जीवन ईश्वर है या ईश्वर जीवन, इस प्रश्न पर ताओ धर्म के दार्शनिक बहुत समय तक विचार करते रहे और अन्ततः वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जीवन मनुष्य के लिए ईश्वर का सर्वोपरि उपहार है। इसकी गरिमा इतनी बड़ी है जितनी इस संसार में अन्य किसी सत्ता की नहीं। इसलिए उसे ईश्वर के समतुल्य माना जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
ईश्वर की झाँकी जीवन सत्ता की संरचना और संभावना को देखकर की जा सकती है। यदि उसकी ठीक तरह उपासना की जा सके तो वे सभी वरदान उपलब्ध हो सकते हैं जो ईश्वर के अनुग्रह से किसी को कभी मिल सके हैं। यह प्रत्यक्ष देवता है। हमारे इतना समीप है कि मिलन से उत्पन्न असीम आनन्द की अनुभूति अहर्निशि की जा सके।
जीवन का उद्देश्य है, अपने अन्तराल में छिपे दिव्य का, अद्भुत का, सुन्दर का, दर्शन कराना। उस ईश्वरीय जीवन के साथ जोड़ देना जो इस ब्रह्माण्ड की आत्मा है। पूर्ण है और वह सब है जिसमें मानवी कल्पना से भी कहीं अधिक सौन्दर्य का- सुखद का- सागर लहराता है।
ईश्वर को समझना हो तो जीवन को समझो। ईश्वर को पाना हो तो जीवन को प्राप्त करो। हम जीवन रहित जिन्दगी जीते हैं। इससे आगे बढ़ें, गहरे घुसें, निर्मल करें और उस महान अवतरण को प्रतिबिम्बित करें जो प्रेम के रूप में आत्म सत्ता के अन्तराल में आलोक की एक किस्म जैसा विद्यमान है। आत्मा को दिव्य से ओत-प्रोत करने की साधना से ही वह सब प्राप्त हो सकता है, जिसे जीवन का लक्ष्य और वरदान कहा गया है।
-सन्त टी. एल. वास्वानी
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भक्ति मार्ग की गरिमा सर्वोपरि है क्योंकि वह भाव सम्वेदनाओं की उच्च स्थिति है, यह उच्च भावनाएँ तभी उत्पन्न होती हैं जब चेतना अधिक परिष्कृत स्थिति में जा पहुँचती है इससे निम्न परिस्थिति में छोटे स्तर ही सक्रिय हो पाते हैं। कृमि कीटकों में मात्र शरीरगत सक्रियता ही देखने में आती है। पशु-पक्षियों में ज्ञान का उदय होते देखा जा सकता है। भावनाएँ तो उनमें से कुछेक में ही सीमित मात्रा में पाई जाती हैं। वे सहचरत्व एवं प्रजनन प्रभाव से प्रभावित रहती हैं। नर का मादा के प्रति और मादा का नवजात शिशुओं तक एक सभा तक प्यार रहता है। मनुष्य शरीर में भी यह विकास स्तर इसी क्रम से उभरता है। वनमानुषों में कर्म की प्रधानता रहती है उनमें ज्ञान, विवेक, स्वल्प मात्रा में होता है। कुछ और विकसित समझे जाने वाले लोग शिक्षित, चतुर, बहुज्ञ व्यवहार कुशल तो होते हैं, पर उनमें करुणा-ममता उदारता जैसी भाव-संवेदनाएँ तथा सदुद्देश्यों में श्रद्धा, निष्ठा जैसे उत्कृष्टताएं स्वल्प मात्रा में ही देखी जाती हैं। इनका विकास आत्मिक प्रगति की ऊँची कक्षा में पहुँचने पर होता है। इसलिए सामान्य लोगों को कर्म प्रधान पार्थिव पूजा, परिक्रमा, तीर्थ यात्रा, व्रत, मौन, जप, कीर्तन जैसी क्रिया उपासनाएं बताई जाती हैं। ज्ञान भूमिका में पहुँचने पर स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन, ध्यान, धारणा जैसी चिन्तन प्रधान साधनाओं में नियोजित किया जाता है। सबसे ऊँची स्थिति भाव सम्वेदनाओं के उभार उल्लास की है। इसी में भक्तियोग बन पड़ता है। आत्मवत् सर्व भूतेषु-वसुधैव कुटुम्बकम् की मान्यता इसी आत्म विश्वास की स्थिति में हृदयंगम हो पाती है। सब हमारे-हम सबके की उच्च मनोभूमि बन पड़ने पर मनुष्य साधु-ब्राह्मण, परिव्राजक, लोकसेवी की तरह आचरण करता है उसका ‘अहम्’ विस्तृत होते-होते ‘त्वम्’ बन जाता है। यह समर्पण-विसर्जन अद्वैत, तत्व दर्शन के रूप में अन्तःचेतना पर आच्छादित होता है तो मनुष्य ऋषि कल्प बन जाता है, ऐसे लोगों को पृथ्वी के देवता कहते हैं। अन्तःस्थिति के अनुरूप उनमें देवोपम सामर्थ्य भी होती है।
आत्मिक प्रगति की उच्च भूमिका में आनन्द की प्राप्ति होती है। उसके पहले ज्ञानजन्य सन्तुष्टि और कर्मजन्य समृद्धि पुष्टि भर का सुख संतोष मिल पाता है। उच्च आत्मिक भूमिका में पहुँचे हुए व्यक्ति को उच्च-स्तरीय भाव संवेदनाओं से पुलकित पाया जाता है। इसे भक्ति कहते हैं। भक्ति भगवान की, की जाती है। प्रेम का आरंभ, आरोपण श्रेष्ठता के समुच्चय भगवान में श्रद्धा के रूप में किया जाता है। इस व्यायामशाला में परिपुष्ट हुई सबलता जन समूह के मध्य अपना चमत्कार दिखाती है। उसके प्रेम अनुदान का प्रसाद पाकर असंख्य व्यक्ति ऊँचे उठते- पार होते और धन्य बनते हैं।
परमात्मा क्या है? उसकी अनुभूति मनुष्य को किस रूप में होती है। इसका रहस्योद्घाटन करते हुए ऋचा में कहा गया है- ‘रसो वै सः। रसं ह्येवाय लब्ध्वानन्दी भवति। स एवरसानाँ रस तमः। अर्थात् वह परमात्मा ‘रस’ है। उस रस का पान कर आनन्द से ओत-प्रोत बना जाता है। वह रसों में सर्वोत्तम रस है।
उपनिषद्कार भगवान को मधु ब्रह्म कहते हैं - ‘मधु क्षरति तद् ब्रह्म’ अर्थात् जिसमें मधुरता टपकती है वह ब्रह्म है। ऋग्वेद में उसे ‘मधु क्षरन्ति सिन्धवः।’ मधुरता बरसाने वाला समुद्र कहा है। इस मधुरता की पराकाष्ठा स्वीटेस्ट लव’ एवं सुपर मैस्ट डी लाइट’ जैसे नाम भी दिये गये हैं। ईसा के शब्दों में ‘गौड इज लव’- प्रेम ही परमेश्वर है। सन्त इमर्सन के शब्दों में ‘दि एसेन्स आफ गौड इज लव’- परमात्मा का सार तत्व प्रेम है। संत ब्रौनिका की अनुभूति है- ‘व्हियर प्लेजर दियर इज गौड’ उल्लास वहीं है जहाँ परमात्मा है।
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मनुष्य की चेतना सत्ता में मूलतः वह क्षमता मौजूद है, जिसके सहारे वह अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों का समुचित उपयोग कर सके। यह क्षमता उसने खो दी है। वह प्रसुप्त, विस्मृत एवं उपेक्षित गर्त में पड़ी रहती है। किसी काम नहीं आती। इसके बिना प्रगति रथ किसी भी दिशा में महत्वपूर्ण यात्रा कर नहीं पाता। मात्र जीवन निर्वाह क्रम पूरा होते रहने भर का लाभ उस क्षमता से उठा सकना संभव होता है। यह उस प्रचण्ड क्षमता का एक अत्यन्त स्वल्प अंश है। विपुल रत्न भण्डार के अधिपति को मात्र पेट भरने ओर तन ढंकने जितने साधन उपलब्ध हो सके तो यह उसके लिए दुर्भाग्य की ही बात है। इस स्थिति का अन्त करके स्वसम्पदा का ज्ञान और उपयोग कर सकना आत्म-विज्ञान की सहायता से संभव होता है। योगाभ्यास की टार्च और तपश्चर्या की कुदाली लेकर अपनी इसी पैतृक सम्पदा को उपलब्ध करने का प्रयत्न किया जाता है।
व्यामोह ही भव बंधन है। भव बंधनों में पड़ा हुआ प्राणी कराहता रहता है और हाथ पैर बंधे होने के कारण प्रगति पथ पर बढ़ सकने में असमर्थ रहता है। व्यामोह की माया कहते हैं। माया का अर्थ है नशे जैसी खुमारी जिसमें एक विशेष प्रकार की मस्ती होती है। साथ ही अपनी मूल स्थिति की विस्मृति भी जुड़ी रहती है। संक्षेप में विस्मृति और मस्ती के समन्वय को नशे की पिनक कहा जा सकता है, चेतना की इसी विचित्र स्थिति को माया, मूढ़ता, अविद्या, भव बंधन आदि नामों से पुकारा जाता है।
ऐसी विडम्बना में किस कारण प्राणी बँधता, फंसता है? इस प्रश्न पर प्रकाश डालते हुए आत्म दृष्टाओं ने विषय बनी वृत्ति को इसका दोषी बताया है। विषयवती वृत्ति की प्रबलता को बन्धन का मूल कारण बताते हुए महर्षि पातंजलि ने योग दर्शन के कुछ सूत्रों में वस्तुस्थिति पर प्रकाश डाला है।
विषयवती वा प्रवृत्तित्पत्रा मनसः स्थिति निबंधिनि।
-यो.द. 1-35
सत्व पुरुषायोरत्यन्ता संकीणयोः प्रत्यया विशेषोभोगः। परार्थात्स्वार्थ संयमात्पुरुषा ज्ञानम्।
-यो. द. 3-35
ततः प्रतिम श्रावण वेदनादर्शा स्वाद वार्ता जायन्ते।
-यो.द. 3-36
उपरोक्त सूत्रों में यह बताने का प्रयत्न किया गया है कि शारीरिक विषय विकारों में आसक्ति बढ़ जाने से जीवन अपनी मूल स्थिति को भूल जाता है और उन रसास्वादनों में निमग्न होकर भव बंधनों में बंधता है।
लालची मक्खी और चींटी की आसक्ति, आतुरता उसे विपत्ति के बंधनों में जकड़ देती है और प्राण संकट उपस्थित करती है। चासनी को आतुरतापूर्वक निगल जाने के लोभ में यह अबोध प्राणी उस पर बेतरह टूट पड़ते हैं और अपने पंख, पैर उसी में फंसाकर जान गंवाते हैं। मछली के आटे की गोली निगलने और पक्षी के जाल में जा फंसने के पीछे भी वह आतुर आसक्ति ही कारण होती है, जिसके कारण आगा-पीछा सोचने की विवेक बुद्धि को काम कर सकने का अवसर ही नहीं मिलता।
शरीर के साथ जीव का अत्यधिक तादात्म्य बन जाना ही आसक्ति एवं माया है। होना यह चाहिए कि आत्मा और शरीर के साथ स्वामी सेवक का-शिल्पी उपकरण, का भाव बना रहे। जीव समझता रहे कि मेरी स्वतंत्र सत्ता है। शरीर के वाहन, साधन, प्रगति यात्रा की सुविधा भर के लिए मिले हैं। साधन की सुरक्षा उचित है। किन्तु शिल्पी अपने को- अपने सृजन प्रयोजन को भूल कर-उपकरणों में खिलवाड़ करते रहने में सारी सुधि-बुधि खोकर तल्लीन बन जाय तो यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण ही होगी। तीनों शरीर तीन बंधनों में बंधते हैं। स्थूल शरीर इन्द्रिय लिप्सा में, वासना में। सूक्ष्म शरीर (मस्तिष्क) सम्बन्धियों तथा सम्पदा के व्यामोह में। कारण शरीर-अहंता के आतंक फैलाने वाले उद्धत प्रदर्शनों में। इस प्रकार तीनों शरीर-तीन बंधनों में बंधते हैं और आत्मा उन्हीं में तन्मय रहने की स्थिति में स्वयं ही भव बंधनों में बंध जाती है। यह लिप्सा लालसाएँ इतनी मादक होती हैं कि जीव उन्हें छोड़कर अपने स्वरूप एवं लक्ष्य को ही विस्मृति के गर्त में फेंक देता है। वेणुनाद पर मोहित होने वाले मृग बधिक के हाथों पड़ते हैं। पराग लोलुप भ्रमर कमल में कैद होकर दम घुटने का कष्ट सहता है। दीपक की चमक से आकर्षित पतंगे की जो दुर्गति होती है वह सर्वविदित है। लगभग ऐसी ही स्थिति व्यामोह ग्रसित जीव की भी होती है। उसे इस बात की न तो इच्छा उठती है और न फुरसत होती है कि अपने स्वरूप लक्ष्य को पहचाने। उत्कर्ष के लिए आवश्यक संकल्प शक्ति जगाई जा सकती तो इस महान प्रयोजन के लिए मिली हुई विशिष्ट क्षमताओं को भी खोजा जगाया जा सकता था। किन्तु उसके लिए प्रयत्न कौन करे ? क्यों करे ? जब विषयानन्द की ललक ही मदिरा की तरह नस-नस पर छाई हुई है तो ब्रह्मानन्द की बात कौन सोचे? क्यों सोचे?
इस दुर्गति में पड़े रहने से आज का समय किसी प्रकार कट भी सकता है, पर भविष्य तो अंधकार से ही भरा रहेगा। विवेक की एक किरण भी कभी चमक सके तो उसकी प्रतिक्रिया परिवर्तन के लिए तड़पन उठने के रूप में ही होगी। प्रस्तुत दुर्दशा की विडम्बना और उज्ज्वल भविष्य की संभावना का तुलनात्मक विवेचन करने पर निश्चित रूप से यही उमंग उभरेगी कि परिवर्तन के लिए साहस जुटाया जाय। इसी उभार के द्वारा अध्यात्म जीवन में प्रवेश ओर साधना प्रयोजनों का अवलम्बन आरंभ होता है।
परिवर्तन का प्रथम चरण है, बंधनों का शिथिल करना। आकर्षणों के अवरोधों से विमुख होना। आसक्ति को वैराग्य की मनःस्थिति में बदलना। इसके लिए कई तरह के समय परक उपायों का अवलम्बन करना पड़ता है। साधना रुचि परिवर्तन की प्रवृत्ति को उकसाने से आरंभ होती है। इस संदर्भ में महर्षि पातंजलि का कथन है।
बन्धकारण शैथिल्यात्प्राचार सम्वेदनस्य। चित्तस्य पर शरीरावेशः॥
-योग दर्शन 3-38
बंधनों के कारण ढीले हो जाने पर चित्त की सीमा, परिधि ओर सम्वेदना व्यापक हो जाती है।
मोक्षस्य नहि वासोऽस्ति न ग्रामान्तरमेव वा। अज्ञानहृदयग्रन्थिनाशो मोक्ष इति स्मृतिः॥
-शिव गीता 13।32
अर्थात् - मोक्ष किसी स्थान विशेष में निवास करने की स्थिति नहीं है। न उसके लिए किसी अन्य नगर या लोक में जाना पड़ता है। हृदय के अज्ञानांधकार का समाप्त हो जाना ही मोक्ष है।
मोक्ष में परमात्मा की प्राप्ति होती है। अथवा परमात्मा की प्राप्ति ही मोक्ष है। यह मोक्ष क्या है? भव बंधनों से मुक्ति। भव-बन्धन क्या हैं ? वासना, तृष्णा और अहंता के-काम, लोभ और क्रोध के नागपाश। इनसे बंधा हुआ प्राणी ही माया ग्रसित कहलाता है। यही नारकीय दुर्दशा का दल-दल है। इससे उबरते ही आत्मज्ञान का आलोक और आत्म-दर्शन का आनन्द मिलता है। इस स्थिति में पहुँचा हुआ व्यक्ति परमात्मा का सच्चा सान्निध्य प्राप्त करता है और ज्ञान तथा सामर्थ्य में उसी के समतुल्य बन जाता है।
अथर्ववेद में कहा गया है-
ये पुरुषे ब्रह्मविदुः ते विदुः परमष्ठिनम्।
अर्थात्- जो आत्मा को जान लेता है उसी के लिए परमात्मा का जान लेना भी संभव है। ऋग्वेद में आत्मज्ञान को ही वास्तविक ज्ञान कहा गया है। ग्रन्थों के पढ़ने से जानकारियाँ बढ़ती हैं आत्मानुभूति से अपने आप को और परम तत्व को जाना जाता है। श्रद्धा विहीन शब्द चर्या का ऊहापोह करते रहने से तो आत्मा की उपलब्धि नहीं होती। एक ऋचा है- “यः तद् न वेद, किम् ऋचा करिष्यति” जो उस आत्म-तत्व को नहीं जान पाया वह मंत्र, पाठ या विवेचन करते रहने भर से क्या पा सकेगा? उपनिषद् वचन है- “ब्रह्म विद् ब्रह्मैव भवति” अर्थात् ब्रह्म वेत्ता ब्रह्म के ही समकक्ष हो जाता है।
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आग जिस कमरे में जलती है वह पूरा का पूरा गरम हो जाता है। आग रहती- तो ईंधन की सीमा में ही है पर उसकी गर्मी और रोशनी दूर-दूर तक फैलती है। सूरज बहुत दूर होते हुए भी धरती तक अपना प्रकाश और ताप पहुँचाता है। बादलों की गरजना दूर-दूर तक सुनाई पड़ती है। प्राणवान् व्यक्ति अपने प्रचण्ड व्यक्तित्व का प्रभाव सुदूर क्षेत्रों तक पहुँचाते हैं और व्यक्तित्वों को ही नहीं परिस्थितियों को भी बदलते हैं। वातावरण उनसे प्रभावित होता है। यह प्रभाव उत्पन्न करने वाली क्षमता प्राण शक्ति ही है भले ही वह किसी भी रूप में काम कर रही हो। यह देव और दैत्य दोनों स्तर की हो सकती है। उसके अनुचित प्रयोग से वैसा ही विनाश भी होता है जैसे कि उचित प्रक्रिया से सत्परिणाम उत्पन्न होते हैं। दैवी, आसुरी शक्तियों के बीच संघर्ष होते रहने के सूक्ष्म कारणों में यह प्राण प्रक्रिया का टकराव ही मुख्य कारण होता है।
ताप का मोटा नियम यह है कि अधिक ताप अपने संस्पर्श में आने वाले न्यून ताप उपकरण की ओर दौड़ जाता है। एक गरम दूसरा ठंडा लोह खण्ड सटाकर रखे जायं तो ठंडा गरम होने लगेगा और गरम ठंडा। वे परस्पर अपने शीत ताप का आदान-प्रदान करेंगे और समान स्थिति में पहुँचने का प्रयत्न करेंगे।
बिजली की भी यही गति है। प्रवाह वाले तार को स्पर्श करते ही सारे सम्बद्ध क्षेत्र में बिजली दौड़ जाएगी। उसकी सामर्थ्य उस क्षेत्र में बंटती जाएगी। प्राण विद्युत का प्रभाव भी शीत ताप के सान्निध्य जैसा ही होता है। प्राणवान् व्यक्ति दुर्बल प्राणों को अपना बल ही नहीं स्तर भी प्रदान करते हैं। ऋषियों के आश्रमों में सिंह और गाय के प्रेम पूर्वक निवास करने का तथ्य इसीलिए देखा जाता था कि प्राणवान् अपनी सद्भावना से उन पशुओं को भी प्रभावित कर देते थे। बिजली लोहे-सोने में, सन्त-कसाई में कोई भेद नहीं करती वह सब पर अपना प्रभाव समान दिखाती है जो भी उससे जैसा भी काम लेना चाहे वैसा करने में उसकी सहायता करती है, पर मानव शरीर में संव्याप्त विद्युत की स्थिति भिन्न है। उसमें चेतना और सम्वेदना के दोनों तत्व विद्यमान हैं। वह समस्त शरीर पर शासन करती है-मस्तिष्क उसका केन्द्र संस्थान है। इतने पर भी उसे शरीर शक्ति नहीं कह सकते। बल्ब में जलने वाली बिजली उसी में से उत्पन्न नहीं होती, वरन् अन्यत्र से आती है, वहाँ तो वह चमकती भर है। मानव शरीर में पाई जाने वाली बिजली वस्तुतः चेतनात्मक है। उसे प्राण प्रतिमा कहा गया है, वह शक्ति ही नहीं संवेदना भी है। विचारशीलता उसका विशेष गुण है। वह नैतिक और अनैतिक तथ्यों को अनुभव करती है और उस आधार पर भौतिक बिजली की तरह समस्वर नहीं रहती वरन् अपना प्रवाह औचित्य के पक्ष में और अनौचित्य के विरोध में प्रस्तुत करती है।
इतनी छोटी-सी खोपड़ी में इतना बड़ा कारखाना किस प्रकार संजोया जमाया हुआ है, इसे देख कर बनाने वाले की कारीगरी पर चकित रह जाना पड़ता है। यदि इतना साधन सम्पन्न इलेक्ट्रानिक मस्तिष्क बना कर खड़ा करना हो तो संसार भर के समस्त विद्युत उपकरणों के लिए बनाये गये कारखानों जितनी जगह घेरनी पड़ेगी।
निस्सन्देह मनुष्य एक जीता जागता बिजली घर है, किन्तु झटका मारने वाली बत्ती, जलाने वाली सामान्य बिजली की तुलना उससे नहीं हो सकती। जड़ की तुलना में चेतन की जितनी श्रेष्ठता है उतना ही भौतिक और जीवन विद्युत में अंतर है। प्राण विद्युत असंख्य गुनी परिष्कृत और सम्वेदनशील है।
जीव भौतिकी के नोबेल पुरस्कार प्राप्त विज्ञानी हाजक्रिन हक्सले और एकल्स ने मानवी ज्ञान तन्तुओं में काम करने वाले विद्युत आवेग इंपल्स की खोज की है। इनके प्रतिपादनों के अनुसार ज्ञान तंतु एक प्रकार के विद्युत संवाही तार हैं जिनमें निरंतर बिजली दौड़ती रहती है। पूरे शरीर से इन धागों को समेट कर एक लाइन में रखा जाय तो उनकी लंबाई एक लाख मील से भी अधिक बैठेगी। विचारणीय है कि इतने बड़े तन्त्र को विभिन्न दिशाओं में गतिशील रखने वाले यन्त्र को कितनी अधिक बिजली की आवश्यकता पड़ेगी।
शरीर के एक अवयव मस्तिष्क का स्वतंत्र रूप में विश्लेषण करें तो उसमें लगभग 10 अरब नस कोष्ट- न्यूरोन हैं। उनमें से हर एक का संपर्क लगभग 25 हजार अन्य नस कोष्टों के साथ रहता है।
मानव शरीर के इर्द-गिर्द छाये रहने वाले प्रभा मंडल के संबंध में परा मनोविज्ञानी महिला एलीन गैरेट की पुस्तक ‘अवेयर नेस’ में अनेक शोध विवरण छपे हैं, जिसमें उन्होंने शरीर के इर्द-गिर्द एक विद्युतीय कुहरे का चित्राँकन किया है। वे इस कुहरे के रंगों एवं उभारों में होते रहने वाले परिवर्तनों को विचारों के उतार चढ़ाव का परिणाम मानती हैं। इस प्रभाव मंडल के चित्र सोवियत विज्ञानी ‘कीरलिएन’ ने भी उतारे हैं और उनमें परिवर्तन होते रहने की बात कही है। इन प्रभा परिवर्तनों को मात्र विचारों का ही नहीं शारीरिक, स्वास्थ्य का प्रतीक भी माना गया और उनके आधार पर शरीर के अन्तराल में छिपे हुए रोगों के कारण भी परखे गये। इस प्रकार के परीक्षणों में मास्को मेडीकल इन्स्टीट्यूट के अध्यक्ष पावलेन कोव ने विशेष ख्याति प्राप्त की है और उन्होंने रोग निदान के लिए प्रभा मंडल के अध्ययन को बहुत उपयोगी माना है।
इस प्रभा मंडल को प्रत्यक्ष सूक्ष्म शरीर की संज्ञा दी गई है। उसका वैज्ञानिक नामकरण ‘दि बायोलॉजिकल प्लाज्मा बॉडी’ किया गया है। कजाकिस्तान के किरोव विश्वविद्यालय की शोधों में कहा गया है कि यह प्रभा मंडल के ऊर्जा शरीर को उत्तेजित विद्युत अणुओं का समूह मानने में हर्ज नहीं, पर उसमें इतना और जोड़ा जाना चाहिए कि उसमें जीवाणुओं का भी होना है साथ ही उसकी सत्ता मिश्रित होने पर एक व्यवस्थित एवं स्व-संचालित इकाई है। उसमें अपनी उत्पादन, परिग्रहण एवं परिप्रेषण क्षमता मौजूद है।
येल विश्व विद्यालय की न्यूरो एकेडमी के प्रो. हेराल्डवर ने प्रमाणित किया है प्रत्येक वाणी एक ‘इलेक्ट्रो डायनेमिक’ आवरण से घिरा है। उसकी चेतनात्मक क्षमता को इसी क्षेत्र के कारण बाहर भगाने और दूसरे प्रभावों को पकड़ने की सुविधा होती है। इस विद्युतीय आवरण की शोध में आगे चलकर विज्ञानी लियोनाई रोविंग ने यह प्रमाणित किया कि वह लोह कवच नहीं है वरन् मस्तिष्क के प्रभाव से उसे हलका भारी- उथला और गहरा किया जा सकता है। उसकी कार्य क्षमता घटाई या बढ़ाई जा सकती है।
विश्व ज्ञान की असीम सम्पदा को ‘यूनिवर्सल मेमोरी ऑफ नेचर’ कहा जाता है। इसी की चर्चा ‘बुक ऑफ लाइफ’ के नाम से भी होती है। इस पुस्तक में विश्व चेतना का आरंभ से अब तक का इतिहास अंकित है। माइक्रो फिल्मों की विशालकाय लाइब्रेरी की तरह इसे समझा जा सकता है। मोटे रूप में तो पता नहीं चलता कि कहाँ क्या-क्या अभिलेख अंकित हैं, पर विशेषज्ञ यह तलाश कर सकते हैं कि इन संग्रहालय की अलमारी के किस खाने में किस स्थान पर क्या रखा हुआ है? इस कला में प्रवीणता प्राप्त करने के लिए मस्तिष्कीय विद्या की साधना की जाती है। इस प्रक्रिया को पदार्थ वैज्ञानिक अपने ढंग से और आत्म विज्ञानी अपने ढंग से विकसित कर सकते हैं। ध्यान धारणा एवं तप साधना से भी यह संभव है और उन परा मनोविज्ञानी प्रयोगों से भी जो इस क्षेत्र के विशेषज्ञों द्वारा इन्हीं दिनों अपनाये जा रहे हैं।
भौतिक क्षेत्र में विद्युत की अनेकानेक विदित एवं अविदित धाराओं की महत्ता को समझा जा रहा है। उसके प्रभाव से जो लाभ उठाया जा रहा है उससे भी अधिक महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ अगले दिनों मिलने की अपेक्षा की जाती है। ठीक इसी प्रकार मानवीय विद्युत के अनेकानेक उपयोग सूझ पड़ने की संभावना सामने है। विज्ञान इस क्षेत्र में तत्परतापूर्व संलग्न है और विश्वास पूर्वक कई उपलब्धियाँ प्राप्त करने की स्थिति में है।
चैकोस्लेविया- पोलेण्ड-बुलगारिया के जीवशास्त्री मनुष्य की अतीन्द्रिय क्षमताओं के बारे में विशेष रूप से दिलचस्पी ले रहे हैं। उनने पिछले तीस वर्षों में आश्चर्यजनक सफलताएँ प्राप्त की हैं। दूर-दर्शन विचार संग्रहण-भविष्य कथन अब शोध के पुराने विषय हो गये। उसमें नई कड़ी ‘मायकोकिनेसिस’ की जुड़ी है। इस लंबे शब्द का संक्षिप्त संकेत है (पीके) इसका अर्थ है विचार शक्ति से वस्तुओं को प्रभावित एवं परिचालित करने की सामर्थ्य। जिस प्रकार आग या बिजली के सहारे वस्तुओं का स्वरूप एवं उपयोग बदला जा सकता है, उन्हें स्थानान्तरित किया जा सकता है वैसी ही संभावना इस बात की भी है कि मानव शरीर में पाई जाने वाली विशिष्ट स्तर की विद्युत धारा से चेतना स्तर को प्रभावित किया जा सकेगा। इससे न केवल अतीन्द्रिय क्षमता के विकसित होने से मिलने वाले लाभ मिलेंगे वरन् शारीरिक और मानसिक रोग निवारण में भी बहुत सहायता प्राप्त होगी।
एक रूसी परा मनोविज्ञानी कामेंस्की और कार्ल निकोलायेव ने अपनी शोधों के अनेक विवरणों का हवाला देते हुए बताया है कि दूरस्थ अनुभूतियाँ यों यदा-कदा लोगों को अनायास भी होती रहती हैं किन्तु उसके लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित करने पर इस अनुभूति को और भी अधिक स्पष्ट एवं विकसित किया जा सकता है। इस संदर्भ में हुए परीक्षणों का विस्तृत विवरण ‘कोन्सोमोल्स काया प्रावदा’ पत्र में प्रकाशित हुआ था।
मनुष्य की शारीरिक संरचना अन्य प्राणियों की तुलना में विचित्र और अद्भुत है। कर्मेन्द्रियों में हाथों की बनावट ऐसी है जिसके सहारे अनेक शिल्प कौशलों में प्रवीणता प्राप्त हो सके। आँखें मात्र देखने के ही काम नहीं आतीं वरन् उनसे निकलने वाला तेजस दूसरों को प्रभावित आकर्षित करने के भी काम आता है।
मस्तिष्क तो अपने आप में असाधारण विद्युत संस्थान है। अब तक बुद्धि बल, मनोबल की ही प्रशंसा थी। अब उन प्रवाहों का भी पता चल रहा है जो व्यापक क्षेत्र को प्रभावित करने और उसकी खोज खबर लाने में समर्थ हैं। आत्म सत्ता की गरिमा को यदि समझा जा सके और उसकी खोजबीन में- उत्पादन अभिवर्धन में लग जाया जाय तो इतना कुछ प्राप्त किया जा सकता है जो अब तक की भौतिक उपलब्धियों की तुलना में हलका नहीं भारी ही बैठेगा।
उस जमींदार ने विधवा बुढ़िया का खेत बलपूर्वक छीन लिया। बुढ़िया ने गाँव के सभी लोगों के पास इस अत्याचार से बचाने की पुकार की, पर किसी की हिम्मत जमींदार के सामने मुँह खोलने की न हुई।
दुखी बुढ़िया ने स्वयं ही साहस समेटा और जमींदार के पास यह कहने पहुँची कि खेत नहीं लौटाते तो उसमें से एक टोकरी मिट्टी खोद लेने दें, ताकि उसे कुछ तो मिलने का संतोष हो जाय।
जमींदार रजामंद हो गया, और बुढ़िया को साथ लेकर खेत पहुँचा। उसने रोते धोते एक बड़ी टोकरी मिट्टी से भर ली और कहा उसे उठवा कर मेरे सिर पर रखवा दें।
टोकरी बहुत भारी हो गई थी। जमींदार ने अकड़कर कहा-बुढ़िया इतनी सारी मिट्टी सिर पर रखेगी तो दबकर मर जाएगी।
बुढ़िया ने उलट कर पूछा “यदि इतनी सी मिट्टी से मैं दब कर मर जाऊंगी तो तू पूरे खेत की मिट्टी लेकर जीवित कैसे रहेगा?”
