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लोग समझते हैं जितना अधिक बन पड़े अच्छे से अच्छा खा लिया जाय, अच्छे से अच्छा पहन लिया जाय। अधिक से अधिक भोग-भोग लेने की मानवीय भूख को किसी ने मिटते नहीं देखा। यह भूख मायाविनी है। बार-बार रूप बदलती रहती है और मनुष्यों को जाल में फँसा कर उनका जीवन नष्ट करती रहती है।
जीवन का रहस्य भोग में नहीं है, अनुभव द्वारा शिक्षा-प्राप्ति में है। दृश्य बनने की अपेक्षा दर्शक बनने का लाभ कई गुना अधिक है, इससे दृश्य का अनुमान भी होता है और सच्चे ज्ञान की अनुभूति भी होती रहती है। भोग में छल, मिथ्यात्व और प्रवंचना है। एक बार इसमें फँस जाने के बाद उससे छूटना कठिन होता है। भोग साध्य कदापि नहीं हो सकता।
यह मनुष्य जीवन इसलिए मिला है कि इस संसार का शक्ति भर अध्ययन किया जाय और उस ज्ञान को मानवता के संरक्षण के लिए बाँट दिया जाय। भाषा, विचार और अनुभूति के जो अनेक उपहार पूर्व पुरुषों ने हमें दिये है, उनका हमारे ऊपर ऋण है। इसको चुकाने का काम, यह शिक्षा-भावी नागरिकों के लिए संचय कर जाने से पूरा होता है। इसलिए इस अमूल्य मानव जीवन को खाओ म, अपितु मानवों गुणों को संगठित करने में उसका अधिक से अधिक उपयोग करो।
-स्वामी विवेकानन्द
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आठों वसु एक वार सपत्नीक पृथ्वी-लोक पर भ्रमण के लिए उतरे। कई तीर्थ और देवताओं का दर्शन करते हुए वे वसिष्ठ के आश्रम में पहुंचे। वसिष्ठ का आश्रम उन दिनों तप, ज्ञान, साधना और ब्रह्म-वर्चस् के लिए विश्व विख्यात था। वहाँ अलौकिक शान्ति विहर रही थी।
वसु और उनकी पत्नियाँ देर तक आश्रम की प्रत्येक वस्तु को देखती रहीं। आश्रम की यज्ञशाला, साधना-भवन और स्नातकों के निवास आदि सभी स्वच्छ, सजे हुये एवं सुव्यवस्थित देख कर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। बड़ी देर तक वसुगण ऋषियों के तप, ज्ञान, दर्शन और उनकी जीवन व्यवस्था पर चर्चा करते और प्रसन्न होते रहें।
इस बीच वसु प्रभास एवं उनकी धर्म पत्नी आश्रम के उद्यान भाग की ओर निकल आये। वहाँ ऋषि की काम- धेनु नन्दिनी हरित तृण चर रही थी। गौ की माँसल देह, भोली आकृति, धवल वर्ण प्रभास-पत्नी को यों मन भा गये कि वे उसे पाने के लिये व्याकुल हो उठीं।
उन्होंने प्रभास को सम्बोधित करते हुए कहा-”स्वामी! नन्दिनी की मृदुल दृष्टि ने मुझे विमोहित किया है मुझे इस गाय में आसक्ति हो गई है अतएव इसे अपने साथ ले चलिये।”
प्रभास हँस कर बोले- “देवी! औरों की प्यारी वस्तु देख कर लोभ और उसे अनधिकार पाने की चेष्टा करना पाप है, उस पाप के फल से मनुष्य तो मनुष्य, हम देवता भी नहीं बच सकते। क्योंकि ब्रह्मा जी ने कर्मों के अनु-सार ही सृष्टि की रचना की है। हम अच्छे कर्मों से ही देवता हुए हैं, बुराई पर चलने के लिये विवश मत करों, अन्यथा कर्म-भोग का दण्ड हमें भी भुगतना पड़ेगा।’’
“हम देवता हैं इसलिये पहले ही अमर है। नन्दिनी का दूध तो अमरत्व के लिये है, इसलिये उससे अपना कोई प्रयोजन भी तो सिद्ध नहीं होता?” प्रभास ने अपनी धर्म-पत्नी को सब प्रकार समझाया।
पर वे न मानी। उन्होंने कहा- “ ऐसा मैं अपने लिये तो कर नहीं रही। मृत्यु-लोक में मेरी एक सहेली है उसके लिये कर रही हूँ। ऋषि भी आश्रम में है नहीं इसलिये यथाशीघ्र गाय को यहाँ से ले चलिये।”
प्रभास ने फिर समझाया- “देवि! चोरी और छल से प्राप्त वस्तु को परोपकार में भी लगाने से पुण्य फल नहीं होता। अनीति से प्राप्त वस्तु के द्वारा किये हुए दान और धर्म से शान्ति भी नहीं मिलती। इसलिये तुमको यह जिद छोड़ देनी चाहिये।”
वसु-पत्नी समझाने से भी न समझी। प्रभास को गाय चुरानी ही पड़ी। थोड़ी देर में अन्यत्र गये हुए वसिष्ठ आश्रम लौटे। गाय को न पाकर उन्होंने सबसे पूछ-ताछ की। किसी ने उसका अता-पता नहीं बताया। ऋषि ने ज्ञान-चक्षुओं से देखा तो उन्हें वसुओं की करतूत मालूम पढ़ गई। देवताओं के इस उद्धत-पतन पर शाँत ऋषि को भी क्रोध आ गया। उन्होंने शाप दे दिया-”सभी वसु देव-शरीर त्याग कर पृथ्वी पर जन्म लें।”
शाप व्यर्थ नहीं हो सकता था। देवगुरु के कहने पर उन्होंने 7 वसुओं को तो तत्काल मुक्ति का वरदान दे दिया, पर अन्तिम वसु प्रभास को चिरकाल तक मनुष्य शरीर में रह कर कष्टों को सहन करना ही पड़ा।
यह आठों वसु क्रमशः महाराज शान्तनु और गंगा के उदर से जन्मे। सात की तो तत्काल मृत्यु हुई पर आठवें प्रभास को भीष्म पितामह के रूप में जीवित रहना पड़ा। महाभारत युद्ध में उनका शरीर छेदा गया यह उसी पाप का फल था जो उन्हें, देव शरीर में करना पड़ा था इसलिये कहते है कि गलती देवताओं की भी क्षम्य नहीं। मनुष्य को तो उसका अनिवार्य फल भोगना ही पड़ता है। यह न समझा जावें कि एकान्त में किया गया अपराध किसी ने देखा नहीं। नियन्ता की दृष्टि सर्वव्यापी है उससे कोई बच नहीं सकता।
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चार्वाकवादियों ने जिस प्रकार ‘साधनस्य अभावात्’ अर्थात् सृष्टि कार्य का कोई कारण न होने से ईश्वर के सिद्ध न होने की बात कही, उसी प्रकार अदृष्ट के न होने तथा अन्य लोकों में जीवन के न होने की बात कही और इन्हें भी ईश्वर के न होने का प्रमाण बताया।
अदृष्ट के न होने के पक्ष में उनका तर्क है कि मात्र उसी का अस्तित्व है- जा प्रत्यक्ष है। जो प्रत्यक्ष नहीं, उसका अस्तित्व नहीं। क्योंकि उसका कभी प्रत्यक्षण नहीं हुआ। ईश्वर कभी गोचर नहीं हुआ, इसी से उसका अस्तित्व नहीं है। जो कभी-कभी प्रत्यक्ष हुआ है, वह अदृष्ट नहीं है। अदृष्ट तो वही है, जिसका कभी भी प्रत्यक्षण नहीं हुआ। ईश्वर को कभी भी प्रत्यक्ष नहीं देखा गया, इसलिए वह उतना ही अयथार्थ एवं अस्तित्वहीन है जितना खरगोश या गधे के सिर पर सींग।
इसका उत्तर यहीं है कि जो अदृष्ट है, वह अस्तित्वहीन नहीं है। देवदत्त घर में नहीं है, इससे वह दृष्ट नहीं है। पर यह नहीं सिद्ध होता कि देवदत्त को कभी किसी ने देखा है, इसी से वह है, तो ईश्वर का अनुभव भी कई साधकों-सिद्धों ने किया है, इसलिए वह है। देवदत्त को देखना चाहने वाले, उसके स्वरूप से परिचित लोग ही उसे देखकर जानेंगे और पहचानेंगे। अन्य लोग यदि उसे देख भी लेंगे तो कोई एक मनुष्य है, यहीं मानेंगे। देवदत्त है ऐसा निश्चित कथन नहीं कर सकते। इसी प्रकार ईश्वरीय-सत्ता की द्योतक घटनाएँ प्रत्यक्ष देखकर भी नास्तिक लोग उसे प्रकृति की हलचल विशेष कहकर संतुष्ट हो सकते है। ईश्वर को पहचानेगा वही, जो उसके स्वरूप से परिचित होगा।
बच्चे या बाल-बुद्धि लोग देवदत्त के पुतले को देवदत्त मान सकते हैं। कोई समझदार व्यक्ति बाद में तर्क एवं परीक्षण के साथ यह सिद्ध करदे कि यह तो मिट्टी या कागज या प्लास्टिक का पुतला है, देवदत्त नहीं, तो यह उसका यह विश्लेषण अपनी जगह सही होते हुए भी वास्तविक देवदत्त की सत्ता को असिद्ध नहीं करता। उसी प्रकार ईश्वरीय व्यवस्था के नाम पर पुरोहित वर्ग द्वारा रची गई व्यवस्था को यदि विवेकशील वर्ग उखाड़ फेंकता या उसमें दोष ढूँढ़ निकालता हे, उसके आधारों को मिथ्या कर देता है, तो इससे ईश्वरीय व्यवस्था ही मिथ्या नहीं सिद्ध हो जाती जिस समय नीत्से की घोषणा की कि ईश्वर मर गया है, अब उसके स्थान पर मनुष्य को स्वयं अपना भार उठाना होगा, उस समय वह ईश्वरीय व्यवस्था को नहीं, ईश्वर के नाम पर चर्च द्वारा लादी गई व्यवस्था को मृत घोषित कर रहा था। मनुष्य अपनी जिम्मेदारियाँ स्वयं उठाए, इसे नीत्शे के बहुत पहले से भी कहा जाता रहा है। ‘मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है- यह प्रतिपादन आस्तिक आचार्यों का भी रहा है। अतः नीत्से जैसों का कथन और निष्कर्ष वस्तुतः ईश्वर के विरुद्ध नहीं, ईश्वराभास के विरुद्ध था। ईश्वर को गोचर तो आस्तिक भी नहीं मानते। जो गोचर नहीं, वह अस्तित्वहीन है, ऐसा नहीं माना जा सकता। परमाणु सामान्यतः अदृष्ट है, पर उसका अस्तित्व है। अब तो वैज्ञानिक यह भी स्वीकार कर रहे हैं कि सृष्टि के मूल प्राथमिक कण वैज्ञानिक उपकरणों की पकड़ में ही नहीं आ सकते। वे क्या हैं, यह ठीक से जाना ही नहीं जा सकता, इस प्रकार वे अदृष्ट है। किन्तु इससे उनकी अस्तित्वहीनता सिद्ध होती। क्योंकि सृष्टि के मूल कणों का ही अस्तित्व नहीं है, ऐसा कहने का अर्थ है कि सृष्टि ही नहीं है, विज्ञान और वैज्ञानिक नहीं है तथा सृष्टि नहीं है,’- यह कहने वाला भी नहीं है। अतः अदृष्ट की असत्ता सिद्ध नहीं होती। इसलिए ‘अलौकिकस्य अभावात्’ यह नास्तिकों का सूत्र गलत सिद्ध हुआ।
शेष रहा ‘ परलोकस्याभावात्’ सूत्र। परलोक यानी इस लोक के-अतिरिक्त जीवन युक्त कोई अन्य लोक नहीं है, यह तो इस विज्ञान के युग में स्वतः ही अमान्य हो गया है। इसी पृथ्वी लोक जैसे अरबों लोकों में सभ्यता-संस्कृति की विद्यमानता की सम्भावना वैज्ञानिक बता रहें है।
प्राचीन आचार्यों के परलोक के पक्ष में एक और अकाट्य तर्क दिया था। वह अभी भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वह यह है कि- (1) कई बार पुण्य-कार्य करने वालों को भी उचित फल इसी जीवन में मिलता नहीं देखा जाता। दूसरे जन्म में उसका फल मिलता है। जन्मतः विलक्षण प्रतिभाएँ और विशिष्ट अनुकूलताएँ विगत जीवन के पुण्य का ही परिणाम हो सकती है। क्योंकि बिना कारण के कोई कार्य सम्भव नहीं है, यह सिद्ध हो चुका है।
लौकिक दृष्टि से चिरकाल पूर्व नष्ट हुआ पुण्य-कर्म इतनी अवधि के उपरान्त फल- उत्पादन में समर्थ होता है, इसका अर्थ है कि इस बीच उस कर्म की सूक्ष्म रूप में किसी अन्य लोक में उसी प्रकार अवस्थिति रहीं जिस प्रकार कि धरती में गढ़ा बीज ऊपरी सतह पर अदृष्ट होने पर भी नीचे विद्यमान रहता हे। क्योंकि किसी फल के जनक अवान्तर व्यापार के बिना अर्थात् सृजन-उत्पादन की अविच्छिन्न प्रक्रिया के बिना कोई कर्म-बीज फल-उत्पादन में समर्थ नहीं हो सकता। जिस प्रकार चिर-ध्वस्त अनुभव मस्तिष्क में अंकित संस्कार रूप में रहने के कारण ही स्मृति रूप चित्त में कालान्तर में उदित होता है उसी प्रकार कहीं संस्कार-रूप अवस्थित कर्म ही जन्माँतर में फल देते है। यह ‘कहीं’ ही परलोक है, जिस चाहें तो ब्रह्माण्डीय मस्तिष्क-लोक भी कह सकते है। इस प्रकार “परलोकस्य अभावात्” सूत्र गलत हुआ।
(1) पुण्य और नैतिक कर्मों में प्रत्यक्षतः कष्ट होने पर भी अनेक लोग उस ओर प्रवृत्त रहते हैं, पुण्य-पथ से विचलित नहीं होते। इसका अर्थ है कि उन्हें परलोक में विश्वास है। यह विश्वास अकारण नहीं होता। अकारण उत्पन्न विश्वास पीड़ा पाकर डिग जाता है। कष्ट-सहन की सुदीर्घ प्रेरणा युगों-युगों तक देते रहने में आधारहीन विश्वास समर्थ नहीं होता। जो लोग धार्मिक-सम्प्रदायों के नाम पर अंधमान्यताओं में विश्वास करते हैं, उन्हें आए दिन यहाँ से वहाँ भटकते देखा जा सकता है। मूर्ति-पूजा के अंधविश्वासियों ने मूर्ति-भजक मुसल-मानों से मौका पाते ही समझौता कर लिया, रोटी-बेटी का रिश्ता बना लिया। किन्तु आदर्शों-मूल्यों को अपना कर जीवन भर कष्ट भोगने वाले लाखों लोग हर देश-काल में पाए जाते है। इससे स्पष्ट होता है कि इस आदर्शनिष्ठा के फलवती होने की उन्हें अडिग आस्था है। प्रत्यक्षतः यह फल मिलता नहीं। अतः सूक्ष्म रूप में ही उस फल के उत्पादन की किसी प्रक्रिया पर उनके चेतन-अचेतन मन में आस्था रहती है। यही सूक्ष्म भाव-लोक परलोक है। यदि कोई कहे कि चालाक ठगों ने आदर्शवाद का जाल-जंजाल बिछाकर भोले लोगों को ठग रखा है तो “ विप्रलम्मोऽपिनेदृशः” प्रवंचना ठगी भी ऐसी नहीं होती। क्योंकि दूसरों को ठगने के लिए कोई निरंतर आजीवन स्वयं कष्ट नहीं सहता। न ही, किसी सर्वथा आधारहीन तथ्य से हर देश काल में ठगी हो सकती। अतः बड़ी संख्या में किसी ऐहिक सुख के, लोगों की पुण्यकर्मों में निरन्तर प्रवृत्ति परलोक की प्रतिपादक-पुष्टि- कारक घटना है, प्रमाण है। इस प्रकार “परलोकस्य अभावात” सूत्र का तर्क गलत सिद्ध होता हे।
न्यायकुसुमांजलिकार ने नास्तिक प्रतिपादनों का जो खंडन किया है, उसके मुख्य तर्क यही हे। सच पूछा जाय, तो प्रथम स्तवक का प्रतिपादन ही प्रधान है।
शेष चार स्तवकों में क्रमशः उन लोगों के तर्कों को काटा गया है जो कहते हे कि (1) परलोक तो हैं, और पुण्य कर्मों का फल भी मिलता हैं, किंतु ईश्वर नहीं है। (2) ईश्वर नहीं है, इसके प्रमाण विद्यमान हैं, इसलिए ईश्वर नहीं है (3) ईश्वर है, इसके प्रमाण नहीं मिलते, इसलिए ईश्वर नहीं है, किन्तु जीवात्मा चेतन है, पुनः-जन्म होता है और कैवल्य-सिद्धि यानी मोक्ष लाभ भी होता है तथा (4) आत्मा है, वह चेतन है, प्रकृति से भिन्न है, किन्तु वह किसी एक ही परमात्मा का अंश नहीं हैं। अपितु असंख्य आत्माएँ हैं और सभी अपने आप में स्वतंत्र है। स्पष्ट है कि ये सभी तर्क मात्र तर्क के लिए हैं ईश्वर के अस्तित्व का अस्वीकार करने वाले आधारभूत तर्क वही हैं,जो चार्वाकवादियों ने प्रस्तुत किये हैं। और वे तर्क भी तर्क कम हैं, ईश्वर को न मानने का हठ अधिक है। शेष लोग जो कहते हैं कि पुनर्जन्म भी होता हैं, परलोक भी है, आत्मा चैतन्यमय भी हैं, किन्तु परमात्मा नहीं है, वे तो स्पष्टतः दुराग्रह ही प्रदर्शित करते हैं। मानों परमात्मा को मानने से या तो उन्हें भय है या फिर परमात्मा को अस्वीकार करने के दम्भ के प्रदर्शन का उन्हें मोह है।
वास्तविक बात यह है कि नास्तिकता की कोई एक सुस्पष्ट विचारधारा नहीं है। नीत्से जैसों ने ईश्वर को अस्वीकार किया, किन्तु ईश्वरीय गुणों से विभूषित मानवों-अतिमानवों की कल्पना प्रस्तुत कर एक तरह से आस्तिकतावादी मूल्यों को ही स्वीकार किया। बैखरी वाणी से ईश्वर को स्वीकार करना या न करना-वस्तुतः अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। क्योंकि वह तो तर्क-व्यापार मात्र है।
आस्तिकता की कसौटी तर्क और वाणी मात्र नहीं, चिन्तन और आचरण का स्तर है। इसीलिए विवेकानन्द ने कहा था-’जिसे स्वयं पर विश्वास नहीं, वही नयी परिभाषा के अनुसार नास्तिक है। अतिमानस-अतिमानव आदि आदर्शों की संस्थापना करने वाले चिन्तन और कर्म को पूरी तरह नास्तिक नहीं माना जा सकता। नास्तिक तो वह हैं, जिसे कर्मों के सुनिश्चित परिणाम पर एवं कार्य-कारण के अनिवार्य सम्बन्ध पर विश्वास नहीं हैं और इसलिए जो उत्कृष्ट चिन्तन तथा आदर्श कर्तृत्व को मूर्खों तथा उद्भ्रांतों की हरकतें मानता है। ऐसी मान्यता किसी चिन्तन का नहीं, चित्त की विकृति का परिणाम है।
नास्तिकता चित्त की वह स्थिति हैं, जो दुर्बलता, और रुग्णता के कारण कर्कश, दुराग्रहपूर्ण तथा निषेध-वादी हठवादिता से भरपूर होती हैं स्वस्थ एवं श्रेष्ठ चिन्तन का तो जब भी, जहाँ भी प्रयास होगा, वह प्रत्यक्ष न सही परोक्ष रूप में आस्तिकतावादी मूल्यों और नैतिक प्रतिमानों की ही पुष्टि करेगा।
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अन्य सृष्टि के जीवन-जन्तु आकस्मिक दुर्घटनाओं, प्राकृतिक प्रकोपों एवं अन्य आघातों से अपना सन्तुलन रख पाने में अपने को असमर्थ पाते है तथा घटना के प्रवाह में बहते, प्रभावित होते देखे जाते हैं। वहीं मानवी चेतना में इतनी सूझ-बूझ एवं समर्थता है कि इन प्रतिकूल परिस्थितियों को चुनौती देते हुए अपना वर्चस्व कायम रख सकें। किन्तु देखा यह जाता है कि मनुष्यों में अधिकांशतः सामान्य प्रतिकूलताओं में भी अपना मानसिक सन्तुलन स्थिर नहीं रख पाते। सामने आयी प्रतिकूलताओं से जूझने के बजाय स्वयं को असंतुलित कर, प्रकोपों के भाजन बन जाते हैं, अन्यथा सृष्टा ने चेतनशील प्राणियों का नेतृत्व करने वाले मनुष्य को इतना सशक्त, समर्थ बनाया है कि सामान्य तो क्या असामान्य परिस्थितियों में भी अपना अस्तित्व बनाये रख सकता है।
मानवी जीवन को ईश्वर का सर्वोत्तम उपहार मानने एवं उसमें अदम्य प्रेम करने वाले जीवट सम्पन्न व्यक्ति कितनी बार तो मृत्यु को भी चुनौती देते देखे जाते हैं। मृत्यु को भी इन व्यक्तियों के सहस एवं जीवन के प्रति लगाव को देखकर घुटने टेकना पड़ता हे।
द्वितीय विश्व युद्ध की एक घटना है। युद्ध की गतिविधियाँ उन दिनों तीव्र थी। मित्र राष्ट्र संगठित रूप से जर्मनी से टक्कर ले रहे थे। 24 मार्च 1944 को ब्रिटेन के सार्जेन्ट ‘निकोलस’ ने बर्लिन पर बमबारी करने के लिए हवाई जहाज की उड़ान भरी। गन्तव्य स्थान पर चार टन से भी अधिक विस्फोटक सामग्री डालने के पश्चात वह तेजी से शत्रुओं के जहाजों के प्रहार को बचाते हुए अपने जहाज को ले चला। सतर्क शत्रु सेना की विमानभेदी तोपों ने निकोलस के जहाज पर उगलना आरम्भ कर दिया। बचाव के लिए अत्यधिक सतर्कता रखने पर भी दो गोले उसके जहाज पर लग ही गये। फलस्वरूप विमान में आग लग गई। निकोलस ने वायरलेस से कप्तान से संपर्क स्थापित करते हुए सहयोग के लिए याचना की। ऐसी विषम परिस्थिति एवं भयंकर अग्नि में सहयोग किया भी कैसे जाय, यह एक विकट समस्या थी। अन्य विमान को बचाने के लिए भेजे जाने पर उसमें भी आग लगने की सम्भावना थी। कप्तान का नीचे से निराशाजनक स्वर सुनाई पड़ा कि, “ऐसी स्थिति में हम किसी प्रकार का सहयोग करने में असमर्थ है। अपनी सूझ-बूझ से स्वयं बचाव का प्रयत्न करों”।
एक ओर भयंकर अग्नि की ज्वाला दूसरी ओर कप्तान का निराशाजनक उत्तर, कुल मिलाकर दुर्बल मनःस्थिति का व्यक्ति अपना सन्तुलन तो कायम नहीं ही रख सकता। किन्तु इतने पर भी वह अपने को संतुलित रखते हुए बचने का उपाय सोचने लगा। इसे भी एक दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि पैराशूट उस दिन पहन न सका तथा वह बराबर के केबिन में रखा था। पैराशूट की याद आते ही वह केबिन की ओर मुड़ा किन्तु जैसे ही बीच का द्वारा खोला, लपलपाती हुई ज्वाला उसकी ओर बढ़ी। आँखों में धुँआ भर गया तथा केबिन आग की लपटों से घिरा था। लगता था मृत्यु उसे कालग्रस्त करने के लिए सारी परिस्थितियों का सृजन कर रही थी। बचाव का एक मात्र साधन पैराशूट आँखों के सामने देखते ही देखते जलकर भस्मीभूत हो गया। आग विमान में फैलती जा रही थी। जीवन-मृत्यु के बीच अब कुछ ही मिनटों का अंतर था। आग अपनी बाँह पसारे निकोलस को लेने के लिए आगे बढ़ रही थी। मस्तिष्क ने तेजी से सोचना आरम्भ किया। बीस हजार फुट ऊँचाई से निकोलस ने नीचे देखा। यह सोचकर कि “आग की लपटों में जल कर मर जाया जाय क्यों नहीं विमान से कूदकर बचने का प्रयास किया जाय। परमात्मा का नाम स्मरण करके वह कूद पड़ा। सिर के बल फुटबाल के समान तेजी से वह धरातल की ओर आ रहा था, अचेतन स्थिति में अनिश्चित मंजिल की ओर।
चेतना लौटी तो उसने अपने को बर्फ से चारों ओर ढका पाया। सर्वप्रथम परमात्मा को स्मरण किया जिसकी अनुकम्पा, अनुग्रह से उसे बीस हजार फुट से छलाँग लगाने के बाद भी नव-जीवन मिला। अंग-अंग में पीड़ा हो रही थी। एक बार उठने का प्रयास किया। किन्तु पैर की हड्डियाँ टूट गयी थी, इस कारण उठ नहीं पाया। अपनी रेडियम घड़ी पर निगाह डाली तो रात के दो बज रहे थे। इतना तो उसे अनुमान ही था कि यह क्षेत्र शत्रु का होना चाहिए। शारीरिक असमर्थता के कारण वह भाग सकने में असमर्थ था। जीवन की सुरक्षा के लिए उसने कमर में बँधी सीटी बजा दी। कई बार सीटी बजाये जाने पर शत्रु सैनिकों ने आकर उसे बन्दी बना लिया।
निकोलस ने शत्रु सेना अधिकारियों को सारी घटना बतायी, किन्तु किसी को यह विश्वास नहीं हो रहा था। जले हुए विमान के अवशेष मिलने पर अधिकारियों को विश्वास पड़ा। पहले तो उन्हें सन्देह था कि निकोलस गुप्तचर है किन्तु घटना की पुष्टि होने पर सन्देह जाता रहा। युद्ध बन्दियों को युद्ध समाप्त होते ही छोड़ा गया। निकोलस सकुशल इंग्लैंड पहुँचा।
घटना जहाँ मानवी साहस का परिचय देती है वही इस बात की भी परिचायक है कि जीवन के प्रति अदम्य प्रेम करने वाले प्रतिकूलताओं को चीरते हुए, चुनौती देते हुए अपना अस्तित्व अक्षुण्ण बनाये रखने में समर्थ होते हैं। यदि ईश्वरीय सर्वश्रेष्ठ उपहार-अलभ्य मनुष्य जीवन से प्रेम किया जा सकें, विपन्नताओं के समक्ष समर्पण न किया जाय तो आयी हुई प्रत्येक कठिनाइयों से जूझने में मानवी चेतना समर्थ है।
निर्जन और सुनसान राह पर भगवान बुद्ध सौम्य और शान्त मुद्रा में कदम-कदम आगे बढ़ रहे थे। मन्थर गति से गम्भीर और सौम्य शान्ति की दीप्ति बिखेरते हुए तथागत के साथ उनके अन्य शिष्य भी थे और सभी शिष्य उनके पीछे पंक्ति बद्ध होकर चल रहे थे। लक्ष्य था राज-गृह। वहाँ पहुँचकर वहाँ के निवासियों को धर्म का उपदेश देना था। तभी राह में भेड़ों का एक झुण्ड निकाला। झुण्ड के पीछे भेड़ों का मालिक गड़रिया चल रहा था।
गड़रिये के कन्धे पर एक भेड़ का बच्चा था जिसे वह उठाकर ले जा रहा था शायद उसके शरीर में कोई पीड़ा रही होगी जिसके कारण वह चलने में असमर्थ है। यह सोचकर तथागत ने गड़रिये को रोका और पूछा उससे कि-’तुम इस मेमने को कन्धे पर क्यों उठाये हुए हो।’
गड़रिये ने साधु वेष में एक तेजस्वी पुरुष को अपने सामने देखा तो वह अनायास ही श्रद्धा से नत मस्तक हो उठा और बोला- भगवन्, मेमने के पैर में चोट है। इसलिए इसे कन्धे पर रखना पड़ा है।
बुद्ध कातर हो उठे और उन्होंने मेमने के उस अंग पर हाथ रखा जहाँ कि गड़रिये ने चोट बतायी थी। करुणा और दया की प्रतिमूर्ति तथागत का स्पर्श पाकर उस मूक पशु को जैसे राहत मिली हो। उसने आँखें मुँद ली और चुपचाप मूँदी पलकों से दो चार आँसू टपका दिये। भगवान बुद्ध मेमने की यह स्थिति देखकर और भी दयार्द्र हो गये।
तभी गड़रिये ने पूछा-भन्ते! आपको इस अकेले मेमने के पैर की चोट से इतनी व्यथा है तो फिर थोड़ी देर बाद जब इन भेड़ों को एक साथ अग्नि में समर्पित किया जायगा तो कितनी व्यथा होगी।
‘क्या कहा’- सदैव शान्त रहने वाले बुद्ध के मुख मण्डल पर व्यग्रता आ गयी- ‘क्या ये सब भेड़े बलि चढ़ाने के लिए ही ले जायी जा रही हैं। कौन है वह अभागा जो इन निरीह निरपराध भेड़ों को बलि चढ़ाकर स्वर्ग प्राप्ति का सौभाग्य लूटना चाहता है।’
‘राजगृह की अधिपति अजातशत्रु। कहते हैं उसने अपने पिता का वध किया था। उसी पाप के प्रायश्चित स्वरूप वह यज्ञ रचाकर एक हजार पशुओं की बलि चढ़ाने जा रहा है’- और जल्दी के कारण वह वहाँ से चल दिया।
भगवान बुद्ध जब राज भवन पहुँचे तो पाया कि गड़रिये ने जो कहा था वह सच है। राज भवन के आँगन में स्त्री, पुरुषों की भीड़ लगी हुई थी। यज्ञ वेदी के चारों ओर बैठकर ब्राह्मण पुरोहित मन्त्रोच्चार कर रहे थे। और अजात शत्रु पीत वस्त्र धारण कर यजमान के वेश में बैठे हुए थे। चारों ओर पशुओं की लम्बी कतारें लगी हुई थी तथा उनके पास ही हाथ में नंगी तलवारें लिए वधिक खड़े थे।
तभी आयोजन स्थल पर तथागत ने पदार्पण किया। सारे सभास्थल में खलबली मच गयी। अजातशत्रु भी भगवान की अभ्यर्थना हेतु अपने आसन से उठ खड़ा हुआ और बिना पूछे ही इस समारोह के सम्बन्ध में बताने लगा। सारी बातें सुनकर भगवान बुद्ध ने भेड़ों के सामने रखी हुई वनस्पतियों में से घास का एक तिनका उठाया और बोले-’राजन्! इस तिनके को तोड़कर चीरना तो जरा।’
जिन लोगों ने इस विचित्र बात को सुना वे आश्चर्य में पड़ गये। अजातशत्रु ने भी आश्चर्यपूर्वक तथागत का कहना मानकर वह तिनका तोड़ा और अगले आदेश की प्रतीक्षा करने लगा तब भगवान ने कहा- ‘राजन् अब इस टूटे हुए तिनके को जोड़ो तो सही।
राजा चुप हो गया। तब भगवान ने कहा-’राजन्! मैं तुमसे यही बात इस समारोह के सम्बन्ध में भी कहना चाहता था। पिता के वध का जो पाप हुआ है उसे किसी भी प्रयत्न द्वारा मिटाया नहीं जा सकता जैसे इस टूटे तिनके को नहीं जोड़ा जा सकता।’ जैसे इस टूटे तिनके को नहीं जोड़ा जा सकता।’ तथागत से यह कथन सुनकर अजातशत्रु ने वह आयोजन निरस्त कर दिया।
वैज्ञानिक विकास के प्रारम्भिक चरण ने ईश्वरीय सत्ता के अस्तित्व को स्वीकार न करने का हठ किया था। यह वैज्ञानिकों के अपरिपक्व मस्तिष्क का परिणाम है। प्रकृति स्वयं संचालित है न कोई उसका सृजन करने वाला है न ही चलाने वाला। इसके कर्त्ता के रूप में ईश्वर एक आरोपित नाम है जिसका कहीं न तो अस्तित्व है न इस-विश्व-ब्रह्माण्ड से इसकी गति विधि से कोई सम्बन्ध। विज्ञान की यह नास्तिक विचारधारा कुछ दिनों तक जोर पकड़े रहीं वैज्ञानिकों ने अपनी अपूर्व खोज के आधार पर यह घोषणा की थी कि संसार के मूल तथा उसकी प्रत्येक क्रिया एवं प्रतिक्रिया में एक विशेष प्रकार की सामर्थ्य काम कर रही हैं जो सृष्टि संचालन में स्वयं समर्थ है, उनमें स्वयं ही चेतना उत्पन्न होती है। सक्रियता के लिए उन्हें किसी अन्य चेतन शक्ति पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है, जिसे आस्तिकतावादी ईश्वर कहते है।
इस नास्तिक भाव का वास्तविक कारण विज्ञान का अपूर्ण ज्ञान ही था। पर जैसे-जैसे वैज्ञानिक ज्ञान स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ता गया-चेतन शक्ति के अधिकाधिक प्रमाण मिलते गये। वह दिन दूर नहीं जब चेतन शक्ति की क्रियाशीलता प्रत्येक अणु में, होने की हमारी आध्यात्मिक मान्यता से विज्ञान भी सहमत होगा और यह स्वीकार करने में आपत्ति नहीं होगी कि अणुओं की गतिविधि उसकी स्वयं की शक्ति द्वारा नहीं अपितु किसी चेतन शक्ति द्वारा संचालित है। इस तथ्य को विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिक ‘आइन्स्टीन’ ने भी स्वीकार किया था। यद्यपि पिछले दिनों विज्ञान ने आश्चर्यजनक प्रगति की है, पर अभी पूर्णता की सीमा में नहीं पहुँचा है। जिस दिन विज्ञान अपनी पूर्णता को प्राप्त होगा निश्चय ही वह तत्वज्ञान में बदल जायेगा और उसका विश्वसनीय उद्घोष यही होगा-यह सृष्टि उस ‘चेतन’ संरचना है जिसे परम ब्रह्म परमात्मा कहते है।
यह विश्व उसी चेतना से उत्पन्न हुआ हैं, उसी की सत्ता में स्थिति है और उसी में लयमान होता जा रहा है। जड़-चेतन की संपूर्ण सक्रियता का आधार वह परम प्रभु है; जो सृष्टि की प्रत्येक कलाकृति में ओत-प्रोत है। न तो कुछ परमात्मा से भिन्न है और न परमात्मा किसी से पृथक है।” पूर्णता को पहुँचा हुआ वैज्ञानिक सबसे बड़ा आस्तिक होगा ऐसा विश्वास वैज्ञानिकों की बदलती हुई धारणाओं के आधार पर किया जा सकता है।
पवन, अग्नि, जल और मृत्तिका चार व्यक्त एवं अस्तित्ववान पदार्थों से विश्व का निर्माण हुआ है। यह चारों पदार्थ अपने जड़ एवं निर्जीव है। किन्तु उनमें एक जीवन, एक सक्रियता, सजीवता दिखायी देती है, उससे ईश्वरीय चेतन शक्ति की उपस्थिति का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। हवा की गतिशीलता जल की तरलता, अग्नि की तेजस्विता, मिट्टी की उर्वरता का गुण उस सर्वशक्तिमान परमात्मा से ही सम्भव है। अन्यथा किसी जड़ अथवा निर्जीव पदार्थ में सक्रियता की सम्भावना कहाँ? गुण अथवा चेतनशील प्राण के रूप में विद्यमान परमात्मा जब इन पदार्थों में से तिरोधान हो जाता है, तो ऐसी स्थिति में कोई भी पदार्थ अपनी सक्रियता का प्रमाण नहीं दे पाता।
सृष्टि के किसी भी पदार्थ में अपनी कोई क्षमता अथवा अपना कोई गुण नहीं है। वह सब उस चेतन-स्वरूप परमात्मा का ही चमत्कार है जो प्रत्येक अणु के गुण एवं सक्रियता के रूप में दृष्टिगोचर होता है। ऐसे सर्वव्यापक, सर्व समर्थ चेतन शक्ति के अस्तित्व से इन्कार करना अपनी अज्ञानता का परिचय देना है।
लोहा जड़ एवं निर्जीव पदार्थ है किन्तु यन्त्रों एवं चक्रों के रूप में सक्रिय दिखाई देता है। पत्थर की निर्जीवता चक्की की सक्रियता के रूप में देखी जाती है। काष्ठ जैसा जड़ पदार्थ वृक्ष के रूप में उठता हुआ और फल-फूल-पत्तों से भरता दिखाई देता है। इन सबकी सक्रियता का कारण चेतन शक्ति ही है। उसका समावेश चाहे मनुष्य की सहायता से हुआ हो अथवा उक्त चेतना स्वयं ही उन पदार्थों में गतिशील हो उठी हो। चेतन सत्ता के अभाव एवं अव्यक्ति की स्थिति में सम्पूर्ण जग निर्जीव, निष्प्राण एवं निस्तब्ध स्थिरता मात्र है। इस प्रकार संसार की नियामक सत्ता के अस्तित्व में विमुख होकर मनमानी घोषणायें करना विवेक युक्त नहीं है।
खिलते हुए फूल, बहती नदियाँ, उदय-अस्त होते हुए सूर्य चन्द्र, चमकते हुए तारे, गतिशील नक्षत्र, बदलती हुई ऋतुओं में उसी चेतन रूप परमात्मा की ही विद्यमानता है अन्यथा मूल रूप में जड़, इन सबमें यह विशेषताएँ स्वयं सम्भव कैसे हो सकती?
