हे प्रभो! मेरी केवल एक ही कामना है कि मैं संकटों से डर कर भागूं नहीं, उनका सामना करूं। इसलिए मेरी यह प्रार्थना नहीं है कि संकट के समय तुम मेरी रक्षा करो बल्कि मैं तो इतना ही चाहता हूँ कि तुम उनसे जूझने का बल दो। मैं यह भी नहीं चाहता कि जब दुःख सन्ताप से मेरा चित्त व्यथित हो जाय तब तुम मुझे सान्त्वना दो। मैं अपनी अञ्जलि के भाव सुमन तुम्हारे चरणों में अर्पित करते हुए इतना ही माँगता हूँ कि तुम मुझे अपने दुःखों पर विजय प्राप्त करने की शक्ति दो।
जब किसी कष्टप्रद और संकट की घड़ी में मुझे कहीं से कोई सहायता न मिले तो मैं हिम्मत न हारूं। किसी और स्रोत से सहायता की याचना न करूँ, न उन घड़ियों में मेरा मनोबल क्षीण होने पाये। हे प्रभो! मुझे ऐसी दृढ़ता और शक्ति देना जिससे कि मैं कठिन से कठिन घड़ियों में भी−संकटों और समस्याओं के सामने भी दृढ़ रह सकूँ और तुम्हें हर घड़ी अपने साथ देखते हुए उन्हें हँसी खेल समझ कर अपने चित्त को हल्का रखूँ। मैं बस यही चाहता हूँ।
चाहे जैसी ही प्रतिकूलताएँ हों, व्यवहार में मुझे कितनी ही हानि क्यों न उठानी पड़े इसकी मुझे जरा भी परवाह नहीं है। लेकिन प्रभु मुझे इतना कमजोर मत होने देना कि मैं आसन्न संकटों को देखकर हिम्मत हार बैठूँ और यह रोने बैठ जाऊँ कि अब क्या करूँ मेरा सर्वस्व छिन गया।
प्रभु तुम्हारा और केवल तुम्हारा विश्वास ग्रहण कर लोगों ने अकिंचन अवस्था में रहते हुए भी इतिहास की श्रेष्ठ उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। मैं इतना ही चाहता हूँ कि तुम्हारा विश्वास मेरे लिए शक्ति बने याचना नहीं, सम्बल बने−क्षीणता नहीं। बस इतनी ही कृपा करना।
-रवींद्रनाथ टैगोर
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व्यक्तिगत जीवन, पारिवारिक बन्धन और सामाजिक संवेदन−तीनों अध्याय एक−एक कर दृश्यपटल पर घूमते जाते हैं। महाश्रमण महावीर के धर्मोपदेश उस प्रकाश की तरह हैं जिसमें इन तीनों के उज्ज्वल पृष्ठ ही नहीं कषाय−कल्मषों के कथानक भी एक के ऊपर एक उभरते चले आते हैं। मेघ अनुभव करते हैं कि तृष्णाओं, वासनाओं और अहंताओं के जाल में जकड़ा जीवन नष्ट होता चला जा रहा है, पर लिप्साएँ शान्त नहीं हो पा रही वरन् और अधिक बढ़ती हैं उनकी पूर्ति के लिये और अधिक अनैतिक कृत्य पापों की गठरी बढ़ रही है काल दौड़ा आ रहा है जहाँ से उपभोग का अन्त हो जायेगा शरीर को नाश कर देने वाला क्षण अब आया कि तब आया तब फिर पश्चाताप के अतिरिक्त हाथ कुछ लगने वाला नहीं। विषय वासनाओं के कीचड़ में फँसे जीवन को विवेक−ज्योति से देखने पर निज का जीवन ही अत्यधिक घृणास्पद लगा। मेघ ने उधर से दृष्टि फेर ली।
काम, क्रोध, मद, मोह, द्वेष, द्वंद्व, घृणा तिरष्कार अनैतिकता अवांछनीयतायें यदि यही संसार है तो इसमें और नरक में अन्तर ही क्या। कुविचारों की कुत्सा में झुलसते मायावी जीवन में भी भला किसी को शान्ति मिल सकती है। हमारे महापुरुष महावीर यही तो कहते हैं कि मनुष्य को आध्यात्मवादी होना चाहिये, उसके बिना लोक−जप सम्भव नहीं। मुझे तप का जीवन जीना चाहिये।
निश्चय अटल हो गया। श्रेणिक पुत्र मेघ ने भगवान् महावीर से मन्त्र दीक्षा ली और महाश्रमण के साथ ही रहकर तपस्या में लग गये?
विरक्त मन को उपासना से असीम शान्ति मिलती है। कूड़े से जीवन में मणि−मुक्ता की−सी ज्योति झलझलाने लगती है, मन वाणी चित्त अलौकिक स्फूर्ति से भर जाते हैं, साधक को रस मिलने लगता है सो मेघ भी अधिकांश समय उसी में लगाते। किन्तु आर्य श्रेष्ठ महावीर की दृष्टि अत्यन्त तीखी थी वह जानते थे रस−रस सब एक हैं−चाहे वह भौतिक हों या आध्यात्मिक। रस की आशा चिर नवीनता से बँधी है इसीलिये जब तक नयापन है तब तक उपासना में रस स्वाभाविक है किन्तु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही तो मेघ का मन उचट जायेगा, अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार−बार उधर धकेलने लगे।
मेघ ने कभी रूखा भोजन नहीं किया था अब उन्हें रूखा भोजन दिया जाने लगा, कोमल शैया के स्थान पर भूमि शयन, आकर्षक वेषभूषा के स्थान पर मोटे वत्कल वस्त्र और सुखद सामाजिक सम्पर्क के स्थान राजगृह आश्रम की स्वच्छता, सेवा व्यवस्था एक एक कर इन सब में जितना अधिक मेघ को लगाया जाता उनका मन उतना ही उत्तेजित होता, महत्वाकांक्षाएं सिर पीटतीं और अहंकार बार−बार आकर खड़ा होकर कहता−ओ रे मूर्ख मेघ! कहाँ गया वह रस जीवन के सुखोपभोग छोड़कर कहाँ आ फँसा। मन और आत्मा का द्वन्द्व निरंतर चलते−चलते एक दिन वह स्थिति आ गई जब मेघ ने अपनी विरक्ति का अस्त्र उतार फेंका और कहने लगे तात! मुझे तो साधना कराइये, तप कराइये जिससे मेरा अन्तःकरण पवित्र बने।
तथागत मुस्कराये और बोले−तात! यही तो तप है। विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक स्थिरता−यह गुण जिसमें आ गया वही सच्चा तपस्वी−वही स्वर्ग विजेता−उपासना तो उसका एक अंग मात्र है।
मेघ की आंखें खुल गई और वे एक सच्चे योद्धा की भाँति मन से लड़ने को चल पड़े।
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उन्होंने श्रीमती नियेशन को एक बन्द कमरे में रखा और एक उनके सर्वथा अजनबी व्यक्ति की एक वस्तु दी। उस वस्तु को हाथ में लेते ही उन्होंने उस व्यक्ति का न केवल नाक−नक्शा अपितु उसके पूर्व जीवन की अनेक घटनाएँ यों कह सुनाई मानों वे चलचित्र में सब देख रही हैं। कु0 एडम नामक एक अन्य लड़की की अतीन्द्रिय क्षमता के बार में भी प्रो0 क्रेग ने लिखा है कि वह सूँघकर टेलीफोन पकड़ कर दूरवर्ती वस्तुओं को ऐसे बता देती थी मानों वह सामने पड़ी पुस्तक पढ़ रही हो।
इन घटनाओं का उल्लेख करने के बाद प्रो0 क्रेग ने लिखा−परामनोविज्ञान ने (1) दूरानुभूति (2) क्लेसर वापेन्स (3) दूरदृष्टि (4) विचार संचालन (टेलीपैथी) सम्बन्धी अन्य घटनाओं की प्रामाणिक खोजें की हैं उनसे मनुष्य की विलक्षण अतीन्द्रिय क्षमता का पता चलता है कि घटनाओं को इनमें से किसी भी कोटि में नहीं रखा जा सकता। यदि कोई ऐसी शक्ति जो भूत भविष्य को एक ही बिन्दु पर देख सकती हो वह शक्ति आत्मा की या परम सत्ता ही हो सकती है विज्ञान उसे झुठला नहीं सकता।
सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो0 फर्नीनेड वान न्यूट्राइटर को उनके एक सहयोगी ने बताया एक ल्यूथिनियन लड़का किसी भी भाषा का कितना ही बड़ा वाक्य गद्य अथवा पद्य आप कहें, बच्चा उसी भाषा में अर्ध विराम, पूर्ण विराम सहित दोहरा देता है यही नहीं आप बोलना प्रारम्भ करें तो वह स्वयं भी वही शब्द उसी मोड़ और लचक के साथ इस तरह शब्द से शब्द मिलाकर बोलता चला जाता है मानों उसे स्वयं ही वह पाठ कंठस्थ हो। प्रो0 फर्डीनेड ने कहा−सम्भव है वह ओठों की हरकत से उच्चारण पहचानने में सिद्ध हस्त हो सो उनने स्वयं जाँच करने का निश्चय किया। उन्होंने उस बच्चे को एक कमरे में और दूसरे एक व्यक्ति को दूसरे कमरे में−बैठाकर उसे कई भाषायें बदल−बदल कर लगातार बोलने को कहा दोनों कमरों से माइक एक सामने के कमरे में लाकर रखे गये जिसमें डॉ0 फर्निनेंड स्वयं बैठे, प्रयोग प्रारम्भ हुआ तो वस्तुतः वे अत्यन्त आश्चर्य चकित रह गये कि लड़का एक दो भाषाओं का ज्ञाता हो सकता है पर वह तो किसी को भी लाकर खड़ा करने से उसी की भाषा दोहरा देता था इसका अर्थ यह हुआ कि बिना पढ़े हर विद्या में निष्णात होना। ऐसा किसी भी पार्थिव या भौतिक सिद्धांत से सम्भव नहीं। उन्होंने माना कि स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म की शक्तियाँ और क्षमतायें अधिक अलौकिक है जो भौतिकी, बायोलॉजी सब से परे। इन साक्षियों में तो उस तत्व का मृत्यु के उपरान्त भी जीवित बने रहना सम्भव है क्योंकि किसी भी भूत की जानकारी का अर्थ ज्ञाता की उपस्थिति अनिवार्य है। अभी तक में इन बातों को इमेजिनरी (काल्पनिक) मानता था किन्तु अब उनकी वास्तविकता पर कतई सन्देह नहीं रहा।
जीवशास्त्री कैरिंग्टन ने लिखा है जब तक मैं इस घटना से दूर था तब तक धर्म और अध्यात्म के प्रति मेरी मान्यतायें बड़ी निर्जीव और निर्बल थीं किन्तु (उक्त घटना का उल्लेख) जब मैं अपनी प्रयोगशाला से लौट रहा था मुझे एकाएक सामने से आता हुआ मेरा मित्र इलियट दिखाई दिया, मैं सहमा, आंखें मलीं कि कहीं भ्रम तो नहीं हो रहा। इलियट की मृत्यु हुये 3 माह हो चुके मैं उसकी शव यात्रा में स्वयं रहा हूँ और इन्हीं आँखों से दफन होता देखा है कि फिर इलियट यहाँ−वैज्ञानिक के नाते मैं भ्रम पर ही विश्वास कर रहा था मुझे डर नहीं था−तभी क्षीण सी आवाज सुनाई दी−“मित्र! मेरी पत्नी आर्थिक तंगी का जीवन जी रही है मैंने उसके लिये एक लाख डालर जोड़कर अमुक तहखाने में रखे हैं जिसकी चाभी गुप्त रूप से अमुक स्थान पर छिपी है वह आप उसे चुपचाप बता दें आप से अधिक विश्वास पात्र कोई और नहीं इसी लिए यह बात आप तक पहुँचा रहा हूँ।” इन्हीं शब्दों के साथ ऐसा लगा जैसे पानी में पड़ने वाला नंगा प्रतिबिम्ब लहर आ जाने से हौले−हौले ओझल हो रहा हो मैंने उस सूक्ष्म अस्तित्व को अनुभव किया, सुना, स्पर्श किया और वह मेरे सामने ही घुल गया (मेल्टेड) इसे भ्रम (इलूजन) भी मान लेता पर उन कही हुई बातों की सत्यता पर अविश्वास करूं तो अपने आपसे धोखा होगा। लगता है इससे प्राणि शास्त्र में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है। पदार्थ का शक्ति और शक्ति का पदार्थ में इच्छाभूत परिवर्तन व पंजीकरण की इस घटना से तो यही लगता है कि अतीन्द्रिय तत्व बहुत अधिक समर्थ हैं। इसमें मरणोत्तर जीवन तो प्रमाणित होता ही है। नैतिकता का धर्म सम्मत सिद्धान्त पुष्ट होता है। आज भौतिकता की बाढ़ आ गई हैं। उसने नैतिकता को मानवीय दुर्बलता माना है, पर अब यह लगता है कि मनुष्य की मनुष्यता नीति सदाचार और उसकी परमार्थ परायणता आदि शाश्वत महत्व रखते हैं इनको व्यावहारिक और सामयिक लाभ समाज की सुख, शान्ति और व्यवस्था के रूप में गौण है, पारलौकिक जीवन में उनका मूल्य और महत्व और अधिक सिद्ध होता है।
कैबटाउन में एक बिल्डिंग इंजीनियर वान वान्डे के बारे में कहा जाता है कि समय उनकी इच्छा से चलता है। ज्ञात नहीं रहस्य क्या है किन्तु वे सोने जा रहे हों और आप कहें महोदय आप 8 बजे सो रहे हैं पर जगिये आप ठीक बारह बजे सात मिनट उनसठ सैकिंड पर और आप घड़ी लेकर बैठ जाइये क्या मजाल कि उनकी नींद एक भी सैकिण्ड आगे पीछे टूटे। परीक्षण के लिये उन्हें कई दिनों तक किसी से न तो मिलने दिया गया, उनकी घड़ी भी छीन ली गई। एक टूटी घड़ी रख कर उसकी चाभी घुमाकर 8 बजे का समय लगा दिया गया और उन्हें प्रातःकाल 8 बजे सोने को कहा गया और सायंकाल 8 बजे जगने का आग्रह किया गया। और तब भी जब उनकी नींद टूटी तो लोग आश्चर्य चकित रह गये कि ठीक 8 ही बजे थे।
बिना किसी संकेत और वह भी सुषुप्त अवस्था में समय का ज्ञान इस बात का प्रमाण है कि उस स्थिति में भी घटनाएँ चलती रहती हैं क्योंकि समय कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं वह घटनाओं की सापेक्ष माप मात्र है।
डॉ0 केमिले फ्लेमेरियन लिखते हैं बिना इन्द्रिय सहयोग दूर से कार्य करने की क्षमता से ओत प्रोत होना आश्चर्यजनक बात हैं। यह नहीं छिपाना चाहिये कि उपरोक्त प्रकार की घटनायें अज्ञात लोक में प्रवेश कराती हैं इस संदर्भ में और विस्तृत जानकारियों की अपेक्षा है ताकि आत्मा के स्वतन्त्र अस्तित्व एवं उसकी अलौकिक क्षमताओं की और भी अधिक सार्थक जानकारियाँ उपलब्ध हो सकें।
श्रद्धा और विश्वास के द्वारा आत्मा और परमात्मा की अनुभूति किन्हीं संस्कारवान् आत्माओं को पूर्व जन्मों में की गई साधनाओं के पुण्य स्वरूप हो सकती है किन्तु सर्वसाधारण उसका लाभ नहीं ले सकता इस लिये भारतीय तत्वदर्शियों ने क्रिया विज्ञान की खोज की जिसे “योग साधना” कहते हैं भले ही, आत्म सत्ता अशरीरी अतीन्द्रिय चैतन्य मन से भी परे हो पर अन्ततः वह अपने भौतिक शरीर में भी तो निवास करती है। दूर के देव−दर्शन दुर्लभ हो सकते हैं। किन्तु अपने ही भीतर बैठे अधिदेव की प्राप्ति असम्भव कैसे हो सकती है? ध्यान, धारणा, प्रत्याहार, प्राणायाम, मनोलय आदि यौगिक क्रियाओं से क्रमशः शरीर की चंचलता पर विजय, मन की एकाग्रता, प्राणों पर नियन्त्रण करते हुए अपन अहंकार उसी तत्व में घुल जाता है और “तत्वमसि” अर्थात् जो तत्व वह है वही मैं हूँ के रूप में विकसित हो जाता है।
भौतिकीय चेतना से परे चेतना के अस्तित्व को इन वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है और माना है कि वह सर्व समर्थ सत्ता है दूर−दर्शन, दूर अनुभूति विचार संचालन जैसी सामर्थ्य उसके नन्हे−नन्हे खेल हैं। वह इन सबसे भी अधिक अति समर्थ एवं सर्वव्यापी चेतना है। उसे देखे सुने और उसी को प्राप्त कर अपनी क्षुद्रता मिटायें यही मनुष्य जीवन का ध्येय है उसे प्राप्त करने में ही उसकी सार्थकता है।
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महर्षि कण्व का आश्रम, अभी−अभी महाराज दुष्यन्त विदा हुये हैं। कौशिकसुता शकुन्तला के प्रणय से आविर्भूत महाराज दुष्यन्त ने मृगया के मध्य यह समय निकाला था। आश्रमवासी दूर तक विदाकर लौट आये किन्तु शकुन्तला उपवन की एक सघन वल्लरी से ही अपने हृदय सम्राट को जाते अपलक आत्म विस्मृत निहारती रही। उसे पता भी नहीं चला महर्षि दुर्वासा उधर से निकले और वह प्रणाम भी नहीं कर सकी।
दुर्वासा के क्रोध का ठिकाना न रहा। कामार्त्त नारी। उन्होंने चिल्लाकर कहा−जिसकी स्मृति में तू इस तरह आत्म विस्मृत हो रही है−जा मेरा शाप है कि वही तुझे भूल जायेगा। पास जाने पर भी वह तुझे पहचानने से इनकार कर देगा।
अब शकुन्तला को अपनी भूल का पता चला, उसने क्षमा भी माँगी, किन्तु महर्षि तिरस्कारपूर्ण दृष्टि डालते हुए उधर से आगे बढ़ गये।
और सचमुच ही एक दिन जब वियोगिनी शकुन्तला स्वयं ही महाराज दुष्यन्त के समक्ष उपस्थित हुई तो आर्य श्रेष्ठ ने उन्हें पूर्व परिचित होने तक से इनकार कर दिया। यह ठीक है इस दुर्दैव को भी अपनी तपश्चर्या के बल पर साध्वी शकुन्तला ने सौभाग्य में बदल लिया ऐसा न होता तो वह चक्रवर्ती भरत की माँ होने का गौरव कैसे प्राप्त कर सकतीं, तो भी उन्हें असीम कष्ट तो झेलने ही पड़े।
महर्षि मुद्गल, देवकन्या द्रौपदी ऐसे−ऐसे अनेकों आत्माओं को पराभूत करने की दुर्वासा की ख्याति सर्वत्र फैली हुई थी सो सहसा कोई भी उनसे भिड़ने का साहस नहीं करता था। अहंकार की जितनी विजय होती है, वह उतना ही दुर्द्धर्ष होता जाता है, उसकी न केवल विवेक शक्ति अपितु अपनी सामर्थ्य भी साथ छोड़ती चली जाती हैं, इसीलिए अहंकार को साधना की, तप की और ब्रह्म प्राप्ति की सबसे बड़ी बाधा माना जाता है। किन्तु अपनी गहन तपश्चर्या द्वारा दुर्वासा शक्ति के स्वामी बन चुके थे अतएव उनका अहंकार घटा नहीं, निरन्तर बढ़ता ही गया।
तभी उनकी भेंट सरयू तट पर महाभाग सम्राट अम्बरीष से हो गई। महाराज एकादशी व्रत का पारण करने समुद्यत हुये थे अभी वे तट पर जाने की तैयारी कर ही रहे थे कि महर्षि आ पहुँचे। उन्होंने महाराज अम्बरीष का वर्जन करते हुए राजन! तुम्हीं एकादशी पारण नहीं करते, मैं भी करता हूँ सम्राट हो तो क्या? तुम क्षत्रिय हो, मैं ब्राह्मण। यहीं ठहरो जब तक मैं पारण नहीं कर लेता तुम्हें उसका अधिकार नहीं।
महाराज ने विनीत वाणी से वर्जना स्वीकारी और वहीं तट पर बैठकर प्रतीक्षा करने लगे। समय तेजी से बीतने लगा, किन्तु महर्षि गये तो फिर मानों लौटना भूल ही गये। समय समाप्त होने को आया अब क्या किया जाये? उन्होंने विद्वान ब्राह्मणों से विकल्प पूछा तो−उन्होंने कहा−“महाराज आप बिना प्रतीक्षा किये अपना पारण सम्पन्न करें।” तप का महत्व अहंकार प्रदर्शन और शाप देने में नहीं संसार का कल्याण करने की भावना में है, प्रतिवाद न करने से ही अवांछनीयताएँ बढ़ती हैं आप धर्मज्ञ हैं, अनैतिक आचरण का विरोध धर्म का ही तो अंग है। फिर आप डरते क्यों हैं।
महाराज ने आचार्यों की बात स्वीकार कर ली और पारण प्रारम्भ कर दिया। यह देखते ही दुर्वासा का क्रोध भड़क उठा उन्होंने अम्बरीष पर कृत्याघात किया। कृत्या अभी महाराज तक पहुँची ही थी कि महाराज के शरीर से धर्म, न्याय, सदाचरण, चरित्र और विनय−पाँच देव निकले और महाराज के चारों ओर कवच की तरह विराज गये, कृत्या को आघात का अवसर न मिला तो वह प्रहारक दुर्वासा को ही विनष्ट करने को तुल गई। दुर्वासा हाहाकार कर उठे। यह देखते ही महाराज की करुणा उमड़ पड़ी। उस धार ने कृत्या को शीतल कर दिया।
आज दुर्वासा पराजित हुए और उन्होंने अनुभव किया शक्ति की शोभा विनम्रता में है अहंकार में नहीं।
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आँख से, इन्द्रियों से प्रत्यक्ष ईश्वर का दर्शन करना हो तो उसे व्यक्ति के अन्तरंग में छिपी हुई आत्म−ज्योति के रूप में अथवा इस जगत की जड़ चेतन सत्ता में आलोकित देखा जा सकता है। यही विराट् ब्रह्म है जिसका दर्शन गीता के अर्जुन ने किया था। यशोदा को बालकृष्ण ने इसी ब्रह्म स्वरूप की झाँकी कराई थी। कौशल्या ने पालने में झूलते हुए राम में उसे देखा था। काकभुसुण्डि की ईश्वर दर्शन आकांक्षा भी इसी प्रकार पूरी हुई थी। व्यक्ति पर शरीर और मन पर छाये कषाय−कल्मषों के अन्तर को चीर कर यदि उसकी भूल सत्ता में ओत−प्रोत सत्य, शिव और सुन्दर को देखा जा सके तो नर के भीतर नारायण को क्रीड़ा कल्लोल करते हुए देखा जा सकता है। इसी प्रकार विश्व सत्ता की अन्तरात्मा−ब्रह्म चेतना की अनुभूति हो ही सके तो आँखों के सामने फैले हुए इस विराट् में परमात्मा के दर्शन हो सकते हैं। रामायणकार ने “सियाराम मय सब जग जानी” के रूप में इसी विराट् के दर्शन किये थे और ‘करों प्रणाम जोरि जुग पानी’ की भाव−भरी श्रद्धांजलि प्रस्तुत की थी। यही मार्ग दूसरों के लिए भी है। यदि ईश्वर को प्रत्यक्ष ही देखना है, व्यक्ति की अन्तरात्मा में और विराट् की विश्व चेतना में उसकी झाँकी हो सकती है। इसके लिए दिव्य चक्षु चाहिए। दिव्य चक्षु अर्थात् वह दार्शनिक दृष्टिकोण जो कलेवर के भीतर प्रवेश करके अन्तःस्थिति की सूक्ष्मता को समझ सकने में समर्थ हो। ईश्वर दर्शन के लिए यह आधार आवश्यक है। कारण कि उसकी स्थूलता तो पंच तत्वों के रूप में ही दीख पड़ेगी। सत् चित् आनन्द तो सूक्ष्म ही है उसे आँखों से नहीं आत्मानुभूति से ही अनुभव किया जा सकता है। दिव्य चक्षु इसी आवश्यकता की पूर्ति करते हैं।
शास्त्र ने इस विराट् ब्रह्म का वर्णन कितने ही अलंकारिक रूप में किया है। ऋग्वेद 10। 90। 12 “ब्रह्मणोस्य मुख मासीत् वाहु राजन्य कृत मन्त्र में चारों वर्णों को ब्रह्म शरीर कहा है। ऋग्वेद 10। 90। 1 में उसका उल्लेख “सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् “ के रूप में मिलता है। उसे सहस्र अनन्त सिर, आँख, हाथ, पैर वाला बताया गया है। उसने न केवल मनुष्य को वरन् समस्त पृथ्वी को−समूचे ब्रह्माण्ड को घेर रखा है−”सः भूमिं विश्वतः कृत्वा” जिस प्रकार शरीर के भीतर अगणित कोशाओं और तन्तुओं का अस्तित्व और बाहर बाल रोम, कूप आदि का विस्तार है उसी प्रकार उस विराट् ब्रह्म के अवयवों की तरह अनेकानेक प्राणी एवं पदार्थ देखे जा सकते हैं।
यह तो हुआ उसका स्वरूप निर्धारण अब उसकी अनुभूति कैसे हो? यह प्रश्न सामने आता है। खाद्य पदार्थों को देखने भर से तो काम नहीं चलता। उनके चखने, चबाने और उदरस्थ करने से ही बात बनती है। खाद्य जब पेट में जाकर पचता और रक्त मांस आदि के रूप में शरीर का अंग बनता है तभी उससे बल एवं जीवन की प्राप्ति होती है। ईश्वर को दिव्य चक्षुओं से देख लेने भर से किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती। ईश्वर दर्शन का उद्देश्य उस परम सत्ता का जीवन सत्ता में समन्वय होने पर ही पूरा होता है। देखने के लिए तो विराट् ब्रह्म की वे तस्वीरें बाजार से खरीदी जा सकती हैं, जिसमें कृष्ण द्वारा गीता में वर्णित विराट् का अलंकारिक चित्रांकन किया गया है, पर उसे देख लेने भर से किस का क्या प्रयोजन सिद्ध होगा।
जिस समय मनुष्य को यह अनुभूति होती है कि ‘ईश्वर मेरे अन्दर है; उसी समय वह ईश्वर रूप हो जाता है।’ इस तथ्य के प्रतिपादन में ऋग्वेद 6। 47।78 की साक्षी है−”इन्द्रोमायाभिः पुरुरूप ईयते” ऐसा मनुष्य इस तथ्य को जान लेते भर से सन्तोष नहीं कर सकता उसका आचरण एवं चिन्तन भी वैसा ही परिष्कृत हो जाता है जैसा कि ईश्वर के साथ निरन्तर रहने वाले का होना चाहिए। पारस को छूकर लोहे का सोना हो जाना−चन्दन के समीपवर्ती पादपों में सुगन्ध आना, अग्नि की समीपता से उष्णता बढ़ना−समीपवर्ती को छूत लगना यही सही है तो कोई कारण नहीं कि जिसे अपनी अन्तरात्मा में ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव होता है वह उसी स्तर का बनने में क्यों असफल रहेगा। हाँ, अन्तरात्मा में वैसी अनुभूति न होती हो। जीभ, कान और मस्तिष्क तक ही आत्म−ज्ञान की विडम्बना उलझकर रह गई हो तो बात दूसरी है।
उस ईश्वर ने अपनी सत्ता को टुकड़े−टुकड़े करके सर्वत्र बखेर रखा है। यह बिखराव ‘अनेक धा’ और उसका समन्वय ‘एक धा’ कहा गया है। अथर्व 10। 9। 8 में कहा गया है−“एवं यदंगं अकृणोत्सहस्रधा।” अर्थात् परमेश्वर ने अपने एक ही अंग को अनेक टुकड़ों में काटकर बखेर दिया। “एकं अंग सहस्रधा अकृणोत्” में भी इसी तथ्य की पुनरावृत्ति है।
ईश्वरानुभूति की स्थिति का विवेचन करते हुए यजुर्वेद 40। 6 में गीता के एक श्लोक से मिलता−जुलता मन्त्र आता है।
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति। सर्वं भूतेषु चात्मानं, ततो न विचित्सति॥
अर्थात्−जो सब प्राणियों को अपने में और अपने को सब प्राणियों में देखता है। उन्हें अपने ही समान मानता है, उसे अज्ञानान्धकार में नहीं भटकना पड़ता।
यही अद्वैत का प्रतिपादन है। हमें दूसरों से वही व्यवहार करना चाहिए; जो उनसे अपने लिए अपेक्षा करते हैं। यह नीति वचन इसी आत्मानुभूति की ओर इंगित करता है कि हमारी आत्मीयता शरीर परिवार तक सीमित न रहकर अन्यान्यों तक बढ़ती विकसित होती चली जायं। सब अपने लगने लगें और अपने भीतर अन्यान्यों की उपस्थिति परिलक्षित होने लगे। जिस प्रकार शरीर एवं परिवार को अपना मान कर उनकी सुविधा सुरक्षा एवं उन्नति का ध्यान रखा जाता है, वैसे ही भाव व्यापक होते−होते देश, धर्म, समाज की सीमाओं को पार करते−करते प्राणिमात्र तक फैल पड़े तो समझना चाहिए कि नर ने नारायण की−आत्मा ने परमात्मा की−पुरुष ने पुरुषोत्तम की−जीव ने ब्रह्म की−स्थिति प्राप्त कर ली। इसी ब्राह्मी स्थिति को प्राप्त करने के उपरान्त आत्मा मोह आवरणों से मुक्त हो जाता है। इसी को मोक्ष कहा गया है। संकीर्ण स्वार्थपरता ही माया है। वासना, तृष्णा, अहंता और उद्विग्नता के बन्धन ही भव बन्धन कहलाते हैं और इन्हीं नागपाशों में जकड़ा हुआ प्राणी विभिन्न प्रकार के शोक सन्ताप सहता है। यह टूटने लगें तो समझना चाहिए कि जीवन मुक्त होने का परम लक्ष्य प्राप्त हो गया। आत्मा के निर्मल और व्यापक स्वरूप का आभास होने लगे तो समझना चाहिए कि आत्म−साक्षात्कार का−ईश्वर दर्शन का−लक्ष्य पूरा हो रहा है।
उमर बड़े नेक दिल और दुःखीजनों के रहनुमा थे। एक दिन उमर ने आकाश में उड़ते एक फरिश्ते को देखा जिसके हाथ में एक बड़ी सी पुस्तक थी। उन्होंने उसे पास बुलाकर पूछा− “इस पुस्तक में क्या है!” “इसमें उन लोगों के नाम है जो खुदा की इबादत करते हैं।” उन्होंने अपना नाम उस पुस्तक में देखा पर वह कहीं भी न मिला वे बड़े दुःखी हुए।
कुछ दिन बाद वही फरिश्ता एक छोटी पुस्तक लिए उधर से निकला, पूछने पर फरिश्ते ने बताया, “यह उन लोगों के नाम की पुस्तक है जिनकी खुदा इबादत करता है।” यह सुन खलीफा को बड़ा आश्चर्य हुआ कि क्या खुदा भी किसी की इबादत करता है। खुदा जिन खुशनसीबों की इबादत करता है उनके नाम देखने की उत्सुकता में खलीफा ने पुस्तक देखी तो उन्हें अपना नाम प्रथम दिखाई दिया। उन्होंने कहा− “मैं इस काबिल कैसे बन गया कि खुदा मेरी इबादत करने लगे।” तत्क्षण ही उनकी आत्मा ने कहा, “खुदा उनकी इबादत नहीं करता जो सिर्फ उनकी ही इबादत में लगा रहता है और उनका काम नहीं करता, खुदा की बनाई दुनिया को जो खुशनुमा बनाए रखे व खुदा के बनाए हर इन्सान को इन्सानियत का पाठ पढ़ाता रहे वह भी खुदा का प्यारा बेटा होता है।”
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प्राचीन भारतीय इतिहास को आध्यात्मिक उपलब्धियों की शृंखला कहें, तो आध्यात्मिक साहित्य और दर्शन को तत्वदर्शी, ऋषियों, योगी और सन्तों का इतिहास कहना पड़ेगा। आध्यात्मिक जगत की प्रसिद्ध घटना है कि मण्डन मिश्र के जगद्गुरु शंकराचार्य से शास्त्रार्थ में पराजित हो जाने के बाद उनकी धर्मपत्नी विद्योत्तमा ने मोर्चा सम्भाला। उन्होंने शंकराचार्य से “काम−विद्या” पर ऐसे जटिल प्रश्न पूछे जो उन जैसे ब्रह्मचारी संन्यासी, की कल्पना से भी परे थे, किन्तु वे योगी थे। उन्हें मण्डन मिश्र जैसे महान् पण्डित की सेवाओं की अपेक्षा थी सो उन्होंने महिष्मती नरेश के मृतक शरीर में “परकाया−प्रवेश” किया और “काम−विद्या” का गहन अध्ययन किया। उनके द्वारा प्रणीत “काम−सूत्र” इस विद्या का अनुपम ग्रन्थ माना जाता है।
इतिहास में इस घटना की तरह ही पाटलिपुत्र के सम्राट महापद्मनन्द और चाणक्य भी प्रख्यात हैं, पर वे केवल शासकीय दृष्टि से। बहुत थोड़े लोग जानते हैं कि महापद्मनन्द का शरीर एक था, पर उस शरीर से यात्रायें दो आत्माओं ने की थी। एक स्वयं महापद्मनन्द ने तो दूसरे तत्कालीन विद्वान् आचार्य उपवर्ष के प्रसिद्ध योगी शिष्य “इन्द्र दत्त” ने।
महर्षि उपवर्ष और उनके अग्रज महर्षि वर्ष का पाटलिपुत्र में ही विशाल तपोवन और गुरुकुल आश्रम था, जिसमें देश−विदेश से आये स्नातक साहित्य, भेषज व्याकरण और योग विद्या करते थे। उपवर्ष के शिष्यों में तीन शिष्य ऐसे थे जिन्हें त्रिवेणी संगम कहा जाता था। प्रथम वररुचि या कात्यायन जो पीछे सम्राट चन्द्रगुप्त के महामन्त्री बने। इन्होंने पाणिनि के व्याकरण सूत्रों की टीका की थी। दूसरे थे ‘व्याडी’ इन्होंने एक विशाल व्याकरण ग्रन्थ लिखा था जिसमें सवा लाख श्लोक थे, यह ग्रन्थ अंग्रेजों के समय जर्मनी उठा ले गये थे और आज तक फिर उसका पता ही नहीं चल पाया। केवल मात्र कुछ श्लोक ही यत्र−तत्र मिलते हैं। तीसरे देवरारू थे जिनकी योग विद्या में इतनी गहन अभिरुचि थी कि उस युग में उनके समान कोई अन्य योगी न रह गया था। “उपवर्ष” ने उन्हें ‘परकाया प्रवेश’ तक की गूढ़ विद्या सिखलाई थी।
तीनों शिष्यों में प्रगाढ़ मैत्री थी। आश्रम से विदा होते समय तीनों साथ ही महर्षि उपवर्ष के पास गये और उनसे गुरु दक्षिणा माँगने का आग्रह किया। आचार्य प्रवर! ने समझाया− वत्स आचार्यों की विद्या योग्य शिष्य पाकर स्वतः सार्थक हो जाती है, तुमने अपने−अपने विषयों में दक्षता और प्रवीणता पाकर मेरा यश बढ़ाया है यही मेरे लिए पर्याप्त है तो भी मेरी हार्दिक अभिलाषा है कि तुम्हें जो ज्ञान जो प्रकाश और मार्गदर्शन यहाँ मिला उसका तुम सारे देश में प्रचार प्रसार करना।
बात पूरी हो गई थी किन्तु वे तीनों सिद्धि के अहंकार में थे अतएव कोई न कोई लौकिक वस्तु माँगने के आग्रह पर अड़ गये। गुरु को क्षोभ हुआ उन्होंने कहा भी−हमने तुम्हें सिद्ध बनाया किन्तु सिद्धि को आत्म सात करने वाली सरलता और गम्भीरता नहीं दिखाई उसी का यह प्रतिफल है−नहीं मानते जाइये और हमारे लिए एक लाख स्वर्ण मुद्राओं का प्रबन्ध कीजिये।
तीर धनुष से निकल चुका था मर्मस्थल तो विधना ही था। वररुचि और व्याडी दोनों अभी इस चिन्ता में थे कि इस कठिन समस्या का निराकरण कैसे हो तभी देवदत्त ने मुस्करा कर कहा−तात! आपने सुना है आज महापद्मनन्द ने देह परित्याग कर दिया है, मुझे परकाया प्रवेश−विद्या आती है। मैं महापद्मनन्द की मृतक देह में प्रवेश कर स्वयं पद्मनन्द बनूँगा, इसी खुशी में राजभवन में उत्सव होगा दान−दक्षिण बटेगी उसी में इस धन का प्रबन्ध वररुचि को कर दूँगा। व्याडी इस बीच मेरे शव की रक्षा करें ताकि अपना कार्य पूरा करते ही मैं पुनः अपनी देह में आ जाऊँ।
पूर्व नियोजित कार्यक्रम के अनुसार देवदत्त ने अपने कुटीर में लेटकर “प्राणायाम” क्रिया के द्वारा अपने प्राणों को शरीर से अलग कर लिया और महापद्मनन्द के शरीर में प्रवेश किया। महापद्मनन्द पुनः जीवित हो उठे। यह घटना इतिहास प्रसिद्ध घटना है। सारे राज्य में छाई दुःख की लहरें एकाएक खुशी में बदल गई। चारों ओर उत्सव मनाये जाने लगे।
महापद्मनन्द के संस्कार, गुण, कर्म, स्वभाव, मूल सम्राट के गुणों से बिलकुल भिन्न संस्कृत के अल्पज्ञ महापद्मनन्द का महान् पांडित्य ही सन्देह के लिए पर्याप्त था उधर शकटार को यह भी ज्ञात था कि “देवदत्त” ही एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिन्हें परकाया प्रवेश की विद्या आती थी सो यह अनुमान करते देर न लगी कि महापद्मनन्द के शरीर में “देवदत्त” की आत्मा के अतिरिक्त और कोई हो नहीं सकता था।
शकटार कुशाग्र बुद्धि थे परिस्थितियों के सूक्ष्म विश्लेषण के साथ वे प्रख्यात प्रत्युत्पन्नमति महामंत्री थे। यह वह समय था जब सिकन्दर झेलम तक आ पहुँचा था और उसने सम्राट् पुरु को भी पराजित कर लिया था। अगली टक्कर महापद्मनन्द से ही होने वाली थी। यदि उनके निधन की बात सिकन्दर तक पहुँच जाती तो उसका तथा उसके सिपाहियों का मनोबल बढ़ जाता, अतएव शकटार ने निश्चय किया कि महापद्मनन्द वे चाहे जोहों पुनः मरने नहीं दिया जाना चाहिए। शकटार को कई दिनों से व्याडी का पता नहीं चल रहा था जबकि वररुचि इन दिनों व्यर्थ ही राजभवन के आसपास घूमते दिखाई देते थे, अतएव उसे यह अनुमान करते देर न लगी कि व्याडी और कही नहीं देवदत्त के शव की रक्षा में ही होगा। शकटार ने विश्वास पात्र सैनिकों को भेजकर व्याडी के विरोध के बावजूद देवदत्त के पूर्ववर्ती शरीर का “शवदाह” करा दिया। महापद्मनन्द के शरीर में निर्वासित देवदत्त को इस बात का पता चला तो वे माथा पीटते रह गये, पर अब बाजी हाथ से निकल चुकी थी, अतएव रहे तो महापद्मनन्द ही पर अब वह पद्मनन्द नहीं थे जो कभी पहले थे। बदले की भावना से उन्होंने जीवन भर स्वामि भक्त सेवक की तरह काम करने वाले महामन्त्री शकटार को ही बन्दी बना लिया और वररुचि को अपना महामन्त्री नियुक्त कर लिया। राजकाल से सर्वथा शून्य देवदत्त (अब महापद्मनन्द) ने सर्वत्र अस्त−व्यस्तता फैलाई उसी का प्रतिफल यह हुआ कि उसे एक दिन चाणक्य के हाथों पराजय का मुँह देखना पड़ा।
इस घटना के पीछे किसी राजतन्त्र के इतिहास की व्याख्या करना उद्देश्य नहीं वरन् एक बड़े इतिहास−आत्मा के इतिहास की ओर−मानव जाति का ध्यान मोड़ना है, सांसारिकता में पड़कर जिसकी नितान्त उपेक्षा की जाती है। एक शरीर के प्राण किसी अन्य शरीर में रहें, यह इस बात का साक्षी और प्रमाण है कि आत्मा शरीर से भिन्न और स्वतन्त्र अस्तित्व है। इस शाश्वत सत्ता को न समझने की अज्ञान दृष्टि ही मनुष्य को भौतिकतावादी बनाती है, स्वार्थी बनाती है, ऐसे अज्ञान ग्रस्त मनुष्य अपने पीछे अन्धकार की एक लम्बी परम्परा छोड़ते हुए जाते हैं और प्रकाश पथ का पथिक, आनन्द मूर्ति आत्मा, अन्धकार और सांसारिक बाधाओं में मार−मारा फिरता रहता है।
योग मार्ग उस सत्ता से सम्बन्ध जोड़ने, आत्मानुभूति कराने का सुनिश्चित साधन है। यह राह भले ही कठिनाइयों की आत्म नियन्त्रण, आत्म सुधार की हो, पर एक वैज्ञानिक पद्धति है जिसके परिणाम सुनिश्चित होते हैं। उस कठिन मार्ग पर चलाने वाली आस्था को ऐसी परिस्थितियाँ निःसन्देह परिपुष्ट करती हैं, इस तरह की घटनाएँ उसी युग में ही होती रही हों सो बात नहीं आज भी इस देश में ऐसे योगी हैं जो इस विद्या को जानते हैं।
बात उन दिनों की है जब भारतवर्ष में अंग्रेजों का राज्य था उन दिनों पश्चिमी कमाण्ड के मिलिटरी कमाण्डर एल. पी. फैरेल थे उन्होंने अपनी आत्म−कथा में एक मार्मिक घटना का उल्लेख इन शब्दों में किया हैं−
मेरा कैम्प असम में ब्रह्मपुत्र के किनारे लगा हुआ था। उस दिन मोर्चे पर शान्ति थी। मैं जिस स्थान पर बैठा था उसके आगे एक पहाड़ी ढलान थी, ढाल पर एक वृद्ध साधु को मैंने चहलकदमी करते देखा। थोड़ी देर में वह नदी के पानी में घुसा और एक नवयुवक के बहते हुए शव को बाहर निकाल लाया। वृद्ध साधु अत्यन्त कृशकाय थे, शव को सुरक्षित स्थान तक ले जाने में उन्हें कठिनाई हो रही थी तथापि वे यह सब इतनी सावधानी से कर रहे थे कि शव को खरोंच न लगे यह सारा दृश्य मैंने दूरबीन की सहायता से बहुत अच्छी तरह देखा।”
“इसी बीच अपने सिपाहियों को आदेश देकर मैंने उस स्थान को घिरवा लिया। वृद्ध वृक्ष के नीचे जल रही आग के किनारे पालथी मारक बैठे। दूर से ऐसा लगा वे कोई क्रिया कर रहे हों थोड़ी देर यह स्थिति रही, फिर एकाएक वृद्ध का शरीर एक ओर लुढ़क गया; अभी तक जो शव पड़ा था वह युवक उठ बैठा और अब वह उस वृद्ध के शरीर को निर्ममता से घसीट कर नदी की ओर ले चला इसी बीच मेरे सैनिकों ने उसे बन्दी बना लिया। तब तक कौतूहल वश मैं स्वयं भी वहाँ पहुँच गया था। मेरे पूछने पर उसने बताया−महाशय! वह वृद्ध मैं ही हूँ। यह विद्या हम भारतीय योगी ही जानते हैं। आत्मा के लिए आवश्यक और समीपवर्ती शरीर प्राण होते हैं, मनुष्य देह तो उसका वाहन मात्र है। इस शरीर पर बैठकर वह थोड़े समय की जिन्दगी की यात्रा करता है, किन्तु प्राण शरीर तो उसके लिए तब तक का साक्षी है जब तक कि वह परम−तत्व में विलीन न हो जाये?”