जमींदार ने कुछ सोचा, उसका सिर लज्जा से झुक गया और बुढ़िया का खेत लौटा दिया।
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मानवी मस्तिष्क के ‘नर्व सेल्स’ लगभग 10 अरब की संख्या में है। संसार में इन दिनों मनुष्यों की आबादी प्रायः 4 अरब है। इस समस्त संसार को मनुष्यों की तुलना में हमारे मस्तिष्क में बैठे हुए यह कोश ढाई गुने हैं। छोटे होते हुए भी अपनी दक्षता के अनुरूप किसी परिपूर्ण मनुष्य की तुलना में यह किसी भी प्रकार कम नहीं हैं। वे अपनी भीतर एक से एक बढ़कर रहस्य छिपाये बैठे हैं। प्रश्न केवल उनकी प्रसुप्ति और जागृति का है। सोता हुआ मनुष्य मृतक तुल्य होता है किन्तु यह जग पड़े तो अनेक प्रकार के पराक्रम प्रस्तुत करता है। इसी प्रकार यह ‘नर्व सेल्स’ आदि उपेक्षित पड़े रहें तो किसी प्रकार जहाँ-तहाँ पड़े अपने अस्तित्व की रक्षा भर करते रहते हैं, पर यदि उन्हें जगा दिया जाए तो उनमें से प्रत्येक को किसी देव दानव से कम शक्तिशाली नहीं पाया जायगा।
पोर्सन ग्रीक भाषा का अद्वितीय पण्डित था, उसने ग्रीक भाषा की सभी पुस्तकें और शेक्सपियर के नाटक मुख जबानी याद कर लिये थे। ब्रिटिश संग्रहालय के सहायक अधीक्षक रिचर्ड गार्नेट बारह वर्ष तक एक संग्रहालय के मुद्रित पुस्तक विभाग के अध्यक्ष थे, इस संग्रहालय में पुस्तकों की हजारों अलमारियां और उनमें करोड़ों की संख्या में पुस्तकें थीं। श्री गार्नेट अपनी कुर्सी पर बैठे-बैठे न केवल पुस्तक का ठिकाना बता देते थे, वरन् पुस्तक की भीतरी जानकारी भी देते थे।
जर्मनी के कार्लविट नामक बालक ने स्वल्पायु में आश्चर्यजनक बौद्धिक प्रगति करने वाले बालकों में अपना कीर्तिमान स्थापित किया है। वह 9 वर्ष की आयु में माध्यमिक परीक्षा उत्तीर्ण करके लिपजिग विश्वविद्यालय में प्रविष्ट हुआ और 14 वर्ष की आयु तक पहुँचने पर उसने न केवल स्नातकोत्तर परीक्षा पास की वरन् विशेष अनुमति लेकर साथ ही पीएचडी की डिग्री भी प्राप्त कर ली। 16 वर्ष की आयु में उसने उससे भी ऊंची एलएलडी की उपाधि अर्जित की और उन्हीं दिनों वह बर्लिन विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नियुक्त किया गया।
इस घटना पर टिप्पणी करते हुए “न्यूरोन फिजियोलॉजी इन्ट्रोडक्शन’ के लेखक डॉ. जी. सी. एकिल्स ने लिखा है कि यह अनुभव यह बताते हैं कि मनुष्य को बालक के रूप में उपलब्ध ज्ञान जन्मान्तरों के संस्कार के अतिरिक्त क्या हो सकता है? अतएव हमारे जीवन का सर्वोपरि ज्ञान होना चाहिए।
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अन्तःकरण चतुष्टय चेतना की क्रिया पद्धति है। यों चेतन सत्ता एक है, उंगलियों की तरह उसके पृथक-पृथक खंड एवं स्वरूप नहीं हैं और न उसके कार्य विभाजित हैं। वह एक ही शक्ति कई समय पर कई काम करती है। जब वह जो काम करती है तब उसे उस नाम से संबोधित किया जाता है। एक ही व्यक्ति वक्ता विद्यार्थी, अभिनेता, खिलाड़ी, रोगी, मित्र, शत्रु, ग्राहक, विक्रेता आदि की कई भूमिकाएँ समय-समय पर निभाते हुए देखा जा सकता है। जब वह जो काम कर रहा होगा तब उसे उसी रूप में कैमरा चित्रित करेगा और संबोधन कर्ता नाम देगा। चेतना की चार संज्ञाएं मिलने की बात ऐसी ही समझी जानी चाहिए। उन्हें चार स्वतंत्र सत्ताएँ मानने और पृथक्-पृथक् काम करने के लिए नियुक्त नहीं मानना चाहिए।
(1) मन का काम है-कल्पनाएँ करना। अन्तःवर्ती इच्छाओं एवं अनुभूतों में जहाँ सरसता की अनुभूति का उसे ज्ञान है उसी परिधि में प्रायः मन की उड़ानें उड़ती हैं। आकर्षण के अतिरिक्त दूसरा पक्ष है-भय। हानि से आत्म रक्षा भी अग्रगमन और रसास्वादन की ही तरह प्रभावोत्पादक है। सुख की उपलब्धि और दुख की निवृत्ति एक दूसरे की पूरक हैं। मन इन दोनों ही ज्वार-भाटों में उछलता रहता है। कल्पना के वह अनेक पक्ष और दृश्य उपस्थित करता है, जिसके सहारे चेतना की अगली परत बुद्धि को उचित-अनुचित का संभव-असंभव का निर्णय करने में सुविधा रहे। इन दोनों उभारों के बीच एक विनोदी, मनमौजी पक्ष भी है, जिसे निरर्थक अस्त-व्यस्त कह सकते हैं। कई बार अप्रासंगिक विचार भी उठते रहते हैं। यों उनका भी कहीं न कहीं किसी पूर्व स्मृति से संबंध होता है। सर्वथा नवीन एवं अपरिचित प्रसंग के विचार कदाचित ही कभी आते हैं। वे अपनी पूर्व ज्ञान भूमिका में ही विचरण करते रहते हैं।
(2) बुद्धि वह तत्व है जिसे विशालकाय विचार क्षेत्र में से उपयोगी अनुपयोगी का निर्णय करना पड़ता है। उसे न्यायाधीश कह सकते हैं। अनेकों गवाहों, वादी, प्रतिवादियों, वकीलों और सिफारिशी लोगों ने अपनी-अपनी बातें अपने समय और ढंग से कहीं होती है। न्यायाधीश अपने विवेक से इस जाल-जंजाल में से औचित्य तलाश करता है और तद्नुसार फैसला करता है। बुद्धि प्रायः यही भूमिका निभाती है। उसे स्वार्थ को प्रधानता देनी पड़ती है। सामान्य स्थिति में शक्य और स्वार्थ का समन्वय ही उसकी न्याय संहिता होती है। परिष्कृत बुद्धि जिसे गायत्री मंत्र में धी और तत्व दर्शन में ऋतम्भरा कहा गया है वह स्वार्थ की परिधि से ऊपर उठकर मात्र औचित्य और आदर्श को ही प्रधानता देती है। बुद्धि का स्तर जो भी हो निर्णय तो तदनुरूप ही होंगे, पर काम उसका निर्णय करना ही होगा।
(3) चित्त को निर्धारण कह सकते हैं। मन की कल्पनाओं में से ग्राह्य ठहरा देने का निर्णय करना बुद्धि का काम है, पर आवश्यक नहीं कि वे निर्णय क्रिया रूप से परिणित होने के निश्चय तक जा पहुँचे। आकाँक्षा, संकल्प और साहस के समन्वय से ही वह मनोभूमि बनती है, जिसमें कुछ करने के लिए कदम उठते हैं। मंजिल पर चलने के लिए अनेक साधन जुटाने पड़ते हैं और अवरोधों को निरस्त करने के अनेक उपाय सोचने पड़ते हैं। इसकी तैयारी किसी सुनिश्चित निर्धारण के उपरान्त ही होती है। विचार को प्रयास में परिणित करने वाले संस्थान को व्यावहारिक प्रयोजनों में चित्त कहते हैं।
चित्त को वैज्ञानिक भाषा में अचेतन कहा जाता है। असंख्य शरीर में रहने के कारण उसे काय संचालन की मूलभूत क्रिया-प्रक्रिया का परिचय है। अस्तु वह अपने अनुभवों के आधार पर रक्त संचार, आकुंचन-प्रकुंचन, श्वास-प्रश्वास, ग्रहण-विसर्जन, निद्रा-जागृति आदि के क्रिया-कलापों को अनवरत गति से सम्पन्न करता रहता है। स्वसंचालित एवं अनैच्छित, शरीर संचालन की कार्य सिद्धि इस चित्त संस्थान के माध्यम से ही सम्पन्न होती है।
भले-बुरे संस्कार इसी चित्त में जमे रहते हैं। आदतों की जड़ इसी भूमि में घुसी रहती है। तप साधनाओं का उद्देश्य इस चित्त की दिशा धारा मोड़ने, मरोड़ने, भुलाने, सिखाने का अति महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न करके व्यक्तित्व का निर्माण करना ही होता है।
(4) अहंकार-चेतना की वह परत है, जिसमें अपने आपे के सम्बन्ध में मान्यताएँ जमी रहती हैं। अहंकार का अर्थ घमण्ड भी होता है, पर तत्व चर्चा में इस शब्द को आत्म अस्तित्व-ईगो- के संदर्भ में ही प्रयुक्त किया जाता है। तमोगुण का एक अर्थ क्रोधी स्वभाव भी है, पर तत्व चर्चा में उसे आलस्य, प्रमाद, निराशा जैसी चेतनात्मक जड़ता के लिए ही प्रयुक्त किया जाता है। अहं का तात्पर्य स्व सत्ता की अनुभूति, का स्तर ही समझा जाना चाहिए।
व्यक्ति अपने सम्बन्ध में मान्यता स्वयं निर्धारित करता है। इस आधार पर उसकी आकांक्षा उभरती है और दृष्टिकोण बनता है। आस्था, निष्ठा इसी क्षेत्र का उत्पादन है। इसे व्यक्तित्व का बीज भी कह सकते हैं। बाह्य जीवन इसी की प्रतिक्रिया है। आत्म मान्यता के आधार पर ही व्यक्ति की- आकांक्षा, विचारणा एवं क्रिया को दिशा एवं गति मिलती है। बाह्य जीवन में मनुष्य जैसा भी कुछ है उसे अन्तःस्थिति की प्रतिच्छाया मात्र समझा जा सकता है। योगाभ्यास इसी परत को प्रभावित करने के लिए किये जाते हैं। श्रद्धा और भक्ति के भाव संचार ही अहंता का स्तर बदल सकने में समर्थ होते हैं।
चिन्तन को इन चारों परतों का समन्वय करने से समग्र ज्ञान साधना का उद्देश्य पूर्ण होता है। इनमें से एकाध का ही उपयोग किया जाय तो बात अधूरी रह जाएगी और विचार शक्ति का जो लाभ मिलना चाहिए वह मिल न सकेगा।
कल्पना के आधार पर किसी तथ्य के मानसिक चित्र तैयार किये जाते हैं। जिस प्रकार किसी इमारत के लिए कागजी नक्शे या अच्छी तस्वीर के लिए पेन्सिल-स्केच तैयार किये जाते हैं उसी प्रकार कल्पना की तूलिका अभीष्ट प्रयोजन का एक अनगढ़ चित्र तैयार करती है। मन का यही काम है वह तरह-तरह की उड़ानें उड़ता रहता है। आकांक्षाओं के अनुरूप मानस पटल पर तस्वीर बनाता रहता है। अगला काम विवेक बुद्धि का है वह इसमें से उपयुक्त-अनुपयुक्त की काट-छांट करती है। फिल्म खींचते समय कैमरा द्वारा ढेरों फिल्म खिंचती हैं। डायरेक्टर उसमें से उपयुक्त अनुपयुक्त की कांट-छांट करता है। बेकार भाग को निकाल कर फेंक देता है और उपयोगी अंशों को इधर से उधर जोड़ गाँठ करके उसका कारगर ढाँचा खड़ा करता है। बच्चे कुछ भी कहते-कुछ भी माँगते रहते हैं, बड़े उसमें से काम की और बेकाम की बातों का अंतर करते हैं और उनके लिए क्या करना चाहिए इसका निर्णय करते हैं। बुद्धि की कसौटी पर खरे खोटे की परख होती रहती है। कल्पना में से उपयोगी अंश छाँट निकालना उसी का काम है।
विचारों का कार्यों के साथ चिरकाल तक समन्वय बना रहने से वैसा स्वभाव बन जाता है और अनायास ही उस प्रकार की इच्छा उठने और क्रिया होने लगती है। इसी को संस्कार या चित्त कहते हैं। इच्छा, ज्ञान, अभ्यास, वातावरण, समर्थन आदि अनेक कारणों से जीवात्मा के ऊपर एक आवरण बनता है। यही अहंकार है। यह है तो आत्मा से पृथक मान्यताओं और गतिविधियों से विनिर्मित पर चेतना के साथ अत्यधिक घनिष्ठ हो जाने से वह उसी का अंश लगने लगता है। साँप की केंचुल या बल्ब के काँच की उसे उपमा दी जा सकती है। इस अहंकार को ही व्यक्तित्व कह सकते हैं। ईश्वर और जीव की पृथकता की प्रमुख दीवार यही है। उपासना द्वारा ईश्वर को आत्म समर्पण करके इसी अहं को मिटाया जाता है। तप साधना द्वारा कुसंस्कारों का उन्मूलन और सुसंस्कारों का संस्थापन किया जाता है। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन द्वारा विवेक बुद्धि परिष्कृत होती है और इन्द्रियनिग्रह द्वारा मन चले मन को सत्संकल्प करने वाले उपयोगी चित्र गढ़ने वाला बनाया जाता है। यही है आत्म-साधना की पृष्ठभूमि और संक्षिप्त रूप रेखा।
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आत्म-विकास के साधनों में भारतीय मनीषियों ने जप और ध्यान को बहुत अधिक महत्व दिया है। आत्मविकास का अर्थ केवल स्वर्ग और मुक्ति की प्राप्ति परलोक और मरणोत्तर जीवन की पूर्णानुभूति तथा अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास ही नहीं आता अपितु उन समस्त गुणों की अभिवृद्धि भी आती है जो हमारे भौतिक जीवन को भी शक्ति, सामर्थ्य और सक्रियता प्रदान करती है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय, अपरिग्रह, श्रद्धा, विश्वास, परिश्रम, पुरुषार्थ, व्यवहार-कुशलता, निरालस्य यह गुण न हों तो अपार भौतिक सम्पदाओं का स्वामी भी कालान्तर में निर्धन छूँछ हो सकता है, सामाजिक आत्मीयता से अलग अलग पड़ कर अपनी मानसिक शान्ति गंवा सकता है। स्पष्ट है कि हमारी आध्यात्मिक भौतिक सभी आवश्यकताएँ आत्म-विकास पर ही आधारित हैं, अतएव उससे मात्र एकांगी पक्ष की बात नहीं विचारनी चाहिए।
साम्यवाद के कट्टर समर्थक उपासना को समय की बर्बादी कहकर उसे बुर्जुआ संस्कार बताते और उसके लिए जन-जीवन में अथवा अश्रद्धा उत्पन्न करते हैं। उनका तर्क यह होता है कि यदि इतने समय का उपयोग पुरुषार्थ और परिश्रम में किया जाये तो उससे औद्योगिक विकास और राष्ट्रीय सम्पत्ति बढ़ती है और प्रकारान्तर से उसका लाभ सारे देश और समाज को ही मिलता है।
एक पक्षीय चिन्तन की संकीर्णता न होती तो बात किसी हद तक तब भी ठीक हो सकती थी जब आत्मविकास को अध्यात्मवादी दिशा को उपेक्षणीय मान लिया जाता, किन्तु इस चिन्तन के घोर दुष्परिणाम अपने भौतिक जीवन को भी प्रभावित किये बिना मानते नहीं। रेल चौबीस घंटे चलती रहे यह अच्छी बात है, पर यदि उसे कुछ स्टेशनों के बाद रोक कर पानी न भरा जाये, ईंधन न डाला जाय तो क्या गाड़ी चलती रह सकेगी? शिफ्टें बदल कर मजदूर लगाते रहे जायें, पर मशीन का पहिया न रुके तो मशीन कितने दिन तक चल सकती है। विश्राम के ही क्षण ले लें, यदि उस अवधि में क्रीड़ा, मनोविनोद मन-बहलाव की सुविधा न हो तो ऊब और मानसिक थकावट के कारण व्यक्ति का आयुष्य आधा रह जायेगा। सर्वेक्षणों से पता चला है कि विवाहितों की अपेक्षा विधुरों की मृत्यु का अनुपात अधिक है यह इस बात का प्रतीक है कि जीवन की शुष्कता चाहे किसी भी क्षेत्र में मारक प्रतिफल उत्पन्न करती है जब कि अनेक क्षेत्रों में बौद्धिक अभिव्यक्ति से दीर्घायुष्य और स्वस्थ मनोबल का विकास होता है। अतएव साम्यवाद की उक्त कल्पना कुछ समय के लिए व्यावहारिक हो सकती है पीछे तो वह एक ऐसा भार बन जाती है कि उस वातावरण का हर प्रणी अपने आपको, दबा, पिसा और घुटा हुआ अनुभव करता है। साम्यवादी देशों से बुद्धिजीवियों के व्यापक पलायन की घटनाएं इसी तथ्य का समर्थन करती हैं।
उपासना का सुनिश्चित वैज्ञानिक आधार न होता तब तो उपरोक्त मान्यता में कुछ सार भी हो सकता था, किन्तु जब हम उसे अंतरंग जीवन की अपरिहार्य आवश्यकता के रूप में पाते हैं तब उसे बुर्जुआ संस्कार कह कर उपेक्षा करना व्यक्ति, समाज और विश्व समुदाय किसी के लिए भी हितकारक नहीं।
उपासना में ‘उप’ और ‘आसना’ यह दो शब्द हैं। ‘उप’ उपसर्गपूर्वक ‘आस’ उपवेशने’ धातु से ‘युत्र’ प्रत्यय करने पर ‘टाप् प्रत्यान्त’ ‘उपासना’ शब्द बना। ‘उप’ का अर्थ हुआ ‘समीप’, ‘आसना’ का अर्थ है स्थिति। उपास्य, आराध्य की स्थिति से जितनी ही अधिक समीप अपनी स्थिति विनिर्मित कर ली जाये उसके जितना अधिक अनुकूल-समतुल्य बना जाये उसकी क्षमताएं, शक्तियाँ, सामर्थ्य उसी अनुपात में अपने अंदर आती और अपने चेतन व भौतिक गुणों से लाभान्वित करती चली जायेंगी। भले ही वह वस्तु काल्पनिक ही क्यों न हो? भूत का कोई अस्तित्व नहीं किन्तु उसकी मान्यता और विश्वास के आधार पर अंधकार से साकार भूत आ धमकता है और उसे व्यक्ति को कितना भयभीत कर देता है यह हर कोई जानता है- कल्पना का यह भूत यदि किसी को विक्षिप्त, पागल और मार सकता है तो दिव्य गुणों से, दिव्य क्षमताओं से ओत-प्रोत आराध्य हमारे जीवन को दिव्य न बनाये ऐसा कैसे हो सकता है?
आइये अब तथ्यों की खोज पर उतरते हैं। ‘दि ह्यूमन सेन्सेज’ के रचयिता वैज्ञानिक डॉ. गेल्डार्ड ने अपनी पुस्तक में बताया है कि नक्षत्रीय गतिविधियाँ, मनुष्य की मानसिक व शारीरिक गतिविधियों को प्रभावित करती हैं। इस सिद्धांत के समर्थन में उन्होंने एक वैज्ञानिक प्रयोग का उदाहरण देकर यह समझाया है कि मनुष्य की कोशिकाओं में अनुकूल तत्वों को आकर्षित करने, अवशोषण कर अपने में धारण करने और इस आधार पर शरीर से टूटने वाली ऊर्जा की कमी को पूरा करने की अद्भुत सामर्थ्य है। इसकी जाँच तब हुई जब शरीर के जीवित अंश को काट कर अलग रखा गया उस स्थान पर पहले से एक विषाक्त रसायन रखा था। मस्तिष्कीय प्रक्रिया से संबंध विच्छेद होने पर भी उस जीवित टुकड़े के अणु उस घातक वस्तु से दूर हटने की कोशिश करने लगे। वैज्ञानिक इस बात को देखकर आश्चर्यचकित रह गये तुरंत उन्होंने उस विष को वहाँ से हटा दिया और अब उस स्थान पर लाभदायक औषधि रखी तो उन कोषाणुओं का गुण पूरी तरह बदल गया, वे उस औषधि की ओर खिंचने का गुण दिखाने लगे। डॉ. गेल्डार्ड ने अपनी समीक्षा में बताया है कि प्रत्येक जीवाणु एक लघु उपस्टेशन है जो मुख्य स्टेशन मस्तिष्क से जुड़ा रहता है। मस्तिष्क में जो भी भाव-तरंग उठी उसका तत्काल स्पष्ट प्रभाव इन जीवाणुओं में झलक पड़ता है। इसी आधार पर मनुष्य आकाश की अदृश्य शक्तियों से तो प्रभावित होता ही है मन की चुम्बकीय शक्ति के द्वारा वह दूरस्थ नक्षत्र पिण्डों से शक्ति प्रवाह भी अपने अंदर आकर्षित कर धारण कर सकता और अपनी अंतरंग क्षमताओं को विकसित कर सकता है। प्राचीन भारतीय मनीषियों ने इन्हीं शक्ति प्रवाहों को सूक्ष्म दैवी शक्तियों के रूप में माना था, उनके गुणों की पृथकता के आधार पर उन्हें पृथक-पृथक देव शक्तियों की संज्ञा देकर उनकी उपासना की विधियाँ विकसित की थीं और उनके अभ्यास द्वारा अपनी क्षमताओं को विकसित कर प्रचुर भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष उपलब्ध किया था आज तो उन्हें मनगढ़न्त-सा माना जाने लगा है, पर अध्ययन यह निष्कर्ष देते हैं कि वह कल्पनाएँ नहीं यथार्थ हैं आज वैज्ञानिक उनकी पुष्टि करते हैं।
क्वांटम थ्योरी ने परिपूरक सिद्धांत के रूप में यह स्वीकार किया है कि पदार्थ अपनी ठोस अवस्था से तरल, तरल से गैस, गैस से प्लाज्मा तथा इसी तरह के और भी उन्नत किस्म के प्रकाश-कणों में परिवर्तित हो जाता है। उसी तरह उच्चस्तरीय चेतन कण क्रमशः एक स्थिति में पदार्थ के रूप में भी व्यक्त हो सकते हैं। इसी तरह का प्रतिपादन वैज्ञानिक हाइजन वर्ग ने भी किया है। वे लिखते हैं कि अन्तरिक्ष में एक स्थान आता है जहाँ पदार्थ को छोड़ दिया जाये तो वह स्वतः ऊर्जा में परिणत हो जाता है जिस तरह पदार्थ सत्ता परिधि काल और रूप के ढाँचे में बंधी रहती है, उसी तरह मनःसत्ता अनुभूति स्मृति विचार और बिम्ब के रूप में व्यक्त होती है इतना होने पर भी दोनों में अत्यधिक घनिष्ठता है। यह एक दूसरे को प्रभावित ही नहीं करते अपितु परस्पर आत्मसात भी होते रहते हैं। उपासना का, ध्यान का अर्थ इस प्रक्रिया को ही अत्यधिक प्रगाढ़ बनाकर उन शक्तियों से लाभान्वित होना है।
प्रख्यात प्राकृतिक चिकित्साविद् डॉ. हेनरी लिन्डल हर ने अपनी पुस्तक ‘प्रैक्टिस ऑफ नेचुरल थेरोप्युटिक्स में मानवीय मनोभावों को सर्वव्यापी ब्रह्मसत्ता किसी देवसत्ता, अदृश्य देवदूत, सिंह पुरुष, महान् सद्गुरु यहाँ तक कि लौकिक दृष्टि से किसी प्रेमी के मनोभावों से जोड़कर उनकी विचारणाओं, अनुभूतियों को आत्मसात कर न केवल उनकी भावनाएँ समझने की बात स्वीकार की है अपितु यह भी माना है कि इष्ट की भौतिक परमाणु या शारीरिक अनुभूतियाँ भी उस स्थिति में विलक्षण रूप में आकर्षित होती हैं। गंगा के पानी को एक नहर काट कर अन्यत्र ले जाया जाये तो उस जल के सभी गुण वहाँ तक खिंचे चले जावेंगे जहाँ तक नहर जायेगी। इस तरह अपनी शरीर मन, भावनाओं का तेजी से विकास होता है।
गुरुजनों के स्मरण, देवताओं की आराधना और इस तथ्य के समर्थन में दो घटनायें प्रमाण और साक्ष्य रूप में प्रस्तुत है। ‘साइकोलॉजी ऑफ रिलीजन’ पुस्तक के लेखक श्री थूलेस ने सेन्ट कैथराइन का प्रामाणिक विवरण दिया है। जब वह समय आता था, जब कि ईसामसीह क्रास पर कील से ठोंके गये थे, उस समय सेन्ट कैथराइन अपने शरीर के विभिन्न स्थलों में वैसी ही पीड़ा का अनुभव करती थीं, जैसी शरीर में कीलें ठोकने पर होती है। ऐसी अवस्था में एक डॉक्टर को उनकी देखभाल करनी होती थी। डाक्टरी जाँच से पाया गया कि कैथराइन की पीड़ा की अनुभूति वास्तविक थी।
यह उपास्य से उपासक के गहरे तादात्म्य का ही परिणाम है। न केवल चेतन परमाणु अपितु जड़, पिण्ड और वह भी काल और ब्रह्माण्ड की सीमा के परे इस तादात्म्य में जोड़े जा सकते हैं और इस तरह असम्भव लगने जैसी भूत और भविष्य की घटनाओं की भी जानकारी ली जा सकती है।
वैज्ञानिकों ने भी मन की शक्ति को नाप-तौल करने का प्रयत्न किया है। उनके मतानुसार मन भौतिक शरीर की चेतन शक्ति है-आइन्स्टीन के शक्ति सिद्धांत के अनुसार न कुछ भार वाले एक परमाणु में ही प्रकाश की गति गुणित प्रकाश की गति अर्थात् 186000 गुणित 186000 कैलोरी शक्ति उत्पन्न होगी। 14 लाख टन कोयला जलाने से जितनी शक्ति मिलती है उतनी ही शक्ति की मात्रा 1 पौण्ड पदार्थ की शक्ति की होती है। यदि इस शक्ति को पूरी तरह शक्ति में बदलना संभव होता तो एक पौण्ड कोयले में जितना द्रव्य होता है यदि उसे शक्ति में परिवर्तित कर दिया तो संपूर्ण अमेरिका के लिए 1 माह तक के लिए बिजली तैयार हो जायेगी।
ध्यान की अवस्था पर किये गये कुछ वैज्ञानिक अनुसंधान भी इन तथ्यों का आश्चर्यजनक प्रतिपादन करते हैं। ध्यान की अवस्था में कम ऑक्सीजन में भी शरीर का काम चलता रहता है। हृदय व नाड़ियों की गति मंद पड़ने से रक्त-विकार कम होते हैं शयनकाल के बाद शरीर में जो ताजगी आती है वह ध्यानावस्था में ही उपलब्ध होती है। प्रकृति के प्रत्येक पदार्थ में ‘उत्सर्जन’ की क्रिया अनिवार्य है सूर्य, चन्द्रमा ही नहीं हमारे शरीर में भी विकरण क्रिया चलती और उससे शक्ति क्षरण होता रहता है यह आश्चर्य की बात है कि ध्यान की अवस्था में विकीर्ण होने वाली तरंगें अपना गुण बदल देती हैं और वे शरीर के विष शोधन, नई संरचना में जुट जाती हैं। ध्यान से मिलने वाली ताजगी, आयुष्य आदि में इस सिद्धांत के साथ अवधारण क्रिया के द्वारा देव शक्तियों से प्राप्त शक्ति भी सहायक होती है। अपने यहाँ हर मंत्र का देवता होता है। गायत्री का देवता सविता अर्थात् गायत्री उपासना के समय सूर्य के ध्यान की व्यवस्था है। उसका अर्थ सूर्य की अदृश्य शक्तियों किरणों को उपरोक्त वैज्ञानिकों, सिद्धांतों के आधार पर शरीर में धारण करना और उसके आत्मिक व वैज्ञानिक लाभों से लाभान्वित होना है। हमारी प्रगाढ़तम ध्यानावस्था हमारी मनश्चेतना को ‘सूर्य’ बना देती है उस शक्ति, सामर्थ्य और अनुभूति की कल्पना की जा सके तो सहज ही अनुभव किया जा सकता है कि गायत्री सिद्धि के क्या चमत्कार हो सकते हैं? प्रत्येक उपासना के लिए यही बात, यही सिद्धाँत लागू होता है।
रामकृष्ण परमहंस से किसी जिज्ञासु ने पूछा - ‘क्या मंत्र जप सबके लिए समान फलदायक होते हैं?’ उन्होंने उत्तर दिया- नहीं। ऐसा क्यों ? के उत्तर में परमहंस जी ने जिज्ञासु को एक कथा सुनाई।
एक राजा था। उसका मंत्री नित्य जप करता। राजा ने जप का फल पूछा तो उसने कहा-वह सबके लिए समान नहीं होता। इस पर राजा को असमंजस हुआ और वह कारण बताने का आग्रह करने लगा। मंत्री बहुत दिन तक तो टालता रहा, पर एक दिन उपयुक्त अवसर देखकर समाधान कर देने का ही निश्चय किया।
मंत्री और राजा एकान्त वार्ता कर रहे थे। एक छोटा बालक और वहाँ खड़ा था। मंत्री ने बच्चे से कहा- राजा साहब के मुँह पर पाँच चपत जमाओ, मंत्री की बात पर बच्चे ने ध्यान नहीं दिया और जैसे का तैसे ही खड़ा रहा। इस अपमान पर राजा को बहुत क्रोध आया और उसने बच्चे को हुक्म दिया कि मंत्री के मुँह पर जोर से पाँच चाँटे लगाओ। बच्चा तुरंत बढ़ा और उसने तड़ातड़ चाँटे लगा दिए।