मनुष्य का भौतिक विश्लेषण करने पर वह निर्जीव, मिट्टी का एक नश्वर पुतला दिखाई देता है, जिसके न कोई अपने गुण है न अपनी कोई चेतना। किन्तु यह मिट्टी की प्रतिमा क्या-क्या काम और कैसे-कैसे चमत्कार कर दिखाती है? अनुपयोगी को उपयोगी और जड़ों को चेतन बनाकर गति देने वाला मनुष्य यदि अपनी विशेषताओं को अपना निजी उपार्जन समझने का दम्भ करता है तो यह उस परमात्मा के प्रति कृतघ्नता ही है, जिसने अपनी चेतन शक्ति का उसमें समावेश कर उसे ऐसा कर सकने योग्य बनाया।
उस चेतना के अंश की उपस्थिति के कारण ही मनुष्य शरीर का मूल्य एवं महत्व है। मानव शरीर, में स्थित यही चेतना जब प्राणशक्ति के रूप में सक्रिय होती है तो यह मृत्तिकामय शरीर सक्षम एवं संक्रामक बनता है। जिस दिन यह परम तत्व परमात्मा अपने को स्थिर एवं स्तब्ध कर लेता है समग्र अवयवों के अक्षत रहने पर भी शरीर निश्चेष्ट होकर निरर्थक हो जाता है।
आदिकाल से ही तत्वदर्शी ऋषियों ने उस परमात्मा को पहचाना, पाने का प्रयत्न किया एवं सफल हुए। इस उपलब्धि को ही मानव जीवन की सार्थकता मानते हुए उन्होंने आस्तिकता का प्रभाव बढ़ाने के लिए धर्म का स्वरूप निर्धारित किया एवं व्यापक प्रचार किया। जीवन को साधनामय बनाकर कितने परम प्रभु को पाकर तद्रूप हो चुके हैं और आगे भी उस पर चलकर होते रहेंगे।
संसार भर में प्रचलित समस्त साधनात्मक विधियों का मूल गन्तव्य एक ही है- वह है जीवन की रीति-नीति ऐसी बनाना जो परमात्मा के अंश मनुष्य के अनुरूप हो। परिष्कृत जीवन ही परमात्मा का कृपा पात्र बनता है एवं ईश्वरीय अनुग्रह की अजस्र धारा विभिन्न प्रकार की सफलताओं के रूप में बरसती रहती है। ईश्वर परम सन्तोष एवं आनन्द रूप उपासक को अपना मंगलमय सान्निध्य का अनुग्रह करता है। परमात्मा के सच्चे भक्तों को संसार में किसी भी प्रकार की सुख−शांति की कमी नहीं रहती।
परमात्मा की कृपालुता एवं दयालुता असंदिग्ध है। किन्तु उसकी एक व्यवस्था, मर्यादा है इसका उल्लंघन करने वालों के लिए उसका एक और भी स्वरूप है- वह है न्यायी तथा व्यवस्थापक होना। जहाँ उसकी प्रसन्नता मर्यादा व्यवस्था के अनुरूप जीवन नीति-रीति अपनाने वालों पर अनिवर्चनीय उपहारों की झड़ी लगा देती है वहाँ उसकी अप्रसन्नता प्रतिकूल आचरण करने वालों को कठोर दण्ड भी देती है। संसार में कदाचित ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जो परमात्मा की न्याय परिधि में आकर दण्ड की दुःख की कामना करें। नहीं तो प्रत्येक जीव उसकी प्रसन्नता एवं अनुग्रह पाने का ही आकाँक्षी रहता है। उपासना परमात्मा की प्रसन्नता प्राप्त करने का ही एक उपाय है। किन्तु यह प्रसन्नता केवल पूजा-पाठ, भजन, कीर्तन अथवा स्मरण जाप से ही नहीं प्राप्त की जा सकती है।
परमात्मा का अनुग्रह और उसके फलस्वरूप शान्ति, प्रसन्नता की प्राप्ति एवं सफलता का शाश्वत उपहार पाने के लिए मनुष्य को उपासना के साथ जीवन साधना को अपनाना होगा। उसकी दयालुता के साथ ही रुद्र रूप को भी याद रखें तथा सत्पथ शुद्ध एवं सात्विक भावना से चलकर उसे अप्रसन्न होने का अवसर न दे, मनुष्य का कल्याण इसी में है। यही परमात्मा के अंश मनुष्य के लिए योग्य एवं शोभनीय है।
संसार का प्रत्येक क्रिया-कलाप कार्य- कारण श्रृंखला से बँधा है। व्यक्ति, समाज और राष्ट्र इसी कार्य-कारण श्रृंखला को जानकर तदनुरूप अभीष्ट की प्राप्ति के लिये साधन रूप कारण जुटाने ओर कार्य-सिद्धि का प्रयास करते हैं। वैज्ञानिक प्रगति का आधार भी कार्य-कारण सिद्धाँत को समझकर तदनुरूप वैज्ञानिक प्रयोगों को करते हुए नई-नई उपलब्धियां अर्जित करना है। दर्शन-शास्त्र और भौतिक-विज्ञान दोनों में कार्यकारण सिद्धाँत तथा प्रकृति की समरूपता का सिद्धाँत सर्वमान्य है। उसी आधार पर योजनाएँ बनाना और उन्हें क्रियान्वित करने के लिये आगे बढ़ना सम्भव होता है। कार्यों के परिणामों पर विश्वास न हो तो फिर योजना बनाना सम्भव न हो पाये और उस पर अमल करने का उत्साह भी न पैदा हो। राजनीति, समाज-सुधार, नव-निर्माण, अभियाँत्रिकी, आदि किसी भी क्षेत्र में प्रवृत्त होने की प्रेरणा ही न पैदा हो। पदार्थों की प्रकृति में निश्चयात्मकता न हो तो भौतिक विज्ञान की खोजें की आगे न बढ़े। एक पदार्थ का एक अंश एक निश्चित देश-काल-परिस्थिति में जो प्रतिक्रिया करता है, वही प्रतिक्रिया उन पदार्थ का दूसरा वैसा ही अंश उन्हीं परिस्थितियों में अन्यत्र न करें, तो पदार्थ-विज्ञान की प्रगति असम्भव हो जाय। क्योंकि तब एक-एक अणु के बारे में अलग-अलग खोज करनी पड़े। प्रकृति समरूपता का यही सिद्धाँत जीव-विज्ञान, मनोविज्ञान, एवं तत्वज्ञान की विभिन्न शाखाओं के विवेचन का आधार है। प्रकृति अपने गुणों और नियमों के अनुसार ही पदार्थ पैदा करती है। एक बीज से सजातीय पौधा और जीव ही पैदा होता है। आम के बीज में इमली नहीं पैदा होगी। तो भी कई बार प्रकृति में अनेक विलक्षणताएँ विद्यमान पाई जाती एवं उत्पन्न होती देखी जाती है। बारम्बार परीक्षा से पुष्ट, अनुभव से प्रमाणित विधि-व्यवस्था एवं नियम-विधान के अपवाद देखे जाते है और चित्र-विचित्र वस्तुएँ देखी-पाई जाती है, जो प्रकृति के सामान्य क्रम से भिन्न होती है।
सामान्यतः ये अपवाद प्रकृति का ही अंग होते हे। कन्याकुमारी से सात रंग की रेत पाई जाती है। लाल, भूरी, पीली, रजतवर्णी, नारंगी, नीली और बैंगनी। प्रकृति की इसी विलक्षणता को भारतीय पुराकथा में इस रूप में व्यक्त किया गया है कि जब भगवान शंकर कन्याकुमारी पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर उनसे परिणय बद्ध हुए, तो देवताओं ने सात रंग के फूल बर-साए। तभी से यहाँ की रेत सतरंगी हो गई।
प्रकृति- वैचित्र्य के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने वाली ऐसी पुराकथाएँ विश्व के सभी भागों में प्रचलित हैं।
हिमालय पर्वतमाला के बीच गढ़वाल जिले में स्थित ‘फूलों की घाटी ‘ भी प्रकृति का ऐसा ही विलक्षण उपहार है। समुद्रतल से 12 हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित यह रहस्यमय घाटी अपने सौंदर्य और वैचित्र्य-पूर्ण विविधता में अनुपम है। जल के स्थान पर थल में उगने वाला एकमात्र कमल यही उगता-फूलता है। असंख्य पुष्पों की प्रकृति निर्मित स्वतंत्र क्यारियों की अलौकिक छटा मनुष्य के लिये आश्चर्य और आकर्षण का प्रबल केन्द्र है।
दक्षिणी ध्रुव प्रदेश तो ऐसी विचित्रताओं का विस्तृत क्षेत्र ही है यहाँ की हवा रंगीन है। कभी-कभी धरती भी रंग-बिरंगी हो उठती है। कभी घना अंधेरा छा जाता है। कभी धरती से आकाश तक सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश संव्याप्त दिखाई पड़ता है। क्षितिज का दूर-दूर तक कही पता ही नहीं लगता। कभी पृथ्वी घूमती-सी लगने लगती है और लगता है अब गिरे कि तब गिरे। 300 किलोमीटर प्रतिघण्टे से भी अधिक तीव्र गति से हवा बहती है, तो भी उसकी आवाज नहीं सुनाई पड़ती, जबकि पृथ्वी में अन्यत्र 70-80 किलोमीटर प्रतिघण्टे की उतार से चलने वाली हवा भी हू-हू करती शोर मचाती सुनी जाती है।
पृथ्वी की 90 प्रतिशत बर्फ ध्रुव प्रदेश में ही है। यदि यह पिघल जाये तो विश्व के सभी समुद्र अपनी मर्यादा छोड़ दे और सहसा उन सबका तह ढाई सौ फुट ऊँचा हो जाये। अक्टूबर से मार्च तक दक्षिणी ध्रुव में चौबीसों घंटे दिन रहता है। मनुष्य तो यहाँ नहीं रह सकता। किन्तु अन्य अनेक जीव यहाँ मजे से रह लेते है। इनमें से 60 किस्म के ऐसे भी कीड़े है, जो गर्मी के दिनों में ही सक्रिय रहता है। शेष समय प्रसुप्त रहे आते है यदि उनके ऊपर बर्फ जम जाती है, तो भी वे मरते नहीं। प्रसुप्तावस्था में विश्राम करते हैं और बर्फ पिघलते ही फिर सक्रिय हो जाते हैं। ऐसे भी कीड़े-मकोड़े है, जो 70 वर्षों तक प्रसुप्त पड़े रहने पर भी मरते नहीं, पुनः उपयुक्त अवसर पाते ही हलचल करने लगते है।
यह प्रदेश थोड़ा भी नहीं हैं। अपितु क्षेत्रफल में अमरीका का दुगुना है। दक्षिणी ध्रुव प्रदेश में चारों तरफ समुद्र है। बीच में थोड़ा सा-थल- भाग है। जबकि उत्तरी ध्रुव में भूमि-भाग से घिरा हुआ समुद्र तट है।
ये सभी विलक्षणताएं प्रकृति का ही स्वाभाविक अंग है। इनमें से प्रत्येक कार्य का कारण यदि वैज्ञानिक नहीं भी जान पाते, तो भी वह कार्य कारण श्रृंखला का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है। हाँ, इनसे ज्ञान की सीमा का पता अवश्य लगता है। दक्षिणी ध्रुव प्रदेश में ही अब तक वैज्ञानिक अनुसंधान के 70 बार प्रयास किये गये। हर बार नयी ही विलक्षणताएँ सामने आई। किन्तु इससे प्रकृति की समरूपता का सिद्धाँत नहीं खण्डित होता। इससे सिर्फ यह ज्ञात होता है कि कारण-कार्य श्रृंखला का हमें ठीक-ठीक ज्ञान नहीं है और अमुक कार्य का जो कारण मान लिया गया है।, वह पूर्णतः यथार्थ नहीं, अनुमानित यथार्थ है, जो सत्य के निकट हो सकता है, पूर्ण सत्य नहीं। इसी कारण वैज्ञानिक प्रयोगों के नियम बनाते समय ‘एंरर’ या भूल को भी एक सर्वमान्य तथ्य मानकर चला जाता है। प्रायः किसी एक क्रिया की गणनाएँ हर बार एक नहीं होती, उनमें असत्य ही सही अन्तर होता है, जिसे ‘एंरर’ कहकर काम चलाया जाता है।
कई बार ऐसा भी होता है कि एक ही प्रक्रिया की व्याख्या भिन्न-भिन्न व्याख्या-सूत्रों (फार्मूलों) द्वारा सही-सही कर दी जाती है। दोनों व्याख्याएँ पूरी तरह सही प्रतीत होती हैं। उनके परिणाम-निष्कर्ष भी एक ही होती हैं। जबकि वे व्याख्या-सूत्र यानी फार्मूले भिन्न-भिन्न होते हैं, यहाँ तक कि परस्पर विपरीत तक हो सकते हैं।
प्राचीन समय में भारतीय ज्योतिषियों की मान्यता थी कि पृथ्वी स्थिर है, सूर्य की भ्रमणशील है। उस आधार पर ही फार्मूले गढ़कर गणना की गईं, पंचाँग बने, फलित दिखाए गये। तो भी चन्द्र-ग्रहण सूर्य-ग्रहण समेत विभिन्न नक्षत्रीय स्थितियों के निरूपण कभी गलत नहीं सिद्ध हुए। आज सभी मानते हैं कि सूर्य ही नहीं पृथ्वी भी भ्रमण करती है। यद्यपि सापेक्ष दृष्टि से सूर्य भी गतिशील है, तथापि इस सौरमंडल की की सापेक्षता में सूर्य स्थिर है, पृथ्वी उसकी परिक्रमा करती है। इस आधार पर जो गणनाएँ की जाती है, उनके फलित भी वही होते हैं, जो इसकी विपरीत मान्यता से निकलते थे। सूर्यग्रहण, चन्द्रग्रहण की ठीक-ठीक तिथि व समय दानों ही गणना-पद्धति से निरूपित किये जा सकते हैं और दानों के परिणाम एक होते है। इतना ही नहीं आज से लगभग डेढ़ हजार वर्ष पूर्व महान गणितज्ञ आर्यभट्ट ने यह स्थापना की-कि-”यह नहीं (पृथ्वी) गोल आकाश में वैसे ही अधर में लटकती है, जैसे कि चुम्बक की आकर्षण-शक्ति के सहारे कोई गोला अधर में लटका रहें और पृथ्वी का यह गोला सूर्य की परिक्रमा करता है तथा अपनी ही धुरी पर भी घूमता है।” उस समय उनके समकालीन एक अन्य महान गणितज्ञ वराहमिहिर ने भू-भ्रमण सिद्धाँत का जोरदार खण्डन किया था। तो भी नक्षत्रों की स्थिति के बारे में दोनों गणितज्ञों की गणना के परिणाम एक जैसे होते थे।
ये सीमाएँ विज्ञान की जानकारी की सीमाएँ हैं। सर्वव्यापी सत्ता के अविज्ञात क्रियाकलापों के रहस्य पूरी तरह न जान पाने का यह परिणाम हैं। उस अविज्ञात चेतन-सत्ता के विधि-विधानों को पूरी तरह जान पाना तो कठिन है ही। उसकी इच्छा-शक्ति कार्य-कारण नियमों श्रृंखलाओं का भी यदा-कदा किन्हीं और जटिल कारणों से उल्लंघन कर सकती है। जैसा कि विज्ञानी रावर्ट ए. मैल्क ने कहा है- ‘परमात्मा- सत्ता ही अपनी इच्छा शक्ति से सृष्टि का निर्माण करती है। आम के बीज से इमली पैदा करने की शक्ति प्रकृति में नहीं है। किन्तु परमात्म-सत्ता में यह शक्ति है। वह विलक्षण रचनाएँ पैदा करने में समर्थ सत्ता है।”
प्रकृति की विलक्षणताएँ उस सर्वसमर्थ सृष्टा की सामर्थ्य बतलाती हैं। विज्ञान हो या दर्शन, सभी उसी सामर्थ्य को यथाशक्ति समझने का विनम्र प्रयास मात्र है। बौद्धिक सृष्टि से मनुष्य समेत हर प्राणी सीमित है और उनके सभी प्रयासों की सीमाएँ हैं। असीम सामर्थ्य मात्र उस सर्वज्ञ, सर्वव्यापी,, नियामक और अपनी इच्छा से सब कुछ कर सकने में सक्षम ईश्वरीय सत्ता में ही है। व्यवस्था और वैचित्र्य दोनों ही उसी की सामर्थ्य की अभिव्यक्तियाँ हैं।
शरीर के लिए भोजन-वस्त्र विश्राम, चिकित्सा की व्यवस्था करना आवश्यक है। न करें तो उसकी दुर्बलता के कारण अपने काम रुक जायेंगे और अकाल मृत्यु होकर आत्म-हत्या का पाप लगेगा। इसलिए हर बुद्धिमान व्यक्ति अपनी शरीर व्यवस्था जुटाने का प्रयत्न करता है यह उचित भी है और आवश्यक भी। पर यदि कोई व्यक्ति सारा समय, मनोयोग और कर्तव्य शरीर रक्षा तक ही सीमित करलें, उससे आगे की कुछ बात सोचने करने की आवश्यकता ही न समझे तो उसे नर-पशु कहेंगे। पशु को मनुष्य की तुलना में भर्त्सना केवल इसी कारण दी जाती है कि उसका चिन्तन और कर्त्तव्य मात्र शरीर की चर्चा तक सीमित रहता है। मानव शरीर का उपयोग विशाल क्षेत्र में करना पड़ता हैं, तभी उसकी सार्थकता होती है।
शरीर के बाद परिवार का नम्बर आता है। जिस पत्नी का हाथ अग्नि देव की साक्षी में पकड़ा गया है उसे भरपूर स्नेह देना चाहिए, उसका समुचित सम्मान करना चाहिए और भरण-पोषण से लेकर ज्ञान बुद्धि एवं व्यक्तित्व के विकास की समस्त सुविधाएँ जुटानी चाहिएँ। एक विश्वस्त साथी की तरह उसे आगे बढ़ाने और ऊँचा उठाने के लिए सब कुछ करना चाहिए। इसी प्रकार बच्चो के साथ हँसने-खेलने से लेकर उनके स्वास्थ्य, शिक्षा, सुविधा का ध्यान रखना चाहिए। साथ ही उन्हें सुसंस्कृत बनाने के कठोर कर्तव्य का भी विस्मरण नहीं करना चाहिए। माता-पिता-बहिन-भाई, सभी कुटुम्बियों की भौतिक एवं आत्मिक आवश्यकताओं के लिए अपनी सामर्थ्य के अंतर्गत जो कुछ भी हो उसको औचित्य की मर्यादा में पूरी तरह निबाहना चाहिए पारिवारिक कर्तव्यों में न तो उपेक्षा बरतनी चाहिए और न शिथिलता। उस उद्यान को हरा-भरा रखने के लिए एक कर्तव्य-निष्ठ माली की तरह हमें सतत प्रयत्नशील रहना चाहिए माली को पेड़ पौधों की साज सँभाल रखनी चाहिए पर अपने पारिवारिक उत्तरदायित्वों को नहीं भूल जाना चाहिए। हम शरीर की तरह परिवार की भी सुव्यवस्था रखें पर उतने भर से अपने कर्त्तव्य इतिश्री न मान लें।
मनुष्य एक सामाजिक मछली है जिसे सब कुछ पानी रूपी समाज से ही मिला है। उसी में उसका जीवन है। पानी विषैला हो जाय तो मछली न सुखी रह सकेगी और न जीवित। समाज का वातावरण भ्रष्टता और दृष्टता से विषाक्त हो जाय तो किसी सज्जन व्यक्ति की भी शान्ति सुरक्षित नहीं रह सकती। अस्त-व्यस्त समाज में हर किसी की प्रगति रुकी पड़ी रहेगी और शान्ति सुरक्षित न रहेगी। यदि नागरिक अपना ध्यान सामाजिक उत्तर-दायित्वों की ओर से हटालें तो फिर उसमें विकृतियाँ ही भरेंगी, जन-जीवन संकटग्रस्त ही होगा।
सामाजिक कर्तव्य भी इतने आवश्यक और महत्वपूर्ण हैं-जितने शारीरिक और पारिवारिक उत्तरदायित्व। हमें सीमित और संकीर्ण नहीं होना चाहिए। शरीर और परिवार का ध्यान रखते हुए उतनी ही छोटी परिधि में सीमित, अवरुद्ध नहीं होना चाहिए। आत्म-विश्वास की दिशा में बढ़ते चलने का विशाल दृष्टिकोण रखकर ही उदात्त-जीवन जिया जा सकता है।
आत्मा और परमात्मा के साथ भी हमारा कुछ रिश्ता है। इस लक्ष्य को भुला न दिया जाना चाहिए।यह जीवन आत्मशोधन आत्म-निर्माण, आत्मविकास और आत्म-कल्याण के लिए मिला है। ईश्वर ने सुर दुर्लभ मनुष्य शरीर दिया है। क्या उनके लिए हमें कुछ नहीं करना चाहिए? शरीर और परिवार की ममता में इतना डूब जाना कि आत्मकल्याण और ईश्वरीय आदेश की ओर सर्वथा मुँह मोड़ लिया जाय, यह सर्वथा अशोभनीय है।
हम विशाल दृष्टिकोण अपनायें। शरीर और परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए समाज के प्रति आत्मा के प्रति भी अपने उत्तरदायित्व समझें इसी में दूरदर्शिता है।
मरणोत्तर जीवन याकि इस देह के अंत के बाद जीवन के बारे में चर्चा एवं विचार पश्चिमी जगत में कुछ वर्षों पूर्व तक माइथालोंजी मजहब, मैटाफिजिक्स और फिलॉसफी का ही विषय था। किन्तु पिछले कई वर्षों से वहाँ परामनोविज्ञान के अधुनातन अनुसंधानों के, इस दिशा में गम्भीर प्रयासों से कई महत्वपूर्ण परिणाम सामने आये हैं। इसीलिये अधिकांश लोगों में योग-दर्शन के प्रति जिज्ञासा-भाव जागृत-विकसित हुआ है।
अमेरिकी वैज्ञानिक डा. रेमंड ए. मूडी जूनियर ने 5 वर्षों तक इस दिशा में शोध-प्रयास किये और अपने अध्ययन-निष्कर्षों को “लाइफ आफ्टर लाइफ” नामक पुस्तक में प्रस्तुत किया।
डा. मूडी ने ऐसे लोगों के अनुभव एकत्र किये, जिन्हें मृत्यु का किसी न किसी रूप में साक्षात्कार हुआ हो। इनमें से कुछ लोग वे थे, जिन्होंने मृत्यु के तत्काल पूर्व अपनी समीपी लोगों को बताया कि मुझे इस-इस ढंग के अनुभव हो रहे हैं। मूडी ने उन समीपी लोगों के द्वारा बताये गये, वे सुने हुए अनुभव नोट किये। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ऐसे अनुभव बड़ी मात्रा में सन्दिग्ध माने जायेंगे। क्योंकि मनुष्य सामान्यतः अपनी स्मृति में कल्पना और पूर्वाग्रह का मिश्रण कर दिया करते है। तो भी इनसे आँशिक सत्य तो प्राप्त किया ही जा सकता है।
दूसरी कोटि के उन लोगों से मूडी द्वारा संपर्क किया गया, जो गम्भीर रोग या भयंकर दुर्घटना से मानो मौत के मुँह में जाकर लौटे थे। कुछ समय के लिये जिन्हें अपनी मृत्यु का निश्चय हो गया था। और उन्होंने मृत्यु मुख में स्वयं को समाते हुए अनुभव किया था। इनमें कुछ ऐसे लोग भी सम्मिलित थे, जिन्हें चिकित्सक मृत-प्राय घोषित कर चुके थे और कृत्रिम उपायों से श्वास दिलाने के प्रयास किये जा रहे थे, किन्तु जो बाद में बच ही गये।
परामनोवैज्ञानिक सर विलियम थैरेन्ट ने भी ऐसे ही अनुभवों का संकलन अपनी किताब “डेथबेड विजन्स” में किया है। कुछ भारतीय परामनोविज्ञान प्रेमियों ने भी ऐसे तथ्यों का संकलन किया है।
इन सबके कुछ संक्षिप्त निष्कर्ष ये हैं- कार दुर्घटना में गम्भीर रूप से घायल एक व्यक्ति ने बताया कि पहले तो चोट की असह्य पीड़ा से उसका पूरा शरीर ऐंठ रहा था। कुछ देर बाद उस पीड़ा का एहसास खत्म हो गया। उसे लगा कि चारों और धूप अंधेरा है और वह अंधकार के उस अंतहीन विस्तार में तैर रहा है। इस प्रक्रिया में उसे बहुत ही सुखद विश्राम की अनुभूति हुई।
एक अन्य रोगी ने, जो शल्य क्रिया के दौरान मृत्यु के करीब जा पहुंचा था, कहा कि मुझे बहुत तेज आवाजें परेशान कर रही थी। यह शोर का अनुभव अनेक लोगों को हुआ। बाद में इन सभी ने यह अनुभव किया कि इस शोर और गहरे अंधेरे से उन्हें कोई खींचकर बाहर निकाल रहा है। इस खींचने के दौरान किसी को लगा वे अंधकूप से ऊपर आ रहे हैं किसी को तलघट से, किसी को अंधेरी घाटी से कुछ अन्य को अंधगुफा से, किसी को बीहड़ संकरे रास्ते से, किसी को अंधकारमय सिलेंडर से आदि।
इस प्रकार तीन बातें सभी अनुभव- कर्ताओं ने समान रूप से बताई- (1) दर्द, पीड़ा सब मौत के पास जाने के पहले की ही छटपटाहट होते हे। गम्भीर से गम्भीर चोट और कष्ट भी, मृत्यु के अत्यंत समीप जाने पर अप्रभावी हो जाते है और मीठी थपकी से जैसे उन्हें मृत्यु-माँ दुलारने लगती है।
(2) हवा में तैरने जैसा अनुभव होता है। (3) अंधेरे से ऊपर उठने का अनुभव होता है।
यह तो हुआ मृत्यु के तत्काल बाद का अनुभव। इस के थोड़े समय बाद लोगों को भिन्न-भिन्न अनुभव हुए। किसी को लगा कि उन्हें दूसरा शरीर तत्काल मिल गया है। किसी को लगा कि उनका शरीर हल्का और प्रकाश-पूर्ण है। कुछ अन्य ने अनुभव किया कि वे शुद्ध प्रकाश एवं चेतन-तत्व मात्र है। न कोई रूप, न आकृति। भारहीनता की स्थिति सबने समान रूप से अनुभव की। इसके बाद के अनुभव भी बड़े अंशों में एक-से हैं, पर साथ ही कुछ भिन्नताएँ भी हर एक में रही। समानता यह कि हर एक ने बाहरी सहयोग का प्रत्यक्ष अनुभव किया। भिन्नता यह कि किसी ने सहयोगी के रूप में अपने पूर्वमृत एक मित्र परिजन या अनेक मित्रों परिजनों को देखा तो किसी ने प्रकाश पुँज देवदूतों को। ये सभी एक तरह की ज्योति लिपटे थे, वे देवदूत हों या परिजन मित्र। उनके प्रकट होने पर किसी की आँखें चौंधिया गईं, किसी ने श्वेत, पवि« प्रकाश स्त्रोत देखा; उस प्रकाशपुँज के प्रति सभी ने प्रबल आकर्षण का अनुभव किया।
