देवता

“देवो दानाट् द्योतनाद् दीपना द्वा” के अनुसार समाज को देने वाला, समाज की सहायता व रक्षा करने वाला ही देवता माना गया है। देवता वह जो औरों को दे। जो व्यक्ति अपनी ज्ञानाग्नि से अपने समस्त कषाय−कल्मषों को जला कर स्वयं प्रकाशरूप हो, दूसरों के अन्धकारमय जीवन को “प्रकाशित” करता हो, अपने ज्ञान से दूसरे भूले−भटकों को मार्ग दिखाता हो तथा इस तरह पूरे समाज का सत्पथ प्रदर्शक बने उसे ही “देवता” माना जाता है।

अपने में निहित शक्ति की उपयोगिता जगती में सिद्ध कर सूर्य, चन्द्र वायु, अग्नि आदि ने ‘देवता’ की संज्ञा प्राप्त की है। यह निरन्तर देते रहते हैं। सृष्टि में विद्यमान चेतना और वैभव सब इन्हीं देवशक्तियों की देन है। इस उत्सर्ग की भावना ने ही उन्हें यह पदवी दिलाई। “देवत्व” ने ही सूर्य चन्द्र आदि को “देवता” के रूप निरूपित किया अन्यथा स्थूल रूप में तो ये ग्रह उपग्रह पिंड आदि ही वैज्ञानिकों द्वारा माने गये हैं।

जिन प्रकाश−पुँज व्यक्तित्वों के व्यवहार्य सिद्धान्तों एवं कृतित्व से संतप्त प्राणियों को मार्ग मिले, उसके कषाय−कल्मषों को दूर करने की प्रेरणा मिले, सांसारिक कष्टों से मुक्ति पाने का पथ−प्रशस्त हो वे “देव तुल्य “ ही माने जाकर सम्मानजनक स्थान प्राप्त करते हैं।

देवता होने के लिए मात्र ज्ञान व शक्ति का पुँज होना ही पर्याप्त नहीं, वरन् अपनी शक्ति व ज्ञान से लोक−मंगल व लोक−निर्माण के कार्य करना भी है अपनी शक्तियों का लोक−मंगल में उत्सर्ग किये बिना कोई भी देवता नहीं बन सकता।

—डॉ. राधाकृष्णन्

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संगति का प्रभाव, परिणाम!

ऐसे मनस्वी संसार में कम हैं जो अपनी उत्कृष्ट विशेषताएँ अनुपयुक्त व्यक्तियों तथा वातावरण में भी अक्षुण्ण बनाये रह सकें। अधिकतर लोग ऐसे होते हैं जो वातावरण से प्रभावित होते हैं। दुर्बल एवं सामान्य मनःस्थिति पर सम्पर्क एवं वातावरण ही अपना प्रभाव छोड़ता है। दर्पण के सामने जो भी दृश्य उपस्थित होता है उसी का प्रतिबिम्ब दीखने लगता है। जैसे लोगों के बीच रहा जाता है सामान्य व्यक्ति उसी प्रभाव से प्रभावित होता है और हवा के साथ उड़ने लगता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हर व्यक्ति को अपने सम्पर्क क्षेत्र के सम्बन्ध में अत्यन्त सतर्क रहना चाहिए। अवांछनीय तत्वों से बचना चाहिए। सत्सम्पर्क बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। कुसंग से तो सर्प की तरह बचना चाहिए उससे सब प्रकार हानि ही हानि है। शास्त्र कहता है—

यदि संतं सेवेति यद्यसंतं तपस्विनं यदि स्तेनमेव। वासो यथा रंगवशं प्रयाति तथा स तेषां वशमुभ्यपैति॥

—लिंग पुराण

मनुष्य सज्जन, असज्जन, तपस्वी या चोर जिस किसी की भी संगति में रहता है, जिस प्रकार वस्त्र रंग में रंग जाता है उसी प्रकार वह मानव वह साथ रहने वाले मनुष्य के समान बन जाता है।

श्रीमद्भागवते भाग्योदयेन बहुजन्मसमर्जितेन सत्संगमं च लभते पुरुषो यदा वै। अज्ञानहेतुकृतमोह−महांधकारनाशं विधाय हि तदोदयते विवेकः॥

—भागवत

यदि भाग्य से किसी को सज्जनों की संगति प्राप्त हो जाय तो अज्ञान रूपी अन्धकार से छुटकारा मिलता है और विवेक रूपी प्रकाश का उदय होता है।

सत्संगतिः कथय किं न करोति पुंसाम्।

—नीति

सज्जनों की संगति से क्या−क्या सत्परिणाम प्राप्त नहीं होते?

लघुर्जनः सजुनसंग संगात् करोति दुस्साध्यमपि सुसाध्यम्। पुष्पाश्रयाच्छंभुशिरो धिरूढ़ा पिपीलिका चुम्बति चन्द्र विम्बम्।

—नीति सुधाकर

छोटे मनुष्य भी श्रेष्ठ जनों के साथ कठिन कार्यों को सरल बना लेते हैं। चींटी फूल का सहारा लेकर देवता के अधरों का चुम्बन करती है।

येषां त्रीण्यवदातानि विद्या योनिश्च कर्म च। तान् सेवत्तैः समास्या हि शास्त्रेभ्योऽपि गरीयसी॥

महा भा.वन. 1-26

“जिन महापुरुषों के विद्या, वंश और कर्म श्रेष्ठ हों उनकी सेवा में रहना चाहिए। उनके साथ उठना−बैठना शास्त्रों के स्वाध्याय से भी महत्वपूर्ण है।”

निसंगता मुक्तिपदं यति नां संगाद्शेषाः प्रमवन्ति दोषाः आरुढ़ योगोऽपि निपात्यते ऽ धः संगेन यागी किमु ताल्ष सिद्धिः॥

—(स्मृति)

“यतियों का संग (आसक्ति) रहित होना मुक्ति का स्थान है। संग से ही समस्त दोष पैदा होते हैं। योगारूढ़ भी संग से अधोगति को प्राप्त होते हैं, तो फिर अल्प सिद्धि वाला अपक्व योगी की तो बात ही क्या है।”

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सर्वशक्तिमान माता−पिता की संतान

जिनमें एक ही प्रकार के गुण हों ऐसे तत्वों की कुल संख्या अब मुश्किल से 101 तक पहुँची है। किन्तु विभिन्न परिणाम, ताप और वायु−दबाव आदि के साथ भिन्न−भिन्न, तत्वों के मिश्रण से अब तक लगभग आठ लाख यौगिकों के निर्माण की पुष्टि हो चुकी है। यह विचित्र बात है कि तत्व परस्पर मिलकर एक ऐसी विलक्षण तीसरी रचना उत्पन्न कर देते हैं जिनमें न माँ के गुण हों न बाप के फिर भी माँ−बाप विद्यमान दोनों ही रहते हैं।

उदाहरण के लिए हाइड्रोजन व ऑक्सीजन दोनों ही गैसें हैं। दोनों ही ज्वलनशील हैं, किन्तु जब यही दोनों मिलकर एक हो जाते हैं तो न केवल वे गैस से तरल स्थिति में आ जाते हैं अपितु जलाने की अपेक्षा उसका गुण बुझाने का हो जाता है। इस स्थिति में ज्वलनशीलता नष्ट नहीं होती अपितु वह भीतर रहकर पोषण और शक्ति का आधार बन जाती है।

मनुष्य भी इसी तरह परमात्मा व प्रकृति, विचार सत्ता तथा पदार्थ सत्ता दोनों की समन्वित सत्ता है। देखने में उसमें न परमात्मा का−सा उच्च प्रकाश है। न गति ऊर्जा, सक्रियता और सम्वेदनशीलता न ही पूरी तरह जड़ता के गुण, इसी कारण उसे त्रैत् संज्ञा अर्थात् जीव नाम से सम्बोधित किया जाता है। दोनों ही शक्तियाँ हमारे अन्दर हैं, हम चाहें तो परमात्मा तत्व को जागृत कर महापुरुषों की श्रेणी में पहुँचने का सम्मान प्राप्त कर लें या भौतिक गुरुता विकसित कर आर्थिक, औद्योगिक, स्वास्थ्य, खेलकूद, शिक्षा आदि किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति कर अपना भौतिक जीवन और भी सुखी समुन्नत बना लें। दोनों को सन्तुलित रखकर भी क्रमशः आत्मोन्नति की सीढ़ियाँ पार की जा सकती हैं। एक दिशा यह भी है कि अपनी तामसिक प्रवृत्तियों में ही पड़े रहकर कृमि−कीटकों का-सा परवर्ती और पीड़ितों जीवन जियें। यह सब मनुष्य के अपने वंश की बात है, वह कंचन बने या काँच।

प्रख्यात वैज्ञानिक सर जे.जे. टामसन ने हिसाब, लगाकर बताया है कि यदि किसी एक परमाणु के भीतर जो शक्ति संगठित है, वह बिखर जाय, तो क्षणांश में ही लन्दन जैसे घने बसे तीन बड़े शहर राख हो जायँ। यह विद्युदणुओं की शक्ति पर आधारित गणना थी। अब पता चला है कि इन विद्युदणुओं की मूल इकाई अति सूक्ष्म प्रकाशाणु हैं। उनकी शक्ति अनेक गुना अधिक है।

इन तथ्यों से पता चलता है कि हम मानसिक दुश्चिन्ताओं से, भौतिक आकांक्षाओं, लालसाओं से जितने हल्के रहते हैं उतने ही शक्तिशाली और श्रेष्ठ बनते हैं। हमारे भीतर एक शक्ति सम्पन्न राक्षस भी बैठा है—वह है अहं—जब यह उग्र हो उठता है तो व्यक्तिगत जीवन में भयंकर कुण्ठायें, असम्मान तथा अमर्यादा के कारण घोर संघर्ष आ घेरता है, सामाजिक जीवन में वहीं अशान्ति, अव्यवस्था उत्पन्न करता है। तथा ऐसे उपद्रव खड़े करता है जिससे विनाशकारी दृश्य उपस्थित होते देखे जाते हैं, पर यदि प्रकाश की तरह हलके हों तो हमारा दृष्टिकोण प्रकाश की तरह व्यापक, निर्मल तथा गतिशील होता है हमारा चिन्तन अपने तक ही सीमित न रहकर प्राणि मात्र के हित की बात सोचने लगता है। यह स्थिति अपने आप में ही एक ऐसी आन्तरिक स्फुरणा प्रदान करती है, जिसमें शान्ति, शीतलता, सन्तोष और प्रसन्नता की निर्झरणी अपने भीतर ही फूटती प्रतीत होती है।

इस तरह अत्यन्त भार वाले तत्व भी भले ही देर से ज्ञात हों—शक्ति के पुंज हैं और सृष्टि के आविर्भाव से ही विद्यमान सूक्ष्म तत्व भी। दोनों तत्व परस्पर गुम्फित होने से जड़−पदार्थ तो दृश्य हो जाता है, चेतन अदृश्य रहता है। कारण यह है कि अत्यान्तिक वेग के कारण भार रहित पदार्थ भी भारयुक्त हो जाता है। सूर्य से आने वाली किरणें सूक्ष्म हैं किन्तु आकार की तुलना में उनका भार बहुत अधिक है। सूर्य से धरती पर बरसती रहने वाली प्रकाश किरणों का भार यदि लिया जाये तो प्रतिदिन हजारों टन तथा वर्ष भर में लाखों टन उनका भार निकले। प्रोफेसर एडिंगटन ने तो उस भार का हिसाब भी लगाया है कि जो कण जितने ही सूक्ष्म हैं उनका वेग उतना ही अधिक है और जिनका वेग जितना अधिक है उनके आकार की तुलना में उनका भार उतना ही अधिक होगा।

न तो यह गति ही आधुनिकतम यन्त्रों से नापी जा सकती है न भार, क्योंकि इन उपकरणों की एक सीमा है, जबकि यह तत्व असीम और अनन्त है। इस रूप, इस श्रेणी में मन, भावानुभूतियाँ तथा संकल्प ही आते हैं। इसी बात को यह कह सकते हैं कि परमात्मा ही अनादि, अनन्त, अद्भुत, सर्वव्यापी और प्रकृति में घुला हुआ एक मात्र चेतन तत्व है हमें उसे समझने का भी प्रयत्न करना चाहिए, मात्र दृश्य व भौतिक पदार्थों की जड़ता में ही नहीं पड़े रहना चाहिये। प्रकाश में भार की तरह भौतिक शक्तियाँ तो उस तत्व की अनिवार्य उपलब्धि हैं। खेती गेहूँ की होती है भूसा तो अपने आप मिलता है। हम अपनी आध्यात्मिकता सार्थक कर सकें तो भौतिक अभाव आज जो कष्ट देते हैं, वे कल अनुचर अनुगामी बन कर भी पीछे−पीछे चल सकते हैं। दोषी न तो परमात्मा है न प्रकृति। दोनों तत्व हमारी रचना, पोषण और विकास में लगे हैं, पर अपनी दृष्टि में ही कुछ ऐसे दोष हैं कि हम स्वयं उस करुणा को हृदयंगम करने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे समर्थ माता−पिता का पुत्र होकर मनुष्य दीन−हीन जीवन जिये यह खराब बात है। उसका मूल कारण अज्ञान ही है यह अज्ञानता ही मिटाई जानी चाहिये।

हम देख सकें, ऐसे प्रकाश−कणों की सघनता की एक सीमा है। जहाँ ये फोटोन बहुत सघन रूप में हो तथा प्रचुर परिणाम में हों, वहाँ वे हमारे लिए अगोचर हो जायेंगे, अतः प्रचण्ड प्रकाश की स्थिति वहाँ होने पर भी मानवीय दृष्टि से वहाँ घोर अन्धकार ही होगा। उस प्रखण्ड प्रकाश की तुलना में सूर्य का प्रकाश बहुत अधिक स्थूल है।

“तमसो मा ज्योतिर्गमय”—हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो “तेजो वै तेजो में देहि” दिव्य प्रकाश रूप परमेश्वर हमें प्रकाश दें—प्रार्थनाओं में परमात्मा को उसी तरह के सूक्ष्म और सर्वव्यापी प्रकाश के रूप में अस्तित्व में सिद्ध किया है। वैज्ञानिक और वेदान्त दोनों का एक ही निष्कर्ष है कि हमें दिखाई देने वाला प्रकाश तो स्थूल है। सूक्ष्म तत्व स्थूल आँखों से दर्शनीय न होने पर भी हमें चारों ओर से आच्छादित किये रहते हैं। उन्हें अनुभव करने के लिए ज्ञान की आत्म−ज्योति जागृत करने वाली साधनाओं की आवश्यकता होती हैं। अतएव उपासना और स्वाध्याय हमारे जीवन की अत्यन्त महत्वपूर्ण अपेक्षायें हैं, इनके बिना विवेक जागृत ही नहीं होता। स्थूल पदार्थों को ही देखते और उन्हीं में उलझे रहते हैं, सूक्ष्म तत्वों की अनुभूति के लिए हमारी उस तरह की तैयारी भी होनी चाहिए। हमारी पहुँच मन को नियन्त्रित रखने और उसे यथार्थ लक्ष्य की ओर नियोजित रखने की स्थिरता भी चाहिये।

मन विचार और भावनाओं की सत्ता सर्व समर्थ है यह न तो काल्पनिक है न ही ऐसे कि उन तक पहुँच न हो। महान् वैज्ञानिक आइन्स्टीन की मान्यता यह थी कि संसार में प्रकाश ही सर्वोपरि वेग वाला तत्व है किन्तु अमेरिका के ही एक अन्य वैज्ञानिक डॉ. गेरार्ड फीनबर्ग ने ऐसे द्रव्याणुओं की कल्पना का समर्थन किया है जिनकी गति प्रकाश के कणों से भी बहुत अधिक है अमेरिका की टैक्सास यूनिवर्सिटी में कार्यरत भारतीय वैज्ञानिक डॉ. ई. सी. जी. सुदर्शन ने तो यह बात और आधारभूत तथ्यों को व्यक्त करके सिद्ध कर दी है।

बात चाहे वैज्ञानिक ढंग से कही जाये चाहे श्रद्धा विश्वास और आस्तिक−आस्था के रूप में दोनों अन्ततः एक ही स्थान तक पहुँचते हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि अत्यंत सूक्ष्म और सक्रिय परमाणुओं का एक अलग ब्रह्माण्ड है जहाँ पदार्थ नहीं अपदार्थ शक्ति ही शक्ति भरी है। वेदान्त कहता है वह परमात्मा प्रकृति से भिन्न गुणों वाला है, पर उसने व्यवस्थायें प्रकृति के हाथों सौंप दी है और स्वयं प्रकृति रूप हो गया अर्थात् उन्हीं में समा गया। दोनों ही शक्ति के स्वामी दोनों ही परम पोषक और कल्याण कारक है व्यक्त रूप से हमारा पोषण अपनी माँ−प्रकृति से होने पर भी शक्ति का आधार पिता ही रहता है। हम माँ की उपासना उसी रूप में करें जिससे हमारी श्रद्धा अपने पिता के प्रति भी अभिव्यक्त होती रहे। जीवन की समस्वरता और आनन्द के लिये एक नहीं दोनों सत्तायें आवश्यक और अनिवार्य हैं, इनमें से उपेक्षा एक की भी नहीं करनी चाहिए।


काम और क्रोध (kahani)

काम और क्रोध पर विजय पाकर एक दिन विचित्र वेष बनाकर एक व्यक्ति किसी गृहस्थ के यहाँ गया, गृहस्थ ने उसकी उपस्थिति को अशुभ माने उससे पूछा—“तुमने यह कैसा विचित्र-सा वेष बना रखा है” नवागन्तुक ने बताया उसने काम, क्रोध पर विजय पा ली है व उनके दुःख में उसने यह वेष बना लिया है। गृहस्थ ने उसे पागल समझ अपने नौकर से बाहर निकलवा दिया। आगन्तुक फिर आ गया तो फिर निकलवा दिया गया। इस तरह पच्चीसौ बार उसे तिरस्कृत हो निकलना पड़ा व बार−बार वह उसी गृहस्थ के पास आया। अन्त में गृहस्थ ने आगन्तुक से क्षमा याचना की व उससे विनयपूर्वक कहा—”महानुभाव आप वास्तव में क्रोध में जीत लिया है। “अतिथि ने कहा”—वत्स मेरी अधिक प्रशंसा न करो, अधिक प्रशंसा सुनकर तो मुझमें अहंकार का भाव जाग जाएगा”। गृहस्थ ने अपना भाग्य सराहा कि आज उसने एक सन्त के दर्शन किए जो काम, क्रोध व अहंकार से मुक्त है।

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“भवति भिक्षां देहि”

“भवति भिक्षां देहि”— का स्वर महर्षि के कानों में पड़ा और वे विनीत भाव से अपने आसन से उठ गये। द्वार पर आकर देखा, तपोरूप दुर्वासा बाहर खड़े थे। महर्षि उन्हें अपनी कुटी पर पाकर हार्दिक प्रसन्न हुए और सादर पाकशाला में ले जाकर जो कुछ भी उपलब्ध था प्रसाद ग्रहण कराया। महर्षि दुर्वासा प्रसन्न हुए और अपने आरण्यक की ओर चले गये।

बात उन दिनों की है जब महर्षि मुद्गल कच्छ तप कर रहे थे। तपश्चर्या की अग्नि जहाँ मन को आग्नेय बनाती है। शुद्ध और प्रखर करती है वहीं उसकी गति को भी अत्यधिक चंचल बनाती है। साधक के लिए यह समय कसौटी का होता है यदि मन की चंचलता को नियंत्रित कर लिया जाता है तो उसकी आग्नेय प्रखरता विराट् आकाश को भी चीर कर अगम्य बिन्दु तक जा पहुँचती है तथा साधक के लिए सिद्धि और सामर्थ्यों के द्वार खोल देती है किन्तु अस्थिर और अधीर साधक सामान्य अवरोध में ही विक्षिप्त हो उठते हैं तब वे न केवल सिद्धि और सामर्थ्य अपितु अपने लक्ष्य तक से भटक जाते हैं। महर्षि मुद्गल के लिए यह वैसा ही चुनौती भरा समय था।

अन्नमय कोश की शुद्धि का क्रम अस्वाद व्रत से प्रारम्भ कर अब वे सप्ताह में केवल एक दिन, एक ही समय, संस्कारित अन्न लेने की स्थिति तक आ गये थे। आज उनके लिये अन्न ग्रहण का दिन था। उस दिन अपनी प्रातःकालीन साधना सम्पन्न करने से लेकर अपराह्न तक का समय अन्न कटे खेतों में गिरे हुए दाने बीनने में लगाया था। कठोर तप ने पहले ही उनकी देह कृश कर दी थी उस पर दिन भर का यह तप, निःसंदेह थकान उत्पन्न करने वाले थे, किन्तु आत्मा की प्राप्ति के लिए आगे बढ़ते हुए तपस्वी की आशा और उत्साह में कहीं कोई अभाव नहीं आया था पर सप्ताहान्त में आये भोजन ग्रहण के समय एकाएक महर्षि दुर्वासा का आगमन निःसन्देह कष्टपूर्ण था किन्तु महर्षि का मन सागर की तरह धीरे गम्भीर, शशि की तरह निर्मल और पारिजात के समान पवित्र था उनके मुख में विषाद का कहीं संकेत भी नहीं था। संतोष की गरिमा मस्तक पर देदीप्यमान थी। मन का यथार्थ निग्रह यही तो कहलाता है।

किन्तु महर्षि दुर्वासा तो जानबूझ कर ही परीक्षा लेने पर तुले थे। एक बार, दो बार अनेक बार उन्होंने यही किया। अन्न ग्रहण न किये हुये महर्षि को कई माह बीत गये, एक मात्र जल ही उनका निर्वाह रह गया उसी से उनके शरीर में इतनी शक्ति शेष थी कि आज उन्होंने अपने अन्न ग्रहण के दिन फिर किसी तरह दो मुट्ठी दाने संग्रह कर लिये। उन्हें ले जाकर पाकशाला में रखा। थोड़ी देर में कुछ शक्ति आ जायेगी इस आशा से उन्होंने आहार पकाया किन्तु तभी वही चिर परिचित ‘भवति भिक्षां देहि’ की स्वरलहरी कानों में पड़ी। महर्षि ने अतिथि का पूर्ववत् सत्कार कर अपने जीवन को धन्य माना।

आज पुनः उनके अन्नाहार का दिन है पर महर्षि में उठने तक की शक्ति नहीं रही। कई बार प्रयास करने पर भी शरीर ने साथ दिया। महर्षि ने प्रयास किया कि किसी तरह बाहर तक जाकर कुछ दूर्वादल ही तोड़ लायें ताकि शरीर थोड़ी शक्ति पाले, किन्तु द्वार तक पहुँचना भी उनके लिए कठिन हो गया। समय हो चुका था। भगवान् भास्कर अस्ताचलगामी हो रहे थे तभी एक बार फिर वही “भवति भिक्षां देहि” का स्वर गूँजा। महर्षि अब तक दहलीज तक आ गये थे। आज अतिथि खाली लौटेंगे इस कल्पना से उनकी आँखें भर आयीं वे महर्षि दुर्वासा के चरणों में गिर उनकी मूक वाणी से विवशता के स्वर अपने आप निकल रहे थे।

दुर्वासा बोले महर्षि अब तुम सामान्य मनुष्य नहीं रहे तुम्हारे अन्दर का ऋषि जाग गया है यह कह कर उन्होंने महर्षि को गले लगा लिया। मुद्गल की निराशा उसी दिन उनकी समाधि में बदली थी।

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मनोनिग्रह के लिये उपासना की आवश्यकता

विज्ञ व्यक्ति किसी निष्कर्ष पर पहुँचने, दिशा निर्धारण करने और कदम उठाने के लिए दूरदर्शी विवेकशीलता को कदम आधार मान कर चलते हैं। अपनी सूक्ष्म बुद्धि से इतना ही सोचते हैं कि भविष्य को उज्ज्वल बनाने की सम्भावनाएँ कहाँ हैं? वे जहाँ भी होती हैं उधर ही ध्यान केन्द्रित करते हैं और गतिविधियों को अग्रसर करते हैं। भले ही इससे उन्हें तात्कालिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। इसके लिए नीरस लगने वाले, श्रमसाध्य और खर्चीले काम करने में भी उन्हें आपत्ति नहीं होती। मन पर उनका इतना अधिकार होता है कि उसे श्रेय पथ पर नियोजित कर सकें। कुसंस्कार आड़े आते हों तो उन्हें निरस्त करके अभीष्ट लक्ष्य पर तत्परता पूर्वक लगे रह सकें।

यह स्थिति सभी की नहीं होती। मनुष्य समाज में बाल बुद्धि स्तर के लोगों का ही बाहुल्य है। उन्हें कुसंस्कारी मन अपनी उँगलियों के इशारे पर नचाता है। संकल्प शक्ति के अभाव में वे उस प्रवाह को रोक नहीं पाते हैं और आँधी में उड़ने वाले तिनकों की तरह इधर−उधर मर्जी पर चलाने वाले मनस्वी व्यक्ति बहुत कम होते हैं, जो होते हैं वो अभीष्ट प्रगति की दिशा में अनवरत क्रम से बढ़ते हैं और सफलता के उच्च शिखर तक जा पहुँचते हैं। इसके विपरीत अधिकांश व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन्हें मन अपनी मर्जी पर चलाता है। वह हठपूर्वक जिधर भी चलता है उधर ही बेलगाम घोड़े की तरह धर दौड़ता है और बेचारा मालिक अपने को असहाय अनुभव करके साथ−साथ ही मारा−मारा फिरता है यों कहने को तो पीठ पर नहीं बैठा दीखता है। वस्तु स्थिति यह होती है कि उद्दण्ड घोड़ा ही असली मालिक होता है सवार तो किसी प्रकार अपनी स्थिति बनाये रहने के लिए जान बचा कर जैसे−तैसे बैठा भर रहता है। जिधर जाया जा रहा है उसमें खतरा भी दीखता है किन्तु किया क्या जाय आत्मिक दुर्बलता के कारण मन के पीछे−पीछे दौड़ने के अतिरिक्त और कुछ बन ही नहीं पड़ता। मन की अपनी बेढंगी चाल है। उसे आकर्षण ही रुचते हैं। उन्हीं में वह रमता है। अभ्यास ओछे स्तर के आकर्षणों का रसास्वादन करने का रहा होता है तो उसकी कुचालें, उड़ाने उसी क्षेत्र में अपना कमाल दिखती रहती हैं। किसी अनभ्यस्त दिशा में यदि पहले से भी बड़ा आकर्षण प्रस्तुत न किया जाय तो वह उधर मुड़ता ही नहीं। आवारा लड़कों को उनके अभिभावक प्रयत्न पूर्वक स्कूल भेजते हैं। दुकान पर बिठाते हैं, अन्य उपयोगी कार्य बताते हैं, पर आवारागर्दी इस कदर सवार रहती है कि वे कोई न कोई बहाना बना कर अपने रास्ते पर ही चलते हैं, सौंपे हुए महत्वपूर्ण कामों को बर्बाद करके रख देने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती। कुसंस्कारी मन की प्रायः ऐसी ही स्थिति होती है। उपासना जैसे नीरस दीखने वाले प्रसंग पर उसे सहज ही जमाया जा सकना सरल नहीं है। इसके लिए एड़ी−चोटी पसीना एक करना पड़ता है। जो लोग आरम्भ में ही ऐसा सोचते हैं कि आसन पर बैठते ही मन लग जाना चाहिए है वे उस अबोध बालक की तरह हैं जो बीज बोते ही पेड़ खड़ा हो जाने की कल्पना करते हैं। मन की एकाग्रता तो आरम्भ में नहीं साधना की सफलता की स्थिति आने तक मिल पाती है। उपासना का तीन चौथाई परिश्रम तो मन की एकाग्रता साधने में ही लग जाता है। ईश्वर के साथ आदान−प्रदान तो इसके बाद अति सरल रह जाता है। इसके उपरान्त एक चौथाई श्रम प्रयास में ही ईश्वर सान्निध्य का आनन्द मिलने लगता है।

जन्म−जन्मान्तरों से कुसंस्कारों का अभ्यस्त मन भौतिक आकर्षण से विरत होकर आत्मिक आनन्द की रसानुभूति करने लगे, इसके उपासना का विज्ञान और सत्परिणाम समझने के लिए अधिक गम्भीरतापूर्वक प्रयत्न करने की बात कही जा चुकी है। इस दिशा में अधिक चिन्तन करने से, बहुत दिन तक लगातार इस संदर्भ में प्रशिक्षित करते रहने से, स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन के सहारे मन की अभिरुचि बदलती है और वह उस संदर्भ में भी रुचि लेने लगता है। इस संदर्भ में थोड़ी−थोड़ी धीरे−धीरे सफलता मिले तो भी उसे उत्साहवर्धक एवं आशाजनक समझना चाहिए।

बाल बुद्धि और पशु प्रवृत्ति को किसी दिशा में मोड़ने के लिए प्रायः दो उपाय बरते जाते हैं—एक लोभ दूसरा भय। बच्चों को प्रलोभन देकर कुछ कराने और गड़बड़ करने पर डराने की नीति सभी अभिभावकों को अपनानी पड़ती है। एक आँख प्यार की, दूसरी सुधार की रखनी पड़ती है। प्यार का आकर्षण और ताड़ना का भय उन्हें संतुलित रहने के लिए सहमत कर लेता है। पशुओं को चारे का लोभ देकर या छड़ी का भय दिखा कर काम लेने की कला से सभी पशु पालक भली भाँति परिचित होते हैं। वन्य पशुओं को पकड़ कर जब लाया जाता है तब तो इन दोनों क्रियाओं के सहारे ही उन्हें काम करने योग्य (पालतू) बनाया जाता है। बैल और घोड़ों के बछड़े काम में जुतने के लिए आरम्भिक दिनों में कितना परेशान करते हैं और उन्हें काबू में लाने के लिए क्या−क्या करना पड़ता है, उसे पशु पालकों से जाकर पूछा जा सकता है। सरकस में चित्र−विचित्र करतब दिखाने वाले भयानक जानवरों को कलाकार जैसी स्थिति में लाने के लिए उन्हें सिखाने वाले धैर्यपूर्वक अपना चतुरता भरा प्रयास जारी रखते हैं। इस कार्य में उन्हें नरम गरम दोनों ही तरीके काम में लाने पड़ते हैं। इस कार्य में उन्हें चुटकी बजाते सफलता नहीं मिल जाती है। सीखने भूलने का, चलने−हटने का क्रम जारी रखने वाले जानवर कभी तो सहम जाते और कभी उत्तेजित होकर गुर्राते और आक्रमण पर उतारू हुए दीखते हैं। बुद्धिमान शिक्षक इन उतार−चढावों को जानता है। उसे पशु प्रवृत्ति के स्वरूप और उसके परिवर्तन में लगने वाले कौशल की समुचित जानकारी रहती है। अस्तु देर लगने तथा अड़चन पड़ने का उसके मन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। प्रयास को निरन्तर जारी रखने पर उसके जानवर देर−सवेर में सध ही जाते हैं। इन प्रशिक्षकों का धैर्य, प्रयास और आत्म−विश्वास देखते ही बनता है। कुसंस्कारी मन को विशुद्ध रूप में वन्य पशु मान कर चलना चाहिए। आमतौर से वह अनगढ़ ही होता है। नर वानरों का, वन मानुषों का ही समूह चारों ओर फिरता है। आजीविका उपार्जन और व्यवहार कौशल की दृष्टि से भले ही उन्हें भला माना जा सके, मन का स्तर देखने पर तो वहाँ बालबुद्धि और पशु प्रवृत्ति का ही साम्राज्य छाया दीखता है। मनस्वी व्यक्ति ही महत्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त करते और अपनी गौरव गरिमा प्रमाणित करते देखे जाते हैं। विकृत मन की मार खाते रहने वाले तो रोते कलपते, हेय और पतित जीवन जीकर किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं। आत्मिक प्रगति की दिशा में, उपासना अभ्यास में, सबसे बड़ा अवरोध इस अनगढ़ मन द्वारा ही उत्पन्न किया जाता है। उसी की रोक−थाम और शिक्षा−दीक्षा के लिए अनेकानेक साधना विधानों का आविष्कार किया गया है यदि धैर्य, साहस और संकल्प पूर्वक उन्हें अपनाये रहा जाय तो समयानुसार सफलता मिल जाना निश्चित है। आतुर और अधीर ही हथेली पर सरसों जमने की अपेक्षा करते हैं और वे ही कुछ दिन बहुत अभ्यास करके, मन न लगने का बहाना बना कर अपने प्रयास से मुँह मोड़ लेते हैं। पानी के बुलबुले जैसा क्षणिक उत्साह कभी−कभी महत्वपूर्ण सफलता को प्राप्त करने का आधार नहीं बन सकता। ऐसे अस्थिर चित्त व्यक्ति उपासना के महान प्रयोजन को भी पूरा नहीं कर पाते।


Quotation

इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है। सद्ज्ञान से हमारे विचारों की शुद्धि होती है। शुद्ध विचार अन्तःकरण को शुद्ध कर सद्कर्म की प्रेरणा देते हैं।

और निरन्तर किए जा रहे सद्कर्म फिर अन्तःकरण की शुद्धि करते हुए आत्मानन्द की अनुभूति कराने वाले होते हैं।

आत्मानुभूति ही सद्ज्ञान है।

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समर्पण योग की आत्म साधना

उच्चस्तरीय आनन्द की प्राप्ति आत्मा की सहज आवश्यकता है और साथ ही उसकी सम्भावना भी सुनिश्चित है। इस मार्ग में एक ही बाधा प्रधान है−अहंता की विकृति और विसंगति। जब मनुष्य आत्म केन्द्रित बनता है तो उसकी महत्वाकांक्षाओं की सीमा नहीं रहती। वे न औचित्य देखती हैं और न उपयोग। न नीति की ओर ध्यान देती है, न मर्यादा स्वीकार करती हैं। महत्वाकांक्षाएँ असीम भोगने, असीम जमा करने और असीम बर्बादी के लिए उद्यत बनी रहती हैं। तथाकथित बड़े आदमियों की इच्छाएँ और क्रियाएँ किस प्रयोजन में संलग्न है इसे देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आत्म−केन्द्रित व्यक्ति अपनी क्षमताएँ और साधन सम्पदाएँ किस प्रकार कमाते और किस प्रकार उड़ाते हैं। इस प्रकार वह बड़प्पन उनके लिए पतन और दूसरों के लिए विनाश, सन्ताप का कारण बनता है। यद्यपि वे आतंकवादी दबाव से कितने ही लोगों से अपनी मर्जी के काम लेने और इच्छित शब्दावली मुखों से निकलवाने में सफल हो जाते हैं। उन्हें मिलने वाला सम्मान एवं सहयोग ऐसे ही निकृष्ट स्तर का होता है उसके पीछे घृणा और विवशता झाँकती हुई देखी जा सकती है।