“हम जिसे जीवन कहते हैं−प्राण, शरीर और आत्मा की शाश्वत यात्रा की रात, उसका एक पड़ाव मात्र है जहाँ वह कुछ क्षण (कुछ दिनों) विश्राम करके आगे बढ़ता है यह क्रम अनन्त काल तक चलता है, जीव उसे समझ न पाने के कारण ही अपने को पार्थिव मान बैठता है, इसी कारण वह अधोगामी प्रवृत्तियाँ अपनाता, कष्ट भोगता और अन्तिम समय अपनी इच्छा शक्ति के पतित हो जाने के कारण मानवेत्तर योनियों में जाने को विवश होता है। मुक्ति और स्वर्ग प्राप्ति के लिए प्राण शरीर को समझना, उस पर नियन्त्रण आवश्यक होता है। यह योगाभ्यास से सम्भव है। अभी मुझे इस संसार में रहकर कुछ कार्य करना है, जबकि मेरा अपना शरीर अत्यन्त जीर्ण हो गया था इसी से यह शरीर बदल लिया।”
उस व्यक्ति की बातें बड़ी मार्मिक लग रही थीं। मन तो करता था कि और अधिक बातें की जायें, किन्तु हमारे आगे बढ़ने का समय हो गया था, अतएव इस प्रसंग को यहीं रोकना पड़ा, पर मुझे न तो यह घटना भूलती है और न यह तथ्य कि हम पश्चिम वासी रात को दिन, अन्धकार को ही प्रकाश मान बैठे है, इससे अवान्तर जीवन के प्रति हमारी प्रगति एकदम रुकी है यह मरण का वीभत्स रास्ता है उससे बचने के लिए एक दिन पूर्व का अनुसरण करना ही पड़ेगा।
ऊपर की दो घटनाएँ परकाया प्रवेश की, यह सिद्ध करती हैं कि शरीरों और शारीरिक सुखों के लिए मानवीय मोह, माया मिथ्या है शरीर को, आत्मा का देवमन्दिर समझकर उसकी पवित्रता तो रखी जाये, पर उसे विषय वासनाओं के द्वारा इस तरह गन्दा गलीज और घृणास्पद न बनाया जाये कि अपना अन्तःकरण ही धिक्कार कर उठे। पश्चिम की एक ऐसी ही घटना यह सिद्ध करती है कि शारीरिक विषय वासनाओं की आसक्ति किस तरह बार−बार शरीरों में आने को विवश होती है, यहाँ तो प्राण बल था, अतएव दो आत्माएँ एक शरीर के लिए झगड़ती रहीं, किन्तु जब प्राण निर्बल हो तो कीड़े−मकोड़ों की अभावग्रस्त जिन्दगी ही मिलना स्वाभाविक हैं।
मिशिगन (अमेरिका) के एक छोटे से गाँव वैटल क्रीक में वाल्टर सोडरस्ट्राम नामक एक व्यक्ति रहता था वह एक ऊन की फैक्ट्री में काम करता था। प्रस्तुत घटना 13 सितम्बर 1851 के “न्यूयार्क मरकरी” अंक में इन्हीं सोडर स्ट्राम ने छपाई।
वाल्टर को समुद्री नौकायन का शौक था वे जिस टापू पर नौका बिहार और मछलियाँ पकड़ने जाया करते उस पर एक कुटिया थी जिस पर एक अधेड़ आयु का व्यक्ति रहता था। अक्सर आते−जाते वाल्टर की उनसे जान−पहचान हो गई थी। एक दिन तूफान और आकस्मिक वर्षा के कारण वाल्टर ने रात उस कुटिया में ही बिताई। जिस समय तूफान का दौर चल रहा था स्ट्रैण्ड नामक उस व्यक्ति की स्थिति बड़ी विचित्र रही वह इस तरह काँपता रहा जैसे कोई पत्ता काँपता हो यही नहीं बीच−बीच में वह भयंकर चीत्कार भी करता। इस चीत्कार में वह कभी एक भाषा निकालता कभी सर्वथा अनजान दूसरी वाल्टर स्काट ने वह रात बड़ी कठिनाई से बिताई−वे लिखते हैं−उसकी देह बुरी तरह कसमसा कर ऐठती थी तो लगता था कि दोनों ओर से पकड़कर दो आदमी उसे निचोड़ रहे हों। थोड़ी देर तक शरीर पीला और निढाल रहा पीछे स्ट्राण्ड मुस्काकर उठ बैठा। पूछने में पहले तो वह टालता रहा, पर बहुत आग्रह करने पर उसने बताया कि एक फ्रांसीसी की आत्मा भी इस शरीर पर आने के लिए अक्सर प्रतिद्वन्द्विता करती है। उसने बताया कि वास्तव में यह शरीर उसी का है, किन्तु शक्तिशाली होने के कारण इस पर मैंने आधिपत्य जमा रखा है। उसने जेब से एक लाइटर और एक डायरी भी दी जो इस फ्रांसीसी के थे लाइटर पर जेकब व्यूमांट लिखा था। वाल्टर उन्हें लेकर चले आये यह घटना उनके मस्तिष्क पर छाई रही।
कुछ दिन बाद वाल्टर को पेरिस जाने का अवसर मिला, कौतूहल वश वह डायरी के अनुसार पता लगाते हुए व्यूमांट तक पहुँच गये वहाँ जाकर उसने पाया कि वही स्ट्रैण्ड जो टापू में रहता था वहाँ विद्यमान था। वाल्टर को उसने पहचाना तक नहीं, पर उसने अपनी जेब से वाल्टर का फोटो निकालकर बताया कि आपका यह फोटो मेरे पास कैसे आया मुझे ज्ञात नहीं। वाल्टर के स्मरण कराने पर वह अपने को व्यूमाण्ट ही बताता रहा−अलबत्ता उसने यह बात स्वीकार की कि उसका एक अमेरिकी आत्मा से लम्बे समय तक शरीर के लिए संघर्ष हुआ है और उसमें अन्तिम विजय मेरी रही।
एक तीसरी घटना जिसमें एक ही आत्मा द्वारा विभिन्न शरीर उसी तरह बदलने का जिक्र है। जिस तरह एक शहर से ट्रान्सफर के बाद दूसरे शहर में आवास किराये पर लेना पड़ता है। यह घटना अभी थोड़े दिन पूर्व की है।
अपनी पुस्तक में लेखक ने अपने लामा गुरु मिंग्यार का वर्णन करते हुए लिखा है कि परकाया प्रवेश की विद्या मैंने उन्हीं से सीखी और उन्हीं के आदेश से अब तक मैंने तीन शरीर बदले हैं। यह ग्रन्थ पूरा करने के बाद ही मैं यह अंग्रेज शरीर भी छोड़ दूँगा और सचमुच ही पुस्तक लिखने के बाद यह अंग्रेज मृत पाये गये। मृतक की देह पर न तो किसी आघात के लक्षण है न कृत्रिम मृत्यु। शरीर के प्रत्येक अंग को व्यवस्थित करके इस तरह प्राण निकले हैं मानो सचमुच किसी यात्रा की तैयारी में रहे हों। इस घटना के बाद जहाँ एक ओर इसके बारे में तहलका मचा, खोज करने पर वह स्थान, वह परिस्थितियाँ सच निकलीं दूसरी ओर लोग “भारतीय प्राण विज्ञान” की प्रामाणिकता और उसकी उपयोगिता स्वीकारने और समझने को विवश हो रहे हैं।
अपने हृदय में उत्साह, प्रामाणिकता एवं क्रियाशीलता की ज्योति जलाए रखें। यह स्वर्णिम−ज्योति न केवल आपके अन्तस् को ही आलोकित कर प्रकाशमय बनाए रखेगी वरन् आपके परिवार व समाज को भी उज्ज्वल बना देगी! आपकी हो यह स्वर्णिम प्रकाश किरण समाज में मधुरता रस, आकर्षण, स्नेह, व्यवस्था की लय बना रखेगी। इससे प्रकाशित पथ ऐसा होगा जिस पर घोर अन्धकार में भी अन्य व्यक्ति निर्भयता से चलते रहेंगे।
-गुरुदेव रविन्द्रनाथ टैगोर
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जीवन एक संग्राम है। उसमें प्रतिपक्ष के अनेकों व्यक्ति, अस्त्र और व्यवधान सामने आते हैं। इनसे निपटने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। युद्ध मोर्चे पर लड़ने वाले सैनिकों की−खेल मैदान में कौशल दिखाने वाले खिलाड़ियों की−मनःस्थिति से कम में जीवन संग्राम में लड़ना और विजय पाना कठिन है। समस्याएँ स्वाभाविक हैं उनका हल निकालने से ही हमारे पौरुष, साहस और कौशल का संवर्धन होता है। आवश्यकताएँ, उनकी पूर्ति साधन जुटाने में कठिनाई, अवरोधों का समाधान इसी चक्र पथ पर सामान्य जीवन की धुरी घूमती है। हर रोज पेट में भूख लगती है−यह एक दैनिक समस्या है। इसलिए हर दिन पुरुषार्थ करना पड़ता है। वह सरल नहीं कठिन उलझन भरा होता है। शरीर के सभी छोटे बड़े छेद मल उत्पन्न करते हैं। उन्हें स्थानान्तरित करने की समस्या का समाधान किया जाय तो नारकीय दुर्गन्ध और सड़न से घिर जाना पड़ेगा। ऐसी−ऐसी अनेकों गुत्थियाँ सामने आती हैं और वे सूझ−बूझ एवं पौरुष को चुनौती देकर अपना समाधान चाहती हैं।
कठिनाइयों से सुरक्षित−असफलताओं से रहित−सरल एवं सुविधा सम्पन्न जीवन कदाचित ही किसी अभागे को उपलब्ध हुआ हो। जिसे वैसा अवसर मिला होगा समझना चाहिए उसे अदक्ष बने रहने का अभिशाप मिला है। गुजारा भले ही चैन से कर लिया जाय पर आराम की जिन्दगी प्रतिभा से वंचित ही रहती है। इतना महंगा चैन जिसे खरीदना पड़ा, समझना चाहिए कि वह हर दृष्टि से घाटे ही घाटे में रहा। ईश्वर को अपने ज्येष्ठ पुत्र पर ऐसी लानत बरसना पसन्द नहीं, इसलिए उसने उसे समस्याओं युक्त किन्तु साथ ही उन्हें सुलझाने में समर्थ जीवन प्रदान करके संसार क्षेत्र में पग−पग पर संघर्ष करने के लिए भेजा है।
जो उलझनों से डर कर भागते हैं। उनके लिए मुँह छिपाने के लिए कहीं जगह है नहीं। घर छोड़कर जंगल में चले जाने पर वहाँ की समस्याएँ घर से भी अधिक हैं। वहाँ मात्र शरीर निर्वाह के साधन जुटाने और सुरक्षा का प्रबन्ध करने में इतना श्रम और मनोयोग खर्च करना पड़ता है जितने में पूरे परिवार का गुजारा भली प्रकार हो सकता है। भीड़ में रहने की अपनी कठिनाई है, उसमें बेचैनी होती है किन्तु एकाकी रह कर देखा जाय तो उसे काटना और भी कठिन पड़ता है। एकान्त जीवन में चैन की कल्पना तभी तक रहती है जब तक कि उस प्रकार रहने का अवसर नहीं मिला है जिसे भी नितान्त एकाकी रहना पड़ा है उसी को वहाँ से भाग कर फिर भीड़ में आना पड़ा है। वस्तुतः भारी भीड़ और नितान्त एकाकीपन दोनों ही ‘अति’ वादी है। नितान्त चैन और निरन्तर संघर्ष भी अप्रिय लगते हैं किन्तु मध्यवर्ती जीवन में समस्याएँ रहनी ही चाहिए और उनके समाधान में बुद्धि कौशल एवं श्रम पराक्रम को संलग्न रहना ही चाहिए। इसे कम में उन सद्गुणों का विकास हो ही नहीं सकता जो पर्वतोमुखी प्रगति के आधार भूत साधन हैं। तथ्यों को समझा जाना चाहिए और विश्व के क्रीड़ा प्रांगण में अपनी कुशलता का परिचय देने के लिए उमंग भरे खिलाड़ी की भूमिका निभाने के लिए कटिबद्ध रहना चाहिए। संसार एक रंग मंच है उस पर नाटक के आकर्षक पात्र की तरह हमें अपना प्रभावोत्पादक खेल खेलना चाहिए।
कठिनाइयों से डरना और उलझनों से घबराना बेकार है। घबराहट में इतना ही हो सकता है कि प्रस्तुत उत्तरदायित्व को छोड़ कर चैन की तलाश में, कहीं बच निकलने की जगह तलाश करें और मोर्चा छोड़कर भाग खड़े हों। ऐसा किया तो जा सकता है पर जिस प्रयोजन के लिए यह सस्ती तरकीब अपनाई गई थी वह पूरी हो नहीं सकेगी। एक उलझन को सुलझाने के लिए दस नई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा जो अपरिचित होने के कारण और भी अधिक भारी पड़ेंगी।
प्रगतिशील जीवन के लिए संघर्ष आवश्यक है। दूसरों को सताने के लिए आत्म रक्षा और उपार्जन के लिए जूझना पड़ता है। किसान को जमीन से, विद्यार्थी को पुस्तकों से, श्रमिक को मशीनों से और विचारक को समस्याओं से जूझना पड़ता है। सृजन के लिए पति−पत्नी को मिलकर मनोयोगपूर्वक संयुक्त प्रयत्न करना पड़ता है। सन्तानोत्पादन से लेकर गृहस्थ की सुव्यवस्था तक इसी सृजनात्मक संघर्ष का प्रतिफल उनके सामने आता है। नवजात शिशु को भ्रूण लोक से उतर कर भूलोक में अवतरित होने के लिए चक्रव्यूह वेधन की तरह प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। इस संघर्ष की प्रखरता का परिचय प्रसव वेदना के रूप में जननी अपने अनुभव से बता सकती है। हृदय, आमाशय, आँतें, जिगर, गुर्दे, मस्तिष्क आदि भीतरी अवयव बिना क्षण भर विश्राम लिए जीवित रहने के लिए मृत्यु को दूर भगाने के लिए कितना परिश्रम करते हैं इसे कोई भी शरीर विज्ञानी उन अवयवों की गतिविधियों का वर्णन करते हुए बता सकता है। रक्त से श्वेत जीवाणुओं को विजातीय द्रव्य और विषाणुओं से जूझने के लिए हर घड़ी कमर कस कर मोर्चे पर खड़ा रहना पड़ता है। इसमें तनिक भी शिथिलता आने पर दुर्बलता, रुग्णता और अकाल मृत्यु के भयानक आक्रमण आरम्भ हो जाते हैं और जीवन की स्थिरता में सन्देह उत्पन्न होने लगता है। मस्तिष्क को तो भीतर और बाहर की अगणित समस्याओं के इतने अधिक समाधान एक साथ करने पड़ते हैं कि शतविधानियों जैसी उसकी तत्परता देखकर चकित रह जाना पड़ता है।
अर्जुन लड़ाई से बचना चाहता है। कृष्ण उसे समझाते हैं। ऐसा करके भी वह चैन से नहीं बैठ सकेगा। पाप को हम न मारे तो निर्विरोध स्थिति पाकर प्रबल हुआ पाप हमें मार डालेगा। इसलिए जीवित रहने पर सुख और मरने पर स्वर्ग का लाभ मिलने का उभय−पक्षीय लाभ समझाते हुए उसे कमर बाँधकर उठ खड़े होने का उद्बोधन करते हैं। जब आना−कानी की स्थिति देखते हैं तो अनुशासनात्मक निर्देश करते हैं कि “युद्धाय कृत निश्चय” निश्चित रूप से युद्ध ही करना चाहिए।
समझाने और सज्जनता की नीति सदा ही सफल नहीं होती। प्रेम से सुधार का उद्यान उत्पादन उर्वरा भूमि में ही सम्भव होता है। दुष्टता को भय की भाषा ही समझ में आती हैं। उसे और किसी उपाय से सही राह पर चलने के लिए सहमत नहीं किया जा सकता। नीति शास्त्र में साम की तरह दंड को भी औचित्य की ही संज्ञा दी गई है।
भगवान परशुराम का अवतार कहे जाने वाले गुरु गोविन्दसिंह ने अपने समय की दुर्दशा का कारण जन समाज की आन्तरिक भीरुता को देखा। उनका निष्कर्ष कि जब तक जन आक्रोश न जागेगा। शौर्य और साहस की पुनः प्राण प्रतिष्ठा न होगी। तब तक पददलित स्थिति से उबरने का अवसर न मिलेगा। उन्होंने संघर्ष के लिए जनमानस को ललकारा। भगवान को ‘असिध्वज’ और महा लौह नाम दिये। असिध्वज वे भगवान हैं जिनके झण्डे पर तलवार का निशान है। महा लौह वे भगवान हैं जिनकी प्रतिभा तलवार या भाले के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त करती है, सबसे पहले भगवान ने तलवार बनाई इसके बाद और कुछ सृजा। प्रार्थना करते हुए वे इन दो नामों वाले भगवान का विशेष रूप से उल्लेख करते हैं−
जो हो सदा हमारे पच्छा। श्री ‘असिधुज’ जी करिहहु रच्छा। महाकाल रख वार हमारे। ‘महा लौह’ में किंकर धारे॥
ब्राह्मण धर्म की यज्ञीय परम्परा के पाँच प्रधान उपकरणों में जहाँ घृत होमने के स्रुवा की आवश्यकता है वहाँ सुरक्षा के शस्त्र ‘स्फ्य’ की भी उतने ही आदर और भक्ति भाव के साथ स्थापना की जाती है। ‘स्फ्य’ तलवार का प्रतीक है। दुष्टता से बचाव किये बिना सज्जनता की प्राण रक्षा हो नहीं सकती। विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिए धनुर्धारी राम लक्ष्मण खड़े थे। संरक्षण की यह परम्परा धर्मानुष्ठानों में अभी भी कार्यान्वित होती है।
मध्यकालीन अतिवादी दयालुता के उत्साह में लोगों को ऐसी अहिंसा का पाठ पढ़ाया जिसके फलस्वरूप अत्याचार सहते रहने की भीरुता को ‘क्षमा’ का आवरण ओढ़ा दिया गया। संसार को माया मिथ्या कह कर प्रस्तुत समस्याओं को उलझी छोड़कर वैराग्य की आड़ में जा छिपने के लिए कहा गया। क्षमा का उद्देश्य और स्वरूप लोगों ने समझा ही नहीं, मात्र आततायी के सामने नत मस्तक हुए खड़े रहने और उसे कुछ भी करने देने की छूट को क्षमा−अहिंसा आदि के रूप धर्म धारणा के अन्तर्गत जन मानस में उतार दिया गया। फलतः धर्मोपदेश के लाभों से समाज लाभान्वित न हो सका।
भगवान के अवतरण में दो प्रयोजन हैं और वे दोनों ही एक से एक बढ़कर महत्वपूर्ण हैं। एक धर्म की स्थापना दूसरा अधर्म का नाश। यहाँ औचित्य के अभिवर्धन और अनाचार के उन्मूलन को समान महत्व दिया गया है। भगवान के सभी अवतारों में इन्हीं दो प्रयोजनों के लिए अनेकानेक क्रिया कलाप सम्पन्न हुए हैं। अवतारों की लीलाओं में एक प्रकार की नहीं वरन् इन दोनों ही गतिविधियों का समुचित समावेश है। धर्म श्रद्धा के साथ साथ अधर्म के प्रति घृणा का समन्वय रहना चाहिए अन्यथा एक पक्षीय प्रतिपादन लाभ के स्थान पर हानि कारक परिणाम ही प्रस्तुत करता रहेगा। अवतारों की कथा गाथाओं में धर्म प्रेमी जिज्ञासुओं को इस समन्वय धर्म को अपनाने की शिक्षा एवं प्रेरणा दी गई है।
मध्यकालीन एकांगी भक्ति भावना में निराशाजन्य कातरता का बाहुल्य था। परावलम्बन का−याचना अनुग्रह का−भाव ही एक तथाकथित भक्ति में तरह तरह के वेश बना कर मन बहलाने और मन समझाने का प्रयोजन पूरा कर रहा था। उसमें प्रेमयोग जैसी कोमल भावनाओं के समावेश को जितना लाभ था उससे अधिक परावलम्बन का अपने को दीन अकिंचन मानने का भाव भी था। भक्ति के पवित्र नाम का वास्तविक तात्पर्य न तो समझा गया और न समझाया गया वरन् उस जंजाल में उलझ कर दीनता का परावलंबन का−पराभव अनजाने ही गले में बाँध लिया गया। समाज की दीर्घ कालीन दुर्गति का एक बड़ा कारण यह भी रहा है।
नये युग के सन्तों में समर्थ रामदास, गुरु गोविन्दसिंह स्वामी दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द, लोक मान्य तिलक महात्मा गांधी जैसे महा पुरुषों की नई पीढ़ी सामने आई। उसने अपने तीखे विचारों से कर्मयोग के, अनीति विरोधी संघर्ष के स्वर पैने किये और प्रसुप्त जातीय जीवन को उठाकर फिर एक बार तन कर खड़ा होने की स्थिति में ला दिया। अमेरिका से लौटने पर स्वामी विवेकानन्द ने धार्मिक जनता का उद्बोधन करते हुए कहा था−“सोये हुए देवताओं को सोने दो और जगे हुए राष्ट्र देवता की आराधना में लग जाओ यही परमात्मा की सबसे बड़ी आराधना है। ऐसे ही मिलते−जुलते उद्बोधन अन्य प्रगतिशील लोकनायकों ने दिये। उसी का प्रतिफल था कि धर्म क्षेत्र सहित जीवन के समस्त क्षेत्रों में नव जीवन का संचार हुआ और उसका प्रतिफल राष्ट्रीय स्वाधीनता के रूप में सामने आया।
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शरीर के यों सभी अंग महत्वपूर्ण हैं और अपना−अपना काम सम्भालने में उनकी उपयोगिता एवं क्षमता को अद्भुत ही कहा जा सकता है; तो भी सम्पूर्ण अवयवों में मस्तिष्क की गरिमा सर्वोपरि है। लगता है इसीलिए ईश्वर ने उसे शरीर कैलाश के सर्वोच्च शिखर पर शिवजी की तरह प्रतिष्ठापित किया है। उसके निवास के लिए खोपड़ी का ऐसा सुदृढ़ दुर्ग गढ़ा है; जिसमें चोट−फेंट से बचने की ही नहीं ऋतु प्रभाव से लेकर अनेकानेक प्रदूषणों और विकिरणों से भी सुरक्षित रख सकने की पूरी−पूरी क्षमता है। साथ ही इस दुर्ग की दीवारें बाहरी क्षेत्र के साथ ऐसे महत्वपूर्ण सम्पर्क साधे रहती हैं जो मस्तिष्क के लिए ही नहीं सम्पूर्ण शरीर के लिए भी अतीव उपयोगी है।
जन्म−काल में मनुष्य मस्तिष्क मात्र 12 ओंस का होता है, किन्तु पूर्ण यौवन आने पर वह प्रायः तीन पौण्ड भारी हो जाता है। वजन की तुलना में उसकी कार्यक्षमता असंख्य गुनी बढ़ जाती है। माइक्रो फिल्मों के माध्यम से विशालकाय ग्रन्थ छोटी−सी डिबिया में बन्द करके रखे जा सकते हैं। एक स्वस्थ और सुविकसित मस्तिष्क में प्रायः एक करोड़ ग्रन्थों में लिखी जा सकने जितनी सामग्री संग्रह करके रखी जा सकती है। आवश्यकता पड़ने पर इस क्षमता में सहज ही दूनी अभिवृद्धि भी की जा सकती है। किसी कारणवश आधा मस्तिष्क नष्ट हो जाए तो शेष आधे से भी पूरे का काम चल सकता है। एक हाथ, एक पैर, एक आँख वाले अनेकों मनुष्य होते हैं, इसी प्रकार किसी कारण एक नष्ट हो जाने पर दूसरा गुर्दा एवं फेफड़ा ही दोनों का काम अकेला ही करता रहता है। मस्तिष्क दो नहीं है। फिर भी उसका आधा भाग शेष आधे की पूर्ति करता रह सकता है। द्वितीय महायुद्ध में घायल सैनिकों में से 62 का आधा मस्तिष्क गोलियों से छिद जाने के कारण निकालना पड़ा था। प्रयोग से यह आशंका निर्मूल रही कि जितना अंश कट गया है उसके अनुपात से मस्तिष्कीय कार्य क्षमता घटी हुई रहेगी, पर वैसा कुछ हुआ नहीं। जितना टुकड़ा खोपड़ी में बचा रहा उसी ने पूर्ण मस्तिष्क जैसा काम भली प्रकार चला दिया।
शरीर को भारी, मोटा ऊँचा देखकर उसके बलिष्ठ होने का अनुमान लगाना किसी हद तक सही हो सकता है, पर मस्तिष्क के भार या विस्तार के आधार पर किसी प्राणी के बुद्धिमान या मूर्ख होने का अन्दाज नहीं लगता। विकसित मनुष्य का मस्तिष्क 3 पौण्ड भारी होता है और हाथी का दस पौण्ड। फिर भी हाथी मनुष्य की तुलना में बुद्धिमान नहीं होता। बुद्धि का सम्बन्ध कोरटक्स में फैली हुई तंत्रिका कोशिकाओं से हैं। उसमें भी एक और बात है कि उस क्षेत्र की कोशा से कितनी अधिक अपनी सहेलियों के साथ जुड़ी हुई है और उनके बीच आदान−प्रदान का कैसा स्फूर्तिवान सिलसिला चलता है। सहयोग का सिद्धान्त जहाँ प्रगति के हर क्षेत्र में काम करता है वहाँ बुद्धिमत्ता का आधार भी वही है, यह मनुष्य की मस्तिष्कीय कोशिकाओं की संरचना और प्रखरता को देखते हुए सहज ही स्वीकार किया जा सकता है।
शरीर संचालन से लेकर मानसिक हलचलों तक और भावानुभूतियों से लेकर चित्र−विचित्र कल्पनाओं का तानाबाना मस्तिष्क के छोटे से क्षेत्र में ही बुना जाता है। अनुभव उसी में एकत्रित रहते हैं और योजनाएँ इसी में बैठे बुद्धिमान घटक बनाया करते हैं। शरीर की आकुंचन प्रकुंचन, श्वास−प्रश्वास, ग्रहण−विसर्जन जैसी अनेकानेक सरल और जटिल क्रिया−प्रक्रियाएँ उसी क्षेत्र में संचालित होती हैं। दार्शनिक, वैज्ञानिक, व्यावसायिक, व्यापारिक, प्रणय, संगीत, कला, पराक्रम जैसी अगणित प्रवृत्तियों के उद्भव, अभिवर्धन और समापन का केन्द्र यही है। काया की संरचना और कार्यपद्धति कुछ भी क्यों न हो उसके चप्पे का नियन्त्रण और संचालन पूरी तरह मस्तिष्क के हाथ में हैं। कौन किस तरह जीवनयापन करता है और भविष्य में क्या बनने, क्या पाने जा रहा है इसका सही अनुमान लग सकता है, यदि मनःक्षेत्र की गतिविधियों की समुचित जानकारी प्राप्त हो सके।
खोपड़ी के भीतर भरा हुआ यह थोड़ा−सा पदार्थ अपनी संग्रह क्षमता की दृष्टि से अद्भुत है। समय पर भण्डार की वस्तुओं को तुरन्त निकाल लाने की उसकी कुशलता तो और भी अधिक आश्चर्यजनक है। इस दृष्टि से संसार का कोई श्रेष्ठतम पुस्तकालय या मनुष्य कृत कोई भी कम्प्यूटर उसकी तुलना नहीं कर सकता। यन्त्रों की रचना ऐसी है कि वे जिस उद्देश्य के लिए बने हैं और निर्माताओं ने जितने शक्ति सम्पन्न बनाये हैं उतना ही काम कर सकते हैं, पर मस्तिष्क के बारे में ऐसी बात नहीं हैं। वह अपने क्रिया कौशल में ही नहीं स्तर में भी निरन्तर वृद्धि करता रह सकता है। बचपन से लेकर मरण पर्यन्त वह अपना काम करते हुए भी अपनी योग्यता बढ़ाने के लिए वैसा ही प्रयत्नशील रहता है जैसे कोई अध्यापक स्कूल का काम करने के साथ−साथ अपनी योग्यता वृद्धि के लिए नई−नई परीक्षाएँ भी पास करता चले। मस्तिष्कीय संरचना और क्रिया शक्ति के सम्बन्ध में पिछले दिनों बहुत कुछ जाना जा चुका है, किन्तु जो जानने के लिए शेष है वह उपलब्ध ज्ञान की तुलना में कहीं अधिक है। सुविदित और व्यवहृत क्रिया−शक्ति की दृष्टि से उसकी तुलना किसी भी मानवी कृति से नहीं की जा सकती। फिर भी उसके इतने कोष्टक बन्द पड़े हैं कि यदि उन सबको गतिशील बनाया जा सके तो मनुष्य की शारीरिक और मानसिक क्षमता इतनी अधिक बढ़ सकती है कि वह आज की स्थिति से तुलना करने का देवता या दैत्य जितना बलिष्ठ समर्थ दिखाई पड़ने लगे।
शारीरिक परिपोषण के लिए, विद्युतीय उत्तेजन के लिए व्यायाम, मालिश जैसे प्रयोग काम में लाये जाते हैं और रासायनिक परिपोषण के लिए सुपाच्य एवं पौष्टिक आहार की व्यवस्था की जाती है। मानसिक क्षमताओं को परिष्कृत करने के लिए ऐसे आहार का प्रयत्न करना पड़ता है जो सात्विक तो हो ही साथ ही ऐसी सूक्ष्म शक्ति से सम्पन्न भी हो जो चेतना में उपयोगी प्रखरता उत्पन्न कर सकने की सामर्थ्य से युक्त कहा जा सके। मनःसंस्थान में यों उसके अपने स्वसंचालित शक्ति उत्पादन केन्द्र हैं, पर बाहर से भी उस तन्त्र को सहायता पहुँचाने के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। इन उपचारों में यों तरह−तरह की वे तपश्चर्याएँ भी आती हैं जो स्नायु संस्थान में उत्तेजना उत्पन्न करके सारे मनःक्षेत्र को अभिनव उत्साह से भर देती हैं, इसके अतिरिक्त ध्यान साधना इस प्रयोजन के लिए सर्वोपरि हैं। एकाग्रता से शक्ति उत्पादन के अगणित प्रमाण आये दिन देखे जाते हैं। आतिशी शीशे पर सूर्य ताप का केन्द्रीकरण−भाप के धक्के से इंजन का चलना, बन्दूक के छेद से बारूद का विस्फोटक हो उठना जैसे उदाहरण हमें एकाग्रता की शक्ति का परिचय देते हैं। मस्तिष्क संस्थान में अगणित विद्युत प्रवाह उठते और बहते रहते हैं। इन्हें केन्द्रित करके मनःक्षेत्र को सुविकसित करने में नियोजित कर लिया जाय तो चिन्तन चेतना का असाधारण परिष्कार हो सकता है और हम सहज ही मनोबल सम्पन्न बन सकते हैं। कहना न होगा कि मनोबल की गरिमा शरीर बल, शिक्षा बल, धन बल, कौशल बल, साधन बल आदि सभी की अपेक्षा अधिक महत्वपूर्ण है। उसके सहारे मनुष्य उन्नति के उस चरम शिखर पर पहुँच सकता है; जिसकी आज तो कल्पना कर सकना भी कठिन है।
मनुष्य का व्यक्तित्व व उसमें अंतर्निहित कृतत्व शक्ति वाणी में प्रसुप्त रहती है। मनुष्य के बोलचाल, सम्भाषण से ही विदित हो जाता है कि उसमें कितनी क्षमता है व उसका विनियोजन किस कार्य में किया जा सकता है।
−कारलायल
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व्यष्टि को श्रेष्ठ बनाये बिना समष्टि की समर्थता का कोई अर्थ नहीं रह सकता। संघ बद्धता की उपयोगिता तभी है जब उसके घटकों में सज्जनता मौजूद हो। दुष्टों का समूह दूसरों के लिए संकट उत्पन्न करेगा और आपस के जादती विग्रह खड़ा करके आत्मघात जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करेगा। अपनी शताब्दी में संघबद्धता पर इतना जोर दिया गया है कि उसमें व्यक्ति की मौलिकता ही पिस गई। अधिनायक वादी देशों ने अपनी समूह शक्ति का विकास तो बहुत किया पर व्यक्ति की अन्तरात्मा की विवशता की कातरता से बँध कर रह जाना पड़ा। समाज हित का नारा लगाकर नैतिक मूल्यों को झुठला दिया गया। फलतः व्यक्ति की दुष्टता ने समूह की पीठ पर चढ़ कर विनाश के और भी बड़े आधार खड़े कर दिये। कत्लेआमों का, जातीय विनाशों का, सामूहिक अत्याचारों का इतिहास रोमांचकारी है। व्यक्ति की दुष्टता समझ में आती है पर समूह द्वारा इस प्रकार की नृशंसता क्यों कर अपनाई जा सकती है। यह आश्चर्य का विषय है। समूह तभी नृशंसता पर उतरता है जब उसकी भाव सम्वेदना, आदर्शवादिता समाप्त हो जाती है। मनुष्यों और पशुओं का सामूहिक−संहार देश भक्ति के, सुविधा संवर्धन के, सांस्कृतिक विस्तार के आकर्षक नाम देकर किया जाता रहा है जब कि न्याय और सहयोग को सच्ची इच्छा लेकर चलने पर अधिक−अच्छी परिस्थितियों और परिणामों का लाभ लिया जा सकता था। सामूहिक विकास यदि व्यक्ति की गरिमा का अपहरण करके किया जाता है तो उसमें उत्पादित शक्ति का परिणाम भी सामूहिक विनाश के रूप में ही सामने आ सकता है।
विज्ञान, उद्योग, शस्त्र सज्जा, शिक्षा, वाहन, संचार आदि साधनों में वृद्धि होती रहे इसमें किसी को क्या आपत्ति हो सकती है, पर ध्यान रखने की बात इतनी ही है कि भौतिक प्रगति के साथ−साथ आत्मिक प्रगति का क्रम समानान्तर चलते रहना चाहिए अन्यथा बढ़ी हुई समृद्धि, नैतिकता का अंकुश न रहने पर उन्मत्त हाथी की तरह विनाश के इतने कुत्सित दृश्य खड़े करेगा जिसकी तुलना में दरिद्रता एवं बिखराव की वह स्थिति भी बुरी न लगेगी जिसे पिछड़ापन और असभ्यता कहकर तिरस्कृत किया जाता है।
समर्थता और सम्पन्नता के साथ आदर्शवादी नीति सत्ता के अभिवर्धन का भी उतने ही उत्साह से प्रयत्न किया जाना चाहिए जितना कि भौतिक प्रगति के लिए किया जाता है। दुःख इसी बात का है कि हम एकांगी प्रगति से सन्तुष्ट हैं। मानव बुद्धि, आस्था और सम्वेदना में किस प्रकार आदर्शों का प्रतिष्ठापन हो सके इसके लिए मूर्धन्य प्रतिभाओं में आकुलता दिखाई नहीं पड़ती है। जीभ की लपालपी करके इस महान प्रयोजन की चिह्न पूजा ही जहाँ−तहाँ की जाती है जबकि मनुष्य को एक उत्कृष्टतम यन्त्र मानकर उसके द्वारा उच्चस्तरीय उत्पादन की कारगर योजना बननी चाहिए। इतना बड़े काम बोलने या लिखने भर से पूरे नहीं हो सकते। मानवी प्रकृति और सामाजिक परिस्थितियों को उपयुक्त ढाँचे में ढालने के लिए आर्थिक उन्नति से भी बढ़ी−चढ़ी योजना बनाने और उसे कार्यान्वित करने की आवश्यकता पड़ेगी।