कुछ निष्ठावान ईसाइयों को ईसामसीह प्रकाश के रूप में दिखे, तो यहूदी लोगों ने देवदूत को देखा। दिल्ली की एक हिन्दू महिला ने देखा कि चार प्रकाशवान व्यक्ति आये है। उनमें से एक के हाथ में कागज-कलम है और वह कुछ लिख रहा है। एक अन्य हिन्दू ने वैतरणी पार की, धुँए और बादलों के बीच अंधेरे में दम घुटता महसूस किया फिर सहसा उसे हनुमान जी दिखे और चारों और प्रकाश भर गया।
पाश्चात्य देखो के ऐसे लोग, जिन्हें व्यक्तिगत रूप से किसी धर्म, मत विशेष के प्रति खिंचाव नहीं था, ऐसे अनुभवों से गुजरे मानो एक दिव्य ज्योतिर्मय आकृति उनके समक्ष प्रकट हुई।
सभी ने जो अनुभव बतायें, उनमें एक समानता यह थी कि प्रकट ज्योतिर्मय आकृतियों ने उनसे कुछ प्रश्न किये। पर ये प्रश्न भिन्न-भिन्न थे। प्रश्न प्यार भरे स्वर में थे, धमकी, चेतावनी या क्रोध के प्रभाव से भरे स्वर में नहीं।
डा. मूडी और सर विलियम बेरेंट, दानों के अध्ययन में एक समानता यह भी है कि जिन लोगों ने भी मृत्यु का यह अल्पकालिक अनुभव किया, वे सभी इस अनुभव के बाद अधिक करुणापूरित एवं आदर्शवादी हो गये। डा. मूडी एक ऐसे व्यक्ति से मिले, जो जीवन भर लोगों से तीव्र घृणा करता रहा और तिरस्कार पाता रहा। मृत्यु के उक्त अनुभव के बाद उसे प्रकाशमय व्यक्ति से इतना प्यार एवं दुलार मिला कि वह कहने लगा-”मैं जब तक जीवित हूँ, लोगों को अधिकतम प्यार करूंगा।” एक अन्य समानता यह रही कि ये सभी लोग अब शारीरिक मृत्यु के प्रति भय से मुक्ति अनुभव करते हैं।
जो लोग इस अनुभव से गुजरे हैं, उनका विश्लेषण किया जाये, तो यह स्पष्ट दिखेगा कि इस जीवन के संस्कारों और अपने प्रति पाली गई मान्यताओं का मरणोत्तर अनुभूतियों पर पर्याप्त प्रभाव रहा है। गीता में कहा गया है-” यं यं वापि स्मरन्भावँ, त्यजत्यन्ते कले-वरम्! तं तेवैति कौंतेयसदा तद्भावभावितः” अर्थात् मृत्यु के पूर्व जीवात्मा जिस भाव-जगत से संबद्ध होता हैं, वही भावनाएँ मरणोत्तर जीवन में सक्रिय रहती हैं।
ये भावनाएँ आकस्मिक नहीं होती। प्रायः मृत्यु के पूर्व व्यक्ति के मनश्पटल पर पिछला सम्पूर्ण जीवन घूमने कौंधने लगता है। सन्निपात की सी स्थिति में लोग उस समय बड़बड़ाहट में मन कर प्रमुख रूप से हावी घटनाएं और भावनाएँ ही होती हैं। जीवन भर के जागृत-सक्रिय संस्कार ही उस क्षण में, जब चेतन मस्तिष्क का नियंत्रण हट जाता है और अचेतन खुलकर खेलता हैं उभर आते हैं। इसीलिये मृत्यु के पूर्व सहसा कोई सद्भावना मन में लाकर सद्गति साधने की बाल-कल्पना किसी को नहीं करनी चाहिए। क्योंकि उस समय ऐसी चालाकी भरी सजगता का अवसर नहीं मिल पाता। जो घनीभूत मनोभाव होता है, प्रतिफल पोषित-विकसित भावनाएँ होती हैं, वे ही प्रबल होकर उस समय छा जाती हैं। इसी से रामचरित-मानस में कहा गया हैं-
“जनम-जनम मुनि जतन कराहीं। अंत राम कहि आवत नाहीं॥”
काव्योचित अतिशयोक्ति पूर्ण शैली में यहाँ तुलसी ने इसी तथ्य को उभारा हैं कि जब तक सर्वथा सहज भावभूमि ही प्रभुमय न हो जाय, अन्तकाल में ईश्वर-स्मरण की मनोदशा स्थिर नहीं रह पाती। इससे जन्म-जन्मोतर के प्रयासों की निष्फलता नहीं, अपितु उस उच्च चेतना-स्तर की दुस्साध्यता वर्णित समझनी चाहिए।
यही बात वृहदाण्यकोपनिषद में भिन्न ढंग से कही गई हैं- “तस्य हैतस्य हृदय स्प्राग्रं प्रद्योतते तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्क्राभति चक्षुष्टो वा मुध्नों वा अन्येम्यों वा शरीर देशेम्यस्तुत्कामन्तं प्रणोऽनूत्क्रामति।” (अ04 ना0 4/2)
अर्थात् मृत्यु के समय हृदय के अग्रभाग में प्रकाश होता है। उस प्रकाश के द्वारा यह जीवात्मा शरीर के चक्षु से, मूर्धा से अथवा अन्य किसी शरीर-छिद्र से निकलता है।
आगे यह बताया गया है कि मल-मूत्र द्वारों से निकलने पर नरक की, नाभि-छिद्रों से निकलने पर प्रेत-योनि की, आँखों आदि से निकलने पर उत्तम लोकों की तथा मूर्धा भेदनकर प्राण निकलने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है।
किस द्वारा से आत्मा निकलेगा, यह आकस्मिक नहीं होता। किस भाव-समूह के प्रति आकर्षण है, मन किस भावभूमि में अवस्थित हैं, उससे इस निष्क्रमण का संबंध है। मलमूत्र द्वार, कामापभोग, नाभिकेन्द्र, अर्थ-लोभ नेत्रादि का चिन्तनपरक मनःस्थिति से सम्बन्ध है। मूर्धा या सहस्रार में, आनन्दमय कोश में अवस्थिति से ब्रह्मलोक की प्राप्ति स्वाभाविक है, क्योंकि उस स्तर के व्यक्ति इस जीवन में भी ब्रह्म-चेतना से ही निरन्तर जुड़े रहते है।
जीवन की गहरी मान्यताएँ, आस्थाएँ और तदनुसार अपनाया गया सतत जीवनक्रम ही प्रधान भूमिका निभाते है। वैतरणी, चित्रगुप्त आदि मान्यता हिन्दुओं में है, तो उन्हें वे दिखते हैं। ईसाइयों को ईसा और यहूदियों को देवदूत दिखें। जो किसी धार्मिक मान्यता से नहीं बँधे हैं, उन्हें उत्कृष्ट जीवन क्रम होने पर प्रकाश और छल प्रपंचमय जीवन होने पर धुँआ, कोहरा दमघोट वातावरण दिख सकता है। मृत्यु के बाद भी वासना-समूह और संस्कार-समूह साथ लगे रहते हे। इन्हें ही भारतीय दर्शन में सूक्ष्म-शरीर व कारण-शरीर कहा गया है।
बाइबिल में “वेली ऑफ शेडों ऑफ डेथ” का उल्लेख है। अर्थात्-मृत्यु की छाया या प्रभाव-क्षेत्र की घाटी। अंधकार भरी घाटी, कुँए, गुफा आदि की अनुभूति से उसका मेल है।
नयी जिन्दगी पाने वाले लोगों की मृत्यु-मध्यान्तर की अनुभूति की ये विविधताएँ एक ही बात पर प्रकाश डालती हैं, कि जीवात्मा से जुड़ा संस्कार-जगत मृत्यु के बाद भी सक्रिय रहता है और वह अपनी मनःस्थितियों का वहाँ भी प्रक्षेपण करता है। यही बात इस जीवन में भी दृश्य जगत के प्रति हमारी अनुभूति के बाद में भी सत्य है।
व्यक्तियों और वस्तुओं के प्रति हमारी दृष्टि हमारी मनःस्थिति से प्रेरित-प्रभावित रहती है। एक व्यक्ति को एक संत अपनी उदात्त और अंतर्भेदी दृष्टि से देखते है। एक लोक सेवी संगठन उसे ही सामाजिक प्रवृत्तियों और सामाजिक उपयोगिता की दृष्टि से देखता है। कुछ लोग उसके प्रति एक भिन्न ही दृष्टि रखते हैं, जो रूप सौंदर्य की उनकी अपनी धारणा से बँधी होती है। सौंदर्य-शास्त्री उसके रूप-सौंदर्य को शास्त्रीय मानदंडों से देखता है। प्रेमिका-पत्नी अपनी विमुग्ध दृष्टि से देखती है। सहकर्मी प्रतिस्पर्धा और विनिमय की उपयोगिता की दृष्टि से देखते है और शत्रु विरोध की दृष्टि से। व्यक्ति एक ही है और देखने वाली आँखें मनुष्य की ही हैं, पर उसका विवरण इनमें से हर एक को लिखने को कहा जाय, तो उन विवरणों में परस्पर अत्यधिक भिन्नता होगी।
फिर, मनुष्य की अनुभूति-सामर्थ्य भी सीमित हैं। शरीर-वैज्ञानिकों के अनुसार जिन लोगों को देखने के अवसर मनुष्य को नित्य मिलते हैं, उनमें परस्पर अंतर उन्हें जल्दी दिख जाता है। किन्तु अजनबी लोग व्यक्ति को लगभग एक जैसे लगा करते है। उदाहरणार्थ सामान्य भारतीयों को कई चीनी या अनेक नीग्रो लगभग एक-से दिखेंगे। चीनियों या नीग्रो लोगों को हजारों भारतीय पुरुष एक जगह खड़े होते वे एक जैसे ही लगेंगे। सैकड़ों भारतीय स्त्रियाँ एक जैसी दिखेगी। अतः मृत्यु के बाद होने वाले ये अनुभव दृश्य का बारीकियों के हिसाब से भिन्न-भिन्न हैं, तो यह स्वाभाविक ही हैं, क्योंकि व्यक्ति-मन तो वहाँ भी रहता ही हैं, और उनकी मनःस्थिति दृश्य-जगत को अपने चश्मे से देखती हे। परन्तु अनुभूतियों में जो समान तत्व हैं वह विचार की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है।
इन अनुभूतियों से यही स्पष्ट होता है कि जीवन देह-नाश से समाप्त नहीं हो जाता। वह तो निरन्तर प्रवाहित होता रहता है। जैसा कि गीता में कहा गया है- “मरण माना जीर्ण वस्त्र उतार कर फेंकना हैं।” जीवन का अविच्छिन्न प्रवाह आरोह-अवरोह के विभिन्न क्रम-संघातों के साथ निरन्तर गतिशील रहता है। दूसरा यह कि मृत्यु के बाद के जीवन की अनुभूतिक्रम में वर्तमान अनुभूतियों से एक तरह का सातत्य रहता है। अतः मरणोत्तर जीवन को श्रेष्ठ, सुखी बनाने के लिये इस जीवन में भी परिष्कृत दृष्टिकोण एवं समुन्नत जीवन कम अपनाना आवश्यक है।
सन्त पुरन्दर गृहस्थ थे तो भी क्या लोभ, क्या काम और क्रोध उन्हें छू भी नहीं गये थे। दो तीन घरों में भिक्षाटन करते उससे जो दो मुट्ठी चावल और आटा मिल जाता उससे वे अपना और अपनी धर्मपत्नी सरस्वती देवी का उदर पोषण कर लेते और दिन भर लोक सेवा के कार्यों में जुटे रहते।
एक दिन विजय नगर के राजपुरोहित व्यासराय ने महाराज कृष्ण देव राय से कहा राजन्! सन्त पुरन्दर गृहस्थ होकर भी राजा जनक की तरह विकार मुक्त है दिन भर बेचारे पिछड़ों को ज्ञान दान देने, कष्ट पीड़ितों की सेवा करने में लगे रहते हैं। स्वार्थ की बात तो उनके मन ही में नहीं आती। महाराज कृष्णदेव राय-हँसे और बोले “गृहस्थ जीवन में कौन तो निर्लोभ रहा, कौन काम वासना से बचा?” “यदि गृहस्थ में ऐसा सम्भव हो जाए तो संसार के सभी लोग अपना मनुष्य शरीर सार्थक न कर लें?”
“कर सकते हैं” व्यास बोले-”यदि लोग सन्त पुरन्दर और देवी सरस्वती की भाँति निर्लोभ, सेवा परायण व सरल जीवन जीना सीख लें।” महाराज कुछ खिन्न से हो गये और बोले ऐसा ही है तो आप उनसे कुछ दिन यही हमारे यहाँ भिक्षाटन के लिए कह दें। व्यासराय ने सन्त पुरन्दर से जाकर आग्रह किया- “आप आगे से राजभवन से भिक्षा ले आया करें।” सन्त पुरन्दर ने कहा-”मैं जिन लोगों के बीच रहता, जिनकी सेवा करता हूँ उन अपने कुटुम्बी जनों से मिली हुई भिक्षा ही पर्याप्त है। दो ही पेट तो हैं उसके लिए राज भवन जाकर क्या करूंगा? पर व्यासराय तब तक बराबर जोर डालते रहे जब तक सन्त ने उनका आग्रह स्वीकार नहीं कर लिया।
सन्त पुरन्दर राजभवन जाने लगे। वहाँ से मिले चावल ही उनके उदर पोषण के लिए पर्याप्त होते।सन्त अपनी सहज प्रसन्नता लिए हुए जाते, उसका अर्थ महाराज कुछ और ही लगाते। एक दिन तो उन्होंने व्यासराय से कह भी दिया देख ली आपके सन्त की निस्पृहता। आज-कल देखते नहीं कितने प्रसन्न रहते हैं। व्यासराय बोले आपका तात्पर्य समझे नहीं। इस पर महाराज ने कहा- “आप मेरे साथ चलिए अभी बात स्पष्ट हो जाएगी।” महाराज पुरोहित के साथ सन्त पुरन्दर के घर पहुँचे देखा उनकी पत्नी चावल साफ कर रही है और कह रही हैं- “आजकल न जाने कहाँ से भिक्षा लाते है इन चावलों में कंकड़-पत्थर भरे पड़े हैं। यह कहकर उन्होंने अब तक के बीने कंकड़ उठाये और बाहर की तरफ फेंकने चल पड़ी।” महाराज बोले भद्रे यह तो हीरे मोती हैं- जिन्हें आप कंकड़ पत्थर कहती हैं। सरस्वती देवी हँसी और बोली पहले हम भी यही सोचते थे, पर अब जब से भक्ति को संपत्ति मिल गई इनका मूल्य कंकड़ पत्थर के बराबर ही रह गया। महाराज यह उत्तर सुनकर अवाक् रह गये, वे आगे और कुछ न बोल सके।
जीवित कौन है और मृत कोन? इसके अलग-अलग दृष्टिकोण से अलग-अलग उत्तर दिये जाते रहे हैं। परन्तु सबका साराँश यही है कि जिसमें चेतना और क्रिया-शीलता हैं, वही जीवित है।
गीता में अर्जुन से श्रीकृष्ण ने कहा कि”सम्भावितस्य चाऽकीतिर्मरणादितिरिच्यते” अर्थात् सम्भ्रान्त व्यक्ति के लिये अपकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर है।
अन्यत्र श्री वेदव्यास ने लिखा है- “ये पराधीन जन्मानस्ते चेज्जीवन्ति के मृताः” अर्थात् जो पराधीन है; वे यदि जीवित हैं, तो फिर मृत कोन हैं? यानी पराधीन होना मृत्यु है।
एक अन्य संस्कृत-कवि ने लिखा है-कि जो अपना ओर अपने परिवार का भली-भाँति भरण-पोषण नहीं कर पाता, ज्ञानार्जन में जिसकी रुचि नहीं है, श्रेष्ठ विचार जिसे व्यर्थ लगते हैं, जिसकी कीर्ति का प्रसार नहीं हुआ है और दूसरों के लिये जिसने कभी कुछ उत्सर्ग नहीं किया, वह स्वकेन्द्रित जड़ लाश की तरह है।
सामान्य-रीति से भी, जब कोई आन्दोलन या संस्था प्राणवान और गतिशील लोगों से रहित हो जाती हैं, तो लोग कहते है-अमुक आन्दोलन मर गया’। यद्यपि तब भी उसके हजारों लाखों सदस्य होते हैं। जब कोई व्यक्ति उत्साहहीन, शिथिल रहा आता है तो कहा जाता है- “क्या मुर्दा हो गये हो? “अब इसमें जान नहीं है।” किसी सुन्दरता के लिये प्रसिद्ध व्यक्ति का सौंदर्य जब धूमिल पड़ जाता हैं, तो भी कहते हैं- “अब तो जान रही नहीं इसमें। “ किसी मूर्ति चित्र या साहित्यिक-कृति में यदि रस-संचार करने की सामर्थ्य न हो तो उसे निष्प्राण कहा जाता है।
आत्मिक-दृष्टि से, जिसमें आन्तरिक-जागरूकता और गतिशीलता नहीं है, उसे मृत कहा जाता है। शारीरिक-दृष्टि में भी जिसमें चेतना नहीं हैं, उसे ही मृत कहा जाता है। जब तक चेतन विद्यमान है, जीवन की सम्भावना विद्यमान है। उसे स्थिति में, भले ही कुछ समय के लिये व्यक्ति निष्क्रिय, निढाल हो गया हो, उसे मृत नहीं कहा जाता। चेतना का अभाव ही मृत्यु कहलाता है।
श्वसन-क्रिया और हृदय-गति का अवरोध, नाड़ी की गति रुकना, रक्त-संचार समाप्त दिखना, ये सब जीवाणुओं के आन्तरिक-क्षय के लक्षण हैं, मृत्यु की सम्भावना के द्योतक हैं। किन्तु जब तक मस्तिष्क में चेतना विद्यमान हैं, इस क्षय को रोकने की सम्भावनाएँ भी पूरी-पूरी हैं। उसी प्रकार जैसे देह-व्यापार में, पेट और प्रजनन के प्रयोजनों में लिप्त रहना ही आध्यात्मिक-दृष्टि से निष्क्रियता और क्षरण का द्योतक तो है, किन्तु तो भी मानवीय-चेतना के जाग उठने और ऊर्ध्वगामी बन सकने की सम्भावनाएँ उस स्थिति में भी बनी रहती हैं।
इसीलिये अब शरीर-शास्त्री किसी व्यक्ति की “सेण्ट्रल नर्वस-सिस्टम” से संचालित समस्त जीवन-क्रियाएँ बन्द होने पर भी उसे तब तक मृत नहीं मानते, जब तक मस्तिष्क में चेतना की विद्युत-तरंगें ही नहीं समाप्त हो जाती। ऐसे अनेक प्रमाण भी अब तक सामने आ चुके हैं कि “सेरिब्रल डेथ” यानी शारीरिक गतिविधियों की समाप्ति के बाद भी, व्यक्ति पुनः जीवित हो उठे, क्योंकि उनके मस्तिष्क में चेतन-विद्युत अवशिष्ट थी।
सन 1936 का 14 नवम्बर। पुलिस, न्यूयार्क के सेट-विन्सेण्ट चिकित्सालय में हैरिस दायले नामक व्यक्ति को पोस्टमार्टम के लिये ले गयी। क्योंकि उसकी मृत्यु का कारण अज्ञात था।
डाक्टर ग्लैडिम पोस्टमार्टम-कक्ष में पहुँचे। वहाँ नर्सों व सहायकों ने सारी तैयारी कर रखी थी। ग्लैडिस ने पोस्टमार्टम शुरू किया। पहला चीरा लगते ही हैरिस हड़बड़ा कर उठ बैठा और डाक्टर की गर्दन धर दबोची। चपरासी और भृत्य उस प्रत्यक्ष भूत को देखते ही सर पर पैर रखकर भागे। डाक्टर की घिग्घी बँध गई। उसकी जीभ तालू से चिपक गई। हृदय का धड़कना बन्द हो गया और आंखें भाव-शून्य हो गई। वह भय की अधिकता से मर गया था। हैरिस पोस्टमार्टम-कक्ष के बाहर आया। बाद में, उसके चीरे के घाव की मरहमपट्टी की गई और एक सप्ताह में वह शहर पूर्ववत् जीवन बिताने लगा।
ऐसी ही एक घटना एडिनबरा में घटी वहाँ एक महिला-कर्मचारियों के सामूहिक-आवास में रहती थी जोजियाना। वह बीमार पड़ीं। फिर मर गई। लोग दफनाने की तैयारी करने लगें। पर वहाँ की संरक्षिका श्रीमती रेमण्ड एक जागरूक और नई-नई जानकारियों से सम्पन्न महिला थी। उन्होंने “क्लीनिकल डेथ” और “सेल्यूलर डेथ” का अन्त्र पढ़ रखा था। वे बोली-”लाश अभी यही रहेगी। जब तक सड़ नहीं जाती। “
जोजियाना का शरीर दस दिन तक यो ही पड़ा रहा। इसके बाद उसमें हलचल हुई। वह उठ बैठी। उसकी मालिश वगैरह की गई। भोजन दिया गया। वह सामान्य जीवन जीने लगी।
भारत में भी गोवा में एक पादरी की मृत्यु के बाद इसी प्रकार जी उठा। उसे दफनाने की तैयारी पूरी हो गई थी। उसका प्रिय भजन गाया जा रहा था। तभी उस मृतक के भी होंठ हिलने लगे। भक्तों ने इसे ईश्वरीय-कृपा से मिला नव-जीवन समझा और चमत्कृत हो उठे।
ये तो हुए ये सौभाग्यशाली मुर्दे, जो जिन्दा-भूत बनने का सुअवसर पा सकें। पर सभी को यह स्वर्णिम सुयोग नहीं मिलता और तब उन्हें कब्र या ताबूत में ही तड़प-तड़प कर मर जाना पड़ता हैं।
20 अप्रैल 1896 के कलकत्ता में अँग्रेज डाक्टर अर्नेस्ट घर में एक प्रीति-भोज का आयोजन किया गया। एक युवक-अफसर फैंक लेजली भी उसमें सम्मिलित हुआ। सहसा, अपनी कुर्सी पर भोजन करते-करते ही उसकी गर्दन एक और झुक गई। उसने दम तोड़ दिया था। उसे कब्रिस्तान में दफना दिया गया। परन्तु उसके सम्बन्धियों का आग्रह था कि उसे ऊटकमण्ड में उस गिरजा-घर के अहाते में दफनाया जाय, जहाँ फ्रैंक के माँ-बाप की कब्र है। लिखा-पढ़ी में समय लग गया। अन्ततः अनुमति मिल गई।
ठीक 1 माह बाद, 20 मई 1896 के दिन उसका ताबूत खोदकर बाहर निकाला गया। शव वही है, इसकी पुष्टि करने के लिये ताबूत खोला गया तो लोग चौंक पड़ें। था तो शव फ्रैंक का ही, पर उसे लिटाया गया था चित्त-वह लेटा था औंधा। कपड़े पहनाये गये थे-नये। अब उसके कपड़े कई स्थानों से फटे थे। हाथ छाती पर क्रास बनाकर रखे गये थे, पर एक हाथ की अँगुलियाँ चबाई हुई थी, दूसरा हाथ यो ही टेड़ा पड़ा था।
स्थिति स्पष्ट थी। ताबूत में बन्द वह युवक दफनाने के बाद जिन्दा हो गया था। वहाँ उसने जाने कब तक हाथ-पैर मारे होंगे। असह्य छटपटाहट और क्रोध से अपना ही हाथ चबा डाला। अन्ततः वही तड़पकर मर गया।
यही स्थिति कुस्तुन्तुनिया की एक कब्र में गढ़े मुर्दे के साथ देखी गई। कब्र में दरारें पड़ गई थी। आशंकित हो उसे खोदा गया। तब पता चला कि बेचारा मृतक जीवित हो उठा था। उसने हाथ-पैर मारे, जिससे चोटें आ गई खून बहने लगा। कब्र तोड़ने की भी उसने पूरी कोशिश की। अन्ततः तड़पकर मर गया।
एक अन्य व्यक्ति अपने वफादार कुत्ते के कारण जिन्दा दफनाये जाने से बच गया। बात मैक्सिको की है। सम्बन्धी तो व्यक्ति को मृत समझ दफनाने की तैयारी करने लगे, पर कुत्ते को बाँध दिया गया। वह रस्सी तुड़ाने की जी-तोड़ कोशिश करता रहा। इधर लोग ताबूत लेकर चले, उधर कुत्ता रस्सी तोड़ने में सफल हो गया। क्रोध से वह स्वामी को यों ही लजा रहे लोगों पर टूट पड़ा। आकस्मिक आक्रमण से ताबूत लोगों के हाथ से गिर पड़ा और टूट गया। उसे पूरी तरह अलग किया गया, ताकि नये ताबूत में बन्द किया जा सके। पर, तब तक मृतक जीवित हो चुका था और कुत्ता खुशी से उछल रहा था।
इन्हीं सब अनुभवों के आधार पर अब चिकित्सकों-वैज्ञानिकों ने यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि जब तक मानव-मस्तिष्क पूर्ण निस्तब्धता न आ जायें; उसे पूरी तरह मृत नहीं कहा जा सकता। भले ही उसके हृदय की धड़कन बन्द हो गई हो, किन्तु-यदि मस्तिष्क से विद्युत-तरंगें उठ रही हैं, तो मृत्यु नहीं मानी जा सकती।
मूर्च्छा से मृत व्यक्तियों में जीवन की सम्भावना प्रायः बनी रहती हैं। चिकित्सक मृतकों का ई.ई.जी. (इलेक्ट्रो एन्सफालो ग्राम) लेते हैं, यानी मस्तिष्क की विद्युत-तरंगों का परीक्षण करते हैं। यदि ई.ई.जी. की रीडिंग फ्लैट यानी ‘सीधी रेखा’ में आये तो इसका अर्थ है कि मस्तिष्क में विद्युत-तरंगें उठ रही हैं और वह व्यक्ति जीवित है। जब तक मस्तिष्क में विद्युत-तरंगें विद्यमान हैं, शरीर में सड़न नहीं पैदा होती। भले ही साँस या हृदय की धड़कने बन्द दिख रहीं हों। कोशाओं को प्राणवायु न मिलने से उनमें मूर्च्छा तो आ जाती है, परन्तु सजीवता विद्यमान रहती है।
इस प्रकार मृत्यु की परम्परागत मान्यताएँ अब रद्द हो चली हैं। जीवन का मूल सम्बन्ध नाड़ी, साँस, हृदय की गति से नहीं, मस्तिष्क में चेतना की उपस्थिति से है। मस्तिष्क ही मनुष्य के समस्त सम्वेदनों का भी केन्द्र है, और हलचलों का भी। जब तक मस्तिष्क सक्रिय है, तब तक मनुष्य जीवित है।
