जब अंधकार की सघनतम वेला के अति समीप ही प्रभातकाल की ब्रह्म वेला जुड़ी रहती है, गर्मी की अतिशय तपन बढ़ चलने पर वर्षा की संभावना का अनुमान लगाया जाता है और वह सार्थक भी होता है। दीपक जब बुझने को होता है तो उसकी लौ जोर-जोर से चमकती है। मरण की वेला निकट होने पर रोगी में हलकी-सी चेतना लौटती है और असामान्य रूप में लंबी सांस चलती हैं। सभी जानते हैं कि मरने की अवधि आने से कुछ ही पहले चींटी के पर निकलते हैं।
अनीति की थोड़ी मात्रा नीतिवानों के सामने चुनौती बनकर पहुंचती और उन्हें अनौचित्य से लड़ पड़ने की उत्तेजना एवं पौरुष प्रदान करती है। जन-जन की दुष्टता को पराभव देखने का अवसर मिलता है। जागरूकता, आदर्शवादिता और साहसिकता का उभार तभी होता है जब अनय के असुर की दुरभि संधियां देवत्व के आक्रोश का आवेश भरती हैं। इस दृष्टि से अनय का अस्तित्व दुखदायी होते हुए भी अंततः उत्कृष्टता के प्रखर बने रहने का अवसर देता है।
किंतु यदा-कदा ऐसी परिस्थितियां भी आती हैं, जब संत, सुधारक और शहीद अपने पराक्रम पराभव को भारी देखते हैं और विपन्नता से लड़ते-लड़ते भी सत्य परिणाम की संभावना को धूमिल देखते हैं। ऐसे अवसरों पर अवतार का पराक्रम उभरता है और ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करता है जिससे पाशा पलटने, परिस्थिति उलटने का असंभाव्य संभव हो सके विपत्ति की विषम वेलाओं में सदा से वही होता रहता है। भविष्य में भी यही क्रम चलेगा। वर्तमान में इसके महातथ्य का प्रत्यक्ष प्रकटीकरण सामने है। युग-परिवर्तन की इस पुण्य वेला में प्रज्ञावतार की प्रखर भूमिका संपादित हुए ज्ञानवानों की पैनी दृष्टि सरलतापूर्वक देख सकती है।
“सृष्टि क्रम में सृजन और उत्थान के तत्व प्रधान है। कृषि क्रम में भूमि शोधन, बीज वपन, हरितमा का विस्तार, पुष्प की शोभा और फलों की सम्पदा का वैभव भी अधिक समय तक दृष्टिगोचर होता है। इतने पर भी वह स्थिति न तो निर्बाध गति से चली है ओर नहीं स्थिर रहती है। कृमि-कीटक और पशु-पक्षी उस हरितमा को नष्ट करने में कमी नहीं रहने देते। ऋतु प्रभाव भी कई बार इस उत्पादन में अवरोध उत्पन्न करता है। अन्ततः एक समय ऐसा आता है जब पकी फसल सूखती और अपनी जीवन लीला समाप्त करती है। उत्पादन का क्रम चक्र चलते रहने के लिए आवश्यक है कि उत्थान के बाद पतन और पतन के बाद उत्थान का क्रम जारी रहे। सूर्य का उदय-अस्त, प्राणियों का जन्म -मरण इस सुनिश्चित तथ्य की सुनिश्चित साक्षी देते रहते है “
“सृष्टि की सुव्यवस्था और सुन्दरता देखने ही योग्य है। प्रगतिक्रम का एक इतिहास है जिसमें नये अध्याय जुड़ते ही जाते है। इतने पर भी अवगति का अन्त नहीं पतन और पराभव के तत्व अपना काम करते है। और प्राणियों की सुरक्षा के लिए अधिक जागरूक रहने की प्रेरणा देते है। जीवन प्रवाह का एक सिरा है, जन्म, दूसरा मरण। गति चक्र इसी प्रकार बनता है। विस्तार सीधा चलता रहे उतना स्थान इस ब्रह्मांड में नहीं है। इसलिए उसे चक्र गति से परिभ्रमण करने के लिए बाधित किया गया है। पहिए नीचे जाते ओर ऊपर उठते है। सृष्टि क्रम में भी यही होता है। शैशव, किशोरावस्था, यौवन पूर्ण होते-होते जरा जीर्णता का ढलना आरम्भ हो जाता है ओर अन्त मरण के अतिरिक्त ओर कोई समाधान रह नहीं जाता है। यह मरण भी अन्तिम नहीं है। समापन के दिन से ही नव जीवन की भूमिका आरम्भ हो जाती है। मृतक को नवीन जन्म मिलता। असमर्थ वयोवृद्ध के सामने मरण की निराश रहती तो है पर उससे अगला कदम अभिनव शैशव के रूप में दूरदर्शी ज्ञान चक्षु आसानी से देख सकते है। निराश की सघन तमिस्रा को प्रत्यक्ष देखते हुए भी ऊषा द्वारा नवीन अरुणोदय का आश्वासन हर आस्थावान को उपलब्ध हो सकता है।”
“मनुष्यों की मनः स्थिति के समष्टि प्रवाह में भी ऐसे ही उत्थान- पतन के पन्ने पलटते रहते है। शालीनता के साथ व्यवस्था जुड़ी हुई है। यही जीवन है। यही विस्तृत है। यही सुनिश्चित है। इतने पर भी पतन और पराभव से छुटकारा नहीं घुन छोटा होता है। चिनगारी छोटी होती है। और विषाणुओं की सत्ता भी नगण्य है फिर भी वे चुपके-चुपके इतना कर गुजरते है कि मरण अथवा उसके समतुल्य संकट का सामना करना पड़ता है। विश्व के इतिहास में ऐसी घड़ियां अनेक बार आई है। जिनमें विनाश को घटाटोप बादल छाये ही नहीं, भयानक रूप से गरजे और सब कुछ डुबा देने की चुनौती देकर मूसलाधार बरसे है। इसी आशंका ने जन-जन को भयाक्रान्त किया है। कि विपत्ति का प्रभाव सर्वनाश करके ही छोड़ेगा।”
“यह सब होते हुए भी सृष्टा अपनी इस अद्भुत कलाकृति-विश्व वसुधा को मानवी सत्ता को सुरम्य वाटिका को विनाश के गर्त में गिरने से पूर्व ही सजाता और अपनी सक्रियता का परिचय देता है। ओर परिस्थितियों को उलटने का चमत्कार उत्पन्न करता है। यही अवतार है। संकट के सामान्य स्तर से तो मनुष्य ही निपट लेते है तो सृष्टा को स्वयं ही अपने आयुध संभालने पड़ते है। उत्थान के साधन जुटाना भी कठिन है पर पतन के गर्त में द्रुतगति से गिरने वाले लोक मानस को उलट देना अति कठिन है। इस कठिन कार्य को सृष्टा ने समय समय पर स्वयं ही सम्पन्न किया है। आज कि विषय वेला में भी अवतरण की परम्परा को अपनी लीला मदीह प्रस्तुत करते है। हम में भी कोई भी प्रज्ञावान प्रत्यक्ष देख सकता है।”
शरीर में हर घड़ी विषाक्तता उत्पन्न होती रहती है और उसकी सफाई का व्यवस्था क्रम भी स्वसंचालित रीति से चलता रहता है। कोशिकाओं का मरण, आहार का परिशोधन, गति क्रम में अवरोध, वाह्य आघात जैसे अनेकों कारण कार्य सत्ता के अन्तः क्षेत्र में विकृतियाँ उत्पन्न करते है। प्रकृति ने इनकी परिशोधन पद्धति का भी, काया के साथ-साथ ही निर्माण किया है। मल, मूत्र, स्वेद, कफ, श्वास, आदि के माध्यम से अनुपयुक्त का निष्कासन होता रहता है। रक्त के श्वेत कण बाहर से आने वाले विषाणुओं से जूझने और उन्हें परास्त करने में निरन्तर अपना प्रयास सजग प्रहरी की तरह जारी रखते है। थकान की क्षतिपूर्ति विश्राम से होती रहती है।
“यह विश्व भी विराट ब्रह्मा का शरीर है। इसमें भी पिण्ड काया की जैसी व्यवस्था काम करती है। प्रकृति का सृजन आर विनति का विसर्जन, निर्माण ओर ध्वंस की आँख मिचौनी खेलते रहते है। इसी को अनवरत क्रम से चलने वाला देवासुर संग्राम कहते है। ईसाई, मुस्लिम धर्मा में इसी को शैतान भगवान की प्रतिद्वन्द्विता कहा जाता है। मन का स्वभाव पानी की तरह नीचे की ओर चलना है। मनुष्य शरीर मिलने पर भी निम्न योनियों के संग्रहित कुसंस्कार अपनी जड़ जमाये बैठे रहते है। मानवीय मर्यादाओं का धर्म, आध्यात्म, कानून, व्यवस्था सुप्रचलन आदि के द्वारा उद्बोधन उत्तेजन होता रहता है, फिर भी कुसंस्कारिता अपनी करतूत करती ही रहती है। अनपढ़ व्यक्तियों के चिन्तन में भ्रष्टता और चरित्र में दृष्टता का बाहुल्य रहता ही है। सज्जन प्रकृति के लोग भी यदा कदा अवाँछनीयता की कीचड़ में फिसलते देखे गये है। इस अनुपयुक्तता से जूझना भी उतना ही आवश्यक है जितना कि सृजन के साधन जुटाना। “
“घर में भोजनालय की तरह ही शौचालय की व्यवस्था करनी पड़ती है। ओर रसोई दारिद की तरह ही महतरानी की भी आवश्यकता रहती है। उपार्जन के साथ-साथ ही सुरक्षा की योजना बनानी पड़ती है। भण्डारी की तरह चौकीदार का भी दर्जा है। अगरबत्ती जलाकर सुगंध बखेरने की ही तरह नाली में फिनायल छिड़कने की भी आवश्यकता रहती हे। किसान बीज बोने की, खाद-पानी की व्यवस्था जुटाने की तरह ही वन्य पशुओं और कृमि कीटकों से फसल को बचाने का भी प्रबन्ध करता हे। माली के श्रम की सार्थकता फलों को पक्षियों से बचाने का प्रबन्ध किये बिना हो नहीं सकती। सरकारें शिक्षा, चिकित्सा, परिवहन, सिंचाई, बिजली उद्योग आदि के अभिवर्धन में जितना ध्यान देती हे। लगभग उतना ही व्यय उन्हें पुलिस, जेल, कचहरी, सेना, शस्त्र निर्माण आदि पर करना पड़ता है। मात्र सृजन ही अभीष्ट नहीं, ध्वंस का अवरोध भी एक तथ्य है। जिसकी ओर रो आँख मीच सकना न काय सत्ता के लिए न विश्व व्यवस्था के लिए न व्यक्ति के लिए न समाज के लिए संभव होता है। उपार्जन एवं सृजन की कितनी ही महत्ता क्यों नहो, उसकी अपूर्णता तब तक बनी ही रहेगी जब तक विनाश के विघातक तत्वों से निबटने का प्रबन्ध न किया जाय। मानवी ओर दैवी व्यवस्था क्रम में दोने का ही समुचित समावेश पाया जाता है। इस क्रम में जब भी असंतुलन पड़ता है। तभी विषम परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है। और विडंबनाओं का सामना करना होता है।
उपयोगी का अभिवर्धन करने के लिए सृजन के तत्व गतिशील रहते है। उन्हीं के पुरुषार्थ से भौतिक और आत्मिक जगत् में समृद्धि और संस्कृति की सुषमा हरितमा इस विश्व वसुधा पर दृष्टिगोचर होती है। साथ ही निकृष्टता की विनाश लीला को निरस्त करने के लिए प्रखर पराक्रम भी अपना जौहर दिखाता रहता है। शौर्य और साहस इसी का नाम है। श्रेष्ठता के संवर्धन और निकृष्टता के उन्मूलन में नियोजित मानवी प्रखरता को ही त्याग बलिदान कहते है। इतिहास में ऐसे ही वीर पुरुषों का यशगान है। धर्म ग्रन्थों के ऋषि प्रायः सृजन कृत्य में संलग्न रहे है उन्होंने सर्वतोमुखी प्रगति के महत्व पूर्ण आधार खड़े किये है। साधु और ब्राह्मण की परम्परा इन्हीं पुण्य प्रयोजनों में गतिशील रही है। वीर बलिदानियों का वर्ग क्षत्रिय है। क्षात्र धर्म भी ब्रह्म धर्म के समकक्ष ही माना गया है। और उसकी प्रशक्ति भी समतुल्य ही आँकी जाती रही हैं। ब्रह्म क्षात्र का समन्वय ही श्रेष्ठता के सम्वर्धन और संरक्षण में समर्थ इकाई बनकर प्रकट होती है। एक ही केन्द्र से दोनों प्रवृत्तियां चले या दो उद्गमों से निकल कर एक लक्ष्य तक पहुँचे, यह परिस्थितियों पर आधारित है, किन्तु पूर्णता समग्रता बनती तभी है जब सृजन का अभिवर्धन और ध्वंस का उन्मूलन सन्तुलित गति से अपना आधार सुदृढ़ बनाये रख सके।
शास्त्र और शस्त्र का समन्वय करने वाले तत्वों और व्यक्तियों ने ही सृष्टि के प्रगति क्रम को आगे बढ़ावा हैं उन्हीं ने ध्वंस की चुनौती से वसुधा की सौंदर्य सुषमा को सुरक्षित रखा है। ऋषि परम्परा में द्रोणाचार्य परशुराम, भीष्म, विश्वामित्र आदि के अनेकानेक उदाहरण ऐसे है जो उभपक्षेय भूमिका निभाते रहते है। शास्त्र और शस्त्र का समान उपयोग करते रहते है। होता ऐसा भी रहा है कि दोनों उद्गम स्वतन्त्र इकाई बनकर रहे और आवश्यकतानुसार उपयुक्त मात्रा से तालमेल बिठाकर काम करे। धर्मा तन्त्र और राजतन्त्र की दो ध्वजाओं के नीचे दो आधार प्रथम-पृथक भी एकत्रित होते रहे है। और पारस्परिक सहयोग से समृद्धि और प्रगति की सुख-शाँति का ढाँचा खड़ा करते रहे है।
काम सत्ता की तरह विश्वसत्ता में भी औचित्य का सम्वर्धन और अनौचित्य का उन्मूलन क्रम रथ के दो पहियों की तरह सहयोग पूर्वक चलता है। यह सुव्यवस्था जब तक सही रूप से बनी रहती है तब तक प्रगतिक्रम सुनियोजित गति से चलता और सुख शान्ति का वातावरण बनता रहता है। किन्तु जब असन्तुलन उत्पन्न होता है अथवा सामंजस्य लड़खड़ाता है। तो संकट की घटाये घुमड़ने लगती है। जन-जीवन में सृजन की चेतना उच्चस्तरीय रहनी आवश्यक है। धर्म और आध्यात्म का तत्व दर्शन इसी की भावनात्मक पृष्ठभूमि खड़ी करता है। सन्त और सृजेता अपनी प्रवृत्तियां इस प्रयोजन में नियोजित रखते है। साथ ही प्रखरता का पराक्रम निकृष्टता को निरस्त करने में आपने शौर्य साहस का परिचय देता है। शान्ति और सुव्यवस्था की गारन्टी इन दोनों की समर्थता और सहकारिता पर ही निर्भर रहती है।
यह हुआ सृष्टि की सुव्यवस्था का सन्तुलित प्रगति-क्रम। साथ ही असन्तुलन की अव्यवस्था भी दृष्टव्य है। जब सृजन के तत्व दुर्बल पड़ जाते है तो आत्मिक क्षेत्र में अज्ञान और भौतिक क्षेत्र में दारिद्रय की विभीषिकायें सिर उठाने लगती है। इसी प्रकार पतन से जूझने वाली प्रखरता अपनी वरिष्ठता भूलकर ललक लिप्सा के गर्त में गिरने लगती हे। तो निकृष्टता की अपनी विनाशलीला रचने के लिए खुला क्षेत्र मिल जाता हे। सृजन की शिथिलता और विनाश की स्वच्छंदता का असन्तुलन ही व्यक्ति और समाज के सम्मुख अनेकानेक विपत्तियाँ खड़ी करता है। समस्यायें और कठिनाइयाँ इसी स्थिति में आँधी तूफान की तरह उठती हे। सर्वनाशी विभीषिकाओं का आधारित कारण यह असन्तुलन ही है। जिससे देवता दुर्बल पड़ता हैं और दैत्य को स्वच्छंद रहने का अवसर मिलता है।
काया में दुर्बलता, रुग्णता और अकाल मृत्यु जैसे संकट तभी खड़े होते है जब पोषण घटता है और मालिन्य बढ़ता है। मानसिक तेजस्विता का व्यक्तित्व की उत्कृष्टता का ह्रास भी इसी आधार पर होता है कि चिन्तन और चरित्र में से आदर्श वादिता घटती और दुर्बुद्धिजन्य दुश्चरित्रता बढ़ती जाती है। व्यक्ति के पतन पराभव का एकमात्र कारण यही है। समाज का उत्थान पतन भी इसी तथ्य पर आधारित है। सृष्टि का चिरपुरातन इतिहास साक्षी है कि संकट असाधारण रूप से जब कभी जहाँ कहीं उभरे है वाही सृजन की दुर्बलता और ध्वंस की बलिष्ठता भी नाना आकार प्रकार के संकटों को बनाते उभारते देखा जा सकता है।
सृजन की सत्प्रवृत्तियां सनातन है। वे अपना काम करती ही रहती है। परिस्थितिवश दुर्बल तो पड़ती है पर पूर्णतया नष्ट नहीं होती। लंका में असुरों का बाहुल्य था फिर भी विभीषण और मन्दोदरी न केवल अपनी वरिष्ठता बनाये रहे वरन् अनीति के प्रतिरोध अधिक संभव न होने पर भी असहयोग ओर विरोध तो करते ही रहे। सन्त, सुधारक और शहीद तथा श्रेष्ठता के समर्थन ओर निकृष्टता के उन्मूलन में भी अपनी क्षमता और परिस्थितियों की विषमता के साथ तालमेल बिठाकर कुछ योजना बनाते ओर प्रयास करते है। यह सामान्य क्रम हलके भारी रूप में चलता ही रहता है। किन्तु कभी-कभी स्थिती बहुत विषम हो जाती है। सामान्य प्रयासों से न सृजन की बढ़ी-चढ़ी आवश्यकता पुरी होती है और न ध्वंस की विनाशलीला पर नियन्त्रण बन पड़ता है। आतंक की तमिस्रा घनी होती जाती है। और निराशा भरी परिस्थितियाँ बेकाबू हो गयी है। और पतन और उत्थान में बदल सकने वाली प्रखरता मनुष्य के हाथ से छिन गई। यह असमंजस यदि दे तक ऐसा ही बना रहे तो ध्वंस ही जीतेगा। विनाश ही नग्न नृत्य करेगा।
ऐसे ही अवसरों पर सृष्टा का वहां आश्वासन अवतरित होता है जिससे उसको अपने सुरम्य उद्यान को विनाश के गर्त में गिरने से पूर्व ही उसे बचाते रहने का सुनिश्चित विश्वास दिलाया है। “यदा यदा हि धर्मस्य..................।” वाली प्रतिज्ञा गीताकार ने अर्जुन के सम्मुख ही प्रकट नहीं की हैं वरन् इस आश्वासन का शास्त्रों और आप्त वचनों में अनादि काल से अनवरत उल्लेख होता रहा है ने केवल उल्लेख वरन् उसके प्रकटीकरण का प्रमाण भी समय-समय पर उपलब्ध होता रहा हे। दिव्य सत्ता का अवतरण ऐसे ही अवसरों पर होता है। अवतार ऐसी ही विषम परिस्थितियों में प्रकट होते है। मनुष्य का पौरुष जहाँ लड़खड़ाता है वहाँ गिरने से पूर्व सृजेता के लम्बे हाथ सन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के लिए अपना चमत्कार प्रस्तुत करते दिखाई पड़ते है। यही है सृष्टा की लीला अवतरण प्रकटीकरण।
सृष्टि के आदि से लेकर अब-तक अनेक बार अनेक क्षेत्रों में अनेक विषमताओं को निरस्त करने के लिए होते रहे हे। भूतकाल में विश्व बिखरा हुआ था। यातायात के साधनों में न्यूनता रहने से एक दुनिया छोटी-छोटी अनेक दुनियाओं में बैठी हुई थी। इसलिए विषमतायें भी क्षेत्र विशेष की स्थानीय परिस्थितियों की होती थीं। विश्वव्यापी कोई संकट प्रायः नहीं ही होता था,इसलिए अवतार भी क्षेत्रीय ही होते थे और ‘ उनके सामने लक्ष्य भी उतना ही रहता था जितना कि उन दिनों संकट उत्पन्न करने के लिए उत्तरदायी था। भारतवर्ष में हिंदू धर्म के अंतर्गत 14 अवतार गिनाये जाते हैं। जैन धर्म के 14 तीर्थंकर इनके अतिरिक्त है। सिक्खों के दस गुरु भी उसी श्रेणी के गिने जाते है। अन्यान्य सम्प्रदायों में भी ‘ अपने प्रवर्तकों एवं ऋषि देवताओं का पृथक-पृथक उल्लेख है। हिन्दू धर्म की शाखा प्रशाखाओं के अंतर्गत जिन्हें अवतार स्तर की मान्यता मिली है उसकी गणना हजारोँ में ही जाती है। फिर भारत से बाहर अन्य देशों एवं धर्मो की गाथाओं में अपने-अपने अवतारों का अलग से वर्णन है। ईसाई, मुसलिम, पारसी, यहूदी, आदि धर्मावलम्बी भी अपने अवतारों की गणना अलग से करते है। वे हिन्दू धर्मानुयायियों की गणना से भिन्न है।
मात्र धार्मिकता का क्षेत्र ही एक मानवी आवश्यकताओं एवं समस्याओं का क्षेत्र नहीं है। उसके बाहर भी बहुत कुछ है। उन क्षेत्रों में भी समस्याओं का समाधान करने वाली शक्तियाँ भी अनेक महा मानवों के रूप में प्रकट होती रही है। दर्शन,विज्ञान,शिक्षा,चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में छाये हुए अन्धकार को प्रकाश में बदलने वाले व्यक्तित्वों को उनसे लाभान्वित होने वाले एवं श्रद्धालु लोग अवतार ही मानते है। दर्शन एवं विज्ञान की महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्रस्तुत करने वाले महामानवों को वैसा ही मसीहा माना जाता है जैसा कि धर्म क्षेत्र के लोग पौराणिक अवतारों को श्रद्धास्पद एवं अभिनन्दनीय मानते है।
व्यक्तियों को अवतार,मानना हो तो मात्र धर्मक्षेत्र की विभूतियों को -ही नहीं,सन्तुलन में सहायक हर महान् को उसी श्रेणी में गिनना पड़ेगा।ऐसी दशा में उनकी संख्या सीमा का निर्धारण सम्भव न रहेगा।साथ ही एक कठिनाई और बनी रहेगी कि उनके स्तर के अनुरूप कनिष्ठ वरिष्ठ का वर्गीकरण भी आवश्यक हो जावेगा। अवतारों की क्षमता और विशिष्टता का मूल्याँकन उनकी कलाओं के मापदण्ड में आँका जाता है। परशुराम जी तीन कला के और रामचन्द्र जी बारह कला के अवतार थे। दोनों एक ही समय में ‘हुए और एक दूसरे के संबंध में यथार्थता से अपरिचित ही बने रहे। मच्छ,कच्छ,बाराह आदि की कलायें कम थीं और क्रमिक विकास के अनुसार,बढ़ती चली आई। राम बारह कला के और कृष्ण सोलह कला के अवतार थे युद्धवीस के। पूर्ण कलायें चौसठ मानी जाती है। इस प्रकार अबतक के अवतारों की सामयिक परिस्थितियों के अनुसार जैसा भी पुरुषार्थ करना पड़ता है उसके स्तर और विस्तार को देखते हुए उनका महत्व,स्तर और पराक्रम भी बढ़ता रहा है।
अपने युग में भगवान की सत्ता “ प्रज्ञावतार” के रूप में प्रकट हो रही है। इसकी कलायें चौबीस है। गायत्री के चौबीस अक्षरों, में से प्रत्येक को एक कला किरण माना जा सकता है। इन दिव्य धाराओं में बीज रूप से वह सब कुछ विद्यमान है जो मानवी गरिमा को स्थिर एवं समुन्नत बनाने के लिए आवश्यक है। सूर्य के सप्त अश्व, सप्त मुख, सप्त आयुध प्रसिद्ध है। सविता की प्राण सत्ता गायत्री की शक्तिधारायें इससे अधिक है। गायत्री के चौबीस अक्षरों में साधन परक सिद्धियां और व्यक्तित्व परक, ऋद्धियां अनेकानेक हैं उनका वर्गीकरण चौबीस विभागों में करने से विस्तार को समझने में सुविधा होती है चेतना की अन्तरंग का परिष्कार और साधन सुविधाओं का विस्तार यह दोनों ही तथ्य मिलने पर मनुष्य में देवत्व के उदय और समाज में स्वर्णिम परिस्थितियों के विस्तरण की सम्भावना बनती है। प्रज्ञावतार का कार्यक्षेत्र यही है। वह व्यक्ति के रूप में नहीं शक्ति के रूप में प्रकट होगी। जिस व्यक्ति में इस प्रज्ञा तत्व की मात्रा जितनी अधिक प्रकट होगी वह युग सृजेताओं की गणना में आ सकेगा और अपने पुरुषार्थ के आधार पर श्रेय प्राप्त कर सकेगा इतने पर भी परिवर्तन के लिए अवतरित मूल सत्ता निराकार ही रहेगा। चेतना सदा निराकार ही रहती है। व्यक्तियों में घटनाओं के माध्यम से उसके प्रवाह का अनुभव भर किया जा सकता है। पंखा,बल्ब,मोटर,हीटर आदि बिजली से चलते तो है पर वें उपकरण बिजली नहीं हे। विद्युत धारक मूलभूत स्वरूप को प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता उसकी प्रतिक्रिया भर अनुभव की जा सकती है। प्रज्ञावतार का दर्शन भी इसी आधार पर कर सकना सम्भव होगा। उसे किसी व्यक्ति की आकृति में देखा जा सकेगा। हाँ विशिष्ट व्यक्तियों में उसकी ज्योति न्यूनाधिक मात्रा में जलती देखी जा सकेगी। यह ज्योति पुँज अपनी विशिष्टता का परिचय देते हुए यह प्रमाणित करेगा कि युग परिवर्तन की ईश्वरीय इच्छा को पूरा करने में वे कितने समर्थ एवं श्रेयाधिकारी बन सके।
न अवतार का प्रयोजन डगमगाते सन्तुलन को स्थिर करने के लिए सूक्ष्म जगत में ऐसा भावनात्मक प्रवाह उत्पन्न करता हैं जो अपनी प्रेरणा से असंख्य प्राणवानों में नव सृजन के लिए अभीष्ट आवेश उत्पन्न कर सके। धर्म की ग्लानि की ओर दुष्कृतों को उलट कर धर्म की स्थापना एवं साधुता की सुरक्षा का महान् प्रयोजन, इसी प्रकार सम्पन्न होता रहा है। अपने युग में वह प्रक्रिया इसी क्रम से सम्पन्न होने जा रही है।
संयुक्त राज्य अमेरिका का एक साधनहीन व्यक्ति। फिर भी उसने अपने भाग्य को कभी बुरा भला न कहा। कर्म में उसकी निष्ठा थी। आगे बढ़ने की चाह थी। दिन भर जीविकोपार्जन के लिए कठिन श्रम पड़ता,फिर भी वह रात को मनोविनोद के लिए अपने समय को बरबाद न करता और न थकान मिटाने के लिए जल्दी सोता।
रात को आग के उजाले में बैठकर गणित का अभ्यास करता था। एक दिन ब्लैक स्टोन की लिखी किसी पुस्तक की इच्छा हुई,तो वह पुस्तक प्राप्ति हेतु चार मील पैदल चलकर अपने मित्र के घर गया और लौटकर आया तब तक रास्ते में ही उसके सौ पृष्ठ समाप्त कर लिये।
इस अध्ययनशील और पुरुषार्थी व्यक्ति ने अपने देश की गुलामी-प्रथा का अन्त करने के लिए सारा जीवन ही लगा दिया। आखिर एक दिन उस साधन हीन अब्राहमलिंकन को अपने देश संयुक्त-राज्य अमेरिका का राष्ट्रपति बनने का अवसर मिला।
व्यापक शक्तियाँ सूक्ष्म और निराकार होती है। उनका कार्य क्षेत्र अदृश्य जगत हे। परब्रह्म की अवतार सत्ता युग सन्तुलन को संभालने,सुधारने के लिए आती है। यह कार्य वह उनसे कराती है। जिनमें दैवी तत्वों का चिर संचित बाहुल्य पाया जाता है।
सूक्ष्म-जगत में चलने वाले प्रवाहों की प्रतिक्रिया से सभी परिचित है। ग्रीष्म,शीत,और वर्षा ऋतुओं में भिन्न-भिन्न प्रकार का वातावरण रहता है और उसी आधार पर पदार्थों एवं प्राणियों की स्थिति बदलती रहती है। बसन्त ऋतु में कुछ विचित्र प्रवाह बहते हैं और प्राणियों से लेकर वनस्पतियों तक को उल्लास उन्माद से भर देते है। महामारी से लेकर युद्धोन्माद तक की परिस्थितियाँ सूक्ष्म जगत में बनती और स्थूल जगत में अपने अस्तित्व का परिचय देती है। लोक प्रवाह में अवाँछनीयता की विषाक्तता भर जाने से पतन और पराभव का संकट खड़ा होता है। उसका तूफानी प्रभाव सारे वातावरण को झकझोरता है। जागृत आत्मायें उस दैवेच्छा को पूरा करने में अग्रगामी भूमिका निभाती और महाकाल का हाथ बंटाती दीखती है। साथ ही लोक मानस पर भी उस उभार का प्रभाव पड़ता है। अवाँछनीयता की जड़ें खोखली होने लगती है और औचित्य का समर्थन करने के लिए हर किसी का मन मचलता है। इस सहज परिवर्तन का प्रभाव नये सृजन के लिए उत्पन्न हुई अनेकानेक सत्प्रवृत्तियों के रूप में सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है।
मानवी काया में जो अवतार का दर्शन करना चाहते है, ने उस समय के श्रेष्ठ सज्जनों को उदास चरित्र एवं उदात्त प्रयास के विकास विस्तार में भली प्रकार देख सकते है। जब युगान्तरीय चेतना से प्रभावित आदर्शवादी व्यक्ति सृजन प्रयोजनों में अधिक तत्परता पूर्वक कार्य संलग्न दिखाई पड़ तो उसे अवतार की प्रेरणा ही मानना चाहिए। सन्त,सुधारक ओर शहीद बढ़ने लगें तो समझना चाहिए इसका सूत्र संचालन अवतारी सता ही अदृश्य रूप में कर रही है।
सन्त सुधारक और शहीद सामान्य जन-जीवन से ऊंचे स्तर के होने के कारण छोटे-बड़े अवतारों की गणना में आते है। सन्त अपनी सज्जनता से मानव जीवन के सदुपयोगों का आदर्श प्रस्तुत करते है। मानव जीवन के सदुपयोगों का आदर्श प्रस्तुत करते है। उनकी विचारणायें गतिविधियाँ और उपलब्धियाँ जन-जन के मन में आदर्शवादिता के प्रति श्रद्धा और अनुकरण के लिए उमंग उत्पन्न करती है। सुसंस्कृत जीवन यापन किस प्रकार होना चाहिए इसका प्रत्यक्ष उदाहरण सन्त अपने उपदेशों से ही नहीं चरित्र एवं व्यक्तित्व के आधार पर भी प्रस्तुत करते है। हेय, उदाहरण ही सर्वत्र दृष्टिगोचर होते हैं इसलिये आमतौर से यही समझा जाता है कि आदर्शवादिता कहने सुनने भर की बात है उसका उपयोग कथा-प्रवचन में तो हो सकता है पर व्यवहार में उसे उतारना सम्भव नहीं। इस निराशा को सन्त अपने निजी’ उदाहरण से निरस्त करते है और यह साहस प्रदान करते हैं कि मनः स्थिति ऊँची रहने पर विषम परिस्थितियों में भी मानवी गरिमा अक्षुण्ण रखी जा सकती है। निराशा की अनास्था को उलटने में सन्तों का जीवन क्रम प्रकाश स्तम्भ जैसा प्राणवान उदाहरण प्रस्तुत करता है। आदर्शों के परिपालन में आने वाली कठिनाई का सामना करते हुए उत्कृष्टता को दृढ़ता पूर्वक अपनाये रहने वाले व्यक्ति सन्त वर्ग में गिने जाते है भले ही वे दश और व्यवसाय सामान्य स्तर का ही क्यों न अपनाये रहते हों। सन्तों को धरती के देवता कहते है। साधु और ब्राह्मणों को जो उच्चस्तरीय सम्मान मिलता है उससे अवतार के प्रति लोकश्रद्धा की झाँकी मिलती है।
जन जीवन में अवतार का इससे ऊँचा स्तर है सुधारक। यह स्थिति ऊंची है। इसमें सन्त होने के लिए आत्म निर्माण की तपश्चर्या ही पर्याप्त नहीं होती। श्रेष्ठ,जीवन जी लेने तक ही बात नहीं बनती वरन् एक और भी बड़ा कदम उठाने की आवश्यकता पड़ती हैं कि जन-जीवन पर छाये हुए भ्रष्ट चिन्तन और दुष्टाचरण के साथ जूझने का प्रबल पराक्रम करना होता है। आत्म-सुधार अपने हाथ की बात है इसलिए संत का कार्यक्षेत्र सीमित और सरल है। किन्तु सुधारक को दूसरों को बदलना होता है। इसलिए अपेक्षाकृत अधिक प्राण शक्ति की आवश्यकता पड़ती है। चरित्र ऊंचा साहस अधिक प्रखर और पुरुषार्थ अधिक बल चाहिए तभी दूसरों को अभ्यस्त अनाचार से विरत करने और सदाशयता अपनाने के लिए सहमत एवं विवश करना सम्भव होता है। सुधारक न केवल लोक प्रवाह में घुली हुई अवांछनीयता से जूझते हैं वरन् साथ ही अभीष्ट परिवर्तन को प्रचलन में जोड़ने और परम्परा बनाने का सृजन प्रयोजन भी पूरा करते है। उन्हें दो मोर्चे संभालने पड़ते है। जबकि सन्त के लिये एक कार्य भी पर्याप्त समझा जाता है। सन्त का ब्राह्मण होना पर्याप्त है किन्तु सुधारक को ब्रह्मक्षेत्र’ धर्म अपनाना होता है। उसके एक हाथ में शास्त्र और दूसरे में शस्त्र रहता है। व्यापक परिवर्तन के लिए इससे कम प्रखरता से काम चल भी नहीं सकता। सुधारकों की गणना देवदूतों में होती रही है। अवतार का यह द्वितीय चरण है।
तीसरा चरण है शहीद। शहीद का अर्थ है- “ स्व “ का “ पर “ के “ लिए समग्र समर्पण। अध्यात्म भाषा में इसी को समर्पण, शरणगति कहते हैं। स्वार्थ का परमार्थ में उत्सर्ग करने का तात्पर्य है लोभ और मोह के बन्धनों को काट फेंकना, अपने दायरे को शरीर परिवार तक सीमित न रखकर विश्व नागरिक जैसा बना लेना वसुधैव-कुटुम्बकम् के दर्शन को चिन्तन और चरित्र का अविच्छिन्न अंग बना लेना। इस स्तर के व्यक्तित्व लोक प्रवाह से अलग थलग पड़ जाते हैं। लोगों की दृष्ट में वे मूर्ख होते हैं और उनकी दृष्ट में लोग मूर्ख। यह एक प्रकार से लौकिक जीवन का मरण है। जीवित रहते हुए भी वे आस-पास की परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होते अथवा दृष्टिकोण और कार्यक्रम दूसरों के प्रभाव, परामर्श से नहीं अन्तः प्रेरणा से निर्धारित करते है। तथाकथित स्वजन सम्बन्धियों का मित्र, परिचितों का अनुपयुक्त परामर्श उन्हें रत्तीभर भी प्रभावित नहीं करता। अपनी नीति स्वयं निर्धारित करते है। ऐसे महामानवों को ही आत्मदानी-शहीद कहा जा सकता है।
साधारणतया शहीद उन्हें कहते हैं जो किसी महान प्रयोजन के लिये अपनी जान गँवा देते है। पर यह परिभाषा एकाँगी है। जिनने परमार्थ के लिए प्राण त्यागे उनके चरणों पर श्रद्धा के सुमन चढ़ने ही चाहिए। उनकी यश गाथा का गायन आदर्शों के प्रति, आदर्शवादियों के प्रति लोक मानस के नत मस्तक होने और उच्चस्तरीय प्रेरणाओं से अनुप्राणित होने का अवसर प्रदान करता है। इस दृष्ट से बलिदानियों का जितना गुणगान किया जाय, जितना सम्मान दिया जाय उतना ही कम है। इतने पर भी एक बात ध्यान में रखने की है कि हर आत्मदानी के लिए प्रभु समर्पित के लिए मरण कृत्य अपनाना अनिवार्य नहीं है। हर शहीद को फाँसी गोली तलाश ही करनी पड़े ऐसी बात नहीं है। संकीर्ण स्वार्थपरता का अम्ल करके परमार्थ को ही अपनी महत्त्वाकाँक्षाओं का केन्द्र बना लेना उसी में रस लेना उसी चिंतन में तन्मय रहना वस्तुतः मानसिक शहादत है। यह जहाँ होगी वहाँ व्यवहार भी वैसा ही बनेगा क्रियाकलापों का निर्धारण और कार्यान्वयन वही होता है, जो अन्तःकरण में वसा हो। समर्पण एक आस्था है जिसमें लोभ मोह,और अहंकार के भव बन्धन काटने पड़ते हैं और आदर्शों के लिए चिंतन और चरित्र को पूरी तरह नियोजित रखना पड़ता है। अपने को इस ढाँचे में ढाल लेने वाले व्यक्ति अध्यात्म शब्दावली में ‘ऋषि कहलाते हैं। शहीद शब्द से यह अधिक उपयुक्त है। शहीद होने में मरण की आवश्यकता जुड़ी रखती है जबकि ऋषि के लिए जीवन या मरण में कोई अन्तर नहीं रहता, वह जीवित रहते हुए चतुर लोगों की दृष्ट में मृतक हे। इतिहासकार उसके मर जाने पर भी जीवितों जैसी अभ्यर्थना करते है।
सन्त और सुधारक में अपना ‘अह’ शेष रहता है। जबकि समर्पित को वासना,तृष्णा का लोभ,मोह का ही अन्त नहीं करना पड़ता वरन् अहन्ता का भी विसर्जन आवश्यक होता है। आमतौर से लोकसेवियों की लोकेषणा,यश और सम्मान की कामना घटने के स्थान पर बढ़ती देखी जाती है जबकि वस्तुतः उसका पूर्णतया विसर्जन होना चाहिए।सार्वजनिक जीवन में यह लोकेषणा ही सबसे बड़ी बाधा है। लोकसेवी बहुत कुछ त्यागते पाये जाते है,पर अपनी यश लिप्सा-पद लिप्सा,छोड़ नहीं पाते यही कारण है कि संस्था संगठनों के अन्तःक्षेत्र में आये दिन भूकम्प आते और विस्फोट होते देखे जाते है। जन-सहयोग के अभाव में सार्वजनिक सेवा क्रम में उतनी बाधा नहीं पड़ती जितनी तथाकथित लोकसेवियों की महत्वाकाँक्षा की चिनगारी उन उपयोगी प्रयासों को नष्ट-भ्रष्ट करके सन्त की पवित्रता-सुधारक की प्रखरता के साथ-साथ ऋषि की तत्व दृष्टि अपनाई और अहंता का पूरी तरह विसर्जन कर दिया। अपने श्रम,समय,चिन्तन,प्रभाव का पूरी तरह परमार्थ के ब्रह्मानंद पर उत्सर्ग कर दिया। ऐसे लोगों की प्रतिभा एवं क्षमता सामान्य लोगों की तुलना में असंख्यों गुना अधिक होती है। स्व का परिपोषण मनुष्य की अधिकाँश शक्ति से निकल जाता है। यदि उससे बचा जा सके और सच्चे अर्थों में उत्कृष्टता के लिए समर्पण किया जा सके तो अहंता के परिपोषण में लगने वाली इच्छा,विचारणा एवं क्रियाशीलता इतनी अधिक मात्रा में बच जाती हे जिसके आधार पर सामान्य व्यक्ति भी सामान्य स्तर के काम कर सकता है। ऐसी प्रतिभाएं जब कभी,जहाँ कहीं उपलब्ध होती हैं तब वहीं चमत्कार उत्पन्न होते चले जाते है।
