संकल्प और आत्मबल एक ही तथ्य के दो पक्ष हैं।

सुखद कल्पनाओं का आनन्द सभी लेते हैं, पर उन्हें पूर्ण करने को सफलता का गौरव प्राप्त कर सकना किसी-किसी के लिए ही सम्भव होता है। कल्पना की चिड़िया इस उन्मुक्त आकाश में कितनी ही ऊँची उड़ानें उड़ सकती है। उस पर कोई रोक टोक नहीं, पर एक छोटा-सा सुनियोजित घोंसला तक बनाकर खड़ा करना हो तो बया जैसी तत्परता और तन्मयता का परिचय देना पड़ता है। प्रगति की अभीष्ट उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए जिस सामर्थ्य की सर्वप्रथम आवश्यकता पड़ती है वह है संकल्प शक्ति।

किसी कार्य के पक्ष विपक्ष पर भली-भाँति मंथन करने के उपरान्त जो निष्कर्ष निकलता है और अपनी क्षमता का अनुमान लगाकर जिसे करने का फैसला किया जाता है ,उसे निश्चय कहते हैं। निश्चय को कार्यान्वित करने के लिए साहस चाहिए और साथ ही यथार्थतावादी विवेक भी। निश्चय को साहस का योगदान मिलने से जो दृढ़ता उत्पन्न होती है ,उसे संकल्प कहते हैं। संकल्प की शक्ति असीम है। उसके द्वारा असम्भव को सम्भव बना सकना ; शक्य न हो तो भी इतना निश्चय है कि कठिन लगने वाले कार्य सरल हो जाते हैं। ऊँचा उठने और आगे बढ़ने का श्रेय प्राप्त करने वालों में से प्रायः सभी ने संकल्पशक्ति के सहारे ही अतिमहत्वपूर्ण श्रेय सम्पादन किये हैं।

सफलताएँ कर्म- पुरुषार्थ के सहारे उपलब्ध होती हैं। दृढ़तापूर्वक अभीष्ट प्रयोजन के लिए पुरुषार्थ को नियोजित किये रहना, संकल्पशक्ति के सहारे ही सम्भव होता है। इसलिए विभिन्न क्षेत्रों की विभिन्न सफलताओं के लिए संकल्पशक्ति की आन्तरिक सामर्थ्य ही अगणित प्रकार के वरदान और चमत्कार उपस्थित करती है। सदुद्देश्य के लिए किये गये संकल्प और उन्हें पूरा करने के लिए नियोजन भावभरे पराक्रम को आत्मबल कहा जाता है। संकल्प और आत्मबल एक ही तथ्य के दो पहलू मात्र हैं।

----***----


इसे खरीदेगा कौन?

सम्राट सर्वमित्र अपने वैभव के लिए समस्त विश्व में विख्यात थे और बोधिसत्व अपनी तप, साधना, त्याग, उदारता, विनम्रता और क्षमाशीलता के लिए। उनके आत्मिक गुणों के कारण प्रजा जितना सम्मान उनका करती थी उतना अपने शासक सर्वमित्र का भी नहीं। यह बात सर्वमित्र को बहुत खटकती थी। वे अपने आप को कहीं अधिक उपयोगी मानते और बोधिसत्व की निन्दा करते रहते।

यह बात प्रधानमंत्री सुहास को काँटे की तरह चुभती थी। वह कहा करते " सन्त राष्ट्र की आत्मा होते हैं, उसे पथ भ्रष्ट होने से बचाते हैं, जनजीवन को रचनात्मक प्रेरणायें और मार्गदर्शन देकर उसे शान्ति, स्थिरता और कर्मठता प्रदान करते हैं।" जिस समाज में यह गुण नहीं होते. उसका पराक्रम पुरुषार्थ नष्ट हो जाता है। तब पोषण और प्रगति के सभी द्वार बन्द हो जाते हैं अतएव सन्त और ब्राह्मण राष्ट्र के प्रहरी कहलाते हैं, इस दृष्टि से वे सम्मान के पात्र हैं। राजा सर्वमित्र यह उपदेश बिल्कुल पसन्द न करते।

कहावत है– “दंभ' व्यक्ति के पतन का मूल कारण है।" दंभी व्यक्ति अनेक बुराइयों में फँसता चला जाता है। सर्वमित्र के साथ भी यही हुआ। कुछ दिन पीछे वे सुरापान के जाल में फँस गये। यथा राजा तथा प्रजा प्रारम्भ में शासन के प्रमुख अधिकारियों ने साथ दिया पीछे तो वह एक प्रथा –परम्परा बन गई। कोई भी पर्व कोई भी उत्सव वारुणी के अभाव में अपूर्ण माना जाने लगा। शासक - शासित सभी एक ही तन्द्रा में डूब गये। फलस्वरूप उत्पादन, जन स्वास्थ्य, शासकीय और सामाजिक व्यवस्थायें लड़खड़ाने लगीं। अर्थ- तन्त्र इस तरह लड़खड़ाया कि देश के पराधीन होने तक की स्थिति आ गई।

इस तथ्य को हर विचारशील अनुभव करता, पर सर्वमित्र को सुधारने और सावधान करने का साहस किसी में नहीं था। महात्मा बोधिसत्व ने यह सुना और देखा, तो उनका अन्तःकरण उद्दीप्त हो उठा, उन्होंने अपने शिष्यों को जन-चेतना जागृत करने का काम सौंपा और स्वयं एकाकी ही राजधानी की ओर चल पड़े। प्रधान मंत्री ने यह समाचार सुना तो इस आशंका से कि धृष्ट सम्राट कुछ अनुचित न कर बैठे " उन्होंने बोधिसत्व को रोकने का बहुतेरा प्रयत्न किया किन्तु, वे न माने | उन्होंने कहा- राज्यभय से भयभीत होकर समाज को दिशा देने की परम्पराए वहाँ लुप्त होती हैं, जहाँ जागृत आत्माओं का अभाव होता है। देश भी हमारा शरीर है; उसमें हमारे प्राण बसते हैं। हम उसे कलुषित होने दें, तो यह किसी एक व्यक्ति को नहीं हम सब के लिए पाप है।

दूसरे क्षण वे दरबार में उपस्थित थे। द्वारपाल ने उन्हें मंत्रिपीठ सहित आसीन शासनाध्यक्ष के समक्ष प्रस्तुत किया। बोधिसत्व ने कहा–राजन् मैं इस देश का नागरिक हूँ- व्यापारी हूँ- मेरे हाथ में आप यह जो पात्र देख रहे हैं, इसे जहाँ भी गया, किसी ने क्रय नहीं किया | यह जिसके पास जायेगा ,उसका पतन सुनिश्चित है| उसकी और पशु की आत्मा में कोई अन्तर नहीं रह जाता, वह दुष्ट और दुराचारी होकर स्वयं तो भ्रष्ट होता ही है; अपने आश्रितों को भी नष्ट- भ्रष्ट करता है| बोलिये! आप इसे खरीदेंगे ? उस तेजस्वी आकृति को पहचानना सम्राट को कठिन हो रहा था, तो भी उनने दृढ़ता से कहा- महात्मन् ! तुम्हीं बताओ भला ऐसी खराब वस्तु का व्यापार कौन करेगा ,कौन खरीदेगा इसे?

निर्भीक सन्त ने कहा- राजन्! इसे आप खरीदते हैं, प्रतिदिन, औरों को भी बाँटते हैं। यह कहकर उन्होंने सुरा पात्र वहीं लुढ़का दिया। राजदरबार दुर्गन्धि से भर गया किन्तु सर्वमित्र की आंखें खुल गई। वे महात्मा के चरणों में गिर पड़े और फिर कभी सुरापान न करने की सौगन्ध खायी।

----***----


जीवन विराट् पार्थिव नहीं -विराट् तत्व

संस्कृत में एक “खेट” शब्द आता है जिसकी शब्द व्युत्पत्ति = खे + अटनम्, खे अर्थात् आकाश, अटनम् अर्थात् भ्रमण करना। खेट आकाश-भ्रमण करना इसी शब्द से खेट शास्त्र बना है जिसका अर्थ विशुद्ध रूप से यह होता है कि प्राचीन काल में भारतवर्ष में विमानन एक समृद्ध विद्या थी और उसके द्वारा यहाँ के लोग सुदूर अन्तरिक्ष यात्रायें कुशलता पूर्वक किया करते थे। भारद्वाज कृत “यंत्र सर्वस्व” के 28 वें वैमानिक प्रकरण में इस बात की विस्तृत व्याख्यायें दी हैं जिनका उन औपनिषद् तथा पौराणिक आख्यानों से पूरी तरह मेल खाता है, जिनमें सुदूर ग्रहों के बुद्धिमान प्राणियों तथा वहाँ की स्वर्गीय परिस्थितियों का उल्लेख मिलता है।

इसका यह अर्थ हुआ ,कि जीवन- मात्र पार्थिव नहीं ,वह अनन्त है। एक क्षुद्र ग्रह की प्रकृति और परिस्थितियों से उसे बाँध देना, एक प्रकार से उसका अपमान है | जितना जगत विराट है, हमारा जीवन भी उतना व्यापक हो ,तो ही इस देवोपम सौभाग्य की सार्थकता मानी जायेगी। हमारा चिन्तन नितान्त भौतिकवादी न होकर आध्यात्मिक रहना चाहिये। यह सम्भव है, कि हम उस उद्देश्य को समझ पायें, कि मनुष्य जीवन का लक्ष्य और उपयोग क्या हो सकता है।

यह मान्यता गलत है ,कि जीवन– मात्र पार्थिव तत्वों की रासायनिक प्रक्रिया मात्र है | ऐसा रहा होता ,तो यह मानते हुये भी, कि प्रत्येक ग्रह की प्रकृति के अनुरूप ही मानव शरीर और उसकी बौद्धिक रचना भी होगी। जहाँ तक शारीरिक बनावट की बात है ,वह तो देशान्तरों के जलवायु ऋतु आदि के परिवर्तन के साथ इस पृथ्वी में ही बदली हुई मिलती है। एक ही पृथ्वी के मनुष्य भारतीय, चीनी, तिब्बती, अफ्रीकन तथा जर्मन इन सब के रूप- रंग आकृति, प्रकृति में विलक्षण वैषम्य पाया जाता है , किन्तु बौद्धिक क्षमताओं में ऐसा कोई अन्तर दीखता नहीं |शिक्षा-दीक्षा के अभाव में या न्यूनाधिक्य के कारण यह अन्तर तो हो सकता है ; किन्तु विचारसत्ता सबमें समान होती है | इसी तरह अन्य ग्रहों की पार्थिव रचना भले ही कैसी ही हो; पर ऐसी प्रामाणिक घटनायें अक्सर घटती रहती हैं, कि अन्तरिक्ष के कोने-कोने में बौद्धिक क्षमतायें विद्यमान हैं। इस तथ्य का भी प्रतिपादक है, कि जिस तरह पदार्थसत्ता का एक स्थान से विस्फोट हुआ है उसी तरह विचार सत्ता की भी एक केन्द्रीभूत शक्ति अवश्य होनी चाहिये ;जहाँ से वह दीपक की तरह सर्वत्र, जलता ,बुझता रहता है।

अमेरिका के न्यू हैम्पशायर में एक्सेटर गाँव के समीप पुलिस सर्जन यूगिने वट्रेण्ड अपनी ड्यूटी पर थे– तभी एकाएक एक कार आई और उन्हें देखकर रुक गई | उसमें से एक अत्यन्त घबराई हुई स्त्री निकली। उसने बताया मेरी कार के ऊपर एक विशाल गोलाकार रक्तवर्णी चमकती हुई वस्तु तेजी से पीछा करती हुई आ रही थी वह अभी-अभी एकाएक जंगल की ओर तेजी से मुड़कर अदृश्य हो गई है।

पुलिस सर्जन ने समझा –स्त्री कहीं डर गई है। भय की अवस्था में अक्सर ऐसा होता है, कि मानसिक कल्पना का साकार भूत आ धमकता है ; पर मनोबल वाले लोगों को वैसा कुछ प्रतीत नहीं होता। अभी सर्जन इसी उधेड़ बुन में था, कि एकाएक वायरलैस कन्ट्रोल की घंटी बजी और उसने भी चिल्लाकर वही सूचना दी |उनके ऑफिसर जिनी टोलेन्ड ने इस पेट्रोल पार्टी को तुरन्त जंगल की ओर बढ़ने का आदेश दिया। गाड़ी रास्ते में बढ़ी ,तो उन लोगों को 58 व्यक्ति उसी तरह घबराये हुये ,कुछ खंदकों में छुपे, कुछ भागते हुये मिले। उन सबके कथन एक ही तरह के थे। पेट्रोल गाड़ी अभी कुछ दूर ही गई थी। एक खेत की ओर से 6 घोड़े भयानक चीत्कार करते हुये आगे आ रहे थे और वही द्रुत गति की उड़न तश्तरी जैसी वस्तु उनका पीछाकर रही थी। पेट्रोल पार्टी के पास पहुँचने तक वह निशान एकाएक पीछे मुड़ा, आकाश की ओर तेजी से उड़ते हुये शून्य में विलीन हो गया।पीछे निकाले गये निष्कर्ष में इन अधिकारियों ने माना, कि वह कोई विलक्षण आकृति का यान था, हम नहीं जानते , कि उसे कोई बुद्धिमान प्राणी चला रहे थे या यह कोई अणु-नियंत्रित यन्त्र था ; जो भी हो ;उसके पीछे किसी अत्यन्त बुद्धिमान सत्ता का हाथ सुनिश्चित था।

एक तर्क यह हो सकता है कि विमानों के उड़ने की, घूमने की, मुड़ने की नियमित गणितीय व्यवस्था होती है; पर इन घटनाओं से उक्त तथ्य पुष्ट नहीं होता। यह तर्क इसलिये उठ सकता है क्योंकि अपनी पृथ्वी में किसी आविष्कार के दायें-बाँये ही उस तरह के विकास की कल्पना चलती है ; पर बौद्धिक क्षेत्र का विस्तार तो अनन्त है | सो यदि विचार करें, तो एक ही वस्तु के अनेक रूपांतर हो सकते हैं। भारद्वाज के “यंत्र सर्वस्व” में ही विमानों के उड़ने के पाँच तरह के मार्ग बताये हैं (1) रेखा पथ (2) मंडल (3) लक्ष्य (4) शक्ति (5) केन्द्र। इसी प्रकरण में उन यंत्रों का भी उल्लेख है- जिनसे विमानों के न केवल उड़ने– उतरने वरन् नीचे– ऊपर दायें –बायें जाने के लिये यंत्रों के प्रयोग का वर्णन और विधान मिलता है। ऐसा भी उल्लेख मिलता है, विमान को दृष्टि से ओझल भी किया जा सकता था और उस कृत्रिम आवरण को मिटाया भी जा सकता था। यदि प्राचीन भारत में ही उस तरह के प्रमाण उपलब्ध हो सकते हैं, तो अन्य लोकों में बुद्धिमान प्राणियों की कल्पना को नकारा नहीं जा सकता।

21व 23 नवम्बर 1967 के म्युनिख़ (जर्मनी) के अखबार ' डाईसईट से ज्युच 'ने भी इस तरह की एक घटना के हवाले से उक्त तथ्य क़ी पुष्टि की है अौर ळिखा है ,कि अगराम के एक नक्षत्रविद॒ ने तो आकाश से आने वाले इस वस्तु के फोटो भी ळिऐ हैं| यूगोस्लाविया के माउन्ट नीग्रे पहाड़ी पर इसी तरह की एकवस्तु  ने  जंगल मेंआग ल गा  दी  और  बहुत  देरतक  दूर थरथराती खड़ी रही; मानों वह किसी प्रतिक्रिया का अध्ययन कर रही  हो|    इवानग्रेडके निवासियों  का   तो  यहाँ   तक  कथन   है  , कि  बाहर  दिखने वाली  चमक  वस्तुतः  कोई  परमाण्विकआवरण   था; यथार्थ  वस्तु  तो उस आवरण के   मध्य  थी|  एक  स्थान  पर

विरल हुये   उस   आवरण  के   अन्दर अन्य  वस्तुएँ भी  देखी हैं, जो अत्यधिक  शुभ्र संगमरमर की तरह  कीधातु जैसी प्रतीत होती थी |

यह घटनाएँ  इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं, कि जीवन विराट् पार्थिव नहीं। वह एक सर्वव्यापी विचार सत्ता का दृश्य प्रभाव और उसका शक्तिशाली अंश है  |         हमें मूलतः उस चेतना की शोध और अनुसंधान में रत होना चाहिये। अपना चिन्तन अपने विचार भौतिक सुखों की संकीर्णता तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए।


शरीर एवं मन (kahani)

शरीर एवं मन में एक बार विवाद छिड़ गया | शरीर का कहना था “पाप कर्म मैं कर सकता हूँ।; मैं तो जड़ हूँ- मिट्टी का ढेला, मोह, क्रोध उत्पन्न करने वाला स्पन्दन मुझमें भला कहाँ से हो सकता है। अंतः पाप कर्म का भागीदार मैं नहीं। '' मन कैसे यह दोषारोपण सह सकता था तुरन्त बोला “मेरे पास पाप करने का साधन ही कहाँ है, मैं पाप कर्म कर नहीं सकता | बिना साधनों के कोई कर्म कैसे किया जा सकता है। ?

भगवान ने दोनों को झगड़ते देखा ,तो वे मुस्कराये व बोले, “पाप कर्म में तुम दोनों ही बराबरी के भागीदार हो, शरीर पर जब मन हावी हो जाता है, तब शरीर को पाप कर्म में प्रवृत्त करता है; तो फिर शरीर भी सक्रिय हो जाता है व दुष्कर्म होते रहते हैं |”

सच है, मन को शरीर पर हावी न होने दिया जाय तो शरीर कर ही क्या सकता है और शरीर मन की न मानें ,तो मन फिर चुप हो बैठ जायेगा।

----***----


धर्म और विज्ञान का समन्वय ही एक मात्र चारा

विश्व में फैली ज्ञान की दो धाराओं- धर्म और विज्ञान का प्रादुर्भाव दो भूमिखण्डों से हुआ है। समस्त जीवित और महान धर्मों की जन्मभूमि आज का सीमित किंतु कभी का वृहत्तर भारत है। प्राकृतिक विज्ञानों की पाश्चात्य जगत एक अन्तर्मुखी और आत्मनिष्ठ है, दूसरी बहिर्मुखी और वस्तुनिष्ठ। एक इन्द्रियातीत तत्वों के रहस्यों के उद्घाटन में व्यस्त दूसरी इन्द्रियग्राह्य वस्तुओं के सन्दर्भ में प्रयत्नशील।

भारतीय विचारधारा मूलतः धार्मिक विचारधारा है। हिन्दू, बौद्ध, जैन, यहूदी, मुसलमान और येरुसलेम की भूमि में उपजे क्रिश्चियन धर्म की रोमन कैथोलिक शाखा का अनुयायी ईसाई- इन सब की व्यक्तिगत  ,पारिवारिक और   सामाजिक   जीवन   जीने   की  रीति -नीतियाँँ ,मन्यताएँँ ,परम्पराएँ  ,द्रष्टिकोण और    व्यावहारिक गतिविधियाँ अपने-अपने धर्मों के द्वारा प्रतिपादित नियमों द्वारा नियमित और संचालित होती हैं। किसी समय आध्यात्मिकता उत्पन्न करने वाला यह सारा क्षेत्र वृहत्तर भारत की परिधि में आता था, जिसे इन दिनों एशिया कहते हैं।

देश-काल-परिस्थिति ने इन धर्मों को भिन्न-भिन्न कलेवर तो धारण करा दिये हैं, कर्मकाण्ड और विचार-व्यवहार के ढंग तो अलग-अलग कर दिये हैं, परन्तु उनका माँस और प्राण-उनकी मूल मान्यताएँ-बहुत बड़े अंश में समान हैं। उदाहरणार्थ, उपरोक्त सभी धर्म मरणधर्मा शरीर को नियन्त्रित और संचालित करने वाली ऐसी सत्ता- आत्मा- के अस्तित्व में विश्वास करते हैं। जिसका इस जीवन के परे भी अस्तित्व बना रहता है। इस तथा ऐसी ही अन्य उभयनिष्ठ आधारभूत मान्यताओं ने इन धर्मों के अनुयायिओं के सम्पूर्ण जीवन को, इन्द्रिय मस्तिष्क-हृदय की प्रत्येक क्रिया को, अनुशासित करने का न केवल प्रयत्न किया है वरन् परलोक के लोभ और भय दिलाकर आत्मा के कल्याण के लिए अनेक विधि-निषेधों को मानने को मजबूर भी किया है।

इसे स्वस्थ स्थिति नहीं कहा जा सकता। एशियाई धर्मों ने स्वर्ग, और निर्वाण के प्रति, पारलौकिक जीवन के प्रति, अपने अनुयायियों के झुकाव, रुचि और ललक को इतना तीव्र कर दिया है कि इहलोक का मूल्य भव बन्धन एवं माया जाल कहा जाने लगा। वैयक्तिक जीवन से श्रम, कर्म, स्वावलम्बन और आत्म-विश्वास, पारिवारिक जीवन से घनिष्ठता और उदारता तथा सामाजिक जीवन में सामूहिकता की भावना और सहयोग जैसे सद्गुण इस पारलौकिकता की अति से लुप्त होने लगे। अपनी मेहनत से धरती को स्वर्ग बनाने और इसी जीवन में स्वर्ग में रहने का आनन्द पाने के बदले किसी बने बनाए स्वर्ग में मृत्यु के उपरान्त पहुँचने और सुख पाने की मोहक कल्पना ने जन मानस को ग्रस लिया। परलोकवाद का एकांगी पक्ष एक घातक रोग बन गया और और उसने सर्वतोमुखी प्रगति के मार्ग में बाधा ही पहुँचाई।

इसके विपरीत पश्चिमी विचारधारा मूलतः विज्ञान प्रेरित विचारधारा है। इन्द्रियग्राह्य वस्तु व विषय ही प्राकृतिक विज्ञानों के अध्ययन एवं अनुसंधान का क्षेत्र हैं। अब तक के अधिकांश वैज्ञानिक अध्ययन एवं अनुसंधान का मुख्य उद्देश्य केवल इतना रहा है कि ऐहिक जीवन को अधिक सुख-सुविधापूर्ण बनाने के लिए प्रकृति का दोहन किस प्रकार किया जा सकता है। इस विचारधारा ने जहाँ मनुष्य को साहसी, कर्तव्यपरायण, कर्मशील और व्यावहारिक बनाया है, वहीं उसे बहिर्मुखी, सुखवादी, और आत्मवादी भी बना दिया है। कर्मफल के नियम और आत्म-कल्याण की कल्याणकारी आस्था को हटाकर, औचित्य की समस्त सीमाओं को लाँघती विलासिता ने तथा स्नेह रहितता, असुरक्षा और तनाव ने पश्चिमी मन को ग्रस लिया।

यद्यपि यह सही है कि धर्म के समान प्राकृतिक विज्ञान भी गणित की गिनती, भौतिक की ऊर्जा, रसायन की संयोजकता जैसे अनेक अवस्तुनिष्ठ विचारों (एबसैट्रेक्ट आइडियाज) की नींव पर टिके हैं, तथापि यह भी सही है कि उन विज्ञानों से उपजी पश्चिमी विचारधारा व सभ्यता का वर्तमान स्वरूप केवल वस्तुनिष्ठता या वैषयिकता से, अर्थात् केवल इहलोकवाद से नाता जोड़े हुए है। परलोकवाद के समान इहलोकवाद भी पश्चिम का एक संक्रामक घातक रोग बन चुका है।

धर्म और विज्ञान की यह स्थितियाँ एक दूसरे के बिलकुल विरुद्ध पड़ती है, और प्रतीत होता है कि उनमें समझौते की तनिक भी सम्भावना नहीं है। किन्तु सूक्ष्म विचार करने पर ज्ञात होता है कि इन परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली विचारधाराओं के बीच में सन्तुलन का बिन्दु भी विद्यमान है। गतिमान पैण्डुलम जब बाँए या दाँए छोर पर पहुँच जाता है, तब विपरीत दिशा में लौटने के सिवा उसके पास और कोई चारा नहीं रह जाता। यह डोलना, यह अस्थिरता उस समय तक जारी रहती है जब तक कि मध्य की सन्तुलित स्थिति स्थायी रूप से प्राप्त न हो जाय। आत्मवादी धर्म और पदार्थवादी विज्ञान मध्यमान सन्तुलन-बिन्दु की विपरीत दिशाओं में स्थित दो अतिवादी व अस्थायी स्थितियाँ हैं, जहाँ से उन्हें सन्तुलन-बिन्दु की ओर लौटना ही होगा। इससे मिलता-जुलता उदाहरण देते हुए हर्बर्ट स्टेन्सर यह मत प्रतिपादित करते हैं कि-”अन्तिम सीमा तक विकसित हुए भावनात्मक (धार्मिक) संस्कृति को चेतनात्मक (पदार्थवादी) संस्कृति की दिशा में तथा चेतनात्मक संस्कृति को भावनात्मक संस्कृति की दिशा में लौटने के सिवा और कोई विकल्प नहीं है।” इस प्रकार इस विचित्र किन्तु तर्क सिद्ध निष्कर्ष पर हम पहुँचते हैं कि परम सत्य की खोज में संलग्न धर्म और प्राकृतिक विज्ञान अतिवादी एवं अस्थायी स्थितियों पर स्थिति होने के कारण स्वयं ही “असत्य” की श्रेणी में ही रखे जा सकते हैं। तर्क, प्रयोग और अनुभव यह सिद्ध करते हैं कि दो अतिवादी स्थितियों के मध्यमान पर ही “सत्य” स्थित होता है, क्योंकि वहीं पर सन्तुलन और स्थायित्व उपलब्ध होते हैं। यह तथ्य स्पष्ट रूप से समझ लिया जाना चाहिए कि यह स्थायित्व जड़ता का सूचक नहीं है, वरन् गतिशील सन्तुलन का मध्यमान का गुण है।

इस सन्तुलित मध्य स्थिति को प्राप्त करने में, जिसमें धार्मिक और वैज्ञानिक विचारधाराओं का समानुपातिक समन्वय हो जाता है ,  दर्शन बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। प्रसन्नता की बात है कि सर्वोच्च कोटि के वैज्ञानिकों ने भी दर्शन की इस उपयोगिता को अब स्वीकार कर लिया है। परिणामस्वरूप मानवीय इतिहास का नया और कल्याणकारी युग प्रारम्भ करने की सामर्थ्य से युक्त वैज्ञानिक धर्म और धार्मिक विज्ञान की प्रतिष्ठापना का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

अन्ध श्रद्धा उपार्जित, – कल्पना प्रभूत – अवास्तविकता पर आधारित धर्म, स्वतन्त्र इकाई के रूप में कितना हानिप्रद है, इसका अनुमान व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन पर पड़ने वाले उसके दुष्प्रभावों को देखकर लगाया जा सकता है। गैलीलियो और आर्किमिडीज के प्राणहरण से लेकर धर्मोन्माद और धर्मयुद्ध तक, तथा परदाप्रथा से लेकर गलत कार्य (पाप) की अनिवार्य हानिकारक प्रतिक्रिया (दण्ड) से मात्र स्नान द्वारा मुक्ति तक सैकड़ों-सहस्रों धार्मिक अन्धविश्वास और मूढ़ मान्यताएँ धर्म के नाम पर मानव मस्तिष्क पर हावी हो गई हैं। गुरुडम नामक तानाशाही-बैकुण्ठ-निर्वाण दिलाने की दलाली-आनुवंशिक उच्चता तथा प्रजातीय उच्चता का अहंकार जैसी अनेक अवैज्ञानिक मान्यताएँ व परम्पराएँ धर्म की दुहाई देकर फल-फूल रही हैं। कारण-कार्य का नियम, धार्मिक सिद्धान्तों व नियमों का पुनः परीक्षण करने का प्रत्येक जिज्ञासु को अधिकार है। उनकी सुस्पष्ट एवं सर्वज्ञात विधि-व्यवस्था, प्रमाणित तथ्यों की मान्यता-जैसे वैज्ञानिक आधार धर्म व्यवस्था में ढूँढ़े नहीं मिलते।; किन्तु आशा की जानी चाहिए कि वैज्ञानिक धर्म जब कभी भी मानव समाज में प्रचलित होगा ; तब क्यों-कैसे मान्यता और समाज में उनके प्रसारण की स्वीकृति का प्रमाण पत्र प्रदान किया करेंगी।

विज्ञान भी स्वतन्त्र इकाई के रूप में कितना अपूर्ण है, इसकी झलक जेम्स जीन्स के इस वक्तव्य से मिलती है-”विज्ञान गूँगा और बहरा है। वह अपनी एक हथेली पर पैनिसिलीन और दूसरी पर परमाणु बम रखकर तुम्हारे पास आता है। अब यह तुम पर निर्भर है कि तुम किसे पसन्द करते और उठाते हो॥तात्पर्य यह हुआ कि विज्ञान चुनाव सम्बन्धी कोई सलाह नहीं देता, न ही गलत चुनाव के दुष्परिणामों की शिकायत सुनना चाहता है।

तब सही मार्गदर्शन कहाँ से प्राप्त हो? असमंजस की इस स्थिति में धर्म, वास्तविक धर्म,सहायता का हाथ बढ़ाता है। वह सत्य, न्याय और लोक मंगल की कसौटियाँ प्रस्तुत करता है। प्राकृतिक विज्ञानों की जो भी देन इन कसौटियों पर खरी उतरें ,वे ही ग्रहणीय है, शेष नष्ट करने योग्य। जब कभी भी धार्मिक विज्ञान विश्व में प्रचलित होगा, उपरोक्त कसौटियाँ ही अनुसन्धान की दिशाओं को निश्चित किया करेंगी।

इस दृष्टिकोण से अच्छा हो, यदि हम धर्म को “अपूर्ण विज्ञान” कहें और विज्ञान को “अपूर्ण धर्म।” यह पर्यायवाची शब्द जहाँ उनका निजी विशेषताओं पर जरा भी आँच नहीं लाते, वहीं उनकी अपूर्णता और अन्योन्याश्रितता को भी उभारकर हमारे सामने लाते हैं; और हमारी इस भ्रान्ति को दूर करते हैं कि उनमें से कोई एक प्रमुख और प्रभावशाली है, तथा दूसरा गौण और मुखापेक्षी।

वास्तविकता यह है कि मानव रचना में आत्मतत्व और अनात्मतत्व दोनों लगे हैं। दोनों के तालमेल से ही जीवन सुसंगठित, सन्तुलित और उन्नत हो सकता है। आत्म विज्ञान और पदार्थ विज्ञान, दोनों का समानुपातिक समन्वय ही इहलोक और परलोक को उत्साह व समृद्धि से तथा सन्तोष व आनन्द से भर सकता है। धर्म और विज्ञान का – अर्थात् आत्मा और अनात्म पक्षों का –अर्थात् परमात्मा और माया का –अर्थात् आत्म कल्याण और विश्व कल्याण का – अर्थात् परलोक और इहलोक का ऐसा बुद्धिमत्तापूर्ण योग  ही व्यावहारिक और उचित है।

पिछले कुछ समय की तथा वर्तमान समय की धर्म और विज्ञान  – क्षेत्रों की गतिविधियाँ इस बात का संकेत दे रही हैं ,कि उनके बीच की कृत्रिम दीवारों के ढहने की प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी है। पूर्वकाल में धर्म द्वारा निन्दित और दण्डित विज्ञान आज धर्म से हाथ मिलाकर, उसे अपनी वैज्ञानिकता प्रदान कर रहा है, दूसरी ओर धर्म के शाश्वत सिद्धान्तों ने सर्वोच्च कोटि के वैज्ञानिकों के चिन्तन को परम सत्य की शोध तथा मानव कल्याण के प्रयास की दिशा में बढ़ने की सफल प्रेरणा दी है। प्रकृति के मूलभूत नियमों की खोज, परामनोविज्ञान आदि धर्म और विज्ञान के मध्य सेतु बनने जा रहे हैं। इस बात के लक्षण दिखाई देने लगे हैं , कि सम्पूर्ण मानवता की एक आत्मा की घोषणा करने वाला वैज्ञानिक धर्म , भविष्य के गर्भ में विकसित हो रहा है। विभिन्न विशिष्ट विज्ञान भी परस्पर समन्वित होकर एक विज्ञान का रूप धारण करने की दिशा में बढ़ रहे हैं। आशा की जानी चाहिए कि ऐसा समन्वित विज्ञान स्वयं को तथा धर्म को , एक ही वृहद सत्य के दो परस्पर सम्बन्धित पक्ष सिद्ध कर सकेगा। अविच्छिन्न रूप से जुड़े तथा एक दूसरे को पोषित करने वाले धर्म और विज्ञान की, अर्थात् वैज्ञानिक धर्म और धार्मिक विज्ञान की ,आज के विश्व में महती आवश्यकता है। इनके प्रादुर्भाव और क्रियाशील होने के पश्चात् ही विश्व-शान्ति और विश्व-बन्धुत्व की कल्पनाएँ सार्थक हो सकेंगी।


एक साधक था (kahani)

एक साधक था |   साधना करते-करते उसे पानी पर चलने की एवं मनचाही वस्तु प्राप्त करने की सिद्धि प्राप्त हो गई। वह गुरु के पास दौड़ा-दौड़ा गया व बोला – “महाराज मैं पानी पर चल सकता हूँ तथा जो चाहूँ , –वह वस्तु प्राप्त कर सकता हूँ।”

महात्मा बोले – “यह कोई बड़ी बात नहीं है| ” पानी पर ले जाने का काम तो मल्लाह भी कुछ पैसे लेकर कर देते हैं और जहाँ तक चीजें बनाने का प्रश्न है – मामूली से जादूगर भी रुपया, फल बनाते रहते हैं! क्या इतनी सारी तपस्या व साधना का उद्देश्य इस तरह की तुच्छ शक्तियों की प्राप्ति के लिए ही की थी या केवल भगवद् प्राप्ति – आनन्द के लिए।

----***----


एकांगी साधना-अधूरी साधना

विपश्च जितने विद्या-विभूषण और मेधावी थे, साधना के संस्कार भी उनमें उतने ही सुदृढ़ थे। आत्म-साक्षात्कार की जिज्ञासाऐं किसी के भी अन्तःकरण में जाग सकती हैं, किन्तु ध्येय पूर्ति के लिये मन की भौतिक लालसाओं से निरन्तर लड़ते हुये उन पर विजय प्राप्त करने का साहस किसी-किसी में होता है। विपश्च उसी कोटि की आत्मा थे। आचार्य विद्या बल्लभ को इस तरह का मनस्वी शिष्य प्राप्त करने पर हार्दिक प्रसन्नता थी,सो  उनने अपने शिष्य को साधना के पथ पर आगे बढ़ाने का कोई भी उपक्रम रिक्त नहीं छोड़ा।

अन्नमय कोश की प्रारम्भिक साधना को अस्वाद व्रत से प्रारम्भकर .एक मात्र उबले हुये आँवले ग्रहण करने तक की लम्बी अवधि में ,   उनने एक भी दिन मन को पश्चात्ताप नहीं करने दिया।

अन्नमय कोश की सिद्धि के क्षण समीप आये | आचार्य प्रवर ने कहा -तात ! इस साधना का दूसरा चरण यह है कि तुम अपनी इस अर्जित साधना का लाभ समाज को भी दो। लोगों को जाकर यह बताओ कि समय न केवल आरोग्य का आधार है अपितु उससे शरीर में प्रसुप्त शक्ति कोशों का जागरण होता है। यह शक्ति अदृश्य जगत से सम्बन्ध जोड़ती और हमारी आध्यात्मिक आस्थाओं का अभिसिंचन करती है।"

" सो तो ठीक है, गुरुदेव! किन्तु संसार का हर प्राणी अपने आत्म-कल्याण के लिये आप उत्तरदायी है, हम किसी और की चिन्ता क्यों करें!शास्त्र भी तो यही कहते हैं - अपनी आत्मा का उद्धार व्यक्ति को स्वयं ही करना चाहिये।” विपश्च ने विनीत वाणी में असहमति दर्शायी।

आचार्य विद्यावल्लभ को शिष्य के प्रातवाद पर दुःख हुआ। कहा उनने कुछ नहीं, निर्निमेष नीले अम्बर के गहन अन्तराल में देर तक आंखें गड़ाये रहे। मानों वहाँ ,कहीं विपश्च का भविष्य लिखा हुआ हो: और वे उसे पढ़ने का प्रयत्न कर रहे हों।

विपश्च ने प्राणमय कोश की साधना की | प्राणों को वशवर्ती कर लेने से उनकी अन्तःचेतना विराट् में विचरण करने लगी| उनके आने पर प्रदीप्त प्राण ऐसा झलझलाता था, मानों कोई देवशक्ति धरती पर उतर आई हो। मनोमय कोश की सिद्धि ने विपश्च को ऐसी मानसिक प्रतिभा प्रदान की, जिससे वे खूखार से खूखार जन्तुओं को भी सम्मोहित कर सकते और मृतक में भी नया जीवन फूक सकते थे। आचार्य प्रवर ने पुनः विपश्च से आग्रह किया उन्हें अपने ज्ञान ,अपने तप अपनी साधना का ,लाभ देने के लिये जनसंकुल समुदाय में भी जाना चाहिये ! किन्तु विपश्च ने हर बार असहमति ही दर्शायी।

समय के साथ विपश्च उच्चकोटि के सिद्ध हुये। साधना का विराम आने पर अब क्या किया जाये? यह प्रश्न उनके सम्मुख था किन्तु अब आर्यश्रेष्ठ कोई आदेश देने की अपेक्षा मौन धारण कर चुके थे! निर्णय उनने विपश्च पर ही छोड़ा?

