लीव बैवस्टेर से मिलता−जुलता ही है। वे कहते हैं− जिस प्रकार समुद्र में पाये जाने वाले ज्वालामुखी द्वीप समूह बाहर से पृथक दीखते हुए भी अग्नि उगलने के सम्बन्ध में गहराई के अन्तराल में परस्पर जुड़े रहते हैं उसी प्रकार प्राणियों की सत्ता पृथक−पृथक होते हुए भी उनके बीच एक ऐसा सम्बन्ध सूत्र मौजूद है जो एक−दूसरों की अनुभूतियों में सहभागी बनाता रहता है।
बूल्फ मेसिंग नामक एक व्यक्ति में बिना किसी प्रशिक्षण के अनायास ही ऐसी क्षमता पाई गई जिससे वह दूरस्थ घटनाक्रमों एवं विचारों का परिचय प्राप्त कर लेता था। वह व्यक्ति अनेक वैज्ञानिकों के लिए परीक्षण विषय बना रहा और टेलीपैथी के अस्तित्व को यही सिद्ध करता रहा।
मिरबाइह लोवा नामक एक अन्य महिला को यह विशेष शक्ति प्राप्त थी कि वह अपनी इच्छा शक्ति का प्रयोग करके मेज पर रखी कितनी ही वस्तुओं को बिना छुए इधर से उधर हटा देती थी। उस घटना को अनेक प्रामाणिक व्यक्तियों के सामने देखा गया जिसमें तस्तरी में रखा डबल रोटी का टुकड़ा अपनी जगह पर से उठा, खिसका, खड़ा हुआ और उछल कर मिरवाइलोवा के मुँह में घुस गया। यह शक्ति इस महिला को अपनी माता से उत्तराधिकार में मिली थी। वे भी ऐसे ही चमत्कार दिखाने में ख्याति प्राप्त कर चुकी थीं, पर उन पर कोई परीक्षण नहीं हुआ था। शोध का विषय मिरवाइलोवा ही रही और उन पर कितनी ही प्रयोगशालाओं में कितनी ही तरह के प्रयोग होते रहे।
तीसरा नेत्र−आज्ञाचक्र अति प्रभावी है। उसमें संसार की स्थूल और सूक्ष्म परिस्थितियाँ जानने समझने की ही नहीं, वस्तुओं और व्यक्तियों को भी प्रभावित करने की क्षमता है। इतना ही नहीं वातावरण में परिवर्तन इसकी शक्ति का व्यापक प्रयोग करने से सम्भव हो सकता है। दूर−दर्शन अदृश्य दर्शन उसकी आरम्भिक कला है। एक्सरे की किरणें जिस प्रकार ठोस पदार्थों में होकर पार निकल जाती हैं और आँखों से न दीख पड़ने वाली भीतरी स्थिति के भी फोटो खींचती है उसी प्रकार यह आज्ञाचक्र का कैमरा भी अदृश्य को देख सकता है। इस माध्यम से न केवल पदार्थों को देखने का प्रयोजन पूरा होता है वरन् जीवित प्राणियों की मनःस्थिति को समझ सकना भी सम्भव होता है। बात देखने समझने तक ही पूरी नहीं होती आज्ञाचक्र की क्षमता इससे भी आगे है वह दूसरों को प्रभावित परिवर्तित भी कर सकती है।
विषय का हर पदार्थ अपने साथ ताप और प्रकाश की विद्युत किरणें संजोये हुए है। वे कम्पन लहरियों के साथ इस निखिल विश्व में अपना प्रवाह फैलाती है। ईथर तत्व के द्वारा वे दूर−दूर तक जा पहुँचती है। यदि उन्हें ठीक तरह पकड़ा जा सके तो दृश्य बहुत दूरी पर अवस्थिति होते हुए भी उसे देखा जा सकता है। जो घटनाएँ सुदूर क्षेत्रों में घटित हो रही हैं उन्हें निकटवर्ती दृश्यों की तरह देखा जा सकता है। इन किरणों को पकड़ने के लिए नेत्र उपयुक्त माध्यम है। प्रत्यक्ष को−समीपवर्ती को वे ही देखते हैं। एक तीसरा नेत्र आज्ञाचक्र है जिसे नेत्र शक्ति का उद्गम केन्द्र कह सकते हैं। जननेन्द्रिय की काम क्षमता का सूक्ष्म केन्द्र मूलाधार चक्र है। विविध काम सम्वेदनाएँ तथा क्षमताएँ मूलतः वही से उद्भूत होकर जननेन्द्रिय में एवं मनःक्षेत्र में सक्रिय बनती है। इसी तरह नेत्रों की शक्ति को अपने क्रिया कलाप सम्पन्न करने की क्षमता जिस बैटरी−डायनेमो या जेनरेटर से मिलती है उसे आज्ञाचक्र कहा जा सकता है।
इतने पर भी यह नहीं समझ लिया जाना चाहिए कि रूप तत्व का सम्बन्ध मात्र नेत्रों से ही है। अग्नि तत्व की प्रधानता से रूप कम्पन उत्पन्न होते हैं। शरीर में अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व नेत्र ही करते हैं ऐसा नहीं मान लेना चाहिए। अग्नि तत्व शरीर के अन्य अंगों में भी है। समस्त शरीर पंच तत्वों के गुम्फन से बना है। यदि अन्य अंगों का अग्नि तत्व अनायास ही विकसित हो जाय अथवा साधनात्मक प्रयोगों से उसे विकसित कर लिया जाय तो नेत्रों की बहुत कुछ आवश्यकता उससे भी पूरी हो सकती है।
एक रूसी लड़की कुलेशोवा आँखों में पट्टी बाँध कर मात्र उंगलियों से छूकर पुस्तकें पढ़ती चली जाने की विशेषता से सम्पन्न रहने के कारण संसार भर के वैज्ञानिकों को अचम्भे में डाल चुकी है। डॉ. नोवोमीस्को की अध्यक्षता में इस प्रसंग पर प्रकाश डालने के लिए बने वैज्ञानिकों के आयोग ने इस सम्बन्ध में गहरी जाँच पड़ताल की। समिति न इसमें कोई छल तो नहीं पाया, पर निश्चित कारण बताने में असमर्थता प्रकट की है। अनुमान कई तरह के लगाये और कहा इनमें से कोई अथवा अन्य कारण इस प्रकार की विलक्षण क्षमता का उत्तरदायी हो सकता है पर अभी तो कुछ निश्चित मत प्रकट सकना सम्भव नहीं है।
न्यूयार्क के बर्नाडे कालेज के प्राध्यापक रिचार्ड यूट्स की अध्यक्षता में बनी एक समिति ऐसी ही एक महिला पोद्दोशिया की जाँच कर चुकी है जिसे घोर अन्धकार के बीच भी आँखों से पट्टी बाँधकर रंग पहचान लेने की क्षमता प्राप्त थी।
लेनिन ग्राड यूनिवर्सिटी की शरीर शास्त्री प्रो. वसिलियेव ने रूसी सरकार को प्रतिवेदन प्रस्तुत करते हुए कहा था अतिरिक्त ऐन्द्रिक अनुभूति (ई. एस. पी.) की मूल शक्ति को खोजना अणुशक्ति की खोज जितनी ही महत्वपूर्ण है। इस दिशा में हमें अधिक सतर्कता और तत्परतापूर्वक रहना चाहिए। सरकार ने इस दिशा में समुचित ध्यान दिया और उन्हें ही उस विश्वविद्यालय के परामनोविज्ञान विभाग का शोध अध्यक्ष नियत किया गया और उन्होंने उस कार्य को पूरी तत्परता के साथ निबाहने का प्रयत्न किया। पिछले दिनों इस शोध संस्थान के मार्ग दर्शन में विभिन्न स्थानों पर जो तथ्य सामने आये हैं उनसे प्रतीत होता है कि ब्रह्माण्डीय चेतना के सूक्ष्म धारा प्रवाह के साथ मनुष्य अपने आप को जोड़ सकेगा और नये किस्म के ऐसे लाभ प्राप्त कर सकेगा जो अभी तो काल्पनिक और अविश्वस्त ही समझे जाते हैं।
सन्त यूसुफ थे तो बड़े ज्ञानी−वेरागी परन्तु वह अपने पास एक बोतल व प्याला रखते थे जिससे लोगों को यह आभास होता था कि वे शराबी हैं। इस कारण उनकी निन्दा भी यदा−कदा होती रहती थी।
एक बार एक व्यापारी को बाहर जाना था, वह अपनी एक सुन्दर पुत्री को किसी के पास सुरक्षित छोड़कर जाना चाहता था। उसने सन्त यूसुफ के बारे में सुन रखा था वह अपनी पुत्री को लेकर सन्त यूसुफ के यहाँ गया परन्तु उसके मन में आशंका बनी रही कि जिस सन्त की लोग इस तरह की निन्दा करते हैं कि वह शराबी है उसके पास पुत्री को छोड़ना कहाँ तक उपयुक्त होगा। व्यापारी ने अन्ततः सन्त से पूछ ही लिया कि आप इतने अच्छे सन्त है फिर भी आप अपने पास बोतल व प्याला क्यों रखते हैं? इससे जन साधारण में आपके बारे में यह धारणा बनने लगी है कि आप शराबी हैं। यूसुफ ने बताया मेरे पास पानी पीने का कोई और पात्र नहीं है इससे मैंने इन्हें रख छोड़ा है, रही जन सामान्य की धारणा की बात तो इससे मुझे लाभ ही है कि मुझे अधर्म से जन सामान्य झिझकता है व मुझे इस तरह एकान्त में रहकर प्रभु की उपासना का अच्छा अवसर मिल जाता है। यदि मैं प्रसिद्ध हो जाऊँ तो मेरे पास भीड़ सी एकत्रित हो जाय व मैं फिर प्रभु चिंतन में अधिक समय न लगा पाऊँगा।
सन्त व्यक्ति अपने आपको छिपाए रखते हैं व जीवन के मूल उद्देश्य की ओर लगे रहते हैं। चाहे बाह्य रूप से उनके रूप के बारे में जनसाधारण कुछ भी सोचते रहें। यह सोचकर व्यापारी सन्तुष्ट हुआ। उसने अपनी पुत्री खुशी-खुशी यूसुफ के संरक्षण में रख दी।
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बौद्धिक उतार−चढ़ाव, तर्क−वितर्क हमारे क्रिया−कलापों को अधिक लाभदायक और सुरक्षा युक्त बनाने में सहायता करते हैं, पर वे जीवन को कोई दिशा या प्रेरणा नहीं देते। किसी विचार से सहमत होने पर भी आवश्यक नहीं है कि उसे कार्यान्वित करने का उत्साह उभरे ही। जो करते हैं उसका आनन्द सामान्यतया तब मिलता है जब सफलता मिलती है। असफलता मिले तो दुःख होगा। यह बौद्धिक अनुभूति हुई। आन्तरिक आस्थाओं का प्रभाव इससे कहीं गहरा है। उच्च आदर्शों के प्रति निष्ठावान रहने भर की मान्यता दृढ़ रहे तो इतने भर से कोई व्यक्ति अपनी उत्कृष्टता पर गर्व कर सकता है। यह आस्थाओं का चमत्कार है जो बिना सफलताओं के भी मात्र अपनी आन्तरिक उपस्थिति भर से अन्तःकरण को उल्लास से भरे रहती है।
आस्थाएँ प्रेरणा भरती है, गति देती है, बढ़ने के लिए गति और सोचने के लिए प्रकाश प्रस्तुत करती है। उत्कृष्टता की दिशा में बढ़ सकना आस्थाओं की उपस्थिति के बिना, हो ही नहीं सकता। निष्ठा से संकल्प उठता है और संकल्प से साहस और पराक्रम उभर कर आता है। तन्मयता और तत्परता इसी अन्तःस्थिति में किसी प्रयास से नियोजित होती है और मन एवं कर्म का ऐसा स्तर बन पड़ने पर ही महत्वपूर्ण प्रगति सम्भव होती है। सोचने से पता चलता है कि बुद्धि की अपनी उपयोगिता होते हुए भी श्रद्धा की शक्ति असीम है। इसलिए श्रद्धा को ही जीवन कहा गया है। व्यक्तित्व और कुछ नहीं−श्रद्धा का प्रतिबिम्ब परिचय भर है। गीताकार की यह उक्ति दर्शन के मर्म को स्पर्श करती है−
“श्रद्धामयो यं पुरुष यो यच्छ्रद्धः स एव स।”
यह व्यक्ति श्रद्धामय है। जिसकी जैसी श्रद्धा है वह वैसा ही है। यथार्थता यही है। शरीर की बनावट और मस्तिष्कीय कुशलता का महत्व होते हुए भी उनका व्यक्तित्व के स्तर का निर्माण करने में कोई विशेष योगदान नहीं है। मनुष्य के व्यक्तित्व की ढलाई श्रद्धा की भट्टी के सान्निध्य में होती है। इस श्रद्धा तत्व की गरिमा को यदि स्वीकार किया जा सके तो यह भी मानना पड़ेगा कि उसे विकसित, परिष्कृत एवं परिपक्व करने के लिए आस्तिकता की मान्यता का अवलम्बन लेना आवश्यक है। ईश्वर के अस्तित्व की आस्था और उसके साथ तादात्म्य बिठाने के प्रयास में इतना लाभ प्रत्यक्ष मिलता है कि मनुष्य की आदर्शवादी निष्ठाएँ परिपक्व होती है और उसके सहारे व्यक्ति ऐसा बनता है जिसमें आत्मा के अस्तित्व का परिचय भीतरी और बाहरी दोनों क्षेत्रों से प्राप्त किया जा सके।
ईश्वर के विकृत स्वरूप का ही इन दिनों प्रचलन है। भक्त लोग उसे तरह−तरह से फुसलाने की विडम्बनाएँ रचते और उन दाव−पेचों से अपने स्वार्थ पूरा करने के मनसूबे बाँधते रहते हैं। कम से कम मूल्य से अधिक से अधिक लाभ पाने का मनोरथ उन्हें ईश्वर की पूजा−पत्री से मिलने की आशा जब तक रहती है तब तक उसमें आधा−अधूरा उत्साह भी रहता है और जैसे ही उस प्रकार का लाभ संदिग्ध दीखता है वैसे ही तथाकथित भक्ति भावना भाप बनकर आसमान में उड़ जाती है। बात इस प्रकार की भ्रम विकृति की नहीं−यथार्थवादी आस्तिकता की चल रही है। उसका असली लाभ उस उच्चस्तरीय आस्था का निर्माण करना है जिसे श्रद्धा कहते हैं। श्रद्धा को महानता का बीज कह सकते हैं वही उगता, बढ़ता और परिपुष्ट होता है तो जीवन वृक्ष को स्वर्गस्थ कल्प−वृक्ष के समतुल्य बना देता है। चेतना का वर्चस्व उसी से निखरता है। नर−वानर का मानव, महामानव, अतिमानव की दिशा में बढ़ चलने का साहस एवं बल श्रद्धा के सहारे ही सम्भव होता है। श्रद्धा और आस्तिकता का एक दूसरे के साथ अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। ईश्वर का प्रत्यक्ष अनुग्रह श्रद्धा के रूप में ही मिलता है और जैसे इस तत्व की जितनी उपलब्धि हो जाती है उसके जीवन को वन्दनीय बनने की सम्भावना उसी अनुपात से परिपुष्ट होती चली जाती है। इस स्थिति को ऋषियों और सिद्धियों की जननी कहा जा सकता है। आस्तिकता का यह परोक्ष प्रतिफल है जिसमें सन्देह की कोई गुंजाइश नहीं है। पूजा का प्रत्यक्ष प्रतिफल मिलने में सन्देह होने पर भी इस श्रद्धा के वरदान को असाधारण वरदान की ही संज्ञा दी जा सकती है।
जीवन में प्रिय और अप्रिय प्रसंगों की कमी नहीं। सफलताएँ न मिलती हों ऐसी बात नहीं, पर असफलताओं, हानियों, विछोहों और दुर्घटनाओं की भी कमी नहीं। प्रतिकूलताओं से आदमी टूटता है और कई बार किंकर्त्तव्य-विमूढ़ होकर ऐसा सोचने और ऐसा करने लगता है जिससे प्रस्तुत हानि से भी बढ़ी−चढ़ी दुर्घटना खड़ी हो जाती है। टूटा व्यक्ति अपने ऊपर से आस्था खो बैठता है और प्रकाश की ज्योति खो बैठने से अन्धकार में भटकता है। ऐसी स्थिति में मनुष्य जीवित तो रह भी सकता है, पर उज्ज्वल भविष्य की आशाएँ एक प्रकार से गुम हो जाती है। इस स्थिति को प्रत्यक्ष दुर्घटनाओं से भी अधिक भयानक कह सकते हैं, यद्यपि वह दीखती नहीं, पर दुष्परिणामों की दृष्टि से उसकी विभीषिका कम नहीं होती। ईश्वर विश्वास यदि वास्तविक हो तो इस प्रकार के दुहरे प्रहार से बच सकना सम्भव हो सकता है। बाहरी कठिनाइयाँ कितनी ही बढ़ी−चढ़ी क्यों न हों आन्तरिक साहस और सन्तुलन के रहते सहज ही सरल हो सकती। यह आत्म−ज्योति श्रद्धा का तेल पाकर ही जलती है। ईश्वर विश्वासी अनुभव करता है कोई दिव्य शक्ति उसके साथ है। लोगों का सहयोग छूट जाने पर भी वह सहारा देगी। दूसरे साथ छोड़ सकते हैं, पर माता का दुलार कुपुत्र के प्रति भी बना रहता है। ईश्वर की करुणा पतित पर, पथभ्रष्ट पर भी बरसती है और डरावनी विभीषिकाओं के बीच भी अपने आँचल में आश्रय देती है। जो उस आश्रय पर विश्वास करते हैं उन्हें उज्ज्वल भविष्य की ज्योति घोर अन्धकार की घड़ियों में भी दीख पड़ती है और उतना भर आसरा मिलने से मनुष्य डूबने से बच जाता है। फिर से उठ खड़ा होने का अवलम्बन प्राप्त कर लेता है।
जागृत और भावना युक्त आत्माएँ ही ईश्वर का सान्निध्य और अनुग्रह प्राप्त कर पाती है। इस सन्दर्भ में सूफी कवि हफीज ने अपने एक संस्मरण में लिखा है । एक रात उसके गुरु ने आवाज देकर किसी शिष्य को बुलाया। सब सो रहे थे अकेला हफीज ही जाग रहा था सो वह उठ कर आया। गुरु ने उसे बहुत-सी महत्वपूर्ण बातें बताई। इसके बाद फिर गुरु ने आवाज देकर किसी शिष्य को आने के लिए कहा और सब तो सो रहे थे अकेला हफीज ही जब रहा था सो वह फिर जा पहुँचा और इस बार भी वह लाभदायक ज्ञान नोट करके लाया। उस रात इसी प्रकार पाँच बार पुकार हुई और हर बार हफीज ही पहुँचता और ज्ञान पाता रहा। कवि ने लिखा है−गुरु के इस विशेष अनुग्रह और शिष्य के लाभान्वित होने के सौभाग्य के पीछे जगना ही कारण था। अन्य छात्रों की तरह यदि वह भी सो रहा होता तो उस लाभ से वंचित ही रहना पड़ता जो केवल उसे ही मिल सका।
अरविन्द कहते थे−ईश्वर दर्शन के लिए आत्मा की ज्योति का आलोक रहना आवश्यक है। अन्यथा अन्धकार में समीप रहते हुए भी अन्य पदार्थों की तरह ईश्वर को भी नहीं देखा जा सकेगा। आत्मा की ज्योति तीन धाराओं में बहती है−जागरुकता, सतर्कता और चैतन्यता। जिसका अन्तःकरण जागृत है−जिसका विवेक सतर्क है और जिसकी क्रियाशीलता में चैतन्यता का समावेश है वह हर क्षेत्र में सफल होता है। इन्हीं सफलताओं में से एक ईश्वर का साक्षात्कार भी है।
जी. एल. गोल्डस्मिथ कहते थे−“भगवान् मनुष्य की अन्तरात्मा है और वह सदा सत्य की ओर उन्मुख रहती है। कोई अपनी उस अन्तरात्मा से विमुख नहीं हो सकता, जो विश्वात्मा का ही एक अंग है। ऐसी दशा में किसी का भी सच्चे अर्थों में नास्तिक बन सकना सम्भव नहीं। यह बात दूसरी है कि ईश्वर सम्बन्धी किन्हीं मान्यताओं से चिढ़ कर कोई उस समूची सत्ता से ही इनकार करने का आक्रोश व्यक्त करने लगे।” मनुष्य एक ऐसी चेतना से सम्पन्न है जो ऊँचा उठना, श्रेष्ठ बनना और शान्ति पाना चाहता है। यही है आत्मा जो हर किसी के भीतर विद्यमान है। चलने की दिशा का निर्णय करने में ही लोग भटकते हैं। आकांक्षा सर्वत्र एक ही रहती है। असफलता एवं विपन्नता से जब मन उद्विग्न हो रहा हो, तो उसे केवल आत्मा के अंचल में ही शान्ति मिल सकती है । वैभव और वर्चस्व आत्मा में सन्निहित है। कष्टग्रस्त तो शरीर होता है। आत्मा को पहचाने पर अपनी सुसम्पन्नता और सुखद भवितव्यता पर विश्वास बना रहता है। जहाँ इस प्रकार की आस्था रहेगी वहाँ विपन्नताओं से न तो असह्य उद्विग्नता होगी और न निराशा का भार ही वहन करना पड़ेगा।
कोई ईश्वर से विमुख होने की बात कह सकता है, पर सत्य से विमुख होने का साहस नहीं कर सकता। मिथ्याचारी भी सच्चाई का प्रतिपादन करता है और अपने प्रति दूसरों से सत्य व्यवहार की ही अपेक्षा करता है। दुष्टता में खिन्नता और सज्जनता में प्रसन्नता आत्मा की प्रकृति है। उसे अपने व्यवहार में कोई भले ही उपेक्षित करता रहे फिर भी दूसरों के व्यवहार दर्पण में उसे देखने के लिए आकांक्षा बनी ही रहती है। स्वयं को भी सन्तोष तब मिलता है जब कुछ उदार सद्व्यवहार बन पड़ता है। यही है आत्मा का आस्तित्व जिससे इनकार कर सकना न नास्तिक के लिए सम्भव है और न आस्तिक के लिए । हम आत्मा को झुठलाने का प्रयत्न कर सकते हैं, पर इसमें सफलता किसी को भी मिल नहीं सकती। अपने अस्तित्व से अपनी मूल प्रकृति में समाये हुए सत्य, श्रेष्ठ और सन्तोष के प्रति आस्था रखे बिना किसी का भी काम नहीं चल सकता इसलिए आत्मा के अस्तित्व से इनकार करने वाला भी आत्म−विश्वास का परित्याग कर सकने में समर्थ और सफल नहीं हो सकता।”
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कुछ थोड़े से लोग आज की वैज्ञानिक प्रगति का तर्क देकर आस्तिकता, आध्यात्मिकता तथा धार्मिकता जैसे महान् सिद्धान्तों का प्रतिवाद करने लगे हैं। यदि वस्तुस्थिति का गम्भीर अन्वेषण करें तो यह पता चलेगा कि विज्ञान की दुहाई देने वाले इन लोगों की विज्ञान सम्बन्धी जानकारियों अत्यल्प है। जिन्होंने गहन परीक्षणों के बाद कोई उल्लेखनीय निष्कर्ष निकाले हैं उन वैज्ञानिकों में से शायद ही कोई ऐसा रहा हो जिसने इन मानवीय अस्तित्व को गरिमा प्रदान करने वाले तथ्यों को नकारा हो। अधिकांश ने सिद्धांततः उस परम सत्ता और उसकी नियामक व्यवस्था को हृदय से स्वीकार किया है।
इसमें सन्देह नहीं कि विगत दो शताब्दियों में ज्ञान−विज्ञान के अनेक क्षेत्रों का तेजी से विकास हुआ है उससे निकट भविष्य में और अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियों की आशा बँधी है। फोटोग्राफी का प्रचलन 112 वर्ष पूर्व हुआ था और आज उसके प्रति विकसित रूप त्रिविमीय और रंगीन फोटोग्राफी के रूप में देखा जा सकता है। टेलीफोन ने विकास के लिए 56 वर्ष लिये रेडियो ने 35 वर्ष तथा रैडार ने 15 वर्ष, टेलीविजन 12 तथा अणु शक्ति ने 6 वर्ष लिए हैं। यह घटती हुई सीमा अवधि इस बात का प्रतीक है कि ज्ञान की विभिन्न दिशाओं को जितना विकास होता है विज्ञान की उतनी ही प्रगति तेज होती है। इन तथ्यों ने ज्ञान की सार्थकता सिद्ध कर दी है और यह बात दिया है कि ज्ञान के अभाव में मनुष्य किसी भी दिशा में बढ़ नहीं सकता। ज्ञानार्जन की प्रवृत्ति को एक मर्म भरी आवश्यकता के रूप में स्वीकार करके ही उन्नति सम्भव है।
किन्तु इतने मात्र से ही पूर्णता का अहंकार बौद्धिक औद्धत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं। ज्ञान का क्षेत्र इतना अगाध है जितना अमेद्य है ब्रह्माण्ड और यह अब विज्ञान भी मानने लगा है कि ब्रह्माण्ड की व्यापकता को मशीनों और यन्त्रों के द्वारा खोज सकना मनुष्य को गम्भीर समस्याओं में उलझा सकता है। अतएव जीवन के अस्तित्व की समस्या का समाधान किसी और तरह ढूँढ़ना पड़ेगा।
ऐसी परिस्थिति में भी बुद्धिवाद की चुनौती देना कोरे दम्भ के अतिरिक्त कुछ नहीं। बौद्धिक दृष्टि से आज संसार ने जितनी प्रगति की है अपने पूर्वज उससे एक इंच पीछे नहीं थे। धर्म और अध्यात्म ने पुनीत उपहार हमें जिन महान आत्माओं ने प्रदान किये हैं उनकी ज्ञान की सामर्थ्य अतुलनीय थी। यदि विज्ञान को, टेक्नालॉजी को ही ज्ञान का मापक माना जा रहा हो तो इस क्षेत्र में भी पूर्वज अग्रगामी थे। कदाचित इतिहास पूर्व की उपलब्धियों पर दृष्टिपात करे तो यह तथ्य स्पष्ट हो जाते हैं।
आज जो इतिहास उपलब्ध है वह अधिकतम ईसा से 1000 वर्ष पूर्व तक ही है। इससे पूर्व युग को आदिम युग, प्रस्तर युग जैसे भ्रामक नामों से सम्बोधित किया जाता है, पर वास्तव में वह अतीत इतिहास का, विज्ञान और टेक्नालॉजी का स्वर्णिम युग था। हिरोशिमा और नागासाकी के परमाणु संहार की तरह की किसी दुर्घटना ने एकाएक यह परिवर्तन ला दिया अन्यथा उपलब्ध प्रमाण इस बात के प्रतीक है कि उस युग की तुलना में आज की उपलब्धियाँ पासंग−सदृश हैं।
कपास की खेती का पेरू में 1000 वर्ष पूर्व का ही इतिहास मिलता है किन्तु इनका सभ्यता के जो अवशेष मिलते हैं उससे पता चलता है कि 3000 वर्ष पूर्व भी कपास की उन्नत कृषि होती थी। हैलवान् में कपड़े का एक अति प्राचीन टुकड़ा मिला है वह इतना बारीक है कि आज की इतनी एडवांस टेक्नालॉजी भी उस तरह का वस्त्र बनाने में असमर्थ है।
मानवीय मस्तिष्क की क्षमता असीम है वह जैसा इस युग में है प्राचीनकाल में भी वैसा ही था। आज तो मारक विष, पर्यावरण, दूषण, मानवीय समस्याओं का बोझ इन सबसे मनुष्य के मस्तिष्क को दुर्बल ही बनाया है जबकि उस समय यह कोई कारण भी न थे। फिर वे उन्नति क्यों न करते? गार्ड कौवे (टिहानको) में 40000 वर्ष पूर्व चकमक बनाने की फैक्ट्री थी उसी तरह की फैक्ट्री 30000 वर्ष पूर्व बारा डोस्टियन में होने के प्रमाण मिले है। आज के गैलवानिक तथा केमिकल पद्धति से जिस तरह के ड्राई सेल बनते हैं ठीक उसी तरह के बने सेल बिजली के इलेक्ट्री लाइट, कॉपर इलेक्ट्रोड्स तथा लीड्स बगदाद म्यूजियम में सुरक्षित है अर्द्ध कार्बन जीवन−पद्धति से इनकी आयु 40000 वर्ष पूर्व की मानी जाती है।
गोबी रेगिस्तान तथा प्राचीन ईराक में इसी अवधि के लगभग बालू से काँच बनाने का विधिवत् शिल्प शालाएँ स्थापित थी। आज जो लेन्सेस बनते हैं इन्हें −इलेक्ट्रो प्रोसेसिंग क्रिया द्वारा तैयार किया जाता है। इस तरह के क्रिस्टल लेन्सेज असीरियन सभ्यता से 700 वर्ष पूर्व ईराक और इजिप्ट में बनते थे। और उस समय के लोगों द्वारा प्रयुक्त किये जाते थे। यह चश्मे के लेन्सेस विभिन्न शक्ति (पावर) के सूक्ष्म गतीय सिद्धान्तों पर नाभ्यान्तर दूरी ज्ञात करके बनाये जाते हैं इसका अर्थ यह हुआ कि उस समय प्रकाश परावर्तन के सारे भौतिकी नियमों की लोगों को निश्चित जानकारी थी।
धातु विज्ञान की आधुनिकतम जानकारियों से भी कई गुनी आगे की जानकारियाँ उस समय के लोगों को थी। ग्वाटेमाला के टिकाल पिरामिड में हरित मणि की 5 लड़ियों वाला हार उपलब्ध है। हरितमणि केवल चाइना (चीन) में मिलती है इसका यह अर्थ हुआ कि दूरवर्ती व्यापार भी प्रचुर मात्रा में होता था। आज अधिक से अधिक स्वर्णाभूषणों का रिवाज है, पर पेरू के पठार में प्लैटिनम के गहने मिले हैं। दिल्ली में अशोक लाट के नाम से बना लौह स्तम्भ जो 40000 वर्षों से भी अधिक वर्षा के थपेड़े सह रहा है उसमें जंग का धब्बा तक नहीं, वह कैसा धातु सम्मिश्रण है यह आज के धातु विशेषज्ञ तक बता सकने में असमर्थ हैं। लोहे में जंग न लगना मात्र तभी सम्भव है जब उससे सल्फर और फास्फोरस पूरी तरह निकाल लिया जाये आज का विकसित विज्ञान अभी तक भी इस रहस्य को खोज नहीं पाया। पश्चिमी वैज्ञानिकों का मत है इसे बनाने वाले बहुत कुशल इंजीनियर्स रहे होंगे।
वैमानिकी भी इस युग की वृहत्तर उपलब्धियों में से एक है जब कि प्राचीन भारत ने इस दिशा में जो उन्नति की डॉ॰ एरिच के शब्दों में वहाँ तक पहुँचने में आधुनिक विज्ञान को अभी कई शताब्दियाँ लग जायेंगी। भारद्वाज मुनि प्रणीत यन्त्र सर्वस्व के 40 प्रकरणों में से 28वाँ प्रकरण वैज्ञानिक प्रकरण के नाम से है इसमें शकुन, रुक्म, सुन्दर, त्रिपुर आदि 25 प्रकार के विमानों की किस्में दी गई हैं सुन्दर विमान शुँडालु से निकलने वाले धुएँ से चलते थे। त्रिपुर आकाश, जल, थल तीनों में चलते थे इसमें लगा ‘सीत्कारी यन्त्र’ उसे पनडुब्बी की स्थिति में बदल देता था। जिससे पानी के अन्दर भी लोगों को शुद्ध व शीतल वायु मिलती रहती थी इस प्रकरण में विमानों के रेखा पथ, दम्भोक्ति, गुहादर्भादर्श यन्त्र ‘त्रास्यवात निरसन’ आदि यन्त्रों का विस्तृत उल्लेख है जो दूरवर्ती ग्रहों की यात्रा के अवरोधों को भी हटाने में सक्षम होते थे। यह सब अत्यधिक वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर ही सम्भव रहा होगा फिर आज के लोगों का अपनी बौद्धिक क्षमता का अहंकार उचित प्रतीत नहीं होता।