आत्म केन्द्रित−संकीर्ण स्वार्थपरता में निमग्न−उद्धत अहंकारी और असीम महत्वाकांक्षी व्यक्ति संसार के लिए भयंकर अभिशाप हैं। माचिस स्वयं तो जलती ही है अपने सम्पर्क क्षेत्र में भी अग्निकांड खड़ा करती है। इसी तरह आत्म−केन्द्रित व्यक्ति किसी तरह ही सफलताएँ तो प्राप्त कर लेते हैं और अपनी प्रतिभा से अनेक को चमत्कृत भी करते हैं, पर अन्तिम परिणाम उनके अपने लिए−सम्पर्क में आने वालों के लिए तथा प्रकारान्तर से समस्त समाज के लिए भयंकर ही होते हैं। वे उद्धत आचरण न भी करें तो भी उनकी सामर्थ्य, साधन सामग्री एवं स्थिति का लाभ जन−समाज को मिल नहीं पाता। यह अनुत्पादन भी एक प्रकार से दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।

सामाजिक पातकों में उन दुराचरणों की गणना है, जो दूसरों के अधिकारों पर आक्रमण करते हैं। दुष्टतापूर्वक उपार्जन करते हैं। अनीति पूर्वक त्रास पहुँचाते हैं। चोरी, ठगी, आक्रमण, आदि के अनेक प्रकार प्रचलित हैं और वे दण्डनीय अपराधों की संज्ञा में गिने जाते हैं। अशिष्ट, नीरस, कर्कश, आचरण नागरिक मर्यादाओं का व्यतिक्रम, गन्दगी आदि लोक व्यवहार में हेय गिने जाने वाले अपराध हैं, इन्हें अपनाने वाले व्यक्ति असभ्य माने जाते हैं और दूसरों की सद्भावना गँवा बैठते हैं। आध्यात्मिक अपराध वे हैं—जो व्यवहार में असभ्य और कानून में अपराध न गिने जाने पर भी पातकों की संज्ञा में आते हैं। मानवी गरिमा को गिराने वाले हेय कृत्यों में एक यह भी है कि व्यक्ति आत्म−केन्द्रित होता चला जाय, अपनी ही सुविधा तथा अहंता का परिपोषण सब कुछ समझे और जिस समाज में व्यक्तित्व की जड़ें रस चूसती और कलेवर का अभिवर्धन करती हैं उसके हित साधन को सर्वथा विस्मरण ही कर दे। व्यक्तिवादी संकीर्ण स्वार्थपरता बाहर से निर्दोष दीखती है और लगता है कि उसमें अनुचित भी क्या है? मनुष्य अपनी कमाई आप ही खाता रहे किसी दूसरे को हिस्सेदार न बनाये तो इसमें बुरा मानने की बात क्या है? इसमें किसका क्या अपराध हुआ? उदारता बरतना अच्छी बात हो सकती है, पर यदि कोई वैसा नहीं करता तो इसमें आक्षेप क्यों लगाया जाय? देखने में यह तर्क निर्दोष मालूम पड़ते हैं और आत्म केन्द्रित व्यक्ति पर कोई दोष मढ़ने की गुंजाइश नहीं दीखती।

पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। मनुष्य सामाजिक प्राणी है। यह कहे जाने का तात्पर्य यह है कि उसकी समस्त प्रगति पूर्णतया अन्यान्यों के विविध−विधि सहयोगों पर निर्भर है। इसलिए उसे समाज से जितना मिला है उतना वापिस लौटा कर सृष्टि सन्तुलन स्थिर रखना चाहिए। यदि प्राप्त ही करते रहा जाय वापिस न लौटाया जाय तो अनुदान के सृष्टि स्रोत समाप्त हो जायेंगे और फिर ऐसा कहीं कुछ शेष ही नहीं रहेगा जिसे उपलब्ध करने की पाने वाले आशा कर सके। जानवर घास खाते हैं बदले में गोबर देकर जमीन की उर्वरता का सन्तुलन बनाते हैं। पेड़ भूमि से जीवन रस पाते हैं साथ ही अपने पत्ते भूमि पर गिराकर खाद वापिस करते हैं, तब कहीं भूमि की उर्वरता स्थिर रहती है। समुद्र से बादल जल लेकर वर्षा का पानी भूमि को देते हैं। भूमि नदियों के माध्यम से उसे फिर समुद्र को वापिस लौटाती है। यदि यह गति चक्र रुक जाय, कोई पाने वाला घटक उसे जमा करने लगे, आगे के लिए न खिसकाये तो अवरोध उत्पन्न हो जायगा और प्रगति पथ ही नहीं रुकेगा, संग्रही के लिए मरण संकट खड़ा हो जायेगा। पेट को भरते तो रहें, पर मल विसर्जन न करें तो दुर्गति ही होगी। मुँह ग्रास को अपने ही कोंटर में रोके रहे, हृदय अपनी रक्त सम्पदा अपनी ही तिजोरी में बन्द कर दे तो शरीर पर क्या बीतेगी और वे संग्रही अवयव कितने घाटे में रहेंगे यह कल्पना मात्र से समझा जा सकता है। आक्रमण गर्हित है। अनीति हेय है, पर संचय भी इन्हीं की भाँति मन्द विष है। उससे सृष्टि क्रम रुकता है। देने वाले स्रोत सूखते हैं। भूमि समुद्र को वर्षा का जल न लौटाये तो सागर का पानी कुछ ही समय में सूख जायेगा, ऐसी दशा में फिर बादल बनने और वर्षा होने की परम्परा ही समाप्त हो जायेगी। तब जल संकट से प्रलय के दृश्य ही उत्पन्न होंगे।

मानव समाज को आदिम परिस्थितियों में लौटना हो तो ही व्यक्तिवाद का समर्थन किया जा सकता है। सहयोग के बिना तो चींटी, दीमक, मधुमक्खी जैसे क्षुद्र प्राणियों तक का काम नहीं चलता। वन्य पशु और घोसलों को अपनाते हैं फिर मनुष्य स्वार्थी होते−होते पारिवारिक कर्तव्यों तक से विमुख होता चला जायगा। स्वार्थ के साथ−साथ निष्ठुरता बढ़ती है। अनुदारता के साथ−साथ असामाजिकता पनपती है। दूसरों के सुख−दुःख का ध्यान नहीं रहता तो सहयोग निर्वाह ही कठिन नहीं पड़ता वरन् शोषण उत्पीड़न को अपराधी प्रवृत्ति अपनाने में भी कुछ हर्ज नहीं दीखता। दुष्ट दुरात्माओं की गतिविधियाँ जिस आधार पर खड़ी होती और पनपती हैं, वह निष्ठुरता अनुदारता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। स्पष्ट है कि स्वार्थ परता के कारण ही अनुदारता और निष्ठुरता के कारण सम्भव हो सकने वाले कुकृत्यों की बाढ़ आती है।

उदारता और सहकारिता को मान्यता का पर्यायवाची माना गया है। उससे आदर्शवादिता उत्कृष्टता जैसे दैवी गुण पनपते हैं और सर्वतोमुखी प्रगति के पथ−प्रशस्त होते हैं। यदि वह परम्परा बन्द हो जाय तो स्वार्थों की खींचातानी में असहयोग पनपेगा और विग्रह बढ़ेगा। सृजन में लगने वाली सहकारी प्रवृत्ति उलट कर असहयोग और विग्रह में लगेगी, फलतः विनाश का वातावरण बनेगा। यह स्थिति अब तक के मानवी प्रगति प्रकरण को उलट देगी और हमें आदिम काल की परिस्थितियों में वापिस जाना पड़ेगा। वहाँ भी चैन नहीं मिलेगा। क्योंकि तब आक्रमण के लिए हाथ या ढेले ही काम में आते थे। तब जमीन भी बहुत खाली पड़ी थी। अब न निर्वाह के लिए खाली भूमि है और न अस्त्र−शस्त्रों से आक्रमण होने पर सुरक्षा के साधन। ऐसी दशा में आदिम काल की स्थिति में लौट जाने पर भी आज की स्थिति में मानवी अस्तित्व का बच सकना कठिन हो जायगा।

उदारता अपनाये बिना न अस्तित्व की रक्षा है और न आदर्शों का संरक्षण। श्रेष्ठ समाज में ही श्रेष्ठ व्यक्ति उपजते और पनपते हैं। अस्तु हमारे तत्व चिन्तन में स्वार्थ−परता को नियन्त्रित और परमार्थ परायणता को प्रोत्साहित करने वाले तत्वों का समावेश अधिकाधिक मात्रा में होना आवश्यक है। उदार समाज सेवियों की प्रतिष्ठा बढ़नी चाहिए और आक्रामक एवं छल−छद्म अपनाने वाले दुरात्माओं की तरह उनकी भी भर्त्सना होनी चाहिए, जिनके लिए स्वार्थ ही सब कुछ है जो वासना, तृष्णा और अहंता के परिपोषण के अतिरिक्त और कुछ सोचने या करने के लिए तैयार ही नहीं होते। लोक हित में जिनकी कोई रुचि नहीं−सामूहिक उत्थान पतन से कोई मतलब न रखकर अपने तक ही जिनकी आकांक्षाएँ सीमित हैं। ऐसे लोग निर्दोष लगते भले ही हैं। वस्तुतः उनका संकीर्ण दृष्टिकोण समाजगत श्रेष्ठता और व्यक्तिगत गरिमा को नष्ट−भ्रष्ट किये बिना रह नहीं सकता। भले ही वह विनाश कृत्य अग्नि−काण्ड या महामारी जैसा न होकर शीत लहर या अनावृष्टि जैसी घटना रहित ही क्यों न प्रतीत होता हो।

अध्यात्म तत्वज्ञान व्यक्ति को अधिकाधिक उदार बनने की प्रेरणा देता है ताकि उसकी सामर्थ्य का उपयोग शालीनता और प्रगतिशीलता के सम्वर्धन में हो सके। ब्राह्मण, साधु, वानप्रस्थ, परिव्राजक आदि को पृथ्वी के देवताओं जैसा सम्मान उनकी लोक−सेवा को ध्यान में रखकर ही दिया गया है। पुण्य परमार्थ की—दान धर्म के माहात्म्य बखाने गये हैं। यह सारा प्रतिपादन मनुष्य में उदारता की मात्रा बढ़ाने वाली सत्प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करने के लिए है। यह बढ़ेगी तो निश्चित रूप से व्यक्ति की गरिमा और समाज की सुव्यवस्था बढ़ेगी इससे भौतिक प्रगति और आत्मिक शान्ति के उभयपक्षीय शुभ लक्षण प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगेंगे।

गीताकार ने समर्पण योग का महत्व विस्तारपूर्वक बताया है। भगवान कहते हैं—‘मुझमें अपना मन रख, मुझे बुद्धि सौंप इतने भर से तेरा कल्याण हो जायगा। समर्पण के शरणागति, अनेक आमन्त्रणों में भगवान इतना ही कहते हैं कि अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को ईश्वर को समर्पित कर दें। इसके बाद सच्चे अर्थों में ईश्वर भक्त की स्थिति प्राप्त हो जायगी और भगवान के अनुग्रह से जो लाभ मिलना चाहिए वह निश्चित रूप से मिल जायगा। यहाँ भगवान से मतलब किसी अदृश्य व्यक्ति या सूक्ष्म शरीर धारी देवी−देवता के साथ दोस्ती बढ़ा लेने−मनुहार उपहार के आडम्बर रचने से नहीं वरन् आदर्शों के रूप में विद्यमान विश्व चेतना के सम्मुख आत्मसमर्पण करने से है। इसी तथ्य को और अधिक स्पष्ट समझना हो तो यों कहना चाहिए कि स्वार्थ का परमार्थ में, व्यक्तिवाद का समूहवाद में, संकीर्णता का उदारता में, निष्कृष्टता का उत्कृष्टता में विसर्जन करना है। समर्पण तत्व का महत्व अध्यात्म प्रतिपादनों में अनेक स्थानों पर अनेक ढंग से किया गया है। गोपियों का कृष्ण के साथ रास रचाने के पीछे यही तत्व है कि सभी प्रवृत्तियाँ आत्मा की पुकार का, वेणुवाद का अनुसरण करें। अर्जुन को भी यही करने के लिए कहा गया है। भक्ति योग में इसी समर्पण शरणागति की प्रधानता है। वेदान्त में इसे अद्वैत एकत्व कहा गया है।

रवीन्द्र नाथ टैगोर का प्रतिपादन है—“मनुष्य का स्थायी आनन्द इच्छित वस्तु की प्राप्ति में नहीं, वरन् अपने से महान के लिए आत्मार्पण करने में है। यह महानता उच्चस्तरीय आदर्शों में, महान व्यक्तियों में, देश में, समाज में अथवा परमात्मा में हो सकती है। जब तक अपना सर्वस्व किसी महान उद्देश्य के लिए अर्पण नहीं कर दिया जाता, जब तक क्षुद्रता के बन्धनों से छुटकारा नहीं पा लिया जाता, तब तक मनुष्य निरन्तर अशान्त उद्विग्न ही बना रहेगा।

उपनिषदों में इसी ‘महान्’ को ईश्वर कहा गया है और उसे प्राप्त होने पर पूर्णता का लक्ष्य पूरा होने का तथ्य समझाया गया है। ऋषि गाता है−हे नाविक मुझे पार ले चल मैंने तेरी नाव का आश्रय लिया है। आश्रय लेने का तात्पर्य है माझी के नेतृत्व और नाव के सम्बल पर विश्वास करना। हम ईश्वर पर विश्वास करें उसके आदर्शों को शिरोधार्य करें और उसकी प्रेरणा को जीवन नीति के साथ एकाकार कर दें तो आत्मा के लिए परमात्मा का प्राप्त कर सकना सरल हो जाता है। इस तत्व दर्शन की रहस्यमय दिशा धारा एक ही व्यक्ति आत्म केन्द्रित न रहे, संकीर्णता के बन्धनों में न बँधे वरन् महान आदर्शों के प्रति आत्म समर्पण करके जीवन मुक्त जैसी गतिविधियाँ अपनाएँ और इसी शरीर में देवोपम गरिमा का आनन्द लाभ प्राप्त करें।

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इन्द्रिय बोध अप्रमाणिक

दुनिया को जैसी कुछ हम देखते हैं वस्तुतः वह वैसी ही है उसमें संदेह की पूरी−पूरी गुंजाइश है। यदि हमारी आँखों की वर्तमान क्षमता में थोड़ा−सा अन्तर होता है और वे इन्फ्रारेड किरणों को देख पातीं तो दुनिया इससे बिलकुल भिन्न प्रकार की दीखती जैसी कि अब हमें दीख पड़ती है। प्राणि जगत के विभिन्न प्राणी अपनी इन्द्रिय शक्ति के सहारे अपने सम्पर्क में आने वाले पदार्थों और प्राणियों के बारे में मत निर्धारित करते हैं। ये अनुभूतियाँ एक से दूसरे को इस प्रकार होती हैं जिसमें परस्पर तनिक भी समानता नहीं रहती। दीमक के लिए तीतर साक्षात यमराज है, पर बाज के लिए वह चलते फिरते स्वादिष्ट भोजन के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। ऊँट नीम की पत्तियों को स्वाद पूर्वक खाता है किन्तु हमें वे कड़ुई लगती हैं। रासायनिक विश्लेषण से नीम का सार तत्व एक ऐसा रसायन है जिसे विभिन्न प्राणियों की जिह्वा विभिन्न प्रकार के स्वादों में अनुभव करेगी। इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों की संरचना के आधार पर वस्तुओं की तथा प्राणियों की उपस्थिति की चित्र−विचित्र प्रतिक्रियाएँ होती हैं। इसमें मस्तिष्क की बनावट और प्राणी की वंश परम्परा गत संचित अनुभूतियाँ भी बहुत बड़ा कारण हैं। विज्ञानी रेनाल्ड के अनुसार यह दृश्य संसार परमाणुओं की धूलि का उड़ता हुआ अन्धड़ मात्र है। कणों के इकट्ठे होने और बिखरने से विभिन्न पदार्थ बनते बिगड़ते रहते हैं। प्राणी किस वस्तु को किस रूप में समझे और उनसे क्या अनुभूति उपलब्ध करें यह पदार्थ के ऊपर नहीं, जीव धारियों की अपनी संरचना पर निर्भर है। संसार का असली रूप और प्रभाव क्या है यह जानना असंभव है क्योंकि हमारी जानकारी जिन इन्द्रियों पर निर्भर है वे स्वयं ही एक विशिष्ट प्रकार की है और जैसी कुछ वे हैं उनका ज्ञान भी उसी प्रकार पर बनता है। इन अनुभूतियों में वास्तविक नगण्य और संरचना का ही प्राधान्य है।

कामुकता की वृत्ति को ही लें उसका रसास्वादन एक प्राणी से दूसरे के लिए सर्वथा भिन्न प्रकार का है। यह उसके अपने स्नायु संस्थान मनःतन्त्र एवं इन्द्रिय संरचना की प्रतिक्रिया भर है। स्पर्श कितना उत्तेजक, कितना सरस नीरस कितना भार भूत होता है यह सब हर प्राणी की अपनी−अपनी स्थिति पर निर्भर है। साथी के योगदान और सरसता मिलने की बात समझी भर जाती है वस्तुतः वह सब कुछ होता अपनी ही स्थिति की प्रतिफल है।

आँखों की उपयोगिता से इन्कार नहीं किया जा सकता। उनकी प्रामाणिकता भी माननी पड़ती है। प्रत्यक्ष दर्शन की बात सही मानी जाती है। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि आँखें जो कुछ देखती हैं वह सही ही होता है। मृग मरीचिका, इन्द्रधनुष, भूत−प्रेत आदि आँखों से दीखने पर भी मिथ्या ही सिद्ध होते हैं। सिनेमा में चलती फिरती तस्वीरों का दीखना आँखों का भ्रम है वस्तुतः वे अचल होती हैं। जिस तेजी से फिल्म घूमती है उतनी तेजी से आँखों के ज्ञान−तन्तु मस्तिष्क तक सही सूचना पहुँचा सकने में समर्थ नहीं होते। फलतः फिल्में चलती−फिरती दीखने लगती हैं। जब सामान्य घटना क्रमों के सम्बन्ध में यह बात है तो संसार की, जीवन की वस्तुस्थिति समझने में तो आँखें और भी कम काम करती हैं। भगवान का, आत्मा का, दर्शन दिव्य चक्षुओं से, ज्ञान नेत्रों से ही सम्भव है। चर्म−चक्षुओं से चेतना तत्व को देख सकना तो दूर भौतिक जगत में प्रत्यक्ष विद्यमान विद्युत प्रवाह, रेडियो विकरण, श्रवणातीत ध्वनियाँ जैसे तथ्यों को भी नहीं देखा जा सकता सामने प्रस्तुत कितनी ही वस्तुएँ खुली आँख से नहीं दीखतीं सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों के सहारे ही उनका पता चलता है। टेलिस्कोप सामने के वे दृश्य दिखाता है जो आँखें नहीं देख पातीं।

ज्ञान प्राप्ति के माध्यमों से सुनना और देखना अति महत्वपूर्ण है। मस्तिष्कीय विकास में इन्हीं दो माध्यमों की भूमिका प्रधान है। स्वाध्याय में आँखें और सत्संग में कान ही मस्तिष्क तक ज्ञान का प्रवाह पहुँचाते और उसे सुसम्पन्न बनाते हैं। यों अन्य माध्यमों से भी कई तरह की उपयोगी जानकारियाँ मिलती हैं, पर प्रधानता इन्हीं दो की है।

भगवान ने दस इन्द्रियाँ मनुष्य को दी हैं, पर ज्ञानभंडार को भरने में आँख और कान का योगदान जितना काम करता है उतना अन्य सब ज्ञान उपार्जन−साधन मिल कर भी नहीं कर पाते। यह दोनों इन्द्रियाँ कुछ अन्धे बहरों को छोड़ कर होती तो सभी के हैं, पर उनका ठीक उपयोग विरले ही जानते हैं। जो जानते हैं वे इन दोनों गुरुओं से वैसा ही महत्वपूर्ण शिक्षण प्राप्त करते हैं जैसा कि व्यास ने वशिष्ठ और विश्वामित्र से प्राप्त किया था।

उपेक्षा पूर्वक पढ़ने और पढ़ाने से कुशल अध्यापक और सुयोग्य विद्यार्थी भी लाभान्वित नहीं हो पाते। ज्ञान प्राप्ति के लिए आवश्यक सुविधा और उसे ग्रहण करने के लिए मस्तिष्कीय प्रखरता होने पर भी बहुत बार मनुष्य ज्ञान सम्पदा से वंचित ही रह जाता है अथवा सुविधा की तुलना में स्वल्प लाभ ले पाता है। इसमें प्रधान कठिनाई इन दोनों ज्ञानेन्द्रियों के ठीक तरह उपयोग न करने की ही होती है।

ध्यान पूर्वक सुनने से सामान्य चर्चा में भी कितनी ही सारगर्भित बातें समझ में आती हैं। उपेक्षा पूर्वक सुनने से जो शब्द कान में पड़ते हैं, उनका आधा−चौथाई भाग भी पल्ले नहीं पड़ता। जो सुनाई पड़ता है वह गले नहीं उतरता। प्रभाव इतना हलका होता है कि सुनने−सुनाने की अवधि में ही वह समाप्त हो जाता है चर्चा के समय तब कुछ समझ में आया था, वह समाप्त होते−होते उसकी भी कोई छाप शेष नहीं रह जाती।

किसी से बात करते समय यदि अखबार पढ़ने या किसी और उधेड़−बुन में लग जाने से कहने वाला अपनी उपेक्षा अवज्ञा मानता है और समझता है मेरी बात को महत्व नहीं दिया जा रहा है या उसे सुनते हुए भी अनसुनी किया जा रहा है। महत्वपूर्ण वार्ता सुनने के लिए अधिक सतर्क रहना पड़ता है। सामान्य रीति से सुनने को ‘हिय−रिंग’ कहते हैं और मनोयोग पूर्वक सुनने को ‘लिसनिंग‘। जे. कृष्ण मूर्ति अपने आध्यात्मिक भाषणों के बीच−बीच में ‘प्लीज लिसन’ शब्द कहते थे। उनका अभिप्राय उस प्रतिपादन को मनोयोग पूर्वक सुनने के लिए श्रोताओं को सजग करना होता था। पुराणों के कथानकों में थोड़े−थोड़े प्रसंग के उपरान्त ‘सूत उवाच’ शब्द आता है। बार−बार उसी शब्द का उल्लेख करने का तात्पर्य इतना ही है कि सूत जी के प्रवचन का महत्व समझा जाय। नादयोग की शब्द साधना में जिन चमत्कारी सिद्धियों का वर्णन किया गया है उन्हें कान के माध्यम से मनोयोगपूर्वक सुनना और सूक्ष्म जगत के ध्वनि प्रवाहों को ग्रहण करना ही है। वे प्रवाह सनातन हैं और सतत चलते रहते हैं। कानों के छिद्र भी सदा खुले रहते हैं। किन्तु नादयोग की स्वर साधना में सफलता तभी मिलती है जब उस श्रवण प्रयोजन के साथ गहरे मनोयोग का समावेश होता है।

जिह्वा की मधुरता की महिमा बहुत पाई गई है। मीठे और प्रेरणाप्रद शब्द कितने प्राण प्रिय लगते हैं। कटु शब्दों का घाव किस प्रकार तलवार से भी गहरा होता है यह सर्व विदित है। किन्तु जिह्वा के उच्चारण को ग्रहण तो कान द्वारा ही किया जाता है। बहरेपन से पीड़ित व्यक्ति मधुर या ज्ञानवर्धक वाणी का कोई लाभ नहीं उठा सकता, अस्तु जिह्वा से मिलने वाला लाभ वस्तुतः अपनी कर्णेन्द्रिय का ही प्रसाद है। श्रवण शक्ति से ही विविध उच्चारणों का प्रभाव ग्रहण किया जाता है अस्तु शब्द शक्ति के प्रभाव को कान की ही महत्ता समझा जाना चाहिए।

दूसरी शक्ति है आँख की। यों मोटे तौर से उसके सहारे दृश्य देखे जाते हैं पदार्थों का स्वरूप तथा घटनाओं का विवरण उससे ज्ञात होता है। गहराई में प्रवेश करने पर पता चलता है कि दृष्टि के साथ भावनाएँ भी जुड़ती हैं। युवती के प्रति कामुक की, बालक की, सन्त की दृष्टि अलग−अलग होती है। किसी का धन वैभव देखकर चोर की, हितैषी की दृष्टि में भारी अन्तर रहता है। धनी के सम्बन्ध में एक व्यक्ति उसे पुरुषार्थी, बुद्धिमान समझता है दूसरा उस पर बेईमानी से संचय का आरोप लगाता है। वास्तविकता का पता दोनों में से किसी को भी नहीं, पर वे अपनी−अपनी कल्पना के अनुसार मान्यता बनाते हैं। एक के लिये यह संसार भव बन्धन है—दूसरे के लिए माया मिथ्या, तीसरे के लिए विलासिता का प्रांगण चौथे कि लिए विराट ब्रह्म का साकार रूप। यह अपनी दृष्टि में भावनाओं का समन्वय ही है जिसके कारण वस्तु की आकृति एक रहते हुए भी उससे उत्पन्न संवेदनायें भिन्न−भिन्न प्रकार की होती हैं।

किसी के प्रति शत्रुता के भाव हैं तो उसमें सारे दोष दुर्गुण ही दिखाई देंगे और मित्रता होने पर दोष न जाने कहाँ तिरोहित हो जाते हैं और गुण ही गुण उभर कर आँख के आगे आ खड़े होते हैं। एक ही व्यक्ति को अनेक लोग अनेक दृष्टि से देखते हैं। कोई उसे पुत्र, कोई पिता, कोई भाई, कोई पति, कोई नौकर, कोई मालिक आदि की दृष्टि से देखते हैं। इसी प्रकार उसकी विशेषताएँ भी अनेक लोगों को अनेक प्रकार की दृष्टिगोचर हो सकती हैं। यह आँख की पुतली का नहीं उसकी गहराई में जुड़ने वाली भाव संवेदना की प्रतिक्रिया है। सौन्दर्य का खुली आँख से तो बहुत ही उथला अंश दिखाई देता है उसकी गहराई में तो कला दृष्टि ही प्रवेश करती और वही उसकी अनुभूति का आनन्द लेती है। वनवासी लकड़हारों को प्रकृति के सौन्दर्य का तनिक भी आभास नहीं होता जबकि चित्रकार उसी को कागज पर उतार कर स्वयं भाव−विभोर होता और असंख्यों में आह्लाद उत्पन्न करता है।

इन्द्रियों के सहारे ज्ञान प्राप्त होने के तथ्य को मान्यता देते हुए भी हमें यह मान कर चलना होगा कि वे यथार्थता का पूरा बोध करा सकने में असमर्थ है। जीवन के रहस्यों को समझने के लिए ज्ञान चक्षुओं के उपयोग की आवश्यकता है। ज्ञान चक्षु से तात्पर्य है विवेक दृष्टि—ऋतम्भरा प्रज्ञा। तत्व दर्शन के लिए हमें अपनी इसी आत्मिक विशेषता को प्रखर करना चाहिए। सत्य की शोध और लक्ष्य की उपलब्धि इसी के सहारे सम्भव हो सकती हैं।


जैसे को तैसा

एक वृद्ध व्यक्ति की शारीरिक स्थिति अत्यन्त क्षीण हो गई, आँखों से उसे ठीक प्रकार से दीखता नहीं था न ही उसके हाथ पैरों से कोई काम हो जाता था। उसके हाथ दुर्बलता के कारण हिलते रहते थे। उसके बेटे, बहू भी उसकी उपेक्षा करने लगे थे। जब वह भोजन करता तो हाथ से ठीक से कौर पकड़ भी न पाता। बहू उसे घर के बारा मिट्टी के बरतन में भोजन दिया करती थी। एक दिन वृद्ध के हाथ से मिट्टी का बरतन गिर गया व फूट गया। बहू इस पर बहुत झल्लाई व उसने काठ का एक पात्र बनवा कर उसे दिया। वह वृद्ध अब काष्ठ पात्र में भोजन करने लगा! उस वृद्ध का नाती यह सब देखता रहता था। एक दिन उसने वह काष्ठ पात्र लिया व उसी तरह का एक पात्र बनाने के लिए वह लकड़ी के एक टुकड़े को काटने छीलने लगा, पिता ने यह देखा तो उसे डाँटते हुए पूछा कि वह यह क्या कर रहा है। लड़के ने उत्तर में कहा—“आप व माताजी जब दादी की तरह ही वृद्ध हो जावेंगे तब आप दोनों को भोजन कराने के लिए मैं काष्ठ पात्र बनाने का अभी से अभ्यास कर रहा हूँ।”

माता पिता ने सुना तो उनकी आँखें खुल गईं, उन्हें किसी सन्त की यह उक्ति स्मरण हो आई “दूसरों के साथ वह व्यवहार न करो जो तुम्हें स्वयं अपने लिए पसन्द न हो।”

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महत्व प्रवृत्तियों का नहीं, उनके उपयोग का है।

सर्दी और गर्मी दोनों के अपने उपयोग हैं। इन्हें एक−दूसरे को पूरक कह सकते हैं। सृष्टि सन्तुलन प्राणि जगत का व्यवस्थित विकास उन दोनों के समन्वय से ही होता है। जहाँ शीत का बाहुल्य होगा वहाँ का वातावरण न प्राणियों के निर्वाह योग्य रहेगा और न वनस्पतियों के उगने की व्यवस्था बनेगी। सामान्य स्वास्थ्य पर इन दोनों की प्रतिक्रिया का ऐसा प्रभाव पड़ता है कि दृढ़ता एवं सहन शक्ति बढ़े तथा प्रतिकूलता से जूझने वाली जीवनी शक्ति का विकास होता चले।

रात्रि और दिन देखने में परस्पर विरोधी लगते हैं, पर वस्तुतः दोनों एक−दूसरे के पूरक हैं। सदा दिन रहे तो उत्तेजना और थकान से चूर−चूर रहकर प्राणियों को दम तोड़ना पड़े और पदार्थ जल भुनाकर नष्ट होने लगें। सदा रात्रि रहे तो भी सर्वत्र आलस्य उदासी छाई रहे तो निस्तब्धता की नीरसता में दम घुटने लगे। सुख और दुःख भी यों एक−दूसरे के प्रतिकूल हैं, पर इन उतार−चढ़ावों के सहारे के अनुभव बढ़ता है, व्यवहार कुशलता आती है तथा सन्तुलन की आवश्यकता गले उतरती है। जिसे इनमें से एक ही परिस्थिति में रहना पड़े, उनका व्यक्तित्व सर्वथा एकांगी और अपूर्ण रह जायगा। समुद्र में ज्वार−भाटे आने से ही उसकी स्थिरता में प्रवाह की आवश्यकता पूरी होती है। यदि वह उतार−चढ़ाव न आवें तो समुद्र कुछ ही समय में सड़न, दुर्गन्ध और विषाक्तता से भर जाय।

बुद्धि क्या है? नीर−क्षीर विवेक की प्रवृत्ति। मन में एक पक्षीय कल्पना तरंगें उठती हैं। उन्हीं के प्रेरणा, प्रवाह में निम्न स्तर वाले प्राणी बहते रहते हैं। मनुष्य की मानसिक विशेषता यह है कि वह उचित−अनुचित, लाभ−हानि का उभयपक्षीय विचार करता है और उस उलटे सीधे मन्थन के उपरान्त जो युक्ति संगत निष्कर्ष निकलता है, उसे निर्णयात्मक एवं स्वीकार्य मानकर ग्रहण करता है। इसी का नाम बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता या विवेकशीलता है। इसी मन्थन एवं निष्कर्ष क्षमता का जिसमें जितना विकास हुआ है वह उतना ही बुद्धिमान समझा जाता है और अपनी इस विशेषता के कारण उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचता है। बढ़ी−चढ़ी सफलताएँ प्राप्त करता है। जिनमें यह विशेषता नहीं होती वे भावुक अथवा मूर्ख कहे जाते हैं। अपनी इसी कमी के कारण वे किधर भी भटकते हैं—हवा के साथ उड़ने वाले पत्तों की तरह दिशा विहीन उड़ते हैं, घाटा उठाते और ठोकरें खाते हैं तथा धूर्तों के चंगुल में फँसकर भयंकर बर्बादी के गर्त में जा गिरते हैं। श्रद्धा और विश्वास की अपनी उपयोगिता है किन्तु सतर्कता और आशंका का संरक्षण न रहे तो वह अन्ध श्रद्धा भी मनुष्य को ले डूबती है। श्रद्धा के साथ विवेक का, भावना के साथ तर्क का, समन्वय होना ही चाहिए।

सद्गुणों और दुर्गुणों के सम्बन्ध में भी हमें मौलिक रूप से विचार करना चाहिए और दोनों की उपयोगिता पर विचार करना चाहिए। उचित स्थान पर हर बात का उपयोग श्रेयस्कर है। निन्दा तो अनुचित प्रयोग भर की होती है। गलत जगह पर किसी वस्तु या वृत्ति का प्रयोग किया जायगा तो ही उससे गड़बड़ी उत्पन्न होगी। खीर में नमक और दाल में चीनी डालने वाले रसोइये पर डांट पड़ेगी। न चीनी व्यर्थ है और न नमक। दोनों का उचित स्थान पर उपयोग किया जाय तो स्वाद मिलेगा और स्वागत होगा। चाकू से शाक काटा जाय तो लाभ है किन्तु उससे उँगली काट ली जाय तो फिर उसकी निन्दा ही होगी। माचिस से दीपक जलाना ठीक है पर उसी से छप्पर में आग लगा दी जाय तो उस वस्तु को निन्दा का ही भाजन बनना पड़ेगा। गुणकारी औषधि भी यदि गलत तरीके से गलत रोग में दे दी जाय तो उसमें हानि ही उठानी पड़ेगी।

उदाहरण के लिए प्रेम और घृणा को दो परस्पर विरोधी वृत्तियों में लिया जा सकता है और यह देखा जा सकता है कि उनमें से जिस प्रेम की प्रशंसा की जाती है क्या वह सर्वथा निर्दोष ही है? और जिस घृणा को हेय ठहराया जाता है क्या उसे सर्वथा त्याज्य ही समझा जाय? मोटेतौर पर जो कहा सुना जाता रहता है, वह एकांगी और एक पक्षीय है। उसे अविवेक पूर्ण ही कहा जायगा। आमतौर से सबसे सद्व्यवहार करने की बात कही जाती है, पर यदि उसी सिद्धान्त को आँखें मूँदकर व्यवहार में लाया जाय तो इसका परिणाम निश्चित रूप से अनर्थ के रूप में ही सामने आवेगा। क्षमा, दया, करुणा आदि गुणों की बहुत प्रशंसा है पर यदि इन्हें कुपात्रों और कुकर्मियों के लिए भी प्रयुक्त किया जाने लगे तो समझना चाहिए कि इस अविवेक के कारण मात्र सर्वनाश ही उपस्थित होगा।