ऋषियों के सभी कृत्य शहीदों जैसे दुस्साहस भरे होते हैं। अपने साधनों के परमार्थ के लिए विसर्जित करने में उन्हें वाजिश्रवा के सर्वमेध यज्ञ जैसे दृश्य दिखाई पड़ते है। लक्ष्य में इतनी तन्मयता रहती है कि अर्जुन के मत्सवेध का अनुकरण करने में घटना अहिर्निश घटित होते देखी जा सकती है। प्राण का माह छोड़ना कठिन है, पर अपने वैभव,व्यामोह और अहमन्यता का विसर्जन करने के उच्चस्तरीय उदाहरण प्रस्तुत कर सकते है। इसी स्तर के लोग प्रकाश स्तम्भ की तरह ज्योतिर्मय रहते और कर्तव्य की गरिमा से असंख्यों को प्रभावित करते है। उनके त्याग,बलिदान का परिचय, पग-पग मिलता रहता है। शहीद मरने के उपरान्त आक्रोश उत्पन्न करते है, किन्तु ऋषियों की सुषमा हर घड़ी स्वर्गीय श्रद्धा सम्वेदना का संचार जन-जन में करती रहती है।
बिजली हर वस्तु में प्रवाहित नहीं होती। वह कुछ ही पदार्थों में प्रवेश कर पाती है। लकड़ी।,चीनी,रबड़, काँच जैसी वस्तुओं पर उसका तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता। अवतार के सहकर्मी,सहधर्मी तीन ही होते हे, सन्त,सुधारक और शहीद। सज्जन,सृजन शिल्पी, ऋषि। जिन्हें अवतार के प्रत्यक्ष दर्शन करने होते है वे इन तीन वर्ग का विस्तार एवं स्तर उभरता देखकर यह सन्तोष कर लेते है कि अवतार की प्रखरता कितनी दीप्तिवान् हो रही हे। राम कला के रीछ बानर, कोल-भील,गीध,गिलहरी जिस आदर्शवादिता को अपना रहे थे उसे देखकर यह जाना जा सकता था कि सूक्ष्म जगत में अवतार की ऊर्जा किस आवेग के साथ काम कर रही है। कृष्ण काल के पाण्डव और ग्वाल-बाल इसी तथ्य का प्रमाण प्रस्तुत करते थे। बुद्ध काल के परिव्राजक और गान्धी काल के सत्याग्रहियों की गतिविधियों से भी यही सिद्ध होता था कि अवतार उनके शरीर से वही करा लेता है जो उसे अभीष्ट है।
प्रज्ञावतार का आवेश उसके प्रभाव से अनुप्राणित परिव्राजकों-समयदानियों की बढ़ती हुई संख्या और उठती हुई श्रद्धा को देखकर सहज ही आँका जा सकता है। इस वर्ग से सन्त,सुधारक और शहीद के तीनों ही तत्व असाधारण मात्रा में बढ़ते उभरते देखे जा सकते है। आदर्शवादी, निष्ठावान् और पराक्रमी सृजन शिल्पियों का बाहुल्य उनकी गतिविधियों का अनुकरणीय सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन यह बताता है कि निराकार प्रज्ञावतार अपने अनुकूल और अनुरूप आत्माओं को नियत दिशा धारा में नियोजित करके अभीष्ट की पूर्ति का वातावरण बनाने में अपनी तत्परता दे रहा है।
सामान्य बुद्धि इसी निश्चय पर पहुँचती है कि सुविधा साधन बढ़ने मनुष्य को सुख शान्ति मिलनी चाहिये ओर अधिक प्रसन्नता तथा प्रगति का अवसर मिलना चाहिए। इसी आधार पर अधिक समृद्धि उपलब्ध करने के लिए नाना प्रकार के उचित अनुचित प्रयत्न करने में लगे रहते है। इन दिनों मान्यता एवं चेष्टा और अधिक बढ़ गई है। साम्यवादी प्रतिपादनों ने पिछले दिनों यह घोषणा बहुत जोरों से की है कि संसार की समस्त कठिनाइयों का प्रधान कारण धन की कमी है। धन बढ़ेगा तो समस्त कठिनाइयां स्वयं ही समाप्त हो जायेंगी। इसके लिए अधिक उत्पादन पर जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था उतना नहीं दिया गया वरन् धनिकों को गरीबी का कारण ठहरा कर वर्ग संघर्ष खड़ा कर दिया है जो हो, लक्ष्य धन की अभिवृद्धि ही रही।
पूंजीवादी क्षेत्रों में भी अर्थ संवर्धन के लिए कम प्रयत्न नहीं किये गये। हर देश में अपने-अपने ढंग से समृद्धि संवर्धन के प्रयत्न चल रहे हैं। विज्ञान ने इस नियमित अनेकानेक आविष्कार किये हैं और सफल संवर्धन ही नहीं अर्थ उपार्जन के लिए भी अनेकानेक उपकरण आधार विनिर्मित किये हैं। शिल्पी, व्यवसायी, अर्थशास्त्री अपनी आमदनी का अधिकांश भाग धन उपार्जन के निमित्त ही लगाते रहे हैं। इसमें सफलता भी कम नहीं मिलती। पूर्वजों की तुलना में अपनी पीढ़ी कहीं अधिक समृद्ध है। सुविधा साधनों की दृष्टि से इस समय पीढ़ी के लाग इतने सौभाग्यशाली हैं जितने सृष्टि के आरंभ से लेकर अपनी शताब्दी के मध्य काल में कभी नहीं रहे। गरीबी दूर नहीं हुई। कारण यह नहीं है कि 400 करोड़ मनुष्य की उचित आवश्यकता पूरी कर सकने के लिए आवश्यक सुविधा साधन उपलब्ध नहीं हैं। वरन् यह है कि उनके संचय की ललक और उपभोग की लिप्सा ने संपत्ति का सदुपयोग संभव नहीं रहने दिया। साधनों की वृद्धि तेजी से जारी है। संपन्नता बढ़ रही है। इतने पर भी यह आशा नहीं बंधती कि प्रस्तुत कठिनाइयों का कोई हल निकलेगा अमेरिका जैसे धन कुबेर इस बात के साक्षी हैं कि बहुत वैभव होने पर भी मनुष्य शारीरिक और मानसिक दृष्टि से किस तेजी के साथ दुर्बल एवं रुग्ण होते चले जा रहे हैं। पारिवारिक और सामाजिक जीवन में उन्हें कितनी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। बढ़ते हुए मनोरोग और अपराध यह बताते हैं कि बढ़ा हुआ वैभव भी व्यक्ति को सुखी एवं समुन्नत बनाने में कुछ अधिक कारगर सिद्ध नहीं हो रहा है।
यहां वैभव वृद्धि की अनुपयोगिता नहीं ठहराई जाती है और उन प्रयत्नों के विरुद्ध कुछ नहीं कहा जा रहा है। संपत्ति बढ़ना तो मनुष्य के कौशल एवं पुरुषार्थ का ही प्रतिफल है अस्तु उसे सराहनीय ही कहा जायेगा। चर्चा यह हो रही है कि पिछली धरोहर के लिए लोग आज की तुलना में कहीं अधिक अभावग्रस्त थे। उनमें से कुछ जीवित रहे होते तो आज बढ़ी-चढ़ी सुविधाओं को देखते और अपने समय की परिस्थितियों के साथ तुलना करते तो उन्हें यह समय चमत्कारी समृद्धि सिद्धियों से भरा पूरा प्रतीत होता रेल, तार, डाक, जहाज, मोटर, सड़क, शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, कला, व्यवस्था आदिक की जो बढ़ोतरी हुई हैं उसे देखते हुये पिछली पीढ़ी वाले यही कल्पना कर सकते हैं इन दिनों के लाग देवोपम जीवन जी रहे हैं और स्वर्गीय परिस्थितियों का आनंद ले रहे होंगे।
स्थिति बिल्कुल उल्टी है। व्यक्ति दिन-दिन शारीरिक, मानसिक और आंतरिक हर क्षेत्रों में दुर्बल पड़ता जा रहा है। रुग्णता और दुर्बलता एक फैशन एवं प्रचलन है यद्यपि पौष्टिक खाद्य पदार्थों और चिकित्सा साधनों की कोई कमी नहीं है। इसी प्रकार मस्तिष्कीय विकास के लिए पाठशालाओं से लेकर पुस्तकों तक के अगणित साधन उपलब्ध हैं। रेडियो, अखबार, प्रदर्शनी, यात्रा, सभा सम्मेलन आदि की सुविधा से जानकारी का क्षेत्र तेजी से बढ़ रहा है।
अशिक्षा के विरुद्ध युद्धस्तरीय प्रयत्न चल रहे हैं और विज्ञ एवं कुशल लोगों की संख्या तूफानी गति से बड़ रही है। इतने पर भी मनोरोग, हेय चिंतन, दुर्भाव, अनुपयुक्त महत्वाकांक्षा, निकृष्टता में अनुभूति जैसे अनेकों ऐसे आधार खड़े हो गये हैं जिनके कारण जन-मानस में असंतुलन उद्वेग एवं आक्रोश उत्पन्न करने वाले तत्वों की ही भरमार है। अधिकांश जनमानस संतोष और शांति से वंचित हैं। प्रसन्नता एवं प्रफुल्लता के लक्षण अपवाद रूप से नहीं दृष्टिगोचर होते हैं। हर व्यक्ति खिन्न चिंतन, उदास दृष्टिगोचर होता है। न उमंगे हैं न आशा। आशंकाओं और समस्याओं के भार से हर मनुष्य का मस्तिष्क तनावग्रस्त दिखता है। असुरक्षा और एकाकीपन का भार इतना लद रहा है कि जिंदगी भारी लाश की तरह ढोनी पड़ रही है। बढ़ी हुई विपन्नता में हताशों, आत्महत्याओं का दौर बढ़ रहा है। अर्ध हत्या, अर्ध आत्म हत्या की घटनायें तो पग-पग पर देखी जा सकती हैं। विक्षिप्त और अर्ध विक्षिप्त-सनकी और बहमी लोगों की संख्या इस तेजी से बढ़ रही है कि स्वास्थ्य और संतुलित मनःस्थिति वाले व्यक्ति खोज निकालना कठिन दिखता है। बाहर से चतुर और बुद्धिमान सुशिक्षित और संपन्न दीखने वाले व्यक्ति भी भीतर ही भीतर इतने खोखले और उथले पाये जाते हैं कि कई बार तो उनके सुशिक्षित होने में भी संदेह होने लगता है।
पारिवारिक स्नेह सौजन्य सहयोग सौहार्द घटते-घटते समाप्ति के बिन्दु तक जा पहुंचा है। माता-पिता और संतान के बीच भाई बहिनों में भावज ननद जैसी आत्मीयता होती जा रही है उसका दर्शन दुर्लभ हो रहा है। एक बाड़े में रहने वाली भेड़ों की तरह कुटुंबों में कई व्यक्ति रहते तो हैं पर एक दूसरे पर प्यार और सहयोग बखेरने के स्थान पर अपनी-अपनी गोटी बिठाने में लगे रहते हैं परिवार संस्थान अधिकाधिक लाभ उनसे उसी प्रकार उठाया जा सकता है घर का हर सदस्य इतना ही सोखता है। अधिकार की मांग है और कर्तव्य की उपेक्षा। फलतः परिवार नीरस निरानंद हो चले हैं। दुकान, दफ्तर से लौटने पर घर में जो स्वर्गीय आनंद मिल सकता है उससे अधिकांश लोग वंचित हैं। थकान मिटाने के नाम पर नशा, सिनेमा यारवासी जैसे घटिया आधार ढूंढ़ने के लिए लोग प्रायः बचे हुये समय को भी बाहर ही बिताते हैं।
पति पत्नी का रिश्ता एक प्राण दो देह का मना जाता है। जीवन रथ को अग्रगामी बनाने में दोनों को दो पहियों की भूमिका निभानी चाहिए। नाव खेने में दो हाथ काम देते हैं वहीं गृहस्थ की सुव्यवस्था में पति-पत्नी का योगदान होता है दोनों को एक न होकर समन्वित जीवन जीना पड़ता है। किंतु लगता है वे आदर्श समाप्त हो गये। यौन लिप्सा ही वह आधार रह गया है जिस में दोनों एक दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं। इसी प्रसंग में बच्चे आ सकते हैं और उनके प्रति जो प्रकृति प्रदत्त माया मोह होता है उस सूत्र में भी पति-पत्नी किसी प्रकार बंधे रहते हैं। यदि यौन आकर्षण और बालकों का मोह हटा लिया जाय तो सहज सौजन्य से प्रेरित भाव भरा दांपत्य जीवन कदाचित ही कहीं दृष्टिगोचर होगा समृद्ध देशों में स्वच्छन्दता के कारण ही पिछड़े देशों में विवशता के कारण ही पति-पत्नी के बीच काना कुबड़ा स्नेह संबंध जीवित रह रहा है। परिवार टूटते जा रहे हैं। वयस्क होते ही हर किसी को अलग रहने की बात सूझती है मजबूरी से जो साथ रहते हैं उन्हें भी सोचना यही पड़ता है कि सम्मिलित कुटुंब के सदस्य रहते तो अच्छा होता पढ़ी लिखी लड़कियों और उनके अभिभावक विवाह संबंध जोड़ने के साथ ही यह सोचते हैं कि बड़े कुटुंब का सदस्य न रहना पड़े। विलगाव के इस प्रयत्न में पारिवारिक जीवन जिसे घरौदों में बसने वाला स्वर्ग कहा जाता था एक प्रकार से छिन्न-भिन्न अस्त-व्यस्त और नष्ट-भ्रष्ट ही होता चला जा रहा है। इस सौभाग्य से वंचित रहने पर लोग सराय में दिन बिताने वाले आवारागिर्द लोगों की तरह दिन गुजारते हैं। गृहस्थ जीवन का भावात्मक आनंद कितना उच्चस्तरीय होता है इसकी अनुभूति ही नहीं कल्पना भी लोगों के हाथ से छिनती जा रही हैं।
आर्थिक दृष्टि से प्रायः सभी लोग दरिद्री हैं। अभाव ग्रस्त लोग स्वतंत्र आजीविका के कारण जितने खिन्न पाये जाते हैं उससे अधिक उद्विग्न वे हैं जिनके पास साधनों का बाहुल्य है। धन कमाना एक बात है और उसका सदुपयोग करना बिल्कुल दूसरी। एक पक्ष तो बढ़ रहा है पर दूसरे की दुर्दशा ने सारा संतुलन ही बिगाड़ दिया। विलासिता, आलस्य, बनावट, शान-शौकत की मदें इतनी खर्चीली हो रही हैं कि भोजन वस्त्र जैसे आवश्यक व्यय तो उसकी तुलना में नगण्य जितने ही लगते हैं। अहंकार और बड़ापन सहोदर जैसे बनते जा रहे हैं। संपन्नता की धारा दुर्व्यसनों के गर्त में गिरती है और उसकी प्रति क्रिया से अनेकानेक आचरण एवं विग्रह उत्पन्न होते हैं। आजीविका सीमित है और लिप्सा असीम तो फिर ऋणी बनने या कुकर्म करके उपार्जन करने के अतिरिक्त और कोई उपाय ही नहीं रह जाता। सामाजिक कुरीतियों की लाश ढोने में भी अर्थ-व्यवस्था की कमर टूटती है। उचित से काम नहीं चलता तो अनुचित उपार्जन किया जाता है और अपराधी स्तर को कमाई का एक बड़ा साधन बनाया जाता है। इतने पर भी कितने लोग हैं जो आर्थिक दृष्टि से अपने को सुख संतुष्ट कर सकें। धनी निर्धन सभी को अर्थ संकट से गुजरने की शिकायत है।
समाज व्यवस्था का ढांचा ऊपर से तो किसी प्रकार कागज से बने विशालकाय पुतले की तरह खड़ा है पर उसके भीतर खोखलेपन के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं। भिन्नता की आड़ में जितना छल छद्म चलता है उतनी घात दुश्मन भी नहीं लगा पाते। संबंधियों के बीच किस प्रकार बुनने उधेड़ने की दुरभि संधियां चलती हैं उसे विवाह शादियों में होने वाले लेन-देन को देखकर भली प्रकार समझा जा सकता है। ग्राहक और विक्रेता के मध्य अकसर और प्रजाजन के मध्य- जिस प्रकार की सदाशयता युक्त आदान-प्रदान होना चाहिए। उसके दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं मूल्य तौल, स्तर के संबंध में ग्राहक को सदा छल की आशंका ही बनी रहती है। अधिकारी और प्रजाजनों के मध्य उचित सहयोग का आधार रिश्वत पर केन्द्रित होता जा रहा है। पड़ौसी से हर घड़ी चौकन्ना रहना होता है। परदेश में परिचितों के बीच वही जिंदा रह सकता है जो किसी के साथ कुछ समय रहने पर समुचित सतर्क रह सके। विश्वास करने वाले और निश्चिंत रहने वाले पग-पग पर जोखिम उठाते हैं। सेवक स्वामी के बीच का रिश्ता अब समाप्त हुआ ही समझना ही चाहिए। दोनों के मध्य सद्भावना सूत्र टूट चुके। मालिक को सर्प पालने की तरह सतर्क रहना होता है नौकर को हर घड़ी शीर्षक के साथ रहने जैसे अप्रिय लगता है। पारिवारिक सहयोग से समृद्धि और व्यवस्था बढ़ सकती है उसकी संभावना निरंतर घटती जा रही है। श्रम संकट आज के समाज की इतनी निकट समस्या है कि उसकी उलझन में समृद्धि की संभावना को बेतरह धूमिल कर दिया है।
समाज के प्रथा प्रचलनों को देखते हुए लगता है इस प्रमाद में बहने वाले जन समाज को विपत्तियों के गर्त में ही गिरा रहना पड़ेगा। नशेबाजी, फैशन परस्ती, विलासिता, धूर्तता, उच्छृंखलता जैसे प्रचलन सभ्यता के अंग बन चले हैं। यों कहने को तो अपने समय की तर्क और बुद्धि का युग कहा जाता है पर अंधविश्वासों और कुरीतियों का परिष्कार जितने उत्साह के साथ इन दिनों बढ़ रहा है उतना कदापि पिछले दिनों के उस समय में भी न रहा हो जिसे अनगढ़ आदिम काल कहते हैं।
बुद्धिमत्ता और पूर्णता का यह विचित्र समन्वय देखते ही बनता है। ज्योतिषोन्तात्रिक, भविष्यवक्ता जादूगरों ने जिस प्रकार धर्म और अध्यात्म को ग्रस्त लिया है उसे देखते हुए लगता है कि विवेक का अरुणोदय अभी भी बहुत दूर है। भ्रांतियों से छुटकारा पाने की शुभ घड़ी आने में अभी भी बहुत दिन प्रतीक्षा करनी पड़ेगी ऐसा लगता है। जाति लिंग के असमानता आर्थिक विषमता, क्षेत्रीय संकीर्णता, मत वादियों की कट्टरता, आहार-विहार की शैली, विनोद की व्यवस्था, चिंतन की धारा आदि की स्थिति को देखते हुए लगता है जिस मध्य कालीन अंधकार युग को कोसा जाता है, उसमें वह अभी भी यथावत् विद्यमान है। उसने मात्र अपना पुराना चोला उतारा और जामा नया पहना है। समाज प्रवाह के आधार पर सामान्य जन मानस ढलता है और लोक प्रवृत्तियां पनपती हैं। यदि उसमें अमानवीय तत्व ही भरे रहें तो फिर यह आशा करना व्यर्थ है कि शालीनता को लाग अपने जीवन व्यवहार में स्थान दे सकेंगे। समाज का स्तर उस क्रम से नीचे गिरता जा रहा है उसे देखते हुए लगता है आदर्शवादी सिद्धांत लिखने पढ़ने और सुनने तक ही सीमित बनकर रह जाता है। शासन व्यवस्था प्रकारांतर से समस्त व्यवस्था का ही दूसरा नाम है। प्रायः समाज को श्रेष्ठ शासन मिलने की आशा नहीं ही करनी चाहिए।
ऊपर की पंक्तियों में व्यक्ति के सामने प्रस्तुत कठिनाइयों और विपत्तियों का चित्रण किया गया है। अधिकांश जनसंख्या को इन्हीं समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। जन-जीवन में शांति और व्यवस्था की प्रगति और प्रसन्नता की संभावनाएं घटती जा रही हैं।
सामूहिक जीवन में शासन तंत्र की प्रधानता है। सरकारें अपने संकीर्ण स्वार्थों की पूर्ति के लिए दूसरे देशों के प्रति जो रवैया बनाती हैं उससे शोषण आधिपत्य, विग्रह और युद्ध का कुचक्र ही गतिशील होता है। शीत युद्ध तो कूटनीति का ध्वज ही ठहरा। गरम युद्ध ही आशंका बढ़ रही है। अणु आयुध विषाक्त जैसी दाहक किरणें रासायनिक युद्ध जैसे उत्पादनों का चरम सीमा तक जा पहुंचना यह बताता है कि कोई भी एक पागल अनंत काल की श्रम साधना से संचित मानवों का अंत चुटकी बजाने जितने समय में कर सकता है। तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या ने यह संकट सामने खड़ा कर दिया है कि एक शताब्दी में ही जीवन यापन करने के लिए आवश्यक अन्न, जल, वस्त्र, निवास जैसे साधन मिलना कठिन हो जायेगा। जनसंख्या जिस तेजी से बढ़ रही है उस अभिवृद्धि का भार उठा सकने की क्षमता अपनी धरती शताब्दी पूरी होते-होते गंवा बैठेगी। कारखाने जिस अनुपात से प्रदूषण और विकिरण उत्पन्न करते हैं उसका प्रभाव मनुष्यों का शारीरिक एवं मानसिक संतुलन स्थिर नहीं रख सकता। शरीर और मन की बढ़ती हुई दुर्बलता, प्रकृति का दबाव और विकृति प्रचलनों दबाव कहां तक सहन कर सकेगी इसमें भारी संदेह है। विनाश की ऐसी अगणित विभीषिकायें हैं जिन्हें काल्पनिक नहीं वास्तविक ही माना जायेगा।
प्रगति और शांति के लिए कुछ नहीं किया जा रहा या उस स्तर के प्रयासों की कोई उपलब्धि नहीं है यह कहा जा रहा है। लक्ष्य इतना ही प्रस्तुत किया जा रहा है कि सृजन से ध्वंस की गति तीव्र होने के कारण दिवालिया होने और ऐसी विपत्ति में फंस जाने की ही संभावना अधिक है जिससे निकल सकने के लिए नई सृष्टि की शुभ घड़ी आने के लिए लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।
विपत्तियां भौतिक क्षेत्र में बढ़ रही हैं। और विकृतियों से आत्मिक क्षेत्र उद्विग्न होता जा रहा है। सुधार और बचाव के प्रयास अपेक्षाकृत बहुत धीमे हैं। लगता है मनुष्य द्वारा अन्यमनस्क भाव से किया गया आधा अधूरा प्रयास वर्तमान की समस्याओं को सुलझाने तथा भविष्य की विभीषिकाओं को परास्त करने में सफल नहीं हो सकेगा, एक गज जोड़ने के साथ-साथ दस गज टूटने का क्रम चल रहा है। ऐसी दशा में विश्व की महाविनाश के गर्त में जा गिरने की ही आशंका है।
अवतार ऐसे ही समय में प्रकट होते हैं। मनुष्य का बाहुबल थक जाता है और विनाश की आशंका बलवती हो जाती है तो प्रवाह तो प्रवाह को उलटने का पुरुषार्थ महाकाल ही करता है। सृष्टि की अपनी उस सुरम्य वाटिका को दर्द भरा आश्वासन सहन नहीं हो सकता। वे धर्म से गलानी और अधर्म की अभिवृद्धि को एक सीमा तक ही सहन कर सकते हैं। मानवी पुरुषार्थ जब संतुलन बनाये रहने में असफल होता है तो व्यवस्था को भगवान स्वयं संभालते हैं। राष्ट्रपति शासन तभी लागू होता है जब राज्य की सामान्य व्यवस्था लड़खड़ा जाती है। पागलों और बालकों के अधिकार का उत्तरदायित्व किन्हीं अन्य संस्थाओं को सौंप दिया जाता है। इन दिनों ऐसा ही होने जा रहा है। महाकाल की चेतना सूक्ष्म जगत में ऐसी महान हलचलें विनिर्मित कर रही है जिसके प्रभाव परिणाम को देखते हुए उसे अप्रत्याशित और चमत्कारी ही माना जायेगा। अवतार सदा ऐसे ही कुसमय में होते रहे हैं जैसे कि आज हैं। अवतारों ने लोक चेतना में ऐसी प्रबल प्रेरणा भरी है जिससे अनुपयुक्त को उपयुक्त में बदल देने की, उत्साह लगने वाली संभावना सरल हो सके। दिव्य चक्षुओं की युगांतरीय चेतना को गंगावतरण की तरह धरती पर उतरते देखा जा सकता है। चर्म चक्षुओं को भी कुछ ही दिनों में अवतार के लीला संदेह का परिचय प्रत्यक्ष एवं सुनिश्चित रूप से देखने को मिलेगा।
यों प्रकृति के उतार चढ़ाव भी प्राणियों को प्रभावित करते हैं और उन कारणों से भी उन्हें कई प्रकार की सुविधा, असुविधाओं को सहन करना होता है। किंतु यह तथ्य सामान्य प्राणियों पर ही अधिकतर लागू होता है। मनुष्य की विलक्षण बुद्धि उसे प्रकृति के प्रतिकूल प्रभाव से बच निकालने और अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न करने में सहायता करती रहती है। मनुष्य प्रकृति पर पूर्णतया आधिपत्य तो स्थापित नहीं कर सकेगा पर इतना अवश्य है कि अनुकूलन में बहुत बड़ी सफलता प्राप्त कर ली है। इस सफलता का स्तर और अनुपात अगले दिनों घटेगा नहीं बढ़ता ही जायेगा।
इस तथ्य की चर्चा यहां इसलिए की जा रही है कि इन दिनों मनुष्य के सामने प्रस्तुत वैयक्तिक और सामूहिक कठिनाइयों का कारण खोजते समय कहीं प्रकृति की प्रतिकूलता को दोषी न ठहराया जाने लगे। बहुत भाग्यवादी लोग ऐसा ही कुछ कहते सुने जाते हैं कि ग्रह-नक्षत्रों ने, विधि-विधान ने, प्रकृति की परिस्थितियों ने मनुष्य के सामने कठिनाइयां उत्पन्न की और वह उनके प्रभाव से विपत्तियों में फंस गया। सुविधा संवर्धन के अवसरों पर भी इसी प्रकार के श्रेय आकस्मिक परिस्थितियों को दिया जाने लगा है। ऐसा कभी-कभी अपवाद जितना भले ही होता हो, आमतौर से मानवी चिंतन और प्रयास ही भली-बुरी परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी होता है। प्रकृति की प्रतिकूलता भी कभी किसी सीमा तक कारण होती है, पर मनुष्य को परिस्थितियों से जूझने का इतना अनुभव प्राप्त है कि वह उनसे सुरक्षा के उपाय किसी न किसी प्रकार खोज ही लेता है। प्रकृति संघर्ष के लंबे इतिहास में सृष्टि के आरंभ से लेकर अब तक का घटनाक्रम साक्षी है कि मनुष्य हारा नहीं। जीता भले ही न हो पर तालमेल बिठा लेने में उसे आशाजनक सफलता दिलाने में बुद्धि-कौशल ने सदा-सर्वदा अपना चमत्कार दिखाया है।
जमाना बुरा है। कलियुग का दौर है। परिस्थितियां कुछ ऐसी ही बन गईं। भाग्य चक्र प्रतिकूल रहा, जैसे कारण बताकर मन को हलका किया जा सकता है, पर उससे समाधान कुछ नहीं निकलता। मूर्धन्य राजनेताओं, दार्शनिकों, सेनापतियों, धर्माचार्यों, धनिकों को भी प्रतिकूलताओं के लिए दोषी ठहराया जा सकता है, पर यह नहीं कहा जा सकता है कि जन-मानस सर्वथा निर्दोष है। तथ्य यह है कि मूर्धन्य व्यक्ति भी आकाश से नहीं टपकते, जन-समाज में से ही निकलते हैं। लोक-मानस का स्तर ही प्रतिभाएं उत्पन्न करता और उन्हें दिशा प्रदान करता है। व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है। उसकी अंतःचेतना में अनंत संभावनाएं बीज रूप में विद्यमान हैं। वे उभरती हैं कि व्यक्तित्व का स्तर बनता है और उस आधार पर विनिर्मित हुई प्रतिभा अपना चमत्कार दिखाती है। मूर्धन्यों के उभरने और पुरुषार्थ की दिशा अपनाने का यही तत्वज्ञान है। परिस्थितियों को दोष या श्रेय देने को तो किसी को भी दिया जा सकता है, पर मूल कारण ढूंढ़ना और तथ्य तक पहुंचना हो तो यही निष्कर्ष निकलेगा की व्यक्ति का अंतराल ही प्रगति एवं अवगति के लिए उत्तरदायी है। आज की विषम परिस्थितियों को बदलने की जो आवश्यकता समझते हैं उन्हें कारण की तह तक पहुंचना होगा। अन्यथा सूखते, मुरझाते पेड़ को हरा बनाने के लिए जड़ की अपेक्षा करके पत्ते सींचने जैसी विडंबना चलती रहेगी और थकान के अतिरिक्त और कुछ भी पल्ले न पड़ेगा।
आमतौर से मनुष्य की कृतियों को परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी माना जाता है। प्रत्यक्षवादी को इतना ही दीखता है। किंतु जो गहराई तक उतर सकते हैं उन्हें प्रतीत होगा कि शरीर जड़ पदार्थों का बना है, वह उपकरण मात्र है। उसमें क्रियाशीलता तो है, पर यह विवेक नहीं कि क्या करें, क्या न करें। यह निर्धारण मन को करना होता है। शरीर मन का आज्ञानुवर्ती सेवक है। मन के इशारे पर ही उसके समस्त क्रिया-कलाप चलते हैं। भली-बुरी आदतें यों देखने में तो शरीर के अभ्यास में जुड़ी प्रतीत होती हैं, पर वास्तविकता यह है कि गुण, कर्म, स्वभाव का सारा ढाँचा मनःक्षेत्र में खड़ा रहता है,शरीर को तो उस बाजीगर के इशारे पर कठ-पुतली की तरह हरकत भर करनी होती है। शरीर से की गई हर क्रिया के लिए मानसिक स्तर को ही कारण मानना होगा।
इससे भी अगली परत एक और है जहाँ पहुँचने पर व्यक्तित्व के आधार भूत मर्मस्थल को जाना जा सकता है। यह है आस्था केन्द्र-अन्तःकरण। यहीं भाव सम्वेदनाएं उठती हैं। रुचि और इच्छा का निर्माण यहीं होता है। साधारण बुद्धि तो शरीर किये गये कर्मों को ही परिस्थिति उत्पन्न करने वाला कारण मानती है। सूक्ष्म दृष्ट की खोज आगे तक जाती है और वह मानसिक स्तर को-विचार विन्यास को महत्व देती है। इससे आगे तथ्यान्वेषी प्रज्ञा का विवेचन प्रतिपादन आरम्भ होता है। वह व्यापक परिस्थितियों के लिए लोगों की कृतियों और विचारणाओं को एक सीमा तक उत्तरदायी मानती है। उसका अन्तिम निर्णय यही होता है कि अन्तःकरण का स्तर ही विचार समुच्चय में से अपने अनुकूलों को अपनाता है और आन्तरिक उमंगे है। काय को किसी दिशा विशेष में विचारणा एवं क्रियाशीलता को वे ही प्रभावित करती है। व्यक्ति जो कुछ सोचता या करता है वस्तुतः वह सब कुछ आस्था एवं आकाँक्षा के उद्गम केन्द्र-अन्तःकरण का ही निर्देश होता है।
सामान्य परिस्थितियाँ सभी के लिए एक जैसी होती हैं। साधन सुविधा के अवसर किसी-किसी को तो पैतृक उत्तराधिकार में या आकस्मिक कारणों से भी मिल जाते है, पर आमतौर से सारा उपार्जन मनुष्य की आन्तरिक अभिरुचि के अनुरूप होता है। यही है चुम्बकत्व का वह उद्गम केन्द्र जो अपने स्तर के विचारों, साधनों, व्यक्तित्व की वास्तविक पूँजी या कुँजी। कहने को तो यही कहा जाता है कि जो जैसा सोचता है वह वैसा बनता है, पर वास्तविकता यह है कि जिसकी आकाँक्षा जिस स्तर की होती है उसे उसी स्तर के विचार चुनने, अपनाने होते है। मन में जो विचार जम जाते हैं वे ही शरीर को अपनी मन मर्जी पर शिल्पी के उकरणों की तरह हिलाते घुमाते रहते है।
गीताकार ने इस आत्यंतिक सत्य का रहस्योद्घाटन करते हुए कहा है- श्रद्धा मयोयं पुरुषा यो यच्छृद्धः स एव स। “ व्यक्तित्व श्रद्धा का ही प्रतिफल है। जिसकी जैसी श्रद्धा है उसका स्तर ठीक तदनुरूप ही होता है।
मनुष्यों की आकृति और नित्यकर्म प्रक्रिया प्रायः एक जैसी होती है। शरीर सभी के आहार-बिहार की पद्धति लगभग एक जैसी ही अपनाते हैं। नहाने,खाने, सोने, जागने जैसी हरकतें और अनुकूल सुविधा साधन पाने के लिए सभी समान रूप से इच्छुक रहते हे। ऋतु प्रभाव से लेकर समय का प्रभाव भी सभी को समान रूप से प्रभावित करता है। थोड़ा-बहुत अन्तर भले ही हो प्रगति के लिए अवसर हर मनस्वी को उपलब्ध रहते हैं। ऐसी दशा में किसी का पिछड़ेपन से घिरा रहना-किसी का दिन गुजारना, किसी का प्रगतिशील होना- किसी को महामानवों जैसी मूर्धन्य स्थिति प्राप्त करना-आश्चर्य-जनक लगता है। इस आकाश, पाताल जैसे अन्तर का एकमात्र कारण अन्तराल में अवस्थित आस्थाएं एवं आकाँक्षाएँ ही होती है। वे ही जीवन-क्रम की दिशा धारा निर्धारित करती है।
एक ही प्रसंग में असंख्य प्रकार की विचारधाराओं का प्रचलन है। उनमें किन्हें चुना जाय, इसका फैसला अन्तराल अपनी आस्थाओं एवं आकाँक्षाओं के अनुरूप करता है। क्या साधन ढूंढ़े जाँय? किन व्यक्तियों से संपर्क साधा जाय-किन परिस्थितियों में रहा जाय- किस प्रकार का वातावरण अपनाया जाय, इसका अन्तिम निर्णय बाहरी व्यक्ति नहीं करते। यह परामर्श या संगति वातावरण के कारण होती भर दीखती है। वास्तविकता यह है कि मनुष्य का ‘ स्व’ उसके अन्तराल में प्रतिष्ठित रहता है। निर्णय निर्धारण यहीं से होते हैं। मन और शरीर स्वामिभक्त सेवक की तरह अन्तःकरण की आकाँक्षा को पूरा करने के लिए तत्परता और ईमानदारी के साथ लगे रहते है। एक ही परिस्थितियों में जन्मे और पले व्यक्तियों के सामने एक जैसे अवसर रहने पर भी उनकी दिशा धारा भिन्न दिशाओं में चलती है और ऐसे परिणामों पर पहुँचती है जिन्हें उन साथियों के मध्य आकाश, पाताल जैसे अन्तर के रूप में देखा जा सकता है। इस गूढ़ पहेली का समाधान एक ही है कि व्यक्तियों की आस्था ही उन्हें सोचने-करने के लिए विवश करती है और धकेलते-धकेलते भली या बुरी परिस्थितियों के दरबार में जा खड़ा करती है। तत्वदर्शियों का यह निष्कर्ष अक्षरशः सही है कि अन्तःकरण ही व्यक्तित्व है। आस्थाएं ही चिन्तन और चरित्र की दिशाधारा निर्धारित करती हैं। कौन किस प्रकार जिया और किन परिस्थितियों में रहा इसका निमित्त कारण उनके अन्तःकरण का स्तर ही होता है। यही उत्थान पतन का भाग्य विधान लिखा जाता है। कदाचित विधाता इसी मर्म केन्द्र को कहते है। भाग्य और भविष्य यदि वस्तुतः लिखा जाता होगा उसकी विधि पाठ अन्तराल के मर्मस्थल में ही प्रतिष्ठित होती होगी।
कई बार परिस्थितियाँ भी किसी को कुछ से कुछ बना देती है, पर उन्हें अपवाद के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। इतनी बड़ी विश्व वसुधा में बेतुके प्रसंगों का जब तब घटित होते रहना अप्रत्याशित नहीं है। अनुपयुक्तों को भी कई बार उच्चस्तरीय परिस्थितियाँ मिल सकती है।इसी प्रकार उपयुक्त व्यक्ति कुछ समय तक हेय, परिस्थितियों में भी पड़े रह सकते है। इतने पर भी एक तथ्य सुनिश्चित है कि व्यक्ति के स्तर और परिस्थिति के बीच यदि विसंगति बन भी गई होगी तो वह अधिक समय ठहरेगी नहीं। न तो कुपात्र,श्रेष्ठता को स्थिर सुरक्षित रख सकते हैं और न श्रेष्ठ व्यक्तियों को देर, तक हेय परिस्थितियों में घिरे रहना पड़ता है।
प्राचीन काल और अर्वाचीन काल में जो तुलनात्मक विसंगतियाँ पाई जाती है। उनका कारण परिस्थिति नहीं मनःस्थिति है। परिस्थिति की दृष्ट से आज सुविधा साधनों का बाहुल्य है। सम्पत्ति,शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, कला व्यवसाय, विज्ञान आदि क्षेत्रों में हम अपने पूर्वजों की तुलना में कहीं अधिक समृद्ध, सौभाग्यशाली है, किन्तु स्वास्थ्य, सन्तुलन, स्नेह, सहयोग जैसे जीवन के सभी महत्वपूर्ण क्षेत्र में श्मशान जैसी वीभत्स भयकप्ता छाई हुई है। जबकि होना उल्टा यह चाहिए कि लोग अधिक समृद्ध सुसंस्कृत दिखाई पड़ते,प्रसन्न रहते और प्रसन्न रखते। उठते ओर उठाते। जो क्षमताएँ, सृजन ओर सहयोग में नियोजित रहने पर संसार में स्वर्गीय वातावरण बना सकती थीं- वे ही एक-दूसरे को काटने-गिराने में लगी हुई है। यह दुरुपयोग कैसे बन पड़ा? सृजन की धारा ध्वंस में कैसे जुट गई? इस विडम्बना का कारण एक ही है-आदर्शवादी आस्थाओं का पलायन। अन्तःकरण के स्तर का अवमूल्यन। इसी विपर्यय की प्रतिक्रिया व्यक्ति ओर समाज के सम्मुख खड़ी हुई अनेकानेक समस्याओं, विपत्तियों और विभीषिकाओं के रूप में दृष्टिगोचर हो रही है।