तो क्या मस्तिष्क ही जीवन का केन्द्र है? उत्तर स्पष्ट है। मस्तिष्क नहीं, उसमें क्रियाशील चेतना ही जीवन का स्त्रोत है। मस्तिष्क तो मुर्दे में भी रहता है। पर चेतना के अक्षय स्त्रोत से जब उसका सम्बन्ध टूट जाता है, तब फिर जीवन की कोई भी सम्भावना नहीं बचती। जब तक उस चेतना-समुद्र से सम्बन्ध कायम है, तभी तक जीवन है।
यह सम्बन्ध सिर्फ शरीर के तल पर नहीं, अन्तःकरण के तल पर भी जागृत रहे, जीवन का लक्ष्य सामने रहें, और उसके अनुरूप गतिविधियां अपनाई जाती रहें, तभी सचमुच जीवित कहा जाना चाहिए। लक्ष्यविहीन गति-विधियों में घिसट रही जिन्दगी तो लाश ढोने का ही पर्याय है।
मनुष्य शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आत्मिक शक्तियों का भण्डार है। इन्हीं के बलबूते पर आज उसने ज्ञान, विज्ञान में आश्चर्यजनक प्रगति की है-आत्मा, परमात्मा जैसे सूक्ष्म अध्यात्म तत्वों का अनुशीलन किया है। जिन लोगों ने इस शक्ति को अपव्यय से बचाकर एक ही दिशा में लगा दिया, उन्होंने महान सफलताएँ प्राप्त की। वे ऋषि, वैज्ञानिक, विद्वान, महापुरुष तथा समाज सेवी के रूप में प्रसिद्ध हुए और विश्व मानव को बहुत अनुदान दिया।
यह शक्ति सभी मनुष्यों में है। अनजाने में हम उसका अपव्यय करते रहते हैं तथा उसका सदुपयोग नहीं कर पाते। कुछ व्यक्ति बैठे-बैठे यों ही अपनी टाँगें हिलाते रहते है। कुछ बैठे-बैठे टेबल पर या अपने अंगों पर ही तबला बजाने जैसी क्रिया करते रहते हैं। कुछ अपनी उँगलियाँ तोड़ते हैं, कुछ सिर झटकते हैं, कुछ कन्धे उचकाते हैं तो कोई सीटी बजाते हैं। उन लोगों के पास करने को कुछ काम नहीं है, पर उन्होंने अपनी शक्ति को खर्च करने का आवश्यक काम हाथ में ले लिया है। हम में से प्रत्येक में ऐसी आदतें हो सकती हैं, जिनकी ओर कभी हमारा ध्यान नहीं जाता।
यों देखने में यह साधारण-सी बात हो सकती है किन्तु शक्ति का थोड़ा-थोड़ा अपव्यय भी जीवन भर में जाकर के कितना बड़ा हो जाता है। बूँद-बूँद करके घड़ा भर जाता है और बूँद-बूँद करके वह खाली भी हो जाता है। यह क्रिया-कलाप बूँद-बूँद करके घड़ा खाली करने जैसा ही है।
इन क्रिया-कलापों से कितनी शारीरिक तथा मानसिक शक्ति का अपव्यय होता है, इसका हमें भान ही नहीं रहता। यह क्रम अपने आप होता है इस कारण हम उस पर ध्यान न दें किन्तु हम जो कुछ करना चाहते है। उसके लिये सर्वप्रथम मस्तिष्क को क्रियाशील होना पड़ता है। वह ज्ञान तंतुओं को आदेश देता है कि अमुक काम करने के लिये साँस पेशियों तक मेरा आदेश पहुंचाओ। ज्ञान तन्तु उस आदेश को माँस-पेशियों तक पहुंचाते है। फिर उस आदेश की शिरोधार्य करके वह वैसा ही कार्य उपस्थित करती है।
इस प्रकार के कार्य आगे चलकर बार-बार किये जाने से आदत बन जाते हैं। ये आदतें प्राकृतिक न होकर कृत्रिम होती हैं। इनके कारण जिस शक्ति का कोई उप-योग हो सकता था उसे व्यर्थ ही खो दिया जाता है। आवश्यक कार्यों के लिये जब शक्ति का अभाव हो जाता है तो फिर व्यक्ति थकने लगता है। पहले ही अपव्यय न किया जाय तो थकान का प्रश्न ही न उठे।
इस प्रकार मन मस्तिष्क पर भी भावी आशंकाओं तथा निरर्थक कल्पनाओं का भार हम दिन भर ढोते रहते हैं जिनकी आवश्यकता नहीं होती। अपनी कामनाओं को इतना बढ़ा लेते है कि शरीर तन्त्र को एक क्षण का भी विश्राम नहीं मिल पाता। स्नायुविक तनाव बढ़ने का यही कारण होता है।
शारीरिक शक्ति का अपव्यय रोका जा सके तथा मानसिक उद्वेगों से बचा जा सके तथा मनुष्य एक शान्त सरोवर की तरह निस्पन्द बना रहकर थोड़े ही समय में पूर्ण विश्राम कर सके तो खोयी हुई शक्ति पुनः प्राप्त की जा सकती है। उसके लिए यह आवश्यक नहीं कि बिस्तर बिछाकर ही लेटा जाय। रात्रि में तो शयन करके आपनी बैट्री को चार्ज किया ही जाता है, पर दिन में भी ऐसे अवसर कम नहीं आते जब व्यक्ति कुछ समय तक अपने इन अवयवों को पूर्ण विश्राम देकर उनकी शक्ति को पुनः अर्जित कर सकने का अवसर प्रदान कर सकता है।
अनजाने ही हम अपनी इस शक्ति का अपव्यय करते रहते है इससे हमें बचना ही चाहिये।
किन बातों में मनुष्य सृष्टि के अन्य प्राणियों की तुलना में श्रेष्ठ है? इस प्रश्न का समाधान खोजने से पूर्व उसकी विशेषताओं को सृष्टि के दूसरे प्राणियों की विशेषताओं से तुलना कर देख लेना चाहिए आरम्भ में शरीर बल को ही लें। शारीरिक शक्ति की दृष्टि से मनुष्य संसार के अधिकाँश प्राणियों की तुलना में कमजोर ही नहीं नगण्य भी है। छोटे-छोटे जानवरों तथा कीड़े मकोड़ों चिड़ियों जैसे पक्षियों को छोड़कर और कोई प्राणी नहीं है जिनसे वह अधिक शक्तिशाली हो। भागने में वह एक खरगोश से भी पीछे रह जाता है, लड़ाई का बाहुबल आज-माने का मौका आये तो एके छोटा-सा कुत्ता भी उसे पराजित कर सकता है। अच्छे से अच्छा पहलवान भी शेर के सामने टिक नहीं सकता। यह बात और है कि कुछ लोग लम्बे समय तक अभ्यास करने के बाद इन क्षेत्रों में कीर्तिमान स्थापित कर लें।
कुत्ते की घ्राणशक्ति, चमगादड़ की श्रवणशक्ति चील की देखने की क्षमता और साँप की स्पर्श चेतना जो धरती के बहुत सूक्ष्म कम्पन को भी अनुभव कर लेता है- आदि इंद्रियों की शक्ति-सामर्थ्य में मनुष्य इनकी तुलना में कही नहीं ठहरता। कुत्ता मीलों दूर की गंध पहचान लेता है और बहुत देर बाद भी वस्त्रों, उपयोग की गयी वस्तुओं में अवशिष्ट गन्ध को पहचान कर उसके उपयोग कर्त्ता को पहचान लेता है। इसे स्मरण शक्ति भी कहा जा सकता है कि वर्षों से बिछुड़ने और मीलों दूर पहुंच जाने के बाद भी कबूतर अपने स्थान पर बिना किसी से रास्ता पूछे पहुंच जाता है। साँप के लिए कहते हैं कि उसके कान नहीं होते, पर वह धरती पर चलने वाले पैरों से पृथ्वी में उठने वाले कम्पन को त्वचा से पहचान कर सुरक्षित स्थान पर पहुंच जाता है।
शरीर को साधने और उसका संतुलन बनाने में तो मनुष्य बन्दर से भी मात खा जाता है। वर्षों तक अभ्यास करने के बाद सरकस के कलाकार एक झूले पर झूलते हुए दूसरे झूले पर पहुंच जाते हैं किन्तु बन्दर यदि सोते-सोते भी किसी डाली से अकस्मात् गिर जाय तो अर्धनिद्रित अवस्था में भी वह नीचे वाली टहनी को तुरन्त पकड़ लेता है और अपनी रक्षा कर लेता है।
शारीरिक शक्ति और संतुलन साधने में तो वह अपने से क्षुद्र कितने ही प्राणियों से पिछड़ा हुआ है। फिर क्या यह कहा जाय कि मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो समूह बना कर समाज में रहता है और सह जीवन का सिद्धान्त अपनाता है। इस मामले में भी वह झुण्ड बना कर रहने वाले हरिणों, जंगली सुअरों हाथियों यहाँ तक कि चींटियों से भी पिछड़ा हुआ है। कई जंगली जानवर समूह बना कर रहते और सामूहिक जीवन व्यतीत करते हैं। इस जीवन शैली के वह इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि अकेले रहना उन्हें पसन्द ही नहीं आता। ऐसा भी नहीं है कि वे समूह में रहकर केवल अपना ही स्वार्थ पूरा करते हों, अपने कमजोर साथियों और आश्रित बच्चों की वे खूब चिन्ता करते हैं और समूह के किसी एक सदस्य पर आपत्ति आते ही मिल कर उस संकट का मुकाबला करते हैं।
सामूहिक जीवन का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण चींटियों को कहा जा सकता है। बहुत छोटी-सी और क्षुद्र प्रतीत होने वाली चींटियां आपस में मिलकर समझौता कर लें तो साँप से लेकर हाथी तक को परेशान कर डालती हैं। मिल-जुल कर काम करने और संगठित शक्ति का महत्व समझने में मधु मक्खियाँ भी बेमिसाल हैं जो अलग-अलग जाकर पुष्पों से मधु संचित करती हूँ और एक छत्त में ले जाकर संग्रहित करती हैं।
फिर क्या बुद्धि की तुलना में वह अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ है? इस प्रश्न का उत्तर जानने से पहले थोड़ा ठहरना होगा। निस्संदेह मनुष्य को जो बुद्धि बल मिला है वह अन्य किसी जीव जंतु के पास नहीं है। उससे भी बड़ी बात यह कि वह अपने बुद्धिबल का उपयोग स्वतंत्र रूप से किसी भी दिशा में कर सकता है जबकि उन प्राणियों को जिन्हें थोड़ी बहुत बुद्धि मिली है प्रकृति की प्रेरणा तक ही सीमित रहने की छूट मिली हुई है।
सभ्यता और विज्ञान के स्वतंत्र प्रयोगों द्वारा प्राप्त की गयी वर्तमान अवस्था मनुष्य की बुद्धिमत्ता का ही परिणाम है। इसी बुद्धिमत्ता के कारण उसने ऐसे-ऐसे दांव पेच सीखे जिनके द्वारा वह अपने से शक्तिशाली प्राणियों को भी नियंत्रित कर लेता है, कोयल से भी अधिक मीठे स्वरों का संगीत जब चाहे तब सुन सकता है, चील को दिखाई देने वाली दूरी से भी असंख्य गुनी दूरी की वस्तुएं दूरबीन द्वारा स्पष्ट देख लेता है और बारीक से बारीक चीजों को, जिन्हें सृष्टि का कोई प्राणी नहीं देख पात, देख लेता है।
इसे मस्तिष्क का ही कमाल कहना चाहिए कि मनुष्य ने अपने से बलवान प्राणियों पर भी सहज ही विजय प्राप्त करने वाले अस्त्र-शस्त्र बना लिये। खरगोश, हिरन और अन्य तेज दौड़ने वाले पशुओं से भी अधिक तीव्र गति से दौड़ने वाली कारें बना लीं तथा ऐसे अंतरिक्षयान निर्मित कर लिये, जिनकी बराबरी कोई भी पक्षी नहीं कर सकता।
निस्संदेह बुद्धिबल के कारण मनुष्य ने अन्य सभी क्षेत्रों में सभी प्राणियों को पीछे छोड़ दिया। परंतु यहीं एक क्षण रुकना पड़ता है, यह जानने के लिए कि मस्तिष्कीय क्षमता में वह, स्वयं अपने बनाये यांत्रिक उपकरणों से पिछड़ गया है। औद्यौगिक क्रांतियों ने जिस तरह मनुष्य की मांसपेशियों का काम मशीनों को सौंप कर उसे श्रम से मुक्त करना आरंभ किया उसी तरह अब एक ‘कम्प्यूटर क्रांति’ की संभावना भी व्यक्त की जा रही है, जिसके बाद मनुष्य सोचने समझने और मानसिक श्रम के तमाम कार्य उन कम्प्यूटरों को सौंप कर निश्चिंत हो जायेगा।
इलेक्ट्रान की तरंगों- अर्थात् परमाणु की नाभि के चारों ओर चक्कर लगाने वाले ऋण आवेश वाले कणों- का नियमन कर उनका उपयोग इस मशीनी मस्तिष्क में किया जाता है। आरंभ में जब कम्प्यूटरों को प्रचलन हुआ था तो मामूली गणना करने वाले कम्प्यूटरों का आकार एक बड़े कमरे के बराबर होता था। शुरू-शुरू के रेडियो सेट भी बहुत भारी भरकम थे, जिन दिनों उनका प्रचलन हुआ था उन दिनों किसी को यह कल्पना भी नहीं थी कि किसी दिन इन्हें जेब में रखकर भी घूमा जा सकता है। लेकिन विज्ञान के क्षेत्र में इलेक्ट्रानिक्स की सूक्ष्मता का दौर आरंभ होने के बाद जेबी ट्रांजिस्टरों के साथ जेबी कम्प्यूटरों की भी कल्पना की जाने लगी। इस दिशा में कुछ जापानी वैज्ञानिकों ने कार्य किया तो चौथाई वर्ग इंच के आकार वाले सिलिकॉन चिप-एक तत्व जो 2600 डिग्री सेंटीग्रेड ताप को भी सहन कर जाता है, ऐसे कम्प्यूटर बनाने की संभावना मूर्त होती दिखाई दी अर्थात् अंगूठी जितना बड़ा कम्प्यूटर जेब में रखना संभव हो गया।
अंगूठी के बराबर कम्प्यूटर तैयार कर लिये गये हैं और ये केवल संगणक का- जोड़, बाकी, गुणा, भाग का ही काम नहीं करते बल्कि 32 हजार तरह के मस्तिष्कीय कार्य करने लगे हैं। अंगूठी जितने आकार के कम्प्यूटर से अगले दशक तक 10 लाख विभिन्न काम लेने की बात सोची जा रही है। इनका मूल्य भी कोई विशेष नहीं होगा। आरंभ में जिस प्रकार बड़े-बड़े रेडियो सेट 700-800 रुपये में बिकते थे परन्तु अब 50-60 रुपये तक के जेबी ट्रांजिस्टर बनने लगे हैं। उसी प्रकार इन कम्प्यूटरों का निर्माण व्यय भी बहुत कम रह जायेगा।
हाल ही में एक ऐसे टैक्सी मीटर का आविष्कार भी हो गया है जो किराया बताने के साथ-साथ प्रत्येक सवारी पर लगने वाला किराया भी बता देता है। निकट भविष्य में कारों के ऊंघते ड्रायवरों को जगाने, नशे की हालत में या मोड़ों पर सचेत करने तथा इंजन की खराबी मालूम करने वाले कम्प्यूटर उपकरण भी तैयार हो रहे हैं। इसी प्रकार पोर्टेंबल टेलीफोन भी तैयार हो जायेंगे जिन्हें सुविधानुसार जेब में डाल कर कहीं भी ले जाया जा सकेगा और किसी भी व्यक्ति में जब चाहे संपर्क किया जा सकेगा। फिर चिट्ठी लिखकर डाक में डालने की भी आवश्यकता नहीं रहेगी, यहाँ चिट्ठी लिखकर कम्प्यूटर को सौंपी कि तत्क्षण अभीष्ट पते पर उसी प्रकार की चिट्ठी छप कर बाहर आ जायेंगी। कार्यालयों में फाइलों का अंबार लगाने की आवश्यकता नहीं रहेगी क्योंकि सारे भारत के सभी कार्यालयों में जितने रिकार्ड हैं वे सभी रिकार्ड एक छोटे से कम्प्यूटर में सुरक्षित रखें जा सकेंगे। फाइलों के नष्ट होने, खोने या समय पर न मिलने का भी डर रहता है परन्तु कम्प्यूटर से जब भी चाहें बटन दबाते ही अभीष्ट जानकारी प्राप्त की जा सकेगी।
कम्प्यूटर की मदद से बच्चों को पढ़ाने, रोगियों की देख भाल तथा इलाज करने के काम भी ले पाना सम्भव हो गया है। यदि ऐसे कम्प्यूटर सहज सुलभ हो गये और निश्चित है कि अगले कुछ दशकों में ही वे सुलभ हो जायेंगे तो न अध्यापकों की आवश्यकता रह जायेगी न डॉक्टरों की वर्षों तक पढ़ाने और ट्रेनिंग देने के बाद कोई व्यक्ति अध्यापक बनता है और ढेरों रुपये तथा वर्षों का समय खर्च कर डॉक्टर बना जा सकता हैं, परन्तु इन मशीनी अध्यापकों तथा मशीनी डॉक्टरों को दो चार हजार रुपये खर्च कर अपने घर में ही रखा जा सकेगा तथा आवश्यकता पड़ने पर मनुष्य अध्यापकों व चिकित्सकों से भी अच्छी व प्रामाणिक सेवायें प्राप्त की जा सकेंगी। डॉक्टरों के पास जाने पर तो यह डर रहता है कि वह रोगी को ठीक करने में नहीं बल्कि लाभ कमाने में रुचि रखता है इसलिए तुरन्त ठीक करने वाली दवा नहीं भी देगा। कम्प्यूटर इस आशंका की सम्भावना को ही निर्मूल कर देंगे क्योंकि इन्हें न फीस का लोभ रहेगा न लाभ कमाने का आकर्षण। वे तो अपने मालिक की निस्वार्थ सेवा करेंगे और सही परामर्श, उचित इलाज ही बतायेंगे।
जिन किन्हीं भी तकनीकी दक्षताओं के कारण मनुष्य अपने आपको बुद्धिमान समझ बैठा है और इस कारण अपने आपको सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी समझ रहा है ये दक्षताएं तो कम्प्यूटर में ही विकसित हो रही है। दूसरे शब्दों में मनुष्य की बुद्धिमता का दम्भ उसका स्वयं का बनाया हुआ मशीनी मस्तिष्क ही तोड़ चुका है और अगले दिनों वह मस्तिष्क रेडियो, ट्राँजिस्टर की तरह सर्व सुलभ हो जायगा।
बुद्धि के क्षेत्र में भी मनुष्य हार गया। मजे की बात यह है कि उसे किसी दूसरे प्राणी ने नहीं हराया बल्कि स्वयं उसके द्वारा निर्मित यंत्र ने ही उसे यह शिकस्त दी। तो क्या यह, सिद्ध हो गया कि मनुष्य के पास अपने आपको सर्वश्रेष्ठ कहने के लिए कोई आधार बचा ही नहीं हैं? शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति और बुद्धि बल के रूप में तो निश्चित ही ऐसा कोई आधार नहीं है जिसके कारण वह अपने आपको सर्वश्रेष्ठ कह सकें।
परन्तु जिन आधारों पर मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ कहा गया है व शाश्वत हैं। यह अलग बात है कि उस आधार को भुला दिया गया और श्रेष्ठता के दम्भ को बनाये रखने के लिए दूसरे सस्ते कारण खोज लिये गये। वे आधार, वे मूल्य शाश्वत हैं। मनुष्य उन्हें आज भी अपनाये तो परमात्मा के युवराज होने का आत्मगौरव यथा-स्थान है। आवश्यकता इस बात की है कि उन मूल्यों को पहचाना जाय। प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि क्या हैं वे मूल्य? सहज उत्तर है जिस उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही नष्ट न किया जाय वरन् मानवीय जीवन को सार्थक बनाने वाले आदर्शों को ही अपनाया जाय। अब तक यह बात इतिहास द्वारा ही प्रमाणित थी कि वे ही लोग सार्थक जीवन व्यतीत करने हैं जो अपने लिए नहीं औरों के लिए, स्वार्थों के लिए नहीं आदर्शों के लिये जिये हैं। अब यह बात विज्ञान सिद्ध भी हो गयी है कि बलवान् और बुद्धिमान होना उतना अर्थ-पूर्ण नहीं है जितना कि मनुष्य होना। मनुष्यता को तिलाँजलि देकर मनुष्य का बलवान होना भी निरर्थक है और बुद्धिमान होना भी। मनुष्यता का वरण करने पर ही मनुष्य का मनुष्य होना ही गरिमामय है अन्यथा मनुष्य बेचारा एक निरीह सबसे अशक्त प्राणी है।
वाराणसी नरेश ब्रह्मदत्त की अपने राज पुरोहित दव-मित्र पर टूट श्रद्धा और अनन्य निष्ठा थी। उनके व्यक्तित्व में विद्वता, योग्यता और प्रतिभा के स्वर्ण के साथ शील, सदाचार और नैतिकता की सुगन्ध भी व्याप्त थी। अतः राजा की यह निष्ठा और श्रद्धा सहज स्वाभाविक थी। राजा की ही बात नहीं, वाराणसी राज्य के ही नहीं अन्यान्य राज्यों के विद्वानों में उनका अच्छा सम्मान और वहाँ की जनता में उनके प्रति अपार भक्ति भाव था। वे जहाँ भी जाते जन-जन उनके आगे श्रद्धानत् हो जाया करता था।
वाराणसी नरेश का तो उनसे निकट का संपर्क था। वे तो उनके उच्च उदात्त चरित्र और प्रखर व्यक्तित्व से इतना अधिक प्रभावित रहते थे। भला ऐसे ब्राह्मण के प्रति कौन श्रद्धावान न होता।
राजपुरोहित देवमित्र के मन में एक दिन यह प्रश्न उठा कि उनके प्रति राजा और प्रजा की जो श्रद्धा और सम्मान है उसका कारण क्या है? वे पाण्डित्य, शास्त्र ज्ञान रूप और व्यक्तित्व की प्रखरता को लेकर मेरा सम्मान करते हैं या मेरे शी, सदाचरण और नैतिकता के कारण? वे इस प्रश्न का उत्तर चाहते थे। उन्होंने इसका उत्तर पाने के लिये कुछ दूसरा ही आचरण किया, अगले दिनों।
एक दिन राजसभा विसर्जन पर राजपुरोहित देवमित्र अपने घर लौट रहे थे, उन्होंने राजकोष में से एक काषार्पण (सिक्का) उठा लिया। कोषाध्यक्ष ने राज पुरोहित का यह अनुचित आचरण देखा, पर उसे अनदेखा कर दिया। सम्भवतः वह यह सोचकर रह गया हो कि पुरोहित जी ने किसी प्रयोजन विशेष से काषार्पण उठाये है सो कल उस प्रयोजन को स्पष्ट कर देंगे।
दूसरे दिन भी पुरोहित ने राजसभा से लौटते हुए पहले दिन की तरह ही काषार्पण उठा लिये। उस दिन भी कोषाध्यक्ष ने उनके इस आचरण का वैसा ही अर्थ लगाया और उनके इस आचरण को अनदेखा कर दिया। पर तीसरे दिन भी जब पुरोहित ने राजसभा की समाप्ति पर घर जाते समय मुट्ठी भर काषार्पण उठा लिये और वे अपनी राह चलने को उद्यत हुए तो कोषाध्यक्ष ने लपक कर उनका हाथ थाम लिया और सैनिकों की ओर उन्मुख होकर बोला-”यह धूर्त चोरी करता है इसे न्याय पीठ में उपस्थित करो”
पतित आचरण के कारण राज पुरोहित के साथ राज्य कर्मचारियों ने वैसा ही व्यवहार किया जो एक चोर के साथ किया जाता है। उनके हाथ बाँधकर नंगे पाँव राजमार्ग पर पैदल ही ले जाया गा न्यायालय में उन्हें राजा के सम्मुख न्याय के लिये उपस्थित किया गया। राजा ने उनसे उसी प्रकार प्रश्न पूछे, कोषाध्यक्ष से पूछताछ की और राज पुरोहित के दुष्कर्म पर आश्वस्त होकर निर्णय सुनाया-”यह व्यक्ति चोर है इसने राजकोष से एक बार नहीं तीन-तीन बार धन चुराया हैं इसके दक्षिण हस्त की एक अंगुली काट ली जाय ताकि वह आगे से सचेत रहे और ऐसे कुकर्म से विरत ही रहे।”
राजा के इस निर्णय से राज पुरोहित को अपने प्रश्न का उत्तर मिल गा। उन्होंने राजा से कहा, अपने धीर गम्भीर स्वर में-”राजन्! मैं चोर नहीं हूँ। मैंने चोरी किस प्रयोजन से की थी उसे मैं अब आपके सामने प्रकट करता हूँ। मैं यह जानना चाहता था कि आप मुझे जो श्रद्धा, जो सम्मान दिया करते थे उसकी सच्ची अधिकारिणी मेरी योग्यता और विद्वता थी या मेरा शील, सदाचरण और नैतिकता। आज यह स्पष्ट हो गया कि विद्वता, ब्राह्मणत्व और रूप का अपना महत्व तो है, पर यदि वह शील, सदाचरण और नैतिकता में च्युत हो जाय तो उसकी ये क्षमताएँ उसकी रक्षा नहीं कर सकती। शील सदाचरण और नैतिकता ही मेरे सम्मान का मूल कारण थी। उनके च्युत होते ही मैं दण्ड का अधिकारी बन गया।”
प्रेम इस धरती का अमृत है। वह मनुष्य का जीवन-सार है, रस है। जितना ही वह विकसित होगा, उतनी ही सुख-शांति में वृद्धि होगी।
रूखा, नीरस, एकाकी मनुष्य न तो स्वयं ही शाँति-प्रसन्नता पाता, न हीं दूसरों को उसके सामीप्य से शाँति मिलती है। वह किसी का नहीं। उसका कोई नहीं। वह स्वयं से डरता है, स्वयं ही जलता है और संकीर्णता की आँच में झुलस जाता है। हाहाकार सूनापन पीड़ा-दायक रिक्तता, डरावना रूखापन और सब कुछ खो चुकने जैसी हताशा ही उसके नियति है। प्रेम-भावना के अभाव से बड़ा अभाव और क्या होगा?
मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने वाली वास्तविक शक्ति प्यार ही है। विचारक राल्फलिन्टन ने लिखा है कि “मनुष्य की एक बड़ी जरूरत यह है कि वह अपने प्रति दूसरों से प्रेम पूर्ण आवेग चाहता है।” प्रेम की भूख को शारीरिक आवश्यकता नहीं माना जा सकता। छोटे शिशु को तो अपनी शारीरिक जरूरतों के लिये ही दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है, इसलिये उसके मातृ-प्रेम को शारीरिक आवश्यकता से जुड़ा भी मान सकते है। पर वयस्क व्यक्ति बिना किसी शारीरिक चाह के भी दूसरे मनुष्यों में रुचि लेते हैं। भले ही इसका विकृत रूप ताक-झांक करने, मीन-मेख निकालने, छिद्रान्वेषण के रूप में सामने आता हो, किंतु मूलरूप में यह मनुष्य के भीतर की प्रेम की भूख ही है, जो उसे दूसरों के प्रति संवेदनात्मक स्तर पर जागरूक बनाती है। यों, जिसे सभ्य-जीवन कहते हैं, उसमें प्रेम की प्रत्यक्ष आवश्यकता नहीं दिखती। पुलिस का सिपाही और न्यायाधीश, इंजीनियर और मजदूर, बाबू और चपरासी, व्यापारी और ग्राहक आपस में बिना प्रेम के भी अपना-अपना कार्य सुचारु रूप से कर सकते हैं। किंतु यह उनके जीवन का एक ही पक्ष है। उनमें से प्रत्येक को ऐसे लोगों की आवश्यकता महसूस होती है, जो उनके जीवन में गहरी रुचि ले यानी प्रेम करे। पति-पत्नी, प्रेमी-प्रेयसी में शारीरिक आकर्षण होने पर भी उनके भीतर कभी भी मात्र शारीरिक और भौतिक आकांक्षाएं ही नहीं रहतीं, इनसे परे भी बहुत कुछ रहता है। इसलिये उसे प्रेम की छाया या प्रेम की एक छोटी झलक तो कहा ही जा सकता है। इस छाया या झलक की प्रेरणा कितनी प्रबल होती है, यह सभी जानते हैं। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रेम वस्तुतः कितना उल्लासपूर्ण और कितना शक्तिशाली हो सकता है। वह कितनी अधिक सक्रियता और प्रगति की प्रेरणा दे सकता है।
प्रेम आत्मा की प्रकृति और प्रवृत्ति है। वह आंतरिक विकास ही स्वाभाविक अंतःप्रेरणा है। ‘स्व’ के निरंतर विस्तार की प्रक्रिया है। आरंभिक क्रम में वह स्त्री, पुत्र मित्र-संबंधी, श्रेष्ठ पुरुषों के माध्यम से विकसित होता है। उसकी सार्थक परिणति विश्व-प्रेम, ईश्वर प्रेम के रूप में होती है। प्रेम का स्फुरण बढ़ते-बढ़ते संपूर्ण अंतःकरण को ओत-प्रोत कर लेता और चिंतन एवं कर्तृत्व का मुख्य आधार बन जाता है।
प्रगति-पुरुषार्थ, इच्छा की तीव्रता पर निर्भर करता है। इस इच्छा का मूल उद्गम प्यार ही है। अंतःकरण स्वयं को तो देख नहीं पाता। अपना रस खुद नहीं चख पाता। अतः अपनी श्रेष्ठता को देखने और सरसता को चखने के लिये वह किसी माध्यम को चुनता है। संस्कार और प्रवृत्ति के अनुसार कोई वस्तु, व्यक्ति या दिशाधारा लक्ष्य बन जाती है। वहीं प्रिय लगने लगती है। उसे पाने, उस दिशा में बढ़ने और उससे एक रूप हो जाने की प्रबल एवं उत्कृष्ट उमंग उठने लगती है। इस उमंग को ही उस वस्तु, व्यक्ति या लक्ष्य से प्यार हो जाना कहते हैं। इस प्रकार वस्तुतः प्रेम आत्मा की उमंग और रस है। आनंद और उल्लास उसी के स्वाभाविक गुण-धर्म हैं। उस उमंग की हर लहर आनंद, उल्लास और पुरुषार्थ-प्रेरणा के रूप में संपूर्ण व्यक्तित्व को हिलोर जाती है, भिगो डालती है।
सृजन और आनंद की अनंत शक्ति प्रेम में भरी पड़ी है। जिस प्रयोजन से गहरा प्यास हो जाता है, उसे उपलब्ध करने के लिये व्यक्ति के भीतर से गजब की शक्ति फूट पड़ती है। फरहाद ने शीरीं को पाने के लिये ऊंचे पहाड़ को काटकर नगर तक नहर खोद डाली थी। जबकि सामान्यतः यह काम एक आदमी के बूते का है नहीं। किसी भी बड़े वैज्ञानिक, अन्वेषक या महामानव के कार्यों को देखा जाय तो वे ऐसे ही असंभव प्रतीत होने वाले और आश्चर्यजनक लगेंगे। अभीष्ट प्रयोजन से प्रगाढ़ प्यार ही उनमें यह असामान्य शक्ति भर देता है। उस कार्य में तल्लीन होने में उन्हें अकथ आनंद मिलता है। इस प्रकार आनंद और शक्ति दोनों प्रेम से जुड़े हैं। सृजन और उपलब्धि वस्तुतः प्रेम ही प्रतिक्रिया का ही दूसरा नाम है।
स्कूल जाने वाले छोटे बच्चे को जब तक विद्या का महत्व नहीं ज्ञात होता और विद्यार्जन के प्रति उसके मन में प्यार नहीं जागता, वह स्कूल के नाम से ही बिदकता है। उसी बालक को विद्या से प्यार हो जाने पर वह दिन-रात मेहनत करने लगता है। यह मेहनत भौतिक लाभों के लिए नहीं की जाती। ऐसे लोगों की कमी नहीं, जिनके मन में ज्ञानार्जन के लक्ष्य से इतना गहरा लगाव-प्यार था कि- भौतिक दृष्टि से हर प्रकार का घाटा उठाकर भी वे दिन रात विद्याध्ययन में ही जुटे रहे। भले ही बाद में उनके अगाध ज्ञान के कारण उनका सम्मान हुआ हो, किंतु प्रायः जीवन भर भौतिक दृष्टि से उन्हें घाटा ही उठाना पड़ा और असफलताएं ही झेलनी पड़ीं। अतः उनके विद्या-प्रेम को लाभ-हानि का आकर्षण नहीं कहा जा सकता। वह तो अंतःकरण का आकर्षण है। इसके विपरीत, जिन्हें अध्ययन-ज्ञानार्जन से प्यार नहीं होता, वे उच्च अध्ययन से ऊंची ठाटदार नौकरी पाने का प्रत्यक्ष लाभ होने और सभी साधन तथा अवसर अनुकूल रहने पर भी पढ़ाई के लिये मेहनत नहीं कर पाते। यद्यपि उससे मिलने वाले लाभों के प्रति उनके मन में तेज ललक बनी रहती है। वे उनसे विमुख और वैराग्य-संपन्न थोड़े ही होते हैं। इससे स्पष्ट है कि लाभ-हानि का आकर्षण सक्रियता की वैसी प्रेरणा नहीं देता, जैसी अंतरंग के आकर्षण से मिलती है। आदर्शों, उत्कृष्टताओं से होने वाले प्रेम में तो सांसारिक दृष्टि से प्राय हानि ही उठानी पड़ती है। देश के लिये प्राण न्यौछावर कर देने वाले लाखों लोगों को आज कोई जानता तक नहीं। अपने जीवन में भी उन्हें कोई भौतिक लाभ नहीं मिला। तो भी देश-प्रेम ने उनमें वह उमंग भर दी है कि वे हंसते-हंसते सर्वस्व उत्सर्ग कर बैठे। समाज सेवकों को प्रायः उपेक्षा, अपमान और अभावों तक का सामना करना पड़ता है। पर लोक-सेवा के लक्ष्य से प्रेम के कारण उनके भीतर उल्लास ही लहरें उठती रहती हैं। ईश्वर-भक्ति में प्रत्यक्षतः घाटा ही रहता है, तो भी भगवद्भक्त ईश्वर-प्रेम में निमग्न रहने को ही सर्वोपरि मानते हैं। स्पष्ट है कि प्यार भरी भावनाएं साकार करने की इच्छा व्यक्ति को जो पुरुषार्थ-प्रेरणा देती है, वह लाभ-हानि के विचार से भी बढ़कर प्रेरक होती है।
इस प्रबल प्रेरणा का कारण यही है कि वह अंतरंग की आवश्यकता के संबद्ध होती है। अंतःकरण से जुड़ी प्रेरणा, बुद्धि-प्रेरणा से भारी पड़े यह स्वाभाविक है। वही प्रेम तृप्ति देता है, जो अंतःकरण की आवश्यकता पूरी करे। उसे आनंद-उल्लास से भरे। आत्म-तत्व के विस्तार की जिसमें आकांक्षा जुड़ी हो। वस्तुतः प्रेम एक विशुद्ध अध्यात्म-तत्व है और उससे आनंद-उल्लास तभी तक मिलता है, जब तक उसकी आध्यात्मिकता जागृत रहे। जहां वह मन की चंचलता और इन्द्रियों की खुजली तथा मचलन से जुड़ जाता है, वहां ज्वर-उन्माद, व्यग्रता-व्यथा ही पल्ले पड़ती है। जब नर-नारियों के बीच चल रही वासनात्मक गतिविधियों को ही प्रेम का पर्याय बतलाया जाने लगता है, तब मांसलता के प्रदर्शन, यौन-आकर्षण और रूप-यौवन की उच्छृंखल उमंगें ही प्रेम की आड़ में क्रियाशील रहती हैं। आत्म-तत्व के विस्तार की आकांक्षा उसमें राई रत्ती भर ही रहती है। वासना के पहाड़ के बीच दबी होने पर भी वह अपनी प्रभाव उल्लास के रूप में तो प्रदर्शित करती है, परन्तु धीरे-धीरे वासना का यह प्रवाह शारीरिक आवश्यक बन जाता है। तब उसके पीछे, जोड़-तोड़, सौदेबाजी, झूठे छल और प्रदर्शन ही शेष रहता है। परिणामस्वरूप उल्लास का नाम भी नहीं बच रहता। नशे की उत्तेजना और पतन की ग्लानि का चक्र चलने लगता है। तब प्रेम की रट लगाने पर भी भीतर रिक्तता ही रिक्तता बढ़ती रहती है। क्योंकि तब वह दिमागी फितूर बम चुका होता है।
इन्द्रिय परक सभ्यता के केन्द्र भारतीय शहरों में भी यह बुखार फैल-बढ़ रहा है। दिन-रात प्रेम की बात करने पर भी, इस वासना-व्यापार से सदा अशान्ति, अतृप्ति ही बढ़ती है। प्रेम का नाम लेकर चली जाने वाली मन-मस्तिष्क की कुचालों से यदि जीवन में व्यग्रता-रिक्तता बढ़ती दिखें, तो इसे प्रेम का दुष्परिणाम नहीं कहा माना जा सकता। उस जलन और खीझ, अभाव और अलगाव का कारण प्रेम की प्यास नहीं, प्रेम का मिथ्या-भास और आत्मप्रवंचना है। देह-व्यापार और मनोविकार को प्रेम कह देने भर से वे सत्परिणाम नहीं देने लगेंगे। व्यवहार की मधुरता मात्र भी प्रेम नहीं है। वह तो आदान-प्रदान की सामान्य वृत्ति मात्र है।
प्रेम इससे ऊँची चीज है। वह अन्तःकरण की सही और श्रेष्ठ प्रवृत्ति है। अन्तःकरण में भरें अमृत-रस की अनुभूति की प्रक्रिया ही प्रेम है। इसलिए वह वस्तुतः एक साधना है। साधना के उपकरण व्यक्ति और वस्तुएँ हो सकते हैं, पर वे ही प्रेम का स्रोत नहीं हैं। कुँआ खोदने के लिये गैंती, फावड़ा की जरूरत पड़ती है। पर जल-स्त्रोत कुँए के भीतर से ही फूटता है, उन उपकरणों से नहीं।
इस तथ्य को समझने पर ही प्रेम-साधना सम्भव है। अन्तरंग से निकलने वाले प्रेम-रस का उभार ही साध्य है। यह ध्यान रखकर प्रेम-साधना करने पर ही आत्म-तृप्ति मिलती है। उस प्रेम में कभी भी विफलता नहीं प्राप्त होती। आन्तरिक उल्लास और सच्ची शाँति प्रेम, के विकास के अनिवार्य परिणाम हैं।
केवल अपने लिये ही न जियें, जीवन का यह घृणित-तम उपयोग है कि उसे अपने लिये ही जिया जाय-उससे दूसरे लाभ न उठायें।
जो गाय दूध नहीं देती उसे बंध्या कहते है, जो पेड़ फल नहीं देते उन्हें काट देते हैं। जिस भूमि में उपज नहीं होती उसे हेय दृष्टि से देखा जाता है। फलित न होना बुरा है- जिसमें उत्पादन की सामर्थ्य नहीं उस असमर्थ का दयनीय कहा जाता है।
पर इससे भी बुरा वह है जो उत्पादक होते हुए भी उस लाभ को अपने लिए ही सुरक्षित रखता है, दूसरों को उससे लाभान्वित नहीं होने देता। कहते कृपण अपना धन किसी को भी नहीं देता-यहाँ तक कि मरने के बाद उस भूमि में गढ़े धन की रक्षा करने के लिए सर्प की योनि धारण करता है और वन-विचरण का सुख छोड़कर उसी की चौकसी करता रहता है। यद्यपि वह स्वयं भी उसका कुछ लाभ नहीं लेता, पर दूसरों को-लाभान्वित होने देने की उदारता न होने से उसे अवरोध ही रुचिकर प्रतीत होता है।
जिधर दृष्टि दौड़ाकर देखें, जड़-चेतन जगत में उदारता का नियम काम कर रहा है। हर सत्ता अपनी विभूतियों को दूसरों के लिए बाँटने में मोद मनाती और गौरवान्वित होती है। केवल कुछ कृपण ही इसके अपवाद हैं, वे उपलब्धियों का लाभ स्वयं ही लेते हैं उसमें किसी दूसरे को साक्षी नहीं बनने देते। कुछ तो उससे भी आगे बड़े-चढ़े है। वे न स्वयं उस सम्पत्ति से लाभान्वित होते हैं और न किसी दूसरे को होने देते हैं।
देखने में यह निर्दोष लगता है कि जो कमाये वही खाये तो उसमें अनुचित क्या है? अपनी वस्तु किसी को न दे तो इसमें दोष क्या है? पर समझने में यह सृष्टि क्रम का व्यतिक्रम हानिकारक ही नहीं भयानक भी है। यदि इसे निर्दोष मान लिया जाय तो प्राणियों के बीच जुड़ी हुई आदान-प्रदान की श्रृंखला ही टूट जायगी और किसी से सम्बन्ध ही न रह जायगा। यह आदान-प्रदान का क्रम ही एक दूसरे को जोड़ता है और बाँधता है इसलिये तत्वदर्शी इस क्रम विधान की सूत्रात्मान परमात्मा के नाम से भी पुकारते है।
गाय अपना दूध आप ही पिया करे-न बछड़े को न किसी मनुष्य को पीने दे तो फिर वह गौ माता कैसे रहेगी? फिर भगवान का पंचामृत पूजन कैसे होगा? वृक्ष अपनी शाखा, पल्लव, पुष्प, फल किसी को छूने न दे उन्हें अपने उपयोग के लिए ही सुरक्षित रखे; जो लेने की चेष्टा करें उसी को सर्प की तरह काट लिया करे तो फिर संकट ही खड़ा हो जायगा। भूमि अपन अन्न, अपने खनिज किसी को लेने न दे। बादल अपना पानी अपने भंडार में भरे रखे। माता बच्चे के पालन का कष्ट न उठाये, सूरज अपनी गर्मी अपने गोदाम में बन्द रखे तो यह सुन्दर सजीव संसार देखते-देखते कुरूप और दुर्गन्धित मृत पिण्ड मात्र बनकर रह जायगा।
हमें कहीं से मिला है-बदले में किसी को हम भी देते हैं, तभी काम चलता है। हमें किसी की पुत्री, पत्नी रूप में मिली-हम अपनी पुत्री को किसी की पत्नी बनने के लिए प्रदान करते हैं। अभिभावकों ने हमें पाला-हम अपने बालकों को पालते हैं। अनेक लोगों के सहयोग से हमें जीवनोपयोगी सुविधाएँ प्राप्त हुई है। अतः अनेकों की सुविधा बढ़ाने वाले हमारे भी क्रिया-कलाप होने चाहिये।
परिवार तक आदान-प्रदान का क्रम तो पशुओं में भी चलता है, मनुष्य की विशेषता उस उपकार प्रत्युपकार के क्रम से अधिक व्यापक बनाने से ही गौरवान्वित होती है।
कृपण बनकर देने से जब हम इनकार करते हैं तो वह लाभ मिलना बन्द हो जाता है जिसके आधार पर हमें इतनी उपलब्धियां प्राप्त कर सकना संभव हुआ था। नदी-पुल, बाँध आदि को तोड़ना बुरा हैं। इससे भी बुरा परस्पर आदान-प्रदान की अनादि सृष्टि परम्परा को तोड़ना है। कृपण इसी अपराध का अपराधी बनता है और अपने उभय लोक को अन्धकारमय बनाता है।
मगध के सिंहासन पर सम्राट इन्द्रगुप्त आसीन थे। महाकौशल से उनकी शत्रुता हो गई। महा कौशल की शक्ति और सैन्यबल उन दिनों यौवन पर था। वहाँ से किसी भी क्षण आक्रमण की पूरी आशंका थी यह बात मगध के एक-एक नागरिक को मालूम थी। इसलिए कोई भी रात में बाहर न निकलता। सारी प्रजा युद्ध की आशंका से भयभीत थी।
मगध के सैनिक पूरी तत्परता के साथ सीमा चौकियों की रक्षा कर रहे थे, पर आपातकालीन स्थिति हो तो किसी भी व्यक्ति को चुप नहीं बैठना चाहिये चाहे वह राजा हो या प्रजा। इन्द्रगुप्त स्वयं इस आदर्श का पालन कर रहे थे। वे रात-रात भर जागकर प्रजा की रक्षा व्यवस्था देखा करते थे।
तब जब मगध के युवक और प्रौढ़जन भी भयवश अन्धकार में बाहर नहीं निकलते थे। एक स्त्री घर से बाहर निकलती। वह राज दरबार की मालिन थी। सम्राट और साम्राज्ञी दोनों प्रातःकाल पीयूष वेला में भगवान् पाशुपत का पूजन किया करते थे उसके लिये शुद्ध और ताजे पुष्पों की आवश्यकता होती थी। मालिन ने अपने इस कर्तव्य पालन में इन गाढ़े दिनों में भी भूल नहीं की। वह प्रतिदिन पूजा के पुष्प नियमित रूप में पहुँचाती रही। किसी को भी उँगली उठाने का अवसर नहीं मिला कि मालिन डरकर अपने कर्त्तव्य का पालन नहीं कर रही।
प्रातःकाल होने में अभी देर थी। महाराज इन्द्रगुप्त भ्रमण करते हुये उधर ही आ निकले जहाँ उस मालिन का निवास था। अन्धकार में कुछ आकृतियाँ उधर घूमती दिखाई दी। महाराज को सन्देह हुआ वह चुपचाप झुरमुट में खड़े होकर स्थिति का अध्ययन करने लगे।
भवन के बाहर पदचाप सुनकर मालिन की निद्रा टूट गई। उसने समझा प्रातःकाल हो गया है सो फूल चुनने की पेटिका उठाकर वह घर से बाहर आई पर यहाँ तो स्थिति कुछ और ही थी। महाकौशल के चार गुप्तचरों ने बाहर आते ही घेर लिया। किसी तरह उन्हें पता चल गया था कि मालिन नियमपूर्वक राज्य-भवन में प्रवेश करती है उसे वहाँ की सारी व्यवस्था का पता होगा इसीलिए प्रातः होने से पूर्व ही यह दल वहाँ पहुँचा था
नारी के कोमल नहीं-कठोर शब्द निकले-कौन हो तुम? इतनी रात गये यहाँ क्या कर रहे हो? “भद्रे! हम आपके अतिथि है आपकी सेवा पाने का अधिकार लेकर आये है यदि यदि यह अधिकार उपलब्ध हो गया तो आप महाकौशल की सम्मानित महिलाओं में होगी। धन, वैभव तुम्हारे चरणों पर ऐसे लौटेगा जैसे नागराज के चरणों में सिन्धु का जल।” एक गुप्तचर ने धीमे स्वर में कहा।
महाकौशल! और में- मेरा महाकौशल से क्या सम्बन्ध? साफ-साफ कहो क्या चाहते हो? मालिन ने पीछे हटते हुए दृढ़ स्वर में पूछा। हम महाकौशल के सैनिक हैं मगध राज्य का रहस्य ज्ञात करने के लिये आये हैं। उसकी जानकारी भर तुम्हें देनी है उसके बदले महान् ऐश्वर्य की स्वामिनी बनोगी।
और इससे पूर्व कि कुछ और कहे-मालिन ने तड़पकर कहा-बस बन्द करो बकवास आगे और कुछ कहा तो जबान काट लूँगा। इस देश के निवासी महत्वकाँक्षाओं के लिए कर्तव्यों की हत्या करना नहीं जानते। हम प्राण दे सकते हैं, पर अपने कर्तव्य से एक इंच भी डिग नहीं सकते। गुप्तचर चिल्लाया! मूर्ख स्त्री- यदि ऐसा ही है तो उसका फल तु ही भुगतेगी। फिर अपने साथियों की ओर देखकर उसने आज्ञा दी- पकड़ लो इसे, डाल दो मुश्कें जब लौह शलाकाओं से छेदा जायगा तब कर्त्तव्यनिष्ठा याद आयेगी।
इससे पूर्व कि सैनिक उसे हाथ लगायें- महाराज इन्द्रगुप्त झुरमुट से बाहर निकल आये। मगध और महाकौशल की पहली झड़प वहीं हुई कर्त्तव्यनिष्ठ मालिन की रक्षा के लिए महाराज इन्द्रगुप्त ने चारों सैनिकों को वही धराशायी कर दिया।
वाल्टर अपनी पत्नी के साथ चाय की टेबल पर बैठा हुआ था। श्रीमती मैसी कप में चाय छान रही थीं। चाय उड़ेल कर उसने दूध मिलाया ही था कि वह बड़बड़ाने लगी-’किसी होटल के मैनेजर को गोली से मार कर एक हत्यारा कार में चढ़ कर भागा जा रहा है। दो मोटर साइकिलें उसका पीछा कर रही हैं। हत्यारे ने पीछा करने वालों पर भी गोली चलायी उनमें से एक सवार मारा गया। हत्यारा मोटर छोड़ कर अधबनी झोंपड़ी में घुस गया......।’
‘यह बुदबुदाना जारी ही था कि श्रीमती मैसी के हाथ से दूध का बर्तन छूट गया और वह अर्धमूर्छित होकर टेबल पर ही लुढ़क-सी गयीं। वाल्टर को कुछ भी समझ में न आया कि क्या करें? उपलब्ध चिकित्सा उपचार के बाद जब उसकी पत्नी होश में आयी तो उसने बताया कि वह ठीक यही दृश्य किसी फिल्म की तरह चाय की प्याली में देख रही थी।’
यह घटना मार्टिन इबोन ने अपनी पुस्तक “डू एकस-पीरिन्स इन प्रोफेसी” में लिखी है। लेखक ने इस तरह की और भी कई प्रामाणिक घटनाओं का उल्लेख करते हुए यह सिद्ध किया है कि मनुष्य के भीतर अद्भुत, अलौकिक और विलक्षण क्षमतायें हैं। उन क्षमताओं के माध्यम से भूत,भविष्य, वर्तमान को देश काल की सीमाओं से परे जा कर भी देखा व जाना जा सकता हैं।
वाल्टर ने इस घटना को कोई विशेष महत्व नहीं दिया, पर मैसी के मस्तिष्क पर इसका प्रभाव ज्यों का त्यों बना हुआ था। वह अपने पति से बार-बार यही कहती कि या तो यह घटना हो चुकी है अथवा घटने वाली है। अतएव इस बारे में पुलिस को सूचित कर देना चाहिए। वाल्टर इसे भ्रम या मनोग्रंथि का विकार कह रहा था जबकि मैसी बार-बार कर रही थी। दो दिन तक दोनों में विवाद हुआ, अन्ततः वाल्टर ने मैसी की बात रख कर इस विवाद से छुटकारा पा लेने का निर्णय किया। वे लोग पुलिस दफ्तर पहुंचे और स्वप्न में देखे हत्यारे की हुलिया तथा पोशाक बताते हुए सारी बात कह दी। पुलिस अधिकारियों ने वाल्टर और मैसी को सनकी समझा तथा रिपोर्ट फाइलों में दबा दी गयी।
अभी दो सप्ताह भी न बीत पाये थे कि ठीक ऐसी ही घटना का विवरण दैनिक समाचार पत्रों में छपा। कैलीफोर्निया के एक होटल मैनेजर की तिजोरी लूटने और गोली मार देने का विवरण सचमुच से अक्षरशः मेल खाता था। हत्यारा कार में बैठ कर ही भागा था। दो पुलिस मैनों ने मोटर साइकिल पर उसका पीछा किया जिनमें से एक हत्यारे की गोली से मारा गया। बाद में वह हत्यारा लूट के धन समेत एक अधबनी झोपड़ी में पकड़ा गया।
यह समाचार भी बाद में अखबारों ने प्रकाशित किया कि किस प्रकार श्रीमती मैसी को इस हत्या की दुर्घटना का पूर्वाभास हो गया था तथा वह घटना अक्षरशः सत्य निकली। इस घटना से मार्टिन इबोन ने यही निष्कर्ष निकाला है, कि मनुष्य ने अतींद्रिय शक्तियाँ की सम्भावनायें बीज रूप से विद्यमान हैं जो कभी-कभी इस रूप में भी प्रस्फुटित हो जाती हैं। मनुष्य यों अन्य प्राणियों की तरह ही एक जीवित पशु मात्र है उसमें बोलने और सोचने की अतिरिक्त विशेषतायें भर विद्यमान हैं।
कितनी ही बातों में तो वह अन्य जीवों की तुलना में पिछड़ा हुआ भी है, फिर भी उसे सृष्टि का मुकुटमणि परमात्मा का युवराज बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है उसका प्रधान कारण यही है कि परमात्मा ने अपने इस पुत्र में कितनी ही अलौकिक शक्तियाँ और अद्भुत विशेषतायें रोम-रोम में कूट-कूट कर भर दी है। इन्हीं शक्तियों ने उसे स्नेह, सहकारिता, सद्भाव,संयम, परमार्थ जैसे सद्गुण प्रदान किये और उन्हीं के बल पर वह अनेक भौतिक तथा आन्तरिक समृद्धियों तथा सिद्धियों का अधिपति बन सका है। सृष्टि के अन्य प्राणियों में इस प्रकार के सद्गुण कहीं-कहीं नाम मात्र को ही देखे जाते हैं। वह मनुष्य ही है जो इनके बल पर मनस्विता तथा तेजस्विता अर्पित करता है। परमात्मा ने मनुष्य में ही इस प्रकार की सम्भावना कूट-कूट कर भर रखी है कि वह आदर्शवादी उत्कृष्टता अपनाकर-उपासना और साधना का सहारा लेकर चाहे तो इतना ही ऊँचा उठ सकता है जहाँ पहुँचने पर उसे सिद्ध पुरुष एवं देवात्मा कहा जा सकता हैं।
अतीन्द्रिय शक्तियों के यदा-कदा दिखाई पड़ने वाले चमत्कार भी मनुष्य को अन्य प्राणियों की तुलना में श्रेष्ठ सिद्ध करते हैं। दूसरे प्राणी खाना, सोना और जगना भर जानते हैं अतः उनके क्रिया-कलाप भी वही तक सीमित रहते है जितनी कि उनकी क्षमता होती है; परन्तु मनुष्य के भीतर निहित उच्चस्तरीय जागृत आत्मा इन महिमामय झलकियों के रूप में बिजली की तरह कौंधती भी रहती है।
यदि इस शक्तियों का विधिवत् विकास किया जा सकें तो जो कुछ मनुष्य ने भौतिक व मानसिक दृष्टि से उपार्जित विकसित या है उससे कही अधिक सिद्धियाँ, सफलतायें और सामर्थ्य अर्जित कर सकता है। अभ्यास और साधनाओं के द्वारा इन सामर्थ्यों को विकसित करने के उदाहरण भारतीय योगी ऋषियों में सामान्य रूप से देखने को मिलते हैं। परन्तु चेतना और मानवीय सत्ता की शक्ति सामर्थ्य किसी देश-प्रदेश तक सीमित नहीं हैं सृष्टि के नियम जिस प्रकार सर्वत्र लागू होते हे उसी प्रकार चेतना भी अपना प्रभाव व सामर्थ्य हर कहीं दिखाती है। आवश्यकता उसे विधिवत् विकसित करने भर की है।
हाल ही में इंग्लैंड में चमत्कारी क्षमता सम्पन्न जादूगर राबर्ट हडची की जन्म शताब्दी मनायी गयी। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम तथा बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में राबर्ट हडची अपने समय का अद्भुत व्यक्ति था। पूरी सावधानी और मजबूती के साथ जकड़ी गयी बेड़ियों को वह उसी क्षण कच्चे धागे की तरह तोड़ फेंकता था। कमरे में बन्द करके बाहर से ताला लगाने पर भी वह सबके सामने बाहर निकल आता था। इंग्लैंड में जब उसके इन करतबों की धूम मच रही थी तो तब के प्रख्यात समाचार पत्र ‘डैलीमिरर’ ने उसकी इन शक्तियों के प्रति आशंका व्यक्त की तथा कुछ प्रश्न उठाये। राबर्ट हडची ने इन आपत्तियों की चुनौती को स्वीकार किया और हजारों लोगों की उपस्थिति में एक सुरंग में घुसकर पूरी तरह बन्द हो जाने के बाद बाहर निकलने का प्रदर्शन किया। इस पर भी कतिपय आशंकाएँ शेष रहीं तो तुरन्त एक ताजा गड्ढा खुदवाया गया और हडची उसमें उतर गया। उतर जाने के बाद घण्टे भर में ही उस गड्ढे को मिट्टी से अच्छी तरह पाट दिया गया तथा ऊपर से बन्द कर दिया गया। हडची ने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार अच्छी तरह सीमेण्ट कर देने के बाद तीस सेकेंड में ही बाहर आ जाने की घोषणा की थी। सचमुच वह इससे भी कम समय में बाहर आ गया। गड्ढे के ऊपर किये गये सीमेण्ट में कहीं भी कोई दरार या छिद्र तक नहीं था। पुनः उस गड्ढे को खोदा गया तो वहाँ केवल वह संदूक मिला जिसमें हडची को बन्द कर गड्ढे में उतारा गया था।
राबर्ट हडची ने मरने से पूर्व एक वसीयत लिखी थी और कहा था कि इसमें उसकी तमाम चमत्कारी क्षमताओं के रहस्य उसने बता दिये हैं। प्रतिबंध यह था कि इस वसीयत को सन 1974 में खोला जाय। इसी वर्ष हडची की सौवीं वर्ष गाँठ मनायी गयी और वह वसीयत प्रकाशित की गयी तो उसमें इतना भर लिखा था कि-योग साधनाओं के अभ्यास द्वारा इस प्रकार करतब कोई भी कर सकता है।
योग विद्या के प्राचीन ग्रन्थों में इस प्रकार की सिद्धियों के अनेकानेक विवरण मिलते हैं। उपासना साधना द्वारा इस प्रकार की सिद्धियाँ अनायास ही मिल जाने के उल्लेख भी मिलते है। निस्सन्देह साधना तपस्या से कोई भी व्यक्ति इस प्रकार की असाधारण शक्ति प्राप्त कर सकता है। परन्तु इस बात के कोई कारण नहीं मिल सकें हैं कि किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में ये विशेषतायें अनायास ही क्यों उत्पन्न हो जाती हैं?