समूह शक्ति को विकसित करते समय भी यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि उसे अव्यवस्थित उन्माद की तरह ही तो संघबद्ध नहीं किया जा रहा है। ईसा को फाँसी एक संघबद्ध सरकार ने ही दी थी। उसके लिए न्याय का नाटक रचा गया था। सरकारी लोगों ने भीड़ को ईसा के विरुद्ध भड़काया था और दर्शक उस सन्त की जान लेने पर उतारू हो गये थे। संगठन के पास साधन होते हैं और उनके सहारे सामान्य लोगों को बहकाया और भड़काया भी जा सकता है। ईसा के सम्बन्ध में जो हुआ वही सामूहिक संगठनों ने अन्यत्र भी किया है। जर्मनी के यहूदी न तो नाजी तहखानों को भूले हैं और न जापानी जनता अणु संहार की व्यथा के आँसू सुखा पाई है। ऐसी नृशंसता वर्ग, समाज, धर्म भी अपनी−अपनी घात लगाने पर करते रहे हैं। बड़े देश छोटे देशों का शोषण उत्पीड़न करते हैं कुलीनों द्वारा अंत्यजों को पददलित करने के पीछे उनकी सामूहिक शक्ति ही काम करती है। युद्धों में आक्रमण संगठित सैन्य बल ही करता है। चोर और डाकुओं के द्वारा भी गिरोह और षड्यन्त्र बनाये जाते हैं। सामूहिक शक्ति की जो प्रशंसा है वह तभी स्थिर रह सकती है जब उसके पीछे नैतिक आदर्शों का समावेश बना रहे अन्यथा अनीति के लिए खड़ी की गई संगठता तो बिखराव से भी महंगी पड़ेगी राजमहलों में दास−दासियों के लिए जो यंत्रणा गृह बने हुए थे वे स्मरण दिलाते हैं कि शक्ति का केन्द्रीकरण यदि न्याय के नियन्त्रण से बाहर चला गया तो वह मनुष्य जाति के लिए और भी अधिक बढ़ा−चढ़ा अभिशाप सिद्ध होगा।
बड़ी बात व्यक्ति है; समाज नहीं। व्यक्तियों के समन्वय का नाम समाज है। समाज में से व्यक्ति नहीं टपकते। सिद्धान्त कितने ही बड़े क्यों न हों उन्हें कार्यान्वित करने के लिए चरित्रवान व्यक्ति चाहिए। अन्यथा समाज हित के नाम पर ऐसे कार्य होते रहेंगे जो देखने भर के लिए लोक−कल्याण के लिए किये गये प्रतीत होंगे। वस्तुतः उनके पीछे दुरभि सन्धियाँ छिपी होंगी और फलस्वरूप उनसे अहित और विनाश के परिणाम ही सामने आवेंगे सिद्धान्त अपने आप तो कार्यान्वित नहीं होते उन्हें व्यवहार में उतारना ईमानदार मनुष्यों के लिए ही सम्भव होता है। बेईमान तो सिद्धान्तों की आड़ लेकर वैसे अनर्थ करते हैं जैसे खुली दुष्टता करने वाले अपराधी भी नहीं कर सकते।
सिद्धान्तों के लेबल लगाकर दुनिया में अनर्थ कम नहीं किये गये हैं। जन क्रान्तियों की आड़ में जनता से विश्वासघात कितने हुए हैं इसका विवरण तैयार किया जाय तो यह समझना कठिन हो जायगा कि क्रान्ति कह कर जो किया गया वह प्रतिक्रान्ति तो नहीं थी। धर्म के नाम पर चल रही कुरीतियाँ, अध्यात्म के नाम पर पनपने वाला परावलम्बन ही पल्ले बाँध दिया जाता है। समाजवाद की रक्षा के लिए हंगरी पर, और प्रजातन्त्र बचाने के लिए जापान पर जो कहर बरसा उससे समाजवाद, प्रजातन्त्र पर से ही निष्ठा डगमगाने लगती है। सभी जानते हैं कि पाकिस्तान को आजादी कितनी महंगी पड़ी है। स्वतन्त्रता पाकर भी प्रकारान्तर से अधिक कड़ी गुलामी में फँस जाने वाले देशों की सूची काफी लम्बी है। कम्युनिज्म और दूसरे प्रकार के अधिनायकवाद द्वारा व्यक्ति की नागरिक स्वतन्त्रता का हनन जिस प्रकार किया गया उससे प्रतीत होता है कि जितने उच्च उद्देश्यों की बातें कही जा रही थीं उस कथनी और करनी में कितना अन्तर हैं।
कभी देश भक्ति की बड़ी धूम थी। राष्ट्रीयता का झण्डा हर जगह बुलन्द था। पर जब देखा गया कि धर्म विशेष के पक्षपात के लिए उसके अनुयायी अन्य धर्मावलम्बियों के साथ जैसी अनुदारता बरतते हैं, उससे भी गई गुजरी स्थिति राष्ट्रवाद ने उत्पन्न की है। सिकन्दर नैपोलियन, हिटलर, मुसोलिनी, माओ अपने−अपने देशों की भलाई के नाम पर अन्यों के साथ जो कुछ करते रहे हैं उससे प्रतीत होता है कि राष्ट्रवाद भी कट्टरता ग्रसित होने पर साम्प्रदायिक उन्माद का रूप धारण कर सकता है युग मनीषियों में से सेगान, सिमोन, मात्र, बर्ट्रेण्ड रसेल, जैसे मूर्धन्य लोगों ने संकीर्णता ग्रस्त राष्ट्रीयता को मानवी एकता और सार्वभौम नीति न्याय के विरुद्ध एक पक्षता पूर्ण षड्यन्त्र कहा है।
कला की महत्ता के सम्बन्ध में जितना कहा जाय उतना ही कम है; किन्तु कौन नहीं जानता कि कला के नाम पर नैतिक मर्यादाओं के अवमूल्यन का कैसा कुचक्र चलता रहा है। गीत, वाद्य, नृत्य, अभिनय के क्षेत्र का पर्यवेक्षण किया तो ज्ञात हुआ इस संदर्भ में शताब्दियों से जो भी उत्पादन किया गया है उसका बहुत बड़ा भाग कुरुचिपूर्ण, अशालीन और पशु प्रवृत्तियों को भड़काने के दोष का दोषी है। कला ने जिस दिमागों ऐयाशी और आवारा−गर्दी को जन्म दिया है उससे कोई यथार्थवादी अपरिचित नहीं होगा। साहित्य ने व्यक्ति को कितना उठाया और कितना गिराया इस कटु सत्य पर दृष्टिपात करने से यह असमंजस उत्पन्न होता है कि लेखन, प्रकाशन, पुस्तक विक्रय एवं अध्ययन में लगने वाली मानवी शक्ति का वस्तुतः कोई उपयोग भी है या नहीं? जिस प्रकार कला और साहित्य की देवियों को दुष्टता की दुरभि सन्धियों ने बाजारू वेश्या और कुटनी बनाकर रख दिया है उसी प्रकार स्वतन्त्रता, देशभक्ति, धर्मधारणा, संस्कृति रक्षा के जैसे पुनीत तथ्य के साथ भी बलात्कार किया गया है। शास्त्रीयता को तोड़−मरोड़कर विकृतियों के समर्थन में उनका कैसा वीभत्स उपयोग हो सकता है। इसे देखकर आदमी की बुद्धि से चमत्कृत होने की उतनी नहीं जितनी भयभीत होने की आवश्यकता पड़ती है। संस्कृति रक्षा के नाम पर भारत विभाजन के समय श्रोणित तर्पण के दृश्य जिनने देखे हैं वे अभी भी यह निर्णय नहीं कर पाये कि जिस संस्कृति की रक्षा के लिए यह नरमेध रचे गये थे वह आखिर थी किस वर्ग की? मानवीय अथवा अमानवीय उन दिनों पूरा जोर देकर−पूरा गला फाड़कर धर्म की−जाति रक्षा की−दुहाई दी जाती थी। इसका अर्थ होता है अधिकाधिक पैशाचिकता का उपयोग। यह धर्म अथवा जाति आखिर थे क्या वस्तु जिसके लिए इतना कुछ करने और सहने के लिए भोले भावुक लोगों को विवश होना पड़ा वे आखिर थे क्या, हैं क्या? यह प्रश्न अभी भी विचारणीय है। यहाँ न्याय और न्यायकर्त्ता का अन्तर समझना पड़ेगा। लारेन्स ठीक ही कहते थे−कोई बात न्यायोचित हो सकती है, पर यह नहीं कहा जा सकता है कि जज ने जो निर्णय दिया वह न्याय ही था। सत्य के पुजारी ईश्वर भक्त और धर्म निष्ठ कहलाने वाले लोग जो करते या कहते हैं−तथ्य वही है। यह नहीं कहा जा सकता। भ्रान्तियों एवं दुर्भावनाओं में उलझा हुआ व्यक्ति जिस निष्कर्ष पर पहुँचता है वे सदा वैसे ही नहीं होते जैसे कि उन्हें प्रस्तुत या प्रतिपादित किया गया है। अमानवीय हठों और दुराग्रहों का दुःखदायी इतिहास बहुत लम्बा है। दुर्भाग्य से उनके पीछे दिग्भ्रान्त भाव बोध ही अपना काम कर रहा होता है। यह भावबोध बहुत बार तो यथार्थता से दूर ही नहीं विपरीत भी होते हैं। आग्रही व्यक्ति उन भाव−बोधों को सत्य के समतुल्य ही मानता है।
मानव जाति में न तो शौर्य साहस की कमी है न सूझबूझ की और न त्याग बलिदान की। इन विशेषताओं के होते हुए भी उसे पतन और संकट के दलदल में फँसा रहना पड़ता है। इसका एक मात्र कारण है गलत लक्ष्य एवं आदर्श का निर्धारण। युद्धों में लड़ने वाले सैनिक अपनी सूझबूझ और बहादुरी का अच्छा परिचय देते हैं, पर युद्ध का लक्ष्य न्यायोचित न होकर जब कुटिलतापूर्ण होता है तो वह नहीं मिलता जो उन सद्गुणों का मिलना चाहिए। डाकू भी जंगलों में छिपे रहते, एकाकी जीवन जीते, सतर्कता रखते और जान हथेली पर लिये फिरते हैं। यह सभी गुण तपस्वियों से मिलते−जुलते हैं फिर भी वे निन्दा और दुर्गति के भागी बनते हैं। कारण स्पष्ट है−लक्ष्य विहीन रहने पर गुण और कर्म दोनों का स्तर कुछ भी क्यों न हो उससे व्यक्ति और समाज को केवल हानि ही होती है। दिशा तो आदर्शों से मिलती है। ऊँचा लक्ष्य लेकर चलने का श्रम किया जाय तो उस आधार पर उत्कृष्टता के प्रशंसा योग्य स्तर तक पहुँचा जा सकेगा। अन्यथा अस्त−व्यस्त घन्टों घूमते रहने पर केवल थकान ही पल्ले पड़ती है। दिशा उलटी हो तो चलते रहने पर भी गन्तव्य की दूरी क्रमशः अधिक ही बढ़ती चली जाती है।
अपने समय की मानवी प्रवृत्ति विलासिता के साधनों की आतुरता, अपव्यय के लिए प्रचुर धन की आवश्यकता, दर्प प्रदर्शन के लिए चित्र विचित्र आडम्बर जैसे तुच्छ प्रयोजनों में ही सीमाबद्ध होती चली जा रही है। व्यक्ति आत्म केन्द्रित होता चला जाता है। दूसरों के सुख दुख में उसकी रुचि घटती जा रही है। फलतः आनन्द की अनुभूति का पलायन हो रहा है।
आनन्द साझेदारी का उत्पादन है। वह एकाकी चिन्तन या प्रयत्न से उपलब्ध नहीं होता। मिलजुल कर ही उसे उगाया, कमाया और बढ़ाया जाता है। आत्मीयता का विस्तार करने से जितने क्षेत्र में गहरी घनिष्ठता उत्पन्न कर ली जाती हैं उसमें चल रहे सहयोग से भौतिक आनन्द मिलता है। इस प्रकार का पारस्परिक आदान−प्रदान उच्च आदर्शों के आधार पर ही बन पड़ता है। स्वार्थों की मैत्री में जल्दी ही खींचतान आरम्भ हो जाती है और जहाँ उनमें कमी पड़ती है वहीं टकराव आरम्भ होकर शत्रुता तक की स्थिति बन जाती है। गहरी मित्रता का आधार उच्च स्तरीय सद्भावना और निर्मल निश्छल ममता के अतिरिक्त और कुछ होता ही नहीं। आनन्द उसी मैत्री का प्रतिफल है। यह निश्छलता, पवित्र उदारता जो मैत्री उत्पन्न करती है आदर्शवादी आस्थाओं का परिणाम है। इसी से अन्तःज्योति से आन्तरिक उल्लास उत्पन्न होता है और इसी के प्रकाश में सम्पर्क क्षेत्र में भावभरी मित्रता के आनन्द का रसास्वादन कर सकना सम्भव होता है। उन लोगों को इन आत्मिक और लौकिक दिव्य अनुभूतियों से वंचित ही रहना पड़ेगा जो आत्म−केन्द्रित होते चले जाते हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता अपनाकर मनुष्य सुविधा साधन तो इकट्ठे कर सकता है, पर उसे उस उल्लास एवं आनन्द से वंचित ही रहना पड़ता है जिसे जीवन की सरसता एवं सफलता कहा जा सकता है।
रश्किल कहते थे−“झूठ धोखे पर खड़ा है, वह शब्दों तक ही सीमित नहीं होता। चुप रह कर, किसी बात पर विशेष जोर देकर−किसी वाक्य को विशेष महत्व देकर−आँख मटका कर भी झूठ बोला जा सकता है। झूठ की यह सभी किस्में, शब्दों के माध्यम से गलत बयानी करने की अपेक्षा अधिक कमीनी और गिरी हुई है। “आल्डुअस हक्सले ने लिखा है”−कोई भी सुधार आन्दोलन तब तक व्यक्ति और समाज में उपयुक्त परिवर्तन न ला सकेगा जब तक कि उसका संचालन उचित वातावरण और उचित तरीकों से न किया जाय। गान्धी जी का मत था। हम अपने लक्ष्य की दिशा में उतने ही आगे बढ़ सकते हैं जितने कि हमारे साधन शुद्ध हों। यह रास्ता लम्बा भले ही मालूम होता हो पर मुझे पूरा विश्वास है कि यही सबसे छोटा रास्ता है।
व्यक्ति ऊँचे हों, आदर्शवादी हों, चरित्र वान हों तो सामान्य नीति मर्यादा की नोटी−मोटी बातें जानने वाला ही ब्रह्म विद्या के गूढ़ रहस्यों को समझने वाला और तत्व दर्शन में प्रवीण विद्वान उस व्यक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक श्रेष्ठ सिद्ध होगा जो जानता तो बहुत है, पर करता कुछ नहीं। इसी प्रकार समाज गठन में बहुत बड़ी सुव्यवस्था न होने पर भी भले मनुष्यों का समूह शान्ति का वातावरण भली प्रकार बनाये रह सकता है।
ईसा के साथ साम्यवादी, लिंकन के साथ प्रजातन्त्रवादी अशोक के साथ राजतन्त्रवादी, मूसा के साथ धर्मतन्त्रवादी और बुद्ध के साथ बैरागी होने में आपत्ति की कोई बात नहीं हैं। सिद्धान्तों के बीच प्रतिकूलता रहते हुए भी व्यक्ति या समाज को कोई क्षति पहुँचने वाला नहीं है। यहाँ तक पूँजीवाद या समाजवाद में से किसी भी व्यवस्था के अन्तर्गत शान्तिपूर्वक निर्वाह हो सकता है। स्वतन्त्रता और पराधीनता के सम्बन्ध में भी यही बात है। आत्मीयता के संघ−बन्धनों में बाँध लेने वाली परतन्त्रता का अपना आनन्द है इसी प्रकार घुटन भरे वातावरण से छुटकारा पाने की स्वतन्त्रता भी सराहनीय है। इन परस्पर भिन्न विचारधाराओं और क्रिया−पद्धतियों के बीच किसे कितना श्रेय दिया जाय किसे कितना अमान्य ठहराया जाय इसका सीधा उत्तर नहीं हो सकता, देखना यह होगा कि यह पद्धतियाँ किन लोगों के द्वारा संचालित की जा रही हैं। भ्रष्ट व्यक्तियों के हाथ में पहुँचने पर तो स्वर्ग की सुव्यवस्था भी नरक के रूप में परिणत हो जायगी।
विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर की बढ़ती हुई प्रतिभा व लोकप्रियता से लोग ईर्ष्या करने लगे थे। उन्होंने गुरुदेव की छवि को धूमिल करने के लिए विभिन्न पत्र−पत्रिकाओं के माध्यम से अपने कलुषित प्रयास प्रारम्भ कर दिए परन्तु टैगोर समभाव से सब सहन करते रहे तथा तनिक भी विचलित नहीं हुए।
श्री शरदचन्द को जब ये आलोचनाएँ सहन नहीं हुई तो उन्होंने गुरुदेव से कहा कि वे इन आलोचकों को रोकने का कुछ प्रयास करें। टैगोर ने शान्त भाव से शरदचन्द को समझाया, “प्रयास क्या करूं? मैं उन जैसा नहीं बन सकता व उन्होंने जो मार्ग अपनाया है वह भी मैं अपना नहीं सकता।”
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सन् 1823 में सुप्रसिद्ध वनस्पति शास्त्री श्री जगदीश वसु ने जब वृक्ष वनस्पतियों में भी जीवन के अस्तित्व का सिद्धान्त प्रस्तुत किया जो वैज्ञानिक जगत में एक नई हलचल उत्पन्न हो गई। इससे भारतीय तत्व−दर्शन की वह मान्यता पुष्ट होती थी जिसमें आत्म−सत्ता को विशाल वनस्पति तथा विराट् जगत में समासीन बताते हुए कहा गया है−
यो देवो अन्नो यो अप्पु योविश्वम भुवनमावशेष। या ओषधींषु यो वनस्पतीशु देवाय तस्मै नमोनमः॥
जो आत्मा अन्न, जल, औषधि एवं वनस्पतियों में व्याप्त है जो विश्व ब्रह्माण्ड का मूल घटक है उसे बारम्बार नमस्कार है।
उक्त धारणा का आधार यह प्रयोग था कि जब पौधों को जीवनदायी तत्व प्रदान किये जाते तब उनमें विकास की गति और जब उन्हें किसी तरह का विष दिया जाता तो उससे उनके द्वारा बनाये गये वैज्ञानिक यन्त्र कोशाओं में मरण−क्रिया अंकित करने लगते।
श्री वसु का यह अनुसन्धान मनुष्य शरीर के बाह्य अध्ययन के ही समान था। अभी वृक्षों में भावना व कल्पनाशील आत्मा का अस्तित्व प्रमाणित करने के लिए बड़ा कार्य शेष था। तो भी शरीर विज्ञान के समान ही यह कम महत्वपूर्ण नहीं था। रचना की स्थूल दृष्टि से ही देखा जाये तो मनुष्य शरीर अपने आप में इतना जटिल किन्तु उपयोगी वाहन है कि आज तक सृष्टि का कोई भी रचनाकार इतनी सर्वांगपूर्ण कृति प्रस्तुत नहीं कर सका। स्पष्ट है उसके एक−एक अवयव में निर्माण का जो अन्यतम कौशल छिपा हुआ है वह किसी समर्थ रचनाकार−परमात्मा से ही सम्भव हो सकता है, किन्तु मनुष्य का यह दुर्भाग्य है कि वह अपने विशिष्ट निर्माण के विशिष्ट उपयोग की बात विचार तक में नहीं लाता और भौतिक सुखों की मृग तृष्णा में ही गँवाकर पश्चाताप करता हुआ एक दिन उसे छोड़ने को विवश होता है।
शरीर में विद्यमान विचारणाएँ और भावनाएँ उसमें अतीन्द्रिय सत्ता का बोध कराती हैं। यही वह तत्व है जिससे विराट् सत्ता की अनुभूति होती है उसी का चिन्तन, मनन तथा निदिध्यासन कर भारतीय तत्वदर्शियों ने कहा कि उसे ही जानो उसे ही प्राप्त करो। आत्मा को जाने बिना व्यक्ति की क्षुद्रताएँ, तृष्णा और वासनाएँ, अभाव अशक्ति और अज्ञान विगलित नहीं होते।
किन्तु कुछ वैज्ञानिकों की यह धारणा कि विचारणाएँ मात्र शारीरिक रसायन का वैसा ही परिणाम हैं जैसे जल में विद्युत या आमाशय में पित्त। किन्तु जैसे−जैसे जगदीश चन्द वसु के अनुसंधान को दूसरे वनस्पति, शास्त्रियों, वैज्ञानिकों ने आगे बढ़ाया यह स्पष्ट होता गया कि शरीरों की रचना की भिन्नता के बावजूद भावनाओं की सूक्ष्म सत्ता सर्वव्यापी तत्व है और वह अन्य जीवधारियों में ही नहीं वृक्ष, वनस्पति, खनिज और संसार के प्रत्येक कण में विराजमान है स्थूल शरीर उसका वाहन मात्र है। वह स्वयं शारीरिक उपादान नहीं।
1869 में “लाई डिटेक्टर विशेषज्ञ”। यह एक अति सम्वेदनशील यन्त्र है जिससे व्यक्ति झूठ बोल रहा है या सच। इस बात का पता चलता है, झूठ बोलते समय शरीर की ग्रन्थियों से कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण रसों का या तो बहुत अधिक मात्रा में स्राव होता है या कुछ का बिलकुल ही नहीं। इसी आधार पर यह यन्त्र वस्तुस्थिति का संकेत दे देता है। डॉ0 क्लाइडवैक्स्टर ने एक अति सम्वेदनामापी यन्त्र एक ऐसे पौधे को पत्तों से जोड़ा जो पानी ग्रहण कर रही थी, उसकी प्रतिक्रिया देखने के लिए वे अभी माचिस जलाने की बात सोच ही रहे थे कि डिटेक्टर ने तुरन्त प्रतिक्रिया दर्शायी, इसका यह अर्थ हुआ कि पौधे ने मन की बात पकड़ ली। आश्चर्यचकित वैक्स्टर ने एक दूसरा यन्त्र बनाया जिससे उन्होंने जीवित समुद्री केकड़े को ठण्डे पानी से निकाल कर गर्म पानी में डाला जैसे ही उसे गर्म जल में डाला उस यन्त्र ने 1/100 सैकिंड में एक रेखा चित्र बना दिया वही यन्त्र एक−एक कर समीप के कई पौधों के साथ जोड़कर रखा गया था। उन सबने भी नाटकीय प्रतिक्रिया दर्शायी और प्रत्येक यन्त्र ने केकड़े से जुड़े यन्त्र के समान ही 1/100 सैकिंड में वैसा ही रेखा चित्र बना दिया। विज्ञान जगत में यह परीक्षण “वैक्स्टर इफेक्ट” के नाम से जाना जाता है। उन्होंने यहाँ तक पाया कि यदि कमरे में बैठे किसी व्यक्ति को उँगली या दाढ़ी बनाते समय ब्लेड लग जाये तो समीपवर्ती पौधा तत्काल प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। पोली ग्राफिक (इलेक्ट्राड्स) से तीव्र स्पन्दन आधारित कर जाँच करने से पता चलता है कि यही बात बड़े पौधों के बारे में भी है। किसी ऐसे स्थान, जहाँ हत्या हुई हो, पशु मारे जाते हों या शवदाह किया जाता हो−वृक्ष भय की ऐसी प्रतिक्रिया धारण कर लेते हैं कि उसका प्रभाव लम्बे समय तक उनमें बना रहता है। पशु वध तथा शवदाह के समीप वाले पौधों में जीवन के प्रति अनुत्साह बना रहता है। वैज्ञानिक तो अब यहाँ तक सोचने लगे हैं कि ऐसा यन्त्र निर्मित हो सकता है जो अपराधी का हुलिया तक बता देने में भी सहायक होगा।
इन शोधों के आधार पर ही वैज्ञानिक वैक्स्टर ने अपना विश्वास व्यक्त किया है कि पौधों में इतनी गहन संवेदनशीलता पायी जाती है कि वे अपने समीपवर्ती प्राणियों जिनमें मनुष्य भी शामिल हैं वे स्वर में स्वर मिलाने लगते हैं। अर्थात् वे न केवल हमारी प्रसन्नता के क्षणों में प्रसन्न होते हैं अपितु शोक की घड़ी में सम्वेदना भी व्यक्त करते हैं। प्रकृति को यह साझेदारी इस बात की द्योतक है कि प्राणिमात्र आत्मीयता के एक घनिष्ठ गठबन्धन में जुड़े हुए हैं सबके प्रति दया, स्नेह, कर्त्तव्य भावना रखकर उसे जितनी शान्ति, सुख और सन्तोष मिल सकता है, घृणा, शत्रुता और परायेपन को घृणित स्वार्थपरता से सैकड़ों साधन उपलब्ध होने पर भी वैसी प्रसन्नता सम्भव नहीं।
सेंट लारेंस ने भी अपनी शोधों में उपर्युक्त तथ्यों को सत्य पाया। वे लिखते हैं कि पौधों में “इलेक्ट्रो डायनिक” गुण का होना इस बात का प्रमाण है कि वे वातावरण के संकेत व प्रभाव संगठक से भी विस्मयकारक ढंग से ग्रहण करते हैं यह तो ज्ञात नहीं कि उनमें मनुष्य की तरह का मन होता है या नहीं, किन्तु वे प्रतिक्रिया निश्चित रूप से व्यक्त करते हैं। जिसका अर्थ यह भी हो सकता है कि उनमें भी मनुष्य की तरह का मन हो और वे भी अपने किसी भाग में स्मृति रखने वाला संग्राहक तत्व रखते हों। यदि यह बात पूरी तरह ज्ञात हो जाती है, तब फिर “कानून और पुलिस से बच सकते हैं, किन्तु परमात्मा से नहीं” यह उक्ति मनोवैज्ञानिक और धार्मिक आस्था के रूप में ही नहीं वरन् वैज्ञानिक तथ्य के रूप में भी स्वीकार की जाने लगेगी। हमारे ऋषि तो इस गूढ़ तत्व के विज्ञ होने के कारण वृक्षों वनस्पतियों से परामर्श और सहयोग तक प्राप्त किया करते थे। पीपल को तो देव वृक्ष तक इसी आधार पर माना गया है कि उसकी संवेदनशीलता अन्य वृक्षों की अपेक्षा बहुत अधिक होती है।
यह तथ्य तब प्रकट हुए जब सेंट लारेंस के मन में यह जिज्ञासा पैदा हुई कि क्या पौधे ब्रह्माण्ड की जानकारियाँ देने में भी सहायक हो सकते हैं। यह बात मस्तिष्क में तब आई जब माइक्रोइलेक्ट्राड से पौधे की कोशिका में विद्युत प्रवाहित कर वे उसका अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने देखा कि उस स्थिति में उसके “कोश” का साइटोप्लाज्मा सिकुड़ता है तथा सर्दी, गर्मी, प्रकाश, क्षति, स्पर्श, चमक आदि के प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है। 350000 पौधों पर प्रयोग कर उन्होंने निकाला कि पौधे सर्वोत्तम मौसम विशेषज्ञ हो सकते हैं तथा वे ब्रह्माण्ड की और भी सूक्ष्मतम हलचलों की जानकारी दे सकते हैं। उनकी इस विलक्षण समझ शक्ति को सेंट लारेंस ने मानव मस्तिष्क के समान ही विराट् बताया है। उनकी प्रजनन कोशिकाओं पर पड़ने वाले चुम्बकीय प्रभाव को तो और भी सरलता से मापा जा सकता है और उससे जो नैस्टिक (मलिन) प्रतिक्रिया पैदा होती है उससे उसके भय, निराशा, प्रसन्नता आदि का ही पता नहीं लगाया जा सकता है। वरन् उसके आधार पर ब्रह्माण्ड में चल रही आज की घटनाओं को भविष्य की घटनाओं के रूप में जाना जा सकता है।
28 अक्टूबर 1871 में मोजिव रेगिस्तान जो−लागबेगास के पास है 7 मील दूर तक एक−एक परीक्षण किया गया। इसे “प्रोजेक्ट साइक्लोव्स” नाम दिया गया। पौधों को फैरेडाइज्ड पिंजड़ों में रखा गया ताकि ये पार्थिव प्रभाव से विमुक्त रहें उन्हें “मेजरिंग सेट” से जोड़ा गया तो हर सेट ने एक ही तरह के विशिष्ट रेखा चित्र प्रदान किये, चुम्बकीय तरंगों से जोड़ने पर यह सिद्ध हो गया कि यह रेखा चित्र ब्रह्माण्ड की किसी प्रतिक्रिया के ही हैं, पर मन की बात न जानने की विज्ञान की असमर्थता और पौधों में प्राणी के अभाव के कारण इन रेखा चित्रों का अर्थ ज्ञान न हो सका। अलबत्ता वैज्ञानिकों ने यह माना कि वह ब्रह्माण्ड को किसी अत्यन्त सूक्ष्म सम्वेदना के स्वर थे और किन्हीं तारों से अथवा क्वासास के संकेत थे।
इन दिनों विज्ञान की एक नई शाखा “इकॉलाजी” का विकास हो रहा है−जिसकी मान्यता यह है कि संसार का हर कण एक ही जीवित चेतना से पिरोया है, सृष्टि के किसी कोने में भी हलचल हो उसकी प्रतिक्रिया ब्रह्माण्ड के हर कण में होती है। इस विज्ञान के पण्डित डॉ0 इवान एल मैकहर्ग ने वनस्पति विज्ञान की उक्त शोधों का निष्कर्ष निकालते हुए लिखा है− वनस्पति जगत एक दिव्य प्रभा से युक्त है और उसका अध्ययन अलंकारिक रूप में नहीं अपितु यथार्थ और वैज्ञानिक ढंग से यह सिद्ध करता है कि यदि कहीं कोई दिव्य शक्ति है तो वह सर्वव्यापी है। इससे भारतीय तत्वदर्शियों का यह विश्वास भी सत्य होता है कि न केवल चेतन प्राणियों में अपितु वृक्ष वनस्पति में भी अपना ही आत्मा समाया हुआ है। उस दिव्य विराट् का अनुभव करें। धारण करे तो कण−कण में अपना ही प्राण बसता दिखाई देने लगे, उसकी पुलक और प्रसन्नता हमें दिव्य आनन्द का रसास्वादन कराने लगे।
रांका अत्यन्त ही निर्धन व बिना पढ़े−लिखे व्यक्ति थे, परन्तु थे बचपन से ही वैराग्य वृत्ति वाले। रंक होने के कारण ही कदाचित् उनका नाम रांका पड़ा हो! उनकी पत्नी भी बड़ी साध्वा व पतिव्रता महिला थीं। रांका के प्रभाव में आकर उनकी पत्नी को भी सांसारिक सम्पत्ति से वैराग्य हो गया था। ये दोनों पति−पत्नी जंगल से लकड़ी काटकर लाते व उन्हें बेचकर जो मिल जाता उससे ही अपना गुजारा कर लेते।
एक दिन जब पति−पत्नी दोनों जंगल में लकड़ी काटने जा रहे थे तो राँका ने देखा कि रास्ते में सोने की मुहर पड़ी है। राँका ने सोचा ऐसा न हो सोने की मुहर देखकर उनकी पत्नी लालायित हो उठें व यह मुहर उठा ले। अतः राँका ने मुट्ठी भर धूल उठाकर मुहर पर डाल दी।
पत्नी ने पूछा−“आप किस चीज पर धूल ढक रहे हैं।” रांका ने उत्तर दिया− “मार्ग में सोने की मुहर पड़ी थी सोचा इसे धूल से ढक दूँ कहीं ऐसा न हो तुम इससे आकर्षित हो इसे उठा लो” राँका की पत्नी ने कहा−“स्वामी मैं तो सोने और धूल में कोई अन्तर नहीं समझती। मैं समझती थी आपने धूल पर ही धूल डाली है लगता है आप अभी भेद अभेद से परे नहीं हैं” अपनी परम वैराग्यवती पत्नी के इस बाँके तर्क को सुनकर राँका स्वयं ही लज्जित तो हुए, परन्तु उनको गर्व भी हुआ कि उनकी पत्नी कितनी परम विरक्त हैं। अपने बाँके वैराग्यभाव के कारण ही शायद इस महिला का नाम ‘बांका’ पड़ा होगा।
बांका की तरह सहयोग यदि हर गृहस्थ को भी मिल जाय तो भेद अभेद करने की स्थिति से वह क्रमशः दूर होता चला जाय।
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तथागत आज अपनी ही जन्मभूमि कपिलवस्तु पधारे हैं। शाक्यों का उत्साह उमड़ पड़ा, उन्होंने राजधानी को नव−वधू की तरह तोरण−वन्दनवारों, लता, वल्लरियों और पद्म प्रसूनों से सजाया है। महाराज शुद्धोधन अत्यन्त कृश हो गये हैं, आयुष्य का प्रभाव उतना नहीं है जितना पुत्रवियोग की पीड़ा ने थका दिया है, किन्तु आज उनकी जीर्ण काया में भी नव−जीवन संचरित हो उठा है, आँखों में यौवन की चमक आ गयी है। उन्होंने स्वयं ही सारी व्यवस्था का निरीक्षण किया। हर रचना में राजकुमार का किशोर रूप आँकता है तो महाराज की आँखें बरबस बरसने लगती हैं। फिर नया उल्लास जगता है आज वही मेरा राजकुमार तो आ रहा है फिर उनका भिक्षु रूप−उनसे भेंट−पुनः विदाई की नीरवता महाराज का मन इसी तरह उद्वेलित हो रहा है।
राजमाता की भी स्थिति ऐसी ही है। राजकुमार राहुल ने अभी तक कभी भी अपने पिता को नहीं देखा, प्यासे हिरण−शावक की तरह बार−बार उनकी दृष्टि राज पथ पर दौड़ती है और सिकता भ्रम की तरह भटक−भटक कर लौटती है। यदि राजमहल के किसी प्रकोष्ठ में शान्ति है, निश्चलता है, मौन है तो वह महारानी यशोधरा का अन्तःपुर है। शुभ्र श्वेत वेश भूषा में आज वे साकार तपमूर्ति प्रतीत हो रही हैं−सभी जानते हैं इस सागर का अन्तर्मन्थन झंझावात खड़ा कर देने वाला है, अतएव उस निश्छल नीरवता को कोई भंग करने का साहस नहीं करता।
नियत समय पर भगवान् बुद्ध का पदार्पण हुआ। भिक्षु वेष में देखकर नगर निवासियों की आँखों के सरोवर फूट पड़े हैं, कोई किसी से कुछ कहता नहीं। सारी कपिलवस्तु शोक के अथाह सागर में डूब गई है।
राजभवन का सभा मण्डप धार्मिक प्रवचन की यहीं व्यवस्था की गई। एक ओर तथागत के लिए उन्नत मञ्च उनके सम्मुख ही राजपरिवार के लिए आसन−एक ओर सम्भ्रान्त दूसरी ओर प्रजाजन। सब निस्तब्ध, भगवान् के अमृत उपदेशों की तृषा−महाराज शुद्धोधन ने आकर अपना स्थान ग्रहण किया। महाप्रजापति गौतमी, राहुल और मंत्रिपरिषद् एक−एक कर सभी विराज गये। किन्तु भगवान् बुद्ध जिसे खोज रहे हैं वह मूर्ति? हाँ यशोधरा नहीं आई। उन्होंने निश्चय किया है यदि वे आयेंगे तो उनकी पूजा करूंगी, किन्तु जाऊँगी नहीं, भारतीय नारी जिस तरह कोई अपराध नहीं कर सकती उसी तरह उसका स्वाभिमान भी अडिग रहता है।
भगवान् का धर्म−प्रवचन प्रारम्भ हुआ। ईश्वर, जीव और जगत है कि श्रद्धा ज्ञान के रूप में भक्ति वैराग्य के रूप में परिणत हो रही है, किन्तु बोधि सत्व आज अपने ही अन्तर्द्वन्द्व से पराभूत हो रहे हैं। यशोधरा का न आना उनकी स्मरण शक्ति को विवाह मण्डप में खींच ले जाता है और कहता है− संसार को धर्म का उपदेश करने वाले तथागत! एक दिन तुमने अग्नि की साक्षी में वचन दिया था देवि! मैं तुम्हें अर्द्धांगिनी के रूप में ग्रहण करता हूँ। यावज्जीवन तुम्हारा भरण पोषण और निर्वाह करूंगा? क्या यही थी तुम्हारी प्रतिज्ञा जो तुम मुझे सोता हुआ छोड़कर भाग गये?