विपश्च ने अब सेवा के क्षेत्र में पदार्पण किया | वहाँ इन्द्रियों के आकर्षण, प्राणों का मोह, मन की तृष्णा, वासना और यश की कामनायें ,उनके स्वागत में पुष्पमालायें हाथ में थामें खड़ी थीं। तैरना जल के बीच सीखा जा सकता है, थल में कोरा सिद्धान्त सीखा जा सकता है। निर्वाध क्षेत्र, उन्मुक्त सुविधायें ,देखते ही, दमित वासनायें एकाएक विद्रोह कर उठीं, उन्हें सम्भालना विपश्च के लिए कठिन पड़ गया उनकी सिद्धियाँ भोगों के बन्दीगृह में जा पड़ीं। वर्षों की तप - साधना अल्पकाल में ही बूढ़े वटवृक्ष की तरह ढह गई और उनकी सारी तेजस्विता का यों अन्त हो गया, मानों वे जन्म से ही निस्तेज और अशक्त हों।जब पास कुछ न रहा, तब पश्चाताप आ खड़ा हुआ, वे भागे और आचार्य प्रवर के चरणों पर सिर पटक कर रोने लगे। उठो विपश्च! आर्य श्रेष्ठ ने समझाया- यदि प्रारम्भ से ही तुम जनसम्पर्क बनाये रखते, तो आज यह स्थिति न आती! सेवा-साधना का अर्द्धांग है !यदि उसे विस्मृत किया जाये तो साधना निष्फल हो जाती है, पर यदि वह साथ रहे तो साधना के प्रतिफल चिरस्थायी होते हैं। विपश्च ने भूल अनुभव की, पुनः साधना -पथ अपनाया ,पर अब उनने मार्ग बदल लिया था| अब उनकी साधना के साथ सेवा भी जुड़ गई थी।

----***----


सपनों में सन्निहित जीवन सत्य

'दि अण्डर स्टैडिग आँफ ड्रीम एण्ड देयर एन्फलूएन्सेस ऑन दि हिस्ट्री ऑफ मैन ,'हाथर्न बुक्स  न्यूयार्क ' द्वारा  प्रकाशित पुस्तक में एडाल्फ़ हिटलर के स्वप्न का जिक्र है, जो उसने फ्रासीसी मोंर्चे के समय 1971 में देखा था | उसने देखा कि उसके आसपास की मिट्टी भर-भरा कर बैठ गई है, वह तथा उसके साथी पिघले हुऐ लोहे में दब गये है | हिटलर बचकर भाग निकले ; किन्तु तभी बम विस्फोट होता हैं ;उसी के साथ हिटलर की नींद टूट ग़यी | हिटलर अभी उठकर खडें ही हुये थे कि सचमुच एक तेज धमाका हुआ, जिससे आस-पास की मिट्टी भर-भरा  कर ठह पडी ओंर खादकों में छिपे उसके तमाम सैनिक़ बन्दूकों सहित दब-कर मर गये| स्वप्न और द्रस्य का यह सादृश्य हिटलर आजीवन नही भूले|

स्वप्नों में भविष्य के इस प्रकार के दर्शन की समीक्षा करने बैठते हैं, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि चेतना मनुष्य शरीर में रहती है। वह विश्व- ब्रह्माण्ड के विस्तार जितनी असीम है; और उसके द्वारा हम बीज रूप से विद्यमान अदृश्य के वास्तविक दृश्य, चलचित्र की भांति देख और समझ सकते हैं। यह बात चेतना के स्तर पर आधारित है; इसीलिये भारतीय मनीषी भौतिक जगत के विकास की अपेक्षा अतीन्द्रिय चेतना के विकास पर अधिक बल देते हैं। हिन्दू धर्म और दर्शन का समस्त कलेवर इसी तथ्य पर आधारित रहा है ;और उसका सदियों से लाभ लिया जाता रहा है।

“बुस्साद साल के खुसखी महीने के छठवें दिन गुरुवार की रात मैंने सपना देखा कि एक खूबसूरत जवान से मैं मजाक कर रहा हूँ। उस समय मुझे भीतर ही भीतर यह भी आश्चर्य हो रहा था कि मैं किसी से मजाक का आदी नहीं हूँ ; फिर ऐसा क्यों कर रहा हूँ |तभी उस जवान ने निर्वस्त्र होकर दिखाया कि वह तो औरत है। मुझे उस घड़ी अहसास हुआ कि मराठे औरत वेष में हैं। मुझे लगा कि मैंने इसी से मजाक किया। उसी साल के उसी महीने के आठवें रोज मैंने मराठों पर हमला किया तो वे औरतों की तरह भाग निकले और मेरे स्वप्न का एहसास पक्का हो गया।” इस तरह सैकड़ों स्वप्न टीपू की मूल 'नोंध' किताब में हैं उनकी हकीकत के वाक्ये भी हैं। यह सब एकाग्रता द्वारा चित्त की प्रखरता के लाभों की ओर भी संकेत करते हैं। मन को किसी एक ध्येय की ओर लगाया जा सके, तो उस सम्बन्ध की अनेक जानकारियां स्वतः ही मिलती चली जाती हैं।

अपने स्वप्नों पर टीपू सुल्तान को आश्चर्य हुआ करता था; सो वह प्रतिदिन अपने स्वप्न डायरी में नोट किया करता था| उसके सच हुये स्वप्नों के कुछ विवरण इस प्रकार हैं।

“शनिवार 24 तारीख रात को मैंने सपना देखा – एक वृद्ध पुरुष  काँच का एक पत्थर लिये मेरे पास आये हैं और वह पत्थर मेरे हाथ में देकर कहते हैं–- सेलम के पास जो पहाड़ी है; उसमें इस काँच की खान है ,यह काँच मैं वहीं से लाया हूँ। इतना सुनते-सुनते मेरी नींद खुल गई।”

टीपू सुल्तान ने अपने एक विश्वास- पात्र को सेलम भेजकर पता लगवाया, तो ज्ञात हुआ कि सचमुच उस पहाड़ी पर काँच का भण्डार भरा पड़ा है। इन घटनाओं से इस बात की भी पुष्टि होती है कि समीपवर्ती लोगों को जिस तरह बातचीत और भौतिक आदान-प्रदान के द्वारा प्रभावित और लाभान्वित किया जा सकता है , उसी तरह चेतना के विकास के द्वारा बिना साधना भी आदान-प्रदान के सूत्र खुले हुए हैं।

वापी( गुजरात) के पास सलवास नाम का एक गाँव है | वहाँ बाबूलाल शाह नाम के एक प्रतिष्ठित के व्यापारी है | सन् 1973 की घटना है–उनका पुत्र जयन्ती हैदराबाद मेंडिकल काॅलेज का छात्र था | एक रात वह सिनेमा  देख़कर  लौट रहा था ;तभी कुछ डाकुओं ने उसका अपहरण कर लिया और बाबूलाल शाह को पत्र लिख़ा  – यदि बच्चे को जीवित देखना चाहते हैं ,तो अमुक स्थान पर 50 हजार रूपये पहुँचाने की व्यवस्था करे | " श्री शाहजी बहुत दू:खी हुये और मित्रोँ की सलाह से वे एक सन्त के पास गये और आप बीती सुनाकर बच्चे की जीवन- रक्षा की प्रार्थना की | स्वामी जी  ने उन्हें आश्वस्त किया और कहा- तुम  लोग जाओ | जयन्ती 19 जुलाई को स्वत: घर पहुँच जायेगा |

जिस दिन स्वामी जी ने आश्वस्त दिया ,वह 17 जुलाई थी | उस रात डकैत जयन्ती को लेकर एक गुफा में पहुँचे | जयन्ती बेहद घबड़ाया हुआ था,साथ ही दस दिन का थका हुआ था | तीन बन्दुकधारी डकैतों के बीच उसका भी बिस्तर लगाया गया | थका होने कारण जयन्ती को नींद भी  टूट गई ;पर उसकी उठने की हिम्मत न हुई| सहसी अवस्था में फिर नींद आ गई , तब उसने फिर वैसा ही स्वप्न देखा | इस बार उसे विस्वसा हो गया कि कोई शक्ति उसके साथ है और उसकी मदद कर रही है | उसने आँखे घुमाकर देखा,सचमुक डकैत गहरी नींद में सो रहे थे| जयन्ती उठकर गुफा के बाहर  आया और वहाँ से भाग निकला| सीधे स्टेशन पहुँचा | गाडी बिलकुल तैयर थी| उसमें  सवार होकर वह ठीक  19 जुलाई को घर आ गया | इस स्वपन ने न केवल बालक जयन्ती की जीवन-रक्षा की : अपितु उसे विस्वसा भी हो गया कि अतिन्द्रिय जगत वस्तुत:दिव्य आत्माओं का निवास स्थल है | उस आश्रय स्थल पर पहुँचकर न केवल अपनी आत्मिक क्षमतायें प्रखर की जा सकती हैं;अपितु उच्च आत्माओं का स्नेह सन्निध्य भी पाया जा सकता है |

स्वप्न सभी सत्य होते हों, यह बात नहीं। अनेक स्वप्न ऐसे होते हैं ,जो केवल अपनी शारीरिक और मानसिक स्थिति का संकेत करते हैं | जिस तरह वैद्य, नाड़ी, और लक्षणों को देखकर रोग और बीमारी का पता लगा लेते हैं। उसी तरह इन समझ में आने वाले स्वप्नों से शरीर और मनोजगत की अपनी स्थिति का अध्ययन शीशे की भाँति किया और उन्हें सुधारा जा सकता है। फ्रायड मनोविज्ञान में स्वप्नों की समीक्षा को इसी रूप में लिया जा सकता है।

स्वप्नों का, स्थान विशेष से भी सम्बन्ध होता है। इस सम्बन्ध में डॉ. फिशर द्वारा उल्लेखित एक स्त्री का स्वप्न बहुत महत्व रखता है। वह स्त्री जब एक विशेष स्थान पर सोती ,तो उसे सदैव यही स्वप्न आता कि कोई व्यक्ति एक हाथ में छुरी लिये दूसरे से उसकी गर्दन दबोच रहा है। पता लगाने पर ज्ञात हुआ कि उस स्थान पर सचमुच ही एक व्यक्ति ने एक युवती का इतना गला दबाया था, जिससे वह लगभग मौत के समीप जा पहुँची थी। स्थान विशेष में मानव विद्युत के कम्पन चिरकाल तक बने रहते हैं। कब्रिस्तान की भयानकता और देव-मंदिरों की पवित्रता इसके साक्ष्य के रूप में लिये जा सकते हैं।

Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI

/* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-priority:99; mso-style-qformat:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt; mso-para-margin-top:0in; mso-para-margin-right:0in; mso-para-margin-bottom:10.0pt; mso-para-margin-left:0in; line-height:115%; mso-pagination:widow-orphan; font-size:11.0pt; mso-bidi-font-size:10.0pt; font-family:"Cambria","serif"; mso-ascii-font-family:Cambria; mso-ascii-theme-font:minor-latin; mso-fareast-font-family:"Times New Roman"; mso-fareast-theme-font:minor-fareast; mso-hansi-font-family:Cambria; mso-hansi-theme-font:minor-latin;}

16 फरवरी 1975 के धर्मयुग के अंक में स्वपनों की समीक्षा करते हुये एक अंधे का उदाहरण दिया गया है | अन्धे पुछा गया कि क्या तुम्हेँ स्वप्न दिखाई देते है? इस पर उसने उत्तर दिया –मुझे खुली आखों से भी जो वस्तुयें दिखाई नहीं देती , वह स्वप्न में दिखाई देती हैं |इससे फ्रायड की इस धारणा का खण्डन होता है कि मनुष्य दिन भर जो देखता और सोचता– विचारता है, वही दृश्य मस्तिष्क के अन्तराल में बस जाते और स्वपन के रुप में दिखाई देने लगते हैं | निश्चय ही वह तथ्य यह बताया हैं| कि स्वपनों का समबन्ध, काल की सीमा से परे अतीन्द्रिय जगत से है; अर्थात् चिरकाल से चले आ रहे भूत से लेकर अन्तत काल तक चलने वाले भविष्य जिस अतिर्न्दिय चेतना से सन्नहित हैं , स्वप्नकाल में मानवीय चेतना उसका स्पर्श करने लगती है| इसका एक स्पष्ट उदाहरण भी इसी अंक में एक बालक द्वारा देखे गये स्वप्न की समीक्षा से है |बच्चे से पहले न तो कश्मीर देखा  था, न नैनीताल ; किन्तु उसने बताया मैंने हरा -भरा मैदान , कल-कल करती नदियाँ , ऊँचे बर्फ़ीले पर्वत शिखर देखे ,कुछ ही क्षणॉ में पट - परिवर्तन हुआ और मेरे सामने जिस मैदान का दृश्य था, वह मेरे विद्यालय का था| मेरे अध्यापक महोदय हाथ में डंडा लिये मेरी ओर बढ़ रहे थे; तभी मेरी नींद टूट गई |  | इससे एक बात स्वपनों की क्रमिक गहराई का भी बोध होता है | स्पर्श या निंद्रा जितनी प्रगाढ  होगी ,स्वप्न उतने ही सार्थक , सत्य और मार्मिक होंगे | सामायिक स्वपन उथले स्तर पर अर्थात्  जागृत अवस्था के करीब होते प्रतीत होते हैं , पर यह तभी सम्भव हैं , जब अपना अंत:करण पवित्र और निर्मल हो | निदाई  किये हुऐ खेतों की फसल में एक ही तरह के पौधे दिखाई देते हैं , वे अच्छी तरह विकसित होते और फलते-फूलते भी हैं; पर यदि खेत खरपतवार से भरा हुआ हो,तो उसमें क्या फसल बोई गई हैं, न तो इसी बात का पता चल पाता है और न ही उस खेत के पौधे ताकतवर होते हैं | ये कमजोर पौधे कैसी फसल देंगे , इसका भी सहज ही अनुमान किया जा सकता है| मन जितना अधिक उच्च-चिन्तन,उच्च संस्कारों से ओत -प्रोत ,, शान्त और निर्मल होगा,स्वप्न उतने ही स्पष्ट और सार्थक होंगे |

बृहदारण्यक में जागृति, सुषुप्ति की तरह स्वप्न को मन की तीसरी अवस्था बताया गया है। जब मन सो जाता है ,तो वह अपने ही संकल्प- विकल्प से अभीष्ट वस्तुओं के निर्माण की क्षमता से ओत-प्रोत होता है। सुख-दुःख की सामान्य परिस्थिति भी जागृत जगत की तरह ही उस स्थिति में भी जुड़ी रहती है। जिस तरह जागृत में जीवन के संस्कार उसे आत्मिक प्रसन्नता और आह्लाद प्रदान करते और निश्चिन्त भविष्य की रूप रेखा बनाते रहते हैं, उसी तरह संयत और पवित्र मन में भी जो स्वप्न आयेंगे, वे भविष्य की उज्ज्वल सम्भावनाओं के प्रतीक होंगे।

भगवान महावीर के जन्म से पूर्व रानी मिशला ने 14 मार्मिक स्वप्न देखे थे। प्रथम में हाथी, द्वितीय में बैल, तृतीय में सिंह, चतुर्थ में लक्ष्मी, पंचम में  सुवासित पुष्पों की माला, पष्टम में पूर्ण चन्द्र, सप्तम में सूर्यदर्शन, अष्टम में जल भरे मंगल कलश, नवम में नीले स्वच्छ जल वाला सरोवर, दशम में लहलहाता सागर, एकादश में सिंहासन, द्वादश में देव विमान, त्रयोदश में रत्नराशि और चतुर्दश में तेजस्वी अग्नि।

स्वप्न का फलितार्थ मर्मज्ञों ने इस प्रकार किया-हाथी सहायक साथी धैर्य, मर्यादा और बड़प्पन का प्रतीक है| उसके पेट में प्रविष्ट होने का तात्पर्य– प्रलम्ब बाहु पुत्र जन्म का द्योतक है| वह महान् धर्मात्मा, अनन्त शक्ति का स्वामी, मोक्ष प्राप्त करने वाला, यशस्वी, अनासक्त ज्ञानी, सुख-शान्ति का उपदेष्टा, महान् गुणों वाला, शांत और गम्भीर, त्रिकालज्ञ, देवात्मा और महान् होगा। भगवान महावीर का जीवन इस स्वप्न का पर्याय था, इसमें सन्देह नहीं। उपरोक्त सभी प्रतीकों का अर्थ मर्मज्ञों ने उन-उन वस्तुओं के गुण प्रभाव आदि की दृष्टि से निकाला जो उपयुक्त ही सिद्ध हुआ। अपने स्वप्नों की समीक्षा करते समय देखी गई वस्तुओं की उपयोगिता ,उनकी महत्ता और गुणों के विश्लेषण के रूप में किया जा सके , तो बहुत सारे अस्पष्ट स्वप्नों के अर्थ भी निकाल सकते और उनसे अपने जीवन को सँवार सकते हैं।


जब सिकन्दर भारत को विजित करता हुआ लौट रहा था (kahani)

अपनी दिग्विजय का शंखनाद करता हुआ जब सिकन्दर भारत को विजित करता हुआ लौट रहा था, तो मार्ग में उसने एक महात्मा के विषय में सुना। उसकी इच्छा उन महात्मा के पास जाने की हुई,| सिकन्दर महान् उन महात्मा के पास गया। महात्मा धूम में  बैठे थे, सिकन्दर ने उन्हें प्रणाम किया ; फिर भी वे बोले कुछ नहीं | इस पर अभिमान भरे भाव में सिकन्दर ने कहा- “महाराज मैं सिकन्दर हूँ |आपकी सेवा करने आया हूँ; आप मुझे आदेश दें ,मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ”। महात्मा ने अनमने मन से कहा- “मुझे दिग्विजयी सिकन्दर से कुछ लेना-देना नहीं, तुम उस प्रभु की दी हुई धूप का मुझे आनन्द लेने दो व एक तरफ हट जाओ।”

भौतिक रूप से भले ही सिकन्दर ने विजय या आनन्द की अनुभूति कर ली हो पर वह इस ब्रह्मानन्द के सामने अपने को तुच्छ ही समझने लगा।

----***----


भारतीय संस्कृति और उसकी विशेषताएं

Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI /* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-priority:99; mso-style-qformat:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt; mso-para-margin-top:0in; mso-para-margin-right:0in; mso-para-margin-bottom:10.0pt; mso-para-margin-left:0in; line-height:115%; mso-pagination:widow-orphan; font-size:11.0pt; mso-bidi-font-size:10.0pt; font-family:"Cambria","serif"; mso-ascii-font-family:Cambria; mso-ascii-theme-font:minor-latin; mso-fareast-font-family:"Times New Roman"; mso-fareast-theme-font:minor-fareast; mso-hansi-font-family:Cambria; mso-hansi-theme-font:minor-latin;}

भारतीय संस्कृति और उसकी विशेषताएँ

**********

भारतीय संस्कृति की विशेषताएँ ढूँढ़नी हों , तो उनमें ऐसी कितनी ही अच्छाइयाँ मिल सकती हैं  जो दूसरों के लिए भी प्रेरणाप्रद सिद्ध हो सकें। उनमें से एक अत्यधिक महत्व की है - वैचारिक सहिष्णुता। भारत में अनेक विचार और मत मतान्तर पनपे और बढ़े हैं। किसी ने किसी को रोका –काटा नहीं है। औचित्य किस प्रतिपादन में कितना है, इसका निर्णय जन विवेक पर छोड़ दिया गया है। उसमें आस्तिक से लेकर नास्तिक तक, जीव हिंसा को पाप मानने वालों से लेकर पशु बलि चढ़ाने वालों तक, को अपनी बात कहने की छूट दी गई है। बौद्ध धर्म भारत में पैदा हुआ और देश निकाला लेकर अन्यत्र चला गया | यह स्वस्थ प्रतिद्वन्दिता के कारण हुआ। इसके लिए उसे बाधित नहीं किया गया। इस वैचारिक स्वतन्त्रता से जहाँ यत्किंचित् भ्रम फैलने की गुंजाइश है ,वहाँ बहुत बड़ा लाभ यह है कि प्रस्तुत मीनाबाजार में से अपने उपयोग की सर्वोत्तम वस्तु तलाश करने के लिए विवेक बुद्धि जागृत रहती है। वह विकसित रही तो देर- सवेर में अधिकतम उत्कृष्ट का चुनाव सम्भव हो ही जायेगा। यदि मान्यताओं के बन्धनों से बुद्धि सामर्थ्य को जकड़ दिया गया होता ,तो कट्टरता भले ही बनी रहती, औचित्य को परखने वाला तत्व तो कुंठित ही होता चला जाता।" बाबा वाक्यं प्रमाणम् " के अन्धानुकरण में कई अच्छाइयों पर दृढ़ बने रहने का जितना लाभ है ,उसकी तुलना में यह हानि भारी है कि तर्क और तथ्य का आश्रय लेना ही बन्द कर दिया जाय। सही या गलत जैसी भी बनी हुई है, उसी लकीर को पीटते रहा जाय। भारतीय संस्कृति की यह विशेषता ऐसी है, जो कट्टरतावादियों को एक अच्छी दिशा की ओर संकेत करती है। हम अनेक प्रस्तुतीकरणों में से जहाँ जितने उपयोगी अंश मिल सकें, वहाँ से उतना चुन लेने की नीति अपना-कर अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमत्ता का ही परिचय देते हैं।

भीरतीय संस्कृति में व्यक्ति को ऐसी इकाई माना गया है , जो अपने आप में पूर्णता की सम्भावना सन्निहित रखते हुए भी समाज के लिए अति उपयोगी बना रह सकता है। आत्मबोध, आत्मकल्याण, आत्मोत्कर्ष जैसे शब्दों को भारतीय  दर्शन में प्रमुखता मिलने से  यही व्यक्तिवादी मान्यता लगती है और लगता है ?  स्वार्थी बनने के लिए कहा जा रहा है। इससे स्वार्थान्धता को प्रोत्साहन मिलेगा और सामाजिकता क्षीण होगी। यह आशंका तभी सही सिद्ध हो सकती थी, जब व्यक्ति विकास को विश्वात्मा के लिए समर्पित करने के स्थान पर निजी सुख -सुविधा के लिए आत्मकेन्द्रित किया गया था, पर यहाँ तो यह मान्यता है कि विश्वात्मा के- परमात्मा के, चरणों पर उत्कृष्टतम पूजा शाकल्य के रूप में परिष्कृत आत्मसत्ता को समर्पित किया जाय , इस प्रकार यह व्यक्तिवाद भी परिष्कृत समाजवाद की भूमिका प्रस्तुत करता है और उस पर व्यक्तिवादी स्वार्थान्धता का एकाकीपन का आक्षेप नहीं आता।

अरस्तु ने राज्य को सर्वोपरि माना है और व्यक्ति को उसके हित में कुछ भी करने के लिए कहा है। हीगल ने इस मान्यता को और भी आगे बढ़ाकर सर्वहारा की तानाशाही तक का परोक्ष समर्थन किया है। मार्क्स ने उसे और भी अधिक तर्क और तथ्य के साथ समाज की सर्वोच्च सत्ता के पक्ष में प्रस्तुत किये हैं और व्यक्ति की निजी स्वतन्त्रता को अमान्य ठहराया है। इन दिनों यही मान्यता प्रबल हो रही है। व्यक्ति के अधिकार बने रहने पर स्वतन्त्र आत्मोत्कर्ष की- अन्तरात्मा का अनुसरण करने की गुँजाइश रहती है ; किन्तु जब वह समाज के संचालकों की वशवर्ती कठपुतली मात्र रह गया ,तो फिर स्वतन्त्र चिन्तन की गुँजाइश ही कहाँ रही। माना कि इसमें दुष्टता बरतने के गुँजाइश है, पर साथ ही ऐसा भी तो है कि चेतना की स्वेच्छा साधियत गतिविधियाँ अपनाकर उस स्थान पर पहुँचे , जहाँ अवतारी महामानव पहुँचते रहे हैं। समाज नियन्त्रण को सर्वोपरि मान लेने पर वैयक्तिक महानता को विकसित कर सकने वाली आत्म-साधना के लिए अवसर ही नहीं रहता। इसी प्रकार प्रचलित विचार धारा को ही अन्तिम मानना पड़ेगा | उससे भिन्न प्रकार के तथ्यों को उभारना एवं जन साधारण के सामने प्रस्तुत कर सकने की बात ही शेष न रह जायगी। इससे मानवी प्रगति के इतिहास क्रम में भारी बाधा उत्पन्न होगी। भारतीय संस्कृति की प्रतिपादित एवं समर्थित वैयक्तिक स्वतन्त्रता में कितने ही दोष क्यों न गिनाये जाय, एक गुण तो बना ही रहेगा कि उसकी अन्तरात्मा जीवित रहे और अपने ढंग से अपने निर्णय लेने और गतिविधियाँ अपनाने में समर्थ रह सके। इस विशेषता के रहते आत्म-निर्माण की आत्माभिव्यक्ति की जो सुविधा मनुष्य के हाथ रह जाती है, वह असंख्य व्यवधानों के रहते हुए भी अधिक मूल्यवान है।

भारतीय संस्कृति में संवेदना, कल्पना, आचरण, भाव संयम, नैतिक विवेक, उदार आत्मीयता के जो तत्व अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं ,उनका आंशिक पालन बन पड़ने पर भी व्यक्ति सौम्य एवं सज्जन ही बनता है। इस दृष्टि से औसत भारतीय नागरिक तथा-कथित प्रगतिवान एवं सुसम्पन्न समझे जाने वाले देशों की तुलना में कहीं अधिक आगे है।

कर्मफल के सिद्धान्त की मान्यता– पुनर्जन्म के प्रति आस्था , भारतीय संस्कृति की ऐसी विशेषता है, जिसके आधार पर नीति और सदाचार की रक्षा होती है। यह एक अच्छी दार्शनिक ढाल है, जिसके कारण अनैतिक बनने के लिए उभरने वाले उत्साह पर नियन्त्रण लगता है। अपने देश में, ईमानदारी, अतिथि – सत्कार, दाम्पत्य मर्यादाओं की कठोरता, पुण्य– परोपकार, पाप के प्रति घृणा, जीवदया जैसे तत्व ,दरिद्रता और सामाजिक अव्यवस्था के रहते हुए भी जीवित है ,  उतने संसार में अन्यत्र कहीं भी नहीं है। जिन दिनों इस कर्मफल, सिद्धान्त पर वास्तविक आस्था थी, उन दिनों यहाँ की चरित्रनिष्ठा और समाज निष्ठा देखते ही बनती थी। प्राचीनकाल का भारतीय गौरव वस्तुतः उसकी महान संस्कृति का ही एक अनुदान रहा है।

मातृ शक्ति को देवी रूप में परम प्रतिष्ठा एवं भोजन , स्नान आदि के साथ जुड़ी हुई स्वच्छता ऐसे आधार हैं, जिनका श्रेष्ठता के संवर्धन में अच्छा योगदान रह सकता है। वर्ण –व्यवस्था आज जन्म-जाति के साथ जुड़कर विकृत हो जाने के कारण बदनाम है, पर उसके पीछे अपने व्यवसाय तथा अन्य विशेषताओं को परम्परागत रूप से बनाये रहने की भारी सुविधा है। आज छोटे-छोटे कामों के लिए नये सिरे से ट्रेनिंग देनी पड़ती है , जबकि प्राचीनकाल में वह प्रशिक्षण वंश- परम्परा के आधार पर बचपन में आरम्भ हो जाता था और अपने विषय की प्रवीणता सिद्ध करता था। आश्रम धर्म में ब्रह्मचर्य और गृहस्थ में बीतने वाली आधी आयु भौतिक प्रगति के लिए और आधी आयु आत्मिक विभूतियों के संवर्धन के लिए है। वानप्रस्थ और संन्यास में आत्मिक श्रेष्ठता के संवर्धन तथा लोकमंगल के योगदान देने के लिए निश्चित है। इससे व्यक्ति और समाज दोनों की श्रेष्ठता समुन्नत होती रहती है।

तीर्थ यात्रा में जहाँ स्वास्थ्य संवर्धन, अनुभव वृद्धि, स्वस्थ मनोरंजन, व्यवसाय वृद्धि, अर्थ वितरण जैसे अनेक लाभ हैं, वहाँ घर बैठे आदर्शवादी लोकशिक्षण की भी प्रचुर संभावना है। देवदर्शन के बहाने तीर्थयात्री गाँव-गाँव, गली- मुहल्लों में जाकर धार्मिक जीवन की प्रेरणा देते थे। पैदल तीर्थयात्रा का नियम रहने से धर्मात्मा व्यक्ति अपने मार्ग के अनेक स्थानों में अनेक व्यक्तियों तक श्रेष्ठ जीवन के सदुपयोग का मार्गदर्शन करते थे। साधु - ब्राह्मणों के अतिथि -सत्कार एवं दान- दक्षिणा के पीछे यही भावना भरी हुई है कि लोक सेवा के लिए स्वेच्छा- समर्पित कार्यकर्ताओं को किसी प्रकार की आर्थिक तंगी का सामना न करना पड़े।

व्रत उपवासों से जहाँ उदर रोगों की कारगर चिकित्सा की पृष्ठभूमि बनती है ,वहाँ मनः शुद्धि की प्रेरणा भी तीर्थयात्रा के साथ जुड़े हुए ऐतिहासिक स्थलों द्वारा मिलती है। प्रत्येक शुभ कर्म के साथ अग्निहोत्र जुड़ा रहने के पीछे दूरदर्शी तत्व वेत्ताओं की इच्छा यही रही है कि लोगों का यज्ञीय जीवन जीने की प्रेरणा मिले। यज्ञ– परमार्थ की प्रेरणाओं में जन– जीवन में त्याग –परमार्थ की पुनीत सत्प्रवृत्तियों का अधिकाधिक समावेश होता रहे। पर्वों और जयन्तियों की अधिकता भारतीय धर्म की ऐसी विशेषता है, जिसके सहारे सत्–परम्पराओं को अपनाये रहने और प्रेरणाओं को हृदयंगम किये रहने के लिए पूरे समाज को प्रकाश मिलता है?

भारत दर्शन के लिए आने वाले पाश्चात्य पर्यटक इस बात पर भारी अचम्भा करते हैं कि इस देश में पक्षी इतनी बहुलता के साथ जीवित हैं ; और वे इतनी निर्भीकता के साथ विचरण करते हैं। पश्चिमी देशों में ऐसा नहीं होता। वहाँ ढेरों किशोर, तरुण छोटी बन्दूकें लिये दिन भर पक्षियों की शिकार के लिए लुक-छिपकर घात लगाते रहते हैं। फलतः वहाँ उनका एक प्रकार से वंशनाश ही होता चला आ रहा है। उन देशों में जहाँ तक हुआ, पक्षी– संरक्षण– क्षेत्र बनाये हैं और वहाँ शिकार खेलने का निषेध किया है; फिर भी वहाँ वे सुरक्षित नहीं है। भारत के पक्षियों का स्वर्ग देखकर इस सह– अस्तित्व पर सभ्यताभिमानी लोग आश्चर्य करते हैं और जब देखते हैं कि पक्षियों को दाना डालने- उनके लिए विश्रामगृह बनाने, संरक्षण देने और चिकित्सालय तक बनाने तक की प्रथा है, तब तो उनके अचम्भे का ठिकाना ही नहीं रहता।

सभ्यता एक बात है, संस्कृति दूसरी। सभ्यता क्षेत्रीय होती है , उस पर स्थानीय परिस्थितियों का और समय के उतार –चढ़ावों का प्रभाव रहता है; किन्तु संस्कृति, आत्मा की मौलिक विशेषता होने के कारण सनातन और शाश्वत है। समय के साथ वह बढ़ती - घटती अवश्य है, पर उसके सिद्धान्तों में कोई अन्तर नहीं आता। मानवता के साथ कुछ आदर्श अविच्छिन्न रूप में जुड़े हुए हैं। वे देश, काल, पात्र से प्रवाहित नहीं होते। समर्थन या विरोध, की परवाह न करते हुए, वे अपने स्थान पर चट्टान की तरह अडिग बने रहते हैं। बहुमत या आत्ममत से भी उन्हें कुछ लेना देना नहीं पड़ता। संस्कृति ऐसी आदर्श शृंखला है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता यहाँ तक कि व्यवहार में उन सिद्धान्तों के प्रतिकूल चलने वाला भी खुले रूप में उसका विरोध नहीं कर सकता।

चोर अपने यहाँ दूसरे चोर को नौकर नहीं रखना चाहता। व्यभिचारी अपनी कन्या का विवाह व्यभिचारी के साथ नहीं करता और न अपनी पत्नी को किसी ऐसे व्यक्ति के साथ घनिष्ठता बढ़ाने देता है। ग्राहकों के साथ धोखेबाजी करने वाला दुकानदार भी वहाँ से माल नहीं खरीदता , जहाँ धोखेबाजी की आशंका रहती है। झूठ बोलने का अभ्यासी भी सम्बन्धित लोगों से यही अपेक्षा करता है कि वे उसे सच बात बताया करें। अनैतिक आचरण करने वालों से पूछा जाय कि आप न्याय - अन्याय में से उचित  अनुचित में से सदाचार- दुराचार में से किसे पसन्द करते हैं, तो वह नीति -पक्ष का ही समर्थन करेंगे। अपने सम्बन्ध में परिचय देते समय हर व्यक्ति अपने को नीतिवान के रूप में ही प्रकट करता है। इन तथ्यों पर विचार करने से प्रकट होता है कि मनुष्य की अन्तरात्मा एक ऐसी दिव्य परम्परा के साथ गुँथी हुई है, जिसे झुठलाना किसी के लिए भी- यहाँ तक कि पूर्ण कुसंस्कारी के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता। वह अपने दुराचरण के बारे में अनेक विवशताएँ बताकर अपने को निर्दोष सिद्ध करने का प्रयत्न तो कर सकता है, पर अनीति को नीति कहने का साहस नहीं कर सकता। यही कारण है, जिसके आधार पर संस्कृति को विश्व विजयिनी कहा जाता है।


बुरों पर रहम कर(kahani)

एक फकीर खुदा से दुआ कर रहा था –  “तू बुरों पर रहम कर” सुनने वालों ने फकीर से पूछा – “सब तो अच्छों के लिए दुआ करते हैं और आप हैं कि बुरों के लिए दुआ कर रहे हैं?” फकीर ने जवाब दिया, “अच्छों के लिए दुआ करने से क्या लाभ ? उन्हें तो खुदा ने अच्छा ही पैदा किया ;उनके कारण तो दुनिया में अच्छाई रहेगी ही, दुआ तो उनके लिए करनी चाहिए, जो बुरे हैं; ताकि उनमें अच्छे काम कर दुनिया को अच्छा रखने का उत्साह पैदा हो।”

----***----


आस्था, जिम्मेदारी और हिम्मत

आस्था जिम्मेदारी और हिम्मत

*******

मनुष्य के सामने परिस्थितिजन्य कठिनाइयाँ हैं तो पर वे अत्यन्त ही स्वल्प हैं। कठिनाइयों के अन्धड़ और तूफान तो अन्तःक्षेत्र में उठते हैं ; और जीवन के सारे क्षेत्र को अस्त-व्यस्त करके रख देते हैं । अपने को दूसरों से पृथक् और दूसरों से घटिया समझना ,ऐसा विलगाव है, जिससे इस संसार में बहते हुए आनन्द प्रवाह से हम वंचित रह जाते हैं। आनन्द का एकाकी अस्तित्व है नहीं, वह संयुक्त उपार्जन है। उसे साझेदारी की कमाई कह सकते हैं। एकाकी चिन्तन के कारण जो अलग– थलग पड़ता है , वह उस संसार की अति महत्वपूर्ण सरसता से वंचित ही रह जाता है।

यदि अपने को दूसरों से भिन्न और पृथक् समझा जाये , तो फिर अपरिचय का भय मन पर सवार होता चला जायगा। आमतौर से अन्धेरे में डर लगता है। पूछा जाय कि डर किसका लगता है , तो कुछ उत्तर न बन पड़ेगा। चोर, भूत, साँप, शेर आदि वहाँ कुछ भी तो नहीं होता , पर डर तो छाया ही रहता है। अँधेरा किसी को क्या त्रास दे सकता है ? इसका उत्तर एक ही है कि उस स्थिति में आदमी अपने को अकेला पाता है। अकेला असहाय होता है। बाहर के सहयोग और सम्पर्क से वंचित रह जाने पर मनुष्य के पास जो कुछ बचा रहता है , वह बहुत थोड़ा ही नहीं, खोटा भी है। उतने भर से उसका काम नहीं चल सकता। अभाव ,ग्रस्तता, नीरसता, एकाकीपन यह सभी डरावने हैं। अँधेरे में यही वातावरण भरा रहता है ;और आदमी सहज ही डरने लगता है।

प्रगतिशील जीवन के तीन आधार हैं– (1) आस्था (2) जिम्मेदारी (3) हिम्मत। इन्हें शरीरयात्रा के लिए अन्न, जल और वायु की मौलिक आवश्यकताओं की भाँति ही गिना जाना चाहिए; और समझा जाना चाहिए प्रसन्नता और सफलता का आनन्द ,आस्था, जिम्मेदारी और हिम्मत को अपनाये बिना, मिल ही नहीं सकेगा।

सोने – खाने तक का सीमित जीवन तो कृमि -कीटक भी बिताते हैं। मनुष्य उनसे कुछ आगे है; और अधिक है। यह विशेषता कौशल एवं चातुर्य मात्र की नहीं है | इस दृष्टि से तो कितनी ही ऐसी विशेषताएँ बहुत से प्राणियों में पाई जाती हैं ,जिन्हें देखते हुए मनुष्य घटिया ही बैठता है। उसकी मौलिक विशेषता है- आस्था , जो अन्य किसी प्राणी में नहीं पाई जाती। इसी के आधार पर वह ऊँचा उठा और आगे बढ़ा है। जीवन के साथ कुछ आदर्श उद्देश्य जुड़े हुए हैं और वह कुछ नीति - नियमों के साथ बँधा हुआ है। यह अनुभव करने के उपरान्त वह श्रेष्ठता को अक्षुण्य बनाये रहने की आवश्यकता अनुभव करता है। इस संसार की कोई नियामक सत्ता है। यहाँ कोई अनुशासन विद्यमान है। श्रेष्ठता ही बुद्धिमत्ता है ; और सज्जनता ही प्रसन्नता देती है। सद्भावों के सहारे ही विश्वास और सम्मान प्राप्त किया जा सकता है। स्थिर सफलता के लिए नीति- नियमों को अपनाये रहना आवश्यक है। ये मान्यताएँ जिसके अन्तःकरण में जितनी गहराई तक जमी होंगी ,बवह उतना ही आस्थावान कहा जायगा। व्यक्तित्व की गरिमा आँकने की कसौटी उसकी आस्थाएँ ही होती हैं। जिसने आदर्शों से अपनी श्रद्धा गँवा दी, उसके दृष्टिकोण में निष्कृष्टता और व्यवहार में दुष्टता की मात्रा बढती चली जायगी। नाव में पानी भरने से वह भारी होते-होते डूबने लगती है। आस्था -विहीन जीवन आन्तरिक गरिमा गँवाता चला जाता है। तब उसके पास धूर्तता मात्र बची रहती है। इतने भर से कुछ ऐसा नहीं कमाया जा सकता जिसे संतोषप्रद कहा जा सकेगा। निकृष्टता में सबसे बड़ा दोष यह है कि वह सम्मान और विश्वास से वंचित कर देती है ,उसका सच्चा मित्र एक भी बचा नहीं रहता।

