वैभव की जड़ें अन्तरंग की गहराई में धँसी होती हैं।

वृक्ष की दृश्य सम्पदा ही चर्म चक्षुओं को परिलक्षित होती है और प्रतीत होता है कि यह सारा कलेवर धरती की सतह से उठता और ऊँचाई तक उठ कर शाखा प्रशाखाओं, टहनियों और पत्र-पल्लवों के रूप में अपनी सफलता का परिचय देता है। इन्द्रियों की पहुँच इतनी ही है और वे उनके साधन इतनी ही जानकारी दे सकते हैं।

विवेक दृष्टि से देखने पर आगे की बात का पता चलता है। वृक्ष जितना ऊपर फैला दीखता है, भूमि की गहराई में उसकी मोटी-पतली जड़े उतने ही विस्तार में फैली होती हैं। उन्हें आँख से नहीं बुद्धि एवं अन्य साधनों की सहायता से जाना जा सकता है। फूल और फल कहाँ से आते हैं? नई कोपलें कहाँ से प्रकट होती है? उसके उत्तर में स्थूल दृष्टि आसमान की ओर ही ताकती हैं? सोचती है जब यह वृक्ष के ऊपर वाले भाग से चिपके हैं तो सम्भवतः आसमान से ही टपके होंगे।

वृक्षों की स्थिति के सम्बन्ध में अधिकांश लोगों की समझ में वास्तविकता आ गई है। यह जान लिया गया है कि पेड़ का सारा वैभव भूमिगत जड़ों का ही विकास विस्तार और उदार अनुदान है। मानवी विकास के सम्बन्ध में यह भ्रम अभी भी बना हुआ है कि उसे भौतिक सिद्धियाँ और आत्मिक ऋद्धियाँ किसी बाहरी सत्ता द्वारा उपहार में प्रदान की जाती है। सिद्ध पुरुषों मन्त्र उपचारों और देव परिवार से मनोकामनाओं की पूर्ति के वरदान मिलने की अपेक्षा की जाती है। इसी प्रकार समर्थ व्यक्तियों के सहयोग और साधनों के बाहुल्य से प्रगति के अपने सपने सँजोये जाते हैं। यह भूल ठीक वैसी ही है जैसा कि वृक्ष के वैभव को आसमान से टपका हुआ मानना।

काया के खोखले में संव्याप्त अन्तर्जगत ही व्यक्ति की सर्वतोमुखी प्रगति का वास्तविक क्षेत्र है। अन्तःकरण की सत्प्रवृत्तियों में वे जड़े हैं जिनमें मनुष्य को सर्वतोमुखी सफलता और महानता का श्रेय प्राप्त होता है। इस तथ्य को समझा जा सके तो यही माना जायगा कि सत्य और तथ्य का अति महत्वपूर्ण आलोक प्राप्त कर लिया गया।

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आत्म ज्ञान से कल्याण

सृष्टि संरचना का कार्य पूर्ण हो गया। प्रजापति ने अपनी संतानों की ओर देखा तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। सर्वांग सुन्दर और सर्वोपयोगी शरीर जैसा मनुष्य के पल्ले पड़ा वैसा किसी जीवधारी को भी तब तक उपलब्ध न हो पाया था, जैसी बौद्धिक क्षमतायें मनुष्य में थीं किसी अन्य प्राणी में नहीं, प्रजापति ने सन्तोष की साँस ली और आत्म जनों को विदाई दी।

फिर न जाने क्या सोचकर पितामह ने प्रजाजन को रुक जाने को कहा-परिजन, उनकी ओर उन्मुख हुये। प्रजापति ने कहना प्रारम्भ किया-तात! तुम्हें सर्वांगपूर्ण शरीर दिया गया है। तुम शरीर नहीं हो, तुम्हें बुद्धि दी गई तुम बुद्धि नहीं हो, तुम जो हो-उस आत्म तत्व के ज्ञान के बिना तुम सुखी नहीं रह सकोगे। अतएव विपुल साधनों के स्वामी होकर भी आत्म-विमुल नहीं होना, क्योंकि यह समस्त समस्याओं का एक मात्र हल यह आत्म-ज्ञान ही है।

प्रजाजन के दो वर्ग थे- एक सुर, दूसरे असुर। यों भी कहा जा सकता है। दो विभिन्न क्षेत्रों में विभक्त दो दलों का यह नामकरण मात्र था। दोनों ने निश्चय किया कि प्रजापति जिनने हमें जन्म दिया, हमारे कल्याण के सभी साधन संग्रहीत किये इनकी उक्ति मिथ्या नहीं होनी चाहिए अतएव दोनों वर्गों से प्रतिनिधि स्वरूप दो व्यक्ति नियत किये गये, जो प्रजापति से आत्मा का ज्ञान प्राप्त करें और अपने-अपने वर्ग को उसका प्रशिक्षण करें। देव वर्ग ने इन्द्र को और असुरों ने विरोचन को अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा।

प्रजापति ने अन्तर्मुखी दृष्टि के विकास के लिये इन शिष्यों को दर्पण साधना बताई उन्हें कहा-दर्पण में अपनी छवि देखना। छवि देखने वाले दृगों को देखना, दृगों की पुतलियों के बिन्दु के भीतर प्रविष्ट होकर यह पहचान करना कि यह भीतर कौन देखता है? कैसे देखता है? क्यों देखता है?

दोनों शिष्य अपनी साधना करने लगे। विरोचन ने तरह-तरह से दर्पण देखा, वेश-भूषा बदलकर केश विन्यास में परिवर्तन कर सौंदर्य प्रसाधनों में कई बार अन्तर कर उसने जितनी बार दर्पण में देखा उसको अपनी सुडौल देहयष्टि, सुन्दर मुखमण्डल ही स्मरण में आया तो उसने यही माना कि यह शरीर ही आत्मा है उसे ही तरह-तरह से सजाने से उसी की तृप्ति में लगे रहना ही सुख का साधन है, विरोचन को और अधिक रुकने में उकताहट हुई सो उसने अपनी इसी मान्यता को पूर्ण मान लिया और घर लौट आया।

इन्द्र ने बहुतेरी दृष्टि जमाई, पर नेत्रों की पुतलियों से उन्हें कुछ नहीं दीखा। उन्होंने प्रजापति से आगे की कक्षा का पाठ पढ़ाने की याचना की। प्रजापति ने उन्हें और अधिक समय तप करने का आदेश दिया।

प्रजापति ने कहा अब तुम यह ज्ञान करो कि स्वप्नावस्था में यह जो तुम्हारी तरह क्रियायें करता है वह कौन है? इन्द्र ने तुलनात्मक अध्ययन के बाद पाया कि चेतन और स्वप्न दोनों का ही कर्त्ता एक है, पर कई बार प्रगाढ़ निद्रा में स्वप्न का चेतन अबोध हो जाता है तब फिर उसे आत्मा कैसे माना जाये।

प्रजापति ने उन्हें फिर तप करने की आज्ञा दी। इस बार इन्द्र को बोध हुआ दर्पण के आगे से मुँह फेर लेने से शीशा रहने पर भी जिस तरह प्रतिबिम्ब नहीं रहता उसी तरह मृत्यु के बाद शरीर रहने पर भी आत्मा आकाशभूत हो जाता है। शरीर तो उस आत्मा की अभिव्यक्ति का दर्पण मात्र है। आत्मा उसका चेतन भाग है सो इन्द्र उस चेतना के विकास में ही लग गये और देवताओं को उसी का उपदेश दिया जिससे देवगण अमर, पवित्र, पूज्य और उच्च पदस्थ हुये जबकि शरीर को ही आत्मा मानकर उसी को सजाने सँवारने में इन्द्रिय सुखों की लिप्सा में पड़े असुर गण सर्वत्र विग्रह उत्पन्न करते और निकृष्ट जीवन जीते हुए प्रजापति की कृति को कलंकित करते रहते हैं।

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भगवान बुद्ध-उनका मार्ग और व्यक्तित्व

बुद्ध को क्या कहा जा सकता है? हम उन्हें देवता तो नहीं कह सकते, क्योंकि देवताओं में राग-द्वेष, सुख विलास होता है, जिससे बुद्ध विमुक्त थे और ऊपर उठे हुए थे। सम्पूर्ण मानवीय दुर्बलताओं और असंगतियों से अतीत होने के कारण बुद्ध एक तरह ‘मनुष्य’ भी नहीं कहे जा सकते। हम उन्हें केवल ‘बुद्ध’ ही कह सकते हैं। प्रबुद्ध मानव, आश्चर्यमय पुरुष।

बुद्ध एक योगी के रूप में ध्यान करते थे। बुद्ध संगीत की प्रशंसा भी कर सकते थे और अपने एक ममण कवि शिष्य के काव्यात्मक उद्गारों की भी सुन सकते थे। दुःखग्रस्त प्राणियों के लिए उनके हृदय में जो करुणा की विमल धारा बहती थी, उसके बारे में तो कुछ कहना ही नहीं बुद्ध प्राकृतिक दृश्यों की रमणीयता का अनुभव करते थे और पूर्ण ज्ञानी होते हुए भी उन्हें अपने एक शिष्य के वियोग में चारों दिशाएँ शून्य-सी जान पड़ने लगी थी। जिसने दुःख को जीवन के प्रथम सत्य के रूप में देखा था। उसकी संवेदनशीलता की सीमा नहीं आंकी जा सकती।

आज भी हम मनुष्यत्व के ऊपर देवत्व की बात कहते हैं। परन्तु तथागत ने इस क्रम को उलट दिया। उन्होंने कहा, “यह जो मनुष्यत्व है, वही देवताओं का सुगति प्राप्त करना कहलाता है।”

मनुस्सत्तं खो भिक्खेव देवानां सुगतिगमन संखाते।

देवता जब सुगति प्राप्त करता है, तब वह मनुष्य बनता है। देवताओं में विलास है। राग, द्वेष, ईर्ष्या और मोह भी वहाँ है। निर्वाण की साधना वहाँ नहीं हो सकती। इसके लिए देवताओं को मनुष्य बनना पड़ता है। मनुष्यों में ही बुद्ध-पुरुष का आविर्भाव होता है, जिसकी देवता नमस्कार करते हैं। अतः मनुष्य धर्म देवता धर्म से उच्चतर है, जैसे कि विराग भोग से महत्तर है।

भगवान बुद्ध इतिहास के सर्वप्रथम पुरुष है, जिन्होंने बहुजन हित, बहुजन सुख और लोक की अनुकम्पा को अपने धर्मचक्र की धुरी बनाया। उनके बहुजन हित और बहुजन सुख की परिधि से शूद्र बहिष्कृत नहीं थे। बल्कि उन्हीं को लक्ष्य कर बहुजन हित शब्द का प्रयोग किया है।

जाति (जन्म) और वर्ण (रंग) की बाधा को दूर कर सका उसने उसके लिए ज्ञान के मार्ग को खोलने का प्रयत्न किया है। मनुष्य-मनुष्य के बीच कोई जातिगत भेद नहीं है, इसको दिखाने का वासेट्ठसुत्त (मज्झियनिकाय 2/5/8) से अधिक स्पष्ट वैज्ञानिक आधार अन्यत्र दीखता नहीं।

क्रोध से क्रोध को हम कभी जीत लेंगे यह शक्य नहीं। अक्रोध से क्रोध को जीता जाता है इसे भगवान बुद्ध ने सनातन धर्म कहा है।

अनुकम्पक शास्ता ने कहा- मैं अपने चित को विकार युक्त न होने दूँगा और न दुर्वचन मुँह से निकालूँगा। मैत्री भाव से हितानुकम्पी होकर विहरूँगा। उस विरोधी व्यक्ति को भी मैत्री पूर्ण चित्त से आप्लावित कर विहरूँगा। उसको लक्ष्य कर सारे लोक को मैत्री पूर्ण चित्त से आप्लावित करूंगा जिसका कोई परिमाण नहीं है।

जिसने मैत्री भावना का अभ्यास किया है उसे क्रोध उत्पन्न नहीं हो सकता।

लोकानुकम्पा से प्रेरित होने पर भी वह उन लौकिक (लोकिय) बातों के प्रशंसक नहीं थे जिनमें साधारण जनता रमती है। जनता की प्रशंसा पाना उनका लक्ष्य नहीं था। इसलिये जन-जीवन को वह इतना ऊपर भी उठा सका। ब्रह्मा की प्रार्थना बुद्ध से उस समय की गई जिस समय उन्होंने ज्ञान प्राप्त किया था। हे शोक रहित! आप इस शोकमग्न जनता को देखें। “सोकावतिष्णं जनतं अपेत सोको अवेक्खस्सु” बौद्ध धर्म सच्चे अर्थों में जनता का जाति वर्ण, निर्विशेष लोक समूह का धर्म था।

बुद्ध-उपदेशों की एक बड़ी विशेषता यह है कि वे भगवान बुद्ध के अपने अनुभव पर आधारित हैं। उन्होंने जोर देकर कहा है, ‘‘मैं किसी श्रमण या ब्राह्मण से सुनकर नहीं कहता बल्कि मैंने जो स्वयं देखा है, स्वयं जाना है, स्वयं अनुभव किया है। उसे ही कहता हूँ।

आरामदण्ड ब्राह्मण का बुद्ध से प्रश्न- समाज में पारस्परिक कलह, ईर्ष्या-द्वेष क्यों हैं?

इस प्रश्न का उत्तर देते हुए तथागत ने कहा था- ‘‘यह इन्द्रिय वासनाओं की दासता और उनके बंधनों के कारण है। इससे समाज में सर्वत्र कलह पारस्परिक संघर्ष और असंतोष व्याप्त है।’’

जिन साधकों ने शील की साधना पूरी कर ली है। उनके लिए ध्यान का अभ्यास आवश्यक माना गया है। ध्यान या समाधि में ही सत्य के दर्शन होते हैं। बिना ध्यान के प्रज्ञा की प्राप्ति नहीं होती और जिसमें प्रज्ञा नहीं है वह ध्यान नहीं कर सकता। अतः ध्यान और प्रज्ञा अन्योन्याश्रित हैं।

अब क्यों न मैं ध्यान सुख का अनुभव करते हुए निर्वाण में प्रवेश करूँ? कहा गया है कि तथागत के मन में इस प्रकार का विचार आना भी एक प्रलोभन था। वह भार का अन्तिम प्रयत्न था जिसे उसने सम्यक् सम्बुद्ध को मार्ग भ्रष्ट करने के लिए किया। किन्तु मारकी पराजय हुई। …… दुःखार्त लोक की करुणा के लिए उन्होंने ध्यान सुख छोड़ दिया। निर्वाण प्रवेश कुछ काल के लिए स्थगित कर दिया गया। तभी हमें बौद्ध धर्म मिला। इतने पर भी तथागत कभी ध्यान से रिक्त नहीं रहते थे। इसकी गवाही त्रिपिटक के प्रत्येक पृष्ठ पर हमें मिलती है। एक-एक वाक्य, एक-एक अक्षर जो तथागत के मुख से निकला है, उनकी सहज ध्यानावस्था का सूचक है। सम्पूर्ण त्रिपिटक बुद्ध का ध्यान ही है।

शास्ता शिष्यों की समान भूमि पर आ जाते हैं। उन्हें चिन्ता है कि कहीं उनका विशाल लोकोत्तर व्यक्तित्व शिष्यों के कल्याण में बाधक न बने। अतः वह उनके सुख अनतेडडडड हैं, ताकि शिष्य निःसंकोच भाव से उनसे पूछ सकें। धर्म स्वामी की वह विनम्रता मनुष्य धर्म की आधार भूमि है। भगवान बुद्ध ने अपने को भिक्षुओं का ‘कल्याण मित्र’ कहा है, जो उनकी मानवीय सहृदयता और विनम्रता को सूचित करता है। बुद्ध ने कहा- ‘‘जैसे मित्र, मित्र से पूछता है, वैसे तम मुझ से पूछो।’’ (सहायको विभिक्खेव सहायकस्य आरोचे तूति)

‘‘करुणा, विशेषतः स्त्री-जाति के प्रति करुणा, जिसके जीवन को भगवान पुरुष के जीवन से अधिक दुःख, भय मानते थे, तथागत के स्वभाव की एक प्रमुख विशेषता थी’’ गाथा- पटचारा नामक एक पागल, नंगी औरत जेतवन में बौद्ध के पास आ गई। लोगों ने इसे रोका पर बुद्ध ने आने देकर कहा- ‘‘भगिनी! स्मृति लाभ कर।’’ इससे होश आया। तब बुद्ध ने कहा- ‘‘पटचारे! चिन्ता मत कर। शरण देने में समर्थ व्यक्ति के पास तू आ गई है।’’ उसे उपदेश देकर उसका शोक दूर किया और वह एक प्रमुख साधिका बनी।

एक बार वक्कलि नामक अनुरक्त, भिक्षु शिष्य अधिक बीमार पड़ा। उसने भगवान का दर्शन करना चाहा। भगवान स्वयं गये। भिक्षु ने उन्हें सम्मान देने के लिए चारपाई छोड़नी चाही। किन्तु तथागत ने रोकते हुए स्वयं बिछे आसन पर बैठ गये। भिक्षु ने वंदना की कि दर्शन देकर आपने बड़ी कृपा की। इस पर भगवान ने कहा- ‘‘शान्त वक्कलि! जैसी तेरी गंदी काया है वैसी ही मेरी काया है। इस गंदी काया को देखने से क्या लाभ? वक्कलि! जो धर्म को देखता है, वह मुझे देखता है, जो मुझे देखता है, वह धर्म को देखता है।’’

एक बार एक भिक्षुणी सुन्दरी भगवान् के दर्शनार्थ श्रीवस्ती गई तो उनका स्वागत करते हुए भगवान ने उससे कहा था, ‘‘आ कल्याणी! तेरा स्वागत है।’’

‘‘तस्सा ते सागतं भद्दे।’’

बौद्ध धर्म बुद्धि प्रधान धर्म है। उसे ‘ऐहिपस्सिक’ धर्म कहा गया है, जिसका अर्थ ‘आओ और देख लो।’ विश्वास का यहां कोई स्थान नहीं है। वैज्ञानिक प्रक्रिया के समान खोज और परीक्षण उसके साधन हैं और विश्लेषण उसका मार्ग है। सत्य उसके लिए एक खोज करने की वस्तु है, पहले से तैयार की हुई देन-लेने के लिए नहीं। इसलिए मनुष्य को बांधने का प्रयत्न यहां बिल्कुल नहीं किया गया है। बौद्ध धर्म की यह एक ऐसी विशेषता है, जो उसे संसार के अन्य धर्मों से अलग कर देती है।

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मानवी सामर्थ्य और प्रकृति से भी बृहत्तर शक्ति

एक समय था जब क्यूबा में रहने वाला सेनर ऐवेलिनो पेरेज नामक एक व्यक्ति व्यक्तियों और वैज्ञानिकों के आकर्षण और शोध का बहुचर्चित विषय बन गया था। पेरेज की यह विशेषता थी कि वह अपनी इच्छानुसार अपनी एक आँख या एक साथ दोनों आँखों की पुतलियों से दो इंच बाहर निकाल लेता था और उन्हें वापस यथा स्थान बैठा लेता था। इससे उसकी देखने की शक्ति में किसी भी तरह का दबाव नहीं पड़ता था।

यौगिक अभ्यास और प्राणायाम द्वारा शरीर और प्राणों पर नियन्त्रण करके उन्हें मनमाने ढंग से मोड़ने-मरोड़ने के यौगिक प्रदर्शन हमारे देश में कोई अनोखी घटनायें नहीं मानी जाती। यहाँ का प्रायः सामान्य नागरिक भी इस तरह के चमत्कारों से परिचित मिलेगा। कई शिक्षित लोग इसे उनका अन्ध-विश्वास भी मान लेते हैं, पर जिन्होंने भी योग साहित्य का अध्ययन किया होगा, शरीरस्थ, चक्रों, गुच्छकों, उपलब्धियों का जिन्हें थोड़ा भी विज्ञान ज्ञात होगा वे इस तरह के आश्चर्यजनक लगने वाले प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि भली प्रकार अनुभव कर सकते हैं। अन्तःस्रावी ग्रन्थियों (ग्लैण्ड्स) के बारे में आधुनिक शरीर शास्त्रियों ने अब तक जो जानकारियाँ प्राप्त की हैं उनमें से भी यह सिद्ध हो गया है कि यदि इन स्रावों (हारमोन्स) पर पूरी तरह नियन्त्रण कर लेना मनुष्य के लिए सम्भव हुआ तो एक दिन वह आयेगा जब हनुमान जी की तरह मनुष्य एक क्षण में ‘मसक समान’ और दूसरे क्षण ‘शत योजन मुख सुरसा’ बन जाना बिलकुल साधारण बात हो जायेगी।

यह सब मनुष्य की प्रचण्ड इच्छा शक्ति, संकल्प और इनके द्वारा विकसित अभ्यासों की उपलब्धियाँ मात्र हैं। यद्यपि डॉक्टर लोग अब भी यह नहीं समझ सके कि पेरेज ने इस तरह आँख की पेशियों पर नियन्त्रण कैसे प्राप्त कर लिया जब कि यह मात्र नियन्त्रण का कौतुक है। पेरेज की आँखें बचपन में बड़ी कमजोर थीं, उसने अपने ही आप आँखों को इधर-उधर घुमाकर व्यायाम प्रारम्भ किया और यह क्षमता विकसित कर ली। इच्छा शक्ति सचमुच एक महान दैत्य है यदि वह अपनी पर आ जाये, संकल्प रूप धारण कर ले तो मनुष्य ऐसे-ऐसे एक नहीं लाख चमत्कार दिखाई देने वाले परिणाम प्रस्तुत कर सकता है। किसी व्यक्ति का स्वस्थ होना, किसी का जीवन भर रोगी बने रहना, किसी का सफलता के उच्च शिखर पर पहुँच जाना और दूसरे का जीवन भर परमुखापेक्षी बने रहना उस मनोबल के ही प्रतिफल हैं, जो मनुष्य को कुछ से कुछ बना देते हैं।

कन्या में सम्बरू नामक एक व्यक्ति ने निश्चय कर लिया कि वह जिन्दगी भर कभी बैठेगा नहीं और सचमुच ही अब वह लगभग 58 वर्ष का होने को आया, 28 वर्ष का था तब उसने यह प्रतिज्ञा की थी अब तक 30 वर्ष हो गये, खाना, पीना, टट्टी पेशाब सब उसने खड़े ही खड़े किया। लेटने या खड़े रहने की प्रतिज्ञा मृत्यु पर्यन्त निबाहने की आन अब उसकी सामान्य आदत बन गई है जबकि सामान्य व्यक्तियों के लिए उसकी चर्चा भी कम विस्मयकारक नहीं होगी। बुफेली अमेरिका के टाममीलिफ के एक भी हाथ नहीं था, पर वह विश्व का माना हुआ गोला चैम्पियन था उसने 18 बार चैम्पियनशिप जीती। योगी हरिदास अपनी जीभ से भ्रू-मध्य का स्पर्श कर लेते थे। अफ्रीका के सार्स जिन्जेस ने अपने दोनों ओठ इतने बढ़ा लिए थे कि वह उसकी पत्नी के लिए पूरी तकिया का काम देते थे। ओठों के इस राक्षसी आकार के कारण जिन्जेस न तो कड़ा खाना खा सकता था, न बोल सकता था। ऊपर से वह कहीं भाग न जाये इस भय से उसकी पत्नी उसके ओठों को तकिया बनाकर सोती थी ताकि वह कहीं खिसकने का प्रयास करे तो तुरन्त नियन्त्रित किया जा सके।

अच्छे हों या बुरे परिणाम संकल्प शक्ति को जुटाकर मनुष्य अति मानव बन सकता है इसमें सन्देह नहीं। इतना होने पर भी उसे सर्वशक्तिमान नहीं कह सकते। इसलिए कि उसकी इच्छा और माँग के विरुद्ध अनुवांशिकी, भौतिकी और पराभौतिकी क्षेत्र में ऐसी सैकड़ों घटनाएँ घटती रहती हैं, जिनका नियन्त्रण तो दूर वह उस रहस्य तक को नहीं जान पाता कि उसका कारण क्या है? जबकि निसर्ग में उस तरह का स्वयं में कोई सुनिश्चित सिद्धान्त नहीं होता। उदाहरण के लिये 1829 में लन्दन में चार्ल्सवर्थ नामक एक बच्चे ने जन्म लिया। सामान्यतः 4 वर्ष तक की आयु ऐसी होती है जब बच्चा अच्छी तरह बोल भी नहीं पाता किन्तु चार्ल्स वर्थ ने अनुवांशिकी के सारे वैज्ञानिक नियमों को उठाकर एक ओर फेंक दिया। चार वर्ष में ही वह पूर्ण वयस्क हो गया। उसके मूँछ, दाढ़ी भी निकल आई। उसके व्यवहार बातचीत में भी पूरी तरह बुजुर्गपन टपकने लगा था। सात वर्ष की आयु में उसके सम्पूर्ण बाल सफेद हो गये और इसी वर्ष उसकी मृत्यु हो गई।

अनुवांशिकी का सिद्धान्त यह है। बच्चे में यह तो हो सकता है कि उसके माता-पिता के न होकर बाबा, नाना, परबाबा, परनाना, दादी, परदादी, नानी, परनानी अथवा इससे ऊपर वहाँ तक जहाँ से उस वंश के आविर्भाव का महापुरुष पहुँचता है, भले ही वह ब्रह्माजी ही क्यों न हों, के आनुवांशिकीय लक्षण अवश्य होने चाहिए जबकि विश्व इतिहास में यह अपनी तरह का एकमेव उदाहरण है जो मनुष्य की संकल्प शक्ति से भी परे किसी विधेय-सत्ता की ओर संकेत करता है।

एक ही रंग रूप आकृति के एक से अधिक व्यक्ति हो सकते हैं, पर उनमें ऊँचाई, निचाई, तिल, मस्से, नाक, भौं, दाँत, माथा, बाल कहीं न कहीं कोई न कोई ऐसा अन्तर अवश्य रह जाता है जिससे उनकी पहचान सरल हो जाती है किन्तु सन् 1895 में न्यूयार्क में एक साथ एक ही मुहल्ले में हेनरी, थामस तथा वेर्नन नाम के तीन ऐसे व्यक्ति निकल आये जिनकी पहचान स्वयं उनके माता, पिता, भाई, बहिनों के लिए दुःसाध्य हो गई। कई बार थामस को घर पहुँचने में देर हो जाती तो उसकी माँ ढूँढ़ने निकलती और सामने पड़ जाता हेनरी तो वह उसी की पिटाई करते घर ले जाती। बेचारा हेनरी कहता भी कि मैं हेनरी हूँ, पर माँ उसकी आवाज तो पहचानती थी फिर वह कैसे धोखा खा सकती थी? पर सचमुच में खाती वह धोखा ही थी। उन तीनों की आवाज भी एक जैसी थी। आवाजों से भी उन्हें पहचानना कठिन था।

अब तक वे काफी बड़े हो गये थे। लोगों ने समझा अब दाढ़ी, मूँछ में तो कुछ फर्क आयेगा ही, पर न जाने किस सत्ता का निर्माण है यह जो मनुष्य की सारी कल्पनाओं को भी लाँघकर कल्पनातीत सृष्टि का सृजन करता रहता है। तीनों की मूँछ, दाढ़ी भी एक ही तरह की थी। अन्त में दाढ़ी, मूँछों, दाढ़ी भी एक ही तरह की थी। अन्त में दाढ़ी, मूँछों की आकृति भिन्न-भिन्न रखने का उन तीनों ने निश्चय किया हेनरी ठोढ़ी के नीचे के बाल तो साफ रखता था, पर दोनों गालों के नीचे दाढ़ी समानान्तर लटकती थी उन्हें मूँछ इस तरह जोड़ती थी कि दाढ़ी, मूँछ का आकार अँग्रेजी के एच की तरह बन जाता था। उसके नाम का पहला अक्षर भी यही था। थामस मूँछों के अतिरिक्त केवल ठोढ़ी के नीचे मुसलिम काट दाढ़ी रखता था दोनों गाल के बाल साफ रखने से उसकी मूँछ और दाढ़ी की आकृति अँग्रेजी के ‘टी’ वर्ण के आकार की हो गई और इस तरह उसकी पहचान सम्भव हुई। बर्नन ने तीसरी युक्ति निकाली उसने अपनी मूँछें तो सफाचट करा ली और दाढ़ी के बालों की इस तरह कटिंग कराता कि वह दोनों कनपटियों से चलकर ठोढ़ी में अँग्रेजी के वर्ण ‘वी’ कीसी आकृति बना देती। इस तरह मानवीय बुद्धि ने एक समस्या का निराकरण तो कर लिया, पर लगता है वह उस रहस्य का कुछ महत्व ही नहीं समझता कि ऐसा किस नियम के अन्तर्गत होता है कि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों, वातावरण, माता-पिता, आहार-विहार के भी एक-सी शक्ल के वह भी इतने साम्य गुणों वाले कि उनकी पहचान तक न हो सके किसी बहुत ही कुशल कलाकार की तूलिका का ही चमत्कार हो सकता है। उस पूर्ण परात्पर रचनाकार को जानना ही मानव जीवन का लक्ष्य बताया गया है, पर मनुष्य तो अपने सांसारिक बखेड़ों में इतना उलझ गया है कि इस तरह की दुर्लभ घटनाएँ देखकर भी उसका विवेक जागृत नहीं होता।

इस तरह के विलक्षण अपवाद मनुष्य ही नहीं जीव जन्तुओं में भी मिलने लगें तो विकासवाद के सिद्धान्त को एक दूसरा प्रश्न चिन्ह लग जाता है और उसके समर्थकों के दावों पर सन्देह होने लगता है कहीं उन्होंने उपहास में ही तो दर्शन को विकृत नहीं कर डाला।

ऐली (इंग्लैण्ड) में एच.जी बाय के घर मुर्गी ने ऐसा बच्चा दिया जिसके चार पैर थे। तमाम उम्र इस बच्चे ने यों ही सामान्य स्थिति में बिताई। प्रजनन क्रियाएँ भी उसमें सम्मिलित थीं, पर उसकी सन्तानों में कहीं कोई इस तरह का अद्भुत देखने को नहीं मिला। मैन चेस्टर सागर में कैप्टन जे.टी. बैनेट ने एक ऐसा कछुआ पकड़ा जिसके दो सिर थे। यह कछुआ उन्होंने अपनी मृत्यु पर्यन्त पालकर रखा। ग्रोन्सवर्ग के वाल्टर रडिल मैन के पास एक ऐसी भेड़ थी जिसके सारे शरीर में बाल उगते थे किन्तु पीठ के बिलकुल ऊपरी हिस्से में विधिवत घास उगा करती थी। यह एक विलक्षण संरचना थी जिसका कोई भी अनुवांशिकी आधार, शारीरिक त्रुटि या कारण ढूँढ़ पाना आज तक भी वैज्ञानिकों के लिए सम्भव नहीं हो पाया। यह वैसा ही कठिन कार्य है जैसे घड़े में जमाये दूध को बिलौने वाला रई से समुद्र मंथन की बात सोची जाये। सृष्टि जितनी विराट है मानवीय ज्ञान की सीमाएँ उतनी ही नगण्य है अतएव सुनिश्चित अनुभूति प्राप्त न होने तक किसी को भी उस परम सत्ता पर अविश्वास नहीं करना चाहिए जिसकी शक्ति से ही इस विलक्षण निर्माण की प्रक्रिया चलती है।

हस्तक्षेप प्राणि-सत्ता तक ही सीमित नहीं है, लगता है प्रकृति को भी इच्छानुसार बनाने और बदलने की शक्ति का कोई और उद्गम है। स्काटलैण्ड के डंकल्स नामक स्थान में 13 फुट लम्बा 7 फुट चौड़ा तथा 5 फुट ऊँचा एक पत्थर तीन छोटे-छोटे पत्थरों पर इस तरह टिका है मानो कोई भीमकाय कछुआ चल पड़ने की तैयारी में हो, पुरातत्व वेत्ताओं के अनुसार यह पत्थर पिछले बीस लाख वर्षों से इसी तरह टिका हुआ है जबकि इस बीच आये अधड़ तूफानों से सैकड़ों पहाड़ ढहा दिये बिना किसी गणितीय आधार के ही यह तीन छोटे सिपाही खड़े अपने महान् सम्राट की अभ्यर्थना करते जान पड़ते हैं।