उपदेश समाप्त हुआ। कोई नहीं जानता आगे क्या होगा। तथागत अपने आसन से उठते हैं अंतर्द्वंद्व तभी शान्त होगा। जब वे स्वयं यशोधरा के द्वार पर जाकर क्षमा याचना करेंगे। राज भवन सिसकियों से भरा हुआ है। बोधि सत्व सीधे यशोधरा के पास पहुँचे। करुणा और तपश्चर्या की मूर्ति यशोधरा ने प्रणिपात किया। मन की सम्पूर्ण वेदना सागर वन कर उमड़ पड़ी। तथागत के पैर धुल गये किन्तु पश्चाताप नहीं। वह तभी धुला जब उसने स्वयं यशोधरा से क्षमा याचना की−देवि! संसार के कल्याण के लिये यह आवश्यक था, तथापि आज मैं तुम्हारी तपश्चर्या के आगे पराभूत हूँ। तुम्हारी तपश्चर्या चिरकाल तक इस देश जाति और संस्कृति को जीवन देगी।
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वृक्षारोपण ऐसा परमार्थ है जो मात्र श्रम एवं उत्साह की सहायता से ही संभव हो जाता है। खाली जमीनों पर फलदार एवं जलाऊ लकड़ी के पेड़ लगाये जा सकते हैं। वन सम्पदा के वृद्धि से (1) अधिक वर्षा होने (2) भूमि का कटाव रुकने (3) जमीन की उर्वरता बढ़ने (4) मौसम का संतुलन बनने (5) उपयोगी प्राण वायु प्राप्त होने (6) फल छाया एवं लकड़ी मिलने (7) हरीतिमा का उपयोगी मानसिक प्रभाव पड़ने (8) पशु पक्षियों को आश्रय मिलने जैसे अनेकों लाभ हैं। धर्मशास्त्रों में वृक्षारोपण को परम पुण्य बताया गया है। आगामी वर्षा ऋतु निकट है। हमें उस समय अपने−अपने क्षेत्रों में वृक्ष, पुष्प, शाक आदि उगाने एवं तुलसी लगाने की अभी से तैयारी करनी चाहिए। साथ ही अनावश्यक रूप से वृक्ष काटने को रोकना भी चाहिए।
कीर्तिश्च मानुषे लाके प्रेत्य चैव शुभं फलम्। लभ्यते नाकपृष्ठे च पितृभिश्च महीपते॥
देव−लोक गतस्यापि नाम तस्य न नश्यति। अतीतनागतश्चैव पितृवंशाश्च भारत॥
तारयेत् वृक्षरोपीतु तस्माद् वृक्षान् प्ररोपयेत।
−महा भारत
“भरतनन्दन! वृक्ष लगाने में मनुष्य−लोक में कीर्ति बनी रहती है और मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग लोक में शुभ फल की प्राप्ति होती है। वृक्ष लगाने वाला पुरुष पितरों द्वारा भी सम्मानित होता है देवलोक में जाने पर भी उसका नाम नष्ट नहीं होता; वह अपने बीते हुए पूर्वजों और आने वाली सन्तानों को भी तार देता है। अतः वृक्ष अवश्य लगाने चाहिये।
तस्य पुत्रा भवन्त्येव पादपा नाच संशयः॥ परलोक गतः र्स्वगे लोकांश्चाप्नोति सोव्ययान्॥
−महा0
जिसके कोई पुत्र नहीं हैं उसके वृक्ष ही पुत्र होते हैं, इसमें संशय नहीं है वृक्ष लगाने वाला पुरुष परलोक में जाने पर स्वर्ग में अक्षय लोकों को प्राप्त करता है।
पुष्पैः सुरागणान् वृक्षाः फलैश्चापि तथापितृन्। छायया चातिथींस्तात पूजयन्ति महोरुहाः॥
−महा0
“तातः वृक्ष अपने फूलों से देवताओं का फलों से पितरों का तथा छाया से अतिथियों का सदा पूजन करते रहते हैं।
भूमि दानेनयेलोका गोदानेन च कीर्तिताः। ताल्लाकान्प्राप्नुयान्मर्त्यः पादपानां प्ररोपणे॥
−लिखित
भूमि के दान से जो लोक प्राप्त होते हैं और जो गौ के दान के बतलाये हैं। उन्हीं लोकों को वृक्षों को लगाने से मनुष्य पाता है।
पुष्पिताः फल वन्तश्च तर्पयन्तीह मानवान्। वृक्ष दान पुत्र वद् वृक्षाः तारयन्ति परम च॥ तस्मात् तटाके वृक्षा वै रोप्याः श्रेयोऽर्थिना सदा॥
−दक्ष स्मृति
फल और फूलों से भरे हुये वृक्ष इस जगत् में मनुष्यों को तृप्त करते हैं जो वृक्ष, दान करते हैं उनको वे वृक्ष परलोक में पुत्र की भाँति पार उतारते हैं। अतः कल्याण की इच्छा चाहने वाले को सदा ही सरोवर के किनारे वृक्ष लगाना चाहिये।
त्रि लौकेषु च गल्याणां वृक्षाणां देव पूजने। प्र धान रूपा तुलसी भविष्यति वरानने।
−ब्रह्म वैवर्त
तीनों लोकों में जितने भी गुल्म एवं वृक्ष है उन सब में तुलसी सबसे श्रेष्ठ है।
इन्छनार्थमशुष्काणां द्रुमाणामवपातनम। आत्मार्थ च क्रिया रम्भा निन्दितान्नादनं तथा॥
−मनु0 11। 64
ईन्धन के लिये हरे वृक्षों का काटना और निन्दित अन्न को खाना उपपातक है।
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छुट पुट समस्याओं के समाधान में हमारी बुद्धि और श्रमशक्ति का बहुत बड़ा भाग लगता है। ग्रन्थियों को सुलझाने और कठिनाइयों का हल निकालने के लिए हर बुद्धिमान व्यक्ति सामर्थ्य भर प्रयत्न करता है; पर यह भूल आमतौर से होती रहती है कि आज किन्हीं भी प्रत्यक्ष समस्याओं को ही समस्या माना जाता है। जो कठिनाई कुछ समय पश्चात् आने वाली है उसकी ओर ध्यान नहीं जाता। इसी प्रकार लाभ हानि का लेखा जोखा पदार्थों की बहुलता और व्यक्तियों की सुगठता सहकारिता के आधार पर लिया जाता है। गुण, कर्म, स्वभाव की श्रेष्ठता और क्षमताओं की अभिवृद्धि का महत्व इसलिए भुला दिया जाता है कि उनका प्रत्यक्ष एवं तात्कालिक लाभ दिखाई नहीं देता।
यदि दूरदर्शिता की दिव्य दृष्टि अपनाई जा सके तो समस्याओं का स्वरूप दूसरे ही ढंग से सामने आ उपस्थित होगा। तब आज की बड़ी समझी जाने वाली समस्याएँ छोटी और उपेक्षा के गर्त में पड़ी हुई समस्याएँ दिखाई देंगी। यदि वस्तुस्थिति समझी जा सके तो गुत्थियों के हल करने के क्रम में उन्हें अधिक महत्व देना होगा तो तत्काल तो कोई बड़ी कठिनाई उत्पन्न नहीं कर रहीं पर निकट भविष्य में भयंकर आशंकाओं का संकेत देती है।
अभी बचपन है। खेलकूद में समय गँवाया जा सकता है और अभिभावकों के सिर पर गुजारा हो सकता है। पर सदा तो वह स्थिति रहने वाली नहीं है। खेलने के दिन लद जायेंगे और कठिन उत्तरदायित्व अपने ही कंधे पर ढोने होंगे। यदि यह तथ्य सामने रहे तो प्रत्येक किशोर को युवावस्था की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उसकी तैयारी में संलग्न होना होगा। उपार्जन की क्षमता उत्पन्न करने वाली शिक्षा का महत्व समझना पड़ेगा और उसमें तत्परतापूर्वक संलग्न होना होगा। इसी प्रकार आज जिस मौज मस्ती में ही सारा समय और मन लगा रहता है उस पर अंकुश लगाने की आवश्यकता अनुभव होगी। जो व्यवहार कुशलता युवावस्था में अपनानी पड़ेगी उसका अभ्यास किशोरावस्था में ही आरंभ करने में समझदारी है। यदि दूरदर्शिता जग सके तो प्रत्येक किशोर को समर्थ और सफल युवावस्था के लिए आवश्यक क्षमताएँ जुटाने में लगना होगा। ऐसी दशा में उसके तात्कालिक खेल खिलवाड़ों में मन सकोड़ने की आवश्यकता अनुभव होगी। ताकि भविष्य का उचित निर्माण सही ढंग से कर सकना संभव हो सके।
दुकानदार अपना कारोबार आरंभ करता है। तात्कालिक लाभ की दृष्टि से उसे लगता है कि सस्तेपन का आकर्षण देकर ग्राहकों को लुभाया जाय और उन्हें घटिया वस्तुएँ कम नाप तोल से देकर अधिक लाभ उठा लिया जाय। वह इसी नीति को अपनाता है और जल्दी धनवान बन जाने के स्वप्न देखता है। धंधा आरंभ में चमकता भी है, पर वस्तुस्थिति देर तक छिपी नहीं रहती, तथ्य उभर कर सामने आये बिना रह नहीं सकते। लोगों को वह चालाकी विदित होनी ही थी। धीरे धीरे सस्तेपन के अथवा चापलूसी के प्रलोभन से आकर्षित हुए सारे ग्राहक टूट जाते हैं। इतना ही नहीं वे अपने परिचितों को उस दुकानदार से सचेत रहने की बात भी कहते हैं। फलतः उस अदूरदर्शी दुकानदार का कारोबार ठप्प हो जाता है और जल्दी अमीर बनने की ललक उल्टे उसे स्थायी दरिद्रता के गर्त में धकेल देती है। यह अदूरदर्शिता का ही परिणाम है। यदि उसने ग्राहकों के ऊपर अपनी ईमानदारी एवं प्रामाणिकता की छाप डालने के दूरगामी लाभ हो समझा होता तो आरंभ में धैर्य रखकर ईमानदारी की नीति अपनाई होती। इस मार्ग पर जो लोग चले हैं उनका व्यापार क्रमशः बढ़ता ही गया है। विश्वास बढ़ने से सहयोग बढ़ता है और जिसके जितने सहयोगी हों वह उतना ही प्रगतिशील बनता चला जाता है।
शक्तिकोष को युवावस्था में ही खर्च कर डालने पर वृद्धावस्था की गाड़ी खींचना कितना कठिन पड़ता है; यदि यह बात ध्यान में रखी जा सके तो समय रहते सचेत होने और संयम बरतने की आवश्यकता अनुभव होगी। युवावस्था में बरता गया आहार बिहार का संयम उस समय तो कठोर प्रतिबंध जैसा असुविधाजनक लगता है पर पीछे जब वृद्धावस्था में भी प्रौढ़ता का आनंद और सुखी दीर्घ जीवन का लाभ मिलता है तब पता चलता है कि दूरदर्शिता की नीति अपनाने में कितना बड़ा लाभ है।
अनाचार की नीति आमतौर से इसलिए अपनाई जाती हैं कि उससे तात्कालिक लाभ मिलता है। चोरी, बेईमानी, ठगी, चालाकी जैसे कुकृत्य करने वाले देखते हैं कि तनिक सी चतुरता और हिम्मत दिखाकर कितना बड़ा लाभ सहज ही उठा लिया गया; यदि उतना ईमानदारी से कमाना पड़ता तो बहुत समय लगता और श्रम करना पड़ता। इस प्रकार सोचने पर उस समय लगता है कि अनाचार अपनाने में लाभ और सदाचार से हानि है; किन्तु जब दूरगामी परिणाम देखे जाते हैं तब पता चलता है कि वह तात्कालिक लाभ कितना महंगा पड़ा और अन्ततः कितना दुखदायी सिद्ध हुआ। स्पष्ट है कि अनाचार छिपता नहीं। पाप में सबसे बड़ी कमी एक ही है कि वह खुले बिना रहता नहीं। कुछ समय कुछ लोग भ्रम में भी रह सकते हैं पर सदा सबको अँधेरे में नहीं रखा जा सकता। बेईमान व्यक्ति की करतूतें जब प्रकट होती है तब लोग उससे बचते और घृणा करते हैं। अप्रामाणिक समझा जाने वाला व्यक्ति अपना सम्मान और विश्वास खो बैठता है। तब उसे न केवल असहयोग का वरन् विरोध का भी सामना करना पड़ता है। समाज तिरस्कार, राजदंड के अतिरिक्त आत्म प्रताड़ना की प्रबल पीड़ा भी उसे सहन करनी पड़ती है। ऐसे व्यक्ति मित्र रहित, विश्वास रहित, सम्मान रहित असफल एवं निरानंद जीवन जीते हैं। श्मशान निवासी भूत पलीतों से ऐसे लोगों की मनःस्थिति तनिक भी अच्छी नहीं होती भले ही वे अनीति के आधार पर कितना ही धन वैभव क्यों न इकट्ठा कर लें। इस प्रकार का उपार्जन दुर्व्यसनों में ही नष्ट होता है और उससे व्यक्तित्व के विनाश की गति और भी तीव्र हो जाती हैं।
आतंकवादी दुष्टता अपना कर कई लोग समीप वर्ती लोगों को भयभीत करते हैं। उन्हें त्रास देकर अनुचित लाभ उठाते हैं। तत्काल यह नीति लाभदायक प्रतीत होती है, पर सर्वत्र शत्रुता के बीज बोने वाले यह लोग बेमौत मरते और जड़मूल से उखड़ते हैं। उनकी अपनी ही चाण्डाल चौकड़ी में फूट पड़ती हैं और वे एक दूसरे के विनाश में संलग्न होकर मुन्द उपमुन्द की तरह परस्पर मर कट कर समाप्त होते देखे जाते हैं। अनीति प्रयोजनों को लेकर स्थापित हुई मित्रता में दीर्घजीवन कहाँ होता है? वह पानी के बबूले की तरह पहले क्षण उठती और दूसरे क्षण टूटती देखी जा सकती है। आतंक अजेय तभी तक है जब तक प्रतिरोधी शक्तियाँ प्रसुप्त पड़ी रहती हैं, यदि वे जाग पड़ें तो गुण्डागर्दी का सिर कुचल जाने में भी देर नहीं लगती।
अदूरदर्शिता का एक बेहूदा रूप अपव्यय है। फिजूल खर्ची की कोई सीमा नहीं। कितनी ही आमदनी होने पर भी उसकी पूर्ति नहीं हो सकती। जेब में आये पैसे को फूँके बिना चैन नहीं पड़ता। आवश्यक अनावश्यक का ध्यान नहीं रहता, विलासिता की चीजें खरीदने ठाठ बाट बनाने और लोगों पर अमीरी का रौब जमाने में ढेरों पैसा उड़ जाता है। जब आवश्यक वस्तुओं की कमी पड़ती हैं तो कर्ज लेते, उधार माँगते, बेईमानी करते हैं। ऐसे लोग सदा अभाव ग्रस्त स्थिति में रहते हैं। संचित सम्पत्ति को फूँकते हैं और जब परिवार के आवश्यक उत्तरदायित्वों के लिए पैसे की जरूरत पड़ती हैं तो बगलें झाँकते हैं। शिक्षा, चिकित्सा, विवाह शादी आकस्मिक दुर्घटना एवं आवश्यकता के अवसर सामने आने पर ऐसे लोग कितने चिन्तित और कितने असहाय होते हैं उसे देखकर उनकी उस अदूरदर्शिता पर क्षोभ उठता है जो उनने फिजूलखर्ची की बुरी आदत की तरह अपने आप अपने कंधों पर ओढ़ी।
बच्चों की संख्या बढ़ाते समय लोग यह नहीं सोचते कि इन बालकों के निर्वाह, शिक्षा, चिकित्सा, स्वावलम्बन, विवाह आदि के लिए कितने पैसे की जरूरत पड़ेगी। उन्हें समुचित संस्कार, और दुलार देने के लिए कितना समय लगाने और कितने साधन जुटाने की आवश्यकता होगी। आँखें मींचकर बच्चे उत्पन्न करने वाले आरंभ में तो इसमें कोई बड़ी हानि नहीं सोचते; पर जब उन बालकों के लिए आवश्यक साधन जुटाने में अपनी आजीविका एवं योग्यता स्वल्प दीखती हैं तब पता चलता है कि भूल कितनी बड़ी हो गई। यदि साधन स्वल्प थे तो बिना विवाह के रहा जा सकता था अथवा बिना बच्चे का सुविधा पूर्ण गृहस्थ चल सकता था। अदूरदर्शी व्यक्ति आरंभ में ऐसा कुछ नहीं सोचते पर जब विपत्ति सिर पर लद जाती तो पछताते हैं। समय चूक जाने पर वह पछताना भी तो काम नहीं आता।
धन की तरह समय की सम्पत्ति है। समय की सम्पदा का सदुपयोग करके स्वास्थ्य, शिक्षा, कला, अनुभव परमार्थ जैसी कितनी ही बहुमूल्य उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं किन्तु यदि आलस्य और प्रमाद में आवारागर्दी और मटरगश्ती में वह समय ऐसे ही गँवाते रहा जाये तो व्यक्तित्व थोथा सारहीन रह जायगा। विशेषताओं के अभाव महत्वपूर्ण सफलताएँ कहीं मिलती हैं। ऐसे लोग किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करने वाली निरर्थक जिन्दगी का भार ढोते हैं; भविष्य के बारे में जिन्हें चिन्ता नहीं होती, केवल आज की अभी की सुविधा ही जिनके लिए सब कुछ रहती है वे लोग ओछी और उथली गति विधियाँ अपनाते हैं और दुर्भाग्य का रोना रोते हुए संसार से विदा होते हैं।
जीवन भगवान का दिया हुआ सबसे बड़ा उपहार हैं। मनुष्य को बनाने में उसका सारा कला कौशल लगा है। जीव को दिये जा सकने वाले उपहारों में यही सबसे बड़ा ईश्वरीय अनुदान है। इतना बहुमूल्य साधन प्राप्त करके पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। महानता की ऐसी उपलब्धियाँ मानव जीवन में सम्मिलित हैं जिनके सहारे स्वयं भव सागर से पार हो सकना और असंख्यों को अपनी नाव पर बिठाकर पार कर सकना संभव हो सके। अदूरदर्शी व्यक्ति इस सुर सौभाग्य का महत्व नहीं समझते और ऐसे ही पेट प्रजनन जैसी पशु प्रवृत्तियों में उसे नष्ट कर देते हैं। किन छोटी योनियों को पार करते हुए कितनी लम्बी यात्रा करने के उपरान्त जो मिला है उसे उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में लगा दें, समझदारी इसी में थी। पर अदूरदर्शिता की करतूत तो देखिये, प्रस्तुत उपहार से लाभान्वित होने के स्थान पर पापों की पोटली सिर पर बाँध ली जाती हैं। फिर उसके दंड भुगतने में मृत्यु के उपरांत चिरकाल तक कष्ट कर नारकीय यंत्रणाओं का त्रास सहना पड़ता है।
मृत्यु जीवन का अन्तिम अतिथि हैं। वही सबसे बड़ी परीक्षा की घड़ी हैं। उसी अवसर पर प्राणी के दीर्घ कालीन भविष्य का फैसला होता है। तुच्छ योनियों से आगे बढ़ते लाखों वर्षों में मनुष्य योनि तक पहुँच पाना संभव हुआ हैं। यदि जीवन के सदुपयोग का लेखा जोखा प्रस्तुत करने के आधार पर भविष्य निर्धारण होने की वेला में−हम खोटे सिद्ध हुए तो अगले जन्मों में फिर तुच्छता ही पल्ले बँधेगी। अस्तु दूरदर्शिता इसी में है कि न्याय की निर्णायक घड़ी में हम निर्दोष सिद्ध होने की तैयारी करने का आरंभ से ही ध्यान रखें। मुकदमे का फैसला अपने पक्ष में चाहने वाले काफी समय पहले से ही दौड़ धूप करते हैं और सबूत गवाह जुटाने के लिए समय तथा धन खर्च करते हैं। मनुष्य जीवन श्रेष्ठतापूर्वक जिया गया इसके प्रमाण एकत्रित करने के लिए हमारी चेष्टाएँ आरंभ से ही रह सकें तो समझना चाहिए कि निर्णायक घड़ी के लिए हम पर्याप्त साधन जुटा सकते हैं। उच्च पद पाने के लिए सरकारी परीक्षाएँ तथा प्रतियोगिताएँ होती हैं और जो उस कसौटी पर खरे सिद्ध होते हैं वे घोषित उच्च पद प्राप्त करते हैं। मृत्यु का दिन ऐसा ही निर्णायक दिन है जबकि भविष्य में देवात्मा−परमात्मा की स्थिति प्राप्त करने के पद उपहार मिलते हैं। इसके लिए बहुत दिन पहले से ही तैयारी करनी पड़ती है। उसे सफलतापूर्वक कर सकना मात्र दूरदर्शियों के लिए ही संभव होता है। अदूरदर्शी तो खाओ, पियो, मौज उड़ाओ की नीति अपना कर अपने वर्तमान और भविष्य को अन्धकार पूर्ण बनाने में ही लगे रहते हैं।
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दो मुखों वाला विहंग भारण्ड निरभ्र सिन्धु तट पर निवास करता। सागर उद्दाम वेग से कभी जल राशि तट से दूर तक फेंकता और सभी स्वयं ही वापस समेट लेता। इस आरोह−प्रत्यारोह में वह बहकर आये हुये अनेक फल तट पर छोड़ जाता। भारण्ड उन्हीं से अपना आहार चलाता और सुखमय जीवन व्यतीत करता।
दीर्घकाल तक यही क्रम चलता रहा; किन्तु एक दिन एकाएक अनहोनी हो गई। आये हुये समुद्री−ज्वार ने एक ऐसा मधुर फल तट पर छोड़ा जैसा भारण्ड ने पहले कभी नहीं देखा था। उसने फल का स्वाद चखा तो मानों उसे अमृत ही मिल गया। जिस मुख से उसने उस फल का रसास्वादन किया स्वार्थ बुद्धि ने उसे बदलने तक से इनकार कर दिया। दूसरे मुख ने कातर दृष्टि से देखते हुये प्रथम से अनुनय की। तात! मैं भी तो तुम्हीं से सम्बद्ध हूँ। और दिन भी तो हम दोनों साथ साथ स्वाद चखा करते थे बन्धुवर आज अचानक ही मुझसे यह छल क्यों कर रहे हैं।
अपनी बुद्धिमत्ता दर्शाते हुए प्रथम मुख ने कहा आर्य! तुमने खाया या मैंने, बात एक ही है, रुधिर संचार गति एक है, जीवन और प्राण एक है। अतएव तुम्हारे खाने न खाने से अन्तर ही क्या पड़ेगा। यह देखो अब जो भाग शेष बचा है उसे अपनी भारण्डनीय को ले चलते हैं। चलो चलो इस विवाद में कितना विलम्ब हुआ बेचारी क्षुधा से व्याकुल होगी।
दूसरा मुख अपमान का घूँट पी कर रह गया। फल दूसरे मुख में लगा था। कुछ कर भी नहीं सकता था; पर भीतर ही भीतर उसका अहंकार सुलग उठा और बदला लेने के अवसर की खोज करने में लग गया।
कुविचार की जड़ें जब सुदृढ़ हो जाती हैं। तो कुकर्म होते देर नहीं लगाती। नियम व्यवस्था हर दिन एक सी नहीं रहती एक दिन ऐसा भी हुआ कि समुद्र कहीं से अपने साथ विष−फल बहा लाया और अपने ज्वार के साथ उसे उसी तट पर छोड़ गया जहाँ भारण्ड निवास किया करते थे। दूसरा मुख इसी ताक में तो था ही उसने अवसर आया जान तत्परता से काम किया और उस विष फल को अविलम्ब उठा लिया।
परिणाम आँखों के आगे तड़ित गति से नाच गया। प्रथम मुख ने एक प्राण और समान हित होने का बोध कराते हुये कहा−तात! आप इसका भक्षण न करें अन्यथा हम दोनों का अवसान सुनिश्चित है। प्रथम मुख दर्प भरी हँसी−हँसा और बोला−बंधुवर! वह दिन याद करो जब मैंने भी तुमसे ऐसी ही याचना की थी, तुम मुझे उपदेश तो देते रहे किन्तु यह नहीं बन पड़ा था कि उपलब्ध सुख का एक कण मुझे भी दे देते अब अभिष्ट से क्यों डरते हो जैसा किया वैसा भरने को भी तैयार हो जाओ। यह कहते हुये उसने विष−फल एक बार में ही उदरस्थ कर लिया।
भारण्ड की मृत्यु हो गई। शोकाकुल भारण्डनीय सिन्धु तट पर बैठी रुदन कर रही थी तभी अम्बुधि की एक उर्मि वहाँ तक आई और बोली−भामिनि! जो केवल अपने स्वार्थ के लिये औरों की उपेक्षा करते हैं वह तथा जो प्रतिशोध की ज्वाला में निरंतर जलते और अपनों को ही भिन्न मानकर नीचा दिखाते रहते हैं दोनों ही निन्दा के पात्र हैं ऐसे निन्दनीय के प्रति दुःख नहीं किया करते।
सागर−पुत्री अपने घर लौट गई पर भारण्डनीय यह सोच कर अब भी विलाप कर रही है कि आने वाली नियति कौन जाने इस पूर्वाग्रह के पाप से मुक्त होगी भी या नहीं।
दुनिया को दुष्टता से उतना खतरा नहीं जितना कि अच्छाई की दुर्बलता से। भलाई का साहस ही न रहना ही बहुत बड़ी बुराई है। घने बादलों से रात नहीं होती। सूरज के निस्तेज होने से ही अँधेरा फैलता है।
−अज्ञात
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“पक्षी मानव” (ह्यूमन बर्ल्ड आइसलैण्ड) के नाम से विख्यात ईस्टर द्वीप आज भी मानवीय प्रगति और सभ्यता को प्रश्न वाचक चिह्न से घेरे हुए यह पूछता है कि आत्मतत्व को भुलाकर बाह्य जगत के ज्ञान में प्रतिबद्ध आज का मनुष्य सराहनीय है अथवा अतीत के पूर्वज जिन्होंने भौतिकी की उच्चतम इकाइयों का संस्पर्श तो किया किन्तु मानव जीवन की आध्यात्मिक गरिमा को ठुकराया नहीं, उसे गले से लगाये रखा। तभी वह युग स्वर्गीय परिस्थितियों का धरती में ही देवत्व का, स्वर्णिम युग बना रहा।
चिली से 2250 मील दूर इस द्वीप में 18वीं शताब्दी में जब पहले पहल योरोपियन नाविक पहुँचे तो उन्होंने वहाँ जो देखा तो वे भय मिश्रित आश्चर्य से अविभूति हो उठे। रक्षक पहरुओं की तरह समूचे द्वीप में गोलाकार खड़ी पत्थर की विशाल मूर्तियाँ आज भी दूर से यंत्र मानव सी प्रतीत होती हैं दिन भर उनकी छाया के बनते बिगड़ते दृश्य मन में कौतूहल पैदा करते हैं आखिर इतना विशाल परिश्रम उस समय किस तरह और किस लिये किया गया।
ज्वालामुखी चट्टानों को काट कर बनाई गई यह आकृतियाँ 33 से 66 फीट तक ऊँची और 50 टन वजन तक की भारी हैं। अनुमान है इन्हें बनाने में 10000 टन वजन तक के पत्थर के भारी टुकड़े काटे गये होंगे। इनके हाथ, पाँव, पेट, सिर, आदि इस तरह तराशे गये हैं कि देखने से ऐसा लगता है मानों यह बोलने ही वाली हैं। यह कार्य समर्थ व्यक्तियों द्वारा ही सम्पन्न हो सकता है असमर्थों द्वारा नहीं।
पुरातत्व वेत्ताओं के लिये यह एक दम नया आश्चर्य था और तब से अब तक हजारों विशेषज्ञ इसकी यात्रा कर चुके हैं। सबने अलग−अलग तरह की मान्यतायें बनाई हैं किन्तु अधिकांश का मत है कि छोटी बड़ी आकृतियाँ दिन में सूर्य की रोशनी में बनने वाली छाया में किन्हीं गणितीय सूत्रों के हल और रात में नक्षत्र मंडल की नाप−जोख की वेधशाला का काम करती रही हैं। लकड़ी की पट्टियों में मिले कुछ विचित्र संकेत और आश्चर्य जनक चित्र भी इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं और वहाँ आदिम निवासियों का चन्द्रमा आदि समीपवर्ती ग्रहों का सूक्ष्मतम ज्ञान भी इसी सत्य का समर्थन करते हैं। आज भी इस द्वीप के निवासी अपनी ही पृथ्वी के बारे में उतना नहीं जानते जब कि वर्षा कब होगी, नक्षत्र मंडल की स्थिति, समुद्री तूफान कब आयेगा यह सब समय से पूर्व ही प्राकृतिक परिवर्तनों के सामान्य अध्ययन से ही घोषित कर देते हैं।
टिहानकों से यह द्वीप यद्यपि 3125 मील दूर है तथापि टिहानकों के पुरातत्व अवशेषों और यहाँ से जो साम्य है वह इस बात की भी पुष्टि करते हैं कि अपने समय की अति उच्च मय सभ्यता और संस्कृति से इस द्वीप का कोई न कोई सम्बन्ध रहा है और पारस्परिकता में उनका अक्षुण्ण विश्वास रहा है।
मय सभ्यता जो भारतीय संस्कृति का वाम पक्षीय पंथ माना जाता है उच्च सभ्यता थी जो न केवल भवन निर्माण, विमान विद्या अपितु नक्षत्र विद्या में परम निष्णात थी। आज भी इनके कलेण्डर उपलब्ध हैं जो 4000 लाख वर्ष तक पंचांग का काम करते रहेंगे आश्चर्य है कि इतने समय तक सूर्य और चन्द्र ग्रहण सम्बन्धी इन कलेण्डरों की घोषणायें अत्याधुनिक वेधशालाओं के समान ही सटीक उत्तर देती आ रही हैं। फिर यह कहना कि पूर्वज रूढ़िवादी या अन्ध−विश्वासी थे अपनी ही संकीर्णता और संकुचित मनोवृत्ति का परिचायक हैं।
मय−कलेण्डर चन्द्रमा सूर्य और शुक्र को 37960 वर्षों में समान युति में आना बताते हैं−
सूर्य−8x13x5x73=104x5x73=37960
शुक्र−5x13x8x73=65x8x73=37960
इन युतियों पर विश्व सत्ता के प्राकट्य पर मय सभ्यता का भारतीय संस्कृति के समान ही विश्वास रहा है। उसे कुछ क्षणों के लिए श्रद्धाजन्य विषय मान लें तो भी उनकी अद्भुत गणितीय क्षमताओं पर तो कोई भी अविश्वास नहीं कर सकता।
मय अपने इन कलेण्डरों से स्थानों की उपयोगिता और वहाँ पड़ने वाले विशेष नक्षत्रीय विकिरण का पता लगाकर आँकते थे और वहीं अपनी वेधशालाएँ, शहर और दुर्ग बनाते थे। कोपन पैलेम्बी, चींचा आदि इन्हीं गवेषणाओं के आधार पर बनाये गये थे। सेक्सेह्यूमान किला इन्काओं का था पर वह भी “मायन” कलेण्डरों के अनुसार ही बना था जो विभिन्न क्षेत्रों में उसे समय के पारस्परिक सहयोग और घनिष्ठता पर प्रकाश डालता है। किसी कारण वश वे समुद्र के किनारे बसना पसंद नहीं करते थे पर उन्हें समुद्री यातायात की पूरी जानकारी रहती थी। नक्षत्र विद्या से इनकी न केवल स्थापत्य कला अपितु सम्पूर्ण जीवन प्रभावित था इसी से पता चलता है कि उनका ज्ञान ससीम नहीं विराट था उनका विज्ञान भी आध्यात्मिक विकास की एक आवश्यक धारा के रूप में था। आज की तरह भौतिक साधनों के उपभोग के लिये नहीं। यही कारण था कि तब लोग अधिक सुखी और प्रसन्न थे जब कि आज साधनों के भण्डार भरे हैं किन्तु मानवीय शान्ति और सुरक्षा को स्थिरता उपलब्ध नहीं हैं।
मय−सभ्यता के जो खंडहर उपलब्ध होते हैं उनसे पता चलता है कि उनके शहर अत्यधिक किस्म के होते थे जिनमें जल−मल निष्कासन तथा स्टेडियम जैसे सार्वजनिक स्थान भी होते थे इस भौतिक प्रगति में भी आध्यात्मिक सिद्धान्तों का परिपालन और उनकी शोध में निरन्तर लगे रहना उनकी बुद्धिमत्ता का परिचायक है। एक ओर आज का युग है जो मनुष्य जीवन को मात्र रासायनिक संवेग की संज्ञा देकर कभी न बुझने वाले जीवन तत्व के विकास की उपेक्षा करता है अध्यात्मवाद का और चाहे कोई दुष्परिणाम हो न हो पर सामाजिक जीवन में अत्यधिक भोगवाद ने व्यक्ति को इतना स्वार्थी बना दिया है कि वह अपने सुख के लिये हर किसी का शोषण और उत्पीड़न करने लगता है। परस्पर अविश्वास, अमैत्री उसी के फल स्वरूप हैं और हर समाज और समुदाय का परस्पर द्वेष, कटुता और संघर्ष उसी का प्रतिफल है।
इटली में ब्रेसिया की गुफाओं में दीवालों पर ऐसी आकृतियाँ अंकित हैं जो नक्षत्रों में अवतरण की विशेष पोशाक पहने हैं उनके हेलमेटों में सींग से निकले हैं जो स्पष्टतः एरियल यंत्र प्रतीत होते हैं। वैली लोनिया में ऐसी पट्टियाँ मिलती हैं जिनमें भूतकाल के चन्द्रग्रहणों की तिथियाँ अंकित हैं और वे आज भी सच निकलती आ रही हैं चीचने में एक ऐसी वेधशाला खोजी गई है जिसकी सीढ़ियाँ छत व गुम्बद सभी नक्षत्रीय गवेषणाओं तथा गणितीय समीकरण निकालने में सहायक थे यह छेद उन तारों की ओर नहीं हैं जो अत्यधिक चमकीले हैं। उपलब्ध शिलालेखों में यूरेनस नेपच्यून तक की सूक्ष्म जानकारियाँ अंकित हैं पैलन्क्वीन में नक्षत्र यान चलाती हुई मानव आकृतियाँ उपलब्ध हैं यह सारी उपलब्धियाँ अत्यधिक बुद्धि कौशल की परिचायक हैं जिन लोगों की विज्ञान में इतनी पहुँच रही है उनके आत्म विज्ञान को रूढ़िवाद कहना अपने आप को धोखा देना है तब लोगों की आध्यात्मिक क्षमताएं आज से हजार गुना बढ़ चढ़कर थीं। स्पष्ट है उनके ज्ञानार्जन का उद्देश्य आत्म−तत्व की खोज को बढ़ावा देना मात्र था यह कितने दर्द की बात है कि आज ज्ञान का उद्देश्य आध्यात्मिकता को कुचलना हो गया है इसी से मनुष्य क्लान्त, क्लीव और संतप्त है। अपने इस दृष्टिकोण में परिवर्तन लाये बिना आज का मनुष्य सुखी हो सकता है; इसे मात्र दुराशा ही कहा जा सकता है।
जिस तरह हम यज्ञ में आहुति देते समय कहते हैं कि “इन्द्राय इदं न मम” यह मेरा नहीं है, उसी तरह आज हम जो कुछ उत्पादन करते हैं; चाहे वह खेती में हो, चाहे फैक्टरी में, उसके बारे में हमें कहना चाहिए कि “समाजाय इदं, राष्ट्राय इदं न मम” यह सब मेरे लिए नहीं हैं, समाज के लिए है, राष्ट्र के लिए है, अपने पास जो भी कुछ है, वह सब समाज को अर्पण करना चाहिए। फिर समाज की ओर से अपनी आवश्यकतानुसार जो मिलेगा वह अमृत होगा।
−विनोबा भावे
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एक स्पेनिश पत्रकार ने एक बार महात्मा गाँधी से प्रश्न किया−”आप अब जिस रूप में हैं वह बनने की प्रेरणा कहाँ से मिली?” गाँधी जी ने बताया−भगवान् श्री कृष्ण, महापुरुष ईसा, दार्शनिक रस्किन और संत टॉलस्टाय से।
पत्रकार अचम्भे में आ गया। उसने अनुभव किया−इनमें से कोई भी तो गाँधी जी के समय में नहीं रहा पर फिर उनसे प्रेरणा वाली बात वह कैसे कहते हैं। उसने अपनी आशंका व्यक्त की इस पर गाँधी जी बोले−”महापुरुष सदैव बने नहीं रहते यह ठीक है समय के साथ उनको भी जाना पड़ता है किन्तु विचारों, पुस्तकों के रूप में उनकी आत्मा इस धरती पर चिरकाल तक बनी रहती है; जिन्हें लोग कागज के निर्जीव पन्ने समझते हैं उनका आत्मा उन्हीं में लिपटा हुआ रहता है उनमें जब तक जीवित रहें लोगों को दीक्षित करने संस्कारवान् बनाने और जीवन पथ पर अग्रसर होने के लिये शक्ति प्रकाश और प्रेरणायें देने की सामर्थ्य बनी रहती है। मुझे भी इसी प्रकार उनसे प्रकाश मिला है।”
“गीता के प्रतिपादन किसी भी शंका शील व्यक्ति का सही मार्ग दर्शन कर सकते हैं। संसार में रहकर कर्म करते हुये भी किस तरह विरक्त और योगी रहा जा सकता है यह बातें मुझे “गीता” ने पढ़ाई। इस तरह मैं भगवान् कृष्ण से दीक्षित हुआ। दलित वर्ग से प्रेम व उनके उद्धार की प्रेरणा मुझे “बाइबिल” से मिली−इस तरह मैं महापुरुष ईसा का अनुयायी बना। युवा अवस्था में ही मेरे विचारों में प्रौढ़ता कर्म में प्रखरता तथा आशा पूर्ण जीवन जीने का प्रकाश− “अण्टु दिस लास्ट” से मिला इस तरह रस्किन मेरे गुरु हुये और बाह्य सुखों, संग्रह और आकर्षणों से किस तरह बचा जा सकता है यह विद्या मैंने “दि किंगडम आफ गॉड विदइन यू” से पाई इस तरह मैं महात्मा टॉलस्टाय का शिष्य हूँ। सशक्त विचारों की मूर्तिमान प्राण पुंज इन पुस्तकों के सान्निध्य में नहीं आया होता तो अब मैं जिस रूप में हूँ उस तक पहुँचने वाली सीढ़ी से मैं उसी तरह वंचित रहा होता जिस तरह स्वाध्याय और महापुरुषों के सान्निध्य में न जाने वाला कोई भी व्यक्ति वंचित रह जाता है।
स्वाध्याय वस्तुतः आत्मोन्नति का ऐसा ही साधन है। “स्वाध्यायान्मत्प्रमदः” “विद्याध्ययन से, स्वाध्याय से कभी भी प्रमाद नहीं करना”−ऋषियों की इस शिक्षा में यही तथ्य सन्निहित है कि व्यक्ति के आत्मिक परिमार्जन की प्रक्रिया उसी से सम्पन्न होती है दीन हीन जीवन को ऊँचा उठाने की शक्ति उसी से मिलती है इतिहास साक्षी है कि संसार में जितने भी सफल और महापुरुष हुये हैं उनको आगे ले जाने वाला यान किसी न किसी पुस्तक की प्रेरणा के रूप में ही मिला है।
पाश्चात्य देशों में लोग−पुनर्जन्म का सिद्धान्त नहीं मानते−किन्तु स्टालिन के बारे में किसी समय समस्त योरोप यह कहा करता था कि उसमें “मार्क्स” की आत्मा का पुनर्जन्म हुआ है। बात कुछ भी रही हो पर इतना सुनिश्चित है कि मार्क्स और स्टालिन−दो शरीर अवश्य थे किन्तु स्टालिन के मस्तिष्क में विचार पूरी तरह मार्क्स के थे। स्टालिन तब कुल 15 वर्ष के बालक थे एक दिन उनके हाथ मार्क्स की “कैपिटल” पड़ गई। स्टालिन इस पुस्तक से इतना अधिक प्रभावित हुये कि उस नन्हीं सी आयु में ही मार्क्स वादियों के गुप्त संगठन के सदस्य बन गये थे। कार्ल मार्क्स के पके पकाये विचारों की खुराक ने ही उन्हें यह प्रौढ़ता प्रदान की कि वह कम उम्र में ही संगठन में छा गये और कुछ ही समय में उसका संचालन तक उन्हीं के हाथ आ पड़ा था। स्वाध्याय से मनुष्य का विचार बल उसी तरह पोषण पाता है जिस तरह खेतों को उर्वरता बढ़ाने के लिये नहरों से लिया गया जल। यह सौभाग्य हर किसी के लिये सुलभ है, हर तरह की दिशायें मीडडडडड समुपलब्ध रहती हैं मनुष्य जिस किसी भी दिशा में आगे बढ़ना चाहे उसे उसी तरह का प्रशिक्षण और मार्ग दर्शन घर बैठे मिल सकता है।
पेरिस के “लूव लला संग्रहालय” में एक पाण्डुलिपि नैपोलियन के हाथ की लिखी हुई रखी है। यह लगभग दो सौ विभिन्न पुस्तकों की सूची है जिन्हें नैपोलियन बोनापार्ट ने किसी समय अपने स्वाध्याय के लिये चुना और मँगाया था। इन पुस्तकों में वीरतापूर्ण इतिहास, युद्ध विद्या ही नहीं मानवीय जीवन की समस्याओं पर लिखे गये महापुरुषों के निबन्ध और उपन्यास भी सम्मिलित थे। नैपोलियन जैसे तानाशाह का यह पुस्तक प्रेम अन्यथा नहीं था यदि उसने अपनी यह अभिरुचि विकसित न की होती तो 23 वर्ष की आयु में ही “ब्रिगेडियर जनरल” के पद तक पहुँचने की योग्यता, क्षमता और विचार बल उसे नहीं मिल सका होता। पुस्तकें ज्ञान और अनुभव का वह सार होती हैं जो दूसरे लोग कंटकाकीर्ण मार्ग पर चल कर प्राप्त करते हैं और अपने पीछे की पीढ़ी के लिये सरल सुबोध और निर्विघ्न राजपथ के रूप में छोड़ जाते हैं जिनमें चल कर कोई भी व्यक्ति सुविधा पूर्वक, सुरक्षा पूर्वक इच्छित लक्ष्य तक जा पहुँचता है।
पं0 जवाहर लाल नेहरू एक सम्पन्न परिवार के विलास प्रिय नवयुवक थे, यह बात अलग थी कि वे क्या पढ़ते थे किन्तु निरंतर पढ़ने का पैतृक गुण उन्हें पिता श्री मोती लाल नेहरू से मिला था। वे कहा करते थे एकान्त की सर्वोत्तम मित्र पुस्तकें ही हो सकती हैं उनसे जितनी शान्ति मिलती है उतना ही विचारों को पोषण और आत्मा को बल। यह बात उनके जीवन से ही चरितार्थ होती है जिन दिनों वे कैंब्रिज में पढ़ते थे उनके हाथ टाउनऐड मेरी डिथ की सुप्रसिद्ध पुस्तक “एशिया एण्ड योरोप” हाथ लग गई। अब तक जवाहर लाल नेहरू ने कभी राजनीति का विचार तक नहीं किया था। किन्तु इस पुस्तक ने एकाएक उनके जीवन की धारा को बदल दिया और वे राजनीति में रुचि लेने लगे। मेरी डिथ एक तरह से उन्हें उँगली पकड़ कर आगे बढ़ाते रहे और उसी मार्गदर्शन का यह प्रतिफल था कि पं0 जवाहर लाल नेहरू न केवल भारत एशिया अपितु समूचे विश्व के गण्य मान्य राज−नेताओं की सूची में जा बैठे। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद से ही उनकी इतिहास और राजनीति की रुचि गहराती गई और उन्होंने भारत एशिया और विश्व इतिहास का गहन तम स्वाध्याय किया और इस तरह संसार के सफल सम्राटों, राजनीतिज्ञों की सूझ−बूझ, चिंतन, निष्कर्ष, अनुभव उन्हें एक सम्पन्न खजाने के रूप में मिलते गये जिससे उनकी राजनैतिक प्रतिभा निखर उठी। विन्सेन्ट स्मिथ, मार्शल प्लेटो, मैक्समूलर, मैकडोनल तथा सुकरात में से जिस किसी को ढूँढ़ना हो अपने विचारों के रूप−में−सिद्धान्तों के रूप में सबके सब जवाहर लाल नेहरू में मिल सकते थे।
