कुछ लोग विभूतियाँ पाकर फलों से आच्छादित डाल के समान विनम्र होते हैं जो कुछ लोगों के वैभव ही उन्मत्त और मदान्ध बना देता है। बात उन दिनों की है जब बोधिसत्व वानराधिपति के रूप में उत्तराखण्ड के एक रम्य वन क्षेत्र में रह रहे थे और उत्तरांचल के सम्राट थे भूरिया। सिंहासन पर आसीन होने के बाद से अब तक प्रजा के शोषण, उत्पीड़न, युद्ध और काम पिपासा की तृप्ति के अतिरिक्त उन्होंने सृष्टि में कहीं सत्य, न्याय, विवेक, करुणा भी होती है, इसे जाना तक नहीं। समीपवर्ती सेवक वर्ग और अन्तःपुर तक उनसे थर-थर काँपता था। इस प्रकार भूरिगा उपर्युक्त दो वर्गों में से दूसरी कोटि के व्यक्ति थे।
शीतकाल प्रारम्भ हो चुका था। एक दिन भूरिगा मध्याह्न में हेमा नदी की धवल लहरों की अपनी रमणियों सहित जल-क्रीड़ा में व्यस्त थे। तभी जल प्रवाह के साथ बहता हुआ एक ऐसा न्यग्रोध फल आया, जिसकी मादक सुगन्ध ने सबको स्तम्भित कर दिया। कामिनियों ने फल को पकड़ा तो उनकी स्थिति बीन की मधुर ध्वनि सुनकर सम्मोहित हुए सर्प जैसी हो गई। भूरिग ने स्वयं आगे बढ़कर फल झपट लिया और तट पर आकर ही उसका रसास्वादन करने लगा। फल न केवल गन्ध से अपितु स्वाद में भी अप्रितम था। वैसे फल चखने के लिए सम्राट् बुरी तरह आतुर हो उठा।
देर तक जल में पड़े फल की गन्ध दूषित हो जाती है जबकि इस फल की गन्ध यह बताती थी कि वह कुछ ही दूर से बहकर आ रहा है। यह विचार आते ही भूरिग ने सैन्य दल को प्रस्थान का आदेश देकर स्वयं भी उस वृक्ष को ढूँढ़ निकालने की उत्कण्ठा में चल पड़े। उनकी दृष्टि से यह फल चिर यौवन प्रदान करने वाला था। कामुक की आकांक्षा उससे अतिरिक्त और क्या हो सकती है।
कुछ ही देर की यात्रा के बाद वृक्ष का ठिकाना मिल गया। हेम कल्प पर्वत की उपत्यिका में खड़े इस वृक्ष में पीत वर्ण के सुन्दर फल गुँथे हुए थे। यह फल वैसे ही बड़ा मनोरम लगता था, उस पर उसकी सुगन्ध से तो सम्पूर्ण वातावरण में ही मादकता फूटी पड़ रही थी। इससे भी बड़ा विस्मय यह था कि सारा वृक्ष वानरों से भी उसी तरह लदा था। कपि समुदाय को अपनी तृष्णा पूर्ति में बाधक देखकर भूरिग क्रोध में जल गए, यह तृष्णा है ही ऐसी पिशाचिनी कि अपनों की ही शत्रु बना देती है फिर वह तो प्राणी ही और जाति के थे। सम्राट के मुँह से आज्ञा होने की देर थी सैन्य दल ने पत्थरों, बर्छो और तीरों की मार की झड़ी लगा दी। वानर दल बुरी तरह क्षत-विक्षत हो चला।
एक ओर नदी, दूसरी ओर से सेना द्वारा बन्द किया आवागमन। वानराधीश ने तीसरी ओर पर्वतीय शिखर की ओर देखा तो वहाँ से छलाँग लगाकर पार जाना मृत्यु के मुख में जाने के समान लगा। इधर बन्धु-बान्धवों का विनाश देखकर उनकी आँखें छलक उठी। शरीर की समस्त शक्ति झोंक कर कपीश ने पर्वत शिखर को पा लिया, पर उनकी देह का समस्त अस्थि समुदाय चरमरा गया। उन्होंने बत की लम्बी शाखाएँ तोड़ी उन्हें अपने पैरों से मजबूती से पकड़ा और दूसरी छलाँग लगाकर पुनः वृक्ष की डाली को जा पकड़ा। डाल हाथ में आते ही अपने वानर समुदाय को उन्होंने आज्ञा दी- सब लोग इस तरह बनाये बेंत के पुल को पकड़कर पर्वत शिखर की ओर कूद कर भागें और अपने प्राणों की रक्षा करें। वानरों ने ऐसा ही किया।
बेतों का बोझ, वानरों के पसीने से लथपथ होती देह उधर नृप भूरिग के सैनिकों द्वारा निरन्तर शस्त्र प्रहार से उनकी देह क्षत-विक्षत हो गई, किन्तु अपनी सम्पूर्ण प्रजा से बचकर निकल जाने तक उन्होंने मरणासन्न होकर भी डाल नहीं छोड़ी तो फिर नहीं ही छोड़ी।
प्रजा संकट से पार हो गई। वानराधिपति की चेतना विलुप्त हो चली, आहत शरीर वे भूमि पर आ गिरे। अब तक नृप भूरिग अत्यधिक कौतूहल पूर्ण दृष्टि से सारा दृश्य देख रहे थे। अब वे वानरों के नृप के समीप जाकर बोले :-
परिभूयात्मनः सौख्यं परव्यसनपापतत्। इत्यात्मनि समारोप्य प्राप्तः को भवतागुणः॥
हे वानर! अपने सुख की अवहेलना कर स्वजातियों पर आई विपत्ति अपने ऊपर लेकर तुमने कौन सा लाभ प्राप्त कर लिया।
वानराधीश ने उत्तर दिया :-
एभिर्मदाज्ञा प्रतिपत्ति दक्षै रारोपितो-मययधिपत्वभारः। पुत्रेष्विवैतेष्व व बद्धहार्दस्तं बोढुमेवाह्मभिप्रपत्रः।
हे राजन! इन वानरों ने मुझे अपना अधिपति बनाया। यह दायित्व मुझ पर डाला और मेरी आज्ञापालन में तत्पर रहे। इस प्रकार ये मेरे पुत्रवत् हुए। उस पुत्रवत् स्नेह के कारण ही मैंने ऐसा आचरण किया। यानी अपने कर्तव्य का पालन कर पिता के समान इनकी रक्षा की।
राजा भूरिग सम्राट था, शासक था। तर्क निपुण तो वह था ही। उसने मूर्छित से हो चले महाकपि से तर्क किया-
अधिपार्थममात्यादि न तदर्थ महीपतिः। इति कस्मात्स्वभृत्यामात्मानं त्यक्तवान् भवान्॥
हे वानरराज! अमात्य एवं सभी अधीन लोग अधिपति के लिए हैं न कि अधिपति इन अधीनस्थों के लिए। तब भला अपने अधीन अनुचरों के लिए आपने स्वयं को ही क्यों न्यौछावर कर दिया?
वानर योनि धारी बोधिसत्व ने हंसकर कहा-
अकारि येषां चिरमाधिपत्यं। तेषां मयार्तिर्विनिवर्तितेति। ऐश्वर्यलब्धस्य सुख क्रमस्य। सम्प्राप्तमानृण्यमिदं मयाद्य।
हे राजन! मैं चिरकाल तक जिनका अधिपति रहा, उनके सुख की वृद्धि और दुःख की समाप्ति का दायित्व भी अधिपति होने के नाते मुझ पर ही तो है। इसलिए मैं उनके दुःख दूर करने के लिए अपने को न्यौछावर करने को उद्यत हुआ।
ये वानर सदा मेरे अधीन रहे। मेरा आदेश प्राणपण से पालन करते रहे। सदा मेरा मुँह जोहते रहे। मुझ पर भक्ति रखते रहे। इस प्रकार आदर, सत्कार, भक्ति और आज्ञा पालन द्वारा ये सदा मुझे सुख देते रहे। उस सुख का मुझ पर ऋण था। जिन्होंने इतना सुख दिया, सम्मान दिया, उनके प्रति अपने ऋण से मैं आज ही तो मुक्त हो सका हूँ।
‘‘युग्मं बलं जानपदामात्यान्। पौराननाथांछामणान् द्धिजातीन। सर्वान् सुखेन प्रयतेत योक्तुं। हितानुकूलेन पिते व राजा।
हे राजन्! नृप अपनी प्रजा का, सैनिकों का, पशुओं का देश के सभी नागरिकों का पिता होता है। वह श्रेष्ठ लोगों, साधु, श्रमणों, अनाथों, असहायों एवं सर्वसाधारण को ऐसा सुख पहुँचाये, जो उनका कल्याण करने वाला हो, अकल्याणकारक नहीं। यह पिता जैसे अधिपति का कर्त्तव्य है। सन्तान जैसी प्रजा के ऊपर सदा करुणा, स्नेह एवं मंगल का भाव रखने वाला अधिपति ही श्री सम्पन्न होता है।
वानराधिपति के ऐसे भावनापूर्ण तर्कसंगत उदाराशय उत्तर से नृप भूरिग की प्रसुप्त सम्वेदना जागृत हो उठी। उन्हें अधिपति के रूप में अपने गुरुतर दायित्वों का बोध हुआ। प्रजा के प्रति उन्हें करुणा, वात्सल्य की नयी दृष्टि मिली। उत्सर्ग का लाभ उन्हें समझ में आ गया। बोधिसत्व महाकपि प्रफुल्ल चित्त से यह क्षत-विक्षत शरीर छोड़कर स्वर्ग चले गये।
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देवताओं की क्षमता और अनुकम्पा के सम्बन्ध में अनेक मधुर कल्पनाएँ की जाती हैं। उनकी मनुहार अभ्यर्थना करते हुए यह आशा की जाती है कि वे द्रवित होंगे और साधक की सुविधा प्रसन्नता बढ़ाने में सहायता करेंगे। देव पूजन का प्रचलन इन दिनों प्रायः इसी धुरी पर घूमता है। इतने पर भी ऐसे भाग्यशाली थोड़े ही होंगे जो इस परिकल्पना को फलित और सफल होती देख पाते हों।
परोक्ष देवताओं की तुलना में प्रत्यक्ष आत्म देव की क्षमता की गरिमा और अनुकम्पा की महिमा को इन्हीं आँखों से देखा और यथार्थता की सभी कसौटियों पर परखा जा सकता है। आत्म परिष्कार के लिए की गई जीवन साधना से वे भी सभी सिद्धियाँ मिल सकती हैं जिनके लिए देवताओं के द्वारा भटकने, दीनता दिखाने और निराश रहने की विडम्बना सहन करनी पड़ती है। देवताओं में सर्वश्रेष्ठ आत्म देव है। उस तक पहुँच अति सरल है। उसकी जैसी उपासना जिसने भी की है उसे उसी अनुपात से अनुग्रह का लाभ मिला है। भौतिक सिद्धियाँ और आत्मिक ऋद्धियाँ अभीष्ट परिमाण में प्राप्त करने के लिए आत्म देव से बढ़कर और कोई सुनिश्चित उपास्य है नहीं।
साधनाओं में सर्वश्रेष्ठ, सर्व सुलभ और तत्काल फलदायक साधना आत्म देव की है। जीवन के प्रकाश पर जो दुष्प्रवृत्तियों के आवरण छाये हुए हैं, उन्हीं को साहसपूर्वक हटाने की तपश्चर्या करने से आत्म देव की साधना का पूर्वार्ध पूरा होता है। उत्तरार्ध में सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन करना पड़ता है, योगाभ्यास का तत्व ज्ञान यही है। आत्मानुशासन और आत्म परिष्कार के चरण बढ़ाते हुए कोई भी साधक इस परम देव तक पहुँच सकता है और उसके अनुग्रह का अजस्र लाभ पा सकता है।
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हमारा स्वाध्याय पृष्ठ-
जितनी हानि शत्रु-शत्रु की और बैरी-बैरी की करता है, मिथ्या मार्ग का अनुगमन करने वाला चित्त उससे कहीं अधिक हानि पहुँचाता है।
सत्य वाणी ही अमृत है, सत्य वाणी ही सनातन धर्म है। सत्य, सदर्थ और सद्धर्म पर सन्त जन सदैव दृढ़ रहते हैं।
जिस मनुष्य के मन से लोभ, द्वेष और मोह ये तीन मनोवृत्तियाँ नष्ट हो गई हैं, वही चारों दिशाओं में प्राणिमात्र के प्रति मैत्री भाव प्रसारित कर सकता है। अपने मैत्रीमय चित्त से चारों दिशाओं में बसने वाले समस्त प्राणियों पर वह प्रेम की रस वर्षा करता है। करुणा, मुदिता और उपेक्षा की भावनाओं का उसे अनायास ही सुलभ हो जाता है।
बैर से बैर कभी शान्त नहीं होता। वैर प्रेम से ही शान्त होता है। यही सनातन नियम है।
लोगों की हड्डियाँ तोड़ डालने वाले, दूसरों का प्राण ले लेने वाले, गाय, घोड़ा, धन, सम्पत्ति आदि का हरण करने वाले और राष्ट्र में विप्लव मचाने वाले लोग भी मेल कर लेते हैं, उनमें भी एका हो जाता है, तब (हे धर्म प्रेमियों) तुम्हारा मेल क्यों नहीं होता?
प्रमादरत मनुष्य की तृष्णा लता की भाँति बढ़ती ही जाती है। वह एक वस्तु से दूसरी वस्तु तक इस तरह दौड़ती रहती है- जैसे वन में बन्दर एक फल के बाद दूसरे फल की इच्छा करता है।
ये रोगयुक्त संकल्प स्रोतों के रूप में चारों ओर बह रहे हैं, जिनके कारण तृष्णारूपी लता अंकुरित होती और जड़ पकड़ती रहती है। जहाँ भी कहीं तुम यह लता जड़ पकड़ती हुई देखो, वहीं प्रज्ञा की कुल्हाड़ी से उसकी जड़ काट डालो।
ये जो लोहे, लकड़ी या रस्सी के बन्धन हैं इन्हें बुद्धिमान लोग दृढ़ बन्धन नहीं कहते। इनकी अपेक्षा दृढ़ बन्धन तो वह चिन्ता है, जो मणि, कुण्डल, पुत्र और कलत्र के लिए की जाती है।
मनुष्य तभी तक शान्त और नम्र दीखता है, जब तक कोई उसके विरुद्ध अपशब्द नहीं कहता, पर जब उसे अपशब्द या निन्दा सुनने का प्रसंग आता है, तभी इस बात की परीक्षा हो सकती है, वह वास्तव में शान्त और नम्र है या नहीं।
जो प्राणी तर्क-वितर्क आदि संशयों से पीड़ित है और तीव्र राग में फँसा हुआ है तथा सदा सुख ही सुख की अभिलाषा करता है, उसकी तृष्णा बढ़ती ही जाती है और वह प्रतिक्षण अपने लिए और भी मजबूत बन्धन तैयार करता जाता है।
मनुष्य जितना ही कामादि का सेवन करता है, उतनी ही उसकी तृष्णा बढ़ती है। काम के सेवन में क्षण मात्र के लिए ही रसास्वाद मालूम देता है।
हे ब्राह्मण! शीलरूपी घाटवाले निर्मल धर्म सरोवर में, जिसकी सन्तजन प्रशंसा करते हैं, नहाकर कुशल जन शुद्ध होते हैं। वे शरीर को बिना-भिगोये ही पार उतर जाते हैं।
शुद्ध मनुष्य के लिए सदा की फल्गु नहीं है, सदा ही उपोसथ (व्रत का दिन) है। शुद्ध और शुचि कर्मों के व्रत तो सदा ही पूरे होते रहते हैं।
बर्तन के पानी में काला रंग डाल देने के बाद जैसे उसमें हमें अपना प्रतिबिम्ब ठीक-ठीक नहीं दिखाई देता, उसी तरह जिसका चित्त काम विकार से व्यग्र हो जाता है, उसे अपने हित-अहित का ज्ञान नहीं रहता।
स्वच्छ पानी का बर्तन जब गरम हो जाता है, तब उस पानी से भाप निकालने लगती है और वह खौलने लगता है। उस समय मनुष्य उस खौलते हुए पानी में अपना प्रतिबिम्ब नहीं देख सकता। इसी तरह मनुष्य जब क्रोधाभिभूत होता है, तब-उसकी समझ में यह नहीं आता कि उसका आम हित किसमें है।
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मार्क्स ने किसी पुस्तक में यह लिखा है कि-”यदि तुम्हारा ईश्वर प्रयोगशाला की किसी परखनली में सिद्ध किया जा सके तो मैं मान लूँगा कि वस्तुतः ईश्वर का अस्तित्व है।” नास्तिक दर्शन की मूल मान्यता भी यही है कि ईश्वर सिद्ध नहीं किया जा सकता और जो सिद्ध नहीं होता उसका अस्तित्व कैसे हो सकता है।
यह मान्यता अपने आप में एकांगी और अधूरी है। जो वस्तु विज्ञान से सिद्ध नहीं होती उसका अस्तित्व ही नहीं है-यह अब से सौ वर्ष पूर्व तक तो अपने स्थान पर सही थी क्योंकि तब विज्ञान अपने शैशव में था। परन्तु जब विज्ञान ने अविज्ञात के क्षेत्र में प्रवेश किया और एक से एक रहस्य सामने आते गये तो यह माना जाने लगा कि ऐसी बहुत-सी वस्तुओं का, सत्ताओं का अस्तित्व है जो अभी विज्ञान द्वारा सिद्ध नहीं हो सका है अथवा जिन तक विज्ञान नहीं पहुँच सका है।
कुछ दशाब्दियों से पूर्व तक यह माना जाता था कि पदार्थ का सबसे सूक्ष्म कण अणु है और वह अविभाज्य है। पदार्थ के सूक्ष्मतम विभाजन के बाद अवशिष्ट स्वरूप को अणु कहा गया और माना जाने लगा कि यही अन्तिम है। परन्तु इसके कुछ वर्षों बाद ही वैज्ञानिकों को अणु से भी सूक्ष्म कण परमाणु का पता चला। परमाणु को अभिभाज्य समझा जाने लगा। लेकिन परमाणु का विखण्डन भी सम्भव हो सका। पदार्थ के इस सूक्ष्म-अतिसूक्ष्म स्वरूप के विखण्डन से बहुत बड़ी ऊर्जा का विस्फोट दिखाई दिया, जिसके ध्वंस या सृजन में चाहे जिस प्रयोजन के लिए उपयोग सम्भव दिखाई देने लगा।
परन्तु अब भी यही नहीं मान लिया गया है कि परमाणु ही अन्तिम सत्य है। यह समझा जा रहा है कि परमाणु से भी सूक्ष्म पदार्थ का कोई अस्तित्व हो सकता है। इसी आधार पर प्रो0 रिचर्ड ने अपनी पुस्तक “थर्टी ईयर ऑफ साईकिक रिसर्च” में लिखा है-पचास वर्ष पूर्व यह माना जाता था कि जो बात भौतिक विज्ञान से सिद्ध न हो उसका अस्तित्व ही नहीं है। किन्तु भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में ही अब ऐसे प्रमाण मिलने लगे हैं कि वह अभी भौतिक वस्तुओं का ही ठीक से समझ नहीं पाया है। फिर उस सत्ता के अस्तित्व को इस आधार पर कैसे चुनौती दी जा सकती है जिसे भौतिक विज्ञान की पहुँच के बाहर कहा जाता है।”
सर ए0 एस0 एडिग्रन ने इसी तथ्य को यों प्रतिपादित किया है- ‘‘भौतिक पदार्थों के भीतर एक चेतन शक्ति काम कर रही है जिसे अणु प्रक्रिया का प्राण कहा जा सकता है। हम उसका सही स्वरूप और क्रियाकलाप अभी नहीं जानते, पर यह अनुभव कर सकते हैं कि संसार में जो कुछ हो रहा है वह अनायास, आकस्मिक या अविचारपूर्ण नहीं है।
आधुनिक विज्ञान पदार्थ का अन्तिम विश्लेषण करने में भी अभी समर्थ नहीं हो सका है। उदाहरण के लिए परमाणु का विखण्डन हो जाने के बाद पदार्थ का एक ऐसा सूक्ष्मतम रूप अस्तित्व में आया है जिसे वैज्ञानिक अभी तक पूरी तरह समझ नहीं पाये हैं। जैसे प्रकाश कोई वस्तु नहीं है। वस्तु का अर्थ है जो स्थान घेरे, जिसमें कुछ भार हो और जिसका विभाजन किया जा सके। प्रकाश का न तो कोई भार होता है, न वह स्थान घेरता है और न ही उसका विभाजन किया जा सकता है। पदार्थ का अन्तिम कण जो परमाणु से भी सूक्ष्म है ठीक प्रकाश की तरह है, परन्तु उसमें एक वैचित्र्य भी है कि वह तरंग होने के साथ-साथ स्थान भी घेरता है। वैज्ञानिकों ने परमाणु से भी सूक्ष्म इस स्वरूप को नाम दिया है- “क्वाण्टा”।
कहने का अर्थ वह कि भौतिक विज्ञान अभी पदार्थ कि विश्लेषण करने में भली-भाँति समर्थ नहीं हो सका है फिर चेतना का विश्लेषण और प्रमाणीकरण करना तो बहुत दूर की बात है। शरीर संस्थान में चेतना का प्रधान कार्यक्षेत्र मस्तिष्क कहा जाता है। वहीं विचार उठते हैं, चिन्तन चलता है, भाव-सम्वेदनाओं की अनुभूति होती है। शरीर विज्ञान की अद्यतन शोध प्रगति भी मस्तिष्कीय केन्द्र का रहस्य समझ पाने में असमर्थ रही है। डॉ0 मैकडूगल ने अपनी पुस्तक “फिजियोलॉजिकल साइकोलॉजी” में लिखा है- ‘‘मस्तिष्क की संरचना को कितनी ही बारीकी से देखा समझा जाय यह उत्तर नहीं मिलता कि मानव प्राणी पाशविक स्तर से ऊँचा उठकर किस प्रकार ज्ञान-विज्ञान की धारा में बहता रहता है और कैसे भावनाओं सम्वेदनाओं से ओत-प्रोत रहता है। भाव सम्वेदनाओं की गरिमा को समझाते हुए हमें यह भी स्वीकार करना पड़ेगा कि मनुष्य के भीतर कोई अमूर्त सत्ता भी विद्यमान है, जिसे आत्मा अथवा भाव चेतना जैसा कोई नाम दिया जा सकता है।”
जीवित और मृत देह में मूलभूत रासायनिक तत्वों में कोई परिवर्तन नहीं होता। परिवर्तन होता है तो इतना भर कि उनकी गति, निरन्तर उनका होता रहने वाला रूपान्तरण विकास अवरुद्ध हो जाता है। इस अवरुद्ध क्रम को चालू करने के कितने ही प्रयास किये गये, परन्तु उनमें कोई सफलता नहीं मिल सकी। प्रयास अभी भी जारी हैं, परन्तु भिन्न ढंग के। अब यह सोचा जा रहा है कि मृत्यु के समय शरीर में विलुप्त हो जाने वाली चेतना को पुनः किसी प्रकार लौटाया जा सके तो पुनर्जीवन सम्भव है। इसी आधार पर “मिस्टिरियस यूनिवर्स” ग्रन्थ के रचयिता सरंजेम्स जोन्स ने लिखा है ‘विज्ञान जगत अब पदार्थ सत्ता का नियन्त्रण करने वाली चेतन सत्ता की ओर उन्मुख हो रहा है तथा यह खोजने में लगा है कि हर पदार्थ को गुण धर्म की रीति-नीति से नियन्त्रित करने वाली व्यापक चेतना का स्वरूप क्या है? पदार्थ को स्वसंचालिता इतनी अपूर्ण है कि उस आधार पर प्राणियों की चिन्तन क्षमता का कोई समाधान नहीं मिलता।
सृष्टि क्रम की सुव्यवस्था, विकासक्रम और जीवन चेतना की विचित्र अद्भुत विविधता फिर भी उनमें सुनियोजित साम्य-ईश्वरीय अस्तित्व का प्रबल प्रमाण है। इसके विरुद्ध यह कहा जाता है कि सृष्टि का कोई भी घटक, जीव-प्राणी पदार्थ से भिन्न कुछ नहीं है। कहा जाता है कि समस्त विश्व कुछ घटनाओं के जोड़ के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
उसके उत्तर में ख्याति प्राप्त विज्ञान वेत्ता टेण्डल ने अपने ग्रन्थ “फ्रेगमेण्टस ऑफ साइन्स” में लिखा है-हाइड्रोजन ऑक्सीजन, कार्बन और कुछ ऐसे ही जड़ ज्ञान शून्य पदार्थों के परमाणुओं से जीवन चेतना का उदय हुआ यह असंगत है, क्योंकि जीवन चेतना का स्पन्दन हर जगह इतना सुव्यवस्थित और सुनियोजित है कि उसे संयोग मात्र नहीं कहा जा सकता। चौपड़ के पासे खड़खड़ाने से होमर के काव्य की प्रतिभा एवं गेंद की फड़फड़ाहट से गणित के डिफटेंशियल सिद्धान्त का उद्भव कैसे हो सकता है?
“पुगमेण्ट्स ऑफ साइन्स” के लेखक ने लिखा है कि यांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से देखना, सोचना, स्वप्न, सम्वेदना और आदर्शवादी भावनाओं के उभार की कोई तुक नहीं बैठती। शरीर यात्रा की आवश्यकता पूरी करने के अतिरिक्त मनुष्य जो कुछ सोचता, चाहता और करता है तथा संसार में जो कुछ भी ज्ञात-विज्ञात है वह इतना अद्भुत है कि जड़ परमाणुओं के संयोग से उनके निर्माण की कोई संगति नहीं बिठाई जा सकती।
रहस्यमय यह संसार और इसके जड़ पदार्थों का विश्लेषण ही अभी प्रयोगशालाओं में सम्भव नहीं हुआ है तो चेतना, ईश्वरीय सत्ता का विश्लेषण प्रमाणीकरण लैबोरेटरी के यन्त्रों से किस प्रकार हो सकेगा? फिर भी यह कहने का अथवा इस आग्रह पर अड़े रहने का कोई कारण नहीं है कि विज्ञान से सिद्ध न होने के कारण ईश्वर का अस्तित्व नहीं है। परमाणु का जब तक पता नहीं चला था, इसका अर्थ यह नहीं है कि उससे पहले परमाणु था ही नहीं। परमाणु उससे पहले भी था और आज तर्कों द्वारा उसे असत्य सिद्ध कर दिया जाय तो भी उसका अस्तित्व मिट नहीं जाता। स्वीकार करने या न करने, ज्ञात होने अथवा अज्ञात रहने से किसी का होना न होना कोई मतलब नहीं रखता।
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एक प्रश्न का सही उत्तर भी सदैव एक होता है, दो नहीं। यदि उत्तर दो हों तो उनमें से एक का असत्य होना अवश्यम्भावी है, यह एक बात हुई। जिसका उत्तर सही होता है वह उत्तीर्ण विद्वान और विचारवान घोषित किया जाता है जिसका हल त्रुटिपूर्ण होता है यह माना जाता है कि उसका अध्ययन अपूर्ण रहा, यह दूसरी बात हुई। एकिक नियम से इन दोनों बातों को यों भी कहा जा सकता है विद्वान, विचारवान और अध्ययनशील व्यक्तियों के निष्कर्ष मान्य होने चाहिये जबकि जिन्होंने किसी विषय का स्पर्श ही न किया हो उसके उत्तर से सन्तुष्ट कदापि नहीं हो जाना चाहिये।
परमात्मा का अस्तित्व है या नहीं इस बात की पुष्टि के लिये यदि उपरोक्त सिद्धान्त को कसौटी पर कसें तो ऐसा लगता है कि मात्र सतही ज्ञान वाले, या निषेध बुद्धि व्यक्तियों ने ही उपरोक्त मान्यता का खण्डन किया है, विज्ञान वेत्ताओं में अधिकांश सभी ने या तो इस सम्बन्ध में प्रायोगिक तौर पर अपनी अनभिज्ञता व्यक्त की है या फिर उन्होंने पूरी तरह ईश्वरीय सत्ता पर विश्वास व्यक्त किया है।
ईश्वर की मान्यता सृष्टि का सर्वोच्च विज्ञान है, और परम सत्य की खोज, विज्ञान का इष्ट। अतएव वैज्ञानिकों के निष्कर्षों की उपेक्षा करने का अर्थ असत्य का समर्थन और सत्य से इनकार के अतिरिक्त और कुछ नहीं होगा। अखण्ड-ज्योति में समय-समय पर वैज्ञानिकों की वह सम्मतियाँ प्रकाशित की जाती रही हैं जिनमें उन्होंने विराट् के प्रति, असीम के प्रति श्रद्धा वश, ज्ञान के अगाध विस्तार और मानवीय विवेक के आधार पर समर्थ सत्ता के औचित्य को स्वीकार किया है। ऐसा ही जोरदार प्रश्न एक बार अमेरिका के वैज्ञानिकों के सम्मुख वहाँ के बुद्धिवादियों ने उठा दिया उस समय “न्यूयार्क एकेडमी आफ साइन्सेज” के तत्कालीन अध्यक्ष-वैज्ञानिक ए क्रैशी मारिशन ने उसका उत्तर इतने तार्किक और व्यवस्थित ढंग से दिया जिससे डार्विन के सिद्धान्त को मानने वालों में तहलका मच गया। ईश्वरीय अस्तित्व के प्रतिपादन में उन्होंने जो सात मूलभूत आधार निश्चित किये हैं वे इतने सशक्त और प्राणवान हैं जिनसे एकाएक तो कोई पूर्वाग्रह ग्रस्त नास्तिक भी इनकार नहीं कर सकता। ये सातों सिद्धान्त भारतीय सिद्धान्त सृष्टिकर्त्ता के- (1) सृजन कर्त्ता (2) पालन कर्त्ता (3) संहार कर्त्ता तीनों स्वरूपों का प्रतिपादन करते हैं।
योरोप तथा एशिया के वैज्ञानिकों के समक्ष अपनी बात प्रस्तुत करते हुए मारिशन महोदय ने बताया कि सृष्टि संरचना पर दृष्टि दौड़ाते हैं तो ऐसा लगता है सारा निर्माण किसी गणितज्ञ, सूझबूझ वाले, बुद्धिमान चीफ इंजीनियर की देख-रेख प्लानिंग के अन्तर्गत हुआ है सृष्टि का प्रादुर्भाव एकाएक, अकस्मात्, दुर्घटनावश, यों ही नहीं हो गया। रेल की रेल से, मोटर से, पुल से दुर्घटना हो जाती है, तो ध्वंस होता है, विनाश होता है, त्राहि-त्राहि मचती है जबकि संसार में अच्छी से अच्छी और उससे अच्छी प्रसन्नतादायक रचनायें निर्गत होती चली आती हैं, ध्वंस के स्थान पर व्यवस्था दिखाई देती है। प्रसन्नता, प्रफुल्लता, उल्लास, उत्साह और प्राणों की छलकन दिखाई देती है। दुर्घटना कभी-कभी होती है, आकस्मिकता का नम्बर करोड़ों बार के प्रयोग में कहीं एक बार आता है। उदाहरण के लिये दस-दस नये पैसे के दस सिक्के लें उन पर एक से दस तक के नम्बर डाल दें। सारे सिक्कों को दोनों हथेलियों का घोंसला बनाकर देर तक हिलायें और उन्हें फिर एक गड्डी में रख दें। यह क्रिया सौ दो सौ बार दुहरायें तो यह सम्भव है कि एक नम्बर का सिक्का ठीक एक नम्बर पर ही आ जाये। हजार दो हजार बार में एक नम्बर के बाद दूसरा भी क्रम में आ सकता है, चार पाँच हजार बाद में सम्भव है एक, दो तीन नम्बर वाले सिक्के भी क्रम में आ जायें। एक से दस तक के सभी सिक्के एक ही क्रम में आ जायें, उस स्थिति के लिये लाखों करोड़ों नहीं असंख्य बार यह क्रिया दोहरानी पड़ सकती है। यदि सिक्कों को आँखों से देख कर, ज्ञान से उनके नम्बर पढ़कर क्रम बार लगायें तो एक से अधिक बार की क्रिया दोहरानी नहीं पड़ेगी। प्रकृति की, सृष्टि की सुव्यवस्थायें इस बात की प्रमाण हैं कि यह सारी रचना प्रकाश में, बुद्धि के द्वारा देख सुन समझ और निष्कर्षों को ध्यान में रखकर की गई है।
उस बड़े इंजीनियर का रेखा गणित ज्ञान तो उस समय आश्चर्यचकित कर देता है जब पता चलता है कि पृथ्वी अपने ही कक्ष में 23 (अंश) झुकी हुई है यदि ऐसा न होता तो महासागरों का सारा जलवाष्प विभक्त होकर कुछ उत्तरी ध्रुव में भाग जाता कुछ दक्षिणी ध्रुव में। फिर न ये सुहावने बादल आते, न रिमझिम वर्षा होती, न झरनों की झरझर, न नदियों की कल−कल, पौधों का बढ़ना फूलना, फलना सारी शोभा विनाश के गर्भ में डूब जाती।
पृथ्वी कुल दस फुट मोटी होती तो जीव जगत के लिए ऑक्सीजन ही सम्भव न होता। समुद्र दस फुट गहरा होता तो कार्बन डाई ऑक्साइड और ऑक्सीजन का संतुलन ही न बैठता, वायुमण्डल विरल होता तो तारों का उल्कापात इस तरह होता मानों किसी बगीचे में आम टपकते हों। सारी धरती लहूलुहान होती, सौन्दर्य नाम की तो यहाँ कोई सत्ता ही नहीं होती।
अपना दूसरा तर्क प्रस्तुत करते हुए डॉ0 मारिशन ने बताया कि जिन दिनों डार्विन विकासवाद सिद्धान्त प्रतिपादन करने में जुटे थे उन दिनों “प्रोटोप्लाज्मा” या “कोशिका विज्ञान” का प्रादुर्भाव नहीं हो पाया था। इस विज्ञान से जीवन का सूक्ष्मतम स्वरूप आया और यह सिद्ध हो गया कि कोशिका उसी तरह का एक ब्रह्माण्ड है जैसा हमारा बाह्य दृश्य ब्रह्माण्ड। उसमें से नाभिक की इच्छा से प्लाज्मा की हलचल होती है स्वयं साइटोप्लाज्मा से नाभिक नहीं बनाता। इसे यों समझ सकते हैं कि दृश्य प्रकृति का निर्माण सूर्य करता है। यह दृश्य प्रकृति ने सूर्य निर्माण नहीं किया। यह चेतना ही जीवन है और भार न होने पर भी इतना शक्तिशाली है कि पौधे में अभिव्यक्त होता है तो चट्टान को फोड़कर ऊपर आ जाता है। इतना बड़ा कलाकार है कि फूलों में तरह-तरह के रंग भरता रहता है। प्रत्येक जीव को समूह गान की प्रेरणा देकर उसने अपने आपको महान संगीतज्ञ और प्रत्येक फूल में अलग-अलग तरह की गन्ध भर कर उसने अपने महान रसायनज्ञ (केमिस्ट) स्वरूप ही दर्शा दिया है।
बाजार की किसी खिलौने वाली दुकान में जाते हैं तो झांझ बजाने वाली गुड़िया नाच दिखाने और ढपली बजाने वाले बन्दर, दौड़ने वाले घोड़े, तेज गति से दौड़ने वाली बसें, रेलें और हैलिकॉप्टर आदि तरह-तरह के खिलौने देश कर मन प्रसन्न हो उठता है। सामान्य दृष्टि में यह खिलौना चाभी भर देने से चलने वाले होते हैं, पर विचारशील व्यक्ति उसे इंजीनियरिंग बुद्धि का कौशल मानते और उन कारीगरों की प्रशंसा करते हैं जिन्होंने उनके भीतर इस तरह की मशीनरी का निर्माण कर दिया जिससे निर्जीव घोड़े, प्लास्टिक के बने बन्दर भी सजीव से गति करते दिखाई देने लगते हैं।
सृष्टि में दृष्टि दौड़ायें तो लगता है यहाँ भी एक विलक्षण इंजीनियरिंग कलाम भरा हुआ है। खिलौनों की मशीन की तुलना प्रकृति के नन्हें-नन्हें जीव-जन्तुओं से लेकर विशालकाय पशुओं तक की अन्तःप्रवृत्तियों से की जाती है। इनमें मनुष्यों की तरह की विचारशक्ति नहीं होती, उनमें लिखने-पढ़ने या गूढ़ विषयों को सोचने समझने की भी सामर्थ्य नहीं होती, पर जिस तरह चाबी भरे हुए खिलौने वैसी ही गति करने लगते हैं जैसे उनके मूल उपमान तो यह विश्वास न करने का कोई कारण शेष नहीं रह जाता कि सृष्टि का कोई नियंता नहीं है। अन्तःप्रवृत्तियों का यह इतिहास इतना अचरज भरा है कि उसमें सिवाय सृष्टि सृजेता के सर्वज्ञ सर्व कुशल और सर्वशक्तिमान होने के अतिरिक्त दूसरी बात ही मस्तिष्क में नहीं आती। अस्तित्व में न होने की बात तो बिलकुल ही गले नहीं उतरती।
सालमन मछली वर्षों तक समुद्र में रहती है और जब कभी अपने जल स्थान की याद करती है तो समुद्र से चलकर अनेक बड़ी नदियों, सहायक नदियों की यात्रा करती हुई ठीक उसी स्थान पर पहुँच जाती है जहाँ उसका जन्म हुआ था यदि उसे विपरीत दिशा में मोड़ने का प्रयत्न भी किया जाये या धोखा देने का प्रयास किया जाये तो भी उसे बहकाया नहीं जा सकता। वह फिर कर लौटेगी अपने सही स्थान को ही।
टिड्डियाँ किसी उपयुक्त स्थान पर अंडे देकर उड़ जाती हैं। पीछे बिना अभिभावकों की देख−रेख के अंडों से बच्चे निकल आते हैं और अपने पूर्वजों के पीछे-पीछे यात्रा पर उसी दिशा में चल पड़ते हैं और कुछ समय पश्चात् अपने पितरों से जा मिलते हैं।
प्रवासी पक्षी एक ऋतु कहीं गुजारते हैं, दूसरी के लिये कठिन यात्रायें करके ठीक उसी स्थान पर जा पहुँचते हैं जहाँ उनके वंशधर आते जाते रहे हैं। ये सारे कार्य अन्तःप्रवृत्ति के सहारे चलते हैं। ये प्रवृत्तियाँ और कुछ नहीं वह चाबियां हैं जो नियन्ता ने उनमें पहले से भर कर छोड़ दी हैं।
ईल मछली इस तरह का सर्वाधिक आश्चर्यजनक उदाहरण है। दुनियाभर की सभी ईलें चाहे वह ग्रेट वियर की हों या काश्मीर की डल झील की अंडे बच्चे। वे अटलांटिक के बरमूडा क्षेत्र में जहाँ समुद्र संसार में सबसे गहरा है, में ही देती हैं। यह वही स्थान है जहाँ से पृथ्वी किसी ऐसे ब्रह्माण्डीय शक्ति प्रवाह से जुड़ी है जहाँ के आकाश में गया कोई भी जहाज आज तक लौटा नहीं, यह कहाँ अन्तर्धान हो जाते हैं यह आज तक भी कोई जान नहीं पाया।
झीलों की ईलें, वहाँ से निकलने वाली नदियों से होकर समुद्र और समुद्र से अटलांटिक महासागर और वहाँ से बरमूडा पहुँचती हैं। वहाँ बच्चे देकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर देती हैं जिस मछली ने कोई भूगोल नहीं पढ़ी जिसे महाद्वीपों का ज्ञान नहीं। वही ईलें यहाँ जन्म लेने के उपरान्त अपने माता-पिता के देश चल देती हैं और बड़े-बड़े महासागर पार कर ठीक वहीं जा पहुँचती हैं जहाँ उनके माता-पिता कभी जीवनयापन किया करते थे।
ततैया की तरह का कीड़ा वाष्प ऐसा जीव है जिसके बच्चों को विकास के लिये जीवित जीव का ही मांस चाहिये मृत का नहीं, वाष्प कीड़ा घास के कीड़े को पकड़ता है और उसे मिट्टी में इस तरह गाड़ देता है जिससे वह मरता नहीं वरन् मूर्छित हो जाता है। इस तरह जीवित किन्तु अचेतन घास के कीड़े से ही ये बच्चे अपना विकास कर लेते हैं। यह बुद्धि का खेल नहीं है यह मात्र भरी हुई चाबी का खेल है यदि बुद्धि की बात होती तो हाथी विधिवत् खेती कर रहे होते, शेर अपने बच्चों के लिये विद्यालय खोले हुए होते, भेड़ियों की मनुष्य से मित्रता हो गई होती, बन्दर बगीचों के मालिक हो गये होते। ठीक उसी तरह जिस तरह चाबी भरा घोड़ा आदमी को देशाटन करा सकता है, हर मनुष्य की अपनी रेलगाड़ी होती और हैलिकॉप्टर से कम में कोई यात्रा नहीं कर रहा होता।
मनुष्य में बौद्धिक क्षमताओं की असीम सम्भावनायें परमात्मा के अस्तित्व का चौथा बड़ा प्रमाण है। इस इलेक्ट्रानिक युग में जब कि दुनिया भर के सारे कार्य कम्प्यूटर करने लगे हैं, मानवीय बुद्धि की तुलना में सभी हतप्रभ हैं। गणित के उतने हल जितनी जानकारियाँ भरी गई हों कंप्यूटर प्रदान कर सकता है, पर किसी भी तरह की बात का तात्कालिक, परिस्थितिजन्य तथा ऐसा उत्तर जिसमें भावनायें, सम्वेदनायें भी जुड़ी हुई हों वह दे नहीं सकता। शरीर की रचना जैसी मशीन नहीं, बुद्धि और विवेक जैसी चेतनता अन्यत्र नहीं, इस रूप में उसने साक्षात् अपनी ही चेतना का एक अंश मानवीय प्राणों में घोल दिया है।
अध्यात्म की, परमात्मा की कल्पना अपने आप में एक महान शोध है। यह कल्पना नहीं बुद्धि का गणितीय निर्णय है इसमें भले ही अंक प्रयुक्त न हुये हों उसमें बुद्धि की दौड़ उससे भी बहुत अधिक उत्कृष्ट स्तर पर हुई है। अज्ञात की कल्पना न कर सकें इसका यह अर्थ नहीं कि अज्ञात होता ही नहीं। यह बात हमारे जीवन व्यवहार में प्रतिदिन देखने को मिलती रहती है। इस तरह मानवीय भावनाओं ने जिस समर्थ सत्ता का स्पर्श-अनुभूति के रूप में किया और उसके प्रति श्रद्धा के सतोगुणी सत्परिणाम प्राप्त किये, उसे यों ही झुठला देना व्यक्ति विशेष के तात्कालिक सन्तोष का कारण हो सकता है। उससे न तो उसका, न समाज और विश्व का हित हो सकता है। आज की समस्याओं का एक मात्र आधार यह अनास्था ही है उसे दूर किया जा सके तो मानवीय गरिमा अत्यन्त समर्थ, समृद्ध और समुन्नत रूप में चरितार्थ हो सकती है।
एक आँखों से अन्धा व्यक्ति हाथ में लालटेन लिए अँधेरी रात में रास्ते के निकट एक बड़े खड्ड के पास खड़ा था, और चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा था-‘‘भाइयो, सामने बड़ा खड्ड है। बचते हुए इधर से निकलना।”
उधर से निकलने वाले एक राहगीर ने पूछा-‘सूरदास’ तुम्हें खुद तो कुछ दिखाई नहीं पड़ता। फिर दूसरों को इस तरह रास्ता क्यों बता रहे हो?’
