पवित्रता, महानता और संयमशीलता

पवित्रता, महानता और संयमशीलता यह तीन तत्व हैं, जो मनुष्य की गरिमा को बनाते और महिमा को बढ़ाते हैं। भौतिक समृद्धि किसकी कितनी है, उसे जाँचने के लिए उसके स्वास्थ्य, शिक्षण, अनुभव, कौशल, पद, धन, साधन आदि अनेक वस्तुओं की जाँच पड़ताल करनी पड़ती है और उसी के आधार पर उसकी सम्पन्नता का अनुमान लगाया जाता है। अन्तरंग की दैवी सम्पत्ति किसके पास कितनी है, इसका पता लगाना हो तो यह देखना होगा कि उसके चरित्र और चिन्तन में कितनी पवित्रता है। व्यक्तित्व में मानवोचित महानता सिद्ध करने वाले सद्गुणों का कितना बाहुल्य है और वह व्यक्ति किस सीमा तक संयमशीलता, सादगी और सज्जनता का अपने व्यवहार में समावेश कर सका है।

समृद्धि में कोई व्यक्ति दूसरों को चमत्कृत कर सकता है, पर किसी की श्रद्धा और सद्भावना प्राप्त कर सकने में समर्थ नहीं हो सकता। सम्पन्न व्यक्ति सुख, सुविधा का लाभ दे सकता है। इन्द्रिय तृप्ति और अहंता का परिपोषण कर सकने वाले प्रदर्शन भी उपलब्ध हो सकते हैं किन्तु तृप्ति, तुष्टि और शान्ति की अनुभूति मात्र वैभव के सहारे हो नहीं सकती।

विभूतिवान वह है जो भले ही अमीरी के साथ जुड़ी हुई विलासिता यह सुविधा से वंचित रहा हो, पर कर्त्तव्य-निष्ठा के सहारे मिलने वाले आत्मा-गौरव और आत्म-सन्तोष का अभाव जिसे कभी नहीं अखरा। सज्जनता संसार की सबसे बड़ी विभूति है। जिसने उसे उपार्जित कर लिया समझना चाहिए यह विश्व की गरिमाशील विभूतियों में से एक है।

अन्न, जल और हवा के सहारे शरीर जीवित रहता है। आत्मा की गरिमा को जीवन्त रखने के लिए उसे पवित्रता, महानता और विनम्रता की परिस्थितियों में रहने का अवसर मिलना चाहिए।

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प्रगति के लिये कल्मषों का निवारण आवश्यक

आयुर्वेद के प्रख्यात ग्रन्थ माधव निदान के प्रणेता माधवाचार्य अपने साधना काल में वृन्दावन रहकर समग्र तन्मयता के साथ गायत्री महा पुरश्चरणों में संलग्न थे। उन्होंने पूर्ण विधि विधान के साथ लगातार ग्यारह वर्षों तक अपनी साधना जारी रखी। इतने पर भी उन्हें सिद्धि का कोई लक्षण प्रकट होते दिखाई न पड़ा। इस असफलता से उन्हें निराशा भी हुई और खिन्नता भी। सो उसे आगे और चलाने का विचार छोड़कर काशी चले गये ।

काशी के गंगा तट पर वे बड़ी दुःखी मनःस्थिति में बैठे हुए थे कि उधर से एक अघोरी कापालिक आ निकला। साधक की वेषभूषा और छाई हुई खिन्नता जानने के लिए वह रुक गया और कारण पूछने लगा। माधवाचार्य ने अपनी व्यथा कह सुनाई। कापालिक ने आश्वासन दिया कि उसे भैरव की सिद्धि का विधान आता है। एक वर्ष तक उसे नियमित रूप से करते रहने से सिद्धि निश्चित है। माधवाचार्य सहमत हो गये और कापालिक के बताये हुए विधान के साथ मणिकर्णिका घाट की श्मशान भूमि की परिधि में रहकर साधना करने लगे। बीच-बीच में कई डरावनी और लुभावनी परीक्षाएँ होती रहीं। उनका धैर्य और साहस सुदृढ़ बना रहा। सो वर्ष पूरा होते-होते भैरव प्रकट हुए और वरदान माँगने की बात कहने लगे।

माधवाचार्य ने आँख खोलकर चारों ओर देखा, पर बोलने वाला कहीं दिखाई न पड़ा। उन्होंने कहा-यहाँ आये दिन भूत-पलीत ऐसी ही छेड़खानी करने आया करते हैं और ऐसी ही चित्र-विचित्र वाणियाँ बोलते हैं। यदि आप सचमुच ही भैरव हैं तो सामने प्रकट हों। आपके दर्शन करने, चित्त का समाधान कर लूँ तो वरदान माँगू। इसका उत्तर इतना ही मिला। आप गायत्री उपासक रहे हैं। आपके मुख मण्डल पर इतना ब्रह्म तेज छाया हुआ है कि सामने प्रकट होकर अपने को संकट में डालने की हिम्मत नहीं है। जो माँगना हो ऐसे ही माँग लो।

माधवाचार्य असमंजस में पड़ गये यदि गायत्री पुरश्चरणों से इतना ही ब्रह्म तेज उत्पन्न होता है तो उसकी कोई अनुभूति मुझे क्यों नहीं हुई ? सिद्धि का आभास क्यों नहीं हुआ ? यह प्रश्न बड़ा रहस्यमय था, जो भैरव के संवाद में ही उपजा था। उन्होंने समाधान भी उन्हीं से पूछा। कहा-देव ! यदि आप प्रकट नहीं हो सके और गायत्री उपासना को इतनी तेजस्वी पाते हैं तो कृपा कर यह बता दें कि मेरी इतनी लम्बी और इतनी निष्ठा भरी उपासना निष्फल कैसे हो गई ? इतना समाधान करा देना भी आपका वरदान पर्याप्त होगा। जब आप गायत्री तेज के सम्मुख होने तक का साहस नहीं कर सकते तो फिर आपसे अन्य वरदान क्या माँगू।

भैरव ने उसकी इच्छा पूर्ति की। और पिछले ग्यारह जन्मों के दृश्य दिखाये। जिनमें अनेक पाप कृत्यों का समावेश था। भैरव ने कहा-आपके एक-एक जन्म के गायत्री पुरश्चरण से एक-एक जन्म के पाप कर्मों का परिशोधन हुआ है। ग्यारह जन्मों के संचित पाप प्रारब्धों के दुष्परिणाम इन ग्यारह वर्षों के तप साधन से नष्ट हुए हैं। अब आप नये सिरे से फिर उसी उपासना को करें। संचित प्रारब्ध की निवृत्ति हो जाने से आपको अब के प्रयास में सफलता मिलेगी।

माधवाचार्य फिर वृन्दावन लौट गये और बारहवाँ पुरश्चरण करने लगे। अब की बार उन्हें आरम्भ से ही साधना की सफलता के लक्षण प्रकट होने लगे और बारहवां वर्ष पूरा होने पर इष्टदेव का साक्षात्कार हुआ। उन्हीं के अनुग्रह से वह प्रज्ञा प्रकट हुई, जिसके सहारे माधव निदान जैसा महान ग्रन्थ लिखकर अपना यश अमर करने और असंख्यों का हित साधन कर सकने की उपलब्धि उन्हें मिली और जीवन का लक्ष्य पूरा कर सकने में सफल हुए।

इस गाथा से इस तथ्य पर प्रकाश पड़ता है कि साधना की सिद्धि में प्रधान बाधा क्या है? संचित दुष्कर्म ही उस मार्ग की सफलता में प्रधान रूप से बाधक होते हैं। यदि उनके निराकरण का उपाय सम्भव हो सके तो अभीष्ट सफलता सहज ही मिलती चली जायगी। यही बात संचित पुण्य कर्मों के बहुत देर में फल देने वाली व्यवस्था में जल्दी भी हो सकती है। द्रुतगामी वाहनों पर सवार होकर पैदल चलने से देर में सम्पन्न होने वाली यात्रा अपेक्षाकृत कहीं जल्दी पूरी की जा सकती है। हमारे वर्तमान प्रयत्न ही सब कुछ नहीं होते उनमें पूर्व संचित सत्संग्रहों का भी योगदान होता है। उनका योगदान मिलने से सफलताओं का परिणाम स्वल्प प्रयत्न से भी इतना अधिक हो सकता है कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़े।

संचित संग्रहों में से अशुभों का निराकरण और शुभ सुखदों का शीघ्र परिपाक होने के दोनों उद्देश्य तपश्चर्या द्वारा सम्पन्न हो सकते हैं। ताप कहते हैं गर्मी को। गर्मी ही आग है। आग से दो काम होते हैं-(1) जलाना, नष्ट करना (2) शक्ति सामर्थ्य को असंख्य गुना बढ़ा देना। धातुओं में मिली हुई विकृतियाँ उन्हें भट्टी में डालने से जल कर नष्ट हो जाती है। कूड़े-कचरे को आग लगा देने से उसकी सड़न, दुर्गन्ध से छुटकारा मिल जाता है। गरम पानी में खौलाने से कपड़ों का मैल छूट जाता है। इसके अतिरिक्त यह गर्मी ही शक्ति बन कर काम करती है। ठण्डी बारूद को विस्फोटक बनाने का काम चिनगारी ही करती है। पानी को भाप बनाकर रेलगाड़ी जैसे भारी वाहन को वह द्रुतगति से घसीटती चली जाती है। तेल को शक्ति में परिणत करने का काम भी आग ही करती है उसी से मोटरों और जहाजों को चलाया जाता है। बिजली भी आग का ही एक स्वरूप है। अणु विस्फोट से निकलने वाले विकरण भी अग्नि ही होते हैं। शरीर को जीवित रखने और अवयवों के संचालन में भी जठराग्नि राग्नि ही काम करती है। सूर्य से लेकर चूल्हे तक अग्नि का ही सर्वत्र साम्राज्य छाया हुआ है। पदार्थ में हलचल और प्राणी में चिन्तन की जो सामर्थ्य काम करती दीखती है उसे अग्नि के ही भेद-उपभेदों के अन्तर्गत गिना जा सकता है। इसी अग्नि का एक नाम आपत है। आध्यात्म क्षेत्र में उसके उत्पन्न करने पद्धति का नाम ‘तप’ है। तपस्वी ही ओजस्वी, तेजस्वी और मनस्वी कहलाते हैं। यह सभी शब्द ‘शक्ति मंत्रों’ के प्रतीक हैं। प्रकाश अग्नि का ही गुण है। प्रकाश को जीवन के अर्थ में भी प्रयुक्त किया जाता है और ब्रह्म को ज्योति के रूप में ध्यान करने तथा उसका विवेचन वर्णन करने की परम्परा है।

तपश्चर्या को साधना का प्रधान अंग माना जाता है। उससे संचित कषाय-कल्मषों का निराकरण होता है और सुसंस्कारों को फलित होने का अवसर मिलता है। प्रगति के प्रधान अवरोध अशुभ प्रारब्ध के निराकरण की प्रक्रिया प्रायश्चित्त कहलाती है। इसे तप साधना का प्रथम लक्ष्य माना गया है। संचित अशुभ से पीछा छूट सके-निराकरण समाधान हो सके, तो उसका परिणाम साधन की सफलता में अत्यधिक सहायक हो सकता है। इसी प्रकार यदि प्रार्थना पूजा की साधना के साथ तपश्चर्या का समावेश हो तो उसको अधिक अच्छी तरह फलित होने का अवसर रहता है। विलासिता और शिथिलता की स्थिति में रहकर उपासना करने वालों की तुलना में तपश्चर्या की रीति-नीति अपनाकर भजन प्रयोजनों में लगने वाले व्यक्ति अपने लक्ष्य तक अधिक अच्छी तरह जा पहुँचते हैं।

न केवल अध्यात्म क्षेत्र में वरन् भौतिक जीवन में भी यही सिद्धान्त काम करता है। रक्त विकार जैसे रोगों को दूर करने के लिए कुशल वैद्य पेट की सफाई करने के उपरान्त अन्य रक्त शोधक उपचार करते हैं। कायाकल्प चिकित्सा में बलवर्धक औषधियों का नहीं, संचित का निष्कासन करने वाले उपायों को ही प्रधान रूप से कार्यान्वित किया जाता है। वमन, विरेचन, स्वेदन आदि क्रियाओं द्वारा मल निष्कासन का ही प्रयास किया जाता है। इसमें जितनी सफलता मिलती जाती है उसी अनुपात से जरा जीर्ण रोगग्रस्त व्यक्ति भी आरोग्य लाभ करता और बलिष्ठ बनता चला जाता है। कायाकल्प चिकित्सा का विज्ञान इसी सिद्धान्त पर आधारित है।

दोष, दुर्गुणों के रहते चिरस्थायी प्रगति के पथ पर चल सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं हुआ है। फूटे बर्तन में दूध दुहने से पल्ले कुछ नहीं पड़ता। पशु पालते और दुहने का श्रम निरर्थक चला जाता है। कषाय-कल्मषों से दोष, दुर्गुणों से लड़ने के लिए जो संघर्ष पुरुषार्थ करना पड़ता है उसी के विधि-विधानों को तप साधन कहते हैं। तपश्चर्या का तत्वदर्शन, आत्म-शोधन की आवश्यकता पूरी करने के लिए ही गढ़ा गया है। उसका उद्देश्य देवताओं के सम्मुख हठवादिता अपनाकर मनोकामना पूरी करने का दुराग्रह ठानना नहीं, वरन् आत्मशोधन के सहारे अपनी पात्रता का सम्वर्धन करना है। गड्ढा जितना गहरा होता है, पात्र जितना बड़ा होता है उसी अनुपात में वर्षा का जल उसमें जमा होता चला जाता है। आन्तरिक सत्पात्रता का सम्वर्धन करने के लिए तप−साधना को ही उपाय उपचार बताया है। चिड़िया की छाती की गर्मी पाकर ही अण्डे पकते हैं। पौधों के विकसित होने और फूलने-फलने में गर्मी का कितना बड़ा योगदान होता है इसे किसान और माली भली प्रकार जानते हैं। जप का समानान्तर शब्द तप। बोलचाल की भाषा में प्रायः जप, तप-दोनों को मिलाकर बोलने का रिवाज है।

ब्रह्मवर्चस् अभियान से तप साधना को प्रमुखता दी गई है। ‘वर्चस्’ शब्द ही तप का पर्यायवाची है। उपासनाओं के साथ कई प्रकार की छोटी-बड़ी तप साधनाओं की शृंखला जोड़ी गई है। उसकी आधारशिला चान्द्रायण व्रत पर रखी गई समझी जा सकती है। यह संचित कुसंस्कारों के परिशोधन और प्रसुप्त दिव्य-शक्तियों के जागरण के लिए शरीर और मन के सुविस्तृत क्षेत्र में अनुकूल वातावरण उत्पन्न करता है। भागीरथ ने गंगा अवतरण के लिए कई प्रकार के उपासना उपचार किये थे। गंगा की आराधना और शिव की अभ्यर्थना की साधना वे लम्बे समय तक करते रहे और अपने उद्देश्य में सफल होकर रहे। पर यह सफलता हाथ तभी लगी जब उपासना उपचार के साथ तपश्चर्या को अग्नि शक्ति का समावेश हो सका। यदि वे मात्र पूजा आराधना ही करते रहते और तप के कष्टसाध्य झंझट से बचकर रहना चाहते तो उन्हें उससे अधिक कुछ भी न मिलता जो शिव मन्दिरों और गंगा मन्दिरों के पुजारियों को नगण्य-सा प्रतिफल उपलब्ध होता है।

ब्रह्मवर्चस् साधना में सन्निहित तपश्चर्या का अभ्यास एक प्रकार से प्रखरता के उत्पादन का जीवन-दर्शन है। उसे अपनाने वाला न केवल आत्मिक क्षेत्र की सफलताओं का अधिकारी बनता है, वरन् भौतिक क्षेत्र में भी-लोक-व्यवहार में भी उसकी सफलताएं दूसरों की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी हो सकती हैं। इसलिए वह न केवल आत्मिक प्रगति के इच्छुकों के लिए वरन् भौतिक समर्थता प्राप्त करने के उत्सुकों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकती हैं।

यहाँ इस तथ्य को भली-भाँति समझ लेना चाहिए कि संचित कर्मों को ही भाग्य कहते हैं और यह भाग्य विधान हमारी प्रगति अवगति में अत्यधिक महत्वपूर्ण निमित्त और आधारभूत कारण होता है। भाग्य की प्रतिकूलता का समाधान करने और अनुकूलता को बढ़ाने के लिए तपश्चर्या कितनी सहायक है इसका तत्वज्ञान समझना आवश्यक है। प्रसंग कुछ-कुछ रूखा-सा अवश्य है, पर जिन्हें इस मार्ग में अभिरुचि है उन्हें धैर्यपूर्वक और मनोयोग के साथ समझना भी चाहिए।

अगले तीन लेखों में संचित कर्मों का, भाग्य प्रारब्ध का, स्वरूप और जीवन के उत्थान-पतन में योगदान समझाने के लिए प्रयत्न किया जा रहा है। इसे समझने में थोड़ी कठिनाई तो पड़ेगी, पर इन लेखों को दो या तीन बार पढ़ने से वस्तुस्थिति समझ में आ जायगी कि भाग्य विधान की प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलना किस प्रकार सम्भव हो सकता है। इस तथ्य को जान लेने पर प्रस्तुत अवरोधों को निरस्त करते हुए भौतिक और आत्मिक प्रगति के मार्ग पर सुनिश्चित रीति से बढ़ सकना हर किसी के लिए सम्भव हो सकता है।


Quotation

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्व कर्मणा तपश्चर्या सिद्धिं विब्दन्ति मानवः॥ (गीता 18।46)

“जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है उस परमेश्वर की अपने श्रेष्ठ कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।”

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अभिवर्धन से पूर्व परिशोधन करना होगा।

अभिवर्धन से पूर्व परिशोधन की आवश्यकता सामान्य जीवन में सर्वत्र समझी जाती है, पर आत्मिक प्रगति का प्रसंग जब आता है तो उस ओर से एक प्रकार मुँह ही मोड़ लिया जाता है। इस उपेक्षा का ही कारण है कि प्रगति के लिए किये गये प्रयास प्रायः निरर्थक चले जाते हैं और यह शिकायत बनी रहती है कि आत्मिक क्षेत्र की सफलताएं प्राप्त करने के लिए जो उपाय बताये गये, वे सारगर्भित नहीं थे। अधिकांश साधकों को ऐसी ही असमंजस की स्थिति में फंसा और निराशा से खिन्न मनःस्थिति की ओर जाता देखा जाता है। आरम्भिक उत्साह को बहुत समय तक स्थित रखने वाले कोई विरले ही दीखते हैं। इसमें अधीरता तो एक कारण है ही, पर उस कठिनाई की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती, जिसके कारण साधनाएं अपने प्रभाव का कोई परिचय प्रस्तुत नहीं करतीं और आशा का कुसुम असमय में ही मुरझाने लगता है।

तथ्यों को खोजने पर एक भयंकर भूल सामने आती है कि अभिवर्धन से पूर्व परिशोधन के सिद्धान्त की उपेक्षा कर दी जाती है। सरलतापूर्वक जल्दी उपार्जन के लोभ में ऐसी आतुरता अपनाई जाती है जिसके अत्युत्साह में परिशोधन की प्रक्रिया पूरी करने के लिए ठहरना बन ही नहीं पड़ता। फलतः एकाकी प्रयास अधूरे रहते हैं, सफलता के लिए समग्र प्रयास चाहिए। आधी-अधूरी प्रक्रिया हर काम में असफलता उत्पन्न करती है तो फिर आत्मिक क्षेत्र ही उसका अपवाद कैसे रह सकता है। साधनाओं की असफलता का मूल कारण यह अधूरापन ही होता है जिसमें परिशोधन जैसी आरम्भिक आवश्यकता को पूरा किये बिना ही आगे की छलाँग लगा दी गई।

दुष्कर्मों के कारण चित्त पर जमे हुए कुसंस्कारों की मोटी परतें आत्मिक प्रगति के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। उन्हें हटाने को ‘परिशोधन’ कहते हैं। उपासना का महत्व कृषि कर्म करने-उद्यान लगाने जैसा है जिसके लिए बीजारोपण से भी पूर्व भूमि शोधन की आवश्यकता है। अच्छी तरह जोतना भूमि के कंकड़, पत्थर हटाना, खर पतवार उखाड़ना, नमी रखना, खाद देना जैसे कई काम करके भूमि को इस योग्य बनाया जाता है, कि उसमें बोया हुआ बीज ठीक तरह उग सके। अंकुरों को बढ़ने और फलने-फूलने की स्थिति तक पहुँचने के लिए उपयुक्त भूमि की आवश्यकता होती है। यदि उसके बनाने में आनाकानी की गई है और जल्दी फसल कमाने के लोभ में भूमि साधना का श्रम निरर्थक समझा गया है तो उसे भूल ही कहा जायगा। जो आरम्भ में तो श्रम बचाने की बचाने की बुद्धिमत्ता समझा गया था, पर पीछे उसमें बीज भी गँवा बैठने की निराशा ही हाथ लगती है।

आत्मिक प्रगति की साधना का पूर्वार्ध है-आत्मशोधन और उत्तरार्ध है-आत्म विकास। उपासनाएं आत्म-विकास का प्रयोजन पूरा करती हैं। इसके लिए योगाभ्यास वर्ग के अनेकानेक विधि-विधानों का प्रचलन है। अपनी रुचि, आवश्यकता और परम्परा के अनुसार उनमें साधक चुनाव करते हैं और प्रगति का उपक्रम आरम्भ करते हैं, यह उत्तरार्ध है। यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि उत्तरार्ध से लाभ पाने के नये आधार और दृश्य सामने आते हैं और कुछ पाने की आशा तो बंधती है, पर पूर्वार्ध की उपेक्षा करके यह छलांग प्रायः असफल ही होती देखी गई है। पूर्ण असफल न भी हो तो भी उसका प्रतिफल इतना स्वल्प दिखाई देता है जो आरम्भ में सोचे या बताये गये माहात्म्य की तुलना में बहुत ही कम होता है और साधक का मन उदास कर देता है।

होना यह चाहिए था कि विकास प्रयासों का उत्तरार्ध अपनाने के साथ-साथ पूर्वार्ध का परिशोधन पक्ष भी ध्यान में रखा गया होता। इसे तप साधना कहते हैं। इसके हलके भारी अनेकों प्रकार हैं। उन्हें अपनाने से मनोभूमि की कुसंस्कारिता हटती है और उर्वरता उत्पन्न होती है। यही भूमि शोधन है जिसमें अंकुर उपजाने जैसे उत्साहवर्धक दृश्य तो तत्काल सामने नहीं आते, पर दूरदर्शिता के सहारे निकट भविष्य में अभीष्ट सफलता मिलने का आश्वासन अवश्य मिलता है। अस्तु साधना की सनातन परम्परा में आत्मशोधन की- तपश्चर्या की भी उतनी ही आवश्यकता और महत्ता बताई गई है जितनी कि उपलब्धियों की झलक दिखाने वाली योग साधनाओं की। अदूरदर्शिता की भूमि की उखाड़-पछाड़ बेकार लगती है और अंकुर उपजाना या पौध लगाना प्रत्यक्ष लाभदायक दीखता है। इतने पर भी तथ्य तो तथ्य ही रहेंगे। शोधन की उपेक्षा करके उपार्जन की उतावली अन्ततः निराशाजनक ही सिद्ध होती है।

उपासना विधानों का प्रचलन इन दिनों तेजी पर है। बताने वाले ऐसे गुरुओं की बाढ़-सी आई हुई है जो बहुत ही सरल पूजा प्रक्रिया बताकर लम्बे-चौड़े लाभ मिलने का आश्वासन देकर पहली ही बार अनेक को आकर्षित कर लेते हैं। उनका आरम्भ कर देने वाले लोगों की भी कमी नहीं रहती। क्योंकि वे बहुत ही सरल होते हैं। इतने सरल जिससे शारीरिक-मानसिक या अन्य किसी प्रकार का दबाव नहीं पड़ता। ऐसे ही बाल-क्रीड़ा की तरह उस पूजा पत्री को पूरा कर देना चुटकी बजाने जैसे खेल मात्र होता है। इतना कुछ करने पर भी देवता को प्रसन्न करके और उससे तरह-तरह के वरदान पाने का लाभ यदि मिलता है तो उसे कौन छोड़े। लाटरी खुलने के लाभ की कल्पना करके जब एक रुपये का टिकट खरीदने वाले लाखों मिल सकते हैं तो अत्यन्त सरल पूजा विधि के सहारे प्रचुर लाभ पाने का लोभ कौन संवरण कर सकेगा? स्पष्ट है कि चमत्कारी फल श्रुति बताने वाले को अपनी बताई विधि को अपनाने वालों की कमी नहीं मिलती। किन्तु बताये हुए लाभ न मिलने पर जो निराशा होती है वह अनास्था में बदलती जाती है। ऐसी दशा में सस्तेपन का प्रलोभन बताने वाले के लिए, उपासना पद्धति के लिए, साधक के लिए, लोक-मान्यता के लिए, अहित कर ही सिद्ध होता है।

उपयुक्त मार्ग यही है कि साधना विज्ञान को सही रीति से अपनाया जाय। उचित मूल्य चुकाकर महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने के सिद्धान्त पर विश्वास किया जाय। उपासनात्मक प्रक्रिया अपनाने के साथ या उससे भी पहले आत्मशोधन की महत्ता और आवश्यकता समझी जाय। प्रगति के प्रयासों में उसे अनिवार्य रूप में सम्मिलित रखा जाय। योग और तप दोनों एक दूसरे के पूरक और अन्योन्याश्रित हैं। इन्हें धुलाई और योग को रंगाई कहा जा सकता है। मैले, कुचैले, चिकनाई और गन्दगी से सने कपड़े पर कोई भी रंग नहीं चढ़ता और रंग का पैसा एवं रंगाई का श्रम निरर्थक चला जाता है। इसी प्रकार साधना मार्ग पर चलते हुए आत्मिक प्रगति के साथ जुड़ी हुई अति महत्वपूर्ण सफलताएं जिन्हें सिद्धियों या विभूतियों के नाम से जाना जाता है-प्राप्त कर सकना तभी सम्भव हो सकता है जब आत्मशोधन और आत्म विकास की दोनों ही प्रक्रियाएं समानान्तर चलती रहें।

उपासना को योग पक्ष कहते हैं। उसकी विधि व्यवस्था में जप, ध्यान, प्राणायाम, नाद, मुद्रा, बन्ध, प्रत्याहार, समाधि आदि प्रौढ़ स्तर का और पूजा-पाठ, स्नान, देवदर्शन, कथा, कीर्तन जैसे बाल स्तर को अनेकानेक उपचारों का समावेश है। आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाली क्षुद्रता को महानता के साथ सम्बद्ध करने वाली, व्यवहार में आदर्श भर देने वाली और जीवात्मा को परमात्मा बना देने वाली यह समस्त गतिविधियाँ योग कहलाती हैं। योग का अर्थ है-जोड़ना। अपूर्ण को पूर्ण के साथ जोड़ना। योग साधना को, उपासना प्रक्रिया को, आत्मिक प्रगति का उत्तरार्ध कहते हैं।

परिशोधन को तपश्चर्या कहते हैं-इस प्रकरण में अपनी अवांछनीय आदतों और मान्यताओं को उलटने के लिए अन्तःक्षेत्र में जमी कुसंस्कारिता से संघर्ष करना पड़ता है और आदर्श पालन के लिए कष्ट, कठिनाई को जानबूझकर आमन्त्रित करना और हंसते-हंसते सहना होता है। इसी स्तर के हलके भारी क्रिया-कलापों को तपश्चर्या कहते हैं। व्रत, उपवास, ब्रह्मचर्य, मौन, अभ्यस्त सुविधाओं का परित्याग, मितव्ययिता एवं सादगी का वरण, सत्कार्यों के लिए श्रमदान एवं साधनों का अंशदान इसी वर्ग में आते हैं। परमार्थ के लिए किये जाने वाले सभी पुण्य प्रयास इसी श्रेणी में गिने जा सकते हैं। स्वयं कष्ट सहकर उस बचत का लाभ दूसरों को देने के समस्त उपचारों को तपश्चर्या की श्रेणी में सम्मिलित किया गया है।

साधना की प्रौढ़ता में उन दोनों वर्गों का समावेश आवश्यक है। नित्य कर्म की बात दूसरी है उसमें योग और तप के सिद्धान्तों का समावेश अनिवार्य नहीं है। आवश्यकता तो हर किसी के लिए है और बनी ही रहेगी। कौन कितना कर सकता है? किसके लिए कितना साहस कर सकना कितना सरल या कठिन पड़ता है? इस आधार पर नित्य कर्म के रूप में उपासना का नित्य नियम बनाना दूसरी बात है। इसे उच्चस्तरीय साधना क्रम में सम्मिलित नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार शौच, स्नान, दंतमंजन, कपड़े धोना, कमरा बुहारना, फर्नीचर झाड़ना, बर्तन माँजना, स्वच्छता बनाये रहने और गन्दगी न जमने से होने वाली हानि से बचने के लिए आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार मनःक्षेत्र में भीतर से उठने वाली गन्दगी और अनुपयुक्त वातावरण से अवांछनीय छाप को निरन्तर हटाते रहने के लिए इतनी उपासना तो हर किसी के लिए आवश्यक है जिसे नित्य नियम कहा गया है और संध्या-वन्दन नाम दिया गया है। इसका इतना ही लाभ है कि मलीनताएं जमते रहने से जिस अशुभ की आशंका थी उससे बचा जा सकता है। आत्मिक प्रगति के लिए जो विशिष्ट पुरुषार्थ करने पड़ते हैं वे साधना कहे जाते हैं। उनमें प्रौढ़ता रहती है। प्रखरता की आवश्यकता पड़ती है। समग्र साधना को योग और तप का समन्वय कह सकते हैं। उसका मार्ग भी कष्ट साध्य है और महत्व भी असाधारण है।

नित्य कर्म, नित्य नियम हर किसी के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। उसे बाल, वृद्ध रुग्ण, अशक्त हर किसी को किसी न किसी रूप में करना ही चाहिए। शुद्धता पूर्वक, नियत स्थान और नियत समय पर, निर्धारित विधि से न बन पड़े तो भी ईश्वर स्मरण का कोई सरल तरीका अपनी स्थिति के अनुरूप हर किसी की निकाल लेना चाहिए। मौन मानसिक जप किसी भी स्थिति में हो सकता है। भगवान की ध्यान धारण किसी भी समय की जा सकती है। नियमितता बन पड़े तो सर्वोत्तम, अन्यथा जिसके लिए जितना, जिस प्रकार सम्भव हो सके संध्या-वन्दन का नित्य कर्म किसी न किसी प्रकार पूरा कर ही लेना चाहिए। आस्तिकता के प्रतिफल महान हैं। उस बीज को सींचते रहने के लिए थोड़ा-बहुत समय निकालते रहना हर दृष्टि से बुद्धिमत्ता पूर्ण है। उस थोड़े का भी बहुत लाभ है। तथ्यों पर विचार करते हुए परिजनों में से प्रत्येक का कहा गया है कि वे अपने घरों में आस्तिकता का वातावरण बनाने के लिए इतनी परम्परा तो अपने घर में चला ही डालें कि नित्य नियम जितना उपासना का उपक्रम चल ही पड़े। गायत्री माता के चित्र को नमन वन्दन करके तब भोजन करने की परम्परा चल पड़े तो उस छोटे बीजारोपण में भी आस्तिकता का कल्पवृक्ष कभी प्रौढ़ बन जाने की आशा बनी रहेगी।

साधना का उच्चस्तरीय आधार अगला है। जिसके लिए इन दिनों विशेष रूप से प्रयत्न किया जा रहा है। यों चेतना को परिष्कृत करके भौतिक सम्पत्तियों की तुलना से लाखों गुनी अधिक महत्वपूर्ण विभूतियों के उपार्जन के लिए बहुत समय से समझाया और उकसाया जाता रहा है, पर अब उसके लिए अधिक आग्रह किया जा रहा है। उसके लिए उपयुक्त वातावरण बनाने और साधन जुटाने में भी कमी नहीं रखी जा रही है। यह प्रयास उस आत्मविकास की उस प्रौढ़ प्रक्रिया के संदर्भ में है जिसे उच्चस्तरीय साधना की संज्ञा दी जा सकती है।

ब्रह्मवर्चस् नाम यों एक नव निर्मित आश्रम को भी दे दिया गया है और एक साधना पद्धति का नामकरण भी यही किया गया है। किन्तु वस्तुतः यह एक अभियान है जिसका उद्देश्य मनुष्य के भीतर दबी हुई विशेषताओं एवं विभूतियों को उभारना है। लघु की विभु-तुच्छ को महान् पुरुष को पुरुषोत्तम-नर को नारायण बनाने की योजना एवं सम्भावना इसमें सन्निहित है। मनुष्य को वर्तमान स्थिति में नहीं रहना है उसे अपने गौरव के अनुरूप ऊँचा उठना है यही देवत्व का उदय है। अपने विश्व और समाज को यह दुर्गति नहीं रहनी चाहिए उससे सद्भावना पर सहकारिता के सहारे प्रगति और समृद्धि की सुख-शान्ति भरी परिस्थितियाँ उत्पन्न होनी चाहिए। यही है धरती पर स्वर्ग का अवतरण। युग परिवर्तन और युग निर्माण का स्वरूप एवं तथ्य क्या है? इसका संक्षिप्त उत्तर मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण कहा जा सकता है। यह महान प्रयोजन अत्यन्त व्यापक, कठिन और साधना साध्य है। इसके लिए शक्ति चाहिए। कल कारखाने और छोटे-छोटे उत्पादन निर्माणों में किसी न किसी प्रकार शक्ति नियोजित करनी पड़ती है तभी वे चल पाते हैं। फिर युग परिवर्तन युग निर्माण जैसे महान कार्य के लिए भी शक्ति चाहिए ही। यह आत्म शक्ति ही हो सकती है। निर्माण एवं परिवर्तन जब विचारणाओं, भावनाओं और आस्थाओं के चेतना क्षेत्र का करना है तो शक्ति भी उसी स्तर की चाहिए। आत्म-शक्ति ही युग-शक्ति है। इसी को बड़े परिणाम में जुटाने के लिए ब्रह्मवर्चस् अभियान का स्थानीय शुभारम्भ है। इसका विश्व व्यापी विस्तार होना आवश्यक भी है और महाकाल की इच्छानुरूप होने के कारण सुनिश्चित भी।

ब्रह्मवर्चस् साधना में व्यक्ति का वर्चस्व और समाज का भविष्य समान रूप से समुन्नत बनते हैं। वस्तुतः यह अभियान एक साथ दोनों प्रयोजन पूरे करता है। व्यक्ति में महानता और समाज में सुसम्पन्नता का एक साथ उद्भव करना अपना उद्देश्य है। वस्तुतः दोनों एक ही हैं। व्यक्तियों का समुदाय ही समाज है। व्यक्ति की शालीनता समाज की सुसम्पन्नता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इस प्रयास में स्वार्थ और परमार्थ का समान रूप से समन्वय है। ब्रह्मवर्चस् की उच्चस्तरीय साधना का मार्ग अपनाने वाला अपने आपको आत्म-शक्ति से समृद्ध करता है, फलतः उसे स्वर्ग, मुक्ति, सुख-शान्ति, सिद्धि, विभूति, सद्गति नाम दिये जा सकते हैं। चन्दन का वृक्ष बढ़ता है उसकी दूर-दूर तक सुगन्ध फैलती है। बादल उठते हैं तो प्राणियों और वनस्पतियों की प्यास बुझती है। धरती हरी-भरी दिखती है। इसी प्रकार व्यक्ति की उत्कृष्टता की समाज की सम्पन्नता और वातावरण की बसन्ती अनुकूलता के रूप में दृष्टिगोचर होती है।

इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ब्रह्मवर्चस् प्रौढ़ बनाने का प्रयत्न किया गया है। उसमें उपासना के योगाभ्यास पक्ष से सम्बन्धित उत्तरार्ध का भी परिपूर्ण समावेश है। उसका परिचय गत वर्ष मार्च, अप्रैल, मई, जून की अखण्ड-ज्योति अंकों में प्रस्तुत किया गया है। विषय की गम्भीरता उसके विस्तार व्यवहार को देखते हुए उसे संक्षिप्त एवं सांकेतिक ही कहा जा सकता है। सर्वसाधारण को प्राथमिकता जानकारी देने की दृष्टि से इतना ही पर्याप्त समझा गया। जिन्हें विशेष रुचि है उनकी विशेषता बढ़ाने एवं विशेष मार्ग-दर्शन प्रस्तुत करने के लिए आवश्यकतानुसार मौखिक अथवा लेखनीबद्ध मार्ग दर्शन उपलब्ध होता रहेगा।

पूर्वार्ध पहले बताया जाना चाहिए था। योग से भी पहले तप की महत्ता का वर्णन प्रशिक्षण चलना चाहिए था, पर लाभ का प्रलोभन समझ में आने के उपरान्त ही उसके लिए प्रयत्न करने की जो लोक परम्परा चल रही है उसी को अपनाने के लिए हमें भी बाध्य होना पड़ा। पहले कष्ट साध्य आधार बताते तब कहीं उसके लाभों की झाँकी मिलती तो अधिकांश को साहस ही समाप्त हो जाता। इसलिए पहले क्या-पीछे के अन्तर को विशेष महत्व न दिया जाय तो एक शब्द में इतना ही कहा जा सकता है कि योग और तप अविच्छिन्न हैं। दोनों कदम समन्वित तालमेल के साथ बढ़ाते चलने पर ही लक्ष्य तक पहुँचने की ही बात बनती है। तप का उद्देश्य परिशोधन है। मिट्टी मिले कच्चे लोहे को फौलाद बनने के अग्नि संस्कार को लोहे का तप कहा जा सकता है जिसके आधार पर उसके साथ जुड़ी हुई मलीनता जल कर अलग होती है और शुद्ध स्वरूप निखरता है। प्रायश्चित्त की तपश्चर्या इसी प्रयोजन के लिए आवश्यक समझी गई है।


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मत्यो न किंचिच्छक्यस्त्व मेको मारयितुं बलात्। मारणीयस्य कर्माणि तत्कर्तृणीति नेतरत्॥

हे मृत्यु तू स्वयं अपनी शक्ति से किसी मनुष्य को नहीं मार सकती, मनुष्य किसी दूसरे कारण से नहीं, अपने ही कर्मों से मारा जाता है।

-योगवाशिष्ठ

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कर्मफल की सुनिश्चितता बनाम आस्तिकता