जार्ज बर्नार्ड शा को “शा” बनाने का श्रेय भी पुस्तकों को ही है उनकी माँ ने जब वे 8 वर्ष के थे तभी स्वाध्याय की अभिरुचि उत्पन्न कर दी थी। “शा” के पिता अक्सर कहा करते थे बच्चे को खेलने कूदने भी दिया करो तो माँ कहती−पुस्तकों में सिनेमा, खेल कूद, यात्रा−भ्रमण, इतिहास, दर्शन आदि सभी कुछ है और वह भी है जो बच्चे की विचार शक्ति के लिये ईंधन का कार्य करेगा। उसकी विचार−ऊष्मा को निरंतर प्रज्ज्वलित रखेगा। 7 वर्ष से 8 वर्ष तक वे पहले ही बाइबिल पढ़ चुके थे जिससे उनका मन आध्यात्मिक भावनाओं में संस्कारित हो चुका था। अब उन्हें शेक्सपियर बनियन तथा−दि अरेबियन नाइट्स” आदि को पढ़ने का अवसर मिला डिकिन्स, उससे वायरिन, डिंडन जान स्टुअर्ट मिल तथा शैले साहित्य का 12 वर्ष की आयु तक पूर्ण अध्ययन कर लिया। एक दूसरे के विरोधी विचार पढ़ने से न केवल उनकी तार्किक शक्ति, बौद्धिक पैनापन उभरा अपितु चिन्तन के नये आयामों का उदय हुआ। जिसके मस्तिष्क में दो विचार हों उनसे वह अधिक से अधिक चार बना सकता है किन्तु हजार विचारों वाले के लिये लाख चिंतन भी कम है। यह शक्ति मात्र स्वाध्याय से उभरती है−शा में उभरी। स्वाध्याय को जीव का प्राण मानने के कारण ही उन्होंने जीवन के अन्तिम क्षणों तक पढ़ने का क्रम बराबर बनाये रखा और चाहे सब कुछ छोड़ दिया हो। यही स्थिति पाश्चात्य विचारक जान स्टुअर्ट मिल की भी थी। विचार भले ही भौतिक दिशाओं में बढ़ गये हों किन्तु उनके साहित्य में उनकी बौद्धिक प्रखरता बराबर झाँकती मिलती है यह भी “लाइफ आफ टरगट” के रचयिता कंडोर−ऐट तथा झिलिप क्रुक ड्रेक प्रेडरिक आदि के मकदूनिया की देन थी।
चार्ल्स डार्विन जिन्हें विकास वाद सिद्धान्त का जनक कहा जाता है पुस्तकों के अनन्य भक्त और प्रेमी थे। व्हाइट की सेलवोर्न हेनरी तथा पार्क की “केमिकल कैर सिज्म तथा” वान्डर्स आफ दि वर्ल्ड ने उन्हें अत्यधिक प्रभावित किया था। इन्हीं पुस्तकों के स्वाध्याय ने ही उनके मस्तिष्क में इस नये दर्शन की पृष्ठ भूमि विनिर्मित की थी।
माइकेल फैराड़े, मार्कोनी गैलेसियस, हम्फ्री डैवी, हों या भारतीय इतिहास के नक्षत्र सुभाष, शास्त्री, राधाकृष्णन और सरदार बल्लभ भाई पटेल सब ने जीवन में जो कुछ पाया वह सब उनकी स्वाध्याय सुरुचि का वरदान था। जिसने उनकी प्रसुप्त क्षमताओं को अनेक गुना सक्रिय बना दिया। विचार की सत्ता हर व्यक्ति में होती है स्वाध्याय उसे पैना कर उपयोगी बना देता है जिनकी पढ़ने में अभिरुचि नहीं होती, यह कहना चाहिये कि उनके विचारों को खाद पानी नहीं मिलता और वे फलने फूलने की अपेक्षा मुरझा कर नष्ट हो जाते हैं निराशायें, चिंतायें, उद्विग्नतायें और व्याधियाँ ऐसे ही लोगों को घेरती हैं। स्वाध्याय शील तो आपदाओं में हँसी खुशी और प्रसन्नता का जीवन जी लेते हैं।
कौत्स ऋषि कण्व के आश्रम में तप साधना करते थे। एक दिन वन से लौटते हुए मार्ग में उन्हें एक आहत रूपवती स्त्री पड़ी दिखाई दी। कौत्स एक क्षण इसे देखने व उसकी सहायता करने को रुके परन्तु दूसरे ही क्षण वे अपने आश्रम की ओर चल दिए।
उनके पीछे महर्षि कण्व भी आ रहे थे। उन्हें अपने शिष्य की हृदय हीनता व असहाय अबला के प्रति दर्शाई गई उदासीनता पर आश्चर्य हो रहा था। कण्व ने उस महिला की सहायता की, उसकी चिकित्सा की तथा उसे वे आश्रम में ले आए।
आश्रम में उन्होंने कौत्स को बुला कर पूछा तो कौत्स बोले, “भगवन् मैंने देखा वह स्त्री इतनी रूपवती व सौंदर्यशाली थी कि मुझे अपने पर ही आशंका होने लगी थी−कि ऐसा न हो उसका सान्निध्य मुझे साधना से विचलित कर दे अतः मैंने अपने लक्ष्य की प्राप्ति के आसक्ति विषय को टाल देना ही उचित समझा” महर्षि कण्व ने कौत्स को समझाया “वत्स निर्धन, दरिद्र व अकर्मण्य मनुष्य यदि यह कहे कि उसे धन−सम्पत्ति का मोह नहीं है−उसे कर्म करने, एवं परिश्रम कर धनोपार्जन में कोई रुचि नहीं तो यह उसकी त्याग वृत्ति का नहीं परन्तु उसकी अक्षमता का सूचक है। संसार में प्रवृत्त रहते हुए भी अपने धन वैभव, ज्ञान, पुत्र पौत्रों में “अलिप्त भाव” से रहना सच्ची साधना है तुम्हारी साधना की सफलता की कसौटी ही यह है कि तुम पानी में रहकर भी पानी से दूर रहो।”
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जिसमें पृथ्वी में स्त्रियाँ तो होंगी किन्तु पुरुष नाम की कोई सत्ता नहीं होगी। तब फिर बेचारी नारी अकेली सृष्टि संचालन का कार्य किस तरह चला पायेगी? अधिक से अधिक एक शताब्दी अपनी जीवन ज्योति जलाये रख सके। वह बुझ गई तो आज की धरती की भी वही स्थिति होगी जो निर्जन और बीहड़ चन्द्रमा, मंगल या मानव विहीन किसी भी अन्य ग्रह नक्षत्र की।
बात न तो हँसी की है न पागल प्रलाप। आधुनिक सभ्यता, प्रगति और मनुष्य के हाथ मिट्टी न लगे− उसे कम से कम शारीरिक श्रम करना पड़े−यह धारणा ही उक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न करने जा रही हैं। औद्योगीकरण के नाम खड़े किये जा रहे बड़े−बड़े कल कारखाने, तीव्र गति के निरंतर बढ़ते वाहन तथा अणु आयुधों सहित निरंतर बढ़ रहीं युद्ध की विभीषिकाएं−यह सब निरंतर वातावरण को विषैली गैसों से धरती जा रही हैं। पर्यावरण दूषण की समस्या न केवल वायु मंडल में छाती चली जा रही हैं अपितु जीवन के लिये अत्यावश्यक जल को भी विषाक्त बनाती चली जा रही हैं। जैसे−जैसे यह विष बढ़ता जा रहा है घुटन, स्वास्थ्य में गिरावट और अनेक तरह की नई तथा असाध्य बीमारियों के आगे अब वह अनुवांशिकी को भी नष्ट करने पर तुल गई है। वैज्ञानिक और विचारक इन तथ्यों को लेकर बुरी तरह चिन्तित हैं। बचाव के उपायों का अनुसंधान भी चल रहा है पर मूल कारण नष्ट करने की अपेक्षा उन्हें और बढ़ावा मिलता रहेगा तो अकेले चिन्ता करने मात्र से क्या कुछ बन पड़ेगा।
मिलान (इटली) के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो0 कार्लो सिर तोरी ने अपनी वैज्ञानिक शोधों के आधार पर बताया है कि जल्दी ही वह युग आ रहा है; जब धरती पर से पुरुष सत्ता का नामों निशान मिट जायेगा। यह इस लिये संभावित है कि पर्यावरण प्रदूषण इस हद तक बढ़ गया है कि उससे भ्रूण में नर लिंग निर्धारित करने वाले गुण सूत्र (क्रोमोसोम) नष्ट हो जाते हैं। ऐसा इसलिये होता है कि समूचे भ्रूण में यह गुण सूत्र उतने अधिक कोमल तथा संवेदन शील होते हैं कि वे वायु प्रदूषण की निर्धारित सीमा से अधिक सहन करने में असमर्थ होते हैं। जिन देशों और क्षेत्रों में दूषण का घनत्व बढ़ा है वहाँ यह संकट अभी से दिखने लगा है और वहाँ अभी से आने वाली नई संतति यह विकार लेकर जन्म ले रही है। अभी तो स्थिति उनकी शरीर रचना में अनियमितता, जन्म जात अपंगता के ही दृश्य उपस्थित कर रही है पर एक समय वह भी आयेगा जब वे धरती पर जीवित उपस्थित होने से ही मना कर देंगे।
एक ही उपाय है मनुष्य शहरी करण की प्रवृत्ति का शिकार होने से बचे, औद्योगीकरण का बायकाट करे तथा प्राकृतिक जीवन की ओर लौटे। दूषण का सामना करने वाले साधन−यज्ञ वृक्ष रोपण, पुष्पोद्यान के प्रचलन में रुचि ली जाये और उन्हें मानवता की रक्षा के पुण्य के रूप में महत्ता प्रदान की जाये। यदि वह नहीं कर सकते तब भी तो उसी नृशंस कांड के लिये तैयार रहना होगा जिसकी आशंका डॉ0 सिरतोरी ने व्यक्त की है।
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मनुष्य की कोमल भावनाओं, सूक्ष्म अभिव्यक्ति के तीन साधन तीन कलायें हैं (1) नृत्य (2) संगीत और अभिनय। इनसे आत्मा की स्वाभाविक अभिव्यक्ति होती है, साथ ही जीवन सत्ता के ललित और आह्लादकारी गुण का भी पता चलता है। इन्हें मनुष्य की बुद्धि और प्रगति शीलता का एक माप दण्ड भी कहा जा सकता है पर जीवन मनुष्य की ही विरासत नहीं, वह विराट् रूप में बिखरा पड़ा है। जिसमें जीव जन्तु भी आते हैं। विभिन्न कलाओं द्वारा पशु-पक्षी भी अपनी प्रमोद प्रियता का परिचय देते रहते हैं। कभी-कभी तो ऐसा विश्वास होने लगता है कि मनुष्य को ललित कलायें सिखाई ही अन्य जीवों ने हैं, क्योंकि उनमें से कई में यह कलायें अत्यन्त प्रौढ़ किस्म की होती हैं।
नृत्य कला प्रकृति के सूक्ष्म रहस्यों तथा भावनाओं की अभिव्यक्ति का एक गूढ़ विज्ञान है। विश्व के अनेक प्रकार के नृत्य विख्यात श्रेणी में आते हैं। इनमें भारत के भारत नाटयम्, कचिपुड़ि, कत्थक, रूस का बैले तथा ब्रिटेन के काकटेल प्रमुख है, किन्तु आश्चर्य तब होता है जब कि प्रकृति के परिन्दों में भी न केवल उन्नत श्रेणी के अपितु विलक्षण अभिव्यक्ति और भंगिमाओं के नृत्यों की परम्परा पाते हैं। मोर इस कला में बादशाह माना जाता है।
यह न केवल ऋतु−नृत्य नाचने में ही प्रवीण होते हैं। अपितु संवादी, आक्रमण, भय आदि अवस्था में भी वे नृत्य कला का उपयोग करते हैं। ऋतु काल का नृत्य जो विशुद्ध प्रेम भावना से प्रेरित होता है। न्यूनतम 5 मिनट से एक घंटे तक भी चलता है। अपने भोजन या प्रणय क्षेत्र में किसी सजातीय या विजातीय को पाकर वे बहुत तेजी से पंख थरथरा कर तथा सीधी चोंच से प्रहार करते हुये नृत्य करते हैं। मोरों में ईर्ष्या वश भी नृत्य होते हैं। यह किसी दूसरे मोर को नाचता देख कर तब किये जाते हैं जब दूसरे मोर को यह आशंका हो जाती है कि कहीं मादा उसी की ओर आकृष्ट न हो जाये। अन्य नृत्यों को छोड़ कर प्रायः बादलों की गरज चमक के समय प्रातः और सायंकाल मोर नृत्य होते हैं। काली घटा देख कर मोर बहुत प्रसन्न होता है और कूहू−कूहू कर नाचने लगता है। मनुष्यों में भी अनेक प्रकार के नृत्यों की परम्परा है। भाव प्रदर्शन दोनों में समान है फिर मनुष्य को ही उन्नत श्रेणी का क्यों माना जाये मार्ग दर्शक इस जीव प्रकृति को ही क्यों न माना जाय।
ध्रुवों की खोज करने वाले वैज्ञानिक बताते हैं कि पेन्गुइन की सामाजिक व्यवस्था बहुत विकसित किस्म की है। नर को विवाह की इच्छा होती है तो वह अपने मुँह में एक पत्थर लेकर इच्छित मादा के पास जाता है और इस बात का संकेत देता है कि वह उसके लिये पत्थर का सुन्दर महल बनाने को तैयार है यदि मादा वह पत्थर स्वीकार करले तो विवाह पक्का फिर सभी पेन्गुइन इसी खुशी में नाचते गाते हैं। देखने वालों का तो यहाँ तक कहना है कि इस विवाह नृत्य में नर पेन्गुइन मादा की विधिवत पीठ थपथपा कर “एक्शन−साँग“ का सा दृश्य प्रस्तुत करते हैं। बहुत बार ऐसा भी होता है कि मादायें पत्थर लाने वाले नर से संतुष्ट नहीं होती उस स्थिति में वे पत्थर स्वीकार करने की अपेक्षा मुँह फेर कर खड़ी हो जाती हैं। मनुष्य की अपेक्षा यह कितने भले हैं। मनुष्य तो अपने सामाजिक दायित्वों में भी स्वार्थपरता और अहं प्रदर्शन जोड़ने से नहीं चूकना विवाहों पर दहेज की माँग, जेवर जकड़े, आतिशबाजी, नशेबाजी ऐसी ही दुष्प्रवृत्तियाँ हैं। अन्य जीव तो उनसे मुक्त ही हैं।
हम समझते हैं कला का वरदान मात्र मनुष्य जाति को ही मिला है। बच्चे को सुलाने के लिये लोरी गाना, मेलों के प्रयाण पर गाये जाने वाले पीत, धान रोपाई के गीत, सावन के मल्हार और ब्याह शादियों पर गाये जाने वाले गीत मनुष्य की उदात्त कला संस्कृति के प्रतीक माने जाते हैं लगता है यह उपहार केवल मनुष्य को ही उपलब्ध है यह गीत तो आत्मा और मन के आह्लाद और प्रसन्नता के प्रदर्शन मात्र है और मनुष्येत्तर जीवन भी इस कला में कम पटु नहीं। कोयल के बसंत गान से तो सभी परिचित हैं किन्तु अपने घोंसलों का निर्माण करते समय “राबिन” पक्षी तथा “ओरिओल” के गीत कहीं उससे भी अधिक मन मोहक होते हैं। “दरजी” “बया” और “बुनकर” पक्षी भी गायकों−की श्रेणी में आते हैं। यह सब विशेष प्रकार की लय और ताल में गीत गाते हैं। स्काई लार्क के प्रभात गीत तो शेक्सपियर के लिये प्रेरणा स्रोत ही बन गये थे। शेक्सपियर इसे “प्रभात”−दूत” कहा करते थे और उसके मधुर संगीत में तन्मय हो जाने के बाद ही साहित्य साधना किया करते थे। बालजाक को रात में पपीहे का स्वर सुनने को मिल जाता तो वे एक तरह साहित्य साधना में समाधि ही लगा जाते। भावना शील व्यक्तियों ने सदैव ही जीवों से प्रेरणायें पाई हैं। प्रातःकाल उनका चहचहाना, सायंकाल ढलते हुये सूर्य का चंदन करना देख कर हृदय उमड़ने लगता है। यदि मनुष्य ने अपना जीवन कृत्रिम नहीं बनाया होता उसने भी इनकी तरह अपने को बंधन मुक्त रखा होता तो उसका जीवन भी कितना रसमय रहा होता यह स्पष्ट अनुभव किया जा सकता है।
एक बार तो ह्वेल मछली से संगीत को टेप करने का भी प्रबन्ध किया गया। उसके जो परिणाम प्राप्त हुये वे और भी आश्चर्यजनक है−सर्व प्रथम एक ह्वेल मछली ने संगीतमय ध्वनि से नौ बाद “क्लिकं” “क्लिकं” की ध्वनि की। इस के बाद एक दूसरी ह्वेल ने वैसी ही ध्वनि सात बार की, फिर दोनों ने 8 बार वहीं ध्वनि समवेत दुहराई इसके बाद क्रमशः 14, 8 तथा 7 बार ध्वनि टेप की गई। इस संगीत ध्वनि के समय का दृश्य इस बात का साक्षी है कि मछलियों के पास अक्षरों और शब्दों का सुविस्तृत भंडार भले ही न हो पर उन्हें अपने विचार विनियम में कोई दिक्कत नहीं होती। पहले दोनों ह्वेलें एक नर एक मादा अलग अलग स्थानों में थीं 8 और सात की ध्वनि से उन्होंने अपने मिलने का स्थान तय किया 14 बार क्लिक की आवाज के द्वारा उन्होंने कोई बात तय की फिर 7 और 8 क्लिक के बाद दोनों दो भिन्न दिशाओं की ओर मुड़ गई। इनके संगीत में कुछ ऐसा आकर्षण होता है कि इनका शिकार स्वयं ही इनकी ओर चला आता है।
जापान की एक फर्म ने तो अत्यन्त संवेदन शील इलेक्ट्रानिक उपकरणों की सहायता से ऐसे विशेष संगीत रिकार्ड तैयार किये हैं, जो कुत्तों और बिल्लियों का क्रोध शान्त करने उनको मानसिक शान्ति प्रदान करने में सहायक होते हैं। इन रिकार्डों का व्यावसायिक उत्पादन प्रारम्भ भी कर दिया गया है और अमेरिका उनका सबसे बड़ा खरीददार है। संगीत आत्मा की अदम्य आकांक्षा है। ऐसा लगता है उसका संगीत से कोई सनातन सम्बन्ध है तभी वह इतना रस अता है। आज जब कि भौतिक आकर्षणों की दौड़ में हर व्यक्ति बुरी तरह परेशान है तब उसके मन और अन्तःकरण को इसी तरह संगीत माध्यमों से राहत पहुँचाई जा सकती है।
दक्षिणी अफ्रीका में पाये जाना वाला एक पक्षी तो नृत्य में इतना पटु होता है कि उसका नाम ही “दि डार्न्स” पड़ गया है। न्यूजीलैण्ड में पाई जाने वाली “वर्ल्ड आफ पैराडाइसों” में तो विवाह के अवसर पर विधिवत स्वयंवर होता है। एक विशेष ऋतु में सभी विवाह योग्य युवक पक्षी एक ओर पंक्तिबद्ध खड़े हो जाते हैं, युवतियां उसी तरह दूसरी ओर, बालक व वृद्ध पक्षी दर्शक के रूप में तीसरी पंक्ति में। अब कोई एक पक्षी बाहर निकल कर नाचना प्रारम्भ करता है। युवतियां ध्यान से उसका अंग परिचालन देखती हैं जिस युवती को वह नृत्य पसंद आ जाता है वह बाहर आकर उसकी चोंच में चोंच डालकर अपनी सहमति व्यक्त करती हैं फिर दोनों मिलकर नाचते और गाते हैं इस तरह वे अपना अपना जोड़ा बना लेते हैं। जटिल हो गई है कि आये दिन गृहस्थ जीवनों में विग्रह विद्रूप खड़े होते रहते हैं उनसे मुक्ति के लिये मनुष्य जाति को बहुत कुछ इन जीवों से सीखना पड़ेगा।
नृत्य कला में यों प्रवीण मोर को माना जाता है किन्तु कला पारखी मकड़े के नृत्य को अधिक उत्कृष्ट मानते हैं। भले ही अपनी नैसर्गिक सुन्दरता के अभाव में वह किसी का ध्यान आकृष्ट न पर पाता हो। मकड़े प्रायः अपनी मादा को प्रसन्न करने के लिये नाचते हैं किन्तु यह जोखिम बड़ा घातक होता है यदि मकड़ी अप्रसन्न हो गई तो बेचारे को जान से भी हाथ धोना पड़ता है। मकड़े के सिर पर एक श्वेत कलंगी जैसी होती है नृत्य करते समय वह मकड़ी को इसे दिखने में सफल हो जाता है तो मकड़ी निश्चित रूप से प्रसन्न होती है। आठ दस मकड़ों का सामूहिक नृत्य तो और भी दर्शनीय होता है।
जीव जन्तुओं के अधिकांश नृत्य मादा को रिझाने या उनके सामूहिक विवाह के अवसरों पर ही होते हैं इस कला में बिच्छू भी प्रवीण होता है। बिच्छुओं में नर व मादा के साथ−साथ नृत्य करने की परम्परा है। जब तक थक कर चकनाचूर न हो जायें तब तक इनका नृत्य चलता रहता है। यह आगे पीछे कदम बढ़ाकर नाचते हैं गोल चक्कर में नहीं।
नृत्य कला एक महत्वपूर्ण व्यायाम भी है इससे योगासनों के लाभ भी मिलते हैं यदि इसे विशुद्ध कला की दृष्टि से विकसित किया जाये। मेफ्लाई नाम की मक्खी का नृत्य ऐसा ही होता है वह उड़कर, उठ बैठ कर लेटकर नाना प्रकार ने नृत्य करती है वह मक्खियाँ खा-पी नहीं सकतीं क्योंकि इनके मुख ही नहीं होता। शुतुरमुर्ग के लिये तो नृत्य पूरी तपश्चर्या है वे अपनी प्रेयसी को प्रसन्न करने के लिये एक पैर से भी थिरकते हैं इतने पर भी वे प्रसन्न न हों तो उस टाँग को भी तोड़कर नृत्य करना पड़ता है तब कहीं “देवी” प्रसन्न होती है?
वर्षा ऋतु में जब पानी बरसता है तो मोरों की तरह बत्तख भी पानी में तैरते हुये नृत्य करते हैं। मछलियाँ भी शृंगारिकता की ही भावना से नृत्य करती हैं पर इनकी मुद्रायें और हाव भाव उतने सूक्ष्म होते हैं जैसे भरतनाट्यम् और कत्थकली। घोंघे को यों सुस्तों का बादशाह कहा जाता है। एक स्थान पर पड़े रहना ही उसका काम है किन्तु किसी ने नृत्य−गीत कला को सच ही प्रकृति की नैसर्गिक चेतना कहा है इससे मानव मन के लालित्य का पता चलता है सदियों से इस कला का सांस्कृतिक परम्परा के रूप में विकास किया गया है और अब यह मनोरंजन का मूल साधन बन गया है किन्तु यदि उसका उद्देश्य मात्र शृंगारिकता रहे तो मनुष्य और अन्य जीवों में अन्तर ही क्या रहे। वह तो घोंघा जैसा आलसी प्राणी भी कर लेता है। घोंघा मादा के आस−पास घूम कर गुनगुनाता हुआ नृत्य करता है किन्तु यदि उसे कला−साधना का रूप दिया जाये तो इसके माध्यम से सूक्ष्मातिसूक्ष्म भावों का भी प्रदर्शन संभव है। जैसा कि भारतीय नृत्यों की शैली से स्पष्ट है।
नृत्य−गीत ही नहीं मनोविनोद और क्रीड़ा का स्वाभाविक जीव−गुण भी इन पक्षियों में पाया जाता है कुत्ते और बन्दरों को अपने बच्चों से खेलते कभी भी देखा जा सकता है। तोते और कनेरियाँ पेड़ में लटक-लटक कर झूलते और विचित्र तरह से कह कहा कर अपनी प्रसन्नता व्यक्त करते हैं। पीलक, क्या परस्पर एक दूसरे से ठिठोली करते देखे जा सकते हैं। न्यूनाधिक मात्रा में यह गुण हर जीव में होता है।
अमरीका में पायी जाने वाली “मार्किंग चिड़िया” अपनी विनोद प्रियता के लिये विख्यात है। यह न केवल मनुष्यों की अपितु दूसरे पशु−पक्षियों की आवाज की भी नकल उतारने में बड़ी पटु होती है। उसके इस स्वभाव का बूढ़े बच्चे सभी आनन्द लेते हैं। वह स्वयं भी इससे बड़ी प्रसन्न होती है।
एक बार इंग्लैंड में एक पक्षी ने वहाँ के लोगों को असमंजस में डाल दिया। वे लोग जब प्रातः काल मीठी नींद में सो रहे होते तो वृक्षों की ओर से मनुष्यों की सी खिल खिलाकर हँसने की कभी−कभी तो अट्टहास की ध्वनि आती और उनकी नींद टूट जाती। लोग परेशान थे आखिर यह हँसता कौन है? पीछे पता चला कि यह और कोई नहीं “कूकावड़ा” पक्षी है जो कुछ दिन पहले ही आस्ट्रेलिया से इंग्लैंड आ गये थे।
एक मनुष्य है जो दूसरों को समुन्नत देख कर ईर्ष्या, विद्वेष, राग−रोष और तृष्णा की कीचड़ में सड़ता रहता है दूसरी ओर यह जीव हैं। कितने आनन्द और उल्लास का उन्मुक्त जीवन जीते हैं। जीवन समस्या रहित है उसमें कुछ भी जटिलता नहीं। समस्यायें तो मानवीय दुर्गुण और मनोविकार हैं उनसे मुक्ति पाना है तो मनुष्य को भी ऐसा ही सहज और सरल जीवन क्रम अपनाना पड़ेगा।
नृत्य−गीत, मनोविनोद की भाँति अभिनय भी आत्माभिव्यक्ति का एक साधन है। यह अलग बात है कि मनुष्य अपनी इस कला में बहुत निष्णात हो गया है पर यह भी सच है कि झूठी अभिनय बुद्धि के कारण सर्वत्र अभिनय ही अभिनय शेष रहा है। यथार्थ से मनुष्य कोसों दूर हटता जा रहा है। पति−पत्नी के सम्बन्धों, बच्चों के पालन पोषण, सामाजिक दायित्वों के निर्वाह में कलाबाजी अधिक, सच्चाई और ईमानदारी कम है यदि अभिनय का उद्देश्य सत्य का प्रतिष्ठा, मानवीय मूल्यों के प्रति संवेदना जागृत करना न होकर मात्र मिथ्या प्रदर्शन और दूसरों को भ्रम में डालना ही हो तब तो यह जीव ही हमसे अच्छे।
मेन्टिस कीड़ा यह जानता है कि उसका रंग हरा होता है तभी तो वह रहे पत्तों के बीच अपनी दोनों टाँगें इस प्रकार ऊपर करके लेट जाता है मानों किसी पौधे की जड़ से दो किल्ले फूटे हों। कीड़े की शक्ल में तो ऐसा लगता है मानो वह किसी से प्रार्थना कर रहा हो पर यह वास्तव में शिकार पकड़ने के लिये उसका बगुला−भक्तपना है। मृतक की-सी स्थिति में पड़े इस कीड़े के समीप से कोई शिकार निकला तो वह अत्यन्त द्रुत गति से उठ खड़ा होता है और चिमटे की शक्ल की अपनी दोनों टाँगों में उसे धर दबोचता है।
स्पाइडर केकड़े पानी के पौधों या जल काई को अपने शरीर में लगा लेते हैं। उनमें से कई पादप तो विधिवत जड़ पकड़ लेते हैं इस तरह वह एक हरी भरी पहाड़ी का लघु−संस्करण प्रतीत होने लगता है और तब क्या मजाल जो कोई भी व्यक्ति या जानवर इन्हें बहुत पास से पहचानले।
दण्ड कीट और अमेरिकी “वाकिंग स्टिक” के नाम करण से ही यह पता चलता है कि वे लकड़ी की टहनियों के बीच किस तरह सादृश्य बना लेते हैं कि उनके और लकड़ी के मध्य अन्तर करना भी संभव नहीं रह जाता। “माथ” का नन्हा बच्चा तो अपने अस्तित्व की रक्षा भी केवल इसी कारण कर पाता है यदि वह लकड़ी की किसी टहनी में चिपक कर स्वयं भी पूर्ण विकसित होने तक उसकी एक नन्हीं डाली न बना रहे तो कोई भी जीव उसे विकास के प्रारम्भिक चरण में ही सफाचट कर डाले।
कैलीमा तितली, फ्लावर फ्लाई तथा कुछ रंगीन सर्पों में अपने रंग की प्रकृति में छुप जाने की प्रवृत्ति होती हैं। कुछ जीव तो इस कार्य विधिवत मन चाहा रंग भी उत्पन्न कर शरीर की स्थिति के अनुरूप रंगीन वातावरण में डालने तक की क्षमता रखते हैं।
कुछ जीवों में गोल छल्ले की आकृति में, कुछ में ढेले की शक्ल में लुढ़क जाने की प्रवृत्ति होती है इनमें घिनहरी (गिंजाई) काँतर कंगारू वर्ग का आर्मडिल्लों आदि प्रमुख होते हैं। भूरे बटेर में भी छिपने की ऐसी प्रवृत्ति पाई जाती है। कई बार खोजी इनके आस−पास ही चक्कर काटते रहते हैं और यह साँस साधे मिट्टी बने पड़े रहते हैं किन्तु वहाँ से जरा-सा हटे कि फुर्र से उड़कर भाग जाते हैं।
फार्म−4
प्रकाशन का स्थान − मथुरा
प्रकाशन का अवधि क्रम − मासिक
मुद्रक का नाम − मृत्युंजय शर्मा
राष्ट्रीयता − भारतीय
पता − जन−जागरण प्रेस, मथुरा।
प्रकाशक का नाम − मृत्युंजय शर्मा
राष्ट्रीयता − भारतीय
सम्पादक का नाम − भगवती देवी शर्मा
राष्ट्रीयता − भारतीय
पता − अखण्ड−ज्योति संस्थान−मथुरा।
स्वत्वाधिकारी − मृत्युंजय शर्मा
पता − अखण्ड−ज्योति संस्थान, मथुरा।
मैं, मृत्युंजय शर्मा यह घोषित करता हूँ कि ऊपर दिये गये सब विवरण मेरी अधिकतम जानकारी और विश्वास के अनुसार सत्य हैं।
−हस्ताक्षर, मृत्युंजय शर्मा
मनुष्य का जीवन कलाओं को समर्पित रहे तो उसे सर्वत्र आनन्द आमोद छलकता दिखाई देता रह सकता है किन्तु यदि वह इन्हें भी स्वार्थ साधन, मिथ्या, प्रदर्शन के लिये अपनाता है तो इससे बढ़कर दुर्बुद्धि और क्या हो सकती है।
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मनुष्य अनुचित सोचते और अकर्म करते हैं तो सन्तुलन बिगड़ता है। व्यक्ति दुःख पाता है और समाज संकटग्रस्त होता है। स्थिति उसी प्रकार चलती रहे तो महाविनाश के गर्त में गिरना पड़ेगा। मानवी प्रयास जब अवांछनीयता को रोकने में उपेक्षा बरतते हैं अथवा अपने को असमर्थ समझते हैं तो महाकाल को स्थिति अपने हाथ में लेनी पड़ती है। सृष्टा को अपना यह विश्व उद्यान दुष्प्रवृत्तियों के कुचक्र में फँसकर नष्ट हो जाने देना स्वीकार नहीं। वे भूलोक की अपनी अनुपम कलाकृति को विनाश के गर्त में गिरने देता नहीं चाहते। अस्तु समय रहते सन्तुलन बनाने वाली शक्तियों का अवतरण होता है। वे जागृत आत्माओं के अन्तःकरणों में अपनी प्रकाश किरणें फेंकती हैं। उन्हें कठपुतली जैसा माध्यम बनाकर परिवर्तन का तूफान उत्पन्न करती है।
स्थिति की विषमता को सम्भालने के लिए भगवान इसी रूप में अवतार लेते हैं। युगान्तर चेतना के रूप में उसका अवतरण होता है। उसे कार्यान्वित करने में जो अग्रिम पंक्ति में खड़े होते हैं वे श्रेय पाते हैं। किन्तु उसमें योगदान असंख्यों का होता है। राम के रीछ बानर−कृष्ण के ग्वाल−बाल, बुद्ध के परिव्राजक−गान्धी के सत्याग्रही अवतार भूमिका के उपकरण कहे जा सकते हैं। श्रेय किसको मिला यह संयोग की बात है। परिवर्तन विचारधारा के तूफानी प्रवाह के रूप में आता है और असंख्यों को अपने प्रभाव से उद्वेलित करता है। जागृत आत्माओं को ऐसे अवसरों पर विशेष भूमिका निभानी पड़ती है। जो युग धर्म को समझते हैं−युग देवता का आह्वान सुनते हैं वे धन्य बनते हैं। उन दिनों जो असमंजस में पड़े रहते हैं उन्हें समय को न पहचान सकने की सदा पश्चात्ताप की आत्म प्रताड़ना ही सहन करनी पड़ती हैं।
अरुणोदय का पूर्वाभास पाकर मुर्गा पहले बाँग लगाता है, इस जागरुकता ने उसे प्रख्यात कर दिया। देर से तो सभी पक्षी जगते हैं, पर वे वैसी ख्याति नहीं पाते। उगते सूर्य को नमस्कार किया जाता है पीछे तो वह दिन भर ही बना सकता है। शुक्ल पक्ष में सर्वप्रथम निकलने वाले दौज के चन्द्रमा का दर्शन करने के लिए सब आतुर रहते हैं। पीछे तो वह महीने भर घटता बढ़ता बना ही रहता है। जन्म का पहला दिन स्मरणीय रहता है ऐसे तो जिन्दगी में हजारों दिन आते और चले जाते हैं। पर्वत चोटियों के बारे में प्रथम शोध करने वालों के नाम पर एवरेस्ट आदि शिखरों के नाम रखे गये हैं। नेपच्यून, प्लूटो आदि के नाम भी उनके शोधकर्त्ताओं के नाम पर रखे गये हैं। पीछे तो उनके शोध करने वाले अनेक पैदा होते रहे हैं। फोटो में साफ तस्वीर उनकी आती है जो ग्रुप की अगली पंक्ति में खड़े होते हैं। साहस उन्हीं का सराहनीय है जो दूसरों की प्रतीक्षा न करके अपनी साहसिकता का परिचय देते हैं।
युग परिवर्तन अगले दिनों की सुनिश्चित सच्चाई है। ईश्वरीय प्रयोजन पूरे होने हैं। गीता में भगवान अर्जुन को यही समझाते हैं कि यह कौरव दल तो मरा रखा है। तेरे पीछे हटने पर भी वह दूसरी प्रकार से मरेगा। सुनिश्चित सफलता के श्रेय को उपलब्ध करना ही बुद्धिमत्ता है। युग देवता की पुकार सुनने, माँग पूरी करने और प्रेरणा का अनुसरण करने के लिए तो देर सवेर में अभी को हाथ उठाने और पैर बढ़ाने पड़ेंगे। सराहना उनकी है जो समय रहते चेतते हैं। स्वतन्त्रता संग्राम में थोड़े−थोड़े दिन के लिए जेल गये लोग शासन सम्भालते और पेन्शन पाते देखे जा सकते हैं। जो उस समय चूक गये उनके लिए वह संयोग कभी भी आ नहीं सका। जागृत आत्माओं को युग देवता ने पुकारा है और कहा है वे अग्रिम पंक्ति में खड़े हों। हनुमान, अंगद की−भीम, अर्जुन की भूमिका सम्पन्न करें। जो स्वीकार करेंगे वे न भौतिक दृष्टि से घाटे में रहेंगे न आत्मिक दृष्टि से। जो असमंजस में पड़े रहेंगे उन्हें पश्चात्ताप ही पल्ले बाँध कर प्रयास करना पड़ेगा।
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आत्मघाती लोक प्रवाह को रोकने और विश्व उद्यान को हरा−भरा बनाये रहने के दैवी प्रयास इन दिनों पूरी तरह सक्रिय है। सृष्टि का सन्तुलन बनाये रहने की “यदा−यदा हि धर्मस्य।” वाली प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए जो युग परिवर्तन प्रक्रिया इन दिनों चल रही है उसके पीछे कई कठपुतलियाँ अपना अभिनय करती दिखाई पड़ती है, पर उनके मूल में सृष्टा का सूत्र संचालन ही काम करता है। वर्षा ऋतु आने पर घास की सूखी हुई जड़ें हरी−भरी हो जाती हैं। जागृत आत्माओं का इन दिनों नव−निर्माण के लिए भाव भरे अनुदान प्रस्तुत करना तत्वतः महाकाल की प्रबल प्रेरणा के अतिरिक्त और कुछ है नहीं।
युग निर्माण परिवार के सदस्यों को इस सन्दर्भ में जो भूमिका निभाने का अवसर मिल रहा है उसे उनके सौभाग्य और ईश्वरीय अनुग्रह का समन्वय ही कहना चाहिए। रीछ−बानर, गिद्ध−गिलहरी, ग्वाल−बाल भी कभी इसी तरह भाग्यशाली बन गये थे जिस तरह साधन रहित होते हुए भी नव निर्माण के लिए भाव भरे अनुदान प्रस्तुत करके इस छोटे से परिवार के परिजन बन रहे हैं।
युग परिवर्तन का उद्घोष कभी अतिवाद कहा जाता था। मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की बात कभी दिवास्वप्न बताई और उपहासास्पद समझी जाती थी, पर अब वैसी स्थिति नहीं रही। विगत तीस वर्षों में नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति की दिशा में जो प्रगति हुई है−व्यक्ति, परिवार और समाज निर्माण की दिशा में जो ठोस कार्य हुआ है उसे देखते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि आँधी का प्रवाह ही प्रमुख हैं उसमें उड़कर आसमान तक पहुँचने वाले तिनके तो अनायास ही श्रेय प्राप्त कर रहे हैं।
सृजन शिल्पियों का दल क्रमशः बढ़ता ही जा रहा है। समय की पुकार पर जागृत आत्माएँ सदा ही आगे आती रही हैं। आज भी वही हो रहा है। उद्बोधन, उद्घोष, आह्वान, एकत्रीकरण, मार्गदर्शन जैसे सामान्य उत्तरदायित्व ही इस मिशन के सूत्र संचालकों को निवाहने पड़ रहे हैं। शेष कार्य दिव्य जगत से अवतरित होने वाली युगान्तरीय चेतना अपना काम आप ही सम्भाल रही है। जो इस तथ्य को जानते हैं उन्हें प्रस्तुत सफलताओं और भावी सम्भावनाओं के सन्दर्भ में तनिक भी आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं होती। असमंजस तो उनके सामने आता है जो इसे व्यक्ति विशेष का प्रयास एवं साधना रहित परिस्थितियों में विकास विस्तार की संगति बिठाने का प्रयत्न करते हैं।
युग शिल्पियों को अपने सौभाग्य को सार्थक बनाने का जो अवसर मिला है उसे अधिक कलात्मक बनाने की खरादने और चमकाने की भूमिका शान्ति कुञ्ज के कन्धे पर आई है। पिछले पाँच वर्ष से उसी प्रक्रिया के अन्तर्गत यहाँ शिक्षण सत्रों की शृंखला चल रही है। यों सामने प्रस्तुत प्रयोजन अत्यंत महत्वपूर्ण और अत्यन्त विशाल है। उसके शिल्पियों का शिक्षण डॉक्टर, प्रोफेसर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, कलाकार आदि से कम समय, श्रम और साधन साध्य नहीं है, किन्तु आपत्तिकाल में नई भर्ती को थोड़ी−सी जानकारी देकर ही युद्ध मोर्चे पर लड़ने के लिए भेज दिया जाता है उसी प्रकार की स्वल्पकालीन सत्र शृंखला की व्यवस्था बनानी पड़ी। शिक्षार्थियों को बहुलता, समय और स्थान की कमी का सन्तुलन स्वल्प शिक्षण के अतिरिक्त और किसी प्रकार बैठता ही नहीं। पिछले दिनों वही होता रहा है। गत पाँच वर्षों से पुरुषों के लिए जीवन साधना सत्र और स्त्रियों के लिए कन्या सत्र और महिला सत्र चलते रहे हैं। उनमें सम्मिलित होने वाले शिक्षार्थियों की संख्या और सफलता आश्चर्यजनक है।
समय की माँग ने इस प्रयास में कुछ विशेषताएँ जोड़ देने की आवश्यकता बताई है सो भी इस पुनर्गठन वर्ष से जुड़ रही हैं। युग सृजेताओं के शिक्षण में मात्र मार्गदर्शन परामर्श ही पर्याप्त नहीं। उनके परिपक्व होने के लिए अधिक समय की आवश्यकता है साथ ही ऐसे वातावरण का लाभ मिलना चाहिए जिसमें उनके व्यक्तित्व को प्रखर बनने के लिए उपयुक्त अवसर मिल सके। पिछले दिनों थोड़े−थोड़े दिन के सत्र होते थे और समय पूरा होते ही शिक्षार्थी को विदा होना पड़ता था। जबकि शिक्षण के रूप में मिले हुए भोजन को पचने के लिए−मार्गदर्शन की संस्कार रूप में परिणित होने के लिए−प्रेरणाप्रद वातावरण में अधिक समय तक ठहरने की सुविधा मिलनी चाहिए थी। अब उस अभाव की पूर्ति होने जा रही है और ऐसा साधन बन रहा है जिसमें युग निर्माण की ऐतिहासिक भूमिका निभा सकने के लिए प्रतिभाओं को परिपक्व होने के लिए कुछ अधिक समय मिलना सम्भव हो सकेगा। इस पुनर्गठन वर्ष में− प्रस्तुत बसन्त पर्व से इस प्रकार की सुविधा का नवीन शुभारम्भ हुआ है।
ब्रह्म वर्चस् आरण्यक बनकर लगभग तैयार है। उसमें प्रथम सत्र अप्रैल, मई दो मास का होगा। पूर्व घोषणा के अनुसार सन् 78 में दो सत्र आगे और होने हैं तक अगस्त, सितम्बर में। दूसरा नवम्बर, दिसम्बर में। स्पष्ट है कि जिस उद्देश्य के लिए यह सत्र लगाये जा रहे हैं उसके लिए यह अवधि नितान्त स्वल्प है। माँग यह थी कि अधिक समय रुकने की सुविधा मिले ताकि साधना का चुचुडडडड प्रवेश होकर हीन रह जाय, वरन् उसे उपयुक्त वातावरण, उपयुक्त, मार्गदर्शन, उपयुक्त अनुदान के सहारे अधिक परिपक्व होने का अवसर मिले। माँग उचित और आवश्यक समझी गई। तदनुसार नई व्यवस्था यह बनी है कि दो−दो महीने के ब्रह्म वर्चस् सत्र तो यथा समय चलते ही रहेंगे। व्यस्त लोगों को थोड़ा−थोड़ा करके प्रकाश पाते रहने का लाभ उनसे भी मिलता रहेगा, पर जो लोग अधिक समय ठहरना चाहेंगे उनके लिए व्यवस्था बनी रहेगी।
ब्रह्म वर्चस् प्रशिक्षण वस्तुतः वानप्रस्थ साधना से संगति रखता है। दो−दो महीने के शिक्षार्थी भी उतने समय तक अपने को कनिष्ठ वानप्रस्थ ही अनुभव करेंगे और उसी स्तर की साधना तथा शिक्षा का सुअवसर प्राप्त करेंगे। वरिष्ठ वानप्रस्थ वे है जो पारिवारिक उत्तर−दायित्वों से निवृत्त होकर जीवन के उत्तरार्ध को परमार्थ साधना में लगाना चाहते हैं। उनके लिए ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में समुचित सुविधा रह सके ऐसा प्रबन्ध किया गया है। वानप्रस्थ में पत्नी समेत साधना करने की भी छूट है। साधक अपना भोजन आप बना सकें ऐसी सुविधा भी बनाई गई है। फिलहाल इस प्रकार के लोगों के लिए 16 कक्ष अलग से बने हैं जिनमें पति−पत्नी सुविधा पूर्वक रहकर आत्म−कल्याण की साधना कर सकें।
युग शिल्पियों के लिए एक दूसरी सुविधा इन्हीं दिनों ओर बनी हैं। उनके लिए एक नया नगर बसाये जाने का कार्य इसी बसन्त पर्व से आरम्भ हो गया है। नाम रखा गया है−गायत्री नगर। यह शान्ति−कुञ्ज से बिलकुल सटा हुआ है। दूसरे शब्दों में इसे वर्तमान आश्रम का ही क्षेत्र विस्तार कहना चाहिए। ठीक पीछे वाली 25 बीघे जमीन अभी−अभी खरीदी गई है उसका शिलान्यास बसन्त पर्व के दिन कर दिया गया है। उसका निर्माण कार्य भी यह अंक पाठकों के हाथ में पहुँचते−पहुँचते आरम्भ हो जायगा। योजना की दृष्टि से यह जमीन कम पड़ती है। अधिक प्राप्त करने के लिए साधन जुटाये जायेंगे।
गायत्री नगर में 100 क्वार्टर बनने जा रहे हैं। प्रत्येक क्वार्टर में दो कमरे−एक बरामदा−फ्लेस टट्टी−स्नान घर, रसोई, स्टोर, हैण्डपम्प एवं खुले आँगन की व्यवस्था रहेगी। इनमें एक छोटा परिवार सुविधापूर्वक रह सकेगा। सम्भवतः संकल्पित योजना लगभग एक वर्ष में पूरी भी हो जायगी और जिस प्रकार ब्रह्म वर्चस् का शिलान्यास गत बसन्त पर्व पर हुआ था और ठीक एक वर्ष में इस बसन्त को उसका उद्घाटन कार्यारम्भ हो गया। उसी प्रकार सन् 78 के बसन्त को गायत्री नगर भी पूर्ण हुआ और निवासियों से भरा−पूरा दिखाई पड़ने लगेगा।
गायत्री नगर बसाने के दो उद्देश्य हैं−
युग निर्माण की व्यापक आवश्यकताओं को देखते हुए चरित्र निष्ठ, प्रतिभावान, भावनाशील, क्रिया कुशल, आत्म−दानियों की आवश्यकता पड़ेगी। गत गुरु पूर्णिमा को ऐसी जागृत आत्माओं का आह्वान किया गया था। उस आमन्त्रण पर कितने ही आत्म−दानी शान्ति−कुञ्ज पहुँच चुके हैं और कितने ही आने की तैयारी में जुटे हुए हैं। इनमें से जो परिवार सहित आवेंगे उनके निवास का प्रबन्ध गायत्री नगर में रहेगा।