नास्तिकता का अर्थ - नीति और मर्यादा पर से आस्था गँवा बैठना है। उत्कृष्टता का ही दूसरा नाम ईश्वर है। ईश्वर को मानने का अर्थ है- आदर्शों के प्रति आस्था बनाये रहना। उसे गँवा देने पर मनुष्य नास्तिक बन जाता है ,भले ही वह घण्टों पूजा -पाठ करता हो। नास्तिकता के अनेक दुष्परिणाम शास्त्रों में बताये गये हैं। उन सबमें भयावह है व्यक्तित्व में निकृष्टता का प्रवेश। आस्थाविहीन व्यक्ति ओछा सोचता है- घिनौना करता है; फलतः वह सब कुछ गुम जाता है, जिसके ऊपर प्रसन्नता, प्रतिभा, और सफलता का आधार खड़ा होता है।

जीवन की सफलता का दूसरा तथ्य है–- अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करना। हम अपने कामों के प्रति स्वयं जिम्मेदार हैं। प्रगति और अवगति में अपनी ही भूमिका प्रधान रहती है। दूसरे के सहयोग एवं अवरोध का भी महत्त्व हो सकता है ,किन्तु मूल बात अपने सोचने और अपने करने की है। अब तक के अवरोधों में अपने ही आलस्य, प्रमाद की सबसे बड़ी भूमिका देखी जा सकती है। दूसरे प्रयत्नशील व्यक्ति ,इससे भी गई -गुजरी स्थिति को पार करके, अपने पुरुषार्थ के बल पर आगे बढ़े हैं; फिर अपने रुके रहने का क्या कारण होना चाहिए | परिस्थितियाँ बदली जा सकती हैं- अवरोध हट सकते हैं- साधन जुट सकते हैं; शर्त एक ही है कि अपनी आन्तरिक प्रखरता पैनी रखी जाय।

अपने कन्धों पर पड़े हुए उत्तरदायित्वों को समझने और उन्हें पूरा करने के लिए जागरुकता बनी रहनी चाहिए। जो काम सामने है, उसे बेगार भुगतने की तरह नहीं, वरन् प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर पूरा करना चाहिए। आदमी के कामों के साथ जुड़ा हुआ मनोयोग एवं परिश्रम ही उनका स्तर बढ़ाता है; और इन क्रिया-कलापों को देखकर ही किसी के जिम्मेदार– गैर जिम्मेदार होने का पता चलता है। ईमानदारी और सज्जनता का जितना महत्व है ,उतना ही जिम्मेदारी समझने और निवाहने का भी। स्मरण रखा जाय, जिम्मेदारी अपनाये बिना व्यक्तित्व का वजन बढ़ ही नहीं सकेगा ;और इसके बिना प्रगति की दिशा में बढ़ सकने का अवसर मिल ही न सकेगा। अवरोधों के लिए दूसरों को दोष देने से ,आत्म-प्रवंचना से, मन हलका किया जा सकता है ,पर कुछ कर गुजरने की क्षमता तो जिम्मेदारी -समझने और उसे पूरी करने से ही उत्पन्न होती है।

तीसरा तथ्य है हिम्मत, जिसके सहारे अग्रगमन के लिए आवश्यक आत्मशक्ति उभरती है। शरीर इसी के सहारे अधिक काम करता है। मनःसंस्थान में इसी से दूरदर्शिता और गम्भीरता बढ़ती है। प्रसुप्त शक्तियों को जगाकर दुर्बल को बलिष्ठ बना देना ,हिम्मत के सहारे ही बन पड़ता है। दूसरे उन्हीं का साथ देते और उन्हीं के पीछे चलते हैं ,जो हिम्मत के धनी होते हैं। प्रशंसनीय गुण अनेक हैं, पर उनमें से जो तत्काल सत्परिणाम उत्पन्न करता है ,उसे साहस ही कह सकते हैं।

हिम्मत और ताकत एक ही बात है। साधनबल का कोई मूल्य नहीं। शक्ति तो साहस में रहती है। हिम्मत गँवा देने पर शरीरबल और शस्त्रों से सुसज्जित योद्धा भी पराजितों की स्थिति में जा पहुँचता है। जो भीतर से हार गया, उसके लिए विजयश्री का वरण कर सकना असम्भव है। आशा की बाती- उत्साह का तेल और साहस की आग न हो तो जीवन -दीपक में प्रकाश उत्पन्न ही न हो सकेगा; और उस आलोक के बिना सर्वत्र अन्धकार ही अन्धकार दृष्टिगोचर होगा।

आस्था, जिम्मेदारी और हिम्मत का समन्वय जहाँ भी होगा ,वहाँ आन्तरिक प्रसन्नता और वाह्य क्षेत्र की सफलता के आधार खड़े होते चले जायेंगे। सर्वतोमुखी प्रगति के लिए यह समन्वय किन्हीं भाग्यवानों को ईश्वरीय वरदान की तरह उपलब्ध होता है।


दो भाई थे (kahani)

दो भाई थे। एक शासन के किसी विभाग में नौकरी करता था, दूसरा शारीरिक मजदूरी कर परिश्रम से रोजी –रोटी की व्यवस्था करता था। शासकीय नौकरी वाला भाई अधिक कमाता था। उसने दूसरे भाई से कहा –“तुम क्यों रोज मजदूरी कर परिश्रम करते हो; मेरी तरह नौकरी करलो; काम भी कम करना पड़ेगा व मेहनत से भी छुटकारा मिलेगा।” दूसरे ने कहा- “तुम मेरी तरह मेहनत का काम क्यों नहीं करना प्रारम्भ कर देते ;निकृष्ट चाकरी के भाव से छुटकारा भी मिलेगा व अधिक आत्मसंतोष व आत्मिक प्रसन्नता भी।”

----***----


मनुष्य जीवन भी एक प्रवास ही तो है।

मनुष्य जीवन भी एक प्रवास ही तो है

***********

जब पृथ्वी में यातायात के साधनों का उतना अधिक विकास नहीं हुआ था ,तब भी यात्राएँ मानव-स्वभाव का एक आवश्यक अंग थीं। न केवल आजीविका, रोजगार, अध्ययन; अपितु प्राकृतिक सुषमा के दर्शन ,सत्संग और ज्ञान प्राप्ति के लिए भी एकाकी तथा सामूहिक यात्राएँ आयोजित हुआ करती थीं। संसाधनों के विकास के साथ-साथ इस प्रवृत्ति का भी विकास हुआ है। यात्राओं की सफलता के लिए प्रचुर भौगोलिक ज्ञान ,स्थान विशेष के रीति-रिवाज, रहन-सहन, योग्य विश्रामस्थलों की जानकारियाँ पूर्व में ही उपलब्ध हो जाने के कारण ये यात्रायें अब सब तरह से आरामदेह हो गई हैं।

दूसरी ओर पशु−पक्षी हैं उनमें भी प्रवास का नैसर्गिक गुण आदिकाल से चला आया है। उनकी यात्रायें पहले की अपेक्षा अब अधिक संकटपूर्ण हो गई हैं। उन्हें कोई भौगोलिक ज्ञान भी नहीं मिला होता किन्तु यह प्रकृति का एक चमत्कार ही है कि प्रतिवर्ष हजारों पक्षी-जंगली जीव न केवल पड़ोसी राज्यों की अपितु सुदूर देशों की भी यात्रायें करते हैं। मनुष्यों में भाषावाद, जातिवाद रहन-सहन की भिन्नता के कारण उनके हृदय परस्पर मिल नहीं पाते, पर इन जीवों में ऐसा कोई अंतर्द्वंद्व नहीं। विशेष अवसरों पर विशेष स्थानों में अनेक देशों से आये भिन्न जाति के पक्षी और जीव−जंतु परस्पर सहिष्णुता आदर भावना और भाईचारे की स्वस्थ परम्परा से जीवन निर्वाह कर नियत समय पर अपनी मातृभूमि लौट जाते हैं। मनुष्य जीवन भी एक सुनिश्चित और विराट प्रवास का लघु संस्करण है। जीव-जन्तुओं के माध्यम से हम पता लगा सकें कि इस नैसर्गिक क्षमता का कारण क्या है तो एक अनोखी जीवन दृष्टि का विकास नितान्त सम्भव है।

Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI

/* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-priority:99; mso-style-qformat:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt; mso-para-margin-top:0in; mso-para-margin-right:0in; mso-para-margin-bottom:10.0pt; mso-para-margin-left:0in; line-height:115%; mso-pagination:widow-orphan; font-size:11.0pt; mso-bidi-font-size:10.0pt; font-family:"Calibri","sans-serif"; mso-ascii-font-family:Calibri; mso-ascii-theme-font:minor-latin; mso-hansi-font-family:Calibri; mso-hansi-theme-font:minor-latin; mso-bidi-font-family:Mangal; mso-bidi-theme-font:minor-bidi;}

प्रवासी पक्षियों में व्हाइट स्टार्क,गोल्डन प्लावर,आर्कटिक टर्न , सेन्ड पाइपर , सारस ,बोबालिक मुख्य हैं |वह अधिकांश समुद्र के ऊपर उड़ान भरते हैं;   इस कारण इन्हें उबाऊ दूरी लगातर उड़कर पार करनी पड़ती है | गोल्डन प्लावर टून्डा के पम्पास तक की 12000 किलोमीटर,श्वेत स्टार्क , को समूचा स्टार्क ,जिब्राल्टर , जल डमरुमध्य आर्कटिक  को तो समुची धरती की परिक्रमा करनी पड़ जाती हैं|जब ये उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की लगभग 25 हजार किलोमीटर दुरी तयकर एक स्थान से दूसरे स्थान जाते है | जहाजों की तरह वह भी नियमित रुप से समुद्रों में पाये जाने वाले टापुओं में कुछ समय विश्राम कर  अपनी आगे की यात्रा की तैयारी करते हैं |

योरोपीय देशों के सारस शरदऋतु में अफ्रीका आ जाते हैं और बसन्त ऋतु में पुनः लौट जाते हैं। एक बार पूर्ण प्रशा (जर्मनी) से अनभिज्ञ सारसों के कुछ बच्चे ऐसेन नामक स्थान पर ले जाकर छोड़ दिये गये। उस समय तक वहाँ के अन्य प्रवासी सारस जा चुके थे अत्यधिक चक्करदार रास्ता होने पर भी वे किसी अन्तःप्रेरणा से एक निश्चित दिशा से प्रशा जा पहुँचे। इसी तरह कुछ कौवों की उत्तरी जर्मनी और वाल्टिक के पार उत्तरपूर्व की दिशा में ले जाकर छोड़ा गया, पर वे 500 मील की वापसी यात्रा समानान्तर मार्ग से सम्पन्न कर यथा पूर्व स्थान पर लौट आये। आश्चर्य तो तब होता है। जब इनके अंडे भी यदि एक स्थान से दूसरे स्थान पर पहुँचा दिये जायें तो उनसे निकलने वाले बच्चे भी अपने जन्म स्थान लौट आये। ऐसा पैत्रिक गुण-सूत्रों की प्रेरणा से होता है इससे संस्कारों की महत्ता प्रतिपादित होती है।

Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI

/* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-priority:99; mso-style-qformat:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt; mso-para-margin-top:0in; mso-para-margin-right:0in; mso-para-margin-bottom:10.0pt; mso-para-margin-left:0in; line-height:115%; mso-pagination:widow-orphan; font-size:11.0pt; mso-bidi-font-size:10.0pt; font-family:"Calibri","sans-serif"; mso-ascii-font-family:Calibri; mso-ascii-theme-font:minor-latin; mso-hansi-font-family:Calibri; mso-hansi-theme-font:minor-latin; mso-bidi-font-family:Mangal; mso-bidi-theme-font:minor-bidi;}

इग्लैंड से अफ्रीका की दूरी 6000 मील है , पर वहाँ की अजीवन कष्ट उठाकर  भी यह देशान्तर करती है| अमेरिका से दक्षिणी अमेरिका जाने वाली स्वर्ण टिटहरी को 2000 मील यात्रा करनी पडती है | पेन्गुइन उड़ नहीं सकते ,पर वे समुद्र में तैरकर ही अंटार्कटिका से दक्षिणी अमेरिका की यात्रा करती हैं | वे जिस रास्ते जाती हैं , उसी से लौट आती है | विशेष ध्वनि से गाते हुए चलने वाली इनकी टोलियाँ दर्शकों का मन उसी तरह मोहती हैं ,जैसे मेले-ठेले जाने वाली स्त्रियों की गीत गाती टोलियों|

अपने जन्म स्थान की कुत्तों को भी विलक्षण पहचान होती है। वे गन्ध के सहारे सैकड़ों मील दूर से अपने घर लौट आते हैं। न्यूयार्क (अमेरिका) का कुत्ता एल्वनी विश्वभ्रमण की ख्याति प्राप्त कर चुका है। इसने अकेले रेल और समुद्री जहाजों से जापान, चीन, योरोप देशों की यात्रा की और अन्ततः सकुशल न्यूयार्क वापस लौट आया।

मनुष्य कहाँ से आया ; उसका यथार्थ क्या है; यह न तो समझने का प्रयास करता है, न लक्ष्य प्राप्ति के प्रयत्न ; पर यह पक्षी हैं , जो दूर-दूर तक जाकर भी समय पर प्रयत्नपूर्वक खुशी-खुशी लौट आते हैं। शरद ऋतु में उत्तरी - पश्चिमी ध्रुव प्रदेशों के पक्षी भारत, दक्षिणी अफ्रीका, श्रीलंका तक फैल जाते हैं, पर ग्रीष्म ऋतु आते ही अपनी जन्मभूमि लौट जाते हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जीव वैज्ञानिकों ने जर्मनी के व्रिमेन नगर में एक प्रयोग किया| उन्होंने सात अबावीलें पकड़ीं और उन्हें लाल रंग से रंग दिया। फिर उन्हें विमान में बैठा कर लन्दन लाकर हवाई अड्डे के पास छोड़ दिया गया। पीछे पाया गया कि उनमें से पाँच अबावीलें सुरक्षित अपने पूर्ववर्ती घोंसलों में पहुँच गईं।

हममें से अनेक मनुष्यों को परमात्मा कुछ विशेष बौद्धिक और आत्मिक गुणों से सम्पन्नकर पृथ्वी पर भेजता है; और यह आशा करता है कि वे सृष्टि को सुन्दर बनाने की उसकी कल्पना को साकार बनायेंगे, पर वह ऐसा करना तो दूर, अपने बुद्धिकौशल को अपने ही स्वार्थ-साधनों में उलझाकर यह कामना करता रहता है, कि उसे संसार से जाना नहीं पड़ेगा। अपनी हठबुद्धि के कारण वह न केवल संसार को कुरूप बनाता है ,  अपितु पश्चाताप भरी जिन्दगी लेकर लौटने को विवश होता है।

नवीनता के प्रति आकर्षण जीवन का नैसर्गिक गुण है , यह गुण भी जीवन की पृथक-पृथक इकाइयों में सामंजस्य प्रस्तुत करता है ;  और मनुष्य को उसके चिन्तन के लिए भावभरी विराट् सामग्री प्रदान करता है। जीवों की भाँति मनुष्यों में भी यह गुण पाया जाता है ; किन्तु सांसारिकता के भार इस तरह के आह्लाद प्रदान करने वाले गुणों को भी नष्ट कर देते हैं। तब उनकी पाशविकता उभरकर सामने आ जाती है। अच्छे और नये के स्वागत की दृष्टि ने ही भारतीय मनीषा को अनासक्त कर्मयोग का दर्शन दिया है। इस परम्परा को बनाये रखने में न केवल प्रसन्नता , अपितु पवित्रता भी निहित है |अमेरिका के आरेगन राज्य में सिलबर्टन नाम के एक कस्बे के निवासी फ्रैंक ब्रेजियर ने कोली जाति का एक कुत्ता पाला  नाम रखा गया -“बाबी” बाबी बड़ा ही स्वामिभक्त कुत्ता था| वह न केवल तरह-तरह के करतबों से घर वालों का मनोरंजन करता, अपितु वह एक स्वामिभक्त सेवक के सभी कर्त्तव्य निबाहता, घर की रखवाली के अतिरिक्त बच्चों को स्कूल पहुँचाना, जंगली जानवरों से खेतों की रक्षा करना उसकी दिनचर्या में सम्मिलित कार्य थे। एक बार ब्रेजियर को इडियाना जाना पड़ा, साथ में बाबी भी था। दुर्भाग्य से कुत्ता वहाँ खो गया बहुत खोजने पर भी बाबी न मिला तो निराश ब्रेजियर वापस सिलबर्टन लौट आये। किन्तु बाबी निराश नहीं हुआ। नितान्त अपरिचित 3000 मील का कष्ट भरा मार्ग उसने अगणित बाधाओं के बावजूद पार कर ही लिया ; और अन्ततः एक दिन अपने मालिक तक पहुँचने में सफलता प्राप्त कर ली। इसे कुत्तों की यात्रा का सबसे बड़ा रिकार्ड माना गया है। साथ ही उसकी स्वामिभक्ति का अद्भुत उदाहरण भी।

इसी तरह भावनाओं के अलौकिक जगत के सत्य से हमें भी इनकार नहीं करना चाहिए। यह सत्य दृष्टि में निरन्तर बना रहे , तो अनायास ही दुष्कर्मों और खोटे कृत्यों से छुटकारा मिल जाता है, पर उसी के साथ ही व्यावहारिकता का आधार भी नष्ट न हो , तो ही संतुलन बना रह सकता है। नवीन के प्रति अनन्य जिज्ञासा का अर्थ पलायनवाद नहीं होना चाहिए। अपनी इसी त्रुटि के कारण भारतीय जीवन ने धक्का खाया और शिरोमणि तत्वदर्शन को धरती की धूल चाटनी पड़ी। आकाश की कल्पना करते समय धरती के यथार्थ से मुँह न मोड़ें। जन्म स्थान पर बार-बार लौटने में जीवों की प्रकृति का यही संदेश- संकेत हो सकता है।

प्रकाश चिरकाल से ही मानवीय प्रेरणा का स्रोत रहा है। प्रकाश जितना दिव्य और स्निग्ध होता है , उतना ही मोहक लगता है। चैत्र की नवरात्रियों के समय आकाश में आने वाले प्रकाश में कुछ ऐसी दिव्यता होती है कि उसका अनुभवकर आँखें चमकने लगती हैं। ब्याह शादियों के समय छूटने वाली फुलझड़ियाँ देखकर न केवल बच्चे, अपितु बड़े भी प्रसन्न होते हैं। प्रकाश का मानवीय चेतना से कोई सीधा सम्बन्ध है, तभी हम अन्धकार बर्दाश्त नहीं कर पाते। परमात्मा से “अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलने” की प्रार्थना करते हैं। प्रकाश ही जीवन और अन्धकार अविद्या है। यह बात प्राण - चेतना पर समान रूप से लागू होती है; चाहे वह मनुष्य हो या मनुष्येत्तर जीव।

पक्षियों के प्रवास सम्बन्धी वैज्ञानिक अनुसंधानों ने यह सिद्ध कर दिया है, कि पक्षियों का प्रवास जिन कारणों से प्रेरित होता है, उनमें ऋतु परिवर्तन को अनुकूल बनाये रखना, भोजन प्राप्त करना गौण है ; अधिक समय प्रकाश की उपलब्धि प्रमुख जिन प्रदेशों में चौबीसों घण्टे या अधिक से अधिक समय सूर्य का प्रकाश रहता है, वहाँ पक्षी अधिक रहना पसंद करते हैं। ध्रुवों के समीपवर्ती प्रदेश इसी कोटि के हैं। आर्कटिक टर्न तथा गोल्डन प्लोवर ऐसे ही पक्षी हैं , जो ध्रुवों की यात्रा गर्मियों में ही करते हैं ; क्योंकि उन दिनों वहाँ से सूर्य चौबीसों घण्टे दिखाई देता है। केवल मौसम की ही बात होती, तो उसमें आये दिन उतार --चढ़ाव आते रहते हैं , किन्तु वे ऐसा नहीं करते। अमेरिका के एक सर्वेक्षण में यह पाया गया है। वहाँ सैन जुआन कैपिस्ट्रान स्थान में आने वाले स्वालो पक्षी प्रतिवर्ष एक ही निर्धारित तिथि को पहुँचते हैं।

न्यूयार्क में एक पक्षी पाया जाता है ब्राँज- कक्कू  इनके बच्चे पैदा होते ही आत्मनिर्भर जीवन बिताते हैं। माता-पिता इन्हें अपने साथ यात्राओं में भी नहीं ले जाते; जबकि वे प्रतिवर्ष सोलोन द्वीप समूह की यात्राएं करते हैं। न जाने कौन-सी सूक्ष्म अन्तःप्रेरणा है , कि बच्चे अपने आप ही अपने पूर्वजों की तरह यात्रायें करते हैं और उन स्थानों में स्वतः पहुँच जाते हैं। जहाँ उनके पितामह आते- जाते रहते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि प्रकाश किरणों की दिशा, विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र तथा पृथ्वी के घूमने की स्थिति, को पक्षी भली प्रकार अनुभव करते हैं , इसी कारण वे इतनी लम्बी यात्रायें बिना किसी जान-पहचान और यन्त्र के सम्पन्न करते हैं। नक्षत्रों की स्थिति ,सूर्य के परिभ्रमण के आधार पर भी वे अपनी यात्रायें सम्पन्न करते हैं,  किन्तु जितना ही उनका यह सूक्ष्म बोध आश्चर्यजनक है, उतना ही यह तथ्य भी है, कि वे रात में बिना पूर्व ज्ञान और मार्गदर्शन से उन्हें इन सभी परिस्थितियों की जानकारी किस स्रोत से उपलब्ध होती है।


Quotation

अपने लम्बे जीवन में मैंने कुछ ध्रुव सत्य देखे हैं। पहला यह है कि घृणा, द्वेष और द्रोह को पल-पल पर मरना पड़ता है। दूसरा यह कि सहिष्णुता से बड़ी कोई प्रेम- प्रीति नहीं होती। तीसरा यह है कि ज्ञान को ही पोषण देने से मनुष्य को आज की कालरात्रि भोगनी पड़ रही है। ज्ञान के साथ-साथ विवेक को भी पुष्ट करते चलिए। भविष्य की हर सीढ़ी निरामय होगी।

-बट्रेडरसेल

----***----


सौर-ऊर्जा का अथाह सिन्धु, काश! उसे धारण कर पायें

सौर-ऊर्जा  का अथाह सिन्धु , काशा उसे धारण कर पायें

************

न्यू मैक्सिको में अलबुकर्क के अनुसंधानकर्त्ताओं ने एक ऐसा यन्त्र बनाया है ,जो सौरऊर्जा को एकत्र करता है। शोधकर्मियों ने अपने प्रथम प्रयोग में ही 4.5 मीटर लम्बी व 1.8 मीटर चौड़ी इस्पात की चादर को गलाकर रख दिया। यह 1/4 इंच मोटी थी और प्रयोग संडिया की प्रयोगशाला में किया गया।; किन्तु सबसे अच्छी प्रयोगशाला मनुष्य का अपना शरीर ही है | यदि इसमें प्रसुप्त पड़ी शक्तियों को पहचाना और विकसित किया जा सके ,तो बिना किसी यान्त्रिकी या भौतिकी के भी ,अपार शक्ति संचय और उसके द्वारा विलक्षण चमत्कार तक दिखाये जा सकते हैं।

Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI

/* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-priority:99; mso-style-qformat:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt; mso-para-margin-top:0in; mso-para-margin-right:0in; mso-para-margin-bottom:10.0pt; mso-para-margin-left:0in; line-height:115%; mso-pagination:widow-orphan; font-size:11.0pt; mso-bidi-font-size:10.0pt; font-family:"Calibri","sans-serif"; mso-ascii-font-family:Calibri; mso-ascii-theme-font:minor-latin; mso-hansi-font-family:Calibri; mso-hansi-theme-font:minor-latin; mso-bidi-font-family:Mangal; mso-bidi-theme-font:minor-bidi;}

" समुद्र से आकाश तक '' गत सितम्बर 1977 में एवरेस्ट विजेता एडमण्ड हिलेरी ने एक अभियान प्रारम्भ किया , जिसमें उन्होंने कलकत्ता से गंगा

मार्ग द्वारा गंगोत्री तक की यात्रा सम्पन्न की | जिस समय एडमण्ड हिलेरी की मोटर वोट इलाहाबाद पहुँची, उस समय एक 68 वर्षीय वृद्ध हठयोगी ने उनकी नाव को एक स्थान  पर ही 10 मिनट तक रोके रखा | इस प्रयोग को हजारों  व्यक्तियों ने देखा |14 सितम्बर के दैनिक हिन्दुस्तान में यह समाचार छपा भी था और बनाया गया था–200 हार्सपावर की मोटर ने पूरा जोर लगाया ; वोट बुलबुले छोडती रही ; पर टस से मस न हो सकी | सूर्य किरणॉ  को केन्द्रित करने के लिए तो कम्प्यूटर नियन्त्रित दर्पण प्लेटें (हैलिपोस्टैटस) प्रयुक्त की गई थी ,जिससे दो मिनट में 3000 डिग्री फारेनहाइट ताप 1.8 मेगावाट विधुत के बराबर उर्जा उत्पन्न हुई और उसने इस्पात की चादर को गला दिया, पर आत्मव्यक्तियों को केन्द्रित करने और उनका लाभ उठाने के लिये न ऐसे किसी जटिल उपकरण की आवश्यकता होती है ,न साधनों की | जिस तरह आतिशी शीशे में किरणों को एकाग्रकर उन्हें अकृत बना लिया जाता है , उसी प्रकार प्राण शक्तियों के संलयन से वह अदभुत शक्ति मनुष्य शरीर में ही प्राप्त कर ली जाती है, हाइड्रोजन सर्वत्र बिखरा पड़ा है और किसी स्थान विशेष में 10 करोड़ सेन्टीग्रेट ताप पैदा कर दें , तो इस हाइड्रोजन की संलयन (फ्यूजन) प्रक्रिया वहाँ स्वयमेव प्रारम्भ हो जायेगी और उस स्थान पर कृतिम सूर्य पैदा  हो जायेगा | वैज्ञानिक फ़िलहाल इतनी गर्मी पैदा करने की प्रक्रिया  का विकास नहीं कर पाये , इसीलिए अभी ऊर्जा का यह अक्रृत भंडार हमारे आसपास बिखरा होने पर भी उसका उपयोग नहीं हो पाता | मनुष्य में से प्रत्येक के पास भी परमात्मा ने इस तरह की शक्तियाँ दी हैं ; पर इसकी प्रचण्ड गर्मी वाला मनोबल या संकल्पबल किन्हीं बिरलों में ही जागृत हो पाता है;जो कर लेते है, वे लोग साधनों ,विचरों आदि के मूर्तिमान शक्तिपुंज चलते -फिरते बिजली  घर बन जाते हैं उससे वे सैकडों लोंगों का भला कर सकते हैं | मात्र वचारों की ही एकाग्रता मनुष्य को कुशाग्र बुद्धि ,साहित्यकार ,इंजीनियर ,वैज्ञानिक और न जाने क्या बना देती है , आत्मशक्ति संचय के सत्परिणाम की तो कल्पना भी नहीं हो सकती |

प्रकारान्तर से प्राप्त ऊर्जाशक्ति चाहे वह प्राकृतिक रूप में हो या उसे साधनरूप में प्रयुक्त किया गया हो, सूर्य की ही का  चिर संग्रहीत शक्ति होती है। सम्भालकर रखे गये पदार्थ कभी भी काम में आ जाते हैं ; इस तथ्य में यही सिद्धान्त कार्य करता प्रतीत होता है।

भूताप विशेषज्ञ सी गुलेमीन के कुछ दिनों पूर्व पेरिस में आयोजित एक ऊर्जा सम्मेलन में अपने निब्न्ध में बताया कि अकेले पेरिस के इलाके में 15oo से 2ooo मीटर गहरे कुएँ खोदे जायें , तो वहाँ उपलब्ध गरम जल से इतना अधिक ताप मिला जायेगा ,जितने के लिये 1करोड़ 80 लाख टन ईधन जलाना पड़ेगा | पेरिस में मेलन नामक स्थान में इस 100 क्युमिक मीटर प्रति घंटे की गति से 70 अंश से .ग्रेड पानी निकालकर लगभग 1900 घरों को पहुँचाया जाता है |

हिमालय के अत्यन्त शीत वाले प्रदेश में स्थान-स्थान पर ऐसे कुण्ड उपलब्ध हैं , जिनमें 350 से.ग्रेड .तक गर्म जल उपलब्ध है। रूस के उत्तरी ध्रुव- क्षेत्रों में भी पृथ्वी के भीतर के गर्म जल का उपयोग करके 2 करोड़ टन ईन्धन की बचत की जाती है। टस्केनी के लाडरेल्लो में एक ऐसा कारखाना चलाया जा रहा है ,जिसमें इस भू-ताप से ही 390 मेगावाट शक्ति की भू-ताप बिजली तैयार की जाती है। कैलीफोर्निया में पहले से ही 6 भू-ताप बिजली घर हैं, 7 और तैयार हो रहे हैं। यह सब 1000 मेगावाट बिजली तैयार करेंगे। जापान, मैक्सिको, आइसलैण्ड, न्यूजीलैण्ड, फिलीपीन्स आदि में भी ऐसे भू-ताप कारखाने हैं। यह समग्र शक्ति और कुछ नहीं सूर्य द्वारा वर्षों से धरती के सघन अन्तराल में संचित की हुई पूँजी है| उसका लाभ आज का मनुष्य समाज पूर्वजों द्वारा संग्रहीत सम्पत्ति के रूप में लेता है।

फ्राँस ने रांस नदी पर समुद्री ज्वार से 240 मेगावाट बिजली बनाने का कारखाना खड़ा किया है। वह भी सूर्य की ही उधार दी हुई सामर्थ्य है।अपने देश की धरती में अनुमानत: 140 अरब टन कोयला है , उससे अगले 200 वर्षो से भी अधिक तक 625 करोड़ टन प्रति वर्ष की दर से उर्जा प्राप्त की जा सकती है | यह भी सूर्य की ही चिर संचित पूँजी है | अनुमान है कि यह कुछ करोड़ वर्षो  से संग्रहीत शक्ति है,जो कोयलों में विद्यमान रहती है | इस तरह सारी धरती के कोयले में प्रसुप्त सौर -शक्ति की माप भी सम्भव है |

बरसात के दिनों में, जो बादल अपने आप हवाई समुद्र बन जाते और सारी पृथ्वी को जल से सराबोर कर देते हैं ; यह बादल उस भाप का परिणाम हैं, जिसे सूर्य अपनी गर्मी से प्रति सेकेंड 1 करोड़ 60 लाख टन पानी को पका कर भाप में बदलता रहता है। सूर्य से पृथ्वी को मिलने वाली कुल ऊर्जा शक्ति का दो तिहाई भाग इसी कार्य में प्रयुक्त होता है। नैसर्गिक शक्तियाँ विश्व व्यवस्था का भार कितने विवेकपूर्वक चलाती है यह इसी तथ्य से प्रकट है। यदि सृष्टि में वृष्टि की प्रक्रिया किसी एक वर्ष ही रुक जाये,तो न केवल मनुष्य जाति ,अपितु उससे पड़ने वाले अकाल से सारा जीवन जगत समाप्त हो सकता है। कहाँ तुरन्त कितनी आवश्यकता है, कहाँ भविष्य के लिये संग्रह की आवश्यकता है, पृथ्वी में शीत ताप का सन्तुलन किस प्रकार रखने का है, इस सम्बन्ध में प्रकृति की चिन्तन दृष्टि विवेकपूर्ण, सूक्ष्म और दूरदृष्टि न रहे ,तो यहाँ जो कुछ भी सौन्दर्य और जीवन व्यवस्था दिखाई देती है, कुछ भी न रहे। जो लोग अपने जीवन में भी यह दृष्टि और दूरदर्शिता बनाये रखते हैं ; वे न केवल स्वयं सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं ,अपितु अपने परिवार-परिजनों को भी प्रगति पथ पर अग्रसर करने में सफल होते हैं।

सूर्यशक्ति का यह विशाल परिणाम और उसकी सर्वव्यापक सक्रियता न केवल जगत के शक्तिमय होने की झाँकी प्रस्तुत करती है ; अपितु उससे भौतिक लाभ भी लिये जा सकते हैं। सूर्य हमारे जीवन का आधार- हमारा आरोग्य प्रदाता है हमारा पिता है ; हमें उनको भौतिक ही नहीं ,आत्मिक दृष्टि से    भी पहचानना चाहिए।

ब्रिटेन के टेलीफोन इंजीनियरों ने एक ऐसे टेलीफोन का विकास किया है, जिसमें तार बिछाने की न तो कोई समस्या रहेगी ,न खर्च। उससे सुदूर ग्रामीण क्षेत्रों में भी संचार - व्यवस्था स्थापित हो जायेगा, जहाँ वर्तमान साधनों से भी पहुँचना सम्भव न था। ब्रिटेन की दूरसंचार - प्रणाली की संचालन करने वाले डाक घर के प्रवक्ता ने बताया, कि नारफोक के निकट ब्रिटेन के पूर्वी तट पर एक निगरानी चौकी बनी है, जिससे उस क्षेत्र में कोई पक्षियों का शिकार न कर पाये | उसकी निगरानी की जाती है|  उपरोक्त टेलीफोन का परीक्षण इसी स्थल पर किया गया।

यह एक प्रकार से विशालकाय सूर्य की अनन्तशक्ति की एक फुलझड़ी मात्र हुई। आये दिन ऐसे अनेक लोगों के चमत्कार के वर्णन सुनने को मिलते रहते हैं, कि उन्होंने भविष्यवाणी की; सच निकली। उन्होंने तन्त्र विद्या से कोई वस्तु प्रकट कर दी। उन्होंने शाप देकर किसी का अनिष्ट कर दिया | उन्होंने किसी को सम्मोहित कर दूरवर्ती अदृश्य तथ्य को भी जान लिया। यथार्थ चमत्कार तो वह है ,जो किन्हीं महापुरुषों, सन्तों और अवतारों द्वारा युग की दिशायें मोड़ने में प्रयुक्त होता और जनजीवन के प्रकाश के रूप में चमत्कार दिखाता है ; विनाश की दिशा में चल रही मानवीय प्रवृत्तियों को उलटकर, उन्हें रचनात्मक दिशायें देते और संसार में सुख -शान्ति की परिस्थितियाँ लाते हैं। इसके लिए कितनी विशाल शक्ति की आवश्यकता होगी, उसकी कल्पना करना भी कठिन है।

परमात्मा के इस विशाल जगत में किसी भी वस्तु का अभाव नहीं है ; यदि कुछ है तो वह मात्र मनुष्य का अज्ञान है, उसकी जड़ता है। अज्ञान और जड़तायें आगे बढ़ने ही नहीं देतीं, संकीर्णता में ही उलझाये रहती हैं। ऊर्जा के लिए ईंधन और कोयला स्थूल साधन हैं। बड़े परिमाण में मिलें , तो भी थोड़ी शक्ति मिलती है। उससे आगे भू-ताप है; उससे भी बढ़कर विद्युत शक्ति। इससे भी यदि आवश्यकतायें पूर्ण न हों तब फिर सूर्यशक्ति का अजस्र भंडार। शक्तियों के एक से एक बुद्धि को चकरा देने वाले साधन प्रकृति के अन्तराल में भरे पड़े हैं। उन्हें प्राप्त करना एक क्लिष्ट प्रणाली हो सकती है, किन्तु वैज्ञानिकों ने वह तथ्य सम्मुख ला दिये हैं, जिनसे शक्ति चुक जाने की आशंका का पूर्ण निराकरण हो गया है।

सूर्य पृथ्वी से 1490000000 किलोमीटर दूर है। इतनी दूरी और पृथ्वी के क्षेत्रफल के अनुपात से वह अपनी कुल ऊर्जा का मात्र 0.000000005 वाँ अंश ही पृथ्वी को देता है, किन्तु यह शक्ति भी इतनी विशाल है की उसकी बराबरी 2 अरब अणु विद्युत घरों से प्राप्त बिजली ही कर सकती है। उसे यदि विद्युत शक्ति में बदला जा सके, तो 1 खरब 73 अरब मेगावाट विद्युत भार के बराबर होती है। अनुमान है कि प्रति वर्गमीटर एक किलोवाट विद्युत भार के बराबर ताप पृथ्वी को मिलती है। समूची धरती का हिसाब लगायें, तो उसे सूर्य से प्रति वर्ष 1311 करोड़ खरब कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है। इस विशाल परिणाम का अनुमान करना भी कठिन है। हमें यह अनुदान अजस्र रूप से मिलता रहता है; फिर कितना दुर्भाग्य है कि हम शक्ति-शक्ति चिल्लाते रहते हैं। " जल में मीन पियासी " वाली कहावत है।

सूर्य की यह अजस्र ऊर्जा हमारा प्राण है। समस्त जीव-जगत और वृक्ष - वनस्पति उसी से जीवन धारण करते हैं। शैवाल से लेकर सभी पौधे सूरज की ऊर्जा सोखकर “ फोटो ऐन्थेसिस ” क्रिया करते हैं और कार्बन -डाइ - ऑक्साइड तथा पानी से हमारे लिए शाकाहार तैयार करते हैं। अकेले भारतवर्ष में 23 करोड़ पशु, कृषि -उपयोग में आते हैं। इनका मुख्य आहार यह प्रकृति ही है। फिर पृथ्वी के 3 अरब लोग और इनसे करोड़ों गुना अन्य जीव - जन्तु सब सूर्यशक्ति के सहारे ही जीवित हैं। यह सब बातें भारतीय तत्व दर्शन की इस मान्यता का ही प्रतिपादन करते हैं ,कि सूर्य हमारी आत्मा है। तात्विक दृष्टि से हम उसी दिव्य ज्योति के प्रकाश कण हैं; अतएव हमें उनकी ओर उन्मुख रहना, उन्हें धारण किये रहना चाहिए उनके न रहने पर फूल खिलना बन्द हो जाता है। रोगाणु पनपने लगते हैं, हमारे जीवन में व्याप्त कषाय - कल्मषों का निवारण और प्रसन्नता का विकास, इसी आधार पर सम्भव है कि हम उस आत्मतत्व को विस्मृत न करें।

किसी समय लोग इसे कल्पनातीत मानते थे कि सूर्यशक्ति को पकड़ा, बाँधा और बड़े कार्यों में प्रयुक्त नहीं किया जा सकता। इसी तरह आज लोग आत्मशक्तियों पर विश्वास नहीं करते; किन्तु जब नेशनल फिजिकल लैबोरेटरी की स्थापना की गई , जिसके अध्यक्ष एन. पी. एल. तथा डॉ. भिड़े हैं और उसने सूर्य - ऊर्जा को बिजली में बदलने, वाला सोलर-सेल बनाकर  सिलीनियम- कैडमियम - सल्फाइड आदि से उसे सम्भव बना दिया।वही विश्वास होने लगा | माउंट लुई तथा ओडिलो (फ्राँस) में परावलमी शीशों से सौर - भट्टियाँ बनाई गई | इनमें एक काला रोगन पुता रहता है, जो शक्ति को सोख लेता है। पानी गर्म करने के यन्त्र ,आलू भूनने के यन्त्र, इसी आधार पर बने हैं। अरविन्द आश्रम में चाय बनाने, सामान सुखाने तथा पानी व कमरे गर्म करने के लिए छोटे सौर ऊर्जा यन्त्र बनाये गये हैं। इजराइल में खारे पानी को इसी तरह शुद्ध किया जाता है। भविष्य में तो वैज्ञानिकों की योजना, सारे समुद्री जल को मीठा बनाकर जल समस्या के निवारण की है। शक्ति एक ही है उसका जहाँ भी उपयोग करें, वहीं चमत्कारी सत्परिणाम उपस्थित हो सकते हैं।

दुनिया भर में यह प्रयोग चल रहे हैं। रूस ने अर्मेनिया घाटी में बिजलीघर बनाया है ,जिसमें 1300 दर्पण -ऊर्जा संग्रह करते हैं। यह बिजलीघर पाँच एकड़ में है। 130 फुट ऊँची बुर्जी पर रखे बायलर पर सूर्य किरणें डालकर 25 लाख किलोवाट प्रतिघण्टे बिजली पैदा की जाती है। मिश्र ने एक सूर्य कुकर, भारत ने अल्मूनियम के शीशे वाला प्रेशर कुकर बनाने में सफलता पा ली है | अब तक लोहे से 2800 अंश ,टंग्सटन से 6100 अंश तथा किसी भी अच्छी से अच्छी ताप निरोधक धातु 6900 अंश पर भाप बनकर उड़ जाती हैं ; किन्तु अब सूर्य से 8000 अंश तक की तापशक्ति मिल जाने से , सर्वत्र औद्योगिक  -क्रान्ति की संभावनाएं बढ़ गई हैं। अमेरिका में इस दिशा में व्यापक खोजें चल रही हैं।

सर्वोपरि आवश्यकता, अन्तःशक्तियों पर विश्वास नहीं, उनके विकास की जटिलता से सिद्धि पाने तक जूझते रहने के साहस की होती है। बड़ी बारीकी से आत्मनिरीक्षण करना पड़ता है सौर ऊर्जा - संग्रह के लिए दर्पण वाले यन्त्र लगते हैं। अपने मन को भी दर्पण बनाकर उसमें झाँककर मलिनताओं को निकालना पड़ता है। अन्यथा प्रकाश के साथ अंधकार भी छनकर जाता रहे और शक्तिसंचय का प्रयोजन ही पूरा न हो। आत्मसुधार के बाद आत्मनिर्माण अर्थात् बुराइयों के स्थान पर अच्छे विचार, अच्छा चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाना पड़ता है; इतना करने के बाद ही आत्मा का विकास या आत्मानुभूति का दिव्य लाभ मिल पाता है।


Quotation

“आपकी सफलता का रहस्य क्या है? अमेरिका के प्रसिद्ध उद्योगपति कारनेगी से किसी ने पूछा। उत्तर था  – “सही समय पर सही निर्णय।”

“और सही निर्णय कैसे कर सकते हैं?”