स्वप्नों के द्वारा भविष्य के पूर्वाभास को घटनायें आमतौर पर प्रकाश में आती हैं। प्रसिद्ध विज्ञानवेत्ता जे.वी. राइन और उनकी पत्नी लुई ईण्टाइन ने मिल कर इस सम्बन्ध में वर्षों तक शोध की कि कईबार स्वप्नों में इस प्रकार के संकेत क्यों मिलते हैं जिनमें भावी घटनाओं का आभास होता है। डा. राउन विज्ञान अन्वेषण के दूसरे क्षेत्र में कार्यरत थे; परन्तु जब उनकी पत्नी ने ऐसी दर्जनों घटनाओं का विवरण सुनाया जिनसे स्वप्नों की सार्थकता सिद्ध होती थी तो उनने अपने अन्वेषण का क्षेत्र बदल कर स्वप्नों में पूर्वाभास को अपना विषय बना लिया और लगभग 4000 ऐसी घटनाओं का संग्रह प्रकाशित किया जिनमें स्वप्नों के माध्यम से लोगों की भवितव्यता की पूर्व सूचना प्राप्त हुई थी।
डा. राउन ने अपने अन्वेषण पर कितनी विज्ञान गोष्ठियों में भाषण दिये और इस संदर्भ में और अधिक शोध करने की आवश्यकता प्रतिपादित की। ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन ने उनके कई भाषण भी प्रकाशित किये। उनके भाषणों में मुख्यतः तीन शोध निष्कर्ष रहते थे। एक यह कि मनुष्य के भीतर ऐसी कोई अविज्ञात चेतना विद्यमान है जो सुदूर क्षेत्र तक अपना सम्बन्ध सूत्र बनाये हुए है और वह उपयुक्त अवसरों पर रहस्य-मयी घटनाओं का उद्घाटन करती है। दूसरा यह कि परस्पर घनिष्ठ व्यक्तियों में सहज ही यह आदान-प्रदान हो सकता है। तीसरा यह कि इस प्रकार की अतीन्द्रिय शक्तियाँ महिलाओं को अपेक्षा पुरुषों में अधिक रहती हैं। विशेष रूप से उनमें जो धार्मिक रुचि लेती हैं।
यह चमत्कारी क्षमतायें अद्भुत, विलक्षण हैं और कोई भी इन्हें प्राप्त करने का लोभ संवरण नहीं कर सकेगा। परन्तु भारतीय ऋषियों ने इस सिद्धियों को दूसरे दृष्टिकोण से देखा है। महर्षि पातंजलि ने योगदर्शन में इस प्रकार की सिद्धियाँ का उल्लेख करते हुए कहा है कि “ये सिद्धियाँ समाधि में विघ्न हैं तथा व्युत्थान में सिद्धि है, (विभूतिपाद 39)
अर्थात्-ये जीवन का अन्तिम लक्ष्य नहीं है। जैसे दरिद्र मनुष्य थोड़ा-सा द्रव्य पाकर ही सन्तुष्ट हो जाता है उसी प्रकार विभ्रम ग्रस्त पुरुष ज्ञान से पहले प्राप्त होने वाली इन सिद्धियों में रम जाता है और हर्ष, गौरव तथा गर्व से अभिभूत होकर अपने अन्तिम लक्ष्य-समाधि, परमशान्ति से विमुख हो जाता है। इन सिद्धियों की एक ही उपयोगिता बतायी गयी है कि मनुष्य इनके माध्यम से अपनी अद्भुत सामर्थ्य को पहचाने और विराट् चेतना का ही एक अंश होने की अनुभूति करे। उसे प्राप्त करने के लिए प्रेरित हो
उसी से शास्त्रकारों ने इन सिद्धि सामर्थ्यों में न उलझते हुए सत्य की खोज में अनवरत लगे रहने का निर्देश दिया है यदा-कदा यह चमत्कारी क्षमतायें झलकती दिखाई देती हैं तो उसका भी कुल इतना ही उपयोग है कि मनुष्य अपने आपको परमपिता परमात्मा का उत्तराधिकारी होने की बात अनुभव कर सके और स्वयं भी उतना ही समर्थ, शक्तिमान तथा संसिद्ध होने की बात स्वीकार कर सके।
परमात्मा ने मनुष्य को परिपूर्ण और सामर्थ्यवान शरीर दिया हैं। उसे अलौकिक एवं अतींद्रिय क्षमताओं की सम्भावनायें भी बीज रूप में प्रदान की हैं तथा इस सम्भावना के द्वार भी हर किसी के लिए खोल दिये हैं कि वह उन दिव्य शक्तियों को प्रयत्नपूर्वक अर्जित कर सकता है। इतने पर भी कोई व्यक्ति अपने यथार्थ स्वरूप को न पहचान सके तो दोष किसका है। कोई सम्पन्न और प्रभावशाली व्यक्ति अपनी सन्तान में आत्म-विश्वास जगाने के लिए बार-बार अपनी साधन सम्पदा के बारे में बताता रहता है तथा हिम्मत न हारने की-निरन्तर आगे बढ़ते रहने की-प्रेरणा देता रहता है। परमात्मा भी उसी प्रकार अपने पुत्र की इन सिद्धियों की झलक बताकर उसमें आत्म-विश्वास उत्पन्न करना चाहता हैं। ताकि वह अपने मूल स्वरूप को पहचान सकें और जिस उद्देश्य से उसे इस संसार में भेजा गया है उसे प्राप्त करने के लिए कटि-बद्ध हो सके।
सम्पदाएँ दूसरों को चमत्कृत करती हैं और अपने पर भार बनकर लदती हैं। विभूतियाँ दूसरों को दिखाई नहीं पड़ती, पर अपने में आनन्द और उल्लास भर देती हैं।
धन, वैभव, पद बड़प्पन को देखकर दूसरे लोग यह अनुमान लगाते हैं कि जिनके पास यह सम्पदाएँ हैं वे बहुत सुखी होते है, पर असल में बात ऐसी हैं नहीं। कोल्हू में बैल को चलते देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह तेल पीता होगा, खली खाता होगा और तेल के व्यापार से लाभ कमाता होगा तो यह मान्यता सही नहीं है। दूर से देखने पर अक्सर ऐसे ही भ्रम हो जाते हैं। अँधेरी रात में जंगली झाड़ हाथी जैसा लगता हैं, पर पास जाने पर असलियत खुल जाती है। सम्पदाएँ चन्द्रमा की तरह दूर से चमकती तो खूब हैं, पर कोई वहाँ चला जाय तो वायु, जल, जीवन रहित एक निष्प्राण नीरव और अण्ड-खण्ड पिंड ही दृष्टिगोचर होगा।
वैभव संग्रह कर सकना सहृदय व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं, संसार में इतना दुःख भरा पड़ा है कि उसे दूर करने के लिए सम्पदा तो क्या सहृदय व्यक्ति अपना प्राण भी देना चाहता है। जो सब ओर से आँख बन्द किये रहे-अपने और अपने बेटे की अमीरी ही सोचता रहे, केवल उसी कठोर हृदय कन्जूस के लिए अमीर बन सकना सम्भव हैं न्यायोपार्जित आजीविका स्वल्प होती है, उससे गुजारा भर हो सकता है-संग्रह नहीं। संग्रहित संपदा-समीपवर्तियों में ईर्ष्या, द्वेष-उत्पन्न करती हैं। ठग पीछे पड़ते है और उनकी घात न लगे तो शत्रु बनते हैं। संग्रह की सुरक्षा और और भी कठिन हैं। मधुमक्खी के छत्ते पर न जाने कितनों का दाँव रहता है, फिर वह सम्पदा मदोन्मत्त बनाती है, अहंकार बढ़ाती है और व्यसनी, विलासी बनाकर पतन के गर्त में धकेल देती है। जब तक वह संग्रह रहता है उत्तराधिकारी भी यह दण्ड दुष्परिणाम भोगते हैं।
विभूतियां आन्तरिक सद्गुणों को कहते हैं। अमली सम्पदाएँ यही हैं। वे जहाँ भी होगी व्यक्तित्व में श्रेष्ठता का समावेश करेंगी। सम्मान और सहयोग का क्षेत्र बढ़ायेंगी। मित्रों का क्षेत्र विस्तृत होता चला जायेगा प्रशंसकों की कमी न रहेगी।
सद्गुणों के आधार पर ही ठोस, चिरस्थायी, उच्च, कोटि की सफलतायें मिलती है। श्रमशीलता, साहस, धैर्य लगन, संयम और अध्यावसाय के आधार पर ही इस संसार में विविधविधि, उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं और प्रगति का पथ प्रशस्त होता है। सच्चरित्रता और प्रमाणिकता के आधार पर ही विश्वास प्राप्त किया जाता है और विश्वासी को ही समाज में अपनाया जाता है, उसे ही महत्वपूर्ण काम सौंपे जाते हैं और सहयोगी दिये जाते हैं। अप्रमाणिक व्यक्ति अपना विश्वास खो बैठता है और उस कमी के कारण उसे कहीं भी सच्चा सहयोगी नहीं मिलता। फलस्वरूप महत्वपूर्ण प्रगति से उसे आजीवन वंचित ही रहना पड़ता है।
सद्भावना सम्पन्न-सद्गुणी व्यक्तित्व अपने आपमें एक वरदान है। ऐसा व्यक्ति अपने भीतर सन्तोष, उल्लास और हलकापन अनुभव करता है। उसे न किसी से डर होता है न दुराव। जिसमें न भीरुता है न दुष्टता वह किसी से क्यों डरेगा? जिसके मन में पा दुराव नहीं है उसे किसी के आगे झेंपने, झिझकने की आवश्यकता क्यों पड़ेगी? सदाचारी व्यक्ति निर्भय रहता है और निर्द्वन्द्व। अपनी न्यायोपार्जित आजीविका से गरीबों जैसा गुजारा करते हुए भी उसे इतना सन्तोष रहता है जितना अनीति उपार्जित विपुल सम्पदा के स्वामी को कभी स्वप्न में भी नहीं मिल सकता। हमें सम्पदाओं के लिए लालायित नहीं होना चाहिए। विभूतियों का महत्व समझना चाहिए। जहाँ विभूतियाँ होगी वहाँ सम्पदाएँ भी रहेंगी। पर आँख मूँद कर सम्पदा के पीछे भागने से खाली हाथ रहना पड़ता है। न सुख मिलता है न सन्तोष।
प्रकृतिः शान्त वातावरण में निवास करने से उत्तेजना में नष्ट होने वाली शक्ति की बर्बादी रुकती हैं। और उस बचत को उपयोगी प्रयोजनों में लगाकर प्रगति का पथ-प्रशस्त किया जा सकता है। इसी प्रकार रात्रि के प्रकृति प्रदत्त अनुदान अन्धकार का लाभ उठाकर थकान मिटाने का ऐसा लाभ प्राप्त किया जा सकता है जिसके सहारे अधिक काम करने की क्षमता अर्जित की जा सकें।
योगाभ्यासी अपने व्यक्तित्व को अधिक विकसित करने की साधना करते हैं। भीतर की प्रमुख शक्तियों को जगाने के लिए भी उनका प्रयोग प्रयास चलता है। इस प्रयोजन के लिए उन्हें ऐसे स्थान में अपना निवास निर्धारित करना पड़ता है जहाँ अनावश्यक कोलाहल की पहुँच न हो और जहाँ रात्रि के समय कृत्रिम प्रकाश उत्पन्न न करना पड़े। दिन में सूर्य का और रात्रि में चाँद-तारों का प्रकाश ही सामान्य और स्वाभाविक निर्वाह के लिए पर्याप्त होना चाहिए।
स्तब्धता और अन्धियारी थी विनोद, मनोरंजन में भारी बाधक लगती है और ऐसी ऊब उत्पन्न करती है जिससे बचने के लिए हर किसी का जी करता है। फिर भी वैज्ञानिक दृष्टि से इनकी उपयोगिता दिन-दिन अधिक स्पष्ट होती जा रही है। विज्ञान के अनुसंधान हमें इस निष्कर्ष पर पहुँचाते हैं कि यदि शान्त, एकान्त स्थान में रह सकता रुचिकर हो सके तो उससे कोलाहल भरे स्थानों की अपेक्षा हर दृष्टि से लाभदायक उपलब्धियाँ ही करतलगत होगी। इसी प्रकार रात्रि को जितने समय जितने कृत्रिम प्रकाश से बचाया जा सके उतना ही उत्तम है।
निस्तब्धता एक बात है और तमिस्रा दूसरी। दोनों के सम्मिश्रण ने तीसरी स्थिति बनती है। जो सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों ही दृष्टि से अपने अद्भुत परिणाम प्रस्तुत करती है। भूमि खोद कर समाधि में बैठाने की साधना योगाभ्यासियों के लिए पुरानी है। मोटे तौर से वह कोई कौतुक-कौतूहल जैसी जादुई क्रिया-प्रक्रिया मालूम पड़ती है, पर तथ्यतः उसमें शरीर को उस स्थिति में रखने का अभ्यास है जिसे अन्तरिक्ष संव्याप्त भार-हीनता के समतुल्य माना जा सकता हैं आयुर्वेद शास्त्र में काया-कल्प चिकित्सा का विधान है। उसमें शरीर के पुनर्गठन नवीनीकरण की विधा सम्पन्न की जाती है। कहा जाता है कि इससे वृद्धता दूर होती है और यौवन लौट आता है। इस विधान में भी लम्बे समय तक एकान्त और अँधेरे में रहना पड़ता है। औषधि उपचार के अतिरिक्त इस विशेष स्थिति का जो प्रभाव शरीर पर पड़ता है उस का महत्व अधिक माना गया है। तपस्वियों के एकान्त-सेवा-गुफा निवास की बात तो सर्वविदित ही है। उसका कोई अतिरिक्त लाभ न हो तो व्यावहारिक दृष्टि स अनेकों असुविधाओं से भरी हुई इस स्थिति में रहने के लिए कोई क्यों तैयार होगा? अकारण अपने का इस विपन्नता में धकेलना किसी को क्यों सुहाना?
वैज्ञानिक साहित्यकार, शोधकर्ता, योगाभ्यासी प्रायः वैसी ही स्थिति तलाश करते है। भीड़-भाड़ के बीच उनका काम ठीक तरह हो ही नहीं पाता। चिन्तन और मनन के लिए तो विशेष रूप से एकान्त की ही आवश्यकता पड़ती है। आत्मानुसंधान में निरत योगाभ्यासी प्रायः एकान्त वन, पर्वतों की कन्दराओं में रहकर अपने प्रयोग सफलतापूर्वक सम्पन्न करते थे। अभी भी वैज्ञानिक अन्वेषणों के लिए प्रयोगशालाएँ ऐसे ही स्थान और वातावरण में बनी होती है जहाँ बाह्य विक्षेपों का प्रभाव कम से कम पहुँचे।
निस्तब्धता की क्षमता दोनों ही प्रकार की है। शोर के अभ्यस्त लोगों के लिए वह बहुत ही कष्ट कर होती है; किन्तु जिनके अभ्यास में आ जाती है-सहन होने एवं रुचिकर लगने लगती है। उनके लिए वह एक वरदान का काम करती है। रात्रि के समय मरघटों में, खण्डहरों या सुनसान स्थानों पर अकेले होने से डर लगता है। इस डर का कारण पूछने पर भूत, चोर, साँप आदि की बात कही जा सकती है, पर वस्तुतः वे शब्द कुछ ठोस उत्तर न होने के कारण ही कह दिये जाते है। जो लोग भूत प्रेत पर विश्वास नहीं करते या चोर, साँप आदि का सामना करने की हिम्मत रखते है वे भी अन्धेरे एकान्त से डर अनुभव करते है यह और कुछ नहीं स्तब्धता का अभ्यास न होने के कारण उत्पन्न रिक्तता की प्रतिक्रिया मात्र है।
रात्रि के सुनसान अन्धेरे में हवा से पत्ते खड़कने, पक्षियों के बोलने या कीड़ों के रेंगने स उत्पन्न हल्की ही आवाजें भी बहुत भयंकर लगती है और प्रतीत होता है मानों कोई भयंकर संकट ही सामने आ रहा हो। इसे अपने आप से अपरिचित होने के कारण असहाय और दीन-दुर्बल होने की अनुभूति ही कहा जा सकता है। वस्तुतः मनुष्य अपने आप से डरता है। जब तक औरों के अंचल में छिपा रहता है-भीड़ में खोया रहता है- तब तक अपने को सुरक्षित मानता है किन्तु जब उसे अपना दुर्बल स्वरूप देखने का अवसर एकान्त के समय मिलता है तो उसे बुरी तरह डर लगता है और इस स्थिति से पीछा छुड़ाने के लिए फिर भीड़ में घूमने की कल्पना या चेष्टा करता है। साधना के समय प्रायः एकाकीपन रहता है। अंतर्मुखी होने की चेष्टा चलती है। अपने आपे से अपरिचित मन इस स्थिति में रहने से डरता है। और भीड़ की तरफ दौड़ पड़ता है। उपासना में मन न लगने की, तरह-तरह के विचार उठने की,अजनबी कल्पनाएँ आने की, स्थिरता न होने की-शिकायत इसी आत्म-विस्मृति का चिन्ह है। ऐसे दुर्बल मन वालों को एकान्त की ध्यान साधना अनुकूल नहीं पड़ती। उन्हें कथा, कीर्तन, यज्ञ, तीर्थयात्रा, आरती, प्रार्थना जैसे सामूहिक धर्मानुष्ठान ठीक पड़ते है। बहिर्मुखी गतिविधियों का समावेश रहने से इस स्तर के लोगों का मन लग जाता है। ऐसे लोग दैनिक जीवन में भी भीड़ के साथ ही काम कर सकते है। यहाँ तक कि सोने के समय भी अन्य लोगों को साथ रखे बिना काम नहीं चलता। सो जाने के बाद भी उन्हें बत्ती जलाये रखने की आवश्यकता पड़ती है। ताकि अन्धेरे का संकट उनके ऊपर टूट न पड़े। जेल के नियम तोड़ने वाले कैदियों को वहाँ के अफसर कई तरह की स्थानीय सजा देते है। उनमें से एक है-एकान्त वास जिसे काल कोठरी कहते है; फिर भी अकेले दिन गुजारना इतना कठिन पड़ता है कि समय काटे नहीं कटना और कैदी बुरी तरह संत्रस्त रहने लगता है।
आमतौर से सामान्य मनुष्यों के लिए अन्तर्मुखी होना बहुत कठिन पड़ता है। वे दुनिया की बातें बहुत सोच सकते हैं और साँसारिक समस्याओं पर काफी ऊहापोह कर सकते हैं किन्तु आत्म-निरीक्षण और आन्तरिक समाधान की बात सोचना और उस दिशा में कुछ आगे तक बढ़ सकना उनके लिए सम्भव ही नहीं हो पाता, इसी प्रकार वे भीड़ के साथ रहने और गप बाजी करने में घन्टों गुजार सकते हैं, पर अकेले थोड़ी देर भी नहीं बैठ सकते। आत्म-संपर्क उनसे सधता ही नहीं, एकान्त में मन लगता ही नहीं। इसका कारण तलाश करने पर मनोविज्ञानी इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि ऐसे व्यक्ति वे होते है जिनका मन अपने व्यक्तित्व के सम्बन्ध में अच्छा नहीं होता। वे उसे बुरा, पिछड़ा और घिनौना समझते है फलतः अपने साथ बैठने में उन्हें घृणा उपजती और नाराजी होती है। जिस प्रकार गन्दे और अविश्वासी लोगों के पास बैठने को जी नहीं करता। आत्म-चिन्तन से ऐसे ही लोगों का जी उचटता है और एकान्त उन्हें ही डर लगता है।
इसके विपरीत ऐसा भी देखा गया है कि उस एकान्त अन्धता की स्थिति में कई व्यक्ति आत्म-चिन्तन से ही तन्मय रहने लगे और अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं को हटाने तथा विशेषताओं को बढ़ाने के लिए सुनिश्चित मार्ग ढूंढ़ निकालने में भी सफल हो गये। इस प्रकार यह स्तब्धता जहाँ अनभ्यस्त होने के कारण अखरी तो किन्तु थोड़े समय में वह न केवल सहन ही हो गई वरन् उपयोगी तथा रुचिकर भी लगने लगी।
जन्म-जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कारों को उखाड़कर उनके स्थान पर मानवी गरिमा के अनुकूल दुष्प्रवृत्तियों को उलटने और उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियां जमाने के लिए ही आध्यात्मिकता, आस्तिकता और धार्मिकता का दर्शन बनाया और विधान खड़ा किया गय है। धर्म कृत्य का सारा सरंजाम इसी धुरी के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। अन्तःचेतना को परिष्कृत करने के लिए ही स्वाध्याय सत्संग से लेकर पुण्य परमार्थ से लेकर तप साधना के विधि-विधानों तक अनेक धर्म-कृत्य किये जाते है। भजन, कीर्तन, जप, ध्यान, पूजा-पाठ का उद्देश्य इतना ही है कि ब्राह्मी चेतना का अन्तःकरण में उदय उद्भव हो सकें, संक्षेप में इस सारी विधा को आत्म परिवर्तन या आत्म-परिष्कार कह सकते हैं। इसी के लिए धर्म कलेवर का विभिन्न उपचारों के साथ प्रयोग होता रहता है।
देखा गया है कि जितना आवश्यक है उतना लाभ इन प्रयोजनों से हो नहीं पाता। कारण कि उनका प्रभाव कान, आँख, मस्तिष्क तक ही पहुँच पाता है। इन यन्त्रों की बनावट ही कुछ ऐसी है कि किसी प्रभाव से देर तक प्रभावित नहीं रहते। अगले ग्रहण करने के लिए उन्हें पिछला भुलाना पड़ता है। पिछला पैर उठाने पर ही अगला पैर उठता है। प्रगति का क्रम यही है। इस लिए धर्मोपदेशों को भुला देने का दोष भी इन्द्रियों पर मस्तिष्क पर लादना व्यर्थ है। उनकी संरचना ही इस प्रकार की है कि वे भले या बुरे किसी भी प्रभाव को देर तक पकड़े नहीं रह सकती। अन्तःपरिष्कार के लिए आवश्यक है कि अन्तःचेतना की गहरी परतों का स्पर्श और परिवर्तन कर सकने योग्य उपाय ढूंढ़ा जाय। इसके लिए एकान्त सेवन की योग साधना में बहुत प्रशंसा है। जब वह सहन हो जाय तो गुफा गमन जैसे अन्धकार, अभ्यास को भी उसी में सम्मिलित कर लिया जाता है। योगी प्रायः इसी प्रक्रिया को अपनाते देखे गये हैं।
जर्मनी चीन और रूस के अधिनायक, राजनैतिक विरोधियों को, अपने मत बदलने और सहमत होने के लिए ‘ब्रेनवाशिंग’ पद्धति का उपयोग करते रहे हैं। इसमें उन्हें सफलता भी मिली है। ब्रेनवाशिंग का तात्पर्य है-मस्तिष्क की धुलाई। अर्थात् पूर्व मान्यताओं का बदलाव। इसके लिए समझाने-बुझाने, लाभ-हानि सुझाने और लालच दिखाने का पुराना तरीका कमजोर मनःस्थिति के लोगों पर ही सफल होता है। कड़े विचारों वाले, सिद्धान्तवादी लोग प्रायः अपनी बात पर अड़े रहते हैं और परिवर्तन की अपेक्षा मरने या मारने की बात सोचते रहते हैं। ऐसे लोगों को मार देना तो सरल है पर उन्हें बदल कर जा लाभ उनके कुशल व्यक्तित्व से उठाया जा सकता है वह भी हाथ से चला जाता है। ऐसी दशा में बदलाव ही अधिक उपयुक्त सोचा गया और उसके लिए तरह-तरह के उपाय निकाले गये। शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न तथा भविष्य में इसी प्रकार तिलतिल मरने की विभीषिका एक और अनुभव कराई जाती है। दूसरी और बीच-बीच में उन सुखद परिस्थितियों का आस्वादन भी करा दिया जाता है। जो परिवर्तन कर लेने के उपरान्त सहज ही मिल सकती है। समझाने-बुझाने से लेकर डराने तक के विभिन्न परामर्श भी इसी के साथ-साथ चलते रहते हैं। इस प्रयास से अधिकाँश कट्टर भी नरम हो जाते हैं और सिद्ध करते हैं कि ‘ब्रेन वाशिंग कठिन नहीं सरल है। इन उपचारों के फलस्वरूप सामयिक ही नहीं स्थायी परिवर्तन भी होते देखा गया है। बन्धन मुक्त होने पर ऐसे विपक्षी सच्चे मन से पक्ष घर बन जाते है। अवसर मिलने पर दुबारा उलटते बहुत कम ही देखे गये है। अन्यथा उसी धारा में उनका मन एवं स्वभाव बहने लगता है जिसमें कि उन्हें प्रयत्नपूर्वक बताया गया था।
ब्रेन वाशिंग के लिए किये गये उत्पीड़नों से अँधेरी एकान्त कोठरी में रखना, बिना चोट या घाव का निशान लगाये सबसे अधिक दबाव डालने वाला तरीका सिद्ध हुआ है। इन कमरों की बनावट ऐसी होती है जिसमें बाहर की आवाज का एक शब्द भी नहीं जाने पाता और न रोशनी की कोई किरण पहुंचनी है। कैदी को अकेला बन्द किया जाता है। उस कोठरी में घंटी बजाने का एक बटन रहता है। जिसे तभी बजाने के लिए हिदायत की जाती है जब कि विचार बदलने के लिए तैयार हो। इस कमरे में रोटी, पानी, मलमूत्र विसर्जन, शैया, वस्त्र जैसे निर्वाह वस्त्र, जैसे निर्वाह आवश्यक साधना बदले और पहुँचाये जाते रहते है। इतने पर भी वह निस्तब्धता और तमिस्रा इतनी खलती है कि प्रायः एक दिन में ही बन्दी घबरा जाता है और आत्म-समर्पण की घंटी बजा देता है। दस दिन से अधिक तो कोई भी उस स्थिति को सहन नहीं कर सका हैं।
आस्थाओं के उलटने में तमिस्रा युक्त एकान्त सेवन का क्या प्रभाव हो सकता है इसकी झांकी ‘ब्रेन वाशिंग’ के नाम पर चलने वाले उत्पीड़न और उसके परिणाम को देखकर हो सकती है। इसका दूसरा पक्ष भी है कि उस स्थिति में मनःसंस्थान का स्तर प्रायः वैसा हो जाता है जैसा कि अन्तरिक्ष में पहुँचने पर भार विहीन स्थिति में शरीर को अनुभव होता है। पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को लाँघकर ऊपर पहुँचने के बाद इच्छा-शक्ति के सहारे शरीर की तनिक-सी गति देने पर किसी भी दिशा में चल पड़ना और बढ़ते जाना सहज सम्भव हो जाता है। इसी प्रकार अंध एकान्त में मस्तिष्क अन्य दबावों से मुक्त होकर अभीष्ट चिन्तन अपना कर मनचाही प्रगति कर सकता है। इस प्रकार यह स्थिति रचनात्मक प्रगति के लिए भी बहुत उपयुक्त बैठती है।
कनाडा के मनोवैज्ञानिकों ने इस अन्ध निस्तब्धता के समय कैसा अनुभव होता है, इसके परीक्षण किये हैं। इसके लिए ठीक ब्रेन वाशिंग में काम आने वाले कमरों की तरह ही कक्ष बनाये गये। उनमें बन्द किये जाने वाले लोगों ने बाहर निकल कर बताया कि वहाँ भी उन्होंने जोर-जोर की विचित्र आवाजें सुनी। सीटी,सरसराहट, धड़धड़ाहट, गरजन, खटपट, भगदड़ जैसे शब्द उनके कानों में आते रहते थे। यह आवाजें क्या हो सकती हैं इसका पता लगाने पर यही जाना गया है कि शरीर में होने वाला रक्त संचार, श्वास-प्रश्वास जैसी हलचलों की ही प्रतिक्रिया थी। यही ध्वनि तरंगें उस कमरे में प्रतिध्वनित होती हैं और बन्दी उन्हें कहीं बाहर से आने वाली आवाजें समझता है।
इन कमरों में पहुँचने वालों ने और भी कई तरह के अनुभव सुनायें, कई उस कमरे में पहुँचते ही गहरी नींद सो गये और तीस चालीस घन्टे तक सो लेने के बाद उनकी आँख खुली। जब जागे तो उन्हें लगा कि पहले की तुलना में कहीं अधिक चेतनता और ताजगी उनमें आई। कई को बन्द होने से पहले खुजली, खाँसी, जुकाम, सिर दर्द आदि की जो शिकायतें थी वे अपने आप ही अच्छी हो गई। कइयों ने अन्तःप्रेरणा से ही अपनी नशेबाजी जैसी पुरानी आदतें छोड़ दी। तंबाकू जैसे अभ्यस्त नशे उनके पास मौजूद रहे, पर सहज अरुचि के कारण उनमें उन्हें छुआ भी नहीं अथवा एकाध कश लेकर ही फेंक दिया। कइयों की पुरानी स्मृतियां जागी और बीती घटनाओं को इस तरह अनुभव करने लगे मानों वे अभी कल परसों की ही हों। कई अपने प्रिय विषयों पर अधिक गम्भीरता और तन्मयता के साथ सोचने लग गये और महत्वपूर्ण नतीजों तक पहुँच सकने में सफल हो गये।
एकान्त सहन करने का प्राथमिक अभ्यास काफी कठिन होता है। उसमें मनोबल की आवश्यकता पड़ती है। आत्म-दमन करना पड़ता हैं और पुरानी भीड़-पसन्द आदत को समझा-बुझाकर कठिनाई से इस स्थिति में थोड़ा समय गुजारने के लिए सहमत करना पड़ता है। स्पष्ट है इतने भर अभ्यास से मनोबल बढ़ता है और प्रतिपक्षी अभ्यासों से जूझने और उन्हें निरस्त कर सकने की क्षमता का आत्म-विश्वास होता है। यह आत्मिक प्रगति की दृष्टि से अच्छी सफलता है। इसके सहारे भविष्य में आत्म परिष्कार के अन्य बढ़े-बढ़े उपाय अपनाये जा सकते हैं और विशिष्ट आध्यात्मिक उपलब्धियाँ प्राप्त की जा सकती हैं। थोड़े-थोड़े समय के लिए-मात्र एकान्त को-मात्र अन्धकार को सहन करने की-साधना के सहारे अभ्यास आरम्भ होना है तो आगे चलकर अन्धता युक्त एकान्त भी कठिन नहीं रहता।
पूर्ण एकान्त, पूर्ण अन्धकार का लाभ अधिक समय तक न मिल सके तो भी यह प्रयत्न करना चाहिए कि जब भी सुविधा हो-जितने समय भी सम्भव हो उसका लाभ उठाया जाना चाहिए। इसी प्रकार मन को भीड़-भाड़ के विचारों से हटाकर किसी एक प्रसंग पर नियोजित करने की ध्याना-धारणा को किसी न किसी रूप में क्रियान्वित करते रहना चाहिए।
गीता में कहा गया है- “नहिं ज्ञानेने सद्दश पवित्र मिह विद्यते” अर्थात् इस संसार में ज्ञान से बढ़कर और कोई श्रेष्ठ पदार्थ नहीं है, यदि हम इस संसार में सर्व श्रेष्ठ वस्तु तलाश करना चाहें तो अन्ततः ‘ज्ञान’ की ही वह श्रेष्ठता प्रदान करनी पड़ेगी। इस प्राप्त कर सामान्य श्रेणी की योग्यता एवं परिस्थितियों के व्यक्ति अत्यन्त उच्च कोटि का स्थान प्राप्त करते हे। ज्ञान को ही पारसमणि कहा गया है। लोहा पारस को छूकर सोना बन जाता है या नहीं? पारस कहीं है या नहीं? यह बातें संदिग्ध हैं। पर ज्ञान रूपी पारस को स्पर्श कर तुच्छ श्रेणी के व्यक्ति ऊँचे से ऊँचे स्थान पर पहुँचे हैं यह निर्विवाद सत्य है।
शरीर की दृष्टि से मनुष्य अल्पबुद्धि पशु पक्षियों से भी गया बीता है। उनके शरीरों में जो भागने, बोझ उठाने, उड़ने; सर्दी गर्मी सहने, बीमार न होने आदि की विशेषतायें हैं वे मनुष्य शरीर में नहीं हैं; फिर भी उन सब की अपेक्षा वह अधिक साधन सम्पन्न हो सका इसका एक मात्र कारण उसका ज्ञान ही है। जब कभी किसी व्यक्ति का दिमाग खराब हो जाता है, ज्ञान शक्ति में अन्तर आ जाता हैं- तो शरीर ज्यों का त्यों रहने पर भी उसकी स्थिति हास्यास्पद हो जाती है। इसके विपरीत ज्ञानवान व्यक्ति शारीरिक दृष्टि से गये बीते होने पर भी गौरवपूर्ण स्थान प्राप्त किये रहते हैं। ज्ञान की महिमा अपार है। गीताकार ने उसे सर्वश्रेष्ठ तत्व कह कर पुकारा तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं की है।