एण्डले फ्रान्स में भी एक इसी तरह का बोल्डर (पत्थर) इस तरह नन्हें से आधार पर नाचते हुए लट्टू की-सी आकृति में खड़ा है, मानो उसे किसी विद्युत चुम्बकीय शक्ति ने चारों ओर से साध रखा हो। वैज्ञानिक उस बल की सब तरह जाँच कर चुके, पर वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके। विचित्र बात यह है कि वह पत्थर गजब की भविष्य वाणी भी करता है। मौसम साफ रहेगा तो वह अपनी उसी धुरी पर चुपचाप खड़ा रहेगा, किन्तु तूफान आने को हो तो वह धीरे-धीरे हिल-डुलकर उसकी सूचना दे देता है उस स्थिति में भी उसका सन्तुलन यथावत् रहता है जबकि यदि कोई दूसरा पत्थर हो तो हाथ के रत्तीभर इशारे से सैकड़ों फिट दूर जा लुढ़क सकता है, पर उसे जोर देकर भी हटाया नहीं जा सका।

भारतीय वेद पुराण और दर्शन कहते हैं उसने अपनी इच्छा शक्ति को मुखर करने के उद्देश्य से सृष्टि की रचना की। अनेक-अनेक जीव योनियों की संरचना वस्तुतः इच्छाशक्ति का ही संगठन है, सम्भव है उससे सर्वशक्तिमान सत्ता परमात्मा का अस्तित्व सिद्ध न हो, पर इंग्लैण्ड के वाटफोर्ड नामक कस्बे में हुई एक घटना ने यह सिद्ध कर दिया है कि मानवीय इच्छा शक्ति किसी न किसी रूप में एक अति समर्थ सत्ता की ही सन्तान है उसे परमात्मा, विश्वात्मा, ब्रह्म परमेश्वर कुछ भी कहें, वह विचार की ही श्रेणी का कोई श्रेष्ठ तत्व। हुआ यह कि लिड नामक एक व्यक्ति को अंजीर बहुत प्रिय थे। उसकी मृत्यु होने लगी तो उसने कहा, अंजीर ने मुझे जीवन में अत्यन्त तृप्ति प्रदान की है मेरा मन है कि मेरे ताबूत में अंजीर का एक पौधा रखा जाये, मेरी आत्मा उसी से फूटे और इतने फल दे कि हजारों लोग उससे तृप्ति पायें।

ऐसा ही किया गया। लिड को जिस ताबूत में रख कर दफनाया गया उसी में अंजीर का एक नन्हा-सा पौधा भी रख दिया गया। कुछ दिन बात समय के गर्भ में रही, पर न जाने कैसे एक दिन ताबूत में बन्द मिट्टी में दबा हुआ वह अंजीर का पौधा पृथ्वी को फोड़कर ऊपर निकल आया। जैसे-जैसे उसका विकास होता गया वैसे-वैसे कब्र फटती गई और एक दिन वह पूर्ण वृक्ष के रूप में उभर उठा। सचमुच सामान्य अंजीर वृक्षों की अपेक्षा उसमें इतने अधिक, मीठे और बढ़िया अंजीर लगते हैं कि खाने वाला उस वृक्ष की याद अवश्य करता है। उसके अंजीरों पर किसी का प्रतिबन्ध नहीं रखा गया ताकि लिड की इच्छा की पूर्ति हो सके।

गीता कहती है कि मृत्यु के समय मनुष्य की जो भी इच्छा हो परमात्मा उसे उसी रूप में स्वीकार और पूर्ण करता है। सम्भवतः यह भी उसी का एक उदाहरण हो जो भी हो संसार में कोई ऐसी शक्ति है अवश्य जो मानवीय सामर्थ्य और प्रकृति से भी वृहत्तर है।

इन्हें संयोग नहीं कहा जा सकता क्योंकि इस तरह की और भी घटनाएँ हैं जो मानवीय बुद्धि को प्रकृति में प्रतिघाटित होने का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत करती है जिन्हें न तो वैज्ञानिक नियमों के अन्तर्गत कहा जा सकता है न प्राकृतिक संयोग। सम्भवतः कोरिया की कोयम नदी “नाक्यवाह्य चट्टान” इस सम्बन्ध में सबसे प्रामाणिक और सृष्टि की सबसे बड़ी आश्चर्यजनक घटना कह सकते हैं। सन् 660 में चीन के बादशाह ने कोरिया पर आक्रमण कर दिया। कोरिया नरेश पाकजे, उनके पुत्र, महामन्त्री, मन्त्री और सचिव आदि सभी बन्दी बना लिए गये और उन्हें चीन भेज दिया गया। किन्तु साम्राज्ञी सहित राजघराने की दूसरी स्त्रियों तथा मन्त्री आदि की 71 (इकहत्तर) स्त्रियों ने केयम नदी के किनारे ढलवाँ बनी इस चट्टान से नदी में कूदकर आत्महत्या कर ली। ज्ञात नहीं मृत्यु के समय इन साध्वी स्त्रियों की इच्छाएँ क्या थी, यह भी अविज्ञात है कि परमात्मा उस घटना को क्यों अमर बनाये रखना चाहता है, पर यह बड़े आश्चर्य की बात है कि लगभग 1400 वर्ष होने को आये प्रतिवर्ष उस चट्टान पर एक ही नस्ल के केवल मात्र 71 (इकहत्तर) पौधे ही उगते हैं और उनमें 71 फूल लगते हैं। यह सभी इकहत्तर फूल एक ही दिन कली से पुष्प का आकार ग्रहण करते हैं और जब तक खिले रहते हैं सभी इकहत्तर के इकहत्तर। एक दिन वर्ष का, इसी बसन्त ऋतु का वह दिन आता है जिस दिन इन 71 महिलाओं ने सामूहिक जौहर किया था ठीक उसी दिन सभी इकहत्तर फूल एक साथ नदी में गिर जाते हैं। इस दृश्य को देखने और अपनी भाव भरी श्रद्धा समर्पित करने के लिए हजारों लाखों व्यक्ति वहाँ एकत्र होते हैं और यह मानते हैं, सृष्टि में कोई विराट् विचारशील चेतना कार्य अवश्य कर रही है भले ही दृश्य रूप में वह दिखाई न दे।


गौतम बुद्ध ने देखा (kahani)

राजगृह पथ पर जा रहे गौतम बुद्ध ने देखा, एक गृहस्थ भीगे वस्त्र पहने सभी दिशाओं को नमस्कार कर रहा था।

बुद्ध ने पूछा-‘‘महाशय! इस छः दिशाओं की पूजा का क्या अर्थ है? यह पूजा क्यों करनी चाहिए?”

गृहस्थ बोला-‘यह तो मैं नहीं जानता।’

बुद्ध ने कहा-‘‘बिना जाने पूजा से क्या लाभ होगा।”

गृहस्थ ने कहा-‘‘भन्ते! आप ही कृपाकर बतलायें कि दिशाओं की पूजा क्यों करनी चाहिए।”

तथागत बोले-‘‘पूजा करने की दिशाएँ भिन्न हैं। माता-पिता और गृहपति पूर्व दिशा है, आचार्य दक्षिण, स्त्री, पुत्र पश्चिम और मित्र आदि उत्तर दिशा है। सेवक नीची तथा श्रमण ब्राह्मण ऊँची दिशा है। इनकी पूजा से लाभ होता है। गृहस्थ बोला-”और तो ठीक, भन्ते। परन्तु सेवकों की पूजा कैसे? वे तो स्वयं मेरी पूजा करते हैं।”

बुद्ध ने समझाया-‘‘पूजा का अर्थ हाथ जोड़ना, सिर झुकाना नहीं। सेवकों की सेवा के बदले उनके प्रति स्नेह-वात्सल्य ही उनकी पूजा है।” गृहस्थ ने कहा-‘‘आज आपने मुझे सही दिशा ज्ञान कराया।”

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आत्म-परिष्कार की तीन सरल किन्तु महान साधनाएँ

मानवीय अस्तित्व को तीन भागों में बाँट सकते हैं (1) स्थूल (2) सूक्ष्म (3) कारण। अध्यात्म शास्त्र में इन्हें ही मनुष्य के तीन शरीर कहा गया है। केले के तने की तरह अथवा प्याज की तरह परत-दर-परत उधेड़ते जाने पर हमें रक्त-मांस निर्मित स्थूल शरीर के भीतर सूक्ष्म शरीर और उसके भी भीतर कारण शरीर का बोध होता है। मानो शरीर के ऊपर क्रमशः बनियान, कुर्ता, जाकेट पहन रखी गई हों।

स्थूल शरीर माँ के पेट से प्रारम्भ होकर श्मशानघाट में समाप्त हो जाता है। इहलौकिक क्रिया-कलापों का यही माध्यम है। खाने, सोने, चलने, रोटी कमाने, शुभ-अशुभ कर्म करने, इन्द्रिय-सुख भोगने आदि के प्रयोजन इसी शरीर से पूरे होते हैं।

सूक्ष्म शरीर चिन्तन-मनन, आकांक्षा, अभिरुचि आदि मानसिक गतिविधियों का केन्द्र व माध्यम है। इसका प्रधान कार्यस्थल मस्तिष्क ही है, यद्यपि सामान्यतः यह पूरे स्थूल शरीर में उसी तरह व्याप्त है, जैसे दूध में घी।

तीसरा कारण शरीर आत्म का के अति समीप है तथा उच्चस्तरीय दिव्य भावनाओं का आधार है। दया, प्रेम, कर्त्तव्यनिष्ठा, संयम, करुणा, सेवा, धर्म, कोमल संवेदनादिक उच्चभाव इसी में उठते रहते हैं। जो लोग क्रूरता और दुष्टता में ही परिपक्व हो जाते हैं, उनका कारण शरीर भी क्रूर चेष्टाओं हेतु सहमत हो जाता है।

साधना का अर्थ है इन तीनों ही शरीरों की समुचित साज-सम्हाल और उत्कर्ष की व्यवस्था। साधना की दिशा में प्राथमिक पग है-उपासना। भजन-पूजन, जप-ध्यान, व्रत-उपवास आदि उपासना-अभ्यास मन की प्रवृत्ति को पदार्थपरकता से चेतना की ओर मोड़ते हैं। विश्वव्यापी चेतना के स्मरण और सान्निध्य की अनुभूति की आकांक्षा जागृत हो जाने पर मनोवृत्तियों का वासना और तृष्णा की दिशा में भटकाव, समय, शक्ति और पुरुषार्थ का भयानक दुरुपयोग प्रतीत होने लगता है। तब मनःशक्ति को संयमित कर परमार्थ में नियोजित करने की प्रवृत्ति दृढ़ होती जाती है। यही साधना है। उपासना दिन के एक छोटे से अंश में, निश्चित समय तक की जाती है, साधना एक अविच्छिन्न प्रक्रिया है। वह पूरे जीवन का ही नाम है। साधनामय जीवन आन्तरिक पवित्रता को निखरता जाता है और ईश्वरीय प्रकाश का दिव्य दर्शन कराता है। मानवीय व्यक्तित्व में देवत्व के अवतरण की यह प्रक्रिया है।

साधना के दो वर्ग हैं- (1) विशिष्ट लोगों की विशिष्ट प्रयोजन हेतु विनिर्मित विशिष्ट प्रक्रिया। (2) सर्वसाधारण के लिए सहज सुगम सौम्य पद्धति।

विशिष्ट प्रक्रियाएँ असाधारण मनोबल-सम्पन्न, कठोर तपश्चर्या के लिए समुद्यत, सांसारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त लोगों, योगी यती एकान्तवासी लोगों के लिए हैं। हठयोग, षट्चक्र वेधन, कुण्डलिनी जागरण लययोग, ऋजुयोग, तन्त्रयोग, प्राणयोग आदि की साधनाएँ इसी वर्ग की है। पर यह मार्ग अत्यन्त कठिन है। भूल होने पर इस राह में खतरे ही खतरे हैं। निश्चय ही इसमें ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त होती है। पर उन उपलब्धियों से चमत्कार-प्रदर्शन द्वारा लोगों को विस्मित-चकित कर देने की बात-आकांक्षा मात्र अहंकार ही बढ़ाती है। सिद्धियों द्वारा किसी का तात्कालिक कष्ट निवारण भी सम्भव है और उसमें थोड़ा बहुत आत्मसन्तोष भी प्राप्त हो जाता है। लेकिन यह मार्ग है जोखिम भरा ही।

चमत्कारों के लोभ से इस राह पर चल पड़ने वाले अधिकांश साधक साधना-पथ की कठिनाइयों और लम्बाई से निराश होकर या तो विरत हो जाते हैं या फिर अपनी असफलता की झेंप मिटाने के लिए धूर्तता के द्वारा लोगों का चमत्कृत करने का निकृष्ट व्यवसाय अपनाकर स्वयं भी पतित होते और दूसरों को भी गड्ढ़े में धकेलते हैं। मात्र असामान्य साहसी व्यक्ति ही इस मार्ग में बढ़ सकते हैं, सो भी विशिष्ट परिस्थितियाँ बन पड़े तभी।

सौम्य साधना पद्धति का राजमार्ग सर्वसाधारण के लिए सुगम है। आजीविका-उपार्जन तथा सामान्य गृहस्थ जीवन-यापन करते हुए इस साधना क्रम को अपनाया जा सकता है। इस पथ पर सहज ही गतिशील रहा जा सकता है। इसीलिए शास्त्रकारों और ऋषियों ने सर्वसाधारण को इसी पथ के अवलम्बन हेतु प्रोत्साहित किया है। इस मार्ग द्वार जादूगरी जैसे चमत्कार भले न प्राप्त हो, पर नर को नारायण की स्थिति तक पहुँचा देने का वास्तविक चमत्कार निश्चित ही सम्भव है।

इस सौम्य साधना पद्धति द्वारा स्थूल, सूक्ष्म कारण तीनों शरीरों का संस्कार-परिष्कार, परिमार्जन और परिवर्धन किया जाता है। इसके तीन प्रयोग हैं-(1) कर्मयोग (2) ज्ञानयोग (3) भक्तियोग। तीनों की सुसंतुलित क्रिया-पद्धति का अवलम्बन ही श्रेयस्कर है। श्रीमद्भगवद् गीता में इसी प्रक्रिया का विवेचन है। धर्मशास्त्रों का विशालकाय-कलेवर भी इसी त्रिविधि तत्वज्ञान की विवेचना में ही खड़ा किया गया है। अपनी विचारपद्धति, कार्यपद्धति और भावस्थिति में यदि इन आस्थाओं का समुचित समावेश कर लिया जाय, तो हम अपनी असह्य यन्त्रणा को वर्तमान मनोभूमि से मुक्त होकर इसी शरीर से अपने जीवन में देवत्व के अभ्युदय की अनुभूति कर सकते हैं। देश, काल, पात्र की स्थिति के अनुरूप साधनाओं को मूल उद्देश्य सुरक्षित रखते हुए कार्यपद्धति में सामयिक हेर-फेर किये जाते रहे हैं और किए जाने ही चाहिए। सृष्टि के आरम्भ से आज तक समय-समय पर ऋषियों ने इसी त्रिविधि साधना का-विभिन्न विधि-विधानों के रूप में, अपने समय के साधकों की मनोभूमि तथा सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मार्ग-निर्देश किया है। इस क्रिया-विधान में कर्मयोग, भक्तियोग एवं ज्ञान योग तीनों का इस ढंग से समावेश किया गया है कि व्यक्ति के तीनों शरीर परिपुष्ट होते चलें और समाज के विकास के पुण्य-प्रयोजन का भी कार्य होता चले।

कर्मयोग की आधार-शिला है प्रातःकाल आँख खुलते ही चारपाई पर पड़े-पड़े हर दिन नया जन्म, हर रात नई मौत की विचारणा प्रक्रिया को अपनाना तथा प्रस्तुत दिन के सर्वोत्तम सदुपयोग की तैयारी कर निश्चित कार्यक्रमों-गतिविधियों एवं विचार-प्रक्रिया का निर्धारण। सम्पूर्ण दिन मन में किस स्तर की भावनाएँ किस काम के साथ संयोजित की जाएगी, यह भी निश्चित कर लेना अनिवार्य है। दिनभर इसी निर्धारण का दृढ़ता से पालन सामान्य जीवन क्रम को ही कर्म-योग की साधना का फल प्रदान करेगा।

फिर रात्रि में शयन पूर्व बिस्तर पर पहुँचते ही दिन की गतिविधियों का लेखा-जोखा कर सफलताओं के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना तथा भूलों के लिए सच्चे पश्चाताप के साथ क्षमा प्रार्थना कर, पूर्ण निश्चिन्तता के साथ, शान्तिपूर्वक माता निद्रादेवी की गोद में सो जाना।

कर्मयोग की इस साधना के साथ ही ज्ञानयोग की साधना भी जुड़ी है। उस हेतु मन में उत्कृष्ट विचारों का अनवरत समावेश आवश्यक है। प्रेरक स्वाध्याय ही इसका मार्ग है। रूढ़िवादी रीति से किन्हीं पुरानी, किस्से कहानी जैसी किताबों का वासी रहना, घोटना स्वाध्याय नहीं। व्यावहारिक जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्टता की दिशा दिखलाने वाला स्वाध्याय ही आवश्यक है और उसे दैनिक जीवन का एक नित्य क्रम मानकर किया ही जाना चाहिए। व्यक्ति एवं समाज के नव-निर्माण हेतु उपयोगी उत्कृष्ट साहित्य के दैनन्दिन स्वाध्याय के लिए समय अनिवार्यतः निकालना ही चाहिए।

यह हुई ज्ञान-योग की निजी साधना। इसे ज्ञान-यज्ञ का रूप देना चाहिए। समाज में सद्विचारों का सर्वाधिक अभाव है। विश्वव्यापी शोक-सन्ताप का यही कारण है। जन-मानस का स्तर परिवर्तित करने पर ही दुःख दारिद्रय की प्रचण्ड आग बुझेगी। विचार क्रान्ति आज की सर्वोपरि आवश्यकता है। ज्ञान-यज्ञ इसी आवश्यकता की पूर्ति करने वाला महान अभियान है। एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य खर्च करना देखने में तो एक छोटा ही काम है, पर उसका सम्मिश्रित परिणाम अत्यधिक है, युग-परिवर्तन का वह एक सशक्त माध्यम है। साधक का आत्म-कल्याण एवं विश्व-कल्याण दोनों ही ज्ञान-यज्ञ द्वारा सहज सम्भव है।

भक्तियोग का अर्थ है अन्तरात्मा में दिव्य भावनाओं का अनवरत प्रवाह। परम ब्रह्म से अपने अनन्य प्रेम का स्मरण, तादात्म्य की प्रचण्ड अनुभूति और जघन्य उभयपक्षीय प्रेम-हिलोर की प्रखर अनुभूति का स्मरण-अभ्यास अवरुद्ध आन्तरिक रसस्रोतों को पुनः मुक्त करता है। इन गहरे प्रेमस्रोतों का प्रांजल प्रवाह सम्पूर्ण परिवेश में सरसता, सौमनस्य तथा प्रफुल्लता की वृद्धि करता है। सच्चा प्रेमी, सच्चा भक्त मात्र ईश्वरीय ध्यान, छवि को प्यार नहीं करता अपितु-ब्रह्माण्ड में संव्याप्त ईश्वरीय सत्ता से, प्राणिमात्र से, अनन्य आत्मीयता भरा प्रेम सम्बन्ध प्रस्थापित कर लेता है। यह तादात्म्य भावना पग-पग पर करुणा, उदारता, सद्भाव, सहृदयता, सहानुभूति, सेवा, सज्जनता के रूप में कार्यरूप में प्रकट परिणत होती रहती है। ईश्वर भक्त परिग्रही या स्वार्थी कैसे हो सकता है? उसके लिए तो एक ही मार्ग है- अपनी समस्त उपलब्धियों का विश्वमानव के चरणों में व्यवहारतः समर्पित कर देना। इससे कम में कभी भी ईश्वरीय अनुकम्पा प्राप्त भी नहीं हो सकती। लोकमंगल में अपना सर्वत्र समर्पण करने वाला परमार्थ परायण व्यक्ति ही सच्चा ईश्वर भक्त कहा जा सकता है। अपने परिवार का पालन भी वह इसी भावभूमि के आधार पर ही करता है सभी लोगों के साथ उसके व्यवहार का भी यही आधार होता है। वासना-तृष्णा से सर्वथा रहित, निर्मल-निश्चिन्त अन्तःकरण वाला व्यक्ति ही, भक्तियोग का अधिकारी है। शबरी, मीरा, सूर, तुलसी आदि भक्तों ने तथा सभी ऋषि मुनियों ने इसी भावभूमि पर पहुँचकर ईश्वर दर्शन आत्मसाक्षात्कार का परमानन्द प्राप्त किया था और सभी दूसरों के लिए भी वही राजमार्ग खुला है।

स्थूल शरीर का कर्मयोग से परिष्कार सूक्ष्म शरीर का ज्ञानयोग द्वारा उत्कर्ष एवं कारण शरीर में भक्तियोग द्वारा परमेश्वर की प्रतिष्ठापना ही सार्वभौम राजमार्ग है।

परिष्कृत जीवन अपने लिए, परिवार के लिए और समस्त संसार के लिए मंगलमय होता है। मान्यतायें, आदतें, आकांक्षायें परिवर्तित करने पर जीवन से बाह्य रूप का बदल जाना सहज सुनिश्चित है। उपासना और साधना इसी स्थिति को प्राप्त करने के लिए है।

आत्मा का परिष्कृत स्वरूप ही परमात्मा है। इस परिष्कार की प्रक्रिया है आत्म-निरीक्षण, आत्म-सुधार, आत्म-निर्माण और आत्म-विकास। अपने आपको जितना निर्मल और परिष्कृत बनाया जायगा उसी अनुपात से ईश्वरीय दिव्य शक्तियों का अवतरण होता चला जायगा। निर्मल दर्पण में प्रतिबिम्ब स्पष्ट दीखता है। निर्मल अन्तःकरण में ईश्वर के दर्शन होते हैं और उसे देखने पर वह सब उपलब्ध हो जाता है जो कुछ इस संसार में पाने योग्य है।


महर्षि चरक (kahani)

महर्षि चरक औषधियों की खोज में निकले थे। रास्ते में उन्हें एक विचित्र फूल दीखा। शोध के लिए उसे तोड़ना उचित प्रतीत हुआ, पर वे खेत की मेंड़ पर जाकर ही ठिठक गये।

शिष्य ने पूछा इसे लाने में क्या कठिनाई है, मैं अभी तोड़ लाता हूँ।

चरक ने कहा-नहीं, हमें बिना खेत के मालिक से पूछे इसे नहीं तोड़ना चाहिए। शिष्य ने कहा-आपको तो राजाज्ञा मिली हुई है कि कहीं से भी कोई भी वनस्पति तोड़ लें। फिर किसान से पूछने की क्या आवश्यकता।

महर्षि ने कहा-राजाज्ञा के आधार पर यदि भूमि के मालिक की उपेक्षा की गई तो नैतिक आदर्श कहाँ रहेगा?

चरक एक योजन रास्ता चलकर किसान के घर गये और उससे स्वीकृति लेकर ही फूल तोड़ा।

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विषया शक्ति के मायावी घेरे

चीन में पैराडाइज नाम की एक ऐसी मछली पाई जाती है जो अपने मुँह से एक विशेष प्रकार के लस-लसे रसायन के बुलबुले छोड़ती है। थोड़ी देर में बड़ी संख्या में एकत्र हुए इन बुलबुलों में एक सिरे से छेद कर वह भीतर-भीतर ऐसी सुन्दर छंटाई करती है जिससे बुलबुलों का समुदाय अनेक मकानों वाला नगर दिखाई देने लगता है। अब मादा अण्डे देने प्रारम्भ करती है। और उन्हें इसी बबूल-नगर में पहुँचाती जाती है स्वयं उस नगर की पहरेदारी करती रहती है। दुर्ग के किसी भी द्वार से बच्चे निकल न भागने पावें वह इसकी बराबर देख-रेख रखती है, इसी तरह उसकी वंशवृद्धि होती रहती है।

माया ने उसी तरह अपना विस्तार अनेक प्रकार के शरीर बना कर किया। ऐसे शरीर जहाँ जीव के अस्तित्व को किसी प्रकार संकट न पावे। पीछे वह ऐसी व्यवस्था और उपक्रम जुटाती रहती है जिससे जीव उसी मायावी नगर में फँसा रहे उससे बाहर न निकलने पावे। माया के इस घेरे को बिरले ही तोड़ पाते हैं।

अमेरिका के दक्षिणी भागों में पानी में पाया जाने वाले कछुये की-सी शक्ल का एलीगेटर स्नैपर बड़ा चतुर जीव है। वह अपनी जीभ को बाहर निकाल कर इस तरह दायें-बायें, आगे-पीछे लपलपाता है कि देखने वाले को यह जीभ किसी स्वतन्त्र जीव-सी लगती है, उसे देख कर कई मछलियाँ उसे खाने के लिए दौड़ पड़ती हैं जैसे ही वह उसके पास पहुँचती हैं। एलीगेटर स्नैपर उन्हें दबोच कर खा जाता है।

यही स्थिति शरीर में इन्द्रियों में बसे विषयों की लपलपाहट से भ्रमित जीव उनकी तृप्ति के लिए भाग-भाग कर आता है और बार-बार काल के द्वारा दबोच लिया जाता है। थोड़े से बुद्धिमान भी होते हैं जो इन्द्रियों की इस आसक्ति को आत्मा का नहीं शरीर का विषय मानते हैं और उनसे दूर रह कर ही अपनी रक्षा कर पाते हैं।

नदियों में पाया जाने वाला घड़ियाल जितना क्रूर होता है उतना ही चतुर भी। शिकार के लिए वह नदियों के किनारे आकर इस तरह निश्चेष्ट पड़ा रहता है। मानो वह कोई चट्टान या निष्प्राण वस्तु हो जैसे ही कोई मूर्ख मछली पास पहुँची कि उसने पकड़ा और उदरस्थ किया।

मनुष्य की इन्द्रियाँ भी उतनी धूर्त और चालाक होती हैं, सामान्यतः वे निर्जीव दिखाई देती हैं। इसलिए मनुष्य आहार-विहार और परिस्थितियों की सतर्कता नहीं रख पाता। जैसे ही खान-पान और मर्यादाजन्य भूलें हुईं कि इन्हीं निष्प्राण लगने वाली इन्द्रियों की उत्तेजना ने धर पकड़ा फिर तो उनके चंगुल से निकल पाना कठिन ही होता है। ज्ञानी और विचारशील लोग पहले से ही सतर्क रहते और संयमित तथा मर्यादित जीवन जीते हैं तभी उनसे बचते और अपनी शक्ति, शान्ति और सम्मान सुरक्षित रख पाते हैं।

योरोप में एक चिड़िया पाई जाती है “स्पैरो”। उसका मूल आहार है टिड्डा, पर वह मिले कैसे। स्पैरो एक कोने में दुबक कर बैठती है और ठीक टिड्डे की आवाज में बोलना शुरू करती है। टिड्डे यह आवाज सुनकर उसके पास आ जाते हैं और स्पैरो पक्षी के आहार बन कर मौत के मुँह में चले जाते हैं।

इन्द्रियजन्य सुखों की स्थिति भी ऐसी ही है जब वे कुलबुलाते हैं तो मनुष्य यह नहीं समझ पाता कि उनका शरीर से सम्बन्ध है। आत्मा से नहीं। वह उन्हें अपना ही स्वजन सहायक समझ कर उनकी तृष्णा बुझाने में लगा रहता है और इस तरह आत्मा को अवनति के गर्त में धकेलता रहता है।

माया के इन खेलों का समझने वाला और उनसे दूर रहने वाला व्यक्ति ही बुद्धिमान, विचारशील और आत्म-निष्ठ होता है। उसी का जीवन सफल और सार्थक कहलाता है।

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विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय सन्निकट

पदार्थ का सूक्ष्मतम घटक जब परमाणु माना जाता था, तब बात बहुत पुरानी हो गई। परमाणु भी इलेक्ट्रोन, प्रोटोन, न्यूट्रोन आदि अनेक घटकों में विभाजित हो गया और उसका स्थान एक संघ संचालक भर का रह गया है।

विज्ञान क्रमशः आगे ही आगे बढ़ते-बढ़ते पदार्थ की मूल इकाई को तलाश करने की दिशा में पिछली शताब्दियों और दशाब्दियों की तुलना में बहुत प्रगति कर चुका है और अब बात चेतना के घटक समुदाय तक का स्पर्श करने लगी है। इन दिनों चेतना के मूल घटक के रूप में एक नये घटक को मान्यता मिली है। उसका नामकरण हुआ है साइकोट्रान। इस नयी खोज का स्वरूप जिस तरह सामने आया है उससे जड़-चेतन का मध्यवर्ती विवाद निकट भविष्य में नये करवट बदलता दिखाई पड़ता है। इसलिए उस परिशोध को असाधारण महत्व दिया गया है। उसकी खोज पर विज्ञान जगत का ध्यान नये सिरे से केंद्रीभूत हुआ है और उसकी शोध को एक अतिरिक्त प्रकरण की तरह मान्यता मिल रही है। इसकी शोधचर्या की साइकाट्रानिक विज्ञान नामक एक अतिरिक्त धारा ही मान लिया गया है। जुलाई 75 की अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञान परिषद के अधिवेशन में यह प्रसंग उभरा था तब से लेकर अब तक इन तीन वर्षों की अवधि में बहुत काम हो चुका है और पदार्थ की नई परिभाषा करने की तैयारियाँ जोरों में चल रही है।

इस अभिनव शोध धारा ने पदार्थ सत्ता और मनुष्य की अन्तःचेतना को पारस्परिक तारतम्य बिठाने वाला आधार ढूँढ़ निकाला है। चेतना ऊर्जा और पदार्थ ऊर्जा में दिखाई देने वाली भिन्नता इस आधार पर अधिकतम निकट तो दीख ही रही है उसके अविच्छिन्न सिद्ध होने की भी सम्भावना है।

फोटोग्राफी में प्रायः उन्हीं पदार्थों के चित्र उतरते थे तो आँखों की सहायता से देखे जा सकते हैं। सूक्ष्मदर्शी और दूरदर्शी यन्त्रों की सहायता से जो देखा जा सका वह भी नेत्रों की परिधि में ही आया समझा जाना चाहिए। कैमरों का लेन्स प्रकारान्तर से नेत्र की ही अनुकृति है। साइक्राट्रानिक विज्ञान के अन्तर्गत क्लिर्लियन फोटोग्राफी के आधार पर अब भाव सम्वेदनाओं के उतार-चढ़ावों को भी फोटो प्लेटों पर कैद कर सकना सम्भव हो गया है। इस सफलता से यह निष्कर्ष निकलता है कि ताप, तरंगों-ध्वनि, कम्पनों और रेडियो विकरण की तरह इस अनन्त ब्रह्माण्ड में भाव सम्वेदनाएँ भी प्रवाह मान रहती हैं और अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच कर विशिष्ट प्रभाव उत्पन्न करती हैं। यदि लेसर आदि किरणें किसी अभीष्ट स्थान तक पहुँचा कर इच्छित प्रभाव उत्पन्न किया जा सकता है तो अब यह मानने के पक्ष में भी आधार बन गया है कि विचारणाएँ एवं भावनाएँ भी अमुक व्यक्ति को वही, अमुक पदार्थ को भी प्रभावित कर सकती हैं। बन्दूक की गोली अन्तरिक्ष में तैरती हुई निशान तक पहुँचती और प्रहार करती है। रेडियो, टेलीफोन भी व्यक्तिगत वार्तालाप की भूमिका बनाते हैं। भाव सम्वेदना को पदार्थ सत्ता के साथ तालमेल बिठा सकने वाला साइकोट्रानिक्स भी इस सम्भावना को प्रशस्त करता है कि भाव सम्वेदनाएँ भी अब भौतिक पदार्थों को प्रभावित करने में समर्थ रह सकेंगी।

परम्परागत मान्यता में इतना तो जाना और माना जाता रहा है कि पदार्थ से चेतना प्रभावित होती है। सौन्दर्य और कुरूपता से दृष्टि मार्ग द्वारा मस्तिष्क में उपयुक्त एवं अनुपयुक्त भाव-सम्वेदनाएँ उत्पन्न होती हैं। अन्य इन्द्रियाँ भी जो रसास्वादन करती हैं उनसे भी चेतना को प्रसन्नता, अप्रसन्नता होती है। त्वचा द्वारा ऋतु प्रभाव की प्रतिक्रियाएँ अनुभव की जाती हैं और उनसे प्रिय-अप्रिय का भान होता है। चोट लगने आदि की प्यास बुझाने जैसी पदार्थजन्य हलचलों का मनःसंस्थान पर प्रभाव पड़ता है। अब नये तथ्य सामने इस प्रकार आ रहे हैं मानो चेतना में भी यह शक्ति विद्यमान है जिससे पदार्थों एवं प्राणियों के शरीरों को भी प्रभावित किया जा सकता है। इस प्रकार के प्रमाण मिलते तो पहले से भी रहे हैं किन्तु उनके कारण न समझे जाने से किसी मान्यता पर पहुँच सकना सम्भव न हो सका।

अतीन्द्रिय क्षमता मनुष्य में विद्यमान है और वह कई बार ऐसी जानकारियाँ देती हैं जो उपलब्ध इन्द्रिय शक्ति को देखते हुए असम्भव लगती है। ऐसी घटनाओं को या तो छल, भ्रम आदि कहकर झुठला दिया जाता है या फिर दैवी चमत्कार का नाम देकर किसी अविज्ञात एवं अनिश्चित के गर्त में धकेल कर पीछा छुड़ा लिया जाता है। पैरासाइकोलॉजी- मैटाफिजिक्स के आधार पर जो शोधें हुई हैं, उनसे इतना ही जाना जा सकता है कि चमत्कारी अनुभव और घटनाक्रम होते हैं। वे प्रपंच नहीं तथ्य है। इतने पर भी यह नहीं जाना जा सका कि भौतिकी के किन नियमों के आधार पर ऐसा हो सकने की बात सिद्ध की जा सकती है। अतीन्द्रिय क्षमता को मान्यता तो मिले, पर उसके कारणों का पता न चल सके तो वस्तुतः यह एक बड़े असमंजस की बात है। अब तक स्थिति ऐसी ही रही है।

चमत्कारी सिद्धियों और शक्तियों से यही प्रमाणित होता है कि पदार्थ ही चेतना को प्रभावित नहीं करता वरन् चेतना भी पदार्थ को प्रभावित कर सकने में समर्थ है। मैस्मरेजम, हिप्नोटिज्म के आविष्कार ने इस दिशा में एक और प्रमाण मूल तथ्य सामने रखा था फिर भी बात अधूरी ही रही। प्राण ऊर्जा को मान्यता देने के लिए तथ्य तो विवश करते थे, पर साहसिक प्रतिपादन कैसे सम्भव हो? विज्ञान की किस शाखा के आधार पर इसका सुनिश्चित समर्थन किया जाय? अटकलें तो लगती रही हैं और कुछ संगति बिठाने के लिए तर्क और प्रमाण भी प्रस्तुत किये जाते रहे हैं, पर वह सब रहा संदिग्ध ही। जब तक कुछ प्रमाणिक तथ्य सामने न आयें तो उसे निश्चित कहने का साहस किस आधार पर किया जाय?