“अनुभवों के आधार पर।”

“अनुभव कैसे प्राप्त किये?”

“गलत निर्णयों के आधार पर।”

गलतियों को दुहरायें नहीं    – यही गलती को सुधारने का उपाय है।

***************************


कर्मचारी नौकर की आवश्यकता थी (kahani)

कर्मचारी नौकर की आवश्यक

बादशाह को एक कर्मचारी नौकर की आवश्यकता थी। तीन व्यक्ति उसके पास उम्मीदवारी के रूप में आए। बादशाह ने उनकी व्यवहार्य बुद्धि की परीक्षा ली। उन्होंने पूछा –“यदि तुम्हारी व मेरी दाढ़ी में एक साथ आग लग जाय , तो तुम क्या करोगे ?” पहले व्यक्ति ने कहा, - "हजूर मैं पहले आपकी दाढ़ी बुझाऊँगा”। दूसरे ने उत्तर दिया - “मैं तो पहले अपनी दाढ़ी बुझाऊँगा फिर आपकी ”। " तीसरे ने तपाक से कहा “मैं एक हाथ से आपकी व दूसरे से अपनी बुझाऊँगा ”! बादशाह ने तीसरे व्यक्ति को रख लिया व वह अपने दरबारियों से बोला,- " अपनी उपेक्षा कर दूसरों की रक्षा करना अव्यावहारिक है जब मनुष्य स्वयं की रक्षा नहीं कर सका ,तो दूसरों की कैसे कर सकता है। दूसरों की भलाई करते रहने के लिए आवश्यक है कि हम स्वयं भी सुरक्षित, समर्थ व क्षमतावान बने रहें ; परन्तु मात्र अपने आप तक ही सीमित रहना भी उचित नहीं। अपने ही सुखों के लिए, अपने ही क्षेत्र के लिए सोचते रहना स्वार्थपरता है। खुदा स्वार्थी को भी पसन्द नहीं करता। खुदा को वही व्यक्ति पसन्द है , जो स्वयं का भी भला करता रहे - स्वयं को भी विकसित करता रहे व दूसरों को भी आगे बढ़ाने का प्रयत्न करता रहे।

----***----


नीति निष्ठा का निर्वाह इस तरह बन पड़ेगा!

निति  निष्ठा का  र्निर्वाह इस तरह बन पड़ेगा

********

यों सभी अपने आपको चरित्रवान कहते हैं। उसके समर्थन की दुहाई देते हैं और प्रसंग आने पर दुश्चरित्रता की निन्दा भी करते हैं ; पर ऐसे कम ही लोग हैं , जो चरित्र की सही परिभाषा जानते हों और अपनी या दूसरों की चरित्रनिष्ठा को सही कसौटी पर कस सकते हों | अपने देश में तो यह परिभाषा बहुत ही छोटी और संकीर्ण हो गई। यहाँ ब्रह्मचर्य तक ही चरित्र को सीमित किया जा सकता है और नर-नारी के बीच जहाँ भी मधुर सम्बन्ध चल रहे हों वहाँ उन्हें दुश्चरित्रता में गिन लिया जायेगा। यद्यपि दाम्पत्य मर्यादा की सामाजिक और ब्रह्मचर्य पालन की शारीरिक –मानसिक–सुरक्षा भी चरित्र का एक अंग है, पर उतने तक ही उसकी परिधि सीमित कर देने से बात बनती नहीं है।

आर्थिक ईमानदारी भी चरित्र का अंग है। लेन–देन का व्यवहार साफ रखें। अच्छा तो यह है कि हर व्यक्ति अपने परिश्रम की कमाई पर गुजर करे। अधिक धन अपेक्षित है ,तो इसके लिए योग्यता वृद्धि ,अधिक श्रम, मनोयोगपूर्वक काम का स्तर ऊँचा करना, अधिक लाभ वाले काम ढूँढ़ना, जैसे प्रयास किये जाने चाहिए। हर हालत में खर्च अपनी निश्चित आजीविका से कम ही रखना चाहिए। जिससे न ऋण लेना पड़े और न अनुचित मार्ग से धन कमाने की बात सोचनी पड़े। यह ईमानदारी का महत्वपूर्ण चरण है कि आय और व्यय का सन्तुलन रखा जाय। न्यायोपार्जित कमाई में जिस स्तर का जीवन जिया जा सकता है, उतना ही कठोरतापूर्वक निर्धारित करके रखा जाय। धन कमाने में हर्ज नहीं है ; पर वह ऐसा नहीं होना चाहिए, जो बेईमानी, चोरी, ठगी, उठाईगीरी, रिश्वत, मिलावट, कम तौल-नाप, अनुचित मुनाफाखोरी जैसे उपायों से कमाया गया हो। फिजूलखर्ची यद्यपि प्रत्यक्ष अपराधों में नहीं गिनी जाती ; पर वह आश्रित दुश्चरित्रता की जननी है। उद्धत प्रदर्शन या शौक-मौज के लिए धन फूँकने वाले लोग अपने बड़प्पन की छाप दूसरों पर डालना चाहते हैं, पर होता ठीक इसके विपरीत है। इतना धन आया कहाँ से ? इस अपव्यय का पूर्ति कहाँ से होगी? परिवार के आवश्यक उत्तरदायित्वों को किस प्रकार निभाया जाता होगा? जैसे प्रश्न तुरन्त ही सम्पर्क वालों के मन में उठते हैं और वे आशंका की दृष्टि से देखते हैं। कम से कम अदूरदर्शी और अप्रामाणिक तो मान ही लेते हैं। इस प्रकार का सन्देह बहुत करके सही भी होता है। सीमित आमदनी में सबसे पहले अपनी और अपने परिवार की महत्वपूर्ण आवश्यकताएंँ पूरी की जानी चाहिए। इसके बाद भी कुछ बचता हो, तो भावी प्रगति और सुरक्षा, आकस्मिक आवश्यकता एवं सत्कर्मों के लिए उसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए। जो फिजूलखर्ची में धन उड़ाता होगा, वह इन आवश्यक उत्तरदायित्वों का निर्वाह ठीक तरह कर नहीं सकेगा। यह भी कर्त्तव्य त्याग का अपराध ही बना। फिर अपव्यय से अपनी जो आदत बिगड़ती है, उसे पूरा करने के लिए ऐसे कदम उठाने पड़ते हैं ,जो बेईमान के समतुल्य ही जा पहुँचते हैं। ऋण लेकर काम चलाने की प्रवृत्ति प्रत्यक्ष बेईमानी भले ही न हो, तो भी उसमें अनैतिकता अपनाये जाने की सम्भावना पूरी तरह विद्यमान है। व्यवसाय की पूँजी के रूप में अथवा आकस्मिक रूप से अनिवार्य आवश्यकता पड़ने पर ऋण लिया भी जा सकता है, पर उसे जल्दी से जल्दी चुका देने की अकुलाहट बनी रहनी चाहिए। इसके लिए यदि अतिरिक्त कमाई की सम्भावना हो तो अपने चालू खर्चों में कटौती के उपाय बरतने चाहिए ; भले ही इसमें कई प्रकार की कठिनाई का सामना करना पड़ता हो।

सामाजिक कुरीतियों का अन्धभक्त होने से अपव्यय बढ़ता है और उससे  यों तो ऋणग्रस्त होकर सामाजिक तिरस्कार और अर्थ-संकट में फँसना पड़ता है। यदि साहसपूर्वक विवाहोन्माद, मृतकभोज जैसी कुरीतियों को अस्वीकार कर दिया जाय , तो अर्थ - संकट  की विवशता में बन पड़ने वाली बेईमानी से बचा जा सकता है। वर्तमान परिवार की- भाई, बहिनों एवं अभिभावकों की आवश्यकताएंँ पूरी न हो सकने पर भी नई सन्तानें उत्पन्न करना अनैतिक है। यों इसे प्रसन्नता का कारण माना जाता है, पर वस्तुतः उसे ऐसी अदूरदर्शिता में गिना जा सकता है , जिसकी सीधी प्रतिक्रिया दुश्चरित्रता के रूप में सामने आती है। मात्र चोरी - ठगी ही अपराध नहीं है ; कन्धे पर रखे हुए उत्तरदायित्वों से इनकार करना भी लगभग ऐसा ही है। जब प्रस्तुत लोगों के लिए ही पूरी गुजर नहीं है, तो नये अतिथियों को आमन्त्रित करके पुरानों को संकट में धकेलने में क्या बुद्धिमता है? चरित्रनिष्ठा में वह दूरदर्शिता भी सम्मिलित है जिसके कारण न केवल आज वरन् भविष्य में भी नीतियुक्त जीवन जिया जा सके। इस दृष्टि से आय-व्यय का सन्तुलन बनाये रहना भी सच्चरित्रता का महत्वपूर्ण अंग गिना जा सकता है। दाम्पत्य मर्यादाओं का पालन तो सदाचरण का अंग माना ही जाता है।

दूसरों को ऐसे आश्वासन देने चाहिए, जिनका निर्वाह सम्भव हो सके। दूसरों को ऐसी जानकारी देनी चाहिए , जिसमें अत्युक्ति का समावेश न हो। आत्मप्रशंसा के लिए अपने सम्बन्ध में वैसा बताना ;  जैसी कि वस्तुस्थिति है नहीं ,तो यह शेखीखोरी भी अनैतिकता में ही गिनी जायेगी। फिर भले ही वह आत्मश्लाघा का रौब गाँठने के लिए ही क्यों न की गई हो। अपने सम्बन्ध में अथवा किन्हीं अन्य प्रसंगों में बात को अपनी वास्तविक जानकारी की अपेक्षा बढ़ा कर या घटाकर कहना ,यह झूठ का ही एक अंग हैं। भले ही उसका उद्देश्य धन हरण न होकर कुछ अन्य है, पर दूसरों को भ्रम में डाल देना, कुछ का कुछ समझा देना भी कुटिलता का घिनौना रूप है। मनुष्य अपने वचन और कर्म से दूसरों पर जो छाप छोड़ता है, वह छल युक्त नहीं होनी चाहिए ; उसमें यथार्थता का समावेश रहे। इसी में आत्मसम्मान की रक्षा होती है। बेईमान की तरह झूठा आदमी भी हेय ही गिना जायेगा। झूठी जानकारियाँ देना, भ्रम में डालना और अपनी चतुरता के आधार पर किसी को भटका देना , यह सभी बातें अनैतिकता की सीमा में आती हैं ; भले ही उन प्रवंचनाओं से सीधी अर्थलाभ उठाया न गया हो।

जो काम अपनी सामर्थ्य से बाहर हो ; या न करना हो ; उसके लिए झूठे वायदे नहीं किये जाने चाहिए। तत्काल प्रसन्न कर देने के लिए कुछ भी वायदा कर देना और पीछे उसे पूरा न करना, दूसरों के साथ एक प्रकार का विश्वासघात है। यदि उससे पहले ही असमर्थता व्यक्त कर दी जाती , तो वह कोई अन्य उपाय सोचता। विश्वास में बैठे रहकर उसने दूनी हानि उठाई। जिस सहायता का आश्वासन मिला था, वह तो मिली नहीं ; उलटे अन्यत्र प्रयत्न करने का रास्ता और रुक गया। झूठे वायदे करने से आरम्भ में किसी पर छाप भले ही पड़ती हो ,पर जब यह प्रतीत होता है कि हमें बहकाया गया ,तो फिर उलटी प्रतिक्रिया होती है। आरम्भ में जो सहायता की आशा से सद्भावना उत्पन्न हुई थी, वह निराशा में परिणित होकर घृणा का रूप धारण कर लेती है। यह कमाना कम, गँवाना ज्यादा हुआ। यदि कोई वायदा किया गया था, उसे पूरा करने की स्थिति नहीं रही, तो बिना संकोच उस बदली स्थिति की जानकारी दे देनी चाहिए। इससे भले ही उसे निराशा हो, पर वह हानि न उठानी पड़ेगी , जो अन्त तक प्रतीक्षा में बैठे रहने और अन्त में इनकारी होने के कारण अत्यन्त खिन्नतापूर्वक सहन करनी पड़ती है। झूठे मनुष्य सदा के लिए अपना विश्वास गँवा देते हैं। यह चारित्रिक पतन ही गिना जायगा।

समय का पालन भी चरित्र का एक अंग है। जिसके यहाँ जिस समय पहुँचने का या कोई वस्तु देने, पहुँचाने, लौटाने का वायदा किया गया है ,उसे बिना प्रतीक्षा कराये निश्चित रूप से पूरा करना चाहिए। यह मनुष्य का चरित्र है। समय का पालन न करने पर दूसरों की प्रतीक्षा में अपना समय बर्बाद करना पड़ता है और बेचैनी सहन करनी पड़ती है। प्रकारान्तर से यह भी दूसरों के समय का-- मानसिक सन्तुलन का - अपहरण करना ही है। इस प्रकार के आलस्य, - प्रमाद जो दूसरों को परेशानी में डालते हों, उनका समय नष्ट करते हों, अनैतिकता की श्रेणी में ही आते हैं।

नागरिक कर्त्तव्यों का पालन हर सभ्य व्यक्ति के लिए नितान्त आवश्यक है। समाज में रहते हैं ; उससे लाभ उठाते हैं ; तो यह भी आवश्यक है कि उसके नीति - नियमों का भी पालन करें। सड़क पर बांएँ हाथ को चलना, साइन लगाना, सार्वजनिक स्थानों पर कूड़ा-कचरा न फेंकना, छींक, जम्हाई, खाँसी आदि से दूसरों को कुरुचि उत्पन्न न होने देने के लिए रूमाल का उपयोग करना, वाणी में नम्रता का समावेश रखना, दूसरों के सम्मान की रक्षा करना, सहयोग के लिए भी आभार व्यक्त करना, किसी के कार्यों में अस्त-व्यस्तता उत्पन्न न करना जैसे शिष्टाचार के अनेक नियम हैं। इन्हें नागरिक कर्त्तव्यों में गिना जाता है। समाज के प्रत्येक सभ्य सदस्य को इनका स्वयं पालन करना चाहिए और दूसरों से वैसा ही करने का अनुरोध करना चाहिए। कर्मचारी पूरे समय और पूरी मेहनत, दिलचस्पी, जिम्मेदारी और ईमानदारी से अपनी ड्यूटी पूरी करें। श्रम कराने वाले उनका उचित पारिश्रमिक नियत समय पर देते रहें। अधिकार माँगने की तरह कर्तव्यपालन को भी महत्व दिया जाय। अधिकार पाने की लड़ाई में कर्तव्य पालन की उपेक्षा को शस्त्र न बनाया जाय। उसके लिए दूसरे अन्य उपाय मौजूद हैं फिर अधिकार न देने वाले के समतुल्य ही अपने ऊपर कर्तव्यपालन न करने का कलंक क्यों लिया जाय? चरित्र को महत्व देने वाले इस सन्दर्भ में सदा पूरा ध्यान रखते हैं।

नैतिकता की रक्षा के लिए ऐसे साहस की आवश्यकता है, जिसमें गलतियों के प्रति दुःख मानने, पश्चाताप प्रकट करने और प्रायश्चित करने के लिए आगे बढ़ा जा सके। पिछले दिनों जो गलतियाँ हुई हैं, उससे जो समाज को क्षति पहुँची, उसकी भरपाई करना प्रायश्चित है। प्रायश्चित से ही पापों का परिमार्जन होता है। इतना साहस प्रकट करने पर ही यह जाना जा सकता है कि भविष्य में वैसा न करने का संकल्प किया गया है। आत्मशुद्धि के लिए भूतकाल की गलतियों की क्षतिपूर्ति कर सकने जितना प्रायश्चित और भविष्य में न करने का प्रण ये दोनों ही बातें यह प्रकट करती हैं कि गँवायी गई चरित्रनिष्ठा को पुनः अंगीकार कर लिया गया है। उससे खोया हुआ आत्मबल फिर प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार नैतिक साहस को चरित्र निष्ठा का प्रमाण माना जायेगा।

अपनी भूल के लिए किसी दूसरे को दोषी ठहराया जा रहा हो, तो चरित्रनिष्ठ में इतना साहस होना चाहिए कि वह वास्तविकता बताये और अपनी गलती स्वीकार करे। इससे निर्दोष की बदनामी और कठिनाई बच जायेगी। यदि भूल से अथवा आवेश में अपने द्वारा किसी पर गलत दोषारोपण किया गया है, तो उसके लिए क्षमा माँगने और अपना आरोप वापिस लेने की हिम्मत अपने में होनी चाहिए।

नैतिक व्यक्ति परिश्रम की कमाई को ही ईमानदारी की समझते हैं और उसी से सन्तोषपूर्वक गुजारा करते हैं। सट्टा, जुआ, लाॅटरी, रेस, पहेलीहल जैसे उपायों से बिना परिश्रम का धन कमाना,कानूनी पकड़ की सीमा में आता हो अथवा न आता हो , नैतिक दृष्टि से अनुचित है। बिना समुचित समाजसेवा किये, वंश या वेश के नाम पर दान-दक्षिणा बटोरना तथा समर्थ होते हुए भी भिक्षा -- व्यवसाय के आधार पर आजीविका चलाना अनैतिक है। कोई चौकीदारी कर रहा है या नहीं, इसकी परवाह किये बिना अपना काम ठीक तरह करते रहने में भी नैतिकता का वह आदर्श सन्निहित है, जिसमें हराम की कमाई का निरोध होता है। दहेज, अलन-चलन, जैसी कुरीतियों के सहारे मुफ्त का धन बटोरना, न देने पर दबाव डालना, आर्थिक भ्रष्टाचार की श्रेणी में ही गिने जाने योग्य हैं।

जिन कार्यों या व्यक्तियों के प्रति आपके मन में घृणा है, दुर्बलतावश उन्हीं की प्रशंसा करना या साथ देना अनुचित है। अनैतिकता के साथ सीधा संघर्ष करने की अपनी परिस्थिति न हो, तो कम से कम इतना तो किया ही जा सकता है कि उससे असहयोग किया जाय। जिन कार्यों को हम पसन्द नहीं करते , उनके प्रति असहमति प्रकट करने में हर्ज नहीं है। यदि इतना भी न बन पड़े , तो कम से कम इतना तो होना चाहिए कि उनके समर्थन में कुछ न कहा जाय और सम्मान तथा सहयोग किसी भी तरह प्रदान न किया जाय। संकोच, दबाव, लाभ, दोस्ती आदि किसी भी दबाव में अनुचित को समर्थन प्रदान करना नीति निष्ठा के लिए किसी भी तरह सहन नहीं हो सकता। टूट जाना पर अनीति के आगे सिर न झुकने की नीति- निष्ठा का निर्वाह आदर्शवादी साहसिकता के सहारे ही सम्भव हो सकता है, इसलिए सत्साहस को सच्चरित्रता का ही एक अंग माना गया है।

----***----


व्याधि निवारण के लिए धर्मानुष्ठानों का उपचार

व्याधि निवारण के लिए धर्मानुष्ठानो का उपचार

***********

काय चिकित्सा की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं। आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी, ऐलोपैथी, बायोकैमी, क्रोमोपैथी, नैचरोपैथी, प्राण चिकित्सा, विद्युत चिकित्सा, झाड़-फूँक आदि कितने ही प्रकार के उपचार रोग - निवारण के लिए काम आते हैं। पर मनोरोगों का न तो महत्व समझा जाता है और न उनके उपचार का कोई प्रबन्ध है ; जबकि उनसे हानियाँ शारीरिक रोगों से भी कहीं अधिक होती हैं। शरीर वाहन है और मन सवार। शरीर औजार और मन कारीगर। वाहन और औजार की तुलना में उसके प्रयोक्ता का महत्व अधिक है। शरीर के रुग्ण होने से जितनी क्षति होती है, उसकी तुलना में मन के अस्वस्थ होने पर कहीं अधिक हानि उठानी पड़ती है। अस्तु मानसिक स्वास्थ्य की ओर शरीर स्वास्थ्य से भी अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है, जबकि उस ओर प्रायः उपेक्षा ही दिखाई जाती है।

मानसिक संतुलन खो बैठने पर उन्मादग्रस्तों को पागलखाने में भर्ती किया जाता है। इससे कम की मानसिक रुग्णता की ओर ध्यान नहीं जाता , जबकि व्यक्तित्व को गया-गुजरा बनाने, पिछड़ापन लादे रहने और प्रगति पथ में पग-पग पर अवरोध उत्पन्न करने में वे ही प्रधान कारण होते हैं। बुरी आदतों से ग्रसित, बात-बात में आपे से बाहर हो जाने वाले, दुराग्रही, उद्धत स्वभाव, कल्पनालोक में उड़ते रहने वाले, अशिष्ट, सनकी प्रकृति के लोग भी मनोरोग ग्रसित ही कहे जायेंगे | वैसे मनोरोग विज्ञान के अंतर्गत सही चिन्तन न कर सकने वाले - अविकसित मस्तिष्क वाले भी रोगी ही माने गये हैं। किन्तु सर्वसाधारण की दृष्टि में यह स्वभाव दोष भर है और इनका समझाने बुझाने एवं स्वयं सुधरने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है। तथ्य इससे भिन्न है। बुरी आदतें भी बीमारियाँ ही हैं और उनका भी कायरोगों की तरह उपचार हो सकता है।

साइकोमैट्री जैसे आधारों पर सामान्य मानसिक रोगों की - सनकों की - चिकित्सा बहुत दिनों से चल रही है। उससे रोगी को अपने मन की बातें जी खोलकर कहने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। सोचा जाता है कि जैसे पथरी से पेशाब रुक जाता है ,उसी प्रकार किन्हीं मानसिक दबावों की गाँठें बन जाने से, चिन्तन - स्वाभाविक प्रवाह में अवरोध आता है। उसी से विक्षिप्तता आती मानी जाती है। समझा जाता है कि यदि स्वच्छन्द कथन में वे बातें मुँह से निकल जायें, जो मन पर दबाव डालती थीं, तो उससे वह दिमागी पथरी निकल सकती है, जिन्हें मानसिक ग्रन्थियाँ कहा जाता है और मनोरोगों का कारण माना जाता है। इस स्वच्छन्द कथन के अतिरिक्त रोगी को कुछ सुझाव भी दिये जाते हैं। उसके चित्त में से कुछ मान्यताएँ उखाड़ने और कुछ जमाने के लिए स्नेह युक्त हलका- फुलका वार्तालाप किया जाता है। प्रायः इसी स्तर की मनोवैज्ञानिक चिकित्सा पद्धति बहुत दिनों से चल रही है। उसके कभी उत्साहवर्धक, कभी निराशाजनक परिणाम भी सामने आते रहते हैं।

विचारणीय यह है कि क्या मनःशास्त्रियों की यह मान्यता सही है कि कभी कोई मानसिक दबाव पड़ जाने से ही मनोरोग उत्पन्न होते हैं? यदि ऐसा ही है, तो जिन्हें जीवन भर भारी प्रतिकूलताओं, खिन्नताओं और विपन्नताओं के बीच निर्वाह करना पड़ता है ; वे क्यों विक्षिप्त नहीं हो जाते? प्रतिकूलताओं की उत्तेजना से प्रखरता उभरती है, इस सिद्धान्त को फिर किस प्रकार मान्यता मिलेगी? तब सदा अनुकूलता ही ढूँढ़नी पड़ेगी, भले ही वह किसी भी कीमत पर क्यों न मिले? अन्यथा तनिक-सी भी प्रतिकूलता का दबाव पड़ने पर मनोरोग उत्पन्न होने का भय रहेगा। इसके अतिरिक्त एक बात और भी है कि यह कह देने भर से मानसिक गाँठें खुल जाती हैं तो जो दुखियारे अपनी व्यथा और कठिनाई आये दिन ,हर किसी से कहते ही रहते हैं ,उनका समाधान क्यों नहीं होता? गम्भीर प्रकृति के लोग अपनी और दूसरों की महत्वपूर्ण बातें प्रायः छिपाये ही रहते हैं, राजनीतिज्ञ, सेनाध्यक्ष, षड्यन्त्रकारी, अपराधी जैसे लोगों की सफलता तो इसी पर निर्भर रहती है कि अपने मन की बातें छिपाये रहें, उसकी गन्ध भी किसी को नहीं लगने देते। ऐसी दशा में छिपाने, न कहने से उन्हें मनोरोग क्यों नहीं होते? लगता है मनोवैज्ञानिकों द्वारा निर्धारित यह प्रक्रिया, उतनी सारगर्भित नहीं है कि मानसिक दबावों से ही विक्षिप्तता आती है और जी खोलकर कह देने भर से मनोरोगों का निराकरण हो जाता है। इन सन्देहों के बावजूद यदि इसे उपयोगी एवं आवश्यक मान लिया जाय, तो भी इतना तो निश्चित है कि इतना भर पर्याप्त नहीं है। इतने भर उपाय से अनेक मानसिक रोगों का निराकरण पूरी तरह नहीं हो सकता। इससे आगे भी करने के लिए बहुत कुछ शेष रह जाता है, यह मानकर चलना होगा।

कायिक रोग प्रकृति द्वारा शरीर - यात्रा के लिए निर्धारित नियमों के उल्लंघन का परिणाम हैं। इसी प्रकार मनोरोगों का कारण चिन्तन के लिए निर्धारित नीति मर्यादा का व्यतिक्रम करना है। व्यक्तिगत जीवन में हर मनुष्य को चरित्र-निष्ठ रहना चाहिए और सम्पर्क - क्षेत्र में समाजनिष्ठ सद्व्यवहार का पालन करना चाहिए। अरोग्य शास्त्र की नियम -मर्यादा इसलिए है कि आहार-विहार का ठीक तरह पालन किया जाय। समाज शास्त्र के अन्तर्गत शासकीय कानून और शिष्टाचार सहित नागरिक कर्तव्यों का निर्वाह आवश्यक है। वैयक्तिक और सामाजिक आचार -संहिता का अनुशासन मानने वाले सज्जन कहलाते हैं। उनकी प्रशंसा होती है, जन सहयोग मिलता है और उनका अस्तित्व सुखद वातावरण का निर्माण करता है। इसके साथ-साथ सबसे बड़ा और पूर्ण प्रत्यक्ष लाभ यह है कि चित्त हलका रहने से उन अन्तर्द्वन्द्वों का उद्भव नहीं होता ,जो मानसिक रोगों के प्रधान कारण हैं। व्यक्तिगत जीवन की उत्कृष्टता बनाये रहने की आवश्यकता पूरी करने वाले तत्वदर्शन का नाम अध्यात्म है। इसी को व्यवहार में मानवी संस्कृति कहते हैं। आत्मपरिष्कार इसका उद्देश्य है। व्यावहारिक जीवन की गतिविधियों की मर्यादा क्या हो, इसका निर्धारण धर्म -धारणा के अन्तर्गत किया गया है। धर्म को ही सभ्यता भी कहते हैं। धर्म प्रवृत्ति को जीवित रखने के लिए, पुण्य -परमार्थ के लिए, की गई विविध-विधि तपश्चर्याओं का अभ्यास किया जाता है, उनमें पिछली भूलों के लिए पश्चाताप प्रायश्चित का भाव है और आगे के लिए सतर्कतापूर्वक श्रेष्ठ जीवन बिताने का संकल्प। धर्म -धारणा के समस्त क्रिया-कलाप इसी उद्देश्य के लिए विनिर्मित हुए हैं। अध्यात्म के अन्तर्गत कितने ही प्रकार की योग -साधनाएँ आती हैं ,उनमें आत्मनिरीक्षण और अन्तर - परिशोधन के लिए कई तरह के अभ्यास कराये जाते हैं। इनके द्वारा अन्तः श्रद्धा का स्तर अपेक्षाकृत अधिक ऊँचा उठाया जाता है। ‘अहम्’ को संकीर्ण सीमाबन्धन से आगे बढ़कर सुविस्तृत क्षेत्र में आत्मभाव विस्तृत करने वाले स्वाध्याय, सत्संग, मनन,- चिन्तन के अभ्यास, योगसाधना के अन्तर्गत ही आते हैं। प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की पाँच साधनाएँ योगसाधना का अन्तःस्पर्शी अभ्यास है। इनसे पहले तीन को लोकव्यवहार का मर्यादापालन कहना चाहिए। उनमें सामाजिक अनुशासन है। उच्छृंखलता का नियन्त्रण इन्हीं तीन में किया जाता है; इसलिए उन्हें तप वर्ग में गिना गया है। आत्मोत्कर्ष का दार्शनिक पक्ष योग में और क्रियापक्ष तप में गिना जाता है। योग को संस्कृति और तप को सभ्यता कह सकते हैं। इन्हीं के दर्शन, अध्यात्म और धर्म के नाम से जाने जाते हैं।

योग और तप के माध्यम से कितनी ही लौकिक और अलौकिक ऋद्धि-सिद्धियों का आकर्षक वर्णन साधना विज्ञान के अन्तर्गत किया गया है। इनमें अत्यन्त स्पष्ट सिद्धियाँ शारीरिक और मानसिक रोगों के निवारण की हैं। धर्म पालन से शरीर निरोग बनता है और अध्यात्म का अवलम्बन करने से मनोविकारों की जड़ें कटती हैं। प्रस्तुत सन्दर्भ में अन्यान्य लाभों की चर्चा न करते हुए इतना भी सोचा जा सकता है कि जीवन के सुविधा और प्रगति के उभयपक्षीय उद्देश्य पूरे करने वाले आरोग्य की रक्षा में धर्म और अध्यात्म का क्या योगदान हो सकता है और उस योगदान को किस प्रकार व्यवहार में उतारा जा सकता है?