युग निर्माण परिवार के सभी सदस्य चाहते हैं कि उनके घरों की महिलाएँ परिवार निर्माण की प्रतिभा सम्पन्न हों और लोक मंगल के कार्यों में उनकी सहयोगिनी बने, इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए शांति−कुंज में दो−दो महीने के महिला−सत्र चलते थे, पर उसमें बच्चों समेत न आने का प्रतिबन्ध होने से इच्छुकों को मन मारकर रहना पड़ता था। स्थान की कमी और शिक्षार्थियों की बहुलता को देखते हुए दो महीने से अधिक समय रोकना भी कठिन था। जबकि व्यक्तियों को ढालने के लिए इतना समय बहुत ही कम पड़ता है। इस कठिनाई का निराकरण गायत्री नगर बस जाने से हो जायगा।
युग निर्माण परिवार की नींव, त्याग और तप पर रखी गयी है। इस तथ्य और गौरव को समझने वाले परिजनों में सांसारिक जीवन की सुविधाओं के प्रति न तो आकर्षण रहना उचित हैं और न उनके लिए आग्रह। किन्तु मिशन का कार्य आगे बढ़ने के लिए अपनी क्षमताओं में निखार लाने की आकांक्षा को तो अस्वीकार नहीं ही किया जा सकता। सचमुच ही जिनकी पारिवारिक स्थिति ऐसी नहीं है कि बच्चों को छोड़कर केन्द्रीय प्रशिक्षण एवं वातावरण का लाभ उठाने के लिए पहुँच सकें, उनकी आवश्यकता को समझना तथा उसकी पूर्ति करना भी तो परिवार प्रमुख का उत्तरदायित्व है। इस नवीन चरण में इसी महती आवश्यकता की पूर्ति का श्रीगणेश किया जा रहा है।
परिजनों के घरों की महिलाएँ भविष्य में बच्चों समेत भी आ सकेंगी और दो महीने के स्थान पर अधिक समय ही ठहर सकेंगी। न केवल महिलाओं का वरन् बच्चों के शिक्षण का क्रम भी साथ−साथ स्वतन्त्र रूप से चलता रहेगा। यों शान्ति−कुञ्ज का भोजनालय अच्छा और सस्ता होने की दृष्टि से अनुपम समझा जाता है, फिर भी बनाने का श्रम उसमें जुड़ जाने से कुछ तो महंगा पड़ता ही है। अपने हाथ बनाने में अपनी रुचि की भावना सकता है और सस्ता भी रहता है। सहकारी स्टोर भी नगर में रहने से लागत मूल्य पर दैनिक आवश्यकता की सभी वस्तुएँ मिलती रहेंगी। इन सुविधाओं के कारण निर्धन लोग भी अपनी महिलाओं को शिक्षण के लिए भेज सकेंगे। मार्ग व्यय ही अतिरिक्त है शेष खर्च तो वही पड़ेगा जो घर में पड़ता है।
गायत्री नगर के 100 क्वार्टरों में आत्म−दानियों के परिवार स्थायी रूप से बसेंगे और महिला सत्रों में आने वाली महिलाएँ शिक्षण काल तक वहाँ रहा करेगी।
ब्रह्म वर्चस् में वानप्रस्थ आश्रम जैसी अधिक समय निवास करने की नई व्यवस्था बढ़ी है। गायत्री नगर की सुविधा से आत्म−दानियों को परिवार समेत यहाँ बसने में और महिला सत्रों में आने वाली महिलाओं को बच्चों समेत आने तथा अधिक समय ठहरने की सुविधाएँ बढ़ जाने से युग शिल्पियों में अधिक प्रखरता उत्पन्न हो सकना सम्भव बन सकेगा। इस उपलब्धि को हर दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण और उत्साहवर्धक ही कहा जायगा। इस आधार पर नव युग के अनुरूप प्रतिभाएं ढालने में कितनी सफलता मिलती है इसे कुछ ही समय में प्रत्यक्ष देखा जा सकेगा।
इस अभिनव सुविधा की प्रमुख विशेषता है−ऐसे प्रेरणाप्रद वातावरण का निर्माण जिसमें अधिक समय ठहरने पर बिना किसी प्रशिक्षण के भी व्यक्ति श्रेष्ठता के ढाँचे में ढलता हुआ चला जाय। फिर उपयुक्त प्रशिक्षण मार्गदर्शन, अनुदान उपलब्ध होने लगे तो व्यक्तियों के परिष्कृत होने से निस्सन्देह असाधारण सफलता मिल सकती है। पुनर्गठन वर्ष की इन नूतन उपलब्धियों के पीछे उज्ज्वल भविष्य की झाँकी हर किसी को हो सकती है।
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युग शिल्पियों में वाक् पटुता और क्रिया कुशलता का होना आवश्यक है। किन्तु उसमें भी अधिक महत्वपूर्ण है उसका परिष्कृत व्यक्तित्व। अपना परिवर्तन कर सकने वाला ही दूसरों में परिवर्तन कर पाता है। व्यक्ति निर्माण चाहे अपना हो या पराया मात्र प्रशिक्षण चाहिए। इसी के अभाव में न लोक सेवा में प्रखरता उत्पन्न होती है और न उसके प्रयत्नों को सफलता मिलती है। व्यक्तित्वों को ढालना ही युग परिवर्तन का प्रमुख आधार है। जनमानस के परिष्कार से ही नव−निर्माण का उद्देश्य पूरा होगा। इस परिष्कार में प्रशिक्षण के साथ−साथ वातावरण की व्यवस्था भी बननी चाहिए। समाज में परिवर्तन के लिए उत्साह भरा वातावरण पैदा किया जाय और युग शिक्षकों को ऐसी परिस्थितियों में रहने का अवसर दिया जाय जहाँ वे लोक सेवा का तत्वदर्शन एवं क्रिया कौशल ही सीख कर छुट्टी न पालें वरन् अपने व्यक्तित्व में परिपक्वता उत्पन्न करने की भी सफलता प्राप्त कर लें।
युग शिल्पियों को कार्यक्षेत्र में उतरने से पहले बहुत समय तक ऐसे वातावरण में रहना चाहिए जिससे उनके संग्रहीत कुसंस्कारों का निराकरण और अभीष्ट परिपक्वता का समुचित सम्वर्धन हो सके। ऐसे वातावरण का परिपोषण न मिलने से आदर्शवादिता कभी−कभी भावुकता की तरह सवार हो तो जाती है, पर नशा उतरते ही उसके समाप्त होने में भी देर नहीं लगती। कच्ची ईंटें देर तक भट्टे की गर्मी में पकते रहने के उपरान्त ही सुदृढ़ बनती है, यह कार्य तुर्त-फुर्त नहीं हो सकता। विशेषताएँ विशेष वातावरण में नियम समय तक रहने से ही पैदा होती देखी जाती हैं।
आज का चिकित्सा विज्ञान अपने आप में पर्याप्त विकसित हो चुका है, किन्तु वह भी वातावरण का महत्व स्वीकार करता है। क्षय रोग की चिकित्सा का प्रबन्ध यों सभी अस्पतालों में है किन्तु भुवाली जैसे उपयुक्त जलवायु में बने अस्पतालों का चिकित्सा परिणाम अन्य स्थानों की तुलना में कहीं अधिक उत्साह वर्धक रहता है। इसमें चिकित्सकों की योग्यता एवं औषधियों की विशेषता नहीं वरन् उस क्षेत्र का वातावरण ही आधार पर भूत कारण होता है। ऐसे स्थानों पर सहज स्वभाव रहने से भी स्वास्थ्य सुधारता है, बीमारियाँ अपने आप भी अच्छी हो जाती हैं।
मनुष्यों के शरीरों में ही नहीं उनके स्वभावों में भी क्षेत्रीय विशेषता के अनुरूप अन्तर रहते हैं। संस्कृतियाँ दो आधारों पर बनती हैं एक तो उस क्षेत्र के निवासियों का चिन्तन एवं रहन−सहन, दूसरे उस क्षेत्र की प्रकृतिगत भिन्नता विशेषता इन दोनों प्रभावों के कारण उस क्षेत्र के निवासियों का एक विशेष ढर्रा बन जाता है और वह गुण, कर्म, स्वभाव में गहराई तक अपनी जड़ जमा लेता है। संस्कृतियों को भिन्नताओं के यही दो प्रमुख आधार है। यों मनुष्य स्वतन्त्र और समर्थ है वह अपनी संकल्प शक्ति के बल पर परम्परागत सभी दबावों को बदल सकने में सैद्धान्तिक दृष्टि से पूर्णतया सक्षम है पर व्यवहार में होता यही है कि वातावरण अपने प्रभाव से उस क्षेत्र के मनुष्यों को ढालता चला जाता है। व्यक्ति की मौलिक विशेषता को मान्यता देते हुए भी यह स्वीकार करना ही होगा कि जन समाज की बहु संख्या विचारपूर्ण नहीं वातावरण के प्रभाव जीवनयापन करती है। व्यापक क्रान्तियाँ कुछ व्यक्तियों के बदलने से सम्पन्न नहीं होती वरन् वातावरण में ऐसा परिवर्तन लाना पड़ता है जिसके प्रभाव से जन साधारण को परिष्कृत ढंग से सोचने और उपयोगी क्रिया कलाप अपनाने का साहस एवं अवसर उपलब्ध हो सके।
जातियों और वंशों में कई प्रकार की अपनी−अपनी विशेषताएं पाई जाती हैं। ब्राह्मण में धार्मिकता, क्षत्रिय में अक्खड़ता, वैश्य में अर्थ दृष्टि, शिल्पकारों में क्रिया कुशलता जैसी विशेषताएँ दूसरों की अपेक्षा कुछ अधिक मात्रा में पाई जाती है। कायस्थ समाज में शिक्षा का बाहुल्य रहेगा। पिछड़े वर्गों में प्रायः अस्वच्छता, अशिष्टता और अस्त−व्यस्तता सर्वत्र पाई जायगी। कुछ में चोरी उठाईगीरी की आदत जातीय विशेषता के रूप में मिली होती है। कुछ कायरता और बेवकूफी के लिए बदनाम है। इनके कारणों की खोज करने पर एक यही तथ्य सामने आता है कि अमुक वर्ग के व्यक्तियों को अमुक प्रकार के वातावरण में रहने का अवसर मिलता है जिससे उसी के अनुरूप विशेषताएँ उनमें विकसित हो जाती हैं। वातावरण प्रयास पूर्वक बनाया गया था काल प्रभाव से संयोगवश बना, यह बात भिन्न है, किन्तु उसके प्रभाव का महत्व तो हर स्थिति में स्वीकार करना ही पड़ता है।
किसी नवजात बालक को अपने परम्परागत वातावरण से भिन्न प्रकार की परिस्थितियों में रखा जाय तो वह उस बदले हुए वातावरण से ही पला हुआ होगा उसमें पूर्वजों की विशेषताओं का वंशानुक्रम जितना थोड़ा−सा ही प्रभाव रह जायगा। शेष सब कुछ बदला हुआ ही होगा। प्राचीन काल में जाति परिवर्तन के अनेक उदाहरण इतिहास पुराणों में भरे पड़े हैं। इसका कारण जन्म क्षेत्र की अपेक्षा कर्म क्षेत्र में भिन्नता उत्पन्न हो जाना ही रहा है। परिस्थितियों का प्रभाव बालकपन में ही नहीं बड़ी आयु में भी पड़ता है लोग मानसिक काया−कल्प करते−कुछ से कुछ बनते देखे गये हैं। इस परिवर्तन में वातावरण का दबाव ही प्रधान रूप से काम करता है।
उत्तर प्रदेश के आगरा जिले में एक तीन वर्ष का बालक शिकारियों ने भेड़िये की माँद से बरामद किया था। भेड़िये उसे कहीं से उठा लाये थे। संयोगवश मादा ने उसे अपना बच्चा मानकर दूध पिलाना आरम्भ कर दिया और पाल लिया। शिकारियों ने भेड़ियों को मारकर जब इस मनुष्य बालक को पकड़ा तो उसमें सारी आदतें भेड़ियों जैसी थी। चार पैर से चलना, कच्चा मांस खाना, वैसा ही बोलना तथा अन्य आदतों में भेड़ियों का अनुकरण करना उसका स्वभाव बन चुका था। इस बालक को लखनऊ मेडिकल कालेज में सुधारने के लिए रखा गया। वातावरण के प्रभाव से मनुष्य कैसे भेड़ियों जैसी जीवन चर्या का आदी हो गया। यह देखने को भारी संख्या में देश-विदेश के व्यक्ति वहाँ पहुँचते रहे।
वनवासी जन−जातियों में चित्र−विचित्र रिवाज पाये जाते हैं। उनके स्वभाव और अभ्यास भी अपने ढंग के होते हैं। सुधारकों के प्रयास उनमें परिवर्तन लाने के होते हैं पर वैसा कुछ अधिक प्रभाव हो नहीं पाता क्योंकि उनके चारों ओर घिरा हुआ वातावरण उन्हें यत्किंचित् सुधार स्वीकार करने की ही छूट देता है। परिवर्तन के लिए वातावरण बदलना आवश्यक है। बहुत से अफ्रीकी नीग्रो बहुत समय से अमेरिका में बस गये हैं। उनकी और उनके अफ्रीकी वंशधरों की आकृति में तो थोड़ा-सा ही फर्क पड़ा है, पर प्रकृति में भारी परिवर्तन आ गया है। अमेरिकी नीग्रो प्रायः अमरीकी गोरों के स्तर का ही जीवन यापन करते हैं। उत्तरी ध्रुव के एस्किमो लोगों में से बहुत से कनाडा में आ बसे हैं। उस वर्ग के मूल निवासियों और कनाडी एस्किमो वर्ग में आश्चर्यजनक अन्तर आ गया है। इसी प्रकार अन्यान्य देशों में जा बसने वाले अपने मूल देश की अपेक्षा नई परिस्थितियों में नये ढंग में ढलते बदलते देखे जाते हैं। वातावरण के प्रभाव से बचे रहना आग्रहशील लोगों के लिए ही सम्भव है। सामान्य लोग तो परिस्थितियों के अनुरूप ढलते बदलते चले जाते हैं।
वातावरण का प्रभाव मनुष्य पर पड़ता है यह एक तथ्य है। मनुष्य में जितनी विचार क्षमता है उससे अधिक उसकी अनुकरण प्रवृत्ति प्रबल है। विचारपूर्वक जो होता है उससे अधिक क्रिया कलाप देखा देखी चलते हैं। कई बार तो ऐसा भी होता है कि विचारशील जिसे अनावश्यक एवं अवांछनीय समझते हैं उसे भी इसलिए करना पड़ता है ताकि दूसरे कर रहे हैं। कई उपयोगी कार्य इसलिए सम्भव नहीं हो पाते कि उन्हें दूसरे लोग नहीं करते तो हम क्यों करें? प्रथा परम्पराओं में अनेक ऐसी हैं, जिनको बुद्धिपूर्वक स्वीकार न करने वाले भी इसलिए अपनाये रहते हैं कि दूसरे लोग वैसा करते हैं तो हम उनका अनुकरण क्यों न करें? इसे वातावरण का प्रभाव ही कहना चाहिए। नशेबाजी जैसे दुर्व्यसनों को लोग बुद्धिपूर्वक किसी लाभ हो पाने की सम्भावना से नहीं करते वरन् देखा-देखी ही सीखते हैं बच्चों पर तो पूरी तरह इसी प्रवृत्ति का साम्राज्य छाया रहता है। विवेक बुद्धि का उदय तो बहुत पीछे होता है, पहले तो अनुकरण की प्रवृत्ति ही बढ़ी−चढ़ी रहती है। परिपक्व अवस्था आने पर भी उस मूल प्रवृत्ति का असर बना ही रहता है। धर्म सम्प्रदायों के प्रथा प्रचलन−भाषा, संस्कृति आदि की कट्टरता में विवेक का दबाव नहीं, सम्बद्ध वातावरण का प्रभाव ही प्रधान रूप से काम करता है।
व्यक्ति जैसा कुछ है उसके निर्माण में अधिकांश योग उसके वातावरण का ही रहा होता है। पिछड़े और समुन्नत वर्गों के व्यक्तियों का गम्भीरतापूर्वक पर्यवेक्षण करने से सहज ही वह पता चलता है कि प्रकृति संरचना की दृष्टि से दोनों के शारीरिक मानसिक गठन में कोई विशेष अन्तर नहीं था, पर उनके बीच जो जमीन-आसमान जैसी भिन्नता पैदा हो गई उसका कारण मुख्यतया वह वातावरण ही था जिसमें इन्हें रहने का अवसर मिला। मनुष्य अपनी मौलिक क्षमताओं का उपयोग बहुधा वातावरण से प्रभावित होकर उसी के अनुरूप करने लगता है। युग निर्माण के लिए व्यक्ति निर्माण आवश्यक है। व्यक्ति निर्माण के लिए जो अनेक उपाय किये जाने हैं उनमें प्रमुखता ऐसे वातावरण के निर्माण को भी देनी पड़ेगी जिसमें रहकर व्यक्ति अनायास ही ढलता बदलता चला जाय। प्रशिक्षण से व्यक्ति बदलता है यह ठीक है पर यह भी निश्चित है कि इतने से ही अभीष्ट परिणाम नहीं निकलता। उस प्रशिक्षण को फलित बना सकने वाला वातावरण भी चाहिए।
सामान्य स्तर पर कोई कार्य सामान्य वातावरण में भी किया जा सकता है। किन्तु विशिष्ट स्तर का अथवा बड़े पैमाने पर काम करना हो तो उपयुक्त वातावरण का सहयोग भी लेना ही पड़ता है। अच्छा सूत कातने के लिए वातावरण में एक निश्चित मात्रा में नमी की आवश्यकता होती है। सामान्य स्तर पर चर्खों से सूत कातते समय न तो उसकी उतनी आवश्यकता अनुभव की जाती है, और न हर जगह वह स्थिति पैदा करना ही सम्भव है; किन्तु कताई मिलों में जहाँ महीन किस्म का सूत बड़ी तेजी से काता जाता है, वहाँ वायु में निश्चित आद्रता पैदा करनी ही पड़ती है। जहाँ फोटो ग्राफिक फिल्में बनाई जाती है, उस फैक्ट्री में तापमान को एक निश्चित मर्यादा में ही रखना पड़ता है। यदि इसकी उपेक्षा की जाय तो सारे साधनों के होते हुए भी अच्छी फिल्में बनाना सम्भव नहीं हो सकता। विशेष औषधियों एवं रासायनिक पदार्थों के निर्माण में भी इसी प्रकार विशेष परिस्थितियाँ बनाकर रखी जाती हैं।
यह सभी उदाहरण ऐसे हैं जिनमें चाहे जितनी तकनीकी सुविधा एवं कुशलता प्राप्त हो, फिर भी वातावरण का सहयोग लिए बिना वांछित प्रतिफल पाना सम्भव नहीं हैं। युग प्रवर्तक व्यक्तियों के निर्माण के लिए भी इस विधा को स्वीकार करना तथा अपनाना आवश्यक है इस अति महत्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति के लिए उच्च आदर्श, दृढ़ आस्था, प्रखर प्रेरणा, स्पष्ट मार्गदर्शन, दिव्य अनुदानों आदि को तकनीकी व्यवस्था के साथ साथ समुचित वातावरण की सुविधा जुटाना भी आवश्यक समझा गया है।
उपयुक्त वातावरण बनाने में विशेष पुरुषार्थ के साथ क्षेत्रीय विशेषताओं का तालमेल बिठाना भी लाभदायक होता है। जब किसी प्रयोगशाला, चिकित्सालय अथवा शोध संस्थान की योजना बनती है तो उसके लिए उपयुक्त स्थल भी खोजा जाता है। क्षेत्र विशेष की अपनी विशेषताएँ होती है। स्वास्थ्य के लिए कुछ पर्वतीय क्षेत्र (हिलस्टेशन) बहुत उपयोगी माने जाते हैं। भुसावल क्षेत्र में केले, नागपुर क्षेत्र में सन्तरे, मैसूर में चन्दन तथा आसाम में चाय आदि के उत्पादन की विशिष्ट क्षमता से सभी परिचित है। बंगाल एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्र में धान तो पंजाब हरियाणा में गेहूँ की पैदावार भरपूर होती है। तत्सम्बन्धी प्रयोग परीक्षण बीज विकास आदि के लिए वही क्षेत्र उपयुक्त माने जाते हैं।
निश्चित रूप से आध्यात्मिक प्रयोगों के लिए इस विश्व में भारत एवं भारत में हिमालय क्षेत्र को अद्वितीय गौरव प्राप्त है। अस्तु युग निर्माण योजना के सूत्र संचालकों ने युग सृजेताओं के व्यक्तियों की प्रयोगशाला टकसाल बनाने के लिए वही क्षेत्र चुना है। समुचित वातावरण के निर्माण हेतु अपनी शक्ति सामर्थ्य का प्रयोग इसी सनातन दिव्य संस्कार युक्त भूमि में करना उचित समझा।
हिमालय क्षेत्र ऋषि योगियों की भूमि मानी जाती है। उच्च आध्यात्मिक प्रयोग इसी क्षेत्र में अनादि काल से होते चले आ रहे हैं इसे ऋषि भूमि एवं देवभूमि की संज्ञा दी जाती है। पौराणिक मान्यताओं एवं तथ्य तर्कों के आधार पर भी यह क्षेत्र दिव्य स्थल सिद्ध होता है पृथ्वी पर देवभूमि के अस्तित्व की बात यदि आगे बढ़ानी हो तो उसका क्षेत्र हिमालय ही ठहरता है। कैलाश और मानसरोवर उसी में है। पाण्डवों के स्वर्गारोहण का स्थान बद्रीनाथ के समीप है। देवलोक के पर्वत का नाम सुमेरु है। यह सुमेरु बद्रीनाथ और गंगोत्री के बीच एक हिमाच्छादित शिखर है। स्वर्ग से गंगा का अवतरण धरती पर होने की कथा की संगति हिमालय के भूगोल के साथ ठीक प्रकार बैठ जाती है। “स्वर्ग में गंगा दूध की थी। धरती पर आई तो पहले शिवजी की जटाओं पर उतरी पीछे पानी बनकर बहने लगी।” इस वर्णन का सन्दर्भ इस प्रकार ठीक बैठ जाता है कि गोमुख से आगे शिवलिंग शिखर है। उसकी चोटी पर जमी हुई बर्फ जब पिघलती है तो गाढ़े बर्फीले पानी की धारा दूध की तरह ऊपर से नीचे उतरती दिखाई पड़ती है। चोटी के नीचे एक सरोवर है जिसे मानसरोवर कहा जाता है। शिवलिंग चोटी का दूसरा नाम कैलाश भी है। यही पानी गंगा ग्लेशियर में होता हुआ गोमुख पर निकलता है और धरती पर गंगा का प्रथम दर्शन होता है भागीरथ ने जिस शिला पर खड़े होकर तप किया था वह भी गंगोत्री क्षेत्र में ही है। गोमुखी से ऊपर नन्दन वन है। नन्दन वन देवताओं का उद्यान कहा गया है। इस क्षेत्र में बड़े वृक्ष तो नहीं है, पर अगणित प्रकार के चित्र−विचित्र फूलों की संख्या और भिन्नता इतनी अधिक है कि वैसा प्राकृतिक पुष्प सौन्दर्य संसार भर में अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होता। फूलों की घाटी पुष्प अन्वेषियों का प्रमुख आकर्षण केन्द्र है। यह पट्टी गोमुख से ऊपर नन्दन वन के पठार तक चली गई है। इन संगतियों से भी स्वर्ग का अस्तित्व धरती पर खोजने वालों की आँखें हिमालय के ऊपरी क्षेत्र पर ही जा टिकती हैं।
हिमालय के उत्तराखण्ड क्षेत्र पूरा दौरा कर लेने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि पुराणों से वर्णित प्रायः सभी ऋषियों की तपोभूमि और क्रिया भूमि उत्तराखण्ड से ही सम्बन्धित रही है। उनके गुरुकुल और आवश्यक इसी क्षेत्र में थे। आत्म विज्ञान की शोध प्रयोगशालाएँ इसी प्रदेश में बिखरी हुई थी। तपश्चर्याएँ इसी अनुसंधान के लिए होती थीं। इसके लिए उपयुक्त स्थान और वातावरण तलाश करने पर इसी क्षेत्र को सर्वश्रेष्ठ पाया गया था। आत्म साधना के लिए शीत प्रधान क्षेत्र उपयुक्त बैठते हैं जलवायु की दृष्टि से वही असाधारण रूप से आरोग्यवर्धक भी है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक इस प्रदेश में जितनी उच्चस्तरीय साधनाएँ इस क्षेत्र में की हैं उसके कारण वहाँ के वातावरण में विशिष्ट अध्यात्म तत्वों की भरमार है।
इस गये गुजरे जमाने में भी उस क्षेत्र में सतयुगी वातावरण के दृश्य देखे जा सकते हैं और लगता है कि संव्याप्त कलुषित वातावरण से यह क्षेत्र अभी भी उतना प्रभावित नहीं हुआ है। पहाड़ी कुली तीर्थयात्रियों का सामान ढोते हैं। बिस्तर आदि लेकर कुली बहुत आगे निकल जाता है और यात्री घन्टों पीछे पहुँचते हैं। सारा सामान ठीक तरह पहुँचता है। चोरी उठाईगीरी की घटनाएँ सुनने में नहीं आतीं। उस क्षेत्र में रहने वालों के घरों में अभी भी ताले नहीं लगते। कुंडी बन्द करके सूना मकान छोड़ जाते हैं। चोरी की घटनाएँ प्रायः नहीं ही होतीं।
उत्तराखण्ड को साधना के सर्वथा उपयुक्त संस्कारवान देवभूमि समझ लेने के उपरान्त ही इसे सृजन सैनिकों के प्रशिक्षण के लिये उपयुक्त समझा गया और उसे एक छावनी के रूप में विकसित करने का निश्चय किया गया है अन्यत्र स्थानों में व्यापक परिश्रम से भी जो सत्परिणाम उपलब्ध होने असम्भव थे वह यहाँ अल्प प्रयास से सम्भव होंगे क्योंकि यहाँ के वातावरण में चिरकाल से आच्छादि ऋषियों के विचारों के संकल्प का लाभ साधकों को मिलेगा। शान्ति कुञ्ज, ब्रह्मवर्चस और गायत्री नगर का संगम तो उसे तीर्थराज ही बनाने जा रहा है। स्वर्गीय वातावरण के अतिरिक्त दिव्य चिन्तन और युगान्तर सत्ता के प्राणवान् सत्संग का लाभ जुड़ जाने से उसकी महत्ता बहुत अधिक बढ़ गई है। जागृत आत्माओं को इस वातावरण, इस तीर्थ के पर्व स्नान की तैयारी प्रारम्भ कर देनी चाहिये।
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यह सही है कि मनस्वी व्यक्ति वातावरण बनाते हैं, पर यह भी एक सत्य है कि वातावरण मनुष्यों को बनाता है। मनस्वी हर कोई नहीं होता। आत्म−निर्माण की क्षमता भगवान ने सबको दी है, पर उसका उपयोग कितने कर पाते हैं? अधिकांश को पानी के बहाव में−हवा के प्रवाह में बहते ही देखा जाता है। छुट−पुट घटनाएँ मनस्वी व्यक्तियों द्वारा प्रखरता प्रकट करने और प्रतिभा का परिचय देने की भी आती हैं। ऐसे लोग महामानव कहे जाते हैं। संसार उनसे प्रकाश ग्रहण करता है−प्रेरणा लेता है और नमन करता है। इतने पर भी जन−साधारण के लिए वैसा सम्भव नहीं होता कि मान्य आदर्शों के अनुरूप अपने आप को ढाले। प्रतिकूल वातावरण को चीरते हुए ऊँचा उठे। ऐसा तो अपनी प्रचण्ड शक्ति से पृथ्वी के वायु मण्डल को चीरते हुए अन्तरिक्षीय यात्रा पर निकलने वाले तेजस्वी राकेट ही कर पाते हैं। सर्वसाधारण को तो वातावरण ही कठपुतली की तरह नचाता और साँचे की तरह ढालता चला जाता है। वातावरण और व्यक्ति में किस की वरिष्ठता है और किसकी कनिष्ठता इसका सीधा उत्तर दे सकना कठिन है। मुर्गी में से अण्डा हुआ या अण्डे में से मुर्गी, इसका निर्णय कैसे हो? बीज से वृक्ष उपजा या वृक्ष से बीज उत्पन्न हुआ इसका क्या उत्तर दिया जाय? नर से नारी को उत्पन्न किया या नारी से पुरुष जन्मा। इसका सही निष्कर्ष निकालना शोधकर्त्ताओं तक के लिए कठिन है। दोनों ही पक्ष समान रूप से तर्क संगत है। व्यक्तियों से वातावरण और वातावरण से व्यक्तियों के बनने की बात भी समतुल्य और समकक्ष मानी जा सकती है। युग परिवर्तन के लिए परिष्कृत व्यक्तियों की नितान्त आवश्यकता है। इसके लिए उपयुक्त प्रशिक्षण की आवश्यकता सहज ही समझी जा सकती हैं। किन्तु यह भुला नहीं देना चाहिए कि उसी ढलाई के लिए उपयुक्त वातावरण की उपेक्षा नहीं की जा सकती।
ऐसा प्रभावशाली वातावरण जो व्यक्ति को ऊँचा उठाने और आगे बढ़ाने में समर्थ हो सकें, प्राणवान् व्यक्तित्वों की प्रचण्ड ऊर्जा से ही विनिर्मित होता है। प्राचीन काल में ऐसे सान्निध्य के लिए प्रत्येक विचारशील प्रयत्नशील रहता था और उसे लाभ को प्राप्त करने के लिए समय निकालने, खर्च करने एवं कष्ट सहने में भी संकोच नहीं करता था। प्राणवान व्यक्तियों के सम्पर्क में सुअवसर की अवधि तीर्थ निवास कही जाती थी। शान्ति कुञ्ज के साथ संलग्न दोनों अन्य आश्रम ब्रह्म वर्चस् और गायत्री नगर मिलकर गंगा, यमुना और सरस्वती का त्रिवेणी संगम बनते हैं। इस समन्वय को तात्विक दृष्टि से तीर्थ राज की ही समता दी जायगी।
सामान्य व्यक्तियों को परिष्कृत वातावरण में कुछ−कुछ समय तक रहने को प्राचीन काल में एक परम्परा प्रचलित थी, जिसे तीर्थ निवास कहते थे। कुछ समय तक लोग अपने परिवार सहित या अकेले-दुकेले जाकर रहा करते थे यह अवधि लम्बी नहीं होती थी तो भी उस स्वल्प काल में नये ढंग से सोचने नये ढंग का रहन−सहन अपनाने नई परिस्थितियों में रहकर नव जीवन के उपयुक्त उलट फेर करने की बात उतने ही समय में बहुत कुछ बन जाती थी।
अभी भी प्रयोग में त्रिवेणी तट पर लोग एक महीने या अधिक समय का ‘कल्पवास’ करते हैं। अपनी निजी झोंपड़ी बनाकर रहते हैं। कुम्भपर्व के अवसर पर भी इसी प्रकार की निवास व्यवस्थाएँ बनाकर लोग पहुँचते हैं। नासिक, उज्जैन, हरिद्वार, कुम्भ के पर्व प्रायः दो−दो महीने के होते हैं। उनमें साधु, सज्जन अपने−अपने परिकर के व्यक्तियों को बुलाकर एक जगह रखते हैं। उन्हें साधना कराते तथा सत्संग का लाभ पहुँचाते हैं।
तीर्थ यात्रा तो धर्म प्रचारक मण्डली द्वारा परिभ्रमण करते हुए जन−सम्पर्क के लिए सम्पन्न की जाती है। तीर्थ निवास इसके भिन्न है। उसमें सामयिक अवकाश निकाल कर थोड़े−थोड़े समय के लिए लोग वहाँ रहते हैं। प्राचीन काल के ऐसे अनेक उदाहरण कथा, पुराणों में भरे पड़े हैं, राजा दिलीप अपनी पत्नी समेत महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में जाते हैं और वहाँ रहकर बहुत समय तक गुरु की गौएं चराते हैं।
स्वास्थ्य लाभ के लिए उपयुक्त जलवायु के स्थानों में जाने और होने की चेष्टाएँ होती रहती हैं। बीमार पड़ने पर अस्पताल में भर्ती होने−इलाज कराने की आवश्यकता पड़ती है। तीर्थों का वातावरण किसी समय विशुद्ध रूप से मानसिक अस्पतालों जैसा−मनोवैज्ञानिक विद्यालयों जैसा था। वहाँ रहने वाले उस विशिष्टता सम्पन्न वातावरण में साँस लेते थे और सहज ही मानसिक स्वास्थ्य सम्वर्धन का लाभ उठाते थे। मनीषियों के आश्रमों की नैतिक, बौद्धिक एवं भावना स्तर पर छाई हुई विकृतियों के निराकरण के लिए उपयुक्त उपचार करने वाले अस्पतालों से ही तुलना की जाती है। प्रशिक्षण से परामर्श और उपदेश से भ्रान्तियों के निराकरण और उपयुक्त मार्गदर्शन का प्रकाश मिलता था। अन्तर्मन में जमी हुई दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन के लिए साधनाएँ कराई जाती थीं। उन दिनों तीर्थ निवासी आज की तरह निरुद्देश्य इधर−उधर भटकते नहीं फिरते थे। वहाँ जाने के ठहरने के पीछे एक अत्यन्त महत्वपूर्ण उद्देश्य रहता था। साधारणतया मानसिक स्वास्थ्य सम्वर्धन, मानसिक रुग्णता के निवारण से उसकी तुलना की जाती थी। निश्चय ही यह लाभ शारीरिक आरोग्य की तुलना में भी कहीं अधिक उच्चस्तरीय है फिर उस अवधि में सात्विक आहार−विहार व्रत उपवास एवं अन्य चिकित्सा उपचारों से स्वास्थ्य समस्याओं का समाधान भी साथ−साथ ही मिल जाता है। तीर्थ निवास को काया कल्प का नाम दिया जाता था। अभी भी प्रयोग में एक महीने के लिए त्रिवेणी तट पर रहने वाले कल्पवासी कहे जाते हैं। उस निवास का नाम ‘कल्प वास’ है। कल्पवास को काया−कल्प का प्रयोग उपचार कह सकते हैं। आज वह सब चिह्न पूजा मात्र ही रह गया है, पर प्राचीन काल में उसमें वास्तविकता थी। उन दिनों निवास मात्र ही सब कुछ नहीं था वरन् वहाँ स्वा−ध्यान, सत्संग, मनन चिन्तन एवं साधना अभ्यास का अवसर मिलता था। उसमें स्थिति के परिवर्तन का समुचित अवसर मिलता था। लोग जिस स्थिति में जाते थे उसकी तुलना में अपना बाहरी और भीतरी स्वरूप बहुत कुछ बदल कर ही आते थे।
आत्मिक परिष्कार तथा आत्मोत्कर्ष के लिए अध्यात्म क्षेत्र में अनेक विशिष्ट साधनात्मक प्रयोगों का प्रचलन रहा है। जप, तप, ध्यान तथा अन्य योग साधनाओं के विधि−विधान इसीलिए है। अध्ययन, सत्संग, मनन, चिन्ता भी इसी के अंग रहे हैं। तीर्थों के संस्कारित वातावरण में इन सभी का प्रभाव और लाभ बढ़ जाना स्वाभाविक हैं। प्रखर साधन और समुचित वातावरण का संयोग सोने में सुहाग की उक्ति चरितार्थ करता रहा है।
शान्ति कुञ्ज में चलने वाले दस−दस दिवसीय जीवन साधना सत्रों की तुलना प्राचीन काल की तीर्थ यात्रा एवं तीर्थ निवास प्रक्रिया के साथ करनी चाहिए। उन सत्रों में सभी शिक्षार्थियों को नौ दिन का एक गायत्री अनुष्ठान करना होता है। साथ में ब्रह्म वर्चस् साधना से सम्बन्धित विशिष्ठ ध्यान धारणा का अभ्यास कराया जाता है। सोऽहम् का हंस योग−खेचरी मुद्रा का सोम पान, त्राटक द्वारा तृतीय नेत्र उन्मीलन की तीन साधनाएँ जप और ध्यान के अतिरिक्त हैं। इस प्रकार इन छोटे साधना सत्रों में भी ब्रह्म वर्चस् की उच्चस्तरीय साधना का उतना अंश मिला दिया गया है जो आरम्भिक साधकों को ठीक प्रकार हजम हो सके।
यह साधनाएँ सामान्य रूप से गूढ़ मानी जाती हैं। सामान्य साधकों की गति उनमें होना कठिन माना जाता है। सामान्य दृष्टि से यह मान्यता गलत भी नहीं हैं। गायत्री का जप अनुष्ठान ही लोग असाधारण मानते हैं, फिर विशिष्ट योग साधनाओं का उसमें समावेश किया जाना अनोखा−सा लगता ही है। लोग समझते हैं कि इनकी मात्र जानकारी भर प्राप्त की जा सकती है, कुछ उल्लेखनीय लाभ पाना सामान्य व्यक्ति के लिए कठिन है। किन्तु अभ्यास तथा वातावरण के संयोग से अन्तःकरण को प्रभावित करने के विज्ञान की जानकारी जिन्हें हैं उनकी मान्यता भिन्न होती हैं।
साधना एवं तीर्थ वास के द्वारा अन्तःकरण को विशेष संस्कारों में रंगने की विशेष उद्देश्य ही सामने रहता था। जानकारियों का महत्व उस दृष्टि से उतना अधिक नहीं है। सिद्धान्तों की जानकारी तो सभी को जाती है, किन्तु अभ्यास तथा वातावरण के प्रभाव से बने हुए संस्कार अपना अलग ही महत्व रखते हैं। कुछ उदाहरणों से यह बात स्पष्ट रूप से समझ में आ सकती है।
पशु वध के सम्बन्ध में विवेक स्पष्ट रूप से निषेधात्मक निर्णय देता है। हिंसा पाप है, जीव हत्या मानवी सम्वेदनाओं का हनन करती है, मांसाहार मनुष्य का स्वभाविक आहार नहीं है। आदि के सन्दर्भ में अनेक तथ्य एवं तर्क प्रस्तुत किए जा सकते हैं। सहृदय व्यक्ति उसकी कल्पना भर से सिहर उठता है; किन्तु जिनमें पशुबलि के संस्कार होते हैं, वे उस जघन्य कृत्य को करते हुए इतने प्रसन्न होते हैं मानो देवताओं को तुष्ट करने के लिए इससे अधिक अच्छा ढंग और कोई नहीं है।
नर−नारी के पारस्परिक सम्बन्धों के बारे में भारत वासी बहुत सम्वेदनशील होते हैं। किसी की आबरू पर हाथ डालना, उसको तिलमिला देने, मारने मारने पर उतारू कर देने के लिए पर्याप्त है, किन्तु विदेशों में अभिभावक स्वतः अपनी युवा बेटियों को युवकों से सम्पर्क बनाने के लिए प्रोत्साहन देते हैं एवं सुविधाएँ प्रदान करते हैं। नशेबाजी नैतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से त्याज्य है, किन्तु जहाँ उसे देव पूजन का अंग माना जाता है वहाँ उसे प्रसाद मानकर ग्रहण करके लोग अपने को धन्य मानते हैं। सभा सोसाइटियों में विशिष्ट शिष्टाचार (एटीकेट) के रूप में प्रचलित सुरापान को लोग उत्साह पूर्वक अपनाते हैं।
इन सबके पीछे यह तथ्य कम महत्व रखता है कि यह सब कितने अंशों में उचित है अथवा कितना कठिन या आसान है। मुख्य आधार बन जाते हैं−तत्सम्बन्धी अन्तःकरण के लम्बे संस्कार तथा वातावरण में व्याप्त उत्साह उमंग। आध्यात्मिक उत्कर्ष की दिशा में भी यह तथ्य लागू होते हैं। संसार में रहकर आध्यात्मिक प्रगति बड़ी कठिन दुरूह लगती है, पर जागृत तीर्थों के विशिष्ट वातावरण में वही सहज स्वाभाविक लगने लगती है। दस दिवसीय शिविरों में सम्मिलित होने वाले विभिन्न प्रकृति के नये−नये व्यक्तियों को साधना क्षेत्र में तीव्र गति से आगे बढ़ते देखकर इस सिद्धान्त पर बरवश विश्वास करना पड़ता है।
तीर्थ स्थानों की विशिष्टता का एक पक्ष यह भी है कि उन क्षेत्रों में सम्पन्न हुई ऐतिहासिक सत्प्रवृत्तियों का वातावरण बहुत समय पीछे तक बना रहता है और वहाँ पहुँचने वाले उससे प्रभावित होते रहते हैं। हल्दी घाटी, चित्तौड़ का सती स्थल, जलियावाला बाग आदि स्थानों पर जो महान घटनाएँ घटीं उनका प्रभाव वहाँ पहुँचने पर पड़े बिना रह नहीं सकता। अयोध्या, मथुरा का महत्व राम और कृष्ण की लीला भूमि होने के कारण अभी तक बना हुआ है। अन्यान्य महामानवों से सम्बन्धित अनेक प्रेरणाप्रद तीर्थ जगह−जगह बने हुए हैं। वहाँ श्रद्धापूर्वक अनेक लोग पहुँचते हैं। भगवान बुद्ध के कार्यक्षेत्र में बने हुए स्मारकों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने संसार भर के बौद्ध आते हैं। काबा, यरुशलम आदि के सम्बन्ध में भी यही बात है यह सब इतिहास प्रसंग ही नहीं हैं। इसमें उन महामानवों, अवतारों के प्रचण्ड व्यक्तित्व अभी भी एक विशिष्ठ वातावरण के रूप में विद्यमान हैं।
शान्ति कुञ्ज एवं ब्रह्म वर्चस् क्षेत्र को युग परिवर्तन के लिए समुचित शक्ति अवतरण की दृष्टि से विशेष रूप से संस्कारित किया गया है। भूमि चयन से लेकर विशेष तप साधनात्मक प्रयोगों, चेतना के आह्वान आकर्षण की विशिष्ट शैलियों से उसे जागृत तीर्थ के रूप में विकसित किया गया है। उसका लाभ वहाँ सत् प्रयोजन से साधना करने वाले हर साधक को सहज ही प्राप्त होता रह सकता है।
दस दिवसीय साधना सत्रों में मिलने वाला एक विशेष लाभ और भी है जिसकी महत्ता हर भारतवासी समझता है तथा जिसे पाने के लिए लालायित रहता है। वह है अनुभवी मार्गदर्शन, समर्थ, संरक्षण तथा सान्निध्य।
सत्संग और कुसंग की प्रशंसा निन्दा से शास्त्र भरे पड़े हैं। सत्संग की महिमा का तो इतना भावनापूर्ण उल्लेख है जिसे पढ़ने-सुनने पर अत्युक्ति की गन्ध आती है, पर विचार करने पर उस प्रतिपादन को तथ्यपूर्ण माना जायगा। इतिहास में इस बात के असंख्य प्रमाण हैं कि सामान्य मनःस्थिति और परिस्थिति के व्यक्ति किन्हीं महामानवों के सम्पर्क में आकर तेजी से अपने व्यक्तित्व को समुन्नत और परिष्कृत करते चले गये और प्रगति के उच्च शिखर पर जा पहुँचे। यदि उन्हें वैसा अवसर न मिलता तो सम्भवतः वे उसी स्थिति में पड़े रहते जिसमें कि उनके अन्य साथी कुटुम्बी निर्वाह करते हुए जिन्दगी के दिन पूरे कर गये। इसी प्रकार ऐसी घटनाओं की भी कमी नहीं हैं जिनमें अच्छे, खासे, भले, चंगे मनुष्य कुसंग में फँसे और क्रमशः गिरते−गिरते पतन के भयंकर गर्त में जा गिरे। नई उम्र के किशोर और युवक प्रायः इसी कुचक्र में फँसकर अपना भविष्य अन्धकारमय बनाते देखे गये हैं। आवारागर्दी, गुण्डागर्दी, उच्छृंखलता, चोरी, नशेबाजी जैसी बुरी आदतों में भले घरों के बालकों को फँसते और अपना सर्वनाश करते बहुधा देखा जाता है। ऐसा क्यों हुआ है इसका पता लगाने पर यही बात समाने आती है कि कुसंग के फौलादी पंजों में फँसकर वे बाज द्वारा दबोचे हुए कबूतर की तरह विवश मनःस्थिति में कहीं से कहीं घिसटते चले गये हैं।
