मेरा दृढ़ विश्वास है कि मानव समाज को धर्म की आवश्यकता सबसे अधिक है। धर्म सही अर्थों में एक ही है− मानव धर्म। धर्म के नाम पर जो अलग−अलग रूप हम देखते हैं वे वास्तव में अलग−अलग धर्म नहीं, एक ही धर्म के अलग−अलग सम्प्रदाय हैं। आज धर्म के साथ ही साथ इन अलग−अलग संप्रदायों में आपसी सहकार की भी आवश्यकता है।
मैं जानता हूँ कि धर्म और विज्ञान में, धर्म और उच्चतम सामाजिक नैतिकता में धर्म और इसके पृथक−पृथक संप्रदायों के पारस्परिक सहयोगात्मक−समन्वयात्मक भाव में कोई विरोध नहीं है। धर्म का उद्देश्य है इस प्रज्ञा जगत में जहाँ विभेद है, द्वित्व है वहाँ हम में सामंजस्य, समन्वय, एकत्व लाते हुए जीवन में विकसित होते रहने में हमारी सहायता करना।
धर्म का आन्तरिक रूपान्तरण है− एक आध्यात्मिक परिवर्तन है। धर्म हमारे अपने विभेदवादी स्वरों में एकरूपता लाने की क्रिया है। धर्म का यह स्वरूप इतिहास के आरम्भ में ही मिलता आया है। यही इसका मूल रूप है।
धर्म एक आध्यात्मिक परिवर्तन है− एक अन्तर्मुखी रूपान्तरण है। धर्म नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा कर उनकी महत्ता प्रतिपादित करता है। यह अन्धकार से प्रकाश की ओर ले जाता है, आत्मोद्धार की स्थिति में पहुँचाता है।
धर्म का एक जागरण है− एक प्रकार का पुनर्जन्म है।
-डॉ. राधाकृष्णन्
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आध्यात्मिक पुरुषार्थ का लक्ष्य होना चाहिए अन्तरंग की उत्कृष्टता का अधिकतम सम्वर्धन। यही है वह प्रयोग जो व्यक्ति को आत्म−सन्तोष, जन−सहयोग और दैवी अनुग्रह प्रचुर परिमाण में जुटा सकता है। ईश्वर की अनुकम्पा माँगने के लिए किये गये मनुहारों की सार्थकता तभी है जब अनुग्रह को आत्म परिष्कार की प्रचण्ड आकुलता के रूप में जाना जा सके।
दैवी अनुकम्पा इसी रूप में साधकों पर होती रही है। इसी दिव्य अनुदान को विभूतियों की उपलब्धि कहा जाता है। विभूतियों की आन्तरिक विशिष्टताओं की पूँजी जिसके पास जितने परिमाण में बढ़ी−चढ़ी होगी, वह उसी अनुपात में बाह्य जीवन में समर्थ और सुविकसित दृष्टिगोचर हो रहा होगा।
पात्रता के अनुरूप दैवी अनुकम्पा की उपलब्धि का तथ्य आत्मिक प्रगति की अपेक्षा करने वाले हर साधक को भली प्रकार ध्यान में रखना चाहिए। ईश्वर का अनुग्रह इस आधार पर नहीं मिल सकता कि मनुहार उपचार की घुड़दौड़ में कौन कितना आगे निकल गया। बात तब बनती है जब अन्तरंग की उत्कृष्टता का चुम्बकत्व दैव परिवार को अपनी ओर आकर्षित करता है और अपनी पात्रता के आधार पर प्राणियों का ही नहीं देवताओं का भी मन मोहता है।
उपासना कितनी गहरी और कितनी सार्थक रही, इसका प्रमाण परिचय एक ही बात से मिलता है कि आन्तरिक सुसंस्कारिता और बाह्य सज्जनता का कितना विकास सम्भव हो सका। साधना यों कहने को तो ईश्वर की अभ्यर्थना भी कही जा सकती है। किन्तु उसका वास्तविक स्वरूप एक ही है अन्तरंग में अवस्थित देव मानव को जागृत, प्रखर और समर्थ बनाने की आकुलता भरी चेष्टा। साधना का केन्द्र बिन्दु यही है अस्तु सिद्धियों का आधार भी इस उद्देश्य के लिए किये गये पुरुषार्थ को समझा जा सकता है।
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प्रकाण्ड विद्वता और अनुपम शास्त्रीय ज्ञान के कारण अनमीषि को ‘अक्षर महर्षि’ कहा जाता था। वे आश्रम में ब्रह्मचारियों का शिक्षण करते और अपने ज्ञान का निरन्तर दान करते रहते। नागरिक आश्रम के लिए अन्नादि की व्यवस्था जुटा देते।
एक दिन अनमीषि के आश्रम में एक सन्त पधार और प्रार्थना की− “हमें कुछ अन्न−दान दें, जिससे निर्धनों भूखों के लिए सदावर्त चलाया जा सके।” ब्रह्मर्षि ने कहा− ‘श्रीमान्! तेरे पास ज्ञान−धन है उसका ही दान भी करता हूँ। अन्न तो सीमित ही है, उसका दान मैं कैसे करूँ।’
सन्त ने कहा− ‘‘ऋषिव ! ज्ञान का दान तो श्रेष्ठ कर्म है ही, पर व्यक्ति के पास इसके अतिरिक्त भी धन रहता है− अन्न, श्रम आदि। आप विद्यार्थियों के शिक्षण में ज्ञान, समय और श्रम लगाते हैं। परन्तु अन्न भी तो आपके द्वारा उपार्जित धन ही है। उसका भी एक अंश लोक−मंगल के लिए समर्पित होना ही चाहिए। मात्र अपने लिए खाने वाले तो पापी कहा गया है।’’
विद्वान ऋषि को शास्त्र−पुष्टि यह कथन सही लगा। विनयपूर्वक उन्होंने सन्त से क्षमा माँगी और कहा− “मैं आपके इस उपदेश को जीवन में उतारूँगा।”
जीवन−सहचरी से महर्षि ने मन्त्रणा की। उस धर्म परायण ने सहर्ष स्वीकृति दे दी। महर्षि दम्पत्ति नित्य किसी क्षुधा पीड़ित को भोजन कराकर तभी अन्न−जल ग्रहण करते।
लम्बे समय बाद, एक दिन ऐसा हुआ कि कोई भी आश्रम के द्वार पर नहीं आया। प्रतीक्षा में दिन ढल चला। ऋषि−दम्पत्ति को लगा कि आज यह क्रम भंग हो जायेगा। अभी तक तो निरन्तर चल रहा था। अतः वे व्यग्र हो उठे।
किसी सत्पात्र की खोज में ऋषि दम्पत्ति आश्रम के बाहर निकल पड़े। कुछ दूर जाने पर एक वृक्ष के नीचे एक वृद्ध कुष्ठ रोगी पीड़ा से कराहता लेटा दीखा। उसके शरीर में घाव थे। पीड़ा की अनुभूति से ऋषि की करुणा उमड़ पड़ी। वे वृद्ध के पास पहुँचे और आश्रम चलकर भोजन ग्रहण करने तथा सेवा का अवसर देने को कहा।
पीड़ा भरे स्वर में वृद्ध ने कहा “आर्य श्रेष्ठ! मैं चाण्डाल हूँ। आश्रम में कैसे जाऊँ। आप करुणामूर्ति हैं। प्रभु आपका मंगल करें। आप कुछ बची−खुची सामग्री यहीं भेज दें तो मैं खाकर तृप्त हो जाऊँ।”
ऋषि की कोमल भावना नेत्र में अश्रुधार बनकर व्यक्त हो उठी। उन्होंने विनम्र एवं दृढ़ शब्दों में कहा− “तात! हम ऐसी मिथ्या मर्यादाएं नहीं मानते जो मानवी स्नेह सौजन्य में बाधा पहुँचाती हों। हम सभी एक ही परमात्मा के अंश हैं। हममें−आपमें कोई भेद नहीं। आप कृपा कर आश्रम चलें व हमें सेवा का अवसर दें।”
महर्षि दम्पत्ति के आग्रह को टाल पाना वृद्ध के वश में नहीं था। वे दोनों उसे आश्रम ले गये। उसके हाथ−पैर धुलाए और प्राथमिक उपचार किया तथा भोजन कराकर अपना व्रत पूर्ण किया।
रात को गहरी निद्रा की स्थिति में महर्षि को लगा कि प्रभु उनसे कह रहे हैं− “अनमीषि! यही है सच्चा सेवा−धर्म। इसी को अपनाने से आत्मा की प्राप्ति तथा ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। प्रातः जगने पर ऋषि तेज के प्रतीक चिन्ह, गहरी तृप्ति, आन्तरिक आह्लाद एवं प्रसन्नता के भाव छाये हैं।
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उच्चस्तरीय अध्यात्म साधना के भाव पक्ष के तीन चरण हैं- (1) भजन (2) मनन और (3) चिन्तन। तीनों का सन्तुलन ही समग्र साधना का स्वरूप है। तीनों में से एक की भी कमी अन्न, जल और वायु में से एक की कमी होने जैसा है। जीवन−यात्रा के लिये जैसे ये तीनों जरूरी हैं, जीवन साधना के लिए उसी तरह भजन, मनन, और चिन्तन तीनों जरूरी हैं। इन्हें ही गायत्री महामन्त्र के तीन चरणों की सूक्ष्म प्रेरणाओं की त्रिवेणी कहा जा सकता है।
सामान्यतः शरीर की मांसपेशियों पर क्रियाकलापों का तनाव बना रहता है और मन−मस्तिष्क पर विषयों के आकर्षण की उत्तेजनाएं छाई रहती हैं। उच्चस्तरीय भजन के लिए शरीर व मन मस्तिष्क का इन स्थितियों से ऊपर उठना जरूरी है। इसके लिए शरीर को शिथिल और मन को उदासीन करना होता है। थोड़े से अभ्यास से यह सहज सम्भव हो जाता है।
शरीर को शिथिल करने के लिए शिथिलीकरण मुद्रा एवं शवासन का अभ्यास वांछित है। आराम कुर्सी पर या पेड़, दीवार आदि पर टिककर अथवा कोमल बिस्तर का सहारा लेकर शरीर को निद्रानिमग्न यानि निष्प्राण की−सी स्थिति में ले जाना चाहिए। ताकि शरीर पूर्ण विश्राम की स्थिति में रह सके। मानसिक दृष्टि से इस स्थिति का ध्यान भूमिका कहा जाता है। शरीर के शिथिलीकरण के बाद ही ध्यान सम्भव है। पद्मासन, बुद्ध पद्मासन जैसे तनाव उत्पन्न करने वाले आसनों से अन्य प्रयोजन तो सिद्ध हो सकते हैं, पर ध्यान में कठिनाई हो जाती है। ध्यान के लिए मांसपेशियों की शिथिलता जरूरी है।
शारीरिक शिथिलता के साथ ही मन को रिक्त करना आवश्यक है। इसके लिए मन में शून्यता को परिव्याप्त करने का अभ्यास करना होता है। इसकी सहज विधि यह है कि प्रलयकाल की स्थिति का स्मरण किया जाय। बाजार में बिकने वाले प्रलय दृश्य− वाले चित्रों का सहारा सजीव कल्पना के लिए लिया जा सकता है। मन को अधिकाधिक शान्त बनाते हुए सोचा जाए कि प्रलयकाल की तरह नीचे निस्सीम जलराशि की अनन्त नीलिमा है और ऊपर नील आकाश का निरतिशय विस्तार है। कोई भी व्यक्ति या पदार्थ कहीं नहीं। सर्वत्र परम शान्तिदायिनी नीलिमा एवं नीरवता ही व्याप्त है। मन को आकर्षित करने लायक कहीं कुछ बचा ही नहीं है। परमशून्यता की इस स्थिति में अपनी निर्मल चेतना कमल−पत्र पर शिशु की तरह लेटी तैर रही है। जैसे बालक अपने ही पैर का अंगूठा पीता है, वैसे ही आत्मचेतना स्वरस का पान कर रही है। बस, चारों ओर परम शान्ति है। अभ्यास में यह दृढ़ होगा। क्रमशः प्रगाढ़ मानसिक शान्ति की स्थिति बनती जाएगी। यही भावपरक ध्यानयोग का पूर्वार्ध है। ऑपरेशन के समय हिलना−डुलना प्रतिबंधित रहता है। एक का रक्त जब दूसरे के शरीर में प्रविष्ट कराया जाता है, तो भी हिलना−डुलना वर्जित होता है। भजन के समय भी ऐसी ही शान्त स्थिति आवश्यक है।
इसका अगला चरण यह है कि सर्वसमर्थ, सर्वशक्तिमान, सर्वोत्कृष्ट परमेश्वर को अपनी सम्पूर्ण सत्ता में अवतरित होते हुए अनुभव किया जाय। ब्रह्म−चेतना का ब्रह्माण्डव्यापी दिव्य प्रकाश, समुद्र लहरा रहा है। अपनी स्थिति उसमें निमग्न एक मछली जैसी ही तो है। विराट चेतना समुद्र की हम सब मछलियाँ हैं। भावना की जाए कि (1) वह दिव्य आलोक अपने रोम−रोम में भरा रहा है। इससे अंग−अंग ओज, शक्ति एवं संयम से परिपूर्ण हो उठा है। (2) यही परम प्रकाश मस्तिष्क में विवेक और प्रखर प्रतिभा के तेजस् के रूप में चतुर्दिक् परिव्याप्त हो रहा है। (3) अन्तरात्मा के संस्थान में, हृदय−क्षेत्र में यही आलोक दिव्य भावना एवं आनन्द के प्रवाह की तरह अनुभव किया जाना चाहिए। परम ज्योति की प्रदीप्त अग्नि अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों शरीर में समाविष्ट है और उससे हमारे तीनों शरीर आलोकित हो रहे हैं, ऐसा निरन्तर अनुभव करना ही ध्यान विद्या है।
प्रशांत चित्त में इस आलोक साधना के अभ्यास के साथ ही मनन साधन भी वांछित है। ये सभी भावनात्मक साधनाएं हैं। जिनके लिए ब्राह्ममुहूर्त का अनिवार्य बन्धन नहीं। सुविधा और समय के अनुसार इसे आगे−पीछे भी किया जा सकता है पर एकान्त स्थान तथा शान्त वातावरण जरूरी है, तभी अभीष्ट परिणाम सम्भव है। आंखें बन्दकर विचार किया जाए कि हमारा शरीर मृत अवस्था में पड़ा है। प्राण रूपी हंस इसमें से निकलकर किसी ऊँचे स्थान पर बैठा है। वह इस शव का परीक्षण कर रहा है। एक−एक अंग उघाड़कर, उलट−पलटकर देख रहा है। विचार करना चाहिए कि यह शरीर कपड़ों से भरी एक पोटली जैसा ही है। इसकी सामयिक उपयोगिता है। प्रत्येक अंग की समुचित देखभाल व सही उपयोग ही इसे स्वस्थ रखता है। अन्ततः तो इसे नष्ट होना ही है। इस शरीर में मस्तिष्क रूप यह डिब्बा है, जिसमें चार आभूषणों की तरह मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार है। अहंकार ही मैं-पन की भावना में सबको समेटे है। बुद्धि हमारे अपने संस्कारों व जानकारी की प्रतिक्रिया मात्र है। मन भाव सम्प्रेषण का माध्यम है। विषयों के प्रति इसकी उछल−कूद की निरर्थकता व चपलता को समझा जाना चाहिए मृत्यु की अनिवार्यता का स्मरण करना चाहिए और अपने जीवन−लक्ष्य तथा वर्तमान क्रियाकलापों की तुलना की जानी चाहिए। अपने वास्तविक चेतना स्वरूप, जीवन−लक्ष्य, शरीर और आत्मा के संबंधों को स्वरूप, श्रेयस और प्रेयस का अन्तर इन सबका समुचित विचार करना चाहिए।
इस तरह ये दो विधियां हुईं। पहली ध्यान−साधना द्वारा आत्म सत्ता के ब्रह्मसत्ता में विलय की अनुभूति तथा अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को ब्रह्म−चेतना से ओतप्रोत अनुभव करना। दूसरी मनन द्वारा आत्मबोध अर्थात् जीवन−लक्ष्य का स्मरण, अपनी ऐन्द्रिक तृष्णाओं और आत्मिक आवश्यकताओं का अन्तर समझना। दोनों अभ्यास जितनी अधिक गहराई से किए जाएंगे तथा भावना जितनी ही प्रगाढ़ वह गहरी होगी अन्तर्ज्योति उतनी ही प्रखर−प्रदीप्त होती चली जाएगी। इससे श्रेष्ठतम उपलब्धियाँ भी सरल होती जाएंगी।
ध्यान और मनन के साथ ही तीसरे चरण चिन्तन का भी आश्रय आवश्यक है। शारीरिक और मानसिक गतिविधियों को उत्कृष्ट आदर्शों के आधार पर अनुशासित सन्तुलित रखना ही चिन्तन का उद्देश्य है। इसके लिए प्रातः उठते ही दिनभर को अपने लिए जीवन का एक अनुपम उपहार मानना और उसके सर्वोत्तम सदुपयोग का संकल्प कर तदनुरूप योजना बनाना अनिवार्य है। माना जाय कि एक ही दिन के लिए यह जन्म है और आज ही रात को मृत्यु देवी की गोद में विश्राम करना है। अतः समय की सम्पदा और भावों के वैभव का श्रेष्ठतम समायोजन कर लिया जाना चाहिए, ताकि इस एक दिन के जीवन का अधिकाधिक लाभ लिया जा सके और इस मार्ग की सभी बाधाएं दूर की जा सकें। ‘हर दिन नया जन्म, हर रात नई मृत्यु’ का तथ्य सामने होने पर यह कुछ कठिन न होगा। प्रातःकाल जागरण से रात्रिकालीन विश्राम तक की समयचर्या का निर्धारण किया जाना चाहिए। जिन पर परिवार को जिम्मेदारी है, उन्हें आठ घण्टा कमाने के लिए, छह घण्टा सोने के लिए, चार घण्टा नित्य नैमित्तिक कामों के लिए और शेष 6 घण्टे में से 2 घण्टे अन्य फुटकर घरेलू कामों का भ्रमण, पारिवारिक जनों में सम्पर्क आदि के लिए लगाना चाहिए। बाकी बचे 4 घण्टे अपने जीवनोद्देश्य की पूर्ति में लगाना चाहिए।
इनमें से प्रत्येक कार्य के पीछे गहरी भावनात्मक होनी अनिवार्य है, तभी कर्म उत्कृष्ट स्तर का एवं अधिक कुशलता के साथ सम्पन्न होगा। प्रत्येक क्रिया-कलाप के पीछे उच्च आदर्शों की प्राणवान भावनाएं रहीं, तो मनोगत आकांक्षा भी तीव्र व व्यवस्थित रहेगी। ऐसी स्थिति में शारीरिक अनुशासन भी जबर्दस्त रहेगा ही और कर्म समग्र प्रखर तथा सही शुद्ध होगा। ऐसे कर्म ही सत्−संस्कारों के आधार बनते हैं।
चिन्तन की उत्कृष्टता इसी में है कि अपनी ही तरह औरों को भी ईश्वरीय−चेतना से समान मात्रा में सम्पन्न मानकर उनके प्रति सम्मान, स्नेह और कर्त्तव्य की भावना रखी जाए। मानसिक प्रतिक्रियाएं हमारी अपनी हलचलें हैं। ऐसा स्मरण रहे, तो दूसरों से व्यवहार में उत्तेजना की बजाय संयम ही रहेगा। उत्तेजना का कारण हमारी अपनी मानसिक दुर्बलता होती है और उसे हम विषयों, पदार्थों, सहकर्मियों या अन्य व्यक्तियों पर आरोपित कर देते हैं। इसकी प्रतिक्रिया में दूसरी ओर से भी उत्तेजना ही होती है। जबकि संयमित व्यवहार की प्रतिक्रिया शिष्टता और सौजन्य के रूप में हमें लाभ पहुँचाती है। अपनी पत्नी को अपने संरक्षण में रखी, ईश्वर की पुत्री, बच्चों को ईश्वरीय उद्यान के सुरभित पुष्प और अन्य परिजनों को भी इसी तरह ईश्वरीय अनुग्रह के भरपूर चेतना−पुंज मानकर अपने को उनके प्रति कर्त्तव्य−निर्वाह का अवसर अपनी ही कसौटी के लिए दिया गया माना जाय, तो फिर हमारे व्यवहार में प्यार तो भरपूर होगा, किन्तु मोह नहीं। तब परिजनों के अप्रीतिकर आचरण के प्रति करुणापूर्ण समझदारी और सहिष्णुता ही रहेगी। उनके दोषों के सुधार का अपनी शक्ति भर प्रयास तो अवश्य ही करणीय प्रतीत होगा, किन्तु उसमें न तो व्यर्थ का दर्प होगा, न ही आवश्यकता खीझ और न ही आसक्तिजन्य उत्तेजना तथा परिणामस्वरूप हताशा ही मन को क्षुब्ध करेगी। सद्गुणों के विकास−अभिवर्धन का प्रयास तो अपना व परिजनों का भी वांछित है, किन्तु उस दिशा में उपस्थिति कठिनाइयों से उद्विग्नता का कोई कारण नहीं। ऐसी विकसित मनःस्थिति में शिशु−पोषण, परिवार−पालन उद्वेग और चिन्ता का भण्डार नहीं, गृहस्थयोग का, सेवा साधना का ही अवसर उपहार प्रतीत होगा। स्नेह, सेवा, प्यार की भावनाओं से भरपूर, वातावरण वाला परिवार सम्वेदना, कोमलता नेतृत्व, सुसंचालन, सौजन्य, सद्भाव, सुव्यवस्था, सन्तुलन, समन्वय आदि योग्यताओं के विकास का माध्यम बनता है। यही गुण जीवन−समर में उच्चतर उपलब्धियों के आधार बनते हैं। सुव्यवस्थित परिवार निश्चय ही तपोवन हैं और उनके निवासियों को तपोवन में घर बनाने की कोई आवश्यकता नहीं हैं।
अपनी आन्तरिक इच्छाओं−आकांक्षाओं के प्रति भी वैसी ही विवेक−बुद्धि आवश्यक है। जीवन के प्रयोजन को निश्चित कर, फिर उसमें विपरीत इच्छाओं का अनुवर्तन, मार्ग का भटकाव और समय, श्रम तथा शक्तियों−साधनों का दुरुपयोग ही लगेगा, अतः उधर मन वैसी तेजी से न खिंचेगा। पुनःपुनः स्मरण चिन्तन, मनन से तो मन में अवांछित इच्छाओं के प्रति विरक्ति ही दृढ़ हो जाएगी। शरीर की आवश्यकताएं प्रयोजन−पूर्ति में साधक या बाधक होने की कसौटी पर कसी जाएंगी। ईश्वरीय प्रयोजन का वाहन शरीर सुदृढ़−स्वस्थ रहे, यही आवश्यक है।
भजन, मनन और चिन्तन की त्रिवेणी में दिनभर सतत् स्नान करते हुए किए गए कर्म की वास्तविक अध्यात्म साधना का आनन्द अनुदान देते हैं। रात्रि को सोते समय बिस्तर पर जाने पर दिनभर के कर्तव्यों का शक्ति एवं निष्ठा में निर्वाह करने का स्मरण किया जाय। शेष रहे कार्य तथा दायित्व ईश्वर को सौंपकर पूर्ण निश्चिन्तता के साथ अनासक्त कर्मयोगी की तरह निद्रा−मृत्यु की गोद में विश्राम किया जाय। यही ‘हर दिन नया हर जन्म, हर रात नई मृत्यु’ सूत्र पर आचरण की विधि है। यही श्रेष्ठतम साधना है।
ढीली−पोली दिनचर्या ही विकृतियों−विभ्रान्तियों का क्रीड़ास्थल बनती है। जागरूक व सतर्क मनःस्थिति से तो दुष्ट दुर्भाव दूर ही भागते हैं। यदि आक्रमण का दुस्साहस भी कभी करें, तो चिन्तनशील व्यक्ति के पास उनके विरोधी सद्विचारों की प्रचण्ड सेना तैयार रहती है। दुर्भावनाओं−कुविचारों के अनुरूप आचरण से होने वाली हानि तथा उनके विरोधी सदाचार के पालन से प्राप्त शान्ति−सन्तोष और शक्ति का गम्भीर ऊहापोह सदा ही सत्पथ पर ले जाता है। सत्पथ पर सतत् यात्रा से ही सदा श्रेष्ठ उपलब्धियाँ करतलगत होती रही हैं और होती रहेंगी।
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‘तात!’ उल्हाने भरे स्वर में आयुष्मान् विलाड ने पिता से कहा− ‘‘स्नातक मेरा उपहास करते हैं, कहते हैं तुम्हें कोई अर्थवसु का पुत्र कहेगा? तुम्हारी वेशभूषा, तुम्हारा जीवन स्तर तो हम निर्धन वर्ग से किसी भी तरह ऊँचा नहीं− सच तो आपने आज तक कभी भी मेरी अभियाचनायें पूर्ण नहीं कीं। आर्य! आखिर आप हमारी महत्वकांक्षाओं का अनादर क्यों करते हैं?”