प्रश्न यह होता है कि यदि यह सब था तो आज वह क्यों नहीं, अब तक तो यह विकास पूर्णता की स्थिति में होना चाहिए था। उत्तर के लिए हमें फिर उस युग से इस युग में आना पड़ता है। उस युग में विज्ञान का चरम विकास होने पर भी लोगों ने आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता के मूल मानवीय लक्ष्य का परित्याग नहीं किया था। विचार शीलता ने तर्क की गुंजाइश नहीं रखी थी। विज्ञान विराट् के साकार परिकल्पना का माध्यम मात्र था उसे भौतिक दम्भ का आधार नहीं बनाया गया। यह ज्ञान श्रद्धा भूत था। विश्वास की शक्ति के लिए तर्क से अधिक सम्मान और मान्यता थी इसी कारण सामाजिक जीवन में नैतिकतापूर्ण मर्यादा, पारस्परिक एकता और भाईचारे की भावना थी इसी कारण तब लोग अधिक सुखी और प्रसन्न थे।
किन्तु धीरे−धीरे इन भौतिक उपलब्धियों ने अपनी वास्तविकता दर्शायी। टेक्नालॉजी ने मानवीय क्षमताओं को इन्द्रियोन्मुख बनाया, लोग आलसी होने लगे, प्रमाद छाने लगा। स्वाभाविक था कि कुछ लोगों में अनैतिकता पनपी होगी और जिस तरह आज सारा संसार परमाणविक युद्ध के सम्भावित खतरे से थर−थर कांप रहा है उसी तरह तब भी इस तरह का कोई विश्व युद्ध हुआ होगा और उसने उन सारी उपलब्धियों को ध्वस्त कर मनुष्य को फिर प्रस्तर युग में ला दिया इतिहास जहाँ अपने आपको दोहराता है वही वह अतीत के अनुभवों का लाभ उठाने की भी प्रेरणा देता है। हम भौतिक विज्ञान की प्रगति से होने वाले दुष्परिणामों से समय रहते सजग और सावधान हो सके तो आज वैयक्तिक व सामुदायिक जीवन में जो विकृतियाँ उठ खड़ी हुई हैं उनसे छुटकारा मिल सकता है मशीनीकरण की अपेक्षा लोग प्राकृतिक सामंजस्य बनाये रख सकें तो स्वास्थ्य ही दृष्टि, मनोविकारों की दृष्टि और मर्यादाओं की दृष्टि से वह अधिक सुखी और सुव्यवस्थित हो सकता है अथवा उस समय के सर्वनाश की तरह आगे भी यह संकट आ सकता है कल्पना की जानी चाहिए कि तब फिर अगला युग विज्ञान का नहीं आदिम सभ्यता का ही युग होगा।
यह कथा प्रमाण भूत है। लेबनान के शीशे की तरह चट्टान के टुकड़े के जिन्हें टेक्सीटेस कहते हैं, मिले हैं। अमेरिका के वैज्ञानिक डॉ. स्टेयर ने इनमें रेडियो धर्मो अल्युम्युनियम समस्यानिक (आइसोटोपों) का अध्ययन किया तो उनके मुँह से एकाएक यही निकला−हमसे पहले भी परमाणु युद्ध हो चुके लगते हैं आस्ट्रेलिया, फ्रांस, भारत तथा लेबनान दक्षिणी अफ्रीका व चिली में ऐसे काले पत्थर मिले हैं इनमें अल्युम्युनियम तथा बैरीलियम काफी मात्रा में मिला है इनके अध्ययन से पता चलता है कि यह अत्यन्त उच्च ताप वाले भयंकर अणु विस्फोट के परिणाम स्वरूप बने हैं। विशेषज्ञों का मत है कि महाभारत के युग की बात हो सकती है। महाभारत में युद्ध का जो स्वरूप दिखाया गया है वह टेक्नोलॉजी युक्त वर्तमान युद्धों से बिलकुल मिलता−जुलता है। वह स्थिति फिर से आ सकती है यदि दुर्योधन की सी दुर्बुद्धि, न्याय, नीति और मानवता के मार्ग का अनुसरण करने को तैयार न हो।
आज का मनुष्य इतिहास से कुछ शिक्षा ले सके तो उसका सौभाग्य अन्यथा श्रद्धा विहीन ज्ञान और भौतिक प्रगति अन्ततः हमारी आज की साधन सामग्री और प्रगति को उस युग के विनाश की तरह ही नष्ट−भ्रष्ट कर सकती है।
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आत्मीयता भरी सद्भावनाओं का नाम प्रेम है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। उसके दाता को अपार सन्तोष मिलता है और उपलब्ध कर्ता कृतकृत्य होता है प्रेम को व्यवहार भर के लिए−किन्हीं मित्र स्वजनों के लिए सीमित रखने से काम नहीं चलता । वह तो चतुरता या घनिष्ठता भर कही जा सकती है। वह चरित्र और स्वभाव में सम्मिलित होना चाहिए। फूल का स्वभाव ही प्रसन्नता और सुगन्ध है इसके लिए उसे किसी बनावट या प्रशिक्षण की जरूरत नहीं पड़ती । प्रेम इसी प्रकार का−इसी स्तर का होना चाहिए। नर−नारी के बीच पाया जाने वाला यौन आकर्षण प्रेम से सर्वथा भिन्न प्रकार का आकर्षण है। इसमें वंश वृद्धि के लिए नियोजित प्रकृति प्रेरणा भर काम करती है यह उमंग पशु-पक्षियों और कृमि कीटकों में भी पाई जाती है। कामोत्तेजना नर−नारियों के बीच एक विचित्र प्रकार का उत्साह भरती है और वह अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति के बाद नशे की तरह ठंडा हो जाता है। प्रेम इससे सर्वथा भिन्न प्रकार की वस्तु है। वह किसी भौतिक विनिमय पर आधारित नहीं होता वरन् उच्चस्तरीय आध्यात्मिक आदान−प्रदान करता है। इस मार्ग पर प्रथम कदम बढ़ाने वाले को उत्सर्ग करना पड़ता है और उपलब्ध कर्ता को अपने अनुदानी की गरिमा पर आंच न आने देने का पूरा−पूरा ध्यान रखता है। दोनों एक−दूसरे को उठाते हैं, गिराता कोई किसी को नहीं। जिस घनिष्ठता के फलस्वरूप आदर्शों के परिपालन में बल मिले, उत्कृष्टता उभरे और सन्मार्ग पर चल पड़ने में सहयोग मिले उसी घनिष्ठता को प्यार कहना चाहिए। ऐसे तो प्यार के नाम पर आज पतन ही पतन गली चौराहों पर बिकता फिर रहा है। प्रेम आत्मा का गुण है, शरीर गत आकर्षण नहीं। उसमें पाने की नहीं देने की ही आतुरता रहती है। आकुलता छलकती है। लगाव आकर्षण, दुलार−मनुष्यों के बीच होता है और वह प्रायः नीति मर्यादाएँ छोड़कर प्रेमी से कुछ पाने के लिए ताना बाना बुनता है पर प्यार में, ऐसी कोई बात नहीं है। सन्तान के प्रति माता का प्यार आदर्श माना गया है। इसमें भावनात्मक आदान−प्रदान है। प्रत्यक्ष व्यवहार में तो प्रेम की अग्रिम पंक्ति में जो हो, उसे घाटा ही घाटा है क्योंकि उत्तरदायित्व भी उसी का बड़ा है। प्यार करने का व्यवहार उठाने की प्रक्रिया में ही परिणत होता है। माता बच्चे को गोदी में और पिता−कन्धे पर उठाये फिरते हैं। यह उठाने का−वात्सल्य जहाँ जितना उभरता देखा जाय, वहाँ उतने ही सच्चे प्रेम की स्थिति आँकी जा सकती है।
प्रेम वस्तुतः आदर्शों से किया जाता है। आत्मा की प्यास जिस उत्कृष्टता की है−उसी को परमेश्वर कहते हैं। प्रेम का केन्द्र परमेश्वर है। उसमें स्थिरता है और अभीष्ट उद्देश्यों की पूर्ति भी। भौतिक प्यार के साथ कई प्रकार के स्वार्थ जुड़े रहते हैं। उसमें प्रतिफल की अपेक्षा रहती है। कमी वेशी पड़ने पर उस उन्माद में ज्वार भाटे आते रहते हैं। आज के मित्र, कल शत्रु होते देखे गये हैं। यह प्यार व्यवहार या व्यवसाय है। जिसके लाभ में आकर्षण और हानि में विकर्षण होना स्वाभाविक है शाश्वत प्रेम में केवल लाभ ही लाभ है। यह अनुदान एकांगी होता है उसमें प्रतिदिन की अपेक्षा नहीं की जाती । मूर्ति पूजा के माध्यम से यही अभ्यास किया जाता है। भक्ति द्वारा प्रतिमा की सदा आराधना, अभ्यर्थना की जाती रहती है। बदले में मूर्ति कभी मुस्कराती तक नहीं। अपनी स्तब्धता ही बनाये रहती है। फिर भी भक्त इस रुखाई से तनिक भी विचलित नहीं होता और अपनी एकांगी उपासना करता रहता है। यही भक्त का स्वावलम्बन है जिनमें न कोई आशा है न अपेक्षा। इसमें कभी कोई बाधा, व्यवधान भी नहीं आ सकता। तथाकथित प्रेम पात्र के लिए ऐसा नहीं कहा सकता। जब देव मन्दिर में प्रतिष्ठापित प्रतिमा निष्ठुरता धारण किये रह सकती है तो घर बाजार में रहने वाले सामान्य व्यक्ति यदि उतार−चढ़ाव का परिचय दे−कभी पतंग की तरह आसमान पर चढ़ते और कभी जमीन पर गिरते दिखाई पड़े तो उसमें कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है। प्रतिदान के लिए लालायित प्रेम का निराश होना निश्चित है। काबू तो अपने ऊपर ही रखा जा सकता है, किसी दूसरे पर अपना क्या वश है। प्रेम की आराधना ऐसी नहीं है जो किसी दूसरे की कृपा के सहारे सफल-असफल होती हो। वह अपने भीतर से ही उगती है और अपने तक ही सीमित रहती है। दूसरे उसमें सहयोग दें, न दें यह उनकी मर्जी पर निर्भर है । प्रेमी को आरम्भ से ही उसकी अपेक्षा नहीं रहती है अन्ततः प्रतिदान की उपेक्षा करता रहता है। शाश्वत प्रेम इससे कम में हो नहीं सकता और इससे अधिक वह और कुछ है भी नहीं। अपनी आन्तरिक उत्कृष्टता को−उदात्त भाव सम्वेदना को उभारना ही प्रेम है। उसके विकास परिष्कार के लिए किन्हीं दृश्य अदृश्य आधारों की सहायता भर ली जाती है। माता−बालक, पति−पत्नी, सखा−स्वजन, गुरु−शिष्य आदि के बीच ऐसी ही मैत्री होती है जिसमें स्वार्थों का आदान−प्रदान नहीं, स्नेह−सौजन्य का उच्चस्तरीय अभ्यास ही अभीष्ट होता है। इसमें प्रिय पात्र के लिए अनन्य सद्भाव रहता है। भूलों को सुधारने और आदर्शों में निष्ठा रखने का आग्रह तो रहता है, पर अपेक्षा कुछ नहीं रहती। ऐसी दशा में प्रेम के आन्तक शिखर तक जा पहुँचने में किसी प्रकार के संशय की गुंजाइश नहीं रहती।
व्यक्ति प्रेम साधना के लिए प्रतीक प्रतिमाओं की तरह उपकरण हो सकते हैं लक्ष्य नहीं। पति के मार जाने पर पतिव्रता के पति प्रेम में रत्ती भर भी कमी नहीं आती। शरीर न रहने या दूर रहने पर भी किसी आत्मा के साथ अति घनिष्ठता बनाये रखने में कुछ अन्तर नहीं आता। इस दृष्टि से परमात्मा का प्रेम पूर्णतया व्यावहारिक है। इसमें आत्म समर्पण ही प्रधान है। ईश्वर अनुग्रह की प्रतीक्षा करते रहने की उसमें तनिक भी आवश्यकता नहीं पड़ती । अपना आत्म निवेदन ही अनन्त अन्तरिक्ष से प्रतिध्वनित होकर अपने पास शब्दबेधी बाण की तरह वापिस लौट आता है। प्रेम भी प्रतिध्वनि से लक्ष्य बेध होता है− प्रतिध्वनि से सारा ब्रह्माण्ड गूँजता है और भाव सम्वेदनाओं के अनेक गुनी होकर वापिस लौटने से अपना अन्तरात्मा आनन्द विभोर हो जाता है। इसमें प्रेम−पात्र का योगदान तो यत्किंचित् ही रहता है। वास्तविक उपलब्धि तो अपनी ही प्रेम भावनाओं के सम्वर्द्धन द्वारा उपलब्ध होती है। उसमें किसी दूसरे सहयोग न तो विशेष सहायक होता है और न असहयोग बाधक। अपनी अन्तःवृत्ति को अपने बलबूते एकांकी विकास की ही तपश्चर्या को प्रेम साधना कहा गया है। भक्तियोग यही है−इसी के सहारे आत्म साक्षात्कार से लेकर ईश्वर दर्शन तक के समस्त अध्यात्म उपहार उपलब्ध होते हैं। मनुष्य में देवत्व के उदय और परमेश्वर के प्रकटीकरण की पूरी-पूरी सम्भावना इस प्रेम योग की साधना पर अवलम्बित है। ईश्वर के सान्निध्य में−समर्पण में जो आनन्द आता होगा उसी अनुभूति भाव भरी प्रेम सम्वेदनाओं के उभार में भली प्रकार की जा सकती है।
परमेश्वर की स्वरूप रचना मानवी कल्पना है। इसमें उपासनात्मक सुविधा एवं ध्यान धारणा के लिए−जीवन लक्ष्य निर्धारण के लिए−प्रतीक स्थापना का उद्देश्य पूरा होता है। वस्तुतः उसका कोई रूप है नहीं। यदि रूप हो सकता है तो उसमें इतनी छूट और जोड़कर रखनी होगी कि हर व्यक्ति अपनी श्रद्धा के अनुरूप किसी भी आकृति प्रकृति की प्रतिमा गढ़ सके। हाँ उसमें इतना ध्यान अवश्य रखना होगा कि इस प्रतीक के साथ उत्कृष्ट आदर्शवादिता जुड़ी हुई हो, निकृष्टता एवं दुष्टता को परमेश्वर के स्वभाव एवं चरित्र में सम्मिलित नहीं किया जा सकता। भ्रष्ट परिकल्पना का समन्वय करते ही ईश्वर के ईश्वरत्व का अन्त हो जाता है। चरित्र भ्रष्ट भगवानों की मान्यता से साधक के भी उसी ढाँचे में ढल जाने की आशंका बनी रहेगी। जिन देवताओं को मद्य मांस, दुराचार, भ्रष्टाचार से आपत्ति नहीं उनकी उपासना से भक्ति योग का परम लक्ष्य पूरा नहीं हो सकता।
भगवान की आकृति कुछ भी बनाई अपनाई जा सकती है, पर उसकी प्रकृति में उत्कृष्ट आदर्शवादिता के अतिरिक्त और किसी तत्व का समावेश नहीं होना चाहिए। निराकार मानना हो तो उस सत् चित् आनन्द को सत्यं शिवं सुन्दरम् का केन्द्र, सद्ज्ञान का प्रकाश पुंज माना जा सकता है। सविता यह अनुदान भर परमेश्वर है। प्रातःकालीन सूर्य उसका प्रतीक है। आदर्शवादी उत्कृष्टता के रूप में−इसकी परिकल्पना की जा सकती है। श्रद्धा और भक्ति के रूप के सहारे उसके साथ तादात्म्य स्थापित किया जा सकता है। श्रद्धा का अर्थ है श्रेष्ठता से असीम प्यार। और भक्ति कहते हैं−उदार आत्मीयता और सहृदय सेवा सज्जनता को यही है सचेतन परमेश्वर का भावात्मक पूजा−पाठ । इन्हीं को योग और तप कहते हैं। आत्मिक प्रगति का लक्ष्य श्रद्धा और भक्ति के समन्वय से ही होता है। इसी एकीकरण को प्रेम कहते हैं। प्रेम योग की साधना ही सर्वोपरि है। कर्मयोग और ज्ञान योग के सोपानों पर चढ़ते हुए परम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए प्रेम योग की साधना करनी पड़ती है। इसका तत्काल प्रतिफल मिलता है। जिस अनुभूति के लिए अध्यात्म शास्त्र में रस शब्द आता है−जिसके रसास्वादन से आत्मा को असीम तृप्ति होती है उसे रस कहा गया है। यह रस प्रेम रस के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। ईश्वर का साक्षात्कार अन्तःकरण से शाश्वत प्रेम का अनन्त निर्झर फूट पड़ने के रूप में ही होता है।
प्रेम का अभ्यास परमेश्वर की उपासना, आराधना द्वारा भक्ति योग के माध्यम से किया जाता है। यह व्यायामशाला में किया गया उपार्जन है। प्रयोगशाला पाठशाला, पाठशाला में ही ऐसी ही उपलब्धि उपार्जित की जाती है फिर उस उपार्जन का व्यापक क्षेत्र में उपयोग होगा। पाठशाला में सम्पादित किया गया ज्ञान छात्र द्वारा जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रयुक्त होता है। प्रयोगशाला की उपलब्धियों से असंख्य व्यक्ति लाभ उठाते हैं। व्यायामशाला में बलिष्ठ हुआ पहलवान अनेक क्षेत्रों में अपनी समर्थता का परिचय देते हैं। ठीक इसी प्रकार प्रेम योग का भक्ति साधना के अभ्यास करने वाले अपने अन्तरंग में भावनात्मक और बहिरंग में क्रियात्मक प्रेम तत्व की दिव्य सम्वेदनाओं का परिचय देते हैं सत्कर्मों से भरा−पूरा कर्म क्षेत्र− सद् विचारणाओं में निमग्न ज्ञान संस्थान पर ही किसी की प्रेम साधना की सफलता एवं सार्थकता आँकी जा सकती है।
शरीर को जिस प्रकार अपने निर्वाह के लिए आहार की आवश्यकता पड़ती है ठीक उसी तरह आत्मा की तृप्ति प्रेम की भाव भरी सम्वेदनाओं पर निर्भर रहती है। व्यवहार में जो प्रसन्नता, उल्लास, आशा, उमंग आदि के रूप में सुखद सम्वेदन होता है उसी के उच्चस्तरीय अनुभूति प्रेम है। वस्तुओं अथवा प्राणियों के ऊपर जब प्रेम का आरोपण होता है तो वे परम प्रिय लगने लगती है। वह वस्तुओं का व्यक्तियों की विशेषता नहीं वरन् आत्मीयता के आरोपण की प्रतिक्रिया भी है।
जिन्हें हम शत्रु अथवा पराया मानते हैं उनका रूप, सौन्दर्य, व्यवहार, गुण, स्वभाव अच्छा होते हुए भी उपेक्षा बनी रहती है और कई बार तो निन्दा करने तक का प्रसंग आ जाता है। इसके विपरीत आत्मीय समझे जाने वाले व्यक्तियों में विशेषताएँ ही दृष्टिगोचर होती है उनके प्रति प्रशंसा के ही उद्गार निकलते हैं।
लगता है दूसरे हमें प्रेम करते हैं। बहुत बार ऐसा होता भी है किन्तु यह प्रेमानुभूति वस्तुतः अपना ही उत्पादन है जो सामने वालों से टकरा कर वापिस लौटती है और उस अपने ही प्रतिबिम्ब को सामने खड़ा देखती है। अपने भीतर प्रेम तत्व की जितनी न्यूनता होती है उसी अनुपात से दूसरे भी नीरस दीखते हैं।
मनुष्यों में गुणों की तरह दोष भी होते हैं और वे अपनी प्रकृति वश प्रेमी को भी हानि पहुँचाने से नहीं चूकते। पर यदि अपना अन्तःकरण प्रेम से लबालब भरा हो तो इस प्रकार के उपकार से हानि भर उठानी पड़ती है। विक्षोभ कारी अशान्ति नहीं उभरती। अपने बच्चे भी तो दिन भर गड़बड़ी करते और हानि पहुँचाते हैं। स्वजन भी रोगी होने पर हैरानी उत्पन्न करते और कष्ट तथा घाटा देते हैं, इतने पर भी उन्हें सहन किया जाता और सँभाला जाता है। यह आत्मीयता ही है जो दूसरों के व्यवहार की समीक्षा न करके अपने कर्तव्य धर्म का पालन करती रहती है। आत्मा प्रेममय है इसलिए यदि वह अपनी सही स्थिति में हो तो आत्म परिचय के रूप में उसे प्रेम व्यवहार ही करना पड़ेगा। यहाँ यह और भी ध्यान रखने योग्य बात है कि किसी की इच्छापूर्ति करने में नहीं उसके हित साधन की दूरदर्शिता में आत्मीयता प्रकट है। प्रेम के नाम पर पतन का समर्थन होने लगे और अनाचार का समर्थन चल पड़े तो समझना चाहिए प्रेम के स्थान पर किसी व्यामोह जैसे अनात्म तत्व को अपना लिया गया।
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समझा जाता है कि संस्थाएँ ही बड़े−बड़े काम कर सकती हैं। उनके पास जन−शक्ति और धन−शक्ति सहज ही जुट जाती है। फलतः वे व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक बड़े काम कर सकती हैं। यह बात एक सीमा तक ही सच है, सर्वांश में नहीं। गहराई से खोजने पर तथ्य कुछ दूसरे तरह के ही सामने आते हैं। बड़ी−बड़ी संस्थाओं के मूल में सूत्र संचालक कुछ ही मनस्वी व्यक्ति रहे हैं। उन्हीं की प्रबल प्रेरणा से संस्थाएँ बनती काम करती हैं और सफल होती देखी गई हैं। विद्वान एमर्सन ने इस प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए लिखा है− महान् संस्थाएँ प्रायः उनके मूल में काम करने वाले प्राणवान् व्यक्तियों की विशालकाय छाया भर पाई गई है। जिस प्रकार प्रातः या सायंकाल की छाया मूल व्यक्ति की अपेक्षा कई गुनी लम्बी होती है उसी प्रकार महान व्यक्तियों के व्यक्तित्व विशालकाय संस्था के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं।
थियोडोर रूजवेल्ट की ऐसी संस्थाओं में गहरी दिलचस्पी थी जिन्होंने अमेरिकी सामाजिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निवाही। वे कहते हैं इन महान् संस्थाओं के मूल में प्रायः एक−एक ही प्राणवान् व्यक्ति की प्रधान भूमिका देखी गई है। अन्य सहयोगियों ने तो अनुकरण और अनुगमन भर किया है।
जार्ज बर्नार्डशा ने संस्थाओं के प्रसंग में चुटकी लेते हुए एक बार कहा था−आदर्श संस्थाएँ प्रायः तीन आदमियों से मिलकर बनी होती हैं। जिनमें से दो व्यक्ति प्रायः बीमार जैसे होते हैं।
विद्वान रेनाल्ड केरे ने लिखा है−मनुष्यों की बाहरी और भीतरी संरचना में बहुत थोड़ा अन्तर होता है। तो भी उनमें से कितने ही बहुत ऊँची स्थिति तक जा पहुँचते हैं और कितने ही गई−गुजरी स्थिति में पड़े रहते हैं। इस अन्तर का कारण इतना ही है कि कुछ ने अपनी आन्तरिक ज्योति को पहचाना और उसे प्रज्वलित रखने के लिए घनघोर प्रयत्न किया जब कि दूसरे उससे अनजान बने रहे और उपेक्षा बरतते रहे। हम चाहें तो आत्म−ज्योति को प्रखर रख सकते हैं और उसके प्रकाश में जीवन के हर क्षेत्र को प्रगति के आलोक से भर सकते हैं।
आज व्यक्तियों से कुछ करने और कराने की आशा की जाती है। संगठन को महत्व दिया जाता है और उनको संयुक्त शक्ति का जो परिणाम निकल सकता है उसे ध्यान में रखते हुए संगठित आन्दोलनों का ढाँचा खड़ा किया जाता है। एकता पर बहुत जोर दिया जाता है और मिल जुलकर काम करने का महत्व बताया जाता है। इस प्रयास की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। अच्छे उद्देश्यों की प्रशंसा ही की जा सकती है। इन प्रयत्नों के साथ एक आरम्भिक कड़ी और जुड़ी रहनी चाहिए कि कर्तृत्व उभारने से पहले व्यक्तित्वों को सही किया जाय, ऊँचा उठाया जाय। अन्यथा जिस प्रकार श्रेष्ठता की सम्मिलित शक्ति से सत्प्रयोजन सिद्ध होते हैं, उसी प्रकार दुर्जनों का संगठन विनाश का विस्तार करेगी। एक चोर जो हानि पहुँचता है। उनका संयुक्त गिरोह बड़े दुस्साहस कर सकता है। एकत्रीकरण जिस उद्देश्य के लिए किया गया है उसे उसी तक सीमित रखा जा सके ऐसा कोई उपाय नहीं है। सज्जन जब मिलते हैं तो मिलन प्रयोजन के अतिरिक्त अन्य प्रकार की सत्प्रवृत्तियों के लिए सोचते और करते हैं। संगठन जैसे श्रेष्ठ कार्य की उपयोगिता तभी है जब वह सत्प्रयोजनों के लिए हो तथा सज्जनों के एकीकरण का तथ्य भी उससे जुड़ा रखा जाय।
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अमेरिका का नगर कैन्टुकी। पास ही एक छोटा−सा गाँव है। गाँव में एक के नवयुवक पुत्र को एकाएक मांसपेशियों में जकड़न तथा दर्द उठ खड़ा हुआ। प्राथमिक उपचार किया गया किन्तु उसकी अवस्था में कोई सुधार परिलक्षित होने की अपेक्षा स्थिति बदतर होती गई और युवक अचेत हो गया।
बहुत देर तक मूर्छा समाप्त नहीं हुई तब फिर कैन्टुकी से योग्य डॉक्टर बुलाये गये। उसने युवक−एडगर केसी को होश में लाने की अनेक चेष्टाएँ कीं, पर सफलता मिली नहीं। डॉक्टर अभी परिस्थिति की गम्भीरता पर परस्पर परामर्श कर रहे थे कि एकाएक एडगर ने आंखें खोल दी और चिल्लाकर डाक्टरों से कहा−डॉक्टर तुम्हारा निदान सही नहीं−मुझे अमुक बीमारी है, उसकी अमुक दवा है। साथ ही उसने कुछ औषधियों के नाम गिनाकर उनका पेस्ट (मरहम) बनाकर पीठ पर मालिश करने को कहा। उसके यह शब्द सुनकर वहाँ का हर व्यक्ति आश्चर्यचकित हो गया−घर वाले इसलिए कि एडगर केसी अनपढ़ है, ग्रामीण भाषा में बात करता है, किन्तु आज वह एकाएक शुद्ध अँग्रेजी का उच्चारण कैसे कर रहा है? डॉक्टर इसलिए विस्मित थे कि एडगर ने जो औषधियाँ बताई थी वे वस्तुतः प्रभावशील थीं तथा मरीज के बताये अनुसार उपचार से मरीज अच्छा हो गया और डाक्टरों ने वे जहाँ गये इस विलक्षण घटना की रिपोर्ट दी। फलतः बहुत से डाक्टरों ने भी वहाँ जाकर उसका परीक्षण किया, पर अब वहाँ उस तरह की कोई बात नहीं थी अतएव सब कुछ यथावत शान्त हो गया।
कुछ दिनों उपरांत एडगर केसी का एक मित्र बीमार पड़ा, बीमारी असाध्य थी डॉक्टर बुलाये गये इस बार भी डाक्टरों की उपस्थिति में चमत्कार हो गया। एडगर केसी वहाँ उपस्थित था। कुछ देर में ही वह तड़ित तन्द्रा में चला गया और एकाएक लैटिन में कुछ कहने लगा, कुछ डॉक्टर लैटिन समझते थे उन्होंने एडगर केसी के शब्द लिख लिये उनका अर्थ मित्र की बीमारी से ही सम्बद्ध था। उसे क्या बीमारी है तथा किस औषधि से वह अच्छा हो जायेगा, औषधि कहाँ मिलेगी? उस स्थान का अता−पता सब कुछ था। डॉक्टर एडगर केसी इस अद्भुत क्षमता पर आश्चर्यचकित थे। उसी इलाज से मित्र ठीक हो गया। इस बार इस घटना की चर्चा व्यापक रूप से फैल गई। वहाँ के मेडिकल एसोसिएशन ने वस्तुस्थिति की जाँच के लिए योग्यतम डाक्टरों और विशेषज्ञों का एक आयोग बनाया और स्थिति का पूरा अध्ययन कर रिपोर्ट देने को कहा।
एक दिन आयोग के सदस्य डॉक्टर एक बहुत धनाढ्य और असाध्य रोगी को लेकर एडगर केसी के पास आ गये। यह व्यक्ति अब तक सैकड़ों डाक्टरों का इलाज करा कर हार चुका था, पर बीमारी जहाँ की तहाँ थी। एडगर केसी को उस पर दया आ गई उसने अविलम्ब ध्यान समाधि ली−डाक्टरों ने परीक्षण कर यह लिखा कि उस अवस्था में एडगर का शारीरिक संस्थान सामान्य रूप से काम कर रहा है किन्तु उसकी चेतना विद्यमान नहीं है।