शारीरिक और मानसिक बनावट की दृष्टि से सभी मनुष्य लगभग एक से होते हैं, उनमें जो अन्तर होता है उसे बहुत थोड़ा ही कहा जा सकता है किन्तु आन्तरिक स्थिति की विचार और विवेक की भिन्नता के कारण उनमें जो अन्तर देखा जाता है वह असामान्य है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उसने अपने अन्तःकरण का विकास अवश्य ही किया था। यदि वह न किया गया होता तो वे अन्य असंख्यों साधन सुविधाओं के होते हुए भी उस उच्च स्थिति के अधिकारी न हुए होते।
क्या व्यक्तिगत जीवन में- क्या सामूहिक जीवन में सर्व विचार शक्ति का ही बोल बाला है। जब अज्ञान पूर्ण कुविचारों की मात्रा बढ़ जाती है। तो पाप, अनाचार, ईर्ष्या, द्वेष, स्वार्थपरता, क्रोध, छल,शोषण,असंयम,तृष्णा, लाभ, क्लेश, भय, चिन्ता एवं दीनता का अन्धकार छा जाता है। यदि व्यक्तिगत जीवन में यह परिस्थिति पैदा हुई तो वह नरक बनेगा और यदि यह प्रवृत्तियां सार्वजनिक सामाजिक जीवन में बढ़ीं तो सारा समाज इन दुख-द्वंद्वों में ग्रस्त होकर अधःपतन के सत्यानाशी मार्ग पर अग्रसर होगा। इसके विपरीत यदि सद्ज्ञान के आधार पर अन्तःप्रदेश में सत्प्रवृत्तियां बढ़ी-दया, प्रेम, उदारता,संयम, सदाचार, स्नेह, सहयोग एवं सेवा की भावनाएं विकसित हुई-तो चाहे व्यक्तिगत जीवन हो चाहे सामाजिक जीवन, दोनों में ही सुख, शान्ति, समृद्धि, सहयोग, संगठन, आरोग्य, मैत्री, सुरक्षा की स्वर्गीय परिस्थितियाँ स्वयमेव पैदा हो जायेंगी।
ज्ञान के दो अंग है एक शिक्षा दूसरा विद्या। शिक्षा वह है जो स्कूल कालेजों में पढ़ाई जाती है, जिसे पड़ कर लोग ग्रेजुएट, क्लर्क, डाक्टर, वकील, इंजीनियर, प्रोफेसर, अफसर आदि बनते हैं। यह जीविकोपार्जन एवं लोक व्यवहार में निपुणता प्राप्त करने के लिए है। यह आवश्यक है क्योंकि इसके बिना साँसारिक जीवन में सुस्थिरता एवं उन्नति का मार्ग नहीं खुलता। पर इससे भी आवश्यक ‘विद्या’ है। जिस ज्ञान को प्राप्त कर मनुष्य अपनी मान्यताओं, भावनाओं, आकाँक्षाओं एवं आदर्शों का निर्माण करता है उसी ज्ञान को विद्या कहा जाता है। इसे प्राप्त करने का माध्यम स्कूल कालेज नहीं वरन् ‘स्वाध्याय’ और सत्संग है। चिन्तन और मनन से सत्साहित्य पड़ने से, सज्जनों के साथ रहने, उनके अभिवचन सुनने एवं कार्य-कलाप देखने से विद्या का आविर्भाव होता है।
जिस ज्ञान को संसार का सर्व श्रेष्ठ पदार्थ कहा गया है यह विद्या ज्ञान ही है। स्कूली ज्ञान तो करोड़ों मनुष्यों को है। उससे थोड़ा लौकिक विकास तो जरूर होता है, पर आन्तरिक महानता किसी की नहीं, बढ़ती। आत्म निर्माण की, चरित्र गठन की, सत्प्रवृत्तियों की भावनाएँ जागृत करने वाले सद्विचारों को ही सच्चा ज्ञान कहा जा सकता है। यही जीवन को सफल बनाने वाला सर्व श्रेष्ठ पदार्थ है। इसे प्राप्त करने के लिए हम में से हर एक को शक्ति भर प्रयत्न करना चाहिए।
सत्संग के साधन जब भी उपलब्ध हों, सत्पुरुषों के साथ विचार विनिमय एवं सान्निध्य जब भी संभव हो तब उसका लाभ उठाना चाहिये, पर यह है बहुत कठिन। क्योंकि ऐसे अनेक सत्पुरुषों का एक साथ मिलना दुर्लभ है, जिनके विचारों में से उचित अंश को ग्रहण करके अपना ज्ञानकोष पूरा किया जा सकें। कोई व्यक्ति सत्पुरुष होते हुए भी सर्वथा निभ्रान्त नहीं होता। यदि उसके सभी विचारों को ठीक माना जाय तो उस सत्पुरुष में जो भ्रान्ति थी वह अपने पल्ले भी बँध जायगी। भगवान बुद्ध अत्यंत उच्चकोटि के त्यागी-तपस्वी महापुरुष थे, उनकी अधिकाँश शिक्षाएँ बड़ी उत्तम हैं, पर ईश्वर को न मानने का उनका सिद्धान्त उचित नहीं माना जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति बुद्ध भगवान पर अनन्य श्रद्धा करके उनके विचारों में से उचित अनुचित की काट-छाँट न करे तो उसे अनीश्वर वादी बनना पड़ेगा और उस मान्यता के दुष्परिणामों को भी भोगना पड़ेगा। संसार को हर व्यक्ति अपूर्ण है। इसलिए श्रेष्ठ पुरुषों के भी सब विचार निभ्रान्त ही होंगे यह नहीं कहा जा सकता। उनकी बातों में से उपयोगी, बुद्धि संगत और देश, काल परिस्थिति के अनुरूप विचारों को छाँट कर ग्रहण किया जाय इसके लिए यह आवश्यक है कि सत्संगत के लिए अनेक सत्पुरुषों का सान्निध्य प्राप्त हो यह कठिन है। क्योंकि ऐसे श्रेष्ठ विचारशील सत्पुरुष न तो बड़ी संख्या में उपलब्ध होते हैं न वे अपने समीप ही रहते हैं। फिर वे इतने कार्य व्यस्त भी होते हैं कि हर जिज्ञासु के लिए अभीष्ट सम्मति दे सकना उनके लिए सम्भव नहीं होता इसलिए सत्संग को यदाकदा प्राप्त होते रह सकने वाला अवसर ही माना जायगा। ज्ञान लाभ का उद्देश्य पूर्ण करने वाला सर्व सुलभ साधन स्वाध्याय ही है।
संसार में अनेक सत्पुरुष हैं, और हो चुके हैं वे जीवित हों या मर गये हों, उनके विचारों का संकलन यदि साहित्य रूप में उपलब्ध है तो उससे कोई भी व्यक्ति किसी भी समय लाभ उठा सकता है। महात्मा गाँधी का भरपूर सत्संग एवं विचार विनिमय का अवसर प्राप्त कर सकना उनके जीवन काल में भी लोगों के लिए सम्भव न था। अब उनके स्वर्गवास के बाद तो वह बात सर्वथा असम्भव हो गई। पर उनकी लिखी पुस्तकों को पढ़ कर हर कोई व्यक्ति रात के दो बजे भी जी चाहे जितनी देर सत्संग का लाभ उठा सकता है। इसी प्रकार पूर्व काल में हुए ऋषि महर्षि, महापुरुष, ज्ञानी, विज्ञानी हमारे लिए साहित्य के माध्यम से हमें सत्संग के लाभ देने के लिए अभी भी प्रस्तुत मिल सकते हैं, घर बैठे संसार भर के श्रेष्ठ पुरुषों के साथ चाहे जब, चाहे जितनी देर घुल मिल कर बातें करना, उनके विचारों से लाभ उठाना स्वाध्याय द्वारा हर किसी के लिए सम्भव हो सकता है।
संसार के सर्वश्रेष्ठ तत्व ‘ज्ञान’ को प्राप्त करके जीवन को सफल बनाने- उसे श्रेष्ठ दिशा में विकसित करने के लिए स्वाध्याय ही प्रधान माध्यम है, इसलिए स्वाध्याय को एक आवश्यक धर्म कर्तव्य माना गया है। शास्त्र कहता है-‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ अर्थात् स्वाध्याय में प्रमाद न करों और ‘अहरहस्ऋध्यायमेध्येतव्यः’ अर्थात् दिन रात स्वाध्याय में लगे रहो। शतपथ ब्राह्मण में लिखा हैं कि-”भावन्तः वा इमा पृथिवी वितेन पूर्णददल्लोकं जयति त्रिस्तावन्तं जयतिभूयाँ संवाक्षम्य य एवं विद्वान अहरहः स्वाध्यायामेधीते।’ अर्थात् जितना पुण्य धन धान्य से पूर्ण इस समस्त पृथ्वी को दान देने से मिलता है उसका तीन गुना पुण्य तथा उससे भी अधिक पुण्य स्वाध्याय करने वाले को प्राप्त होता है। इस कथन पर आश्चर्य करने की कोई बात नहीं हैं। भावनाओं को प्रेरणा देने का प्रमुख आधार स्वाध्याय ही वह तथ्य माना गया है जिससे प्रेरित होकर मनुष्य के विचार और कार्य सन्मार्ग की दिशा में विकसित होते है और यही विकास क्रम अन्ततः अक्षय पुण्य फल प्राप्त होने का हेतु बनता है।
शरीर, वस्त्र, मकान, बर्तन की सफाई नित्य करनी पड़ती है क्यों कि नित्य ही उन पर मैल जमता रहता है। इसी प्रकार मन पर भी संसार के बुरे वातावरण का मैल और कुप्रभाव निरन्तर पड़ता रहता है। उसकी सफाई के लिए सत्संग और स्वाध्याय की बुहारी लगाने की नित्य ही आवश्यकता होती है। इसलिए शास्त्रकारों ने भोजन, स्नान, शयन आदि की भांति ही स्वाध्याय को भी नित्य कर्म माना है। पानी को फैलाते ही वह तेजी से नीचे की और बहने लगता है। उसी प्रकार मन का स्वभाव भी नीच कर्मों की और आकर्षित होता है। यदि उसे न रोका जाय तो वह पशु प्रवृत्तियों की और ही बढ़ेगा। पानी को ऊपर ले जाना होता है तो रस्सी, बाल्टी, पम्प, आदि का प्रयोग करना पड़ता है तब कहीं वह ऊपर को बढ़ाया जा सकता है। स्वाध्याय को वह व्यवधान कहा जा सकता है जो मन रूपी पानी को कुमार्ग की ओर बहने से रोकता है। यहीं वह पम्प है, जो मानसिक वृत्तियों को उच्च मार्ग की ओर चढ़ा कर तुच्छमानव प्राणी को महापुरुषों की- भूसुरों की श्रेणी में ले जाकर बिठा देता है अनेकों दुर्गुणों, और दुर्भावों, हानियों को स्वाध्याय के आधार पर समझा जा सकता है आत्म निरीक्षण द्वारा उन्हें ढूंढ़ा जा सकता है और प्रयत्नपूर्वक उन्हें छोड़ा जा सकता है। आत्म शोधन और आत्म निर्माण का सबसे प्रधान विधान ‘स्वाध्याय’ ही माना गया है। इसी से परमात्मा की प्राप्ति भी होती है। महर्षि व्यास का कथन है- ‘स्वाध्याय योग सभ्यत्या परमात्मा प्रमाशते’ अर्थात् स्वाध्याययुक्त साधना से ही परमात्मा का साक्षात्कार होता है।
हमें अपने व्यक्ति एवं राष्ट्रीय चरित्रनिर्माण के लिए स्वाध्याय को प्रमुख आधार मानना पड़ेगा और इसे जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में जन-जन को हृदयंगम कराना पड़ेगा। जो अनेकों दुष्प्रवृत्तियां हमारे वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन में घर कर गई हैं उनकी हानियों को भली प्रकार समझने एवं त्याग ने के लिए प्रेरणा देने में स्वाध्याय की शक्ति को प्रमुख उपाय मानना होगा। इसी प्रकार जो सद्भावनाऐं एवं सत्प्रवृत्तियां विकसित की जानी आवश्यक हैं उनकी उपयोगिता समझने एवं ग्रहण करने के लिए उत्साह उत्पन्न करने का कार्य भी स्वाध्याय की आदत को अधिकाधिक प्रोत्साहन देने से ही संभव हो सकेगा।
हममें से प्रत्येक को स्वाध्याय के लिए नित्य कुछ समय नियमित रूप से निकालना चाहिए। जिस प्रकार स्नान के लिए एक समय नियत रहता है और रोज ही उस समय नहाया जाता है उसी प्रकार नित्य स्वाध्याय के लिए भी एक समय नियत रहना चाहिए। यों पढ़ने को तो तरह-तरह की चीजें लोग पढ़ते हैं- पढ़ने का अर्थ स्वाध्याय नहीं है। स्वाध्याय वही कहा जायेगा जो हमारी जीवन समस्याओं पर, आंतरिक उलझनों पर प्रकाश डालता है और मानवता को उज्ज्वल करने वाली सद्प्रवृत्तियों को अपनाने की प्रेरणा देता है।
आनन्द की जो बौछार भीतर से होती है, उसे छीनने के लिए कोई झगड़ा नहीं करेगा, क्योंकि वह तो एक भाव विशेष है। योगियों का आनन्द इसी तरह का आनन्द है। महर्षि रमण और गाँधीजी इसी तरह के व्यक्ति थे। उनके पास भौतिक सुख के विशेष सामान नहीं थे। वे तो अकिंचन ही थे, किन्तु उन्हें जो आनन्द प्राप्त था वह संसार में विरले ही पाते है। हम सोचकर देखें कि हमें हृदय की भावना को संतुष्ट करने में जो सुख मिलता है वह क्या जिह्वानंद में मिल सकता है! हमारे यहाँ राजा जनक का उदाहरण दिया जाता है! उन्हें भोग की सारी वस्तुएँ प्राप्त थीं और वह उनका उपभोग करके भी उनसे निर्लिप्त रहते थे। ठीक उसी तरह हम भौतिक पदार्थों को आवश्यक समझकर काम में लावें, किन्तु आज कल के भौतिकवाद के समान उसी में सुखवाद न मान लें। -डॉ. राजेन्द्रप्रसाद
दक्षिण अफ्रीका की बात है उस दिन गाँधी जी ने ग्लैडस्टन की जीवनी पढ़ी थी। एक प्रसंग था जिसने गाँधी जी के जीवन की एक धारा को उलट कर रख दिया। “एक दिन एक आम सभा हो रही थी। उसमें ग्लैडस्टन, के साथ उनकी धर्म-पत्नी भी थीं। ग्लैडस्टन को चाय पीने की आदत थी। चाय बनाने का उनकी धर्म-पत्नी ही करती थी। आम-सभा के बीच ग्लैडस्टन ने चाय पीने की इच्छा की तो श्रीमती ग्लैडस्टन ने बिना किसी झिझक, लज्जा या संकोच के अपने हाथ से वही चाय बनाई पति को पिलाई और कप-प्लेट हाथ से साफ किये। ऐसा उन्होंने कई स्थानों में किया। “
इस घटना को पढ़कर गाँधी जी के जीवन में जो प्रति-क्रिया हुई, उसका उल्लेख उन्होंने स्वयं इन शब्दों में किया है- “पत्नी के प्रति वफादारी मेरे सत्य के व्रत का अंग थी; पर अपनी स्त्री के साथ भी ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये, यह बात दक्षिण अफ्रीका में ही स्पष्ट रूप से समझ में आई।”
लोग पुस्तकें पड़ते हैं पर जो पढ़ा गया है उस पर चिन्तन-मनन और वार्तालाप नहीं करते। उससे पढ़े हुये का प्रभाव जीवन में स्थायी नहीं हो पाता। यदि पुस्तकों के सार जीवन में उतारने की प्रक्रिया लोग सीख जायें तो सामार्न्यासी परिस्थितियों में ही हर व्यक्ति उत्कृष्टता क चरम बिन्दु तक पहुँच सकता है। पुस्तकें गौघृत और दुग्ध के समान पौष्टिक आहर है। जो मन, बुद्धि, आचार-विचार, तक व विवेक को परिपुष्ट करके आत्मोत्थान का उज्ज्वल पथ-प्रशस्त करती हैं।
गाँधी जी ने उक्त प्रसंग राजचन्द्र भाई को बड़े कौतूहल के साथ सुनाया। इस पर राजचन्द्र भाई ने कहा-’बापू इसमें आश्चर्य की क्या बात है? अब आप बताइये-अपनी बहिनें, बेटियाँ और छोटे-छोटे बच्चे क्या ऐसे कार्य कहीं भी नहीं कर सकते? बड़ी की आज्ञा पालन में तो उन्हें प्रसन्नता ही होती है। पत्नी के इस व्यवहार को असामान्य मानने का एक ही कारण हो सकता है-पत्नी से कोई आकांक्षा। साधारण लोग अपनी धर्म-पत्नी को कामवासना की दृष्टि से देखते है। उससे नारी के प्रति हीनता का भाव आता है। यही भाव हम उसके साथ प्रत्येक कार्य से आरोपित करते है। पत्नी उसे ही बुरा मानती है, यदि उसे हीरता या कामुकता की दृष्टि से न देखा जाय तो सचमुच प्रत्येक स्त्री ग्लैडस्टन की धर्म-पत्नी की तरह ही बहिन बेटियों की सी सेवा बिना लज्जा या संकोच के कर सकती है।”
गाँधी जी को यह बात बड़ी महत्वपूर्ण लगी। ग्लैडस्टन के जीवन चरित्र को पढ़ने से जिस मर्म को वह नहीं भेद पाये थे, वह वार्तालाप से खुल गया। तब तक कस्तूरबा और उनमें प्रायः झगड़ा हुआ करता था। उस दिन से बापू ने ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया और इतिहास जानता है कि इसके बाद कस्तूरबा गाँधी ने गाँधी जी को सच्चे मित्र की भाँति खुलकर सहयोग प्रदान किया। उन्होंने उनके साथ जेल जाने तक में भी झिझक या संकोच नहीं किया। स्वाध्यायशीलता और पढ़े हुये को जीवन में पचाने के अभ्यास ने गाँधी जी को महान बना दिया। रस्किन की लिखी पुस्तक “अण्ड दि लास्ट” पुस्तक तो गाँधी जी के सारे जीवन की मार्गदर्शिका रही।
दस वर्ष की आयु में स्कूल जाना छुड़ा दिया गया, क्योंकि पिता गरीब था। घर का काम-काज करने के लिये उसकी आवश्यकता आ गई। वह अपने ही शहर सन जान(अर्जण्टाइना) में दुकानदारी करने लगा। 6 वर्ष दुकानदारी में ही बीते।
इन वर्षों में वह पढ़ने के लिए समय अवश्य निकाला करता था। समय ही क्यों वह प्रत्येक पढ़े हुए पर विचार किया करता और उन्नति के अनेक मनसूबे बनाया करता। इस बालक की जीवनी से पता चलता है कि उसकी क्रिया-शीलता बड़ी विलक्षण थी। पुस्तकें पढ़ने का उस पर तुरन्त प्रभाव होता और वह प्रभाव उसके जीवन में कोई न कोई परिवर्तन ही लाने वाला होता। व्यापार में ईमान-दारी, समाज-सेवा और राजनीतिक धड़ेबाजी से संघर्ष करने की हिम्मत भी उसे ऐसे ही मिली पर मुसीबत यह थी वह पढ़-लिखा नहीं था।
एक दिन वह फ्रैंकलिन को भी दस वर्ष की आयु में पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी पर उसने अपने अध्यवसाय से से स्वतः ही दुनिया की पाँच भाषायें सीखीं और एक साथ वैज्ञानिक, दार्शनिक एवं राजनीतिक के रूप में विश्व-विख्यात हुआ। यह पढ़कर उस युवक ने विचार किया क्या वह दूसरा फ्रैंकलिन नहीं बन सकता? बन सकता है, उसके मन ने कहा-अध्यवसाय से क्या सम्भव नहीं। वह उस दिन से पढ़ने लगा। अँगरेजी, चिली, फ्रैंच कई भाषायें सीखीं और राजनीति में भाग लेने लगा। इस पर उसे देश निकाला दे दिया गया। वह काफी दिन तक चिली में रहकर देश में राजनैतिक स्वार्थ बाजी के विरुद्ध संघर्ष करता रहा। उसने पत्रकार के रूप में अर्जेण्टाइना निवासियों को भ्रष्टाचार के विरुद्ध संगठित कर दिया और एक दिन विद्रोह की ज्वाला फूट ही गई युवक स्वदेश लौटा और एक दिन वह अर्जेण्टाइना का उप राष्ट्रपति बना। इस महत्वपूर्ण पद पर पहुंचकर भी उसने जन-सेवा का मार्ग न छोड़ा। उसने अर्जेंटाइना को साक्षर बनाने का अभियान चलाया और उसे इतना तीव्र किया कि आज अर्जेण्टाइना दुनिया के देशों में सबसे अधिक शिक्षित देश है। अमेरिका तक ने उसकी सेवायें उपलब्ध की। एक पुस्तक की प्रेरणा ने इस युवक को ‘डोमिगो फास्टिनो सारमिन्टों के नाम से विश्व-विख्यात कर दिया।
सरमिन्टो युवकों से हमेशा कहा करता था- यह आवश्यक नहीं कि तुम दिन त पढ़ों थोड़ा पढ़ो अच्छा पढ़ो उसे अपने जीवन में आत्म-सात करने का अभ्यास भी डालों तो तुम्हारे सामान्य जीवन में भी सफलता के अनेक द्वार खुल सकते है।
वर्मा की क्लंग घाटी पर आजाद हिन्द सेना का मुकाबला अँगरेजी सेना की टुकड़ी से हो गया। आजाद हिन्द सेना के कुल तीन जवान और अँगरेजों की 169 सैनिकों की टुकड़ी। इस भीषण परिस्थिति में नेताजी बैठे स्वामी विवेकानन्द की पुस्तक पढ़ रहे थे-पुस्तक के इस अंश ने- “जब संकटों के बादल सिर पर मँडरा रहे हों तब भी मनुष्य को धैर्य नहीं छोड़ना चाहिये। धैर्यवान व्यक्ति भीषण परिस्थितियों में भी विजयी होते हैं।” नेताजी को भारी प्रकाश दिया।
घाटी से खबर आई क्या तीनों सैनिक पीछे हटा लिये जायें। नेताजी ने हृदय में छुपे विवेकानन्द के विचार फूट पड़े बोले-नहीं जब तक एक भी सैनिक जीवित रहता है चौकी खाली न की जाये। तीन सैनिक रात भर गोली चलाते रहे। प्रातःकाल तो वे मुठभेड़ की लड़ाई के लिये चढ़ दौड़े। जब चौकी पर पहुँचे तो देखा अँगरेजों के कुछ सिपाही तो मरे पड़े है शेष अपना सामान छोड़कर भाग गये हैं।
सुभाषचन्द्र बोस हैं नहीं पर स्वतन्त्रता का सबसे पहला आनन्द उन्होंने ही लिया। ऐसा भी क्यों कहें सच बात तो यह है कि स्वामी विवेकानन्द के साहित्य ने उन्हें चिर-मुक्त बना दिया था। उनमें अगाध निर्भयता, धैर्य और साहस था यह सब गुण उन्हें विवेकानन्द साहित्य से विरासत में मिले थे। उन्होंने जो कुछ भी पढ़ा उसके एक एक वाक्य को अपने जीवन का एक-एक चरण बना लिया उसी का प्रतिफल था कि वह जापान, सिंगापुर और जर्मनी जहाँ भी गये उसी प्रकार स्वागत हुआ जिस प्रकार स्वामी विवेकानन्द का अमेरिका और इंग्लैंड में। यह श्रेय स्वाध्याय को ही है जो सुभाष को जीवन शिला पर क्रिया शीलता बनकर खुद चुका था।
निराशा और घुटन की जिन्दगी से ऊबकर बालजक अपने एक मित्र के पास गया। तब वह एक वकील के पास क्लर्की करता था। मित्र से उसने कुछ धन की सहायता के लिए कहा तो मित्र ने इनकार कर दिया। निराशा और एक कदम आगे बढ़ गई।
अब मैं किसी को मित्र नहीं बनाऊंगा उसने प्रतिज्ञा की। आज की स्थिति में मित्र की भावना है कहाँ? मित्रतायें लोभ, लालच व किसी स्वार्थ के लिये होती हैं सहयोग और अच्छे रास्ते ले जाने के लिए नहीं युवक ने कहा अब पुस्तकें ही मेरी मित्र हैं। वही मेरे माता-पिता। उस दिन से वह पुस्तकों की शरण आ गया। दिन-दिन भर पड़ने में गुजारना और पढ़े हुए पर निरन्तर विचार करना ही उसका जीवन हो गया। मस्तिष्क में विचारों का समुद्र लहराने लगा।
फिर उसने एक समुद्र का मंथन किया। इच्छा तो थी एक वकील बनने की पर ज्ञान-संचय उसे अपनी ही ओर खींच ले गया। वाल्जक लेखक बन गया। पढ़े हुये विचारों को परिमार्जित रूप देने वाला वही वाल्जक प्रसिद्ध उपन्यासकार बना उसे 19 वी शताब्दी का सृष्टा कहा जाता हैं। अनेक प्रकार के ज्ञान के समन्वय से उसने विश्व को एक नई समन्वय पूर्ण विचारधारा दी।
सात वर्ष के एक बालक में पढ़ने की अभिरुचि जाग गई। जब उसके दोस्त मटरगश्ती कर रहे होते तब यह कोई कहानी, कविता, नाटक और धार्मिक पुस्तकें पढ़ रहा होता। हर्बर्ट स्पेन्सर, स्टुअर्ट मिल और टिंडल की पुस्तकों ने उसे बहुत प्रभावित किया फिर उसने बेकार किस्म के उपन्यास, कहानियाँ, पड़ना छोड़ दिया और निर्माणात्मक साहित्य ढूंढ़-ढूंढ़कर पढ़ने लगा। वह एक स्टेट एजेन्ट के यहाँ नौकरी कर रहा था तब भी अच्छी पुस्तकें पढ़ने का चाव उसने न छोड़ इससे उसके जीवन में बुराइयों का प्रवेश नहीं हो सका। पश्चिम में जन्म लेकर माँसाहार का कट्टर विरोधी यही बालक एक दिन जार्ज बर्नार्डशा के नाम से विख्यात हुआ। उसने जब लेखनी उठाई तो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ नाटककारों की श्रेणी में जा विराजा।
“एक फटी सी पुस्तक मेरे हाथ लगी। आरम्भ के कुछ पृष्ठ फटे थे। पर प्रत्येक पुस्तक से कोई न कोई अच्छी बात सीखने का मुझे व्यसन हो गया था। इस पुस्तक को पढ़ने से मुझे कुछ बहुत ही मासिक पंक्तियां हाथ लगी उन्हें मैंने अपनी डायरी में नोट कर लिया। यह पंक्तियां एक कहानी की थी और इस तरह थी- “मैं किसान हूँ मुझे किसान होकर जीने दो और वैसे ही मरने भी दो। मेरा पिता किसान का अतः उसके पुत्र को भी वैसा ही होने दो।” मुझे दस वर्ष बाद पता चला कि यह शब्द जार्ज ए. ग्रीन के थे।”
“इन पंक्तियों में परिश्रम शीलता के भव थे। डायरी में नोट इन शब्दों ने मुझे निरन्तर परिश्रम करने की प्रेरणा दी। मैंने बहुत-सी पुस्तकें पढ़ी। उन प्रत्येक पुस्तक से मैंने अनीति के विरुद्ध संघर्ष, मानव-जाति से प्रेम के पाठ पढ़े और सीखे। यों कहूँ कि पुस्तकों का साराँश ही उत्तर कर मेरे जीवन में समा गया है जो कुछ भी सफलता दिखाई दे रही है वह उनका ही आशीर्वाद है।”
आप समझ गये होंगे यह शब्द मैक्सिम गोर्की के हैं। मानवता की सेवा के लिये उन्हें बहुत समय तक याद किया जाता रहेगा।
संसार की अधिकाँश प्रतिभायें पुस्तकों से निकली हैं। पढ़ते हम लोग भी है, पर पढ़कर अपने जीवन को महान बनाने का जो अवसर जवाहरलाल नेहरू मार्क्स स्टालिन, माईकेल फैराडे, डार्विन, लूथर बरबैंक, गैलियस आदि ने प्राप्त या उस रहस्य को हम कहाँ जान पाये? हम भी इनकी तरह पढ़े हुये आदर्शों को अपने जीवन में उतार सके होते तो हमारी श्रेणी भी गाँधी, गोर्की जैसे महान पुस्तक प्रसूत पुत्रों में रही होती।
“कितना स्वार्थी है यह समुद्र और कैसी पागल है ये नदियाँ” चन्द्रमा बड़बड़ाया-”ये तो सब जगह से जल समेट-समेट कर सागर को समर्पित करती रहती हैं और वह सम्पूर्ण जल स्वीकार करता हुआ संग्रह करता है।”
तभी बादल एक साथी बोल उठे-”आप ही भ्रम में हैं बन्धु! समुद्र तो अपनी निधि प्रति दिन लुटाता ही रहता है। सूर्य के ताप से उसका जल भाप न बनें, तो हमारा अस्तित्व हो और न ही हम धरती पर जल बरसा पाएँ। सागर के इस उदार दानी स्वभाव को जान कर ही नदियाँ अपना सब कुछ उसे देती है।”
मनोवैज्ञानिकों का कथन है कि विनोद- वृति आत्म-उपचार का सर्वोत्तम माध्यम है। वस्तुतः निर्मल हास्य आन्तरिक उत्कृष्ट से घनिष्ठ रूप से जुड़ा है। दुनिया में जितने भी श्रेष्ठ एवं क्रियाशील पुरुषार्थी लोग हुए हैं, विनोद की प्रवृत्ति सभी में समान रूप से पाई जाती है।
महात्मा गाँधी और महान वैज्ञानिक चिन्तक आइन्स्टाइन की हँसी को उनके संपर्क में आने वाले लोग कभी भी भूल नहीं पाते थे। डाक्टर राममनोहर लोहिया की बाँकी हँसी उनके अनुयायियों को मुग्ध कर लेती थी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मुस्कुराहट के बारे में भी लोगों का यही कथन है। जवाहरलाल नेहरू कई बार आवेश में साथियों से बहुत कुछ कह जाते और हड़बड़ी में गलत समझ बैठते थे। किन्तु उनके सभी प्रशंसक साथियों का कहना था कि ऐसी किसी भी घटना के थोड़ी ही देर बाद, वे कोई विनोद कर, इतनी खुली हँसी हँस उठते थे कि सामने वाले का समस्त रोष-क्षोभ धुल बह जाता। चन्द्रशेखर आजाद का भी विनोद पूर्ण निर्मल हास्य प्रसिद्ध है।
श्री गोलवलकर गुरुजी की विनोद हँसी न केवल उनके संगी-अनुयायी स्वयंसेवकों को आकर्षित करती थी, अपितु उनके कट्टर विरोधी भी खुशवन्त सिंह जैसे पत्रकार तक ने उनसे मिलने के बाद इस स्वस्थ परिहास एवं निर्मल हँसी की मुग्धभाव से चर्चा की।
इससे यही स्पष्ट होता है कि आन्तरिक प्रसन्नता ने जुड़ी निश्छल हँसी तथा स्वस्थ विनोद-वृत्ति सुसंस्कारों का सत्यपरिणाम है और उससे संपर्क-क्षेत्र का प्रत्येक व्यक्ति प्रफुल्लता का अनुभव करता है। ऊपर जिन महापुरुषों की चर्चा की गई है, उनके संपर्क में आने वालों में जहाँ ऐसे लोग रहे, जिन्होंने उनसे सहयोग-अनु-दान-मार्गदर्शन प्राप्त कर जीवन धन्य बनाया; वहीं ऐसे लोग भी कम नहीं थे, जिन्होंने उनकी प्रसन्नता को देखकर ही कुछ पा लेने का अनुभव किया। एक तरह की ताजगी और शुचिता से वे भर उठे।
सच्ची प्रसन्नता वह पवित्र भागीरथी-प्रवाह है, जिसके समीप कुछ देर बैठ लेन भर से नवीन स्फूर्ति रग-रग में भर जाती है, चित्त हलका हो जाता है और कषाय-कड़ुवाहट से उत्पन्न व्यग्रता-भरी गर्मी तथा भार धुल-बह जाता है।
जो प्रसन्नता समीपवर्ती अन्य लोगों को इतना हर्ष और शक्ति देती है, वह स्वयं अपने धारक को कितना सुख न देती होगी।
कहा जा सकता है कि यह तो सब ठीक है। किन्तु विपन्नता, अभाव और प्रतिकूलता में विनोद-भाव एवं प्रसन्नता कैसे बनी रहे? वस्तुस्थिति यह है कि साधन-सम्पन्नता और सुविधा-संरक्षण से प्रसन्नता का कोई अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है। ऐसा आये दिन देखने में आता है कि रूखा-सुखा खाने, पहनने वाले भी प्रसन्न और धन-वैभव से सज्जित लोग भी चिड़चिड़े, बेचैन, अधीर, अशान्त हों। अस्थिर अनमन आँखें, तने तेवर, फूलती नसें और खिंची मुखाकृति-बड़े अफसरों, धनपतियों और साधन-सम्पन्नों के बीच भी कोई दुर्लभ दृश्य नहीं है। दूसरी और आर्थिक कठिनाइयों और तीखे संघर्षों के बीच भी जी खोलकर हँसने वाले व्यक्तियों की संख्या कुछ कम नहीं है।
गरीबी की सीमा-रेखा से नीचे जीवन जीने को विवश लोगों में भी प्रसन्नता तथा अपव्ययी विलासिता की स्थिति में जीने वालों में भी उद्विग्नता के उदाहरण आये दिन देखने के बाद भी साधन-सुविधाओं से प्रसन्नता का सम्बन्ध जोड़ना कहाँ तक उचित है?