प्राचीन काल में लोग स्वल्प साधनों से गुजारा कर लेते थे। आज की तुलना में उस समय की भारी अभाव-ग्रस्तता भी उन्हें अखरती नहीं थी। कारण इतना ही था कि तब यह सोचा जाता था कि जीवन उच्चस्तरीय प्रयोजनों के लिए है। शरीर निर्वाह के लिए न्यूनतम साधन जुटाने में सन्तोष करने के उपरान्त क्षमताओं का समुच्चय सदुद्देश्यों में नियोजित रहना चाहिए। आदर्शवादी परम्पराओं को अपनाने में गर्व- गौरव अनुभव चाहिए। यही वे मान्यताएं है जिनके कारण हमारे महान पूर्वज अपने क्षेत्र में स्वर्गीय परिस्थितियाँ बनाये रहने के उपरान्त समस्त विश्व को अजस्र अनुदानों से लाभान्वित करते हुए, लोक श्रद्धा अर्जित करने की दृष्टि से देव-मानव कहलाने का सौभाग्य पा सके।
आज आस्थाओं का स्तर गिर गया। संकीर्ण स्वार्थ-परता का विलासी परिपोषण जीवन का लक्ष्य वन गया है। वैभव के सम्पादन और उसका उद्धत प्रदर्शन- उच्छृंखल दुरुपयोग ही जन-जन को अभीष्ट है। आदर्शवादी कहने-सुनने भर का एक बुद्धि विलास बनकर रह गया है। समृद्धि बढ़ रही है और चातुर्य की मात्रा भी। न प्रतिभाओं की कमी है न कर्म कौशल को चरितार्थ कर सकने के अवसरों की। फिर भी श्रेष्ठता का संवर्धन और निकृष्टता का उन्मूलन बन नहीं पड़ता। इस संदर्भ में एक ही कठिनाई है कि लोक-मानस पर पशु-प्रवृत्तियों का ही आधिपत्य है। आदर्शों के प्रति न आस्था है, न आकाँक्षा। उस स्तर की उमंगें उठती ही नहीं। उत्कृष्टता अपनाने में गर्व-गौरव की अनुभूति कर सकने वाली भाव सम्वेदना को ढूँढ़ निकालना अति कठिन हो रहा है। ऐसी दशा में आधे-अधूरे मन से श्रेष्ठता का लंगड़ा, लूला समर्थन और उन्हें क्रियान्वित करने के अनुत्साह कोई ऐसे आधार खड़े नहीं कर सकते जिनके सहारे ध्वंस को निरस्त और सृजन को अग्रसर कर सकना सम्भव हो सके।
हम आस्था संकट के दुर्दिनों में रह रहे है। दुर्भिक्ष मात्र आस्थाओं का है। अन्य सभी वस्तुएँ महंगे, सस्ते दाम पर विपुल परिमाण में खरीदी जा सकती हैं। समस्याओं का स्थूल उत्पत्ति क्षेत्र आर्थिक, राजनैतिक या सामाजिक प्रतीत होता है। अतएव इन्हीं को सुधारने के लिए आन्दोलन और संघर्ष खड़े किये जाते रहते हैं। स्वास्थ्य माना जाता है। मनोरोगों का कारण उत्कृष्ट चिन्तन का अभाव नहीं स्वेच्छाचार का नियंत्रण बताया जाता है। अर्थ समस्या का समाधान श्रमशीलता और मितव्ययिता का अभाव नहीं पूँजी का वितरण माना जाता है। अपराधों को रोकने के लिए आस्तिकता का, आध्यात्मिकता का तत्व-दर्शन हृदयंगम कराने की अपेक्षा की जाती है और पुलिस,कचहरी में समाधान सोचा जाता है। राजसत्ता के सुधार की जादुई छड़ी मानकर उस पर आधिपत्य करने के लिए हर महत्वाकाँक्षी लालायित है। धर्मतन्त्र को परिष्कृत करने और उसके सहारे आस्थाओं से झंझट करने का मार्ग किसी को सूझता तक नहीं है। यह उथले प्रयत्न। रक्त की विषाक्तता की उपेक्षा करके फुन्सियों पर पटृी बाँधते रहने का रास्ता बहुत लम्बा है और घुड़दौड़ इन्हीं उथले प्रयत्नों के बवंडर खड़े करने में लगी हुई है। जड़ को खोजें बिना उथले प्रयत्न कितने दिनों में-किस सीमा तक सफल हो सकेंगे यह नितान्त अनिश्चित है।
यह हजार बार समझना और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि अपने युग की अनेकानेक समस्याओं, विपत्तियों और विभीषिकाओं का एकमात्र कारण मानवी अन्तःकरण से सन्निहित रहने वाली उच्चस्तरीय आस्थाओं का अवमूल्यन है। सड़ी कीचड़ में से मक्खी, मच्छर, कृमि कीटक, विषाणु ओर दुर्गन्ध के उभार उठते है। इनका आत्यंतिक निराकरण नाली में जमी हुई सड़क को धो डालना ही हो सकता है। आस्थाओं में जड़ जमाये बैठी हुई निकृष्टता को न हटाया जा सका-अन्तःकरण में उत्कृष्टता का स्तर न बढ़ाया जा सका- तो समझना चाहिए बालू से तेल निकालने की तरह सुधार परिवर्तन के समस्त प्रयास निष्फल ही होते रहेंगे। उज्ज्वल भविष्य दिवास्वप्न की तरह कल्पना का विषय ही बना रहेगा।
बाह्योपचारों के लिए कोई मनाही नहीं। वे होते हैं ओर रहने चाहिए। किन्तु महत्व अन्तःउपचार का भी समझा जाना चाहिए। युग परिवर्तन का वास्तविक तात्पर्य है अन्तःकरण में जमी हुई आस्थाओं का उत्कृष्टतावादी पुनर्निर्धारण,समस्त समस्याओं का समाधान इस एक ही उपाय पर केन्द्रित है क्योंकि गुत्थियों का निर्माण इसी क्षेत्र में विकृतियाँ उत्पन्न होने के कारण हुआ है। खाद्य संकट, ईधन संकट, स्वास्थ्य संकट, सुरक्षा संकट की तरह आस्था संकट के व्यापक क्षेत्र और प्रभाव को भी समझा जाना चाहिए। युग की समस्याओं के समाधान में इससे कम में काम चलेगा नहीं और इससे अधिक और कुछ करने की आवश्यकता नहीं है। यों लोगों को आश्वासन देने की दृष्टि से सुधार और संवर्धन के बहिर्मुखी प्रयास भी चलते रहने चाहिए। किन्तु ठोस बात तभी बनेगी जब समष्टि के अन्तःकरण में उत्कृष्टता की आस्थाओं का आरोपण और अभिवर्धन युद्ध स्तरीय आवेश के साथ किया जायेगा। एक ही समस्या है और एक ही समाधान। मनुष्य इसे भले ही समझ न पाये, पर महाकाल की यथार्थता की जानकारी है। वह लोक-मानस में आस्थाओं को पुनर्जीवन प्रदान करने के लिए प्रज्ञावतार को भेज रहा है। उसका प्रधान उद्देश्य अनास्था को आस्था में बदल देना ही होगा।
शक्ति और साधनों की उपयोगिता से इनकार नहीं किया जा सकता। सुविधा सम्वर्धन की दृष्टि से उनका बाहुल्य निश्चित रूप से अभीष्ट है। इसलिए इन दोनों को व्यर्थ बताने या उपेक्षा करने का प्रश्न ही नहीं उठता पराक्रम के लिए सामर्थ्य चाहिए और उपलब्धियों के लिए उपकरण। अस्तु इन दोनों का संचय-सम्वर्धन मनुष्य आदिम काल से ही करता रहा है। और जब तक धरती पर उसका अस्तित्व भी है, तब तक करता भी रहेगा। यह स्वाभाविक भी है। उचित भी ओर अभीष्ट भी।
किन्तु ध्यान रखने योग्य तथ्य यह है कि शक्ति एवं साधनों का उपायों करने वाली चेतना का स्तर ऊंचा रहना चाहिए। तभी समर्थता और सम्पदा का सहयोग बन पड़ेगा। इसके अभाव में बन्दर के हाथ तलवार पड़ने की तरह मात्र अनर्थ की ही सम्भावना है। दुर्बुद्धियुक्त कुकर्मी का सशक्त होना उसे विनाश के गर्त में और भी तेजी के क साथ धकेलता है। आग में ईंधन पड़ने से वह भड़कती ही है। अन्तरंग की निकृष्टता अभावग्रस्त स्थिति में तो दबी भी पड़ी रहती है, पर साधन मिलने पर तो उसे खुल खेलने का अवसर मिलता है ऐसी दशा में कुकर्मी का वैभव उसके स्वयं के लिए-सम्बंधित व्यक्तियों के लिए और समस्त समाज के लिए अभिशाप ही सिद्ध होता हे। दुर्बलता बुरी होती हे। पर दृष्टता तो भयानक ही कही जायगी। अभावजन्य दुर्बलता को कोई पसन्द नहीं करता, पर समर्थताजन्य दुष्टता द्वारा कुछ घटित होता है उसे देखकर तो रोमाँच ही जो आता है। जब उस पर नियंत्रण करने वाली शालीनता को अक्षुण्ण और प्रखर रखा जा सके।
पिछले दिनों प्रगति के नाम पर बहुत कुछ हुआ है। इससे अनेकों में कुशलता और तत्परता का बड़े परिमाण में नियोजन हुआ है। अन्यमनस्कता और अकर्मण्यता की हेय स्थिति की तुलना इस पुरुषार्थ को मुक्त कण्ठ से सराहना ही की जायगी। जिन पुरुषार्थियों ने बुद्धिकौशल से विज्ञान, उद्योग आदि क्षेत्रों में प्रबल प्रयत्न करके सुविधा साधन बढ़ाये है उनके पराक्रम को विस्मृत नहीं किया जा सकता है। इने पर भी यह अभाव खटकता ही रहेगा कि दूरदर्शिता, विवेकशीलता, उदारता, शालीनता जैसी सत्प्रवृत्तियों का उत्पादन, अभिवर्धन उपेक्षित ही पड़ा रहा। उसकी उपयोगिता वैसी नहीं समझी गई जैसी समझी जानी चाहिए थी। एकाँगी चिन्तन यह बताता रहा कि भौतिक प्रगति ही सब कुछ है। साधनों के बढ़ने पर मनुष्य के सामने उपस्थित होने वाली सभी कठिनाइयों का समाधान हो जायगा।
मनुष्य जितना बुद्धिमान है उतना ही अदूरदर्शी भी। सम्पदा को सब कुछ मान बैठन ओर चेतना की उत्कृष्टता को अपेक्षित रखने की भूल निश्चित रूप से अदूरदर्शिता है। इतिहास साक्षी है। कि निकृष्ट स्तर के व्यक्तित्व समर्थता प्राप्त करने के उपरान्त अपने कुकर्मों से सारे वातावरण को ही विक्षुब्ध करते रहे है। उनका वैभव असंख्यों के लिए अभिशाप बना है। आज भी अस तथ्य को पग-पग पर चरितार्थ होते देखा जा सकता है। सम्पन्न देशों के नागरिक उपलब्ध सुविधाओं का उपयोग किस प्रयोजन के लिए कर रहे है, उसके क्या-क्या परिणाम भुगत रहे है, उसका प्राण अमेरिका जैसे सम्पन्न देशों की वास्तविक स्थिति को, ऊपर से चमकीला आवरण उघाड़ कर भली भाँति देखा जा सकता है। सम्पन्नता से सुविधाएं तो बढ़ती है। पर उससे व्यक्ति के अन्तरंग को ऊंचा उठाने में तनिक भी सहायता नहीं मिलती। फलतः मात्र भौतिक सफलता के सहारे जिस स्थिति में जा पहुंचते हे। उससे भारी निराशा होती हे। क्या व्यक्ति, क्या समाज, ओर क्या राष्ट्र सभी पर यह तथ्य समान रूप से लागू होता है कि आवश्यकता बढ़े बिना, बढ़े हुए वैभव से संकटों ओर विग्रहों की बाढ़ आती है।
आदर्शवादिता का नियंत्रण हट जाने पर बलिष्ठता की परिणित उद्दंड उच्छृंखलता में होती है सुन्दरता कामुकता ओर अहमन्यता का पथ प्रशस्त करती है बढ़ा हुआ बुद्धिकौशल छद्म रचने के काम आता है। वैभव क बढ़ते ही दुर्व्यसन चढ़ दौड़ते है। अधिकारों का उपयोग स्वार्थ के लिए अशक्तों के शोषण, उत्पीड़न में होता हे। कला का सौष्ठव पशु प्रवृत्तियों को भड़काने में नियोजित होता है। धनी अधिक धनी बनना चाहता है, समर्थ अधिक सामर्थ्यवान किन्तु वे यह नहीं सोच पाते कि इस अभिवृद्धि का सदुपयोग क्या हो सकता है? दूरदर्शी विवेक के अभाव में तृष्णा ओर अर्हता की पूर्ति ही वह आधार रह जाती है जिसके लिए बाहुल्य ओर वार्धक्य को लगाया को लगाया जा सके। यहां होता है -यही हो रहा है। प्रतिक्रिया सामने है वैभव बढ़ रहा है साथ ही दुर्व्यसन भी। शिक्षा साधन ओर कुशलता संवर्धन के अनेकानेक आधार बढ़ रहे है ओर मनुष्य अपेक्षाकृत अधिक चतुर, अधिक सतर्क बनता जा रहा है। इतने पर भी यह बढ़ी हुई बुद्धिमता दुरभिसंधियाँ गढ़ने में ही काम आती है।
शान्त चित्त से स्थिति की विवेचना करने पर एक बार तो ऐसा लगता है कि प्रगति की दिशा में दौड़ते हुए हम अवगति के गर्त में गिरने को तेजी से बढ़ रहे। तब क्या प्रगति निरर्थक है? समर्थता ओर संपन्नता बढ़ाने के लिए जो प्रयत्न चल रहे है क्या वह अनावश्यक है। इस प्रकार सोचने की आवश्यकता नहीं है। सम्पन्नता अचेतन है ओर समर्थता अन्धी। इनमें से न किसी को भला कहा जा सकता है न बुरा। पदार्थ, पदार्थ है। ओर बल, बल है। इनमें क्षमता भर है इतनी योग्यता नहीं कि अपना उपयोग किसी भले या बुरे प्रयोजनों के लिए कर सके। आग में ताप तो है, पर उससे यह निर्णय करते नहीं बनता कि वह भोजन पकाने में लगे या अग्निकाण्ड उत्पन्न करने में। यह कार्य किसी सचेतन का है। पदार्थ प्रकृति की प्रेरणा भर अंगीकार करते है।उचित-अनुचित का निर्णय कराना या परिणाम की कल्पना करना उनके वस से बाहर की बात है। इसलिए बारूद, आग, बिजली जैसी समर्थताओं से भी उचित-अनुचित का निर्णय करते नहीं बन पड़ता। चेतन ही उन्हें विकास या विनाश के लिए नियोजित करता है। रेल, मोटर, जहाज, की गतिशीलता सर्वविदित है। किन्तु वे कुशल ड्राइवर के संरक्षण में ही अपनी उपयोगिता का परिचय दे सकते है। अन्यथा वे अनियमित गतिशीलता अपना कर स्वयं नष्ट होने एवं दूसरों को नष्ट करने जैसी दुर्घटनाएं ही उपस्थित कर सकते है।
“एकाँगी प्रगति असंतुलन उत्पन्न करती है। एक पहिए की गाड़ी ओर अर्थात् पक्षाघात से पीड़ित काया कितनी ही मूल्यवान क्यों न हो अन्ततः भारभूत ही सिद्ध होती है। एक पैर मोटा, एक पतला होना सुन्दरता और गतिशीलता में बाधक ही होता है। फूला हुआ पेट, घेंघे का गला, सूजा हुआ चेहरा, रसौली या फोड़ा होने पर वे अंग अपेक्षाकृत उठे, उभरे दिखाई पड़ते हे, तो भी उस असन्तुलन को शुभ न माना जाता है न सुविधाजनक। जीवन एकांगी नहीं है। उसके दो पक्ष-एक शरीर अर्थात् भौतिक, दूसरा प्राण अर्थात् चेतन, दोनों का सम्मिलित ढाँचा जब तक सुसंतुलित बना रहता है। तभी तक जीवनचर्या चलती है। एक के विलग हो जाने पर दूसरा अपंग, असमर्थ ही नहीं परिहार्य ही हो जाता है। प्राण रहित शरीर तो तेजी से सड़ता है। शरीर रहित प्राण भूत-पलीत जैसी विचित्र स्थिति में जा पहुँचता है। भौतिक प्रगति का लक्ष्मी कहा गया है। पर नारायण के आदर्श के साथ रहने में ही उसकी शोभा है। ऋद्धि-सिद्धि के युग्म में भौतिक और आत्मिक प्रगति का सहसंतुलन ही प्रतिपादित किया गया है। उमा-महेश, शची-पुरन्दर, सी-राम, राधेश्याम आदि युग्मों में प्रगति की उभयपक्षीय आवश्यकता का ही प्रतिपादन है। साधन रहित सद्भावना और सद्भाव रहित साधन की स्थिति अवांछनीय ही मानी जाती है।
पिछले दिनों बुद्धिवाद ओर प्रत्यक्षवाद ने जीवन के तत्व भौतिक पक्ष को ही सब कुछ मान बैठने की भूल की है। तत्व दर्शन के आधार पर प्रतिपादित हो सकने वाली उत्कृष्टता को काल्पनिक कहकर अमान्य ठहरा दिया है। फलतः आदर्शवादिता का नियंत्रण लोक-मानस पर से उठ गया है। अनियंत्रित पशु प्रवृत्तियां समर्थ होने की स्थिति में कितनी उच्छृंखल एवं घातक होती है, इसका अनुमान मदोन्मत्त हाथी, नर भक्षी, व्याघ्र, श्मशान के पिशाच, जलाशय के मगर द्वारा किये जाने वाले विनाश को देख कर सहज ही लगाया जा सकता है। छुट्टल पशु हरी-भरी फसल को चर कर समाप्त कर देते है।अराजकता, उच्छृंखलता के आततायी दुष्परिणामों को जो अनुमान लगा सकते है उन्हें यह भी जानना चाहिए कि चेतना पर से आदर्शवादिता का अंकुश हट जाने पर जो परिस्थिति उत्पन्न होती है, उसे सर्वनाशी दावानल से कम विघातक नहीं माना जा सकता। शत्रु देश के आक्रमण गृहयुद्ध, दुर्भिक्ष, महामारी आदि विपत्तियों से जूझने के लिए अवसर आने पर अथवा उसे पहले ही जो सतर्क सक्रियता अपनानी होती, उससे कम नहीं अधिक ही सावधानी चिन्तन क्षेत्र पर आधिक्य जमाने वाले स्वेच्छाचार के प्रति बरती जानी चाहिए।
पिछली पीढ़ी प्रत्यक्षवादी अदूरदर्शिता क आतुर आवेश में मात्र भौतिक प्रगति पर ही अपनानी सक्रियता नियोजित किये रही है। जबकि उससे भी अधिक प्रयास चेतना को सुसंस्कृत बनाने के लिए किया जाना चाहिए था। शरीर से प्राण का मूल्य ओर महत्व अधिक हैं उसी प्रकार समृद्धि से संस्कृति की गरिमा अपेक्षाकृत अधिक समझी जानी चाहिए। इस संदर्भ में जो असंतुलन बरता गया-एकाँगी दृष्टिकोण को अपनाया गा, उसी की प्रतिक्रिया आज अनेकानेक संकटों ओर विग्रहों के रूप समे सामने प्रस्तुत है। जिस तत्परता से समृद्धि समृद्धि का प्रयास किया गया उसी तन्मयता से सद्भाव उन्नयन के लिए प्रबल प्रयास होने चाहिए थे। शरीर से आत्मा का महत्व अधिक हैं इसलिए समृद्धि की तुलना में संस्कृति का प्रमुखता मिलनी चाहिए थी ओर उसी अनुपात से लोक मानस को उत्कृष्टता से भरा-पुरा रखने वाले प्रयास चलने चाहिए थे। वर्षा का पानी, नाला न मिलने पर भयंकर बाढ़ के रूप में विनाश लीला उत्पन्न करता है। इसी का दृश्य हम सब अपनी आंखों से प्रत्यक्ष देखते हैं।
भूल के परिमार्जन का ठीक यही समय है। मानवी दूरदर्शिता से शांत चित्त से विचार करना चाहिए कि क्या पिछली भूल का परिमार्जन करने के लिए अब कुछ नहीं हो सकता? मानवी प्रखरता की समझने वाले यह भी प्रकार जानते हैं कि जिस भी दिशा में आकांक्षा ओर तत्परता का विनियोग होता है। उसी दिशा में तूफानी प्रगति होने लगती है। आज के साधन हाँ विनाश का पथ प्रशस्त करते है, वहाँ उनमें यह क्षमता भी विद्यमान है कि विकास के सांस्कृतिक पुनरुत्थान की दिशा में भी चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत कर सके। प्रेस, लाउडस्पीकर, चलचित्र जैसे कितने ही उपयोगी यन्त्र ऐसे निकल पड़े है, जिनकी सहायता से चिन्तन को परिष्कृत करने की दिशा में कई प्रचारात्मक कार्य आसानी से सम्पन्न हो सकते है। युगसाहित्य का निर्मा और प्रसारण एक कार्य है। और ज्ञान गोष्ठियों के माध्यम से मनीषियों द्वारा शिक्षण दूसरा। रचनात्मक ओर सुधारात्मक गतिविधियों की सुगठित रूप रेखा बना कर उनमें असंख्यों सद्भाव सम्पन्नों की श्रम-साधना नियोजित की जा सकती। समृद्धि सम्वर्धन के लिए जिस प्रकार सोचा जाता रहा है, जिस प्रकार उसमें साधन, श्रम तथा मनोयोग का नियोजन होता रहा है। उसी तन्मयता तथा तत्परता से यह भावनात्मक उत्कृष्टता बढ़ाने के लिए सक्रियता अपनाई जाएगी तो कोई कारण नहीं कि प्रयत्न असफल चले जायें। असफलता का एक ही प्रमुख कारण है - उपयुक्त तन्मयता तथा अभिरुचि एवं प्रयत्नशीलता का अभाव। इसे यदि दूरी किया जा सके तो प्रगति किसी भी क्षेत्र में हो सकती है। भले ही वह उत्कृष्टता संवर्धन के लिए ही नियोजित क्यों न की गई हो?
यहाँ स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि जिस क्षेत्र में दृष्टिकोण की उत्कृष्टता उत्पन्न होती हे वह न तो शरीर है और न मस्तिष्क। शरीर को सैनिकों, नर्तकों, श्रमिकों, बालचरों की तरह कुछ अभ्यास करा दिए जाये, तो उससे काया भर सधेगी। मस्तिष्क को प्रशिक्षित करने के लिए कितनी ही तरह के पाठ्यक्रम चलते है। दृश्य दिखाये, अनुभव कराए ओर प्रसंग सुनाये जाते हे। साहित्य पढ़ने ओर प्रवचन सुनने का भी क्रम चलता रहता है, उससे जानकारी भर बढ़ती है। आस्थाओं के परिष्कार में कोई खास सहायता नहीं मिलती। नीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, नागरिकशास्त्र आदि पढ़ाने वाले अध्यापकों तक का निजी जीवन जब उच्चस्तरीय न बन सका, आदर्शवादिता पर आये दिन लिखते रहने वाले लेखकों तक का स्तर जब सामान्य लोगों से अधिक ऊँचा न उठ सका-कथा प्रवचनों में संलग्न रहने वाले पुरोहितों तक को जब प्रतिपादनों के अनुरूप आचरण करते न पाया जा सका-तो यही मानना पड़ेगा कि मस्तिष्कीय शिक्षा मात्र जानकारी बढ़ाती है। उसका सीधा प्रभाव उस मर्मस्थल तक नहीं पहुँच पाता जहाँ उच्चस्तरीय आस्थाओं का उत्पादन और उत्थान होता है। यदि व्यक्तित्व के मूल आधार-दृष्टिकोण को परिष्कृत परिमार्जित करना हो तो फिर निश्चय ही पुनर्निर्माण का कार्य क्षेत्र अन्तःकरण को मानकर चलना होगा। तब उन आधारों को अपनाना होगा जो उच्चस्तरीय आस्थायें उत्पन्न करने में काम आते और सफल होते रहे हैं।
आस्थाओं के क्षेत्र को स्पर्श करने वाला एक ही माध्यम है-अध्यात्म, अध्यात्म के चिन्तन को तत्वदर्शन और व्यवहार को धर्म कहते हैं। दोनें को मिलाने से ही समग्र अध्यात्म बनता है। तत्वदर्शन को हृदयंगम करने की पद्धति को योग और व्यवहार में उच्चस्तर का समावेश करने का नाम तप कहा जाता है। तप को साधना और योग को ब्रह्मविद्या कहते हैं। आस्तिकता- आध्यात्मिकता और धार्मिकता की त्रिवेणी मिलने से वह त्रिवेणी बनती है, जिसमें स्नान करने पर रामायण में प्रतिपादित “काक होंहि पिक-बक्हु मराला” का भावनात्मक कायाकल्प संभव होता है।
यों चिन्तन के माध्यम से ही आस्थाएँ जगाई जाती हैं, पर वह उथला नहीं गहरा होता है। तर्क का समावेश तो रहता है पर साथ में श्रद्धा भी जुड़ी रहती है। शुष्क तर्क बुद्धि विलास है। बहस के लिए ही बहस करने वाले-मस्तिष्क से चतुर वकीलों की तरह वह प्रतिपादन करते चले जाते हैं, जिन पर उनकी आस्था तनिक भी नहीं है। सच्चे को फँसाने और झूठे को छुड़ाने के लिए वे वकील भी प्रभावी बहस करते देखे गये हैं, जो वस्तु स्थिति को ठीक तरह समझते हैं। इसलिए मस्तिष्क को माध्यम मानते हुए भी, उसे आस्थाओं को उच्चस्तरीय बनाने के लिए पर्याप्त नहीं माना जा सकता। इसके लिए एक ही अवलम्बन है- अध्यात्म। अध्यात्म का प्राण है ऋतम्भरा प्रज्ञा। गायत्री इसी को कहते हैं। ऋतम्भरा प्रज्ञा में विवेक और श्रद्धा इन दो तत्वों का समन्वय होता है। विवेक अर्थात् दूरदर्शिता-श्रद्धा अर्थात् उच्चस्तरीय आस्थाओं में उल्लास भरी, सघन अभिरुचि। यह भाव-संवेदनाऐं जिस चिन्तन और जिस अभ्यास से उभारी जाती हैं, उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। संक्षेप में इसी को प्रज्ञा कहा गया है। गायत्री मंत्र की अन्तरात्मा को “प्रज्ञा की प्रेरणा” माना गया है। प्रज्ञा जीवन्त तभी होती है, जब उसमें प्रेरणा देन-प्रवाह उत्पन्न करने की क्षमता हो। गायत्री महामंत्र में यही सब कुछ है। उसके चौबीस बीजाक्षरों में मान्यताओं, संवेदनाओं और प्रेरणाओं का सुनियोजित तारतम्य विद्यमान है। युग परिवर्तन के लिए-लोकमानस को उच्चस्तरीय बनाने के लिए इस एक महामंत्र के अतिरिक्त और कोई ऐसा कारगर उपाय नहीं खोजा जा सका, जो मनुष्यों में देवोपम आस्थायें जगाने-प्रेरणाऐं उभारने और सक्रियता अपनाने के लिए अभीष्ट लक्ष्य तक खींचता घसीटता चला जाय।
सामयिक विकृतियों से निपटने ओर उज्ज्वल भविष्य का सृजन करने के उभयपक्षीय प्रयोजन जिस एक ही युगान्तरीय चेतना से संभव होने जा रहे हैं उसी के उदय-उद्भव का नाम है-प्रज्ञावतरण। इन दिनों इसी का उषाकाल हैं अरुणोदय सन्निकट है। नव प्रभात की संभावनाऐं प्रकट और प्रत्यक्ष होती जा रही हैं। विकृतियों की तमिस्रा का निराकरण और गतिशीलता उत्पन्न करने की ऊर्जा का सम्वर्धन जिस युग-प्रभात में होने जा रही है, उसी को अपने समय का अवतार कहना चाहिए। सामान्य मानवी प्रयास इतने बड़े अभियान में कम न पड़ जायें इसलिए महाकाल की युग-चेतना का सूक्ष्म जगत में विशिष्ट प्रादुर्भाव हो रहा है। प्रज्ञावतार का आलोक युग-समस्याओं के समाधान की महती भूमिका सम्पादित कर सकेगा इस पर विश्वास करने के ठोस कारण सामने ही विद्यमान हैं।
भगवान के अवतार, समय की आवश्यकता के अनुसार अपने स्वरूप और कार्य क्षेत्र को विनिर्मित करते रहे हैं। जब जिस प्रकार की समस्याऐं उत्पन्न हुई हैं तब उसी असंतुलन को सही करने के लिए सूक्ष्म जगत में एक दिव्य चेतना प्रादुर्भूत हुई है। अपने कौशल एवं पराक्रम से डगमगाती नाव को संभालने और भँवरों वाले प्रवाह से उसे बचा ले जाने का लीला-उपक्रम ही अवतारों का चरित्र रहा है। सृष्टि के आदि में जब इस भूमि पर जल ही जल था और प्राणिजगत में जलचर ही प्रधान थे तब उस क्षेत्र की अव्यवस्था को मत्स्यावतार ने संभाला था। जल और थल पर जब छोटे प्राणियों की हलचलें बढ़ीं, तो तदनुरूप क्षमता वाली कच्छप काया उस समय का संतुलन बना सकी। समुद्र-मंथन का पुरुषार्थ-प्रकृति दोहन की प्रक्रिया उन्हीं के नेतृत्व में आरम्भ हुई। हिरण्याक्ष द्वारा जल में-समुद्र में छिपी सम्पदा को ढूँढ़ निकालने तथा तस्कर का दमन करने को वाराह रूप ही समर्थ हो सकता था, वही धारण भी किया गया।
उद्धत उच्छृंखलता का दमन प्रत्याक्रमण से ही हो सकता है इसके लिए ऐसे अवसरों पर शालीनता से काम नहीं चलता। तब नृसिंहों की आवश्यकता पड़ती है और उन्हीं का पराक्रम अग्रणी रहता है। भगवान ने उन दिनों की आदिम परिस्थितियों में नर और व्याघ्र का समन्वय आवश्यक समझा और दुष्टता के दमन तथा सज्जनता के संरक्षण का अपना आश्वासन पूर्ण किया।
संकीर्ण स्वार्थपरता ओर उससे प्रेरित संचय एवं उपभोग की पशु-प्रवृत्ति को तब उदार बनाने की आवश्यकता पड़ी, जब मनुष्य अपनी आवश्यकता से अधिक कमा सकने में समर्थ हो गया। वामन भगवान के नेतृत्व में छोटे, बौने, पिछड़े लोगों की आवाज बुलन्द हुई और बली जैसे सम्पन्न लोगों को उदार वितरण के लिए स्वेच्छा सहमत किया गया। यही वामन अवतार है।
इसके बाद परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध के अवतार आते हैं। इन सबके अवतरण का लक्ष्य एक ही था-बढ़ते हुए अनाचार का प्रतिरोध और सदाचार का समर्थन-पोषण। सामन्तवादी आधिपत्य को परशुराम ने शस्त्र बल से निरस्त किया। लोहे से लोटा काटा। राम ने मर्यादाओं के परिपालन पर जो दिया। कृष्ण ने छद्म से घिरी हुई परिस्थितियों का शमन करने में “विषस्य विषमौषधम्” का उपाय अपनाया। उनकी लीलाओं में कूटनीतिक दूरदर्शिता की प्रधानता है। तत्कालीन परिस्थितियों में सीधी उंगली घी नहीं निकलता होगा तो काँटे से काँटा निकालने के लिए टेढ़ी चाल से लक्ष्य तक पहुँचा गया होगा।
धर्म तत्व के श्रेयाधिकारी होते हुए भी उसमें विकृतियाँ भर जाने से साबुन का स्वरूप गन्दगी फैलाना जैसा बन गया था। “मद्य माँस च मीनं य मुद्रा मैथुन मेवच” क अनाचार धर्म की आड़ लेकर लोक व्यवस्था को अस्त-व्यस्त कर रहा था। उन दिनों बुद्ध ने धर्म व्यवस्था का सज्जनों के संगठन का और विवेक को सर्वोपरि मानने क प्रवाह बहाया था। “धर्म शरणं गच्छामि-बुद्धं शरणं गच्छामि” का शंखनाद ही बुद्ध का लीला संदोह है। इस कार्य के लिए उनके आ....न पर लाखों धर्म प्रचारक प्रव्रज्या पर निकले थे और विचार क्रान्ति का आलोक संसार के कोने-कोने तक पहुँचाया था।
बदलती परिस्थितियों में बदलते आधार भगवान को भी अपनाने पड़े हैं। विश्व-विकास की क्रम व्यवस्था के अनुरूप अवतार का स्तर पर एवं कर्म क्षेत्र भी विस्तृत होता चला गया है। मनुष्य जब तक साधन प्रधान और कार्य प्रधान था तब तक शास्त्र और साधनों के सहारे काम चला गया। आज की परिस्थितियों में बुद्धि तत्व की प्रधानता है। म नहीं सर्वत्र छाया हुआ है। महत्वाकाँक्षाओं के क्षेत्र में अनात्म तत्व की भरमार होने से सम्पन्नता और समर्थता का दुरुपयोग ही बन पड़ रहा है। महामारी सीमित क्षेत्र तक नहीं रही, उसने अपने प्रभाव क्षेत्र में समूची मानव जाति को जकड़ लिया है। विज्ञान ने दुनिया को बहुत छोटी कर दिया है और गतिशीलता को अत्यधिक द्रुतगामी। ऐसी दशा में भगवान का अवतार युगान्तरीय चेतना के रूप में ही हो सकता है। जन-मानस के सुविस्तृत क्षेत्र में अपने पुण्य प्रवाह का परिचय देना इसी रूप में संभव हो सकता है, जिसमें कि ‘प्रज्ञावतार’ के प्रादुर्भाव की सूचना संभावना सामने है।
बुद्ध के बुद्धिवाद का स्वरूप ‘विचार क्राँति’ था। पूर्वार्द्ध में धर्म चक्र का प्रवर्तन हुआ था। धर्म धारणा सम्पन्न लाखों व्यक्तियों ने उसमें भाव भरा योगदान दिया था। आनन्द जैसे मनीषी, हर्षवर्धन जैसे श्रीमन्त, अंबपाली जैसे कलाकार, अंगुलिमाल जैसे प्रतिभाशाली बड़ी संख्या में उस अभियान के अंग बने थे। इससे पिछले अवतारों का कार्यक्षेत्र सीमित रहा था, क्योंकि समस्यायें छोटी और स्थानीय थीं। बुद्ध-काल तक समाज का विस्तार बड़े क्षेत्र में हो गया था। इस लिए बुद्ध का अभियान भी भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा और उन दिनों जितना व्यापक प्रयास संभव था उतना अपनाया गया। धर्मचक्र प्रवर्तक भारत से एशिया भर में फैला और उससे भी आगे बढ़कर उसने अन्य महाद्वीपों तक अपना आलोक बाँटा।
प्रज्ञावतार-बुद्धावतार का उत्तरार्ध है। बुद्धि प्रधान युग की समस्यायें भी चिंतन प्रधान होती हैं। मान्यतायें, विचारणायें, इच्छायें ही प्रेरणा केन्द्र होती हैं और उन्हीं के प्रवाह में सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तदनुरूप ही हो सकता है। लोकमानस को अवाँछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़ मान्यता से विरत करने वाली विचार क्राँति ही अपने समय की समस्याओं का समाधान कर सकती है।
हर क्राँति का प्रतीक ध्वज रहा है। प्रवाह के स्वरूप और निर्माण का परिचय देने के लिए कोई सम्बल चिन्ह रखे जाते हैं। धार्मिक क्षेत्र में मन्त्र, देवता, तिलक, ग्रन्थ आदि को आगे रखा गया है। राजनैतिक क्षेत्र में झण्डों का उपयोग होता रहा है। अपने युग में जो महाभारत लड़ा जायेगा वह विशुद्ध चेतना-क्षेत्र का होगा। उसमें विचारणाएँ-मान्यताएँ-आस्थाएँ-आकाँक्षाएँ ही उखाड़ी और जमाई जायेंगी। उसका प्रारूप क्या हो? उसका निर्धारण क्या हो चुका है। गायत्री महामन्त्र के अक्षरों में उन सभी तथ्यों का समावेश है जो सद्भाव सम्पन्न आस्थाओं के निर्माण एवं अभिवर्धन का प्रयोजन पूरा कर सकें। व्यक्ति का चरित्र-चिंतन और समाज का विधान प्रचलन क्या होना चाहिए, इसकी ऐसी सुनिश्चित निर्धारण इस महामन्त्र के अंतराल में विद्यमान है जिसे सार्वभौम, सार्वजनिक, सर्वोपयोगी माना जा सके।
करने से पहले सोचना आवश्यक होता है। प्रयाण से पहले लक्ष्य निर्धारित होता है। नवयुग का प्रारूप सामने होने पर ही उस घोषणा-पत्र एवं संविधान को समझकर लोकमानस को उसे समझाने, अपनाने का प्रयास आरम्भ हो सकेगा। इसके लिए नये सिरे से कुछ नया ऊहापोह करना नहीं है। चिर पुरातन को चिर नवीन के साथ जोड़ देने के काम चल जायेगा। सतयुग में मानवी चिंतन और कर्तृत्व का आधार गायत्री ही है। उसी को मानवी-धर्म-संस्कृति का उद्गम तथा प्रथा-प्रचलन का सुनिश्चित आधार गुरुमन्त्र माना जाता रहा है। उस महान तत्वज्ञान को अपनाकर हमारे पूर्वज महामानव और नर-नारायण का जीवन जीते रहे हैं। देवता स्वर्ग में रहते हैं। उन देव मानवों की मनःस्थिति अपने इर्द-गिर्द स्वर्गीय परिस्थितियों का सहज सृजन करती है। यह नया प्रयोग नहीं है, चिरकाल तक परखा गया परीक्षण है। उसी पुरातन का नवीन संस्करण प्रस्तुत होने जा रहा है। अस्तु, देव-संस्कृति की जन्मदात्री देवमाता अगले दिनों अपना विशाल विस्तार वेदमाता के रूप में करेगी। वेदमाता अर्थात् सद्ज्ञान की अधिष्ठात्री सुसंस्कृत और समुन्नत विश्व का निर्माण उन्हीं के द्वारा होने जा रहा है। अतएव गायत्री की विश्वमाता भूमिका भी उज्ज्वल भविष्य के अनुरूप ही होगी।
ऋतम्भरा प्रज्ञा का संक्षिप्त उच्चारण ‘प्रज्ञा’ के रूप में होता है। ऋतम्भरा वह है जिसमें विवेक और श्रद्धा का समुचित समावेश है। विवेक उस निवारण को कहते हैं जिसमें तर्क, तथ्य और दूरदर्शिता का समुचित समावेश हो। श्रद्धा उस आस्था का नाम है जो उत्कृष्ट आदर्शवादिता को अत्यधिक प्यार करे और उस स्तर के चिंतन तथा कर्तृत्व से भाव भरे रसास्वादन का आनन्द प्रदान करे। विवेक को बुद्धि का उत्कृष्टतम स्तर माना गया है। श्रद्धा अन्तःकरण की श्रेष्ठतम उपलब्धि है। दोनों का जहाँ जितना सम्मिश्रण होता है वहाँ उतनी ही महानता दृष्टिगोचर होती है। उसी उपलब्धि के सहारे सामान्य परिस्थितियों में जन्मे, पले व्यक्ति भी ऐतिहासिक महामानवों की भूमिका निभाते और विश्वनिर्माण में असाधारण योगदान करते हैं।