अन्धे ने कहा मेरी माथे की आँखें फूटी हैं। हृदय की आँखें खुली हैं, जिनसे मैं दूसरों को आपत्ति में पड़ने का खतरा देखता हूँ और उन्हें बचाने का सामर्थ्य भर प्रयत्न करता हूँ।
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किसी भी प्राणी का दृष्टिगोचर होने वाला स्वरूप केवल उसकी काया ही होती है। जो अस्तित्व अनुभव में आता है वह भी बातचीत, व्यवहार और स्थूल गति विधियों से ही व्यक्त होता है। परन्तु किसी भी प्राणी का अस्तित्व इतने मात्र तक ही सीमित नहीं है; उसका एक बड़ा भाग रहस्य के गर्भ में ही छुपा रहता है। आइस वर्ग (हिमशिलायें) जब सागर में तैरते हैं तो उनका एक तिहाई भाग ही दिखाई देता है, शेष दो तिहाई भाग समुद्र में डूबा हुआ रहता है। इसलिए कभी-कभी यह भ्रम हो जाता है कि जिसे छोटी-सी हिमशिला समझ लिया जाता है वह बहुत बड़ी चट्टान निकलती है।
शास्त्रकारों ने इस संसार की तुलना एक प्याज से की है जिसकी पर्त दर पर्त निकलती जाती है। केले के तने पर जिस प्रकार छाल पर छाल चढ़ी रहती है उसी प्रकार रहस्यमय संसार में रहस्यों के आवरण पर आवरण चढ़े हुए हैं। विज्ञान भी इस तथ्य को स्वीकार करता है और बताता है कि ज्ञान का कहीं अन्त नहीं है। सभी रहस्यों के भेद अभी पा नहीं लिये गये हैं और अब तो अपना स्वयं का शरीर भी अनजाना, अचीन्हा लगने लगा है। कुछ दिन पहले की ही घटना है जिसकी अभी तक कोई व्याख्या नहीं की जा सकी है। अमेरिका के अनेक प्रतिष्ठित समाचार पत्रों ने इस घटना को छापा था। यह खबर संसार के कई पत्रों ने भी प्रकाशित की थी कि हैनरौट बीसरूस नामक एक विधवा के शरीर में विश्वविख्यात चित्रकार गोया की आत्मा ने एक अद्भुत कलाकृति का सृजन किया था। जबकि बीसरूस को कभी ठीक से तूलिका पकड़ना भी नहीं आया था। आश्चर्य की बात तो यह कि इस कलाकृति की नायिका तथा गोया की प्रख्यात कलाकृति ‘गवालन’ में चित्रित नायिका में अद्भुत समानता थी जबकि बीसरूस ने उस कलाकृति को स्वप्न में भी नहीं देखा था।
परामनोविज्ञान के शोधकर्त्ताओं ने इस घटना का विवेचन करते हुए बताया कि यह काम मरने के बाद भी जीवित गोया के सूक्ष्म शरीर के बीसरूस के माध्यम से कराया था। इस तरह की अनेकानेक घटनाओं का उल्लेख ‘जर्नीज आउट आफ द बॉडी’ (शरीर के बाहर यात्रा) ‘द अदर वर्ल्ड’ (दूसरा संसार) तथा ‘स्प्रिचुअल हीलिंग में मिलती है।
मरने के बाद अथवा जीवित अवस्था में ही सूक्ष्म शरीर के माध्यम से दूसरों के शरीर में प्रवेश कर जाना योगी यतियों के लिए सामान्य-सी बात रही है। आद्य शंकराचार्य के सम्बन्ध में विख्यात है कि उन्होंने शास्त्रार्थ में विजय पाने के लिए राजा सुधन्वा की मृतदेह में प्रवेश किया था।
भारत में ही कुछ वर्षों पूर्व इस तरह की एक असाधारण घटना घटी, जिसे राष्ट्रीय स्तर के कई समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया।
कुछ लोग जसवीर के शव के पास भी बैठे थे। उन्होंने देखा कि जसवीर की देह में धीरे-धीरे हल-चल हो रही है। थोड़ी देर बाद जसवीर उठ बैठा। आस-पास बैठे लोगों को हर्ष मिश्रित आश्चर्य हुआ, कुछ भय-भीत भी हुए। परन्तु कुछ समझदार लोगों के समझाने-बुझाने पर सभी ने यह मान लिया कि जसवीर पुनर्जीवित हो गया है। पूरी तरह स्वस्थ हो जाने पर घर के लोगों ने जसवीर के व्यवहार में आश्चर्यजनक परिवर्तन देखा। वह प्रायः कहता-‘‘मैं ब्राह्मण हूँ। तुम लोगों के हाथ का बना खाना नहीं खाऊँगा। मुझे मेरी पत्नी के पास ले चलो।”
करीब सप्ताह भर तक घर के लोगों ने काफी उपचार किया। वे समझ रहे थे कि बीमारी के कारण जसवीर का दिमाग पगला गया है। परन्तु किसी प्रकार फायदा न होते और जसवीर द्वारा समझदार लोगों की तरह व्यवहार करते देख उसके कथानुसार पास के गाँव में ले जाया गया, जहाँ कि उसने अपना घर बताया था।
तलाश करने पर पता चला कि उसी गाँव के शोभाराम त्यागी नामक एक ब्राह्मण युवक की मृत्यु एक दुर्घटना में हो गयी थी। जसवीर अपने को वह शोभाराम ही बताता था। उसने शोभाराम की पत्नी, माँ और भाई को पहचाना तथा उन्हें स्वयं की पत्नी, माँ तथा भाई बताया। जसवीर अपने साथ आये लोगों को उस स्थान पर भी ले गया जहाँ दुर्घटना घटी थी। उस दुर्घटना में जो अन्य लोग और आहत हुए थे तथा जीवित बच गये थे, उन्होंने जसवीर के कथन की पुष्टि की।
गीताकार ने कहा है कि-
न जायते प्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भयः। अजोः नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणों न हन्यतेहन्यमाने शरीरं।
यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है अथवा न यह आत्मा हो कर के फिर होने वाला है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य शाश्वत और पुरातन है, शरीर के नाश होने पर भी यह नाश नहीं होता।
मृत्यु की मीमांसा करते हुए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृहणति न रोड परणि। तथा शरीराभणि विहाय जीर्णान्यन्याति संयाति नवानि देही॥
जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़ कर नये वस्त्र धारण करता है उसी प्रकार जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर नये शरीरों को प्राप्त होता है।
मृत्यु के समय केवल शरीर ही नष्ट होता है। मनुष्य की इच्छायें, वासनायें, आकांक्षायें और भावनायें ज्यों की त्यों बनी रहती हैं और सूक्ष्म शरीर के साथ पुनः नये शरीर की तलाश करने लगती है।
यदि अपनी चेतना को नियन्त्रित किया जा सके तो जीते जी भी सूक्ष्म शरीर को स्थूल देह से अलग कर इच्छानुसार विचरण भ्रमण किया जा सकता है।
वैज्ञानिकों ने इस दिशा में भी सफल प्रयोग किये हैं और पाया है कि स्थूल शरीर के अतिरिक्त मनुष्य का एक और सूक्ष्म शरीर जिसे भाव शरीर कहा जाता है, भी है और इसका प्रकाश मानवी काया के इर्द-गिर्द चमकता रहता है। परामनोवैज्ञानिकों ने सूक्ष्म शरीर को न केवल आँखों से देखने वरन् उनका चित्र लेने तक में सफलता प्राप्त कर ली है।
रूस के एक वैज्ञानिक दंपत्ति इलेक्ट्रान विशेषज्ञ सेमयोन किलियान तथा उनकी पत्नी वेलैण्टीना ने मिल कर ऐसे कैमरे का निमार्ण किया है जिससे कि मनुष्य और अन्यान्य जीव जन्तुओं के सूक्ष्म शरीर का चित्र खींचा जा सके।
इसका विचार वैज्ञानिक दंपत्ति को कैसे आया, यह भी एक रोचक घटना है। डॉ0 किलियान अपने एक शोध छात्र के साथ एक अनुसंधान केन्द्र में काम कर रहे थे। एक प्रयोग के दौरान उन्होंने देखा कि इलेक्ट्रो थेरेपी की हाई फ्रीक्वेंसी वाली मशीन तथा रोगी की त्वचा के बीच एक हल्का-सा प्रकाश चमक रहा है। उन्होंने इस प्रकाश का चित्र लेने के लिए मशीन के कोच के स्थान पर धातु का इलैक्ट्रोड लगा कर सीधे अपना हाथ रख दिया, फिर हाथ और इलैक्ट्रोड के बीच में फोटोप्लेट रख दी। यन्त्र का बटन दबाते ही किलियान का हाथ जलने लगा था। डार्क रूम में ले जा कर फोटोप्लेट धोयी गयी तो उस पर उँगलियों के नोंक के आहार की चमकती हुई छवि देख कर वैज्ञानिक दंपत्ति चकित रह गये। इसी घटना से प्रेरित हो कर डॉ0 किलियान में अपनी पत्नी बेलेण्टीना के सहयोग से ऐसे कैमरे का अविष्कार किया जिससे सूक्ष्म शरीर का चित्र लिया जा सके। इस कैमरे से लिये गये चित्रों में मनुष्याकृति एक छाया के समान आती है जिसमें कई तारे चमकते दिखाई देते हैं। किलियान ने इस कैमरे के द्वारा वृक्ष की पत्तियों के भी चित्र लिए हैं और उनके चित्र भी मनुष्य अंगों की चमकीली छाया के समान आये हैं।
लिंगदेह-सूक्ष्म शरीर के सम्बन्ध में हुई अधुनातन खोजों के आधार पर अब यह भी प्रतिपादित किया गया है कि सूक्ष्म शरीर निद्रा, अचेतन अवस्था या रुग्णावस्था में स्थूल शरीर से अलग होकर कहीं भी विचरण कर सकता है जो स्थूल शरीर के लिए सम्भव नहीं है।
अमेरिका के मनो चिकित्सक डॉ0 एण्डरीना पुटार्रथ ने अपनी पुस्तक ‘बिर्याण्ड टेलीपैथी में एक घटना का उल्लेख किया है- श्रीमती हायेस प्रातः लगभग साढ़े पाँच बजे सोते से यकायक जाग उठी। उठने का कारण यह था कि उन्होंने एक भयंकर स्वप्न देखा था। स्वप्न में उन्होंने देखा था कि उनका पुत्र जॉन कार में घूमने जा रहा है, तभी एक दुर्घटना हो जाती है और उनके पुत्र का शरीर बुरी तरह घायल हो गया है। इसके पश्चात् उनको दिखाई दिया कि उनके पुत्र का शरीर कपड़े से ढ़का हुआ है और वह लेटा हुआ है। इस स्वप्न से श्रीमती हायेस इतनी घबड़ा गयीं कि उन्होंने फौरन उस होस्टल में फोन किया जहाँ जॉन पढ़ता था।
वहाँ के अधिकारियों को किसी प्रकार की दुर्घटना की जानकारी नहीं थी उन्हें तो यह भी नहीं मालूम था कि इस समय जॉन कहाँ है। वे केवल इतना ही बता सके कि जॉन इस समय होस्टल में नहीं है। बारह घण्टे बाद श्रीमती हायेस को टेलीफोन द्वारा सूचना मिली कि एक कार दुर्घटना में जान घायल हो गया है। वह कल रात अपने मित्रों के साथ सैर करने गया था। जब वह एक पहाड़ी पर तेजी से कार को दौड़ा रहा था तो 75 फीट की ऊँचाई से उसकी कार एक गड्ढे में गिर गयी। सौभाग्य से कार इस प्रकार गिरी कि उसको बहुत अधिक चोट नहीं आयी। जॉन के कथनानुसार उस समय लगभग साढ़े पाँच बजे थे।
इस घटना के पीछे ‘सूक्ष्म शरीर का प्रक्षेपण सिद्धान्त ही कारण रूप में प्रतिपादित किया गया है। मृत्यु के समय सूक्ष्म शरीर अपनी भौतिक काया का परित्याग कर उससे अलग हो जाता है क्योंकि वह काया मनुष्य की इच्छा, वासना, भावनाओं को पूरा करने में समर्थ नहीं रहती। मृत्यु के समय सूक्ष्म शरीर द्वारा देह त्याग की घटना को भी विज्ञान की कसौटी पर कसा जा चुका है।
चैकोस्लोवाकिया के वैज्ञानिक ब्रेतिस्लाव ने परीक्षणों द्वारा यह सिद्ध किया कि जब मनुष्य की मृत्यु हो जाती है तो उसके चारों ओर दिखाई देने वाला प्रभामण्डल लुप्त हो जाता है। इसके लिए उन्होंने एक मरणासन्न स्थिति में शैय्या पर पड़े एक रोगी के चित्र लिये। जब वह रोगी जीवित था तब उसके शरीर का प्रभामण्डल धीरे-धीरे धुँधलाता जा रहा था। जब डाक्टरों ने उसकी मृत्यु घोषित करा दी तब रोगी का जो चित्र लिया गया उसमें कहीं भी कोई प्रकाश नहीं दिखाई दिया।
डॉ0 ब्रेतिस्लाव का कहना है कि यह प्रकाश बायोप्लाज्मा तत्व के सक्रिय रहने पर ही दिखाई देता है तथा मृत्यु के समय इसकी लपटें और चिंगारियाँ शून्य में विलीन हो जाती हैं।
ऐसी बात नहीं है कि केवल मनुष्य ही सूक्ष्म शरीर का स्वामी है, अन्य और कोई प्राणी सूक्ष्म देह धारण करने में असमर्थ हो। बल्कि हर जीवित प्राणी यहाँ तक कि पेड़-पौधों के भी सूक्ष्म शरीर होते हैं। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक श्रीमती एलीन गैरटा ने अपनी पुस्तक ‘अर्बचरर्नस’ में लिखा है- ‘गौर से सूक्ष्म यन्त्रों द्वारा देखा जाने पर पौधों तथा पशुओं के चारों ओर एक कुहासा दिखाई देता है जिसे प्रभामण्डल कहते हैं। यह कुहासा कई स्तरों का होता है, किन्हीं व्यक्तियों में बहुत हल्का होता है तो किन्हीं में दीप्तिमंत। इसकी दीप्ति मनुष्य की मनःस्थिति के अनुसार घटती बढ़ती रहती है।
आगे चल कर कहा गया है स्थूल शरीर सूक्ष्म शरीर के व्यापार का माध्यम है जिस प्रकार बढ़ई का बसूला। अर्थात्-इच्छाओं, वासनाओं को पूरा करने के लिए सूक्ष्म शरीर एक यन्त्र की भाँति स्थूल शरीर का उपयोग करता है। ऐसी घटनायें जो स्थूल जगत से परे की प्रतीत होती हैं। स्थूल उपकरणों से प्रयोजन पूरा न होने के कारण दूसरे माध्यमों से सूक्ष्म शरीर की प्रयोजन पूर्ति मात्र रहती हैं और जब यह यन्त्र बेकार कूड़ा-कबाड़ा हो जाता है तो सूक्ष्मदेह इसे उसी प्रकार फेंक देता है जैसे फटा हुआ वस्त्र। अन्ततः यही कहना पड़ेगा जिसे हम अपना शरीर कहते हैं, जिसके लिए इतने मोहासक्त रहते हैं और कुछ नहीं, सूक्ष्मदेह की वासनाओं इच्छाओं को पूरा करने का माध्यम भर है।
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पाटलिपुत्र भगवती जाह्नवी की प्रलयंकर बाढ़ से ग्रस्त-समस्त पुरवासी जीवन रक्षा और जीवनोपयोगी सामग्री की सुरक्षा में व्यस्त हैं, किन्तु सुवर्ण श्रेणिक को इस सब की कोई चिन्ता नहीं थी। उनका अपना भवन इतना विशाल था कि उससे दस गुनी जलराशि भी गगनचुम्बी अट्टालिका का स्पर्श न कर पाती। विशाल भवन की प्राचीर में बैठा श्रेणिक परिवार उस समय भी आनन्द ले रहा था जिस समय सारा नगर जीवन और मरण के इस संकट से बुरी तरह जूझ रहा था।
सुवर्ण के तरुण पुत्र योमी “ब्रहज्जातक” पढ़ रहे थे पर उनकी एकाग्रता उस जन कोलाहल में बार-बार भंग हो जाती थी। वे बारम्बार बाहर आते, दूर तक फैली हुई जलराशि की ओर अपनी दृष्टि दौड़ाते विपत्ति ग्रस्त जन-जीवन को देखते, अन्तःकरण कहता-योमी! यदि तुम्हें कभी संकट पड़ता तो क्या तुम सहायता की आकांक्षा और अपेक्षा नहीं करते, आज तुम्हारे पास धन है, सम्पत्ति है, विशाल भवन है, इसलिए तुम सुरक्षित हो, पर विचार करो यदि कहीं यह साधन सुविधाएँ उपलब्ध न हुई होती तो क्या तुम भी इस स्थिति में संकट ग्रस्त न होते? तुम्हें क्या यह उचित नहीं कि विपत्ति में ग्रस्त प्राणियों की रक्षा करते?
आत्मा अभी अपनी बात पूरी भी नहीं करने पाती कि मन बोल उठता-संसार में सभी अपने तई पैदा होते हैं, अपने लिए सुख-साधन आप जुटाते हैं, जब अपनी जरा अपनी मृत्यु को कोई बदल नहीं देता तो अपने सौभाग्य को ही औरों के संकट से क्यों बदला जाये?
आत्मा की पुकार-मन की तृष्णा के आगे दबकर रह जाती। योमी के पैर पीछे मुड़ते फिर वह बाहर आते आज उनके अन्तःकरण में जैसा द्वन्द्व उठा वैसा तो पहले कभी नहीं हुआ। लगता था आत्मा ने मन के विरुद्ध अपनी सारी शक्ति झोंक दी तभी तो सारा दिन, सारी रात, योमी को शान्ति नहीं मिली वे बार-बार पाटलिपुत्र की जल प्लावित वैथियों, भवनों में दृष्टि दौड़ाते। संकटग्रस्त लोगों को देखते तो करुणा से हृदय उमड़ पड़ता। आत्मा कहती-जीवन का सार योमी! परोपकार है! परोपकार!! यों स्वार्थ की जिन्दगी जीकर भी तू कितने दिन सुखोपभोग कर लेगा?
योमी के पैर द्वार तक आते मन कहता-अरे योमी, तू अत्यन्त सम्भ्रान्त नागरिक है, तेरी मान मर्यादा का अपना स्तर है। चाहे तो सम्पत्ति देकर लोगों का कल्याण कर सकता है। दीन−हीन, दरिद्र और दुर्गन्ध ग्रस्त प्राणियों के बीच जाने से लोग क्या कहेंगे?