साइकोट्रानिक्स ने इस असमंजस को किसी निष्कर्ष तक पहुँचाने की आधारशिला रख दी है और उस सिद्धान्त को उजागर किया है जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि चेतना और पदार्थ के बीच तालमेल बिठाने वाले कोई सुनिश्चित सूत्र विद्यमान हैं। वे दोनों परस्पर गुंथे हुए ही नहीं हैं वरन् एक ही सत्ता के दो रूप हैं, जिन्हें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष की संज्ञा दी जा सकती है। इस विज्ञान के अन्तर्गत चेतना की एक अति प्रभावशाली क्षमता-साइकोकायनेसिस दूरस्थ व्यक्ति के प्रति आदेश प्रेषण क्षमता को तथ्य रूप में स्वीकार कर लिया गया है।

साइकाट्रानिक विज्ञान के मूर्धन्य शोधकर्ता डॉ. राबर्ट स्टोन का प्रतिवेदन है कि जड़ और चेतन के विवाद को सुलझाने के लिए अब तक जो प्रयत्न चलते रहे हैं उसे देर तक अनिश्चित स्थिति में न पड़ा रहने देने की चुनौती स्वीकार कर ली गई है और अपनी पीढ़ी के ही शोधकर्ता किसी निश्चित स्थिति तक पहुँच जाने योग्य आधार प्राप्त कर चुके हैं। विज्ञान की पिछली पीढ़ी के कुलपति आइन्स्टाइन के नेतृत्व में स्पेस-टाइम-युनिवर्स के सिद्धान्त ने काफी प्रगति की थी उससे ब्रह्माण्ड की मूल स्थिति को समझ सकने के लिए आशाजनक पृष्ठभूमि बनी थी। अब साइकाट्रानिक्स ने और बड़ा प्रकाश प्राप्त किया है। गुत्थी को अपेक्षाकृत अधिक अच्छी तरह सुलझाने में उससे भारी सहायता मिलेगी।

गत वर्ष टोकियो के अन्तर्राष्ट्रीय विज्ञान कान्फ्रैन्स के अधिवेशन में भी यह प्रसंग प्रधान रूप से चर्चा का विषय रहा। स्टेनफोर्ड रिसर्च इन्स्टीट्यूट ने तो अपने कन्धे पर उस धारा के सम्बन्ध में अधिक विस्तारपूर्वक उच्चस्तरीय शोध करने के लिए मूल्यवान साधन भी जुटा लिये हैं।

चन्द्रमा के धरातल पर उतरने वाले 11 वें वैज्ञानिक एवं नोयटिक साइन्स इन्स्टीट्यूट के संस्थापक एडगर निचेल ने अपनी चन्द्र यात्रा से लौटने के उपरान्त यह मानना और कहना जोरों से शुरू कर दिया है कि ब्रह्माण्ड की संरचना जिन पदार्थों से हुई है वे किसी चेतना प्रवाह के उद्गम से आविर्भूत हुए हैं। भौतिक नहीं है। पदार्थ को जिन प्रतिबन्धों में बँध कर परिपूर्ण अनुशासन में रहना पड़ रहा है वह संयोग मात्र नहीं वरन् किसी महत्ती विश्व व्यवस्था का अंग है।

इस दिशा में मनोविज्ञानी डॉ. कार्ल सिमण्टन ने एक साधन सम्पन्न अस्पताल की स्थापना की है जिसमें चिकित्सा का जो नया आधार खड़ा किया है उसमें साइकोट्रानिक्स के सिद्धान्तों को ही क्रियान्वित किया गया है। यह प्रचलित मानसिक चिकित्सा से भिन्न है। इन दिनों मानसोपचार में सजेशनों को ही आधारभूत माना जाता है। स्व संकेत पर संकेत की जो प्रक्रिया पिछले दिनों हिप्नोटिज्म प्रतिपादनों के सहारे चलती रही है इन नये प्रयोग में उससे बहुत आगे की बात है। इसमें विचार सम्प्रेषण को एक शक्ति एवं औषधि के रूप में रोगी के शरीर और मस्तिष्क में प्रवेश कराया जाता है। परिणामों को देखते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा रहा है कि विचार सम्प्रेषण पद्धति प्रचलित अन्य चिकित्सा पद्धतियों की तुलना में किसी दृष्टि से पीछे नहीं है। उसके उत्साहवर्धक परिणामों का अनुपात अन्य उपचारों की सफलता के समतुल्य नहीं वरन् अग्रगामी है।

इस क्षेत्र में अधिक तत्परतापूर्वक शोध प्रयत्नों में लगे हुए डॉ. स्टोन ने मस्तिष्क विधा के परीक्षण निष्कर्षों का प्रतिफल यह बताया है कि मानवी मस्तिष्क का बायें भाग तो उसकी निजी आवश्यकताएँ जुटाने में लगा रहता है और दाहिना भाग इस सुविस्तृत ब्रह्माण्ड के साथ अपना तालमेल बिठाता और आदान-प्रदान बनाता रहता है। वह सम्पर्क एवं वातावरण से प्रभावित होता भी है और प्रभावित करता भी है। सामान्यतया वह प्रक्रिया उतनी ही छोटी परिधि में चलती है जिससे व्यक्ति को छोटा व्यक्तित्व अपनी सीमित इच्छाओं के अनुरूप सुविधा और सुरक्षा पाने में किसी कदर समर्थ होता रह सके। किन्तु इस परिधि का विकास होना सम्भव है। इस बात की पूरी सम्भावना है कि व्यक्ति की चेतना यदि अपने को अधिक समुन्नत स्थिति तक विकसित कर सके तो वातावरण से प्रभावित होने और प्रभावित करने से जो लाभ उठाया जा सकता है उसे उठा सके। स्टोन के कथनानुसार कला, संस्कृति, दर्शन तथा सम्वेदनाओं का बहुत कुछ आधार मस्तिष्क के इस दाहिने भाग पर ही बहुत कुछ निर्भर रहता है।

अतीन्द्रिय क्षमता का परिचय देने वालों के मस्तिष्क का यह दाहिना भाग-सेरीव्रम- अधिक सक्षम, परिपुष्ट पाया गया है। रहस्यों को जानने और अद्भुत कर सकने की चमत्कारी विशेषताएँ विकसित करने का श्रेय इसी भाग को है। इस क्षेत्र की क्षमताएँ भौतिक क्षेत्र से विकसित होने पर व्यापक पदार्थ सम्पदा के साथ अपनी घनिष्ठता स्थापित कर सकती हैं और ज्ञान एवं कर्म का क्षेत्र सीमित न होकर असीम बन सकता है। ऐसे ही आन्तरिक क्षमता सम्पन्नों को देव मानवों की संज्ञा एवं श्रद्धा प्रदान की जाती रही है।

न्यूरो सांइटिस्ट डॉ. कार्लप्रिब्रम और फ्रिजिसिस्ट प्रो. डेविड ब्रोहम ने व्यक्ति और ब्रह्माण्ड के गहन रहस्यों की झाँकी की है। उसे वे एक अद्भुत सत्य का अनिर्वचनीय आभास बताते हैं। दोनों के कथन मिलते-जुलते हैं वे मानवी मस्तिष्क इस निखिल ब्रह्माण्ड का लघु अणु रूप है। इसके प्रसुप्त संस्थानों को मेडीटेशन ध्यान-जैसे उपचारों से जागृत बनाया जा सकता है। अपने ही, संकल्प बल से इस क्षेत्र में ‘साइकाट्रानिक लेसर बीम’ तैयार की जा सकती है। उसका मेट्रिक्स के अभेद्य समझे जाने वाले क्षेत्र में प्रवेश हो सकता है और ऐसा कुछ प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है जो मनुष्य की वर्तमान क्षमता को असंख्य गुनी अधिक समुन्नत बना दे।

औसत व्यक्ति की भौतिक सम्पन्नता की तरह आन्तरिक क्षमता भी सीमित है। किन्तु यह सीमा बन्धन अकाट्य नहीं है। व्यक्ति प्रयत्नपूर्वक अपने को क्रमशः ससीम से असीम बनने की दिशा में निरन्तर प्रयत्न करता रह सकता है। यह विशालता विश्व सत्ता और आत्मसत्ता के अन्तर को समाप्त करती है और सबको अपने में, अपने को सब में, देखने का अवसर मात्र भाव-सम्वेदना की दृष्टि से ही नहीं-तथ्यों के आधार पर भी उपलब्ध हो सकता है। आत्मा और परमात्मा का मिलन, नर का नारायण रूप में परिणति जैसे अध्यात्म लक्ष्यों के साथ विकासोन्मुख आत्म सत्ता की संगति पूरी तरह बैठ जाती है।

जीवनी शक्ति-चेतन सत्ता एवं पदार्थ ऊर्जा के क्षेत्र पिछले दिनों एक सीमा तक हो पारस्परिक घनिष्ठता स्थापित कर सके हैं, पर अब यह सम्भावना प्रशस्त हो रही है कि तीनों का परस्पर पूरक और सुसम्बन्ध मान कर चला जाय और एक की उपलब्धि से अन्य दो धाराओं को अधिक सक्षम बनाकर अभाव ग्रस्तताओं से उबरा जाय। अगले कदम इस स्थिति का भी रहस्योद्घाटन कर सकते हैं कि चेतना सागर के अतिरिक्त इस विश्व ब्रह्माण्ड में और कुछ है ही नहीं। प्राणियों के स्वतन्त्र अस्तित्वों का दृश्यमान स्वरूप उसी स्तर का है जैसा कि समुद्र की सतह पर उतरने वाली लहरों का होता है। उनकी दृश्यमान पृथकता अवास्तविक और मध्यवर्ती एकता वास्तविक होती है। इस निष्कर्ष पर पहुँचने पर वेदान्त और विज्ञान दोनों एक हो जाते हैं। तत्वदर्शन और पदार्थ विज्ञान को एकीभूत करने के लिए नई शोध धारा साइकोट्रानिक्स के रूप में सामने आई है। उसका अभिनव प्रतिपादन, विश्लेषण प्रयोग और निष्कर्ष सापेक्षवाद की तरह ही जटिल है। उन्हें ठीक तरह समझ सकना इन दिनों कठिन प्रतीत हो सकता है, पर इन सम्भावनाओं का द्वार निश्चित रूप से खुला है कि चेतना को विश्व की मूलभूत शक्ति मानने का सिद्धान्त सर्वमान्य बन सके। ऐसा हो सका तो भौतिकी को जो श्रेय इन दिनों प्राप्त है उससे कम नहीं वरन् अधिक ही आत्मिकी को प्राप्त होगा।


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जो व्यक्ति अपनी रोजी ईमानदारी से कमाना चाहता है, उसके लिए किसी भी प्रकार का श्रम करना अपमानजनक नहीं है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि परमात्मा ने हमें जो हाथ पैर दिये हैं, उनका इस्तेमाल करने को हम तैयार रहें। परमात्मा ने मनुष्य को पैदा ही इसलिए किया कि हम अपनी रोटी के लिए स्वयं परिश्रम करे। प्रकृति को भी हमसे यही अपेक्षा है कि हम पसीना बहा कर अपनी रोटी कमाएँ। इस प्रकार हर व्यक्ति जो एक मिनट भी फालतू खोता है, अपने पड़ोसियों पर उतनी ही मात्रा में बोझ बन जाता है और ऐसा करना अहिंसा के बुनियादी सिद्धान्त की अवहेलना है। अहिंसा का कोई महत्व ही नहीं रह जाता, यदि व्यक्ति अपने पड़ोसी का सन्तुलित तरीके से ख्याल नहीं रखता। आलसी और कमजोर आदमी में इस गुण का सर्वथा अभाव रहता है।

हमारा अधिकांश समय रोटी कमाने के लिए परिश्रम करते हुए बीत जाता है अतः हमारे बच्चों को बचपन से ही श्रम की प्रतिष्ठा का मूल्य सिखाया जाना चाहिए। बच्चों को हमें ऐसी शिक्षा कदापि नहीं देनी चाहिए, जिससे वे श्रम से घृणा करें।

दिन में एक घन्टा हमें मजदूरों के समान श्रम करना चाहिए, ताकि हम दरिद्र नारायण के साथ और इस प्रकार सम्पूर्ण मानवता के साथ अपना तारतम्य स्थापित कर सकें। मैं और किसी चीज को न इससे अधिक उदार समझता हूँ न राष्ट्रीय ही। मैं यह कल्पना भी नहीं कर सकता कि परमात्मा के नाम पर गरीबों के लिए श्रम करने से अधिक बढ़िया ईश्वर की और कोई पूजा हो सकती है।

प्रतिभा को जागृत करने के लिए, बुद्धिपूर्वक लाभकारी श्रम करने से अच्छा और कोई साधन नहीं हो सकता। सन्तुलित बुद्धि के विकास में तन-मन और आत्मा का सामंजस्यपूर्ण विकास अनिवार्य रूप से निहित है।

-मो. क. गांधी

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विस्तार को नहीं स्तर को महत्व दिया जाय।

सामान्य दीखने वाला मनुष्य कितना विलक्षण है उसको दृढ़ता और सुसंस्कारिता के आधार पर नापा जा सकता है। यों उसमें सहज विलक्षणताएँ भी कम नहीं। यह कमी जन्मजात रूप से अनायास ही उभरती है, कभी प्रयत्नपूर्वक विकसित कर ली जाती है। यह कौतूहल बढ़ाती है और बताती कि साधारण के भीतर कितनी असाधारण सम्भावनाएँ विद्यमान हैं।

‘संख्या नहीं स्तर’ यह दृष्टि उपयोगी और सराहनीय है। काम थोड़ा करें, पर उसमें मनोयोग और कौशल का सारा समावेश किया जाय और उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया जाय। ऐसा करने से वह छोटा दीखने वाला या थोड़ा लगने वाला काम ही कर्त्ता की प्रतिष्ठा बढ़ाने वाला और अधिक लाभ दे सकने वाला बन सकता है।

इसके विपरीत यदि संख्या वृद्धि एवं कलेवर विस्तार को महत्व दिया जाता रहा, स्तर का ध्यान न रखा गया तो वह बढ़ा हुआ विस्तार हितकर होने की अपेक्षा कष्टकर ही सिद्ध होता है। सिर पर लदा हुआ भार जितने परिमाण में अधिक होता है उतना ही वहनकर्त्ता को अधिक कष्ट उठाना पड़ेगा, भारी शरीर वाले मोटे दीखने वाले व्यक्ति हर दृष्टि से घाटे में रहते हैं। बढ़ा हुआ निरर्थक मांस क्रिया शक्ति को कुण्ठित करने और रुग्णता उत्पन्न करने के अतिरिक्त और किसी काम नहीं आता।

रूस के यूक्रेन क्षेत्र में ओडिसा गाँव का एक आठ वर्षीय छात्र संसार भर के बालकों में अपनी विशालता का कीर्तिमान स्थापित किये हुए है। नाम विट्या, ऊँचाई पाँच फुट, वजन 150 पौण्ड। आठ वर्ष की आयु में इतना विस्तार आश्चर्यजनक है।

इस व्यक्ति की आर्थिक स्थिति दयनीय ही बनी रही वह उतना उपार्जन भी न कर पाता था, जितना कि सामान्य व्यक्ति कर लेते हैं। कौतुकी दर्शकों की व्यंग उपहास करने वाली भीड़ से उसे कभी कोई लाभ नहीं हुआ वरन् उस जमघट से उसका समय ही बर्बाद होता रहा।

ऊँचाई अधिक होने से उनकी छाया का लाभ उतनी अच्छी तरह नहीं मिल पाता जितना कि सामान्य वृक्षों से काम चलता है। उनके फल-फूल भी निरर्थक होते हैं। लकड़ी काटने का साहस भी इतने ऊँचे चढ़कर कौन करेगा? यह पेड़ दीर्घजीवी तो होते हैं, पर जितनी जमीन घेरते हैं उतनी का किराया भी वापिस कर सकने जितनी उनकी उपयोगिता नहीं होती।

बहुलता का विस्तार कौतूहल भर बढ़ता है। भिन्नताएँ विचित्र तो लगती हैं, पर उनसे परेशानी ही बढ़ती है। अपने आज के संसार में 3064 भाषाएँ बोली जाती हैं। इस बहुलता ने मनुष्य की क्या सेवा की? यदि संख्या थोड़ी होती तो क्या हर्ज था? सच तो यह है कि थोड़ी भाषाएँ होने से ज्ञान के विस्तार में सहायता मिलती और मनुष्यों के बीच आदान-प्रदान का रास्ता सरल होता।

इन दिनों संसार भर में छोटे-बड़े 90 हजार मजहब हैं। इस सम्प्रदायों की कटीली घास अधिक भूमि पर छाई हुई तो दीखती है, पर उससे रास्ता चलने वाले को अनुयायियों को क्या लाभ मिलता है? अनेक रास्ते बना देने से मुसाफिर को भटकने की कठिनाई रहेगी। सीधा रास्ता एक दो ही हों तो अगणित टूटी-फूटी पगडंडियाँ खड़ी कर देने की तुलना में अधिक सुविधाजनक रहेगा।

अलग-अलग मन्दिर बनाने की प्रतिस्पर्धा चलती रहती है। साधन रहित कितने ही देवालय बनते और अपनी दयनीय दरिद्रता का परिचय देते हुए कुरुचि और अश्रद्धा उपजाते रहते हैं। यह संख्या विस्तार न बड़े और थोड़े से ही साधन सम्पन्न धर्म मन्दिर सुनियोजित उद्देश्य लेकर काम करें तो वे ईसाई मिशन के गिरजाघरों की तरह अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सकते हैं।

विस्तार की गरिमा सहज ही समझी जा सकती है, पर यदि प्रखरता का अभाव हो तो उस विशाल कलेवर को आदिम काल के दैत्याकार सरीसृपों के समतुल्य ही माना जायगा। जिसे एक नई जाति के भेड़िये ने उन सभी को कतरव्यौंत करके रख दिया। प्रशंसा प्रखरता की है विस्तार तो कौतूहल बढ़ाने भर के काम आता है।

अपना भारत भूमि की दृष्टि से ब्रिटेन से 14 गुना जापान से 9 गुना बड़ा है। योरोप के विकसित समझे जाने वाले सभी देशों का क्षेत्रफल जितना होता है उसकी तुलना में भी भारत का विस्तार अधिक है। 400 करोड़ जनसंख्या वाले विश्व में 60 करोड़ से अधिक लोगों का भारत प्रायः छठा भाग है। संसार के विकसित अविकसित निवासियों में से हर छह के पीछे एक भारतीय की गणना की जा सकती है। संख्या और भूमि के विस्तार की तुलना में यदि अपनी प्रखरता भी बढ़ी-चढ़ी रही होती तो निश्चय ही उसे अपने आप में अति बलिष्ठ होने और दूसरों की प्रचुर सहायता कर सकने का श्रेय वैसा ही मिला होता जैसा कि अतीत में भारत के भूमि पुत्रों को मिलता रहा है।

संख्या और विस्तार को सौभाग्य का चिह्न कभी माना जाता रहा है अब तो बड़े परिवार एक प्रकार से निग्रह और असंतोष के अखाड़े ही बने दीखते हैं। समझा और समझाया जा रहा है कि परिवार छोटे रखे जायं ताकि उनके स्तर उठाने के प्रयासों में अधिक सफलता मिल सके।

अधिक धनी होना अन्य लोगों को चमत्कृत कर सकता है, पर जिन पर वह लदान लदा रहता है वे विद्वेषी, चिन्ताओं और दुर्व्यसनों से घिरते ही चले जाते हैं। इस कुचक्र में शारीरिक आरोग्य, मानसिक सन्तुलन, पारिवारिक सद्भाव भी गँवा बैठते हैं। लोभ की ललक बढ़ते जाने से बहुत बार वे अवाँछनीय रीति से कमाई करने लगते हैं और लोक-परलोक बिगाड़ते हैं। अधिक धन का होना आवश्यक नहीं। आवश्यक यह है कि नीति से कमाया जाय और श्रेष्ठ प्रयोजनों के लिए उसका सदुपयोग किया जाय। ऐसा धन थोड़ी मात्रा में होने पर भी उपार्जनकर्त्ता को सुख और श्रेय प्रदान करता है। हमें विस्तार का नहीं स्तर का ही अधिक ध्यान रखना चाहिए।


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धर्म को मत-मतान्तरों में मत उलझाओ। उसे सिद्धान्त वाद-विवादों, शास्त्र-चर्चाओं और कर्मकाण्डों में मत उलझाओ। धर्म तो जीवन है-जीवन यज्ञ का मूर्तिमान रूप है।

जो भी काम करो-जहाँ भी काम करो-धर्म और कर्त्तव्य समझकर करो। अपनी परीक्षा समझो और उसे श्रेष्ठतम स्तर का-श्रेष्ठतम उपयोग में आ सकने योग्य बनाने का प्रयत्न करो। आदर्शवादी दृष्टिकोण के साथ समग्र तत्परता के साथ किया हुआ कर्म ही धर्म है। पूजा के समय ही नहीं, हर घड़ी धर्मात्मा रहने की आवश्यकता है।

दैनिक जीवन ही वह मन्दिर है जिससे धर्म के देवता की पूजा की जा सकती है। उसके पुजारी तुम्हीं हो सकते हो-केवल तुम्हें। जीवन यज्ञ है। उसमें तुम्हीं मन्त्र बनो, तुम्हीं अग्नि और तुम्हीं आहुति। पवित्र धर्मानुष्ठान के लिए न कि इससे कम से काम चलता है और न इससे अधिक की आवश्यकता है।

-सन्त श्री वास्वानी

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इस संसार में रहस्य कुछ नहीं,सर्वत्र नियम और व्यवस्था ही है।

इस संसार की समस्त गतिविधियाँ सुव्यवस्थित रीति से चल रही हैं। प्रकृति के नियम ऐसे हैं जिनमें व्यतिरेक की तनिक भी गुंजाइश नहीं है। जिन नियमों को हम जानते हैं, उन्हें सामान्य समझते हैं। जिनका पता अभी तक चल नहीं पाया है, उन्हें रहस्य कहते हैं। रहस्य का तात्पर्य उन घटनाक्रमों से है जो असामान्य होते हैं और जिनके घटित होने के कारणों का पता नहीं है।

ऐसे घटनाक्रमों को दैवी कहकर सन्तोष कर लिया जाता है। अभी भी सूर्य और चंद्रग्रहण को असाधारणतः कोई दैवी प्रकोप समझा जाता है। बिजली का कड़कना पिछड़े इलाकों में देवता दैत्यों के विग्रह का प्रतीत है। विज्ञान के विद्यार्थी इन्हें प्रकृति क्रम की एक नियत विधि व्यवस्था के अन्तर्गत प्रकट होने वाले सामयिक घटनाक्रम मात्र मानते हैं। उन्हें ऐसे कारणों में आश्चर्य जैसी कोई बात प्रतीत नहीं होती।

मिस्र के पिरामिडों को ‘जादुई’ माना जाता है और उनके निर्माण की अलौकिकताओं का सम्बन्ध किन्हीं दैवी-देवताओं के साथ जोड़ा जाता है। अब उन आधारों का पता लगाया जा रहा है जिनके सहारे इन निर्माणों में कई प्रकार के ‘अद्भुत’ दृष्टिगोचर होते हैं।

इलेक्ट्रॉनिक विज्ञानी ऐरिक मेहलोइन ने यह सिद्ध किया है कि पिरामिडों में पाई जाने वाली सभी अलौकिकताएँ आज भी उन्हीं वैज्ञानिक नियमों के आधार पर खड़ी की जा सकती हैं जिनके सहारे कि वे प्राचीन काल में की गई थीं। उनने अठारह इंच ऊँचा एक पिरामिड मॉडल प्लेक्सोग्लास का बनाया है उसके भीतर मांस के टुकड़े तथा अन्य पदार्थ उसी स्थिति में रखे गये जैसे कि पिरामिडों में रखे हुए हैं। प्रायः सभी पदार्थ वही प्रतिक्रिया उत्पन्न करने लगे जो उन प्राचीन निर्माणों में पाई जाती और जादुई कही जाती है।

ताबूतों में बन्द ‘ममी’ हजारों वर्ष बाद भी क्यों सुरक्षित है? इन्हें पिछले लोग भूत-प्रेतों की चौकीदारी मानते थे, पर अब प्रतीत हुआ है कि जैसा वातावरण पिरामिडों के बाहर और भीतर है वैसा ही बना लेने पर मांस की सड़न रुक सकती है और वैसे ही रहस्य दृष्टि गोचर हो सकते हैं जैसे कि पिरामिडों की कथा-गाथाओं के साथ जुड़े हुए हैं।

आग के बारे में यह मान्यता सर्वविदित है कि उसके जलने के लिए ईंधन और ऑक्सीजन दोनों की आवश्यकता है। वे दोनों जब तक उपलब्ध रहेंगे तब तक आग जलेगी एक भी समाप्त हो जाने पर वह बुझ जायगी, किन्तु ऐसे प्रमाण भी मिले हैं जिनमें इस सर्वविदित मान्यता का खण्डन होता है। मामूली आकार के दीपकों में भरी हुई चिकनाई कुछ घण्टों ही जल सकती है, पर यदि कोई छोटा दीपक सैकड़ों वर्षों तक जलता रहे तो ईंधन के आधार पर अग्नि प्रज्ज्वलन का सिद्धान्त कट जाता है, यही बात ऑक्सीजन के सम्बन्ध में भी है। एक बन्द सन्दूक के भीतर की हवा दो चार दिन ही काम दे सकती है उतने से घेरे की हवा सैकड़ों वर्षों तक किसी दीपक का काम दे सकती है इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। तो भी ऐसे प्रमाण पाये गये हैं जो अग्नि विज्ञान को प्रचलित मान्यताओं के सही-गलत होने के सम्बन्ध में प्रश्न चिन्ह लगाते हैं।

इतिहासकार विलयम कैमडन ने अपनी पुस्तक ‘ब्रिटेन’ में पुराने खण्डहरों में खुदाई में मिले ऐसे जलते दीपकों का वर्णन किया है जो सैकड़ों वर्षों से बन्द खिड़की के भीतर जलते चले आ रहे थे। कैमडन ने इस आश्चर्य का समाधान यह लिखकर किया है कि प्राचीन काल के रसायनवेत्ता सोने को पिघलाकर तेल जैसा बना देते थे उसी से यह दीपक सैकड़ों वर्षों तक जलते थे। सेन्ट अमास्टाइन ने अगली संस्मरण पुस्तक में लिखा है कि देवी वीनस के मन्दिर में ऐसा अखण्ड दीपक खुली जगह में जलता था जिस पर वर्षा और तेज हवा का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। पुरातत्व विभाग ने सन् 1840 में स्पेन कुर्तण क्षेत्र की एक कब्र को खोदकर जलता दीपक उपलब्ध किया था। उस ज्योति को कई सौ वर्षों से जलती आ रही माना गया है।

इटली के नसीदा द्वीप में एक किसान ने अपने खेत में एक कब्र पाई थी। उसे खोदकर देखा गया तो काँच के बरतन में बन्द एक ऐसा दीपक पाया जो मुद्दतों से उसी में बन्द जल रहा था। इतिहासकार ऐसेलाईस ने ऐस्टेनाग की खुदाई में निकला एक कब्र का वर्णन किया है, जिसमें जलता हुआ दीपक पाया गया। उसके पास ही अभिलेख पाया गया, जिसमें लिखा था-खबरदार कोई दीपक को छुए नहीं यह देवता पलोटी का उपहार है। ऐसेलाईस ने इस दीपक को चौथी शताब्दी में जलाया गया माना है।

अनुसन्धानकर्त्ता ओडोपेन्सी रोलेस ने सम्राट् कान्स्टेट क्लोर्स के राजमहल का वर्णन किया है और लिखा है उसमें कभी न बुझने वाले दीपक जला करते थे उनमें मामूली तेल नहीं वरन् कोई विशेष रासायनिक पदार्थ जलता था। सिसरो की वेटी टोल्या की कब्र में भी एक ऐसा ही दीपक पाया गया था जो बिना तेल और हवा के जल रहा था। उसे हवा में निकाला गया तो तुरन्त ही बुझ गया।

उड़न तश्तरियों के सम्बन्ध में पिछले 30 वर्षों से बहुत चर्चा चली है। उनके आँखों देखे विवरण इतने अधिक छपे और रिकार्ड किये गये हैं कि उन्हें कपोल कल्पनाएँ मनगढ़न्त कहकर झुठलाया नहीं जा सकता। आँखों न देखा गया जो काण्डरों और कमराओं ने उन्हें क्यों अंकित किया? अप्रैल 77 में उड़न तश्तरियों के सन्दर्भ में विचार करने के लिए एक अन्तर्राष्ट्रीय अमेरिका में सम्पन्न हुई। उनमें अनुसन्धानकर्त्ताओं ने अपने विभिन्न निष्कर्ष बताये। उनमें से एक शोधकर्त्ता सालवाडोर फ्रीक्सेडो ने कहा-अच्छा हो यह शोध भौतिक विज्ञान तक सीमित न रहे इसमें आत्म-विद्या विशारद भी भाग ले और तलाश करे कि क्या इसमें किन्हीं प्रत्यक्ष या अदृश्य प्राणियों की हलचलें तो जुड़ी हुई नहीं हैं?