कर्मफल मिलने में विलम्ब होने के कारण ही सत्कर्मों के प्रति उत्साह शिथिल होता है और दुष्कर्मों के प्रति साहस बढ़ता है। यदि तत्काल कर्मफल मिलने का विधान रहा होता तो फिर किसी को भी अनास्था न होती। चोर के हाथ में लकवा मार जाता, झूठे की जीभ बोलने में असमर्थ हो जाती, कुदृष्टि देखने वाले अन्धे हो जाते, कुमार्गगामियों की चलने-फिरने की शक्ति चली जाती तो षडयन्त्र रचने वाले स्मरण शक्ति खो बैठते, उद्दण्डता बरतने पर क्षय जैसे असाध्य रोग घेर लेते तो फिर किसी को भी कुकर्म करने का साहस न होता। इसी प्रकार सज्जनों द्वारा अपनाई गई सत्प्रवृत्तियों के फलस्वरूप उन्हें अच्छी आरोग्यता, विद्वत्ता, सम्पदा, सफलता जैसे लाभ तत्काल मिला करते तो फिर किसी को भी धर्मशिक्षा सुनने या सुनाने की आवश्यकता न रहती। प्रत्यक्ष फल प्राप्त होने की कठोर व्यवस्था बनी रहती तो फिर अवांछनीय गतिविधियों का कहीं दर्शन भी न होता। नाम भी सुनाई न पड़ता। फिर न धर्मोपदेशकों की आवश्यकता होती, न शास्त्रों का कोई प्रयोजन रह जाता। पुलिस, कचहरी, कानून, जेल, वकील, गवाह आदि का जंजाल भी कहीं दिखाई ही न पड़ता। जब तत्काल दण्ड मिलने की व्यवस्था ही चल रही होती तो फिर अधर्म के उन्मूलन और धर्म के संस्थापन के लिए ईश्वर को अवतार लेने की भी कोई आवश्यकता न पड़ती। सुधारकों और सेवाभावियों का क्षेत्र भी समाप्त हो जाता। उनका उद्देश्य विकृतियों का निराकरण और सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन ही तो होता है, पर जब तत्काल ही कर्मफल मिलने की व्यवस्था रहती तो किसी को यह साहस ही न पड़ता कि मर्यादा तोड़ें और सन्मार्ग छोड़ें। आग छूने पर जलने की बात प्रत्यक्ष है। फलतः कोई भी जान-बूझकर उसे छूने और जल मरने का प्रयत्न नहीं करता। अनजाने कोई दुर्घटना हो जाय तो बात दूसरी है। ठीक इसी प्रकार अधर्म करने की भी कोई गुंजाइश नहीं रहती। ठण्डा पानी पीते हैं तत्काल प्यास बुझती है, उसी प्रकार यदि सत्प्रवृत्तियों के सत्परिणाम मिला करते तो फिर उनका लोभ छोड़ना उसी तरह सम्भव न रहता जिस प्रकार भोजन, विश्राम आदि प्रत्यक्ष सुविधाओं की कोई उपेक्षा नहीं करता।

विचारणीय यह है कि यदि कर्मफल सचमुच ही नहीं मिलता है-जैसा कि विलम्ब लगने के कारण आभास होता है तो फिर यह स्पष्टीकरण भी साफ होना चाहिए ताकि या तो सभी लोग अनैतिकता के लाभों को समझकर वैसी ही नीति अपनायें। सर्वसाधारण को भी यह अवसर मिले कि कर्मफल जैसी कोई बात ही जब नहीं है तो फिर न्याय, शासन, ईश्वर आदि के सहारे आत्म-रक्षा की आशा न करें और अपने बचाव के जो कुछ उपाय सम्भव हों उसे अपनायें। इस स्पष्टीकरण से उथल-पुथल तो बहुत मचेगी, पर सच्चाई तो सामने आ ही जायगी। इससे मनुष्य यथार्थवादी ढंग से सोचने का और परिस्थिति का सामना करने का कोई कारगर रास्ता तो सोचने लगेगा।

किन्तु सृष्टि व्यवस्था के बारे में इतनी दूर तक जाने और असमंजस में पड़ने की आवश्यकता है नहीं। इस विश्व का निर्माणकर्त्ता बहुत ही दूरदर्शी और व्यवहार कुशल है। उसने इतना बड़ा सृजन किया है। जड़ में हलचल और चेतन में चिन्तन की इतनी अद्भुत सत्ता का समावेश किया है कि किसी सूक्ष्मदर्शी को आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। निर्माण, व्यवस्था और परिवर्तन की जो रीति-नीति विनिर्मित की है उसके तारतम्य को देखते हुए मनीषियों ने कला की कल्पना और विज्ञान की धारणा का मूर्त रूप दिया है। ऐसे सर्व सम्पन्न सृष्टा से कर्म व्यवस्था के सम्बन्ध में चूक होगी यह सोचना अपनी ही बाल बुद्धि का खोखलापन दर्शाना है। जिसकी दुनिया में दिन और रात की, ग्रह-नक्षत्रों के उदय-अस्त की, पदार्थ की प्रकृति और प्राणियों की परम्परा की विधि-व्यवस्था में कहीं राई-रत्ती अन्तर नहीं पड़ता- वह कर्मफल को सन्देहास्पद बनाकर अराजकता का और आत्मघात का विग्रह खड़ी नहीं कर सकती।

फिर देर से कर्मफल क्यों मिलता है? इस प्रश्न के कितने ही उत्तर हैं। पहला तो यही है कि अधिकतर ऐसा होता नहीं है। विलम्ब होने के अपवाद अधिक नहीं कम ही दिखाई पड़ते हैं। सामान्य सृष्टि व्यवस्था में-लोक-व्यवहार में अधिकांश कर्मों के फल यथा समय मिलते रहते हैं। यदि न मिलने तो कृषि, पशु-पालन, व्यवसाय, शिक्षा, चिकित्सा आदि की जो अनेकानेक उपयोगी गतिविधियाँ चल रही हैं उनमें से किसी का भी क्रम अनिश्चितता की स्थिति में चल नहीं पाता। परस्पर व्यवहार में भी सज्जनता, दुर्जनता की कोई निश्चित प्रतिक्रिया न होती तो मनुष्यों के लिए अपने स्वभाव और आचरण को किसी निश्चित ढाँचे में ढालने की आवश्यकता न होती। कार्यों के परिणामों पर विश्वास न होता तो फिर किसी की योजना की रूपरेखा बन ही न पड़ती। फिर सब कुछ यहाँ अनिश्चित, अविश्वस्त, अस्त-व्यस्त ही दृष्टिगोचर होता। सभ्यता, संस्कृति, नीति, धर्म, न्याय आदि का कोई रूप ही खड़ा नहीं हो सकता था। फिर विज्ञान की शोधों का, आविष्कारों का, क्रिया-प्रक्रिया का कोई तारतम्य ही नहीं बैठ सकता था। पदार्थों में पाई जाने वाली हलचल की एक सर्वांगपूर्ण विधि-व्यवस्था है। उसी की रूपरेखा प्रस्तुत करने के लिए भौतिक विज्ञान का ढाँचा खड़ा हुआ है। प्राणियों की इच्छा, विचारणा एवं क्रिया के पीछे भी कुछ प्रकृति प्रेरणा काम करती है, तालमेल बिठाने वाली व्यवस्था रहती है। जीव विज्ञान, मनोविज्ञान एवं तत्वज्ञान की शाखा-प्रशाखाओं में चेतना के स्वरूप और प्रवाह का ही विवेचन किया जाता है। यह विश्व हर दृष्टि से एक नियत व्यवस्था में बंधा हुआ है। फिर यह हो ही नहीं सकता कि कर्मों का फल न मिले। पुण्य का फल सुख और पाप का फल दुःख मिलने की बात भी इतनी ही स्पष्ट है। अपने ही चारों ओर हम में से प्रत्येक को अनेकानेक प्रमाण उदाहरण सहज ही उपलब्ध हो सकते हैं।

प्रश्न व्यवस्था का नहीं अपवादों का है। ऐसा कभी-कभी ही होता है। कहीं-कहीं ही देख जाता है कि अनीति करने वाले फले-फूले हों और नीति को पराभव का मुँह देखना पड़ा हो। यदि यह अपवाद अधिक संख्या में बनते हैं तो उस असन्तुलन से सार्वभौम संकट खड़ा होता है। उस सम्भावना के लिए सुधारकों और देवदूतों की सेना को समय-समय पर महाभारत रचने, समुद्र बाँधने और गोवर्धन उठाने जैसे प्रचण्ड पुरुषार्थ करने पड़ते हैं।

इतने पर भी यह मानना पड़ेगा कि इन अपवादों का अस्तित्व है और वे देखने को मिलते रहते हैं। वे इतने परिमाण में अवश्य होते हैं कि उतने से भी भ्रम उत्पन्न हो सके। दुष्टता की दिशा में साहस बढ़ सके और सदाशयता के प्रति निराशा उत्पन्न हो सके। विचारणीय तथ्य इतना ही है कि आखिर इतना भी होता क्यों है?

दृश्यमान बुराई के पीछे भी कई बार भलाई के तत्व छिपे रहते हैं। स्पष्ट है कि हर बीमारी कष्टकारक होती है, पर यह भी स्पष्ट है कि उसके पीछे प्रकृति की परिशोधन अनुकम्पा का हाथ रहता है। देह में घुसे हुए विजातीय द्रव्य से, जीवनी शक्ति के प्रचण्ड संघर्ष का नाम ही बीमारी है। यह एक प्रकार की प्रकृति चिकित्सा है। यदि प्रकृति को अपना काम करने दिया जाय और उसके प्रयास में यत्किंचित् अनुकूलता बनाई जाय तो उतने भर से रोग ही अच्छे नहीं हो जाते। भविष्य के लिए संग्रहित मलिनता से उत्पन्न होने वाले संकटों से भी छुटकारा मिल जाता है। ठीक इसी प्रकार विलम्ब से कर्मफल मिलने की बात को प्राणियों में सजगता, प्रखरता और दूरदर्शिता बनाये रहने का एक बहुत बड़ा आधार समझा जा सकता है। यदि इतना व्यतिक्रम न रहता तो प्राणियों को विकास मार्ग पर चलने का अवसर ही न मिलता। सजगता की कोई आवश्यकता ही न रहती। पराक्रम करने की जरूरत ही क्या थी? चिन्तन बहुत ही सामयिक रह जाता। बुद्धिमत्ता का विकास उचित-अनुचित का-लाभ-हानि का विचार करने पर ही होता है। यदि संसार में सब कुछ ठीक ठाक ही चलता रहता, व्यतिक्रम न होते तो फिर बुद्धि-बल को विकसित करने की आवश्यकता ही न पड़ती। फलतः प्राणी अविकसित स्थिति में ही पड़े रहते। अवांछनीयता के दुष्परिणाम का भय और सत्प्रवृत्ति के सत्परिणामों का लोभ ही है जो प्राणी को क्रमशः आगे धकेलते और ऊँचा उठाते हुए विकास की वर्तमान सीमा तक घसीट लाया है। प्रतिकूलताओं का-विपत्तियों का भय भी इतना ही बड़ा प्रगति आधार है जितना कि सृजन प्रयोजनों में संलग्न होने पर मिलने वाले लाभों का प्रलोभन। दिन का महत्व रात्रि के अस्तित्व से ही है। रात न होती तो दिन का आनन्द और लाभ ले सकना ही सम्भव न हो पाता। अवांछनीयताएं जहाँ वे कष्ट पहुँचाती और अव्यवस्था फैलाती हैं वहाँ उनसे एक लाभ भी है कि तुलनात्मक अध्ययन करने का, गुण-दोष समझने का अवसर मिल जाता है। यदि कर्मफल में अपवाद न होते, पराक्रम सुनिश्चित विधि से चल रहा होता तो फिर अनौचित्य अपनाने के लिए कहीं गुंजाइश ही न रहती और विग्रह का कोई चिन्ह कहीं दिखाई न पड़ता। फलतः सतर्कता और प्रखरता विकसित करने की आवश्यकता ही न होती। जागरुकता और साहसिकता को, दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता को प्रश्रय देने वाला एक बहुत बड़ा आधार नष्ट हो जाता। ऐसी दशा में सरलता और व्यवस्था तो बनी रहती, पर प्रबल पुरुषार्थ के लिए न आवश्यकता पड़ती, न चेष्टा होती। ऐसी दशा में निश्चित रूप से प्रगति क्रम अवरुद्ध हो जाता और मनुष्य को इस स्तर तक पहुँचाने का सौभाग्य न मिलता, जहाँ कि वह इस समय पहुँच सका है। इसमें उसकी सुखेच्छा ही नहीं उन व्यवधानों को हटाने की अभिलाषा भी है, जो अनौचित्य अपनाने के कारण ही संकट बनकर सामने आते हैं। तुलना करने पर ही भले-बुरे का परिचय मिलता है। तुलना से प्रेरणा मिलती है। अच्छाई की गरिमा जानने के लिए बुराई से उत्पन्न दुर्गति को भी जानना चाहिए। संसार में फैली हुई दुष्प्रवृत्तियों का यह एक लाभ भी है। यों हानियाँ तो उनकी असंख्यों ही हैं।

जिस प्रकार अनास्था से आतंकवादी उच्छृंखलता अपनाने का उत्साह मिलता है। ठीक इसी प्रकार उस अनौचित्य को निरस्त करने के लिए देव मानवों को अधिक प्रखरता उत्पन्न करने, संगठित होने और अनाचार से जूझने की अन्तःप्रेरणा उभरती है। इन प्रयासों के फलस्वरूप न केवल सत्प्रवृत्तियों की मात्रा और सज्जनों की संख्या ही बढ़ती है, वरन् वह शौर्य, साहस, त्याग, बलिदान भी उमड़ता है जो मानवीय शालीनता का पक्ष मजबूत करता है और सर्वतोमुखी प्रगति के अनेकानेक आधार खड़े करता है। भूकंप, महामारी, बाढ़, विपत्ति, युद्ध आदि के कारण जो क्षति असंख्यों को होती है उसे सभी जानते हैं, किन्तु उसका एक पक्ष यह भी विचारणीय है कि उन संकटों से अनेक की करुणा उभरती है-सेवा वृत्ति जगती है और परमार्थ में जुट पड़ने के लिए भाव भरी प्रतिस्पर्धा भी उमड़ पड़ती है। उसे कहते हैं बुराई के पीछे अच्छाई का झाँकना।

कर्मफल देर से मिलने के अपवादों की हानियों से इनकार नहीं किया जा सकता। उससे अनास्था उत्पन्न होती है और चरित्र संकट खड़ा होता है। इतने भर भी उसका किसी रूप में बने रहना इनके सूक्ष्म कारणों से सृष्टा ने आवश्यक समझा। फलतः उसका नियति क्रम में एक छोटा-सा अस्तित्व बना हुआ है।

सामान्यतया यह देरी वाली परम्परा भी अपनी नियति व्यवस्था का एक साधारण क्रम है। समझदार लोग उसकी धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करते हैं और विलम्ब लगने की बात को स्वाभाविक समझ कर अधीर नहीं होते। किन्तु कर्मफल में तनिक-सा विलम्ब होते देखकर मनुष्य न जाने क्यों धीरज खो बैठते हैं और अनास्था के संकट में न जाने कैसे जा फँसते हैं। आज का दूध कल दही बनता है। अब का बोया बीज कई महीने बाद फसल बनता है। आरोपित किये गये पौधे वृक्ष बनने और फलित होने में कई वर्ष का समय ले जाते हैं। व्यायामशाला में प्रवेश करने और पहलवान बनने के बीच लम्बा मध्यान्तर रहता है। विद्यार्थी को पाठशाला में प्रवेश पाने के उपरान्त स्नातक बनने की सफलता पाने के लिए वर्षों की अध्ययन साधना करनी पड़ती है। कारखाना खड़ा करने से लेकर लाभ मिलने लगने की प्रक्रिया के बीच समय की काफी लम्बाई रहती है। जब हर बड़ा काम समय माँगता है तो कर्मफल मिलने में थोड़ा विलम्ब लगते देखकर धीरज खो बैठना और यह मान बैठना- तत्काल परिणाम नहीं मिला तो कभी मिलेगा ही नहीं-बाल-बुद्धि का चिन्ह है।

बच्चा अभी कमाता नहीं है, उलटे सेवा और खर्च कराता है तो यह समझ बैठना उचित नहीं कि यह जीवन भर ऐसे ही सेवा लिया करेगा कभी कुछ कमाने और घर का उत्तरदायित्व संभालने लायक न हो सकेगा। साधना आरम्भ करने से लेकर सिद्धि तक पहुँचने में समय लगता है। यात्रा आरम्भ करने के दिन नहीं लक्ष्य तक कौन पहुँचता है? लम्बी मंजिल पूरा करने में समय तो लग ही जाता है। मुकदमा चलने से लेकर फैसला होने तक में अदालतें बहुत दिन गुजार देती हैं। कर्मफल मिलने में यदि विलम्ब लगे तो समझदारी का परिचय देने वाले मनुष्य को यह विश्वास भी रखना चाहिए कि इस सुनिश्चित सृष्टि व्यवस्था में जो बोया है वही काटना होगा।

स्वर्ग-नरक, दुर्गति, सद्गति, मरणोत्तर जीवन, पुनर्जन्म आदि में मनुष्य को मिलने वाले सुख-दुःख यह सिद्ध करते हैं कि कुछ समय पहले किये गये कर्म समयानुसार फलित हो रहे हैं और परिपक्व होने के बाद अपने फल दे रहे हैं।

समाज की सुव्यवस्था इस बात पर निर्भर है कि मनुष्यों के बीच पारस्परिक सद्भावना और सहकारिता के सूत्र सुदृढ़ बने रहें। सामूहिक प्रगति के पथ पर चलने और सुख-शान्ति की परिस्थितियाँ बनी रहना इसी वातावरण में सम्भव हो सकता है। समाज व्यक्तियों का समूह है। व्यक्ति अच्छे रहेंगे तो उनका सम्मिलित समुदाय भी समुन्नत और विकसित दिखाई पड़ेगा। व्यक्ति के सज्जन और सुसंस्कृत बनाये रहने के लिए कर्मफल को सुनिश्चितता का तत्व-दर्शन हर किसी की आस्थाओं में गहराई तक प्रतिष्ठापित होना चाहिए।

कर्मफल के समर्थन में हजार तर्क, तथ्य और प्रमाण मौजूद हैं। पर उसमें एक ही खामी रहती है कि अपवाद स्वरूप कई बार भले कर्मों का सत्परिणाम और बुरे कर्मों का दुष्परिणाम उत्पन्न होने में विलम्ब लग जाता है। इस विलम्ब में ही अदूरदर्शी लोग अपना धैर्य खो बैठते हैं और अनास्था अपना लेते हैं। इसे बाल-बुद्धि की क्षुद्रता और विवेकहीनता का अभिशाप ही कहना चाहिए। यह उतावली जीवन की दिशाधारा को भटका देने का प्रधान कारण बनती देखी गई है। इसलिए इस मनःस्थिति की शास्त्रकारों ने तीव्र भर्त्सना की है। ‘नास्तिकता’ का मोटा अर्थ ईश्वर को न मानना समझा जाता है और किसी को ‘नास्तिक’ कहना इसकी सदाशयता पर लांछन लगाना समझा जाता है। विचारणीय है कि ईश्वर को मानने न मानने, से उसके अनुदानों में कोई अन्तर नहीं आता। फिर ‘नास्तिकता’ की इतनी तीव्र भर्त्सना क्यों की गई? इसकी तात्विक विवेचना से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि ईश्वर को न मानने से अभिप्राय वस्तुतः उसकी कर्मफल व्यवस्था के प्रति अनास्था रखना है। पूजा-पाठ करने और ईश्वर के गुणानुवाद गाने पर भी यदि कोई कर्मफल के क्रम को झुठलाता है तो भजन, पूजन करते रहने पर भी उसे नास्तिक ही कहा जाना चाहिए। इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति ईश्वर की चर्चा नहीं करता किन्तु कर्मफल का अनुशासन सुनिश्चित मानकर अपनी गतिविधियों को सज्जनोचित रखे रहता है तो तात्विक दृष्टि से उसे आस्तिक कहने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए। ‘आस्ति’ और ‘नास्ति’ का मोटा अर्थ ईश्वर है, और नहीं है, यह समझा जाता है। यह उथला अर्थ है। सच्चा अर्थ है-कर्म व्यवस्था सुनिश्चित है या नहीं। आस्तिक वह है जो कर्मफल की अकाट्य ईश्वरीय व्यवस्था पर विश्वास करके अपना हित अनहित निश्चित करता है। ऐसा व्यक्ति बुराई से बचने वाला चरित्र-निष्ठ और उदार परमार्थ परायण समाज-निष्ठ ही हो सकता है। पाप से बचकर दुःखों से छूटने और पुण्य अपनाकर सुखी बनने का यही राजमार्ग है।


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ब्रह्मा येन कुलालवन्नियमितो ब्रह्माण्ड भाण्डोदरे। विष्णुर्येन दशावतारग्रहणोक्षिप्तो महासंकटे॥ रुद्रो येन कपाल पाणि पुटको भिक्षाटनः कारितः। सूर्योभ्रार्म्यति नित्य मेप गगने तस्मै नमः कर्मणे॥

-भर्तृहरि नीति शतक

ब्रह्मा जिससे प्रेरित होकर कुम्हरे की तरह इस सृष्टि का सृजन करते रहते हैं। विष्णु को जिसके कारण दश अवतार धारण करने पड़े और संकट सहने पड़े। रुद्र जिसके दबाव से हाथ में खप्पर लिए भिक्षा माँगते फिरते हैं। जिसके दबाव से सूर्य आकाश में नाचता फिरता उस परम देव कर्म को नमस्कार।

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कर्मफल की अस्त-व्यस्तता एवं अपवाद शृंखला

हर मनुष्य चाहता भी यही है और उपयुक्त भी यही है कि कठिनाइयों का सामना न करना पड़े-संकट सतायें नहीं और प्रगति के लिए आवश्यक सुविधाएं एवं परिस्थितियाँ उपलब्ध होती रहें। संकटों का सामना करने में कितना कष्ट उठाना पड़ता है और उनसे जूझते रहने में कितना समय, मस्तिष्क एवं धन खर्च होता है यह सभी जानते हैं। यदि वे न आते तो विपन्न समय चैन से व्यतीत होता और किसी उपयोगी काम में लगने से प्रगति के कुछ नये आधार खड़े करता। शरीर को कष्ट, मन को दुःख, साधनों का अपव्यय किसी को अच्छा नहीं लगता, पर अनचाहे संकट जब सिर पर आ ही जाते हैं तो उनसे जूझने और सहने की व्यथा वेदना सहन करनी ही पड़ती है। यदि यह संकट न आते अथवा सहज ही टल जाते तो कितना अच्छा होता, यही हर कोई सोचता है।

सुख सुविधा हर किसी को अभीष्ट है। अनुकूल परिस्थितियाँ मिलतीं तो अधिक उपार्जन सम्भव हो सकता था। दूसरे सहयोग करते, आवश्यक साधन उपलब्ध होते तो सम्पन्नता और सफलता की कमी न रहती। किन्तु प्रयत्न करने पर भी अनुकूलता मिल नहीं पाती। अभीष्ट सफलता पीछे हटती और दूर भागती जाती है तो निराशा से मन खिन्न रहने लगता है। दूसरे लोग अपनी ही योग्यता के थे-अपने जितना ही प्रयत्न करते थे-पर उन्हें उपयुक्त सफलताएं मिल गईं और वैसे साधन एवं अवसर न मिलने के कारण अपना प्रगति पथ अवरुद्ध ही बना रहा। परिस्थितियाँ अनुकूल हुई ही नहीं, अवसर मिले ही नहीं, साधन जुटे ही नहीं, सहयोग रहा ही नहीं, फिर एकाकी प्रयत्न से भी क्या बनता। हाथ मलते हुए, दुर्भाग्य का रोना रोते हुए, मन मसोस कर बैठा रहना पड़ा। समुन्नत परिस्थिति प्राप्त करने के स्वप्न धरे के धरे रह गये।

इन निराशाजनक परिस्थितियों में प्रायः मनुष्य का अपने कौशल और पुरुषार्थ की कमी का दोष ही प्रधान होता है। सूक्ति है कि- असफलता मिलने पर यही सोचना चाहिए कि उसे प्राप्त करने के लिए जितने प्रयत्न की आवश्यकता थी उसमें कमी रही। अगली बार दूने उत्साह और साहस के लिए नया प्रयत्न करना चाहिए और बार-बार असफलताएं आने पर भी पुरुषार्थ तब तक जारी रखना चाहिए जब तक कि सफलता सामने ही आकर खड़ी न हो जाय यह उत्साहवर्धक परामर्श साधारण को पुरुषार्थ की शक्ति और भविष्य की आशा के प्रति आस्थावान बनाये रहने की दृष्टि से उपयुक्त और आवश्यक है। ऐसे कथनों का समर्थन ही किया जाना चाहिए। अनवरत श्रम, अथक पुरुषार्थ और अडिग साहस और अविचल धैर्य की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही कम  है। लोक शिक्षण की दृष्टि से पुरुषार्थ परायणता का ही समर्थन किया जाना चाहिए। नीतिकारों का यही प्रयत्न भी रहा है। इस प्रकार के प्रतिपादनों की उपयोगिता के सम्बन्ध में दो मत हो ही नहीं सकते।

किन्तु तात्विक दृष्टि से गम्भीरतापूर्वक जब तथ्यों पर विचार करते हैं तो एक दूसरा पक्ष भी उभर कर आता है। वह यह कि कितने ही लोगों के सामने ऐसे अप्रत्याशित संकट आ खड़े होते हैं जिनके लिए उन्हें किसी भी प्रकार दोषी नहीं ठहराया जा सकता। उनने ऐसा कोई काम नहीं किया था जिससे वह मुसीबत सिर पर टूट पड़ती। दुर्घटनाएं कौन न्यौत बुलाते हैं? अनाचारियों के आक्रमण से होने वाली क्षति में किसका क्या दोष होता है? चोर, उचक्के जिस ढंग से हाथ साफ करते हैं उसमें सामान्य सजगता की कमी नहीं, वरन् कुटिलता के कुचक्र ही प्रधान होते हैं। प्रकृति प्रकोपों की तरह कई बार परिस्थितियाँ अकारण ही इतनी प्रतिकूल हो जाती हैं कि उनमें अपना दोष क्या रहा होगा? अपनी किस भूल ने यह विपत्ति की होगी? ऐसा बहुत खोजने पर भी कुछ हाथ नहीं लगता और भाग्य का खेल कह कर किसी प्रकार जी हल्का करना पड़ता है।

ऐसे ही अपवाद कई बार प्रगति प्रयासों के असफल होने के सम्बन्ध में भी सामने आते रहते हैं। उसी योग्यता के, उसी मार्ग पर चलने वाले, उसी उपाय का अवलम्बन करने वाले दूसरे लोग बाजी पर बाजी जीतते, सफलता पर सफलता पाते चले जाते हैं। पर पूरी ईमानदारी और समझदारी के साथ किये गये अपने प्रयत्न बहुत ही स्वल्प परिणाम दे पाते हैं। कई बार तो बुरी तरह निराशा ही हाथ लगती है। यदि अपनी ही भूल से ऐसा हुआ तो वह भूल क्या थी? यदि थी तो क्या वह जानबूझ कर की गई? इन प्रश्नों पर बहुत ढूंढ़ खोज करने पर भी कुछ ऐसे तथ्य हाथ नहीं लगते, जिन्हें असफलता का कारण ठहराया जाय, भूल माना जाय और भविष्य में उसे सुधारने का प्रयत्न किया जाय। अनेक बार मनुष्य स्वयं बिलकुल निर्दोष होता है। परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी विचित्र बन जाती हैं कि सब कुछ किया कराया मिट्टी हो जाता है। अतिवृष्टि, पाला, टिड्डी, कीड़े आदि के कारण किसान का तत्परतापूर्वक किया गया श्रम जब निरर्थक चला जाता है तो उसकी समझ में नहीं आता कि उससे कहाँ क्या भूल हुई? और वैसी भूल भविष्य में न होने पाये, इसके लिए वह भविष्य में क्या सावधानी बरतें? ऐसे ही अगणित प्रसंग सामने आते रहते हैं जिनसे पुरुषार्थ की सर्व समर्थता के पक्ष में प्रस्तुत किये गये प्रतिपादनों की यथार्थता के सम्बन्ध में सन्देह होने लगता है।

इन्हीं आशंकाओं के मध्य भाग्यवाद का जन्म होता है। कहा जाता है-” मनुष्य नियति के हाथ की कठपुतली है। भाग्य टलता नहीं। विधि का विधान अकाट्य है। जो होनी है सो होकर रहती है।” इसी प्रकार के और भी बहुत से कथन, उप कथन तब कहे जाते हैं जब प्रयत्न निष्फल हो जाते हैं। कोई अप्रत्याशित संकट सामने आ खड़ा होता हैं। अथवा सफलता मिलते-मिलते अपना रुख बदलती और बिजली की तरह आशा की चमक दिखा कर कहीं से कहीं चली जाती है। ऐसा ही तब भी कहा जाता है जब अन्धे के हाथ बटेर लगती है। कितनों को ही ऐसी सफलताएं हाथ लग जाती हैं जिसके लिए उनके पुरुषार्थ को श्रेय किसी भी प्रकार नहीं दिया जा सकता। पूर्वजों की बड़ी सम्पत्ति उत्तराधिकार में मिल जाय तो इसमें प्राप्तकर्ता का श्रेय क्या है? लाटरी खुल जाने जैसी सफलताओं में किस कौशल या पौरुष को सराहा जाये? तेजी-मन्दी के चक्र में कई व्यापारी देखते-देखते लखपति होते देखे जाते हैं। उसमें किसको मूर्ख, किसको बुद्धिमान कहा जाय? नदी की बाढ़ आती है। किसी का खेत काट कर उसकी आजीविका को उदरस्थ कर जाती है। किसी के ऊपर खेत में कहीं से लाकर ऐसी उपजाऊ मिट्टी पटक दी जाती है कि वह उसकी पैदावार से देखते-देखते अमीर बन जाता है। नदी द्वारा एक की भूमि को काट ले जाना और दूसरे को समृद्धि का वरदान बरसा जाना। इसे क्या कहा जाय? इसके लिए दोष या श्रेय किसे दिया जाय? आँधी तूफान में जिसका छप्पर उजड़ गया और घर बिगड़ गया इसमें उसकी क्या भूल बताई जाय? और भविष्य में क्या सावधानी बरतने का परामर्श दिया जाये?

यह ठीक है कि यह अपवादों की शृंखला है। सामान्य क्रम नहीं है। फिर भी अपवाद भी सर्वथा उपेक्षणीय नहीं है। उनका भी कारण खोजना होगा। विशेषतया ऐसी दशा में जबकि वे अत्यधिक परिमाण में आये दिन देखने को मिलते हैं। अत्युक्ति न समझी जाय और पौरुष समर्थकों को बुरा न लगे तो नम्रतापूर्वक दबी जुबान से यहाँ तक कहा जा सकता है कि ‘भाग्य का खेल’ प्रायः 30 प्रतिशत घटनाक्रमों में काम कर रहा होता है। यों महत्ता तो कर्मनिष्ठा की ही रहेगी और खुला समर्थन उसी को दिया जायगा। पर इन अप्रत्याशित परिणामों के सम्बन्ध में भी विचार तो किया ही जाना चाहिए।

विज्ञान कहता है कि-”इस संसार में ऐसा कभी कुछ नहीं हो सकता जो प्रकृति नियमों के विपरीत हो।” भूकंप, बिजली गिरना, ज्वालामुखी फटना, तूफान जैसी घटनाएं सामान्य बुद्धि को आकस्मिक लगती हैं और उनके पीछे विपर्यय दीखता है, पर वस्तुतः वैसा कुछ होता नहीं है। उनके पीछे भी प्रकृति के सूक्ष्म नियम ही काम करते हैं। यह दूसरी बात है कि उन नियमों की जानकारी सर्वसाधारण को न हो अथवा उस तरह के घटनाक्रम आये दिन घटित न होने के कारण वे आश्चर्यजनक लगते हों। चमत्कार उन्हीं को कहते हैं जो दृश्य आमतौर से देखने को नहीं मिलते। जब भी विज्ञान के आविष्कार प्रथम बार हुए तो उन्हें भारी चमत्कारों के रूप में देखा गया था। रेल, टेलीफोन, बिजली, रेडियो, सिनेमा आदि पूर्वकाल में अप्रचलित आविष्कार जब सामने आये तो सामान्य बुद्धि हतप्रभ रह गई और उसे जादू या भूत देव की करामात समझा गया। पीछे अब जब विज्ञान और आविष्कारों का सिलसिला समझ में आ गया हो तो अन्तर्ग्रह यात्रा पर निकले यानों, अणु आयुधों, लेसर किरणों जैसी आश्चर्यजनक उपलब्धियों तक को साधारण बात मान लिया गया है।

जादू नाम की कोई वस्तु दुनिया में नहीं है। लोगों की आँखों को परख क्षमता को चकमा दे सकने की सफलता का नाम ही जादूगरी है। अध्यात्म क्षेत्र में सिद्धि चमत्कारों का वर्णन बहुत होता रहता है। उन्हें देखकर आश्चर्य तो किया जा सकता है, पर ऐसा नहीं माना जा सकता है कि यह आकस्मिक है। इनके पीछे प्रकृति की सामान्य नियम परम्परा का हाथ नहीं है। सच तो यह है कि यह सृष्टि पूर्णतया सुव्यवस्थित है। इसमें अव्यवस्था के लिए रंच मात्र भी गुंजाइश नहीं है। यहाँ ऐसा कुछ हो ही नहीं सकता जिसे अप्रत्याशित असंभव या चमत्कारी कहा जा सकेगा। जिसे हम नहीं जानते उस अविज्ञात को ही चमत्कार की संज्ञा दी जाती रही है। इस अविज्ञात को ही अपवाद कह सकते हैं। वस्तुतः उन अपवादों के पीछे भी प्रकृति का परिपूर्ण व्यवस्थाक्रम काम कर रहा होता है। आदि काल में सूर्य, बिजली, आग, वर्षा आदि आँख मिचौनी खेलने वाले तथ्यों को देवता माना जाता था। उनकी मनौती मनाई और बलि चढ़ाई जाती थी। चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण किन्हीं राक्षसों का आकस्मिक आक्रमण समझा जाता था, पर अब वह बात रही नहीं है। विज्ञान के शोध निष्कर्षों ने भली प्रकार समझा दिया है कि यहाँ अप्रत्याशित कुछ नहीं है। अविज्ञात को ही अपवाद कहते हैं। वस्तुतः इस सृष्टि में अन्धेरगर्दी के लिए, व्यतिक्रम के लिए, कहीं रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं है।

अविज्ञात-अप्रत्याशित को ही अपवाद कहा जाता है। वस्तुतः यहाँ यथार्थवाद का ही अस्तित्व है अपवाद का अर्थ इतना ही है कि जिस आधार पर वह असामान्य घटनाक्रम उपस्थित हुआ उसकी जानकारी अपने पल्ले नहीं पड़ी है। यों अपवादों का सिलसिला चलता ही रहेगा क्योंकि सामान्य व्यवस्था की ही हमें जानकारी है और उसी को देखने समझने की आदतें भी है। सृष्टि के अविज्ञात नियमों के आधार पर जब भी कुछ असामान्य घटित होगा तभी उसे अपवाद कह दिया जाया करेगा। प्रकृति के रहस्य अनंत हैं और मनुष्य की बुद्धि अत्यन्त स्वल्प। ऐसी दशा में असाधारण तो घटित होता ही रहेगा। उचित यही है कि उसके सम्बन्ध में हम अपना दृष्टिकोण साफ कर लें। अपनी ससीमता को स्वीकार करें और असमंजस में न पड़कर तथ्यों तक पहुँचने का यथा सम्भव प्रयत्न करते रहें।

पिछले दिनों एक सस्ता तरीका अपनाया जाता रहा है कि हर अपवाद को देव-दानवों के क्रिया-कृत्य मान कर समाधान कर लिया जाता रहा है। भाग्यवाद भी कुछ इसी प्रकार का दर्शन है जिसमें देवताओं के द्वारा भाग्य निर्माण की बात कह कर एक विचित्र प्रकार की भ्रान्ति उत्पन्न कर दी गई है। विचारशील वर्ग में अपवादों को-‘चान्स’ ‘लक’ आदि कहा जाता रहा है। उसे ‘अप्रत्याशित अवसर’ मात्र ठहराया गया है। उसके लिए किसी देवता को श्रेय या दोष नहीं दिया गया है। उसमें अविज्ञात को, अपवाद को मान्यता भर दी गई है और उसका कारण विदित न होने पर उसे किसी देवता का कोप या अनुग्रह कह कर एक नया भ्रम गढ़ने की चेष्टा नहीं की गई है। यह समझदारी का चिन्ह है। सर्वज्ञ होने का, दावा करना मिथ्या अहंकार है। जो ज्ञात नहीं है उसे जानने के लिए मस्तिष्क खुला रखा जाय और धैर्यपूर्वक रहस्योद्घाटन के सूत्र खोज निकालने का प्रयत्न करते रहा जाय। इसी में बुद्धिमानी है।

भाग्य को देवताओं के साथ, ग्रह-नक्षत्रों के साथ जोड़ना सर्वथा उपहासास्पद है। देवता किसी का भाग्य बुरा लिखे और किसी का भला तो उन्हें विक्षिप्त ही कहा जायगा। मनुष्यों में अधिक न्यायशील और विवेकवान होने की मान्यता अपनाकर ही तो देवताओं को श्रद्धास्पद माना गया है यदि भाग्य लेखन में किसी मर्यादा का ध्यान न रखेंगे और चाहे जिसका भाग्य भला और चाहे जिसका बुरा लिखने लगेंगे तो उनकी वह गरिमा टिकेगी ही नहीं, जिसके कारण उन्हें श्रद्धास्पद और पूजनीय ठहराया गया है। ग्रह-नक्षत्रों की गणना भी ज्योतिषियों ने देवताओं के रूप में की है। इसीलिए तो वे उनकी पूजा-पत्री करते और अनुग्रह माँगते हैं। खगोलवेत्ताओं की तरह यदि वे ग्रहों को निर्जीव पदार्थ पिण्ड मानते तो उनके प्रभाव का समूची धरती या किसी भूखण्ड पर उनके किसी व्यापक प्रभाव की परिकल्पना करते और यदि अनुकूलता, प्रतिकूलता की बात सोचते तो उसका आधार इतना ही तो होता कि अन्तर्ग्रही आदान-प्रदान को न्यूनाधिक करने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है। इसके विपरीत जब उनकी प्रसन्नता-अप्रसन्नता से व्यक्ति विशेष को कष्ट मिलने की मान्यता बनाई गई और पूजा-पत्री से उनका रोष शान्त करने एवं अनुकम्पा पाने की समझी समझाई गई तो स्पष्ट है कि इन देवताओं को खगोल सम्पदा के स्थान से हटाकर देव संज्ञा दे दी गई। होता भी यही रहा है। ग्रह-नक्षत्रों को देव प्रतिमाओं के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता और पूजा जाता है। देववाद और भाग्यवाद की विसंगति को संगति के रूप में बिठाकर एक अनोखे बुद्धि-कौशल का ही परिचय दिया गया है। इसमें चमत्कार अवश्य है। ग्रह-नक्षत्रों का देवताओं का न सही इस परिकल्पना को गढ़ने वाली बुद्धि को तो निश्चय ही चमत्कारी कहा जायगा। इस उद्योग को चलाने वाले और उसके चंगुल में फँसने वालों को भी अपने ढंग के चमत्कारी ही कहा जा सकता है। इतने पर भी यह प्रश्न तो यथा स्थान बना ही रहेगा कि यदि यह देवता और ग्रह-नक्षत्र सचमुच ही देवता है तो फिर अकारण किसी को दुःख किसी को सुख देने की अव्यवस्था क्यों फैलाते हैं ? अपने क्रिया-कलाप में अन्धेरगर्दी की भरमार क्यों करते हैं? उनके रोष से विपन्न हुए दुखियारों की हाय, उन पर क्यों नहीं पड़ेगी? उनके अनुग्रह से सम्पत्तिवान लोग कर्म और पुरुषार्थों को अँगूठा क्यों नहीं दिखायेंगे? फिर नया एक और प्रश्न उठ खड़ा होता है कि पूजा-पत्री के छुटपुट उपहार पाकर वे क्यों अपनी गतिविधियों को उलट देते हैं? पूजा मिलने पर वे दोष को अनुग्रह में बदल देते हैं और न मिलने पर त्रास देते ही रहते हैं। इसका क्या कारण हो सकता है? पूजा के नाम पर मिलने वाली प्रशंसा और सस्ती उपहार सामग्री मात्र से उनकी नीति और क्रिया में भारी उलट-पुलट हो जाती है? कोई पत्थर अँगूठी में पहन लेने से किस कारण कोई ग्रह-नक्षत्र किसी पर अनुग्रह बरसाने लगता है ? आदि ऐसे असंख्य प्रश्न है जो भाग्यवाद की अपवाद स्थिति को स्वीकार करते हुए भी यह समाधान नहीं होने देते कि उस सबके लिए देवताओं का लिखा विधान अथवा ग्रह-नक्षत्रों का रोष अनुग्रह किस प्रकार कारण हो सकता है? यदि कोई कारण है तो उसका किस तर्क और तथ्य के आधार पर समर्थन किया जाय?