नारद के सम्पर्क से ध्रुव, प्रह्लाद, पार्वती, सावित्री आदि अनेक नर−नारियों ने ऐसी प्रेरणाएँ पाई जिनके सहारे वे असामान्य बन गये। बाल्मीकि, अंगुलीमाल, अजामिल, अम्बपाली जैसे ओछे जीवन भी किन्हीं प्रतिभाओं के प्रभाव से अपने में पूर्णतया परिवर्तन करके निकृष्ट से उत्कृष्ट बनने में समर्थ हुए। भगवान बुद्ध के सम्पर्क में आकर असंख्यों को देवमानव बनने का अवसर मिला। गाँधीजी की निकटता और घनिष्ठता ने कितनों को ही युग पुरुष बनाया। वे अपने को धन्य बनाने और अपने समय को बदलने में सफल हुए। अरस्तु के द्वारा सिकन्दर का−चाणक्य द्वारा चन्द्रगुप्त का−समर्थ रामदास द्वारा शिवाजी का−रामकृष्ण परमहंस द्वारा विवेकानन्द का−विरजानन्द द्वारा दयानन्द का−निर्माण हुआ था। यों इनमें अपनी मौलिक प्रतिभा भी थी, पर खराद पर चढ़ने से हीरे का मूल्य निखरता है। सत्संगति के अभाव में बहुमूल्य प्रतिभाएँ भी जहाँ की तहाँ पड़ी रहती और समाप्त होती देखी जाती है। मोती उत्पन्न करने का श्रेय सीप को ही मिलता है, पर स्वाति बिन्दु के सम्पर्क का लाभ न मिले तो उसकी सृजन शक्ति निरर्थक ही चली जाती है।
सत्संग की महत्ता इसी कारण है कि उससे न केवल विचार, सुनने परामर्श पाने का अवसर मिलता है, वरन् व्यक्तित्व के साथ जुड़ी रहने वाली प्राण ऊर्जा की गर्मी पाने का भी लाभ मिलता है। निकटता से महत्वपूर्ण आदान−प्रदान सम्भव होते हैं।
मैस्मरेजम विज्ञान की सारी उपलब्धियाँ प्राण विद्युत के आदान−प्रदान से ही सम्बन्धित है। प्रयोग कर्त्ता अपनी प्राण विद्युत को बढ़ाने और एकाग्रता करने की साधना करता है। कष्ट निवारण−परिपोषण, मार्गदर्शन, परामर्श जैसे उद्देश्यों के लिए इस शक्ति का जिस पर प्रयोग किया जाता है वह लाभान्वित होता है। इसे माता द्वारा बच्चे को दूध पिलाने अथवा सम्पन्नों द्वारा जरूरतमन्दों की सहायता करने से समतुल्य कहा जा सकता है। मनुष्य की संचित सम्पदा से धन, बल, बुद्धि, प्रतिभा आदि की ही तरह एक महत्वपूर्ण सामर्थ्य प्राण शक्ति भी है। इसे अपनी प्रगति और दूसरों की भलाई के लिए अच्छी तरह प्रयुक्त किया जा सकता है।
प्राणशक्ति का उपार्जन तो उपयुक्त वातावरण में की गयी उपयुक्त साधनाओं से बड़ी मात्रा में सम्भव है ही, उसका अनुदान, संचार, हस्तांतरण भी अध्यात्म जगत का एक सर्वमान्य तथ्य है। प्रस्तुत 10 दिवसीय साधना सत्रों में इन दोनों ही प्रक्रियाओं का लाभ साधकों को मिलता रहा है तथा अब और भी अधिक प्रखरता से मिल सकेगा। व्यक्ति अपनी वृत्तियों को मात्र इतना नियन्त्रित कर ले कि प्राप्त अनुदानों को उपयोग ईश्वरीय मर्यादा के अनुकूल ही करे, उन्हें प्रतिकूल दिशा में न जाने दे, तो उसे प्रचुर शक्ति अनुदान मिलते देखा गया है। तीर्थवास, योग साधना, आध्यात्मिक प्रशिक्षण एवं दिव्यानुदान प्राप्त करने का संयुक्त अवसर देने वाले इन दस दिवसीय अल्पावधि शिविरों का लाभ व्यस्त रहने वाले व्यक्ति भी प्राप्त कर सकते हैं।
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नारी वर्ग आधी जनसंख्या है। उसका पिछड़ापन दूर करना मनुष्य जाति को अर्धांग पक्षाघात से मुक्त करने के सामान अपने युग का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। युग निर्माण योजना ने महिला जागृति अभियान के अन्तर्गत नारी के मानवी अधिकारों की मान्यता दिलाने के लिए व्यापक आन्दोलन आरम्भ किया है। इसमें नर को न्याय एवं औचित्य को स्वीकार करने तथा व्यापक हित साधन को अपनाने की दूरदर्शिता अपनाने के लिए अनुरोध किया है। साथ ही नारी को शिक्षा, स्वावलंबन, सुरुचि एवं योग्यता की दृष्टि से समर्थ बनने का प्रयत्न करने के लिए जगाया है। इन प्रयोजनों के लिए प्रचारात्मक, रचनात्मक एवं सुधारात्मक गतिविधियों का सामान्य प्रयास तो आरम्भ से ही किया जा रहा था। शान्तिकुञ्ज की स्थापना के बाद उसमें नया उत्साह उत्पन्न हुआ है। महिला जागरण शाखाएँ देश भर में अपनी संगठनात्मक और रचनात्मक सत्प्रवृत्तियों में तत्परतापूर्वक लगी हुई हैं। मिशन की देवकन्याओं के जत्थे देश के कोने−कोने में महिला जागृति के लिए प्राण फूँक रहे हैं। महिला पवित्र का एवं प्रेरणाप्रद साहित्य ने उद्देश्य का समर्थन करने के लिए जन−जन को सहमत करने के लिए इन दिनों अथक परिश्रम किया है और उसका सत्परिणाम भी सामने आया है।
एक−एक वर्षीय कन्या प्रशिक्षण सत्र और दो−दो महीने के महिला सत्र इसी अभियान के अन्तर्गत शान्ति कुञ्ज में पिछले चार साल से चल रहे हैं। इस वर्ष से उस सन्दर्भ में एक नई प्रगति यह होने जा रही है कि महिला सत्रों के लिए भविष्य में अधिक सुविधा रहेगी और शिक्षा के लिए उत्सुक महिलाओं के लिए जो सीमित स्थान था वह बढ़ जायगा। वे बच्चों समेत भी आ सकेंगी और सुविधानुसार दो महीने से अधिक समय भी ठहर सकेंगी। नये गायत्री नगर में उनके लिए एक अतिरिक्त कक्ष रहेगा जिसमें नारी को सुयोग्य और सुसंस्कृत बनाने के लिए यथा सम्भव सभी साधन उपलब्ध कराने का सामर्थ्य भर प्रयत्न किया जायगा। युग निर्माण परिवार के सदस्य अब तक व्यक्ति निर्माण और समाज निर्माण के लिए बहुधा अपने प्रयास नियोजित करते रहे हैं। परिवार निर्माण का कार्य अपने घर से ही आरम्भ हो सके तो उसका तात्कालिक लाभ सीधा उसी कुटुम्ब को मिलेगा। साथ ही उस आकर्षण से सम्पर्क में आने वाले परिवार भी अनुकरण का प्रकाश ग्रहण कर सकेंगे।
कन्या शिक्षण सत्रों की सफलता अब मिशन के परिचित क्षेत्र में एक प्रकार से प्रख्यात ही हो चुकी है। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में उत्साहजनक उन्नति करके कन्याएँ वापिस लौटी हैं तो उनके अभिभावक बहुत प्रसन्न हुए हैं कि एक वर्ष की यह शिक्षा लड़की के अब तक ही पूरी शिक्षा की तुलना में अधिक सार्थक हुई। पाठ्यक्रम के अनुसार संगीत, कुटीर उद्योग, भाषण कला, गृह विज्ञान, जैसे वही सामान्य विषय है जो हर जगह कन्या विद्यालयों में सीखे जा सकते हैं। यहाँ की विशेषता है−व्यक्तित्वों को सुसंस्कारी और प्रतिभावान बनाना। अब तक के परिणामों को देखते हुए प्रशिक्षण प्रयासों को सर्वथा सफल ही कहा जा सकता है।
सुसंस्कारिता का अनुदान लेकर लौटी हुई छात्राओं ने अपने प्रयास से अपने अपने घरों को नये ढाँचे में ढालने में आशाजनक सफलताएँ पाई हैं। वे पितृ घर में रह रही हों या ससुराल में हर जगह उनकी भूरि−भूरि प्रशंसा हुई है। उनकी आकृति तो वैसी ही रही है पर देखने वालों ने देखा है कि प्रकृति बदल गई। नारी के नाम के साथ प्रायः देवी शब्द लगता है। यह कहने मात्र का ही प्रयोग था पर शान्ति कुञ्ज की शिक्षा प्राप्त करके लौटने वाली छात्राओं ने सिद्ध किया है कि उनकी परम्परागत पदवी−देवी−निरर्थक नहीं है। जन्मजात रूप से उनमें वह विशेषताएँ विद्यमान हैं मात्र खरादे जाने भर की कमी रह जाती है यदि वह शान्ति कुञ्ज जैसी प्रयोगशालाओं में पूरी की जा सकें तो वे सच्चे अर्थों में गृह लक्ष्मी की भूमिका सम्पन्न कर सकती है। अपने और अपने पड़ोस, सम्पर्क, रिश्तेदारी क्षेत्र में उनने जो प्रभाव छोड़ा है उसे देखते हुए सर्वत्र यह अनुभव किया जा रहा है कि हमारे घरों की कन्याओं और वधुओं को भी इस प्रशिक्षण में सम्मिलित होना चाहिए।
बदनामी की तरह नेक नामी भी हवा के साथ उड़ती और फैलती है। शान्तिकुञ्ज की प्रशिक्षित कन्याओं की परिवार को स्वर्ग में बदल देने वाली विशेषताओं को देखकर विवाह योग्य सुयोग्य लड़कों के माता−पिता यह खोज करते हैं कि हमारे घर कन्या प्रशिक्षण से लौटी हुई वधू आये। जहाँ इस प्रशिक्षण की गन्ध जानकारी पहुँच गई है वहाँ नव वधुओं की तलाश में रंग, रूप, स्वास्थ्य, शिक्षा, कुशलता, खानदान, दहेज आदि की परख एक कोने पर उठा कर रख दी जाती है और यह पूछा जाता है कि कन्या शान्तिकुञ्ज की शिक्षा में कितने समय तक सम्मिलित रही है। साधारण एक वर्ष का पाठ्यक्रम है। परिवार के लाखों सदस्यों की कन्याओं को लाभ देने की दृष्टि से अवधि थोड़ी ही रखी गई है। वह अवधि पूरी होने पर भी कितनी ही कन्याओं और अभिभावकों को आग्रह कुछ और समय तक शिक्षा पाने का अवसर दिये जाने का रहता है। कइयों को वैसी सुविधा देनी भी पड़ती हैं। स्कूली शिक्षा बीच में छोड़कर भेजने में जहाँ एक वर्ष मारा जाने का असमंजस रहता था, वहाँ लौटी हुई कन्याओं ने यह सिद्ध कर दिया है कि यह लाभ तो दस वर्ष की पढ़ाई हर्ज करके भी उठाया जाना चाहिए। यही कारण है कि वर्ष मारा जाने, पढ़ाई बीच में छूटने की बात अब युग−निर्माण परिवार के सदस्यों में कहीं भी नहीं सोची जाती और शिक्षार्थी छात्राओं के आवेदन पत्र हर साल पहले की अपेक्षा बढ़ ही जाते हैं। स्थान सीमित होने के कारण इच्छुक छात्राओं में से तिहाई चौथाई को ही जगह मिल पाती है।
आरम्भ में जब कन्या सत्र और महिला सत्र चले थे तब उनके परिणामों के सम्बन्ध में अनुमान ही लगाया जाता था, पर अब जबकि प्रतिफल सामने आये हैं और उपयोगिता समझी गई है तो छात्राओं के लिए अधिक स्थान बनाने का दबाव बढ़ रहा है। गायत्री नगर के निर्माण में एक कारण यह दबाव भी है। बहुत दिन तक विचार चलता रहा कि कन्या शिक्षणों के लिए अधिक स्थान बनाया जाय और महिलाशिक्षण के लिए? दोनों के पक्ष में मजबूत तर्क हैं। कन्याओं का समय रहता है, उनमें स्फूर्ति, स्मरण शक्ति की अधिकता, उमंग, आदि कितनी ही विशेषताएँ रहती हैं और वे जल्दी ही अधिक सीख सकती हैं। भविष्य कन्याओं के ही हाथ में है इसलिए उन्हीं की व्यवस्था अधिक होनी चाहिए।
महिलाओं के पक्ष में दलील यह है कि उनकी बुद्धि प्रतिभा परिपक्व हो चुकी हैं। वे अपने परिवार और सम्पर्क के लोगों पर प्रभाव दबाव डालने में समर्थ हैं महिला जागरण और परिवार निर्माण के लिए यदि कुछ ठोस काम जल्दी ही करना हो तो महिला प्रशिक्षण को प्राथमिकता देनी चाहिए। कन्याएँ तो जल्दी ही ससुराल चली जाती हैं। जाते जाते गोदी में बच्चे आ जाते हैं। सयानी लड़कियों और वधुओं को घर से बाहर जाने पर भारत के वर्तमान वातावरण में भारी प्रतिबन्ध है नव जागरण की तात्कालिक आवश्यकता की पूर्ति महिलाओं के माध्यम से ही हो सकती है। दोनों ही तर्कों में तथ्य है। बहुत विचारने के वाद कन्याओं की संख्या पिछली जितनी ही रखने और बढ़ाने का निश्चय किया गया है। कन्याओं के लिए तो वर्तमान स्थान से ही काम चल जायगा। महिला छात्राओं की संख्या वृद्धि की दृष्टि से गायत्री नगर बनाने और बसाने की विशेष व्यवस्था की गई है।
आज परिवार संस्था टूट रही है। पाश्चात्य देशों में विलासिता और संकीर्णता के कारण वह परम्परा नष्ट होती जा रही है। अपने देश में पिछड़ेपन के कारण संयुक्त परिवार भेड़ों के बाड़े बन कर रह रहे हैं। प्रगतिशील और पिछड़े वर्गों में परिवार टूटने के कारण तो भिन्न-भिन्न हैं, पर उसका प्रभाव समाज रचना की दृष्टि से बहुत ही अहितकर सिद्ध हो रहा है। नव−युग का आधार पारिवारिकता ही होगी। गायत्री परिवार युग−निर्माण परिवार−नाम इसी लिए रखे गये हैं कि अपनी समाज रचना के सिद्धान्त संयुक्त परिवार प्रक्रिया के साथ जुड़े होंगे। समाजवाद का लक्ष्य भी यही है। लार्जर फैमिली गठन के सम्बन्ध में कहा-सुना तो बहुत कुछ जाता रहा है। पर उनका प्रयोग, परीक्षण एवं शुभारम्भ विधिवत् कहीं भी नहीं हो सका है।
विचार पूर्ण विशालकाय संयुक्त परिवारों का प्रयोग विज्ञ समाज में भावी समाज रचना का एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है। संयुक्त परिवारों में जिन कारणों से कलह और मनो मालिन्य रहता है उन्हें हटा दिया जाय और एक सहकारी समिति की तरह आचार और व्यवस्था के तत्वों को मिला कर परिवार बसाये जायें, यदि ऐसा हो सके तो श्रम, समय, व्यय, व्यवस्था में अलग-अलग रहने के कारण जो शक्ति नष्ट होती है वह बच जायगी सद्भाव और सहकार का अभ्यास बढ़ेगा। लार्जर फैमिली विशाल परिवार−का यह प्रयोग छोटे रूपों में आरम्भ किया जा सकता है और पीछे इसी को वसुधैव कुटुम्बकम् के−विश्व परिवार के बड़े पैमाने पर प्रयुक्त किया जा सकता है।
स्त्रियाँ ससुराल में तो श्रमिक की तरह ही दिन गुजारती हैं। उन्हें शिक्षा, दीक्षा, स्वास्थ्य, संस्कार आदि का लाभ तो बाप के घर ही मिलता है। सुयोग्य महिलाओं की प्रशंसा में उनके कुल, खान−दान एवं माता−पिता को भी भागीदार बनना पड़ता है। नारी की शिक्षा योग्यता एवं श्रेष्ठता की उपलब्धि प्रायः बाप के घर ही होती है। आज के बाप बच्चों को जन्म देने और पेट भरने तक ही हाथ पैर पीटते हैं। उनके पास संस्कार देने के न तो साधन होते हैं और न अनुभव अभ्यास हो रहता है। इस कमी को पूरा करने के लिए ऐसा वातावरण, साधन बनाना चाहिए जहाँ अभिभावकों की इस कमी को पूरा किया जा सके। प्रयत्न यही किया जा रहा है कि गायत्री नगर युग−निर्माण परिवार की महिलाओं के लिए ‘बाप का घर’ बन सके और वे बड़ी आयु हो जाने पर भी सुसंस्कारी माता−पिता के आश्रय में पलने और ढलने का नये सिरे से लाभ प्राप्त कर सकें।
ऋषिकाओं के संरक्षण में महिलाओं के व्यक्तित्व के एवं उनके बच्चों के भविष्य निर्माण का कार्य सम्पन्न होते रहने के अनेक उदाहरण इतिहास में विद्यमान हैं।
सीता परित्याग के समय राम के सामने दो प्रश्न थे। महलों के सुख से अधिक बढ़ा चढ़ा संतोष जानकी जी को कहाँ मिल सकेगा? गर्भस्थ बालक को सुसंस्कारी बनने का अवसर कहाँ मिल सकेगा? इन प्रश्नों का समाधान उन्हें एक ही सूझा कि सीता जी को महर्षि बाल्मीकि आश्रम में रखा जाय। तदनुसार वैसी ही व्यवस्था बना दी गई। आश्रम जीवन में सीता राजमहल की तुलना में अधिक संतुष्ट रही। बच्चों की प्रतिभा का विकास जितना किसी महंगी से महंगी शिक्षण व्यवस्था से हो सकता था उसमें कम नहीं वरन् अधिक ही हुआ। लव, कुश की जोड़ी राम लक्ष्मण के समकक्ष ही तेजस्विता सम्पन्न थी।
भरत का परिपालन महर्षि कन्व के आश्रम में हुआ था। शकुन्तला वहीं रहती थी, सिंह शावकों से खेलते रहने का पराक्रम उस बालक को इसी आश्रम में उपलब्ध हुआ था बड़ा होने पर उसी के द्वारा किये गये पुनर्गठन के आधार पर इस देश का नाम भारत रखा गया।
व्यक्ति और समाज की मध्यवर्ती कड़ी परिवार है। इसी खदान से नर रत्न निकलते हैं। परिष्कृत परिवार का निर्माण सुयोग्य नारी ही कर सकती है। उसकी सुसंस्कारिता से घर के हर सदस्य को अपेक्षाकृत अधिक सुखी और समुन्नत बनने का अवसर मिल सकता है। नारी शिक्षा का तो जगह−जगह प्रबन्ध है, पर उसमें सुसंस्कारिता उगाने और बढ़ाने की व्यवस्था ढूँढ़े नहीं मिलती। इसी अभाव की पूर्ति नये गायत्री नगर में होने जा रही है। उसे उज्ज्वल भविष्य की सृजन प्रक्रिया का उत्साह वर्धक समाचार कहा जा सकता है।
आश्विन की तरह चैन नवरात्रि में भी सामूहिक गायत्री अनुष्ठानों के साधना आयोजन होने चाहिए। चैत्र की नवरात्रि 8 अप्रैल से 16 अप्रैल तक है। तैयारी अभी से आरम्भ की जानी चाहिए।
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ब्रह्म वर्चस् साधना सत्रों में उच्चस्तरीय साधना एवं प्रशिक्षण की व्यवस्था व्यक्ति निर्माण तथा युग परिवर्तन के उच्चस्तरीय उत्तरदायित्वों की पूर्ति के लिए की गयी है। उसे कम समय अथवा छुट-पुट प्रयासों से पूरा नहीं किया जा सकता। परिस्थितियों से तालमेल बिठाने के लिए उसे खण्डों में विभाजित तो किया जा सकता है, किन्तु उन्हें भी एक सीमा तक छोटा किया जा सकता है। उसकी न्यूनतम अवधि दो माह रखी गयी है। उससे कम से प्रायश्चित्त, योग साधना, तपश्चर्या एवं प्रशिक्षण की धाराओं को समुचित महत्व दिया जाना सम्भव नहीं।
यों इन सत्रों में प्रवेश के लिए किसी भी वयस्क व्यक्ति पर प्रतिबन्ध नहीं है, किन्तु उसके लिए अधिक उपयुक्त वही रहेंगे जिन के विचारों में प्रौढ़ता आ गयी है, और साधना जिन्हें पर्याप्त अनुभव है। साधना में थोड़ी ही देर में जिनका चित्त उचटने लगे, गम्भीर अध्ययन एवं चिंतन से जो पल्ला बचाकर चलना चाहें, साधना काल में जिनका मन सांसारिक आकर्षण अथवा उत्तरदायित्वों की ओर भाग−भागकर जाये, उन्हें इस प्रक्रिया का समुचित लाभ मिलना शायद ही सम्भव हो।
वास्तव में इस स्तर की लोक मंगल परक एवं आत्मोत्कर्ष की साधनाएँ वानप्रस्थों के लिए ही अनुकूल पड़ती है। साधना के लिए लम्बा समय लौकिक उत्तरदायित्वों से पूर्ण नहीं तो आंशिक मुक्ति के बिना इस दिशा में सुनिश्चित गति सम्भव नहीं। अस्तु ब्रह्मवर्चस् साधना को प्रकारान्तर से वानप्रस्थ साधना भी कह सकते हैं। आयु की शर्त छोड़ भी दी जाय तो भी मनःस्थिति तथा परिस्थितियों की दृष्टि से वानप्रस्थ स्तर के व्यक्ति ही इसके लिए अपेक्षित है।
इस संदर्भ में एक तथ्य और भी ध्यान रखने योग्य है, वह यह कि हर महत्वपूर्ण कार्य के लिए घर का मोह छोड़ना पड़ता है। इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद को मक्का छोड़ कर मदीना जाना पड़ा। इस स्थान परित्याग को हिजरत कहा गया और उसी की स्मृति में हिजरी सन् चला। ईसा मसीह यरुशलम छोड़कर अन्यत्र कार्य करते रहे। बुद्ध ने कपिलवस्तु छोड़ी, आद्य शंकराचार्य ने केरल, जैन धर्म के संस्थापक महावीर और सिक्ख धर्म के प्रणेता नानक अपनी जन्म भूमि में नहीं रहे थे। सन्तों की तरह अवतारों का कार्य क्षेत्र भी अन्यत्र ही रहा है। कृष्ण मथुरा में जन्मे, उज्जैन में पढ़े, इन्द्रप्रस्थ में रहे, कुरुक्षेत्र में लड़े− द्वारिका में बसे और वेराबल में स्वर्ग धाम सिधारे। राम अयोध्या में जन्मे, विश्वामित्र आश्रम में पढ़े, वनवास में रहे और अन्ततः वानप्रस्थ की अवधि आने पर चारों भाई गुरु वशिष्ठ के समीप हिमालय पर रह कर साधना करते हुए ब्रह्म लोक गये। वशिष्ठ जी का स्थान वशिष्ठ गुफा के रूप में अभी भी विद्यमान है। इस क्षेत्र में ही देव प्रयोग में राम, लक्ष्मण झूला में लक्ष्मण, ऋषिकेश में भरत, मुनि की रेती में शत्रुघन के तप कुटीर थे।
उपरोक्त उदाहरणों से सिद्ध होता है कि लक्ष्य आत्मोत्कर्ष हो या लोक कल्याण, दोनों में ही व्यक्ति को स्थानीयता का मोह छोड़ कर भिन्न क्षेत्र से सम्बन्ध जोड़ना पड़ता है। उपयुक्त वातावरण का लाभ उठाना अथवा सीमित छोड़कर व्यापक कार्यक्षेत्र पकड़ना इसके बिना सम्भव नहीं। इसी लिए वानप्रस्थों को घर छोड़कर रहने एवं परिव्राजक का क्रम अपनाने के लिए जाता रहा हैं। इसी आधार पर भारतीय संस्कृति की कीर्ती पताका सारे विश्व में फहराई जा सकी थी।
अतीत का भारतीय गौरव प्रधानतया वानप्रस्थ परम्परा की आधार शिला पर खड़ा रहा है। पूर्वार्ध भौतिक प्रयोजनों के लिए और उत्तरार्ध अध्यात्म प्रयोजनों के लिए। जीवन सम्पदा का विभाजन अत्यन्त ही महत्व पूर्ण। इससे लोक और परलोक दोनों ही सधते हैं। इसमें व्यक्तित्व का−परिवार का और समाज का सुसंतुलित साधना होता है। भौतिक उत्तरदायित्व अधेड़ होने तक निपट जाने चाहिए तदुपरान्त आत्मा और परमात्मा के प्रति देश धर्म समाज और संस्कृति के प्रति जो महान जिम्मेदारियाँ मनुष्य के कन्धे पर रहती हैं उन्हें पूर्ण करना चाहिए। इसी में स्वार्थ और परमार्थ की समन्वित पूर्ति होती हैं। यह जीवन लक्ष्य की प्राप्ति का उचित, सरल और मध्यम मार्ग है।
संचित कुसंस्कारों के निराकरण के लिए तपश्चर्या−आत्मिक विभूतियों के अभिवर्धन के लिए योगाभ्यास−तत्वदर्शन के लिए आत्मज्ञान की समन्वित साधनों को देवत्व से भरा−पूरा त्रिवेणी संगम कहा गया है। उसका अवगाहन ही आत्मकल्याण और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग है उस पर चल पड़ना वानप्रस्थ स्थिति में ही समग्र रूप से बन पड़ता है। ज्ञान, कर्म और भक्ति का त्रिविधि समागम ठीक इसी काल में होता है। त्रिपदा गायत्री की उच्चस्तरीय साधना तीसरेपन की इसी अवधि में ठीक तरह बन पड़ती है। बचपन का अल्हड़पन−जवानी का उन्माद−बुढ़ापे की विक्षिप्तता में अपने अपने ढंग की विषमताएँ छाई रहती हैं। साधना के लिए सन्तुलित वय वानप्रस्थ की ही है। जिस किसी ने आत्म समुद्र मन्थन से जो महत्वपूर्ण रत्न पाये हैं उसमें वानप्रस्थ स्तर की साधना ही प्रमुख रही है।
आत्म कल्याण और लोक कल्याण के आधार पर ही आत्मा और परमात्मा का जीवन को सार्थक बनाने वाला संयुक्त वरदान मिलता है। कषाय कल्मषों को निरस्त करने वाली तपश्चर्या इन्हीं दिनों ठीक तरह बन पड़ती हैं। प्राचीन काल में भारत भूमि को देवभूमि बनाने का श्रेय वानप्रस्थों को ही था। परिष्कृत प्रतिभा के धनी होने के कारण वे ही सच्चे और सफल लोक सेवियों की भूमिका निभाते थे। देश के कोने−कोने में−विश्व के क्षेत्र−क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों का आरोपण और अभिवर्धन करने में कुशल माली की तरह वे ही निरंतर जुटे रहते थे। उन्हीं के पुरुषार्थ से शालीनता की परम्पराएँ फलती−फूलती थीं। उसी महक से यह विश्व उद्यान हरा−भरा शोभा, सुषमा युक्त बना रहता था। असंख्यों निस्वार्थ एवं परिपक्व सार्वजनिक कार्यकर्ताओं की आवश्यकता इसी परम्परा द्वारा पूरी होती है। नर रत्नों की कृषि करने और विभृतियों के भण्डार भर देने वाली यही खदान थी। आज वह प्रचलन धूमिल हो गया तो सब ओर अन्धेरा ही अन्धेरा छाया हुआ है। समय ने वानप्रस्थ परम्परा को पुनर्जीवित करने की माँग की है। मानवी संस्कृति की प्राण रक्षा के लिए संजीवनी बूटी का काम इसी नव−जागरण एवं पुनर्निर्धारण से सम्भव हो सकेगा।
उच्चस्तरीय निर्माण अल्प समय में सम्भव नहीं होता। आयुर्वेदिक औषधियों को देर तक घोंट कर एवं बार−बार पुटि देकर सशक्त बनाया जाता है। अस्तु भारतीय गौरव की पुनः स्थापना कर सकने योग्य प्रखर व्यक्तित्वों के निर्माण कर सकने योग्य प्रखर व्यक्तित्वों के निर्माण के लिए भी सामान्य की अपेक्षा अधिक समय लगाया जाना आवश्यक है। सामान्य दृष्टि से तीर्थ यात्री 2-4, दिन के लिए भी जाते हैं, पर विशेष लाभ पाने के इच्छुक दीर्घ प्रवास के लिए ही जाते रहे हैं।
काशी, अयोध्या, मथुरा आदि में निवास करने के लिए अभी भी कितने ही वृद्ध जन यह व्रत लेकर पहुँचते हैं कि वहाँ से फिर वापिस न लौटेंगे। बृज क्षेत्र में इन दिनों हजारों बंगाली इस संकल्प के साथ रह रहे हैं। कि मरण पर्यन्त वे इसी पवित्र भूमि में रहेंगे और कहीं शरीर का त्याग करेंगे। ‘काशी करवट’ के सम्बन्ध में मान्यता है कि वृद्धावस्था में वहीं जाकर रहने और प्राण त्याग करने वाला शान्ति सद्गति पाता है। कई व्यक्ति जब मरणासन्न होते हैं तब यह इच्छा व्यक्त करते हैं कि उनका शरीर त्याग उसी तीर्थ की पवित्र भूमि में सम्पन्न हो। जो नहीं जा पाते, उनके मृत शरीर की अस्थियाँ और भस्मी हरिद्वार, प्रयाग जैसे तीर्थों में प्रवाहित की जाती है। इस प्रचलन का एक मात्र कारण यही है कि तीर्थों के वातावरण में जीवित या मृत शरीर का निवास जितने समय हो उतना ही उत्तम हैं। पुराणों में तीर्थ निवास का महात्म्य और प्रचलन असाधारण रूप से वर्णन किया गया है। कई बार तो लगता है कि यह अलंकारिक और अत्युक्ति पूर्ण है। स्कन्द पुराण में तो तीर्थ खण्ड के अन्तर्गत इस प्रकार के महात्म्यों की ही भरमार है।
इस प्रतिपादन पर तात्विक दृष्टि से विचार करने पर प्रतीत होता है कि तीर्थों में निवास करने की बात पर जोर देने का कुछ ठोस कारण है। यदि किसी भूमि, या नदी, पर्वत, मन्दिर आदि की ही महिमा गाई गई होती तो निश्चय ही वह अत्युक्ति पूर्ण कही जाती किन्तु तीर्थ का स्वरूप आज जो भी हो प्राचीन काल में अत्यन्त उच्चस्तरीय था। वहाँ श्रेष्ठ मनीषियों का निवास था। उनके आश्रम थे। उन आश्रमों में लोगों के लिए सद्ज्ञान शिक्षण और आत्मोत्कर्ष के साधनों का समुचित प्रबन्ध था। जो वहाँ आते, ठहरते थे वे पर्यटक नहीं होते थे वरन् मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने और आत्मिक प्रगति का आधार प्राप्त करने के लिए ही आते थे। उनका सोद्देश्य आगमन पूर्णतया सार्थक भी होता था।
गंगा के किनारे, हरिद्वार में ब्रह्मवर्चस् आरण्यक की स्थापना के पीछे साधकों की इसी स्तर की उपलब्धियों को मूर्तरूप देने का लक्ष्य रखा गया है। उसके लिए आदर्श तीर्थवास अथवा शाश्वत ऋषि आश्रमों में निवास के स्तर से कम की व्यवस्था से काम नहीं चल सकता। ऋषियों ने जिस आधार पर भारतभूमि के निवासियों को ‘देवता’ स्तर का बनाया था, उसी प्रकार को पुनर्जागृत करना अभीष्ट है।
ऋषियों के जीवन यापन की−रहन−सहन, निवास, आचार−व्यवहार की शोध करने पर प्रतीत होता है कि उनमें से अधिकांश के विशालकाय आश्रम में से कुछ में गुरुकुल चलते थे, कुछ में आरण्यक। गुरुकुल ब्राह्मण वर्ग के ऋषि चलाते थे और आरण्यक तपस्वी स्तर के। गुरुकुलों में विद्यार्थी पढ़ते थे और आरण्यकों में वानप्रस्थी। बच्चों को गुरुकुलों में इसलिए नहीं भेजा जाता था कि वहाँ कुछ अतिरिक्त पढ़ाई ही विचारवान व्यक्ति अपने बालकों को वहाँ पढ़ने भेजते थे। यद्यपि सुख सुविधा की दृष्टि से वहाँ कठिनाई ही रहती थी। कठिनाई की परिस्थितियों में जीवन विकास का प्रशिक्षण होना, विज्ञजनों की दृष्टि में एक सौभाग्य है। दरिद्रता में पिछड़ेपन में कष्ट सहना एक बात है और आदर्शों के परिपालन की साधना के निमित्त तितीक्षा भरा जीवन यापन करना दूसरी। दरिद्रता के साथ जुड़ी हुई हीनता व्यक्तित्व को दबोचती है। किन्तु आदर्श पालन के साथ जुड़े हुए कष्ट सहन से प्रतिभा और प्रखरता निखारने का अवसर मिलता है। प्राचीन काल में गृहस्थ ब्राह्मणों के संचालकत्व में गुरुकुल चलते थे। बौद्धिक शिक्षण ऋषि करते थे और दुलार भरा व्यवहार ऋषिकाएँ सिखाया करती थीं। ऋषि उनकी चेतना जगाते थे ऋषिकाएँ उपयुक्त व्यवस्था बनातीं। दोनों के सहयोग से ऐसे गुरुकुल चलते थे, जिनमें पढ़ने के उपरान्त जो भी छात्र अपने घरों को लौटते थे; नर रत्न होते थे। उनमें महामानवों के सारे गुण भरे रहते थे। व्यवसाय की दृष्टि से वे जो भी करें, परिष्कृत व्यक्तित्व जुड़ा रहने के कारण वे सामान्य काम भी व्यक्ति और समाज की सुख शान्ति का सर्वतोमुखी अभिवर्धन करते थे। गुरुकुलों में विद्यार्थी आरण्यकों में वानप्रस्थ रहते थे। प्रशिक्षण पद्धति की सार्थकता उन विद्यालयों के वातावरण के साथ जुड़ी रहती थी। वहाँ तपस्वी जीवन की उच्च स्तरीय अध्यात्म की−शिक्षा व्यवस्था रहती थी। इसका संचालन उसी स्तर के ऋषि करते थे। आरण्यकों का वातावरण गुरुकुल से इस आधार पर भिन्न रहता था कि दोनों प्रकार के शिक्षार्थियों के स्तर और उद्देश्य में भिन्नता होती थी। गुरुकुल के छात्रों को वयस्क होते ही जीवन संग्राम में उतरना था और आरण्यक के शिक्षार्थी परमार्थ की भूमिका में प्रवेश करते थे। स्वभावतः दोनों की शिक्षण प्रक्रिया एक-दूसरे से भिन्न रहती थी। तदनुसार व्यवस्था, परम्परा आदि में भी भिन्नता का रहना आवश्यक था। इतने पर भी दोनों प्रकार की शिक्षण संस्थाओं का उद्देश्य एक ही रहता था−व्यक्तित्व में देवतत्व का अवतरण।
ब्रह्म वर्चस् प्रशिक्षण को प्रकारान्तर से वानप्रस्थ प्रक्रिया की ही शिक्षा, साधना एवं व्यवस्था का समन्वय कहना चाहिए। प्रशिक्षण दो महीने का हो अथवा लम्बे समय का उसमें प्रातः तीन घन्टे योगाभ्यास एवं तपश्चर्या की साधना मध्याह्न तीन घन्टे ब्रह्म विद्या, आत्म विज्ञान का स्वाध्याय सत्संग, सायंकाल तीन घन्टे लोक सेवा का प्रशिक्षण। यही तीनों क्रम निरन्तर चलते रहेंगे। गंगा की गोद, हिमालय की छाया एवं दिव्य चेतना का प्राण भरा अनुदान यही है। ये विशेषताएँ हैं जिनके आधार पर यहाँ का वातावरण ऐसा बन पड़ा है जिसमें उच्चस्तरीय साधनाओं के सफल होने की पूरी−पूरी सम्भावना बनती है।
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विद्यार्थी अपने पुरुषार्थ से ही अच्छे नम्बरों से पास हुआ समझा जाता है और उसी से मान, पुरस्कार, छात्र वृत्ति आदि का लाभ मिलता है, पर वस्तुतः उसमें दूसरों का भी अनुदान जुड़ा होता है। अभिभावक उसके भोजन, वस्त्र, फीस, पुस्तक आदि का प्रबन्ध करते हैं अच्छा अध्यापक उसे पढ़ाता है। अच्छे विद्यालय में प्रवेश पाने से उसे सुविकसित साधनों का लाभ मिलता है। यों यह सहयोग परोक्ष होते हैं, पर विज्ञजन जानते हैं कि छात्र को यदि एकाकी पुरुषार्थ ही करना पड़ता, अभिभावक, अध्यापक आदि का सहयोग न मिलता तो उसकी सफलता संदिग्ध ही बनी रहती।
आत्मिक प्रगति की साधना एवं उसकी सफलता के सम्बन्ध में भी यही बात है। उसके लिए उपयुक्त वातावरण, मार्गदर्शन, संरक्षण एवं वातावरण की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है। वह न मिले तो किये हुए श्रम और प्रयास का सत्परिणाम संदिग्ध ही बना रहेगा। कुशल चिकित्सक के परामर्श बिना मनमाना इलाज यदि रोगी स्वयं ही करने लगे तो बात बनेगी नहीं। औषधि एवं तथ्य जुटाने के लिए भी दूसरों की सहायता अपेक्षित होती है। गन्दगी, सीलन, सड़न के वातावरण में रहने पर भी रोग निवृत्ति कठिन पड़ती है। बीमारी दूर होने का लाभ और श्रेय तो रोग को ही मिलता है पर उसमें चिकित्सक, उपचार सामग्री परिचर्या तथा जलवायु का महत्व भी स्वीकार करना ही होगा।
आत्म कल्याण की साधना को भी मानसिक रुग्णता से परित्राण अथवा व्यायामशाला के सहारे स्वास्थ्य सम्वर्धन जैसा प्रयास माना जा सकता है। उसके लिए आवश्यक सहयोग एवं साधनों की सुविधा चाहिए ही। ब्रह्म वर्चस् आरण्यक में उसी प्रकार की सुविधाएँ जुटाई गई हैं जिस प्रकार कि अस्पतालों, सैनेटोरियमों एवं शोध संस्थानों में होती हैं। उपयुक्त संरक्षण एवं वातावरण में रहने पर जो लाभ मिल सकता है वह घरेलू अस्त−व्यस्तता के बीच रहते हुए मिल सकना सम्भव नहीं हैं। गंगा की गोद, हिमालय की छाया का समन्वय एक प्रकार के साधना लोक ही हुआ। सप्त ऋषियों की तपस्थली होने के कारण इस भूमि में साधना को सफल बनाने वाले सूक्ष्म तत्व पहले से ही मौजूद हैं।
ब्रह्म वर्चस् में रहकर साधना करने और घर रहकर किसी प्रकार पहिया घुमाते रहने से अस्पताल की भरती और चलती फिरती चिकित्सा जैसा अन्तर रहेगा। जो सफलता मिलने में अन्यत्र दस वर्ष लगेंगे। उसे इस उपयुक्त वातावरण में दो वर्ष में भी पूरा किया जा सकेगा।
पूर्ण गायत्री पुरश्चरण 24 लक्ष्य का होता है। यदि छह घण्टे नित्य साधना का जप, केवल उसी एक प्रयोजन में लगे रहा जाय तो इसमें एक वर्ष लगेगा। यदि उस साधना के साथ ब्रह्म विद्या का आत्म विज्ञान भी सुनना समझना हो−लोक साधना का समन्वय रखना हो तो अनुमानतः तीन घण्टे ही चल सकेगा और तीन−तीन घण्टे ब्रह्म विज्ञान और सेवा साधना के लिए रखने होंगे। ऐसी दशा में दो वर्ष का समय लगेगा। यह एक पूर्ण साधना एवं प्रशिक्षण कहा जा सकता है। जिनकी स्थिति इस योग्य हो उन्हें यहीं के वातावरण में रहकर वह तपश्चर्या करनी चाहिए। गंगाजल पीना, गंगा स्नान, आहार सम्बन्धी विशेष प्रतिबन्धों का पालन करने वाले, नियमित प्रकाश एवं अनुदान पाने वाले यह अनुभव करेंगे कि उनकी साधना प्रगति पथ पर द्रुत गति से अग्रसर हो रही है। ब्रह्म वर्चस् का निर्माण जिन दिव्य शक्तियों ने जिस दिव्य प्रयोजन के लिए कराया है वे इस बात के लिए सजग रहेंगी कि उनकी इस प्रयोगशाला में वो उत्पादन हो उसकी क्वालिटी घटिया न रहे। घटियापन में उत्पादित सामग्री से उत्पादन कर्त्ता और कारखाने की सम्मिलित रूप से बदनामी होती है। सामान्य मनुष्य असफलता और बदनामी से बचना चाहते हैं तो ब्रह्म वर्चस् के सूत्र संचालक ही क्यों अपने सिर यह अपयश आने देंगे।
दो माह के सत्रों में 24 लक्ष का नहीं मात्र सवा लक्ष का लघु पुरश्चरण कराया जाता है। उसके साथ योग साधना की पाँच धाराएँ ध्यान, प्राणायाम, त्राटक, नाद एवं मुद्रा आदि को भी जोड़कर रखा जाता है। साधक के स्तर के अनुरूप उसे इन धाराओं के विभिन्न स्तरों का निर्देश देने की व्यवस्था रखी जाती हैं। गायत्री की पंचमुखी उपासना पंचकोष अनावरण एवं कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया योग की इन्हीं धाराओं के विभिन्न प्रकार के संयोगों प्रयोगों से सम्भव है।
ब्रह्म वर्चस् द्वारा वानप्रस्थ परम्परा का पुनर्जीवन प्रधान लक्ष्य है। प्रशिक्षण लगभग उसी स्तर का है। मात्र भजन, पूजन की पर्याप्त नहीं होता। प्रखर साधना में जीवन को पवित्र और परमार्थ परायण भी बनाना पड़ता है। आत्म साधना और लोक साधना का खाद पानी पाकर ही साधना का कल्प वृक्ष बढ़ता और फलता फूलता है। यह तीनों ही प्रयोजनों वानप्रस्थ में सधते हैं। भारतीय संस्कृति का मेरुदण्ड वही है। इसी खदान में ऐसे लोकसेवी निकलते रहे हैं जो व्यक्ति को परिष्कृत और समाज को समुन्नत बना सकने में समर्थ सिद्ध हो सके। आज की साधु संस्थाओं में निठल्ले पड़े रहने, दिन काटते रहने भर की सुविधा तो है, पर वैसी परिस्थितियाँ जिन्हें अस्पताल, विद्यालय के शोध संस्थान एवं प्रयोगशाला की उपमा दी जा सके कदाचित ही कहीं मिलेगी। ब्रह्म वर्चस् ने इस अभाव की पूर्ति की है। अस्तु उसे आज की स्थिति में अनुपम ही कहा जा सकता है।
उपासना, साधनात्मक नियमों के अतिरिक्त ब्रह्म विज्ञान एवं सेवा साधना के अभ्यास क्रम की व्यवस्था एवं रूपरेखा आदर्श वानप्रस्थ के अनुरूप ही बनायी गयी है। जीवन की अगणित धाराओं को माया के भूल भटकाव से बचाकर बनाने के लिए किसे कब किन परिस्थितियों में क्या करना चाहिए यह जाने बिना वानप्रस्थ स्तर के उत्तरदायित्व पूरे नहीं किये जा सकते। सेवा साधना के सूत्रों को जीवन में उतारने का व्यवस्थित अभ्यास भी उसी के अनुरूप होना आवश्यक है, अन्यथा इच्छा और ज्ञान होते हुए भी कुछ करना सम्भव नहीं होगा।
वानप्रस्थ जीवनचर्या अपनाने वालों के लिए लोक−मंगल के धर्म प्रचार का एक उपयोगी तन्त्र भी खड़ा किया जाना है। अन्यथा हर व्यक्ति अपने बूते वह कर भी नहीं सकता। स्वतन्त्र रूप से धर्म प्रचार करने के लिए व्यक्ति को कठिनाई पड़ती है। उसका परिचय कम रहने से कर्मक्षेत्र भी छोटा रहता है और प्रामाणिकता भी संदिग्ध रहती है। मिशन का अंग बनकर धर्म प्रचार के क्षेत्र में उतरने की उपयोगिता एकाकी प्रयत्नों की अपेक्षा सैकड़ों गुनी अधिक है। मिशन का सुविस्तृत कार्यक्षेत्र देश−देशान्तरों में बिखरा पड़ा है। भारत के कोने−कोने में उसका विस्तार है। मिशन की प्रामाणिकता का लाभ उसमें पले पोसे साधकों को सहज ही उत्तराधिकार में मिल जाता है। अधिक व्यापक क्षेत्र में काम करने−अधिक विज्ञ जनों का सहयोग पाने−अधिक लोगों को बीच यश पाने एवं अधिक सेवा करने का जो सुयोग ब्रह्म वर्चस् के साधकों को मिल सकता है; उससे उन्हें वंचित ही रहना पड़ेगा जो अलग−थलग रहकर अकेले ही काम करना चाहते हैं। तिनकों से मिलकर रस्सी और सींकों से मिल कर बुहारी बनने की बात सर्वविदित है। संयुक्त शक्ति सहारे ही बड़े कार्य सम्भव होते हैं। सेना का अंग रहने की स्थिति में किसी योद्धा को अपने पुरुषार्थ को बढ़ा एवं प्रकट करने का जो अवसर मिलता है वह घर रहकर योद्धा बनने के एकाकी प्रयत्न करने वाले को कहाँ मिल सकता है?