अगले दिनों मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पदा एवं उपलब्धि ऋतम्भरा प्रज्ञा मानी जायेगी। यों कथा, प्रसंगों में और धर्म प्रवचनों में प्रज्ञा की महिमा बहुत गायी जाती है और ब्रह्म विद्या का सुविस्तृत कलेवर में उसी का प्रतिपादन किया जाता है किन्तु उसे व्यवहार में कार्यान्वित करने का अवसर किन्हीं बिरलों को ही मिलता है। सामान्य जीवन क्रम में उसका समावेश नहीं के बराबर होता है। जो बात-व्यवहार में नहीं आती वह कठिन या असम्भव मानी जाती है प्रेरणा प्रदान करने में अनुकरण की परिस्थितियाँ ही प्रभावी होती हैं दूसरे की देखा देखी ही कुछ अपनाने और कुछ करने की मानवीय दुर्बलता ही सर्वत्र संव्याप्त है मौलिक चिंतन की प्रखरता और मौलिक निर्णय की साहसिकता किन्हीं विरलों में ही होती है बिना दूसरों का प्रभाव ग्रहण किए उच्चस्तरीय नीति अपनाने और उस पर अन्त तक दृढ़ बने रहने का आत्मबल तो कदाचित ही किन्हीं मनस्वियों में दृष्टिगोचर होता है। प्रज्ञा के माहात्म्य की चर्चा, करते रहना सरल है, पर उसे अपनाना कठिन है कठिन इस लिए नहीं कि व्यवहार में जटिल भी असंभव है। कारण मात्र इतना भर है कि अनगढ़ प्रचलनों से आच्छादित वातावरण में अनुकरण के उदाहरण न मिलने से सामान्य व्यक्ति उस दिशा में पग बढ़ाते हुए डरता है। यह डर ही वह बाधा है जो प्रज्ञा को अपनाकर मंगलमय जीवन-यापन करने के आनन्द से मनुष्य को वंचित किये रहती है।
प्रज्ञावतार से उत्पन्न युगान्तरीय चेतना की विशेषता यह होगी कि अनायास ही जन-जन के मन में ऐसा उल्लास उत्पन्न करेगी जिसमें अन्तःप्रेरणा ही वह कार्य कर सके तो सामान्य व्यक्ति के लिए सामान्य परिस्थितियों में सम्भव नहीं होता। असम्भव को संभव बना देना यही अवतार प्रक्रिया का प्रधान चमत्कार है।
रावण का आतंक दसों दिशाओं में संव्याप्त था। उसके विरोध प्रतिरोध की बात कोई सोचता तक न था। इतने दुर्दान्त दानव परिवार की शक्ति सामर्थ्य का अनुमान लगाने वाले बेतरह निराश और भयभीत हो जाते थे। अनीति सहते-सहते मरते तो असंख्यों थे, पर लड़ते हुए मरने का शौर्य किसी में भी जगता न था। सीता अपहरण जैसी हृदय द्रावक घटना हुई, पर न अयोध्या से प्रतिरोध-प्रतिशोध का प्रयास हुआ और न मिथिला से। रघुवंशी भी चुप थे और राजा जनक के स्वजन परिजन भी। ऐसे आतंक को चीरते हुए अशिक्षित और अनगढ़ समझे जाने वाले रीछ वानरों का शौर्य उभरा और वे प्रत्यक्ष मरण से लड़ने के लिए प्राण हथेली पर रखकर चल दिए। एक के पीछे अनेकों की सेना बनती बढ़ती चली गयी। अन्य प्राणियों पर भी प्रभाव पड़ा। गिद्ध ने शौर्य साहस का परिचय दिया और प्रत्यक्ष काल से लड़ने में सम्भावित मरण का उल्लासपूर्वक वरण किया गिलहरी उस धर्म युद्ध में सहायता करने के लिए बालों में भर-भरकर बालू लाई। घटनाएँ अत्यधिक महत्व की भले ही न हो, पर एक तथ्य स्पष्ट होता है कि आतंक को चीरते हुए जब सत्साहस अप्रत्याशित रूप में उभरे तो समझना चाहिए कि कोई दैवी चेतना काम कर रही है और बुद्धि द्वारा लगाये जाने वाले गणित को निरस्त करके असाधारण का परिचय दे रही है। अवतार की प्रक्रिया यही है। प्रेरक राम थे या हनुमान बहस इस बात की नहीं। तथ्य यह है कि अन्तरालों ने आदर्शवाद अपनाया और घाटे का सौदा स्वीकार करने वाले दुस्साहस का परिचय दिया।
कृष्ण काल में इन्द्र के आतंक से व्रज जलमग्न हुआ जा रहा था। सामान्य बुद्धि भाग खड़े होने के अतिरिक्त और कोई उपाय सोच ही नहीं सकती थी। असम्भव को सम्भव बनाने वाला साहस उभरा। ग्वाल बाल शिला खण्ड को दूर-दूर से समेटकर हाथ और लाठियों के सहारे लाने लगे। विशालकाय बाँध बना। बाढ़ और वर्षा से होने वाली हानि टली। इन्द्र हारा मनुष्य जीता। असम्भव लगने वाला कार्य सम्भव हुआ। गोवर्धन उठ गया। सृजन से श्रम शक्ति के नियोजन का सत्परिणाम प्रत्यक्ष हुआ। सामान्यतया ऐसे बड़े कार्य किसी सुसम्पन्न शासनतन्त्र से ही बन पड़ता है। निहत्थे और निर्भय श्रमिक किशोरों में न इतना ज्ञान होता है न अनुभव। सामान्य क्षणिक बुद्धि इस प्रकार के दुस्साहसों में अनर्थ होने का ही निष्कर्ष निकालती है और ऐसे झंझट में उलझने से दूर रहने का ही परामर्श देती है। इसके विपरीत महान उद्देश्य के लिए जोखिम भरे दुस्साहस के लिए कटिबद्ध हो जाना असाधारण आदर्शवादिता का ही काम है। ऐसी प्रेरणा प्रज्ञा के अतिरिक्त और कोई दे नहीं सकता।
दुर्योधन के पास जन-शक्ति और साधन-शक्ति असीम थी। पाण्डव अज्ञात वास में जान बचाते फिर रहे थे। कोई सहायक न था। सहायता करने में किसी को अपनी खैर नहीं देखती थी। पाण्डव अपने बलबूते न सेना खड़ी कर सकते थे न शस्त्र जुटा सकते थे। ऐसी दशा में निरीह पाण्डवों का कौरवों की अनीति से लड़ना सम्भव न था। फिर भी असम्भव सम्भव हुआ। न्याय पक्ष के समर्थन में महाभारत रचा गया और उसमें पराजय की सम्भावना को समझते हुए भी असंख्यों आदर्शवादी धर्म युद्ध लड़ने के लिए पहुँचे। साधनहीनता ने साधनों की विपुलता को पछाड़ा। इससे असमर्थों की साहसिकता देखते ही बनती है। यह चमत्कार मात्र अवतार ही कर सकता है। आदर्शों के लिए घाटा स्वीकार करते हुए लड़ मरने की साहसिकता का अनुदान अवतार के अतिरिक्त और किसी के पास होता ही नहीं।
बुद्धकाल के दुर्दिनों में जन मानस को कुत्साओं और कुण्ठाओं ने बेतरह पाप पंक में डुबो रखा था। पुरोहित वर्ग इस अनाचार का मूर्धन्य मार्ग दर्शन कर रहा था। ऐसी दशा में विचार क्रान्ति का शंखनाद दुहरे संकट से भरा था। वातावरण की प्रतिकूलता में समर्थकों और सहयोगियों की सम्भावना अत्यन्त क्षीण थी। विपक्षियों को निहित स्वार्थों में आँच आने से क्रुद्ध होना और घातक आक्रमण करना स्वाभाविक था अंगुल माल ने प्राणा हरण का बीड़ा उठाया और अंबपाली ने चरित्र हनन का। ऐसे घोर निराशा भरे वातावरण में परिस्थितियों को उलट देने वाला उभार उमड़ पड़ना निश्चय ही अप्रत्याशित था। बुद्ध के अभियान को भरपूर सहायता मिली। लाखों व्यक्ति सुख सम्पदा को लात मारकर चीवरधारी परिव्राजक बने। संपन्नों से लेकर निर्धनों तक ने उसका सहयोग किया। न जन-शक्ति की कमी रही न धन शक्ति की। आदर्शवादी पराक्रम आँधी तूफान की तरह उफनता चला गया और प्रतिकूलताएँ इस प्रकार अनुकूल होती चली गई मानो मनुष्य को निर्मित बनाकर भगवान ने सारा विधान पहले से रच पचकर तैयार रखा हो। बुद्ध की क्षमता और परिस्थितियों की विषमताओं का असन्तुलन रहते हुए भी जो परिणाम उत्पन्न हुए इन्हें अवतार लीला के अतिरिक्त और क्या कहा जाये? आदर्शवादी कथनीय कथन तो बहुत होते रहते हैं, पर ऐसे दुस्साहस कदाचित ही कभी फूटते हैं। जब लोग आदर्शों के परिपालन में अपना सर्वस्व समर्पण करने की बात सोच ही नहीं वरन् हजार प्रतिकूलताओं के रहते हुए भी उसे कर की गुजरें। आदर्शवादी दुस्साहस ही अवतार है। वह एक भावनात्मक प्रवाह के रूप में उत्पन्न होता है और असंख्यों को अनुप्राणित करता है। श्रेय किस व्यक्ति को मिला। प्रमुख किसे माना जाय, यह बात नितान्त गौण है। झण्डा लेकर आगे चलने वाले की ही छवि फोटो में आती है। यद्यपि उस सैन्यदल में अनेकों को शौर्य पुरुषार्थ झण्डा धारी की तुलना में कम नहीं अधिक ही होता है।
गाँधी युग में भी ऐसा ही चमत्कार उत्पन्न हुआ। अंग्रेजों की समर्थता और कुशलता पहाड़ जितनी ऊँची थी। उनके राज्य में सूर्य अस्त नहीं होता था। युद्ध कौशल में वे अपना शानी नहीं रखते थे। निहत्थे मुट्ठीभर सत्याग्रहियों की टोली उनका कुछ बिगाड़ सकेगी इसकी आशा अपेक्षा किसी को भी नहीं थी। हजार वर्ष की गुलामी से अस्तव्यस्त जन समुदाय में ऐसा साहस भी नहीं था कि इतने सशक्त विपक्ष के साथ लड़ मरने के लिए अभीष्ट त्याग बलिदान का परिचय दे सके। ऐसी निराशा जनक परिस्थितियों में एक अप्रत्याशित उभार उमड़ा। स्वतन्त्रता संग्राम ठना और अन्ततः विजयी होकर रहा। जन साधारण ने उस संदर्भ में जिस पराक्रम का परिचय दिया, वह देखने ही योग्य है। असमर्थता की समर्थता और साधनहीनों के साधन असहायों की सहायता करने के लिए वे अनुकूलताएँ न जाने कहाँ से आ उपस्थित हुई। असम्भव लगने वाला लक्ष्य पूरा होकर रहा। यही है सूक्ष्म जगत में बहने वाली प्रचण्ड शक्तिधाराओं का प्रवाह जो ऊपर ही से शान्त और सामान्य दीखते हुए भी भीतर से ज्वाला मुखी जैसी विस्फोट क्षमता छिपाये बैठा रहता है। जब फूटता है तो सब कुछ उलट देता है इसी बुद्धि के लिए अगम्य विलक्षणता को अवतार कहते हैं।
अवतार का दार्शनिक विश्लेषण उस ऋतम्भरा प्रज्ञा की उमंग भरी हलचल के रूप में किया जाता है। जो मात्र अन्तःकरणों में अनायास ही उभरती है और अपनी प्रखरता के कारण मनुष्यों को आदर्शवादी दुस्साहस कर गुजरने के लिए विवश करती है। यह अवतरण एक पर नहीं अनेकों पर होता है। जो इस ऊर्जा के वाहन बनते हैं उनके पराक्रम असामान्य होते हैं। उनकी परिस्थिति और मनःस्थिति में कोई तालमेल नहीं रहता। असाधारण सोचना और असाधारण कर गुजरना सामान्य लोगों का काम नहीं। लोग तो संकीर्ण स्वार्थपरता से आगे की बात सोच ही नहीं पाते। उन्हें निकट का ही दीखता है दूर का नहीं, अस्तु न लोभ छोड़ने बनता है और न शौर्य अपनाते। अवतार इस प्रचलन से विपरीत सोचने और बिना समर्थन पाये एकाकी चल पड़ने की सामर्थ्य प्रदान करता है। इस आवेश में कितने ही व्यक्ति वह कर गुजरते हैं जिसे दैवी पराक्रम के रूप में माना जाता है। इस प्रकार की चेष्टायें अपने कर्ता को धन्य बनाती हैं वह असंख्यों के लिए उत्कृष्ट पराक्रम कर गुजरने का साहस अपने अनुकरणीय आदर्श द्वारा प्रदान करता रहता है। ऐसे व्यक्ति देवदूत कहलाते हैं। सामान्य भाषा में इन्हें महा मानव कहा जाता है। अवतार का प्रधान कार्य अपने लीलाकाल में देवदूतों में अदृश्य वातावरण की उच्चस्तरीय उमंगे भर देना भर होता है। शेष कार्य तो वे युग सृजेता स्वयं ही करते रहते हैं। सफलता सहज ही उन्हें भी नहीं मिल जाती। प्रतिकूलताओं से लड़ने का पराक्रम और अपने अनुदानों से लोक श्रद्धा उभारने वाला वरदान प्रस्तुत करते रहना ऐसे लोगों के लिए तनिक भी कष्ट साध्य नहीं होता। सामान्य लोग जिसे मुसीबत मोल लेना कहते हैं, मनीषियों के लिए वही कष्ट सहना, युग साधना के रूप में सम्मानित होता है। तत्वदर्शी इन्हीं अदृश्य हलचलों को जागृत आत्माओं के अन्तःकरणों में उछलती देखते हैं तो कहते हैं अवतार का आवेश असन्तुलन को सन्तुलन में बदलकर ही रहेगा।
अवतार क्या करता है? उसके लीला, प्रसंग क्या होते है? इसका स्थिर निश्चय नहीं हो सकता। परिस्थिति के अनुरूप हर अवतार ने अपने क्रिया कलाप निर्धारित किये और आवश्यकतानुसार बदले हैं। लीलाओं का महत्व नहीं। उनमें पाई जाने वाली विलक्षणताओं एवं विसंगतियों का भी कोई महत्व नहीं। सारभूत तथ्य इतना ही है कि उस अदृश्य प्रेरणा से हर सुसंस्कृत अन्तरात्मा में कुछ ऐसा कर गुजरने का दुस्साहस उमड़ता है जिसको चरितार्थ होते देखकर आदर्शवादिता असम्भव नहीं लगती वरन् व्यवहार साध्य प्रतीत होती हैं। प्रवाह को उत्पन्न करने में भागीरथों को अग्रणी भर होना पड़ता है, आगे तो उसी धारा में असंख्य सामान्यों को अनायास ही बहते देखा जाता है।
प्रज्ञा अवतरण में उसी परम्परा का निर्वाह होने जा रहा है। श्रद्धा और विवेक का संगम युग शक्ति के रूप में प्रकट हो रहा है। श्रद्धा अपनाने में पूर्ण तथ्यों को खोजने और यथार्थता अपनाने के लिए विवेक का अवलम्बन लेना पड़ता है। अन्यथा अविवेक के रहते अन्ध श्रद्धा ही पनपती है और उससे लाभ के स्थान पर हानि होती है। बलिष्ठता शरीर की बुद्धिमत्ता मस्तिष्क की, श्रद्धा अन्तरात्मा की शक्ति है। यही चेतना क्षेत्र की सर्वोपरि क्षमता है। श्रद्धा ही मनुष्य को अनन्त सामर्थ्य प्रदान करती है। उत्कृष्टता को व्यवहार में उतारने वाला दुस्साहस उसी उद्गम से प्रस्फुटित होता है। जिन्हें श्रद्धा की जितनी मात्रा मिल सकी उन्होंने उतने ही उच्चस्तरीय और उतने ही सुविस्तृत महान कार्य सम्पन्न किये हैं। गीताकार ने सच ही कहा है- ‘‘श्रद्धाँ मयोयं पुरुषायो यच्छ्रद्धः सएवसः” “यह मनुष्य मात्र श्रद्धा का पुतला है। जिसकी अन्तः श्रद्धा जिस स्तर की है उसका जीवन स्वरूप ठीक उसी के अनुरूप बन जाता है। ईश्वरीय प्रयोजन को पूरा करने में अपने प्रचण्ड पुरुषार्थ की श्रद्धाँजलि लेकर युग देवता के चरणों में उपस्थित होने वाले अवतार के सहधर्मी सहकर्मी माने जाते हैं। अनन्त श्रेय के स्वामी ऐसे ही लोग बनते हैं। युग शिल्पियों के स्तर को विस्तार होना इस तथ्य का प्रमाण है कि अवतार की तत्परता कब कितनी प्रखर हो रही है।
श्रद्धा से सामर्थ्य उत्पन्न होना सुनिश्चित तथ्य है। सामर्थ्य का आकर्षण साधनों और सहयोगियों को प्रचुर परिणाम में खींचकर बुला लेता है। उच्चस्तरीय उद्देश्यों पूर्ति सदा इसी प्रकार सम्भव होती रही है। साधनों में श्रद्धा उत्पन्न करने की सामर्थ्य नहीं है। साधन सम्पन्न दृश्य खड़े करने और हलचलों को चलचित्रों जैसा प्रतिबिम्ब भर खड़ा कर सकते हैं। मात्र साधनों से विनिर्मित प्रयास लोगों को आकर्षित चमत्कृत तो करते हैं पर अनुकरण की प्रेरणा नहीं देते। यही कारण है कि धनिकों, कलाकारों, विद्वानों प्रचारकों द्वारा खड़े किये गये अभियान आन्दोलन अपनी उछल कूद का परिचय तो देते हैं पर कोई ठोस कार्य कर सकने में सफल नहीं होते। जहाँ तक मनुष्यों को दिशा धारा देने का प्रश्न है उनकी अन्तःस्थिति में उत्कृष्टता, अभिवर्धन का प्रश्न है वहाँ तक एक ही उपाय कारगर होता है.......श्रद्धा सिक्त व्यक्तित्वों का अनुकरणीय आचरण और साधन श्रद्धा के बिना और किसी प्रकार बन नहीं पड़ता श्रद्धा साधनों के अभाव में भी अपना चमत्कार प्रस्तुत करती है जब कि साधनों की प्रशंसा तक ही सीमित रहना पड़ता है वे श्रद्धा की संचार कर सकने में सदा असफल ही बने रहते हैं।
युग परिवर्तन बड़ा काम है लोक मानस को अवाँछनीयता से विरत करके उत्कृष्टता के प्रति भावविभोर हो उठने की स्थिति को समष्टि व्यक्तित्व का कायाकल्प ही कहा जा सकता है। यह बड़ा काम है इसके लिए बड़ी शक्ति चाहिए। चेतना को प्रभावित करने वाली शक्ति एक मात्र श्रद्धा ही है। इसी को गँवा बैठने से अपने समय को दुर्दशा ग्रस्त होना पड़ा है। इसी अभाव के कारण साधनों की बहुलता भी सुख शान्ति को बनाए रहने तक में सफल नहीं हो पा रही है। समस्याओं और विपत्तियों का तथ्य मूल कारण आस्था संकट के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। श्रद्धा का संवर्धन ही प्रकारान्तर से नव युग का सतयुग का अवतरण है। सूर्य की किरणें पहले पहाड़ की चोटी पर दिखाई देती हैं पीछे नीचे उतर कर समस्त भूतल को आलोक प्रदान करती हैं। प्रज्ञावतार का प्रभाव सबसे पहले जागृत आत्माओं पर चमकेगा, तदुपरान्त जन-साधारण को उस दिव्य अनुदान से लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा।
नग्नो मुण्डः कपालेन। भक्षार्क्षी क्षुत्पिपासितः। अन्धः शत्रुकुलं गच्छेद्यः साक्ष्यमनृतं वदेत्॥17॥
वह व्यक्ति नग्न शरीर और मुण्डे सिर वाला होकर, कपाल लेकर भूखा प्यासा होकर भीख माँगता हुआ, अन्धा होकर शत्रु के कुल को प्राप्त होता है जो झूठी गवाही देता है॥17॥
अश्रद्धा अर्थात् आदर्शवादिता की अवमानना। अन्ध श्रद्धा अर्थात् व्यक्तियों, क्रियाओं या देवदूतों की विलक्षणता में आशक्ति। श्रद्धा अर्थात् उत्कृष्टता की सर्वोपरि उपलब्धि के रूप में अवधारणा। इस व्याख्या को समझ लेने पर उनकी लाभ-हानि का अनुमान लगा सकना भी सम्भव होता है। आदर्शों की अवमानना का अर्थ है- उस रिक्तता का पशु प्रवृत्तियों से भरना। जो भला नहीं होगा उसे बुरा होना चाहिए। जब दिन नहीं होता तब रात रहती है। अन्धकार और प्रकाश की मध्यवर्ती और कोई रेखा नहीं है। अश्रद्धा की प्रतिक्रिया चिन्तन की भ्रष्टता और आचरण की दुष्टता भयावह रूप धारण करती और श्मशान में होने वाले प्रेत पिशाचों के नृत्य जैसा जीवन क्रम एवं वातावरण विनिर्मित करती है। धर्म क्षेत्र में घुसी हुई विकृतियों तथा बुद्धिवाद के नाम पर पनपी भ्रान्तियों ने इन दिनों अश्रद्धा की भावनात्मक अराजकता उत्पन्न की है। परिणाम सामने है। मनुष्य क्रमशः नरपशु, नरकीटक, नर पिशाच बनता और पतन के गर्त में गिरता चला जा रहा है।
अन्ध श्रद्धा ने भ्राँतियों के जंजाल में चिन्तन को उलझाया और कष्टकारण भूलभुलैयों में भटकाया है। भोले भावुक व्यक्तियों का चतुर लोग अन्धश्रद्धा के रस्से बाँधकर की अनुपयुक्त मान्यताओं के गर्त में धकेलते हैं। निहित स्वार्थों का व्यवसाय अन्धश्रद्धा की अन्धेर नगरी में जिस सफलता के साथ चलता है उतना अन्यत्र कहीं नहीं। भीरुता और बौद्धिक अपंगता मिलकर एक ऐसा दलदल प्रस्तुत करती है जिसमें जादू-टोना, देवभूत ज्योतिष से लेकर सामाजिक कुरीतियों जैसी विकृतियाँ ही पल्ले पड़ती हैं। तथा कथित प्रगतिशीलता अश्रद्धा में और पिछड़ी मनःस्थिति अन्ध श्रद्धा में भटकती है। आस्था संकट इन्हीं दोनों के समन्वय का नाम है। चेतना की क्षमता को अनर्थ में धकेलने और निरर्थक बनाने की दुरभिसंधि इन दोनों ने ही मिलकर रची है। भटकी और बौराई मनुष्य जाति को इन्हीं दोनों के अभिशाप सहने पड़ रहे हैं।
प्रज्ञा युग में श्रद्धा को मानवी अन्तरात्मा में प्रतिष्ठित होने का अवसर मिलेगा। इन उपलब्धियों से जो जितना सम्पन्न होगा उसे उसी अनुपात में अपने दृष्टिकोण एवं आचरण का स्तर ऊँचा उठाने को सुअवसर प्राप्त होगा। कहना न होगा कि इसी सौभाग्य के सहारे व्यक्तित्व में प्रखरता उत्पन्न होती है और भौतिक सफलताओं से लेकर आत्मिक विभूतियों की अनेकानेक सुसम्पन्नताऐं उपलब्ध होती हैं। आत्मकल्याण और लोक कल्याण के दोनों ही जीवन-लाभ मात्र श्रद्धालु ही प्राप्त करते हैं।
श्रद्धालु अपने को आत्मा मानता है और उसके सन्तोष एवं कल्याण के लाभ को प्रमुखता देता है। शरीर उसे मात्र वाहन, उपकरण प्रतीत होता है। अतएव उसके भरण-पोषण का समुचित ध्यान रखते हुए भी शरीराध्याय की कीचड़ में कृमि-कीटकों की तरह आत्म सात नहीं करता। इन्द्रियों की अनुभूति क्षमता से जीवनचर्या में सहयोग तो लेता है पर ऐसी स्थिति नहीं आने देता कि इन्द्रियाँ ही अधिपति बन बैठें और उन्हीं की वासना तृप्ति के लिए शारीरिक मानसिक सन्तुलन ही नहीं नीति मर्यादा तक को गंवाना पड़े। श्रद्धालु मस्तिष्क की लगन काम में रहती है और उसे उच्छृंखल घोड़े जैसा आचरण नहीं करने देता। संग्रह की तृष्णा, बड़प्पन की अहंता, उपभोग की लिप्सा, परिजनों में आवश्यक आसक्ति, ईर्ष्या, द्वेष मद, मत्सर जैसी व्याधियाँ, दिशाहीन भटकने जैसी वितृष्णाएँ निरन्तर मानसिक सन्तुलन को अस्त-व्यस्त करती रहती हैं। उद्विग्नता की अनेकानेक परतें मनःक्षेत्र को विक्षुब्ध बनाये रहती हैं। तनाव और खीज से विकृत हुआ मुख मण्डल कितनी ही चमड़ी की सुन्दरता रहते हुए विद्रूप और कुरूप लगता रहता है। यह स्थिति शारीरिक रुग्णताओं का पहाड़ टूट पड़ने से भी अधिक दुःखदायी होती है। इसका समग्र उपचार, उन्मूलन, निराकरण श्रद्धा की रामबाण औषधि ही कर सकती है। गुण ग्राहकता, सौंदर्य दृष्टि, विधायक चिन्तन, उदार आत्मीयता, अभिनेता जैसी मनःस्थिति बन जाने पर हर परिस्थिति में जी हलका रखा जा सकता है। ऐसा हलका मन रहने पर ही गुत्थियों के समाधान और प्रगति के निर्धारण सही रूप में सम्भव हो सकते हैं। कहना न होगा कि सौजन्य और सौमनस्य श्रद्धा तत्व के ही दो प्रतिफल हैं। मनीषी प्रकारान्तर से श्रद्धालु को ही कहते हैं। विवेक मात्र उन्हीं के मस्तिष्क में रहता है। दृष्टा एवं तत्वदर्शी उन्हीं को कहा जाता है।
श्रद्धा, संयम और अनुशासन द्वारा शरीर को स्वस्थ और दीर्घ जीवन प्रदान करती है। श्रद्धा में सद्विचारणा और सद्भावना का अभ्यास होता है। फलतः सामान्य स्तर का मस्तिष्क भी ऋषिकल्प मेधा का भरा रहता है। वे चन्दन की तरह महकते और वातावरण को शीतल सुव्यवस्थित बनाये रहते हैं। चिन्तन की उपयुक्त दिशा धारा मिलने से उनकी क्रियाधारा उत्कृष्टता की ओर प्रवाहित होती है। इसका परिणाम उस स्तर की सफलता बनकर सामने आता है जिसे सामान्यतया वरदान या चमत्कार की संज्ञा दी जाती है।
श्रद्धा की परिणित आत्मीयता और सुव्यवस्था में होती है। परिवारों का आनन्द और उत्साह, सहयोग और सौजन्य इसी मनःस्थिति में सम्भव रहता है। ऐसा वातावरण जिन कुटुम्बों में रहेगा उन्हीं में श्रेष्ठ नागरिक और नव रत्न पैदा होते हैं। धन से विलासिता और वैभव के साधन बन सकते हैं, पर उसमें उद्धत अहंकार का पोषण होने के अतिरिक्त और कुछ बनता नहीं, ऐसी सड़न में विकृत व्यक्तित्व ही जन्मते और पलते हैं। ऐसे कुटुम्ब बाहर से एक बाड़े में रहने की तरह इकट्ठे भले ही दीखें पर पारस्परिक स्वभाव और उपयुक्त वातावरण के अभाव में दुरभिसंधियाँ ही पनपती हैं। ऐसे कुटुम्ब पालने की अपेक्षा एकाकी रहने वाले अपेक्षाकृत अधिक सुखी रह सकते हैं।
श्रद्धा ही वह तत्व है जो छोटे कुटुम्बों को आत्मीयता के सूत्र में बाँधता है और विवेक उल्लास के साथ गरीबी में भी अमीरों से कहीं अधिक सन्तोष प्रदान करता है। पति पत्नी के बीच, भाई बहिन के बीच, अभिभावक संरक्षकों के बीच जो आत्मीयता और उदार सेवा साधना की भाव सम्वेदनाऐं मचलती रहती हैं उन्हीं पर कुटुम्ब का आनन्द और उत्थान टिका हुआ है श्रद्धा तत्व हटा देने के बाद कुटुम्बियों के बीच आपाधापी, खींचतान, उठक-पटक, रोष प्रतिशोध, घृणा ईर्ष्या के अतिरिक्त और कुछ बचता ही नहीं। ऐसे कुटुम्बों को प्रतिदिन अनुभव में आने वाला तरक ही माना जायेगा। परिवार संस्था की गरिमा श्रद्धा सद्भावना के अतिरिक्त किसी प्रकार न तो स्थिर रह सकती है और न बढ़ सकती है।
धन दुधारी तलवार है। उसका सदुपयोग बन बड़े तो व्यक्ति का भी कल्याण है और समाज का भी। दुरुपयोग होने लगे तो बढ़ी हुई सम्पदा के कारण उससे हर प्रकार हानि ही हानि होती है। दुर्व्यसन बढ़ने दुर्गुण पनपने और कुकृत्य बन पड़ने में दुर्जनों का आर्थिक सुविधा सम्पन्न होना भी एक बड़ा कारण है। धन एक शक्ति है। दुर्बुद्धि के हाथों उसका उपयोग अनाचरण एवं विनाश के लिए ही हो सकता है श्रद्धा तत्व अन्तःकरण में रहने पर धन के उपार्जन और उपयोग में पूरी-पूरी सावधानी बरतनी होती है। कठोर परिश्रम के द्वारा ईमानदारी के साथ मात्र उपयोगी कार्य करके ही आजीविका कमाई जाय, यह दृष्टि सर्व प्रधान है। इस प्रकार यदि स्वल्प उपार्जन होता है तो इतने में ही काम चलाने की तैयारी आरम्भ से ही करली जाती है। इसका एक मात्र उपाय है ब्राह्मण जीवन, सादगी का निर्वाह औसत भारतीय के स्तर पर गुजारा करने में गर्व गौरव की अनुभूति। मितव्ययिता, सादगी, श्रमशीलता और ईमानदारी इन चारों का समन्वय हीं अर्थक्षेत्र में श्रद्धा का समन्वय है। ऐसे श्रद्धालु व्यक्ति न तो ठाटबाट बनाते है न सन्तान की संख्या बढ़ाकर अनावश्यक भार बहन करने की मूर्खता बरतते हैं। योग्यता बढ़ाने, मनोयोग पूर्वक श्रम करने की मितव्ययिता बरतने की नीति अपना लेने पर किसी को भी आर्थिक तंगी नहीं भुगतनी पड़ती। ऋण लेने, याचना करने अथवा कुकृत्यों पर उतारू होने की उन्हें आवश्यकता ही नहीं पड़ती। ऐसे लोग सीमित आजीविका रहने पर भी यथा सम्भव दूसरों की मदद कर सकते हैं। कृपणता तो लोभ और मोह की मात्रा बढ़ जाने संग्रह एवं उपभोग की महत्वाकाँक्षा अनियन्त्रित हो जाने पर ही अनीति उपार्जन क सिलसिला चलता है। सौम्य निर्वाह भर के साधनों में सन्तुष्ट रहने वाला न तो दरिद्र होता है न दुर्व्यसनी, न कुमार्गी। धन की औचित्य मर्यादा का निर्वाह महत्वपूर्ण है। संग्रह क परिमाण नहीं। उपार्जन उपयोग में ही न लगे वरन् उसमें पिछड़ेपन को दूर करने, असमर्थों को सहायता देने तथा सत्प्रवृत्तियों को सींचने का तथ्य भी सुनिश्चित रूप से जोड़ रखा जाय। खर्च की सामान्य मद में ही उदार दानशीलता को भी एक अनिवार्य आवश्यकता मानकर चला जाय। इन्हीं तथ्यों का समावेश अर्थ क्षेत्र में प्रयुक्त होने वाली श्रद्धा का रहता है। प्रज्ञावतरण की प्रेरणा अन्यान्य क्षेत्रों की तरह अर्थ क्षेत्र में भी श्रद्धा का समन्वय करने की रहेगी। फलतः अनेक दुष्प्रवृत्तियों की जननी दरिद्रता और उद्धतता का कहीं कोई अस्तित्व ही न रह जायेगा।
सामाजिक क्षेत्र की बुराइयाँ, कुरीतियाँ, अनैतिकतायें, मूढ़ मान्यतायें प्रकारान्तर से व्यक्तियों में भरी हुई निजी निकृष्टताओं का सामूहिक प्रदर्शन मात्र है। समाज का अलग से कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं। मनुष्यों की सामूहिकता ही समाज है। श्रेष्ठ नागरिकों के बिना समुन्नत समाज बन ही नहीं सकता। प्राचीन काल में पंचायतें समाज व्यवस्था बनाती थी। आजकल सारी शक्ति सिमटकर शासन के हाथ में चली गई हैं। पंचायतें भी मुकदमा निपटाने अथवा सफाई जैसी छुट-पुट व्यवस्था बनाने में सीमित हो गई। शासन के कानून अपराधों को रोकने भर के लिए बने हैं। सत्परम्पराओं का प्रचलन करने की न तो उसमें आकाँक्षा रह गई है और न सामर्थ्य। सुरक्षा, शिक्षा चिकित्सा, उद्योग, परिवहन जैसे कार्यों की साज संभाल ही उसके काबू से बाहर होती जा रही है। सहकारिता को उद्योगों में समाविष्ट करने तथा नीति शिक्षा को पुस्तकीय पाठ्यक्रम में जोड़ने, रेडियो, टेलीविजन आदि पर कुछ प्रचार कर देने जैसे बाल प्रयास ही शासन के द्वारा वर्तमान स्थिति में बन सकते हैं। पंचायतें भी शासन का अंग भर रह गई हैं और भौतिक प्रयोजनों की ही यत्किंचित देखभाल कर पाती हैं। समाज व्यवस्था लड़खड़ाने का कारण ऐसे तन्त्र का अभाव है जो जन-समुदाय में आदर्शवादी आस्थाओं को उभार सके। साथ ही ऐसा वातावरण भी बना सके जिसमें दुष्प्रवृत्तियों को सहन करने तथा समर्थन देने वालों को लोकमत का तिरस्कार भाजन बनना पड़े। न्याय और औचित्य का समर्थन अनीति एवं उच्छृंखलता का मान-मर्दन करने की प्रखरता जन-जन में उत्पन्न होने पर ही स्वस्थ समाज की संरचना हो सकती है। श्रेष्ठ प्रचलनों की, सत्परम्पराओं की प्रतिष्ठा तभी सम्भव है जब व्यक्ति को निजी जीवन में आदर्शवादिता अपनाने की उत्कृष्ट श्रद्धा बनी रहे। इसके अभाव में वह अपने पापों पर पर्दा डालेगा। अवाँछनीय तत्वों का प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन करेगा तथा हेय परम्पराओं से जूझने के स्थान पर उनके समर्थन का ही उपक्रम करता रहेगा।
वस्तुस्थिति समझ लेने के उपरान्त समाज की एक ऐसी सम्भावना आवश्यक हो जाती है जो सामाजिक प्रचलनों ओर वैयक्तिक आदर्शों को उत्कृष्टता की दिशा में उछाल सके अनौचित्य के विरुद्ध असहयोग एवं विरोध का वातावरण बना सके ऐसा समाज, अध्यात्म दर्शन एवं धर्म प्रचलन जैसे उच्चस्तरीय आदर्शों के लिए बने संगठनों द्वारा ही विनिर्मित हो सकता है। जो व्यक्ति के अन्तराल को स्पर्श करेगा जो उस मर्म स्थल में सदाशयता का बीजारोपण कर सकेगा, उसी के लिए देव समाज की कल्पना कर सकना और तदनुरूप ढाँचा खड़ा कर सकना सम्भव होगा। समाज में सत्परम्पराओं का प्रचलन सृजन पक्ष है और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन निषेध पक्ष दोनों को मिलाने से ही समग्रता बनती है। धर्म तन्त्र का संगठन ऐसा होना चाहिए जो व्यक्ति और समाज के अन्तराल को झकझोरने में उत्कृष्टता के ढाँचे में ढाल सकने में भावना और क्रिया को साथ लेकर चल सके।
व्यक्ति और समाज में धर्म धारणा का बहुत बड़ा स्थान है। मनुष्य के आदिम प्रयत्नों से लेकर आधुनिकतम प्रतिपादनों में धर्म तत्व का समावेश सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप होता रहा है। यह आत्मा की आवश्यकता और अन्तःकरण की पुकार है। इसका दमन न तो बुद्धिवाद कर सकता है, न प्रत्यक्षवाद न उपयोगितावाद, धर्म की, कर्तव्य की, उत्कृष्टता की आवश्यकता ईश्वरवादी अनीश्वरवादी सभी को समान रूप से अनुभव होती है। अस्तु नवयुग की साज सज्जा में धर्म धारण को प्रमुखता देने से ही काम चलेगा। देव समाज की परिकल्पना को मूर्तिमान करने में धर्म तन्त्र की पवित्रता प्रखरता और संगठनों के तीनों ही पक्ष उच्चस्तरीय बनाये जाने चाहिये। जिस दिन इस आवश्यकता को गम्भीरता पूर्वक समझा जायेगा और उसके लिए भावभरी तत्परता का उपयोग किया जायेगा, उसी दिन से उज्ज्वल भविष्य का सुनिश्चित आरम्भ हो जायेगा।
मोटी दृष्टि से अनेकों समस्यायें और विपत्तियाँ व्यक्ति एवं समाज के सम्मुख खड़ी दीखती हैं। वे परिस्थिति जन्य प्रतीत होती हैं। फलतः उनके उपाय भी उसी स्तर के होते रहते हैं। गरीबी, अशिक्षा, बीमारी, अपराध, विग्रह, आक्रमण जैसे बड़े कारण ही लोक नेताओं के मस्तिष्क पर छाये रहते हैं। वे उनके निराकरण का उपाय साधनों की सहायता से खोज निकालने का प्रयत्न करते हैं। राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्रों की सारी शक्ति सरकारों के हाथ में केन्द्रित है। अस्तु उस मंच को हथियाने अथवा उसी आधार पर गुत्थियों को सुलझाने में मूर्धन्य वर्ग का सारा ध्यान और प्रयास केन्द्री भूत बना रहता है। गुत्थियों को सुलझाने की वर्तमान पद्धति यही है। स्थूल दृष्टि उसमें अधिक न तो कुछ सोच सकती है और न कुछ कर ही सकती है। जो हो रहा है, होता रहा है वह कम नहीं है पर गुत्थियां सुलझाने के स्थान पर उलझती ही जा रही हैं। एक छेद सीने को काम पूरा नहीं हो पाता कि दस नये छेद नये सिरे से उभरते सामने आ खड़े होते हैं। यह क्रम चिरकाल से चल रहा है। बार-बार परखा अपनाया जाता है। फिर भी निराशा के और व्यग्रता बढ़ने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।
उपाय आज खोजा जाय या हजार वर्ष बाद प्रयत्न आज किया जाय या हजार वर्ष बाद। इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। व्यक्ति और समाज के सम्मुख खड़ी हुई अनेकानेक समस्याओं, विपत्तियों और विभीषिकाओं का हल निकलेगा तभी तब मानवी अन्तःकरण में उत्कृष्ट आस्थाओं के बीजारोपण तथा परिपोषण का प्रयास युद्ध स्तरीय तत्परता के साथ आरम्भ होगा। इसके लिए न राजनीति से काम चलेगा न अर्थ तन्त्र के बलबूते कुछ ठीक काम हो सकेगा। उसे मात्र धर्म तन्त्र ही कर सकता है। आज धर्म का कलेवर उपहासास्पद और विद्रूप हो गया है, यह ठीक है। किन्तु यह भी ठीक है कि इसी को परिष्कृत, प्रखर एवं सुनियोजित बनाने पर भावनात्मक नव निर्माण करने के अतिरिक्त और कोई उपाय है नहीं। सम्पदा को अर्थ तन्त्र, शरीर को चिकित्सा तन्त्र, मस्तिष्क को शिक्षा तन्त्र व्यवस्था को शासन तन्त्र प्रभावित कर सकता है, परन्तु अन्तःकरण को प्रभावित करने की क्षमता धर्मतन्त्र के अतिरिक्त और किसी में भी है नहीं। टूटे को सुधारा जाय तो उसे नये सिरे से ढाला जाय यह तकनीकी प्रश्न है। मूल तथ्य जहाँ का तहाँ रहता है कि विपत्तियों से छुटकारा पाने और उज्ज्वल भविष्य को मूर्तिमान करने में धर्मतन्त्र की सहायता लिये बिना काम किसी भी प्रकार नहीं चल सकता। बहस शब्द की नहीं विवेचना तथ्य की है। किसी को धर्म अध्यात्म से चिढ़ हो तो उनको सन्तुष्ट कराने वाले शब्द दूसरे शब्दकोष में ढूँढ़ निकाले जा सकते हैं। पर करना यह होगा कि व्यक्ति एवं समाज की अनेकानेक दिशाधाराओं को प्रभावित करने वाले अन्तःकरण की उत्कृष्टता को सम्पदा से सुसम्पन्न बनाया जाय। मानवी संस्कृति के अवमूल्यन का अन्त किया जाय। श्रद्धा और विवेक के समन्वय को दृष्टिकोण को आधारभूत तथ्य बनाया जाय।