यह दम्भ कितना दारुण है, यह भी नहीं समझने देता कि परमार्थ, परोपकार में कितनी शान्ति, कितना सन्तोष, विराट् की कैसी सुखद अनुभूति है? सम्मान तो दूर लोग सम्वेदनशील अन्तःकरण के प्रति अपनी श्रद्धा तक समर्पित कर देते हैं, दम्भ के चंगुल में फँसकर ही मानवता कष्ट भोगती और दुःख पाती है-योमी भी उसी के वशीभूत आत्मानुभूति के दिव्य क्षणों से वंचित होता रहा। जीवन यदि दबा है तो ऐसे पाथर भार से।
व्योम में वलाहक पूरी तरह से आच्छादित थे; किन्तु शुक्ल पक्ष के कारण दूर तक की गतिविधियाँ दिखाई देती हैं। समीप ही एक कच्चे भवन की अट्टालिका में जीवन रक्षा करती तरुणी का करुण क्रंदन सुनाई दे रहा है। एक ही बालक शेष रहा है, जिसकी सुरक्षा के लिए वह प्रत्येक संकट से जूझ रही है-किन्तु तभी विशाल जनराशि का आवेग आता है भवन चरमरा कर बैठ गया, एक ही क्षण में, टिमटिमाते हुए दो प्राणदीप बुझ गये।
योमी का अन्तःकरण कराह उठा अबोध शिशु और अबला नारी की मृत्यु का दोषी तू है योमी, तूने समाज की चोरी की, धन संग्रह किया। अपने अपराध पर भी अहंकार, यह घोर पाप है, योमी, तू पापी है, इस मृत्यु के लिए दोषी भी तू ही है, तू चाहता तो उन्हें बचा सकता था, जीवन दान दे सकता था। आत्म प्रताड़ना का और अधिक भार असह्य हो उठा, योमी घर से निकल पड़ा तो फिर वापिस नहीं लौटा, जनसेवा में ही उसने सर्वस्व समर्पित कर दिया।
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मनुष्य को परमात्मा की सर्वश्रेष्ठ रचना कहा गया है। परमात्मा ने उसमें वे सभी विशेषताएँ और क्षमताएँ समाहित कर दी हैं-जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि ईश्वर ने अपने इस प्रिय पुत्र पर अपना विशेष प्यार दुलार लुटाया। स्थूल दृष्टि से देखने पर यही दिखाई देता है कि मनुष्य को सर्वसमर्थ शरीर तन्त्र के अलावा बौद्धिक सामर्थ्य का विशेष अनुदान मिला है। लेकिन मनुष्य को प्राप्त हुई शारीरिक सामर्थ्य से अन्य प्राणियों की तुलना की जाय तो कितने ही प्राणी उससे अधिक बलवान और शक्तिशाली सिद्ध होंगे। बौद्धिक सामर्थ्य और सूझबूझ की तुलना में चींटी, कौआ, खरगोश, कुत्ता, बिल्ली आदि कितने ही प्राणी मनुष्य से इक्कीस सिद्ध होंगे।
कहा जाय कि इन सब प्राणियों में सीखने की क्षमता नहीं होती। यह सोचना भी गलत है क्योंकि शरीर रचना में उससे समानता रखने वाले प्राणी उससे अधिक अच्छी तरह सीख समझ सकते हैं। मनुष्य की शरीर संरचना और बौद्धिक सामर्थ्य से निकटतम अनुरूपता रखने वाला प्राणी खोजा जाय तो वह लंगूर ही होगा। लंगूरों की प्रायः तीन श्रेणियाँ बतायी जाती हैं एक-ओरगुटांन, दूसरी-गुरिल्ला और तीसरी श्रेणी में चिंपैंजी आते हैं।
इनमें से भी ओरगुंटान श्रेणी के लंगूर कम होते जा रहे हैं। अब ये केवल इण्डोनेशिया के जंगलों में ही मिलते हैं और बन्दरों की तरह वृक्षों पर एक टहनी से दूसरी टहनी पर कूदते हैं। इनकी भुजाएँ अन्य लंगूरों की तुलना में अधिक लम्बी और सशक्त होती हैं तथा इनके पाँव अन्य लंगूरों की अपेक्षा छोटे और कमजोर। ओरगुण्टान को पकड़कर यदि किसी पिंजड़े में बन्द कर दिया जाय तो चुपचाप उदास मुद्रा में बैठ जाते हैं। जैसे ये अपनी बंधक स्थिति से क्षुब्ध हों और उसको पीड़ा छटपटाहट अनुभव करते हों।
ओरगुंटान के कुछ अधिक विकसित लंगूर है गोरिल्ला। ये प्रचुर संख्या में पाये जाते हैं। सीधे खड़े होने पर 5 फीट के दिखाई देते हैं। अफ्रीका में पाये जाने वाले गुरिल्लों में से कुछ का वजन तो दो क्विंटल तक है। लेकिन ये कभी-कभी ही सीधे खड़े होते हैं।
मनुष्य से सर्वाधिक समीप लंगूर है चिंपैंजी और मनुष्य के रक्त में इतनी समानता पाई जाती है कि कई बार यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि यह आदमी का रक्त है अथवा चिंपैंजी का। यही नहीं चिंपैंजिओं को भी मनुष्य में होने वाले रोगों यथा-यस्पिण्ड पोलियो जैसी बीमारियों का शिकार होता देखा गया है।
चिंपैंजी को एक भाषा ही नहीं मिली है अन्यथा कई मामलों में यह मनुष्य की न केवल बराबरी करता है, वरन् उसे पीछे भी छोड़ देता है। चिम्पैंजी जंगल में अपने आसपास के वायुमण्डल के सम्बन्ध में बहुत अधिक सतर्क रहते हैं। जंगल में जब ये एक दूसरे को पुकारने के लिए किलकारी करते हैं तो मनुष्य के लिए उसकी आवाज कान फाड़ देने वाली सिद्ध होती है। जब इन्हें पकड़कर कहीं रख लिया जाता है और ये नये व्यक्तियों को देखते हैं तो इतनी जोर से चीखते हैं कि इनके रखवालों को कनटोप पहन लेना पड़ता है।
चिंपैंजी मनुष्य के हावभाव और सिखाई जाने वाली बातों का बहुत शीघ्र अनुकरण करने लगते हैं। उनकी प्रकृति का अध्ययन करने वालों में गार्डनर तथा उनकी पत्नी बीट्राइस प्रमुख रही हैं। 11 वर्ष गार्डनर दम्पत्ति ने एक आठ मास के चिंपैंजी को सिखाना आरम्भ किया। चिंपैंजी को बाकायदा नाम भी दिया गया-बाशोई। गार्डनर दम्पत्ति ने बशोई को अमेरिका सांकेतिक भाषा सिखाई जो प्रायः गूँगों, बहरों को सिखाई जाती है। जब वह चिंपैंजी 5 का वर्ष हो गया तो उसे इस भाषा के 132 संकेतों का अच्छी तरह अभ्यास हो गया।
बाशोई के अलावा गार्डनर दम्पत्ति ने 4 और चिंपैंजी वाले जिनमें से एक का नाम भोजा। भोजा अब चित्र भी बनाने लगा है। उसने अपनी प्रतिभा का प्रथम परिचय श्याम पट पर एक चाक से दिया। भोजा प्रायः अपने मानव सम्बन्धियों को चित्र बनाते हुए देखता रहता था। एक दिन भोजा को न जाने क्या सूझी कि उसने चाक उठाया और लगा ब्लैक बोर्ड पर एक डिजाइन बनाने। जब वह डिजाइन बना चुका तो उसने संकेत दिया कि मेरा काम खत्म हो गया है।
यह पूछा जाने पर कि यह क्या है तो भोजा में सांकेतिक भाषा में उत्तर दिया-यह पक्षी है।
सिखाने पर कोई भी व्यक्ति कुछ भी समझ सीख सकता है, परन्तु उसमें जटिलता के अनुसार सीखने समझने की सामर्थ्य में भी अन्तर आ जाता है। उदाहरण के लिए कम्प्यूटर की कार्य प्रणाली इतनी जटिल है कि उसे चलाना हर किसी के बस की बात नहीं होती, परन्तु एक तीन वर्षीय चिंपैंजी लाना कम्प्यूटर चलाने में भी समर्थ है। उसकी विशेषता यह है कि वह अनुसन्धान कर्त्ताओं के प्रश्नों का उत्तर मशीन से मनुष्य चालकों की अपेक्षा अधिक शीघ्रता और कुशलता से उत्तर देता है।
इन घटनाओं को अपवाद भी कहा जाय तो रोजमर्रा के जीवन में चौराहों पर मजमा लगाकर मदारी के इशारों पर खेल दिखा रहे बन्दरों को देखा जा सकता है। अपने मास्टर का इशारा पाकर वे बन्दर कैसे-कैसे आश्चर्यजनक करतब कर लेते हैं, देखते ही बनता है। भालू भी बन्दरों की ही तरह कोई आदत या अभ्यास को तुरन्त ग्रहण कर लेता है। सरकस में तो घोड़े, शेर, बकरी, हाथी तक मनुष्यों से न हो सकने वाले काम सीख लेते हैं और अपने मास्टर के निर्देशन में खेल दिखाकर लोगों को चमत्कृत कर देते हैं।
कहा जा सकता है कि किसी कार्य का अभ्यास करना या बार-बार दोहरा कर उसे सीख लेना बुद्धिमत्ता नहीं है। बुद्धिमानी का अर्थ मौलिक सूझबूझ है जो किसी भी अवसर या घटना विशेष पर तुरन्त निर्णय लेकर अमल में ले आये। इस मौलिक सूझबूझ को प्रत्युत्पन्नमति भी कहा जा सकता है। अन्य प्राणियों में प्रत्युत्पन्नमति नहीं होती। जैसे किसी तोते को रटा दिया जाय कि “डर मत डर मत।” तोता हमेशा यही दोहराता रहे-डर मत डर मत” परन्तु बिल्ली दिखाई देते ही तोता टें-टें करने लगता है। उस समय न इससे उड़ते बनता है न डर मत डर मत का पाठ करते।
आकस्मिक घटनाओं में फँसकर तुरन्त निर्णय लेने की क्षमता तो मनुष्यों में भी बहुत कम होती है। शौर्य, पराक्रम और साहस पर घण्टों भाषण देने वाले लोग स्वयं संकट के समय घबड़ाकर भागते या हड़बड़ाहट में उस संकट को और गम्भीर बनाते देखे गये है। वस्तुतः मनुष्य में जो कुछ बुद्धिमता दिखाई देती है, उसका अस्सी प्रतिशत भाग सीखा और दोहराया गया भर होता है। बार-बार अभ्यास से वह बात उसके दिमाग में डाल दी गयी भर होती है। उदाहरण के लिए चार पाँच वर्ष का होते ही बच्चे को अक्षर ज्ञान कराया जाता है, पाठों को दोहराना और अक्षरों को पहचानना सिखाना जाता है। जो भाषा वह बचपन में सीख लेता है वह उसे आजीवन याद रहती है। इसी प्रकार आदतें, स्वभाव और प्रकृति भी बहुत कुछ दूसरों की देखा−देखी सीखी जाती है।
जिसे मौलिक बुद्धि कहा जा सके, वह क्षमता बहुत कम लोगों में होती है क्योंकि मनुष्य जो कुछ भी सीखता समझता और उस आधार पर सभ्य, समझदार दिखाई देता है वह समाज में रहने के कारण ही हैं। जिस वातावरण में वह रहता है, वह वातावरण उसे अनुरूप बनने के लिए प्रेरित करता है। बचपन से ही उसे सीखना सिखाया जाता है इसलिए वह आगे चलकर बिना सिखाये भी बहुत कुछ सीख लेता है।
मौलिक बुद्धि जैसी कोई चीज न होने पर भी मनुष्य को श्रेष्ठ सिद्ध करने के लिए भावनाओं का आधार लिया जा सकता है। मनुष्य में भावनाएँ होती हैं, यही ठीक है, परन्तु पशुओं में भी यह भाव सम्वेदनाएँ होती है और वे मनुष्य से ज्यादा उन्हें अनुभव करते हैं। अन्तर है तो इतना ही कि मनुष्य भावनाओं को व्यक्त कर सकता है और पशु-पक्षी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर सकते।
भावों की यह अभिव्यक्ति भी मनुष्य अपने परिवार और समाज से ही सीखता है। मनुष्य के संसर्ग में रहने वाले अन्य कई प्राणी, पशु-पक्षी भी अपनी भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करना सीख जाते हैं और उन्हें व्यक्त भी करते हैं। कहा जाता है कि मनुष्य के पास अपने भावों को व्यक्त करने के लिए एक समर्थ और समृद्ध भाषा है। अन्य प्राणियों के पास कोई आधा नहीं है। लेकिन यह एक भ्रम भी हो सकता है कि अन्य प्राणियों के पास भाषा नहीं है। हो तो उन्हें भी देखा जा सकता है। यह बात और है कि मनुष्य उनकी वाणी को सुनता तो है, परन्तु समझ नहीं सकता अथवा मनुष्य ने अपनी भाषा का आवश्यकता के अनुसार अधिक विकास कर लिया और अन्य प्राणी उस क्षेत्र में पीछे रह गये। लेकिन यहाँ आकर मनुष्य को मात खा जानी पड़ती है। कोई मनुष्य आज तक पशु-पक्षिओं की भाषा में बात करने या समझने में समर्थ नहीं हो सका है, जबकि जानवर उसके भाव यहाँ तक कि उसकी भाषा को समझने का अभ्यास बहुत जल्दी कर सकते हैं।
मनःशास्त्र वेत्ता पेटरराक ने एक चिंपैंजी पाला जिसे नाम दिया ‘कोको।’ कोको के सम्बन्ध में राक का दावा है कि वह अपनी भावनाओं को भी व्यक्त कर सकता है। कोको ने 5॥ वर्ष की आयु में सांकेतिक भाषा के 300 वाक्य सीख लिए।
कुछ और मनोवैज्ञानिकों ने कोको की परीक्षा ली तो उसने प्रत्येक व्यवहार की प्रतिक्रिया व्यक्त की और हर्ष उल्लास के साथ खेद व दुःख भी व्यक्त किया।
शरीर, बुद्धि, भावनाएँ उनकी अभिव्यक्ति और भाषा की दृष्टि से मनुष्य का अन्य प्राणियों की तुलना में बढ़ा-चढ़ा होना मात्र एक भ्रम है। यह आभास जरूर होता है कि वह अन्य प्राणियों से बढ़ा-चढ़ा और उन्नत है। सम्भव है यह भ्रम अन्य प्राणियों में भी हो। जिन आधारों पर मनुष्य की श्रेष्ठता सिद्ध की जाती है, वे तो झूठे हैं ही परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि वस्तुतः मनुष्य अन्य प्राणियों के समान ही है। निस्सन्देह मनुष्य अन्य प्राणियों की तुलना में श्रेष्ठ और परमात्मा का सबसे बड़ा पुत्र है। क्योंकि मनुष्य जीवन एक अवसर है जिसमें यह सिद्ध किया जा सकता है कि परमात्मा ने हमें जो वस्तुएँ, जो विशेषताएँ और जो अधिकार दिये हैं उनका हम सदुपयोग कर सकते हैं और अपनी प्रामाणिकता, कर्तव्यपरायणता के आधार पर और अधिक उच्च स्थिति प्राप्त करने के योग्य सिद्ध कर सकते हैं।
छोटा भाई वासुदेव फाँसी के तख्ते पर चढ़ने जल्लादों के साथ जा रहा था। रास्ते में बड़े भाई की कोठरी पड़ी जिसमें वह भी जल्दी ही फाँसी पर चढ़ने की प्रतीक्षा कर रहा था। वासुदेव ने जोर से कहा-
“भैया विदा, मैं चला.........”
उत्तर में बालकृष्ण ने कहा-
“चलो, मैं भी दो दिन बाद आ मिलूँगा। दामोदर को कहना- हम तीनों ही मिलेंगे और फिर मिलकर भारत माता पर इसी तरह शीश चढ़ाएंगे।”
चाफेकर बन्धु तीन भाई थे, दामोदर, बालकृष्ण, वासुदेव। तीनों को फाँसी लगी।
दामोदर ने अँग्रेज कमिश्नर को गोली मारी थी। बालकृष्ण बम काण्ड के प्रमुख थे और वासुदेव ने उन दोनों मुखबिरों को गोली से उड़ा दिया था जिनने उनका भेद खोला था। स्वतन्त्रता ऐसे ही बलिदानियों के रक्त का मूल्य पाकर प्राप्त हुई है।
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यज्ञ की धूमशिखाओं से आकाश आच्छादित हो रहा था। महाराज रथवीति दार्म्य की राजधानी में वेद मन्त्रों की पुनीत ध्वनि गूँजने लगी थी। वे अपनी राजमहिषी और मनोरमा कन्या के साथ यज्ञवेदी के समीप ही आसीन थे।
‘कितनी सुशील और लावण्यमयी है यह कन्या!-अत्रिपुत्र ऋषि अर्चनाना ने यज्ञ कुण्ड में वेदमन्त्रों से आहुति देते हुए मन में विचार किया। धवलोज्वल श्वेत दाढ़ी के साथ तपःतेज से दीप्त मुखमण्डल पर चमकती हुई आभा और भी प्रगाढ़ हुई। तभी उन्होंने अपने पुत्र श्यावाश्य की ओर निहारा। श्यावाश्य ने पच्चीस वर्ष तक आश्रम में ब्रह्मचर्य पूर्वक रहकर अन्तेवासी की दीक्षा प्राप्त की थी। यह दीक्षा उन्हीं छात्रों को मिलती थी जो वेद वेदांगों में विशेष दक्षता प्राप्त कर लेते थे। ऋषि कुमार में यौवन का निखार था नेत्रों में सात्विकता और हृदय में श्रद्धा भक्ति थी।
आकांक्षा हुई कि महाराज से राजकन्या का हाथ अपने पुत्र के लिए माँग ले। यज्ञ पूर्णाहुति के बाद समय पाकर अर्चनाना ने रथवीति और राजमहिषी से कहा- ‘मैं आपकी कन्या को अपनी पुत्रवधू बनाने के लिए याचक रूप में प्रस्तुत हूँ महाराज!’
‘यह तो आपकी बहुत बड़ी कृपा है, मेरी कन्या के लिए इससे बढ़ कर सौभाग्य और क्या होगा कि वह महर्षि अत्रि के आश्रम में वास करेगी?’-महाराज रथवीति ने अर्चनाना के प्रति श्रद्धा व्यक्त की।
महर्षि अर्चनाना अपनी आकांक्षापूर्ति का आश्वासन प्राप्त हुआ जान सन्तोष का भाव पूरी तरह अनुभव भी नहीं कर पाये थे कि राजमहिषी ने कहा-”लेकिन हमारा कल राजर्षियों का कुल है महात्मन्! हमारी कुलमर्यादा है कि हम अपनी कन्या मन्त्रदर्शी ऋषि को ही सौंप सकते हैं। क्या ऋषि कुमार मंत्रद्रष्टा हैं?”
आशा और सन्तोष की दीप्त हो रही भाव शिखा जैसे किसी ने झपट कर बुझा दी हो, वैसा लगा अर्चनाना को। वे श्यावाश्व को लेकर आश्रम आ गये। खिन्न भी थे और उदास भी। जीवन में पहली बार योग्यता के अभाव में निराश होना पड़ा था। राजधानी में क्या घटा था, यह उन्होंने अपने पुत्र को भी नहीं बताया था परन्तु श्यावाश्व से पिता की मनःस्थिति छुपी न रह सकी। ऋषि कुमार ने पिता की व्यथा को उगलवा ही लिया। और निश्चयात्मक स्वर में कहा-’पिताजी! मैं अपनी कुल योग्यता सिद्ध करने के लिए ऋषि पद प्राप्त करूंगा, राजकन्या उतनी महत्व की वस्तु नहीं है जितने महत्व का विषय ऋषिपद है। बताइये इसके लिए क्या करूँ।
‘मन्त्रदर्शन की साधना वत्स।’-अर्चनाना ने कहा।
‘उसका क्या स्वरूप है? तात्।
‘ब्रह्मचर्य पूर्वक भिक्षाटन, प्रव्रज्या, शिक्षण और चिन्तन मनन’-अर्चनाना ने समझाया और श्यावाश्व अपने पिता की चरण धूलि लेकर निकल पड़े। स्नातक ब्रह्मचारी तो वह थे ही, आश्रम का निर्वाह भी भिक्षाटन से ही होता था, ऋषि कुमार का चिन्तन मनन भी निरन्तर ही चलता रहता था। मन्त्रदर्शन की साधना में नया अंग था केवल प्रव्रज्या और लोकशिक्षण का।
दीर्घकाल तक श्यावाश्व ने नगर, ग्राम, वन और प्रान्तर का भ्रमण किया। लोक जीवन को निकट से देखा, समाज देवता की आराधना की, जनमानस को दिशा प्रेरणा और शिक्षण देते हुए। महाराज विदेदश्व, तरन्त, राजमहिषी, शशीयसी, पुरुभीड़ आदि नरेशों ने ऋषिकुमार का यथेष्ट स्वागत सत्कार किया। उन्हें कितनी ही गायें और अपार धन राशि दक्षिणा में दी। परन्तु ऋषिकुमार भिक्षा में प्राप्त राशि का निर्वाह भाग रख कर शेष सब आश्रम पहुँचा देते। और निरन्तर भ्रमण, अनवरत पर्यटन, अविराम परिव्रज्या करते रहे।
पुत्र विछोह से व्याकुल अर्चनाना एक बार श्यावाश्व को देखने आये। श्यावाश्व से उन्होंने आश्रम चलने और वहाँ कुछ दिन निवास करने के लिए कहा तो श्यावाश्व ने कहा-तात मैंने अभी मन्त्रदर्शन नहीं किया है और आश्रम में आ जाऊँगा तो मेरे व्रत में व्यतिक्रम आ जायेगा।
यह कह कर श्यावाश्व उस स्थल से भी चल पड़े। अन्ततः साधना परिपक्व होने पर रुद्र पुत्र मरुद्धाषों ने श्यावाश्व को दर्शन दिये और उनकी कृपा से श्यावाश्व ने मन्त्रदर्शी ऋषि का पद प्राप्त किया। मरुद्धाषों ने श्यावाश्व को रुक्ममाला दी।
श्यावाश्व ने आश्रम की ओर प्रस्थान किया। गले में रुक्ममाला और मुखमण्डल पर प्रदीप्त ब्रह्मतेज देख कर अर्चनाना ने पुत्र को सीने से लगा लिया, तुम्हारे पुण्य से हमारा कुल उज्ज्वल हो गया वत्स। अब तक हमारे कुल में कोई भी ब्रह्मचारी ऋषिपद को प्राप्त नहीं कर सका था।
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‘साइकिकल रिसर्च सोसायटी’ तथा परामनोविज्ञान की अन्य शोध-संस्थाओं ने अपनी खोजों से पुनर्जन्म-प्रतिपादक अनेक अद्यतन-आधार जुटाये हैं। इससे जहाँ जीवन के बारे में भारतीय तत्वदर्शियों की मान्यताएँ खरी सिद्ध हुई हैं, वहीं पुनर्जन्म कौर कर्मफल सम्बन्धी प्रतिपादन भी नये सिरे से प्रमाणित हुआ है? तथा संस्कारी का सातत्य और क्रमबद्धता सामने आयी है।
पुनर्जन्म का अभिप्राय यह नहीं कि फिर नये सिरे से जीवन-विकास में जुटना होगा। यदि हर बार व्यक्ति वैसी ही आन्तरिक स्थिति में पैदा हो। मन, बुद्धि, अन्तःकरण के नये सिरे से विकास हेतु प्रयास शुरू करना पड़े। मृत्यु के पूर्व तक अपने गुणों और अपनी क्षमताओं को चाहे जितना बढ़ा लेने और परिपक्व बना लेने पर भी अगले जीवन में यदि उनकी कोई उपयोगिता न रहे, तब पुनर्जन्म होने पर भी उसका कोई दार्शनिक और नैतिक महत्व नहीं रह जायेगा। पुनर्जन्म का अर्थ भौतिक तत्वों के एक निश्चित क्रम-संघात का पुनरावर्तन हो और स्मृति-कोषों का कोई अंश-विशेष ही उसका एकमात्र सातत्य-सूत्र हो, तब पुनर्जन्म की प्रक्रिया की मानव-जीवन में कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं रह जायेगी। किन्तु वस्तुस्थिति इससे सर्वथा भिन्न है। अगले जीवन में चेतना का वह स्तर जन्मतः उपलब्ध होता है, जो वर्तमान जीवन में विकसित कर लिया गया हो। इस प्रकार प्रगति का तार टूटता नहीं और मानवीय चेतना सतत् विकसित होती चलती है।
भौतिक दृष्टि से पुनर्जन्म एक पुनरावर्तन जैसा ही प्रतीत होने पर भी, वह वस्तुतः जीवन-यात्रा का अगला चरण है। विकास का अगला क्रम है। पुनर्जन्म सतत् गतिशीलता का अगला आयाम है। शरीर की दृष्टि से तो उस नये जीवन में भी शैशव, यौवन, जरा, मृत्यु का क्रम पूर्ववत् ही रहता है। देह-धर्म तो उसी क्रम से चलता है। किन्तु मन, बुद्धि, अन्तःकरण में समायी चेतना जिस स्तर तक विकसित हो जाती है, वहाँ से पीछे नहीं लौटती प्रयत्न और साधन के अनुरूप आगे ही बढ़ती है।
पाप हो या पुण्य, उसका फल उसकी मात्रा व गुण के आधार पर ही मिलता है। न तो कोई भी कर्म बिना किसी प्रतिक्रिया-परिणाम के रहता और न ही किसी भी कर्म का परिणाम अनन्त होता है। जहाँ कर्मफल भोगना-अनिवार्य है, वहीं यह भी निश्चित है कि पाप हो या पुण्य, अपनी गुरुता या लघुता के अनुसार उसके परिणामों का भी अन्त होता है। तब अपनी अन्तश्चेतना में संचित-संकलित स्मृतियों, गुण-धर्म, संस्कारों और सामर्थ्य के साथ आत्मा पुनः नये शरीर में अवतरित होती है। विगत जीवन में अर्जित-उपलब्ध शिक्षाएँ-दिशाएँ नये जीवन की प्रवृत्ति-प्रेरणाएँ बनती हैं और विकास पथ पर आगे बढ़ने के आधार प्रस्तुत करती हैं। इसीलिए मनुष्य-योनि को कर्मयोनि कहा गया है। प्रत्येक मनुष्य जहाँ अपनी अन्तःप्रकृति के गुण-धर्म-स्वभाव से प्रेरित होता है, वहीं वह अपने विवेक से इन प्रेरणाओं पर अनुशासन-नियंत्रण भी स्थापित कर सकने में समर्थ है। तपश्चर्या, साधना द्वारा वह अपनी अन्तःप्रकृति का परिष्कार कर सकने, उसे नयी विशेषताओं-विभूतियों से सम्पन्न बना सकने में भी सक्षम है। पुनर्जन्म के शास्त्रीय सिद्धान्तों से यह तथ्य भी स्पष्ट होता है कि कोई प्राणी बार-बार इसी जगत में जन्म ले, यह आवश्यक नहीं। अनन्त ब्रह्माण्ड के किसी भी ऐसे लोक में वह जन्म ग्रहण कर सकता है, जहाँ जीवन्त प्राणियों का निवास हो और जो लोक उसकी सूक्ष्म इन्द्रियों तथा चेतना-स्तर के अनुरूप हो।
पुनर्जन्म के सम्बन्ध में सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यही है कि उससे इस जन्म में अर्जित विकसित प्रवृत्तियों का प्रभाव अगले जीवन में भी प्रमाणित होता है। पुराणों में पुनर्जन्म की जो कथाएँ वर्णित हैं, उनमें भी चेतना-स्तर का सातत्य दिग्दर्शित है। संस्कारों का महत्व प्रतिपादित करने वाली ये पुराकथाएँ हमारे मनीषी पूर्वजों ने इसी उद्देश्य से संकलित की हैं, जिससे व्यक्ति कर्मफल की अनिवार्यता के सिद्धान्त को भली-भांति समझकर सत्प्रवृत्तियों का तत्काल सत्परिणाम न दिखने पर भी हतोत्साहित न हो और श्रेयस के पथ पर पुरुषार्थ, कौशल साहस एवं धैर्य के साथ बढ़ता रहे।
पद्मपुराण के अनुसार सोमशर्मा नामक तपस्वी साधक हरिहर-क्षेत्र में साधना-निरत थे। उनके जीवन का अन्तिम समय निकट था, तभी दैत्यों की एक टोली वहाँ पहुँची और भयानक उपद्रव किया। इस प्रकार अन्तकाल में उनके स्मृति-पटल पर दैत्यों की यह छवि अंकित हो गई। सात्विक प्रकृति के साधक वे थे ही। उनका सूक्ष्म शरीर मृत्यु के तत्काल बाद दैत्यराज हिरण्यकशिपु की पत्नी कयाधु में प्रविष्ट हुआ। प्रहलाद के रूप में वे प्रकट हुए। जन्मतः ही उनकी अन्तश्चेतना परिष्कृत-उदात्त थी। दैत्य-दुष्प्रवृत्तियों के प्रति उनमें प्रबल विरोध भाव भी था। यही बालक प्रहलाद अपनी तपश्चर्या से भगवान के नृसिंहावतार का कृपाभाजन और दानवराज हिरण्यकशिपु के नाश का कारण बना।
स्कन्दपुराण में बलि की कथा के द्वारा सत्प्रवृत्तियों के क्रमिक अभिवर्धन का सत्परिणाम गिनाया गया है। देव ब्राह्मण निअंक जुआरी था, पर साथ ही उसमें दान की उदार प्रवृत्ति भी विद्यमान थी। एक बार जब जुए में उसने पर्याप्त धन कमा लिया, तो मद्यपान कर एक वेश्या के घर की ओर चला। मार्ग में मूर्छित हो गिर पड़ा। होश आने पर ग्लानि और प्रायश्चित्त-भावना से वह भर उठा। उसने अपने धन का एक अंश शिव-प्रतिमा को समर्पित कर दिया।
उस दिन से शिवत्व के प्रति यह आकर्षण उसमें उभरता ही गया। मृत्यु के उपरान्त उसे अपने अल्प पुण्य कर्मों के फलस्वरूप तीन घड़ी के लिये स्वर्ग का शासन प्राप्त हुआ। तब तक सत्प्रवृत्तियों का महत्व वह समझ चुका था। स्वर्ग के भोगों की ओर उसकी रंचमात्र रुचि नहीं जगी। उल्टे इस पूरी तीन घड़ी तक वह स्वर्ग की बहुमूल्य वस्तुएँ सत्पात्र श्रेष्ठ ऋषियों को लगातार दान करता रहा। इससे उसी पुण्य-प्रवृत्ति और गहरी हुई। अगले जन्म में वह महादानी बलि बना।
आधुनिक अनुसंधानों ने भी संस्कारों के महत्व को भी प्रतिपादित किया है। फ्रांस में गे-दम्पत्ति के यहाँ एक बच्ची पैदा हुई-थिरीज गे। तीन माह की वय में उसने बोलना शुरू किया। परन्तु अपने जीवन में पहला शब्द उसने अपनी मातृ-भाषा फ्रेंच में नहीं, एक ऐसी भाषा में बोला, जो न तो माँ जानती थीं, न पिता। उन लोगों ने वह शब्द डायरी में अपनी बुद्धि से नोट किया-”अहस्यपाह।” वे इस विचित्रता पर हँसते रहे।
तीन वर्ष की होने पर इस लड़की ने माँ-पिता को तब फिर विस्मित किया, जब वह अंग्रेजी शब्द अधिक बोलने लगी। यद्यपि अभिभावकों का आग्रह फ्रेंच पर था। फिर भी उनके घर-परिवार में अंग्रेजी कोई अपरिचित भाषा न होने के कारण, उन लोगों ने इसे बालिका की भाषिक-प्रवृत्ति का झुकाव विशेष माना। वास्तविक विस्मय तो तब शुरू हुआ, जब वह बच्ची किन्हीं मि0 गाँधी के बारे में बोलने-बतलाने लगी। माँ-बाप ने मामले को कुछ अनोखा ही समझा उसकी सूचना अखबारों को दी। ‘साइकिकल रिसर्च सोसायटी’ के अध्येताओं ने इसमें रुचि ली। तब जाकर इस तथ्य की ओर ध्यान गया कि तीन माह की उम्र में बालिका ने जिस शब्द का उच्चारण किया, वह संस्कृत का “अरूपाः” था। गाँधी को बच्ची के माँ-बाप तो नहीं जानते थे, पर फ्रांस के अध्येता जानते थे। उन्होंने बात की, तो पाया कि लड़की गांधी जी के बारे में बहुत-सी बातें विस्तार से बतलाती है। बच्ची का कथन था कि वह गांधी जी के साथ दक्षिण-अफ्रीका के प्रवास-काल में रही है। इस प्रकार पिछले जन्म की स्मृतियाँ तथा संस्कृत और अँग्रेजी का ज्ञान ही उसके साथ था, धन-उपकरण नहीं।
कोरिया के सियोल नगर का एक बालक किन अंग यांग बिना भाषायी शिक्षण के ही धारा प्रवाह अँग्रेजी और जर्मन बोलने लगा। गणित की “डिफरेन्शल एन्ड इन्टेग्रल-केलकुलस” की समस्याएँ बिना गणित का विशेष शिक्षण पाये सुलझाने लगा और श्रेष्ठ दार्शनिक कविताएँ लिखने लगा। अन्ततः उसे अध्ययन के लिये अमरीका में एक उच्च अध्ययन संस्थान में प्रवेश मिल गया। इस बच्चे की ये विशेषताएँ परामनोवैज्ञानिकों की दृष्टि में पिछले जन्म की अर्जित शक्तियों का एक प्रमाण हो सकती हैं।
परामनोवैज्ञानिक मेयर ने अपनी पुस्तक “ह्यूमन पर्सनालिटी” में अमरीका की पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी में असीरियन-सभ्यता के विशेषज्ञ प्राध्यापक हिल प्रेचट द्वारा बेबीलोनिया-साम्राज्य की एक मणि पर खुदे अक्षरों को सहसा पूर्वजन्म की स्मृति से पढ़ लेने का वर्णन किया है। इन प्राध्यापक को उस लिपि व भाषा का ज्ञान नहीं था। अकस्मात् दिवा स्वप्न की तरह उनके दिमाग में वह अर्थ कौंध गया, जो बाद में उस लिपि के विशेषज्ञों द्वारा सही बताया गया। इससे यह अनुमान किया गया कि ये प्राध्यापक पूर्वजन्म में असीरियाई नागरिक थे और उसका संस्कार इतना गहरा था कि इस बार अमरीका में जन्म लेने पर भी वे असीरियाई-सभ्यता के ही अध्ययन की ओर अधिक प्रवृत्त हुए।
इस प्रकार यद्यपि उनके पिछले जन्म की स्थिति ने इस जीवन में उनके विषय के विद्वान प्राध्यापक बनने के साधन जुटाये, तो भी यह दक्षता जन्मजात नहीं थी। जन्म से तो उस दिशा में प्रवृत्ति-विशेष ही साथ थी। अन्तरंग में उमड़ रही उस प्रवृत्ति ने ही सफलता का पथ प्रशस्त किया। वस्तुतः प्रवृत्तियाँ और संस्कार ही जन्म जन्मान्तर के साथी-सहयोगी होते हैं।
मरणोत्तर जीवन की मान्यता और संस्कारों का दूरगामी प्रभाव-परिणाम अध्यात्म-दर्शन का एक बड़ा आधार है। चिन्तन की शैली, आकांक्षा और दिशा का प्रभाव न केवल इस जीवन में विविध हलचलों की केन्द्रीय प्रेरणा के रूप में क्रियाशील रहता है, अपितु अगले जीवन में भी यह प्रभाव बना रहता है। व्यक्तित्व को विकसित एवं परिवर्तित कर सकने की वास्तविक शक्ति इन्हीं संस्कारों की प्रखरता में सन्निहित है। संस्कार किसी ग्रह-नक्षत्र की कृपा से नहीं बनते-बिगड़ते। मनुष्य अपने मनोबल, विवेक और पुरुषार्थ से ही उन्हें निखारता है। अतः सत्संस्कारों को ही जन्म-जन्मान्तर तक साथ देने वाले अभिन्न-मित्र समझकर उनकी संख्या और शक्ति बढ़ाने के लिए सदा सजग रहने में ही बुद्धिमानी है।
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न्यूयार्क की एक अदालत में नगर के ही एक दम्पत्ति ने अलग-अलग मुकदमे दायर किये। पति ने पत्नी पर और पत्नी ने पति पर लांछन लगाकर परस्पर सम्बन्ध विच्छेद की अभियाचनायें प्रस्तुत की थीं। एक दूसरे पर लगाये गये अभियोग सच रहे हों या झूठ, इनसे एक बात निर्विवाद सिद्ध थी कि पारिवारिक जीवन में जो स्नेह आत्मीयता और संवेदना अभीष्ट होती है उनमें उसका नाम मात्र भी अंश नहीं था।
जज ने जो निर्णय दिया, उसे दूसरे लोग विलक्षण कह कर संतोष कर सकते हैं, पर उसके भीतर छिपा विचार शीलता का दर्द ऐसा है जिसकी ओर से आँखें नहीं मूँदी जा सकतीं। विद्वान न्यायाधीश ने सजा सुनाते हुए कहा-आप दोनों एक वर्ष तक चिड़िया घर में जानवरों के बीच रहिये ताकि आप लोगों को यह ज्ञात हो जाये कि पारिवारिक जीवन किसे कहते हैं।
पारिवारिकता वस्तुतः मनुष्य के विचारवान तथा भावनाशील होने का सबसे बड़ा उदाहरण है। यह संयम और सहिष्णुता की ऐसी पाठशाला है। जहाँ से व्यक्ति तृष्णा-वासना, अहंता के मानवीय दुर्गुणों को दूर भगाने का अभ्यास करता है। सृष्टि का सौरभ, समाज की शान्ति सुव्यवस्था का आधार ही यह है कि मनुष्य स्वयं का जितना ध्यान रखे उतना ही दूसरों का भी। परिवार इस आदर्श के परिपालन की इकाई है। खेद है कि आज का इन्सान इस मानवीय सद्भावना से निरन्तर वंचित होता जा रहा है। जबकि अशिक्षित, उद्दंड और स्वार्थी समझे जाने वाले इतर जीवों में ये भावनायें अत्यन्त गहराई तक देखने को मिलती हैं। कुछ जीवों में तो स्नेह-पूर्ण आत्मदान ही ऐसी सजीव परंपराएं देखने को मिलती हैं कि हृदय छलक उठता है, दम्भी मनुष्य का सिर लज्जा से झुक जाता है।
डॉ0 इराउर्ल्फट ने अंटार्कटिक प्रदेश की यात्राओं के जो रोचक वर्णन प्रस्तुत किये हैं उनमें यह प्रसंग बड़ी मार्मिकता के साथ उभारा गया है। उन्होंने एडला पेन्गुइन पक्षी के पारिवारिक सौहार्द्र का चित्रण करते हुए लिखा है कि पेन्गुइन समुद्र में रहते हैं। दक्षिणी ध्रुव प्रदेश होने के कारण यहाँ समुद्र 8-8 फीट मोटी बर्फ की चादरों से ढका रहता है। पेन्गुइन उसमें 30 मील प्रति घंटे की गति से फिसल कर चल लेते हैं। समुद्र में उन्हें कीड़े-मकोड़े, सेवार जो कुछ मिल जाता है उसी से वे अपना उदर पोषण करते रहते हैं।
अण्डे देने और बच्चे सेने के लिए यह पक्षी गोल पत्थरों से एक विलक्षण बनाते हैं। जिसे “रुकरी” कहा जाता है। मादा को जब भी अण्डे देने होते हैं वह इसी रुकरी में चली आती है। आहरा व्यवस्था कठिन होने के कारण इस प्रसव काल के लिए संग्रह सम्भव नहीं हो पाता, जबकि प्रसव के बाद मादा को न केवल क्षुधा सताती है, अपितु शरीर में निर्बलता भी आ जाती है। यह स्थिति कब तक आयेगी, नर एडली (पेन्गुइन) को उसका अनुमान रहता है। वह ठीक समय पर मादा के पास पहुँच जाता है। जिस समय परिवार का कोई भी सदस्य आता है। मेजवान पेन्गुइन अपने स्थान से उछल कर आगे बढ़ती और चोंच और गर्दन हिलाती हुई तथा ग ग ग ग ग उच्चारण करती हुई भाव विभोर होकर उसका स्वागत करती है।
पेन्गुइन को कई बार 6 सप्ताह तक बिना आहार अपने बच्चों के पोषण और सुरक्षा में बिताना पड़ता है इतने दिनों में शारीरिक स्थिति कितनी चिन्ताजनक हो जाती होगी सप्ताह में एक भी दिन निराहार न रहने वाला मनुष्य उसे भली-भांति अनुभव कर सकता है। इसका अर्थ यह हुआ कि जीव-जन्तुओं में कई गुनी अधिक सहिष्णुता हुई जबकि होना इससे उलटा चाहिए।
विद्वान न्यायाधीश का इस निर्णय के पीछे यही मन्तव्य रहा है। यदि मनुष्य स्वयं विचार नहीं कर सकता तो कम से कम वह अपने इन छोटे कहे जाने वाले भाइयों से सीख तो सकता है।
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अच्छा करना तभी सम्भव हो सकता है, जब उसके मूल में अच्छा चिन्तन भी उत्कृष्टता की प्रेरणा भरता रहे। करना मूल्यवान है, पर सोचना अव्यक्त होते हुए भी क्रिया-कलाप के समतुल्य ही महत्वपूर्ण है। लोगों को श्रेष्ठ काम करने के लिए कहा जाय, पर साथ ही उन्हें यह भी सुझाया जाय कि कर्म का बाह्य स्वरूप ही सब कुछ नहीं है, उसकी आत्मा तो उद्देश्यों में निवास करती है।
अन्तर्राष्ट्रीय मसीही धर्म सम्मेलन में उद्बोधन करते हुए संसार के ईसाई जगद्गुरु-आर्कविशप कार्डिनल ग्रासीयास ने कहा था-मसीही धर्म समेत समस्त धर्मावलम्बियों को अपने सहयोग का क्षेत्र अधिकाधिक व्यापक बनाना चाहिए। यह सहयोग पारस्परिक सद्भाव, सहानुभूति और विश्वास पर आधारित होना चाहिए। धर्म की मूल धारणा और ईश्वर प्रदत्त न्याय की समूची परम्परा की रक्षा, उसका विकास और उसे समृद्ध बनाने जैसे महान् कार्यों में विभिन्न धर्म मिल-जुलकर काम कर सकते हैं।
अनास्था का संकट सभी धर्मों के सामने समान रूप से है। उद्योग, विज्ञान और विकृत तर्कवाद ने जो अनास्था उत्पन्न की है, उससे प्रभावित हुए बिना कोई धर्म रहा नहीं है। संचित कुसंस्कारों की, पशु प्रवृत्तियों को इस अनास्था ने और भी भड़काया है, फलतः समूची मनुष्य जाति स्वार्थान्धता और दुष्टता की काली छाया से ग्रसित होती चली जा रही है।
धर्म का तात्पर्य है-शालीनता एवं नीतिमत्ता। यह प्रयोजन उच्चस्तरीय आस्थाओं के सहारे ही सधता है। दैनिक जीवन के प्रत्येक क्रिया कृत्य के साथ सज्जनता और उदारता के तत्वों को संजो देने की विचार पद्धति का नाम अध्यात्म है। आध्यात्मिकता का चक्र आस्तिकता की धुरी के इर्द-गिर्द घूमता है। इन सबका परस्पर सम्बन्ध और तारतम्य है। एक कड़ी तोड़ देने से यह समूची जंजीर ही बिखर जाती है। वैयक्तिक जीवन में जिसे नीतिमत्ता कहते हैं, वही सामूहिक रूप में विकसित होने के उपरान्त सामाजिक सुव्यवस्था बन जाती है। प्रगति और समृद्धि की सुख और शान्ति की आधार शिला इसी पृष्ठभूमि पर रखी जाती है।
नीति क्या है? इसका उत्तर उतना सरल नहीं है जितना कि समझा जाता है। उसका स्वरूप कई विचारक कई तरह से प्रस्तुत करते हैं। नीति शास्त्री सिज्विक ने अपने ग्रन्थ “मैथड आफ एथिक्स” में लिखा है सत्य बोलना अपरिहार्य नहीं है। राजपुरुषों को अपनी गतिविधियाँ गुप्त रखनी पड़ती हैं। व्यापारियों को भी अपने निर्माण तथा विक्रय के रहस्य छिपाकर रखने पड़ते हैं। अपराधों को पकड़ने के लिए जासूसी की कला नितान्त उपयोगी है उसमें दुराव और छल का ही प्रश्रय लिया जाता है। इसलिए नीति का आधार सच्चाई को मानकर नहीं चला जा सकता। अधिक लोगों के अधिक सुख का ध्यान रखते हुए नीति का निर्धारण होना चाहिए।
लेस्ले स्टीफन ने अपने ग्रन्थ ‘साइन्स आफ एथिक्स’ में लिखा है-किसी के कार्य के स्वरूप को देखकर उसे नीति या अनीति की संज्ञा देना उचित नहीं। कर्त्ता की नीयत और कर्म के परिणाम की विवेचना करने पर ही उसे जाना जा सकता है।
क्रिया कृत्यों को देखकर नीतिमत्ता का निर्णय नहीं हो सकता। सम्भव है कोई व्यक्ति भीतर से छली होकर भी बाहर से धार्मिकता का आवरण ओढ़े हो यही भी हो सकता है कि कोई धर्म कृत्यों से उदासीन रहकर भी चरित्र और चिन्तन की दृष्टि से बहुत ऊँची स्थिति रह रहा हो। व्यक्ति की गरिमा, मात्र उसकी आन्तरिक आस्थाओं को देखने से ही जानी जा सकती है। नीयत ऊँची रहने पर यदि व्यवहार में भूल या भ्रम से कोई ऐसा काम बन पड़े जो देखने वालों को अच्छा न लगे, तो भी यथार्थता जहाँ की तहाँ रहेगी। अव्यवस्था फैलाने के लिए उसे दोषी समझा और दण्डित किया जा सकता है। इतने पर भी उसकी उत्कृष्टता अक्षुण्ण बनी रहेगी। व्यक्तित्व और कर्तृत्व की सच्ची परख उसकी आस्थाओं को समझे बिना हो नहीं सकती। धर्म तत्व की गहन गति इसीलिए मानी गई है कि उसे मात्र क्रिया के आधार पर नहीं जाना जा सकता। नीयत या ईमान ही उसका प्राण भूत मध्य बिन्दु है।
संस्कृत का अर्थ है-सुसंस्कारिता। इसके पर्यायवाची शब्द हैं-सज्जनता और आत्मीयता। ऐसी आत्मीयता जो दूसरों के सुख-दुःख को अपनी निजी सम्वेदनाओं का अंग बना सके। यह सार्वभौम और सर्वजनीन है। संस्कृति के खण्ड नहीं हो सकते उसे जातियों, वर्गों, देशों और सम्प्रदायों में विभक्त नहीं किया जा सकता। यदि संस्कृति को वर्गहित के साथ जोड़ दिया गया तो वह मात्र विजेताओं और शक्तिमन्तों की ही इच्छा पूरी करेगी। अन्य लोग तो उससे पिसते कौर पददलित ही होते रहेंगे। ऐसी संस्कृति को विकृति ही कहा जायगा भले ही उसे लबादा कितना ही आकर्षक क्यों न पहनाया गया हो।
संस्कृति एक है उसे खण्डों में विभक्त नहीं किया जाना चाहिए। अन्यथा यह टुकड़े आपसे में ही टकराने लगेंगे और जादवी वंश विनाश का अप्रिय प्रसंग उपस्थित करेंगे। जर्मन संस्कृति, अरब संस्कृति, रोम संस्कृति आदि के पक्षधरों ने अपने अत्युत्साह को उस चौराहे पर इस तरह नंगा ला खड़ा किया जहाँ विश्व संस्कृति की आत्मा को अपनी लज्जा बचानी कठिन पड़ गई। सर्वहारा को निवोदित संस्कृति, सामान्य जन-जीवन को मानवोचित न्याय प्राप्त कर सकने का अवसर दे सकेगी इसमें सन्देहों की भरमार होती चली जा रही है। माओ की लाल किताब में वह आह्वान छपा है जिसमें कहा गया है कि हिमालयों की चोटी पर खड़ा माओ एशिया को अपने पास बुला रहा है। ‘उस आमन्त्रण को जिन्हें स्वीकार करना है, सोचते हैं निकट बुलाने के उपरान्त आखिर हमारा किया क्या जायगा?’