तभी ज्येष्ठ पुत्र वधू उधर आ पहुँची, कहने लगीं− विलाड सच ही तो कहते हैं आर्य श्रेष्ठ। आज ग्राम्य ललनाओं ने मुझे जो कहा, उसे सुनकर तो मेरा अन्तःकरण ही कराह उठा है। वे कहती हैं तिर्यग! तुम्हारे श्वसुर इतने धनाढ्य हैं, वे चाहें तो तुम्हें नख-शिख से आभूषण धारण करा सकते हैं किन्तु आज वह सावित्री को अर्चना के समय भी तुम्हारे परिधान तक अति−सामान्य गृहणी से अधिक सुन्दर नहीं आभूषणों की तो बात ही नहीं है।
ऐसे-ऐसे उपालंभ अर्थवसु ने सहस्रों बार सुने हैं, झेले हैं किन्तु उन्होंने कभी कोई उत्तर नहीं दिया। एक क्षण के लिए अधर स्मित हुए हैं और दूसरे ही क्षण वे शीतकाल की अन्धकार−आवेष्ट रजनी की तरह मौन हो गये हैं। यह ठीक है कि उनने कभी किसी का प्रतिवाद नहीं किया, किन्तु सच यह भी है कि वणिक वृत्ति में व्यापक लाभ के अन्तर भी कभी वैभव का जीवन न स्वयं जिया, न अपने कुटुम्बीजनों को विलासी होने दिया। सलज्ज राजहंसिनी के प्रणय व्यापार की तरह किसी ने यह तक नहीं जाना कि अर्थवसु किस लिए संग्रह करते हैं, किसके लिए संग्रह करते हैं। यदि इतने पर भी कुछ सच था तो यही कि उन्होंने परिजनों के पालन पोषण, शिक्षा दीक्षा वेशभूषा के सामान्य नागरिक कर्तव्यों की कभी अवहेलना नहीं की, इसीलिए कभी किसी ने भी उनको असम्मानित करने का साहस नहीं जुटाया।
परिवर्तन और परिवर्तन प्रकृति का यह रथ चक्र मानव जीवन को कभी सौरभसिक्त आनन्द के आंचल में सुला देता है तो कभी पीड़ा के गहन काँटों भरे कतार खण्ड में ला खड़ा करता है। इस परिवर्तन का ही नाम सृष्टि है, गति है, जीवन है। काल के इन थपेड़ों से आज तक न बचा है कोई राव और न कोई रंक।
नियति का यह क्रम इस वर्ष अत्यन्त क्रूर बनकर आया। ज्येष्ठ की तपन से झुलसे हृदय बारम्बार अम्बर की ओर निहारते, बलाहकों की अभ्यर्थना करते किन्तु अषाढ़ सूखा निकल गया। चित्रा, अश्लेषा, पुनर्वस, स्वांति सारे ही नक्षत्र यों ही निकल गये धरती के कण्ठ में एक भी बूँद न गिरी तो फिर नहीं ही गिरी, राजगृह श्मशान की-सी भयंकरता में परिणत हो गया। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गया और लोग भूखों मरने लगे।
अब तक जिन अर्थवसु की आँखों में शून्य क्रीड़ा किया करता था अब वही दृग−द्वय मानवीय संवेदना से सिक्त हो उठे हैं, राजगृह के नागरिकों के लिए अर्थवसु ने अपने द्वार खोल दिए सारी सम्पत्ति गतिमान हो उठी। जिन अर्थवसु को किसी ने एक कौड़ी खर्च करते नहीं देखा था, युग पीड़ा ने उनके हृदय कपाट पूरी तरह खोल दिये, उनका सर्वस्व स्वाहा हो गया किन्तु उनके हृदय ने कभी भी किसी को यह अनुभव नहीं होने दिया कि राजगृह असहाय है, अनाश्रित है।
भगवान बुद्ध ने सुना तो वे गदगद हो उठे। जिनके दर्शनों के लिए जन−समुदाय सागर की तरह लहरा उठता, वही आज स्वयं ही अर्थवसु के दर्शनों के लिए चल पड़े। तिर्यग ने पुकारा! आर्य श्रेष्ठ! उठिये! तथागत आज आपके द्वार पर आये हैं। अर्थवसु ने आँखें खोली, उनने इतना भर देखा कि दैदीप्यमान सूर्य उनके सम्मुख उपस्थित हैं और उनकी आत्मा उसमें समाती चली जा रही है। तथागत की आँखें भर आयीं− उनके मुँह से इतना ही निकला। अर्थवसु तुम सच्चे अर्थों में अपरिग्रही थे, तुम्हारे त्याग ने आज सारे राजगृह की रक्षा कर ली। इसी सन्तोष भरे आनन्द में अर्थवसु की आत्मा शून्य में विलीन हो गई।
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मोटेतौर से प्रतीत होता है कि विज्ञानी और अध्यात्म के आधारभूत सिद्धान्तों में मौलिक अन्तर है इसलिए उनका समन्वय कदाचित कभी भी सम्भव न हो सकेगा। अन्तर को देखकर प्रस्तुत निष्कर्ष पर पहुँचने वाले मनीषियों का कहना यह है कि विज्ञानी आग्रही नहीं है वह तथ्यों को खुले मस्तिष्क से तलाश करता है। पूर्वाग्रहों से मुक्त रहता है और जब जो प्रामाणिक आधार मिलते हैं उनके सहारे सिद्धान्तों का निर्धारण करता है। इसके विपरीत अध्यात्म में पूर्वाग्रहों की ही भरमार है। तर्क के लिए गुंजाइश नहीं है। शास्त्र अथवा आप्त पुरुष ही सब कुछ हैं। उन्हीं की खींची रेखाओं की परिधि में घूमने के लिए आर्थिक अथवा अध्यात्मवादी का सीमित रहना पड़ता है। तर्कों के झरोखे में झाँकने वालों की धार्मिकता को पतिव्रत को तोड़ने वाला घोषित कर दिया जाता है। ऐसी दशा में तथ्यों का निर्धारण करने को जब तक दोनों की स्थिति एक न हो तब तक समन्वय कैसे सम्भव होगा? या तो विज्ञान अपने तथ्यों को प्रामाणिकता देने वाली प्रवृत्ति छोड़े अथवा धर्म को परम्परा आग्रह अपनाये रहने से विरल किया जाय तभी वह स्थिति बनेगी जिसके आधार पर दोनों को साथ चलने अथवा सहयोग करके सत्य की शोध में समन्वित मार्ग अपनाने की बात बन सके।
कथन को सच मानने को मन तभी करता है जब दोनों की मूल प्रकृति को समझने में भ्रम बना रहे। यह अड़चन उथले चिंतन से सही मालूम पड़ती हैं और उस समय भी ठीक लगती है जब धर्म पक्ष के विकृत रूप को ही उसका आधारभूत सिद्धान्त मान लिया जाय। गहराई में उतरने पर धर्म और विज्ञान दोनों ही ऐसे तथ्यों पर आधारित दीखते हैं, जिन पर विश्वास करने या मिलजुल कर साथ-साथ न चल सकने की आशंका करने का कोई कारण नहीं हो।
विकृतियाँ तो न्याय और कानून के क्षेत्र में भी रहती हैं। इससे उनकी उपयोगिता या आवश्यकता इन्कार नहीं किया जा सकता। उत्पादन और व्यय में भी आये दिन बदमाशियाँ चलती हैं इसी कारण कार्यों को बन्द तो नहीं कर दिया जाता। धार्मिक क्षेत्र में निहित स्वार्थों को घुस पड़ने और अवांछनीय प्रथा परम्परा पर चला देने का अवसर मिल जाता है जब कि उस के अनुयायी तर्क और तथ्यों को जानने की आवश्यकता नहीं समझते। यदि वे धर्माध्यक्षों के उद्देश्य और प्रतिपादनों के फलितार्थ पर विवेकपूर्ण विचार करना सीखें तो फिर क्षेत्र की उपयोगिता भी विज्ञान क्षेत्र की तरह ही अक्षुण्ण बनी रह सकती है। धर्म की मूल प्रवृत्ति अन्धविश्वासी या दुराग्रही नहीं है। जिस श्रद्धा तत्व के आधार पर अंधेरगर्दी फैलती रहती है उसका भी आधार श्रेष्ठता के साथ जुड़ा हुआ है। श्रेष्ठता के प्यार को श्रद्धा की अवधारणा जहाँ भी करनी हो वहाँ सर्वप्रथम श्रेष्ठता है या नहीं इसको कसौटी पर कसना होता है। यह परख जागृत रखी जा सके तो श्रद्धा के शोषण की सम्भावना न रहेगी और धर्म को अवैधानिक तर्क विरोधी अथवा अप्रामाणिक कहे जाने का अवसर न आने पावेगा।
धर्म भी एक विज्ञान है। चेतना को अनुशासित रखना और उसे प्रयोजनों में नियोजित करना उसका उद्देश्य है। चेतना की सामर्थ्य प्रकृति क्षेत्र में भरी पदार्थ, सम्पदा एवं शक्ति धाराओं से किसी भी प्रकार कम नहीं है। प्रकृति सम्पदाओं की खोज निकालने और उनका सदुपयोग कर सकने की क्षमता पदार्थों में नहीं है। वह तो चेतना ही कर सकता है। विचारणाएं, भावनाएं और प्रवृत्तियाँ चेतना की ही चमत्कारी धाराएं हैं। पदार्थों की जड़ता को चेतना जैसी सुखद स्थिति में उभार लाने का श्रेय चेतना को ही है। सर्व विदित है विचार संस्थान की उत्कृष्टता से ही व्यक्ति का अन्तरंग आनन्दित और बहिरंग समुन्नत बन पाता है। उसमें त्रुटि रहेगी तो विकृत चिन्तन के फलस्वरूप मनुष्य उद्विग्न और दरिद्र ही बना रहेगा। पिछड़ेपन और शोक संकट से उसे छुटकारा मिल ही न सकेगा। भले ही परिस्थितियाँ उसके अनुकूल हों अथवा साधनों का बाहुल्य सामने प्रस्तुत हो। व्यक्ति को सुविकसित और समाज को सुव्यवस्थित बनाये रहना इस बात पर निर्भर है कि लोक चेतना का धारा प्रवाह किस दिशा में चल रहा है। इन तथ्यों पर ध्यान देने से धर्म चेतना को वैज्ञानिक उपलब्धियों की तरह ही श्रेयस्कर माना जाएगा। इतनी बड़ी उपयोगिता यदि अवैज्ञानिक, अप्रामाणिक मानी जाने की स्थिति में बनी रहे तो उसे मनुष्य जाति का दुर्भाग्य ही कहा जायगा। धर्म को प्रखर बनाये रहने के लिए उसके साथ यथार्थवादी विज्ञान दृष्टि का जुड़े रहना आवश्यक है। यह कार्य दोनों के समन्वय से ही हो सकता है।
ठीक इसी प्रकार विज्ञान को उस भाव सम्वेदना को अपनाकर चलना होगा जो विचार संस्थान की नहीं भाव संस्थान की उत्पत्ति कही जा सकती है। विज्ञान को मात्र बुद्धिवादी बने रहने से भी उसकी उपलब्धियाँ तो मिलती रह सकती हैं, पर उपयोगिता नष्ट हो जायगी और वे सूत्र सूख जायेंगे जहाँ से अन्वेषणों के मूलभूत स्फुरण का उद्भव होता है।
आविष्कारों के बारे में समझा यह जाता है कि वे प्रयोगशालाओं की देन है अथवा वे बुद्धिमत्ता के कारण उपलब्ध हुए हैं, पर बात इतनी उथली नहीं है। प्रत्येक आविष्कार की सम्भावना का आरम्भिक विचार अंतःस्फुरणा से उठा है। बुद्धि का काम पूर्व प्रचलनों का ऊहापोह करना है। पूर्ववर्ती अस्तित्व के बिना उसकी दौड़ आगे बढ़ती ही नहीं। मस्तिष्कीय संरचना में ऐसे विचारों के उद्भव की गुंजाइश नहीं है जिन्हें मौलिक कहा जा सकेगा। विज्ञान का विस्तार, बुद्धि और साधन सामग्री के सहारे होने की बात सच है, पर यह यह सच नहीं है कि आविष्कारों से भी पूर्व अन्तःकरण में उठने वाली अन्तःस्फुरणाएं भी मस्तिष्क ही उगा सकता है। यदि ऐसा होता तो पूर्ववर्ती बुद्धिमानों ने उन सब आविष्कारों को बहुत पहले ही कर लिया होता जो अब क्रमशः प्रत्यक्ष होते चले जा रहे हैं। न्यूटन से पहले भी चिरकाल से पेड़ों पर से फल जमीन पर गिरते हुए मूर्खों से लेकर विद्वानों तक सभी देखते रहे हैं, पर उतने भर संकेत से पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति का आभास पाना विश्वास करना और अन्ततः उसे खोज निकालना न्यूटन की बुद्धि का नहीं अन्तःस्फुरणा का आधार है।
इसी प्रकार अन्यान्य सभी आविष्कार अपने प्रारम्भिक रूप में जब चिन्तन क्षेत्र में उतरे तब उनका अवतरण स्थल उस परत से कहीं गहरा था जिसे मस्तिष्क सम्पदा कहते हैं। यह अन्तःकरण ही है जो न केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों का आधारभूत कारण है, वरन् मानवी व्यक्तित्व की उत्कृष्टता और सामाजिक संगठनों का उद्गमस्रोत भी यही है। यदि अन्तःकरण तत्व को मनुष्य से छीन लिया जाय तो उससे न वैज्ञानिक शोधों की आरम्भिक अनुभूति पाने की क्षमता रहेगी और न पशु आचरणों से ऊँचे उन आधारों के अपनाने की आशा की जा सकेगी, जिसे मानवी संस्कृति कहा जाता है। सर्वतोमुखी प्रगति का श्रेय जितना शारीरिक और मानसिक श्रमशीलता को दिया जाता है उससे भी अधिक संस्कृति को मिलना चाहिए।
संस्कृति भी वैज्ञानिक उपलब्धि है। अन्तःस्फुरणा उत्पन्न करने वाला अन्तराल प्रकृति प्रदत्त अनुदान नहीं है वरन् विज्ञान की तरह ही मानवी पुरुषार्थ का प्रतिफल है। धर्म तत्व को विज्ञान की आत्मा में गुंथा देखा जा सकता है। ऐसा न होता तो वैज्ञानिकों में भी स्वार्थपरता और विलासिता जैसे दुर्गुण छाये रहते और वे शोध प्रयत्नों में योगियों जैसी तत्परता और तन्मयता का समावेश न कर सके होते। विज्ञानी में योगी और तपस्वी के दोनों लक्षण पाये जाते हैं। वह सत्य का शोधक भी होता है और व्यक्तिगत, ललक लिप्साओं से ऊँचा उठकर शोध प्रयत्नों में दत्तचित्त रहने वाला तपस्वी भी होता है। इन प्रयासों में उसे जो संकट सहने और खतरे उठाने पड़ते हैं वे चेतना की उत्कृष्टता के, बिना संभव नहीं हो सकते। विज्ञानी भले ही ईश्वरवादी नहीं, धार्मिक तो निश्चित रूप से होता है। भले ही वह किसी मत, सम्प्रदाय का अनुसरण न करता हो।
धर्म के बिना विज्ञान अपंग है और विज्ञान के बिना धर्म अन्धा। दोनों परस्पर सहयोग न करेंगे तो वे अपूर्ण ही बने रहेंगे और उतने उपयोगी सिद्ध न हो सकेंगे जितना कि मिलजुलकर काम करने पर हो सकते हैं। दोनों के बीच जो दिशा विरोध दीखता है वह सतही है। गहराई तक उतरने पर भिन्नता घटती और समता बढ़ती जाती है। गंगा और यमुना का मध्यान्तर लम्बा है पर गंगोत्री और यमुनोत्री की दूरी कम है यदि हिमालय की भीतरी जल सम्पदा तक पहुँचा जा सके तो प्रतीत होगा कि दोनों के उद्गम भिन्न स्थानों पर होते हुए भी उनकी धाराएं एक ही विशाल जलाशय से अनुदान प्राप्त करती हैं। धर्म और विज्ञान की प्रवाहमान धाराएं अलग−अलग हैं, उनके कार्य क्षेत्र भिन्न हैं इतने पर भी दोनों के मध्य मौलिक समानता विद्यमान है और दोनों को पूर्ण बनने के लिए पारस्परिक सहयोग की नितान्त आवश्यकता है।
अध्यात्म क्षेत्र में जिन रहस्यमयी उपलब्धियों की चर्चा होती है, उन सिद्धियों और चमत्कारों का आधार विज्ञान की किसी ऐसी धारा के साथ कल नहीं तो परसों जुड़ा हुआ पाया जायगा जो प्रकृति के अन्तराल में विद्यमान तो हैं पर अभी प्रकाश में नहीं आई है। यहाँ अद्भुत का कोई अस्तित्व नहीं। सब कुछ सुव्यवस्थित है। जिस व्यवस्था के कारणों को हम जान नहीं पाते वही अद्भुत लगता है। आरम्भ में अग्नि का प्रकटीकरण भी दैवी चमत्कार था। पीछे उसके रहस्य विदित हो जाने पर प्रकृति का एक सामान्य उपक्रम उसे मान लिया गया। ठीक इसी प्रकार वैयक्तिक चेतना की गहरी परतों से जब कभी कोई स्रोत फूट पड़ते हैं तो वे दैवी प्रतीत होते हैं। अनुसंधान को अपनाये रहा जाय तो उस सूत्र के सहारे वहाँ पहुँचने में सफलता मिलती है, जहाँ चेतना की किन्हीं गहरी परतों से वैयक्तिक चमत्कारी का उत्पादन होता है। इसी प्रकार इस विशाल ब्रह्माण्ड में संव्यक्त चेतना के समुद्र का स्वरूप और उपयोग समझा जा सके तो वह आधार मिल सकता है जिसे दिव्य लोकों से बरसने वाले वरदानों की संज्ञा दी जाती है। वैयक्तिक विभूतियों और दैवी अनुकम्पा की चमत्कारी सिद्धियों की चर्चा होती रहती है और उन्हें अभौतिक कहा जाता रहता है, किन्तु तथ्य यह है कि जो इन्द्रियगम्य या बुद्धिगम्य वह सभी मौलिक है। अध्यात्म के नाम पर चलने वाली साधनाओं को अथवा उपलब्धियों को भौतिक क्षेत्र से बाहर समझना भूल है। पदार्थों की सहायता से जो किया जाता है अथवा जिनकी अनुभूति मन समेत ग्यारह इन्द्रियों द्वारा होती है उन्हें अभौतिक कहने का साहस बालबुद्धि तो कर सकती है, पर तत्वदर्शन के गले उसे नहीं उतारा जा सकता। इसी प्रकार विज्ञान का उद्भव, अनुसंधान, अभिवर्धन और उपयोग में आदर्शों की तिलांजलि नहीं दी जा सकती है। इस प्रकार धर्म और विज्ञान एक ही उदर से जन्मे दो सहोदर भाइयों की तरह समझे जा सकते हैं और उनमें परस्पर सहयोग से मिलकर काम करने की पूरी गुंजाइश है। देव और दानवों के सहयोग से समुद्रमन्थन किए जाने और उनके फलस्वरूप चौदह रत्न मिलने की पौराणिक गाथा को अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय की आवश्यकता का प्रतिपादन करते हुए पाया जा सकता है।
विज्ञान अब विगत शताब्दी की तरह अप्रत्यक्ष की सत्ता से इन्कार करने में दुराग्रही नहीं रहा है। मैटाफिजिक्स और पैरासाइकोलॉजी की अगणित शाखा-प्रशाखायें इस अनुसंधान में संलग्न हैं कि अतीन्द्रिय अनुभूतियों के मूल में किन तथ्यों का समावेश है। गणितज्ञ सी.ए. डार्विन ने अपने ग्रन्थ ‘दि न्यू कंसेयशंस आफ मैटर’ में कहा है− अपने जमाने में वैज्ञानिक क्षेत्र की यह एक बड़ी क्रान्ति है कि जो अप्रत्यक्ष है उसकी सत्ता को भी अनुसंधान के क्षेत्र में सम्मिलित कर लिया गया है।
विज्ञानी हर्बर्ट डिगल ने स्वीकारा है वे दिन बीत गए जब विज्ञान का क्षेत्र मात्र तथ्यों तक सीमित था। अब उसका कार्य क्षेत्र कहीं आगे बढ़ गया है और रहस्यों को भी अनुसन्धान के उपयुक्त आधारों का मान लिया गया है। अन्तरिक्ष विज्ञानी एडगृन के कथनानुसार विज्ञान के रहस्यों को भी तथ्यों में सम्मिलित कर लिया है इसका अर्थ है उनने अपने में अध्यात्म के सुरक्षित सीमा क्षेत्र तक पहुँचने और उसमें प्रवेश करने की हिम्मत जुटा ली है।
इन दिनों विज्ञान ने विधिवत् रहस्यवाद को अपने कार्यक्षेत्र में सम्मिलित किया है पर पूर्ववर्ती विज्ञानवेत्ता उस सन्दर्भ में सर्वथा अनुदार नहीं रहे हैं वे अपने शोध प्रयत्न धर्म और विज्ञान दोनों ही दिशाओं में नियोजित किये रहे हैं और उनके समन्वय की सम्भावना पर विश्वास करते रहे हैं। पैरासेल्सस, ब्रूनो, पैस्काल, न्यूटन आदि की गणना इसी वर्ग के वैज्ञानिकों में की जा सकती है। प्लेटो अपने समय का प्रख्यात समन्वयवादी था। उसके दार्शनिक चर्चा करने के लिए आने वाले जिज्ञासुओं के लिए यह शर्त रखी थी कि उनका गणित का जानकार होना आवश्यक है। उसके दरवाजे पर एक तख्ती टँगी रहती थी, जिस पर लिखा था− ‘‘जिसे गणित न आता हो वह भीतर न आये।’’
धर्म को विज्ञान सम्मत अर्थात् बुद्धिसंगत बनाने और तथ्यों को कसौटी पर कसने का प्रतिपादन करने वाले अनेक सुधारक समय−समय पर होते रहे हैं। धर्म क्षेत्र में चिरकाल में चलती आने वाली क्रान्तियाँ इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं कि अन्धानुसरण नहीं तथ्यों की कसौटी पर श्रद्धा और परम्परा को कसा जाना आवश्यक है।
भगवान बुद्ध की ख्याति इसी रूप में थी कि उनने बुद्धिवाद का प्रतिपादन किया था और तथ्यों की कसौटी पर खरी न उतरने वाली परम्पराओं को स्वीकार करने के लिए जन−मानस को भड़काया था। इस शृंखला में प्राचीन एवं अर्वाचीन समाज सुधारकों को इसी वर्ग में गिना जा सकता है।
विग्रह का अन्त और समन्वय का आरम्भ हर क्षेत्र में आवश्यक समझा जा रहा है और उसके लिए सर्वत्र अपने−अपने स्तर के प्रयत्न अपने−अपने ढंग से चल रहे हैं। धर्म और विज्ञान के सहयोग की आवश्यकता भी युग की पुकार है। हमें इच्छा और अनिच्छा से इस दिशा में बढ़ना ही होगा। विज्ञान को भावनाशील और धर्म को तथ्यानुवर्ती होने की आवश्यकता है। इस यथार्थता को जितनी अच्छी तरह समझा जाने लगेगा उतनी ही तेजी और मजबूती के साथ दोनों महान् शक्ति धाराओं के सुखद समन्वय का दिन निकट आता चला जायगा।
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किसी महत्वपूर्ण निर्णय पर पहुँचने के लिए विचारों की एकाग्रता नितान्त आवश्यक है। यदि मन पर चंचलता छाई रहे, चित्त किसी पर जमे ही नहीं। विचारों की अस्थिर अस्त−व्यस्तता के कारण प्रस्तुत प्रसंग पर गहरा चिन्तन हो ही न सके तो फिर यह अत्यन्त कठिन रहेगा किसी बात के हर पक्ष पर विचार कर सकना और सही निष्कर्ष पर पहुँच सकना सम्भव हो सके।
चींटी, दीमक, मधुमक्खी, मकड़ी जैसे कई छोटे जीव जन्तु अपने नियत क्रम से नियमपूर्वक कार्य करने के आदी होते हैं। फलतः उनकी कृतियाँ देखने की बनती हैं। स्वयं लाभान्वित होते हैं और दूसरों की प्रशंसा के पात्र बनते हैं। बया पक्षी का घोंसला देखते ही बनता है। उसमें रहने वाला परिवार दूसरे पक्षियों की अपेक्षा अधिक सुखी रहता है। सर्वत्र उसकी प्रशंसा भी होती रहती है। इस सफलता का श्रेय उसे मात्र तन्मयता के आधार पर ही मिलता है। इसके अतिरिक्त उसमें और कोई ऐसी विशेषता नहीं होती जिसके कारण उसे यह ऐसी प्रतिष्ठा मिल सके।
योगी जन एकाग्रता का अभ्यास ध्यान धारणा द्वारा करते और उसमें प्राप्त सफलता के अनुपात में ऋद्धि−सिद्धियों के अधिकारी बनते हैं। किन्तु वह सर्वसाधारण के लिए भी उतनी ही उपयोगी है जितनी कि योगी, तपस्वियों के लिए। सर्वसाधारण के जीवन में भी उसकी नितान्त आवश्यकता है। मोची, दर्जी, लुहार, बढ़ई आदि अपना काम एकाग्रता के बल पर ही ठीक तरह कर पाते हैं अन्यथा उनके पैने औजार ही गफलत होने पर हाथ-पैर तोड़ कर रख सकते हैं।
घास खोदने से लेकर खेती करने वालों तक के काम ठीक तरह तभी हो पाते हैं जब वे अपना काम ध्यान पूर्वक करें। विद्यार्थी की बौद्धिक प्रखरता ही नहीं एकाग्रता भी सफलता में सहायक होती है। अभिनय और सरकस के पात्रों की कुशलता प्रकारान्तर से एकाग्रता की ही साधना होती है। गायक, वादक, चित्रकार मूर्तिकार, कवि और साहित्यकार भी अन्य शिल्पियों और कलाकारों की तरह तन्मयता के सहारे ही श्रेय सम्पादन करते हैं। इस विशेषता के न रहने पर समर्थ और साधन सम्पन्न व्यक्ति भी कहने लायक सफलता अर्जित नहीं कर सकता। वैज्ञानिकों और अनुसंधानकर्त्ताओं का कठिन कार्य उसी अनुपात से प्रगति पथ पर आगे बढ़ता है जिसे जितना उनका मन अभीष्ट प्रयोजन की गहराई तक उतरता चला जाता है। धनुष बाण की संरचना का अपना महत्व हो सकता है किन्तु लक्ष्यवेध के लिए समूचा ध्यान अभीष्ट केन्द्र पर केन्द्रित किये बिना कोई चारा नहीं।
बौद्धिक प्रखरता मौलिक नहीं है, उसे एकाग्रता की बेटी कहा जा सकता है। बुद्धि को अनेक तर्क और तथ्य तभी सूझते हैं जब उसकी क्षमता बिखरने से बचाई और अभीष्ट प्रयोजन में लगाई जाती है। ऐसा न हो सकने पर चिन्तन का तिनका अस्थिरता की आँधी में जहाँ−तहाँ उड़ता फिरेगा और किसी निश्चित स्थान तक पहुँच नहीं सकेगा।
आँखों के आगे से दृश्य गुजरते रहते हैं और कान के निकट ही ध्वनियाँ होती रहती हैं किन्तु चित्त यदि कहीं अन्यत्र पड़ा हो तो खुली आँखें भी अन्धी जैसी रहेंगी और सही कानों पर बहरापन छाया रहेगा। स्मरण शक्ति का भी स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। आयु और स्वास्थता के अनुरूप मस्तिष्कीय धारणा घटती बढ़ती रहती है किन्तु विस्मरण का मूल कारण उपेक्षा ही रहता है। अन्यमनस्कता ही है जो स्मरण शक्ति की कमी के रूप में जानी जाती है। जिन घटनाओं में समुचित दिलचस्पी रही होगी वे सहज की विस्मृत नहीं होतीं वरन् चिरकाल तक याद बनी रहती है।
शिक्षा और अनुभव के महत्व से इन्कार नहीं किया जा सकता किन्तु कामों में गहरी दिलचस्पी न हो तो शिक्षा और अनुभव भी समय पर काम नहीं आते। गहरी दिलचस्पी का नाम ही एकाग्रता है और सफलताओं में उसी की प्रमुख भूमिका रहती है।
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जड़ पदार्थ यों निर्जीव और निर्दोष मालूम पड़ते हैं इतने पर भी यह निश्चित है कि वे नीति और अनीति के आचरण से प्रभावित होते हैं और जिस भले या बुरे व्यक्ति के साथ रहते हैं− वातावरण से घिरते हैं उसका प्रभाव उन पर पड़े बिना नहीं रहता। श्रेष्ठ व्यक्तियों के उपयोग में आई हुई उनके द्वारा बनाई या सम्पर्क में रखी वस्तुओं में उनका प्रभाव रहता है। उनका उपयोग करने वाले लाभान्वित होते हैं। प्रसाद या उपहार में ऐसी किसी वस्तु का प्राप्त करना सौभाग्य का कारण बन जाता है। इसी प्रकार दुष्टता से प्रभावित वस्तुएं हानिकारक बन जाती हैं। कई मकान या पदार्थ कई बार अभिशप्त देखे गये हैं। उनके साथ कोई दुष्ट आचरण या व्यक्ति का प्रभाव जुड़ा होता है। फलतः वह जहाँ भी होता है अपना दुष्प्रभाव प्रकट करते हैं।
एक अभिशप्त हीरा दुनिया के अधिकांश भाग में पिछली शताब्दियों से यहाँ-वहाँ टक्करें खाता हुआ खानाबदोश की तरह घूम रहा है। वह जहाँ भी जाता है अपने आश्रयदाता का पूरी तरह सफाया करके रख देता है। कोई उसे मर्जी से नहीं छोड़ता, पर उसकी आदत ही ऐसी है कि देर तक कहीं ठहरे नहीं और आधिपत्य अहंकार की मूर्खता जताने वाले हर व्यक्ति को वास्तविकता का सबक सिखा कर आगे बढ़ जाय।
संसार में न सही− कम से कम अमेरिका में इन दिनों सब में कीमती समझा जाने वाला हीरा ‘होप’ है। इसका वजन किसी समय 112 कैरिट था, पर अब टुकड़े होते-होते उसका बड़ा भाग 42 कैरिट रह गया है। उसमें से काटे गये अन्य टुकड़े कहाँ हैं, इसका कुछ ठीक पता नहीं चल रहा है। इसकी अभिशप्त स्थिति का पता चलने पर अब कोई उसे खरीदने और अपने पास रखने को रजामन्द नहीं होता। इसलिए फिलहाल सस्ते मोल में उसे अमेरिका के प्रसिद्ध हीरा व्यवसायी संस्थान ‘स्मिथ सोनियन’ ने अपने सुरक्षित भण्डार में जमा कर दिया है। उसका मोलभाव नहीं होता केवल जब तब उसका प्रदर्शन भर कर दिया जाता है।
इसका अविज्ञात इतिहास यहाँ से आरम्भ होता है कि वह किसी को अचानक पड़ा मिला। उसने औरों को दिखाया। कीमत का पता चलने पर उसे मार डाला गया और बलवान ने उसे छीन लिया। जब मारने भर से बहुमूल्य सम्पत्ति हाथ लग सकती है तो उस सरल नीति को अपनाने का सिलसिला चल पड़ा। कहीं चोरी, कहीं हत्या उस कुचक्र में घूमते−घूमते वह हीरा किसी के पास भी बहुत समय तक न टिका और अधिक बलवान ने अपने से कमजोर को दबोच कर उसका अपहरण कर लिया। आरम्भ में वह बहुत समय तक खरीदा बेचा नहीं गया। उसका मूल्य यही था कि जो आतंक और अपहरण की कला में निपुण हो वह अपनी क्रूरता का परिचय दे और उसका स्वामी बने। मूल्य देकर खरीदने और पैसा लेकर बेचने की बात तो जब कभी ही देखने को मिली है। आतंक, क्रूरता, हत्या, कुचक्र, अपहरण, लालच जैसी दुरभिसन्धियाँ उसके साथ जुड़ती चली आई। फलतः अब उसकी प्रकृति ही ऐसी बन गई कि जहाँ रहे दुष्परिणाम और आतंक का वातावरण उत्पन्न करे।
विज्ञात इतिहास यहाँ से चलता है कि एक बंगाली ताँत्रिक ने किसी मालदार को आतंकित करके उसे सुरक्षा का आश्वासन दिया था और बदले में यह हीरा उससे हड़प लिया था। ले तो लिया पर करें क्या? न किसी को देते बना न बेचते। उसे छिपाया कहाँ जाय? तरकीब यह सोची गई कि उसे देवी की मूर्ति में आँखों की जगह जड़ दिया जाय। किया तो यही गया, पर भेद छिपा न रहा, किसी चोर ने वह उखाड़ लिया और एक फ्राँसीसी यात्री टेवर्नियर के हाथों बेच दिया। वह अपने देश पहुँचा ही था कि घर का वातावरण बुरी तरह छिन्न−भिन्न हो गया। उसका बेटा ही बागी हो गया और बाप को धता−बता सारी कमाई पर कब्जा कर बैठा। टेवर्नियर को पागल कुत्ते ने काट खाया। अस्पताल में वह उसके पास पाया गया और उस समय के सम्राट लुई पन्द्रहवें के पास जा पहुँचा। लुई ने अपनी महारानी को उसे पहनाया। पहनते ही उसके बुरे दिन आ गये उसकी हैसियत गिरी और मामूली बाँदी नौकरानी की तरह राजमहल में जिन्दगी के दिन पूरे करके मौत के मुँह में चली गई। बाद में वह उत्तराधिकार लुई सोलवें के कब्जे में आया। उसने भी से अपनी रानी मेरीआन्टोइने को पहनाया। उस बेचारी की भी मुसीबत आई। राजा-रानी में अनबन हुई सो उसका सिर सरेआम धड़ से अलग करा दिया गया। कसूर इतना भर था कि उसकी बाँदी ने उस हीरे को थोड़ी देर के लिए पहन भर लिया था। पीछे वह चोरी से एक अफसर निकोलस के पास जा पहुँचा। पकड़ा गया और फाँसी पर चढ़ाया गया। हीरा फिर राजमहल वापिस आ गया। उसे राजा−रानी और राजकुमारी पहना करते थे। फ्राँस की राज्यक्रान्ति हुई और राजा लुई रानी एन्टवायने और राजकुमारी दलमेहल तीनों ही मौत के घाट उतार दिये गए। राज महल की लूट−पाट का कोई उस्ताद उसे उड़ा ले गया और हालैंड के हीरा व्यापारी फाल्स ने उसे खरीद लिया। हीरा भारी था। इतने बड़े का मूल्य मिलना कठिन था। इसलिए उसके टुकड़े काटे ताकि खण्डों में उसे बेचा जा सके। तराशने का काम पूरा होते होते उसका लड़का ही उन टुकड़ों को ले उड़ा। साथ ही उस जौहरी पर गर्दिश आई और उसका दिवाला पिट गया। लड़का आत्महत्या करके मरा। दफन करने वालों ने उसे अन्य जौहरी मेलहम को बेचकर अच्छी रकम कमाई। पर वह खरीदार भी चैन से न बैठ सका। डाकू उस पर चढ़ दौड़े और उसे मारकर हीरा छीन ले गये।
इसके बाद वह घूमता घामता किसी साइमन राइडस नामक व्यक्ति के पास पहुँचा। वह अपने परिवार सहित पहाड़ की चोटी पर सैर करने गया था। पैर फिसला तो पत्नी और बच्ची समेत गहरे खड्डे में जा गिरा और वहीं तीनों की मौत हो गई। कोई पहुँच वहाँ भी गया और इन लाशों की तलाशी में मिले माल को बेचकर खुश हुआ। सबसे पहले उसकी बिक्री इंग्लैण्ड में हुई टामस होप नामक धनी ने इसे 18 हजार पोण्ड में खरीदा। होप ने उसकी हिस्ट्री सुनी तो काँप गया। उसने अमेरिका के जौहरी को बेचा। खरीद किये बहुत दिन नहीं बीते थे कि उसका भी दिवाला निकल गया। यहाँ से उसकी यात्रा रूस के लिए हुई। रूसी राज कुमार कानोतोवस्की ने उसे खरीदा एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि उसने किसी घरेलू समस्या का क्षुब्ध होकर आत्म-हत्या कर ली। हीरा उसके नौकर ने चुरा लिया और उसे यूनान में बेचा। जिसने खरीदा था वह मुसीबत में आ गया। इसके बाद वह टर्की के सुलतान हमीद के हाथों बिका। हमीद के हाथ में गद्दी ही नहीं गई उसकी बुरी दुर्गति हुई। हमीद और उसकी बेगम में अनबन हुई और बेगम का उसने सिर काट डाला और खुद पागल हो गया। इस उथल−पुथल में वह टर्की ने एक दरबारी हवीब के हाथ लग गया। वह समुद्र में डूब मरा। घर वालों ने उसे अमेरिकी व्यापारी मेकमिलन के हाथों 75 हजार पौण्ड में बेच दिया। मेकमिलन का आठ वर्षीय बालक मोटर से कुचल कर मर गया। औरत तलाक देकर चली गई और खुद का अच्छा−खासा व्यापार चौपट हो गया। अनिद्रा उस पर सवार हो गई और एक दिन अधिक मात्रा में नींद की गोलियाँ खा लेने से चिर निद्रा में सो गया। मरने से पूर्व में इस हीरे को हीरे संग्रहालय के स्मिथ संस्थान को दे गये थे। जहाँ वह इन दिनों विराजमान है। भविष्य में उसका क्या होगा यह तो समय ही बता सकता है।
अनीति और दुष्टता से दूर रहना ही उचित है। इस स्तर के वातावरण और व्यक्तियों से भी बचना ही श्रेष्ठ है। इसी प्रकार वे वस्तुएं भी अग्राह्य समझी जानी चाहिए जिनके पीछे अनीति भरे इतिहास− वातावरण या व्यक्तियों का सम्पर्क जुड़ा रहा हो।
जीवन जीने की कला जिसको आ गई वह मानो तपस्वी ही तो हो गया।
-गांधी
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इसे विचित्र विसंगति ही कहना चाहिए कि हम शरीर के लिए ही जीवन निछावर करने की नीति अपनाने पर भी उसी की सब से अधिक उपेक्षा करते हैं। उपेक्षा ही क्यों, कहा तो यह भी जा सकता है कि उसके प्रति शत्रुता तक बरतते हैं।
प्रातः उठने से लेकर रात्रि को सोने तक के कार्यों पर दृष्टि डालें तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि सारा श्रम, समय, मनोयोग शरीर और उसके साथ जुड़े हुए परिकर के निमित्त खपाया जाता रहा है। पेट की भूख और इन्द्रियों की लिप्साएं तरह−तरह की फरमाइशें प्रस्तुत करती हैं और उसके साधन जुटाने के लिए कई प्रकार के ताने−बाने बुनने पड़ते हैं। दिन में आराम और रात्रि में विश्राम का प्रबन्ध करना पड़ता है। मन मस्तिष्क भी शरीर का ही एक अवयव है उसकी अपनी आदतें और माँगे हैं। बड़प्पन की अहंता उसके भीतर उठती रहती है। उसके लिए शरीर सज्जा से लेकर अमीरी की खर्चीले ठाट−बाट बनाने के लिए निरन्तर दौड़−धूप करनी पड़ती हैं। बड़प्पन वैभव निरन्तर बढ़े और स्थिर रहे इसकी चेष्टाएं तृष्णा कहलाती हैं। इन्द्रिय सुखानुभूति की, वासना की माँग पूरी करने के साथ ही तृष्णा की जरूरतें सामने आ खड़ी होती हैं। इसी खाई को पाटने में दिन भर का पूरा समय और जीवन का लम्बा विस्तार खप जाता है। एक शब्द के लिए इसी को यों भी कह सकते हैं। शरीर ही जीवन की गाड़ी धकेलता है किन्तु उसकी सारी कमाई अपने लिए ही खर्च करा लेता है। इसे और भी स्पष्ट करना हो तो यों कह सकते हैं कि हम शरीर के लिए ही जीवित रहते हैं।
जीवन व्यय का एक और क्षेत्र है− परिवार। यह भी शरीर यात्रा की ही परिधि में आता है। जिन अभिभावकों ने भरण−पोषण किया है उनका ऋण चुकाना भी आवश्यक है। विवाह के आधार पर जिन साथी के शरीर और मन का लाभ उठाया गया है उसे सुविधाएं देने के रूप में मूल्य चुकाना चाहिए। रति सुख का मूल्य संतान पालन के रूप में चुकाना पड़ता है। परिवार के उच्च−स्तरीय आदर्श भी हैं पर सामान्यतया उसमें शरीरगत आदान-प्रदान ही मुख्य होते हैं। इसलिए परिवार निर्वाह को शरीर सुविधा को ऋण मुक्ति और मूल्य चुकाने के रूप में विनिर्मित हुआ समझा जा सकता है।
इन पंक्तियों की चर्चा का विषय यह है कि बहुमूल्य मानव जीवन सम्पदा का उपयोग आखिर होता किस निमित्त है? उसके साथ जुड़ी हुई क्षमता किस प्रयोजन में लगती और क्या उपार्जन करती है। पूरी छान−बीन करने पर निष्कर्ष एक ही निकलता है कि शरीर मन और परिवार के निमित्त ही जीवन की पूरी अवधि और क्षमता लगी रहती है। यह तीनों देखने और कहने भर के लिए ही अलग हैं वस्तुतः इन्हें शरीर के अविच्छिन्न अवयव ही कहना चाहिए। मन कोई अलग पदार्थ नहीं है। मस्तिष्क ही मन है। मस्तिष्क को शरीर से अलग कैसे किया जा सकता है। परिवार का चाहे ऋण चुकाना पड़ रहा है अथवा सुविधाएं पाने का मूल्य दिया जा रहा हो, दोनों ही दृष्टियों से उसे शारीरिक आवश्यकताओं की परिधि में ही सम्मिलित रखना पड़ेगा। समीक्षक को यही कहना पड़ेगा कि औसत मनुष्य शरीर के खोखले में निवास करता है और उसी के निमित्त अहर्निश प्रयत्नरत बना रहता है। जीवन शरीर में से उत्पन्न होता है और इसी के निमित्त अपनी सारी क्षमताएं समर्पित किये रहता है। सच्चे अर्थों में वही वास्तविक इष्टदेव है जिसकी पूजा उपासना में आत्मा का पुजारी विविध−विधि उपचार करता और साधन जुटाता रहता है।
यह नीति उचित है या अनुचित? शरीर के अतिरिक्त उसके स्वामी आत्मा का भी कुछ हित साधन होना चाहिए या नहीं? होना चाहिए तो किस प्रकार? यहाँ इन प्रश्नों पर विचार नहीं हो रहा है। विचारणीय यह है कि जब शरीर ही सब कुछ ठहरा और आराध्य बना तो कम से कम इतना तो होना ही चाहिए था कि उसके वास्तविक हित का ध्यान रखा गया होता। जब शरीर से इतना काम लिया जा रहा है− अथवा उसी के लिए जिया जा रहा है तो आवश्यक यह भी है कि उसे स्वस्थ और सुदृढ़ भी बनाये रखा जाय? जिस पेड़ के फूलों और फलों में लाभ उठाया जा रहा है उसकी जड़ें सींचने का ध्यान रखा जाना चाहिए।
इन्द्रिय लिप्साएं बड़प्पन की वितृष्णाएं− शरीर रूपी वृक्ष के फल−फूल हैं। उन्हें तोड़ते तो रहा जाय पर पोषण और संरक्षण का ध्यान न रखा जाय तो यह अदूरदर्शिता ही होगी। इस उपेक्षा से तो वह स्वार्थ सिद्ध भी नहीं होता, जिस में निरन्तर लगे रहने की बदनामी और आत्म प्रताड़ना सहनी पड़ती है। सिंचाई और सुरक्षा के अभाव में वृक्ष कितने दिन तक हरा भरा रखा जा सकेगा? और कब तक उससे कितनी मात्रा में फल−फूल बटोरे जा सकेंगे? दुर्बलता, रुग्णता से ग्रसित शरीर कष्ट भुगतता रहेगा। लादा हुआ काम निपटा नहीं सकेगा और अनेक दबावों से संत्रस्त होकर असमय में ही अपना अस्तित्व गँवा बैठेगा।
शरीर की संरचना ऐसे कुशल कलाकार के हाथों ऐसी सुदृढ़ सामग्री के सहारे हुई है कि यदि उसे तोड़ा-फोड़ा न जाय तो वह लम्बी अवधि तक अपना काम ठीक तरह करती रह सकती है। उसके स्वार्थ या परमार्थ जो भी साधना हो साधा जाय, किन्तु इतना तो ध्यान रहना ही चाहिए कि वाहनों और औजारों तक को सही रखने के लिए जब सतर्कता बरतनी पड़ती है तो शरीर की सुरक्षा की ही क्यों उपेक्षा की जानी चाहिए।
यह तथ्य है कि शरीर की शक्ति को शरीर के लिए खर्च किया जाता है पर वह नियोजन बहुत ही उथला होता है उसमें ललक लिप्सा जुटाने बुझाने तक ही बात सीमित रह जाती हैं। स्थिरता और आवश्यकता की बात तो एक प्रकार से ध्यान में ही नहीं रखी जाती।
शरीर से काम लेना है तो उसे कष्ट मुक्त और सक्षम बनाये रहने का भी प्रबन्ध करना चाहिए। अन्यथा शरीर के लिए सौंपा हुआ काम पूरा करना कठिन हो जायगा। इतना ही नहीं वह कष्ट पीड़ित रहने लगेगा और अपनी व्यथा से आप ही जलता−गलता रहेगा। यह कैसी विसंगति है कि जिस शरीर को इष्टदेव मानकर जीवन की सारी सम्पदा ही उसके चरणों पर अर्पित की जा रही है उसकी जड़ें काटने, दुर्बल और रुग्ण बनाने तथा असमय में ही अस्तित्व गँवा देने के लिए बाध्य किया जा रहा है। इसे शरीर प्रेम कहा जाय या द्वेष? चालू विसंगतियों को देखते हुए यह निर्णय कठिन पड़ता है कि शरीर के प्रति अपनाया गया वर्तमान दृष्टिकोण कहाँ तक बुद्धिमत्तापूर्ण और लाभदायक है।
नशा मौज के लिए पिया जाता है? जिसकी मौज के लिए यह खर्चीला व्यसन अपनाया गया है, उस पर क्या बीतती है यह भी देखा जाना चाहिए। नशीली वस्तुएं काया के भीतरी अवयवों को कितनी क्षति पहुँचाती हैं, उनकी कुशलता पर कितना प्रहार करती हैं यह भी देखा जाना चाहिए। धन की बर्बादी, बौद्धिक प्रखरता की घटोत्तरी, बदनामी की बात यदि महत्वहीन मालूम पड़ती हो तो भी इतना तो सोचना ही चाहिए जिसके लिए एक हाथ से मौज के साधन जुटाये जा रहे हैं दूसरे हाथ से उसके अस्तित्व के लिए खतरा तो उत्पन्न नहीं किया जा रहा है। नशे की मौज मस्ती कहीं विपत्ति के सरंजाम समेट कर तो नहीं ला रही है।
शरीर की एक इकाई जीभ को प्रयत्न करने के लिए मिष्ठान्न और पकवानों के सरंजाम जुटाये जायं यह बात समझ में आ सकती है क्योंकि उसमें काया के एक अंग को गुदगुदी अनुभव करने का अवसर मिलता है। किन्तु यह समझ में नहीं आता कि दुष्पाच्य आहार की अधिक मात्रा पेट पर लाद कर उसे अशक्त बनाया जाय और अपच में उत्पन्न होने वाली विषाक्तता का ध्यान न रखते हुए समूचे पाचन तन्त्र को ही लड़खड़ा दिया जाय।
जननेन्द्रिय की सरसता समझ में आती है, पर अतिवादी नीति अपना कर उस संवेदना केन्द्र को ही क्षत−विक्षत और अशक्त बना दिया जाय। जो सरलता पूर्वक देर तक मिलता रह सकता था उसे नष्ट, भ्रष्ट करके रख दिया जाय उसमें क्या समझदारी रही। यह तो वैसा ही बन पड़ा जैसा कि सोने का एक अण्डा रोज देने वाली मुर्गी का किसी ने अति लालच में पेट चीरा था और फिर उस आजीविका स्रोत से सदा के लिए हाथ धो बैठा था।
आँखों से काम लेने में सुखद दृश्य देखने का आनन्द मिलता है सो ठीक है पर सोने के लिए बनाई गई और अंधेरी रखी गई सृष्टी की सुखद संरचना रात्रि में ही भी देर तक जगते रहा जाय और आँखों पर तेज रोशनी का दबाव डाला जाय तो यह अन्धता को निमन्त्रण देते हुए देर तक मनोरंजक दृश्य देखने में रात्रि बिताने में क्या समझदारी रही। आंखें गँवाने के मूल्य पर खरीदा गया मनोरंजन अन्ततः कितना महँगा पड़ा, आखिर इसका भी तो कुछ हिसाब−किताब रखा जाना चाहिए।
बहुत ठंडे गरम पदार्थों का अपना मजा है सो भी ठीक है किन्तु दाँतों को असमय में ही गिरा देने वाली इस मौज को कितनी कीमत चुकानी पड़ी, कुछ इसका भी अनुमान लगाया जाना चाहिए। भारी और कसे हुए कपड़े पहनने में शोभा बढ़ती है या नहीं इस पर विचार भले ही न किया जाय, पर त्वचा तक स्वच्छ वायु और धूप रोशनी न पहुँचने पर उसकी क्षमता की कितनी हानि होगी यह भी देखा जाना चाहिए। आलस्य में पड़े रहने से चैन मिलता है, पर श्रम के अभाव में कल पुर्जे कितने अशक्त होते चले जाते हैं उसे क्यों भुला दिया जाता है?