मंत्री ने निश्चिन्ततापूर्वक कहा-राजन्। मंत्र शक्ति इस बच्चे की तरह है जिसे इस बात का विवेक रहता है कि किस का कहना मानना चाहिए, किस का नहीं। किस पर अनुग्रह करना चाहिए किस पर नहीं।
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पदार्थ क्या है ? संसार क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर इन्द्रिय अनुभूति मात्र से नहीं दिया जा सकता, शरीर पंच तत्वों से बना हुआ है इस उपकरण के सहारे पदार्थ का दृश्य रूप ही परिलक्षित होता है। किन्तु सब कुछ इतना ही तो नहीं है। उसके अन्तराल में भी बहुत कुछ है। उसे ‘ज्ञान’ से ही जाना जा सकता है। अदृश्य को देखने वाले उपकरण भी ज्ञान के आधार पर ही बनते हैं और उनसे जो सूचनाएँ मिलती है उनसे कुछ निष्कर्ष निकल सकना ज्ञान के आधार पर ही संभव होता है। मनुष्य की शक्ल एवं शारीरिक संरचना ही सब कुछ नहीं है। मुख्य वस्तु है उसका व्यक्तित्व और उसके जानने, परखने के लिए आँखें पर्याप्त नहीं, उसे ज्ञान के आधार पर ही जाना जा सकता है। पदार्थ के गर्भ में जो आणविक हलचलें होती हैं उन्हें इन्द्रियों ने प्रत्यक्ष दृश्य के रूप में नहीं देखा है। ज्ञान चक्षुओं से उसकी स्थिति का अनुमान लगाया और पीछे उसे प्रमाणित करने के साधनों का निर्माण कर सकना ज्ञान के आधार पर ही संभव हुआ। मंत्र उपकरण तो उस ज्ञान साधना के अकिंचन जैसे उपकरण भर हैं। बिना ज्ञान वाला निष्कर्ष, निकालने वाले के वे उपकरण जो सांकेतिक सूचना देते हैं, उतने से किसी तथ्य का पता नहीं चलता। अन्तरिक्षीय सूचनाएँ संकेत रूप से ही प्राप्त होती हैं। उनकी व्याख्या बुद्धिमत्ता पूर्वक करने के उपरान्त ही उपलब्ध सूचनाओं का कुछ सही अर्थ निकलता है।
आत्मा है या नहीं? इसका उत्तर हाँ और ना में दोनों ही तरह दिया जा सकता है। हाँ, उनके लिए ठीक है जो ज्ञान के आधार पर सूक्ष्म विषयों पर विचार कर सकने और निष्कर्ष निकाल सकने में समर्थ हैं। ना, उनके लिए जो मात्र इन्द्रियों के सहारे ही चेतन सत्ता का दर्शन करना चाहते हैं। चेतन सूक्ष्म है वह चेतन सत्ता की ज्ञानानुभूति के द्वारा समझा और देखा जा सकता है। किसी की आँखों में से आँसू बहते देखकर आँखें तो इतना ही बता सकती हैं कि भवों के नीचे वाले गड्ढों में से पानी की पतली सी धार बह रही है। उस पानी के पीछे कोई व्यथा वेदना तो नहीं भरी है, यह जान सकना जीवित अन्तःकरण की भाव सम्वेदना के लिए ही संभव है। यदि वह न हो तो फिर आँसू और पसीने में वैज्ञानिक उपकरणों के सहारे कुछ अधिक अंतर नहीं पाया जा सकता। सूर्य की रोशनी और फूल की शोभा की अनुभूति उन्हीं को हो सकती है जिनकी आँखें सही हों। यदि दृष्टि समाप्त हो जाय तो अपने लिए संसार के सभी दृश्य समाप्त हो जायेंगे। भले ही वे अन्य लोगों के लिए यथावत् बने रहें। दृश्यों की अनुभूति में जितना महत्व पदार्थों के अस्तित्व का है उससे अधिक अपनी दृष्टि का है। यह ज्ञान ही है तो हमें दृश्य या श्रव्य के स्थूल रूप की तुलना में असंख्य गुने रहस्यमय मर्मों से हमें परिचित कराता है।
ज्ञान के दो पक्ष हैं एक विचारणा दूसरा सम्वेदना। विचार मस्तिष्क की देन हैं वे बाहर से आते हैं, प्रशिक्षण एवं अनुभव के सहारे। भाव भीतर से उठते हैं, वे अन्तःकरण के उत्पादन हैं। विचारों से जानकारी तो बढ़ती है और बुद्धि में परिपक्वता आती है, पर उनका प्रभाव अन्तस् पर नहीं के बराबर पड़ता है। बहुत पढ़ने और बहुत सुनने से भी आन्तरिक उत्कृष्टता उभरने का कोई निश्चय नहीं। कितने ही व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके कान सत्संग सुनते-सुनते पक गये और आँखें स्वाध्याय करते-करते थक गईं, फिर भी उनकी मूल प्रवृत्तियों में कुछ विशेष अंतर नहीं आया। लोभ, मोह से उन्हें रत्ती भर भी विरति नहीं हुई। काम, क्रोध के आवेश घटे नहीं। धर्मोपदेशकों में धर्म धारणा और नेताओं में देश भक्ति प्रायः प्रसंग चर्चा की कलाकारिता जितनी ही दिखाई पड़ती है। दूसरों को जिन तर्कों से वे प्रभावित कर लेते हैं उससे अपने आपको प्रभावित नहीं कर पाते। क्योंकि वे बाहर से आये आगन्तुक हैं। अपने गृह सदस्य नहीं। अन्तस् तो भावों का भण्डागार है। वहाँ से निसृत होते हैं और वहीं के चुम्बकत्व से उन्हें बाह्य जगत में से आकर्षित एवं ग्रहण किया जाता है। विचार की गति तर्क और तथ्य के सहारे होती है और वे बढ़ते-बढ़ते विज्ञान का स्वरूप धारण कर लेते हैं। विचार के आधार पर यह संस्कार पदार्थ गुच्छक या गुलदस्ता मात्र है। अथवा विभिन्न प्रकार की तरंग प्रवाह का अन्धड़ क्षेत्र उसे कह सकते हैं। विद्युत चुम्बकीय लहरों से भरा-भूरा समुद्र भर यह संसार रह जाता है। ऐसे ही कुछ नाम और भी उसे दिये जा सकते हैं। मस्तिष्कीय, चेतना-पदार्थ ज्ञान पर अवलम्बित है और वह अपनी सीमा उसी परिधि के अंतर्गत रखती है। यही उसकी मर्यादा है। उसे आगे की ऐसी कोई बात मस्तिष्क के आधार पर नहीं जानी या पाई जा सकती जो हृदय से, अंतस् से संबंधित है।
भाव, सम्वेदना, अन्तस् का उत्पादन है। भावुक व्यक्ति ही दूसरों की व्यथा वेदनाओं को अनुभव कर सकता है। पाषाण हृदय व्यक्ति पर किसी की करुणाजनक स्थिति का कोई प्रभाव नहीं पड़ता, पर दूसरों के रुदन और चीत्कार तक की स्थिति-प्रज्ञ की तरह निर्मम होकर देखता रहता है, कई बार तो उनसे विनोद करता और रस लेता भी देखा गया है।
धर्म को सम्वेदना का उद्गम स्त्रोत कह सकते हैं। वह उपदेश नहीं उपचार है जिसके सहारे दिव्य चक्षुओं पर चढ़ी हुई धुन्ध को दूर किया जा सकता है। उस धुन्ध के हटने पर पदार्थ के अन्तराल में संव्याप्त सत्ता को देखा जाता है। उसी के सहारे उस ब्रह्माण्ड व्यापी चेतना की अनुभूति होती है जिसे विश्वात्मा कहा जाता है और जिसका एक घटक आत्मा है। विचार से पदार्थ के गुण, धर्म, स्वभाव और उपयोग को जाना जाता है, धर्म से आत्मा का साक्षात्कार होता है और जीवन को आत्मा के अनुशासन में चलने के लिए प्रशिक्षित अभ्यस्त किया जाता है।
यों ज्ञान की मोटी परिभाषा जानकारी है। शिक्षा द्वारा उसी का संचय सम्वर्धन होता है। मन की कल्पना शक्ति और बुद्धि भी निर्णय शक्ति के संयुक्त परिणाम को बुद्धि कौशल कहते हैं। सूझ-बूझ, समझदारी, विद्वता और विशेषज्ञता इसी की परिणिति हैं। इतने पर भी सम्वेदना पर इस सारी बुद्धिमत्ता का कोई असर नहीं है। धर्म अग्नि है, जिसका उद्गम आत्मा है। आत्मा के अन्तराल से जो ज्योति प्रस्फुटित होती है, जिसका आलोक अन्तःज्ञान के रूप में देखा जा सकता है। आत्म बोध यही है। इसी का प्रकट होना और आत्म सत्ता के समूचे क्षेत्र को प्रकाशवान कर देना यही आत्म साक्षात्कार है। विचार क्षेत्र शिक्षा कहलाता है, अन्तः सम्वेदनाओं के ऊहापोह को विद्या एवं ब्रह्म विद्या कहते हैं। यह इन्द्रियातीत है इसलिए उसकी अनुभूतियाँ भी अतीन्द्रिय कहलाती है। दया, करुणा, प्रेम, सेवा, उदारता, त्याग, बलिदान, संयम, आत्मानुशासन जैसी दिव्य सम्वेदनाओं की पूर्ति के लिए मनुष्य खुशी-खुशी कष्ट कहते हैं। अपने लाभों का परित्याग करते हैं और भौतिक दृष्टि से प्रत्यक्षतः घाटा उठाते हैं। आदर्शवादियों के निहित स्वार्थों द्वारा तरह-तरह की हानि पहुँचाई जाती है। उदार व्यवहार में भी वे कुछ त्याग ही करते हैं। देश भक्तों और तपस्वियों को कष्टमय जीवन व्यतीत करना पड़ता है और कई बार तो उन्हें प्राणों तक हाथ धोना पड़ता है। बुद्धिमानी का भौतिक मापदण्ड इनमें घाटा ही घाटा देखता है। प्रत्यक्ष लाभ जैसी कोई बात इस मार्ग पर चलने से नहीं मिलती। फिर भी समझदारी की सीमाओं का उल्लंघन करके वे कदम उठाये जाते हैं जिसे व्यवहार बुद्धि अपने भौतिकवादी गणित के सहारे मूर्खता ही सिद्ध करेगी। इतने पर भी सारे तर्कों का उल्लंघन करके कोई आन्तरिक उमंग ऐसी उठती है और उच्चस्तरीय भाव सम्वेदना की भूख बुझाने के लिए त्याग, बलिदान की माँग करती है और अनेक सद्भाव सम्पन्न उसकी पूर्ति भी करते हैं।
यह सम्वेदना ही अग्नि है। जब वह आदर्शों को अपनाये रहने की परिपक्वावस्था में होती है तो उसे श्रद्धा कहते हैं। अपने लिए कल्याणकारी कर्तव्य यही है। इसका सुनिश्चित निर्धारण विश्वास कहलाता है। श्रद्धा को भवानी की और विश्वास को शंकर की उपमा दी गई है और कहा गया है कि इन्हीं दोनों की सहायता से अन्तरात्मा में ओत-प्रोत परमात्मा का दिव्य दर्शन होता है। आदर्शवादी सम्वेदनाओं की यह समूची परिधि धर्म क्षेत्र के नाम से जानी जाती है। इसी की उमंगें कर्म क्षेत्र पर छाई रहती हैं। आस्थाओं की प्रेरणा से विचार तंत्र को दिशा मिलती है और विचारों की कर्म के रूप में परिणिति होती है। इसी क्षेत्र में जब प्रखरता आती है तो अतीन्द्रिय ज्ञान जागृत होता है और दूर दर्शन, दूर श्रवण, प्रकृति के रहस्यों का उद्घाटन, भावी सम्भावनाएं जैसी वे जानकारियाँ मिलती हैं जो सामान्य इन्द्रिय क्षमता की पकड़ से बाहर हैं।
अन्तः संस्थान के शान्त, सुस्थिर एवं परिष्कृत करने की विधि व्यवस्था का नाम योग है। योगाभ्यास में जिस समाधि की चर्चा की जाती है वह मस्तिष्क की घुड़ दौड़ शान्त करके अन्तःकरण की भाव सम्वेदनाओं को उभारने की प्रक्रिया है। चित्त वृत्तियों का निरोध इसी को कहा गया है। यह स्थिति प्राप्त होने पर अपने अस्तित्व में आत्मा की उपस्थिति अनुभव होती है और उसके अनुशासन को स्वीकार करने की सहज स्वीकृति जागृत होती है। आत्मसमर्पण के क्षण इन्हीं भावनाओं से भरे होते हैं। दिव्यत्व में अन्तःकरण का सराबोर हो जाना इतना आनन्द युक्त होता है कि उसे ईश्वर दर्शन के संबंध में किये गये समस्त वर्णन यथार्थता के रूप में अनुभव होते हैं।
धर्म को भीरुता से जोड़ा जाता है, जीवन संघर्ष से कतराने वाले धर्माडम्बरों में उलझे रहते हैं यह कहा जाता है, पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। यह साहसी शूर वीरों का मार्ग है। मन और अन्तःकरण का संघर्ष स्पष्ट है। मन सुविधाओं में रमता है और अन्तःकरण को वे भाव सम्वेदनाएं चाहिए जो उत्कृष्टता अपनाने के मूल्य पर ही उपलब्ध होती है। लोक प्रवाह और अपने संचित संस्कार मनोकामनाओं की पूर्ति की दिशा में खींचते और मनमानी करने के लिए उकसाते हैं इसके ठीक विपरीत वह क्षेत्र है जिसे आत्मा की पुकार कहते हैं। यहाँ सब कुछ दूसरे ही तरह का है। यहाँ वैभव बेचकर संतोष खरीदा जाता है। इतना बड़ा सौदा करना जुआरी द्वारा अपना सर्वस्व ऐसी बाजी पर लगा देने जैसा है जिसमें प्रत्यक्षतः घाटा ही घाटा है। ऐसा बड़ा कदम उठाना सती शूरमाओं जैसा दुस्साहस है जिसमें प्रत्यक्ष का उत्सर्ग करके परोक्ष के उपलब्ध होने का सुनिश्चित विश्वास आवेश की तरह अन्तराल के कण-कण में छाया होता है। ऐसी स्थिति प्राप्त करने में केवल साहसी शूरवीर ही सफल होते हैं। भावनाओं के परिपोषण में कामनाओं की बलि चढ़ा देना जिनसे बन पड़ता है वस्तुतः वे ही धर्मात्मा हैं। कहा जाता है कि- धार्मिकता स्वर्ग के लालचियों और नरक से भयभीत लोगों को छिपाये रहने वाली माँद भर है, पर बात ऐसी है नहीं। कुछ उथले धर्माडम्बरियों या धर्म भीरुओं के लिए यह बात भले ही लागू होती हो, पर वस्तुतः धर्म एक सत्साहस और प्रबल पुरुषार्थ है जिसमें अन्तरात्मा को सर्वोपरि माना जाता है और उत्कृष्टता भरी भाव सम्वेदनाओं के समर्थन की सुख-सुविधाओं से लेकर स्वजनों को रुष्ट करने तक का ऐसा साहस प्रदर्शित किया जाता है जिसे अलौकिक एवं असाधारण कहा जा सके।
जिज्ञासु अग्निवेश ने आचार्य चरक से पूछा - ‘संसार में जो अगणित रोग पाये जाते हैं, उनका कारण क्या है ?’
चरक संहिता के अनुसार आचार्य ने उत्तर दिया- ‘व्यक्ति के पास जिस स्तर के पाप जमा हो जाते हैं, उसी के अनुरूप शारीरिक एवं मानसिक व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं।’
व्यक्तिगत पापों का फल व्यक्ति को भुगतना पड़ता है, पर सामूहिक दुष्प्रवृत्तियों का फल समूचे समाज को भोगना होता है। अतिवृष्टि अनावृष्टि, भूकम्प, महामारी, हिमपात, टिड्डी दल आदि प्रकृति प्रकोपों को व्यापक रूप से फैली हुई अवांछनीयताओं, कुरीतियों एवं अनैतिकताओं का प्रतिफल समझा जाना चाहिए।
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ईश्वर प्रदत्त सौन्दर्य किसी-किसी को ही मिलता है। पर हर कोई अपने हाथों अपना प्राकृतिक सौन्दर्य बना और बढ़ा सकता है। सहज मुसकान का अभ्यास करने पर यह दिव्य उपलब्धि किसी को भी मिल सकती है। दाँत कितने ही कुरूप क्यों न हों जब वे कमल पुष्प की तरह खिलते हैं तो अतीव सुन्दर लगते हैं। मुसकाते हुए होठों की शोभा की तुलना अन्य किसी सौन्दर्य प्रसाधन से नहीं हो सकती। चेहरे को सुसज्जित करने के लिए केश सज्जा एवं रंग-रोगन के कितने ही प्रकार उपाय प्रचलित हैं, पर उन सबसे उत्कृष्ट एवं बिना मूल्य का उपाय सहज मुसकान से बढ़ कर और कुछ भी हो नहीं सकता। यह ऐसा चुम्बकत्व है जिससे हर किसी का मन आकर्षित होता चला जाता है। खिले हुए पुष्प पर भौंरे, तितली, मधुमक्खी झुण्ड के झुण्ड- मंडराते रहते हैं। उस पर हर किसी की ललचाई दृष्टि पड़ती है। मुसकाते होठों की भी ऐसी शोभा विशेषता है।
हंसते-मुसकराते व्यक्ति के पास बैठने का, उससे बातें करने का, मित्रता साधने का, हर किसी का मन करता है। समझा जाता है कि जो अपने से संतुष्ट है, जो सफल है, जो समृद्ध है वही प्रसन्न दिखाई दे सकता है। ऐसे व्यक्ति से कुछ पाने की आशा हर किसी को होती है। जो अपनी समस्याएँ हल कर चुका वह दूसरों को भी वैसे समाधान में सहायता दे सकता है। जो प्रसन्न है वह दूसरों को प्रसन्नता दे सकता है। जो स्वयं हंसता है वह दूसरों को भी हंसा सकता है। इन्हीं बातों के लिए हर कोई तरसता है। इसलिए प्रसन्न चित्त के प्रति आकर्षित होने और उससे सम्बद्ध रहने के लिए यदि लोगों का मन ललचाये तो इसे स्वाभाविक ही माना जाना चाहिए। कहना न होगा कि जिसके मित्र और प्रशंसक अधिक होते हैं, वह सहयोग का आदान-प्रदान करके न केवल स्वयं आगे बढ़ता, ऊँचा उठता है, वरन् दूसरों के लिए भी वैसी ही सुखद परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में समर्थ रहता है।
स्वयं प्रसन्न रहना ऐसा सद्गुण है जिसके सहारे प्रसन्नता का प्रसाद दूसरों को भी वितरण किया जा सकता है। यह धन दान से भी बड़ा अनुदान है। हर कोई प्रसन्नता चाहता है। इसलिए समय लगाता, भागता, दौड़ता, दरवाजे खटखटाता और पैसा खर्च करता है। यह अनुदान जहाँ से भी मिलेगा वे वही होंगे जो स्वयं स्वाभाविक अथवा कृत्रिम रूप से प्रसन्न, हंसते-खिलते दीखते हैं। गायक, वादक, अभिनेता, नर्तक भीतर जैसे भी रहते हों- बाहर से अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। सिनेमा, थियेटरों में ऐसे दृश्यों की भरमार रहती है जिनमें पात्रों को प्रसन्नता व्यक्त करते देखा जाता है। वृक्ष उद्यान, नदी-सरोवर, बादल, बिजली आदि में प्रकृति की प्रसन्नता दृष्टिगोचर होती है और उन्हें निहारने वाले को भी संतोष होता है। विवाह-शादियों, प्रीतिभोजों, हर्षोत्सवों और मेले-ठेलों में लोग इसीलिए जाते हैं कि वहाँ विनोद उल्लास का वातावरण रहता है। इस सम्पर्क में जो पहुँचता है वह भी प्रसन्नता साथ लेकर लौटता है। इस प्रसन्नता के अनुदान को वह व्यक्ति सहज ही बाँटता है, बखेरता रहता है जिसने अपना स्वभाव हंसने-मुसकाने का बना लिया है।
शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रसन्न रहने की आदत का उत्साहवर्धक प्रभाव पड़ता है। खीजते रहने वाले-मुँह लटकाये और झल्लाते रहने वाले अन्य सुविधाएँ होते हुए भी अपना स्वास्थ्य गिराते, गंवाते चले जाते हैं। निराश, खिन्न, क्षुब्ध उद्विग्न मनुष्य अपने आपको दुखी बनाते हैं, निरानंद नीरस जिन्दगी जीते हैं और सम्बद्ध मनुष्यों को अपनी इस दुष्प्रवृत्ति के कारण दुःखी करते हैं। ऐसे लोगों से हर कोई बचना चाहता है। हम प्रसन्न रहें-प्रसन्नता बाँटे और हंसी-खुशी का वातावरण बनायें, इसी में जीवन की सार्थकता है।
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इस युग में जब भी कोई नई मान्यता, नूतन दर्शन और विचारधारा फैलाई जाती है तब पूर्व मान्यताओं को चुनौती देने की एक परम्परा बन गई है। पंचतत्वों से भी ऊपर चेतन परमाणु तक की भी आणविक संरचना, प्रकाश, अग्नि और वरुण (पानी) की गति, स्थिति और उसके प्रयाग पर प्रकाश डालने वाली वैदिक ऋचाओं को गल्प माना जाने लगा है। पूर्वजों को आदिवासी सभ्यता का अंग बताया जाता है। अब तो तथाकथित बुद्धिवाद इस सीमा तक उद्धत हो चला कि रामायण और महाभारत को भी इस आधार पर काल्पनिक ठहराया जाने लगा है, कि उसमें वर्णित इतिहास असम्भव से भी असम्भव है। यह कि उस युग के मानव को बौद्धिक स्तर इस योग्य था ही नहीं कि वह कोई चमत्कारिक कार्य कर सकता।
सच पूछा जाये तो बौद्धिक दृष्टि, विज्ञान तकनीक, उद्योग, वाणिज्य, वास्तुकला, स्थापत्य, विमान आदि समस्त क्षेत्रों में जैसी प्रगति प्राचीन काल में हुई वैसी स्थिति तक पहुँचने में आधुनिक विज्ञान को कई शताब्दियाँ लग जायेंगी। “चैरियट्स ऑफ गाड्स” नामक पुस्तक में सुप्रसिद्ध जर्मन इतिहास वेत्ता डॉ. एरिचवान डनिकेन ने सारे संसार का पर्यटन किया और उन तथ्यों को संग्रहण संकलन किया जिन्हें इस युग में आश्चर्य की संज्ञा दी जाती है। इस अध्ययन का निष्कर्ष विद्वान लेखक ने भी इसी तरह के शब्दों में निकाला है और लिखा है जहाँ से हमारा इतिहास लिखा गया है उससे पूर्व के वैदिक युग की सभ्यता, संस्कृति और वैज्ञानिक उपलब्धियाँ आज की अपेक्षा सैकड़ों गुना अधिक थीं। हमारे पूर्वजों की शक्ति, सामर्थ्य, बौद्धिक और आत्मिक क्षमताएँ ऐसी थीं जिसका वर्णन कर सकना भी असम्भव है। उस युग का तकनीकी ज्ञान भी अब से किसी भी स्थिति में कम न था।
मिश्र के पिरामिडों को ही लें। यदि उस युग में विज्ञान और तकनीक का विकास नहीं था तो मिश्र में यह पिरामिड बड़े बड़े शहर, मन्दिर, मूर्तियाँ, सड़कें, पानी निकास की नालियाँ, चट्टानें काटकर बनाये गये मकबरे और भयंकर आकार प्रकार के पिरामिड्स कहाँ से आ गये। इन सबका कोई पूर्व इतिहास नहीं मिलता इसका अर्थ मिश्र के विशेषज्ञ भी यह निकालते हैं कि तब इस तरह की क्षमताएँ सामान्य बात रही होंगी। किसी ने उस सभ्यता के विनाश और भविष्य में परिघटित मानवीय सामर्थ्यों की कल्पना ही न की होगी इसीलिए सम्भवतः वह इतिहास लिखने के आदी नहीं रहे। एक कल्पना यह भी है कि किसी भयंकर युद्ध (महाभारत के समान) जिसमें अणु आयुध भी प्रयुक्त हुए हों, रेडियोधर्मिता, जल प्रलय, हिम प्रलय, भूस्खलन या ज्वालामुखियों ने उस सभ्यता और उसके इतिहास को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया हो। जहाँ तहां जो सामग्री बच गई वही आज पुरातत्व अवशेषों में देखी जाती है।
तत्कालीन शारीरिक क्षमता, बुद्धिमत्ता कला-कौशल के प्रतीक के रूप “च्योप्स के पिरामिड” को लिया जा सकता है। जहाँ यह पिरामिड बना है वह स्थान अत्यधिक ऊबड़-खाबड़ क्षेत्र है उसे समतल बनाने में ही भयंकर परिश्रम करना पड़ा होगा फिर यही स्थान क्यों चुना गया? इसे प्रागैतिहासिक युग की सूक्ष्मतम बौद्धिक सामर्थ्य का प्रतीक कह हैं। यह स्थान महाद्वीपों तथा समुद्रों को ठीक दो बराबर-बराबर भागों में विभक्त करता है। स्पष्ट है। यह कार्य न तो सागर नापकर किया जा सकता है और न ही धरती। तो फिर बहुत सुधरे किस्म के यन्त्रों से प्राप्त जानकारियों को गणित में बदल कर स्थान ज्ञात किया गया होगा। यह स्थान गुरुत्वाकर्षण शक्ति के बिलकुल मध्य में है जो यह दर्शाता है कि तब के लोग नक्षत्र विद्या में भी पारंगत थे। चुम्बकीय-बलों से अच्छी तरह परिचित थे।
च्योप्स के इस दैत्याकार पिरामिड में 26 लाख पत्थर के सुँदर डिजाइन किये हुए पत्थर लगे हैं। इनकी फिटिंग इतनी साफ है कि दो पत्थरों के बीच की अधिकतम झिरी 1/1000 इंच से भी कम अर्थात् नहीं के बराबर है। इसमें जो गैलरी है उसकी दीवारें सुंदर रंगों से पेंट की हुई हैं। 1 ब्लाक पत्थर का वजन 12 टन का है। आज के स्तर से हिसाब लगाया जाये तो प्रतिदिन अधिक से अधिक दस पत्थर-ब्लाक ही चढ़ाये जा सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि 26 लाख पत्थर 2 लाख 60 हजार दिनों में अर्थात् 712 वर्षों में उसका निर्माण संभव है। जब कि पिरामिड में उसके एक ही निर्माता का नाम ‘फाराह खुफू’ अंकित है।
इस विशाल निर्माण पर आश्चर्य कर लेना एक बात हुई, पर विचारक को तो तब तक संतोष नहीं, जब तक वस्तुस्थिति की समीक्षा न हो। इस आश्चर्य के पीछे निम्नांकित प्रश्न उभरते और आज के बौद्धिक दम्भ से उसका समाधान चाहते हैं-
(1) 12 टन के पत्थर बनाने के लिए खान से कम से कम 15 टन भार के पत्थर तो निकाले ही गये हैं यदि उस समय डायनामाइट जैसे तत्व और उपकरण न थे तो इतने भारी वजन के ब्लाक खानों से निकालना कैसे संभव हुआ?
(2) यह पिरामिड काहिरा और अलेक्जेन्ड्रिया के मध्य बने हैं। गाड़ी व घोड़ों का प्रचलन भी सन् 1600 ई. में माना जाता है फिर यह भारी पत्थर बिना किसी सशक्त यातायात साधन के खान से पिरामिड क्षेत्र तक ढोये कैसे गये?
(3) मिश्र रेगिस्तानी प्रदेश है जहाँ ताड़ वृक्षों के अतिरिक्त और कोई लकड़ियाँ उपलब्ध नहीं। इतने भारी भार के पत्थर सिवाय रोलर्स से और किसी तरह स्थानान्तरित नहीं हो सकते। इतने बड़े कार्य के लिए इतने रोलर कहाँ से आये। ताड़ वृक्ष वहाँ के निवासियों का मुख्य आहार-आधार है वे उसे काट नहीं सकते फिर क्या यह रोलर समुद्री मार्ग से आयात किये गये? यदि ऐसा हुआ तो क्या तब जलयान नहीं थे?
(4) अरब विशेषज्ञों ने इन पिरामिडों, भूमिगत शहरी खण्डहरों और इन पिरामिडों के निर्माण में लगी जन-शक्ति का अनुमान करते हुए अरब की जनसंख्या 5 करोड़ निश्चित की है जब कि वहाँ नील डेल्टे के दायें बाये बाजू का ही एकमात्र क्षेत्र कृषि की उपज के योग्य है। सो भी अधिकांश नील ही वहाँ पैदा की जाती है। आज से 5000 वर्ष पूर्व समूचे विश्व की आबादी 2 करोड़ अनुमानित की गई है। फिर उससे पूर्व यह 5 करोड़ आबादी अकेले मिस्र में कहाँ से आ गई? उनके भोजन की व्यवस्था क्या पड़ोसी देशों से होती थी?
(5) उस युग में विद्युत नहीं थी। टार्च नहीं थे जब कि पिरामिड की सैकड़ों फीट लंबी सुरंगों की विधिवत् रंगाई-पुताई हुई है। मशालों से वहाँ के मजदूरों का दम घुट सकता था। दीवारें काली हो सकती थीं अतएव उनका प्रयोग कदापि न होने की बात एक स्वर से पुरातत्ववेत्ता भी स्वीकार करते हैं फिर इस प्रकाश की व्यवस्था कैसे हुई?
(6) पत्थरों की इतनी अच्छी कटाई कैसे हुई कि दो पत्थर जोड़ने पर झिरी 1/1000 इंच से भी कम अर्थात् हर पत्थर एक दूसरे से चिपक कर बैठा हो?