प्रेम तत्व की महिमा सर्वत्र गाई गई है और उसे परमेश्वर का रूप बताया गया है। इस मान्यता की गरिमा तभी है जब वह प्रेम सज्जनों के साथ सदुद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाय। यदि दुष्ट, दुराचारी परस्पर कुकर्म करने के लिए आपस में घनिष्ठता उत्पन्न करें तो उन मित्रों के लिए, समाज के लिए, आदर्शों के लिए, भयंकर दुष्परिणाम ही उत्पन्न होंगे। यह प्रेम तत्व का अवांछनीय उपयोग हुआ, इसलिए उसे हेय ठहराया गया। अन्धा, अनाचार उत्पन्न करने वाला ‘प्रेम’ उस अर्थ में नहीं लिया जा सकता जिसको ध्यान में रखते हुए तत्वदर्शियों ने प्रेम तत्व को इतना गौरव प्रदान किया था। सत्पात्र एवं सदुद्देश्य की शर्त पूरी करने के बाद ही प्रेम की सराहना की जायेगी अन्यथा दुष्प्रयोजन में संलग्न होने पर तो वह शत्रुता से भी गया बीता और हेय निन्दित ठहराया जायगा।

प्रेम का प्रतिकूल पथ है—घृणा। आमतौर से इसे निन्दित ठहराया जाता है, पर देखना यह है कि क्या अनाचार से घृणा करना भी अनुचित है। स्पष्ट है कि अवांछनीयता के प्रति—पाप और दुष्कर्मों के प्रति जितना गहरा घृणा भाव रहेगा उतना ही उनसे बचाव सम्भव होगा। यदि पाप और पुण्य दोनों से उपेक्षा भाव बरता जाय तो मनुष्य भावनात्मक दृष्टि से नपुंसक ही ठहराया जायगा। भले और बुरे में अन्तर करने पर ही बुराई से बचना और भलाई को अपनाना सम्भव होगा। यह कार्य घृणा और प्रेम की प्रखरता से ही सम्भव हो सकता है। यदि एक ही लाठी से पाप और पुण्य को भले और बुरे को हाँका जाने लगा तो समझना चाहिए कि विवेकशीलता का अन्त हो गया। ऐसी सम दृष्टि या तो परमहंसों के लिए सम्भव हो सकती है या फिर उसे वज्र मूर्ख ही अपना सकते हैं। व्यावहारिक क्षेत्र में उससे मात्र अनर्थ ही उपस्थित हो सकता है।

अनजान बालकों से व्यवहार ज्ञान की कमी के कारण जो भूलें होती रहती हैं उन्हें अबोधता की मनःस्थिति का ध्यान रखते हुए क्षमा किया जा सकता है। किन्तु दुष्ट, अनाचारी, आक्रमणकारी, आततायी, षड्यन्त्रकारी भी उन्हीं अबोधों की श्रेणी में खड़े होकर क्षमा मांगने लगें तो फिर न्याय की, दण्ड व्यवस्था की, कोई आवश्यकता ही न रहेगी। जन साधारण की धर्म भीरुता का लाभ उठा कर दुष्ट−दुराचारी क्षमा याचना करते और दया की भिक्षा माँगते देखे गये हैं। पकड़ में आजाने पर इसी ढाल से वे अपना बचाव कर लेते हैं और जैसे ही अवसर टला अपनी चतुरता पर मूंछें ऐंठते, दुर्बल मनोभूमि वालों को उल्लू ठहराते, चौगुने उत्साह के साथ फिर उसी दुष्कर्म में लगते हैं। उन्हें भरोसा रहता है कि इसी हथकण्डे को अपना कर वे बार−बार अपना बचाव करते हुए कुकर्मरत रह सकते हैं।

कोई अपराधी सच्चे मन से क्षमा याचना नहीं कर सकता और सुधर नहीं सकता, यहाँ यह नहीं कहा जा रहा है। पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त यदि वास्तविक हो तो उससे जीवन क्रम में आमूल−चूल परिवर्तन भी हो सकता है, पर उसमें सच्चाई होनी चाहिए। सच्चे मन से क्षमा याचना की जा रही है या नहीं इसकी दो कसौटियाँ हैं—एक यह कि लोक निन्दा का दण्ड स्वेच्छापूर्वक स्वीकार करने के लिए जो कुकर्म किये हैं उन्हें जी खोल कर उगल दे। इसके अतिरिक्त अनीति उपार्जन को वापिस लौटाने का साहस दिखायें। उस कमाई से लाभ−उठाने का लोभ त्यागें, वापसी में आनाकानी न करें। प्रायश्चित्त इसी का नाम है। सचाई का प्रमाण इससे क्रम में नहीं मिलता यदि दुष्कर्म को उगलने और पाप उपार्जन को वापिस करने की बात नहीं तो समझना चाहिए कि क्षमा याचना थोथी है और उसे दण्ड अवसर चुकाने के लिए एक धूर्ततापूर्ण हथकण्डे के रूप में प्रयुक्त किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में क्षमादान का पुण्य वस्तुतः पाप पोषण का अनर्थ करने के समान ही भयंकर होता है।

भगवान के अवतार में अधर्म के नाश और धर्म की स्थापना की दो प्रतिज्ञाएँ जुड़ी हुई है। नाश पर उतारू तभी हुआ जा सकता है, जब उसके लिए घोर घृणा हो। स्थापना की बात तभी बनेगी जब उस कार्य में अतिशय प्रेम और उत्साह हो। भगवान का प्रत्येक अवतार इन दोनों प्रकार की प्रखरताओं से भरा−पूरा रहा है। भगवान राम ने राक्षसों द्वारा खाये जाने पर ऋषियों की अस्थियों के ढेर देखे, उन्हें देखने पर उनके क्रोध का ठिकाना न रहा। ऋषियों को अकारण जिस अनीति का शिकार होना और उत्पीड़न सहना पड़ा उससे भगवान के मन में जो करुणा उत्पन्न हुई वह निर्जीव नपुंसकों जैसी नहीं थी वरन् उसमें पौरुष पराक्रम एवं शौर्य साहस से भरा−पूरा प्राण भी जुड़ा हुआ था। इसलिए उन्होंने करुणा व्यक्त करने के साथ−साथ दूसरे ही क्षण भुजा उठाकर ‘निश्चर हीन करो मही’ की प्रतिज्ञा भी कर डाली। तथा उस संकल्प को पूरा करके भी दिखाया। धर्म की स्थापना के लिए राम अवतरण हुआ था। पर वह एक पक्षीय क्रिया−कलाप अपनाने से सम्भव नहीं था, उसके लिए असुरता का उन्मूलन भी समान रूप से आवश्यक था। विनाश के लिए घोर घृणा और स्थापना के लिए प्रबल−सद्भावना की आवश्यकता है। दोनों बातें एक दूसरे से सर्वथा विपरीत हैं। फिर भी उनका समन्वय रहने से ही भगवान राम को, भगवान कृष्ण को अथवा अन्यान्य अवतारों के लिए अपना अवतरण उद्देश्य पूरा कर सकना सम्भव हुआ।

स्वाभिमान और अहंकार में थोड़ा−सा ही अन्तर है। आत्मिक गरिमा को उत्कृष्टता के आधार पर अक्षुण्ण बनाये रहने के वृत्ति को स्वाभिमान कहते और सराहते हैं। धन, रूप, पद, बल आदि भौतिक सम्पदाओं के आधार पर जो अहमन्यता उत्पन्न होती है वह अहंकार है। आत्म−गौरव प्राप्त करने की एक ही चेष्टा दो भिन्न आधारों में जब फूटती है तो वह एक स्थान पर प्रशंसनीय और दूसरे पर निन्दनीय बन जाती है।

समाज को अपना श्रेष्ठतम प्रतिनिधि−सभ्य नागरिक देकर जीने की भावना से किया हुआ सन्तानोत्पादन एक प्रकार का बलिदान एवं सृजन निर्माण है। इसके विपरीत कामुकता से प्रेरित होकर अश्लील क्रिया−कलाप में जुट जाना और कुसंस्कारी पिल्ले जनते रहना पाप कर्म है। काम प्रवृत्ति के सदुपयोग और दुरुपयोग की कसौटी पर ही उसे श्रेष्ठ और निकृष्ट ठहराया जाता है।

सदुद्देश्य के लिए आत्मीयता की सघनता को प्रेम और व्यक्तिगत व्यामोह से प्रेरित होकर व्यक्ति विशेष की अनुचित आकांक्षाओं को पूरा करना अथवा उसके लिए अनावश्यक वैभव छोड़ना मोह है। प्रेम में गुणों का सम्वर्धन और मोह में तुष्टीकरण जुड़ा रहता है, जो भले ही अनुचित रहा हो। प्रेम और मोह में राई रत्ती का अन्तर है और उसे उत्कृष्टता निष्कृष्टता की कसौटी पर ही परखा जा सकता है।

उद्दण्ड और शूरवीर में—सत्याग्रही और अनुशासनहीन में, संयमी और कृपण में, कायर और अहिंसक में बाहरी दृष्टि से बहुत थोड़ा अन्तर मालूम पड़ता है, पर अन्वेषण से पता चलता है कि एक ही प्रवृत्ति को गलत एवं सही तरीके से प्रयोग करके उसे निकृष्ट अथवा श्रेष्ठ बना दिया गया है। यहाँ सदुपयोग−दुरुपयोग की बात को ही महत्व दिया जा सकता है।

क्रोध की उपयोगिता उस कथा में प्रकट होती है जिसमें एक सर्प ने किसी महात्मा का उपदेश सुनकर अहिंसा का व्रत ले लिया था। फलतः बच्चों ने पीट पाट कर उसका भुर्ता बना दिया। पीछे उसे एकांगी सज्जनता की भूल मालूम हुई तो फुंसकारना आरम्भ किया और पीटने वालों की डराकर अपनी जान बचाई। यहाँ सन्तुलित क्रोध की उपयोगिता सिद्ध होती है। द्रोणाचार्य के कन्धे पर धनुष और हाथ में शास्त्र रहता था। वे कहते थे दुष्टता से निपटने के लिए शस्त्र और सज्जनता को बढ़ाने के लिए शास्त्र की आवश्यकता है। दोनों एक−दूसरे से प्रतिकूल दीखते हैं, पर आवश्यकतानुसार दोनों का प्रयोग करने से ही व्यावहारिकता की नीति अपनाई जा सकती है। गुरु गोविन्द सिंह ने अपने शिष्यों को एक हाथ में भाला और दूसरे में माला धारण करने का गुरु मन्त्र दिया था। इस प्रकार के प्रशिक्षण की उपयोगिता भी है और आवश्यकता भी। बुद्ध के शिष्यों ने एकांगी अहिंसा का प्रचार करके जनसाधारण को निस्तेज बना दिया फलतः मुट्ठी भर आक्रमणकारी इतने बड़े देश को पैरों तले कुचल डालने और लम्बे समय तक नृशंस शासन कर सकने में सफल हो सके। यह अनीति के प्रति आक्रोश ठण्डा कर देना और अहिंसा के अतिवाद का ढिंढोरा पीटने का ही दुष्परिणाम था।

भारतीय धर्म संस्कृति में आदर्शों के एकांगी उपयोग का कहीं समर्थन नहीं किया गया है वरन् देश, काल, पात्र की स्थिति को समझते हुए तदनुसार रीति अपनाने का निर्देश किया गया है। इसमें दक्षिणाचार और वामाचार दोनों की समान रूप से गुंजाइश रखी गई है। सत्य, अहिंसा, दया, क्षमा, करुणा, दान आदि सभी सद्गुणों की शास्त्रकारों ने भूरि−भूरि प्रशंसा की है पर साथ ही पात्र कुपात्र का ध्यान रखने का कठोर निर्देश भी किया है अन्यथा यही सद्गुण समझी जाने वाली सत्प्रवृत्तियाँ दोष−दुर्गुणों से भी अधिक भयंकर दुष्परिणाम उत्पन्न कर सकती हैं। डाकुओं के घर में घुस आने और पकड़ लेने पर घर का माल कहाँ रखा है यह सच-सच बता दिया जाय तो उससे अपने ऊपर निर्धनता का अभिशाप चढ़ेगा और डाकू सरलतापूर्वक सम्पन्न बन कर अधिक उत्साहपूर्वक दुष्टता अपनायेंगे। ऐसी दशा में उन्हें सत्यवादियों के घरों पर डाका डालना ही अधिक लाभदायक प्रतीत होगा। मिलिट्री के कप्तान अपनी भावी योजना को सचाई के नाम पर प्रकट कर दिया करें, गुप्तचर विभाग के लोग अपना पद और उद्देश्य सच−सच घोषित करते फिरें तो फिर वे अपने कर्त्तव्य से च्युत ही गिने जायेंगे। सच बोलना नहीं, सत्य, आदर्शों की रक्षा करना आवश्यक है। इसके लिए युक्ति−युक्ति असत्य को भी अपनाया जा सकता है। भगवान कृष्ण का जीवन ध्यानपूर्वक पढ़ने से प्रतीत होता है कि उन्होंने सत्य की रक्षा के लिए असत्य के शस्त्र को अपनाने में कहीं भी आनाकानी नहीं की है। श्रेष्ठ उद्देश्य के लिए श्रेष्ठ साधन की नीति सन्त परम्परा में चलती रही है और चलनी चाहिए, पर वह सर्वमान्य सिद्धान्त नहीं है। राजनीति के क्षेत्र में यदि उसी को मान्यता मिलने लगे तो समझना चाहिए कि अब सर्वनाश ही होकर रहेगा।

सत्य की अपनी उपयोगिता है और असत्य की अपनी। प्रश्न केवल उपयुक्त स्थान पर उन्हें प्रयोग करने का है। अहिंसा की गरिमा बताई गई है, पर वह भी सापेक्ष है। आततायियों को मृत्यु दण्ड देने में प्रत्यक्षतः हिंसा कृत्य मालूम देता है, पर वस्तुतः वह हिंसा अनाचार की रोकथाम का उद्देश्य पूरा करने में अहिंसा से भी अधिक उपयोगी है। सज्जनों से, सदुद्देश्यों से प्रेम करना उचित है। पर दुष्टता के प्रति जितनी गहरी घृणा होगी, उतना ही उस पर नियन्त्रण करने वाले रोष आक्रोश का, विरोध असहयोग का जगाया जा सकना सम्भव होगा। यदि सज्जनता से भी प्रेम, दुर्जनता से भी प्रेम करने की नीति अपनाई गई तो उसे आदर्शों के साथ किया गया व्यभिचार ही माना जायगा। अबोधों को क्षमा किया जाना चाहिए, पर दुष्टता के अभ्यस्त कुचक्रियों को दण्ड दिलाने में भी उतना ही उत्साह होना चाहिए। दान उत्तम है किन्तु ढोंगियों, निठल्लों और विकृतियाँ उत्पन्न करने वाले लोगों को यदि आँखें मूँद कर दान दिया जाता रहा तो पुण्य दीखते हुए भी निश्चित रूप से पाप जैसे दुष्परिणाम उत्पन्न करेगा। ऐसे लोगों के साथ उदारता बरतने की अपेक्षा निष्ठुरता अपनाने में ही अधिक भलाई है।

मानवी प्रवृत्तियों में सत् और तम की दोनों प्रवृत्तियों का भगवान ने विचार पूर्वक समावेश किया है। उन्हें उचित स्थान पर उचित रीति से प्रयोग में लाया जाय तो दोनों ही अपनी−अपनी उपयोगिता सिद्ध करती हैं। अनर्थकारी कोई प्रवृत्ति नहीं। मात्र उनका दुरुपयोग ही हानिकारक है। प्रवृत्तियों को महत्व देने की अपेक्षा उनके औचित्य और उपयोग स्थल का ध्यान रखा जाय।

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देवत्व दुर्बल न पड़े, असुरता पर हावी रहें

सृष्टि की प्रत्येक रचना का कोई न कोई रचनाकार होता है। कापी पर बनी व्यवस्थित ड्राईंग देखते ही पहला प्रश्न यह होता है इसे किसने बनाया? कार्टून देखकर बड़ी प्रसन्नता होती है, पर उस प्रसन्नता से सर्वप्रथम प्रसूत जिज्ञासा यह होती है कि उसे बनाया किसने? कोने में दृष्टि डालने से उसका समाधान नाम पढ़ने से हो जाता है, किन्तु परमात्मा को किसी ने नहीं बनाया इसलिए उसकी सत्ता—स्वयंभू—कहलाती है।

उसकी सृष्टि के विकास के साथ अनेक प्रकार के तत्व, यौगिक और उनसे विनिर्मित मनुष्य, जीव जगत, वनस्पति आदि जन्मे। दृश्य प्रकृति में जो कुछ भी है अच्छी और बुरी दो प्रवृत्तियों में बँटा हुआ है। जीवन की सूक्ष्मतम अवस्था जीवाणु का अध्ययन करें तो एक दूसरा तथ्य भी उपस्थित होता है वह यह कि अच्छाइयाँ और बुराइयाँ किसी और की देन नहीं यह भी स्वयंभू हैं। मनुष्य का अपना देवत्व ही अच्छी प्रवृत्तियाँ विकसित कर लेता और उनके सत्परिणामों से लाभान्वित होता है जबकि उसका अन्तःपिशाच ही दुष्प्रवृत्तियों के रूप में प्रकट हो उठता और न केवल उसे अपितु दूसरों का भी सर्वनाश करके छोड़ता है। जीवाणु अर्थात् देवत्व की शक्ति , प्रति जीवाणु या विषाणु असुरता का प्रतीक है।

सैल्यूलोज आवरण से आच्छादित तरल प्रोटोप्लाज्मा से बने जीवाणु किसी भी स्थान पर नमी, आदि पाकर स्वयं ही जन्म ले लेते हैं यह इतनी सूक्ष्म सत्ता है कि एक इंच की लम्बी लकीर में इन्हें पंक्ति बद्ध खड़ा किया जाये तो 25000 जीवाणु बड़े मजे में खड़े हो जायेंगे। इतने आदमी एक पंक्ति में खड़े किये जायें और यह माना जाये कि एक व्यक्ति औसतन 1 फुट जगह लेगा तो कुल आदमियों के लिए 5 मील लम्बी सड़क की आवश्यकता होगी। देवत्व सूक्ष्म तत्व है अनुभूति के लिए वैसी ही सूक्ष्म बुद्धि दूरदर्शी समीक्षा चाहता है यह न हो तो मनुष्य सामान्य स्वार्थ का ही इस श्रेणी में मानकर उसके लाभों से वंचित हो सकता है।

विषाणु तो उससे भी सूक्ष्म और प्रभावी सत्ता है। एक इंच में यह 141000 आसानी से बैठ सकते हैं—अर्थात् यदि वह एक आदमी बराबर हों और यह माना जाये कि उनमें से प्रत्येक को 1 फुट ही जगह चाहिए तो 26 मील सड़क की आवश्यकता होगी। तात्पर्य यह हुआ कि बुराई की शक्ति अत्यन्त सूक्ष्म है। वह कब आ धमके यह पता लगाना भी कठिन है जब तक कि उतनी ही पैनी और सूक्ष्म निरीक्षण बुद्धि न रखें।

दूसरी ओर विषाणु हैं जो जीवाणु के ही पैरों में लगा चला आता है। बुराइयाँ सदैव छद्म वेष में देवत्व के बाने में आती हैं अन्यथा उन्हें स्थान ही न मिले इसलिए अच्छाइयाँ जहाँ हमारे जीवन की अभीष्ट हैं। वहीं सतर्कता भी उतनी ही आवश्यक है। इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि अतिथि और मित्र बनकर आये परिजनों में ही कहीं कोई अपनी दुविधा और भ्रम का लाभ उठाकर कोई चोर उचक्का तो नहीं आ धमका।

दूध में पड़ा बैक्टीरिया उसे दही बना देता है देवत्व और श्रेष्ठ व्यक्तियों की संगति समाज को भी उसी तरह सुन्दर बना देती है, जैसे दूध की अपेक्षा दही अधिक सुपाच्य हो जाता है। अपने जीवन में छोटी से छोटी वस्तु का उपयोग है। यदि हम भलाई के हर कण को अपनाने की कला सीख जायें तो हर किसी के आदर और विश्वास के पात्र बन सकते हैं, पर विषाणु जहाँ भी पहुँच जायें वहीं बीमारी पैदा कर दें अर्थात् बुराई के कर्म ही नहीं विचार भी हमारे पतन का आधार बन जाते हैं।

जीवाणु तथा विषाणु दोनों की ही संचार और विस्तार व्यवस्था बड़ी व्यापक है, पक्षियों के परों में लिपटे जहाजों में चढ़ कर यात्रियों के माध्यम से भी ये एक स्थान से एक देश से दूसरे स्थान दूसरे देश पहुँच जाते हैं। और सर्वत्र महामारी की स्थिति पैदा कर देते हैं कुछ न मिले तो हवा ही उनके लिए उपयुक्त वाहन है। इसी से यह कहीं भी जा पहुँचते हैं। अच्छाइयों और बुराइयों का क्षेत्र भी उसी तरह सर्वत्र खुला पड़ा है। स्वाध्याय के माध्यम से हम अर्वाचीन युग के देवत्व को भी अपने वर्तमान जीवन में बुला सकते हैं और नाटकों, फिल्मों से भी अच्छे बनने की प्रेरणा ले सकते हैं। दूसरों के अच्छे आचरण हमारे जीवन दीप बन सकते हैं और उनकी शिक्षायें भी वही प्रेरणा दे सकती हैं। बुराइयों के लिए भी ठीक यही स्थिति है बुलायें तो मन ही मन से करोड़ों मनोविकार आमन्त्रित कर लें दृढ़ता हो तो दृष्टि में पड़ने वाली कुत्सा भी अन्दर झाँकने न पाये।

हमारे भीतर आसुरी प्रवृत्तियाँ जड़ न जमा पायें उसके लिए उन्हें मारने की मुहिम जागृत रखनी चाहिए। एण्टी बायोटिक औषधियाँ जिस तरह शरीर में पहुँच कर वहाँ के विषाणुओं को चारों ओर से घेर कर रसद मार्ग काट कर उन्हें आत्मघात को विवश करती हैं। उसी तरह आत्म सुधार के लिए हमें प्रलोभनों को मार भागने का, बुराइयों से लड़ने का माद्दा अपने अन्दर से ही पैदा करना चाहिए। यदि ऐसा कर लें तो वह हमारी उसी तरह हानि नहीं कर सकतीं जिस तरह हास्पिटलों में टी.बी., कैन्सर आदि के मरीज भरे पड़े रहते हैं। स्वाभाविक है कि वहाँ विषाणुओं का सरोवर लहरा रहा हो किन्तु उसी वातावरण में डॉक्टर लोग दिन−दिन भर काम करते रहते हैं। फिर भी उनका रत्ती भर भी अहित नहीं हो पाता।

दैवी अंश प्रबल हों तो वह सशक्त जीवाणुओं की तरह शरीर की ढाल का कार्य करते हैं। उससे असुरता हावी नहीं होने पाती, आत्म सुधार की सबसे अच्छी प्रक्रिया यह है कि हम निरन्तर रचनात्मक विचारों को मस्तिष्क में विकसायें, रचनात्मक कार्य करते रहें उससे बुराइयाँ अपने आप ही झाँक कर लौट जाती हैं। जिस घर में पहले ही समर्थ लोग रहते हों वहाँ चोर उचक्के झाँक कर ही लौट जाते हैं।

लेकिन यदि सीलन, सड़न, गलन अपने भीतर ही हो तो कमजोर भले मानस को भी सशक्त बदमाशों द्वारा सताये जाने की तरह बुराइयों को पनपने का भीतर ही आधार मिल जायेगा। बाहर के विषाणु शरीर में आयें पर शरीर सशक्त हो, पाचन यन्त्र ठीक काम करते हों, रुधिर में श्वेताणुओं की कमी न हो तो विषाणु रत्ती भर असर नहीं डाल पायेंगे उल्टे नष्ट हो जायेंगे पर भीतर विजातीय द्रव्य भरा हो। आदमी में आकर्षणों की सड़न भीतर−भीतर बुझ रही हो तब तो वे अपनी शक्ति भीतर ही बढ़ा कर हमारे विनाश का कारण बन जायेंगे यहीं नहीं विजातीय द्रव्य के बाद वे शरीर की कोशाओं को भी खाने लगेंगे तब फिर जीवन का अन्त होगा ही।

प्रकाश में विषाणुओं को मार देने की शक्ति है। हमारे जीवन में प्रकाश तत्व बना रहे, विवेक बना रहे तो न केवल भलाई की शक्ति, देवत्व का विकास और उसके फलितार्थों से लाभान्वित होते रह सकते हैं। आसुरी तत्व वे चाहे कितने ही अदृश्य और शक्तिशाली क्यों न हों जानकारी में आते रहें और उन्हें नष्ट करने, मार कर भगा देने का साहस हमारे जीवन में बना रहना चाहिए।

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वृक्ष वनस्पति के प्रति श्रद्धा अक्षुण्ण रहे

पेड़ पौधे के प्रति पूज्यभाव रखने की अपनी परम्परा सदियों पुरानी है। दुनिया में कोई भी देश ऐसा नहीं जिसमें एक त्यौहार केवल इसी लिए मनाया जाता हो कि उस दिन हर व्यक्ति वृक्षारोपण अवश्य करे। यह पर्व भी ब्राह्मण पर्व कहलाता है—अर्थात् वृक्षारोपण को ब्रह्मकर्म के समतुल्य माना गया है महाभारत ने तो एक वृक्ष लगाने को सौ पुत्रों से बढ़कर पुण्य माना है।

इस उदात्त दृष्टिकोण में विराट् आत्मा की अनुभूति भी संयुक्त हो सकती है और आत्मीयता के विस्तार का प्रायोगिक प्रशिक्षण भी किसी भी दृष्टि से लें यह एक उपयोगी और आवश्यक ही नहीं अनिवार्य परम्परा रही है। जिसकी वैज्ञानिक उपयोगिता इन दिनों समझ में आ रही है जबकि वृक्ष−वनस्पति हमारे सम्मुख त्रिदेवों की तरह अत्यन्त पूज्य रूप में प्रतिष्ठित होते हैं। ब्रह्मा के रूप में वे सृष्टि में सौन्दर्य की रचना करते। विष्णु के रूप में उनका पालन गुण सर्वविदित है। आज तो उनकी सर्वाधिक प्रतिष्ठा शिव रूप में है। इस रूप में मानवता का विष निरन्तर पीते रहने का देवकार्य वे न कर रहे होते तो बीसवीं शताब्दी धरती में जीवन के सर्वनाश की शताब्दी होती। आज का विज्ञान भी स्वीकारता है कि मानवी अस्तित्व फ्लोरा (पृथ्वी के वनस्पति जगत) पर आधारित है। सूर्य से मिलने वाले अनुदान हम पचा नहीं पाते, यह वृक्ष ही हैं जो कच्चे अन्न को भोजन के रूप में पकाकर देने वाली माँ की तरह और ऊर्जा को पहले स्वयं आत्मसात करते और पीछे हमारे लिए उपयोगी और प्राणदायी बनाकर वातावरण में बिखेर देते हैं। इनके गुणों को देख कर ही किसी विद्वान ने आज के बुद्धिवाद पर व्यंग करते हुए लिखा है कि आज लोग मेट्रोलाजिकल प्लान्ट, थर्मोप्लान्ट, हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्लान्ट प्रभृति प्लान्टों पर तो ध्यान देते हैं, पर प्लान्ट (पौधों) पर नहीं जिनके बिना मनुष्य का जीवन संकट में पड़ सकता है।

थोड़े से भी थोड़ा पढ़ा लिखा व्यक्ति जानता है कि प्रश्वास क्रिया धुँये तथा पदार्थों के सड़ने आदि से उत्पन्न कार्बन डाई ऑक्साइड जो एक विषैली गैस है, उसे पेड़-पौधे ही सूर्य के साथ होने वाली फोटो संश्लेषण क्रिया में ग्रहण कर लेते हैं और बदले में ऑक्सीजन गैस छोड़ते हैं। जीवधारियों की प्रश्वास को अपनी श्वास और अपनी प्रश्वास को जीवन के लिए श्वास बनाकर वृक्ष वनस्पति सृष्टि में जो “इकॉलाजिकल संतुलन” स्थापित करते हैं। उसी के कारण सृष्टि टिकी हुई है।

किन्तु लगता है मनुष्य उस संतुलन को बिगाड़ डालने और अपने ही हाथ अपनी “खुदकुशी” करने को तुल पड़ा है। जनसंख्या वृद्धि के साथ−साथ अधिक कृषिभूमि, अधिक आवास, सड़कों, नहरों, फैक्ट्रियों, बड़े−बड़े कारखानों के लिए अधिक जमीन चाहिए और यह सब जंगल साफ करके, वृक्षों का विनाश करके ही सम्भव है। वही हो रहा है जिससे ऑक्सीजन और कार्बनडाई ऑक्साइड का संतुलन बिगड़ रहा है। ऑक्सीजन की जमा पूँजी कम और खर्च बढ़ने से पिछले 50 वर्षों में कार्बनडाइ ऑक्साइड की मात्रा 0.030 से बढ़कर 0.044 प्रतिशत बढ़ गई है। इस असंतुलन को पाटने के लिये अधिक से अधिक वृक्ष लगाने की आवश्यकता है। अब इसे मात्र धार्मिक दृष्टि से ही नहीं अपितु जीवन रक्षा की दृष्टि से भी पूरा किया जाना चाहिए।

कार्बनडाई ऑक्साइड के अतिरिक्त कल कारखानों से सल्फर डाई ऑक्साइड, कैडमियम, लेड, नाइट्रोजन ऑक्साइड का विष भी बुरी तरह बढ़ता जा रहा है। टोक्यो (जापान), न्यूयार्क (अमेरिका) तथा लन्दन (इंग्लैंड) के कुछ क्षेत्र तो ऐसे हैं जहाँ साँस लेने तक में भी कष्ट होता है। यह विष मनुष्य देह के लिए प्रतिदिन 40 सिगरेटें पीने के बराबर नुकसानदायक होता है। शीशे (लेड) का जहर किडनी डैमेज (गुदा नष्ट करना) ब्लड प्रेशर तथा मस्तिष्कीय क्रियाओं को क्षतिग्रस्त करता है। सल्फर डाई ऑक्साइड अस्थमा तथा श्वास सम्बन्धी कष्ट उठ खड़े होते हैं। हमारे देवता यह वृक्ष उस विष को पियें नहीं तो हर व्यक्ति रोग शैया पकड़ लें।

एक वृक्ष एक ऋतु में वायुमण्डल से 130 लीटर पेट्रोल के शीशे का अंश सोखकर उसे लेड फास्फेट में बदल देता है। यह पानी में घुलता नहीं उसे वह अपने आप में जीवन भर आत्मसात किये रहता है। मर जाने के बाद ईंधन के रूप में उसे ही मनुष्य के लिए उपयोगी बना कर छोड़ जाता है। यही नहीं बड़े कारखाने जो ताप पैदा करते हैं। स्वयं प्रकृति की गर्मी की असह्य मात्रा को भी संतुलित रखने में यह वृक्ष ही सहायक होते हैं।

एटॉमिक रेडिएशन (अणु विकिरण) जैसे हानिकारक प्रभाव से भी वृक्ष हमारी जीवन रक्षा करते हैं। मांट्रियल स्थित मैकगिल यूनिवर्सिटी की गैस्ट्रो इन्टेस्टाइनल रिसर्च लैबोरेटरी ने अपनी शोधों के आधार पर बताया है कि साधारण घास तक रेडियेशन से रक्षा करती है। अतः पृथ्वी में हरीतिमा अभिवृद्धि, वृक्षारोपण, पुष्पवाटिका अभियान को नैतिक कर्त्तव्य के रूप में पूरा करना चाहिए। शहरों में तो लोन और पार्क इतने अधिक आवश्यक हैं कि उन्हें मनुष्य जीवन का हृदय ही कहा सकता है। वह मस्तिष्क को दृष्टि मात्र से निद्रा प्राप्त करने वाली शीतलता देते हैं यदि शहरों में पार्क न हों पागलपन की मात्रा इतनी अधिक बढ़ सकती है कि सम्भालना ही कठिन हो जाये।

जेट हवाई जहाजों, भारी मात्रा में रेलों, बसों भारी मात्रा में वाहनों तथा फैक्ट्रियों आदि के शोर गुल से कानों को सीधा आघात पहुँचता है। वृक्ष न हों तो यह शोरगुल लोगों को बहरा बना दे सकता है। किसी भी रूप वृक्षों के प्रति श्रद्धा व्यक्त किये बिना काम चलेगा नहीं।

जंगल अनावश्यक न कटें यह कार्य सरकार देखे पर मनुष्य को तो स्थान−स्थान पर वृक्षारोपण करना चाहिए। घरों के आस−पास गमलों, लकड़ी की पेटियों में फल−फूलों, सब्जियाँ लगा कर अपने लिए दोहरे लाभ की व्यवस्था कर सकते हैं। फूलों के पौधे तो कहीं भी निरर्थक स्थान मिले वहीं रोपें, यह न कहें कि यह स्थान उनका तो है ही नहीं, मानवता की सुरक्षा का दायित्व सब पर है, उसे उदारतापूर्वक पूरा किया जाना चाहिए।


साधकों ने व्रत लिया (kahani)

तांदोई संप्रदाय के चार साधकों ने व्रत लिया कि वे सात दिन तक मौन−व्रत रहेंगे।

पहला दिन निःशब्द बीता, साधक प्रसन्न थे कि उनके व्रत का वे पालन कर रहे हैं।

दूसरे दिन भी वे नहीं बोले परन्तु रात की नीरवता और गहराई में जब उनमें से एक ने देखा कि उनके कमरे में जल रहे दीपक की लौ क्षीण होती जा रही है व कुछ ही समय में वह बुझ जायगी। साधक ने अकस्मात् अपने नौकर को आवाज लगाई,”दीपक में तेल डाल दो।”

उसे बोलते सुन दूसरे साधक को आश्चर्य हुआ उसने सोचा उसके साथी को मौन व्रत की विस्मृति हो गई होगी, वह बोल पड़ा, “अरे! हमारा तो मौन व्रत चल रहा है तुम भूल गए कि हमें एक भी शब्द का उच्चारण नहीं करना है।”

तीसरे से न रहा गया—वह झल्लाकर बोला, “तुम दोनों कैसे मूर्ख हो व्यर्थ बातचीत कर रहे हो जबकि हम दोनों अपने व्रत के पालन में मौन बैठे हैं।” तीनों के व्रत भंग हो जाने पर चौथा साधक आत्मसन्तोष की मुद्रा बना कर कह उठा—”तुम तीनों ने व्रत तोड़ दिया एकमेव मैं ही सच्चा व्रती हूँ जो बोल नहीं रहा हूँ।”

सभी साधकों का व्रत पूर्ण नहीं हुआ भले ही उनमें से कुछ ने मुख से न बोला हो संकेत की ही भाषा अपनाई हो, पर उन क्षणों में उनका अहंकार बोल रहा था।