इस सन्दर्भ में शरीर-शास्त्र, मनःशास्त्र और अध्यात्मशास्त्र के मूर्धन्य विशेषज्ञों का मत यह है कि जीवनक्रम में यदि धर्म और अध्यात्म के वैज्ञानिक तथ्यों का समावेश किया जा सके, तो उसकी आस्थाएँ, प्रवृत्तियाँ, आकांक्षाएँ, विचारणाएँ एवं गतिविधियाँ ऐसी मोड़ ले सकती हैं ,जिनमें आदर्शों को अपनाने की दिशा में प्रगति क्रम चल पड़े। इससे स्वास्थ्य - रक्षा पर बहुत ही अच्छा प्रभाव पड़ेगा। पिछले रोगों को मिटाने और भविष्य में हंसती-हंसाती हलकी-फुलकी जिन्दगी जीने का सहज अवसर प्राप्त होगा।

प्राचीनकाल में जब धार्मिकता का वातावरण था, तब पुष्टाई और चिकित्सा की उतनी सुविधा न होते हुए भी जन-स्वास्थ्य की स्थिति बहुत सन्तोषजनक थी। जब से लोग निरुद्देश्य जीवन जीने लगे हैं - उच्चस्तरीय आस्थाओं की अवहेलना करने लगे हैं - विलासी, बनावटी और अहंकारी गतिविधियाँ अपनाने लगे हैं- तब से आन्तरिक तनावों और अन्तर्द्वन्द्वों में भारी वृद्धि हुई है। फलतः जनस्वास्थ्य को भारी आघात लगा है। तथ्य को यदि ध्यान में रखा जा सके तो स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से भी धार्मिक मनोवृत्ति को वापिस लौटाने के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता अनुभव होगी।

पाश्चात्य देशों में धार्मिकता को स्वास्थ्य- संरक्षण एवं रोग- निवारण के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है और उस परीक्षण के अच्छे परिणाम सामने आ रहे हैं। विंग्स आफ हीलिंग, मार्च आफ फेथ, क्रिश्चियन साइन्स, यूनिटी जैसी संस्थाएँ धार्मिकता के उपचारों के सहारे शारीरिक और मानसिक रोगों के निराकरण का प्रयोग कर रही हैं और उसमें उन्हें आशातीत सफलता मिल रही है। इन प्रयोग परीक्षणों में अमेरिका के नार्थ केरोलिना प्रान्त के ब्लूरिज पर्वत श्रेणियों के मध्य बना हुआ हेव्रान आश्रम बहुत ख्याति प्राप्त कर चुका है। इसके संस्थापक डॉ. डिलाई आरोग्य लाभ के लिए आने वाले रोगियों के लिए एक ही उपचार बताते हैं कि वे जब तक यहाँ रहें ,अपने आपको धर्म चिन्तन में प्रभु प्रार्थना में निरत रखें। आगन्तुकों को तत्काल शान्ति मिलती है और वे अपना कष्टभार हलका हुआ ,अनुभव करने लगते हैं|       Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI

/* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-priority:99; mso-style-qformat:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt; mso-para-margin-top:0in; mso-para-margin-right:0in; mso-para-margin-bottom:10.0pt; mso-para-margin-left:0in; line-height:115%; mso-pagination:widow-orphan; font-size:11.0pt; mso-bidi-font-size:10.0pt; font-family:"Calibri","sans-serif"; mso-ascii-font-family:Calibri; mso-ascii-theme-font:minor-latin; mso-hansi-font-family:Calibri; mso-hansi-theme-font:minor-latin; mso-bidi-font-family:Mangal; mso-bidi-theme-font:minor-bidi;}

क्षय से  पिड़ित एक लँगड़े व्यक्ति चालर्स फिल्मोर को जब सब ओर से निराशा मिली और डाक्टरों ने उनके रोग को असाध्य धोषित कर दिया,तो उन्होंने प्रार्थाना का अवलम्बन किया और उसी को चिकित्सा – उपचार के स्थान पर काम में लाने लगे | जीवन बच गया,तो उन्होंने उपासना को आरोग्य – रक्षा के लिए प्रयुक्त करना आरम्भ किया | एक छोटे से किराये के मकान में उनने कार्य आरम्भ किया |रोगियोंको लाभ मिला, तो ख्यति भी फैली ओंर श्रध्या भी बढ़ी ; फलत: उस आश्रम का बिस्तार बढ़ता चला गया | इन दिनों उसका विस्तार 12oo एकड़ भूमि में है| हजारों की संख्या में रोगी निरन्तर निवास करते ओंर आरोग्य लाभ लेते है| सात सौ कर्मचारी काम करते है | दो साप्ताहिकों और सात मासिक – पत्रों की 20 लाख प्रतियों यहाँ से हर महीने प्रकाशित होती है | प्रतिदिन 6 हजार पत्र आते है | यहाँ से छपने वाले प्रार्थना – साहित्य का अनुवाद संसार की 140 प्रमुख भाषाओं में होता है | वह यूनिटी संस्था अमेरिका का एेसा धर्म –संस्थान है,जिसकी आधारशिला भर ईसाई मतावलम्बी है |लाभ पाने की द्रष्टि से सभी धर्मो और वर्गो को समान सुविधा है |

आयुर्वेद – चिकित्सा – पद्धति में, जहाँ रोगों की औषधि  –उपचार  –पद्धति के वर्णन हैं ,वहाँ उनके मूल का स्थानरण की ओर संकेत करते हुए यह भी बताया गया है कि धर्मानुष्ठानों के माध्यम से जीवन क्रम को अधिक पवित्र बनाने का उपक्रम भी रोग निवारण के लिए आवश्यक है। चरक  – संहिता के एक प्रसंग में छात्र अग्निवेश आचार्य चरक से पूछता है - भगवन | संसार में पाये जाने वाले अनेक रोगों का मूल कारण क्या है?" आचार्य उत्तर देते हैं "- ‘लोगों के दुष्कर्म जिस स्तर के होते हैं, उसी के अनुरूप उन्हें पापों का प्रतिफल शारीरिक और मानसिक व्याधियों के रूप में प्राप्त होता है।"

जिस प्रकार शरीर में भरे विषद्रव्य का निष्कासन एवं मारण ,रोग- निवारण के लिए आवश्यक है, उतना ही आवश्यक यह भी है कि कुकर्मों के प्रायश्चित और कुसंस्कारों के निष्कासन के लिए धर्मानुष्ठानों की प्रक्रिया का आश्रय लिया जाय।


स्वर्ग जाने की तरकीबें (kahani)

स्वर्ग जाने की तरकीबें पूछने के लिए कितने ही जिज्ञासु बैठे हुए थे। सन्त ने कहा- ‘हमें नरक के दुखियारों की सेवा – सहायता करने के लिए चलना चाहिए। स्वर्ग उन्हीं की मुस्कानों में छिपा मिलेगा।’

----***----


मनःशक्ति की विकृति और विनाश एक है।

मन:शक्ति की विकृति और विनाश है |

*********

“ए टेक्स्ट बुक ऑफ फिजियोलॉजिकल साइकोलॉजी” के लेखक एस. पी. ग्रासमैन ने एक ऐसे उदर –शूल –रोगी का वर्णन किया है, जिसे प्रतिदिन अपराह्न दो बजे ही भयंकर कष्ट होता। उस स्थिति में उसका सारा शरीर पीला पड़ जाता, आँखों के कोर काले पड़ जाते, अपान वायु रुक जाती और जीवन   –  मरण जैसा संकट उत्पन्न हो जाता। उसने अनेक डाक्टरों से उपचार कराया ,किन्तु रत्ती भर आराम न मिला। अन्त में उसने मनोचिकित्सक से भेंट की और उन्हें अपनी कष्ट – कहानी सुनाई।

विन्सेन्ट थाम्प्सन नामक उक्त व्यक्ति अमेरिका के अत्यन्त धनाढ्य उद्योगपति हैं। डॉ. ग्रासमैन ने कई प्रकार से उनका जीवन – वृत्तांत जानने का प्रयत्न किया ,किन्तु वे किसी ठोस कारण की खोज न कर सके। अन्त में उन्होंने उनकी धर्मपत्नी से पूछताछ की। उससे इस बात का पता चला कि थाम्प्सन महोदय दिन भर प्रसन्न रहते हैं ,किन्तु बारह बजे से एक बजे तक वे किसी विचार में खोये से प्रतीत होते हैं।

मनोवैज्ञानिक को सूत्र हाथ लग गया। उन्होंने थाम्प्सन से पूछा-" वे ऐसा क्यों करते हैं?"  इस पर उनने वर्षों पुरानी अपनी गाँठ खोली। उनने बताया कि ठीक बारह बजे रैमिंजे कम्पनी के मालिक वानथेक्सी उधर से निकलते हैं। हम दोनों किसी समय सहपाठी थे। जिस लड़की से मैं प्यार करता था ,ज्ञात हुआ कि श्री थैक्सी भी उसमें रुचि रखते थे। अन्त में उन्हीं के कारण उस लड़की ने उन्हें अपमानित किया ,तभी से उनके मन में थैक्सी के प्रति कटुता बढ़ती गई। उन्हीं के कारण एक बार मुझे अपने रोजगार में भी घाटा उठाना पड़ा, इसी द्वेष के कारण जब भी वे सामने से गुजरते हैं ; मेरी क्रोधाग्नि भभक उठती हैं और मैं उन्हें मार डालने तक की बात सोचने लगता हूँ।

इस घटना की जानकारी के बाद डॉ. ग्रासमैन ने फिजीशियन डॉ. ब्लेयर्ड के साथ जाँच करने के बाद पाया कि ठीक उसी समय स्वैच्छिक –नाड़ी –मण्डल से एक प्रकार का स्राव आमाशय और आँतों में विष के समान फैल जाता है | उस समय मानसिक शरीर दूषित हो उठता है और तभी पीड़ा उसे एकाएक दबोच लेती है। सारा दोष उनकी क्रोध और उत्तेजना मिश्रित ईर्ष्या का था, उसी कारण उन्हें इस भयंकर व्याधि का सामना करना पड़ रहा था ;जबकि डॉक्टर और दूसरे लोग बीमारी पेट में ढूँढ़ रहे थे।

डॉ. ग्रासमैन ने उन सज्जन को समझाया , –आप (1) जुडिशस सप्रेशन - अर्थात् मन में जो भी भली-बुरी बात उठा करे , उसका विवेचन किया करे, ;दूसरी को बताया करें, अपनी विवेक – बुद्धि इतनी तीव्र रखें कि अपनी छोटी से छोटी भूल तक पकड़ में आ जाये और तब पूर्वाग्रह रहित केवल सत्य को, न्याय को, व्यावहारिकता को ही उचित मानने का अभ्यास किया करें।  (2) जुडिशस सग्रेगेशन – अर्थात् उस स्थिति में निषेधपूर्ण चिन्तन के स्थान पर सद्भावपूर्ण आचरण यथा, – क्षमायाचना, मित्रता ,उपकार आदि का आचरण करें। (3) जुडिशस फारगेटफुलनेश –अर्थात् बार-बार उन बातों को मन में लाने की अपेक्षा, उस समय कोई अच्छी पुस्तक पढ़ने, धर्मपत्नी के साथ मनोविनोद करने, संगीत सुनने जैसे किसी अन्य कार्य में मन को घुलाकर उस बात को भूल जाया करें। (4) इमैजिनेशन अर्थात् अपनी आत्मा के सम्मुख अपने आप को खड़ा करके सम्वेदनापूर्ण चिन्तन किया करें। उस समय अपने आपको अबोध शिशु और अन्तःकरण को माँ मानकर उस तरह की भावनायें जगाया करें, जैसी माँ बेटे के मध्य होती हैं।

उपरोक्त चार आधार आज मनोविज्ञान के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी रुप में प्रस्तुत हो रहें हैं | उनका आधार यह है कि मनुष्य की जो भी कुछ शरीरिक व्याधियाँ होती हैं , वह आज या कल के दुर्भाग्यपूर्ण चिन्तन का ही अभिशाप होती है | मनुष्य का दृश्य शरीर तो यह हाथ -पाँव वाला शरीर है,पर वह वास्तव में उस कठपुतली की तरह है , जिससे मन में बँधे विचारों के धागे सुक्ष्म  –नाड़ी  –मण्डल के द्वारा नचाते रहते है | यदि मन बीमार है, तो शरीर अवश्य बीमार  होगा | मन की गाँठ जितनी कठिन होंगी, व्याधि उतनी ही स्थायी और कष्टप्रद | अब बीमारियों का दोष किसी विषाणु को देने की अपेक्षा, शारीरिक मल को देने की अपेक्षा, पूरी तरह मानसिक विशेष को मान लिया गया है और यह निष्कर्ष पूरी तरह सामने आ गया है कि मनुष्य  सद्विचारों ,सद्भावनाओं में निमग्न रहकर 80 प्रतिशत  बीमारियों से तो तत्काल ही छुट सकता है| 20 प्रतिशत के जो आधार पहले से बन चुके हैं ,उन्हें भी अपनी दुर्भावनाओं ,पापों , कुविचारों को खोलकर , उनका प्रायश्चितकर माफ़ किया जा सकता है जो अटल प्रारब्ध बन गये हों| मन को सम्वेदनाओं यथा असीम करूणा ,परोपकार की भावना ,प्रगाढ़ श्रध्दा ,ईश्वरभक्ति की भावनाओं में डुबाकर होने वाले अटल कष्टों को भी भाले के स्थान पर मात्र कांटे चुभने जैसे हलके रुप से निपटा जा सकता है |

थाम्प्सन महोदय ने बात को गम्भीरता से अनुभव किया। उन्होंने माना अपने पर अधिकार हो सकता है, दूसरों को अपना मानने और उससे अपने अनुकूल आचरण की आशा रखना मूर्खता ही तो है। उन्होंने थैक्सी से जाकर क्षमा याचना की और अपने अब तक के विद्वेष के विष को विसर्जित कर दिया। अपने घर में वे अधिक रुचि लेने लगे। यह परिवर्तन उनकी पत्नी उनके बच्चों को बहुत अच्छा लगा| वे सब उन्हें स्नेह और प्यार की दृष्टि से देखने लगे। विचारों की दिशा बदली तो उनका सारा जीवन ही आनन्द विभोर हो गया। उदर शूल तो मानों ब्याज में ही ठीक हो गया हो।

मनोभावों की उथल-पुथल शारीरिक क्रिया-कलाप को किस तरह प्रभावित करती है? सामान्यतः यह बात अक्सर दृष्टि में आती रहती है | अत्यन्त भय की अवस्था में लोग एकाएक पीले पड़ जाते हैं, क्रोध की अवस्था में आँखें लाल हो उठती हैं। वैज्ञानिक यह मानते हैं कि ऐसा चमड़ी के नीचे रक्ताणुओं के एकाएक विस्तारण से होता है। जो हमेशा चिन्ता, तनाव, ईर्ष्या से घिरे रहते हैं ,उनकी खोपड़ी में गंजापन और चिकनापन आ जाने का भी यही कारण है |यदि तनाव में किसी के प्रति प्रतिशोध की भावना हो , तो गिल्टियाँ तक उभर आती हैं। चिन्ताग्रस्त स्थिति में अधिकांश दबाव आमाशय और जननेन्द्रिय पर पड़ता है। पेट का कड़ा होना, गाँठें पड़ना, भूख न लगना, अतिकामुकता, बार-बार पेशाब जाना ,ये बीमारियाँ इस बात की प्रतीक हैं  , कि मस्तिष्क में चिन्ता और तनाव की आँधियाँ चल रही हैं। पश्चिमी देशों में “ध्यान-साधना” से लोगों को अत्यन्त शान्ति मिलने की आम मान्यता बन गई है। इसी कारण ध्यान और योग-साधनाओं के प्रति वहाँ व्यापक आकर्षण बढ़ रहा है, उसका अर्थ यही है कि मन को विकृत चिन्तन की परिधि से निकाल कर उसे भावभरी सम्वेदनाओं में गहरा उतारा जाये। हाल की कुछ बिलकुल नई शोधों से यह तथ्य और भी स्पष्ट हुए हैं।

अभी हाल ही में अमरीका के कार्नेल विश्वविद्यालय में एक प्रयोग किया गया। विश्वविद्यालय के अस्पताल में एक रोगी आया। आकस्मिक चोट के कारण उसकी ग्रास की नली बन्द हो गई थी। इसलिए उसे एक छिद्र द्वारा आमाशय में खाना पहुँचाया जाता था। इस प्रकार उस व्यक्ति का आमाशय वैज्ञानिक प्रेक्षणों के लिए उपलब्ध हो गया। उस समय देखा गया कि उस व्यक्ति को डाँटने पर जब उसमें असन्तोष तथा विरोध का भाव आया, तो उसका आमाशय लाल हो गया। उसमें से अधिक रक्त प्रवाहित होने लगा और आमाशय की परतें फूलकर मोटी हो गईं।

लन्दन के डॉ. वानडेन ब्राँक और कैलिफोर्निया के डॉ. आर्थर ए वेल ने मृत्यु के कारणों पर प्रकाश डालते हुये अपने-अपने ग्रन्थों में लगभग एक से विचार व्यक्त किये हैं। वे कहते हैं मानवी - काया की संरचना ऐसी है कि यदि उसे सही साज सम्भालकर रखा जा सके,  तो सामान्य आयुष्य सैकड़ों वर्ष की हो सकती है। विनाश तो मनःशक्ति के विकृत होने से आरम्भ होता है | यदि अस्त-व्यस्तता रोकने और जीवट बनाये रहने का प्रयत्न किया जाये , तो आरोग्य और दीर्घजीवन के मार्ग में आने वाली अन्य सभी बाधायें सरलतापूर्वक हटाई जा सकती हैं।

----***----


मित्रता और उसका निर्वाह

मित्रता  और  उसका निर्वाह

*********

मित्र को जाने दो। उसकी विदाई पर शोक प्रकट न करो और न हीं उसकी सुखद यात्रा को अपने आँसुओं से दुःखद बनाओ। जिसके कारण तुम उसे प्रेम करते थे , वे कुछ विशेष गुण ही थे। जिनके कारण दूसरों की तुलना में वह अधिक भाया और सुहाया था, उन गुणों को अधिक अच्छी तरह समझने का अवसर तो वियोग के उपरान्त ही लगेगा। पर्वतारोही की अपेक्षा हिमाच्छादित गिरिश्रृखला का दर्शन लाभ वे अधिक अच्छी तरह ले सकते हैं ,जो किसी दूरवर्ती समतल क्षेत्र में खड़े होकर उस सौन्दर्य को निहारते हैं। समीपवर्ती मित्र की अपेक्षा दूरवर्ती अधिक श्रेष्ठ है क्योंकि एक रस और एकांगी प्रेम करना केवल उसी से सम्भव है ; निकटवर्ती तो निरन्तर उतार-चढ़ाव उत्पन्न करता रहता है।

मैत्री मधुरता का उल्लास भरती है , रिक्तता की पूर्ति के लिए उसका उपयोग नहीं हो सकता। रिक्तता भरने के लिए जिनकी अपेक्षा की जाती है , वे भोग्य उपकरण हैं। उनकी आवश्यकता हो सकती है, पर मैत्री नहीं निभ सकती। मित्रता का आनन्द लेना हो, तो उपयोगिता की दृष्टि हटानी पड़ेगी और उस विशेषता को निहारना पड़ेगा ,जो सघन मित्रता का आधार बन सकती है | गुणों का स्पर्श आवश्यक नहीं, उनके चिन्तन से भी काम चल सकता है। मित्र की उपस्थिति की अपेक्षा मैत्री की उपस्थिति, कितनी अधिक सरस होती है , इसे कोई प्रेमी ही जानता है।

ईश्वर से प्रेम करना इसीलिए सम्भव है कि वह हमसे दूर एवं अप्रत्यक्ष है। यदि वह शरीरधारी की तरह हमारे साथ रहता ,तो उसके साथ मैत्री नहीं हो पाती। उसकी अपेक्षा के अनुरूप हमारे आचरण और हमारी अपेक्षा के अनुरूप उसके आचरण बने रहना कठिन पड़ता। ऐसी दशा में किसी न किसी पक्ष का उभरता असंतोष मैत्री के आनन्द में गाँठ लगाता रहता। यह अच्छा ही है कि ईश्वर हमसे दूर है और उसके गुणों का चिन्तन करते हुए निर्बाध मैत्री सम्बन्ध बनाये रह सकना सम्भव हो सका।   मैत्री अदृश्य है और व्यवहार दृश्य। मैत्री गुणों पर निर्भर है और व्यवहार उपयोगिता पर। कौन हमारे लिए कितना उपयोगी हो सकता है--कौन हमारी कितनी आवश्यकताएँ पूर्ण कर सकता है ,इस आधार पर जिससे भी मित्रता होगी वह उतनी ही उथली रहेगी और उतनी ही क्षणिक अस्थिर रहेगी। यदि किसी से आजीवन मैत्री निवाहनी हो तो उसका एक ही उपाय है। मित्र की गुणपरक विशेषताओं को ध्यान में रखे और यह सोचे कि यह सद्गुण परमेश्वर की परमज्योति के वे स्फुल्लिंग हैं, जो कभी भी बुझ नहीं सकते। जिनमें मलीनता नहीं आ सकती।

मित्रता विशुद्ध आध्यात्मिक अनुभूति है, जो किसी में उच्च गुणों की स्थापना के आधार पर उदय होती है। जिसे निकृष्ट समझा जायेगा , उसकी कारणवश चापलूसी हो सकती है , पर श्रद्धाजन्य मैत्री का उदय नहीं हो सकता। श्रद्धा और मैत्री उत्कृष्टता के देवता की दो भुजाएँ हैं। यदि हम किसी से मैत्री करने से पूर्व इस तत्व को समझ लें ,कि अमुक सद्गुणों के आधार व्यक्ति विशेष से प्रेम करना है, तो समझना चाहिए कि उसके बदल जाने या दूर चले जाने से भी उस शाश्वत -आदत- प्रवाह में कोई अन्तर नहीं आवेगा जो यथार्थ मित्रता के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहता है।

इसलिए तत्वदर्शी कहते हैं कि जाने वालों को जाने दो। उसे रोको मत , क्योंकि इससे मित्रता के निर्वाह में कोई अन्तर आने वाला नहीं है।

----***----


विक्षिप्तता और उसका स्थायी समाधान

विक्षिप्तता और उसका स्शायी  समाधान

**********

सही जीवनयापन के लिए नैतिक दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। इससे सरल और सरस प्रक्रिया बनी रहती है और शान्तिपूर्वक निर्वाह होता रहता है। अनैतिक आचरण से अन्तर्द्वन्द्व उठते हैं - आत्मग्लानी बढ़ती है। समाज की निन्दा, तिरस्कार और शासन का न्यायदण्ड सदा डराता रहता है। इस दबाव से मनःसंस्थान इतना पिसता है, जितना कि लगातार मानसिक श्रम करने पर भी सहन नहीं करना पड़ता। सन्तुलित जीवनयापन करने के लिए चिन्तन की सन्तुलित दिशाधारा लोगों को मालूम नहीं होती, फलतः इधर से उधर भटकने और अचिन्त्य चिन्तन करने लगते हैं। भय, आशंका, निराशा उन्हीं लोगों को होती है , जो परिस्थितियों पर असन्तुलित प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं और घबराहट में अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने की तरह मस्तिष्क को विक्षिप्त एवं अर्धविक्षिप्त बना लेते हैं।

मनोविकारों और मानसिक रोगों में क्रिया और प्रतिक्रिया जितना ही अन्तर है। काम और उसका परिणाम देखने में दो प्रकार के होते हैं, पर वस्तुतः दोनों के बीच घनिष्ठ तारतम्य रहता है। चोरी करना जब आदत में सम्मिलित हो जाता है और अवसर पाते ही वह क्रिया अनायास ही होने लगती है ,  तब उसे मनोविज्ञानी ‘क्लपटोमीनिया’ कहते हैं। नशेबाजी की गहरी आदत ‘डिपसोमीनिया’ कहलाती है। पदार्थों को नष्ट करने की अदम्य अभिलाषा ‘वायरोमीनिया’ कहलाती है। दूसरों को कष्ट पाते देखकर मजा लूटने का स्वभाव ‘म्यूटिलोमीनिया’ कहलाता है। यौन कुत्साएँ , जो बेतरह मन पर छाई रहती हैं - डिमेनशिया कहलाती हैं।

किसी स्वजन सम्बन्धी की मृत्यु एवं हानि , दुर्घटना का समाचार सुनकर चेहरा सुस्त पड़ जाता है और भूख मारी जाती है। भय के अवसर उत्पन्न होने पर शरीर काँपता है, पसीना छूटता है, मुँह सूखने और रोमांच खड़े होने लगते हैं। क्रोध में भयंकर उष्णता उत्पन्न होती है और उस गर्मी से पक्षाघात, रक्तचाप जैसे रोग उत्पन्न होने का भय रहता है। कहा जाता है कि एक घण्टे का क्रोध एक दिन के बुखार की बराबर शक्ति क्षीण करता है। मनोविज्ञान शास्त्र के अनुसार अनेक मनोविकारों के परिणाम भयंकर बीमारियों के रूप में सामने आते हैं। हृदयरोग, श्वास रोग एवं पाचन सम्बन्धी कितने ही रोग शारीरिक गड़बड़ी से उतने नहीं होते ,जितने कि मानसिक दबावों के कारण निराश और खिन्न रहने वाले व्यक्ति मधुमेह, अनिद्रा, अपच, गठिया, सिरदर्द जैसे रोगों से ग्रसित रहने लगते हैं।

पूरे मनःसंस्थान में विभिन्न प्रकार की अनेकानेक विसंगतियाँ का उत्पन्न हो जाना ही पागलपन कहा जाता है। इस स्थिति को ‘स्कित्जोफ्रीनिया’ कहते हैं। आंशिक विक्षिप्तता को सनक, मूढ़ता आदि नाम दिये जा सकते हैं। ऐसे लोग आजीविका उपार्जन, नित्यकर्म आदि जीवन- निर्वाह के सामान्य कार्य मजे में करते रहते हैं किसी विशेष प्रयोजन में ही वह सनकते और गड़बड़ाते हैं। इस स्तर की बीमारियाँ न्यूरोसिस कहलाती हैं।

उदास प्रकृति का पागलपन एकाकी होता है। वह दूसरों के सम्बन्ध में न अधिक सोचता है न उनसे मतलब रखता है। अपने में ही खोया रहता है। अपनी मनमर्जी से चलता है। न वह किसी को अपना मानता है और न अपने ऊपर किसी का अधिकार स्वीकार करता है। अपने बेढंगेपन पर उसे दूसरों की प्रतिक्रिया की परवाह नहीं होती। आत्मकेन्द्रित रहकर वह गुजारा करता है | कोई इच्छा, महत्वाकांँक्षा भी उसकी नहीं होती।

कमजोर मन वाले व्यक्तियों को तनिक-सी प्रतिकूलताएंँ बहुत डरावनी लगती हैं और उनसे भयभीत होकर वे अपना मानसिक सन्तुलन बिगाड़ लेते हैं। दाम्पत्य रीति-नीति से अपरिचित लड़कियाँ सुहागरात प्रकरण से कई बार इतनी डर जाती हैं कि उन्हें उस प्रकार की पुनरावृत्ति प्राण संकट जैसी लगती है। इसी प्रकार कई गर्भवतियों का मानसिक स्वास्थ्य प्रसव पीड़ा की भयानकता को बढ़ा-चढ़ाकर सोचते रहने से चौपट हो जाता है। पति या सास के थोड़े से दुर्व्यवहार से नव-वधू कभी-कभी इतनी घबरा जाती है कि उन लोगों के साथ रहना उन्हें असह्य प्रतीत होता है और बच निकलने का मार्ग न देखकर आत्महत्या जैसे दुःखदायक प्रसंग खड़े कर लेती हैं। ससुराल में उपेक्षा, पितृगृह का विछोह, नये वातावरण में फिट न हो सकना , पुरानी जीवनयापन पद्धति में भारी अन्तर आने जैसी विसंगतियों का तालमेल न बैठ पाने से कई नवविवाहिताएँ भूत-पलीत, , मिर्गी , घबराहट के दौरे आने जैसी बीमारियों में फँस जाती हैं।

उत्तेजित प्रकृति के पागल हर समय बेचैन रहते हैं। उत्तेजनाग्रस्त, अस्थिर, चंचल उन्हें पाया जाता है। कुछ न कुछ उठक-पटक करते रहते हैं, बड़बड़ाते हैं, दूसरों के कामों में हस्तक्षेप करते हैं और लड़ने - मरने पर उतारू रहते हैं। आत्म प्रशंसा, दर्प - प्रदर्शन, धमकी, दूसरों का तिरस्कार जैसी हरकतों में उन्हें संलग्न देखा जा सकता है। इस स्तर की बीमारी ‘हैब्रेफ्रेनिक’ कहलाती है शारीरिक और मानसिक तनाव बढ़ा-चढ़ा रहे ; चैन से न बैठने ,और न बैठने देने की स्थिति हो , तो उसे ‘कैटाटोनिक’ कहा जायेगा। अदृश्य दृष्टि देखना, तरह तरह की आवाजें सुनना ,  पीड़ा - प्रताड़ना सहनी पड़ रही है,- ऐसा आभास होना , यह चिन्ह पागलपन के उस स्तर के हैं , जिसे ‘पैरेनोइड’ कहा जाता है।

हताश, निराश बैठे रहने से रोगियों के रक्त में ‘सेरेटोनीन’ का अनुपात न्यूनाधिक हो जाता है। ऐसे लोग खिन्न होकर आत्महत्या कर बैठते हैं। कहीं दूर एकान्त में जा बसने वाले प्रायः इसी मर्ज के मरीज होते हैं।

कई व्यक्तियों को अपनी कल्पनाएँ बहुत दिन तक संजोये रहने पर वे वास्तविकता जैसी लगने लगती हैं और फिर वे उसे वास्तविक घटना समझने लगते हैं और वैसा ही वर्णन करने लगते हैं। इसे ‘कोर्साकोफ्स सायकोसिस’ कहा जाता है। सिद्ध योगियों के देवी-देवताओं के - भूत-प्रेतों के चमत्कारों को , आँखों देखे घटना क्रम की तरह दावे के साथ बताने वालों में प्रायः इसी रोग के मरीज होते हैं। वे कल्पनाओं को वास्तविक समझने में ईमानदार गलती करते रहते हैं।

विस्मृति के साथ-साथ यदि विसंगतियाँ उस स्थान पर जम बैठें ,तो पिछली घटनाओं को- व्यक्तियों को अथवा सम्बन्धों को अवास्तविक रूप से अपना लिया जाता है ; ऐसी स्थिति में उनके कथन में ऐसी बातें घुस पड़ती हैं , जिनके लिए मिथ्या भाषण का दोष लगाया जा सके। एल्जाइमर एवं लोप्रेशर हाइड्रोसेफल्स रोग प्रायः वृद्धावस्था में ही होते हैं और विस्मरण से उत्पन्न विक्षिप्तता के लक्षण बढ़ जाते हैं। ‘सठियाना’ इसी को कहते हैं। साठ वर्ष बाद अनेक को हलके - भारी रूप में इस प्रकार की मानसिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

विक्षिप्तता की चरम सीमा तक पहुँच जाने पर रोगी को पकड़कर पागलखाने पहुँचाया जाता है। इससे कम की स्थिति में मानसिक रोग , सनक, उद्दंडता, दुष्टता आदि समझे जाते रहते हैं। जबकि वह अटपटापन वस्तुतः मानसिक अस्वस्थता के कारण ही उत्पन्न होता है। सही मनःस्थिति होने पर वह व्यक्ति पछताता भी है और अपने को सुधारना भी चाहता है, पर कोई ऐसा विचित्र आवेश दौरे के समय चढ़ता है और वह देह कुछ से कुछ करने लगता है।

पागलखाने के डाक्टरों के पास कुछ थोड़े से उपचार हैं और वे प्रायः उन्हीं में उलट-पुलट करते रहते हैं। भारतीय जड़ी-बूटियों में पागलपन की दवाओं में ‘सर्पगंधा’ की अधिक ख्याति है। ऐलोपैथी परीक्षणों में उसे रक्तचाप के लिए अधिक उपयोगी पाया गया है। ऐलोपैथ सर्पगंधा के समकक्ष एक अन्य औषधि - ‘रेजरपीन’ का उपयोग करते रहे हैं। इन दिनों एमीप्रभीन, ट्राइसाइकिलिक, लीथियम कारबोनेट जैसी कई औषधियों का अधिक प्रचलन है। इन्हीं दिनों कई नई औषधियाँ बाजार में आई हैं, पर अभी उनके परिणामों के बारे में निश्चित निष्कर्ष नहीं निकले हैं।

शल्य चिकित्सा में पागलपन का उपचार करने की पद्धति को ‘सिग्लोटोमी’ कहते हैं। इसमें गड़बड़ी पैदा करने वाले भाग को काटकर अलग कर दिया जाता है। इससे अटपटापन तो दूर हो जाता है, पर मस्तिष्क की प्रखरता में भारी कमी आ जाने से स्थिति मन्दबुद्धि जैसी बन जाती है। अगले और पिछले मस्तिष्क का सम्बन्ध सूत्र काट देने से मनुष्य की बुद्धिमता चली जाती है, हाँ किसी प्रकार शांतिपूर्वक जीवनयापन कर सकने जैसी स्थिति अवश्य बन जाती है। इन उपचारों से चिन्ताजनक स्थिति का ही समाधान निकला है। पगलाये हुए व्यक्ति को भले - चंगे मनुष्य के स्तर पर फिर से ला सकने जैसी सफलता नहीं मिली है।   मस्तिष्कीय कोशाओं और तंतुओं का पारस्परिक सम्बन्ध सूत्र शिथिल पड़ जाने से सही निष्कर्ष निकालना और सही निर्णय करना, उसके लिए कठिन हो जाता है। अभ्यस्त क्रियाकलापों में से कोई भी, कुछ भी, कभी भी उठ सकता है। शरीर एवं मन द्वारा किसी प्रकार की अनियन्त्रित गतिविधियाँ चलने लग सकती हैं। यही है मोटे रूप से पागलपन की व्याख्या। इस असम्बद्धता को दूर करने में बिजली का झटका देने की उपचार पद्धति काम में लाई जाती है। उछलकर लम्बी कूद कूदने और बीच की खाई पाट लेने की रीति-नीति मस्तिष्कीय घटकों की असम्बद्धता दूर करने के भी काम आती है। इसे ‘शाकथैरेपी’ कहते हैं। मस्तिष्क को बिजली का झटका देने से पहले इंसुलिन का इन्जेक्शन लगाया जाता है। जिससे रक्त में शकर की मात्रा घट जाती है और रोगी बेहोश हो जाते हैं। इस बेहोशी की हालत में ही मस्तिष्क में बिजली के झटके दिये जाते हैं। काम पूरा हो चुकने पर कोकजि इन्जेक्शन देकर रोगी को फिर से होश में कर लिया जाता है। जिस प्रकार भावनात्मक झटका लगने से मनुष्य पगला सकता है , उसी प्रकार शाकथैरेपी के आधार पर मस्तिष्कीय संस्थान को झनझना देने वाले बिजली के झटके , उस टूट-फूट को दुरुस्त करते हुए भी देखे गये हैं। पागलपन की चिकित्सा में यही पद्धति अन्य सभी उपचारों से अधिक सफल रहती देखी गई है।

पागलखानों के डॉक्टर कई प्रकार के रासायनिक पदार्थ रोगियों के शरीर में पहुँचाकर उस कमी को पूरी करते हैं ,  जो मानसिक रोगों का कारण समझी जाती है। इस प्रकार के रसायनों में ‘केटेकोलोमीन’ वर्ग की औषधियाँ ही प्रधान रूप से काम में लाई जाती हैं। इनकी एक शाखा ‘एड्रेनेलीन’ हारमोन की है , जिससे मस्तिष्कीय शिथिलता घटती और उत्तेजना बढ़ती है। इनसे अवसाद की, शिथिलता की स्थिति दूर होती है। दूसरी शाखा ‘नोराड्रेनेलीन’ रसायनों की है जो अपेक्षाकृत हलकी है। उससे उत्तेजना नहीं फुर्ती भर आती है। इनके अतिरिक्त कुछ अन्य औषधियाँ भी प्रख्यात हैं। जैसे तन्तु संस्थान के अवरोधों को दूर करने वाली डोपामीन , आवेग रोकने के लिए- सेरोटोमीन आदि।

मनःचिकित्सा का एक तरीका यह है कि रोगी को कुछ भी कहने के लिए प्रोत्साहित किया जाय। आदमी उसी की चर्चा करता है ,जो उसकी समझ से अधिक महत्वपूर्ण है। भले ही वह दूसरों की दृष्टि में निरर्थक ही क्यों न हो ? दिलचस्पी से सुनने पर रोगी अपने जीवन की, मन की स्मृतियों को कहना आरम्भ कर देता है। यह क्रम एकाध घण्टे नित्य चलता है ; फलतः उसके जी में जमी हुई ऐसी ग्रंँथियां खुल जाती हैं जिनके कारण मनोरोग उत्पन्न होते माने जाते हैं। मान्यता यह है कि कोई अप्रिय प्रसंग जीवन में आते हैं और वे दूसरों से कहने योग्य न होने के कारण मस्तिष्क के किसी कोने में छिपे रहते हैं। मनुष्य का मस्तिष्क खुली पुस्तक की तरह होना चाहिए, जिसे कोई भी पढ़ सके ,तो किसी को भी खुशी-खुशी पढ़ाया जा सके। ऐसा दुराव रहित निष्कपट मन स्वच्छ रहता है। ग्रंन्थियों दुराव की होती है। दुराव, अनीति या छल से सम्बन्धित होते हैं। वे गुर्दे ,मूत्राशय या जिगर में जमने वाली पथरी की तरह दिमाग में जम जाते हैं और बाहर न निकलने तक चुभे हुए कांटे की तरह कष्ट देते रहते हैं, इन्हें निकाल बाहर किया जाय तो मनोरोग दूर होते हैं। मनोरोग चिकित्सा में यही पद्धति प्रमुखतया काम में आती है और यदि दुराव के कारण उन्माद हुआ और उसे बिना संकोच कहकर प्रकट कर दिया गया , तो उसका अच्छा परिणाम होता है और व्यथा के निवारण में सहायता मिलती है।

संसार भर में बढ़ते हुए पागलपन पर मनःविशेषज्ञों ने चिन्ता व्यक्त की है और रोकथाम तथा उपचार के अनेकों तथ्य खोजें एवं उपाय सोचे हैं। औषधि उपचार से नहीं के बराबर लाभ हुआ है। मस्तिष्क को ठप्प या उत्तेजित करने वाली औषधियाँ आरंभ में कुछ लाभ दिखाकर अपना फिर प्रभाव दिखाना बन्द कर देती हैं। इसके अतिरिक्त उनमें बुद्धि मन्द पड़ते जाने जैसी नई व्यथा उत्पन्न होती है जो लगभग पागलपन के ही समतुल्य होती है।

चिकित्सा जितनी महत्वपूर्ण है , उससे भी अधिक महत्व रोकथाम के उपाय बरतने पर दिया जाना चाहिए | उन्माद के मूलकारण असन्तुलन को दूर करने के लिए नीतिशास्त्र, समाजशास्त्र और मनःशास्त्र के उन सिद्धान्तों को जनमानस में प्रतिष्ठापित कराया जाना चाहिए, जो मनुष्य को सरल, सौम्य एवं शालीनता का जीवनयापन करने की विधि-व्यवस्था समझाते हैं। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए धर्मधारणा और अध्यात्म साधना को उपयोगी उपचार की तरह काम में लाया जा सकता है। उसकी उपयोगी विधिव्यवस्था अपनाकर न केवल उन्मादी और सनकी रोगरहित किये जा सकते हैं, वरन् वैसे उपद्रवों की रोकथाम भी सहज ही हो सकती है। इस निष्कर्ष पर विचारशील मनःशास्त्री पहुँच रहे हैं और कुछ समय पूर्व जिस नीतिशास्त्र का उपहास किया जा रहा था अब उसका समर्थन मानसोपचार के रूप करने की बात सोची जा रही है। यही है विक्षिप्तता को रोकने और समाप्त करने का स्थिर समाधान।

----***----


दारिद्रय की समस्या और एक विकल्प

दारिद्रय  की समस्या और  एक  विकल्प

प्रायः लोग बात-बात में धनाभाव और निर्धनता का रोना रोया करते हैं ; जबकि उनसे होना जाना कुछ नहीं है। इस प्रवृत्ति को निराशा और ऋणात्मक ही कहा जायगा क्योंकि यह सभी कोई जानते हैं कि परिस्थितियों की विकरालता का बारंबार चिन्तन व्यक्ति को न केवल जीवन्त रूप से तोड़ देता है, वरन् वे स्रोत भी बन्द कर देता है। जिन पर विचार किया जाता, तो बहुत सम्भावना थी कि निर्धनता इतनी कष्टकारक नहीं बनती। संसार के सभी महापुरुषों ने स्वेच्छा से गरीबी का वरण किया हैं ? गरीबी कोई बुरी चीज नहीं है- बुरी और कष्टकारक है ,उसके प्रति हमारा अपना दृष्टिकोण। भारत और विश्व के इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं ,जिनमें कई महापुरुषों ने अपना जीवन - खर्च चलाया।

सुकरात के सम्बन्ध में प्रसिद्ध है ,किसी भी वस्तु को खरीदने से पहले वे इसका विचार करते थे कि क्या इसके बिना मेरा काम किसी प्रकार नहीं चलेगा। यदि उत्तर मिलता कि चल सकता है तो वे नहीं खरीदते ; क्योंकि उसे खरीदने के लिए जो वे पैसा खर्च करना पड़ता, उसे अर्जित करने में जीवन लक्ष्य के लिए दिये जाने वाले समय में कटौती करनी पड़ती। उन्हें अर्थकष्ट निरन्तर बना रहता था ,यहाँ तक कि कई बार उधार लेकर खाना पड़ता ,परन्तु उन्होंने अपनी निर्धनता पर कभी हीन दृष्टि से विचार नहीं किया, फलतः वे जीवन भर सन्तुष्ट और प्रसन्न वदन रहे।

वस्तुतः जिन्हें निर्धनता ,अभिशाप लगती है और जीवन की प्राथमिक आवश्यकताएँ  पूरी होने योग्य भी जो उपार्जन नहीं कर पाते, उन्हें चाहिए कि वे निराश और चिन्तित रहने की अपेक्षा सोच- विचारपूर्वक काम लें। आमदनी किन उपायों से बढ़े , इस पर विचार करने से पूर्व हमें अपनी आवश्यकताओं पर विचार करना चाहिए। क्योंकि आज के समय में लोगों के पास व्यर्थ के खर्च इतने अधिक बढ़ गये हैं, जो अनावश्यक रूप से अनिवार्य है। यदि देखा जाय तो आम आदमी की आवश्यकतायें , जिन्हें प्राथमिक आवश्यकतायें कहना चाहिए, वे पाँच हैं - भोजन, वस्त्र, आवास, शिक्षा और बचत। बचत का अर्थ कि कई  ऐसी जरूरतें होती हैं ; जो रोज तो नहीं आतीं ;पर उनके लिए पास में थोड़ी बहुत राशि जमा रखना आवश्यक है। जैसे बीमारी के समय ही नही, रिश्तेदारों में यथावसर आने-जाने के लिए भी बचत आवश्यक है। इन पाँच जरूरतों में से चार पर तो खर्च होता है। पाँचवीं और नियमित रूप से कुछ बचाते रहना चाहिए।