अन्तरिक्ष विज्ञानी एलने हाईनेक का कथन है-वे भौतिक क्षेत्र की ही इकाइयाँ हैं। अभी बहुत से प्रकृति रहस्य जाने जाने के लिए शेष है। उन्हीं में से एक उड़न तश्तरियों का प्रसंग भी सम्मिलित रखा जाना चाहिए और उस सन्दर्भ में धैर्य और प्रयत्नपूर्वक प्रयत्न किया जाना चाहिए।

अमेरिकी वायु सेना के एक जाँच कमीशन ने अपने देशवासियों को आश्वस्त किया था कि वे जो भी हों सार्वजनिक सुरक्षा के लिए उनसे कोई खतरा नहीं है। इतने पर भी जनता को कोई समाधान न हो सका और यह भय बना ही रहा कि यदि वे कभी नीचे उतर आईं तो न जाने क्या कहर बरसाने लगेंगी।

मानसिक रोग और स्नायविक दुर्बलता से उत्पन्न ज्ञान तन्तुओं की विकृतियाँ भूत-पलीतों का सृजन करती हैं। किम्वदन्तियों और अन्धविश्वासों का जाल-जंजाल उन्हें इस प्रकार धुंए से बादल गठ देता है मानो वे सचमुच ही चोर उचक्कों की तरह हर किसी को परेशान करने पर उतारू हो रहे हों।

जादूगरी, बाजीगरी के अनेक खेल लोगों को अचम्भे में डाल देते हैं और लगता है वह किसी जिन्न दैत्य की करामात है। इसका खण्डन प्रायः भले बाजीगर करते भी रहते हैं और यही बताते हैं कि यह केवल हाथ की सफाई है फिर भी कितने ही अन्धविश्वासी उन्हें चमत्कार ही कहते रहते हैं।

स्मरण रखने योग्य यही है कि विश्व ब्रह्माण्ड आपने आप में रहस्य है। उसके नियम विधान भी रहस्य जैसे हैं उसके अतिरिक्त वैसा कोई रहस्य नहीं है जैसा कि अन्धविश्वासी क्षेत्र में फैला हुआ है।


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“आप तो फकीर हैं। फिर गृहस्थों जैसे कपड़े क्यों पहन रखे हैं?” -सूफी फकीर ने नानकदेव से पूछा।

नानक ने कहा- ‘‘परमात्मा वेश और आश्रम नहीं देखता। वह देखता है अन्तःकरण।’’

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प्रेम मानव जीवन की सर्वोपरि सम्पदा

संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में काम करने वाली संस्था ‘वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गनाइजेशन में’ डाइरेक्टर मनीषी डी. चिसोम ने अपने एक प्रतिवेदन में कहा था। “अपनी दुनिया का भविष्य इस बात पर निर्भर है कि परिपक्व व्यक्तित्व और प्यार कर सकने में समर्थ कितने अधिक व्यक्ति हम तैयार कर सके। बदलती दुनिया की समस्याएँ बेशक बहुत ही जटिल हैं फिर भी वे ऐसी नहीं है कि सज्जनता और सद्व्यवहार के सहारे हल न हो सकती हों। घृणा और ध्वंस का उपयोग प्रतिकूलताओं के हटाने के लिए बहुत समय से होता रहा है। उससे सामयिक लाभ भले ही हुआ हो, पर अन्ततः उससे नये किस्म के ऐसे संकट उभरे हैं जो पहले से भी अधिक जटिल सिद्ध हुए। दण्ड की आवश्यकता नहीं यह तो नहीं कहा जा सकता, पर इतना निश्चित है। समाधान के दोनों सिरे प्याज और सहकार के साथ सम्बद्ध हैं। इनका उपार्जन और उपयोग कर सकने वाले व्यक्तित्व ही दुनिया को शान्ति और प्रगति की ओर ले जा सकेंगे। आज के निर्माण का सबसे अधिक महत्वपूर्ण और रचनात्मक पक्ष यही है।”

सन्तों और महामानवों ने अपने आचरण और परामर्श के द्वारा जन-साधारण को प्रेम करने की शिक्षा दी है। धर्म-कृत्यों में पुण्य परमार्थ की विधि व्यवस्था इसलिए है कि उसके सहारे मनुष्य उदारता का अभ्यास करे। भक्ति को ईश्वर प्राप्ति का प्रमुख आधार माना गया है। भक्ति अर्थात् प्रेम। प्रेम का आरम्भिक अभ्यास भक्ति-योग की साधना के सहारे किया जाता है उसका विकास परिपाक जैसे-जैसे होगा वैसे-वैसे करुणा जगेगी और दूसरों के साथ आत्मीयता भरा उदार व्यवहार करने की नीति अपनानी पड़ेगी। साधु और ब्राह्मण परम्परा में संयमी और मितव्ययी जीवन पद्धति अपनाने का प्राविधान है। यह इसलिए कि व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं से विरत होकर दूसरों की सेवा सहायता करने के लिए समय और साधन बनाये जा सकें। अध्यात्म तत्व ज्ञान के प्रधान सूत्र ‘‘आत्मवत् सर्व भूतेषु”-‘‘वासुदैव कुटुम्बकम्”-‘‘आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्” ‘‘कामये दुःख तल्फानां प्राणिनां आर्त नाशनम्” आदि हैं। इनमें दूसरों से प्यार करने की शिक्षा दी गई है। यही है आधार अवलम्बन जिसे अपना कर व्यक्ति अपनी गरिमा को विकसित करने और सेवाधर्म अपना कर यशस्वी बनने में समर्थ होता है। समाज की प्रकृति और शक्ति भी इसी आस्था पर निर्भर है।

शारीरिक रोगों की उत्पत्ति में आहार-विहार की विकृति से भी अधिक दुःखदायी तथ्य यह है व्यक्ति एकाकी उपेक्षित और असहाय अनुभव करता है। अपनेपन का अभाव अनुभव करने वाला व्यक्ति कुपोषणग्रस्त लोगों से भी अधिक दुर्बल रहता और बीमार पड़ता है।

मानसिक रोगियों में से अधिकांश इसलिए विक्षिप्त स्थिति में जा पहुँचते हैं कि उन्हें आत्मीयता का उत्साहवर्धक आश्वासन न मिल सका। “मिल सका” का एक अर्थ भी है कि दूसरों ने तो उन्हें प्यार किया हो किन्तु वे उसे अनुभव न कर सके हों। परिवार और समाज के साथ व्यक्ति की घनिष्ठता के साथ जकड़े रहने और सद्व्यवहार करने के लिए समाज परम्परा और नियम विधान का इतना प्रभाव नहीं होता जितना कि भाव-संवेदना का। आत्मीयता, उदारता, सद्भावना, सहकारिता भरे व्यवहार का जहां अनुभव होगा मानसिक संतुलन का ठीक तरह बना रहना वहीं सम्भव है। उपेक्षा के वातावरण में रहने वाले अपनी मानसिक स्वस्थता खो बैठते हैं और सही सोचने की क्षमता गँवा बैठते हैं।

अमेरिका के टेपिका-केनास के मानसिक अस्पताल में रोगियों को अर्धनिद्रित किये रहने वाली औषधियाँ, बिजली के झटके जैसे पुराने उपचार यदा-कदा ही प्रयुक्त होते हैं। उनके उपचार में ‘बिन माँग प्यार’ का प्रयोग बताया जाता है। इसे अस्पताल के कर्मचारी तो क्रियान्वित करते ही हैं। उनके कुटुम्बियों एवं मित्रों को भी यही परामर्श दिया जाता है कि वे जब भी मिलें तब रोगी को अपने प्रेम भाव का परिचय दें। दुःख, शिकायतें और चिन्ता उत्पन्न करने वाली बात न कहे।

बाल-विकास की दृष्टि से उनके भोजन, मनोरंजन और शिक्षण को प्रधानता दी जाती है किन्तु इस तथ्य पर ध्यान नहीं दिया जाता है कि उन्हें स्तरीय प्यार की आवश्यकता इससे भी अधिक है। आमतौर से माता, दादी आदि ही बच्चों को अनगढ़ दुलार दे पाती हैं। बाकी तो पूरा परिवार उनकी हरकतों में हानि होती देखते हैं और दुत्कारते, फटकारते इधर से उधर भगा देते हैं। घर के वयस्क व्यक्तियों से उसका परिचय भर होता है। यदाकदा उपहार भले ही मिल जाए पर ऐसा व्यवहार कदाचित ही मिल पाता है जिससे वे उन सब को भी अपना मित्र मान सकें और उनके साथ जो खुल कर बात करने या खेलने का अवसर पा सकें। घरों में यदि दुलार होगा तो ‘खुश करने’ के लिए होगा। बच्चे जो भी माँगेंगे दिया जायगा। जो करेंगे करने दिया जायगा। यह अनगढ़ प्यार है। उससे सुधार परिष्कार का शिक्षण मार्गदर्शन को मात्रा न रहने से परिणाम हानिकारक ही होता है और बच्चे उद्दण्ड असंस्कृत हो जाते हैं। स्तरीय प्यार में बच्चे को आत्मीयता का आभास करने के अतिरिक्त खेलते खिलाते नीति मात्र का अभ्यास कराया जाता है। इस उपलब्धि के सहारे बालक अभावग्रस्त परिस्थितियों में सुविकसित और सुसंस्कृत बन जाते हैं। इसके विपरीत प्यार का अभाव या अनगढ़ दुलार मिलने से वे साधन सम्पन्न घरों में पलने पर भी असामाजिक एवं उच्छृंखल अथवा अविकसित मनःस्थिति से ग्रसित रह जाते हैं।

शारीरिक स्वास्थ्य-मानसिक संतुलन और क्रमिक विकास के लिए अन्य साधनों की भी आवश्यकता रहती है, पर प्यार भरे वातावरण की उपयोगिता भी कम नहीं है। यदि उसका अभाव बना रहे तो फिर मात्र साधनों के सहारे वास्तविक स्वस्थता, समर्थता एवं सुसंस्कारिता का लाभ मिल ही नहीं सकेगा।

अपराधी प्रकृति के लोगों के उस स्थिति में पहुँचने के कारणों का पता लगाने के लिए संसार के विभिन्न भागों में नीति शास्त्रियों, समाजवेत्ताओं एवं मनोवैज्ञानिकों ने लम्बी शोधों के उपरान्त जो निष्कर्ष निकाले हैं उनमें सब से बड़ा कारण प्यार न पा सकना और प्यार न दे सकना बनाया गया है। स्नेह की संवेदनाओं के आधार पर ही व्यक्ति दूसरों के साथ बँधता है। शिष्टता और उदारता की सत्प्रवृत्तियाँ इसी आधार पर पनपती हैं। भावनात्मक परिपोषण के अभाव में व्यक्ति आत्म केन्द्रित बनता है। उसका स्वभाव संकीर्ण स्वार्थ परायण बनता है फलतः उससे निष्ठुरता की मात्रा बढ़ती चली जाती है। प्रायः ऐसे ही लोग चोरी डकैतों, ठगी, बेईमानी जैसे कुकर्म करते हैं। तनिक से कारणों पर असंतुलित होकर वे किसी पर भी आक्रमण कर बैठते हैं। हत्यायें एवं आत्महत्यायें करते हुए ऐसी ही मनःस्थिति वाले पाये जाते हैं।

दूसरे पर प्यार करना एक सामाजिक दीखने वाला किन्तु वस्तुतः आध्यात्मिक गुण है वह वस्तुओं में सौन्दर्य खोजता है और उससे उभरता है। दूसरों को उदार सद्व्यवहार देकर बदले में सम्मान और सहकार पाता है। अपने प्रति प्यार करने के उपयुक्त सद्गुण बढ़ाता और श्रेय सहायक सत्प्रवृत्तियों में संलग्न रहता है। समाज के प्रति प्यार को देश-भक्ति, लोक-साधना आदि नामों में पुकारते हैं। आदर्शों के प्रति किये जाने वाले प्यार को देवत्व कहते हैं। ईश्वर के प्रति प्यार विकसित करने वाले जीवन मुक्त बनते हैं। लक्ष्य के प्यार करने वाले परिश्रम करते और अभीष्ट सफलता के लक्ष्य तक जा पहुँचते हैं। जिसे इनमें किसी के लिए प्यार नहीं वे उच्छृंखल आवारागर्दी में भटकते और पतन तथा पराभव की दुर्गति की ठोकरें खाते हैं। स्वयं दुःख पाते और दूसरों को दुःख देते हुए विदा होते हैं।

नृतत्व विज्ञानी डॉ. पावर्ट अपनी पुस्तक प्रेम के प्रयोग में अनेक उदाहरण देते हुए सिद्ध किया है कि सद्भाव का परिचय पाकर अविकसितों को खिलने-अस्वस्थों को बलिष्ठ बनने और विक्षिप्तों को पुनः सामान्य स्थिति में लौटने का अवसर जिस तरह इस प्रयोग से मिलता है उतना और किसी प्रकार नहीं। वे अपराधी और उच्छृंखलों को भी सामान्य नागरिक बनाने का इस प्रक्रिया को अपनाने पर अत्यधिक सफलता मिलने का दावा करते हैं। उनके कथनानुसार खंडित व्यक्तित्व और कुछ नहीं प्रेम का अभाव सहन करने की प्रतिक्रिया मात्र है। यदि सद्-व्यवहार पाने और देने का सिलसिला चलता रहे तो न तो पिछड़ेपन पल्ले बंधेगा और न असफल अपमानित जीवन जीने की आवश्यकता पड़ेगी। हितैषियों की ही यह जिम्मेदारी है कि वे अपने प्रिय पात्र को समुचित स्नेह और सम्मान प्रदान करते रहें।

प्यार-आत्मा की भूख और प्यास है उसके बिना अन्तःकरण की पुष्टि और तृप्ति हो ही नहीं सकती। कुशलता, क्षमता और सफलता तो पुरुषार्थ के बल पर भी पाई कमाई जा सकती है, पर व्यक्तित्व का सुसंस्कृत होना प्यार की सच्चाई और गहराई पर ही निर्भर रहता है। यहाँ एक भारी भूल होती रहती है कि लोग पाने का उद्देश्य लेकर प्यार करते हैं जबकि उसमें आदि में अन्त तक देना ही देना पड़ता है। बदले में तो केवल आदर्शवादिता के निर्वाह का आत्मसंतोष मात्र मिलता है।

हेरी ओवर स्टेट कहते थे-”प्यार करने का तात्पर्य यह नहीं है कि प्रिय पात्र पर हमारा अधिकार हो गया और उसे मनमर्जी के अनुसार चलाने के लिए बाधित किया जायगा। अधिकार थोपने और वशवर्ती बनाये रखने का लाभ सोच कर जो दिलचस्पी लेते हैं और उसे प्यार करते हैं वे वस्तुतः इस महान शब्द का न तो अर्थ समझते हैं और न उपयोग।”

दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति कहते थे। ‘यह कैसी विडम्बना है कि हम प्यार करते नहीं- मात्र पाना चाहते हैं। मनःशास्त्री डीएरिक फ्रांस ने लिखा है-प्यार करने का अर्थ उतना ही है कि प्रिय पात्र को समुन्नत बनाने के लिए अधिकाधिक योगदान करना।

न्यूमन हर्बर्ट के अनुसार किसी के सौन्दर्य, प्रतिभा, कौशल आदि विशेषताओं के प्रति आकर्षित होना उन गुणों की स्वीकृति मात्र है प्यार नहीं। आकर्षण घटने पर दिलचस्पी घटती है और वह तथाकथित प्यार भी बादलों की छांह की तरह पलायन कर जाता है।

मनोविज्ञानी मार्टिन हेरी ने सच ही कहा है कि लोग अपने आप से प्यार करना सीख ले तो कितने ही अन्य लोगों का वजन बहुत हलका हो सकता है। रुग्णता, दरिद्रता, दुष्टता, मूर्खता आदि के कारण मनुष्य स्वयं खिन्न रहता और विपन्न बनता है। चिकित्सक, अर्थशास्त्री, पुलिस कर्मचारी, राजनेता आदि कितने ही वर्ग के लोक सेवी वर्ग इन खंडित व्यक्तित्वों के कारण उत्पन्न होने वाली विडम्बनाओं के समाधान में ही उलझे रहते हैं। उनके कारण समाज को अनेक दृष्टि से अनेक प्रकार की हानियाँ सहन करनी पड़ती हैं। व्यक्ति यदि आत्म तिरस्कार करना छोड़ दे तो अपने प्रति किया गया प्यार विकसित होते-होते विश्वव्यापी बन सकता है और उससे सभी का हित साधन हो सकता है।

दूसरों को देने के लिए यों हर मनुष्य के पास कुछ अधिक नहीं बचता। इतने पर भी अन्तःकरण में पाई जाने वाली प्यार भरी भाव संवेदना को यदि सघन आत्मीयता के साथ बखेरा जा सके तो यह देव सम्पदा घटेगी नहीं बढ़ती रहेगी। प्यार का उद्भव और उपयोग इतना महत्वपूर्ण कार्य है कि उतने में ही सरसता और सफलता का दुहरा उद्देश्य पूरा हो सकता है। संसार के उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रेम सम्पदा का अभिवर्धन अन्य सभी प्रकार की आवश्यकताओं की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।


Quotation

रेशम का कीड़ा अपना सर्वस्व अर्पित कर सुरक्षा के लिए अपने चारों ओर जाल बुनता है, पर कुछ ही समय बाद वह उसी जाल में बन्द हो समाप्त हो जाता है।

सांसारिक प्राणी की भी यही गति है। मनुष्य अपनी प्रसन्नता के लिए जिस माया का जाल रचता है अन्त में वही माया-जाल उसे लील जाता है।

-रामकृष्ण परमहंस

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समर्थक सहयोगी का पातक

पातक केवल वे ही नहीं होते जो अपने शरीर से किये गये हैं। कुकर्मकर्ताओं को सहयोग, परामर्श देना, उनके साथ सम्बन्ध रखना, समर्थन करना भी प्रकारान्तर से उस पातक में भागीदार होने जैसा ही है। दुष्टता एकाकी उतनी नहीं बन पड़ती, जितनी कि इस विश्वास के कारण होती है कि हमारे कितने ही सहयोगी मौजूद हैं। ऐसे लोगों को यदि यह आभास हो जाय कि हमारा समर्थनकर्ता कोई नहीं है, किसी से सहयोग की आशा नहीं है। तो उसकी हिम्मत आधी टूट जाती है। अन्ततः पूरा सहयोग भले ही न मिले, पर वाणी के सद्भाव प्रकट करने पर भी दुष्ट उसका अनुमान यही लगा लेते है कि अमुक व्यक्ति हमारा साथी है। इतने भर से उनके हौसले बढ़ जाते हैं और दूनी हिम्मत से अपना कुकृत्य करते हैं। हौसला बढ़ाना भी एक प्रकार से समर्थन ही है। इसलिए वाणी से सत्कार करना तथा साधारण व्यवहार के अतिरिक्त किसी प्रकार की घनिष्ठता बढ़ाना भी स्वयं पाप कर्म करने जैसा पातक हो जाता है। ऐसे लोग भी प्रायश्चित्त करें ऐसा शास्त्र विधान है।

यो येन पतितेनैषां संसर्ग याति मानवः। स तस्यैव व्रतं कुर्यात् संसर्गस्य विशुद्धये॥

-हारीत

जो जिस पतित का सहायक समर्थक रहा हो उसे उस अपराधी जैसा प्रायश्चित्त करना चाहिए।

आसनांच्छयनाद्यानात्संभाषण सह भोजनात्। संक्रामन्तीह पापानि तैलबिंदुरिवाँभसि॥

-पाराशर

पतित मनुष्य का साथ देने, उसके साथ सहयोग रखने से भी पाप उस सम्पर्ककर्ता पर चढ़ जाता है जैसे तेल की बूँदें समूचे जल स्तर पर फैल जाती हैं।

यो येन पतिते नैषां संसर्ग याति मानवः। एतस्यैव व्रतं कुर्यात् तत्संसर्ग विशुद्धये। पतितेन तु संस्पर्श लोभेन कुरुते नरः। स कृत्यायनोदार्यं तस्यैव व्रत माचरेत्।

-उशनन्न स्मृति

जो जिस पतित का सहयोग समर्थन करता है-सम्पर्क में आता है। वह उसी पाप का भागी बन जाता है। लोभवश ऐसा करने वाले भी उसी प्रकार प्रायश्चित्त के अधिकारी हैं।

कानूनी प्रक्रिया में भी अपराधी की हिम्मत बढ़ाना अपराध माना गया है और उसके लिए भी समान रूप से सजा का विधान रखा गया है किन्तु इस प्रक्रिया में अनेक बार प्रभाव के कारण राजदंड से लोग बच निकलते हैं इसलिये अपने यहाँ सामाजिक बहिष्कार की परम्परा अपनाई गई थी। अर्थात् समीपवर्ती कुटुम्बी पड़ोसी और ग्रामवासी जो भी कहीं बुराई पनपती देखें वह बहिष्कार की नीति अपनाकर अपराधी का मनोबल तोड़ें आज यह परम्परा विश्रृंखलित हो गई है। इसे एक प्रकार से अनैतिकता के विरुद्ध आवाज न उठाने का सामूहिक पातक कहना चाहिये। उससे मुक्त होना हो तो अनैतिक आचरण का डटकर प्रतिरोध करने की नीति हर किसी को अपनानी चाहिये।

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स्मरण शक्ति प्रयत्न पूर्वक बढ़ाई भी जा सकती है।

स्मरण शक्ति की प्रखरता से मनुष्य अधिक विचारशील समझा जाता है और उसके ज्ञान की परिधि अधिक बड़ी होती है। जबकि भुलक्कड़ लोग महत्वपूर्ण ज्ञान संचय से तो वंचित रहते ही हैं, साथ ही दैनिक काम-काज में भी जो आवश्यक था उसे भी भूल जाते हैं और समय-समय पर घाटा उठाते तथा ठोकरें खाते हैं।

किसी-किसी को स्मृति की प्रखरता जन्मजात रूप से भी मिलती है और वह इतनी पैनी तथा व्यापक होती है कि दूसरे लोग चमत्कृत होते और अवाक् रहते देखे जाते हैं।

इंग्लैण्ड निवासी एक अन्धे व्यक्ति फिल्डिंग को दस हजार व्यक्तियों के नाम याद थे। इतना ही नहीं वह आवाज सुनकर उस व्यक्ति का नाम बता देता था। इसी प्रकार की विलक्षणता एक और माण्टुगुनस नामक अंग्रेज में थी। वह जन्मान्ध था। पच्चीस वर्ष तक उसने पोस्ट मैन का काम किया। घर-घर जाकर चिट्ठी बाँटता था। उसके बाँटने में कभी गलती नहीं पकड़ी गई। वह पत्रों को सिलसिले से लगाता था और बाँटने से पहले दूसरों की सहायता से नाम और क्रम मालूम कर लेता था। इतने भर से हर दिनों सैकड़ों चिट्ठियाँ बाँटने में उसकी स्मरण शक्ति सही काम दे जाती थी।

जर्मन इतिहास में स्मरण शक्ति की प्रखरता के लिए विद्वान नेबूर प्रसिद्ध है। यह ख्याति उन्हें सबसे प्रथम तब मिली जब वे एक दफ्तर में क्लर्क थे। कागजों में संयोगवश आग लग गई। इस पर नेबूर ने सारे रजिस्टर और जरूरी कागज पत्र मात्र स्मरण शक्ति के आधार पर ज्यों के त्यों बना दिये। इसके बाद वे अपनी स्मृति की विलक्षणता के एक से एक बड़े प्रमाण देते चले गये और उस देश के प्रख्यात लोगों में गिने गये।

जर्मनी में ही म्यूनिख की नेशनल लाइब्रेरी लाइब्रेरी के डायरेक्टर जोनफ वर्नहर्ड डोकन की भी ऐसी ही ख्याति है। उन्हें आती तो कितनी ही भाषाएँ थीं, पर 9 भाषाओं पर उनका पूरा अधिकार था। उन्हें पत्र व्यवहार बहुत करना पड़ता था। इसके लिए उनके पास नौ विभिन्न भाषाओं के नौ अलग-अलग सेक्रेटरी थे। वे सबको एक साथ बिठा लेते थे और सभी को पत्र लिखते जाते थे। इतना ही नहीं उन्हें पूरी बाइबिल कंठस्थ थी। प्रसंग के अनुसार वे कहीं से भी उसे सुना सकते थे।

राजा भोज के दरबारी एक श्रुतिधर नामक विद्वान का उल्लेख मिलता है जो एक घड़ी (24 मिनट) तक सुने हुए प्रसंग को तत्काल ज्यों का त्यों सुना देते थे।

इतने पर भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि स्मरण रखने की विशिष्ट क्षमता कोई दैवी वरदान या जन्मजात सौभाग्य ही होता है। वह अन्य शारीरिक क्षमताओं की तरह एक सामान्य सामर्थ्य ही है जिसे प्रयत्नपूर्वक आसानी से बढ़ाया जा सकता है। जिस बात पर अधिक ध्यान दिया जाता है। वह स्वभावतः विकसित होने लगती है और जिसकी उपेक्षा की जाती है। उसका घटना भी सुनिश्चित है। यह तथ्य स्वास्थ्य, सम्पत्ति, शिक्षा आदि सामान्य बातों से लेकर यश, वर्चस्व और स्मृति तक पर समान रूप से लागू होता है। घटनाओं की, अवधारणाओं की उपेक्षा की जाय, उन्हें अन्यमनस्क होकर उपेक्षित भाव से देखा जाय और महत्वहीन समझा जाय तो वे स्मृति पटल पर देर तक न टिक सकेंगी। इसके विपरीत यदि उन्हें तन्मयता के साथ एकाग्र होकर समझने, देखने का प्रयत्न किया जाय तो उनका स्मरण बहुत समय तक बना रहेगा। अधिकांश महत्वपूर्ण घटनाएँ मनुष्य को आजीवन स्मरण बनी रहती हैं जबकि महत्वहीन समझी जाने वाली दो-चार दिन पुरानी होते ही विस्मरण हो जाती हैं।

मनुष्य-मनुष्य के बीच मस्तिष्कीय संरचना में अन्तर नहीं, मात्र उसमें स्थूलता और सूक्ष्मता का अन्तर पाया जाता है। वह भी जन्म-जात नहीं परिस्थितिजन्य होता है। जिस प्रकार व्यायाम, भोजन आदि से शरीर को सुदृढ़ बनाया जा सकता है उसी प्रकार मस्तिष्कीय प्रखरता की भी अभ्यास द्वारा अभिवृद्धि की जा सकती है।

मनोविज्ञानी कार्ल सीशोर का कथन है कि औसत व्यक्ति अपनी स्वाभाविक स्मरण शक्ति का मात्र दस प्रतिशत प्रयोग करता है। 90 प्रतिशत तो ऐसे ही मूर्छित और अस्त-व्यस्त स्थिति में पड़ी रहती है। फलतः मनुष्य मंद बुद्धि और मूर्ख स्तर का बना रहता है। यदि प्रयत्न किया जाय तो ऐसे लोग अपने को बौद्धिक दृष्टि से कहीं अधिक सक्षम बना सकते हैं। विकसित मस्तिष्क वालों को भविष्य में और भी अधिक तीक्ष्णता उत्पन्न कर लेने की पूरी-पूरी गुंजाइश है।

विस्मरण के तीन कारण है- (1) किसी बात को स्मरण रखे रहने की पूर्व इच्छा का न होना (2) प्रस्तुत विषयों को पूरे मनोयोगपूर्वक समझने का प्रयत्न न करना (3) प्रसंगों में अरुचि और उपेक्षा का भाव रहना, महत्व स्वीकार न करना। यही है वह मनोभूमि जिसमें देखी, सुनी, बातों को उथले और आधे-अधूरे रूप में ग्रहण किया जाता है। रुचि की गहराई न होने से वे बातें चिन्तन के लिए काम करने वाले कणों में गहराई तक प्रवेश नहीं करती और जल्दी ही विस्मरण के गर्त में गिरकर खो जाती हैं।

यदि प्रसंगों को भविष्य में स्मरण रखने की आवश्यकता, उपयोगिता समझी जा सके तो निश्चय ही उन्हें अधिक ध्यानपूर्वक पढ़ा या सुना जायेगा। आवश्यकतानुसार उन्हें मन ही मन कई बार दुहराया भी जायगा। किस सन्दर्भ में इस स्मृति की आवश्यकता पड़ सकती है, इसका भी तारतम्य मिला लिया जायगा। ऐसी दशा में जब भी वैसे अवसर आवेंगे, वे स्मृतियाँ सहज ही ताजा हो जायेंगी और विस्मरण की कठिनाई से हैरान होकर सिर न खुजाना पड़ेगा।

मनःशास्त्री वार्टलेट का कथन है कि जिन तथ्यों को भविष्य में याद रखने की आवश्यकता समझी जाय उनमें गहरी रुचि उत्पन्न करनी चाहिए और यह विचार करना चाहिए कि स्मरण से क्या लाभ और विस्मरण से क्या हानि होने की सम्भावना है। वे प्रसंग कब याद करने की आवश्यकता पड़ेगी और उन संस्मरणों का किस प्रकार क्या उपयोग होगा। इतना सोच विचार कर लेने के उपरान्त यदि किन्हीं तथ्यों की परत मस्तिष्क पर जमाई जायगी तो देर तक स्थिर बनी रहेगी और उन प्रसंगों को भूल जाने की कठिनाई उत्पन्न प्रायः नहीं ही होगी।

विद्वान गेट्स वर्ग ने पुनरावृत्ति पर बहुत जोर दिया है। वे प्राचीन काल की तोता रटन्त पद्धति का मजाक नहीं उड़ाते वरन् स्मरण को चिरस्थायी बनाने के लिए उपयोगी मानते हैं। शब्दों के रूप में रटना एक बात है और प्रसंग की क्रम शृंखला बनाकर उसे मानस पटल पर जमा लेना दूसरी। घटना अथवा प्रसंग को कल्पना चित्र की तरह देखा जाय और उसमें पूरी दिलचस्पी रखी जाय तो वह बात चिरकाल तक स्मरण बनी रहेगी। कविताएँ कितने ही लोग आसानी से याद कर लेते हैं, इसी प्रकार यदि प्रयत्न किया जाय तो किन्हीं आवश्यक सन्दर्भों को गद्य रूप में भी याद रखा जा सकता है।

प्रो. इवेगाडस का कथन है, ‘‘प्रसंगों को न केवल कल्पना चित्र के रूप में वरन् उनके तात्पर्य और फलितार्थ को भी ध्यान में रखते हुए यदि मानस पटल पर जमाया जाय तो जल्दी याद भी हो जायेंगे और देर तक टिकाऊ भी बने रहेंगे। आवश्यकतानुसार उनको स्मरण करने में किसी प्रकार की कठिनाई न होगी।’’

देखा जाय कि कौन घटनाएँ स्मरण रखने योग्य हैं? किन बातों की उपयोगिता है? किन तथ्यों को चिरकाल तक स्मृति पटल पर जमाये रहना आवश्यक है। जो उपयोगी हो उसे गम्भीरतापूर्वक समझने का प्रयत्न किया जाय, उन पर चित्त को एकाग्र किया जाय। कई-कई बार उन्हें वाणी एवं स्मृति से दुहराया जाय। आवश्यक हो तो नोट करके रखा जाय। ऐसा करते रहने से ही न केवल उपयोगी तथ्य स्मरण बने रहेंगे वरन् स्मरण शक्ति भी अनायास ही बढ़ती चली जायगी।

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समय और साधनों की अस्त-व्यस्तता पर भी ध्यान दें।

जीवन देखने में छोटा लगता है, पर वस्तुतः वह बहुत लम्बा होता है। कुछ ही वर्ष जीकर मर जाने की शिकायत सभी को रहती है पर यह समय भी इतना अधिक है कि उतने में भी बहुत कुछ कर गुजरना सम्भव हो सकता है। दैनिक कामकाज में भी कितना कुछ कर लिया जाता है इसका लेखा-जोखा कोई बिरला ही लेता है। कितना खर्च एक आदमी की जिन्दगी पर आता है और उसकी पूर्ति में सामान्य क्रिया-कलापों से ही कितना कुछ कर गुजरना पड़ता है उसको तनिक बारीकी से खोजा जाय तो आश्चर्य होता है कि इतनी सामर्थ्य और व्यवस्था होते हुए भी जीवन सम्पदा का अधिक श्रेष्ठ, सदुपयोग क्यों सम्भव नहीं हो पाता?