विचारों का एकाकी प्रवाह सदा उपयोगी ही नहीं होता उसमें बहुधा एक पक्षीय विचारणा का बाहुल्य जुड़ जाने से यथार्थता की मात्रा घटने लगती है। अपनी मान्यता और आकांक्षा के पक्ष में मस्तिष्क काम करता चला जाता है और प्रतिपक्षी तर्कों एवं तथ्यों का ध्यान ही नहीं रहता। किसी निर्णय पर पहुँचने के लिए पक्ष और विपक्ष के सभी तर्कों को सामने रखा जाना चाहिए। न्यायाधीश को वस्तुस्थिति के समझने के लिए वादी और प्रतिवादी दोनों पक्षों के प्रमाण, साक्षी एवं तर्क सुनने पड़ते हैं। अन्य न्यायाधीशों ने ऐसे प्रसंगों पर क्या-क्या निष्कर्ष निकाले हैं इसका ध्यान रखना पड़ता है। तब कहीं उचित निर्णय करने की स्थिति बनती है। यदि एक ही पक्ष की बात सुनी जाय दूसरा पक्ष कुछ बताये ही नहीं तो स्वभावतः एकांगी निर्णय करने की स्थिति खड़ी हो जायगी। इसमें न्याय के स्थान पर अन्याय का पक्षपात जैसी दुर्घटना घटित हो जायगी। इसमें न्यायाधीश की नीयत का नहीं उस एकांगी परिस्थिति का दोष है जिसमें मन्थन के लिए काट-छाँट के लिए अवसर ही नहीं मिला और न करने योग्य निर्णय कर लिया गया। यही दुर्घटना तब घटित होती है जब एकांगी, एक पक्षीय विचारों की घुड़दौड़ मस्तिष्क में चलती रहती है और ऐसे निष्कर्ष निकाल लिए जाते हैं जो अनुपयुक्त होने के कारण असफल एवं उपहासास्पद सिद्ध होते हैं।
यदि मन पक्षपाती पूर्वाग्रहों से भरा हो तो फिर आप्त वचन और शास्त्र भी सही मार्गदर्शन कर सकने में असमर्थ रहेंगे। उनकी व्याख्याएँ इस प्रकार तोड़-मरोड़ कर की जाने लगेंगी कि तर्क की दृष्टि से उस प्रतिपादन को चमत्कारी माना जायगा फिर भी शास्त्रकारों और आप्त पुरुषों के मूल्य मन्तव्य की वास्तविकता के साथ उसकी पटरी बिठाना अति कठिन हो जायगा।
गीता के अनेक भाष्य हुए हैं। इन भाष्यकारों ने जो भाष्य किये हैं उनमें उनकी अपनी मान्यताओं को सिद्ध करने का आग्रह ही प्रधान रूप से काम करता है। जानबूझकर अथवा अनजाने ही वे मूल ग्रन्थकार के वास्तविक उद्देश्य के विपरीत बहुत दूर तक निकल गये हैं। यदि ऐसा न होता तो इतने तरह के परस्पर विरोधी भाष्य एक ही ग्रन्थ के क्योंकर लिखे जा सकते? इनमें से कुछ ही टीकाकार सही हो सकते हैं। कर्त्ता का यह उद्देश्य तो रहा नहीं होगा कि वह ऐसी वस्तु रच दे जिसका तात्पर्य निकालने वाले इस प्रकार के परस्पर विरोधी जंजाल में फँसकर स्वयं भ्रमित हों और दूसरों को भ्रमित करें। रामायण की अनेक चौपाइयों के ऐसे विचित्र अर्थ सुनने में आते हैं जिन्हें यदि मूल रचनाकार के सामने रखा जाय तो स्वयं आश्चर्यचकित होकर रह जायेंगे कि जो बातें कल्पना में भी नहीं थी वे उनके गले किसी प्रकार मढ़ दी गईं।
संसार के मूर्धन्य साहित्यकारों के अपनी कृतियों में भारतीय शास्त्रों और मनीषियों के अनेकों उद्धारण दिये हैं। ध्यान से देखने पर प्रतीत होता है कि उद्धरणों की शब्द रचना यथावत् है, किन्तु उन्हें इस प्रकार के प्रयोजनों में प्रयुक्त किया गया है जैसा कि उन कथनों का मूल उद्देश्य नहीं था। डी0 एच॰ लारेन्स ने अपनी अन्तःस्थिति का विश्लेषण करते हुए कहा है-‘मेरे भीतर एक नहीं कई देवता निवास करते हैं।’ यहाँ उनने देवताओं को जिस रूप में प्रस्तुत किया है वह देववाद के मूल प्रतिपादनों के अनुरूप नहीं हैं। हेनरी मिलर की पुस्तकों में रामकृष्ण परमहंस और विवेकानन्द के उद्धरणों की भरमार है, पर वे मूलतः उन मन्तव्यों के लिए नहीं कहे गये थे जैसा कि मिलर ने सिद्ध किया है। स्टेनबेक ने अपनी पुस्तक ‘केनेरी को’ में संस्कृत कवि विल्हण की कई रचनाओं का उल्लेख किया है। कालिन विल्सन ने मानवी पृथकतावाद के समर्थन में भारत में प्रचलित धर्म दृष्टान्तों का अनेक प्रसंगों में सहारा लिया है। आल्हुआस हक्सले ने प्राचीनता और आधुनिकता के विग्रह में भगवान बुद्ध को आधुनिकता का समर्थक सिद्ध किया है
एरिक फ्राम ने अपनी पुस्तक ‘आर्ट आफ लविंग’ में योरोप में उत्पन्न हुए अनेक संघर्षों की जड़ अरस्तु के तर्कशास्त्र को बताया है जिसने जनमानस में यह बात बिठाई कि संसार में देव और असुर दो ही शक्तियाँ हैं और दोनों परस्पर विरोधी हैं। यह (ए, एण्ड नान ए) का सिद्धान्त मुद्दतों तक लोगों के दिमागों में गूँजता रहा है और वे यह सोचते रहे कि बुराई पर आक्रमण करके उसे मिटाया जाना चाहिए। अब इसका निर्णय कौन करे कि बुराई किस पक्ष की है? अपनी या पराई? इस निष्कर्ष में फैसला अपने ही पक्ष को सही मानने की ओर झुकता है। हम जो सोचते और करते हैं वही ठीक है। गलती तो अन्य लोग ही कर सकते हैं, वह हमसे क्यों होगी? इसी पूर्वाग्रह से हर व्यक्ति और वर्ग घिरा रहता है। फलतः उसे सामने वाले में ही बुराई दीखती है ओर उसे मिटाने के लिए तलवार पर धार रखता है। इसी मान्यता ने कलह, विद्वेष और आक्रमणों को जन्म दिया है।
उच्चस्तरीय आस्थाओं के प्रति व्यक्ति को निष्ठावान बनाना अध्यात्मवादी तत्वदर्शन का काम है। धर्म और दर्शन का लक्ष्य सही है। संस्कृति की उपयोगिता इसी में है कि वह मानवी चिन्तन का स्तर ऊँचा उठाये। उसे आत्म गौरव की अनुभूति कराने के साथ-साथ सज्जनता को व्यवहार में उतारने का साहस भी प्रदान करे।
इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए उदार चिन्तन की मनोभूमि होनी चाहिए। तथ्यों को समझने के लिए पूर्वाग्रहों से मुक्त रहना आवश्यक है। औचित्य को ही प्रधानता दी जाय। तथ्यों को तर्क और प्रमाणों की कसौटी पर कसा जाय। मानवी आदर्शों को सर्वोपरि रखा जाय। अधिकार को पिछली पंक्ति में स्थान दिया जाय और कर्त्तव्य को आगे रखा जाय। ये ऐसे उपाय हैं जिनके सहारे सज्जनता की रक्षा हो सकती है। प्रगति और शान्ति का वातावरण बन सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि सुसंस्कारिता को प्रमुखता मिलने के लिए हर क्षेत्र से प्रबल प्रयत्न किया जाय। ऐसे सुव्यवस्थित प्रयत्नों को ही तत्वदर्शियों ने धर्म धारणा का नाम दिया है। वर्तमान को सुखद और भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए उसकी आज सबसे अधिक आवश्यकता है।
मुल्ला अब्बास बगदादी ने अपने शिष्यों को सम्बोधित कर पूछा-‘‘आज तुम सब मुझे प्रलय के बारे में बताओ।” एक ने कहा-मेरी नजर में खुदा के प्रति इन्सान का अक्षम्य अपराध ही प्रलय का कारण है। दूसरे ने कहा-‘‘जब इन्सान के जुल्म धरती नहीं झेल पाती तो खुदा प्रलय से सब धोता है। तीसरे ने कहा-नहीं मेरे मौला!ये सब गलत है। मेरी नजर में तो कमजोर आदमी की लाचारी का एक आँसू ही सबसे बड़ा प्रलय है।
-वर्कनाया
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भगवान बुद्ध वेलुवन पधारने वाले हैं। धर्मदीक्षा का विशाल आयोजन कुशी संघाराम में रखा गया है। बौद्ध बिहार की इस सामयिक व्यवस्था के लिए कौशल, कौशाम्बी, मगध, पंचनद, जेतवन विहारों के परिव्राजकों को समय से पूर्व पहुँच जाने का निर्देश हुआ। इन परिव्राजकों में संथाली भी हैं। संथाली एक समय इसी नगर में निवास किया करते। उनके पिता यहाँ के प्रधान श्रेणिक थे। उनके विशाल भवन को देख कर राज प्रासाद होने का भ्रम होता था। ऐसा कोई वैभव शायद ही रहा होगा जो इसमें विद्यमान न रहा हो, पर आज तो वह सर्वथा वीरान दिखाई देता है।
संघाराम की मर्यादा के अनुसार संथाली और परिव्राजक वलैशी को भिक्षा के लिए भेजा गया। शेष भिक्षुओं को दूसरे कार्य सौंपे गये हैं। दिन भर की परिव्रज्या से थके संथाली जिस क्षण इस विशाल भवन के मुख्य द्वार पर पहुँचे जो कभी उनके सांसारिक सुखों के रंगीन स्वप्नों में खोया हुआ रहता था उनके हृदय की गति में ज्वार उमड़ पड़ा, सांसें तेज हो उठीं, गला रुँध गया। अतीत के सैकड़ों दृश्य, सहस्रों स्मृतियाँ उनके मानस पटल पर एक साथ घूम गईं। “भवति भिक्षा देहि जननी” के चार शब्द उनके मुख से इस पीड़ा के साथ निकले जैसे कोई पंख काटा पक्षी किसी दृश्य भय से कातर होकर अपने घोंसले से भागता है। द्वार पर कौन आता है जलती हुई जिज्ञासा से उनके नेत्र वह देखने के लिए मुख्य द्वार में अपलक टिक गये।
“भवति भिक्षां देहि” का यह स्वर अन्य दिनों के स्वर से भिन्न था उसके प्रस्फुटित होते ही तन्द्रित प्राचीरों में विद्युत दौड़ गई। जिस किसी के कान में स्वर पड़ा- उसके मुख से पहला स्वर यही फूटा संथाली। संथाली आया है, संथाली आये हैं, माँ तात संथाली पधारे हैं, सहोदर संथाली पिता-माता, पत्नी शिशु, भाई सब के मुँह से एक ही शब्द। सभी द्वार की ओर भागे अपने उस संथाली को देखने के लिए जिसने पाँच वर्ष पूर्व ही सांसारिक वैभव को त्याग कर बुद्ध धर्म की शरण ली थी अपने देश की आध्यात्मिक धार्मिक चेतना में नये प्राण फूँकने के लिए जातीय जीवन को दुःख सामाजिक परम्पराओं की निराशा से उबारने के लिए व्यक्ति के चरित्र को अधःपतन के प्रवाह से बचाकर ऊर्ध्वगति प्रदान करने के लिए। इस अवधि में ही संथाली के त्याग, तप, सेवा, साधना की कहानियाँ घर-घर पहुँच चुकी हैं। यह स्वाभाविक ही था कि अपने प्रिय सपूत को देखने के लिए नगर का, घर-परिवार का हर परिजन पुलकित हो उठता। बाहर आते प्रत्येक परिजन की गति इस तथ्य का स्पष्ट साक्ष्य थी।
गैरिक चीवर और उत्तरीय, पाहन विहीन पद, मुंडित केश हाथ में भिक्षापात्र, तपश्चर्या की साक्षात् प्रतिकृति को सम्मुख खड़ा देख कर जननी जनक दोनों की आँखों से अश्रुधारा फूटी तो फिर फूट ही पड़ी अविराम बहती ही चली गई।
तात! करुणामय वातावरण की निस्तब्धता भंग करते हुए संथाली ने पूछा- आपके दुःखी होने का अर्थ तो यही हो सकता है। आर्य-मेरी साधना अभी तक अधूरी है अन्यथा आपको हर्षित होना चाहिए था।
अवुस ऐसा न कहो। तुम इस देश के आदर्श हो तुम्हारा इतिहास कोटि-कोटि प्राणों को तप, त्याग और सेवा की प्रेरणा देगा। ये आँसू तो पश्चाताप के आँसू हैं वत्स! सोचते हैं यदि हम मोह में न फँसे होते, माया से ग्रस्त न हुए होते तो आज यह स्थिति क्यों होती। जो कार्य हमें करना चाहिए था, वह तुम्हें करना पड़ रहा है।
संथाली की आत्म-ग्लानि धुल गई। उसने वलैशी की ओर दृष्ट डाली, भिक्षा ग्रहण की और बिहार की ओर चल पड़े। और दिन की अपेक्षा आज उनका भिक्षा पात्र कहीं अधिक भरा हुआ था।
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रेल की पटरियों पर एक विद्युत ट्रेन दौड़ी जा रही थी। ट्रेन छोटी-सी थी और उसमें आठ-दस डिब्बे से अधिक डिब्बे नहीं थे। यात्री भी बहुत थोड़े से थे। ट्रेन चालू कर देने के बाद ड्राइवर भी इंजन छोड़कर पीछे के डिब्बे में जा बैठे थे। गाड़ी अपनी गति से चली जा रही थी कि रास्ते में खड़े पेड़ ने हुक्म दिया-
“रुक जाओ।”
गाड़ी रुक गयी।
‘पीछे की ओर चलो’
गाड़ी पीछे चलने लगी।
फिर दूसरे किनारे पर खड़े पेड़ ने कहा-‘रुक जाओ।’
गाड़ी फिर रुक गयी।
पेड़ ने गन्तव्य दिशा की ओर चलने का आदेश दिया तो गाड़ी गन्तव्य की ओर चल पड़ी।
ये पंक्तियाँ न किसी परी कथा से उद्धत की गयी हैं और न ही किसी ने इस घटना को स्वप्न में देखा है। अब से कुछ वर्ष पूर्व न्यूजर्सी (अमेरिका) में हजारों दर्शकों ने यह प्रदर्शन देखा और प्रदर्शनकर्त्ता है इलेक्ट्रानिकी विशेषज्ञ पियरेणल साविन। प्रदर्शन से पूर्व साविन ने घोषणा की थी कि वह अपनी आन्तरिक शक्ति को किसी भी पेड़ पर केन्द्रित करके विद्युत ट्रेन को आगे-पीछे दौड़ा सकते हैं। घोषणा को लोगों ने अविश्वास कौतूहल और आश्चर्य के साथ सुना तथा हजारों की संख्या में निर्धारित स्थान पर पहुँचे जहाँ सफलतापूर्वक घोषित कार्यक्रम पूरा किया गया। ट्रेन पटरियों पर थोड़ा आगे बढ़ती किनारे पर खड़े वृक्ष में कुछ हल-चल होती और ट्रेन एक विद्युत का झटका खा कर रुक जाती। फिर पीछे दौड़ने लगती।
पहले कभी वैज्ञानिकों को मान्यता रही थी कि पेड़ पौधे भी धूल-पत्थर की तरह निष्प्राण हैं। परन्तु एक छोटी-सी घटना से प्रेरित हो कर हमारे ही देश के एक वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र वसु ने यह सिद्ध किया कि पेड़ पौधों में भी जान है। वे भी अनुभव करते हैं। उनमें भी अनुभूति और भावनायें मौजूद रहती है। वे भी मनुष्यों और जानवरों की तरह सुख में सुख तथा दुःख में दुःख अनुभव करते हैं। वसु ने ‘ऑप्टिकल लीवर’ नामक एक विशेष यन्त्र बनाया था जिसके माध्यम से पेड़ पौधों की गति, स्पन्दन और संवेदनाओं का अध्ययन किया जाता था। पेड़ की पत्ती तोड़ने पर उसे जो पीड़ा होती है, ऑप्टिकल लीवर ने उसे पकड़ा और बताया इसी तरह की कई बातें, प्रतिक्रियायें ‘ऑप्टिकल लीवर’ से देखी जा सकीं।
परन्तु सर जगदीश चन्द्र वसु के बाद से अब तक विज्ञान ने काफी तरक्की कर ली हैं और उसी तरह वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में हुई नयी-नयी शोधों ने वनस्पति संसार के नये रहस्य खोल कर रख दिये हैं। जैसा कि उपरोक्त घटना में ही देखा गया। पेड़ पौधे मनुष्य के संकेतों को समझते हैं और उन्हें प्रेरित किया जाय तो सम्मोहित व्यक्ति की तरह उन पर आचरण भी करते हैं। पियरे पाल साविन ने यही तो किया था। उन्होंने घोषित प्रदर्शन के पूर्व बिजली के एक स्विच का सम्बन्ध अपनी देह के साथ जोड़ा और दूसरे स्विच को गैल्वेनोमीटर से लगाया। इस गैल्वेनोमीटर का सम्बन्ध एक पौधे के साथ जोड़ा गया था। साविन वहाँ बैठे-बैठे संकेत देते और पौधा विद्युत ट्रेन के परिपेक्ष के साथ उलटा सम्बन्ध स्थापित करता, जिससे ट्रेन पीछे की ओर चलने लगती। इस प्रयोग को अमेरिका में टेलीविजन पर भी बताया गया। लोग दंग रह गये यह देख कर कि पौधा भी इतना आज्ञाकारी हो सकता है।
भारतीय धर्मशास्त्रों में पेड़ पौधों और वनस्पतियों से मनुष्य द्वारा स्थापित किये गये सजीव संपर्क की ढेरों घटनाओं का उल्लेख मिलता है। आयुर्वेद शास्त्र के पितामह चरक के सम्बन्ध में विख्यात है कि उन्होंने अपने छोटे से जीवन में हजारों जड़ी-बूटियों के गुण मालूम किये तथा कौन-सी जड़ी किस रोग में कैसे प्रयोग की जानी चाहिए इसका विस्तृत विधि-विधान खोजा। आजकल वैज्ञानिक एक रोग की दवा खोजने अथवा एक औषध का परीक्षण विश्लेषण करने में ही जीवन भर गुजार देते हैं तो एक व्यक्ति द्वारा अपने छोटे से जीवन में हजारों औषधियों का अध्ययन विवेचन कैसे सम्भव है। विश्वास नहीं किया जाता।
ऐसा उल्लेख मिलता है कि आयुर्वेद की रचना करते समय चरक जंगल में एक-एक झाड़ी, पौधे और वनस्पति के पास जाते और उससे उसकी विशेषताएं पूछते। वनस्पति स्वयं अपनी विशेषतायें बता देती। इसी आधार पर हजार वर्षों या हजार वैज्ञानिकों का कार्य एक व्यक्ति द्वारा सम्पन्न किया जा सका। पहली बात को जहाँ संदिग्ध समझा जाता रहा है वहीं दूसरी को हास्यास्पद कहा जाता है। परन्तु अब, जबकि वनस्पति जगत में हुई अधुनातम खोजों के आधार पर वैज्ञानिक यह कहने लगे हैं कि पेड़ पौधों से न केवल संवाद सम्भव है वरन् उनसे इच्छित कार्य भी कराया जा सकता है। पियरे पाल साविन का तो यहाँ तक कहना है कि चोरों से घर की सुरक्षा के लिए भी भविष्य में पेड़-पौधों का इस्तेमाल किया जा सकेगा। उसके लिए किसी भी पौधे का सम्बन्ध दरवाजे के साथ जोड़ दिया जायेगा और मकान मालिक जब उस पौधे के पास जाकर खड़ा हो जायेगा तो पौधा अपने मालिक का पहचान कर दरवाजा खुलने देगा।
यहाँ तक तो फिर भी उतना आश्चर्य नहीं होना चाहिए। अमेरिका के ही एक और इनेक्ट्रानिकी विशेषज्ञ बैकस्टर ने तो यहाँ तक कहा है कि पेड़ पौधे अपने मालिकों की मृत्यु पर शोक भी व्यक्त करते हैं। पियरे पाल साविन ने यहां तक कहा है कि पेड़-पौधे न केवल मनुष्यों की मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हैं बल्कि उन्हें मानव कोशाओं की मृत्यु का बोध होता है तो वे उस पर भी अपनी संवेदना व्यक्त करते हैं।
इसके लिए साविन ने अस्सी मील दूर पर एक प्रयोग किया। साविन ने जिस पौधे को प्रयोग के लिए चुना था वह अस्सी मील दूर पर एक अनुसंधान केन्द्र में स्थित था। फिर उसने अपने शरीर को बिजली के झटके दिये। अस्सी मील की दूरी पर स्थित पौधे पर इसकी प्रतिक्रिया नोट की गई जबकि दोनों के बीच कोई सम्बन्ध नहीं था सिवा इसके कि जब साविन के शरीर को बिजली के झटके दिये जा रहे थे तो वह कल्पना में उन पौधों का ध्यान कर रहा था।
फिर भी साविन को यह विश्वास नहीं हुआ कि पौधे उसके शरीर पर लगने वाले विद्युत झटकों पर ही प्रतिक्रिया व्यक्त करते थे। साविन ने विचार किया कि सम्भव है पौधे अपने आस-पास की दूसरी किसी घटना पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हों। अतः अब एक पौधे के स्थान पर तीन-तीन पौधे लिए गये और तीनों पौधों को अलग-अलग कमरों में रखा गया। हर कमरे का माहौल दूसरे कमरे के माहौल से बिल्कुल भिन्न था तथा तीनों पौधे एक ही विद्युत पथ से जुड़े हुए थे। उधर अस्सी मील दूरी पर स्थित साविन ने अपना प्रयोग आरम्भ किया। न कोई सम्पर्क न सम्बन्ध सूत्र। केवल विचार शक्ति का उपयोग करना था। साविन ने जब अपना प्रयोग आरम्भ किया तो तीनों ही पौधों पर एक समान प्रतिक्रियायें हुईं। अब इसमें कोई सन्देह नहीं था कि पौधे अस्सी मील दूर बैठे साविन की अनुभूतियों, संवेदनाओं को ग्रहण कर अपनी प्रतिक्रियायें व्यक्त कर रहे थे।
पेड़-पौधे न केवल मनुष्य के आज्ञा पालन को तत्पर और दुःख-सुख में संवेदनायें व्यक्त करते हैं वरन् उनमें भी भावनाओं का आवेग उमड़ता है। जापान के मनोविज्ञानी डॉ0 केन हाशीमोतो ने ‘लाइडिटेक्टर’ के माध्यम से इस बात का पता लगाया। लाइडिटेक्टर एक ऐसा यन्त्र है जो अपराधियों का झूठ पकड़ने के काम आता है। इसका सिद्धान्त है कि व्यक्ति जब कोई बात छुपाता है या झूठ बोलता है तो उसके शरीर में कुछ वैद्युतिक परिवर्तन आ जाते हैं। लाइडिटेक्टर उन परिवर्तनों को अंकित कर लेता है और बता देता है कि व्यक्ति झूठ बोल रहा है। अर्थात् मनुष्य की भावनात्मक स्थिति में आने वाले परिवर्तनों को लाइडिटेक्टर बता देता है।
डॉ0 केम हाशीमीतो ने इस मशीन का सम्बन्ध कैक्टस के एक पौधे से जोड़ा इसके बाद यन्त्र को चालू कर दिया। यंत्र ने बड़ी तेजी से कम्पन अंकित किये।
हाशीमीतो ने इन कम्पनों को ध्वनि तरंगों में बदलने के लिए कुछ विशेष इलेक्ट्रॉनिक यंत्रों का सहारा लिया। इन यंत्रों की मदद से कम्पनों को ध्वनि तरंगों में परिवर्तित किया और उन्हें सुना गया तो लयात्मक स्वर सुने गये। जो स्वर सुने गये उनमें कहीं हर्ष का आवेग था तो कहीं भय की भावना।
हाशीमोतो ने कैक्टस के पौधे पर इतने प्रयोग किये कि उसे गिनती गिनना तक सिखा दिया। कैक्टस का पौधा हाशीमोतो की आज्ञा पाकर एक से बीस एक गिनती गिनने लगता और यह पूछने पर कि दो और दो कितने होते हैं, स्पष्ट उत्तर देता चार। इस प्रयोग को अन्य कई वैज्ञानिकों ने भी देखा और संसार की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित कराया।
प्रदर्शन के समय पेड़ के सामने प्रश्न रखा गया कि बारह में से चार घटाने पर कितने बचते हैं। कैक्टस ने जो उत्तर दि या डॉ0 हाशीमोतो ने उसे ध्वनि तरंगों के रूप में परिवर्तित करके दिखाया ध्वनि तरंगों को जब हैडफोन पर सुना गया तो स्पष्ट उत्तर सुनाई दे रहा था-आठ। इन प्रयोगों और निष्कर्षों को लेकर जापान ही नहीं संसार के वनस्पति विज्ञान में एक नयी हलचल पैदा हो गयी है।
अब इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि चरक ने कभी जड़ी-बूटियों से प्रश्न किया हो और जड़ी−बूटियों ने बताया हो कि हम अमुक रोग का उपचार करने में समर्थ है। प्रश्न उठता है कि प्राचीनकाल में जब भारतीय विज्ञान इतना विकसित रहा था तो वह लुप्त क्यों हो गया। इस संदर्भ में एक बात स्मरणीय है कि आधुनिक विज्ञान, यंत्रों के द्वारा शोध और प्रयोग करता है परन्तु प्राचीनकाल में यही कार्य आत्मा की शक्ति सामर्थ्य के बल पर किया जाता था। चेतना तक चेतना की पहुँच सुगम है अपेक्षाकृत चेतन को यन्त्रों से सम्बोधित करने के। वहाँ भी चेतना ही काम करती है, परन्तु यान्त्रिक व्यवस्था जब बीच का माध्यम बनती है तो चेतन की गति निर्विरोध नहीं रह जाती। प्राचीनकाल में चेन को चेतन से प्रभावित करने और आत्मिक चेतना से अदृश्य गुह्य रहस्य उद्घाटित करने के जो प्रयोग हुए तथा उनमें जा सफलतायें मिलीं उन्हें परम्परागत रूप से एक-दूसरे का प्रत्यावर्तित नहीं किया जा सका।
डॉ0 हाशीमीतो ने जब जापान के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में इस तरह के लेख लिखे तो उनके पास ढेरों पत्र पहुँचने लगे। लोगों ने कैक्टस की इन भौतिक क्रियाओं के पीछे विद्यमान रहने वाले भौतिक कारणों को जानना चाहा तो डॉ0 हाशीमीतो ने एक दूसरे लेख में लिखा-संसार में ऐसी कितनी ही घटनायें घटती हैं जिनके पीछे विद्यमान कारणों पर भौतिक विज्ञान प्रकाश नहीं डाल सकता, क्योंकि वह अभी पूर्ण विकसित नहीं हुआ है। इस गुत्थी को सुलझाने में पूर्व का अध्यात्म विज्ञान ही समर्थ है जो चेतना की सर्व व्यापकता और उसके जीवन्त अस्तित्व को स्वीकारता है। यह कोई विलक्षण घटना नहीं है, विलक्षण इस लिए लगती है कि हमारी जानकारी में अभी आयी है। अन्यथा गैलीलियो के बताने से पूर्व भी पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती थी और बताने के बाद भी। केवल गैलीलियो का यह सिद्ध करना विस्मयकारी और अविश्वसनीय रहा कि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है।
अगले दिनों भारतीय तत्वदर्शन की अन्यान्य मान्यतायें भी इसी प्रकार खरी सिद्ध हो सकती हैं कि सृष्टि ब्रह्माण्ड में जड़ कुछ नहीं है। अद्वैत दर्शन सर्वत्र एक चेतना के अस्तित्व का ही तो प्रतिपादन करता है।