सामान्य व्यवसायी अपने कारोबार में लाभ और हानि दोनों पक्षों का विचार करके तब अपनी सन्तुलित नीति अपनाते हैं। हम जीवन व्यवसाय में मौज वाले पक्ष को ही ध्यान में रखें और स्वास्थ्य बर्बाद करके मौज करने वाले का ही सफाया कर दें तो इसे क्या कहा जाय? यह तो सामान्य दुकानदार जितनी समझदारी भी नहीं हुई। जीवन व्यवसाय के व्यवसायों को कम से कम इतना तो देखना ही चाहिए कि लाभ की ललक में घाटे ही घाटे के उपक्रम तो बनते नहीं चले जा रहे हैं।
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सुखी और समुन्नत जीवन जीने के लिए कुछ अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता। उसके लिए समुचित प्रबन्ध सृष्टा ने स्वयं ही कर रखा है। जो करना है वह इतना ही है कि अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने की हरकतें बन्द कर दें। अपने को नष्ट करने वाली उद्दंडता न बरतें। इतना भर किया जा सके तो समझना चाहिए− आये दिन संत्रस्त करने वाली कठिनाइयों में से अधिकांश में पीछा छुड़ाने का सुअवसर हाथ लग गया।
इसमें क्या कठिनाई है कि भूख में कम खाया जाय और पेट खाली रखा जाय। इसमें समय, श्रम और धन सभी की बचत होती है। अधिक खाने से जहाँ पेट की स्वाभाविक शक्ति नष्ट होती है और पैसा भी तो अतिरिक्त रूप से खर्च होता है। स्वास्थ्यकर सात्विक आहार सस्ता भी होता है और पकाने बनाने में सौम्य सरल। वह सुपाच्य भी होता है और शक्तिवर्धक भी। यह सब होते हुए भी अनेक कृत्रिमताओं की भरमार करके गरिष्ठ, महंगा बनाने में कठिन और हानिकारक पदार्थों को ठूँस−ठूँसकर खाते रहने में क्या समझदारी रही? अकल का अनावश्यक प्रयोग यदि आहार के सन्दर्भ में न किया जाय तो अन्य सुविधाओं के साथ−साथ आरोग्य और दीर्घजीवन का लाभ अनायास ही पाया जा सकता है।
ऋतु प्रभाव से शरीर की रक्षा करने और प्रचलित शिष्टाचार के अनुरूप तन ढ़कने के लिए थोड़े से हलके कपड़ों की जरूरत है। वे आसानी से धोये भी जा सकते हैं। सस्ते मिलते हैं। देखने में भी सादगी के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ी रहने वाली शालीनता का भी परिचय देते हैं। शरीर की भाप बाहर ले जाने और बाहर का प्राण वायु रोमकूपों तक पहुँचाने में अवरोध भी खड़ा नहीं करते। ऐसी दशा में परिधान यदि उतने ही रखे जायें तो क्या हर्ज है? बहुमूल्य कपड़ों की चित्र−विचित्र सिलाई कराने के उपरान्त अभिनेताओं जैसा लिबास पहने फिरने में कितना तो पैसा खराब होता है और कितना मिथ्या अहंकार शिर पर चढ़ा रहता है। प्रदर्शन ही करना रहा तो ढेरों डिजाइनें चाहिए और उनके रखने के लिए जगह। अनावश्यक संग्रह पुराना होने पर सड़ता है और कीड़ों के पेट में जाता है। गुड्डे−गुड़ियों की−सी सज−धज बच्चों को भले ही आकर्षित करे किन्तु विज्ञ व्यक्तियों की आँखों में यह ओछेपन के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। एक को देखकर अन्य ओछी लतों की तरह कपड़े और जेवरों का फैशन भी औरों को ललचाता है। इस नकल में गरीबों का दिवाला पिटता है और आवश्यक कामों में कटौती करनी पड़ती है। ईर्ष्या भड़कती और फिजूलखर्ची बढ़ती है। सीधी रीति से इतना खर्च जुट नहीं पाता तो चोरी, बेईमानी से लेकर ऋण लेने और अपराध करने की नौबत आती है।
अंगों को जकड़ने वाले कपड़े स्पष्टतः स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। त्वचा पर बुरा असर डालते और रक्ताभिषरण के स्वाभाविक क्रम में अड़चन पैदा करते हैं। इन सब बातों पर ध्यान रखा जा सके कि भोजन की तरह वस्त्रों में भी सादगी का समावेश किया जा सके तो उसमें हर दृष्टि से लाभ ही लाभ है। कपड़े का अपव्यय बचने से व्यक्ति को ही बचत का लाभ नहीं मिलेगा वरन् अपव्यय रुकने से नंगों को तन ढकने की सुविधा भी मिल जायगी। चटोरेपन से अन्न की बर्बादी होती है और फैशन से कपड़े की। राष्ट्रीय दृष्टि से यह दोनों ही बचते सच्चे अर्थों में अन्य बचत योजना का बहुत बड़ा प्रयोजन पूरा करती हैं। इन अपव्ययों में कटौती करने से राष्ट्रीय समृद्धि के अभिवर्धन में भारी सहायता मिलती है। सात्विकता अपनाने से उसके साथ जुड़ी हुई शालीनता का स्तर तो बढ़ेगा ही। उसका प्रकाश व्यक्तित्वों के परिष्कृत बनाने वाली सत्परम्परा के रूप में सामने आता है।
विलासिता के अनेक उपकरण थोड़ी सुविधा तो देते हैं, पर उनका मुख्य प्रयोजन दूसरों पर अपने बड़प्पन का आतंक उत्पन्न करना ही मनोवैज्ञानिक तथ्य होता है।
सद्गुणों से सत्कर्मों से, दूसरों के अन्तःकरणों में श्रद्धा उत्पन्न करना एक बात है और ठाट-बाट के चकाचौंध से आतंकित करना दूसरी। अमीरी का उद्धत प्रदर्शन ही खर्चीला ठाट−बाट है। यह बहुत ही खर्चीला और आडम्बर की दृष्टि से पूरा जाल−जंजाल है। इसे बनाने वाले लोग सोचते हैं वह नितान्त भ्रमयुक्त है। अमीरी का आतंक बहुत ही निकृष्ट स्तर के लोग स्वीकार करते हैं। विचारशीलता की मात्रा बढ़ाते हैं उसके प्रति उपहास, तिरष्कार की दृष्टि बढ़ते−बढ़ते घृणा और बहिष्कार तक जा पहुँचती है। इस समानतावादी युग में अमीरी निष्ठुरता का प्रतीक मानी जाती है और उस उद्धत प्रदर्शन को खुलेआम दुष्टता की संज्ञा दी जाती है। महंगे आडम्बर के बदले महँगा ईर्ष्या, द्वेष खरीदने वाले किस प्रकार अपनी बुद्धिमानी का परिचय देते हैं, कुछ कहा नहीं जा सकता। छोटे परिवारों के लिए बड़े बंगले, अनावश्यक वाहन, सज्जा उपकरण और विलासी साधनों में खर्च होने वाली कुशलता किस प्रकार किसके लिए, किसी सीमा तक उपयोगी सिद्ध होती होगी। इसका मूल्यांकन किया जा सके तो प्रतीत होगा कि बुद्धिमानों की मूर्खता में यह विलासी प्रदर्शन एक दुःखद प्रकरण है।
दूसरों से अधिक बड़ा बनने के लिए लोग अपनी समर्थता सिद्ध करने के लिए उद्धत प्रदर्शनों में अग्रणी रहते हैं। येन-केन-प्रकारेण सस्ती वाहवाही लूटने में निरत रहते हैं। संस्थाओं में पद पाने, अभिनन्दन बटोरने, मंच पर बैठने, माइक पर चिल्लाने, पर्चे छपाने, आत्मश्लाघा करने, दूसरों में भद्रती कराने के लिए न जाने कितनी तरकीबें लोग भिड़ाते रहते हैं। इसके लिए कितने ही अनैतिक सन्धि विग्रह करते हैं। इन बाल प्रयासों में किसी को तत्काल कुछ सफलता के दृश्य दीखने को भी मिल सकते हैं, पर अन्ततः उपहासास्पद ही बनना पड़ता है। यश लिप्सा जब असंयत होकर सर्वविदित बनती है तो प्रयासों के प्रति तिरष्कार के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रह जाता। किया गया श्रम और खर्चा हुआ धन न केवल निरर्थक ही चला जाता है वरन् व्यंग उपहास का कूड़ा करकट सिर पर उलटा लद जाता है।
सज्जनता के साथ जुड़ी हुई नम्रता अपनाई जा सके, दूसरों को बड़ा और अपने को छोटा प्रस्तुत किया जा सके तो लोग कोने में से घसीट पर बड़प्पन के सिंहासन पर प्रतिष्ठित करेंगे। नीतिकारों की उक्ति है, जो ख्याति के पीछे भागता है वह उसे खोता है, किन्तु जो नम्रता अपनाता है उसके पीछे वह पीछे−पीछे दौड़ती चली आती है। नम्रता−सज्जनता और प्रामाणिकता का प्रतिनिधित्व करती है। उससे व्यक्तित्व की गरिमा बढ़ती है और ख्याति से भी बढ़कर श्रद्धा उपलब्ध करते हैं। वह श्रद्धा सम्पदा ही है जिसके कारण असंख्यों का स्नेह, सहयोग और विश्वास अनवरत रूप से बरसता है। यह उपलब्धि चेतना क्षेत्र की सबसे बड़ी सफलता है। इसे पाकर व्यक्ति प्रमुदित और पुलकित रहता है, साथ ही हर क्षेत्र में सहकार प्राप्त करता और प्रगति पथ पर द्रुतगति से आगे बढ़ता चला जाता है। संसार के इतिहास में विशिष्ट कार्य सम्पन्न करने वाले महामानवों की सफलता का रहस्य एक ही रहा है कि उनने अपनी नम्रता युक्त सज्जनता के सहारे लोक श्रद्धा सम्पादित की और उसी के बलबूते ऐतिहासिक भूमिकाएं निभा सकें।
मस्तिष्क की चिन्तन शक्ति को अनजाने और अनावश्यक विषयों में दौड़ते रहना ही बहुमूल्य विचार शक्ति को कूड़े करकट में बिखेरने के बराबर है। उत्पादन में श्रम की उपयोगिता को सभी जानते हैं, किन्तु सच पूछा जाय तो उसमें अधिक योगदान सही चिन्तन और सही नियोजन का होता है। यह कार्य ठीक तरह तभी हो सकता है जब सोचने का काम करने वाला विचार−तन्त्र अभीष्ट प्रयोजनों में तन्मयता पूर्वक लगा रहे। थोड़ा वही अभीष्ट स्थान तक पहुँचता है जो सीधे रास्ते ठीक चलता रहे। यदि वह बेसिलसिले चाहे जिस दिशा में असंगत भगदड़ मचाता रहे तो थकान के अतिरिक्त और कुछ पल्ले नहीं पड़ेगा। विचार शक्ति भी अश्वशक्ति की तरह है जिसे अभीष्ट दिशा में लगाये रखा जाय, असंगत भगदड़ से बचाये रखा जाय तो ही आवश्यक क्रिया−कलापों में उत्साहवर्धक सफलता मिल सकती है। यदि मस्तिष्क में असंगत कल्पनाएं चलती रहती होंगी, कुविचार और मनोविकार छाये रहते होंगे तो चिन्तन की बहुमूल्य सम्पदा की बर्बादी तो होती ही रहेगी। ‘खाली दिमाग शैतान की दुकान’ वाली लोकोक्ति के अनुसार अवांछनीय विचारों में रस मिलने लगे तो सर्वनाश के आधार बन चलेंगे। सभी जानते हैं कि मस्तिष्क पर कामुकता के अश्लील विचार छाये रहे तो प्रत्यक्ष रति कर्म न हो सकने पर भी शारीरिक, मानसिक और नैतिक क्षति कितने बड़े परिमाण में होती है अन्य, अवांछनीय विचार भी न केवल चिन्तन क्षमता को बर्बाद करते हैं वरन् पतन और संकट के सरंजाम भी जुटा कर खड़े कर देते हैं।
चिन्तन को सुनियोजित दिशा में लगाये रहना भी नैतिक और सामाजिक मर्यादाओं को पालन करने की तरह है। विचारों को कुछ भी सोचने की छूट नहीं मिलनी चाहिए। विशेषतया अनावश्यक, अव्यावहारिक अनुपयुक्त प्रसंगों पर तो मनःशक्ति का छोटा−सा अंश भी नहीं लगना चाहिए। बर्बादी में बिखराव भी एक कारण है। विचार शक्ति को दिशा विशेष में न लगाया जा सके तो फिर उसकी स्वेच्छाचारिता भटकती भर रहती है, उपार्जन उससे तनिक भी नहीं बन पड़ता। बुद्धिमान होते हुए भी कितने ही लोग इसलिए मूर्खों से भी अधिक घाटे में रहते हैं कि वे गम्भीरतापूर्वक अपने सामने के आवश्यक काम में तन्मय होने की अपेक्षा जिस−तिस अनावश्यक प्रसंग में अकारण उलझने लगते हैं और उसमें उतनी विचार सम्पदा नष्ट कर देते हैं जितने में सामने पड़े कार्य बहुत ही खूबसूरती के साथ सम्पन्न हो सकते हैं। भूतकाल की घटनाओं से शिक्षा ली जा सकती है। भविष्य की कल्पनाओं से आज का आधार खड़ा किया जा सकता है, पर असल तो वर्तमान है। अपने करने के लिए वही सब कुछ है। हमारी मनःशक्ति वर्तमान का मूल्यांकन करते हुए आज जो सम्भव है उसी का श्रेष्ठतम स्वरूप बनाने में नियोजित रहनी चाहिए।
यदा−कदा तोड़−फोड़ की भी जरूरत पड़ती है, पर काम तो सृजन से ही चलता है। हमारी प्रवृत्ति ध्वंसात्मक नहीं सृजनात्मक होनी चाहिए। ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, आक्रोश, धर्म−विरोध, निन्दा जैसी मनःक्षेत्र की आक्रामक प्रवृत्तियाँ कभी−कभी ही आवश्यक होती हैं। डराना, धमकाना भी यदा−कदा उपयोगी हो सकता है, पर सामान्यतया, स्नेह और सहयोग के सहारे रचनात्मक कार्य में ही जुटा रहना होता है कितने ही व्यक्ति निषेधात्मक प्रवृत्ति के होते हैं। दोष−दर्शन और निन्दा वर्णन ही उनके मस्तिष्क पर चढ़ा रहता है। नीचा दिखाने और बदला लेने की योजनाएं बनाने में उनका कौशल नष्ट हो जाता है। फलतः उनके पास उपयोगी सृजन के लिए बौद्धिक क्षमता बचती ही नहीं। दिलचस्पी ही चली गई तो शरीर से उपयोगी श्रम भी कैसे बन पड़ेगा। सृजन ही मानवी प्रतिभा का सदुपयोग है। उसी से व्यक्ति यशस्वी बनता है और अपनी कृतियों से अनेक को सुखी समुन्नत बनाता है। यह सम्भव तभी है जब मूल प्रवृत्ति में सृजनात्मक रुझान का बाहुल्य हो। ध्वंस तो फोड़े के ऑपरेशन की तरह कदाचित ही कभी करना कराना पड़ता है। नित्य तो आहार, विश्राम, उत्पादन एवं सहकार का ही क्रम चलता है। हमारा चिन्तन और क्रिया−कलाप स्वभावतया इसी दिशा में गतिशील रहना चाहिए।
यह सब सरल और स्वाभाविक है। जीवन का सहज प्रवाह सुख−शान्ति की ओर बहता है उसे यथावत चलने दिया जाय और बुद्धिमत्ता के नाम पर बरती जाने वाली मूर्खता प्रगति के बहाने अपनाई गई। अवगति से यदि बचा जा सके तो पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाने वाली वह सुखद प्रक्रिया चलती ही रहेगी जिसका आनन्द लेने के लिए यह सुरदुर्लभ मनुष्य शरीर उपलब्ध हुआ है।
‘‘स्वयं कृतं यदात्मना पुरा,
फलं तदीयम् लभते शुभाशुभम्।
परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुटं,
स्ययं कृतं कर्म निरर्थकं तदा॥’’
-शांडल्य नीति
अर्थात्- जो कर्म पूर्वकाल में मनुष्य द्वारा किया गया है, उसका शुभ तथा अशुभ फल उसको मिलता है। यदि वह माना जाये कि यह फल किसी अन्य व्यक्ति का दिया हुआ है तो अपने किये हुए कर्म निरर्थक ही ठहरेंगे।
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अपने सौर मण्डल के ग्रह-उपग्रहों की विविधविध गतिविधियों का स्रोत सूर्य है। उससे जो ऊर्जा निसृत होती है उसी के बलबूते सौर परिवार अपना निर्वाह करता है। गर्मी के बिना न चूल्हा ही जलता है और न रेल, मोटर, दौड़ती हैं। शरीर की गर्मी चुक जाय तो निस्तब्धता छा जायगी और मौत आ दबोचेगी। तेल, पेट्रोल न हों तो गाड़ी कैसे चलेगी? बिजली न हो तो उसके सहारे चलने वाले कारखाने ठप्प पड़ जायेंगे। सूर्य का ऊर्जा उत्पादन बन्द हो जाय तो सौर−मण्डल के ग्रह स्वतः ठण्डे हो जायेंगे और इस परिवार के पारस्परिक सम्बन्ध क्षीण होने से विगठन चल पड़ेगा। तब ठंडे ग्रह किसी अन्य गरम सूर्य का आश्रय पाने के लिए अपना देश छोड़कर किसी लम्बी यात्रा पर चल पड़ने की तैयारी करेंगे। जलाशय सूख जाने पर पक्षी भी तो उड़कर अन्यत्र चले जाते हैं।
जन्म के उपरान्त हर वस्तु मरण की दिशा में चलती है। विकास और यौवन के पड़ाव इसी बीच में आ जाते हैं। अपने सूर्य का बचपन चला गया। किशोर काल व्यतीत हो गया। प्रौढ़ावस्था भी व्यतीत हो गई। यह उसकी ढलती उम्र है जो उसे क्रमशः मरण की दिशा में घसीटे लिए जा रही है। जिस पृथ्वी पर हम रहते हैं वह शतपथ ब्राह्मण के अनुसार सूर्य की पतिव्रता पत्नी है। वह उसी कमाई खाती है। सुरक्षा के लिए उसी पर आश्रित है और पति मरण पर साथ सती होने के लिए समुद्यत है। अस्तु सूर्य के मरण का सीधा सम्बन्ध अपनी पृथ्वी के साथ होने और उसके अंचल में पलने वाले हम सब मनुष्यों का भाग्य भी इन अभिभावकों की स्थिति पर अवलंबित है। सूर्य और पृथ्वी की स्थिति से हम मानव प्राणी अप्रभावित नहीं रह सकते। अस्तु अपना भविष्य चिन्तन करते समय हमें सूर्य और पृथ्वी के भविष्य का विचार करना पड़े तो उसे अनावश्यक नहीं माना जाना चाहिए।
सूर्य ठण्डा हो रहा है। उसके फलस्वरूप पृथ्वी भी ठण्डी हो रही है। साथ ही उसकी सक्रियता भी घट रही है। अब से एक करोड़ वर्ष पहले दिन−रात 22 घण्टे के होते थे और वर्ष 400 दिन का था। अब वर्ष में प्रायः 40 दिन की कमी और दिनमान में 2 घण्टे की बढ़ी हो गई है। वह अपनी धुरी पर भी अपेक्षाकृत मन्द गति से घूमने लगी है और सूर्य की परिक्रमा करने वाली यात्रा में भी धीमापन आ गया है।
सूर्य बुझते−बुझते एक टिमटिमाते दीपक की तरह रह जायगा। गर्मी समाप्त हो जाने के कारण सौरमण्डल के सभी ग्रह उपग्रह ठण्डे हो जायेंगे, सघन अन्धकार उन्हें ढक लेगा। इतने पर भी बिखराव रोकने का एक कारण तब भी बहुत दिन बना रहेगा। सूर्य में भरा हुआ पदार्थ बहुत विस्तृत है। वह अपने विस्तार के कारण ही आकर्षण शक्ति बनाये रहेगा और उसमें बंधे हुआ ठंडा अंधेरा सौरमंडल किसी प्रकार अपनी कक्षा एवं धुरी पर परिभ्रमण करता रहेगा। यह नहीं कहा जा सकता है कि उस नीरस स्थिति को प्रकृति कब तक सहन करेगी, हो सकता है कि इस शून्य को भरने के लिए के लिए ब्रह्माण्ड के कोई समर्थ सूर्य कहीं से टूट पड़े और इन अनाथ बालकों की साज संभाल नये सिरे से करने लगें। एक सम्भावना और भी है कि अनाथालय जैसा सौरमण्डल अपनी पृथ्वी समेत नव जीवन पाने के लिए अन्तरिक्ष की लम्बी यात्रा पर निकल पड़े। उस महायात्रा के भटकाव से त्राण पाकर स्थिरता का संरक्षण मिलने में किन−किन परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा, इसका अनुमान लगाने में अभी तो मनुष्य की वर्तमान बुद्धि ने असमर्थता ही घोषित कर दी है।
पृथ्वी के आकार से सूर्य का आकार 13 लाख गुना बड़ा है। जिस ध्रुव तारे की अपना सूर्य अपने गृह परिवार समेत परिक्रमा करता है वह उसकी तुलना में 3 लाख गुना बड़ा है। ध्रुव के परिवार में अनेक सौरमण्डल सम्मिलित हैं। वह उन सब को समेटे हुए महाध्रुव की परिक्रमा के लिए दौड़ रहा है। महाध्रुव का आकार, प्रकाश और चुम्बकत्व अपने ध्रुव से अत्यधिक वृहत है।
इतने वजन से लदे हुए इतनी तीव्र गति से चल रहे इस परिभ्रमण में शक्ति खर्च होती है और वह कहीं न कहीं से आनी ही चाहिए। स्पष्ट है कि सूर्य की उत्तेजना से पृथ्वी का अन्तराल उफनता है। दोनों के समन्वय से वह क्षमता उत्पन्न होती है जो इस भूमण्डल की असंख्य गतिविधियों को संचालित करती है। साधन सामग्री सीमित है असीम नहीं। उत्पादन की तुलना में जब खर्च बढ़ जाता है तो जीवनी शक्ति घटती है और शरीर जराजीर्ण होते−होते मृत्यु के मुख में प्रवेश कर जाता है। यही अन्त ग्रह−नक्षत्रों का भी होता है। अपने सूर्य का और उसकी आश्रिता धरती का भी इसी प्रकार अन्त होता है। देर या सवेर में मरणधर्मा मनुष्यों की भाँति यह विशालकाय सूरज भी अपनी सहेली धरती समेत मरने की तैयारी कर रहा है। हमें भी इस तथ्य को समझना है और अपने मरण को ध्यान में रखना है।
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यों कहने को तो सभी कहते हैं कि जो जन्मा है सो मरेगा। इसलिए किसी भी मृत्यु पर दुःख मानते हुए भी यह नहीं कहा जाता है कि यह कोई अनहोनी घटना घट गई। देर सवेर में आगे−पीछे मरना तो सभी को है यह मान्यता रहने के कारण रोते−धोते अन्ततः सन्तोष कर ही लेते हैं। जब सभी को मरना है तो अपने स्वजन सम्बन्धी ही उस काल चक्र से कैसे बच सकते हैं?
लोक मान्यताओं की बात दूसरी है, पर विज्ञान के लिए यह प्रश्न काफी जटिल है। परमाणुओं की तरह जीवाणु भी अमरता के सन्निकट ही माने जाते हैं। जीवाणुओं की संरचना ऐसी है जो अपना प्रजनन और परिवर्तन क्रम चलाते हुए मूलसत्ता को अक्षुण्ण बनाये रहती है। जब मूल इकाई अमर है तो उसका समुदाय शरीर क्यों मर जाता है? उलट−पुलटकर यह जीवित स्थिति में ही क्यों नहीं बना रहता? उनके बीच जब परस्पर सघनता बनाये रहने वाली चुम्बकीय क्षमता का अविरल स्रोत विद्यमान है तो कोशाओं के विसंगठित होने और बिखरने का क्या कारण है? थकान से गहरी नींद आने और नींद पूरी होने पर फिर जग पड़ने की तरह ही मरना और मरने के बाद फिर जी उठना क्यों सम्भव नहीं हो सकता?