कुछ ही देर में एडगर ने पहले रोग का विश्लेषण करना प्रारम्भ किया। उसने जहाँ−जहाँ दर्द जो−जो लक्षण बताये वह उस व्यक्ति ने बिलकुल सत्य बताया, यही नहीं कुछ ऐसे कष्ट जिसे वह अनुभव करता था, पर व्यक्त नहीं कर पाता था, एडगर ने वह सब भी बताये जबकि मरीज ने कोई भी बात नहीं कही थी, एडगर का रोग की स्थिति की जानकारी देना वस्तुतः आश्चर्यचकित कर देने वाला था डॉक्टर प्रत्येक स्थिति का सूक्ष्म अध्ययन करते जा रहे थे। अब एडगर ने सारी दवाइयां भी बताई पर वह अत्यन्त दुर्लभ थीं, डाक्टरों की राय में उनका कैन्टुकी तो क्या अमेरिका के किसी बड़े शहर में भी मिलना कठिन था। तो भी उस व्यक्ति ने सब तरफ छानबीन कराई वस्तुतः औषधि मिली नहीं। इस पर उसने सभी ख्याति प्राप्त अन्तर्राष्ट्रीय में विज्ञापन निकलवाये। उसके फलस्वरूप पेरिस के एक नवयुवक डॉक्टर ने पत्र लिखकर बताया कि ऐसा फार्मूला काफी समय पूर्व बनाया था, पर वह चला नहीं अतएव अमुक लैबोरेटरी को बेच दिया गया है। उस लैबोरेटरी से दवा की पुष्टि हो गई अब तक वह दवा केमिस्टों के लिए बिक्री नहीं हुई थी, पर उन सज्जन को औषधि मिल गई और वे उसी से अच्छे हुये। इससे एडगर की सर्वत्र ख्याति फैल गई−मेडिकल एसोसिएशन ने पहली बार एक ऐसे अनपढ़ युवक को डॉक्टर की डिग्री प्रदान की तथा उसे मेडिकल फैलोशिप प्रदान कर रोगियों को उपचार और मार्ग−दर्शन देने को कहा तब से वे प्रतिदिन दो मरीजों को देखते हैं। उनसे कोई फीस वे नहीं लेते।
जब उनसे यह पूछा जाता है कि वे अचेतावस्था में ही ऐसा क्यों करते हैं तथा उनके लिये रोगी की इतनी अच्छी स्थिति तथा इतना अच्छा निदान किस तरह ज्ञात होता है। एडगर केसी का कहना है कि मुझे अनायास ही किसी के भी मस्तिष्क से अपने मस्तिष्क को जोड़ लेने की क्षमता मिल गई है। सामान्य स्थिति में मन एकाग्र नहीं होता अचेतावस्था इसलिए आती है कि इस क्रिया के लिये असीमित शक्ति शरीर के कोशों से मिलती है इसी से उस समय मूर्छा आ जाती है। जब में रोगी के मस्तिष्क से सम्बन्ध जोड़ता हूँ तो उसके कष्ट की अनुभूतियाँ जो पहले से ही उसके मस्तिष्क में विद्यमान रहती है मेरे मस्तिष्क में उस भाषा के शब्दों के साथ उतर आती है रोगी जिस भाषा का व्यक्ति होता है। तत्पश्चात् मेरा मन उस बात के जानकार की ओर घूमता है अभी तक मस्तिष्क के 1 /10 भाग को ही जानकारी मिल सकी है 9/10 भाग अभी तक भी शरीर शास्त्रियों और वैज्ञानिकों के लिये चुनौती बनी हुई है इस 9/10 भाग में असीमित क्षमताएँ भरी पड़ी है जो टेलीविजन से भी स्पष्ट संसार का कोई भी दृश्य−बोध, संसार की कोई भी जानकारियाँ रेडियो तरंगों से भी शीघ्र देने में सक्षम है उस क्षमता के एक नन्हें से कण का उपयोग उस समय करके मैं डॉक्टर या उस विषय के जानकर के मस्तिष्क से जोड़ कर निदान मालूम कर लेता हूँ।
विज्ञान ने भी अब यह सिद्ध कर दिया है कि ऐसा होना असम्भव नहीं। जड़ इलेक्ट्रानों से निर्मित कृत्रिम मस्तिष्क−संगणक (कंप्यूटर) में जब इस तरह की क्षमताएँ हो सकती है तो चेतन मस्तिष्क की क्षमताओं का तो कहना ही क्या? शिक्षित और विचारशील लोग किस तरह उतने ही ज्ञान तथा विचारों से नये दर्शन, नये निर्माण और वैज्ञानिक आविष्कार कर लेते हैं, पर योग साधनायें तो उन सम्भावनाओं से भी हजार लाख करोड़ गुनी अधिक सामर्थ्य प्रदान कर सकती है इसे निम्न विवेचन से भली प्रकार समझा सकता है।
अमेरिका में भौतिक विज्ञान की अद्यतन उपलब्ध जानकारियाँ एक कम्प्यूटर में भी भरी पाई हैं उन जानकारियों के आधार पर यह कम्प्यूटर न केवल भौतिक विज्ञान की असंख्य समस्याओं का निराकरण कर देता है अपितु नई शोधों का भी मार्ग प्रशस्त करता है। इसी तरह एक कम्प्यूटर ज्यूरिच में बना है जो मेडिकल इलेक्ट्रानिक्स का कमाल है वह रोग उपचार केमिकल फार्मूलों की हर समस्या हल कर सकता है। इसी प्रकार का कम्प्यूटर काहिरा में है जो नक्षत्रों का विशेषज्ञ है। अभी तक ने कम्प्यूटर अपने विषय की ही जानकारी दे सकते थे, पर यह वैसे ही कम्प्यूटर हैं जैसे एडगर केसी का मस्तिष्क। यदि कोई काहिरा के एस्ट्रानामी कम्प्यूटर से कई मेडिकल का प्रश्न पूछे तो काहिरा का कम्प्यूटर अविलम्ब उस बात को ज्यूरिच कम्प्यूटर के लिए सम्प्रेषित (ट्रान्समिट) करता है। ज्यूरिच कम्प्यूटर उसका उत्तर निकाल कर पुनः सन्देश काहिरा कम्प्यूटर को भेज देता है और इस तरह मशीनी दुनिया में भी यह सम्भव हो गया है कि एक विषय का अनभिज्ञ वह ज्ञान दूसरों से लेकर प्रसारित कर सकता है।
हमारा मस्तिष्क एक जादुई पिटारा है, एक हजार फनों वाला सहस्रार है जो एक नामा सेकिंड (सेकिंड के अरबवें हिस्से) में ही सारे ब्रह्माण्ड को देख लेने, जान लेने उस पर किसी का हस्तक्षेप तक करने में समर्थ है। इतनी समर्थ सत्ता के स्वामी हम फिर भी दीन−हीन इन्द्रिय लिप्सा का जीवन जियें तो यह धिक्कार की बात है, मनुष्य का और उसे बनाने वाले परमात्मा का अपमान है।
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शरीर से प्रौढ़ हो जाना एक बात है और व्यक्तित्व की दृष्टि से प्रौढ़ होना दूसरी। बहुत से वयोवृद्ध ऐसे हो सकते हैं, जिनके दृष्टिकोण, अनुभव एवं रुझान को देखते हुए उन्हें बिलकुल बचकाना बाल−बुद्धि कहा जा सके । कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी आयु तो अधिक नहीं है−बाल भी सफेद नहीं हुए किन्तु उस मनःस्थिति में जा पहुंचे जहाँ उन्हें प्रौढ़ एवं परिपक्व समझा जा सके। यह प्रौढ़ता ही मनुष्य की गरिमा है। उसी के आधार पर उसका मूल्यांकन होता है। श्रेयस्कर सफलतायें इस आन्तरिक प्रौढ़ता के बिना प्रायः मिल ही नहीं पाती।
प्रौढ़ता का प्रथम चिन्ह यह है कि मनुष्य भावुकता को सुरक्षित रखते हुए उसे अति की सीमा में न जाने दे और मस्तिष्क पर उफानों के इतने बादल न जमने दे जिनसे वस्तुस्थिति बताने वाली विवेकशीलडडडडड की गायब हो चले। प्रिय और अप्रिय परिस्थितियाँ प्रायः हर किसी के जीवन में आती है। सज्जनों की तरह दुर्जनों से भी पाला पड़ता है। सफलताओं की तरह असफलताएँ भी मिलती हैं। धूप छाँव को ध्यान में रखा जाना चाहिए। कठिनाइयों का हल निकालने और क्षति की पूर्ति करने के लिए भरसक प्रयत्न करना चाहिए। किन्तु ऐसी स्थिति नहीं ही आने देनी चाहिए कि किन्हीं अप्रिय प्रसंगों के कारण अपना मानसिक सन्तुलन ही गड़बड़ा जाय। प्रस्तुत कठिनाई अपना हल पूछती है। आशंकाएँ रोकथाम का उपाय जानना चाहती हैं। जो क्षति हो चुकी अब उसकी क्षति पूर्ति का उपाय ही अभीष्ट है। जो बीत चुका वह वापिस नहीं लौट सकता इसलिए शोक−संताप में डूबे रहने से क्या लाभ? भविष्य में कठिनाई आने वाली है इसकी चिन्ता करते रहने से बनेगा क्या? आक्रमण की सम्भावना है, तो उस आतंक से बचने को भयभीत होने से क्या प्रयोजन सधेगा? अवरोधों को तो अपना समाधान चाहिए और वह तभी निकल सकेगा जब मनःस्थिति सन्तुलित बनी रहे। असन्तुलित आवेश ग्रस्त मस्तिष्क के लिए सही समाधान ढूँढ़ सकना कठिन है। जब मानसिक स्थिरता रखने जैसा सरल काम नहीं बन पड़ा तो समाधान के साधन जुटाने का कार्य कौन करेगा? हर हालत में मानसिक स्तर ऐसा रहना चाहिए जिसके सहारे प्रगति के उपाय और अवरोधों के समाधान ठीक तरह खोजे जा सकें। इसके लिए आवेश रहित मस्तिष्क ही कारगर हो सकते हैं। आवेश तो स्वयं ही एक विपत्ति है जो अकारण नई−नई कठिनाइयाँ उत्पन्न करते हैं। उनके कारण ऐसे अवांछनीय कदम उठते हैं, जो नई विपत्तियाँ गढ़ देते हैं। समाधान के स्थान पर नई समस्याएँ उत्पन्न करने वाला यह असन्तुलन अपरिपक्वता का चिन्ह है। इसे नियन्त्रित करने के लिए प्रयत्नशील व्यक्ति ही प्रौढ़ता से गौरवान्वित होते हैं।
हर मनुष्य को प्यार और उपकार की आवश्यकता होती है। दूसरों से हर किसी को इसी की अपेक्षा रहती है। भले ही वह स्वयं वैसा न कर पाता हो, पर अन्यों से ऐसी ही अपेक्षा रखता है। इस प्रकार की अपेक्षा करने वालों में मनुष्य स्वयं भी सम्मिलित है। हर वस्तु मूल्य देकर ही खरीदी जाती है। हम दूसरों को प्यार और उपकार की मधुरता प्रदान करेंगे तो बदले में उसकी प्रतिक्रिया का लाभ भी उठा सकेंगे। स्वयं नीरस रहेंगे, अनुदार बनेंगे तो दूसरों से सरसता की सद्भावना की अपेक्षा नहीं कर सकते। इस अभाव से अपने को निराशा रहेगी। साथ ही हम अपने साथियों को उतनी स्वल्प सहायता न कर सकेंगे जो प्यार भरी उदार मनोभूमि रखने पर सहज ही बन पड़ती। अनुदारता, बच्चों के लिए क्षम्य हो सकती है−प्रौढ़ों से उतना भी न बन पड़े तो यह खेदजनक है। अपने मतलब से मतलब रखने−दूसरों की उपेक्षा करने से मनुष्य असामाजिक बनता चला जाता है। भले ही किसी से अनुचित स्वार्थ सिद्धि की इच्छा न हो तो आत्म केन्द्रित रहना, दूसरों के सुख−दुःख में निस्पृह बने रहना भी भावनात्मक शून्यता का लक्षण है। प्रौढ़ता की यह विशेषता होनी चाहिए कि उसमें अधिक सामाजिकता जुड़ी हुई हो। व्यवहार में उदारता, मृदुलता और आत्मीयता का समावेश हो। ऐसे व्यक्ति दूसरों को सद्भाव देते हैं और बदले में अपने लिए और भी बढ़ी−चढ़ी मात्रा में सद्भाव प्राप्त करते हैं।
प्रौढ़ता आत्म−ज्ञान के सहारे उभरता और बढ़ती है। आत्म समीक्षा इसका प्रथम आधार है। अपने कामों की भूल ढूँढ़ने और सुधारने का कार्य तो साथियों की सहायता से भी किया जा सकता है। वे भूलों को बताने और सुधारने का उपाय बता सकते हैं, पर काम इतने से भी नहीं चलता। भूलें उतनी घातक नहीं होती जितनी कि बुरे इरादों के दुष्परिणाम उत्पन्न होते हैं। वस्तुतः हमारी औसत में भ्रष्टता के तत्व घुस पड़ते हैं और वे ही जाने और अनजाने ऐसे कृत्य कराते हैं जिन्हें भूलें कहने भर से काम नहीं चलता, उनसे दुष्ट इरादे प्रत्यक्ष झलकते हैं। यह ‘दूसरे’ ही मनुष्य के वास्तविक व्यक्तित्व का सृजन करते हैं। चिन्तन उसी आधार पर दिशा पकड़ता है और गतिविधियों का निर्माण इसी प्रेरणा से बन पड़ता है। इन दूसरों को ही अध्यात्म की भाषा में−श्रद्धा, आस्था मान्यता, आकांक्षा आदि के नामों से पुकारा गया है। मनोविज्ञान की भाषा में इन्हें संचित संस्कार, दृष्टिकोण एवं अभ्यस्त आदतें कहते हैं। ईमान या नीयत इसी का नाम है। हम क्या चाहते हैं इसी आधार पर क्या सोचते और क्या करते हैं−इसकी पृष्ठभूमि बनती है। अपने इरादों का नंगा रूप मनुष्य स्वयं ही समझ सकता है। यदि वे घटिया हैं−अनैतिक एवं असामाजिक हैं तो उनका निराकरण स्वयं ही करना चाहिए। प्रौढ़ता इसी आत्म−शोधन का कार्य साहसपूर्वक सम्पन्न करती है। आत्म−निरीक्षण के लिए निष्पक्षता की आवश्यकता होती है। जिस प्रकार दूसरों का पर्यवेक्षण तीखी दृष्टि से किया जाता है उसी से अपना भी किया जा सके तो वे त्रुटियाँ समझ में आती हैं जो सामान्यता पकड़ में ही नहीं आती। स्वभाव का अंग बन जाने से और अभ्यास में आते रहने से वे इतनी आत्मसात हो जाती हैं कि यह पता लगाना ही कठिन पड़ता है कि अपने में भी कुछ कमियाँ हैं। आत्म−ज्ञान का पूर्वार्ध यह है कि अपनी नीयत में मानवी स्तर से नीचे के जो भी तत्व घुसे पड़े हों उन्हें समझा जाय और उन्हें निरस्त करके रहने का ही निश्चय किया जाय। आन्तरिक प्रौढ़ता में मानवी आदर्शवादिता और उत्कृष्टता के तत्वों का समुचित समावेश होना आवश्यक है। निकृष्टता अन्तःकरणों में घुसी रहेगी तो कभी कोई मनुष्य व्यक्तित्व की दृष्टि से प्रौढ़ परिपक्व न बन सकेगा।
आत्म ज्ञान का उत्तरार्ध यह है कि जिन सद्गुणों के आधार पर मनुष्य ऊँचे उठते और आगे बढ़ते रहे हैं उनकी आवश्यकता अनुभव की जाय और उन्हें स्वभाव का अंग बनाने के लिए जुट जाया जाय। यह प्रयास तब तक जारी रहने चाहिए जब तक वे पूरी तरह स्वभाव के सहज अंग न बन जायें।
बहुधा अपने सम्बन्ध में लोग बहुत ही हीन विचारों से भरे रहते हैं। जिस तरह दुस्साहस भरे काम करने के लिए सोचते हुए डर लगता है उसी प्रकार खरा व्यक्तित्व बनाने के लिए जिस प्रखरता की जरूरत पड़ती है, उसका विकसित होना भी कठिन लगता है। छोटे−छोटे सत्संकल्प करने पर भी वे निभा नहीं पाते बड़े किस प्रकार पूरे हो सकेंगे। यह आशंका मन पर छाई रहती है और डरते काँपते जो किया जाता है वह पूरा हो भी नहीं पाता। यहाँ संकल्प शक्ति की आवश्यकता है। दृढ़ निश्चय और आत्मविश्वास के साथ सद्गुणों की सम्पदा उपार्जित करने के लिए कदम बढ़ाये जायं तो उनके पूरे होने में फिर कोई कठिनाई शेष न रह जायगी। बहुत से लोग ऐसे हुए हैं जिनमें पहले कुछ भी विशेषता नहीं थी। अयोग्य समझे जाते थे और उनकी संरचना ही घटिया मान ली गई थी, पर जब वे कुछ करने और बनने के लिए कटिबद्ध हो गये तो असफलताओं और अवरोधों के होते हुए भी रास्ता रुका नहीं। झगड़ते−जूझते, गिरते−पड़ते जिनने प्रगति के प्रयास जारी रखे वे सफलता की ऊँची मंजिल तक पहुँच कर रहे हैं। उत्साह पानी के बबूले जैसा क्षणिक हो तो बात दूसरी है। प्रौढ़ता के साथ जुड़ा हुआ आत्म−ज्ञान ऐसे ही मस्तिष्क की कोठरी में संचित होकर बैठ नहीं जाता वरन् दो मोर्चों पर लड़ाई लड़ता है। दोनों हाथों से तलवार चलाना है। एक ओर अपने घटियापन का उन्मूलन और दूसरी ओर श्रेष्ठताओं का सम्वर्धन। इन प्रबल प्रयासों में निरत व्यक्ति को आत्मोत्कर्ष को साधना में निरत प्रौढ़ता सम्पन्न मनस्वी या तपस्वी कहा जा सकता है।
वाल्टर लिपमन कहते थे− प्रौढ़ व्यक्ति आशावादी तो होते हैं, पर आतुर नहीं। दूसरे लोग तुर्त−फुर्त हमारे आदेशों का पालन करने लगेंगे। हमारी इच्छानुरूप परिस्थितियाँ चुटकी बजाते बन जायेंगी, ऐसा सोचने वाले आशावादी नहीं आतुर होते हैं। वस्तुओं को तोड़−फोड़कर दूसरे रूप में बदलना जल्दी भी हो सकता है, पर मनुष्यों या परिस्थितियों को हमारी इच्छानुरूप तुरन्त ढल जाने के लिए विवश नहीं किया जा सकता। प्रयत्न जारी रखे जाने चाहिए। जितना सत्परिणाम निकले उस पर सन्तोष व्यक्त करते हुए आगे की चेष्टा और भी अधिक उत्साह के साथ करनी चाहिए। समय के बारे में आतुर नहीं होना चाहिए। परिवर्तन दूसरों के सहयोग, साधन एवं परिस्थितियों पर निर्भर है जो बात अपने हाथ की नहीं, उसके लिए आतुरता क्यों बरती जाय। ऐसे उतावले लोग ही निराश होते देखे जाते हैं और अपने सत्प्रयत्नों को तनिक−सा विलम्ब लगते देखकर प्रायः छोड़ ही बैठते हैं। प्रौढ़ता की मनःस्थिति में ऐसा नहीं होता। बीज बोने के दिन से लेकर छायादार वटवृक्ष बनने में उगाने वाले को सतर्क श्रम ही नहीं करना पड़ता उपयुक्त अवसर आने की प्रतीक्षा भी धैर्यपूर्वक करनी पड़ती है। यह प्रौढ़ता का चिन्ह है। ऐसे ही लोगों पर निराशा के अंधेर का आक्रमण नहीं होता बल्कि वह उनकी आशाओं का दीपक जलाते रहकर उज्ज्वल भविष्य का आश्वासन देने वाला प्रकाश बनाये रहता है।
प्रौढ़तावान दूसरों के मुँह से अपनी प्रशंसा सुनने के लिए व्याकुल नहीं रहते। न निन्दा सुनकर विक्षुब्ध होते हैं। संसार में असंख्य मनुष्य रहते हैं और उनकी आकृति ही नहीं प्रकृति भी एक दूसरे से भिन्न होती है। वस्तुस्थिति को ठीक तरह समझकर योग्य समीक्षा करने का अवसर भी उनके पास नहीं होता। ऐसी दशा में लोगों के मुँह से सुनी जाने वाली निष्ठा या प्रशंसा प्रायः एकांगी उथली एवं अवास्तविक होती है। अबोध उच्चारण से प्रसन्न या अप्रसन्न होने से कोई बुद्धिमानी नहीं है। बहुत से लोग कारणवश ठकुर सुहाती कहने की कला में निष्णात होते हैं और अवास्तविक प्रशंसा करके मैत्री जोड़ते और उसका लाभ उठाते देखे जाते हैं। प्रशंसा उनका स्वाभाविक गुण नहीं होता उसे वे कला की तरह प्रयुक्त करते हैं और सामने वाली की मानसिक दुर्बलता का लाभ उठाते हैं। ऐसी प्रशंसा के लिए लालायित रहना और उसके आधार पर अपने बड़प्पन का गर्व करना व्यर्थ है इसी प्रकार निन्दा के कारण शत्रुता, ईर्ष्या या गलतफहमी, सुनी बातों पर विश्वास कर बैठना जैसे अनेक कारण हो सकते हैं जिनके कारण अवास्तविकता को वास्तविकता मान लिया गया हो अथवा वस्तुस्थिति को समझते हुए भी बदनाम करने का इरादा किया गया हो।
निन्दा और स्तुति को इतना ही महत्व दिया जाना चाहिए कि जो कहा जा रहा है उसे ध्यानपूर्वक सुना जाय और यह देखा जाय कि उन प्रिय−अप्रिय कथनों में क्या सचाई का कुछ अंश है। जितनी यथार्थता हो उससे प्रकाश ग्रहण किया जाय। प्रशंसा से अपने बढ़े हुए गुणों को अधिक बढ़ाने की और निन्दा से अनुपयुक्त को सुधारने की प्रेरणा ली जाय। अत्युक्ति करने वालों को शान्तिपूर्वक वस्तुस्थिति बताई जा सकती है। फिर भी दूसरे लोग अपनी स्थिति के अनुरूप कुछ कहते ही रहे तो उन पर ध्यान न देते हुए अपने काम में लगे रहा जाय। बचकानी बुद्धि निन्दा, स्तुति को बहुत महत्व देती है और उतने मात्र से अपना सन्तुलन गँवाती रहती है। प्रौढ़ता का तकाजा है कि लोगों की निन्दा स्तुति को वस्तुस्थिति समझने और भावी सुधार परिवर्तन के लिए कुछ प्रेरणाप्रद तत्व हों तो उन्हें शिरोधार्य करके शेष को कूड़े−कचरे की तरह बुहार फेंकना ही उचित है। इसमें व्यर्थ ही विभाग उलझता है और अपनी सामान्य गतिविधियाँ शान्त चित्त से जारी रख सकने में भारी कठिनाई उत्पन्न होती है।
प्रौढ़ता की दृष्टि में साधन संग्रह की सफलता का मुख्य स्वरूप होता है। इसलिए वह बड़प्पन के लिए लालायित नहीं रहती। सफलताएँ और सम्पदाएँ अवांछनीय तरीकों से भी पाई जा सकती हैं। यश के लिए चाटुकारी का उपयोग हो सकता है। पैसा खर्च करके अथवा उस्तादी के आधार पर वाहवाही लूटी जा सकती है यह उपार्जन ओछा है। बाल बुद्धि ही इससे बहकाई जा सकती है। आत्म सन्तोष, आत्म गौरव और आत्म कल्याण की सम्भावनाएँ तो उत्कृष्ट दृष्टिकोण और आदर्श क्रिया−कलाप के आधार पर विकसित होने वाली महानता के सहारे ही बनती है। व्यक्तित्व में महानता का समावेश ही वस्तुतः जीवन की सच्ची सफलता और वास्तविक सार्थकता है जिससे इस स्तर की मान्यताएँ बन सकें, जिसकी प्रखरता से मनुष्य अनुकरणीय व्यक्तित्व का निर्माण कर सके, समझना चाहिए उसी का आन्तरिक प्रौढ़ता प्राप्त हो रही है जिससे मनुष्य का गौरव उसके बचपन से नहीं उस प्रौढ़ता से है जो अपने को ऊँचा उठाने दूसरों को आगे बढ़ाने में समर्थ हो सके।
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भारतीय मनीषियों ने शब्द को ब्रह्म कहा है ब्रह्म या परमात्मा एक विराट् तथा सर्वव्यापी तेजस सत्ता का नाम है−जिसकी शक्ति का कोई पारावार नहीं। इस तरह से तत्वदर्शी भारतीयों ने शब्द की सामर्थ्य को बहुत पहले ही जान लिया था। यही नहीं उस पर गम्भीर खोजें हुई थीं और मन्त्र−विज्ञान नाम की एक स्वतन्त्र शाखा की ही स्थापना हुई थी। मन्त्र-शक्ति की महत्ता इन्हीं शब्दों से ज्ञात हो जाती है−
मन्त्र परम लघु जासु बस विधि हरिहर सुरसर्व। महामन्त्र गजराज कहँ बस कर अंकुश खर्व ॥
जिस शब्द तत्व को इतना निरूपित किया गया है वह चाहे जो कुछ चाहे जैसे मुँह से बोल देने वाले शब्द नहीं। वरन् विशेष गति, लय, क्रम में गुम्फित अक्षरों की विशेष ध्वनि ही यह कार्य करती है। विज्ञान जगत में इस तरह की ध्वनि को ‘अश्रव्य’ ध्वनि कहते हैं। अश्रव्य का अर्थ है जो सुनाई न दे, किन्तु जिसका अस्तित्व हो। विभिन्न प्रकार की विशेष ध्वनियों से इस्पात की मोटी चादरें काटने से लेकर चिकित्सा, कृषि, पशुओं से दुग्ध उत्पादन आदि अनेक प्रकार के आश्चर्यजनक काम होने लगे हैं प्रकारान्तर से चिकित्सा जगत फिर से अपने उसी प्राचीन मन्त्र−तन्त्र के सिद्धान्त पर लौट रहा है।
मन्त्र के सम्बन्ध में भी यही तथ्य काम में आता है। ध्वनि को अश्रव्य स्थिति में तीव्र आवृत्ति देने का जो काम यन्त्र करते हैं वह तालु, कण्ठ, ग्रीवा आदि से सम्पन्न कर लिया जाता है। भावनाओं द्वारा इन्हें नियन्त्रित किया जाता है और फिर किसी भी स्थान विशेष पर इन तरंगों के विखण्डन, मार्जन आदि के द्वारा उपचार, प्रताड़न, मारण, मोहन उच्चाटन आदि के विभिन्न प्रयोग किये जाते हैं। दोनों अवस्थाओं में काम शब्द−शक्ति ही करती है, पर उनकी बनावट, गति और भावनाओं के अनुरूप उनकी शक्ति घट−बढ़ होती है और उसी अनुपात में उसके परिणाम प्रस्तुत होते हैं।
भले ही मन्त्र विद्या के जानकार अब उँगलियों में गिनने लायक ही लोग बचे हों, पर इस विज्ञान की सुनिश्चितता से इनकार नहीं किया जा सकता। अनुमान है कि उच्च आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगों से भविष्य में रुधिर संचार की गतिविधि शरीर के ऊर्जा स्रोतों की जानकारी और उन्हीं से रोगों के निवारण की अन्तःव्यवस्था भी होने लगेगी। इन ध्वनियों का जो चमत्कारिक पक्ष प्रस्तुत होने जा रहा है वह है पदार्थ की संरचना सम्बन्धी गूढ़ से गूढ़ जानकारी। इतना हो जाने के बाद शब्द शक्ति से ही परमाणु विखण्डन पदार्थ को शक्ति में बदल कर उसके मनमाने उपयोग का मार्ग खुल जायेगा मन्त्र विद्या से ऐसे ही चमत्कारों की परिकल्पना की जाती है जो अब विज्ञान द्वारा साकार होने जा रहे हैं।
शब्द को प्रकाश से भी अधिक समर्थ शक्ति माना जाने लगा है इन दिनों सुपर सोनिक नामक जो माइक्रोस्कोप बने हैं वह प्रकाश−सिद्धान्त पर बने माइक्रोस्कोपों से अधिक शक्तिशाली होते हैं। रचना में ध्वनि तरंगें प्रकाश तरंगों से बहुत कुछ मिलती−जुलती होने पर भी गुणों में उनसे ठीक विपरीत होती हैं। प्रकाश−तरंगें उन्नतोदर लेन्स में तो संगठित होकर शक्तिशाली बनती हैं जबकि नतोदर में बिखर जाती है किन्तु अश्रव्य ध्वनि तरंगों के बारे में स्थिति ठीक इससे विपरीत रहती है। इस केन्द्रित शक्ति से न केवल शरीर अपितु पौधों, धातुओं आदि के दोषों का पता लगाना संभव हो गया है और इस नई शक्ति से औद्योगिकी में व्यापक क्रान्ति आने की सम्भावनाएँ व्यक्त की जा रही है।
मन्त्रों में उपरोक्त प्रकार की सम्भावनाओं से भी अधिक समर्थ अपेक्षायें विद्यमान हैं, जो भी शब्द बोला जाता है वह दूसरे को सुनाई ही तब पड़ता है जब हवा में से उसके कम्पन दूसरे कानों तक पहुँचते हैं। हर शब्द से हर दूसरा व्यक्ति प्रभावित होता है, पर जब वही शब्द प्रखर संवेगों और भावनाओं से प्रेरित होते हैं तो उसका अर्थ अश्रव्य कम्पनों का निर्माण ही होता है। मन्त्र विद्या के कुछ अन्य पहलू भी है जो शब्द उच्चारण में प्रयुक्त होने वाले शरीर यन्त्रों से सम्बन्धित है तालु, जिह्वा, विवर तथा कुछ विशिष्ट चक्रों, उपत्यिकाओं से भी है जो शब्दों को गति प्रवाह, भ्रमर आदि में बदल देते हैं यह उन यन्त्रों की तरह ही हैं जैसे ट्रान्स्ड्यूसर यन्त्र जो ध्वनि को सूक्ष्म आवृत्ति वाला बनाकर उन्हें अति समर्थ बना देते हैं।
मंत्र विज्ञान एक अति समर्थ तथा सूक्ष्म विज्ञान है उसे समझा तो जाये, पर जिस आधार पर यह शक्तियाँ मिलती हैं उस आत्मिक धरातल को भी सुदृढ़, विकसित और पवित्र बनाया जाना आवश्यक रहता है उसके बिना मन्त्र विद्या का कुछ अर्थ ही नहीं हो सकता।
जुए में पांडवों ने द्रौपदी को भी दाव पर लगा दिया, पांडव इस बार भी हारे। दुर्योधन ने भरी सभा में द्रौपदी को नग्न करने का आदेश दिया, दुशासन उसे नंगी करने लगा, द्रौपदी ने उस अवसर पर उपस्थित उसी लोगों से इस अनाचार के विरुद्ध आवाज उठाने को कहा, परन्तु सब चुप थे। धर्मराज युधिष्ठिर, गांडीवधारी अर्जुन, गदाधारी भीम सभी ने कुछ भी करने में अपनी असमर्थता प्रकट की, वे मात्र सिर नीचा किये मूक दर्शक बने रहे। भीष्म पितामह जैसे वरिष्ठ व ज्ञानी व्यक्ति भी “मौन” साधे रहे। सब ओर से निराश हो द्रौपदी ने कृष्ण को पुकारा तो एक दम अदृश्य सहायता हुई द्रौपदी की लाज बच गई।
इस घटना के कुछ समय बाद द्रौपदी ने कृष्ण से पूछा− “भैया आप तो कहते हैं भक्तों पर पड़ने वाली विपत्ति दूर करने को मैं स्वयं तुरन्त दौड़ा आता हूँ। फिर उस समय आप इतने विलम्ब से क्यों आये? क्या आपको मेरी व्यथा चिन्तित न किये थी? कृष्ण बोले- “द्रौपदी मैं था तो वहीं, पर तूने तो ज्ञानी विरागी भीष्म, धनुर्धारी अर्जुन, गदाधारी भीम व धर्मराज युधिष्ठिर का ही स्मरण कर उन्हीं को समर्थ समझती रही एवं उनसे ही आशा लगाये रही तो मैं क्यों आता, परन्तु जब तूने मेरा स्मरण किया तो मैं तुरन्त ही आ गया।”
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जो मन से स्वस्थ है वह शरीर−स्वास्थ्य साध लेता है। यदि मनःक्षेत्र उद्विग्न, आवेशपूर्ण हो तो पौष्टिक आहार और पर्याप्त उपचार की व्यवस्था भी व्यर्थ ही सिद्ध होगी तथा रोग अकारण ही उत्पन्न होते रहेंगे। मनःस्वास्थ्य का आधार है सन्तुलन।