इन आवश्यकताओं के तीन खण्ड किये जा सकते हैं- जीवनयापन विषयक, सुख विषयक और विलास विषयक। जीवनयापन विषयक आवश्यकतायें न पूरी होने वालों की अपेक्षा उन लोगों की संख्या अधिक है, जिनकी दूसरी और तीसरी विषयक आवश्यकतायें पूरी नहीं होतीं। जीवनयापन के लिए उन्हीं आवश्यकताओं की गणना की जा सकती है, जिनकी चर्चा ऊपर की जा चुकी है। पर उनको भी अविवेकपूर्ण ढंग से पूरा करने वाले लोगों की ही अधिक संख्या है। कुछ वर्ष पूर्व डॉ. कैरेम कोर्ड ने मजदूरों के भोजन व्यय का अध्ययन किया तो पता चला कि बहुत से मजदूर अनावश्यक वस्तुएँ खरीदते हैं और खाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए अनुपयोगी होने के साथ साथ हानिकारक भी हैं। उन आवश्यकताओं को पूरा करने में भी विवेक का परिचय देना चाहिए।

सुख और विलासपूर्ण आवश्यकताओं का तो कोई अन्त ही नहीं है। इनमें फैशन, मिथ्याप्रदर्शन से लेकर दुर्व्यसनों , मूढ़तापूर्ण ,प्रतिस्पर्धाओं तक कितनी ही निरुपयोगी बातें हैं। एक विचारक के अनुसार , अधिकांश व्यक्तियों की आर्थिक चिन्ताओं के मूल में जो कारण प्रमुख है, उनमें से कुछ इस प्रकार हैं- कृत्रिम आवश्यकता की अभिवृद्धि, दूसरों के सामने स्वयं को बढ़ा-चढ़ाकर प्रदर्शित करना, शौक-मौज की वस्तुओं में खर्च करना, नशेबाजी और अन्य दुर्व्यसनों की लत, ब्याह-शादियों में हैसियत से अधिक खर्च करना, सन्तानोत्पादन तथा मित्रों के साथ रहकर खर्च करने में अपना सिक्का जमाना।

यदि अपनी आवश्यकताओं को पूरी करने में सूझ-बूझ से काम लिया जाय ,तो कम आमदनी में भी अच्छे स्तर का सुखी जीवन जिया जा सकता है। अल्प आय में गुजारा करने के बावजूद उसमें से कुछ बचा लेने के लिए विख्यात प. महावीर प्रसाद द्विवेदी ने व्यय कला पर अपने जीवनवृत में पं. बनारसीदास जी चतुर्वेदी जी ने लिखा है - “एक वर्ष अजमेर में पन्द्रह रुपये प्रतिमाह पर नौकरी करने के बाद तार का काम सीखने के लिए बम्बई गये और वहाँ से बीस रुपये प्रतिमाह पर तार बाबू बने लेकिन वहाँ अपने मातहतों पर अत्याचार करने की अपेक्षा उन्होंने नौकरी छोड़ देना अधिक उचित समझा और त्यागपत्र दे दिया। फिर वे बीस रुपये प्रतिमास पर ही ‘सरस्वती’ में आ गये।”

इतने में अपना गुजारे चलाने के बावजूद भी उन्होंने काफी कुछ बचाया और जब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना हुई तो उसमें छात्रों को

शिष्यवृत्ति देने के लिए दे दिया। द्विवेदी एक-एक पैसा सोच समझकर खर्च करते थे और उसका हिसाब-किताब भी रखते थे।

मितव्ययिता और सूझबूझ पूर्वक खर्च द्वारा अपने सीमित साधनों में भी इस प्रकार ‘सन्तुष्ट’ रहा जा सकता है। अपनी आवश्यकताएँ जीवन-यापन स्तर की रखने और एक-एक पैसा सोच-समझकर खर्च करने के साथ स्वावलम्बन भी एक ऐसा गुण है, जिससे कितनी ही बचत की जा सकती है। सामर्थ्य   है तो क्या जरूरी है कि धोबी से कपड़े धुलवाये जाएँ या नाई से ठोड़ी बनवायी जाएे। जूतों पर पालिश, टूटी-फूटी चीजों की मरम्मत, घर की सफाई आदि काम अपने हाथ से किये जा सकते हैं। न आता हो तो इन कामों को सीखा भी जा सकता है। इसमें एक ओर जहाँ खर्चों की बचत होगी, वहीं दूसरी ओर स्वावलम्बन की वृत्ति भी पनपेगी।

अपनी आर्थिक समस्याओं का रोना रोते रहने के स्थान पर यदि इन पहलुओं पर भी विचार किया जाय तो आशा की जा सकती है कि एक सीमा तक हमें आर्थिक परेशानियों से राहत मिल सकती है।

Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI /* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-priority:99; mso-style-qformat:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt; mso-para-margin-top:0in; mso-para-margin-right:0in; mso-para-margin-bottom:10.0pt; mso-para-margin-left:0in; line-height:115%; mso-pagination:widow-orphan; font-size:11.0pt; mso-bidi-font-size:10.0pt; font-family:"Calibri","sans-serif"; mso-ascii-font-family:Calibri; mso-ascii-theme-font:minor-latin; mso-hansi-font-family:Calibri; mso-hansi-theme-font:minor-latin; mso-bidi-font-family:Mangal; mso-bidi-theme-font:minor-bidi;} अपना काम अपने हाथ से करना कोई अशोभनीय कार्य नहीं है। संसार के सभी महापुरुष अपने कार्यों को अपने हाथ से करते रहे हैं। अमेरिका के इतिहास पुरुष राष्ट्रपति लिंकन के सम्बन्ध में तो विख्यात है  - एक बार वे अपने जूतों पर पालिश कर रहे थे। तभी एक सिनेटर वहाँ आ पहुँचा। उन्होंने राष्ट्रपति को यह करते देखा , तो बड़ा चौंका और उन्होंने कहा  -" मि. लिंकन। यह क्या ? आप अपने जूतों पर पालिश कर रहे हैं।"

बिना शरमाये अपने काम में लगे रहते हुए लिंकन ने चुटकी ली - " तो क्या मेरे लिए यह उचित होगा कि दूसरों के जूतों पर पालिश करना शुरू कर दूंँ।"  कहने का अर्थ यह कि हमारी आर्थिक समस्याओं के पीछे आमदनी का इतना दोष नहीं है, जितना कि हमारी खर्च करने की पद्धति का। कहा भी गया है कि धन कमाना सरल है , पर उसे खर्च करना कठिन। निस्सन्देह पर्याप्त धनोपार्जन करते रहने के बावजूद भी जो लोग खर्च करने की विधि नहीं जानते , वे दीन-हीन और कंगाली का ही जीवन ढोते रहते हैं। इस सम्बन्ध में अंग्रेजी के विख्यात कवि और उपन्यासकार गोल्ड स्मिथ का उदाहरण देना अप्रासंगिक न होगा। वे एक उच्चकोटि के कवि और नाटककार थे। लेखन में उन्हें आमदनी भी खूब होती थी , किन्तु जो भी आय होती , उसे खर्च करने में उन्होंने जरा भी सूझ-बूझ का उपयोग नहीं किया। जिन दिनों वे अध्यापक थे, उस समय जो कुछ बचाया वह सब एक दिन भावावेश में आकर घोड़ा खरीदने में लगा दिया। उनके सम्बन्धियों ने एक बार कुछ रकम इकट्ठीकर उन्हें कानून की शिक्षा पढ़ने के लिए भेजा , तो उस रकम से वे शराब पी गये और जुआ खेलते रहे।

किस्मत ने साथ दिया ; तो उनकी लेखनी खूब सफल होने लगी ;फिर भी वे दूध का बिल चुकाने, मकान किराया न देने के कारण पकड़े गये। उन्होंने काफी कमाया; पर जो कमाया; वह सब व्यर्थ के कार्यों में खर्च कर डाला और यहाँ तक कि जब वे मरे, तब भी उनके शरीर पर दर्जी से उधार ली हुई कोट और पेन्ट थी।

अपनी आर्थिक समस्याओं का रोना रोते रहने के स्थान पर यदि इन पहलुओं पर भी विचार किया जाय, तो आशा की जा सकती है कि एक सीमा तक हमें आर्थिक परेशानियों से राहत मिल सकती है।

----***----


तीर्थयात्रा का आधार, स्वरूप और प्रतिफल

तीर्थयात्रा  का आधार , स्वरूप और  प्रतिफल

तीर्थयात्रा का पुण्यफल धर्मशास्त्रों में पग-पग पर भरा है। उसके कारण पाप- प्रवृत्तियों का विनाश और उत्कृष्ट सत्यप्रवृत्तियों के अभिवर्धन का जो प्रयास बन पड़ता है ,वही पुण्यफल बनकर परम कल्याणकारी सिद्ध होता है। तीर्थयात्रा का पुण्यफल बताते हुए कहा गया है-

निष्पापत्वं फलं बिद्धि तीर्थस्य मुनिसत्तम। कृषेः फलं यथा लोके निप्पन्नान्नस्य भक्षणम्॥

-देवी भागवत

जिस प्रकार कृषि का फल अन्न उत्पादन है। उसी प्रकार निष्पाप बनना ही तीर्थयात्रा का प्रतिफल है।

तीर्थैस्तरन्ति प्रवतो महीरििति यज्ञकृतः सुकृतो येन यन्ति। अन्नादधुर्यजमानाय लोकं दिशो भूतानि यद कल्पयन्त॥

-अथर्ववेद

जिस तरह यज्ञ करने वाले यजमान यज्ञादि द्वारा बड़ी-बड़ी आपत्तियों से मुक्त होकर पुण्यलोक की प्राप्ति करते हैं, उसी प्रकार तीर्थ यात्रा करने वाले तीर्थ यात्री तीर्थादि द्वारा बड़े-बड़े पापों और आपत्तियों से मुक्त होकर पुण्यलोक की प्राप्ति करते हैं।

अनुपातकिनस्त्वेते महापातकिनो यथा। अश्वमेधेन शुद्धयन्ति तीर्थांनुसरणेन च॥

-विष्णु स्मृति

महापातकी और उतपातकी के शुद्ध करने वाले दो ही साधन हैं। - यज्ञ और तीर्थाटन।

अनुपोथ्य त्रिरात्राणि तीर्थान्य नभिजम्य च। अदत्त्वा कांचनं गाश्च दरिद्रो नाम जायते॥

-महाभारत

जो तीन रात्रि तक उपवास नहीं कर सका, जिसने कभी तीर्थयात्रा नहीं की, जिसने परमार्थ के लिए दान नहीं किया, ऐसा व्यक्ति दरिद्र होता है।

ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरत सत्रम। तीर्थाभिगमनं पुण्यं यज्ञैरपि विशिष्यते॥

-महाभारत

ऋषियों का गुह्य मत यह है कि यज्ञों में भी तीर्थयात्रा की विशेषता है।

तीर्थाटन की महिमा का बखान करने वाले कई प्रसंग तुलसीकृत रामचरित मानस में आते हैं।-

तीर्थाटन साधन समुदाई, विद्या विनय विवेक बड़ाई॥ जहँ लगि साधन वेद बखानी, सब कर फल हरि भगति भवानी॥

-उत्तरकांड

चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के उर माही॥

-अयोध्याकांड

सूरसागर में महात्मा सूरदास तीर्थयात्रा न कर सकने को एक दुर्भाग्य मानते हैं और उसका सुयोग न बन पड़ने पर दुःख प्रकट करते हुए कहते हैं -

मन ही मनही माँहि रही, ना हरि भजे न तीरथ सेये, चोटी काल गही ||

-सूरदास

विधिपूर्वक तीर्थ करने से तात्पर्य है  – उस परिभ्रमण के साथ-साथ अपनी दुष्प्रवृत्तियों को छोड़ने और सत्यप्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए भाव भरा प्रबल प्रयास करना।

तीर्थानि च यथोक्तेन विधिना संचरन्ति ये। सर्व द्वन्द्वसहा धीरास्ते नराः स्वर्गगामिनः॥

-नारद पु.

जो यथोक्त विधिपूर्वक यात्रा करते हैं, सम्पूर्ण द्वन्द्वों को सहन करने वाले वे धीर पुरुष स्वर्ग में जाते हैं।

कामं क्रोधं च लोभं च यो जित्वा तीर्थ माविशेत्। न तेन किंचिदप्राप्तं तीर्थाभिगमनाद् भवेत॥

-नारद पु0

जो काम, क्रोध तथा लोभ को जीतकर तीर्थ में प्रवेश करता है, उसे तीर्थयात्रा से सब कुछ प्राप्त हो जाता है।

तीर्थान्यनुसरन् धीरः श्रद्दधानः समाहितः। कृतपापो विशुद्धये्त् किं पुनः शुद्ध कर्म कृत्॥

धैर्यवान और श्रद्धायुक्त होकर एकाग्र चित्त से तीर्थों का सेवन करने से पापाचारी भी शुद्ध हो जाता है। फिर शुद्ध कर्म करने वाले का तो कहना ही क्या।

यदि तीर्थाटन पर्यटन मनोरंजन के लिए किया गया है, तो उसका उतना ही लाभ है। किन्तु उसे आत्मपरिष्कार के लिए प्रबल प्रयत्न करने के उद्देश्य रूप से किया गया है , तो उसका प्रतिफल श्रद्धा के अनुरूप ही होगा। धर्म प्रयोजनों में यह श्रद्धा ही प्रमुख निमित्त है।

मन्त्रे तीर्थे द्वजे दैवे दैवेज्ञे भेषजे गुरौ। यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी॥

तीर्थ,मन्त्र,ब्राह्मण,देवता,औषधि, गुण,तथा

ज्योतिषी में जिसकी जैसी जितनी श्रद्धा भावना होती है, वैसा ही फल मिलता है।,

येनैकादश संख्यानि यन्त्रितानीन्द्रियाणि वै। स तीर्थ फलमाप्नोति नरोऽन्यः क्लेशभाग् भवेत्॥

जिसने अपनी ग्यारह (दस इन्द्रियाँ और मन) इन्द्रियों को वश में कर रखा है, वही तीर्थयात्रा का वास्तविक फल पाता है, दूसरे अजितेन्द्रिय मनुष्य तो केवल क्लेश के ही भागी होते हैं।

तीर्थ में व्यक्ति का परिष्कार होता है ,यह ठीक है; पर यह भी सत्य है कि उत्कृष्ट स्तर के ब्रह्मज्ञानी किसी स्थान को तीर्थ बना देते हैं।

यो न क्लिष्टोऽपि भिक्षेत ब्राह्मणस्तीर्थ सेवकः। सत्यवादी समाधिस्थः स तीर्थस्योपकारकः॥

जो तीर्थसेवी ब्राह्मण अत्यन्त क्लेश पाने पर भी किसी से दान नहीं लेता, सत्य बोलता और मन को वश में रखता है, वह तीर्थ की महिमा बढ़ाने वाला है।

भवद्विधा भागवतास्तीर्थ भूताः स्वयं विभो। तीर्थी कुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तः स्थेन गदाभृता॥

-भागवत

युधिष्ठिर विदुर से कहते हैं - आप जैसे भक्त स्वयं ही तीर्थ रूप होते हैं। आप लोग अपने हृदय में विराजित भगवान के द्वारा, तीर्थों को महातीर्थ बनाते हुए विचरण करते हैं।

तीर्थयात्रा का एक उद्देश्य है - उन क्षेत्रों में निवास करने वाले मनीषियों से आत्मकल्याण एवं उज्ज्वल - भविष्य -निर्माण के लिए उपयुक्त मार्गदर्शन प्राप्त करना।

तीर्थेषु लभ्यते साधु ब्रह्मज्ञान परायणः। यद्दर्शनं नृणां पापराशिदाहाशुशुक्षणिः॥

-पद्म पुराण

तीर्थों में ब्रह्म परायण, साधु सज्जन मिलते हैं। उनका दर्शन मनुष्यों की पाप-राशि को जला डालने के लिए अग्नि के समान है।

तस्मात् तीर्थेषु गंतव्यं नरैः संसार भीरुभिः। पुण्योदकेषु सततं साधुश्रेणि विराजिषु॥

-पद्म पुराण

इसलिए जो लोग पाप से डरे हुए हैं और उसके बन्धन से छूटना चाहते हैं ,उन्हें पवित्र जल वाले तीर्थों में, जो साधु -सज्जनों के समूह से सुशोभित हैं, अवश्य जाना चाहिए।

“ तरति अनेन इति तीर्थ”

तारने वाले को तीर्थ कहते हैं। तरना सत्कर्मों, सद्भावनाओं, सद्विचारों एवं सज्जनों के द्वारा ही हो सकता है। इसलिए इन्हीं को तीर्थ कहते हैं। जिन स्थानों में इन प्रवृत्तियों को बढ़ाने वाला वातावरण होता है, उन्हें ही तीर्थ स्थान कहा गया है।

साधुनां दर्शनं पुण्यं तीर्थ भूता हि साधवः। तीर्थ फलति कालेन सद्यः साधु समागमः॥

साधुओं का दर्शन बड़ा पुण्यकारक होता है, क्योंकि साधु तीर्थ रूप ही हैं। तीर्थ तो समय पर फल देते हैं, किन्तु साधु समागम का तत्काल फल मिलता है।

मुख्या पुरुष यात्रा हि तीर्थ यात्रा प्रसंगतः। सद्भिः समागमो भूमिभागस्तीर्थ तयोच्य ते॥

-स्कन्ध पुराण

तीर्थयात्रा के प्रसंग से महापुरुषों के  दर्शन के  लिए जाना ही तीर्थयात्रा का मुख्य उद्देश्य है, अतः जिस भूभाग में सज्जन निवास करते हैं वही तीर्थ कहलाती है।

ब्राह्मणा जंगमं निर्मलं सार्वकामिकम्। येषाँ वाक्योदकेनैव शुद्धयन्ति मलिना जनाः॥

-शातातपस्मृति

साधु-ब्राह्मण चलते - फिरते तीर्थ हैं। जिसके सद्वाक्यरूपी निर्मल जल से मलिन जन भी शुद्ध हो जाते हैं।

सम्पूर्ण भारत वर्ष ही तीर्थ स्वरूप है। उसके किसी भी भाग की यात्रा की जाय , उसे तीर्थयात्रा ही माना जायगा।

त्रयाणपि लोकानां तीर्थ मध्य मुदाहृतम्। जाम्बवे भारतं वर्ष तीर्थ त्रैलोक्य विश्रुतम॥ कर्म भूमिर्यतः पुत्र तस्मातीर्थ तदुच्यते॥

-ब्रह्म पुराण

तीनों लोकों के मध्य में स्थित कर्म भूमि भारत वर्ष साक्षात् तीर्थ स्वरूप है।

छोटों के लिए, बड़े शिष्यों के लिए ,अज्ञान निवारण करने वाले गुरुजन भी तीर्थ के समान ही श्रद्धास्पद होते हैं।

अज्ञानाख्यं तमस्तस्य गुरुः सर्व प्रणाशयेत्। तस्माद् गुरुः परं तीर्थ शिष्याणामवनी यते॥

-पद्म पुराण

हे राजन्! शिष्य के हृदय के अज्ञानान्धकार को नष्ट करने वाले गुरु, शिष्यों के लिए परम तीर्थ हैं।

तीर्थ स्थान में जाकर पाप परित्याग का अभ्यास करना चाहिए। वहाँ अपने ऊपर कठोर नियंतण करके यह प्रयत्न करना चाहिए कि उस पुण्यक्षेत्र में कोई अभ्यस्त दृष्वृत्ति भी सक्रिय न होने पावे। तीर्थ मर्यादा का उल्लंघन करके वहाँ किये गये पाप तो और भी अधिक दुःखद एवं दुर्भाग्यपूर्ण सिद्ध होते हैं।

यदन्यत्र कृतं पापं तीर्थ तद् याति लाघवम्। न तीर्थ कृत मन्यत्र क्वचि देव ब्ययोहति॥

दूसरे स्थान पर किया हुआ पाप तीर्थ में क्षीण हो जाता है, परन्तु तीर्थ में किया हुआ पाप अन्य स्थानों में कभी नष्ट नहीं होता।

अन्य क्षेत्रे कृतं पापं पुण्य क्षेत्रे विनश्यति। पुण्य क्षेत्रे कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति॥

-स्कन्ध पुराण।

दूसरे क्षेत्रों के पाप, पुण्य- क्षेत्रों में नष्ट हो जाते हैं। किन्तु पुण्यक्षेत्रों में किये हुए पाप कहीं नष्ट नहीं होते।

तीर्थयात्रा पद यात्रा के रूप में ही होनी चाहिए। सवारी पर नहीं। तभी उसका समुचित लाभ मिलता है।

इति ब्रुवन् रसनया मनसा च हरिं स्मरन्। पादचारी गति कुर्यात् तीर्थ प्रति महोदयः॥

वाणी में कीर्तन करते हुए तथा मन में भगवान का स्मरण करते हुए पैदल तीर्थ यात्रा करने वाले का महान अभ्युदय होता है।

ऐश्वर्य लोभान्मोहाद् वा गच्छेद् यानेन या नरः। निष्फलं तस्य तत्तीर्थ तस्माद्यानं विवर्जयेत्॥

-मत्स्य पुराण

ऐश्वर्य के गर्व से, मोह से या लोभ से जो सवारी पर चढ़कर तीर्थयात्रा करता है, उसकी तीर्थयात्रा निष्फल हो जाती है।

आज की स्थिति में ब्रह्मवर्चस् साधना के अन्तर्गत आरम्भ की गई धर्मप्रचार यात्रा मण्डलियाँ ही तीर्थयात्रा का वास्तविक उद्देश्य पूरा कर सकती हैं। ऋषि प्रणीत इस पुण्य परम्परा को नव जीवन देने के लिए ऐसी ही सार्थक तीर्थ यात्रा प्रक्रिया देश के कोने-कोने में प्रारम्भ होनी चाहिए।


Quotation

स्वर्ग द्वारेण तत्तुल्यं हरिद्वारं न संशयः सप्तगंगे त्रिगंगे च शक्तावर्त समाहितः। देवान् पितृश्च विधिवत् पुण्य लोके महीयते।

-पद्मपुराण

हरिद्वार स्वर्गद्वार के समतुल्य है। वहाँ सप्त गंगा, त्रिगंगा और शक्तावर्ल (शिवालक) पर्वत है। इस पुण्यक्षेत्र में देवों और पित्रों के तृप्त करने से पुण्यलोक की प्राप्ति होती है।

स्कन्द पुराण, महाभारत, नारद पुराण एवं रुद्र यामल में भी हरिद्वार महात्म्य विस्तारपूर्वक वर्णित है।

----***----


ज्ञान-प्रसाद की दिशा में

ज्ञान-प्रसाद की दिशा में

दिनोंदिन शिक्षा के क्षेत्र में हो रहे प्रसार तथा तीव्रगति से हो रही विज्ञान की प्रगति ने यह आवश्यक बना दिया है कि ज्ञानप्रसार के समस्त साधनों में निरन्तर वृद्धि होती रहे। जिस देश में जितना अच्छा साहित्य उपलब्ध होगा , उतना ही अच्छा उसका विचार व आचरण बनेगा, यदि पूरे देश में सद्साहित्य के बड़े भंडार हो जाएँ सद्साहित्य की पुस्तकें विपुल मात्रा में व सस्ती दरों पर सुलभ कराई जाती रहें, तो अधिकाधिक शिक्षित व्यक्ति उसका अध्ययनकर तद्नुसार अपना विचार व कार्य व्यवहार बनावेंगे तथा कुसाहित्य स्वयमेव ही अदृश्य हो जायगा।

देश के युवकों व बच्चों को कुछ भी पढ़ने की स्वाभाविक इच्छा तो रहती ही है यदि उन्हें सद्साहित्य सुलभ न हुआ तो जो भी साहित्य उन्हें सरलता से उपलब्ध हो जाता है, उसे ही वे पढ़ते हैं अतः यदि सुसाहित्य सृजन का क्रम चलता रहा तो सृजनात्मक प्रवृत्तियों वाला समाज भी बनाया जा सकता है।

Normal 0 false false false EN-US X-NONE HI /* Style Definitions */ table.MsoNormalTable {mso-style-name:"Table Normal"; mso-tstyle-rowband-size:0; mso-tstyle-colband-size:0; mso-style-noshow:yes; mso-style-priority:99; mso-style-qformat:yes; mso-style-parent:""; mso-padding-alt:0in 5.4pt 0in 5.4pt; mso-para-margin-top:0in; mso-para-margin-right:0in; mso-para-margin-bottom:10.0pt; mso-para-margin-left:0in; line-height:115%; mso-pagination:widow-orphan; font-size:11.0pt; mso-bidi-font-size:10.0pt; font-family:"Calibri","sans-serif"; mso-ascii-font-family:Calibri; mso-ascii-theme-font:minor-latin; mso-hansi-font-family:Calibri; mso-hansi-theme-font:minor-latin; mso-bidi-font-family:Mangal; mso-bidi-theme-font:minor-bidi;}    इस दिशा में जर्मन जनवादी गणतन्त्र में हो रहे प्रयास अनुकरणीय है | वहाँ का "अकादमी फेरलाग" नामक प्रकाशन पर औसतन एक पुस्तक -पुस्तिका अथवा विवरणिका प्रतिदिन प्रकाशित करता है |यह पुस्तकघर आज से पच्चीस वर्ष पूर्व स्थापित हुआ था| इस अवधि में अभी तक 7200 पुस्तकें ही प्रकाशित करता है | पुस्तक प्रकाशन के अतिरिक्त "अकादमी फेरलाग 60 वैज्ञानिक पत्रिकाएँ भी प्रकाशित करता है| इसमें से अनेकों का सम्पादन-मण्डलों द्वारा किया जाता है | यहाँ की प्रकशित पुस्तकें तथा पत्र-पत्रिकाएँ विश्व के 45 देशों में जाती हैं | यहाँ की पुस्तकें मुख्यतः ,विश्व ,भारत ,जापान ,संयुक्त राज्य अमेरिका आदि में अधिक आयात होती है |"

जर्मन- जनवादी -गणतन्त्र के विश्व ज्ञान - भण्डार में इस योगदान का न केवल स्वयं जर्मन -जनवादी -गणतन्त्र में ही, अपितु विश्व के अन्यान्य राष्ट्रों में भी बड़ा प्रभावपूर्ण लाभ हुआ है। जर्मन -जनवादी- गणतन्त्र में प्रायः अधिकांश बच्चों, युवकों, शिक्षितों में विज्ञान के क्षेत्र में अधिकाधिक जानकारियाँ प्राप्त करने की रुचि बढ़ी है तथा यहाँ के वैज्ञानिक विश्व में नई-नई प्रतिभाओं को उभरने का अवसर दिया है।

इस देश में सत्साहित्य -प्रचार का कार्य इस प्रकाशन -घर तक ही सीमित नहीं है ; वरन् पूरे देश में इस तरह के और भी कई प्रकाशन - घर है, जो विज्ञान के अतिरिक्त ज्ञान के अन्यान्य क्षेत्रों से सम्बन्धित साहित्य का प्रकाशन करते हैं। बात प्रकाशन तक ही सीमित नहीं रहती, यहाँ पर प्रायः हर छोटे-बड़े नगर में एक-एक पुस्तकालय है, सामूहिक वाचनालय है जहाँ पर साहित्य पठन-पाठन की निःशुल्क व्यवस्था है। इन पुस्तकालयों, वाचनालयों से यहाँ बच्चे व अन्यान्य व्यक्तियों में सुसाहित्य के स्वाध्याय के प्रति अभिरुचि बढ़ी है, जिसका स्पष्ट परिणाम यह परिलक्षित हुआ कि न केवल विज्ञान के क्षेत्र में ही अपितु अन्यान्य क्षेत्रों में भी नई-नई प्रतिभाएं उभरने लगी हैं। यह राष्ट्र साहित्य के माध्यम से समर्थ व संपत्तिवान बनने की ओर निरन्तर आगे बढ़ता ही जा रहा है।

जर्मन- जनवादी- गणतन्त्र के इस अनूठे योगदान से भारत भी लाभान्वित हुआ है। भारतवर्ष में भी यहाँ की पुस्तकें लोकप्रिय होती जा रही है तथा यहाँ के साहित्य से मुख्यतः विज्ञान के क्षेत्र में एक नई विचारशैली पनपने लगी है।

जर्मन -जनवादी - गणतन्त्र का साहित्य प्रसार-प्रचार की दिशा में यह एक प्रशंसनीय व अनुकरणीय योगदान है।

----***----


चटोरापन स्वास्थ्य की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण

चटोरापन स्वास्थ्य की बर्बादी का सबसे बड़ा कारण

अनावश्यक और हानिकारक होते हुए भी यह ठूँस - ठाँस आखिर होती क्यों है ? इसका रहस्य जानने का प्रयत्न किया जाय, तो छिद्र सहज ही पकड़ में आ जाता है। जिह्वा को चटोरेपन की नशेबाजी का चस्का लग गया है और वह उस नशेबाज की तरह पैग पर पैग पीते चली जाती है , जो बेहोशी आने या जेब खाली होने की मजबूरी आने से पहले अपने पियक्कड़पन से हाथ रोकता ही नहीं। चटोरापन एक प्रकार का नशा है, जिसे अन्य मादक पदार्थों की तरह स्वभाव का अंग बना लिया जाता है और वह अपनी ललक बुझाने के लिए बार-बार मचलता रहता है। नमक, शकर, मसाले इसी स्तर के पदार्थ हैं जिनकी अलग से लेने की तनिक भी उपयोगिता नहीं। इनमें से जिनकी जितनी आवश्यकता है वे सामान्य खाद्य-पदार्थों में घुले रहने के कारण सहज ही मिलते रहते हैं। उस घुली स्थिति में अन्य पदार्थों के सहचरत्व से वे पच भी सहज ही जाते हैं किन्तु अलग से इनकी अतिरिक्त मात्रा लेने में वे भार बनते और हानि पहुँचाते हैं। उपयोगी नमक, क्षार, विटामिन हर खाद्य-पदार्थ में मौजूद हैं। वे उस स्तर के हैं , जो शरीर में घुल सकें और उसकी आवश्यकताएंँ पूर्ण कर सकें। भोजन के साथ वे पेट में पहुँचते रहते हैं और देह की क्षारीय आवश्यकताओं की भली प्रकार पूर्ति कर देते हैं ;पर वे स्वाद में वैसे खारी नहीं,  जैसा कि मसाले में काम आने वाला नमक होता है। नमकों के अनेक स्वाद हैं।  बायोकैमिक बारह दवाओं को बारह प्रकार के नमक ही समझना चाहिए। उनमें से एक भी खारी नहीं। सभी कडुए, कसैले आदि हैं। मैकसैल्फ समुद्री नमक है, पर स्वाद में कड़ुवा, कसैला-सा है। फ्रुट साल्ट क्रुशनसाल्ट आदि गुणकारी नमक बाजार में बिकते हैं, पर उनमें से कोई भी खारी नहीं होता। विटामिनों की भी कई जातियाँ हैं वे भी नमक हैं। शरीर के लिए भी नमक की जरूरत है वे खाद्य-पदार्थों में घुले रहते हैं और सहज ही शरीर में प्रवेश करते रहते हैं। पर हमें उन सबसे क्या वास्ता- हमें तो स्वाद के लिए वह खारी नमक चाहिए जो विशेषतया स्वाद के लिए प्रयुक्त होता है। गुणों की दृष्टि से उसे दोषों की खदान ही कह सकते हैं। रक्तचाप, शोध, गुर्दे के रोग, आदि कितनी ही बीमारियों में तो उसे बलपूर्वक बन्द करना पड़ता है अन्यथा रोगी का प्राण संकट में फंस जाय। यह स्वादिष्ट नमक शरीर में घुलता नहीं ,वरन् पेशाब पसीना, कफ आदि के सहारे प्रकृति द्वारा लात मार-मारकर बाहर निकाला जाता रहता है। इन द्रवमलों में नमक की मात्रा अत्यधिक पाये जाने का प्रधान कारण अनावश्यक मात्रा में खारापन को खाया जाना है। यदि इसका निष्कासन ठीक प्रकार न हो सके तो समझना चाहिए कि यह नमकीन की शौकीनों अन्य नशों की तरह ही जीवन संकट उत्पन्न करेगी। एक प्रकार से तो करती भी है। जायके के प्रलोभन से हम अनावश्यक मात्रा में उसी के कारण पेट में ठूँसा-ठूसी मचाते हैं। यदि दाल, शाक, चटनी आदि में नमक डालना बन्द कर दिया जाय तो फिर ठूँस-ठाँस के समय विवेक जीवित रखा जा सकता है। और सोचा जा सकता है कि भूख पूरी हो जाने पर फिर क्यों भरमार मचाई जाय?

नमक की तरह ही मिर्च मसाले हैं, जिनके अपने-अपने स्वाद- जायके हैं। वे एक दूसरे के साथ मिलकर अपनी-अपनी रंगीनियाँ प्रकट करते हैं। गर्म मसाले पड़ी दाल, तरकारी कितनी मजेदार लगती है? किन्तु इसका परिणाम तो नाम से जाना जा सकता है। गर्म मसाला छूने में तो ठंडा होता है ; पर उसकी प्रतिक्रिया जलते अंगारे को निगल जाने से किसी प्रकार कम भयंकर नहीं होती है। फोड़े, फुन्सियों पर लौंग, काली -मिर्च, लाल-मिर्च आदि पीसकर लेप लगाते हैं ,तो उनसे वहाँ के माँस, चमड़ी को जलते हुए देखा जा सकता है। इस श्रेणी की वस्तुएँ आमाशय एवं आँतों को भी इसी तरह जलाती हैं। उनके भीतर दीवार बहुत ही कोमल होती है। उसमें छोटी-छोटी रस ग्रन्थियाँ रहती हैं जो पाचक रस निकाल कर आहार को रस - रक्त में बदलने का काम करती है। इन रसों में कमी पड़ जाने से पाचन क्रिया गड़बड़ाती है। मसालों से आमाशय की भीतरी परत जलती है और वह कोमलता कठोरता में बदल जाती है। रस बहाने वाली ग्रन्थियाँ कठोर गाँठों की शकल बना लेती हैं और उनसे रसों का स्राव बहुत थोड़ी मात्रा में ही हो पाता है। ऐसी दशा में अपच का सिलसिला चल पड़ना स्वाभाविक है।

स्वाद की वस्तुओं में नमक एवं मसालों के बाद तीसरी वस्तु आती है- शकर। यह भी वस्तुओं के प्राकृतिक स्वाद को नष्ट करके कृत्रिम उत्तेजना भरने की दृष्टि से अनावश्यक मात्रा में मिलाई और खाई जाती रहती है। माना कि शकर की आवश्यकता शरीर को रहती है, पर यह भी स्पष्ट है कि प्रायः सभी अन्नों में उसकी पर्याप्त मात्रा भरी रहती है। मक्का जैसे अन्नों में तो उसकी मात्रा वैसे ही अधिक रहती है। फिर गाजर, टमाटर, चुकन्दर जैसे शाकों और लगभग सभी प्रकार के फलों और मेवों में उसकी भरमार रहती है। पाचनतन्त्र की एक विलक्षणता यह है कि मुँह की लार का सम्मिश्रण अन्न के साथ होने से लेकर आमाशय में पहुँचने तक की अनेक रासायनिक क्रियाओं द्वारा मुँह का प्रत्येक ग्रास शकरमय बन जाता है। यह शकर उत्पादन की विचित्र पद्धति ऐसी है , जो शरीर को शकर की रत्ती भर की कमी नहीं पड़ने देती। भले ही शकर की बाहरी मात्रा का एक डेली भर भी उपयोग न किया जाय। हम हैं जो स्वाद के प्रलोभन में शकर की धका -पेल करते रहते हैं। दूध का, दही का अपना निजी स्वाद है। उसे नष्ट करके शकर मिलाई जाती है। यह तो ऐसा ही हुआ जैसा कि रंग-बिरंगे फूलों का आनन्द लेने की अपेक्षा उन्हें एक ही नीले रंग के कढ़ाव में डालकर नीला बना दिया जाय। पदार्थों के विभिन्न स्वाद और गुण उनके असली रूप में ही सुरक्षित रहते हैं। यदि उनमें नमक, शकर आदि की भरमार कर दी जाय,  तो स्वाद ही नहीं, गुण भी समाप्त हो जाते हैं। सबसे बड़ी हानि यह है कि जायके के प्रलोभन में भोजन की अधिक मात्रा पेट में चली जाती है और उसका दुष्परिणाम आरोग्य गंवा बैठने के रूप में भुगतना पड़ता है।

स्वाद- सम्बन्धी बुरी आदतों में एक और भी गिनी जा सकती है, वह है - भुनी और तली वस्तुओं का सोंधापन। पकवान और मिष्ठान्न इसी स्वादिष्टता के निमित्त बनाये जाते हैं। भूनने से चना, चवैना, लाई, परमल, सत्तू आदि के रूप में अनाज सोंधे बन जाते हैं। घी, तेल में तलने से भी पूड़ी, परांठेे, हलुआ, कचौड़ी जैसे पकवान बनते हैं। मिठाइयों में शकर के साथ-साथ मावा चिकनाई आदि का बाहुल्य रहता है। तरकारियाँ भी तलने-भूनने से जायकेदार बन जाती हैं। यह सोंधापन अच्छा लगता है ; और त्यौहारों, दावतों में उन्हें छककर खाया भी जाता है। सभी जानते हैं कि दावतों में आहार की मात्रा सामान्य की अपेक्षा प्रायः ड्यौढ़ी उदरस्थ कर ली जाती है। जली, भुनी तली होने पर हर वस्तु दुष्पाच्य बन जाती है। गरिष्ठ, दाहक, उत्तेजक -स्वाद -साधनों के सम्मिश्रण से आहार स्वभावतः कुपाच्य भी बनेगा और अनावश्यक मात्रा में उदरस्थ होगा। इस प्रकार यह बाह्य प्रलोभन स्वास्थ्य की दृष्टि से दुहरा संकट उत्पन्न करेगा।

स्वादिष्टता की ललक आम व्यवहार में प्रयुक्त होती रहने के कारण उसमें कोई बड़ा दोष प्रतीत नहीं होता ; किन्तु बारीकी से देखने पर अपने आपे को भ्रमग्रस्त बनाकर आत्म-हत्या के मार्ग पर धकेल देने जैसे छद्म विडम्बना तो इसे कहा ही जा सकता है। नमक, मसाला और शकर के तीन स्वादों का दास बनना पड़ा और खाद्य-पदार्थों के विभिन्न स्वादों से वंचित रहना पड़ा। स्वादेन्द्रिय की उचित-अनुचित परखने वाली विवेकशीलता इसी लोलुपता के कारण नष्ट हुई। प्रत्येक प्राणी की जिह्वा उसके लिए उपयुक्त-अनुपयुक्त आहार का तत्काल निर्णय कर देती है। अपने शरीर के लिए क्या लाभदायक है ; क्या हानिकारक इसकी परख करना जिह्वा के डॉक्टर का काम है ; पर जब लोलुपता की मदिरा पिलाकर उसका परख कौशल नष्टकर दिया गया हो ,तो फिर कृत्रिम स्वाद की आड़ में कुछ भी खिलाया जा सकता है। पाकविद्या के सहारे अभक्ष्य पदार्थों को भक्ष्य बनाने की चतुरता ढूँढ़ ली गई और जिह्वा को अनुपयुक्तता की घोषणा कर सकने में असमर्थ बना दिया गया। इतने पर भी पदार्थ का मूल गुण तो बना ही रहा ; उससे होने वाली हानि का बचाव कहाँ हो सका?