देवताओं और ग्रह-नक्षत्रों के अस्तित्व और अनस्तित्व के सम्बन्ध में बुद्धिपूर्वक तर्क और तथ्यों के आधार पर बहुत कुछ कहने, सोचने और खोजने की गुंजाइश है। दैवी शक्तियों को मानव-जीवन में कोई विशेष प्रभाव हो सकता है। इसी प्रकार ग्रह-नक्षत्र भी पृथ्वी के पदार्थों और प्राणियों को प्रभावित कर सकते हैं। इन सम्भावनाओं पर विचार करने के लिए व्यापक शोध क्षेत्र खुला पड़ा है। किन्तु इस प्रसंग पर तो गाड़ी एक दम रुक जाती है कि देवता किसी भाग्य विधान बिना ऐसे ही मनमर्जी से भला-बुरा लिखते चले जायं? अथवा ग्रह-नक्षत्र किसी पर रोष और अनुग्रह के अकारण वर्षा करते हुए अपने को अनाचारियों की स्थिति में ला पटके। यदि वस्तुतः वे लोग ऐसे ही जैसा कि उनके बारे में मूढ़ मान्यताएँ समझाती हैं तो फिर उनके और हम सबके लिए बड़े दुर्भाग्य और शर्म की बात है। सृष्टि की सुव्यवस्था के सिद्धान्त का तो उसमें खुला उल्लंघन और उपहास है ही।

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पाप कर्मों का परिमार्जन मात्र प्रायश्चित्त से

सामान्य कर्मफल व्यवस्था का स्वाभाविक क्रम हमारे चिरकालीन अभ्यास का अंग है। इसलिए वह साधारण प्रतीत होता है और उसकी ओर विशेष ध्यान नहीं जाता। अभ्यस्त गतिविधियाँ कितनी ही महत्वपूर्ण क्यों न हों अपने दैनिक व्यवहार को अंग बन जाने से महत्वहीन प्रतीत होने लगती हैं। शरीर निर्वाह में अन्न-जल का महत्व इसलिए है कि हर समय उनका सेवन नहीं किया जाता। साँस के द्वारा निरन्तर मिलने वाली ‘ऑक्सीजन’ का किसी को ध्यान भी नहीं आता। यद्यपि मूल्य और महत्व की दृष्टि से उसे अन्न और जल की अपेक्षा कहीं अधिक ऊँचा मान मिलना चाहिए। कर्मफल की यथार्थता का परिचय पग-पग पर मिलता है, पर वह एक प्रकार से सामान्य चर्चा में सम्मिलित होकर रह जाती है। उस पर न कोई ध्यान देता है और न किसी विशेष चर्चा करने की ही आवश्यकता समझी जाती है। अपवाद ही सिर पर छाये रहते हैं और उन्हीं को अत्यधिक महत्व देकर यह समझने की भूल होने लगती है कि संसार में जो कुछ हो रहा है अपवाद है। भाग्य ही भाग्य है। इसलिए भाग्य को बदलने वाले वे प्रयत्न करने चाहिए जो दैवी या चमत्कारी कहे जाते हैं। तथाकथित पूजा, उपासना में लगे हुए लोगों का बहुत बड़ा समुदाय इसी प्रकार का होता है जो ऐहिक समृद्धियों और सफलताओं के लिए जन्त्र-मन्त्रों का, देवी-देवताओं का, सिद्ध योगियों का आश्रय लेता और आशा-निराशा के झूले में झूलता रहता है। इस विडम्बना का पर्यवेक्षण करने पर यही प्रतीत होता है कि यह जन-समुदाय अपवादों को प्रधानता देता और भाग्य को फेरने वाली किन्हीं पगडंडियों की तलाश में फिरते रहने वाले लोगों का परिष्कार है। उपासना बिलकुल दूसरी बात है। साधना तो चेतना शक्ति को प्रखर बनाने का एक उच्चस्तरीय विज्ञान है। उसमें आत्म-शोधन और आत्म-परिष्कार की ही सांगोपांग विधि व्यवस्था है। उस ओर से आँखें बन्द करके मात्र मनोकामनाएँ पूरी करने और संकट हटाने के लिए उनका मनुहार करते हैं जो भाग्य बदलने में समर्थ हैं। जिनके सहारे अपवाद पद्धति से मनोरथ पूरे हो सकते हैं।

अस्त-व्यस्त मान्यताओं की समीक्षा करना यहाँ इसलिए आवश्यक हो गया कि तथ्य के तलाश करने के मार्ग में जो भटकाव खड़ा है उससे परिचित रहा जा सके। अन्यथा अविज्ञात तथ्यों पर आधारित ‘अपवाद’ प्रक्रिया पर वैज्ञानिक दृष्टि से विचार करना और किसी सही निष्कर्ष पर पहुँच सकना सम्भव ही न हो सकेगा।

अपवाद और भाग्य का समान अर्थ लिया जा सकता है। देखना यह है कि जब अन्य प्रकृति अन्यान्य-असामान्य घटनाएं भी किसी-किसी प्रकृति नियम के अनुसार ही घटित होती हैं तो मनुष्य जीवन में ऐसे अवसर किस कारण से आते हैं जिनका उसको प्रत्यक्षतः कोई इतना बड़ा दोष दिखाई नहीं पड़ता जिसके कारण उन संकटों या अवरोधों का त्रास सहन करना पड़ता। प्रगति क्रम में जब अन्य लोग सहज स्वभाव बढ़ते, चलते जाते हैं तो अमुक व्यक्ति को ही क्यों असफलताओं का मुँह ताकना पड़ता हैं? यह “भाग्य” किस कारण व्यक्ति विशेष को सताता और उसके प्रगति पथ को अवरुद्ध करके रख देता है।

तत्वदर्शियों की सनातन मान्यता एक ही रही है कि मनुष्य के संचित कर्म ही भले या बुरे भाग्य का रूप धारण करके सामने आते हैं। संचित कर्मों के कालान्तर में मिलने वाले परिपाक को ही भाग्य कहा जाता रहा है। साथ के साथ ही अधिकतर कर्मों का फल मिलता और निपटता रहता है। कुछ ही विशेष कर्म ऐसे बचते हैं जिनके फल उत्पन्न होने में समय लग जाता है। शारीरिक परिश्रम और बुद्धिकौशल के प्रतिफल प्रायः साथ के साथ ही थोड़े बहुत समय के फेर से मिलते चले जाते हैं। देर उनमें लगती है जो ‘नैतिक’ होते हैं। पाप और पुण्य ही फलित होने में देर लगाते हैं। हथेली पर सरसों उगाई जा सकती है जो बोने से दस दिन में ही उनके अंकुर छह इंच ऊँचे उग आते हैं किन्तु जिनका जीवन लम्बा हो जो चिरस्थाई हैं उनके बढ़ने और प्रौढ़ होने में देर लगती है। नारियल की गुठली बो देने पर भी एक वर्ष में अंकुर फोड़ती है और वर्षों में धीरे-धीरे बढ़ती है। बरगद का वृक्ष भी देर लगाता है। जबकि अरंड का पेड़ कुछ ही महीनों में छाया और फल देने लगता है। हाथी जैसे दीर्घजीवी पशु, गिद्ध जैसे पक्षी, ह्वेल जैसे जलचर अपना बचपन बहुत दिन में पूरा करते हैं जबकि खरगोश जैसे छोटे प्राणी एक वर्ष में ही बच्चे पैदा करने लगते हैं। मक्खी, मच्छरों का बचपन और यौवन बहुत ही जल्दी आता है, पर वे मरते भी उतनी ही जल्दी हैं। शारीरिक और मानसिक परिश्रम का, आहार-विहार का, व्यवहार शिष्टाचार का प्रतिफल हाथों-हाथ मिलता रहता है। उनकी उपलब्धियाँ सामयिक होती हैं, चिरस्थायी नहीं। स्थायित्व नैतिक कृत्यों में होता है उनके साथ भाव सम्वेदनाएं और आस्थाएँ जुड़ी होती हैं। जड़ें अन्तरंग की गहराई में धँसी रहती हैं इसलिए उसके भले या बुरे प्रतिफल भी देर में मिलते हैं और लम्बी अवधि तक ठहरते हैं। इन कर्मों के फलित होने में प्रायः जन्म-जन्मान्तरों जितना समय लग जाता है।

अपनी दृष्टि सामयिक ही होती है। प्रत्यक्ष ही सब कुछ दीखता है। पुण्य और पाप का भला-बुरा प्रतिफल तत्काल न मिलने पर अधीरता और अनास्था उत्पन्न होती है और उस स्थिति में तो एक प्रकार का अंतर्द्वंद्व ही उठ खड़ा होता है जब संचित कर्मों के प्रतिफल और आज के क्रिया-कलाप के मध्य विपरीतता दिखाई पड़ने लगे। पूर्व जन्म का पुण्य जिन दिनों फलित होकर शुभ परिणाम उत्पन्न कर रहा था, संयोग वश उन्हीं दिनों उस व्यक्ति ने नया दुष्कर्म कर डाला। देखने वालों को यह भ्रम होता है कि अभी-अभी जो दुष्कर्म किया था उसका फल इस विशेष लाभ के रूप में सामने आया। कहा जाने लगता है-” कलियुग की ऐसी ही महिमा है। भला करने का बुरा और बुरा करने का अच्छा फल मिलता है।” इस कथन के प्रतिपादन में उन प्रमाणों को प्रस्तुत कर दिया जाता है जिनमें अशुभ कर्त्ता को दुष्कर्म करने के दिनों में ही संचित पुण्य फल का लाभ संयोग वश मिल गया था।

ऐसे ही प्रसंग वे होते हैं जिनमें उस समय अच्छा कर्म करने के दिनों ही किसी संचित अशुभ कर्म का बुरा प्रतिफल कष्ट रूप में सामने आ गया। तब भी ऐसी ही विसंगति बिठा दी जाती है कि अच्छा करने वाले को दुःख भुगतना पड़ता है। यह समय की महिमा है। ऐसी विसंगतियाँ कभी-कभी ही सामने आती हैं तो भी उतने से भी सामान्य बुद्धि को असमंजस में पड़ने का अवसर मिल ही जाता है। ऐसे ही प्रसंगों को देखते हुए शास्त्रकारों ने कर्म की गति बड़ी गहन बताई है और “गहना कर्मणो गतिः” कहकर उसकी जटिलता का संकेत किया है।

इन पेचीदगियों के होते हुए संचित कर्म और भाग्य की एकता में कोई तात्विक अन्तर नहीं है। कल का दूध आज दही के रूप में प्रस्तुत है उसे संचित कर्म और भाग्य का उदाहरण समझा जा सकता है। शास्त्रकारों ने इस तथ्य को समय-समय पर, स्थान-स्थान पर, उजागर भी किया है। भाग्य के स्थान पर बहुत बार ‘कर्म’ शब्द का भी उपयोग होता है। ‘करम में लिखा था’-’करम रेख मिटती नहीं’- जैसी लोकोक्तियाँ भी हैं। ‘कर्म प्रधान विश्व करि राखा’ जैसी अर्धालियों में भले-बुरे भोगों के लिए कर्म को ही उत्तरदायी माना है।

कर्म का पूर्व रूप विचार है। विचार को, बीज और कर्म को, वृक्ष कहा गया है। जैसे विचार होते हैं वैसे ही प्रयास चल पड़ते हैं तद्नुरूप भली-बुरी परिस्थितियाँ सामने आ खड़ी होती हैं। यह तथ्य सर्वविदित है। पर एक पक्ष दूसरा भी है जो भाग्यवाद के पक्ष में जाता दीखता है। जैसी भवितव्यता होती है वैसे कर्म बन पड़ते हैं। कर्मों को जिस रूप में बनना है वैसे विचार उठेंगे। संचित कर्मों की प्रतिक्रिया इसी रूप में प्रकट होती है। रामायण में एक चौपाई आती है-”काल दंड लै काहु न मारा। हरेउ पथय तस बुद्धि विचारा।” संस्कृत में एक सूक्ति है-”देवता लाठी लेकर किसी को नहीं मारते जिसको दुःख देते हैं उसकी बुद्धि का अपहरण कर लेते हैं।” दैवी दुर्घटनाएं तो कभी-कभी ही होती हैं, आसमान से टूटने वाली विपत्तियाँ तो कभी-कभी ही किसी-किसी पर गिरती हैं। आमतौर से मनुष्य ऐसे मार्ग से चल पड़ते हैं जहाँ उनके लिए विनाश प्रतीक्षा कर रहा होता है। संचित कर्मों के फलस्वरूप जो दण्ड या पुरस्कार मिलने हैं उनका पूर्व रूप अन्तःकरण के किसी भीतरी कोने में बीज रूप से पनपने लगता है और बढ़ते-बढ़ते वही विपत्ति या सम्पत्ति की परिस्थितियों के रूप में प्रकट होता है। दैवी वरदान या अभिशाप का यही रूप है। इसमें प्रत्यक्षतः तो दोष कर्ता का ही दीखता है, पर परोक्ष कारण यह होता है कि संचित कर्मों का विष भीतर ही भीतर उफनता है और वह फोड़े के रूप में प्रत्यक्ष होकर कष्ट देता है। पुण्य कर्मों के फलस्वरूप मिलने वाली सुविधा सफलता भी आसमान से नहीं उतरती, वरन् अन्तरंग के किसी कोने से सत्प्रवृत्ति बनकर अपनी जड़ जमाती है और उसके अमृत फल श्रेय, यश, सुख, सम्मान आदि की उपलब्धियों के रूप में सामने आ जाते हैं। “दैवेच्छा” शब्द ऐसे ही प्रसंगों के लिए उपयुक्त बैठता है। कई बार न चाहते हुए भी ऐसी भली-बुरी उमंगे भीतर से उठती हैं जो समझाने-बुझाने से भी नहीं रुकतीं और अपनी प्रेरणा से ऐसा कुछ करा लेती हैं, जो सामान्यतया मनुष्य के मन में पहले से नहीं रहा होता। ऐसी अप्रत्याशित घटनाओं की कमी नहीं होती जिनकी भूमिका थी नहीं, किन्तु अनायास ही आँधी तूफान की तरह प्रकट हुई और सामान्य परिस्थितियों को तोड़ती, मरोड़ती मनुष्य को कहाँ से कहाँ उड़ा ले गई। ऐसी घटनाएं भले के लिए भी होती देखी गई हैं और बुरे के लिए भी।

भाग्यवाद के समर्थन में भी अगणित घटनाएं घटित होती रहती हैं। वे अपवाद तो होती हैं, पर इतनी कम मात्रा में नहीं होतीं कि उनकी उपेक्षा की जा सके। उनका तथ्य कारण जानने के लिए ग्रह-नक्षत्रों पर दोषारोपण करने या देवताओं को घसीटने, बदनाम करने की आवश्यकता नहीं है। यह कहा जा सकता है कि मनुष्य से संचित कर्म-प्रारब्ध बनकर प्रकट हुए और उनने निश्चित परिणाम तक पहुँचाने के लिए भीतर उमंगे उठाने से लेकर बाहर साधन बनाने तक के अनेकानेक आधार परोक्ष रूप से खड़े कर दिये।

निदान सही हो जाने पर रोग की चिकित्सा सरल हो जाती है और बिना भटके उचित उपचार का सही लाभ मिल जाता है। प्रत्यक्ष कर्मों की तरह संचित कर्मों का स्वरूप समझ लिया जाय तो फिर भाग्यवाद और कर्मवाद के बीच जो विरोधाभास है उसकी आवश्यकता न रहेगी। तब किसी ग्रह-नक्षत्र की मनुहार किये बिना अपने पैर में अपनी ही भूल से चुभे हुए काँटे को निकालने का दूरदर्शिता पूर्ण प्रयत्न आरम्भ करना होगा। जिस प्रकार अपनी ही भूल से संकट उपजते हैं उसी प्रकार अपनी ही समझदारी से उनका निराकरण भी किया जा सकता है। समस्याएं खड़ी करने और गुत्थी उलझाने का दोष भी मनुष्य ही करता है, पर यदि वह संभलने और बदलने पर तैयार हो जाय तो उन्हें सुलझाने में भी सफल हो सकता है। अपने ही अनाचरण से रोग उत्पन्न होते हैं, पर उस कुमार्गगामिता को छोड़कर यदि पथ्य बरतने और उपचार करने पर उतारू हो सका जाय तो उन रोगों से छुटकारा पाने का भी आधार बन जाता है। विग्रह खड़ा करने वाले यदि चाहें तो संधि भी कर सकते हैं। अशाँति के उत्पन्नकर्त्ताओं के लिए यह भी सम्भव है कि वे शान्ति के लिए नये सिरे से प्रयत्न करें और अपनी सूझ-बूझ के सहारे उनमें सफल होकर रहें।

संचित कर्म अपना निज का उपार्जन एवं संग्रह है। इसमें हेर-फेर करना अपने काबू से बाहर की बात नहीं है। कर्म का फल निश्चित है, पर उसकी दिशा धारा मोड़ी जा सकती है। उसका निराकरण और समाधान भी हो सकता है। विष खा लेने पर भी जब उपचार द्वारा मरण संकट से बचाव हो सकता है तो कोई कारण नहीं कि प्रारब्ध-जन्य सम्भावनाओं में सुधार एवं हेर-फेर न हो सके। अशुभ प्रारब्ध के द्वारा उत्पन्न होने वाली विषम सम्भावनाओं का निराकरण सम्भव है। कर्जदारों को किस्तों में ऋण चुकाने के लिए सहमत किया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि अपने ही कर्मों के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली सम्भावित विपत्तियों से प्रयत्नपूर्वक छूटा न जा सके।

कर्मों का फल भोग निश्चित होने पर भी उसके निवारण और निराकरण के उपाय हो सकते हैं। ऐसे उपायों को धर्मशास्त्रों में ‘प्रायश्चित्त’ संज्ञा दी गई है। प्रायश्चित्त का अर्थ गिड़गिड़ाना या सस्ते मोल में विधि-विधान से बच निकलना नहीं, वरन् क्षति-पूर्ति करना है। दुष्कर्मों से अपने अन्तःकरण की, विचार संस्थान की तथा काय कर्मों में जिस प्रकार दुष्प्रवृत्तियों से भर दिया गया था उसी साहस और प्रयास के साथ इन तीनों संस्थानों के परिमार्जन, परिशोधन एवं परिष्कार की प्रक्रिया को प्रायश्चित्त कहा गया है। पाप कर्मों से समाज को क्षति पहुँचती है। सामान्य मर्यादा प्रवाह में व्यवधान उत्पन्न होता है। लोक परम्पराएं नष्ट होती हैं। अनेकों को कुमार्ग पर चलने के लिए अनुकरण का उत्साह मिलता है। जिन्हें क्षति पहुँची है वे विलाप करते हैं और उससे वातावरण विक्षुब्ध होकर सार्वजनिक सुख-शान्ति के लिए संकट उत्पन्न करता है। ऐसे-ऐसे अन्य अनेक कारण हैं जिन्हें देखते हुए समझा जा सकता है कि जिसे पाप कर्म द्वारा क्षति पहुँचाई गई अकेले उसी की हानि नहीं हुई, प्रकारान्तर से सारे समाज को क्षति पहुँची है। विराट् ब्रह्म को, विश्व मानव को ही परमात्मा कहा गया है। यह एक प्रकार से सीधा परमात्मा पर आक्रमण करना, उसे आघात पहुँचाना और रुष्ट करना हुआ। अपराध भले ही व्यक्ति या समाज के प्रति किये गये हों उनका आघात सीधे ईश्वर के शरीर पर पड़ता है और उसे तिलमिलाने वाले कभी सुखी नहीं रहते।

अवांछनीयताओं का तत्काल परिशोधन होता रहे। गन्दगी जमा न होने पाये यह उचित है। देर तक जमा रहने के उपरान्त गन्दगी की सड़न अधिकाधिक बढ़ती जाती है। शरीर में जमा हुआ विजातीय द्रव्य जितने अधिक समय तक ठहरेगा। उसी अनुपात से विष बढ़ता जायगा और सामान्य रोगों की अपेक्षा उससे असाध्य बीमारी उपजेगी। पुराना कर्जा ब्याज समेत कई गुना हो जाता है। मनोमालिन्य बहुत समय तक टिका रहे तो वह द्वेष प्रतिशोध का रूप धारण कर लेता है। संचित पाप कर्मों के सम्बन्ध में भी यही बात है। उनका प्रतिफल भुगतने में जितनी देर होगी उतनी ही प्रतिक्रिया भयंकर होगी। नया अपच जुलाब की एक गोली से साफ हो जाता है किन्तु यदि कई दिन तक मल रुका रहे तो उसकी पत्थर जैसी कठोर गांठें बनकर ऐसे भयंकर उदर शूल का कारण बनती हैं, जिसके लिए पेट फाड़कर गाँठें निकालने के अतिरिक्त और कोई चारा ही शेष नहीं रह जाता। गन्दगी को जितनी जल्दी हटाया जा सके उतना ही उत्तम है।

इस जन्म के विदित और स्मृत पापों से लेकर जन्म-जन्मान्तरों तक के पापों का निराकरण आवश्यक है। उन्हें निकालना और निरस्त करना आवश्यक है। विष खा जाने की गलती का परिमार्जन इसी प्रकार हो सकता है कि पेट और आँतों की धुलाई करके वमन विरेचन आदि द्वारा उसे जल्दी से जल्दी निकाल बाहर किया जाय। प्राण संकट उसी उपाय से टल सकता है। प्रायश्चित्त ही परिशोधन का एक मात्र उपाय है। नदी, तालाबों में स्नान करने से, देव मन्दिरों का दर्शन करने से या छुट-पुट से ही अन्य ऐसे उपचार कर देने से पाप नष्ट हो जायेंगे, ऐसा सोचना भूल है। यदि ऐसे ही दुष्कर्मों के दण्ड से छुटकारा मिल जाया करेगा तो फिर निर्भय होकर लोग वैसे ही कुकृत्य करते रहेंगे और दण्ड से बच निकलने के लिए ऐसे ही सस्ते तरीके ढूँढ़ लिया करेंगे। राज दण्ड से बचने के लिए रिश्वत का पहले ही बोलबाला है। लोकसेवी और धर्मात्मा का आडम्बर रचकर उसकी आड़ में समाज दण्ड से भी बचाव हो जाता है। ईश्वरीय दण्ड ही एक मात्र पाप से डरने का कारण रह गया था। उसी अंकुश से नीति-निष्ठा बनी रहने की सम्भावना है यदि उसे भी सस्ते कर्मकाण्डों के सहारे झुठला दिया गया तो समझना चाहिए कि उस आधार पर भरपेट पाप करते रहने और सरलता पूर्वक ईश्वरीय दण्ड से बच निकलने का एक और नया भ्रष्टाचार खड़ा हो गया। शारीरिक और मानसिक दुष्प्रवृत्तियों के परिमार्जन का एकमात्र उपाय प्रायश्चित्त ही है। उसमें दण्ड भुगतने-क्षति पूर्ति करने और भविष्य में वैसी गलती न करने के तीनों ही वे तत्व घुले हुए हैं। जिनके सहारे भूल सुधारने और अन्धकार को प्रकाश में बदलने का अवसर मिलता है।

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प्रारब्ध न तो अन्धविश्वास है और न अकारण।

भाग्यवाद के प्रति विरोध और आक्रोश इसलिए उमड़ पड़ा कि उसके सहारे निहित स्वार्थों ने पाने-खाने के लिए ग्रह नक्षत्रों को बीच में डालकर अपना एक स्वतन्त्र व्यवसाय खड़ा कर लिया। अन्यथा वह एक स्वतन्त्र तत्व ज्ञान समझा जा सकता है और उसके प्रभाव का व्यक्ति के उत्थान-पतन में क्या स्थान रहता है इस पर विचार करते हुए वह उपाय खोजा जा सकता है कि अन्य विपत्तियों की तरह उससे भी किस प्रकार जूझा जाय-किस प्रकार कठिनाइयों को सरल करने के अन्य क्षेत्रों में चलने वाले प्रयत्नों की तरह इस दिशा में भी उपाय ढूँढ़ा जाय।

भाग्य के सम्बन्ध में कितनी ही लोकोक्तियाँ ऐसी प्रचलित हैं जो उसके ऊपर पड़े हुए पर्दे को अनायास ही उठा देती हैं। भाग्य को विधि का या विधाता का विधान कहा जाता है। इस लोकोक्ति वे शब्दार्थ पर विचार करने से भी तथ्य का आभास मिलता है। विधि कहते हैं-कानून को, विधान कहते हैं-व्यवस्था को। विधि का विधान अर्थात् कानून की व्यवस्था। विधान निर्माण कर्त्ता को कहते हैं। विधाता अर्थात् सृष्टा। सृष्टा अर्थात् परमेश्वर। परमेश्वर की व्यवस्था अर्थात् विधि का विधान। कानून का नियम कहा जाय अथवा परमेश्वर का-बात एक ही है। उसका तात्पर्य एक ही है-भाग्य अर्थात् वह प्रतिक्रिया जो किसी सुनिश्चित नियम प्रक्रिया पर आधारित है। इस निर्णय पर पहुँच जाने से वह भ्रम जंजाल सहज ही कट जाता है जो भाग्य व्यवसायियों ने ग्रह-नक्षत्रों की आड़ में रचकर खड़ा कर दिया है और जिसमें दुर्बल मनःस्थिति के लोगों को डराने और लाभ उठाने का कुचक्र चलाया जाता है। बेचारे ग्रह-नक्षत्रों को इस सामान्य सृष्टि व्यवस्था में घसीटना-उन्हें दोष या श्रेय देना सर्वथा निरर्थक है।

खगोल विद्या-अस्टोनोमी एक मान्य विज्ञान है। ग्रह-नक्षत्रों की गतिविधियों की जानकारी कितनी उपयोगी है, उसे विज्ञ समाज में भली प्रकार जाना माना गया है। इसकी खोज के लिए अन्तरिक्षीय और अन्तर्ग्रही खोज खबर लाने के लिए विज्ञान क्षेत्र में कितने महंगे और कितने प्रबल प्रयास किये जा रहे हैं, यह सर्वविदित है। उससे लाभ भी है। रेडियो, टेलीफोन, टेलीविजन जैसे प्रत्यक्ष और कितने ही परोक्ष लाभ खगोल विद्या की जानकारियों के आधार पर मिलते जा रहे हैं। इस विज्ञान की प्रतिष्ठा रही है और रहेगी। किन्तु खगोल विद्या-अस्टोनोमी को-जब फलित वर्णन के रूप में वर्णन किया जाने लगेगा और उससे नये किस्म की भ्रान्तियाँ फैलाकर स्वार्थ साधन का उपक्रम खड़ा किया जायगा तो बिना समाज में उसकी भर्त्सना होती ही रहेगी।

भविष्य कथन एक अतीन्द्रिय क्षमता है। परामनोविज्ञान के आधार पर उसका समर्थन हो रहा है। किन्तु यदि जन्म कुण्डलियों को भविष्य कथन के निमित्त एक नये जंजाल के रूप में खड़ा किया जायगा तो विज्ञ समाज में उसकी प्रतिक्रिया हुए बिना नहीं रह सकती। खगोल विज्ञान की तरह भाग्य विधान को भी विशुद्ध तत्व ज्ञान के रूप में लिया जाय तो उसका उपयोग भी व्यवहार शास्त्र-कर्म प्रतिफल-व्यवस्था विज्ञान की तरह ही उपयोगी हो सकता है। उसके सहारे विपत्तियों के निराकरण और सुविधाओं के संवर्धन में भारी योगदान मिल सकता है।

जान-बूझकर किये गये या अनजान में बन पड़े काम अपनी भली-बुरी प्रतिक्रिया उत्पन्न किये बिना नहीं रहते। इतने पर भी जो बन पड़ा है उसकी प्रतिक्रिया में सुधार संशोधन करने के लिए कुछ तो किया ही जाता है। आहार-विहार सम्बन्धी व्यतिक्रम से रोग उत्पन्न होते हैं। यह सभी जानते हैं पर भूल हो चुकने के उपरान्त जब बीमारी का कष्ट सिर पर आ धमकता तो चुपचाप बैठकर सहन करते रहना भी तो नहीं बनता। उपचार किया जाता है और उससे पूरा-अधूरा कुछ तो लाभ मिलता ही है। इसी प्रकार प्रस्तुत कर्मफल के कष्टों को सरल बनाने और जो अभी तक परिणाम नहीं दे सके हैं उनकी अशुभ सम्भावनाओं से निपटने के लिए पूर्व प्रयास किये जा सकते हैं। इन प्रयासों को शास्त्रकारों ने प्रायश्चित्त नाम दिया है।

कर्म फल की निश्चिंतता का सिद्धान्त अकाट्य है। यदि यह अनिश्चित रहा होता तो संसार की व्यवस्था बिगड़ती और अराजकता फैल जाती। भगवान ने यह संसार बनाया है, पर उसे सुसंचालित और सुव्यवस्थित रखने के लिए जड़ और चेतन के लिए विधान भी बनाया है। पदार्थ सम्बन्धी हलचलों के विधान को-साइंस कहते हैं। प्राणि जगत में विचारणा और क्रिया-प्रक्रिया को सुनियोजित रखे रहने के लिए कर्म विधान का सृजन हुआ है। पदार्थों के सम्बन्ध में काम करने वाले प्रकृति नियम सुनिश्चित हैं। उन्हें बदला नहीं जा सकता है। प्रकृति के अन्य नियमों के अनुसार पदार्थ को सामान्य गतिविधियों को असामान्य बनाया जा सकता है। ईंधन पाकर आग भड़कती है यह सामान्य नियम है। इस ज्वलन प्रक्रिया में ऑक्सीजन का कितना योगदान रहता है यह अप्रत्यक्ष रहने से सर्वसाधारण को विदित नहीं रहता। जब आग तक ऑक्सीजन पहुँचने का अवरोध खड़ा करके अर्थात् कार्बन ऑक्साइड गैस को उड़ेलकर जलती आग बुझा दी जाती है तो आश्चर्य होता है कि आग और ईंधन होते हुए भी यह पटाक्षेप कैसे हो गया उसी प्रकार कर्मफल की सुनिश्चित और अकाट्य व्यवस्था होते हुए भी यह गुंजाइश रहती है कि जो कर्म हो चुका और जिसके परिणाम सामने आ रहे हैं या आने वाले हैं उनमें रोकथाम कैसे की जाय? वर्षा यथा समय होती ही है उसे रोका नहीं जा सकता, पर छाता लगाने से शरीर की और छत बनाने से घर में रखे सामान की सुरक्षा तो हो ही जाती है।

भगवान ने संसार बनाया, साथ ही विज्ञान और विधान की व्यवस्था भी रच दी। चेतन जगत के लिए कर्म व्यवस्था ऐसी बनाई गई जो भगवान की तरह ही सुनिश्चित है। भगवान ने स्वयं अपने आपको उस व्यवस्था बन्धन में जकड़ लिया है और सर्वसाधारण के सम्मुख यह उदाहरण प्रस्तुत किया है कि उस कर्म व्यवस्था को तोड़ सकना सर्वशक्ति मान होते हुए भी उनके लिए उचित अथवा सम्भव नहीं है। भगवान ने राम के रूप में छिपकर बालि को मारा-युद्ध नीति के अनुसार-छिपकर मारना निषिद्ध है। निषिद्ध कर्म का प्रतिफल उस समय तो नहीं मिला, पर जब अगली बार राम ने कृष्ण के रूप में अवतार लिया तो बालि ने बहेलिया बनकर उसी तरह छिपकर वैसा ही बाण चलाया और कृष्ण को भी बालि की तरह ही प्राण त्यागने पड़े। राम के पिता को पुत्र शोक में बिलख कर मरने का ऋषि शाप लगा था। दशरथ जी के बाण से श्रवणकुमार की मृत्यु हुई थी। मरते समय उन्होंने आक्रमणकारी को पुत्र शोक में बिलखकर मरने का शाप दिया। सच ही हुआ। दशरथ जी की मृत्यु उसी प्रकार हुई। भगवान राम उस शाप को निरस्त करने में समर्थ नहीं हुए। कृष्ण को उनकी बहिन सुभद्रा ने उलाहना दिया था कि उनके भगवान होते हुए उसके पुत्र अभिमन्यु की प्राण रक्षा नहीं की। कृष्ण ने विस्तार पूर्व सुभद्रा का समाधान किया था और बताया था कि वे भगवान होते हुए भी कर्म फल मिटाने में असमर्थ हैं। ऐसे-ऐसे अनेक पौराणिक-ऐतिहासिक एवं आधुनिक प्रसंगों से स्पष्ट होता है कि इस संसार में कर्म व्यवस्था का, उसकी सुनिश्चितता का कितना स्थायित्व और कितना महत्व है।

जो लोग साधारण क्षमा प्रार्थना, स्रोत-पाठ, कथा-कीर्तन, स्नान-दर्शन जैसे छुटपुट कर्मकाण्डों के सहारे कर्मफल के विधान को झुठला देने की बात सोचते हैं वे भूल करते हैं। इतने सस्ते में यदि यह विधि-व्यवस्था उलट जाया करे तो फिर उसे उपहासास्पद ही माना जायगा। इतनी सस्ती तरकीब भिड़ाकर तो कोई भी दुष्कर्मों के दण्ड से बच जाया करेगा और निर्भयतापूर्वक अपनी दुष्वृत्तियों को दुहराया करेगा। भाग्य विधान को सुनिश्चितता के साथ-साथ ईश्वरीय व्यवस्था के उच्च नियमों के आधार पर उनमें परिवर्तन तो हो सकता है, पर वह परिवर्तनकारी उपक्रम भी इतने सरल और सस्ते नहीं हो सकते जैसे कि आज धर्मोपदेशकों द्वारा बताये जाते हैं। तनिक-तनिक से कर्मकाण्डों से एक नहीं सैकड़ों जन्मों के पाप दूर होने के महत्व आये दिन सुने जाते हैं। गंगा स्नान से लेकर सत्यनारायण कथा सुनने तक की सरल प्रक्रिया मात्र से सैकड़ों जन्मों के पाप नष्ट हो जाने की जन श्रुतियाँ आये दिन सुनने को मिलती हैं। परिशोधन विधान को इतना सस्ता कर देने से तो उसका मखौल ही बन जायगा। परलोक पुनर्जन्म में कठोर कर्मफल मिलने तक की बात का भी मजाक हो जायगा। सम्भव है उन कर्मकाण्डों का महत्व बढ़ाने के लिए पा नाश होने की बात कही गई हो, पर कहने वालों ने यह तो भुला ही दिया कि इसमें पाप दण्ड का भय ही समाप्त हो जायगा और जीवन में धर्म धारणा के महत्व को समझाने के स्थान पर उलटे उपेक्षा होने लगेगी और अधर्म पनपेगा। जो हो यह मान्यता किसी भी कसौटी पर सही नहीं बैठती कि छुटपुट कर्मकाण्डों से ही बड़े-बड़े पापों का दण्ड भुगतने से छूट मिल जायगी। अधिक से अधिक इतना कहा जा सकता है कि पाप प्रवृत्ति में परिशोधन होगा। पाप न करने की आस्था जगेगी। इतने भर को पाप निवृत्ति कहा जाय तो उसे सारगर्भित कहा जा सकता है। पाप में प्रवृत्ति से छुटपुट पूजा-पत्री द्वारा भी छुटकारा पाने की बात समझ में आ सकती है, पर पाप दण्ड से बच निकलने के लिए सस्ते धर्मोपचारों की असाधारण महिमा बताया जाना न केवल अत्युक्ति है वरन् उसके पीछे धर्माचरण की उपेक्षा का भी परोक्ष प्रतिपादन है। अत्युक्ति भले ही सदुद्देश्य से की गई हो अन्ततः उसकी प्रतिक्रिया अवांछनीय ही होती है।

दुष्कर्मों के संग्रहीत प्रतिफल को, प्रारब्ध एवं भाग्य विधान को सुधारने और सरल बनाने के लिए भारतीय धर्म शास्त्रों में एकमात्र विधान प्रायश्चित्त का ही है। प्रायश्चित्त का एक सुविस्तृत तत्वज्ञान और सुनिश्चित विधि-विधान है। यों सस्तेपन की बचकानी घुस-पैठ ने इस क्षेत्र को भी अछूता नहीं छोड़ा है और प्राचीन विधि-विधानों को ओछी और बचकानी नकलें बनाकर उस महान प्रयोजन को भी उपहासास्पद ही बना दिया गया है। वस्तुतः प्रायश्चित्त विधान का वजन किये गये पाप कर्मों के फलस्वरूप मिलने वाले दण्ड के समतुल्य ही जा पहुँचता। अन्तर थोड़ा-सा ही रह जाता है। किसी की चोरी करने पर पुलिस और अदालत द्वारा कठोर जेल दण्ड भुगतना पड़ता है या अपनी भूल स्वयं समझकर जिसकी चोरी की है उसके सामने दुखी होने और जितना सम्भव है उतना लौटा देने से अपेक्षाकृत कम कष्ट सहने में काम चल जाता है। यही बात प्रायश्चित्त के सम्बन्ध में भी है। भूल स्वीकार करने, किये का पश्चाताप करने और भविष्य में वैसा न करने की भावभरी मनःस्थिति में अपराधी मनोवृत्ति का परिवर्तन का चिह्न है। यह चिह्न ही पाप दण्ड को हलका करने का प्रधान आधार होता है। उसके उपरान्त क्षति-पूर्ति का प्रश्न सामने आता है। जो हानि पहुँचाई गई है। अनाचरण से अन्तःकरण को कलुषित और वातावरण को दूषित करने का सदाचार बन पड़ा है। उसकी क्षति पूर्ति दो प्रकार से हो सकती है एक तो अनाचार का जितना गहरा गड्ढा खोदा गया है उसे पाटा जाय अर्थात् क्षति पूर्ति कर सकना वर्तमान परिस्थितियों में जितना कुछ सम्भव रह गया है उसे पूरा किया जाय। उसके अतिरिक्त अन्तःकरण पर उन कुकर्मों के जो कुसंस्कार जमे हों उन्हें कुछ नये पुण्य कर्म करके सुसंस्कारों की नई स्थापना की जाय। जिनका श्रेष्ठ प्रभाव नये सिरे से अन्तःकरण पर जमे और मलीनता की संचित परतों को हटा सकने में समर्थ बन सके। इसी नीति को अपनाने में समाज की पहुँचाई गई क्षति पूर्ति भी सम्भव हो सकती है।