प्रज्ञावतार का प्रयोजन यही है। उसका कार्यक्षेत्र जन-जन की आस्थाओं की अध्यात्म के आधार पर और आदतों को धर्म धारणा के सहारे परिष्कृत करना है। उत्कृष्टता के प्रति श्रद्धा संवर्धन उसका प्रधान कार्यक्रम है। यह गतिचक्र जितनी तेजी से परिभ्रमण करेगा नवयुग के दिव्य दर्शन की पुण्य बेला उतनी ही समीप आती चली जायेगी।
सम्पत्ति बढ़नी चाहिए और गरीबी का पूर्णतया अन्त होना चाहिए किन्तु यदि न बढ़ सके और जो है उसी को मिल बाँटकर खाने की नीति अपना ली जाय तो उतने से भी निर्वाह भली प्रकार हो सकता है। शिक्षा बढ़नी चाहिए अशिक्षित एक भी न रहना चाहिए किन्तु यदि वर्तमान शिक्षित अपने शिक्षित होने का लाभ अपने को तथा अशिक्षितों को देने लगे तो इतने से भी काम चलता है। तब विद्या का अभाव किसी को अखरेगा नहीं। ज्ञान जहाँ भी संचित है उसका वितरण और उपयोग की सुविधा हर किसी को प्राप्त होने लगे तो प्राचीन काल का तरह थोड़े से सुविज्ञ व्यक्ति भी जन साधारण को विद्या का लाभ सुविधापूर्वक मिलता रह सकता है। थोड़े से किसान अन्न उगाते हैं पर पेट सभी का भरता है। यही प्रयोग बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भी चल सकता है। प्राचीन काल के ब्राह्मण ऐसा ही करते भी रहे हैं।
थोड़े से चिकित्सक जन-साधारण के स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं। थोड़े से प्रहरी राष्ट्र की सीमा रक्षा कर सकते हैं। थोड़ी-सी पुलिस अपराधियों से निपटती है। थोड़े से कलाकार व्यापक क्षेत्र में विनोद और उल्लास का वातावरण बनाये रहते हैं। थोड़े से साहित्यकार जन-समाज को दिशा दे सकते हैं। थोड़े से ऋषि अपने समय में शालीनता का स्तर बनाये रहते हैं। थोड़े से राजनेता समूचे देश की सर्वतोमुखी प्रगति की ओर अग्रसर करते हैं। थोड़े से वैज्ञानिक अपने आविष्कारों से परिस्थितियाँ ही उलट देते हैं। सभी लोग श्रेष्ठ समुन्नत हों प्रयत्न यही होना चाहिए, पर यदि उतना न बन पड़े तो मूर्धन्य वर्ग के थोड़े से लोग भी समूचे समाज को समुन्नत बनाये रह सकने में समर्थ हो सकते हैं। एक गृह पति भी आखिर पूरे परिवार के भरण पोषण का उत्तरदायित्व सम्भालता ही रहता है।
प्रज्ञावतार का आलोक समस्त भूमण्डल के प्रत्येक मनुष्य को उपलब्ध होगा। प्राणि जगत का प्रत्येक सदस्य मानवी शालीनता के माध्यम से अपेक्षाकृत अधिक शान्ति और व्यवस्था का लाभ प्राप्त करेगा। किन्तु उसका आरम्भ पर्वत शिखरों पर सर्वप्रथम दृष्टिगोचर होने वाली प्रभात किरणों का तरह होगा। जागृत आत्माओं का अन्तःकरण ऋतम्भरा प्रज्ञा की भाव सम्वेदनाओं से उमगता दिखाई देगा। उनकी विचारणा संकीर्ण स्वार्थपरता में आबद्ध रहने से इन्कार करेगी। अण्डा पकता है तो उसका छिलका टूटता ही है। चिन्तन का लोभ मोह की कृपणता में बंधे रहना ही भव बन्धन है। विशाल हृदय होना ही जीवन मुक्ति है। श्रद्धा जगेगी तो मनुष्य स्वार्थी नहीं रहेगा। उनका आत्म गौरव अहंता के परिपोषण से नहीं उदात्त आदर्शवादिता अपनाने से ही परितृप्त होगा। ऐसे लोगों की गतिविधियाँ पीड़ा और पतन के उन्मूलन में-सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन में ही लगी रहती है। निर्वाह में सन्तोष करने के ‘शम’ को जिनने हृदयंगम कर लिया उनके पास महान कार्य सम्पादन के लिए ढेरों समय, श्रम, चिन्तन बच जाता है। इस बचत पूँजी से वे समाज का, ईश्वर का अनुग्रह प्रचर परिमाण से प्राप्त कर सकते हैं। आत्म गौरव और आत्म सन्तोष को भी यदि महत्व मिलता हो तो श्रद्धासिक्त व्यक्ति को उसकी अनुभूति हर घड़ी होती रहती है।
अनास्था का विष घटने लगे और श्रद्धा का अमृत उमगने लगे तो फिर व्यक्तित्व की गरिमा गगनचुम्बी होती चलती है। ऐसे लोगों के द्वारा जो भी काम होते हैं वे अपनी विशिष्टता और सुन्दरता का परिचय देते रहते हैं। निजी जीवन में वे स्वस्थ, प्रसन्न, सन्तुलित, आशान्वित एवं निश्चिन्त पाये जाते हैं। कौटुम्बिक जीवन में सद्भावना, सहकारिता एवं सुव्यवस्था का वातावरण बना रहता है और छोटे घर घरौंदे स्वर्ग की प्रतिकृति प्रतीत होते रहते हैं। पारिवारिक जीवन में यों आवश्यकता तो सम्पन्नता और सुविधा की भी पड़ती है पर उसकी कमी भी सहन हो सकती है यदि शालीनता की कमी न पड़ने पाये। सम्पन्न परिवारों में भी दुरभि संधियाँ और दुर्भावनाएँ भरी रहती हैं जबकि विपन्नताजन्य कठिनाइयों का बाहुल्य रहते हुए भी स्नेह सौहार्द्र के सहारे हँसता हँसता जीवन सरलता पूर्वक जिया जा सकता है। इस रहस्य को श्रद्धासिक्त मनोभूमि ही समझने और अनुभव करने में समर्थ रहती है। अन्य लोग तो इस कर्म से अपरिचित रहने के लिए विपुल खर्च और कठिन श्रम करने पर भी पारिवारिक सद्भावना के लिए तरसते ही रहते हैं। पत्थर में भी प्रगति जगाने की क्षमता श्रद्धा में होती है। वह जग सके तो परस्पर स्वाभाविक स्वार्थ श्रृंखला में बंधे हुए परिजनों के बिखरने और विद्रूप रहने का कोई कारण ही नहीं रह जाता।
सजातियों को खींच बुलाने की क्षमता से मानवी अन्तःकरण सदा भरा पूरा रहा है। अपनी आकृति के तो नहीं पर प्रकृति के असंख्यों मनुष्य सहज की संपर्क में आते और सरलता पूर्वक घनिष्ठ होते चले जाते हैं। सामाजिक अव्यवस्था से त्रास तो सभी को मिलता है पर साधारणतया होता यही है कि अपनी निकृष्टता ही अन्य निकृष्ट व्यक्तियों में कस लेती और घनिष्ठ बनाती है। फलतः आग से घनिष्ठता बढ़ाने पर झुलसने का खतरा उठाने की तरह अनेकों दुष्परिणाम भुगतने पड़ते हैं। जमाना खराब होने की शिकायत आमतौर से ऐसे ही लोग करते हैं जिन्होंने संपर्क बढ़ाने साथी सहयोगी चुनने में उत्कृष्टता की कसौटी पर कसने की आवश्यकता नहीं समझी और निकृष्ट स्तर से बचने की सावधानी नहीं बरती है। सज्जनों को अपने स्तर के साथी ढूँढ़ने में भी अधिक कठिनाई नहीं होती है। ऐसा संपर्क निकटवर्ती न होने पर भी दूरस्थ रहने की स्थिति में भी सहायता करता रहता है यहाँ तक कि दिवंगत महामानवों के साहित्य और चरित्र से भी इतना लाभ उठाया जा सकता है जिनका निकटवर्ती सामान्य व्यक्ति बहुत घनिष्ठ रहने पर भी दे नहीं सकते। सत्संग कुसंग की महिमा सभी कहते और मानते हैं पर यह भूल जाते है कि सौभाग्य दुर्भाग्य किसी पर अनायास आकाश से नहीं टपकता, आग्रह, अनुरोध एवं प्रयत्न करने पर ही उपलब्ध होता है। मनःस्थिति ही परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी होती है और सुनिश्चित तथ्य को अमान्य ठहराने की बिलकुल भी गुंजाइश नहीं है। श्रद्धालु के सगे सम्बन्धी सज्जन ही हो सकते हैं। अन्य प्रकार के या तो निकटस्थ होते ही नहीं; यदि किसी प्रकार हो भी जायँ तो वे देर तक साथ नहीं रहते। श्रद्धा ही स्वर्गीय वातावरण का सृजन करती है और इससे पहले सज्जनों का समुदाय अपने इर्द गिर्द जमा कर लेती है।
दूसरों की दृष्टि में किसी व्यक्ति के प्रति आकर्षण तो अनेक आधारों पर हो सकता है पर उसके प्रति सघन सम्मान का एक ही आधार है-चरित्र में प्रामाणिकता बनकर उछलने वाली आदर्शवादी श्रद्धा। यही है किसी व्यक्ति का सबसे बड़ा वैभव जिससे प्रभावित होकर लोग पूरा और पक्का विश्वास करते तथा सघन सहयोग प्रदान करते हैं। महामानवों की चमत्कारी सफलताओं, का प्रधान कारण उन्हें उपलब्ध हुआ जन-सहयोग ही है। आरम्भ में परीक्षाकाल में श्रेष्ठ व्यक्ति को अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए कई प्रकार के अवरोधों का सामना करना पड़ता है। यही वह कसौटी है जिस पर किसी की आदर्शवादी श्रद्धा को कसा परखा जाता है। इसके बिना झूठे सच्चे का-नकली असली का भेद भी तो स्पष्ट नहीं हो सकता। जब कोई व्यक्ति लोभ और भय के दबावों को स्वीकार करके अपनी उत्कृष्टता पर अडिग बना रहता है तो जनसाधारण को वास्तविकता स्वीकार करनी पड़ती है। यही वह परिपक्वावस्था है जिसमें जन सम्मान और जन सहयोग का उदार अनुदान अजस्र रूप से प्राप्त होने लगता है। जन नेतृत्व करने वाले इतिहास के पृष्ठों पर अपने पद चिन्ह छोड़ जाने वाले उच्चस्तरीय सफलताएँ पाने वाले व्यक्तित्वों में अन्य क्षमताएँ तो सामान्य मनुष्यों जितनी होती हैं पर जो असाधारण विशिष्टता पाई जाती है वह एक ही होती है-आदर्शों के प्रति अडिग श्रद्धा। भावना स्तर पर जो सुदृढ़ है। मात्र उन्हीं के लिए अनुकरणीय चरित्र पर अन्त तक सुदृढ़ बने रहना सम्भव होता है। उथले उत्साह वालों के कुछ ही समय में आदर्शवादिता का जोश ठण्डा हो जाता है और वे फिर पुराने ढर्रे पर लौटकर गये बीते स्तर का निर्वाह करने लगते हैं।
लौकिक विशेषताएँ चमत्कृत करती तो है पर वह मात्र आकर्षण होता है। बल, रूप, धन, चातुर्य, कला, कौशल, प्रतिभा प्रभाव आदि से जनसाधारण का आकर्षण भर होता है पर वह अन्तःकरण की गहराई से निकलने वाला वह सम्मान प्राप्त नहीं होता जो महामानवों को देव पुरुषों को उपलब्ध होता है। नर्तकों, विदूषकों, गायकों, धनिकों, विद्वानों की ओर ध्यान भर जाता है और उनकी विशिष्टता देखकर मनोरंजन भी होता है। आकर्षण की परिधि इतनी ही उथली रह जाती है। मनुष्य की आन्तरिक इच्छा जन-सम्मान पाने की रहती है और उचित भी है और आवश्यक भी किन्तु इसका मूल्य आदर्शवादी श्रद्धा से भरा पूरा आचरण ही हो सकता है। इससे कम में उसे खरीदा नहीं जा सकता। उथली वाहवाही तो विदूषक भी प्राप्त कर सकते हैं। ख्याति प्राप्त करने में ही बहुत बार छद्म भी सफल हो जाता है। आततायी भी लोक चर्चा का विषय बन जाते हैं। इतने से किसी को न तो सन्तोष होता है और न कोई महत्वपूर्ण सहयोग मिलता है। सरकस में काम करने वाले नटों का करतब देखकर हैरत भी होती है और तालियाँ भी बजती हैं किन्तु किसी नट के संकट में फँस जाने पर उसकी सहायता के लिए कोई नहीं आता। स्मारक अभिनेताओं के नहीं उन लोक नेताओं के बनते हैं जिन्होंने उत्कृष्ट कर्तृत्वों के लिए बढ़ चढ़कर आत्म दान देने की भाव श्रद्धा का परिचय दिया। धन्य ऐसे ही व्यक्ति होते हैं। लोक मानस को दिशा प्रदान करने में मात्र ऐसे ही लोगों की चिरस्थायी भूमिका रहती है।
भौतिक उपलब्धियाँ प्राप्त करने में कई बार अनीति अपनाने वाले भी सफल होते देखे गये हैं; पर वह चिरस्थायी नहीं होतीं। वस्तुस्थिति विदित होते ही लोग सावधान हो जाते हैं और किनारा करने लगते हैं। उपेक्षा, अवज्ञा और असहयोग का दौर आरम्भ होता है और अनीति से प्राप्त सफलता घृणा तिरस्कार से आरम्भ होगी विरोध, संघर्ष और दमन प्रतिशोध तक जा पहुँचती है। ऐसी दशा में अनीति की पगडंडी से जो जितनी जल्दी पाया गया वह तिरोहित भी उतनी ही तीव्र गति से हो जाता है। चिरस्थायी और उच्चस्तरीय सफलताएँ मात्र प्रामाणिक लोगों को ही मिलती है। सहयोग का हाथ बढ़ाने से पहले हर आदमी सोचता है कि सम्बन्ध उन्हीं के साथ सघन किये जाने चाहिए जिनके साथ खतरा न हो। यारवासी तो आवारागर्दी लोगों के बीच भी हो जाती है, पर न तो गहरी होती है, न स्थायी न फलवती। गोटी बिठाने में शतरंज की चाल ही इस उथली दोस्ती के सहारे चली जा सकती है। जड़ न होने के कारण उसके उखड़ने और बिखरने में भी देर नहीं लगती। कई बार तो ऐसी यारी जानी दुश्मनी तक में बदलती देखी गई है। जमाने का दौर दोस्ती की आड़ में दुश्मनी निभाने का है। समाधान कारक यश उथले तरीकों से नहीं प्रामाणिक एवं उदार चरित्र निष्ठा के आधार पर ही मिल सकता है। भौतिक वैभव उपार्जन करने की बात मन में हो तो भी बड़ी उपलब्धियों के लिए प्रामाणिकता और विश्वासनीयता सिद्ध करने के अतिरिक्त जन सहयोग पाने और महत्वपूर्ण सफलताएँ पाने का और कोई रास्ता नहीं है।
अतीन्द्रिय क्षमताएँ-सिद्धियाँ-उपार्जित करने में उथले कर्मकाण्ड सफल नहीं हो सकते। साधनों के पीछे श्रद्धा की शक्ति ही काम करती है। उसका अभाव रहने पर कर्मकाण्डों की रटन लकीर पीटने जैसी उपहासास्पद ही बनकर रह जाती है। उससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। अध्यात्म क्षेत्र की सिद्ध पुरुषों में से प्रत्येक को अन्तःभूमिका श्रद्धासिक्त होती है। स्वर्ग, मुक्ति, आत्म साक्षात्कार, ईश्वर दर्शन जैसी दिव्य सफलताओं के लिए किसी कृत्य विशेष का आश्रय लेने से काम नहीं चलता। उसके मूल में श्रद्धा की शक्ति ही काम करती है। इस उत्कृष्टता के रहते सामान्य से क्रिया-कृत्य भी योग साधना एवं तपश्चर्या का प्रतिफल प्रस्तुत करते हैं किन्तु यदि भीतर नीरसता छाई हो-भाव सम्वेदनाएँ प्रसुप्त पड़ी हों-तो कितना ही काय कष्ट सहने तथा जप तप करने से भी कुछ बनता नहीं है। क्षेत्र चाहे भौतिक सफलताओं का हो चाहे आत्मिक विभूतियों का-हर हालत में श्रद्धा की सघनता अपेक्षित होती है। उसके बिना लौकिक पुरुषार्थ भी उस स्तर के नहीं बन पड़ते जो बढ़ी-चढ़ी सफलताओं के लिए आवश्यक है। धुन के धनी, लगनशील, तन्मयता और तत्परता बरतने वाले स्वल्प साधनों और नगण्य सामर्थ्यों के रहते अनवरत प्रयत्नरत रहकर पर्वतों के शिखर पर जा पहुँचते हैं इसके विपरीत चंचल चित्त, अस्थिर मति, आस्था रहित मनःस्थिति के व्यक्ति प्रचुर साधनों के रहते, अपनी बढ़ी-चढ़ी क्षमता का भी कुछ लाभ नहीं उठा पाते।
श्रेष्ठ और सुदृढ़ व्यक्तित्व बाह्य साधनों से विनिर्मित नहीं हो सकता। अभ्यास और शिक्षण से उथला शिष्टाचार भर पल्ले पड़ता है। गहराई तो अन्तः श्रद्धा में होती है। पेड़ उतना ही ऊँचा उठता और उतना ही फलता फैलता है जितनी उसकी जड़ें गहरी और मोटी होती हैं। जड़ें दीखती नहीं, दृष्टिगोचर तना ही होता है। इतने पर भी तथ्य अपने स्थान पर यथावत् ही बना रहता है। उथली जड़ वाले पौधे न तो अधिक दिन जीवित रहते हैं और न प्रतिकूल ऋतु प्रभाव ही सहन कर सकते हैं। इसी प्रकार उथली मनःस्थिति के लोग पिछड़ी और उथली जिन्दगी ही जी पाते हैं। आत्म-सन्तोष, जन-सम्मान और दैवी अनुग्रह दे सकने जैसी कोई ठोस सम्पदा उनके पक्ष में होती ही नहीं। फिर मूल्य चुकाये बिना बड़ी उपलब्धियों का अर्जन आखिर हो किस प्रकार? व्यक्ति के अन्तराल में सन्निहित उसकी मूल भूत क्षमता एक ही श्रद्धा इसी को गवाने और बढ़ाने पर मनुष्य पतन के गर्त में गिरता और आकाश जितना ऊँचा उठता है।
नव युग में संसार का समाज का सारा ढाँचा बदल देने की योजना है। निकृष्टता के आवरण उघारे और उत्कृष्टता के आच्छादित चढ़ाये जाते हैं। परिस्थितियाँ बदलने के लिए प्रबल पुरुषार्थ की आवश्यकता है उसका निर्झर अन्तराल के मर्मस्थल के भाव श्रद्धा के रूप में फूटता है।
परिवर्तन शब्द कहने और सुनने में सरल है। वह रुचिकर भी है और अभीष्ट भी। किन्तु कठिनाई एक ही है कि लगभग असम्भव नहीं तो अत्यधिक कष्टसाध्य उस कार्य को सम्पन्न करने के लिए न तो साधन जुटाने से काम चलता है और प्रयास परिश्रम के पहाड़ खड़े करने से। इसके लिए आदर्शवादी श्रद्धा को उथला नहीं गहरा स्तर चाहिए। यह न तो समाज में, न साधनों में, न श्रम में और न चातुर्य में सन्निहित है यह मणि-माणिक व्यक्तित्व के गहन अन्तराल में समुद्र की तली में पाई जाने वाली सम्पदा है। यही है समर्थता का वह भण्डार जो अनिवार्य उपकरणों की तरह प्रचुर परिमाण में उत्पन्न किया जाना चाहिए।
नवयुग को श्रद्धा युग कहा जायेगा। उसमें सम्पदा का नहीं-समर्थता का नहीं-श्रद्धा का मूल्याँकन है। इसी की मात्रा को नाप तौलकर किसी को क्षुद्र अथवा महान माना जायेगा। इसी सामर्थ्य के बलबूते मनुष्य इतने समर्थ होंगे कि पर्वत जैसी अवांछनियताओं को उलट सकने और स्वाति वर्षा जैसी सत्प्रवृत्तियों को नन्दन वन उगा सकना सम्भव हो सके। समर्थ व्यक्ति ही ऐसे पुरुषार्थ कर सकते हैं जिन्हें असम्भव को सम्भव कर दिखाने जैसा चमत्कार माना जा सके। ऐसा चमत्कारी मनुष्य एक ही हो सकता है-श्रद्धालु। कहा जा चुका है कि विवेक और श्रद्धा का समन्वय ऋतम्भरा प्रज्ञा है। वही गायत्री- ब्रह्मविद्या-अथवा संस्कृति की अन्तरात्मा है। इन दिनों उसी का अरुणोदय प्रज्ञावतार के रूप में हो रहा है। दूसरे शब्दों में इसे यों कहना चाहिए कि लोक मानस में विवेक युक्त श्रद्धा की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है। इसी विभूति से सम्पन्न मनुष्यों को प्राचीन काल की तरह देव मानव कहा जायेगा। उनका समुदाय और आदर्शवादी क्रिया-कलाप धरती पर स्वर्ग जैसी परिस्थितियों का सृजन करेगा। यही है नव युग का आधार तत्व जिसे परिमाण में बरसने के लिए कटिबद्ध हो रहा है। जो इस तथ्य और सत्य को देख समझ सकेंगे उन्हें नव युग को निकटतम देखने में कोई कठिनाई अनुभव न होगी।
चेतना निराकार है और प्रकृति साकार। चेतना का परिचय प्रकृति पदार्थों की हलचलों में देखा जा सकता है, पर उसकी मूल सत्ता आकार रहित ही होती है। अवतार एक प्रकार की चेतना ऊर्जा है जिसका प्रभाव सम्बद्ध पदार्थों के बढ़े हुए तापमान के रूप में देखा जा सकता है। गर्मी व्यापक होने के कारण उसका निजी स्वरूप इन्द्रियातीत ही रहता है। प्रज्ञावतार का प्रभाव न्यूनाधिक मात्रा में अनेकों दिव्य आत्माओं में उभरता हुआ देखा जा सकेगा, पर वह स्वयं प्राणियों या पदार्थों के रूप में आकारवान नहीं बन सकती है। प्रज्ञावतार का रूप देखना हो तो वह युगान्तरीय चेतना के रूप में ही देखा जा सकेगा। किसी व्यक्ति विशेष के रूप में उसे सीमाबद्ध नहीं किया जा सकता है। प्रज्ञा का जहाँ जितना उभार हो रहा हो समझना चाहिए कि वहाँ उतनी ही मात्रा में युग देव ने अपना परिचय एवं दर्शन देना आरम्भ कर दिया।
स्पष्ट है कि अपने युग का ‘असंतुलन’ आस्था संकट ने उत्पन्न किया है। इसलिए निवारण का केन्द्र बिन्दु भी वही होना चाहिए। इन दिनों ऐसा भावनात्मक प्रवाह जन-मानस में उत्पन्न होना है जिसके कारण यह प्रमाण परिचय मिलने लगे कि श्रद्धा तत्व की अभिवृद्धि का दौर चल पड़ा। आदर्शवादी गति विधियों का नया सूत्रपात हुआ। व्यावहारिक जीवन में आदर्शवादिता का समावेश कर सकना किन्हीं सन्त महन्तों का काम माना जाता था। इसके विपरीत प्रज्ञा का उभार उत्पन्न होने पर जन-जन में यह चेतना उत्पन्न होगी कि उसे अपने जीवन क्रम में श्रेष्ठता की अवधारण अधिकाधिक मात्रा में करना चाहिए इसके लिए वह इतना साहस सँजोयेगा कि संकीर्ण स्वार्थपरता के लिए समर्पित इच्छा और चेष्टा नये सिरे से समीक्षा करे और उसमें भरी हुई क्षुद्रता को हटाकर उस स्थान पर महानता की स्थापना के लिए कुछ कहने योग्य कदम बढ़ायें। यह परिवर्तन किसी बाहरी दबाव से नहीं, वरन् स्वतःप्रेरणा से होगा।
आमतौर से लोभ, मोह और अहंकार के दैत्य ही जनसाधारण को कठपुतली की तरह नचाते हैं। यही प्रभाव सर्वत्र चल रहा है। समर्थ, असमर्थ-धनी, निर्धन-शिक्षित अशिक्षित इन दिनों सभी अपने तुच्छ स्वार्थों की सिद्धि में बुरी तरह संलग्न हैं। लिप्सा और लालसा की कीचड़ में लोक चेतना गहराई तक धंसी हुई है। सामान्य प्रयत्नों से इसमें हेर-फेर होते दिखाई नहीं पड़ रहा है किन्तु प्रज्ञावतार की प्रेरणा नये आयाम प्रस्तुत करेगी। अन्तःप्रेरणा का उद्गम ही बदलने लगेगा। लोग अपना स्तर उत्कृष्टता की ओर उठाने और आदर्शवादिता की ओर बढ़ाने का प्रयत्न करेंगे। यह परिवर्तन बाहर से थोपा हुआ नहीं; भीतर से उभरा हुआ होगा। कहने सुनने को तो धर्म और अध्यात्म की-भक्ति और शान्ति की सज्जनता और उदारता की चर्चा आये दिन कहने, सुनने को मिलती रहती है। कइयों का विनोद विषय भी यही होता है। तथाकथित धर्म गुरु, लोक नेता, लेखक वक्ता उत्कृष्टता की चर्चा आयेदिन करते रहते हैं किन्तु उन प्रतिपादनों को क्रियान्वित करते इनमें से कोई विरले ही देखे जाते हैं। फिर सर्व साधारण के लिए तो उन्हें आचरण में उतारना और भी अधिक कठिन होता है। उदाहरण तो केवल समझाने के लिए प्रचार प्रक्रिया अपनाने के रूप में ही हो सकता है। सो हो भी रहा है लेखनी और वाणी से आदर्शवादिता का प्रतिपादन भी कम नहीं हो रहा है किन्तु सफलता इसलिए नहीं मिलती कि लोक चेतना की अन्तःस्थिति उसे स्वीकार ने और अपनाने को सहमत नहीं होती। कानों के सुनने या मस्तिष्क से समझने से काम बनता नहीं। व्यक्ति की स्थिति और कृति तो अन्तःप्रेरणा से ही बदलती है इन दिनों उसी क्षेत्र के ऊसर हो जाने से जो बोया जाता है वह निष्फल होकर रह जाता है। प्रज्ञावतार इस कठिनाई का समाधान करेगा। भीतर से ‘हिय हुलसने’ दिशा बदलने जैसी स्थिति उत्पन्न होगी। फलतः वह प्रयोजन सफलता पूर्वक पूरा होने लगेगा। जिसके आज प्रशिक्षण और दमन के सभी अस्त्र, शस्त्र निष्फल होते, निरर्थक जाते दीखते हैं।
अन्तःकरण मूर्क्षित पड़ा रहे तो उच्चस्तरीय भाव सम्वेदनाएँ उसमें से उठती ही नहीं। धर्म धारणा के बीजाँकुर जमते ही नहीं। यही है वह अपरिहार्य कठिनाई जिसके निराकरण का कोई मार्ग किसी को सूझता ही नहीं। मानवी प्रयास जहाँ असफल होते हैं वहाँ दैवी प्रयास बागडोर अपने हाथ में सम्भालते हैं। प्रज्ञावतार की प्रेरणा से यही कठिनाई हल होगी। लोग अपने भीतर कुछ नई उमँग उठती अनुभव करेंगे और देखेंगे कि उनका मस्तिष्क उत्कृष्टता में रुचि लेने लगा और शरीर ने सत्कर्मों में रस लेना आरम्भ कर दिया। युग परिवर्तन के बीजांकुर इसी रूप में फूटेंगे। शुभारंभ का अग्रगमन का श्रेय सदा सुसंस्कारी जागृत आत्माओं को मिलता है। सामान्य-जन क्रमशः उनके अनुगमन एवं अनुकरण का ही साहस समयानुसार सँजोते रहते हैं। सेनापति की तत्परता के उपरान्त ही सैनिकों को युद्ध मोर्चे की ओर बढ़ते देखा जाता है।
गुजारे के लिए औसत भारतीय स्तर का निर्वाह स्वीकार लेने के उपरान्त विलासिता और तृष्णाओं की वह आग बुझ जाती है जिसके लिए मनुष्य की क्षमता और प्रतिभा का सर्वनाश होता रहता है। संकीर्ण स्वार्थपरता के स्थान पर आत्मीयता की परिधि जितनी ही विस्तृत होती है उतना ही परमार्थ प्रयोजनों में रस आने लगता है। कृपणता और निष्ठुरता तो संकीर्णता की सहेलियाँ हैं जहाँ उदारता का उद्भव हुआ वहाँ लोभ और मोह के नागपाश से छुटकारा प्राप्त करना भी कठिन नहीं रहता। खाने में मजा तो कृमिकीटकों और पशु-पक्षियों को भी आता है। मनुष्य जीवन के साथ जुड़े हुए आनन्द की अनुभूति तो दूसरों को खिलाने से ही मिलती है। परमार्थ प्रयोजनों में सामान्य बुद्धि घाटा ही देखती है, किन्तु ऋतम्भरा प्रज्ञा का उदय होने पर प्रतीत होता है कि जीवन सम्पदा की सबसे बड़ी सार्थकता एक ही कार्य में है और वह है शालीनता के सम्वर्धन में किया गया पुरुषार्थ। त्याग बलिदान ऐसे ही अनुदानों को कहा जाता है।
प्रज्ञावतार द्वारा मानवी सत्ता को इसी स्तर के अनुष्ठानों से विभूतिवान बनने का अवसर मिलेगा। श्रम, समय और साधनों की सम्पदा का न्यूनतम अंश अपने लिए रखने की बात सोचेगा और अधिकतम को ईश्वरीय प्रयोजनों में सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन में नियोजित करने के लिए जब मनुष्य तत्पर होता है तो उसका स्तर देवोपम बनने में सन्देह नहीं रहता। अगले दिनों ऐसे ही देव मानवों की संख्या बढ़ेगी और अपने परम पुरुषार्थ इसी धरती को स्वर्गीय परिस्थितियों से परिपूर्ण करेगी। ऐसी आत्माएँ कुटुम्ब बढ़ाने की मूर्खता नहीं करेंगी पिछली पीढ़ी को अभिभावकों का ऋण चुकाने को ही पर्याप्त समझेंगे। नित नये बच्चे उत्पन्न करके सिर पर अनावश्यक बोझ लादना और उसी को ढोने में हड्डी; पसली निचोड़ देना उन्हें रुचेगा ही नहीं। हलके रहने के कारण वे अधिक परमार्थ कर लेते हैं जिसके पास परिवार है वे उनके प्रति उचित कर्त्तव्य का पालन करने भर से सन्तोष कर लेते हैं और युग धर्म के निर्वाह में कोई अड़चन उत्पन्न नहीं होने देते।
इन दिनों जागृत आत्माओं की संख्या कम है, पर जितनी भी कुछ है आरम्भ उसी से होना है। सबसे प्रथम उन्हीं को अभ्यास होगा और वे ही स्वतः प्रेरणा से प्रेरित होकर अपने आपको बदलने का साहस प्रदर्शित करेंगे। उनकी निजी आस्थाएँ उभरेंगी। फलतः क्षुद्रता प्रेरित गति विधियों में कटौती करने और उस बचत को महान प्रयोजनों में लगाने की नीति अपनाते दृष्टिगोचर होंगे। आत्म संयम ही परमार्थ बनता है इसलिए महामानव सदा ही व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षाओं में कटौती करते हैं। जो इतना कर सका वह दीखेगा कि परमार्थ प्रयोजनों में लगाने के लिए उसके पास श्रम, समय, मनोयोग एवं साधनों की तनिक भी कमी नहीं है। अच्छी स्थिति आने की प्रतीक्षा करने की बात उसे निस्सार प्रतीत होती है जो उपलब्ध है वह भी कम प्रतीत नहीं होता। उतने का ही सदुपयोग बन पड़े तो इतनी समर्थता उभरती है कि सामान्य व्यक्ति भी असामान्य एवं आश्चर्यजनक मात्रा में सदुद्देश्य की पूर्ति के लिए अपने कर्तृत्व का परिचय दे सके।
आत्म कल्याण और लोक कल्याण की गंगा-यमुना जहाँ भी मिलेगी वहाँ उस दिव्य संगम का एक ही रूप होगा। जन-जागरण के लिए अंशदान, श्रमदान, समय दान करने का भाव भरा उत्साह। यह जब आतुर होता है तो हजार कठिनाइयाँ रहने पर भी विरोध, असहयोग रहने पर भी एकाकी चल पड़ने की साहसिकता जगती है। इस अन्तःप्रेरणा को कोई बाहरी शक्ति रोक नहीं सकती है। बाहरी प्रलोभन झुका नहीं सकता। वाक् चातुरी एवं मोह ममता भी उसे फुसला सकने में समर्थ नहीं हो सकती। धनुष से छूटा हुआ तीर लक्ष्य तक पहुँच कर ही रुकता है। जागृत आत्माएँ युगान्तरीय चेतना से अनुप्राणित होकर जब प्रज्ञावतार की सहचरी बनती है तो फिर उन्हें सोते जागते एक ही लक्ष्य अर्जुन की मछली की तरह दीखता है। जन मानस का परिष्कार ही अपने युग का सबसे महत्वपूर्ण काम है। आस्थाओं का पुनर्जीवन यही है। ज्ञान एवं विचार क्रान्ति अभियान इसी प्रक्रिया का नाम है। इस संदर्भ में क्या किया जा सकता है? अपनी स्थिति इस दिशा में कितनी तेजी से कितनी दूरी तक चल सकने की है। इसी का ताना बाना उनका मस्तिष्क बुनता है चिन्तन और मंथन से हर स्थिति का व्यक्ति अपनी योग्यता और परिस्थिति के अनुरूप काम ढूँढ़ निकालने में सफल हो सकता है। विचार क्रान्ति अभियान ही प्रज्ञावतार की प्रमुख प्रक्रिया है समस्त क्रिया कलाप इसी क्षेत्र में नियोजित रहेंगे। आस्थाओं का कल्प वृक्ष उग पड़ने के उपरान्त उसके पत्र, पल्लव और फल-फूलों की सम्पदा इतनी बढ़ी-चढ़ी होगी कि उसके सहारे प्रस्तुत संकटों के निवारण में कोई अड़चन शेष न रहे।
युग परिवर्तन का केन्द्र बिन्दु एक ही है आस्थाओं का उन्नयन-चिन्तन का परिष्कार, सत्प्रवृत्तियों का अवगाहन। यह दीखते तो तीन है, पर वस्तुतः एक ही तथ्य के तीन रूप हैं। सत्कर्म और सद्ज्ञान वस्तुतः सद्भावों का ही उत्पादन है। यही है जागृत आत्माओं के माध्यम से प्रज्ञावतार द्वारा कराया जाने वाला महा प्रयास। हर जागृत आत्माओं को अगले दिनों अपनी समस्त तत्परता और तन्मयता जन-मानस के परिष्कार कर केन्द्री भूत करनी होगी।
शास्त्र कहते हैं कि मनुष्य जीवन में परोपकार ही सार है, हमें सदैव परोपकार में रत रहना चाहिये, किन्तु वह अभियान, दम्भ या कीर्ति के लिए नहीं, आत्म-कल्याण के लिए होना चाहिए। मेरे कारण दूसरों का भला हुआ यह सोचना मूर्खता है। हमारे बिना संसार का कोई कार्य अटका नहीं रहेगा-हमारे पैदा होने से पहिले-संसार का सब काम-ठीक-ठीक चल रहा था और हमारे बाद भी वैसा ही चलता रहेगा परमात्मा इतना गरीब नहीं है कि हमारी मदद के बिना सृष्टि का काम न चला, सके। किसी भिखारी को हमारे ही देने की कोई बड़ी भारी आवश्यकता नहीं’ वह हमारी एक रोटी के बिना भूखा न मर जायेगा।
सच पूछो तो जितना हमें उपकार करने का अवसर दिया है उसका कृतज्ञ होना चाहिये। हमारी उपकार बुद्धि जागृत करके वह हमें ऋणी कर देता है। इससे जो मानसिक उन्नति होती है और आत्मा को जो शक्ति प्राप्त होती है, वह दान लेने वाले को नहीं, वरन् देने वाले को प्राप्त होती है। दूसरों का उपकार करना मानो एक प्रकार से अपने ही कल्याण का प्रयत्न करना है। किसी को एक पैसा देकर हम भला उसका कितना भला कर सकते हैं, किन्तु उसकी अपेक्षा अपना भला हजारों गुना कर लेते हैं। हमारी उदारता का विकास न होने से संसार की रत्ती भर भी हानि न होगी। किन्तु हमारा ही आनन्द स्रोत नष्ट हो जायेगा।
मनुष्यो! परोपकार को अपना जीवन-लक्ष बनाओ। जितनी हो सके दूसरों की भलाई करो। इसमें तुम्हारा ही भला है, तुम्हारा ही लाभ है, तुम्हारा ही कल्याण है।
आत्म-क्षेत्र तक पहुँच मात्र एक ही उपकरण की है-और वह है अध्यात्म। साधनों से सुविधाएँ बढ़ती हैं। बलिष्ठता से पराक्रम सम्भव होता है। बुद्धि से वैभव और वर्चस्व कमाया जाता है। इन तीन आधारों पर परिस्थिति बनती बिगड़ती है। साँसारिक सफलताओं में प्रायः इन्हीं तीन क्षमताओं का उपयोग होता रहता है। धन, बल और बुद्धि का चमत्कार सर्वत्र बिखरा पड़ा है। इनका महत्व समझा जाता है और उपार्जन का प्रयत्न चलता है। इतने पर भी यह तथ्य अपने स्थान पर अडिग है कि आस्थाओं का क्षेत्र स्वतन्त्र है और वह इन समस्त साधनों से भी प्रभावित नहीं होती। उच्च अन्तःकरण न धनिकों को मिलता है-न बलिष्ठों को-न बुद्धिमानों को। उनके आरोपण एवं अभिवर्धन जिसके माध्यम से हो सकता है वह मात्र अध्यात्म दर्शन ही हो सकता है। आस्था संकट का निवारण- सद्भावनाओं का सम्वर्धन यदि सचमुच ही अभीष्ट हो तो उसके चिन्तन के लिए ब्रह्म विद्या का और व्यवहार में धारणा का आश्रय लेना होगा।
प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण की दृष्टि से कितने ही महत्वपूर्ण आयोजन आये दिन होते रहते हैं। साहित्य सृजा जाता है और प्रवचनों का उपक्रम बनता है। लेखनी और वाणी की शक्ति को नकारा नहीं जा सकता किन्तु यह भी सत्य है कि इनसे मात्र मस्तिष्क ही प्रशिक्षित होता है। बुद्धि कौशल के अनेक प्रकार हैं उन्हीं में से एक का नाम आदर्शवादिता भी हो सकता है। मस्तिष्क को आदर्शों की उपयोगिता स्वीकार करने के लिए तर्क और तथ्यों के सहारे सहमत किया जा सकता है इतने पर भी यह आवश्यक नहीं कि उतने भर से आस्थाएँ भी प्रभावित परिवर्तित हो सकें।
