दूरदर्शिता का दुहरा लाभ

वैभव की दृष्टि से बड़े वे हैं, जिनके पास साधनों की प्रचुरता और बुद्धिकौशल की प्रखरता है। ऐसे लोग ऐश्वर्यवान कहलाते हैं और अपनी समर्थता के बदले सुख-साधन एवं पद-सम्मान पाते है।

वर्चस् की दृष्टि से महान वे हैं, जिनके दृष्टिकोण एवं चरित्रक्रम का स्तर ऊँचा है। जो आदेश पर आस्था रखते हैं और उन्हें कठिन अवसरों पर भी अपनाए रहने वाले साहस का परिचय देते हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता को ही भवबंधन कहते है, जिसने इस निकृष्टता से मुँह मोड़ा और उदात्त अंतःकरण की प्रेरणा से सत्प्रयोजन के लिए कदम बढ़ाया, उसे ही जीवनमुक्त कहते हैं। मुक्ति को परम पुरुषार्थ माना गया है और उसका श्रेयाधिकारी उसे पाया गया है, जो बड़प्पन से नहीं, महानता से प्यार करता है।

वैभव से दूसरे चमत्कृत हो सकते हैं, शरीर की सुविधा हो सकती है। किंतु जहाँ तक आत्मसंतोष, लोक-सम्मान एवं दैवी अनुग्रह जैसी विभूतियों का संबंध है, वे वैभववानों को नहीं, महामानवों को ही उपलब्ध होती हैं।

दूरदर्शी वे हैं, जो क्षुद्रता से ऊँचे उठकर महानता का वरण करते हैं। वैभव नश्वर और अस्थिर ही नहीं, मादक भी है। उसमें उन्माद उत्पन्न करने का दुर्गुण है। ऐसे कम ही हैं, जो वैभव को पचाने और उसका सदुपयोग करने में समर्थ होते हैं। अधिकतर तो उसका दुरुपयोग ही होता है। इसके विपरीत महानता की विभूतियाँ ऐसी हैं, जो व्यक्ति की गरिमा बढ़ाती हैं। गरिमा ही वह विभूति है, जिसके आधार पर जनसहयोग बरसता और उच्चस्तरीय सफलताओं का अवसर मिलता है।

अदूरदर्शिता वैभव के लिए मचलती है और उसके लिए क्षुद्रता की रीति-नीति का अनुसरण करती है। दूरदर्शिता हर कसौटी पर वर्चस् की गरिमा को परखती और उसी का वरण करती है। महामानव वर्चस् के लिए, महत्ता के लिए प्रयत्न करते हैं; फलतः दुहरे नफे में रहते हैं। महानता जहाँ रहती है वहाँ संपदा का भी अभाव नहीं रहने पाता।


किस पुण्य का कितना मूल्य

सम्राट वीरभद्र अपनी दान-वीरता के लिए बहुत प्रसिद्ध थे। उनके संबंध में कहा जाता था कि प्रातः होते ही राजमहल के द्वार पर आने वाला कोई भी याचक उनके यहाँ से खाली हाथ नही जाता था। याचकों की भीड़ लग जाती और वीरभद्र अपने अंतःपुर से निकलकर याचकों को पर्याप्त दान दिया करते थे।

इस तरह दान देने के कारण राजकोष खाली होता चला गया। दान के अतिरिक्त राजपरिवार की सुख-सुविधाओं के लिए भी पर्याप्त राशि खर्च होती थी। इस प्रकार खाली होते राजकोष को भरने के लिए जनता पर नए-नए कर लगाने पड़ते। एक ओर लोग जहाँ सम्राट की दानवीरता का गुणगान करते थे, वहीं     करभार और अन्यान्य अव्यवस्थाओं के प्रति असंतोष भी व्यक्त करा चुके थे। इस अस्त-व्यस्तता का लाभ उठाकर राज्य को अपने राज्य में शामिल करने के लिए पड़ौसी राजा ने वीरभद्र के राज्य पर आक्रमण कर दिया। दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया गया और राजा वीरभद्र को रानी सहित वंदी बना लिया गया, पर कुछ ही दिनों बाद वे दोनों वंदीगृह से निकल भागे।

उनके पास ऐसे कोई साधन तो थे नहीं, जिससे गुजारा चलाते। इसलिए दोनों वन-वन भटकने लगे। एक दिन परेशान होकर रानी ने कहा—”सुना है! सेमरगढ़ नगर का एक सेठ पुण्य खरीदा करता है। आप तो जीवन भर दान देते रहे हैं। यदि हम लोग सेमरगढ़ जाकर अपने दान-पुण्य का एक अंश बेच दें तो उससे कम से कम उदरपूर्ति की व्यवस्था तो जुट ही सकती है।”

वीरभद्र भी रानी के इस विचार से सहमत हो गया और दोनों सेमरगढ़ की ओर चल पड़े। जिस स्थान पर वे लोग भटक रहे थे, वहाँ से गंतव्य स्थान काफी दूर पड़ता था अतः मार्ग में निर्वाह की व्यवस्था दोनों पति-पत्नी मजदूरी करके जुटाते, साथ ही अपने दुर्दिनों और भाग्य को भी कोसते थे। एक स्थान पर मजदूरी भी बड़ी मुश्किल से मिल पाई। उस दिन केवल इतना ही कुछ कमाया जा सका कि जैसे-तैसे चार रोटियाँ ही बनाई जा सकें। इतना आटा लेकर ही वे आगे का रास्ता तय करने के लिए निकल पड़े। चलते-चलते शाम हो गई तो वे एक गाँव में ठहर गए। आस-पास के वृक्षों से लकड़ियाँ तोड़कर आग जलाई और चार मोटी-मोटी रोटियाँ सेंक लीं।

रोटियाँ तैयार करने के बाद वे ग्रास तोड़ने ही वाले थे कि एक भिखारी रोटी माँगता हुआ वहाँ आया और बुरी तरह गिड़गिड़ाने लगा। वीरभद्र के स्वभाव में दया और उदारता तो थी ही। उसने अपने पास की दोनों रोटियाँ क्षुधार्त भिक्षुक को दे दीं और शेष दो रोटियों में से दोनों पति-पत्नी ने एक-एक रोटी खाई।

इसी तरह किसी प्रकार चलते-चलते राजा-रानी सेमरगढ़ पहुँचे। सेठ के सामने पहुँचने पर उसने अपने आने का उद्देश्य बताया। सेठ ने कहा—”आप अपने जिन पुण्यों को बेचना चाहते हैं। उन्हें एक कागज पर लिखकर इस तराजू के पलड़े में रख दीजिए।”

राजा ने वैसा ही किया, पर तराजू ज्यों की त्यों रही। सेठ ने वस्तुस्थिति समझते हुए कहा—”ऐसा प्रतीत होता है कि आपने अनीति और अधर्म की कमाई का दान किया है।"

आगे कुछ कहने का साहस ही नहीं जुट पा रहा था। राजा क्या कहता, वह लज्जा से अवनत हुआ नीचे देखने लगा। सेठ ने कहा—"मुझे आपकी दुःखदाई और त्रासपूर्ण स्थिति से पूरी सहानुभूति है। आप किसी ऐसे पुण्य का स्मरण कर लें, जो ईमानदारी से अर्जित कमाई द्वारा संचित किया गया हो।"

वीरभद्र काफी देर तक सोचते रहे। फिर उसे पिछले दिन वाली घटना याद आई,जब उसने अपने हाथ से भिखारी को अपने सामने की रोटी खाने के लिए दे दी थी। भिखारी को रोटी दान में देने की बात एक कागज पर लिखकर ‘वीरभद्र’ ने उसे तराजू के पलड़े में रख दिया। दूसरे ही क्षण राजा ने देखा। पलड़ा नीचे झुक गया है। सेठ ने अनेक स्वर्णमुद्राएँ उसमें रखीं, फिर भी कांटा बराबर न हो रहा था। उसे आश्चर्य हुआ कि इस छोटे से पुण्य के लिए सेठ को पाँच हजार स्वर्णमुद्राएँ रखनी पड़ीं तब जाकर कहीं काँटा बीचों-बीच आया।

यह कथा सुनाते हुए मुनि अमरनाथ ने अपने शिष्यों से कहा—”दान वही सार्थक होता है जो नैतिक साधनों द्वारा अर्जित किए गए धन से करे।         अनीतिपूर्वक अर्जित की गई समस्त संपदा का पारमार्थिक मूल्य नीतिपूर्वक कमाई गई एक रोटी के बराबर भी नहीं होता है।"


आस्तिकता अनुभूतिगम्य है!

बीसवीं सदी में प्रत्यक्षवादी मान्यताओं के प्रति विशेष उमंग उमड़ा। उत्साह इस सीमा तक बढ़ा कि अदृश्य परमात्मसत्ता के अस्तित्त्व से भी इनकार किया गया। पदार्थसत्ता को ही सर्वोपरि ठहरानेवाले एक ऐसे वर्ग का प्रादुर्भाव हुआ, जिसने आत्मा, परमात्मा, कर्मफल की मान्यताओं पर भी कुठाराघात किया। इस वर्ग का कहना है कि ईश्वर पर विश्वास करने से मनुष्य पुरुषार्थवादी नहीं रहता, भाग्यवादी बनकर भ्रम-जंजालों एवं अंधविश्वासों में भटकता है। वास्तविकता के धरातल से परे हटकर काल्पनिक दुनिया में अपना समय एवं श्रम गँवाता रहता है। नास्तिक वर्ग का यह तर्क विचारणीय है।

निस्संदेह वह ईश्वर जो मनुष्य को पुरुषार्थहीन बनाता हो, भ्रम-जंजालों में भटकाता हो, की मान्यता से इनकार किया जाना चाहिए। सच तो यह है कि  ईश्वरविश्वासी के समान पुरुषार्थी कोई नहीं होता। जहाँ सामान्य व्यक्ति का पुरुषार्थ व्यक्तिगत दायरे में सिमटा रहता है, वहीं आस्तिक की प्रखरता प्रचंड पुरुषार्थ के रूप में मानवमात्र के कल्याण के लिए समर्पित होती है। जिन्होंने भी उस सत्ता का अवलंबन लिया, स्वयं तो श्रेष्ठ बने ही, अन्यों को भी श्रेष्ठता के मार्ग पर चलने के लिए बाध्य किया। आस्तिकतावादी महापुरुषों के इतिहास इस बात के साक्षी हैं कि उन्होंने अपनी तेजस्विता के बलबूते समाज को एक ऐसा श्रेष्ठ-प्रवाह दिया, जिसमें असंख्यों व्यक्ति बहते चले गए तथा महामानवों की श्रेणी में जा पहुँचे। जहाँ कहीं भी अकर्मण्यता दिखाई पड़ती है वहाँ समझा यह जाना चाहिए कि ईश्वर का अवलंबन नहीं, उसका खोखला कलेवर अपनाया गया है। भ्रम-जंजालों एवं अंधविश्वासों की नहीं, प्रचंड विवेक की उत्पत्ति ईश्वरीय विश्वास से उत्पन्न होती है। अंधविश्वास तो विकृतियाँ हैं, ईश्वरीय विश्वास की उपलब्धियाँ नहीं।

चर्च संघ के मूर्धन्य धर्माध्यक्ष डाॅ. हैरीएमरसन फासगिक से नास्तिक वर्ग की इन विकृतियों की चर्चा की। तो उन्हीं ने उत्तर दिया—" ईश्वर के उस स्वरूप को जो अंधविश्वासों विकृतियों को जन्म देता हो, को न मानना ही श्रेष्ठकर है।" उन्होंने कहा कि, “पुरुषार्थ से विमुख करने वाली ऐसी किसी भी आस्तिकवादी मान्यता को स्वीकार करने के पक्ष में मैं नहीं हूँ।”

आस्तिकता के विरोध में इसका तर्क यह दिया जाता है कि ईश्वर है तो फिर दिखाई क्यों नहीं पड़ता? किंतु यदि दिखाई पड़ने के आधार पर ही ईश्वरीय अस्तित्व को स्वीकार करने की बात होगी तो वह शक्ति न होकर व्यक्ति, असीम न होकर ससीम सत्ता होगी। उस महान सत्ता को उसकी बिखरता से खींचकर सीमित क्षेत्र में प्रत्यक्ष कर देने की कल्पना वस्तुस्थिति अनुपयुक्त एवं उसकी गरिमा के प्रतिकूल होगी। दिखाई तो नेत्रों से पंचतत्वों से बना यह संसार ही पड़ता है। जो सतत परिवर्तित एवं विखंडित होता रहता है। परमात्मा को भी इन तत्त्वों से गढ़ी ऐसी ही शक्ति मानी जाए तो यह एक भारी भूल होगी।