वेदान्त हिन्दू सभ्यता तथा संस्कृति की पराकाष्ठा है। अपने जीवन को सर्वोच्च और सर्वोत्तम प्रकार से बिताने के विज्ञान और कला को वेदान्त कहते हैं यह वह विचार है जो ज्ञान के संसार को प्रकाशित करता है। वेदान्त कहता है कि तुम यह नश्वर शरीर नहीं हो वरन् सब में व्याप्त अमर आत्मा हो।
-स्वामी शिवानन्द
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जिस गृहिणी का घर व्यवस्थित और सन्तुलित होता है वह बुद्धिमती तथा कुशल गृहिणी कही जाती है, पर जिसका हर कार्य अस्त-व्यस्त खर्च बेहिसाब, आय-व्यय का कहीं कोई संतुलन नहीं वह फूहड़ और मूर्ख कही जाती है। यह तो एक घर की बात हुई। वास्तव में प्रकृति में आवश्यक उपार्जन, समुचित खर्च का ऐसा सन्तुलन विद्यमान है जिसे देखकर कोई भी व्यक्ति इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि प्रकृति में बुद्धि और एक निरन्तर चेतनशील प्रक्रिया कार्यरत है।
एक बार आस्ट्रेलिया में जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा के लिए कैक्टस की बाड़ लगाई गई। पौधे बाहर से लाई गयी थी, उसमें किसी प्रकार कैक्टस खाने वाले कीड़े नहीं आ पाये। कैक्टस निरंकुश अभिवृद्धि की ओर अग्रसर हुआ। कुछ ही समय में कैक्टस ने इंग्लैण्ड के क्षेत्रफल के बराबर भूमि अधिग्रहित कर ली। कृषि विशेषज्ञों के सम्मुख यह एक वैसी ही चुनौती बनकर खड़ी हो गई जैसी अन्धाधुन्ध प्रजनन के कारण आज संसार को खाद्य समस्या का सामना करना पड़ रहा है।
विशेषज्ञों की गोष्ठी आयोजित की गई। अन्ततः एक ऐसा कीटाणु खोज निकाला गया जिसका प्रमुख खाद्य ही कैक्टस था। इस कीड़े की एक विशेषता यह भी थी कि उसकी प्रजनन शक्ति भी बहुत अधिक थी। इसने जो कैक्टस को खाना प्रारम्भ किया तो उसका सफाया ही करके छोड़ा अन्त में कैक्टस तो थोड़ा रह गया, पर इन जीवाणुओं की पूरी फौज तैयार थी। अभी विशेषज्ञ इस उधेड़बुन में थे कि समस्या का निराकरण कैसे हो, पर जब खोज की गई तो यह पाया गया कि अब उतने ही बैक्टीरिया (जीवाणु) शेष रह गये हैं जितनों के लिए खाद्यान्न शेष था। शेष भाग गये या मर गये कुछ पता नहीं। आज की अपार जनसंख्या अन्य ग्रहों को भाग जाये तब तो सम्भव है कि समस्या उतनी भारी न पड़े अन्यथा प्रकृति, सन्तुलन के लिए दूसरा अस्त्र प्रयुक्त करने से हिचकेगी नहीं। क्योंकि प्रतिरोध और सन्तुलन व्यवस्था से ही उसने सृष्टि क्रम को यथावत कर रखा है।
प्रकृति की व्यवस्थापिका बुद्धि का एक बड़ा प्रमाण यह भी है कि जिन प्राणियों में अत्यधिक प्रजनन पाया जाता है उनके फेफड़े होते ही नहीं, फेफड़ों के स्थान पर मात्र एक ट्यूब लगा दिया गया है। यह ट्यूब प्रारम्भ में जितना छोटा होता है अन्त तक उतना ही अर्थात् छोटे का छोटा ही बना रहता है। यह कठोर नियन्त्रण उसकी अत्यन्त बुद्धि कुशलता का प्रमाण है अन्यथा कैक्टस का ही छोटा कीड़ा सिंह के समान होता उस स्थिति में वह कैक्टस के समाप्त होते ही मनुष्यों को ही खा जाता।
यह तथ्य मनुष्य सम्प्रदाय में भी उतनी ही कठोरता से लागू है अधिक बच्चे पैदा करने वाले लोगों के फेफड़े प्रायः दुर्बल होते हैं। इसी कारण थोड़े परिश्रम से ही उनका दम फूलने लगता है। इस तरह वे दीर्घजीवन तो खोते ही हैं, बीमारियों की आधि-व्याधि में ऊपर से जकड़े रहते हैं। ये बीमारियाँ ही उन्हें खाती रहती हैं। यदि उससे बचे तो भोजन आवास की समस्या सताती रहती है। ऐसे व्यक्ति स्वयं अपने और समाज के लिए भी घातक परिस्थितियाँ पैदा करते हैं। उनका सामूहिक दण्ड सारी मानव जाति को अकाल, अनावृष्टि, भुखमरी, बेकारी, बेरोजगारी के रूप में भुगतना पड़ता है। इससे मनुष्य की बुद्धिमानी इसमें है कि वह प्रकृति की सचेतन व्यवस्था को अच्छी तरह अनुभव करे, पालन करे और सृष्टि को व्यवस्थित सन्तुलित तथा सुन्दर बनाने में सहयोग प्रदान करे।
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महान दार्शनिकों, अन्वेषी सिद्ध तपस्वियों और श्रेष्ठ महापुरुषों के प्रचण्ड परिश्रम से उपार्जित-उपलब्ध अमूल्य रत्न-राशि का सहजता से हाथ लग जाना कितना बड़ा सौभाग्य है, यह उनके ही जीवन से जाना जा सकता है, जिन्होंने इस सौभाग्य को पाने का अवसर गँवाया नहीं है। इतने अनुभवपूर्ण ज्ञान को इतनी सुगमता से पा सकना सचमुच मनुष्य के लिये कितना श्रेष्ठ अनुदान है।
व्यक्तित्व के उत्कर्ष के लिये प्रत्यक्ष प्रेरणा ही प्रभावी सिद्ध होती है। ऐसी प्रेरणा पाना ही सत्संग का लाभ उठाना कहा गया है। व्यक्तियों का सत्संग तो वैसे भी दुर्लभ ही है। सामान्यतः जो लोग कुछ आगे बढ़े-चढ़े होते भी हैं, उनसे सद्ज्ञान जितना मिलता है, उससे अधिक भ्रान्तियों का अम्बार मिलता है। जबकि उत्तम पुस्तकों के रूप में हमें उत्कृष्ट मनीषा का सान्निध्य सहज उपलब्ध हो जाता है।
रस्किन के “अनटु दिस लास्ट” ने भी गांधी जी को अभिभूत कर लिया। बाद में उन्होंने “सर्वोदय” नाम से इस कृति का गुजराती अनुवाद भी प्रस्तुत किया। उनकी गहनतम आस्थाएँ इसी पुस्तक को पढ़ते हुए जागृत हुई। इसी प्रकार गीता को वे अपना आध्यात्मिक सन्दर्भ ग्रन्थ मानते थे तथा संशय के किसी भी अवसर पर उसी प्रकाश-स्रोत ग्रन्थ की शरण जाते एवं मार्गदर्शन प्राप्त करते थे। वे उसे अपनी माँ कहते थे।
जार्ज वाशिंगटन के मन में स्वतन्त्रता की अमर आग पुस्तकों ने ही जलाई थी। रोम्या रोलां के उपन्यास “जां क्रिस्तोफ” ने हजारों लोगों में नयी जीवन-दृष्टि जगाई। मेरी स्टो की पुस्तक ”टाम काका की कुटिया” ने अमरीका एवं पाश्चात्य जगत में हलचल मचा दी थी। तो गोर्की की ‘माँ’ ने रूस को हिला दिया था।
हीगेल के दर्शन के अध्ययन ने मार्क्स को अपनी जीवन दृष्टि के निर्धारण के लिये प्रचुर सामग्री दी। तथा एडमस्मिथ, डेविड रिकार्डो आदि अर्थशास्त्रियों की कृतियों ने अर्थशास्त्रीय दृष्टि दी। इस मेधावी सिद्धान्तकार के जीवन में सदैव पुस्तकों का अत्यधिक महत्व रहा और जीवन के बहुमूल्य वर्ष उसने गम्भीर अध्ययन में बिताए। लेनिन को रूसी समाजवादी क्रान्ति की प्रेरणा मार्क्स एजेल्स की प्रभावी रचनाओं से ही मिली। इस प्रकार अमरीका और रूस दोनों के स्वतन्त्रता-संग्राम में पुस्तकों की विशेष भूमिका रही। अफ्रीकी देशों में जो जागृति दिखाई पड़ रही है, उसमें भी पुस्तकों की प्रेरणाएँ अन्तर्निहित हैं। केनेथ काउन्डा, जोमो केन्याता, माकरियोस सभी ने किसी प्रत्यक्ष सत्संग से नहीं, प्रेरक पुस्तकों से ही संघर्ष की प्रेरणाएँ पाईं।
माओत्सेतुंग को मार्क्स की ही नहीं, सनयान-सेन की भी पुस्तकों ने प्रभावित किया। होची मिन्ह और चेम्वेवारा मार्क्सवादी साहित्य के अध्येता भी थे, प्रणेता भी।
भारतीय क्रान्तिकारियों के जीवन में बंकिम के ‘आनन्द मठ’ शरत् के ‘पथेर दावी’ और लोकमान्य तिलक के ‘गीता-रहस्य’ की विशिष्ट भूमिका रही है। विवेकानन्द और अरविन्द की कृतियों ने अनेक अभिनव राष्ट्रीय, सांस्कृतिक एवं सामाजिक गतिविधियों को शक्ति दी। जबकि खुद विवेकानन्द और अरविन्द ने वेद, उपनिषद् एवं भारतीय शास्त्रों तथा पाश्चात्य दार्शनिक ग्रन्थों का गम्भीर अध्ययन किया था।
दार्शनिक एमर्सन कहा करते थे कि पुस्तकों से प्रेम ईश्वर के राज्य में पहुँचने का विमान है। सिसरो के अनुसार “अच्छी पुस्तकों को घर में संचित-संग्रहित करना घर को देव-मन्दिर बनाना है।
कैम्पिस ने एक बार अपने साथियों से कहा था-अपना कोट बेचकर भी अच्छी पुस्तकें खरीदो। कोट के बिना जाड़ों में शरीर में कष्ट होगा। किन्तु पुस्तकों के बिना तो आत्मा ही भूखी तड़पती रहेगी।
चुश्किन, ताल्सताय, तुर्गनेव, चेरवक और गोर्की की पुस्तकों ने जितना रूसी जन-मन को आन्दोलित, स्पन्दित किया है, उससे कुछ कम बाहरी विश्व को नहीं। उपनिषदों का सन्देश दुनिया भर के तत्वान्वेषियों नयी अन्तर्दृष्टि तथा अभिनव चेतना से भरता रहा है। शेक्सपियर का प्रभाव क्षेत्र इंग्लैण्ड की सीमाओं से हजार गुना अधिक है। कालिदास की रचनाएँ अमरीकी, रूसी, जर्मन, फ्रेंच, ब्रिटिश, जापानी, एशियाई और अफ्रीकी-साहित्यानुरागियों को समान रूप से आकर्षित करती है। पतंजलि के योगसूत्रों का प्रत्यक्ष या परोक्ष प्रभाव विश्वभर की योगाभ्यास, प्रक्रियाओं में देखा जाता है। जिन्होंने गांधी को नहीं देखा, ऐसे एशियाई, अफ्रीकी, यूरोपीय अनेक जन नेताओं को गांधी की पुस्तकें ही नयी रणनीति एवं राजनीति का मार्ग दिखा रही हैं, फिर वे स्व0 मार्टिन लूथर किंग हों या चैकोस्लोवाकिया के विद्रोही।
मानवीय प्रगति के प्रमुख आधारों में स्वाध्याय का विशिष्ट महत्व है। स्वाध्याय का अर्थ है सद्ग्रन्थों का अध्ययन-मनन। मनोरंजन मात्र के लिये पढ़ी जाने वाली पुस्तकें आस्था के आधार नहीं प्रस्तुत कर पातीं। ज्ञान की जिज्ञासा का समाधान एवं तृप्ति प्रदान करने वाली पुस्तकों को पढ़ना, उन पर सोचना, मनन करना ही जीवन प्रगति का आधार बनता है। ऐसी पुस्तकें व्यक्ति की पथ-प्रदर्शक गुरू बनती हैं और उनके भीतर निहित क्षमताओं को उभारकर उन्हें विकसित व्यक्तित्व का स्वामी बनाती हैं।
अपरिष्कृत मनोभूमि वाले भस्मासुर ने वर्षों तक भगवान शंकर को प्रसन्न करने के लिये घोर तप किया। अन्त में भगवान प्रसन्न हुए और उसे वर माँगने को कहा। असुर अन्ततः असुर ही तो था। वर माँगा-‘जिसके सिर पर हाथ रखूँ वही भस्म हो जाय।’ उसे वह शक्ति मिल गयी।
शक्ति पाते ही वह उसके मद में मत्त हो उठा। उसका असुरत्व यहाँ तक बढ़ा कि भगवती पार्वती को पाने के लिये वह भगवान शंकर पर ही उस शक्ति का प्रयोग करने को उद्यत हो गया। भगवान शंकर भागे। भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर उसे अपने रूप जाल में फँसा अपने साथ नाचने पर विवश किया। नाचते समय उसने अपने सिर पर हाथ उठाया और भस्म हो गया। वर्षों के तप के प्राप्त शक्ति को उसकी कुपात्रता ने न तो उसके काम आने दिया न लोक के ही। उल्टे उसे ही समाप्त होना पड़ा। भगवान विष्णु ने शिवजी को आग्रह किया भविष्य में पात्र को ही शक्ति देना, कुपात्र को नहीं।
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श्रीमती जीन डिक्सन, जाज सैवेज, श्रीमती आपरीन ह्यूजेज जैसी भविष्यवक्ताओं की ही कोटि की एक और पश्चिमी महिला पराज्ञान की शक्ति से सम्पन्न होने के कारण ख्याति अर्जित कर चुकी है। उक्त महिला का नाम था फ्लोरेन्स।
फ्लोरेन्स की अतीन्द्रिय सामर्थ्य पीटर हरकौस की ही तरह विस्मयकारी थी। वह हाथ से किसी वस्तु को छू कर उस वस्तु से सम्बन्धित व्यक्ति के बारे में बहुत कुछ बता सकती थी।
नेबेल हँस पड़ा। उसने कहा कि ‘‘आपसे मैं यह अच्छा मजाक कर बैठा। अब अगर हमारे इस कार्यक्रम को हमारी कम्पनी के किसी संचालक ने सुना होगा तो दूसरे राज्य में जब जाऊँगा तब, यहाँ से अवश्य मेरा कार्यकाल समाप्त समझिए।’’
कुछ मिनटों बाद कन्ट्रोलरूम में फोन घनघना उठा। वह नेबेल के लिए ही फोन था। कंपनी के जनरल मैनेजर ने उसे बताया कि ‘‘शीघ्र ही न्यूपार्क से एक कार्यक्रम शुरू किया जायेगा। वहाँ तुम्हें ही भेजने का निर्णय लिया गया है। किन्तु यह घोषणा कल होगी। अभी इसे गुप्त ही रखना है। फ्लोरेन्स ने जो कुछ बताया है कि वह है तो सच पर उसे यह बात ज्ञात कैसे हुई? यही आश्चर्य का विषय है।’’ नेबेल फ्लोरेन्स से यह भी कही कह पा रहा था कि आपकी भविष्यवाणी सच है।
फ्लोरेन्स ने अपनी पराशक्ति के बल पर खोये हुए व्यक्तियों, वस्तुओं और हत्या के मामलों जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सम्बद्ध व्यक्तियों तथा पुलिस को आवश्यक जानकारी देकर मदद की।
न्यूयार्क की टेलीफोन कम्पनी के कुछ दस्तावेज गुम गये। ढूँढ़ने पर मिल ही नहीं रहे थे। अन्त में कम्पनी ने फ्लोरेन्स से प्रार्थना की कि वह उन कागजातों के बार में बताएँ। फ्लोरेन्स कम्पनी दफ्तर गई, वहाँ फाइलों की केबिनेट को छुआ और बतलाया कि कागज कहीं गये नहीं, दफ्तर में है। एक क्लर्क भूल से उन्हें अठारहवीं मंजिल पर स्थित स्टॉक रूम में रखी हरे रंग वाली आलमारी में छोड़ आया था। ढूँढ़ने पर वे दस्तावेज वहाँ सुरक्षित मिल गये।
इसके दो दिन बाद पुलिस अधिकारी जब लड़की की डायरी लेकर फ्लोरेन्स के पास पहुँचे तो उसे हाथ में लेने के बाद फ्लोरेन्स न निश्चित रूप से यह घोषणा कर दी कि इस बालिका की हत्या की जा चुकी है और लाश पड़ोस के घर में तहखाने में दफन है। खोज करने पर लड़की का शव वहीं मिला।
कुछ दिनों बाद फ्लोरेन्स से पत्रकारों से पूछा कि आपको ये सब बातें किस प्रकार मालूम हो जाती हैं? फ्लोरेन्स ने कहा- मुझे यह तो नहीं मालूम। लेकिन मैं इतना जानती हूँ कि बीसवीं शताब्दी के अन्त तक भारत वर्ष से निकलने वाला एक प्रकाश पूरे विश्व को उन दैवी शक्तियों के नियमों की जानकारी दे देगा, जो अभी हमारे लिए रहस्यमय है। इस प्रकाश के वाहक महापुरुष सृष्टि के प्रयोजन एवं विश्व की व्यवस्थाओं के मूल में क्रियाशील शक्ति प्रवाहों को स्पष्ट विश्लेषण कर सबको सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देगा। पूरी दुनिया में विचारों और भावनाओं के क्षेत्र में एक नयी ज्योति फैल जायेगी।’’
एक बार एक लड़की की हत्या के प्रकरण में पुलिस जब कोई सुराग न पा सकी, तो शव के पास पड़ा एक सिक्का लेकर फ्लोरेन्स के पास पुलिस अधिकारी पहुँचा। उस सिक्के को हाथ में लेकर फ्लोरेन्स ने बताया कि यह आखिरी बार जिस व्यक्ति के हाथ में था वह साढ़े पाँच फुट लम्बा है, 160 पौण्ड वजन वाला है तथा जिस इमारत में यह शव प्राप्त हुआ है, उसके पास वाले मदिरालय में आता जाता रहता है। पुलिस ने इस आधार पर खोज की और शीघ्र ही अपराधी को पकड़ लिया। रूमाल, पुस्तक, डायरी, पेन, अँगूठी आदि कोई भी वस्तु छूकर वह सम्बद्ध व्यक्ति के बारे में बता सकती थी। पर फ्लोरेन्स ने अनुभव किया कि ऐसे प्रत्येक परादर्शन के बाद, जिसमें यह प्रयत्नपूर्वक अपनी शक्ति खर्च करती है। उसे अपनी अतीन्द्रिय शक्ति में कुछ ह्रास-सा अनुभव में आता है।
शीघ्र ही उसने अपने को सीमित कर लिया। अपनी शक्ति का प्रदर्शन तो फ्लोरेन्स ने पूरी तरह बन्द कर ही दिया। यह लोगों को जानकारियाँ अब नहीं देती। अत्यावश्यक एवं विषम परिस्थितियों में ही वह लोगों को जानकारी देती। उसने ध्यान उपासना एवं स्वाध्याय में अधिक समय लगाना प्रारम्भ कर दिया। न्यूजर्सी के अपने मकान को उसने साधना केन्द्र ही बना डाला। कुछ वर्षों बाद उसने क्रम प्रारम्भ किया। उसकी पुस्तकें बाजार में तेजी से बिकने लगीं। इनमें से ‘गोल्डन लाइट ऑफ ए न्यू एरा’ तथा ‘फाल ऑफ द सेन्सेशनल कल्चर’ अधिक प्रसिद्ध हुईं। मनोचिकित्सक एवं सम्मोहन कला विशारद डॉ0 मोरे बर्सटीन से उसकी मैत्री विकसित हुई। वह समाजसेवा के कार्यों में अधिकाधिक रुचि लेने लगी।
डॉ0 बर्सटीन ने भी उससे अनेक प्रश्न पूछे और उनके उत्तर एक संकलन के रूप में प्रकाशित किये। इन्हीं डॉ0 बर्सटीन से एक बार फ्लोरेन्स ने प्रसंगवश कहा-डॉक्टर! शीघ्र ही वह समय आ रहा है, जब विग्रहलीन राजनेताओं की तुलना में आप जैसे सच्चे समाजसेवियों की बातें समाज में अधिक ध्यान से सुनी जायेंगी। एक व्यापक अभियान पूरे विश्व में बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में फैलकर लोगों की मान्यताएँ बदल देगा। हर देश में चरित्रवान लोगों की तेजस्वी टोलियाँ सामाजिक नेतृत्व के लिए आगे बढ़ेंगी। इस अभियान का केन्द्र होगा भारत के उत्तरी इलाके का एक पवित्र स्थान, जो धरती को स्वर्ग बनाने एवं मनुष्य में सोये देवत्व को जगाने के लिए दिन−रात क्रियाशील एक प्रचण्ड तपस्वी के तेज से जगमगाता मुझे स्पष्ट दिखाई पड़ रहा है।
‘गोल्डन लाइट आफ ए न्यू एरा’ में फ्लोरेन्स ने लिखा कि मैं ध्यान में अक्सर एक प्राचीन एशियाई देश में कार्यरत एक गौरवर्ण प्रशस्त ललाट तपस्वी का देखती हूँ, जिस पर ऊपर आकाश से एक अत्यन्त तेजस्वी नक्षत्र की ज्योति रश्मियाँ निरन्तर बरस रही है। वह महापुरुष अपनी क्रान्तिकारी विचारधारा से और चरित्र सम्पन्न अनुयायियों की शक्ति से सम्पूर्ण विश्व को एक नये ही ज्ञान के आलोक से विभूषित कर रहा है।
पुस्तक में फ्लोरेन्स ने बताया कि ‘‘यह महापुरुष अपनी शक्ति लगातार बढ़ा रहा है। वह प्रकृति में अभीष्ट उथल-पुथल कर सकने में सक्षम है। किन्तु वह अपना कार्य पूर्ण वैज्ञानिक रीति से करेगा। सूक्ष्म स्तरों पर ही वह वांछित हलचल उत्पन्न करेगा, जिसकी स्वाभाविक परिणित स्थूल जगत में भी होगी। अनेक अप्रत्याशित मोड़ मानवीय सभ्यता में आयेंगे और जागृति एक सीमित कुलीन वर्ग में ही नहीं होगी बल्कि विस्तृत जन समूह नयी चेतना से भर उठेगा। लोक शक्ति का नया ही स्वरूप सामने आयेगा। उसका दबाव समर्थ सत्ताधारियों की स्वेच्छाचारिता को भी नियन्त्रित करने में समर्थ होगा।’’
फ्लोरेन्स के अनुसार विश्व के घटनाक्रम में बीसवीं शताब्दी के अन्तिम चतुर्थांश में नये परिवर्तन होंगे। साम्यवादी देशों तक में पराशक्ति के प्रयोगों का परिणाम नयी आस्थाओं को जन्म देगा। मध्य एशिया में अरबों की प्रहारक प्रवृत्ति शिथिल होगी और वे इजराइल को नष्ट कर डालने की कल्पना तक छोड़ देंगे। साम्यवादी देशों में आपस में ठनेगी। पश्चिमी यूरोप, अमरीका में भी विघटनकारी प्रवृत्तियाँ सिर उठाएंगी। विश्व युद्ध की स्थिति से दुनिया के सभी देश तनावग्रस्त मनोदशा में होंगे। किन्तु विश्वयुद्ध अन्ततः होगा नहीं। एक समतावादी, मानवतावादी, आध्यात्मिक विचारधारा प्राचीन एशियाई देश के राजनेताओं को पहल की नयी शक्ति देगी। एक धार्मिक महापुरुष की शक्ति उन नेताओं के पीछे होगी और उनके प्रयास से विश्वयुद्ध टल जायेगा। विचारों के आधार पर बनाई गई संकीर्ण नाकेबन्दियाँ टूट जायेंगी और मनुष्य की चारित्रिक श्रेष्ठता तथा साधुता को सर्वोपरि मान्यता मिलेगी।
‘द फाल आफ सेन्शेसनल कल्चर’ में फ्लोरेन्स ने लिखा कि ‘‘पश्चिम की इन्द्रियपरक आवेशमूलक सभ्यता बीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में ढलान की ओर लुढ़कने लगेगी। स्थूल इन्द्रियानुभूति को ही सब कुछ मानने वालों की अशान्ति, व्यग्रता, हताशा एवं अतृप्ति बढ़ती जायेगी सम्पन्न समाजों में भी आपसी कटुता पराकाष्ठा पर पहुँच जायेगी।’’
हिंसा और बर्बरता बढ़ती ही जायेगी। अपेक्षाकृत वंचित लोग सम्पन्नों की सम्पन्नता छीनने के लिए और कम सम्पन्न लोग अधिक सम्पन्नों को हर तरह से नीचा दिखाने के लिए ऐसे स्तर तक उबर आयेंगे कि चारों ओर हाहाकार मच जायेगा। क्रुद्ध प्रकृति भी इसी बीच रुद्र रूप प्रकट करेगी। चारों ओर असन्तुलन, आक्रोश, असामंजस्य, अनाचार बढ़ता जायेगा। इसका अन्त भारतवर्ष से उठने वाली एक अभिनव विचारधारा के प्रकाश पूर्ण विस्तार के साथ होगा, जो सन्तुलन, सामंजस्य, समता और सहयोग का वैज्ञानिक स्वरूप सबको समझाएगी। आध्यात्मिकता एवं भौतिकता का, धर्म तथा विज्ञान का अविरोधी स्वरूप सबके सामने रखेगी तथा मध्यमवर्ग के बीच अपनी शक्ति का विस्तृत एवं सुदृढ़ आधार तैयार करने के बाद समाज के सभी वर्गों को आन्दोलित कर डालेगी। उसके तीक्ष्ण विचारपुंज लोगों के चिन्तनक्रम में चमत्कारी परिवर्तन का कारण बनेंगे।’’
‘‘लोगों की आँखें मात्र स्थूल को देखती है। प्रकृति की सूक्ष्म हलचलों और सुदूर नक्षत्रों के प्रभाव का अध्ययन जिस छठवीं अतीन्द्रिय शक्ति से होता है, उससे मुझे यह बोध हो गया है कि पश्चिम की भोगवादी सभ्यता के स्थान पर संवेदनशील संस्मृति का उद्गाता भारत में जन्म ले चुका है। एक बार फिर से उसके पुष्पात्मा सैनिक जगा रहे हैं और अपने देश की आध्यात्मिक धार्मिक कुंठा को झकझोर डाल रहे हैं। यह दल धीरे-धीरे पश्चिम की ओर बढ़ेगा। एशिया होता हुआ यूरोप और अमेरिका में छा जायेगा। एक बार सारा संसार उसके चरण चिन्हों पर चलेगा। पश्चिम वाले उसे ईसा, मुस्लिम राष्ट्र उसे सच्चा रहनुमा और एशियावासी उसे अवतार की संज्ञा देंगे। वह बौद्धिक क्रान्ति के सहारे बढ़ेगा और सबसे पहले बुद्धिजीवियों से जूझ कर उनकी मान्यताओं को बदल उनमें श्रद्धा विकसित करेगा तभी परिवर्तन का सूत्रपात होगा।”
स्वर्णिम भविष्य के यह कथन तथ्य के द्योतक है कि ईश्वरीय सत्ता अपनी प्रखरता के साथ युगीन उत्कृष्टता की दिशा में सक्रिय हैं। मानव सभ्यता का नया मोड़ सन्निकट है। ईश्वरीय सत्ता के इस पुष्प प्रयोजन में हर भावनाशील व्यक्ति योगदान के लिए तत्पर और प्रस्तुत होना चाहिए।
‘‘सब छोटे बड़े नहीं हो सकते, सब गरीब अमीर नहीं हो सकते लेकिन सादे सब हो सकते हैं और यदि इस तरह सब एक जैसे हो जायेंगे तब राम राज्य की कल्पना साकार करना कठिन नहीं होगा।’’
- महात्मा गाँधी
एक बार पाँच असमर्थ व अपंग व्यक्ति एक जगह एकत्रित हुए व आपस में चर्चा करने लगे। पर क्या अन्धे ने कहा “यदि मेरी आँखें होतीं तो अच्छा देखता जहाँ जो बुराई देखता उसे अच्छा बनाने का प्रयत्न करता। लंगड़े ने कहा “मेरे पैर होते तो दौड़ कर असहायों को सहायता करता दिन रात सत्कर्मों में ही लगा रहता। निर्धन ने कहा “यदि धन होता तो मैं अपना सारा धन परोपकार व लोक हित में लगाता”। मूर्ख ने कहा “क्या करूं मैं अधिक पढ़ा लिखा नहीं हूँ अन्यथा मैं देश की अशिक्षा को मिटाने में ही अपने आप को लगा देता”। शारीरिक दृष्टि से निर्बल क्षीणकाय व्यक्ति ने कहा “यदि मुझमें शारीरिक बल होता और मैं स्वस्थ रहा होता तो निर्बलों, दुखियों पर कभी अत्याचार न होने देता।
देव राज इन्द्र उनकी बातें सुन रहे थे। उनकी सत्यता की परीक्षा लेने हेतु उन्होंने इन पाँचों को अपनी इच्छानुसार स्थिति में कर दिया। अन्धे को आँखें, लंगड़े को पैर, मूर्ख को विद्या, अशक्त को शक्ति व निर्धन को धन मिल गया। वे पाँचों प्रसन्न हो गये।