इस युग को विज्ञान और तकनीक का युग कहते हैं, वजन उठाने वाली अच्छी से अच्छी क्रेनें, सामान ढोने के लिए यातायात के साधन, उन्नत निर्माण यंत्र, अच्छी से अच्छी इंजीनियरिंग जो भाखड़ा जैसे बाँध विनिर्मित कर सके, पर यह पिरामिड उन्नत विज्ञान के भी वश की बात नहीं? तब फिर यह आश्चर्यजनक रचना संभव कैसे हुई? एक ही उत्तर मिलेगा तब के लोग आज के लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक सशक्त, समर्थ, बुद्धिमान और हर क्षेत्र में विकसित थे। तब न केवल समुद्री मार्गों से अपितु वायु मार्गों से भी विमान चलते थे इसके पुष्ट प्रमाण हैं। भारद्वाज संहिता का “वैमानिक प्रकरण” जिसमें विमान की विकसित तकनीक का वर्णन है वह तो प्रमाण है ही पुरातत्व विभाग ने वह स्थल भी खोजे हैं जो आज की अपेक्षा अधिक सुरक्षित “एरोड्रोम” तथा “हवाई पट्टी” के रूप में प्रयुक्त होते थे।
‘टेरेस ऑफ बाल बैक” के प्रति अपना विश्वास व्यक्त करते हुए रसियन विद्वान अगरेस्ट का भी यही अनुमान है कि निश्चित ही यह अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा था जहाँ दूसरे देशों के भी जहाज आते-जाते थे। टिहानको की कृत्रिम पहाड़ी छत भी इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है 4784 वर्ग क्षेत्र में पूरी पहाड़ी को इस तरह समतल बनाया गया है कि उसमें एक सूत भी ऊँचाई निचाई का अंतर नहीं मिलता।
टिहानको नगर पुमेरिन सभ्यता का वैसा ही विकसित अड्डा माना जाता है जैसे सिंधु घाटी के ‘हड़प्पा व मोहन जोदड़ो’। सबसे अधिक उन्नति राजा ‘कुमुन्दजित’ के समय में हुई। ‘सुमेरु’ से बना शब्द सुमेरियन तथा ‘कुयुन्द जित’ दोनों ही स्पष्ट भारतीय नाम है और इस बात के प्रमाण कि विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में भारत विश्व शिरोमणि था अन्य देशों को यहाँ से न केवल बौद्धिक प्रशिक्षण तथा मार्ग-दर्शन मिलता था अपितु आत्मा-विद्या के साथ-साथ भवन निर्माण, कलाकारी, विमान विद्या कृषि और वाणिज्य, भाषा, साहित्य और गणित आदि पढ़ने यहाँ संसार भर के लोग आते थे।
पुरातत्व की यह शोध सामग्री, यह आश्चर्यजनक निर्माण और उपलब्धियां निःसंदेह इस बात के प्रमाण हैं कि हमारे पूर्वज किसी भी क्षेत्र में हमसे कम नहीं थे, विद्या बुद्धि, कला-कौशल, आवास निर्माण, विज्ञान तकनीक, शरीर स्वास्थ्य, विमानन वाणिज्य, कृषि आदि में उनकी उपलब्धियाँ हमारी अपेक्षा बहुत अधिक बड़ी-चढ़ी थीं फिर भी उनका मूल ध्येय आत्म-निर्माण जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति था आज स्थिति उल्टी है आत्म-तत्व की शोध के लिए जब कि विराट् ज्ञान उपलब्ध है तब वह भौतिक साधनों की मृग-मरीचिका में भटक गया है फिर भी स्वयं को सही तथा पूर्वजों को पिछड़ा हुआ मानने के दम्भ पर उसे लज्जा भी नहीं आती।
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परमाणु बिजली घरों से संसार को जितनी बिजली आवश्यक है उसका सातवाँश पूरा होने लगा है अनुमान है कि एक दिन इनसे सारी की सारी आवश्यकता पूर्ति होने लगेगी किन्तु इससे विकिरण की और इन बिजली घरों में बचे रेडियो सक्रिय कूड़े की मात्रा इतनी अधिक जमा हो जायेगी कि उसे ही ठिकाने लगाना मनुष्य जाति के लिए चुनौती बन जायेगी।
कुछ रिएक्टरों से प्लूटोनियम 239 पैदा होता है उसका दूषण समाप्त होने के लिए 48 हजार वर्षों की लंबी अवधि चाहिए। इसके 10 लाख वें हिस्से से भी फेफड़े का कैंसर हो जाता है। इतना भीषण विष और उसकी इतनी लंबी आयु का स्पष्ट अर्थ यही होगा कि कुछ ही वर्षों बाद की पीढ़ी में से एक भी बालक ऐसा नहीं होगा जो अपने साथ अनुवांशिक कैंसर लेकर न जन्मा हो।
परमाणु शक्ति के इस विषाक्त प्रभाव तथा अनुवांशिकी अभिशाप को देखकर मानवतावादी चिन्तन को कुछ अत्यन्त कठोर निर्णय करने आवश्यक हो गई है। परमाणु शक्ति सम्पन्न होने वाली बात ही मुख्य नहीं है, वरन् प्रौद्योगिकी के भीषण विकास का भी प्रश्न है यदि इस पर रोक नहीं लगाई जाती तो विद्युत शक्ति के लिए भी अणु-विखण्डन आवश्यक बना रहेगा और इस तरह भावी पीढ़ी की बाधिता व मनुष्यता के विनाश का चक्र चलता ही रहेगा।
क्यों कर लोग मशीनों का आश्रय लें, शरीरों से श्रम करने की नीति स्वल्प उत्पादन वाली तो होगी, पर उससे जहाँ लोग स्वयं स्वस्थ होंगे, प्रतिस्पर्द्धायें घटेंगी हर व्यक्ति को काम मिलेगा, अर्थ तन्त्र विकेन्द्रित नहीं होगा वहीं मानवता का भविष्य उज्ज्वल और संरक्षित बनेगा इसके लिए आज कुछ अभावग्रस्त जीवन जीना पड़ता हो तो उसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। वैसे प्राकृतिक जीवन से बढ़कर अन्य कोई आनन्द नहीं।
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भगोड़ों में से बहुत से तथाकथित अध्यात्म के कोंतर में छिपने की कोशिश करते हैं। एकान्त में भजन करने और शांति पाने की बात सोचना सर्वसाधारण के लिए उपयोगी नहीं है। यह वैज्ञानिक अन्वेषण एवं अभ्यास का प्रकरण है। अन्तर्मुखी होकर सूक्ष्म अति सूक्ष्म सत्ता के गहरे समुद्र में डुबकी लगाने और वहाँ से बहुमूल्य रत्न राशि ढूँढ़ लाने के लिए कुशल पनडुब्बी का सा- दुस्साहस करना एक महत्वपूर्ण काम है तो पर वह बन तब पड़ता है जब पहले मन को भली प्रकार निग्रहीत कर लिया जाय और एकान्त में भी रंग मंच जैसा आनन्द आने लगे। यह समय-साध्य और अभ्यास साध्य है। यह प्रारंभ नहीं परिपक्वावस्था है। जो लोग आरंभ में ही एकांत ढूंढ़ते हैं और पहले दिन ही समाधि लगने की बात सोचते हैं वे भारी भूल करते हैं। व्यायामशाला में प्रवेश करते ही दंगल जीतने वाला पहलवान कौन बनता है और पट्टी पूजन के दूसरे दिन ही किसके हाथ में स्नातक होने का प्रमाण पत्र मिल जाता है। इसी बाल बुद्धि से एकाकी आत्म साधना के लिए कुछ लोग भागते हैं। इसके लिए उनकी पूर्व तैयारी तो होती नहीं। जो उत्साह होता है वह भी श्रद्धाजन्य नहीं-जीवन संग्राम की भयंकरता से डरकर कहीं छिपने की पलायनवादी मनोवृत्ति से उत्पन्न हुआ होता है। उसमें न श्रद्धा होती है, और न गहराई। फलतः मन वहाँ भी नहीं लगता। वापिस लौटने में उपहास होने की झिझक से एक नया असमंजस और खड़ा हो जाता है।
कुछ लोग भजन करने के लिए घर छोड़कर तो नहीं भागते पर एक विचित्र प्रकार की उदासी धारण कर लेते हैं। यह वैराग्य है तो नहीं पर कहा या समझा इसी तरह जाता है। अपने कर्त्तव्यों एवं आश्रितों से उदासीन हो जाना। उदासी से उत्पन्न शिथिलता भी भारी पड़ती है। जीवन में इस प्रकार जो रिक्तता उत्पन्न होती है उसे भरने के लिए कई व्यक्ति पूजा पाठ, सत्संग, साधु संगम जैसा कोई नया आश्रय ढूँढ़ते हैं। यदि उस विषय में गंभीरता पूर्वक कदम उठाये गये होते तो कर्मयोग की सनातन प्रक्रिया पहले से ही मौजूद थी। उसे अपना कर जनक अर्जुन, हनुमान आदि की तरह उभयपक्षीय कर्त्तव्य धर्म भली प्रकार सध सकते थे। लोक और परलोक का समन्वयपूर्ण व्यावहारिक है साथ ही सरल और सरस भी।
वैयक्तिक जीवन में आत्म परिष्कार, पारिवारिक जीवन में सहयोगियों का पोषण, सम्वर्धन, सामाजिक जीवन में सत्यप्रवृत्तियों का समर्थन जैसे उत्तरदायित्व हर किसी के सामने मौजूद हैं। उनका निर्वाह भली प्रकार किया जाना चाहिए। इन तीनों ही मोर्चों पर कर्म कौशल का, शौर्य साहस का-विवेक संतुलन का परिचय दिया जाना चाहिए। इनसे मन हटा लेना और कल्पना लोक में विचरण करके मन को समझाना ऐसा प्रयत्न है जिससे किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती। भाग खड़े होने से समस्याएँ और भी अधिक विकराल होती हैं और पहले जितना उपद्रव चल रहा था, उसमें और भी अधिक वृद्धि हो जाती है। मन जिस समाधान को खोजने चला था वह भी भटकाव भरी पगडंडियों में कहाँ मिलता है। उपेक्षा, उदासीनता की रीति नीति, चैन मिलने में सहायक होने की कल्पना जिनने भी की है उन्हें प्रयोग के उपरांत निराशा ही हाथ लगी है।
प्रायः कायरता से उत्पन्न पलायनवाद की चपेट में बहुत से लोग धर्म आवरण ओढ़ते और व्यावहारिक जीवन से जुड़ी हुई समस्याओं से मुँह मोड़ते हैं। ऐसे ही धर्मात्मा उपलब्धियां मिलती हैं। धर्म क्षेत्र में प्रवेश करने पर सर्वत्र उपहासास्पद बनते हैं। हर क्षेत्र में श्रम करने पर व्यक्तित्व में तद् विषयक प्रखरता उत्पन्न न हो तो सहज ही उसकी निरर्थकता का अनुमान लगाया जाएगा। दर्शकों और पर्यवेक्षकों में सहज ही उसकी बुरी प्रतिक्रिया होगी। धर्मात्माओं की अपरिपक्वता का दोष धर्म पर धार्मिकता पर मढ़ा जायेगा। देखा यही जाता है कि धर्म-चर्चा करने वाले लोग अपने स्वजन संबंधियों से उदास होते जाते हैं। जिम्मेदारियों से हाथ खींचकर उन्हें और भी अधिक विकृत करते हैं-साथ ही स्वयं भी निराश, निष्क्रिय बन कर अपने आप के लिए भार भूत बनते हैं। जहाँ रहते हैं वहाँ भी नीरसता का वातावरण उत्पन्न करते हैं। जिस समुदाय के बीच रहा जाय- जिन लोगों के साथ घनिष्ठता पूर्वक निर्वाह किया जाय उन्हें पारस्परिक स्नेह, सहयोग, विनोद, उत्साह का लाभ मिलना चाहिए। इसके बिना सह निर्वाह के साथ जुड़े हुए कर्त्तव्य की अवहेलना ही होती है। जो माँ स्वयं उदास रहती है और अपने बच्चों पर पति पर, परिवार पर उदासी थोपे रहती है वह प्रकारान्तर से उन पर अत्याचार ही करती है भले ही वह निर्दोष जैसी दीन-दुखी जैसी ही क्यों न दीखती हो। यहाँ महिला का तो उदाहरण भर दिया गया है। बात उपेक्षा बरतने वाले हर नर-नारी, बाल-वृद्ध पर लागू हो सकती है। सह जीवन में साथियों के प्रति रुचि घटा लेना उनके प्रति अपने कर्तव्यों में शिथिलता कर देना हर दृष्टि से अनुचित है। भले ही इसके लिए धार्मिकता की आड़ क्यों न ली गई हो? धर्म धारणा का निर्वाह करने के लिए नीरस और उत्तरदायित्व विहीन जीवन क्रम अपनाना आवश्यक नहीं है। उसे सरसता और सक्रियता के साथ अपेक्षाकृत और भी अच्छी तरह निभाया जा सकता है।
ऐसी पलायनवादी धार्मिकता पर करारे व्यंग करते हुए दार्शनिक विसेन्ट पील ने लिखा है - “कमजोर मनःस्थिति के लोग जीवन संग्राम की स्वाभाविक कठिनाइयों को तिल का ताड़ बनाते हैं और भयभीत होकर मुँह छिपाने का कोई आसरा ताकते हैं। कोई धर्म का पल्ला पकड़ते हैं तो कोई शराब का आश्रय लेते हैं। पर इससे उन्हें मिलता कुछ नहीं। ऐसे सभी आसरे परिस्थिति में सुधार नहीं, बिगाड़ ही उत्पन्न करते हैं।” धर्म को अफीम की गोली कहकर अनास्थावादी लोगों ने उसे खूब बदनाम किया है और कहा है कि इस जंजाल में फंसने वाले लोग काहिली और गैर जिम्मेदारी से लद जाते हैं यह बदनामी किसी भी भले बुरे इरादे से क्यों न की जाती हो उसमें इतना तथ्य तो है ही कि धार्मिकता और उदासीनता प्रायः पर्यायवाचक बनती दिखाई पड़ती हैं तो उस परिणाम को देखते हुए इस प्रकार के निष्कर्ष निकालने वालों को अधिक दोष नहीं दिया जा सकता।
वीसेन्ट पील ने इस संदर्भ में अपना निजी अभिमत व्यक्त करते हुए कहा है-धार्मिकता, औषधियाँ, मनोरंजन आदि सभी साधन ठीक तरह प्रयुक्त किये जायं तो इनके सहारे प्रगति होती है और प्रसन्नता मिलती है। किन्तु इन पर इतना आश्रित न बना जाय कि कठोर कर्त्तव्यों की उपेक्षा ही होने लगे। औषधियों पर आश्रित रहने से नहीं स्वास्थ्य रक्षा के ठोस प्रयत्न से काम चलता है। मनोरंजन के अवसर ढूंढ़ने से नहीं आन्तरिक उल्लास से प्रसन्नता स्थिर रहती है- इसी प्रकार धर्म के कल्पना लोक में विचरण करने से नहीं, जीवन संग्राम में कर्म का गांडीव उठाने से समाधान मिलता है। कर्मनिष्ठा का स्थान यदि पलायनवादी धार्मिकता ग्रहण करने लगे तो उसमें अनर्थ की संभावना रहती है। वैसे दोनों ही अपने अपने स्थान पर आवश्यक और महत्वपूर्ण हैं।
धर्म का वास्तविक तात्पर्य है- मानवी चेतना में ऐसी सत्प्रवृत्तियों का समावेश जो सदाचरण और कर्त्तव्य पालन के रूप में वातावरण को उल्लासपूर्ण बनाने में समर्थ हो सकें। सहिष्णुता, दया, प्रेम, विवेक, उदारता, संयम, सेवा जैसे गुणों में सच्ची धर्मनिष्ठा का परिचय मिलता है। कर्त्तव्य परायणता को प्रमुखता देने वाला व्यक्ति धर्मात्मा कहा जा सकता है। किन्तु आज तो इन सबकी उपेक्षा करके मात्र पूजा पठन में निरत रहना ही धर्म परायणता का चिन्ह बन गया है। धर्म के प्रति अनास्था इसी विकृति के कारण उत्पन्न हुई है। धर्म के कारण लोग पिछड़ेपन के शिकार नहीं हुए हैं वरन् पिछड़े लोगों ने धर्म का आडम्बर ओढ़कर उसकी उपयोगिता में संदेह उत्पन्न कर दिया है।
नींद की गोली खाने से, नशा पीने से-भाग्यवाद का आश्रय लेने, भाग खड़े होने, उदासीनता धारण कर लेने से, उलझनें सुलझती नहीं और न पलायनवादी धार्मिकता से किसी को समाधान मिलता है। तथ्यों को समझा जाना चाहिए और समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना चाहिए। वह एक तरह से न सही तो दूसरी तरह हल हो सकती है। जिस तरह हम हल चाहते हैं वही एकमात्र उपाय हो ऐसी बात नहीं है। खोजने पर ऐसे अनेक आधार निकल सकते हैं। जिस से प्रस्तुत कठिनाइयों से निपटना या बचना संभव हो सके। पानी की धार कोई बड़ी चट्टान सामने आने पर किसी दूसरी दिशा में मुड़ जाती है। सीधी टक्कर कठिन पड़ती है तो बगल से रास्ता ढूंढ़ा जाता है। निराशा, कायरता और भीरुता से ग्रसित मनःस्थिति में अपनाया गया धर्माश्रय किसी के कुछ काम नहीं आ सकता। धर्म तो कठोर कर्म का पर्यायवाचक है। धर्म-निष्ठा और कर्म-निष्ठा समान अर्थबोधक हैं। दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाकर अपनी और अपने सम्पर्क क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करने की क्षमता का विकास ही सच्ची धार्मिकता है। इसी विशेषता के कारण धर्मतत्व को मानव जीवन में सम्मान और उच्च स्थान मिला है। इस मौलिकता से विरत होकर वह अनुपयोगी बनता और बदनाम होता चला जाएगा।
धर्म और ईश्वर के प्रति आस्था होने का तात्पर्य है- जीवन की गरिमा और उसकी श्रेष्ठता पर सुदृढ़ श्रद्धा। इसकी प्रेरणा से मनुष्य व्यक्तिगत जीवन में ईमानदार, जिम्मेदार और उदार बनता है। ईश्वर विश्वास से जानता है कि उसे पैर इसीलिए दिये गये हैं कि उनके सहारे न केवल खड़ा हो वरन् आगे चलने का भी प्रयास करे। यदि ईश्वर की लकड़ी का घोड़ा बनाया जाएगा और उस पर चढ़कर सफर करने का इरादा रखा जाएगा तो यह आस्तिकता और धार्मिकता के मूल सिद्धाँतों का अतिक्रमण ही होगा।
आस्तिकता के सहारे ईश्वर विश्वास विकसित किया जा सकता है और सत्कर्मों में उसकी सहायता मिलने का भरोसा रखा जा सकता है। आस्तिकता के अध्यात्म से आत्म-गौरव और आत्म-विश्वास बढ़ाते हुए आत्मावलम्बन की दिशा में बढ़ा जा सकता है। आत्मनिर्भर रहा जा सकता है। धार्मिकता का तत्वज्ञान हमें कर्त्तव्य परायण बने रहने और जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर आदर्शों की लड़ाई लड़ने का शौर्य, साहस मिलता है। क्या यह उपलब्धियाँ जीवन को सार्थक बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं ? धर्म और अध्यात्म को पलायनवाद का तबादा क्यों बनाया जाय जब कि उसमें सज्जनता, शालीनता एवं प्रखरता प्रदान करने की विभूतियाँ आदि से अंत तक भरी पूरी हैं।
ब्रह्म जी ने जब पृथ्वी बनाई तो वह हिल रही थी। उन्होंने बड़े-बड़े पहाड़ उत्पन्न किये जिनके भार से उसका डगमगाना बंद हो गया। पहाड़ों की विशालता देखकर देवता चकराये। उनने पूछा- ‘भगवान इस धरती पर क्या पहाड़ से भी बड़ा और कोई है ‘ब्रह्मा जी ने कहा- ‘वह लोहा है जिससे पहाड़ तोड़ा जा सकता है। उससे अधिक और क्या है उसका उत्तर देते हुए ब्रह्माजी ने कहा- ‘वह आग है जो लोहे को गला देती है।’
प्रश्न एक के बाद एक बढ़ते गये। इससे अधिक बलवान और क्या? इस जिज्ञासा का लगातार समाधान करते हुए ब्रह्मा जी ने आग से बड़ा पानी को बताया जो उसे बुझा देता है। पानी से बड़ा पवन को बताया जो उसे सुखा देती है। अंत में पवन से बड़ा इंसान बताया गया और कहा- ‘साधारण स्थिति में तो उसका रूप जो भी रहे, पर जब वह अपने साधनों को बाँटकर खाता है तब उसकी शक्ति असीम हो जाती है।’
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मनुष्य में से भावनाएँ निकाल दी जायें तो फिर जो शेष बचेगा वह इतना घृणास्पद होगा कि उसे स्पर्श करना तो दूर कोई देखना भी पसंद न करेगा। भाव संवेदनाएं ही हैं जो जीवन को जोड़कर रखती हैं, मनुष्य-मनुष्य के बीच मैत्री कायम रखती है, व्यवस्था बनाये रहती हैं, भावनाओं से रिक्त संसार में और मरघट में कोई अंतर नहीं रह जाता। दूसरी ओर भावनाओं की शीतल छाया उपलब्ध हो तो लोग अभाव की स्थिति में भी आनन्दपूर्वक जीवन जीते हैं, भावनाएं न होतीं तो संसार बिखर गया होता, अब तक कभी का नष्ट-भ्रष्ट हो गया होता है।
खेद है कि मनुष्य जीवन भौतिक आकर्षणों की भयंकर दौड़ में भाव विहीन होता जा रहा है जिससे साधन बढ़ने पर भी निराशा बढ़ रही है, बढ़ते हुए अपराध, तलाक, आत्म-हत्याएँ इस तथ्य के प्रमाण हैं कि मनुष्य का हृदय रस सूखता जा रहा है, यदि इस ओर मनुष्य जाति ने स्वयं ही रचनात्मक दृष्टि न डाली तो एक दिन उसका विनाश ही हो सकता है।
यह मनुष्य के लिए लज्जा की बात है कि उस जैसा विचारशील प्राणी जबकि इन मानवीय गुणों से रिक्त होता जा रहा है तब भी सृष्टि के दूसरे अबोध प्राणियों की भाव-सम्वेदना यथावत अक्षुण्ण है। मनुष्य मर्यादाशील, विचारशील प्राणी होने का दम भरता है, पर टूटते हुए दाम्पत्य संबंध, नष्ट होती पारिवारिक शाँति, उच्छृंखल होती जा रही भावी पीढ़ियाँ और अराजकतापूर्ण सामाजिक संबंध यह बताते हैं कि हमारा जीवन क्रम अशुद्ध होता जा रहा है हम चाहें तो अपने दूसरे भाइयों से सीख कर अपने कदम फिर पीछे लौटा सकते हैं।
‘डिक-डिक’ जाति का हिरन एक पत्नी व्रती होता है। वह सदैव जोड़े में रहता है। अपने जीवन काल में वह कभी किसी अन्य हरिणी के साथ सहवास नहीं करता। शेर और हाथी के बारे में भी ऐसी ही बात होती है। जोड़ा बनाने से पूर्व तो वह पूर्ण सतर्कता बरतते हैं, किन्तु एक बार जोड़ा बना लेने के बाद वे तब तक इस मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करते जब तक कि नर या मादा में से किसी एक की मृत्यु न हो जाये। मृत्यु के बाद भी कई ऐसे होते हैं, जो पुनर्विवाह की अपेक्षा विधुर जीवन व्यतीत करते हैं पर उस स्थिति में उनकी संवेदना नष्ट हो जाती है और वे प्रायः बहुत अधिक खूँखार हो जाते हैं। उस स्थिति में भी वे जब कभी अपनी मादा की याद में आँसू टपकाते दीखते हैं तो करुणा उभरे बिना नहीं रहती। तब पता चलता है जीवन का आनन्द भावनाओं में है, पदार्थ में नहीं।
चिम्पैंजिओं की भी पारिवारिक और दाम्पत्य निष्ठा मनुष्य के लिए एक उदाहरण है। यह अपना निवास पेड़ों पर बनाते हैं, जोड़ा बनाने के बाद चिंपैंजी अपने दाम्पत्य जीवन को निष्ठापूर्वक निबाहते हैं और किसी अन्य मादा या नर की ओर वे कभी भी आकृष्ट नहीं होते। नर अपने समस्त परिवार की रक्षा करता है जब वे वृक्ष पर बनाये विश्राम गृह में आराम करते हैं तो वह नीचे बैठकर उनकी पहरेदारी करता है, कर्त्तव्य भावना से ओत-प्रोत चिंपैंजी की तेजस्विता देखते ही बनती है। वस्तुतः अपनी जिम्मेदारियाँ भली प्रकार निभा ली जायें तो इससे बड़ी कोई अन्य साधना नहीं ‘योगः कर्मसु कौशलम्’ का महामंत्र इसी तथ्य का तो बोध कराता है कि कर्त्तव्यों का पालन मनुष्य संपूर्ण निष्ठा के साथ करे।
जंगली बत्तखें भी पारिवारिक निष्ठा से ओत-प्रोत होती हैं अपनी जाति के अतिरिक्त यह बतखों की 40 लगभग जातियों में से किसी से भी संबंध नहीं बनातीं। जापानी मैण्डेरिन इनके बहुत अधिक समीप होती हैं किन्तु जीव शास्त्रियों के अनेक प्रयत्नों से भी उसने उससे मिलने से इंकार कर दिया।
दाम्पत्य निष्ठा की तरह जीवों में नर-मादा का पारस्परिक प्यार भी भावपूर्ण होता है, जंगली भैंसे, हिरण, बारहसिंगे तथा साँभर भी अपनी मादा के सींगों से सींग रगड़ कर अपनी प्रेम भावना प्रदर्शित करते हैं। सिंह-सिंहनी को अपना पराक्रम दिखाकर आकर्षित करता है तो हाथी को अपनी सूँड उठाकर अपनी प्रेम भावना का परिचय देना पड़ता है। कुछ पक्षी तथा जीव जन्तु सुरीले राग और आवाज से अपनी विरह व्यथा व्यक्त करते और प्रणय-याचना करते हैं। कुछ जीवों में नेत्रों से अभिव्यक्ति कर अपने प्रेम का परिचय देने का प्रचलन होता है, पर प्रेम की स्वाभाविक अभिव्यक्ति प्रत्येक जीव में होती है। अतएव इसे एक सनातन तत्व के रूप में उसकी पवित्रता बनाये रखने का प्रयास करना चाहिए। प्रेम प्रदर्शन की वस्तु नहीं वह आत्मा का भूषण है। अतएव वह जागृत किसी के भी प्रति हो पर प्रयास उसके सार्वभौमिक रूप की अनुभूति का ही हो तभी सार्थकता है।
अपने साम्राज्य में अन्य सजातीय की उपस्थिति बर्दाश्त न करने वाला उल्लू भी दाम्पत्य-निष्ठा का एक अनोखा उदाहरण है। एक बार जोड़ा बना लेने के बाद वे गृहस्थ जीवन का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं। मादा को 30 से 35 दिन तक अंडे सेने में लगते हैं इस अवधि में नर अपनी मादा के लिए स्वयं भोजन जुटाता है और उसकी रक्षा करता है। उल्लू के बच्चे जब तक उड़ना और शिकार करना नहीं सीख पाते तब तक वे प्रौढ़ न हों, उन्हें यह माता-पिता ही आश्रय देते और परवरिश करते हैं।
धनेश पक्षी को तो और भी अधिक कष्टपूर्ण साधना करनी पड़ती है। अंडे सेने के लिए आवश्यक ताप तथा मादा की सुरक्षा के लिए वह जिस खोल में रहती है नर उसका मुँह बिल्कुल बंद कर देता है, उतना ही खुला रखता है जिससे चोंच भर बाहर निकल सके। बस इसी से नर अपनी मादा को खिलाता-पिलाता रहता है।
पत्नी के बाद सेवा के सबसे बड़े अधिकारी अपने बच्चे होते हैं। जिन्हें जन्म दिया है उन्हें अच्छी तरह स्नेह वात्सल्य देकर पोषण प्रदान करना भी एक प्रकार की समाज सेवा ही है। इस कर्त्तव्य की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। जबकि दूसरे जीव अपने दायित्व हँसी-खुशी निबाहते हैं तब मनुष्य ही इधर से मुँह मोड़े यह उचित नहीं।
मनुष्य और पशु दोनों में ही मातृत्व भावना समान रूप से पाई जाती है। हिरण, गाय, नील गाय आमतौर पर सीधे जानवर होते हैं। किंतु इनके बच्चों को किसी प्रकार का खतरा हो तो उनकी रक्षा के लिए यह कुछ हिंसक हो उठते हैं। बिल्ली के लिए एक कहावत है- वह अपने बच्चों को सात घर घुमाती है। जीव शास्त्रियों ने अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि उसे अपनी संतान की असुरक्षा का भय सताता रहता है इसीलिए वह सुरक्षित स्थान की खोज करती रहती है। बच्चों को अपनी गोद में ही सुलाती है। कुतिया के बच्चों को कोई उठा ले जाये तो वह उदास होकर डोलती है। वह अपने बच्चों को किन्हीं सुरक्षित हाथों में देखती है तो उसे बहुत कृतज्ञ और कातर दृष्टि से देखती है मानों उसे अपनी निर्धनता और उन हाथों में बच्चे के उज्ज्वल भविष्य का ज्ञान हो।
सारस अपने अंडे इतने सुरक्षित, पानी से घिरे हुए, किसी नन्हे टापू पर उन दिनों देती है जब बाढ़ की कतई आशंका न हो वहाँ भी यदि कभी कोई लड़के या जंगली जानवर पहुँच जाते हैं तो उन्हें लहू-लुहान करके छोड़ते हैं। सारस कभी भी अपने अंडों या बच्चों को अकेला नहीं छोड़ते। एक भोजन की तलाश में जाता है तो दूसरा उनके पास रहता है।
कौवे और सर्प जैसे क्रूर जीव भी अपने बच्चों के प्रति अत्यधिक भावनाशील होते हैं। कौवे के अण्डों या बच्चों से कोई छेड़खानी करे तो समूचा काक सम्प्रदाय उन पर टूट पड़ता है। सर्प अपने बच्चों को अपनी कुँडली में रखता है उस अवस्था में उसके भोजन का प्रबंध नर करता है। इस प्रकार वे अपनी सन्तति सहिष्णुता का परिचय देते हैं। छछून्दर गर्भ धारण के बाद से ही भावी शिशु के लिए खाद्य संग्रह प्रारंभ कर देती है ताकि प्रसव के बाद जब तक बच्चे भली प्रकार चलने फिरने न लगें तब तक वह उनकी पहरेदारी कर सके।
इस संबंध में सबसे अधिक सुचारु व्यवस्था हाथियों में होती है वे न केवल बच्चे की अपितु समूचा-कबीला गर्भिणी हथिनी को एक घेरे में रखकर उसकी सुरक्षा का प्रबंध करते हैं यदि उस पर कोई आक्रमण करे तो हाथी इतने अधिक खूंखार हो उठते हैं कि सारे जंगल को उजाड़ कर रख देते हैं।
हिन्द महासागर की कुछ मछलियाँ तो अपने अंडों को जो हजारों की संख्या में एक छत्ते के आकार में होते हैं तब तक अपने ही साथ तैराती घूमती हैं जब तक बच्चे न निकल आयें और वे स्वयं चलने फिरने न लगें। एरियस तथा तिलपिया मछलियाँ तो अण्डों को अपने मुँह में सेतीं और उनके आत्म निर्भर होने तक अपने ही साथ रखती हैं। तिलपिया की थोड़ी भी आशंका हो तो वह फिर अपने बच्चों को मुँह में छिपाकर उनकी रक्षा करती हैं। कुत्ते, बिल्ली जिस सावधानी से अपने बच्चों को मुँह में दबाकर उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती हैं यह उससे भी अनूठा उदाहरण है। चूहों के दाँत बड़े तेज होते हैं। किन्तु अपने बच्चों को उठाते समय उन्हें कहीं भी कतई खरोंच नहीं आती, वे इस कोमलता से उन्हें उठाते हैं।
मछलियाँ पानी में रहने वाली जीव हैं, पर गौराई जाति की मछलियाँ एक विशेष प्रकार की घास से अपना घोंसला बनाती और उसी में बच्चे पालती हैं, यही नहीं उन्हें चिड़ियों की तरह बड़े होने तक स्वयं ही खिलाती पिलाती भी हैं। सील मछलियाँ अपने बच्चों की परवरिश के लिए अपने शरीर से खुराक की पहले ही प्रचुर मात्रा एकत्र कर लेती हैं और उन्हें वे 5 सप्ताह तक उसी के बल पर किनारे पड़ी सेती रहती हैं इस अवधि में वे पूर्ण उपवास करती हैं।
मादा गैंडा अपने बच्चे की सदैव अपने आँखों के सामने रखती हैं। वह कभी दायें-बायें होना चाहे तो वह उसे धौल मारकर अनुशासन में रहने को विवश करती है। शूश भी अपने बच्चों का पालन करते समय उन्हें अनुशासन सिखाती है। वह जब चलती है तो अपने एक बच्चे को अपनी पूंछ पकड़ा कर अनुगमन करने की प्रेरणा देती है शेष बच्चे क्रमशः एक दूसरे की पूंछ पकड़ कर पंक्तिबद्ध रेल के डिब्बों की तरह चलते हैं।
आरेजूटन और गिबन बंदर तथा चिंपैंजी पेट या पीठ पर लादे, बच्चों को बड़े होने तक घुमाते हैं। कई बार बच्चे मर जाते हैं तो भी ये मातृत्व पीड़ा वश कई-कई दिनों तक उनकी लाश को ही छाती से चिपकाये घूमते रहते हैं। ओपोसम बोमनेट के कंगारू की तरह की पेट में थैली होती है ये बच्चों को उसी में रखकर पालते हैं कहीं रुकने पर वे इन्हें बाहर निकाल कर सिखाते समझाते भी हैं, केवल लाड़ वश पेट में लगाये रहें तो इसमें कर्त्तव्य पालन कहाँ हुआ। ये उन्हें शिकार करना, खेलना, कूदना भी सिखाते रहते हैं।
वेल्स द्वीप से एक बार नाम क्रम आदि के निर्देश पट्ट पैरों में बाँधकर कुछ जल कपोतों को विमान से ले जाकर अन्य देशों में छोड़ दिया गया। इनमें एक कपोती भी थी जिसने हाल में ही दो बच्चों का प्रसव दिया था, उसे ले जाकर वेनिस में छोड़ा गया, जबकि अन्य जल कपोत 5-6 माह पीछे लौटे, कपोती 930 मील की समीप से दूरी 15 दिन में ही तय कर वापस बच्चों के पास लौट आई जिनके संतान नहीं थी वे अटलांटिक और जिब्राल्टर होते हुए 3700 मील की यात्रा आनन्दपूर्वक भ्रमण करते हुए लौटे इससे यह पता चलता है कि कर्त्तव्य पालन की मूल प्रेरणा सम्वेदनाओं से प्रस्फुटित होती है। सच्चे और ईमानदार व्यक्ति की पहचान करनी हो तो उसकी सम्वेदना टटोलना होगी। सम्वेदना का अर्थ ही है अपने से छोटों के प्रति करुणा, दया और उदारता की भावनाएँ रखना उनकी कष्ट कठिनाई में सहायक होना।
शेर जैसे खूँखार जीव में मातृ सुलभ वात्सल्य प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। सुरक्षा की दृष्टि से शेरनी को कई बार एक स्थान से दूसरी घाटी तक मीलों लंबा स्थान बदलना पड़ता है तब शेरनी एक-एक बच्चे को गर्दन में बड़ी नरमी से पकड़ कर दूसरे स्थान पर पहुँचाती है यह कार्य वह प्रायः रात में करती है।
चुहिया जैसा तुच्छ प्राणी भी ममता से ओत-प्रोत है उसके दाँत अत्यधिक पैने होते हैं तो भी वह उन्हें उठाते समय इतना भावुक होती है कि उन्हें खरोंच भी नहीं आती।
अन्य जीवों में इस तरह की सम्वेदना मिले और मनुष्य उनसे शून्य रहे यह परमात्मा के अनुग्रह का अपमान है। हमें अपनी भावनाएँ परिवार और बच्चों तक ही सीमित न रखकर समस्त मानव जाति तक फैलावें और सब के कल्याण की बात सोचनी चाहिए तभी मानव जीवन की सफलता और सार्थकता है।
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मनुष्य अपने को एकाकी अनुभव करके स्वार्थान्ध रहने की भूल भले ही करता रहे, पर वस्तुतः इस विराट् ब्रह्म का- विशाल विश्व का- एक अकिंचन सा घटक मात्र है। समुद्र की लहरों की तरह उसका अस्तित्व अलग से दीखता भले ही हो, पर वस्तुतः वह समष्टि सत्ता का एक तुच्छ सा परमाणु भर है। ऐसा परमाणु जिसे अपनी सत्ता और हलचल बनाये रहने के लिए दूसरी महा शक्तियों के अनुदान पर निर्भर रहना पड़ता है।
अपनी पृथ्वी सूर्य से बहुत दूर है और उसका कोई प्रत्यक्ष सम्बन्ध दिखाई नहीं पड़ता फिर भी वह पूरी तरह सूर्य पर आश्रित है। सर्दी, गर्मी, वर्षा, दिन, रात्रि, जैसी घटनाओं से लेकर प्राणियों में पाया जाने वाला उत्साह और अवसाद भी सूर्य सम्पर्क से सम्बन्धित रहता है। वनस्पतियों का उत्पादन और प्राणियों की हलचल में जो जीवन तत्व काम करता है उसे भौतिक परीक्षण से नापा जाय तो उसे सूर्य का ही अनुदान कहा जायगा। असंख्य जीव कोशाओं से मिलकर एक शरीर बनता है, उन सबके समन्वित एवं सहयोग भरे प्रयास से जीवन की गाड़ी चलती है। प्राण तत्व से इन सभी कोशाओं को अपनी स्थिति बनाये रहने की सामर्थ्य मिलती है। इसी प्रकार इस संसार के समस्त जड़ चेतन वटकों को सूर्य से अभीष्ट विकास के लिए आवश्यक अनुदान सन्तुलित और समुचित मात्रा में मिलता है।
यह सूर्य भी अपने अस्तित्व के लिए महासूर्य के अनुग्रह पर आश्रित है और महा सूर्यों को भी अति सूर्य का कृपाकांक्षी रहना पड़ता है। अन्ततः सभी को उस महा केन्द्र पर निर्भर रहना पड़ता है, जो ज्ञान एवं शक्ति का केन्द्र है वह ब्रह्म है, सविता है। अति सूर्य, महासूर्य और सूर्य सब उसी पर आश्रित हैं।
प्राणियों, वनस्पतियों और पदार्थों की गतिविधियों पर सूर्य के प्रभाव का अध्ययन करने पर पता चलता है कि उनकी स्वावलम्बी हलचलें वस्तुतः परावलम्बी हैं। सूर्य की उँगलियों में बंधे हुए धागे ही बाजीगर द्वारा कठपुतली नचाने की तरह विभिन्न गतिविधियों की चित्र विचित्र भूमिकाएं प्रस्तुत करते हैं। यहाँ तक कि प्राणियों का मनुष्यों का चिन्तन और चरित्र तक इस शक्ति प्रवाह पर आश्रित रहता है। न केवल सूर्य वरन् न्यूनाधिक मात्रा में सौरमण्डल के ग्रह, उपग्रह तथा ब्रह्मांड क्षेत्र के सूर्य तारक भी हमारी सत्ता स्थिरता एवं प्रगति की प्रभावित करते हैं।
अमेरिका के पागल खानों में किए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि पूर्णिमा के दिन मानसिक रोगी अधिक विक्षिप्त हो जाते हैं, जबकि अमावस के दिन यह दौर सर्वाधिक कम होता है। विक्षिप्त ही नहीं, सामान्य मनुष्यों की चित्त दशा पर भी चन्द्रकलाओं के उतार-चढ़ाव का प्रभाव पड़ना सामूहिक मनश्चेतना का ही द्योतक है।
वनस्पति विज्ञानी वृक्षों के तनों में बनने वाले बर्तुलों द्वारा वृक्षों के जीवन का अध्ययन करते हैं। देखा गया है कि वृक्ष में प्रतिवर्ष एक वृत्ता बनता है, जो कि उसके द्वारा छोड़ी गई छाल से विनिर्मित होता है। हर ग्यारहवें वर्ष यह वृत्त सामान्य वृत्तों की अपेक्षा बड़ा बनता है। अमेरिका के रिसर्च सेन्टर ऑफ ट्री रिंग ने पता लगाया है कि ग्यारहवें वर्ष जब सूर्य पर आणविक विस्फोट होते हैं तो वृक्ष का तना मोटा हो जाता है और उसी कारण वृत्त बड़ा बनता है। स्पष्ट है कि सूर्य और चन्द्र के परिवर्तनों से मनुष्यों एवं पशु पक्षी तथा पेड़-पौधे भी प्रभावित होते हैं। तब क्या मात्र मनुष्यों में ही सामूहिक मनश्चेतना न होकर सम्पूर्ण सृष्टि में ही कोई एक समष्टि चेतना विद्यमान है, यह प्रश्न आज वैज्ञानिकों के सामने खड़ा उन्हें आकर्षित कर रहा है।
डॉ0 हेराल्ड श्वाइत्जर के नेतृत्व में आस्ट्रिया के वैज्ञानिकों ने सूर्यग्रहण के प्रभावों का निरीक्षण-परीक्षण कर यह निष्कर्ष निकाला कि पूर्ण सूर्यग्रहण के समय सामान्य कीट पतंगे भी विचित्र आचरण करने लगते हैं। अनेक पक्षी सूर्य ग्रहण के चौबीस घण्टे पूर्व ही चहचहाना बन्द कर देते हैं। चींटियां सूर्यग्रहण के आधा घण्टे पूर्व से भोजन की खोजबीन बन्द कर देती हैं और व्यर्थ ही भटकती रहती हैं। सदा चंचल बन्दर वृक्षों को छोड़कर जमीन पर आ बैठते हैं। बुड लाइस, बीटल्स, मिली पीड्स आदि ऐसे कीट-पतंग जो सामान्यतः रात्रि में ही बाहर निकलते हैं, वे भी सूर्य ग्रहण के दिन बाहर निकले देखे जाते हैं। दिशा ज्ञान में दक्ष चिड़ियाँ भी चकित हो जाती हैं और उन्हें दिशा बोध नहीं रह जाता। नीलकंठ, गौरैया जैसी कुछ चिड़ियों को छोड़कर शेष चिड़ियाँ चहकना भी भूल-सी जाती हैं।
जापान के प्रख्यात जैविकीविद् तोनातो के अनुसार हर ग्यारहवें वर्ष सूर्य पर होने वाले आणविक विस्फोटों के समय पृथ्वी पर पुरुषों के रक्त में अम्ल तत्व बढ़ जाते हैं और उनका रक्त पतला पड़ जाता है।
पृथ्वी का मात्र सूर्य से अथवा अपने ही उपग्रह चन्द्र से ही अन्तर्सम्बन्ध नहीं है। प्रोफेसर ब्राउन ने मंगल, शुक्र, वृहस्पति आदि ग्रहों का अध्ययन कर यह सिद्ध किया है कि इनकी गतियों और स्थितियों के परिवर्तन से पृथ्वी भी प्रभावित होती है। ये सभी सूर्य सन्तति ही तो हैं और जुड़वां बच्चों वाला सिद्धान्त यहाँ भी घटित होता है, तो आश्चर्य ही क्या है?