पेट की बनावट ऐसी है कि उसमें बारीक पिसी हुई वस्तुएँ ही लेही की तरह पक सकती हैं। दाँत इसलिए बने हैं कि वे खाद्य-पदार्थों को न केवल बारीक पीस ही दें, वरन् मुख के स्रावों को अच्छी तरह मिलाकर उसे इतना पतला कर दें कि ग्रास को गले से नीचे उतरने में कोई कठिनाई न हो। मुँह आधा पेट है ,उसमें ठीक तरह पिसने और पाचक - स्रावों का सम्मिश्रण होने से पेट का आधा काम पूरा हो चुका होता है। इस लुगदी से रस- रक्त बनाना आमाशय और आँतों का काम रह जाता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए बुद्धिमानों ने यह सिद्धान्त बनाया है कि-”पानी खाया जाना चाहिए और रोटी पीयी जानी चाहिए।” इस उलटा मासी का तात्पर्य यह है कि पानी को घूँट-घूँट कर मुँह में फिरा- घुमाकर थोड़ा-थोड़ा करके इस प्रकार पीना चाहिए, मानो उसे खाया जा रहा हो ; इससे पानी के साथ मुँह के पाचक- रसों का सम्मिश्रण हो जाने से वह अधिक गुणकारी बन जायगा और उसका लाभ एक अच्छे- खासे खाद्य-पदार्थ के रूप में मिल जायगा। रोटी पीनी चाहिए; इसका तात्पर्य यह है कि उसे इतना चबाना चाहिए कि गले की कोमल नली को उसे नीचे उतारते समय तनिक भी कठिनाई न हो। आमाशय में दाँत नहीं है कि वे अधकुचले आहार को वहाँ पीसे और तब उसे लेही की तरह पकने के लिए तैयार करे। आमाशय की बनावट इस प्रकार की है उसमें बारीक पिसी हुई लुगदी पहुँचे तो ठीक प्रकार उसका मंथन -पाचन आरम्भ हो जाय। वह तन्त्र विशुद्ध रूप से पकाने की दृष्टि से ही बना है। पीसने वाला कोई कल-पुर्जा उसमें नहीं है। मुँह ही है; पीसने और पाचक स्राव मिलाकर लुगदी बनाकर आमाशय का आधा काम करता है|मुहँ को आधा आमाशय ही   कहा जाता है। दोनों का श्रम, सहयोग मिलकर पाचन -पद्धति का समग्र प्रयोजन पूरा करते हैं। वस्तुतः मुँह से आरम्भ होकर मलद्वार पर पहुँचने वाली एक ही नली है ,जो टेड़ी-मेढ़ी, मोटी-पतली बनती हुई. आदि से अन्त तक चली गई है। विभिन्न स्थानों पर उसी नली में पाचन के विभिन्न कार्य सम्पन्न होते रहते हैं। मुँह, जीभ, आमाशय, आँतें जैसे प्रमुख अवयव मिलकर अपने-अपने ढंग के अपने-अपने काम करते रहते हैं और पाचन का एक नियत कार्य मिल-जुलकर पूरा करते हैं। यदि प्रक्रिया आदि से ही गलत हो जाय, चबाने के काम में ही अधूरापन छोड़ दिया जाय ,तो आगे की मशीन अपना काम ठीक तरह कैसे पूरा कर सकेगी  ?

खाने का सही तरीका यह था कि यदि प्रवाही - पदार्थ उदरस्थ किये जाने हैं , तो उन्हें घूँट-घूँटकर चम्मच से थोड़ा-थोड़ा लेते हुए पेट में पहुँचाया जाता। रोटी जैसी ठोस चीज खायी जानी है , तो उन्हें दाँतों से पीसकर गले से नीचे उतरने जितनी बारीक लुगदी बनाया जाता। जल्दबाजी में अधकुचले ग्रास गले से नीचे उतारने में हमारा आलस्य ही आड़े आता है। दाँतों को श्रम क्यों करना पड़े ? खाने में देर क्यों लगे ? जैसे उतावली भरे आग्रह मन में रहते हैं ; अस्तु अधकुचले ग्रासों को आगे धकेलने की आतुरता को कार्यान्वित करने के लिए रोटी के साथ दाल जैसी पतली चीजें मिलाकर उसे गीला कर दिया जाता है और चबाने के श्रम से बचने की चतुरता बदल ली जाती है। जबकि होना यह चाहिए था कि रोटी को अकेली चबाकर पीसा और प्रवाही बनाया जाता। भले ही इसमें थोड़ी देर लग जाती। दाल आदि पतली चीजों को अलग से खाना सुविधाजनक रहता। उन्हें भी थोड़ी देर मुँह के स्रावों का सम्मिश्रण कराने के बाद आगे धकेला जाता। कम पीसे और कम मुख स्राव मिले ग्रास, प्रवाही पदार्थों की सहायता से गले से नीचे उतर तो जाते| पर पचने में भारी असुविधा उत्पन्न करते हैं। चबाने में आलस्य और उतावली बरतकर हम जो समय बचाते हैं , उसकी तुलना में कई गुना अधिक समय पचने में लग जाता है। जो लाभ सोचा गया था ,वह हानि बनकर सामने आता है। भले प्रकार पीसे भोजन को निचोड़कर अग्नि जितना पोषक - रस प्राप्त कर सकती थी , उसकी तुलना में बहुत थोड़ा अंश ही उनके पल्ले पड़ता है। अधिक श्रम करना पड़ा और लाभ कम मिला। यह घाटा उस मूर्खता का परिणाम है ; जो ग्रास को जैसे-तैसे, जल्दी-पल्दी गले से नीचे उतारने के रूप में बरती जाती है। पेट का खराब होने और उसके फलस्वरूप पूरे शरीर के दुर्बल एवं रुग्ण बनते जाने की विपत्ति में भोजन सम्बन्धी बुरी आदतों की ही सबसे बड़ी भूमिका है। उन्हीं में से एक ,मुख में बरती गई उतावली छोटी दीखते हुए वस्तुतः बहुत बड़ी भूल है। यदि इससे बचा जा सकता ,तो आहार के लिए किये गये खर्च को, पकाने वाले के श्रम को तथा पूरे शरीर- तन्त्र पर पड़ने वाले भार को बहुत कुछ बचाया जा सकता था।

भोजन सम्बन्धी बुरी आदतों का पर्यवेक्षण  करने पर एक नहीं ,अनेक की चाण्डाल चौकड़ी गुंथकर बैठी हुई दिखाई पड़ती है। स्वाद के प्रलोभन में जल्दी-जल्दी कुछ न कुछ खाते रहने की आदत भी ऐसी ही है | खिचड़ी हांडी को पकने देने के बीच में यदि उसमें नये-नये दाल-चावल डालते रहा जाय , तो उसका क्या नतीजा होगा? यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। पहले पड़े हुए बुरी तरह गल धुल रहे होंगे और पीछे वाले तब तक कच्चे ही बने रहेंगे। यदि यही क्रम जारी रहे ,तो उस हांडी में हमेशा कुछ भाग जला हुआ-कुछ पका हुआ-कुछ अधपका बना रहेगा और वही कभी खाने योग्य न बन सकेगी। तरीका यही सही है कि एक बार चूल्हे पर चढ़ाई हुई हांडी को शांतिपूर्वक पकने दिया जाय और जब नीचे उतर आवे ,तब उसमें दूसरी किस्त भरी और पकाई जाय। रसोई घर में कोई ऐसी भूल नहीं करेगा कि दाल में कच्ची-पक्की मिलाते चलने की उतावली करे और उपहासास्पद बने ; पर हम यही करते रहते हैं। सवेरे नाश्ता, दोपहर भोजन ,तीसरे पहर फिर जलपान, रात को भोजन तो आम बात है ही। इसके बीच-बीच थोड़ी-थोड़ी देर बाद जायका चखने को मन करता रहता है और खाने के लिए कुछ न कुछ ढूँढ़ा, समेटा जाता रहता है। यह आदत छोटी लगते हुए भी पाचनतन्त्र की क्रिया पद्धति को लड़खड़ा देने में किसी भयंकर आक्रमणकारी का ही काम करती है।

नाश्ते की छूट कठोर श्रम करने के लिए सवेरे से ही खेत या कारखाने में जाने वालों को मिल सकती है। हलका काम करने वालों के लिए तो सवेरे का नाश्ता हर दृष्टि से हानिकारक है। रात्रि में सोते रहने के कारण पाचनतन्त्र का काम शिथिल हो जाता है और प्रातः उठने तक पेट हलका नहीं हो पाता, ऐसी दशा में दोपहर के भोजन तक उसे इतना अवसर देना चाहिए कि रात के बचे हुए काम को पूरी तरह निपटा लें। नाश्ता इस कार्य में भारी रुकावट पैदा करता है।

सवेरे नींबू पानी का एक गिलास पिया जा सकता है। खाली पानी से भी काम चल सकता है। बहुत हुआ तो दूध, छाछ, उबले शाकों का रसा, फलों का रस जैसी कोई हलकी पतली चीज ली जा सकती है।

----***----


सूर्य सेवन हमारे लिये परम उपयोगी

सूर्य  सेवन हमारे लिये परम  उपयोगी

महर्षि चरक का कथन है-”आरोग्यं भास्करादिच्छेत् ” अर्थात् आरोग्य की कामना सूर्य भगवान की सहायता से पूरी करें। इस उक्ति में कितना अधिक तथ्य है ; अब विज्ञान के शोध - निष्कर्ष दिन-दिन अधिक स्पष्ट और प्रामाणिक सिद्ध करते चले जा रहे हैं।  किसी समय सूर्य को रोशनी और गर्मी देने वाला एक अग्नि - पिण्ड मात्र माना जाता था। अतिप्राचीनकाल में वह कोई चमत्कारी देवता था और पूजा- उपासना करने वालों को प्रसन्न होकर वरदान देने वाला समझा जाता था। अब गहन अन्वेषण ने उसे पृथ्वी की जड़ -चेतना- सत्ता में विविध-विधि -स्पन्दन उत्पन्न करने वाला शक्ति - स्रोत माना जाता है और स्वीकार किया जाता है कि धरती पर जितना कुछ जीवन- तत्व है, जितनी भी हलचलें हैं, उसका उद्गम केन्द्र सूर्य सत्ता में ही सन्निहित है।

ताप और प्रकाश तो सूर्य के स्थूल अनुदान हैं ; वस्तुतः उसकी ऊर्जा ‘तेजस्’ रूप है ; जिसे विज्ञान की भाषा में ‘सोलर एनर्जी’ कहते हैं। यही प्राणियों की ‘विटल ऐनर्जी’ है। उसका प्रभाव रेडियो एक्टिविटी के रूप में पहचाना जाने लगा है; और समझा जाने लगा है कि विभिन्न शक्तियों की उपलब्धियाँ इसी केन्द्र से होती हैं। प्रगति के लिए जिन शक्ति- अनुदानों की आवश्यकता पड़ेगी, उन्हें सविता देवता के भण्डार से ही उपलब्ध करना पड़ेगा।

भारतीय तत्वदर्शियों ने सूर्य को सहस्र किरण वाला माना है और उनकी प्रधान एवं सुपरिचित किरणों को ‘सात रश्मि’ कहा है।

रवे रश्मि सहस्रं यत् परांड़.मया समुदाहृतम्।

तेषां श्रेष्ठाः पुनः सप्त रश्मियो गृह योन यः॥

-वायु पुराण

अर्थात् सूर्य की सहस्र रश्मियाँ हैं, उनमें से सात प्रधान हैं। ऋग्वेद 10।139।9 कौशीतकी ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में भी सात रश्मियों का वर्णन है। उनके नाम (1) सुषुम्णः (2) हरिकेशः (3) विश्वकर्मा (4) संपहसु (5) अर्वावसु (6) विश्वश्रवः (7) स्वराट् गिनाये गये हैं। उन नामों में उन विशेषताओं एवं शक्तियों का संकेत है , जो भौतिक जगत में प्रगति का और आत्मिक जगत में ब्रह्मतेजस् का पथ प्रशस्त करती है। सात रंगों के रूप में हम उनका प्रत्यक्ष परिचय चर्मचक्षुओं से भी प्राप्त करते हैं।

इंग्लैण्ड की शरीर विज्ञानी " श्रीमती हैरियट चिक" ने बताया है कि सूर्य धूप का सेवन मनुष्यों के लिए अन्न तथा दूध की तरह ही उपयोगी है। उनने रोगी और दुर्बलों को प्रातःकालीन धूप को नंगे बदन पर पड़ने देने की सलाह दी है ; और जिनने उस प्रयोग को नियमित रूप से चलाया है, उन्हें आशातीत लाभ भी हुआ है।

जो बाबू लोग बन्द दफ्तरों में बैठे रहते हैं,- जो श्रमिक अंधेरे कारखानों में काम करते हैं,- स्त्रियाँ जिन्हें घरों में कैद खाने में ही जिन्दगी गुजारनी पड़ती है ;धूप से वंचित रहने के कारण ही दुर्बल रहते हैं और आये दिन बीमारियों का शिकार बनते रहते हैं। यदि उन्हें खुली धूप में रहने का अवसर मिला होता ,तो निश्चय ही अस्वस्थता की दयनीय दुर्दशा से बच सकते थे। छोटे घरों की बनावट में खुली धूप और खुली हवा जाने की आर-पार जाने वाली खिड़कियाँ ,छोड़ी गई होतीं तो सन्दूकनुमा बने बिजली के पंखों और बत्तियों के सहारे रहने योग्य बने हुए विशाल भवनों की अपेक्षा, वे कहीं अधिक स्वास्थ्यकर होते। जमीन के नीचे या ऊपर तहखानेनुमा घिरे हुए मकान बनाने की पद्धति भी उतनी ही दुर्भाग्यपूर्ण है, जितनी कि आटे और शाकों के छिलके फेंक देने की। सूर्य किरणों को दैनिक जीवन से जितनी दूर रखा जायेगा, अस्वस्थता हमें उतनी ही अधिक घेरेगी। सूर्य की खुली किरणों से जो जितना दूर रहेगा , उसी अनुपात से अविकसित और दुर्बल रहना पड़ेगा। छाया वाली जगहों में वनस्पतियाँ प्रायः उगती और बढ़ती ही नहीं। इसका कारण उनका सूर्य किरणों से वंचित रहना ही है। बड़े पेड़ों के नीचे छोटे पौधे उगते नहीं, उसका कारण केवल यही नहीं है कि पेड़ उन पौधों के खुराक खा जाते हैं ; वास्तविक कारण यह है कि उन्हें छाया ढके रहने के कारण धूप से वंचित रहना पड़ता है। बड़े पेड़ों की जड़ें गहरी होती हैं और वे अपनी खुराक गहराई में जाकर खींचती हैं ;जबकि छोटे पौधे या घास जमीन की ऊपरी उथली सतह पर ही अपनी जड़ें सीमित रखते हैं ;  इससे खुराक खींचने वाली बात उतनी महत्वपूर्ण नहीं है जितनी उनके विकसित न होने में सूर्य किरणों के प्राप्त न होने की कठिनाई।

अनाज के पकने में, फलों के उत्पादन में, सूर्य किरणों का अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान रहता है। बीजों ,फलों और शाकों के ऊपरी छिलके में महत्वपूर्ण खनिज, क्षार विटामिन और प्रोटीन पाये जाते हैं | यह अनुदान उन्हें सीधे सूर्य किरणों के सम्पर्क से मिलता है। फलों की ऊपरी सतह सीधी सूर्य सम्पर्क में रहती है और गूदा भीतरी परतों में छिपा रहता है। इससे छिलके में सार तत्व अधिक और गूदे में न्यून मात्रा में रहना, क्यों होता है इसका रहस्य सहज ही समझा जा सकता है। छिलके में थोड़ा कड़ापन और कसैलापन देखकर लोग उसे फेंक देते हैं। आटे को छानकर भूसी फेंक देते हैं और शाक-भाजियों के दालों के छिलके उतार देते हैं जबकि इसी भाग में उनकी वास्तविक पौष्टिकता छिपी रहती है। पाक विद्या में घुसी हुई यह मूर्खता अत्यन्त ही दुर्भाग्यपूर्ण है।

शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. सी डब्ल्यू सेलिली अपने अस्पताल में आने वाले रुग्ण बालकों के अभिभावकों को यह सलाह दिया करते थे कि वे बच्चों को आधा घन्टा सूर्य ताप का सेवन तो अवश्य ही कराया करें। यह औषधि उपचार से कम लाभदायक नहीं है।

डॉक्टर वारिन ने अपने प्रयोगों से बताया कि किस प्रकार सूर्य किरणों का उपयोग करके शरीर में फास्फेट, कैल्शियम, लौह, आयोडीन, फास्फोरस उपयोगी खनिज एवं विटामिनों की पर्याप्त मात्रा बिना उस प्रकार का आहार लिये अथवा औषधि सेवन किये ही प्राप्त हो सकती है।

मानवी स्वास्थ्य का सूर्य सेवन से घनिष्ठ सम्बन्ध है। यह तथ्य पूर्ण प्रतिपादन चिरकाल से स्वीकार किया जाता रहा है कि ‘जहाँ सूर्य किरणें पहुँचती हैं, वहाँ चिकित्सक के जाने की जरूरत नहीं पड़ती। “ सूर्य किरणों से इतनी शक्ति उपलब्ध की जा सकती है जो किसी भी पौष्टिक आहार की अपेक्षा अधिक बलपूर्वक सिद्ध हो और किसी भी कीटाणु नाशक औषधि की तुलना में रोगों के निवारण में अधिक उपयोगी सिद्ध हो। भारतीय तत्ववेत्ता इस रहस्यमयी क्षमता को ‘प्राण तत्व’ कहकर पुकारते रहे हैं और उसे शारीरिक ,मानसिक ही नहीं ,आध्यात्मिक प्रगति का भी आधार बताते रहे हैं। प्राण विद्या भारतीय अध्यात्म शास्त्र का एक अति महत्वपूर्ण अंग रहा है।

अमेरिका के सुप्रसिद्ध डॉक्टर वैविट ने सूर्य किरण चिकित्सा पर दीर्घकालीन शोध तथा प्रयोग करके यह निष्कर्ष निकाला है कि यह चिकित्सा पद्धति संसार की अन्य किसी उपचार प्रक्रिया से कम लाभदायक नहीं है बल्कि वह अपनी सभी सहेलियों की तुलना में अधिक निर्दोष है। उसकी कोई ऐसी प्रतिक्रिया नहीं होती जिससे रोगी को नई व्यथाओं में फंस जाने को शिकायत करनी पड़े।

डॉ. वेविड ने अपने प्रयोगों का विवरण अपने ‘हैल्थ मेनुअले ग्रन्थ’ में प्रकाशित किया है। उनकी एक पुस्तक- ‘प्रिंसपिल्स आफॅ लाइट एण्ड कलर’ भी बहुत प्रसिद्ध हुई। उनका एक और भी ग्रन्थ है - “ ह्मूमन कलेवर एण्ड क्योर” उसमें उन्होंने बताया है कि मनुष्य को जीवनी शक्ति सूर्य से प्राप्त होती है फिर वह रोग निवारण जैसा छोटा प्रयोजन उससे क्यों पूरा नहीं कर सकता।

ऊर्जा विज्ञान के अध्येता विक्टर इनियुशिन ने कहा है हम सामान्य सूर्य किरणों के सीमित प्रभाव से ही परिचित है; यदि उनमें से छान कर रंगीन किरणों का भी उपयोग करना जाने , तो उससे कितने ही महत्वपूर्ण अतिरिक्त लाभ उठाये जा सकते हैं।  नोबेल पुरस्कार प्राप्तकर्ता जीव विज्ञानी 'अल्बर्ट जेन्ट जोजी' ने प्राणियों की त्वचा के रंग द्वारा सोखी जाने वाली विभिन्न स्तर की सूर्य किरणों का उल्लेख किया है और बताया है कि उनकी विशेषताएं किस प्रकार इस रंग विज्ञान के आधार पर सूर्य देवता द्वारा अनुदान से मिलती है। इसी स्थापना को उसके अनुवर्ती विक्टर इनियुशिन ने अधिक खोजबीन करके क्यूलर बायोलॉजी के रूप में सुव्यवस्थित किया था।

सूर्य की सात किरणों के अपने-अपने गुण एवं प्रभाव हैं। लाल, नीला और पीला। इन्हीं के सम्मिश्रण से अन्य रंग बनते हैं। सूर्य किरणों पर भी यह बात लागू होती है। सप्त किरणों का उद्गम इन विविध रंग प्रवाहों को भी ठहराया जा सकता है। सूर्य किरण चिकित्सा में प्रधान तथा इन तीन रंगों से और आवश्यकतानुसार उनके सम्मिश्रण से रुग्ण अवयवों को प्रभावित करने का प्रयत्न किया जाता है। लाल रंग गर्मी एंव उतेजना उत्पन्न करता है |  इसके विपरीत नीला रंग शान्ति एवं शीतलता प्रदान करता है। पीले रंग को पाचक एवं शमन समाधान का एक कह सकते हैं। रोग के चिन्हों को देखकर यह समझा जा सकता है | कि सर्दी की अधिकता या गर्मी की अधिकता या गर्मी की अधिकता से रुग्ण अवयव को कष्ट सहना पड़ रहा है। अथवा अवरोध से विकृति से पीड़ा उत्पन्न हुई है। इसी निदान के आधार पर उपरोक्त तीनों रंगों में से किसी विशेष का प्रयोग करने का निश्चय करना पड़ता है। यदि इनमें से किन्हीं के सम्मिश्रण जैसे लक्षण मालूम पड़ते हैं, तो फिर उपचार के लिए मिश्रित रंगों का प्रयोग किया जाता है। सभी जानते हैं कि पीला-नीला मिलने से हरा, नीला-लाल बनने से नारंगी, नीला-लाल बनने से बैंगनी रंग बनता है। काला और सफेद रंग सूर्य किरण चिकित्सा में काम नहीं आता; अस्तु उपचारकर्ता उपरोक्त तीन प्रधान और तीन मिश्रित कुल छह रंगों का प्रयोग करते हैं। मिश्रण की मात्रा में न्यूनाधिकता लाने से तो फिर सैकड़ों हजारों रंग बन सकते हैं। किस रोग से भूल में किस-किस प्रकार की विकृतियों का समावेश है और उनके उपचार में किस रंग का कितना न्यूनाधिक मिश्रण किया जाय यह पूर्णतया चिकित्सक की सूझ-बूझ और दूरदर्शिता पर निर्भर रहता है। सही निर्णय पर पहुँचने के लिए कई परिवर्तन करने पड़ते हैं। निदान और उपचार यदि सही मिल जायें ,तो यह निर्णय सही हो कि किस रंग का प्रयोग किया जाना उपयुक्त है ,तो फिर रोग निवारण में सफलता मिलना बहुत ही सरल हो जाता है।

सविता देवता की भौतिक उपासना सूर्य सेवन से ,आध्यात्मिक उपासना 'तेजस्' का ध्यान करते हुए की जा सकती है। उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर आशाजनक प्रभाव पड़ता है।


अकबर के यहाँ माँगने के लिए गया (kahani)

एक फकीर बादशाह अकबर के यहाँ माँगने के लिए गया, फकीर ने देखा कि अकबर खुदा की इबादत कर यह दुआ माँग रहे थे कि उसकी धन दौलत बरकरार रहे तथा उसका साम्राज्य वैसा ही बना रहे। फकीर यह देख लौटने लगा। इसी बीच बादशाह की इबादत भी पूरी हो गई। बादशाह ने पूछा, वह क्यों आया था व बिना बताये, बिना कुछ कहे व माँगे ही क्यों वापस जा रहा है। फकीर ने उत्तर दिया, “ मुझ में व आप में क्या अन्तर रहा, मैं आपसे माँगने आया था पर मैंने देखा कि आप भी अपने लिए किसी और से माँग रहे हैं, एक भिखारी फिर दूसरे भिखारी से क्यों माँगे, अतः मैं अब उसी सर्वशक्तिमान से माँगने जा रहा हूँ जो सबको देता है व सबके साथ आपको भी। भिखारी की उक्ति बादशाह ने समझी- बात सच है। याचना में मध्यस्थता कैसी?

----***----


ध्यान योग का पूर्वाभ्यास शिथिलीकरण मुद्रा से!

ध्यान योग का पूर्वस्थान शिथिलीकरण मुद्रा से

***********

ध्यान योग का एक सत्परिणाम शारीरिक एवं मानसिक तनाव को दूर करना है। अधिक श्रम से, काम करने के क्षेत्र में रहने वाली प्रतिकूलताओं से और मौसम के दबाव से, प्रायः थके हुए शरीर में तनाव उत्पन्न हो जाता है और बेचैनी अनुभव होती है। इस स्थिति में श्रम में खर्च होने वाली शक्ति से भी अधिक सामर्थ्य नष्ट होती है। मानसिक तनाव दूसरों के अप्रिय व्यवहार से -प्रतिफल परिस्थितियों से अथवा अपने ही चिन्तन तन्त्र की दुर्बलता से उत्पन्न होते हैं। भावुक, आतुर एवं आवेशी प्रकृति के मनुष्य प्रायः तनिक-तनिक सी बात पर सन्तुलन खो बैठते हैं। आशंकाएंँ, कुकल्पनाएंँ भी कम हैरानी उत्पन्न नहीं करती। अधीर और भीरु प्रकृति के व्यक्ति तिल का ताड़ बनाते और उद्विग्र रहते देखे गये हैं। कामना पूर्ति में व्यवधान पड़ने पर भी कई लोग बेतरह विक्षुब्ध हो उठते हैं। ऐसे-ऐसे अनेक कारण मानसिक उत्तेजना के हो सकते हैं। उत्तेजना का प्रत्यक्ष लक्षण तनाव है जिसे बढ़े हुए रक्तचाप, बेचैनी, अनिद्रा, खोज आदि लक्षणों से सहज ही जाना जा सकता है

शारीरिक एवं मानसिक तनावों में मनुष्य की असाधारण क्षति होती है। कहते हैं कि एक घण्टे का क्रोध एक दिन के बुखार जितनी क्षति पहुँचाता है। शोक के प्रसंगों पर नींद, भूख सभी गायब हो जाती है। तनाव किसी भी प्रकार का किसी भी कारण से उत्पन्न हुआ क्यों न हो उससे सामयिक कष्टों के अतिरिक्त दूरगामी दुष्परिणाम भी उत्पन्न होते हैं। इन हानियों को समझते हुए यथा सम्भव उसके उपचार भी किये जाते हैं। शामक औषधियाँ ली जाती हैं। नींद की गोलियों से मस्तिष्क का भार हलका करने के प्रयत्न होते हैं। नासमझ व्यक्ति इसके लिए नशेबाजी पर उतर आते हैं। फिर भी अभीष्ट एवं स्थायी समाधान हो नहीं पाता। आज के समय में तनाव की व्यथा अन्य शारीरिक, मानसिक रोगों की तुलना में कम नहीं, वरन् अधिक ही होती है।

तनाव दूर करने का एक सहज एवं प्रभावशाली उपचार ‘ध्यान’ हो सकता है। मन का शासन पूरे शरीर तन्त्र पर होता है। यदि मन को शान्त, शिथिल एवं समाधान की स्थिति पर पहुँचाया जा सके तो उसका प्रभाव न केवल मस्तिष्क पर शरीर के समूचे नाड़ी संस्थान पर पड़ता है और तनाव से छुटकारा पाने में भारी सहायता मिलती है। इसके लिए शिथिलता की मनःस्थिति उत्पन्न करनी पड़ती है। शिथिलासन-शिथिलीकरण मुद्रा के उपचार इसी निमित्त होते हैं।

अध्यात्म साधना की दृष्टि से मनःस्थिति शान्त करना प्राथमिक प्रयोग समझा जा सकता है। यदि विचारों की अनियन्त्रित घुड़दौड़ चल रही होगी, चंचलता का आवेश छाया होगा तो फिर उपासना की भाव भूमिका बन ही नहीं सकेगी। अशान्त मन से आत्म-चिन्तन, भक्ति साधन जैसे प्रयोजन सध ही नहीं पाते। किसी प्रकार कर्मकाण्डों की चिन्ह पूजा भर करते रहने की बात कुछ बनती नहीं है।

शारीरिक और मानसिक उत्तेजनायें आत्मिक -साधनाओं में अत्यन्त बाधक होती है। उनके कारण महत्वपूर्ण साधना विधानों के लिए किया गया भारी प्रयास पुरुषार्थ भी निरर्थक चला जाता है। इसलिए तत्वदर्शी आत्मिक प्रगति की दिशा में बढ़ने के लिए प्रयत्नशील पथिकों को सदा से यही शिक्षा देते रहे हैं कि शरीर को तनाव रहित और मस्तिष्क को उत्तेजना रहित रखा जाय। ताकि उस पर दिव्य चेतना का अवतरण निर्वाध गति से होता रह सके। क्रिया-कलापों की भगदड़ से मांस पेशियों में, नाड़ी संस्थान में तनाव रहता है। बाहर से स्थिर होते हुए भी यदि शरीर के भीतर आवेश छाया रहा, तो उस उफान के कारण   मन का स्थिर एवं एकाग्र रह सकना भी सम्भव न होगा।

मन मस्तिष्क में अनियन्त्रित हलचलें चल रही होंगी, तरह - तरह के विचार उठ रहे होंगे तो जल में उठती हुई हिलोरी की तरह अस्थिरता ही बनी रहेगी। स्थिर जल राशि में चन्द्र, सूर्य, तारे आदि का प्रतिबिम्ब ठीक प्रकार दृष्टिगोचर होता है, पर हिलते हुए पानी में कोई छवि नहीं देखी जा सकती। विचारों की हड़कम्प यदि मस्तिष्क में उठती रहें, तरह-तरह की कल्पनाएंँ घुड़दौड़ मचाती रहें तो फिर ब्रह्म सम्बन्ध की प्रगाढ़ता में निश्चित रूप से अड़चन पड़ेगी। मस्तिष्क जितना अधिक विचार रहित, खाली होगा उतनी ही तन्मयता होगी और आध्यात्मिक परमात्मा का मिलन संयोग अधिक प्रगाढ़ एवं प्रभावशाली बनता चला जायगा।

आकाश में जब बिजली कड़क रही हो या आँधी तूफान का मौसम चल रहा हो तो हमारे रेडियो में आवाज साफ नहीं आती। कड़कड़ जैसे व्यवधान उठते रहते हैं और प्रोग्राम ठीक से सुनाई नहीं पड़ते। अन्तरिक्ष से भौतिक शक्तियों एवं आत्मिक चेतनाओं का सुदूर क्षेत्र से मनुष्य पर अवतरण होता रहता है। ब्राह्मी चेतना एक प्रकार का ब्रॉडकास्ट केन्द्र है जहाँ से मात्र संकेत, निर्देश, सूचनाएंँ ही नहीं वरन् विविध प्रकार की सामर्थ्यें भी प्रेरित की जाती रहती हैं। सूक्ष्म जगत में यह क्रम निरन्तर चलता रहता है | जहाँ सही रेडियो यन्त्र लगा है, जहाँ व्यक्ति ने अपने आपको सही अन्तःस्थिति में बना लिया है वहाँ यह सुविधा रहेगी कि ब्रह्म चेतना की विविध सूचनाओं को ग्रहण करके अपनी ज्ञान चेतना को बढ़ा सकें। इतना ही नहीं प्रेरित दिव्य शक्तियों को ग्रहण करने और धारण करने का लाभ उठाकर अपने को असाधारण आत्म-बल सम्पन्न बना सकें। परन्तु यह सम्भव तभी है जब मनुष्य अपने मस्तिष्क को तनाव रहित-शान्त स्थिति में रखे। आँधी-तूफान , कड़क और गड़गड़ाहट की उथल-पुथल रेडियो को ठीक में काम नहीं करने देती। मनुष्य का शरीर और मन उत्तेजित -तनाव की स्थिति में रहे तो फिर यह कठिन ही होगा कि वह ब्रह्म चेतना के साथ अपना सम्बन्ध ठीक से जोड़ सके और उस सम्मिलन की उपलब्धियों का लाभ उठा सके।

तनाव की स्थिति से उबरने के लिए शरीर को ढीला और मन को खाली रखना चाहिए। इसके लिए शिथिलीकरण मुद्रा का अभ्यास करना पड़ता है। शिथिलीकरण का स्वरूप यह है कि देह को मृतक-निष्प्राण मूर्छित, निद्रित, निःचेष्ट स्थिति में किसी आराम कुर्सी या किसी अन्य सहारे की वस्तु से टिका जाय और ऐसा अनुभव किया जाय मानो शरीर प्रसुप्त स्थिति में पड़ा हुआ है। उसमें कोई हरकत हलचल नहीं हो रही है। यह मुद्रा शरीर को असाधारण विश्राम देती और तनाव दूर करती है। उच्चस्तरीय ध्यानयोग के लिए यही स्थिति सफलता का पथ-प्रशस्त करती है। इस साधना के लिए समय का बन्धन नहीं है तो भी रात्रि का समय अधिक उपयुक्त रहता है।

इस समस्त विश्व को पूर्णतया शून्य रिक्त अनुभव किया जाय। प्रलय के समय ऊपर नील आकाश नीचे नील जल स्वयं अबोध बालक की तरह कमल पत्र पर पड़े हुए तैरना, अपने पैर का अंगूठा अपने मुख से चूसना इस प्रकार का प्रलय चित्र बाजार में भी बिकता है। मन को शान्त करने की दृष्टि से यह स्थिति बहुत ही उपयुक्त है संसार में कोई व्यक्ति, वस्तु, हलचल, समस्या, आवश्यकता है ही नहीं, सर्वत्र पूर्ण नीरवता ही भरी पड़ी है- यह मान्यता प्रगाढ़ होने पर मन के लिए भोगने, सोचने, चाहने का कोई पदार्थ या कारण रह ही नहीं जाता। अबोध बालक के मन में कल्पनाओं की घुड़दौड़ की कोई गुंजाइश नहीं रहती। अपने पैर के अंगूठे में से निसृत अमृत का जब आप ही परमानन्द उपलब्ध हो रहा है तो बाहर कुछ ढूँढ़ने खोजने की आवश्यकता ही क्या रही? इस उन्मनी मुद्रा का आस्थापूर्वक यदि मन जमाया जाय तो उसके खाली एवं शान्त होने की कोई कठिनाई नहीं रहती। कहना न होगा कि शरीर को ढीला और मन को खाली करना ध्यानयोग की सफलता के लिए नितान्त आवश्यक है।

शरीर को मृत समान निर्जीव करने, काया से प्राण को अलग मानने, अर्धनिद्रित स्थिति में माँस पेशियों को ढीला करके आराम कुर्सी जैसे किसी सुविधा-साधन के सहारे पड़े रहने को शिथिलीकरण मुद्रा कहते हैं। ध्यान योग के लिए यही सर्वोत्तम आसन है। शरीर को इस प्रकार ढीला करने के अतिरिक्त मन को भी खाली करने की आवश्यकता पड़ती है। ऊपर नील आकाश-नीचे अनन्त नीलजल-अन्य कोई पदार्थ, कोई जीव कोई परिस्थिति कहीं नहीं, ऐसी भावना के साथ यदि अपने को निर्मल निश्चिंत मन वाले बालक की स्थिति में एकाकी होने की मान्यता मन में जमाई जाय तो मन सहज ही ढीला हो जाता है। इन दो प्रारम्भिक प्रयासों से सफलता मिल सके तो ही समझना चाहिए कि ध्यानयोग में आगे बढ़ने का पथ-प्रशस्त हो गया।

मस्तिष्क पर क्रोध, शोक, भय, हानि असफलता, आतंक आदि के कारणवश आवेश आते हैं, पर वे स्थायी नहीं होते। कारण समाप्त होने अथवा बात पुरानी होने पर शिथिल एवं विस्मृत हो जाते हैं। उनका प्रभाव चला जाता है। पर कामनाओं की उत्तेजना ऐसी है जो निरन्तर बनी रहती है और दर्द की तरह मनः संस्थान में आवेश की स्थिति बनाये रहती है। घृणा, द्वेष, प्रतिशोध, आशंका जैसे निषेधात्मक और लोभ, मोह, अहंता, वैभव, सत्ता, पद, यश, भोग, प्रदर्शन जैसी भौतिक महत्वाकांक्षाओं की विधेयात्मक कामनायें यदि उग्र हों तो दिन-रात सोते जागते कभी चैन नहीं मिल सकता और अपना अन्तःकरण निरन्तर उद्विग्न उत्तेजित बना रहता है। यह स्थिति ध्यान साधना के लिए-ब्रह्म सम्बन्ध के लिए सर्वथा अनुपयुक्त है।

शरीर को पूरी तरह ढीला और मन को पूरी तरह खाली करना ही शिथिलीकरण मुद्रा का उद्देश्य है। तनाव से पिण्ड छुड़ाने का यह उत्तम उपचार है। इस अभ्यास को करते समय शरीर को ऐसी स्थिति में रखा जाना चाहिए जिसमें माँस पेशियों को नाड़ी संस्थान को पूरी तरह विश्रान्ति मिल सके। उच्चस्तरीय ध्यानयोग में पद्मासन, सिद्धासन आदि लगाने पड़ते हैं। कमर को सीधा रखना पड़ता है। ताकि मेरुदण्ड गत सुषुम्ना में ब्रह्माण्डीय चेतना का दिव्य अवतरण निर्वाध गति से सम्भव हो सके। इसके लिए पूर्वाभ्यास के रूप में शिथिलीकरण मुद्रा का अभ्यास है। इसमें शरीर को ऐसी स्थिति में रखा जाता है जिसमें किसी प्रकार का दबाव न पड़े। अस्तु इसके लिए ‘शवासन’ का उपयोग करना पड़ता है। शवासन का अर्थ है- मुर्दे की तरह निःचेष्ट पड़े रहना यह बिस्तर पर पड़े-पड़े भी हो सकता है। आराम कुर्सी पर लेटा जा सकता है। दीवार या मसनद का सहारा लेने में भी हर्ज नहीं है। इस प्रकार पड़े रहने के उपरान्त सोचना पड़ता है कि शरीर में से प्राण निकल गया और काया मृतक जैसी स्थिति में पहुँच गई है। मृतक के अवयवों को कोई काम नहीं करना पड़ता। फलतः वे पूरे विश्रान्ति में रहते हैं। समाधि में भी यही स्थिति होती है। तुरीयावस्था में पहुँचने पर प्राण को भी ऐसी ही अनुभूति होती है। इनमें न केवल शरीर पूरी तरह शिथिल रहता है वरन् मन को भी कल्पना रहित बनना होता खाली रहना पड़ता है। संसार भर में प्रलय का साम्राज्य छा जाने की मान्यता इसी मनःस्थिति को लाने के लिए संकल्पपूर्वक अपनानी पड़ती है। प्रलय काल में कहीं को व्यक्ति, प्राणी पदार्थ शेष ही नहीं रहता ऐसी दशा किन्हीं के साथ किसी प्रकार का सम्बन्ध कैसे रखा जाय? किसी पदार्थ की कामना कैसे की जाय जबकि कहीं कुछ है ही नहीं? ऐसी दशा में परिस्थितियों का अनुकूलता, प्रतिकूलता उत्पन्न होने का प्रश्न भी कहाँ उठता है? मृतक के लिए चिन्ता या आकांक्षा करने को कोई कारण नहीं। जब सबसे नाता टूट ही गया और शरीर न रहने पर किसी से कोई आदान-प्रदान हो ही नहीं सकता तो निरर्थक कल्पनाओं की घुड़दौड़ मचाने से क्या लाभ?