इन्हीं सब तत्वों का सम्मिश्रण प्रायश्चित्त विधान है। उसमें वे सिद्धान्त बीज रूप से मौजूद हैं जो अशुभ भाग्य विधान को काट सकने में, अन्धकारमय भविष्य की विभीषिका को निरस्त करने में समर्थ हो सकते हैं। अपराधकर्त्ता की इसी में शालीनता, सज्जनता और साहसिकता भी है। जिस दुस्साहस से प्रेरित होकर कुकर्म किये थे। उसी स्तर का सत्साहस जुटाने वाला हो अपने संचित दुष्प्रवृत्ति के विरुद्ध विद्रोह करते और उसके उन्मूलन में जुट जाने का सत्साहस कर सकता है। उस साहस में वीरता और शालीनता के चिन्ह हैं। इसलिए उसका परिणाम परिवर्तनकारी, सुधार परायण एवं मंगलमय सिद्ध होता है तो यह उचित ही है।

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तत्काल फल न मिले तो भ्रम में न पड़ें।

बीज बोने पर फल पाने में कुछ समय लग जाता है, इसी प्रकार कर्म का प्रतिफल मिलने में थोड़ी देर लगने से अधीर लोग आस्था खो बैठते हैं और दुष्कर्म के दण्ड से बचे रहने की बात सोचने लगते हैं। विलम्ब के कारण कोई आस्था न खोयें यह चेतावनी देते हुए शास्त्र कहते हैं-

नाधर्मः कारणापेक्षी कर्तारमभिमुंचति। कर्ताखलु यथा कालं ततः समभिपद्यते॥ ( महा0 शान्ति0 अ॰ 298)

अधर्म किसी भी कारण की अपेक्षा से कर्ता को नहीं छोड़ता निश्चय रूप से करने वाला समयानुसार किये कर्म के फल को प्राप्त होता है। 8।

कृतकर्म क्षयोनास्ति कल्पाकोटि शतैरपि। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥ ( शिव॰ कोटी रुद्र0 अ॰ 23)

किये हुए कर्म का सौ करोड़ कल्प तक भी क्षय नहीं होता, किया हुआ शुभ तथा अशुभ कर्म अवश्य ही भोगना पड़ेगा। 39।

अवश्यमेव लभते फलं पापस्य कर्मणः। भर्तः पर्यागते काले कर्ता नास्त्यत्र संशयः॥ (बाल्मी0 युद्ध0 स॰ 111)

पाप कर्म का फल अवश्य ही प्राप्त होता है। हे पते! समय आने पर कर्त्ता फल पाता है इसमें संशय नहीं है। 25।

हे उत्तम पुरुष! जो कोई शुभ या अशुभ कर्म करता है वह पुरुष अवश्य ही उसके फल को प्राप्त होता है इसमें संशय नहीं है।

यदा चरति कल्याणि शुभं वा यदि वा शुभमं। तदेव लभते भद्रे कर्त्ता कर्मजमात्मानः॥ ( बाल्मी0 अयो0 स॰ 63)

अवश्यं लभते कर्ता फलं पापस्य कर्मणः। घोरं पर्थ्यागते काले द्रुमः पुष्पमिवार्तपम्॥ ( बाल्मी0 अरण्य0 स॰ 29)

हे कल्याणी! यदि जो कुछ भी शुभ-अशुभ करता है करने वाला वही अपने किये कर्मों के फल को प्राप्त होता है। 6।

करने वाला अपने पाप कर्मों का फल घोर काल आने पर अवश्य प्राप्त करता है। जैसे मौसम आने पर वृक्ष फूलों को प्राप्त होते हैं। 8।

यथा धेनु सहस्त्रेषु वत्सो विन्दति मातरम्॥ एवं पूर्व कृतं कर्म कर्तारमनुगच्छति। अचोद्यमानानि यथा पुष्पाणि च फलानि च॥ तत्कालं नाति वर्तन्ते तथा कर्म पुराकृतम्॥ ( महा0 अनु0 अ॰ 7)

नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्प कोटि शतैरपि। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्मं शुभाशुभम्॥ ( ब्रह्मवैवर्त0 प्रकृति0 अ॰ 37)

जैसे हजारों गौवों में से बछड़ा अपनी माँ को ढूँढ़ लेता है।22। ऐसे ही पूर्व किया हुआ कर्म कर्त्ता को प्राप्त होता है। बिना प्रेरणा के ही जैसे फूल और फल। 23।

अपने समय का उल्लंघन नहीं करते। वैसे ही पूर्व में किया हुआ कर्म समय का उल्लंघन नहीं करता। 24।

सौ करोड़ कल्पों तक भी किया हुआ कर्म बिना भोगे क्षय नहीं होता। किया हुआ शुभ तथा अशुभ कर्म अवश्य ही भोगना पड़ता है। 17।

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कुसंस्कारों का परिपाक कष्टों और संकटों के रूप में

जैसे-जैसे हम स्थूल से सूक्ष्म में प्रवेश करते हुए आगे बढ़ रहे हैं, वैसे-वैसे हमें संकटों और अभावों के कारणों के वास्तविक कारणों को समझने में सुविधा मिल रही है। मोटी बुद्धि सदा संकटों का कारण बाहर ढूंढ़ती है। व्यक्तियों, परिस्थितियों पर ही प्रस्तुत विपन्नताओं का दोष थोपकर चित्त हलका करने की विडम्बना चलती रहती है। समझदारी बढ़ने पर ही यह पता चलता है कि घटिया व्यक्तित्व ही पिछड़ेपन से लेकर समस्त संकटों के घाट हैं। मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थिति बनती है उसे विचारशील ही स्वीकार करते हैं। अन्यथा आमतौर से कठिनाइयों के कारण बाहर ही ढूँढ़े जाते हैं। गहराई में प्रवेश किये बिना न तो वास्तविकता जानी जा सकती है और न उनके निवारण का कारगर उपाय ही बन पड़ता है। व्यक्तित्व का घटियापन सूझ ही न पड़े- उसके सुधार की कोई योजना बने ही नहीं तो परिस्थितियों की विपन्नता का समाधान हो नहीं सकता। वे एक से दूसरा रूप भर बदलती रहेंगी।

बहुत समय पहले शारीरिक रोगों को बाहरी भूत-पलीतों का आक्रमण माना जाता था। पीछे वात, पित्त, कफ का ऋतु प्रभाव का कारण उन्हें माना गया। उसके बाद रोग कीटाणुओं के आक्रमण की बात समझी गई। रोगों की शोधों में अगला चरण यह बना कि आहार की विकृति से पेट में सड़न पैदा होती है और उस विष से रोग उत्पन्न होते हैं। यह क्रम अधिकाधिक गहराई में प्रवेश करने का, अधिक बुद्धिमत्ता का, स्थूल से सूक्ष्म में उतरने का है। इस प्रगतिक्रम में उतरते-उतरते इन दिनों आरोग्य शास्त्र के मूर्धन्य क्षेत्र में इस तथ्य को खोज निकाला गया है कि शारीरिक रोगों के सन्दर्भ में आहार-विहार, विषाणु, आक्रमण आदि को तो बहुत ही स्वल्प मात्रा में दोषी ठहराया जा सकता है। रुग्णता का असली कारण व्यक्ति की मनःस्थिति है। मनोविकारों की विषाक्तता यदि मस्तिष्क पर छाई रहे तो उसका अनुपयुक्त प्रभाव नाड़ी संस्थान के माध्यम से समूचे शरीर पर पड़ेगा। फलतः दुर्बलता और रुग्णता का कुचक्र बढ़ते-बढ़ते अकाल मृत्यु तक का संकट खड़ा कर देगा। नये अनुसन्धान जीवनी शक्ति का केन्द्र हृदय को नहीं मस्तिष्क को मानते हैं। रक्त की न्यूनाधिकता या विषाक्तता को रुग्णता का उतना बड़ा कारण नहीं माना जाता जितना कि मानसिक अवसाद एवं आवेश को।

इन शोध प्रयासों में नये-नये तथ्य सामने आये हैं। उनसे पता चलता है कि शरीर की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष क्रियाओं पर पूरी तरह मानसिक अनुशासन ही काम करता है। अचेतन मन की छत्र-छाया में रक्ताभिषरण, आकुंचन-प्रकुंचन, श्वास-प्रश्वांस, निमेष-उन्मेष, ग्रहण-विसर्जन, निद्रा-जागृति आदि की अनैच्छिक कहलाने वाली क्रियाएं चलती रहती हैं। चेतन मन के द्वारा बुद्धिपूर्वक किये जाने वाले क्रिया-कलापों और लोक व्यवहारों का ताना-बाना बुना जाता है। शरीर की परोक्ष और प्रत्यक्ष क्षमता पूरी तरह अचेतन और चेतन कहे जाने वाले मनःसंस्थान के नियंत्रण में रहती है, उसी के आदेशों का पालन करती है। शरीर का पूरा-पूरा आधिपत्य मन मस्तिष्क के ही हाथों में रहता है। उस क्षेत्र की जैसी भी कुछ स्थिति होती है उसका प्रभाव शरीर पर पड़ता है। यदि मस्तिष्क आवेशग्रस्त होगा तो शरीर के अवयवों में उत्तेजना और बेचैनी छाई रहेगी। इस स्थिति में ऐसे रोग उत्पन्न होंगे जिनसे शरीर के उत्तेजित होने, गरम होने, फलने-फूलने जैसे अनुभव होने लगेंगे। यदि मस्तिष्क उदास-हताश, शिथिल हो जायगा तो उस अवसाद का प्रभाव अंग अवयवों की दुर्बलता के रूप में देखा जा सकेगा।

यह मोटा निष्कर्ष हुआ। बारीकी में उतरने पर पता चलता है कि अमुक शारीरिक, रोग अमुक मनोविकास के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं और वे तब तक बने ही रहते हैं जब तक कि मानसिक स्थिति में कारगर परिवर्तन न हो जाय। इस अनुसंधान ने उस असमंजस को दूर कर दिया है जिसके अनुसार रोगियों को चिकित्सकों के दरवाजे-दरवाजे पर ठोकरें खानी पड़ती हैं। नित नई दवाएं बदलनी पड़ती हैं। किन्तु आशा निराशा के झूले में झूलते हुए समय भर बीतता रहता है। रोग हटने का नाम ही नहीं लेते। तेज औषधियाँ अधिक से अधिक इतना कर पाती हैं कि बीमारी के स्वरूप और लक्षण में थोड़ा-बहुत फेर बदल प्रस्तुत कर दे। जीर्ण रोगियों में से अधिकांश का इतिहास यही है। जिससे औषधि उपचार की निरर्थकता ही सिद्ध होती रहती है। आहार-विहार जन्य साधारण रोग तो शरीर की निरोधक जीवनी शक्ति ही अच्छे करती रहती है। उसी का श्रेय चिकित्सकों को मिल जाता है। सच्चाई तो यह है कि एक भी छोटे या बड़े रोग का शर्तिया इलाज अभी तक संसार के किसी भी कोने में किसी भी चिकित्सक के हाथ नहीं लगा है। कोई भी औषधि अपने आश्वासन को पूरा कर सकने में सफल नहीं हुई है। अंधेरे में ढेले फेंकने जैसे प्रयास ही चिकित्सा क्षेत्र में चलते रहते हैं, उसी भगदड़ में कभी-कभी किसी अन्धे के हाथ बटेर लग जाती है यदि ऐसा नहीं होता तो कम से कम चिकित्सकों को खुद तो रुग्ण रहना ही न पड़ता और उनके घर वाले तो सम्बन्धी तो बीमारियों से ग्रसित नहीं ही रहते। देखा यह गया है कि दवाओं की भरमार बीमारियों को घटाती नहीं वरन् उस नई विषाक्तता के शरीर में घुस पड़ने से नये-नये उपद्रव और खड़े होते हैं। सच तो यह है कि चिकित्सकों के शरणागत रहने वालों की अपेक्षा वे कहीं अधिक नफे में रहते हैं जिन्हें चिकित्सा का सौभाग्य या अभिशाप प्राप्त कर सकने का अवसर ही नहीं मिल सका।

शरीर शास्त्री अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि आरोग्य और रुग्णता की कुँजी मनःक्षेत्र में सुरक्षित है। मानसिक असन्तुलन और प्रदूषण का निराकरण किये बिना किसी को भी स्वस्थ शरीर का आनन्द नहीं मिल सकता। जीवनी शक्ति का पिछले दिनों बहुत गुणगान होता रहा है। उसे प्राप्त करने के लिए आकाश-पाताल के कुलावे भी मिलाये जाते रहे हैं। टॉनिकों, हारमोनों और ग्रन्थि आरोपणों जैसे प्रयोग परीक्षणों की भरमार रही है। किन्तु गरीबों की बात तो दूर कोट्याधीश, शासनाध्यक्ष एवं स्वयं चिकित्सकों तक को उस प्रयास में कुछ पल्ले न पड़ा। अब यह निर्णय निकला है कि जीवनी शक्ति कोई शरीर गत स्वतन्त्र क्षमता नहीं है वरन् जिजीविषा की मानसिक प्रखरता ही अपना परिचय जीवनी शक्ति के रूप में देती रहती है। मानसिक स्थिति के उतार-चढ़ावों के अनुरूप यह जीवनी शक्ति भी घटती बढ़ती रहती है। शरीर की बलिष्ठता, सक्रियता, स्फूर्ति ही नहीं कोमलता, सुन्दरता और कान्ति तक मानसिक स्थिति पर अवलम्बित है। विपन्नता की मनःस्थिति में भय, शोक, क्रोध आदि के अवसर आने पर तो तत्काल आकृति से लेकर शरीर की सामान्य स्थिति पर बुरा प्रभाव पड़ते प्रत्यक्ष देखा जाता है। यदि मनोविकार जड़ जमा लें तो समझना चाहिए कि शरीर एक प्रकार से विपन्नता में फंस ही गया और उसे दलदल से निकल सकना चिकित्सा उपचार के बलबूते की बात भी नहीं रह गई है।

अब आरोग्य दशा और रोग निवृत्ति को दोनों ही आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए मनःसंस्थान की खोज-बीन करना आवश्यक हो गया है और समझा जाने लगा है कि यदि मनुष्य के चिन्तन क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों की ओर ध्यान नहीं दिया गया। वहाँ जमी हुई वितृष्णाओं और विपन्नताओं का समाधान न किया गया तो आहार-विहार का सन्तुलन बनाये रहने पर भी रुग्णता से पीछा छूट नहीं सकेगा। चिकित्सा उपचार से भी मन बहलाने के अतिरिक्त और कुछ प्रयोजन सिद्ध हो नहीं सकेगा। अब क्रमशः औषधि उपचार का महत्व घटता जा रहा है और मानसोपचार को प्रमुखता दी जा रही है। मानसिक बीमारियों की पिछले दिनों अलग से गणना होती रही है और उनका क्षेत्र अलग रहा है। अब नये शोध प्रयोजनों ने कुछ दुर्घटना जैसे आकस्मिक कारणों से उत्पन्न होने वाले रोगों को ही शारीरिक माना है और लगभग समस्त बीमारियों को मनःक्षेत्र की प्रतिक्रिया घोषित किया है। गहरी खोजों के फलस्वरूप आरोग्य जैसे मानवी-जीवन के अति महत्वपूर्ण प्रयोजन पर नये सिरे से विचार करना होगा और आहार-विहार के ही गीत न गाते रहकर यह देखना होगा कि मनस्विता बनाये रहने के लिए क्या कुछ किया जा सकता है?

मानसिक विकृतियों में से सामयिक उलझनों के कारण तो बहुत थोड़ी-सी ही होती है। अधिकतर उनका कारण नैतिक होता है। छल, दुराव एवं ढोंग, पाखण्ड के कारण मनुष्य के भीतर दो व्यक्तित्व उत्पन्न हो जाते हैं। एक वास्तविक, दूसरी पाखण्डी। दोनों के बीच भयंकर अंतर्द्वंद्व खड़ा रहता है। दोनों एक-दूसरे के साथ शत्रुता बनाये रहते हैं और विरोधी को कुचलकर अपना वर्चस्व बनाने का प्रयत्न करते हैं। यह देवासुर संग्राम सारे मनःक्षेत्र को अशान्त उद्विग्न बनाये रहता है। इस विग्रह के फलस्वरूप अनेक रोग उठ खड़े होते हैं और वे वैसे ही मानसिक स्थिति बने रहने तक हटने का नाम नहीं लेते।

शारीरिक रोग प्रत्यक्ष होते हैं। इसलिए उनकी जानकारी भी सहज ही मिल जाती है और दवा दारू से इनका इलाज होने के भी साधन मौजूद रहते हैं। मानसिक रोगों के प्रायः विक्षिप्त, अर्धविक्षिप्त स्तर के ऐसे लोग गिने जाते हैं जो अपना सामान्य काम-काज चला सकने में असमर्थ हो गये हों, जिनका शरीर निर्वाह और लोक व्यवहार लड़खड़ाने और लटपटाने लगा हो जो अपने लिए और साथी सम्बन्धियों के लिए भार बन गये हों। ऐसे रोगियों की संख्या भी लाखों से आगे बढ़कर करोड़ की संख्या अपने ही देश में छूने लगी है। यह विज्ञान विक्षिप्त हुए हैं। ऐसे लोगों की संख्या का कोई ठिकाना नहीं जो रोजी-रोटी तो कमा लेते हैं और खाते-सोते समय भी साधारण लगते हैं, पर उनका चिन्तन विचित्र और विलक्षण होता है। कितने ही दुष्टता की भाषा में सोचते और हर किसी पर दोषारोपण करते हुए शत्रुता की परिधि में लपेटते हैं। कितने ही आशंकाओं, सन्देहों, आक्षेपों के इतने अभ्यस्त होते हैं कि उन्हें अपनी पत्नी, बेटी, बहिन आदि तक के चरित्र पर अकारण संदेह बना रहता है। सम्बन्धियों और पड़ौसियों को अपने विरुद्ध कुचक्र रचते हुए देखते हैं। दुर्भाग्य और ग्रह-नक्षत्रों के प्रकोप से कितने हर घड़ी कांपते रहते हैं और विपत्ति का पहाड़ अपने ऊपर टूटता ही अनुभव करते रहते हैं। शेख चिल्लियों के से मनसुये बाँधते रहने वाले, सम्भव, असम्भव का विचार किये बिना अपने सपनों की एक अनोखी दुनिया बनाये बैठे रहते हैं। न अपनी पटरी दूसरों के साथ बिठा पाते हैं न किसी और को अपना घनिष्ठ बनने का अवसर देते हैं। परिस्थिति का मूल्यांकन कर सकना-दूसरों की मनःस्थिति और परिस्थिति समझ सकना उनके लिए सम्भव ही नहीं होता। अटपटे अनुमान लगाते और बेतुके निष्कर्षों पर पहुँचते हैं। विचार जो भी उठें वे एक पक्षीय सनक की तरह बिना किसी तर्क-वितर्क का आश्रय लिये बेलगाम के घोड़े पर चढ़कर दौड़ते चले जाते हैं। जो सोचा जा रहा है उसका आधार क्या है-और उस सनक पर चढ़े रहने का अन्ततः परिणाम क्या निकलेगा इतना समझ पाना उनके क्षत-विक्षत मस्तिष्क के लिए सम्भव ही नहीं होगा। अकारण मुँह लटकाये बैठे रहने वाले, जिस-जिस पर दोषारोपण करने वाले, दुर्भाग्य की कुरूप तस्वीरें गढ़ने में उन्हें देर नहीं लगती। दुनिया को निस्सार बताने वाले, आत्म-हत्या की बात सोचते रहने वालों की संख्या अपने ही इर्द-गिर्द ढेरों मिल सकती हैं। हंसी-खुशी से उनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। कहीं न कहीं से मुसीबत की कल्पना ढूँढ़ लाते हैं और स्वयं दुख पाते, साथियों को दुख देते, जिन्दगी की लाश ढोते रहते हैं। यह सनक कभी-कभी आक्रामक हो उठती है तो जो भी उनकी चपेट में आता है उसे सताने में कसर नहीं छोड़ते। मित्र को शत्रु और शत्रु को मित्र समझने में उनकी अदूरदर्शिता पग-पग पर झलकती रहती है। ठगों के आये दिन शिकार होते रहते हैं। आयु बड़ी हो जाने पर भी सोचने का तरीका बालकों जैसा ही बना रहता है। किसी महत्वपूर्ण प्रसंग में उनका परामर्श तनिक भी काम का सिद्ध नहीं होता। अपनी कार्य पद्धति को किसी उद्देश्य के साथ जोड़ सकना उनसे बन नहीं पड़ता। जैसे-तैसे समय गुजारते हुए-ज्यों-त्यों करके ही मौत के दिन पूरे कर लेते हैं। इन्हें पागल तो नहीं कह सकते, पर व्यक्तित्व की परख की दृष्टि से उससे कुछ अच्छी स्थिति में भी उन्हें नहीं समझा जा सकता।

विक्षिप्त-अर्धविक्षिप्त और विक्षिप्तता के सन्निकट-सनकी लोगों से प्रायः आधा समाज भरा पड़ा है। मूढ़ मान्यताओं-कुरीतियों, अन्धविश्वासों से जकड़े हुए लोगों में तर्क शक्ति एवं विवेक बुद्धि का अभाव रहता है। उनके लिए अभ्यस्त ढर्रा ही सब कुछ होता है। उस लक्ष्मण रेखा से बाहर जाने में उन्हें भय लगता है। स्वतन्त्र चिन्तन का प्रकाश उनकी आँखें चौंधिया देती हैं और औचित्य को समझने स्वीकार करने जैसा साहस उनके जुटाये जुट ही नहीं पाता। इस वर्ग के लोगों को मानसिक दृष्टि से अविकसित नर-पशुओं की श्रेणी में ही रखा जा सकता है।

शरीर से असमर्थों, दुर्बलों और रुग्णों की ही तरह मानसिक पिछड़ेपन और विकारग्रस्तता के दल-दल में धंसे हुए लोगों का ही बाहुल्य अपने समाज में दृष्टिगोचर होता है। यह विक्षिप्तता भी एक प्रकार की बीमारी ही है जिसमें प्राणियों को तिरस्कार, असन्तोष, अभाव एवं चित्र-विचित्र प्रकार के दुख सहने पड़ते हैं।

विचारणीय है कि यह सब होता क्यों है? मनुष्य का प्रत्यक्ष कोई दोष दिखाई नहीं पड़ता। जान-बूझकर ऐसा कुछ किया हो जिससे उन शारीरिक व्याधियों और मानसिक आधियों का दुःख सहना पड़े ऐसा कुछ सूझ नहीं पड़ता। फिर ईश्वर ने ऐसी विचित्र संरचना क्यों की? किसी को ऐसा-किसी को वैसा क्यों बनाया? इसका भी कोई उत्तर नहीं हो सकता। ईश्वर न तो अन्यायी है न उसकी सृष्टि में अन्धेरगर्दी, अव्यवस्था। दूसरी ओर इन व्याधिग्रस्त लोगों का ऐसा कोई प्रत्यक्ष कसूर भी नहीं दीख पड़ता, जिसका दण्ड भुगतने जैसी बात कही जा सके।

इस असमंजस का समाधान मनःशास्त्र के आचार्य एक ही शोध निष्कर्ष के आधार पर देते हैं कि अनैतिक एवं असामाजिक चिन्तन और कर्तृत्व से मनःक्षेत्र में उत्पन्न होने वाला अंतर्द्वंद्व दुहरा व्यक्तित्व रच देता है और उससे निरन्तर उठने वाली आन्तरिक कलह सारे मनोभूमि को क्षत-विक्षत करके रख देती है। संचालक को आहत, घायल, उद्विग्न होने पर उसके आधीन काम करने वाले तन्त्र की दुर्दशा होना स्वाभाविक है। शरीर के अनाचार और मस्तिष्क के मनोविकार ही वे कारण हैं जिनके कारण आत्म-सत्ता का स्वसंचालित तन्त्र अनेकानेक प्रकार के आत्म-दण्डों की व्यवस्था अपने आप ही कर लेता।

नरक का अधिपति पुराणों में चित्रगुप्त को कहा गया है। वर्णन है कि इन चित्रगुप्त के बही खातों में मनुष्य के सभी कर्म निरन्तर लिखे जाते रहते हैं। उन अभिलेखों के आधार पर भगवान चित्रगुप्त प्रत्येक प्राणी के लिए दण्ड पुरस्कार की व्यवस्था करते हैं। यह चित्रगुप्त विज्ञान की विवेचना के अनुसार अचेतन मन ही है जिसकी अत्यन्त सम्वेदनशील कोशाओं के ऊपर मनुष्य के भले-बुरे कर्म टेपरिकॉर्डर के फीते अथवा फोटोग्राफी की प्लेट की तरह अंकित होते रहते हैं। समयानुसार वे प्रकट एवं फलित होते हैं तो उनकी प्रतिक्रिया का परिचय शारीरिक एवं मानसिक रोगों के रूप में सामने आता है। इन दो व्यथाओं के साथ तीसरी एक और भी अनायास ही जुड़ जाती है, वह है सामान्य जीवन में पग-पग पर असफलता।

गंगा और यमुना दो के संगम पर एक तीसरी सरस्वती कहीं पाताल में से अनायास ही प्रकट होकर उस समागम के स्थान पर आ धंसी है। ठीक इसी तरह शारीरिक व्याधियाँ और मानसिक आधियाँ जिसे घेरे हुए हैं, उस विकृत मस्तिष्क और अस्वस्थ शरीर के द्वारा न कुछ उपयुक्त सोचते बन पड़ेगा और न उचित कर सकना सम्भव होगा। अतएव अपनी अटपटी कानी-कुबड़ी गतिविधियाँ किसी महत्वपूर्ण सफलता तक पहुँचने ही न देंगी सम्बन्धित व्यक्ति उस बेतुके व्यक्ति से खिंचते, खीजते रहेंगे। फलतः सच्चे सहयोग से भी प्रायः वंचित ही रहना पड़ेगा। मतभेद बढ़ते-बढ़ते शत्रुता और विग्रह तक जा पहुँचते हैं और आक्रमण, प्रत्याक्रमण के कुचक्र में ऐसे व्यक्ति को भारी घाटा उठाना पड़ता है। प्रगति पथ तो प्रायः अवरुद्ध ही बना रहता है। यह नई विपत्ति शारीरिक और मानसिक रुग्णता की ही देन है। दो रंगों के मिलने से तीसरा एक और नया रंग प्रकट हो जाता है। आधि और व्याधि ग्रस्तों को अवरोध और असफलता का तीसरा संकट अतिरिक्त रूप से सहन करना पड़ता है।

शारीरिक रोग, मानसिक उद्वेग और सफलता के अवरोध का त्रिविध समन्वय कितना कष्ट कर और सन्तापदायक होता है उसे भुक्तभोगी ही जानता है। जिन्हें इन संकटों का त्रास सहना पड़ता है उनके लिए इस विपन्नता का प्रत्यक्ष नरक के रूप में ही अनुभव होता है। यमलोक के अधिपति चित्रगुप्त को-अचेतन मन ही समझा जाना चाहिए। उनका कार्य यमलोक वह मनःसंस्थान ही है जिसमें प्रतिफल को परिणित कर सकने की ईश्वर प्रदत्त क्षमता मौजूद है। यम-नियमन-व्यवस्था एवं अनुशासन को कहते हैं। मस्तिष्क को यमलोक और उसकी मूल भूत सत्ता चित्त को चित्रगुप्त की संज्ञा देकर शास्त्रकारों ने स्थिति का सर्वथा सही चित्रण किया है। ईश्वर ने सर्वत्र स्वसंचालित पद्धति रखी है। ताकि न्याय व्यवस्था का अलग से अतिरिक्त झंझट न उठाना पड़े। अपनी ही सत्ता का एक पक्ष कर्म करता है और दूसरा उसका प्रतिफल गढ़ कर तैयार कर लेता है। बाहर के न्यायाधीश को तो भ्रम में भी डाला जा सकता है, पर अन्तस् बैठे हुए हर दृष्टा की निष्पक्ष न्यायशीलता को झुठलाना तो किसी के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता।

इतना सब जान लेने के उपरान्त हमें एक ही निश्चय निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि चेतन की मूल सत्ता अन्तःकरण को प्रभावित करने वाले नैतिक और अनैतिक विचार एवं कर्म ही हमारी भली और बुरी परिस्थितियों के लिए पूर्णतया उत्तरदायी हैं। इसी उद्गम से हमारे उज्ज्वल भविष्य का आधार खड़ा होता है और यहीं से विपत्तियों के जाल गिराने वाली दुःखद सम्भावनाएं विनिर्मित होती हैं। इस मूल केन्द्र का परिशोधन करना ही एक प्रकार से आन्तरिक काया-कल्प जैसा प्रयास है। प्रस्तुत संकटों से छुटकारा पाने और निकट भविष्य में फलित होने वाले संचित प्रारब्धों का निराकरण करने के लिए आन्तरिक परिशोधन का प्रयास इतना अधिक आवश्यक है कि उसे अनिवार्य की संज्ञा दी जा सकती है और कहा जा सकता है कि विष वृक्ष की जड़ काटने से ही काम चलेगा। टहनियाँ तोड़ने और पत्तियाँ गिराने से स्थायी समाधान बन नहीं पड़ेगा।

साधारणतया समझाने-बुझाने की पद्धति ही सुधार परिवर्तन के लिए काम लायी जाती है, पर देखा यह गया है कि भीतरी परतों पर जमे हुए कुसंस्कार इतने गहरे होते हैं कि उन पर समझाने-बुझाने का प्रभाव बहुत ही थोड़ा पड़ता है। देखा जाता है कि नशेबाजी जैसी आदतों से ग्रसित व्यक्ति दूसरे अन्य समझदारी की तरह ही उस बुरी आदत की हानि स्वीकार करते हैं। दुःखी भी रहते हैं और छोड़ना भी चाहते हैं, पर उस आन्तरिक साहस का अभाव ही रहता है जिसकी चोट से उस अभ्यस्त कुसंस्कारिता को निरस्त किया जा सके। इस विवशता से कैसे छूटा जाय? इसका उपयुक्त उपाय सूझ ही नहीं पड़ता। लगता रहता है कि कोई दैवी दुर्भाग्य ऐसा पीछे पड़ा है जो विपत्ति से उबरने का कोई आधार ही खड़ा नहीं होने देता। पग-पग पर अवरोध ही खड़े करता और संकट पटकता भी वही दीखता है। यह दुर्भाग्य और कोई नहीं, अपने अन्तरंग पर छाये हुए कषाय-कल्मष कुसंस्कार ही हैं, जो अभ्यास और स्वभाव का अंग बन जाने के कारण छुड़ाये नहीं छूटते और पटक-पटककर मारते हैं। नरक के यमदूतों जैसा त्रास देते हैं। इस विपन्नता को उलटने का समर्थ उपचार आन्तरिक परिशोधन ही है। इस अन्तस् के काया-कल्प के लिए जितने भी उपाय खोजे गये हैं उनमें तत्वदर्शियों ने अपने अनुभवों के आधार पर चान्द्रायण तपश्चर्या को सर्व सुलभ और अत्यन्त प्रभावशाली पाया है।


Quotation

शरीर जैः कर्म दोषैर्द्याति स्थावरतां नरः। वाचिकैः पक्षि मृगतां मानसै रन्य जातिताम्॥

इह दुश्चरितैः केचित्केचित् पूर्व कृतैस्तिथा। प्राप्नुवन्ति दुरात्मानों नरा रूपं विपर्ययम्॥

-मनु0

शारीरिक पाप कर्मों से जड़ योनियों में जन्म होता है। वाणी पाप से पशु-पक्षी बनना पड़ता है। मानसिक दोष करने वाले मनुष्य योनि से बहिष्कृत हो जाते हैं। इस जन्म के अथवा पूर्व जन्म के किये हुए पापों से मनुष्य अपनी स्वाभाविकता खोकर विद्रूप बनते हैं।

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कर्मफल भोगे बिना छुटकारा नहीं

कर्मफल की व्यवस्था सृष्टि की स्थिरता का सुनिश्चित आधार है। दुष्कर्मों के दुष्परिणाम भुगते बिना और कोई गति नहीं। सामान्य पूजा उपचारों से उनकी निवृत्ति संभव नहीं। दण्ड पाने से पूर्व स्वेच्छापूर्वक क्षति पूर्ति करने की प्रायश्चित्त व्यवस्था अपना लेना, मनुष्य के सत्साहस का चिन्ह है।

आत्मनैव कृतं कर्म ह्यात्मनैवोपभुज्यते। इह वा प्रेत्य वा राजंस्त्वया प्राप्त यथा तथा ॥ (महा0 भीष्म0 अ॰ 77)

आत्म से अर्थात् स्वयं किया हुआ कर्म आत्मा से ही अर्थात् स्वयं ही भोगता, चाहे इस जगत में, चाहे परलोक में अपना ही भोगता है ।4।

नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्प कोटि शतैरपि। अवश्यं एवं भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्॥

बिना भोग के सौ करोड़ कल्प तक भी कर्म का नाश नहीं होता। जो कुछ किया है, उसका फल जरूर भोगना पड़ेगा। इस भोग का कारण कर्त्तृत्वाभिमान है, जीव अभिमान के वशीभूत होकर सोचता है कि मैं ही कर्त्ता हूँ, किन्तु वास्तव में जीव अकर्त्ता है।

स्वयमात्सकृतं कर्म शुभं वा यदि वाऽशुभम्। प्राप्ते काले तु तत्कर्म दृश्यते सर्व देहिनाम्॥ हरि0 पु0 उग्रसेन अभि0 25

संसार के सम्पूर्ण प्राणियों को अपने कर्मों का फल भुगतना ही पड़ता है। चाहे वह शुभ कर्म हो या अशुभ कर्म हो। शुभ कर्मों का परिणाम सुखद होता है और अशुभ कर्मों का फल दुःखद होता है।

यत् करोत्यशुभं कर्म शुभं वा यदि सत्तम । अवश्यं तत् समाप्नोति पुरुषो नात्र संशयः॥

मनुष्य जो शुभ या अशुभ कार्य करता है, उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है, इसमें संशय नहीं है।

स्वयं कर्म करोत्यात्मा स्वयन्तत्फलमश्नुते। स्वयं भ्रमति संसारे स्वयन्तस्माद्विमुच्यते॥ - चाणक्य

जीव आप ही कर्म करता है, उसका फल भी आप ही भोगता है, आप ही संसार में भ्रमण करता है और आप ही उससे मुक्त भी होता है, इसमें उसका कोई साझी नहीं।

तस्मिन् वर्षे नरः पापं कृत्वा धर्म्मच भो द्विजाः। अवश्य फलमाप्नोति अशुभस्य शुभस्य च॥

- ब्रह्म पुराण

मनुष्य पाप कर्म करके तथा धर्म का कर्म करके अवश्य ही फल प्राप्त किया करता है चाहे वह कोई शुभ कर्म करे तो उसका अच्छा फल उसे अवश्य मिलता है और चाहे वह अशुभ कर्म करे तो उसका भी वह फल प्राप्त किया करता है।

सुखं वा यदि वा दुःख यत्किंचत क्रियते परे । ततस्तत्तू पुनः पश्चात सर्वात्मनि जायते॥ -दक्ष स्मृति 21

सुख या दुःख जो भी दूसरों के लिए किये जाते है वे कुछ बाद में पीछे सब अपने ही लिए उत्पन्न होते हैं।

यथा मृत्पिण्डतः कर्ता कुरुते यद्यदिच्छति। एवमात्मकृतं कर्म मानवः प्रतिपद्यते।

यथा छाया तपौ नित्यं सुसम्बद्धौ निरन्तरम। यथा कर्म च कर्ता च सम्बद्धावात्मकर्मभिः॥ (म॰ अनु0 प॰ अ॰ 1।74।75)

जैसे मिट्टी के पिण्ड के कर्ता (कुम्हार) जो-जो चाहता है सो-सो करता है उसी प्रकार मनुष्य अपने किये हुए कर्मानुसार फल प्राप्त करता है। जैसे छाया एवं धूल निरन्तर नित्य साथ हैं वैसे ही कर्म और कर्ता अपने लिए कर्मों से बंधे हैं।

शुभानामशुभानां च नेह नाशोस्ति कर्मणाम्। प्राप्यप्राप्यानुपच्यन्ते क्षेत्रं क्षेत्रं तथा तथा। क्षेत्रं कर्मजमाप्नोति शुभं वा यदि वाऽशुभम्॥ (म॰ आश्वमे0 प॰ अ॰ 18।5)

इस संसार में शुभ और अशुभ कर्मों का नाश नहीं होता। यथा खेत-खेत को प्राप्त कर पकता जाता है फल लाता जाता है। इसी प्रकार कर्मों के पाक या फल का भी क्रम चलता रहता है। तदनुसार ही शुभ एवं अशुभ शरीर को मनुष्य कर्मानुसार प्राप्त किया करता है।

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आकस्मिक विपत्तियों और दुर्घटनाओं की परोक्ष पृष्ठभूमि

कितनी ही बार मनुष्य के सामने आकस्मिक विपत्तियों और दुर्घटनाओं का एक ऐसा कुचक्र सामने आ खड़ा होता है कि उनने जूझने वाला यह नहीं समझ पाता कि आखिर संकटों के बरसने का कारण क्या हो सकता है? अपनी कोई तात्कालिक भूल ऐसी दिखाई नहीं पड़ती जिसके फलस्वरूप वह विपत्ति सिर पर टूटती। व्यक्तियों द्वारा पहुँचाई गई हानि को शत्रुता कहा जा सकता है और शत्रु को नरम करने के लिए ठण्डा या गरम उपाय बरता जा सकता है। पर जिस संकट में प्रत्यक्षतः किसी व्यक्ति का हाथ नहीं दीखता उसके लिए निमित्त का क्या अनुमान लगाया जाय?