स्थूलनेत्रों से दृष्टिगोचर होना ही मात्र किसी सत्ता के अस्तित्व का प्रमाण नहीं है। चुंबक, विद्युत, ताप जैसी अनेकों शक्तियाँ प्रत्यक्ष दिखाई नहीं पड़ती है, किंतु उनका परिचय विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाओं के रूप में मिलता है। विद्युत— पंखे में चलती, बल्ब में चमकती एवं हीटर को गरम करती देखी जाती है। चुंबक अपना परिचय आकर्षणशक्ति के रूप में देता है। प्रत्यक्ष न दिखाई पड़ते हुए भी उसकी सत्ता को स्वीकार किया गया है। प्रतिक्रियाओं के आधार पर इन शक्तियों की प्रकृति एवं विशेषताओं की जानकारी मिलती है।

प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होने वाली यह सृष्टि ही परमात्मा का साकार स्वरूप हो सकती है। इसकी सुव्यवस्था एवं सौंदर्य में ईश्वरीय चेतना को क्रीड़ा-कल्लोल करते भावनेत्रों द्वारा देखा जा सकता है। उसका एक अंश चेतना के रूप में सृष्टि की व्यवस्था संचालित करता है। पूर्ण ब्रह्म को देख सकना अथवा अनुभव कर सकना असंभव है। नास्तिक वर्ग द्वारा परमात्मा के संदर्भ में यह प्रश्न किए जाने पर कि परमात्मा दिखाई नहीं पड़ता। डाॅ. फासगिक ने उत्तर दिया कि, “सागर को एक प्याले में उड़ेल देना संभव नहीं है। पूरी तरह से उस सत्ता का वर्णन कर सकना अथवा देख सकना इन नेत्रों से संभव नहीं है। सागर के जल का प्रतिनिधित्व करने वाला प्याला सागर के जल की विशेषता को दर्शाता तो है, किंतु उसकी समग्र विशेषताओं का परिचय नहीं दे सकता। इसी प्रकार ईश्वर की विशेषताओं का अध्ययन सृष्टि में कर तो सकते हैं, किंतु पूर्णरूपेण उसे जान सकना इन प्रतीकों द्वारा संभव नहीं है।” डा. फासगिक ने आगे कहा कि, “जिस प्रकार समुद्र के निकट पहुँचकर भी उस का एक बड़ा भाग सदा अज्ञात बना रहता है। उसमें स्नान किया जा सकता है। उसकी शीतलता का लाभ उठाया जा सकता है। उसी प्रकार परमात्मा इतना विराट है कि वह बुद्धि एवं इंद्रियों के पकड़ से बाहर है। सांकेतिक रूप से प्रकृतियों की संरचनाओं एवं उसकी विशेषताओं में उसका दर्शन किया जा सकता है। ईश्वर को निकटवर्ती रूप में सौंदर्य, प्रेम, दिव्यता, श्रेष्ठता, सत्य एवं सच्चरित्रता जैसे गुणों के रूप में देखा जा सकता है।”

यह पूछे जाने पर कि सामान्य व्यक्ति ईश्वर को पाने का प्रयत्न करते है, किंतु सफल नहीं होते, ऐसा क्यों है? डाॅ. फासगिक ने कहा कि, “संपूर्ण रूप से तो उसको कोई नहीं जान सकता और न ही यह संभव है। उसकी दिव्यता का जितने अंश में दर्शन कर सके, जान सके, उसी को आधार मानकर अपनी साधना आरंभ करें। विचारक श्रेष्ठ विचारों के रूप में, कलाकार सौंदर्य के रूप में, साधक श्रद्धाभावना के रूप में तथा कर्मयोगी श्रेष्ठ कर्मों के रूप में अपनी साधना आरंभ करके उस परमात्मा की अनुभूति कर सकता है। सृष्टि की सुव्यवस्था एवं महापुरुषों के उदात्त चरित्र में भी उस महती चेतना का दर्शन किया जा सकता हैं। गणित के नियमों के समान नियम व्यवस्था एवं अनुशासन में बंधी सृष्टि प्रत्येक विचारशील को यह सोचने को बाध्य करती है कि क्या यह सब बिना किसी विचारशील नियामक सत्ता के संभव है।”

ईश्वरीय सत्ता में अविश्वास करने वाले वर्ग ने डाॅ. फासगिक से पूछा कि, "आपके ईश्वर की परिभाषा क्या है।" उन्होंने कहा कि, "परिभाषाएँ बुद्धि की उपज हैं। जो ईश्वर बुद्धि की परिभाषा के क्षेत्र में आता है। उसका स्तर मानवी होगा, असीम सामर्थ्यों से मुक्त सत्ता के रूप में नहीं होगा। मानवी परिभाषाओं में बँधने वाला ईश्वर विराट न होकर सामान्य होगा। ऐसा ईश्वर शक्ति नहीं व्यक्ति होगा। स्पष्ट है कि ईश्वर की परिभाषा दे सकना संभव नहीं हैं।” डाॅ. फासगिक का उपरोक्त कथन गीता के इस तत्त्वज्ञान का समर्थन करता है, जिसमें गीताकार कहता है—

वह परमात्मा इंद्रियों से बुद्धि से परे है—

इन्द्रियाणी पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥ गीता३/४२

स्थूलशरीर से इंद्रियाँ, इंद्रियों से मन, मन से बुद्धि सूक्ष्म और श्रेष्ठ है, किंतु जो बुद्धि से भी परे है। उसे ही (परम) आत्मा कहा जाता है अर्थात् परमात्मा इंद्रियों एवं बुद्धि की पकड़ से परे है।

इसे जानने के लिए इंद्रियों एवं बुद्धि की सीमा से निकलकर भाव-जगत में प्रविष्ट होना होगा। ऋषियों द्वारा बताए हुए सनातन मार्ग पर चलने, श्रेष्ठ  जीवनक्रम अपनाने से ईश्वरीय अनुभूति संभव है। महानता अपनाना एवं श्रेष्ठता की ओर बढ़ चलने का साहस जुटा पाना अंधविश्वास—अकर्मण्यता नहीं, प्रचंड पुरुषार्थ एवं विवेक का परिचायक है। जिसको अपनाने वाला स्वयं तो महान बनता है, दूसरों को भी श्रेष्ठता की ओर बढ़ चलने की प्रेरणा दे सकने में समर्थ होता है। आस्तिकता का अवलंबन ही वस्तुतः जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ एवं वास्तविक ज्ञान का परिचायक है।


दैव सत्ताएँ, चैतन्य ऊर्जाएँ

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वस्तुसत्ता के तीनों रूपों को समझने के साधन-उपकरण माध्यम और विधियाँ भिन्न-भिन्न होती हैं। मात्र भौतिकी के द्वारा तीनों स्तरों की तत्त्वविवेचना संभव नहीं होती। आधुनिक भौतिकी वस्तुओं के आधिभौतिकीस्वरूप की ही खोज-बीन करती है। उनके आधिदैविक रहस्य को समझने के लिए उपकरण भी आधिदैविक ही चाहिए। भौतिक-द्रव्य से विनिर्मित उपकरण चाहे जितने सूक्ष्म हों, वे आधिभौतिक अर्थ को ही प्रकाशित कर सकते है। भौतिक विज्ञान के इस युग में बुद्धिमान लोगों की भी प्रवृत्ति मूलतः आधिभौतिक अर्थ को समझने की ही होने के कारण आधिदैविक अर्थों को भी आधिभौतिक प्रतीकों द्वारा ही संकेतित करना आवश्यक है। यह बहुत कठिन भी नहीं है। भारतीय प्रज्ञा ने अपनी अभिव्यक्ति के लिए सदैव ऐसे शब्दों को प्रचुरता से चुना है, जिनके एक साथ तीन स्तरों पर तीन अर्थ होते हैं— आधिभौतिक, आधिदैविक एवं आध्यात्मिक।

देवों को प्रजापति की अतिसृष्टि कहा जाता है। सृष्टि का क्रम इनके उपरांत है। सृष्टि के प्राणी मर्त्य हैं। देवता अमर हैं, क्योंकि ये अमृतपान किए हुए हैं। अमृतों की पाँच कोटियाँ हैं, ऐसा छांदोग्य उपनिषद् में वर्णित है। इन पाँचों अमृतों के अनुगत पाँचों देव वर्ग हैं। छांदोग्य उपनिषद् में इनका विवरण यों है—

“तद्यत्प्रथममृतं तद्वसव उपजोवन्त्यग्निना मुखेन। (छा.3/6/1)

अर्थात यह जो पहला अमृत है, उससे वसुगण जीवन धारण करते हैं। वे अग्निमुख द्वारा ही उसे धारण करते हैं।

अथ यद्द्वितीयममृतं तदुद्रा उपजीवन्तीन्द्रेण मुखेन (छा.3/7/1)

अर्थात जो दूसरा अमृत है, उससे रुद्रगण जीवन धारण करते हैं। उनका मुख इंद्र है।

“अथ यत्तृतीयममृतं तदादित्या उपजीवन्ति वरुणेन मुखेन। (छा.3/8/1)

अर्थात यह जो तीसरा अमृत है, उससे आदित्यगण जीवन धारण करते हैं। उनका मुख वरुण है।

“अथ यच्चतुर्थममृतं तन्मरुत उपजीवन्ति सोमेन मुखेन (छा1/9/1)

अर्थात चौथे अमृत से मरुत—सोम मुख से जीवन धारण करते है।

“अथ यत्पञ्चमममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति ब्राह्मण मुखेन (छा.३/१०/१)

अर्थात यह जो पाँचवाँ अमृत है, उससे ब्रह्मरूपी मुख से साध्यगण जीवन धारण करते हैं।

इस प्रकार पाँच अमृतों के अनुगत ये पाँच मुख्य देव-प्रकार हुए— वसु,रुद्र, आदित्य, मरुत, एवं साध्य। ये सभी चेतन-विकिरण-ऊर्जाओं के वर्ग है। इनके आधिभौतिक स्वरूपों को आधुनिक भौतिकी की भाषा में क्रमशः रेडियो विकिरण, अवरक्त विकिरण, दृश्य विकिरण, एक्स किरण एवं गामा किरण समझा जा सकता है। इनके मुखस्वरूप अग्नि, इंद्र, वरुण, सोम एवं ब्रह्म को क्रमशः फोटान-कण, एल्फा-कण, मेसान-कण, लेष्टान-कण, एवं न्यूक्लिआन-कण के स्तर पर सक्रिय चेतना-उर्जाएँ समझा जा सकता है। ये ही मूल कणिकाएँ सृष्टि में द्रव्य के परमाणुओं का गठन करती हैं। सर्वव्यापी चैतन्य अमृतसत्ता की शक्ति का अंश ही इन मूल कणिकाओं का भी प्राण है। इन सभी मुखों में वही अमृत समाहित होता तथा इन्हें जीवन प्रदान किए रहता है। चेतन-विकिरण उर्जाएँ अपनी क्रीड़ा उसी सर्वव्याप्त अमृतसत्ता की शक्ति से करती हैं। वे उसका ही अंश है। उससे भिन्न कोई सत्ता संभव ही नहीं।

इन पाँच प्रधान देव वर्गों के साथ ही अश्विन कुमारों का अपना विशेष स्थान है, क्योंकि वे देवताओं के वैद्य हैं। विश्वेदेवा—देवताओं की सबसे ऊँची कोटि को कहा जाता है। जो अतिसूक्ष्म चिन्मय शक्तियाँ है। इस प्रकार प्रमुख देव वर्ग ये सात हुए— (१) आदित्य (२) वसु, (३) रुद्र (४) मरुत (५) साध्य (६) अश्विन (७) विश्वेदेवा।

देवशक्तियों के वाचक प्रतीकों के आधिभौतिक अर्थ भी होते हैं और उन्हें भौतिक विज्ञान के द्वारा समझा-जाना जा सकता है। हाँ! यह अवश्य है कि वैदिक विज्ञान की भाषा आधुनिक भौतिकी की भाषा से भिन्न थी। इसीलिए इन शब्दों का वर्तमान वैज्ञानिक शब्दों से साम्य नहीं है, किंतु अर्थसाम्य पूरी तरह है। अतः देवशक्तियों के स्वरूप को समझने के लिए वैदिक वैज्ञानिक पर्याय समझना बौद्धिक वर्ग के लिए उपयोगी हो सकता है, किंतु यह उपयोग संभव तभी है जब देवशक्तियों को इन पर्यायों के आधिभौतिक अर्थ में ही न समझ लिया जाए, अपितु इन समानता को देववाद को समझने का सूत्र मानकर ग्रहण किया जाए। स्थूलभाव ही ग्रहण कर लेने पर भ्रांति बनी रहेगी। यहाँ देवशक्तियों के सूक्ष्मस्वरूप को समझने के लिए आधुनिक भौतिकी के अभिज्ञात सूत्रों का सहारा लिया जा रहा है, उन्हें ग्रहण करते समय उपर्युक्त सतर्कता बरतनी भी आवश्यक है।