बैक्टीरिया से लेकर अमीबा तक के दृश्यमान और अदृश्य जीवधारी अपने ही शरीर की उत्क्रान्ति करते हुए अपनी ही परिधि में जन्म−मरण का चक्र चलाते हुए प्रत्यक्षतः अपने अस्तित्व को अक्षुण्ण बनाये रहते हैं। फिर बड़े प्राणी ही क्यों मरते हैं? मनुष्य को ही क्यों मौत के मुँह में जाने के लिए विवश होना पड़ता है? इस प्रश्न के उत्तर में जर्मनी के जीव विज्ञानी आगस्ट बीजमान का कथन है कि जीव विकास की प्रगति शृंखला में प्राणियों का मरण तब से प्रारंभ हुआ जब उनमें मेरुदण्ड और मस्तिष्क का विकास, विस्तार आरम्भ होने लगा। मेरुदण्ड भी वस्तुतः मस्तिष्क का ही एक पूँछ जैसा भाग है। मरण को कभी नाड़ी या हृदय की धड़कन के साथ जोड़ा जाता था, पर अब जीवन सत्ता में प्रधानता मस्तिष्क की ही मानी जाती है। हृदय समेत अन्य अवयव उसी के आज्ञानुवर्ती माने जाते हैं। अन्य अवयवों के निःचेष्ट हो जाने पर भी यदि मस्तिष्क में किसी प्रकार की हलचल विद्यमान है तो प्रत्यक्षतः उसे मृतक घोषित किये जाने पर भी उसमें जीवन का अस्तित्व माना जाता है और पुनर्जीवित करने का प्रयत्न किया जाता है। मरने वालों में से बहुत से घोषित मृत्यु के दस मिनट पश्चात तक मस्तिष्कीय दृष्टि में जीवन पाये गये हैं और कृत्रिम धड़कन एवं श्वास−प्रश्वास की व्यवस्था करके प्राण लौटाने के लिए प्रयत्न किये गये हैं। इनमें से कितनों को ही जीवित करने में सफलता भी मिल गई है।
मृत्यु भी प्रगतिक्रम की एक सीढ़ी कही जा सकती है। जड़ता में स्थायित्व है। परमाणु और तरंगों की सत्ता में ऊर्जा और हलचल तो है, पर मरण नहीं है। आरम्भिक स्तर के जीवधारियों में भी मरण संकट नहीं है। जीवाणुओं से लेकर एकेन्द्रिय जीवों तक अपनी सत्ता बनाये रहते हैं यों मरण−जीवन का क्रम तो चलता रहता है, पर इससे उनके अस्तित्व के लिए चुनौती उत्पन्न नहीं होती। वे बिना टकराये और बिना किसी महत्वाकांक्षा के प्रकृति के प्रवाह क्रम में बहते रहते हैं। महत्वकांक्षाएं जहाँ प्रगति में सहायक हैं वहाँ उनमें यह खतरा भी मौजूद है कि प्रकृति ऐसे प्राणियों को अपनी सुव्यवस्था में बाधक समझें और जल्दी ही अपना बिस्तर गोल करने के लिए रास्ता साफ करती हैं। मनुष्य के लिए मृत्यु संकट सम्भवतः इसीलिए अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक जटिल और कष्टकर बन गया है।
बीमारियों से मनुष्य का घिरा रहना ही उसका प्रकृति को चुनौती देने का ही दण्ड दुष्परिणाम है। उपभोग की मर्यादाओं का उल्लंघन शरीर संरचना के अनुरूप आचार संहिता न अपनाने से स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होता है और उसकी दुःखद प्रतिक्रिया आये दिन बीमार रहने के रूप में भुगतनी पड़ती है। जितना सरल, सौम्य, हलका और आवेश उत्तेजनाओं से रहित जीवन जिया जायेगा, उतना ही मृत्यु का भय और कष्ट हलका होता जायेगा।
मौत भयानक या अवांछनीय ही हो, ऐसी बात नहीं है। कई बार तो वह जीवन से भी अधिक मूल्यवान, सुखद और सत्परिणाम उत्पन्न करने वाली होती है। देश की सुरक्षा के लिए युद्ध क्षेत्र में जाने वालों में से कितनों को ही अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता है और वे उच्च आदर्शों के लिए इस प्रकार प्राण गंवाते हुए गर्व गौरव का अनुभव करते हैं। उनकी इस वीरगति के लिए लोक श्रद्धा भी बरसती है। लोकहित के लिए प्रयत्नशील महामानवों से कितनों को ही कठिनाइयों से जूझते हुए अकाल मृत्यु का ग्रास होना पड़ता है। कितने ही ईसा, सुकरात, गान्धी आदि की तरह प्रति पक्षियों द्वारा मौत के घाट उतार दिये जाते हैं। गीता कहती है कि ऐसा मरण भाग्यवानों को ही उपलब्ध होता है। क्षत्रिय धर्म में नीति से संघर्ष करते हुए मिलने वाले मरण को यश और स्वर्ग देने वाला कहा गया है। मौत यदि बुरी ही होती तो उसे हर कोई कष्टकर ही अनुभव करता। तब गोली और फाँसी के सामने दौड़ते हुए चले जाने के लिए कोई तैयार ही न होता और वीर बलिदानियों की परम्परा ही समाप्त हो जाती।
कई बार तो जीवन और मौत के बीच कौन सुखद है यह चुनने में मनुष्य को मौत के पक्ष में अपना निर्णय देना पड़ता है। आत्महत्याएं उसी प्रकार के निर्णय का परिणाम होती हैं। समाज उसे किस दृष्टि से देखता है और कानून उसे कितना अवांछनीय दण्डनीय मानता है यह दूसरी बात है, पर जो इस प्रकार के भयानक निर्णय करते हैं और जिन्दगी से मौत को वरिष्ठ मान बैठते हैं उनके अपने भी तो कुछ तर्क होने ही चाहिए। भले ही उन्हें जन विवेक मान्यता न देता हो।
मनोविज्ञान शास्त्र को सुव्यवस्थित बनाने वाले डॉ. सिंग फ्रायड का नाम विश्व विख्यात है। उनकी समझदारी पर कोई अविश्वास नहीं कर सकता। जीवन के अन्तिम दिनों में उन्हें जबड़े का कैन्सर हो गया था। यह लगातार 16 वर्ष तक चला। इतने समय में उस फोड़े का 33 बार आपरेशन हुआ। फिर भी वे उस असह्य पीड़ा से छुटकारा न पा सके। फलतः उन्होंने मार्फीन की सुई लगा ली और 83 वर्ष की आयु में स्वेच्छामरण को गौरवास्पद मानते हुए विदा हो गये।
इसी प्रकार एक असह्य पीड़ा से छटपटाते हुए असाध्य रोगी की दया भिक्षा स्वीकार करते हुए डॉ. विन्सेट मान्ट मेरिनो ने स्वेच्छामरण में सहायता करने वाली औषधि उपलब्ध करा दी थी, रोगी को पाँच मिनट के भीतर ही चिरशान्ति का लाभ मिल गया। पर कानून ने इसे अपराध ही माना और चिकित्सक को न्यायालय का निर्धारित दण्ड भुगतना पड़ा। महात्मा गान्धी ने भी साबरमती आश्रम में एक मृत्यु से छटपटाते हुए बछड़े को मरण की सुई लगाने की आज्ञा दे दी थी और उन्हें तीखे जन विरोध का सामना करना पड़ा था।
यहाँ स्वेच्छामरण के कानूनी और औचित्य पथ पर चर्चा नहीं हो रही है। देखा यह जा रहा है कि क्या कोई ऐसा भी समय आ सकता है जब जीवन से मरण को अधिक उपयुक्त माना जाय? मृत्यु दण्ड के अपराधियों के लिए भी न्याय परम्परा यही निर्धारण करती है कि उनके जीवित रहने की अपेक्षा मरण ही श्रेयस्कर है।
प्रसंग जीवन और मरण में से वरिष्ठता किसे दी जाय यह निर्णय करने का है। यहाँ सब कुछ सापेक्ष ही ठहरता है। उपयोगिता ही प्रधान है। न जीवन ही सदा सर्वदा उत्तम समझा जा सकता है और न मृत्यु को ही सर्वथा हेय ठहराया जा सकता है। दोनों ही अपने−अपने स्थान पर गुण−दोष की कसौटी पर कसे जाने के उपरान्त श्रेष्ठ समझे जा सकते हैं।
प्राणियों की इस मनःस्थिति पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए महाभारत में महर्षि व्यास करते हैं−
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यम मन्दिरम्। अन्ये स्थिरत्वमिच्छन्ति किमाश्चर्य मतः परम्॥
अर्थात्− प्राणियों को निरन्तर मृत्यु मुख में जाते हुए आँखों में देखते हुए भी लोग अपनी स्थिरता का ही विश्वास किये बैठे रहते हैं यह कितने बड़े आश्चर्य की बात है।
आत्मा की पुकार है− मृत्योर्माऽमृतं गमय। ‘‘हे परमेश्वर− मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चल।” मरण कितना अवांछनीय और जीवन कितना अभीष्ट है इसका आभास इस पुकार में मिलता है। अन्तरात्मा की प्रबल कामना है− जिजीविषा। वह जीना चाहता है। यह सभी जानते हैं कि शरीर गत मृत्यु अपराजित है। वह प्रकृति पदार्थों को परिवर्तित करने के लिए अनिवार्य रूप से आती है। किन्तु निश्चय ही उसका भय जीता जा सकता है। मौत अपने आप डरावनी नहीं है। परिवर्तन में विनोद है और उत्साह भी। स्थिरता में नीरसता रहती है। गति और सरसता बनाये रहने के लिए परिवर्तन आवश्यक है। यह स्वाभाविक सरल प्रक्रिया ही मरण कहलाती है जिसे काय−कलेवर का परिवर्तन ही कह सकते हैं। इसमें न तो कुछ अप्रिय है न अनुचित और न कष्ट कर। कष्टकारक तो मृत्यु का भय है। यदि उससे निवृत्ति मिल सके तो समझना चाहिए कि मृत्यु का भय है। यदि उससे निवृत्ति मिल सके तो समझना चाहिए कि मृत्यु से छुटकारा पाने और अमरता का लाभ लेने जैसा आनन्द मिल गया।
मृत्यु कोई विभीषिका नहीं एक सुनिश्चित नहीं एक सुनिश्चित संभावना है, उसे एक समस्या का रूप दिया जा सकता है। उसका हल इतना ही खोजा जा सकता है कि सुखद, संतोषजनक और सराहनीय मृत्यु का वरण किस प्रकार सम्भव हो। इसका उत्तर एक ही है कि जीवन का सदुपयोग इस प्रकार किया जाय कि जन्मोत्सव की तरह ही मरणोत्सव भी देह छोड़ने वाले प्राणी को सरल प्रतीत हो सके। सुखद मृत्यु जीवन देवता की आराधना का वरदान है। जो इस साधना को कर सके उसके लिए मरण का दिन पश्चात्ताप का नहीं वरन् अधिक सुखद परिस्थितियों के लिए विनोद यात्रा पर निकलने की तरह उत्साहवर्धक ही बन कर आता है।
भगवान बुद्ध जब मरने लगे तो रोते हुए अपने प्रिय शिष्य आनन्द को दुलारते हुए उन्होंने कहा− ‘आनन्द, रोओ मत, यह रोने का अवसर नहीं है। स्वयं अपने लिए दीपक बनो। निर्वाण तो नितान्त स्वाभाविक है। उसके लिए तो पहले से ही तैयार रहना है।’ विल्सन ने मृत्यु की बेला से मुस्कराते हुए किसी अज्ञात से कहा− “मैं तो बिलकुल तैयार हूँ।” और उन्होंने आँखें मूँद ली। वाल्टेयर ने उपस्थित लोगों से मरते समय कहा− ‘आप लोग, गड़बड़ न करें शान्ति से बैठें और मुझे शान्ति से मरने दें।’ गेटे ने मरण की उपस्थिति को प्रकाश के रूप में देखा और वे बड़े उत्साह से चिल्लाये प्रकाश−प्रकाश− अनन्त प्रकाश। इतनी अनुभूति व्यक्त करके उनकी वाणी मौन हो गई। स्वामी दयानन्द ने सन्तोष भरी लम्बी साँस खींची और कहा− हे! दयामय तेरी इच्छा पूर्ण हो।’ गान्धी जी के मुख से अन्तिम शब्द निकला− ‘हे राम’ और वे राम में ही समा गये।
जीवन का सदुपयोग ही मौत को सरल बनाने की पूर्व तैयारी है जो उसे कर सके उनके लिए जीवन और मरण दोनों अभिन्न मित्रों की तरह सुखद और सहयोगी प्रतीत होते हैं।
जीवन की सफलता के सम्बन्ध में कई व्यक्तियों की कई मान्यताएं पाई जाती हैं। कुछ लोग सम्पत्तिवान होने को जीवन लाभ मानते हैं और सोचते हैं जितना अधिक धन मिल सके उतने ही अधिक सुविधा साधन मिलेंगे और दूसरों को आकर्षित करने अथवा दबाने का अवसर मिल जायगा। उसका संचय इसलिए किया जाता है कि सम्पत्ति सुख का लाभ जीवन भर अपने को मिलता रहे और उत्तराधिकारी उसी सुविधा का उपभोग करते रहें। कुछ को ख्याति बहुत प्रिय होती है। अपनी जानकारी जितने अधिक लोगों को हो उतना अच्छा, यह सोचकर वे कुछ ऐसी तरकीबें लड़ाते हैं जिससे उनके नाम की चर्चा दूसरों के मुख से होती रहे। विवाह शादियों की धूमधाम में यही लिप्सा काम करती है। कई व्यक्ति संस्थाओं में पदाधिकारी बनने की फिराक में इसीलिए रहते हैं कि उन्हें बहुत लोग जानेंगे। वक्ता, गायक, नेता, अभिनेता बनने का शौक बहुतों को होता है। इसमें भी ख्याति की छिपी कामना ही लोक−सेवा का आवरण ओढ़कर सामने आती है। कइयों से कुछ नहीं बनता तो भूत−प्रेतों का पाखंड रचने से लेकर गुण्डागर्दी मचाने जैसे निकम्मे तरीके अपनाते हैं। शृंगार सज्जा में भी प्रायः यही प्रवृत्ति काम कर रही होती है। धनी लोग अपनी ख्याति के लिए इमारतें बनाते हैं। तीर्थयात्रा, धर्मानुष्ठान, ब्रह्मभोज आदि के उत्सव करते देखे जाते हैं।
कइयों को शक्तिवान होने के पद पाने की अभिलाषा रहती है ताकि अपने नियन्त्रण में औरों को रख सकें और अपना वर्चस्व सिद्ध कर सकें। नाम छपाना भी, एक नशा है। योग्यता न होते हुए भी कई लोग लेखक, सम्पादक बनते हैं। जहाँ−तहाँ से जोड़ गांठ करके किसी तरह अपनी आकाँक्षा तृप्त करते हैं।
ऐसे−ऐसे अनेक और भी उपाय हैं जिनमें दूसरों की आँखों में अपना मूल्यांकन कराने की, दूसरों की जीभ से अपनी चर्चा प्रशंसा सुनने की अपेक्षा की जाती है। यह साधन साध्य होने से सरल तो है पर स्थिर नहीं। जिनके पास चतुरता, फुरसत और सम्पत्ति मौजूद है वे कितने ही उपायों से बड़प्पन खरीद सकते हैं। इस कार्य में उन्हें थोड़े प्रलोभन के मूल्य पर खरीदे हुए चमचे भी मिल जाते हैं और काम किसी न किसी हद तक बन ही जाता है। ईमानदारी या बेईमानी से कुशल व्यक्ति पैसा भी कमा लेते हैं। लोकसेवी या धर्मात्मा का आवरण ओढ़ लेना इन सबसे सरल है।
इन उपायों से उपलब्ध की गई सफलता बाहरी होती है। उसके लिए दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है। दूसरे तो दूसरे ही हैं उनकी मति न तो स्थिर होती है और न ही यही पता चलता है कि जैसा दर्शाया जा रहा है वैसा ही उनका भीतरी मन भी है या नहीं। लोक चर्चा बहुत ही उथली होती है। उसका प्रवाह उलटने में भी देर नहीं लगती। मात्र अफवाहें तो उस उथले उपार्जन को हलके तिनके की तरह उड़ाकर कहीं से कहीं ले जा सकती हैं। फिर जनता की स्मृति इतनी उथली होती है कि पीठ फेरते ही औरों की बातें विस्मरण हो जाती है। असल में हर व्यक्ति अपने निजी कार्यों और झंझटों में इतना अधिक व्यस्त है कि उसे दूसरों की निंदा प्रशंसा में कोई गहरी दिलचस्पी नहीं होती। सामने की बातों पर या घटनाओं पर हलकी−सी प्रतिक्रिया व्यक्त करने के उपरान्त हर आदमी अपने काम में लग जाता है। ऐसी दशा में दूसरों के प्रशंसा−प्रमाण पत्र बादल की छाया जैसे होते हैं। इनसे बालकौतुक भर पूरा होता है, जीवन की सफलता जैसे महान् प्रयोजनों की पूर्ति में उससे कोई सन्तोषजनक सहायता नहीं मिलती।
आत्मसन्तोष की सफलता का सबसे बड़ा लक्षण है। वही अन्तरंग के साथ रहता है। उसी का अभिमत वास्तविक होता है और चिरस्थायी भी। आत्म तृप्ति और आत्म तुष्टि इसी के सहारे सम्भव है। यह सन्तोष कैसे पाया जाय? इस प्रश्न का उत्तर एक ही है कि अपने क्रियाकलापों में अधिकतम आदर्शवादिता का समन्वय किया जाय। अपने दैनिक कामों में तत्परता, कलाकारिता और उत्कृष्टता का इतना अधिक समन्वय किया जाय कि वे दूसरों को भले ही सामान्य दीखें, पर अपने आपको उसकी विशिष्टता प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होती रहे। सुवासित, सुन्दर पुष्पों का गुलदस्ता आँखों के आगे रहता है तो बहुत सुहावना लगता है। अपने कामों का स्तर इतना ऊँचा होना चाहिए कि उनकी श्रेष्ठता से अन्तःकरण निरन्तर पुलकित होता रहे।
जीवन की सफलता की बात यदि गम्भीरता से सोची गई है और उसके लिए सच्चे मन से प्रयास करने का उत्साह उठा हो तो उसकी योजना एक ही बनानी चाहिए कि अपने दैनिक कामों का स्वरूप और स्तर ऊँचा उठा दिया जाय। स्वरूप से तात्पर्य यह है कि वह अनैतिक और सार्वजनिक हित विरोधी नहीं होना चाहिए। मद्य−मांस जैसे व्यवसाय करने पड़ते हों, अनैतिक प्रवृत्तियों में संलग्न क्रियाकलाप में नौकरी करनी पड़ रही हो तो उसे बदलने का प्रयत्न करना चाहिए। श्रम ऐसे कामों के लिए किया जाय जिनके फलस्वरूप दुष्प्रवृत्तियों के पनपने में में सहायता न मिलती हो। इसके उपरान्त परिस्थितिवश जो भी काम करने पड़े उन्हें सामान्य असामान्य का भेद-भाव किये बिना उत्साहपूर्वक करना चाहिए। अमुक काम समाज में सम्मानित समझा जाता है अमुक को छोटे लोगों का माना जाता है। इस झंझट में पड़ने की आवश्यकता नहीं है। काम न कोई छोटा है न बड़ा। अपने−अपने स्थान पर सभी की उपयोगिता है। सम्मानित कहलाने वाले काम ही यदि सब लोग करने लगें, सभी मेज, कुर्सी का काम तलाश करें तो फिर खेतों और कारखानों में होने वाले उत्पादन के अभाव में सर्वत्र भुखमरी फैल जायगी। परिस्थिति और आवश्यकता के अनुरूप जहाँ जो काम मिल सकें उन्हें ही अपनाया जा सकता है। सम्मानित काम ढूँढ़ने के लिए बेकार बैठे रहना सर्वथा अनुपयुक्त है।
आजीविका के लिए किए जाने वाले कामों में जितना समय लगता है प्रायः उतना ही शरीर और परिवार की व्यवस्था में भी लग जाता है। यह निजी कहलाने या नित्य कर्म समझे जाने वाले क्रियाकलाप भी आखिर काम ही हैं। आवश्यक नहीं कि जो आजीविका के लिए किया जाय उसी को काम की संज्ञा दी जाय। परमार्थ प्रयोजन से लेकर भजन, उपासना के कृत्य भी अपने−अपने ढंग से काम ही हैं। इन्हें करने की प्रक्रिया और दृष्टि समुन्नत होनी चाहिए। यह समावेश हो जाने से छोटे काम भी कर्मयोग की संज्ञा से गिने जाने योग्य बन जाते हैं।
काम साधारणतया थकान उत्पन्न करता है। उसमें शक्ति व्यय होती है। अस्तु हर कोई श्रम से बचना और आराम से समय काटना चाहता है। किन्तु यदि उसे खेल मान लिया जाय तो उसे जितना भी किया जाय प्रसन्नता मिलती जायगी और उत्साह बढ़ता जायगा। बच्चे उठने से लेकर सोने तक खेलते रहते हैं। इसमें उन्हें कितनी उछल कूद करनी पड़ती है इसका लेखा−जोखा लिया जाय तो शरीर के अनुपात को देखते हुए वह लगभग उतना ही हो जाता है जितना कि किसी श्रमिक को आठ घण्टे की मजूरी में करना होता है। इतने पर ही बच्चों में थकान और उदासी के कोई चिन्ह दिखाई नहीं पड़ते। काम को भार या पराया समझकर उदास मन से किया जाता है तो वह भारी पड़ेगा अन्यथा विनोद की तरह किये गये कामों में जितनी शक्ति खपती है उतनी ही विनोद के कारण दूसरी ओर से मिलती भी जाती है। डायनेमो और बैटरी का परस्पर सम्बन्ध बन जाय तो बैटरी डायनेमो को चलती है और डायनेमो बैटरी चार्ज करता है इस प्रकार दोनों एक दूसरे के पूरक बने रहते हैं। किसी की भी शक्ति चुकने नहीं पाती।
कर्मनिष्ठ होने का गौरव प्राप्त करना अन्य सभी सफलताओं से बढ़कर है। काम यदि ईमानदारी और दिलचस्पी के साथ किया जाय तो उसका स्वरूप और परिणाम ऐसा सुन्दर एवं सुखद होता है जिस पर महज ही गर्व किया जा सके। बेगार भुगतने की तरह हाथ के काम को किसी तरह निपटाने से और निश्चित रूप से आधा−अधूरा, काना−कुबड़ा ही बन सकेगा। किन्तु उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर अपनी सारी कुशलता को दांव पर लगा दिया जाय तो उपलब्धि इतनी सुन्दर होगी जिसके लिए हर किसी की जीभ से प्रशंसा के स्वर ही निकलेंगे। ऐसे कार्य नयनाभिराम होते हैं, उनसे दूसरे प्रेरणा लेते हैं, अनुकरण का उत्साह प्राप्त करते हैं तथा जो भूल करते थे उसे सुधारते हैं।
दूसरों को कई तरह की नसीहतें देने के लिए कई लोग कई तरह की योग्यताएं प्राप्त करते हैं। कई प्रकार की कलाएं सीखते हैं और विशेषताएं बढ़ाते हैं। यह सब भी ठीक ही है। किन्तु यदि काम को तन्मयता−तत्परता−कुशलता के साथ किया जा सके तो यह जनसाधारण को सिखाने के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण धर्मोपदेश है। अधर्म का निवारण और धर्म का अवधारण बहुत ही अच्छी बात है किन्तु उससे भी पहला कदम यह है कि आदमी अपना काम ऐसी अच्छी तरह सम्पन्न करे जिसमें व्यक्तित्व को गौरवान्वित करने और अच्छे काम का समुचित प्रतिफल पाने का अवसर प्राप्त हो सके। इसमें व्यक्ति और समाज दोनों का तात्कालिक हित साधन होता है। अतएव उसे भी धर्म धारणा में ही सम्मिलित किया जा सकता है। सही काम करने की नसीहत ऐसी है जिसे धर्म अध्यात्म सिखाने की तरह ही श्रेयस्कर माना जा सकता है। यह शिक्षण वाणी से नहीं अपना अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करने से ही सम्पन्न होता है। अपनी कृति दिखाकर दूसरों को जितना अच्छी तरह प्रभावित किया जा सकता है, उतना और किसी प्रकार नहीं।
सफलताएं किसी भी क्षेत्र की क्यों न हों वे उत्कृष्ट स्तर के श्रम से ही मिलती हैं। बिना प्रबल पुरुषार्थ किये आसमान से किसी के भी गले में विजय श्री की माला नहीं पड़ती। अभीष्ट कुछ भी क्यों न हो उसके लिए प्रबल पुरुषार्थ तो करना ही होगा। सामान्य काम और पुरुषार्थ में इतना-सा ही अन्तर है कि एक को किसी प्रकार उदास मन से निपटा दिया जाता है और दूसरे के लिए यह ध्यान रखा जाता है कि अपनी किसी कृति में घटियापन न रह जाय। उसका स्तर हलका रह जाने से अपने को शर्मिन्दगी न उठानी पड़े। जिसे इस प्रकार से काम करने का अभ्यास हो गया, उसे हर दिशा में सफलता ही मिलती चली जायेगी।
जीवन खाने−सोने में दिन बिताने को नहीं कहते। उसका मूल्यांकन मनुष्य की कृतियों के आधार पर ही बनी हैं। उनके काम सामान्य श्रमिकों को जैसे नहीं हुए होते वरन् जो करते हैं उसमें ईमानदारी, जिम्मेदारी और बाहरी श्रमशीलता का समावेश रहा होता है। अन्य सफलताएं मात्र पुरुषार्थ पर निर्भर नहीं रहतीं, किन्तु कर्मनिष्ठा की दृष्टि से गौरवान्वित हो सकना हर किसी के लिए सम्भव है।
बौद्ध भिक्षु होने पर अपना नाम बदलना अनिवार्य था। उसका उद्देश्य यह था कि वर्ण, गोत्र, जाति का आभास न हो व सब शिष्यगण अहंकार को विस्मृत कर दें!
एक बार शिष्यों में चर्चा चली कि दीक्षित होने पर भी शरीर तो छूट नहीं जाते फिर गोत्र, जाति वर्ण कैसे छूट जायेंगे। बात भगवान के कानों तक पहुँची उन्होंने सबको एकत्र कर कहा, “वत्स, तुमने सांपों की केंचुली देखी है?” हाँ भगवन् देखी है “तो कोई बतावे यह क्या है?” “भगवन् केंचुली जब आती है तो साँप अन्धा हो जाता है।”
“एवं जब केंचुली छूट जाय तब”
“तब सांप को पुनः दीखने लगता है।”
तथागत ने समझाया, “हमारे गोत्र, वर्ण व जातियाँ भी साँप की केंचुली के समान ही हैं जब तक शरीर पर यह रहती हैं, मनुष्य अहंकार में अन्धा बना रहता है, परन्तु जब यह केंचुली छूट जाती है तो उसे सर्वव्यापी विराट सत्ता की अनुभूति होने लगती है। इसीलिए नाम पद, यश और कुलगोत्र की अहंता से विमुक्त होना आवश्यक है।
शिष्य वस्तुस्थिति समझकर सन्तुष्ट हो गये।
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मनुष्य के महानता संभावनाओं के स्रोतों को देखते हुए उसकी गरिमा को भी स्वीकार करना पड़ता है, पर मूर्खताओं को देखते हुए यह आश्चर्य भी होता है कि उसे इन विडम्बनाएं के रहते, किस प्रकार बुद्धिमान ठहराया जाय।
मूर्खताओं में एक है बड़प्पन की वह उथली प्रवृत्ति जो दूसरों को ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए चित्र−विचित्र प्रकार की विडम्बनाएं रचती रहती हैं। ठाट−बाट, सज−धज, फैशन, शान−शौकत, जैसी शेखी−खोरी का सरंजाम खड़ा करने में मनुष्य की आधी से अधिक क्षमता खर्च होती रहती है। समय, श्रम, धन एवं चिन्तन का बहुत बड़ा अंश इन्हीं निरर्थक जाल जंजालों के रचने में नष्ट होता रहता है। यदि उसे बचाया जा सका होता और उस बचत को सृजनात्मक प्रयोजनों में लगाया जा सकना सम्भव रहा होता तो उतने भर से ही प्रगति के नये आयाम बनते और नये द्वार खुलते।
निर्वाह की समस्या अत्यन्त सरल है। मनुष्य की आवश्यकताएं सीमित हैं। उन्हें थोड़े में परिश्रम और कौशल के सहारे सरलतापूर्वक पूरा करते रहना सरल बना रह सकता है। कठिनाइयां महत्वकांक्षाएँ खड़ी करती हैं। यह महत्वाकांक्षाएं किसी उपयोगी सृजनात्मक प्रयोजन के लिए होती तो उन्हें सराहा जा सकता था, पर वे प्रायः निम्न स्तर की होती हैं और शेखी−खोरी के इर्द−गिर्द घूमती रहती हैं। उनका उद्देश्य इतना ही होता है कि लोग अपने को बड़ा आदमी अमीर सुन्दर, आकर्षक एवं असामान्य समझें। कैसे समझें? इसके लिए क्या किया जाय? इस प्रश्न का उत्तर समझ में एक ही आता है कि या तो कुछ आकर्षक ठाट−बाट रोपा जाय या कुछ ऐसा आचरण किया जाय जिसके कारण लोगों की आँखें, अपने पर गढ़ें उनकी जीभ पर अपने प्रसंग की चर्चा चढ़ी रहे। नेता बनने या कोई उद्धत प्रसंग खड़ा कर देने में यही अहंतावादी दुष्प्रवृत्ति काम करती रहती है। धर्माडम्बर खड़े करने तथा दान पुण्य की विज्ञापन बाजी के पीछे मूलतः सस्ती वाह−वाही लूटने की ही ललक छिपी रहती है। परामर्श का तो उन विडम्बनाओं को आडम्बर मात्र उढ़ा दिया जाता है।
आदर्श प्रस्तुत कर अपनी गरिमा का परिचय देना और लोक श्रद्धा का भाजन बनना एक बात है। और सस्ती वाह−वाही लूटने के लिए आडम्बर खड़े करना दूसरी। आमतौर से अधिक खर्च करने अधिक पराक्रमी, अधिक चतुर होने के सच्चे झूठे प्रसंग गढ़े जाते रहते हैं और यह अपेक्षा की जाती रहती है कि इतने भर से अहंकार की तृप्ति कर सकने जैसी चित्र−विचित्र खिलवाड़ें रची जाती रहती हैं। स्पष्ट है कि तथ्य छिपा नहीं रहता है उद्देश्य छिपा सकना अति कठिन है। सस्ते बड़प्पन को पाने के लिए रचा गया ठाट−बाट कौतूहल भर लगता है और उससे जो चर्चा फैलती है उसमें सामने झूठी प्रशंसा और पीछे व्यंग उपहास भरी भर्त्सना के अतिरिक्त और कुछ सार नहीं होता। इसी आत्म−प्रवंचना में उलझे हुए अधिकांश लोग अपने समय, चिन्तन और साधनों को बर्बादी करते रहते हैं। इसे बुद्धिमानी कहा जाय या मूर्खता, इसका निर्णय उन्हीं पर छोड़ा जाना चाहिए जो आत्महीनता की ग्रन्थि से ग्रसित रह कर बड़प्पन के उथले सरंजाम खड़े करते रहने में सामर्थ्य का बहुत बड़ा अंश ऐसे ही अस्त−व्यस्त और नष्ट−भ्रष्ट करते रहते हैं।
कितना ही व्यक्ति अनेक दृष्टियों में सामान्य लोगों की तुलना में अधिक समृद्ध होते हैं। वे अपने को सौभाग्यवान कहलाने और चर्चा का विषय बनने में भी सफलता पा लेते हैं, पर देखना यह है कि इस उथली चर्चा से उनका अथवा चर्चा करने वालों का क्या कुछ हित साधन होता है? बड़प्पन के उद्धत उदाहरण ढूँढ़ने पर ऐसे अनेक प्रसंग सामने आते हैं, जिनमें विचित्रता का कौतूहल एवं चर्चा का विषय तो था, पर उस यश का कहीं अता−पता ही न था, जिसके कारण अन्तराल में इस प्रकार की उमंगे उठती हैं।
अफ्रीका कांगो देश का राजा यलनटी 1894 में मरा। उस समय उसकी 415 पत्नियाँ थी। उसके परिवार में बहिनों से भी विवाह की प्रथा रही है। अस्तु इन पत्नियों में उसकी 55 बहिनें भी शामिल थीं। उसके पिता ने इससे भी अधिक पत्नियाँ संग्रह की थीं।
दक्षिण अफ्रीका के डरबन में 90 वर्षीय नीग्रोखोतों सेयुत्सा नामक व्यक्ति की वर्तमान पत्नियों की संख्या 21 और बच्चों की संख्या 227 हैं। इससे पूर्व जो पत्नियाँ एवं बच्चे मर गये इनकी संख्या उनसे अतिरिक्त हैं। सेयुत्सा के सबसे बड़े बच्चे की आयु 70 वर्ष है। 150 बच्चे प्रौढ़ और कमाऊ हैं। 30 बच्चे हाईस्कूल में पढ़ते हैं। शेष अभी छोटे हैं।
चर्चा की दृष्टि से यह सफलता ऐसी आश्चर्यजनक समझी जा सकती है। कुछ को प्रकृति ने अनायास ही इस प्रकार के उपहार दिये होते हैं। एक असाधारण मोटे और भारी आदमी का विवरण सुनिये।
डेनियल का पिता जेल कर्मचारी था। गरीबी में दिन गुजरते थे। बचपन में वह सस्ती मजूरी करता रहा। बड़ा होने पर उसे भी जेल कर्मचारी की नौकरी मिल गई। युवा होते−होते उसकी ऊँचाई 5 फुट 11 इंच पहुँच गई थी। वजन तीन मन से भी अधिक। फिर भी फुर्ती इतनी थी कि 7 फुट ऊँची छलाँग लगा सकता था।
वजन क्रमशः बढ़ता ही गया। 1793 में वह 5 मन 24 सेर हो गया। सन् 1798 में वह प्रायः 6 मन था। 1804 में वह 8 मन से अधिक था। अन्तिम बार वह तराजू पर सन् 1805 में बढ़ा तब वह 8 मन 32 सेर था। इसके बाद उसने तौल न कराने की कसम खाई फिर किसी के भी करने पर तुलने के लिए तैयार न हुआ। क्यों कि लोग आये दिन उसका वजन लेने के लिए तौलने की मशीन लिए खड़े रहते थे। उन लोगों के तो कौतूहल की पूर्ति होती थी पर बेचारे डेनियल को तुलने में समय नष्ट करने और आगन्तुकों का स्वागत सत्कार करने में हर दृष्टि से घाटा ही घाटा उठाना पड़ता था। हाँ वह अपने समय में ही मोटापे का कीर्तिमान स्थापित अवश्य कर गया था और उसकी चर्चा उस देश भर में सर्वत्र होती रहती थी। वजन बढ़ने से प्रायः लोग अपने जैसे हो जाते हैं। बढ़ा हुआ मांस शरीर पर अनावश्यक दबाव डालता है और उस बोझ को ढोने से पैर और घुटने इन्कार कर देते हैं। रीढ़ की हड्डी और हृदय पर भी इस बढ़े हुए वजन का बुरा असर पड़ता है। यह आम बात है, पर डेनियल को इस प्रकार की कठिनाई मरते समय तक नहीं हुई। वह दूसरों की तरह ही चलता फिरता भागता दौड़ता था। एक बार तो अपने कुत्ते पर आक्रमण करने वाले रीछ से ही उसे गुथ पड़ना पड़ा और इस लड़ाई में रीछ ही पिट कर भागा। डेनियल उसे और लड़ने के लिए खड़ा−खड़ा चुनौती ही देता रहा। लोग उसे मांस का पहाड़ कहते थे। गेंडे के चमड़े की तरह उसकी मांस-पेशियाँ जगह−जगह लटकती रहती थीं। पेट की झूल घुटनों को छूने लगती थी।
अपनी इच्छा के विरुद्ध अन्तिम बार किसी चकमे में आकर तुल गया और 9 मन 8 सेर का निकला, इसके बाद उसका वजन और बढ़ा या घटा इसकी कोई निश्चित जानकारी का उल्लेख नहीं मिलता।
इस मोटापे से उसको कोई वैयक्तिक लाभ नहीं मिला। नौकरी के दिनों भी मुश्किल से ही गुजर होती है। उसे 800 रुपये वार्षिक अर्थात् 66 रु. मासिक के लगभग वेतन मिलता था। इतने में गुजर न होती तो मछली पकड़ने, मुर्गी पालने जैसे अन्य अतिरिक्त काम करके किसी तरह अपना काम चलाता था। एक बार उसकी भेंट एक वोस्लवास्की नामक बौने से हुई। इस भेंट में डेनियल ने उससे पूछा− ‘आपके पजामे में कितना कपड़ा लगता है। जब उसने बताया कि पौन गज काफी होता तो डेनियल ने लम्बी साँस खींचते हुए कहा− ‘इतना तो मेरी एक बाँह को ढकने में ही खर्च हो जाता है।’
एक विचित्र लम्बे आदमी का प्रसंग इस प्रकार है−
हरियाणा प्रान्त में रेवाड़ी के पास एक छोटे गाँव का निवासी रतीराम नामक श्रमिक की ऊँचाई 224 सेन्टीमीटर− वजन 127 किलोग्राम है। उसके पैरों का पंजा 45 से.मी. है। जिराफ जैसी लम्बाई को देखकर दर्शक आश्चर्यचकित रह जाते हैं। इस चलते−फिरते अजूबे को देखकर भीड़ खड़ी हो जाती है, बच्चे पीछे लग लेते हैं। इतने पर भी अपनी कोई आन्तरिक विशेषता न होने से उसे सदा गुजारे की ही चिन्ता करनी पड़ती है। बढ़ी हुई काया से उसका खाने, पहनने का खर्च ही बढ़ा है। उसी अनुपात से योग्यता भी बढ़ी होती तो वह बड़प्पन काम का भी सिद्ध हो सकता था।
इस अजूबे से चकित और प्रभावित लोग कभी−कभी उसकी ओर आकर्षित भी होते रहे हैं और यथा सम्भव कुछ सहायता करने का भी प्रयत्न करते रहे हैं, पर वह बाहरी सहायता भी कुछ विशेष काम नहीं आ सकी और स्थिति जहाँ की तहाँ बनी रही। एक बारात में गया तो चकित महिलाओं में से चार ने उसे एक-एक रुपये का पुरस्कार दिया। हरियाणा के मुख्यमन्त्री राव वीरेन्द्र सिंह ने उसे ढाई सौ रुपये मासिक पर चौकीदार की नौकरी लगवा दी। पुलिस में भी सिपाही की भर्ती का अवसर किसी प्रकार मिल गया, पर इन पदों पर भी वह टिक नहीं सका। दिल्ली की कृषि प्रदर्शनी के राजस्थानी पंडाल में उसे बीस रुपया रोज की मजूरी मिल गई। अखबारों में कौतुक कौतूहल की दृष्टि से उसके फोटो भी छपे। ऐसे-ऐसे छुट−पुट सहयोग ही दूसरे लोग उसे दे सके, पर इनसे उसका कुछ काम नहीं चला। काया की ऊँचाई दर्शकों के लिए कौतुक भले ही रही तो, पर उससे उसने स्वयं कुछ लाभ नहीं उठाया। पग−पग पर हैरानी ही अनुभव होती रही है। साइज की न तो धोती बाजार में मिलती है और न जूता। चारपाई से लेकर चप्पल तक अपने नाप की अलग से बनानी पड़ती। इस झंझट से उसे असुविधा का ही सामना करना पड़ता।
ब्लिडा अल्जीरिया के वैण्डस्टेस्ड कस्बे में एक बार एक ताड़ का पेड़ जमींदोज पक्की छत वाले तहखाने को फाड़कर ऊपर उगा दिखाई दिया है। कमजोर पौधे ने इतनी मजबूत छत में किस तरह छेद बनाया और ऊपर आया इस पर सभी लोग बहुत चकित हुए थे और दूर−दूर से लोग उसे देखने पहुँचे थे।
अपने देश की आबादी 50 करोड़ के करीब है। इनमें से 1 करोड़ लोग मानसिक रोगों से पीड़ित हैं। इनमें कम से कम 8 लाख ऐसे हैं जिन्हें पागलखाने में ही रखा जाना चाहिए। खुले रहकर वे सामाजिक अशान्ति और उपद्रव उत्पन्न करते हैं। इनके अतिरिक्त 16 लाख मनुष्य ऐसे हैं जो मन्द बुद्धि मस्तिष्क के हैं और वे कठिनाई से अपनी शरीर यात्रा भर चलाते रह सकने योग्य उत्पादन कर सकते हैं। व्यवस्था की दृष्टि से उन्हें अपंग ही माना जा सकता है।
संसार में सबसे खारा जल ‘डेड सी’ का है। इटली के स्कीपा द्वीप के फारिया बन्दरगाह के समुद्र का जल इतना गर्म है कि उसमें अण्डे उबारे जा सकते हैं। अटलांटिक समुद्र में एक जगह 30246 फुट गहराई है। इतनी ऊंची कोई भी पर्वत चोटी अपनी पृथ्वी पर नहीं है।
उत्तर में उसने अपना नाम डम्बर्टो बताया। यही नाम सम्राट का था और ठीक यही जन्मदिन भी।
पत्नी और सन्तान के नामों की पूछ−ताछ हुई तो वे भी दोनों के एक ही निकले। दोनों की पत्नियों के नाम ‘मार्गरीता।’ दोनों के पुत्रों का नाम− ‘वित्तेरियो।’
बात आगे चली। वर्तमान कार्यक्षेत्र में दोनों ने कम प्रवेश किया। इस पूछ−ताछ में यह तथ्य सामने आया कि 9 जनवरी 1877 को ही एक ने होटल संभाला और दूसरा सिंहासनारूढ़ हुआ और भी कितनी ही बातें एकता प्रदर्शित करने वाली सामने आई।
वार्ता समाप्त होने तक दोनों इस आश्चर्यजनक एकताओं के कारण अत्यन्त घनिष्ठ बन गये। विदाई से पूर्व फिर मिलने का अवसर निश्चित किया गया। सम्राट को दूसरे दिन ओलम्पिक खेलों का पुरस्कार वितरण करना था। दुबारा भेंट की बात उसी समय होने की बात तय हो गई। आश्चर्य है कि वे दुबारा इस संसार में फिर कभी न मिल सके।
सम्राट डम्बर्टो को किसी ने समारोह के बीच ही गोली का निशाना बना दिया और होटल मालिक डम्बर्टो भी ठीक उसी समय आपसी रंजिश के कारण एक प्रतिद्वन्दी की गोली का शिकार बन गया।
दोनों की शव यात्रा ठीक एक ही समय निकली यद्यपि वे दफन दो भिन्न स्थानों पर हुए।
सामान्य की अपेक्षा असामान्य कहलाने का अवसर उपरोक्त घटनाओं से सम्बन्धित व्यक्ति अथवा पदार्थों को मिला है, पर देखना यह है कि उस चर्चा के पात्रों को अथवा उनकी गाथा गाने वालों को उथले मनोरंजन के अतिरिक्त और क्या मिला?