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जीवन साधना के 14 स्वर्णिम सूत्र

पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मथा गया था और उसमें से 14 बहुमूल्य रत्न निकले थे, जिनमें सूर्य, चन्द्र और अमृत जैसी दिव्य विभूतियाँ भी सम्मिलित थीं। कथानक की यथार्थता के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता पर यह सत्य है कि जीवन एक समुद्र है और यदि उसे सही रीति से मथा जा सके तो उसमें से वे रत्न प्राप्त हो सकते हैं जो देवताओं के लिए समुद्र मन्थन से प्राप्त उपलब्धियों से भी कहीं अधिक मूल्यवान सिद्ध हो सकें।

आत्मिक प्रगति के पथ पर जिन दो चरणों को बढ़ाते हुए चला जाता है उनमें एक है उपासना, दूसरा साधना। उपासना पूजा उपक्रम को कहते हैं और साधना—जीवन को परिष्कृत स्तर पर जीने की प्रक्रिया को उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तव्य की नीति अपना कर सज्जनता और परमार्थ परायणता के समन्वय को जीवन साधना कहा जा सकता है। उपासना व्यायाम है और साधना आहार। उपासना बीज है और साधना उपजाऊ भूमि। उपासना पौधा है और साधना सिंचाई। उपासना कारतूस है और साधना बन्दूक। दोनों के समन्वय से ही आत्मोत्कर्ष की दिशा में अभीष्ट प्रगति हो सकती है।

साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष में 45 मिनट की साधना का उपक्रम चल रहा है। उसमें जिन लोगों ने भाग लिया है वे उसे उत्साहपूर्वक जारी रखें। साथ ही इस तथ्य पर भी ध्यान रखें कि उपासना के साथ जीवन साधना के लिए भी प्रयत्नशील रहना है। अपने दृष्टिकोण को अपेक्षाकृत अधिक उत्कृष्ट और क्रिया−कलाप को अधिकाधिक आदर्श बनाने के लिए निरन्तर जागरूकता बरतें और सचेष्ट रहें।

इसके लिए समुद्र मन्थन द्वारा निकले हुए रत्नों की तरह जीवन साधना के 14 सूत्र धर्मशास्त्रों और आप्त वचनों के सार रूप निचोड़े गये हैं। इन पर साधना वर्ष के सदस्यों को विशेष रूप से ध्यान देना चाहिए।

1. आस्तिकता (ईश्वर विश्वास)

ईश्वर विश्वास मानवी नैतिकता का मेरुदंड है। उसे हर कीमत पर सुरक्षित रखा जाना चाहिए। कर्म फल सिद्धान्त आस्तिकता से जुड़ा हुआ है। तत्काल कर्म फल मिलने की छूट देकर मनुष्य की निजी गरिमा परखी गई है, अन्यथा तत्काल कर्मफल की व्यवस्था रही होती तो मनुष्य दण्डभय से एक जैसे बने रहते और उनको निजी स्तर निखर न पाता। कर्मफल तत्काल मिलते न देखकर लोग इस भ्रम में पड़ते हैं कि वे सदा ही अपनी चतुरता से बचे रह सकते हैं और मनमानी स्वार्थपरता एवं अनीति में लगे रह सकते हैं। इसी भ्रम में मनुष्य कुमार्गगामी बनता है। अस्तु जनमानस में ईश्वरीय शासन की आस्था दृढ़तापूर्वक जमा रहनी चाहिए।

2. आध्यात्मिकता (आत्मविश्वास− आत्मनिष्ठा)

अपने गौरव एवं वर्चस्व को सदा ध्यान में रखा जाय। अपनी मूल सत्ता को ईश्वर का पवित्र एवं समर्थ अंश माना जाय। अपने भीतर छिपी अगणित विशेषताओं को ध्यान में रखा जाय और उन्हें जागृत करने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहा जाय। गुण, कर्म स्वभाव की उत्कृष्टता की अपनी सबसे बड़ी पूजा समझा जाय और इस आधार पर उत्पन्न हुई आत्म−शक्ति की मात्रा को जीवन की वास्तविक सफलता अनुभव किया जाय।

अपने भाग्य का निर्माणकर्ता मनुष्य स्वयं है। इस तथ्य को पूरी तरह हृदयंगम रखा जाय। हर दिन कुछ समय निकाल कर आत्म−चिन्तन, आत्म−सुधार, आत्म−निर्माण एवं आत्म विकास को ध्यान में रखते हुए वर्तमान स्थिति की समीक्षा और प्रगति की भावी योजना बनाने की प्रक्रिया नियमित रूप से जारी रखी जाय।

मनुष्य शरीर को ईश्वर प्रदत्त सर्वोपरि उपहार और चौरासी लाख योनियों की लम्बी शृंखला का अनुपम सौभाग्य माना जाय। समझा जाय कि इतना साधन सम्पन्न शरीर सृष्टि के अन्य किसी प्राणी को नहीं मिला इसमें ईश्वर का पक्षपात नहीं वरन् विशिष्ठ उत्तरदायित्व सौंपकर प्रामाणिकता परखना ही एक मात्र कारण है। यह धरोहर ईश्वर के इस विश्व उद्यान को अधिक सुविकसित सुसंस्कृत बनाने में हाथ बटाने के लिए मिली है। इस सम्पदा को लोभ, मोह और वासना, तृष्णा की संकीर्ण स्वार्थपरता में नष्ट नहीं किया जाना चाहिए वरन् अपने को अधिकाधिक पवित्र बनाते हुए पूर्णता के स्तर तक पहुँचने में, लोकमंगल के लिए बढ़े−चढ़े अनुदान देने में जीवन की सार्थकता माननी चाहिए।

3. धार्मिकता (कर्त्तव्य−निष्ठा)

मानवी गरिमा को उच्चस्तरीय धर्म कर्त्तव्यों से पूरी तरह जकड़ा माना जाय। नैतिक और सामाजिक कर्त्तव्यों का पालन करने के लिए अपने को कठोर अनुशासन में बाँध कर रखा जाय। उच्छृंखलता, उद्दण्डता, अनैतिकता अपनाने की पशु प्रवृत्ति को प्रत्यक्ष आत्मपतन माना जाय। और पिछले दिनों ऐसा कुछ बन पड़ा हो तो उस पर पश्चाताप किया जाय। अनैतिक आचरणों से व्यक्ति विशेष को ही नहीं समूचे समाज को क्षति पहुँचती है इसलिए जो अपने से हों उसकी क्षतिपूर्ति के लिए प्रायश्चित्त का साहस जुटाया जाय। पापों के रूप में पतन की दिशा में जो बन पड़ा है उसी के समतुल्य सत्प्रवृत्तियाँ बढ़ाने वाला पुण्य परमार्थ करके ही पिछले पापों का प्रायश्चित्त हो सकता है।

धर्म का अर्थ है कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों का निर्वाह अपने प्रति तथा दूसरों के प्रति कर्त्तव्य पालन में तत्परता बरती जाय और जो व्यवधान इस मार्ग में आड़े आते हो उन्हें हटाया जाय।

शरीर, आत्मा, परिवार, समाज एवं ईश्वर के प्रति अपने पवित्र कर्त्तव्यों का निरन्तर ध्यान रखा जाय और उनके पालन करने में कुछ भी भेद न रखा जाय।

4. प्रगति शीलता (आत्मोत्कर्ष)

हमें विचारशील दूरदर्शी होना चाहिए और पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर हर बात की यथार्थता समझने की चेष्टा करनी चाहिए। एकांगी दृष्टिकोण रखने से भ्रमपूर्ण स्थिति मस्तिष्क पर छा जाती है और उसके प्रभाव से अनुचित निर्णय हो जाते हैं जिनका परिणाम पीछे पश्चाताप करने जैसा ही सामने आता है। हमें सर्वत्र सत्य की खोज करनी चाहिए और उचित निर्णय लेने चाहिए।

ज्ञान वृद्धि की दृष्टि से हर दिन ऐसा साहित्य पढ़ने का नियम बनाना चाहिए जो अपने व्यक्तित्व को सुसंस्कृत बनाने में तथा सामाजिक समस्याओं के हल करने में उपयुक्त मार्ग दर्शन कर सके। ऐसा स्वाध्याय मानसिक भूख बुझाने के लिए दैनिक आहार की तरह ही आवश्यक समझा जाय उसके लिए नित्य कुछ समय निर्धारित रखा जाय।

5. संयम शीलता (इन्द्रिय निग्रह)

इन्द्रिय शक्ति के दुरुपयोग से असंयम से केवल हानि ही हानि है। जीभ को मिर्च-मसाले और पकवान−मिष्ठान्नों का आदी बनाकर अनावश्यक और अनुपयोगी पदार्थ पेट में भरे जाते हैं फलतः अपच उत्पन्न होता है और तरह−तरह के रोग खड़े होते हैं। तामसिक राजसिक आहार में धन समय और स्वास्थ्य की बर्बादी अत्यन्त स्पष्ट है। जैसा अन्न वैसा मन की उक्ति सर्वविदित है। आहार की सात्विकता का प्रभाव साधक की मनोभूमि पर सीधा पड़ता है। जीभ का चटोरापन रोके बिना इन हानियों से नहीं बचा जा सकता। समझदारी इसी में है कि कड़ी भूख लगने पर सात्विक और सुपाच्य आहार ही उचित मात्रा में ग्रहण किया जाय।

ब्रह्मचर्य का अधिकाधिक पालन किया जाय। ओजस का कामुकता के क्षणिक मनोरंजन में अपव्यय करना बहुत महंगा सौदा समझा जाय। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए ब्रह्मचर्य पालन की उपयोगिता स्वीकार की जाय और आचरण में लाया जाय।

6. समस्वरता (मानसिक सन्तुलन)

मस्तिष्कीय समस्वरता को हर स्थिति में अक्षुण्ण रखा जाय। प्रिय और अप्रिय परिस्थितियाँ हर किसी के जीवन में आती हैं, उनमें उद्विग्न हो उठने से मानसिक तन्त्र गड़बड़ा जाता है और उत्तेजित स्थिति में ऐसे निर्णय एवं काम करता रहता है जिनसे स्वनिर्मित विपत्ति के संकट घुमड़ने लगते हैं। सफलताओं पर कई व्यक्ति हर्षोन्मत्त हो उठते हैं। अहंकारी बनते और दुस्साहस करने पर उतारू होते हैं। उद्धत प्रदर्शन करने एवं शेखीखोरी पर उतारू भी ऐसे ही लोग होते हैं फलतः वे ठोकर खाते और यश गँवाते हैं। सफलताओं को ईश्वरीय अनुग्रह एवं साथियों का सहयोग समझा जाय। आत्म−विश्वास तो बढ़े पर नम्रता एवं गम्भीरता हर हालत में बनी रहे।

7. पारिवारिकता (आत्मविस्तार की प्रक्रिया)

परिवार एक छोटा समाज एवं छोटा राष्ट्र है। उसकी सुव्यवस्था एवं शालीनता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी बड़ी रूप में समूचे राष्ट्र की। इस छोटी-सी प्रयोगशाला में व्यायामशाला एवं पाठशाला में उसके प्रत्येक सदस्य को वैयक्तिक कर्त्तव्यों एवं सामाजिक उत्तरदायित्वों को समझने निबाहने की शिक्षा प्राप्त करने का अवसर मिल सके, ऐसा ढाँचा खड़ा किया जाना चाहिए। यही प्रवृत्ति विकसित होते−होते विश्व नागरिकता एवं मानव परिवार का सृजन करेगी।

दिनचर्या बनाकर घर के सब काम निपटाये जाय। कोई सदस्य बेकार न रहे और किसी पर श्रम का अनावश्यक दबाव न पड़े। श्रमशीलता, मितव्ययिता, सहकारिता, शिष्टता, एवं उदार आत्मीयता की सत्प्रवृत्तियाँ सीखने और बढ़ाने का अवसर घर के हर सदस्य को मिले। बड़ों को समुचित आदर और छोटों को भरपूर स्नेह दुलार मिलना चाहिए। उत्तराधिकार में प्रचुर सम्पदा छोड़ने की बात किसी को भी नहीं सोचनी चाहिए। सद्गुणी और स्वावलम्बी बना देना ही अभिभावकों का कर्त्तव्य है।

8. सामाजिकता (नागरिकता)

दूसरों के साथ वही व्यवहार किया जाय जो हम दूसरों से अपने प्रति किये जाने की अपेक्षा करते हैं। इस कसौटी पर जो भी कार्य खरे उतरे उन्हें नैतिक एवं सामाजिक कहा जा सकता है। हमें किसी के नागरिक अधिकारों का हरण नहीं करना चाहिए। शोषण, दबाव, छल की नीति किसी के प्रति भी नहीं अपनायी जानी चाहिए। हर किसी को सम्मान दिया जाय और सद्व्यवहार किया जाय। अपनी शालीनता की रक्षा इसी में होती है। अपराधी आचरण न तो स्वयं किए जायं और न दूसरों को करने दिया जाय। जहाँ अनीति बरती जा रही हो वहाँ असहयोग और विरोध तो किया ही जाय। आवश्यकता पड़ने पर संघर्ष करने और सरकारी सहायता से उसे रोकने में भी शिथिलता न की जाय। अनैतिक और असामाजिक कार्यों के विरोध में संगठित चेतना उत्पन्न की जानी चाहिए।

शिष्टाचार, सद्व्यवहार, मनुजता, सामूहिकता और नागरिकता की प्रवृत्तियाँ सभ्य समाज के प्रत्येक सदस्य को अपनानी पड़ती हैं। उसे अपना चिन्तन उदार और कर्त्तृत्व आदर्श रखना पड़ता है। हमारा स्वभाव समाजनिष्ठ होना चाहिए। व्यक्तिवाद के प्रति उपेक्षा और समूहवाद के प्रति निष्ठा रखने वाले व्यक्तियों का समाज ही समुन्नत होता है और उसके सदस्य सुखी रह सकते हैं यह तथ्य हर किसी को हृदयंगम करना और कराना चाहिए।

9. शालीनता (स्वच्छता एवं सादगी)

स्वच्छता मनुष्य की जागरूकता, सुरुचि एवं कलात्मक दृष्टिकोण की परिचायक है। उससे मनुष्य की सौन्दर्यप्रियता व सतर्कता का प्रमाण मिलता है। मनुष्य की सुरुचि का उसके विकसित सभ्यता स्तर का पता इस बात से लगता है कि उसका स्वभाव कितना स्वच्छता प्रिय है।

स्वच्छता की स्थिति तभी रह सकती है जब गन्दगी से निपटने के लिए हर समय कटिबद्ध रहा जाय। स्वच्छता से प्रेम हो तो गन्दगी साफ करने में अपना निज का उत्साह करना चाहिए। शरीर, वस्त्र, वस्तुएँ, उपकरण, घर आदि की स्वच्छता सुव्यवस्था देख कर यह पता चलता है कि आपने मानवी सभ्यता के क्षेत्र में कितना प्रवेश पा लिया। सौन्दर्यप्रियता की एक मात्र परख स्वच्छता और सुव्यवस्था है। अपने पहनाव−उढ़ाव, परिधान, वेश विन्यास एवं उपकरणों में सादगी सस्तेपन का समावेश होना चाहिए। अपव्यय और उद्धत प्रदर्शन से शालीनता का स्तर गिरता है बढ़ता नहीं। यह तथ्य भली प्रकार ध्यान में रखा जाय।

10. नियमितता (समय और श्रम का संतुलन)

समय ही जीवन की आवश्यक सम्पत्ति है दुनिया के बाजार में से अभीष्ट वस्तुएँ समय और श्रम का मूल्य देकर ही खरीदी जाती हैं। प्रत्येक क्षण को बहुमूल्य माना जाय और समय का कोई भी अंश आलस्य−प्रमाद में नष्ट न होने पावे इसका पूरा−पूरा ध्यान रखा जाय। समय की बर्बादी अप्रत्यक्ष आत्महत्या है। धन के अपव्यय से भी असंख्य गुनी हानि समय के अपव्यय से होती है। खोया धन पाया जा सकता है, पर खोया हुआ समय नहीं।

सोकर उठने से लेकर रात्रि को सोते समय तक की पूरी दिनचर्या हर रोज निर्धारित कर ली जाय और शक्ति भर यह प्रयत्न किया जाय कि हर कार्य अपने समय पर पूरा होता रहे। परिस्थिति बदल जाने पर आकस्मिक कारणों से तो हेर-फेर हो सकता है, पर आलस्य प्रमादवश व्यतिरेक न होने दिया जाय।

11. प्रामाणिकता (ईमानदारी− जिम्मेदारी)

धन सम्बन्धी ईमानदारी और कर्त्तव्य सम्बन्धी जिम्मेदारी का समन्वय किसी व्यक्ति को प्रामाणिक एवं प्रतिष्ठित बनाता है। हर व्यक्ति को अपनी योग्यता बढ़ाकर तथा कठोर श्रम करके अधिक उपार्जन, उत्पादन करना चाहिए, तभी राष्ट्रीय समृद्धि और व्यक्तिगत क्षमता का विकास होगा। किन्तु जो पैसा कमाया जाय वह न्यायनीति युक्त एवं श्रम उपार्जित होना चाहिए, बेईमानी, मिलावट, रिश्वत, मुनाफाखोरी के उपार्जन को भी चोरी, लूट, ठगी, डकैती जैसे बड़े अपराधों की कोटि में ही गिनना चाहिए। श्रमिकों को पूरा श्रम करना चाहिए। व्यापारियों को उचित कीमत पर सही चीज बेचनी चाहिए और किसी को भी अनीतिपूर्वक पैसा नहीं कमाना चाहिए। बजट बनाकर अपना खर्च उतना ही सीमित रखा जाय जिसमें ईमानदारी की सीमित कमाई से ही गुजारा हो सके। आमतौर से अपव्ययी और संग्रह के लालची लोगों को ही बेईमान बनना पड़ता है। फिजूल खर्ची अपनाकर ऋणी बनने वाले लोग भी बेईमानों की हेय श्रेणी में ही गिने जायेंगे।

12. विवेकशीलता (औचित्य की ही मान्यता)

अपनी संस्कृति कभी बहुत ही उच्च कोटि की थी उसकी श्रेष्ठ परम्परायें संसार भर में सम्मानित होती थीं। पर पिछले अन्धकार युग में विदेशी दासता के साथ साथ अनेक विकृतियाँ घुस पड़ी हैं और उसमें कुरीतियों अन्ध विश्वासों और मूढ़ मान्यताओं ने जड़ें जमा ली हैं। शुद्ध रक्त यदि सड़ जाय तो वह विषैले मवाद का रूप धारण कर लेता है। विषाणुओं का उन्मूलन न किया जाय तो शरीर की रुग्णता बढ़ेगी और अकाल मृत्यु का संकट सामने आ खड़ा होगा। अपने समाज में फैली हुई अवांछनीय मान्यताओं को उसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए और उनके उन्मूलन का शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए।

13. परमार्थ परायणता (अंशदान)

हर मनुष्य के पास (1) समय (2) श्रम (3) बुद्धि (4) धन, ये चार सम्पदायें होती हैं। इनमें से समय और श्रमशक्ति युक्त जीवन तो विशुद्ध रूप से ईश्वर प्रदत्त है। बुद्धि भी उन्हीं की देन है। इसे विकसित करने में चिर काल से असंख्य लोगों द्वारा संचित अनुभवों के संग्रह का ही योगदान रहता है। धन कमाना तो मनुष्य पुरुषार्थ से है, पर वह संभव तभी होता है जब दूसरे भी उस उत्पादन एवं विनिमय में सहयोग करें। इन चारों सम्पत्तियों को भगवान की एवं समाज की अमानत माना जाय और इनके द्वारा मात्र अपना ही स्वार्थ सिद्ध नहीं करते रहा जाय वरन् परमार्थ प्रयोजनों के लिए भी अंशदान किया जाय।

हम में से प्रत्येक को ज्ञानघट में न्यूनतम दस पैसे प्रतिदिन निकालने और एक घण्टा नित्य विचार क्रान्ति के लिए जन सम्पर्क में लगाने का कर्त्तव्य नियत किया है। इतना न्यूनतम अंशदान तो हर भावनाशील व्यक्ति को करना ही चाहिए। यह पैसा और समय मात्र जन मानस का भावनात्मक परिष्कार करने के लिए उपयोगी साहित्य खरीदने और उसे पढ़ाने सुनाने में लगाया जाना चाहिए।

14. प्रखरता (साहस एवं पराक्रम)

हर व्यक्ति को निर्भीक और साहसी होना चाहिए। इसके लिए उद्दण्डता की सीमा तक जाने की या आतंकवादी बनने की आवश्यकता नहीं है। सज्जनता के साथ निर्भीकता और साहसिकता जुड़ी रहे तभी उसका कुछ मूल्य है। बिना कटुता उत्पन्न किये एवं बिना कष्ट के अपनी आदर्शवादिता को अक्षुण्ण बनाये रखा जा सके तो इसे व्यवहार कुशलता माना जायगा। सहयोग मात्र सत्प्रवृत्तियों का ही किया जाय, सज्जनता का ही समर्थन हो। अपने भले या भोले होने का लाभ अवांछनीय व्यक्तियों को अवांछनीय कर्मों के लिए न मिलने पावे इसके लिए समुचित सतर्कता बरती जानी चाहिए।

हर किसी को आत्म−विश्वासी होना चाहिए। अपने पुरुषार्थ और साहस पर भरोसा करना चाहिए। अपने बलबूते, अपने साधनों से अपने संकल्प बल के सहारे अपनी योजनाएँ बनानी चाहिए।

लक्ष्य तक पहुँचने की दृढ़ता और हिम्मत अपने भीतर उगानी चाहिए। अपनी दुर्बलताओं को आत्मबल से समाप्त करना चाहिए। परामर्शदाताओं की बातों में जितना तथ्य एवं औचित्य हो, केवल उतना ही मानना चाहिए। आदर्शों को पालन करने में एकाकी खड़े रह सकने की प्रखरता उत्पन्न करनी चाहिए। ऐसे मनस्वी व्यक्ति ही सांसारिक एवं आत्मिक प्रयोजनों में सफल होते हैं। इस कटु सत्य को हृदयंगम करने में ही कल्याण है।

उपरोक्त 14 स्वर्णिम सूत्रों को यहाँ संक्षेप में लिखा गया है। इनका अधिक विस्तार 30 पैसा मूल्य की “जीवन साधना के 14 स्वर्णिम सूत्र” नामक पुस्तिका में छाप दिया गया है। इन आदर्शों को अपने व्यावहारिक जीवन में उतारने का प्रयत्न भी आरम्भ कर देना चाहिए।

आरम्भ के दिन ही इन सब आदर्शों का पालन पूरी तरह किया जाने लगेगा इसकी अपेक्षा तो नहीं की गई, पर यह आशा अवश्य की गई है कि इन्हें सिद्धान्त रूप से निष्ठा पूर्वक स्वीकार कर लिया जाय और प्रतिदिन यह समीक्षा की जाय कि आदर्श और व्यवहार में कितना अन्तर है उस अन्तर को क्रमशः घटाते चला जाय। यह प्रगति भले ही धीमी हो पर प्रयास आगे ही आगे चलते रहने चाहिए। जहाँ यह निश्चय होगा वहाँ परिवर्तन में तीव्रता आती जायगी। स्पष्ट है कि जीवन साधना की पृष्ठभूमि पर ही उपासना का कल्पवृक्ष पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है।


कृष गात गौतम (kahani)

स्थान−स्थान, निर्जन वन, पर्वत, कन्दरा में घूमते रहने−विभिन्न साधु−सन्तों से सम्पर्क सान्निध्य करते रहने पर भी गौतम को जब सद्ज्ञान की प्राप्ति न हुई तो वे एक स्थान पर वट वृक्ष के नीचे एकाग्र चित्त हो चिन्तन करने के लिए बैठ गए। उन्होंने अन्न जल सभी छोड़ दिया।

कृष गात गौतम एक दिन जब चिन्तन मग्न बैठे विचार कर रहे थे कि इतनी तपस्या कर, शरीर को सुखा डालने के उपरान्त भी उन्हें सद्ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ—तभी उनके पास से ग्राम्य बालाओं का एक समूह गाना गाते हुए निकला। गौतम के कानों में आए इन सुरीले शब्दों का आशय इस प्रकार था,”अपनी सितार के तारों को ढीला न छोड़—कस कर रख, पर इतना भी न कस कि वे टूट ही जायं।”

और उस दिन उन्हें मम्झिम मार्ग (मध्य मार्ग) का ज्ञान मिला। उन्होंने उस दिन अन्न ग्रहण कर जो समाधि लगाई तो वह पूर्णता तक पहुँचा कर ही टूटी।

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विज्ञान का अधूरापन दूर किया जाय

विज्ञान शब्द व्यापक है, उसमें पदार्थ और चेतना दोनों ही भागों का समावेश होता है, किन्तु आज उसकी एकांगी व्याख्या हो रही है। मात्र पदार्थ और उसका स्वरूप एवं उपयोग की विधि व्यवस्था को समग्र विज्ञान मान लिया गया है। यहाँ तक कि चेतना को भी जड़ तत्वों की प्रतिक्रिया भर सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाता रहा है। यह सर्वथा एकांगी तथा अपूर्ण प्रयत्न है।

पदार्थ कितना ही मूल्यवान एवं उपयोगी क्यों न हो, उसकी कोई कीमत तभी है, जब चेतन प्राणी उसे उस प्रकार की मान्यता दे। अन्यथा वस्तु की दृष्टि से हीरा और कोयला लगभग एक ही स्तर के होते हैं। उपयोगिता की दृष्टि से लोहा सोने की अपेक्षा अधिक कारगर है; पर मनुष्य ने इनमें से जिसे जितनी मान्यता दी उसी अनुपात से उसका मूल्य बढ़ा है। पदार्थ अपनी उपयोगिता स्वयं सिद्ध नहीं कर सकते। मनुष्य की बुद्धि ही उन्हें खोजती है और काम में लाने योग्य बनाती है। अस्तु पदार्थ की तुलना में चेतना का महत्व अधिक हुआ। स्वयं विज्ञान का विकास भी बुद्धि कौशल की ही प्रतिक्रिया है। ऐसी दशा में चेतना के मूल अस्तित्व को स्वीकार न करना, उसे जड़ शरीर के सम्मिलन से उत्पन्न हलचल भर मानना यही सिद्ध करता है कि वैज्ञानिकों ने उस क्षेत्र को आधा−अधूरा ही समझा है, जिसमें वे अपनी सारी अन्वेषण प्रक्रिया संजोये हुए हैं।

पदार्थ विज्ञान की ही बात लें तो प्रतीत होगा कि उसकी खोज के साधन रूप में जड़ पदार्थों का ही उपयोग होता है। जिन यन्त्र उपकरणों के माध्यम से प्रकृति गत हलचलों का पता लगाया जाता और उपलब्ध ज्ञान का उपयोग किया जाता है वे स्वयं जड़ पदार्थों के बने हुए होते हैं। उसकी पकड़ और पहुँच अपनी सीमा तक ही काम कर सकती है। मस्तिष्क का सचेतन इन्द्रियगम्य ज्ञान विशुद्ध भौतिक है। इसे मन कहते हैं। जानकारियाँ प्राप्त करना और खोज कुरेद करना इसी का काम है। बुद्धि और अन्वेषण उपकरणों की सहायता से ही वैज्ञानिक खोजबीन का ढाँचा खड़ा किया जाता है। ऐसी दशा में चेतना सत्ता का वास्तविक स्वरूप और बल प्रकट नहीं हो सकता। उसके प्रकटीकरण में चेतना का वह भाग प्रयुक्त करना होता है जिसे अन्तर्मन, उच्च मन, अन्तरात्मा अतीन्द्रिय तत्व कहते हैं। ब्रह्म विद्या इसी की विवेचना करती है। तत्व−दर्शन का आविष्कार इसी निमित्त हुआ है। ऋतम्भरा, प्रज्ञा, भूमा, घी इसी प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होती है। अतीन्द्रिय ज्ञान के सहारे ही चेतना तत्व का ज्ञान प्राप्त कर सकना सम्भव है। इसकी उपेक्षा करके जो विज्ञान काम में लाया जा रहा है उसे अपूर्ण ही कहना चाहिए।

वैज्ञानिक विचारक एडिंगटन ने इधर विज्ञान की इस मान्यता पर कि वही वस्तुओं का सही−सही वर्णन कर सकता है, अनेक प्रश्न चिन्ह लगा दिए हैं। अपनी पुस्तक “द फिलॉसफी आफ फिजिकल साइन्स” में उन्होंने कहा है कि जब हम अणुओं अथवा किसी तत्व के गुणों की चर्चा करते हैं, तो ये गुण उन अणुओं या पुद्गल तत्वों के एकमात्र वास्तविक गुण कदापि नहीं माने जा सकते, अपितु ये तो वे गुण हैं, जो हमने अपनी प्रेक्षण−विधि द्वारा उन अणुओं या पुद्गल−तत्वों पर आरोपित कर दिया है। इस प्रकार एडिंगटन ने निष्कर्ष निकाला है कि विज्ञान जिस जगत का वर्णन करता है, वह और भी अधिक आत्म−परक होता है, जबकि अभी तक कथित पदार्थवादी या वैज्ञानिक भौतिकतावादी इसी बात पर जोर देते थे कि अध्यात्मवादियों का सम्पूर्ण चिन्तन आत्मनिष्ठ होता है, वस्तुपरक नहीं और वस्तुपरक चिन्तन तो मात्र विज्ञान द्वारा ही सम्भव है।

एडिंगटन ने अपनी बात एक उदाहरण द्वारा समझाई है। उनका कहना है कि जिस प्रकार एक मछुआ कुछ मछलियों को पकड़ता है, फिर वह वर्णन करता है कि मछलियाँ इस−इस तरह की होती हैं। अब, मछुए का यह वर्णन सिर्फ उन्हीं मछलियों पर लागू होता है, जिन्हें उसने पकड़ा है। उसी प्रकार भौतिक−शास्त्र का विश्व−सम्बन्धी ज्ञान केवल उन्हीं वस्तुओं पर लागू हो सकता है, जिन्हें हम अपनी इन्द्रियों, उपकरणों तथा बुद्धि की पकड़ में ला सकते हैं। इस प्रकार भौतिक शास्त्र में जिसे हम सामान्य कथन या प्रकृति के नियम कहते हैं, वे एक ऐसे संसार का वर्णन है जो हमारे अपने बोध पर निर्भर है। इसे ही एडिंगटन “चयनात्मक आत्मनिष्ठतावाद” (सेलेक्टिव सब्जेक्टिविज्म) कहते हैं।

इसीलिए जाक रुएफ ने “फ्राम द फिजिकल टू द सोशल साइन्सेज” में लिखा है—”हमारे पास यह कहने का कोई आधार नहीं है कि भौतिक शास्त्र के सिद्धान्त जिन कारणों का उद्घाटन करते हैं, वे वस्तुओं की असली प्रकृति हैं।” उदाहरण के लिए इलेक्ट्रान, प्रोटान आदि को लें। इनकी असली प्रकृति क्या है, यह पूरी तरह कोई वैज्ञानिक नहीं कह सकता। जिस रूप में इनका वर्णन किया जाता है, वह वैज्ञानिकों के विभिन्न प्रेक्षणों (आब्जर्वेशन्स) को सम्बद्ध करने के लिए आवश्यक गुण मात्र हैं। इनकी वास्तविक सत्ता का पूर्ण विवरण ज्ञात नहीं है।

विज्ञान के द्वारा आविष्कृत इस ‘अनिश्चयात्मकता’ ने आज जहाँ एक ओर ऐसे ‘दर्शनों’ को जन्म दिया है, जो ‘दर्शन−शास्त्र’ मात्र के विरोधी हैं, तथा जिनका कहना है कि सृष्टि सम्बन्धी कोई भी दार्शनिक−समीक्षा मात्र परिकल्पनात्मक होती है, उसकी वास्तविकता की जाँच सम्भव नहीं है; वहीं दूसरी ओर अनेक स्थापित वैज्ञानिक सिद्धान्तों के पैर उखाड़ दिए हैं।

विटगेन्स्टाइन तथा अन्य तर्कमूलक भाववादियों (लाजिकल−पाजिटिह्विस्ट्स) की मान्यता है कि प्रकृति के नियम सामान्य कथन नहीं हो सकते, बल्कि वे ‘प्रोपीजीशनल फन्क्शन’ मात्र होते हैं। उनके द्वारा विवर्तमात्र मूल्यों के विभिन्न मान रखकर परीक्षण के लिए विशेष कथन तो प्राप्त किए जा सकते हैं, पर कोई सामान्य कथन नहीं निकाले जा सकते; जबकि वैज्ञानिक प्रवर आइन्स्टाइन मानते थे कि प्रत्येक वैज्ञानिक इस निश्चित धारणा के साथ ही अनुसंधान करता है कि यह विश्व एक सुसंगत तथा कारण−कार्यमूलक इकाई है। देखने में ये दोनों निष्कर्ष परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं, पर ये वैसे हैं नहीं। ये वस्तुतः यथार्थ के दो भिन्न−भिन्न स्तरों के भिन्न−भिन्न विश्लेषण हैं।

आज विज्ञान भी यथार्थ एवं आभास का अन्तर कह−मान रहा है। वेदान्त−मत में इसी ही पारमार्थिक सत्य तथा व्यावहारिक सत्य के रूप में विश्लेषित किया गया है। वैज्ञानिकों द्वारा यथार्थ का यह परीक्षण कि सृष्टि की मूल सत्ता उस रूप में नहीं है, जैसी कि व्यवहारतः हम जानते−मानते हैं, वेदान्त के सर्वथा अनुरूप है। यह ध्यान रहे कि वैज्ञानिक यह कतई नहीं मानते कि विश्व कुछ है ही नहीं और सब ‘शून्य’ है।

एडिंगटन ने ‘न्यू पाथवेज इन साइन्स’ नामक ग्रन्थ में स्पष्ट कहा है कि “मेरा तात्पर्य यह कदापि नहीं कि भौतिक विश्व का अस्तित्व ही नहीं है।” वस्तुतः भौतिक विश्व व्यवहारतः पूर्ण सत्य है, उसमें एक निश्चित विधि−व्यवस्था है, क्रमबद्धता है। अनिश्चय के सिद्धान्त का भी यह अर्थ नहीं कि इस दुनिया में सभी कुछ अनिश्चित है। इससे सर्वथा विपरीत वैज्ञानिकों और वेदान्तियों का यह मत है कि सृष्टि में सर्वत्र कारण−कार्य भाव विद्यमान है। प्रत्येक कार्य का एक निश्चित कारण है। अनिश्चय के सिद्धान्त से तात्पर्य यह है कि वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा हम सृष्टि की मूल सत्ता को पूरी तरह कभी नहीं जान सकते; क्योंकि प्रयोग के उपकरण और माध्यम भी उसी दृष्टि के अंश है, जिसका परीक्षण किया जा रहा है।