(1) आदित्य—छांदोग्य उपनिषद् में बताया गया है कि आदित्य में और नेत्र में एक ही देवता है।

“अथय एषोडन्तरक्षिणि पुरुषो दृष्यते तस्यैतस्य तदेव स्वयं यदमुष्य रुपं ।" (छां.1/7/5)

अर्थात जो नेत्रों के मध्य में देवसत्ता है, वह वही है, जो उस आदित्य में है। इसीलिए वहीं पर आगे यह भी कहा गया है कि चाक्षुष और आदित्य दोनों की एकता जानने वाला ऊर्ध्वलोकों में गमन करता है। वृहदारण्यक उपनिषद् में भी इस एकता का ऐसा ही कथन है। उसके भाष्य में श्री शंकराचार्य ने लिखा है—

“विद्युति त्वचि, हृदये चैका देवता।” (बृहदा. 2/1/4 का शंकरभाष्य)

आगे श्री शंकराचार्य ने यह भी लिखा है—

“तेजस्वीति विशेषणम् तस्यास्तत्फलम्।”

अर्थात् विद्युत, त्वचा और हृदय में एक ही देवता है। उसका विशेषण ‘तेजस्वी’ है। यही उसका फल है। इससे ज्ञात होता है कि दर्शनशक्ति की कारणीभूत दृश्यप्रकाश की किरणों में क्रियाशील चेतनशक्ति की संज्ञा आदित्य है। शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है कि प्रथमतः आदित से सात आदित्य ही उत्पन्न हुए। ये सात आदित्य दृश्यप्रकाश के सात प्रकारों के प्रतीक देवता हैं। ज्यामितीय दृष्टि से दिशाओं की संख्या 6 हैं— आगे, पीछे, ऊपर, नीचे, दाहिने और बाँए।

इन छहों दिशाओं को प्रकाशित करने वाले दृश्य विकिरणों के प्रतीक छः आदित्य और होने चाहिए, किंतु चेतन-प्राणी अपने सम्मुख रखी वस्तु के ऊपर- नीचे, दाँए-बाँए, और आगे तो देख सकते हैं, पीछे नहीं देख पाते। इसीलिए वस्तुओं की आकृतियों के निर्धारक पाँच आदित्य ही कहे गए। प्रत्येक आदित्य एक दिशा में वस्तु के विस्तार के निर्धारक दृश्य विकिरण का दैवी प्रतीक है। दिव्यसत्ता है। इसीलिए आदित्य बारह ही हैं। पीछे की दिशा के लिए कोई आदित्य नहीं होता। ये सभी आदित्य शक्तियाँ सविता की ही रश्मियाँ हैं। यह स्पष्ट है।

(2) (वसु)—ऋग्वेद के अनुसार वसुओं की दो विशेषताएँ है। एक तो वे 'जागृत' है। अर्थात शब्दसंवाहक एवं शब्दप्रदाता हैं। दूसरे वे 'पेरुर्विमदये अर्णसोधायपज्रः।' (ऋग्वेद 1/58/3) हैं अर्थात अर्णव में यदि कोई फेंक दिया जाता है और वह वसुओं की शरण में जाता है, तो वे उसे बलपूर्वक पार कराते हैं। इस कार्य में वे अतिकुशल हैं।

इस पर विचार करने पर विदित होता है कि रेडियो-तरंगों की संचालक चेतन क्रियाशक्ति ही वसु है। रेडियो प्रसारण केंद्र में वक्ता या गायक अथवा वादक के मुख से या वाद्ययंत्र से जो तरंगमयी ध्वनि-ऊर्जा उत्पन्न होती है, उसे विद्युत-स्पंदनों में परिवर्तित किया जाता है। और उन विद्युत-स्पंदनों को उच्च आवृत्ति वाली रेडियो-तरंगों पर आरूढ़ कर दिया जाता है।

ये रेडियो विकिरण ही आकाश मार्ग से ध्वनि-तरंगों के विद्युत-स्पंदनों को बलपूर्वक पार कराते हैं और संग्राहक-यंत्र तक पहुँचाते हैं, जहाँ मूलस्वरूप में ध्वनि पुनः प्रकट होती है। आधुनिक आकाशवाणी व्यवस्था की यांत्रिक प्रविधि, प्राचीनकाल की प्रविधि से भिन्न भले ही थी, किंतु आकाशवाणियों के साधन वसु ही होते थे और अब भी होते है। क्योंकि शक्ति तो वही है, प्रविधि भले भिन्न हो।

(3) रुद्र—ऋग्वेद (1/3/3) के अनुसार “रुद्राणां रोदन कारिणां।”

अर्थात जो रुदन कराए वह रुद्र। ऋग्वेद में ही यह भी कहा गया है कि “रुद्राय क्रूर अग्नये’’ अपनी तेजस्विता से भस्मीभूत कर देने वाली प्रचंड-शक्ति रुद्र है। पौराणिक भाषा में इसीलिए रुद्र को तृतीय नेत्रसंपन्न कहा गया है, जिसके खुलते ही प्रचंड ताप निकलता है। रुदन कराने का अर्थ भी द्रवीभूत करना है। अतः उस प्रचंड तापशक्ति की अभिमानी देवसत्ता का ही नाम रुद्र है, जो अपने प्रखर ताप से अत्यंत तप्तकारी प्रभाव उत्पन्न करती है और लौहपिंडों तक को गलाकर द्रवीभूत कर सकती हैं। वसुशक्ति संपन्न रेडियो विकिरणों से अधिक सूक्ष्म अधिक उच्च आवृत्ति वाली रश्मियों में सक्रिय देवसत्ता रुद्र है, यह छांदोग्य उपनिषद् में मधुविद्या के वर्णन से स्पष्ट है। उसमें अमृत के पाँच वर्गों का विवेचन हैं, जो ऊर्जा की सूक्ष्मता के आरोहक्रम से गिनाए गए हैं। इसमें प्रथम स्थान वसुओं को दिया गया है और कहा गया है कि प्रथम अमृत से ही वसुगण जीवन धारण करते है। जबकि रुद्रगण द्वितीय अमृत से जीवन धारण करते है।

“तद्यत्प्रथमंमृतं तद्वसव उपजीवन्ति (छां. 3/6/1)

“अथ यद्द्वितीयममृतं तद्रुद्रा उपजीवन्ति। (छां. 3/7/1)

इस प्रकार रुद्र वसुओं से अधिक सूक्ष्म है। उनकी रश्मियाँ उच्चतर आवृत्ति वाली हैं। आधुनिक भौतिकी की भाषा में ये अवरक्त किरणें है। अवरक्त किरणों में सक्रिय चेतनसत्ता ही रुद्र है। छांदोग्य उपनिषद् में ही यह भी कहा गया है कि वसुओं की अपेक्षा रुद्रों का भोगकाल दूना है।

(4) मरुत—मरुद्गण वायु के देवता है। ऋग्वेद में उन्हें “दाह्हाणां चेद् विभिदुर्विपर्वतम” (ऋ 1/85/10) कहा गया है। अर्थात वे तीक्ष्ण तथा भेदने के सामर्थ्य से संपन्न होते है, किंतु ये रुद्र की तरह तापकारी, रुलाने गलाने वाले नहीं है। क्योंकि मरुत, का शब्दार्थ ही है—‘मा रुदन्त’, जो रुलाते नहीं, पीड़ा नहीं देते, किंतु सूक्ष्म और भेदन क्षमता से युक्त है, वे मरुत है।

भारतीय तत्त्व दर्शन में जिसे वायुतत्त्व कहा गया है वह आधुनिक भौतिकी के ‘इलेक्ट्रान’ कण का पर्याय है। ‘मरुत’ का ‘इलेक्ट्रान’ अथवा वायुतत्त्व से भी संबंध होना चाहिए। इन सभी विशेषताओं का विचार करने पर एक्स किरणों में क्रियाशील देवशक्ति ही मरुत प्रतीत होती है। एक्स किरणों का तरंगदैर्ध्य इलेक्ट्रान की आनुषंगिक तरंगों के दैर्ध्य स्तर का होता है। एक्स किरणें शरीर में प्रविष्ट होने पर भी पीड़ा नहीं पहुँचातीं, सूक्ष्म होती है और भेदन में समर्थ होती है। इससे एक्स किरणों की मरुद्गणों से समानता प्रकट होती है।

(5) साध्य—छांदोग्य उपनिषद् में साध्य का वर्णन यह है।

“अथ यत्पञ्चममृतं तत्साध्या उपजीवन्ति।” (छां.3/10/1)

अर्थात यह जो पाँचवां अमृत है, साध्यगण उससे ही जीवन धारण करते है।

स्पष्ट है कि यह मरुद्गणों से भी अधिक सूक्ष्म चैतन्य उर्जा हैं। इसे आदित्य की ऊर्ध्वदिक संबंधी किरणें भी कहा गया है। जिस प्रकार परमाणु के मध्य में नाभिक होता है उसी प्रकार आदित्य के मध्य में यह मधु स्थापित है। परमाणु के नाभिक सदा सक्षुब्ध से रहते हैं। उनमें तीव्र हलचल होती रही है। साध्यदेवों को भी “आदित्यस्य मध्ये क्षोभत इव” अर्थात आदित्य के मध्य में क्षुब्ध होता हुआ मधु कहा गया है। सूक्ष्मता और संक्षोभ से संबंध दिखाए जाने से पता चलता है कि विकिरणधर्मी गामा किरणों में सक्रिय चेतनाशक्ति को ही साध्यदेव कहा गया है। वे मरुद्गणों से ऊपर अधिष्ठित है। गामा किरणें भी एक्स किरणों से अधिक सूक्ष्म होती है। वे विघटनशील सक्षुब्ध परमाणु नाभिकों से उत्सर्जित होती है।

(6) अश्विन—तैत्तिरीय ब्राह्मण में दोनों अश्विनों को देवो के वैद्य, हवियों का वहन करने वाले, विश्वेदेवों के दूत तथा अमृत के रक्षक कहा गया है—

यौ देवानां भिपजौ हव्यवाहो। विश्वस्य दूतावमृतस्य गोपौ॥” (तै. 3/1/11)

अश्विन या अश्विनीकुमार दो है। अश्वयन का अर्थ प्रसरण, विस्तरण या फैलना है। वे गणदेवों का प्रभाव प्रसारित करते हैं, उनकी श्रेष्ठता के अमृत-स्तर को सुरक्षित रखते है। इन सब बातों का विचार करने पर पता चलता है कि विद्युतचुंबकीय उर्जा-तरंग के उभय घटक ही दो अश्विनीकुमार हैं। प्रत्येक रश्मि-तरंग वस्तुतः विद्युत-ऊर्जा और चुंबकीय उर्जा की संयुग्मित तरंग होती है। ये दोनों ही घटक समरूप होते है। दोनों अश्विनी कुमार भी समरूप होते है। इन घटकों के आयामों के द्वारा ही किसी तरंग का प्रभाव आगे बढ़ता है। जितनी अधिक इनकी आवृत्ति होगी, उतनी ही सूक्ष्म किरण होगी। इस प्रकार रश्मियों का स्तर बनाए रखने और उनका प्रभाव प्रसारित करने का काम ये घटकद्वय ही करते हैं। अग्निकण आधुनिक भौतिकी के फोटान कणों का प्राचीन भारतीय नाम है। इन फोटान कणों में उर्जा के परिमाण की कमी या अधिकता के ही अनुसार गणदेवों या सूक्ष्मप्रवाह तरंगों का स्वरूप वैविध्य विनिर्मित होता है।

इसीलिए उस ऊर्जा के संवाहक विद्युतचुंबकीय घटकों के आयामों को अश्विनों के बाहु कहा गया है, जिनसे वे अग्नि में अर्पित हव्य को ऊर्जा के रूप में वहन करते है।

अंतत्तोगत्वा-ये सभी छहों देव अग्नि में अनुगत है—

‘‘अग्निवै सर्वा देवताः।” (1/6/2/8)।

उसी प्रकार जिस प्रकार फोटान-कण समूह में ही अंततः सभी प्राथमिक तरंग कणिकाएँ समाहित है। फोटान- कणों के ही भिन्न-भिन्न क्रम एवं भिन्न-भिन्न संहतियाँ विभिन्न उर्जा तरंगों का रूप लेती है। उस अग्नि या फोटान की ऊर्जा का वहन करने वाले विद्युतचुंबकीय घटक ही सभी रश्मियों का सार हैं, इन घटकों में क्रियाशील चित्तशक्ति अश्विन है।

अग्नि को देवों का पुरोहित कहा गया है। बृहस्पति भी उसका ही पर्याय नाम है। उसे देवमुख भी कहा गया है, क्योंकि वह चैतन्य-विकिरण-उर्जाओं का मुख जैसा ही है। मात्र विश्वेदेवा उससे भी सूक्ष्म चैतन्य उर्जाएँ है।