सत्यता तो यह है कि परिस्थितियों को जटिलता नहीं, मनोभूमि की जटिलता ही व्यक्ति से उसकी सहजता और हँसी छीनती है। उद्विग्नताजन्य मानसिक तनाव, मानसिक दुर्बलता का परिणाम है। सशक्त मन में अनुकूलन की स्वाभाविक प्रवृत्ति तथा सामर्थ्य होती है।
प्रसन्नता का संबंध उपभोग-तन्त्र से नहीं, सम्वेदना-तन्त्र से है। उपभोग-तन्त्र की विषमता, क्रूरता तथा जटिलता के प्रति सात्विक रोष भिन्न बात है और निरन्तर खीझ, तनाव, चिड़चिड़ेपन से भिंचे-तने रहना भिन्न बात है। सही बात तो यह है कि सामाजिक अशुभ को भी ठीक से वही समझ सकेगा, जो शुभ को देख-समझ सकता है। जिन्हें मात्र अशुभ-चिन्तन, दोष-दर्शन, अभाव अनुभव और अवरोध-अन्वेषण की ही आदत है, वे खिन्नता उद्विग्नता, क्षोभ और आवेश से ही इतने भरे रहेंगे कि सामाजिक मंगल का सन्तुलित-चिन्तन और प्रवाहपूर्ण कर्म उनके वश की बात नहीं। वैसे भी, सामाजिक हित की चिन्ता करने वालों में आन्तरिक प्रसन्नता की भी स्वाभाविक प्रवृत्ति सर्वत्र देखी-पाई जाती है। चिड़चिड़ापन, अवसाद, असमंजस और कुण्ठा तो उन्हें ही अधिक घेरती है, जो अपनी ही भौतिक सुविधाओं की चिन्ता एवं अनुकूलताओं की कामना में दिन-रात डूबे रहते हैं।
अनुकूलताएँ और प्रतिकूलताएँ दोनों प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में आती हैं। जो मात्र प्रतिकूलताओं की ही बाबत विचार करता रहेगा, उसे हताशा और पीड़ा ही दबोचे रहेगी। अधिक सुविधा-सम्पन्न लोगों से अपनी तुलना कर कुढ़ते रहने वाला व्यक्ति सदा ही क्षुब्ध दिखाई पड़ेगा। जबकि अपनी अनुकूलताओं पर विचार करने वाला यह देखेगा कि उसके पास जो कुछ है, वह भी अनेकों के लिए दुर्लभ है। अतः कुढ़ने-खीझने की कोई आवश्यकता है नहीं। हाँ, विषमता के सामाजिक आधारों को समझने और उन्हें ध्वस्त करने की आवश्यकता अवश्य है। पर जो अपने ही अभावों को लेकर रो रहा है उसमें ऐसी श्रेष्ठ तत्परता आने की नहीं। उसे तो बस अपना अभाव और अधिक सम्पन्न लोगों का आमोद-हर्ष, दो ही बातें दिखाई देती हैं। उसका चित्त सदा बोझिल ही बना रहता है।
बार-बार आशा भंग होने से; श्रम के न्यूनतम पुरस्कार से भी वंचित रहने से या सतत शारीरिक पीड़ा से मनुष्य की भावनात्मक प्रकृति पर गहरे घाव हो जाते हैं। किन्तु इन घावों को गहरा करने में व्यक्ति की बढ़ी-चढ़ी अपेक्षाएँ अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यदि ये घाव सामाजिक कु-व्यवस्था के परिणाम हैं तो उन्हें एक-दो नहीं, करोड़ों को सहना-भोगना पड़ता होगा। उनके विरुद्ध संगठित-सुव्यवस्थित प्रयास ही सम्भव है। यदि ये विफलताएँ अपनी अक्षमताओं-दुर्बलताओं से सामने आई हैं, तो शांत-चित्त से उन्हें दूर करने में जुट जाना चाहिए। किसी भी स्थिति में, जो घटित हो जाये उसके लिये पछताते बैठने से कैसा भी लाभ होने वाला नहीं। वह अपनी प्रचण्ड आत्म-सत्ता का अपमान मात्र है। अपने को इतना छोटा नहीं मान बैठना चाहिए कि परिस्थितियों के प्रतिकूल झकोरे जड़ें ही हिलाकर रख दें।
प्रसन्नता एक दैवी विभूति है। उससे स्वयं को वंचित न होने दें। वह अन्य अनेक उपलब्धियों से बढ़-चढ़कर है। प्रतिकूलताओं के प्रचण्ड-आघातों को हँसकर झेलने से बड़ी वीरता क्या हो सकती है? सभी जीवट वाले लोगों में परिस्थितियों की विडम्बनाओं पर तथा स्वयं अपनी विसंगतियों पर हँस सकने की समान क्षमता देखी जाती है। वस्तुतः यही सच्ची विनोद-वृति है। सच्चा विनोदी अपने ऊपर भी हँस सकता है। किन्तु पड़ौसी पर, साथी पर विष-बुझे व्यंग-बाण कभी नहीं छोड़ता।
विनोद-वृत्ति जहाँ स्वस्थ चित्त की द्योतक है; वहीं बात-बात पर व्यंग करने की प्रवृत्ति हीन-भावना एवं रुग्ण मनःस्थिति का परिणाम है। हास-परिहास स्वस्थ होता है, किन्तु दूसरों का उपहास सदा कलहकारी एवं हानिकर होता है। खिल्ली उड़ाना तथा विनोद करना-दो सर्वथा भिन्न प्रवृत्तियां हैं। खिल्ली उड़ाने वाली प्रवृत्ति प्रारम्भ में भले ही रोचक नोंक-झोंक प्रतीत हो, किन्तु उसका अन्त सदा आपसी दरार, तनाव और कटुता में होता है। ऐसी ही प्रवृत्ति के लिये कहा गया है- “लड़ाई की जड़ हाँसी और रोग की जड़ खाँसी।”
विनोद और उपहास का अन्तर ऐसा नहीं है, जो हर किसी की समझ में न आ सके। इसके विपरीत, उनके शब्दों, शैलियों, मन्तव्यों और परिणामों में इतना अधिक अन्तर होता है कि प्रत्येक व्यक्ति उसे आसानी से समझ लेता है। उपहास दूसरों की कमजोरियों पर उँगली रखना है। इससे वह व्यक्ति तिलमिला उठता है। जबकि विनोद अपनी खुशी को बँटाना है, जिससे दोनों को आनन्द मिलता है।
जिस प्रकार तेज हवा कूड़ा-करकट उड़ा ले जाये, वैसे ही मुक्त हास्य मन का सारा दबाव-भार उड़ा देता है। जो हँस सकता है, वह दबावों से विक्षुब्ध नहीं बना रहता। “बच्चों जैसी हँसी।” विशेषण का प्रयोग प्रायः निश्छल हास्य के लिये किया जाता है। वह उपयुक्त ही है। बच्चों के मन पर घटनाक्रमों का बोझ नहीं रहता। यद्यपि प्रत्येक घटना के प्रति उनकी प्रतिक्रिया जीवन्त एवं तीव्र होती है। विनोदी वृति के व्यक्तियों का चित्त हलका रहता है, इसलिये वे प्रस्तुत क्षण के प्रति प्रत्यक्ष एवं तात्कालिक प्रतिक्रिया करते है। किसी पूर्ववर्ती घटना-प्रतिक्रिया का दबाव-बोझ उन पर नहीं रहता। इसलिये विनोद-वृत्ति का अगम्भीरता या छिछोरेपन से कोई सम्बन्ध नहीं। छिछोरापन भी वस्तुतः एक प्रकार का मानसिक बोझ ही है, जो हरदम चित्त पर लदा रहता है और सामने घट रही घटना को पैनेपन से देखने-समझने नहीं देता।
विनोद-वृत्ति तो भीतरी खुशी का अजस्र झरना है। निरन्तर चलने वाला फव्वारा है। बाहर खुशियों की तलाश के नतीजे अनिश्चित रहते हैं। बाहरी परिस्थितियाँ सदा व्यक्ति के वश में नहीं होती। उत्तम मार्ग यही है कि खुशियों का स्रोत भीतर ही प्रवाहमान, गतिशील रखा जाय। बाहर खुशी ढूढंना, प्यास लगने पर कुँए या प्याऊ की तलाश करना है। कुँआ सूखा या खारे जल वाला हो सकता है। प्याऊ में पानी नहीं मिले, यह भी हो सकता है, पर भीतर बहने वाला निर्मल हास्य का झरना तो तृप्ति के लिये सदा ही उपलब्ध रहता है।
सभी प्रखर, प्राणवान एवं क्रियाशील व्यक्तियों में विनोद-वृत्ति पाई जाती है। वह उन्हें नित नूतन स्फूर्ति देती है। इसीलिये हममें से हर एक को हँसती-हँसाती जिन्दगी जीना चाहिए। स्वस्थ विनोद-वृत्त को सदा जागृत रखना चाहिए।
पेरिस के एक सभा भवन में प्रति रविवार को 10 बजे एक गोष्ठी आयोजित होती है। जिसमें वहाँ के वैज्ञानिक हँसी परभाषण देते हैं। अन्त में सभी कक्षों में अन्ध-कार हो जाता है और लोगों के कहकहे गूँजने लगते हैं। मन के सुखद भावों को बाहर लाने के लिए हँसी सर्वोत्तम उपाय है। जो स्वयं को ही प्रसन्न नहीं करती वरन् आस-पास के लोगों और मित्रों को भी प्रफुल्ल कर देती है। हास्य शरीर की स्वाभाविक तथा आवश्यक क्रिया है जो दैनन्दिन जीवन में आने वाले व्याघातों का कुप्रभाव नष्ट करती है।
जब किसी के व्यवहार से दुःख पहुँचता है, कोई नैराश्यपूर्ण स्थिति आ जाती है और संयोग से उसी समय हँसी आ जाय तो सारा क्रोध और चिन्ता दूर होकर मन झूम उठता है। यह प्रत्यक्ष अनुभूत किया जा सकता है। मुस्कान और हँसी के द्वारा अंतर्जगत् में एक ऐसा स्निग्ध वातावरण बनता है जो अन्दर ही अन्दर हृदय को शीतलता प्रदान करता है।
इस शुभ प्रभाव का कारण हँसी की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया है। व्यथा, क्रोध, चिड़चिड़ापन थके हुए मन में ही ज्यादा उत्पन्न होता है। जबकि हास्य, मन के सारे तनावों और ग्रन्थियों को दूर कर देता है, खोल देता है। एक फ्रांसीसी मनोविज्ञान रोग चिकित्सक डॉ. पौस्क्डि ने लम्बे समय तक इस विषय में अन्वेषण किया। लगभग 140 प्रयोगों के द्वारा वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हँसने से मनुष्य के मन और सज्जा तन्तुओं को स्फूर्ति और संजीवता प्राप्त होती है तथा थकान और चिन्ता का भार कम हो जाता है। हँसी एक ऐसा मनोवैज्ञानिक व्यायाम है जो मन को ही नहीं शरीर के अवयवों तथा माँसपेशियों को अनावश्यक दबाव से मुक्त कर देता है।
हँसी के बाद में सर्व सम्मत सिद्धान्त है कि इसमें खून बढ़ता है। यह केवल कल्पना मात्र ही नहीं है। अमेरिका के डॉक्टरों ने इस सिद्धान्त की सचाई को परखने के लिए बालकों के दो समूह किए और दोनों को अलग-अलग रखा। एक समूह को दोपहर के भोजन के बाद एक मस-खरा तरह-तरह से हँसाता रहता। दूसरे समूह के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गई। एक मास बाद दोनों समूह के बच्चों का परीक्षण किया गया तो पता चला कि हँसने वाले बच्चों का स्वास्थ्य पहले की अपेक्षा और अच्छा हो गया है। वे पढ़ने-लिखने में भी और तेज हो गये हैं।
परन्तु यह सब होता तब है जब दिल खोल कर हँसा जाय। बहुत से अवसरों पर हम औपचारिक रूप से ही हँस पाते है। अपने साथी मित्रों का मन रखने के लिए अथवा आसपास के लोगों का साथ देने के लिए ऐसी हँसी का कोई परिणाम नहीं होता।
मुस्कान भी हँसी का ही एक स्वरूप है। यह सदा बनी रहने वाली स्थिति है। चौबीसों घण्टे खिलखिलाते रहना असम्भव हो सकता है परन्तु सदा मुस्कराते रहना ज्यादा कठिन नहीं है। दर्पण में खिला हुआ मुख कमल देखकर मन आह्लादित हो उठता है। मुस्कुराते हुए व्यक्तियों के समीप क्रोध, ईर्ष्या और प्रतिहिंसा फटकती तक नहीं। प्रतिहिंसा की अग्नि को शान्त करने वाली यह अचूक औषधि है। कभी-कभी घर में पति-पत्नी के बीच कलह होता है, या कोई मित्र रूठ जाता है तो मुस्कराने का नुस्खा आजमा कर इस दुःस्थिति को आसानी से सम्हाला जा सकता है। मन पर जमा हुआ सारा मैल मुस्कान के जल-प्रवाह में बह जाता है।
मनोवैज्ञानिक का मत है कि मुस्कान के द्वारा आन्तरिक मन को एक स्वस्थ संकेत मिलता है, विद्युत प्रभाव पड़ता ह। इसका दूसरा अर्थ यह है कि हमारा मन मधुर कल्पनाओं, सद्भावनाओं तथा पवित्र विचारों से ओत-प्रोत है। मानसिक स्वास्थ्य का प्रभाव शरीर, आयु और आरोग्य पर निस्सन्देह पड़ता है। इसी तथ्य की और इंगित करते हुए श्रीमती एलिजाबेथ सैफोर्ड ने लिखा है कि, सौ वर्ष जीने के लिए चारों और से जवान और हँसमुख मित्रों से घिरे रहो।”
प्रो. लोकेश द्वारा पी.एच.डी. प्रयास आरम्भ परिचितों से सहयोग की अपेक्षा
विश्व विद्यालय अनुदान आयोग नई दिल्ली के तत्वावधान में में समस्त सम्बद्ध महाविद्यालयों में ‘‘संकायस्तरोन्नयन कार्यक्रम’’ के अंतर्गत पाँच लाख परियोजना नामक अनुदान आरम्भ किया गया है। इस निधि का कतिपय अंश संकाय सुधार के अतिरिक्त महाविद्यालयीन शिक्षकों की योग्यता अभिवृद्धि अर्थात् अध्यापन क्षमता में गुणात्मक परिपक्वता लाने की दृष्टि से पी. एच. डी. उपाधि अर्जित करने हेतु (जो अब महाविद्यालयीन शिक्षक की अनिवार्य योग्यता निर्धारित की जा चुकी है) टीचर फैलोशिप के रूप में प्राचार्य की संस्तुति पर व्यय करने का प्रावधान है। उक्त टीचर फैलोशिप 3 वर्ष के लिए दीर्घ अवधि फैलोशिप तथा एक वर्ष के लिए अल्पावधि फैलोशिप क्रमशः 35 वर्ष से कम एवं 45 वर्ष से कम आयु के प्राध्यापकों को जिनकी शैक्षिणिक योग्यता सतत् उच्च श्रेणी एवं मेरिट स्तर की होती है प्रदान की जाती है।
युग निर्माण मिशन के सूत्र संचालन से निकट से संबद्ध चि. प्रो. लोकेश जो शासकीय विज्ञान महा-विद्यालय जबलपुर (पुराना रावर्टसन कालेज) में हिन्दी विभाग में प्राध्यापक थे को भी त्रिवर्षीय टीचर फैलोशिप मेरिट के आधार पर उपलब्ध हो गई है जिसे उनके महाविद्यालय के प्राचार्य ने प्रस्तावित मध्यप्रदेश शासन, महाविद्यालय शिक्षा विभाग के अनुमोदित जबलपुर विश्वविद्यालय ने अग्रसित तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने स्वीकृत किया है।
ज्ञातव्य है कि प्रो. पूर्णसिह लोकेश आरम्भ से ही मेधावी एवं अनुशासन प्रिय छात्र रहे है। उन्होंने एम. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में विशेष योग्यता सहित उत्तीर्ण की, साथ ही विधि स्नातक की उपाधि भी अर्जित की है। शासकीय विज्ञान महाविद्यालय में लगभग दो वर्षों तक हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर कार्यरत रहने वाले विगत 6 वर्षों से स्नातक एवं स्नातकोत्तर कक्षाओं के अध्यापन अनुभव से पूर्ण प्रो. लोकेश ने अनेक बार वेदमूर्ति तपोनिष्ठ आचार्य प्रवर जिन्हें चलता-फिरता विश्व कोश (इनसाइक्लोपीडिया) कहा जाता है जिनने समस्त आर्ष साहित्य के भाष्य के साथ अनेक पन्नों का सम्पादन एवं लगभग 650 के लगभग छोटे-बड़े ग्रंथों की रचना की है उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर शोध कार्य करने की विगत चार वर्षों से लगातार इच्छा अभिव्यक्त की, किन्तु आचार्यजी ने उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया। विगत नवम्बर 78 में जब प्रो लोकेश ने शिष्य वत्सल पूज्यवर से पुनः हठपूर्ण विशेष आग्रह एवं निवेदन किया तो उन्होंने सहमति दे दी। फलस्वरूप मेरठ विश्वविद्यालय से शोध कार्य के पंजीयन हेतु संपर्क साधा। मेरठ विश्वविद्यालय की “शोध उपाधि समिति द्वारा डा द्वारिका प्रसाद सक्सेना अध्यक्ष, हिन्दी विभाग खुर्जा महाविद्यालय, के संयोजकत्व में एवं डा उदयभानु सिंह अध्यक्ष हिन्दी विभाग दिल्ली विश्वविद्यालय तथा डा जयचन्द राय अध्यक्ष, हिन्दी विभाग गाजियाबाद महाविद्यालय, प्रभृति अधिकारी विद्वानों तथा मूर्धन्य हिन्दी सेवियों की सहमति से” आचार्य श्रीराम शर्मा व्यक्तित्व एवं कृतित्व विषय पर शोध कार्य हेतु सहर्ष स्वीकृति दी गई।
यह शोध दो प्राध्यापकों के निर्देशन में चलेगा एक है डा गोविन्द जी प्रसाद मेरठ विश्वविद्यालय (आन्तरिक निर्देशक) तथा दूसरे हैं (वाह्य निर्देशक) डा विष्णुदत्त राकेश गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय।
चि. प्रो. लोकेश, ने अपना शोध कार्य गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय में आकर करना आरम्भ कर दिया है। चूँकि आचार्यजी ने अपने जीवन के समस्त महत्वपूर्ण कार्य माँ वीणापाणि के पावन पर्व वसन्त से ही शुभारम्भ किये हैं फलतः यह पर्व उनके आध्यात्मिक जन्मदिवस के रूप में सर्वत्र मनाने की पुनीत परम्परा आरम्भ हो गई है। आचार्य श्री के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर होने जा रहा शोध कार्य किसी भी दृष्टि से कम महत्वपूर्ण नहीं है।
आचार्यजी के द्वारा संचालित रचनात्मक प्रवृत्तियाँ, साहित्य, क्रिया-कलाप, वैचारिक अभियान तथा व्यक्तिगत, सन्निद्ध संपर्क आदि से परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित ज्ञात अज्ञात परिजन अपनी अनुभूतियाँ भी भेजें।
विचित्र किन्तु सत्य, जिसे नकारा नहीं जा सकता, जो परिजन आचार्यजी के संपर्क में आर्य हैं अथवा उनके परिसर में प्रवेश कर उनके द्वारा को जिस-जिसने खट-खटाया है वे खली हाथ नहीं लौटे हैं, इस संदर्भ में भी तथा अपनी समस्याओं के समाधान विषयक विवरण भी भेज सकते है।
शोधार्थी अभी तो मात्र आचार्यजी द्वारा रचित, अनूदित, संपादित, कृतियों के संकलन में ही संलग्न है। इस समय जो असुविधा हो रही है वह यह है आचार्य श्री द्वारा लिखित उनके आरंभिक साहित्य के न मिल पाने की। जो साहित्य अब प्रकाशन से परे है, प्राचीन परिजन अच्छी तरह सुपरिचित है, 6 आने सीरीज वाली 50 पुस्तकें एवं एक रुपये सीरीज वाली 200 पुस्तकें यहाँ उपलब्ध नहीं है। साहित्य सर्जना के विकास क्रम के निर्धारण एवं अनुशीलन हेतु, उक्त साहित्य की महती आवश्यकता अनुभव हो रही है। जिन परिजनों के पास यह साहित्य उपलब्ध हो शीघ्र भेजें।
भेजना कहाँ है-
चि. प्रो. लोकेश वैसे तो शान्तिकुंज में रहकर ही अपना शोध कार्य पूर्ण करेंगे, क्षेत्रीय कार्य (फील्ड वर्क) की से दृष्टि आचार्यजी के कृतित्व के अनुशीलनार्थ उन्हें देश-विदेश की शाखाओं में जाना भी पड़ सकता है। बाहर रहने पर भी उनका मुख्यालय यहाँ का ही रहेगा। इसलिए प्रो. लोकेश, शान्तिकुंज हरिद्वार उ. प्र. के पते पर वाँछित सामग्री प्रेषित कर सकते है।
कहा जा चुका है कि शोध विषय “आचार्य श्रीराम शर्मा का व्यक्तित्व एवं कृतित्व” है। इसमें उनके अद्यावधि जीवनक्रम का-लिखित साहित्य का-नव निर्माण के लिए किये गये महान रचनात्मक प्रयासों का उल्लेख होगा। साथ ही उन प्रयासों में आते रहे उतार-चढ़ावों, तथा संशोधन, परिवर्तनों के साथ जुड़ी हुई मनःस्थिति एवं परिस्थिति पर भी चर्चा होगी। इस समस्त प्रसंग की तुलना देश-विदेश के अन्यान्य महामानवों, सद्ग्रन्थों एवं रचनात्मक प्रयासों के साथ भी की जायगी और इस तथ्य पर प्रकाश डाला जायगा कि नव सृजन के लिए अन्यत्र होते रहे ऐसे ही प्रयत्नों का पारस्परिक तारतम्य क्या है? सृजन परम्पराओं की किन धाराओं ने आचार्यजी को कितनी मात्रा में किस प्रकार प्रभावित किया है। आचार्यजी के व्यक्तित्व और कृतित्व में संसार के महामानवों एवं उनके सत्प्रयत्नों की जो गहरी छाया है उसका न तो अनुपान कम है और न प्रभाव ही नगण्य कहा जा सकता है। ऐसी दशा में उस आलोक की चर्चा करना भी आवश्यक समझा गया है जिसकी ऊर्जा ने इतनी बड़ी उपलब्धि सामने प्रस्तुत कर दी जिस पर शोध करने का श्रम प्रयास आवश्यक बन गया। स्पष्ट है कि संसार की युगान्तकारों विचारधाराओं और सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों के सार तत्वों का असाधारण समन्वय प्रस्तुत व्यक्तित्व एवं कृतित्व में भली प्रकार समाविष्ट देखा जा सकता है।
उपरोक्त शोध प्रयोजनों में जिन परिजनों को जान-कारी, कल्पना हों। जिनकी स्मृति इस संदर्भ में कुछ उपयोगी सुझाव दे सके उन्हें भी आमन्त्रित किया जा रहा है।
अपेक्षा क्या हैं?
इसके बाद परिजनों से, जो शोधार्थी की अपेक्षा है, इन पंक्तियों द्वारा व्यक्त की जा रही है-कि निम्नलिखित (सिनाप्सिम) रूप रेखा के अनुसार जिस प्रकार का सहयोग “आचार्यजी से सम्बद्ध परिजन दे सकने में समर्थ हों। उनका सहयोग एवं विचार आमन्त्रित है।
आचार्यजी के जीवन वृत्त एवं जीवन दर्शन से सम्बन्धित सामग्री जिसमें उनके (परिजनोँ के) निजी, संस्मरण घटनायें, महत्वपूर्ण, शोधोपयोगी पत्र, सान्निध्य लाभ विषयक अनुभूतियाँ सुवाच्य लिपि में या टाइप करा-कर भेजें। चूँकि आचार्यजी ने व्यक्ति, परिवार एवं समाज के परिष्कार में एक अहम् भूमिका सम्पादित की है उसकी प्रतिक्रिया में एक अहम् भूमिका सम्पादित की है उसकी प्रतिक्रिया वातावरण में सर्वत्र परिलक्षित हो रही है इससे सम्बन्धित जो परिवर्तन एवं परिष्कार आपने अनुभव किया हो उसे भी संक्षिप्त में भेजें।
बहुत सुना है रूढ़िवाद को, कान थक गए सुनते-सुनते, कब तक सहन करेंगे यह सब ऊब गया मन गुनते-गुनते!! रटी रटाई, रोली चंदन, धूप अगर की बात पुरानी, व्यष्टि भावना भरी साधना, जगह-जगह पर यही कहानी!!
गंगा ज्ञान शुष्क है भाई निष्ठा को हम कैसे जानें हर घर में है निशा अंधेरी, सही राह कैसे जानें
सद्विचार, सद्कर्म, धारणा, सद् है इस कलियुग में रोया, मानव-मानव का ही दुश्मन, अंतराल तू भी है सोया
करो प्रतिज्ञा परिष्कार की,- उनमें प्राण भरेंगे अब हम-
युग निर्माण करेंगे अब हम!!
गंगा ज्ञान तभी आवेगी, भागीरथ जब बन पायेंगे, अपने श्रम, सौरभ की जब हम, नव बसंत श्री दिखलायेंगे!!
नई दिशा निर्धारित होगी नए मार्ग ही चुनना होगा, दुष्प्रवृत्ति, मद, लोभ, मोह के कांटों को मुड़ना होगा!!
महा वासना के पर्वत को निग्रह से तोड़ा जाना है, अन्तः में धर शमन, दमन को-इच्छा को मोड़ा जाना है!!
धवल साधना, नव उपासना, महाशक्ति की अब करनी है, नई शक्ति, अभिव्यक्ति, प्रेरणा, जगती के मरु में भरनी है!!
अब तो केशरिया वाना है, निश्चित त्राण करेंगे अब हम!
युग निर्माण करेंगे अब हम!!
बलिदानों की परम्परा में, नव इतिहास बनाएंगे हम, भारतीय गरिमा ललाट पर गौरव चांद लगाएंगे हम!!
हर घर गली, कुटी राहों पर ज्ञान धर्म के दीप जलाना, है कर्तव्य हमारा पहिला- सच्ची मानवता अपनाना!!
यही पुण्य व्रत, यही तपस्या, यही साधना अब है मेरी उठो सभी परिजन अब जागो बजती महाकाल की भेरी!!
नव युग के इस ब्रह्म काल में, गति का प्राण भरेंगे अब हम
युग निर्माण करेंगे अब हम!!
-राजेन्द्रकुमार पाण्डेय
*समाप्त*