व्यक्ति−जीवन हो या सामाजिक जीवन, सन्तुलन ही सही गतिशीलता को जन्म देता है। गर्मी−सर्दी का असन्तुलन पर्यावरण में आँधी तूफान की सृष्टि करना है और मनःस्थिति के उतार−चढ़ाव का असन्तुलन व्यक्ति के भीतरी क्षेत्र को झकझोर कर रख देता है। समाज में व्यवस्था और भावना का सन्तुलन ही जन−जीवन को सामान्य रीति से चलाता रहता है। विकृतियों और अवांछनीयताओं की वृद्धि क्रान्ति धर्मी आन्दोलनों− अभियानों को जन्म देती है।
व्यक्ति के मानसिक असन्तुलन की विक्षुब्ध प्रतिक्रिया ज्ञानतन्तुओं के माध्यम से शरीर के अंग−अवयवों तक पहुँचकर वहाँ भी विष−वृद्धि करती है।
‘इकॉलाजी’ की मान्यता है कि सृष्टि सन्तुलन पर टिकी है। परस्परावलंबन (इन्टरडिपेन्डेन्स) मर्यादा (लिमिटेशन) और सम्मिश्रता (काम्प्लैक्सिटी) इन तीन आधारों पर प्रकृति व्यवस्था गतिशील है।
व्यक्ति−जीवन में सन्तुलन का आधार यही तीनों माने जा सकते हैं। परस्परावलम्बन का अर्थ हुआ प्रकृति की हर वस्तु अन्य सब वस्तुओं के साथ जुड़ी है। व्यक्ति जीवन में भी सभी बातें परस्पर अंतर्संबद्ध और परस्परावलम्बी है। सुख−दुःख, संयोग−वियोग परस्पर जुड़े हैं। ऐसे में मात्र प्रिय एवं अनुकूल परिस्थितियों की ही आशा करना दुराशा ही सिद्ध होने वाला है । अतः उभय स्थितियों में सन्तुलन बनाए रखना आवश्यक है।
मर्यादा तो सन्तुलन का आधार है। जब तक व्यक्ति अपनी सीमाओं (लिमिटेशन्स) को नहीं पहचानेगा, वह जीवन में न तो प्रगति कर सकेगा, न शान्ति पा सकेगा। संसार में अनुकूलताएँ प्रतिकूलताएँ, भलाई−बुराई भरी पड़ी हैं। हममें इतनी शक्ति नहीं कि हम उन्हें सर्वथा परिवर्तित कर सकें। दुनिया में काँटे भी रहने ही वाले हैं। उनका सम्पूर्ण उन्मूलन हमारे लिए असम्भव है हमारी सीमा यही है कि हम स्वयं जूते पहन कर काँटों से पैर लहूलुहान हो जाने से बचा लें। हम न तो यात्रा बन्द कर सकते, न ही काँटों को बीन फेंकने के बाद यात्रा प्रारम्भ करने की योजना बनाकर चल सकते हैं।
सम्मिश्रता का सिद्धान्त तो सन्तुलन की और अधिक प्रेरणा देता है। यह सिद्धान्त इस तथ्य का प्रतिपादक है कि जिनके साथ हमारा प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है, उनसे भी परोक्ष सम्बन्ध होता है। समाज की अवांछनीयताएँ दुर्बलताएँ हमारे भीतर की कमजोरियों का भी परिणाम हैं। जितने अंशों में हम अपना परिष्कार करेंगे, उतने अंशों में, हमारी तुलनात्मक सामर्थ्य के अनुसार समाज में भी श्रेष्ठ परिवर्तन अवश्य होगा। हम जो सुविधाएँ भोग रहे हैं और प्रगति के अवसर प्राप्त कर रहे हैं, वह भी सामाजिक परिवेश का ही अंश है। ऐसे में प्रिय वस्तुओं−व्यक्तियों को अपनाता और अप्रिय की कल्पना से भी त्रस्त हो जाना हास्यास्पद ही है। अधिक अच्छा यही है कि धैर्यपूर्वक अप्रिय वस्तुओं−परिस्थितियों का भी स्वरूप समझें और जितना सम्भव हो, उनमें वांछित परिवर्तन लाने का प्रयास करें।
सम्मिश्रता−सिद्धान्त का ही एक पहलू यह भी है कि एक का सुख दूसरे के लिए दुःख का कारण हो सकता है। एक ही सुविधा का अधिक विस्तार, दूसरे की न्यूनतम आवश्यकताओं को भी छीन रहा होता है अतः सुख−दुःख दोनों में मन को सन्तुलित रखें और अपनी सुविधाओं को भी मर्यादित ही रखें। अन्यथा विषमता की प्रतिक्रिया हमारे लिए महँगी पड़ेगी।
वस्तुतः इकॉलाजी के निष्कर्ष प्रत्येक दिशा में मर्यादा और सन्तुलन पर बल देते हैं। उसके अनुसार अमर्यादित उत्पादन और अवाँछनीय उपयोग विज्ञान के अवैज्ञानिक उपयोग की चेष्टा है और इस चेष्टा के दुस्साहस को स्वयं प्रकृति ही कुचल देगी। औद्योगिकी तथा भौतिकता प्रधान सभ्यता के अनियन्त्रित विस्तार से न केवल जड़ जगत तथा प्राणी जगत में घातक असन्तुलन उभरा है अपितु मानव−अस्तित्व भी संकटग्रस्त हो गया है।
व्यक्ति−जीवन में भी असन्तुलन त्रास और पीड़ा का ही कारण बनता है। अपनी परिस्थितियों का सही−सही विश्लेषण कर निर्दिष्ट दिशा में धैर्य एवं अध्यवसायपूर्वक बढ़ते रहने पर उल्लास, आनन्द एवं सफलता प्राप्त होती है। जबकि दूसरों के साथ अपनी तुलना करते रहकर मन की निरंकुश घुड़दौड़ को बढ़ावा देने से तृष्णा, उद्विग्नता विफलता और निराशा ही पल्ले पड़ती है।
क्रियाशीलता के क्षेत्र में सन्तुलित लक्ष्य निर्धारण की जितनी आवश्यकता होती है, उतनी ही भावनात्मक अनुभूतियों के क्षेत्र में भी। वस्तुतः सुख−दुःख की समस्त अनुभूतियाँ सापेक्ष होती है। दुर्भाग्य-सौभाग्य की धारणाएँ तक हमारे अपने दृष्टिकोण का परिणाम होती हैं। खिन्नता, शिकायत और अभियोग की प्रवृत्ति बन जाय, तो उपलब्ध साधन−सुविधाएँ सदैव−कम ही दिखती रहती हैं और समाज में अपने को सर्वाधिक दुःखी व्यक्ति ही मान लेने को जी करता है। जबकि प्रसन्नता की प्रवृत्ति अभावों के बीच भी, अपने से भी दुःखी तथा आपत्तिग्रस्त व्यक्तियों की स्थिति देखकर कष्टों को हँसते−खेलते सहने की प्रेरणा देती है।
सत्य तो यह है कि संसार में अधिक महत्व घटनाओं परिस्थितियों का नहीं, अपने ही दृष्टिकोण का है। असन्तुलित दृष्टिकोण सदा अशान्ति और दुःख देता है। सन्तुलित दृष्टिकोण जीवन में आशा−उल्लास बनाए रखता है। सुख−दुःख में वास्तविकता का अंश भी होता है, पर उन वास्तविकताओं के बीच सही मार्ग भी तभी निश्चित किया जा सकता है जब मनःस्थिति सन्तुलित हो। फिर इन वास्तविकताओं से कहीं बहुत अधिक दुःख−दारिद्रय, दुर्भाग्य−असन्तोष की अनुभूतियाँ तो काल्पनिक ही होती हैं असन्तुलित मनःस्थिति सदैव आधारहीन कल्पनाओं के बीच झूलती रहती है। उपलब्ध साधनों और प्रस्तुत परिस्थितियों में सरसता का अनुभव कर पाना। उसके लिए सम्भव ही नहीं होता। असन्तुलित मनःस्थिति वाला व्यक्ति अनिष्ट की आशंकाओं से ही आक्रान्त रहा आता है, विकट परिस्थितियों से संघर्ष का क्षण उपस्थित होने की कल्पना से ही वह घबराता रहता है।
सन्तुलित दृष्टिकोण ही प्रगतिशील जीवन का आधार है। हानि−लाभ का क्रम जो जीवन में अनवरत रूप से चलता ही रहा है। इस तथ्य को स्मरण रखा जाय, तो विषम से विषम परिस्थिति और बड़ी से बड़ी क्षति भी हँसकर झेली जा सकती है। सुख दुःख की सापेक्षता का भी ध्यान रखा जाय, तब तो कहना ही क्या? अधिकांश दुःखों को अस्तित्व ही मिट जाय और सुख भी सामान्य ही प्रतीत हो उनके कारण आचरण में उच्छृंखलता, दर्प या आवेश न उत्पन्न हो। सन्तुलन ही जीवन का केन्द्रीय नियम है। उसे सदा बनाये रखने में ही सब प्रकार से कल्याण है।
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“इलेक्ट्रिकल रिव्यू” नामक पत्रिका के अंक में चिकित्सा शोध−समूह द्वारा दी गई इस खोज का विवरण प्रकाशित हुआ है कि मानव शरीर की विद्युत क्षमता का पर्यावरण के विद्युतीय दबाव से घनिष्ठ अन्तःसम्बन्ध है। हमारे अयन मंडल में जब भी कोई गम्भीर उथल−पुथल होती है उसका प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे शरीर की सामान्य जैव विद्युत चुम्बकीय शक्ति पर पड़ता है, उससे सामान्य क्रियाशीलता गड़बड़ा जाती है। उस उथल−पुथल को सन्तुलित करने के लिए शरीर में कई तरह की मानसिक व शारीरिक व्याधियां उठती दिखाई देती हैं, जिन्हें हम रोग व शोक की संज्ञा देते हैं। विचार पदार्थ को किस प्रकार प्रभावित करते हैं उसका यह स्पष्ट उदाहरण है कि मनोसंस्थान में उतरा यह प्रभाव अविलम्ब शरीर के नाड़ी संस्थान में फैल जाता है और शरीर का जो अंग कमजोर हुआ वही वह किसी रोग या बीमारी के रूप में उसी तरह फूट पड़ता है जैसे भयग्रस्त व्यक्ति को चोर, बदमाश अस्थिर और दुर्बल चित्त लोगों को भूत प्रेत हैरान करते रहते हैं।
यह एक विलक्षण सत्य है कि प्राणि−जगत की मनोदैहिक अवस्था को प्रभावित करने वाला वातावरण का चुम्बकीय परिवर्तन स्वायंभु नहीं अपितु वह उथल−पुथल का परिणाम होती है। प्राकृतिक परमाणु से इस दबाव को चलते−फिरते झेल जाते हैं, किन्तु अपनी जीवनचर्या में कृत्रिमता का लबादा ओढ़े इन्सान तनिक से परिवर्तन से ही लड़खड़ा जाता है। महामारियाँ आती हैं तो एक साथ हजारों लोगों को मार जाती हैं, सामान्य से ऋतु परिवर्तन से कितने ही लोगों को सर्दी, जुकाम और टाइफ़ाइड तक हो जाता है, किन्तु जिन व्यक्तियों के आहार−बिहार, रहन−सहन, खान−पान में प्राकृतिक साहचर्य घुला हुआ रहता है वे उसे हलके से बोझ की तरह हँसते-खेलते झेल जाते हैं। उन्हें किसी संकट या बेचैनी का सामना करना नहीं पड़ता है। तालाब का पानी स्वच्छ और स्थिर हो तो सूर्य का प्रतिबिम्ब उतना ही स्वच्छ और चमत्कार दिख जायेगा, किन्तु यदि उसे किसी ने घेर रखा हो और पानी अस्थिर हो तो वह बिंब इस तरह बिखर जायेगा कि उसका स्वरूप ही समझ में नहीं आयेगा।
विश्व व्यवस्था की दृष्टि से हर व्यक्ति परिवर्तनों का सामना करने के लिए विवश है। जीव−रसायन, जीवन−शास्त्रों की तरह इन दिनों विज्ञान की एक नई विद्या का विकास हो रहा है जिसे जीव−चुम्बकीय विज्ञान कहते हैं। वैज्ञानिक माइकेल गाक्वेलिन ने अपने अनुसंधानों द्वारा यह सिद्ध किया है। आकाशीय पिण्डों की चुम्बकीय शक्ति हमारे आनुवांशिक जीवन या कोशिका जगत को प्रभावित करती है। जन्म के समय चन्द्रमा के प्रभाव क्षेत्र में होने पर बालक के स्वभाव में साहित्यिक गुण पाये गये यदि प्रभाव शनि का रहा तो वह अच्छे डॉक्टर या वैद्य बनते देखे जाते और उसी तरह वह बालक जो बृहस्पतिवार की राशि में से जन्म लेकर बढ़ते हैं वे बौद्धिक सूझबूझ वाले, अभिनेता किस्म के होते हैं यह तथ्य वास्तव में इस बात के प्रतीक है कि हमारा जीवन ग्रहों से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।
विभिन्न चुम्बकीय बल प्राणियों पर क्या प्रभाव डालते हैं? इसके अनुसन्धान के परिणामस्वरूप “बायो मैग्नेटिक्स” नामक चिकित्सा विधि का विकास किया गया है शिकागो की “बायो मैग्नेटिव रिसर्च फाउंडेशन” 15 वर्षों तक चूहों पर किये गये परीक्षणों से विदित हुआ कि इससे “कैन्सर सेल्स” की वृद्धि रोकी जा सकती है। इस प्रभाव में कैन्सर के कोशाणु बढ़ नहीं पाते। न्यूयार्क के डॉ॰ केई मैक्लीन ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है, लेनिन ग्राड चिकित्सालय में न्यूरोलॉजिकल वार्ड के रोगियों के लिए एक निश्चित चुम्बकीय क्षेत्र के प्रति सक्रिय रहने वाली आहार व्यवस्था की गई परिणामतः उनके गुर्दे की पथरी टूटकर घुलने लगी और रोगी को अपेक्षा से अधिक सुधार हुआ। इस दिशा में आगे के अनुसन्धान एक नई सम्भावना की ओर संकेत करते हैं जब मनुष्य केवल ग्रहों से मन को जोड़कर दैवी तत्वों से सीधे सम्पर्क का लाभ ले सकेगा। यह स्पष्टतः लोगों को देववाद और उपासना की ओर ले जायेगा। उपासना और कुछ नहीं दो चुम्बकीय शक्तियों के योग का ही नाम है। गायत्री उपासना से यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है।
गायत्री का देवता सविता−सूर्य है उससे उपासक में वहाँ को सद्यः स्फूर्त प्राण चेतना भरती और सूर्य की आन्तरिक स्थिति में जब भी परिवर्तन होता है हमारा पार्थिव जगत उसी अनुपात में प्रभावित होता है मनोमय−जगत में भी व्यापक हलचल उत्पन्न होती है। सूर्य बिम्ब में दिखाई देने वाले काले धब्बे जब−जब बढ़ते हैं पृथ्वी में व्यापक प्राकृतिक परिवर्तन होते हैं। इसी प्रकार सौर वायु सौर ज्वालाएँ तथा विकिरण भी भूकम्प, हृदय वे मानसिक रोगों तथा मानवीय विपत्तियों को बढ़ाते हैं। मंगल और वृहस्पति 90 अंश की कोणीय दूरी पर आते हैं उस समय अयन मण्डल में बड़ी तीव्र हलचल पैदा होती है। सौर विकिरण का मनुष्य की कोशिकाओं (जीन्स) में तीव्र असर होता है अर्थात् हमारे स्वभाव का भी सीधा सम्बन्ध सूर्य से जुड़ गया है। इन परिवर्तनों का केन्द्र बिन्दु कहाँ है यह कहना कठिन है, किन्तु सापेक्षवाद के जनक आइन्स्टीन के सापेक्षवाद सिद्धान्त के अनुसार उसका एक केन्द्र बिन्दु अवश्य होना चाहिए। हम चाहें तो उसे प्रकृति की व्यवस्था या परमात्मा का नियम कुछ भी कह सकते हैं। शरीर और मन की तरह ब्रह्माण्ड और उसका जैव चुम्बकीय तत्व भी एक अनिवार्य सत्य है अतएव जहाँ हमारी शरीर चर्या प्राकृतिक रहन−सहन से स्वास्थ्य अनुभव करती है। उसी प्रकार हमारा मनोमय कोश मन भी उसी के अनुरूप जीवन की मूल नैतिक आकांक्षा के अनुरूप रहना आवश्यक है, अन्यथा कोई भी छोटी−सी कठिनाई हमें निराशा के गर्त में धकेल सकती है।
सूर्य−मण्डल ही नहीं, विचार तन्त्र समस्त ब्रह्माण्ड में शरीर की नाड़ियों की तरह फैला हुआ है। चन्द्रमा की घटती−बढ़ती तड़ित झंझावात, परमाणु परीक्षणों का वायुमण्डल में चुम्बकीय परिवेश में पड़ा प्रभाव न केवल समुद्र, बादल, तापमान को प्रभावित करते हैं अपितु शरीर स्थिति विद्युतीय प्रक्रिया को अस्त−व्यस्त कर देते हैं, “दि लिव्हिंग ब्रेन” के लेखक डॉ॰ ग्रे वाल्टर ने इस तथ्य को उल्टे ढंग से यों प्रतिपादित किया है कि जब किसी को शारीरिक चोट लगती है, आहत स्थल की जीव विद्युतीय गतिविधि में प्रबल परिवर्तन होता है। उसी से मन पीड़ा अनुभव करता है। इसी तरह सृष्टि के किसी भी भाग में उत्पन्न दुर्दशा से मूल सत्ता का प्रभावित होना आवश्यक है, उन व्यवस्थाओं को सम्भालने के लिए परमात्मा आपात व्यवस्था की तरह तीव्र परिवर्तन करती है, उसमें हर प्राणी को भागीदार होना पड़ता है अतएव यदि इस तरह का कभी कोई दबाव पड़ता है तो कमाण्डर के इंगित पर सक्रिय हो उठने वाले प्रत्येक सिपाही की तरह ही हमें उन व्यवस्थाओं को मानने के लिए तैयार हो जाना चाहिए और आसुरी प्रवृत्तियों के निराकरण में, जुट जाना चाहिए। यह आदेश हमारी भावनाओं में विचारों में आते अवश्य हैं यदि हम उनकी उपेक्षा करते रहें और अपनी जीवन−शक्ति निरर्थक नष्ट करते रहें तो यही व्यवस्थाएँ हमारे लिए घातक हो जाती हैं। ऐसे व्यक्ति देर सवेर आपत्ति, असफलता, मानसिक उद्वेग में फंसकर अपनी शान्ति व प्रसन्नता ही गँवाते हैं।
सेवाग्राम में नित्य प्रातःकालीन प्रार्थना होती थी, एक दिन शिष्य ने बापू से कहा कि कल की प्रार्थना में अमुक लोग नहीं आये थे। बापू ने डाँटते हुए उनसे कहा, “तू भी प्रार्थना में न आता तो ठीक था, निन्दा करने से तो प्रार्थना में न आना ही ठीक रहता।”
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समस्त मनुष्य जाति एक ही पिता की सन्तान है। सभी की माता धरती है। सभी परस्पर स्वजन और कुटुम्बी है। इस कौटुम्बिक एकता को बनाये रहने में ही मनुष्यता है। विभेद ही जितनी दीवारें खड़ी की जायेंगी और विभिन्न आधारों पर पृथकता के जितने अवरोध खड़े किये जायेंगे उनसे तात्कालिक कोई वर्ग स्वार्थ भले ही सिद्ध होते हों−अन्ततः उनसे विनाश ही उत्पन्न होगा।
कौटुम्बिकता की आधारशिला एकता और समता के सिद्धान्तों को अपनाने से ही जा सकती है। आत्मवत् सर्वभूतेषु और वसुधैव कुटुम्बकम् के महान आदर्शों को स्वीकार करने पर ही सर्वतोमुखी मानवी प्रगति का पथ−प्रशस्त हो सकता है। उज्ज्वल भविष्य की आशा तभी की जा सकती है, जबकि हम विषमता को मिटाकर समता का और विलगता को हटाकर एकता का वातावरण उत्पन्न करने के लिए कटिबद्ध हों। जाति, लिंग, धन क्षेत्र, भाषा, देश, धर्म, संस्कृति आदि के आधार पर चल रहे वर्तमान विलगावों को हटाने और सर्वतोमुखी समता, एकता के आधार खड़े करने पर ही सर्वनाशी उलझनों का समाधान सम्भव हो सकेगा।
विवेक की माँग और समय की पुकार यही है कि हर क्षेत्र में भावनात्मक एकता और व्यावहारिक समता की सार्वभौम एकता के लिए प्रबल प्रयत्न किये जायें। इसके बिना मनुष्य की वैयक्तिक और प्रकृति की भौतिक शक्तियों का सदुपयोग बन ही नहीं पड़ेगा। फलतः जो भी उपलब्धियाँ हस्तगत होंगी वे क्षणिक सुख देती दिखाई पड़ने पर ही अन्ततः विपत्तियाँ और समस्याएँ ही खड़ी करती चली जायेंगी।
भारतीय परम्परा सार्वभौम सर्वजनीन एकता एवं समता की समर्थक रही है। साम्यवाद समाजवाद के नवीन प्रतिपादन उसी आध्यात्मिक प्रतिपादन का एक अंग है जिसे ऋषियों ने सदा से मानवी नीति निष्ठा में सम्मिलित रखा है। कहा गया है−
जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नाना धर्माणं पृथिवी यथौकसम्। सहस्त्रं धारा द्रविणस्य में दुहाँ ध्रुवेव धेनुरनपस्फुरन्ती॥ अथर्व 12 का॰ 1 सू॰ 45 म॰
यह पृथ्वी माता विविध भाषा भाषी, विविध धर्मावलम्बी, मनुष्यों को एक घर में रहने वाले कुटुम्बियों की तरह धारण करती है। वह बिना झुंझलाये सबका शान्त गौ की तरह पोषण करती है।
“पृथिव्यै समुद्रपर्यन्ताया एकतद्।”
−श्रुति
समुद्र पर्यन्त जितनी सब पृथ्वी है। उस सम्पूर्ण भूभाग का एक ही आर्य राजा हो।
ये समानां समनसो जीवा जीवेषु मामकाः। येषां श्रीर्मयि कल्पता मस्म लोके शतं समाः॥
मुझे अन्य सबमें वे ही प्रिय हैं जो सब में साम्य भाव रखते हैं। उन्हीं की सम्पदा स्थिर रहती है और सुखी रहते हैं।
सहृदयं सामनस्य मविद्वेषं कृणोमि बः। अन्यो अन्वमभि हर्यत वत्सं जातमिताध्न्यो॥
-अथर्व 3।30।1
तुम सबके हृदय में समता हो। मन समान हो। कोई किसी से द्वेष न करे। परस्पर ऐसा प्यार करो जैसा गाय और बछड़े के बीच होता है।
अज्येष्टासो अकनिष्टास एते सं भ्रातरो वादृधुः सौभगाय। युवा पिता स्वपा रुद्रं एषां सुदुघा पृश्निः सुदिना रुद्भ्यः॥
ऋ॰ 5।60।5
जिनमें कोई बड़ा नहीं है और जिनमें कोई छोटा नहीं है ऐसे ये सब भाई एक हैं । ये उत्तम ऐश्वर्य के लिए मिलकर उन्नति का प्रयत्न करते हैं। इन सबका तरुण पिता उत्तम कर्म करने वाला ईश्वर है इनके लिए उत्तम प्रकार का दूध देने वाली माता प्रकृति है, यह प्रकृति माता न रोने वाले जीवों के लिए उत्तम दिन प्रदान करती है।
समानोः मन्त्रः समिति समानी समानमनः सह−चित्तमोषांम्। समानं मन्त्रमभि मन्त्र येवः समानेन वो हविषा जुहामि।
तुम्हारे मन्त्र समान हों, तुम्हारी समिति समान हो तुम्हारे मन तथा चित्त एक से हो मैं तुमको समान मन्त्र में मन्त्रित करता हूँ और तुमसे समान हवि द्वारा हवन कराता हूँ।
समानी वः आकूर्ति समाना हृदयानि वः। समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति॥
तुम्हारा अभिप्राय एक हो, तुम्हारे हृदय एक हो तुम्हारा मन एक हो जिससे पूर्णरूप से संगठन हो।
समानी प्रया सहवोन्नभागः समानेयोम्भे सहवो युनजि। सम्यंचोऽग्निं सपयंतारा नाभिमिवामितः॥
तुम्हारी जलशाला एक हो और तुम्हारा अन्न का भाग−साथ−साथ हो, मैं तुम्हें एक ही जोते में साथ−साथ जोड़ता हूँ तुम मिलकर चलते हुए मुझ ज्योतिस्वरूप को इस प्रकार पूजो जैसे पहिये के दण्ड नाभि में चारों ओर से सटे रहते हैं।
सं गच्छध्वं वदध्वं सं वो मनांसिजानताम्। देवोभागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते॥
हे मनुष्यों तुम सब मिलकर चलो, मिलकर बातचीत करो, तुम्हारे मन एकसा विचार करें, जैसे पहले विद्वान् सम्यक् जानते हुए अपने धर्म का पालन करते थे वैसा तुम भी करो।
दृते दृहंमा मित्रस्य, चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षत्ताम्। मित्रस्याऽहं चक्षषां−सर्वाणि भूतानि समीक्षे, मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे॥
यजुर्वेद 36।18
हे अविद्या अन्धकार के विनाशक परमात्मन् मुझको ऐसा दृढ़ कीजिये कि समस्त प्राणी मुझको मित्र की दृष्टि से देखें, मैं भी सब प्राणियों को मित्र ही की दृष्टि से देखूँ इस प्रकार हम सब मनुष्य एक दूसरे को मित्र की दृष्टि से देखते रहें।
इहैत तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोष हि समं ब्रह्म तस्माद ब्रह्मणि ते स्थिताः॥
जिनका मन इस समतावाद में सुस्थिर हो गया उन्होंने जन्म−मरण की परम्परा रूप सृष्टि पर विजय प्राप्त कर ली, अर्थात् वे जीवन्मुक्त हो गये, क्योंकि उन्होंने दोषरहित ब्रह्म को ही सर्वत्र समरूप में अपनाया।
ज्यायस्वन्ताश्चेत्तिनो मा वि यौष्ठ, संराधयन्तः सधुराश्चरन्तः। अन्योन्यस्मै बल्गु वदन्तो यात, समग्रास्थ सध्रोचीनाम्॥
श्रेष्ठता प्राप्त करते हुए सब लोग हृदय से एक साथ मिलकर रहो, कभी विलग न होओ। एक दूसरे को प्रसन्न रखकर एक साथ मिलकर भारी बोझ को खींच ले चलो। परस्पर मृदु भाषण करते हुए चलो और अपने अनुरक्त जनों से सदा मिले हुए रहो।
सध्रीचनान्वः समनसः कृणोम्यो। कृश्नुष्टेन् संवनेन सहृदः॥ देवा इवेदमृतं रक्षमाणाः। सायं प्रातः सुसमितिर्वो अस्तु॥
समान गति वाले आप सबको सममनस्क बनाता हूँ, जिससे आप पारस्परिक प्रेम से समान भावों के साथ एक अग्रणी का अनुसरण करें। देव जिस प्रकार समान चित्त से अमृत की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार सायं प्रातः आप सबकी उत्तम समिति हो।
मैत्रीसंस्थापकोयश्च विश्व शान्ति विधायकः। सनातनाय धर्माय तस्मै नित्यं नमो नमः॥
जो विश्व शान्ति तथा सर्वत्र मैत्री की स्थापना करने वाला है। उस सनातन धर्म को प्रतिदिन सदा सर्वदा नित्य निरन्तर ही नमस्कार है।
न वै भिन्ना जातु चरन्ति धर्म न वै सुखं प्राप्नु वन्तीह भिन्ना। न वै भिन्ना गौरवं प्राप्नुवन्ति न वै भिन्नां प्रशमं रोचयन्ति॥
महा॰ उद्योग 36।56
जो आपस में एक दूसरे से भिन्न हो गये हैं, वे धर्म नहीं कर सकते और न भेद को प्राप्त हुए सुख पाते हैं। उनको न गौरव मिलता है और न पृथक हुए मनुष्यों को शान्ति मिलती है।
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क्या वास्तव में ही प्रकृति में बड़ों के बड़े महत्व का सिद्धान्त कार्य करता है प्रिन्स क्रोपाटकिन ने जान स्टुअर्टमिल के इस उपयोगितावाद (डयूटेलिरिज्म) सिद्धान्त की शव परीक्षा का निश्चय किया। वे प्रकृति की पुस्तक खोल कर बैठ गये फिर उन्होंने जो पढ़ा और जो निष्कर्ष निकाले वे न केवल उक्त तथ्य का खण्डन, प्रकृति में सहयोग और सहजीवन के सिद्धान्त का समर्थन करते हैं अपितु उन घटनाओं से जो उनने अपनी पुस्तक सहयोग और संघर्ष में संकलित की है, पढ़ कर मानव मन को जीव मात्र के प्रति उदारता की, सहयोग की, सहायता की प्रेरणा मिलती है।
ऐसे उदाहरण स्थान−स्थान पर, प्रत्येक जीव की सृष्टि में देखने को मिलते हैं−जिनसे पता चलता है यह संसार परस्पर विश्वास, आत्मीयता, सहयोग तथा जियो और जीने दो के सिद्धान्त का पालन करता है। सामूहिकता की भावना चीतलों में बहुत अधिक पाई जाती है। देहरादून के समीप बने कार्बेट नेशनल पार्क में देखा गया है कि कई बार गांवों से चरने आये जानवरों में भी वे अपनी इसी भावना के साथ घुल मिल जाते हैं और साथ−साथ चरने लगते हैं।
चीतलों और बन्दरों की दोस्ती भी दिलचस्पी होती है। गर्मियों के दिनों में जब जंगल में तरह के फल लगते हैं यह मैत्री अत्यन्त प्रगाढ़ हो जाती है। मित्रता प्रायः चीतल ही करते हैं। उसका कारण यह है कि यह बन्दर पेड़ों पर चढ़ जाते हैं, चीतल चढ़ नहीं पाते। बन्दर उनके लिये ऊपर से फल गिराते हैं जिन्हें मित्र चीतल मण्डली प्रेमपूर्वक खाती है। बन्दर चीतल समुदाय की दोस्ती ठुकरा सकते हैं किन्तु वे इस बात को नहीं भूलते कि एक ही जंगल में रहने के नाते वे भी उनके भाई और सहयोग के पात्र हैं।
राजगीध आकाश में एक सांकेतिक गति से उड़ान भर कर दूर−दूर तक के अपने साथियों को मृतक जीव की दावत का संकेत देते हैं। थोड़ी ही देर में सैकड़ों गिद्ध एकत्र हो जाते हैं किन्तु भोज की शुरुआत वही गीध करता है जो अन्यों को आमन्त्रित करता है। यही नहीं मृतक जीव के शरीर का कोमल भाग उसे ही खाने को मिलता है शेष शरीर के अन्य अंगों के मांस पर सन्तोष करते हैं।