चर्चा को विषय बनने के लिए खर्चीले श्रम साध्य, खड़े करने में, अति जटिल साधनों को रचने में मन जितना ललकता रहता है उतना ही यदि वह वास्तविक बड़प्पन पाने के लिए महान उद्देश्य पूरा करने वाले आदर्शवादी क्रिया−कृत्यों में लगें तो उस भाव भरे सम्मान की उपलब्धि भी हो सकती है, जिसके लिए उद्धत आचरण और बचकाने खिलवाड़ करने में बालबुद्धि प्रायः लगी रहती है।
न्यूयार्क के एक प्रसिद्ध मेयर लागाडिया को जो सुप्रबन्ध के लिए प्रसिद्ध थे− पुलिस अदालत के मुकदमों में बड़ी रुचि थी। इसलिए वे अकसर पुलिस के मुकदमों की अध्यक्षता स्वयं किया करते थे।
एक दिन पुलिस ने एक चोर पर मुकदमा चलाया कि उसने एक रोटी चुराई है।
मेयर ने निर्णय सुनाया, “चूँकि अपराधी ने चोरी की है इसलिए उस पर दस डालर अर्थदण्ड किया जाता है” और तुरन्त उसने अपनी जेब से दस डालर निकाल कर अपराधी को दे दिए− ‘यह रहा तुम्हारा दंड’ फिर वे उपस्थिति जनों की ओर उन्मुख हुए एक क्षण सभी पर दृष्टि दौड़ाई फिर बोले− “साथ ही न्यायालय में उपस्थित हर व्यक्ति पर भी आधा डालर अर्थदंड किया जाता है क्योंकि आप सब एक ऐसे समाज में रहने के अपराधी हैं, जिसमें एक भूखे मनुष्य को अपनी रोटी की चोरी करनी पड़ती है।”
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खाद्य पदार्थों को प्राकृतिक सजीवता के आधार पर उन्हें पसन्द किया जाय। हरे शाक−भाजी, ऋतु−फल प्रायः हर जगह मिल जाते हैं और अन्न की तुलना में सस्ते भी पड़ते हैं। अन्नों को अंकुरित करके अधिक सजीव एवं शक्तिदायक बनाया जा सकता है। वस्तुओं की कम से कम तोड़−फोड़ की जाय। दलिया या मोटा आटा− बारीक पिसे मैदा की तुलना में अधिक सुपाच्य होता है। छिलके अन्न, शाक, फल आदि सभी के अधिक गुणकारी होते हैं। सूर्य की किरणों के सीधे सम्पर्क में रहने से छिलकों में बहुमूल्य जीवन−तत्व भरे रहते हैं। अस्तु जिनके छिलके बिलकुल ही अखाद्य हैं उन्हें छोड़कर शेष को छिलके समेत ही खाया जाय। आटे को साफ तो किया जाय, पर उनकी भूसी फेंकी न जाय। दालें साबुत पकाई जायें। दलनी ही हों तो भी छिलका तो जुड़ा ही रहने दिया जाय। यही बात तरकारियों के सम्बन्ध में भी है। अरबी, कटहल जैसे बेतुके शाकों को छोड़कर शेष शाक छिलके समेत ही पकने चाहिए। पकाने में अग्नि संस्कार कम से कम किया जाय। हलकी आग पर वस्तुओं का उबाल लेने भर तक चूल्हे की गतिविधियों को सीमित किया जाय। तलना, भूनना खाद्य पदार्थों की जीवनीशक्ति को जला डालता है और उनकी स्थिति निर्जीव कोयले जैसी बन जाती है। उबालने का अधिक उपयुक्त तरीका भाप के सहारे पकाने का है। इसमें खाद्य पदार्थों की मूल सामर्थ्य उतनी नष्ट नहीं होती जितनी कि तेज आग पर अथवा खुले मुँह की पतीली से भाप उड़ते रहने पर होती है। पकाने के लिए प्रेशर कुकर एवं सादे कुकरों का उपयोग करना अधिक वैज्ञानिक है। यह उपकरण हर कहीं बड़ी आसानी से और कम मूल्य के मिल जाते हैं। उनका उपयोग भी कठिन नहीं है।
जो प्राणी जहाँ पैदा होता है उसे उसी क्षेत्र के खाद्य पदार्थ अधिक अनुकूल पड़ते हैं। प्रयत्न यह किया जाये तो परदेश से मंगाई हुई, बहुत समय की रखी हुई वस्तुओं का उपयोग न हो। दूध, दही, घी जिन्हें मिल सकता हो वे उसका उचित मात्रा में उपयोग करें अन्यथा मूँगफली, तिली, सोयाबीन से चिकनाई की आवश्यकता पूरी कर लें। यह मोटे−मोटे नियम हैं, जिनका प्रतिपादन सामान्य जानकार से लेकर उच्चकोटि के शरीर शास्त्री तक समान रूप से करते रहे हैं।
अभक्ष्य पदार्थों में मांसाहार मनुष्य की शरीर रचना और दयालु प्रकृति के हिसाब से सर्वथा विपरीत पड़ता है। भूत−पलीत, शकुन, मुहूर्त, जादू टोने जैसे अनेक भ्रम पिछड़े लोगों पर छाये रहते हैं। तथाकथित समझदारी का एक बड़ा भ्रम यह है कि मांसाहार से शरीर पुष्ट बनता है। यह बात सिंह, व्याघ्र जैसे हिंसक संरचना वाले प्राणियों के लिए ही हो सकती है। मनुष्य के दाँत, आंतें और नाखून विशुद्ध रूप से शाकाहारी वर्ग के हैं। उसके लिए मांस किसी भी प्रकार सुपाच्य नहीं हो सकता। मांस में विटामिन ए प्रोटीन आदि तत्व होने का ढोल तो पीटा जाता है, पर यह भुला दिया जाता है कि दालों में मिलने वाले प्रोटीन की तुलना में मांस का प्रोटीन कहीं अधिक गरिष्ठ और घटिया होता है। फिर प्राणियों के शरीर में पाये जाने वाले रोग भी मांस के साथ खाने वाले के पेट में चले जाते हैं। विटामिन ए की दृष्टि से मांस एवं अण्डों की तुलना में गाजर कहीं अधिक समृद्ध है।
किसी जमाने में मांस का समर्थन एवं उपयोग प्रगतिशीलता का चिन्ह माना जाता था और उसका विरोध करने वालों को दकियानूसी ठहराया जाता था। शरीर-शास्त्र की नवीनतम खोजों ने स्थिति को उलटकर रख दिया है। मांसाहार की प्रतिक्रिया स्वास्थ्य पर क्या होती है उसके गहन अनुसंधान ने मानवी विवेक को यह समझने के लिए विवश किया है कि बौद्धिक दृष्टि से मांसाहार का समर्थन उथले दर्जे की प्रतिगामिता है। शरीर शास्त्र की दृष्टि से अखाद्य को खाद्य सिद्ध करने जैसी कुचेष्टा है। भावनात्मक दृष्टि से यह एक क्रूर कर्म है। एक से एक स्वादिष्ट और पौष्टिक खाद्य पदार्थों के रहते हुए भी माँस का आग्रह यह बताता है कि दूसरों के प्राण हरण करने की निष्ठुरता को कोई बुराई नहीं माना जा रहा है और अपने स्वाद एवं भ्रम की पूर्ति के लिए ऐसा कुछ किया जा रहा है जैसा यदि अपने साथ किया गया होता तो न्याय और अधर्म की दुहाई दी जाती। दुर्बलों और असमर्थों के उत्पीड़न में न तो बहादुरी है और न प्रगतिशीलता। इस समर्थन में मानवी गरिमा का अवमूल्यन ही होता है। मांस की तामसिकता मन और बुद्धि पर निष्ठुरता की ऐसी प्रतिक्रिया छोड़ती है। इससे होने वाली सत्प्रवृत्तियों और सद्भावनाओं की कमी इतनी बड़ी हानि है जिसके साथ तथाकथित स्वास्थ्य लाभ को नगण्य ही ठहराया जायगा। शारीरिक लाभ की मृग तृष्णा तो पूरी न हुई उलटे मानसिक उत्कृष्टता भी गुम गई तो खाद्य चुनाव में मांसाहार को भी स्थान देना बुद्धिमत्तापूर्ण कहाँ हुआ?
अभक्ष्यों की गणना में बहुत प्रचलित नशेबाजी का भी स्थान है। बुद्धिमत्ता की वृद्धि के लिए किये जाने वाले खर्च और प्रयत्नों की बात समझ में आती है, पर अच्छे खासे आदमी को देखते−देखते पागलों की श्रेणी में ले जाकर खड़े कर देने वाले नशों के लिए जो शौक चल पड़ा है, उसकी उपयोगिता किस प्रकार समझी जाय?
नशे की हानि सर्वविदित है। तम्बाकू से लेकर शराब तक के चित्र−विचित्र नशों में पेट और दिमाग को खराब करने वाली बुराइयाँ आरोग्य शास्त्र के आधार पर आये दिन घोषित की जाती रहती हैं। उन सेवन की प्रतिक्रिया को धीमी आत्म−हत्या सिद्ध किया गया है। कितने ही रोग उनसे होते हैं। पेट, फेफड़े, जिगर, गुर्दे, हृदय, मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अवयवों पर नशेबाजी का घातक प्रभाव पड़ता है। जीवनी शक्ति के घटते जाने से खोखला बना शरीर आये दिन बीमारियों का शिकार बनता जाता है। विक्षिप्तता में निरर्थक गई− प्रतिक्रिया से रुग्ण हुई− और अन्ततः अकाल मृत्यु में घट गई जीवन सम्पदा को नशेबाजी के कारण जो क्षति पहुँचती है उसका पूरा लेखा−जोखा तैयार किया जाय तो प्रतीत होगा कि व्यक्ति के समस्त शत्रु मिलकर उतनी हानि नहीं पहुँचा पाते, जितनी कि नशेबाजी के कारण अपने द्वारा ही अपने को पहुँचाई जाती है। नशे वस्तुतः विष हैं। मादकता के साथ−साथ उनमें विघातक तत्व भी बड़ी मात्रा में भरे रहते हैं। मात्रा में स्वल्प होने के कारण उनसे तत्काल मृत्यु तो नहीं होती, पर धीरे−धीरे उनका दुष्परिणाम सामने ही आता जाता है। आंशिक मृत्यु के छिद्र में से जीवन रस टपकता रहता है और बहुमूल्य जिन्दगी का प्रायः एक चौथाई भाग अकाल मृत्यु के मुख में चला जाता है। उनका प्रसाद रुग्णता और दुर्बलता के रूप में मिलता है और बढ़ता ही चला जाता है।
देखना यह भी है कि कहीं मद्य, मांस जैसे अभक्ष्य पदार्थों को खान−पान में सम्मिलित करके अपने ही हाथों अपने धनुष−बाण से अपने को बेध डालने की बुद्धिमत्ता में यह अभक्ष्य भोजन भी तो सम्मिलित नहीं हैं। यदि हो, तो उसे उसी प्रकार अपनाये रहा जायगा या गलती को सुधारने का प्रयत्न किया जायगा?
मुख द्वार से हमें अमृत पीना चाहिए और अमृत बांटना चाहिए। इसलिए इस देव गुफा का निर्माण हुआ है। जिह्वा के रूप में भगवान ने इस महामन्दिर में भगवती, सरस्वती की प्रतिष्ठापना की है। इनकी आराधना करके सुदृढ़ स्वास्थ्य और आकर्षक सौन्दर्य का वरदान पाया जा सकता है। इन्हीं भगवती की वाणी शक्ति दूसरों को स्नेह, सौजन्य से परितृप्त करती है। फलस्वरूप जब समाज का असीम सद्भाव, सहयोग अर्जित कराती हुई भौतिक प्रगति का पथ निरन्तर प्रशस्त होता चला जाता है। मुख को मूर्धन्य तीर्थ और देव शक्तियों का निवास गृह कहा गया है। यदि उसका स्तर बनाये रहा जाय तो सहज ही इस देव द्वार से बरसने वाले अनुदानों से सुनिश्चित आरोग्य तो मिलता ही रहेगा।
चरित्र का विकास तो संगति से होता है, परन्तु बुद्धि व चिन्तन एकान्त के ही विषय हैं।
-गेटे
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प्रगति और प्रसन्नता के लिए अनुकूल पड़ने वाली परिस्थितियाँ बनी बनाई तो शायद ही कि सी को मिलती हों, वे आम तौर से बनानी पड़ती हैं। यह निर्माण कार्य अपनी आदतों को सुधारने के साथ आरम्भ करना होता है। आदतों का जीवन में जितना महत्व है उतना शिक्षा और तन्दुरुस्ती का भी नहीं हैं, यद्यपि यह दोनों ही हर किसी को आवश्यक प्रतीत होती हैं।
शरीर की कार्यक्षमता अद्भुत है। वह इसी छोटी जिन्दगी में इतना काम कर सकता है कि जिसका मूल्याँकन करने पर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ेगा। कठिनाई इतनी ही है कि वह श्रम शक्ति हवा के झोंके के साथ उड़ने वाले पत्ते की तरह अव्यवस्थित रास्ते से दिशा विहीन उड़ती रहती है और उसका योजनाबद्ध लाभ बहुत ही स्वल्प मात्रा में मिल पाता है। आदतें ही हैं जो निरर्थक कामों में शरीर को उलझाये रहती हैं और वे काम करने से रह ही जाते हैं जिन्हें करने से कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हाथ लग सकती थीं।
बुद्धि तीव्र है या मन्द, यह कोई बड़ी बात नहीं है। बड़ी बात है सोचने की दिशा और उपयोगी तथ्य पर विचार शक्ति का केन्द्रित रहना। काम उनके सफल होते हैं जो अपने करने के लिए कुछ निश्चित लक्ष्य निर्धारित कर लेते हैं और उस पर नियमित रूप से लगे रहते हैं। इसी प्रकार बुद्धि का लाभ उन्हें मिलता है जो अपने सोचने के लिए एक दिशा धारा निश्चित करते और फिर उसी मार्ग पर अनवरत गति से बिना इधर−उधर भटके चलते रहते हैं। ऐसे लोग मन्द बुद्धि होने पर भी इतना कुछ कर गुजरते हैं कि बुद्धिमत्ता को अपनी निरर्थकता और असफलता स्वीकार करनी पड़े। जिनका मन निरुद्देश्य कल्पनाओं में भटकता रहता है वे समय ही नहीं गँवाते वरन् उलटे ऐसी भ्रान्तियों में फँस जाते हैं जो चिन्तन, श्रम और समय की बहुमूल्य सम्पदाओं को नष्ट-भ्रष्ट ही करती चली जाती हैं।
सही करने और सही सोचने की आदत डाल ली जाये, चंचलता और भटकाव पर अंकुश रखा जाय तो स्वास्थ्य, शिक्षा, सम्पदा, सहयोग आदि की दृष्टि से हल्का पड़ने वाला मनुष्य भी अपने सुनिश्चित मार्ग पर धीरे−धीरे चल कर भी इतनी प्रगति कर सकता है जिसे देखकर अस्त-व्यस्त साधन सम्पन्नों को भी लज्जा लगती है।
परिस्थितियों की अनुकूलता भले ही आवश्यक प्रतीत होती हो पर वह अपने हाथ में नहीं है। जैसा चाहे वैसा सोचना, जैसा चाहे वैसा करना, तो मनुष्य के हाथ में है पर परिणाम सर्वथा अनिश्चित है। क्योंकि उसमें मात्र पुरुषार्थ ही सब कुछ नहीं होता ढेरों अन्य कारण भी जुड़े रहते हैं। अनुकूलता और इच्छित सफलता पाने के लिए उत्साह भरे प्रयत्न करने के लिए साहस जुटाना बहुत ही अच्छी बात है। उसका लाभ भी है इतने पर भी जो चाहा गया है वही होकर रहेगा इसका कोई ठिकाना नहीं है। जो अनिश्चित है उसी के लिए अड़े रहने की अपेक्षा और अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण है कि जो पूर्णतया अपने हाथ में है उसी को संभालें। मनःस्थिति को सुनियोजित बनाने के प्रयास ऐसे हैं जिसमें सफलता प्राप्त करना किसी संकल्पवान व्यक्ति के लिए सरल है। मनःस्थिति को परिष्कृत किया जा सके तो परिस्थितियों की अनुकूलता का मार्ग खुल जाता है। कुछ कमी भी रहे तो मानसिक परिष्कार अपने आप में इतना सुखद है कि उसके रहते परिस्थितियों की प्रतिकूलता भी बहुत बाधक और बहुत कष्टकर नहीं रह जाती।
मनःस्थिति सुधारने का तात्पर्य विचारों में हेरा-फेरी करने से इतना नहीं है जितना कि आदतों को सुधारने से। सोचने वाला मस्तिष्क तर्क और तथ्य उपस्थित कर देने पर विचार बदलने के लिए आसानी से तैयार हो जाता है। कठिनाई अचेतन मन के सम्बन्ध में उसकी आदतें जड़ जमाये बैठे रहती हैं और इतनी हठी होती हैं कि समझाने−बुझाने का सामान्य प्रयत्न उन्हें अपनी और जिद से हटाने में सफल नहीं होता।
बुरी आदतें ही हैं जो आलस के रूप में नस, नाड़ियों में घुस बैठती हैं और मनुष्य को गठिया, लकवा आदि रोगों से ग्रसित व्यक्ति से भी अधिक अपंग बनाकर रख देती हैं। मस्तिष्क पर छाया रहने वाला प्रमाद उतना ही हानिकारक सिद्ध होता है जितना कि अविकसित और अर्द्धविक्षिप्त लोग अपने को दुर्भाग्य ग्रस्त अनुभव करते हैं। चटोरेपन की आदत अनेक बीमारियों की जननी है। यों उसमें कोई खास बुराई नहीं दीखती, पर जहाँ तक स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन का सम्बन्ध है उसे हलका विष पीते रहने का आरोग्य गँवा बैठने की मूर्खता से कम घातक नहीं माना जा सकता।
दिनचर्या बनाकर चलने और समय की नियमितता के नियन्त्रण में कसे रहने पर सामान्य योग्यता का व्यक्ति भी आशाजनक प्रगति कर सकता है। इसके विपरीत जो भी प्रसंग सामने आ जाय उसी में उलझ जाने और आवश्यक कामों को भुला देने वाले व्यक्ति बहुत घाटे में रहते हैं। उनकी उपलब्धियाँ नगण्य ही बनकर रह जाती हैं।
कछुए और खरगोश की वह कहानी सभी को याद है, जिसमें दोनों बाजी कर नियत स्थान पर जल्दी पहुँचने के लिए निकले थे। खरगोश इधर−उधर उछलता भटकता रहा, कछुआ बिना दायें बायें देखे अनवरत चलता रहा। फलतः वही पहले पहुँचा और बाजी जीत ली। प्रश्न द्रुतगामिता और मन्दगामिता का उतना नहीं है जितना क्रमबद्धता का। सफलताओं का एक तिहाई श्रेय योग्यता और साधनों को दिया जा सकता है। शेष दो तिहाई मनुष्य की आदतों पर निर्भर रहता है। सुनियोजित रीति−नीति अपनाने वाले ही दूसरों की दृष्टि में प्रामाणिक बनते हैं और सहयोग उपलब्ध करते हैं। चोर उचक्कों की ही तरह अस्त−व्यस्त व्यक्ति भी अप्रामाणिक समझा जाता है। उसका सहयोग पाने में किसी को रुचि नहीं होती और न कोई उसे उत्साहपूर्वक कुछ सहयोग देने के लिए ही सहमत होता है। दूसरों पर असहयोग करने का दोष देने से पूर्व यह देखना होगा कि कहीं अपनी ही अस्त−व्यस्त आदतें तो उस अवरोध का भीतरी कारण तो नहीं है। आहार-विहार सम्बन्धी अनियमितताएं और उच्छृंखलताएं स्वास्थ्य की बर्बादी का बहुत बड़ा कारण हैं। अन्यमनस्कता अपनाये रहने वाले आधे-अधूरे मन से काम करते हैं फलतः उनके अध्ययन, व्यवसाय, शिल्प आदि में अपूर्णता रह जाती है। ऐसी दशा में असफल रहना स्वाभाविक है। शरीर को तत्परता और मन को तन्मयता के लिए अभ्यस्त बना लिया जा सके तो असफलताओं में से अधिकांश अनायास ही दूर बनी रहेगी।
भारी मन से काम करना बहुत बुरा है। यह बहुत कठिन है। मुझ पर लद गया है। इसे करने पर तो मैं बुरी तरह थक जाऊँगा। यह मेरे बस का नहीं है। यह मेरी रुचि का नहीं। न जाने कब इससे पीछा छूटेगा। इस प्रकार के विचार अपने प्रस्तुत कामों के सम्बन्ध में करने वाले सचमुच ही उसे थोड़ा−सा करने पर ही बुरी तरह थक जाते हैं और बेगार भुगतने की तरह कुरूप और काना कुबड़ा ही किसी प्रकार कर पाते हैं। अरुचि मनुष्य की आधी योग्यता और शक्ति का अपहरण कर लेती है। अरुचि और कुछ नहीं एक बुरी आदत भर है। वस्तुतः कोई काम कठिन नहीं है। अभ्यास और मनोयोग से ही हर काम सीखा जा सकता है और भली प्रकार किया जा सकता है। खिलाड़ी की तरह अपने दैनिक कामों को खेल की तरह सम्पन्न किया जाय और उसे अपनी वरिष्ठता सिद्ध करने वाली कलाकारिता के स्तर का समझा जाय तो उसे बढ़ी−चढ़ी दिलचस्पी के कारण काम हलका ही हलका लगेगा, जल्दी और अच्छा भी होगा। काम कोई भारी नहीं होता। भारी होता तो दूसरे इसे कैसे कर पाते। असल में सब से भारी होती है अरुचि। अन्यमनस्कता के सामयिक कारण कुछ भी गिनाये जाते रहे वस्तुतः वह एक बुरी आदत भर है।
आदतें स्वनिर्मित होती हैं। इसलिए उन्हें संकल्पपूर्वक बदला या हटाया जा सकता है। गलत बुन जाने पर स्वेटर को लड़कियाँ उधेड़ डालती हैं और फिर नये सिरे से उसे दुबारा बुनती हैं। आदतों के सम्बन्ध में भी यही बात है वे अपने आप कहीं से नहीं आतीं। बहुत समय तक जाने या अनजाने एक ढर्रा अपनाये रहने पर वह अभ्यास परिपुष्ट होता है और आदत बनती है जिन आदतों को अवांछनीय समझा गया है उसके प्रतिकूल आचरण करने का कार्यक्रम बनाया जाय और उस पर दृढ़तापूर्वक आरूढ़ रहा जाय तो परिवर्तन भी उतना ही सरल प्रतीत होगा जितना कि आरम्भ में उसे स्वभाव का अंग बनाते समय कोई विशिष्ट कष्ट नहीं सहना पड़ा था।
बुरी आदतें छोड़ने की तरह ही अच्छी आदतें डालने के लिए भी हर किसी को सहज सफलता मिल सकती है। आदतें चाहे भली हो या बुरी स्वभाव में सम्मिलित तब होती हैं जब उन्हें दिलचस्पी और क्रियाशीलता का आश्रय मिलता है। यदि यह पोषण बन्द कर दिया जाय तो आदतें भीनी पड़ती और समाप्त होती चली जाती हैं। कई आदतों के सम्बन्ध में यही बात है यदि उनकी उपयोगिता समझी जाय, रुचि ली जाय और दैनिक व्यवहार में सम्मिलित किया जाय तो आरम्भ में नवीनता के कारण कुछ अड़चन भले ही लगे अभ्यास चलते रहने में स्वभाव का अंग बनने में देर न लगेगी।
आज का काम आज निपटाने का स्वभाव बनाया जाय। कल पर तभी छोड़ा जाय तब नितान्त विवशता हो। मन उचटते ही काम को आधा अधूरा छोड़कर भाग निकलना। छोड़ने से पहले उसे सुव्यवस्थित रीति से न संभालना, बुरा है। इससे अगले दिन उस बिखराव को संभालने में उससे दूनी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा जितना कि बन्द करते समय ठीक तरह समेटने में करना पड़ता। अधूरे काम अपने कर्त्ता की निंदा चुगली हर दर्शक से करते हैं और कहते हैं यह व्यक्ति और कुछ भी क्यों न हो, सुसंस्कारी नहीं है। सुसंस्कारिता का प्रथम परिचय उसके वस्त्र, उपकरण ही नहीं काम करने के ढंग और उसे सांगोपांग करने का ढंग देखकर ही ज्ञात होता है। विद्वत्ता, सुन्दरता, बलिष्ठता, सम्पन्नता आदि विभूतियों का अपना महत्व है किन्तु सुसंस्कारिता इनमें से किसी से भी हलकी नहीं पड़ती। व्यक्तित्व का वास्तविक मूल्यांकन किसी के स्वभाव और क्रिया-कलाप को देखकर ही किया जा सकता है।
उतावली में अधिक उत्सुकता तो झलकती है पर जब वह अधीरता को सीमा तक जा पहुँचती है तो भावोन्माद ने मस्तिष्क पर कब्जा कर लिया। इससे सफलता जल्दी मिलने की सहायता नहीं मिलती वरन् वह और अधिक दूर हटती जाती है। कामों में अनावश्यक विलम्ब न लगाया जाय यह ठीक है। जो काम आज हो सकता है उसे पीछे कभी के लिए न टाला जाय, यह उचित है। किन्तु हड़बड़ी में सारे काम आज ही कर डालने और सोचने तथा साधन जुटाने तक की गुंजाइश न रहने देने से भी सफलता लूटी नहीं जा सकती। योजनाबद्ध रीति से मनोयोगपूर्वक श्रम करने वाले और उपयुक्त सफलता का अवसर आने तक धैर्य रखने वाले ही महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न कर सके हैं। यह तथ्य ध्यान में रखने योग्य है। विशेषतया उन लोगों को जो अधीरताजन्य उतावली को ही सक्रियता की निशानी मान लेते हैं।
कई व्यक्तियों में ऊँचे स्वर में बोलने की, रूखे और कर्कश शब्दों का प्रयोग करने की आदत होती है। कइयों को बात−बात में अपनी बड़ाई करने और शेखी बघारने की लत होती है। वे समझते हैं कि ऐसा करने से दूसरों पर अपने बड़प्पन की छाप जमाई जा सकती है। पर होता ठीक उलटा है। फैशन के नाम पर उद्धत प्रदर्शन और वाचालता के सहारे आत्म विज्ञापन करने वाले किसी पर अच्छी छाप नहीं छोड़ते, ऐसे लोग ओछे, बचकाने और घटिया समझे जाते हैं। वाणी में मिठास और विनय का समन्वय न हो, दूसरों के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति का पुट न रहे तो समझना चाहिए वाणी का आकर्षण एक प्रकार से गँवा ही दिया गया। अपनी प्रभावोत्पादक शक्ति बचकानी आदतों के कारण गँवा बैठना वस्तुतः एक बड़ा घाटा और जोखिम उठाना है।
दूसरों की बात में अपनी टाँग अड़ाना, दूसरों के कार्यों में अकारण हस्तक्षेप करना सामान्य शिष्टाचार के विपरीत है। किन्तु कइयों को ऐसा करने की आदत होती है। बहुत से लोग इस उस की निन्दा स्तुति में ही मजा लेते रहते हैं और अपना तथा दूसरों का समय खराब करते रहते हैं। जहाँ आवश्यक हो वहाँ सलाह दी जा सकती है। जहाँ सहयोग अपेक्षित हो वहाँ हाथ बंटाया जा सकता है। इस प्रकार जब प्रशंसा एवं निन्दा की कोई उपयोगिता हो तो उन्हें भी करने में हर्ज नहीं। किन्तु अपनी कुसंस्कारिता का परिचय देने के लिए अकारण शक्तियों का अपव्यय करना और अशिष्ट कहलाना बुद्धिमानी की बात नहीं है। निरर्थक हानिकारक आदतों से पीछा छुड़ाने की बात यदि समझ में आ सके तो साथ ही अच्छी आदतें डालने के लिए भी साहस जुटाना चाहिए। प्रातःकाल दिन भर की दिन−चर्या बना लेना और उस क्रम पर ध्यान रखे रहना बहुत अच्छी आदत है। भले ही उस क्रम में परिस्थितिवश हेर−फेर करना पड़े पर इतना निश्चित है कि उसके स्वभाव और अभ्यास में उपयोगी तत्व जुड़ जाते हैं। समस्याओं के समाधान में योगदान देने वाले साहित्य का नित्य नियमित रूप से अध्ययन करना संसार का सबसे बड़ा उपयोगी मनोरंजन है। सत्साहित्य में सम्पर्क बनाये रहना अपने चिन्तन को सुसंस्कृत बनाने का सरल किन्तु प्रभावोत्पादक उपाय है।
भोजन का समय, आहार का चयन परिमाण नियत रखा जाना चाहिए। सफाई को स्वभाव का अंग बनाया जाय। शरीर, कपड़ा, उपकरण, निवास आदि अपने सभी सम्पर्क सूत्र साफ सुधरे रखे जायें। इसका सहज उपाय यह है कि जहाँ भी गंदगी दृष्टिगोचर हो उसे हटाने के लिए दूसरों को हुक्म देने में पहले स्वयं ही आगे रहा जाय। गन्दगी यदि असह्य होगी आँखों में काँटे की तरह चुभेगी तो ही यह संभव है कि स्वच्छता का आनन्द लेना और गौरव पाना शक्य होता रहे।
अच्छी आदतें अपनाने वाले ही प्रसन्न रह सकते हैं। कुढ़न का कारण बाहरी कठिनाइयाँ उतनी नहीं होती जितनी कि भीतर की सुसंस्कारिता। सफलता के मार्ग में भी वे ही सबसे अधिक बाधक होती हैं। दूसरों का सहयोग पाने में भी अपने ही दुर्गुणों के कारण व्यवधान उत्पन्न होता है। अपनी आदतों को सुधारना इतना सरल और इतना उपयोगी काम है कि उसे सबसे प्रथम हाथ में लिया जाना चाहिए।
पौराणिक मान्यता के अनुसार भागीरथ ने प्रचण्ड तप करके गंगा को स्वर्ग से उतरकर धरती पर प्रवाहित होने का अनुग्रह करने के लिए सहमत किया था। इससे पूर्व उनका लाभ देव लोक के निवासी ही उठाते थे। गंगावतरण में भगवान शिव का महान योगदान रहा। स्वर्ग से धरती पर उतरते समय उनका प्रचण्ड वेग धारण करने का प्रश्न बड़ा विकट था, उसका समाधान भगवान शिव ने अपनी जटाओं पर उतरने का अवसर देकर सम्भव किया। भागीरथ तो तप करके वरदान पाकर ही निवृत्त हो गये। धार्मिक मान्यता के अनुसार शिवजी तो अभी भी उन्हें अपनी जटाओं में धारण किए हुए हैं। वे कहाँ से निकलीं? पौराणिक उत्तर है-विष्णु भगवान के चरणों से। इस प्रकार गंगाजल, विष्णु का चरणामृत ही होता है।
दूसरी दृष्टि से गंगा को हिमालय का अमृत रस कह सकते हैं। उस क्षेत्र की रासायनिक विशेषताएँ प्रख्यात हैं। उनका सार तत्व निचुड़ता और गंगा के जल में सम्मिश्रित होकर प्रवाहित होता है। दिव्य जड़ी बूटियाँ इस क्षेत्र में अभी भी पाई जाती हैं। अन्य क्षेत्र में उगने पर उनकी वे विशेषताएँ नहीं रहतीं जो हिमालय क्षेत्र में उगने पर रहती है। ब्राह्मी, अष्ट वर्ग, रत्न ज्योति जैसी बूटियाँ शिलाजीत जैसे खनिज होते तो अन्यत्र भी हैं, पर भूमि की विशेषता के कारण उनके गुण इस क्षेत्र के उत्पादन में रहते हैं। वे दूसरी जगह नहीं रहते। ये विशेषताएँ जल स्रोतों के साथ घुलकर गंगा में जा पहुँचती हैं। गंगा लगभग 500 मील हिमालय क्षेत्र में परिभ्रमण करने के उपरान्त मैदानी भूमि में आती है। इस बीच प्रायः तीस नदियाँ दूर-दूर से बहकर आती और गंगा में विसर्जित होती चलती हैं। इस प्रकार हिमालय के अति महत्वपूर्ण क्षेत्र का रासायनिक निचोड़ उसकी जलधारा में सम्मिलित होता रहता है। इस प्रकार आरोग्य शास्त्र की दृष्टि से गंगाजल की उपयोगिता किसी बहुमूल्य औषधि द्रव से कम नहीं रहती।