छोटी लगने वाली जिन्दगी में भी एक व्यक्ति का खर्च उतने समय में इतना अधिक होता है, जिसे एक बारगी सोचा और हिसाब जोड़ा जाय तो लगता है कि इतनी व्यवस्था कैसे बन पावेगी, पर रोज की आमदनी और रोज के खर्च का सामान्य ढर्रा ही उसे भली प्रकार पूरा कर देता है।

अब शाक भाजी की बारी आती है। आलू का प्रचलन सबसे अधिक होने से अनुमानतः वह 160 मन होगा। हरी सब्जियाँ इससे ड्यौढ़ी अर्थात् 250 मन के लगभग होंगी। औसत आदमी इतनी अवधि में 110 मन चीनी, 27 मन घी खा चुकेगा। चावल, दाल का विस्तार और परिमाण रोटियों के वजन और विस्तार के समतुल्य ही समझा जा सकता है।

पानी-स्नान, कपड़ा धोने, बर्तन माँजने, घर की सफाई आदि में कितना खर्च होगा? इसका हिसाब लगाना तो कठिन है, पर मात्र पीने के लिए प्रयुक्त होने वाले जल का हिसाब लगाया जाय तो उसका विस्तार 25 फुट ऊँची, 25 फुट चौड़ी और 25 फुट लम्बी टंकी जितना होगा। इतने पानी से एक छोटा तालाब ही बन जाता है।

स्नान में खर्च होने वाले पानी की तरह ही यदि नहाने और कपड़ा धोने के साबुन का खर्च जोड़ा जाय तो उसकी राशि इतनी हो जाती है जितने में एक छोटी गृहस्थी का रिहाइशी निजी मकान बन सकता है।

तन ढकने के कपड़े को लिया जाय और बिस्तर, बिछावन में जितना धागा काम में आता है उसे जोड़ा जाय तो उसकी लम्बाई प्रायः इतनी जा पहुँचेगी जितनी कि पृथ्वी से चन्द्रमा तक की है। इस धागे को कातने बुनने, सीने में मशीनों द्वारा अधिकांश काम निपट जाता है और जल्दी हो जाता है यह बात दूसरी है, पर यदि प्राचीन काल की तरह कपड़े सम्बन्धी आवश्यकताएँ आधुनिक ढंग से निपटानी पड़े तो उनके कातने बुनने में एक आदमी की आवश्यकता पूरी करने में एक मनुष्य के लगभग एक हजार दिन लग जायेंगे।

सोना है तो आवश्यक, पर उस बिना उपार्जन की मृतक जैसी स्थिति में पड़े-पड़े जीवन का कितना बड़ा भाग समाप्त हो जाता है, इसका हिसाब लगाया जाय तो दिन और रात को मिला कर सोने तथा उनींदे पड़े रहने में प्रायः आठ घण्टे रोज ही बीत जाते हैं। यह आयुष्य का एक तिहाई भाग है। इस हिसाब से 70 वर्ष जीने वाला मनुष्य प्रायः 25 वर्ष होता है। सभी जानते हैं कि बचपन में नींद से ही समय अधिक बीतता है।

कितने समय तक क्या किया गया? यदि इसका लेखा-जोखा तैयार किया जाय तो प्रतीत होगा कि प्रायः एक तिहाई जिन्दगी सोने में गुजर जाती है और हर दिन तीन घण्टे सुस्ताने मस्ताने में लग जाते हैं। इतने समय तक कोई उपयोगी काम नहीं हो पाता, लगातार यह सुस्ताने का समय एक बार एक साथ नहीं होता इसलिए उसका पता नहीं चलता, पर यदि कोई घड़ी लेकर जाँच पड़ताल करने बैठे तो पता चलेगा कि औसत आदमी का कितना समय सोने सुस्ताने में चला जाता है। यह जवान आदमी की बात है। बच्चे, बूढ़े, बीमार, अमीर ओर निठल्ले आदमियों द्वारा की जाने वाली समय की बर्बादी इसके अतिरिक्त है।

समझा जाता है कि स्त्रियाँ घर पर निठल्ली बैठी रहती हैं। उन्हें कहीं बाहर नहीं जाना पड़ता और चौके चूल्हे की अतिरिक्त और कुछ करना धरना नहीं होता किन्तु हिसाब लगाकर देखा गया तो पता चला कि घर के छोटे-मोटे कामों में ही वे इधर-उधर चलते-फिरते कितनी लम्बी मंजिल पूरी करती हैं।

पुरुषों को स्त्रियों की अपेक्षा अधिक चलना-फिरना पड़ता है। कई तो हलकारे जैसी नौकरियों अथवा प्रचारकों, फेरी वाले जैसे धन्धों में बहुत समय चलने में ही बिताते हैं। स्त्रियों को अपेक्षाकृत कम चलना पड़ता है। वे घर की चहारदीवारी में ही अपना अधिकांश समय गुजारती हैं। बाहर तो उन्हें कभी-कभी ही जाना पड़ता है। इतने में भी घर के भीतर अपना दैनिक काम-काज निपटाने में एक वर्ष में प्रायः दो हजार मील चल लेती हैं। 70 वर्ष में से 4-5 वर्ष ही कम चलने के होते हैं शेष आयु में तो बचपन से लेकर 70 वर्ष तक की आयु तक चलने का काम लड़कियों को भी करना ही पड़ता है।

सारी जिन्दगी में एक नारी की सामान्य यात्रा प्रायः डेढ़ लाख मील मानी गई है। पृथ्वी की परिधि 25 हजार वर्ग मील है। 70 वर्ष की जिन्दगी में एक नारी धरती की छह बार परिक्रमा कर लेती है। पुरुष की तो बात ही क्या है। वह तो नारी की अपेक्षा कई गुनी यात्रा करता है। फलतः उसकी सारी यात्रा जोड़ी जाय तो वह अपेक्षाकृत कहीं अधिक परिक्रमाएँ इस धरती की कर लेता है।

काम तो हर आदमी को करना ही पड़ता है, पर वह होता अस्त-व्यस्त ढंग से बेसिलसिले ही है। यदि उसे क्रमबद्ध ढंग से एक प्रयोजन के लिए किया जाता रहा तो सामान्य स्तर का व्यक्ति अपने काम में प्रवीण पारंगत हो सकता है। विशेषज्ञों जैसी योग्यता उसमें उत्पन्न हो सकती है। व्यायाम, अध्ययन, गृह उद्योग जैसे कार्यों में बचत के थोड़े से घन्टे भी नियमित रूप से लग सकें तो स्वस्थता, बुद्धिमत्ता, सम्पन्नता की दृष्टि से उससे मनुष्य कहीं अधिक लाभ में रह सकता है जैसा कि आमतौर से रहता है।

गप्पबाजी, फैशन, मटरगश्ती जैसे कामों में जो समय बर्बाद होता है और तरह-तरह के व्यसनों में पैसा खर्च होता है उसे बचाया जा सके तो और उस बचत को उपयोगी कार्यों में लगाने का क्रम बिठाया जा सके तो इतने भर से मनुष्य की प्रगति और समृद्धि में उतनी अभिवृद्धि हो सकती है, जिसे दूसरों की दृष्टि में किसी देवता की चमत्कारी अनुकम्पा ही समझा जा सकता है।

चोरी, बेईमानी जैसे पाप अपराधों की हानि समझी जाती है और निन्दा की जाती है, पर अस्त-व्यस्तता में होने वाली बर्बादी को समझा जा सके और साधनों को सदुद्देश्य में लगा पाने की अनियमितता का मूल्यांकन किया जा सके तो प्रतीत होगा कि छोटी-सी जिन्दगी प्रचुर सम्भावनाओं से भरी होने पर भी क्रमबद्धता का अभाव ही जिन्दगी के व्यर्थ चले जाने का प्रधान कारण होता है।

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दान की महिमा और भिक्षा की गरिमा

प्राचीन काल में जितना महत्व उद्योग धन्धों के विकास और बाहरी संसाधनों की प्रगति को दिया जाता था उतना ही महत्व समाज के चिन्तन को ऊर्ध्वगामी बनाये रखने तथा जनमानस में आदर्शवादी आस्थायें विकसित करने की प्रक्रिया को भी प्राप्त था। समाज का एक मूर्धन्य वर्ग जनमानस को उत्कृष्ट और परिष्कृत बनाये रखने के लिए अहर्निश प्रयत्नशील रहता था और अपना सारा समय इसी कार्य में लगाता था। उद्योग धन्धों और उत्पादक कार्यों में लगे व्यक्तियों की जीविका तो उनसे प्राप्त होने वाले पारिश्रमिक से होता था। चूँकि वे उत्पादक श्रम में लगते थे इसलिए उत्पादन में उनका एक भाग आसानी से उन्हें मजदूरी या वेतन के रूप में मिल जाता था। परन्तु जो वर्ग जनमानस के निर्माण में, समाज में उत्कृष्ट आदर्शवादी आस्थाओं के विकास में रचनात्मक श्रम करते थे, उससे तो कोई स्थूल सम्पत्ति का उत्पादन नहीं होता था। जबकि जीविका का आधार उन्हें भी चाहिए। निर्वाह की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए उन्हें भी आर्थिक संसाधन चाहिए।

कहा जा चुका है कि यह कार्य भी बहुत अधिक महत्व प्राप्त था और समाज का नेतृत्व करने वाले वर्ग को श्रद्धा सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। इस तरह के समाज का नैतिक और बौद्धिक स्तर ऊँचा उठाने के कार्य में लगे हुए प्रतिभाशाली व्यक्तियों को ऋषि-महर्षि, सन्त, महात्मा कहा जाता था। उपार्जन के कोई प्रत्यक्ष साधन तो उनके पास थे नहीं इसलिए उनके निर्वाह की व्यवस्था समाज करता था। समाज का दूसरा वर्ग जो उत्पादक श्रम करता था अपने उपार्जन का एक अंश इस वर्ग के लिए सश्रद्धा, ससम्मान सुरक्षित रखता और उन्हें देता था। इस अंश सहयोग को निकालने और समाज का नैतिक व बौद्धिक नेतृत्व करने वाले वर्ग को वह अंश समर्पित करने की व्यवस्था का नाम दान था।

शासन व्यवस्था में भी जो सत्ता का संचालन करते हैं, वे लोगों से उनके उपार्जन का एक अंश टैक्स के रूप में वसूल करते हैं। लोग वह देते भी हैं परन्तु सामन्तशाही में वह वसूली छीनने की शैली में ढल गयी। कर व्यवस्था जन कल्याण के दूसरे कार्यों का आर्थिक आधार तैयार करने के लिए विनिर्मित की गयी इसमें कोई संदेह नहीं है। परन्तु सामन्ती काल में लोगों से वसूल किये गये कर का उपयोग व्यक्तिगत उपयोग के लिए किया जाने लगा। कर वसूली का ऐसा ढंग भी प्रचलित हुआ जिसे खुली लूट समझा जाने लगा। पहले लोग खुशी-खुशी देते थे, पर उसका सदुपयोग न होते देख कर आनाकानी करने लगे तो जोर जबर्दस्ती का प्रयोग किया जाने लगा। इससे लोग किसी प्रकार बच निकलने के स्रोत ढूँढ़ने लगे।

सामूहिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कर निर्धारण तथा कर वसूली अलग बात हुई। उसका कितना सदुपयोग हुआ और कितना दुरुपयोग यह अलग बात है। परन्तु अधिकारपूर्वक वसूल किये जाने के कारण अधिकारियों में अहंभाव को प्रश्रय मिला तथा सदुपयोग न होते देख कर जनसामान्य में आस्था घटी। ऋषि-महर्षियों ने स्वयं को इस विकृति की सम्भावना से बचाने के लिए घर-घर जाकर भिक्षा माँगने तथा लोगों से दान लेने की पद्धति का अनुसरण किया। इससे अहंकार बढ़ने का खतरा भी कम हुआ और दानदाता में भी यह भाव उत्पन्न हुआ कि समाज का नेतृत्व करने वाला यह वर्ग हमारे साथ सीधे जुड़ा हुआ है।

“दान देने और भिक्षा लेने” की यह व्यवस्था विशुद्ध रूप से लोक कल्याण के लिए बनी, पली और आगे बढ़ी। लेकिन जिस प्रकार अन्य परम्परायें विकृत हुईं हैं उसी प्रकार यह परम्परा भी वीभत्स रूप से विकृत हो गयी है। आज-कल किसी को कुछ दान देना कुँए में पैसे फेंकना जैसा बना हुआ है। क्योंकि कहीं भी उसका सदुपयोग होता नहीं दीखता। ऐसे त्यागी, वीतरागी और सम्पूर्ण रूप से समाज सेवा के लिए समर्पित व्यक्तित्वों का दर्शन भी दुर्लभ है जिन्हें दान देना आवश्यक लगे। अथवा जिस उद्देश्य से वह व्यवस्था निर्मित की गई वह उद्देश्य सार्थक या पूरा होता दिखाई दे और जो व्यक्ति लोगों की उदारता, दानशीलता से लाभ उठाने के लिए आगे आते हैं उनमें भी शायद ही ऐसा कोई हो जो किसी उपयोगी उद्देश्य के लिए भिक्षा माँग रहा हो।

किसी समय में ‘भिक्षु’, जिसका अर्थ भिखारी होता है, शब्द सुनते ही लोगों के मस्तक श्रद्धा से झुक जाते थे और उन्हें अपने घर के आमन्त्रित कर लोग उनकी चरण धूलि को मस्तक से लगा लेते थे। परन्तु आज भिक्षु या भिखारी शब्द सुनते ही लोगों के मन में घृणा, तिरस्कार तथा नफरत के भाव आने लगते हैं। इसका कारण है दान देने और भिक्षा माँगने की व्यवस्था का गरिमाहीन हो जाना। आजकल भिक्षा एक व्यवसाय ही बन गया है जिसमें लगने वाला वर्ग किसी सामाजिक उद्देश्य से नहीं अपना निर्वाह करने के लिए भीख माँगता है और व्यावसायिक नुस्खों की तरह लोगों की करुणा उभार कर दान प्राप्त करने के लिए तरह-तरह के नुस्खे काम में लाता है, भिक्षा पद्धति का प्रचलन प्राचीनकाल में हुआ यह ठीक है, परन्तु आजकल भिक्षा का जो स्वरूप प्रचलित है उसे भिक्षा का नाम देना भी प्राचीन संस्कृति और समाज व्यवस्था की अवमानना करना होगा।

जगह-जगह बैठ कर तरह-तरह से लोगों की करुणा उभारने तथा पुण्य प्राप्त होने का प्रलोभन दे कर भीख माँगने वाले व्यक्तियों की जीविका केवल उससे प्राप्त होने वाली सहायता अथवा लोगों द्वारा दी जाने वाली भीख से ही चलती है। कहा जा सकता है कि भिक्षा वह व्यवसाय है जिसमें कमाई तो होती है परन्तु कमाने के लिए कुछ नहीं करना पड़ता। देश के कोने-कोने में रह कर तरह-तरह से भीख माँगने वाले भिखारियों की संख्या 1 करोड़ से भी अधिक कूती गयी है।

इस व्यवसाय में धर्मजीवी वर्ग भी आ जाता है। भारत में 6 लाख के करीब गाँव हैं। प्रत्येक गाँव में औसतन 1 मन्दिर तो मानना ही चाहिए। यद्यपि कस्बों और शहरों में एक-एक स्थान पर सैकड़ों मन्दिर हैं। फिर भी न्यूनतम को ही औसत माना जाय तो प्रत्येक स्थान पर एक मन्दिर तो मानना ही चाहिए। एक मन्दिर में एक पुजारी तो होगा ही। यद्यपि बड़े मन्दिरों में दासियों कर्मचारी, पुजारी, मैनेजर, क्लर्क, चौकीदार और सफाई कर्मचारी होते हैं। इनके सही-सही आँकड़े उपलब्ध नहीं है। फिर भी प्रत्येक मन्दिर में औसतन दो कर्मचारी मान लेने में कोई हर्ज नहीं है। प्रति मन्दिर पीछे दो व्यक्ति अपने परिवार का निर्वाह मन्दिर में चढ़ायी गयी भेंट, पूजा, दान-दक्षिणा से ही करते हैं। एक परिवार में पाँच व्यक्ति भी माने जायें तो 12 लाख परिवारों में 60 लाख व्यक्तियों की जीविका केवल धर्मश्रद्धा से प्रेरित दान द्वारा चलती है।

भिक्षाजीवियों में साधु, बाबाओं, महन्त, मठाधीशों को भी लें तो यह संख्या कम से कम दुगनी तो हो ही जायेगी। एक करोड़ से अधिक की संख्या तो इसी प्रकार हो जाती है। सड़कों, चौराहों पर, बस स्टेण्डों, मन्दिरों के बाहर पंक्तियाँ लगाकर बैठने वाले भिखारियों की संख्या तो इसमें सम्मिलित ही नहीं की गयी है। हिन्दुओं में तो ‘नाथ’ और ‘जोगी’ दो जातियाँ तो भिक्षा द्वारा ही अपनी जीविका चलाती हैं और भीख से इतना कमा लेते हैं कि उसके सहारे न केवल अपना रोजमर्रा का खर्च चलाते हैं बल्कि सामान्य व्यक्तियों से भी अधिक अच्छे ढंग का जीवन व्यतीत करते हैं।

भिक्षा द्वारा अपनी जीविका चलाने वाली इन जातियों में केवल महिलायें ही भीख नहीं मांगतीं, शेष परिवार का प्रत्येक सदस्य भीख माँग कर परिवार की अर्थव्यवस्था जुटाता है। कहा जाता है कि गरीबी और धनाभाव के कारण लोग इस क्षेत्र में आते हैं। वस्तुतः ऐसी बात नहीं हैं। यह मान लिया जाय तो प्रश्न उठता है कि जिस देश में सत्तर प्रतिशत से भी अधिक व्यक्ति गरीबी के मानदण्ड से निचले स्तर पर जीवनयापन करते हैं वहाँ सभी व्यक्ति यह पेशा क्यों नहीं अपना लेते? शारीरिक असमर्थता, चत्रुपन या अन्धत्व भी भिक्षा व्यवस्था अपनाने का कारण नहीं है क्योंकि अधिकांश भिखारी शारीरिक दृष्टि से काफी हृष्ट-पुष्ट स्वस्थ और सबल शरीर के स्वामी होते हैं। किस तरह के व्यक्ति भिक्षा माँगते हैं? इसके एक सर्वेक्षण में पता चला कि केवल 12 प्रतिशत व्यक्ति ऐसे थे, जो शारीरिक दृष्टि से असमर्थ या अपंग होने के कारण भिक्षा द्वारा अपना गुजारा चला रहे हैं। बाकी सभी शारीरिक दृष्टि से समर्थ और स्वस्थ पाये गये।

ऊपर जो आँकड़े दिये गये हैं। उनमें धार्मिक संस्थानों, मन्दिरों, देवालयों पर निर्भर रहने वाले व्यक्तियों की गणना नहीं की गयी है। लेकिन दान और भिक्षा की परम्परा विकृत रूप में वहाँ भी कायम तो है ही। इतनी बड़ी संख्या और इतने विशाल समुदाय की कल्पना करते ही आँखें विस्मय से फटी रह जाती हैं कि ये लोग अपना आत्म सम्मान गंवा कर किस प्रकार दूसरों की दया पाने के लिए याचना के हाथ फैलाते हैं। तमाम कारणों का विश्लेषण करने के बाद इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि जो लोग भिक्षा व्यवसाय को जीविका के रूप में अपनाये हुए हैं उनके लिए अकर्मण्यता के अतिरिक्त और कोई कारण नहीं है जिससे विवश होकर उन्हें इस क्षेत्र में आना पड़ा हो। अभी कुछ महीनों पूर्व बम्बई पुलिस ने करीब 14 सौ से भी अधिक भिखारियों को भिखारी उन्मूलन कानून के अन्तर्गत गिरफ्तार किया था। उन्हें गिरफ्तार कर एक बाँध पर मजदूरी करने के लिए भेजा गया।

जब तक पुलिस अधिकारियों की देख-रेख बनी रही तब तक तो वे काम करते रहे परन्तु जैसे ही देख-रेख ढीली हुई चौदह सौ में से 12 सौ के करीब भिखारी भाग गये और बाकी जो बचे वे भी रो पीट कर काम करते। अन्ततः उन्हें भी छोड़ दिया गया। कई स्थानों पर ऐसी घटनायें घटती देखी गयी हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि भिक्षा व्यवसाय में लगे व्यक्ति केवल अकर्मण्यता के कारण ही इस पेशे को अपनाये हुए हैं।

दुनिया के किसी भी देश में भिक्षा व्यवसाय का इस प्रकार प्रचलन नहीं है जिस प्रकार का अपने देश में। दूसरे देशों से आने वाले पर्यटक जब यहाँ किसी को भीख माँगते देखते हैं। तो प्रायः उनके चित्र खींच लेते हैं और अपने यहाँ के समाचार पत्रों में प्रकाशित कराते हैं। यूरोपीय देशों में तो भारत के सम्बन्ध में प्रायः कहा ही जाता है कि यह साँपों, साधुओं और भिखारियों का देश है। अर्थात् यह स्थिति विदेशों में भारतीय जनता की घृणित और गिरी हुई तस्वीर प्रस्तुत करती है।

दान देने और भिक्षा लेने की परम्परा यदि अपने मूल स्वरूप में प्रचलित रही होती तो भी वह एक आदर्श स्थिति होती। क्योंकि दान देने से उदारता और सामाजिकता का भाव विकसित होता है। लोग यह समझ लें कि जो कुछ हम कमा रहे हैं उस पर केवल हमारा ही अधिकार नहीं है वरन् उसके एक अंश पर समाज का भी हक है और जिसका अधिकार उसी को दिया जा रहा है तो उसमें अहंकार करने जैसी कोई बात नहीं है। इस परम्परा के परिष्कृत स्वरूप को प्रचलित रहने तक उन व्यक्तियों को भी निर्वाह और भविष्य की सुरक्षा के आश्वासन का आधार पुष्ट होता है। जो वर्ग समाज का नेतृत्व मार्गदर्शन करने में लगा होता, उसे प्रत्यक्षतः यह अनुभव भी होता कि हम समाज की उदारता का लाभ उठा रहे हैं, समाज पर निर्भर है तो उसका मूल्य चुकाने के लिए किसी भी तरह पीछे नहीं रहना चाहिए।

खेद है कि दान देने वाले न इस तथ्य को समझते हैं कि किसे दान दिया जाना चाहिए और क्यों दिया जाना चाहिए। दूसरों पर अपने बड़प्पन का रौब डालने, उदारता का विज्ञापन करने तथा जिसे दान दिया जा रहा है स्वयं को उससे बड़ा अनुभव करने के लिए लोग दूसरों को दिखा कर अपनी जेब से दो-चार सिक्के निकाल कर भिक्षुक के भिक्षापात्र में डाल देते हैं और जो वर्ग समान की उदारता के सहारे जी रहा है। वह इस परम्परा को व्यवसाय की तौर पर इस्तेमाल कर रहा है। भिखारियों की बात छोड़ दें तो कई व्यक्ति ऐसे भी हैं जो प्रतिभाशाली हैं और चाहे तो अपनी प्रतिभा का उपयोग समाज हित में कर सकते हैं। परन्तु मुफ्त में मिलने वाली रोटी कुछ ऐसा चस्का लगा देता है कि उसे छोड़ कर और कुछ करने का जी ही नहीं होता।

आवश्यकता इस बात की है कि इस विकृत परम्परा को जल्दी से जल्दी नष्ट किया जाय। पहले जिस उद्देश्य से यह व्यवस्था बनी उन उद्देश्यों को पूरा करना अभीष्ट भी हो तो उसका विकल्प खोजा जाय किन्तु भिक्षा व्यवसाय को वर्तमान रूप में तो जीवित रहना ही नहीं चाहिए।

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कर्मफल का प्रारब्ध में भुगतान

कर्म का प्रतिफल भौतिक जगत में उपलब्ध होते पग-पग पर दृष्टिगोचर होता है, सत्कर्म और दुष्कर्म का भला-बुरा परिणाम भी मनुष्य को मिलकर ही रहता है। उस सुनिश्चित व्यवस्था से शास्त्रकारों ने सर्वसाधारण को इस प्रकार अवगत कराया है-

कर्मणःफलनिर्वित्ति स्वयमश्नाति कारकः। प्रत्यक्षं दृश्यते लोके कृतस्यापकृतस्य च॥

शुभेन कर्मणा सौख्यं दुःखं पापेन कर्मणा। कृतं फलति सर्वत्र ना कृत भुज्यते क्वाचिद्॥

अर्था वा मित्र वर्गो वा ऐश्वर्यवा कुलान्वितम्। श्रीश्चापिदुर्लभाभोक्तु तथैवाकृतकर्मभिः॥

स्यं चेतु कर्मफलं न स्यात् सर्वमेवाफलं भवेत्। लोको दैवमालक्ष्य उदासीनो भवेन्ननु॥

अकृत्वा मानुषं कर्म यो दैवमनुवर्तते। वृथा भ्राम्यति सम्प्राप्यपर्तिं क्लीवमिवांगना॥

कृतः पुरुष कारस्तु दैवमेवानुवर्तते। न दैवमकृते किञ्चिद् दातुमर्हति॥

पांडवानां कृतं राज्यं धार्तराष्ट्रमहाबलैः। पुनः प्रत्याहृतं चैव न दैवाद् भुजसंश्रयात्॥

यथा तैलसंक्षयाद् दीपः प्रह्वासमुपगच्छति। तथा कर्मक्षमाद् दैवं प्रह्वासमुपवच्छति॥ -महाभारत अनु. अ. 6

कर्म की फल सिद्धि को स्वयं कर्त्ता भोगता है, अच्छे और बुरे कर्म का संसार में प्रत्यक्ष परिणाम देखा जाता है। शुभ कर्म से सुख एवं पाप कर्म से दुख होता है। किए हुए कर्म का फल मिलता है। कर्म के बिना फल कहीं भी भोगा नहीं जाता। धन या मित्र या ऐश्वर्य या कुलीनता और लक्ष्मी का भी भोगना कर्महीन जनों के लिए दुर्लभ है। यदि कर्म का फल न होता तो कर्म निष्फल हो जावें और सभी लोग भाग्य का आश्रय लेकर निश्चय कर्म करने से उदासीन हो जावें। जो जन मनुष्योचित कर्म न करके दैव के भरोसे रहता है, वह नपुंसक पुरुष-स्त्री की भाँति व्यर्थ जीवनयापन करता है। पुरुषार्थ किया हुआ ही दैव के रूप में आता है, दैव पुरुषार्थ किये बिना किसी को कुछ नहीं दे सकता है। पाण्डवों का राज्य धृतराष्ट्र के पुत्रों द्वारा छीना हुआ पुनः बाहुबल से प्राप्त किया दैव से नहीं। जैसे-तैल के क्षय से दीपक क्षीणता को प्राप्त हो जाता है। इसी प्रकार कर्म के क्षय से दैव भी क्षीण हो जाता है।

अवश्यमेव लभते, फलं पापस्य कर्मणः। भर्तः पर्यागते काले कर्ता नास्त्यत्र संशयः॥ बाल्मी.यद्ध.स. 111॥।

पाप कर्म का फल अवश्य ही प्राप्त होता है। हे पते! समय आने पर कर्त्ता फल पाता है, इसमें संशय नहीं है।

हे उत्तम पुरुष! जो कोई भी शुभ या अशुभ कर्म करता है वह पुरुष अवश्य ही उसके फल को प्राप्त होता है। इसमें संशय नहीं है।

सुशीघ्रमपि धावन्तं विधानमनुधावति। शेते सह शयानेन येन-येन यथा कृतम्॥

उपतिष्ठिति निष्ठन्तं गच्छन्तमनुगच्छति। करोति कुर्वतः कर्म छायेवानुविधीयते। येन-येन यथा यद्यत् पुरा कर्म समाहितम्।तत्तदेव नरो भुड्ते नित्यं विहितमात्मना॥ महा. शान्ति. अ. 181

जिसने जो कर्म किया है वह कर्म शीघ्र दौड़ते हुए के साथ दौड़ता है, सोये हुए के साथ सोता है।

बैठे हुए के साथ बैठता है और चलते हुए के साथ चलता है, करते हुए के साथ करता है। सारांश यह कि किया हुआ कर्म छाया के समान मनुष्य के साथ रहता है।

जिस-जिस ने जैसे जो-जो पहले कर्म किया है। वह-वह ही मनुष्य अपने किये कर्मों को नित्य भोगता है।

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अनुत्तरित प्रश्न सटीक समाधान

ऊँची अट्टालिकाओं वाले एक भव्य मकान के नीचे कोई ब्राह्मण उदास और गम्भीर मुद्रा में बैठा था। वेश-भूषा से वह कोई राजपुरुष लग रहा था, परन्तु उस मकान के नीचे दीनता और उदासी का आवरण ओढ़े उसकी मुख-मुद्रा बता रही थी कि वह किसी मानसिक उलझन से बुरी तरह त्रस्त है।

ऊपर वाली अट्टालिका से नीचे की ओर झांक रही उस भवन की स्वामिनी ने उक्त ब्राह्मण को देखा तो उसका वेश और उसकी स्थिति दोनों ने उसे असमंजस में डाल दिया। वेशभूषा से राजपुरुष-सा और बैठा हुआ इस तरह जैसे कोई भिक्षुक, दीन−हीन या दरिद्र व्यक्ति। उस भवन की स्वामिनी का नाम था कमलिनी। आयु कोई 34-35 वर्ष की रही होगी, परन्तु उसकी देहयष्टि इतनी गठीली, शरीर इतना कोमल और रूप इतना सुन्दर था कि वह कोई वयस्क नहीं नवयौवना ही प्रतीत हो रही थी। उसका व्यवसाय भी ऐसा था जो समस्त समाज में निन्द्य, गर्हित और पतित समझा जाता था। वह किसी कुलीन परिवार की कुलवधू नहीं समाज की मलीनता से पैदा हुई और उसी पंक में रही, पली नगर वधू थी। फिर भी कमलिनी ने सहज मानवीय भाव से प्रेरित होकर उस अज्ञात राजपुरुष से लगने वाले ब्राह्मण के पास अपनी एक दासी को भेजा।

दासी के साथ ही कुछ देर में वह ब्राह्मण आ गया। कमलिनी ने उसे यथोचित सम्मान के साथ आसन प्रस्तुत किया और सेवकों को उसी अनुरूप स्वागत प्रबन्ध का निर्देश देकर ब्राह्मण के सामने जा बैठी और बोली-‘मैं श्रीमान् का परिचय जानने का सौभाग्य प्राप्त कर सकती हूँ।’

‘मुझे याजक चन्द्रशेखर कहते हैं।’

उतना परिचय ही पर्याप्त था कमलिनी के लिए क्योंकि उन दिनों प.चन्द्रशेखर की ख्याति न केवल पूना में वरन् सारे महाराष्ट्र में थी। राज्य में उन्हें अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त थी। इसलिए कमलिनी ने इतने मात्र परिचय को ही पर्याप्त समझा और फिर पूछा-‘तो महाराज! आप कुछ उदास और चिन्तित दिखाई देते हैं। क्षमा करें? क्या मैँ इसका कारण जान सकती हूँ।

याजक चन्द्रशेखर ने कहा-‘गत दिनों एक शास्त्रार्थ में मुझे नीचा देखना पड़ा। वैसी पराजय मेरी कभी नहीं हुई और सोचता हूँ जब तक उन प्रश्नों का उत्तर न खोज लूँ, जिनके कारण कि मुझे पराजित होना पड़ा तब तक अपने घर में प्रवेश नहीं करूंगा।

‘क्या मैं आपकी उस समस्या का निवारण करने में मैं कोई सहयोग दे सकती हूँ?’

‘प्रश्न ही कुछ ऐसा जटिल है कि मैं आपसे क्या कहूँ। बताइये पाप की जड़ कहाँ है।’

‘हाँ प्रश्न तो जटिल है ही। मनुष्य जानते-समझते भी पाप पंक में क्यों पड़ता है। जबकि सभी कोई जानते हैं मर्यादाओं को तोड़ने का दण्ड प्रत्येक व्यक्ति को भोगना पड़ता है।

याजक चन्द्रशेखर इस पर मौन रह गये। फिर उन्होंने कहा-”आप इस समय घर से बाहर ही रहते हैं तो भोजन आदि की व्यवस्था कैसे करते हैं।”

‘मैं स्वपाकी, ब्राह्मण हूँ। इसलिए अपने हाथ से ही भोजन बनाता और खाता हूँ।’

‘धृष्टता क्षमा करें महाराज तो एक निवेदन करूँ।’

चन्द्रशेखर जी ने कमलिनी की ओर प्रश्न मुद्रा से अपने पापों को प्रक्षालित करने का सुअवसर दें तो बड़ी कृपा होगी।’

परन्तु कमलिनी इससे मेरा व्रत टूटेगा।

‘आप क्या इतनी भी उदारता नहीं कर सकते कि मुझ अधर्म का उद्धार करने के लिए कुछ देर तक व्रत बन्धनों का मोह छोड़ दें-कमलिनी बोली-’और फिर मैं आपको दस स्वर्ण मुद्राएँ भी दक्षिणा में देती रहूँगी।’

याजक चन्द्रशेखर के लिए वेश्या के उद्धार से भी अधिक आकर्षक थी इस स्वर्ण मुद्राओं की दक्षिणा। इससे पूर्व याजक ने कभी अपने व्रत को भंग नहीं किया था। वे घर में रहते थे तब भी अपने या अपनी पत्नी के हाथ से बना भोजन ही करते थे। नियम मर्यादाओं के इतने पाबन्द कि कदाचित ही उनसे स्खलित हुए हों। नीति-परायण और मर्यादाओं से बंधे जीवन के कारण उनके चरित्र पर कभी किसी ने उंगली नहीं उठायी थी। विद्वत समाज में भी वे आदर की दृष्टि से देखे जाते थे।

लेकिन एक विद्वत्सभा में किये गये इस प्रश्न ने पण्डित चन्द्रशेखर को इस भाँति आन्दोलित कर दिया कि उनके मन की शान्ति और मस्तिष्क का सन्तुलन सब कुछ विचलित हो उठा। उसी प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए निरुद्देश्य भटकने को ही उन्होंने अपनी शोध बना ली तथा संकल्प किया कि जब तक इस प्रश्न का उत्तर नहीं कर लेंगे तब तक गृह में प्रवेश नहीं करेंगे। स्वाभाविक था कि यत्र-तत्र घूमने और यायावर जीवन व्यतीत करने के कारण साधनों का भी अभाव होता। पण्डित याजक चन्द्रशेखर ने कमलिनी का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। दस स्वर्ण मुद्राएँ प्रतिदिन अर्थात् एक मास में ही तीन सौ स्वर्ण मुद्राएँ। राजसभा की विद्वत्परिषद के सदस्य होते हुए भी उन्हें इतना धन कभी नहीं मिला था और बढ़िया सुस्वादु भोजन।

प्राज्ञवर चन्द्र ने प्रतिदिन कमलिनी के आवास पर जाना प्रारम्भ कर दिया। नित्य प्रति प्रातःकाल और संध्या समय के भोजन के लिए पहुँचने लगे। कमलिनी स्वयं अपने हाथ से भोजन बनाती, प्राज्ञवर को सम्मान पूर्वक आसन पर बिठाती, स्वयं भोजन कराती और जब तक पण्डित जी भोजन करते तब तक उन्हें पंखा झलती रहती। भोजन करते-करते पण्डित जी की दृष्टि कई बार कमलिनी से भी मिलती और उसकी रूप माधुरी में उलझ कर खो जाती।’

एक दिन कमलिनी ने कहा-’पूज्यवर आप इन दिनों घर में तो जाते नहीं।’

‘हाँ’-पण्डित चन्द्रशेखर ने कहा।

तो फिर निवास कहाँ करते हैं?