पारिवारिक भावना शेरों में भी होती है साथ ही अनुशासन की प्रवृत्ति भी। अक्सर हठ या चंचलता व्यक्त करने वाले बालक को शेरनी ही डपटती है, पर कई बार शेर भी दंगा करने वाले की पिटाई कर देता है। बन्दरिया अपने बच्चे की ताड़ना हलकी चिकोटी काट कर करती है। अनुशासन के नाम पर दण्ड दिया जाना अमानवीय कृत्य नहीं वरन् वह तो आवश्यकता है और उससे भी प्रकारान्तर से अन्यों के प्रति भलाई की ही भावना का पोषण होता है।
किसी समय भारतीय परिवार सम्मिलित कुटुम्ब प्रणाली के लिये विश्व विख्यात थे किन्तु आज यह परम्परा धीरे-धीरे नष्ट हो चली। आधुनिक सभ्यता के नाम पर नव दंपत्ति न केवल अलग पसन्द करते हैं अपितु वे परिवार के बुजुर्गों यहाँ तक कि अपने माता पिता को भी अनुपयोगी कहकर उनसे घृणा करने लगे है। किन्तु यह वृद्ध कितने उपयोग होते हैं इसका पता नव गृहिणी के प्रसव आदि के समय चलता है जब कि दादी−मातायें ही उन्हें शिशु−पोषण के इस कठिन दायित्व से मुक्त रखती और बच्चों के पोषण जैसे दुस्तर कार्य को वे खुशी−खुशी, भावनापूर्वक मेहतरानी की तरह करती हुई भी प्रसन्न और प्रफुल्ल रहती हैं वे कितना बड़ा बोझ उठाती हैं यह सहज समझ में आने वाली बात है।
मनुष्य जाति इस प्रथा को भूलकर अमानवीय आचरण पर उतर रही है किन्तु अनेक जीव अब भी इस उपयोगी परम्परा को कायम किये हैं। सम्भवतः वे अन्त तक इस कार्य में निष्ठा बनाये रखेंगे। डाल्फिन जाति की मछलियों से चिरकाल से यह परम्परा चली आ रही है। डाल्फिन जब गर्भावस्था में होती है तब उसी जाति की कोई वृद्ध मादा बहू और नाती की सुरक्षा के लिये उन्हें अपनी पीठ पर तब तक चढ़ाये घूमती है जब तक शिशु जन्म न ले ले। शेरों में ऐसी प्रथा है कि दूसरी शेरनी प्रसूता की सहायता करती और उसके बालकों की देखभाल करती है कदाचित कभी शेरनी का निधन हो जाये तो वही पालिका उनकी माँ बन जाती है और उनका पालन विमाता की तरह नहीं सगी माता की तरह व्यवस्था और लाड़−प्यार से करती है किन्तु मनुष्यों में विमाता के प्रति सामान्य दृष्टि कितनी संकीर्ण है यह सभी जानते हैं सभी मामलों में यह भले ही न हो तो भी प्रायः वैसा ही होता है जैसी मान्यता बन गई है।
बोनीलिया मादा नर की अपेक्षा इतनी बड़ी होती है कि वर्षों तक जीव शास्त्री इन्हें दो जाति के जन्तु समझते रहे। मादा अपने स्तर को आजीवन अपने पेट की थैली में रखती है यहीं उसे आहार विश्राम आदि सभी कुछ मिलता रहता है। इस गुण के कारण ही वर्षों अध्ययन के बाद यह पता लगाया जा सका कि दोनों ही जन्तु एक ही जाति के नर व मादा हैं।
अपेक्षाकृत अपने से कृशकाय पति का भार आजीवन ढोने वाली बोनीलिया सहकारी जीवन का एक अनूठा उदाहरण है और इस बात की प्रेरणा कि संसार में मैत्री का आधार समान हित समान स्वार्थ साधक ही नहीं कष्ट सहकर भी दूसरों का कल्याण भावनात्मक आदान−प्रदान होना चाहिये उससे जीव में कहीं अधिक गति और रस आता है।
“लाइकेन” जीव−विज्ञान का एक ऐसा शब्द है जो प्रकृति सहजीवन का उद्घोष करता है। बरसात के दिनों में जहाँ-तहाँ उगने वाले कुकुरमुत्तों को तुलसीदास ने सुकृत की उपमा दी है। वास्तव में यह है भी ऐसा ही। देखने में तो यह लगता है कि कुकुरमुत्ता जिस पेड़ पर या पत्थर की चट्टान पर उगा है वही उसका आश्रय और पोषक है पर तथ्य इससे विपरित है इसके कोमल तने के अन्दर जल शैवाल नाम का कोष−समुदाय निवास करता है वह कुकुरमुत्ते के भीतर न केवल सुरक्षित बना रहता है अपितु कुकुरमुत्ते के इस उपकार का बदला वह उसे प्रकृति से जीवन तत्व खींचकर कुकुरमुत्ते को दे देता है जिससे उसका भी विकास होता रहता है। इसी तरह का सम्बन्ध घोंघे में रहने वाले कर्कट तथा सी एनीमोन के बीच पाया जाता है। कर्कट आजीवन इन्हें पीठ पर बैठाये घूमता रहता है। यह जीवन इस उपकार का बदला कर्कट की जीवन रक्षा में सहायता के रूप में करते हैं। कर्कट अनेक जल जीवों का प्रिय भोजन है किन्तु यह एनीमोन अपने शरीर से एक प्रकार का विषैला द्रव निकालते रहते हैं जिसके भय से आक्रामक जीव कर्कट से कोसों दूर भागते हैं।
जैसा कि नाम से जाना जा सकता है फ्रांस में पाया जाने वाला मेल मिड वाइफ टोड नामक मेंढक मादा को, बच्चे को सोने का कष्ट नहीं देता। यह अंडों को स्वयं अपनी टाँगों में तब तक चिपकाये रहता है जब तक उनसे बच्चे न निकल आयें इस तरह वह न केवल अपनी पारिवारिकता का परिचय देता है। अपितु आदर्श दाम्पत्य निष्ठा का भी। परस्पर एक दूसरे के प्रति इस तरह उदार और सहायक बने रहने से इस मेढ़क परिवार की तरह चाहें तो मनुष्य भी अपने पारिवारिक जीवन को आदर्श और आनन्दपूर्ण बनाये रख सकते हैं।
जिराफ और जेबरा की दोस्ती जीव जगत की एक अनोखी घटना है। जिराफ जेबरे को खाना खिलाता है जेबरा न केवल संकट के समय जिराफ को उसकी पूर्व जानकारी देता है अपितु उसकी प्राण देकर भी सहायता करता है।
पानी में तैरते दरियाई घोड़े की पीठ पर बैठी चिड़ियों से दोस्ती भी ऐसी है। चिड़िया उसकी पीठ पर बैठ कर केवल अपने लिये आहार प्राप्त करती है अपितु सैर का भी आनन्द लेती है। दरियाई घोड़े का भी उसमें अपना स्वार्थ है अपने शरीर और मुँह पर लगे अवांछनीय तत्वों की सफाई वह इन चिड़ियों से करा लेता है इस तरह उनकी यह मैत्री प्रगाढ़ रूप में चलती रहती है।
सहयोग का यह क्षेत्र जीव−जीव तक ही सीमित नहीं मनुष्य और जीव समुदाय परस्पर भी इस मैत्री और उदार सहकारिता के पुष्प फल लम्बे वर्षों से प्राप्त करते चले आ रहे हैं। तोते और मैनाओं के द्वारा चोरों से मालिक की सुरक्षा के दृश्य तो कभी−कभी देखने में आते हैं पर खाकी रंग की 5 इंच की छोटी सी चिड़िया हनी गाइड का उपकार तो मनुष्य के साथ वर्षों से जुड़ा है। हनीगाइड शहद ढूंढ़ने वालों के लिये गाइड का काम करती है वह जैसे ही किसी सहरिये (शहद निकालने वाले) को देखती है एक विशेष प्रकार की आवाज करती है उसे अपनी ओर आकर्षित करती है अब वह आदमी उसके पीछे−पीछे चलने लगता है। हनीगाइड इसी तरह चहचहाती एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष तक चलती हुई उसे उस स्थान तक पहुँचा देती है जहाँ शहद का छत्ता लगा होता है।
इसमें उसका अपना भी स्वार्थ है। मधु−छत्ते का मोम उसका विशेष प्रिय भोजन है। यह सहयोग वह इसी के लिये करती है किन्तु कदाचित सहरिये ने यह भूल को कि छत्ते का मोम उसे खाने के लिये नहीं छोड़ा तो फिर वह उसे जंगल में बहकाकर किसी ऐसे स्थान पर पहुँचा देगी जहाँ कोई खूंखार सर्प या भयानक जंगली जीव होगा। इस भय से मनुष्य को उसके साथ विश्वासघात की हिम्मत नहीं होती। आदमी स्वयं ढूंढ़े और हनीगाइड भी वहाँ पहुँच जाये पर मोम न मिले तो वह यह असहिष्णुता नहीं दिखायेगी वह विशुद्ध अपने परिश्रय का ही लाभ लेने की इच्छुक रहती है पर ऐसी परिस्थिति में भी वह व्यक्ति को पहचानने और भविष्य में उससे दोस्ती जोड़ने की दूरदर्शिता से भी चूकती नहीं।
हनीगाइड के शरीर में कोई ऐसा तत्व है जो मोम को पिघला देने में सक्षम है। वैज्ञानिक अभी तक उस तत्व की खोज नहीं कर पाये। जब ऐसी आशा बंधी है कि हनीगाइड सम्भव है। इस कठिनाई का निराकरण कर दे ऐसा हुआ तो ‘आर्टरियों स्कले रोसिस’ धमनियों के सख्त हो जाने जैसी असाध्य बीमारियाँ का निदान सम्भव हो जायेगा।
मनुष्य जीवन अपनी सभ्यता के आदि काल से ही जिन मनुष्येत्तर प्राणियों से उपकृत हुआ पारावत या कबूतर उनमें से एक है। मनुष्य के उपकार के लिये उसने अपार संकट सहे, कष्ट झेले पर उसकी सहिष्णुता और कर्त्तव्य−निष्ठा को रत्ती भर आँच नहीं आई। 1870-71 में जर्मनी ने फ्रांस में घेरा डाला उस समय पेरिस में कबूतरों की एक विधिवत सिगनल ब्रिगेड स्थापित की गई थी, संकट ग्रस्त और युद्ध पीड़ित क्षेत्रों में सन्देशवाहक का कार्य यह ब्रिगेट ही करती थी। कहना न होगा कि जर्मनी के पंजे से फ्रांस को मुक्ति दिलाने का श्रेय इन कपोतों को ही है। ग्रीक वासी कपोतों को लम्बे अर्सों तक अपने डाकियों के रूप में प्रयुक्त करते रहे। भारत के उपनिवेशों में सन्देश भेजने, पाने का कार्य पुर्तगाली शासक इन कबूतरों से ही कराते थे।
इतिहास प्रसिद्ध घटना है कि ग्रीक के राजकुमार एंड्रोक्लीस ने एक बार एक शेर के बच्चे के पाँवों से काँटा निकाला था। कुछ दिन बाद शेर बड़ा होकर राजकीय चिड़ियाघर में आ गया इस बीच एंड्रोक्लीस को किसी अपराध में सजा दी गई। उसे मृत्यु दण्ड के बतौर उसी शेर के पिंजड़े में फेंका गया किन्तु खूँखार शेर ने राजकुमार के शरीर की सुगन्ध से अपने उपकारी को पहचान लिया, कृतज्ञता उमड़ पड़ी। चाटने लगा जैसे बहुत दिनों बाद कोई बिछड़ा बालक अपनी माँ से मिला हो। खूँखार जानवरों में भी जब इस तरह की प्रवृत्ति के दर्शन होते हैं तो मानने के लिये विवश होना पड़ता है कि जीवन की गहराइयाँ जिन तत्वों से बनी है वे मूलतः भाव−संवेदनाएं हैं। मैत्री, प्रेम, दया, करुणा और उदारता हर किसी को प्रिय है भले ही भौतिक दृष्टि से उसका कुछ भी मूल्यांकन क्यों न किया गया हो।
प्रेम, दया, करुणा, उदारता और सहअस्तित्व की तरह प्राणियों में ईर्ष्या की भावना भी कम नहीं पाई जाती किन्तु वह विशुद्ध स्पर्धा के रूप में कई बार तो उनमें यह स्पर्धा भी अत्यन्त सिद्धान्तपूर्ण होती है। लोडस्टर (एक प्रकार की मछली) जाति की मादा के शरीर पर एक प्रकार का कड़ा आवरण चढ़ा होता है। गर्म धारण से पूर्व वह अपना वह खोल उतार फेंकती है। उसे इस स्थिति में पाकर मादा में ईर्ष्या से जलभुन उठती है। यह तथ्य इस बात से सिद्ध होता है कि उस पर केवल मादायें ही चारों तरफ से आक्रमण कर देती हैं कोई भी नर ऐसा नहीं करता।
जीवों में प्रतिस्पर्धा सिद्धान्त रूप में ही होती है वे न तो जन्मजात बैर बांधते हैं न देर तक उस गैर को मन में रखते हैं एक शेर दूसरे को चित्त कर दे बस उनका फैसला अन्तिम हो गया फिर लड़ाई समाप्त और सन्धि का रास्ता साफ है।
शेर अपने लिये एक क्षेत्र नियत करके रखते हैं और एक−दूसरे की सीमा का अतिक्रमण नहीं करते यदि एक शेर किसी नये स्थान पर जाये और उसे यह ज्ञात हो जाये कि यहाँ का साम्राज्य किसी और का है तो वह बिना कोई अपमान अनुभव किये उस क्षेत्र को तुरन्त छोड़ देता है। शेर अपने क्षेत्र की पहचान वृक्षों पर लगाये गये नाखून के निशानों से तथा एक विशेष प्रकार की गन्ध से करते हैं। स्थान−स्थान पर पेशाब करके उसकी गन्ध से भी शेर अपनी सीमा निर्धारित करते पाये गये हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि प्रवासी शेर पंजों के निशान की ऊंचाई से पूर्व निवासी शेर की शक्ति का अनुमान करते हैं और यदि उन्हें यह ज्ञात हो जाये कि अधिष्ठित दुर्बल श्रेणी का है तो वह भिड़ने के लिये भी तैयार हो जाता है, पर ऐसा बहुधा नहीं होता।
बहुत बुरी तरह ही भूखा न हो तो शेर प्रायः अकेले शिकार खाना पसन्द नहीं करते। शिकार के बाद शेर एक विशेष प्रकार की आवाज से समीपवर्ती जंगल के शेर−शेरनियों को दावत में सम्मिलित होने के लिये आमन्त्रित करता है। प्रत्युत्तर में दूसरा शेर स्वीकृति के स्वर में उसी की तरह की आवाज करता है। आमंत्रित शेर को तब वहाँ तक पहुँचने में कुछ समय भी लगे पर भोज उनके एकत्र हो जाने के बाद ही प्रारम्भ होता है। इस दावत में बच्चों को पूर्ण अनुशासित रहना पड़ता है। यदि वे कुछ चंचलता या ढिठाई करें तो उन्हें शेरनी की ताड़ना का भी सामना करना पड़ता है। शेर एकाकी रहने वाला जीव है पर उसकी सामूहिकता और पारिवारिकता भी प्रौढ़ किस्म की है।
तुच्छ कहे जाने वाले इन जीवों की जीवन दृष्टि बड़ी व्यापक बड़ी उदार होती है उसे देखकर ही प्रिन्स क्रोपाटकिन ने लिखा है−हमारा जीवन के प्रति मोह इस कारण से है कि उसमें आत्मा को आह्लाद प्रदान करने वाले तत्व अधिक है। तभी वह जीवन के लिये संघर्ष करता है यदि उपयोगितावाद हो प्रकृति का सत्य रहा होता तो फिर इस सृष्टि में रहना कौन पसन्द करता है।
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उपयोगिता की अभिवृद्धि ही प्रगति है। जो अपनी अपने साधनों की उपयोगिता बढ़ाने में संलग्न है वह प्रगतिशील है। अस्तित्व तो सभी का सामान्य है। उसका सामान्य पक्ष ही सहज सम्पर्क में आता है। जो महान है वह छिपा रहता है। उसे प्रयत्नपूर्वक ढूँढ़ना पड़ता है। धातु खदानें ढूँढ़नी पड़ती हैं, फिर उपलब्ध पदार्थ का परिशोधन करना होता है तब उपयोगी वस्तु हाथ लगती है। ढूँढ़ खोज न की जाय तो पैरों तले की जमीन में ही सोने की खदान का अस्तित्व रहने पर भी कुछ पता न चलेगा और उस भूमि पर पीढ़ियों से रहने वाला व्यक्ति दरिद्र ही बना रहेगा। ढूँढ़ने के बाद खुदाई के लिए गहरे उतरने, साधन जुटाने और कठोर श्रम करने की आवश्यकता होती है। कच्चे माल की भट्टियों में डालकर धातु से मिट्टी छुड़ानी पड़ती है। तब कही शुद्ध धातु के उपकरण, औजार बनते हैं। अपने व्यक्तित्व को उपयोगी बनाने के लिए लगभग इसी स्तर के प्रयास करने पड़ते हैं। इन्हें ही जीवन साधन कहते हैं।
अपना व्यक्तित्व सामान्यतया उतना ही दीख पड़ता है जितना कि खाने कमाने के काम आता है। यह उसका बहुत छोटा अंश है। इसकी क्षमता इतनी ही है कि उससे जीवन यात्रा की गाड़ी घिसटती चले। धान की तरह उगने और कटने में ही जिन्दगी समाप्त हो जाती है। पेट और प्रजनन की पूर्ति ही मानव−जीवन का लक्ष्य नहीं है। इतना तो कृमि−कीटक भी कुशलतापूर्वक कर लेते हैं। अन्तराल की गहराई में घुसा जाय− परिष्कृत दृष्टिकोण के वरमे से उसे खोदा जाय−तो पता चलेगा कि इसी भूमि में यह सब कुछ विद्यमान है जिसे जीवन सम्पदा का सार तत्व कहा जा सकता है और विश्व वसुधा का सारभूत वैभव।
हम अपनी उपयोगिता बढ़ाये। अपने लिए उपयोगी बनें−साथ ही परमात्मा एवं विश्व की समष्टि आत्मा के लिए भी। अनुपयोगी किसी के लिए भी न रहे। जो अपने लिए उपयोगी होता है। वह दूसरों के लिए भी उपयोगी हो सकता है। दूसरों की सेवा सहायता करने के लिए आवश्यक है कि हम अपने लिए अपने आपको उपयोगी बनायें।
उपयोगिता को घटाने में सबसे बड़ी बाधा अपनी ही बुरी आदतों की है जो सोचने और करने के दोनों ही यन्त्रों पर अपना आधिपत्य जमाये बैठी हैं। इन मलीनताओं को धो डालें तो अन्तर की पवित्रता स्वतः निखर पड़ेगी। दूसरों का तिरस्कार करके अपना मान बढ़ाना दूसरों का शोषण करके अपना वैभव बढ़ाना−उस मृगतृष्णा की तरह है जो देखने में सच मालूम पड़ते हुए वस्तुतः नितान्त मिथ्या होती है। भलाई और बुराई का ऐसा वर्गीकरण नहीं हो सकता जो अपने लिए एक तरह का और दूसरों के लिए दूसरी तरह का परिणाम उत्पन्न करे। आग औरों के लिए गरम और अपने लिए ठण्डी सिद्ध, हो ऐसा हो ही नहीं सकता। दूसरों के लिए अनुपयोगी सिद्ध होने वाला व्यक्ति अपने लिए भी घाटे का ही निमित्त बनता है। अपने लिए लाभदायक केवल वे ही व्यक्ति सिद्ध होते हैं जिन्हें दूसरों के लिए लाभदायक अनुभव किया जा सके। औरों को सुखी बनाये बिना कोई सुखी नहीं हो सकता। पेड़ लगाने पर औरों की तरह अपने को भी उसकी छाया में बैठने का अवसर मिलता है। औरों के लिए कुआँ जलाशय बनाने वाले उससे अपनी भी प्यास बुझाते हैं। इसी प्रकार स्वयं को मद्यपान का अभ्यासी बनाकर अपने शरीर, मन और धन की ही बर्बादी नहीं होती, पर सम्पर्क में आने वाले दूसरे लोग भी प्रकारान्तर से उसी बुरी आदत से हानि उठाते हैं। निन्दा का भाजन तो उन्हें भी होना पड़ता है । बुराई और भलाई की गतिविधियाँ अपने को और दूसरों को समान रूप से प्रभावित करती हैं।
बुराई छोड़ने वालों में से प्रत्येक को यह संकल्प करना पड़ता है कि जो की जा चुकी उन्हें फिर नहीं दुहरायेंगे और जिनके खतरे जानते हैं उन्हें करेंगे नहीं। इस प्रकार अभ्यस्त और अनभ्यस्त दोनों ही प्रकार के पातकों से छुटकारा मिल सकता है। स्वभावतः आत्मा पातकी नहीं है। पशु प्रवृत्तियाँ तो विजातीय है। उनसे छुटकारा कठिन लगता भर है, वस्तुतः उनका निराकरण अति सरल है। सच्चे मन से उन्हें अस्वीकृत कर देने, रिश्ता तोड़ देने, प्रश्रय न देने भर का निश्चय कर लेने से वे अनायास ही पल्ला छोड़कर चली जाती है। अन्धकार अवास्तविक है और प्रकाश शाश्वत। एक माचिस भर जलाने से पूरे कमरे में प्रकाश भर जाता है। सत्संकल्प का उदय होने पर छाये हुए कल्मषों की जड़ कट जाती है और वे सूखे ठूँठ भर रह जाते हैं।
विवेक बुद्धि का अनादर करने से अनेक प्रकार के विग्रह उत्पन्न होते हैं। यदि दूरदर्शिता अपनाई जा सके और औचित्य को ही मान्यता देने का निश्चय किया जा सके तो इतने भर से व्यक्तित्व पर छाई हुई अनेक मलीनताएँ घटना और मिटना आरम्भ कर देती हैं। पवित्रता, शान्ति स्वच्छता और उदार आत्मीयता का दृष्टिकोण यदि बना रहे तो उन अवांछनीयताओं में से एक भी टिक नहीं सकेंगी, जिनके कारण जीवन बोझिल मलीन और अनुपयोगी बना रहता है।
अपनी मूल पवित्रता की रक्षा करते हुए ही हम अपने और दूसरों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं आत्मीयता का विस्तार करने से सहज ही सद्व्यवहार और सहयोग की प्रतिक्रिया वापिस लौट आती है। दूसरों को हानि पहुँचाकर अपना लाभ लेने की कुटिलता अपनाते ही मनुष्य सबके लिए अनुपयोगी बन जाता है भले ही वह प्रत्यक्षतः किसी का कोई बड़ा अहित न कर सके।
दूसरे लोग ही पीछे धकेलते हैं−चिढ़ते ईर्ष्या करते या गिरते हैं ऐसा सोचना व्यर्थ है। वस्तुतः हर व्यक्ति स्वयं आगे बढ़ने में प्रयत्नशील है। किसी समझदार को इतनी फुरसत नहीं होती कि वह दूसरों को गिराने में अपने समय या श्रम की बर्बादी करे। ऐसे कुछ ही लोग होते हैं जो अपनी उन्नति का राजमार्ग छोड़कर दूसरों को गिराने का ताना−बाना बुनते हैं। ऐसे ओछे लोग वस्तुतः इस योग्य ही नहीं हो पाते कि किसी की कुछ हानि कर सके, वे मात्र करते रहते हैं। भोले व्यक्ति न अपना न किसी अन्य का कुछ हित साधन कर सकते और न किसी को कोई बड़ी हानि पहुँचाने की ही उनमें क्षमता होती है। ऐसी दशा में उनकी सूची तैयार करना व्यर्थ है, जिनके बारे में पीछे धकेलने का आरोप लगाया जाता है। सतर्कता बुरी बात नहीं है। आशंकाओं की छान−बीन करनी चाहिए और उनसे निपटने की तैयारी रखनी चाहिए, पर यह गौण प्रश्न है। मूल बात यह है कि हम अपनी प्रगति की तैयारी करें और उसी तेजी को अपनाएँ जिसे प्रगतिशील लोग अपनाते रहे हैं।
दो मोटरें साथ−साथ छोड़ें एक आगे निकल जाय तो अपने पीछे रहने के सम्बन्ध में यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि आगे निकलने वाली ने हमें पीछे धकेल दिया वरन् यह समझना चाहिए कि हमारी अपेक्षा दूसरी ने अधिक तेजी अपनाई और आगे निकल गई। अपने पीछे रह जाने में साथियों का असहयोग या अवरोध भी एक कारण किसी सीमा तक हो सकता है, पर मूल बात दूसरी ही होती है। अपनी प्रगतिशीलता धीमी पड़ने पर ही प्रायः पिछड़ जाने की स्थिति बनती है। उपयोगिता बनाये रहने के लिए चौकस रहा जाय तो कहीं से भी उपेक्षा अवज्ञा न होगी। यदि होती है तो एक स्थान की अपेक्षा दूसरे स्थान पर और भी बड़ा और महत्वपूर्ण काम सामने आ सकता है। दूसरों से धकेले जाने की शिकायत आमतौर से वे लोग करते हैं जो अपनी क्षमता एवं उपयोगिता घटा लेते हैं। पीछे धकेले जाने वालों में यही कमजोरी सर्व प्रमुख है। यदि हम अपनी सतर्कता सक्षमता , तत्परता, अक्षुण्ण रख सकें तो किसी को पीछे धकेलने का साहस ही न होगा, यदि होगा तो उससे किसी प्रकार की क्षति पहुँचने की आशंका न रहेगी।
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रात आती है तो आकाश में अरबों जगमगाते तारागणों, आकाश गंगाओं और नीहारिकाओं से ऐसे जगमगा उठता है मानो किसी बहुत बड़े राजकुमार की बारात निकल रही हो। टिमटिमाते हुए तारागण चिरकाल से मानव मन में यह जिज्ञासा जगाते रहे कि क्या इस ब्रह्माण्ड में हम अकेले ही है या फिर पृथ्वी की तरह अन्यत्र भी जीवन और विकसित सभ्यता की सम्भावना है
इस प्रश्न के सुलझ जाने से और कोई लाभ हो या नहीं पर एक बात निश्चित है, तब मानवीय दृष्टिकोण और चिन्तन स्वार्थ−संकीर्णता की अँधेरी गुफा में ही कैद नहीं रह सकेगा। संसार के यथार्थ को समझने में कोई बहुत बड़ी बाधायें नहीं है। विराट् के साथ तादात्म्य की अनुभूति की सारी सम्भावनायें मानव−मन में विद्यमान है, पर जब उसे अन्तः प्रक्रिया पर दृष्टिपात का अवसर मिले तब न? उसने तो माया−मोह के भ्रम जाल में, मेरे तेरे की संकीर्णता, काम क्रोध की कुत्सा और इन्द्रिय सुखों की ललक इस चार दीवारी में ही अपने को उस तरह बन्दी बना लिया है जिस तरह पिंजड़े में कैद शुक पिंजड़े के द्वार खोल देने पर भी उन्मुक्ति को कपोल कल्पना मान लेता है ओर फिर−फिर पिंजड़े में कैद हो जाता है। दृष्टिकोण विशाल बने तो ही सम्भव है कि जीवन के उच्च रहस्य हमारे सामने अभिव्यक्त हो और हम उच्च−आदर्शों और कर्तृत्व में आरूढ़ हों।
इन दूरबीनों के माध्यम से देखे गये सुदूर नक्षत्रों पर अपने विचार व्यक्त करते हुए सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो॰ डॉ॰ बिल्ली ने स्पष्ट किया है कि ब्रह्माण्ड में 180000000 ग्रह ऐसे हैं जहाँ किसी न किसी रूप में जीवन अवश्यम्भावी है। 18 हजार ऐसे है जिनमें मनुष्य की तरह के विचारशील प्राणी तथा न्यूनतम 180 तो ऐसे है जो पंचभौतिक तत्वों की अत्यन्त सूक्ष्मतम जानकारियों से ओत−प्रोत है। हमारे उपनिषद् और पुराण इन तथ्यों का विधिवत समर्थन करते हैं।
इस कल्पना को हवाई उड़ान नहीं कह सकते। एक समय के वैज्ञानिक पूर्वानुमान (यूरोपिया) आज सच हो रहे हैं तो यह आधार नितान्त कल्पनायें हों ऐसा नहीं कहा जा सकता। पृथ्वी का आविर्भाव 4000000000 वर्ष पूर्व का माना जाता है और आदमी की तरह के जीव का जन्म 10 लाख वर्ष पूर्व माना जाता है। देखने में यह अवधि बहुत लम्बी लगती है किन्तु यदि ब्रह्माण्ड के साथ उसकी तुलना करें तो यह मात्र कल की घटना लगेगी।
बायोकेमिस्ट डॉ॰ एस मिलर ने प्रकाश स्रोतों की रासायनिक संरचना के विश्लेषण के बाद यह बताया है कि ऐसे समुन्नत और जीवधारी ग्रहों की संख्या 1 लाख से किसी भी स्थिति में कम नहीं होनी चाहिए। अन्य वैज्ञानिक गवेषणाओं से 1.2 मिलियन अर्थात् 12 लाख तारों में जीवधारियों की उपस्थिति के पुष्ट प्रमाण मिले हैं। उनकी शारीरिक बनावट, अंग सज्जा, शारीरिक रसायन, स्वभाव, खान−पान, रहन−सहन भिन्न प्रकार के हो सकते हैं किन्तु जीवधारी होने का अर्थ उनमें विचार, ज्ञान, अनुभूति, भावनाओं, सम्वेदनाओं वाला अंश वही होगा जो जीवन के लक्षण के रूप में अपनी धरती में विद्यमान है। यह तथ्य जीवन की सार्वभौमिकता के सिद्धान्त की भी पुष्टि करते हैं और विस्फोटक से ब्रह्माण्ड विकास की तरह वे एक तत्व से सब जग ‘निर्मया’ सिद्धान्त से भी इनकार नहीं करते।
ऑक्सीजन के बिना जीवन नहीं रहता । अब तक लोगों की यह मान्यता थी पानी न मिले तो अधिक से अधिक 2−4−10 दिन काटे जा सकते हैं किन्तु हवा न मिलने पर तो एक क्षण भी जीवित रहना असम्भव है−यह बात अब गये जमाने की बात हो गई। अभी एक ऐसे एनोरोबिक जीवाणु का पता चला है जिसे ऑक्सीजन जहर की तरह लगती है। ऑक्सीजन जहाँ न हो वह ऐसे ही मनुष्य के लिये विषाक्त वातावरण में जन्म लेता और परिपुष्ट होता रहता है। उसने अपनी एक न्यारी दुनिया बनाई हुई है जहाँ न कोई और जा सकता है और न वह स्वयं भी दूसरी जगह जाता है। “खग जाने जग ही की भाषा, ताते उमा गुप्त करि राखा” वाली कहावत है एक दूसरे के भेद का पता न लगे इसीलिये विधाता ने संसार को एक दूसरे से छिपाकर बनाया है अन्यत्र जीवन न होने की कल्पना सम्भवतः इसी कारण उठती है कि लोग अपनी भाषा से अतिरिक्त किसी और की पूर्णता पर विश्वास ही न रखते हों। इस संकीर्ण दृष्टिकोण के बिना तो हम अपने पड़ोसी से भी अनभिज्ञ बने रहते हैं विराट् सृष्टि के बारे में तो कहना ही क्या?