भारत में इसी तत्वदर्शन के अनुरूप अतीत में ज्योति-विज्ञान का विकास हुआ था। आर्यभट्ट का ज्योतिष सिद्धान्त, कालक्रिया पाद, गोलपाद और सूर्य सिद्धान्त फिर नारदेव, ब्रह्मगुप्त आदि द्वारा उन सिद्धान्तों का संशोधन-परिवर्धन, भाष्कराचार्य का महाभाष्कीय आदि ग्रन्थ उस महत् प्रयास के कुछ सुलभ अवशिष्ट परिणाम हैं। बाद में इस विशुद्ध विज्ञान का जो दुरुपयोग हुआ, उसे जातीय-जीवन क्रम के ह्रास-काल की अराजकता समझते हुए उसके मूल सिद्धान्त सूत्रों तथा निष्कर्ष संकेतों के आधार पर इस दिशा में बहुत कुछ जानकारी प्राप्त की जा सकती है।
भारतीय तत्व मनीषी हजारों वर्ष पूर्व इस तथ्य से परिचित थे कि जड़ता वस्तुतः कहीं है नहीं। वह हमारी स्थूल दृष्टि की ‘एपियरेन्स’ या आभास मात्र है। यथार्थतः सर्वत्र आत्मचेतना ही विद्यमान है। यह सर्वव्यापी चैतन्य सत्ता ही विश्वात्मा है। विश्वात्मा के साथ आत्मा की जितनी समीपता-घनिष्ठता होती है उसी अनुपात से उसे विशिष्ट अनुदान प्राप्त होते रहते हैं।
हम अपने बच्चों के लिए बेड़ियाँ नहीं गढ़ सकते, हमें तो उन जंजीरों को तोड़ना है जो पुरानी होते हुए भी सिर्फ जकड़ने का कष्ट भर दे रही हैं। हम तर्क, न्याय और विवेक के पक्षपाती हैं, हम सर्वज्ञ होने का दावा नहीं करते और न यह कहते हैं कि हर समस्या का कारण और समाधान ढूंढ़ लिया है फिर भी हमारा विश्वास है कि औचित्य का अनुशीलन, घिसे-पिटे धर्म सिद्धान्तों को रटते रहने से उत्तम है। हमें देवताओं से डरने की अपेक्षा मनुष्य से प्यार करना बेहतर लगता है।
-इंगरसोल
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सीधी, सरल और सज्जनता की नीति अपनाकर कदाचित ही कोई अपने को तत्काल चर्चा का विषय बना सका हो। इसमें देर लगती है। महानता वट वृक्ष की तरह है जिसकी प्रगति क्रमबद्ध रूप से होती है। उसकी अभिवृद्धि और सुरक्षा के लिए लम्बे समय तक तत्परता और सतर्कता का खाद, पानी मिलना चाहिए। जिन्हें वाहवाही की आतुरता है वे इतनी प्रतीक्षा क्यों करेंगे और सज्जनता एवं प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए कष्ट क्यों सहेंगे? आतुरता के लिए इतने महंगे मूल्य पर वाहवाही खरीद सकना कठिन है। उसके लिए धूर्तता ही सरल उपाय रह जाता है। उसमें कोई त्याग करने या शौर्य, साहस प्रदर्शित करने की आवश्यकता पड़ती है तो वह नाटकीयता और उच्छृंखलता के ऐसे तरीके अपनाने भर से पूरी हो जाती है जो सर्व साधारण के स्वभाव में सम्मिलित नहीं है। जिसका सामान्य जीवन में प्रचलन नहीं है। ऐसे काम प्रायः अनैतिक ही होते हैं। अनैतिक न सही क्षुद्रता से भरे हुए तो होते ही हैं। उन्हें ओछे बचकाने एवं छिछोरे ही कहा जा सकता है। नाटकीय सजधज बनाने वाले लोग प्रायः ऐसी ही आत्महीनता से ग्रसित होते हैं। बड़प्पन के लिए जिस सज्जनता की आवश्यकता है वह नाटकीयता से नहीं बनती उसे स्वभाव का- चरित्र का एक अंग बनाना पड़ता है और यह कार्य समय और श्रम-साध्य ही नहीं है उसमें आदर्शवाद और दृढ़ चरित्र का भी समावेश होना चाहिए। सज्जनता तो संस्कृति का ही दूसरा नाम है। इसे जीवन को साधनात्मक बनाकर ही पाया जा सकता है।
मनुष्य की इसी क्षुद्रता का बड़ा मनोरंजक एवं सुविस्तृत वर्णन अंग्रेजी उपन्यासकार सामरसेट माम ने बड़ी खूबी के साथ किया है। उनकी पुस्तक ‘दि समग अप’ तो ऐसी है जिसमें इन बचकाने लोगों की मनःस्थिति, तर्क, एवं मान्यता का पूरा विश्लेषण भली प्रकार समझा जा सकता है। ऐसे आतुर मनुष्य ही आतंकवादी बनते, उद्धत आचरण करते, गुण्डागर्दी अपनाते हैं यहाँ तक कि अपराधी बन कर फाँसी पर चढ़ने तक के लिए वे तैयार हो जाते हैं। चर्चा बुरी ही क्यों न हो, पर होनी अवश्य चाहिए। अनेक आततायी व्यक्ति किसी अभाव के कारण नहीं इसी उद्धत ओछेपन से पीड़ित होकर कुकृत्य करने पर उतारू होते हैं और शूरवीरों में गणना कराने की सनक में अत्याचारी पैशाचिकता तक को अंगीकार कर लेते हैं।
लोग अपना बड़प्पन इस बात में समझते हैं कि अधिक लोगों का ध्यान उनकी ओर आकर्षित हो। अधिक लोग उनकी चर्चा करें। फैशन, सजधज, ठाट-बाट, और अमीरों जैसे खर्च करके लोग सम्पर्क क्षेत्र पर यह आतंक जमाना चाहते हैं कि उनकी विशेष स्थिति स्वीकार की जाय और उन्हें बार-बार देखा जाय, उनके बारे में बार-बार सोचा जाय। यह उद्देश्य पूरा करने के लिए जितना आडम्बर बनाना पड़ता है, जितना सरंजाम जुटाना पड़ता है और जितना समय खर्च करना पड़ता है, उसे सामान्य रूप से नहीं किया जा सकता है। उसके लिए असामान्य तरीके अपनाने पड़ते हैं। वह तरीके हैं- धूर्तता, नाटकीयता, उच्छृंखलता, आडम्बर और पाखण्ड। यह सारी सज्जा असत्य के कंकाल में ही उठाई जा सकती है। छद्म नीति अपनाये बिना इतना बड़ा ढाँचा खड़ा ही नहीं हो सकता, जिसे लोग घूर-घूर कर देखें और बार-बार सोचें।
यह एक भ्रान्त धारणा है कि नुकसान पहुँचाने की क्षमता का नाम शक्ति है। ऐसे काम प्रायः लुक-छिप कर किए जाते हैं। बेखबर आदमी पर छिप कर हमला करने से तो कोई अदना आदमी किसी सशक्त के प्राण हरण कर सकता है बगल में छुरी घोंप देना किसी के लिए भी सरल है। विश्वासघात करने में उनकी धूर्तता उतनी कारगर नहीं होती जितनी कि सामने वालों की सज्जनता। जिसने विश्वास किया उसी पर हमला बोल देना कायरता है, इस कायर आक्रमणकारिता से घृणा, द्वेष, कटुता, प्रतिशोध की भावना उलट कर अपने लिए ही सर्वनाश के कारण उपस्थित करती है।
सौजन्य की सद्भावना को कुण्ठित करने वाले कई कुसंस्कार हैं जो हमें असभ्य और धृष्ट बनाते चले जाते हैं। दूसरों को छोटा बनाकर अपने को बड़ा बनाना गलत तरीका है। अच्छाई की दृष्टि से हम औरों से आगे बढ़ें तो यह स्वस्थ प्रतियोगिता है। श्रेष्ठता की घुड़दौड़ में आगे निकलने की प्रतिस्पर्धा को सराहा जा सकता है, पर साथियों को लात मार कर गिरा देना और इस स्थिति का लाभ उठा कर अपने को विजेता घोषित करना बेकार है। इसी प्रकार अपनी वर्तमान स्थिति पर असन्तुष्ट रहना भी शील सौजन्य के विपरीत है। जो उपलब्ध है उस पर प्रसन्नता भरा सन्तोष अनुभव करें, साथ ही आगे बढ़ने का उत्साह जारी रखें। इतना ही पर्याप्त है, पर जो सदा असन्तुष्ट ही रहता है, उसकी खीज और खिन्नता ही उसकी शक्तियों को नष्ट करती रहती है। अहंकार मनुष्य को सद्भावनाओं से वंचित करता है। दूसरों का व्यंग्य, उपहास, अपमान करके कई व्यक्ति अपना बड़प्पन सिद्ध करते हैं। कई सम्वेदन शून्य सहानुभूति रहित और निर्मम प्रकृति के होते हैं उन्हें दूसरों की स्थिति समझने की फुरसत नहीं होती और न हृदय इतना विशाल होता है जिसके कारण किसी पर क्या बीतती है इसका अनुभव किया जा सके। इन दुष्प्रवृत्तियों के रहते उस शील सौजन्य का विकास नहीं हो सकता, जिससे मनुष्य अपनी और दूसरों की आँखों में ऊँचा उठता तथा सम्मानित बनता है।
यदि तत्काल प्रसिद्धि पाने की आतुरता न हो और सम्पर्क क्षेत्र में अपने लिए भाव भरा सम्मान प्राप्त करने का धैर्य हो तो फिर एक ही सुनिश्चित मार्ग है- सज्जनता अपनाने का। यह सच्चाई और शालीनता पर अवलम्बित है। धीरे-धीरे लोग ही इसे अपनाते हैं। जिनमें दूरदर्शी विवेक की मात्रा जितनी होगी- जिनमें आदर्शों के प्रति निष्ठा का आत्मगौरव होगा उन्हीं के लिए यह मार्ग सरल है। नम्रता, विनयशीलता, मर्यादा, शिष्टता का व्यवहार देखकर किसी की सज्जनता का आरम्भिक परिचय मिलता है। उद्धत स्वभाव के मनुष्यों की अशिष्टता, वाणी और व्यवहार में झलकती देखी जा सकती है और यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह व्यक्ति कितना क्षुद्र और कितना ओछा है। सौजन्य हीन व्यक्ति असभ्य माने जाते हैं, तुनक मिज़ाज, अशिष्ट तथा उद्धत वेश विन्यास बनाने वाले व्यक्ति प्रायः इसी स्तर के होते हैं।
अपने सम्पर्क क्षेत्र के सभी व्यक्तियों से व्यवहार सहानुभूति पूर्ण रखें। वह न्याय संगत रहे और सहानुभूतिपूर्ण स्वार्थों के टकराव में यदि कुछ घाटा भी पड़ता हो तो उसे सहन किया जा सकता है किन्तु सद्भाव गँवा देने की क्षति ऐसी है जो अन्ततः अधिक घाटे की सिद्ध होगी। जब तक टकराव का कोई अत्यन्त ही अनैतिक या असभ्य कारण न हो तब तक व्यवहार कुशलता इसी में है कि सद्भावों को बनाये ही रखा जाय। इससे इतना लाभ तो प्रत्यक्ष ही है कि शत्रुता का नया सिलसिला चल पड़ने से जो आक्रमण-प्रत्याक्रमण का सिलसिला चलता है और उससे जो मानसिक अशांति छाई रहती है उसकी आवश्यकता न पड़ेगी। विद्वेष के कारण उत्पन्न होने वाली मानसिक अशान्ति जितनी हानि पहुँचाती है उसकी तुलना में वह घाटा कम ही रहेगा जो स्वार्थों में थोड़ी कमी करके भी सद्भावों को बनाये रख सके।
सौजन्य निजी जीवन में सादगी के रूप में दीखता है और दूसरों के साथ व्यवहार के अवसर आने पर वह नम्रता, विनयशीलता के रूप में दिखाई पड़ता है। उसमें दूसरों के सम्मान का भाव है न कि अपना छोटापन प्रदर्शित करने का नम्रता का भरा शिष्ट व्यवहार करने पर कोई अपनी इज्जत गंवाता नहीं है और न किसी की दृष्टि में छोटा बनता है, वरन् सच तो यह है कि उसकी इज्जत और भी अधिक बढ़ जाती है। किसी का सम्मान करने का अर्थ है बदले में उसका सम्मान पाना। इससे कम कीमत सम्मान पाने की और कुछ हो ही नहीं सकती कि हम सादगी के परिधान पहनें, शालीन लोगों जैसी वेशभूषा रखें और शिष्टता भरा मधुर व्यवहार करें, मीठे वचन बोलने से दूसरों को जितना सन्तुष्ट किया जा सकता है उतना टोकरी भर मिठाई खिला देने पर भी सम्भव नहीं है।
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पुराना अर्थ शास्त्र, समाज शास्त्र, चिकित्सा शास्त्र, नीति शास्त्र यहाँ तक कि धर्म शास्त्र भी प्रगति की गंगा में बहते-बहते कुछ से कुछ हो गया है। टूट-टूटकर नदी में गिरते रहने वाला पाषाण खण्ड जल धारा के थपेड़े, खाते-खाते, गोल-मटोल शालिग्राम या शिवलिंग बन जाते हैं। इस क्रमिक प्रवाह में पड़कर अनगढ़ को सुगढ़ कुरूप को सुन्दर, अस्त-व्यस्त को व्यवस्थित होना चाहिए था, किन्तु वैसा हो नहीं सका। प्रगति एकाँगी रह गई उसमें समृद्धि का लक्ष्य तो ठीक तरह की नहीं आवश्यकता से अधिक भी समझ लिया गया, किन्तु आन्तरिक विभूतियों की भी कुछ आवश्यकता है, यह नहीं समझा गया। परिवर्तन अच्छी चीज है। अभावों की परिधि तोड़कर हम सम्पन्नता उपलब्ध करते हुए आगे बढ़ रहे हैं। यदि यह विकास अध्यात्म और दर्शन के क्षेत्र में इतना हो सका होता कि उसे व्यवहार में स्थान मिल सकता तो हमारा विकास एवं परिवर्तन सच्चे अर्थों में सार्थक हो जाता।
शताब्दियाँ आगे बढ़ रही हैं। मान्यताओं की दृष्टि से भी हम पिछली शताब्दी से भी आगे हैं। यह प्रश्न दूसरा है कि उसमें दूरदर्शिता भी सम्मिलित है या नहीं। अब एडमन स्मिथ पुराने पड़ गये। इन दिनों कांस और मार्क्स को मान्यता मिल रही है। अब जेन सिस, विशप, विलयर फोर्म की निवृत्ति दे दी गई, उनके स्थान पर डार्विन और हक्सले को नियुक्ति हुई है। अब त्रिकालदर्शी योगियों के स्थान पर न्यूटन और आइन्स्टीन को सत्य के अधिक निकटवर्ती स्वीकार किया गया है। अब हम अन्तरिक्ष युग में रह रहे हैं, अन्तरिक्ष में परियों के उड़नखटोले से विदा लें चुके अब अंतर्ग्रही उड़ानें पूरी करने वाले यानों के ढाँचे खड़े किये जा रहे हैं। राकेटों की एक बड़ी सेना तो अभी भी अपने आकाश में निर्वाध उड़ानें उड़ रही हैं।
अपने विकास क्रम में हम कहीं मौलिक गलती छोड़ रहे हैं। भाले से शिकार करने के स्थान पर हमारे पास दूर मारक राकेट और अणुबम मौजूद हैं। शरीर के अंगों की काट-छाँट और मरम्मत करने की कला, कपड़ों की सिलाई स्तर पर आ गई है। विज्ञान के सुख-सुविधा के असीम साधनों ने मनुष्य को लाभान्वित किया है इतने पर भी हत्याएं और आत्म हत्याएं क्यों बढ़ती जा रही हैं। पुलिस और न्यायालयों के विशालकाय ढाँचे खड़े होने पर भी मनुष्य अपने को असुरक्षित क्यों अनुभव करता है? समाज की संगठनात्मक संरचना में उभार आने पर भी मनुष्य अपने को एकाकी, उपेक्षित और असहाय क्यों अनुभव करता है? मस्तिष्कीय विद्या का असाधारण विकास हुआ है। खोपड़े के भीतर की समस्त गतिविधियों की जानकारी देने वाली विशिष्ट एक्सरे प्रक्रिया इलेक्ट्रो-एन-सेफेलोग्राफी ने जब कि मनःविश्लेषण के असाधारण आधार खड़े कर दिए हैं तो मनुष्य अपनी दृष्टि से ओझल और दूसरों की दृष्टि में विस्मृत होता क्योँ चला जा रहा है? मानसिक उपचार विज्ञान साइकोफार मेकालाजी ने जब आदमी की अकल दुरुस्त कर देने का दावा किया है तो मनुष्य उलझनों के जाल-जंजाल में अधिकाधिक कड़े शिकंजों में कसता क्यों चला जा रहा है? ब्रेन वाशिंग के लिए अब उत्पीड़न अथवा प्रचार की जरूरत नहीं रह गई। वह कार्य खोपड़ी पर इलेक्ट्रॉनिक केप पहना देने से उसमें लगे कपड़ों की ड्राइक्लीनिंग की तरह साफ कर डालने वाले किरण ब्रुस भली प्रकार कर सकते हैं। इतने पर मूल संकल्पों में अन्तर नहीं आता। नींद की गोलियाँ खाकर झपकी लेने और नशा पीकर गम गलत करने का रिवाज क्यों बढ़ाता जा रहा है? अन्तर्द्वन्द्व तथा प्रकृति प्रतिरोध से उत्पन्न तनाव के कारण मनुष्य अर्ध विक्षिप्त जैसी स्थिति में क्यों रह रहा है?
विचार शैली को प्रभावित करने वाले अब नये आधार और नये आयाम सामने हैं। समय ने बहुत कुछ बदल दिया है। हम अब वहाँ नहीं हैं जहाँ कभी थे। न वे पुरानी समस्याएं रह गईं है और न उन समाधानों से काम चल सकता है। समय ने नई समस्याएं उत्पन्न की हैं और उनके लिए नये समाधानों की आवश्यकता पड़ी है। वन मानुष की शक्ल में मनुष्य का पिछले दस लाख वर्ष से आदमी का अस्तित्व इस धरती पर है; पर उसे आदमी कहलाने योग्य स्थिति प्राप्त हुए एक लाख वर्ष से भी कम समय बीता है। मध्यवर्ती नौ लाख वर्ष की भी कोई निर्वाह पद्धति रही है; पर अब उसका कोई महत्व नहीं रह गया है। प्रगति का क्रम एक लाख वर्ष से चल रहा है उसमें भी हर शताब्दी- हर सभ्यता और हर भौगोलिक स्थिति का प्रभाव व्यक्ति की मनःस्थिति और सामाजिक परिस्थिति पर पड़ता रहा है। तदनुसार तेजी से परिवर्तन होते रहे हैं। धर्म सम्प्रदायों, सभ्यताओं और शासन पद्धतियों के रूप में इन परिवर्तनों की भिन्नता और विचित्रता सहज ही देखी जा सकती है। इन विचित्रताओं के प्रयोग परीक्षण से आदमी तरह-तरह के निष्कर्ष निकालता रहा है और पुरानेपन का आग्रह किए बिना सुधार और परिवर्तनों का सहारा लेकर अपेक्षाकृत अधिक अच्छी स्थिति प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करता रहा है। यही है हमारी प्रगति का इतिहास जिसके सहारे क्रमिक गतिशीलता अपनाकर वहाँ पहुँचे हैं जहाँ आज हैं।
इस प्रगति की व्यंगात्मक आलोचना करते हुए मानव विज्ञानी एडमंड लीच ने एक बार कहा था- ‘आदमी देवताओं जैसा हो गया है।’ उसके इस कथन का अर्थ इतना ही था कि प्रकृति के रहस्यों को बाँधने और नियमों का अतिक्रमण करने से उसने देवताओं की प्रतिद्वन्द्विता ठान ली है। अन्तर इतना भर रह गया कि देवताओं ने अपनी आन्तरिक दिव्यता विकसित करके प्रकृति विजय के लाभ को सबमें वितरित किया। इसके विपरीत आज का प्रगतिशील आदमी इसे अंगूर की शराब बनाकर पी रहा है और अमृत को विष में बदल रहा है। यदि इस प्रगति क्रम में आन्तरिक विकास को भी जुड़ा रखा गया होता तो देवताओं की प्रतिद्वन्द्विता करने वाला मनुष्य धरती पर स्वर्ग का सृजन कर सकने में भी सफल हो गया होता।
हम देवताओं जैसा वैभव तो प्राप्त कर रहे हैं, पर उनके जीवन दर्शन से वंचित रह रहे हैं। अणु सभ्यता के विकास पर गर्व करने की पूरी गुंजाइश है, पर विकरण और प्रदूषण के विष से आत्म रक्षा कर उपाय क्या है यह सूझ नहीं पड़ता।
प्रगति प्रवाह तीव्र होने से नदियों में नौकायन की सहज सुविधा बढ़ती है; पर साथ ही प्रचण्ड भँवरों की संख्या बढ़ जाने से पार होने का प्रयत्न करने वालों के लिए संकट भी गहरा होता जाता है। विकृत प्रकृति का स्वरूप अवगति का रूप धारण कर लेता है। छोटे से बड़े होने के स्थान पर बड़े का छोटा होना भी प्रगति की एक विशेष शाखा कहा जा सकता है। रेंगने वाले प्राणियों के युग में प्रायः सौ फुट लम्बा एक जन्तु था। डिप्लोडोक्स और लगभग 50 टन भारी टायकसार्स जैसे महादैत्य जिन दिनों मस्ती के साथ भूतल पर अपनी विजय पताका फहरा रहे थे उन्हीं दिन अधिक बुद्धिमान और अधिक आक्रामक फासकोलोथेरियन पल रहा था और उसने उन महादैत्यों का वंश नाश करके ही चैन लिया। कौन जाने निकट भविष्य में मनुष्यों की कोई ऐसी विकसित जाति पनप उठे जो आज की समृद्धि की दृष्टि से महादैत्य और दूरदर्शिता की दृष्टि से संज्ञा शून्य नर पशु को निरस्त करके सहृदयता और सम्पन्न सज्जनता को इस भूलोक का संचालन सूत्र थम सकने में सफल हो सके।
प्रगति पथ पर चलते हुए हमें कुछ क्षण रुक कर यह सोचना होगा कि इतना अधिक परिश्रम और प्रबल पुरुषार्थ करते हुए भी हम सुख-शांति से पीछे क्यों हटते जा रहे हैं। इसका कारण हमारी लंगड़ी दौड़ है। समृद्धि पर ध्यान रखा जाय और सद्गुणों की विभूतियों की अपेक्षा की जाय तो उस काने, कुबड़े अन्धे, पंगे विकास से काम चलेगा नहीं।
नव युग की माँग है कि आत्मिक विकास के महत्व को भी समझा जाय और नीति नियमों के पालन पर भी समुचित ध्यान दिया जाय। इसके लिए प्रस्तुत वातावरण उससे मौजूद है। मानवी अन्तरात्मा अपने उत्कर्ष के लिए आतुरतापूर्वक माँग करती है। उसे सुना जा सके तो परिपोषण के लिए उपयुक्त वातावरण बनाया जा सके तो समग्र प्रगति की सम्भावना के मूर्तिमान होने में कोई कठिनाई नहीं है।
हम नव युग के एक कोने में नई नैतिकता को उगते और बढ़ते देख सकते हैं। वह नर्सरी की एक क्यारी में बोई जाने वाली पौध की तरह थोड़ी ही क्यों न हो, पर उसका उदय अभिवर्धन निश्चित रूप से हो रहा है। यही अगले दिनों विश्व उद्यान को सुविकसित सौन्दर्य से शोभायमान करेगी। यह उत्पादन चिर नवीन दीखते हुए भी वस्तुतः चिर प्राचीन है। उसे मानवी संस्कृति या सनातन सभ्यता कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है।
अन्तरिक्ष यात्रियों को अब प्राचीन योगियों की भाँति अविचल धैर्य, आत्म नियन्त्रण, एक आसन, एकान्त, अल्पाहार, मौन, ध्यान, सतत जागरूकता, लक्ष्य के प्रति अडिग निष्ठा, सन्तों जैसी ईमानदारी अपने स्वभाव का अंग बनाने के लिए सतत अभ्यास करना होता है और उसमें पारंगत सिद्धि प्राप्त करनी पड़ती है। जिस प्रकार की तन्मय एकाग्रता के मध्य योग साधना की रहस्यमय विद्याएं और सिद्धियाँ खोज निकाली गई थी, उससे कम मनोयोग प्रकृति की अद्भुत क्षमताओं का पता चलाने और मानवी उपयोग में लाने के प्रयत्नों में भी नहीं लगा है। अणु के अन्तराल की रहस्यमय परतों पर से पर्दा उठाना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि आत्मा पर चढ़े हुए कषाय-कल्मषों को हटाने में योगियों को कराना पड़ा है।
दार्शनिक हक्सले ने समय की प्रगति-समीक्षा करते हुए अपनी पुस्तक “ब्रेव न्यू वर्ल्ड” में अपने समय को बहादुरों का- कर्मवीरों का- युग कहकर उल्लेख किया है। विज्ञान सहित हर क्षेत्र में अपनी पीढ़ी के प्रबल पुरुषार्थ की प्रशंसा करते हुए वे कहते हैं यदि भौतिक प्रगति पर नैतिकता का अंकुश न लगाया गया तो यह प्रगतिशील अत्युत्साह ही हमें ऐसी दुर्गति में फँसा देगा जिससे उबर सकना अत्यन्त कष्ट साध्य होगा। उनने अपनी एक दूसरी पुस्तक ‘दि पैकिनियल फिलॉसफी’ में भाव भरी किन्तु गम्भीर भाषा में लिखा है- एक विश्वात्मा इस चराचर जगत में संव्याप्त है उसका दर्शन करके ही मनुष्यता कृत कृत्य हो सकेगी।
उस उज्ज्वल भविष्य की आशा प्रतीक्षा करते रहने से काम नहीं चलेगा। आवश्यकता इस बात की है कि जिस पुरुषार्थ के साथ भौतिक प्रगति के लिए प्रबल प्रयत्न हो रहे हैं, उसी तत्परता के साथ नैतिक और साँस्कृतिक सुसम्पन्नता से मानव जाति को अलंकृत किया जाय। इस सर्वांगपूर्ण प्रगति का आधार बनते ही हम उस वातावरण में रहने लगेंगे जिसे स्वर्गीय और मानवी गरिमा के अनुरूप कहा जा सके।
सन 30 की मन्दी में इंग्लैण्ड की एक पुरानी मिल घाटे में चली गई। स्टॉक का मूल्य कम रह गया और बिक्री घट गई। फलतः स्थिति यहाँ तक पहुँची कि मिल को बन्द करने के अतिरिक्त और कोई चारा न रहा। मालिक और मजदूरों में मुद्दतों का स्नेह सम्बन्ध चला आता था। वस्तुस्थिति की सूचना देने के लिए एक दिन मालिक ने सब मजदूरों को बुलाया और कहा- घाटा अब इतना बढ़ गया है कि मिल अब दिवालिया घोषित होने जा रही है। हमारी और आपकी लम्बी मित्रता का अन्त होने में अब एक सप्ताह से अधिक का समय नहीं रह गया।
मजदूर भारी मन से वापिस चले गये। दूसरे दिन वे आये तो सभी ने अपने कामों पर जाने की अपेक्षा वे मालिक के दफ्तर पर लाइन लगाकर खड़े हो गये। उनमें से प्रत्येक एक-एक करके दफ्तर में घुसा और अपनी-अपनी पास-बुकों के साथ चुकती पावती की रसीद मालिक की मेज पर रखता चला गया । उन्होंने कहा- “जो हमारे पास जमा पूँजी है उसे आप निकाल दें। उसे घाटे की पूर्ति में लगा दें और मिल को चालू करने का प्रयत्न करें। यदि मिल और आप डूबने जा रहे हैं तो हम कम से कम अपनी जमा पूँजी तो साथ में डुबा ही सकते हैं।
हजारों पास बुक साथ लेकर मालिक बैंक गया। बैंक आगे से नया उधार देने से स्पष्ट मना कर चुका था। इतनी सारी पास बुकों को देखकर बैंक के व्यवस्थापक अचकचाये और कुछ विचारने के पश्चात इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि जिस मिल के कर्मचारियों और मालिकों में इतना घनिष्ठ सहयोग है उसका भविष्य बुरा नहीं हो सकता। सह लोग बुरे दिनों से किसी प्रकार मिल जुलकर निपट ही लेंगे। यह सोचकर उन्होंने मिल को फिर से उधार देने का फैसला कर लिया। फलतः मिल चालू रही और संकट के दिन टल गये।
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भारतीय संस्कृति में धन के उपयुक्त वितरण को पर्याप्त महत्व दिया है अनायास प्राप्त होने वाले धन के अतिरिक्त उचित श्रम एवं न्यायपूर्वक जो धन कमाया गया है, उसके भी खर्च करते समय सब कुछ अपने लिए ही लगाने की बात नहीं सोचनी चाहिए वरन् उसका भी विभाजन करके खाना चाहिए। आवश्यकता के अतिरिक्त कृषि व्यवसाय आदि से जो बचे, उसे संसार में फैली हुई पीड़ा एवं पतन प्रवृत्तियों के निवारण में लगाते रहना चाहिए। दान को नित्य कर्म माना गया है। समता को स्थिर रखने के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक अधिक उपार्जन कर्ता स्वेच्छापूर्वक संसार का पिछड़ापन दूर करने के लिए अपनी कमाई का उपयुक्त अंश परमार्थ प्रयोजनों में लगाता रहे। इसी प्रकार उपार्जन कारी प्रतिभा सार्थक बनती है। निन्दा तो उस धन की है जो विलासिता एवं संग्रह के लिए प्रयुक्त होता है। उपार्जन के साथ निर्वाह के अतिरिक्त दान-प्रक्रिया को भी अविच्छिन्न रूप से जोड़कर रखा गया है। कहा है-
अगं स केवलं भुंक्ते यः पत्रत्यात्मकारणात्। यज्ञशिष्टाशनं ह्मैतत् सतामन्नं विधीयते॥
जो अपने लिए ही कमाता और आप ही खाता है, वह पाप ही खाता है। श्रेष्ठ व्यक्ति सत्कर्मों के लिए कमाते हैं और जो बचा रहता है उतना ही खाते हैं।
पशवोऽपि हि जीवन्ति केवलात्मोदरम्भराः। कि कायेन सुगुप्तेन बलिना चिरजीविनः॥
-व्यास स्मृति 4।25
अपना पेट भरना और अपनी मौज करना पशु भी जानते हैं। ऐसे पेट और प्रजनन के लिए जिये जाने वाले पशु जीवन की क्या सार्थकता है?