वैज्ञानिक विश्लेषणों के तीन मुख्य दार्शनिक निष्कर्ष हैं—

(1) ब्रह्माण्ड का आदि कारण कोई अति सूक्ष्म एकमेव सत्ता है, जो चेतन है, किन्तु पूरी तरह पदार्थ विहीन नहीं। तरंगों का जो रूप ज्ञात हुआ है, वह प्रकृति की मूल शक्ति के सापेक्ष स्वरूप को स्पष्ट करता है। प्रकृति की यह मूल शक्ति वेदान्त−विचार की माया की तरह अवरार्य, अव्यारव्येय है। शुद्ध माया या मूलशक्ति तो चेतन से घनिष्ठता से सम्बद्ध है, पर वह स्वयं चैतन्य−मात्र नहीं। वह पूरी तरह ‘द्रव्यातीत’ नहीं है।

(2) सृष्टि का ठीक−ठीक स्वरूप जाना नहीं जा सकता। क्योंकि हमारे ज्ञान की सीमाएँ हैं, उसके द्वारा हम उससे परे का यथार्थ नहीं जान सकते।

(3) वैज्ञानिकों का तीसरा निष्कर्ष यह है कि भौतिक विश्व आभास का (एपियरेन्स का) क्षेत्र है, यथार्थ का नहीं। यथार्थ उसकी पृष्ठभूमि में है। अर्थात् विश्व की व्यावहारिकता सत्ता है, पारमार्थिक या परम् यथार्थ सत्ता नहीं है। स्पष्टतः यह वेदान्त मत के अनुसार है।

अपनी पुस्तक “द न्यू बैकग्राउंड आफ साइन्स” में सर जेम्स जीन्स ने भी कहा है—”सृष्टि में हम जो विधि−व्यवस्था पाते हैं, वे अत्यन्त स्पष्टता तथा सरलता से आइडियलिज्म की भाषा में वर्णित−व्याख्यापित हैं।”

यथार्थ और आभास (रियलिटी एण्ड अपियरेन्स) की विवेचना करते हुए वैज्ञानिक अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि प्रकृति को हम पूरी तरह कभी भी जान नहीं सकेंगे। उसका मूल स्वरूप सदा ही अज्ञात रहेगा। क्योंकि जैसे ही हम ‘जानने’ की चेष्टा करते हैं, हम उसमें ‘व्यवधान’ उपस्थित करने लगते हैं। इसीलिए महान वैज्ञानिक हेजनबर्ग ने ‘अनिश्चय का सिद्धान्त’ प्रतिपादित किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी माध्यम के द्वारा फिर वह प्रकाश हो, ऊर्जा हो या कुछ और जैसे ही हम ‘मैटर’ के किसी अंश से सम्पर्क करते हैं, हम उसके प्राकृतिक स्वरूप में व्यवधान उपस्थित कर देते हैं। इस प्रकार इलेक्ट्रान का असली स्वरूप क्या है, यह कभी भी नहीं जाना जा सकता। जब हम इलेक्ट्रान की स्थिति एवं वेग का प्रकाश की सहायता से सूक्ष्म उपकरणों द्वारा परीक्षण करते हैं, तो प्रकाश का यह सहयोग कथित ‘इलेक्ट्रान’ की स्वाभाविक दशा को निश्चित ही प्रभावित कर देता होगा। फिर परीक्षण के लिए प्रयुक्त उपकरण भी उसी सृष्टि के एक अंश हैं, जिनके द्वारा कि उस ‘सृष्टि’ का रहस्य जानने का प्रयास किया जा रहा होता है। इन उपकरणों का सम्पर्क परीक्षित किए जा रहे अंश को स्वाभाविक नहीं रहने दे सकता। इस प्रकार प्रयोगों द्वारा यथार्थ सत्ता का ज्ञान असम्भव है।

जगत का स्वरूप समझने की वैज्ञानिक विधि इन्द्रिय−ज्ञान तक सीमित है। सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों द्वारा एकत्र जानकारी मस्तिष्क को इन्द्रियों द्वारा ही मिलती है। स्थूल दृश्य जगत की यथार्थता जानने−समझने में ही हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ बराबर धोखा खाती रहती हैं, मस्तिष्क भी पग−पग पर भ्रम में पड़ता रहता है। स्पष्ट है कि इन आधारों पर जब प्रत्यक्ष−जगत के बारे में ही सही निष्कर्ष निकाल पाना सम्भव नहीं, तो अदृश्य सूक्ष्म जगत में तो हमारी सीमाएँ स्पष्ट हैं। अणु संरचना के स्पष्टीकरण में उपकरणों द्वारा जो जानकारी और सहायता एकत्र की गई है, उससे अधिक आश्रय अनुमान पर आधारित गणित परक आधारों का लिया गया है, तभी कुछ निष्कर्ष निकाले जा सके हैं।

यथार्थ की तह तक पहुँचने के लिए, सत्य को प्रत्यक्ष करने के लिए परख के आधार को अधिक विस्तृत करना होगा। प्रत्यक्ष में अतीन्द्रिय ज्ञान को भी सम्मिलित करना होगा। अध्यात्म−प्रयोगों के निष्कर्षों की प्रमाणिकता की जाँच कर उनको भी समझना होगा। अदृश्य जगत की सम्भावनाओं के द्वार पर ठिठके खड़े विज्ञान को ऋतम्भरा, प्रज्ञा, योग भूमिका जैसे आधारों को भी समझना आवश्यक है, आगे के क्षेत्र में इनसे ही सहायता मिल सकती है।


महात्मा पहाड़ी पर चढ़ रहे थे (kahani)

एक महात्मा पहाड़ी पर चढ़ रहे थे, उसी समय एक दस वर्षीय लड़की अपने दो वर्ष के भाई को गोदी में लिए चढ़ रही थी, महात्मा ने पूछा “बच्ची तू इस भारी बच्चे को गोद में लिए कैसे चढ़ पायेगी।” लड़की ने तुरन्त कहा—

“बाबा यह भारी नहीं है, भाई है”

महात्मा गदगद हो गए। जहाँ प्रेम व भावना होती है वहाँ कोई काम भारी व कष्टमय नहीं होता अन्यथा भावना न हो तो जीवन ही भारी लगने लगे।

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जितने सितारे उतने रहस्य

ऐसी अजनबी परिस्थितियों में फौजी निर्णयों से काम नहीं चलता, उसके लिये विचार मन्थन के बाद किसी निष्कर्ष पर पहुँचना आवश्यक होता है, पर यहाँ अवसर होता तब न? उस समय फ्लाइट लेफ्टिनेंट आर विल्सन अपने एक−86 जेट हवाई जहाज के साथ प्रशिक्षण उड़ान पर थे। उन्हें बेतार के तार (वायरलैस) से इस अजनबी वस्तु का पीछा करने और वह है क्या? इसकी खोज खबर लेने का निर्देश दिया गया। अब तक वस्तु (आब्जेक्ट) पश्चिमोत्तर दिशा में मुड़ चुका था। आर. विल्सन ने उसका तेज गति से पीछा किया और 160 मील तक पीछे लगे रहे। इस बीच उनने जो सन्देश दिये वह इस प्रकार है—1−यह कोई गोलाकार यान लगता है पर वह किस धातु से बना हो सकता है कुछ समझ में नहीं आता। 2− उसके भीतर कोई दिखाई नहीं दे रहा पर उसकी गति, मुड़ना, दिशा नियन्त्रण इस बात के प्रतीक हैं कि अन्दर या बाहर कोई अत्यन्त कुशल बुद्धि उसका नियन्त्रण कर रही है।

अभी ये शब्द पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाये थे कि ऐसा लगा कि वह वस्तु और आर−विल्सन का जेट दोनों परस्पर मिल गये और एक−दूसरे में आत्मसात हो गये। कन्ट्रोलर बहुतेरा हलो विल्सन! हलो विल्सन!! चिल्लाते रहे; पर कोई प्रत्युत्तर नहीं आया। वह वस्तु और भी तेज गति से अन्तरिक्ष पार क्षितिज के पेट में जा समाई।

हवाई अड्डे का खोजी दल वाहनों में भागा, फायर ब्रिगेड सक्रिय हुई, दूसरे जहाज उड़ाये गये, जिस स्थान पर इस घटना का रडार ने संकेत दिया था वहाँ से बीसियों वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का चप्पा−चप्पा छान मारा गया किन्तु विल्सन तो दूर जहाज का रत्ती भर टुकड़ा तक कहीं नहीं मिला। इस खोज का क्रम कई दिनों तक चला। अन्त में विशेषज्ञ समिति ने “आर−विल्सन कहाँ गये यह एक रहस्य भरी पहेली बन गया है।” कह कर अपनी असमर्थता और हार स्वीकार ली।

इस दुर्घटना के बाद से कई ऐसे रहस्य उभरते हैं जिनका आज तक कोई समाधान नहीं निकल सका। क्या यह अन्तरिक्ष के विकिरण का कोई “बगूला” या “भँवर” था जिसने विलसन को आकाश के गहरे विकिरण सागर में डुबो दिया या फिर किसी अन्य ग्रह से आया कोई यान था जो पृथ्वी वासियों के रहस्यों का पता लगाने के लिये योजना बद्ध ढंग से भेजा गया हो? दोनों ही तरह से पाठक सोच सकते हैं और जी में आये वह निष्कर्ष निकाल सकते हैं क्योंकि तथ्य किसी को ज्ञात नहीं, यदि कोई एक बात तथ्य रूप में सामने आती है तो वह मात्र यह कि इस ब्रह्माण्ड में जितने सितारे चमक रहे हैं, रहस्य उससे भी अनेक गुने अधिक है? क्या मनुष्य उनमें से कुछ जान सकता है? इतनी दूर की क्यों मनुष्य शरीर ही विलक्षण शक्ति केन्द्रों की, सामर्थ्यों की चलती−फिरती रहस्यमय मशीन है यदि वह इसी को भली प्रकार जान ले सो ही बहुत है।

अमेरिका, फिलीपीन्स, रूस, प. जर्मनी, मैक्सिको आदि देशों में यह उड़न तश्तरियाँ देखी गई है, यदि यह मान लिया जाये कि 98 प्रतिशत व्यक्तियों को यह भ्रम बाल लाइटनिंग, मौसम विभाग द्वारा छोड़े गये गुब्बारे देखकर अजब तरह के बादल और उन पर पड़ी किरणें देखकर, धुँधलके में प्रकाश व छाया से बने दृश्य या किसी नये तरह के हवाई जहाज को देखकर हुआ होगा तो भी 2 प्रतिशत लोग तो ऐसे हैं ही जिनके कथन असत्य नहीं कहे जा सकते उनकी जानकारियाँ प्रामाणिक होनी चाहिये इन लोगों में एअर क्रैफ्ट (हवाई जहाज के लोग) मौसम विज्ञान के लोग आते हैं। दूसरा भूल कर सकता है पर अनुभवी पायलट जो उड़ान के समय शराब नहीं पीते, व्यर्थ बात नहीं करते, ऐसा करें तो उन्हें सर्विस से हाथ धोना पड़े। झूठ क्यों बोलेंगे। तब फिर इन रहस्यों का कोई समाधान हो सकता है क्या? उसके लिये तब तक प्रतीक्षा करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं जब तक सारे ब्रह्माण्ड के स्वरूप और स्थिति की जानकारी नहीं मिल जाती।

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अतीत के समृद्ध ज्ञान की उपेक्षा न करें!

यह एटलस 18वीं शताब्दी पूर्व में तुर्की के एडमिरल पिरीरीस को टापकापी राजमहल से मिला था। पुरातत्व वेत्ताओं के अनुसार यह एटलस वास्तविक नहीं था, अपितु मूल एटलस की नकल था। इस तरह की अनेक नकलें उस एटलस की पहले भी हो चुकी थीं। एडमिरल पिरीरीस के नाम से ही यह एटलस इन दिनों पिरीरीस एटलस के नाम से विख्यात है और इन दिनों भी उसने विशेषज्ञों को आश्चर्य में डाल रखा है कि आज का बुद्धिवाद जिस युग को अन्ध−विश्वास रूढ़ियों, प्रथाओं और परम्पराओं का युग मानते हैं उस युग में इतना अधिक प्रौढ़ बौद्धिक विकास किस तरह हो सकता है। इसका अर्थ तो यह निकाला जायेगा कि यदि उस युग के लोग इतने अधिक बुद्धिमान थे तो फिर उनकी आध्यात्मिक धार्मिक मान्यताओं को ही किस आधार पर अवैज्ञानिक ठहराया जा सकता है। क्यों न उसे अत्यन्त सूक्ष्म और पैनी दृष्टि की यथार्थ अनुभूति माना जाये।

इस एटलस में अमेरिका के पठार, दक्षिणी ध्रुव, महाद्वीपों के भीतर पहाड़ों की चोटियाँ, नदियाँ, द्वीप, समुद्र, पठार आदि सभी कुछ दर्शाये गये हैं। मेडीटेरिन राज्य और डे डसी (मृत सागर) के चारों तरफ के क्षेत्र दिखाये गये हैं। बर्लिन की स्टेट लाइब्रेरी में भी इसी नक्शे की दो नकलें मिली हैं उनके उद्धरणों से भी यह ज्ञात होता है कि मूल अंश इसी पिरीरीस−एटलस से ही उद्धृत किये गये हैं।

अमेरिकन कार्टोग्राफर सर आर्लिंग्टन एच मिलैरी को यह एटलस जाँच करने को दिये गये। उन्होंने मि. वाल्टर्स की मदद से उसे ग्लोब पर चढ़ाकर देखा तो अत्यधिक आश्चर्यचकित रह गये कि उस युग में अक्षाँश, देशान्तरों की इतनी अच्छी जानकारी थी तथा कठिन और दुर्गम स्थानों का सर्वेक्षण किस तरह किया होगा। उसका तो एक ही अर्थ होता है कि वह युग अन्धकार का नहीं प्रकाश का, ज्ञान का युग था जिसमें लोग भौतिक आवश्यकताओं की ओर कम से कम ध्यान देते थे पर ज्ञान विज्ञान की शोधों में ऋषि मनीषी बन कर लगे रहते थे।

इस नक्शे की तरह ही “निपुर” खण्डहरों से 60000 मिट्टी की ऐसी पट्टियाँ मिली हैं जिनमें सुमेरियन सभ्यता का ज्ञान विज्ञान अंकित है। ऐसा लगता है कि “कला पात्र” (टाइम कैपसूल) की तरह सम्भावित परमाणु खतरे से इस ज्ञान को सुरक्षित रखने की दृष्टि से इन्हें मिट्टी की पट्टियों पर लिखा गया होगा जबकि उस युग में भोज पत्र से बढ़िया से बढ़िया कागज बनाने की परम्परा प्रचलित थी। कदाचित उस ज्ञान को पूर्वजों की उपलब्धियों के रूप में सामने रखकर उसके प्रकाश में आज के ज्ञान विज्ञान को संचालित, संयमित और मर्यादित किया जाता तो अनेक अकल्पित आविष्कारों का उन्नयन होता, साथ ही अब जो विज्ञान ध्वंस की दिशा में चल रहा है तब वह कहीं अधिक सोद्देश्य बन सका होता।

इसे मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि धार्मिक मदान्धता और मानवीय अहंकार के कारण ज्ञान विज्ञान के इन स्रोतों को योजनाबद्ध ढंग से नष्ट किया गया यही कारण है कि अब उस युग की जो ज्ञान सामग्री मिलती है वह स्फुट और बिखरी हुई मिलती है। सम्पूर्ण क्रमबद्ध नहीं। अधिकांश सामग्री तो नष्ट−भ्रष्ट ही कर दी गई। अलेक्जेन्ड्रिया पुस्तकालय किसी समय 5 लाख ग्रन्थों का महाविद्वान पिटोलेमी सोटेर का संग्रहात देवालय था। उसका कुछ अंश रोमन आक्रमणकारियों ने नष्ट किया, रहा बचा खलीफा उमर ने अलेक्जेण्ड्रिया के सार्वजनिक स्नान घरों का पानी गर्म करने के लिये जलवा दिया।

दक्षिण अमेरिका में “भारतीय विज्ञान विद्या” के अनेक खण्ड 63वें इन्का सम्राट पचकुटि ने नष्ट करा दिये। परगेमोन में 2 लाख बहुमूल्य ग्रन्थों के पुस्तकालय, जिसमें इतिहास, खगोल विद्या दर्शन शास्त्र तथा भारतीय विद्याओं की अलभ्य पुस्तकें थीं। ई. पूर्व 214 में राजनैतिक कारणों से चीनी सम्राट “ची हुआँग” ने जलवा दीं।

यवन आक्रमणकारियों ने नालंदा, तक्षशिला और बीजापुर के ज्ञान मन्दिरों को किस तरह ध्वस्त किया, उसका स्मरण करने से ऐसा लगता है−पुस्तकें नहीं प्रतिभायें और विभूतियाँ कुचल दी गई, अन्यथा आज वैज्ञानिक परीक्षणों में समय, शक्ति और धन की यह बर्बादी न केवल कम हो सकती थी अपितु दुर्लभ जानकारियों का लाभ भी मिल सकता था।

चाइना में किंडर गार्टेन क्रान्ति के समय माओत्सुंग, हिटलर ने बीच सड़कों में प्राचीन ज्ञान ग्रन्थों को नष्ट कराया। मुहम्मद गोरी ने भी इसी तरह के दुष्कृत्यों द्वारा उस अगाध ज्ञान निधि को नष्ट न किया होता तो हम आज अपनी प्रामाणिकता स्पष्ट सिद्ध कर सके होते। फिर भी अभी बहुत कुछ है; यदि उस की शोध, अध्ययन और अपनी अब की उपलब्धियों को उसका योगदान सम्भव हो सके तो हमारी प्रगति और भी प्रखर और सार्थक हो सकती हैं।


Quotation

किसी की करुणा व पीड़ा को देख मोम की तरह दयार्द्र हो पिघलने वाला हृदय तो रखो, परन्तु विपत्ति की आँच आने पर कष्टों—प्रतिकूलताओं के थपेड़े खाते रहने की स्थिति में चट्टान की तरह दृढ़ व ठोस भी बने रहो।

—द्रोणाचार्य

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आस्थाएँ विकृत होने से रोग, शोक बढ़ते हैं!

रोग कष्ट तो शरीर को देते हैं, पर वे उपजते मन में हैं। असंयम शारीरिक नहीं मानसिक रोग है। शरीर तो हर हालत में मन का वफादार नौकर ही बना रहेगा। सत्कर्म और दुष्कर्मों का दोष तो शरीर को ही दिया जाता है और दण्ड भी उसी को भुगतना पड़ता है, पर वस्तुतः बात कुछ और भी है। मन के कुसंस्कारी और अचिन्त्य चिन्तन का अभ्यासी हो जाने के कारण उसकी दिशा धारा उस ओर बहने लगती है जो नैतिकता एवं प्रकृति व्यवस्था के प्रतिकूल होती है। शरीर तो औजार, उपकरण मात्र है। उसे वाहन की संज्ञा ठीक ही दी गई है। मन भली दिशा में चले या बुरी में शरीर को अपने स्वामी का उसका पालन करना पड़ेगा, वह वफादार नौकर की तरह है। साथ ही उसमें सोचने, तर्क करने या अवज्ञा करने जैसी सामर्थ्य भी नहीं है, ऐसी दशा में स्वामी का आज्ञानुवर्ती होकर ही उसे रहना पड़ता है। भली-बुरी क्रियाएँ तो शरीर ही करता है, पर उसको प्रेरणा—आज्ञा देने की जिम्मेदारी पूर्णतया मन की है। मन का असंयम ही आहार-बिहार में अव्यवस्था उत्पन्न करता है। प्रकृति के प्रतिरोध की चेष्टा में असफल रहने का परिणाम ही रोग है। रोग अपने आप नहीं आते। वे आमन्त्रित किये हुए अतिथि भर होते हैं। असंयमी मन ही दौड़−दौड़ कर उनके पास जाता है और आग्रहपूर्वक उन्हें बुलाकर घर लाता है। आते हैं तो अपनी प्रकृति के अनुरूप उपहार अनुदान देते ही हैं। भले ही वह प्रसाद हमें बुरा लगे या भला। यही है रोगों की उत्पत्ति एवं सक्रियता का तत्व ज्ञान।

औषधियों से लेकर प्राकृतिक चिकित्सा तक के सभी उपचार प्रायः रुग्ण अंग को राहत देने वाले उपाय बरतते हैं। उनसे सामयिक रूप से कष्ट निवृत्ति में सहायता भी मिलती है, पर ये एक जादू भर हुआ। अधिक से अधिक तात्कालिक समाधान कह सकते हैं। इसमें रोग निवृत्ति का ऐसा कोई मार्ग नहीं है जिसमें बार−बार नये−नये रूप बनाकर उठते रहने वाले इन भूतों का स्थायी निराकरण हो सके जो आये दिन वेष बदल−बदल कर सामने आते और आँख मिचौनी खेलते रहते हैं। एक रोग अच्छा नहीं हो पाता कि उसकी जाति बिरादरी का कोई दूसरा उपद्रव फिर आ धमकता है। एक की विदाई पूरी तरह नहीं हो पाती कि नयों के आगमन का नगाड़ा बजने लगता है।

रोग उपचार के चिकित्सा प्रावधान में दो उपाय बरते जाते हैं—एक यह कि विषाणुओं को मारने के लिए तेज निरोधक औषधियाँ दी जायँ जिससे आक्रमणकारियों की संख्या तथा शक्ति क्षीण हो। दूसरा यह कि कष्ट की अनुभूति कराने वाले तन्त्र को शिथिल कर दिया जाय। इन उपायों से तात्कालिक समाधान तो होता है, राहत भी मिलती है, पर ऐसा कुछ नहीं होता जिससे रोगी को उस घातक व्यथा से पूरी तरह छुट्टी मिल सके।

जो हो—औषधि उपचार को कितना ही आवश्यक क्यों न समझा जाय, इतना तो मानना ही पड़ेगा कि वे सर्वथा हानि रहित नहीं हैं। विषाणुओं की तरह—विजातीय द्रव्य की तरह वे भी अपने दाँत, पंजे चलाती हैं और जीवनी शक्ति के लिए वे भी हानिकारक ही सिद्ध होती हैं। मूल बात यह है कि क्या उस उपचार से रोगों से आत्यंतिक निवृत्ति मिलती है, या मिल सकती है। उत्तर ‘न’ में ही मिलता है। रोग उत्पादन के मूल कारण बने रहने पर वे उपजते ही रहेंगे। इस उत्पादन को रोके बिना सामयिक रोकथाम से कोई बड़ा प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता।

रक्त विकृत होने पर फोड़े−फुन्सी, दाद, खाज, दर्द, सूजन, गाँठ आदि कुछ न कुछ उपद्रव खड़े होते ही रहेंगे। एक रोग का इलाज करने पर दूसरा उठ खड़ा होगा। निवृत्ति तो तभी मिलेगी जब शोधन की बात बने। मच्छर तब मरेंगे जब गन्दगी दूर हो। गन्दगी के रहते उन्हें मारते रहने से कोई लाभ नहीं। नई उत्पत्ति उस प्रयास को व्यर्थ बना देगी जो मच्छरों के मारने के लिए किया गया था। पत्ते सूखते हों तो उन पर छिड़काव करने का कोई लाभ नहीं, सिंचाई जड़ की की जानी चाहिए। रोगों के ऊपरी स्वरूप को मिटाने के लिए की जाने वाली भागदौड़ का इतना ही लाभ है कि विग्रह को किसी प्रकार चुप कर दिया जाय। भीतर का द्वेष और क्रोध आज नहीं तो कल फिर उभरेगा और नये रूप में विग्रह उत्पन्न करेगा। समस्या के समाधान के लिए गहराई में उतरना होगा।

यह हजार बार समझा जाना चाहिए कि शरीर को बीमारियाँ बुलाने से लेकर दुष्कर्म करने तक में दोषी नहीं माना जा सकता। वह जड़ तत्वों का बना होने से अपनी समझ से कुछ नहीं कर सकता। तलवार में काटने की शक्ति तो होती है, पर वह अपनी इच्छा से किसी को नहीं काटती। प्रयोगकर्त्ता के इशारे पर ही उसे चलना पड़ता है। ठीक इसी प्रकार शरीर भी स्वेच्छापूर्वक न भले आचरण करता है न बुरे। वह किसी के निर्देश का पालन करता है और वह निर्देशकर्त्ता निश्चित रूप से मन है। उसी बाजीगर की उँगलियाँ बेचारी कठपुतली को भला−बुरा नाच नाचने के लिए विवश करती हैं। दर्शकों की आँखों से बाजीगर छिपा रहता है इसलिए वे भ्रम वश कठपुतली के नाच में रस ले सकते हैं, पर किसी विवेकशील को उस उछलकूद के लिए बाजीगर की उँगलियों को ही कारण मानना और श्रेय देना पड़ेगा। शरीर की स्वस्थता और रुग्णता का मूलकारण मानसिक स्थिति के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। मन के संकेतों पर शरीर असंयम बरतता है। असंयम का प्रकृति दण्ड रोगों के रूप में सामने आता है। शरीर की भली−बुरी परिस्थितियों के लिए कुछ अपवादों को छोड़कर मन को ही उत्तरदायी ठहराया जायगा।

सामयिक राहत को ही यदि रोगोपचार माना जाय जाय तो प्रचलित चिकित्सा पद्धति पर सन्तोष किया जा सकता है। यदि अस्वस्थता का आत्यन्तिक समाधान अभीष्ट हो तो कुछ आगे चलना होगा और उस उद्गम केन्द्र की मूल स्थिति में सुधार करना होगा जिससे कि बाढ़ का पानी निकलता है। मेंड़ बाँधने से काम न चलेगा। उफनता नाला एक जगह से रोकने पर दूसरे स्थान से फूट निकलेगा। असंयम की मनःस्थिति शरीर से प्रकृति की अवज्ञा करती रहेगी और उसका दण्ड बेचारा शरीर रोगों के रूप में भुगतता रहेगा। थोड़ा गहरा विचार करें तो रोगों की व्यथा भी शरीर के माध्यम से मन को ही सहनी पड़ती है। संवेदनाओं का केन्द्र रहने के कारण अन्ततः मन ही शरीर की पीड़ा और दुर्गति के लिए कष्ट सहन करता है। मस्तिष्क सुन्न कर देने पर शरीर में घाव रहने पर भी उस बेचारे को कोई कष्ट नहीं होता, इसलिए देखा जाय तो मन ही कुकर्म करता और वही दण्ड भुगतता है।

रोगों से पूर्ण छुटकारा पाने के लिए मन को स्वास्थ्य का कारण भूत आधार मान कर चलना होगा और चिकित्सा के लिए उसी पर छाई रुग्णता को दूर करने का उपाय करना होगा। जब तक इस तथ्य को स्वीकार न किया जायगा तब तक आरोग्य लाभ की आकांक्षा मृगतृष्णा ही बनी रहेगी।

रोगों के दो वर्ग हैं- एक आधि, दूसरा व्याधि। ‘व्याधि शारीरिक रोगों को’ ओर ‘आधि’ मानसिक रोगों को कहते हैं। ज्वर, खाँसी, दमा, दर्द, अपच, मधुमेह, रक्तचाप आदि को शारीरिक रोग गिना जाता है और उन्माद, सनक, मूर्खता, विस्मृति, विसंगतियाँ, उलझनों आदि की मानसिक रोगों में गणना होती है। मस्तिष्कीय रोगों की चिकित्सा पागल खाने के डॉक्टर करते हैं और मनः चिकित्सक पूछताछ करके अन्तरंग में जमी कुंठाओं को उगलवाने और सत्परामर्श देने के उपायों का सहारा लेते हैं। शरीर विज्ञानी औषधि उपचार, शल्य कर्म आदि के द्वारा करते हैं। इनमें आंशिक सफलता भी मिलती है, पर प्रयत्न फिर भी अधूरा ही रह जाता है वैसा लाभ नहीं मिलता जैसा अभीष्ट है। इस अधूरेपन को दूर करने के लिए मन की उस गहराई तक जाना होगा जहाँ से कि शरीर और मन को प्रभावित करने वाले प्रवाहों को उभारने और काम करने की प्रेरणा मिलती है। कुँए में जो पानी भरा दीखता है वह उसकी तली में जल फेंकने वाले स्रोतों से आता है। इसी प्रकार मस्तिष्कीय अस्त−व्यस्तताएँ चेतना की मूल प्रवृत्ति के मर्मस्थल में से उभरती हैं। इस परत को आस्था केन्द्र कहते हैं। मनुष्य के गहन अन्तराल में कुछ आस्थाएँ जैसी होती हैं। व्यक्तित्व का मूल स्रोत उन्हीं में सन्निहित रहता है। इच्छाएँ स्वतन्त्र नहीं है वे इसी आस्था केन्द्र से उद्भूत होती हैं। इच्छाओं से विचारणाएँ और विचारणाओं से क्रियाएँ होने की बात तो सभी जानते हैं, पर यह बहुत कम को विदित है कि इच्छाएँ भी मौलिक नहीं हैं वे चेतना के उस गहरे परत में से उदित होती हैं जिन्हें मान्यताएँ एवं आस्थाएँ कहा जाता है।

आस्थाओं के दो वर्ग हैं—एक नैतिक, दूसरी अनैतिक। एक दैवी, दूसरा आसुरी। एक उत्कृष्ट, दूसरा निकृष्ट। एक मानवी, दूसरा पाशविक। एक सात्विक, दूसरा तामसिक। दोनों की अपनी−अपनी विशेषताएँ हैं और अपनी−अपनी प्रतिक्रियाएँ। नैतिक आस्थाएँ उन मान्यताओं को अपनाती हैं जिन्हें उत्कृष्ट एवं आदर्शवादी कहते हैं। पवित्रता, संयम, उदारता, सज्जनता, नीति, निष्ठा, सामूहिकता जैसे सद्गुण इसी वर्ग के हैं। इन्हें देवत्व कहा जाता है और जिनमें इनकी मात्रा जिस अनुपात से बढ़ती है उन्हें उतने ही अंश में सन्त, ऋषि या देवता कहा जाता है। बोल−चाल के शब्दों में उन्हीं का सज्जन, आदर्शवादी, लोक सेवी आदि नामों से पुकारते हैं। दूसरे वर्ग में उनकी गणना है जिन्हें अनैतिक, असज्जन कह सकते हैं। इनके अन्तराल में स्वार्थान्धता की पशु−प्रवृत्ति और दुष्टता की पैशाचिकता छाई रहती है। छल, अभिमान, उत्पीड़न, अपहरण, ईर्ष्या, द्वेष, जैसे दुर्गुणों की असुरता स्वभाव का अंग बन जाती हैं और मस्तिष्क तथा शरीर का रुझान उसी दिशा में गतिशील रहता है। वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए उनकी लिप्सा निरन्तर ललकती रहती है। लोभ और मोह के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। जिनमें राग होता है उनके लिए पक्षपात की अति करने और जिनसे द्वेष होता है उन्हें मिटा डालने के प्रति सर्प जैसी विनाश लीला रचने से कम में चैन ही नहीं पड़ता। न्याय, औचित्य, विवेक की छाया भी दिखाई नहीं पड़ती। ऐसे लोग असुर एवं नर−पिशाच कहलाते हैं। देव और दैत्यों के बीच का एक मध्यवर्गीय समन्वित पक्ष भी है जिन्हें मनुष्य कहते हैं। यह मानवी सत्ता ही है जिसमें कहीं दैवी और कहीं आसुरी तत्वों की बहुलता दीख पड़ती है। देव और असुर कोई व्यक्ति विशेष नहीं होते। इन्हें आस्थाओं का स्तर एवं प्रवाह ही कह सकते हैं। दोनों में से जिसमें, जिसका, जितना बाहुल्य होता है वह उतने ही अंशों में देव या असुर कहा जाता है। इन वर्गों की आकृति देख कर नहीं प्रकृति पर दृष्टिपात करके ही पहचाना जा सकता है।

पौराणिक प्रतिपादन है कि देवता स्वर्ग में ऊर्ध्वलोक में रहते हैं और दानव भूमि से नीचे पाताल में—पतितावस्था में रहते हैं। देवताओं का स्वर्गलोक आकाश में ऊंचाई पर है। इन्हें उत्कृष्टता और निकृष्टता का लोक कह सकते हैं। लोकों का वर्णन किया गया तो इस प्रकार है मानो वे कोई देश क्षेत्र हों। पर वस्तुतः वे मनोभूमियाँ भर हैं और उन्हें दृष्टिकोण भी कहा जा सकता है। स्वर्ग में सुख सम्पदाएँ भरी पड़ी हैं और नरक में यातनाएँ ही यातनाएँ हैं। ये यातनाएँ मरने के बाद ही मिलती हों ऐसी बात नहीं है। उनका अनुभव इसी जीवन में इसी शरीर में भी किया जाता है। शारीरिक व्याधियाँ और मानसिक आधियों को इसी रूप में लिया जा सकता है।

यों कोई भी रोगी सहज दया का पात्र होता है। कष्ट पीड़ित के प्रति मानवी करुणा का उभरना स्वाभाविक है। उचित भी है और आवश्यक भी। दुःखी के प्रति सहानुभूति और सेवा सहायता की वृत्ति रहना मानवी गरिमा के अनुरूप है। इसलिए रोगी को अपराधी समझकर उसके प्रति घृणा उपेक्षा बरतने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है। उसके कष्ट निवारण में तो करुणा भरा उदार सहकार ही अपेक्षित है यहाँ तो चर्चा उन तथ्यों के विश्लेषण की हो रही है, जिनके कारण मानव जीवन का सौभाग्य दुर्भाग्य में बदलता है और सुख शान्ति के स्थान पर शोक सन्ताप सहन करना पड़ता है।

अन्तःकरण की आस्थाएँ ही हैं जो मनुष्य को ऊपर उठने एवं नीचा गिरने की प्रेरणा देती हैं। उसी की प्रतिक्रिया व्यक्तित्व को समुन्नत एवं पतित बना कर रख देती है। इसी आन्तरिक उत्थान−पतन के आधार पर मनुष्य स्वर्गीय एवं नारकीय दृष्टिकोण विनिर्मित करता है और तदनुसार अनेक प्रकार के शारीरिक, मानसिक कष्टों को सहन करना पड़ता है। इतना ही नहीं जीवन के अन्य क्षेत्र भी ऐसी विषम परिस्थितियों से भर जाते हैं जिनमें रहने वाला अपने को पग−पग पर असफल, उपेक्षित तिरस्कृत, दरिद्र एवं दुर्भाग्यग्रस्त अनुभव करता है। ऐसे लोग नीरस, खिन्न, विपन्न, उद्विग्न एवं भार भूत जीवनयापन करते हुए किसी तरह साँसों का बोझ वहन करते हैं।

जहाँ तक शारीरिक और मानसिक रोगों का सम्बन्ध है उनकी गहरी जड़ें अन्तःकरण की उस गहरे परत में घुसी होती हैं जिन्हें आस्था कहा जाता है। यदि आस्थाएँ अनैतिक स्तर की बन गई होंगी तो मनुष्य न प्रकृति के नियमों की परवाह करेगा और न नीति, धर्म, कर्तव्य एवं आदर्श की। ऐसी दशा में गतिविधियाँ अवांछनीय होती चली जायेंगी, उनमें निकृष्टता एवं उच्छृंखलता का बाहुल्य रहेगा। विश्व विधान में किसी को भी उच्छृंखलता बरतने की छूट नहीं है। मनुष्य को भी नहीं। आस्थाएँ गँवाने वाला असंयमी बनता है और उस उद्धत आचरण का प्रतिफल ही शारीरिक मानसिक रोगों के रूप में सामने आता है। अन्यान्य क्षेत्रों में आर्थिक, सामाजिक, पारिवारिक, आन्तरिक अनेकानेक हानियाँ एवं कठिनाइयाँ उठानी पड़ती हैं सो अलग। आस्थाओं के उद्गम केन्द्र को व्यवस्थित परिष्कृत करने से कम में न शारीरिक रोगों से छुटकारा मिल सकता है न मानसिक उद्विग्न असंतुलन से। आस्थाएँ ही हैं जो परिष्कृत होने पर हमें शारीरिक आरोग्य, मानसिक उल्लास और आन्तरिक संतोष से भरापूरा सुख शान्तिमय जीवन प्रदान करती है।

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विवेक रहित बुद्धि से काम न चलेगा !