परिस्थिति बदलते ही उनके विचार भी बदलने लगे। अन्धा दिन रात सुन्दर वस्तुएँ ही देखने में लगा रहता। वह सोचता जब भगवान् ने देखने को आँखें दी हैं तो इनका भरपूर उपयोग करना चाहिए। सुन्दर वस्तुएँ देख-देख तथा आँखों के द्वारा हो सकने वाले भौतिक सुख में ही वह लगा रहा। धनी व्यक्ति ने अपने धन से ऐश्वर्य की सामग्री जुटाली वह अपने ही सुख में सबका सुख समझ ही अपनी संतुष्टि करता रहा। निर्बल को बल प्राप्त होने पर वह अपनी शारीरिक शक्ति के सहारे दूसरों को आतंकित कर अपनी सुख सुविधा के साधन जुटाने में लगा रहा। विद्वान व्यक्ति अपनी बौद्धिक चातुर्य से समाज को सदाशयता का लाभ उठा कर सुविधामय जीवन व्यतीत करने लगा। बचा लंगड़ा व्यक्ति, वह भी पैर प्राप्त कर दुनियादारी के झंझटों में लगा रहा।
बहुत दिनों बाद इन्द्र आए व उन्होंने जब इन पाँचों की यह दशा देखी तो सबको पूर्व स्थिति में कर दिया। अब पाँचों व्यक्ति पुनः पश्चात्ताप करने लगे। जब उन्हें पुनः कष्टमय स्थिति में पुनः रहना पड़ा तब समझ में आया कि भगवान के दिए हुए अनुदानों, भगवान द्वारा प्रदत्त सुख-सुविधाओं में ही लिप्त रह हमें यह नहीं भूल जाना चाहिए कि हमारा धन, ज्ञान, बल आदि हमारे उपयोग के लिए ही नहीं वरन् समाज के कल्याणार्थ विनियोजित करने में भी हैं।
मनुष्य अपने साधनों को देव अनुदान समझ यदि उनका सद्कार्यों में उपयोग करता रहे तो इन अनुदानों में भी निरन्तर वृद्धि होती रहती है पर यदि इनका उपयोग स्वयं के हित तक ही सीमित रहा तो साधन कम होने लगते हैं। अन्ततः मनुष्य छूँछ का छूँछ ही रहता है।
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चौबीस घण्टे काम करने की न किसी में सामर्थ्य रहती है न शक्ति। परिस्थिति विशेष में यदा-कदा भले ही आठ घण्टे से अधिक श्रम किया जा सके, परन्तु रोज का क्रम इसी प्रकार का बनाने की चेष्टा की जाय तो अशक्तता, कमजोरी, रोग और दुर्बलता शीघ्र ही आ घेरती है और व्यक्ति पुनः लम्बे समय तक विश्राम के लिये बाध्य हो जाता है। अर्थात् अनवरत खर्च होने वाली शक्ति को उस अवधि में अर्जित करने के लिए प्रकृति द्वारा विवश कर दिया जाता है। शक्ति के अनुसार परिश्रम कर लेने के बाद व्यक्ति को विश्राम की आवश्यकता अनिवार्य रूप से पड़ती है।
विश्राम द्वारा शरीर तो अपनी खर्च हुई शक्ति को अर्जित कर लेता है। लेकिन शरीर के साथ-साथ मन को भी तो सक्रिय रहना पड़ता है। वैसी स्थिति में मानसिक शक्तियाँ भी खर्च होती है। उनके भी पुनरार्जन की आवश्यकता है। वे किस प्रकार अर्जित की जाय। प्रायः सोते समय भी मन निष्क्रिय नहीं रहता। व्यक्ति दिन भर विश्राम करते समय मन उसी धारा में क्रियाशील रहता है। न रहे तो भी मन कितनी ही आकांक्षाएं, इच्छायें और संकल्प विकल्प करता रहता है। क्योंकि हम सोते समय तो शरीर को विश्राम की अवस्था में छोड़ देते हैं, पर मन के सम्बन्ध में चूक जाते हैं और मन उस समय भी व्यस्त रहता है। यही कारण है कि अधिक सोच-विचार करने वाले या चिन्ताओं में मग्न रहने वाले मानसिक दृष्टि से रुग्ण हो जाते हैं।
तो मन को भी विश्राम देने की आवश्यकता पड़ जाती है और उसी विश्राम की कला का नाम है मनोरंजन। जिसे आह्लाद, खुशी या हल्कापन लाना भी कहा जा सकता है। विश्राम काल में शरीर को शिथिल छोड़ना पड़ता है तथा मनोरंजन के समय मन ढीला हो जाता है। यद्यपि बिना मनोरंजन के भी मन को विश्राम में पहुँचाया जा सकता है, पर वह श्रम साध्य है और उच्चस्तरीय योग साधनाओं में रत रहने वाले लोगों के लिये सम्भव है। जन-सामान्य के लिये थके हुये मन को राहत पहुँचाने का काम मनोरंजन द्वारा ही सम्भव होता है और लोग थक जाने के बाद इसी कारण सिनेमा देखने, गीत-संगीत सुनने, हल्का-फुल्का साहित्य पढ़ने में अपना खाली समय लगाकर मन को बहलाते हैं।
व्यक्तित्व के सम्पूर्ण विकास के लिये मनोरंजन की आवश्यकता उसी प्रकार बतायी गयी है। जिस प्रकार की शरीर के लिये विश्राम की ओर इस आवश्यकता को शिक्षा, स्वास्थ्य, सम्पर्क उपयुक्त वातावरण की तरह ही शुद्ध और स्वस्थ रूप में पूरा करने का निर्देश दिया गया है। स्वस्थ मनोरंजन जहाँ व्यक्ति को नयी ताज़गी देता है, जीवन में रस घोलता है और मनोभूमि में नयी शक्ति का संचार करता है वहीं अस्वस्थ और अशुद्ध मनोरंजन उसे नीरस, कुण्ठित और पथभ्रष्ट बनाता है। स्वस्थ शरीर को भी अनुपयुक्त आहार-विहार जिस प्रकार लड़खड़ा देते हैं उसी प्रकार अस्वस्थ मनोरंजन व्यक्ति को पथभ्रष्ट, कुमार्गगामी और दुर्व्यसनी बना देता है। स्वस्थ मनोरंजन जहाँ व्यक्ति में आगे बढ़ने की, कठिनाइयों से संघर्ष करने की और प्रतिकूलताओं से डटकर लोहा लेने की प्रेरणा देता है वही अशुद्ध मनोरंजन व्यक्ति में कायरता, बुज़दिली, दोष-दुष्प्रवृत्तियों से लगाव और शौक-मौज के चस्के उत्पन्न करता है।
मनोरंजन की आवश्यकता उस समय और भी दृढ़ता के साथ अनुभव होने लगती है या उसका महत्व समझ में आने लगता है कि जबकि हम प्रत्येक व्यक्ति की इसके लिए लालायित देखते हैं। हर समय चेहरे पर मधुर मुस्कान लिए और खिल-खिलकर हँसने वाले लोगों के सम्पर्क में और की चाह तुरन्त उत्पन्न होती है। ताकि बिजली की सुचालक वस्तुओं की तरह विद्यमान आह्लाद का प्रवाह हमारे भीतर भी आ जाय। साधन-सम्पन्न और धनवान, विभूतिवान व्यक्ति भी अपने महत्वपूर्ण कार्यों को एक समय छोड़कर खुले हृदय से हँसना या प्रफुल्लित होना चाहते हैं। वे लोग भी जिनके लिये पैसा जीवन से भी अधिक महत्वपूर्ण है, पैसा कमाना छोड़कर खुश होना चाहते हैं। क्यों? स्पष्ट है कि मनोरंजन भूख, प्यास और निद्रा की तरह ही एक नैसर्गिक आवश्यकता है।
यह भी सत्य है कि दुनिया के महापुरुषों से लेकर सामान्य जनों तक जिनकी प्रवृत्तियाँ, विचार और कार्यक्षेत्र अलग-अलग रहते हैं और कोई भी चीज एक दूसरे से नहीं मिलती, मनोरंजन के प्रति समान रूप से सजग रहते हैं। परिस्थितियाँ सभी के लिये अलग-अलग होते हुये भी प्रायः सभी व्यक्तियों में हास्य-विनोद और आमोद-प्रमोद की प्रवृत्ति समान रूप से विद्यमान रहती है।
मनोरंजन इतना आवश्यक है कि उसके बिना जीवन चल पाना कठिन ही नहीं, लगभग असम्भव-सा भी है तो भी खेद है कि उसके स्तर की ओर हमारा कोई ध्यान नहीं रहता। गरीबी, अशिक्षा, संकीर्णता या कारण चाहे जो भी हो अधिकांश लोग मनोरंजन की आवश्यकता तो अनुभव करते हैं, पर उसके महत्व को नहीं समझते अथवा उसे हेय-स्तर का बनाये रखने में ही कोई भलाई दिखती है।
मनोरंजन के हेय और उत्कृष्ट के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि जो पशु-प्रवृत्तियाँ भड़कायें वह- हेय और जो मानवीय गुणों के प्रति आस्था जगाये वह- उत्कृष्ट। इस आधार पर उपलब्ध सभी मनोरंजन साधनों का विश्लेषण किया जा सकता है। आजकल उपयोग में लाये जाने वाले मनोरंजन साधनों में फिल्म और पुस्तकें प्रमुख हैं। खेद है कि इस ओर से हमें निराश ही होना पड़ेगा। फिल्में देखकर पशु-प्रवृत्तियों के शिकार हुये लोगों की कितनी घटनाएँ अखबारों में प्रकाशित हुआ करती हैं। साहित्य भी बहुत कुछ फिल्मों से प्रभावित हुआ। मानवीय गुणों के प्रति आस्था जागृत करने वाले उपन्यास, कहानियाँ, कवितायें बहुत कम दिखती हैं और सस्ती रोमांटिक पुस्तकें बड़ी मात्रा में छपकर धड़ल्ले से बिकती हैं।
लोग इन्हें इस कारण देखते हैं कि उन्हें मनोरंजन की आवश्यक खुराक मिलती रहे। परन्तु उसके प्रभाव की बारीक बातों का चयन करने की क्षमता जन-साधारण में नहीं होती। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि व्यस्तता की अपेक्षा खाली समय में मन बड़ी गहराई से प्रभावित होता है। हम जब निश्चित मुद्रा में अवकाश के समय कोई बात सुनते हैं तो देर तक वह स्मरण में बनी रहती है और बड़ी जल्दी में कहीं जा रहे हों तो कोई बात सुनकर भी वह बड़ी जल्दी विस्मृत हो जाती है। व्यस्त लोगों को अपने आस-पास क्या हो रहा है इस बात का ध्यान नहीं रहता। सम्मोहन और कुछ नहीं, खाली मन में डाले गये संकेत ही हैं। विशेष उपचारों और प्रविधियों के कारण उनकी शक्ति बढ़ जाती है यह बात और है। लेकिन मूल सिद्धान्त एक ही है खाली मन में डाले गये संकेत और निर्देश। मनोरंजन भी उसी पद्धति से अपना प्रभाव डालता है वह कथ्य की प्रेरणाएँ बनाकर प्रस्तुत करता है।
मनोरंजन का प्रभाव संस्कारों के रूप में भी पड़ता है और वे तत्काल यदि कोई प्रभाव नहीं दर्शातीं तो कालान्तर में जब संस्कार दृढ़ हो जाते हैं तब अपना घातक असर पैदा करते हैं। अतः मनोरंजन को केवल विश्राम ही नहीं, मन को प्रभावित करने वाली एक कला के रूप में भी देखा जाना चाहिए और जो चीज कुरुचि जगाये, विकृतियों बढ़ाये उनसे दूर रहना चाहिए।
एक स्वस्थ और परिष्कृति रूप यह भी है मनोरंजन का कि वह मन के साथ-साथ शरीर को भी लाभ पहुँचाये। इस दृष्टि से खेल-कूद, बॉलीबॉल, कुश्ती कबड्डी, क्रिकेट, तैरना, दौड़ लगाना आदि क्रीड़ाओं कला-अभ्यासों को भी मनोरंजन में सम्मिलित किया जा सकता है। मनोरंजन का इतना ही अर्थ है कि हम मन के खिंचे हुये तार थोड़े ढीले करें ओर जीवन वीणा को इस योग्य रहने दें कि पुनः उसका जब साज बजाना हो तब वह पहले की तरह ही चुस्त, सक्रिय और सतेज हो सके। हमें मनोरंजन के महत्व और स्तर को समझना चाहिए तथा उसे अस्वास्थ्यकर और हानिप्रद ढंग से प्रयोग में नहीं लेना चाहिये।
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अंग्रेजी के प्रसिद्ध उपन्यासकार जार्ज एलन नॉट ने एक वैज्ञानिक उपन्यास लिखा है- ‘जर्नीबाय अनवेज’। उपन्यास में एलन नॉट ने एक ऐसे यान की कल्पना की है जिसमें नायक कुछ ही मिनटों में हजारों मील की यात्रा कर लेता है। यान प्रकाश की गति से चलता है और नायक यात्रियों को इच्छित स्थान पर उतार देता है। यह यान न किसी धातु का बना होता है ओर न ही इसमें कोई यन्त्र लगा होता है। बल्कि कुछ वैज्ञानिक अपनी संकल्प शक्ति से सूक्ष्म अणुओं को इस प्रकार जोड़ते हैं कि उसमें बैठकर यात्री भारहीन हो जाता है। यान चालक संकल्प करता है, अमुक जगह पहुँचना है और यान के सूक्ष्म यन्त्र चलने लगते हैं। चलने लगता है यह कहना भी गलत होगा क्योंकि कुछ ही पल में, इतनी शीघ्र कि लगता है तत्काल गन्तव्य स्थान पर खड़ा दिखाई देता है।
वहाँ जाकर मैंने देखा, चारों ओर आग लगी हुई है। जॉन एक तम्बू में फँसा हुआ है और उसके ऊपर लोहे का वजनी ट्रक गिरा पड़ा है जिसके नीचे वह दबा हुआ है। मैंने तुरन्त उस ट्रक को जॉन के ऊपर से हटाया और तम्बू के बाहर ले जाकर उसे खड़ा कर दिया।
इसके बाद मुझे अपना शरीर पूर्ववत् हो गया लगा। आँखें खोली तो प्रतीत हुआ कि जैसे तन्द्रा टूट गयी हो। पास ही मेरी पत्नी बैठी मेरी नब्ज़ टटोल रही थी। मैंने पूछा-क्या हुआ? तो वह बोली मुझे ऐसा लगा जैसे आप एबनॉर्मल हैं। मैंने उसे अपना अनुभव सुनाया तो वह बोली आपने कोई दुःस्वप्न देखा होगा। परन्तु मुझे न जाने क्यों अपनी पत्नी की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था। छः महीने बाद जब जॉन छुट्टी पर लौटा तो उसने युद्ध के अनुभव सुनाते समय एक अग्निकाण्ड में फँस जाने और वहाँ से चमत्कारी ढंग से निकल जाने की घटना सुनायी।
इस घटना के सम्बन्ध में वर्नहाट का विश्वास है कि दूरबोध द्वारा उक्त दुर्घटना की सूचना पाकर उनका सूक्ष्म शरीर ही जॉन को बचाने के लिए गया था। तो क्या सूक्ष्म शरीर से हर कहीं तत्क्षण पहुँच सकता है। अध्यात्म विज्ञान इसका उत्तर ‘हाँ’ में देता है और विज्ञान का ध्यान भी इस तथ्य की ओर आकर्षित होने लगा है? ऐसा कई घटनाओं के विवरण संकलित किये जा चुके हैं जिनमें सूक्ष्म की शक्ति ही क्रियाशील दिखाई दी है।
सूक्ष्म देह स्थूल देह से अलग हो सकती है यह तो कई व्यक्तियों के अनुभव में आ चुका है। पिछले दिनों अमेरिका की विश्वविख्यात अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर का अनुभव प्रकाशित हुआ था। उसमें बताया गया था कि टेलर का कोई गम्भीर आपरेशन किया जाना था, टेलर को आपरेशन टेबल पर लिटाया गया और बेहोश किया गया। आपरेशन काफी समय तक चला और जब पूरा हो गया तो डॉक्टरों का अकस्मात् ध्यान गया कि टेलर की काया निष्प्राण हो चुकी है। उसकी साँस भी बन्द हो गयी थी नाड़ी डूबती जा रही थी, हृदय भी बहुत धीरे-धीरे धड़क रहा था। काफी प्रयत्नों के बाद वह स्वस्थ हो सकी और जब वह स्वस्थ हुई तो उसने कहा- ‘मैंने अपना आपरेशन अपनी आंखों से देखा है।’
टेलर तो बेहोश थी। भला अपना आपरेशन आप कैसे देख सकती थी? डॉक्टरों ने पूछा तो उसने बताया कि-‘‘तब मैं अपने शरीर को भी उसी प्रकार देख सकती थी जैसे कि किसी दूसरे का देख सकती हूँ। सिर, चेहरा, मुँह, नाम आदि सब कुछ। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे मैं अपने शरीर के बाहर निकल आयी हूँ और अपने शरीर को उस प्रकार देख रही हूँ जैसे वह किसी दूसरे का शरीर हो, उस समय में अपने आपको बहुत हल्का-फुल्का अनुभव कर रही थी।’’
एलिजाबेथ टेलर कहीं उस समय स्वप्नों के सागर में तो नहीं खो गयी थी यह जाँचने के लिए डाक्टरों ने पूछा, अच्छा आपरेशन के दौरान क्या-क्या हुआ यह बताइये। टेलर ने आपरेशन की प्रत्येक प्रक्रिया बता दी, यही नहीं डाक्टरों ने कौन-सी वस्तुएं आपरेशन के कौन से उपकरण किसी क्रम से इस्तेमाल किये यह भी बता दिया। एलिजाबेथ ने यह भी बताया कि अमुक उपकरण यथास्थान उपलब्ध न होने के कारण प्रमुख सर्जन किस प्रकार झल्ला उठे थे और उन्होंने कौन-कौन से शब्द कहे थे।
इन अनुभूतियों को सुनकर एलिजाबेथ की बातों पर किसी को सन्देह न रहा। भारतीय अध्यात्म-दर्शन से परिचित व्यक्तियों के लिए यह घटना नितान्त सहज हो सकती है क्योंकि यहाँ स्थूल के अतिरिक्त सूक्ष्म और कारण शरीर का अस्तित्व भी सदा से स्वीकारा जाता रहा है परन्तु पश्चिम के लिए यह घटना चौंका देने वाली हो सकती है। ऐसी बात नहीं है कि पश्चिम में शरीर से परे आत्मा के अस्तित्व को कभी स्वीकारा ही नहीं गया हो। वहाँ भी जिन सन्त महात्माओं ने अध्यात्म विज्ञान की खोज की उन्होंने सूक्ष्म के अस्तित्व को स्वीकारा परन्तु आधुनिक पदार्थ विज्ञान ने उन बातों को अन्धविश्वास का फतवा देकर बुद्धिजीवियों के दिमाग से उन आस्थाओं को पोंछ-सा ही दिया।
इसके बावजूद भी इस तरह की घटनायें घटती रही हैं। जिनके कारण पदार्थ विज्ञानियों को यह सोचने के लिए विवश होना पड़ा कि मनुष्य की चेतना स्थूल शरीर से बँधी हुई नहीं है। वह इच्छानुसार कहीं भी आ जा सकती है। प्रसिद्ध मनश्चिकित्सा विज्ञानी डॉ0 थैमला मोस ने सिद्ध कर दिखाया है कि-‘कोई भी व्यक्ति अपनी चेतना को अपने शरीर से बाहर निकाल सकता है और पल भर में हजारों मील दूर जा सकता है।
एक दूसरी घटना का उल्लेख करते हुए डॉ0 मोस ने लिखा है-‘‘ब्रिटिश कोलम्बिया विधानसभा का अधिवेशन विक्टोरिया सिर्ए में चल रहा था। उस समय एक विधायक चार्ल्सवुड बहुत बीमार थे, डाक्टरों को उनके बचने की उम्मीद नहीं थी परन्तु उनकी उत्कट इच्छा थी कि वे अधिवेशन में भाग लें। डाक्टरों ने उन्हें बिस्तर से उठने के लिए भी मना कर दिया था और वे अपनी स्थिति से विवश बिस्तर पर लेटे थे। परन्तु सदन में सदस्यों ने देखा कि चार्ल्स विधान सभा में उपस्थित है। अधिवेशन की समाप्ति पर सदस्यों का जो चुपचाप फोटो लिया गया, उसमें चार्ल्सवुड भी विधान सभा की कार्यवाही में भाग लेने वाले सदस्यों के साथ उपस्थित थे।”
विश्वविख्यात दार्शनिक, चिन्तक और मनोवैज्ञानिक डॉ0 कार्लजुंग ने तो स्वयं एक बार सूक्ष्म शरीर के शरीर से बाहर आने का अनुभव किया था। उन्होंने ‘मेमोरीज’ ड्रीम्स एण्ड रिफ्लेक्शंस’ नामक पुस्तक में इस घटना का उस वर्ष जुंग को दिल का दौरा पड़ा। दौरा बहुत खतरनाक था और डॉक्टरों के अनुसार जुंग का मौत से आमना-सामना हो रहा था। जुंग ने उस समय के अनुभव को इन शब्दों में लिखा है-‘जब मुझे दवा दी जा रही थी और प्राण रक्षा के लिए इन्जेक्शन लगाये जा रहे थे तब मुझे कई विचित्र अनुभव हुए। कहना मुश्किल है मैं उस समय अचेत था अथवा स्वप्न देख रहा था। पर मुझे यह स्पष्ट अनुभव हो रहा था कि मैं अन्तरिक्ष में लटका हुआ हूँ और धुनी हुई रुई के गोलों की तरह हल्का-फुल्का हूँ। मैं उस समय जहाँ था वहाँ से हजार मील दूर पर स्थित चेरुशलय शहर को इस प्रकार देख रहा था कि जैसे मैं विमान में बैठकर आकाश से नीचे झाँक रहा हूँ। इसके बाद मैं एक पूजागृह में प्रविष्ट हुआ। वहाँ मैंने अनुभव किया कि मैं इतिहास का कोई खण्ड हूँ और कहीं भी आने जाने के लिए स्वतन्त्र हूँ। तभी मेरे ऊपर कोई छाया-सी मण्डराती दिखाई, दी, उस छाया ने मुझसे कहा कि तुम्हें अपने भौतिक शरीर में प्रवेश कर जाना चाहिए। जैसे ही मैंने उस छाया के आदेश का पालन किया मैंने अनुभव किया कि मैं अब स्वतन्त्र नहीं हूँ। परन्तु इस अनुभूति ने मुझे जो अन्तर्दृष्टि प्रदान की उसने मेरे सभी सन्देह समाप्त कर दिये तथा मैंने जान लिया कि जीवन की समाप्ति पर क्या होता है।”
भौतिक विज्ञान पदार्थ का विश्लेषण करते-करते इस बिन्दु तक तो पहुँच ही गया है कि जिन्हें हम पदार्थ कहते हैं वह वस्तुतः कोई स्वतन्त्र इकाई नहीं है बल्कि किसी भी पदार्थ का छोटे से छोटा कण भी असंख्य सूक्ष्मातिसूक्ष्म कणों का संघटक है। इन घटकों को अणु कहा जाता है। इससे आगे शोध करने पर वैज्ञानिकों ने चेतना के दर्शन आरम्भ किये हैं।
वैज्ञानिकों ने इस शरीर को ‘द बायोलॉजिकल प्लाज्मा बॉडी’ नाम दिया है। इस शरीर के सम्बन्ध में यह बताया गया है कि यह केवल उत्तेजित विद्युत अणुओं से बने प्रारम्भिक जीवाणुओं के समूह का योग भर नहीं है वरन् एक व्यवस्थित तथा स्वचालित घटक है जो अपना स्वयं का चुम्बकीय क्षेत्र निःसृजित करता है।
अध्यात्म विज्ञान ने चेतना को स्थूल की पकड़ से सर्वथा परे बताया है उसे केवल अनुभव ही किया जा सकता है। फिर भी प्राणियों का शरीर निर्मित करने वाले घटकों का जितना विवेचन, विश्लेषण अभी तक हुआ है, उससे प्रतीत होता है कि आज नहीं तो कल विज्ञान भी इस तथ्य को अनुभव कर सकेगा कि चेतना को स्थूल यन्त्रों से नहीं, विकसित चेतना के माध्यम से ही अनुभव किया जा सकेगा।
‘द बायोलॉजिकल प्लाज्मा बॉडी’ का अध्ययन करते हुए वैज्ञानिकों ने उसके तत्वों का भी विश्लेषण किया। बायोप्लाज्मा की संरचना और कार्यविधि का अध्ययन करने के लिए सोवियत वैज्ञानिकों ने कई प्रयोग किये और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि बायोप्लाज्मा का मूल स्थान मस्तिष्क है और यह तत्व मस्तिष्क में ही सर्वाधिक सघन अवस्था में पाया जाता है तथा सुषुम्ना नाड़ी और स्नायविक कोशाओं में सर्वाधिक सक्रिय रहता है।
अध्यात्मविद् मानते हैं कि मानवीय चेतना का मूल स्थान मस्तिष्क में ही है। शास्त्रकार ने तो इस शरीर की तुलना एक ऐसे वृक्ष से की है जिसकी जड़ें ऊपर और शाखायें नीचे की ओर हैं। जिस प्राण ऊर्जा के अस्तित्व को वैज्ञानिकों ने अनुभव किया वह आत्मचेतना नहीं है बल्कि सूक्ष्म शरीर के स्तर की ही शक्ति है जिसे मनुष्य शरीर की विद्युतीय ऊर्जा भी कहा जाता है यह ऊर्जा प्रत्येक जीवधारी के शरीर में विद्यमान रहती है।
थेल विश्वविद्यालय में न्यूरो अकादमी के प्रोफेसर डॉ0 हेराल्डवर ने सिद्ध किया है कि प्रत्येक जीवित प्राणी चाहे वह क्रीड़ा ही क्यों न हो ‘इलेक्ट्रोडायन मिक’ क्षेत्र से आवृत्त रहता है।
बाद में इसी विश्वविद्यालय के एक अन्य वैज्ञानिक डॉ0 लियोनार्ड राबित्ज ने इस खोज को आगे बढ़ाया और कहा इस क्षेत्र को मस्तिष्क के द्वारा प्रभावित किया जा सकता है। भारतीय अध्यात्म ने इन शक्तियों के विकास हेतु ध्यान धारणा का मार्ग बताया है।
अब यह लगभग निश्चित हो चला है कि विज्ञान भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहा और सफल हो रहा है जिस सफलता की योग और दर्शन बहुत पहले प्राप्त कर चुका है। पुराणों और धर्मग्रन्थों में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जिन्हें चमत्कारी घटनायें कहा जाता है।
सूक्ष्म की सत्ता और सामर्थ्य को देखते हुए यह भी असम्भव नहीं लगता कि प्राचीनकाल में ऋषि, महर्षि, देवता, असुर आदि संकल्प बल से या सूक्ष्म के माध्यम से सुदूर ग्रह-नक्षत्रों की यात्रा पलक झपकते ही सम्पन्न कर लेते हों। कौन जाने अगले कुछ ही वर्षों में विज्ञान ही ग्रह-नक्षत्रों पर खर्चीले तथा भारी यन्त्रों से लदे यान की अपेक्षा सूक्ष्म के माध्यम से वहाँ पहुँचने की विधि खोज निकाल ले। प्रसिद्ध इलेक्ट्रॉनिक विशेषज्ञ डॉ0 निकोलसन ने तो यहाँ तक कहा है कि अगले सौ पचास वर्षों में इलेक्ट्रॉनिकी इतनी विकसित हो जायगी कि किसी भी वैज्ञानिक को किसी भी ग्रह पर भेजा जा सकेगा। करोड़ों मील दूर स्थित ग्रह पर बैठा कोई वैज्ञानिक किसी गुत्थी के बारे में पूछेगा तो उसे कहा जा सकेगा कि एक सेकेंड रुकिये अभी पहुँच रहा हूँ। और यह सब सूक्ष्म शरीर के द्वारा ही सम्भव हो सकेगा।
सन्त फ्रांस्वा अगोबीओ नगर जा रहे थे। मार्ग में भयंकर जंगल पड़ता था। शिष्यों ने कहा-भगवन् मार्ग में बहुत खूँखार भेड़िया रहता है इस रास्ते से मत चलिये। “दुष्ट और दुराचारियों को स्नेह सदाचार की राह पर चलाना यही तो धर्म का उद्देश्य है तात!” यह कहकर फ्रांस्वा उसी रास्ते से आगे बढ़ गये।
सचमुच भेड़िया आ धमका, शिष्यगण भयवश इधर-उधर छुप कर प्राण बचाने की चेष्टा में थे किन्तु सन्त ने अत्यन्त करुणा और प्यार की दृष्टि डाली उस भेड़िये पर। हृदयतंत्री फूट पड़ी। निरीह जीव! पिछले जन्मों के दुष्कृत्यों का प्रतिफल तुम भेड़िये की योनि में पड़कर भुगत रहे हो, सोचो इस जन्म के पापों का गट्ठर कब तक लादे फिरोगे?