यावद् भ्रियेत जठर तावत् स्वत्वं हि देहिनाम। अधिक योऽभि मन्येत स स्तेनो दण्डमर्हति॥
- श्रीमद्भागवत
जितने से मनुष्य का उदर पोषण हो जाये मनुष्य का उतने पर ही अधिकार है जो इससे अधिक की कामना करता है वह चोर है और दण्डनीय है।
य आध्राय चकमानाय पित्वोन्नवात्सन्नफिता योपजग्मुषे। स्थिरमनः कृणुते सेवते पुरोतो चित्समर्डितारं न विदते॥
स इद्भोजो यो ग्रह्व ददात्यन्न- कामाय चरतेकृषाय। अरमस्मै भवति यामदूता उतापरीषु कृणुते सखायम॥
-ऋग्वेद
जो अन्नवान् होता हुआ, अन्न चाहने वालों और गरीबी से पास आये हुए दुखियों के लिए मन कठोर कर लेता है और अपने आप मजे में खाता है, उसे सुख देने वाला मित्र नहीं मिल सकता है।
जो अन्न चाहने वाले दुर्बल याचक को अन्न देता है वही सच्चा भोजन करता है। ऐसे दाता के पास दान करने के लिए पर्याप्त अन्न आता है और कठिन समय में सहायक मित्र उत्पन्न होते हैं।
दान-सहयोग करने वाले को मनुष्य का सहयोग तो प्राप्त होता ही है- ईश्वरीय अनुदान भी मिलते हैं। वेद भगवान् कहते हैं-
न किः परिष्टिर्मघवन मघस्य ते यद्दाश्षे दशस्यसि।
-ऋग्वेद
परमेश्वर दानी व्यक्ति को इतना ऐश्वर्य देता है जिस की कोई सीमा नहीं।
बुद्धिमानों को निर्देश दिया गया है कि वे कृपणों को चतुरता पूर्वक समझाकर किसी प्रकार अनावश्यक संग्रह को श्रेष्ठ कामों में दान करा देने की भूमिका बनाते रहें। वे आनाकानी करें तो भी निराश न हों वरन् धैर्य पूर्वक लगे ही रहें। महर्षि चाणक्य कहते हैं-
अदातारमप्यर्थवन्त मर्थिनो न त्यजन्ति।
-चाणक्य सूत्र
कंजूस धनी से निराश होकर नहीं बैठ जाना चाहिए।
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असाध्य रोगों के निवारण और ऐसी ही अनेक संकट पूर्ण परिस्थितियों में जीवन को बचाये रखने की दिशा में सर्वोपरि प्रगति अमेरिका ने की है। हृदय, फेफड़ों, यकृत तथा कृत्रिम रुधिर संचार की अच्छी से अच्छी यांत्रिकी और जीवन दायिनी मशीनों और उपकरणों के लिए सारा संसार अमेरिका का आश्रित है। इसका कारण इस देश में विपुल सम्पत्ति और साधन नहीं हैं अपितु एक ऐसा सहयोग है, जिसकी ओर दुनिया के बहुत कम लोग ध्यान देते हैं। ज्ञान-विज्ञान के अनेक क्षेत्रों के विशेषज्ञ यदि सहकार और सहयोग की भावना से एक स्थान पर मिलें, बैठें और परस्पर विचार विनिमय करें तो ऐसी अनेक उपलब्धियाँ अर्जित की जा सकती हैं, जो औरों के लिए आश्चर्यजनक सी लगती हों? ऊपर जिस यन्त्र “हृदय मशीन” (मेशमेकर) से सहयोग के सत्परिणाम की गाथा प्रारम्भ होती है वह किसी अकेले एक व्यक्ति, कम्पनी या विभाग की उपलब्धि नहीं अपितु कई विभागों की संयुक्त से योग्यताओं के एक स्थान पर संगठित होने का परिणाम है। पेशमेकर के निर्माण में अमेरिकन कम्प्यूटर टेक्नालॉजी, विद्युत विभाग तथा स्वास्थ्य विशेषज्ञों का सम्मिलित प्रयास लगा हुआ है। यदि यह तीनों ज्ञान की धाराएं अलग-अलग दिशाओं में बहती रहतीं तो सम्भवतः त्रिवेणी संगम की तरह पुण्य फलदायक इस यन्त्र का निर्माण ही सम्भव नहीं होता।
सहयोग की भावना में प्रथम लाभ तो यह है कि आदमी की अहं भावना मिटती है एक का ज्ञान, एक की क्षमता सीमित दस का ज्ञान दस की क्षमता असीमित सीमित क्षमता से असाधारण उपलब्धियाँ सम्भव नहीं उसके लिए असाधारण सामूहिक योगदान ही शक्य और समर्थ है। पीछे तो अमेरिकन की जनरल इलेक्ट्रिक कम्पनी भी इस सहकार में सम्मिलित हो गई तभी इतना उपयोगी यन्त्र विकसित हो सका कि अब उसे धारण करने वाले न केवल सामान्य जीवन प्रक्रिया चला लेते हैं अपितु खेलकूद भी सकते हैं, उछल सकते हैं, तेज गति से दौड़ भी सकते हैं।
अमेरिका भौतिक समुन्नति का श्रेय भी इसी बात को है कि वहाँ ज्ञान सारे विश्व से आकर्षित किया गया और उसका ध्रुवी कृत लाभ अमेरिकी प्रशासन ने प्राप्त किया यह परम्परा चाहे देश हो या समाज जहाँ भी सहकारिता पनपती है, वहीं समुन्नति फलती-फूलती है। ‘जहाँ सुमति तहं सम्पत्ति नाना’ कहावत इसी बात को सिद्ध करती है। सुमति का अर्थ ही- सामूहिक सद्भाव का विस्तार है, उपचार के क्षेत्र में बने संगणक अमेरिका के लाकहीड कं0 के इंजीनियरों के सहयोग से बना यह कं0 लड़ाका विमान स्टार फाइटर्स बनाती है मेडिकल का तो उसे ज्ञान है, यह मार्गदर्शन उसे मेयोक्लीनिक से मिला। डिजाइनर्स मेडिकल प्रोफेसरों के सुझाव पर ‘एक्पेसेंमा बेल्ट’ जो वास्तविक शोध और फेफड़े की बीमारी पर साँस लेने में सुविधा प्रदान करती है। ‘नार्थ अमेरिकन एविएशन’ के सहयोग से सम्भव हुआ।
विश्व को ‘महा प्रपंच’ और प्रकृति को विविध रूपा कहा गया है। हमारे शरीर में ताप विज्ञान भी विद्यमान है, रसायन शास्त्र भी फोटोग्राफी भी, फिजियोलॉजी भी, इंजीनियरिंग का इसमें कमाल है तो यह मनोविज्ञान का जादुई पिटारा भी है। इतना सब होते हुए भी मनुष्य जीवन के अस्तित्व पर एक सुनिश्चित निर्णय आज तक नहीं हो पाया। पन्थों, सम्प्रदायों और नित्य नये दर्शनों का उदय इसी कारण हुआ। यदि ज्ञान विज्ञान के समूचे क्षेत्र को एक स्थान पर एकत्र किया जा सका होता तो सम्भवतः बहुत समय पूर्व किसी सर्वमान्य सिद्धान्त की वैसे ही स्थापना हो चुकी होती जैसी कि इन मेडिकल मशीनों के प्रति किसी को कोई आशंका नहीं। यह तो कुछ उदाहरण मात्र हैं। जो न केवल चिकित्सा अपितु जीवन के अनेक क्षेत्रों में सहयोग के चमत्कार की सम्भावनाओं का संकेत करते हैं।
ऊपर जिस ‘बेल्ट’ का जिक्र किया गया है, वह अन्तर्ग्रहीय यानों पर उल्कापिंड गिरने के प्रभाव का अध्ययन करने के लिए बनाया गया था। ‘नासा स्पेश अधिकारियों से कुछ डाक्टरों की मैत्री थी। एक दिन दोनों प्रकार के अनुभवों का एकीकरण हुआ तो एक नये आविष्कार ने जन्म लिया। इसी तरह मानव जीवन की अनेक समस्याओं का, राजनैतिक उथल-पुथल, अकाल और युद्ध जैसी मानवीय विभीषिकाओं का भी मिल जुल कर जितना अच्छा समाधान हो सकता है; कोई अकेला तमाम उम्र वैसा नहीं कर सकता। यदि ज्ञान की समस्त धाराओं को एकत्र किया गया होता अपने-अपने अनुभवों का पंजीकरण विद्वान लोग कर सकते होते तो सब मिलकर अनात्मवादी आस्था को समाप्त करने में सफल हो गये होते जब कि इस के अभाव में आज दर्शन टकराते हैं, सभ्यताओं और सम्प्रदायों में संघर्ष है, मान्यताओं को लेकर मनुष्य-मनुष्य में खींचतान है। ‘सत्य’ एक है दो नहीं पर उसकी पहचान एक नहीं अनेक ज्ञान धाराओं के संगम से ही सम्भव है।
चन्द्रमा के गुरुत्वाकर्षण में उतरने वाला चन्द्रयान यदि तेजी से उतर कर भी ध्वस्त नहीं हो सकता तो पृथ्वी पर वाहनों के बीच की दुर्घटनाएं क्यों नहीं टल सकतीं? यह विचार आते ही, हवाई जहाजों में प्रयुक्त ‘हनीकूम्ब’ चद्दरें अत्यन्त हल्की तथा मजबूत होती हैं। उनका उपयोग कर यात्राएं सस्ती और वाहन हल्के क्यों नहीं किए जा सकते, इस विचार से कुछ मोबाइल कम्पनियाँ नये यातायात साधनों की खोज में लग गई हैं। कपड़ा उद्योग मौसम विभाग की जानकारी प्राप्त न करें तो उसका उत्पादन आधा हो जाये, रसायन शास्त्री अपने रासायनिक विश्लेषण देकर अपराधियों को पकड़वाने में मदद देते हैं। इस तरह जीवन के विभिन्न क्षेत्रों के ज्ञान यदि कहीं भी एकत्र किए जा सकें तो एक अभिनव सामाजिक क्रान्ति हो सकती है और मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है।
ज्ञान और अनुभवों का क्षेत्र बड़ा व्यापक और विशाल है, पर यह अनेक दिशाओं में बिखरा पड़ा है। सूर्य की करोड़ों किरणें सैकड़ों दिशाओं में फैली हुई है, उनसे प्राणिजगत को चेतना तो मिलती है, पर यदि उस शक्ति का चमत्कार देखना हो तो एक आतिशी शीशे में उन असंख्य किरणों को एक करना पड़ेगा। नई दिशाएं, नई उपलब्धियाँ, नये निर्माण खड़े करने हों तो अनेक तरह की प्रतिभाओं का संकलन आवश्यक ही नहीं अनिवार्य होगा। ज्ञान का अर्थ प्रतिभा, प्रतिभा का अर्थ क्षमतावान मनुष्य यदि विचारशील व्यक्तियों की अपने तक ही सीमित रहने की संकीर्ण मनोवृत्ति दूर हो सके तो इसी तरह के मनुष्य जीवन को लाभान्वित करने वाले असंख्य चमत्कार प्रस्तुत किए जा सकते हैं।
संग्रहेक पः प्ररायः समुद्रोऽपि रसातले। दातारं जलदंपश्य गर्जन्त भुवनोपरि॥
बराबर संग्रह करने वाला समुद्र भूमि पर ही स्थित है किन्तु दाता मेघों को ऊपर आकाश में गरजते देखिए।
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मस्तिष्कीय विकास की न्यूनाधिकता में उसकी प्राकृतिक संरचना की बात कहकर प्रकारान्तर से भाग्यवाद और विधि विधान का ऐसा समर्थन करते हैं जिसे बदलना मनुष्य के बस की बात नहीं है।
दूसरा कारण शिक्षा की कमीवेशी को कहा जाता है। संगति और वातावरण को भी इसमें सहायक या बाधक माना जाता है। यह सभी कारण अपने स्थान पर बहुत हद तक सही भी होते हैं, पर इनसे भी अधिक महत्वपूर्ण और गाँठ बाँध रखने योग्य बात है कि मस्तिष्क शरीर का एक अवयव भर है भले ही उसकी उपयोगिता और कार्यक्षमता कुछ भी क्यों न हो? अन्य अवयवों पर आहार और व्यायाम का असर पड़ता है। उनकी कमजोरी दूर करने में इन दोनों ही उपायों का प्रयोग किया जाता है। औषधियाँ आहार ही तो हैं। अन्य उपचारों को व्यायाम वर्ग में सम्मिलित किया जा सकता है। अब अन्य अवयवों की अविकसित या विकृत स्थिति को उपचारों द्वारा सुधारा जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि मस्तिष्कीय दुर्बलता का समाधान न हो सके।
पुरानी कहावत है- ‘जैसा खाये अन्न-वैसा बने मन’ इस उक्ति को किंवदंती मानने का कोई कारण नहीं। आये दिन हम इसे तथ्य रूप में देखते हैं। आहार से रक्त माँस ही नहीं मन भी बनता है और उसका प्रभाव मानसिक कार्यक्षमता के विकास पर भी पड़ता है। चाय, काफी आदि गरम उत्तेजक पदार्थ मन पर उत्साहपूर्वक प्रभाव डालते हैं। गर्मी में शरीर ही नहीं मन भी संतप्त होता है। शीतल पेय पीने पर मुँह एवं पेट में ही ठण्डक नहीं लगती, वरन् मन भी शान्त होता है। क्रोध से उद्विग्न व्यक्ति को ठण्डे पेय पीने पर अपने आवेश में घटोत्तरी अनुभव होती है। आहार का मन पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसे उष्ण और शीतल पेय लेकर तत्काल अनुभव किया जा सकता है।
इस सन्दर्भ में नशे अपना विलक्षण ही चमत्कार दिखाते हैं। गाँजा, भाँग, चरस, अफीम, शराब आदि के सेवन करने पर मस्तिष्क की स्थिति जैसी कुछ हो जाती है उससे भारी आश्चर्य होता है। मनुष्य एक प्रकार से अपने स्तर को ही भूल जाता है और लोक-व्यवहार की सामान्य क्रिया प्रक्रिया तक लड़खड़ा जाती है। उद्धत अनर्गल सम्भाषण और आचरण करते देखकर यह अनुमान लगता है कि कम से कम कुछ समय के लिए तो नशेबाज की स्थिति लगभग पागल जैसी ही हो जाती है। नशे के आवेश में लोग दूसरों पर आक्रमण करते और अपनी दुर्गति बनाते देखे जाते हैं। युद्ध मोर्चे पर जाने वाले प्रायः शराब का आश्रय लेकर अपने में आक्रामक आवेश उत्पन्न करते हैं। क्रूर कर्म कर्ता भी अपनी सहृदयता एवं विवेकशीलता दबाने के लिए नशे अथवा अन्य उत्तेजक पदार्थ सेवन करते हैं। यह आहार का हानिकार पक्ष हुआ। इसी का दूसरा पक्ष प्रतिपादन यह है कि सात्विक आहार से बुद्धि सतोगुणी होती है। इतना ही नहीं ऐसे भी खाद्य पदार्थ हैं जो मस्तिष्कीय कार्यक्षमता का सम्वर्धन भी करते हैं। बुद्धि कौशल, मनोबल, दूरदर्शिता, यथार्थ चिन्तन, सूझबूझ एवं सही निर्णय लेने जैसी अनेक मानसिक क्षमताओं के विकास में ऐसे खाद्य पदार्थों की सहायता ली जा सकती है जिनमें मानसिक परिपोषण के उपयुक्त रासायनिक पदार्थों की उपयोगी मात्रा मौजूद है।
मस्तिष्कीय विकास में ऐसे खाद्य पदार्थों का बड़ा योगदान रहता है जो सात्विक प्रकृति के और सुपाच्य माने जाते हैं। गरिष्ठ, चटपटे, तले भुने, शकर की अनावश्यक मात्रा वाले मसाले डालकर सुगन्धित और रंग डालकर आकर्षक बनाये गये पदार्थ सात्विक प्रकृति के नहीं होते। उनमें उत्तेजना भरी रहती है और वह प्रायः तामसिक स्तर के होते हैं। ऐसे पदार्थों का सेवन अपच रक्त विकार जैसी विकृतियाँ उत्पन्न करता है और फिर उनसे तरह-तरह की बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं। स्वाद के लिए गरिष्ठ और उत्तेजक पदार्थों को खाने से न केवल सामान्य स्वास्थ्य को वरन् मस्तिष्कीय कोमलता एवं सक्षमता को भी हानि पहुँचती है।
मस्तिष्क को बल देने वाले सात्विक खाद्य पदार्थों की सूची माँगने की आवश्यकता नहीं है। बिना भूने, उबाले अपने प्राकृतिक रूप, रस, गन्ध और स्वाद से हमारी तृप्ति करते हैं उन्हें अपने शरीर रचना के हिसाब से अनुकूल एवं प्राकृतिक कहा जा सकता है। ऐसे आहार पर निर्भर रहने वाले अध्यात्मवेत्ता अपनी बौद्धिक और आत्मिक विशेषता बनाये और बढ़ाते रहते हैं।
कुछ विशेष पदार्थ ऐसे भी है जो सामान्य भोजन की तरह तो नहीं औषधियों के- अतिरिक्त परिपोषणों के रूम में लिए जा सकते हैं। इनमें कई उपयोगी जड़ी-बूटियों की गणना होती आई है। आयुर्वेद में गोरखमुण्डी, शतावरी, बच, शंखपुष्पी, ब्राह्मी आदि का उल्लेख बुद्धि वर्धक पदार्थों के रूप में हुआ है।
ऑल इण्डिया मेडिकल इन्स्टीट्यूट के शोधकर्त्ताओं ने स्मरण शक्ति बढ़ाने के सम्बन्ध में प्रख्यात ब्राह्मी बूटी पर शोध की है। हर्मेपोनिन मोनिएसा नाप से जानी जाने वाली इन वनस्पति का सत्व इन्जेक्शन द्वारा कुत्तों के मस्तिष्क में पहुँचाया गया तो उससे ‘हिपोकैम्पस’ क्रिया में अपेक्षाकृत अधिक तेजी पाई गई। इस तेजी से यह सिद्ध होता है कि मस्तिष्क ने अपना काम अधिक फुर्ती और अधिक मुस्तैदी से करना आरम्भ कर दिया।
शरीर के सभी क्षेत्र परिपुष्ट और सुविकसित रहते हैं या नहीं, इसमें बहुत कुछ वहाँ के रासायनिक सन्तुलन पर निर्भर है। मस्तिष्क के सम्बन्ध में तो यह बात और भी अधिक सही है। उसमें रासायनिक पदार्थों की मात्रा का सन्तुलन बिगड़ने लगे तो न केवल बुद्धिमत्ता में ही कमी आती है वरन् सनक, आतुरता, अधीरता, उथलापन, दीर्घसूत्रता जैसे कितने ही मन्द मस्तिष्क रोग आ घेरते हैं। ऐसे लोगों को विक्षिप्त तो नहीं कह सकते किन्तु अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित तो कहा ही जायगा। मस्तिष्क में जिन रसायनों की उपस्थिति बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती है उनमें एक ‘यूरिक ऐसिड’ भी है। रक्त में इसकी मात्रा बढ़ जाय तो जोड़ों की जकड़न, गठिया जैसी शिकायतें बढ़ जाती है किन्तु उसकी कमी पड़ना भी कम हानिकारक नहीं है। सन्तुलन की दृष्टि से रक्त में 2 मिलीग्राम प्रतिशत ही यूरिक ऐसिड होना आवश्यक है। गठिया की आशंका तो तब होती है जब यह मात्रा 9 मिलीग्राम प्रतिशत तक जा पहुँचती है।
डाक्सी रोवोन्यूक्लिक ऐसिड को बुद्धि और स्मृति का संवाहक माना जाता है। इस पदार्थ की बुद्धि स्तरीय विद्युत में परिणत होने की उत्तेजना यूरिक ऐसिड से मिलती है। कनाडा के जीव रसायनवेत्ता कीथ कैनिथ और अर्थर कापले ने मस्तिष्कीय प्रखरता पर यूरिक ऐसिड की न्यूनाधिकता का भारी प्रभाव पड़ता सिद्ध किया है। इसकी मात्रा सन्तुलित कैसे रहती है- न्यून या अधिक होने के खतरों से किस प्रकार बचाव होता है। इसके शोध प्रयास से यह निष्कर्ष निकला है कि व्रेन प्रोटीन मेटाबॉलिज्म क्रिया द्वारा यूरिक ऐसिड उत्पन्न तो पर्याप्त मात्रा में होता है, पर उसका सन्तुलित मात्रा में रखना कुछ विशेष ऐंजाइमों पर निर्भर है। यह ऐंजाइम पशुओं के शरीर में अधिक मात्रा में उत्पन्न होते हैं और उनके मस्तिष्कीय यूरिक ऐसिड को नष्ट करके रख देते हैं। अस्तु उन्हें मूर्ख रहना पड़ता है। किसी प्रकार इन ऐंजाइमों के आघात आक्रमण से पशुओं का मस्तिष्कीय यूरिक ऐसिड नष्ट होने से बचाया जा सके और सन्तुलित मात्रा में रखा जा सके तो वे भी मनुष्यों के समान ही बुद्धिमान हो सकते हैं। मूर्खता एवं मानसिक दुर्बलता के अन्य कारण भी हो सकते हैं, पर उनमें से एक यूरिक ऐसिड की कमी पड़ जाना भी है। भले ही उसका उत्पादन कम होता हो या विरोधी ऐंजाइमों की मार से उसकी मात्रा घट जाती हो।
विज्ञानवेत्ताओं ने कुछ लवण, खनिज, वनस्पति, सत्व एवं प्रोटीन ऐसे ढूँढ़ निकाले हैं, जो मस्तिष्क पर सीधा प्रभाव डालते हैं और बुद्धि संवर्धन से स्मरण शक्ति के विकास में आशाजनक योगदान करते हैं। इस संदर्भ के विश्व भर के रसायन शास्त्री अपने-अपने ढंग से शोध प्रयोग चला रहे हैं और शारीरिक बलवर्धक टॉनिकों की तरह मनःशक्ति को विकसित करने वाले सम्वर्धनों के निर्माण का प्रयत्न कर रहे हैं। इन प्रयोग कर्ताओं का विश्वास है कि प्रगति क्रम जिस तरह चल रहा है। उसे देखते हुए अगली पीढ़ी के लोगों को मन्द बुद्धि होने का कलंक शायद अपने ऊपर नहीं ही ओढ़ना पड़ेगा।
मन्द मति मनुष्यों के मस्तिष्कीय पिछड़ेपन का कारण खोजने में ब्रिटेन के मैनचेस्टर मेडीकल स्कूल ने मनुष्यों तथा पशुओं पर लम्बी शोध की है और जो निष्कर्ष निकले हैं उनमें एक बड़ा कारण भोजन के कुपोषण को भी बताया है। शरीर के अन्य अवयवों की तरह मस्तिष्क भी अपने विकास के लिए आवश्यक खाद पानी माँगता है। उसमें कमी रहने पर विकास क्रम रुकता है और पत्र पल्लव मुरझाते हैं। भ्रूणावस्था में शिशु के लिए जिस पोषण की आवश्यकता है यदि यह वहाँ न मिले तो बालक के अन्य अंगों की तरह मस्तिष्क भी दुर्बल बना रहेगा। अन्य अवयवों की दुर्बलता तो छिपी रहती है; पर मस्तिष्कीय पिछड़ापन तो पग-पग पर अपना परिचय देता है।
उपरोक्त शोध संस्थान के दो प्रमुख अन्वेषक डार्विंग और सेन्डस् इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जिस प्रकार आस्थाओं की मजबूती के लिए आहार में कैल्शियम और आयरन की समुचित मात्रा रहनी चाहिए उसी प्रकार मस्तिष्क का पोषण करने वाले प्रोटीनों की मात्रा तब तक तो मिलती ही रहनी चाहिए जब तक कि बीस वर्ष की आयु पूरी नहीं हो जाती। इस आयु तक पहुँचते-पहुँचते मनुष्य में बौद्धिक परिपक्वता का बड़ा अंश पूरा हो चुका होता है।
एवोट रासायनिक प्रयोगशाला के शोधकर्ता प्रो0 ग्लास्की ने पेमोलीन नामन रसायन खोजा है। अभी इसका प्रयोग चूहों पर चल रहा है। अब तक के निष्कर्ष में जिन चूहों को यह टानिक दिया गया वे साथियों की तुलना में अधिक बुद्धिमान बन रहे हैं। डॉक्टर जेम्समेकाफ द्वारा इस संदर्भ में की गई रासायनिक खोजें भी मस्तिष्क विज्ञानियों के क्षेत्र में दिलचस्पी के साथ चर्चा का विषय बन रही हैं। जेम होफइन के द्वारा प्रतिपादित रसायन और पशु वर्ग पर परीक्षण के उपरान्त मनुष्यों पर प्रयुक्त हो रहे हैं। उन्हें निरापद और लाभदायक बताया गया है। न्यूयार्क के आइन्स्टाइन कालेज ने ठीक उलटी खोज की है वे तीव्र बुद्धि वालों को मन्द बुद्धि बनाने में भी आशाजनक प्रगति कर रहे हैं उनका कथन है कि सदा सर्वदा बुद्धि-वृद्धि ही आवश्यक नहीं। अपराधी प्रकृति के लोगों को मन्द मति बनाया जा सके तो वे अपेक्षाकृत अधिक शाँति से रह सकेंगे और दूसरों को कम त्रास दे सकेंगे। विद्रोही प्रकृति के लोगों को इस उपचार से शाँत, सज्जन नागरिक बनाया जा सकेगा।
ऐसे शोध प्रयत्नों में अमेरिका सबसे आगे माना जाता है। वहाँ लास एन्जेल्म कैलीफोर्निया विश्व विद्यालय ने रिबामिनोल नामक योगिक को स्मरण शक्ति बढ़ाने के लिए उपयोगी पोषक घोषित किया है। इसी विश्व विद्यालय के मनोविज्ञानी प्रोफेसर डेविड क्रेस ने इस शोध के संदर्भ में एक खतरे की भी चेतावनी दी है कि इस सेवन से दुष्ट प्रकृति के लोग अपने कुकर्मों में अधिक कुशल और दुस्साहसी होकर अपने तथा समाज के लिए विपत्ति भी खड़ी कर सकते हैं। अस्तु इन योगिकों का उत्पादन सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध नहीं रहना चाहिए। उसका उत्पादन वितरण ही नहीं सामने सेवन करने का अधिकार उच्चस्तरीय विवेकशील लोगों के हाथों में सुरक्षित रहना चाहिए।
मस्तिष्कीय कार्यक्षमता का विकास एवं चिन्तन में आदर्शवादी उत्कृष्टता का समावेश करने के लिए स्वाध्याय, सत्संग, अनुभव सम्पादन प्रशिक्षण आदि प्रयत्नों की तरह ही एक अति महत्वपूर्ण उपाय यह है कि आहार ऐसा लिया जाय जिसमें न केवल जल्दी पचने की वरन् सतोगुणी प्रकृति की सूक्ष्म विशेषताएँ भी विद्यमान हों। आहार का निर्धारण करते समय यदि स्वाद को प्रधानता देने के स्थान पर आहार में सन्निहित सतोगुणी विशेषता को ध्यान में रखा जाय तो निश्चय ही इससे मानसिक विकास में असाधारण सहायता मिल सकती है। कहना न होगा कि जीवन की प्रगति और सार्थकता का अवलम्बन मस्तिष्क की दिशा धारा पर निर्भर है और उसको सही रखने के लिए उपयुक्त आहार का महत्व समझने और खाद्य के चयन में सतर्कता बरतने की आवश्यकता होगी।
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“पूँजीवाद तथा साम्यवाद एक कमरे में कैसे रह सकते हैं?” इटली में वह शक्ति कहाँ जो वह विश्व युद्ध में भाग ले? मुसोलिनी का उदय एक अपराजेय शक्ति के रूप में हुआ है। उसका पतन असम्भव है? विश्व-संस्था का निर्माण एक असंगत कल्पना है जिसकी स्थापना कभी भी सम्भव नहीं?” एक पत्रकार ने दृढ़ शब्दों में इटली के सुप्रसिद्ध भविष्यवक्ता फादरपियों का प्रतिवाद किया। पियो का कथन था-
“द्वितीय विश्व युद्ध की अनेक विचित्रताओं में अमेरिका और रूस दोनों का एक साथ मित्र सेना के रूप में युद्ध में भाग लेना भी सम्मिलित है। इस युद्ध में इटली को भी भाग लेना पड़ेगा और भाग ही नहीं युद्ध समाप्ति की पहल भी वही करेगा। तब तक मुसोलिनी का पतन हो चुका होगा और एक बार इटली को भयंकर मुद्रास्फीति, महंगाई तथा देशव्यापी संकटों का सामना करना पड़ेगा। इस विश्व युद्ध का आखिरी चरण इतना भयंकर होगा कि दुनिया के सभी शीर्ष राजनीतिज्ञ यह सोचने को विवश होंगे कि युद्ध, समस्याओं का अन्तिम हल नहीं है। वार्ताओं से भी समस्यायें सुलझाई जा सकती हैं इस भावना से प्रेरित एक विश्व संस्था का निर्माण होगा किन्तु उसमें राजनैतिक अखाड़ेबाजी के अतिरिक्त होगा और कुछ भी नहीं- ”
ऊपर जिस पत्रकार ने फादर पियो से इन भविष्य वाणियों की सम्भावनाओं पर आशंका व्यक्त की थी तब तक अधिक ख्याति प्राप्त न होने के कारण बहुत अधिक लोगों को तो विवाद का अवसर नहीं मिला किन्तु जब उसी पत्रकार द्वारा सर्वप्रथम प्रकाशित फादर पियो की भविष्य वाणियाँ एक-एक कर सच होती गईं तो एकाएक उनके नाम की इटली में धूम मच गई। इटली के एक गिरजाघर में पादरी श्री पियो अत्यन्त विनम्र स्वभाव, मधुर-वाणी, ऊँचा शरीर, स्वस्थ और गौर वर्ण और विनोद प्रिय स्वभाव के हैं। परमात्मा पर उनकी अनन्य आस्था है। अपनी निश्चिन्तता का आधार भी वह इसी आस्था को मानते हैं उनका कहना है कि अब परमात्मा को अपनी हर सन्तान के हित की चिन्ता आप है तो मनुष्य व्यर्थ की कल्पनाओं में क्यों डूब मरे?
विचार और व्यवहार दोनों में एक समान फादर पियो ने कभी प्रदर्शन या अहंकार भावना से कोई भविष्य वाणी नहीं की। न ही उन्होंने कभी अड़ियल रुख रखा यदि कभी किसी ने उनकी बात का प्रतिवाद किया तो वे आत्म-विश्वास पूर्वक कहते हैं। परमात्मा की शक्ति सर्वोपरि है। वह क्या करेंगे यह कोई नहीं जानता, पर कभी-कभी मुझे अपने भीतर उन्हीं का प्रकाश झाँकता और प्रेरणाएँ प्रस्फुटित करता दिख जाता है। उस समय मेरे चित्त की स्थिति द्विविधाजनक नहीं होती, इसी से अपने कथन की सत्यता पर मुझे असीम विश्वास रहता है।
उन दिनों अमेरिका में प्रेसीडेन्ट निक्सन चुनाव लड़ रहे थे। इटली में भी उनके पक्ष-विपक्ष की बाते चलती रहती थीं। एक दिन यह प्रसंग फादर पियो के समक्ष भी उठा तो उन्होंने कहा- ‘शक नहीं निक्सन अब तक के अमेरिकी शासनाध्यक्षों की अपेक्षा अधिक बहुमत से विजयी होंगे, किंतु जिस तरह उफान आग को बुझा देता है और स्वयं भी तली में चला जाता है उसी प्रकार निक्सन महोदय उतने ही बदनाम राष्ट्रपति होंगे और उन्हें बीच में ही गद्दी छोड़ने तथा जन-सत्ता के अधिकारों के हनन का अपयश भोगना पड़ेगा।
उस समय कोई यह कल्पना भी नहीं कर सकता था कि इतने शक्तिशाली प्रेसीडेन्ट निक्सन को वाटर गेट काँड ले डूबेगा और उस कारण उन्हें महाभियोग तक का सामना करना पड़ेगा; पर इतिहास ने यह सब कुछ सच कर दिखाया।
आइन्स्टीन ने समय की परिभाषा करते हुये कहा है कि यह घटनाओं के सापेक्ष माप की प्रतीति मात्र है अन्यथा समय नाम की कोई वस्तु नहीं जब कि इतिहास समय के बिना लिखे ही नहीं जा सकते। तब फिर यह कहना गलत न होगा कि कोई एक बिन्दु, एक शक्ति, एक स्फुरणा सृष्टि में कही ऐसी है जो समय का अर्थात् घटनाओं का मूल कारण है। वही महा इतिहास है। भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों ही उस केन्द्र बिन्दु पर एकाएक हैं। सामान्य मनुष्य थोड़े समय के लिये भी यदि उस महाशक्ति परमात्मा के साथ चित्तलय करता है तो उस क्षणिक अनुभूति से विराट भविष्य के दर्शन नितान्त सम्भाव्य हैं। अनेक तत्व-दृष्टियों की तरह फादर पियो भी उसके उदाहरण थे।
लोग उनसे अक्सर पूछते- परमात्मा नैतिक शक्तियों के केन्द्र और अध्येता है, आज संसार में अनैतिकता का, अधर्म का साम्राज्य बढ़ रहा है, पहले शिक्षित व्यक्तियों की प्रामाणिकता असंदिग्ध मानी जाती थी किन्तु अब स्थिति उलट गई है। शिक्षा का अर्थ चालाकी अर्थात् धोखेबाजी में उतना ही पटु हो गया है इससे स्थिति और भी भयानक हो गई है। क्या आप बता सकते हैं कि परमात्मा इस स्थिति में भी कभी परिवर्तन लायेगा- यदि हाँ तो किस तरह?