आस्थाओं की जड़ें शरीर और मस्तिष्क की निचली परतों में नहीं अन्तःकरण की गहराई में जमी होती हैं। वहाँ श्रद्धा के अतिरिक्त अन्य किसी का प्रवेश निषिद्ध है। श्रद्धा भरे उपचारों से ही भाव सम्वेदनाओं को जगाने एवं जीवन को प्रभावित करने वाली मान्यताओं को जमाने की सम्भावनाएँ सन्निहित रहती हैं। अस्तु व्यक्ति के अन्तराल को बदलने के लिए धर्म श्रद्धा से भरे पूरे उपाय उपचारों का प्रयोग करना होता है। एक शब्द में इस तथ्य को यों भी कहा जा सकता है कि धर्मतन्त्र के माध्यम से वह लोक शिक्षण सम्भव है जो आत्माओं के उत्कर्ष का चमत्कारी परिवर्तन प्रस्तुत कर सके।
यों यह बात धर्म क्षेत्र के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है कि धर्मजीवी लोग भी कहाँ आस्थावान होते हैं। मस्तिष्क तक सीमित धार्मिकता भी अन्य प्रकार के छद्मों में से ही एक है। छद्म भी एक आक्रामक तत्व है वह भी अन्य दुष्टताओं की तरह अपने प्रथम चरण में ही कुछ समय के लिए सफलता जैसी चमक दिखाता है। वास्तविकता के अभाव में वह देर तक ठहर नहीं पाता और जादुई खिलवाड़ों की तरह अविश्वस्त एवं उपहासास्पद बन जाता है। धर्म छद्म एवं वस्तु है और धर्म धारणा। दोनों को एक नहीं कहा जा सकता। असत्य कितना ही विस्तृत क्यों न ही सत्य की प्रतिष्ठा अपने स्थान पर अक्षुण्ण ही बनी रहेगी भले ही उसका परिपालन करने वाले स्वल्प मात्रा में ही क्यों न हों। प्रज्ञावतार की गतिविधियाँ धर्म छद्म पर नहीं धर्म धारणा पर अवलम्बित होंगी। आप स्तर की ऋषि प्रणीत धर्म चेतना का दर्शन और व्यवहार आज नये सिरे से खोजना और क्रियान्वित करना होगा तो भी उसकी उपयोगिता पर किसी प्रकार का सन्देह करने की गुंजाइश नहीं है। खिलौने की बन्दूकों से भी बाजार भरा पड़ा है फिर भी लड़ाई के मैदान में बन्दूक का प्रयोग करने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। धर्म छद्म को तमिस्रा के रहते हुए भी धर्म धारणा का अवलम्बन लिये बिना प्रज्ञावतार का प्रयोजन, आस्थाओं का अभिवर्धन सम्भव नहीं हो सकता।
अध्यात्मक चिन्तन हैं और धर्म व्यवहार। दोनों का मिलाने पर ही समग्र धर्मतन्त्र बनता हैं। यहीं है वह प्रक्रिया जो लोक मानस के अन्तराल तक पहुँचने उसे बदलने और उत्कृष्टता के चरम लक्ष्य तक पहुँचाने में समर्थ हो सकती हैं। आस्थावान और धार्मिक एक ही होते हैं। प्रचलित धर्म परम्परा में भारी परिवर्तन करने की आवश्यकता हैं। वर्तमान प्रचलनों में से अनेकों के प्रति आक्रोश उत्पन्न करने की आवश्यकता हैं। इतने पर भी धर्म तत्व की आत्मा को अपनाये बिना देव मानवों की नई पीढ़ी उत्पन्न कर सकना अन्य किसी उपाय से सम्भव नहीं हो सकता। आस्थाओं का उन्नयन बिना धर्म धारणा का आश्रय लिए सम्भव हो ही नहीं सकता।
जन-जन तक धर्म धारणा का आलोक पहुंचाना प्रज्ञावतार के क्रिया-कलापों का प्रमुख अंग हैं। इसके लिए प्रथम चरण गायत्री शक्तियों की स्थापना एवं प्रव्रज्या अभियान की परिपक्वता के रूप में महाकाल ने कदम उठाया हैं। इन दोनों को मिलाकर शरीर और प्राण मिलने से जीवन तत्व जैसी एक इकाई बनती है। प्रव्रज्या से लोक चेतना उत्पन्न होगी। जन-संपर्क उसी के द्वारा सधेगा। घर-घर पहुँचने और जन-जन को नव युग का सन्देश सुनाने वाले सृजन के अग्रदूत आलोक वितरण का अपना प्रयास निरन्तर जारी रखेंगे। किन्तु उनकी गतिविधियाँ हवा में उड़ने वाले पत्तों की तरह अनिश्चित तो नहीं हो सकती। वे निराश्रित तो नहीं टिकते रह सकते। प्राचीन काल में मन्दिर, मठ, धर्मशाला, आश्रम जैसे संस्थानों का निर्माण एक ही उद्देश्य से होता हैं कि-धर्म सेवा देवालयों के वहाँ निवास निर्वाह जैसी सुविधाओं का तथा संपर्क केन्द्र के माध्यम से बनने वाली सुव्यवस्था का लाभ मिलता रहें। आज धर्म संस्थाओं की संख्या तो बहुत हैं पर उस उद्देश्य की पूर्ति कहीं भी होती दिखाई नहीं पड़ती जिसके लिए ऋषियों ने देवालयों की-स्थापना का आन्दोलन उठाया और उसे सफल बनाया था। आत्मा शरीर में आश्रय पाता हैं और उसे सुनियोजित रीति से कार्य संलग्न भी करता हैं। प्रव्रज्या को गायत्री शक्ति पीठों के आश्रय मिले और सुयोग संयोग से धर्म धारणा को जन-जन के मन में अपना आलोक पहुँचाने का अवसर मिलने लगेगा।
कर्मकाण्डों, उपासनात्मक, विधि-विधानों, कथा, प्रसंगों, धर्मानुष्ठानों के बाह्य स्वरूप का सीधा महत्व समझने समझाने में कठिनाई होती है किन्तु जब उनमें सन्निहित प्रेरणाओं का भाव भरे वातावरण में हृदयंगम होने और चमत्कारी सत्परिणाम उत्पन्न करने की प्रतिक्रिया सामने आती हैं तब पता चलता हैं कि यह निरर्थक जैसी लगने वाली प्रक्रिया किन्तु मर्मस्पर्शी और कितनी प्रभावोत्पादक है।
दैनिक उपासना द्वारा दिव्य सत्ता के साथ घनिष्ठता और आदान-प्रदान का उपक्रम-योगाभ्यास और तप साधना द्वारा अति मानवी क्षमताओं का उन्नयन षोड्श संस्कारों के साथ सम्पन्न होने वाली ज्ञान गोष्ठियाँ द्वारा पारिवारिक वातावरण शालीनता का संवर्धन पर्व त्यौहारों में सन्निहित सामाजिक सत्प्रवृत्तियों का परिपोषण जैसे अनेकानेक उच्चस्तरीय उद्देश्य धार्मिक किया-कृत्यों के सहारे भाव भरे वातावरण में सरलता पूर्वक सम्पन्न होते रह सकते हैं। कथा पुराणों में रोचक संस्मरणों के सहारे संस्कृति की महान् परम्पराओं को बाल वृद्ध, नर-नारी जिस प्रकार सुनते, समझते और अपनाते हैं उसे देखते हुए प्रतीत होता हैं। प्रत्यक्ष निर्देशन की अपेक्षा यह देव इतिहासों का कथन श्रवण अन्तरंग की गहराई तक अधिक अच्छी तरह प्रविष्ट हो सकता हैं। आदर्शवादी अनुकरण प्रत्यक्ष न मिल सकें तो उस अभाव की पूर्ति ऐतिहासिक महापुरुषों के द्वारा अपनाई गई देव परम्पराओं के दृश्य मनःक्षेत्र में विचरते रहने पर भी एक बड़ा काम हो सकता है। अनुकरण का उत्साह उठ सकता है। जन-जागरण को घर-घर पहुंचाना और जन-जन से संपर्क साधना आवश्यक है। प्रभावशाली श्रेष्ठ सज्जन इस पुनीत कार्य में श्रद्धा पूर्वक जुट पड़ें तो यह वातावरण उत्पन्न करना तीर्थ यात्रा की पुण्य परम्परा में उत्साह भरने से सम्भव हो सकता हैं। यह सारे कार्य ऐसे हैं जो शासकीय अथवा दूसरे मंचों से किये जाने वाले समाज कल्याण जैसे कार्यों द्वारा किये जाने वाले रचनात्मक प्रयासों की तुलना में कहीं अधिक गहरा एवं चिरस्थायी सत्परिणाम उत्पन्न करेंगे।
भारत धर्म प्रधान देश हैं। इसमें अशिक्षा, गरीबी एवं अन्धविश्वास का बाहुल्य होते हुए भी धर्म श्रद्धा की परम्परागत मात्रा अधिकाँश लोगों में विद्यमान हैं। इसे सही मार्ग न मिलने से उमड़ती हुई धर्म भावना का निरर्थक एवं अनर्थ मूलक कार्या में अपव्यय होता हैं। इस बर्बादी को बचाया और रचनात्मक प्रयोजनों में लगाया जाना आवश्यक हैं। भारत में 60 लाख के करीब भिक्षा व्यवसायी साधु सन्त हैं। यदि 7 लाख गाँवों के इस देश में इन्हें श्रमदान, समाज सुधार, प्रौढ़ शिक्षा जैसे कार्या में लगाया जा सके तो हर गाँव पीछे आठ सन्त स्वयं सेवक इतना काम कर सकते है जिससे देश का काया-कल्प ही हो सके। 60 लाख पूरा समय धर्म प्रयोजनों के लिए लगाने वाले और करोड़ों आधा अधूरा समय इन्हीं कृत्यों में लगाने वालों की जन-शक्ति का मूल्याँकन किया जाय तो उसका वजन लगभग उतना ही हो जाता हैं जितना कि सरकारी एवं अर्ध सरकारी संस्थाओं में काम करने वाले कर्मचारियों का। इतनी बड़ी जन-शक्ति को अव्यवस्था फैलाने से विरत करके रचनात्मक कार्या में नियोजित करने का उद्देश्य उनसे-उनके पोषणकर्ताओं से सम्बन्ध मिलाकर ही पूरा हो सकता हैं। गायत्री शक्ति पीठों के माध्यम से लोक मंगल की सर्वतोमुखी योजनाओं को क्रियान्वित करने वाले परिव्राजकों का एक विशिष्ट प्रयत्न यह भी होगा कि धर्म क्षेत्र से सघनता उत्पन्न करके उसमें लगी जनशक्ति को समय की माँग पूरी करने के लिए सहमत करने का जी तोड़ प्रयास करें।
धर्म परम्पराओं के निर्वाह में कितनी धन शक्ति लगती हैं इसका अनुमान लगाने से प्रतीत होता है कि यह राशि लगभग सरकारी राजस्व जितनी बड़ी होती हैं। तीर्थ यात्रा का एक ही प्रसंग ऐसा है कि उसमें हर वर्ष 100 करोड़ से भी अधिक धन खर्च होता हैं। देवालयों पर, कर्मकाण्डों पर, आयोजन समारोहों पर खर्च होने वाली दान दक्षिणा की राशि इतनी बड़ी है कि उसे विवेकवान धर्म धारणा के लिए नियोजित किया जा सके तो संसार भर में होने वाले ईसाई मिशनों जितना काम भारतीय धर्मनिष्ठा द्वारा ही सम्पन्न हो सकता हैं। धार्मिक साहित्य, धार्मिक प्रवचन का रुझान यदि थोड़ा-सा बदला जा सके तो उतने भर से व्यक्ति, परिवार और समाज की अभिनव संरचना के लिए सहज ही आवश्यक वातावरण उत्पन्न हो सकता हैं। धर्म तन्त्र की समर्थता सर्वविदित हैं। भूतकाल में उसने मानव समाज को सुसंस्कृत एवं समुन्नत बनाने में भारी सफलता पाई है। अब फिर उसकी पुनरावृत्ति हो सकती हैं। धर्म का तत्वदर्शन और उसके द्वारा आकर्षित उत्पादित होने वाले भौतिक बल यदि मानवी उत्कर्ष का भाव परिष्कार पक्ष संभाल सके तो उसे इस धरती पर बरसा हुआ देव लोक का अजस्र वरदान ही माना जायगा।
धर्म परायण अर्थात् चरित्र निष्ठ-व्यक्तित्व सम्पन्न, आदर्शवादी, प्रतिभाशाली, परमार्थ परायण। यही परिभाषा प्राचीन काल में समझी जाती थी। धर्म तत्व के प्रति अगाध निष्ठा अन्धविश्वास की तरह नहीं वरन् उसकी उपयोगिता एवं प्रतिक्रिया को देखकर ही उत्पन्न होती है। इस ढाँचे का लड़खड़ा जाना, मनुष्य का एक अत्यन्त कष्टकारक दुर्भाग्य हैं। स्थिति को बदला जना आवश्यक है। धर्म क्षेत्र पर छाई हुई प्रतिगामिता की प्रगतिशीलता में अन्ध परम्परा को विवेक युक्त सत् श्रद्धा के रूप में परिवर्तित किया जाता है तभी वह युग परिवर्तन की उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण की भूमिका निभा सकेगी।
प्रज्ञावतार के लीला भवन गायत्री शक्ति पीठों के रूप में विनिर्मित हो रहे हैं। उनमें न्यूनतम पांच और अधिकतम दर्जनों परिव्राजक सुविस्तृत क्षेत्र में रचनात्मक प्रयास करेंगे। इन प्रयासों को धर्म तंत्र के द्वारा लोक-शिक्षण प्रक्रिया के अनुरूप क्रियान्वित किया जा रहा है। सच तो यह है कि धर्म तत्व का सर्वोपयोगी- सर्वमान्य स्वरूप खड़ा करने से लेकर धर्म श्रद्धा का युग सृजन के महान प्रयोजन में लगा देने की यह भूमिका है। इसकी सफलता सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों के समर्थ होने और नव सृजन का सुनिश्चित स्थिति उत्पन्न कर सकेगी। प्रस्तुत प्रयास में इसी महान संभावना के समस्त आधार विद्यमान देखे जा सकते हैं।
प्रज्ञा का आरम्भिक उद्गम जागृत आत्माओं से आरम्भ होता है। इस ऊर्जा से अनुप्राणित व्यक्ति सर्व प्रथम अपने चिन्तन और चरित्र को बदलते हैं। उनकी चेतना नर कीटकों जैसा क्षुद्र जीवन जीने से स्पष्ट इन्कार करती है। पुरानी इच्छाएँ-रुचियों और आदतें बदलना आमतौर से सामान्य व्यक्तियों के लिए अतिकठिन होता है। इसे समुद्र तैरने और पर्वत लाँघते जैसा दुम बताया गया हैं। लोग श्रेष्ठता की दिशा में सोचते तो बहुत कुछ हैं पर संकल्प बल के अभाव में कर कुछ नहीं पाते। शेखचिल्ली जैसे सपने गढ़ते, दिवास्वप्न देखते और कल्पना लोक में उड़ते-उड़ते ही जिन्दगी बीत जाती हैं और सड़ी कीचड़ से निकलने की बात बनती ही नहीं। किन्तु प्रज्ञा पुरुष अन्तः प्रेरणा की प्रचण्डता से प्रेरित होकर असाधारण साहसिकता का परिचय देता हैं और पुराने ढर्रे को मकड़ी की तरह अपने बुने ताने-बाने को समेटकर अपने ही पेट में निगल लेते हैं। आत्म परिवर्तन सामान्य लोगों के लिए निस्संदेह अतिकठिन हैं, पर प्रज्ञा पुरुष अपनी दैवी साहसिकता के सहारे उसे इतनी अच्छी तरह सम्पन्न कर लेते हैं कि साथियों को उसे दांतों तले उँगली दबाकर ‘आश्चर्यवत् पश्यति कश्चिदेव’ की पुनरावृत्ति खुली आँखों से देखनी पड़ती हैं।
दैवी अनुग्रह का प्रथम चिन्ह यही हैं कि सामान्य से असामान्य की दिशा में छलाँग लगाये। संसार के ऐतिहासिक महामानवों में से प्रत्येक को महानता का पहला पाठ यही पढ़ना पड़ा है कि साथी सम्बन्धियों के परामर्श और अपने कुसंस्कारों की प्रत्यक्ष अवमानना करके ऐसा कदम उठाये जिसे अपने मतलब से मतलब रखने वाले मोहान्ध में जकड़े हुए व्यक्ति अव्यावहारिक बताये और घाटे का सौदा ठहराये। प्रवाह में तो हाथी तक बहते चले जाते हैं। धारा को चीरकर उलटा चलने का साहस मछली वर्ग के असाधारण शक्ति सम्पन्न प्राणियों में ही होता हैं। महानता का जाप इसी स्तर की साहसिकता के साथ होता हैं। वे लोभ मोह की महत्वकाँक्षाओं के बन्धन काटते हैं और लिप्सा, लालसाओं को ताक पर रखकर आदर्शवादिता के मार्ग पर चलते हैं, पर आने वाली कठिनाइयों को जान-बूझकर स्वीकार शिरोधार्य करते हैं।
देव मानव वे हैं जो आदर्शों के क्रियान्वयन की योजना बनाते और सुविधा की ललक लिप्सा को अस्वीकार करके युग धर्म के निर्वाह की काँटों भरी राह पर एकाकी चल पड़ते हैं। यही साहसिकता उन्हें आत्म-कल्याण और लोक-कल्याण के दुहरे प्रयोजन पूरे कराती हुई पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचती है। प्रज्ञावतार की प्रथम प्रेरणा प्रथम प्रक्रिया देव मानवों के उत्पादन की होती है। वे आत्म-परिवर्तन का आदर्श उपस्थिति करके अनेकानेकों के अनुगमन की प्रेरणा देता हैं। अग्रगमन ही साहसिकता है। यह पराक्रम देवमानवों के भाग्य में ही बढ़ा होता है। समयानुसार अनुगमन तो असंख्यों करने लगते है। आँधी के साथ उड़ने वाले पत्ते तो अपना रुख बदलते, ऊँचे उछलने, नीचे गिरने की हलचलें सहज ही करते रहते हैं।
अवतार के अनुयायी आरम्भ में थोड़े ही होते हैं पीछे वह समुदाय बढ़ता चला जाता हैं। राम के साथियों में सुग्रीव, हनुमान जैसे कुछ ही साथी थे। कृष्ण के प्रारम्भिक सहयोगी पाँच पाण्डव थे। बुद्ध की प्रथम दीक्षा में सात सम्मिलित हुए थे। ईसा के व्रतवद्ध शिष्य तेरह थे। अग्रगामियों के कंधों पर सेनापतियों जैसी योजना बनाने और व्यवस्था जुटाने का उत्तरदायित्व आता है। साधनों और सहयोगियों के अभाव में भी पर्वत उठाने और समुद्र लाँघने जैसे असम्भव दीखने वाले कार्या के लिए आत्म-बल और ईश्वरीय सहयोग पर विश्वास करते हुए कटिबद्ध हो जाना यही सिद्ध करता हैं कि इन आत्माओं पर दैवी आवेश अवतरित हो चला। कालान्तर में ऐसी ही आत्माओं के लोग अवतार या अवतार उपकरण कहने लगते हैं। प्रथम चरण में ढलाई इन्हीं की होती है।
अवतार के द्वितीय चरण में अनेक व्यक्ति आदर्शवादी साहस का परिचय देते दिखाई पड़ते है। कृपणों को उदारता अपनाते, डरपोकों की साहस करते, स्वार्थियों को परमार्थ अपनाते पतितों को आदर्श अपनाते देखकर यही सिद्ध होता हैं कि हवा का रुख बदला और मौसम पलटा। वर्षा ऋतु आते ही सारा माहौल बदल आता हैं। आसमान में छाई धूल और धुन्ध को धकेलकर सुहावनी घटाएँ अपना अड्डा जमाती हैं। तवे जैसी जलती भूमि पर जल भरा दीखता है। हरियाली उगती और सोये मेंढकों की आवाज हर दिशा में सुनाई पड़ती हैं। जबकि हर व्यक्ति स्वार्थ सिद्धि के लाने-बाने बुनने के अतिरिक्त और कुछ सोचने करने से आगे बढ़ ही न पाये। तब कुछेक व्यक्तियों की परमार्थ परायणता निस्सन्देह आश्चर्यवत् प्रतीत होती हैं और उसे किसी आवेश का चमत्कार कहा जाता हैं। आदर्शों को चर्चा का विषय और वाक् विलास का प्रसंग भर माना जाता हैं। उन्हें प्रत्यक्ष अपनाया जाने लगे तो समझना चाहिए कि कहीं कुछ विशिष्ट उतरा और महान् उभरा हैं। अवतार की चेतना जन-समाज में घुले मिले उत्कृष्ट तत्वों को ऐसे ही साधारण आचरण करने-उदास का परिचय देने एवं ऐसा कर गुजरने के लिए उकसाती हैं जिसे अभिनंदनीय और अनुकरणीय कहा जा सके। अवतार काल में उन्हीं उदाहरणों की संख्या बढ़ती और परम्परा बनती चली जाती है।
प्रज्ञावतार की इस पुण्य वेला में इस स्तर की अनुकृतियाँ द्रुतगति से बढ़ रहीं हैं। भविष्य में उनका विस्तार और भी तेली से होगा। युग निर्माण परिवार में उनका विस्तार और भी तेजी होगा। युग निर्माण परिवार में लाखों सदस्य अपना समय दान और अंशदान अन्तः प्रेरणा से अनुप्राणित होकर कर रहें है। उन बूँद-बूँद अनुदानों का समुच्चय नव युग के अनुरूप वातावरण बनाता चला जा रहा है। जागृत आत्माओं को युग देवता का आह्वान, सर्वत्र भाव श्रद्धा के साथ सुना गया है। आत्माहुतियाँ लेकर जीवनदानियों का एक समर्थ वर्ग शान्ति कुँज पहुँचा है और सृजन प्रयोजन में अदम्य उत्साह के साथ जुट गया है। प्रव्रज्या अभियान के विस्तार में ऐसे ही झरने झरते दृष्टिगोचर होते है। वरिष्ठ, कनिष्ठ और समयदानी वर्ग के परिव्राजकों के बादल जिस तरह उमड़ रहे है उनसे यह अनुमान लगाने में तनिक भी कठिनाई नहीं होती कि तवे-सी जली धरती पर मखमली चादर बिछाने और जीवनदानी हरितमा उगने में अब बहुत विलम्ब नहीं रह गया है।
अपने देव परिवार के परिजनों द्वारा नव सृजन के एक से एक बढ़कर उच्चस्तरीय आदर्श अनुदान उपस्थित करने में इन दिनों होड़-सी लग रही है। गायत्री शक्ति पीठों के निर्माण में कितनों ने अपनी सामर्थ्य को लाँघते हुए कितने बढ़े-चढ़े अनुदान प्रस्तुत किये है, इसका इतिहास अगले दिनों एक विशाल ग्रन्थ के रूप में सचित्र छपेगा। उसे पढ़ने वाले देखेंगे कि इस युग चुनौती को किस उच्चस्तरीय भाव श्रद्धा के साथ स्वीकार किया गया और उस निर्माण में कितने सहास भरे त्याग बलिदान का नियोजन किया गया। इतिहास के पृष्ठों पर स्वर्णाक्षरों में अंकित भूतकालीन महामानवों के त्याग बलिदान चिरकाल से अनेकों पीढ़ियों को आदर्शवादी प्रेरणाएं देते रहे है। उनसे अनुप्राणित होकर असंख्यों ने अपने जीवन की दिशा धारा बदली और अनुकरण की हिम्मत जुटाई है। अग्रगामी आदर्शवादी ही अन्तरिक्ष के ग्रह-तारकों की तरह धरती बालों को प्रकाश देते और वस्तुस्थिति जताने से लेकर रास्ता दिखाने तक का महान प्रयोजन पूरा करते है।
मध्य काल में यह परम्परा शिथिल ही नहीं लगभग समाप्त हो गई थी। साधु, ब्राह्मण तक धर्म व्यवसायी बंध गये थे। देश भक्ति, लोक सेवा, जन-कल्याण का आवरण तो अनेकों ने ओढ़ा और वाक् शक्ति के आधार पर धुएं के बादल भी खड़े किये पर अपने निजी आवरण से ऐसी प्रेरणा प्रस्तुत न कर सके। जिससे वे श्रद्धा के पात्र बन और भाव भरी प्रेरणा देकर दूसरों को अनुकरण के लिए सहमत करते। प्राचीन काल में भारतीय देव मानवों की एक ही प्रमुख विशेषता थी कि वे उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व से अपने जीवन श्रम को पूरी तरह सजे थे। उनके क्रिया-कलाप साहसिक परमार्थ प्रयोजनों भरे रहते थे। त्याग बलिदान की ही वैभव और वचनों मानते थे। यह परम्परा नष्ट हुई और धर्म का स्वरूप छत्र बनकर रह गया। ऐसी दशा में विनिर्मित हुए वातावरण में महामानवों का उत्पादन बन्द हो जाना स्वाभाविक ही था। यही है वह मान क्षति जिसका दुष्परिणाम वर्तमान हेय परिस्थितियों और विकट विपत्तियों के रूप में अपनी पीढ़ी को भुगतना पड़ रहा है। युग बदलना है तो प्रवाह भी बदलेगा ही। महान् व्यक्तियों का उत्पादन-सामान्य लोगों द्वारा आदर्शवादी क्रिया-कृत्यों का सम्पादन यह दोनों ही कार्य ऐसे है जिनसे निराशा भरी परिस्थितियों में भी आशा की चमक उत्पन्न होती है। सामान्य समझे जाने वाले लोगों को भी जय अन्तःप्रेरणा में प्रेरित होकर परमार्थ प्रयोजनों के लिए कोई अभिनन्दनीय कार्य करने के लिए अनायास ही कटिबद्ध पाया जाय तो समझना चाहिये कि युग देवता का चमत्कार सिर पर चढ़कर बोला।
युग सृजन लिए प्रचुर साधनों की आवश्यकता पड़ेगी। कार्यक्षेत्र व्यापक है, उसकी परिधि समस्त भूमण्डल पर रहने वाले 400 करोड़ मनुष्यों तक उससे सम्बद्ध असंख्य अन्य प्राणियों तक चली जाती है। इतने बड़े क्षेत्र एवं वर्ग की स्थिति को नीचे से उठाकर ऊँची उछाल देना निस्सन्देह बहुत बड़ा कार्य है। इसलिए श्रम-बल, मनोबल एवं साधन बल की प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पड़ेगी। इस आवश्यकता को तो चन्दा संग्रह करके पूरा किया जा सकेगा और न शासन के लिए इतने बड़े लक्ष्य को पूरा करने की बात सोच सकना संभव होगा। इतनी बड़ी सम्पदा, जन-जन के मन-मन में उभरने वाली भाव श्रद्धा के कारण स्वेच्छा समर्पित अनुदानों से ही सम्भव होगी।
युग चेतना की प्रेरणा हर जागृत आत्मा के लिए यह है कि वह न केवल जीवन क्रम को उत्कृष्ट बनाये वरन् युग सृजन के छुटपुट नहीं ऐसे अनुदान प्रस्तुत करे जिनकी स्मृति से इतिहास के पृष्ठों को धन्य बनने का अवसर मिले। दृष्टता और भ्रष्टता पिछले दिनों एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगाते रहे है। अब यह प्रतिस्पर्धा दूसरे स्तर की है। भीम ने ब्राह्मण के बालक को बचाने के लिए अपना प्राण देने का अधिकार माता तथा भाइयों से लड़ झगड़ कर प्राप्त किया था। गुरु गोविन्द सिंह के बच्चों में से प्रथम बलिदान होने वाले बालक ने अपने सौभाग्य को उच्च स्वर से सराहा था। अब प्रतिस्पर्धाएं इसी स्तर की चलेगी कि असंख्यों की प्रेरणा देने वाले आदर्शवादी त्याग, बलिदान में कौन-कौन किस से आगे निकलता है। दंगल में कुश्ती पछाड़ने वाले पहलवान अपनी विजय ध्वज उड़ाते हुए हाट बाजारों में निकलते है। आदर्शवादी अनुदान प्रस्तुत करने में किसने अपने कितने साथियों को पछाड़ा और अपनी आन्तरिक बलिष्ठता का कितना भारी प्रमाण प्रस्तुत किया, यही प्रसंग लोक चर्चा का विषय बनेगा। इतिहास के पृष्ठ इन्हीं दिव्य संस्मरणों से रंगे और लिखे जायेंगे। यही वह आधार है जिससे युग निर्माण के लिए अभीष्ट शक्ति एवं सम्पदा प्रचुर परिमाण में सहज ही उपलब्ध होती होती चलेगी। अनुकरणीय आदर्शों का ताँता लगते इन दिनों भी देखा जा सकता है। अगले दिनों इस दिशा में और भी अधिक उत्साह उत्पन्न होगा। इसी को युग अवतार का सामयिक एवं समर्थ अनुदान कहा जायेगा।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के एक मित्र की कन्या का विवाह था। वे कुछ याचना का मनोरथ लेकर आये, पर भारतेन्दु जी की जेब उन दिनों बिल्कुल खाली थी। अपना निर्वाह भी कठिन पड़ रहा था।
फिर भी जरूरतमंद को खाली हाथों न जाने देना ही उन्होंने उचित समझा। हीरा जड़ी अँगूठी उतार कर एक हाथ से मित्र के हाथ मैं रखी और लेने से इनकार करने का अवसर आने देने से पूर्व ही उन्होंने दूसरे हाथ से मित्र का मुँह यह कहते हुए बन्द कर दिया-बस, अब कुछ मत कहना। मेरे पास अब कुछ बचा नहीं है।
अवतारों का भी विकास हुआ है। उनकी कलाएँ क्रमशः बढ़ती आई है। कच्छ-मच्छ एक-एक कला के अवतार थे। वाराह और वामन दो-दो के। नृसिंह और परशुराम तीन-तीन कला के माने जाते है। राम बारह के, कृष्ण सोलह के और बुद्ध बीस कला के मान गये है। निष्कलंक के बारे में कहा गया है कि वे चौबीस कला के होंगे। यह क्रमिक विकास है। सम्पूर्ण कलाएँ चौंसठ मानी जाती है। सृष्टि क्रम में अवतारों की श्रृंखला अनवरत चलती रहती है और विश्व विकास के साथ-साथ उनकी कला सामर्थ्य भी बढ़ती रहेगी।
भूतकाल के अवतारों में प्रारम्भिक का कार्य क्षेत्र भौतिक परिस्थितियों से जूझना भर था। उसके बाद वालों को अनाचारियों से लड़ना था। उसके बाद स्थापनाओं का क्रम चलता है। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम-कृष्ण को पूर्ण पुरुष और बुद्ध को विवेक का देवता कहा जाता है। इनके चरित्र और कर्तृत्व में उच्चस्तरीय स्थापनाओं का दौर है। अधर्म का नाश करने के लिए उनके जितने प्रयत्न हुए है, उनकी अपेक्षा स्थापनाओं पर गतिविधियाँ अधिक केन्द्रित रही है। कृष्ण का गीता प्रतिपादन और बुद्ध का बुद्धि की शरण में जाने का प्रचण्ड अभियान, जन-जीवन को दिशा और लोक-मानस को प्रेरणा देने में अपने पूर्ववर्तियों को तुलना में अधिक प्रयत्नशील रहे। प्रज्ञावतार का कार्य अपेक्षाकृत अधिक कठिन और अधिक व्यापक है। उसे सामयिक समस्याओं एवं व्यक्तिगत उद्दण्डताओं से ही नहीं जूझना है वरन् लोक-मानस में ऐसे आदर्शों का बीजारोपण, अभिवर्धन, परि-पोषण एवं क्रियान्वयन करना है जो सतयुग जैसी भावना और राम जैसी व्यवस्था के लिए आवश्यक अन्तः प्रेरणा व्यापक क्षेत्र में उत्पन्न कर सके। लक्ष्य और कार्य की गरिमा एवं व्यापकता को देखते हुए प्रज्ञावतार की कलाएँ चौबीस होना स्वाभाविक है।
समुद्र मन्थन से चौदह रत्न निकल थे। हृदय मंथन की वर्तमान भाव चेतना से अनेकानेक नर रत्नों का निकलना निश्चित है। समुद्र मन्थन से निकले रत्नों ने सृष्टि की आदिम स्थिति में उत्कृष्ट के साधनों का बाहुल्य उपस्थित किया था। लक्ष्मी (सम्पदा) सूर्य (ज्ञान) चंद्रमा (सन्तुलन) अमृत (आत्म ज्ञान) धन्वंतर (शमन) वज्र(अनुशासन) अश्व (उत्साह) ऐरावत (पराक्रम) रम्भा (कला) जैसी अनेकों दिव्य सम्पदाएँ आविर्भूत हुई तो समुद्र मन्थन ने तत्कालीन परिस्थितियों को कुछ से कुछ बना दिया था। इन दिनों भी ऐसा ही कुछ होने जा रहा है। अन्तःप्रेरणा से उत्पन्न हुआ आत्म ज्ञान और भावावेश मनुष्यों को कुछ उच्चस्तरीय सोचने और करने के लिए विवश करेगा। अग्रगामी सदा अपने अनुयायी उत्पन्न करते और परम्पराओं को जन्म देते है। जागृत आत्माओं द्वारा अपनाई गई युग साधना का प्रवाह जन-मानस को अनुकरण के लिए अनायास ही आकर्षित और प्रेरित करेगा। पिछले दिनों जहाँ आदर्शवादिता के दोनों आधार धर्म और अध्यात्म चर्चा एवं उपचार की विडम्बनाओं में उलझकर रहते रहे है। इन दिनों उन्हें अपनी प्रखरता प्रकट करने का-प्रत्यक्ष कार्यरत होने का अवसर मिलेगा। इंजन चलता रहता है तो डिब्बे अनायास ही पीछे लुढ़कने लगते है। तूफान उठता है तो पत्ते और तिनके साथ ही उड़ने लगते है। जल प्रवाह में जाने क्या-क्या साथ ही तैरता डूबता, बहता चला जाता हैं। जागृत आत्माओं के अपने उदात्त दृष्टिकोण और उदार आचार से पर लोक श्रद्धा उभरेगी तो अनेकों व्यक्तियों एवं सत्प्रवृत्तियों को प्रगति के पथ पर द्रुतगति से अग्रसर होते देखा जा सकेगा।
इस तथ्य को हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि अपने युग की समस्याएं परिस्थितिजन्य दीखती भर है वस्तुतः उनका उद्भव विकृत मनःस्थिति से हुआ है। जड़ तक पहुँचने पर ही समाधान खोजा जा सकेगा। मनःस्थिति बदलने से ही परिस्थितियाँ बदलेंगी। नाली साफ करने पर ही मक्खी, मच्छरों और दुर्गन्ध फैलाने वाले विषाणुओं से छुटकारा मिलता है। रक्त शुद्धि का चिरस्थायी उपचार किये बिना निरंतर उठते रहने वाले फोड़े’-फुन्सियों से पिण्ड नहीं छूटता। समस्याएँ असंख्य हैं, उनके बाह्योपचार भी असंख्यों हो सकते है। यह प्रयत्न हो रहे है और होते भी रहे है। प्रतिफल और अनुभव भी सामने है। समाधान चाहे शासन तन्त्र में ढूंढ़ें हो, चाहे अर्थ तन्त्र ने। बात कुछ बनी नहीं है। एक हाथ जोड़ने के साथ ही दो हाथ-टूटने का सिलसिला चलता रहे तो गुत्थियों को सुलझाना किस प्रकार सम्भव हो सकता है। बुद्धि और सम्पदा की, साधन और सामर्थ्य की इन दिनों कोई कमी नहीं। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक के इतिहास में मनुष्य कभी इतना समृद्ध और सशक्त नहीं हुआ, जितना इन दिनों हैं। साथ ही यह भी सच है कि वर्तमान में उस पर जितनी विपन्नता छाई है उतनी भूतकाल में कभी भी सहन नहीं करनी पड़ी।
समस्याएं सुलझेंगी तो एक-एक करके नहीं, वरन् एक साथ ही उनका समाधान निकलेगा। क्योंकि उनका उद्गम एक है। अस्वस्थता दूर होनी होगी तो उस पर मात्र समय से-आहार-विहार संबंधी अनुशासन के सहारे ही विजय प्राप्त की जा सकेगी। असंयम का दौर रहते, आहार को बहुमूल्य बनाने एवं चिकित्सा उपचार के पहाड़ जैसे साधन खड़े करने पर भी कोई हल न मिलेगा। नित नई औषधियों का आविष्कार होगा और नित नूतन अस्पताल खुलेंगे किन्तु दुर्बलता और रुग्णता पर विजय प्राप्त करने का स्वप्न दिन-दिन दूर ही हटता जायेगा।
मनुष्य की वितृष्णा आंतरिक समाधान, सन्तुलन, सन्तोष जैसे चिन्तन से ही शान्त होगी। अन्यथा तनिक-तनिक सी बातों पर उत्तेजना, उद्विग्नता के ज्वालामुखी फूटते रहेंगे। वस्तुओं का बाहुल्य और व्यक्तियों का अनुकूलन एक स्वप्न है जिसकी पूर्ति व्यावहारिक जीवन में सम्भव नहीं। हर किसी को ताल-मेल बिठाकर चलना पड़ता है। अधिकार के साथ कर्तव्य को-उपार्जन के साथ सन्तोष को -संघर्ष के साथ सहयोग को-उपभोग के साथ संयम को मिलाकर चलने से ही मानसिक सन्तुलन बनता है। किसी को मानसिक तनावों से छुट-कारा पाना है तो अनुकूल परिस्थितियां नहीं है। चिंतन में विधायक तत्वों को भर लेने-दृष्टिकोण को ऊँचा उठा लेने से ही काम चल जाता है। संव्याप्त विक्षोभ और असंतोष का समाधान इसी प्रकार होगा। अनुकूल के लिए किया गया पुरुषार्थ तो दूसरा चरण है।
परिवार छोटे करने का प्रयोग पाश्चात्य देशों में व्यापक रूप से चला है। पति-पत्नी और न्यूनतम बच्चे यही है आधुनिक परिवार का स्वरूप। संयुक्त परिवार को तो आफत समझा गया और उनको विखण्डित किया गया, पर इतने से भी समस्या कहाँ सुलझी। छोटे परिवार भी आपाधापी के केन्द्र है और स्नेह सौजन्य की कमी का रोना उनमें भी रोया जाता है। जबकि कितने ही बड़े कुटुम्ब स्नेह सिक्त सहकारी संस्था के रूप में अपनी सार्थकता और सफलता सिद्ध करते है। पारिवारिक समस्याओं की गणना असंख्य है, किन्तु उनके मूल में भावनात्मक दरिद्रता ही प्रधान कारण रही होती है। परिवार का सुख, प्रचुर साधना के, रूप यौवन के अथवा व्यवस्था उपचार के सहारे उपलब्ध होने को आशा की जाती है, किन्तु देखा यह गया है कि जहाँ इन सबकी प्रचुरता है वहाँ भी मनोमालिन्य कम नहीं है। तथ्य ढूंढ़ने पर भावनाओं को दरिद्रता ही कुटुम्बों को विश्रृंखलित एवं विपन्न बनाती है। इसका निराकरण हो सके तो अभावग्रस्त घरौंदे में भी लोग देवोपम स्नेह सौजन्य का आनंद लेते हुए दिन बिता सकते है।