अभी−अभी संसार के उच्च श्रेणी के वैज्ञानिकों के दो प्रयोगों ने यह सिद्ध कर दिया है कि पृथ्वी से भिन्नतर परिस्थितियों, वातावरण, जलवायु, भू-गुरुत्वाकर्षण, विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र और अणु विकरण वाले क्षेत्रों में भी जीवन रह सकता है। बिस्टल यूनिवर्सिटी के नक्षत्रविद डॉ॰ हिटेन व डॉ॰ ब्लम ने कुछ गिनी पैग को 100 से॰ ग्रे॰ पर सुखाया (स्वाभाविक है कि उनकी मृत्यु हो गई) फिर उन्हें हीलियम द्रव में डाला गया जिसका शून्य डिग्री से भी नीचे, तापमान होता है। फिर उस पर तेज विकिरण डाला गया। वह स्वयं भी यह देखकर आश्चर्य चकित रह गये कि उन गिनीपिगों में फिर से जीवन आ गया। उनका शरीर ठीक काम करने लगा उन्होंने बच्चे भी दिये जो पूर्ण स्वस्थ थे। यह तथ्य इस बात के प्रमाण हैं कि जीवन कठोर ग्रीष्म और भयंकर शीत में भी रह सकता है। ज्वालामुखी क्षेत्रों में तो ऐसे जीवाणु (बैक्टीरिया) पाये जाते हैं जो पत्थर खाते और मल के रूप में लोहा बनाते हैं।
डॉ॰ सीगेन ने तो अपनी प्रयोगशाला में वृहस्पति का वातावरण तैयार कर उसमें बैक्टीरिया और माइट्स को उत्पन्न भी कर दिखाया (वृहस्पति अमोनिया मीथेन और हाइड्रोजन का क्षेत्र है) इस वातावरण में यह जीव नष्ट नहीं हुये, तब फिर यह नहीं कहा जा सकता कि चन्द्रमा के अति शीतल और बुध के उस भाग में जो आजीवन सूर्य की ओर उन्मुख है उस महा ग्रीष्म में जीवन नहीं हो सकता, यह तथ्य उस मान्यता को ध्वस्त कर डालते हैं।
कुछ भी हो ब्रह्माण्ड में जीवन की दृष्टि से पृथ्वी का एकाधिकार नहीं हो सकता है। इसकी तरह के अरबों नक्षत्र हवा में तैर रहे हैं उनमें लाखों जीवधारियों की विकसित और समुन्नत बस्तियां होगी न जाने कब मनुष्य उन्हें देख पायेगा, वहाँ तक जा भी पायेगा?
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प्रियजनों के सुख−दुःख में सम्मिलित होना−सम्वेदना सहानुभूति रखना मित्र धर्म का आवश्यक कर्त्तव्य है। यह आत्मीयता का क्षेत्र जितना विस्तृत हो उतना ही उत्तम है, पर जो परस्पर घनिष्ठ हैं उनके प्रति भावनात्मक सद्भावना एवं क्रियात्मक सहयोग का बरतना तो आवश्यक कर्त्तव्य हो जाता है। लोक व्यवहार इसी आधार पर चलता है। ऊँची स्थिति में तो यही आत्म विस्तार आत्मिक प्रगति का माध्यम ही बन जाता है। परिवार और समाज की सुदृढ़ता इसी आदान−प्रदान के आधार पर पनपती है।
मात्र साथ−साथ रहने से कोई प्रियजन− प्रेमास्पद नहीं बनता। जिनके बीच सुख−दुःख की जितनी सम्वेदना होती है और सहयोग का जितना उत्साह रहता है, वे उतने ही घनिष्ठ बनते जाते हैं। जीवधारियों के बीच पनपने वाली यह आत्मीयता ही ऐसी सुखद सम्वेदना उत्पन्न करती है, जिसे संसार का सबसे बड़ा आनन्द कहा गया है। प्रेम ही परमेश्वर है की उक्ति से यही तथ्य उभरता है कि भावनात्मक दिव्य अनुभूतियाँ सघन आत्मीयता के आधार पर पनपती हैं और उन्हीं से जीवन में सरलता उत्पन्न होती हैं। एक बाड़े में तो कितनी ही भेड़ें भी रहती हैं−एक जेल में कितने ही कैदी बन्द होते हैं−रेल के डिब्बों और धर्मशालाओं में एक साथ कितने ही व्यक्ति घिचपिच बैठे रहते हैं, पर इस निकटता के बीच सघनता कहाँ होती है? ऐसी दशा में उनका साथ रहना भी अखरता है। हर मुसाफिर चाहता है कि जितनी भीड़ कम हो उतनी ही फैलने फूटने की सुविधा मिले।
प्रियजनों के बीच जो स्नेह सम्मान भरा सद्भाव होता है और जो सहयोग के रूप में विकसित होकर सर्वतोमुखी प्रगति बनता है−उसी को मित्रता अथवा प्रेम कहना चाहिए। देखना है कि हम अपनी आत्मीयता को सार्थक बनाने के लिए सम्पर्क क्षेत्र के प्रियजनों के साथ सुख−दुःख की सम्वेदनाओं का आदान−प्रदान करते हैं या नहीं? यदि नहीं तो उस भूल का परिमार्जन तत्काल करना चाहिए, अन्यथा उस सम्पर्क का मूल्य उतना ही बाजारू बन जायगा जितना कि ग्राहक और दुकानदार के बीच उथले स्तर पर पनपता और विलुप्त होता रहता है।
स्वजनों के साथ सद्भाव सहयोग के आदान प्रदान का स्तर ऊँचा उठाने का शुभारम्भ यदि अधिकतम घनिष्ठों से करें तो यह अधिक मुक्ति युक्त होगा और प्रभावी भी।
सबसे निकटवर्ती, सबसे घनिष्ठ और सदा सर्वदा साथ रहने वाला अपना प्रियजन है शरीर । ऊपरी दृष्टि से हमारे साथ वह गहरी मित्रता निवाहता है और जीवन धारण करने में सर्वोपरि भूमिका निवाहता है। स्वामि भक्त इतना कि पल्ला पकड़ने के दिन से वियोग की अन्तिम घड़ी तक साथ देगा और अनवरत श्रम करेगा। ‘अहर्निशि सेवामहे’ का सूत्र साइन बोर्डों पर लिखा तो अनेक जगह देखा गया है, पर उसे सच्चे मन से सार्थक करने में निरत रहने वाला सेवक तो शरीर ही है। जो कुछ पाया कमाया गया है उसका अधिकांश श्रेय इस काया को ही है। जितनी गहराई में उतरने जाया जाय−प्रियजनों के समूह में सबसे अधिक उपकारी−सहयोगी और घनिष्ठतम साथी यह शरीर ही है। अब तक की इसकी सेवाएँ इतनी हैं, जिन्हें तोलने पर लगता है संसार के अन्य सभी के मिले−जुले उपकारों से भी इसके उपकार कहीं अधिक भारी है। ऐसे प्रियजन के लिए हमारे रोम−रोम में कृतज्ञता भरी रहनी चाहिए। भले ही उसे वाणी से व्यक्त न करें।
इस प्रिय पात्र के अनुदानों के बदले में अपने भी कुछ प्रतिदान है ही। उसकी सरसता और सुविधा आहार, निद्रा की सुविधा सुरक्षा की आमोद−प्रमोद की सुविधा जुटाने में−दुर्बलता और रुग्णता हटाने में भरसक प्रयत्न किया गया है। यह दूसरी बात है कि इस हित साधन में दूरदर्शिता का अभाव रहने से पाले हुए बन्दर द्वारा मालिक की मक्खी मारने के लिए तलवार चलाकर चोट पहुँचाने की कहानी की तरह परिणाम उलटा ही निकला है। शरीर से हम लाभ तो कई प्रकार के उठाते हैं, पर उसके प्रति कर्त्तव्य पालन में प्रायः उपेक्षा ही बरतते रहते हैं। यदि ऐसा ही कुछ चलता रहा हो, तो उस भूल के परिमार्जन का आज का दिन ही सबसे अच्छा मुहूर्त माना जाय।
जिस प्रकार साथी सहयोगी से दुःख दर्द की बात पूछी जाती है, उसी प्रकार अपने अभिन्न मित्र शरीर से भी पूछी जानी चाहिए कि उसे व्यथा ग्रसित तो नहीं रहना पड़ रहा है। दुर्बलता का शिकार तो नहीं रहना पड़ रहा है। बुरी आदतों को रेती से अपनी गरदन अपनी ही रेती से तो नहीं रेती जा रही है? इन प्रश्नों का उत्तर काया के अवयव वाणी या लेखनी से तो व्यक्त नहीं कर सकते, अपनी स्थिति सामने रखकर यह विदित तो भली प्रकार करा सकते हैं कि उन्हें किन परिस्थितियों में गुजारा करना पड़ रहा है।
दर्पण लेकर चेहरे का निरीक्षण किया जा सकता है। त्वचा में लालिमा और चमक की कमी, आँखों के आसपास गड्डे, काले, निशान, पुतलियाँ में मुर्दनी, गालों पर झरियाँ, गरदन पर लटकती हुई खाल, दृष्टि की मन्दता, वालों का पकना, झड़ना, खोपड़ी पर जगने वाली फूसी, कानों से कम सुनाई देना, जुकाम, सिर भारी रहना, नींद की कमी जैसी शिकायतों में से कुछ को भी देखकर यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि काया के इस शीर्ष स्थान को उपयुक्त पोषण नहीं मिल पा रहा है। जितना मिलता है, उससे अधिक खर्च करना पड़ रहा है और स्थिति दिवालिये जैसी बनती जा रही है। स्मरण शक्ति की कमी, सूझ−बूझ का अभाव, संकोच छाया रहना और किसी महत्वपूर्ण प्रसंग से अपने को बचायें छिपाये रहना जैसे लक्षण भी इसी शिर शीर्ष की दयनीय दुर्बलता को प्रकट करते हैं।
शिर के बाद दूसरे नम्बर का विभाग है− धड़। इसमें हृदय, फेफड़े, जिगर, आमाशय, आँतें , गुर्दे जैसे महत्वपूर्ण अवयव सटे हुए हैं। इन सबसे पूछा जा सकता है कि आप लोग किस स्थिति में अपना निर्वाह कर रहे हैं। अन्य अवयव तो अधिक गहराई में हैं और उनको सही जानकारी कुरेद बीन के बाद ही लगती है, पर पाचन तन्त्र वह कुछ सहज ही बता देता है जो उसे आये दिन सहन करना पड़ता है। जो किया जाता है वह ठीक तरह नहीं पचता। आंतें मल विसर्जन ठीक तरह कर नहीं पाती। पेट भारी रहना, खुलकर भूख न लगना जैसी अभ्यस्त कठिनाइयाँ यों देखने में छोटी लगती हैं, पर घुन की तरह वे जीवनी शक्ति के भण्डार को खोखला करती जाती है। पाचन के अभाव में रस रक्त इतनी स्वल्प मात्रा में बनते हैं कि उतने भर से शरीर की आवश्यकता पूरी नहीं हो पाती और थकान छाई रहती है। पेट में पड़े हुए अपच आहार का सड़ना स्वाभाविक है। यह सड़न, अपान वायु, डकार, जम्हाई, मुँह में छाले, टोन्सिल आदि के रूप में देखे जाते हैं। यह सड़न गैस बन कर जोड़ों में दर्द, हृदय की धड़कन, शिर दर्द जैसी कठिनाइयां उत्पन्न करती है। अपच की सड़न विषाक्त गैस बनती है। रक्त के साथ, साँस के साथ समस्त शरीर में भ्रमण करती है और जहाँ कही अपने ठहरने के लिए स्थान पाती है वहीं डेरा डालकर बैठ जाती है। यही है विभिन्न नाम रूप वाली बीमारियों का प्रधान कारण। यदि भोजन ठीक तरह पचता रहे, सड़न उत्पन्न न हो तो शरीर के जर्जर बनाने वाले दर्द, दाह, सूजन, गठन, व्रण आदि चित्र−विचित्र रोगों की तरह उभरते रहते हैं। पोषण के अभाव में स्वास्थ्यघाती बाह्य आक्रमणों से जूझना कठिन पड़ता है और भीतर से उत्पन्न होने वाली विकृतियों को निकाल बाहर करना दुष्कर बन जाता है। इतने विवरण का एक शब्द में निचोड़ यह है कि अपच के कारण तीन चौथाई बीमारियों का त्रास सहना पड़ता है, दुर्बलता घेरे रहती है और अकाल मृत्यु का ग्रास बनना पड़ता है।
शरीर अपना परम स्नेही और घनिष्ठ स्वजन सम्बन्धी है। उसकी दयनीय स्थिति पर चिन्ता करना और दुःख होना उचित ही है। यदि इस दिशा में निष्ठुरता झूठी है। जन्म से लेकर मरण तक के साथी अहर्निशि सेवा संलग्न स्वामिभक्त सेवक के कष्टों को भी यदि चिन्ता न की जा सकी और उसे संकट से उबारने की आकांक्षा न उठी तो इसका अर्थ यही होगा कि अपेक्षाकृत दूर रहने वाले, कम सम्पर्क में रहने वाले कम उपयोगी, कम उपकारी स्वजनों के प्रति मित्र धर्म की गहराई तक पहुँच सकना किसी भी प्रकार सम्भव न हो सकेगा। बाहर से मोह के आवरण से ढका स्नेही होने का मुखौटा पहनकर किन्हीं को अपने प्रेमी होने का झूठा आश्वासन भले ही दिया जाता रहे।
अभ्यास में आने से तो हर बुरी स्थिति भी सह्य और स्वाभाविक लगने लगती है। ऐसी दशा में अपने शरीर की दुर्दशा पर भी यह मानकर सन्तोष किया जा सकता है कि वह दूसरे कितनों से ही अच्छी है, पर यह तो कोई तर्क नहीं हुआ। ऐसे तो चोर भी यह कह सकता है कि वह हत्यारा जितना क्रूर तो नहीं है। इस तर्क के आधार पर उसकी सज्जनता कहाँ सिद्ध हुई? यह कहने से वह सज्जनों की श्रेणी में कैसे गिना जा सकेगा?
तुलनात्मक अध्ययन से ही वस्तुस्थिति का पता चलता है। चलें देखें कि निरोग शरीर वालों की तुलना में हम कितनी गई−गुजरी स्थिति में है। खेलों के मैदान में गेंद के साथ−साथ उछलते हुए खिलाड़ी−बलिष्ठता की प्रतियोगिताओं में बाजी मारते हुए विजेता दैनिक काम−काज में फुर्तीली चिड़ियों की तरह फुदकते रहने वाले−कमल पुष्प की तरह खिले हुए चेहरे अपने इर्द−गिर्द ही अनेक देखे जा सकते हैं। देखना चाहिए कि इन्हें कौन−सी अतिरिक्त सुविधाएँ मिली हुई हैं, जिनके सहारे वे ऐसी सुदृढ़ सशक्त और सौन्दर्यवान काया का आनन्द ले सके और अपने पास क्या कमी है जिससे उनसे वंचित रहना पड़ा?
स्वस्थ और सुन्दर दीखने वाले लोगों से मिलकर उनके निजी जीवन क्रम की गहराई में उतर कर बहुत बारीकी से देखा गया, पर ऐसा कुछ हाथ न लगा जिससे यह समझा जाता कि इन लोगों ने अमुक साधनों को अतिरिक्त सौभाग्य के रूप में पाया और ऐसे अच्छे स्वास्थ्य के अधिकारी बने। अपने ऊपर कोई अतिरिक्त विपत्ति भी छाई हुई नहीं है जिसके दबाव से शरीर को इस गई गुजरी स्थिति में रहना पड़े। इतने पर भी यह असाधारण अन्तर क्यों दीखता है? अपने सम्पर्क क्षेत्र में अपने से भी गई−गुजरी स्थिति में रहने वालों में से ढेरों के स्वास्थ्य कही अच्छे है फिर इस अन्तर का कारण क्या होना चाहिए? यह खोजना ही पड़ेगा अन्यथा इस असन्तुलन की जड़ तक न पहुंचा जा सकेगा और यदि सुधार करना हो तो उसका उपाय भी समझ में न आयेगा। जबकि अपने परम स्नेही शरीर के दुःख में सम्मिलित होना उसकी दुर्बलता एवं रुग्णता को हटाने के लिए प्रयत्न करना अपना परम पवित्र मित्र धर्म है।
गुरु मच्छिन्द्रनाथ को एक बार सोने की ईंट दान में मिली तो उन्होंने उसे स्वीकार कर अपनी झोली में डाल लिया अपनी झोली को अब वे अधिक संभालकर रखने लगे। एक बार वे अपने शिष्य गोरखनाथ के साथ बीहड़ वन में होकर जा रहे थे। रास्ते में उन्होंने अपनी झोली शिष्य को दे दी व उसे संभालकर चलने को कहा− जैसे−जैसे जंगल गहन होता जाता था व संध्या होती जाती, मच्छिन्द्रनाथ चिन्तातुर होने लगे। शिष्य ने पूछा− “गुरुदेव आप किसी अज्ञात भय से व्याप्त दिख रहे हैं, कृपया अपने भय व चिन्ता का कोई कारण हो तो बतावें। मच्छिन्द्रनाथ ने कहा− बेटा अपने साथ सोने की ईंट है मुझे डर है कहीं कोई चोर डाकू उसे हमसे छीन न ले।
शिष्य गोरखनाथ ने गुरु को निश्चिन्त हो बताया “गुरुदेव मुझे भी झोली भारी लग रही थी, मैंने देखा सोने की उस ईंट के कारण ही व इतनी बोझिल थी सो मैंने उसे रास्ते में फेंक दिया है, मैं तो इस तरह हल्का हो ही गया हूँ अब कृपया आप भी भय मुक्त हो जायं।”
अपने शिष्य की यह उक्ति सुन मच्छिन्द्रनाथ मन ही मन लज्जित हुए व सोचने लगे− सच है अनावश्यक सम्पत्ति के बोझ से ही मनुष्य में भय व आसक्ति होती है।
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बचपन में कितनी ही क्षमताएँ नहीं होतीं, वे समयानुसार बढ़ती हैं। कोई चिन्ता नहीं करता कि बच्चों में प्रौढ़ों जितनी योग्यताएँ क्यों नहीं है। फिर इसी बात की चिन्ता क्यों की जाय कि बुढ़ापे में कितनी ही क्षमताएँ घट रही हैं। परिवर्तन ही जीवन है। परिवर्तन का पूर्वार्ध विकास है और उत्तरार्ध अवसाद। सूर्य दोपहर तक चढ़ता है फिर ढलने लगता है। इस पर किसी को न आश्चर्य होता है और न दुःख। सृष्टि का यह बुद्धिमत्तापूर्ण उपक्रम है कि वह वस्तुओं को एक सीमा तक विकसित करे और फिर मदारी की तरह अपने करतबों को सेट कर भानमती की पिटारी में बन्द कर ले। यह कौतूहल देखने योग्य है और रस लेने योग्य। बुढ़ापे के अवसाद को देखकर खिन्न होने की आवश्यकता नहीं है। बसन्त के नव−पल्लवों का उदय एक ढंग का सौन्दर्य है। पतझड़ में पीले पत्तों को भूमि पर गिरना ये भी उससे कम सुन्दर नहीं है। स्वर्ग से देवताओं द्वारा पुष्प बरसाये जाने के कथा प्रसंगों का प्रत्यक्ष दर्शन हम पतझड़ के पीत पत्रकों को भूमि पर गिरते हुए इन्हीं आँखों से कर सकते हैं। बसन्त के उल्लास की तरह हेमन्त का अवसाद भी क्यों न हमारे लिए आनन्ददायक हो। दुहरा आनन्द क्यों न लिया जाय। बसन्त को लाभ और हेमन्त को हानि बनाकर क्यों हम खाली हाथ रहें और पश्चाताप की उदासी सिर पर ओढ़े। उठती हुई आयु की किशोरावस्था की तरह ही ढलती आयु की वृद्धावस्था भी क्यों न हमारे लिए आनन्ददायक और उल्लास भरी हो। प्रातःकाल उठने की उमंगों की तरह की रात्रि की सुखद निद्रा की कल्पना भी हमें क्यों आनन्द विभोर न करे।
बचपन अपने हाथ से चला गया वह लौट नहीं सकता, फिर भी शैशव इस दुनिया में मौजूद ही रहता है। दूसरे अनेक बालकों में उसे किलकारियाँ लेते हुए आँखों के सामने विद्यमान देखा जा सकता है। यदि शैशव सुहाता हो तो उसे अपने पेड़ पर से उतरकर सामने के असंख्य पौधों पर सामने ही खड़ा देखकर आनन्द लिया जा सकता है। अपने हाथों कई कार्यों का शुभारम्भ करते हैं, आगे चलकर उन्हें दूसरे चलाने लगते हैं। इसमें प्रसन्नता होती है दुःख नहीं। कोई समझदार आरम्भकर्त्ता ऐसा नहीं सोचता कि इसे अन्त तक चलाते रहने का काम भी उसी को करना है। जीवन की प्रियताएँ अपने हाथों से खिसककर यदि दूसरों के द्वारा अपने आस्तित्व और विकास का परिचय दे रही है तो खोया क्या, गया क्या, जो प्रिय था वह सामने ही विद्यमान है, पर खेद किस कारण किया जाय?