विलक्षण बौद्धिक क्षमतायें आदि काल से ही वैज्ञानिकों और जीवशास्त्रियों के लिये एक प्रकार की चुनौती रही हैं। बुद्धि, ज्ञान, चिन्तन की क्षमता−यही वह तत्व हैं जो मृत और जीवित का अन्तर स्पष्ट करते हैं। अतएव जीवन को बौद्धिक क्षमता में केन्द्रित कर वैज्ञानिक प्रयोगों की प्रणाली अपनाई गई। इस दिशा में मस्तिष्क की जटिल संरचना एक बहुत बड़ी बाधा है इस कारण रहस्य अभी तक रहस्य ही बने हुये हैं, तथापि अब तक जितना जाना जा सका है, उससे वैज्ञानिक यह अनुभव करने लगे हैं कि बुद्धि एक सापेक्ष तत्व है अर्थात् सृष्टि के किसी कोने से समष्टि मस्तिष्क काम कर रहा हो तो आश्चर्य नहीं, जीवन जगत उसी से जितना अंश पा लेता है उतना ही बुद्धिमान होने का गौरव अनुभव करता है।

वैज्ञानिक अब इस बात को अत्यधिक गम्भीरता से विचारने लगे हैं कि मानव−मस्तिष्क और उसकी मूलभूत चेतना का समग्र इतिहास अपने इन कम विकसित समझे जाने वाले भाइयों के मस्तिष्क की प्रक्रियाओं से ही जाना जा सकता है। इसके लिये अब तरह−तरह के प्रयोग प्रारम्भ किये गये हैं।

मनुष्य की तरह ही देखा गया कि कई बार एक कुत्ता अत्यधिक बुद्धिमान पाया गया। जबकि उसी जाति के अन्य कुत्ते निरे बुद्धू निकले। चूजे अपने बाप मुर्गे की अपेक्षा अधिक बुद्धि चातुर्य का परिचय देते हैं। डाल्फिन मछलियों की बुद्धिमत्ता की तो कहानियाँ भी गढ़ी गई हैं। बुद्धि परीक्षा के लिये कोई बहुत सम्वेदनशील यन्त्र तो अभी तक नहीं गढ़े जा सके किन्तु स्वादिष्ट भोजन की पहचान, जटिल परिस्थितियों के हल आदि के लिये जो विभिन्न प्रयोग किये गये उनसे पहली दृष्टि में यह स्पष्ट हो गया कि बन्दर, डाल्फिन, लोमड़ी (काली की अपेक्षा लाल) अधिक चतुर होते हैं, नीलकण्ठ, संघकाक और कौवों की बुद्धि स्वार्थ प्रेरित जैसी होती है—विवेक जनक नहीं। रूस के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. लियोनिद क्रुशिन्स्का ने अपने विचित्र प्रयोगों से यह सिद्ध किया है कि जिस तरह चिन्तन से मानवीय शक्ति का ह्रास होता है पशु−पक्षियों में भी यह प्रक्रिया यथावत होती है। इनमें कुछ तो डर जाते हैं कुछ बीमार पड़ जाते हैं सम्भवतः इन्हीं कारणों से वे जीवन की गहराइयों में नहीं जाकर प्राकृतिक प्रेरणा से सामान्य जीवन यापन और आमोद−प्रमोद के क्रिया−कलापों तक ही सीमित रह जाते हैं। इस दृष्टि से देखा जाये तो मानवीय चिन्तन प्रक्रिया भी उतनी उन्नत नहीं है, वह भी तो अपनी बुद्धि का उपयोग मात्र ऐसी ही उपलब्धियों में करता है जिससे उसकी भौतिक प्रसन्नता तथा सुख−सुविधा बढ़ती है। अन्तरात्मा की अन्तरंग गहराइयों तक पहुँचने की तो उसे कल्पना भी बहुत कठिनाई से होती है। सो वह भी कुछ ही बुद्धिजीवियों में होती है जबकि यही सबसे बड़ा प्रश्न है, जिसे सुलझाने में मानवीय क्षमताओं की प्रतिष्ठा हो सकती है।

प्रो. क्रुशिन्स्की के अनुसार तर्क, विवेक और प्राकृतिक हलचलों के अनुरूप अपने को समायोजित करने की बुद्धि अन्य प्राणियों में भी यथावत होती है इसी कारण वे पर्यावरण की समस्याओं को झेलते हुये भी अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं जबकि मनुष्य उनमें बुरी तरह जकड़ता जा रहा है उसके अपने ही कारनामे चाहे वह विशाल औद्योगिक प्रगति हो या अणु−आयुधों का निर्माण, उसके अपने ही विनाश के साधन बनते जा रहे हैं।

पेट ही मनुष्य का साध्य हो, तब तो उससे अच्छा कर्कट है, जो रहता तो समुद्र में है किन्तु वह नारियल वृक्ष पर चढ़कर फल तोड़ लाता है।

जीवों की बुद्धिमत्ता अपने विकसित रूप में तब अभिव्यक्त होती है जब उनके सामने कोई संकट आ जाता और आत्म रक्षा की आवश्यकता आ पड़ती है। हिरन, खरगोश, चीते और कंगारू बहुत तेज दौड़ते हैं किन्तु जब इन्हें अपने सामने कोई संकट आता दिखाई देता है तब! वे जानते हैं कि उस स्थिति में सामान्य गति से बचाव नहीं किया जा सकता अतएव वे अपनी गति को अत्यधिक तीव्र कर देते हैं। चीता उस स्थिति में 100 किलोमीटर प्रति घन्टे की रफ्तार से दौड़ जाता है, कंगारू उस स्थिति में हवा में जोरदार कुलांचे लगाता है जिससे उसकी मध्यम गति अपनी प्रखरता तक पहुँच जाती है। यदि भागने में भी जान न बचे तो वह खड़े होकर अपना शक्ति प्रदर्शन करते हैं। बिल्ली अपने बाल फुलाकर तथा गुर्राकर यह प्रदर्शित करती है कि उसकी शक्ति कम नहीं, कुछ जानवर दाँत दिखाकर शत्रु को डराते हैं तो कुछ धुड़ककर, कुछ पंजों से मिट्टी खोदकर इस बात के लिए भी तैयार हो जाते हैं कि आओ जब नहीं मानते तो दो−दो हाथ कर ही लिये जायें। स्पाही तो मुँह विपरीत दिशा में करके अपने नुकीले तेज काँटे इस तरह फर्राकर फैला देती है कि शत्रु को लौटते ही बनता है। अमेरिका में पाई जाने वाली स्कंक नामक गिलहरी अपने शरीर से एक विलक्षण दुर्गन्ध निकाल कर शत्रु को भगा देती है। आस्ट्रेलिया के कंगारू रैट तो सचमुच ही आँखों में धूल झोंकना, जो कि बुद्धिमत्ता का मुहावरा है, जानता है कई बार रैटल साँप का उससे मुकाबला हो जाता है तो यह अपनी पिछली टाँगों से इतनी तेजी से धूल झाड़ता है कि कई बार तो सर्प अन्धा तक हो जाता है उसे अपनी जान बचाकर भागते ही बनता है।

कछुआ, कर्कट तथा अमेरिका में पाये जाने वाले पैगोलिन व आर्मडिलो शत्रु आक्रमण के समय अपने सुरक्षा कवच में दुबक कर अपनी रक्षा करते हैं तो बारहसिंगा युद्ध में दो−दो हाथ की नीति अपना कर अपने पैने सींगों से प्रत्याक्रमण कर शत्रु को पराजित कर देता है।

कहते हैं कि भालू मृत व्यक्ति पर आक्रमण नहीं करते। इसकी पहचान के लिये वे नथुनों के पास मुँह ले जाकर यह देखते हैं कि साँस चल रही है या नहीं। चतुर लोग अपनी साँस रोक कर उसे चकमा दे जाते हैं यह बात कहाँ तक सच है कहा नहीं जा सकता, किन्तु ओपोसम सचमुच ही विलक्षण बुद्धि और धैर्य का प्राणी है वह संकट के समय अपनी आँखें पलट कर जीभ लटका कर मृत होने का ऐसा कुशल अभिनय करता है जैसा सिनेमा के नायक। इस तरह अपनी सूझबूझ से वह अपने को मृत्यु मुख में जाने से बचा लेता है।

मोर आक्रमण की स्थिति से नृत्य मुद्रा में निबटता है अपने पंखों को छत्र की तरह बनाकर वह आक्रमणकारी रोष प्रकट कर शत्रु को धमका देता है। कुछ छोटे−छोटे पक्षी तो और भी चतुराई दिखाते हैं आक्रामक को देखकर ये लँगड़ा कर चलने का नाटक करते हैं। इससे इस बात का भ्रम होता है कि पहले ही इसे किसी ने घायल कर दिया है। इस स्थिति में आगंतुक सीधे आक्रमण करने की अपेक्षा पीछा करने की नीति अपनाता है। काफी दूर तक तो वह इसी तरह पीछे−पीछे भगाता है इसी बीच वह एकदम फुर्र से उड़ जाता है और शिकारी टापता ही रह जाता है।

वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ (विश्व वन्य जीवन) त्रैमासिक पत्रिका के एक संस्करण में मलेशिया में पाई जाने वाली मछली एक्रोबेट का वर्णन छपा है। जिसमें बताया गया है कि यह मछली भोजन की तलाश में अपने बड़े−बड़े पंखों के सहारे वृक्षों पर भी चढ़ जाती है। यही नहीं वह अपने थुथने में पानी भर कर इस तरह की क्रिया करती है वह थुथना बन्दूक का-सा काम करता है और पानी गोली का अपनी इसी प्राकृतिक गन से वह अपने भोजन के उपयुक्त जीवों का स्वयं शिकार कर लेती है। उसमें यह भी समझ होती है कि किस जीव को मारने के लिये कितनी बड़ी गोली प्रयुक्त की जाये। दागते समय वह उतने ही जल का प्रयोग करती है।

शेरनी 108 दिन में प्रसव करती है इसके बाद वह 2 वर्ष तक जब तक कि बच्चे बड़े और समर्थ नहीं हो जाते वह उन्हीं के पोषण प्रशिक्षण में व्यस्त रहती है। सहवास की इच्छा होने पर भी वह उसे टालती है और बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जाने के बाद ही वह पुनः गर्भधारण करती है। इस तरह के उदाहरण से भावनाओं की गम्भीरता का पता चलता है इसके विपरीत आचरण मानवीय स्वभाव का हलकापन है। भावनाओं का अर्थ केवल मात्र झुकना नहीं अपितु अपनी समीक्षा बुद्धि को जागृत रखते हुये जो पवित्र रसमय और मर्यादाजन्य है उसे पूरा करने में अपनी सम्पूर्ण निष्ठा का परिचय देना ही भाव निष्ठा है।

डेथ हेड होव−कीड़ा विलक्षण ध्वनियाँ निकाल लेने में बड़ा चतुर होता है। उसे यदि कहीं मधुमक्खी का छत्ता दिख जाये तो वह रानी मक्खी की-सी आवाज निकालता है। अन्य मक्खियाँ भुलावे में आ जाती हैं और यह महोदय चुपचाप छत्ते में घुसकर शहद चोरी कर लाते हैं।

हाथी की खोपड़ी ही बड़ी नहीं होती अपितु उनमें उसी अनुपात की बुद्धिमत्ता भी है। वे सूक्ष्म संकेतों को भी थोड़े प्रशिक्षण के बाद ही समझने लगते हैं यही कारण है कि उसे भूतकाल में युद्ध भूमि में प्रयुक्त किया गया था। आज भी सवारी के काम में, सागौन के जंगलों में स्लीपर ढोने तथा सरकसों में विविध करतब दिखाने में प्रयुक्त होते हैं। जगपति चतुर्वेदी ने अपनी पुस्तक जीव जन्तुओं की बुद्धि में लिखा है कि एक हाथी ने एक बच्चे की जेब में सूँड़ डाली पता चला कि उसकी जेब में चीनी है हाथी उसे ही लेना चाहता था। हाथी को मिष्ठान्न अधिक प्रिय है सम्भवतः इसी से उसकी तुलना मोदक प्रिय गणेश जी से की जाती है। हाथी अपने गिरोह की प्रधान किसी वयोवृद्ध हथिनी को बनाते हैं इससे उनके मातृत्व के प्रति सम्मान का परिचय मिलता है।

सामान्य बुद्धि से देखें तो चींटियों का ही क्या मनुष्य जीवन भी खा−पीकर वासना तृष्णा अहंता में बिताया जाने वाला बेकार−सा जीवन है पर उपयोगिता और उपादेयता तब स्पष्ट होती है जब जीवन−प्रक्रिया के सूक्ष्म तत्वों का भी बारीकी से अध्ययन, चिन्तन और मनन किया जाये। चींटियां यों ढेर में बिलबिलाती दिखती हैं पर उनका हर कार्य व्यवस्थित−नियन्त्रित और अपनी प्रभु सत्ता सम्पन्न रानी के इंगित पर चलता है। कोई भी चींटी न तो कभी निष्क्रिय होगी न व्यर्थ के कार्य करेगी। जो कार्य जिसे सुपुर्द है वह वही करेगी। नर का काम है परिश्रम पूर्वक खाद्यान्न व्यवस्था, सैनिक पहरेदारी करते, मजदूर बोझा ढोते, शव बाहर निकालते हैं और शिल्ली भवन निर्माण में जुटे रहते हैं। यही व्यवस्था मधुमक्खियों में भी समान रूप से पाई जाती है। मनुष्य की तरह पेट और प्रजनन में व्यस्त रहने पर भी उनमें अव्यवस्था और उच्छृंखलता के लिये कोई स्थान नहीं।

इंजीनियरिंग दक्षता विज्ञान युग की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। भारी−भारी बाँधों के निर्माण से लेकर नहर निकाल कर जन−सुविधायें बढ़ाने के अनेक बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य हो रहे हैं किन्तु इस तरह का बुद्धि कौशल अन्य जीवों में भी कम नहीं। ऊदबिलाव को तो जीव−शास्त्रियों ने कुशल इंजीनियर की पदवी तक दे डाली है। यह सुरंगी नहरें बनाने तथा मिट्टी के पुल निर्माण करने में बड़ा पटु होता है। हैम्पटन नगर में इस ऊदबिलाव के कारनामों से तो लोग बहुत ही तंग रहते हैं। नगर के बाहर एक झील है। ऊदबिलावों ने वहाँ से नगर के भीड़ वाले इलाकों तक में भीतर−भीतर सुरंगें बना रखी हैं। बहुत प्रयत्न करने के बाद भी आज तक न तो ऊदबिलाव ही पकड़े जा सके और न ही वह नहरें बन्द की जा सकीं जो इन्होंने जमीन के अन्दर−अन्दर बना रखी हैं।

मनुष्य और मानवेत्तर जीवों की बौद्धिक क्षमताओं का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद शास्त्रकार की इस मान्यता की ही पुष्टि होती है :—

आहार निद्रा भय मैथुनं च सामान्यमेतद् पशुभिः नराणाम। धर्मेण एको मधिको विशेषो, धर्मेण हीनाः पशुभिः समानः॥

अर्थात्—खाने−पीने, निद्रा, विश्राम, भय और उससे सुरक्षा तथा कामवासना का जीवन इन चारों दृष्टियों से मनुष्य और पशुओं में कोई अन्तर नहीं है। यदि मनुष्य भी इन्हीं चार में अपनी बुद्धि फँसाये रहता है तो यह उस महान कृति का अपमान है। वह इन सब से परे धर्मतत्व के अवगाहन के लिये बना है यदि वह अपनी इस विशेषता को चरितार्थ नहीं करता तो उसे भी एक प्रकार का पशु ही कहा जायेगा।

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पराज्ञान का कुछ अर्थ भी निकालें

जीवन असामान्य सत्ता का ही सृजन नहीं वह स्वयं भी उसी तत्व से बना होने के कारण उन सभी पराशक्तियों से परिपूर्ण बन कर आया है। जिनकी महत्तत्व में कल्पना की जाती है। पूर्वाभास, मन की बात जान लेना। अपनी भावनाओं के संदेश औरों तक पहुँचाना, प्राणों पर नियन्त्रण आदि अनेक प्रकार के असामान्य चमत्कार देखकर उपरोक्त धारणा की ही पुष्टि होती है। आत्म जिज्ञासायें तब और भी प्रगाढ़ हो उठती हैं जब देखने में आता है कि सृष्टि के अन्य जीवों में भी यह क्षमतायें विद्यमान हैं। इससे यही सिद्ध होता है कि विराट् जगत छोटे−बड़े जिस रूप में अभिव्यक्त हैं—सब मूल चेतना का ही अंश है। अन्य जीवों को तो ऐसी सुविधायें और बुद्धि नहीं मिली, पर मनुष्य को वह सभी सुविधायें सुलभ हैं, जिनसे वह अपने अतीन्द्रिय स्वरूप का बोध कर सके। आत्म−तत्व की खोज में मनुष्य जीवन की सार्थकता है। केवल कुछ उदाहरण जैसी क्षमतायें समस्या का हल नहीं कर सकतीं। ऐसी क्षमताओं से तो पशु−पक्षी भी विभूषित रहते हैं। भारतीयों में उत्तर की ओर सिरहाना लेकर सोना वर्जित है इसे काफी समय तक अन्धविश्वास निरूपित किया गया किन्तु जर्मनी के वैज्ञानिक डॉ. बेकर ने यह सिद्ध कर दिया कि वस्तुतः हमारा मस्तिष्क उत्तरी ध्रुव की चुम्बक शक्ति से प्रभावित होता है तो बात बुद्धि संगति मान ली गई। कई बार ऐसा होता है कि लोग किसी ऐसे स्थान में पहुँच जाते हैं। जहाँ दिशाज्ञान में दिक्कत आती है तो वे दिकसूचक यन्त्र से यह जानने का प्रयास करते हैं कि उत्तर दिशा किधर है। मनुष्य जैसे बुद्धिमान व्यक्ति को इतना आश्रित रहना पड़े यह अचरज ही है जब कि डॉ. बेकर ने एक अन्य प्रयोग में यह सिद्ध कर दिया कि दीमक जैसे जीवों को भी चुम्बकीयता का पता रहता है उन्हें कृत्रिम चुम्बक क्षेत्र के सहारे सीधे लिटाने का प्रयास किया गया किन्तु वे तब न सो सकीं जब तक कि वे सही स्थिति में न आ गईं।

रेडियो सक्रियता की माप के लिए फ्रेंच वैज्ञानिकों ने “गाहगर−वाउन्टर” यन्त्र बनाया जिसकी कीमत लाखों डालर पड़ती थी। इस बीच कुछ जीव शास्त्रियों ने जब यह संकेत दिया कि चींटियों में यह सूक्ष्म संवेदना तो जन्मजात होती है तब से इस यन्त्र का निर्माण बन्द कर दिया गया और अब इस कार्य के लिए वहाँ विधिवत चींटियों की ही सेवा ली जाती है।

बाँस में कभी फूल नहीं देखे जाते इनकी जड़ें ही वंशवृद्धि करती रहती हैं। किन्तु 50 वर्ष बाद प्रायः बाँस से फूल आते और उनमें से फल भी निकलते हैं। 50 वर्ष की अवधि में यदि एक चूहे की वंशवृद्धि प्रारम्भ हो तो उस समय तक 50 पड़ पोते पहुँच जायेंगे जिन्हें यह पता भी नहीं होगा कि बाँस में भी फल होते हैं, किन्तु चूहे अपनी सुगन्ध विश्लेषण थी सूक्ष्म बुद्धि से इस फल की उपयोगिता ताड़ कर उसे खूब खाते हैं यह फल उनकी प्रजनन क्षमता को कई गुना अधिक बढ़ा देता है। यह ज्ञान उसे किस तरह मिलता है। इस गुत्थी की जीवशास्त्री सुलझा नहीं पाये।

कई बार ऐसा होता है कि जंगल में शेर बैठा होता है तथा हिरन उसके समीप ही घास चर रहा होता है। फिर भी वह न तो भयभीत होता है, न आतंकित। क्योंकि उसे ज्ञात रहता है कि शेर भूखा होने पर ही शिकार करता है और इस समय उसे ऐसी कोई परेशानी नहीं है। हिरन मन की बात कैसे जान लेता है। जीव वैज्ञानिक इस आश्चर्यजनक तथ्य की शोध में लगे हुए हैं, पर अभी तक कुछ जानकारी मिली नहीं।

शेरनी जब किसी ऐसे युद्ध के लिये चलती है, जिसमें शत्रु समान शक्ति का हो तो वह अपने बच्चों को किसी सुरक्षित स्थान पर बैठा जाती है। युद्ध बच्चों की आँखों से ओझल चलता है। बच्चे इसी स्थान पर बैठे रहते हैं। किन्तु इस बात की अनुभूति उन्हें न जाने कैसे हो जाती है कि अब युद्ध समाप्त हो गया और माँ की विजय हुई। वे शेरनी के पास विजय के बाद बिना बुलाये चले जाते हैं।

आधुनिक परामनोविज्ञान पूर्वाभास दूर संवार, तथा स्वप्नों में होने वाले भविष्य दर्शन को पाँच ज्ञानेन्द्रियों से भिन्न व अतीत−छठवीं संवेदना (सिक्स्थ सेन्स) की संज्ञा दी है। इस छठवीं संवेदना को आज बड़ी जिज्ञासापूर्ण दृष्टि से देखा और खोजा जा रहा है।

न केवल मनुष्य अपितु जीवों में इस तरह की सूक्ष्म क्षमतायें पाई गईं तो आश्चर्य होना स्वाभाविक ही था। आज भी समुद्रों में चलने वाले जहाजों से यदि चूहे निकल कर स्वेच्छा से भाग निकलें तो नाविक आने वाले संकट का अनुमान कर लेते हैं। जबकि अनेक बार अत्यधिक आधुनिक किस्म के यन्त्र भी सही जानकारी देने में असमर्थ रहते हैं।

वर्मा की कलादान घाटी में एक बिल्ली की एक विचित्र समाधि बनी है। इसके चारों ओर लिखा है—”रैडी” की यह बिल्ली हमारी समय पर सहायता न करती तो हम मारे जाते और पराजित होते”—इन शब्दों में वास्तव में जीवों में अद्भुत अतीन्द्रिय क्षमता का इतिहास अंकित है। बात उन दिनों की है जब वर्मा में अँग्रेजों और जापानियों के बीच युद्ध चल रहा था। एक दिन अँग्रेजों की टुकड़ी ने एक जापानी टुकड़ी पर आक्रमण कर दिया। जापानियों ने पीछे हटने का नाटक खेला वास्तव में वे पीछे हटे वरन् खंदकों में छिप गये पर बाहर वे इस तरह सामान बिखेर गये मानों वे सचमुच भाग गये हों। एक मेज पर वे ताजा पका पकाया खाना भी छोड़ गये उसे देखते ही अँग्रेज सैनिक उस खाने पर टूट पड़े किन्तु अभी वे प्लेटों तक नहीं पहुँच पाये थे उनमें से एक सर्जेंट रैंडी की काली बिल्ली उस खाने पर जा टूटी और बुरी तरह गुर्राकर अँग्रेज सैनिकों को पीछे हटा दिया अँग्रेजों ने बिल्ली को धमकाया भी वह अपनी क्रुद्ध मुद्रा में तब तक गुर्राती ही रहीं जब तक वहाँ एक भयंकर धमाका नहीं हो गया। वास्तव में उस खाने के साथ बारूदी सुरंग का सम्पर्क जुड़ा था उन सैनिकों के प्राण ले सकता था पर बिल्ली ने अपनी आत्माहुति देकर न केवल अपनी स्वामिभक्ति का परिचय दिया अपितु उसमें यह भी बता दिया कि जीव जिन्हें हम तुच्छ समझते हैं किस तरह विलक्षण आत्मिक गुणों, अतीन्द्रिय क्षमताओं से ओत−प्रोत होते हैं।

इसी तरह की एक घटना जर्मनी के साथ अँग्रेजों के युद्ध में कैम्बरवेल में घटी थी। मिस्टर ज्योफरी नामक एक अँग्रेज ने एक बिल्ली पाल रखी थी। एक दिन जर्मनी बमवर्षक जहाज कैम्बरवेल से गुजरे। सारा परिवार घबराकर मकान के एक कोने में दुबक गया। तभी उनकी बिल्ली बगीचे के तहखाने से दर्दनाक ध्वनि में म्याऊँ−म्याऊँ चिल्लाने लगी। पहले तो ज्योफरी उसे बुलाते रहे पर जब वह न आई तथा उसी तरह चिल्लाती रही तो उन्होंने समझा कि बिल्ली मर गई है सारा परिवार उसके पास पहुँचा अभी वे तहखाने में घुसे ही थे कि दोबारा जहाजों ने आक्रमण कर बम बरसाये और वह मकान बुरी तरह विस्फोट के साथ मलबे में बदल गया। बिल्ली के इस अतीन्द्रिय ज्ञान के कारण ही ज्योफरी व उनका परिवार बच सका।

इस अतीन्द्रिय ज्ञान से आत्मचेतना की दुर्लभ अवस्था सिद्ध होती है। उसे प्राप्त करने में ही मानवीय पुरुषार्थ की सार्थकता है। हमें सामान्यतः पशुप्रवृत्तियों तक ही केन्द्रित न रह कर सृष्टि के सूक्ष्म अस्तित्व के अध्ययन अनुभूति की भी अभिरुचि बढ़ानी चाहिए तभी मनुष्य जीवन जैसी परमात्मा की अमूल्य कृति की उपयोगिता और उपादेयता सिद्ध होगी।


अपने आपको उसने सुधार लिया (kahani)

अरब निवासी एक सज्जन श्री नाहेर के पास एक अच्छा−सा अश्व था। एक अन्य दाहेर नामक व्यक्ति को वह अश्व पसन्द आया व उसने अश्व बेच देने का प्रस्ताव नाहेर के समक्ष रखा। नाहेर अपने अश्व को अत्यधिक चाहते थे अतः उन्होंने मना कर दिया।

श्री दाहेर ने एक षड्यन्त्र रचा। वह एक फकीर का वेष बनाकर उस मार्ग पर बैठ गया जहाँ से श्री नाहेर गुजरने वाले थे जब श्री नाहेर पास आये तो दाहेर ने उनसे याचना की वह उसे अगले गाँव तक घोड़े पर बिठाकर ले जायें। नाहेर को फकीर की हालत पर तरस आया व उन्होंने दाहेर को घोड़ा दे दिया। दाहेर घोड़े पर चढ़कर चलने लगा व नाहेर पैदल। थोड़ी देर बाद दाहेर ने घोड़े को दौड़ाना प्रारम्भ किया व श्री नाहेर से कहा, देखो−तुमने सीधे रास्ते से अश्व नहीं दिया तो मैंने किस तरकीब से पा लिया। श्री नाहेर ने शान्त चित्त से दाहेर से कहा “खुदा की मर्जी, तुम घोड़ा लो जाना चाहो तो ले जाओ परन्तु यह धोखे−धड़ी की बात किसी से न कहना नहीं तो जो भी सुनेगा वह आइन्दा जरूरतमन्दों, दीन-दुःखियों की सहायता करने में हिचकिचाहट करेगा तथा उसकी राय फकीरों के बारे में यह बन जायगा कि फकीरी वेष में भी छली, कपटी व्यक्ति फिरा करते हैं।”

नाहेर की इन बातों का दाहेर पर बड़ा असर हुआ उसने घोड़ा लौटा दिया व अपने आपको उसने सुधार लिया।

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अपने पैरों आप कुल्हाड़ी न मारें

शरीर शास्त्रियों से पूछा तो उनने काया की संरचना के ईश्वरीय कौशल पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला और बताया कि इस तुलना में मनुष्यकृत सारे निर्माण तुच्छ हैं। इसका प्रत्येक कल-पुर्जा इतनी कुशलता के साथ बनाया गया है कि उसे सौ वर्ष तक नहीं सैंकड़ों वर्षों तक भली प्रकार काम करते रहने में किसी प्रकार की अड़चन नहीं हो सकती। वे अपना काम बिना किसी गड़बड़ी के चिरकाल तक बड़ी आसानी से करते रह सकते हैं। हथौड़ा कुल्हाड़ी लेकर उसे बर्बाद करना हो तो बात दूसरी है अन्यथा इतनी मजबूत और इतनी सही स्वसंचालित मशीन संसार भर में एक भी नहीं है जैसी कि मानवी काया। इतना ही नहीं इसमें एक और भी विशेषता है कि टूट−फूट की मरम्मत और बाहरी आक्रमणों को निरस्त करने की भी अद्भुत क्षमता इसके कण−कण में भरी पड़ी है। रक्त के श्वेत सैनिक बाहर से भीतर आने वाले अथवा भीतर ही उत्पन्न होने वाले मारक विषाणुओं को परास्त करने की क्षमता से पूरी तरह सम्पन्न हैं। चोट लग जाने पर रक्त का एक विशेष अंश ऊपर चमड़ी पर चिपककर खुरंट बन जाता है और रक्त बहने को रोकने तथा बाहर के अवांछनीय तत्वों को उसमें न घुसने देने के दोनों ही कार्य पूरे कर देता है। रक्त में प्रवेश विष फोड़े फुंसियों के दर्द, ताप, दाह आदि के रूप में बाहर निकाल फेंकने के लिए जीवनी शक्ति अनायास ही प्रबल प्रयत्न करती रहती है। शरीर शास्त्री बताते हैं कि शरीर जैसी अद्भुत रसायनशाला इस धरती पर कहीं भी नहीं है। अनाज से रक्त बना देने वाली रासायनिक क्रिया की वैज्ञानिक अभी कल्पना भी नहीं कर सके हैं। आहार का शारीरिक बल और मस्तिष्कीय चिन्तन में बदल जाना ऐसा चमत्कार है जिसे रसायन शास्त्री स्वयं प्रस्तुत कर सकने में अपने को सर्वथा असहाय अनुभव करते हैं।

लगता है पूर्ण सृष्टा ने अपनी इस कलाकृति को यथासम्भव सर्वथा पूर्ण न सही पर पूर्णता के अनुरूप तो अवश्य ही बनाया है। अनावश्यक और अवांछनीय तोड़−फोड़ की जाय तब तो बारूद के सहारे पहाड़ तक गिराये जा सकते हैं, पर यदि सम्भाल कर रखा जा सके और अनावश्यक छेड़खानी करने से हाथ रोका जा सके तो यह शरीर बिना किसी विशेष प्रयत्न के ऐसे ही सुदृढ़ बना रह सकता है।

शरीर विज्ञानियों का यह तथ्य अक्षरशः सही प्रतीत होता है क्योंकि जानबूझ कर तोड़−फोड़ न मचाने वाले वनवासी−अभाव ग्रस्त और अशिक्षित होते हुए भी सशक्त रोग मुक्त और दीर्घजीवी बने रहते हैं। रूस के उजेविस्तान क्षेत्र में लोग अधिक स्वस्थ और अधिक दीर्घजीवी पाये जाते हैं। तलाश करने पर इतना ही निष्कर्ष निकला है वे भी अन्यत्र रहने वाले, पिछड़े समझे जाने वाले लोगों में से ही हैं, विशेषता एक ही है कि शरीर को अपने ढंग से काम करने देते हैं उसके साथ शरारत नहीं करते। इतने भर से उनका स्वास्थ्य, समस्या का रूप धारण नहीं करता है और निरोगता की गाड़ी अपने पहियों पर ठीक तरह लुढ़कती हुई−लम्बा सफर पार कर लेती है। यही बात अन्यत्र पाये जाने वाले स्वस्थ मनुष्यों के सम्बन्ध में भी है। प्रकृति प्रदत्त सहज ज्ञान के आधार पर यदि आहार−विहार की क्रिया पद्धति बनी रहे तो फिर न तो कमजोरी घेरेगी और न बीमार पड़ना पड़ेगा। काया को क्षत−विक्षत कर डालने वाली कुल्हाड़ी असंयम की अनियमितता ही है। इसी भारी रेती से हम अपने अच्छे भले कल−पुर्जों को काट-पीट कर दुर्दशाग्रस्त स्थिति में पटक देते हैं। अस्वस्थता के अभिशाप में दैवी प्रकोप की, विधि−विधान की बात सोचना व्यर्थ है। इस आत्म प्रवंचना को अपनाने से तो सुधार का उपाय सोचने की भी आवश्यकता प्रतीत नहीं होती और भविष्य पूर्णतया अन्धकारमय बन जाता है।

बात विधि के विधान और भाग्य दोष की चल पड़ी तो लगे हाथों इस पर भी विचार क्यों न कर लिया जाय? सृष्टि के समस्त प्राणियों पर दृष्टि डालकर उसकी शारीरिक स्थिति का पर्यवेक्षण किया जाय और देखा जाय कि उनमें से कितनों को दुर्बलता एवं रुग्णता का शिकार बनना पड़ रहा है। जलचर, नभचर और थलचर प्रकृति के स्वदेज, अंडज, उद्विज, जरायुज वर्ग के समस्त प्राणियों का गहरा उथला सर्वेक्षण करने पर प्रतीत होता है कि इनमें से किसी के भी सामने स्वास्थ्य समस्या नहीं है। बुढ़ापा और मरण तो सभी के सामने आता है, पद मध्यावधि में किसी को भी बीमारियों का त्रास नहीं सहना पड़ता। सर्दी−गर्मी, भूख, आक्रमण के शिकार होते रहने—अनेकानेक प्रतिकूलताओं का सामना करते रहने पर भी वे आजीवन निरोग ही बने रहते हैं। मनुष्य को तो अनेक सुविधाएँ प्राप्त हैं। फलतः उसे अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ रहना चाहिए था पर देखा विपरीत जाता है। पिछड़ी समझी जाने वाली योनियों के प्राणी आरोग्य का आनन्द लेते रहे और प्रगतिशील कहलाने वाला मनुष्य उस सहज सौभाग्य से वंचित ही बना रहे यह कैसी विषम विडम्बना है? मनुष्य स्वयं बीमार पड़ा और अपने चंगुल में फँसे हुए पालतु पशुओं, पक्षियों को भी बीमार बनाया। यदि इसी का नाम बुद्धिमत्ता है तो उसे पाकर मनुष्य ने क्या लाभ कमाया?