आध्यात्मिक स्वास्थ्य सम्बन्ध गंगा की सर्वोपरि विशेषता है। मनुष्य मानवी सत्ता की तरह पदार्थ सत्ता भी (1) स्थूल (2) सूक्ष्म (3) कारण स्तर हैं। स्थूल प्रत्यक्ष को कहते हैं। सूक्ष्म अदृश्य और सूक्ष्म की गहन अन्तरात्मा कह सकते हैं। मनुष्य में स्थूल भाग प्रत्यक्ष शब्द है। सूक्ष्म मनःचेतना और कारण अन्तरात्मा। यही बात पदार्थों के सम्बन्ध में भी है। तुलसी पौधे के रासायनिक पदार्थ औषधि रूप हैं। उसके सूक्ष्म प्रभाव से वातावरण में शान्तिदायक प्रभाव फैलता है। कारण प्रभाव से तुलसी भक्ति भावना का, श्रद्धा का, पवित्रता का संचार मानवी अन्तःकरण में करने वाली होने के कारण देवोपम गिर गई है। उसे वनस्पति वर्ग में देवतुल्य माना गया है। वह पीपल, आंवला आदि वृक्षों में भी ऐसी ही दिव्य विशेषताएँ रहने से उनके अन्तराल में रहने वाले, तत्वों के परखने वाले, सूक्ष्मदर्शियों ने उन्हें वृक्ष वर्ग के देव माना है। पिप्पलाद ऋषि पीपल वृक्ष के नीचे निवास करते थे और उसी के फलों से अपनी आहार आवश्यकता पूरी थे। पशु वर्ग में गौ को माता इसी आधार पर कहा है। दूध आदि का लाभ तो अन्य पशु भी दे सकते हैं, कृषि कर्म में तो बैलों की जगह अनेक देशों में घोड़े आदि भी काम देते हैं। गौ की मान्यता पशु उपयोगिता प्रतिस्पर्धा में अग्रणी होने से नहीं उसे देव संज्ञा में आध्यात्मिक ‘कारण’ विशेषताओं के कारण मिली है। भगवान के चरणामृत में, पंचामृत, पंचगव्य, में यज्ञ प्रयोजनों में गौ रस की महिमा है। यह गौरव उस पशु की विशेषताओं के कारण नहीं, उसमें पाई जाने वाली आध्यात्मिक गरिमा के आधार पर मिली है। गौ को ब्राह्मण के समतुल्य माना गया है और उसकी सेवा को देवाराधन के समान कहा गया है।
गंगाजल की विशेषता में ऐसे ही दिव्य कारणों का समावेश होने से उसे देव संज्ञा दी गई है। उसके स्नान से शरीर की गर्मी एवं मलीनता हटाना ही नहीं, अन्तः पवित्रता का संचार होना ही प्रधान हेतु है। इसी उद्देश्य से असंख्य भावनाशील नर-नारी उसमें स्नान करने के लिए दौड़े आते हैं और अपनी धर्म भावना तृप्त करते हैं। यह अन्धविश्वास भर नहीं है, इसके पीछे तथ्य है। जहाँ गंगा की पवित्रता अभी भी अक्षुण्ण है वहाँ उसके तट पर कुछ समय निवास करके यह प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है कि उससे आन्तरिक शान्ति का कितना लाभ मिलता है। शहरी कोलाहल-गटरों का गन्दा पानी मिलते चलने से उनका प्रभाव घटते जाना स्वाभाविक है। किन्तु अभी भी हिमालय क्षेत्र में प्रवाहित होने वाली धारा में प्राचीन काल जैसी पवित्रता का अनुभव किया जा सकता है।
सप्त ऋषियों ने अपनी तपस्थली हिमालय की छाया और गंगा की गोद में ही बनाई थी। भगवान राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघन अयोध्या की सुविधाओं को छोड़कर गंगा तट की दिव्य विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए ही इस क्षेत्र में तप करने के लिए आ गये थे। तपस्वियों की परम्परा हिमालय क्षेत्र में पहुँचने और गंगा तट पर निवास करने की रही है। यह सब अकारण ही नहीं होता रहा है। तत्वदर्शी अध्यात्म विज्ञानियों ने शारीरिक, मानसिक और आत्मिक अनुकूलताओं, उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए ही इस प्रकार का चयन किया था। गंगा यों एक नदी भर है, पर सूक्ष्म दृष्टि से उसे प्रवाहमान देव-सत्ता ही कहा जा सकता है। उसके स्नान, दर्शन, जलपान आदि से सहज ही पवित्रता का संचार होता है। माता की गोदी में रहने के समान ही उसके सान्निध्य का भाव भरा आनन्द कभी भी भावनाशील लोग सहज ही उपलब्ध करते हैं।
गंगा भारत भूमि की सर्व प्रधान पयस्विनी है उसके धार्मिक आध्यात्मिक महत्व पर कोटि-कोटि धर्म प्रिय भारतीय विश्वास करते हैं। उसके सम्पर्क सान्निध्य में शान्ति प्राप्त करते और प्रेरणा ग्रहण करते हैं। उसकी अन्य पवित्रता को, सद्ज्ञान की गरिमा के साथ जोड़ते हुए तत्वदर्शी लोग ज्ञान गंगा की तुलनात्मक चर्चा करते हैं।
आर्थिक दृष्टि से उसके द्वारा होने वाली, सिंचाई, नौकायन, भूमि को उपजाऊ बनाने जैसे कितने ही महत्व हैं। स्वास्थ्य की दृष्टि से विचार किया जाय तो उसका जल अमृत है और समीपवर्ती क्षेत्रों में जो वातावरण बनता है उसका अपना महत्व है। तटवर्ती क्षेत्र में उगे हुए वृक्ष, गुल्म और वनस्पति न केवल आर्थिक दृष्टि से वरन् स्वास्थ्यकर वायु प्रदान करने की दृष्टि से भी अत्यन्त उपयोगी है।
गंगाजल न केवल शारीरिक, आर्थिक प्रभाव रखता है वरन् उसकी क्षमता मनुष्य के मानसिक सन्तुलन को उच्चस्तरीय बनाये रखने में भी योगदान देती है। धार्मिक क्षेत्र की यह मान्यता अब विज्ञान के क्षेत्र में भी उपहासास्पद नहीं है। उसे क्रमशः अधिक तथ्यपूर्ण माना जा रहा है। गंगा स्नान, गंगा तट पर निवास, गंगाजल पान का महात्म्य अब मात्र श्रद्धा का विषय ही नहीं है उसके पीछे अनेक तथ्य, तर्क और प्रमाण भी जुड़ते जा रहे हैं।
गंगा के आध्यात्मिक, मानसिक एवं शारीरिक प्रभावों को मात्र हिन्दू धर्मावलम्बी ही स्वीकार करते रहे हों सो बात नहीं। भूतकाल में उसकी विशेषताओं को अन्य धर्मावलम्बी ही स्वीकार करते रहे हों सो बात नहीं, भूतकाल में उसकी विशेषताओं को अन्य धर्मावलम्बी भी स्वीकार करते रहे हैं। अब उसकी कमी नहीं वरन् वृद्धि ही हो रही है। गंगा की गरिमा को सार्वभौम और सर्वजनीन स्तर पर मान्यता मिल रही है। आशा की जानी चाहिए कि भविष्य में उसकी बहुमुखी विशेषताओं को और भी अच्छी तरह समझा जायगा और जनसाधारण द्वारा उसका और भी अधिक लाभ उठाया जायेगा।
इतिहास के पृष्ठ बताते हैं कि गंगाजल को बिना किसी धार्मिक भेदभाव के किस तरह उपयोगी एवं महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।
इब्नबतूता नामक एक भ्रमणशील लेखक अफ्रीका महाद्वीप, एशिया की लम्बी यात्रा करते हुए भारत भी आया था। उसने जो संस्मरण लिखे हैं उनका गिव्स ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है। इस पुस्तक में तत्कालीन सुल्तान मुहम्मद तुगलक के शासन का विस्तृत वर्णन है। उसमें यह भी उल्लेख है कि बादशाह गंगाजल पीते थे। उनके लिए दौलताबाद गंगाजल पहुँचाने में 40 दिन लग जाते थे।
फ्रान्सीसी यात्री बर्नियर सन् 1459 से 1467 तक आठ वर्ष भारत रहा। उसने शाहजादा दाराशिकोह की चिकित्सा भी की थी। औरंगजेब के भोजन के साथ गंगा जल भी रहता है। बादशाह ही नहीं अन्य दरबारी भी गंगाजल का नियमित प्रयोग करते हैं। यात्रा में भी वे ऊँटों पर लदवा कर गंगा जल अपने साथ ले जाते थे।
एक दूसरे फ्रान्सीसी यात्री टैवर्नियर ने लिखा है हिन्दुस्तान के राजे और नवाब समान रूप से गंगा जल का दैनिक उपयोग करते हैं।
ब्रिटिश कप्तान एडवर्ड मूर ने अपने स्मरणों में लिखा है, शाहनवर के नवाब केवल गंगा जल पीते थे इसके लिए उन्होंने काफिला तैनात कर रखा था।
इतिहासकार गुलाम हुसैन ने अपनी पुस्तक ‘रियाजुस-सलातीन’ में लिखा, हिन्दुओं की तरह इस देश के अन्य धर्मावलम्बी भी गंगा जल की बड़ी कद्र करते हैं और उसे स्वास्थ्य की दृष्टि से बहुत उपयोगी मानते हैं।
पेशवाओं के पीने का पानी गंगा जल ही होता था। गढ़मुक्तेश्वर तथा हरिद्वार से वहँगियों द्वारा उनके लिए गंगा जल पहुँचता था।
अंग्रेजी शासन के दिनों वैज्ञानिक हैकिन्स ने गंगा जल की विशेषताओं के संबंध में प्रचलित किम्वदन्तियों पर शोध कार्य किया था। उन्होंने काशी नगर के गन्दे नालों का जल जाँचा जिसमें हैजे के असंख्य कीटाणु भरे हुए थे। वही नाला जब गंगा में मिला तो उसमें रहने वाले विषाणु तत्काल मर गये। सड़े हुए मुर्दों की लाश से निकलने वाला विष भी गंगा में घुलते ही अपनी हानिकारक प्रकृति खो बैठता है। कुँए में तथा अन्य जलों में हैजा के कीटाणु डाले गये तो वे तेजी से बढ़े किन्तु गंगा जल में मिलते ही स्वयंमेव नष्ट हो गये।
नन्दा देवी, गुरला, मान्धाता, धौलागिर, गोसाई थान, कंचन जंगा, एवरेस्ट जैसे संसार के सबसे ऊँचे गिरी शिखरों का पिघलता हुआ बर्फ हिमालय में इधर-उधर चक्कर काटता हुआ गोमुख पर एकत्रित होकर गंगा जल के रूप में दृष्टिगोचर होता है। इन विशिष्ट भू क्षेत्रों की धातुएँ तथा रासायनिक वस्तुएँ ऐसी हैं जो गंगाजल को मानवी उपयोग के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण बनाती हैं।
रसायन विज्ञानी प्रो. एन.एन. गोडवोले ने गंगाजल की विशेषताओं का कारण ढूँढ़ने के लिए लम्बी रासायनिक छान-बीन की। उन्होंने गंगा जल में कुछ ऐसे विशेष ‘प्रोटेक्टिव कालौइड’ पाये जो उसे सदा पवित्र एवं कीटाणु रहित बनाये रहते हैं। यह तत्व अन्य नदियों में बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। गोडवोले ने अपने शोध निष्कर्ष में लिखा है, गंगाजल जीवाणु वृद्धि को रोकता ही नहीं वरन् उनका विनाश भी कर देता है। उनका यह भी कथन है गंगा जल का वास्तविक स्वरूप प्रयाग तक ही पाया गया। बाद में कई बड़ी नदियाँ मिल जाने से उसके वह गुण नहीं रहते जो इससे ऊपर पाये जाते हैं।
आयुर्वेद शास्त्र में गंगा जल को शारीरिक और मानसिक रोगों का निवारण करने वाला और आरोग्य तथा मनोबल बढ़ाने वाला बताया गया है।
गंगा वारि सुधा समं बहु गुणं पुण्यं सदायुष्करं, सर्व व्याधि विनाशनं बलकरं वर्ण्यं पवित्रं परम्। हृद्यं दीपन पाचनं सुरुचिम्मिष्टं सु पथ्यं लघु- स्वान्तध्वान्त निवारि बुद्धि जननं दोष त्रयघ्नं वरम्।
अर्थात्- गंगा का जल अमृत के तुल्य बहुगुणयुक्त पवित्र, उत्तम, आयु का बढ़ाने वाला, सर्व रोगनाशक, बलवीर्य वर्द्धक, परम पवित्र, हृदय को हितकर, दीपन, पाचन, रुचिकारक, मीठा उत्तम पथ्य और लघु होता है तथा भीतरी दोषों का नाशक, बुद्धि-जनक, तीनों दोषों का नाश करने वाला सब जलों में श्रेष्ठ है।
आध्यात्मिक गरिमा के अतिरिक्त गंगा की भौतिक उपलब्धियाँ भी कम महत्वपूर्ण नहीं हैं। उससे कितनी सिंचाई होती है कितने बाँध तालाब भरे जाते हैं, उससे कितनी उपलब्धियाँ मिलती हैं इसका लेखा-जोखा आश्चर्यचकित करता है वह भारती की अर्थ समृद्धि में भी भारी योगदान देती है। गंगा का कुल जल ग्रह क्षेत्र 9 लाख 69 हजार वर्ग किलोमीटर है। गंगा नहरों में इन दिनों 6 लाख 95 हजार हेक्टेयर भूमि की सिंचाई होती है। सिंचाई के अतिरिक्त गंगा की प्रवाह शक्ति का उपयोग करके भद्रावाद, मुहम्मद पुर और पथरी पर विशालकाय बिजलीघर बने हैं। वर्षा में गंगा का फालतू पानी जो व्यर्थ ही बहकर समुद्र में चला जाता है, उसे दक्षिण की कावेरी नदी में मिलाने की योजना विचाराधीन है। यदि वह नहर सम्भव हो सकी तो वह छह राज्यों को पानी देती हुई दक्षिण भारत की जन व्यवस्था में भी बहुत योगदान देगी। गंगाजल से पाचक, कीटाणु नाशक प्राण और शक्ति वर्द्धक गुणों की प्रशंसा सुनते-सुनते बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के रसायन शास्त्र के प्रवक्ता डॉ.एन.एन. गोडवोले ने निश्चय किया कि क्यों न गंगाजल की रासायनिक परीक्षा करके देख ली जाय? उसके विश्लेषण के निष्कर्ष इस प्रकार प्रकाशित हैं- “मुझे फिनाइल यौगिकों की जीवाणु निरोधता के परीक्षण का काम दिया गया था, तभी मुझे गंगाजल पर कुछ ‘चिकित्सा सम्बन्धी शोध पत्र’ पढ़ने को मिले जिनमें यह बताया गया था कि ऋषिकेश से लिए गये, गंगाजल में कुछ ‘प्रोटेक्टिव कालौइड’ होते हैं, यही उसकी पवित्रता को हर दर्जे तक बढ़ाते हैं। कालौइड एक ऐसा तत्व है, जो पूरी तरह घुलता भी नहीं और ठोस भी नहीं रहता। शरीर में लार, रक्त आदि देहगत कालौइड हैं ऐसे ही कालौइड गंगाजी के जल में भी पाये जाते हैं, जब उनकी शक्ति का ‘रिडैलबाकर’ नामक यन्त्र से पता लगाया तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि गंगाजल जीवाणु की वृद्धि को रोकता ही नहीं, उन्हें मारता भी है। रिडैल और बाकर नामक दो वैज्ञानिकों ने मिलकर बनाया था। इसमें, जिस तरह परमाणुओं के भार को हाइड्रोजन के परमाणु से सापेक्षित (रिलेटिव) मान निकालते हैं, उसी तरह फीनोल से सापेक्षित (रिलेटिव) जीवाणु निरोधता (कीटाणु नष्ट करने की शक्ति) निकालते हैं।
पौराणिक कथानक के अनुसार सगर के 60 हजार पुत्र जब श्राप वश मृत हो गये तो सगर को उनके उद्धार की चिन्ता हुई। उन्होंने असमंजस के पौत्र भागीरथ को उसके लिए तप करने और गंगाजी को लाने को भेजा। भागीरथ ने हिमालय में जाकर घोर तप किया। उसके फलस्वरूप गंगा का प्राकट्य हुआ।
कवियों और शास्त्रकारों द्वारा अभिव्यक्त इस श्रद्धा के पीछे कोई निराधार कल्पनाएँ और मात्र भावुकता नहीं रही। किसी भी तत्व के प्रति श्रद्धा, उसकी उपयोगिता और वैज्ञानिक गुणों के आधार पर रही है। गंगाजी के जल में ऐसे उपयोगी तत्व और रसायन पाये जाते हैं, जो मनुष्य की शारीरिक विकृतियों को ही नष्ट नहीं करते वरन् विशेष आत्मिक संस्कार जागृत करने में भी वे समर्थ हैं, इसीलिए उसके प्रति इतनी श्रद्धा व्यक्त की गई। वैज्ञानिक परीक्षणों से भी यह बातें स्पष्ट होती जा रही हैं।
प्राचीनकाल में जब भारतवर्ष का अरब, मिस्र और यूरोपीय देशों से व्यापार चलता था, तब भी और इस युग में भी सब देशों के नाविक गंगा की गरिमा स्वीकार करते रहे हैं। डॉ. नेल्सन ने लिखा है कि हुगली नदी का जो जल कलकत्ता से जहाजों में ले जाते हैं, वह लन्दन पहुँचने तक खराब नहीं होता, परन्तु टेम्स नदी का जल जो लन्दन से जहाजों में भरा जाता है, बम्बई पहुँचने के पहले ही खराब हो जाता है।
तब जबकि जल को रासायनिक सम्मिश्रणों से शुद्ध रखने की विद्या की जानकारी नहीं हुई थी, तब पीने के पानी की बड़ी दिक्कत होती थी। खारी होने के कारण लोग समुद्र का पानी नहीं पी सकते थे। अपने साथ जो जल लाते थे, वह भी कुछ ही दिन ठहरता था, जबकि समुद्री यात्रायें महीनों लम्बी होती हैं। यह दिक्कत उन्हें आने में ही रहती थी। जाते समय वे लोग (हुगली) गंगाजी का बहुत जल भर ले जाते थे, बहुत दिनों तक रखा रहने पर भी उसमें किसी प्रकार के कीड़े नहीं पड़ते थे। समुद्री जल में रखे चावल बहुत दिन तक अच्छे नहीं रहते, सड़ने लगते हैं, जबकि गंगाजी के पानी में वह शीघ्र नहीं सड़ते। यों संसार में और भी अनेक पवित्र नदियाँ हैं। पर गंगाजी के जल में पाई जाने वाली जैसी पवित्रता किसी में भी नहीं है।
गंगाजल के जो रासायनिक परीक्षण किए गए हैं, उनके निष्कर्षों पर एकाएक वैज्ञानिक भी विश्वास नहीं करते, क्योंकि उसमें कुछ ऐसे तत्व पाये जाते हैं, जो संसार की और किसी भी नदी के जल में नहीं पाये जाते, गंगाजल में अत्यधिक शक्तिशाली कीटाणु-निरोधक तत्व पाया गया है उनका नाम ‘कालोइड’ रखा गया है।
फ्रान्स के प्रसिद्ध डॉ. डी हेरेल ने जब गंगाजल की इतनी प्रशंसा सुनी तो वे भारत आये और गंगाजल का वैज्ञानिक परीक्षण किया। उन्होंने पाया कि इस जल में संक्रामक रोगों के कीटाणुओं को मारने की जबर्दस्त शक्ति है। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि एक गिलास में किसी नदी या कुएँ का पानी लें, जिसमें कोई कीटाणु नाशक तत्व न हों, उसे गंगाजल में मिला दो तो गंगाजल के कृमिनाशक कीटाणुओं की संख्या बढ़ जाती है, इससे सिद्ध होता है कि गंगाजी में कोई ऐसा विशेष तत्व है जो किसी भी मिश्रण वाले जल को भी अपने ही समान बना लेता है। यही कारण है 1557 मील लम्बी गंगाजी में गोमती, घाघरा, यमुना, सोन, गण्डक और हजारों छोटी-छोटी नदियाँ मिलती चली गईं, तब भी गंगासागर पर उसकी यह कृमिनाशक क्षमता अक्षुण्ण बनी रही। यह एक प्रकार का चमत्कार ही है।
डॉ. डी हेरेल ने अपने प्रयासों से सिद्ध कर दिया कि इस जल में टी.बी. अतिसार, संग्रहणी ब्रण, हैजा के जीवाणुओं को मारने की शक्ति विद्यमान् है। गंगाजी के कीटाणुओं की सहायता से ही उन्होंने सुप्रसिद्ध औषधि ‘बैक्टीरियोफैज’ का निर्माण किया, जो ऊपर कही गई बीमारियों के लिए सारे संसार में लाभप्रद सिद्ध हुई।
हमारी इस श्रद्धा का आधार वह विज्ञान है, जिसे भारतीय तत्ववेत्ता आदि काल से जानते रहे हैं और आज का विज्ञान जिसकी अक्षरशः पुष्टि करता है।
डॉ. केहिमान ने लिखा है- ‘‘किसी के शरीर की शक्ति जवाब देने लगे तो उस समय यदि उसे गंगाजल दिया जाय तो आश्चर्यजनक ढंग से जीवनी शक्ति बढ़ती और रोगी को ऐसा लगता है कि उसके भीतर किसी सात्विक आनन्द का स्रोत फूट रहा है।”
लगता है इस बात का पता भारतीयों को आदिकाल से था तभी प्राचीन काल के अधिकांश सभी वानप्रस्थ और संन्यासी जीवन के अन्तिम दिनों में हिमालय की ओर चले जाते थे। आज भी गंगाजी के किनारे जितने आश्रम हैं, उतने सब मिलाकर समूचे भारतवर्ष में भी नहीं है।
डॉ. हेनकेन आगरा में गवर्नमेंट साइन्स डिपार्टमेन्ट में एक बड़े अफसर थे। प्रयोग के लिए उन्होंने जो जल लिया वह स्नान घाट वाराणसी के उस स्थान का था, जहाँ बनारस की गन्दगी गंगाजी में गिरती है। परीक्षण से पता चला कि उस जल में हैजा के लाखों कीटाणु भरे पड़े हैं। 6 घण्टे तक जल रखा रहा, उसके बाद दुबारा जाँच की गई तो पाया कि अब उसमें एक भी कीड़ा नहीं है, जल पूर्ण शुद्ध है, हैजे के कीटाणु अपने आप मर चुके हैं। उसी समय जब इस जल का प्रयोग किया जा रहा था, एक शव उधर से बहता हुआ आ रहा था। वह शव भी बाहर निकाल लिया गया, जाँचने पर पता चला कि उसके बगल के जल में भी हजारों हैजे के कीटाणु हैं, 6 घण्टे तक रखा रहने के बाद वे कीटाणु भी मृत पाये, यही कीटाणु निकाल कर एक दूसरे कुएँ के जल में दूसरे बर्तन में डालकर रखे गये तो उसमें हैजे के कीटाणु अबाध गति से बढ़ते रहे।
यह घटना अमेरिका के प्रसिद्ध साहित्यकार मार्कट्वेन को आगरा प्रवास के समय ब्योरेवार बताई गई, जिसका उन्होंने ‘भारत यात्रा वृत्तान्त’ में जिक्र किया है। इस प्रयोग का वर्णन प्रयाग विश्व विद्यालय के अर्थशास्त्र के अध्यापक पण्डित दयाशंकर दुबे एम.ए.एल.एल.बी. ने भी अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक ‘श्री गंगा रहस्य’ में किया है।
बर्लिन के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. जे ओलिवर ने तो भारत की यमुना, नर्मदा, रावी, ब्रह्मपुत्र आदि अनेक नदियों की अलग-अलग जाँच करके उनकी तुलना गंगाजल से की और बताया कि गंगा का जल न केवल इन नदियों की तुलना में श्रेष्ठ है वरन् संसार की किसी भी नदी में इतना शुद्ध कीटाणुनाशक और स्वास्थ्यकर जल नहीं होता।
डा.ओलिवर का इस सम्बन्ध में एक लेख न्यूयार्क से छपने वाले ‘इन्टरनेशनल मेडिकल जर्नल’ में भी छपा था।
भावनाशील श्रद्धासिक्त कवि हृदय भगवती गंगा को मूर्तिमान देव-सत्ता के रूप में अनुभव करता है और उसके सान्निध्य की पुलकन को अपनी अभिव्यंजना में इस प्रकार व्यक्त करता है :-
विधिर्विष्णुः शम्भुस्त्वर्मास पुरुषत्वेन सकला, रमोमागीर्मुख्यात्वमसिललनाजन्हुतनये। निराकारागाधा भगवति सदात्वं विहरसि, क्षितौ नीराकाराहरसि जनतापान्स्वकृपया॥
हे जाह्नवी। पुरुष रूप में तुम ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश हो और स्त्री होकर तुम रमा, उमा तथा सरस्वती हो। हे भगवती! तुम निराकार तथा अत्यन्त गम्भीर हो, किन्तु इस पृथ्वी तल पर जल स्वरूप धारणकर विहार करती हो और अपनी कृपा से लोगों के पाप तापों को दूर करती हो।
प्रसिद्धाते कीर्तिर्भवजलधिपारं गमयति स्मृतौ, वेदे लोके व्रजनहरिणी शान्ति सरणिः। अतोहवं यामित्वां शरणम भये मोक्षजननि, भर्वत्या पाल्योऽस्मि प्रभवसि समुद्धारयशसा॥
तुम्हारी यह कीर्ति प्रसिद्ध है कि तुम संसार सागर से पार करा देती हो। लोक, वेद तथा स्मृति में तुम्हारी प्रशंसा अत्यन्त प्रशस्त है। हे अभय तथा मोक्ष देने वाली, मैं तुम्हारी शरण आया हूँ। मेरा उद्धार करो।
वर्षा ऋतु मैं गाँव की पोखर पानी से लबालब हो उठी, तो यह उल्लास उससे सम्हालते नहीं बन रहा था।
ग्राम-तट में बहती थी नदी। पोखर घूमते-घूमते नदी के पास पहुँची।
नदी की निरन्तर प्रवाहशीलता और अपरिग्रह से वह चकित हो उठी-”यह क्या दीदी। कुछ भी संग्रह न कर क्या तुम मूर्खता नहीं कर रही।”
“मैं समझी नहीं, बहन “नदी ने पोखर से कहा-”पानी मेरा नहीं। वह तो मुझे इसी विश्व में कहीं से मिलता है और फिर मुझसे इसी विश्व के लोग उसे लेकर यदि अपनी प्यास बुझाते तथा जरूरत पूरी करते हैं, तो इसमें मुझे खुशी ही मिलती है। इसी आत्म-सन्तोष से मेरा अन्तःकरण निर्मल है। यह निर्मलता मुझे उल्लास देती है।
“ये सब सिद्धान्त बघारना भूल जाओगी, जग गाढ़े वक्त पर कोई भी काम न आवेगा। अपरिग्रह आदर्श-चर्चा है, परिग्रह व्यावहारिक कर्म है।” कहती हुई पोखर ठुनकती लौट पड़ी और मुँह फुलाकर पसर रही।
ऋतु बदली। शरद और बसन्त बीते। अब आयी गर्मी। नदी का शरीर दुबला-पतला हो गया, पर उत्साह और उदारता पूर्ववत् थी।
एक दिन वह पोखर से मिलने गई और उसकी दशा देख पीड़ा से कराह उठी-पोखर के पूरे शरीर में दरारें पड़ गई थीं और पानी की एक भी बूँद नहीं थी।
नदी धीरे से बोली-‘‘बहन! काश! तुम भी उस जीवन-मंत्र को समझती, जो मैं निरन्तर जपती और साधती हूँ। तो आज यह दुर्दशा न होती।”
पोखर क्या कहती, उसके सूखे ओंठ जल रहे थे।
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इन दिनों वैज्ञानिक एवं आर्थिक क्षेत्रों की प्रगति पर सभी का ध्यान है और उनमें उत्साहवर्धक प्रगति भी हो रही है। सभ्यता की भी बहुत चर्चा है। जीवन स्तर बढ़ रहा है। इस बढ़ोत्तरी का तात्पर्य है अधिक सज-धज और सुख सुविधा के साधनों का विस्तार। विलासी साधनों के नये-नये उपकरण बनते और बढ़ते जा रहे हैं। भावनात्मक सौहार्द्र न सही कम से कम व्यावहारिक शिष्टाचार को तो महत्व मिल ही रहा है। यह सब बातें ऐसी हैं जिनके आधार पर प्रगतिशीलता की दिशा में बढ़ते चलने का दावा किया जा सकता है।
इस प्रगतिशीलता के साथ जुड़ा हुआ एक दुःखदायी पक्ष भी है-जिसे आधि-व्याधियों की अभिवृद्धि कहा जा सकता है। लाग शारीरिक दृष्टि से अस्वस्थ और मानसिक दृष्टि से असंतुलित होते चले जा रहे हैं और इस दिशा में प्रगति उन सब क्षेत्रों की तुलना में कहीं अधिक द्रुतगति से हो रही है जिन्हें अपने समय की सफलताएँ कह कर गर्व किया जाता है।
शारीरिक दुर्बलता और रुग्णता का प्रसंग बहुत ही चिन्ताजनक है। स्पष्ट है कि अपच, जुकाम जैसे छोटे रोगों से लेकर क्षय और केन्सर जैसी घातक बीमारियों का क्षेत्र इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि स्वास्थ्य संकट की भयावह विभीषिका सामने खड़ी दीखती है। मधुमेह, अनिद्रा, हृदय रोग, रक्तचाप जैसे रोग अब बड़े आदमियों के क्षेत्र तक सीमित नहीं रहे, उनने सर्वसाधारण को भी अपने शिकंजे में कस लिया है।
समझा जाता था कि पौष्टिक खाद्य सामग्री के अभाव में दुर्बलता और रुग्णता का प्रकोप होता है। यह भी मान्यता थी कि विषाणुओं का आक्रमण बढ़ती हुई रुग्णता का कारण है, पर विश्लेषण और अन्वेषण से पता चलता है कि यह दोनों ही कारण अर्ध सत्य हैं। बड़ा कारण दूसरा है जिसके कारण स्वास्थ्य के मूल में काम करने वाली जीवनी शक्ति की जड़ें खोखली होती हैं और उस खोखले को तनिक-तनिक से आघात क्षत-विक्षत करके रख देते हैं।
उथले कारण जो भी हों, गहराई में उतरने पर एक ही प्रधान तथ्य सामने आता है कि मानसिक तनाव की अभिवृद्धि इन दिनों तेजी से हो रही है और इसी की रुग्णता की अभिवृद्धि में सबसे बड़ी भूमिका है। शरीर पर नियन्त्रण करने वाली क्षमता, मात्र मस्तिष्क में है। यही वह संस्थान है जिससे ऐच्छिक और अनैच्छिक सभी शारीरिक क्रिया-कलापों का सूत्र संचालन होता है। अन्य अवयवों की दुर्बलता एवं उत्तेजना सहन हो सकती है। उसके रहते हुए भी काम चलता रहता है, पर मस्तिष्क के सम्बन्ध में ऐसी बात नहीं है वहाँ तनिक सी-गड़बड़ी उत्पन्न होते ही सारा ढाँचा लड़खड़ाने लगता है। नशे-बाजी से उत्पन्न सामयिक विक्षिप्तता में सारा शरीर किस प्रकार लड़खड़ाने लगता है इसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। आवेशग्रस्त मनुष्यों की मुखाकृति, वाणी, विचार पद्धति से लेकर पाचन, रक्ताभिषरण तक पर अवांछनीय प्रभाव उत्पन्न हुआ देखा जा सकता है। जब सूत्र संचालक ही लड़खड़ाने लगा तो सारा खेल ही बिगड़ेगा। कप्तान के हड़बड़ा जाने पर सेना को बेमौत मरना पड़ता है। ड्राइवर संतुलन खो बैठे तो फिर गाड़ी को दुर्घटनाग्रस्त होना ही पड़ेगा। यही बात स्वास्थ्य संकट के सम्बन्ध में भी है। मानसिक तनाव का समस्त नाड़ी संस्थान पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। उस पर उत्तेजना छाई रहती है। फलतः जीवन धारिणी शक्ति का बुरी तरह अपव्यय होता है। अवयवों की आन्तरिक गति-विधियों का सामान्य क्रम-बिगड़ जाता है और उन्हें इस प्रकार के अवरोधों का सामना करना पड़ता है जिनके फलस्वरूप उनका दुर्बल और रुग्ण हो जाना स्वाभाविक है।
अन्वेषणकर्ताओं ने बताया है कि गिरते हुए स्वास्थ्य और बढ़ते हुए रोग प्रकोप के अन्य कारण उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं जितना कि मानसिक उद्वेग। यह अकेला ही इतना आक्रामक है कि आहार-विहार से लेकर ऋतु प्रभाव, प्रदूषण, वायरस आदि सब की समन्वित क्षति की तुलना में अकेला ही अधिक विघातक सिद्ध होता है।