(7) विश्वेदेव— आर्षग्रंथों में विश्वेदेवों के दो भिन्न-भिन्न समूहों की चर्चा है। कही संख्या तेरह बताई गई है, कहीं इक्कीस। ये अतिश्रेष्ठ देवशक्तियाँ हैं, जो आकाश के अज्ञात प्रदेशों से आती हैं। अनंत अंतरिक्ष के अज्ञात प्रदेशों से बरसने वाली अतिसूक्ष्म कास्मिक किरणों में क्रियाशील चित्तशक्ति ही विश्वदेव है। आधुनिक भौतिकी अभी इनके आधिभौतिक पक्ष का ही अनुसंधान नहीं कर पाई है। फिर देव सत्ताएँ तो भौतिकी के कार्यक्षेत्र और अन्वेषण-क्षेत्र से सर्वथा भिन्न चैतन्य उर्जाएँ है। उन्हें अनुभव करने का माध्यम श्रद्धा है। ऐसा शास्त्रों में स्पष्ट कहा गया है। बिना श्रद्धा के देव सत्ताओं की अनुभूति कर सकना उनके अनुदान पा सकना असंभव है। श्रद्धा ही उन चेतन-उर्जाओं से संबंध जोड़ती है।


सभा विद्वानों की (Kahani)

जनक के यहाँ विद्वानों की सभा में अष्टावक्र भी आमंत्रित थे। अष्टावक्र थे तो शरीर से टेड़े मेढ़े, परंतु उनकी बुद्धि बड़ी विलक्षण थी। उनकी विद्वत्ता की प्रसिद्धि चारों ओर फैली थी। जब वे सभा में प्रविष्ट हुए तो सभा में बैठे विद्वजन हँसने लगे। अष्टावक्र ने कारण जानना चाहा तो उन्हें बताया गया कि, "वे लोग उनकी टेड़ी- मेढ़ी हड्डियों एवं देह को देखकर हँस रहे हैं।"

अष्टावक्र जी ने जनक जी से पूछा—“राजन्!  विद्वानों की सभा कहाँ हो रही है। मुझे वहाँ ले चलिए।" सभासद और हँसे कि इस महाशय को अभी भी नहीं मालूम कि यही विद्वानों की सभा है। अष्टावक्रजी ने तपाक से कहा—"यह सभा विद्वानों की कैसे हो सकती है? यहाँ तो हड्डी व चमड़ी की पहचान करने वाले बैठे हैं।"


जीवन के प्रति घटती आस्था-कारण और निवारण

पहले की अपेक्षा दुनिया में समृद्धि-साधन बढ़े है। जीवन जीना पहले की अपेक्षा सरल हुआ है। यातायात और संचार-साधनों का जिन दिनों अभाव था, उन दिनों लोगों का अपने स्वजन संबंधियों से संपर्क भी वर्षों बीत जाने पर कभी-कभार एकाध बार होता था, किंतु अब लोग सुबह निकलते है और मीलों दूर कार्यालयों, कारखानों में काम करके शाम को वापस घर आ जाते है। किसी वस्तु का अभाव हो तो उसे तुरंत दूसरे शहर से मंगाया जा सकता है। आसन्न विपत्तियों के समय शुभेच्छुओं, मित्रों की सहायता भी प्राप्त की जा सकती है, जबकि पहले प्रत्येक परिस्थिति का सामना मनुष्य को स्वयं अकेले ही करना पड़ता था।

सुविधा-साधनों में इतनी प्रचुर अभिवृद्धि होने के उपरांत भी मनुष्य पहले की अपेक्षा उदास, उद्विग्न और खिन्न हुआ है। पहले की अपेक्षा उसमें मनोबल का अभाव है। प्रमाण है— प्रतिदिन सैकड़ों व्यक्तियों द्वारा जिंदगी से निराश और हताश होकर की जाने वाली आत्महत्याएँ। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रतिदिन कम से कम एक हजार व्यक्ति आत्महत्याएँ करते है और लगभग दस हजार व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करते हैं, किंतु किन्हीं कारणों से वे अपने प्रयासों में सफल नहीं हो पाते।

इसका कारण क्या है? खोजने पर यह तर्क सामने आता है कि आत्महत्याएँ तो पहले भी लोग करते थे, किंतु संचार-साधनों के अभाव के करण उनकी जानकारी अधिक लोगों तक नहीं पहुँच पाती थी। इस कारण कितने लोग प्रतिदिन आत्महत्याएँ करते हैं, यह भी जान पाना कभी संभव नहीं रहा। यह तर्क तब धराशाई हो जाता है जब यह तथ्य सामने आता है कि पिछले बीस-तीस वर्षों में आत्महत्या करने वालों की संख्या कई गुना बढ़ गई है।

ब्रिटेन के एक प्रतिष्ठित मनोरोग चिकित्सक डाॅ. डब्ल्यू. जे. स्टेनले के अनुसार, पिछले बीस वर्षों में आत्महत्या करने वालों की संख्या तीस गुना बढ़ी है। उनके अनुसार ब्रिटेन में तीन चौथाई व्यक्ति अपने जीवन में एक न एक बार आत्महत्या की चेष्टा करते है। उनके पास आने वाले सैकड़ों मनोरोगियों में से हर पाँचवाँ व्यक्ति ऐसा होता है जो दूसरी बार आत्महत्या का प्रयत्न करता है।

अमेरिका के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के अनुसार, विश्व में आत्महत्या मृत्यु का दसवाँ बड़ा कारण है। नौ दूसरे कारण होते हैं, जिनमें बीमारी, हत्या, आक्रमण अथवा रोगों के कारण लोग मरते हैं। अकेले अमेरिका में ही 10,000 व्यक्ति प्रतिवर्ष अपना गला आप घोंट लेते है। जापान, डेनमार्क, स्वीडन तथा आस्ट्रिया में स्वयं मृत्यु को गले लगाने वाले लोगों की संख्या सबसे अधिक है। कनाडा, आस्ट्रिया, डेनमार्क, फिनलैंड, जर्मनी, हंगरी, स्वीडन और स्विट्जरलैंड इन आठ देशों में मरने वाला प्रत्येक चौथा व्यक्ति आत्महत्या के कारण मरता है। पोलैंड में इसका पाँचवाँ स्थान है। इन देशों में जिन प्रथम तीन-चार कारणों से लोग मरते हैं, उनमें दुर्घटनाएँ, कैंसर तथा हृदय रोग आते है। अर्थात आत्महत्या इन राजरोगों के बाद स्थान प्राप्त करने लगी है।

यह औसत पिछले कुछ ही वर्षों से बढ़ा है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आत्महत्या लोग पहले भी करते थे और अब भी करते हैं, अंतर केवल इतना है कि अब इनका पता सबको लग जाता है और पहले नहीं लगता था। यह रोग इतना अधिक फैलता जा रहा है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने प्रत्येक देश में आत्महत्या निरोधक-केंद्र खोलने का आह्वान किया है। संगठन के अनुसार ऐसे व्यक्ति प्रायः अपने इरादे के बारे में पहले ही इरादा व्यक्त कर देते है। लोग उनकी बातों को हलके ढंग से लेते है,पर यह नहीं कहा जा सकता कि आत्महत्या की बात कहने वाला व्यक्ति अपने कहे अनुसार इसे कार्यरूप में परिणत नहीं करेगा। संगठन का कहना है कि जो व्यक्ति पहली बार आत्महत्या करते है वह अपने को बचाने के लिए पुकारते भी है। ऐसा कम ही देखा गया है। जो लोग एक बार आत्महत्या का प्रयास करते समय बचा लिए गए हों, उन पर बाद में ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए तथा आत्महत्या निरोधकेंद्र के सुपुर्द करना चाहिए।

कानूनन आत्महत्या दंडनीय अपराध है, पर इस कानून की पकड़ में वही लोग तो आते है जो आत्महत्या करने से किसी प्रकार बचा लिए गए हों। जो अपने प्रयासों में सफल हो गए उनका तो केवल शव ही हाथ आता है। खैर, हमारा उद्देश्य यहाँ कानूनी बहस में उलझना नहीं है बल्कि यह देखना है कि जीवन की जटिलताएँ दिनों-दिन कम होते जाने के साथ-साथ लोगों में आत्महत्या की प्रवृत्ति क्यों बढ़ती जा रही है?

वस्तुतः आत्महत्या की इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति का कारण मनुष्य में दिनों-दिन मनोबल का टूटते या कम होते जाना है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, आत्महत्या एक मानसिक रोग है जो निराशा, मोहभंग, अवसाद, गरीबी, पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों की प्रतिक्रियास्वरूप जन्म लेती है। यह कारण तो पहले भी विद्यमान थे, बल्कि जीवन की जटिलताएँ आधुनिक काल में उन्नत संसाधनों का कहीं कोई चिन्ह न मिलने की स्थिति में और भी ज्यादा थी। फिर क्या कारण है कि लोगों में इन्हीं दिनों यह प्रवृत्ति ज्यादा फैली है? इसका मूल कारण मनुष्य का बाहरी साधनों पर निर्भर रहने, सुविधाओं का आदी हो जाने के कारण जीवन से संघर्ष की क्षमता कम होते जाना है।

मनुष्य के सामने जितनी ही ज्यादा चुनौतियाँ होती है, संघर्ष के जितने ही ज्यादा अवसर होते हैं उसका मनोबल भी उतना ही बढ़ा-चढ़ा होता है। इसके विपरीत सुविधा-साधनों के बढ़ने पर उनका अभ्यस्त हो जाने की स्थिति में मनुष्य की मनोभूमि इस ढंग से ढल जाती है कि वह प्रतिकूल अथवा अनपेक्षित परिस्थितियों को जरा भी सहन नहीं कर सकता। उदाहरण के लिए कोमल गद्दों पर सोने वाले, शीत और गर्मी दोनों से अपने को बचाने का पूरा प्रबंध रखने वाले व्यक्तियों का शरीर उन सुविधाओं का इतना आदी हो जाता है कि जरा भी असुविधा नहीं सह सकता।

शरीर की भाँति ही मनुष्य की मनःस्थिति भी पूर्वापर, कोमल, असहिष्णु तथा दुर्बल बनी है। यही कारण है कि संघर्ष का अनपेक्षित अवसर आते ही व्यक्ति या तो उससे भागने लगता है अथवा सिर पर आ पड़ने की स्थिति में आत्महनन कर लेता है। जीवन में संघर्ष के अवसर प्रायः 15 से 45 वर्ष की आयु के बीच आते है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 15 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति, जिन्हें बच्चे ही कहा जा सकता है, आत्महत्या नहीं करते। जहाँ कहीं ऐसी घटनाएँ होती है वे अपवादस्वरूप ही हैं। जब कि वृद्ध व्यक्ति किसी असह्य रोग के कारण अकेलेपन, जीवनसाथी के पिछोह अथवा शारीरिक असमर्थता के कारण ही आत्महत्या करते है। इस प्रकार अपनी इहलीला समाप्त करने वालों में १५ से ४५ वर्ष की आयु वाले व्यक्तियों का प्रतिशत ही सबसे ज्यादा है। बल्कि कहा जा सकता है कि इस आयु वर्ग के लोग ही मुख्यतः आत्महत्या करते है।

दिल्ली स्कूल आफ सोशल वर्क के श्री आर. एम. वर्मा ने पुलिस रिकार्ड में उपलब्ध आत्महत्या के 849 केसों का अध्ययन कर बताया कि इनमें से तीन चौथाई व्यक्तियों की आयु 15 से 40 वर्ष के बीच थी। 5 प्रतिशत युवा आत्महत्याओं में से भी 42.5 प्रतिशत उन व्यक्तियों का था जिनकी आयु 20 से 30 वर्ष के बीच थी। इसके साथ ही यह तथ्य भी प्रकाश में आया कि आत्महत्या करने वालों में लगभग 70 प्रतिशत व्यक्ति शहरों के निवासी थे। इससे एक बात यह भी पता चलती है कि शहर, जहाँ सुविधा-साधनों का बाहुल्य है लोग जल्दी ही जीवन-संघर्ष में हार जाते है। स्मरणीय है कि इन साढ़े आठ सौ व्यक्तियों में से केवल 84 व्यक्ति अर्थात 1 प्रतिशत से भी कम लोगों ने आर्थिक कारणों से आत्महत्या की। बाकी लोग तो असफलता, घरेलू झगड़ों, प्रतिस्पर्धा, रोग- बीमारी आदि के कारण आत्महंता बने।