इन सब बातों पर विचार करने से अपने समीपवर्ती क्षेत्र में जो भी निरोग, समर्थ, प्रफुल्लित, उल्लसित, स्फूर्तिवान व्यक्ति पाये जाते हैं उनके सम्बन्ध में यही धारणा बनानी पड़ती है कि वे किन्हीं विशेष सुविधाओं के कारण इस उत्तम स्थिति में नहीं रह रहे हैं मात्र शरीर यात्रा के लिए प्रकृति निर्धारित आचार संहिता का पालन करने भर से ही आरोग्य का वह आनन्द पाया जा सकता है जिसे जीवन का प्रथम सुख कहा जाता है।

स्वस्थ, उत्साही और स्फूर्तिवान मनुष्य से अपनी तुलना की जाय, यदि उनके अंग−अवयवों से अपनों की समता की जाय तो प्रतीत होगा कि एक ही वर्ग के जीवधारी होते हुए भी हम लोगों के बीच अन्य क्षेत्रों में ही नहीं आरोग्य स्तर की विषमता भी बुरी तरह छाई हुई हैं। यह सभी विषमताएँ कृत्रिम हैं। ईश्वर प्रदत्त नहीं। मनुष्य ने अपनी सभी पुत्रों को प्रायः समान स्तर के शरीर और मन दिये हैं। इनका सही गलत उपयोग करके ही मनुष्य पिछड़ेपन की एवं समुन्नत स्तर की परिस्थितियों का निर्माण करते हैं। इसी प्रयास प्रक्रिया के परिणाम ही देर−सवेर में सामने आते रहते हैं। इसलिए भाग्य का एक नाम कर्म भी है। कर्म विधान, कर्म रेख, कर्म लेख आदि शब्दों का यदि भाग्य के स्थान पर प्रयोग किया जाय तो इसमें उसकी अधिक सार्थकता समझी जा सकेगी।

कुछ अपंग, अविकसित अपवादों को छोड़कर प्रायः सभी मनुष्य एक जैसी स्थिति में उत्पन्न होते हैं। आरोग्य से लेकर जीवन के अनेकानेक क्षेत्रों में दृढ़ता एवं प्रगति की सफलताएँ तो मनुष्य की अपनी गतिविधियों पर निर्भर रहती है। अपना आरोग्य यदि पिछड़ा या बिगड़ा हुआ है तो उसके लिए परिस्थितियों को दोष देते रहने से काम नहीं चलेगा। अपना उत्तरदायित्व स्वीकार करना पड़ेगा। कहीं अपने से ही भूल होती है या होती रही है। अपने पैर कुल्हाड़ी मारने से ही यह जख्म हुआ है। ऐसा दूसरा कोई पास में दिखता नहीं जिसके कारण इतनी मजबूत इमारत खोखली होती। आँखें बन्द किये रहें तो बात दूसरी है अन्यथा पलक खोल कर देखने पर वस्तु स्थिति स्पष्ट हो जाती है और वह छिद्र स्पष्ट दीखते हैं जिनमें होकर इस नाव में पानी भरा है और वह डूबने के करीब जा पहुँची है। अपनी ही बुरी आदतें हैं जिनने घुन की तरह इस मजबूत शहतीर को खोखला करके रख दिया है। यदि अपनी भूलें स्वास्थ्य की बर्बादी का कारण समझ में आ सकें और उनका पश्चात्ताप हो तो प्रायश्चित्त एक ही है कि जो हो चुका है उसे सुधारने के लिए उतनी ही हिम्मत के साथ कदम बढ़ाये जायें, जितने उत्साह से विनाश के पथ पर बढ़ने में उत्साह दिखाया गया है।

देखा जाता है कि सृष्टि के समस्त प्राणी अपने लिए निर्धारित आचार संहिता का पालन करते हैं। अन्तःचेतना में विद्यमान प्रकृति−प्रेरणा मार्गदर्शन करती है और प्राणी उसका अनुसरण करते हैं। इतने भर से सुव्यवस्था बनी रहती है और आरोग्य पर कोई आँच नहीं आने पाती। हर प्राणी के लिए जीवन निर्वाह की आचार−संहिता उसकी मूल प्रकृति में मौजूद है। यदि उसे विकृत न किया जाय तो वह ऐसा मार्गदर्शन करती रहती है जिसका अनुसरण करने पर किसी निरोग को पूर्णायुष्य प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं होती। आदत बिगाड़ने पर तो कोई भी अनुपयुक्त आचरण करने लग सकता है। घोड़ों का शराब, बन्दरों को भाँग, पक्षियों को अफीम की थोड़ी−थोड़ी मात्रा देकर पीछे उन्हें ऐसा अभ्यस्त बना लिया जाता है कि बिगड़ी आदत के अनुसार ही उनके आचरण होते हैं। इन्द्रियों की आदतें हमीं बिगाड़ते हैं। पीछे वे इतनी ढीठ हो जाती हैं कि उसी बिगड़ी आदत को पूरा करने के लिए मचलती रहती हैं उसमें कमी पड़े तो रूठने मटकने लगती हैं। नवजात बालक की जीभ पर जरा−सी मिर्च लग जाय तो वह बेतरह व्याकुल हो उठता है, पीछे वह अभ्यास चलता रहे तो मिर्च के बिना भोजन में रस ही नहीं आता है और कई बार तो उसकी मात्रा बढ़ाते रहने पर ही सन्तोष होता है। यही बात तम्बाकू आदि नशों के सम्बन्ध में है, आरम्भ में उनके तनिक से सेवन से मिचली आती है पर पीछे अभ्यस्त बनते बनते उसे खाये−पिये बिना टट्टी उतरना तक कठिन हो जाता है। यह अभ्यास की करामात है जिसके सहारे बुरे आचरण के लिए भी मनुष्य विवश होता चला जाता है।

मूल प्रकृति को समझा गया होता, प्रकृति के संकेतों का अनुसरण किया गया होता तो न स्वास्थ्य सम्वर्धन के उपाय खोजने पड़ते और न रोग निवारण के उपाय उपचार खोजने के लिए जहाँ−तहाँ ठोकरें खाते−फिरने की, पैसा समय गँवाने की झक मारनी पड़ती। तब सृष्टि के अन्य प्राणियों की तरह अपना जीवन भी बिना दुर्बलता एवं रुग्णता का कष्ट सहे हुए ही आनन्दपूर्वक व्यतीत हो रहा होता।

अपना शरीर काम चलाऊ भले ही हो पर जिसे स्वस्थ कहा जा सके उस स्तर की उसकी स्थिति कहाँ है? फिर आये दिन छोटी-बड़ी बीमारियों की खट−खट भी तो लगी रहती है। अपच को ही लें, स्वभाव का अंग बन जाने से अखरता नहीं, किन्तु है तो वह भी शरीर में जड़ता आलस्य, उदासी, अनख आदि कितने भार लादे रहने वाला अभिशाप ही। नींद में कमी, शिर का भारीपन यह छोटे रोग ही हैं पर पेड़ की जड़ में लगने वाली दीमक की तरह उनकी विनाशलीला तो किसी प्रकार कम नहीं है। मसूड़ों में पाया जाने वाला पायेरिया न तो बहुत कष्ट कर होता है और न विद्रूप फिर भी मुँह की बदबू और पेट में पहुँचने वाली मवाद कितनी अधिक हानिकारक होती है इसका पता आरम्भ में नहीं बाद में चलता है।

अपने शरीर को छोटी हानि सहनी पड़ रही है या बड़ी, इसकी विवेचना करना आवश्यक नहीं। इतना जान लेना ही काफी है कि छोटे से विकार भी यदि पनपते रहें तो अन्ततः भारी संकट उत्पन्न करते हैं। छप्पर के एक कोने में लगी आग बढ़ते−बढ़ते उस घर को और समूचे गाँव को जला डालने वाली विभीषिका बन जाती है। यदि कोई बड़ा रोग नहीं है किन्तु अपच जैसे घुन स्वास्थ्य को खोखला करने में लगे हुए हैं तो भी यह कम चिन्ता की बात नहीं हैं। उसके द्वारा पहुँचने वाली क्षति बढ़ते−बढ़ते आयु का बड़ा भाग समाप्त कर सकती है और आगे चलकर किसी भयंकर रोग का कारण बन सकती है। ऐसा न भी हो तो उसकी वर्तमान क्षति ही कौन प्रसन्नता दायक है? उससे कुछ तो असुविधा होती है। क्रियाशक्ति की घटोत्तरी−उत्साह और स्फूर्ति की कमी से भी तो अर्ध मृतक की स्थिति बन जाती है और जो कुछ किया या पाया जा सकता है उसका आधा अंश ऐसे ही बर्बाद हो जाता है। हमें अपने स्वास्थ्य में यदि थोड़ी−सी भी गड़बड़ी दीखती है तो उसे सम्भालने−सुधारने में उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। रोग और शत्रु को छोटा मान कर नहीं चलना चाहिए, यह बड़ों की शिक्षा बहुत ही अनुभवपूर्ण है। हम दूसरों के लिए इतना करते हैं कि अपने सम्बन्ध में सोचना या करना नहीं बन पड़ता। यह आत्म−प्रवंचना अपनी त्याग वृत्ति का रौब गाँठने के लिए गढ़ी जाती है पर वस्तुतः उसमें अदूरदर्शिता और प्रमाद की वृत्ति ही काम करती है। दूसरों को सम्भाला जा सकता है तो अपने आप को भी क्यों न सम्भाला जाय? बच्चे को स्वच्छ रखा जा सकता है और स्वच्छता अच्छी बात समझी जाती है तो स्वयं भी स्वच्छ क्यों न रहा जाय? शरीर दुर्बल और अस्वस्थ रहने लगे और स्वयं उसकी ओर आँखें बन्द करके रहा जाय तो इसमें अदूरदर्शिता का ही परिचय मिलेगा।

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सिर दर्द का सिर दर्द

सिर दर्द का सबसे बड़ा कारण चिकित्सा शास्त्र में पेट के अपच को माना है। बिना हजम हुआ भोजन आँतों में विष उत्पन्न करता है। जब हमारा शरीर उसे बाहर निकाल सकने में सफल नहीं होता तो उस विकृति की प्रतिक्रिया ज्ञान−तन्तुओं के माध्यम पर आक्रमण बोल देती है और वहाँ दर्द होने लगता है।

ऋतु प्रभाव, काम का दबाव, तनाव, क्रोध, चिन्ता, जुकाम, बुखार, अनिद्रा, आँखों की कमजोरी जैसे छुट−पुट कारण भी सिर दर्द के हो सकते हैं पर सबसे बड़ा कारण अपच ही है ‘आँत भारी तो माथ भारी’ की पुरानी उक्ति विज्ञान के पर्यवेक्षण से भी नितान्त सही सिद्ध होती है। गुर्दे या आँतों द्वारा जब सफाई का ठीक तरह पूरा नहीं होता तो रक्त में टौक्सिन नाम का हानिकारक तत्व बढ़ जाता है और उसके आक्रमण से सिर दर्द होने लगता है।

दर्द यों शरीर के अन्य अवयवों में भी होता है, पर अधिक समय तक तेज अथवा हलके सिर दर्द से मस्तिष्क को ही अधिक पीड़ित रहना पड़ता है। गठिया, जोड़ों का दर्द भी हो जाते हैं। मांसपेशियों की जकड़न नसों की अकड़न, चोट, फोड़ा, सूजन भी दर्द का कारण होती हैं। पर मनुष्य जाति को इन सबसे मिलाकर जितनी पीड़ा सहनी पड़ती है उनकी व्यथा अकेला सिर दर्द ही उत्पन्न करता रहता है। सस्ते उपचार में एस्प्रो—इर्गेंटेमाइन टार्ट रेट जैसी दवायें काम में आती हैं। मारफीन का प्रचलन अधिक दर्द होने पर किया जाता है। ऐसे ही अन्य संज्ञा शून्य कर देने वाले रसायन हैं जो दर्द को अच्छा तो नहीं, करते पीड़ित स्थान के ज्ञान तन्तुओं को मूर्छित करके कष्ट की अनुभूति न कर सकने की स्थिति में पहुँचा देते हैं। इस प्रयोजन के लिए इन्जेक्शन के रूप में नोवोक्रेन एवं प्रोकेन का उपयोग किया जाता है। थोड़ी हेरा−फेरी के साथ अलग−अलग नामों से संज्ञा शून्य करने वाली दवाएँ बनाते रहते हैं।

अन्य दर्दों के साथ−साथ सिर दर्द सम्बन्धी कारणों को खोजने में संसार के मूर्धन्य शरीर शास्त्रियों ने बहुत प्रयत्न किये हैं। इन शोधकर्ताओं में पीटर वर्ग विश्वविद्यालय ने पृथक से दर्द अनुसन्धान विभाग खड़ा किया है। शिकागो के इलिनोइस अस्पताल के पीड़ा चिकित्सक डॉ. एलन विली ने अपने अनुभवों का विस्तृत विवरण प्रकाशित कराया है। द्वितीय विश्व युद्ध के घायलों के बीच अपना अधिकांश समय लगाने वाले डॉ. हेनरी बीचर, कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के दर्द विशेषज्ञ डॉ. रिचार्ड, वाशिंगटन विद्यालय के मनोविज्ञानी प्रो. विलबर्ट फोर्डाइस, गैसाच्यूसेट्स अस्पताल के सर्जन जान वारेन, दन्त विज्ञानी विलियम थामस ग्रीन, शोध विज्ञानी गिर्ल्वट एवट जैसे विश्वविख्यात शरीर शास्त्रियों का कथन है कि ज्ञान−तन्तुओं और मस्तिष्क के बीच चल रहे सामान्य आदान−प्रदान में जब जहाँ अवरोध उत्पन्न होता है तब वहाँ दर्द अनुभव होने लगता है। चूँकि सिर समस्त नाड़ी संस्थानों का विद्युत संवाहक केन्द्र है, अस्तु शरीर भर की गड़बड़ियों की शिकायतें वहीं जमा होने लगती हैं और उस जहाँ−तहाँ से एकत्रित कचरे का कष्ट सिर को भुगतना पड़ता है। दर्द की परिभाषाओं में ‘घायल स्नायुओं की चीख’ अधिक उपयुक्त बैठती है और इस घायल होने में बाहरी आघातों से भी अधिक कारण भीतरी विषों का संचय पाया जाता है। इस विषाक्तता का उद्भव जितना अपच से होता है उतना और किसी कारण नहीं। अपच में जितना दोष, स्वाद, लिप्सा से प्रेरित होकर अधिक खा जाने का होता है उससे भी अधिक खाद्य वस्तुओं की गरिष्ठता, उत्तेजकता एवं अनुपयुक्तता की अधिकता का होना पाया है।

सच कहा जाये तो न केवल सिर दर्द अपितु शरीर के सारे उपद्रव ही पेट के विजातीय द्रव्य या मल के कारण उठ खड़े होते हैं। पाचन संस्थान का स्वस्थ, सशक्त होना आरोग्य की कुंजी है उपवास उसका प्रधान उपचार है इसीलिये उपवासों की अपने देश में लम्बी परम्परा चली आ रही है। उसे हर व्यक्ति अपना ले तो न केवल सिर दर्द अपितु शेष बीमारियाँ भी जाती रहें।

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एकाग्रता के सम्पादन के लिये त्रिविध योग साधन

उथली जानकारियाँ तो आँखों से देखकर या अन्य इन्द्रियों के सहारे प्राप्त की जा सकती हैं किन्तु किसी विषय का गम्भीर ज्ञान प्राप्त करने के लिए एकाग्रता की आवश्यकता होती है। इसके बिना गहराई में गोता लगा सकना और कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकना सम्भव नहीं होता। रसायन शास्त्री, पदार्थविज्ञानी, खगोलवेत्ता, साहित्यकार, दार्शनिक किन्हीं महत्वपूर्ण निष्कर्षों पर अपनी एकाग्रता शक्ति के सहारे ही पहुँच सकते हैं। सामान्य जीवन में भी इसका बड़ा उपयोग है। विद्यार्थी, यदि ध्यानपूर्वक न पढ़ें, श्रोता यदि मन लगाकर न सुनें, दर्शक ऐसे ही अन्यमनस्क होकर देखें तो जो कुछ सामने प्रस्तुत हुआ उसका छोटा अंश भी पल्ले न पड़ेगा। अपने−अपने कामों में प्रवीण पारंगत कहलाने वाले व्यक्तियों की वे विशेषताएँ कहीं से उपहार−अनुदान में प्राप्त नहीं की होती। वे उन्होंने एकाग्रता द्वारा उपार्जित मनोयोग के सहारे ही उपलब्ध की होती है। इसका अभाव रहने पर जो भी काम किया जायगा उसमें अस्त-व्यस्तता, अपूर्णता और कुरूपता ही दृष्टिगोचर होती रहेगी। विभिन्न क्रियाकलापों में मिलने वाली असफलता-सफलता के पीछे अन्य कारण उतने प्रमुख नहीं होते जितनी कि एकाग्रता की कमी वेशी काम करती है।

मस्तिष्कीय चेतना की समुचित मात्रा हर किसी के भीतर प्रचुर परिमाण में मौजूद है। जन्मजात मानसिक अपंगता या दुर्बलता भी किन्हीं अविकसित संरचना के रोगियों में पाई जाती है, पर वह अपवाद है सामान्य नियम नहीं। औसत मनुष्य की मानसिक संरचना ऐसी होती है जिसके आधार पर उसे बुद्धिमान घोषित किया जा सके। प्रश्न इस बुद्धिमत्ता को अविकसित स्थिति में पड़े रहने देने या विकसित करने का है। यह मनुष्य के अपने प्रयत्नों पर निर्भर है। यदि एकाग्रता की क्षमता बढ़ा ली जाय और अपने चिन्तन या कर्म में तन्मयता पूर्वक संलग्न हुआ जाय तो निश्चित ही गहरी जानकारी और कुशल प्रवीणता हस्तगत होती चली जायगी। यही है प्रगति और सफलता का आधार अवलम्बन।

एकाग्रता, अभ्यास साध्य है। जिस प्रकार अभ्यास से खेल−कूद में अथवा शिल्प संगीत में मनोयोगपूर्वक लगने से उनमें प्रवीणता प्राप्त हो जाती है उसी प्रकार अन्य विषयों में भी तन्मय हो सकना सम्भव हो सकता है। दिलचस्पी का इस संदर्भ में बड़ा योगदान रहता है। किसी विषय में रुचि हो तो मन का आकर्षण सहज ही उस पर केन्द्रित रहेगा। उदासीनता अथवा उपेक्षा बुद्धि रहने से महत्वपूर्ण कार्य भी निरर्थक लगते हैं और उन्हें करने के लिए जी नहीं होता।

एकाग्रता का घेरा बना देने से अभीष्ट एवं आमन्त्रित विचारों का ही प्रवेश मस्तिष्क में हो पाता है। यदि ऐसा घेरा न हो तो फिर खुले खेत में जिस प्रकार हर दिशा से पशु पक्षी घुस पड़ते हैं उसी प्रकार अनावश्यक और अवांछनीय विचार मस्तिष्क में घुस पड़ते हैं और मानसिक क्षमता की खेती को ऐसे ही खा पी कर समाप्त कर देते हैं। असंबद्ध और अनर्गल विचारों में उलझा हुआ व्यक्ति चिन्तन प्रवाह का रचनात्मक उपयोग कर नहीं पाता। फलतः मानसिक उत्पादन भाप की तरह उड़ता और अन्तरिक्ष में विलीन होता रहता है। इस अपव्यय को यदि रोका जा सके और निहित प्रयोजन के लिए लगाया जा सके तो शक्ति के नये स्रोत खुलते हैं और प्रतीत होता है कि प्रवीणता प्राप्त कर सकने की सामर्थ्य का किसी दिव्य लोक से अभिनव वरदान प्राप्त हुआ है।

भाप नित्य ही चूल्हे पर चढ़े खुले बर्तनों से उड़ती रहती है। इस भाप को अवरुद्ध कर देने पर उससे प्रेशर कुकर के सहारे मिनटों में अच्छी रसोई बन जाती है। थोड़ी-सी भाप रेलगाड़ी के विशालकाय ढाँचे का सहज ही द्रुत गति से घसीटती चली जाती है। इंजन में दृष्टिगोचर होने वाली प्रचण्ड शक्ति वस्तुतः कुछेक बाल्टी पानी को गरम एवं एकाग्र करके प्राप्त की जाती है। जमीन पर ऐसे ही बिखरी पड़ी रहने वाली धूप साधारणतया थोड़ी-सी गर्मी और रोशनी भर दे पाती है किन्तु वैज्ञानिक उपकरणों के सहारे सूर्य बैटरी, सूर्य चूल्हा आदि बनते हैं। निकट भविष्य में उसी के सहारे विशालकाय बिजली घर चलाने की योजना है। जो धूप समुद्र से बादल उठाने में समर्थ है उसी का सदुपयोग करने पर ऊर्जा की मानवी आवश्यकता सहज ही पूरी की जा सकती है। दो इंच जगह की धूप को आतिशी शीशे के सहारे केन्द्रित करके उससे क्षणभर में ऐसी आग उत्पन्न की जा सकती है, जिसे दावानल के रूप में परिणित किया जा सके। बन्दूक से निकलने वाली गोली मात्र बारूद का चमत्कार नहीं है उसे गर्मी तथा एक दिशा देने से ही लक्ष्य बेध होता है। यह एकाग्रता की ही शक्ति की महत्ता है जिससे बाण सही निशाने पर लगता है और मनुष्य अभीष्ट सफलताएँ उपलब्ध करता है। संसार में वैज्ञानिक आविष्कारों से लेकर अनेकानेक आश्चर्यजनक अनुसंधानों, आविष्कारों एवं निर्माण में यह एकाग्रता की शक्ति ही छाई हुई देखी जा सकती है। मूर्तिकार, चित्रकार, कलाकार अपनी इसी एकाग्रता शक्ति द्वारा अपना कौशल प्रकट कर सकते हैं। मन का बिखराव रहने पर समस्त साधन होते हुए भी महत्वपूर्ण उपलब्धि सम्भव न हो सकेगी।

एकाग्रता की शक्ति भौतिक सफलताओं की तरह आत्मिक प्रगति के लिए भी अनिवार्य रूप से आवश्यक है। ध्यान को अध्यात्म साधना में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। ध्यान की उपयोगिता, महत्ता एवं आवश्यकता को साधना विज्ञान के अन्तर्गत बहुत ही महत्वपूर्ण बताया गया है। साधना के प्रत्येक उपचार में मन को एकाग्र रखने पर जोर दिया जाता है। अपने अन्तर की प्रसुप्त शक्तियों को जगाने और उसे उपयोगी प्रयोजनों के लिए प्रशिक्षित करने के लिए उस एकाग्रता की शक्ति का ही उपयोग करना पड़ता है। नोकदार सुई को ही ठीक तरह चुभाया जा सकता है। नोंक पैनी न होने पर छेद करने वाला कोई भी उपकरण अपना काम ठीक तरह न कर सकेगा। चिन्तन को नोकदार बनाने के लिए उसे एकाग्रता के पत्थर पर घिसना पड़ता है। मानसिक बिखराव को फैली हुई सूर्य−किरणों के समतुल्य समझा जा सकता है। आतिशी शीशे के सहारे उनका केन्द्रीकरण किया जाता है। यह प्रखर एकाग्रता मनः संस्थान के जिस भी केन्द्र पर अपना प्रभाव डालती है उसमें गर्मी उत्पन्न होती है। गर्मी से हर चीज फैलती और उठती है। अन्तःक्षेत्र की संकीर्णता और प्रसुप्त स्थिति को सक्रिय बनाने में ध्यान जन्य एकाग्रता बहुत काम करती है। मुख्यतया इसी के सहारे आन्तरिक जागरण के—आत्मोत्कर्ष के अनेक आधार खड़े होते हैं और उच्चस्तरीय सफलताओं का प्राप्त कर सकना सम्भव होता है।

एकाग्रता का प्रमुख आधार है दिलचस्पी। मन वहीं केन्द्रित होता है जहाँ दिलचस्पी होती है। किसी वस्तु के प्राप्त होने पर क्या−क्या लाभ मिल सकता है इस पर विचार करने से उसके प्रति आकर्षण उत्पन्न होता है। इसी आकर्षण के चुम्बकत्व से मन उसमें संलग्न रहने के लिए सहमत होता है। ईश्वर भक्ति इसी प्रयोजन की पूर्ति करती है। परमात्मा कितना महान है उसका सान्निध्य अनुग्रह कितना श्रेयस्कर है। यह तथ्य जितनी अच्छी तरह हृदयंगम किया जा सकेगा उतना ही आकर्षण बढ़ता चला जायगा। यह आकर्षण ही प्रेम है। प्रेम का ही दूसरा नाम भक्ति है। भक्ति भावना द्वारा ही ईश्वर के प्रति आत्मीयता बढ़ती है और आकर्षण उत्पन्न होता है। नाम महात्म भजन प्रभाव, भगवान की भक्त वत्सलता जैसी भक्ति भावनाओं के प्रति प्रगाढ़ता उत्पन्न करने वाले स्वाध्याय, सत्संग, मनन चिन्तन से ईश्वर प्राप्ति के लिए उत्सुकता बढ़ती है। यह उत्सुकता जितनी ही प्रगाढ़ होगी उतना ही मन उसमें सरसता अनुभव करने लगेगा और उसी के इर्द−गिर्द छाया रहेगा। एकाग्रता का यह प्रथम सौपान है। भौतिक प्रयोजनों में भी मन लगाने के लिए यही करना पड़ता है। शिक्षा, शिल्प, खेल, धन, यश, शोध, अध्ययन आदि का माहात्म्य जितनी अच्छी तरह समझ लिया गया होगा। उसके प्रति जितना आकर्षण उत्पन्न कर लिया गया होगा उतना ही मन उसमें लगेगा। मनुष्यों के परस्पर संबन्धों में भी चित्त से न उतरने वाली घनिष्ठता उसी आधार पर उत्पन्न होती है। दाम्पत्य प्रेम या अन्य लोगों के प्रति जितना प्रेम−भाव होगा उतना ही उनके सम्बन्ध में मन रमता रहेगा। यह कार्य उदासीनता की स्थिति में सम्पन्न हो नहीं सकता। मन को यदि किसी केन्द्र पर गहराई के साथ नियोजित करना हो तो सर्वप्रथम उस संदर्भ में आकर्षण बढ़ाने की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए। भक्ति योग का यही उद्देश्य है।

मनोनिग्रह एवं मनोलय योगाभ्यास का केन्द्र बिन्दु है। उसका उद्देश्य एकाग्रता का उत्पादन है। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसके सहारे ही भौतिक सिद्धियाँ और आत्मिक ऋद्धियाँ हस्तगत होती हैं। मनोलय का प्रथम चरण भक्ति योग है। द्वितीय चरण ज्ञानयोग और तृतीय कर्मयोग है। ज्ञानयोग में ध्यान करना पड़ता है। ध्यान का तात्पर्य है चिन्तन को एक ही प्रवाह में बहने देना। उसे अस्त−व्यस्त उड़ानों में भटकने से रोकना। यह कार्य किसी एक ही लक्ष्य पर कुछ समय तक विचार तरंगों को केन्द्रीभूत किये रहना। वैज्ञानिक अपनी शोध परिधि में, साहित्यकार अपने सृजन क्षेत्र में, उपासक अपने इष्ट देव में सारी विचार शक्ति को नियोजित करते हैं। एक बिन्दु पर केन्द्रीकरण आरम्भ में ही सम्भव नहीं। इसलिए उपासना में कोई साकार दृश्य निर्धारित करना होता है। इष्टदेव की प्रतिमा—प्रभात कालीन सूर्य, दीपशिखा, विराट् ब्रह्माण्ड आदि कुछ भी प्रतीक बनाया जा सकता है पर होना उसका आकार चाहिए। ध्यान में प्रधानतया किसी आकृति का ही निर्माण करना होता है। पंचतत्वों में अग्नि तत्व प्रधान है। उसकी तन्मात्रा रूप है। रूप के द्वारा मन पर जितना प्रभाव पड़ता है, उतना अन्य किसी प्रकार नहीं। यों उसके दूसरे प्रकार भी हैं। शरीर पंचतत्वों से बना है। उनकी पाँच तन्मात्रा है। पाँच ज्ञानेन्द्रिय उन्हीं का प्रतिनिधित्व करती हैं। शब्द पर दिव्य कर्णेन्द्रिय द्वारा ध्यान केन्द्रित हो सकता है। नादयोग में शब्द श्रवण का यही उद्देश्य है। नासिका द्वारा गन्ध को, जीभ द्वारा स्वाद को, त्वचा द्वारा सर्द−गर्म या किसी अन्य प्रकार के स्पर्श को माध्यम बना कर ध्यान योग का अभ्यास किया जा सकता है। सांसारिक विषयों में, योजनाओं में अन्वेषणों, कल्पनाओं में भी एक सीमाबद्ध क्षेत्र बना कर उसमें तन्मय हुआ जा सकता है। इसमें एक निर्धारित रूप न होकर अनेक आकृतियाँ मस्तिष्क में होकर गुजरती रहती हैं पर होती एक क्षेत्र की ही हैं। सीमित परिधि का सभी चिन्तन ध्यानयोग के अन्तर्गत आ जायगा। दिशा धारा का अतिक्रमण न करने से काम चल जाता है। नदी एक दिशा में बहती रहे तो काम चल जाता है। उसमें लहरें उठती रहें। भँवर पड़ते रहें तो इससे कोई विशेष हर्ज नहीं है। एक केन्द्र बिन्दु पर यदि एक मिनट मन स्थिर हो जाय तो योगनिद्रा का आनन्द मिल सकता है और यदि तीन मिनट की स्थिरता रहने लगे तो समाधि की स्थिति बन जायगी। वह स्थिति समय साध्य है। मध्यवर्ती ध्यान प्रयोजन तो इतने से ही सध जाता है कि विचारों की दिशा धारा अपने निर्धारित सीमा बन्धनों में बंध कर प्रवाहित होती रहे। ज्ञानयोग का माध्यम ध्यान है। भक्ति योग द्वारा गहरी दिलचस्पी, प्रेम भावना, सघन आकर्षण उत्पन्न कर लेने के उपरान्त चिन्तन प्रवाह को एक दिशा धारा में प्रवाहित करने वाली ध्यान धारणा कुछ कठिन नहीं रह जाती।

योगाभ्यास का तीसरा चरण है—कर्मयोग। अन्तःकरण की, कारण शरीर की, आकांक्षाएं, भाव संवेदनाएँ मस्तिष्क को उत्तेजित करती हैं और प्रस्तुत अभिरुचि को पूरा करने के लिए ताना−बाना बुनने का निर्देश करती हैं। वह उत्साही वकील की तरह तर्क−कुशल, आर्किटेक्ट की तरह नक्शे बनाना और चतुर व्यवस्थापक की तरह साधन जुटाने के लिये आवश्यक दौड़-धूप आरम्भ कर देता है। जिस प्रकार भावनाओं को ज्ञान−संस्थान के सहारे अपनी आकांक्षा पूरी करने का अवसर मिलता है उसी प्रकार चिन्तन को मूर्त रूप दे सकना क्रिया−कलापों के द्वारा ही बन पड़ता है। कार्य रूप में परिणित किये बिना तो मस्तिष्कीय भाग-दौड़ मात्र कल्पना या योजना बना कर रह जायगी।

विचार और कार्य के संयोग से प्रवीणता उत्पन्न होती—संस्कार बनते हैं। अभ्यास से स्वभाव बनता है। उसी के फलस्वरूप व्यक्तित्व का ढाँचा खड़ा होता है। साधनों का जुटाना इसी प्रखरता के लिए सम्भव होता है। तन्मयता जब तत्परता का रूप धारण करती है तो विचारों को मूर्तिमान बनने का अवसर मिलता है। सफलता इसी स्थिति का नाम है। भाव का वाहन−मस्तिष्क और मस्तिष्क का वाहन−शरीर है। वे अपना−अपना योजन अपने सेवकों से पूरा कराते हैं। शरीर के भी दस सेवक हैं—पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ। क्रिया−कलाप इसी की सहायता से संभव होते हैं। कर्म के फलस्वरूप जो उपलब्धियाँ होती हैं उन्हीं को सिद्धि या सफलता कहा जाता है।

आत्मिक प्रगति के प्रयोजनों में क्रिया योग का विस्तार धर्मानुष्ठान एवं कर्मकाण्डों के रूप में हुआ है। जप, पूजन, अभिषेक, आसन, प्राणायाम, परिक्रमा, हवन, स्नान, तीर्थ यात्रा, दान पुण्य, व्रत−उपवास आदि शरीर तथा वस्तुओं की सहायता से बन पड़ने वाले सभी क्रियाकृत्य इसी श्रेणी में आते हैं। इन में विचार और कार्य का समन्वय होने से अन्तःक्षेत्र में तदनुरूप संस्कारों की स्थापना होती है। वे ही परिपक्व होकर आत्मिक प्रगति के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं।

सामान्य जीवन में श्रम की महत्ता से भी परिचित हैं। साधनों और श्रम का समन्वय होने से प्रत्येक प्रकार का उत्पादन होता है और उस उपार्जित वैभव द्वारा ही विभिन्न प्रकार के सुख साधन खरीदे जाते हैं। तरह−तरह की सफलताएँ मिलने का श्रेय मिलता है। कर्म की महत्ता से हर कोई परिचित है। कर्म की उपेक्षा करने वाले को कर्महीन, अकर्मण्य, निकम्मा कह कर भर्त्सना की जाती है। आलस्य को शारीरिक और प्रमाद को मानसिक, शिथिलता को दरिद्रता एवं दुर्गति का आधारभूत कारण माना गया है। कर्म लेख की चर्चा भाग्यवादी करते रहते हैं। उसमें भी देर सवेर के कर्मों के फलस्वरूप सुख−दुःख मिलने का ही प्रतिपादन है। गीता के कर्मयोग में विकास की सर्वतोमुखी सम्भावनाओं के लिए कर्त्तव्य परायणता को ही सर्वोपरि स्थान दिया गया है।