एक पेचीदा प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि जिन्हें पोषक पदार्थों की कमी नहीं, साधन सुविधाओं की भी कमी नहीं, प्रत्यक्षतः कठिनाई भी कोई ऐसी नहीं है जिसे असाधारण कहा जा सके। इतने पर भी लोग मानसिक तनाव से ग्रसित क्यों रहते हैं? सुसम्पन्न लोगों को यह व्यथा क्यों घेरती है और क्यों उन्हें उसके कारण अस्वस्थता का दुःख सहना पड़ता है।
उत्तर खोजने पर एक ही निष्कर्ष सामने आता है कि मनुष्य अनावश्यक रूप से महत्वाकांक्षी बनता जा रहा है। अकारण भय-भीत रहने लगा है और बात को बतंगड़ बना कर देखने का बचकानापन अपनाने लगा है। ऐसे ही कारण उसके सामने कुकल्पनाओं का जाल-जंजाल बुन कर खड़ाकर देते हैं। इसी में फँस कर उसे असंतुलन का शिकार होना पड़ता है। दृष्टिकोण का घटियापन और व्यक्तित्व का ओछापन ही मिल-जुल कर ऐसी विचित्र परिस्थिति उत्पन्न करता है जिससे मनःक्षेत्र की सौम्यता का टिक सकना ही सम्भव न हो सके।
औसत भारतीय स्तर का जीवनयापन ही नैतिक है। योग्यता कितनी ही बढ़े-उपार्जन कितना ही अधिक हो, पर उसमें से निर्वाह के लिए उतना ही लिया जाय जितना कि अपने सामान्य देशवासी के हिस्से में आता है। बचे हुए बुद्धि वैभव और समय साधन को लोक मंगल में लगा दिया जाय। व्यक्तिगत सुविधा सम्वर्धन ओर बड़प्पन की असीम लिप्सा लालसा उठ पड़े तो उसकी पूर्ति के रंगीन सपने मनःक्षेत्र में बुरी तरह धमाचौकड़ी मचाते हैं। उनकी पूर्ति की परिस्थितियाँ उत्पन्न करने साधन जुटाने में जो समय लगाना चाहिए उसके लिए धैर्य नहीं रहता। आतुरता उद्विग्नता का रूप धारण करती है और उतावली में अनैतिक मार्ग अपनाने की छूट दे देती है। इस मार्ग पर चलने वाले को पग-पग पर बाह्य प्रतिरोधों और आन्तरिक असंतोषों का सामना करना पड़ेगा। इच्छित परिस्थिति प्राप्त होने में विलम्ब लगते देखकर धीरज टूटेगा और खीज भरा उद्वेग बढ़ेगा। विलासी और महत्वाकांक्षी उमंगे अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त करा सकती हैं किन्तु उस दिशा में चलते हुए जितने उद्वेग का सामना करना पड़ता है उससे मनःसंस्थान की सौम्यता तो क्षत-विक्षत ही होकर रहती है।
व्यक्तिवादी, स्वार्थी मनुष्य निरन्तर अपनी ही चिन्ता करता है। दूसरों के सुख-दुख की परवाह न करने के कारण आत्म-भाव की परिधि बहुत छोटी रह जाती है। यह एक प्रकार का मानसिक एकाकीपन है। सुनसान में रहने वाले एकाकी जीवनयापन करने वाले प्रायः नीरस और कठोर-कर्कश मनः स्थिति के पाये जाते हैं। भावनात्मक एकाकीपन के सम्बन्ध में भी यही बात है। जो जितनी संकीर्णता, स्वार्थपरायणता से ग्रसित होगा उसे उतनी ही नीरस मनःस्थिति में रहते हुए पाया जायगा।
शंकाशील, भयभीत, निराश, आशंकाग्रस्त, अविश्वासी मनःस्थिति में साथियों पर अविश्वास बना रहता है। निकट भविष्य में किसी विपत्ति की आशंका बनी रहती है, प्रस्तुत परिस्थितियों में कुचक्रों की गन्ध आती रहती है। स्नेह-सौजन्य के अभाव में प्रायः ऐसी ही शंकाशील मनोभूमि रहती है और उसमें चिन्तन रहने के लिए कुकल्पनाओं के पहाड़ निरन्तर आँखों के सामने से गुजरते रहते हैं। क्षुद्रता का एक दोष यह भी है कि वास्तविकता को असली रूप में समझने नहीं देती परिस्थितियों को बहुत बढ़ा कर या बहुत घटा कर दिखाती है। फलतः सही निर्णय ले सकना भी सम्भव नहीं रहता। अनिश्चितता और भीरुता का समन्वय इतना विकट होता है कि उसके दबाव को सहन कर सकना और संतुलन बनाये रहना अति कठिन हो जाता है।
व्यक्तित्व का ओछा और दृष्टि कोण का नीचा होना एक दुर्भाग्यपूर्ण अभिशाप है। ऐसे लोग चालाक कहलाते हैं और कभी-कभी अपनी गरिमा को बेच कर थोड़ी कमाई करने या छोटी सफलता पाने का भी गर्व करते हैं। किन्तु अन्ततः उनकी अप्रामाणिकता से स्नेह सहयोग का वातावरण ही समाप्त हो जाता है। ऐसे व्यक्ति सदा डरे, सकुचे, सिमटे और दबे छिपे रहते हैं। यह आत्मप्रताड़ना भी कम तनाव उत्पन्न नहीं करती। व्यक्तित्व की दरिद्रता अपने किस्म की सबसे बड़ी अभावग्रस्तता है। ऐसे लोग या तो गुण्डागर्दी पर उतारू होते हैं या फिर अपंग असहाय की तरह गई-गुजरी स्थिति में गुजारा करते हैं। असन्तोष भी एक प्रकार का आवेश ही है, संतुलन उससे भी बिगड़ता है।
बढ़ते हुए मानसिक तनाव को स्वास्थ्य संकट का आधारभूत कारण माना गया है। किन्तु भौतिक दृष्टिकोण अपनाये रहने वाले विचारक उसकी उत्पत्ति, सांसारिक कठिनाइयों और सामाजिक अव्यवस्थाओं को दोष देकर अपना समाधान करते हैं और उनके निराकरण का उपाय करने के लिए समाज तथा सरकार को परामर्श देते हैं। अच्छी आजीविका चिकित्सा की सुविधा, सामाजिक सहकारिता मनोविनोद के अवसर, पौष्टिक आहार, अधिक विश्राम जैसे उपाय संतुलन संरक्षण के लिए सुझाये जाते हैं। इसमें विरोध की गुंजाइश नहीं है, पर यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए मूल कारण इससे भी गहरा है। जीवन के प्रति दृष्टिकोण का स्तर गया-गुजरा होना वह प्रमुख कारण है, जिसके रहते अनुकूलताएँ भी निरर्थक चली जाती हैं, और प्रतिकूलताएं अकारण ही उठ खड़ी होती हैं। अहार-विहार की सुव्यवस्था, स्वच्छता, सतर्कता अपनाने की सलाह देना उचित है। उससे रोगों के ऊपरी कारणों का किसी हद तक निराकरण भी हो सकता है, पर तथ्य को भी भुला नहीं दिया जाना चाहिए और स्मरण रखा जाना चाहिए कि दृष्टिकोण में संकीर्णता एवं क्षुद्रता के तत्वों का भरा रहना, ऐसे अनेक दुर्भाग्यपूर्ण आधार खड़े करता है जिनसे स्वास्थ्य की ऊपरी देखभाल और टीपटाप करते रहने पर भी भीतर ही भीतर सब कुछ खोखला होता जाता है। इस विपत्ति के रहते औषधि उपचार से बहुत थोड़ी मात्रा में ही राहत मिल सकती है।
जीवन का मूलतत्व-वाइटिलिटी है। शरीर में जीवनी शक्ति और मन में जिजीविषा बनकर यही अपनी चमत्कारी प्रखरता दिखाती रहती है। यह क्षमता पदार्थजन्य नहीं आस्थाजन्य है। उसका उद्गम हृदय नहीं अन्तःकरण है इसी के अभाव में उद्वेग उठते और सन्तुलन बिगड़ते हैं।
मनोविज्ञानी एरिकट्रिमर कहते हैं-‘डरावने अथवा आक्रोश भरे उद्वेग शरीर और मस्तिष्क को जितना क्षति पहुँचाते हैं उतनी और कोई नहीं। चिन्ता का प्रकृति प्रयोजन इतना ही है कि मनुष्य ‘फाइट या फ्लाइट’ में से एक को अपनाकर प्रस्तुत विपत्तियों से छुटकारा प्राप्त करे। चिन्ता से इन्हीं प्रवृत्तियों के लिए उत्तेजना मिलती है। ‘लड़े या भागे’ यही दो नीतियाँ विपत्ति से बचने की हैं। अपनी स्थिति विचित्र है। न लड़ने का साहस होता है न भागने का कौशल। एक मध्यवर्ती दुष्प्रवृत्ति अपना ली जाती है जिसे संक्षोभ कह सकते हैं। मानसिक तनाव इसी की प्रतिक्रिया है सुखद भविष्य की कल्पित आशंका, उपाय निर्धारण की अक्षमता, यथार्थता का निरूपण कर सकने वाली अदूर दर्शिता, जैसे कारण मिलकर मनःसंस्थान को विचित्र स्थिति में धकेल देते हैं। यही है वह असमंजस भरी उद्विग्नता जो शरीर संस्थान के विभिन्न अवयवों पर बुरा असर डालती है। कोशाओं और ऊतकों को दुर्बल बनाती है और शरीर तन्त्र की सामान्य गति-विधियों को तोड़-मरोड़ कर रख देती है। पाचन तन्त्र, हृदय, यकृत, गुर्दे जैसे महत्वपूर्ण अवयवों को इस विकृति के कारण भयंकर क्षति पहुँचती है।
मस्तिष्क ठीक काम करे उसके सिम्पेथेटिक, पैरा सिम्पेथेटिक सिस्टम यदि समर्थ बने रहें तो शरीरगत कमजोरियों के रहते हुए भी मनुष्य बड़े-बड़े महत्वपूर्ण कार्य करता रह सकता है। इसके विपरीत शरीर के स्वस्थ होते हुए भी असंतुलित मस्तिष्क से कितने ही ऐसे ही रोग उठ खड़े होते हैं जिनकी न तो निदान बन पड़ती है और न उपचार। ‘साइकिकपेन’ इसी प्रकार के होते हैं। रोगी अमुक अवयव में भारी दर्द की शिकायत करता रहता है, पर डाक्टरों को बार-बार आपरेशन करने पर भी वहाँ कुछ दिखाई नहीं पड़ता। बढ़ते हुए हृदय रोगों में मानसिक तनाव सबसे बड़ा कारण है। ‘कोरोनरी थ्रांबोसिस’ में रक्त वाहिनी नलियों की सिकुड़न-रुकावट रक्त में थक्के आदि कारण दीख पड़ते हैं। इतने पर भी उसका मुख्य कारण आहार में चिकनाई की अधिकता न होकर मानसिक तनाव ही होता है। इस व्यथा के अनेक मरीजों का पर्यवेक्षण करने पर शोधकर्ताओं को इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा है।
मानसिक उत्तेजना से शरीर में ‘ऐपीनेक्रिन’ रसायन सामान्य की अपेक्षा सात गुना अधिक बनने लगता है और यह बढ़ी हुई मात्रा मस्तिष्क और हृदय दोनों को ही समान रूप से क्षति पहुँचाती है। यों कहने को तो कोई भी यही कहेगा कि उसने हृदय रोग रक्त-चाप, मधु-मेह, अनिद्रा जैसी व्यथाएँ न्यौत कर थोड़े ही बुलाई है। इतने पर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि महत्वाकांक्षा चिन्ता, अवांछनीयता, आशंका की अनावश्यक मात्रा बढ़ा लेने में मनुष्य का अपना ही दोष होता है यदि चिन्तन में शालीनता जोड़ रखी जाय-दृष्टिकोण में आदर्शवादिता और जीवन कला के जाने माने तत्व घुले रहें तो इतनी उद्विग्नता का कोई कारण न रहेगा जिसके कारण इन भयानक आधि-व्याधियों का शिकार बनना पड़े।
अपच, अल्सर, कोलाइटिस, अतिसार, जैसे रोग यों आमाशय एवं आँतों में उत्पन्न होते दिखाई पड़ते हैं, पर इन अवयवों को शिथिल और अस्त−व्यस्त कर डालने में प्रधानतया उद्विग्नता का ही हाथ होता है। खुजली, प्रदर, प्रमेह जैसे रोगों में औषधि उपचार उतना सफल नहीं होता जितना मानसोपचार। इसमें एक ही लक्ष्य होता है। रोगी की उद्विग्नता का येन-केन प्रकारेण निराकरण। इसमें मनोवैज्ञानिक कौशल का ही मुख्यतया उपयोग होता है। मनःसंस्थान को संतुलन बनाने की कई पद्धतियाँ और विधियाँ खोज निकाली गई हैं और तनाव दूर करने के लिए उनका उपयोग भी होता है। काम इतने से भी नहीं चलेगा। खोजना यह पड़ेगा कि आखिर यह उद्वेग आते कहाँ से हैं? नाम मात्र के कारणों के सहारे वे आसमान पर क्यों छा जाते हैं। निष्कर्ष एक ही निकलता है-दृष्टिकोण में आदर्शवादिता की कमी और निकृष्टता की भरमार ही उसका आधारभूत कारण है। उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व को अपनाकर यदि हलका फुलका-कलात्मक स्नेह सौजन्य से भरा-पूरा जीवन जिया जा सके तो इतने भर से शारीरिक और मानसिक व्यथाओं से बहुत हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। परिष्कृत व्यक्तित्व से महान कार्यों का सम्पादन और आत्मिक गरिमा से जीवन लक्ष्य की प्राप्ति जैसे वे लाभ भी इस मार्ग पर चलने से मिल सकते हैं जो शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य से भी अधिक महत्वपूर्ण हैं।
धनुर्धर अर्जुन भगवान शिव की षोडशोपचार-पूजा के उपरान्त ही भोजन ग्रहण करते। पाण्डव-बन्धुओं का यह नियम था कि वे एक साथ भोजन करते।
अज्ञातवास की अवधि में एक दिन भोजन का समय हो चला। भीम को भूख लगी थी। उन्होंने देखा कि आसपास कोई शिव-मन्दिर नहीं है। अर्जुन बिना शिव-पूजन भोजन न लेंगे। वे विचलित हो उठे। मन्दिर न मिलते देख, हताश हो लौट रहे थे कि एक ताड़ी वृक्ष का तना उसी आकार का पड़ा दिखा। भीम ने उसे ही भूमि में गाड़ दिया और उस पर जल-पुष्प आदि चढ़ाकर अर्जुन से कहा-शिव प्रतिमा मिल गई है, चलो, जल्दी पूजन करो।
अर्जुन ने जाकर पूजा की और तब सबने साथ भोजन किया।
भोजन के बाद भीम को विनोद सूझा। उन्होंने कहा-अर्जुन! तुमने आज जिस शिव प्रतिमा की पूजा की है, वह वस्तुतः क्या है?
अर्जुन ने कहा-‘‘आपने स्वयं ही तो उसे शिव-प्रतिमा कहा था।”
भीम ने हँसते-हँसते बताया कि वह ताड़ी वृक्ष का तना था अर्जुन यह मानने को तैयार नहीं थे। तब युधिष्ठिर ने कहा-चलकर देख लिया जाय। वहाँ पहुँचकर भीम से उसे उखाड़ने को कहा गया। महाबली भीम ने पूरी ताकत लगा दी। पर विफल रहे। उनका सिर लज्जा से झुक गया।
युधिष्ठिर ने कहा- भीम! तुम्हारी बात सही होगी। पर अर्जुन एक निष्ठावान साधक है। जब उसने शिवलिंग की भावना से उस प्रतीक का पूजन किया, तो उसका शिवलिंग हो जाना आश्चर्य नहीं।
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दो समान परिस्थितियों और समान साधनों के व्यक्तियों की मनःस्थिति का विश्लेषण किया जाय तो उनमें भारी अन्तर मिलेगा। कई बार तो उसमें जमीन-आसमान जितना फर्क मिलता है। जिन परिस्थितियों में एक व्यक्ति दुःखी, उदास, खिन्न और असन्तुष्ट बना खीजता रहता है उन्हीं में दूसरा सन्तोष की साँस लेता है और कई बार तो अपने को सुसम्पन्न सौभाग्यशाली भी अनुभव करता है। इस अन्तर का कारण क्या हो सकता है, इस पर विचार करने से एक ही निष्कर्ष उभर कर आता है। ‘विचारों के स्तर एवं प्रवाह का अन्तर।’ वस्तुतः मानव जीवन के दुःख और दुःख के उत्थान-पतन का केन्द्र बिन्दु यही है।
नैपोलियन के पास साधनों की कमी नहीं थी। वे यश, प्रतिभा और पराक्रम ही नहीं सफलताओं के भी धनी थे। इतना सब होते हुए भी जिन्दगी भर में उन्हें न तो कभी चैन मिला और न सन्तोष। दूसरे लोग उनके बारे में क्या सोचते होंगे यह बात दूसरी है, पर अपनी आन्तरिक स्थिति का परिचय देते हुए उनने सेन्टहेलना के कारागार में अपने साथियों से कहा था-बीती जिन्दगी के इतिहास पर नजर डालने से मुझे कुल मिलाकर छह दिनों की ऐसी याद है जिसमें प्रसन्नता का अनुभव कर सका, शेष दिन तो आवेगों और आक्रोश में ही बीत गये।
इसके विपरीत एक साधनहीन ही नहीं कई दृष्टियों से अपंग असमर्थ महिला का उदाहरण है जिसे देखने की सुनने की और बोलने की शक्ति से वंचित रहना पड़ा। यह अन्धी, गूँगी और बहरी महिला हेलेन केलर इन परिस्थितियों में रहते हुए भी प्रबल पुरुषार्थ के आधार पर ज्ञान साधना में संलग्न रही और कई विश्व-विद्यालयों से स्नातकोत्तर परीक्षाएँ उत्तीर्ण करने में सफल रहीं। वह कहती थीं-‘‘मुझे अपने चारों ओर सौन्दर्य ही सौन्दर्य और आनन्द ही आनन्द बिखरा दीखता है।’’
नैपोलियन और केलर की परिस्थिति और मनःस्थिति की तुलना करने पर पता चलता है कि मनुष्य की प्रसन्नता-अप्रसन्नता का आधार साधनों पर नहीं वरन् उसकी विचार पद्धति पर टिका हुआ है। इसी के सहारे मनुष्य प्रसन्न-अप्रसन्न रहता है और उसी प्रवाह में बहता हुआ उत्थान एवं पतन का भागी बनता है।
विश्व विख्यात जीवन-कला के विज्ञानी डेल कारनेगी से एक प्रश्न पूछा गया कि अपने अब तक जो जाना है उसके सर्वोत्तम अंश पर प्रकाश डालें। तो उन्होंने नपे-तुले शब्दों में छोटा-सा उत्तर दिया-‘‘मैंने सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात यह देखी है कि विचारों की शक्ति से बढ़कर इस संसार में और कोई सम्पदा या सामर्थ्य है नहीं। इसी के सहारे मनुष्य जो चाहता है वह बनता है और जैसी स्थिति में रहना चाहता है वह बनता है और जैसी स्थिति में रहना चाहता है वैसी में रहता है।
कारनेगी ने अपनी एक पुस्तक में लिखा है-‘‘हमें जानना चाहिए कि जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करने वाली उसका स्वरूप गढ़ने वाली शक्ति एक ही है- विचारों की प्रवाह धारा। उसी के साथ बहते हुए हम कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं। यदि सोचने का सही तरीका जान लिया जाय तो समझना चाहिए-सन्तोष, सहयोग, सफलता और प्रसन्नता प्राप्त करने की कुँजी हाथ में आ गई।”
अन्धे कवि मिल्टन अपनी निजी अनुभूतियों को व्यक्त करते हुए कहते थे-‘‘यह जीवन मुझे दैवी वरदान की तरह मिला है इसके एक-एक क्षण का पूरी सजगता के साथ उपयोग करूंगा।” सामान्यतया अन्धे व्यक्ति अपने आपको अपंग दुर्भाग्यग्रस्त ही मानते रहते हैं। इन्हीं परिस्थितियों में रह कर मिल्टन ने अपने 65 इंच लम्बे शरीर में आँखों की कमी दो इंच की छोटी-सी ही हानि समझी और जो कुछ शेष था उसका सही उपयोग करके अपना और समस्त विश्व का हित साधन किया। आँखों की कमी से उनके प्रगतिक्रम में तनिक भी अवरोध उत्पन्न न हुआ। वे उस कमी की पूर्ति अन्य साधनों के सहारे करते रहे। इसके विपरीत एक दूसरे प्रख्यात लेखक का उदाहरण है। अँग्रेजी के प्रख्यात साहित्यकार स्विफ्ट अपने जन्मदिन पर शोक सूचक काली पोशाक पहना करते थे। वे कहते थे-‘‘उन्हें दुःख सहने के लिए व्यर्थ ही यह जन्म मिला- अच्छा होता वे जन्मे ही न होते।” मिल्टन की तुलना में उनकी शारीरिक और आर्थिक स्थिति कहीं अच्छी थी फिर भी वे सदा खिन्न ही देखे गये। जन्मदिन जैसे प्रसन्नतादायक अवसर पर तो उनकी खिन्नता और भी अधिक बढ़ जाती थी। इस अन्तर में परिस्थितियों का नहीं मनःस्थितियों की दिशा धारा ही अपनी भूमिका निभाती दीखती है।
इस सन्दर्भ में शेक्सपियर की मान्यता कहीं अधिक स्पष्ट है- वे लिखते हैं, ‘‘हमारे विचार ही हैं जो प्रतिकूलता और अनुकूलता गढ़ते हैं। वे ही हैं जो उदासी या प्रसन्नता देते हैं। सहयोग और तिरस्कार पाने में जितना दूसरों का अनुग्रह और विरोध कारण होता है उससे भी अधिक अपने स्वभाव का आकर्षण, विकर्षण काम कर रहा होता है।’’
विद्वान मान्टेन कहा करते थे- ‘‘मनुष्य जिस भी स्थिति में रह रहा होता है उसमें ईश्वर का हस्तक्षेप कम और अपना निज का कर्तृत्व अधिक काम कर रहा होता है। वे नरक और स्वर्ग को स्वभाव या साधन आदि से संबंधित नहीं मानते, वरन् उस भले-बुरे वातावरण को बताते थे जो अपनी ही मनःस्थिति के अनुरूप अपने ही द्वारा सृजा गया होता है।’’ रोम के दर्शन शास्त्री मार्क्स अण्डीलियस की उक्ति अपने समय की तरह आज भी सत्य समझी जाती है जिसमें कहा गया है कि हर व्यक्ति की एक अलग दुनिया है और वह उसके स्वयं के द्वारा बनाई गई है। मान्यताओं के ढाँचे में गतिविधियाँ ढलती हैं और उन्हीं की प्रतिक्रिया स्व निर्मित दुनिया के रूप में सामने आ खड़ी होती है।
व्यक्ति में शक्ति का अजस्र भंडार भरा पड़ा है। उसमें मौलिक सामर्थ्य प्रचुर परिमाण में विद्यमान है, पर उपयोग उतने का ही हो सकता है जितना कि विचारणा एवं मान्यता के सहारे, उभारा जाता है। अपने को दुर्बल और दुर्भाग्यग्रस्त मानते रहने वाले व्यक्ति सदा इसी स्थिति में पड़े रहेंगे। अन्तर में परिवर्तन हुए बिना सौभाग्य का आलोक उनके जीवन में हो ही नहीं सकेगा। दूसरों की सहायता भी अधिक कारगर न होगी। जिस दुर्दशा को स्वेच्छापूर्वक वरण किया गया है वह सहज ही जाने वाली नहीं है। प्रगति का अरुणोदय सबसे पहले अंतःक्षेत्र में उदय होता है, इसके उपरान्त ही उसकी किरणें बाह्य जीवन में अपना आलोक उत्पन्न करती है।
शास्त्रकारों ने मनोनिग्रह पर बहुत जोर दिया है और उसका चमत्कारी माहात्म्य बताया है। यह एकाग्रता का नहीं चिंतन प्रवाह को शालीनता में जोड़ देने का संकेत है। मन को इधर-उधर न भागने देने की कला से विचारों का बिखराव रुकता है और अभीष्ट प्रयोजनों में चिन्तन को नियोजित किये रहने से कार्य की सफलता का पथ-प्रशस्त होता है। किन्तु मनोनिग्रह की प्रक्रिया का यह आरम्भ है अन्त नहीं। निकृष्टता के साथ जुड़े हुए निषेधात्मक चिन्तन के प्रवाह को उलट कर उसे उत्कृष्टता की दिशा में लगाना और उससे सृजनात्मक गतिविधियों की नई रूपरेखा बनाना यही है मनोनिग्रह का वास्तविक उद्देश्य। चिन्तन जब उच्चस्तरीय उद्देश्यों को अपनाने के लिए कटिबद्ध होता है और परिष्कृत जीवन क्रम के साथ-साथ आन्तरिक विभूतियों और बहिरंग सफलताओं का द्वार खुलता है। विचारशक्ति मानव जीवन की सर्वोपरि सम्पदा है उसका सही उपयोग कर सकने वाले ही सुखी रहते और समुन्नत बनते देखे गये हैं।
जो लगनशील है, कर्त्तव्यपरायण एवं परिश्रमी हैं वे किसी दूसरे का मुँह नहीं ताकते। वे अवसर की बाट नहीं जोहते। वे स्थिति देखते और काम में जुट जाते हैं। कर्त्तव्यपरायण व्यक्ति किसी के कहने, आदेश देने की प्रतीक्षा नहीं करते न इस बात के प्रति चिंतन करते हैं कि उनके काम की कोई सराहना कर रहा है या नहीं।
-नैपोलियन बोनापार्ट
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जीवट का प्रचुर भण्डार मानवी सत्ता के अन्तराल में कूट-कूटकर भरा हुआ है। उसके आधार पर वह आये दिन आँख मिचौनी करती रहने वाली कठिनाइयों से हँसते-खेलते निपटता रह सकता है। शारीरिक क्षमता मानसिक सूझबूझ, सहयोगियों का आश्वासन, साधनों की सामर्थ्य और ईश्वर का विश्वास यह सब मिलकर इतने भारी हो जाते हैं कि कठिनाइयों के पर्वत भी उनके सामने हलके पड़े।
शरीर शास्त्री कहते हैं कि जीवाणुओं और ऊतकों की गहराई में जो जीवनीशक्ति पाई जाती है उसी के आधार पर रोग-निरोध और आरोग्य-संरक्षण का उद्देश्य पूरा होता है। मनोविज्ञानी कहते हैं कि मनुष्य का व्यक्तित्व और भविष्य विद्या बुद्धि पर नहीं उसके उत्साह एवं साहस पर निर्भर है।
कठिनाइयाँ और उलझनें वस्तुतः उतनी जटिल नहीं होतीं जितनी कि भीरुता और घबराहट के कारण प्रतीत होती है। सन्तुलन बनाये रखा जाय तो हर गुत्थी को सुलझाया जा सकता है और ऐसा तालमेल बिठाया जा सकता है, जिसके आधार पर जो अपरिहार्य हैं उसे हँसते-हँसते सहन कर लिया जाय।
मानवी संरचना इतनी दुर्बल नहीं है कि छोटे-मोटे आक्रमणों और आघातों के सामने घुटने टेक दे। उसमें सहन करने से लेकर गुंथ जाने तक की ऐसी अनेक विशेषताएँ भरी पड़ी हैं जिनके सहारे कठिनाइयों और विपत्तियों से डटकर जूझना सम्भव हो सके। मौत से मरने वालों की तुलना में उनकी संख्या अधिक होती है जो भयभीत होकर मौत के मुँह में जा घुसते हैं। जिजीविषा को दुर्बल न पड़ने दिया जाय तो मौत की सहेली जैसी दीखने वाली विपत्तियों को पार कर सकना कुछ अधिक कठिन नहीं पड़ता।
साहसी का अन्तरंग उसकी सहायता करता है और कठिनाई के समय उसकी समस्त क्षमताएँ एकजुट होकर विपत्ति से लड़ पड़ती हैं। ऐसे लड़ाकू प्रायः विजयी होकर ही लौटते हैं। कहते हैं कि ‘ईश्वर उनकी सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करते हैं।’ इस कथन में बहुत तथ्य है। योद्धा का पुरुषार्थ इतना आकर्षक होता है कि उसकी सहायता करने के लिए पड़ोसियों का ही नहीं भगवान का भी मन चलता है। दरिद्र परिवारों में जन्मे, स्वल्प साधनों में गुजारा करने वाले, प्रतिकूलताओं से घिरे कितने ही व्यक्ति क्रमशः आगे बढ़े और उन्नति के उच्च शिखर तक पहुँचे हैं। उस सफलता का श्रेय उनकी साहसिकता को ही दिया जा सकता है जो मनुष्यों से लेकर ईश्वर तक की सहायता को अपने लिए घसीट लाती है।
कहते हैं कोई दुर्भाग्य भी होता है और कई बार वह अप्रत्याशित रूप से मनुष्यों पर टूट पड़ता है। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसे संकट टल नहीं सकते। धैर्य, साहस और सन्तुलन बनाये रहने पर ऐसी सूझबूझ का उदय होता है जो उस तथाकथित दुर्भाग्य से अठखेलियाँ करती रहे और विपत्ति की घड़ी को टाल सकने तक में समर्थ रह सके। ऐसे ही लोगों को अनुकूलताओं का लाभ मिलता है जिसे आमतौर से दैवी सहायता का नाम दिया जाता है। स्पष्ट है यह दैवी सहायता हर किसी को नहीं मिलती उसे उपलब्ध करने की पात्रता भी अपनी ही साहसिकता के आधार पर सिद्ध करनी पड़ती है।
न्यूयार्क की एक वयोवृद्ध महिला कैथोलिन मैक्कोइन का उदाहरण ऐसा है जिसमें आकस्मिक विपत्तियों और अप्रत्याशित सुरक्षा संयोगों का ऐसा विचित्र ताना-बाना है कि आश्चर्य से चकित रह जाना पड़ता है। लगता है कि कोई मारक शक्ति उसे मिटाने पर तुली रही और समय-समय पर प्राणघातक आक्रमण करती रही। दूसरी ओर ऐसा भी होता रहा कि कोई रक्षक सत्ता उसे बचाने के लिए भी कटिबद्ध बैठी रही। मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है, इस तथ्य की पुष्टि ऐसे ही प्रसंग करते हैं जिनमें एक ओर से आक्रमण और दूसरी ओर से संरक्षण के मध्य तगड़ी टक्कर होती रही हो उसमें मरण नहीं, वरन् जीवन जीतता रहा हो। कैथलिन पर सात बार मौत का हमला हुआ और वह सातों बार बेदाग बन गई।
जब वह सात वर्ष की थी तो स्कूल के अन्य बच्चों के साथ स्टीमर में हडसन नदी की सैर को गई। संयोगवश स्टीमर में आग लगी और कई सौ बच्चों में से प्रायः सभी जलकर खाक हो गये। केवल एक कैथलिन ही ऐसी थी जो उस विपत्ति में से दैवयोग से ही बच सकी। जब सब बच्चे बुरी तरह जल रहे थे तब इस लड़की को स्टीमर के एक कोने में बड़ा-सा लकड़ी का तख्ता रखा दीखा। उसने उसे उठाया-छाती से चिपकाया और नदी में कूद पड़ी। बहुत देर इस प्रकार लहरों के साथ मौत के झूले में झूलती रही। उधर से गुजरती हुई एक नाविक ने उसे पकड़ लिया और बचाकर उसके घर पहुँचा दिया।
इन्हीं दिनों टैक्सी से यात्रा करते समय सामने से आती दूसरी मोटर से टक्कर हो गई। गाड़ी टूट गई। ड्राइवर मर गया, तीनों अन्य यात्री बुरी तरह घायल हो गये। अकेली कैथलिन ही थी जिसे तनिक भी चोट नहीं लगी।
यह सात घटनाएँ ऐसी हैं जिनमें उसके लिए प्रत्यक्ष मृत्यु का निमन्त्रण था। अन्य घटनाएँ ऐसी हैं जिनसे प्रतीत होता है कि दुर्भाग्य ने सदा असाधारण रूप से पीछा किया है और बार-बार उस पर संकट छाये हैं किन्तु इतने पर भी कोई संरक्षक शक्ति उसका बचाव करती रही और 61 वर्ष की आयु तक वह भला चंगा जीवन जीती रही।
ऐसे अनेक उदाहरण हम अपने इर्द-गिर्द आसानी से ढूँढ़ सकते हैं जो विपत्ति के समय अपना सन्तुलन और साहस बनाये रहे। उबरने की आशा संजोये रहे और दुर्दिनों को परास्त करके यह सिद्ध करते रहे कि संकट नहीं साहस बड़ा है।
यूनान का राजा सिकन्दर महान् जब भारत पर चढ़ाई करने के लिए चलने लगा तो उसने अपने गुरु अरस्तू से कहा-‘‘मैं भारत विजय के लिए जा रहा हूँ-आपके लिए वहाँ से क्या लाऊँ ?”