ईश्वर का अव्यवस्था नियम विधान में अन्धेरगर्दी न कहते बन पड़े तो फिर दूसरा विकल्प देवी-देवताओं का ग्रह नक्षत्रों का प्रकोप सूझता है। संयोगवश उसकी पूरी शतरंज बिछाकर बैठे हुए ऐसे एजेन्ट भी मिल जाते हैं जो आकस्मिक विपत्तियों को भूत-पलीतों, देवी-देवताओं, ग्रह-नक्षत्रों का प्रकोप बताकर उनसे सन्धि समझौता करा देने की फीस वसूल करते हैं और अपने को उन अदृश्य सत्ताओं का प्रतिनिधि बताते है। यह सब करते हुए भी वे इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे पाते कि उन अदृश्य शक्तियों ने ऐसा निर्मम आक्रमण आखिर किया क्यों? उनका जब कुछ बिगड़ा ही नहीं गया था तो उन्हें मनुष्य की तुलना में अच्छी स्थिति प्राप्त कर लेने पर भी ऐसी निर्दयता का व्यवहार अकारण ही क्यों करना चाहिए था?

शंकाशील मन और भी ऐसे ही बैठे-ठाले अन्य विसंगतियाँ सोचता रहता है। अमुक्त ने उनके ऊपर जादू मन्त्र चला दिया है। तन्त्र क्रिया कर दी है। ऐसे लोक तांत्रिकों डाकिनों की करतूत की आशंका करते हैं। प्रश्न यहाँ भी यही उठता है जब हमने उनकी कोई हानि नहीं की तो फिर वे हमें क्यों त्रास देते है। पूजा उपासना करने वाले, तन्त्र-मन्त्र जानने वाले को आखिर इतना विचारशील तो होता ही चाहिए किसी को अकारण क्षति न पहुँचाये। गाड़ी यहाँ अटक जाती है तो दूसरा अनुमान लगाते हैं। किसी ने लोभ देकर उनसे ऐसा कराया होगा वे डराकर कुछ प्राप्त करना चाहते होंगे। दुर्भाग्य जैसी आकस्मिक दुर्घटनाओं के सम्बन्ध में प्रायः इसी स्तर के अनुमान लगाये जाते रहते हैं। इतने पर भी तथ्यतः निरर्थक होने के कारण उनसे किसी का वास्तविक समाधान नहीं होता। निदान के लिए इन कुकल्पनाओं का सहारा लेने पर भी असमंजस बना ही रहता है। आधे-अधूरे मन से ऐसी विसंगतियाँ बिठाने पर भी चित्त का वास्तविक समाधान होता नहीं। औंधे सीधे अनुमान सदा संदेहास्पद ही बने रहते हैं।

अप्रत्याशित ओर आकस्मिक दुर्घटनाओं के पीछे प्रायः संचित कर्मों का, सामयिक प्रतिक्रिया का यकायक बरस पड़ना ही कारण होता है। जलाशय से भाप उठती है। सघन होकर बादल बनती है, बादल हवा के साथ इधर-उधर भ्रमण करते रहते हैं। जब वे भारी होकर घटा बनते हैं और परिस्थितियाँ उन्हें नीचे उतरने के लिए विवश करती हैं तो भूमि के समीप आकर बरसना आरम्भ कर देते है। भाप उठने के स्थान और समय की बरसने के स्थान और समय के साथ तुलना की जाय तो दोनों के बीच बहुत दूरी और विसंगति दीखती है। फिर भी जानकारों को यह स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं होती कि एक समय का भाप उठाना ही दूसरे समय का घटा बरसना है। मनुष्य के प्रारब्ध कर्म अपने परिपाक का समय बीतने पर जब विपत्ति के रूप में बरसते है तो उनको दुर्भाग्य या दुर्घटना का नाम दिया जाता है। मनुष्य कृत पहुंचाई गई हानि की तो शत्रुता, आक्रमण, अत्याचार, प्रतिशोध आदि कहा जा सकता है, पर जिसमें किसी का हाथ नहीं है जो विपत्तियाँ अप्रत्याशित रूप से बरसीं, उन्हें सृष्टा की अव्यवस्था न मानना हो तो फिर सुनिश्चित और समाधान कारक उत्तर एक ही हो सकता है। संचित प्रारब्ध कर्मों की प्रतिक्रिया। इसी का प्राचीन ऋषि प्रणीत नाम भाग्य प्रारब्ध कर्म परिपाक आदि है।

तत्काल कर्मफल न मिलने पर भी किसी को यह अनुमान नहीं लगा लेना चाहिए कि परिपाक की अवधि पूरी होने पर इसी प्रकार बिना दण्ड पाये, छुट्टल घूमते रहने का अवसर मिलता रहेगा। अनेक को जन्म से ही अन्धे, अपंग स्थिति में जन्म लेते देखा जाता है। कई मानसिक दृष्टि से अविकसित और विपन्न परिस्थितियों में जकड़े होते हैं। इनमें उनका सामयिक दोष कुछ भी नहीं होता। इसी प्रकार कितने ही कला-कौशल बुद्धि चातुर्य, प्रतिभा, सुन्दरता, उत्तराधिकार जन्य सुविधा आदि की विशेषताएँ जन्म से ही लेकर आते है। इसमें उनके अभिभावकों अथवा परिस्थितियों का श्रेय सहयोग नहीं वरन् दैवी अनुग्रह ही काम कर रहा होता है। यह दैवी अनुग्रह और कुछ नहीं मनुष्य के संचित शुभ-अशुभ कर्म ही होते है। दैवी अनुग्रह शब्द का उपयोग करते समय इस स्थान पर प्रारब्ध हो ही प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए और उसे ही श्रेय मिलना चाहिए। दुर्भाग्य के दैवी प्रकोप को भी अशुभ प्रारब्ध का परिपाक कहना ही उचित है। देवता स्वेच्छाकार नहीं बरत सकते। अकारण कोप परितोष करना उनकी सामर्थ्य में ही नहीं है। सृष्टा वे सुनियोजित विविध व्यवस्था में जब अपने आप तक को कड़े बन्धनों में बाँध कर रखा है तो वह मनुष्यों से लेकर देवताओं तक को अकारण स्वेच्छाकार बरतते रहने की छूट नहीं दे सकता है। देवता भी इस विश्व व्यवस्था का उल्लंघन नहीं कर सकते। आकस्मिक दुर्घटनाओं, विपत्तियों और संकटों के पीछे और कोई नहीं मात्र मनुष्य के अपने कृत कर्म ही काम कर रहे होते हैं। भाग्योदय के सम्बन्ध में भी यही बात है। आकस्मिक उपलब्धियाँ और सफलताएँ वे कहलाती है जो बिना पर्याप्त पुरुषार्थ किये सहज ही अपनी ओर बढ़ती चली जाती हैं जबकि प्रबल पुरुषार्थ करने वाले भी अभीष्ट सफलता प्राप्त कर नहीं पाते तब कितने ही व्यक्ति आशातीत उपलब्धियाँ नाम मात्र के प्रयत्न से ही प्राप्त कर लेते हैं। तब इस अप्रत्याशित को संचित प्रारब्ध के अतिरिक्त और नाम नहीं दिया सकता। अन्य कारण ढूँढ़ना हो तो अव्यवस्था और नास्तिकता ही विकल्प रह जाता है।

प्रारब्धवश जो संकट आ गये- जिनके आने की आशंका या सम्भावना है, उनका पूर्व निराकरण करने के लिए उसी स्तर की रोकथाम की जा सकती है। उस उपचार प्रक्रिया में तपश्चर्या ही एक मात्र उपाय है। तपश्चर्याओं में सरलता और प्रमुखता चान्द्रायण साधना का दी गई है। यह एक प्रबल पुरुषार्थ है जिसकी गर्मी से कुसंस्कारों को जलाना और बीज रूप में विद्यमान सुसंस्कारों को विकसित कर सकना सम्भव हो सकता है। चान्द्रायण किसी की मनुहार नहीं है और उसके सहारे किसी देवता को प्रसन्न करके सस्ते मोल में बड़े वरदान पाने की विडम्बना है। इसे विशुद्ध विज्ञान सम्मत प्रयास पुरुषार्थ कहा जा सकता है और यह आशा की जा सकती है कि उससे प्रारब्ध विधान में आवश्यक उलट पुलट किया जा सकना सम्भव है। जब गोली लगे घायलों की जान बचाई जा सकती है और कुरूपों की प्लास्टिक सर्जरी करके उनके अवयवों को सुन्दर बनाया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि विधि के विधान को- सृष्टि के उच्चस्तरीय सिद्धान्तों को अपनाकर उनमें आवश्यक हेर फेर न किया जा सके। इससे कर्मफल के सिद्धान्त को काटने जैसी कोई बात नहीं है। आगत और अनागत विपत्तियों से जूझने का- उनका समाधान और निराकरण करने के लिए मनुष्य को सत्साहस मिला है। तलवार की मारक शक्ति सर्वविदित है, पर उससे आत्म-रक्षा करने के लिए ढाल का भी आविष्कार हुआ है। कर्म विधान को, प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलने के लिए चान्द्रायण जैसी तपश्चर्याओं का आदेश शास्त्रकारों ने दिया है और वे तथ्य एवं अनुभव पर आधारित हैं।

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अनेक संकटों के कारण मनुष्य के संचित पाप कर्म

शारीरिक रोग मानसिक विक्षेप, दरिद्रता, दुर्घटना, अकाल मृत्यु, विपत्ति, संकट आदि अनेक आकस्मिक आपत्तियों के कारण प्रायः पूर्व संचित पाप ही होते हैं। उनका कारण मात्र व्यवहार व्यतिक्रम ही नहीं होता वरन् संचित पाप प्रारब्ध की भी बहुत बड़ी भूमिका होती है। मरने के उपरान्त नरक, प्रेतयोनि, निकृष्ट योनियों में जन्म जैसी दुर्गतियों का कारण भी यह कुसंस्कारी संचय ही होता है। शास्त्र कहता है -

पापेन जायते व्याधिः पापेन जायते जरा। पापेन जायते दैन्यं दुःखं शोको भंयकरः॥

पाप से व्याधि वृद्धत्व, दीनता, दुःख और भयंकर शोक की प्राप्ति होती है। छोटे और बड़े पापों के क्रम से छोटे और बड़े फल प्राणी को भोगने पड़ते हैं।

आत्मापराधवृक्षस्य फलान्येतानि देहिनाम्। दारिद्रयदुःखरोगानि बन्धनव्यसनानि च॥ -चाणक्य

मनुष्यों को अपने अपराध रूपी वृक्ष से दरिद्रता, रोग दुःख बन्धन और विपत्ति आदि फल मिलते है।

उभयमेव तत्रोपयुज्जते फलं धर्मस्यैवेतरस्य च॥ -महाभारत

राजन! धर्म और पाप दोनों के पृथक-पृथक फल होते हैं और उन दोनों का ही उपभोग करना पड़ता है।

आचराल्लभते ह्यायुराचारादीपप्सिताः प्रजाः। आचाराद्धनमक्षयमाचारो हन्त्यलक्षणम्॥ दुराचारो हि पुरुषो लोके भवति निन्दितः। दुःखभागी च सततं व्याधितोऽल्पायुरवे च॥ -मनु0

श्रेष्ठ आचरण का जीवन जीने वाला दीर्घजीवी होता है। श्रेष्ठ सन्तान पाता और सम्पन्नता प्राप्त करना है। बुरों को भी सुधार देता है।

दुराचारी निन्दित होता है। दुःख भोगता है। अल्पजीवी होता है। रोगी रहता है।

पादन्यासकृतं दुःखकण्टकोत्थंप्रयच्छति। तत्प्रभूतरस्थूलशकुकीलसम्भवनम्॥ दुःखंयच्छतितद्वच्चशिरोरोगादिदुःसहम्। अपथ्याशनशीतोष्णश्रमतापादिकारकम्॥ -मार्कण्डेय पुराण

पैर में काँटा लगने पर एक ही जगह पीड़ा होती है। पर पाप कर्मों के फल से तो शरीर और मन में निरन्तर शूल उत्पन्न होते रहते हैं।

स्वमलप्रक्षयाद्यद्वदग्नौ धास्यन्ति धावतः। तत्र पापक्षयात्पापा नराः कर्मानुरुपतः॥ -शिव पुराण

धातुओं के मैल को हटाने के लिए जैसे उन्हें तीक्ष्ण अग्नि में रखते हैं, उसी तरह पापी प्राणियों को पाप-नाश के उद्देश्य से ही अपने कर्मों के अनुसार ही नरकों में गिराया जाता है।

कलौ प्रेतत्वमाप्नोति तार्क्ष्याशुद्ध क्रिया परः। रूतादौ द्वापरं यावन्न प्रेतौ नैव पीडनम्॥ -गरुड़ पुराण

कलियुग में मनुष्यों के रहन-सहन के अशुद्ध हो जाने से वे प्रेतत्व को प्राप्त होते हैं। सतयुग द्वापर आदि में न कोई प्रेत बनता था न किसी को प्रेत सम्बन्धी पीड़ा होती थी।

दुर्भिक्षादेवदुर्भिक्षक्लेशात्क्लेशंभयाद्भम्। मृतेभ्यः प्रमृतायान्तिदरिद्राः पापकर्मिणः॥18॥

जो पापी हैं, वे दरिद्र होते हैं। क्लेश, भय और संकट संतापों से घिरे रहते हैं और बेमौत मरते हैं। पुण्यात्माओं के उनके शुभ कर्मों के सत्परिणाम अनेक सुख-साधनों के रूप में उपस्थित होते रहते हैं।

आधिक्षयेणाधिभवाः क्षीयन्ते व्याधयोऽप्यलम्। शुद्धया पुण्यया साधो क्रियया साधुसेवया।

मनः प्रयाति नैर्मल्यं निकषेणेव कांचनम। आनन्दो वर्धते देहे शुद्धे चेतसि राधव।

सत्वशुद्धता वहन्त्येते क्रमेण प्राणवायवः। जरयन्ति तथान्नाति व्याधिस्तेन विनश्यति॥

-योग वशिष्ठ

शरीर के रोग ‘व्याधि’ और मन के रोग ‘आधि’ कहलाते है। इन दोनों के उत्पन्न होने का कारण विवेक की कमी और मूर्खता की प्रबलता ही है।

जब अविवेक के कारण मनुष्य का मन बेकाबू हो जाता है तो नाना प्रकार की तीव्र वासनाएँ उठती हैं। उन्हें पूरा करने के लिए अखाद्य करता है। अगम्य गमन (अनुचित काम सेवन) करता है। अनियमितता और अस्त व्यस्तता बरतता है, दुष्ट संग करता है और मस्तिष्क में बुरे विचार भरे रहता है।

इससे उसकी नाड़ियाँ शिथिल हो जाती हैं, अंग काम करना छोड़ देते हैं। प्राण शक्ति का संचार अस्त व्यस्त हो जाता है। इन परिस्थितियों में शरीर की स्थिति गड़बड़ा जाती है और नाना प्रकार के दुखदायक रोग उत्पन्न होते है।

मानसिक विकारों से शरीर रुग्ण होता है। उन विकारों के दूर होने से शरीर निरोग हो जाता है।

ब्रह्महा नरकस्यान्ते पाण्डुः कुष्ठी प्रजायते। कुष्ठी गोवधकारी……

बालघाती च पुरुषो मृतवत्सः प्रजायते। गर्भपातनजा रोगा यकृत्प्लीहा जलोदराः।

प्रतिमाभंगकारी च अप्रतिष्ठः प्रजायते।

विद्यापुस्तकहारी च किल मूकः प्रजायते। ओषधस्यापहरणे सूर्यावर्तः प्रजायते। -शातातपस्मृति

अर्थात् ब्रह्म हत्या करने वाला नरक भोगने के अन्त में श्वेतकुष्ठी, गो हत्यारा गलिककुष्ठी, बालकों की हत्या करने वाला, मृत सन्तान वाला, गर्भपात कराने वाला, यकृत तिल्ली एवं जलोदर का रोगी, मूर्ति खण्डित करने वाला अप्रतिष्ठित विद्या और पुस्तकों को चुराने वाला गूँगा, औषधियों को चुराने वाला आधाशीशी का रोगी होता है।

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः। स्थाणुमन्ये ऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथा श्रुतम्॥

अपने कर्म और ज्ञान के अनुसार कितने ही देहधारी तो शरीर धारण करने के लिए किसी देव, मनुष्य, पशु-पक्षी आदि योनि को प्राप्त होते हैं और कितने ही स्थावर भाव (कृक्षादियोनि) को प्राप्त होते हैं।

तद् य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योतिमापद्येरन् ब्राह्मणयोनि वा क्षत्रिययोनिक वा वैश्वयोनिवाथ य इह कपूयचरणा अभ्याशो ह यत्ते कपूयाँ योनिमापद्येरन -छांदोग्य 5-10-7

अर्थात् अच्छे आचरण वाले उत्तम योनि प्राप्त करते हैं और नीच कर्म करने वाले नीच योनियों में जन्मते हैं।

‘पुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन।’

अर्थात् निश्चय ही यह जीव पुण्य कर्म से पुण्यशील होता। पुण्य-योनि में जन्म पाता है और पाप कर्म से पाप शील होता- पाप योनि में जन्म ग्रहण करता है।

‘साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति।’

अर्थात् अच्छे काम करने वाला अच्छा होता है सुखी एवं सदाचारी कुल में जन्म पाता है और पाप करने वाला पापात्मा होता है- पाप योनि में जन्म ग्रहण करके दुःख उठाता है।

महाभारत वन पर्व में कहा है :-

जातिमृत्युजरादुःखै, सततं समाभिद्रुतः। संसारे पच्यमानश्च दोषैरात्मकृतैर्नरः॥33॥

मनुष्य अपने ही किये हुए अपराधों के कारण जन्म-मृत्यु और जरा सम्बन्धी दुःखों से सदा पीड़ित हो बारम्बार संसार में पचता रहता है।

जन्तुस्तुकर्मभिस्तैस्तैः स्वकृतै प्रेत्य दुःखितः। तददुःखप्रतिघातार्थमपुण्यां योनिमाप्नुते॥35॥

प्रत्येक जीव अपने किये हुए कर्मों से ही मृत्यु के पश्चात् दुःख भोगता है और उस दुःख का भोग करने के लिये ही वह पाप योनि में जन्म लेता है।

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व्यक्तित्व को प्रखर और भविष्य को उज्ज्वल बनाने की साधना

आरोग्य शास्त्र की दो धाराएँ हैं (1) स्वास्थ्य संवर्धन (2) रोगोपचार। दोनों ही आवश्यक हैं। रोग का निवारण तो आवश्यक है ही यदि शरीर को अधिक बलिष्ठ सुन्दर और दीर्घजीवी न बनाया जा सका तो भी गई-गुजरी काया से काम चलाते भर रहने से क्या काम बने? कष्ट पीड़ित, अशक्त और दयनीय दुर्दशा में पड़ी हुई विपत्तिग्रस्त रुग्णावस्था से छुटकारा और समर्थ दीर्घजीवन प्राप्त करना दो ही उद्देश्य पूरे कर सकने में ही आरोग्य शास्त्र की सार्थकता है।

मानसोपचार में उन्माद अर्धविक्षिप्तता मूढ़ता जैसी विकृतियों का निवारण ही नहीं-मानसिक दक्षता का अभिवर्धन भी अंग है। अभिवर्धन और परिशोधन दोनों ही लाभ मनः संस्थान को दे सकने में ही समग्र मनोविज्ञान की पूर्णता है।

सरकार भीतरी तस्करों, दुष्ट दुरात्माओं का दमन करती है बाहरी शत्रुओं से जूझती है, साथ ही देश की समृद्धि एवं सुव्यवस्था बढ़ाने के लिए भी प्रयत्नशील रहती है। दोनों ही उसके कर्तव्य हैं।

ठीक इसी प्रकार अदृश्य शास्त्र का उत्तरदायित्व है कि वह मनुष्य के सामने प्रस्तुत अप्रत्याशित विपत्तियों से छुड़ाने और भविष्य का उज्ज्वल सम्भावनाओं का पथ प्रशस्त करने में अपनी भूमिका निवाहें। अदृश्य शास्त्र से तात्पर्य सूक्ष्म जगत को प्रभावित करने वाले विज्ञान से है। उपासना और तपश्चर्या उसके दोनों ही पक्ष हैं। अध्यात्म विद्या में योग और तप दोनों का ही समावेश है। योग अपनी सामर्थ्यों के साथ दैवी शक्तियों का सहयोग बनाकर अधिक सक्षमता प्राप्त करता है। तप का तात्पर्य अवांछनीयताओं को हटाना और दुर्बलताओं को निरस्त करना है। दोनों क्रिया-प्रक्रियाएँ मिलकर ही समग्र अदृश्य शास्त्र एवं अध्यात्म शास्त्र का निर्माण हुआ है।

प्रत्यक्षतः तो बातें मनुष्य के हाथ में दिखाई नहीं पड़ती किन्तु परोक्षतः होती उसी से सम्बन्धित हैं, उन्हें सूक्ष्म कहते हैं। स्थूल को आसानी से समझा जा सकता है और तदनुरूप उपाय भी किया जा सकता है। पर अदृष्ट के सम्बन्ध में मोटी बुद्धि कुछ काम नहीं करती। न निदान समझ में आता है और न उपचार करते बनता है। इस संदर्भ में सूक्ष्म विश्लेषण ब्रह्म विद्या का तत्वज्ञान ही कर पाता है। विपत्तियों के अदृष्ट कारणों को हटाना और उज्ज्वल सम्भावनाओं के लिए परोक्ष ताना-बाना बुनना भी उसी का काम है। यह क्रिया-प्रक्रिया परोक्ष विद्या अध्यात्म विद्या के अन्तर्गत ही आती है।

अध्यात्म के दो पक्ष हैं- एक ज्ञान, दूसरा विज्ञान। ज्ञान पक्ष में स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन की गणना होती है। विज्ञान पक्ष में उपासना और साधना का समावेश है। इन्हें योग और तप भी कह सकते हैं। योग धारा में मस्तिष्कीय क्षेत्र में होने वाले प्रयोगों की गणना है। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के चिन्तन परक चारों ही उपचार योग है। तप में वे सभी क्रियाएँ आती हैं, उनमें अभ्यस्त अवांछनीयताओं के विरुद्ध विद्रोह किया जाता है और उन्हें उखाड़ फेंकने के लिए संघर्ष किया जाता है। शरीर पर छाई हुई अनुपयुक्त आदतों और मन पर छाई गई मान्यताओं को उलटने में समझने समझाने की सामान्य पद्धति बहुत अधिक कारगर सिद्ध नहीं होती। बहुत बार ऐसा प्रतीत होता है कि मस्तिष्क तर्क तथ्य, प्रमाण सामने प्रस्तुत करने पर किसी बात को सिद्धान्ततः स्वीकार कर लेता है, पर भीतरी मान्यताओं एवं आदतों की जड़ें इतनी गहरी होती हैं कि उन्हें बदलना, उस सैद्धान्तिक सहमति से भी बन नहीं पड़ता। ऐसी दशा में तीखे उपाय और पैने प्रहार की उस गहराई तक पहुँचने और आवश्यक परिवर्तन कर सकने में समर्थ होते हैं। इन्हीं उपचारों की क्रिया-प्रक्रिया को तपश्चर्या कहते हैं।

योग और तप के दर्शन और व्यवहार का विवेचन एवं मार्ग-दर्शन प्रस्तुत करने वाले अनेक शास्त्र एवं व्यक्ति प्रायः उपलब्ध रहते हैं। इनमें कठिनाई एक ही रहती है कि देश, काल, पात्र का ध्यान रखा जाता है। प्राचीन काल की मनःस्थिति और परिस्थिति में आज भिन्नता है। उस भिन्नता को ध्यान में रखते हुए परम्परा और सामयिकता का समन्वय होना चाहिए। यही कौशल है।

आज के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक क्षेत्रों में छाये हुए शोक सन्तापों और विग्रहों को निरस्त करने के बहुत कुछ प्रयत्न हो रहे हैं। इतने पर भी एक क्षेत्र अछूता ही रह जाता है- वह है अदृष्ट। इसे आधि दैविक कहते हैं। इसी हलचलों और प्रतिक्रियाओं को भाग्य अथवा दैव कह कर सन्तोष करना पड़ता है। इसके निवारण का प्राचीन काल में एक व्यवस्थित शास्त्र था। आज उस व्यवस्था के स्थान पर अन्य क्षेत्रों की ही तरह विडम्बना की भरमार है।

इस क्षेत्र में अभिनव प्रयत्न ब्रह्मवर्चस् अभियान के अन्तर्गत चल रहे हैं। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण का महान् प्रयास ही युग परिवर्तन है। इतना व्यापक और विस्तृत काम करने के लिए प्रचण्ड ऊर्जा की आवश्यकता है। उसे युग शक्ति कह सकते हैं। इसका उपार्जन करने से ही वातावरण का परिशोधन और सूक्ष्म जगत की अनुकूलता सम्भव हो सकती है। ब्रह्मवर्चस्, तत्वज्ञान और साधना विधान के पीछे यही प्रयास चल रहा है। इसे सामूहिक सम्भावनाओं को श्रेष्ठता की दिशा में घसीट ले चलने की महान प्रक्रिया कह सकते हैं। धरती पर स्वर्ग के अवतरण प्रयासों की दृष्टि से इसे अदृष्ट उपचार की संज्ञा दी सकती है।

व्यक्ति की कठिनाइयों के निराकरण और सुविधाओं के सम्वर्धन के अदृष्ट का उपयोग करने का विज्ञान और विधान भी ब्रह्मवर्चस् अभियान के अन्तर्गत चल रही साधना में समन्वित रखा गया है। यह प्रयास समय साध्य है। इसकी पूर्ण सफलता के लिए अनवरत और सतत प्रयत्न जिस श्रद्धा और तत्परता के साथ चलेंगे उसी अनुपात से सफलताओं का पथ-प्रशस्त होता चला जाएगा।

आरम्भिक प्रयोग, परीक्षण एवं अभ्यास की दृष्टि से इन दिनों ब्रह्मवर्चस् आरण्यक में एक-एक महीने की जो साधन पद्धति चल रही है उसमें चान्द्रायण व्रत की तपश्चर्या और पंचकोशी उच्चस्तरीय गायत्री उपासना का समन्वय किया गया है। चान्द्रायण व्रत को तपश्चर्या का और पंचकोषों के अनावरण और कुण्डलिनी जागरण को योग साधना का इसमें समान रूप से समावेश है। फलतः उससे परिशोधन और अभिवर्धन के दोनों ही उद्देश्य पूरे होते हैं। शरीर और मन को समर्थ सुव्यवस्थित रखने में परिस्थितियों को सुधारने में, प्रतिकूलता को अनुकूलता बनाने में, समग्र परिवर्तन परिष्कार में जो अदृश्य तथ्य काम करते हैं। उन सबका समुचित समावेश इस एक महीने के साधना क्रम में मौजूद है जो व्यक्तित्व को प्रखर और भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए आवश्यक हैं।

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प्रौढ़ साधकों के उपयुक्त प्रखर साधना

गायत्री महामन्त्र के अक्षरों में ब्रह्मविद्या का समस्त तत्वज्ञान बीज रूप में विद्यमान है। साधना विज्ञान की दृष्टि से विविध अनुष्ठानों, पुरश्चरणों एवं तप साधनाओं का विशाल परिकर उसी के साथ समन्वित है। गायत्री का ज्ञान पथ ब्रह्मविद्या और विज्ञान पक्ष वर्चस् कहलाता है। दोनों को मिलाकर ब्रह्मवर्चस् शब्द बनता है। यह आध्यात्मिक प्रौढ़ता और प्रखरता को पृष्ठभूमि बनाने वाली साधना है।

साधना का स्तर जैसे-जैसे उठता है वैसे ही वैसे उसमें अधिक तन्मयता और तत्परता का समावेश होता चलाता है। सामान्य उपासना में जप और ध्यान पर्याप्त समझा जाता है। ध्यान आन्तरिक न बन पड़े तो प्रतिमा के सहारे प्रत्यक्ष दर्शन से भी वह काम किसी प्रकार चला जाता है। धीरे-धीरे जब स्तर बढ़ता है तो अनुष्ठानों और पुरश्चरणों के माध्यम से साधक को अधिक कठोर अनुशासनों में कसना आरम्भ कर दिया जाता है। सभी जानते हैं कि पुरश्चरणों में जप की संख्या का नियत होना ही पर्याप्त नहीं वरन् उसके साथ-साथ उपवास, ब्रह्मचर्य, भूमि शयन, अपनी सेवा आप करना जैसे प्रतिबन्ध लगते हैं। और नियत समय, नियत संख्या, अन्त में अग्नि-होत्र ब्रह्म-भोज आदि के कितने ही उपक्रम जुड़ जाते हैं। वैसा कुछ न हो केवल अस्त-व्यस्त रीति से जब संख्या पूरी कर ली जाय तो पुरश्चरण का जो माहात्म्य बताया गया है, वह उपलब्ध न हो सकेगा। सच पूछा जाय तो साधना के उच्चस्तरीय क्षेत्र में पहुँचने पर तपश्चर्या ही प्रमुख हो जाती है। वही बन्दूक का काम करती है। मन्त्र तो उसके साथ कारतूसों की तरह समन्वित रहते हैं।

पुनर्गठन वर्ष से युग निर्माण परिवार के समस्त साधकों को व्यक्तिगत जीवन में तपश्चर्या का समावेश करने के लिए गुरुवार को अस्वाद व्रत, ब्रह्मचर्य एवं दो घन्टे के मौन की तप साधना का समावेश अनिवार्य कर दिया गया है। ज्ञान यज्ञ के लिए सम्पर्क की तीर्थयात्रा को सामाजिक क्षेत्र की तपश्चर्या कहा गया है और जो जप, मात्र करके अपनी साधना की पूर्णता मान लेते थे उन्हें कहा गया है कि तपश्चर्या की दिशा में बढ़ना चाहिए। इस दिशा में वे जितनी प्रौढ़ता और प्रखरता का परिचय देंगे, उसी अनुपात से वे अपने साधन प्रयत्नों को सफल होते देखेंगे। देवता को अनुनय-विनय से फुसलाया नहीं जा सकता। भागीरथी तप द्वारा उनका अनुग्रह खरीदा जाता है। यह तथ्य क्रमशः परिजनों के सामने उजागर होता चला जा रहा है। उन्हें दबाव देकर अब अपनी परिष्कृत मनःस्थिति और आन्तरिक प्रौढ़ता के अनुरूप साधन क्षेत्र में अधिक कठोरता अपनाने के लिए अनुरोध आग्रह किया जा रहा है। आखिर मिशन के सूत्र संचालकों ने भी अपनी विशेष स्थिति तपश्चर्या का अवलंबन करके ही प्राप्त की है। अनुकरण कर्ताओं को भी इसी पुण्य परम्परा को अपनाने और कुछ कहने लायक उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए इन दिनों विशेष रूप से इंगित किया जा रहा है।

समय साध्य और क्रमशः अधिक कठोर होती चलने वाली साधना पद्धति का एक महत्वपूर्ण सुनियोजित एवं सुसम्बद्ध साधनाक्रम चान्द्रायण व्रत की तपश्चर्या और पंचकोशी योग साधना पद्धति के साथ जुड़ा हुआ है। इसका परिचय प्रशिक्षण और अभ्यास करने के लिए इन दिनों गंगा की गोद, हिमालय की छाया सप्त ऋषियों की साधना स्थली और समर्थ संरक्षण में ब्रह्मवर्चस् साधना क्रम चल पड़ा है। आरम्भिक प्रक्रिया के रूप में यह साधना सत्र एक-एक महीने के रखे गये हैं। और महीना अंग्रेजी महीने न रखकर भारतीय कलैण्डर के अनुरूप पूर्णिमा से पूर्णिमा तक का कर दिया गया है। चान्द्रायण व्रत की उसी से संगति भी है। यह एक महीने चलेगा। साथ ही इसी एक महीने में सवालक्ष गायत्री का पुरश्चरण भी करना होगा। पुरश्चरण के अतिरिक्त पाँच कोशों के अनावरण के लिए पांच साधनाएँ अतिरिक्त रूप से भी करनी होंगी (1) त्राटक (2) सूर्य भेदन प्राणायाम (3) शक्तिचालिनी मुद्रा (4) खेचरी मुद्रा (5) हंसयोग सोऽहम् साधना। इन पाँचों का समन्वित साधनाक्रम ऐसा है जिसमें पंच कोशों के अनावरण के अतिरिक्त कुण्डलिनी जागरण का प्रारम्भिक चरण भी इसी अवधि में पूरा हो जाता है। पीछे के लिए आत्मिक प्रगति के लक्ष्य तक ले पहुँचने वाला यह अवरुद्ध द्वार खुल जाता है, जिस पर चलते हुए पग-पग पर भौतिक सिद्धियों से लौकिक सफलता और आत्मिक विभूतियों की अतीन्द्रिय क्षमता उपलब्ध करते चलना सम्भव हो जाता है।

साधना की अवधि में मात्र गंगा जल पीना होता है। गंगा अति निकट है। वहीं से अपने पीने के लिए सभी साधक स्वयं गंगाजल लाते है और उसी से प्यास बुझाते है। युवाओं के लिए नित्य गंगा स्नान में भी कोई कठिनाई नहीं पड़ती। वृद्धों को शीत ऋतु में गंगा जल गरम करके स्नान करने की भी सुविधा रहती है। नित्य प्रातः काल पंचगव्य पान करना होता है। इसके उपरान्त ही अन्य कोई पेय या भोजन मुख में जा सकता है। नित्य आहार में हविष्यान्न (तिल, जौ, चावल) से बनी एक रोटी और अमृत कल्प (ब्राह्मी, शतावरि, वच, शंखपुष्पी, गोरख मुण्डी, आंवला, अदरक और सेन्धा नमक) में आध्यात्मिक अष्ट वर्ग सम्मिश्रित रहता है। च्यवन प्राशावलेह में शरीर को युवा बनाने वाला अष्टवर्ग है। हविष्यान्न की रोटी और अमृत अष्टवर्ग की चटनी का आहार ऐसा है जिससे ‘‘जैसा खाये अन्न वैसा बने मन’’ की उक्ति प्रत्यक्ष चरितार्थ होती है। विचारो में उत्कृष्टता का अभिनव परिचय आहार में इस चरु का समावेश होने से तत्काल दीखने लगता है। चान्द्रायण व्रत में यों शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से हर दिन चौदहवाँ अंश घटाया जाता है। इसके बाद एक चौदहवां भाग बढ़ाते हुए पूर्णिमा को पूर्ण आहार तक पहुँचाना होता है। यह कई दुर्बल मनःस्थिति के व्यक्तियों के लिए कठिन पड़ता है। इसलिए इस अवधि में शाक और दूध या छाछ की मात्रा बढ़ाते रहकर सन्तुलन बनाये रहने की सुविधा रखी गई है। हविष्यान्न की एक रोटी को प्रसाद चरु माना जाता है। इससे भी कुछ आहार बना रहता है। हविष्यान्न में प्रयुक्त होने वाले जौ, गौ मूत्र में भिगोकर सुखाये और संस्कारित किये जाते। इस प्रकार के विशिष्ट विधि से बने हुए जौ और छाछ के ऊपर अपने चौबीस पुरश्चरण भी पूरे हुए थे। प्रायः इसी स्तर के आहार का समावेश ब्रह्मवर्चस् साधना सत्र में गायत्री की उच्चस्तरीय साधना करने वाले साधकों को मिलता रहे इसका विशेष प्रबन्ध रखा गया है।

प्रातः 3:30 बजे उठना, उठते ही सामूहिक प्रार्थना फिर शौच स्नान से निवृत्ति प्रातःकाल का जप ध्यान, छह बजे पंचगव्य चाय। इसके अतिरिक्त सात से साढ़े आठ तक यज्ञ। साढ़े नौ बजे भोजन। मध्याह्न बाहर से डेढ़ बजे प्रवचन। तीसरे पहर चाय। अपरान्त विचार गोष्ठी। पाँच बजे सांय भोजन। गंगा दर्शन गंगा जल लाना। सात से साढ़े सात सामूहिक आरती। साढ़े सात से आठ सामूहिक ध्यान। साढ़े आठ बजे सो जाना। गुरुवार को अस्वाद व्रत। जैसे नियमों उपनियमों का पालन करते हुए परम सात्विक दिनचर्या का निर्वाह करते हुए एक महीने का योग, तप, विनियोग साधा जाता है। इसी अवधि में दिव्य संरक्षण और दिव्य अनुदान का अनवरत लाभ मिलता रहता है। साधना की सफलता ऐसे ही अनेक सुयोगों का संगम मिल जाने से किस प्रकार सम्भव होती है इसे साधक प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं।


Quotation

ज्ञानोदयात् पुराऽऽरब्धं कर्म ज्ञानान्न नश्यति। यदत्वां स्वफलं लक्ष्यमुद्दिश्योत्सृष्टवाणवत्॥

ज्ञान का उदय होने पर भी पूर्वकृत कर्मों के प्रारब्ध भोग तो भोगने ही पड़ते हैं। उनका नाश नहीं होता। धनुष से छूटा हुआ तीर प्रहार करता ही है।

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सर्वतोमुखी प्रखरता उत्पन्न करने वाली तप-साधना

धर्मशास्त्र में पाप निवृत्ति और पुण्य प्रवृत्ति के दोनों उद्देश्यों को पूरा करने के लिए उपयुक्त साधन चान्द्रायण तप बताया गया है। इस पुण्य प्रक्रिया के पाँच प्रमुख भाग ये हैं (1) एक महीने तथा आहार के घटने-बढ़ने वाला उपवास (2) गुप्त पापों का प्रकटीकरण (3) आन्तरिक परिवर्तन कर सकने वाले वातावरण में निवास और अनुशासन का प्रतिपालन (4) अन्तः करण को परिष्कृत करने वाला योगाभ्यास युक्त तप साधन। (5) दुष्कर्मों की क्षतिपूर्ति और पुण्य वर्धन की परमार्थ परायणता। इन्हें पूरा करने से चान्द्रायण तप सम्पन्न होता है। मात्र एक महीने का उपवास ही चान्द्रायण नहीं है।

एक महीने की निर्धारित ब्रह्मवर्चस् साधना कम में इन पाँचों का समन्वय है।

(1) पूर्णिमा से पूर्णिमा तक एक महीने का उपवास रहता है। पूर्णिमा को पूर्ण आहार करके उसका चौदहवां अंश कृष्ण पक्ष में हर दिन घटाया जाता है। शुक्ल पक्ष में उसी क्रम से बढ़ाते रहते हैं। अनभ्यास लोगों को ‘शिशु’ चान्द्रायण कराया जाता है और मनस्वी लोगों को यति चान्द्रायण। यह स्वास्थ्य सम्वर्धन के लिए शारीरिक काया-कल्प जैसा प्रयोग है। इससे रोगों की जड़े कटती है। परम सात्विक हविष्यान्न ही पेट में जाने से विचार परिष्कार और सद्भाव सम्वर्धन का उद्देश्य बड़ी अच्छी तरह पूरा होता है। पंचगव्य सेवन, गौ मूत्र से संस्कारित हविष्यान्न का आहार आदि के माध्यम से गौ सम्पर्क भी सधता रहता है। प्यास बुझाने के लिए मात्र गंगाजल पर ही निर्भर रहना पड़ता है।