स्पष्ट है कि शहरी लोगों की अपेक्षा देहातियों में जीवन से जूझने की ज्यादा क्षमता रहती है। शहरी जीवन की आपाधापी, यांत्रिकता और मशीनी जिंदगी मनुष्य को भीतर से तोड़कर रख देती है तथा उसे जल्दी ही निर्बल, दुर्बल, बना देती है। जो भी हो, आत्महत्या की ओर प्रवृत्त होने का मूल कारण मनोबल का अभाव अथवा मानसिक दुर्बलता है। प्रश्न उठता है, यह क्यों उत्पन्न होती है? इसका निश्चित उत्तर दे पाना कठिन है, फिर भी इसका कारण मनुष्य में दिनों-दिन आध्यात्मिक आस्थाओं का विघटन होते जाना है। कहना नहीं होगा, इन दिनों मनुष्य ने भौतिक क्षेत्र में असाधारण प्रगति की है। बढ़े हुए वैभव, समृद्धि साधनों और सुविधा उपकरणों के कारण मनुष्य की दृष्टि में वहीं प्रधान हो गए है। जिन थोड़े लोगों के पास ये साधन होते है, सामान्य और मध्यम वर्ग का व्यक्ति उन्हें ही अपना आदर्श मानता है और उन जैसी स्थिति प्राप्त करने के लिए जीतोड़ प्रयत्न करता है।

जब आकर्षण का एकमात्र केंद्र वैभव, प्राप्ति का एकमात्र लक्ष्य समृद्धि और प्रतिष्ठा का एकमात्र मापदंड संपन्नता हो तो व्यक्ति का जीवन के अन्य पहलुओं की ओर से ध्यान हट जाना स्वाभाविक ही है। मौलिकता की बाढ़ आध्यात्मिक आदर्शों, धर्मश्रद्धा, ईश्वरविश्वास, तप-त्याग, पुण्य-परमार्थ जैसे तत्त्व न जाने कहाँ लुप्त-विलीन हो जाते हैं, जो कठिन से कठिन समय में भी मनुष्य के लिए अजस्र शक्तियों का प्रवाह बहाते रहते है। कहा गया है कि आध्यात्मिक -विश्वास वह दुर्ग है, जो मनुष्य की सभी परिस्थितियों में रक्षा करता है। जब यह दुर्ग ही नष्ट हो जाये तो वह कौन-सा आधार होगा जो जीवन को बल प्रदान कर सकता है?

धर्मश्रद्धा या ईश्वरविश्वास वह तत्त्व है, जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी जीवन के प्रति आस्था सुदृढ़ बनाए रखती है। इन तत्त्वों को जीवन की आधार भूमि बनाए रहने पर जीवन के प्रति दृष्टि ही बदल जाती है। जीवन की सार्थकता ही अन्य हो जाती है। वही दृष्टि, अर्थवत्ता और जीवनमूल्य शाश्वत है, जो जीवन को सर्वोपरि ठहराती है और भौतिक-साधनों को उसकी एक आवश्यकता मात्र सिद्ध करती है, न कि उन्हीं में सार्थकता खोजती है। तब भौतिक सफलता या असफलताएँ विचलित नहीं करती, किंतु वह दृष्टि ही इन दिनों बदल गई है, जीवनमूल्यों में ही परिवर्तन आ गया है और साधन ही साध्य बन गया है, आवश्यकता ही लक्ष्य बन गई है। जब तक यही स्थिति रहेगी, तब तक आत्महत्याओं का काम जारी रहेगा और कोई आश्चर्य नहीं कि यह क्रम बढ़ता ही जाए। मध्यकाल में इन तत्त्वों का भले ही अभाव रहा हो, किंतु तब भौतिक प्रगति भी इतनी नहीं हुई थी। अब जब कि भौतिक प्रगति पहले की अपेक्षा कई गुना बढ़ी है तो इन तत्त्वों का अभिवर्धन भी किया जाना चाहिए, तभी संतुलन सधेगा।


दुःख नकारात्मक भाव के सिवा कुछ नहीं

चारों ओर प्रकाश व्याप्त होने पर भी व्यक्ति अंधकार का रोना रो सकता है और अंधेरा-अंधेरा चीखता-चिल्लाता रह सकता है। इसके साथ दो ही कारण हो सकते है—एक तो यह कि व्यक्ति किसी तंग कोठरी में चारों ओर से बंद दरवाजों और खिड़कियों के भीतर बंद हो। उस स्थिति में बाहरी प्रकाश की, सूर्य देवता की एक भी किरण उस तक नहीं पहुँच सकती। दूसरा कारण व्यक्ति का दृष्टिहीन होना हो सकता हैं। इन दो कारणों को छोड़कर तीसरा कोई कारण नहीं है कि व्यक्ति अंधकार से दुःखी और संतप्त हो।

मनुष्य के जीवन में भी इसी प्रकार दुःख और वेदना का कोई अस्तित्व नहीं है। अंधकार एक नकारात्मक सत्ता है, प्रकाश का अभाव है। यह प्रकाश कई बार परिस्थितियों के कारण भी लुप्त हो जाता है, किंतु वैसी स्थिति में परमात्मा ने मनुष्य को वैसी क्षमता दे रखी है कि वह उनका उपयोगकर प्रकाश के अभाव को दूर कर सके। अतः अंधकार को देख-देखकर ही जिसे भयभीत होते रहना हो, संतप्त और दुःखी रहना हो तो उसके लिए अंधकार से मुक्त होने का कोई उपाय नहीं है। दुःख भी अंधकार के समान एक नकारात्मक भाव है। उसका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। व्यक्ति अपनी भ्रांतियों, गलतियों और त्रुटियों की तंग कोठरी में बंद होकर चारों ओर खिले हुए सुख तथा आनंद से वंचित रहे तो इसमें परमात्मा का कोई दोष नहीं है। उसने तो सृष्टि में चारों ओर सुख, आनंद तथा प्रफुल्लता का प्रकाश बिखेर रखा है। अपनी भ्रांतियों और त्रुटियों की दीवारों में, समझ और दर्शन के दरवाजों-खिड़कियों को बंदकर कृत्रिम रूप से अंधकार पैदा किया जा सकता है। प्रायः जो दुःखी, संतप्त, व्यथित और वेदनाकुल दिखाई देते है, उनकी पीड़ा के लिए बाहरी कारण नहीं, अपनी बनाई संकीर्णता की दीवारें उनके लिए उत्तरदाई हैं।

परिस्थितिवश कोई समस्या या कठिनाई उत्पन्न हो जाए तो उसके लिए भी शोध करना आवश्यक नहीं है। परमात्मा ने अंधकार को दूर भगाने की तरह मनुष्य को उन समस्याओं तथा कठिनाइयों को सुलझाने की क्षमता दे रखी है। वह उस क्षमता का उपायकर अपने लिए सुख तथा आनंद का मार्ग खोज सकता है तथा दुःखरूपी अंधकार को दूर हटा सकता है।

बहुधा लोग दुख और सुख के संबंध में दृष्टिभ्रम के शिकार होते है। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, व्यक्ति यदि सुलझे और सुथरे दृष्टिकोण वाला हो तो बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी सुखी व आनंदित रह सकता है। इसके विपरीत परिस्थितियाँ चाहे कितनी ही अनुकूल क्यों न हों, व्यक्ति यदि दृष्टिभ्रम का शिकार है, उसमें अपने आस-पास बिखरे सुख और आनंद को देखने की क्षमता नहीं है तो अनुकूल से अनुकूल परिस्थितियाँ भी उसे आनंदित व प्रफुल्लित नहीं कर सकतीं।

परिस्थितियों को बदलने के लिए प्रयास किया जाना चाहिए। ठीक उसी प्रकार जैसे रात का अंधकार दूर भगाने के लिए रोशनी जलाते है। उसका सरलतम उपाय है। प्रयत्न और धैर्य भी वैसे ही सरल उपाय है, यदि परिस्थितियों को विकट न समझा जाए तो सूरज ढल जाने के बाद कोई भी व्यक्ति न रोता है और न शोकाकुल होता है। इसे प्रकृति का एक नियतक्रम मानकर रोशनी जला लेता है और अंधकार की समस्या से मुक्त हो जाता है। दिन और रात की तरह जीवन में परिस्थितियों के भी उतार-चढ़ाव आते रहते हैं। अपने भीतर वह दृष्टि विकसित की जाए, जो उस क्रम को सहजता से ग्रहण कर सके तो बिना व्यथित और उद्विग्न हुए प्रतिकूल परिस्थितियों से निपटा जा सकता है। प्रकाश के सुनिश्चित और असंदिग्ध अस्तित्व की भांति जीवन में सुख और आनंद भी सुनिश्चित तथा असंदिग्ध है। दुख और वेदना का अस्तित्व कृत्रिम रूप से उत्पन्न किए गए अथवा मान ली गई नकारात्मक सत्ता के सिवाय कुछ भी नहीं है।


इन आश्चर्यों का क्या कोई कारण है?

यंत्रों या मशीनों द्वारा बनाई गई वस्तुओं का रंग-रूप, आकार-प्रकार प्रायः एक ही प्रकार का होता है। किन्हीं यांत्रिक गड़बड़ियों के कारण ही कभी कोई उत्पादन बेडौल हो जाता है, किंतु वह अन्य उपकरणों की भांति न तो टिकाऊ सिद्ध होता है और न ही उसे सामान्य ढंग से प्रयोग में लाया जा सकता है। प्रकृति में विद्यमान चेतनसत्ता, जो यहाँ प्राणियोँ और प्राकृतिक पदार्थों की उत्पत्ति, अभिवर्धन और विनाश का संचालन करती है, उसका पहला प्रमाण तो यही है कि इस सृष्टि में कोई भी दो वस्तुएँ एक समान नहीं है। संसार में इस समय 400 करोड़ से भी अधिक मनुष्य बसते हैं, परंतु किन्हीं में भी एकदूसरे व्यक्ति से पूर्ण साम्य नहीं दिखाई देता। एक साथ जन्म लेने वाले दो बच्चों की आकृति में भले ही समानता दिखाई दे, किंतु उनमें भी कोई न कोई अंतर ऐसा होता ही है, जो दोनों के अलग-अलग अस्तित्व को सिद्ध करता है।

जानवरों में भी यही बात है। मनुष्य की अपेक्षा पशु अधिक एकदूसरे के समान दिखाई देते है, किंतु आयु, वजन, शरीर के आकार, रंग-रूप और विभिन्न विशेषताओं को दृष्टिगत रखते हुए उनकी आपस में तुलना की जाए तो कोई दो पशु भी एक जैसे नहीं होते। प्राणियों की बात जाने दें। दो कचड़े, दो पहाड़, दो नदियाँ भी ऐसी नहीं हैं, जिन्हें एकदूसरे की अनुकृति कहा जा सकता। यह विभिन्नता, विचित्रता इस बात की द्योतक है कि प्रकृति में सृजन, अभिवर्द्धन और विनाश की प्रक्रिया का संचालन करने वाली ऐसी कोई सत्ता है, जो इन सबका नियमन और नियंत्रण करती है।

कई बार उस अद्भुत कलाकार की अद्भुत रचनाएँ इस रूप में भी सामने आती है कि उन्हें देखकर दाँतों तले अंगुली दबानी पड़ती है। यद्यपि उन अद्भुतताओं का रहस्य समझने के लिए वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाता है और उन कारणों का पता लगाने की चेष्टा की जाती है, जिनसे ऐसी विलक्षणताएँ उत्पन्न हुईं। बहुधा इस प्रकार के प्रयासों का कोई निष्कर्ष सामने नहीं आता और न ही कोई उनके कारणों का पता चलता है। ऐसा लगता हैं, ये कृतियाँ उस सृष्टा द्वारा मनुष्य के सामने प्रस्तुत की जाने वाली पहेलियाँ हैं और संभवतः उसके ज्ञान को चुनौती देती हुई-सी प्रतीत होती है। उदाहरण के लिए, 30 सितंबर 1977 को उत्तरपूर्वी चीन के लिआओनिग प्रांत के एक किसान परिवार में एक ऐसे बच्चे का जन्म हुआ, जिसके पैदा होते समय ही दाढ़ी-मूंछ थी। इसके अतिरिक्त पूरे शरीर पर बाल थे।

इस बच्चे के जन्म का समाचार विश्व के प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित हुआ। बच्चे के होठ, हथेली तथा पैरों के तलुओं के अतिरिक्त पूरे शरीर पर घने बाल थे। माथे पर करीब तीन इंच लंबे बाल थे और भौहें इतनी घनी थी कि कपाल तक फैलकर वे सिर के बालों के साथ मिल गई। आश्चर्य की बात तो यह कि इन असामान्य विशेषताओं के होते हुए भी बच्चा सामान्य बच्चों के समान स्वस्थ और शक्तिशाली है। जन्म से अब तक वह एक भी बार बीमार नहीं पड़ा। सामान्य बच्चों की तरह वह भोजन करता और गहरी नींद सोता है। बच्चे को इन दिनों वैज्ञानिकों के विशेष दल द्वारा अध्ययन के लिए लिआओनिग प्रांत की राजधानी शिनयांग में लाया गया है। उसकी एक फिल्म भी बनाई गई है।