“मेरे लिए भारत से सद्ज्ञान लाना।”
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खिन्न रहना, मनुष्य की अपनी उपार्जित कुरूपता है, सौन्दर्य सहज प्रिय है। उसका दूसरों पर प्रभाव पड़ता है और अपने आपको गर्व एवं सन्तोष की अनुभूति होती है। आमतौर से सौन्दर्य वृद्धि के भारी उथले प्रयत्न सभी अपने ढंग और स्तर के अनुरूप करते रहते हैं, किन्तु कुछ ऐसे भी हैं जो प्रकृति प्रदत्त सुरुचि को अपने हाथों बिगाड़ते रहते हैं और उपलब्ध सहज सौन्दर्य पर कुठाराघात करते रहते हैं। ऐसी भूल करने वालों में आलसी और गन्दगी प्रकृति के लोग उतनी बड़ी संख्या में नहीं होते जितने कि अप्रसन्नता की मुद्रा बनाये रहने वाले।
अंगों की बनावट मनुष्य के अपने हाथ में नहीं है। वह जैसी भी कुछ है जन्मजात है और उसमें परिवर्तन बहुत प्रयत्न करने पर भी थोड़ा-सा ही हो सकता है। स्वच्छता और सुसज्जा से सुन्दरता का बाह्य आवरण किस कदर सध जाता है। उससे व्यक्ति की सुरुचि का पता चलता है किन्तु चेतना का आन्तरिक सौष्ठव इन आवरणों के आधार पर यत्किंचित् ही झलकता है। वस्त्र, अलंकार एवं सुसाधनों की सहायता से सज−धज की व्यवस्था एक सीमा तक हो सकती है। केश सज्जा एवं परिधानों के सहारे मनुष्य थोड़ा−सा आकर्षक तो जरूर लगता है फिर वह वास्तविक सौन्दर्य जो व्यक्तित्व का अंग है, इतने भर से बन नहीं पड़ता। शृंगार के द्वारा सहज सौन्दर्य की आवश्यकता बहुत प्रयत्न करने पर भी पूरी नहीं हो पाती।
सौन्दर्य की जड़ें मनुष्य के अन्तरंग की गहराई में होती हैं। बच्चों का भोलापन उनकी निर्मल मनःस्थिति और सहज सरलता के कारण हर किसी की आँखों को प्रिय लगते हैं। बच्चे के साथ खेलने के लिए हर किसी का मन करता है इसमें अपनेपन का मोह ही नहीं उस पर छाये रहने वाले सहज सौन्दर्य का आकर्षण भी बहुत बड़ा कारण होता है जो अनजान का भी मन लुभाता है। अपनों की तरह पराये बालक भी प्रिय लगते हैं।
चेहरा एक पारदर्शी दर्पण है जिसमें होकर मनुष्य का अन्तरंग झाँकता है। आँखों के छिद्र यों होते तो माथे की हड्डी के निचले हिस्से में हैं, पर उनमें होकर मनुष्य की अन्तरात्मा झाँकती है। आँखों की किस स्थिति का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ता है और उसका आधार क्या है उसका अभी तक कोई विधिवत् शास्त्र नहीं बन सका है। फिर भी इतना तो निश्चित है कि आँखों की चमक और चितवन दूसरों पर तरह−तरह के प्रभाव डालती है। वह बाहरी बात हुई भीतर की गहराई में प्रवेश किया जाय तो पता लगेगा कि बात बहुत आगे तक चली जाती है। इन छिद्रों से निकलने वाली संवेदनात्मक किरणों को आँका जा सके तो उनमें व्यक्ति का समूचा व्यक्तित्व मुखरित होते देखा जा सकता है। चर्चा, मात्र आँखों की नहीं हो रही है। पूरे मुखमण्डल का समूचा क्षेत्र आन्तरिक अभिव्यक्तियों का प्रकटीकरण करता है। होठ, कपोल, भवें, नाका, ठोड़ी, गरदन जैसे चेहरे से सम्बन्धित अवयवों की कोमलता और संवेदनशीलता अद्भुत है, वह भीतर की स्थिति का बहुत सही वर्णन करती है। व्यक्तित्व को छिपा सकने की कला में तो हजारों लाखों में से कोई एकाध ही प्रवीण हो पाता है।
सौन्दर्य का नयनाभिराम स्तर ही सज्जा के आधार पर एक सीमा तक विनिर्मित किया जा सकता है। हृदय ग्राही स्तर को विकसित करने में प्रसाधनों का बाहुल्य एवं सज्जा कौशल तनिक भी कारगर नहीं होता, वरन् लादी हुई शृंगारिकता मनुष्य की आत्महीनता का विज्ञापन करती है। ओछे, बचकाने, छिछोरे, मनचले लोग ही प्रायः इस प्रकार के आडम्बर बनाते हैं। यह सहज मान्यता है। इसलिए सौन्दर्य सज्जा पर खर्च किया गया समय और धन उथले लोगों में से कुछ की ही आँखों को अपनी ओर मोड़ने में समर्थ होता है। विचारशील वर्ग की दृष्टि में तो यह छिछोरे लोग एक प्रकार से कुरूप ही नहीं एक प्रकार से अविश्वस्त भी होते हैं। सामान्य वेश-भूषा वालों की तुलना में सह-धज वाले मन-चले लोग अपेक्षाकृत अधिक अप्रमाणिक माने जाते हैं। आकर्षक लगते हुए भी वे किसी की घनिष्ठता और आत्मीयता का लाभ कदाचित ही कभी पा सकते होंगे।
सौन्दर्य अन्तःकरण की देन है। फूल के अन्तरंग की मस्ती जब उफनती है तो वह खिलता-मुसकाता ही नहीं कोमलता, शोभा और सुवास से अपने निकटवर्ती वातावरण को अनुप्राणित कर देता है। पुष्प का यह आन्तरिक और वास्तविक सौन्दर्य तितली, मधुमक्खी, भौंरे जैसे पतंगों को ही नहीं कलाकारों, दार्शनिकों, योगियों की ही नहीं देवताओं को भी अपनी सहज सुषमा का अनुदान बाँटता है। पौधे के उस छोटे से अवयव पुष्प का गुणानुवाद गाते-गाते मूकों और मुखरों में से कोई भी थकता नहीं है।
मनुष्य रूपी वृक्ष का परम शोभायमान अवयव उसका मुखमण्डल है। उसकी उपमा कमल पुष्प से दी जाती रही है सो फवती भी है। यह फवन इसलिए नहीं कि दोनों की आकृति एक जैसी है वरन् इसलिए कि दोनों की प्रकृति में अद्भुत साम्य है। दोनों के अन्तरंग का उभार उनके बाह्य कलेवर पर थिरकता देखा जा सकता है। फूल जब मस्ती पर होता है तो उसकी मादकता भी देखते ही बनती है और जब अन्तःकरण शालीनता की प्रौढ़ता अपनाता है तो उसका सौन्दर्य भी पुलकित किये बिना नहीं रहता। यह आकृतिजन्य नहीं प्रकृति परक होता है।
आत्मा के तीन गुण हैं। सत्य, शिव और सुन्दर। इनमें से प्रथम सुन्दर, द्वितीय शिव और अन्तिम सत्य है। आत्मिक प्रगति ‘सुन्दर’ से आरम्भ होती है। मोटे-तौर से उसे स्वच्छता और सुव्यवस्था के अर्थ में लिया जाता है। बहुत हुआ तो सुरुचि और सुसज्जा की कलात्मकता भी उसी में जुड़ जाती है। यह आवरण क्षेत्र की दृश्य परिकर की बात है। अन्तरंग इससे आगे है। हृदय पर छा जाने वाला सौन्दर्य आगे है सज्ज परक सौन्दर्य तो रंगमंचों के नट नायक कितनी अच्छी तरह बना लेते हैं, पर आन्तरिक सौन्दर्य का सृजन न साधन सामग्री से हो सकता है और न हस्तकौशल से। उसे विनिर्मित करने में आत्मा को ही अपनी सृजनशक्ति का परिचय देना पड़ता है। मधुमक्खी का छत्ता, बया का घोंसला, मकड़ी का जाला अन्य लोग विनिर्मित नहीं कर सकते। असली रूप में ऐसे सृजन वे प्राणी अपनी ही अंतःचेतना के आधार पर कर पाते हैं। हृदय को पुलकित कर देने वाला सौन्दर्य पवित्र अन्तरात्मा के अतिरिक्त और किसी के द्वारा और किसी उपाय से विनिर्मित हो सकना शक्य नहीं है।
जीवन के प्रति सही दृष्टिकोण और तद्नुरूप उत्कृष्ट आचरण जहाँ कहीं भी समन्वित हो रहा होगा वहाँ सन्तोष के लक्षण दृष्टिगोचर होंगे और जो है तथा जो होने वाला है उसके प्रति उत्साह उभर रहा होगा। ऐसी अन्तः स्थिति का होना मनुष्य जीवन की सरसता का सच्चा आनन्द प्रदान करता है और उपलब्धकर्त्ता उससे धन्य बनता है। यह स्थिति किसे प्राप्त है किसे नहीं, इसकी जानकारी की परख कसौटी एक ही है- चेहरे पर चिरस्थायी रूप से छाई रहने वाली मुसकान। परिस्थितियों के कारण समय-समय पर व्यक्त होती रहने वाली प्रसन्नता-अप्रसन्नता इससे भिन्न है। वह तो अनुकूलता-प्रतिकूलता की प्रतिक्रिया मात्र होने के कारण नितान्त बाह्य है और सर्वथा अस्थिर। सहज मुसकान अन्तरात्मा की गरिमा को प्रकट करती है और बताती है कि प्राणी इसमें खोखले के भीतर रहने वाली शालीनता की विशिष्टता का वरण कर रहा है। उसे जीवन के स्वरूप और सौन्दर्य का बोध हो रहा है।
मुस्कान कृत्रिम भी हो सकती है। वेश्याएँ इस छद्म में निष्णात होती हैं। ठगों का धन्धा भी इसी के सहारे चलता है। चापलूसों और दरबारियों को इसी हथियार का प्रयोग दूसरों को फुसलाने के लिए करना पड़ता है। किसी को मूर्ख बनाने के लिए उसके व्यंग उपहास के समय भी ऐसी ही विचित्र मुख मुद्रा देखने को मिलती है। अभिनय करते समय अनेक तरह की मुद्राएँ बनाने में एक मुस्कान भी सम्मिलित की जा सकती है यहाँ इन विद्रूपताओं की चर्चा नहीं हो रही है। प्रसंग उस वास्तविकता का है जो अन्तरात्मा की शालीनता का दृष्टिकोण की परिपक्वता का परिचय देती हुई चेहरे पर परिष्कृत व्यक्तित्व का प्रमाण देने के लिए विद्यमान रहती है। यही है असली मुसकान, जो न केवल अपने धारणकर्ता को उत्कृष्टता का आनन्द देती है वरन् जो भी सम्पर्क में आता है उसे अनेक प्रकार के अनुदान देती रहती है।
परिस्थितियों और व्यक्तियों को अनावश्यक महत्व देने से बात बिगड़ती है और बनती तब है जब अपनी उत्कृष्टता और कर्तव्य निष्ठा का स्तर बनाये रहने पर दृष्टि केन्द्रित रखी जाती है। अपना स्तर बनाये रखा जाय। अपनी रीति-नीति को सही रखा जाय। इन दो तथ्यों की यदि प्रधानता दी जाय और चिन्तन तथा कर्तृत्व को सही बनाये रखा जाय तो फिर वे कारण सहज ही तिरोहित होते दिखाई पड़ेंगे जो असंतोष भड़काने और अप्रसन्न रखने के लिए जिम्मेदार थे।
जो अपने पास है उसकी महत्ता समझी जाय और उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने की व्यवस्था बनाई जाय। अधिक उपार्जन और अधिक सफलता के लिए प्रयत्न तो किया जाय पर जब तक अभीष्ट की प्राप्ति न हो सके तब तक खिन्न बने रहने की तनिक भी आवश्यकता नहीं हैं। जो उपलब्ध है वह भी इतना कम नहीं कि उसपर सन्तोष और हर्ष का अनुभव न किया जा सके। भविष्य के अशुभ होने की कल्पना करके शंका-शंकित रहने की अपेक्षा यह क्या बुरा है कि उज्ज्वल भविष्य की आशा अपेक्षा की जाय और प्रसन्न रहा जाय। भविष्य का कोई ठिकाना नहीं, वह आशा के विपरीत भला भी हो सकता है और बुरा भी। जब यहाँ सब कुछ अनिश्चित के ही आंचल में छिपा पड़ा हो फिर सम्भावनाएँ उज्ज्वल ही क्यों न मानी जाय। यह अनुमान गलत निकला तो भी अशुभ चिन्तन की तुलना में शुभ सम्भावनाएँ सोचते रहना ही लाभदायक है। उतने समय तक खिन्न रहने की अपेक्षा प्रसन्न रहने का और उस आधार पर शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य संभाले रहने का अवसर मिल गया, यही क्या बुरा रहा? यदि अनिश्चित कल्पना के आधार पर मुस्कान बनाये रखी जा सके तो वह कल्पना भी सृजनात्मक ही रही।
अपने अन्तरंग को ऊँचा उठायें। परिष्कृत चिन्तन करें। उज्ज्वल भविष्य की आशा रखे। कर्तव्य को सही रीति से करने में आत्म-सम्मान अनुभव करें। दूसरों से सीमित अपेक्षा करें। परिस्थितियों से ताल-मेल बिठायें, जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलें और उसे खिलाड़ी की तरह बिना हार-जीत की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाये खेलें। अन्य कुछ भी हाथ से चला जाय पर मुस्कान को अक्षुण्ण रखें। क्योंकि यही वह दिव्य सम्पदा है जो आड़े समय में सबसे अधिक सहायक सिद्ध होती है और प्रगति पथ पर बढ़ चलने में सबसे अधिक सुविधा उत्पन्न करती है।
एक जिज्ञासु ने सन्त तिरुवल्लुवर से प्रश्न किया गुरुदेव कभी भगवान को भी हँसी आती है? संत ने उत्तर दिया-दो अवसरों पर भगवान् हँसता है। जब डॉक्टर रोगी की माँ से कहता है-‘‘घबराओ मत, मैं तुम्हारे लड़के को बिल्कुल ठीक कर दूँगा। भगवान् हँस कर कहता है। “मैं तो इसकी जान लेने वाला था क्योंकि इसकी आयु समाप्त हो गई है, परन्तु इस व्यक्ति को जिसे मैंने माध्यम भर बनाया है इसे बचा लेने की गर्वोक्त बात करता है।”
पुनः भगवान तब हँसा जब उसने देखा कि जमीन के किसी टुकड़े के विषय में दोनों भाई लड़ते-झगड़ते मारने मरने पर उतारू हो गए। ईश्वर ने कहा-‘‘यह सारा विश्व तो मेरा है तिस पर अपने क्षणिक से जीवन में अस्थाई व नाशवान चीजों के लिए ये लड़ने वाले कैसे नादान हैं।
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अपनों से अपनी बात-
सूर्योदय की निकटवर्ती सम्भावना सर्वप्रथम पूर्व दिशा में प्रकट होती है। उसे ऊष्मा की लालिमा के रूप में देखा जा सकता है। प्रभात का प्रकाश धीरे-धीरे बढ़ता है और जो ऊष्मा को मात्र कौतूहल समझते थे-उसके आधार पर सूर्योदय की सम्भावना को स्वीकार करने में अकचका रहे थे, उनका भी सन्देह मिटता है, वे देखते हैं कि प्रकाश की आभा क्रमशः बढ़ती ही जा रही है। अन्ततः वह समय आ ही पहुँचता है जब अरुणोदय की आरम्भिक किरणें धरती पर उतरती है और देखते-देखते दिनमान की प्रखरता सारे वातावरण में आभा और ऊर्जा के रूप में अपने अस्तित्व का प्रमाण देती है। तब तो अन्धों को भी वस्तुस्थिति स्वीकार करनी पड़ती है। विचारशील इससे पहले ही सम्भावना को समझ लेते हैं और ब्रह्ममुहूर्त में ही अपने प्रभातकालीन कर्तृत्व का निर्वाह करने लगते हैं। दूरदर्शी इन्हें ही कहते हैं। आलसियों और अविश्वासियों की तुलना में नफे में भी वे ही रहते हैं।
युग अवतरण के पीछे महाकाल की इच्छा और प्रेरणा का अनुमान लगाने में जिन्हें असमंजस था, वे इस पुण्य प्रक्रिया को उसी प्रकार सुविस्तृत होते देख रहे हैं जैसे कि ऊषा का हलका-सा आलोक क्रमशः अधिक प्रखर होता और अरुणोदय की प्रत्यक्ष स्थिति तक जा पहुँचता है। इन दिनों ध्वंसात्मक शक्तियाँ भी जीवन-मरण की बाजी लगा कर विधातक विभीषिकाएँ उत्पन्न करने में कोई-कमी नहीं रहने दे रही हैं फिर भी आशा का केन्द्र यह है कि उसका सामना करने वाले देवत्व का शौर्य और पराक्रम भी निखरता और प्रखर होता चला जा रहा है। निराशा तभी तक रहती है जब तक पराक्रम नहीं जगता। चेतना के ऊँचे स्तर जब उभरते हैं तो न दुष्टता ठहर सकती है न भ्रष्टता। जीतता सत्य ही है असत्य नहीं। जीवन ही शाश्वत है, मरण तो उससे आँख मिचौनी खेलने भर जब तब ही आता है। सूर्य और चन्द्र का आलोक अमर है-उस पर ग्रहण तो जब-तब ही चढ़ता है। सृष्टा की इस सुन्दर कलाकृति की गरिमा शाश्वत है। विकृतियाँ तो बुलबुलों की तरह उठती और उछल-कूद का कौतुक दिखा कर अपनी लीला समेट लेती है। “यदा-यदा हि धर्मस्य” का आश्वासन देने वाला युग विकृतियों का निराकरण करने के लिए समय-समय पर सन्तुलन को सम्भालने के लिए आता रहा है। आज की विभीषिकाएँ उस उस दिव्य अवतरण की पुकार करती हैं तो आनाकानी क्यों होती? विलम्ब क्यों लगता? युग चेतना के रूप में महाकाल का अवतरण प्रक्रिया का परिचय हम सब इन्हीं दिनों प्रत्यक्ष रूप से प्राप्त कर रहे हैं।
जागृत आत्माओं को युग की चुनौती को स्वीकार करने के लिए इन दिनों जो उत्साह उमड़ा है चह देखते ही बनता है। मूर्छितों और अर्धमृतकों को छोड़कर महाकाल की हुँकार ने हर प्राणवान को युग धर्म का पालन करने की युग साधना में संलग्न होने की प्रेरणा दी है। फलतः युग सृजन में योगदान देने के लिए हर समर्थ-असमर्थ के चरण बढ़ रहे हैं। इस वास्तविकता का प्रमाण गिद्धों और गिलहरियों के उत्साह को देखने से भी मिल जाता है। हनुमान, अंगदों का नल और नील का पराक्रम तो सहज स्वाभाविक ही है।
युग निर्माण अभियान के पीछे जो दिव्य प्रेरणा सक्रिय है उसे कठपुतली नचाने वाले बाजीगर के समतुल्य देखा जा सकता है। इस छोटे से परिवार पर उसका विशेष अनुग्रह लगता है। अग्रिम पंक्ति में खड़ा होने का अवसर भी भाग्यवानों को ही मिलता है। हम लोग उन्हीं सौभाग्यशालियों में है जिन्हें महाकाल, से युग सृजन के इस पुण्य पर्व पर ध्वजाधारी, बिगुल वादक-अग्रदूतों की भूमिका निभाने का श्रेय मिल रहा है।
पुनर्गठन वर्ष के उद्बोधन ने शिथिलता को सक्रियता में बदल दिया है। निराशा और निष्क्रियता उत्पन्न करने वाली कृपणता जब अन्तराल में से हटाने लगी तो स्वभावतः पराक्रम की ऊर्जा उभरनी ही थी और उसका प्रमाण उमंग भरी क्रियाशीलता में मिलना ही था। युग निर्माण परिवार में गत वर्ष जो जागरूकता उत्पन्न हुई और उसके सहारे जो रचनात्मक प्रयास बन पड़े सृजन की दिशा में कदम बढ़े, उसे देखते हुए वस्तुस्थिति और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। पुनर्गठन को पुनर्जीवन वर्ष कहा जा रहा है। इस कथन में यथार्थता भी है।
जागृत आत्माओं के सृजन संकल्पों में अधिक प्रखरता भर देने के लिए यह रजत जयन्ती वर्ष नई प्रेरणाएँ, नई उमंगे साथ लेकर आया है। मिशन ने इस वर्ष जिन कार्यक्रमों को हाथ में लिया है उन्हें सरसरी निगाह से पढ़कर उपेक्षित कर दिया जाय तो बात दूसरी है अन्यथा थोड़ी गम्भीरतापूर्वक देखा जाय तो उन्हें अपने समय के सृजनात्मक पर्यवेक्षण की दृष्टि से अद्भुत ही कहा जायगा और उन्हें हाथ में लिया जाना दुस्साहस ही माना जायगा। मनुष्य की तनिक-सी क्षमता अभावग्रस्त परिस्थितियों के रहते इतनी कल्पना तक नहीं कर सकती जितनी कि अनपेक्षित प्रगति अनायास ही होती चली जा रही है। अनायास ही ऐसे सरंजाम खड़े होते और ऐसे साधन जुटते जा रहे हैं जिन्हें देखते हुए इन योजनाओं की कल्पना नहीं, सम्भावना नहीं, यथार्थता मानने के लिए विवश होना पड़ता है।
रजत जयन्ती वर्ष के जो कार्य हाथ में लिए गये हैं, वे यदि सफल होते हैं तो उनके परिणाम दूरगामी होंगे, प्रव्रज्या अभियान का स्वरूप ही समझा न जा सके तो बात दूसरी है, अन्यथा उसके पीछे बुद्धकालीन धर्मचक्र प्रवर्तन अभियान को झाँकते देखा जा सकता है। चीवरधारी भिक्षुओं की परिव्राजक दीक्षा उन दिनों भी आश्चर्यजनक लगी होगी। उस मार्ग पर कदम बढ़ाने वालों को तथाकथित स्वजनों का विरोध उन दिनों भी सहना पड़ा था और आज भी सहना पड़ रहा है। इतिहास साक्षी है कि विश्व के कोने-कोने में नव-जागरण का शंख बजाने वाले परिव्राजकों में भूखे, नंगे, बेकार निठल्ले लोग थे। आज भी जीवन दानियों का, आत्माहुतियों का स्तर देखने से प्रतीत होगा कि निम्न वर्ग के ही उच्चस्तरीय वर्ग के लोग ही अपने आपको युग देवता के चरणों पर समर्पित करने के लिए बढ़ते चले आ रहे हैं। उनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है। परिव्राजकों की सृजन सेना जितनी बड़ी होगी उज्ज्वल भविष्य के सपने उतने ही जल्दी साकार हो सकेंगे। गाँव-गाँव जाकर घर-घर से सम्पर्क साधना और जन-सम्पर्क के सहारे नव युग का सन्देश पहुँचाना यही है अपने युग की तीर्थ परम्परा का सामयिक निर्वाह उसके लिए सुनियोजित और सुविस्तृत योजना बनाई गई है। यह क्रम चला तो आरम्भ से ही है, पर इस रजत जयन्ती वर्ष से उसे सुव्यवस्थित रूप दिया जा रहा है। परिव्राजकों के प्रशिक्षण, निर्वाह, मार्ग व्यय आदि का नया प्रबन्ध किया जा रहा है। इसका शुभारम्भ इसी सितम्बर के सत्र से आरम्भ होगा।
‘समय दान’ रजत जयन्ती वर्ष की एकमात्र माँग है। जीवित आत्माओं से यही अनुरोध किया गया है कि वे अपने व्यस्त कार्यों में से भी समय निकालें और जितना अधिक सम्भव हो उतना इस वर्ष साहसिक अनुदान प्रस्तुत करें। छप्पर को छत तक पहुँचाने के लिए एक बार तो सारे मुहल्ले की जन-शक्ति को बुलाना पड़ता है। रजत जयन्ती वर्ष को छप्पर उठाने जैसी युग पुकार का आह्वान माना जाय और सांसारिक कार्यों में हर्ज करके भी इस युग निमन्त्रण की पूर्ति के लिए जितना सम्भव हो सके समय का अनुदान प्रस्तुत किया जाय। प्रसन्नता की बात है कि इस आह्वान का जागृत आत्माओं ने भाव भरा उत्साहवर्धक उत्तर दिया है। समय दानियों का इतना बड़ा समुदाय सामने है जिस पर संतोष ही नहीं गर्व भी किया जा सकता है।
जो अपने घर रहकर ही अधिक समय दान देंगे उन्हें सितम्बर सत्र में शान्ति कुंज नहीं बुलाया गया है। उनका मार्गदर्शन पत्रिकाओं के द्वारा घर बैठे ही किया जाता रहेगा और बताया जायगा कि जो समय दिया गया है उसका उपयोग कब, किस काम के लिए किस प्रकार करना चाहिए। उदाहरण के लिए अगले दो महीने के लिए दो कार्य इन समय दानियों को सौंपे गये हैं।
(1) युग शक्ति गायत्री पत्रिका के नये सदस्य बनाने के लिए टोली बनाकर निकलें। नये लोगों को पढ़ने दें, वापिस लें और जब उन्हें रस आने लगे तो चन्दा वसूल करके ग्राहक बना लें। इस अभियान में सभी समय दानी यदि सच्चे मन से जुट पड़े तो वर्तमान प्रभाव क्षेत्र का चौगुना, दस गुना बढ़ जाना सहज सम्भव है। प्रवाह क्षेत्र के बढ़ जाने पर उत्पन्न होने वालों सुखद सम्भावनाएँ अभी से पुलकन उत्पन्न करती हैं।
(2) अश्विन नवरात्रि में 9 दिन का साधना सत्र पूरे उत्साह के साथ मनाने की तैयारी अभी से की जाय। गत बसन्त पर्व, गायत्री जयन्ती, गुरु पूर्णिमा एवं चैत्र नवरात्रि के आयोजनों में जिनने भी भाग लिया हो उन सबसे इन्हीं दिनों सम्पर्क साधा जाय। उन्हें नवरात्रि साधना में सम्मिलित रहने और अपने साथ एक दो नये साधक तैयार करने के लिए कहा जाय। यह प्रयास अभी से आरम्भ करने, आयोजन का स्थान निश्चित करने, साधन जुटाने, सहयोग पाने का काम अभी से प्रारम्भ किया जायगा तो ही रजत जयन्ती वर्ष की प्रथम नवरात्रि शानदार ढंग से मनाई जा सकेगी। इन दो सामयिक कार्यों में अतिरिक्त ज्ञान रथों की सुव्यवस्था, जन्म दिवसोत्सवों का प्रचलन, टोली संगठन, प्रज्ञा मन्दिरों का संस्थापन, पाँच पर्व आयोजनों का सुसंचालन जैसे गत वर्ष के निर्धारित कार्यक्रमों को अधिक उत्साह के साथ सम्पन्न करने में निरत रहा जाय। यह कार्यक्रम उन लोगों के लिए है जो अपने घर रहकर ही समय दान देंगे।
जो लोग घर से बाहर जाने की स्थिति में है, उनके लिए वे विशिष्ठ कार्यक्रम है जिनकी चर्चा पिछले अंक में इसी स्तम्भ के अन्तर्गत की गई है। परिव्राजक अभियान इन कार्यक्रमों में सर्वप्रथम है। अपने शाखा संगठनों में नवजीवन फूँकने, सक्रियता उत्पन्न करने एवं प्रशिक्षण देने का कार्य यह परिव्राजक ही करेंगे। आवश्यकता के अनुरूप एक स्थान पर ठहरेंगे और फिर आगे बढ़ चलेंगे।
इन परिव्राजकों का प्रथम प्रशिक्षण सब इसी सितम्बर में करने की बात गत अंक में छपी है। एक महीना समय इसके लिए अधिक नहीं था, पर उस सूचना के प्रकाशित होते ही इच्छुकों की संख्या अपेक्षा से बहुत अधिक हो गई। फलतः स्थिति के देखते हुए समय सम्बन्धी परिवर्तन फिर करना पड़ा। अब सितम्बर में एक नहीं दो सत्र पन्द्रह-पन्द्रह दिन के होंगे। प्रथम सत्र 1 से 15 तक और दूसरा 16 से 30 तक। उनमें दो आवेदन कर्ता अपनी सुविधानुसार किसी में भी आ सकेंगे। उनकी स्थिति, योग्यता को देखते हुए काम सौंपने और उपयुक्त प्रशिक्षण देने की बात इन्हीं दो शिविरों में बन सकेगी। व्यक्तिगत परिस्थितियों और उलझनों के सम्बन्ध में भी वह परामर्श आमने-सामने बैठकर ही हो सकता है, जिसे पत्र व्यवहार द्वारा हल कर सकना संभव नहीं है। अनेक प्रश्न ऐसे होते हैं जो पारस्परिक विचार विनिमय के बिना सुलझते ही नहीं। समय दानियों की आकांक्षा और परिस्थिति का तालमेल किसी प्रकार बैठ सकता है, इस निर्णय पर इन शिविरों में ही पहुँच सकना सम्भव हो सकेगा। इस दिशा में बढ़ने वालों की भावी रूपरेखा का निर्धारण इन्हीं सत्रों में बन पड़ेगा।
परिव्रज्या अभियान के अतिरिक्त कुछ कार्य ऐसे भी हैं जो शान्तिकुंज रहकर भी किये जा सकेंगे। इनके लिए विशिष्ठ योग्यताओं के व्यक्ति ही अपेक्षित हैं यथा-
(1) इस वर्ष शान्ति कुँज के कन्या प्रशिक्षण में मैट्रिक, इण्टर एव बी.ए. की पढ़ाई प्रारम्भ कर दी गई है। कोचिंग क्लास चलाई और प्राइवेट फार्म भराकर उपरोक्त परीक्षाएँ दिलाई जायेंगी। अगले वर्ष से एम.ए. की पढ़ाई के लिए रिटायर अध्यापिकाओं की आवश्यकता है। सामयिक आवश्यकता पूर्ति के लिए रिटायर अध्यापकों से भी काम चल सकता है।
(2) जीवन दानी कार्यकर्त्ताओं की स्त्रियों एवं बच्चों को भी इसी प्रकार पढ़ाया जायेगा। उनकी पढ़ाई गायत्री नगर में चलेगी। इसके लिए भी उपरोक्त स्तर की शिक्षिकाओं एवं शिक्षकों की आवश्यकता पड़ेगी।
(3) विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय का शोध कार्य चिरकाल से चल रहा है और उसी के निष्कर्ष प्रतिपादन में अखण्ड-ज्योति में लेख छपते हैं। अब तक यह कार्य एक व्यक्ति के अध्यवसाय के आधार पर ही चलता रहा है। अब इस खोज का क्षेत्र बढ़ाया जा रहा है। ढूंढ़ खोज में अंग्रेजी ग्रन्थ ही अधिक रहते हैं। इसलिए ऐसे अध्ययनशील रुचि के व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ेगी, जिनको अंग्रेजी पढ़ने और समझने का अच्छा अभ्यास हो, जिनका विज्ञान क्षेत्र से सम्पर्क रहा हो।
(4) अब मिशन का कार्य क्षेत्र हिन्दी तक सीमित न रखकर देश को प्रायः सभी प्रमुख भाषाओं तक फैलाया जा रहा है। जो भाषाएँ अभी हाथ में नहीं ली जा सकीं, शीघ्र ही उनके क्षेत्र में भी प्रवेश किया जाएगा। अभी युग शक्ति गायत्री के संस्करण 10 भाषाओं में छपने का प्रबन्ध किया गया है। हिन्दी, गुजराती, मराठी, उड़िया में प्रकाशन पहले से ही हो रहा था। अब इन्हीं दिनों अँग्रेजी, बंगाली, पंजाबी में और होने लगा है। निकट भविष्य में आसामी, तमिल, तेलगू में और होने लगेगा। अगले दिनों मिशन की अन्य पत्रिकाएँ भी अन्य भाषाओं में छपने लगेंगी। इसी प्रकार युग साहित्य को भी इन सब भाषाओं में प्रकाशित करने की योजना है। इसके लिए ऐसे अन्य भाषा-भाषी अनुवाद कर्ताओं की आवश्यकता आ पड़ेगी जो हिन्दी से अपनी मातृ भाषा में अच्छा, साहित्यिक अनुवाद कर सकें।
(5) गायत्री नगर का निर्माण कार्य अगले दिनों तेजी से चलेगा। इसके लिए इंजीनियर, ओवरसीयर, ठेकेदार, सुपरवाइजर स्तर के कामों के अभ्यासी-पेड़, पौधे लगाने की विद्या के जानकार लोगों की आवश्यकता पड़ेगी। ताकि रूप से सम्पन्न हो सकें।
यह पाँच वर्ग के व्यक्ति शान्तिकुँज में रहकर ही काम करेंगे। उन्हें बाहर जाने की आमतौर से आवश्यकता न पड़ेगी, पर विशेष आवश्यकता के समय किसी को भी सेना के सिपाहियों की तरह बाहर कार्य क्षेत्र में भेजा जा सकता है। आवश्यक नहीं कि उपरोक्त कार्यकर्ता सदा सर्वदा के लिए जीवनदानियों की तरह ही रहें, वे सुविधानुसार थोड़े-थोड़े समय के लिए भी आते रह सकते हैं।
परिव्राजकों एवं अन्यान्य लोकसेवियों के आह्वान के साथ-साथ उनके निर्वाह आदि की नीति पहले से ही घोषित की जाती रही है उसे इस बार नये सिरे से फिर समझ लेना चाहिए। जिनके ऊपर बड़ी गृहस्थी के लिए धन उपार्जन का उत्तरदायित्व है उन्हें नहीं बुलाया जा रहा है। वे यथा सम्भव समय सुविधानुसार देते रहें, उतना ही पर्याप्त है। जो बुलाये जा रह हैं उनमें भी प्राथमिकता उन्हें दी जा रही है जो अपनी संचित पूँजी एवं उत्तराधिकार सम्पदा से उपलब्ध होने वाले ब्याज-भाड़े से अपना गुजारा कर सकें। इसके बाद उनका नम्बर है जो अधिकांश निर्वाह व्यय स्वयं वहन करने की स्थिति में है। जो थोड़ा बहुत कम पड़ता होगा उसे मिशन पूरा कर देगा। इसके बाद उनका नम्बर है जिनकी छोटी गृहस्थी है। एकाकी या पति-पत्नी मात्र हैं। बहुत हुआ तो एकाध बच्चा भी साथ हो सकता है। ऐसे लोगों के पास यदि अपने साधन नहीं है तो उनके भोजन, वस्त्र जैसी यहाँ की परम्परा के अनुरूप व्यवस्था की जा सकती है।
जिनके पास अपनी निज के गुजारे की व्यवस्था तो है, पर यहाँ वेतन लेकर काम करना चाहते हैं उनमें से किसी को भी नहीं आने दिया जायगा। भोजन, वस्त्र जैसी निर्वाह व्यवस्था यहाँ से भी जुटाई तो जाती है, पर इससे पहले यह जाँच लिया जाता है कि अपनी निजी आजीविका सुरक्षित रखने और मिशन से निर्वाह प्राप्त करने के वेतन भोगी जैसी मनःस्थिति तो नहीं है। यहाँ कर्मचारी ही नहीं कार्यकर्ता ही रहेंगे।
कर्मचारी अपनी योग्यता का प्रतिफल माँगता है और कार्यकर्ता को अपने निजी साधनों को काटकर जो ब्राह्मणोचित आवश्यकता पड़ती है उसी में सन्तुष्ट रहना पड़ता है। शान्तिकुँज में निवास करने अथवा परिव्राजक स्तर की प्रक्रिया अपनाने वाले दोनों ही प्रकार के कार्यकर्ताओं को अर्थ-व्यवस्था सम्बन्धी मिशन को उपरोक्त नीति को ध्यान में रखकर ही आगे कदम बढ़ाने की योजना बनानी चाहिए।
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पाई तो मनुज-देह हमने, पर मनुज-धर्म अपना न सके। देवों को दुर्लभ-देही का, किंचित भी लाभ उठा न सके ॥1॥
मानव तो कहलाये, लेकिन हम मनुज-धर्म से दूर रहे। दी बहुत दुहाई धर्मों की, बस इसी नशे में चूर रहे ॥
लेकिन हम अपने जीवन में, हां ! धर्म न धारण कर पाये। धर्मों के सत्यादेशों पर, जीवन में तनिक न चल पाये। किंचित, अनुकूल धर्म के हम, अपना आचरण बना न सके ॥2॥
हमको मानव जीवन पाकर, अनुकरण धर्म का करना था। देवों को दुर्लभ देही पाकर, श्रेष्ठ कर्म ही करना था ॥
हम चले धर्म के पीछे कब, बेचारा धर्म चला पीछे। हम धर्मात्मा कहलाने को, ले चले उसे खींचे-खीचे॥ धर्मों के ठेकेदार रहे, पर धर्म तत्व को पा न सके ॥3॥
अनचाहे, जय-जयकार करी वैभव की, धर्म विचारे ने। सम्मान, अनैतिक-जीवन को दे दिया, हाय! मन-मारेने॥
हो गया धर्म-आचरण लुप्त, धर्माडम्बर के घेरों में। रह गया भटक कर धर्म-तत्व, भ्रम में, अज्ञान अंधेरों में ॥ पर उसका गरिमामय-स्वरूप, जग के सन्मुख हम ला न सके।4।
वास्तविक-धर्म का दर्शन तो, होता है सत्य-आचरण में। वास्तविक-धर्म का धारण तो, होता प्रतिदिन के जीवन में॥
जीवन-पद्धति है धर्म, धर्म होता है नहीं मात्र-अभिनय। कोमलता, करुणा, ममता, सेवा से मिलता उसका परिचय। इन दैव-गुणों से हम अपना धार्मिक -व्यक्तित्व बना न सके॥5॥
पर बिना धर्म के जग, जीवन का सुख केवल मृग-तृष्णा है। यदि धर्म नहीं है तो सुख का संसार, व्यर्थ का सपना है॥
आओ! अधर्म से मानव के जीवन को मुक्ति दिलाने को। मानव को देवों सा सक्षम, धरती को स्वर्ग बनाने को ॥ हो धर्म-साधना, ताकि मनुज पशु-सी जिन्दगी बिता न सके ॥6॥
-मंगल विजय
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*समाप्त*