(2) गुप्त पापों का प्रकटीकरण मात्र ब्रह्मवर्चस् के कुलपति के सम्मुख करके चित्त की भीतरी परतों पर जमी हुई दुराव की जटिल ग्रन्थियों को खोला जाता है। मानसिक रोगों के निराकरण का यह बहुत ही उत्तम उपचार है। जो किया जा चुका उसके परिमार्जन के लिए क्या करना चाहिए यह परामर्श प्राप्त करना भी इसी प्रकटीकरण का अंग है।

शीर्ष संस्कार इसी प्रयोजन के लिए है। पूर्ण मुण्डन तो नहीं कराया जाता, पर बाल थोड़े छोटे अवश्य हो जाते हैं। जिसका तात्पर्य है संचित दुष्ट विचारों का परित्याग। बच्चों का मुण्डन संसार भी जन्म-जन्मान्तरों की पशु प्रवृत्तियों को मस्तिष्क में से हटाने के उद्देश्य से ही किया जाता है। बाल छाँटने के अतिरिक्त गोमूत्र, गोमय आदि मन्त्र विधान सहित शीर्ष संस्कार किया जाता है। साधक अनुभव करता है कि इस धर्म कृत्य के साथ-साथ उसके मनःसंस्थान में अति महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहा है

(3) वातावरण का मनुष्य पर अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। व्यक्तित्व के परिवर्तन प्रयास में वातावरण का परिवर्तन आवश्यक माना गया है। ब्रह्मवर्चस् आरण्यक में वैसी समुचित सुविधा उपलब्ध है। परिमार्जन, संरक्षण और अभिवर्धन के तीनों उद्देश्य पूरे करने वाली त्रिवेणी यहाँ विद्यमान है। दिनचर्या में स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन के चारों तत्व गुंथे हुए हैं। शारीरिक और मानसिक संयम अनुशासन की कठोर विधि व्यवस्था का पालन करना पड़ता है। प्रवचन और परामर्श का दैनिक लाभ मिलता है। दिनचर्या, इतनी अनुशासित और व्यवस्थित रहती है कि इस ढर्रे में ढल जाने वाला भविष्य में अपने आपको सर्वतोमुखी प्रगति में सहायक ढाँचे में ही ढाल लेता है। वातावरण का प्रभाव अभिनव परिवर्तन के रूप में निरन्तर अनुभव होता रहता है।

(4) अन्तःकरण में दैवी संस्कारों की जड़ जमाने वाले योगाभ्यास और तप साधन चान्द्रायण के साथ-साथ ही करने होते हैं। सवा लक्ष्य गायत्री पुरश्चरण अनिवार्य रूप से आवश्यक है। गायत्री यज्ञ में नित्य ही सम्मिलित होना होता है। इसके अतिरिक्त उच्चस्तरीय पंचकोशी साधना के लिए पाँच योगाभ्यास निश्चित है। जप और ध्यान के अतिरिक्त (1) त्राटक (2) सूर्यवेधन प्राणायाम (3) खेचरी मुद्रा (4) सोऽहम् साधना एवं शक्तिचालिनी प्रक्रिया के रूप में नित्य ही करनी पड़ती है। इन साधनाओं का चेतना क्षेत्र के पाँच प्राणों का और काया क्षेत्र के पाँच तत्वों का परिष्कार होने के साथ-साथ जीवन में अभिनव प्राण संचार होता है। शास्त्रों में इसे पंचीकरण योगाभ्यास एवं पंचाग्नि तपश्चर्या कहा है। सर्व साधारण के सध सकने जितना ही दबाव इस एक महीने के साधन क्रम में सम्मिलित किया गया है। गायत्री की पंचमुखी साधना में पंचकोशों के अनावरण को ग्रन्थि वेधन का रहस्यमय विधान इन्हीं पाँच साधनाओं के अन्तर्गत आ जाता है। अन्तःचेतना के यह पाँच उभार पाँच देवताओं के वरदान जैसे चमत्कारी प्रतीत होते है।

(5) पापों की क्षतिपूर्ति एवं पुण्य सम्पदा की अभिवृद्धि के लिए चान्द्रायण व्रत की पूर्णाहुति के रूप में कुछ अवांछनीयताओं का परित्याग और कुछ परमार्थों को अपनाने का संकल्प करना होता है। संग्रह का अंश दान तीर्थयात्रा के रूप में धर्म प्रचार का श्रमदान, पुण्य प्रयोजनों में सहकार, सत्सृजन में योगदान जैसे कुछ कदम ऐसे उठाने के लिए परामर्श दिया जाता है जिनके सहारे अन्तःकरण पर परिवर्तन को व्यवहार में उतारने की छाप प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगे। आन्तरिक काया-कल्प चान्द्रायण तपश्चर्या का उद्देश्य है। यह कल्पना क्षेत्र तक ही सीमित बनकर न रह जाय वरन् व्यवहार में भी परिलक्षित होने लगे। इसके लिए कुछ क्रियात्मक कदम उठाने के लिए वैसा परामर्श मिलता है जो प्रस्तुत परिस्थितियों में सरलतापूर्वक शक्य हो सके। उपलब्ध सुसंस्कार परिपक्वता के लिए दूसरों के सम्मुख परिवर्तन का प्रमाण प्रस्तुत करने के लिए कुछ साहसिक कदम उठाने पड़ते हैं। यही चान्द्रायण की पूर्णाहुति है।

बीज को वृक्ष रूप में परिणित करना एक चमत्कार है। व्यक्ति को तुच्छ से महान भी एक दैवी वरदान है। बीज अनायास ही वृक्ष नहीं बन जाता। उसे उगने से लेकर फूलने-फलने की परिपक्व स्थिति तक पहुँचने में समय और साधनों की आवश्यकता पड़ती है। (1) भूमि (2) खाद (3) पानी (4) सुरक्षा एवं (5) उत्पादक की श्रमशीलता का समन्वय आवश्यक होता है। ठीक इसी प्रकार ईश्वराधन का सफल बनाने के लिए भी पाँच परिपोषणों की आवश्यकता पड़ती है। इन्हीं पाँचों का समन्वय ब्रह्मवर्चस् साधना में है। इसका सुनियोजित तप साधना की सामूहिक व्यवस्था से उस युग शक्ति का उद्भव होगा जिसकी सामर्थ्य से नये युग के सृजन की अनेक आवश्यकताएँ पूर्ण हो सकेगी। व्यक्ति में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के लिए जिन सृजन शक्तियों को युगान्तकारी भूमिका निभानी है, उनकी धार तेज करने के लिए यह एक महीने की चान्द्रायण तपश्चर्या अति महत्वपूर्ण सिद्ध होगी, यह सुनिश्चित है।


Quotation

पूर्व जन्म जनित पुराविदः कर्म दैवमिति संप्रचक्षते। सुखस्य दुःखस्य न कोपिदाता, परोददातीति कुबुद्धिरएषा।

स्वयं कृतं स्वेन फलेन पुज्यते शरीर हे! निस्तदयतत्वयाकृतम्॥ –गरुड़ पुराण

कर्मणैव हि रुदत्वं विष्णुत्वं च लमेन्नरः। -देवी भगवत नमस्तत कर्मेभ्यो विधिरपि नएभ्यप्रभवति। -भर्तृहरि

ब्रह्म भी जिस कर्म के अधीन है, उस कर्म को ही नमस्कार है। पहले जन्मों में किया हुआ अपना ही कर्म इस जन्म में प्रबल दैव बन जाता है और कहलाता है। सुख-दुःख देने वाला कोई दूसरा नहीं अपना किया कर्म ही अपने नैसर्गिक फल का पाता है। अपने कर्म से ही जीव को रुद्रत्व, विष्णुत्व आदि मिलता है। पूर्व जन्म का कर्म ही इस जन्म का दैव है।

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चांद्रायण तप की शास्त्रीय परम्परा

शास्त्रों, पुराणों में चान्द्रायण तप की महत्ता स्थान-स्थान पर प्रतिपादित की गई है। जीवन में हुई भूलों के कारण अन्तःकरण में छाये मल अवसाद के परिमार्जन की दृष्टि से उसे अमोघ साधन माना गया था। वह प्रतिपादन इस प्रकार है

परम पवित्रता दायक चान्द्रायण तप

धर्मशास्त्रों में प्रायश्चित्तों के अनेक विधि विधान बताये हैं। उन सबमें उपवास की तपश्चर्या को प्रधानता दी गई है। गीता में ‘उपवास से विषयों की निवृत्ति होना बताया गया है। लिप्सा और लालसा, लोभ और मोह, वासना और तृष्णा यही है वे आन्तरिक विष बीज जिनके कारण अनेक प्रकार के दुष्कर्म बन पड़ते हैं। इन्हीं आन्तरिक दुष्ट उभारों के विषय कहा गया है। विषयों की निवृत्ति के लिए उपवास का कठोर अनुशासन अपनाना पड़ता है और उसके उपरान्त आहार में सात्विकता का समावेश करना पड़ता है। मन की प्रवृत्तियों के निर्माण में अन्न ही बीज रूप होता है। आहार की सात्विकता से मन को शान्त और सुसंस्कारों बनाने में सफलता मिलती है। यह सारी प्रक्रिया उपवास मर्यादा के अन्तर्गत आती है। प्रायश्चित्त विधान का प्रथम चरण यही है। किन्तु बात इतने से ही समाप्त नहीं हो जाती।

प्रायश्चित्त के अगले चरण और भी है, जिनमें पाप की प्रकटीकरण-दूसरों को पहुंचाई गई क्षति की पूर्ति इनमें से प्रमुख हैं। जो किया गया था उसकी भविष्य में पुनरावृत्ति न करने की प्रतिज्ञा भी इसी विधान के अन्तर्गत आती है। यह सब तो हुआ दण्ड प्रकरण। यह प्रायश्चित्त का एक पक्ष है। दूसरा पक्ष है श्रेष्ठता का साधना का समन्वय जिससे हटाये गये संस्कारों का रिक्त हुआ स्थान श्रेष्ठ कुसंस्कार ग्रहण कर सके। इस पुण्य विधान को रचनात्मक प्रयोजन में लगाया जा सके। मात्र पाप बन्द कर देना या उनका दण्ड भुगत लेना ही पर्याप्त नहीं है, वरन् जो प्रयत्न दुष्कर्मों की हानिकारक प्रक्रिया के लिए चल रहा था वही उलट कर श्रेष्ठता सम्पादन में लग पड़े तब समझना चाहिए कि प्रायश्चित्त प्रक्रिया पूर्ण हुई।

प्रायश्चित्त विधान में चान्द्रायण तपश्चर्या को प्रमुखता दी गई है। उसके दो पक्ष हैं- एक परिशोधन, दूसरा अभिवर्धन। इस साधना से संचित पाप प्रवृत्तियों और कुसंस्कारों का जहाँ शमन होता है वहाँ आत्मोत्कर्ष के लिए प्रबल प्रयत्नों का भी साथ ही नियोजन होता है। अवांछनीयता का ध्वंस और उपयोगिता का सृजन यह दोनों ही कृत्य चान्द्रायण साधना से होते है, इसलिए उसे दण्ड विधान नहीं वरन् तप साधन की संज्ञा दी गई है। पाप निवारण भी उसका महत्वपूर्ण अंग है।

चान्द्रायण का सामान्य व्रत विधान

शास्त्रों में प्रायश्चित्त प्रकरण में कई प्रकार के विधानों का वर्णन है।

कृच्छ, अतिकृच्छ, तप्तकृच्छ, सौम्य कृच्छ, पाद कृच्छ, महा कृच्छ, कृच्छाति कृच्छ, पर्ण कृच्छ, सान्तापन कृच्छ, सान्तापन महा सान्तापन प्राजापत्य पराक ब्रह्मकूर्य आदि विधानों का उल्लेख है। इनमें चान्द्रायण व्रतों को तप में सर्व प्रमुख माना गया है।

उसकी क्रिया-प्रक्रिया सर्वविदित है। मोटे नियम इस प्रकार हैं-

एकैकं ह्रासयेत्पिंड कृष्णे, शुक्ले च वर्द्धयेत्। इन्दुक्षयेन पुंजीत एवचान्द्रायणो विधि॥ -वशिष्ठ

पूर्णमासी को पूर्ण भोजन करके एक-एक ग्राम घटाया जाय। चन्द्रमा न दीखने पर अमावस्या और प्रतिपदा को निराहार रहे। पीछे एक-एक ग्रास बढ़ाकर शुक्ल पक्ष के 14 दिनों में पूर्ण आहार तक पहुँच जाय।

ग्रास से तात्पर्य मुर्गी के अण्डे जितना तथा मुँह में जितना आहार एक बार में आ सके उतना है-

कुक्कुटाण्ड प्रमाणं स्याद् यावद् वास्य मुखे विशेत्। एत ग्रासं विजानीयुः शुद्धयर्थे काय शोधनम्॥ -अत्रि

‘‘मुर्गी के अण्डे के बराबर या जितना सुविधापूर्वक मुख में आ सकता हो उतना बड़ा ग्रास चान्द्रायण में ग्रहण करना चाहिए।’’

ग्रास परिमाण के झंझट में पहुँचने की अपेक्षा यह उत्तम है कि पूर्णिमा वाले आहार का चौदहवाँ अंश कृष्ण पक्ष में घटाता जाय और शुक्ल पक्ष में उसी अनुपात से हर दिनों बढ़ाते चला जाय।

नदी संगम तीर्थेषु, शुचेदिशे अरण्यके। ब्रह्मचारी सदा शान्तोजित क्रोधो जितेन्द्रियः।

अचिन्त्य चिंतनं व्यक्तवा सत्हितमित भाषणम्। सन्ध्ययोस्तु जपेन्नित्यं गायत्री ध्यान पूर्वकम्॥ -आपस्तंव

नदी संगम, तीर्थ, पवित्र स्थान पर, वन प्रदेश में निवास ब्रह्मचर्य पालन, शान्ति चित्त, जितेन्द्रिय, क्रोध रहित, अचिन्तय चिंतन का परित्याग, सत्य हित और स्वल्प भाषण दोनों समय ध्यान पूर्वक गायत्री का जप, यह नित्य नियम रखे।

अरण्ये नियतो जप्त्वा त्रिर्वैदस संहिताम। शुध्यते व मिताशित्वा प्रतिस्रोतः सरस्वतीम्।

‘‘निर्जन वन में संयम पूर्वक रहे, अल्प भोजन करे, किसी पुण्य नदी के उद्गम पर तीन बार सम्पूर्ण वेद का पारायण करे, तभी मनुष्य शुद्ध हो जाता है।’’

सावित्रींच जपेन्नित्यं पवित्राणि च शक्तितः। -सम्वर्त अहोरात्र्यन्तु गायत्र्या जपं कृत्या विशुध्यति। -आपस्तंव

नित्य पवित्र होकर गायत्री का जप करे। दिन-रात उसी उपासना में लगा रहे। उसमें परिशोधन होता है।

सावित्री तुजपेन्नित्यं पवित्राणि च शक्तितः।

पवित्र होकर यथा शक्ति गायत्री का जप करता रहे।

नित्य स्नायी मिताहारी गुरुदेव द्विजार्चकः। पवित्राणि जपेच्चैव जुहुयाच्चैव शक्तिः। ब्रीहिणाष्टिक मुद्गाश्च गोधूम सतीला यवाः। चरुभैक्ष्यं सक्तुव्रणाः शांवांघृत दधि पयः॥ -अग्नि पुराण

नित्य स्नान करे भूख से कम खाये, गुरु देव, ब्रह्मपरायणों का अभिवादन करे, पवित्र रहे, जप करे, हवन करे।

जौ, चावल, मूँग, गेहूँ, तिल, हविष्यान्न, सत्तू, शाक, दूध, दही, घृत पर निर्वाह करे।

चान्द्रायण के चार भेद हैं (1) पिपीलिका (2) यव मध्य (3) यति (4) शिशु। इन चारों के अन्य नियम समान हैं, पर आहार सम्बन्धी कठोरता न्यूनाधिक है। यति तपश्चर्या अधिक कठिन है और शिशु व्रत साधना में शरीर और मन की स्थिति को देखते हुए सरलता रखी गई है।

पाप पर से पर्दा हटाया जाय-

पापों के प्रकटीकरण की प्रक्रिया का एक स्वरूप तो मुण्डन कराने, बाल कटवाने के रूप में प्रतीक चिन्ह की तरह है। दूसरा चरण है प्रकटीकरण। यह मात्र किसी सत्पात्र के सम्मुख ही हो सकता है। सार्वजनिक घोषणा कर सकने का किसी में साहस हो तो और भी उत्तम। पर इस प्रकटीकरण में यह ध्यान रखना आवश्यक है कि व्यभिचार जैसी प्रक्रियाओं में साथी का नाम, पता आदि प्रकट न किया जाय।

पापों पर खड़े हुए पर्दे का उठाने और प्रकटीकरण की विधा पूरी करने के लिए शास्त्र निर्देश इस प्रकार है -

यथा यथा नरोऽधर्म स्वयं कृत्वाऽनुभाषते॥ तथा तथा त्वचेवाहि स्तेनाधर्मेण मुच्यते। -मनुस्मृति।

जैसे-जैसे मनुष्य अपना धर्म लोगों में ज्यों का त्यों प्रकट करता है, वैसे-वैसे ही वह अधर्म से उसी प्रकार मुक्त होता है जैसे केंचुली से साँप।

समत्वे सति राजेन्द्र तयोः सुकृत पापेयाः। गूहितस्य भवेद् वृद्धि कीर्तितस्य भवेत् क्षयः॥ -महाभारत

राजेन्द्र जब पुण्य-पाप दोनों समान होते हैं, तब जिसको गुप्त रखा जाता है। उसकी वृद्धि होती है और जिसका वर्णन कर दिया जाता है उसकी क्षति हो जाती है।

तस्मात् प्रकाशयेत् पापं स्वधर्म सततं चरेत्। क्लीवादुःखी च कुष्ठी च सप्त जन्मानि वै नरः॥ -पाराशर स्मृति।

पाप को छिपाने से मनुष्य, सात जन्मों तक कोढ़ी दुःखी नपुंसक होता है। इसीलिए पाप को प्रकट कर देना ही उत्तम है।

आचक्षाणेतत्पामेतत्कर्म्मास्मिशाधिमाम।

वह अपने किये हुए पाप को भी मुँह से कहता हुआ दौड़े कि मैं ऐसे कर्म के करने वाला हूँ, मुझे दण्डाज्ञा प्रदान कीजिए।

कृत्वा पापं न गूहेत गुह्यमानं विवर्द्धते। स्वल्पं वाथ प्रभूतं वा धर्म विद्धयो निवेदयेत।

ते हि पापे कृते वेद्या हन्तारश्चैव पाप्मनाम। व्याधितस्य यथा वैद्या बुद्धिमन्तो रुजापहाः। -पाराशर स्मृति

पाप कर्म बन पड़ने पर उसे छिपाना नहीं चाहिए। छिपाने से वह बहुत बढ़ता है। पाप छोटा हो या बड़ा उसे किसी धर्मज्ञ से प्रकट अवश्य कर देना चाहिए। इस प्रकार उसे प्रकट कर देने से पाप उसी तरह नष्ट हो जाते हैं, जैसे चिकित्सा करा लेने पर रोग नष्ट हो जाते हैं।

रहस्यं प्रकाशयं च।

-प्रायश्चितेन्दु शेखर

पापं नश्यति कीर्तनात्।

-धर्म सिन्धु

रहस्य के पर्दे को उठा देना चाहिए। पाप के प्रकटीकरण से वे धुल जाते हैं।

तस्मात् पापं न गुह्येत् गुहमानं विवर्धयेत्। कृत्वातत् साधुरवमेयंतेतत् शमयन्त्युत॥ -महा0 अनु0

अतः अपने पाप को न छिपाएं, छिपाया हुआ पाप बढ़ता है। यदि कभी पाप बन गया हो तो उसे साधु पुरुषों से कह देना चाहिए। वे उसकी शान्ति कर देते हैं।

तद् यदिह पुरुषस्य पाप कृतम्भवति तदा निष्करोति यदि हैन दपि रहसीव कुर्वन्मन्यतेथ हैनदाविरेव करोति। तस्याद्वाव पापं न कुर्यात्। -जैमिनीयोपनिषद ब्राह्मण

जब मनुष्य में दिव्य वाणी प्रकट होती है तब वह अपने पाप प्रकट करती है। मनुष्य ने जो पाप नितान्त गोपनीय रखे थे उन्हें भी वह प्रकट कर देती है।

दुष्कर्मों के कितने ही बुरे प्रभाव अन्तःक्षेत्र पर पड़ते हैं। वे कुकृत्य चेतना की गहराई में पहुंच कर कुसंस्कारों के रूप में जड़ जमा कर बैठ जाते हैं और घुन की तरह उस क्षेत्र की गरिमा को नष्ट करते चले जाते हैं। उनके दुष्परिणाम समय-समय पर आधि-व्याधि और आकस्मिक दुर्घटनाओं के रूप में सामने आते रहते हैं।

मनोविज्ञान शास्त्र के अनुसार अन्तःभूमि को क्षत-विक्षत करने वाला सबसे बड़ा कारण है दुराव। दुष्कर्मों के करते समय सामने वाले छल करना पड़ता है। वस्तुस्थिति जान लेने पर तो आक्रमण सफल ही न हो सकेगा। इसके उपरान्त राज दण्ड तथा समाज दण्ड से बचने के लिए उन कुकृत्यों को छिपा कर रखा जाता है। किसी पर प्रकट नहीं होने दिया जाता। यह दुराव हजम तो होता नहीं। पारा खा लेने पर वह पचता नहीं, वह फूट फूटकर शरीर में से फोड़े और घाव बनकर निकलता रहता है। ठीक इसी प्रकार कुकृत्यों का दुराव भी अनेक प्रकार के मानसिक और शारीरिक रोग उत्पन्न करता और आजीवन कष्ट देता रहता है। अंतर्द्वंद्व, तब तक चलता ही रहता है जब तक उसका प्रकटीकरण और प्रायश्चित्त करके परिशोधन न कर दिया जाय।

परिशोधन प्रक्रिया में प्रकटीकरण भी एक उपचार है। जो कुकृत्य बन पड़े हैं उनका प्रकटीकरण आवश्यक है। पर वह होना उन्हीं के सामने चाहिए जो इतना उदार हो कि चिकित्सक की करुणा से अपराधों को धैयपूर्वक सुन सके और घृणा धारण किये बिना उन्हें अपने भीतर पचा सके। प्रकट करने वाले की निंदा न होने दें। उसे उस प्रकटीकरण के कारण लोक निन्दा के द्वारा होने वाली क्षति न पहुँचने दें, वरन् उसे स्नेहपूर्वक सत्परामर्श देकर सुधरने में सहायता करें। ऐसे व्यक्ति जब तक न मिलें तब तक प्रकटीकरण नहीं ही करना उचित है। ईसाई धर्म में मरने से पूर्व ‘पाप स्वीकृति का वर्णन’ कनफेक्शन आवश्यक धर्मकृत्य माना जाता है। समय रहते पादरी को बुलाया जाता है। एकान्त में मरणासन्न व्यक्ति जीवन भर के अपने सारे पापों को विस्तारपूर्वक बताता है और जी हलका करता है। पादरी को पिता कहते है। उसमें परम करुणा रहती है। वह धैर्य और शान्तिपूर्वक उसे सुनता है और ईश्वर से क्षमा की प्रार्थना करता है। न उसके मन में घृणा होती है और न औरों पर प्रकट करने की क्षुद्रता का परिचय देना ही उसकी गरिमा के उपयुक्त होता है।

चान्द्रायण में केश कटाने का संस्कार-

चान्द्रायण व्रत लेते समय शिर के केश कटाने का, मुण्डन कराने का विधान है। इतना न बन पड़े तो बाल बनाने का तो कृत्य किसी न किसी रूप में करना ही होता है। इसमें मस्तिष्क में भरे हुए पुराने विचारों को बदलने की प्रतीक प्रतिज्ञा है। यहाँ बालों को विचारों को प्रतीक माना गया है। इसलिए उन्हें बालकों के मुण्डन संस्कार की तरह ही चान्द्रायण व्रत में भी आवश्यक माना गया है। बालकों का मुण्डन कराने के पीछे उद्देश्य यह है कि पिछले कुसंस्कार जो मस्तिष्क के भीतर भरे हुए हैं उनका उन्मूलन आवश्यक है तभी मनुष्यता की गौरव गरिमा उपलब्ध हो सकती है। इस परिवर्तन का प्रतीक बालों का कटाना माना गया है। तीर्थ में जाकर भी मुण्डन कराने का तात्पर्य यह है कि वहाँ पहुँचने के उपरान्त कुसंस्कारों की जो अवधारणा मस्तिष्क में थी, वह बदल दी। इसी प्रकार मृत्यु शोक के सन्तापदायी विचारों से छुटकारा पाने के लिए श्राद्ध के समय मुण्डन कराया जाता है।

चान्द्रायण व्रत के समय मुण्डन का विधान है। वैसा जो न कर सके उन्हें प्रतीक रूप में शिर के बालों को हल्के तो करा ही लेना चाहिए। इसके दो उद्देश्य है-एक पशु प्रवृत्तियों के परित्याग की दुर्बुद्धि को निरस्त करने की प्रतीक प्रतिज्ञा है। दूसरे पापों की स्वीकृति एवं घोषणा में। इसमें समाज में प्रतिष्ठा बनाये रहने और पाप छिपाये रहने का दुहरे पाप से निवृत्ति पाने का संकल्प है।

सर्वविदित है कि मुण्डन संस्कार में बालों को गोमूत्र, गोबर एवं पंचगव्य से धोया, सींचा जाता है। चान्द्रायण व्रत के समय भी जब बाल बनवाये जाते है तो मस्तिष्क का संस्कार पंचगव्य से ही किया जाता है। मुण्डन से पूर्व यह गोरस सिंचय किया जाय या पीछे यह सुविधा के ऊपर निर्भर है, पर किसी न किसी रूप में उसे किया जाना आवश्यक है।

बाल कटाने के सम्बन्ध में चान्द्रायण व्रत कर्त्ता के लिए शास्त्र निर्देश इस प्रकार है-

शिरसां कृन्तनं युद्धे मुण्डनं तद्वदेव हि। वेदेऽपि स्थिरमेतद्धि समानं समुदाहृतम्॥ -योगिनी तन्त्र

शिर छेदन और शिर मुण्डन एक कार्य है, वेद में यह दोनों कार्य ही समान कहे गये हैं।

श्मश्रुकेशान् वापयेत् भ्रुवोऽक्षि लोमशिखावर्जम नखाननिकृत्त्य।

-वशिष्ठ

‘व्रत के आरम्भ में दाढ़ी, मूँछ और सिर के बालों को कटा लें। भौंह आदि और शिखा न कटाई जाय।’

सर्वानकेशान् समुधृत्यच्छेयेत्च्छेदयेत् अंगुल द्वयम्।

-यम

आकेशान्तान्नखाग्राच्च तपस्तप्यत उत्तमम्।

-बौद्धायनि

यत्किंचित् क्रियते पापं सर्व केशेषु तिष्ठति।

-पारासर

केशश्ममश्रु लोमनखान् वापयित्वाततः शुचिः।

-पारासर

अर्थात् श्चन्दायणं तस्योक्तो विधिः वपनं व्रतं चरेत्।

इन समस्त अभिवचनों में चान्द्रायण व्रत कर्त्ता के लिए पूर्ण मुण्डन की इच्छा न हो तो बाल कटाने, उनकी लम्बाई घटाने की आवश्यकता तो रहती ही है।

प्रायश्चित्त का अति महत्वपूर्ण पथ-क्षतिपूर्ति -

1- निरपराध सताना, आक्रमण, 2- व्यभिचार, बलात्कार 3- आर्थिक शोषण, अपहरण, चोरी, बेईमानी।

पाप कर्मों का प्रायश्चित्त करने में पश्चात्ताप वर्ग की पूर्ति, व्रत उपवास से शारीरिक कष्ट सहने से, तितीक्षा कृत्यों से होती है। किन्तु क्षतिपूर्ति का प्रश्न फिर भी सामने रहता है। इसके लिए पुण्य कर्म करने होते हैं, ताकि पाप सके रूप में जो खाई खोदी गई थी वह पट सके पुण्य-पाप का पलड़ा बराबर हो सके। दुष्प्रवृत्तियों को सत्प्रवृत्तियों से ही पाटा जा सकता है। इसलिए दुष्कर्म करके जो व्यक्ति विशेष को हानि पहुँचाई गई। समाज में भ्रष्ट अनुकरण की परम्परा चलाई गई। वातावरण में विषाक्त प्रवाह फैलाया गया, उसको निरस्त तभी किया जा सकता है। जब सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन करने वाले पुण्य कर्म करके उसकी पूर्ति की जाय। समाज को सुखी और समुन्नत बनाने वाली सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन आवश्यक माना जाय। इसके लिए समय, श्रम एवं मनोयोग लगाया जाय। धर्म प्रचार की पदयात्रा करके लोक प्रेरणा देने वाले तीर्थ यात्रा जैसे पुण्य कर्म किये जायें। जो घटना चुकी वह अनहोनी तो नहीं हो सकती। आक्रामक कुकर्मों की क्षतिपूर्ति इसी में है कि लगभग उतने ही वजन के सत्मर्म सम्पन्न किये जायें।

व्यभिचार जन्य पापों का प्रायश्चित्त यही है कि नारी को हेय स्थिति से उबारने के लिए उसे समर्थ एवं सुयोग्य बनाने के लिए जितना प्रयास पुरुषार्थ बन पड़े उसे लगाने के लिए सच्चे मन से प्रयत्न किया जाय।

आर्थिक अपराधों का प्रायश्चित्त यह है कि अनीति उपार्जित धन उसके मालिक को लौटा दिया जाय अथवा सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के श्रेष्ठ कामों में उसे लगा दिया जाय। इस अर्थदान को प्रायश्चित्त विधान का आवश्यक अंग इसलिए माना गया है कि अधिकांश पाप अर्थलोभ से किये जाते हैं और उतने न्यूनाधिक मात्रा में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में भौतिक लाभ उठाने का उद्देश्य रहता है। यह अनीति उपार्जित धन अपने लिए और अपने परिवार वालों के लिए समयानुसार भयंकर विपत्तियाँ ही उत्पन्न करता है। भले ही तत्काल उससे कोई कमाई होने और सुविधा मिलने जैसा लाभ ही प्रतीत क्यों न होता हो।

जो कमाया गया है उसे बगल में दबाकर रखा जाय। अनीति उपार्जित सुविधाओं का परित्याग न किया जाय। मात्र घड़ियाल के आँसू बहाकर व्रत, उपवास जैसी लकीर पीट दी जाय तो उतने भर से कुछ बनेगा नहीं। व्रत, उपवास तो अनीति अपनाने से आत्मा पर चढ़ी कषाय−कल्मषों की परत धोने भर के लिए है। क्षतिपूर्ति का प्रश्न तो फिर भी जहाँ का तहाँ रहता है। जो अनीति बरती है उसकी हानि को भरपाई कर सकना वर्तमान परिस्थितियों में जितना अधिक से अधिक सम्भव हो उसके लिए उदार साहस जुटाना चाहिए। घटनाओं की क्षतिपूर्ति अर्थदण्ड सहने से भी हो सकती है। रेल दुर्घटना आदि होने पर मरने वालों के घरवालों को सरकार अनुदान देती है। उसमें क्षतिपूर्ति के लिए आर्थिक प्रावधान को भी एक उपाय माना गया है। प्रायश्चित्त विधानों में क्षतिपूर्ति की दृष्टि से दान को महत्व दिया गया है। दोनों में गौदान, अन्नदान, उपयोगी निर्माण आदि के कितने ही उपाय सुझाये गये हैं। वे जिससे जितने बने पड़े उन्हें वे उतनी मात्रा में करने चाहिए। कुछ भी न बन पड़े तो श्रमदान, सत्कर्मों में योगदान तो किसी न किसी रूप में हर किसी के लिए सम्भव हो सकता है। शास्त्र कहता है-

सर्वस्व दानं विधित्सर्व पाप विशोधनम्कूर्मपुराण

अनीति से संग्रह किये हुए धन को दान कर देने पर ही पाप का निवारण होता है।

दत्वै वापहृतं द्रव्यं धनिकस्याभ्यु पापतः। प्रायश्चित्तं ततः कुर्यात् कलुषस्य पापनुत्तये॥ -विष्णु स्मृति

जिसका जो पैसा चुराया हो उसे वापिस करे और चोर कर्म का प्रायश्चित्त करे।

वापसी सम्भव न हो या आवश्यक न हो तो अनीति उपार्जित साधनों का बड़े से बड़ा अंश श्रेष्ठ सत्कर्मों में लगा देना चाहिए।

आचार्य बृहस्पति के अनुसार, उपवास स्तथदान उमौ अन्योन्याश्रित।

प्रायश्चित्त में उपवास की तरह दान भी आवश्यक है। दोनों एक-दूसरे के साथ परस्पर जुड़े हुए हैं।

प्राज्ञः प्रतिग्रहं कृत्वां तद्धनं सद्गति नयेत् यज्ञाद्वा पतितोद्धार पुण्यात् न्याय रक्षणेवापी कूप तड़ागेषु ब्रह्मकर्म समत्सृजेत।

-अरुण स्मृति

अनुचित धन जमा हो तो उसे यज्ञ पतिद्धार, पुण्य कर्म, न्याय रक्षण बावड़ी कुंआ, तालाब आदि का निर्माण एवं ब्रह्म कर्मों में लगा दें। अनुचित धन की सद्गति इसी प्रकार होती है।

तेनोदपानं कर्त्तव्यं रोपणीयस्तथा वटः। -शाता0।

सच्छास्त्र पुस्तकं दद्यात् विप्राय स दक्षिणम्। -पाराशर

वापी कूप तडागादि देवता यतनानि च। पतितान्युद्धरेद्यस्तु व्रत पूर्ण समाचरित्॥ -यम

सोपि पाप विशुद्धयर्थ चरेच्चान्द्रायण व्रतम्। व्रतान्ते पुस्तकं दधात् धेनु वत्स समन्वितम्॥ -शातायन

सुवर्ग दानं गोदानं भूमिदानं तथैवच। नाशयन्त्याशु पापानि अन्यजन्म कृतान्यपि॥ -सम्वर्त

इन अभिवचनों में सत्साहित्य वितरण, विद्यादान, वृक्षारोपण, कुंआ, तालाब, देवालय आदि का निर्माण यज्ञ दुःखियों की सेवा अन्याय पीड़ितों के लिए संघर्ष आदि अनेक शुभ कर्मों में क्षति की पूर्ति के रूप में अधिक से अधिक उदारतापूर्वक दान देने का विधान है। इस दान शृंखला में गौदान को विशेष महत्व दिया गया है। गौ की गरिमा को शास्त्रों में अत्यधिक महत्व दिया गया है। इसलिए गौदान की महिमा बताते हुए प्रायश्चित्त व्रतों के साथ उसे भी जोड़कर रखा गया है यथा-

गोदानं च तथा तेषु कर्त्तव्यं पाप शोधनम्। यत्र यावत् संख्यया प्राजापत्या न्यावतं नीयानि भवन्ति तत्र तावत् संख्यया गोदान्यावर्तनीयानि। -सूर्यारूपा

जिस प्रायश्चित्त में जितने प्राजापत्यादि व्रतों की संख्या का निर्धारण हो उनमें उतनी ही गौओं के दान का भी समावेश समझा जाना चाहिए।

गावो देयाश्च ऋषिभिः अभिषेक युताः वतः। -बृहस्पति

गोदाने वत्स युक्ता गौ सुशीला पयस्विनी। पृथिवीं तेन दत्रास्यादीदृशीं गान्ददातियः। तेनाग्नयो हुताः सम्यक् पितर स्तने तर्पिताः। देवाश्च पूजिताः सर्वे यो ददाति गवान्हिकम॥ -अत्रि

स दधात् दुग्ध धेनुश्च ब्राह्मणाय यथाविधि। -शाता0

तेन धेनुः प्रदातव्या विशुद्ध यर्थ च विल्विषं। -अंगिरा

इन सभी अभिवचनों में गौदान को चान्द्रायण व्रत के साथ जोड़ा गया है। यह धन से न बन पड़े तो श्रम से तो हो ही सकता है। दलीप और उनकी पत्नी ने महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में रहकर गौ चराने का व्रत लिया था। गौ सम्पर्क में जो प्रभाव रहता है उससे भी सात्विकता की वृद्धि और पापों की निवृत्ति में बहुत योगदान मिलता है।

चान्द्रायण व्रत और गौ सम्पर्क

चान्द्रायण व्रत के साथ गौ सम्पर्क जुड़ा हुआ है। इस तपश्चर्या के अनेक कार्य ऐसे हैं, जिनमें गौ को किसी न किसी प्रकार साथ लेकर चलना पड़ता है।

मुख में कोई अन्य वस्तु जाने देने के पहले, चान्द्रायण व्रत कर्ता को ‘पंचगव्य’ ग्रहण करना होता है। इसके उपरान्त अन्य कोई वस्तु मुँह में जानी चाहिए। पंचगव्य गाय के दूध, दही, घृत, गौमूत्र, गोमय के सम्मिश्रण को कहते है। उसमें तुलसी पत्र और गंगाजल भी मिलाया जाता है।

गव्यं पीत्वा विशुध्यति। तत्राप्यशक्ता चैकेन पंच गव्यं पिवेत्ततः -आपस्तंव

पंच गव्येन शुध्यति -आपस्तंव

शुध्यते पंच गव्येन पीत्वा तोयमकामतः -सम्वर्त

मृत्तिका शोधनं स्नानं पंच गव्यं विशोधनम्। -अंगिरा

गो मूत्रं, गोमयं, क्षीरं, दधि, घृत, कुशोदनम्। निदिष्टं पंच गव्यन्तु पवित्रं पापनाशनम्॥ -सम्वर्त

पतितं प्रेक्षितं वापि पंच गव्येन शुध्यति। -अत्रि

श्रृणु पाण्डव तत्वेन, सर्व पाप प्रणाशनम। पापिनो येकन शुद्धयन्ति तत्ते वक्ष्यामि सर्वशः। यथावत्कुर्त कामोयस्तस्य यं प्रथमनु यः। शोधयेतु शरीरं स्वं पंचगव्ये पवित्रतः। -वृद्ध गौतम

यह चान्द्रायण व्रत समस्त पापों का शमन करने वाला है। कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। उसे आरम्भ करते हुए शरीर को पंच गव्य से पवित्र बनाना चाहिए।

इन सब विधानों के सन्दर्भ में शास्त्रों के अनेक अभिवचन उपलब्ध है। चान्द्रायण व्रतकर्त्ता के लिए नित्य सर्वप्रथम पंचगव्य लेने का विधान है।

चान्द्रायण व्रतकर्त्ता के आहार में हविष्यान्न की प्रधानता रहनी चाहिए। हविष्यान्न जौ, तिल, चावल के सम्मिश्रण को कहते हैं। इनमें से जौ को गौमूत्र के साथ विशेष रूप में संस्कारित किया हुआ होना चाहिए। गौमूत्र में जौ भिगोये जायें। वे उस संस्कार को ग्रहण कर लें तब उन्हें सुखाकर पीसा जाय और दलिया या रोटी बनाई जाय। इस प्रकार भोजन में गौ सम्पर्क आवश्यक हुआ।