कहीं भी।

कहीं भी अर्थात्-

‘खुले आकाश के नीचे विस्तृत धरती हो। जहाँ भी उपयुक्त स्थान देखता हूँ सो जाता हूँ।’

आपको यदि कोई आपत्ति न हो तो आप इसी भवन में विश्राम कर लिया कीजिए न।’

याजक चन्द्रशेखर को प्रतीत हुआ जैसे उनकी मन की बात ही कमलिनी ने कह दी है। वे इसके बाद वहीं रहने लगे। भवन में प्रतिदिन नृत्य गान और हास विनोद चलता था। रसिक प्रवृत्ति के व्यक्ति वहाँ प्रायः जुटे रहते और घुँघरुओं की झंकारों से भवन का कोना-कोना गूँजता रहता। कमलिनी जब किसी के सामने हँसती तो पण्डित चन्द्रशेखर के कानों में जैसे जलतरंग बजने लगती।

अब न उन्हें अपना प्रश्न स्मरण रह सका था और न उसके उत्तर की चिन्ता। दस स्वर्ण मुद्राएँ प्रतिदिन मिल जाती और सुस्वादु भोजन से रसना की तृप्ति तथा क्षुधा की निवृत्ति हो जाती। भवन के वातावरण ने पण्डित चन्द्रशेखर पर भी अपना रंग दिखाना आरम्भ किया। उनके मन में रह-रहकर यह आकांक्षा उठती कि वे कमलिनी से प्रणय निवेदन करते। रह-रहकर वे अपनी तुलना उस व्यक्तियों से करते जो कमलिनी के पास आते थे और उनसे अपने आपको किसी भी रूप में कम नहीं पाते। परन्तु न जाने कौन-सा संकोच था जो उनके होठों को सी देता।

अन्ततः! एक दिन उन्होंने सकुचाते-सकुचाते कमलिनी से अपने मन की बात कह दी। सुनकर खिलखिला पड़ी कमलिनी। कुछ समझ नहीं पाये याजक। तव कमलिनी गम्भीर हो गयी और बोली-‘मान्यवर! अब आपके प्रश्न का उत्तर प्राप्त हो गया है।’

लगा जैसे याजक आकाश से धरती पर गिर पड़े हों। फिर अपने आपको सम्हालते हुए बोले- मैं समझ नहीं पाया कमलिनी कि मुझे कौन-सा उत्तर प्राप्त हो गया है।

‘जिस प्रश्न की शोध में आपने गृह त्याग किया था वह यही था न कि पाप की जड़ क्या है?’

‘हाँ।’

‘उसी का उत्तर,- कमलिनी बोली- आपने स्वपाकी होने का व्रत स्वर्ण मुद्राओं के प्रलोभन से ही तोड़ा न था।’

लगा किसी ने गाल पर तमाचा जड़ दिया हो फिर भी याजक अपने को इतना दुर्बल अनुभव कर रह थे कि उनसे अस्वीकार करते नहीं बना। कमलिनी ने कहा-‘मान्यवर मेरी मान्यता है कि वह लोभ ही पाप की जड़ है। यदि आप स्वर्ण मुद्राओं के आकर्षण में फँसकर अपनी शोधचर्या से विमुख न होते तो इस अस्थि चर्म की देह को जो सैकड़ों व्यक्तियों द्वारा शहद की तरह चाटी और पीक की तरह थूकी गयी है, पाने के लिए आतुर होने की स्थिति में नहीं पहुँचते।’

याजक चन्द्रशेखर को समाधान मिल गया था और वह रूपजीवा अपने अतीत की उन स्मृतियों में तैरने, उतरने लगी जिनने उसे यह सूत्र थमाया था।

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विग्रहों का कुचक्र और उसका निराकरण

वैयक्तिक कारणों से आये दिन होते रहने वाले लड़ाई झगड़ों से लेकर समाजों और वर्गों के मध्य चलने वाले संघर्ष क्यों उभरते हैं? आक्रमण प्रत्याक्रमणों का कुचक्र क्यों गतिशील रहता है? देश-देशों के बीच युद्ध क्यों होते हैं? इसके कारणों पर शोधकर्त्ताओं ने मनोविज्ञान को आधार भूत माना है। यों लड़ाइयों के छोटे-मोटे कारण सामयिक भी होते हैं, पर वे ऐसे नहीं होते जो वार्तालाप, समझौता, उदारता अथवा न्याय निर्णय के आधार पर हल न हो सकते हों। अत्यन्त गम्भीर कारणों से उत्पन्न होने वाले विग्रहों तक के जब समाधान खोज निकाले जाते हैं तो कोई कारण नहीं है कि तनिक सी बात पर इतना विग्रह उभरे, जिससे चिरकाल तक वातावरण विक्षुब्ध बना रहे और धन-जन की असाधारण हानि सहन करनी पड़े।

पिछली पीढ़ी के नृतत्व वेत्ता यह मानते रहे हैं कि मनुष्य की डरपोक प्रवृत्ति, किसी प्रतिपक्षी के भयंकर आक्रमण की आशंका से ग्रसित हो जाती है तो अपने ऊपर भयंकर विपत्ति टूटने की कल्पना करने लगती है। डर बढ़ता है। उस काल्पनिक आक्रमण को रोकने के लिए बचाव की रक्षा पंक्ति खड़ी करने के रूप में प्रतिपक्षी को दुर्बल बनाने की दृष्टि से छोटा आक्रमण किया जाता है। आक्रमण का प्रत्युत्तर प्रत्याक्रमण के रूप में मिलता है। फलतः यह कुचक्र चक्रवृद्धि क्रम से घूमता है और कुछ ही समय में तिल का ताड़ बन जाता है। चिनगारी भयानक अग्नि काण्ड का रूप धारण कर लेती है।

मनोविज्ञानी एक और भी कारण बताते हैं कि हर मनुष्य में अपनी विशेषता और बलिष्ठता सिद्ध करने की स्वाभाविक महत्वाकांक्षा होती है। उसे पूरा करने का सहज तरीका तो अपनी योग्यता एवं सफलता सिद्ध करने का ही हो सकता है, पर उसके लिए जिस दृढ़ता, तत्परता ओर कुशलता की आवश्यकता होती है वह जुट नहीं पाती। ऐसी दशा में हानि पहुँचाने की क्षमता प्रदर्शित करने का आतंकवादी तरीका अपनाया जाना। इसी में शौर्य पराक्रम समझा जाता है। आक्रमण करके दूसरों को नीचा दिखाना और अपनी सामर्थ्य सिद्ध करना भी लड़ाइयों की तरह ही एक बड़ा कारण होता है। बहाना तो किसी छोटे-मोटे अप्रिय प्रसंग का ही ले लिया जाता है।

अपराधियों की दुष्टताएँ इससे भिन्न हैं जो चोरी, डकैती, हत्या, बलात्कार की उद्दण्डता बरतने और मर्यादाएँ तोड़ने के रूप में सामने आती रहती हैं। इनमें अर्थ लोभ, एवं द्वेष बुद्धि की प्रधानता रहती है। दुस्साहस का अहंकार भी उसमें जुड़ा रहता है।

नई पीढ़ी के वैज्ञानिक कहते हैं- युद्ध मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं हैं। स्वभावतः मनुष्य सामाजिक और सहयोगी प्रकृति का है उसे सुविधा और खुशी चाहिए। युद्ध में आघात-प्रत्याघात से हर दृष्टि से हानि ही हानि उठानी पड़ती है। जीतने वाला भी घाटे में ही रहता है। ऐसी दशा में युद्ध को स्वाभाविक प्रकृति नहीं माना जा सकता है वह कुसंस्कारों एवं विकृत वातावरण की प्रतिक्रिया ही माना जा सकता है।

अहमन्यता का विकृत रूप उद्दण्डता है, जिसकी ओछी पूर्ति दूसरों का तिरस्कार करके की जा सकती है। झगड़ालू स्वभाव में यही तथ्य काम करता है। यदि मनुष्य को आरम्भ से ही शिष्टता, शालीनता, नम्रता और नागरिकता की शिक्षा दी जाय तो वह आक्रमण की अपेक्षा दूसरों की सहायता करने और बदले में श्रेय सम्मान पाने की बात सोचेगा। ऐसी दशा में मतभेद और स्वार्थ विपर्यय होते हुए भी ऐसा मार्ग खोज लिया जायगा जिसमें झंझट कम खड़ा हो और गुत्थी शान्ति से सुलझ जाय।

पक्षपात की मात्रा जितनी बढ़ेगी उतनी ही विग्रह की सम्भावना बढ़ेगी। उचित-अनुचित का भेद कर सकना तथ्य को ढूँढ़ना और न्याय की मांग को सुन सकना पक्षपात के आवेश में सम्भव ही नहीं हो पाता। अपने वर्ग की अच्छाइयां ही दीखती हैं और प्रतिपक्षी की बुराइयां ही सामने रहती हैं। अपनों की भूलें और विरानों के न्याय तथ्य भी समझ में नहीं आते। तब एकपक्षीय चिन्तन उद्धत बन जाता है। ऐसी दशा में आक्रमण प्रत्याक्रमण का क्रम चल पड़ने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं रह जाता। यदि तथ्यों को खोज निकालने का दूरदर्शिता अपनाते रहा जाय, कारणभूत तथ्यों को ढूँढ़ निकाला जाय और न्यायोचित समाधान के लिए प्रयास किया जाय तो तीन चौथाई लड़ाइयाँ सहज ही निरस्त हो सकती हैं। न्याय और औचित्य को अपनाने वाली उदार सद्भावना का विकास हो सके तो युद्ध प्रवृत्ति पर अंकुश लग सकता है। विग्रह की चिनगारी अन्ततः कितने बड़े दुष्परिणाम प्रस्तुत कर सकती है, इस पर सही ढंग से विचार किया जा सके तो विग्रह की हानि और समाधान का सत्परिणाम सोचा जा सकेगा ऐसी दशा में युद्ध से बचे रहने की प्रवृत्ति पनपेगी और शान्ति का पक्ष मजबूत होता चला जायगा।

वर्ग भेद और वर्ग संघर्ष उत्पन्न कराने वाले कारणों को निरस्त न किया जा सके तो कम से कम उनकी उपेक्षा तो होनी ही चाहिए। सहयोग और समीपता के सूत्र तथा आधार ढूँढ़ने के लिए प्रयत्नशील रहा जाना चाहिए। सम्प्रदाय, भाषा, जाति, वर्ग, क्षेत्र, देश आदि के नाम पर उभरने वाली भेद बुद्धि को यथा सम्भव हटाने या घटाने का प्रयत्न चलना चाहिए। कम से कम इन मतभेदों को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाने और दूसरों की तुलना में विशिष्ट सिद्ध करने का प्रयत्न तो नहीं ही किया जाय। अपनी मान्यताओं के प्रति निष्ठावान रहना ठीक है, पर उसका प्रदर्शन इस प्रकार नहीं होना चाहिए जिससे अन्य मान्यताओं का तिरस्कार होता हो। धर्म के नाम पर आये दिन कलह इसीलिए होते हैं कि अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए उसकी विशेषताएँ बताने की अपेक्षा अन्यों की निकृष्टता सिद्ध करके अपना बड़प्पन सिद्ध करने का घटिया तरीका अपनाया जाता है। यही बात जाति गत श्रेष्ठता एवं देश-देश के बीच चलती रहती है। यदि दूसरों का, मनुष्यों और वर्गों का सम्मान करने का ध्यान रखा जाय तो समन्वय सहिष्णुता एवं सद्भावना के वातावरण में संसार में पाई जाने वाली अनेक भिन्नताएँ बिना टकराये अपने-अपने से ढंग से पनपती रह सकती हैं और एक दूसरे के लिए सहयोगी एवं पूरक सिद्ध हो सकती हैं। संघर्ष का एक ही केन्द्र बिन्दु रहे-अनैतिकता-असामाजिकता। इसके लिए वर्ग संघर्ष को नहीं समूची मानवता के संयुक्त रूप से टूट पड़ने की मुहीम खड़ी की जानी चाहिए।

प्रतिस्पर्धा की प्रवृत्ति यदि स्वाभाविक है तो श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए खेल-कूद स्वास्थ्य सम्वर्धन, शिक्षा, कला आदि में विशेषता, उदार सेवा, साधना जैसे अनेक क्षेत्र ढूँढ़े जा सकते हैं जिनमें लोग अपनी विशेषता बिना दूसरों का तिरस्कार किये या कष्ट पहुँचाये ही सिद्ध कर सकें।

उदार मनोवृत्ति अपना कर ही चैन से रहने और रहने देने की स्थिति बनती है। उदारता का अर्थ दान-पुण्य ही नहीं है वरन् यह भी है कि संकीर्ण दृष्टि से सोचना बन्द किया जाय और दूसरों की स्थिति में अपने आप को रख कर यह सोचा जाय कि गलतफहमी कहां है? और कहीं पक्षपात अथवा अनौचित्य को प्रश्रय तो नहीं मिल रहा है। न्याय और विवेक की कसौटी अपना कर वस्तुस्थिति को समझना अधिक अच्छी तरह सम्भव हो सकता है। प्यार और सहयोग पर यदि अपना विश्वास हो तो संघर्ष की कम ही आवश्यकता पड़ेगी। फिर अनिवार्यतः जो झंझट करना भी पड़ेगा उसकी न तो बहुत बुरी प्रतिक्रिया होगी और न द्वेष का कुचक्र देर तक चलता रह सकेगा।


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यद्दुस्तरं यददुरापं यददुर्ग च यदुष्करम्। सर्वतु तपसा साध्यं तपो हि दुरतिक्रमम्॥

-मनुस्मृति

जो बहुत दुस्तर है, बहुत कठिनता से प्राप्त किया जा सकता है, जो दुर्गम और दुष्कर है वह सब कुछ तप द्वारा सिद्ध किया जा सकता है क्योंकि कठोर श्रम से मनुष्य प्रत्येक कठिनाई को पार कर सकता है।

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विलुप्त जीव ही नहीं, मनुष्य भी होगा।

उपयोगी जीवों के प्रति सेवा भावना रखना अनुपयोगी के प्रति उपेक्षा और अनुदार होना मानवीय कृपणता के अतिरिक्त कुछ नहीं। जिस तरह परस्पर व्यवहार में छोटों के प्रति हम सम्वेदनशील होते हैं, अनुपयोगी बड़ों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता की भावना रखते हैं उसी प्रकार सभ्यता और प्रगतिशीलता का मापदण्ड यह है कि हम अनुपयोगी जीवों के प्रति भी वैसा ही उदारता की भावना रखें।

वैसे भी प्रकृति से सन्तुलन की दृष्टि से हर जीव उतना ही उपयोगी है जितने कि गाय, बैल, भैंस, घोड़े और गधे। चील, कौवे सड़े-गले मांस की ठिकाने न लगायें तो सारा वातावरण दूषित हो जाये। अनेक बैक्टीरिया कृषि उपज के लिए अत्यधिक लाभदायक होते हैं। कई जीव-जन्तुओं से बहुमूल्य चमड़ा और समूर मिलता है तो अनेक परस्पर एक-दूसरे खाकर ही एक-दूसरे की असह्य बाढ़ को नियन्त्रित कर अन्ततः मानव जीवन के लिए उपयोगिता सिद्ध करते हैं इस दृष्टि से सृष्टि का हर जीव उपयोगी और आवश्यक है। उनकी दुष्टता के प्रति ताड़ना का दृष्टिकोण रखा जाय यहाँ तक उचित है। किन्तु उनके प्रति दुष्टता का व्यवहार मनुष्य जैसे भावनाशील प्राणी के लिए कदापि उचित नहीं हो सकता। हमारी बुद्धि प्राणि मात्र के प्रति दया और करुणा की आत्मीयता पूर्ण सम्वेदना से ओत-प्रोत रहे यही मनुष्यता है। मात्र मनुष्य जाति के प्रति विनम्र और कृपालु रहता अपर्याप्त है।

आज देखने में यह आ रहा है कि मनुष्य जाति अपनी बढ़ती हुई मांस भोजी प्रवृत्ति के कारण अन्य जीवों के अंधाधुन्ध वध पर तुल गया है। बहुत से लोग तो शौकिया भी शिकार करते और वन सौन्दर्य को उजाड़ने में अपनी शान समझते हैं यह मानवीय आदर्शों का अपमान नहीं तो और क्या है कि मनुष्य स्वार्थ के लिए दूसरे जीवों का वध करे।

वन्य जीवों का शिकार प्रकृति के सन्तुलन को नष्ट भ्रष्ट करने का एक जघन्य कृत्य ही नहीं हिंसापूर्ण अपराध भी है। फ्रांसीसी दार्शनिक लीब्नित्स कहा करते थे पृथ्वी पर जीवन की तीन अभिव्यक्तियाँ हैं। मनुष्य रूप में जीवन जागता है, प्राणियों में जीवन स्वप्न देखता है और पेड़ पौधों में सोता है। हिंसा चाहे वह सोते व्यक्ति की की जाये या जागृत की एक ही बात है। सुप्त तुरीय और जागृत चेतना जीवन की विलक्षण गति और महारहस्य है उसे उगते, चलते, उड़ते निहारने का आनन्द ही कुछ और है। हिंसा से तो दर्द ही पैदा होता है जिसमें समान रूप मनुष्य को भागीदार होना ही पड़ता है। साधु वास्वानी का कथन है- हर जीव प्रकृति संगीत का सुर है, हर प्राणी जगत् जननी प्रकृति का प्राण प्रिय पुत्र है उन्हें कष्ट नहीं देना चाहिये। जीवों को प्यार न करना परमात्मा से प्यार न करने के बराबर है। कोई भी देश सच्चे अर्थों में तब तक स्वतन्त्र नहीं जब तक मनुष्य के छोटे भाई मूक पशु स्वतन्त्र और सुखी न हों।

व्यावहारिक तथा इससे विपरीत देख कर दुःख होना स्वाभाविक है। अन्य जीवधारियों की तुलना में बुद्धिमान और शक्तिशाली होने के कारण सम्भवतः उसे यह भ्रम हो गया है कि मानवेत्तर जीव उसके अनुचर और उपभोग के लिये है इसी से वह उनका निरन्तर उत्पीड़न करने पर तुल गया। आज स्थिति यह है कि अनेक सुन्दर और उपयोगी जीव-जन्तुओं की जातियाँ तो विलुप्त हो गईं, अनेक लुप्तप्राय स्थिति में है। गत शताब्दी तक पिनग्यूनस इम्पैनिस नामक ओक ग्रीनलैण्ड सेंट लारेंस ग्रेट ब्रिटेन से आइसलैण्ड तक उन्मुक्त विचरण करता था। यह एक अच्छा तैराक पक्षी था। दक्षिण स्पेन से लेकर फ्लोरिडा तक का क्षेत्र इसकी क्रीड़ास्थली थी किन्तु न्यूफाउण्ड लैण्ड वासियों ने इसका तीन शताब्दियों तक जघन्य वध किया। 1845 में इसका एक जोड़ा आइसलैण्ड में बचा था उसे भी सर्वभक्षी मानव ने मारकर उदरस्थ कर इस जीवन दीप को ही बुझा दिया अब मात्र उसके कंकाल ही संग्रहालयों में शेष हैं।

हमारी शिक्षा, हमारे संस्कारों में प्राचीन काल में ही इन तथ्यों का समावेश रहा है। प्राचीनकाल में राजकुमारों तक को प्रकृति के सान्निध्य में शिक्षा की व्यवस्था थी उसका अर्थ ही यह था कि उस वातावरण में वे प्रकृति की विशालता को अनुभव करें और अपने को उसी के एक अंग के रूप में देखें। इसी से उस समय की ज्ञान साधना में मानवीयता के उन गुणों का प्रचुर विकास होता था। तब वन्य जीवन राजकीय संरक्षित सम्पदा मानी जाती थी। कौटिल्य ने उनके वध को अपराध मानकर दण्ड की व्यवस्था की थी।

न केवल मनुष्य अपितु मनुष्येत्तर जीव भी प्रकृति की सृजन चेतना के अंग है। भावनात्मक दृष्टि से भी दोनों समान हैं। कबीर की यह उक्ति निःसन्देह सच है :-

साईं के सब जीव हैं कीरी कुंजर दोय। का पर दाया कीजिये कापर निर्दय होय॥

कीड़े हाथी-सभी जीवन के अंग हैं, यह सब दया के पात्र हैं निर्दयता के नहीं। किन्तु व्यवहार में आज हम भारतीय ही कितने पीछे हैं यह इसी बात से स्पष्ट हो जाता है कि आज भी नागालैण्ड में प्रतिदिन औसत 6 शेर मारे जाते हैं। असम के गोपाल पुरा जंगल में 30 वायसन निरर्थक मार दिये जाते हैं, तो राजस्थान में 11 हजार सैंड ग्राउज का शिकार होता है, लोमड़ियाँ, खरगोश, सियारों की प्रतिदिन की शिकार संख्या लाखों में है। मोर प्रतिवर्ष 10 हजार तक मार दिये जाते हैं। वन्य पशुओं का यह विनाश न केवल शर्मनाक अपितु मनुष्य के लिये कलंक की बात है।

इसे सन्तोष की बात भी कह सकते हैं, गौरव की भी। पक्षियों की संख्या विश्व के किसी भी देश की तुलना में भारत में अधिक है। गिद्ध, चील, कौवे आदि कुछ गिने-चुने पक्षियों को छोड़ देश में अनुमानतः 3300 तरह के शाकाहारी पक्षी हैं। धार्मिक भावना के कारण इनका वध न किये जाने के कारण ही अब तक इस सम्पदा को बचाये रहना सम्भव हुआ है आज यह विदेशी मुद्रा कमाने का एक साधन बन गये हैं। आस्ट्रेलिया, डेनमार्क बेल्जियम, पश्चिमी जर्मनी, जापान, स्वीडन आदि देशों में भारतीय पक्षियों की बहुत माँग है। योरोप और अमेरिका के लोग भारत के राष्ट्रीय पक्षी मोर को प्राप्त करने के लिये बड़ी से बड़ी रकम देने को तैयार रहते हैं। प्रसन्नता की बात है कि भारत सरकार ने इनका निर्यात रोक दिया है।

किन्तु तथाकथित आधुनिक सभ्यता और मांसाहार की बढ़ती हुई प्रवृत्ति के कारण यहाँ भी इनका शिकार होने लगा है। इस निर्दयता के फलस्वरूप योरोपीय नहीं अनेक भारतीय जीव-जन्तु भी अब लुप्तप्राय हो चले। म.प्र. में जहाँ के जंगलों में हजारों की संख्या में शेर, बारहसिंगे और जंगली जैसे विचरण किया करते थे अब केवल 450 शेर बचे हैं। बारहसिंगे मात्र कान्हा राष्ट्रीय उद्यान में बचे हैं। जंगली भैंसा अब केवल बस्तर जिले में बचा है। काला हिरण अमावस का चन्द्रमा हो गया। गीर सहित शेष देश में कुल 1300 शेर बचे हैं। सोहन चिड़िया जो फसलों के लिये वरदान थी, कीड़े-मकोड़े खाकर फसल की रक्षा करती थी अब लुप्तप्राय हो चली है।

इन दिनों “इकोलॉजी” नामक एक नये विज्ञान का विकास हो रहा है उसके अनुसार मनुष्येत्तर प्राकृतिक जीवों को भी समष्टि चेतना का ही अंग माना गया है। आज वन्य जीवों के विनाश से उत्पन्न हो रही समस्याओं की “इकोलॉजिकल बैलेन्स डिस्टर्व” की संज्ञा देकर समय रहते उसे सुधारने की चेतावनी दी गई है इसमें न केवल वृक्ष वनस्पति अपितु जीवों को भी समान रूप से महत्व दिया गया है। वास्तव में दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, दोनों अन्योन्याश्रित हैं। एक के बिना दूसरे की न तो शोभा है न अस्तित्व। इसलिये इन सम्पदा के संरक्षण की सब प्रकार से आवश्यकता है।

अमेरिका के सुप्रसिद्ध जीव शास्त्री। डॉ. फ्रैंक हिबन ने अपने कुछ साथियों के सहयोग से लुप्तप्राय जीवों के संरक्षण का एक अभियान प्रारम्भ किया है। यह कार्य न्यूमैक्सिको विश्वविद्यालय के तत्वावधान में चल रहा है। अफ्रीका की बारबारी भेड़ें तथा एण्टीलोप साइबेरिया के आइबेक्स कुदूं, ईरान से गैजिल, लाल एल्बुर्ज शिप तथा भारतीय मारखोर यहाँ रखे गये हैं। उनकी सुरक्षा और विकास के सभी प्रबन्ध किये गये हैं। यह सभी जीव यहाँ न केवल भली प्रकार पल रहे हैं। अपितु उन्होंने इस तथ्य को भी झुठला दिया कि जो वस्तु जहाँ की है वहीं रह सकती है। अफ्रीका से यहाँ कुल 50 भेड़ें आई थीं आज उनकी संख्या 5 हजार से भी ऊपर हो गई। प्रकृति के इस सौन्दर्य को यदि लुप्त होने से बचाया जा सके तो मनुष्यों को उसके सर्वांगीण लाभ निश्चित रूप से मिल सकते हैं। इस तरह के प्रयास चलें तो अच्छी बात है, पर शिकार और मांसाहार के लिये तो जीव-वध कभी भी नहीं करना चाहिये तभी इस वन्य सम्पदा की सुरक्षा और प्राकृतिक सन्तुलन बना रह सकता है।

जीव दया को अब योरोपीय देशों में अत्यधिक सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है इसके दो जीते जगाते उदाहरण हैं। कनाडा के नगर विक्टोरिया के रोमन कैथोलिक चर्च की मदर सिसीलिया ने एक दिन अपने अहाते में तीन बकरियाँ देखीं, उन्हें जब वे भगाने लगीं तो देखा कि वे बार-बार दीवार से टकरा जाती हैं, बाहर निकलने का दरवाजा उन्हें नहीं मिल रहा था। मदर सिसीलिया ने समीप जाकर देखा तो यह देखकर कि तीनों बकरियाँ अन्धी होने के कारण ठोकरें खा रही हैं उनकी आन्तरिक करुणा उमड़ पड़ी उन्होंने बकरियों को बाड़े में ही रख कर उनके दाने चारे का प्रबंध कर दिया। चर्च अधिकारियों ने इस पर आपत्ति की तो वे बोलीं-‘‘क्या ईसामसीह ने एक नन्हें भेड़ के बच्चे को गोद में उठाकर यह नहीं कहा था जो जितना असहाय है वह उतनी ही करुणा का पात्र है? चर्च के अधिकारी इस बात का प्रतिवाद न कर सके उल्टे मदर सिसीलिया की करुणा से वे भी अत्यधिक प्रभावित हो उठे। सिसीलिया को इसके लिये न केवल समूचे कनाडा अपितु सम्पूर्ण योरोप से असीम सराहना श्रद्धा मिली। इसके लिये लोगों ने स्वयं ही कोष स्थापित करने का सुझाव दिया। देखते ही देखते एक बड़ी स्थिर पूँजी जमा हो गई, जिसके सहारे अब वहाँ न केवल बकरियाँ अपितु अपंग घोड़ों, अपाहिज बिल्लियों और अनाश्रित कुत्तों का एक ऐसा परिवार एकत्र हो गया है जिससे लोगों को जीव दया की प्रेरणा मिलती है। यह दवा की भावना का विकास मनुष्य को उसकी देहशक्ति बुद्धि से आत्मीय गुणों और संस्कारों की ओर ले जाती है जो इस युग की एक अदम्य आकांक्षा है।

इसी तरह का एक उदाहरण उत्तरी वेल्स (ब्रिटेन) की कोलविन खाड़ी में बनी आल्फ्रेड होरोविन की पशुशाला है, जिसमें विभिन्न जाति के लगभग 500 जीवों को आश्रय मिला है। आल्फ्रेड न केवल उनके लिये भोजन का प्रबन्ध करते हैं अपितु उन्हें अपनी सन्तान की तरह स्नेह और प्यार भी प्रदान करते हैं।

भारतवर्ष में ऋषिकेश के समीप गान्धी जी की शिष्या मीरा बहन का स्थापित पशुलोक भी इसी श्रेणी का एक जीव दया का उदाहरण है किन्तु यह अपवाद जैसे हैं। गौतम, गान्धी और भगवान महावीर का यह देश इससे भी व्यापक दृष्टिकोण की अपेक्षा रखता है जिसमें मानव और अन्य प्राणी एक जीव-समुदाय के रूप में बसर न करें तो न सही किन्तु उनका शोषण और उत्पीड़न तो नहीं ही किया जाना चाहिये। यह सभ्यता के नाम पर कलंक है कि मनुष्य अपने स्वार्थ के लिए इन निरीह प्राणियों का वध करे, उनसे अधिक काम ले तथा अनुपयोगी समझ कर उनकी उपेक्षा करे।

करुणा में प्रकाश की तरह की उत्पादकता है। प्रकाश से हमें वस्तु के यथार्थ और अयथार्थ का अन्तर समझ में आता है तो चेतन-जगत में जो कुछ भी सुन्दर और सुसज्जित है, वह सब प्रकाश-कणों की देन है। इसी तरह जहाँ भी करुणा के दृश्य उदय होंगे वहाँ स्वार्थ और हिंसा के दुष्परिणाम प्रत्यक्ष समझ में आने लगेंगे। साथ ही मनुष्य जीवन की सुन्दरता और सुसज्जा मुखरित होगी जो मानवीय प्रसन्नता के प्रधान आधार हैं। करुणा सदा छोटों के प्रति अपने भावनाशील व्यवहार से अभिव्यक्त होती है अतएव यह आवश्यक है कि उसका अभ्यास जीव जगत से प्रारम्भ करें तो उसका प्रतिफल उत्पादकता के सिद्धान्त पर मानव समुदाय में स्वयं परिलक्षित होने लगेगा।


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नास्ति ध्यानं बिना ज्ञानं नास्ति ध्यानमयोगिनः। ध्यानं ज्ञानं च यस्यास्ति तीर्णस्तेन भवाणवः॥

ज्ञानं प्रसन्नमेकांग्रमशेषोपाधिवर्ज्जितम्। योगाभ्यासेन युक्तस्य योगिनस्त्वेव सिद्धयति॥

प्रक्षीणाशेषपापानां ज्ञाने ध्याने भवेन्मतिः। पापोप्रहतबुद्धीनां तद्वार्तापि सुदुलभा॥

यथा वह्निर्महादीप्तः शुष्कमाद्रं च निर्दहेत्। तथा शुभाशुभं कर्म ध्यानाग्निर्दहते क्षणात्॥

-शिव पुराण

ध्यान ही ज्ञान का मुख्य साधन है और योग के बिना ध्यान सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिए योग द्वारा ध्यान को प्राप्त करना सर्वोपरि कर्तव्य है। जो ज्ञान और ध्यान दोनों को प्राप्त कर लेता है वह इस संसार चक्र से निश्चय ही मुक्त हो हो जाता है। जिनके पाप क्षीण हो जाते हैं उन्हीं की रुचि ज्ञान और ध्यान की ओर जाती है अन्यथा पापी लोगों को तो इस तरह की बातें भी अच्छी नहीं लगती। जैसे प्रज्ज्वलित अग्नि गीले सूखे सब पदार्थों को भस्म कर देती है, उसी प्रकार ध्यान की अग्नि भी कर्मों को शीघ्र ही नष्ट कर देती है।

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अवांछनीयता को अस्वीकार कर दें।

इस संसार में सर्वत्र बहुत कुछ भरा हुआ है। उसमें प्रभावित करने की सामर्थ्य तो है, पर इसके लिए आवश्यक है कि उसे पकड़ने अपनाने के लिए ही नहीं धारण करने की क्षमता का आश्रय मिले। यह आश्रय न मिलने पर संसार के शक्ति समुद्र में भरी हुई अनेकानेक क्षमताएँ अपने स्थान पर चुपचाप बैठी रहती हैं।