प्रातःकाल का उदीयमान सूर्य सुहावना लगता है, पर सायंकाल को उसके ढलने की शोभा को भी यदि कला दृष्टि से निहारा जा सके तो उसकी शोभा भी कम नहीं होती। निस्सन्देह उदय और अस्त के दृश्यों में अन्तर रहता है। उस अन्तर में प्रकृति के परिवर्तन प्रयासों का कौतुक कौतूहल निहारा जा सकता है। फिर भी सौन्दर्य की मूल स्थिति में कोई अन्तर नहीं आता। जीवन और मरण दोनों ही परिस्थितियों में उत्साहवर्धक परिवर्तन है। माता की उदर दरी से निकलकर इस विशाल विश्व की भागीदारी का अवसर मिलना एक सौभाग्य है। शरीर के कोटर से निकलकर उन्मुक्त आकाश में उड़ने की क्षमता मिलने पर जब पक्षी शावक खेद नहीं मानते तो मरणोत्तर जीवन की विशालता हमारी कल्पना का सुखद आधार क्यों न बने? शरीर के पिंजड़े में बाधित रहने पर ऐसा क्या आनन्द मिलता है जो उन्मुक्त आकाश में विचरण करने की मरणोत्तर स्थिति में हमें नहीं मिल सकता। प्रगति का स्वागत क्यों न करें? हर पैर आगे बढ़ाते समय पिछला पैर अपनी जगह पर से छूटता ही है। जहाँ के तहाँ जमे रहने की बात पर यदि पैरों का आग्रह हो तो वे प्रगति पथ पर अग्रसर कैसे हो सकेंगे? सराय में डेरा डालकर कौन मुसाफिर बैठता है? आगे की योजनाएँ उसे बढ़ चलने के लिए प्रोत्साहित करती है। जीवन के प्रगति क्रम में वृद्धावस्था से लेकर मरण परिवर्तन को भी सम्मिलित रखा जा सके तो इसमें न तो कुछ अटपटा लगेगा और न खेदजनक। समुद्र की लहरें आगे ही आगे बढ़ती हैं। पीछे का तो छूट गया−अब का छूटने जा रहा है। इस प्रकार का खेद करने लगें, तो समुद्र की लहरें अपना प्रवास आनन्द ही गँवा बैठेंगी।
फिल्म देखने के लिए सिनेमा घर में प्रवेश करते समय उत्सुकता होती है और देखकर हाल से बाहर निकलते समय सन्तुष्टि। किसी दर्शक को सिनेमा हाल छोड़ने का दुःख नहीं होता। जीवन को सिनेमा घर समझा जा सके तो खेल समाप्त होने की घण्टी सुनकर सन्तोष की साँस ही ली जा सकेगी। सब कुछ गुम गया। यह सोच कर सिर धुनने की आवश्यकता क्यों पड़ेगी? विद्यालय में प्रवेश करने के दिन पट्टी पूजन का प्रसंग उत्साहवर्धक होता है, पर उत्तीर्ण करके प्रमाण पत्र लेकर विदाई के दिन भी कौन खेद मनाता है। वृद्धावस्था में मरण की निकटता समीप आ रही हो और उदासी छा रही हो तो उन बच्चों से कुछ सीखना चाहिए जो पढ़ाई पूरी करके विद्यालय छोड़ते समय तनिक भी निराश नहीं दिखाई पड़ते।
विकासोन्मुख जीवन क्रम में भूतकाल की स्मृतियाँ संजोये रहने और उन्हें महत्व देने की आवश्यकता नहीं पड़ती वरन् चिन्तन को−भावी निर्माण को−सुखद कल्पनाओं में नियोजित रखना पड़ता है। किशोर की दृष्टि में बचपन का अनगढ़पन चला जाना हानिकारक नहीं समझा जाता। प्रौढ़ावस्था आने पर किशोर काल की अनुभव हीनता समाप्त होने का दुःख नहीं मनाया जाता। वयोवृद्ध अपनी परिपक्वता पर गर्व करते हैं और प्रौढ़ों की अनुभवहीनता के लिए प्रताड़ना देते हैं। बच्चे किशोरावस्था की प्रतीक्षा करते हैं। किशोरों में प्रौढ़ावस्था की समर्थता पाने का उत्साह रहता है। फिर वृद्धों को आग की सुखद सम्भावनाएँ सोचने की अपेक्षा ऐसा क्यों समझना चाहिए कि जो सुखद था वह चला जा रहा है और दुःखद आ रहा है। निषेधात्मक चिन्तन ही भूत बनकर डराता है यदि विचारों में विधेयात्मक स्तर पर सोचने की कला जुड़ सके तो उसके क्रमिक विकास के प्रकृति क्रम को ध्यान में रखते हुए उज्ज्वल भविष्य के लिए सोचना बन पड़ेगा। तब निराशा का कोई कारण न रहेगा। आशा की अभिनव किरणें सदा आगे बढ़ने का उत्साह भरती रहेंगी। शरीर के जीर्ण होने या कलेवर बदल जाने जैसे सामान्य से प्रकृति परिवर्तन पर किसी को खेद करने की आवश्यकता नहीं।
जिस प्रकार साइकिल की चाल अपने पैरों के इशारों से बढ़ाई या घटाई जा सकती है उसी प्रकार बुढ़ापे का आगमन जल्दी भी हो सकता है और उसे दूर भी धकेला जा सकता है। स्वास्थ्य रक्षा के नियम पालन करने और मानसिक सन्तुलन बनाये रहने से उसे निरोग, बलिष्ठ और दीर्घजीवी बनाये रखा जा सकता है। सबसे बड़ी बात है कि जीवन का स्वरूप और बिताने का ढंग समझा जाय तो शरीर और मन दोनों को सुदृढ़ बनाये रखा जा सकता है और बुढ़ापे को ऐसा रखा जा सकता है जिसमें कुछ भी कष्टकारक प्रतीत न हो वरन् जीवन के अगणित रसों में से एक अनोखा स्वाद बुढ़ापे का भी चखा जा सके ।
बुढ़ापे में उपलब्धियों का अहंकार बढ़ जाता है। उत्साह शिथिल पड़ने से जिज्ञासा के द्वार बन्द होते हैं और अनावश्यक अहंकार से लदा हुआ मन भारी रहने लगता है। आशाएं छोड़ बैठने और अन्धकारमय नीरस भविष्य की कल्पना करते−करते निराश रहने की आदत पड़ जाती है। इस बोझिल और नीरस मनःस्थिति का प्रभाव शरीर पर पड़ता है। उसमें शिथिलता आ जाती है। उत्पन्न होने वाले मलों के निकलने में कठिनाई पड़ती है। रक्त से स्वच्छता की मात्रा घटती ओर मलीनता का अनुपात बढ़ता है। यही मरण की दिशा में अग्रगमन। यदि मनःस्थिति वैसी ही बनाये रखी जाय जैसी बालकों की होती है तो उसका प्रभाव शरीर पर पड़ेगा। स्फूर्ति, सक्रियता, उमंग, आशा, जिज्ञासा, नम्रता बनी रहने से मानसिक सन्तुलन और उत्साह बना रहेगा। फलतः बुढ़ापा उस बुरे रूप से न आवेगा जैसा कि आमतौर से आता है। विशेषज्ञों के अनुसार आमतौर से बुढ़ापे को जिस अभिशाप के रूप में देखा जाता है वह एक मानसिक रोग की प्रतिक्रिया है, जो अपने लक्षण−शरीर को जरा−जीर्ण और मस्तिष्क को अस्त−व्यस्त बनाती हुई प्रकट होती है। इस मनोरोग का नाम है−सेनाइल डिमेनशिया इसमें प्रगति अवगति की ओर वापिस लौटती है और बुड्ढा फिर बालकों जैसा अविकसित, अदूरदर्शी बनता चला जाता है। इस स्थिति को विचारपूर्वक रोका जा सकता है।
जो जीवित हैं वे चलते हैं। यह सोचने की अपेक्षा यह समझा जाना चाहिए, जो चलता है सो जीवित रहता है। सफलताओं और असफलताओं में प्रसन्नता होती है। इस मान्यता में परिवर्तन किया जाना चाहिए कि जो प्रसन्न रहता है उसके समीप अनुकूलताएँ और सफलताएँ खिंचती चली जाती है। हम वर्तमान को प्रसन्नता से भरें, इसलिए आवश्यक है जो सामने है उसका महत्व समझें और उपयोग ढूंढ़ें। बचपन का−यौवन का −अपने ढंग का आनन्द था। वृद्धावस्था में भी स्थिति के अनुरूप कितने ही ऐसे आधार हैं। जिनके लिए गर्व किया जा सकता है। रस लिया जा सकता है और अधिक अच्छा पाने के लिए उपयोग किया जा सकता है। गुजारे की और परिवार की जिम्मेदारियों से निवृत्ति मिली तो खाली होने और सूनेपन की नीरसता क्यों अपनाई जाय? लोक मंगल का इतना विशाल क्षेत्र सामने पड़ा है कि उसमें व्यस्त रहकर कमाने की जिम्मेदारी पूरी करने से भी अधिक सक्रिय रहा जा सकता है। शरीर कम काम करता हो, इन्द्रियाँ साथ देती हों तो चिन्ता की कोई बात नहीं। परिपक्व व्यक्तित्व और परिष्कृत अनुभव की सम्पदा का उपयोग करके घटने वाली शरीर क्षमता की भर पाई आसानी से हो सकती है।
सदा एक ही कोठरी में कैद रहना पड़ेगा इस कल्पना मात्र से कोई कांपने लगेगा। परिभ्रमण करने की इच्छा बाल वृद्ध सभी को बनी रहती है। फिर एक ही शरीर की कोठरी में−एक ही ढर्रे का जीवन जीते रहने में किसे सन्तोष रह सकता है। एक यूनानी दार्शनिक से किसी ने पूछा−आपको यदि अमर बना दिया जाय तो कैसा लगेगा? उसके उत्तर में उन्होंने कहा−मैं घबराकर आत्म−हत्या कर लूँगा। सुविधा एक चीज है और स्वच्छन्दता दूसरी। आत्मा मुक्ति पाना चाहता है इसका एक अर्थ यह भी है कि वह एक ही पिंजड़े में सदा कैदी बन कर नहीं रहना चाहता।
यदि नींद को आनन्ददायक माना जा सकता है तो महा निद्रा के समय मिलने वाला ऐसा विश्राम क्यों कष्टकर लगे? जिसमें लम्बी जिन्दगी की थकान दूर करने और अगली यात्रा के लिए शक्ति संचय का अवसर मिलता है।
अकबर ने तानसेन के सम्मुख उनके गुरु श्री हरिदास का संगीत सुनने की इच्छा व्यक्त की। तानसेन बड़े असमंजस में पड़ गये, श्री हरिदास के दिल्ली आकर बादशाह के सामने गाने को तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। यह भी आशा नहीं की जा सकती थी कि वृन्दावन में भी अकबर को सुनाने के लिए वे तैयार हो जावेंगे।
इस उलझन में तानसेन ने एक रास्ता निकाला, बादशाह अकबर वृन्दावन गए व साधारण वेश में चुपके से स्वामी जी की कुटिया से बाहर छिपकर बैठ गए। तानसेन अन्दर गए व अपने गुरु को प्रणाम कर गाना गाने लगे। तानसेन ने जान−बूझकर गाने में गलती कर दी, अपने इतने पटु शिष्य की गलती सुधारने के लिए गुरु ने स्वयं गाना शुरू किया। इस तरह बादशाह अकबर की इच्छा पूर्ण हुई।
कुछ दिनों बाद की बात है। एक बार जब दिल्ली में तानसेन गा रहे थे तो गाना पूरा हो जाने पर तानसेन से कहा−“तानसेन तुम गाते तो हो, परन्तु तुम्हारे गाने में वह निखार नहीं जो तुम्हारे गुरु के गाने में है। तुम्हारे गुरु का गायन तो बहुत ही उच्च कोटि का है।” तुरन्त ही तानसेन ने नम्रता पूर्वक कहा- “जहाँपनाह इसका कारण यह है कि मैं हिन्दुस्तान के बादशाह के लिए गाता हूँ और मेरे गुरु अखिल विश्व के नियन्ता के लिए गाते हैं।”
जो वस्तु परमात्मा को सौंप दी उससे अधिक पवित्र वस्तु क्या हो सकती है।
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महंगाई, जीवन यापन का स्तर बढ़ जाना, उपार्जन के स्त्रोत पतले रहना जैसे अनेक कारणों से अधिकांश लोगों को आर्थिक तंगी बनी रहती है। परिवार में कमाऊ लोगों का कम होना और सदस्यों की संख्या बढ़ जाना भी एक बड़ा कारण पैसे की तंगी का है। इससे कई उपयोगी काम रुकते हैं और कर्ज लेने की नौबत आ जाती है। चुकना कठिन पड़ने और ब्याज चढ़ने से वह बोझ और भी बढ़ता है। ब्याह शादियों जैसे कई सामाजिक खर्चे अप्रत्याशित रूप से सामने आ खड़े होते हैं। उलझनों से पार होते नहीं बनता तो चिन्ता बढ़ती है और मन भारी रहने लगता है। किन्तु चिन्तित रहना कोई समाधान नहीं है। इससे तो सही सोचने और उपाय खोजने तक की सामर्थ्य चली जाती है। उपयुक्त यही है कि रास्ता निकाला जाय। घर के दो सदस्य कमा सकते हैं उनके लिए उस तरह का साधन प्रस्तुतः कराया जाय। खर्चो में कड़ाई से कटौती की जाय और भावी रीति−नीति ऐसी बनाई जाय जिसमें आय के स्रोत बढ़ने के साथ−साथ खर्चे में कमी करके पिछले असन्तुलन को पूरा किया जाय।
अर्थ व्यवस्था की ही मानसिक दबाव का एक अन्य बड़ा कारण है परिवार के बीच स्नेह सद्भाव की कमी−मनो−मालिन्य एवं असहयोग। यह छोटा करण दीखते हुए भी मानसिक विक्षोभ की दृष्टि से अर्थ चिन्ता से भी अधिक भारी पड़ता है। शरीर के बाद घर परिवार ही ऐसा स्थान है जहाँ मनुष्य आश्रय पाता है। जिस समाज से निरन्तर सम्पर्क रहता है वह परिवार ही है। इस उद्यान के फलते−फूलते रहने में ही पौधों का लाभ और माली का गौरव है। मनोमालिन्य से घर के हर सदस्य को हानि पहुँचती है। एक की प्रतिक्रिया दूसरे को प्रभावित करती है। सद्भावों के द्वारा सींचे जाने पर यह बगीचा हरा−भरा रहता है किन्तु मनोमालिन्य से उस पर तुषारपात होता है और अच्छे भविष्य की सम्भावनाएँ नष्ट होती चली जाती है।
आमतौर से पारिवारिक असामंजस्य में कोई बड़े कारण नहीं होते। प्रायः गलतफहमी ही उसका कारण होती है−एक दूसरे से जी खोलकर बात कर नहीं पाते और बात का बतंगड़ बन जाता है। सम्मान की भूख हर छोटे बड़े की आवश्यकता है। हर किसी को स्नेह भी चाहिए और सम्मान भी। इसमें कमी पाने पर हर व्यक्ति अपने को उपेक्षित या तिरस्कृत अनुभव करता है और तिलमिलाता है। छोटे−मोटे काम ही घर में होते हैं उनमें एक दूसरे के साथ मिल−जुलकर सहयोग करने की आदत बनालें और जी खोलकर बातें करने लगें तो मनो मालिन्य के तीन चौथाई कारण ऐसे ही हँसते−हँसते दूर हो सकते हैं। कोई सदस्य उद्दण्डता बरतता हो तो उसे इस निष्कर्ष पर पहुँचने देना चाहिए कि यह रवैया दूसरों के लिए कम और स्वयं उसी के लिए अधिक हानिकारक है। यह स्नेह सिक्त शब्दों में− शान्तचित्त से एकान्त में अधिक अच्छी तरह समझाया जा सकता है। अपमानित करने से तो प्रतिष्ठा का प्रश्न बनता है और पक्ष विपक्ष जैसी प्रतिद्वन्दिता उत्पन्न हो जाती है। ऐसे प्रसंगों पर व्यवहार कुशलता की आवश्यकता होती है और यदि दूरदर्शिता अपनाकर कारण और निवारण की संगति बिठाई जाय तो घरेलू विग्रह आसानी से दूर हो जाते हैं। जहाँ सुधारने के सभी प्रयत्न निष्फल हो जायं और बात बदनीयती तक बढ़ चले तो फिर यही उचित है कि संयुक्त परिवार को छोटा कर लिया जाय और जो जिसके साथ शान्तिपूर्वक रह सकते हों, वे उनके साथ पृथक रहने लगें। संयुक्त परिवार को हर कीमत पर बनायें ही रहना बुद्धिमानी नहीं है।
मानसिक तनाव में एक कारण खाली दिमाग रखना अथवा अत्यधिक व्यस्त रहना भी है। खाली दिमाग शैतान की दुकान वाली उक्ति सोलहों आने सच है जो फालतू बैठे रहते हैं उन्हीं के दिमाग में बेसिलसिले की बातें अधिक उठती हैं। तनाव उत्पन्न करने वाले कारणों में अधिकतर बेसिर पैर का ऊल−जलूल चिन्तन ही होता है। मनुष्य यदि शरीर और मन को उपयोगी कामों में व्यस्त रखे तो बेकार की बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता ही न पड़ेगी। भारी कामों के साथ−साथ कुछ हलके काम और हलके चिन्तन भी दिनचर्या में जुड़े रहने चाहिए। उपयोगी शौकों में फूल या शाक उगाना, वस्तुओं की सफाई सज्जा, टूट−फूट की मरम्मत, गीत वाद्य, सामूहिक प्रार्थना, खेलकूद जैसे कई कार्य सम्मिलित रखे जा सकते हैं। इनसे व्यस्तता और मनोरंजन का दुहरा उद्देश्य पूरा होता है और मस्तिष्क पर भारीपन नहीं जमने पाता।
प्रकृति के सीधे सम्पर्क से कतरा कर कृत्रिम वातावरण में फँसे रहने से भी मानसिक तनाव बढ़ता है। बन्द मकानों में बिजली की बत्तियों और पंखों के बीच गुजारा करने वाले खुली हवा धूप और प्रकृति सौन्दर्य निहारने से वंचित रह जाते हैं। यह अभाव जीवन में ऐसी रिक्तता लाता है जिससे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य गड़बड़ाने लगता है। ऐसे लोगों को थोड़ी असुविधा उठाकर भी प्रकृति की समीपता वाले स्थानों में रहने का या खुले वातावरण में रहने का मार्ग निकालना चाहिए। अधिक कपड़े पहनने, गन्दी गलियों, घुटन भरे मकानों अथवा शोर-गुल के बीच रहने से मस्तिष्क पर उत्तेजनात्मक दबाव बढ़ते हैं और बेचैनी अनुभव होती है। प्रातःकाल खुली हवा और प्राकृतिक वातावरण में टहलने का नियमित अभ्यास बनाकर मस्तिष्क को तनाव से मुक्त रखने में सहायता मिलती है।
भारी, महत्वपूर्ण उपयोगी और कमाऊ काम करने में मनुष्य को अभिरुचि होनी स्वाभाविक है, उससे लाभ भी मिलता है और श्रेय भी। किन्तु यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि निरन्तर भारी काम करने से जो दबाव पड़ता है उससे उत्साह और उल्लास की कमी होने लगती है। इससे थकान बढ़ती है और मनोयोग शिथिल पड़ने से काम का स्तर गिर जाता है। इस जोखिम से बचने के लिए यह आवश्यक है कि विनोद की तरह कुछ काम करने के लिए दिनचर्या में स्थान रखा जाय। संगीत, गृह−वाटिका, खेल विनोद, घरेलू उद्योग, सज्जा, मरम्मत, जैसे कितने ही कार्य ऐसे ढूँढ़े जा सकते हैं जिससे मन बहलने और हलके−फुलकेपन की ताजगी लाने का कुछ उपक्रम बनता रहे।
स्वार्थपरता, एकाकीपन, दूसरों के कामों में दिलचस्पी न लेना अपनी ही समस्याओं में उलझे रहना ऐसी प्रवृत्ति है जो जिन्दगी का आनन्द नष्ट करती और उसे बोझिल बनाती है। स्वभाव को मिलन सार और पारस्परिक सहयोग में रस लेने वाला बनाना चाहिए। संकोची, अहंकारी और अशिष्ट बकवासी प्रकृति के लोग सरस सामाजिकता का आनन्द नहीं ले पाते और अपने आप में खोये उलझे रहते हैं। ऐसे लोगों को मानसिक सीमा बंधन में पिंजड़े में बन्द पक्षी की तरह घुटन अनुभव होती है और व मानसिक तनाव से ग्रसित रहने लगते हैं। दूसरों के दुःख सुख में सम्मिलित रहने और सहयोगपूर्वक मिलजुल कर काम करने एवं सोचने का रास्ता निकाला जा सके, तो उससे औषधि उपचार की अपेक्षा अधिक सरलतापूर्वक मानसिक तनाव से छुटकारा मिल सकता है।
भविष्य के सम्बन्ध में निराश रहने लगना− विपत्ति की आशंका से भयभीत और प्रस्तुत समस्याओं के सम्बन्ध में अत्यधिक चिन्ता करना मस्तिष्क पर इतना भार डालता है जिससे उसकी स्वाभाविक शान्ति नष्ट होती है। कठिनाइयों, प्रतिकूलताओं, हानियों, आक्रमणों, असफलताओं से हर किसी को वास्ता पड़ता है। सदा सफलताएँ ही मिलती रहें, सदा अनुकूलता और सुविधा ही बनी रहें ऐसा कठिन है। रात दिन की तरह, ताने बाने की तरह ज्वार−भाटे की तरह मनुष्य जीवन में प्रिय−अप्रिय के उतार−चढ़ाव आते ही रहते हैं। उनसे पूर्ण सुरक्षित रह सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं रहा। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अपनी मानसिक तैयारी ऐसी रखनी चाहिए कि प्रतिकूलता आने पर निराश एवं खिन्न होने की आवश्यकता न पड़े। अच्छे भविष्य की आशा को किसी भी स्थिति में न गँवाया जाय। अवरोधों से जूझने में खिलाड़ी जैसा आनन्द लेने का स्वभाव बनाया जाय तो मन को भारी बनाने की आवश्यकता न पड़ेगी।
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परिवार निर्माण की दशा में एक अनुपम एवं अद्भुत प्रयोग
युग निर्माण अभियान तीन भागों में विभक्त है−व्यक्ति निर्माण, परिवार−निर्माण और समाज−निर्माण इन तीनों मोर्चों पर सृजन सेना के सैनिक विगत तीस वर्षों से अविचल निष्ठा के साथ जूझते और अपनी तिलतिल सामर्थ्य को युग देवता के चरणों में गीध, गिलहरी की तरह प्रस्तुत करे चले आ रहे हैं। प्रगतिक्रम के अनुसार युग दूतों में अपने उत्तरदायित्व−सही रीति से निभा सकने की सामर्थ्य उत्पन्न करना आवश्यक समझा गया। शान्ति कुञ्ज की भूमिका इसी प्रशिक्षण केन्द्र के रूप में रही है।
व्यक्ति निर्माण के लिए प्राण प्रत्यावर्तन और जीवन साधना सब चलते रहे हैं। परिवार निर्माण के लिए कन्या प्रशिक्षण और महिला सत्रों की व्यवस्था की गई । समाज निर्माण के ऐसे शिल्पियों की आवश्यकता थी जो अपनी परिष्कृत आत्म शक्ति से दूसरों के अन्तःकरणों को प्रकाशवान बना सकने में समर्थ एवं सफल हो सकें। इसके लिए उपयुक्त शिक्षण ब्रह्मवर्चस आरण्यक के रूप में अभी−अभी आरम्भ होने जा रहा है।
इसके उपरान्त भी एक कमी यह प्रतीत होती थी कि नवयुग के सृजन शिल्पी निश्चिन्ततापूर्वक अपना कर्त्तव्य ठीक तरह पूरा कर नहीं पर रहे थे। उनका मन प्रायः परिवार व्यवस्था जुटाने और उसकी समस्याएँ सुलझाने में लग जाता था और इच्छा रहते हुए भी जितना समय चाहिए उतना दे नहीं पाते थे। जितना मन लगाना चाहते थे उतना लग नहीं पाता था। कर्तव्य बाहर पुकारता था परिस्थितियाँ पीछे घसीटती थीं। जितने समय बाहर रहना होता था, उतने समय स्त्री बच्चों को स्नेह और सुव्यवस्था न मिलने की शिकायत बनी रहती थी। देखा यह भी गया है कि सार्वजनिक कार्यकर्ताओं के बालक अव्यवस्थित हो जाते हैं। पिता लोक सेवा के कार्यों में व्यस्त रहने के कारण उनकी उचित देखभाल नहीं कर पाता फलतः वे कुसंगति में फँसते और आवारा−गर्दी करते हैं स्वभावतः उनके ऊपर यह लाँछन आता है कि समाज निर्माण तो किया पर परिवार निर्माण की उपेक्षा क्यों हुई? आवश्यक है कि लोक सेवी अपने व्यक्तित्व के साथ साथ अपने परिवार को भी अपने सृजन कौशल का प्रमाण बना कर प्रस्तुत करें। यह न बन पड़ने पर असमंजस होना और ग्लानि अनुभव करना स्वाभाविक ही है।
युग निर्माण परिवार के असंख्य भाव−भरे व्यक्तित्व जो नव निर्माण के लिए अपनी प्रतिभा श्रद्धा और परिपक्वता का समुचित लाभ समाज को दे सकते थे, कुछ कर नहीं पा रहे हैं। असमंजस उन्हें आगे पीछे घसीटता रहता है। इस समस्या का समाधान आवश्यक समझा गया फलतः उसका हल भी निकला है।
इसी बसन्त पर्व पर एक विशाल गायत्री नगर बसाया जा रहा है। शांतिकुंज से बिलकुल सटी हुई बीस बीघे जमीन फिलहाल खरीदी गई है। दस पाँच बीघे और भी खरीदने की बात सोची जा रही है। इस गायत्री नगर में लोक सेवियों के परिवारों को बसाया जायगा ताकि उसकी सुव्यवस्था के सम्बन्ध में लोक सेवी पूर्ण निश्चिन्त होकर अपना काम कर सकें। पत्नियों को जो लोग बहुत प्रयत्न करने पर भी लोक मंगल की उपयोगिता न समझा सके और सहमत होने, साथ देने के लिए बहुत प्रयत्न करने पर भी सफल न हो सके उनकी समस्या का समाधान यहाँ बस जाने पर सहज ही सम्भव हो सकेगा। इसी प्रकार जो लोग चाहते हैं कि अपने बालकों को सुसंस्कारी बनायें, उनकी इच्छा पूर्ति के लिए भी गायत्री नगर एक प्रकार से वरदान ही सिद्ध होगा । संस्कार दिलाने के लिए लोग अपने बच्चों पर काफी खर्च भी करते हैं, पर उन्हें सफलता नहीं के बराबर ही मिलती है। गुरुकुलों की स्थिति दयनीय हो चली है। पब्लिक स्कूलों में तथाकथित शिष्टाचार ही सिखाया जाता है। भावनाएँ भरने का न वहाँ प्रबन्ध है न वातावरण। बाल निर्माण की दृष्टि उपयुक्त शिक्षण संस्थाएँ ढूंढ़े नहीं मिलतीं। जो है उनमें प्रवेश कठिन पड़ता है। ऐसी दशा में युग निर्माण परिवार के मध्यवर्ती लोगों के लिए यह भी कठिन पड़ता है कि वे बच्चों को अन्यत्र भेजें। कुछ कर न पाने से उनका मन उदास ही बना रहता है। गायत्री नगर में बस जाने पर उनकी समस्या का सहज समाधान निकल आवेगा।
नवीन नगर में छोटे परिवार ही बसाये जायेंगे पत्नी तथा दो तीन बच्चे तक ही रह सके इतने भर के लिये नये क्वार्टर बनाये जायेंगे। नगर के भीतर ही महिलाओं की शिक्षा का प्रबन्ध होगा। बच्चों के लिए हाईस्कूल स्तर तक ही शिक्षा का प्रबन्ध भी रहेगा। महिलाओं और बच्चों की शिक्षा में उन सभी तत्वों का समावेश रहेगा जो व्यक्तित्व को सुविकसित, समुन्नत एवं सुसंस्कारी बनाने के लिए आवश्यक है। अपने परिवार को गायत्री नगर में बसाने के उपरान्त परिवार के स्वास्थ्य, शिक्षा, संस्कार, स्नेह दुलार की उपयुक्त आवश्यकता भली प्रकार पूरी होती रहेगी। इसकी निश्चिन्तता रखी जा सकती है। यह सुविधा बन जाने से वे परिजन जो युग परिवर्तन की पुण्य बेला में कुछ भाव भरा पुरुषार्थ करना चाहते हैं−कहने लायक योगदान देना चाहते हैं। अपने मार्ग का सबसे बड़ा अवरोध दूर होते और अभीष्ट सुविधा अनुभव करेंगे।
अभी केवल वे ही लोग बसाये जायेंगे जो आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी है। परिवारों का निर्वाह भार उठा सकने की स्थिति अभी नहीं बन सकी है। जिनके पास जेवर, जमीन, फण्ड, पेन्शन आदि की पूँजी बैंक में जमा करके इसकी ब्याज से अपने परिवार का गुजारा कर सकने की स्थिति है प्रथम चरण में उन्हीं को आमन्त्रित किया गया है। द्वितीय चरण में वे लोग बुलाये जायेंगे। जिनके पास कुछ पूँजी तो अपनी है और जिन्हें थोड़ी-सी कमी हो मिशन से पूरी करानी पड़ेगी। तीसरे अन्तिम चरण में यह प्रबन्ध भी किया जायगा कि गायत्री नगर में कुटीर उद्योग लगाये जायं और स्त्री बच्चे उस माध्यम से अपने निर्वाह के लिए आवश्यक उपार्जन स्वयं कर लिया करें। यह क्रमिक चरण है। साधनों के साथ−साथ व्यवस्था बनती और बढ़ती चली जायगी। इस नवीन शुभारम्भ को उन सभी लोगों को अपने लिए विशेष वरदान मानना चाहिए जो परिवार के निर्वाह के बारे में तो निश्चिन्त है पर व्यवस्था की दृष्टि से अपने को विवश अनुभव करते हैं। यहाँ परिवार की उसमें अच्छी ही देखभाल हो सकती है, उससे अधिक ही स्नेह संस्कार मिल सकता है जैसा कि वे स्वयं करने के इच्छुक थे किन्तु कर नहीं पाते थे।
गायत्री नगर से एक और बड़ी आवश्यकता की पूर्ति यह होगी कि महिला सत्र के लिए अधिक संख्या में शिक्षा प्राप्त करने के लिए युग निर्माण परिवार की महिलाएँ आ सकेंगी और इच्छानुसार अधिक समय भी रह सकेंगी। अब तक सबसे बड़ी कठिनाई यह थी कि बच्चों समेत ठहरने की यहाँ बिलकुल व्यवस्था नहीं थी फलतः छोटे बालकों वाली महिलाओं के लिए तो प्रायः उस शिक्षण का द्वार ही बन्द था। जिनके बालक थोड़े बड़े हो गये थे वे उन्हें छोड़कर तो आती थी, पर याद घर की बनी ही रहती थी। माता का छोटे बालकों के प्रति जो वात्सल्य होता है उसे कोई भी भावुक हृदय भली−भाँति जान सकता है। बच्चे घर छूट जाने और स्वयं यहाँ पढ़ने सीखने की स्थिति में आन्तरिक असन्तोष तो बना ही रहता था । फलतः महिला शिक्षण का वह लाभ नहीं मिल पाता था जो मिलना चाहिए था। अब महिला सत्र की छात्राओं के लिए भी नया द्वार खुलता है। वे एक दो बच्चे भी साथ लेकर आ सकेंगी। शिक्षण, मात्र उनका हो नहीं उनके बच्चों का भी होता रहेगा।