गोमूत्र यावकाहारो मासार्धेन विशुद्धयति -अत्रि

गोमूत्र यावाकाहारो। -सम्वर्त गो मूत्र यावकाहारः। -अत्रि

गो मूत्रेणनु संमिश्र यावकं घृतपचितम्। -अत्रि

गो मूत्रेणनु संमिश्रं यावकं चोपजायते। -अंगिरा

गो मूत्र यावकाहारे स्त्रिरात्रेणैव शुध्यति। -शातायन

गो मूत्र यावकाहारः षड़ रात्रेण शुध्यति। -आपस्तंव

गो मूत्र यावकाहरि मासेनैकेन शुध्यति।

–पाराशर

गो मूत्र यावका हरिस्त्रि रात्रेण विशुध्यति। -स्कन्द

गो मूत्रेण समायुक्तं यावकं चोपभोजयेत्। -वशिष्ठ

चान्द्रायण की पूर्णाहुति में गौदान का विधान है। उसे भी प्रायश्चित्त प्रक्रिया का एक अंग माना गया है, जिनके लिए गौदान सम्भव न हो वे गौग्रास (गाय का चारा) भी दान कर सकते हैं। अथवा शरीर से गौ सेवा का श्रम कर सकते हैं। इस प्रकार चान्द्रायण व्रत के साथ गौ सम्पर्क अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रखा गया है।

धर्म-प्रचार की पदयात्रा-तीर्थयात्रा-

पाप निवृत्ति और पुण्य वृद्धि के दोनों प्रयोजनों की पूर्ति के लिए तीर्थयात्रा को शास्त्रकारों ने प्रायश्चित्त को तप साधना में सम्मिलित किया है। तीर्थयात्रा का मूल उद्देश्य है धर्मप्रचार के लिए की गई पदयात्रा। दूर-दूर क्षेत्रों में जनसम्पर्क साधने और धर्मधारणा को लोक मानस में हृदयंगम करने का श्रमदान तीर्थयात्रा कहलाता है। श्रेष्ठ सत्पुरुषों के सान्निध्य में प्रेरणाप्रद वातावरण में रहकर आत्मोत्कर्ष का अभ्यास करना भी तीर्थ कहलाता है। यों गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने के लिए किये गये प्रबल प्रयासों को भी तीर्थ कहा गया है। तीर्थ का तात्पर्य है तरना। अपने साथ-साथ दूसरों का तारने वाले प्रयासों को तीर्थ कहते हैं। प्रायश्चित्त विधान में तीर्थयात्रा की आवश्यकता बनाई गई है।

आज की तथाकथित तीर्थयात्रा मात्र देवालयों के दर्शन और नदी, सरोवरों के स्नान आदि तक सीमित रहती है। यह पर्यटन मात्र है। इतने भर से तीर्थयात्रा का उद्देश्य पूरा नहीं होता है। सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन के लिए किया गया पैदल परिभ्रमण ही तीर्थयात्रा कहलाता है। यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य संवर्धन के लिए श्रेष्ठ उपचार भी है। धर्म प्रचार के लिए जनसम्पर्क साधने का पैदल परिभ्रमण जन-समाज को उपयुक्त प्रेरणायें प्रदान करता है। साथ ही उससे श्रमदान से कर्त्ता की सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन भी होता चलता है। ऐसे ही अनेक कारणों को ध्यान में रखकर तीर्थयात्रा को ऐसा परमार्थ कहा गया है जिसे कर सकना प्रत्येक श्रमदान करने में समर्थ व्यक्ति के लिए सम्भव हो सकता है। तीर्थयात्रा का स्वरूप और महात्म्य शास्त्रकारों ने इस प्रकार बताया है-

नृणां पापकृतां तीर्थे पापस्य शमनं भवेत्। यथोक्त फलदं तीर्थ भवेच्छुद्धात्मनां नृणाम्॥

पापी मनुष्यों के तीर्थ में जाने से उनके पाप की शान्ति होती है, जिनका अन्तःकरण शुद्ध है, ऐसे मनुष्यों के लिए तीर्थ यथोक्त फल देने वाला है।

तीर्थान्यनुसरन् धीरः श्रद्धायुक्तं समाहितः। कृतपापो विशद्धश्चेत् किं पुनः शुद्ध कर्मकृत्॥

जो तीर्थों का सेवन करने वाला, धैर्यवान् श्रद्धायुक्त और एकाग्रचित्त है, वह पहले का पापाचारी हो तो भी शुद्ध हो जाता है, फिर जो शुद्ध कर्म करने वाला है, उसकी तो बात ही क्या है।

तीर्थानि च यथोक्तेन विधिना संचरन्ति ये। सर्वद्वन्द्वसद्वा धीरास्ते नराः स्वर्गगामिनः॥

जो यथोक्त विधि से तीर्थयात्रा करते हैं, सम्पूर्ण द्वन्द्वों को सहन करने वाले हैं, वे धीर पुरुष स्वर्ग में जाते हैं।

यावत् स्वस्थोऽस्ति में देहो यावन्नेन्द्रिविक्लवः। तावत् स्वश्रेयसां हेतुः तीर्थयात्रां करोम्यहम्॥

जब तक मेरा शरीर स्वस्थ है, जब तक आँख, कान आदि इन्द्रियाँ सक्रिय हैं। तब तक श्रेय प्राप्ति के लिए तीर्थयात्रा करते रहने का निश्चय करता हूँ।

जायन्ते च क्रियन्ते च जलैष्वेव जलौकसः। न च गच्छन्ति ते स्वर्गमविशुद्ध मनोमलाः॥

जल में निवास करने वाले जीव जल में ही जन्मते और मरते हैं, पर उनका मानसिक मल नहीं धुलता इससे वे स्वर्ग को नहीं जाते।

क्रिया क्रर्मेण महता तपसा नियमेन च। दानेन तीर्थयात्राभिश्चिरकालं विवेकतः॥

दुष्टकृतैः क्षयमापन्ने परमार्थ विचारणे। काकतालीय योगेन बुद्धिर्जन्तोः प्रवर्तते॥

बहुत दिनों तक यज्ञ दानादि करने कराने से, कठिन तपस्या, नियम, तीर्थ यात्रा आदि द्वारा विवेक बढ़ता है और इनके द्वारा बुरे कर्मों का नाश हो जाने तक काकतालीय न्याय से मनुष्य में परमार्थ बुद्धि प्रस्फुटित हो जाती है।

मनो वाक् काय शुद्धानां राजस्तीर्थं पदे-पदे। तथा मलिन चित्तानां गंगायि कीटकाधिका॥

हे राजन्! मन, वाणी और काया से शुद्ध हुए मनुष्यों के लिए पग-पग पर तीर्थ हैं, किन्तु मलिन चित्त वालों के लिए गंगा भी एक तलैया है।

याममर्द्ध फलं हन्ति तदद्ध छत्र पादुके। वाणिज्यं त्रींस्तथा भागान् सर्वहनि प्रतिग्रहः। - स्कन्द पुराण

सवारी तीर्थयात्रा का आधा फल अपहरण कर लेती है उसका आधा छत्र तथा पादुका अपहरण कर लेता है। व्यापार पुण्य का तीन चतुर्थांश अपहरण करता है तथा प्रतिग्रह तीर्थ के सारे पुण्य को नष्ट कर देता है।

सर्वेषामेव वर्णानां सर्वाश्रमनिवासिनाम्। तीर्थं तु फलदं ज्ञेयं नात्र कार्या विचारणा॥

तीर्थानुगमने पद्भ्यां तपः परमिहोच्यते। तदेव कृत्वा यानेन स्नानमात्र फलं लभेत्॥

सभी वर्णों तथा सभी आश्रमों के लोगों को तीर्थ फलदायक होता है। इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं करना चाहिए। जो पैरों से पैदल चलकर तीर्थ जाते हैं। वे परम तप करते हैं। जो सवारी से यात्रा करते हैं। उन्हें स्नान मात्र का ही फल मिलता है।

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चांद्रायण तप और पंचकोशी योगाभ्यास

चान्द्रायण तप का एक निषेध पक्ष है- कष्ट सहन। जिसमें आहार घटाने-बढ़ाने की तितीक्षा प्रमुख है। दोषों के प्रकटीकरण में भी पश्चात्ताप करने और लज्जित होने का मानसिक कष्ट है। क्षतिपूर्ति के लिए दान पुण्य करना अर्थदण्ड है। तीर्थयात्रा आदि सत्कार्यों के लिए श्रमदान जैसे परमार्थों में भी कष्ट सहने और त्याग करने की ही बात है। यह सारा समुच्चय आत्म-प्रताड़ना परिकर का है। परिशोधन की प्रक्रिया निषेधात्मक होने के कारण कष्ट सहने की ही हो सकती है।

दूसरा विधायक पक्ष है-योग, जिसमें परित्याग की रिक्तता पूर्ण करनी पड़ती है। यह उपार्जन है। आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ना योग है। योग से हर किसी का परिमाण बढ़ता है। परित्याग से जो घाटा पड़ा था उसकी कमी योग की कमाई द्वारा पूरी हो जाती है। शौच जाने से पेट खाली होता है। इस कारण लगने वाली भूख की पूर्ति भोजन से करनी पड़ती है। तभी उस युग्म उपक्रम से शरीर यात्रा का पहिया आगे लुढ़कता है।

ब्रह्मवर्चस् साधना का यह भूमि शोधन पथ चान्द्रायण तप से पूरा होता है। इसके उपरान्त बीज बोने और खाद पानी लगाने की अभिवर्धन उद्देश्य के लिए की जाने वाली प्रक्रिया योग साधना द्वारा सम्पन्न होती है।

ब्रह्मवर्चस् योगाभ्यास पंचमुखी गायत्री की पंचकोशी साधना है। पाँच प्राणों से चेतना का और पाँच तत्वों से काया का निर्माण हुआ है। इन दोनों प्रवाहों के मध्यवर्ती दिव्य शक्ति स्रोतों को पंचकोश कहते हैं। योगशास्त्र के विद्यार्थी जानते हैं कि अन्नमय कोश यह पाँच शक्तिशाली आवरण आत्मा पर चढ़े हैं। इन्हें सुरक्षा कवच, वाहन, आयुध आदि भी कहा जा सकता है। यह रहस्यमय रत्न भण्डार है, जिनमें सिद्धियों और विभूतियों के मणिमुक्तक प्रचुर परिमाण में भरे पड़े है। चाबी न होने पर तिजोरी में भरी धनराशि भी अपने किसी काम नहीं आती और अधिपति को भी अभावग्रस्त रहना पड़ता है। इसी प्रकार इन दिव्य कोशों का द्वार बन्द रहने पर आवरण चढ़ा रहने पर मनुष्य को दुःखी दरिद्रों की तरह गया-गुजरा जीवनयापन करना पड़ता है।

उच्चस्तरीय गायत्री उपासना को पंचकोशों की अनावरण साधना कहते हैं। इस योगाभ्यास की हठयोग की पद्धति के अन्तर्गत चक्रवेधन एवं कुण्डलिनी जागरण साधना कहते हैं। षटचक्रों का नाम सभी ने सुना है। भू-मध्य भाग से मस्तिष्क प्रारम्भ होता है और वह मेरुदण्ड में होकर जननेन्द्रिय क्षेत्र तक चला जाता है। यह समूचा परिधि ब्रह्मलोक या ब्रह्मरंध्र कहलाता है। इसमें सात शक्ति संस्थान हैं। इनमें से छः मध्यवर्ती सक्रिय स्रोत षट्चक्र हैं। एक इन सबका अधिपति नियन्त्रक है, जिसे महाचक्र सहस्रार चक्र कहते हैं। इस प्रकार यह पूरा परिकर गिना जाय तो सप्तचक्र बन जाते हैं। इन्हीं का पिण्ड ब्रह्माण्ड में अवस्थित सप्त ऋषि, सूर्य के सप्त अश्व, सप्त लोक, सप्त सिन्धु, सप्त मेरु, सप्त द्वीप, सप्त तीर्थ आदि अलंकारिक निरूपणों के साथ अध्यात्म शास्त्रों में वर्णन मिलता है।

सप्तचक्रों की भी एक विवेचना यह है कि नीचे का मूलाधार और ऊपर का सहस्रार यह दोनों क्रमशः प्रकृति और पुरुष के, शक्ति और शिव के, रयि और प्राण के धरती और स्वर्ग के प्रतीक हैं। पृथकता की स्थिति में यह दोनों बहुत ही स्वल्प काम कर पाते हैं। मूलाधार प्रायः प्रजनन का ताना-बाना बुनता रहता है और शरीर को ऊर्जा, साहस, उत्साह आदि प्रदान करता है। सहस्रार की अर्धमूर्छित स्थिति में अचेतन और चेतन दोनों मिलकर कायिक गतिविधियों का संचालन और चिन्तन वर्ग के प्रयोजन पूरे करते रहते हैं। यह इन दोनों का निर्वाह मात्र के लिए चलते रहने वाला स्वल्प कार्य है। यदि उन दोनों की तन्द्रा छुड़ा दी जा सके और वे समर्थ सक्रिय हो उठें तो फिर समझना चाहिए कि अनन्त शक्तियों के सिद्धियों के स्रोत खुल पड़ेंगे और मनुष्य साधारण से असाधारण बन जायेगा। ऋषि, देवता और अवतारी मनुष्य इसी स्तर के होते हैं। उनकी आन्तरिक मूर्छना जागृति में परिणित हो गई होती है। कुम्भकरण का पौराणिक उपाख्यान इसी स्थिति की झाँकी कराता है। जब भी वह दैत्य जागता था अपनी सामर्थ्य का हाहाकारी परिचय प्रस्तुत करता था। मूलाधार की सामर्थ्य की सर्पिणी कहते हैं और सहस्रार को महासर्प कहा गया है। इन्हीं शक्तियों को सावित्री और गायत्री नाम से परब्रह्म की दो पत्नियाँ कहा गया है। इन दोनों के मिलन को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं, बिजली के अलग-अलग पड़े तार जब भी मिलते है, तो चिनगारी छूटती और शक्तिधारा प्रवाहित होती है। इसी स्थिति को कुण्डलिनी जागरण कहते हैं। यह सौभाग्य सुअवसर जिन्हें प्राप्त होता है वे भौतिक सिद्धियों और आत्मिक विभूतियों से सुसम्पन्न पाये जाते हैं। वे आत्मोत्कर्ष का परम लक्ष्य प्राप्त करते और अपूर्ण से पूर्ण बनते हैं। ईश्वर प्राप्ति इसी स्थिति का नाम है।

सहस्रार को महासर्प कहा गया है। विष्णु की शेष शैया भी वही है। समुद्रमंथन में रस्सी का काम वही करता है। सर्पिणी के रूप में कुण्डलिनी शक्ति का वर्णन प्रायः होता रहता है। जागृत होने पर ऊपर उठती और अग्नि शिखा के रूप में देवयान मार्ग से ब्रह्मलोक तक पहुँचती है। यह अलंकारिक वर्णन इस बात का है कि जननेन्द्रिय मूल में पड़ी हुई यह महाशक्ति जब ऊर्ध्वगामी बनती है, तो मेरुदण्ड मार्ग से ब्रह्मरंध्र तक जा पहुँचती है और उस क्षेत्र में सन्निहित अगणित दिव्यताओं को अनायास ही जागृत करती है। इसी स्थिति में अतीन्द्रिय, क्षमताओं का जागरण होता है। समुद्र मंथन से चौदह रत्न निकलने के उपाख्यान में मूलाधार के कण्डगह्वर को समुद्र मेरुदण्ड को सुमेरु पर्वत, सूर्यवेधन प्राणायाम के इड़ा-पिंगला संघर्ष को मंथन माना जाता है। समुद्र मंथन कुण्डलिनी जागरण का महा पुरुषार्थ है, जिसमें चेतना के देव पक्ष और काया के दैत्य पक्ष को मिल-जुलकर साधनारत होना होता है। इसका सत्परिणाम समुद्र मंथन से निकले 14 प्रसिद्ध रत्नों की तरह साधक को दिव्य विभूतियों के रूप में प्राप्त होता है।

मूलाधार और सहस्रार को नीचे ऊपर वाले महाचक्रों को यदि कुण्डलिनी जागरण साधना के विशेष वर्ग में गिन लिया जाय तो शेष मध्यवर्ती पाँच चक्र कह सकते हैं। कोश व्याख्या में इन्हें अन्नमय, प्राणमय, मनोमय विज्ञानमय और आनन्दमय कहते हैं। चक्र वर्णन में इन्हीं को स्वाधिष्ठान मणिपूर, अनाहत, विशुद्ध और आज्ञाचक्र कहा जाता है। यह एक ही तथ्य का दो रूप में वर्णन विवेचन मात्र है। वस्तुतः है एक ही। चक्रों का जागरण या कोशों का अनावरण एक ही बात है। संख्या की दृष्टि से पाँच, छः या सात की गणना से किसी को भ्रम में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। गायत्री माता के पाँच मुखों की उच्चस्तरीय साधना परम शान्तिदायिनी और महान शक्तिशाली साधना है। इसी प्रक्रिया को ब्रह्मवर्चस् का योगाभ्यास साधना पक्ष समझा जाना चाहिए।


विश्व भ्रमण पर थे (kahani)

स्वामी विवेकानन्द विश्व भ्रमण पर थे। वे अपने उपदेशों को भारतीय संस्कृति व धर्म की श्रेष्ठता का शंखनाद कर रहे थे। इसी बीच जापान के एक विद्वान ने उनसे पूछा-‘‘भारत में गीता, रामायण, वेद उपनिषद् आदि का इतना उच्च ज्ञान व दर्शन उपलब्ध है। फिर भी भारतवासी पराधीन और निर्धन क्यों बने हुए है।’’ इस पर स्वामी विवेकानन्द ने उत्तर दिया सर्वश्रेष्ठ व शक्तिशाली बन्दूक होते हुए भी उसके उपयोग की विधि उसका मालिक न जाने तो बन्दूक से वह अपनी रक्षा नहीं कर सकता। यही विडम्बना है कि अपने श्रेष्ठ धर्म व संस्कृति के होते हुए भी भारतवासी तद्नुरूप उसका आचरण नहीं करते। धर्म की महत्ता उसके आचरण में निहित है।

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ब्रह्मवर्चस् साधना में ज्ञानयोग, कर्मयोग एवं भक्तियोग का समन्वय

पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच प्राणों की परिचायक हैं। पाँच कर्मेन्द्रियों पाँच तत्वों की। पाँच तत्व जड़ प्रकृति के अंग हैं। पदार्थ में हलचल है। कर्मेन्द्रियाँ हलचल प्रधान हैं। चेतना में चिन्तन, विवेक एवं रस सौन्दर्य है। यह विशेषतायें ज्ञानेन्द्रियों में विद्यमान हैं। ज्ञानेन्द्रियों में प्राण सत्ता और कर्मेन्द्रियों में तत्व क्षमता ही उभरती उछलती दृष्टिगोचर होती है। जब जड़ तत्व, चेतन प्राणों के साथ मिलते हैं, तब उनकी प्रतिक्रिया भी संयुक्त होती है। इस प्रतिक्रिया को तन्मात्रा कहते हैं। ‘शब्द’ अग्नि की रूप, जल की रस, पृथ्वी की गन्ध और वायु की स्पर्श है। इनका परिचय क्रमशः कान, नेत्र, जिह्वा, नाक और त्वचा से होता है।

साधना का उद्देश्य आत्म सत्ता को परिष्कृत करना है। जीव अपने आप में पूर्ण है। पूर्ण से उत्पन्न हुआ पूर्ण ही होना चाहिए। ज्वाला और चिनगारी के आकार भर में अन्तर है। मूल क्षमता की दृष्टि से दोनों की स्थिति में कोई अन्तर नहीं। जीव, ब्रह्म का ही एक अंश है। अंश में अंशी के गुण बीज रूप में विद्यमान रहते हैं। शुक्राणु में पूर्ण पुरुष की और बीज में पूर्ण वृक्ष की सत्ता विद्यमान रहती है। विकसित होने का अवसर पाकर ही उनकी प्रसुप्ति जागती है और बीज का विस्तार होने लगता है। जीवात्मा साधारणतया शरीर निर्वाह के गोरख धन्धे में ही उलझा रहता है। वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति में ही उसकी प्रत्यक्ष क्षमता चुक जाती है। कोई ऐसा महत्वपूर्ण काम बन ही नहीं पाता जिसे विशिष्ट एवं महत्वपूर्ण कहा जा सके। श्रेय और प्रजनन के कुचक्र में ही इस सुर-दुर्लभ सौभाग्य का अन्त हो जाता है। सृष्टि का सर्वोपरि उपहार जिस प्रयोजन के लिए मिला था। उसे पूरा करने को न इच्छा उठती है और न क्रिया बन पड़ती है। लोभ और मोह के कोल्हू में पिलते-पिलते जीवन रूपी गन्ने का रस निचुड़ जाता है और निरर्थक छिलका सृष्टा के दरवाजे पर जा पहुँचता है। उत्तर एक ही देना था कि उस बहुमूल्य अमानत का क्या हुआ? जो विश्व के अन्य किसी प्राणी को नहीं मिली थी। आत्मिक पूर्णता प्राप्त करना और सृष्टा के उद्यान को समुन्नत बनाना ही इस महान अनुदान का उद्देश्य था। वह नहीं बन पड़ा तो परमेश्वर के दरबार में पहुँचकर पश्चात्ताप के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रहता। प्रायश्चित्त की प्रताड़ना ही चिरकाल तक सहन करनी पड़ती है। इस विडम्बना से बचना ही साधना की उद्देश्य हैं।

इसके लिए उपयुक्त बोध, साहस और कौशल प्राप्त करने के लिए विभिन्न अध्यात्म साधनायें की जाती हैं। प्रसुप्ति को जागृति में परिणत करने के लिए आत्म साधना का पुरुषार्थ किया जाता है। इस मार्ग पर चलते हुए जो सफलतायें मिलती हैं। उन्हें सिद्धियों के नाम से जाना जाता है। इन्हें अतीन्द्रिय क्षमता के नाम के जाना जाता है। सामर्थ्य का मूल्यांकन करने वाले इसे आत्मबल या ब्रह्मतेज कहते हैं। यह क्षमता के चमत्कारी क्रिया-कलाप भौतिक क्षेत्र में सम्पदायें, सफलतायें और आत्मिक क्षेत्र में सिद्धियाँ, विभूतियाँ कही जाती हैं। यह आत्मिक क्षेत्र का उत्पादन है। जागृत आत्माओं का पुरुषार्थ उसी क्षेत्र में होता है। सामान्य प्राणी जहाँ सुख-सुविधाओं की स्वल्प मात्रा भर उपार्जित कर पाते हैं, वहाँ अध्यात्म क्षेत्र का पुरुषार्थ महानता का गौरवास्पद प्रतिफल उत्पन्न करता है। उसके सहारे साधक को सन्तोष सम्मान और सहयोग का लाभ मिलता है। उपार्जित सामर्थ्य के बलबूते वह स्वयं पार होता है और अपनी नाव पर बिठाकर असंख्यों को पार करता है। मानव जीवन की सार्थकता इसी में है। इस सिद्धि को प्राप्त करने के लिए साधना मार्ग का अवलम्बन करना होता है।

साधना का प्रत्यक्ष पक्ष वह है जिसमें अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत किया जाता है। दृष्टिकोण में दूरदर्शी विवेकशीलता का समन्वय करने का तत्व दर्शन ब्रह्म विद्या के नाम से प्रख्यात है। स्वाध्याय, सत्संग, मनन, चिन्तन की साधना इसी प्रयोजन के लिए की जाती है। इसे ज्ञानयोग कहते हैं। अध्यात्म विवेचना के ग्रन्थ इसी निमित्त रचे गये हैं।

प्रत्यक्ष साधना का व्यवहार पक्ष है- क्रियाकलाप में आदर्शवादिता का समन्वय। चरित्र निष्ठा और समाज निष्ठा के अनेक क्रिया-कलाप इसी उद्देश्य को पूरा करने के लिए होते हैं। कषाय कल्मषों की निवृत्ति के लिए अपने कुसंस्कारों को निरस्त करने के लिए तपश्चर्या की नीति अपनानी पड़ती है और अन्तःक्षेत्र का कुसंस्कार विरोधी विद्रोह खड़ा करना पड़ता है। साथ ही निर्वाह से बचने वाली सामर्थ्य को परमार्थ प्रयोजनों में लगाना होता है। इसे सेवा धर्म कहते हैं। पीड़ा और पतन के निवारण में अपने भाव भरे अनुदान प्रस्तुत करने में चरित्र निष्ठा और समाजनिष्ठा के दोनों उद्देश्य पूरे होते हैं। प्रभु समर्पित जीवन की साधु और ब्राह्मण शाखाएँ इसी उद्देश्य को पूरा करने को प्राणपण से जुटी रहती हैं। यह प्रत्यक्ष साधना का व्यवहार पक्ष हुआ। इसे नीति शास्त्र, धर्मशास्त्र, समाज शास्त्र के नाम से जाना जाता है। इस सारे क्षेत्र को कर्मयोग कह सकते हैं।

तीसरा योग है भक्तियोग, इससे कारण शरीर का परिष्कार होता है। स्थूल शरीर कर्मयोग से सूक्ष्म शरीर को सुसंस्कृत बनाने के लिए भक्तियोग का विधान है। भक्तियोग के अन्तर्गत वे विधि-विधान आते हैं, जिन्हें उपासना कहते हैं। उपासना क्षेत्र में वे सभी क्रिया-कलाप किये जाते हैं, जो जप, ध्यान आदि के पूजा पद्धतियों के रूप में अनेक परम्पराओं के अनुसार अनेक क्षेत्रों में अनेक क्रिया-प्रक्रियाओं के साथ प्रचलित देखे जाते हैं। इन दिनों साधना शब्द से अभिप्राय इसी क्षेत्र की गतिविधियों तक सीमित होता है। जबकि ज्ञानयोग और कर्म को प्राथमिकता मिलनी चाहिए थी और भक्तियोग को उच्चस्तरीय प्रयोजन समझते हुए उसे सीमित परिमाण में ही प्रयुक्त किया जाना चाहिए था।

ब्रह्मवर्चस् साधना में ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग का सन्तुलित समन्वय है। आत्म-चिन्तन, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास की चारों प्रक्रियाएँ किस प्रकार सम्पन्न की जानी चाहिए इसका कार्यक्रम साधन की स्थिति के अनुरूप बनाया जाता है। साधना के साथ-साथ स्वाध्याय, संयम और सेवा के तीन अवलम्बन भी अपनाये जाने चाहिए और उनकी अनिवार्य आवश्यकता को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह प्रत्येक साधक को विस्तारपूर्वक समझाया और करने को सुव्यवस्थित कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है। समग्र जीवन में उत्कृष्टता भर देने वाली रीति-नीति को ही आत्मोत्कर्ष की सफलता के लिए अनिवार्य बताकर उसका समुचित मार्ग-दर्शन किया जाता है।

भक्तियोग की साधना को उपासना एवं योग साधना का नाम दिया गया है। ब्रह्मवर्चस् साधना में चान्द्रायण तप के साथ इसी प्रयोजन के लिए पाँच प्रकार की उपासनाएँ कराई जाती हैं। (1) त्राटक (2) सूर्यवेधन (3) खेचरी (4) बंध मुद्रा (5) सोऽहम्। इनसे पाँच तत्वों का, पाँच प्राणों का, पाँच तन्मात्राओं का परिष्कार जागरण एवं उन्नयन सुनियोजित रीति से सम्पन्न होता है। सुव्यवस्थित साधना का सदा सत्परिणाम प्रस्तुत करना सुनिश्चित है।


Quotation

अस्मिन् महामोहमये कटाहे सूर्याग्निना रात्रि दिवेन्धनेन।

मासर्तु दर्वी परिघट्टनेन भूतांनि कालः पचतीति वार्ता॥

महा0 वनपर्व

युधिष्ठिर ने कहा- हे यक्ष, इस संसार में मोह का कड़ाह है। इसी में पड़े सब प्राणी उबल रहे हैं। रात और दिन रूपी ईंधन जल रहा है। ऋतुओं की करछी से काल उन्हें घोट रहा है। प्राणी उसी में पक रहे हैं। इसके अतिरिक्त इस संसार में और क्या समाचार है।

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ब्रह्मवर्चस् की योगाभ्यास साधना

योग शब्द डरावना-सा लगता है। उससे किसी अत्यन्त कष्ट साध्य उपासना पद्धति का अनुमान होता है और लगता है इसमें कोई गड़बड़ी पड़ने से किसी विपत्ति की आशंका रहेगी। यह आशंका तभी सच हो सकती है जब सर्वथा मनमानी बरती जाय और साधक की शक्ति तथा स्थिति को जाने बिना चाहे जिससे चाहे जिस साधना को कराने लग जायें। ब्रह्मवर्चस् सत्र में सभी आरम्भिक साधनाएँ शिशु स्तर की करायी जाती हैं और ऐसी हैं जिनमें प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की तनिक भी आशंका नहीं है। चान्द्रायण तप ‘यति’ स्तर का कठोर भी होता है और शिशु स्तर का सरल भी। ब्रह्मवर्चस् साधना में अनभ्यस्त और दुर्बल मनःस्थिति को ही ध्यान में रखकर सारी योजना बनाई गई है। अस्तु ‘चान्द्रायण तप’ भी शिशु स्तर का सरल है। जो बिना किसी हानि कठिनाई के सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाता है। यही बात उन योगाभ्यास साधनाओं में भी है जो इस प्रक्रिया के लिए निर्धारित की गई है वे सरल तो हैं ही उनमें कोई भूल रहने पर भी किसी प्रकार की हानि की तनिक भी आशंका नहीं है।

एक महीने के सत्र में सवा लक्ष गायत्री का पुरश्चरण तथा चांद्रायण तप का समावेश है। जप के साथ ध्यान साधना क्रम भी चलता रहेगा। अतिरिक्त योगाभ्यास साधना में पंचमुखी गायत्री का पंचकोश अनावरण का योगाभ्यास है। इसमें पाँच योगों का समावेश है- (1) त्राटक बिन्दुयोग (2) सूर्यवेधन प्राणायाम, प्राणयोग (3) शक्तिचालिनी, कुण्डलिनी योग (4) खेचरी मुद्रा लययोग (5) सोऽहम् साधना, हंसयोग। इस समन्वय का यम द्वारा नचिकेता को सिखाई गई कठोपनिषद् वर्णित पंचाग्नि विद्या भी कह सकते हैं। इस सरल योगाभ्यास का सामान्य परिचय इस प्रकार है-

(1) बिन्दुयोग (त्राटक)

भगवान विष्णु और भगवती दुर्गा के भ्रू-मध्य भाग में तीसरा नेत्र चित्रित किया गया है। यह तीसरा नेत्र है। दिव्य दृष्टि इसी में रहती है। दिव्य दृष्टि सामान्यतया दूरदर्शिता और विवेकशीलता को कहते हैं। उच्चस्तरीय स्थिति में उसे दूर दर्शन जैसी अतीन्द्रिय क्षमता माना जाता है। वेधक दृष्टि भी यही है। इस केन्द्र से प्रचण्ड विद्युत शक्ति निकलती है और उसके द्वारा दूसरों को कोई प्रकार के अनुदान देना सम्भव हो जाता है। भगवान शिव ने इसी तीसरे नेत्र से निकलने वाली प्रचण्ड विद्युत शक्ति के सहारे आक्रमणकारी कामदेव को जला कर भस्म कर दिया था। संजय इसी केन्द्र का उपयोग टेलीविजन की तरह करते थे उन्होंने धृतराष्ट्र के पास बैठ कर ही सुविस्तृत क्षेत्र में फैले हुए महाभारत का समाचार सुनाते रहने का काम अपने जिम्मे किया था। मैस्मरेजम हिप्नोटिज्म जैसे चमत्कारी प्रयोगों के लिए इन दिनों त्राटक साधना का ही अभ्यास किया जाता है।

मस्तिष्क विद्या के ज्ञाता जानते हैं कि भ्रू-मध्य भाग की तनिक-सी गहराई में पीनियल और पिट्युटरी नामक दो ग्रन्थियाँ हैं। इन दोनों की क्षमता एक दूसरे को प्रभावित करती और एक संयुक्त प्रभाव चक्र बनती हैं। इस चक्र की कार्य पद्धति से मस्तिष्क के विभिन्न भाग प्रभावित होते हैं। मेरुदण्ड से सम्बन्धित नाड़ी गुच्छकों तथा हारमोन ग्रन्थियों से भरी हुई विशिष्ट क्षमता को इसी चक्र से प्रेरणा एवं दिशा मिलती है। चेतन और अचेतन मन को- गतिविधियों को दिशा देने का काम इसी चक्र का है। इसलिए उसे अध्यात्मचेतन से आज्ञाचक्र कहा जाता है। आज्ञाचक्र अर्थात् काया के स्थूल और सूक्ष्म संस्थानों को विभिन्न गतिविधियाँ अपनाने के लिए आज्ञा वाला दिव्य संस्थान है। इस दिव्य केन्द्र में असीम सामर्थ्य भरी पड़ी है, पर वह किसी उच्च उद्देश्य में प्रयुक्त न किये जाने के कारण अंधेरे में भटकती है। कुसंस्कारों से आच्छादित रहती और मूर्छित पड़ी रहती है। इसे जागृत करने की साधना का नाम त्राटक है।

इसके लिए प्रकाश का अवलम्बन लेना पड़ता है।

त्राटक साधना में घृत दीप जला कर सामने रखते हैं। उसे एक बार आँखें खोलकर देखते हैं। फिर आँखें बन्द कर लेते हैं। भ्रू-मध्य भाग में ध्यान करते हैं कि प्रकाश ज्योति भीतर जल रही है और अंतःक्षेत्र में विद्यमान तृतीय नेत्र को ज्योतिर्मय बनाती हुई, दिव्य दृष्टि उत्पन्न कर रही है। इस ध्यान में दीप ज्योति से सहायता मिलती है। संकल्प बल द्वारा आज्ञाचक्र में उसकी प्रतिष्ठापना होती है और अभ्यास से उसे इतना परिपक्व बनाया जाता है कि चर्मचक्षुओं की तरह से उसे विश्व-व्यापी दिव्यता का भान होने लगे। जड़ के आवरण में छिपी हुई आत्मा की झाँकी मिलने लगे। पदार्थों में परमेश्वर परिलक्षित होने लगे। इसे विवेक का जागरण भी कह सकते हैं। सामान्य बुद्धि जहाँ अवांछनीयता से समझौता कर लेती है और मोह जंजाल में भ्रमित होकर कुछ का कुछ निर्णय करने लगती है। त्राटक साधना से जो दूरदर्शी तत्वदर्शी विवेक जागृत होता है उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। गायत्री मन्त्र का धियः तत्व वही है। इस जागरण को आत्म-जागरण की संज्ञा दी जाती है। इसे भौतिक और आत्मिक जीवन की महा उपलब्धि ही कह सकते हैं।

(2) प्राणयोग सूर्यवेधन प्राणायाम-

इस निखिल ब्रह्माण्ड में वायु, ईथर ऊर्जा आदि की तरह ही एक ऐसा दिव्य तत्व भी भरा पड़ता है जिसे जड़ चेतन की समन्वित शक्ति प्राण कहते हैं। आरोग्य शास्त्री उसे जीवनी शक्ति कहते हैं और बताते हैं कि उसकी न्यूनाधिक मात्रा के कारण ही मनुष्य दुर्बल और समर्थ बनते हैं। मनःशास्त्री उमंग, स्फूर्ति, उत्साह, साहस के रूप में उसकी व्याख्या करते है और जीवट एवं प्रतिभा कहते हैं। अध्यात्म शास्त्री इसी प्राण को संकल्प, विश्वास आदर्श की परिपक्वता, प्रखरता कहते हैं। सम्वेदना क्षेत्र में इसी को सद्भावना श्रद्धा, कला, सरसता आदि के रूप में प्रतिपादित करते हैं और महानता नाम देते हैं। व्यक्तित्व के विभिन्न क्षेत्रों में प्रवेश करके यह प्राण ही ओजस्, तेजस्, वर्चस् के रूप में प्रकट होता है। मनस्वी, तेजस्वी, तपस्वी, यशस्वी व्यक्तियों में इसी प्रखरता का बाहुल्य पाया जाता है। चेहरे पर छाये हुए तेजोवलय के रूप में इसी का दर्शन होता है। यह प्राण ही शरीर विद्युत के रूप में सम्पर्क क्षेत्र में अपना चुम्बकीय प्रभाव छोड़ता है। आकर्षण, अनुदान, प्रहार जैसे कितने ही प्रभावशाली तत्व उसमें धुले रहते हैं। प्राण की छाया में जो सामर्थ्य का स्रोत है वह प्राण ही है। इसीलिए उसे प्राणी अर्थात् प्राण द्वारा संचालित कहा जाता है। इसके निकल जाने पर मृत्यु हो जाती है और घटा जाने पर जीवित रहते हुए भी मुर्दनी, सुस्ती, उदासी छाई रहती है। पिछड़ेपन से ग्रसित दीन-दरिद्र, अस्त-व्यस्त, अनिश्चित स्तर के लोगों को प्रधान कठिनाई प्राण तत्व की न्यूनता ही होती है। जिस प्राणी में जितना प्राण तत्व अधिक होगा वह उतना ही पराक्रमी पाया जायेगा। ऋषियों के आश्रमों में उन महामानवों का परिष्कृत प्राण ही उच्चस्तरीय वातावरण बनाये रहता था। उसी के प्रभाव से वहाँ पहुँचने पर सिंह, गाय एक घाट पानी पीते थे। सत्संग और कुसंग में इस प्राण चुम्बक का ही भला-बुरा प्रभाव काम करता है। विचारों प्रवचनों से समझने-समझाने भर से सहायता मिलती है। एक-दूसरे के मध्य जो प्रभाव या आदान-प्रदान होता है उसमें प्राण विद्युत ही काम कर रही होती है। दूसरों का प्रभावित करने का काम प्रायः इसी प्रखरता के सहारे सम्पन्न होता है।

पदार्थ जगत में ऊर्जा और गति के रूप में प्राण शक्ति की विभिन्न प्रकार की मन्द एवं तीव्र गतिविधियाँ उत्पन्न करती हैं। परमाणु के अन्तर्गत काम करने वाले छोटे घटक इसी चुम्बकत्व से परस्पर बंधे रहते हैं। द्रुत गति से अपनी कक्षा पर अनवरत गतिशील रहने की सामर्थ्य इसी दिव्य विद्युत से प्राप्त होती है। पृथ्वी की आकर्षण शक्ति में, सूर्य की ऊष्मा में, ग्रह पिण्डों को परस्पर जकड़कर रखे हुए सूत्र शृंखला में महा प्राण ही काम करता है। लेसर, एक्सरेल अल्ट्रावायलेट आदि विशिष्ट किरण इसी महाशक्ति की चिनगारियाँ हैं। परमाणुओं और जीवाणुओं के मध्य केन्द्र नाभिक, न्यूक्लियस, पदार्थ समुच्चय का प्राण कहा जा सकता है।