भारत में सन् 1925 में मंगलौर के एक प्रोफेसर की पत्नी ने ऐसे ही बच्चे को जन्म दिया था, जिसके मुँह पर मूंछें और शरीर पर घुँघराले बाल थे। यह चीनी बालक से एक अर्थ में भिन्न था कि उसके चार पैर थे, दो पैरों के तलुवे आगे की ओर तथा दो पैरों के तलुवे पीछे की ओर। दिल्ली में सन् 1927 में एक ऐसे बच्चे ने जन्म लिया था, जिसके तीन पैर थे। इसका आधा शरीर पुरुष का था और आधा स्त्री का। यह बच्चा आठ वर्षों तक जीवित रहा।

19 जून 1926 को लाहौर के पास एक गाँव में एक बढ़ई स्त्री ने ऐसी लड़की को जन्म दिया, जिसका चेहरा भालू जैसा और कान गधों के जैसे थे। उसकी जीभ गर्दन से सटी हुई थी। इस तरह की घटनाएँ आज-कल भी होती हैं। आए दिन उनके समाचार प्रकाशित होते रहते है। कई लोग इन विलक्षणताओं के लिए परमाणु परीक्षणों से उत्पन्न हुए विकिरण को बताते है, किंतु ऊपर भारत की जिन तीन घटनाओं का उल्लेख किया गया है, वे तो उस समय की है, जब लोगों ने अणुबम का नाम तक नहीं सुना था और न ही ऐसे प्रयोगों का आरंभ हुआ था।

सन् 1933 में पंजाब के जलालपुर नामक स्थान में एक सात महीने की लड़की के सिर में से बच्चे का जन्म हुआ। यह समाचार लाहौर में प्रकाशित होने वाले अखबार के 22 अप्रैल 1933 में प्रकाशित हुआ था। सात महीने की इस बालिका के सिर में पहले तो एक छोटी-सी रसौली निकली। कुछ ही समय में यह इतनी बढ़ गई कि उसका वजन लगभग लड़की के वजन के बराबर हो गया। लड़की के माता-पिता इस संकट से त्राण पाने के लिए कई डाॅक्टरों के पास गए, पर सभी ने इस खतरनाक ऑपरेशन को करने से हिचकिचाहट व्यक्त की। अंत में लाहौर के डाॅ.बोधराज ने उस बच्ची का ऑपरेशन किया और बढ़ा हुआ     माँसपिंड काट डाला। इस कटे हुए माँसपिंड में से एक बच्चा निकला। जिसका शरीर पूर्णकाल तक गर्भ में रहने वाले बच्चे की तरह विकसित था। उसके सभी अंग नौ माह तक गर्भ में रहने वाले बच्चे के समान विकसित हो चुके थे। यही नहीं, बच्चा कई घंटों तक जीवित भी रहा।

बलग्रेड के सरबिया अस्पताल में कुछ वर्ष पूर्व एक किसान के गर्भ से दो बच्चों के जन्म की घटना समाचारपत्रों में प्रकाशित हुई थी। इस किसान को पेट में दर्द रहने की शिकायत रहती थी। डाक्टरों ने बाहरी परीक्षणों द्वारा यह रोग-निदान किया था कि उसके पेट में कोई फोड़ा या रसौली है, जो ऑरेशन द्वारा ही बाहर निकाली जा सकती है।ऑपरेशन के लिए वह किसान जब सरबिया अस्पताल में गया। डाॅक्टरों ने ऑपरेशन किया, तो उसके पेट के ऊपरी भाग से दो बच्चे निकले। एक लंबाई में नौ इंच, और वजन में कुछ पौंड भारी था। आश्चर्य की बात यह कि उसके सिर पर घने बाल होने के साथ-साथ मुँह में कई दाँत भी थे। शरीर की रचना जन्म लेने वाले सामान्य बच्चों की भाँति परिपूर्ण थी।

चीन में पिछले दिनों एक और अद्भुत बालक का मामला प्रकाश में आया है। सन् 1981 में जन्मे इस बच्चे को जन्म के समय ही पूरे दाँत निकले हुए थे। साथ ही शरीर पर घने बाल भी थे। आमतौर पर बच्चों के दूध के दाँत सात-आठ वर्ष की आयु में गिरने लगते हैं; किंतु नौ वर्ष से अधिक हो जाने पर भी, अभी तक उसका एक भी दाँत नहीं गिरा है। उसके शरीर पर अभी भी पूर्ववत् बाल है। उसका शारीरिक विकास ठीक प्रकार से हुआ है। पढ़ने में भी वह होशियार है, साथ ही पिंग पोंग का अच्छा खिलाड़ी भी है। कहा जाता है कि रामचरित मानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास के भी जन्म के समय ही मुँह में पूरे दाँत थे। आमतौर पर बच्चे जन्म लेने के बाद रोते हैं, किंतु तुलसीदास जन्म लेने के बाद हंसने लगे थे। इसी से उनके माता-पिता ने उन्हें कोई प्रेत का अवतार समझकर, उनसे त्राण पाने का उपाय सोचा था।

इस तरह के विचित्र बालकों का जन्म क्यों होता है? कौन से कारण ये विलक्षणताएँ उत्पन्न करते है? इस संबंध में वैज्ञानिक केवल अटकलों से ही काम ले रहे है। किसी ठोस निष्कर्ष पर पहुँच पाना अभी तक संभव नहीं हुआ है। प्रश्न उठता है कि प्रकृति अपने नियमों के अनुसार काम करती हो तो ये अपवाद किन नियमों के अंतर्गत आते हैं? यदि प्रकृति स्वयं अपना संचालन एवं कार्य को संपादन करने के लिए सर्वतः स्वतंत्र नहीं है तो कौन सी शक्ति उसका नियमन करती है? स्पष्ट ही किसी चेतनासत्ता का अस्तित्व स्वीकार करना पड़ता है और ये घटनाएँ इस सत्ता का क्रीड़ा-कौतुक ही कही जाएँगी। आगे चलकर इन विलक्षणताओं का भले ही कोई कारण खोज लिया जाए, किंतु चेतनसत्ता का अस्तित्व निर्विवाद और असंदिग्ध है।


न ज्ञान, न विज्ञान, फिर भी निर्बाध आदान-प्रदान

22 अगस्त सन् 1944 की घटना है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी व्यापारी फ्रेंड स्पेडलिग अपनी मोटर कार से हेरी की ओर बढ़ रहे थे। हेरी वेस्टइंडीज द्वीप समूह के एक टापू पर स्थित सुरम्य स्थान है। अटलांटिक महासागर के फरोपियन द्वीप हिस्यानोलिया के पश्चिमी स्थान में स्पेडलिग प्रायः व्यापार के सिलसिले में आया-जाया करते थे। उस दिन जब वे हेरी की ओर बढ़ रहे थे कि रास्ते में अचानक तूफान आ गया। तूफान भी ऐसा कि पहले कभी नहीं आया था। उस तूफान में करीब 150 व्यक्ति मर गए थे। स्पेडलिग भी उस अंधड़ में फंस गए, फिर भी उन्होंने आगे चलने का निश्चय किया और किसी तरह होटल तक पहुँच जाने की बात सोचने लगे। अपने होटल तक पहुँचने के लिए वे नक्शे की सहायता से आगे बढ़ना चाह ही रहे थे कि उन्हें सुनाई दिया—“पीछे लौट जाओ, यह रास्ता खतरनाक है।”

आवाज बहुत समीप से आई थी। लगता था, कोई कार की पिछली सीट पर बैठा था। स्पेडलिग ने चौककर इधर-उधर देखा। कोई दिखाई नहीं दिया। उन्होंने समझा—कोई भ्रम हुआ है। स्पेडलिग ने अपनी यात्रा जारी रखी। कुछ दूर आगे बढ़े ही थे कि फिर वही आवाज सुनाई दी। शब्द तो वही थे, किंतु इस बार स्वर पहले की अपेक्षा ऊँचा था। स्पेडलिग ने स्वर को पहचाना भी, वह आवाज उनकी पत्नी से बहुत मिलती जुलती थी। मिलती-जुलती इसलिए कि उस समय श्रीमती स्पेडलिग तो उस स्थान से हजारों मील दूर कनेक्टीक्ट (अमेरिका) में थीं। स्पेडलिग को फिर भी उस आवाज पर भरोसा न हुआ और वे बराबर आगे बढ़ते रहे। रह-रहकर वह आवाज सुनाई देती, स्पेडलिग चौंक जाते, सहम उठते और रुक कर थोड़ी देर विचार करने लगते, फिर आगे बढ़ जाते।

यह आवाज कहाँ से आई? कौन आगे बढ़ने से रोक रहा है? पत्नी तो हजारों मील दूर है? फिर उसकी आवाज इतनी स्पष्ट कैसे सुनाई दे रही है? और उसे कैसे मालूम कि यहाँ अंधड़ आया हुआ है तथा मैं उसी में यात्रा कर रहा हूँ? आदि ऐसे प्रश्न थे, जिन पर स्पेडलिग जितना ही विचार करते, उतना ही असमंजस बढ़ जाता था। रुकते-रुकाते वह कुछ घंटों में समुद्रतट के पास बह रही एक नदी के पुल तक पहुँचे। वह पुल पार करने जा ही रहे थे कि देखा—अंधड़-तूफान में उफन रहे समुद्र ने अपनी एक तेज लहर फेंकी और उस लहर के दबाव से नदी पर बना पुल टूटकर ऐसे बहने लगा जैसे नदी में डूबता-उतरता पत्ता। अचानक यह दृश्य देखकर स्पेडलिग कांप उठे। कुछ क्षण पहले भी यदि उन्होंने अपनी कार पुल पर बढ़ा दी होती तो निश्चित ही उनका कहीं पता नहीं चलता।

यह रहस्य ही रहा कि स्पेडलिग को अपनी पत्नी की आवाज और चेतावनी कहाँ से तथा कैसे सुनाई दे रही थी? घर पहुँचने पर तो इसमें रहस्य का एक और अध्याय जुड़ गया। स्पेडलिग जब घर पहुँचे तो उन्होंने अपनी पत्नी से इस घटना की चर्चा की। उनकी पत्नी ने बताया कि ठीक उसी रात को उसने सपना देखा कि उसका पति हेरी के जंगल में भयानक तूफान में फँस गया है। आगे गहरी नदी है, उसमें उसकी मोटर डूबने ही वाली है। इस दृश्य से वह बुरी तरह घबड़ा उठी और सोते- सोते ही चीख उठी—"फ्रेड वापिस लौट जाओ। खतरे से बचो। आगे खतरा है।" वह अपने पति को इसी नाम से पुकारती थी। यह एक रहस्य ही था कि हजारों मील की दूरी पर रह रही श्रीमती फ्रेड को उसी समय ऐसी अनुभूति कैसे हुई, जो न केवल भविष्य बताती थी, वरन एक की स्थिति का दूसरे को तत्क्षण आभास भी देती थी।

ब्रिटेन की सारकिक रिसर्च सोसायटी ने श्री मायर्स की अध्यक्षता में ऐसी अनेक घटनाओं की जाँच-पड़ताल की है, जिनमें मनुष्य की अंतर्निहित अतींद्रिय क्षमताओं का रहस्योद्घाटन होता है। जिन घटनाओं को मनुष्य के भीतर देव-दानव का आवेश कहा जाता है, उनमें से कई घटनाएँ भी इसी प्रकार की अतींद्रिय क्षमताओं से संबद्ध बताई गई हैं। उपरोक्त घटना से मिलती-जुलती एक और घटना सान फ्रांसिस्को की है। वहाँ का एक ट्रक ड्राइवर लुई अपनी पत्नी हैजल रेफर्टी से झगड़ा होने के कारण घर छोड़कर चला गया। झगड़ा इतना बढ़ा कि दोनों ने आवेश में आकर एकदूसरे से कभी न मिलने की कसम खा ली। इतना ही नहीं, उन्होंने वह शहर छोड़कर अन्यत्र चले जाने की बात भी कही, ताकि वे फिर कभी एकदूसरे का मुख न देख सकें।

इन दोनों में घनिष्ठ प्रेम था। इतना प्रेम कि दूसरे लोग उन्हें देखकर ईर्ष्या से जला करते थे। किसी बात पर उन्हें आवेश आ गया और गुस्सा-गुस्से में वे चले गए। किंतु गुस्सा शांत होने पर वे अनुभव करने लगे कि जरा से आवेश में आकर उन्होंने इतना बड़ा कदम उठा लिया है, जो नहीं उठाना चाहिए। वे सोचने लगे कि इतने समय से वे कितनी अच्छी तरह घनिष्ठ मित्रों की भाँति रह रहे थे। जैसे-जैसे दिन बीतते गये, दोनों का पश्चात्ताप बढ़ने लगा और वापस मिलने की बेचैनी भी होने लगी। इस बेचैनी को शांत करने के लिए वे ऐसा उपाय ढूँढने लगे कि साथी को ढूँढ सके और अपनी गलती स्वीकारकर एकदूसरे से क्षमा माँग सकें।