शान्ति कुञ्ज के भोजनालय में मासिक व्यय 70) पड़ता है। जो देश भर के सभी भोजनालयों से सस्ता है। दोनों समय, रोटी, दाल, चावल, शाक। दो समय चाय, अच्छा भोजन इससे सस्ता कहीं मिल सकता हो ऐसा सुनने में नहीं आया। अच्छा और सस्ता होने का यह कीर्तिमान है। फिर भी जिन्हें अधिक कठिनाई रहती है उनके लिए इतना भार भी कठिन पड़ता है। क्योंकि इसमें पकाने का श्रम भी जुड़ा हुआ है। अपने हाथ से पकाने पर स्वभावतः इसमें कमी हो सकती है। खाद्य पदार्थों का भी अन्तर करके मूल्य कम हो सकता है। गायत्री नगर में बनने वाले क्वाटरों में भोजनालयों की भी व्यवस्था रहेगी ताकि इच्छा एवं स्थिति के अनुरूप अपना भोजन खर्च कम या अधिक किया जा सके। बच्चों समेत आने तथा भोजन व्यय घटा लेने की सुविधा के कारण अब महिला शिक्षण−सत्र में परिजन अपने घरों की महिलाओं को अधिक सुविधापूर्वक भेज सकेंगे।
लार्जरी फैमिली विशाल परिवार के प्रचलन की चर्चा कई बार की जा चुकी है और उसे परिवार निर्माण आन्दोलन का महत्वपूर्ण अंग बताया जाता रहा है। वह प्रयोग गायत्री नगर में सुविधापूर्वक हो सकेगा। मिल जुलकर भोजन पकाना, मिल−जुलकर बच्चे पालन, मिल जुलकर सहकारी स्टोर चलना तथा जीवन चर्या के अन्य कार्यों को मिल−जुलकर करने से समय और मन की भारी बचत होती है साथ ही सहकारिता के रूप में व्यावहारिक अध्यात्म की सत्प्रवृत्ति का अभ्यास अनुभव बढ़ता है। इस आधार को अपनाने पर परिवार के प्रत्येक सदस्य को सर्वतोमुखी प्रगति के लिए अधिक अवसर मिलता है यह प्रयोग छोटे से गायत्री नगर में चलाया और उसे व्यापक बनाया जायगा।
ब्रह्म वर्चस आरण्यक की विशेषता उस पर छाये हुए वातावरण के अनुरूप ही आँकी जायगी। वह आश्रम आत्म−शक्ति सम्वर्धन की साधना तपश्चर्या करने के लिए है । यह नया गायत्री नगर सर्वसाधारण के लिए− घर परिवार के लिए−परिष्कृत वातावरण प्रदान कर सकने के लिए उपयुक्त अनुकूल सिद्ध हो सकने जैसा बनाया, बसाया जा रहा है। इसे एक महती आवश्यकता की पूर्ति समझा जाना चाहिए। अब तक गायत्री तपोभूमि, शान्ति−कुञ्ज, ब्रह्म वर्चस् अपने−अपने ढंग से नव−निर्माण के पुण्य प्रयोजनों में उपयोगी भूमिका निभा रहे थे। इस चौथे निर्माण−गायत्री नगर से −इतनी विस्तृत एवं इतनी महत्वपूर्ण युग आवश्यकता पूरी हो सकेगी जिसकी आज तो कल्पना करना भी कठिन है। युग शिल्पियों को नई पीढ़ी विनिर्मित करने का इसे अभिनव प्रयास कहना चाहिए।
परिवार सहित लोक साधना का द्वार खुलने के संदर्भ में एक प्रसंग ब्रह्म वर्चस् साधकों के लिए भी इन्हीं दिनों जुड़ रहा है। वह है कि निवृत्त लोग अपनी पत्नी समेत अधिक समय तक या सदा के लिए रहने को भी आ सकें ऐसा नया प्रबन्ध कर दिया गया है। सामान्यतया एक कमरे में एक ही साधक के रहने की परम्परा है, पर अब नई व्यवस्था के अनुसार ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में भी 16 कमरों का एक अलग प्रखण्ड बनाया गया है जिसमें पति−पत्नी साथ रह सकें एवं अपना भोजन स्वयं पका सकें।
ब्रह्म वर्चस् में दो−दो महीने के सत्र इसलिए रखे गये हैं कि व्यस्त व्यक्ति भी उस स्वल्प अवधि में यथा सम्भव साधना कर सकें और थोड़ा−थोड़ा करके अपनी आत्म सम्पदा को बढ़ाने का अवसर प्राप्त कर सकें। वस्तुतः यह समय−साध्य प्रक्रिया है और अभीष्ट प्रगति के लिए अधिक समय की आवश्यकता है। दो महीने तो न्यूनतम अवधि है। इससे कम में इतने महान प्रयोजन का ताना−बाना ही खड़ा नहीं हो सकता था। इसमें और कमी की गुंजाइश थी नहीं अन्यथा थोड़ा −थोड़ा करके अधिक लोगों को−अधिक लाभ देने के सिद्धान्त को−ध्यान में रखते हुए इससे भी कम समय का शिक्षण क्रम रखे जाने की बात सोची जाती।
ब्रह्म वर्चस् शिक्षण वस्तुतः वानप्रस्थ की साधना पद्धति है। उसी स्थिति में निश्चिन्तता पूर्वक उसका सधना सम्भव होता है। वानप्रस्थ भारतीय गरिमा का मेरुदण्ड है। उस ऋषि परम्परा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता समझी गई और तदनुरूप उपयुक्त साधनों से युक्त ब्रह्म वर्चस् बनाया गया। उसके पाठ्यक्रम में साधना क्रम में −लगभग वे ही तत्व है जो वानप्रस्थ तपश्चर्या में होते हैं। प्रातः तीन घण्टे योग तप मध्याह्न तीन घण्टे ब्रह्म चिन्तन, आत्म चिन्तन सायंकाल तीन घण्टे लोक सेवा शिक्षण। यही नौ घण्टे की दैनिक वर्चस् साधना है । वानप्रस्थ तपश्चर्या में आर्य परम्परा के अनुसार इन्हीं तीन तथ्यों का अभ्यास अवगाहन करना पड़ता है इन संगतियों के आधार पर कोई चाहे तो ब्रह्म वर्चस् को वानप्रस्थ साधनाश्रम भी कह सकता है। थोड़े−थोड़े समय के छोटे−छोटे सत्र बना देने से ही यह प्रतीत होता है कि यह शिक्षण वानप्रस्थ साधना से कोई भिन्न वस्तु है। उसे थोड़े−थोड़े समय की वानप्रस्थ साधना एवं उसकी पूर्व तैयारी कहा जाय तो भी कुछ अनुचित न होगा।
वानप्रस्थ में पत्नी समेत रहने की छूट है। संन्यास में दोनों को पृथक् रहना पड़ता है। युग निर्माण परिवार के अनेक परिजन ऐसे हैं जो सेवा निवृत्त हो चुके। बच्चे स्वावलम्बी बन गये। पेन्शन आदि के सहारे अपने निर्वाह का प्रबन्ध जिनके पास है। वे चाहते हैं कि जीवन का अन्तिम अध्याय इस प्रकार सम्पन्न हो जिसमें आत्म शान्ति और जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का अवसर प्राप्त हो सकें। उनके लिए इससे अच्छा अवसर, स्थान और वातावरण और कोई हो ही नहीं सकता जैसा कि ब्रह्म वर्चस् में विद्यमान है। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, प्रखर संरक्षण, अनुभवी मार्गदर्शन तथा भाव भरा वातावरण इन पाँचों विशेषताओं से भरी सुविधा अन्यत्र दीपक लेकर खोजने पर भी कहीं न मिल सकेगी। जो लोक ऐसे वातावरण में शेष, सारा या अधिकांश जीवन बिताने के इच्छुक थे उनके लिए ब्रह्म वर्चस् एक सुयोग सौभाग्य ही सिद्ध हो सकता है।
जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व पूरे हो चुके हैं, या हलके है, ऐसे निवृत्त एवं अर्ध निवृत्त व्यक्तियों के लिए ब्रह्म वर्चस् आश्रम अपने ढंग का अनोखे साधना एवं प्रशिक्षण केन्द्र के रूप में विकसित हो रहा है। ऐसे व्यक्ति, जो स्वाभाविक रूप से, अपनी वैराग्य परक प्रवृत्ति के कारण गृहस्थ के जंजाल में उलझे ही नहीं है, उन्हें भी इस प्रयोग परीक्षण का लाभ उठाने का अवसर मिल सकता है। गायत्री नगर बन जाने से उन गृहस्थों के लिए भी व्यवस्था बन सकेगी, जो अभी पारिवारिक उत्तर−दायित्वों से मुक्त होने की स्थिति में नहीं है। इस प्रकार अपने विशाल परिवार के हर स्तर के व्यक्ति के प्रशिक्षण एवं विकास का मार्ग प्रशस्त होता चला जा रहा है।
ध्यान रहे कि हर स्तर के परिजनों के लिए उपयुक्त साधना प्रशिक्षण की सुविधाएँ तो जुटाई जा रही है, किन्तु अनुशासन एवं मर्यादाओं में किसी प्रकार की ढिलाई नहीं बरती जायेगी। मर्यादाएँ नयी नहीं हैं, किन्तु परिजनों को स्मरण दिलाने के लिए उनका उल्लेख संक्षेप में यहाँ किया जा रहा है।
ब्रह्म वर्चस् एवं गायत्री नगर को धरती पर स्वर्ग के अवतरण की प्रयोगशाला के रूप में विकसित किया जा रहा है। अस्तु उसके अनुरूप सज्जन−अनुशासन प्रिय, वातावरण को उत्कृष्ट बनाने में योगदान दे सकने योग्य व्यक्तियों का ही स्वागत किया जा सकेगा। अधिक समय तक रहने के इच्छुक व्यक्तियों को भी एक बारगी स्वीकृति नहीं दी जायगी। उनके आचरण एवं व्यवहार को देखते हुए क्रमशः एक−एक माह की स्वीकृति बढ़ाई जाती रहेगी । शारीरिक एवं मानसिक दृष्टि से रुग्ण व्यक्तियों को भी स्वीकृति नहीं दी जायेगी । गलत स्वीकृति मिल जाने पर उसे रद्द भी किया जा सकेगा। पूर्व शिविरों की तरह शिविरार्थियों के लिए निवास एवं प्रशिक्षण तो निःशुल्क रहेगा, किन्तु भोजन व्यय का भार उन्हें स्वयं ही वहन करना होगा। कुछ घण्टे कहीं कुछ काम करने अपना निर्वाह व्यय जुटा लेने जैसी व्यवस्था भी अभी नहीं है। आवेदन भेजते समय इन मर्यादाओं का पूरा−पूरा ध्यान रखना चाहिए।
उपरोक्त दोनों संस्थानों में अपना स्थान सुरक्षित कराने के लिए आवेदन पत्र भेजने का क्रम अभी से आरम्भ किया जा सकता है। यों गायत्री नगर के निर्माण का कार्य बसन्त पर्व के शुभ मुहूर्त में ही आरम्भ किया जायगा। ब्रह्म वर्चस् पूरा होते-होते निर्माण की वर्तमान शक्ति को उसी नये सृजन में मोड़ दिया जायगा। सम्भव है उसमें निवास का प्रबन्ध आगामी गुरु पूर्णिमा से चल पड़े । ब्रह्म वर्चस् में पत्नी सहित रहने वाले वानप्रस्थों को सुविधा तो अभी से उपलब्ध हो सकेगी।
गायत्री नगर बसाने के लिए आवश्यक मानचित्र बनाने तथा परामर्श देने अनुभवी सिविल इंजीनियरों तथा आर्चीटेक्टों सहयोग की अपेक्षा होगी। इसी प्रकार उस भूमि में क्या फल पौधे अच्छे उग सकते हैं इसके जानकारों का परामर्श अपेक्षित होगा युग निर्माण परिवार में इस स्तर के लोग बसन्त आयोजन के 40 दिनों में ही कुछ समय निकालकर शांति−कुंज आने का प्रयत्न करें ऐसा अनुरोध है।
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बसन्त पर्व प्रेरणा पर्व है। पदार्थ, वनस्पति, प्राणी और मनुष्य सभी पर इन दिनों उमंगों की वर्षा होती है। विशिष्ट आत्माओं के लिए तो यह अवसर एक प्रकार से जीवन प्राण ही है। उन पर इन दिनों दिव्य लोक से अमृत भरे अनुदान बरसते हैं। युग निर्माण मिशन का उद्गम तो इस धुरी से सम्बद्ध समझा जाना चाहिए।
सन् 78 का बसन्त पुनर्गठन योजना की मध्यवर्ती धुरी है। इस जागृत आत्माओं के लिए महाकाल का−युग देवता का अतिरिक्त संदेशवाहक समझा जाना चाहिए। इसकी तुलना नव−जागृति के एक विशेष उभार से की जा सकती है। इस पुण्य घड़ी में नव युग की ऊषा अभिनव अरुणोदय के साथ झांकती देखी जा सकती है।
प्रस्तुत अरुणोदय की प्रथम उद्बोधन किरण अपने देव परिवार को इस रूप में हृदयंगम करनी चाहिए कि इन दिनों युग परिवर्तन की पुण्य बेला का विशिष्ट समय है। ऐसे उथल−पुथल के समय ऐसे विशेष व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ती है जो विशेष परिस्थितियों का सामना करने में समर्थ हों। ऐसे ही लोग युग पुरुष कहलाते हैं। उन्हें सृष्टा के विशिष्ट पार्षदों का देवदूतों का श्रेय मिलता है। हम में से प्रत्येक को अपनी विशेष स्थिति इसी वर्ग की आत्माओं में समझनी चाहिए और अपने निर्धारित कर्त्तव्यों को पहचानने और अपनाने के लिए जागरुकता का परिचय देना है।
दूसरी प्रकाश किरण हम सबके अन्तःकरण में इस रूप में प्रविष्ट होनी चाहिए कि हमें−विशिष्ट उद्देश्य के लिए इस विशेष अवसर पर विशेष प्रयोजन के लिए भेजा गया है । वर्तमान जन्म हमें उसी प्रयोजन के लिए लगाना चाहिए।
यों मानव जीवन ही परमेश्वर की विशेष धरोहर है। जो सौभाग्य अन्य किसी प्राणी को नहीं मिला, उसे मनुष्य को विशुद्ध अमानत के रूप में दिया गया है। सृष्टा के विश्व उद्यान को अधिक सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत बनाने के लिए ही यह थाती मनुष्य को मिली है, पर जागृत आत्माओं को तो युग परिवर्तन की इस पुण्य बेला में विशेष देवदूत की तरह ही भेजा गया है। हम सब अपने को इसी रूप में मानें और पेट, प्रजनन भर के लिए जीवित न रहकर अपने कन्धों पर आये नव−निर्माण के विशेष उत्तरदायित्व को वहन करें।
एक और तीसरी प्रकाश किरण को भीतर प्रवेश करने के लिए हमें अपना द्वार खोलना चाहिए कि दैवी साझेदारी का आमन्त्रण अवसर सामने खड़ा है। उसे स्वीकार या अस्वीकार करने का निर्णय उन्हीं घड़ियों में किया जाना है। अनिर्णीत स्थिति देर तक चलती रहने वाली नहीं।
इस बसन्त पर्व की साझीदारी के विशेष निमन्त्रण के रूप में ही समझना चाहिए। सामान्य मनुष्य के लिए असामान्य की साझेदारी सदा ही सौभाग्य का चिन्ह सिद्ध होती रही है। सफल व्यवसाय फर्मों के शेयर खरीदकर लोग लम्बा मुनाफा घर बैठे कमाते रहते हैं। राजाओं के सामान्य दरबारी भी जागीरदार बन जाते थे। दैवी तत्वों के साथ साझीदारी बनाकर कितने सामान्य व्यक्ति महात्मा, देवात्मा एवं परमात्मा की स्थिति तक पहुँचते रहे हैं। महामानवों एवं सिद्ध पुरुषों की गणना ऐसे ही, दैव व्यवसाय के साझीदारों में की जा सकती है। स्मरण रखने योग्य तथ्य है कि याचना−प्रार्थना भर से कोई बड़ा प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। भिक्षा वृत्ति से किसी को गुजारे भर के लिए ही कुछ मिल सकता है। बड़ा लाभ तो उद्योग पुरुषार्थ से ही मिलता है। उच्च पद या उच्च अनुदानों में याचना की नहीं पात्रता की शर्त रहती है। ईश्वर से याचना करते रहने में नहीं उसके साथ साझीदारी बना लेने के लिए आवश्यक साहस जुटाने में बुद्धिमानी है।
अच्छा हो हम इस बसन्त पर्व पर ईश्वर के साथ साझीदारी स्थापित करने का साहस जुटायें। इसके लिए कुछ नये तथ्य स्वीकार करने होंगे। समझना होगा कि व्यापक परमेश्वर का स्थानीय प्रतिनिधि हमारे भीतर आत्मा के रूप में बैठा है। मैं हर समय चिल्लाते रहने वाला बकरा यह शरीर भर है। यह शरीरगत अहंता ही आदि से अन्त तक व्यक्तित्व पर बुरी तरह छाई हुई है। उसी ने सारे जीवन क्षेत्र पर अपना अधिकार पूरी तरह जमा रखा है। चिन्तन क्षेत्र पर लोभ और मोह के रूप में वासना और तृष्णा के रूप में शत प्रतिशत आधिपत्य जमाये हुए है। वासना और तृष्णा की, स्वार्थ और अहंकार की पेट और प्रजनन की परिधि से एक इंच आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं होता है। शरीरगत सुविधा से आगे की बात न सोचने देने की विवशता को ही माया कहते हैं। उसी की जकड़न भव बन्धन कहलाती है। उसी के निविड़ पाश में दुर्भाग्यग्रस्त बन्दी की तरह प्राणी को अगणित कष्ट सहने पड़ते हैं। लोक और परलोक बिगाड़ने वाले सारे दुर्भाग्य यम दूतों की तरह इसी स्थिति में कष्ट देते हैं। इन निविड़ बन्धनों को जो जितना ढीला कर लेता है, वह उतना ही बड़ा प्रज्ञावान समझा जाता है। जो इन बन्धनों को पूरी तरह काट सकने का पराक्रम कर सके, उसी जीवन भक्ति को परम पुरुषार्थी कहा जाता है।
साझेदारी का आरम्भ यहाँ से होना चाहिए कि हम शरीर की तरह ही आत्मा के अस्तित्व को, उसकी आवश्यकताओं की, उपलब्धियों को, उसके लाभांश को स्वीकार करें। समय, श्रम, मनोयोग, प्रतिभा और साधन यह पाँच ही जीवन व्यवसाय की उपलब्धियाँ है। इनका जितना लाभ शरीर को, जितना आत्मा को देना हो, उसका अनुपात निश्चित निर्धारित कर लेना चाहिए और उस विभाजन वितरण पर फिर आरूढ़ रहना चाहिए। प्रयत्न यह होना चाहिए जो आत्मा−परमात्मा का ही प्रतिनिधि है उसका लाभांश क्रमशः बढ़ाते रहा जाय। भक्ति भावना का−ईश्वर परायणता का यही स्वरूप है। साझेदारी इसी रूप में निभ सकती है कि साझीदारी की भी आवाज सुनी जाय, उसके हित का भी ध्यान रखा जाय और अपनी ही तरह उसका लाभांश भी उसे दिया जाय।
धन के सम्बन्ध में इतना तो करना ही चाहिए कि आत्मा और परमात्मा को घर का एक सदस्य मान लिया जाय और परिवार के प्रत्येक सदस्य के भोजन, वस्त्र, शिक्षा, चिकित्सा, विवाह स्वावलम्बन उत्तराधिकार के लिए जितना खर्च किया जाता है उतना ही परमार्थ के लिए, आत्म−कल्याण के लिए निर्धारित रखा जाय। आत्मा का अंश जीवन व्यवसाय में आधा तो है ही । उतना देना न्यायानुकूल है। इतना न बन पड़े तो उसे एक सन्तान के बराबर तो मान ही लिया जाना चाहिए और उसके लिए उस अनुपात से तो धन व्यय किया ही जाना चाहिए जितना कि एक सन्तान के हिस्से में आता है।
परमार्थ आत्म कल्याण की युग साधना के रूप में ज्ञानयज्ञ का महत्व सर्वोपरि है। इन दिनों महाकाल की सामाजिक मांग यही है। इसमें आत्म कल्याण और लोक कल्याण के दोनों तत्वों का समान समावेश है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा की चतुर्विधि आत्मोत्कर्ष साधना है आत्मनिर्माण और समाज निर्माण का उचित समन्वय है। अस्तु आत्मा के परमात्मा के हिस्से का लाभांश इसी पुण्य प्रयोजन में लगना चाहिए। इस सन्दर्भ में युग निर्माण परिवार के प्रत्येक सदस्य का न्यूनतम अंश प्रतीक चिन्ह के रूप में आरम्भ से ही सदस्यता शर्त के रूप में निर्धारित है। एक घन्टा और दस पैसा नित्य का अनुदान अपने सम्पर्क क्षेत्र में सद्ज्ञान का आलोक फैलाने के लिए निकालने के लिए कहा जाता रहा है। जिनका इतना भी आरम्भ अभी नहीं हुआ है वे उसे आरम्भ करें । जो कुछ कर रहे हैं वे उसका अनुपात बढ़ाएँ साझेदारी की ईमानदारी का परिचय इसी रूप में दिया जा सकता है। प्रस्तुत बसन्त पर्व की प्रेरणा दिव्य आत्मा की सत्ता के साथ साझेदारी आरम्भ करने के लिए विशेष रूप से है।
इस साझेदारी से लाभ ही लाभ है। मिशन के सूत्र संचालक इसी नीति को अपना कर लाभान्वित हुए है। जो उनसे प्रेरणा ग्रहण करने और साधना का समुचित लाभ उठाने के इच्छुक हों उन्हें ऐसे ही भाव−भरे अनुकरण का साहस जुटाना चाहिए। बड़ी उपलब्धियों के लिए उदात्त चिन्तन, विवेकपूर्ण निर्धारण और सत्साहस की आवश्यकता है। बसन्त पर्व इसी शर्त पर दिव्य सत्ता के साथ साझीदारी करने और प्रचुर लाभ कमाने का सन्देश अनुरोध, आग्रह लेकर उपस्थित हुआ है। इसे स्वीकार करने में ही समझदारी है।
पुनर्गठन वर्ष के समुद्र मन्थन से निकले 14 रत्न
इस विशिष्ट बसन्त पर्व पर जिन्हें कुछ आन्तरिक प्रकाश सचमुच ही उपलब्ध हो उन्हें अपनी गतिविधियों में कुछ तो परिवर्तन करना ही चाहिए। इसके लिए इतने न्यूनतम निश्चय निर्धारण कर ही लेने चाहिए। इन्हें क्रमशः अधिक उदात्त बनाने की उत्कंठा जीवित रहनी चाहिए। पुनर्गठन वर्ष के समुद्र मन्थन से बसन्त पर्व के पुण्य पर्व पर निकाले गये इन्हें 14 रत्न समझा जाय और उन्हें अपनाने का प्रत्येक युग निर्माण परिजन द्वारा सच्चे मन से प्रयत्न किया जाय।
(1) उपासना की भोजन, शयन जैसे नित्य कर्मों में सम्मिलित रखा जाय। उसकी उपेक्षा न की जाय। निर्धारण भले ही न्यूनतम हो, पर उसका पालन दृढ़ता पूर्वक किया जाय। उपासना बिना भोजन या शयन न करने का व्रत धारण किया जाय।
(2) उपासना के समकक्ष ही स्वाध्याय को भी महत्व दिया जाय। आत्म कल्याण की समस्याओं को युग के अनुरूप समाधान प्रस्तुत करने वाला सत्साहित्य ही स्वाध्याय की आवश्यकता पूरी कर सकता है। आज की स्थिति में सत्संग का श्रेष्ठ एवं सुगम रूप यही है। पढ़े लोग युग साहित्य पढ़ें, उसे सुनें।
जिनके पास अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना महिला जागृति अभियान आदि मिशन की पत्रिकाएँ पहुँचती हैं उनमें से प्रत्येक का पवित्र कर्तव्य यह ठहराया गया है कि उन्हें अपने परिवार तथा सम्पर्क क्षेत्र में कम से कम पाँच व्यक्तियों को पढ़ा या सुना दिया करें। एक पत्रिका का प्रकाश न्यूनतम पाँच दूसरों तक पहुँचना ही चाहिए।
(3) प्रातः आँख खुलते ही दिन का नया जन्म और रात्रि को उसका अन्त मानी जाय। एक दिन के जीवन की श्रेष्ठतम रीति−नीति के आधार पर जीने की उपयुक्त दिनचर्या बनाई और कड़ाई के साथ निवाही जाय। रात्रि को सोते समय निद्रा को दैनिक मृत्यु माना जाय और संन्यासी, वैरागी, अनासक्त, कर्मयोगी, प्रभु समर्पित भगवद् भक्ति की मनःस्थिति लेकर सोया जाय। यह प्रातः ज्ञान का चिन्तन ज्ञान योग दिन भर की कर्त्तव्यनिष्ठा कर्मयोग और रात्रि की प्रभु परायणता भक्तियोग है। इस जीवन साधना में तीनों प्रमुख योगाभ्यासों का समन्वय समझा जाय।
(4) घर में आस्तिकता का वातावरण बनाया जाय। परिवार के प्रत्येक व्यक्ति का सम्बन्ध ईश्वर के साथ जोड़ा जाय। घर में उपासना कक्ष रहे। परिवार का हर सदस्य वहाँ दो मिनट प्रणाम अभिवादन के साथ जप, ध्यान सम्पन्न करके तब भोजन ग्रहण करें। सम्भव हो तो सामूहिक प्रार्थना, आरती की परम्परा चलाई जाय। चौके में पहली रोटी के पाँच छोटे ग्रास अग्नि पर गायत्री मन्त्र के साथ होम कर तब भोजन किया जाय। इस प्रकार भारतीय संस्कृति की जननी गायत्री और भारतीय धर्म के पिता, यज्ञ के साथ पूरे परिवार का किसी न किसी रूप में सम्बन्ध सूत्र जुड़ा रहेगा।
(5) संयम, साधना, तपश्चर्या का न्यूनतम रूप यह रहे कि साप्ताहिक व्रतशीलता का निर्वाह किया जाय। गुरुवार या अन्य कोई दिन व्रत पालन का दिन नियत रहे। उस दिन उपवास, ब्रह्मचर्य एवं मौन व्रत का किसी न किसी रूप में निर्वाह किया जाय। उपवास, शाकाहार, फलाहार या दूध, छाछ पर रखा जाता है पर वैसा न बन पड़े तो अस्वाद व्रत नमक, शकर का त्याग तो निवाहा ही जाय। उस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें। लगभग कम से कम दो घण्टे मौन साधन का नियम बनायें। उस समय यथा सम्भव एकान्त के वातावरण में रहें और आत्म−शोधन एवं आत्म−विकास की समस्याओं पर विशेष रूप से मनन चिन्तन करें।
(6) अंश दान आवश्यक मानें। ज्ञान घट स्थापित करें। एक घंटा समय और दस पैसा ज्ञान यज्ञ के लिए नियमित रूप से निकालें । सम्भव हो तो अधिक समय और अधिक धन निकालने का साहस किया जाय।
(7) परिवार को सुसंस्कारी करने के लिए अनुचित कर्त्तव्य मानें। उन्हें प्रसन्न करने के लिए अनुचित सुविधाएँ न जुटाएँ परिवार के लोगों के साथ हँसने, खेलने, विचार विमर्श एवं साथ−साथ मिल−जुलकर काम करने के लिए समय निकालें । इस नियमित सम्पर्क का उद्देश्य परिवार परम्परा में (1) श्रमशीलता (2) सुव्यवस्था (3) सादगी मितव्ययिता (4) शिष्ट सज्जनता (5) उदार सहकार की सत्प्रवृत्तियों का अधिकाधिक समावेश करना चाहिए। परिवार को सद्गुणों की पाठशाला एवं नर−रत्नों की खदान बनाने की रूप रेखा बनाई और कार्यान्वित की जाय।
(8) पारिवारिक उत्तरदायित्वों से यथा सम्भव जल्दी निवृत्त होकर वानप्रस्थ की महान परम्पराओं को अपनाने का लक्ष्य रखा जाय। सन्तानें बढ़ाई न जायँ। बड़े बच्चों को अपने छोटे भाई−बहिनों का उत्तरदायित्व निभाकर पितृ ऋण चुकाने की आवश्यकता आरम्भ से ही समझाई जाय। यह एक क्षण के लिए ही नहीं आत्मा और परमात्मा के प्रति भी कुछ कर्त्तव्य हैं और उनका निर्वाह सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन में अधिक बड़े अनुदान प्रस्तुत करने पर ही सम्भव हो सकता है।
(9) स्मरण रखा जाय नव−निर्माण जैसे सुविस्तृत कार्य के लिए सामूहिक प्रयत्न ही सफल हो सकते हैं। सेतुबन्ध में रीछ−वानरों का, गोवर्धन उठाने में ग्वाल−बालों का, धर्मचक्र प्रवर्तन में चीवरधारी बौद्ध भिक्षुकों का, स्वतन्त्रता संग्राम में सत्याग्रही सैनिकों का सम्मिलित प्रयास ही सफल हो सकता था। देवताओं की सम्मिलित शक्ति से दुर्गावतरण और ऋषियों के रक्त घट संचय से सीता जन्म की कथा सर्वविदित है। युग परिवर्तन सज्जनों के सामूहिक प्रयत्नों से ही बन पड़ेगा। इसके लिए युग निर्माण संगठन का महत्व समझा जाय और उसके गठन एवं पुष्टिकरण के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहा जाय।
(10) युग निर्माण मिशन के सूत्र संचालक को एक वृक्ष माना जाय और परिवार का प्रत्येक कर्मठ परिजन अपने आपको उसकी शाखा मानें। एक शाखा की न्यूनतम दस टहनी होनी आवश्यक है। इसका अर्थ यह हुआ कि सृजन सैनिकों में से प्रत्येक को अपनी विकास परम्परा में दस साथी सहयोगियों को जोड़ों रहने का प्रयत्न करना चाहिए। युग निर्माण मिशन की वंश परम्परा इसी प्रकार चल रही है। हिमालय का उद्गम केन्द्र शक्ति उगलता है उसकी एक धारा मिशन का सूत्र संचालक तन्त्र है । इस तन्त्र ने अपनी शाखा प्रशाखा हजारों लाखों की संख्या में विकसित की है। यह परम्परा युग निर्माण परिवार की है। सूत्र संचालक वृक्ष, प्रत्येक कर्मठ परिजन उसकी शाखा प्रत्येक शाखा की न्यूनतम दस टहनी । टोली नायक, कार्यवाहक, कर्मठ कार्यकर्त्ता, व्रतधारी वानप्रस्थ आदि सभी वर्गों के नर-नारी परिजन इसी प्रक्रिया को अपनायें । अपना सम्बन्ध सूत्र इसी आधार पर सुदृढ़ परिपक्व बनायें।
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सागर मंथन किया बहुत अब मानस मंथन करो। सखे! अब मानस मंथन करो॥
रई आत्म-चिन्तन वाली हो। रज्जु विवेकमयी डाली हो॥
चले मनन का क्रम अन्तर में। लहरें उठें हृदय-सागर में॥
प्रिय! अपने ही मनोविकारों से संघर्षण करो। सखे! नितप्रति संघर्षण करो॥
असद अशिव को बाहर करके। भव्य विचार जगाकर उर के॥
रत्न निकालो सद्गुण वाले। जिनकी द्युति में विश्व नहाले॥
कल्मष त्यागो! जीवन-पद्धति में परिवर्तन करो। सखे! अभिनव परिवर्तन करो॥
शशि-सी शीतलता अपनाओ। श्रम की लक्ष्मी को ले आओ॥
दया, क्षमा, ममता और सेवा। वितरित करो प्यार की मेवा॥
दिव्य गुणों से मानवता का शुभ अभिनन्दन करो। सखे! हार्दिक अभिनन्दन करो॥
सम्वेदन की सुधा बहाओ।सबको ही यह अमृत पिलाओ॥
मानव रहे देवता बनकर। स्वर्ग उतर आये पृथ्वी पर॥
इन तपते मैदानों को हिमगिरि का नन्दन करो। सखे! इस जग को नन्दन करो॥
-माया वर्मा
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*समाप्त*