जिन्हें चुँचु प्रवेश करना हो जहाँ तहाँ का जैसा तैसा स्वाद चखना हो वे इधर−उधर भटकते हुए आधी अधूरी साधना करते रहें, पर जिन्हें किसी ठोस परिणाम की अपेक्षा है, उन्हें ब्रह्म वर्चस् जैसे साधन सम्पन्न आश्रम में ही अपने सुव्यवस्थित प्रयास चलाने चाहिए।
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जिन दिनों हम अपना जीवनयापन कर रहे हैं वह विशिष्ट समय है। इसमें मानव जाति की दुर्गति−का अगति का−सद्गति में परिवर्तन का प्रयास हो रहा है। दूसरे शब्दों में इसे मनुष्य के भाग्य निर्माण की−विश्व के भविष्य निर्माण की बेला कहना चाहिए। पिछले अन्धकार युग की विकृतियाँ इन दिनों वैज्ञानिक, बौद्धिक और आत्मिक प्रगति का ईंधन पाकर दावानल की तरह भड़क उठी है। ज्वालामुखी विस्फोटों की तरह ऐसे संकट उभर रहे हैं जिनके समाधान सूझ ही नहीं पड़ते। एक जगह से सीना जब तक पूरा नहीं हो पाता तब तक दूसरी दस जगह कथली फट जाती है। सड़े−गले को गलाने की, ढालने की इन घड़ियों में महाकाल की युगान्तरीय चेतना क्रमशः अधिकाधिक प्रखर होती चली जाती है, जिनकी आँखें हो, वे आज ही इस महान् परिवर्तन के पुण्य पर्व का माहात्म्य और महत्व समझ सकेंगे, अन्यथा इतिहासकार तो इस परिवर्तन काल के घटना−क्रम का उल्लेख करेंगे ही और भावी पीढ़ियाँ रुचिपूर्वक उसे पढ़ेंगी ही।
ऐसी सन्धिबेलाओं में ईश्वर की विशेष निधि के रूप में जागृत आत्माओं को अपना विशिष्ट कर्त्तव्य निवाहना पड़ता है। आपत्ति काल में सामान्य नियम नहीं चलते। उन दिनों विशेष निर्धारण होते हैं और विशेष क्रियाकलाप चलते हैं। गाँव आग से जल रहा हो तो सामान्य दैनिक कृत्य नहीं किये जाते। उस समय विशिष्ट परिस्थितियों का सामना करने के लिए जागृतों को जुटना होता है। भले ही इसमें हानि या असुविधा सहनी पड़े।
बृज के ग्वाल−बाल, किष्किन्धा के रीछ−वानर, इन्द्रप्रस्थ के पाण्डव, बुद्ध के परिव्राजक, गाँधी के सत्याग्रही, युग धर्म को समझ सके थे। उनने ईश्वरीय आह्वान को सुना था। तद्नुरूप उनने अपने विशेष स्तर का समझा। विशेष उत्तरदायित्व को अनुभव किया और लोभ, मोह की कृपणता को छोड़कर महामानवों की परम्परा अपनाकर युग धर्म के पालन में जुट गये। चतुरों ने इसमें घाटा बताया और हानि सुझाई। किन्तु भावनाशीलों ने समय की माँग को ईश्वर का आमन्त्रण माना और वे मूर्खों की मण्डली में जा सम्मिलित हुए। इतिहास साक्षी है कि उस समय की उनकी मूर्खता पीछे चरम स्तर की दूरदर्शिता हुई। वे स्वयं धन्य बने। भगवान को प्रिय लगे। असंख्यों ने उनका अनुकरण किया। इतिहास ने उन्हें सराहा। यश ने उन्हें अमर बनाया। सीढ़ियाँ उनके चरणों पर भावभरी श्रद्धांजलियाँ चढ़ाती रहीं। इतनी उपलब्धियों को प्राप्त करने में उन्हें कृपणता के परित्याग का मूल्य तो चुकाना ही पड़ा है। महामानवों को सदा ऐसे ही दुस्साहस भरे निर्णय करने पड़े हैं। परिस्थितियों की रट लगाये रहने वाले को अभीप्सित अनुकूलता न कभी आई है और न कभी आ ही सकेगी। सदाशयता के मार्ग पर चलने में परिस्थितियों की प्रतिकूलता नहीं, मनःस्थिति पर छाई हुई कृपणता ही सबसे बड़ा व्यवधान होती है। जो उसे हटा सके, वे इस तरह युग धर्म के पालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते ही देखे जाते हैं।
जागृत परिजनों को उच्च स्वर से समय ने पुकारा है। अरुणोदय ने जागृति का सन्देश भेजा है। ऊषा की अग्रिम किरणें करवटें बदलते रहने से विरत होकर अँगड़ाई लेने और उठ खड़े होने की चुनौती प्रस्तुत कर रही है। इस पुण्य बेला में असामान्यों को सामान्यों की तरह समय नहीं गुजारना चाहिए। महानता सम्पन्न आत्माओं को तुच्छताग्रस्त प्राणियों जैसी गतिविधि नहीं अपनाये रहनी चाहिए।
नवयुग की चेतना घर−घर पहुँचाने और जन−जन को जागृति का सन्देश सुनाने का ठीक यही समय है। इन दिनों हमारा भूमिका युग दूतों जैसी होनी चाहिए। इन दिनों हमारे प्रयास संस्कृति का सेतु बाँधने वाले नल−नील जैसे होने चाहिए। खाई कूदने वाले अंगद की तरह−पर्वत उठाने वाले हनुमान की तरह−यदि पुरुषार्थ न जगे तो भी गिद्ध गिलहरी की तरह अपने तुच्छ को महान के सम्मुख समर्पित कर सकना तो सम्भव हो ही सकता है। गोवर्धन उठाते समय यदि हमारी लाठी भी सहयोग के लिए न उठी तो भी सृष्टा का प्रयोजन पूर्णता तक रुकेगा नहीं। पश्चात्ताप का घाटा हमें भी सहना पड़ेगा।
साहसिक शूरवीरों की तरह अब नवयुग के अवतरण में अपनी भागीरथी भूमिका आवश्यक हो गई हैं। इसके बिना तपती भूमि और जलती आत्माओं को तृप्ति देने वाली गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतरने के लिए सहमत न किया जा सकेगा।
विनाश की शक्तियाँ प्रबल होती हैं या सृजन अधिक शक्तिशाली होती हैं? यह प्रश्न वाणी से नहीं व्यवहार से- उत्तर से नहीं, उदाहरण से- अपना समाधान माँगता है। यह देवत्व की प्रतिष्ठा का सवाल है। हमें सृजन की समर्थता सिद्ध करनी होगी, ताकि संव्याप्त निराशा में आशा का आलेग उग सके। कोई आगे नहीं चलेगा तो पीछे वालों का साहस कैसे जगेगा? व्यवसायी की बुद्धि लेकर नहीं, शूरवीरों की साहसिकता को अपनाकर ही हमें वह करने का अवसर मिलेगा, जो अभीष्ट आवश्यक, उपयुक्त ही नहीं विशिष्ट आत्माओं के प्रस्तुत अवतरण का लक्ष्य भी हैं।
युग सृजन के पुण्य प्रयोजन की योजना बनाते रहने का समय बीत गया, अब तो करना ही करना शेष है। विचारणा को तत्परता में बदलने की घड़ी आ पहुँची। भावनाओं का परिपाक सक्रियता में होने की प्रतीक्षा की जा रही है। असमंजस में बहुत समय व्यतीत नहीं किया जाना चाहिए।
लक्ष्य विशाल और विस्तृत है। जन-मानस के परिष्कार के लिए प्रज्वलित ज्ञान-यज्ञ के, विचार क्रान्ति के, लाल मशाल के टिमटिमाते रहने से काम नहीं चलेगा। उसके प्रकाश को प्रखर बनाने के लिए जिस तेल की आवश्यकता है वह जागृत आत्माओं के भाव भरे त्याग बलिदान से ही निचोड़ा जा सकेगा। मनुष्य में देवत्व का उदय, संसार के समस्त उत्पादनों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण उपार्जन है। इस कृषि कर्म में हमें शीत, वर्षा की परवा न करते हुए निष्ठावान कृषक की तरह लगना चाहिए। धरती पर स्वर्ग का अवतरण नया नन्दन वन खड़ा करने के समान है। निष्ठावान माली की तरह हमारी कुशलता ऐसी होनी चाहिए जिससे सृष्टा के इस मुरझाये विश्व उद्यान में बसन्ती बहार ला सकने का श्रेय मिल सके। ऐसी सफलता लाने में खाद, पानी जुटाने से ही काम नहीं चलता उसमें माली को अपनी प्रतिभा भी गलानी, खपानी पड़ती है। भूमि और पौधों के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने वाले किसान और माली की तरह ही हमें देवत्व के उद्भव और स्वर्ग के अवतरण में जागृत आत्माओं को अपनी श्रद्धा और क्षमता का समर्पण प्रस्तुत करना होगा।
राज क्रान्ति का काम साहस और शस्त्र बल से चल जाता है। आर्थिक क्रान्ति साधन और सूझ-बूझ के सहारे हो सकते हैं। यह भौतिक परिवर्तन है जिनके लिए भौतिक साधनों से काम चल जाता है। हमें बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्रान्ति की त्रिवेणी का उद्गम खोजना और संगम बनाना है। इसके लिए चरित्र, श्रद्धा और प्रतिभा के धनी दधीचि के वंशजों को ही आगे आना और मोर्चा सम्भालना है। भवन, पुल, कारखाने आदि को वस्तु शिल्पी अपनी शिक्षा के सहारे बनाने में सहज ही सफल होते रहते हैं। हमें नये व्यक्ति, नये समाज और नये युग का सृजन करना है। जागृत आत्माओं का भाव भरा अनुदान ही यह प्रयोजन पूरा कर सकता है। इसकी याचना करने किसके पास जाया जाय? जिनके पास भावना है ही नहीं, जो कृपणता के दलदल में एड़ी से चोटी तक फंसे पड़े हैं उन दयनीय लोगों से क्या याचना की जाय? कर्ण जैसे उदार व्यक्ति ही मरणासन्न स्थिति में अपने दाँत उखाड़ कर देते रहे हैं, हरिश्चन्द्रों ने ही अपने स्त्री, बच्चे बेचे हैं। लोभग्रसितों को तो कामनाओं की पूर्ति कराने से ही फुरसत नहीं, देने का प्रसंग आने पर तो उनका कलेजा ही बैठने लगेगा।
व्यक्ति, परिवार और समाज की अभिनव रचना के लिए न तो साधनों की आवश्यकता है और न परिस्थिति के अनुकूल होने की। उसके लिए ऐसी प्रखर प्रतिभाएँ चाहिए जिनकी नसों में भाव भरा ऋषि रक्त प्रवाहित होता हो। चतुरता की दृष्टि से कौआ सबसे सयाना माना जाता है। शृंगाल की धूर्तता प्रख्यात है। मुर्दे खोद खाने में बिज्जू की कुशलता देखते ही बनती है। खजाने की रखवाली करने वाला सर्प लक्षाधीश होता है। भावनात्मक सृजन में तो दूसरी ही धातु से ढले औजारों की आवश्यकता है। आदर्शों के प्रति अटूट आस्था की भट्टी में ही ऐसी अष्टधातु तैयार होती है। आवश्यकता ऐसे ही व्यक्तित्वों की पड़ रही है जो अष्ट धातु के ढले हैं। लोक सेवा का क्षेत्र बड़ा है उसके कोंतरों में ऐसे कितने ही छद्म वेषधारी वंचक लूट-खसोट की घात लगाये बैठे रहते हैं, पर उनसे कुछ काम तो नहीं चलता। प्रकाश तो जलते दीपक से ही होता है।
युग-निर्माण परिवार में ऐसी जागृत आत्माओं की कमी नहीं-जिनके पास संचित सुसंस्कारिता की पूँजी प्रचुर परिणाम में विद्यमान है। भावना, निष्ठा और प्रतिभा की भी उनमें कमी नहीं। परिस्थितियाँ भी इतनी प्रतिकूल नहीं कि युग की पुकार पर कुछ अनुदान प्रस्तुत कर सकना उनके लिए सम्भव ही न हो। कठिनाई एक ही है- ‘कार्यण्य दोषापहत स्वभाव........’ का बोझ इतना लदा दीखता है जिसे उतारना बन नहीं पड़ रहा है। यह कठिनाई अवास्तविक है। लगभग वैसी ही अवास्तविक जैसी कि छोटे मुँह के घड़े में से चने निकालते समय बंदर मुट्ठी बाँध लेता है और अनुभव करता है उसे घड़े से बाँध लिया। मनः स्थिति बदले तो परिस्थितियाँ हजार मार्गों से अनुकूल बनने का उपाय खोज निकालती हैं। खोजने वाले ईश्वर को खोज लेते हैं फिर युग पुकार के अनुरूप कुछ कर सकने के लिए कोई रास्ता न मिले यह कैसे हो सकता है?
जीवन के इस अन्तिम अध्याय में मिशन के सूत्र संचालकों का मन है कि परिवार की जागृत आत्माओं को साथ रखने और उनके साथ रहने का अवसर मिल सके तो कितने प्रसन्नता रहे। यह सान्निध्य मोहवश नहीं वरन् उद्देश्य की पूर्ति के लिए ही अभीष्ट है। साथ रहने और साथ काम करने से प्राण ऊर्जा का आदान-प्रदान होता है। दूर से तो चमक ही पहुँच पाती है, गर्मी देने और प्राप्त करने के लिए तो समीपता की ही भूमिका प्रधान होती हैं। आग और ईंधन दूर-दूर रहें तो दोनों के बीच एकता-एक रूपता कहाँ उत्पन्न हो सकती है।
पुनर्गठन वर्ष को-बसन्त पर्व को जागृत आत्मा अपने लिए विशेष उद्बोधन की-विशेष आमन्त्रण की-बेला समझें। जिनमें युग शिल्पियों की मण्डली में सम्मिलित होने की अन्तःप्रेरणा उमगें, वे इसे ईश्वरीय आमन्त्रण समझें, साहस समेटें और आगे बढ़ने की बात सोचें। जिन्हें आगे बढ़ना हो तो समय की प्रतीक्षा न करें- परिस्थितियों की आड़ न लें। आदर्शों के अपनाने का शुभ मुहूर्त आज का ही होता है। कल की प्रतीक्षा में बैठे रहने वालों की कल तो मरण के उपरान्त ही आती है।
शान्ति-कुंज का आह्वान और वातावरण उनके लिए भाव-भरे हाथ और दुलार भरा अंचल पसारता है- जो नवयुग की अवतरण बेला में अपनी गरिमा को जीवन्त करने और प्रखरता का परिचय देने में समर्थ हैं। चरित्रवान, भावनाशील एवं कर्मनिष्ठ परिजनों को बसन्त पर्व पर अपने भीतर प्रखर आदर्शवादिता उगाने का युग आमन्त्रण प्रस्तुत है। अपनी आदर्शवादिता प्रमाणित करने का अपना चरण ही विश्व को परिवर्तित होने की प्रेरणा दे सकेगा।
शान्ति-कुंज, ब्रह्म वर्चस् एवं गायत्री नगर की त्रिवेणी का तट परिवार की जागृत आत्माओं को यहाँ के प्राणवान वातावरण में थोड़े या अधिक समय रहने का आमन्त्रण इन पंक्तियों के माध्यम से भेजा जा रहा है। जो इसे स्वीकार कर सकेंगे वे प्रसन्नता अनुभव करेंगे और उस प्रसन्नता को विकसित करके समस्त संसार में प्रगतिशीलता बिखेरेंगे। अपेक्षा और प्रतीक्षा ऐसे ही साहसिक अग्रगमन की जागृत एवं जीवन्त आत्माओं से की जा रही है।
वानप्रस्थ परम्परा भारतीय संस्कृति का मेरुदण्ड है। परिष्कृत व्यक्तित्व और समाज की संरचना इसी पुण्य प्रक्रिया के आधार पर चलती रही है। हममें से प्रत्येक को ढलती आयु में परमार्थ प्रधान जीवनयापन के लिए वानप्रस्थ की तैयारी करनी चाहिए।
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भौतिक जीवन में लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति के लिए ही विविध-विधि जाल जंजाल रचे जाते रहते हैं और उन्हीं की लिप्सा लालसाओं में यह सुरदुर्लभ मनुष्य जीवन निरर्थक विडम्बना की तरह समाप्त हो जाता है। यह तृष्णाएँ कौन कितनी तृप्त कर सका है? यह पूछने पर रावण, सहस्रबाहु, हिरण्याक्ष, सिकन्दर जैसे पराक्रमियों को भी यही कहना पड़ा है कि आग को घी डाल-डालकर बुझाने की बहुत चेष्टा की, पर उसमें सफलता मिलना तो दूर उलटे उद्विग्नता ही बढ़ती गई। इसके अतिरिक्त क्षुद्र प्राणियों का तो और हो ही नहीं सकता। एषणाओं से संत्रस्त मनुष्य मृग-तृष्णाओं में भटकता रहता है। वासना, तृष्णा, अहंता में से एक की भी तृप्ति नहीं होती। आशा दीखती भर है, हाथ तो निराशा ही लगती है। अनीति अपनाये रहने पर भी अभीष्ट परिमाण में धन नहीं मिलता। उपभोग के कुचक्र में उलटा शरीर ही गलता जाता है। जिन कुटुम्बियों को प्रसन्न करने के लिए कोल्हू के बैल की तरह साधन जुटाने में खपते रहना पड़ा वे कृतघ्नता का ही परिचय देते हैं। अहंकार तृप्त करने के लिए रची गई विडम्बनाएँ समय और धन तो बहुत खर्च करा लेती हैं, पर बदले में चापलूसों की झूठी वाहवाही के अतिरिक्त वस्तुतः व्यंग, उपहास, अनादर, अविश्वास, द्वेष, तिरस्कार जैसे दुःखद तत्व ही हाथ लगते हैं।
आध्यात्मिक जीवन में आत्मिक लाभ तो सुनिश्चित ही है। भौतिक लाभ भी ऐसे है जिन्हें मायाग्रस्त अदूरदर्शी क्षुद्रजनों की तुलना में कहीं अधिक पाया जा सकता है। जागृत आत्माओं को युग आमन्त्रण मिला है। वे यदि उसे स्वीकार करती हैं तो भौतिक दृष्टि से भी घाटे में नहीं रहतीं। सच तो यह है कि कसौटी पर भी वे अधिक लाभान्वित होती और अधिक बुद्धिमान सिद्ध होती है।
सादगी के साधु जीवन में आर्थिक मितव्ययिता अपनानी पड़ती है और स्वादेन्द्रियों पर अंकुश करना पड़ता है। इसका प्रतिफल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के सुधार रूप में तत्काल दृष्टिगोचर होता है। विलासी अपव्यय में पैसा और समय ही नहीं शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक सन्तुलन भी नष्ट होता है। संयम के बदल सम्मान बरसता है। इस तथ्य को हर कसौटी पर कसा जा सकता है। प्रामाणिकता, आदर्शवादिता और शालीनता का समन्वय ही संयम है। यह व्यावहारिक जीवन की तपश्चर्या है। तपस्वी को कितने ही प्रकार के आन्तरिक और भौतिक लाभ मिलते हैं। शान्ति-कुंज को घर बनाने वाले पहले दिन से ही यह लाभ उठाने लगेंगे।
रोटी, कपड़ा और मकान के अतिरिक्त न तो किसी की कोई वास्तविक आवश्यकता है और न इसकी सीमित मात्रा के अतिरिक्त किसी के लिए अधिक उपभोग करना सम्भव होता है। अनावश्यक संग्रह उत्तराधिकारियों को दुर्गुणी बनाने के अतिरिक्त और किसी काम नहीं आता। दस रोटी, दस गज कपड़ा और रहने के लिए छाया के अतिरिक्त किसी के लिए और कुछ उपभोग कर सकना सम्भव ही नहीं हो पाता। उतना प्रबन्ध जब आत्मदानी भी प्राप्त कर सकते हैं, अधिक निश्चिन्ततापूर्वक बिना अनीति अपनाये जब निर्वाह साधन मिल सकते हैं तो इसमें घाटा क्या रहा? पाप और पतन का, खीज और उद्वेग का, चिन्ता और आशंका का बोझ ही उतरा। शान्ति की खोज सबको है। यह शान्ति एकान्त में नहीं निश्चिन्तता की स्थिति में ही मिलती है। इस स्थिर शान्ति की उपलब्धि आध्यात्मिक जीवन अपनाने में जितनी अधिक मिल सकती है उतनी और किसी प्रकार नहीं।
स्त्री, बच्चों के सुख-सुविधा की, उज्ज्वल भविष्य की, चिन्ता तो सभी करते हैं, पर यह जानते नहीं कि उन्हें वस्तुतः सुखी और समुन्नत कैसे बनाया जा सकता है? तथ्य यह है कि सद्विचारों और सुसंस्कारों की सम्पदा के सहारे ही मनुष्य सुखी रहता और प्रगतिशील बनता है। दूसरों के अनुदान पर किसी का भी भविष्य उज्ज्वल नहीं हो सका है। जो उठा है अपने ही बलबूते खड़ा हुआ और बढ़ा है। सज्जनता, श्रमशीलता, मितव्ययिता, सहकारिता, सुव्यवस्था के पंच रत्न जिन शिक्षण में-जिस वातावरण में मिल सकें उसमें रहने पर हर व्यक्ति दिन-दिन ऊँचा उठेगा, आगे बढ़ेगा। परिवार को अपंग समझना और उनके लिए सुविधाएं जुटाते रहने में खपना व्यर्थ है। सुशिक्षित और स्वावलम्बी बनाकर ही अपने आश्रितों का वास्तविक हित साधन किया जा सकता है।
ऐसी व्यवस्था हर कोई अपने बलबूते नहीं बना सकता। क्योंकि कहीं न तो वैसा प्रचलन है, न वातावरण, न साधन। यह सुव्यवस्था आत्मदानियों के लिए गायत्री नगर में उपलब्ध हो सकती है। जो यहाँ बसेंगे उनकी महिलाओं को आजीवन-नियमित रूप से शिक्षा प्राप्त करते रहने का अवसर मिलेगा। शिक्षा के लिए महिलाएँ तरसती रहती है, पर उन्हें व्यस्त एवं प्रतिबन्धित स्थित में उसके लिए अवसर ही नहीं मिलता। गायत्री नगर में यह व्यवस्था की जा रही है कि आश्रम में रहने वाली हर महिला सीमित समय में अपना घरेलू काम-काज निपटालें और न्यूनतम चार घण्टा अपने महिला विद्यालय में पढ़ने जाया करे। इस क्रम को अपनाये रहने पर अगले दस वर्ष में उसकी शिक्षा किस स्तर तक जा पहुँचेगी इसकी कल्पना करने भर से चित्त में उत्साह भर जाता है।
अपनी महिला शिक्षा मात्र स्कूली पढ़ाई तक सीमित नहीं है। उसके साथ स्वावलम्बन के लिए कुटीर उद्योगों की कक्षाएं भी चला करेंगी। अभी तो इतना ही प्रबन्ध है कि समय पड़ने पर वे कुछ कमा सकने की योग्यता प्राप्त कर ले, पर पीछे ऐसा प्रबन्ध किया जायेगा कि जापान में जिस तरह घर-घर कुटीर उद्योग चलते हैं, उस तरह छोटी-छोटी मशीनों के सहारे बचे हुए समय में कुछ कमा सकने की व्यवस्था बन जाय। यह स्वावलम्बन की क्षमता उत्पन्न कर देना उत्तराधिकार में धन छोड़ जाने से अधिक उत्तम और अधिक सुनिश्चित है।
महिला शिक्षा में नारी के व्यक्तित्व का सर्वतोमुखी विकास, शिशु निर्माण, घर की सुव्यवस्था, परिवार में सघन स्नेह, सौजन्य को न केवल पुस्तकों से वरन् व्यावहारिक परामर्श से भी (इन तथ्यों को ) समझाया हृदयंगम कराया जाता रहेगा। दैनिक जीवन में आने वाली समस्याओं के समाधान के माध्यम से आदर्शवादी शिक्षण का दुहरा लाभ होता है। सत्परामर्श को अपनाने से तत्काल किस प्रकार कितना लाभ होता है इसे प्रत्यक्ष देख लेने पर शालीनता के सिद्धान्त जितनी अच्छी तरह हृदयंगम होते हैं उतने और किसी प्रकार नहीं।
अपनी शाक-वाटिका लगाना और अपने लिए फल शाक उगाना हर परिवार को सिखाया जायगा। इसके लिए उन्हें जमीन मिलेगी। यह भी एक प्रकार का शिशु पालन जैसा मनोरंजन ही है। व्यायाम, ड्रिल, लाठी आदि शस्त्र संचालन, खेल-कूल के साधन रहने से महिलाओं का स्वास्थ्य सुधरना स्वाभाविक है। खुली धूप, खुली वायु, गंगा तट, हिमालय का आरोग्य वर्धक वातावरण इस पर भी समूचे नगर में शालीनता की परम्परा। इन परिस्थितियों में रहने वाले बिना किसी अतिरिक्त प्रयत्न के सुखी रहते और समुन्नत बनते देखे जा सकते हैं। ओछे वातावरण से जहाँ दिन-रात क्लेश, कलह, ईर्ष्या, द्वेष, निंदा, चुगली, बहकावा, फुसलावा, कुसंग, कुकर्म, व्यसन, प्रमाद, विलास, अपव्यय की जो पतनोन्मुखी प्रवृत्तियां छाई रहती है, उनका अभाव रहने से सहज ही ऐसा अनुभव होगा कि किसी भाव भरे स्वर्गलोक में जीवित रहते हुए ही रहने का अवसर मिल गया।
आत्मदानियों को नये बच्चे उत्पन्न न करने के लिए कहा गया है, पर जो हैं उनकी शिक्षा स्वस्थता और संस्कारिता की समुचित व्यवस्था रहेगी। गायत्री नगर में ही बाल विद्यालय रहेगा, जिसमें अक्षर ज्ञान से लेकर हाई स्कूल तक की पढ़ाई अपने ही आश्रय में रहेगी। स्कूली परीक्षाएँ दिलाई जाती रहेंगी किन्तु पाठ्य-पद्धति पूरी अपनी ही रहेगी। इसे विशुद्ध गुरुकुल शैली की शिक्षा प्रक्रिया समझा जा सकता है। इस नगर में शिक्षण पाये हुए बालक-बालिकाओं के विवाह एवं स्वावलम्बन की चिन्ता उनके अभिभावकों को नहीं करनी पड़ेगी। मिशन का उत्पादन होने से किसी के कन्धे पर लादने की चेष्टा नहीं करनी पड़ेगी वरन् अपनी विशेषताओं के कारण सहज ही अपनी उपयोगिता सिद्ध करेंगे। उनकी माँग, आवश्यकता सर्वत्र रहेगी उनके लिए सम्मान और सहयोग का कहीं अभाव नहीं रहेगा। बच्चों की चिन्ता व्यक्ति को होनी स्वाभाविक है क्योंकि उसका स्तर और दायरा सीमित है। मिशन व्यक्ति से बड़ा है, समर्थ है, सम्मानित है, प्रामाणिक है। उसके बच्चों का भविष्य कैसा होगा? इसकी चिन्ता से अभिभावक पहले दिन से ही मुक्त हो सकते हैं और यह भार मिशन पर पूरी तरह छोड़ सकते हैं।
भौतिक जीवन में लोभ, मोह और अहंकार यही तीन आवेश उन्माद मनुष्य पर छाये रहते हैं और उन्हीं की पूर्ति के लिए व्यस्त रहना पड़ता है। युग-निर्माण मिशन के सहारे आध्यात्मिक जीवन आरम्भ करने वालों की यह तीनों ही समस्याएं उद्धत तरीके से तो नहीं, पर शालीनता को विधि-व्यवस्था के साथ सहज ही पूरी हो जाती है। गुजारे के लिए औसत भारतीय के स्तर पर निर्वाह करना हो तो खर्च की कमी नहीं पड़ने वाली है।
संचित पूँजी को बैंक में डालकर उसके ब्याज से गुजारा करने वाले ही अभी प्रथम चरण में बुलाये गये हैं। उसमें कुछ कमी पड़ती दीखेगी तो उसकी पूर्ति मिशन भी कर सकता है। अपनी कमाई घर वालों के लिए छोड़कर-दान के पैसे से गुजारा करने की चतुरता बरतने वालों के लिए पहले से ही द्वार बन्द है आत्मदानी का मतलब मुफ्त में प्रचुर साधन पाना और मौज उड़ाना नहीं हैं। वरन् यह भी है जो साधन मौजूद हैं उनसे गुजारा किया जाय। यही बात मोह के सम्बन्ध में भी है। स्त्री बच्चों को विलासी बनाकर प्रसन्न करना हो तो बात दूसरी है अन्यथा वे इस वातावरण से रहकर उससे कहीं अधिक सुखी और समुन्नत बनेंगे जैसा कि मोहग्रस्त व्यक्ति उनके लिए सोचते हैं। इस तरह लोभ और मोह दोनों से ही निवृत्ति, तृप्ति और पूर्ति हो जाती है।
तीसरा भौतिक प्रयोजन बचता है अहंकार। इसे प्रकारान्तर से सम्मान पाने की आशंका ही कहना चाहिए जो ओछे मनुष्य उद्धत तरीके अपनाकर पूरा करते हैं। शृंगार, व्यसन, फिजूलखर्ची, ठाट-बाट, शान-शौकत, राजकाज, बात-बात में नौकर, वाहन, वैभव आदि के सहारे ओछे लोग दूसरों पर अपनी अमीरी की छाप डालते हैं और बड़े आदमी समझे जाने की अपेक्षा करते हैं। इसी प्रकार ऐंठ, अकड़, आतंक, आक्रमण, उद्धत आचरण, शक्ति प्रदर्शन करके अपने को सामर्थ्यवान सिद्ध करते हुए देखे जाते हैं। गुण्डागर्दी और फिजूलखर्ची के पीछे अहंकार की पूर्ति ही ललकती दिखाई पड़ती है। इस मार्ग को अपनाने वाले पाते कुछ नहीं, खोते बहुत हैं। दरिद्रता और अप्रतिष्ठा ही उनके हाथ लगती है।
अध्यात्म जगत की गतिविधियाँ अपनाते ही-उसकी घोषणा करते ही-मनुष्य लोक-श्रद्धा का भाजन बनता है। घाटा होने की बात सोचकर मोहग्रस्त सम्बन्धी इसे मूर्खता बताते और रोकते देखे जाते हैं किन्तु आदर्शवादी साहसिकता के मार्ग नत-मस्तक वे भी होते हैं। जबकि हर व्यक्ति लोभ, मोह में डूबा पड़ा है तब जो व्यक्ति अपनी क्षमताएँ लोकहित के लिए अर्पित करेगा वह सहज ही श्रद्धा भाजन बनेगा। साधु और ब्राह्मण सदा से पृथ्वी के देवता भूसुर-कहे जाते रहे हैं। आज उनके वंशजों में वे विशेषताएँ न मिलने पर भी वरिष्ठता मिलती है। लोकसेवियों को धर्मोपदेशकों को सदा उच्च स्थान मिलता है। आदर की दृष्टि से देखा जाता है और जहाँ भी वे जाते हैं भाव-भरा अभिनन्दन पीछे-पीछे, फिरता पाते हैं- (1) लोकसम्मान (2) आत्मसन्तोष (3) परमार्थ संचय (4) उज्ज्वल परलोक (5) ईश्वर का अनुग्रह (6) चिरस्थायी यश (7) युग शिल्पियों का गौरव यह सात लाभ ऐसे हैं जिसमें अहंकार की तो नहीं, पर आत्म-गौरव की-आत्म-सम्मान की उपलब्धि बड़ी मात्रा में सहज ही प्राप्त हो जाती है। उद्धत अपव्यय अनुचित संग्रह और उच्छृंखल आतंकवाद का आश्रय लेकर अहंकार की पूर्ति निरर्थक भी है और अनर्थ मूलक भी। किन्तु आदर्शवादिता का परिचय देने में जो घाटा सहा और कष्ट उठाया जाता है उसके बदले में इतना आत्म-सन्तोष मिलता है कि वह खरीद किसी भी प्रकार महंगी प्रतीत नहीं होती।
अनुभवहीनता एवं वस्तुस्थिति का सही चिन्तन न कर सकने वाले ही आदर्शवादिता का मार्ग अपनाने में घाटा और मोहग्रस्त जीवन-क्रम बनाये रहने में नफा सोचते हैं। वस्तुतः यह उनका भ्रम है। लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति भी सच्चे अर्थों में उत्कृष्टता अपनाकर ही पाई जा सकती है। जागृत आत्माओं को युग का निमन्त्रण स्वीकार करने में घाटा प्रतीत हो सकता है, पर है उसमें हर दृष्टि से लाभ ही लाभ।
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अन्तघंट से ममता का मधु, तू रात-दिवस छलकाता चल। रे! जीवन-तत्व लुटाता चल॥
जब पीर कहीं गहरायी हो। जब आँख कहीं भर आयी हो॥ अपने आंचल से अरुण कपोलों पर के अश्रु सुखाता चख। रे! जीवन-तत्व लुटाता चल॥
कोई भावुक मवडडडड प्यासा हो। या गयी असीम निराशा हो॥ अपने उर से, आशा-उछाह-विश्वास वहां बरसाता चल। रे! जीवन-तत्व लुटाता चल॥
कोई उर दिखे अभाव ग्रस्त। जकडडडड की कुण्ठा से बहुत त्रस्त॥ अपने उदार सम्वेदन से उसके दुःख-दर्द मिटाता चल। रे! जीवन-तत्व लुटाता चल॥
जो हृदय बन गया हो मरुथल। चाहिए जिसे हो जल-शीतल॥ अपनी करुणा की गंगोत्री, उस हृदय हेतु सरसाता चल। रे! जीवन-तत्व लुटाता चल॥
-माया वर्मा
*समाप्त*