लेकिन समस्या यह थी कि लुई हैजल को और हैजल लुई को कहाँ ढूँढे? दोनों में किसी को भी तो यह पता नहीं था कि उनका साथी कहाँ है? एक दिन सबेरे हैजल ने सुना कि," लुई लास एजिल्टा शहर में है। वह तुम्हारा इंतजार ग्रिफिथ की वेधशाला के पास बैठाकर कर रहा है। हैजल वहाँ तुरंत पहुँच जाओ।" यह आवाज ऐसे सुनाई दी जैसे पास ही कोई रेडियो बज रहा हो और उससे यह सूचना प्रसारित हो रही हो।

ठीक इसी प्रकार की आवाज लुई ने भी सुनी कि, "ग्रिफिथ की वेधशाला पर पहुंचो, वहाँ बैठी हैजल तुम्हारा इंतजार कर रही है।" यह आवाज सुनकर दोनों ही तत्काल दौड़ पड़े और नियत स्थान पर पहुँचते ही दोनों ने एकदूसरे को देखा, आँखों में झाँका। वहाँ पश्चाताप के आँसू इस तरह भरे हुए थे कि पुतलियाँ किसी झील में तैरती-सी प्रतीत हो रही थीं। एकदूसरे को देखकर आँसुओं का वह बाँध टूट गया और दोनों फूट-फूटकर रोए।

अब दोनों के लिए आश्चर्य का विषय यह था कि मिलन की पृष्ठभूमि बनाने वाला यह प्रसारण कहाँ से और कैसे हुआ? लुई को हैजल से मिलने और हैजल  को लुई से मिलने के लिए यह अलग-अलग शब्दावली कैसे प्रसारित हुई? अगर यह रेडियो-प्रसारण था तो एनाउंस किसने किया? रेडियो स्टेशन पहुँचकर दोनों ने मालूम किया तो पता चला कि वहाँ से ऐसी कोई सूचना प्रसारित नहीं की गई फिर भी लुई और हैजल ने यह शब्द सुने थे और इसी आधार पर दोनों एकदूसरे से मिले। जब ऐसी कोई सूचना रेडियो द्वारा प्रसारित नहीं की गई तो आश्चर्य का विषय था कि यह सूचना उनके कानों ने कैसे सुनी? परामनोविज्ञानवेत्ता इस घटना को सुनकर और विश्लेषण करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि अतींद्रिय चेतना ऐसा ताना-बाना बुन सकती है। जिसके कारण दो घनिष्ठ व्यक्तियों के विचार एकदूसरे से वार्तालाप कर रहे हों।

अमेरिका के मनःशक्ति संस्थान के निर्देशक डाॅ. ब्रूकेल्स के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति में इस प्रकार की अतींद्रिय क्षमताएँ विद्यमान है, जिन्हें वह प्रयत्नपूर्वक जागृत कर सकता है। कभी-कभी यह शक्तियाँ अनायास भी जागृत हो जाती है, जो आमतौर पर हर किसी में नहीं दिखाई पड़ती। परामनोविज्ञान भी शोध, अन्वेषण और परीक्षणों के माध्यम से इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि मनुष्य की मानसिक शक्तियाँ इतनी सीमित नहीं है जितनी कि वह प्रतिदिन के कार्यकलापों में प्रयुक्त होती दिखाई देती है। उसका एक बहुत बड़ा अंश तो प्रसुप्त ही पड़ा रहता है और लोग उसका कोई उपयोग नहीं कर पाते, जिस प्रकार गड़ा या गाड़ा हुआ धन व्यक्ति के पास कितनी ही संपदा हो सकती है, पर कोई भी व्यक्ति अपनी सारी जमा पूँजी का उपयोग नहीं कर पाता। उसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य अपनी कुल जमा पूँजी मानसिक शक्ति का पूरा-पूरा उपयोग नहीं कर पाता।

उनके प्रसुप्त ही पड़े रहने का एक कारण यह भी है कि दिनों-दिन जीवन में उनकी कोई आवश्यकता नहीं पड़ती। यदि यह आवश्यकता अनुभव की जाने लगे कि उनका जागरण होना चाहिए तो ऐसी परिस्थितियाँ सहज ही विकसित होने लगती है, जिनमें व्यक्ति परोक्षानुभूति की उन विशेषताओं से संपन्न दिखाई पड़ता है, जो चमत्कारी और अद्भुत कही जा सकती हैं। इस तथ्य को प्रमाणित करने वाली अगणित घटनाएँ आए दिन मिलती रहती हैं और उनसे यह सिद्ध हो जाता है कि उस क्षमता को विकसित कर पाना किसी भी व्यक्ति के लिए संभव है। इस तथ्य पर की गई खोजों ने परामनोविज्ञान को और अधिक गहन अन्वेषणों के लिए प्रेरित किया है। तथा टैलीपैथी (विचार-संप्रेषण), क्लेयर वायर (दूरानुभूति), प्रीकाग्नीशन (पूर्वाभास) अब परामनोविज्ञान को स्वतंत्र-धारा बन गई है।

कुछ समय पूर्व तक इस तरह की बातों पर संदेह किया जाता था और उनकी यथार्थता अविश्वसनीय समझी जाती थी। ऐसी घटनाओं को मात्र जादूगरी के अतिरिक्त कोई महत्त्व नहीं दिया जाता था, किंतु अब विज्ञान क्रमशः इन्हें ऐसे प्रामाणिक तथ्य मानता चला जा रहा है, जिसकी खोज भौतिकी के अन्य क्रियाकलापों की तरह ही आवश्यक है। चेतना के संबंध में अभी तक जितनी जानकारी प्राप्त हो सकी है, उससे स्पष्ट हो चला है कि मनुष्य-मनुष्य के बीच पड़ी हुई गोपनीयता की दीवार उठ सकती है और न केवल एकदूसरे की अंतःस्थिति को जाना जा सकता है, अपितु कार्यक या भौतिक उपकरणों का प्रयोग किए बिना भी दूरस्थ रहे व्यक्तियों से भावनात्मक आदान-प्रदान संभव है।

परामनोविज्ञान के अनुसार विश्वमानस (यूनिवर्सल माइंड) एक समग्र विचार-सागर है और व्यक्ति की चेतना उसकी अलग-अलग लहरें हैं। ये लहरें अलग- अलग दिखाई देने पर भी एकदूसरे से अविच्छिन्न रूप में संबद्ध हैं। उस समग्र विचार-सागर से ही व्यक्तिगत चेतना अनेकविधि चेतनाएँ और स्फुरणाएँ उपलब्ध करती है। अध्यात्मशास्त्र तो इस मान्यता को काफी पहले से प्रामाणिक और अनुभवसिद्ध मानता रहा है। उसके अनुसार समस्त प्राणी एक ही विराट चेतना का अस्तित्व है। कायकलेवर की दृष्टि से अलग दीखते हुए भी सभी प्राणी आत्मिक दृष्टि से एक ही हैं। व्यक्तिगत भौतिकता और स्वभावगत विभिन्नताएँ एकदूसरे के विपरीत स्तर को दिखाई देने पर भी न केवल उनकी मूलप्रवृत्ति में साम्य है; वरन ऐसा पारस्परिक संबंध भी है जिसे पूर्णतया अलग कर पाना संभव नहीं हो सकता। अतींद्रिय क्षमताओं को प्रमाणित करने वाली घटनाएँ इसी तथ्य को सिद्ध करती है। भविष्य में जब इनका रहस्योद्घाटन होगा तो मनुष्य की सत्ता के बारे में यह विश्वासपूर्वक सप्रमाण कहा जा सकेगा कि वह उतना ही नहीं है जितना कि शारीरिक और मानसिक क्षमता के आधार पर जाना-समझा जाता है।


Quotation

मधुमक्खी को जब तक मधु की लालसा रहती है तब तक वह फूल के चारों ओर मँडराती भुनभुनाती ही रहती है, किंतु मधुसंचय कर चुकते ही वह मौन हो जाती है। मधुरस से उत्फुल्ल हो, यदि वह भुनभुनाने भी लगे तो यह भुनभुनाहट पहले की भुनभुन से भिन्न होगी। इस दूसरी भुनभुनाहट में कोई लालसा नहीं होगी।

इसी प्रकार आध्यात्मिक साधना के आरंभिक अभ्यासी बहुत बढ़-बढ़कर अध्यात्म चर्चा करते है, किंतु इसके पीछे प्रायः उसकी स्वयं को आध्यात्मिक दिखाने की अहंभावना रहती है। जिसे सचमुच वह आध्यात्मिक अनुभूति होनी शुरू हो जाती है, वह उसे गोपनीय धन की तरह रखता है। चाहे जब उसकी चर्चा कदापि नहीं करता। बाद में, यदि ज्ञानी उस विषय में बोलता भी है तो लोक-मंगल की उदात्तभावना से न कि पहले जैसे अहं से भरे आवेश में।

—रामकृष्ण परमहंस।


मनोबलः बलं बलः

भिक्षु संघ के साथ विहार करते हुए भगवान बुद्ध शाल्यवन में एक वटवृक्ष के नीचे बैठ गए। धर्म चर्चा के प्रसंग में एक शिष्य ने उनसे पूछा—भगवन्! कई लोग दुर्बल और साधनहीन होते हुए भी बड़े-बड़े कार्यकर दिखाते है, जबकि अच्छी स्थिति वाले साधनसंपन्न लोग भी उन कार्यों को करने में असफल रहते हैं। इसका क्या कारण है? क्या पूर्वजन्मों के पाप अवरोध बनकर खड़े हो जाते है?

नहीं! तथागत ने कहा और एक कथा सुनाने लगे—विराट नगर के राजा सुकीर्ति के पास लौहश्रृंग नामक एक हाथी था। राजा ने कई युद्धों में इस पर आरूढ़ होकर विजय प्राप्त की थी। शैशव से ही लौहश्रृंग को इस तरह प्रशिक्षित किया गया था कि वह युद्धकला में बड़ा प्रवीण हो गया था। सेना के आगे चलते हुए पर्वताकार लौहश्रृंग जब अपनी क्रुद्ध अवस्था में प्रचंड हुंकार भरता हुआ शत्रु सेनाओं में घुसता था तो देखते ही देखते विपक्षियों के पाँव उखड़ जाते थे।

लेकिन जन्म के बाद जिस प्रकार सभी प्राणियों को युवा और जरावस्था से गुजरना पड़ता है, उसी क्रम से लौहश्रृंग भी वृद्ध होने लगा, उसकी चमड़ी झूल गई और युवावस्था वाला पराक्रम जाता रहा। अब वह हाथीशाला की शोभामात्र बनकर रह गया। उपयोगिता और महत्त्व कम हो जाने के कारण उसकी ओर पहले जैसा ध्यान भी नहीं था। उसे मिलने वाले भोजन में कमी कर दी गई। एक बूढ़ा सेवक उसके भोजन-पानी की व्यवस्था करता, वह भी कई बार चूक कर जाता और हाथी को भूखा-प्यासा ही रहना पड़ता।

बहुत प्यासा होने और कई दिनों से पानी न मिलने के कारण एक बार लौहश्रृंग हाथीशाला से निकलकर पुराने तालाब की ओर चल पड़ा, जहाँ उसे पहले कभी प्रायः ले जाया जाता था। उसने भरपेट पानी पीकर प्यास बुझाई और गहरे जल में स्नान के लिए चल पड़ा। उस तालाब में कीचड़ बहुत था। दुर्भाग्य से वृद्ध हाथी उसमें फँस गया। जितना भी वह निकलने का प्रयास करता उतना ही फँसता जाता और आखिर गरदन तक कीचड़ में फँस गया।

यह समाचार राजा सुकीर्ति तक पहुँचा, तो वे बड़े दुःखी हुए। हाथी को निकलवाने के कई-कई प्रयास किये गए, पर सभी निष्फल। उसे इस दयनीय दुर्दशा के साथ मृत्युमुख में जाते देखकर सभी खिन्न थे। जब सारे प्रयास असफल हो गए, तब एक चतुर सैनिक ने युक्ति सुझाई। उसके अनुसार हाथी को निकालने वाले सभी प्रयत्न करने वालों को वापिस बुला लिया गया और उन्हें युद्ध सैनिकों की वेषभूषा पहनाई गई। वे वाद्ययंत्र मँगाए गए, जो युद्ध अवसर पर उपयोग में लाए जाते थे।