समाज में अनेक कुप्रथाएँ प्रचलित है। इनमें परिपाटी उतनी घातक नहीं होती जितनी कि उनकी आड़ में नंगा नृत्य करने वाली दुष्टता। दहेज, समस्या नहीं है। बेटी की विदाई में अभिभावक अपनी सम्पदा का एक अंश उपहार में देते हों तो उसमें कोई अनौचित्य नहीं है। दहेज ने कन्या भक्षी पिशाच का रूप तो उसके पीछे काम करने वाली निष्ठुर अहंकारिता और स्वार्थपरता ने उत्पन्न किया है। यदि इन तत्वों को हटा दिया जाय तो नव परिणीता की स्त्री धन के रूप में कुछ उपहार मिल जाने से निश्चिन्तता और प्रसन्नता ही रहेगी। यही बात अनेकानेक प्रचलनों से संबंध है। कुप्रथाएँ बदली जानी चाहिए यह आवश्यक है किन्तु स्मरण रखा जाये कि दुष्टता के रहते सुधार के नाम पर किये गये परिवर्तन भी सन्तोषजनक परिणाम उत्पन्न नहीं कर सकेंगे। बिना दहेज के तथाकथित आदर्श विवाहों की आजकल धूम है। इसमें भी पर्दे के पीछे लेन-देन पनप रहा है। उसे सुधारवाद का दुर्भाग्य ही कह सकते है। समाज सुधार के बाह्य प्रयत्न कितने ही आवश्यक क्यों न हों उनकी सार्थकता सद्भावना के जीवन्त रहने पर ही हो सकती है। सद्भावना प्रथा परम्परा नहीं है। यह आध्यात्मिक उपलब्धि है। समाज में प्रचलित अनेकों कुप्रथाओं का उन्मूलन तो होना ही चाहिए, पर आत्यंतिक समाधान की तब तक प्रतीक्षा करनी चाहिए अब तक कि सद्-भावनाओं की हरितमा अन्तःक्षेत्रों में लहलहाने न लगे।
शासन सत्ता किस पार्टी के हाथ में रहती है। प्रश्न यह नहीं वरन् यह भी शासन को चलाते है वे किस स्तर के है। घोषणा पत्रों और साइन बोर्डों के बदलने से व्यक्तियों की गोटें इधर से उधर बिठाने भर से स्वच्छ शासन की अपेक्षा नहीं की जा सकती। वोटर से लेकर नेताओं तक की नीयतें बदले तभी कुछ काम चलेगा। उत्थान के लिए बनने वाली योजनाएं उपयुक्त संचालकों के अभाव में किस प्रकार असफल होती है इसका प्रमाण पग-पग पर मिल सकता है। अपराधों के नियन्त्रण में पुलिस, कचहरी, जेल आदि का ढाँचा अति स्वल्प मात्रा में ही कारगर सिद्ध होता है। अपराधी मनोवृत्ति का शमन करने एवं नियन्त्रण कर्ताओं के निर्लोभ एवं कर्तव्यपरायण होने से ही बात बनेगी। अन्यथा अपने ढंग से पनपते रहेंगे और नियन्त्रण का ढकोसला अपनी जगह खड़ा रहेगा। अनैतिकता के वैयक्तिक एवं सामाजिक रूप अनेकानेक है इन सभी पर अंकुश लगने का एक ही उपाय हैं, व्यक्ति के अन्तःकरण में धर्म धारण का घनीभूत होना।
नेतृत्व की हर क्षेत्र में माँग है, पर उसे प्रतिभा और चतुरता के सहारे उपलब्ध करने का प्रयत्न किया जाता है। फलतः वह अभिनेताओं जैसे कौतुक कौतूहल दिखाकर समाप्त हो जाती है। स्थायित्व उस गरिमा में है जो चिन्तन और चरित्र के हर घटक में छाई रहती है जिसमें भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण की-छद्म एवं स्वार्थ साधन के लिए कहीं कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती। ऐसे उच्चस्तरीय नेतृत्वों का उदय ही जब बन्द हो गया तो लोक चेतना क्यों न जगायें? भटकने और भटकाने वाले लोग ही मिल जुलकर नेता और अनुयायियों की मण्डलियाँ बना-बनाकर जल-कल्याण के नाम पर शालीनता का निर्माण करने में लगे हुए हैं। यह परिस्थिति और किसी तरह दूर नहीं हो सकती। प्रज्ञावतार की प्रेरणा से उत्पन्न उत्कृष्टता सम्पन्न मनःस्थिति ही नेतृत्व के अभाव को पूरा कर सकने में समर्थ हो सकती है।
अर्थ सुविधा के लिए साधनों का बाहुल्य उतना आवश्यक नहीं जितना उपलब्धियों को मिल-जुलकर खाने और उन्हें मात्र औचित्य के लिए ही उपयोग करने की धारणा। श्रमशीलता, ईमानदारी, मितव्ययिता जैसे सद्गुणों की कमी पड़ने पर ही दरिद्रता की विपत्ति सहन करनी पड़ती है अन्यथा मनुष्य की आवश्यकताएं ही कितनी हैं उन्हें सरलता पूर्वक स्वल्प साधनों से ही पूरा किया जा सकता है जिसके सहारे आत्म-कल्याण एवं समाज-कल्याण के लिए बहुत कुछ कर सकना सम्भव हो सके।
दृष्टि पसार के वास्तविकता को ढूंढ़ने पर समस्त समस्याओं का एक ही कारण दीखता है-आस्था संकट निकृष्ट चिन्तन। इसका निराकरण आज एक ही उपाय से हो सकता है। अन्तःचेतना का ऊर्ध्वगमन, उन्नयन, अभ्युदय, प्रज्ञावतार की तूफानी गतिविधियाँ जन-जन के अन्तःकरण को झकझोरेंगी और उसे क्रमशः उस दिशा में धकेलती घसीटती ले चलेंगी जहाँ उसे शालीनता और सदाशयता से बढ़कर और कुछ मूल्यवान प्रतीत ही नहीं होता हो। मूर्धन्य देव-मानवों के माध्यम से प्रज्ञावतार आस्था संकट के निवारण का प्रयत्न कर रहा है। धर्म क्षेत्र की नर्सरी में ही महामानवों के कल्पवृक्ष उत्पन्न होते रहेंगे। इस समय भी उसी के प्रभाव में कल्प वृक्षों की नई पौध उग रही है।
गायत्री शक्ति पीठों के हर घोंसले में न्यूनतम पाँच-पाँच परिव्राजक रहें और साधु ब्राह्मण एवं वानप्रस्थ की पुण्य-परम्परा को अपने सत्प्रयत्नों से पुनर्जीवित करने में तत्पर रहें। यह योजना इन दिनों चल रही है। यह पंक्तियाँ लिखी जाते समय तक 108 शक्ति पीठों के निर्माण का क्रम संकल्प चल पड़ा। यह आगे भी चलता रहेगा। गायत्री महामन्त्र में 24 अक्षर है। इन पर एक बिन्दु लगा देने से 240 हो जाते है। इतनी संख्या में इस पुण्य-निर्माण को कर सकने में वर्तमान गायत्री परिवार सक्षम है। आशा की जानी चाहिए कि आगामी गुरुपूर्णिमा आने तक यह संख्या पूरी हो जायेगी। देश की विशालता को देखते हुए यह निर्माण जलते तवे पर बूँद पड़ने की तरह स्वल्प ही रहेगा। जब घर-घर जन-जन तक नवयुग का आलोक पहुँचाना और जन-जागरण का अलख जगाना ही लक्ष्य हो तो प्रयासों को भी सुविस्तृत होना चाहिए। शक्ति पीठों की संख्या 2400 होनी चाहिए और उनमें काम करने वाले कार्यकर्ताओं की संख्या इससे पाँच गुनी प्रायः बाहर हजार तक पहुँचनी चाहिए। यह विस्तार अंक गणना एवं योजना की दृष्टि से बड़ा और भारी प्रतीत होता है किन्तु भारत को ही ले तो इतने बड़े क्षेत्र फल, इतने विशाल जन समुदाय को और इतने महान कार्य को देखते हुए इसे न्यूनतम एवं अनिवार्य ही कहा जायेगा।
धीरे-धीरे गायत्री शक्ति पीठें बनें-इसकी प्रतीक्षा नहीं की जा सकती। इसलिए नया आह्वान यह किया गया है कि वहाँ कोई उपयोगी व्यवस्था नहीं बन रही है उसे गायत्री परिवार ट्रस्ट के सुपुर्द करने का आह्वान किया जाय। इन स्थानों में थोड़ी-बहुत हेरा-फेरी करके उपरोक्त प्रयोजन के अनुकूल बना लिया जायेगा। रानी रासमणि ने अपना बनाया दक्षिणेश्वर मन्दिर रामकृष्ण परमहंस के सुपुर्द कर दिया था। मन्दिर निर्माताओं और उनके व्यवस्थापकों से अनुरोध किया गया है कि वे अपनी पुनीत सम्पदा की सुव्यवस्था की अपेक्षा करते हुए उसे गायत्री परिवार के सुपुर्द कर दें। आशा की जानी चाहिए कि यह अनुरोध अरण्य रोदन सिद्ध नहीं होगा। देश के अधिकाँश देवालय अस्त-व्यस्त एवं अनुपयोगी स्थिति में पढ़े हुए है। उन पर निहित स्वार्थों का कब्जा है। जिसका लाभ वे व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि के लिए उठाते है अथवा संचालकों को उनके निमित्त भारी धन राशि व्यय करनी पड़ती है। इतने पर भी देव प्रतिमा की पूजा अर्चना जितनी लकीर पीटते रहने के अतिरिक्त ऐसा कुछ भी नहीं हो पाता जिससे देव प्रयोजन की-धर्म धारणा की आवश्यकता पूरी होती हो। देवालयों के निर्माण की जिन तत्वदर्शियों ने कल्पना की-योजना बनाई और प्रेरणा दी उनके मस्तिष्क में निश्चित रूप से एक ही आशा थी कि विनिर्मित देव मन्दिर जन जागृति के केन्द्र बनेंगे। उन्हें पता होता कि इनमें लगने वाली धन शक्ति और जन शक्ति का उपयोग मात्र चिन्ह पूजा के लिए होने लगेगा तो कदाचित इस प्रेरणा को देने से पूर्व वे हजार बार सोचते और कदाचित ही इस प्रयास का प्रोत्साहन करते।
देवालयों को देव प्रयोजन के लिए उपयोग होने की ऋषि योजना को पुनर्जीवित करने का ठीक यही समय है। इससे मन्दिरों का, देवताओं का, उनके निर्माणकर्ता, एवं व्यवस्थापकों का-प्रतिमा पूजन के तत्वज्ञान का गौरव बढ़ेगा। जिन मन्दिरों में मात्र देव प्रतिमा के निवास जितना ही स्थान है उनका उपयोग हो सकना तो कठिन हैं, पर जिनके पास खुला प्राँगण है। जन-समुदाय को बैठने के लिए स्थान तथा छाया का प्रबन्ध है। जल व्यवस्था है उनका उपयोग निस्सन्देह हो सकता है। पुराने देवता यथा स्थान रहेंगे। उनकी पूजा अर्चा पहले की ही तरह वरन् उससे भी अधिक शास्त्रीय पद्धति से होती रहेगी। बने हुए स्थान में ही गायत्री माता को भी प्रतिष्ठापित कर लिया जायेगा। दोनों देवता परस्पर बिना लड़े-झगड़े आपस में परम स्नेह सौहार्द्र के साथ नवयुग के अवतरण का स्वागत करते और आशीर्वाद देते पाये जायेंगे।
उपलब्ध मन्दिरों, देवालयों के मुख्य द्वारा को गायत्री शक्ति पीठों से मिलता-जुलता बनाया जायेगा ताकि देखते ही उनकी एक रूपता के सहारे यह जाना जा सके कि यह संस्थान गायत्री परिवार के तत्वावधान में चल रहा है। इनमें से प्रत्येक में दो कमरे, कार्यालय एवं स्वागत सत्संग के लिए रहेंगे। पाँच परिव्राजकों के निर्वाह भोजन नित्य कर्म के लिए निवास गृह भी इसी में रहेंगे। इस प्रकार जो देवालय दान से उपलब्ध होंगे उनमें से प्रायः बीस हजार की राशि नये सिरे से लगानी होगी तभी वे प्रज्ञाभियान के अनुकूल एवं अनुरूप बन सकेंगे। इतनी राशि उस क्षेत्र से संग्रह हो जाना कुछ कठिन नहीं है। इन परिवर्तित परिवर्धित देवालयों को “गायत्री प्रज्ञा पीठ” कहा जायगा। उन्हें भी नव निर्मित गायत्री शक्ति पीठों के समतुल्य ही माना जायेगा। स्वरूप में अन्तर रहने की बात को ध्यान में रखते हुए इनका नामकरण भी अर्थ की एकता रहते हुए भी भिन्नता का बोध रखने जैसा रखा जायगा।
देवालयों की याचना का यह नया अनुरोध, उसी कठिनाई को हल करेगा जिसके कारण बहुत समय तक प्रज्ञाभियान को गतिशील करने के लिए बहुत समय तक निर्माण साधन उपलब्ध होने की प्रतीक्षा करनी पड़ती। यों मोह ग्रस्तता का आधिपत्य और निहित स्वार्थों का विग्रह इस संदर्भ में भी कम आड़े नहीं आवेगा किन्तु विवेकशीलता और दूरदर्शिता की शक्तियों के नवोदय को ध्यान में रखते हुए इस बात की पूरी सम्भावना है कि आवश्यक संख्या में उपयुक्त देवालय उपलब्ध हो सकेंगे और वे जन जागृति के केन्द्र बनकर अपनी उपयोगिता एवं गरिमा का परिचय देने लगेंगे।
इस प्रकार निर्माण कार्य सरल हो जायेगा। गायत्री शक्ति पीठों के नवनिर्माण का सिलसिला तो यथावत् चलता रहेगा; पुराने देवालय प्राप्त करने की नवीन योजना से अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचना और भी अधिक सरल हो जायेगा। अब दूसरा प्रश्न इन सबमें नियुक्त रहने वाले परिव्राजकों का रह जाता है। वे भी संख्या की दृष्टि से कई हजार अभी अभी ही चाहिए। इस आवश्यकता की पूर्ति देवालयों के निर्माण करने एवं अनुदान से प्राप्त करने से भी अधिक कठिन है। लोक सेवा में रुचि लेने वाली पीढ़ी घट रही हैं। हर व्यक्ति संकीर्ण स्वार्थपरता की बात सोचता है। लोक-मंगल के अनुदान प्रस्तुत करने की महत्वाकाँक्षा घटते-घटते मिटने की स्थिति में पहुँच गई है। जहाँ है वहाँ यह कठिनाई भी कम नहीं है कि पारिवारिक उत्तरदायित्वों को छोड़कर साधु परम्परा कैसे अपनाई जाय? शक्ति पीठों के परिव्राजकों को पूरा समय ही देना होगा। ऐसी दशा में यदि उनका परिवार आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी नहीं हो तो उसका निर्वाह कैसे हो?
इसके लिए भी एक हल सोचा गया है कि जहाँ शक्ति पीठ अथवा प्रज्ञा पीठ बनेंगे उसी क्षेत्र के युग निर्माण परिजनों में से जिनकी भावना प्रबल हो और जिनके ऊपर गृहस्थ भार हलका हो-उनके लिए अर्थ अनुदान की कुछ व्यवस्था बनाई जाय और उनके सामने खड़ी चट्टान जैसी कठिनाई को यथासम्भव सरल किया जाय। ऐसे लोगों की कमी नहीं जो अपने संग्रहित एवं पैतृक साधनों के सहारे अपने परिवार की अर्थ व्यवस्था जुटा लेंगे। वे अभी भी जुटा लेंगे और आगे भी। असंख्य लोग इस आधार पर अपने भाव-भरे अनुदान प्रस्तुत करेंगे। साधु ब्राह्मणों पर पारिवारिक उत्तरदायित्व न्यूनतम ही रहता था और वे जनता पर अधिक भार न पड़ने देने की दृष्टि से यथासम्भव हलके से हलका ही रखते थे। अभी भी वह परम्परा चल निकली है। देव-मानवों का युग पुनः वापिस लौट रहा है और समयदानी परिव्राजकों का वर्ग अनवरत गति से बढ़ रहा है।
इतना होते हुए भी जिस पर कार्य को विस्तृत और सरल बनाने के लिए गायत्री शक्ति पीठों के साथ-साथ गायत्री प्रज्ञापीठों की सहायक योजना बनाई गई हो उसी प्रकार आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी परिव्राजकों के अतिरिक्त एक दूसरी पंक्ति और भी खड़ी करने की बात खींची गई है। सृजन शिल्पियों की यह दूसरी पंक्ति ऐसी होगी जिसके लिए पारिवारिक उत्तरदायित्वों के निर्वाह के लिए अर्थ साधन जुटाने होंगे। ऐसा करने पर भी उनसे पूरा समय निश्चित होकर देने की अपेक्षा की जा सकेगी, सामयिक आवश्यकता और कार्य की विशालता को देखते हुए इस प्रयास को भी कार्यान्वित करने का निश्चय किया गया है।
गायत्री शक्ति पीठों का कार्यक्षेत्र प्रायः तीस मील के दायरे में बनाया जायेगा। इसमें औसत 30 गाँव हो सकते है। इसी क्षेत्र से परिव्राजक उपलब्ध हो तो इससे कई लाभ होंगे। भाषा संबंधी कठिनाई न रहेगी। रास्ते देखे समझे होंगे। लोगों की प्रकृति और परम्परा का ज्ञान होगा। पूर्व परिचय के सहारे कार्य विस्तार में सुविधा होगी। बाहर से भेजे गये व्यक्ति भी यह सब सुविधाएं जुटा तो सकते है, पर उन्हें समझने और करने में अपेक्षाकृत देर लगेगी। अतएव सरलता इसी में रहेगी कि शक्ति पीठ के के कार्य क्षेत्र के अथवा उसके इर्द-गिर्द के कार्यकर्ता ही ढूंढ़ें और प्रशिक्षित किया जाये। वे अपने चर परिवार की देखभाल भी करते रह सकेंगे और युग सृजन के पुण्य-प्रयोजन में अपनी सेवा भी नियोजित रखे रहेंगे। सभी परिव्राजकों का प्रारम्भिक प्रशिक्षण शान्ति कुंज में होगा और दे जब अपना कार्य ठीक तरह कर सकने के लिए सुयोग्य बन जायेंगे। समय-समय पर इनका प्रशिक्षण बीच-बीच में भी केन्द्र में बुलाकर किया जाता रहेगा।
आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी परिव्राजकों के अतिरिक्त दूसरी पंक्ति के उन भावनाशील लोक-सेवियों की भर्ती बड़ी संख्या में करनी होगी जिनके लिए परिवार निर्वाह की अर्थ व्यवस्था जुटाई जानी है। यह अनुदान वेतन स्तर का तो नहीं हो सकता और न कर्मचारियों जैसी विधि व्यवस्था अपनाई जायेगी। न्यूनतम निर्वाह और अधिकतम अनुदान ही लोक सेवी की सनातन परम्परा है। उसी का निर्वाह इन सृजन शिल्पियों के निमित्त होगा। योग्यता के आधार पर नहीं आवश्यकता के आधार पर भिन्न-भिन्न कार्यकर्त्ताओं की स्थिति पर विचार करते हुए यह निश्चय किया जायेगा कि किसका पारिवारिक निर्वाह न्यूनतम कितने अनुदान में चल सकता है। संस्था की स्थिति और कार्यकर्ता की आवश्यकता का तालमेल बिठाते हुए ही यह निर्णय किया जाना है कि इच्छुकों में से किन्हें लिया जा सकता है किन्हें नहीं। इसके लिए कोई वेतन मान नहीं रखा गया है। परिस्थितियों का तालमेल ही वह मापदण्ड रहेगा जिसके आधार पर सामयिक आवश्यकताओं पूर्ति के लिए परिव्राजक कार्यकर्ताओं की नियुक्ति होगी और प्रस्तुत शक्ति पीठों में कार्यक्षेत्रों में काम करने वाले कार्यकर्ताओं की आवश्यकता पूरी की जायेगी। इस प्रकार परिव्राजकों की भूमिका निभा सकने की जिनकी स्थिति है उनसे संपर्क साधने और आवेदन पत्र प्राप्त करने का प्रयत्न किया जा रहा है।
शक्ति पीठों के केन्द्र स्थान बनने कार्यकर्त्ताओं की नियुक्ति होने कार्यक्षेत्रों की परिधि निर्धारित होने के साथ ही यह क्रम चालू हो जायेगा कि परिव्राजक नियमित रूप से संपर्क क्षेत्र में जाने लगें। विचारशील लोगों से संबंध बनाये। उन्हें युग साहित्य पढ़ने देने, वापिस लेने का का क्रम चलायें। जन्म दिन मनाने बच्चों के षोडश संस्कारी के लिए परिवार गोष्ठियों की व्यवस्था करें- पर्व त्यौहारों पर सामूहिक जन सम्मेलन बुलाये। रामायण आदि की कथा कहें। इस प्रकार बढ़े हुए संपर्क का उपयोग मिशन की कार्य पद्धति का स्वरूप समझाने और उसके प्रति सहानुभूति आकर्षित करें। युग निर्माण योजना की सदस्यता की शर्त दस पैरा तथा एवं घन्टा समय नियमित रूप से लगा है। ऐसे सदस्य इस संपर्क क्षेत्र में निरन्तर बढ़ते ही रहेंगे उन स्थानीय सदस्यों की सहायता से विचार क्रान्ति अभियान के अंतर्गत आने वाले सभी शिक्षण परक रचनात्मक एक सुधारात्मक कार्यक्रम गतिशील होंगे।
व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण एवं समाज निर्माण की शत सूची योजना में बौद्धिक नैतिक एवं सामाजिक क्रान्ति के सभी तत्वों का समावेश हैं जन-मानस के परिष्कार एवं सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन का विशाल कार्य क्षेत्र सृजन शिल्पियों के सामने है। कहाँ की स्थिति में क्या कार्य, किस स्तर पर आरम्भ किया और आगे बढ़ाया जा सकता है इसका दिशा निर्धारण तो पहले से भी हो सकता है, व्यवहार में कब, कहाँ, क्या किया जा सकता है इसका निर्णय, निर्धारण सामयिक सूझबूझ ही करेगी।सृजन के असंख्यों पक्षों में से जहाँ जो, जितना जन पड़े वह करना ही चाहिए। इसमें स्थानीय सहयोगियों की योग्यता एवं अभिरुचि को भी महत्व देना होगा।
ऊपर की पंक्तियों में मात्र उस कार्य पद्धति की चर्चा है जो शक्ति पीठों के केन्द्र स्थानों में-परिव्राजक मण्डली द्वारा-संपर्क क्षेत्रों में प्रथमतः क्रियान्वित होगी। यह आरम्भिक उपक्रम है। सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने के लिए आदर्शवादी एवं सेवा-भावना व्यक्तियों को अपने-अपने ढंग से कुछ करने के लिए प्रोत्साहित किया जायेगा। लोभ, मोह की वितृष्णा में उलझी हुई प्रतिभाएं इस नव सृजन की ओर मुड़ने लगे-संकीर्ण स्वार्थपरता पर अंकुश लगाने लगे तो नव सृजन के लिए आवश्यक क्षमता का उत्पादन प्रचुर परिमाण में हो सकता है और उसके सहारे इतना कुछ हो सकता है जितना किसी समर्थ शासन अथवा सुविस्तृत संगठन के लिए भी संभव नहीं है।
आरम्भ हिन्दू धर्म के कार्य क्षेत्र से किया गया है क्योंकि मिशन के सूत्र संचालकों का सहज संपर्क उसी समुदाय के साथ है। यह शुभारम्भ की सरलता भर है। इसे बन्धन न समझा जाय। युग सृजन का अभियान जाति,धर्म एक देश की परिधि तक सीमित नहीं रखा जा सकता। वह सार्वभौम एक सर्वजनीन है। अस्तु परिधि बन्धनों से आगे बढ़ने और दृष्टिकोण एवं कार्य क्षेत्र को निरन्तर व्यापक बनाया जाता रहेगा। उस आलोक में सभी देशों, धर्मों एवं जातियों को नव-जीवन प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। शिक्षा, उद्योग, स्वास्थ्य, सहयोग जैसे सभी महत्वपूर्ण प्रयोजनों को प्रगतिशील प्रोत्साहन मिलेगा। अवांछनियताओं, अनैतिकताओं, मूढ़-मान्यताओं, अन्ध परम्पराओं एवं कुरीतियों की विभीषिकाएं मानवी पतन और पराभव का प्रधान कारण बनी हुई है। उनके साथ संघर्ष करने का कार्य भी सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों के समतुल्य ही महत्वपूर्ण एवं आवश्यक है। इस पक्ष की उपेक्षा नहीं की जा सकती। लंका दहन और समुद्र सेतु बाँधने की दोनों योजनाएं एक ही महान लक्ष्य के अविछिन्न अंग है। इसे आरम्भ से ही ध्यान में रखा गया है और अन्त तक तथ्यों को दृढ़ता पूर्वक अपनाया जाता रहेगा।
नव सृजन का कार्य निश्चित रूप से बहुत बड़ा है उसके लिए धर्म, समय एवं मनोयोग के अतिरिक्त साधनों की भी आवश्यकता पड़ेगी ही। इसका स्त्रोत बूँद-बूँद से घड़ा भरने की लोक श्रद्धा के साथ जोड़ा गया है। दस पैसा रोज के ज्ञान घट-मुट्ठी-मुट्ठी भर अनाज जमा करने वाले धर्म घट की मिशन की आवश्यकता पूरी करते रहेंगे। लोक शक्ति जगेगी तो सत्प्रयोजनों में लोक श्रद्धा की भी कमी नहीं रहेगी। विकृत धर्म तन्त्र को जब इतना विलासी और अपव्ययी परिपोषण मिल रहा हैं तो कोई कारण नहीं कि जीवन्त धर्म धारणा को इस धर्म प्राण देश में अपनी स्वल्प आवश्यकताएं जुटाने में असफल रहना पड़े। सरकारी अथवा साधन संबंधों की अपेक्षा न करते हुए इतना बड़ा श्रम साध्य, साधन साध्य, कार्य जिस महाकाल की प्रेरणा से आरम्भ हुआ हैं। वह लोक-श्रद्धा के साथ बरसाने वाले साधनों की भी व्यवस्था करेगा। यह विश्वास ही अपने बजट एवं कार्यक्रम में सुदृढ़ और सुनिश्चित आधार है।
प्रेम के जागृत होने का यह अर्थ नहीं है कि हम मधुरता और सुख में ही विचरण करें, किन्तु इस जागृति से हमें उन वीरोचित प्रयत्नों का जागरण हो जहाँ मृत्यु से जीवन को अमरता प्राप्त होती है और कष्ट-सहन के द्वारा वास्तविक आनन्द मिलता है। -टैगोर
प्रगति के मार्ग में अवरोध का- विशेषतया श्रेष्ठ सम्भावनाओं में अड़चने आने का अपना इतिहास है, जिसकी पुनरावृत्ति अनादिकाल से होती रहीं हैं। जिस प्रकार आसुरी सक्रमणों को निरस्त करने के लिए दैवी सन्तुलन की सृजन शक्तियों का अवतरण होता हैं उसी प्रकार श्रेष्ठता की अभिवृद्धि को आसुरी तत्व सहन नहीं कर पाते। उसमें अपना पराभव देखते हैं और बुझते समय दीपक के अधिक तेजी के साथ जलने की तरह अपनी दुष्टता का परिचय देते हैं। मरते समय चींटी के पंख उगते हैं। पागल कुत्ता जब मरने को होता हैं तो तालाब में डूबने को दौड़ता हैं। पागल हाथी पर्वत पर आक्रमण करता हैं और उससे टकरा-टकराकर अपना सिर फोड़ लेता हैं। आसुरी तत्व भी जब अन्तिम साँस लेते हैं और एक वारगी मरणासन्न की तरह उच्छास खींचकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते है। अवतारों में पुष्प-प्रक्रियाओं भी निर्बाध रीति से बिना किसी अड़चन के सम्पन्न नहीं हो तो जाती, उसमें पग-पग पर अवरोध और आक्रमण आड़े आते है।
भगवान कृष्ण पर जन्म काल से ही एक के बाद एक आक्रमण हुए। वसुदेव जब उन्हें टोकरी में रखकर गोकुल ले जा रहें थे तो सिंह गर्जन, घटाओं का वर्षण, सर्पों का आक्रमण जैसे व्यवधान उत्पन्न हुए। इसके बाद पूतना, वृत्तासुर, तृणावत, कालिया, सर्प आदि द्वारा उनके प्राण हरण की दुरभिसन्धियाँ रची जाती रही। कस, जरासंध, शिशुपाल जैसे अनेकों शत्रु बन गये। चारुढ़, मुष्टिकासुर आदि ने उन पर अकारण आक्रमण बोले। अन्ततः भीलों ने गोपियों का हरण-व्याध द्वारा प्रहार करने जैसी घटनाएं घटित हुई।
कृष्ण की चरित्र-निष्ठा और न्याय-निष्ठा उच्च स्तरीय थी तो भी उन्हें रुक्मिणी चुराने का दोष लगाया गया। चरित्र हनन की चोट भगवान राम को भी सहनी पड़ी। सीता जैसी सती को लोगों ने दुराचारिणी कहा और अग्नि परीक्षा देने के लिए विवश किया। अपवादियों के दोषारोपण फिर भी समाप्त नहीं हुए और स्थिति यहाँ तक आ पहुंची कि सीता परित्याग जैसी दुःखदायी दुर्घटना सामने आई। जयंती ने सीताजी पर अश्लील आक्रमण किया। सूर्पणखा राम के स्तर को गिरा कर असुरों के समतुल्य ही बनाना चाहती है। चाहना अस्वीकार करने पर उसने जो विपत्ति ढाई वह सर्वविदित है। सत्यता और कर्त्तव्यों के प्रति राम के व्यवहार में कहीं अनौचित्य नहीं था। फिर भी उसने वह षड़यंत्र रचा जिससे उन्हें चौदह वर्ष के एकाकी वनवास में प्राण खो बैठने जैसा ही त्रास सहना पड़ा। खरदूषण, मारीच, अहिरावण, रावण, कुम्भकरण ने आक्रमण पर आक्रमण किये इनमें से किसी से भी राम की ओर से पहल नहीं हुई थी। वे तो मात्र आत्म-रक्षा की ही लड़ाई लड़ते रहे।
ईसा को अपराधी ठहराया और शूली पर लटकाया गया। सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ा। दयानन्द को विष दिया गया। गाँधी को गोली से उड़ाया गया। व्याध ने कृष्ण के प्राण हरण किये। गुरु गोविंद सिंह के अबोध बालकों को जल्लादों के सुपुर्द किया गया। मीरा निर्दोष होते हुए भी उत्पीड़न सहती रहीं। जहाँ तक अपराधों, आक्रमणों और प्रताड़नाओं का सम्बन्ध हैं वहाँ तक जो जितना उच्चस्तरीय आत्मवेत्ता हुआ है उसे उतना ही अधिक भार सहन करना पड़ा है। भगवान बुद्ध की जीवन गाथा पढ़ने से पता चलता है कि पुरातन पंथी और ईर्ष्यालु उनके प्राणघाती शत्रु बने हुए थे। उन्होंने अंगुलिमाल को आक्रमण के लिए उकसाया था। चरित्र हनन के लिए ढेरों दुरभिसंधियाँ रची थी। समर्थकों में अश्रद्धा उत्पन्न करने के लिए जो षड़यन्त्र रचे जा सकते थे उसमें कुछ कसर नहीं छोड़ी गई थी। गाँधी को विरोध होता रहा। उन पर पैसा बटोरने और हड़पने का लांछन लगाने वालों की संख्या आरम्भ में तो अत्यधिक थी, प्रताप बढ़ने के बाद ही वह घटने लगी थी। अन्ततः उन्हें गोली से ही उड़ा दिया गया। मध्यकाल में सन्तों में से प्रायः प्रत्येक को शत्रुओं की प्रताड़नाएं सहनी पड़ी हैं। आद्य शंकराचार्य, चैतन्य महाप्रभु, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, रामदास, गुरु गोविंदसिंह, बन्दा वैरागी आदि इसके जी-जागते प्रमाण हैं।
संसार के सुधारकों में प्रत्येक को प्रायः ऐसे ही आक्रमण न्यूनाधिक मात्रा में सहने पड़े है। संगठित अभियानों को नष्ट करने के लिए कार्यकर्त्ताओं में फूट डालने, बदनाम करने, बल प्रयोग से आतंकित करने, जैसे प्रयत्न सर्वत्र हुए है। ऐसा क्यों होता है यह विचारणीय हैं। सुधारक पक्ष को अवरोधों का सामना करने पर उनकी हिम्मत टूट जाने, साधनों के अभाव से प्रगति क्रम शिथिल या समाप्त हो जाने जैसे प्रत्यक्ष खतरे तो हैं, किन्तु परोक्ष रूप से इसके लाभ भी बहुत हैं। व्यक्ति की श्रद्धा एवं निष्ठा कितनी सच्ची और कितनी ऊँची हैं इसका पता इसी कसौटी पर कसने से लगता हैं कि आदर्शों का निर्वाह कितनी कठिनाई सहन करने तक किया जाता रहा। अग्नि तपाये जाने और कसौटी पर कसे जाने से कम में, सोने के खरे-खोटे होने का पता चलता ही नहीं। आदर्शों के लिए बलिदान से ही महा-मानवों की अन्तःश्रद्धा परखी जाती है और उसी अनुपात से उनकी प्रामाणिकता को लोक-मान्यता मिलती हैं। जिसे कोई कठिनाई नहीं सहनी पड़ी ऐसे सस्ते नेता सादा सन्देह और आशंका का विषय बने रहते हैं। श्रद्धा और सहायता किसी पर कभी पर तभी बरसती हैं जब वह अपनी निष्ठा का प्रभाव प्रतिकूलताओं से टकरा कर प्रस्तुत करता हैं।
दुरभिसंधियों के रचने वाले हर सफलता के बाद साहस के साथ अपने दुष्कर्मों को निर्द्वंद्व होकर बढ़ाते है। निष्ठावानों से टकराने पर उनके दाँत खट्टे होते है। आक्रमण महंगा पड़ता है और भविष्य के लिए उनकी हिम्मत टूट जाती हैं। लोक तिरस्कार के कारण वे मुँह दिखाने लायक नहीं रहते। यह उदाहरण दूसरों के सामने भी प्रस्तुत होता हैं और श्रेष्ठता से अकारण टकराने का प्रतिफल क्या होता हैं इसका पता न केवल आततायियों को वरन् उस वर्ग के अन्य लोगों का साहस तोड़ने के लिए भी पर्याप्त होता हैं। अपयश और तिरस्कार का दण्ड जेल फाँसी से भी महंगा पड़ता है। ऐसी स्थिति श्रेष्ठ व्यक्तियों या आन्दोलनों से ही टकराने पर बनती हैं। सामान्य लोगों के बीच तो आक्रमण प्रत्याक्रमण के क्रम आये दिन चलते ही रहते हैं।
अन्ध श्रद्धाओं का समर्थन भी जोखिम भरा हैं। किसी के साथ अनगढ़ अधकचरे, अपरिपक्वों की मण्डली हो तो वह उसे जन-शक्ति समझने की भूल करता रहता है। किसकी श्रद्धा एवं आत्मीयता कितनी गहरी है, इसका पता चलाने का एक मापदण्ड यह भी हैं कि अफवाहों या आरोपों पर तो विश्वास कर लिया जाय, किन्तु सदाशयता पक्षधर अनेकानेक घटनाओं का क्षण भर में भुला दिया जाय। जो अफवाहों की फूँक से उड़ सकते हैं वे वस्तुतः बहुत ही हलके और उथले होते है। ऐसे लोगों का साथ किसी बड़े ही प्रयोजन के लिए कभी कारगर सिद्ध नहीं हो सकता। उन्हें कभी भी, कोई भी, कुछ भी कहकर विचलित कर सकता है। ऐसे विवेकहीन लोगों की छँटनी कर देने के लिए कुचक्रियों द्वारा लगाये गये आरोप या आक्रमण बहुत ही उपयोगी सिद्ध होते है। योद्धाओं की मण्डली में शूरवीरों का स्तर ही काम आता है, शंकालु, अविश्वास, कायर प्रकृति के सैनिकों की संख्या भी पराजय का एक बड़ा कारण होती हैं। ऐसे मूढ़मतियों को अनाज में से भूसा अलगकर देने की तरह यह आक्रमणकारिता बहुत ही सहायक सिद्धा होती हैं। दूरभिसंधियां के प्रति जन-आक्रोश उभरने से सहयोगियों का समर्थन और भी अधिक बढ़ जाता हैं उस उभार से सुधारात्मक आन्दोलनों का पक्ष सबल ही होता है। कुसमय पर ही अपने पराये की परीक्षा होती हैं। इस कार्य को आततायी जितनी अच्छी तरह सम्पन्न करते हैं उतना कोई और नहीं। अस्थिर मति और प्रकृति के साथियों से पीछा छूट जाना और विवेकवानों का समर्थन सहयोग बढ़ना जिन प्रतिरोधों के कारण सम्भव होता हैं वह आक्रमणों को उत्तेजना उत्पन्न हुए सम्भव ही नहीं होता।
प्रज्ञावतार ही निष्कलंक अवतार हैं। उसके प्रतिपादनों और समर्थकों को लोक श्रद्धा कैसे मिले? इसके रचनात्मक आधार तो कितने ही हैं, पर एक विरोधात्मक आधार भी हैं .. आसुरी आक्रमण। इसके पश्चात् ही किसी महान् व्यक्ति या आन्दोलन को प्रौढ़ता का पता चलता हैं। कलंक कालिका का दौर और अवरोध आक्रमणों का क्रम ही वह स्थिति उत्पन्न करेगा। जिससे निष्कलंक भगवान का सर्वत्र जय-जयकार होने लगे।
यह क्रम अपने अभियान में भी निश्चित रूप से चलेगा। चलता भी रहा है। प्रतिगामी निहित स्वार्थ द्वारा तरह-तरह के आक्षेप लगाये जाते रहे हैं। बदनाम करने का कोई अवसर उन्होंने नहीं छोड़ा। अश्रद्धा उत्पन्न करने के लिए जो कुछ कहा जा सकता था - जो कुछ किया या कराया जा सकता था, उसमें की कुछ कमी नहीं रहने दी गई हैं। यह सारा उत्पात उन आसुरी तत्वों हैं जो अवांछनियताओं की सड़ी कीचड़ में ही डाँस, मच्छरों की तरह अपनी जिन्दगी देखते हैं। कुछ ईर्ष्यालु हैं, जिन्हें अपने अतिरिक्त किसी अन्य का यश वर्चस्व सहन ही नहीं होता। इसके अतिरिक्त सड़े टिमाटरों का भी एक वर्ग हैं जो पेट में रहने वाले कीड़ों की-चारपाई पर साथ सोने वाले खटमलों की-आस्तीन में पलने वाले साँपों की तरह आश्रय पाते हैं वहीं खोखला भी करते हैं। बिच्छू अपनी माँ के पेट का माँस खाकर ही बढ़ते और पलते हैं, माता का प्राण हरण करने के उपरान्त ही जन्म धारण करते हैं। कृतघ्नों और विश्वासघातियों का वर्ग इस युग में जिस तेजी से पनपा हैं उतना संभवतः इतिहास भी इससे पहले कभी भी नहीं देखा गया।
अवाँछनीयता हर क्षेत्र में अड्डा डाले और जड़ जमाये बैठी हैं। युग परिवर्तन की प्रक्रिया भी उसे उखाड़ने की उसी क्रम अनुपात से चलेगी जिससे कि सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन। ऐसी दिशा में दुष्प्रवृत्तियों के सामने जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित होगा। अभियान को जब तक दुर्बल समझा जायगा तब तक उसे उपहास उपेक्षा का पात्र बने रहने दिया जायगा। व्यंग तिरस्कार बरसते रहेंगे। किन्तु जब उसकी समर्थता और सफलता का आभास होने लगेगा तो विरोध एवं आक्रमण का सिलसिला चल पड़ेगा। अन्ततः वह देवासुर संग्राम उतना ही प्रचण्ड हो जायगा जितना कि सृजन प्रत्यावर्तन। इसके लिए प्रत्येक सृजन शिल्पी को पहले से ही तैयार रहना होगा। किसान का मुख्य काम अन्न उपजाना है, विभुक्षा का समाधान करना हैं। तो भी उसे इस कार्य क्षेत्र में आये दिन सर्प, बिच्छुओं, दीमकों, सुअर, भेड़ियों से मुठभेड़ के साधन सँजोकर रखने होते हैं। स्वयं श्रेष्ठ कर्म से निरत हैं। यह इस बात की गारंटी नहीं कि दुष्ट दुरात्माओं के आक्रमण होंगे ही नहीं। सज्जनता सामने से ही अनाक्रम दीखती है, पर परोक्ष रूप से उसमें भी दुष्टता की विघातक सामर्थ्य परिणाम में भरी पड़ी है। असुर वस्तुस्थिति को समझता हैं इसलिए देव पर कुछ प्रत्यक्ष कारण न रहने पर भी आक्रमण करने से चूकता नहीं। प्रकाश के उदय में अन्धकार की मृत्यु है। इसलिए सूर्योदय से पूर्व एक बार सघन तमिस्रा जमा होती है और प्रकाश से जूझने का उपक्रम करती हैं, भले ही उसे अन्ततः मुँह की ही क्यों न खानी पड़े।