भेड़िये ने आंखें नीची कर लीं, दोनों पंजे उसने सन्त के चरणों में रख दिये। एक बार फिर उनकी आँखों से झर रही करुणा को उसने निहारा और फिर दोनों पंजे सन्त के चरणों पर रख जीभ से चरण धूलि ली और जंगल में एक ओर भाग गया।
शिष्य अब तक कम्पित गात यह दृश्य देख रहे थे-सन्त के समीप आकर बोले भगवन्! भेड़िये ने आप पर आक्रमण नहीं किया, दूसरों पर वह क्यों करता था। सन्त ने कहा-”तात! प्यार की भाषा मनुष्य ही नहीं मनुष्येत्तर प्राणी भी अच्छी तरह समझते हैं। प्यार सच्चा हो तो इससे भी खूँखार लोग बदले जा सकते हैं।”
तब से भेड़िये का आतंक सदा के लिये समाप्त हो गया।
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हम जिस युग में जी रहे हैं उसमें सुविधाओं और साधनों की प्रचुर मात्रा विद्यमान है। विज्ञान और टेक्नालॉजी के द्रुत विकास के साथ-साथ मानवीय वैभव में अध्यापक अभिवृद्धि हुई। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उपयोगी सामग्री के अम्बार लगते जा रहे हैं। किन्तु इसे युग की सबसे बड़ी विडम्बना ही कहा जायेगा कि साधनों की इस बढ़ोत्तरी के साथ उनका उपयोग करने वाली अन्तःचेतना का स्तर ऊँचा उठने की अपेक्षा उलटा गिरता चला जा रहा है। पतन इस स्थिति तक आ गया है जहाँ से सर्वनाश की विभीषिकायें स्पष्ट दिखाई देने लगी हैं इतने पर भी ध्यान समृद्धि की ओर ही लगा हुआ है। मानवीय अन्तःकरण को, आस्थाओं, आकांक्षाओं, प्रथा-परम्पराओं, रीति-नीति और गतिविधियों को उर्ध्वगामी बनाने की ओर किसी का भी ध्यान नहीं है।
स्वास्थ्य, शिक्षा, उपार्जन और सुरक्षा व्यवस्था मानवीय प्रगति के लिए आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी कहे जा सकते हैं किन्तु यदि यह साधन दुष्ट बुद्धि के हाथों में पड़ जाते हैं तो वह प्रगति ही विनाश का कारण बन जाती है। आज की स्थिति यह है कि सारा समाज तृष्णा और अहंता, इन्द्रिय सुखों की अतृप्ति लालसा में डूबा पड़ा है। उनकी पूर्ति सामान्य तरीकों से हो नहीं सकती। ईमानदारी और परिश्रम के सहारे निर्वाह योग्य आजीविका उपलब्ध की जा सकती है, पर जब थोड़े समय में अपार सुख की कामना हर किसी को सता रही हो तो भ्रष्टता और दुष्टता का बढ़ना निश्चित हो जाता है। आज स्थिति यही है। दूसरों की बात पीछे की है न्याय और विकास के अधिकारी ही, “भेड़ ने खेत” खाया की क्रूरता में लिप्त दिखाई देते हैं जो जन सामान्य की तो कल्पना करना ही कठिन है।
बढ़ती हुई हिंसा, अपराध और समस्यायें इतनी जटिल हो गई हैं कि भयंकर परिणामों की कल्पना करने से भी हृदय सिहर उठता है। छोटे-छोटे बच्चों, अबोध महिलाओं तक के साथ भी दुष्टता बरतने से लोग बाज न आये तो उसे दुर्बुद्धि की पराकाष्ठा समझनी चाहिए। आज का बुद्धिमान कहा जाने वाला समाज इन बुराइयों में आकण्ड डूबा हुआ है। अतएव इस युग की सबसे आवश्यकता व्यक्तियों की अन्तःभूमिका को सुसंस्कृत और समुन्नत बनाने की हो गई है। उसकी उपेक्षा की गई तो आज की प्रगति कल के पिछड़ेपन से भी महंगी पड़ेगी। मनुष्य का अन्तराल उत्कृष्ट बनाया जा सके तो स्वल्प साधनों में भी सुख शान्ति की परिस्थितियाँ विकसित हो सकती हैं। दृष्टिकोण में उदारता, चरित्र में शालीनता और व्यवहार में नैतिकता का समावेश रहे तो अभावग्रस्त स्थिति में भी मनुष्य स्वर्गीय परिस्थितियों का आनन्द लेता रह सकता है। यही वह जिम्मेदारी है जिसे पूरा किया जाना आज की सबसे बड़ी साधना कही जा सकती है।
दण्ड, पुरस्कार, प्रलोभन और सज्जनता का प्रशिक्षण यह तीन प्रयोग पिछले दिनों मानवीय दृष्टिकोणों को सुधारने के उद्देश्य से किये जाते रहे हैं। किन्तु उनकी पहुँच शरीर और मस्तिष्क तक तो किसी तरह हो जाती है, पर आस्थायें निकृष्ट स्तर की होने के कारण वे मनुष्य को देर तक आदर्शवादी बनाये रखने में सफल नहीं हो पाये। कानूनी प्रक्रियायें इतनी लचर हैं कि अधिकांश अपराधी तत्व बच निकलते हैं। इस तरह दण्ड का भय जाता रहा, पुरस्कार की मात्रा कहीं भी हो सीमित हो सकती है, पर लालसाओं की बाढ़ असीम हो तो भी लोग दुष्कर्म के लिए ही उतावले होंगे। सज्जनता का प्रशिक्षण करने वाले लोग जब स्वयं ही ओट से शिकार करते दिखाई देते हैं तो रही सही सज्जनता भी बालू के ढेर की तरह थोड़े से प्रलोभन में ढह कर रह जाती है। अव्यवस्था रोकने के सारे के आधार धरे के धरे रह जाते हैं और अवांछनीयतायें उसी गति से बढ़ती हुई चली जाती हैं।
मनुष्य का जीवन उसकी आस्थाओं से प्रेरित होकर बढ़ता है। यदि आस्थायें निकृष्ट हुईं तो व्यक्ति अधोगामी प्रवृत्तियों में जकड़ा रहेगा। मन आकांक्षाओं का दास है तो शरीर मन का। स्पष्टतः आस्थाओं के अनुरूप जीवन क्रम सुनिश्चित होता है। मनुष्य भला बुरा जो कुछ भी करता है उसकी मूलभूत प्रेरणा उसे अपनी आकांक्षाओं, आस्थाओं से ही मिलती है, आस्थायें संस्कार जन्य होती हैं। राजकीय कानून, सामाजिक नियम तर्क और प्रवचन प्रशिक्षण उन्हें बहुत सीमित मात्रा में ही प्रभावित कर पाते हैं, पर यदि मानवीय विश्वास मोड़े जा सकें, तो व्यक्ति बाल्मीकि, अँगुलिमाल, सदनकसाई, गणिका और अजामिल की तरह से परिवर्तित होकर दुष्ट से महान् सन्तों की श्रेणी में जा खड़े हो सकते हैं।
आस्थाओं में परिवर्तन के लिए आस्थाओं का प्रतिरोपण ही कार्य कर सकता है। अत्यधिक ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न महापुरुषों द्वारा पैदा किया गया वातावरण भी इस कार्य में सहायक होता है, पर उस तरह की उपासना और साधना के द्वारा ही अन्तःकरण में उच्चस्तरीय श्रद्धा का आरोपण, परिपोषण और अभिवर्धन करके मनुष्य जीवन की ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को सृजन प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है। अन्तःकरण परिवर्तित किया जा सके तो सामान्य जीवन के क्रिया-कलाप स्वतः बदल जाते हैं।
आस्थाओं के पुनर्निर्माण का एक अन्य उपाय भी है जिसे तप कहते हैं। उपासना वर्ग के सभी कलेवर वस्तुतः इस तप के ही उपादान हैं, पर इस पद्धति में शरीर को अनेक कष्ट पूर्ण तितीक्षाओं से, मन को विरोधी परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। इस तरह मनुष्य का दृष्टिकोण उदार, उदात्त और विशाल बनता है। शोषण, उत्पीड़न और भ्रष्टता की प्रतिक्रियाओं को स्वतः अनुभूति इसी से होती है और उस स्थिति में मनुष्य स्वयं ही उनसे दूर भागता है। स्पष्ट है कि ऐसे समाज बुराइयों से बचे हुए होंगे, साधन सुविधाओं की सार्थकता भी ऐसे ही समाज में सिद्ध होती है।
ईसा, बुद्ध, शंकराचार्य, विवेकानन्द, गान्धी जैसे महामानवों ने जो भी सफलतायें मानवीय समाज को संस्कारित करने में पाई उनका कारण अपनी प्रखर आत्मशक्ति द्वारा उस समय के जनमानस की भौतिक लालसाओं से हटाकर उन्हें अन्तर्मुखी बनाना रहा है। मानवीय दृष्टिकोण में जब तक भौतिक जीवन के सुखों की चाह प्रबल रूप से छायी रहती है तब तक वह समूचे ब्रह्माण्ड को अत्यन्त विलक्षण संरचना-मनुष्य शरीर की आध्यात्मिक सत्ता की बात ही नहीं सोच पाता। मृत्यु के बारे में हर कोई जानता है कि उसे टाले चला जाना आज तक किसी के लिए संभव नहीं हुआ तो भी कितने लोग हैं जो उसके लिए तैयारी करते हैं। जीवन की अमरता के विश्वास को लोग शारीरिक अमरता के भ्रम में फँसा कर यों ही निरर्थक गँवाते रहते हैं। और मनुष्य शरीर पाने जैसा स्वर्ण-अवसर हाथ से चला जाता है, थोड़े से लोग इस बात को समझते हैं तो सन्त और महात्मा हो जाते हैं। अधिसंख्य जनमानस को इस अध्यात्म के प्रकाश में लाया जा सके तो स्वभावतः लोगों की उद्यत लालसाओं की बाढ़ को रोका जा सकता है। उसके लिए किसी न किसी रूप में हर व्यक्ति को तप करना पड़ता है। तप का अर्थ मन्त्र जप, ध्यान, आसन, प्राणायाम ही नहीं है यह भी उस प्रक्रिया के धार्मिक अंग हैं उसका व्यवहार पक्ष भी है जिसमें अपनी तृष्णा, अहंता से, असीम साधन एकत्र करने, अधिकतम भोग भोगने अपने को बड़ा सिद्ध करने की प्रवाह वाले जीवन क्रम को तोड़-मरोड़ कर सादगी सज्जनता मितव्ययिता, निरहंकारिता का जीवन जीना पड़ता है। अपने लिए साधनों का संचयन न होते देख उस स्थिति में अपने ही कहलाने वालों का बैर विरोध उपहास तिरष्कार भी सहना पड़ता है। तब जाकर कहीं आत्मिक लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। इतिहास साक्षी है जब-जब जनमानस इस तरह आध्यात्मवादी आदर्शों से प्रेरित हुआ लोक व्यवहार में तब-तब स्नेह मधुरता भ्रातृ भाव, कर्तव्यनिष्ठा, उच्च नैतिकता, ईमानदारी और चरित्र निष्ठा का विकास हुआ, सामाजिक जीवन की सुख शान्ति और सुव्यवस्था ऐसे ही युगों में अक्षुण्ण रहती आई हैं। यदि आज के युग में भी भौतिकतावादी मान्यताओं, आकांक्षाओं और आस्थाओं को बदल कर उनमें आध्यात्मिक तत्वों को समाविष्ट किया जा सके तो इन दिनों दिखाई देने वाली चरित्रहीनता, सामाजिक भ्रष्टता और रीति-नीति में छाई स्वार्थपरता को पूरी तरह हटाया और मिटाया जा सकता है।
भगवान् राम, कृष्ण, बुद्ध, ईसामसीह, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द जैसे प्रभृति महापुरुषों की कार्यपद्धतियाँ भिन्न-भिन्न दिखाई देते हुए भी उनका दर्शन एक ही रहा है। आस्थाओं में मोड़, दृष्टिकोण में परिवर्तन, मान्यताओं में आदर्शवादिता का समावेश। कार्यशैली सब की अपनी-अपनी तरह की रही है। पर उन सब का उद्देश्य जनमानस को संस्कारित करना ही रहा है।
इस युग में न तो धार्मिक विकृतियों का संशोधन मुख्य प्रश्न है और न ही भौतिक जीवन का प्रशिक्षण। वस्तुतः जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में, चाहें यह प्रथा परम्पराएँ हों, चाहे रीति-रिवाज, वेश-भूषा, खान-पान और मान-मर्यादायें, सर्वत्र अविवेक ही वह प्रमुख राक्षस घुस बैठा है। जिसके वशवर्ती होकर मनुष्य जाति भ्रष्ट अनैतिक और बर्बर होती चली जा रही है। स्पष्ट है कि आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है मनुष्य के विचारों में सद्-विवेक की स्थापना। विचारों का गुरु दीपक लेकर जागृत हो जाये तो अज्ञानान्धकार में भटकने वाली प्रवृत्तियों का भटकाव स्वतः ही रुक सकता है। युग-निर्माण योजना ने यही कार्य, यही उत्तरदायित्व अपने कन्धों पर उठाया है और पिछले 25 वर्षों से इस दिशा में अत्यधिक तेजी से बढ़ता हुआ यहाँ तक आ पहुँचा है।
गायत्री उपासना को सद्ज्ञान, सद्-विवेक की उपासना भी कहा जाता है। गायत्री महामन्त्र के 24 अक्षरों में बीज रूप से वह सभी तत्व ओत-प्रोत हैं जो उपासक के हृदय अन्तःकरण में जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को स्वस्थ समर्थ और विवेकपूर्ण बनाने वाला प्रकाश जागृत करते है। अनेक तरह की दार्शनिक मान्यताओं के रहते हुए भी गायत्री उपासना, तत्वज्ञान के प्रति आदिकाल से ही ऋषि मनीषी सभी एक मत रहे हैं जितने भी अवतार हुए हैं उन सब ने उपासना के रूप में आद्यशक्ति भगवती गायत्री को ही इष्टदेव चुना है। उसके पीछे इस दर्शन का प्रतिपादन ही रहा हैं कि मनुष्य जाति की समस्याओं का निराकरण एक मात्र विवेक और सद्ज्ञान से ही सम्भव है। इस युग में जबकि असुरता ने मानवीय बुद्धि को ही पूरी तरह आच्छादित कर रखा है तब तो उसकी आवश्यकता और भी अधिक हो जाती है। इसी कारण युग परिवर्तन के लिए गायत्री अभियान को चुना गया। युग शक्ति गायत्री के अवतरण का अभीष्ट भी यही है।
गायत्री उपासना में तप-साधना के वह सभी तत्व विद्यमान है। जिनके आधार पर लोगों की आस्थायें बदलती है जनमानस का परिष्कार होता है। जीवन को सचेतन बनाने वाली प्राण ऊर्जा विकसित होती है और मानवीय सुख शान्ति की परिस्थितियाँ मुखरित होती हैं। गायत्री को त्रिपदा भी कहा गया है। जिसका एक अर्थ यह भी होता है कि इस उपासना से मनुष्य अभाव, अशक्ति और अज्ञान से मुक्ति पाता है। शरीर, समाज और लोक-व्यवहार में क्या उचित है क्या अनुचित इस बात को सीखता है, तद्नुसार, अपना जीवनक्रम निर्धारित करता है। दुःख के यही तीन कारण हैं, इन्हीं तीनों चरणों की भ्रष्टता ही मनुष्य को पतित करती है यदि वह व्यवस्थित हो जाते हैं तो फिर उस कोलाहल, अशान्ति और सर्वनाश की विभीषिका से स्वतः ही बचा जा सकता है। इस प्रयोग को प्राचीनकाल में सर्वाधिक सफलता मिली थी इसलिए मनीषियों ने एक मत से गायत्री उपासना को राष्ट्रीय उपासना के रूप में स्वीकार किया था। अन्य किसी उपासना के बारे में मतभेद रहे होंगे पर गायत्री उपासना और तत्वज्ञान का निर्विवाद स्वरूप लोग आज भी स्वीकारते हैं यदि कहीं कोई मतभेद झलकता है तो वह मात्र प्रयुक्तीकरण में हो सकता है, उसकी महत्ता उपयोगिता के बारे में कहीं कोई विवाद नहीं।
आज के युग की तो सब से पहली आवश्यकता ही वह प्रज्ञा है जिसका मूलाधार गायत्री है। इस महामन्त्र के 24 अक्षरों में सिद्धि सामर्थ्य और ज्ञान-विज्ञान के अनन्त बीज विद्यमान हैं। उसकी शिक्षायें प्राणिमात्र के लिए कल्याणकारक हैं लोक और परलोक दोनों को स्वस्थ, संतुलित और सामंजस्यपूर्ण बनाती हैं। ऐसी कोई दूसरी तप साधना है नहीं। यह कोई जादू या चमत्कार नहीं, अपितु शब्द शक्ति, भावशक्ति का प्रत्यक्ष विज्ञान है। जिसे श्रद्धा अश्रद्धालु, तार्किक, अविवेकी कोई भी अपना कर अपने बिगड़े स्वरूप को सुधार और सुधरे को अधिक सँवार कर स्वर्गीय परिस्थितियाँ विनिर्मित कर सकता है, अपने लिए भी संसार के लिए भी।
इसलिए युगान्तर चेतना के अभ्युदय के साथ-साथ युग शक्ति गायत्री का अवतरण हुआ। संस्कृति के अन्य उपादानों के समान ही यह विज्ञान भी अन्धकार में खोया पड़ा था। एक तो व्याख्यायें, विज्ञान और प्रतिपादन मिलते ही नहीं थे जो मिलते भी थे वह इतने उलझे शास्त्रीय पद्धति में थे कि जन साधारण उसे समझ ही नहीं सकता था। यदि किसी को बात समझ में आ भी सकती थी तो स्वार्थी तत्वों ने इस महान् तत्वज्ञान को भी इस तरह बन्दी बना लिया था कि हर कोई उसके श्रवगाहन का, उपासना का साहस ही नहीं कर सकता है। गायत्री केवल ब्राह्मणों के लिए, स्त्रियाँ प्रतिबन्धित हैं, यह कान में कहा जाने वाला मन्त्र है, गायत्री शापग्रस्त है ऐसी न जाने कितनी मूढ़मान्यताओं ने उपयोगी हीरे को जंग लगा दिया था। पिछले तीस वर्षों से अथक परिश्रम अनवरत लगन और कठोर साहस के साथ उस अन्धकार को काटा गया। गायत्री उपासना को इतना स्पष्ट किया गया जिससे वह शिक्षित-अशिक्षित, आस्तिक-नास्तिक, स्त्री-पुरुष स्वस्थ, बीमार सभी की श्रद्धा का पात्र बनी। शास्त्रीय प्रतिपादनों का संकलन करना उन्हें, सामान्य हिन्दी भाषा में जन सुलभ बनाना, प्रकाशित करना, उस विधान का मार्गदर्शन स्वयं चलकर और संरक्षण देकर दूसरों को भी अग्रसर करने का दायित्व बहुत बड़ा था, पर उसे पूरा किया गया। गायत्री महाविज्ञान के अब तक बीसियों संस्करण निकल चुके हैं और वह गायत्री महाविद्या के “एनसाइक्लोपीडिया” बन गये हैं। छोटे-छोटे ट्रैक्टों के माध्यम से भी इस ब्रह्मविद्या का उद्घाटन और प्रसार जन-जन तक किया गया। इस तरह युग शक्ति गायत्री के अवतरण का एक महान कार्य पूरा हुआ, एक ऐसा सुव्यवस्थित आधार तैयार है जिस पर चलते हुए मानवता चिरकाल तक जीवित रहने की आशा कर सकती है, देवत्व धरती पर उतरने और स्वर्गीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करने को समुद्यत हो सकता है। गायत्री युग-निर्माण का मूल आधार है। अतएव उसे युग शक्ति कहा गया। यह अवतरण इस देश के इतिहास में सौभाग्य सूर्य का उदय कहा जाये तो अत्युक्ति न होगी। अभी एक चरण पूरा हुआ है। अगले चरण उससे भी महत्वपूर्ण हैं वे जब प्रकाश में आयेंगे तो लोग भारतीय तत्वदर्शन की गरिमा पर आश्चर्यचकित और चमत्कृत हुए बिना न रहेंगे। “युग-शक्ति गायत्री पत्रिका” का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण कदम है उसके दूरगामी प्रतिफल सामने आयेंगे तो लोग दाँतों तले उँगली दबाये बिना नहीं रह सकेंगे।
श्रद्धा और प्रतिष्ठा ब्रह्मा जी की दो पुत्रियाँ समय पाकर विवाह योग्य हुईं। ब्रह्मा जी ने उनके लिए सत्य और असत्य नामक दो वर ढूँढ़े। एक दिन शुभ घड़ी में पसन्द के लिए वर श्रद्धा और प्रतिष्ठा को दिखाये गये। सत्य परिश्रमी था, और ईमानदार किन्तु निर्धन भी था। देखने में उतना सुन्दर भी नहीं, उसे देखते ही प्रतिष्ठा ने अपनी आँखें फेर लीं। असत्य आलसी था और बेईमान तो भी सम्पन्न और सुन्दर, प्रतिष्ठा ने वरमाला उसी के गले डाल दी। श्रद्धा ने सत्य को देखा ओर उसे अपना पति बना लिया।
प्रतिष्ठा विवाह के बाद से ही अशान्त और दुःखी रहती है। किन्तु सत्य को पाकर श्रद्धा निहाल हो गई।
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विपत्ति आने पर मनुष्य के चिन्तित होने की बात समझ में आती है और संकट से लड़ने के लिए संघर्ष का जो पराक्रम करना पड़ता है, उसकी उत्तेजना उत्पन्न होने की प्रकृति प्रक्रिया भी समझ में आती है। किन्तु आश्चर्य तब होता है जब लोग मनगढ़न्त विपत्तियों की कल्पनाएँ करते- उन पर रंग चढ़ाकर भयानक बनाते और उस अपने ही उपार्जन से भयभीत होकर बेतरह रोते, कलपते और दुःख उठाते देखे जाते हैं।
सम्भावित बीमारी, गरीबी, दुर्घटना, हानि, मौत, आक्रमण, धोखेबाज़ों की आशंका कइयों के मनों में उठती है। दुर्बल मन उसे कल्पना की यथार्थता के रूप में स्वीकार करने लगता है और मनोविज्ञान की ‘स्व सम्मोहन’ पद्धति के अनुसार अपनी गढ़न्त को अपने लिए लगभग वास्तविक जैसी बनाकर खड़ी कर लेता है। तर्क और विवेचन से काम लिया जाय तो प्रतीत होगा कि यह कुकल्पनाएँ बेसिर पैर की और बकवास मात्र हैं। किन्तु जिनकी तर्क शक्ति पर संशय का आवरण पड़ गया है, उनके लिए वस्तुस्थिति को समझ सकने योग्य समीक्षात्मक विवेचन कर सकना कठिन पड़ता है। संशय को स्वीकार कर लेने के उपरान्त मस्तिष्क का पहिया उन्हीं आशंकाओं के समर्थन करने के लिए चल पड़ता है। ऐसी चित्र-विचित्र कल्पनाएँ उठती हैं और ऐसे कारण सूझ पड़ते हैं जो पूर्णतया अवास्तविक होते हुए भी तथ्य जैसे प्रतीत होने लगते हैं।
शंका डायन-मनसा भूत की उक्ति अक्षरशः सत्य है। किसी और निर्दोष महिला पर अपनी कुशंकाओं का आरोपण करके उसे डाकिन, चुड़ैल, जादूगरनी आदि के रूप में भयानक देखा जा सकता है। डायनों का अस्तित्व पूर्णतया संदिग्ध है, किन्तु कुशंकाओं के खेत में असंख्यों एक से एक भयानक डाकिनों का उत्पादन निरन्तर होता रहा है। आश्चर्य इस बात का है कि यह मनगढ़न्त डाकिनें हानि उतनी ही पहुँचा देती हैं जितनी कि कोई वास्तविक डायन रही होती और उसने पूरे जोर−शोर से आक्रमण किया होता।
“मनसा भूत” की उक्ति से संकेत है कि मन से भूत उत्पन्न होते हैं। पीपल के पेड़ पर, मरघट में, खण्डहरों में भूत-पलीतों के किले बने होने और वहाँ से उनके तीर चलते रहने की मान्यता असंख्यों अन्धविश्वासियों के मनों में जड़ें जमाये बैठी रहती हैं। सभी जानते हैं कि जड़ों में दौड़ने वाला रस पत्र, पल्लव, पुष्प, फल आदि के रूप में विकसित परिणत होता रहता है। आशंकाजन्य भय-भीरुता की जड़ें यदि अचेतन मन में घुस पड़ें तो उतने भर से भूतों की अपनी अनोखी दुनिया बन पड़ेगी और उस सेना के आक्रमण की अनुभूति घिग्घी बँध देने वाला त्रास देती रहेगी। यह स्वनिर्मित भूत भी उतने ही डरावने और हानिकारक होते हैं जितने कि यदि वास्तविक भूत कहीं रहे होते और उनके द्वारा आक्रमण किये जाने पर कष्ट सहना पड़ता।
एक बार रूस में काली प्लेग की महामारी फैली। उसमें हजारों व्यक्तियों की मौत हुई। मरने वालों की जाँच पड़ताल करने पर पता चला कि उनमें से एक चौथाई ऐसे थे जिनके शरीर में उस व्याधि का प्रवेश ही नहीं हुआ था। किन्तु वे अपने आपको उस महामारी से आक्रांत मानते रहे और डर के मारे मौत के मुँह में चले गये। अभी भी डाक्टरों के पास पहुँचने वाले मरीजों में से बहुत बड़ी संख्या ऐसों की होती है जिन्हें वस्तुतः कोई रोग नहीं है, पर वहम की बीमारी मन की गहरी परतों में इस कदर घुस गई है कि उन्हें अपने शरीर में कई रोग दिखाई पड़ते हैं और जहाँ-तहाँ दर्द की तथा दूसरी तरह की बीमारियों की शिकायतें करते रहते हैं। ऐसे रोगी दवा-दारू या फाड़-चीर से अच्छे नहीं होते। किसी मनोवैज्ञानिक उपाय से उसका वहम काट दिया जाय तो ही उनके रोग मुक्त होने की सम्भावना बनती है। कुशल चिकित्सक उन्हें दवा के नाम पर कुछ’ विश्वास’ दिलाने के लिए ‘सोडावाइकार्व’ जैसी वस्तु देते रहते हैं उतने भर से कई ऐसी बीमारियों से छुटकारा पा लिया जाता है। झाड़-फूँक की चिकित्सा से अच्छे होने वाले रोगियों की तथ्यतः उनके विश्वास से ही उन्हें रुग्णता से मुक्ति दिलाते है। सूर्य किरण चिकित्सा के नाम पर रंगीन शीशियों में भरकर धूप में रखकर बनाया गया पानी ही कई रोगों को अच्छा कर देता है। इस पानी में जितना गुण होता है यह विवादास्पद है, पर यह निर्विवाद है कि इन्हें अच्छे होने वालों में से अधिकांश को विश्वास का लाभ मिला होता है।
उपरोक्त तथ्यों पर विचार करने से विदित होता है कि मान्यताएँ अपना बुरा या भला असर किस प्रकार डालती है। तथ्यों पर दृष्टिपात करने से विदित होता है कि मान्यताएँ अपने आप में तथ्य हैं और उनकी क्षमता किसी वास्तविकता से कम शक्तिशाली नहीं है।
विचारों का शरीर पर प्रभाव के सन्दर्भ में गहरी खोज करने वाले मनोविज्ञानी जार्ज लाउन ने अनेक प्रमाण प्रस्तुत करते हुए सिद्ध किया है कि बुढ़ापा और जवानी आहार-विहार से जितने सम्बन्धित हैं उससे कहीं अधिक उनका आधार मनुष्य की मनःस्थिति पर टिका होता है। अपने को हारा हुआ, असफल मानने वाले, निराश और खिन्न रहने वाले मनुष्य भरी जवानी में मन से ही नहीं शरीर से भी बूढ़े दीखने लगते हैं। इसके विपरीत आयु की दृष्टि से बुढ़ापे की परिधि में जा पहुँचने वाले व्यक्ति भी उत्साह, उमंग और भविष्य की उज्ज्वल आशा के सहारे जवान बने रहते हैं। मन ही नहीं उनका शरीर भी जवानों की तरह ही आचरण करता रहता है। विनोदी स्वभाव के हंसमुख लोगों के चेहरे पर ही नहीं नस-नाड़ियों में भी जवानी झलकती रहती है। मनहूसों की तरह किसी विपत्ति से ग्रस्त लोगों जैसी मुखाकृति कई लोग अकारण ही बनाये रहते हैं। तिल जैसी कठिनाई को ताड़ जैसी बढ़ा-चढ़ाकर देखते हैं। हैरान होते और हैरान करते हैं। इसी कुचक्र में अपनी जवानी गँवा बैठते हैं और बूढ़ों जैसे थके माँदे और अर्धमृतक दीखने लगते हैं।
इच्छित काम, इच्छित समय में पूरा हो ही जाय यह कोई नियम नहीं है। प्रयोजन का नियत अवधि में पूरा होना अपने हाथ की बात नहीं है। उसके लिए अपनी इच्छा ही सब कुछ नहीं है। योग्यता, साधन, अवसर, सहयोग आदि अनेक कारणों के समन्वय का नाम सफलता है। इनमें कुछ कम पड़ने पर काम पूरा होने में साधारण या असाधारण कठिनाई उत्पन्न होती रहती है। इसमें समय भी अधिक लग सकता है और सफलता के थोड़े अंश पर भी सन्तोष करना पड़ सकता है। अवरोध अधिक बड़ा होने पर रास्ता बदलने की भी जरूरत हो सकती है। यह सब खिलाड़ी की भावना से किया जाना चाहिए, किन्तु कई लोग अभीष्ट मनोरथ पूरा होने में देर लगते या उसमें कमी रहने के कारण दुःखी रहने लगते हैं। भाग्य को कोसते और खिन्नता में डूबते उतरते हैं।
कइयों को मनोरथ पूरा होने में कठिनाई आने, देर लगने, रास्ता न मिलने जैसी कल्पनाओं के कारण चिन्ता रहने लगती है। यह चिन्ता कभी-कभी इतनी बढ़ जाती है कि मस्तिष्क पर बुरी तरह अधिकार कर लेती है, फिर ऐसे व्यक्तियों से चिन्तित रहने के अतिरिक्त और कुछ करते-धरते नहीं बनता। कठिनाइयों को पार करने के लिए उपाय सोचना और साधन जुटाना सन्तुलित मस्तिष्क के लिए ही सम्भव है, पर चिन्तित की स्थिति तो अर्धविक्षिप्त जैसी रहती है, उसे अवरोध और असफलताजन्य संकट तो दीखते हैं, पर यह नहीं सूझता कि प्रस्तुत कठिनाइयों के समाधान के क्या-क्या उपाय हो सकते हैं और उनमें से आज की स्थिति में किन्हें किस प्रकार अपनाया जा सकता है। चिन्ता की उत्तेजना यदि रचनात्मक मार्ग खोजा निकालने में सहायता करती तो उसकी उपयोगिता भी थी, पर जब वह विचारतन्त्र को ही कुण्ठित किये दे रही है तो फिर उसे एक नई विपत्ति ही कहना चाहिए। इस विपत्ति से लदा हुआ व्यक्ति अपने शरीर और मन की सामान्य कार्यक्षमता को भी जलाता-गलाता रहता है।
शरीर शास्त्री रुग्णता के अनेक कारणों में एक बड़ा कारण चिन्ता को मानते हैं। यलमर गेट का कथन है-चिन्ता और उद्विग्नता जैसी मानसिक उत्तेजनाएँ शरीर में विष द्रव्य उत्पन्न करती और नई-नई तरह के रोग उपजाती रहती हैं। डॉक्टर ड्यूकवन्से ने लिखा है-समय से बहुत पहले बुढ़ापे को मनुष्य पर लाद देने वाले कारणों में चिन्ता प्रमुख है। चिन्तित रहने वाले के बाल समय से पूर्व ही सफेद हो जाते हैं और चेहरा झुर्रियों से भी जाता है। सरचार्ल्स पेस्ट का निष्कर्ष है कि आधी बीमारियाँ खिन्न और उद्विग्न रहने के कारण उत्पन्न होती है। यदि लोग मानसिक नियन्त्रण की कला सीख लें तो उन्हें बीमारियों के कष्ट में आधी कटौती कर लेने का लाभ मिल सकता है।
मस्तिष्क के अणुओं की एक विशेषता यह है कि उन्हें जिस ढांचे में ढाला जाय समयानुसार वे उसी राह पर चलने के अभ्यस्त हो जाते हैं। मस्तिष्क का अनुगमन शरीर को करना पड़ता है। सच तो यह है कि मन का शरीर पर पूरा-पूरा नियन्त्रण है। रक्त संचार, पलक झपकना, माँसपेशियों का सिकुड़ना-फैलना, श्वास-प्रश्वास क्रिया जैसी अनैच्छिक हलचलें भी अचेतन मन के नियन्त्रण में चलती हैं। मन की प्रसन्नता पर शरीर भी अच्छा रहता है और खिन्नता से स्वस्थ को भारी आघात पहुँचता है। इस मनःसंस्थान पर यदि निषेधात्मक विचारों का दबाव लदा रहे तो वे तात्कालिक हानि तो पहुँचाते ही हैं एक और बुरी बात यह हो जाती है कि मस्तिष्क का स्वभाव ही निषेधात्मक प्रकृति का बन जाता है और अकारण ही-अनायास ही किसी न किसी बहाने ऐसा चिन्तन चल पड़ता है जो मस्तिष्क को खिन्नता और शरीर को रुग्णता से ग्रसित बनाये रहे।
चिन्ताग्रस्त मनःस्थिति का सबसे अधिक प्रभाव पाचन तन्त्र पर पड़ता है। पचाने वाले रस मुख से लेकर आमाशय और आँतों तक फैली हुई लम्बी नली में झरते रहते हैं। उनके कितने ही स्तर होते हैं और उनमें पचाने बदलने के लिए कितने ही अति महत्वपूर्ण रसायन मिले होते हैं। यह रस ही पाचन क्रिया के प्राण हैं। उनका स्तर एवं अनुपात सही होने पर ही भोजन ठीक-तरह पचता है और उसमें शुद्ध रक्त बनता है। भोजन करते समय सुरुचिपूर्ण प्रसन्नतादायक वातावरण बनाने की प्रथा सभ्य समाज में सर्वत्र पाई जाती है। इसका कारण यही है कि उल्लास भरी मनःस्थिति होने के कारण पाचन रसों का स्राव समुचित मात्रा में हो ओर उल्लासित मनःस्थिति का समावेश होने से रक्त का परिमाण तथा स्तर ऊँचा रहे। भोजन के समय क्रोध, शोक, भय आदि की स्थिति आ जाय तो देखा जाता है कि भूख एक प्रकार से विदा ही हो जाती है। यह प्रभाव हर समय पड़ता हैं। मानसिक विक्षोभ पाचन तन्त्र में सर्वाधिक प्रभाव छोड़ते हैं फलतः अपच से लेकर रक्त में विषाक्तता भर जाने जैसे अनेक ऐसे उपद्रव सामने आते हैं जो प्रकारान्तर से शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की जड़ें ही खोखली करते चले जाते हैं।
धन, सम्मान आदि की रक्षा के लिए सभी सचेष्ट रहते हैं यदि मानसिक सन्तुलन बनाये रखने का भी ध्यान रखा जाय तो व्यक्तित्व नष्ट कर डालने वाले मनोविकारों की भी भयंकरता से बचे रहने की भी सतर्कता बरतनी होगी।
सारा योरोप यूनान की फौजों से संत्रस्त था। अजेय समझी जाने वाली यूनानियों की धाक उन दिनों सब देशों पर छाई हुई थी और जिस पर भी आक्रमण होता वह हिम्मत हारकर बैठ जाता और अपनी पराजय स्वीकार कर लेता।
रोम के सेनापति सीजर ने देखा कि इस व्यापक पराजय का कारण लोगों में संव्याप्त आत्महीनता ही है जिसके कारण उनने अपने को दुर्बल और यूनानियों को बलवान स्वीकार कर लिया है। इस मनःस्थिति को बदला जाना चाहिए।
सीजर ने अपने देश की दीवार-दीवार पर यह वाक्य लिखवाया-‘‘यूनानी फौजें तभी तक अजेय हैं जब तक हम उनके सामने घुटने टेके बैठे हैं। आओ तनकर खड़े हो जायें।’’
इस वाक्य का रोम की जनता पर जादू जैसा असर हुआ । जमकर लड़ाई लड़ी गई और अजेय समझा जाने वाला यूनान परास्त हो गया।
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मनुष्य वृद्धावस्था से दूर रहना चाहता है क्योंकि उस अवस्था में मनुष्य की शक्ति चुक जाती है, सामर्थ्य ढल जाती है और वह कुछ करने, यहाँ तक कि चलने-फिरने में भी अक्षम हो जाता है। प्रश्न उठता है कि वृद्धावस्था क्यों आती है और क्या उससे बचा जा सकता है? हर नयी चीज पुरानी होती है, जिसका उद्भव होता है, उसका अन्त भी आता है। परन्तु मनुष्य को वृद्धावस्था जिस रूप में सहनी पड़ती है वह स्थिति अन्य किसी जीव-जन्तु को नहीं सहनी पड़ती। यहाँ तक कि मनुष्यों में ही सत्तर-अस्सी वर्ष की आयु वाले व्यक्ति पैंतीस-चालीस वर्ष के जवान जैसे लगते हैं और कई पैंतीस-चालीस वर्ष के व्यक्ति अपनी आयु से एकदम दुगने नहीं तो कम से कम अधिक आयु के वृद्धावस्था की ओर गिरते पड़ते भाग रहे से प्रतीत होते हैं।
इसका क्या कारण है? मनुष्य अपनी अवस्था से पहले बूढ़ा क्यों होता है-सामान्य मनुष्यों की तरह मनोवैज्ञानिकों के लिए भी यह चिन्ता का विषय रहा है।
प्रख्यात जर्मन चिकित्सक क्रिस्टोफ बिल्होम ह्यूफलैण्ड ने ‘मैक्रोबिओरिया’ में वृद्धावस्था के कारण बताते हुए लिखा है कि हमारी भावनात्मक आदतें ही हममें बुढ़ापा ला देती हैं। यदि हम निराश या उदास रहने वाले हों तो निश्चय ही, बुढ़ापा जल्द आयेगा।
डॉ0 बर्नार्ड हटन का कहना है कि हम किसी भी पशु-पक्षी को मनुष्य की तरह जरावस्था और दीर्घकालिक बीमारी से मरते नहीं देखते फिर मनुष्य ही क्यों अपार कष्ट का भागी मान लिया जाये। यदि मनुष्य भी प्रकृति के नियमों की अवहेलना किये बिना अपना जीवन व्यतीत करे तो निश्चय ही उसके लिए भी मृत्यु पीड़ा हीन और कष्ट रहित हो जायेगी।
फ्रांस के डॉक्टर तिसगे ने अपने परीक्षणों से यह निष्कर्ष निकाला कि मनुष्य में वृद्धावस्था जल्दी आने का एक बड़ा कारण अधिक विश्राम है। उन्होंने अनेक प्रयोगों तथा परीक्षणों द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया कि अधिक आराम स्वास्थ्य का शत्रु है। इस प्रतिपादन को पुष्ट करने के लिए अन्य शरीर विज्ञानियों ने भी अनेक प्रयोग किये और इसी निष्कर्ष पर पहुँचे।
शरीर शास्त्रियों का कथन है कि एक शताब्दी पहले जब यन्त्रीकरण इतना अधिक नहीं हुआ था, तब मनुष्य काफी उमर तक भी जवान और स्वस्थ बना रहता था। लेकिन यन्त्रीकरण के परिणामस्वरूप मनुष्य को अब उतना शारीरिक श्रम नहीं करना पड़ता। शारीरिक श्रम के अभाव में मांसपेशियाँ धीरे-धीरे शिथिल हो जाती हैं और असमय ही बुढ़ापा घर लेता है।
गैलेट वर्जेंस ने अपनी पुस्तक “लुक एलिवन इयर्स यंगर’ में लिखा है कि कोई व्यक्ति स्वभावतः एकाकी अथवा एकान्त प्रिय है तो यह निश्चित रूप से जान लेना चाहिए कि वह शीघ्र ही वृद्ध होने वाला है। उसका कोई भी प्रयत्न उसे शक्ति सम्पन्न रखने में कारगर नहीं होगा।
मनुष्य भावनात्मक रूप से जितना हल्का-फुल्का, मानसिक दृष्टि से निश्चिंत, शारीरिक दृष्टि से परिश्रमी और सामाजिक दृष्टि से मिलनसार रहेगा वह उतना ही युवा और उत्साही, स्फूर्त रहेगा।
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जोहनएडम ने बगदाद के राजा की एक कहानी लिखी है। कहानी जिस राजा की है उसने अपने यहाँ एक-एक चिकित्सक को नियुक्त कर रखा था। चिकित्सक का काम था कि राजा जब भोजन कर ले तो वह उसे विरेचक दवायें दे दे ताकि राजा न जो कुछ भी खाया हो वह वमन के द्वारा निकल जाय। पेट खाली हो जाने पर राजा फिर खाता और चिकित्सक की सहायता से उल्टी कर देता। यह क्रम तब तक चलता रहता जब तक कि राजा अपने लिए ढेर सारे बनवाये गये व्यंजन न खा लेता।
कहानी-कहानी है। कोई आवश्यक नहीं है कि यह सत्य और तर्क की कसौटी पर भी सही उतरे ही, परन्तु एक अर्थ में यह बात सभी लोगों पर लागू होती है कि लोग समय-बे-समय, उचित-अनुचित जब जैसा जी चाहे तब वैसा कुछ भी खाता-पीता रहता है, उस कारण बीमार पड़ता है। खान-पान के असंयम और अनियमितता के कारण उत्पन्न होने वाली विकृतियाँ जब बहुत बढ़ जाती हैं तो डॉक्टर के पास जाकर उनका विरेचन कराता है। विकृतियों से छुटकारा पाकर आता है और फिर उल्टा-सीधा गलत-सलत खाने लगता है।
भोजन का उद्देश्य शरीर का पोषण करना, उसे शक्ति देना है, परन्तु हमारी खान-पान की आदतें ऐसी हैं जिनके कारण यह कहने मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि-‘‘हम जीने के लिए नहीं खाते बल्कि खाने के लिए जीते हैं।’’ अपनी खान-पान की आदतों का विश्लेषण किया जाय तो प्रतीत होगा कि भोजन पोषण के लिए स्वाद की तृप्ति और रुचि की सन्तुष्टि के लिए किया जाता है। इस दृष्टि के कारण भोजन को तैयार करने से लेकर उसे ग्रहण करने के तौर तरीके ही ऐसे बन गये हैं जिनसे आहार के सारे पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं।
उदाहरण के लिए आटे को छानने की बात ही लें। आटे के चोकर में ही अधिकांश प्रोटीन और विटामिन्स रहते हैं जबकि छानकर इस भाग को अलग कर दिया जाता है। रोटी को मुलायम बनाने के लिए चोकर के रूप में विटामिन्स और प्रोटीन फेंक देने की महंगी कीमत चुकानी पड़ती है। छाने हुए चोकर रहित आटे में केवल कार्बोहाइड्रेट्स ही रह जाते हैं। कार्बोहाइड्रेट्स विटामिन के साथ हजम होते हैं जबकि विटामिन आटे को छानकर अलग कर दिये जाते हैं। ऐसी स्थिति में कार्बोहाइड्रेट्स बिना पचे ही रह जाते हैं और इस कारण अजीर्ण, गैस, अपच, कब्जियत जैसे रोग होने लगते हैं। हाई ब्लडप्रेशर और हार्ट-टूबल जैसे रोग पचे कार्बोहाइड्रेट्स के कारण भी होते हैं।
आटे का चोकर निकालकर उसके पोषक तत्वों का एक बड़ा भाग जिस प्रकार नष्ट कर दिया जाता है, उसी प्रकार सब्जियों से भी उनके छिलके छीलकर उनके पोषक तत्व छील लिए जाते हैं। आलू, लौकी, तोरई, टिण्डा, शलजम, मूली, बैंगन, परवल आदि सब्जियों के अधिकांश पोषक तत्व तो उनके छिलकों में ही रहते हैं। गृहणियाँ शाक-सब्जी को नफीस बनाने के लिए उन्हें छीलकर पकाती हैं और उनमें से भी पोषक तत्व विदा हो जाते हैं।
छीलने, काटने के अलावा अधिक मिर्च, मसाले तथा छोंक बघार भी सब्जियों की पौष्टिकता नष्ट कर देते हैं। हरे पत्ते वाली सब्जियों को भी प्रायः पहले पानी में उबाला जाता है और फिर उन्हें निचोड़कर छोंका जाता है। इस तरह सारे विटामिन्स और खनिज लवण पानी में घुल जाते हैं तथा निचोड़ी हुई सब्जियाँ एक प्रकार से निर्जीव ही हो जाती हैं। पानी में घुल जाने वाले विटामिन्स और खनिज लवणों को सुरक्षित रखने की दृष्टि से सब्जियों को अधिक देर तक पानी में भी नहीं पड़े रहने देना चाहिए, न ही उन्हें काटकर अधिक धोना चाहिए। क्योंकि इन दोनों ही दशाओं में विटामिन और खनिज लवण पानी में घुलकर निकल जाते हैं।
शाक-सब्जी के पोषक तत्वों को बचाने के लिए आवश्यक है कि न उन्हें छीला जाये, न उबालकर निचोड़ा जाय तथा न ही अधिक देर तक पानी में धोया भिगोया जाय। जिन सब्जियों के छिलके कड़े होते हैं उनकी बात अलग है, परन्तु मुलायम छिलके वाली सब्जियों को छीलना तो हर दृष्टि से अलाभकर ही है।
इसके साथ ही भोजन को अधिक तेज आँच पर पकाने से भी उनके पोषक तत्व जल जाते हैं। भोजन चाहे दाल हो या सब्जी, रोटी हो या दलिया हमेशा ही मन्द आँच पर पकाना चाहिए। दाल-सब्जी पकते समय हवा के सम्पर्क में न आये यह सावधानी भी बरतनी चाहिए। इसके लिए बर्तन को ढक देना जरूरी होता है। हवा लगने से विटामिन्स बहुत जल्दी नष्ट हो जाते हैं।
दूध को अधिक देर तक सुरक्षित रखने के लिए कई-कई बार खौलने की परम्परा भी है। वस्तुतः दूध का बार-बार पकाने, आग पर चढ़ाने और खौलने से उसके भी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं और उसमें चर्बी का अंश ही अधिक रह जाता है। ऐसा दूध बहुत देर से हजम होता है। अतः दूध को ढके बर्तन में मन्द आँच पर एक उबाल देना ही पर्याप्त रहता है।
भोजन पकाने के अतिरिक्त उसे खाने-पीने में गलत तरीके अपनाने के कारण भी उनसे आवश्यक अपेक्षित शक्ति नहीं मिल पाती। अमेरिका के प्रसिद्ध डॉक्टर इमर्सन का कहना है कि- प्रत्येक राष्ट्र नई-नई औषधियों की खोज पर काफी खर्च कर रहा है। नयी-नयी दवाओं की संख्या भी बाजार में दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। परन्तु रोग और रोगियों की संख्या उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। वस्तुतः औषधियों की शोध पर हम जितनी रकम खर्च करते हैं यदि उसकी चौथाई रकम भी लोगों को भोजन सम्बन्धी सही आदतें डालने में खर्च करें तो निश्चय ही बढ़ते हुए रोगों पर बड़ी सीमा तक नियंत्रण किया जा सकता है। क्योंकि 80 फीसदी से अधिक रोग तो आहार संबंधी अज्ञान और खान-पान की गलत आदतों के कारण होते हैं।”
यह विचार मात्र सिद्धान्त ही नहीं तथ्य भी है। अधिकांश बीमारियाँ खान-पान की अनियमितता तथा असावधानियों के कारण होती है। उन्हें दवा-दारुओं से ठीक नहीं किया जा सकता। यदि दवाओं से बीमारियों पर नियंत्रण किया जाना सम्भव रहता तो संसार में बीमारियों का नाम भी नहीं मिलता क्योंकि आज हर रोग की दवा विद्यमान है। उसका प्रभाव भी होता है, परन्तु ठीक होने के बाद आदमी फिर बीमार पड़ जाता है। दवाएँ मनुष्य को मानसिक सन्तोष प्रदान कर सकती हैं। रोग निवारण नहीं, आदमी को आरोग्य और अच्छा स्वास्थ्य अभीष्ट हो तो उसे प्रकृति की ओर ही लौटना पड़ेगा। पहला कदम चौके में प्रकृति प्रवेश है यह भूलना नहीं। यदि लोग खाने की आदतें बदलने को राजी हो सकें तो आधी समस्याओं का तत्काल निराकरण सम्भव है उससे कम में नहीं।
महापण्डित राहुल सांकृत्यायन अपने मित्र के घर गये थे। वहाँ दो-तीन सज्जन और ठहरे हुए थे। मित्र ने सबके लिए अमृताशन (खिचड़ी) तैयार कराया। अभी दूसरे लोग स्नानादि में लगे थे कि भोजन के लिए बुलावा आ गया। राहुल जी बुलाते ही पाटे पर जा बैठे और थाली में रखी खिचड़ी सफाचट करके उठ गये।
बाद में शेष मेहमानों ने खिचड़ी खाई तब यह ज्ञात हुआ कि जल्दी-जल्दी में नमक ही नहीं डाला गया था। राहुल जी से पूछने पर ज्ञात हुआ कि उनका ध्यान इस ओर गया भी नहीं था, क्योंकि भोजन करते समय वे अपने अध्ययन की किसी गुत्थी को सुलझाने में लगे हुए थे। उनके लिए उदर पूर्ति के मामले में जिह्वा के स्वाद का कोई महत्व नहीं था।
सचमुच महत्व स्वाद का नहीं, भूख का होता है। स्वाद के आग्रह में ही विचारों की एकाग्रता नष्ट होती है।
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इन प्रयासों को सफल बनाने में परिजनों का योगदान क्या हो?