बिजली सूखी लकड़ी, काँच आदि पर नहीं गिरती। उसके लिए नमी धातु आदि ऐसी वस्तुएँ चाहिए जो उसे पकड़ती हैं। ब्रॉडकास्ट की गई ध्वनि तरंगें आकाश में घूमती रहती हैं प्रकट वहीं होती हैं, जहाँ रेडियो यन्त्र खुला हुआ हो। ठीक इसी प्रकार विश्व ब्रह्माण्ड में भला या बुरा सब कुछ भरा होने पर भी अपने ऊपर उसी का अवतरण होता है, जिसे अपनाया जाता है। यदि उसे उपेक्षित कर दिया जाय तो वापिस लौट आयेगा और यदि प्रतिरोध करने के लिए कमर कस ली जाय तो फिर वातावरण का प्रभाव अनायास ही बहुत दूर हटता चला जायगा। उदाहरण के लिए शोरगुल को सामने रखकर विचार किया जा सकता है।

शोर की अपनी उत्तेजना है। उससे इनकार नहीं किया जा सकता है। उसके हानिकारक प्रभाव के बारे में भी दो मत नहीं हैं। किन्तु यहाँ एक तथ्य और भी जानने योग्य है। कि मानवी संरचना में एक अद्भुत विशेषता यह है कि वह बाहर के प्रभाव को अपनी मनःस्थिति के अनुसार बहुत कुछ घटा सकती है। कानों की संरचना ऐसी है कि वे एक सीमित परिमाण की ध्वनि तरंगों को ही ग्रहण करते हैं। उस स्तर से नीची-ऊँची तरंगें कानों से टकरा कर अपने रास्ते चली जाती हैं। यदि वे सभी सुनाई पड़ने लगतीं तो कानों के पर्दे उद्विग्न हो उठते और उनके लिए उस ध्वनि प्रवाह में से कुछ भी समझ सकना सम्भव न होता। मात्र शब्दों का कुहराम ही पल्ले पड़ता। ईश्वर की बड़ी कृपा है कि हमें उतना ही ध्वनि प्रवाह सुनने की, काम की और समझने की मस्तिष्क को क्षमता दी है जो जीवन निर्वाह के लिए नितान्त आवश्यक है। इसके अतिरिक्त एक और बड़ी बात यह है कि कोलाहल को अस्वीकृत भी किया जा सकता है और उसके साथ तालमेल बिठाकर भी चला जा सकता है।

अस्वीकृत करने से तात्पर्य यह है कि कोलाहल की ओर से ध्यान हटाकर अपने प्रिय प्रसंग में तन्मय हुआ जा सके तो फिर उन आवाजों से एकाग्रता भंग जैसी कोई कठिनाई उत्पन्न न होगी। दैनिक अखबारों के दफ्तरों के इर्द-गिर्द प्रेस की मशीनें टाइप राइटर तथा दूसरी हलचलें चलती रहती हैं और पास वहाँ एक कमरे में बैठे हुए सम्पादक लोग अपना ऐसा लेखन कार्य मजे में चलाते रहते हैं जो एकाग्रता के बिना किसी प्रकार सम्भव ही-नहीं हो सकता। यहाँ यही तथ्य सामने आता है कि यदि कोलाहल की ओर से ध्यान हटाकर अपने अभीष्ट प्रयोजन के साथ तन्मयता स्थापित की जा सके तो फिर मस्तिष्क और कान को अस्त-व्यस्त करने वाला व्यवधान दूर हो सकता है। भले ही वातावरण पर उसका प्रभाव पड़ता रहे।

तालमेल बिठाने से तात्पर्य यह है उसे अनोखा न मानकर जीवन की क्रम व्यवस्था में एक स्वाभाविकता के रूप में स्वीकार कर लेना। रेलगाड़ियाँ पटरी पर दौड़ती रहती हैं और वहीं बिलकुल सटे हुए बहुत से घर, झोंपड़े होते हैं। उनके निवासी गहरी नींद सोते रहते और गाड़ियाँ धड़धड़ाती हुई दौड़ती रहती है। सामान्य रीति से थोड़ा सा-ही शोर नींद में व्यवधान उत्पन्न करता है और जरा-सी खटपट से नींद खुल जाती है। किन्तु बड़े-बड़े कल कारखानों के सिनेमा घरों के इर्द-गिर्द रहने वाले लोग उसे कोलाहल की परवा न करके सामान्य रीति से अपना निर्वाह आप चलाते रहते हैं। मशीनों पर काम करने वाले कर्मचारी मौका पाकर उधर ही कहीं लुढ़क जाते हैं और गहरी नींद की जरूरत पूरी कर लेते हैं। कोलाहल अपना काम करता रहता है और नींद अपनी जगह छाई रहती है। इसे तालमेल बिठाना कह सकते हैं। नदियों और झरनों के किनारे शोर लगातार चलता रहता है और उधर के निवासी उससे कोई बड़ी असुविधा अनुभव नहीं करते। वरन् उलटे उस कोलाहल के बन्द होने पर वे चौंकने लगते हैं और देखते ही क्या कुछ अचम्भा उत्पन्न हो गया। शोर के अभ्यस्तों को जब शान्त, एकान्त, निर्जन, कोलाहल रहित स्थानों में रहना पड़ता है तो उन्हें वह स्तब्धता बहुत अखरती है। शहरों की घनी बस्तियों में बहुत समय तक रहने वाले लोग जब एकान्त गाँव झोपड़ों में जा पहुँचते हैं तो उन्हें ऐसा कुछ अखरता है जिसके कारण अधिक समय तक उनका वहाँ रहना बन ही नहीं पड़ता और पैर उखड़ जाते हैं। इसी प्रकार बिजली की बत्तियों के चकाचौंध में रहने वाले लोग जब अंधेरे गाँव में जा पहुँचते हैं तो उन्हें वह प्रकाश का अभाव भयानक लगता है।

समीपवर्ती लोगों का प्रभाव पड़ने की मान्यता पर भी इसी दृष्टि से विचार किया जा सकता है। यह सही है कि संगति का प्रभाव पड़ता है। बुरे लोग अपनी हरकतों से सम्बन्धित लोगों को प्रभावित करते हैं और उन्हें अपना जैसा बना लेते हैं, पर यह बात तभी सिद्ध होगी जब दूसरे लोग उसे स्वीकार करें, उसके सामने सिर झुकायें। ऐसी दुर्बल मनःस्थिति पर ही कुसंग का प्रभाव पड़ सकता है। यदि उसकी उपेक्षा कर दी जाय अथवा विरोधी तेवर बदल दिये जायें तो किसी भी कुसंग का प्रभाव किसी पर भी पड़ नहीं सकता। पड़ेगा तो बहुत ही हलकी झलक दिखा कर देखते-देखते हवा में उड़ जायगा। जब अच्छे लोगों की संगति में रहने पर भी कई बुरे लोग अपनी कठोरता यथावत् बनाये रहते हैं। परिवर्तन नहीं लाते तो कोई कारण नहीं कि बुरे प्रभाव से, कुसंग से किसी की क्षति उठानी ही पड़े।

अपना व्यक्तित्व दुलमुल होगा तो चारों तरफ से आक्रमण होंगे। दुर्बलता जहाँ भी होगी, वहीं अवांछनीयता चढ़ दौड़ेगी। पानी निचाई की ओर ढलता है। ऊँचाई को देखकर तो उसके हौंसले ही परस्त हो जाते हैं। यदि अपना चिन्तन और चरित्र सुदृढ़ बना लिया जाय तो फिर इतने से ही वातावरण के द्वारा पहुँचने वाली हानि से बच निकलने की सम्भावना सहज ही बन जाती है।

खिड़की खोल देने पर ही सूरज की रोशनी और बाहर की हवा का अपने घर में प्रवेश करने का अवसर मिलता है। दरवाजा बन्द रहे तो अवांछनीयता की घुस पैठ को रोका जा सकता है। दरिद्रता से लेकर पिछड़ेपन तक की अनेक कठिनाइयाँ किसी ने न्यौतकर तो नहीं बुलाई होतीं, पर इतना निश्चित है कि उनकी रोकथाम के लिए जागरुकता भी नहीं बरती गई होती। बीमारियाँ हर किसी पर नहीं चढ़ दौड़तीं। जहाँ कमजोरी पाती है पोले कोतरों में पक्षियों के घोंसले बनाने की तरह वे भी अपना अड्डा जमाती हैं। दुर्भाग्य लगता तो कहीं से उतारा या थोपा हुआ होता है, पर वस्तुतः आलस्य और प्रमाद के रूप में उदासी और भीरुता के रूप में हमीं उसके स्वागत का थाल सजाते हैं। ठगों और दुराचारियों को अपनी घात लगाने के लिए किसी न किसी प्रकार आक्रान्ता को सहमत करना पड़ता है। सर्वथा अस्वीकृति और असहयोग हो तो उन्हें निराश लौटना पड़ेगा। प्रत्येक अवांछनीयता के सम्बन्ध में यही बात है। अस्वीकृत की प्रखरता ही तो शोरगुल की तरह अन्यान्य अवांछनीय तत्व भी वापिस लौटाये जा सकते हैं भले ही उनका अस्तित्व अपनी जगह बना रहे।

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प्रभावी प्रशिक्षण के लिये उपयुक्त वातावरण की आवश्यकता

शिक्षण के दे वर्ग हैं- एक भौतिक उपार्जन उपभोग, दूसरा व्यक्तित्व का विकास परिष्कार। समग्र शिक्षण के लिए दोनों ही वर्ग समुचित साधन और परिस्थितियाँ चाहते हैं। अनुपयुक्त परिस्थितियों में दोनों में से एक भी प्रयोजन ठीक तरह सध नहीं पाता। शिल्प उद्योग भर सिखाने हों, भौतिक जानकारियाँ देनी हों तो सुविधा की दृष्टि से जो जहाँ रहता है उसे वहीं पढ़ने-पढ़ाने का प्रबन्ध करना होता है। किन्तु व्यक्तित्व का निर्माण करना हो तो वातावरण की अनुकूलता भी चाहिए। अन्यथा शिक्षा के नाम पर जानकारियाँ सीखीं और सिखाई जा सकेंगी, ऐसा बन नहीं पड़ेगा जिसमें विद्या के गुण बताये गये हों। शिक्षा की जो महिमा गाई गई है वह परिणाम दृष्टि गोचर हो नहीं सकेगा।

देखा जाता है कि बड़े शहरों में पढ़ाई की दृष्टि से लड़के जाते हैं। प्रसिद्ध विद्यालयों में दाखिला पाते और पढ़ाई करते हैं। इससे उनकी जानकारी और अभीष्ट विषय में कुशलता भले ही बढ़ती रहे पर चारों ओर छाये हुए वातावरण का प्रभाव उनके कोमल मन पर पड़ता है। फलतः वे सम्पर्क जन्य अनेक बुरी आदतों के शिकार बन जाते हैं। पढ़ाई की दृष्टि से सफलता मिलते हुए भी व्यक्तित्व को गरिमा वाले शिक्षा प्रयोजन में प्रायः असफल ही रहना पड़ता है।

प्राचीनकाल में इस तथ्य को ध्यान में रखा गया था। शिक्षण संस्थाएँ बनाते समय सुविधाओं का उतना ध्यान नहीं रखा जाता था जितना वातावरण की पवित्रता का। गुरुकुल प्रायः वन्य प्रदेशों में नदी सरोवरों के किनारे प्रकृति सौन्दर्य की समीपता में बनते थे। यह ध्यान रखा जाता था कि बालकों के कोमल मस्तिष्क पर दूषित वातावरण का बुरा प्रभाव न पड़ने पाये। ज्ञान और चरित्र के धनी अध्यापकों का प्रखर प्रशिक्षण और उपयुक्त वातावरण इन दोनों के ही समन्वय से प्राचीनकाल की शिखा सार्थक रहती थी और गुरुकुलों से निकलने वाले छात्र नवरत्न बन कर निकलते थे। आज शिक्षण की सुविधा सामग्री और विद्यालयों की भव्य इमारतें तो दृष्टिगोचर होती हैं किन्तु शिक्षकों की चारित्रिक सम्पदा वातावरण की पवित्रता के लिए चेष्टा नहीं की जाती। फलतः सुशिक्षित कहलाने वालों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी होते चलने पर भी विद्या के फलस्वरूप सुशिक्षितों से जो आशा की जानी चाहिए उसकी पूर्ति हो नहीं पाती।

भारतीय तत्व दर्शन के अनुसार मनुष्य जीवन दो भागों में विभाजित है। एक पूर्वार्ध, दूसरा उत्तरार्ध। पूर्वार्ध भौतिक सुव्यवस्था के लिए उत्तरार्ध शालीनता की उच्चस्तरीय उपलब्धि के लिए। दोनों के लिए समुचित शिक्षण और अनुभव की आवश्यकता पड़ती है। पूर्वार्ध का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए ब्रह्मचर्याश्रम के नियम पालन करने होते हैं और उत्तरार्ध की वानप्रस्थ शिक्षा अरण्यकों में पूरी होती है। दोनों के लिए जहाँ शिक्षण की सुविधा एवं उत्कृष्टता आवश्यक है वहाँ उपयुक्त वातावरण भी चाहिए। अन्यथा ऊपरी खिलवाड़ तो होती रहेगी किन्तु वैसा कुछ बन नहीं पड़ेगा, जिसके आधार पर सुसंस्कृत नई पीढ़ी एवं जन नेतृत्व कर सकने वाली परिष्कृत साधु संस्था की उत्साहवर्धक गतिविधियाँ दृष्टिगोचर हो सकें।

संसार के विभिन्न क्षेत्रों का पर्यवेक्षण किया जाय तो प्रतीत होगा कि क्षेत्रीय विशेषता का वहाँ के पदार्थों और प्राणियों पर कितना प्रभाव पड़ता है। ठंडे देशों के निवासी मनुष्य गोरे रंग के सुदृढ़ और दीर्घ जीवी होते हैं। जहाँ गर्मी अधिक पड़ती है वहाँ स्वास्थ्य गिरे शरीर दुर्बल और रंग काले पाये जाते हैं। यही बात वनस्पतियों के सम्बन्ध में भी है। जड़ी-बूटियाँ वही हैं, पर विभिन्न क्षेत्रों में उगाये जाने पर उनके गुणों में न्यूनाधिकता उत्पन्न हो जाती है। हिमालय क्षेत्र में गंगातट पर उगी ब्राह्मी की तुलना में मैदानी क्षेत्रों में नहर रजवाहों के किनारे उगी हुई ब्राह्मी के गुणों में भारी अन्तर पाया जाता है। यही बात अन्य जड़ी-बूटियों के सम्बन्ध में भी है।

भुसावल क्षेत्र के केले, नागपुर क्षेत्र के संतरे, लखनऊ के आस-पास के आम, खरबूजे अपनी विशेषताओं के लिए प्रख्यात हैं। काश्मीर के सेब की अपनी विशेषता है। मैसूर के जंगलों में उगे हुए चन्दन वृक्षों में विशिष्ट सुगन्ध होती है। उन्हीं के बीज, पौधे यदि अन्यत्र बोये, उगाये जायँ तो बढ़ेंगे और फलेंगे तो अवश्य पर उनमें वैसी विशेषताएँ न होंगी। अन्न-शाक के गुण और स्वभाव में भी इसी आधार पर भारी अन्तर पाया जाता है। पंजाब का गेहूँ अन्य प्रान्तों की तुलना में अभी भी बढ़िया होता है। इसका श्रेय या दोष किसान या माली को उतना नहीं जितना उन क्षेत्रों की भूमि और जलवायु को है। संक्षेप में इसे वातावरण का प्रभाव कह सकते हैं।

पशुओं में भी इसी प्रकार का अन्तर देखने में आता है। कच्छ, हरियाणा, नागौर आदि क्षेत्रों के गाय, बैल कितने दुधारू कितने परिश्रमी होते हैं यह सर्व विदित है। बंगाल और दक्षिणी बिहार में जन्मने वाले गाय-बैल अपेक्षाकृत बहुत दुर्बल होते हैं। इसमें नस्ल का उतना श्रेय दोष नहीं जितना कि जलवायु का होता है। उपरोक्त स्थानों के इन पशुओं का निवास क्षेत्र यदि बदल दिया जाय तो नस्ल में सहज ही अन्तर पड़ता चला जायगा। विदेशों में मँगाये गये पशु अपने देश में रहने के उपरान्त उन विशेषताओं को खोते चले जाते हैं जो उनके मूल स्थान में रहती थीं। ठण्डे देशों के रीछ, कुत्ते, हिरन आदि गर्म क्षेत्रों के चिड़ियाघरों में मुश्किल से ही जी पाते हैं। जो रखे जाते हैं उनके लिए वैसे ही ठंडे वातावरण की व्यवस्था करनी पड़ती है।

वातावरण के प्रभाव की सशक्तता का परिचय देने वाले कितने ही कथा प्रसंग इतिहास में मिलते हैं। महाभारत में भाई-भाई का सम्बन्धी-सम्बन्धी का युद्ध होता था। निर्णायक स्थिति में पहुँचे बिना वे लोग पुराने सम्बन्धों की भावुकता में कोई अधूरा समझौता कर सकते थे। इस स्थिति को न जाने देने के लिए कृष्ण ऐसी भूमि को युद्ध क्षेत्र बना चुनना चाहते थे जिसके वातावरण में निष्ठुरता के तत्व अधिक हों। ऐसी भूमि तलाश करने के लिए उनने अपने दूत दूर-दूर तक भेजे। एक दूत ने अपनी जानकारी का ऐसा प्रसंग सुनाया जिससे युद्ध के लिए उपयुक्त भूमि की समस्या हल हो गई।

दूत ने आँखों देखा वर्णन बताते हुए कहा- ‘वर्षा हो रही थी। बड़े भाई ने छोटे भाई को खेत की मेंड़ बाँध कर पानी रोकने के लिए कहा- इस पर छोटा उबल पड़ा। अवज्ञा भरे कटुवचन कहने लगा। सुनते ही बड़े का आवेश चरम सीमा पर जा पहुँचा। उसने तत्काल लाठी से छोटे का सिर फोड़ दिया और उसको लाश को घसीटते हुए खेत के बहते हुए पानी को रोकने के स्थान पर गाड़ दिया।

इस घटना को सुनकर कृष्ण ने जान लिया कि इस वातावरण में ऐसे तत्व मौजूद हैं जिनमें स्नेह सौजन्य की नहीं क्रूर निष्ठुरता की ही वरिष्ठता है। यही महाभारत का युद्ध क्षेत्र ठीक रहेगा। वह कुरुक्षेत्र था। इसी को युद्ध भूमि बनाने का निर्धारण किया गया और वह अनुमान के अनुसार तभी समाप्त हुआ जब दोनों पक्षों के स्वजन सम्बन्धी आपस में लड़ मर कर समाप्त हो गये।

एक और ऐसी ही घटना है-श्रवणकुमार अपने अन्धे माता-पिता को तीर्थयात्रा पर ले जा रहे थे। वाहन का प्रबन्ध था नहीं, सो उन्होंने ‘कांवर’ बनाई। दोनों को दो ओर बिठाया और कन्धे पर लाद कर यात्रा कराने लगे। बहुत यात्रा तो प्रसन्नता पूर्वक कर ली, पर एक क्षेत्र में पहुँचते ही उनका विचार बदल गया। कांवर जमीन पर रख दी और माता-पिता से कहा- आप लोगों की आँखें खराब हैं पैर नहीं। आप लोग अपने पैरों चलिए मैं तो रास्ता बताने भर का काम कर सकता हूँ।

श्रवणकुमार के पिता इस परिवर्तन पर चकित रह गये। वे ऋषि थे। वस्तुस्थिति को उनने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से जान लिया। उन्होंने पुत्र से सहमति प्रकट की और पैदल चलने को तैयार हो गये। साथ ही यह भी कहा- इस क्षेत्र से जल्दी से जल्दी बाहर निकल चलना चाहिए अन्यथा कोई भयंकर अनर्थ होने की आशंका बनी रहेगी। वैसा ही किया गया वे लोग तेजी में उस क्षेत्र को पार करके आगे चले गये।

महाभारत की कथा के अनुसार, जैसे ही वह क्षेत्र समाप्त हुआ श्रवण कुमार की आत्म ग्लानि उमड़ी और वे अपने कुकृत्य पर फूट-फूट कर रोने लगे। माता-पिता को कांवर पर बिठा कर फिर ले चलने का आग्रह करने लगे। संसार भर में माता-पिता की सेवा का अनुपम आदर्श उपस्थिति करके अमर यश पाने का जो अवसर हाथ में था उसे वे गँवाना नहीं चाहते थे।

पिता ने श्रवणकुमार को इन बुरे-भले परिवर्तनों का कारण बताते हुए कहा-‘बहुत समय पूर्व इस क्षेत्र में ‘भय’ नामक दानव रहता था। बड़ा नृशंस था। उसने अपने माता-पिता को मार डाला था। उसी की दुष्टता इस क्षेत्र पर अभी भी किसी रूप में छाई हुई है। उसी ने तुम्हारे मन पर विद्रोह का भाव भड़काया। अब वह क्षेत्र पीछे रह गया तो वह प्रभाव भी समाप्त हुआ और तुम्हारी स्वाभाविक सहज बुद्धि वापिस लौट आई।

सामान्य स्थानों पर प्रायः अवांछनीय वातावरण का ही बाहुल्य रहता है। अस्तु समर्थ अध्यात्म साधना के लिए स्थान बदलने की आवश्यकता पड़ती है। वानप्रस्थ में ऐसे परिवर्तन पर बहुत जोर दिया गया है।

हिमालय ऋषि तपस्वियों की भूमि रही है। किसी समय देव पुरुष इसी क्षेत्र में रहते थे। ऐतिहासिक सर्वेक्षण से प्रतीत होता है कि जिस स्वर्ग लोक का वर्णन पुराणों में किया गया है वह इसी धरती पर था। दशरथ का कैकेयी समेत रथ पर चढ़ कर देवताओं की सहायता के लिए जाने और उनके पक्ष में युद्ध करने का वर्णन मिलता है। अर्जुन भी इन्द्र के पक्ष में लड़ने के लिए गये थे। उर्वशी का उपहार इसी सहायता के बदले में देना चाहते थे जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। नारद जी बार-बार स्वर्गलोक जाते थे। धरती निवासियों की समस्याएँ स्वर्ग वासियों को बताते और स्वर्ग से प्रेषित समाधानों की जानकारियाँ धरती वालों को दिया करते थे। इन घटनाओं को यदि तथ्य माना जाय तो फिर स्वर्ग को कहीं धरती पर ही मानना पड़ेगा।

शिव प्रसंग की एक कथा है कि कलयुग का प्रकोप होने पर उन्होंने धरती छोड़ने का निश्चय किया और काशी से अपनी ममता हटा ली। तदुपरान्त वे अपने लोक चले गये और उत्तरकाशी रहने लगे। ऐसे पौराणिक उद्धरणों की यदि संगति बिठाई जाय तो देवलोक में धरती पर ही मानना पड़ेगा।

इस गये-गुजरे जमाने में तीर्थयात्रियों की भीड़-भाड़ के साथ उधर जा पहुँचने वाले अवांछनीय तत्वों की घुसपैठ होते हुए भी सारे भारतवर्ष की अपेक्षा ईमानदारी, सज्जनता और सद्भावना का वातावरण यहीं अधिक बढ़ा चढ़ा पाया जाता है। पैदल यात्रियों का बोझ ढोने वाले पहाड़ी कुली से प्रायः किसी को भी छल या विश्वासघात की शिकायत प्रायः नहीं करनी पड़ती। संसार भर में इन दिनों कहीं न दीख पड़ने पाण्डव कालीन बहुपति परम्परा का यह प्रदेश जानसार बाबर में अभी भी देखा जा सकता है।

एक संयुक्त पत्नी के साथ सब भाई शान्ति पूर्वक निर्वाह करते और सहकारिता का, सामूहिकता का परिचय इन नाजुक प्रसंग में भी देते हैं जबकि अन्यत्र इस सन्दर्भ में आशंका भर से तेवर चढ़ते और गले कटते देखे गये हैं।

यह एक छोटा-सा उदाहरण है, जिसमें इन दिनों में भी हिमालय क्षेत्र की आध्यात्मिक विशेषता की हलकी-सी झाँकी मिल सकती है। गंगा की पवित्रता हिमालय की महानता तपस्वी व्यक्तियों के महान क्रिया-कलापों की तपश्चर्या के तत्व इस क्षेत्र के वातावरण में अन्यत्र किसी भी स्थान की अपेक्षा अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।

युगशक्ति का उदय करने के लिए ब्रह्मवर्चस साधना की महान प्रक्रिया में ऐसे ही वातावरण और अभीष्ट परिणाम प्रस्तुत कर सकने योग्य बनाने के लिए ही इस आरण्यक को सप्त ऋषियों की सुसंस्कारित तपोभूमि में प्रतिष्ठापित किया गया है।


Quotation

आत्मोत्कर्ष के लिए साधन स्वाध्याय, संयम, सेवा उसी प्रकार आवश्यक है जिस प्रकार शरीर निर्वाह के लिए, भोजन, शयन, श्रम और मल विसर्जन। इन चारों में से एक भी ऐसा नहीं जिसके बिना काम चल सके या एक के बल पर ही आत्मिक प्रगति का लक्ष्य पूरा हो सके।

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संयम बनाम समर्थता बनाम सुनिश्चित जीवन

थोड़ी देर के लिये मनुष्य की बात छोड़ दें और जीव जगत की कल्पना करें तो वहाँ “शक्तिमान के ही जीवित रहने” के अधिकार की पुष्टि होती है। मनुष्य को परमात्मा ने बुद्धि और विवेक के दो विशिष्ट उपहार दिये हैं। इसलिये उसे तो विसंगति श्रेणी में रखना तथा सहयोग और सहकारिता में समृद्धि सुव्यवस्था का पाठ पढ़ाना पड़ेगा, पर यदि वह अपनी इस ईश्वर प्रदत्त विशेषता का अपने जीवन में उपयोग न कर पशुओं का ही पेट-प्रजनन वाला जीवन जीने लगे तो जो व्यवस्थाएं प्रकृति में चल रही हैं, वैसे ही परिणाम से मनुष्य भी बच नहीं सकता।

हाथी संसार का अति सामर्थ्यवान प्राणी है। विश्वास करें या न करें, पर अफ्रीका में मोम्बासा से कीनिया को जो सड़क जाती है उस पर एक प्रवेश द्वार मात्र दो जोड़े हाथी दाँत का बना है। ये दाँत इतने विशाल हैं कि बस और भारी बोझ लदे ट्रक भी उसके नीचे से आसानी से निकल सकते हैं। जिन हाथियों के इतने विशाल और मजबूत दाँत होंगे, उनके शरीर की सामर्थ्य कितनी होगी, उसका अनुमान करना कठिन है। हाथियों में जो सामर्थ्य द्वापर और त्रेता में थी वही आज भी विद्यमान है। उसका कारण प्रकृति का पक्षपात नहीं उसकी अपनी संयम शक्ति है जिसने इस समूची जाति को युग-युगों तक अपनी सामर्थ्य और अपनी सत्ता बनाये रखने योग्य बना दिया है।

एक हाथी युगल अपने जीवन काल में अधिकतम दो या तीन बच्चों को जन्म देता है। यह उल्लेखनीय है कि प्राकृतिक जीवों में प्रायः एक ही बार के सहजीवन से गर्भाधान की क्रिया सम्पन्न हो जाती है। स्पष्ट है कि उसके सहजीवन की संख्या सारे जीवन में अधिकतम पाँच से अधिक नहीं होती। अपनी इस विशेषता के कारण कहीं भी उनकी जनसंख्या के विस्फोट की समस्या नहीं उठी। इतने जंगल कट जाने पर भी उनके लिये कभी खाद्य का अभाव नहीं पैदा हुआ।

यही स्थिति बलशाली दूसरी सभी जातियों की है जिनमें सिंह, चीते, बाघ भी आते हैं। राजहंस पक्षी अपनी इसी प्रवृत्ति के कारण कभी भी संख्या के विस्फोट की स्थिति में नहीं पहुँचा, उसे प्रकृति के अत्यन्त प्रिय उपहार के रूप में सम्मानित किया जाता है।

मछली-मछली है मनुष्य-मनुष्य, पर प्रकृति की दृष्टि में दोनों एक हैं। यदि मनुष्य संयमित जीवन जीने के लिए तैयार नहीं होता तो उसे भी एक दिन ऐसे ही सर्वनाश की तैयारी प्रारम्भ कर देनी होगी। इन दिनों मानवीय सद्भाव में जो व्यापक अभाव दिखाई देने लगा है उसे विनाश पूर्व की चेतावनी समझा जा सकता है।

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अपनों से अपनी बात-


समय दान की श्रद्धांजलियां ‘प्रव्रज्या’ के लिए

युग निर्माण योजना के इस रजत जयन्ती वर्ष में अपने देव परिवार की जागृत आत्माओं से ‘समय दान’ की माँग की है। इस युग निमन्त्रण समझा जाना चाहिए। जहाँ आत्मिक प्रौढ़ता विद्यमान हो वहाँ उसे समय की चुनौती अनुभव किया जाना चाहिए। युग की संधि बेला में सृजन शिल्पियों ने गिद्ध, गिलहरी, रीछ, वानरों जैसी साधनहीन परिस्थितियों में होते हुए भी अपने मनोबल का परिचय दिया है और जिस सम्पदा का हर किसी के पास परिपूर्ण भण्डार है उस समय का मुक्त हस्त से अनुदान प्रस्तुत किया है। साधन सम्पदा हर किसी के पास नहीं होती यह ठीक है, पर यह भी गलत नहीं कि श्रम, समय, मनोयोग, प्रभाव आदि की वास्तविक सम्पदा से सृष्टा ने किसी को भी वंचित नहीं रखा है। धन भी इन्हीं विभूतियों के द्वारा कमाया जाता है। निर्धन भी श्रम और समय की दृष्टि से धनवान होते हैं। दरिद्रता तो कृपणता और अकर्मण्यता को ही कहते हैं। जहाँ उदारता और तत्परता मौजूद हो वहाँ सम्पदा के विपुल भण्डार भरे हुए ही माने जायेंगे। इसी वैभव के सहारे उदारचेता मनुष्यों ने अपने को महान बनाया है और अपनी नाव पर बिठाकर असंख्यों को पार किया है। धनवान बनने के लिए साधनों की आवश्यकता हो सकती है, किन्तु महान बनने के लिए निर्धनता का व्यवधान तनिक भी बाधक नहीं होता। उसके लिए संकीर्ण स्वार्थपरता के बन्धन थोड़े से शिथिल करने भर से इतनी सम्पन्नता सामने आ उपस्थित होती है कि उतने भर में आत्म-कल्याण और विश्व-कल्याण के दोनों प्रयोजन भली प्रकार सध सकें। संसार के समस्त महामानवों की जीवन गाथा इस तथ्य की साक्षी देती हुई हुई देखी जा सकती है।

अपने युग की माँग ‘जागृत आत्माओं से समय दान’ की है। गत अंक में कहा जा चुका है कि उज्ज्वल भविष्य की संरचना का एक ही उपाय है-”घर-घर नव युग का सन्देश पहुँचाने और जन-जन को परिष्कृत दृष्टिकोण अपनाने के लिए सहमत करने के लिए, अलख जगाने के लिए जागृत आत्माओं को समय दान।” रजत जयन्ती वर्ष का अत्यधिक महत्वपूर्ण कदम-परिव्राजक अभियान का पुनर्जागरण है। इसमें ऋषि युग की वानप्रस्थ, सन्त युग की तीर्थ यात्रा और बौद्ध युग की श्रमण संस्कृति का समन्वय है। इसे ‘युग त्रिवेणी’ कह सकते हैं।

बादलों की तरह बरसते और पवन की तरह प्राण बिखेरने के लिए हमें जन-सम्पर्क साधने के लिए कदम बढ़ाने होंगे। दुर्घटनाग्रस्त, रुग्ण, असमर्थ और पिछड़ी मनोभूमि के लोग समर्थों का पता पाने और उनके दरबार तक पहुँच सकने में असमर्थ रहते हैं। समर्थों को ही अपनी सहज करुणा से प्रेरित होकर उनके यहाँ स्वयं ही पहुँचना पड़ता है। सूर्य ही प्रकाश फैलाने के लिए परिभ्रमण करता है। चन्द्रमा को ही चाँदनी वितरण के लिए यायावरों की तरह भटकना पड़ता है। अण्डे से बाहर निकलते ही पक्षी उन्मुक्त आकाश में विचरण करने लगते हैं। पका फल पेड़ को छोड़ देता है और अपने रस से दूसरों का परिपोषण करने और नया वृक्ष उगाने के परमार्थ में जुट जाता है। नदियों की वंश परम्परा यही है। ग्रह-नक्षत्र इसी क्रम को अपना कर सृष्टि का सौन्दर्य बनाये हुए हैं। प्रगति के इसी तत्व ज्ञान को ऋषि परम्परा में प्रमुख स्थान दिया गया है।