युग निर्माण अभियान की प्रज्ञावतार प्रक्रिया उन समस्त सम्भावनाओं से भरी हुई है। सहयोग उसे प्रचुर परिणाम में मिलना हैं किन्तु ऐसी घटनाएँ भी कम नहीं होंगी जा प्रत्यक्ष आक्रमण में कठिनाई और परोक्ष दुरभिसन्धि रचने में सरलता देखकर उसी मार्ग को अपनाये। अन्तः क्षेत्र से उभरने वाले और बाहरी क्षेत्र से आक्रमण करने वाली दोनों ही स्तर की दुरभिसन्धियों से अभियान की सुरक्षा का प्रबन्ध करना चाहिए। इस संदर्भ में बरती जाने वाली जागरूकता, साहसिकता एवं शूर-वीरता उतनी ही आवश्यक हैं जितनी कि सृजन प्रयोजनों के लिए बरती जाने वाली उदार सेवा-साधना एवं भाव भरी परमार्थ परायणता।
प्रत्येक जागृत आत्मा को यह अनुभव करना चाहिए कि यह परिवर्तन की परम पुनीत साध्य बेला हैं। अवांछनीयता की तमिस्रा अब तक में समाप्त होने जा रही है। ऊषा की अरुणिमा सम्मुख है। नवयुग का अरुणोदय होने में देर नहीं। उदीयमान आलोक प्रज्ञावतार है। इसके प्रकाश में हर किसी की आँखें वस्तुस्थिति को देख समझ सकने में समर्थ होंगी। अन्धकार में ही भ्रांतियां और विकृतियाँ पनपता रहता है। निशाचरों की उसी स्थिति में बन आती है। प्रभात के उपरान्त कण-कण में चेतना उभरती है। सृजनात्मक हलचलों से प्रगति के चिन्ह हर दिशा में दृष्टिगोचर होते है। उदीयमान ऊर्जा कण-कण की नव जीवन प्रदान करती है। अन्धकार का प्रकाश में प्रत्यावर्तन सब कुछ उलट पलट कर रख देता है। परिस्थितियाँ सर्वथा भिन्न स्तर की बन जाती है। इन दिनों भी ऐसा ही कुछ होने जा रहा है।
युगान्तरीय चेतना ऐसे आधार खड़े कर रही है; जिससे भ्रान्तियों और विकृतियों को देर तक पैर टिकाये रहना सम्भव न हो सकेगा। उनका पलायन निश्चित है। हर व्यक्ति को सत्य और तथ्य जानने की जिज्ञासा है। अनौचित्य निहित स्वार्थ को ही छाई रहती है। भले ही विवशता में कुछ भी सहन और वहन करना पड़ता हो। जागृति के युग में तथ्य उभरते है और लोक मानस को प्रभावित करते है। पानी और हवा के प्रवाह जब अपने साथ हल्का भारी बहुत कुछ बहाते और उड़ाते रहते है तो कोई कारण नहीं कि युग प्रवाह में औचित्य का समर्थन करने वाले तत्व एक ही दिशा में न बहने लगे। जागृत आत्माओं की हर महत्वपूर्ण अवसर पर शानदार भूमिका रही है। प्रस्तुत युग संध्या में वे निष्क्रिय बने बैठे रहें, यह हो ही नहीं सकता। प्रत्येक देव मानव को इस पुनीत पर्व पर अपनी उपयुक्त भूमिका निभानी होगी। इसके लिए महाकाल की प्रेरणा उन्हें विवश करेगी। जो आनाकानी करेंगे वे आत्म-ताड़ना का दुसह दुःख सहेंगे।
संध्या काल को उपासना कृत्यों के लिए सुरक्षित रखा जाता है। अन्य समय अन्य कामों के लिए होते है पर प्रातःकाल तो आलस्य त्यागने, शौच शुद्धि में लगने एवं आत्म चिन्तन करने के लिए नियत रहता है। नव जागरण की पुण्य-बेला ऐसे ही विशेष कर्तव्य और उत्तरदायित्वों के निर्वाह के परिपालन की प्रेरणा देता है। जागृत आत्माएं तो उसके लिए एक प्रकार से महाकाल द्वारा बलात् प्रेरित की जाती है। इन दिनों भी ठीक वैसा ही हो रहा है। प्राणवानों को समय की माँग और पुकार को सुनने तथा तदनुकूल कार्यक्रम बनाने के लिए कटिबद्ध होते देखा जा रहा है।
युग निर्माण परिवार के प्राणवान परिजनों को इन दिनों सृजन शिल्पी की भूमिका निभानी चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि भौतिक ललक लिप्साओं पर नियन्त्रण किया जाय। लोभ, मोह के बन्धन ढीले किये जाये। संकीर्ण स्वार्थपरता को हलका किया जाय। पेट और प्रजनन भर के लिए जीवन की सम्पदा का अपव्यय करते रहने की आदत को मोड़ा-मरोड़ा जाय। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह पर्याप्त समझा जाय। महत्वाकाँक्षाओं की दिशा बदली जाय। वासना, तृष्णा और अहंता के आवेश शिथिल किये जांयें। युग धर्म के निर्वाह के लिए कुछ बचत इसी परिवर्तन से हो सकती है। परमार्थ तभी बन पड़ता है जब स्वार्थ पर अंकुश लगाया जाय। ब्राह्मणत्व और देवत्व की गरिमा स्वीकार करने और उच्चस्तरीय आदर्शों को व्यवहार में उतारने के साहस जुटाने का यही अवसर है। उसे चूका नहीं जाना चाहिए। युग पर्व के विशेष उत्तरदायित्वों की अवमानना करने वाले जीवन्त प्राणवानों को चिरकाल तक पश्चाताप की आग में जलना पड़ता है। देव मानवों की बिरादरी में रहकर कायरता के व्यंग, उपहास सहना जितना कठिन पड़ता है उतना उच्च प्रयोजन के लिए त्याग बलिदान को जोखिम उठाना नहीं।
जिनकी अन्तरात्मा में ऐसी अन्तः प्रेरणा उठती हो वे उसे महाकाल प्रेरित युग चेतना का आह्वान उद्बोधन समझें और तथाकथित बुद्धिमानों और स्वजनों की उपेक्षा करके भी प्रज्ञावतार का अनुकरण करने के लिए चल पड़े। इसमें इन्हें प्रथमतः ही प्रसव पीड़ा की तरह कुछ अड़चन पड़ेगी, पीछे तो सब कुछ शुभ और श्रेय ही दृष्टि-गोचर होगा।
ज्ञानयज्ञ के लिए समयदान यही है-प्रज्ञावतार की जागृत आत्माओं से याचना। उसे अनसुनी न किया जाये। प्रस्तुत क्रिया-कलाप पर नये सिरे से विचार किया जाय उस पर तीखी दृष्टि डाली जाय और लिप्सा में, निरत जीवन क्रम में साहसिक कटौती करके उस बचत को युग देवता के चरणों पर अर्पित किया जाय’। सोने के लिए सात घन्टे, कमाने के लिए आठ घन्टे, अन्य कृत्यों के लिए पाँच घन्टे लगा देगा साँसारिक प्रयोजनों के लिए पर्याप्त होना चाहिए। इनमें 20 घण्टे लगा देने के उपरान्त चार घण्टे की ऐसी विशुद्ध बचत हो सकती है जिसे व्यस्त और अभावग्रस्त व्यक्ति भी युग धर्म के निर्वाह के लिए प्रस्तुत कर सकता है। जो पारिवारिक उत्तरदायित्वों से निवृत्त हो चुके है-जिन पर कुटुम्बियों की जिम्मेदारियाँ सहज ही हलकी है जिनके पास संचित पूँजी के सहारे निर्वाह क्रम चलाते रहने के साधन है, उन्हें तो इस सौभाग्य के सहारे परिपूर्ण समय दान करने की ही बात सोचनी चाहिए। वानप्रस्थों की परिव्राजकों की-पुण्य परम्परा क अवधारणा है ही-ऐसे सौभाग्यशालियों के लिए। जो जिस भी परिस्थिति में हो समयदान की बात सोचें और उस अनुदान को नव जागरण के पुण्य प्रयोजन में अर्पित करें।
प्रतिभा, कुशलता, विशिष्टता से सम्पन्न कई विभूतिवान व्यक्ति इस स्थिति में होते है कि अनिवार्य प्रयोजनों में संलग्न रहने के साथ-साथ ही इतना कुछ कर या करा सकते है कि उतने से भी बहुत कुछ बन पड़ना सम्भव हो सके। उच्च पदासीन, यशस्वी, धनी-मानी अपने प्रभाव का उपयोग करके भी समय की माँग पूरी करने में अपनी विशिष्ट भूमिका निभा सकते हैं। विभूतिवानों का सहयोग भी, अनेकबार कर्मवीर समय-दानियों जितना ही प्रभावोत्पादक सिद्ध हो सकता है।
नव सृजन के लिए साधनों की भी आवश्यकता रहेगी ही। भौतिक प्रयोजनों में तो अर्थ साधन ही प्रधान होते है किन्तु प्रवाह बदलने जैसे अध्यात्म अभियान के लिए भी अन्ततः साधन तो चाहिए ही। यों श्रम, समय मनोयोग, भाव सम्वेदन जैसे तथ्यों की ही युग परिवर्तन में प्रमुखता मानी जायेगी। फिर भी अर्थ साधनों के बिना उन्हें भी कार्य रूप में परिणित कर सकना सम्भव नहीं हो सकेगा। वस्तुएँ तो इस निमित्त भी चाहिए ही। सामान्य निर्माण कार्यों के लिए साधन जुटाने पड़ते हैं फिर इस महानतम कार्य के लिए साधनों के बिना ही काम चलता रहे ऐसा सम्भव नहीं।
यह आवश्यक भी जागृत आत्माओं को ही पूरी करनी होगी। वैयक्तिक कार्यों में कटौती करके ही युग धर्म के लिए समयदान की व्यवस्था बन सकती है। इसी प्रकार निजी खर्चों में कटौती करके ही युग की पुकार के निमित्त अर्थ साधन प्रस्तुत कर सकना सम्भव हो सकता है। उत्तराधिकारियों के लिए जो अनावश्यक धन सम्पदा छोड़ी जाती है, उस मोह ग्रस्तता पर अंकुश लगाने का तो हर दृष्टि से औचित्य है। निजी परिवार को ही सब कुछ मानते रहना और विश्व परिवार के लिए कुछ भी न करना, ऐसा व्यामोह है जो युग शिल्पियों के लिए अशोभनीय ही ठहरता है।
युग निर्माण परिवार के हर सदस्य को आरम्भ से ही एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य ज्ञान यज्ञ के लिए देते रहने की प्रेरणा दी गई है। वह दिशा निर्धारण युग शिल्पियों के लिए आरम्भिक एवं अनिवार्य कर्तव्य बोध की तरह था। अब उसमें उदात्त अभिवृद्धि का समय आगया। समय और धन दोनों ही अनुदानों का स्तर तथा परिमाण बढ़ना चाहिए। जिसे अपने अन्तरंग में जितनी युग चेतन, हलचल मचाती दिखाई पड़े उन्हें उतने से ही भाव-भरे अनुदान प्रस्तुत करने की तैयारी करनी चाहिए।
अपने युग की व्यापक और भयानक समस्याओं के आधारभूत कारण दो है। एक चेतना क्षेत्र में बढ़ती हुई असुरता और दूसरा भौतिक क्षेत्र में बढ़ती हुई विषाक्तता।
(1) आत्मिक क्षेत्र में बुद्धि विपर्यय एवं आस्था संकट। भ्रष्ट चिन्तन ने दुष्ट आचरण को बढ़ाया है और अवाँछनीयता को उच्छृंखलता के स्तर तक पहुँचने का अवसर मिला है। फलतः अनीति अपनाने में एक-दूसरे से आगे बढ़ना चाहता है। दुष्प्रवृत्तियाँ क्रमशः परम्परा बनती और मनुष्य स्वभाव में सम्मिलित होती जा रही है। फलतः अनीति की क्रिया-प्रतिक्रिया में भयंकर विक्षोभ हो रहे है। उत्पीड़न और विग्रह के फलस्वरूप अनेकानेक प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समस्याएँ उत्पन्न हो रही है। साथ ही ऐसा वातावरण भी बन रहा है जिसके फलस्वरूप दैवी विपत्तियों का टूटना और विनाश के अविज्ञात कारण बनना स्वाभाविक है, यह है चेतना क्षेत्र में बढ़ती हुई असुरता और उसकी प्रतिक्रिया।
(2) भौतिक क्षेत्र में विषाक्तता बढ़ने के कुछ तथ्य सर्वविदित है। वायु मण्डल में जिस तेजी से विघातक विष बढ़ता चला जा रहा है इसी जानकारी जन-साधारण को भले ही न हो, विश्व की परिस्थितियों पर बारीक की दृष्टि रखने वाले बुरी तरह चिन्तित हैं। बढ़ते हुए औद्योगिक संस्थान, कल-कारखानों से विषैला धुँआ प्रचुर परिमाण में निकलता हैं। रेल-मोटर आदि सवारियाँ इस कोढ़ में खाज बनकर उस विषाक्तता को बढ़ाने में और भी अधिक योगदान देती है। अब तक जो परमाणु विस्फोट हो चुके हे उनका विकिरण इतनी बड़ी मात्रा में मौजूद है जिनका मन्द प्रभाव अगली पीढ़ियों के लिए जीवन संकट उत्पन्न करेगा। नित नये विस्फोटों का सिलसिला रुक नहीं रहा है और अणु युद्ध की नंगी तलवार आये दिन मानवी अस्तित्व के सिर पर चमकती रहती है।
तीसरा नया सिलसिला अभी-अभी शुरू हुआ है बारह मंजिली इमारत जितनी विशालकाय और 85 टन भारी एक अन्तरिक्षीय प्रयोगशाला ‘स्काई लैब’ का मलवा जमीन पर गिरने का संकट लोक चिन्ता का विषय बना हुआ है। मलवा गिरने का स्थानीय संकट उतना बड़ा नहीं है जितना कि उसके कारण उत्पन्न हुआ प्रकृति गत असन्तुलन। उल्कापातों का प्रभाव सारे वातावरण पर पड़ता है और दूरगामी दुष्परिणाम उत्पन्न करता है। उसे प्राचीन और अर्वाचीन, खगोलवेत्ता समान रूप से स्वीकार करते है। गिरने से तात्कालिक हानि कितनी हुई यह छोटा प्रश्न है। चिन्ता का विषय यह है कि पृथ्वी के वायु मण्डल में छेद और विक्षोभ उत्पन्न करने वाले ऐसे अन्तरिक्षीय प्रहार कैसी प्रतिक्रिया उत्पन्न करते है। इस प्रकार के उपद्रव पृथ्वी और सूर्य के मध्यवर्ती ‘ओजने’ जैसे उपयोगी आच्छादनों को अस्त-व्यस्त कर सकते है और धरती की जीवनोपयोगी परिस्थिति में भयानक उथल-पुथल कर सकते है। संकट टला नहीं आरम्भ हुआ है। स्काईलैब इन नई श्रृंखला का अन्त नहीं वरन् श्री गणेश है। ऐसी ही छोटी बड़ी प्रयोगशालाएं प्रायः एक हजार की संख्या में पृथ्वी की परिक्रमा कर रही है। समयानुसार उनका बूढ़ा होना और मरना स्वाभाविक है। वे प्रेत अन्ततः धरती पर ही गिरेंगे और आये दिन स्काईलैब पतन की तरह चिन्ता का विषय बनेंगे। मृतक यान प्रेतों को धरती पर उतार-उतारकर लाने वाली अन्तरिक्षीय रेलगाड़ी कल्पना का विषय तो है पर जब तक नौ मन तेल जुटने पर राधा का नाच होगा तब इन प्रेतों का ताण्डव नृत्य विनाश की दिशा में इतना ताण्डव कर सकता है कि उसके संदर्भ में पश्चाताप करना ही शेष रह जाय।
गुत्थियाँ सूक्ष्म जगत की हैं। चेतना क्षेत्र और प्रकृति क्षेत्र दोनों की ही अपनी अदृश्य परिधि है। उसका प्रभाव प्रत्यक्ष जगत पर पड़ता हैं। इन अदृश्य क्षेत्रों में विपत्ति बरसने लगे और उसका उपचार भौतिक उपायों एवं साधनों से बन नहीं पड़ेगा। अदृश्य जगत का सूक्ष्म क्षेत्रों का परिशोधन समाधान अदृश्य स्तर की आत्मिक ऊर्जा के सहारे ही बन पड़ना सम्भव है।
इसी प्रक्रिया में अदृश्य प्रयत्नों की एक दूसरी कड़ी जुड़ती है। वह सूक्ष्म जगत के परिशोधन और अनुकूलन से संबंधित है। पिछले साल रजत जयन्ती वर्ष में गायत्री महा पुरश्चरण अभियान चला था। उसमें जप और हवन के धर्मानुष्ठान का व्यापक विस्तार हुआ। प्रायः 25 लाख व्यक्तियों ने उसमें भाग लिया। यों इनका रचनात्मक एवं भावनात्मक आधार भी था, किन्तु मूलतया उसे चेतना जगत के वातावरण/और प्रकृति जगत के वायु मण्डल के परिशोधन की सूक्ष्म प्रक्रिया भी समझी जा सकता है। यज्ञ में वायुमण्डल की और जप ध्यान से वातावरण की शुद्धि होती है। इन अदृश्य आधारों को गणित की तरह कागज प्रत्यक्ष दिखाना तो कठिन है, पर जो प्रतिक्रियाओं को देखकर तथ्यों का अनुमान लगाने पर विश्वास, करते है उन्हें यह जानने और मानने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि इन अदृश्य उपायों का अदृश्य जगत के अनुकूलन पर कितना उपयोगी प्रभाव हो सकता है। होता रहा है और हो रहा है।
उन प्रयासों को अगले दिनों भी जारी रखा जाना हैं। गायत्री महापुरश्चरण अभियान एक वर्ष तक सीमित न रखकर दो वर्ष का घोषित किया जा चुका है। वह श्रृंखला आगामी गायत्री जयन्ती तक जून 80 तक चलेगी। इस अवधि में नये स्थानों पर विशिष्ट जोर दिया जायेगा। यों जहाँ इस वर्ष पुरश्चरण हो चुके वहाँ भी फिर से उसे करने पर कोई रोक नहीं है, पर क्षेत्र-विस्तार और नये व्यक्तियों तक आलोक पहुँचाने की दृष्टि से नई जगहों में जप हवन से संबंधित पुरश्चरण योजना को अग्रगामी बनाया जाना अधिक उपयुक्त है।
नये स्थानों पर छोटे आयोजन ही सरल पड़ते है। इसलिए गत वर्ष जिस प्रकार 25 कुण्डी आयोजनों की प्रधानता रही है वैसी इस वर्ष न रहेगी। समर्थ शाखाओं के लिए 25 कुण्डी आयोजन कुछ कठिन न थे। पुराने संगठन के बल पर उन्होंने उन्हें सरलतापूर्वक सम्पन्न भी कर लिया, पर नई जगहों में नये व्यक्तियों से वैसी अपेक्षा नहीं की जा सकती। अतएव इस वर्ष दस लाख जप और नौ कुण्डी के महापुरश्चरण आयोजनों का ही क्रम चलेगा। यो 5 लाख जप और पाँच कुण्डी यज्ञ वाले छोटे और 25 लाख जप तथा पच्चीस कुण्डी यज्ञों वाले आयोजन भी जहाँ तहाँ होते रहेंगे, पर प्रधानता नौ कुण्डी आयोजनों की ही रहेगी।
गत वर्ष जहाँ आयोजन हुए हैं, जिनने उन्हें सम्पन्न कराया है; उन पर उत्तरदायित्व सौंपा गया है कि अभी से समीपवर्ती क्षेत्रों का दौरा करें- धार्मिक प्रकृति के नये लोगों से संपर्क करें। तथ्य समझाये और श्रद्धा उभारें। वर्षा ऋतु समाप्त होते ही नये आयोजनों की नई श्रृंखला चल पड़नी चाहिए। आश्विन नवरात्रि से आरम्भ होकर चैत्र नवरात्रि तक के मध्यवर्ती छः महीनों में इन प्रयासों का अधिकांश भाग पूरा हो चुकेगा। ग्रीष्म ऋतु में भी कुछ तो हो ही सकते है, पर उनमें असुविधा बहुत रहती हैं। वस्तुतः मई, जून के दो महीने विशुद्ध रूप से तीर्थ यात्रा के हैं और उन्हें आयोजनों से नहीं जन-साधारण के लिए प्रव्रज्या अभियान के अंतर्गत तीर्थ यात्रा के रूप में ही प्रयुक्त होना चाहिए। इस वर्ष तक महापुरश्चरण आयोजन ग्रीष्म ऋतु में भी हुए हैं, पर अगले साल उन्हें आश्विन और चैत्र की नवरात्रियों के मध्य छः महीने की अवधि में ही पूरा कर लिया जायगा। इस संदर्भ में गुरुपूर्णिमा समाप्त होते ही नये वर्ष की नई योजना बननी प्रारम्भ हो गई है। समर्थ शाखाओं के प्रखर परिजनों ने अपने-अपने क्षेत्र में कार्य आरम्भ भी कर दिया है और तिथियाँ निश्चित करने के लिए गायत्री तपोभूमि के साथ संपर्क बनाने का गत वर्ष जैसा उपक्रम फिर आरम्भ हो गया है।
इस वर्ष इस संदर्भ में वातावरण, परिशोधन का नया प्रयास नये आधार पर नई तैयारी के साथ आरम्भ हुआ है। वह है- सुरक्षा प्रयोजन के लिए आरम्भ की गई पौन घण्टे की ध्यान धारणा। इसका प्रारम्भ 1 जुलाई से 31 जुलाई तक की अवधि में एक महीने के लिए स्काईलैब सुरक्षा के संदर्भ में हुआ है, पर यह इस एक महीने में ही समाप्त नहीं हो जाएगा; वह एक वर्ष तक आगे चलेगा। अन्तरिक्षीय मलवा गिरने से संकट का अन्त नहीं प्रारम्भ हुआ ह। साधना क्षेत्र के वरिष्ठ लोगों का ध्यान इस स्तर का पुरुषार्थ करने के लिए प्रथम बार आह्वान किया गया है। आत्म-बल के बलिष्ठों का सामूहिक शक्ति का अर्जन करने और उसे विश्व संकट के निमित्त झोंक देने का यह प्रथम प्रयोग और उसके परिणाम दोनों ही दृष्टि से सफल रहा है। संकट की जैसी आशंका थी वैसी सामने नहीं आई। स्वल्प कालीन सूचना पर इतनी तत्परता से कार्य संलग्न होने से जिस कठिनाई की आशंका थी वह निर्मूल सिद्ध हुई। गायत्री परिवार के चौबीस लाख साधकों में से अधिकाँश ने उसमें परिपूर्ण श्रद्धा के साथ भाग लिया। यह छोटे किन्तु विशिष्ट लोगों द्वारा सम्पन्न हुए आयोजन पूर्णतया सफल हुए।
आशंकाओं के पर्वत अभी भी जहाँ के तहाँ खड़े हैं। अशुभ संभावनाऐं भविष्य वक्ताओं के द्वारा ही नहीं प्रत्यक्ष का विवेचन करने वाले लोगों के प्रतिपादनों द्वारा भी स्पष्ट है। इनके निराकरण का आत्यंतिक उपाय आत्म शक्ति के दिव्य आयुधों का प्रयोग ही हो सकता है। अणु शक्ति जैसी विषाक्तताओं और विभीषिकाओं से लोहा लेने की सामर्थ्य, मात्र उसी में हैं।
जुलाई का सुरक्षा अनुष्ठान पूरा होते ही अब उसे नये सिरे से एक वर्ष के लिए और आगे संशोधित रूप से चलाने के लिए आत्म-बल के बलिष्ठों से कहा गया है। जुलाई से बड़े सामूहिक आयोजन एक स्थान पर एकत्रित होकर सम्पन्न किये गये और अन्त में हवन हुआ। अगले वर्ष सामूहिक रूप से तो यह प्रयोग होंगे पर आयोजनों के रूप में नहीं। प्रयोग सम्मिलित आत्म-शक्ति उभारने का है इसलिए होंगे तो सामूहिक ही पर समूहों को छोटे रूप में विभाजित रखा जायगा। न्यूनतम पाँच साधकों की इकाइयाँ बनेंगी। अधिकतम चौबीस की। यों कोई अकेले भी करना चाहे तो रोक नहीं, पर अभीष्ट प्रभाव न्यूनतम पाँच व्यक्तियों की संयुक्त साधना से ही इस परिमाण में सम्भव होगा कि व्यापक वातावरण को प्रभावित करने में कहने लायक योगदान द सकें।
जिनकी साधनाएं पिछले समय से निष्ठापूर्वक चलती रही है; ‘जो कई अनुष्ठान कर चुके और दूसरों को प्रेरणा देने में जिनकी प्रतिभा कारगर सिद्ध होती रही है; उन्हें ‘सुरक्षा साधना में अग्रणी होना चाहिए। साथी दूसरों को भी बना सकते हैं, सहयोग दूसरों से भी ले सकते हैं। किन्तु अग्रणी वरिष्ठों को ही करना चाहिए। ठीक नौ से सवा नौ बजे तक सस्वर गायत्री पाठ। सवा नौ से पौने दस तक आधा घण्टा ध्यान। सर्दियों में यह समय एक घण्टे पहले खिसका दिया जायगा। इस साधना का समय 1 अक्टूबर से फरवरी अन्त तक 8 से पौने नौ तक रहेगा। ध्यान प्रक्रिया इतनी ही है कि “गायत्री परिवार के लाखों सदस्य अपनी प्रचण्ड आत्म ऊर्जा एक साथ एक वारगी एक लक्ष्य की पूर्ति के लिए उत्पन्न कर रहे हैं। वह संकल्प-शक्ति ऊपर उठती है और अन्तरिक्ष की ऊँची परतों पर छतरी की तरह छा जाती है। इससे वातावरण एवं वायुमण्डल में भरे हुए दुरित धरातल पर गिरने से पूर्व ही रुक जाते हैं। संयुक्त आत्म-शक्ति का छाता उन्हें ऊपर ही रोक देता है। इतना ही नहीं इस छत्र उपकरण का प्रहर करके अदृश्य जगत पर छाई हुई विभीषिका को किसी अविज्ञात क्षेत्र में धकेल कर भावी विपत्तियों से बहुत हद तक परित्राण पाया जाता है।”
न्यूनतम पाँच-पाँच वरिष्ठ साधकों के ‘सुरक्षा यूनिट’ हर जगह बनने चाहिए। उनके साधना क्रम नियमित रूप से चल पड़ने चाहिएँ। ऐसे ‘यूनिट’ अपनी मण्डली को शान्ति कुँज से पंजीकृत करा लें ताकि उन्हें इस प्रयोग से काम आने वाली अभीष्ट सामर्थ्य अनुदान के रूप में नियमित रूप से मिलती रहे।
आशा की जानी चाहिए कि प्रज्ञावतार का यह ब्रह्मास्त्र युग विभीषिकाओं को निरस्त करने और उज्ज्वल भविष्य का अभिनव सृजन करने की दुहरी भूमिका सम्पन्न करेगा।
आज अन्य धर्म-परम्पराओं की भाँति तीर्थ यात्रा भी लक्ष्य विहीन और निहित स्वार्थों के अधीन बनकर रह गई है। साँस्कृतिक पुनरुत्थान में ‘तीर्थ सेवन’ की साधना को नया जीवन और नया प्रकाश मिलना अपेक्षित है। .... अभियान का आरम्भ तो शक्ति पीठों की प्रक्रिया तथा महापुरश्चरण आयोजनों की व्यवस्था के लिए नियोजित किया, गया पर अन्ततः उसका मूल उद्देश्य धर्म-प्रचार को संपर्क यात्रा के रूप में ही होना है। यही प्रयास तीर्थयात्रा है। तीर्थयात्रा की प्रव्रज्या प्रकारान्तर से अन्योन्याश्रित है।
तीर्थ स्थानों का निर्माण मात्रा इस प्रयोजन के लिए किया गया था कि धर्म प्रेमी कुछ समय प्राणवान वातावरण में निवास करें। अपना मानसिक भार हलका करें और भावी जीवन के लिए उपयुक्त प्रकाश तथा अनुदान प्राप्त करें। तीर्थ संचालक मनीषी, आगन्तुकों के निवास भोजन आदि का प्रबन्ध करते थे और उस स्वल्प अवधि को ही प्रवास आनन्द तथा प्रेरणाप्रद प्रशिक्षक को हर दृष्टि से मंगलमय बना देते थे। तीर्थयात्री, तीर्थ सेवन की प्रक्रिया पूरी करते लौटते थे तो प्रत्यक्ष परिवर्तन का पुण्य फल असंदिग्ध रूप से प्राप्त करते थे। आज की स्थिति लौटती है लोग धन, समय और धर्म विश्वास को बड़ी मात्रा गँवा कर ही वापिस लौटते हैं।
आवश्यक समझा गया कि तीर्थ सेवन को प्राचीन काल के पुनीत परम्परा के अनुकूल बनाया जाए। इसके लिए शान्ति-कुंज की गतिविधियों में एक नये प्रयोग का नये सिरे से समावेश किया जा रहा है। गायत्री नगर में 240 तीर्थयात्रियों के निवास, भोजन, पर्यटन तथा प्रशिक्षण का प्रबन्ध किया जा रहा है, अब तक महिला बच्चों समेत आने पर प्रतिबन्ध लगता रहा है। पर तीर्थ सेवन की व्यवस्था बन पड़ने पर यह प्रतिबन्ध सहज ही उठ जायगा। लोग प्रसन्नतापूर्वक अपने परिवार तथा सम्बन्धियों के साथ हरिद्वार आ सकेंगे। स्वच्छ निवास सस्ता भोजन, पर्यटन के लिए सुव्यवस्थित वाहन, साथ में उपयुक्त मार्गदर्शन का प्रबन्ध करने की नई व्यवस्था बनाई जा रही ही है। इस प्रयोजन के लिए 50 नये कमरे स्नान, शौच, बरामदा तथा रसोई बनाने की सुविधा समेत बनाये जाने हैं। इन कक्षों की लागत सात हजार .... गई है।
तीर्थ यात्रा सत्र पाँच-पाँच दिन के रहा करेंगे। प्रातः काल से लेकर दस बजे तक सभी को नित्य कर्म, साधना, यज्ञ, प्रशिक्षण भोजन आदि से निवृत्त करा दिया जायगा। दस से छः तक आठ घंटे में हरिद्वार क्षेत्र के दूर-दूर तक फैले हुए ज्ञात एवं अविज्ञात तीर्थों के दर्शन बस द्वारा करा दिये जायेंगे। न केवल दर्शन वरन् उनकी पूर्ण गाथा तथा प्रेरणा से भी यात्रियों को लाभान्वित कराया जाता रहेगा।
कितने ही लोग तीर्थों में प्रायश्चित करने, बच्चों के संस्कार कराने, मृतकों के अस्थि विसर्जन करने, श्राद्ध तर्पण आदि के उद्देश्य से आते हैं। वे कार्य विधिवत् भी नहीं हो पाते, लूट खसोट के जंजाल में फँसकर खीज और अश्रद्धा लेकर वापिस लौटते हैं। शान्ति कुंज की प्रस्तुत ‘तीर्थ सेवन, व्यवस्था में यह सभी प्रयोजन बिना किसी खर्च की परम्परा के अनुरूप सम्पन्न हो जाया करेंगे। व्यक्तिगत समस्याओं के संदर्भ में उपयुक्त मार्गदर्शन प्राप्त करने की जो व्यवस्था सदा से रही है वह इन तीर्थ यात्रियों को भी यथावत् उपलब्ध होती रहेगी।
ब्रह्मवर्चस् साधना सत्र एक-एक महीने के ब्रह्मवर्चस आरण्यक की सिद्धि पीठ में चला करेंगे। परिव्राजकों के न्यूनतम एक महीने के सत्र शान्ति कुंज में चला करेंगे। गायत्री नगर में कार्यकर्त्ताओं के परिवारों का निवास निर्वाह एवं प्रशिक्षण क्रम तो पूर्ण योजना के अनुरूप चलेगा ही, इसके अतिरिक्त खाली जगह में ‘तीर्थ सेवन’ के लिए उपयुक्त व्यवस्था बनाने का निश्चय किया गया है। इसके लिए न केवल निवास के लिए धर्मशाला जैसा स्थान बनाया जा रहा है वरन् सस्ते भोजन, नाई, धोबी दूध, आवश्यक सामान, वाहन आदि के आवश्यक साधन वहीं उपलब्ध रहें, ऐसा प्रबन्ध किया जा रहा है। पाँच सौ व्यक्तियों के एक साथ बैठ कर सत्संग करने तथा नौ कुण्डी यज्ञशाला बनाना, फुहारा तथा उद्यान भी इसी निर्माण योजना में सम्मिलित है।
गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व से इस योजना को कार्यान्वित करने का श्री गणेश कर दिया गया है। दिवाली या कार्तिकी पूर्णिमा से युग निर्माण परिवार के परिजनों को तीर्थ सेवन के लिए आमन्त्रित किया जा सकेगा। इस महंगे निर्माण में उदार धनीमानियों के सहयोग की अपेक्षा की गई है।
(1) युग निर्माण परिवार की समर्थ शाखाएँ इन दिनों अपने यहाँ गायत्री शक्ति पीठ स्थापित करने की संभावना पर गम्भीरता पूर्वक विचार करें और जहाँ सम्भव हो वहाँ उसके लिए साहसिक कदम बढ़ायें।
(2) परिजनों के प्रभाव क्षेत्र में जहाँ अधिक भूमि डडडड सुविधा वाले देवालय हों, वहाँ उन्हें गायत्री डडडड ट्रस्ट के लिए प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाय स्थापित देवता की पूजा अर्चना विधिवत होते रहने के साथ-साथ उन्हीं में थोड़ा नया निर्माण करके गायत्री प्रज्ञा पीठ बना लिया जायगा।
(3) समयदानी, वरिष्ठ, कनिष्ठ परिव्राजकों, टोली नायकों एवं कर्मठ कार्यकर्त्ताओं का प्रशिक्षण सन् 25 जुलाई से शान्ति कुंज में चल पड़ा है। यह न्यूनतम एक महीने का होगा। सुविधा और आवश्यकता के अनुरूप यह शिक्षण काल अधिक समय का भी हो सकता है। यह प्रशिक्षण भविष्य में निरन्तर चलता रहेगा। सृजन शिल्पी इस प्रशिक्षण को प्राप्त करने की तैयारी करें और अगले दिनों अपना स्थान सुरक्षित करायें।
(4) जहाँ गायत्री शक्ति पीठ एवं गायत्री प्रज्ञा पीठें बनेंगी, वहाँ प्रशिक्षित परिव्राजकों की अनिवार्य रूप से आवश्यकता पड़ेगी। इसके लिए क्षेत्रीय कार्यकर्ता ही उपयुक्त हो सकते हैं। इसके लिए जिन्हें उपयुक्त समझा जाय उनसे संपर्क साधा जाए।
(5) ब्रह्म वर्चस् आरण्यक के दार्शनिक अनुसंधान कार्य को विस्तार दिया जा रहा है। जहाँ विश्वविद्यालय अथवा समृद्ध पुस्तकालय हैं, वहाँ उच्च शिक्षित साथी सहकारी इस प्रयोजन के लिए ढूँढ़े और सदस्य बनाये जा रहे हैं। अखण्ड-ज्योति परिजनों में से जो इसके लिए अपने को उपयुक्त समझे वे सदस्यता प्राप्त कर अपना नाम पंजीकृत करा लें। इन सदस्यों का प्रथम विचार विनिमय सात दिवसीय सत्र दशहरा दिवाली की छुट्टियों में ता. 5 अक्टूबर से 11 अक्टूबर 76 तक शांतिकुंज में लगेगा। शोध सदस्यों को इसमें सम्मिलित होने के लिए कहा गया है।
(6) एक-एक मास के ब्रह्मवर्चस् साधना सत्र हर भारतीय महीनों की पूर्णिमा से पूर्णिमा तक लगा करेंगे। तारीखों की संगति बदलती रहती है। इसलिए जिन्हें जिस महीने आना हो वे तारीखों की जानकारी प्राप्त कर ले। इसमें सौम्य चांद्रायण व्रत, पंचकोशीय साधना, कुण्डलिनी जागरण सहित गायत्री उपासना का विधान रहेगा। व्यक्ति, विशेष की स्थिति के अनुरूप साधनाक्रम बनाया जाया करेगा। यह नया क्रम कार्तिकी पूर्णिमा ता. 4 नवम्बर से प्रारम्भ होगा। तब तक के सभी स्थान पूर्ण हो चुके हैं।
(7) कार्तिकी पूर्णिमा के उपरान्त शांतिकुंज में पाँच-पाँच दिन के तीर्थ सेवन सत्र लगाये जाया करेंगे। तीर्थ यात्रा के साथ साथ उपयोगी प्रेरणाएँ प्राप्त करने, अपने अनुकूल साधना का निर्धारण तथा प्रस्तुत समस्याओं के समाधान के निमित्त परिजन इनमें आते रहेंगे। व्यस्त लोगों को भी थोड़े दिन अपने प्रिय परिजनों के साथ आने की इस सुविधा का लाभ सभी परिजनों को मिलेगा। स्वभावतः इस निमित्त हजारों परिजन शान्ति कुंज आना और बहु सुविधा सम्पन्न आनन्द उठाना चाहेंगे।
इस नई योजना के लिए शांतिकुंज का वर्तमान स्थान सर्वथा अपर्याप्त है। नये कमरे गायत्री नगर में बनाने की योजना है इस निर्माण को सच्चे अर्थों में धर्मशाला या तीर्थ यात्रा भवन कहा जा सकेगा। दोनों ओर बरामदे 12 ×16 साइज का बड़ा कमरा-स्थान गृह, शौचालय समेत हर कमरा होगा जिसमें चार पाँच व्यक्तियों का एक परिवार आनन्दपूर्वक ठहर सकेगा। आवश्यकतानुसार अपना भोजन भी बना सकेगा। इन निवास कक्षों पर प्रायः सात हजार लागत आयेंगी। उदार परिजनों से एक-एक कमरा अपनी ओर से बनवाकर इस महती आवश्यकता को पूरा करने का अनुरोध किया गया है।
(8) व्यक्तिगत परामर्शों के सम्बन्ध में शांतिकुंज का पत्र व्यवहार अत्यधिक बढ़ रहा है। उधर पोस्टेज बढ़ गया है। ऐसी दशा में उत्तर प्राप्त करने के लिए जवाबी पत्र भेजने का अनुरोध नये सिरे से किया जा रहा है। परम्परा में इन दिनों शिथिलता बरती जाने लगी है। अब जवाबी पत्रों की बात विशेष रूप से ध्यान में रखी जानी चाहिए।
यही घड़ी है निर्माताओ! नवयुग के निर्माण की। आओ! नवयुग की प्रतिमा में करें प्रतिष्ठा प्राण की॥1॥
महाकाल ने परिवर्तन का क्रम फिर से दोहराया है। इस धरती पर स्वर्ग-सृजन का संदेशा पहुंचाया है॥ नव-निर्माण को सके, ऐसा वातावरण जुटाया है। निर्माताओं के प्राणों में फिर तूफान उठाया है॥ नहीं उपेक्षा करना है अब सृष्टा के आह्वान की॥2॥
सृजन-स्वेद की सरिताओं में फिर तूफान उठाना है। जन-मानस की सृजन-सुधा का फिर से पान कराना है॥ युग-युग से इस तृषित-धरा की फिर से प्यास बुझाना है। इस धरती पर हमें प्रीति की पावन-फसल उगाना है॥ मुखर हो रही नई ऋचाएं जन मंगल के गान की॥3॥
यही समय है मनुज-धरा को स्वर्ग समान बनायें हम। और सुप्त-देवत्व मनुज का जन-जन बीज उगायें हम॥ मानवता का पाप पतन से पीछा चलो! छुड़ायें हम। सृजन-शिखर पर नैतिकता की धर्म-ध्वजा फहरायें हम॥ नई कथाएं गढ़ें चलो! हम मानव के उत्थान की॥4॥
सद् प्रवृत्तियां मुखर हो सकें, मानव के आचारों में। और श्रेष्ठ चिंतन की ही हो छाया मनुज-विचारों में॥ दया, क्षमा, करुणा, संवेदन हों मानव-उद्गारों में। हो न कहीं नीलाम आस्था, श्रद्धा फिर बाजारों में॥ मानव में हो प्राण प्रतिष्ठा भावों के भगवान की॥5॥
-मंगल विजय
*समाप्त*