अपने युग की वैज्ञानिक बौद्धिक एवं भौतिक प्रगति ने जहाँ मनुष्य को अनेकानेक सुविधा साधन प्रदान किये हैं, वहाँ अनास्था संकट को भी कम बढ़ावा नहीं दिया है। आदर्शवादी तत्वज्ञान के प्रति अनास्था उत्पन्न होना एक प्रकार से मानवी गरिमा को समाप्त करना ही है। मनुष्य कुशल एवं समृद्ध कितना ही क्यों न हो यदि उसकी उत्कृष्टता चली गई तो फिर बढ़े हुए साधन विनाश की विभीषिका ही उत्पन्न करते हैं। आज के युग विपत्तियों और अन्धकार भरे भविष्य की झाँकियों से तथाकथित प्रगति के साथ-साथ बढ़ते चलने वाला ‘आस्था संकट’ ही अपनी धरती और संचित संस्कृति के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
अखण्ड-ज्योति ने इस खतरे के साथ पिछले चार दशकों से जमकर लोहा लिया है। बुद्धि को बुद्धि से, तर्क को तर्क से, तथ्य को तथ्य से, विज्ञान को विज्ञान से निपटने की उसकी रणनीति ऐसी है, जिसे इतिहासकार अद्भुत और अनुपम ही कहते रहें। आस्था संकट से निपटे बिना मानवी गरिमा का संरक्षण हो नहीं सकता। आदर्शवादी उत्कृष्टता चली गई तो समझना चाहिए कि नर पशुओं और न पिशाचों से भरी हुई यह दुनिया नरक की आग में जलेगी।
आदर्शवादी आस्थाएँ ही ऋषि परम्परा को पुनीत बनाये हैं। इन्हीं के लिए इन दिनों तथाकथित बुद्धिमत्ता और प्रगतिशीलता ने भयानक संकट खड़ा कर दिया है। इससे जूझने के लिए जैसे अस्त्र-शस्त्रों और जैसे कौशल की आवश्यकता उसे जुटाने में कुछ उठा नहीं रखा गया है। अखण्ड-ज्योति का अद्यावधि इतिहास ऐसी ही है, जिसका आज भले ही मूल्यांकन न हो सके, पर भावी विचारक इस निष्कर्ष पर पहुँचे बिना न रहेंगे कि आस्था संकट से लड़ने और उसे पराजित करने में जो पुरुषार्थ किया गया उसमें विश्व भविष्य को उज्ज्वल बनाये रखने में अखण्ड-ज्योति के साधनहीन किन्तु प्राण पुण्य संस्थान ने अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
विज्ञान और अध्यात्म की समन्वित शक्ति के आविर्भाव तथा उसकी समग्र प्रगति के लिए उपयोग करने का प्रयत्न जितना ही सफल होगा, उतना ही मानवी गरिमा को सुरक्षित और देव संस्कृति को जीवित रहने का अवसर मिलेगा। इसे अपने युग की विषमतम विभीषिका के मध्य जलती हुई जीवन-ज्योति कहा जा सकता है। अब तक जो किया गया वह सन्तोषजनक है पर अगले दिनों जो किया जाने वाला है वह और भी अधिक आशाजनक है। अखण्ड-ज्योति परिजनों को यह जानकर हर्ष और गर्व होगा कि अध्यात्म और विज्ञान को जोड़ने वाले जो प्रतिपादन अब तक पत्रिका के पृष्ठों पर किये जाते रहे हैं, अब उनके प्रत्यक्ष प्रमाणित करने के लिए सुसम्पन्न प्रयोगशाला खड़ी की जा रही है। अध्यात्म सिद्धान्त विज्ञान की कसौटी पर भी खरे उतरते हैं उसके अनेकानेक पक्षों को प्रयोगशाला में सिद्ध करने का प्रयत्न किया जाएगा। इस परीक्षण से उन लोगों के मुँह बन्द हो सकेंगे जो अध्यात्म सिद्धान्तों को अन्धविश्वास कहने में अपनी शान समझते हैं। इस प्रयोग परीक्षण में सबसे प्रथम यज्ञ विज्ञान को लिया है और उसका प्रभाव मानवी स्वास्थ्य पर, मानसिक सन्तुलन पर, अन्यान्य प्राणियों पर, वनस्पतियों पर, जीवाणुओं तथा परमाणुओं पर, अन्तरिक्ष तथा वातावरण पर क्या, क्यों और कैसे पड़ता है? इसे प्रत्यक्ष कर दिखाने का निश्चय किया गया है। प्रयोगशाला इन्हीं दिनों खड़ी की जा रही है। उसका कार्य सम्भवतः इसी वसन्त पर्व से आरम्भ हो जाएगा। इन प्रयोगों को अणु परीक्षणों के समतुल्य माना जाए और विनाश के प्रतिपक्षी विकास को प्रतिद्वन्दी माना जाए तो कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
अध्यात्म और विज्ञान की समन्वय शक्ति का प्रादुर्भाव जिन प्रतिपादनों और प्रभावों के आधार पर संभव हो सकता है, अगले दिनों उन्हीं की चर्चा अखण्ड-ज्योति में और भी अधिक गम्भीर तथ्य प्रस्तुत करते हुए छपा करेगी। यों इस दिशा में हलके-भारी प्रयत्न तो बहुत पहले ही से किये जाते रहे हैं। इस प्रकार पत्रिका की उपयोगिता और अधिक बढ़ जायेगी और उसे बुद्धिजीवी वर्ग तक पहुँचाने की आवश्यकता और भी अधिक अनुभव की जायेगी।
इन बढ़ते हुए प्रगति प्रयासों में बुद्धि शक्ति और धन शक्ति का असाधारण उपयोग करना पड़ेगा। जिन्हें छोटे-मोटे साहित्यिक एवं वैज्ञानिक शोध प्रयत्नों का अनुभव है। वे जानते हैं कि यह कार्य कितने जटिल, कितने श्रमसाध्य और कितने व्ययसाध्य होते हैं। उनके लिए योगियों जैसे तन्मयता और सैनिकों जैसी तत्परता बरतनी पड़ती है। साधनों का सरंजाम इकट्ठा करना तो और भी अधिक चिन्ताजनक है। उनके लिए कितने धन की आवश्यकता पड़ सकती है उसे जानना हो तो उन शोधकर्ताओं के क्रिया-कलापों को आंकना चाहिए जो अन्तरिक्ष यात्राएं, अणु शक्ति की महिमा, दूरगामी राकेट बनाने जैसे अन्वेषणों के लिए आवश्यक व्यवस्था जुटा रहे हैं।
यह अखण्ड-ज्योति संस्थान के सूत्र संचालकों द्वारा किये जाने वाले भावी प्रयासों का एक दिग्दर्शन हुआ। यह एक पक्ष है। इसका दूसरा पक्ष है अखण्ड-ज्योति के प्राणवान परिजनों का भाव भरा वह पुरुषार्थ जिसके सहारे उसकी सदस्य संख्या बढ़ती रही है और समुद्र मन्थन से निकली हुई रत्न-राशि का विवरण जनसाधारण तक हो सकना संभव हुआ है। कोई उत्पादन कितना ही महत्वपूर्ण क्यों न हो यदि उसका प्रसार विस्तार न हो सके तो समझना चाहिए कि लगी हुई पूँजी और मेहनत बेकार ही चली गई। अखण्ड-ज्योति के प्रतिपादनों दार्शनिक उत्पादनों को जन-साधारण तक पहुँचाने और उस आलोक से व्यापक क्षेत्र को अलोकित करने का श्रेय ऐसे ही परिजनों को है जो अपनी पत्रिका आप मंगाने और पढ़ने मात्र से अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर लेते वरन् अपने व्यक्तिगत मान-अपमान की चिन्ता किये बिना जन-जन के पास जाते और पत्रिका के नये सदस्य बढ़ाने के लिए आग्रह भरा प्रयत्न करते हैं। स्पष्ट है कि यदि यह प्रयत्न न बन पड़े तो ‘अखण्ड-ज्योति’ की सदस्य संख्या उसके आधी चौथाई भी न रही होती, जितनी कि अब है। भविष्य में इस संस्थान द्वारा-उसके सूत्र संचालकों द्वारा जा कुछ किया जाना है, उसका प्रकाश एवं लाभ जन-जन तक पहुँचाने का और कोई दूसरा माध्यम नहीं है। प्राणवान परिजनों द्वारा किये जाने वाले नये सदस्य बनाने और पुरानों को संभाले रहना यह कार्य जिन लोगों के द्वारा होता रहा है, वे भी अगले दिनों में आशा के केन्द्र बनकर रहेंगे। नये शोध प्रयत्नों में यह सदस्य संख्या बढ़ाने का प्रयास प्रकारान्तर से प्रत्यक्ष सहयोग की भावभरी भूमिका सम्पादित करेगा।
युग शक्ति गायत्री के सदस्य बढ़ाने के साथ-साथ अखण्ड-ज्योति के कार्यक्षेत्र एवं प्रयोजन को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। इस बार तो शोध प्रयत्नों के परिपोषण एवं प्रसार विस्तार की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति की सदस्य संख्या बढ़ाना और भी अधिक आवश्यक हो जाएगा। यह आवश्यकता आत्मीयजनों में भली प्रकार समझी जाएगी और उसके लिए भाव-भरी चेष्टा की जाएगी, ऐसा विश्वास है।
बसन्त पर्व अखण्ड-ज्योति का, युग निर्माण योजना का, उनके सूत्र संचालक का, जन्मदिन है। इस अवसर पर आत्मीय जन अपनी भावभरी श्रद्धांजलि प्रस्तुत करने की एक ही परम्परा अपनाते रहे हैं-अखण्ड-ज्योति के सदस्यों की संख्या वृद्धि। इस बार न केवल उसका परम्परागत निर्वाह करना पर्याप्त होगा वरन् उसमें और दूनी-चौगुनी तत्परता बरतनी होगी। नये शोध-प्रयासों की सफलता का एक अति महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इस अमृतोपम उत्पादन का प्रसार विस्तार द्रुतगति से बढ़ सके। इसके लिए और कोई मार्ग है नहीं। प्राणवान परिजनों का प्रसार पुरुषार्थ ही पहले भी कम आता रहा है। इस आड़े समय में भी उसी से पहले की अपेक्षा अधिक सहयोग, अधिक पुरुषार्थ की अपेक्षा की जा रही है। बसन्त पर्व पर इस बार सदस्य संख्या बढ़ाने की चेष्टा पिछले वर्षों की तुलना में हल्की नहीं भारी ही होगी, ऐसा विश्वास है। इससे बढ़कर इन दिनों श्रद्धा सहयोग का दूसरा कोई माध्यम हो नहीं सकता।
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सर्वतोमुखी प्रगति का इसमें तथ्यपूर्ण मार्गदर्शन न मिलेगा।
अखण्ड-ज्योति हिन्दी मासिक पत्रिका- विगत 42 वर्ष से निरन्तर प्रकाशित होती आई है। उसकी पाठ्य सामग्री जितनी ज्ञानवर्धक है, उतनी ही आकर्षक भी। अपनी लोकप्रियता के कारण उसकी सदस्य संख्या निरन्तर बढ़ती ही गई है।
विज्ञापन एक भी नहीं छपता। जबकि अन्य पत्रिकाओं की प्रायः आधी आमदनी विज्ञापन में ही होती है। सोचा यह गया है कि पत्रिकाओं को मात्र विक्रेताओं की मण्डी बनाकर उनके लाभांश में जो टुकड़ा मिल जाता है, उसे महत्व न दिया जाए और किसी प्रकार कागज छपाई का मूल्य पाठकों से लेकर उन्हें सर्वोत्कृष्ट पाठ्य सामग्री पहुँचाई जाय। गान्धी जी द्वारा सम्पादित पत्रिकाओं का भी यही दृष्टिकोण था। अखण्ड-ज्योति ने भी विज्ञापन न छापने की नीति अपनाकर उसी मार्ग का अनुसरण किया है।
कलेवर की सुन्दरता-पाठ्य सामग्री की उत्कृष्टता-मूल्य की दृष्टि से अत्यन्त सस्ती, ग्राहक संख्या की दृष्टि से अपने स्तर की अन्य समस्त पत्रिकाओं में अग्रणी-ऐसी-ऐसी कितनी ही विशेषताओं की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति का अपना कीर्तिमान है। उसमें छपे लेखों को हिन्दी का अनुवाद-प्रकाशन भारत की अन्य भाषा-भाषी पत्रिकाओं में जितनी बड़ी संख्या में होता है उतना कदाचित ही कहीं नहीं हुआ है।
उत्कृष्टतावादी चिन्तन और आदर्शवादी व्यवहार से समन्वित देव जीवन किस प्रकार सामान्य अथवा जटिल परिस्थितियों के बीच जिया जा सकता है उसका अनुभवपूर्ण मार्गदर्शन अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर मिलता है। असंख्यों ने इन प्रेरणाओं और परामर्श के आधार पर अपने को बदला और ढाला है। पत्रिका का मार्गदर्शन एक प्रकार से जीवन साधना का पाठ्यक्रम ही कहा जा सकता है।
स्वस्थ शरीर, स्वच्छ मन और सभ्य समाज की संरचना के लिए जिस तत्वदर्शन की आवश्यकता है उसे अखण्ड-ज्योति द्वारा तर्क, तथ्य, प्रमाण, उद्धरण, संस्मरण आदि का आधार लेकर इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि कठिन समझा जाने वाला आत्मनिर्माण, सरलतापूर्वक सम्पन्न किया जा सके। व्यक्तित्व के समग्र निर्माण में सफल होने के लिए अखण्ड-ज्योति के लेखों का आधार किसी अनुभवी एवं दूरदर्शी मार्गदर्शक के परामर्श जैसा ही उपयोगी सिद्ध होता है।
अखण्ड-ज्योति में जिस-तिस की, जहाँ-तहाँ से संकलन करके लिखी गयी पाठ्य सामग्री नहीं छपती। उसकी एक-एक पंक्ति के पीछे अगाध अध्ययन एवं प्रयोक्ताओं का अनुभव भरा रहता है। इस पाठ्य सामग्री को अधिकतम लेखनी का अमृतोपम पुण्य प्रसाद कहा जा सकता है।
शरीर को भोजन, वस्त्र आदि को सुविधा देने की तरह ही जो आत्मा की भूख-प्यास बुझाना भी आवश्यक समझते हैं और उसके लिए सद्ज्ञान सामग्री की तलाश करते हैं, उनके लिए स्वाध्याय सामग्री अखण्ड-ज्योति से उत्कृष्ट स्तर की अन्यत्र मिल सकना कठिन है। इसे चन्दन, पुष्पों द्वारा एकत्रित किया हुआ परम पौष्टिक मधु संचय कह सकते हैं।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद शिक्षा, स्वास्थ्य, समृद्धि शांति, सुरक्षा जैसे उत्तरदायित्व राजतंत्र के कन्धों पर आये। वे उन्हें निभायें। किन्तु चरित्रनिष्ठा, उदात्त-विचारणा, सद्भाव युक्त सहकारिता, जैसे उत्कृष्टतावादी तत्वों का राष्ट्रीय जीवन में समावेश करना धर्मतंत्र की जिम्मेदारी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के दिन से ही अखण्ड-ज्योति नैतिक क्रान्ति-बौद्धिक क्रान्ति एवं सामाजिक क्रान्ति के लिए प्रबल प्रयत्न कर रही है। धर्म तन्त्र ने लोकशिक्षण प्रक्रिया को कार्यान्वित करने के लिए उसकी युग-निर्माण योजना रचनात्मक संगठन शृंखला की तरह क्रियान्वित हो रही है। धर्मतंत्र को राष्ट्रीय प्रगति के चिन्तन पक्ष को उच्चस्तरीय बनाने की दृष्टि से अखण्ड-ज्योति ने जो भागीरथी प्रयास किये हैं उन्हें अनुपम ही माना जाता है।
अखण्ड-ज्योति मँगाने वाले मात्र किसी पत्रिका के पाठक भर नहीं होते वरन् वे एक सुगठित देव परिवार के सदस्य बनते हैं। मिशन के सूत्र संचालक के साथ उनका सम्पर्क एक सघन कुटुम्बी की तरह जुड़ जाता है और अति महत्वपूर्ण परामर्श एवं सम्भव सहयोग का सिलसिला चल पड़ता है। यह कौटुम्बिकता अन्ततः कितनी सुखद एवं श्रेयस्कर सिद्ध होती है, इसके इस देव परिवार के परिजन भली-भाँति जानते हैं। अतः वे दूसरों को भी इस सघनता का आनन्द लेने के लिए आमन्त्रित करते रहते हैं।
भौतिक जानकारियों के अन्वेषण, प्रत्यक्षीकरण एवं प्रयोग के लिए जो कार्य विज्ञान क्षेत्र से हुआ है। उसी के समतुल्य आध्यात्म तत्वदर्शन को अखण्ड-ज्योति इस प्रकार प्रस्तुत करती है जिससे अन्धविश्वास को नहीं तथ्यों को अपनाने वाली प्रखरता को ही प्रश्रय मिलता है। फलतः अखण्ड ज्योति के प्रतिपादन बुद्धिजीवी वर्ग में गहरी मान्यता प्राप्त करते चले जा रहे हैं।
धर्म अध्यात्म और ईश्वर के नाम पर प्रचलित भ्रान्तियों और विकृतियों को निरन्तर करने तथा उनके स्थान पर उत्कृष्ट विवेकशीलता की प्रतिष्ठापना का जैसा प्रयत्न अखण्ड-ज्योति ने किया है उसे अभूतपूर्व ही कहा जाता है। तत्वदर्शन की गूढ़ गुत्थियों का सरल और सहज मान्य जैसा प्रस्तुतीकरण इस पत्रिका के पृष्ठों पर किया जाता है उससे आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता की जड़ें विचारशील वर्ग में दिन-दिन गहरी होती चली जा रही है।
योग साधना गृह त्यागी वनवासी लोगों के लिए ही नहीं, वरन् सामान्य जीवन में सरलतापूर्वक अपनाई जाने योग्य व्यक्तित्व का समग्र विकास करने वाली प्रक्रिया है यह प्रमाणित करने में अखण्ड-ज्योति का प्रतिपादन और प्रशिक्षण बहुत सफल ही रहा है।
आध्यात्मिक दृष्टि के आधार पर शारीरिक, मानसिक, पारिवारिक, आर्थिक, सामाजिक क्षेत्रों में किस प्रकार सुखद सफलता पाई जा सकती है। स्वर्ग, मुक्ति पूर्णता, ईश्वरदर्शन जैसे लक्ष्यों को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है? इसका हृदयग्राही एवं अनुभव भरा मार्गदर्शन जैसा अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर मिलता है, वैसा अन्यत्र मिल सकना कठिन है।
अब तक तर्क और तथ्यों के आधार पर ही अखण्ड-ज्योति के पृष्ठों पर अध्यात्म का विवेचन, निरूपण होता रहा है अब उसके लिए भौतिक विज्ञान का भी सहयोग लिया गया है। इसी वर्ष एक साधन सम्पन्न प्रयोगशाला खड़ी की जा रही है जिसमें अध्यात्म सिद्धान्तों को विज्ञान अनुसंधान की तरह परीक्षण किया जाएगा। यह संसार भर में अपने ढंग की अनोखी और प्रथम प्रयोगशाला होगी, जिसने अध्यात्म को श्रद्धा के क्षेत्र से आगे बढ़ाकर वैज्ञानिक आक्षेपों का सामना करने के लिए चुनौती स्वीकार की है। प्रयोगशाला का प्रथम चरण यज्ञ विज्ञान के अनेक पक्षों पर तथ्यपूर्ण परीक्षण करना होगा। इसके लिए बहुमूल्य साधन एवं वैज्ञानिक प्रतिभाएँ जुटाई जा रही है। प्रयोगशाला इसी बसन्त पर्व से अपना कार्य आरम्भ कर सके, इसके लिए सामर्थ्य भर प्रयत्न किये जा रहे हैं।
शरीर के लिए भोजन, वस्त्र में कमी करनी पड़े तो भी इस अध्यात्म भोजन को प्राप्त करने का प्रयत्न करें।
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गंगा तट पर स्थित महर्षि रैभ्य के आश्रम में कई ब्रह्मचारी विद्याध्ययन करते थे। नीति, धर्म और सदाचार का अभ्यास करने के साथ-साथ शास्त्र विद्या में भी पारंगत होकर वे समाज में जाते तथा सुयोग्य नागरिक की भूमिका निभाते थे। वहीं पास में एक ओर तापस रहते थे जो दिन-रात कठोर साधनाओं में लगे रहते। उन तापस का एक पुत्र था यवक्रीत- वह भी अपने पिता के समान ही जप-तप में लगा रहता। परन्तु यवक्रीत की यह भी आकांक्षा थी कि वह वेद-वेदांतों का ज्ञात, शास्त्रों में निष्णात और पंडित बने।
एक आकांक्षा की पूर्ति के लिए यवक्रीत ने अपने तापस पिता से पूछा। पिता ने कहा- ‘वत्स! विद्या प्राप्ति का तो एक ही उपाय है। स्वाध्याय किया जाय।’
परन्तु तात उससे तो दीर्घकाल में सिद्धि होती है- यवक्रीत ने कहा।
यह साधक की अपनी लगन, योग्यता और ग्रहणशीलता पर निर्भर है, तापस ने कहा- ‘फिर भी इनके अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है।’
यवक्रीत चुप हो गया, परन्तु उसके मन में यह बात ठीक से समझ नहीं आयी कि एकमात्र अध्ययन ही ज्ञान प्राप्ति का साधन है। हो भी तो उसे यह बहुत लम्बा और श्रमसाध्य लगा, इसलिए यवक्रीत ने तप द्वारा विद्या प्राप्ति के लिए अपने पिता के पास से प्रस्थान किया। फिर एकान्त स्थान में जाकर यवक्रीत तप करने लगा। पंचाग्नि तप करते हुए यवक्रीत अपने शरीर को निरन्तर संतप्त करने लगे।
यवक्रीत को कठोर तप करते देखकर देवराज इन्द्र उनके पास आये और उनसे तप का कारण पूछा। यवक्रीत ने बताया- ‘‘गुरु के मुख से वेदों की शिक्षा ठीक तरह से प्राप्त नहीं की जा सकती इसके लिए मैं तप के प्रभाव से ही सम्पूर्ण वेद शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ।’’
उपयुक्त गुरु न मिले यह बात तो समझ में आती है, परन्तु गुरु के बिना ही कोई ज्ञान प्राप्त कर लिया जाय यह तो नितान्त असम्भव है। आपने सर्वथा उल्टा मार्ग पकड़ा है विप्रवर! गुरू के पास जाकर अध्ययन कीजिये।
इन्द्र तो चले गये, किन्तु यवक्रीत ने अपनी तपस्या नहीं छोड़ी कुछ वर्षों बाद इन्द्र फिर आये और पुनः समझाने लगे- ब्राह्मण श्रेष्ठ! आपका यह उद्योग बुद्धिमत्ता युक्त नहीं है। किसी को गुरुमुख से पड़े बिना विद्या प्राप्त भी हो तो वह सफल नहीं होती। आप अपने दुराग्रह को छोड़ दीजिये।
इतना कहकर इन्द्र चले गए, परन्तु यवक्रीत ने अपना दृढ़ नहीं छोड़ा। उन्होंने और कठिन तप आरम्भ कर दिया। यवक्रीत का संकल्प था कि वह तपस्या से ही विद्या प्राप्त करके रहेगा। इस प्रकार सिद्धि प्राप्त न होते देख यवक्रीत ने निश्चय किया कि यदि इस अनुष्ठान से विद्या की सिद्धि नहीं हुई तो वह गंगा में अपने शरीर को प्रवाहित कर देंगे। यह निश्चय कर वे एक विशेष तप अनुष्ठान पर बैठे। यवक्रीत के इस निश्चय को जानकर देवराज इन्द्र ने एक अत्यन्त वृद्धा एवं रोगी ब्राह्मण का रूप धारण किया तथा उस स्थान पर आकर बैठ गये जहाँ यवक्रीत स्नान करते लिए आया करते थे।
यवक्रीत जब स्नान करने आये तो उन्होंने देखा कि एक दुर्बल और रोगी ब्राह्मण अंजलि में बार-बार रेत लेकर गंगा में डाल रहा है। प्रथम द्वितीय बार तो यवक्रीत ने कुछ नहीं कहा, पर जब चार-पांच दिन तक यवक्रीत ने उस ब्राह्मण को ऐसा करते देखा तो पूछ ही बैठा- विप्रवर! आप यह क्या कर रहे हैं?
‘लोगों को यहाँ गंगा के उस पार जाने में बड़ा कष्ट होता है’- वृद्ध ब्राह्मण ने कहा- ‘इसलिए मैं गंगा पर पुल बाँध देना चाहता हूँ।’
यवक्रीत ने कहा- ‘भगवन्! आप इस महाप्रवाह को बालू से किसी प्रकार बाँध नहीं सकते। इसलिए असम्भव उद्योग को छोड़कर सम्भव प्रयास कीजिए।’
‘आप जिस प्रकार तपस्या के द्वारा विद्या सिद्ध करना चाहते हैं उसी प्रकार मैं भी यह कार्य कर रहा हूँ। आप असाध्य को यदि साध्य कर सकेंगे तो मैं क्यों नहीं कर सकूँगा’- वृद्ध ब्राह्मण का वेश धारण किये इन्द्र ने कहा।
ब्राह्मण कौन है यह यवक्रीत समझ गये और वे महर्षि रैभ्य के आश्रम में जाकर स्वाध्याय द्वारा ज्ञान प्राप्ति की साधना में संलग्न हो गये।
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मानव जीवन इस जगती का सर्वोत्तम उपहार। सारे मल विक्षेप हटा कर लो तुम इसे सँवार॥
पथ, चौरासी लाख बदल कर राजपंथ यह पाया। पर मानव-मन लक्ष्य भूल-रस्ते में ही भरमाया॥
भूल गया आकर्षक मग में-मुझे कहाँ जाना है। कहाँ हमारी मंजिल है, उसको कैसे पाना है॥
कर बैठा इन्सान राह के प्रलोभनों से प्यार। मानव जीवन इस जगती का सर्वोत्तम उपहार॥
मनुज-देह यह शक्ति-स्रोत है जानो और पहचानो। और चेतना शक्ति-केन्द्र, विकसित करने की ठानो॥
पांच आवरण ओढ़ सखे! जो सोया उसे जगा लो। अखिल विश्व की सब विभूतियाँ घर बैठे ही पा लो॥
आत्म देवता का कर लो साथी! अभिनव संस्कार। मानव जीवन इस जगती का सर्वोत्तम उपहार॥
बन मनुष्य जिसने न मूल्य इस जीवन का पहचाना। उसे अन्त में मलकर हाथ, पड़ेगा ही पछताना॥
यह अन्तिम पड़ाव यात्रा का, आगे प्रभु का घर है। वह ही अन्तिम लक्ष्य, खत्म हो जाती वहाँ डगर है॥
निरावरण आत्मा होगी, तब ही होगा उद्धार। मानव जीवन इस जगती का सर्वोत्तम उपहार। सारे मल, विक्षेप हटाकर लो तुम इसे सँवार॥
-माया वर्मा
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*समाप्त*