जीवन सम्पदा का परिपक्व उत्तरार्ध तो आश्रम व्यवस्था के अनुरूप वानप्रस्थ और संन्यास प्रक्रिया के अन्तर्गत इसी के लिए सुरक्षित है। ऋषियों के गुरुकुल और आरण्यक किसी एक स्थान पर नहीं थे, वे निरन्तर भ्रमणशील रहते थे। ब्रह्मचारी की सांसारिक और वानप्रस्थ की आध्यात्मिक शिक्षा इसी परिभ्रमण प्रक्रिया के अन्तर्गत सम्पन्न होती रहती थी।

भारतीय तत्वदर्शन का, अन्तरात्मा का एक बिन्दु पर दर्शन करना हो तो उसे- ‘‘चरैविति” सूत्र के अन्तर्गत टटोला जा सकता है। शास्त्रकार का यह अनुभव स्वयं सिद्ध है कि जो सोता है उसका भाग्य सोता है। जो बैठा है उसका भाग्य बैठा है। “जो खड़ा है उसका भाग्य भी तनकर खड़ा है और जिसने चलना आरम्भ कर दिया उसकी सर्वतोमुखी प्रगति का पथ-प्रशस्त हो गया।” अन्त में ऋषि कहता है ‘इसलिए चलते रहो, चलते रहो।’ यह चलना सैलानियों और आवाराओं का नहीं वरन् परिव्राजकों का है जिसमें शारीरिक और मानसिक प्रगति के बहुमूल्य आधार जुड़े हैं। व्यक्ति और समाज के उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ भी इसी धर्म प्रयाण में सन्निहित है। परिपक्व व्यक्तित्व के बहुमूल्य लोक सेवी इस प्रव्रज्या परंपरा की खदान से निकलते रहे हैं। उसी सम्पदा से भारत का अतीत देवोपम स्तर का चिरकाल तक बना रहा है। इन्हीं परिव्राजकों ने भारत भूमि को स्वर्गादपि गरीयसी बनाया और समस्त संसार को अपने अजस्र अनुदानों से कृत-कृत बनाया है।

नव युग के अवतरण में भी इसी आधार को अपनाना पड़ेगा। जलते दीपक ही नये दीपक जलाते हैं। साँचे में ही खिलौने ढलते हैं। व्यक्तित्ववान ही परिष्कृत व्यक्तित्व उत्पन्न करते हैं। परिव्रज्या में इन सभी तत्वों का समन्वय है। यदि यह पुष्प प्रक्रिया प्रचलन का रूप धारण कर सके तो गौरव भरे अतीत का वापिस लाने में मनुष्य में देवता का उदय एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने में किसी प्रकार का सन्देह नहीं रह जायगा।

प्रस्तुत रजत जयन्ती वर्ष का स्थिर स्थायी सुनियोजन यही है। यों युगान्तरीय चेतना को विश्वव्यापी बनाने के लिए भाषाई क्षेत्रों में प्रवेश और सामूहिक तप साधना के पुरश्चरण आयोजनों द्वारा सूक्ष्म वातावरण के अनुकूलन का प्रयास भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, पर जिस गंगावतरण के लिए किए गये भागीरथ प्रयास की उपमा दी जा सकती है वह मिशन का परिव्राजक अभियान ही है। इसमें राम की रीछ-वानर, कृष्ण के ग्वाल-बाल, बुद्ध के श्रमण और गान्धी के सत्याग्रही नये युग के अनुरूप नया कलेवर धारण करके नयी परम्परा अपनाते हुए स्पष्टतः देखे जा सकते हैं।

जागृत आत्माओं के नाम भेजा गया महाकाल का युग निमन्त्रण निरर्थक नहीं चला गया है। उसकी सन्तोषजनक प्रतिक्रिया हुई है। जीवन-दानियों की आत्माहुतियाँ शृंखलाबद्ध रूप में बढ़ती ही चली आ रही है। यह वे आत्माएँ हैं जो विभिन्न कार्यों के लिए युग देवता के चरणों पर पूरी तरह समर्पित है। इन बाहर से छोटे किन्तु अन्दर से महान् समर्पित साधकों को प्रशिक्षित किया जा रहा है और उनकी योग्यता तथा मिशन की आवश्यकता के अनुरूप कार्यक्रम बनते बदलते रहे हैं। जीवन दानियों की संख्या 108 होते ही उसे एक प्रकार से विराम दे दिया जायगा।

परिव्राजक अभियान उससे कुछ हलका है, व्यापक बनने और हजारों, लाखों युग शिल्पियों के सम्मिलित होने की उसी में गुंजाइश है। रजत जयन्ती वर्ष में ‘समय दान’ को माँग की गई है। निश्चित रूप से बड़ी संख्या में जागृत आत्माओं की श्रद्धांजलियाँ युग देवता की इस झोली में भी पड़ेंगी। इस भावभरी समय सम्पदा का उपयोग प्रधानतया परिव्राजक प्रक्रिया के अन्तर्गत ही होगा। थोड़े से व्यक्तियों को ही विशेष कामों के लिए शान्ति कुँज रोका जायगा। शेष के जिम्मे एक ही काम रहेगा-नव जागरण के लिए जन-सम्पर्क। जन-सम्पर्क के लिए परिभ्रमण। शाखा संगठनों में नव जागरण उत्पन्न करने युग निर्माण सम्मेलनों और गायत्री पुरश्चरणों को सफल बनाने, श्रमिक वर्ग में मिशन का कार्यक्षेत्र विस्तृत करने जैसे कार्यों में ही इस वर्ष तो अब तक के प्रशिक्षित परिव्राजकों को पन्द्रह-पन्द्रह दिन के लिए भेजा जा रहा है। निकट भविष्य में उनकी अधिक संख्या होने पर देश के कोने-कोने में तथा विदेशों में अधिक समय तक डेरा डालकर रहने और युग चेतना उत्पन्न करने के लिए भेजा जायगा।

जागृति केन्द्रों के निर्माण की बात उन्हीं परिव्राजकों की गतिविधियाँ उन क्षेत्रों में व्यापक बनाने के लिए केन्द्रीय धर्म संस्थान के रूप में बनेगी। जो लोग मात्र गायत्री माता के मन्दिर बनाने के लिए उतावले थे, उन्हें स्पष्ट रूप से इसके लिए मना कर दिया है। मन्दिर पहले से ही बहुत है। जीर्णोद्धार उन्हीं का हो सके तो बहुत है। तीन चौथाई मन्दिर अस्त-व्यस्त पड़े हैं और निहित स्वार्थों की सम्पत्ति बने हुए हैं। उनकी सुव्यवस्था बन सके तो बहुत है। इन्हीं प्राचीन मन्दिरों में गायत्री माता भी प्रसन्नता पूर्वक विराजमान हो सकती हैं। नये बनाने हों या पुराने मन्दिरों में हेर-फेर करके उन्हें अपने उपयोग का बनाना हो, हर हालत में वे जागृति केन्द्र का ही काम करेंगे और उनमें परिव्राजकों के जत्थे ही निवास करते हुए एक निर्धारित क्षेत्र में जन-जागृति का उद्देश्य पूरा करेंगे। समर्थ गुरु रामदास ने भी समूचे महाराष्ट्र में ऐसे ही धर्म संस्थानों की स्थापना करके छत्रपति शिवाजी की पीठ भारी करने वाले साधन जुटाये थे।

विदेशों से भारत में ईसाई मिशनरी हजारों, लाखों की संख्या में आते हैं, पर भारत के एक भी मिशनरी विदेश में नहीं जाता। लेक्चरबाजी करके मन्दिर, आश्रम बनाने के नाम पर प्रवासी भारतीयों को लूट लाने के लिए ढेरों योग शिक्षक और धर्मोपदेशक विदेशों में पहुँचते हैं, पर वास्तविकता तो खुलती है। उस वर्ग के प्रति विदेशों में अश्रद्धा ही बढ़ रही है। आवश्यकता ऐसे लोगों की है जो लम्बे समय तक डेरा डालकर उन क्षेत्रों में भारतीय संस्कृति की जड़ें जमाने का काम कर सकें और अपने आपको उसी में खपा सकें। ऐसे मिशनरी भी इन्हीं परिव्राजकों में से निकलेंगे।

इसी सितम्बर में पन्द्रह-पन्द्रह दिन के दो प्रशिक्षण सत्र लगाकर लगभग 100 परिव्राजक इस वर्ष के आयोजनों में सहायता करने के लिए पन्द्रह-पन्द्रह दिन के कार्यक्रम बनाकर भेजे जा रहे हैं, पर यह तो तात्कालिक आवश्यकता की आपत्तिकालीन पूर्ति हुई। अगले दिनों परिव्राजकों के प्रशिक्षण की वैसी ही व्यवस्था बनेगी जैसी कि बौद्ध विहारों में श्रमणों की शिक्षा सम्पन्न करने के लिए चलती थी। (1) आत्म-साधना (2) ज्ञान संचय (3) सेवा शिक्षण, इन तीनों का ही समन्वय करके एक पाठ्यक्रम बनेगा। उसे छोटे-बड़े प्रशिक्षण सत्र में पूरा कराने की व्यवस्था ब्रह्मवर्चस् आरण्यक में रहेगी, इसके उपरान्त ही प्रशिक्षित परिव्राजकों को कार्यक्षेत्र में युगान्तरीय चेतना उत्पन्न करने के लिए थोड़े या अधिक समय के लिए आवश्यकतानुसार भेजा जाता रहेगा।

युग आह्वान पर समय दान देने के लिए उद्यत युग सृजेताओं का इन दिनों पंजीकरण किया जा रहा है ताकि उनकी संख्या के अनुरूप कदम उठाने की योजना बनाई जा सके। योग्यता के अनुरूप काम सौंपे जा सकें और अगले दिनों जो किया जाना है उसका स्वरूप एवं कलेवर निर्धारित हो सके। यों सभी समयदानी परिव्राजक स्तर के माने जायेंगे। सभी का प्रशिक्षण इसी स्तर का होगा, किन्तु कइयों की शारीरिक क्षमता एवं कार्य की आवश्यकता को देखते हुए उन्हें एक स्थान पर रहकर काम करने के लिए भी कहा जा सकता है, किन्तु वे होंगे अपवाद ही। समयदान का उपयोग परिव्रज्या में होगा आमतौर से यही मानकर चला जाना चाहिए।

परिव्राजकों की स्थिति के अनुरूप उनके तीन वर्ग बनाये जायेंगे।

(1) वरिष्ठ परिव्राजक-जो पूरा समय देंगे और शान्ति कुँज को ही अपना भावी निवास मानकर चलेंगे। ऐसे लोग सपत्नीक भी रह सकेंगे। वर्ष में प्रायः छह-सात महीने जन-सम्पर्क के लिए बाहर रहेंगे। पाँच-छह महीने ब्रह्मवर्चस् में उनकी साधना एवं शिक्षा चलेगी। महिलाओं की शिक्षा का प्रबन्ध पृथक रहेगा। पतियों के बाहर चले जाने पर भी इन महिलाओं का उपयोगी शिक्षण चलता रहेगा। सपत्नीक व्यक्तियों को एक ऐसा कमरा मिल जायगा, जिसमें वे चाहें तो अपना भोजन आप भी बन सकें।

स्थायी रूप से शान्ति कुँज रहने वाले अपने निर्वाह व्यय की व्यवस्था अपने घर से ही बना कर चलेंगे। कुछ कम पड़ता होगा तो अपवाद रूप से ही खर्च की आंशिक पूर्ति मिशन से हो सकेगी। आमतौर से आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी लोगों को ही वरिष्ठ वानप्रस्थ के रूप में शान्ति कुँज रहने के लिए बुलाया गया है।

इस श्रेणी के लोगों में कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जो रहें तो अपने-अपने घर पर ही, किन्तु समीपवर्ती क्षेत्रों में परिभ्रमण करते रहें।

(2) कनिष्ठ परिव्राजक इस श्रेणी के समय दानी हर वर्ष न्यूनतम दो महीने बाहर जाया करेंगे। शेष महीनों में अपने क्षेत्रों में ही काम करेंगे। छुट्टी के दिन इसी कार्य में लगाया करेंगे और हर रोज दो घण्टा समय देने की योजना बना लेंगे।

(3) समय दानी परिव्राजक, जिनकी पारिवारिक स्थिति अधिक समय तक घर छोड़ने की नहीं है वे न्यूनतम दो घण्टा हर रोज और साप्ताहिक छुट्टी जन-सम्पर्क के लिए नियमित रूप से लगाया करेंगे। अपने निवास स्थान में यह दो घण्टे का समय लगाया जा सकता है और समीपवर्ती क्षेत्रों में साप्ताहिक अवकाश में जाया जा सकता है।

उपरोक्त तीनों प्रकार के परिव्राजकों की सूची इन्हीं दिनों तैयार की जा रही है और उन्हें प्रशिक्षित करने के लिए क्रमबद्ध योजना बनाई जा रही है। किसको, कब, कितने समय का प्रशिक्षण प्राप्त करना होगा, इसका निर्धारण उनकी सुविधा को ध्यान में रखते हुए ही करना होगा। उपयुक्त प्रशिक्षण के बिना कार्यक्षेत्र में सही रीति से उतर सकना और परिव्राजक का स्तर गौरव बनाये रह सकना सम्भव न हो सकेगा।

इन दिनों परिव्राजकों के पंजीकरण के लिए कोई अतिरिक्त फार्म छपाया नहीं गया है। सादे कागज पर हाथ से लिखकर यह भेजना होगा कि उपरोक्त तीनों वर्गों में से किसमें प्रवेश लिया जा रहा है। संकल्प कर्ता को (1) संकल्प की तिथि (2) अपना पूरा नाम (3) पूरा पता (4)शिक्षा (5) व्यवसाय (6)जन्म तिथि (7) जाति गोत्र स्पष्ट अक्षरों में लिखकर भेजना चाहिए। इस सूचना के साथ-साथ एक अलग कागज पर विस्तारपूर्वक अपनी वर्तमान स्थिति के सम्बन्ध में कुछ बातें और भी लिखनी चाहिए। (1) शारीरिक स्वास्थ्य (2) मनःस्थिति (3) परिवार का विवरण-शेष उत्तरदायित्वों की जानकारी (4) अर्थ व्यवस्था (5) दुर्गुणों और सद्गुणों की जानकारी (6) समस्याएँ तथा उलझनें (7) अब तक के जीवन में घटी, भली या बुरी महत्वपूर्ण घटनाएँ। (8) कोई विशेष योग्यता यदि हो तो।

संकल्पकर्त्ता का परिचय तथा विवरण प्रस्तुत करने वाले यह दोनों ही कागज अलग-अलग लिखे जाने चाहिए और एक साथ शान्तिकुँज हरिद्वार के पते पर भेजे जाने चाहिए। पंजीकरण इन्हीं आवेदन पत्रों के आधार पर होंगे। परिव्राजक योजना को समग्र और सुव्यवस्थित बनाने के लिए यह जानकारी मिलना आवश्यक है कि युग की पुकार पर किन जागृत आत्माओं में कितना समय देना और उसे जन-जागरण के लिए लगाना स्वीकार किया। प्रस्तुत जानकारी का संग्रह और समय दानियों का पंजीकरण इन दिनों इसी दृष्टि से किया जा रहा है। जिनने समय दान का साहस किया हो वे अपनी जानकारी यथासम्भव जल्दी ही हरिद्वार भिजवा दें।

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कुछ आवश्यक ज्ञातव्य एवं अनुरोध

(1) बसंत पर्व से लेकर अब तक पाँच आयोजन सम्पन्न हो चुके। बसन्त पर्व, गायत्री जयन्ती, गुरुपूर्णिमा पर एक-एक दिन के अखण्ड जप वाले आयोजन सभी समर्थ शाखाओं में उत्साहपूर्वक मना लिये गये। विगत चैत्र की नवरात्रियों के दो दिन वाले साधना सत्र भी उत्साहपूर्वक मनाये गये और यह अंक पाठकों के पास पहुँचते-पहुँचते आश्विन नवरात्रि पर्व पिछले सभी आयोजनों की तुलना में और भी अधिक उल्लास भरे वातावरण में मनाया जा रहा होगा।

इन पर्वों में जिन लोगों ने भाग लिया हो उन्हें इस वर्ष के श्रद्धालु साधक कहना चाहिए। इन सबकी सूची को सामने रखकर नये- पुराने परिजनों का वर्तमान परिवार माना जाय और दस-दस की टोलियों में इनका पुनर्गठन कर लिया जाय। टोली नायक आवश्यकतानुसार पुराने भी रह सकते हैं और सुविधानुसार नये भी बनाये जा सकते हैं। यह टोलियां हर वर्ष आश्विन नवरात्रियों के बाद पुनर्गठित की जाया करेंगी। साहस बढ़ता है तो सामान्य सदस्य टोली नायक की भूमिका निभाने लगते हैं। कुछ परिस्थितिवश कुछ विशेष समयदान नहीं कर पाते, ऐसी दशा में उनका स्थान बदलना ही चाहिए। यह हेर-फेर इस वर्ष आश्विन नवरात्रि के बाद ही कर लिया जाना चाहिए। नई टोलियाँ जिस प्रकार गठित हों, जो नये टोली नायक बनें उनकी सूचना गायत्री तपोभूमि में मथुरा के पते पर भिजवा देनी चाहिए।

(2) गायत्री महाविज्ञान अब से तीस वर्ष पूर्व छपा था। इसके बाद शास्त्रों के अनुसंधान, तपस्वियों के अनुभव तथा साधकों पर किये प्रयोगों के आधार पर गायत्री विद्या की जो नई जानकारी संकलित हुई है वह भण्डागार हर दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण, अनुपम एवं असाधारण है। इसका प्रकाशन ‘युग शक्ति गायत्री’ मासिक पत्रिका के रूप में विगत जुलाई मास से युग निर्माण योजना द्वारा हो रहा है। वार्षिक मूल्य दस रुपया है। इस पत्रिका का प्रकाशन (1) हिन्दी (2) गुजराती (3) मराठी (4) उड़िया (5) अंग्रेजी (6) पंजाबी (7) बंगाली, इन सात भाषाओं में हो रहा है। अगले वर्ष दक्षिण भारत की तीन भाषाओं में भी होने लगेगा।

गायत्री विद्या में जिन्हें अभिरुचि हो, उन सभी के लिए इन पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाली अभिनव जानकारी हर दृष्टि से नितान्त उपयोगी है। वे इनके ग्राहक स्वयं बनें तथा इस महान ज्ञान को व्यापक बनाने के लिए अपने-अपने सम्पर्क क्षेत्र में नये सदस्य बनने का नये उत्साह के साथ प्रयत्न करें।

(3) इस वर्ष देश के कोने-कोने में गायत्री महापुरश्चरणों सहित युग निर्माण सम्मेलन हो रहे हैं। इनमें प्रवचन उद्बोधन के लिए गायत्री तपोभूमि के कुशल वक्ता पहुँचेंगे। इसके साथ ही संगीत गायकों की भी आवश्यकता पड़ेगी। यह आयोजन प्रायः नवम्बर, दिसम्बर, जनवरी, फरवरी, इन चार महीनों में ही पूरे हो जायेंगे। इनमें भेजने के लिए गायक मिशन के पास नहीं हैं। अखण्ड-ज्योति परिवार के कुशल संगीत गायकों में से जो अपना समय इन चार महीनों में जितना दे सकें, वे शान्ति-कुँज के पते पर पत्र व्यवहार कर लें। यह समयदान इन दिनों अधिक आवश्यक प्रतीत हो रहा है। संगीत गायकों का इन पंक्तियों द्वारा विशेष रूप से आह्वान किया जा रहा है।

(4) आश्विन नवरात्रि के अनुष्ठानकर्त्ता अपनी साधना का संरक्षण परिमार्जन करने के लिए समय से पूर्व ही अपने निश्चय की जानकारी शान्ति-कुँज पहुँचा दें। उत्तर की अपेक्षा हो तो जवाबी पत्र भेजें। निजी उद्देश्यों के लिए पत्र-व्यवहार करने वालों से भी जवाबी पत्र भेजने का अनुरोध है।

(5) अब तक घोषित शिविर 10 दिसम्बर 78 तक पूरी तरह भर चुके हैं। अगले घोषित सत्र इस प्रकार हैं।

1. ब्रह्मवर्चस सत्र चान्द्रायण व्रत सहित :-

14 दिसम्बर 78 (मार्गशीर्ष पूर्णिमा) से 12 जनवरी 79 (पौष पूर्णिमा) तक।

2. जीवन साधना सत्र :-

(1) 14 से 23 जनवरी 79 तक, (2) 25 जनवरी से 2 फरवरी तक (3) 3 फरवरी से 11 फरवरी तक। इच्छुक परिजन इन्हीं तिथियों के लिए आवेदन भेजें।

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बाढ़-विभीषिका और हमारे दायित्व

असामान्य संकट का सामना मूर्धन्य मनोबल से किया जाये।

इस वर्ष देश के पाँच प्रान्त-उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, आसाम और दिल्ली बुरी तरह बाढ़ की चपेट में आ गये। इस तरह के प्रकोप पहले भी आते रहे हैं किन्तु जैसी विनाशलीला, इस बार देखी गई वैसी प्रलयंकर स्थिति पहले कभी नहीं देखी गई। अपनी गायत्री तपोभूमि (मथुरा) भी इस आकस्मिक संकट और देव दुर्विपाक से अछूती नहीं रह सकी। अधिकारियों के अनुमान और बाढ़ की घोषित तिथि 8 और 9 सितम्बर थी किन्तु उस से पूर्व ही बाढ़ चढ़ दौड़ी। गायत्री तपोभूमि के आश्रमवासियों को बाढ़ के फैलने का पूर्वाभास था इसलिए निचली मंजिल से सामान हटाने का कार्य 5 सितम्बर को ही प्रारम्भ कर दिया गया था। 6 को जिस गति से जल स्तर बढ़ रहा था उससे भी अधिकारियों का पूर्वानुमान गलत नहीं लगता था, किन्तु यदि प्रकृति मनुष्य की सामर्थ्य में रही होती तो उसे सर्व समर्थ कौन मानता? 6 की रात को ही एकाएक बाढ़ का प्रकोप तेजी से बढ़ा और दूसरे दिन तक गायत्री तपोभूमि 10 फुट गहरे पानी में डूब गई।

इस बीच यज्ञाग्नि को सुरक्षित ऊपरी मंजिल में पहुँचा दिया गया। आफिस के रिकार्ड के अतिरिक्त तैयार साहित्य भी काफी मात्रा में ऊपरी मंजिल में पहुँचा दिया गया। कर्मचारियों को भी नीचे से हटाया गया। कई भाषाओं में पत्रिका प्रकाशन और उसकी संख्या बहुत अधिक बढ़ जाने के कारण कागज का समुचित स्टॉक भरा जाना आवश्यक था। यह कागज नीचे की मंजिल में ही था, बाढ़ के प्रकोप के कारण विषैले जीव-जन्तुओं ने भी इन्हीं डेरों में शरण ले रखी थी इस सब के बावजूद छाती तक पानी में जितना सामान बचाया जा सकता था बचाया गया। पर जल स्तर के एकाएक 5 फुट बढ़ जाने के कारण प्रयास निरर्थक सिद्ध हुए बड़ी संख्या में कागज की रिमें थीं जिन्हें बचाया जाना पूरी तरह असंभव हो गया। प्रेस, और टाइप, चित्र पोस्टर, सीमेन्ट, लाइब्रेरी तथा बहुत बड़ी मात्रा में वह पुस्तकें और पत्रिकायें जिनके फर्में बाइंडिंग के लिए निचले खंडों में भरे हुए थे बाढ़ में न केवल डूब गये अपितु प्रखर जल धार में बह भी गये। बाढ़ इतनी द्रुत और भयंकर थी कि जो टाइप इतना वजनदार होता है कि केस एक आदमी से उठाये नहीं उठता वह भी नावों की तरह से तैर कर निकल पड़ा और बहकर न जाने कहाँ चला गया। यह क्षति लाखों तक पहुँच गई है।

बाढ़ उतर गई है। एक-एक वस्तु का ब्योरा तैयार किया जा रहा है। जो काम में लिया जा सकता है साफ किया जा रहा है। गायत्री तपोभूमि की आर्थिक स्थिति वहाँ पहुँच गई है जहाँ पच्चीस वर्ष पूर्व थी। यह हरिश्चन्द्र की सत्य, प्रह्लाद की भक्ति, दमयन्ती के शील, पाण्डवों के धैर्य और राम की मर्यादा की कठोर परीक्षा जैसी अवस्था थी, जिसका आश्रमवासियों ने पूरे धैर्य और साहस के साथ सामना किया।

परीक्षा का पूर्वार्द्ध समाप्त हुआ है। सामूहिक साझेदारी की परीक्षा अब प्रारम्भ हो रही है। जिसमें मिशन के हर परिजन को अपना कर्तृत्व निवाहना होगा। प्रकृति की यह दण्ड व्यवस्था अकारण नहीं होती यह सभी जानते हैं कि प्रतिष्ठा उन लोगों की होती है, जो परीक्षायें देते और उनमें उत्तीर्ण होते हैं। महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व ऐसे ही लोगों को सौंपे जाते हैं। दुर्बल मनोबल और कठिन चुनौतियों में असफल चाहे व्यक्ति हो,समाज हो अथवा राष्ट्र कभी आगे नहीं बढ़ पाते जबकि यहूदी जैसी जातियाँ और जापान जैसे संकल्पी राष्ट्र महायुद्धों की विभीषिकायें झेलकर भी अग्रणी पंक्तियों में जा खड़े होते हैं। प्राकृतिक विपत्ति से घबड़ाकर भाग खड़े होने वाले लोग तो कायर और प्रतिगामियों की पंक्ति में खड़े होकर अपना, समाज और राष्ट्र सभी का नाम कलंकित करते हैं।

प्रश्न यह नहीं है कि लोक-मंगल के कार्य में जुटे लोगों को भी ईश्वरीय दण्ड का सामना क्यों करना पड़ा? इतिहास साक्षी है कि कोई भी महान कार्य संकटों की चुनौती स्वीकार किये बिना नहीं पूरा हुआ। राम और कृष्ण जैसे अवतारी पुरुषों तक ने महा भयानक युद्ध लड़कर अपने मिशन पूरे किये हैं यदि इस तरह की चुनौतियाँ न आयें तो किसी की भी प्रामाणिकता सिद्ध न हो। प्रज्ञावतार के सम्मुख प्रस्तुत संकट भी उसी इतिहास की पुनरावृत्ति मात्र है उसे अपना कार्य सुनिश्चित सम्पन्न करना है, “अभ्युत्थानं धर्मस्य” का संकल्प पूर्ण होने तक युगान्तर सत्ता चुप नहीं बैठ सकती, “निश्चर हीन करो मही” का प्रण पूरा न होने तक राम विश्राम नहीं ले सकता-सो उसके सहायक रीछ बानरों की सेना को ही अवकाश कैसे दिया जा सकता है। “धर्मयुद्ध की तैयारी अब और भी उत्साहपूर्वक सम्पूर्ण मनोबल के साथ की जायेगी। संकट के कारण वह अधूरा थोड़े ही छोड़ दिया जायेगा।

इस समय गायत्री तपोभूमि का पहिया जाम हो गया है, कागज फिर से मंगाना पड़ेगा, टाइप भरना पड़ेगा, जो मशीनें खराब हो गई हैं ठीक करानी हैं, इमारत को काफी क्षति पहुँची है उसकी भी मरम्मत आवश्यक है। इस रुके हुए चक्के को चलाने के लिए प्रत्येक परिजन को अपनी प्रखरता प्रदर्शित करनी होगी। हम दूसरे बाढ़ पीड़ितों जैसे नहीं जिन्हें दान की अपेक्षा हो तो भी इस समय गायत्री तपोभूमि को उठकर खड़े होने के लिए अर्थ व्यवस्था की तुरन्त आवश्यकता है। यह सहायता इस तरह की जाये :-

(1) युग शक्ति गायत्री के सभी भाषाओं में अधिक से अधिक सदस्य बढ़ाये जायें और उनके चन्दे ड्राफ्ट या मनीआर्डर से तुरन्त भेज दिये जाया करें। सभी पत्रिकाओं का चन्दा 10) वार्षिक के हिसाब से ही लिया जाये। आठ रुपयों में पहले ही पत्रिकायें घाटे में थीं। अन्य भाषाओं की प्रकाशन व्यवस्था बाहर होने से असह्य घाटा पड़ रहा है। जिन लोगों ने आठ रुपये के हिसाब से चन्दे भेजे हैं कृपया वे इसे दिसम्बर 78 तक ही मानें सन् 79 का हिसाब सुविधानुसार समायोजित कर लें।

(2) जिनके पास भी पत्रिकाओं तथा साहित्य का उधार बाकी पड़ा है उनसे उधार राशि तुरन्त भिजवाने का अनुरोध है।

(3) इस वर्ष गायत्री महापुरश्चरणों की शृंखला सारे देश में चल रही है। परिजनों की माँग के अनुसार 1000 मन्त्र लेखन एक रुपया मूल्य वाली मन्त्र लेखन पुस्तकें बड़ी संख्या में छपा ली गई हैं जहाँ-जहाँ महापुरश्चरण प्रारम्भ हो चुके हैं वे मन्त्र लेखन पुस्तिकायें इकट्ठी मँगा लें।

(4) पंजीकृत साहित्य विक्रेताओं और जहाँ भी ज्ञान रथ चल रहे हैं यदि वे अपनी-अपनी आवश्यकता का साहित्य अभी मँगा लें तो पत्रिकाओं के लिये कागज की व्यवस्था करना सम्भव हो जायेगा।

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‘‘मौन-भंग’’

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मौन-भंग (kavita)

बन्दी बहुत रख चुकी अब तक, वाणी! तुम्हें मौन की कारा।

जीवन भर बन्दी रहना ही, वाणी! है क्या धर्म तुम्हारा॥1॥ मौन-व्रतों की गरिमाओं की, वाणी! यूं बदनाम करो मत। निष्क्रिय, दीन, कायरों जैसे, मौन-व्रतों के नाम धरो मत।

वाणी से विष-वमन अगर हो, तभी मौन-व्रत जाता धारा॥2॥ लेकिन अब अनुचित-कृत्यों का, कार्य क्षेत्र बढ़ता जाता हो। जब दुष्कृत्यों का दुस्साहस, छाती पर चढ़ता जाता हो।

कौन कहेगा तुम जीवित हो, जब तक तुम न करो ललकारा॥3॥ व्यक्ति वासनाओं, तृष्णा का क्रीतदास होता जाता है। स्वार्थ-सिद्धि के शूल सहज ही जन-पथ पर बोता जाता है।

पेट और प्रजनन के पीछे, आत्म-रूप, सर्वार्थ क्सिाराडडडड॥4॥ शोषण, उत्पीड़न का क्रम तो मनमाना-मगरूर हुआ है। सबके सुख में आग लगाता, स्वार्थ इस कदर क्रूर हुआ है।

मौन-भंग कर वाणी तुमने बोलो! किस-किस को धिक्कारा॥5॥ जो भी चलता है चलने दो, यही नीति खूंख्वार बनी है। दुष्प्रवृत्तियों, दुष्कृत्यों की हर गतिविधि असिधार बनी है।

मानव-आदर्शों की हत्या सहता कायर-मौन हमारा॥6॥ यह अनीति से समझौते ही नीति, बड़ी घातक होती है। पापों के प्रतिकार न करने की प्रवृत्ति पातक होती है।

संतोषी बन सब सह लेने वाला, मात्र आत्म-हत्यारा॥7॥ शब्द ब्रह्म की प्रतिनिधि हो तुम, वाणी! अब अपना मुँह खोलो। अतुलनीय है शक्ति तुम्हारी, अपनी शक्ति तनिक तो तोलो।

अनुचित और अनैतिक कृत्यों पर टूटो गन विद्युत धारा॥8॥ हर अवांछनीय गति-विधि को बढ़ने से पहले ही टोको। अत्याचारों, अन्यायों को धिक्कारो, ललकारो, रोको।

व्यक्ति और परिवार सुधारो! है नूतन-युग का यह नारा॥9॥ नव-युग-परिवर्तन बेला में, युग-परिवर्तन-मंत्र उचारो। उटान, सम्मोहन, मारन मंत्रों के समुचित–शर मारो।

वांडडडडडडा युग अभिषेक हुआ है, वाणी ने जब मंत्र उचारा॥10॥

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*समाप्त*