शवासन में शरीर को निद्रावस्था अथवा मृत्यु जैसा विश्राम-मन को प्रलय काल जैसा चिन्तन विराम देने की स्थिति उत्पन्न की जाती है। मनोनिग्रह की यही प्रथम भूमिका है। इससे शारीरिक और मानसिक तनावों पर नियंत्रण सम्भव होता है। उच्चस्तरीय आध्यात्मिक ध्यान सफलतापूर्वक कर सकने की भूमिका बनती है अस्तु इस प्रयोग के अभ्यास को दैनिक कार्यक्रम में स्थान देना चाहिए। आरम्भ पन्द्रह मिनट से करके उसे क्रमशः बढ़ाना चाहिए और सुविधानुसार आधे घण्टे तक पहुंचाना चाहिए। यह बाल वृद्ध हर किसी के लिए समान रूप से उपयोगी है।

----***----


गढ़े खजाने ढूँढ़ने पर भी मिलते क्यों नहीं?

गढ़े  खजाने  ढूँढ्ने  पर भी मिलते क्यों नहीं ?

भूमिगत खजानों की चर्चा संसार में अन्यत्र भी होती रहती है, पर भारत में तत्सम्बन्धी तथ्यों और किम्वदंतियों का ऊहापोह अपेक्षाकृत अधिक ही होता रहता है। इन खजानों में कितनी राशि है ? कहाँ छिपी है? और उसे प्राप्त करने के लिए क्या किया जा सकता है ? प्रायः इन्हीं प्रश्नों पर चर्चा होती रहती है। खुदाई के अनेक प्रयत्न होते रहते हैं ? पर उनमें सफलता कदाचित ही थोड़ी बहुत मिल पाती है। इससे दो निष्कर्ष निकलते हैं एक तो यह कि वे गाथाएंँ असत्य हैं, दूसरा यह कि उनका स्थान जानने और प्राप्त करने के उपाय हस्तगत नहीं हो पाते। इन्हीं दो संदर्भों में छानबीन चलती रहती है। उत्सुक व्यक्ति इन्हीं के टिप्पणी पर माथा पच्ची करते रहते हैं और उपाय करते हैं कि किसी प्रकार उस धन राशि का पता लगाया और लाभ उठाया जाय।

इस सन्दर्भ में एक तीसरा तथ्य और भी अधिक विचारणीय होना चाहिए कि सृष्टा की अनेकानेक विधि व्यवस्थाओं में धन सम्बन्धी नीति, मर्यादा और व्यवस्था क्या है ? उसे न समझ पाने पर एक ऐसी बाधा बनी रहेगी जिसके कारण उस भूमिगत धन का पाना और पाकर उसे लाभ उठाना सम्भव हो ही नहीं सकेगा।

सर्वविदित है कि इस धरती और समुद्र के गर्भ में बहुमूल्य खनिजों के विशाल भण्डार दबे पड़े हैं। सोना, चाँदी, ताँबा, लोहा आदि धातुओं की खदानें आखिर जमीन से ही तो निकलती है। कोयले को काला सोना और तेल को पतला सोना कहा जाता है। हीरा, पन्ना, नीलम, पुखराज आदि रत्न भी खनिज ही हैं और जमीन से खोदकर निकाले जाते हैं। मोती, मूँगा आदि समुद्र में पाये जाते हैं। दूसरे रासायनिक पदार्थ भी प्रकारान्तर से भूमि और जल सम्पदा ही हैं। यह समझने में किसी को कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि भूमि ही रत्न गर्भा है। समुद्र को भी एक सीमा तक ऐसा ही श्रेय मिल सकता है। यह सम्पदा सुलभ क्यों नहीं ? इसका उत्तर एक ही है कि मनुष्य के उचित श्रम, मनोयोग, कौशल के फलस्वरूप ही सही पारिश्रमिक के रूप में ही प्रकृति यह सम्पदा किसी को देना चाहती है। पात्रता के मूल्य पर अनुदान पाने की ही सृष्टि व्यवस्था है। मुफ्त की सम्पदा अनैतिक है। भले ही वह जुए, सट्टे में कमाई गई हो, उत्तराधिकार में पाई गई हो, लूटकर लाई गई हो। जो उचित परिश्रम के प्रखर कौशल के आधार पर कमाया गया है वही नैतिक है। नीति युक्त सम्पदा के साथ एक और मर्यादा जुड़ी हुई है कि उसका उपभोग या संग्रह नहीं हो सकता, उसका उपयोग होना चाहिए और सर्वजनीन वितरण भी। व्यक्तिगत लिप्सा के लिए सम्पदा को जमा करना माता लक्ष्मी को बन्दिनी, रखेल औरत का दर्जा देने बराबर है। इसी प्रकार सामान्य लोक निर्वाह की अपेक्षा बहुत अमीरी का उपभोग भी अपने से छोटों के लिए मिलने वाले भाग को हड़प जाने के बराबर है। मनुष्यकृत कानून में दण्ड की व्यवस्था भले ही रखी न गई हो, पर ईश्वरीय नीति मर्यादा से यह धारा सुनिश्चित रूप से विद्यमान है कि सम्पदा उचित पौरुष और कौशल के सहारे ही कमाई जाय और उपार्जन के उपरान्त उसका उपयोग अपने लिए उतना ही किया जाय जितना कि औसत नागरिक के हिस्से में आता है। शेष को संव्याप्त अभाव और पिछड़ेपन के निवारण में तत्काल उदारता पूर्वक वितरित कर दिया जाय।

इस नीति मर्यादा की कसौटी पर जब खजानों में देवी सम्पदा को परखा जाता है तो प्रतीत होता है कि वह हर दृष्टि से खोटी है। उसमें धन सम्बन्धी नीति मर्यादाओं का पूरी तरह उल्लंघन हुआ है। फलस्वरूप उसके संग्रही वैसा लाभ न उठा सके जैसा कि वे चाहते थे। जिस प्रकार उनने उसे हड़पने की चेष्टा की उसी प्रकार प्रकृति ने उनके हाथ से छीन लिया। यह छीना भी सामान्य रीति से नहीं वरन् करारे तमाचे लगा-लगाकर उसे उगलने के लिए बाध्य किया गया।

भूमिगत खजानों में कितनी राशि है और किस स्थान पर दबी है? यह जानने से पूर्व इस उपेक्षित तथ्य को भी जानना चाहिए कि वह किस प्रकार पाई और क्यों छिपाई गई है? स्पष्ट है कि वह धन राशि किसी ने उचित परिश्रम करके नहीं कमाई है। उसे न्यायोचित परिश्रम का प्रतिफल नहीं कह सकते। वह विशुद्ध रूप से लूटमार का धन है। ऐसी लूटमार जिसके कारण अनेक को अपने निर्वाह साधनों से लेकर प्राणों तक का परित्याग करना पड़ा है। सभी जानते हैं कि लुटेरे, उठाईगीरे, ही नहीं होते। वे उत्पीड़न और आक्रमण की असह्य प्रताड़नाएंँ भी देते हैं |जिससे छीना गया है उसके सामान्य जीवन-क्रम को उस पदाघात से तोड़-मरोड़कर रख देते हैं। खजाने ऐसे ही लुटेरों का आततायी दुष्प्रवृत्तियों के प्रतिफल हैं। उन्हें जिस निर्दयता के साथ कमाया गया उसी संकीर्णता के साथ व्यक्तिगत उपयोग के लिए जमा करके रखा गया। रखें कहाँ? ऐसा अनीति उपार्जन को दूसरे अधिक बलिष्ठ लुटेरे छीनने को तैयार बैठे रहते हैं। भविष्य में उपभोग के लिए संग्रह और अन्य बलिष्ठों से बचाव की दृष्टि से ही उन्हें भूमिगत किया गया होता है। यदि ऐसा न होता तो उसका न तो संग्रह ही हो पाता और न सामयिक सदुपयोग की व्यवस्था करने की अपेक्षा जमीन में दबा देने की आवश्यकता पड़ती। स्पष्ट है कि इन खजानों की उपलब्धि और छिपाकर रखने की प्रवृत्ति के पीछे नैतिकता की एक किरण भी कहीं दीख नहीं पड़ती। नीति का समावेश होता तो उसे न्यायोचित रीति से कमाने और आवश्यकता से अधिक होने पर तत्काल सामयिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए उसका उपयोग करने की योजना जुड़ी होती, उसे जमीन में दबाने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। अनीति का समावेश जहाँ भी होगा वहाँ देवी अभिशाप बरसेगा और ऐसा प्रसंग बनेगा जिसके अनुसार आक्रान्ताओं को उसका लाभ उठाने से वंचित रहना पड़े। खजानों के लुप्त हो जाने भूमि द्वारा वापिस छीन लिए जाने के पीछे सृष्टा की इसी नीति मर्यादा को काम करते हुए देखा जा सकता है।

कोई जमाना था जब ब्रह्मज्ञानी राजा जनक ने हल चला कर कृषि कर्म द्वारा अपनी व्यक्तिगत गुजारा करते थे और प्रजा द्वारा राजस्व के रूप में उपलब्ध हुए प्रजा धन को प्रजा हित में लगा देने की व्यवस्था बनाते रहते थे। राजा हरिश्चन्द्र ने सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अपना सर्वस्व विश्वामित्र के सुपुर्द कर दिया था। संचय हो जाने पर राज्याधिकारी सर्वमेध यज्ञ का आयोजन करते थे अर्थात् संग्रहीत सम्पदा को सामयिक सत्प्रयोजनों के लिए पूरी तरह खर्च कर डालते थे और खजाने को सहज ही झाड़ बुहारकर पूरी तरह स्वच्छ कर देते थे। जहाँ अनीति उपार्जन ही नहीं है वहाँ संग्रह की आवश्यकता ही क्यों पड़ेगी। विशेषता व्यक्तिगत उद्धत उपभोग की बात तो सोचने तक में न आ सकेगी। ऐसी दशा में ऐसी धन राशि जमा ही न हो सकेगी। जिसे भूमिगत करने की आवश्यकता पड़े। अनैतिकता ही है जो छिपने और छिपाने के जाल-जंजाल बुनती रहती है। खजाने इसी कारण दबते और दबाये जाते हैं।

स्पष्ट है कि डाकुओं की लूटपाट से प्राप्त हुई सम्पदा ही खजानों में दबी पड़ी है। सामान्य व्यक्ति को डाकू कहा जाता है। बलवान को सामन्त, शूरवीर, भूपति आदि नाम दे दिये जाते हैं। यह तो कहने वालों की इच्छा पर निर्भर है | अनीति उपार्जनकर्ता को हेय तो ठहराया जायेगा, भले ही उसे तिरस्कृत नाम दिया जाय अथवा डर के मारे सम्मानित शब्दों में विभूषित किया जाय। तथ्य अपनी जगह पर जहाँ के तहाँ बने रहेंगे। जिन दिनों खजाने जोड़ने और गाढ़ने की आपाधापी थी वह सामन्तवादी जमाना था। उन दिनों जिसकी लाठी उसकी भैंस का जंगली कानून चलता था। फलतः आक्रमण और लूटमार का ही आतंक सर्वत्र छाया रहता था और उसी की तैयारी या सुरक्षा की बात हर किसी के दिमाग पर छाई रहती थी। आये दिन युद्ध ठनते थे। इनका कोई नैतिक आधार नहीं था। प्रजा को सम्पदा, तरुणों और तरुणियों को गुलामों के रूप में पकड़-धकड़, राजमहलों पर अधिकार, शोषण के लिए अधिक भूमि पर अधिकार, निरंकुशता बरतने के लिए अधिक साधन सम्पन्नता जैसे उद्देश्य ही उन दिनों के आक्रमणों के पीछे काम करते थे। इसी कुचक्र में अनेक को निरीह निर्दोष प्राण गंँवाने और मर्मांतक कष्ट सहने पड़ते थे। सामन्तों की सेनाएंँ लूटपाट करती थी। उनका बड़ा भाग तो अधिनायक के पास जा पहुँचता था, पर होता यह भी था कि उनके चतुर सेनापति और सिपाही अपने दांव−पेंच ढूँढ़ते थे और जहाँ भी अवसर मिलता उस लूट के माल का बड़ा भाग अधिनायक तक पहुँचाने की अपेक्षा बीच में स्वयं ही हड़प लेते थे। इसे वे रखें कहाँ? जमीन में दाब देना ही एकमात्र उपाय था। प्रायः यही है वह तात्विक इतिहास जो इन खजानों के पीछे छिपा पड़ा है , जिनकी उखाड़-पछाड़ के लिए कितने ही लोग कितने ही प्रकार से सोचते और ललचाते रहते हैं।

खजाने किस प्रकार जमा हुए इसके कुछ उदाहरण सामने हैं-

अकबर का विश्वासी सेनापति अबुल फजल, हैदराबाद की लूट का धन लेकर दिल्ली वापिस जा रहा था। उसके पास 23 करोड़ के करीब नकदी और लगभग इतनी ही रत्न राशि थी। रास्ते में ओरछा के राजा ने उसे पकड़कर मार डाला ओर सारा पैसा छीन लिया। ओरछा के अभिलेखों में इसका उल्लेख है।

अनीति उपार्जन में एक बड़ी कठिनाई यह रहती है कि संग्रहकर्त्ता की संकीर्ण स्वार्थपरता उसे किसी उपयोगी काम में लगाने की उदारता नहीं दिखा सकती। उसे यहाँ से वहाँ छिपाने फिरने की ही तरकीबें ढूँढ़ती रहती हैं। अन्ततः उसका क्या होता है यह बात ऐसे लोगों के मस्तिष्क में उपजती ही नहीं।

रतलाम के जंगलों में छिपाये गये एक खजाने का विवरण उपलब्ध ताम्र पत्र में इस प्रकार मिलता है- (1) सोना की 1089 ईंटें (2) मोटे मोतियों की माला 256 (3) सोने की छड़ें 11622 (4) खुले मोती 45678 (5) कंठे हीरों के 22 कंठे व अन्य रत्नों के 37 इसके अतिरिक्त अनेक रत्न जड़ित स्वर्ण आभूषणों की बड़ी सूची और भी है।

शाहजहाँ को जब यह लगा कि उसका बेटा औरंगजेब विश्वास पात्र नहीं रहा तो उसने अपने खजाने का बहुमूल्य हिस्सा कानपुर के समीपवर्ती जंगलों में गढ़वा दिया। एक ताम्र पत्र में इसका वर्णन कैथी लिपि में मिलता है। जिससे पता चलता है कि नौ सौ देशों में भी यह सोना, चाँदी तथा जवाहरात भरे गये थे और जमीन में दफनाये गये थे।

खजाने गाढ़ने के समय जो तांत्रिक विधि-विधानों पूजा उपचार की तरह प्रयुक्त होते थे उसका वर्णन देखने से ऐसे विवरण मिलते है जो उस दुरभि संधि के साथ ठीक तरह तालमेल बिठा देते हैं। गाढ़ने वाला अपने निवास से दक्षिण दिशा में उसे गाढ़ता था क्योंकि यह प्रेतों की दिशा है। प्रेतों को उसका संरक्षण नियुक्त करने के लिए आवाहन, पूजन, परिपोषण अनेक पशु-पक्षियों तथा मनुष्यों की बलि देकर किया जाता था। उन्हें घड़ा मद्य प्रस्तुत किया जाता था। इतने उपहार पाकर वे चौकीदारी करते रहने को सहमत किये जाते थे।

कहा जाता है कि यह प्रेत-पिशाच ही सर्पों के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी उस खजाने की रक्षा करते रहते हैं। यह सर्प अपने लिए जो उसे काम में ला नहीं सकते, पर किसी अन्य की भी किसी भले या बुरे उपयोग के लिए लेने नहीं देते। जो उसे प्राप्त करने की कोशिश करता है; उस पर सर्प या प्रेत के रूप में टूट पड़ते हैं और ठीक उसी मनोवृत्ति का परिचय देते हैं जो उस खजाने को जमा करने और गाढ़ने वाले की रही थी। हो सकता है उस संग्रहकर्ता की दुष्प्रवृत्तियाँ ही प्रकारान्तर से सर्प समुदाय या प्रेत संरक्षकों का रूप धारण करके उसकी चौकीदारी में संलग्न रहती हों।

खजाना गाढ़ने की तरह ही उसे उखाड़ना भी खतरे से खाली नहीं है। यह प्रकृति की मर्यादा और ईश्वर की इच्छा के विपरीत है। उपार्जन कठोर परिश्रम और न्याय नीति के आधार पर होना चाहिए। औसत मनुष्य की तरह निर्वाह करके जो शेष बचता है उसे परमार्थ प्रयोजन में लगाते रहना चाहिए, ताकि संग्रह का अवसर ही न आने पावे। औचित्य इसी में है। अनीति से उपार्जन-लोभवश संग्रह-सामयिक आवश्यकताओं की पूर्ति में न लगाकर उसे उत्तराधिकारियों के जमा करने के लिए दाब पर रख देना विवेक दृष्टि से हेय ही कहा जा सकता है। खजाने गाढ़ने के पीछे कोई नीति सत्ता नहीं है। इसी प्रकार बिना श्रम उपार्जित सम्पत्ति के उपयोग की ललक भी नीति युक्त नहीं है। इससे धन का सिद्धान्त और स्वरूप ही विकृत होता है। सम्भवतः इसीलिए खजाने जमीन में जहाँ तहाँ गढ़े होने पर भी वे इसीलिए ऊपर उभरने नहीं पाते कि गाढ़ने वालों की तरह उखाड़ने वालों को भी उससे पश्चात्ताप ही उपलब्ध होगा।

----***----


गायत्री जयन्ती पर सभी परिजन अपनी भावभरी श्रद्धा का परिचय दें

गायत्री   जयन्ती  पर सभी परिजन अपनी

भावभरी श्रद्धा का परिचय दें

**********

गायत्री भारतीय संस्कृति का बीज मन्त्र है। उस छोटे से शब्दसमुच्चय में उस ज्ञान और विज्ञान के समस्त सूत्र विद्यमान हैं जिन्हें अपनाकर भारत भूमि के तेतीस कोटि नागरिक देवमानव बने और समस्त विश्व में प्रगति के पथप्रदर्शक कहलाये। गुरु मन्त्र कहलाने का गौरव उसी को प्राप्त है। वेदमाता, विश्वमाता और देवमाता नामों से उसे सम्बोधन किये जाने में यथार्थता भी है और सार्थकता भी। उपासना करने वाले उसकी प्रतिक्रिया को देखते हुए उसे अमृत, पारस और कल्पवृक्ष कहते हैं। उसे धरती की कामधेनु कहते हैं। इस अलंकारिक प्रतिपादन में तथ्य तथा सत्य दोनों का समावेश है।

व्यापक परिवर्तन और नवनिर्माण के लिए जिस युग शक्ति की आवश्यकता है ,वह प्रचण्ड ऊर्जा गायत्री उपासना के सामूहिक प्रयोगों से ही उत्पन्न होगी। युग निर्माण योजना के विविध क्रिया-कलापों में सामूहिक गायत्री उपासना जोड़कर रखा गया है और समय-समय पर उसके आयोजन होते रहते हैं। गायत्री जयन्ती ज्येष्ठ शुक्ल दशमी वेदमाता महाशक्ति के अवतरण का पुण्यपर्व है , यही गंगा जयन्ती भी है। वस्तुतः एक ही प्रखर पवित्रता का स्थूलरूप गंगा रूप गायत्री है। एक का अवतरण भागीरथ ने दूसरी का विश्वामित्र ने अपनी प्रचण्ड तपसाधना से सम्पन्न किया था। अब उसे ओंर सूक्ष्म रुप युगशक्ति के रूप में उभारने के लिए अपना परिवार नये सिरे से प्रयोगों के साथ सामूहिक उपासना की साधनतपश्चर्या में निरत है। उसे विश्वव्यापी विश्वमाता बनाने का अपना संकल्प है।

इस वर्ष गायत्री जयन्ती 16 जून को है। इस पुण्यपर्व को इस प्रकार मनाया जाना चाहिए कि इस महाशक्ति के प्रति वर्तमान साधकों की निष्ठा अधिक परिपक्व हो और अपरिचितों को उसे अपनाने के लिए अभिनव प्रकाश प्राप्त हो।

गायत्री जयन्ती यों तो अनादिकाल से मनाई जाती रही है ,पर इस पुनर्गठन वर्ष से उसे अखण्ड जप आयोजन  के साथ मनाने की परम्परा क्रियान्वित की जा रही है। उस दिन परिवार के समस्त प्रभाव क्षेत्रों में उसे इसी रूप में मनाने के लिए समग्र उत्साह के साथ तैयारी की जानी चाहिए। समय बहुत ही कम रह गया है। आयोजन वेदमाता की शान और परिजनों की प्रतिष्ठा के अनुरूप होना चाहिए। अस्तु, तैयारियाँ आरम्भ कर दी जानी चाहिए। जागृत आत्माओं के लिए सभी अग्रगामी परिजनों के लिए यह आवश्यक है कि इस सामयिक कर्तव्य का पालन करने के लिए अपना ध्यान इस दिशा में पूरी तरह नियोजित करें। सभी परिजनों को एकत्रितकर कार्यक्रम समझायें और उसके लिए, आवश्यक सहयोग प्राप्त करने के लिए प्रयत्न करें। इस कार्य के लिए अग्रगामी स्तर के- टोली नायकों, जोड़ीदारों और कार्यवाहकों को एक जुट होकर बिना समय गंँवाये परिपूर्ण प्रयत्न करने चाहिए।

गायत्री जयन्ती 16 जून की है। अखण्ड जप ता. 15 को तीसरे प्रहर 3 बजे से आरम्भ करके ता. 16 को ठीक उसी समय समाप्त किया जाना चाहिए। 24 घन्टे की साधना अखण्ड कहलाती है जप ,मौन ,मानसिक होगी। रात्रि में मानसिक जप का ही विधान है। अखण्ड जप बिना होंठ हिलाये ,मानसिक रूप से होना चाहिए। इस साधना में सम्मिलित होने के लिए सभी स्थानीय उपासकों को सम्मिलित होने के लिए अनुरोध करना चाहिए। इसके लिए उनसे सम्पर्क साधना आवश्यक है। नवरात्रियों में जिनने अनुष्ठान किये थे उन सबसे कहना चाहिए कि वे स्वयं तो सम्मिलित रहें ही। दो चार नये साथी भी तैयार करें। संख्या विदित होने पर क्रम बनाया जाय। दिन की अपेक्षा रात्रि में संख्या का घट जाना स्वाभाविक है। इसलिए अन्तर तो रहेगा, फिर भी ऐसा कार्यक्रम बनाया जाय कि दिन में अमुक संख्या में और रात्रि को- अमुक संख्या में जपकर्ताओं की संख्या का सन्तुलन ठीक बना रहे।

जप के अतिरिक्त गायत्री चालीसा -पाठ, मन्त्र- लेखन के अतिरिक्त कार्यक्रम भी साथ-साथ चलते रह सकते हैं। सामूहिक कीर्तन के रूप में गायत्री चालीसा- पाठ उत्तम है। ‘ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ’ इस कीर्तन मन्त्र का भी मधुर स्वर से सहगान के रूप में वाद्य यन्त्रों के साथ कीर्तन किया जा सकता है। इसमें लाउडस्पीकर का प्रयोग किया जाये तो अधिक लोगों को जानकारी मिलेगी तथा अधिक लोग सम्मिलित हो सकेंगे। अखण्ड जप समाप्त होने पर तीन से सात तक का समय इस सहगान कीर्तन के लिए रखा जा सकता है।

ता. 15 को सायंकाल तथा 16 को प्रातः सामूहिक आरती की जाय। आरती का थाल भली प्रकार सजाया जाय। उसमें 24 घृत दीपक रहें। आरती गान भाव-भरा हो। ता. 16 को आरती के उपरान्त गायत्री यज्ञ आयोजन रखा जाय। उपस्थिति को देखते हुए कुण्डों की व्यवस्था सोची जाय। यज्ञशाला आकर्षक बनाने के कितने साधन हों आदि बातों को ध्यान में रखकर भी कुण्डों अथवा वेदियों की संख्या निर्धारित की जाय। ता. 16 को सायंकाल आयोजन स्थल पर दीपावली मनाई जाय। रात्रि को ज्ञान यज्ञ का सम्मेलन आयोजन रखा जाय। गायकों और वक्ताओं को समय से पहले अपनी तैयारी कर लेने के लिए कहा जाये ताकि वे गायत्री महाशक्ति का स्वरूप और प्रयोग समझा सकें और उपस्थित लोगों को यह प्रेरणा दे सकें कि उन्हें किस प्रकार उसे विश्वव्यापी प्राणऊर्जा बनाने के लिए प्रबल प्रयास करना और योगदान देना चाहिए।

आयोजन के स्थान का चुनाव बहुत ही सूझ-बूझ के साथ किया जाय। सबके लिए सुविधाजनक पड़े। स्वच्छता, हवा, रोशनी, पानी और पेशाब घर इन पाँचों के लिए पहले से ही उपयुक्त प्रबन्ध कर लिया जाय। बिछावन, बिजली, पण्डाल, आकर्षक सजावट का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाय। सुसज्जा में कलाकारिता और भाव - निष्ठा का परिचय मिलना चाहिए। उपेक्षापूर्वक, कुरुचि उत्पन्न करने वाला, फूहड़ वातावरण बनाने से आगन्तुकों में व्यवस्थापकों के प्रति अश्रद्धा ही उत्पन्न होते हैं। झन्डियाँ, पल्लव, बन्दनवार, केले के स्तम्भ, आदर्श वाक्य, बड़े साइज के चित्र आदि से आयोजन स्थल को अधिक आकर्षक और प्रेरणाप्रद बनाने का प्रयत्न किया जाय। यज्ञशाला ,जप स्थान से थोड़ी हटकर बनाई जाय। जपकर्ता पीले वस्त्र न सही पीले दुपट्टे तो कन्धे पर रखें ही।

गायत्री माता की स्थापना सुसज्जित मंच पर बड़े चित्र के रूप में की जाय। कलश में गंगाजल भी उसी वेदी पर प्रतिष्ठित किया जाय। इस प्रकार गंगा जयन्ती और गायत्री जयन्ती के दोनों ही प्रतीकों की प्रतिष्ठापना हो जाती है। आयोजन का आरम्भ षट्कर्म, कलशपूजन, देवपूजन, स्वस्तिवाचन, गायत्री स्तवन, यज्ञोपवीतधारण के साथ सामूहिक रूप से किया जाय। समाप्ति-शान्ति पाठ के साथ की जाय। जहाँ सम्भव हो, वहाँ जप की समाप्ति के उपरान्त गायत्री माता की सुन्दर झाँकी बनाकर शोभा यात्रा निकाली जाय। इसी प्रकार बन पड़े, तो साधकों के सहयोग का प्रबन्ध भी किया जाय। अपने सहभोजों में चावल, दाल, खिचड़ी, दलिया आदि की ही परम्परा है। पकवान, मिष्ठान का निषेध है। प्रसाद में पंचामृत (जल, गंगा जल, तुलसीपत्र, चन्दन, शकर) इन पाँच का सम्मिश्रण ही बाँटा जाय। साहित्यबिक्री के लिए स्टॉल लगाया जाय और प्रचार साहित्य के वितरण के लिए कुछ राशि रखी जाय।

आयोजन के स्वरूप को ध्यान में रखते हुए सामान का पहले से ही प्रबन्ध कर लिया जाय। काम की ड्यूटियाँ बाँट दी जाय। आयोजन में अधिक लोग सम्मिलित हो सकें, इसके लिए छपे निमन्त्रण पत्रों एवं व्यक्तिगत सम्पर्क साधने की बात ध्यान में रखी जाय। पैसे का प्रबन्ध साधक ही मिलजुल कर लें।

ता. 17 जून को आयोजन की विवरण तथा जिन-जिन लोगों ने इस पुण्य आयोजन में भाग लिया हो उन सबको सूची भेज दी जाय, उन्हें आशीर्वाद पत्र शान्ति कुज्ज हरिद्वार से भेजे जायेंगे। आशा की गई है कि प्रत्येक गायत्री- उपासक इस आयोजन को सफल बनाने में सहयोग देकर अपनी भावभरी श्रद्धा का प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करेगा।

----***----


गायत्री महा विद्या के अमूल्य ग्रन्थरत्न

गायत्री महा विद्या के अमूल्य  ग्रन्थरत्न

हजारों ग्रन्थों की खोज, अगणित गायत्री- उपासकों के सहयोग एवं तीस वर्ष की व्यक्तिगत साधना के फलस्वरूप विनिर्मित इन ग्रन्थों की एक-एक पंक्ति अनुभव के आधार पर लिखी गई है। गायत्री साधना से समुचित लाभ उठाने के इच्छुकों के लिए यह साहित्य अनुभवी गुरु के समान पथप्रदर्शन करता है। इस विषय की सभी जिज्ञासाओं तथा शंकाओं का इन पुस्तकों में समुचित समाधान मौजूद है।

1. गायत्री महाविज्ञान तीनों भाग मू. 18)

प्रथम भाग- गायत्री विद्या का वैज्ञानिक आधार, गुप्त शक्तियों का रहस्य, नित्य उपासना, अनुष्ठान विधि, गायत्री सम्बन्धी शंकाओं का समाधान, अनेक कष्टों का निवारण एवं अनेक कामनाओं की पूर्ति के लिए लगाये जाने वाले बीज मन्त्रों का साधन विधान, आत्म-साक्षात्कार एवं ऋद्धि-सिद्धियों का मार्ग, स्त्रियों की विशेष उपासना विधियाँ आदि अनेक महत्वपूर्ण विषयों का सुबोध ढंग से प्रतिपादन। मु. 6)

द्वितीय भाग - गायत्री द्वारा वाममार्गीय तान्त्रिक विधान के अनुसार मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण मुद्रा आदि के अनेक विधानों का वर्णन तथा गायत्री गीता, गायत्री-स्मृति, गायत्री संहिता, गायत्री - उपनिषद्, गायत्री-पारायण, गायत्री-हृदय, गायत्री-पंजर, सहस्रनाम आदि का संग्रह। मू. 6)

तृतीय भाग - गायत्री महामन्त्र द्वारा 24 प्रकार के योगाभ्यासों के साधना विषयक विधान। जप-योग, प्राण-योग, शब्दयोग, नादयोग, हठयोग, कुण्डलिनी-योग, षट्चक्र वेधन की साधनाएंँ तथा अन्नमय, कोश, मनोमय-कोश, प्राणमय-कोश को सिद्ध करने के रहस्य मार्ग का दिग्दर्शन। मू. 6)

2. गायत्री यज्ञ विधान दोनों भाग मू. 6)

प्रथम भाग - गायत्री यज्ञ का विधान, लाभ एवं महत्व का तर्क प्रमाण, शास्त्रीय विधान के आधार पर बहुत ही खोजपूर्ण वर्णन। मू. 3)

द्वितीय भाग - (सामूहिक गायत्री हवन) - गायत्री हवन करने की शास्त्रोक्त विधि, प्रक्रिया, जल यात्रा, मण्डप-प्रवेश, वेदी-पूजन, कुशकण्डिका, अग्निस्थापन, आहुति मन्त्र, पूर्णाहुति, वसोधरा, घृतावघ्राण, भस्मधारण, अभिसिंचन आदि का पूरा विधि-विधान समझकर बड़े यज्ञों का आचार्यत्व किया जा सकता है। मू. 3)

3. गायत्री चित्रावली- विविध प्रयोजनों के लिए गायत्री माता के ध्यान करने योग्य आर्ट पेपर पर छपे 24 तरंगें चित्र तथा सरल भाषा में उनका महत्व प्रतिपादन। मू. 3)

4. गायत्री मन्त्रार्थ- अनेक ग्रन्थों में अनेक ऋषियों द्वारा गायत्री महामन्त्र के अनेक प्रकार के किये हुए अर्थों का संग्रह। राक्षसराज रावण का किया हुआ अर्थ भी इसमें है। मू. 3)

5. गायत्री सम्बन्धी छोटा प्रचार साहित्य

1. छोटा गायत्री ट्रैक्ट साहित्य सैट- तिरंगे कवरों वाले 32-32 पृष्ठ के गायत्री ट्रैक्ट, जिनमें गायत्री उपासना तथा उसकी वैज्ञानिकता पर विस्तृत रूप से प्रकाश डाला गया है। प्रचार की दृष्टि से इन ट्रैक्टों का महत्व असाधारण है। प्रत्येक ट्रैक्ट का मू. 50 पैसा (15 पुस्तकों के सैट का मू. 7)  ट्रैक्टों के नाम इस प्रकार हैं -

1- गायत्री का स्वरूप और रहस्य, 2- गायत्री की गुप्त शक्ति, 3- सर्वसुलभ गायत्री साधना, 4- गायत्री शक्ति का स्रोत सविता देवता, 5- गायत्री और उसकी प्राणप्रक्रिया, 6- गायत्री पंचमुखी और एकमुखी, 7- गायत्री की पंचविधि दैनिक साधना, 8- गायत्री की विशेष साधना, 9- गायत्री मन्त्र की विलक्षण शक्ति, 10- गायत्री की असंख्य शक्तियाँ, 11- गायत्री की सिद्धियाँ, 12- गायत्री शक्ति का नारी स्वरूप, 13- स्त्रियों का गायत्री अधिकार, 14- गायत्री और यज्ञोपवीत, 15- गायत्री और यज्ञ का सम्बन्ध।

2. संक्षिप्त गायत्री हवन- सामूहिक गायत्री हवन तथा पारिवारिक उत्सवों के अवसर पर किये जाने वाले एक घण्टे में पूरे होने वाले संक्षिप्त गायत्री हवन का विधान। मू. 40 पैसे।

3. दैनिक गायत्री साधना- नित्य के जप, हवन का सामान्य विधान। मू. 40 पैसे।

4. गायत्री चालीसा मू. 10 पैसे।

5. युग - निर्माण का सत्संकल्प मू0 .05 पैसे।

पुस्तकें मँगाने का पता-

अखण्ड - ज्योति प्रकाशन, मथुरा

----***----


प्राणों की तरुणाई


प्राणों की तरुणाई (kavita)

प्राणों  की   तरुणाई

********

जब तक जाग नहीं जाती है, प्राणों की तरुणाई। जब तक प्राण नहीं लेते हैं, प्राणवान अंगड़ाई॥

केवल तब तक ही जीवन- रस रहता सूखा - सूखा। जीवन निष्क्रिय सा, नीरस सा रहता रूखा - रूखा॥

जीवित रह कर भी ऐसा जन तो निष्प्राण कहाता। ऐसे जीवित-जन का रहता कब जीवट से नाता॥ जीवन-राग न गाने पाती, सांसों की शहनाई॥2॥

लेकिन जब तरुणाई जगती, रस छलका पड़ता है। जीवन-रस, जीवन्त शिराओं में मचला करता है॥

प्राण जहाँ अंगड़ाई लेते, नभ उल्लास लुटाता। धरा उमंगों से भर जाती, पवन मल्हारें गाता॥ नव-प्रभात संदेशा लाती, प्राणों की अरुणाई॥3॥

घोर-निराशाओं को भी फिर आशा बँध जाती है। आशा और सफलता ,हर तरुणाई की थाती है॥

मरघट में भी फिर जीवन का राग छिड़ा करता है। हर जीवित, मन हूस-मृत्यु से लड़ा-भिड़ा करता है॥

जीवन ही जीवन, देता है चारों ओर दिखाई॥4॥

हम अपने जीवन के रस को और न अधिक सुखायें।

महाप्राण के अंशज होकर, क्यों निष्प्राण कहायें॥

व्यक्ति राष्ट्र सब की ही सोई तरुणाई अब जागे।

युग-परिवर्तन की बेला में हों हम सबसे आगे॥

प्रबल-प्राण पाते गहराई छूते हर ऊँचाई॥5॥

आओ! प्राणवान - स्वर में हम पशुता को ललकारें।

और मनुज में मानवीय- गुणगरिमा चलो निखारें॥

हो अज्ञात, अभाव, निबलता से न मनुजता पीड़ित।

सर्प-विषमता के ,समता के मन्त्रों से हों कीलित॥

आओ! पाटें प्रेम-भाव से ,भेदभाव की खाई॥6॥

-मंगल विजय

----***----

*समाप्त*