योग का अर्थ है जोड़ना, मिलना, घुलना। आत्मा को परमात्मा के साथ घुला देने का, तुच्छता को महानता में परिणत कर देने का उद्देश्य जिस प्रक्रिया से पूरा होता हो उसी का नाम योग है। मन को अन्तःकरण से व्यक्ति को समाज से तथ्य को आदर्शों से जोड़ देने वाले महान प्रयास को योग कहा गया है। योग द्वारा भौतिक क्षेत्र में समृद्धियाँ और आत्मिक क्षेत्र में विभूतियाँ उपलब्ध करने का जो माहात्म्य बताया गया है वह शास्त्र सम्मत भी है और विज्ञान संगत भी। योग साधक को भक्ति योग, ज्ञानयोग और कर्मयोग की समन्वित साधना करनी पड़ती है। इस प्रयास में सच्चे मन से संलग्न होने वाले लौकिक और पारलौकिक उभय पक्षीय सुख−शान्ति का लाभ प्राप्त करते हैं और स्वर्ग मुक्ति का इसी जीवन में रसास्वादन करते हैं।


सज्जन, दयालु व उदार हृदय (kahani)

एक राजा बड़ा सज्जन, दयालु व उदार हृदय था। उसके प्रशंसक उसके दरबार में जाते व कुछ न कुछ धन अवश्य ले जाते। बात फैलने लगी, इस तरह राजा की उदारता का लाभ उठा कर अनेक व्यक्ति राज दरबार में आने लगे व धन सम्पत्ति ले जाने लगे। इस बढ़ती भीड़ को देखा राजा को बड़ी हैरानी होने लगी। राजा ने अपने पुरोहित से परामर्श कर ऐसी घोषणा करवा दी कि राजा बीमार हैं वह उनकी प्राण रक्षा तभी हो सकती है जब राज्य के पाँच व्यक्ति अपना रक्त दें। कुछ दिनों के लिए, राजा अज्ञातवास में चले गये। पूरा एक सप्ताह बीत गया परन्तु राजा का कोई भी शुभ चिन्तक, प्रशंसक अथवा भक्त नहीं आया। राजा को वास्तविकता का ज्ञान होने लगा तो वे व्यथित हो उठे। पुरोहित ने राजा से कहा ........”राजन् यह तो संसार की रीति ही है आप व्यथित न हों, आप तो एक छोटे से राज्य के राजा हैं। आपको प्रजाजनों ने ठग लिया तो कोई बड़ी बात नहीं। उस राजाओं के राजा बड़े महाराजा—परमात्मा के दरबार में भी यही होता है। उसके भक्तगण उसे दिन−रात भ्रमित कर ठगते रहते हैं, परन्तु उस परमात्मा के काम करने के लिए कोई त्याग करने, कष्ट सहने को तैयार ही नहीं होता।’

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रोग निवारण में अग्निहोत्र का उपयोग

प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों में मुख द्वारा सेवन कराने या सुई द्वारा रक्त में औषधि पहुँचा कर ही रोग निवारण का उपाय सोचा गया है। शल्य चिकित्सा, रेडियो आइस्टोप, विद्युत संचार जैसी पद्धतियाँ भी विकसित हुई हैं। इन उपचारों में मोटी काट−छाँट, सफाई या मार−काट ही सम्पन्न होती है। विषाणुओं के पेट में घुसकर उन्हें विनष्ट करने के लिए जिस सूक्ष्मता की आवश्यकता है उसे जुटाने का कोई उतना कारगर उपाय ढूँढ़ा नहीं जा सका जो रुग्णता को ही मारता, स्वस्थता को बचा लेता। इस दिशा में होम्योपैथी ने ही कुछ सोचा और कदम बढ़ाया है। वे सूक्ष्मता की उपयोगिता और आवश्यकता समझती तो है—उस दिशा में बढ़ने के लिए सचेष्ट तो है। अन्य चिकित्सा पद्धतियाँ तो स्थूलता का ही आवरण ओढ़े बैठी हैं। इसलिए उनके हाथ उतना ही लगता है जितना खोदा पहाड़ निकली चुहिया की उक्ति में कहा जाता है।” पीड़ा का सामयिक समाधान ही अभी तक प्रस्तुत चिकित्सा पद्धतियों की एक मात्र उपलब्धि है। रोगों का स्वरूप बदल देना, पीड़ा को स्थानान्तरित कर देना जैसी छोटी−मोटी और भी सफलताएँ हैं जिन पर चिकित्सा शास्त्री गर्व कर सकते हैं। कितना गँवाकर क्या पाया, इस दृष्टि से यदि बीमारियों के विरुद्ध चल रही मुहीम का पर्यवेक्षण किया जाय तो विजय हलकी और पराजय भारी दीखती है।

यज्ञ विज्ञान के अनेक पक्ष हैं। उनमें एक रोगोपचार भी है। मानसिक और आत्मिक स्वास्थ्य की अभिवृद्धि के साथ−साथ शारीरिक रोगों के निवारण में भी उससे ठोस सहायता मिल सकती है। अग्नि के माध्यम से पदार्थ को जितना सूक्ष्म बनाया जा सकता है उतना और किसी प्रकार से नहीं। हलकेपन का चिन्ह है उठना और उड़ना। पदार्थ अपने ठोस या द्रव रूप में भारी ही बना रहता है। वह अपने आप ऊपर नहीं उठता। खींचने, फेंकने, उछालने से बल पूर्वक ही उसे ऊँचा उठाया जा सकता है। धुआँ ऊपर उठता है। इसका अर्थ यह है कि जो वस्तु जली उसके परमाणु इतने हलके हो गये कि ऊपर उठने और हवा के साथ−साथ आकाश में भ्रमण करते हुए कोई कठिनाई अनुभव न करें। देखते हैं कि गन्ध दूर−दूर फैलती है। हवा जिन परमाणुओं को अपने साथ उड़ा ले जाती है। गन्ना से गुड़ बनाते समय जो मिठास हवा में उड़ती है उसका बहुत दूर से ही नाक को पता चल जाता है। घी, तेल के पकवान बनने पर भी उसका पता गन्ध द्वारा ही चल जाता है। मिर्च जैसी वस्तुएँ आग में जल जायं तो उससे दूर तक के लोगों को खाँसी और छींक आने लगती हैं। ये सारे प्रमाण इस बात के हैं कि अग्नि के सम्पर्क से पदार्थ हलका बनता है। उसकी सूक्ष्मता बढ़ जाती है। औषधियों को सूक्ष्म बनाकर यदि शरीर में प्रवेश कराया जा सके तो उसकी व्यापकता और सशक्तता उस सूक्ष्मता के कारण सहज ही कहीं अधिक बढ़ सकती है। यज्ञ प्रक्रिया से रोगों के निवारण में यही सिद्धान्त काम करता है।

एन्टीबायोटिक दवाओं के सारे रसायन मारक शक्ति से ही भरे होते हैं, उनमें पोषण की दृष्टि से कुछ नहीं होता। पोषण के लिए प्रयुक्त होने वाले टॉनिकों में मारक गुण नहीं होते। दोनों ही एकांगी रहते हैं। दोनों का सम्मिश्रण करने पर वे परस्पर ही लड़−भिड़ जाते हैं और शरीर पर प्रभाव डालने वाली क्षमता दोनों ही खो बैठे हैं। इस कठिनाई से निवृत्ति यज्ञ चिकित्सा द्वारा हो सकती है। उस आधार पर मारक और पोषक दोनों ही तत्वों को शरीर में सरलता पूर्वक पहुँचाया जा सकता है।

औषधि उपचार में शरीर के विभिन्न अवयवों तक पदार्थ को पहुँचाने का माध्यम रक्त है। रक्त यदि दूषित निर्बल हो तो वह प्रेषित उपचार पदार्थ का ठीक तरह परिवहन नहीं कर सकता। फिर एक कठिनाई और भी है कि रक्त में रहने वाले स्वास्थ्य प्रहरी−श्वेत कण− किसी विजातीय पदार्थ को सहन नहीं करते और उससे लड़ने मरने को उधार खाये बैठे रहते हैं। औषधि जब तक रोग, कीटाणुओं पर आक्रमण करने की स्थिति तक पहुँचे तब तक उसे इन स्वास्थ्य प्रहरियों से ही महाभारत करना पड़ता है। बीमारी पर आक्रमण होने पर प्रयुक्त औषधि और स्वस्थ कण ही आपस में भिड़ जाते हैं और यह नया विग्रह और खड़ा हो जाता है। पेट की पाचन−क्रिया, रक्त में उन्हीं पदार्थों को सम्मिलित होने देती है जो शरीर संरचना के साथ तालमेल खाते हैं। इसके अतिरिक्त जो बच जाता है वह विजातीय कहा जाता है और उसे मल, मूत्र, स्वेद, कफ आदि के द्वारा निकाल बाहर किया जाता रहता है। इस पद्धति को देखते हुए यह भी एक अति जटिल कार्य है कि औषधियों में रहने वाले रसायन किस प्रकार विषाणुओं तक पहुँचे और किस तरह वहाँ जाकर अपना निवारक उपक्रम आरम्भ करके उसे सफलता के स्तर तक पहुँचायें।

इस कठिनाई का हल यज्ञ प्रक्रिया को चिकित्सा प्रयोजन के लिए प्रयुक्त करने पर सहज ही सम्भव हो जाता है। औषधि को पेट में पच कर रक्त में मिल कर श्वेत प्रहरियों से लड़ने के उपरान्त पीड़ित स्थान तक पहुँचने की लम्बी मंजिल पार नहीं करनी पड़ती। वरन् इस सारे जंजाल से बचकर एक नया ही रास्ता उसे मिल जाता है—साँस द्वारा अभीष्ट स्थान तक पहुँचने का। शरीर शास्त्र के विद्यार्थी जानते हैं कि मात्र रक्त ही जीव कोशों की खुराक पूरी नहीं करता वरन् साँस द्वारा भी शरीर में आहार पहुँचता है और वह इतना महत्वपूर्ण होता है कि उसकी गरिमा मुँह द्वारा खाये और पेट द्वारा पचाये गये आहार की तुलना में किसी भी प्रकार कम नहीं होती। रक्त की भाँति प्राणवायु भी−ऑक्सीजन के रूप में समस्त शरीर में परिभ्रमण करती है। पोषण पहुँचाने और गन्दगी को बुहारने में उसका बहुत बड़ा हाथ है। दृश्य रूप से जो कार्य पाचन और रक्ताभिषरण पद्धति से होता है अदृश्य रूप से वही सारा कार्य श्वासोच्छास क्रिया द्वारा भी सम्पन्न होता है। यह दोनों ही पद्धतियाँ मिलकर दो पहियों की गाड़ी की तरह जीवन रथ को गतिशील बनाये रहती हैं।

स्वास्थ्य सुधार और रोग निवारण की आवश्यकता को पूरा करने के लिए श्वासोच्छास प्रक्रिया को अवलम्बन बनाने पर उससे कहीं अधिक लाभ उठाया जा सकता है जो रक्ताभिषरण पद्धति से आमतौर पर काम में लाया जाता है। यह कार्य यज्ञ चिकित्सा द्वारा सम्पन्न होता है। इस माध्यम से न केवल विषाणुओं से सफलतापूर्वक संघर्ष सम्भव हो सकता है वरन् पोषण की आवश्यकता भी पूरी हो सकती है। यज्ञ द्वारा वायु भूत बनाई गई औषधियां सूक्ष्मता की दृष्टि से इस स्तर पर पहुँच सकती हैं कि विषाणुओं में भी सूक्ष्म होने की विशेषता के कारण उन पर आक्रमण करके सरलतापूर्वक परास्त कर सकें। पाचन, परिवहन और प्रहरियों से उलझनें जैसे झंझट इस मार्ग में नहीं है और विलय का अवरोध भी नहीं है। सांस द्वारा अभीष्ट पदार्थों को शरीर के अन्तरंग में किसी भी अंग अवयव तक आसानी से पहुँचाया जा सकता है।

विषाणुओं का मारण जितना आवश्यक है उतना ही स्वस्थ कोशिकाओं में समर्थता की अभिवृद्धि भी आवश्यक है। अस्वस्थता का एकमात्र कारण विषाणुओं का आक्रमण ही नहीं होता। दूसरा हेतु यह भी है कि सामान्य जीवाणुओं की समर्थता और स्वास्थ्य संरक्षक श्वेत कर्ण की प्रखरता गड़बड़ा जाती है। इसलिए वे रोगों के प्रवेश को रोकने और प्रवेश को निरस्त करने में सफल नहीं हो पाते। यदि जीवनी शक्ति की न्यूनता न हो तो न तो विषाणुओं का शरीर के सुदृढ़ दुर्ग में सहज प्रवेश ही हो सकता है और न प्रवेश करने वालों को देर तक ठहरने की सुविधा ही मिल सकती है। दुर्बलता, क्षीणता यदि बढ़ती जाय तो आवश्यक नहीं कि बाहर से ही रोग प्रवेश करें निरन्तर टूटते रहने वाले अपने ही जीव कोषों की लाशें बाहर ढोकर फेंकी न जाने पर स्वतः सड़ने लगती हैं और उन्हीं का स्वरूप विषाणुओं के रूप में प्रकट होता है।

विषाणु बाहर से आते हैं और उनके आक्रमण से मनुष्य बीमार पड़ता है यह भ्रम अब गहरे अनुसंधानों के कारण प्रायः निरस्त हो गया है। बाहर तो हवा, धूलि, पानी, खाद्य−पदार्थों में सर्वत्र इतनी विषाक्तता भरी रहती है कि उससे बचाव हो ही नहीं सकता, छूत से बचना एक सीमा तक ही सम्भव है। शरीर को शरीर न छुए यह तो हो भी सकता है पर नाक निकली हुई सांस का एक−दूसरे के शरीर में प्रवेश कर जाने पर प्रतिबन्ध कैसे लगे? यह मान्यता अब बहुत पुरानी हो गई कि विषाणुओं का आक्रमण ही रोगों की उत्पत्ति करता है। नया संशोधन यह है कि शरीर में निरन्तर उत्पन्न होते रहने वाले जब ठीक तरह बाहर नहीं निकल पाते तो उन्हीं का संचय सड़ता और विष उत्पन्न करता है। विषाणु बाहर से कम आक्रमण करते हैं उनकी उत्पत्ति अधिकतर भीतरी सड़न से ही होती है। अस्तु रोगोपचार का एक पक्ष जहाँ विष कीटकों का मारना है वहाँ दूसरा पक्ष संव्याप्त दुर्बलता को पूरा करना भी है। यदि दुर्बलता बनी रही तो एक समय में एक प्रकार के रोग को दूर कर भी लिया जाय तो फिर अन्य आकार प्रकार के अन्य रोगों की उत्पत्ति होती ही रहेगी। लक्षण बदलते रहेंगे पर रुग्णता से छुटकारा न मिल सकेगा। इसलिए रोगोपचार का एक पक्ष जहाँ विषाणुओं से लड़ना होना चाहिए, वहाँ दूसरा पक्ष परिपोषण की व्यवस्था जुटाना भी होना चाहिए। दुर्भाग्य से आधुनिक चिकित्सा शास्त्र संहार उपचार पर ही सारा ध्यान केन्द्रित किये हुए है। परिपोषण के आधार ढूँढ़ने के सम्बन्ध में तो एक प्रकार से उपेक्षा ही बरती जा रही है। ऐसे उपाय खोजे नहीं जा सके जिनसे पुष्टाई बढ़ती और जीवनी शक्ति का भण्डार स्वस्थता को सुदृढ़ बनाये रहता। यह अभाव जब तक दूर न किया जा सकेगा, चिकित्सा प्रक्रिया अधूरी ही बनी रहेगी।

यज्ञ चिकित्सा में दोनों ही विशेषताएँ विद्यमान हैं। उसके माध्यम से उपयोगी रासायनिक पदार्थों को इतना सूक्ष्म बना दिया जाता है जिसके कारण वे अपने−अपने उपयुक्त प्रयोजनों को पूरा कर सकें। अणुओं में पाया गया चुम्बकत्व अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए वातावरण में से अभीष्ट वस्तुओं की अभीष्ट मात्रा अनायास ही ग्रहण करता रहता है। यज्ञ प्रक्रिया के सहारे वायु भूत रासायनिक पदार्थ शरीर संस्थान के समस्त भीतरी अवयवों में अनायास ही जा पहुँचते हैं और स्थानीय जीवाणुओं की आवश्यकता पूरी करने का आधार बनते हैं। पेड़ों का चुम्बकत्व आकाश में परिभ्रमण करने वाले बादलों को अपनी ओर खींचता है। घास की पत्तियाँ हवा में रहने वाले जलांश को अपने ऊपर ओस के रूप में बरसा लेती हैं। सशक्त वायुभूत रसायन जब शरीर में भीतर पहुँचते हैं तो वहाँ की आवश्यकता सहज ही पूरी होने लगती है।

प्रकृति एक ओर तो वस्तुओं का परिवर्तन करने के लिए विनाश व्यवस्था चलाती है दूसरी ओर अनावश्यक क्षरण रोकने और क्षतिपूर्ति के साधन भी जुटाती है। इसी सन्तुलन के आधार पर सृष्टि क्रम चल रहा है अन्यथा विनाश या विकास में से एक के अत्यधिक उग्र हो जाने पर एकांगी स्थिति बन जाती और असन्तुलन की अराजकता दिखाई देती। रोग कीटक जिस प्रकार स्वस्थ जीवाणुओं पर आक्रमण करते हैं उसी प्रकार उन्हें भी नियन्त्रित करने के लिए वातावरण में आवश्यक तत्व बने रहते हैं। यज्ञ द्वारा उत्पन्न विशेष गैसों में यह विशेषता रहती है कि वे रोग कीटकों पर नभ सेना की तरह बरस पड़ें। रक्त के श्वेत कण जहाँ भूमि गत लड़ाई लड़ते और आमने−सामने की गुत्थम−गुत्था करते हैं, वहाँ यज्ञ की वायु, नभ मार्ग से बम गिरने की तरह शत्रु सेना को निरस्त करती है। यह उपचार प्राकृतिक परम्परा के अनुसार स्वतः ही सम्पन्न होता है। मनुष्य कृत उपायों का इसमें न्यूनतम भाग ही रहता है। गर्मी के दिनों में सूखी धरती की प्यास शीघ्र ही वर्षा ऋतु को घसीट लाती है। जिस साल गर्मी कम पड़ती है उस साल वर्षा कम होती है। यह प्रकृति चक्र है। जीवाणुओं की दुर्बलता के अन्तराल में एक पुकार रहती है—परिपोषण प्राप्त करने की। बच्चा रोकर माता का ध्यान आकर्षित करता है और उससे अपनी क्षुधा पूर्ति के लिए पयपान का अनुदान प्राप्त कर लेता है। ठीक इसी प्रकार दुर्बलता ग्रस्त जीवाणु अपने लिए समर्थ परिपोषण की याचना करते हैं। इसकी पूर्ति वे रासायनिक पदार्थ करते हैं जो यज्ञ प्रक्रिया द्वारा वायु भूत होकर जीवाणुओं के निकट जा पहुँचते हैं। इस प्रकार सफाई और परिपोषण के−ध्वंस और निर्माण के दोनों ही प्रयोजन यज्ञ वायु के द्वारा पूरे होने लगते हैं और अस्वस्थता का बहुत हद तक समाधान होता है।

सूक्ष्म जगत की क्षमताएँ विलक्षण हैं। हम फूलों में से शहद हस्त−कौशल या यन्त्रों की सहायता से भी पृथक नहीं कर सकते किन्तु मधुमक्खी अपनी विशिष्ट क्षमता से उसे सम्पन्न कर लेती है। आटे में शक्कर मिली हो तो उसका पृथक्करण सामान्यतया अति कठिन है किन्तु चींटी उस सम्मिश्रण के रहते हुए भी मात्र शकर के कणों को खाती रहती है और आटे वाला भाग छोड़ देती है। हमारे जीवाणुओं में यह विशेषता है कि यदि आसपास के वातावरण में अनावश्यक तत्व मौजूद हों तो वे पोषण एवं संरक्षण की आवश्यक सामग्री स्वयंमेव खींच लेते हैं। संरक्षण वायु जो साँस द्वारा ग्रहण की जाती है उसमें सामान्य जीवन संचार बनाये रहने के कितने ही पदार्थ रहते हैं। रोगी की आवश्यकताएँ विशेष प्रकार की होती है। उसे विशेष मात्रा में विशेष पदार्थ चाहिए इनकी पूर्ति यज्ञ विधि द्वारा विनिर्मित विशिष्ट प्रकार की प्राणवायु द्वारा सम्पन्न होती है।

विष कीटकों को मारने के लिए अनेकानेक विशेषताओं से युक्त औषधियाँ निरन्तर बनती और बढ़ती चली जा रही है। ये सभी ऐसी हैं जो प्रत्यक्ष स्पर्श के उपरान्त ही अपना प्रभाव आरम्भ करती हैं इससे भी सरल तरीका यह है कि मारक पदार्थों को वायु भूत बनाकर वहाँ पहुँचा दिया जाय जहाँ संशोधन की आवश्यकता है। फ्रांस के रसायन शास्त्री डॉक्टर ट्रिनेले ने अपने प्रयोगों से सिद्ध किया है कि लकड़ी जलाने से जो फार्मिक अल्डीहाइड गैस निकलती हैं उसमें रोग कीटकों से निपटने की अद्भुत क्षमता रहती है। सम्भवतः भारतीय परम्परा में मृत शरीर को जलाने के पीछे यह दृष्टि भी रही होगी कि निर्जीव काया में उत्पन्न होने वाली सड़न से वातावरण को विषाक्त होने से रोकने के लिए उसे अग्नि संस्कार द्वारा समाप्त किया जाय।

सामान्य स्वास्थ्य सम्वर्धन के लिए यज्ञाग्नि द्वारा वायु भूत बनाये गये पदार्थों का सेवन, मुख द्वारा खाये और पचाये गये पौष्टिक पदार्थों की तुलना में कहीं अधिक लाभदायक सिद्ध हो सकता है। इस प्रकार बीमारियों से लड़ने वाली जीवनी शक्ति को बढ़ाने तथा विषाणुओं के आक्रमण को निरस्त करने में भी यज्ञाग्नि का कारगर उपयोग हो सकता है। क्षय, केन्सर जैसे ढीठ रोगों के उपचार में यदि विज्ञ रसायनवेत्ताओं के परामर्श से चिकित्सा उपक्रम किया जाय तो उसका परिणाम उन औषधियों की अपेक्षा कहीं अधिक हितकर हो सकता है जो बीमारी के साथ−साथ बीमार को भी मारती हैं। स्वास्थ्य रक्षा के अतिरिक्त मनोबल बढ़ाने और व्यक्तित्व को विकसित करने में समर्थ विचारणाओं और भावनाओं का सम्वर्धन इतना बड़ा लाभ है जिसे स्वास्थ्य रक्षा से भी अनेक गुना अधिक महत्वपूर्ण माना जायेगा।


महावीर स्वामी (kahani)

महावीर स्वामी उन दिनों जंगल में घोर तप कर रहे थे। जंगल के ग्वाले उन्हें समाधिस्थ देख उनका उपहास किया करते थे। कुछ दुष्ट तो लांछन लगा कर उन्हें तंग भी करने लगे! महावीर इन व्यवधानों से विचलित न हो तपस्या करते रहे।

तपस्या में विघ्न डालने वालों की बात पास के व्यक्तियों तक पहुँची, वहाँ के धनिक लोग महावीर के पास आए व कहने लगे, “देव आपको ये नादान व्यर्थ कष्ट दे असुविधा में डाल रहे हैं, हमारा निवेदन है हम आपके लिए एक भवन यहाँ बनवा दें तथा ऐसी सुरक्षा व्यवस्था करा दें जिससे आप निश्चिंत हो तपस्या−साधना करते रहें।”

तात! साधनों का अनुचित मोह की मनुष्य को सांसारिक बनाता है एक बार उससे निकल आने के बाद जो आत्म−शक्ति मिली है उसकी तुलना में यह व्यवधान तुच्छ है। आप लोग मेरी चिन्ता न करें। उनकी इस दृढ़ता से ग्वाले भी पराभूत हो उठे उन्होंने फिर सताने की हिम्मत नहीं की।

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सनातन धर्म और उसका आधार

‘सच्चिदानन्द’ परमपिता परमात्मा के अनेक सम्बोधनों में से एक सम्बोधन है− ‘सच्चिदानन्द’ शब्द सत्+चित्+आनन्द इन तीनों शब्दों की परस्पर संधि होने से बना है। ये तीनों शब्द परमात्मा के तीन गुणों के प्रतीक हैं। सत् उसे कहते हैं जो आदि काल से लेकर अनन्त काल तक विद्यमान रहता है। कभी नष्ट नहीं होता। यथा−हम जल को ही लें। पानी आदि काल से लेकर आज तक उपलब्ध है और अनन्त काल तक उपलब्ध है और अनन्त काल तक उपलब्ध रहने की सम्भावना है। यद्यपि पानी का ठोस रूप बर्फ और वायु रूप भाप होता है जो रूप परिवर्तन का द्योतक है। इन्हीं तीन रूपों में पानी आदि से लेकर अब तक विद्यमान है। आदि से लेकर अद्यतन चली आ रही प्रवाहमान धारा को ही सनातन कहते हैं।

जगत में विद्यमान प्रत्येक वस्तु की एक विशेषता होती है। उसका अपना स्वभाव होता है। उसका अपना गुण होता है। वस्तु की इसी विशेषता, स्वभाव या गुण को ही धर्म कहते हैं। उदाहरणार्थ—पानी का गुण या स्वभाव शीतलता प्रदान करना या सृष्टि के प्राणिमात्र की प्यास बुझाना है। इसी प्रकार अग्नि का गुण ताप और प्रकाश प्रदान करना है। सरिता का स्वभाव सतत प्रवाहित रहना है। पक्षियों का स्वभाव सतत चहकते, फुदकते, उड़ते हुये आनन्दित होते रहना है। पशुओं का भी स्वभाव चौकड़ी भरते हुये मस्ती भरे जीवन का आनन्द उठाना है। केवल मनुष्य के सम्पर्क में आने वाले पशु−पक्षी ही, जो मनुष्य की अधीनता का जीवन जीते हैं, उन्हें पराधीनता के कारण आनन्दमय जीवन से वंचित रह जाना पड़ता है और दुःखी जीवन जीने के लिये विवश होना पड़ता है। इसी प्रकार मनुष्य का एक मात्र धर्म ‘आनन्द’ ही है। वह सदा आनन्द प्राप्ति की दिशा में ही उन्मुख रहता है। यह बात दूसरी है कि परिस्थितियों की पराधीनता के कारण उसे आनन्द रहित जीवन जीने के लिये विवश होना पड़ता है, परन्तु सतत् उसकी चिन्तन की धारा दुःख से त्राण पाकर आनन्द प्राप्ति की ओर ही प्रवाहित रहती है। मनुष्य समाज के तत्वान्वेषी ऋषि, मुनि, सन्त, महात्मा, विचारक, चिन्तक आदि जितने भी महापुरुष हो गये हैं तथा जिन्होंने धर्मशास्त्रों का प्रणयन किया है, उन सभी ने एक स्वर से दुःख से त्राण पाने का उपाय और सुख प्राप्ति का मार्ग ही बताया है। सुख प्राप्ति के मार्ग को ही ‘धर्म’ कहा गया है। व्यक्तिगत सुख के मार्ग को ‘व्यक्ति का धर्म’, परिवार को सुखी बनाने वाले मार्ग को ‘कुटुम्ब धर्म’, जिससे समाज को सुख मिले उसे सामाजिक धर्म, जिससे राष्ट्र खुशहाल हो, उसे ‘राष्ट्र धर्म’, जिससे विश्व सुखी हो, उसे सार्वभौम धर्म और जिससे प्राणिमात्र सुख की अनुभूति करें, ऐसे धर्म को ‘सनातन धर्म’ कहा गया है।

यों तो ‘धर्म’ संस्कृत भाषा का एक शब्द है जिसकी शाब्दिक उत्पत्ति ‘धृञ्’=धारणे’ धातु से हुई है। महर्षि व्यास जी ने धर्म की परिभाषा इस प्रकार की है:—

“धारणाद्धर्म इत्याहुधर्मों धारयते प्रजाः। यत्स्पाद् धारणासयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥”

अर्थ:—धारण करने से इसका नाम धर्म है। धर्म ही प्रजा को धारण करता है। वही निश्चय ही धर्म है। महामुनि कणाद ने कहा है:—

“यतोऽभ्यूदय निश्श्रेयससिद्धिः स धर्मः।

अर्थः—जिससे इस लोक और परलोक दोनों स्थानों पर सुख मिले, वही धर्म है।

आधार उसे कहते हैं, जिसके सहारे कुछ स्थिर रह सके, कुछ टिक सके। हम चारों ओर जो गगनचुम्बी इमारतें देखते हैं; उनके आधार नींव के पत्थर होते हैं। इसी पर वे स्थिर हैं। इसी पर वे टिके हुए हैं। प्रत्येक पदार्थ किसी न किसी आधार पर ही अवस्थित हैं। यहाँ तक कि ग्रह, नक्षत्र, तारे, जो अन्तरिक्ष में, शून्य में अवस्थित प्रतीत होते हैं, वे भी एक−दूसरे की आकर्षण शक्ति को आधार बनाये हुये हैं। आधार रहित कुछ भी नहीं है। बिना आधार के सनातन धर्म भी नहीं है। सनातन धर्म का अपना एक मजबूत आधार है जिसके ऊपर उसकी भित्ति हजारों वर्षों से मजबूती से खड़ी हुई है।

वह आधार क्या है? वह आधार है :—”सर्वभूत हितरताः।” इसे दूसरे शब्दों में ऐसा भी कह सकते हैं कि सृष्टि के सम्पूर्ण जड़−चेतन में अपनी आत्मा का दर्शन करना। अपने समान ही सबको मानना। जैसा कि यजुर्वेद में कहा गया है:—

“यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न वि चिकित्सति॥”

यजुर्वेद 40 मन्त्र 6

इसी बात को एक अन्य ऋषि ने इस प्रकार कहा है :—

“न तत्पस्स्य संदध्याप्रतिकूलं यदात्मनः।

एष संक्षेपतो धर्मः कामादन्यः प्रवर्तते॥”

अर्थ :—जो कार्य अपने विरुद्ध जँचता हो, दुःखद मालूम होता हो, उसे दूसरों के साथ भी मत करो—संक्षेप में यही धर्म है।

श्रीमद्भागवतकार ने भी ईश्वर की प्रसन्नता के लिये कहा है कि हृदय में सब भूतों के प्रति दया होना तथा यदृच्छ लाभ से सन्तुष्ट रहना।

“दमया सर्वभूतेषु, सन्तुष्टया येन केन वा।”

भगवान कृष्ण कहते हैं—

“अहमुच्चा वर्चेर्द्रव्यैर्विययोत्पन्नयानधे। नैव तुष्येऽर्चितोऽचयां भूताग्रामाव मानिनः॥”

अर्थ :—जो दूसरे प्राणियों को कष्ट देता है वह सब प्रकार की सामग्रियों से विधिपूर्वक मेरा अत्यन्त पूजन भजन भी करे तो भी मैं उस पर सन्तुष्ट नहीं होता।

मनु स्मृति में मनु महाराज ने कहा है :—

“धर्म शनैर्निश्चनुयाद् बल्मीकमिव पुत्तिकाः। परलोक सहायार्थं सर्व भूतान्यपीडयन्॥”

अर्थ :—जैसे दीमक बाम्बी को बनाती है वैसे सब प्राणियों को न देकर परलोक के लिये धर्म संग्रह करें।

महर्षि व्यास ने कहा है—

“श्रूयतां धर्म सर्वस्व, श्रुत्वा चैव धार्यताम्। आत्मनः प्रतिकूलानि, परेषां न समाचारेत्॥”

अर्थ :—धर्म का सार सुनो। सुनो और धारण करो। अपने को जो अच्छा न लगे, वह दूसरों के साथ व्यवहार न करो।

‘सर्व भूत दया’ ही हमारे सनातन धर्म का आधार है। सब प्राणियों को आत्मवत् मानना ही धर्म का उच्चतम आदर्श है, आधार है। इन्हीं सब कारणों से ही हमारे यहाँ धर्मपालन का निर्देश पग−पग पर दिया गया है जिससे हम अपने आधार को, अपने आदर्श को कभी भी न भूल सकें। जैसाकि कहा गया है कि—

“नामुत्र सहायार्थं पिता माता च तिष्ठतः। न पुत्र दारा न ज्ञातिर्धर्मस्तिष्ठति केवलः॥”

अर्थ:—परलोक में न माता, न पिता, न पुत्र, न स्त्री और न सम्बन्धी सहायक होते हैं। केवल धर्म ही सहायक होता है।

महर्षि चाणक्य ने भी कहा है :—

“चला लक्ष्मीश्चलाः प्राणाश्चले जीवितयौवने। चला चलेति संसारे, धर्म एकाहिनिश्चलः॥”

अर्थ :—लक्ष्मी चलायमान है और जीवन भी चलायमान है। इस चराचर जगत में केवल धर्म ही अचल है। सनातन धर्म कोई मजहब या सम्प्रदाय नहीं है जो परस्पर शत्रुता के बीज बो देवे। इस धर्म का आधार अत्यन्त मजबूत है जो हमें आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का पाठ पढ़ाता है। यही वह धर्म है जो “वसुधैव कुटुम्बकम्” की ऊँची शिक्षा देता है। यही वह धर्म है जो विश्वजनीन है। इसी धर्म से विश्व मानव कल्याण को प्राप्त होगा।

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हम खुली सीपी सहस्रों जन्म की


हम खुली सीपी सहस्रों जन्म की (kavita)

हम उमर खय्याम होते किस तरह?

अश्रु को जिन्दा किये, जीते रहे, जो मिला अमृत-गरल, पीते रहे, आदमी की जिन्दगी के चिथड़े, बन सका जितना उन्हें सीते रहे!

रात-दिन संग्राम-रत साँसें रहीं,

कामना के कल्पतरु अभिराम होते किस तरह? हम उमर खय्याम होते किस तरह? दर्द की वह सोमपायी चेतना, जागती फौलाद की छाती बना, ज्ञान के युग-सुर्य की जागी जवानी, देखकर तम-तोम का सीना तना! त्रास की युग-यामिनी में हम जगे, कुम्भकरणी नींद में, अविराम सोते किस तरह? हम उमर खय्याम होते किस तरह? सत्य का मणिधर नहीं यों रीझता, हर शिवम्-स्वर अन्धता पर खीझता। काल-भेदी बीन का स्वर फूँकना-

मन्त्रपूता, चेतना को ही पता! मूढ़ता को कर नमन, विभचारिणी, कल्पना के साथ हम बदनाम होते किस तरह? हम उमर खय्याम, होते किस तरह? है जिन्हें हाला मिली उन्माद की! याद उनको है सुरा के स्वाद की,हम खुली सीपी, सहस्रों जन्म की,

ताकते हैं बूँद स्वाति, समाधि की! चिरतृषा से ही अधर पपरा रहे, हम सुराही और साकी-जाम होते किस तरह? हम उमर खय्याम, होते किस तरह?

-लाखनसिंह भदौरिया सौमित्र

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*समाप्त*