यह प्राण ही चेतना की सर्वोपरि सामर्थ्य है। उसी के सहारे किसी भी क्षेत्र में प्रगति कर सकना सम्भव होता है। यह महातत्व अग्नि आकाश में प्राण तत्व ऑक्सीजन की ही तरह प्रचुर परिमाण में सर्वत्र भरा पड़ा है। इसकी अभीष्ट मात्रा को खींचना और आत्मसत्ता में धारण कर सकना प्रयत्नपूर्वक सम्भव हो सकता है। इस प्राण विनियोग की प्रक्रिया को प्राणायाम कहते हैं। इसमें विशिष्ट क्रिया-प्रक्रिया के साथ श्वास-प्रश्वास क्रियाएँ करनी पड़ती है। साथ ही प्रचण्ड संकल्प बल का वैयक्तिक चुम्बकत्व समुचित मात्रा में समन्वित किये रहना होता है। इसी साधना को प्राणयोग कहते हैं। सामान्यतः इसे प्राणायाम कहते हैं। ‘लय’ और ‘ताल’ की महान शक्ति का ज्ञान सर्व साधारण को तो नहीं होता, पर विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि सर्वविदित न होने पर भी यह सामर्थ्य कितनी प्रचंड है।

सूर्यवेधन प्राणायाम में लय और ताल का विशेष समन्वय है। इड़ा और पिंगला शरीरगत दो विद्युत प्रवाह हैं, जो मेरुदण्ड के अन्तराल में काम करते रहे हैं। इनका मिलन केन्द्र सुषुम्ना कहलाता है। इड़ा पिंगला से सम्बन्धित श्वास प्रवाह को उलट-पुलटकर चलाने की प्रक्रिया विशिष्ट महत्वपूर्ण है। पेण्डुलम क्रम में उसी के तनिक से स्पर्श का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है और घड़ी चलती रहती है। हृदय की धड़कन भी इसी उलट-पुलट का क्रम रक्त संचार के सहारे जीवन धारण किये रहने का महान कार्य सम्पादन करती है।

इसी लोभ-विलोभ क्रम से किया जाने वाला प्राण-योग सूर्य वेधन प्राणायाम कहलाता है। ब्रह्मवर्चस् साधना में इसी का अभ्यास कराया जाता है। साधक अपने भीतर प्राणतत्व की अभिवृद्धि का अनुभव करता है। इस प्रक्रिया के द्वारा उपार्जित प्राण सम्पदा साधन की बहुमूल्य संपत्ति होती है। इस पूँजी को आवश्यकतानुसार विभिन्न प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। इसे बहिरंग और अन्तरंग क्षेत्र का सामर्थ्य उत्पादक प्रयोग कह सकते हैं। कुण्डलिनी जागरण के लिए तो इसी क्षमता की विशेष रूप से आवश्यकता पड़ती है। विद्युत उत्पादन में जो कार्य जेनरेटर करते हैं, लगभग व्यक्तित्व में अनेक प्रयोजनों में काम आने वाली प्राण ऊर्जा का संचय सूर्यवेधन प्राणायाम की साधना द्वारा किया जाता है।

प्राणायाम के साथ बन्धों का प्रयोग किया जाता है। मुख्य बन्ध तीन है। (1) मूलबन्ध (2) उड्डियान बन्ध (3) जालन्धर बन्ध। प्राण प्रवाह को नियन्त्रित करने में इन्हें बाँध वाल्व के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। प्राण ऊर्जा के उत्पादन अथवा संग्रह के साथ उसे अवांछनीय दिशा में प्रवाहित न होने देने तथा वांछित दिशा में नियोजित करने के महत्व को समझते हुए उसके लिए इन योग क्रियाओं की सहायता ली जाती है।

भव बन्धनों में- मायाग्रस्त जकड़नों में कसे रहने वाली ग्रन्थियों से छुटकारा दिलाकर जीवन मुक्त स्थिति तक पहुँचाना बन्ध साधना का उद्देश्य है। ब्रह्म ग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और रुद्र ग्रन्थि का वर्णन हठयोग की विवेचना में किया जाता है। ब्रह्मवर्चस् की बन्ध साधना में इन्हीं तीनों को खोलने का विधान है। मूलबन्ध जालन्धर बन्ध और उड्डियान बन्धों की साधनाएँ अधिकारी भेद से घटा-बढ़ाकर अथवा समन्वय करके कराई जाती है। इसी लिए प्राणायाम बन्ध सहित करने की प्रक्रिया अपनायी जाती है।

(3) कुण्डलिनी योग- शक्तिचालिनी

ब्रह्म शक्ति का केन्द्र ब्रह्मलोक और जीव शक्ति का आधार भू-लोक है। दोनों ही काया के भीतर सूक्ष्म रूप से विद्यमान है। भूलोक-जीव संस्थान मूलाधारचक्र है। मूलाधार अर्थात् जननेन्द्रिय मूल। प्राणी इसी स्थान की हलचलों और संचित सम्पदाओं के कारण जन्म लेते हैं। इसलिए सूक्ष्म शरीर से विद्यमान उस केन्द्र को उद्गम स्थान मूलाधार चक्र कहा गया है। कुण्डलिनी शक्ति इसी केन्द्र में नीचा मुँह किये मूर्च्छित स्थिति में पड़ी रहती है और विष उगलती रहती है। इस अलंकारिक विवेचन में यह बताया गया है कि जीवात्मा का भौतिक परिकर इसी केन्द्र में सन्निहित है। प्रजनन कर्म इसी का एक सम्वेदना की दृष्टि से अति सरस एवं उत्पादन की दृष्टि से आश्चर्यचकित करने वाला एक छोटा-सा किन्तु चमत्कारी अनुभव है। इसे कुण्डलिनी शक्ति का सर्वविदित प्रतिफल कह सकते हैं।

वस्तुतः प्रकृति शक्ति का इस कुण्डलिनी केन्द्र, मूलाधार को भौतिक क्षमता का मानवी उद्गम कह सकते हैं। जिस प्रकार ब्रह्म सत्ता का प्रत्यक्षीकरण ब्रह्म लोक में होता है ठीक उसी प्रकार प्रकृति की प्रचण्डशक्ति का अनुभव इस जननेन्द्रिय क्षेत्र के कुण्डलिनी केन्द्र में किया जा सकता है। शारीरिक समर्थता मानसिक सजगता और सम्वेदनात्मक सरसता की तीनों उपलब्धियाँ इसी शक्ति केन्द्र के अनुदानों द्वारा प्राप्त की जा सकती हैं।

शरीर के विभिन्न अवयवों में विभिन्न प्रकार की शक्तियों का प्रत्यक्ष परिचय मिलता है। ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों की समर्थता सरस सम्वेदनाओं और चमत्कारी सफलताओं से जीवात्मा को प्रसन्नता मिलती है। शरीर गत स्फूर्ति, ओजस्विता और सुन्दरता इसी प्रकृति शक्ति के बाहुल्य का परिचायक है। मन में उत्साह, साहस, धैर्य और पराक्रम की क्षमता बनती है। बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, कलाकारिता, आदर्शवादिता जैसी व्यक्तित्व को सुसंस्कृत और समुन्नत बनाने वाली विशेषताएँ हैं। जिन्हें प्राप्त कर सकने वाला साहस मानवों की श्रेणी में जा पहुँचता है।

विभूतियाँ आत्मिक होती हैं। वे ब्रह्मलोक से उपलब्ध होती हैं। उनके सहारे मनुष्य को सन्त, ऋषि और देव बनने का अवसर मिलता है। आत्म बल के सहारे ही इन अनुदानों को प्राप्त किया जा सकता है। तपस्वी इसी का साधन जुटाते है। सिद्धियाँ भौतिक होती हैं, इन्हें पाकर व्यक्ति सुसम्पन्न और समुचित बनता है। शरीरगत ओजस्विता और मनोगत मनस्विता के यह प्रतिफल हैं। यह दोनों ही क्षमताएँ भौतिक हैं। शरीर में प्रकृति शक्ति का, बहुलता का, परिचय इसी रूप में मिलता है। इसी समता को अध्यात्म विद्या के विज्ञानी कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं। सामान्यतया यह प्रसुप्त पड़ी रहती है और निर्वाह के साधन जुटाने तथा संयोग रस लेने का ताना-बाना बुनने जैसे तुच्छ कामों में ही उसकी समाप्ति हो जाती है। विवेकवान उसे जगाकर अनेक गुनी प्रखर बनाते हैं और जागरण की उस प्रखरता का उपयोग व्यक्तित्व को प्रतिभा सम्पन्न बनाने तथा उच्चस्तरीय काम हाथ में लेने तथा उन्हें पूर्ण बनाने के लिए प्रयुक्त करते हैं।

कुण्डलिनी जागरण को साधना में मूलाधार शक्ति को जगाने-उठाने और पूर्णता के केन्द्र से जोड़ देने का प्रयत्न किया जाता है। मूलाधार को प्रसुप्त कुण्डलिनी को जगाने और अधोमुखी से ऊर्ध्वगामी बनाने का प्रथम प्रयास शक्तिचालिनी मुद्रा के रूप में सम्पन्न किया जाता है। ऊर्ध्वमुखी कुण्डलिनी अग्नि शिखर की तरह मेरुदण्ड मार्ग से ब्रह्मलोक तक पहुँचती है। अपने अधिष्ठाता सहस्रार से मिलकर पूर्णता प्राप्त करती है। इसी को कुण्ड दग्ध सती का पार्वती के रूप में तप साधन और शिव विवाह के रूप में वर्णन किया गया है। इस मिलन संयोग से दो पुत्र जन्मे एक सद्बुद्धि के देवता गणेश, दूसरे प्रचण्ड पराक्रम के अधिपति कार्तिकेय। इस कथानक में प्रजनन कुण्ड में मरी पड़ी सती के रूप में मूर्छित कुण्डलिनी का वर्णन है। साधना से उसे पुनर्जीवन मिलता है। उच्च उद्देश्यों से जुड़कर वह पार्वती बनती है। और शिव-विवाह का सहस्रार में संयुक्त होने का आनन्द प्राप्त करती है। इस सफलता के फलस्वरूप गणेश और कार्तिकेय के रूप में तत्वज्ञान और प्रचण्ड पराक्रम के रूप में शारीरिक और बाह्य आनन्द उल्लास उपलब्ध होते चले जाते हैं।

शक्तिचालिनी मुद्रा- गुदा संकोचन की एक विशेष पद्धति है जिसे सिद्धासन या सुखासन पर बैठकर, विशिष्ट प्राण साधना के साथ सम्पन्न किया जाता है। इस प्रक्रिया का समूचे कुण्डलिनी क्षेत्र पर ऐसा प्रभाव पड़ता है जिससे उस शक्ति के जागरण और ऊर्ध्वगमन के दोनों उद्देश्य पूरे हो सकें। इस प्रयास में उत्पन्न हुई उत्तेजना का सदुपयोग करने वाले अनेक असाधारण काम सम्पन्न कर पाते हैं।

(4) लय योग-खेचरी मुद्रा

शान्त मस्तिष्क को ब्रह्म लोक और निर्मल मन को क्षार सागर माना गया है। ब्रह्म यों तो सर्वव्यापी हैं पर उसकी विशेष सत्ता ब्रह्मलोक में मानी जाती है। मनुष्य और ब्रह्मलोक का आदान-प्रदान ब्रह्मरन्ध्र मार्ग से होता है। ब्रह्मरन्ध्र अर्थात् मस्तिष्क का मध्य बिन्दु। ब्रह्माण्ड के मध्य में ब्रह्म लोक माना गया है। मस्तिष्क के मध्य में ब्रह्मरन्ध्र है। इसे जीव सत्ता का नाभिक-न्यूक्लियस कह सकते हैं। इसी का नाम सहस्रार कमल है। जीव और ब्रह्म के मध्य अति महत्वपूर्ण आदान-प्रदान का माध्यम यही है। पृथ्वी की संपदा अन्तर्ग्रही आदान-प्रदानों से संचित हो सकी है और सूक्ष्म आवश्यकताओं की पूर्ति के साधन जुटते रहते हैं। इस लेन-देन का द्वार ध्रुव केन्द्र है। ठीक इसी प्रकार मस्तिष्क रूपी मानवों ब्रह्म लोक का मध्य केन्द्र ब्रह्म रन्ध्र सहस्रार कमल है- यह जितना सशक्त दुर्बल होता है, विकसित अविकसित रहता है, उसी अनुपात में जीव सत्ता को ब्रह्म सत्ता के अनुदान प्राप्त कर सकने की सम्भावना बढ़ती है।

पृथ्वी काया है और सहस्रार उसके आकाश में उगा हुआ सूर्य। धरती को अपरिमित अनुदान सूर्य से मिलते हैं। प्रत्यक्ष काय कलेवर को दिव्य विभूतियों का लाभ सहस्रार रूपी सूर्य से मिलता है। शास्त्रकारों ने ब्रह्म लोक की स्थिति ओर उपयोगिता को अलंकारिक चित्रणों द्वारा भली प्रकार समझा दिया है। विष्णु भगवान क्षीर सागर में सहस्र फन वाले सर्प पर शयन कर रहे हैं, लक्ष्मी जी उनके पैर दबा रही हैं। मस्तिष्क के खोखले में भरी हुई मज्जा ही क्षीर सागर है। सहस्र दल कमल, सहस्र फन वाला सर्प है। ब्रह्म तत्व का केन्द्रीय नाभिक- विष्णु इसी पर निद्रित स्थिति में पड़ा है। सिद्धियों और विभूतियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी उसी प्रसुप्त विष्णु के साथ सटी हुई हैं। सूक्ष्म जगत की, सूक्ष्म सत्ता की स्थिति का यह अलंकारिक किन्तु सही चित्रण है। विष्णु सत्ता के सान्निध्य और अनुग्रह का लाभ लेना हो तो वहाँ तक पहुँचना चाहिए। यही खेचरी मुद्रा की साधना है।

ब्रह्मा शान्त समुद्र में कमल पुष्प पर बैठ कर तप करते हैं यह भी मस्तिष्कीय ब्रह्मरंध्र का ही चित्रण है। कैलाश वासी शिव ने गले में सर्प पड़ा है। कैलाश मानसरोवर से घिरा है। यह भी प्रकारान्तर से वही वर्णन है। महासर्प का चित्रण यहाँ कुण्डलाकार ब्रह्म वैभव के रूप में किया गया है। वह विष्णु के नीचे और शिव के गले में है। इसका तात्पर्य यही है कि ब्रह्म सत्ता के निकट तक पहुँचने वाला ही भौतिक और आत्मिक वैभवों से सच्चे अर्थों में लाभान्वित हो सकता है।

अन्तर्जगत के इस ब्रह्मलोक की- सहस्रशीर्षा पुरुष की सहस्र धारा से सम्बन्ध बनाने और उससे होने वाली अमृत वर्षा का लाभ लेने के लिए खेचरी मुद्रा का साधन बताया गया है। ध्यान मुद्रा में शान्त चित्त से बैठकर जिह्वाग्र भाग को तालु मूर्धा से लगाया जाता है। सुहलाने जैसे मन्द-मन्द स्पन्दन पैदा किये जाते हैं। उसे उत्तेजना से सहस्र दल कमल की प्रसुप्त स्थिति जागृति में बदलती है। बन्द छिद्र खुलते हैं। और आत्मिक अनुदान जैसा रसास्वाद जिह्वाग्र भाग के माध्यम से अन्त चेतना को अनुभव होता है। यही खेचरी मुद्रा है।

तालु मूर्धा को कामधेनु की उपमा दी गई है और जिह्वाग्र भाग से उसे सुहलाना पयपान कहा गया है। तान्त्रिक हठयोगी उसे विषयानन्द स्तर का ब्रह्मानन्द कहते हैं। इस क्रिया से आनन्द और उल्लास की अनुभूति होती हैं यह दिव्यलोक से आत्मलोक पर होने वाली अमृत वर्षा का चिन्ह है। देवलोक से सोमरस झरता है। अमृत कलश से अनुदान पाकर आत्मा को अमरता की अनुभूति का आनन्द मिलता है। यह खेचरी मुद्रा की साधना से उत्पन्न होने वाली प्रति क्रियाओं का ही अलंकारिक वर्णन है। इन विवेचनाओं से इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि यदि भावना और क्रिया का सही समन्वय करके इस साधना को किया जा सके तो चेतना क्षेत्र में आनन्द और कार्य क्षेत्र में उल्लास की उपलब्धि होती है। यह लाभ ही प्रकारान्तर से भौतिक और आत्मिक जगत के अनेक लाभों का आभास कराता है। आत्मिक जगत के अनेक लाभों का आभास मिलता है। त्राटक के ऊपर से और खेचरी का नीचे से प्रभाव पड़ने के कारण साधक का ब्रह्म लोक उसका मध्य बिन्दु सहस्रार अपनी जागृत समर्थता का परिचय देने लगता है।

(5) हंसयोग-सोऽहम् साधना

शरीर निर्वाह में अन्न और जल से भी अधिक महत्व वायु का है। वायु में प्राण- वायु की, ऑक्सीजन की महत्ता सर्वोपरि है। ऑक्सीजन का महत्व विज्ञान के विद्यार्थी भली प्रकार जानते हैं। रक्त में लालिमा उसी की है। इसी ईंधन के जलने से शरीर का इंजन गर्म रहता है और सब कल पुर्जे अपना-अपना काम सही रीति से करते है। ऑक्सीजन का एक नाम प्राण वायु भी है। वह समुचित रूप से मिलती रहे तो शरीर बलिष्ठ बना रहेगा।

ऑक्सीजन प्राण के अधिक सूक्ष्म स्तर का प्राण है, जिसे जीवनी शक्ति, प्रतिभा और प्रखरता के रूप में माना जाता है। ऑक्सीजन पाने के लिए तेज और गहरी साँस चलाने वाले दौड़ने से लेकर दण्ड बैठक करने तक के अनेक व्यायाम किये जाते हैं। सूक्ष्म प्राण के रूप में ‘जीवट’ प्राप्त करने के लिए प्राणायाम किये जाते हैं प्राणायामों के अनेकों विधि-विधान हैं। उन्हीं में से एक सूर्यवेधन अनुलोम विलोम ब्रह्मवर्चस् साधना में प्राणयोग के नाम से सम्मिलित है। व्यायाम शरीर का बलवर्धन उद्देश्य पूरा करते हैं और प्राणायाम से मनस्वी तेजस्वी बनने का लाभ मिलता है। सूक्ष्म शरीर में प्रखरता उत्पन्न करना उसका उद्देश्य है।

स्थूल और सूक्ष्म शरीर के लिए अभीष्ट मात्रा में प्राण संचय करने की प्रक्रिया व्यायाम और प्राणायाम कहलाती है। कारण शरीर के अन्तराल के दिव्य प्राण की आवश्यकता होती है। यह ‘महाप्राण’ है। इसे ‘ब्रह्मप्राण’ भी कहा गया है। सोऽहम् साधना इसी का नाम है। गायत्री उपासना के विज्ञान में इसे अजपा गायत्री कहते हैं।

इस साधना में मनः स्थिति को ब्राह्मी भूत बनाना पड़ता है। अपने को शरीर मन से ऊपर की स्थिति में अनुभव कराने वाली ब्रह्म चेतना जगानी पड़ती है। अभ्यास करते समय आत्मिक चुम्बकत्व को अधिक प्रखर बनाना होता है। इतनी भूमिका बन पड़ने पर श्वास प्रक्रिया में इतना दिव्य आकर्षण उत्पन्न होता है जिसके सहारे अनन्त अन्तरिक्ष से दिव्य प्राण को अपने लिए आकर्षित करना और उपलब्ध अंश को धारण कर सकना सम्भव होता है। सोऽहम् साधना इसी का नाम है।

प्राणायाम में सांस खींचने की प्रक्रिया को पूरक कहते हैं। हंस योग में सांस खींचने के साथ अत्यन्त गहरे सूक्ष्म पर्यवेक्षण के उतरकर यह खोजना पड़ता है कि वायु के भीतर प्रवेश करते समय सीटी बजने जैसी ‘सो’ की ध्वनि भी उसके साथ ही घुली हुई है। यह ध्वनि प्रकृतिगत नहीं वरन् ब्राह्मी है। यह ध्वनि ईश्वरीय संकेतों संदेशों और अनुदानों से भरी हुई है। सांस के साथ भीतर प्रवेश करती है और सम्पूर्ण जीवन सत्ता पर अपना अधिकार जमा लेती है। सोऽहम् के कुंभक में यही भावना रहती है कि जीवन सम्पदा पर परिपूर्ण अधिकार ‘सो’ ‘हम्’ परमेश्वर का हो गया। सांस छोड़ते समय साँप की फुँफकार जैसी अहम् की ध्वनि का अनुभव अभ्यास में लाना पड़ता है और भावना करनी होती है कि अहंता को विसर्जित निरस्त कर दिया गया है। अहम् के स्थान पर ‘स’ (उस परमेश्वर) की प्रतिष्ठापना हो गयी। वेदान्त योग की यही एकत्व अद्वैत स्थिति है। इसी में पहुँचने में अयमात्मा ब्रह्म-प्रज्ञान ब्रह्म-शिवोऽहम्- सच्चिदानन्द वदोहमे-तत्वमसि आदि बोध शब्दों में व्यक्त की गई भावनाओं की अनुभूति होती है।

निरन्तर आत्मा और परमात्मा के साथ अपने सम्बन्ध को स्मरण करने और सम्पर्क सूत्र बनाये रहने के लिए हर श्वास के साथ ‘सोऽहम्’ का अजपा जाप जारी रखा है। सोऽहम् का अर्थ है मैं वह (परमात्मा) हूँ। शिवोऽहम् सच्चिदानंदोऽहम् आदि शब्दों में सोऽहम् का ही स्पष्टीकरण है। इस तथ्य को हर घड़ी स्मरण रखे रहने और स्मृति सूत्र को सुदृढ़ बनाने की सुविधा इसी अजपा जाप में मिलती है। ब्रह्म सान्निध्य ब्रह्म साक्षात्कार का लाभ इस साधना में मिलता है। उसके कितने ही आध्यात्मिक क्षेत्र के ऐसे प्रतिफल हैं, जिन्हें क्रमशः आत्मा और परमात्मा की एकता के ही प्रतीक माना जा सकता है। अपूर्णता को पूर्णता में परिणत करने वाली इस हंसयोग साधना को ब्रह्मवर्चस् योगाभ्यास का महत्वपूर्ण अंग उसकी गरिमा को ध्यान में रखते हुए ही बनाया गया है।


Quotation

नास्ति कर्मफलच्छेतो कश्चिल्लोकत्रपेऽपि च।

इति ते कथितं सर्व निर्विशंका भव प्रिये॥

-महा0 अनु0

‘‘तीनों लोकों में कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है जो कर्मों के फल का बिना भोग किये नाश कर सके। हे पार्वती, इस विषय में तुम्हें सारी बातें बता दीं। अब सन्देह रहित हो जाओ।’’

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अपनों से अपनी बात-


ब्रह्मवर्चस् साधना के लिए आमन्त्रण

युग निर्माण परिवार का सृजन किसी दिव्य शक्ति की योजनानुसार इसी निमित्त हुआ है कि उसे सृजन शिल्पियों के उत्पादन का श्रेय मिले। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण सचमुच ही अपने समय का इतना बड़ा काम है जिसे अवतारी सामर्थ्य ही सम्पन्न कर सकती है। इसी सामर्थ्य से सुसम्पन्न नर रत्नों का समुदाय युग की पुकार करने के लिए आगे आ सकता है। भौतिक दृष्टि से स्वल्प साधन होते हुए भी बहुत कुछ कर सकने की, आत्म बल के धनी रीछ जानवरों की तरह अपने परिजनों की भी बहुत बड़ी भूमिका हो सकती है। नव सृजन के महान प्रयोजन को पूरा करने के लिए असंख्यों द्वारा असंख्य कार्य किये जाने हैं। प्रश्न अग्रगमन का है। झंडा हाथ में लिए बिगुल बजाते हुए अग्रगामी जब प्रयास करते हैं तो पीछे-पीछे महारथी भी अपने चतुरंगिनी को हंकाते हुए मोर्चे पर जूझने के लिए बढ़ते चले आते हैं। युगान्तरकारी प्रस्तुत प्रयत्नों को भी अपने समय का महाभारत ही मानना चाहिए। पांचजन्य बज रहा है। गाण्डीव की प्रत्यंचा चढ़ने में भी अब बहुत देर नहीं है।

इस बार के प्रेरणा प्रद बसन्त पर्व पर ‘‘जागृत आत्माओं को युग निमंत्रण’’ उतरा है। उसे पूरे परिवार ने बहुत ध्यान पूर्वक पढ़ा और विचारा है। वह इतना हलका नहीं था कि मनोरंजक पाठ्य सामग्री की तरह मनोरंजन की आवश्यकता पूरी करने के उपरान्त उपेक्षा और विस्मृति के गर्त में चला जाता। जीवित मृतकों की अथवा वितृष्णा के दलदल में बेतरह फंसे हुए लोगों की बात दूसरी है, पर जिनमें प्राण तत्व की चिंगारी गरम थी, उन्होंने अपने भीतर समुद्र मन्थन जैसा कुहराम पाया है। हर प्राणवान की आत्मा ने पूछा है कि इस सृजन बेला में उसकी भी कुछ भूमिका हो सकती है या नहीं।

ज्वार भाटे अपना-अपना पक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। ज्वार कहता है- ‘‘संसार के हर महामानव ने वैयक्तिक कठिनाइयाँ सहन करते हुए भी युग निमन्त्रण स्वीकार करके दूसरों के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया है। फिर अपने लिए ही कौन बड़ा अवरोध है, जो क्षुद्रता के बन्धनों में जकड़कर असमर्थता व्यक्त करते रहा जाय?’’ भाटा कहता है- ‘‘आदर्श कहने सुनने तक ही सीमित रहने चाहिए व्यवहार में उतारने से घाटा पड़ेगा। हमें अपना स्वार्थ साधना चाहिए। परमार्थ के लिए दूसरों को उपदेश देते रहना ही पर्याप्त है। बहुत मन करे तो धर्मात्मा की चादर ओढ़ी जा सकती है। बात वहाँ तक न बढ़ने देनी चाहिए जहाँ स्वार्थ पर किसी प्रकार की चोट पहुँचती हो।

पुनर्गठन वर्ष के आरम्भ में यह समुद्र मन्थन आरम्भ हुआ और बसन्त पर्व पर उसमें तूफानी चक्रवात उभरा। अब निष्कर्ष का नवनीत सामने आ रही है। हर प्राणवान परिजन का युग सृजन में अपनी भूमिकाएँ निभानी होंगी। जो नल-नील की तरह सेतुबन्ध बाँध सकेंगे, हनुमान की तरह पर्वत उठा सकेंगे, जटायु की तरह प्रखरता का परिचय दे सकेंगे, वे वैसा करेंगे। जिनसे कुछ भी न बन पड़ेगा उन्हें भी गिलहरी की तरह बालों में समा सकने वाली बालू तो ढोनी ही पड़ेगी। परीक्षा की इस घड़ी में अकचका कर खोटा सिद्ध होने के लिए कोई भी तैयार नहीं है। पूरे या अधूरे मन या साधना से हमसे से हर किसी को अपनी-अपनी मनःस्थिति और परिस्थितियों के अनुरूप युग धर्म के निर्वाह के लिए युग साधना के लिए कुछ न कुछ तो करना ही होगा। मूकदर्शक बने रहना अब किसी जागृत आत्मा के लिए सम्भव न रह जाएगा।

हथियारों का प्रयोग करने से पूर्व उनकी धार तेज की जाती है। विजयादशमी के अनेक प्रयोजनों में से एक यह भी था कि योद्धा अपने-अपने हथियारों की धार तेज कर लें। टूट-फूट की मरम्मत कर लें और चलाने की कला यदि अभ्यास से उतर गई हो तो उसे फिर से ठीक कर लें। युग सृजन में छोटी-बड़ी भूमिका जिन्हें निभानी हैं वे सभी सृजन सैनिक कहे जायेंगे। उनका प्रधान हथियार उनका अपना व्यक्तित्व है, यदि उसमें प्रखरता मौजूद होगी तो फिर हाथ में लगे हुए प्रचारात्मक-रचनात्मक-सुधारात्मक जो भी काम हाथ में लिए जायेंगे वे सभी सफल होंगे। व्यक्तित्वहीनों के लिए युग नेतृत्व का दुस्साहस करना उपहासास्पद है। रंगमंच पर लड़ाई के पैंतरे बदलना एक बात है और रणभूमि में भवानी की बिजली की तरह चमकाना दूसरी। अभिनेता के रूप में तो वक्ता, नेता का कार्य कोई मसखरा भी कर सकता है, किन्तु प्रभावोत्पादक परिणाम उत्पन्न कर सकना तो मात्र साहसी शूरवीरों के लिए ही सम्भव हो सकता है। युग सृजन के लिए एकमात्र साधन उस पुण्य प्रयोजन को हाथ में लेने वाले प्रखर व्यक्तित्व ही हो सकते हैं। इन दिनों सर्वोपरि आवश्यकता उन्हीं की है। ब्रह्मवर्चस् सत्र को इसी निर्माण की प्रयोगशाला कहा जा सकता है। खदानों से लोहा मिट्टी मिला हुआ कच्चा निकलता है। उसे बड़ी भट्टियों में डालकर शुद्ध किया जाता है। यही बात अन्य धातुओं के सम्बन्ध में भी है। उसमें बहुत-सा कचरा मिला रहता है जो अग्नि संस्कारों से ही शुद्ध किया जाता है। उसके बिना धातुएं काम में लाने योग्य हो ही नहीं सकतीं, भले ही उन्हें खदानों से कितनी ही बड़ी मात्रा में निकाल कर जमा कर लिया जाय।

पहलवान बनने वालों की रगड़ाई बहुत दिनों तक व्यायामशाला में होती है। विद्वान बनने से पूर्व वर्षों पाठशाला का अनुशासन सहना पड़ता है। सैनिकों की भर्ती होते ही युद्ध मोर्चे पर नहीं भेज दिया जाता, छावनी में वर्षों ट्रेनिंग होती है। काम छोटा-बड़ा कोई भी क्यों न हो उसकी सफलतापूर्वक कर सकने के लिए उपयुक्त कौशल उत्पन्न करना होता है। भावनाओं के आधार कुछ कर गुजरने के साहस की तरह ही यह भी महत्वपूर्ण कुशलता भी प्राप्त कर ली जाय। युग सृजेताओं को अपना व्यक्तित्व उस महान प्रयोजन के उपयुक्त बनाना प्रथम कार्य है। कार्य पद्धति की शिक्षा तो बोझ उठाते-उठाते अनुभव के सहारे भी मिलती रहती है। कौशल की कमी पूरी कर लेना अत्यन्त सरल है। महत्व तो व्यक्तित्व का है। वही अपंग रहा तो फिर लकड़ी की तलवार के सहारे प्रबल शत्रु से जूझकर विजय श्री वरण करते हुए लौट सकना कठिन है।

सामान्य जीवन की सफलता-महामानवों की भूमिका- आत्मिक प्रगति की साधना, ये सभी बातें व्यक्तित्व की प्रखरता से सम्बन्धित है। ओछे व्यक्ति प्रचुर साधन हाथ में रहते हुए भी किसी भी क्षेत्र में कहने लायक सफलता प्राप्त नहीं कर सकते। युग सृजन जैसा महान कार्य तो आन्तरिक तेजस्विता प्राप्त किये बिना सम्भव नहीं हो सकता। स्वार्थ और परमार्थ दोनों का ही समन्वय इस तथ्य पर आधारित है कि किसी भी क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य करने के इच्छुक अपना व्यक्तित्व निखारें उसमें ओजस्, तेजस् और वर्चस् की ऊर्जा का समुचित समावेश करें।

इस स्तर की आवश्यकता पूरी करने के लिए ब्रह्मवर्चस् साधना की व्यवस्था बनी है। उसे अग्नि दीक्षा कह सकते हैं। शान्तिकुंज में पिछले वर्षों में जिन्हें किसी सत्र में बुलाया जा चुका है। इस प्रशिक्षण में प्राथमिकता उन्हें दी जायेगी। यों नयों के लिए द्वार सर्वथा बन्द नहीं है, प्रश्न प्राथमिकता और प्रमुखता का है। अब तक प्रत्यावर्तन सत्र, जीवन साधना सत्र, परामर्श सत्र, वानप्रस्थ सत्र, समय-समय पर सम्पन्न होते रहे हैं। उनमें जो सम्मिलित हो चुके हैं प्रथम आह्वान उन्हीं का है। जिन्हें आरम्भिक ज्ञान और अनुभव पहले से ही मौजूद हों। उनकी प्रगति अधिक सरल रहती है और अपेक्षाकृत अधिक सफल भी होती है।

ब्रह्मवर्चस् साधना के उद्देश्य और स्वरूप की संक्षिप्त जानकारी इस अंक में मौजूद है। यों प्रस्तुत साधना का तत्व ज्ञान गत वर्ष मार्च अप्रैल, मई, जून के चार अंकों में अधिक विस्तारपूर्वक भी समझाया जा चुका है। वस्तुतः इस गायत्री महाशक्ति की उच्च स्तरीय साधना हैं। जिसे पंचाग्नि विद्या अथवा पंचकोशों साधना कहते हैं। गायत्री माता का पाँच मुखी सहित चित्रित करने वाले तत्व ज्ञानियों का संकेत इसी रहस्यमयी तपश्चर्या के सन्दर्भ में है।

ब्रह्मवर्चस् आरण्यक की इमारत लगभग पूर्ण हो चली। प्रथम सत्र अप्रैल, मई में सम्पन्न भी हो चुका है। प्राणवान आत्माओं की इस अग्नि दीक्षा के लिए आतुरता बहुत है। स्थान सीमित है- आग्रह भरा अनुरोध बहुत। इस असमंजस के समाधान का एक ही उपाय निकला- ‘समय की कसौटी।’ बसन्त पर्व के उद्घाटन सत्र भी 14 दिन के स्थान पर सात-सात दिन के करने पड़े थे और दो सत्रों को छह बनाना पड़ा था। फिर भी 400 की स्वीकृति लक्ष्य नियंत्रण में न रह सका। उन सत्रों में उपस्थिति एक हजार से लेकर तेरह सौ तक पहुँचती रही। ब्रह्मवर्चस् साधना में सम्मिलित होने का अनुरोध भी प्रायः इसी स्तर का है। अस्तु यहाँ भी विवशता में प्रयुक्त होने वाले उसी उपाय का अवलम्बन करना पड़ा है। ब्रह्मवर्चस् सत्र दो-दो महीने के स्थान पर सन 85 के लिए एक-एक महीने के कर दिये गये हैं। हर सत्र अंग्रेजी महीने से आरम्भ होकर भारतीय महीनों के अनुसार पूर्णिमा तक चला करेगा। दस-दस दिवसीय सत्र फिलहाल तो अक्टूबर में ही दो हैं। एक नवरात्रि का 3 अक्टूबर से 12 अक्टूबर तक दूसरा दशहरा, दिवाली के अवकाश का 13 से 21 अक्टूबर तक। इनमें 24 हजार गायत्री पुरश्चरण तो रहेगा ही ब्रह्मवर्चस् साधना का संक्षिप्त दिशानिर्देश एवं अभ्यास भी जितना सम्भव हो सकेगा सम्मिलित रखा जाएगा।

अब ब्रह्मवर्चस् सत्रों के लिए उपयुक्त साधन बन गये हैं। अस्तु इस अंक के द्वारा उसकी वर्तमान साधना पद्धति की जानकारी इस अंक में कराई गई है। यह कठिन दीखते हुए भी सरल है। चान्द्रायण की कठोरता में शिशु स्तर की जितनी सरलता सम्भव थी कर दी गई है। यति चान्द्रायण विशिष्ट लोगों के लिए ही सुरक्षित है। इतने पर भी उसे अनिवार्य नहीं- स्वेच्छा स्वीकृति के रूप में ही रखा गया है। पांचों योगाभ्यास भी इसी आरम्भिक स्तर के हैं जिन्हें दुर्बल शरीर और मन वालों के लिए भी कर सकना बहुत कठिन न पड़े। यह समूची साधना सौम्य वर्ग की है जिसमें भूल रहने पर भी किसी को किसी प्रकार की हानि की आशंका नहीं है। फिर जिस संरक्षण और नियन्त्रण में इतने महान प्रयोजन के लिए यह साधना क्रम चल रहा है, उसमें किसी को किसी प्रकार की आशंका करने या असमंजस में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। विश्वास किया गया है कि जो इस साधना को करके लौटेंगे वे अपने भीतर कुछ आंतरिक विशेषता उत्पन्न हुई अनुभव करेंगे। यह उपलब्धि भौतिक सुख-शान्ति और आत्मिक सिद्धि प्रगति की दृष्टि से समान रूप से महत्वपूर्ण है।

ब्रह्मवर्चस् सत्र के आने वाले आवेदनों को क्रमशः स्थान दिया जायगा। स्थान और शिक्षण की सुविधा के अनुसार एक बार में जितने शिक्षार्थी जिस महीने बुलाये जा सकेंगे उसी आधार पर अगले-अगले महीनों को स्वीकृति देने का क्रम चलता रहेगा। जिन्हें आना हो अपनी सुविधा का समय बताते हुए शान्तिकुँज की व्यवस्था में तालमेल बिठाते हुए अपना स्थान सुरक्षित करा लें।

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साधना का पारस!


साधना का पारस (kavita)

‘‘छुए साधना का पारस’’, जीवन का लोहा। तो वह शुद्ध, दमकता कंचन बन जाएगा॥

आत्म-पथिक ने कितने लक्ष्य वरण कर छोड़े। कितने बंधन बांधे, कितने नाते तोड़े॥

कितने पथ नापे, कितनी गलियों में भटका। लिया सहारा कितनी सरि, कितने ही तटका॥

मात्र ‘‘साधना’’ से यह भटकन-क्रम टूटेगा। ‘प्राण-दीप’ यह ‘‘प्रभु का अर्चन’’ बन जाएगा॥

जीवन के मल, विक्षेपों की खाद बनालो। सद्-वृत्तियों के अंकुर रोपो, चैन उगालो॥

और ‘साधना’- जल से हर गहराई को भर। एक बनालो ‘आत्म-शान्ति’ का ‘मानसरोवर’॥

‘दिव्य चेतना’ से अनुप्राणित ऐसा जीवन। धरती पर ‘हिमगिरि का नन्दन’ बन जाएगा॥

तेज ‘साधना’ का जब जीवन में आता है। तभी अज्ञता-जड़ता का तम मिट पाता है॥

जगती ‘दीप्ति’ ज्ञान की ‘ज्योति’ भावना-बल की। ‘कांति’ फैलाती ‘श्रद्धा’ ‘निष्ठा’ के शतदल की॥

‘ममता’, ‘करुणा’ की पावन सुगन्ध फैलाए। ‘अन्तःचेतन’ ऐसा ‘चन्दन’ बन जाएगा॥

-माया वर्मा

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*समाप्त*