फादर पियो ने आशा भरे स्वर में कहा- लोहे को लोहा काटता है, लोगों की बुद्धि में जो अपवित्रता समा गई है उसे काटने के लिये भारतवर्ष में एक अत्यन्त प्रबुद्ध सत्ता का अवतरण हो चुका है। उसकी प्रमुख विशेषता यह होगी कि वह अध्यात्म तत्व के बारे में जितना अधिक जानकार सिद्ध व समर्थ होगा उतना ही अधिक वह विज्ञान का भी पण्डित होगा। वह शरीर शास्त्र, जीव-शास्त्र, रसायन विज्ञान, भौतिकी, अनुवाँशिकी आदि विद्याओं का अध्यात्म में समावेश कर एक नये दर्शन का प्रतिपादन करेगा। उसका हर प्रतिपादन व्यक्ति की आत्मिक पवित्रता, आचरण की पुनीतता के लिये होगा। यह शक्ति अपने सहयोगियों के साथ भारत में प्रकटेगी, पर प्रभावित वह दुनिया के हर धर्म, हर क्षेत्र को करेगी। यही नहीं उसी के युग में भारतवर्ष का विश्व की सर्वोपरि सत्ता के रूप में उदय होगा और चिरकाल तक वह संसार को हर क्षेत्र में मार्ग दर्शन प्रदान करेगा।”
उनकी अनेक आगे की भविष्य वाणियों में कुछ प्रमुख इस तरह हैं- अरबों और इजराइल के बीच बराबर टक्कर होती रहेगी, अरब अपनी फूट के कारण कभी भी उसका कुछ बिगाड़ न सकेंगे। इजराइल निरन्तर शक्तिशाली होता चला जायेगा।
रूस और अरबों में जोरदार टक्कर होगी जिसमें तटस्थ रहने के कारण पाकिस्तान मुसलिम समुदाय देशों में असम्मानित होगा किन्तु चीन इस युद्ध में अरबों का साथ देगा।
चीन युद्ध में विषैले कीटाणुओं का प्रयोग करेगा जिससे एक बार संसार में भीषण स्थिति आ जायेगी। उस समय भी भारत वर्ष पर्यावरण और बीमारियों से बचा रहेगा यह आश्चर्यजनक बात होगी।
आज भी वे सामयिक भविष्यवाणियाँ करते रहते हैं। वे प्रायः सब सच निकली है। इसी कारण लोगों को यह जानने की अभिरुचि रहती है कि जिसका उन्होंने संकेत किया है वह शक्ति कब प्रकाश में आती है।
भारतवर्ष से ही नई नैतिक शक्तियों के उदय, उसके विश्व नेतृत्व की भविष्यवाणी जिन-जिन भविष्य वक्ताओं ने की है उनमें कनाडा की एक महिला ‘डी माल्वा’ का भी प्रमुख स्थान है। उत्तरपूर्वी कनाडा के हायलैण्ड प्रदेश की निवासिनी ‘माल्वा डी’ को एक असाध्य बीमारी के मध्य अनायास ही वह शक्ति प्राप्त हो गई जिससे वह लोगों के फोटो या हाथ की लिखावट देखकर उसके सुदूर भविष्य को जान लेती हैं। इन भविष्य वाणियों के द्वारा न केवल उन्होंने अनेक लोगों को उनके खोये बच्चों से मिलाया, आजीविका के रास्ते बताये अपितु सैकड़ों लोगों की आकस्मिक दुर्घटनाओं से भी रक्षा की। ऐसे व्यक्तियों में स्वयं उनके पति भी थे जो उनसे परामर्श लिये बिना कभी भी कोई काम नहीं करते थे।
इन भविष्य वाणियों से जहाँ उच्च सत्ता की उपस्थिति, मानवता के उज्ज्वल भविष्य, इस देश की अकल्पित प्रगति और इसके आध्यात्मिक पुनरुत्थान की आशा बंधती है, वहीं हमारे चिन्तन में स्वस्थ अध्यात्मवादी दृष्टिकोण का भी समावेश होता है जो व्यक्ति समाज और संसार सभी के लिये उज्ज्वल सम्भावनाओं का अध्याय है। संसार की शाँति और प्रगति इसी दृष्टिकोण पर आधारित है यह सुनिश्चित मानना चाहिए।
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कुपोषण से रुग्ण रहने वाले और अकाल मृत्यु के मुख में समा जाने वालों की संख्या संसार में बहुत है। दरिद्रता के कारण शरीर पोषण के उपयुक्त पौष्टिक आहार न मिलने से कितनों को ही दुर्बलता घेरती है। उस अविकसित स्थिति में कई प्रकार के रोग उठते हैं। रोते, कराहते किसी प्रकार कुछ समय जीवित रहने के पश्चात् असमय में ही कूच कर जाते हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँची हुई मनुष्य जाति अपने सदस्यों के लिए उपयुक्त आहार तक की अवस्था न कर सके और उत्पादन के प्रचुर साधन रहते हुए भी करोड़ों को हर साल जीवन का आनन्द रहने से वंचित रहना पड़े।
इससे भी बड़ा दुर्भाग्य है अति पोषण। आर्थिक सुविधा सम्पन्न इस दूसरे आकार-प्रकार से दुर्भाग्य-ग्रस्त बनते हैं और कुपोषण ग्रस्तों की तरह ही रुग्णता एवं दुर्बलता से ग्रसित होकर मृत्यु के मुख में प्रवेश करते हैं। समझा जाता है कि अधिक मात्रा में, अधिक स्वादिष्ट तथा अधिक पौष्टिक समझे जाने वाले पदार्थ खाने से स्वाद का आनन्द मिलेगा और बल वृद्धि भी होगी किन्तु होता ठीक इसके प्रतिकूल है। पाचन की क्षमता, अपनी मर्यादा में ही आहार को हजम कर सकती है। पाचन तन्त्र का निर्माण इस प्रकार नहीं हुआ है कि उस पर कितना ही-कैसा भी भार क्यों न डाला जाय वह सब कुछ पचा सके। अनावश्यक मात्रा में- अति गरिष्ठ आहार पेट में पहुँच कर बिना पचा पड़ा रहता है और सड़ान का विष उत्पन्न करता है। इस विष का रक्त के साथ शरीर के विभिन्न अंगों में प्रवेश होता है और वे विविध आकार-प्रकार के रोगों से ग्रसित बनते हैं। इतना ही नहीं उस अनावश्यक भार का ढोने में घोर परिश्रम करने के कारण थके हुए पाचन तन्त्र अपनी क्षमता गंवाते चले जाते हैं। साथ ही अपच का विष उन्हें भी गलाता जलाता-क्षत विक्षत करता है। इस प्रकार पोषण की दृष्टि से किया गया आहार उलटे पाचन तन्त्र से लेकर समस्त शरीर के लिए विपत्ति का कारण बनता चला जाता है।
इंग्लैण्ड के प्रख्यात कार्डियोलाजिस्ट डॉ0 जे. एफ. गुडविन ने दिल्ली के स्वास्थ्य विशेषज्ञों के सम्मुख संसार में बढ़ रहे हृदय रोगों के प्रति चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा- “इसका बहुत बड़ा कारण ‘अति पोषण’ युक्त आहार है। माँस और चिकनाई के अति प्रयोग से हृदय रोगों की असाधारण वृद्धि हुई है। इतना ही नहीं उसके कारण पेट, छाती और जननेन्द्रिय में होने वाले कैन्सर का प्रधान कारण भी यह ‘अति पोषण’ ही होता है।
केन्सर निवारण के लिए संसार भर में अति महत्वपूर्ण प्रयत्न हुए हैं, शोधें हुई हैं और अभिनव उपचार ढूंढ़े गये हैं। रोकथाम के उपाय भी निकले हैं, पर उनमें सफलता नहीं मिली है जहाँ आहार-विहार की आदतों में सुधार किया गया है, चटोरे और पेटू लोग इन उपचारों का भी कोई लाभ नहीं उठा पा रहे हैं। पेट का कैन्सर अन्य देशों में पहले की अपेक्षा घटा है, किन्तु जापान में अभी भी सुधार का कोई लक्षण दिखाई नहीं पड़ रहा है। इसका कारण अति पोषण युक्त आहार ग्रहण करने और चटोरेपन की आदत को न छोड़ पाना ही समझा गया है। उस देश में माँस के बने पदार्थों में स्वादिष्टता बढ़ाने वाली पाक विद्या बहुत बढ़ गई है। व्यंजन बनाने में उन लोगों ने अपने चातुर्य और कौशल का भरपूर समावेश किया है। सुखानुभूति में काम कौतुक की तरह ही भोजन स्वादिष्टता में अभिरुचि बढ़ी है। फलतः उपभोग में आतुरता उत्पन्न हुई है। इस प्रकार जीभ और पेट पर भार तो बढ़ा है, पर उसे वहन करने की क्षमता में अभिवृद्धि सम्भव नहीं हो सकी है। परिणाम सामने है पेट की छुट-पुट बीमारियों ने भी उन्नति की है और वे कैन्सर जैसे भयंकर विद्रोह का परिचय दे रही है।
इन्द्रियों से सरसता जुड़ी है। मनुष्य उनके माध्यम से आनन्द उठाना चाहता है; किन्तु इस उपयोग में औचित्य का समावेश रहना चाहिए। विवेक खोकर अतिवाद पर उतारू होने का दुष्परिणाम ही सामने आता है। मर्यादा और संयम की समझदारी हटा दी जाय तो फिर विनाश ही सामने प्रस्तुत होगा। इन दिनों बढ़ते हुए रोगों में बहुत से ऐसे हैं जिन्हें सभ्यता के अभिशाप ही कह सकते हैं। तपेदिक, कैन्सर, हार्ट अटैक, अनिद्रा अपच, तनाव, ब्लडप्रेशर जैसे दुःसह दुःख देने वाले और जीवन सम्पदा का बेतरह क्षरण करने वाले रोगों की बाढ़ आने का प्रधान कारण आहार-विहार का असंयम ही बना हुआ है। मूल कारण को न हटाया जायगा तो फिर उनके द्वारा उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों का अन्त कैसे होगा? नशे बाजी जैसी बढ़ती हुई दुष्प्रवृत्तियों की रोकथाम न हुई तो रोग उपचार के सारे प्रयत्न निरर्थक सिद्ध होते चले जायेंगे।
मानसिक रोगों की भयंकरता तब प्रकट होती है जब वे उन्माद का रूप धारण करने और जीवन प्रक्रिया को अस्त-व्यस्त कर देने की विस्फोटक स्थिति में जा पहुँचते हैं। सनकों के स्तर पर जब वे रहते हैं तो दूसरों को उनकी भयंकरता प्रतीत नहीं होती किन्तु उस मानसिक अव्यवस्था से व्यक्ति को सामान्य जीवन यापन में भारी अवरोध दृष्टिगोचर होता है। प्रगति क्रम तो एक प्रकार से रुक ही जाता है। दूरस्थ लोगों को तो पता नहीं चलता, पर निकटस्थ परिजन तो उन सनकों की प्रतिक्रिया को सहते, खीजते और दुःख पाते हैं। स्वयं पर भी दुर्भाग्य की छाया चढ़ी हुई नजर आती है। आत्महीनता संकोच, भय, निराशा आशंका, चिन्ता उदासीनता जैसी सनकें यों ज्वर-जूड़ी की तरह प्रत्यक्ष नहीं होतीं तो भी उनके कारण आनन्दमय जीवन का एक प्रकार से अन्त ही हो जाता है। आन्तरिक गुत्थियों में उलझा हुआ व्यक्ति जाल में फँसे पक्षी की तरह अपने को कातर एवं आपत्ति ग्रस्त ही अनुभव करता रहता है। अपच, जुकाम आदि मन्द रोग ऐसे ही चलते रहते हैं, पर जब भयंकर उदर शूल उठ खड़ा होता है तो घबराहट उत्पन्न होती है। मानसिक रोग जब तक सनकों के रूप में अपने को अस्त-व्यस्त एवं दीन-दरिद्र बनाये रहते हैं तब तक उनकी उपेक्षा होती रहती है। किन्तु जब वे क्रोध, आवेश, आक्रमण, उद्दण्डता के रूप में विकराल बनते हैं और अपराधियों के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं तब पता चलता कि उनकी भयंकरता कितनी बढ़ गई। ऐसी स्थिति में ही हत्या एवं आत्महत्या जैसी दुर्घटनाएं घटित होती हैं। वास्तविक कारण तो कम होते हैं, पर मानसिक उत्तेजना में ही ऐसा विग्रह घटित होते हैं।
चिन्तन को सही धारा से प्रभावित कर सकने का ज्ञान न होने से विचार शक्ति भ्रान्तियों और विकृतियों में भटकती है। इस भटकाव में उद्वेग और विक्षोभ ही हाथ लगता है।
अवाँछनीय गतिविधियाँ अपनाकर क्या दरिद्र क्या सम्पन्न, क्या अशिक्षित, क्या विद्वान- सभी समान रूप से कष्ट पाते हैं। दरिद्र, कुपोषण से जितना कष्ट उठाते हैं- सुसम्पन्नों को अतिपोषण के कारण उससे कम नहीं अधिक ही कष्ट उठाना पड़ता है। अविकसित लोगों को अशिक्षा के कारण जितनी कठिनाइयाँ सताती हैं उससे कहीं अधिक तथाकथित बुद्धिमान लोग अपनी विकृत महत्वाकाँक्षाओं और उद्धत उच्छृंखलता के कारण भुगतते रहते हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में उलझे हुए व्यक्ति अभावों और संकटों के त्रास सहते हैं, पर उनको क्या कहा जाय जो सब प्रकार साधन सम्पन्न होने पर भी मनःस्थिति को उलट लेते हैं और सम्पत्ति से भी विपत्ति जितना संकट रचते, खड़े करते हैं। मकड़ी अपने लिए आप जाल बुनती है और उसी में उलझकर बन्धन ग्रस्त होने का दुख पाती है। अपने ही अज्ञान अनाचार का मनुष्य दुष्परिणाम भुगतता है।
उपयोगी वस्तुओं में अभाव में कष्ट सहने की बात समझ में आती है, पर उपलब्धियों के दुरुपयोग में संलग्न दुष्टता के लिए क्या कहा जाय? स्वार्थी मनुष्य लाभ सोचता है, पर उसके पल्ले संकीर्णताजन्य हानि और विपत्ति ही पड़ती है। हार्टअटैक के प्रत्यक्ष कारण जो भी हों वास्तविकता यह है कि कठोर, निर्दय, निष्ठुर, स्वार्थी और धूर्त प्रकृति के कारण मनुष्य हृदयहीन होता चल जाता है। आत्मिक कोमलता, करुणा और आत्मीयता गँवा बैठने के कारण हृदय की माँसपेशियाँ जकड़ जाती हैं और उस कठोरता पर दैवी वज्रपात की तरह ‘हार्टअटैक’ होता है। नस, नाडियों और माँसपेशियों की कठोरता को स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बढ़ते हुए हृदय रोगों का कारण बताया है। आहार-विहार का असंयम बढ़ते हुए शारीरिक, मानसिक रोगों को विपत्ति ढाने का निमित्त माना गया है। उपचार साधनों की भरमार निरर्थक सिद्ध हो रही है और समझा जा रहा है कि संयम, सन्तुलन अपनाये बिना काम न चलेगा। सुविधा साधनों का अभाव अथवा अभिवर्धन दोनों ही विचारणीय है। दोनों की ओर ही ध्यान दिया जाना चाहिए। किन्तु यदि सर्वपक्षी विपत्तियों का चिरस्थायी समाधान ढूँढ़ना हो तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचना होगा कि संयम, विवेक और उदार दृष्टिकोण अपनाये बिना उन संकटों से छुटकारा न मिल सकेगा जो साधनों की अभिवृद्धि के साथ-साथ ही द्रुत गति से बढ़ते चले जा रहे हैं।
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माल्थस ने इस शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ही यह चेतावनी दे दी थी कि जनसंख्या वृद्धि की वर्तमान दर पर अविलम्ब रोक लगाई जानी चाहिए अन्यथा मानवता भयंकर प्राकृतिक दुष्परिणामों के लिए तैयार रहे। जनसंख्या वृद्धि ज्यामितीय गणना के अनुसार अर्थात् 77 में 1, 78 में 2, 79 में 4 और 80 में 8 की दर से बढ़ती है तो अन्न उत्पादन तमाम सिंचाई साधनों के विकास, रासायनिक खाद की मात्रा बढ़ाकर अधिकतम भूमि कृषि योग्य बना कर भी यदि बढ़ाई जाती है तो उत्पादन गणितीय गणना से अर्थात् 77 में 1, 78 में 2, 79 में 4 और 80 में 4 मात्र इसी गति से बढ़ेगा एक स्थिति वह आयेगी जब वह विराम तक भी पहुँच जायेगा, उस समय क्या होगा?
तब प्रकृति का ‘संहारक सिद्धान्त’ प्रारम्भ होगा। माल्थस ने बताया यदि मनुष्य जनसंख्या रोकने के लिए विवेक से काम नहीं लेता तो फिर प्रकृति अर्थात्- स्वयं संभूत समस्यायें स्वतः ही सर्वनाश पर उतारू हो जायेंगी। अच्छा तो यह है कि लोग संयमशील जीवन जियें पर यदि वैसा सम्भव नहीं तो जन्म निरोध के कृत्रिम साधन भी बुरे नहीं- इतने पर भी यदि मनुष्य अपनी जिद पर अड़ा रहता है तो उसे अभी से युद्ध पूर्व से युद्धाभ्यास की तरह विनाश के लिए तैयार हो जाना चाहिए।
एक ओर मानवता भूख की समस्या से भयाक्रान्त है तो दूसरा पृष्ठ यह है कि इस पर कोई भी विवेकपूर्ण रवैया अपनाने को तैयार नहीं हो रहा। यह एक ऐसी समस्या है जो हर व्यक्ति, हर देश के सामने प्रश्न चिन्ह लगाती और पूछती है- “आप इसके लिए क्या कर रहे हैं?” यह एक ऐसा महत्वपूर्ण प्रश्न है जिसके हल में परम्पराएं, धर्म, देश जाति की संकीर्णताओं को बाधक नहीं बनना चाहिए। समूची मानवता को दृष्टि में रखकर इस दिशा में उदारतापूर्वक सोचना और व्यक्तिगत जीवन में कठोरता बरतना आवश्यक है।
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विश्व विख्यात मनःशास्त्री टामस मैलोन ने पागलपन के कारण ढूँढ़ने वाले अनेक शोध संस्थानों का मार्गदर्शन किया है और उन्हें परीक्षणों के आधार पर किसी उपयुक्त निष्कर्षों तक पहुँचाने में सहायता की है। उनके अनुसन्धानों के निष्कर्षों में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह पाया है कि ‘मनुष्य दूसरों का प्यार पाना चाहता है, पर वह उसे मिल नहीं पाता। इस अभाव से उसके अन्तःक्षेत्र की गहरी परतों में निराशाजन्य उदासी छा जाती है। फलतः उसका चिन्तन प्रवाह अपना सीधा रास्ता छोड़कर भटकावों में फँस जाता है। प्यार पाने की असफलता का कारण सम्भव है उस व्यक्ति के अपने ही दोष दुर्गुणों में रहा हो, पर इससे क्या उसकी आकाँक्षा तो अतृप्त ही रह गई। वह यह समीक्षा कहाँ कर पाता है कि दोष अपना है या पराया। भोजन किसी भी कारण न मिले, पेट का विक्षोभ तो हर हालत में रहेगा ही। इसी प्रकार प्यार के अभाव में मनुष्य अपना मानसिक सन्तुलन धीरे-धीरे खोता चला जाता है और एक दिन स्थिति वह आ जाती है जिसमें उसे विक्षिप्त एवं अर्ध-विक्षिप्त के रूप में पाया जाता है।
जो पूर्ण विक्षिप्त हो चुके हैं उनकी बात दूसरी है, पर जो दूसरों के मन और व्यवहार का अन्तर समझने में किसी सीमा तक समर्थ हैं उनके रोग को साध्य माना जा सकता है। अधिक से अधिक यह समझा जा सकता है कि उपचार कष्ट साध्य है, पर असाध्य तो नहीं ही कहना चाहिए। ऐसे रोगियों का उपयुक्त उपचार यह है कि उन्हें उपेक्षा के वातावरण से निकाल कर स्नेह सद्भाव का अनुभव करने दिया जाय, जिनसे उसका वास्ता पड़ता है वे सभी उसे प्यार और सम्मान प्रदान करें। वैसा न करें जैसा कि आमतौर से पागलों के साथ किया जाता है। अटपटे-पन पर खीज आना स्वाभाविक है, पर हितैषियों को यह मानकर चलना चाहिए कि रोगी आखिर रोगी है और उसके अटपटे व्यवहार जान-बूझकर की गई उद्धतता नहीं वरन् चिन्तक तन्त्र के गड़बड़ा जाने की विवशता भर है। ऐसी दशा में वह तिरस्कार एवं प्रताड़ना का नहीं, दया और दुलार का अधिकारी है।
प्यार की प्यास मानवी चेतना के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। पदार्थों के संग्रह इन्द्रियों की रसानुभूति के उपरान्त तीसरी भूख स्नेह की है जो व्यवहार में सम्मान के रूप में देखी जाती है। यश कामना उसी का रूप है। प्रतिष्ठा प्राप्त करते समय मनुष्य सोचता है कि यह सम्मानकर्ताओं द्वारा दिया गया स्नेह सद्भाव है। यों होता यह भ्रम ही है किन्तु असली न मिलने पर नकली से भी बहुत करके काम चलाते रहा जाता है। स्नेह के साथ सम्मान रहेगा किन्तु सम्मान का प्रदर्शन सदा स्नेह युक्त ही हो यह आवश्यक नहीं। उसमें छद्म भी घुला रह सकता है। सम्मान और यश के लिए लालायित प्रायः सभी पाये जाते हैं और उसके लिए समय, श्रम एवं धन भी खर्च करते हैं। यश लालसा के पीछे वस्तुतः प्यार को उपलब्ध करने की आकाँक्षा ही काम करती है। लोग बड़प्पन के प्रदर्शन में उसे खरीदने की विडम्बना रचते रहते हैं।
पानी की प्यास से गला सूखता है और भूख से पेट उठता है। प्यार के अभाव में आदमी थकता ही नहीं टूटता भी है। एकाकीपन यों अन्य प्राणियों को भी सहन नहीं, पर मनुष्य के लिए तो वह न ढोया जा सकने वाला भार है वह साथ रहना ही नहीं चाहता ऐसे साथी भी चाहता है जो उसके अन्तस् को छूने, गुदगुदाने खड़ा रखने और उठाने में सहायता कर सकें। प्यार का अभाव अखरता तो धैर्यवानों को भी है, पर हलकापन तो उसके कारण उखड़ ही जाता है। प्रायः आन्तरिक उखड़ापन ही पगलाने की व्यथा बनकर सामने आता है। यों पागलपन के इसके अतिरिक्त भी और कितने ही कारण होते हैं।
इस प्रकार पगलाने वालों का सबसे बड़ा दोष यह होता है कि वे प्यार की प्रकृति को नहीं जानते और यह नहीं समझ पाते कि यह अपने भीतर से निकलने वाली आभा भर है जो जहाँ भी पड़ती है वहाँ दूसरे स्थानों की अपेक्षा अधिक चमक उत्पन्न करती और आकर्षक लगती है। अपना प्यार ही दूसरों में प्रतिबिंबित होता है। यदि उसमें कमी हो तो दूसरोँ का वास्तविक सद्भाव भी ठीक तरह समझ सकना सम्भव न हो सकेगा। इसके विपरीत अपनी प्रगाढ़ आत्मीयता होने पर साथियों का सामान्य शिष्टाचार भी गहरे दुलार की अनुभूति करता रहता है। बल्ब स्वयं जलता है और अपने क्षेत्र को प्रकाशवान करता है। व्यक्ति का अपना प्यार ही है जो विकसित होने पर दूसरों में प्रेम प्रतिदान मिलने के रूप में विदित होता रहता है।
जो इस तथ्य को समझते हैं वे पगलाने से बचे रहते हैं। चपेट में आते हैं तो अपना उपचार आप कर लेते हैं। दूसरों की प्रतीक्षा न करके अपनी ओर से सद्भाव बढ़ाते हैं और उसे साथियों में, सम्पर्क क्षेत्र में उसका प्रतिबिंब देखते हैं। मानसिक अवसाद का यह अति सरल किन्तु अत्यन्त कारगर स्वसंचालित उपचार है, पर दुर्भाग्य यह है कि इस तथ्य को कोई-कोई ही समझ पाते हैं और अपनी और न देखकर स्नेह, सद्व्यवहार एवं सम्मान के लिए दूसरों का मुँह ताकते रहते हैं। न मिलने पर खीजते और दूसरों पर ही कृपणता, कृतघ्नता आदि का दोष लगाते हैं। सहयोग के अभाव में साँसारिक कामों में हानि पड़ने की बात सर्वविदित है। आन्तरिक सद्भावों की उपलब्धि भी उससे भी बड़ी आवश्यकता है। इतने बड़े उपार्जन का यही सरल उपाय है कि अपनी ओर से प्यार का प्रकाश फेंककर दूसरों को प्रिय पात्र बना लिया जाय और अपने ही प्रेम प्रकाश का आलोक समीपवर्ती क्षेत्र में छाया देखा जाय।
मानसोपचार की कठिनाई यह होती है कि वह पगलाये हुए रोगियों को यह दार्शनिक तथ्य समझा सकने में सफल नहीं हो पाते, समझने में तथाकथित समझदार भी असफल रहते हैं। मानसिक रोगी पहले तो अपनी विपन्नता ही स्वीकार नहीं करता, करता भी है तो उसे दूसरों की परिस्थितियों के कारण उत्पन्न हुई मानता है। जब तथ्य को स्वीकार ही नहीं किया गया तो उसके परिवर्तन के लिए बताया गया उपाय भी किस तरह गले उतरेगा। कदाचित ही कोई मनोरोग चिकित्सक अपने रोगियों को यह समझा सकने में सफल हो पाते होंगे कि उन्हें अपने भीतर आशा का, उल्लास का, प्रेम का स्रोत उभारना चाहिए और अपने सूखे मनःक्षेत्र को हरा-भरा कर लेना चाहिए। कितना दुर्भाग्य है कि दो वयस्क मस्तिष्क लाख प्रयत्न करने पर भी उस तथ्य को समझने और समझाने में सफल नहीं होते, जिन पर कि उनकी प्रसन्नता और सफलता निर्भर है।
जो हो, उपचार तो करना ही ठहरा। ऐसी दशा में एक ही उपाय शेष रह जाता है कि विक्षिप्तता एवं अर्ध विक्षिप्तता के रोगी से सहानुभूति रखने वाले सभी लोग अपना व्यवहार बदल लें। स्नेह, सहयोग और सम्मान का प्रदर्शन करें। आत्मीयजन होने के नाते यदि ऐसा सहज स्वाभाविक रूप से बन पड़े तो उसका अधिक प्रभाव पड़ेगा, पर यदि भीतर से वैसी उमंग न उठती हो तो भी प्रेम प्रदर्शन को कारगर उपचार मानकर उसके लिए आवश्यक प्रयास किया जाना चाहिए।
मानसोपचार में औषधियों का- विद्युत प्रयोगों का तथा अन्यान्य क्रिया-प्रक्रियाओं का भी महत्व है, पर उन सबके संयुक्त परिणाम में भी अधिक लाभदायक यह होता है कि पगलाये रोगी को स्नेह दुलार के वातावरण में रहने का अनुभव होने लगे। उद्धत मनोरोगियों की आक्रामक गतिविधियों पर नियन्त्रण करने एवं सामान्य शिष्टाचार खो बैठने पर प्रतिबन्धित भी किया जाता है और वैसा करने से उसे क्या हानि उठानी पड़ेगी इसका अनुभव भी कराना चाहिए। अन्यथा उद्धत आचरण बढ़ता ही जायगा। इतने पर भी यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि मानसिक रोगों के रूप में जीवन की नाव में जो पानी घुसता है उसके प्रवेश द्वार को प्यार के अभाव की अनुभूति ही कहा जा सकता है। अवसाद को उत्साह में बदल देना ही मानसिक रोगों की कारगर चिकित्सा है। इसमें प्रेमोपचार को जितनी सफलता मिलती है उतनी और किसी प्रयोग को नहीं।
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मानवीय इतिहास में उन व्यक्तियों की भी कमी नहीं है जिन्होंने अपने आप को ‘अति मानव’ सिद्ध करने के लिए घोरतम दुष्कृत्य किए है। इसी दम्भ के वशीभूत रावण ने न केवल सैकड़ों युद्ध लड़े, लाखों लोगों को उजाड़ा अपितु अपने सम्पूर्ण कुटुम्ब का भी सर्वनाश करा दिया।
कंस ने अपनी इसी सनक के कारण उस समय के सभी दूध पीते बच्चों का नृशंस वध कराया, तो दुर्योधन के इस अभिमान ने 18 अक्षौहिणी सेना को काल के मुख में धकेल दिया, अतिमानव बनने के चक्कर में उसने अपना भी सत्यानाश किया और इतिहास वेत्ताओं के अनुसार इस युद्ध में विश्व के महानतम सेनानी, वैज्ञानिक चिकित्सक, कलाकार मारे गये। पीछे जो भ्रष्टाचार फैला वह आज तक भी नहीं सिमट पा रहा है।
मुसोलिनी चंगेज खाँ, हिटलर, नादिरशाह यह सभी अतिमानव के ही दुर्बुद्धि जात भाई, भतीजे थे जिन्होंने अपने दुष्कृत्यों के प्रतिफल आप तो भुगते ही साथ ही संसार को कुरूप, कुत्सित बनाने वाली अव्यवस्थाएं भी फैलाई इसके लिए उनकी घोर निन्दा हुई, प्रशंसा नहीं।
यह अहंकार आदमी को कितना उद्धत बना देता है इसका प्रमाण पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा खोजी गई कल्ला मीनारों से मिलता है। मध्यकालीन युद्धों के अरबी इतिहास मुन्तरब बुतबारीख ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में वैरमखाँ द्वारा बनवाई गई ‘कल्ला मीनार’ का उल्लेख है। इस स्थान का नाम सर मंजिल रखा गया था। सिकन्दर शाहसूरी के साथ लड़ने में जितने सिर कटे थे या सैनिक मरे थे उनके सिर बटोर कर उन्हें ईंट पत्थरों की जगह काम में लाया गया था और यह ऊँची मीनार खड़ी की गई थी। मुगल बादशाहों ने और भी कितनी ही ऐसी कल्ला मीनारें युद्ध विजय के दर्प-प्रदर्शन के लिए बनवाई थीं, कल्ला फारसी में सिर को कहते हैं। कटे हुए सिरों से बनाई गई मीनार का अर्थ ‘कल्ला मीनार’ नाम से निकलता है। ऐसी-ऐसी कितने ही स्थानों पर कितनी ही मीनारों के बनाये जाने का विवरण पुरातत्व शोध तथा इतिहास के अध्ययन से प्राप्त होता है।
सैवाइल के बादशाह अवदिल मोतादिद अपने प्रधान कोपभाजनों के शिर कटवाता था और उनकी खोपड़ियाँ साफ कराकर उनमें फूल उगाता था। गुलदस्ते और पीकदान के रूप में भी कुछ खोपड़ियाँ इस्तेमाल की जाती थीं। शत्रुओं के न रहने पर भी उनके प्रति घृणा व्यक्त करते रहने का उसका यह अजीब तरीका था।
अपने इन कुकर्मों के कारण इनमें से कोई अति मानव तो नहीं बन पाया। हाँ! आसुरी कुटुम्ब की ही जनसंख्या इनने बढ़ाई। अति मानव बनने के लिए दुष्कृत्य नहीं, मानवीय सम्वेदना का कभी न चुकने वाला विपुल भावना-प्रवाह अपेक्षित है। जीवन और जगत को उदात्त और सुन्दर बनाने वाले विचार और विनियोजन अभीष्ट है। जर्मनी तथा अन्य योरोपीय देशों में भी सुपरमैन शब्द आता है, पर यह ऐसे उद्धत अहंकारी लोगों के लिए नहीं अपितु उन महामानवों के लिए जिन्होंने मानव जीवन के उत्थान के लिए कार्य किया। गेटे, शापेनहावर हाइन बेगनर बिस्मार्क आदि मानतावादी महापुरुषों के लिए ही यह सब प्रयुक्त हुआ है।
नीत्से ने इस शब्द का उपयोग और भी निश्चित सन्दर्भ में किया। इस महान् दार्शनिक ने अपनी प्रख्यात पुस्तक ‘जरथुस्त्र उवाच’ (दस स्पेक जरथुस्त्र) तथा ‘भले बुरे से परे’ (बियान्ड गुड एण्ड इविल) में इस ‘सुपरमैन’ शब्द का न केवल प्रयोग किया अपितु उसकी व्याख्या इन शब्दों में की है- वह विश्व व्यवस्था की सूक्ष्म प्रक्रिया को समझता है, संकल्प को कार्य में परिणत कर सकता है, इष्ट कार्य का हृदय से नेतृत्व करता है। क्रोध को सदा वशवर्ती रखता है, नारी के वश में नहीं होता। दुष्टों के दलन में समर्थ होता है और दुष्प्रवृत्तियों को उखाड़ फेंकता है।
हमें इसी कोटि के महापुरुषों का अनुगमन करना और उनके कार्यों में सहायक होना चाहिए। जितने अंशों में सहायता कर पायें उतने ही महापुरुष कहलाने के अधिकारी हो सकते हैं।
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अपनों से अपनी बात-
समय आ गया जबकि हमें लिप्सा और श्रद्धा में से एक को वरण करने के लिए सुनिश्चित फैसला कर लेना चाहिए। अन्तर्जगत में देवासुर संग्राम चिरकाल से चलता आ रहा है। अब कोई ऐसा दैवी अवतरण होना चाहिए, जिससे इस अन्तर्द्वन्द्व के कारण उत्पन्न महाविनाश का अन्त हो सके।
हमारे भीतर दो प्रबल तत्व बैठे है। एक देवता दूसरा असुर। इस संसार का सृजन ही अन्धकार और प्रकाश के पतन और उत्थान के, दुःख और सुख के तत्वों से हुआ। एक से जूझने और दूसरे को अपनाने के लिए जो प्रयत्न करना पड़ता है उसी के सहारे चेतना और गतिशीलता निखरती है। प्रगति के पथ पर यही दो चरण बढ़ाते हुए लक्ष्य तक पहुँचना सम्भव होता है। इस जड़ चेतन के-तम और सत के-दैत्य और देव के सृजन में सृष्टा का जो भी प्रयोजन रहा हो-स्थिति वही है। मनुष्य के सामने श्रेय और प्रेय के दो मार्ग सदा से खुले रहे हैं। अपने भाग्य का निर्माता वह इसी कारण कहा गया है कि इन दोनों में से एक का चयन करके वह अपने लिए उत्थान और पतन का पथ प्रशस्त कर सकता है।
मानवी बुद्धि की परीक्षा उसकी दूरदर्शिता और अदूरदर्शिता की कसौटी पर कसी जाती है। एक तात्कालिक प्रलोभन और सदा के लिए विनाश का मार्ग है। दूसरा वह है जिसमें प्रथम कठिनाइयाँ स्वीकार करनी पड़ती हैं, बाद में चिरस्थायी सुख शांति की व्यवस्था बनती है। जाल में फँसने वाले पक्षी और काँटे में गला फँसाने वाली मछली जैसे जीव अदूरदर्शिता अपनाते हैं। तत्काल के सरल और प्रचुर दीखने वाले प्रलोभन के लिए इतने आतुर हो जाते हैं कि दुष्परिणामों की बात सोच ही नहीं सकते। चासनी को देखकर टूट पड़ने वाली मक्खी की भी यही दुर्गति होती है। उपभोग की आतुरता में लोग अपना पैसा, स्वास्थ्य, सम्मान, सन्तोष और भविष्य बुरी तरह बिगाड़ते हैं। उन्हें यह दिखाई ही नहीं पड़ता कि सदुद्देश्य अपनाकर श्रेष्ठता की दिशा में चलने वाले आरम्भ में तो कुछ घाटा उठाते दीखते हैं, किन्तु अन्ततः प्रगति के उच्च शिखर पर जा पहुँचते हैं।
किसान, व्यापारी, विद्यार्थी, श्रमिक, शिल्पी, कलाकार आदि सभी को उन बुद्धिमानों की श्रेणी में गिना जा सकता है जो आरम्भ में असुविधा उठाते और अन्ततः अपना भविष्य उज्ज्वल बनाते हैं। जीवन-सौभाग्य को सार्थक बनाने वाले दूरदर्शी महामानवों में प्रत्येक को सदुद्देश्य के लिए संकल्प और साहस करने की प्रखरता अपनानी पड़ी है। इससे कम में न किसी ने अपना लोक बनाया है और न परलोक।
वृक्ष बनने की महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए बीज को गलने का पुरुषार्थ दिखाना ही चाहिए। जो इतना साहस नहीं कर पाता वह दाना कुछ दिन यथावत् रखा भर रहता है पीछे प्रकृति की प्रक्रिया उसे सड़ा घुनाकर समाप्त कर देती है। आतुरतापूर्वक बीज सस्ते मोल में उन्नति करने के लिए आतुर होता है तो सीलन में बैठकर अपना थोड़ा-सा फुलाव भर कर लेता है, पर उस सस्ती प्रगति का दुष्परिणाम और भी जल्दी सामने आता है। सीलन में फूला हुआ बीज अपना अस्तित्व और भी जल्दी गँवा बैठता है। दूरदर्शी बीज उत्साहपूर्वक गलते और वृक्ष की तरह विशाल बनते हैं। उनकी जड़ों को धरती माता खुराक होती है और इंद्र देवता सींचने का अयाचित अनुग्रह बरसाते हैं। जो बीज गलने में हानि और बचने में लाभ देखते रहे उन्हें उनकी कृपणता तुच्छता के गर्त में ही गिराये रहती है, वे प्रगति की किसी भी दिशा में रंच मात्र भी आगे बढ़ नहीं पाते।
दोनों ही मार्ग हर विवेकशील के आगे खुले पड़े हैं। एक प्रेय का दूसरा श्रेय का। एक स्वार्थ का दूसरा परमार्थ का। एक मूर्खता का दूसरा दूरदर्शिता का। एक पतन का दूसरा उत्थान का। इन दोनों में से एक का चयन करने की चुनौती हर जागृत आत्मा के सामने खुली पड़ी रहती है। दोनों ओर लाभ दीखते हैं और हानि भी। मन भ्रमता भटकता रहता है। कभी एक को अपनाने की बात सोचता है, कभी दूसरे को। कभी एक पकड़ता है कभी दूसरे को। कभी एक को छोड़ता है कभी दूसरे को। इस असमंजस भरी मनःस्थिति को ही देवासुर संग्राम कहा गया है। इसी को अंतर्द्वंद्व कहते हैं। जब तक यह स्थिति बनी रहेगी तब तक कोई चैन से न बैठ सकेगा । अन्तर्जगत में चलते रहने वाले इस महाभारत के कारण चीत्कार और हाहाकार छाया रहता है। इस स्थिति के रहते किसी को और कुछ भले ही मिल जाय शान्ति एवं सन्तोष के दर्शन हो ही नहीं सकेंगे।
इस देवासुर संग्राम का अन्त सामान्य बुद्धि के सहारे नहीं हो सकता। क्योंकि दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी सामर्थ्य और विशेषता के कारण पूर्ण प्रबल हैं। इनमें से किसी की क्षमता कम नहीं, कोई हारने वाला नहीं। कलह अनन्त काल तक चलता रहेगा। कभी एक हारेगा, कभी दूसरा। कभी एक की जीत होगी, कभी दूसरे की। विग्रह का अन्त भगवान का अवतार ही करता है। पौराणिक गाथाओं में इसी प्रसंग के अनेक उपाख्यान हैं। देवासुर संग्रामों के अन्त तभी होते रहे हैं, जब भगवान की शक्ति ने किसी किसी रूप में प्रकट होकर अपना चमत्कार दिखाया है। इन कथानकों में एक ही तथ्य स्पष्ट है कि श्रेय और प्रेय की खींचतान का अन्त ऋतम्भरा, प्रज्ञा दूरदर्शी विवेकशीलता सदुद्देश्य के लिए साहस कर सकने वाली प्रखरता के आधार पर ही होता है। जब तक अन्तरात्मा की धरती पर इस रूप में भगवान का अवतार न होगा तब तक अन्तर्द्वन्द्व से भरी अशान्ति मनःस्थिति में मात्र विक्षोभ ही उभरते रहेंगे। शांति और सन्तोष का अनुभव एक क्षण के लिए भी न हो सकेगा।
इस द्विधा, असमंजस का अन्त होने की समस्या जागृत आत्माओं की सबसे बड़ी समस्या है। सुख-सुविधाओं की थोड़ी-सी ओस बूँदें चाटते रहने से अन्तरात्मा की प्यास बुझेगी नहीं। जलते तवे पर लोभ और मोह की पूर्ति की थोड़ी सी सफलता पानी की कुछ बूँदें ही सिद्ध होती रहेंगी। उनके सहारे कुछ समाधान निकलेगा नहीं। उलझन का अन्त स्थायी रूप से हो सके तो ही निश्चित दिशा में निश्चिततापूर्वक निर्धारित गति से चल सकना सम्पन्न हो सकेगा। अन्यथा आगे बढ़ने, पीछे हटने के कुचक्र में फंसे रहने से तो श्रम और समय ही नष्ट होता रहेगा। महत्वपूर्ण निर्णय न हो सके तो महत्वपूर्ण परिणाम भी कैसे हो सकते हैं। समय आ गया कि इस असमंजस भरी अनिश्चित स्थिति का स्थायी समाधान खोज लिया जाय। जीवन सम्पदा का कुछ महत्वपूर्ण उपयोग अंतर्द्वंद्व का हल करने के उपरान्त ही बन पड़ेगा। अस्तु आज की सबसे बड़ी समस्या यही मानी जानी चाहिए कि हम आन्तरिक कलह का स्थायी हल ढूँढ़ें और किसी सुनिश्चित मार्ग पर चलकर कुछ वैसी उपलब्धियाँ प्राप्त करें जिनके लिए यह सुर दुर्लभ सौभाग्य दिया गया है।
दैत्य पक्ष का तर्क है कि प्रत्यक्ष तो उपभोग है। उसका लाभ और आनन्द तत्काल मिलता है। अधिकांश व्यक्ति उसी मार्ग पर चल रहे हैं। साथी स्वजनों का परामर्श और प्रोत्साहन उसी के लिए है। फिर अपने को भी दूसरों की तरह इसी मार्ग पर क्यों नहीं चलते रहना चाहिए? इन्द्रियाँ वासना पूर्ति के लिए लालायित रहती हैं और उपभोग के जितने अवसर मिलते हैं उतनी ही बार प्रसन्न होती हैं। आराम की-सुख साधनों की इच्छा शरीर को हर घड़ी रहती है। विनोद, मनोरंजन में जी रमता है। इनके साधन इकट्ठे करने में लगे रहने का प्रतिफल सुविधाओं को-उपभोग सामग्री को बहुलता के रूप में तत्काल मिलता है फिर इन्हीं के लिए सोचते और करते रहने में क्या हर्ज है? साधन संग्रह से मिलने वाली अमीरी के साथ बड़प्पन भी रहता है। सब चकित एवं प्रभावित होते हैं। सराहना ही नहीं खुशामद भी करते हैं। धन देकर किसी को भी प्रसन्न आकर्षित किया जा सकता है यहाँ तक कि धर्म और भगवान का लाभ भी पैसे के सहारे ही मिल सकता है फिर उसी का अधिकाधिक मात्रा में संचय क्यों न करते रहा जाय? साथ तो कुटुँबी ही रहते हैं। उनकी अनुकूलता और प्रसन्नता पाने के लिए उन्हें सुविधा साधन देना आवश्यक है। फिर वैसा ही क्यों न करते रहा जाय जिसकी कुटुम्बीजन अपेक्षा करते हैं।
यह चिन्तन परामर्श दैत्य वर्ग का है। इसमें तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ बताया जाता है और कहा जाता है कि भविष्य की बातें सोचना व्यर्थ है। भविष्य में क्या होना है इसे कौन जाने? प्रत्यक्ष की उपेक्षा करके परोक्ष की अपेक्षा क्यों की जाय? इन तर्कों से प्रभावित जीवात्मा को लोभ और मोहग्रस्त जीवन जीना पड़ता है। वासना और तृष्णा ही उसकी गतिविधियों पर छाई रहती है। अहंता की पूर्ति इसी में लगती है। लोगों को परामर्श एवं सहयोग इसी के लिए मिलता है। समीपवर्ती वातावरण का प्रभाव भी मनोभूमि पर इसी रूप में अच्छादित रहता है।
अन्तरात्मा में अवस्थित देव पक्ष कहता है- ‘सृष्टा ने मनुष्य जीवन की धरोहर किसी विशेष उद्देश्य के लिए प्रदान की है। सृष्टि के अन्य प्राणियों को जो नहीं दिया गया वह मनुष्य को उपहार के रूप में देना ईश्वर का पक्षपात और अन्याय होता है। वैसा ही नहीं- हो भी नहीं सकता है। जीवन संपदा विम्व-उद्यान को समुन्नत, सुसंस्कृत बनाने में ईश्वर का हाथ बंटाने के लिए मिली है। इसी मार्ग पर चलते हुए मुक्त मनःस्थिति और स्वर्गीय परिस्थितियों का लाभ मिल सकता है। भव-बंधनों से मुक्ति और अपूर्णता से पूर्णता की प्राप्ति का जीवन-लक्ष्य इसी मार्ग पर चलने से मिलेगा। आत्म-संतोष और आत्मशान्ति की दोनों ही महान् उपलब्धियाँ इससे कम में मिलती नहीं और इससे अधिक उसके लिए और कुछ करने की आवश्यकता है नहीं।
देव पक्ष का तर्क है कि तात्कालिक लोभ के आकर्षण में यहाँ माया का छलावा ही फैला हुआ है। यह चूहे को पिंजड़े में फंसा कर उसकी जान लेने जैसी प्रवंचना है। बुद्धिमत्ता और मूर्खता की यह कसौटी है कि वंसरी की आवाज पर मोहित मृग में-कमल पुष्प में बंद होकर हाथी के पेट में जाने वाले भौंरे में और बुद्धिमान मनुष्य में दूरदर्शिता, अदूरदर्शिता का कुछ अन्तर है या नहीं? परीक्षा फीस के लिए घर से मिले पैसों को सिनेमा देखने में खर्च कर डालने वाला विद्यार्थी उस दिन तो बहुत प्रसन्न दीखता है और अपनी चतुरता पर गर्व भी करता है, पर जब परीक्षा में न बैठ सकने, पढ़ाई में पिछड़ जाने, परिवार की प्रताड़ना और साथियों का उपहास सहने का दिन आता है तब पता चलता है कि तात्कालवाद कितना महंगा पड़ता है। नशेबाजों की गणना ऐसे ही अदूरदर्शी लोगों में है जिन्हें तुरन्त का मौज-मजा ही सब कुछ लगता है और उसी कुचक्र में फंस कर अपना पैसा, स्वास्थ्य, सम्मान सब कुछ गंवा बैठते हैं। चोर, जुआरी, लवार भी तत्काल के लाभ को सब कुछ मानते हैं और उस दुर्दिन को नहीं देखते जो कुछ ही समय में तिरस्कार, असहयोग, धिक्कार एवं समाज दण्ड के रूप में सामने आकर खड़ा होने वाला है।
लिप्सा, बिजली की चमक की तरह ही चकाचौंध उत्पन्न करती और क्षण भर में गायब हो जाती हैं। जिह्वा का चटोरपन, अश्लील कामुकता की चमक कुछ मिनट ही रहती है। इसके उपरान्त पेट खराब होने और शरीर खोखला होने का संकट ही चिरस्थायी रूप से गले बंध जाता है। विलासी शृंगारिकता का उद्देश्य दूसरों को आकर्षित करना और अपना बड़प्पन जताना होता है, किन्तु वास्तविक परिणाम इससे ठीक उलटा होता है। छिछोरापन, मनचलापन इससे टपकता है और अप्रामाणिकता की गंध इस सारे विन्यास से आती है। ऐसे लोग किसी की आँखें भले ही लुभा लें। विश्वास किसी का भी नहीं पा सकते। संबंधियों को अनावश्यक सुविधा साधन देते रहने से उसका स्वभाव, व्यक्तित्व और भविष्य बिगड़ता है। उनकी बढ़ी-चढ़ी इच्छाएँ पूरी होने में जब कमी पड़ती है तो तुरन्त आँखें बदल जाती हैं। संचय का धन दूसरे बिलसते हैं और अपने को उसके लिए कोल्हू के बैल जैसी मेहनत, प्राण सुखाने वाली चिन्ता और अनन्त काल तक सहने वाली प्रताड़ना के अतिरिक्त और कुछ पल्ले नहीं पड़ता।
देव पक्ष बुद्धि को निरन्तर यही समझाने का प्रयत्न करता है कि इस सुरदुर्लभ सौभाग्य भरे अवसर को जीवन साधना में लगाया जाय और उसका सत्परिणाम वैसा ही पाया जाय जैसा कि प्रातः स्मरणीय-लोकश्रद्धा के भाजन, विश्व के मार्ग-दर्शक महामानव प्राप्त करते रहे हैं। सुख-शान्ति की आकाँक्षा आन्तरिक उत्कृष्टता के सहारे ही पूरी होती है। साधनों की मृग तृष्णा में भटकने से थकान और खीज ही पल्ले पड़ती है। कस्तूरी का मृग चैन तभी पाता है जब वह सुगन्ध का स्त्रोत अपनी नाभि में होने की जानकारी पा लेता है। सच्ची समृद्धि उत्कृष्ट मनःस्थिति है उसी के आधार पर अनुकूल परिस्थितियाँ बनती हैं। यह जान लेने पर साधनों की लालसा और उपभोग की लिप्सा का समाधान होता है अन्यथा वह आग में घी डालते रहने की तरह घटती नहीं बढ़ती ही रहती है।
जागृत आत्माओं के अन्तःकरण में यही देवासुर संग्राम निरन्तर खड़ा रहता है। पेट और प्रजनन तक सीमित रहने वाली पशु-प्रवृत्ति छोटी योनियों की परिस्थिति के अनुरूप है। उन पर शारीरिक प्रवृत्तियाँ ही हावी रहती हैं। मनुष्य की स्थिति उनसे भिन्न है। उसमें अन्तरात्मा नाम का एक नया तत्व जग जाता है। यही देवत्व है। वह निरन्तर ऊँचा उठने की, आगे बढ़ने की, आत्म-गौरव और आत्म-संतोष पाने की चेष्टा करता है। इसी के लिए चेतना को-बुद्धि को अपनी ओर खींचता है। दूसरी ओर तुच्छ योनियों की संचित पशु-प्रवृत्तियाँ अपने स्थान पर अड़ी रहनी चाहती हैं। वे लोभ और मोह की पेट और प्रजनन की सीमा से चेतना को एक कदम आगे नहीं बढ़ने देना चाहतीं! यही है वह सत्प्रवृत्तियों और दुष्प्रवृत्तियों का मल्ल युद्ध जो निरन्तर अन्तःक्षेत्र में देवासुर संगम के रूप में दृष्टिगोचर होता है। नितान्त नर-पशु के सामने कोई समस्या नहीं, वह निकृष्टता के अभ्यस्त दलदल में फंसे हुए कृमि-कीटकों की तरह मनुष्य काया में भी गुजारा कर लेता है। देवत्व की हल्की सी किरणों पर पर्दा डालने, दबाने, कुचलने से उसे बहुत कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता। ओछा और घिनौना जीवन वह किसी प्रकार जी लेता है। किन्तु जागृत आत्माओं की स्थिति सर्वथा भिन्न है। जिनका देवत्व एक बार जग गया वह फिर सो नहीं सकता। उसकी माँग, पुकार बढ़ती हो रहेगी। अन्तर में घुसे हुए दानव के साथ उसका मल्ल-युद्ध तीव्र ही होता चला जायेगा। जागृत देवता को दबाने के लिए तमिस्रा के असुर का प्रयास सफल नहीं हो पाता, फिर भी वह हारता नहीं। कम से कम इतना तो किये ही रहता है कि देवत्व अपनाने की आकाँक्षा को सफलीभूत न होने दे, उसके मार्ग में पग-पग पर रोड़े अटकाता रहे।
युग-निर्माण परिवार के प्रत्येक परिजन के अन्तर्जगत में इन दिनों ऐसा ही देवासुर संग्राम प्रचण्ड होता चला जा रहा है। इसे कोई भी दिव्य चक्षु संपन्न व्यक्ति अपनी और अपने साथ वाली जागृत आत्मा की अन्तःस्थिति का पर्यवेक्षण करके सहज ही देख सकता है। बाह्य जीवन के विग्रह, विद्वेष, झंझट कितने कष्ट कारक, कितने चिन्ताजनक, कितने विक्षोभ युक्त होते हैं, इसे हर कोई जानता है। जिनने कभी अन्तर्द्वन्द्व का अनुभव किया है कि इससे अधिक उद्विग्नता एवं अशान्ति और कुछ हो नहीं सकती वे देवासुर संग्राम के दिनों की परिस्थितियों का वर्णन जब पौराणिक उपाख्यानों में पढ़ते हैं तो उसकी रोमाँचकारी भयानकता सामने आ खड़ी होती है। इसी का एक रूप देखना हो तो जाग्रत आत्माओं के अन्तःक्षेत्रों में चलने वाले अन्तर्द्वन्द्व की स्थिति का अनुमान लगा देना चाहिये।
एक ओर ईश्वर अपनी भुजाएं पसारे गोदी में चढ़ाने का-छाती से लगाने का आह्वान करता है। दूसरी ओर लोभ और मोह के बंधन हाथों में हथकड़ी, पैरों में बेड़ी की तरह बंधे हैं। स्वार्थान्धता की अहंता कमर में पड़े रस्सों की तरह जकड़े बैठी है। पीछे लौटे, जहाँ के तहाँ रुके रहें, या आगे बढ़ें? यह तीन प्रश्न ऐसे हैं जो अपना समाधान आज ही चाहते हैं। अनिर्णीत स्थिति का असमंजस जागृत आत्माओं के लिये क्रमशः असह्य ही बनता जाता है। समय आ गया कि इस महती सामयिक समस्या का कोई समाधान खोज ही लिया जाय। उपेक्षा करते रहने से समय बीतता जायेगा और यह सुरदुर्लभ अवसर सदा के लिए हाथ से चला जायेगा, जो आज सही रीति से समाधान बन जाने पर अभी भी उज्ज्वल भविष्य की संरचना कर सकता है। जो बीत गया वह बहुत था। पर जो शेष रहा है वह भी इतना है कि उसकी बर्बादी यदि रोकी जा सके, जीवनक्रम की वर्तमान दिशाधारा बदली जा सके तो बचे हुए दिनों में भी स्वयं पार होने और दूसरों को अपनी नाव में बिठाकर पार कर सकने की परिस्थिति बन सकती है।
जागृत आत्माएं अपने को फिर मूर्छित कर सकने में सफल न हो सकेंगी। शरीर बढ़ जाने पर फिर शिशु शरीर पा सकना या छोटे कपड़े पहन कर गुजारा कर सकना संभव नहीं। असुरता को देर तक सहन करना और देवत्व को देर तक टकराना न तो उनके लिए संभव है और न शोभनीय। इससे आत्मा की परमात्मा की और युग धर्म की अवमानना ही होती रहेगी। ओछा जीवन जीते रहने पर भी चैन से रहा नहीं जा सकेगा।
अच्छा है ईश्वर को अपने अन्तःकरण के आँगन में क्रीड़ा करने का अवसर दें। देवत्व का समर्थन करें, ऐसा विवेकपूर्ण निर्णय करें जिसके आधार पर जागृत आत्माओं में दबे मानवों जैसी जीवन नीति निर्धारित को जा सके। यह निर्धारण ही पर्याप्त नहीं इसे कार्यान्वित करने के लिए सत्संकल्प और उत्साह भी चाहिए। इसी उमंग भरे उपहार को व्यक्तिगत जीवन में ईश्वर का अवतरण कहा जा सकता है।
औसत भारतीय के स्तर का सादा निर्वाह-परिवार को सुसंस्कारी ओर स्वावलंबी बना देने का उत्तरदायित्व यदि पर्याप्त माना जाय-तो लोभ और मोह की फाँसी से मुक्ति मिल सकती है। जो संचय मौजूद है, उसी से जीवन की शेष अवधि का निर्वाह भली प्रकार हो सकता है। घर के समर्थ लोगों को पारिवारिक उत्तरदायित्व हस्तान्तरित करने में बहुत अधिक कठिनाई नहीं होती। कारणवश अनुपस्थिति या असमर्थता हो जाने पर भी परिवार व्यवस्था में प्रायः अन्तर नहीं आता और खाँचा इधर-उधर हिल-डुल कर किसी प्रकार फिट ही हो जाता है। वस्तुतः ऐसा कभी विचार ही नहीं किया गया कि युग धर्म को पूरा करने के लिए हमारे कंधों पर कुछ विशेष उत्तरदायित्व है। कभी ऐसी योजना बनाई ही नहीं गई कि संचय और उपभोग और व्यामोह को शिथिल कर देने पर भी किस प्रकार वह सारा काम यथावत् चलता रह सकता है, जिसे प्रमादवश अपने ऊपर पहाड़ रखा होने की तरह अनिवार्य मान लिया गया है और जिसके सामने विवश असहाय की तरह सिर झुका दिया गया हैं। यदि ऐसा न होता तो थोड़ा या अधिक समय और साधनों का अनुदान युग साधना के लिए लगाते रहने में व्यस्त या निर्धन व्यक्ति को भी कठिनाई अनुभव न होती।
पूरा समय समाज सेवा के लिए दे सकने की बात भी यदि जागृत आत्माएं सोचने लगें तो उनमें से आधे लोग अभी भी, आज की स्थिति में भी नव-निर्माण के सृजन सैनिकों की पंक्ति में दिन-रात जुटे रहने वाले कर्मवीरों की अग्रिम पंक्ति में खड़े हो सकते हैं। पिछले दिनों 100 ऐसे ही जीवन दानियों की माँग की गई थी। उस पुकार पर दर्जनों ने तैयारियाँ आरम्भ कर दी हैं। जो उनके पास था उसे बैंक में जमा करके ब्याज से अपना खर्च चलाने की व्यवस्था बना चुके हैं। परिवारों को हरिद्वार ले आये हैं। दिन-रात काम में जुटे हैं। पारिवारिक खर्च में यदि थोड़ी-बहुत कमी किसी को पड़ती है उसकी पूर्ति मिशन से कर दी जाती है। यह पूरा समय देने वालों की बात हुई। अपना सामान्य कामकाज करते हुए भी समीपवर्ती क्षेत्रों में बहुत कुछ किया जा सकता है। जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व अभी शेष हैं वे शरीर और आत्मा दोनों के हित साधन की समन्वयात्मक योजना बनाकर चल सकते हैं। रास्ते हजार निकल सकते हैं। देवत्व के परिपोषण के लिए कुछ कर सकना हर किसी के लिए संभव हो सकता है। प्रश्न दानव को दुत्कारने और देव को शिरोधार्य करने का साहस जुटाने भर का है। जागृत आत्माओं के निर्णय निर्धारण इसी स्तर के हो सकें, समय ने ऐसी ही अपेक्षा की है।
जागृत आत्माएं अपने आन्तरिक देवासुर संग्राम को देखें और उसके समाधान के लिए सद्विवेक से, सत्साहस से, भगवान का आह्वान करें। यदि ऐसा हो सके तो इसी देव परिवार की असंख्य प्रतिभाएं युग देवता के चरणों में अपनी छोटी या बड़ी भाव-भरी आत्माहुति प्रस्तुत कर सकती है। पतन और पीड़ा के गर्त में पड़ी हुई मानवता ने इसी की आर्त पुकार की है। महाकाल ने इसी की माँग की है। जागृत आत्माओं में से हर एक की असाधारण भूमिका इस संदर्भ में हो सकती है। कठिनाई एक ही है। लोभ और मोह के रूप में अन्तर्ज्योति को ग्रस लेने वाले राहु-केतु के ग्रहण से किस प्रकार मुक्ति पाई जाय। जो इस देवासुर संग्राम में देव पक्ष का समर्थन करेंगे उन्हीं के लिए देव-मानवों की तरह युगपरिवर्तन की बेला में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकना संभव होगा। जागृत आत्माएं इस संदर्भ में अधिक गंभीर चिन्तन और अधिक प्रखर साहस अपनायें, जिससे जितना अनुदान बन पड़े वह उसके लिए अधिक से अधिक प्रयास करे। यही अपने युग की सबसे बड़ी माँग और यही अन्तरात्मा की सबसे बड़ी पुकार है। बसन्त पर्व इसी नव-जागरण का विशेष संदेश लेकर आ रहा है। इसे सुनना और शिरोधार्य करना ही हमारे लिए श्रेयस्कर है।
महाभारत कर्ण-पर्व के अध्याय 90 में एक कथा आती है-खण्डन वन में एक महा सर्प रहता था-नाम था अश्वसेन। वन में आग लगी। उस अग्नि काँड का निमित्त अर्जुन को माना गया। अग्नि काँड में अश्वसेन की माता चक्षुश्रक मर गई। इस पर उसे बहुत क्रोध आया और अर्जुन से बदला लेने के लिए घात लगाने लगा।
कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत रचा गया। कर्ण और अर्जुन आमने-सामने थे। अश्वसेन ने उपयुक्त अवसर देखा और वह बाण का रूप धारण करके कर्ण के तरकस में जा घुसा। अर्जुन पर प्रहार करते समय कर्ण के हाथ में संयोगवश वही बाण आया जिसमें अश्वसेन समाया हुआ था। बाण का अटपटा पन देखकर शल्य ने कहा- “महाभाग! यह बाण कुछ बेतुका सा है। धनुष पर बाण दूसरा चढ़ाओ। तो ठीक रहेगा। कर्ण ने दर्प पूर्वक कहा- “शल्य! मैं दोबारा लक्ष्य नहीं देखता और एक बार बाण को धनुष पर चढ़ा कर फिर उसे नहीं उतारता।’ ऐसा कहकर उसने धनुष साधा और बाण को लक्ष्य की ओर छोड़ा।
कृष्ण ने इस महा भयंकर बाण को आते देखकर रथ के घोड़ों को जमीन पर बिठा दिया सो बाण के प्रहार से अर्जुन का मुकुट भर कटा उसका शिर बच गया।
अश्वसेन का क्रोध शान्त न हुआ। अर्जुन के बच जाने से उसे बहुत दुख हुआ। अब की बार वह अपने असली स्वरूप में कर्ण के पास पहुँचा और बोला-’हे महाबली! पिछली बार तुमने मेरा पराक्रम जाने बिना ही बाण रूप में मुझे असावधानी से छोड़ा था उसी से अर्जुन बच गया। अबकी बार तुम ध्यानपूर्वक मुझे छोड़ो। इससे मेरा और तुम्हारा समान रूप से शत्रु-अर्जुन निश्चित रूप से मृत्यु के मुख में चला जायेगा।
‘कर्ण ने पूछा-भद्र तुम कौन हो और किस निमित्त मेरे तरकस में प्रवेश करते हो? अश्वसेन ने कहा- ’मैं विकराल विषधर महासर्प हूँ। अर्जुन ने मेरा देश जलाया है सो मैं उससे बदला लूँगा। अपने पुरुषार्थ से उसे डस नहीं सका सो अब मैं तुम्हारी सहायता लेकर अपने शत्रु से प्रतिशोध लेना चाहता हूँ।
कर्ण ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया और बोला- ’हे नाग! मैं अपने ही पुरुषार्थ से विजय पाना चाहता हूँ। द्वेष बुद्धि से छद्म का आश्रय लेकर तुम जिस प्रकार मेरी सहायता करना चाहते हो उसकी अपेक्षा तो मुझे पराजय भी स्वीकार है। हे तात! जो होगा सो मैं भुगतूँगा, तुम तो सुखपूर्वक अपने घर चले जाओ। किसी भी मूल्य पर सफलता पाने और कुछ भी करके मनोवाँछा पूरी करने की अपेक्षा असफल रहना और हारना श्रेयस्कर है। नैतिक मूल्यों का संरक्षण हर हालत में होना ही चाहिये, चाहे उससे अपने स्वार्थों को कितना ही आघात क्यों न लगता हो?
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हम अमृत पुत्र, भय मृत्यु से कब हमें।कौन कहता, कि हम मृत्यु से डर गये॥ मृत्यु ने भी निमन्त्रण दिया जब हमें,मुस्कुराते हुए, मृत्यु के घर गये॥1॥
हम जिये चार दिन, पर जिये शान से।हम मरे भी अगर, तो मरे शान से॥ जी सके एक क्षण भी अपमान से।है धरोपा हमारा कि श्मशान से॥
मृत्यु हमको नहीं है अमंगलमयी, लोकहित, मुस्कुरा मृत्यु को वर गये॥2॥
हम सुधा भी, न अपमान की पी सके।जिन्दगी हम उपेक्षित नहीं जी सके॥
स्वर्ग की दासता भी न सह ही सके।स्वर्ण से क्या, नहीं लोह से भी झुके॥
विष पिया देव हित, मुस्कुराते हुये,और शिव की कथा को अमर कर गये॥3॥
स्वाभिमानी हमारा कि इतिहास है।और मृत्युंजयी आत्म-विश्वास है॥
स्नेहियों को समर्पित मधुर-हास है।शत्रुओं के लिए बाँह यम-पाश है॥
दी चुनौती हमें क्रूर-अन्याय ने,हम दधीची बने, वज्र-सा गिर गये॥4॥
आज ‘संकल्प’ युग के सृजन का किया।इस धरा पर कि स्वर्ग अवतरण का किया॥
और वृत देववत आचरण का किया।और साहस नये युग सृजन का किया॥
उर कि युग-पीर से छलछलाने लगा,हम कि सम्वेदना-भाव से भर गये॥5॥
-मंगल विजय
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*समाप्त*