हाथी के सामने युद्ध नगाड़े बजने लगे और सैनिक इस प्रकार कूच करने लगे जैसे वे शत्रुपक्ष की ओर से लौहश्रृंग की ओर बढ़ रहे हैं। यह दृश्य देखकर लौहश्रृंग में न जाने कैसे यौवनकाल का जोश आ गया। उसने जोर से चिंघाड़ लगाई तथा शत्रु सैनिकों पर आक्रमण करने के लिए पूरी शक्ति से कंठ तक फँसे हुए कीचड़ को रौंदता हुआ तालाब के तट पर जा पहुँचा और शत्रु सैनिकों पर टूट पड़ने के लिए दौड़ने लगा। बड़ी मुश्किल से उसे नियंत्रित किया गया।

यह कथा सुनाकर तथागत ने कहा—"भिक्षुओं! संसार में मनोबल ही प्रथम है। वह जाग उठे तो असहाय और अवश प्राणी भी असंभव होने वाले कामकर दिखाता है तथा अप्रत्याशित सफलताएँ प्राप्त करते हैं।”


अतींद्रिय क्षमताएँ कल्पना नहीं, विज्ञानसम्मत

योगशास्त्रों में आत्मा को परमात्मा से मिलाने, जीव को ब्रह्म से विलीन करने वाली साधनाओं द्वारा अपने लक्ष्य की प्राप्ति संभव बताई गई है, वहीं यह भी बताया गया है कि ये साधनाएँ करते-करते मनुष्य अनेक दिव्यशक्तियों का स्वामी बन जाता है और उसके भीतर ऐसी-ऐसी विलक्षणताओं के उद्भव की बात भी कही गई है, जिन्हें चमत्कारी सिद्धियाँ कहा जाता है। योग दर्शन के चार पादों में से एक पाद-एक अध्याय में तो केवल उसी बात का विवेचन किया गया है कि योगसाधक को कौन-कोन सी सिद्धियाँ प्राप्त होती है। दिव्यदर्शन, दिव्यश्रवण, दूरदर्शन, भूत-भविष्य का ज्ञान, प्रातिभ, श्रावण, वेदना, आदर्श आस्वाद, बार्ता छह पुरुष ज्ञान सिद्धियाँ तथा अणिमा, महिमा लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व, काय सपत और अनभिघात आदि सिद्धियों का उल्लेख आता है। अन्याय शास्त्रों में इन सिद्धियों का इतना सविस्तार उल्लेख मिलता है कि उन्हें पढ़कर सहज ही विश्वास करते नहीं बनता। कई लोग इसी कारण योगशास्त्र और उसकी सिद्धियों को कपोल-कल्पित मानते थे। कल तक विज्ञान की भी यही धारणा थी किंतु जब इस तरह की अनेकानेक घटनाओं और सिद्धिसंपन्न व्यक्तियों का विश्लेषण तथा परीक्षण किया गया तो पता चला कि अतींद्रिय सामर्थ्य केवल कहने-सुनने या मनमोदक खाने जैसी ही बात नहीं है। बल्कि वे तथ्यपूर्ण हैं और योगसाधना द्वारा उनका विकास एक विज्ञानसम्मत प्रक्रिया से होता है। उसके द्वारा विश्व-ब्रह्मांड में व्याप्त परम चेतना से तादात्म्य स्थापित कर जीवचेतना उसकी सामर्थ्य को अर्जित करने लगती है।

मुंडकोपनिषद् के दूसरे अध्याय में महर्षि अंगिरा शौनक से कहते हैं कि,"जिस प्रकार प्रज्वलित अग्नि से उसी के जैसे रूप-रंग वाली हजारों चिनगारियाँ चारों ओर निकलती है, उसी प्रकार परम पुरुष अविनाशी ब्रह्म से नाना प्रकार के मूर्त-अमूर्त भाव निकलते हैं, उन्हें जीवसत्ता भी कहा जा सकता है। चिनगारियाँ जिस प्रकार अग्नि की समस्त विशेषताएँ अपने में समाहित किए रहती हैं, उसी प्रकार जीवात्मा में भी परमात्मा की समस्त विशेषताएँ अंतर्निहित रहती हैं। उन्हें प्रयत्नपूर्वक योगसाधन और तपश्चर्या द्वारा जागृत किया जा सकता है। उस जागृति के फलस्वरूप जो कुछ इंद्रियातीत है, वह इंद्रियगम्य बन सकता है, और जिसे बुद्धि द्वारा नहीं समझा जा सकता, जो बुद्धि की पकड़ में नहीं आता वह प्रज्ञा द्वारा, जागृत सूक्ष्मबुद्धि द्वारा जाना जा सकता है।

अतींद्रिय क्षमताओं के प्रमाण ऐसे रूप में भी मिलते हैं कि कई बार यह किंहीं व्यक्तियों में बिना किसी प्रयास के अनायास ही जागृत हो जाती है। शास्त्रकार इसका कारण पूर्व जन्मों के संचित संस्कार बताते है। पूर्व अभ्यास के फलस्वरूप भी इनका उदय हुआ बताया जाता है, यह किस प्रकार और कैसे उत्पन्न होती हैं? यह एक अलग विषय है, पर इन चमत्कारी असाधारण कही जाने वाली घटनाओं से इतना तो पता चलता ही है कि मनुष्य में अतींद्रिय क्षमताओं के स्त्रोत विद्यमान हैं तथा उन्हें आध्यात्मिक साधनाओं या भौतिक उपायों और उपचारों क्षरा जागृत किया जा सकता है। ऐसी अनेक घटनाएँ आए दिन सामने आती रहती हैं जिनके आधार पर चेतन की स्वतंत्र सत्ता, ब्रह्माण्डव्यापी, चेतन जगत और अतींद्रिय सामर्थ्य प्रमाणित होती है।

पिछले दिनों विचारशील लोगों का ध्यान इस ओर आकर्षित हुआ और उन्होंने इस दिशा में खोज-बीन की। खोज-बीन का लक्ष्य यह रखा गया कि क्या सचमुच ही चेतना का अपना अस्तित्व, क्षेत्र और बल होता है? यदि होता है तो क्या उसको विकसित करके उपयोग में लाया जा सकता है? यदि हाँ, तो उसका लाभ किस प्रकार उठाया जा सकता है? इन बातों की खोज-बीन करने पर जो जानकारियाँ मिली हैं, वे इसके लिए विवश करती हैं कि विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय से मनुष्य को अधिक समर्थ एवं संसार को अधिक सुखी बनाने वाले आधार खड़े किए जा सकते है।

इस खोज-बीन के दौरान अन्वेषणकर्ताओं ने ऐसी कई घटनाओं और व्यक्तियों की जाँच की जिनका संबंध अतींद्रिय क्षमता से था। चेकोस्लोवाकिया के एक शिल्पी व्रेतिलाव काफ्थ में अतीन्द्रिय दर्शन की अद्भुत क्षमता थी। उसके द्वारा उत्तरी ध्रुव की ऋतुओं और परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त करने में महत्त्वपूर्ण सहयोग मिला तथा दूसरे महायुद्ध के समय उसने युद्ध के मोर्चे की हलचलों के बारे में जो विलक्षण जानकारियाँ दीं, वे आश्चर्यजनक रूप से सत्य सिद्ध हुईं। इतना ही नहीं उसकी इस क्षमता का लाभ भी युद्ध में उठाया गया। इनसाइक्लोपीडिया ऑफ आकल जो तंत्रविद्या के विश्वकोष के रूप में प्रसिद्ध है, में एटीन मेसकर नामक एक ऐसे व्यक्ति का उल्लेख मिलता है जो पेट के माध्यम से अप्रत्यक्ष एवं अदृश्य वस्तुओं का विवरण बताया करता था। फ्रांसीसी वैज्ञानिक और कविजूल्स ने इस व्यक्ति की जाँच कर यह लिखा है कि प्रत्येक व्यक्ति की त्वचा में ऐसे कोषाणु उपस्थित रहते हैं जो देखने की क्षमता रखते हैं। मेसकर में ये कोषाणु अधिक सुविकसित स्थिति में विद्यमान है। यह कोष स्पर्श के आधार पर देखने का बहुत कुछ प्रयोजन पूरा करते है। स्मरणीय है, अंधे व्यक्ति अपनी त्वचा और कानों द्वारा ही नेत्रों के अभाव की बहुत कुछ आवश्यकता पूरी कर लेते हैं।

सन् १९५९ में अमरीका के वैज्ञानिकों ने टैलीपैथी का सफल प्रयोग किया और बिना किसी यंत्र-उपकरण के नाटिलस नामक पनडुब्बी तक अपने विचार-संदेश भेजे और पनडुब्बी में बैठे व्यक्तियों से भी उसी प्रकार के विचार-संदेश प्राप्त किए। इस समाचार को रूस में काफी महत्त्व दिया गया और वहाँ भी टैलीपैथी के जो प्रयोग चल रहे थे, उन्हें काफी तीव्र कर दिया गया। रूस के एक वैज्ञानिक ने एक खरगोश के नवजात बच्चों को पनडुब्बी में पहुँचाया। उद्देश्य था— टैलीपैथी का प्रयोग-परीक्षण करना। इन बच्चों की माँ, मादा खरगोश को समुद्र से बाहर रखा गया तथा मादा और बच्चों के मस्तिष्क में एक ही प्रकार के इलेक्ट्रोड्स लगा दिए गए थे। गहरे पानी में पनडुब्बी पहुँचने पर बच्चों को एक-एक कर कत्ल किया गया। बच्चों और उनकी माँ के मस्तिष्क में लगे इलेक्ट्रोड्स का कोई संबंध नहीं था, पर देखा गया कि जिस समय बच्चे कत्ल किए गए उस समय उनकी माँ बुरी तरह तिलमिलाई। उसकी गतिविधियाँ ऐसी थी मानों वह अपने बच्चों के छीने जाने पर उन्हें बचाने के लिये प्रयत्न कर रही हो या जैसे ठीक उसी के सामने उनका कत्ल किया जा रहा हो। इस प्रयोग से जाना गया कि प्राणियों के बीच कोई पारस्परिक संबंध सूत्र है और उसे प्रखर बनाकर उनके बीच आदान-प्रदान का आधार खड़ा किया जा सकता है।

अमेरिका के जीवविज्ञानी क्लीप वैवस्टीट ने कुछ समुद्री केकड़ों पर इसी प्रकार के प्रयोग किए। उन्होंने देखा कि एक केकड़े के मारे जाने पर दूसरे केकड़ों को ही नहीं अन्य जलजीवों को भी कष्ट का अनुभव होता है। इस अनुभूति-प्रवाह को रोकने के लिए सीसे की दीवारें खड़ी की गईं जिससे कष्ट पाने वाले प्राणी का सूक्ष्मसंपर्क उस क्षेत्र के अन्य प्राणियोँ से न रहे। इतना करने पर भी वह प्रवाह रुका नहीं और एक पीड़ित प्राणी की प्रतिक्रिया अन्यान्यों को प्रभावित करती रही। इस आधार पर वैवस्टेट ने यह प्रतिपादित किया है कि प्राणीमात्र के बीच एक ऐसा चेतना-प्रवाह विद्यमान हैं जो उन्हें परस्पर एकसूत्र में बाँधे रहता है और वे एकदूसरे के सुख-दुख की अनुभूति करते है। एक दूसरे वैज्ञानिक डाॅ. गार्डनर मरफी का प्रतिपादन भी इसी प्रतिपादन से मिलता जुलता है। उनके अनुसार जिस प्रकार समुद्र में पाए जाने वाले ज्वालामुखी द्वीप समूह बाहर से पृथक दीखते हुए भी अग्नि उगलने के संबंध में गहराई के अंतराल में परस्पर जुड़े रहते हैं, उसी प्रकार प्राणियों की सत्ता पृथक-पृथक होते हुए भी उन के बीच ऐसा संबंध-सूत्र विद्यमान हैं। जो एकदूसरे की अनुभूतियों में सहभागी बनाए रहता है।

बीस-बाईस वर्ष पूर्व तक रूप में टैलीपैथी को जादूगरी और धोखाधड़ी की संज्ञा दी जाती थी तथा उसका तिरस्कारपूर्वक उपहास उड़ाया जाता था। इस संबंध में कहा जाता था कि विचार-संप्रेषण के लिए मस्तिष्क में इलैक्ट्रोमैजोटिक-तरंगें चाहिए जब कि वहाँ उनका कोई अस्तित्व नहीं है। ऐसी दशा में इस प्रकार की कोई संभावना विज्ञान स्वीकार नहीं कर सकता। इस प्रतिपादन के अग्रणी वैज्ञानिक अलेक्जेंडर किताई गोरोरस्की ने पीछे अपने विचार बदल दिए। विचार बदलने का कारण यह था कि आगे चलकर उन्होंने कई परामनोवैज्ञानिक शोधों का निकट से अध्ययन किया और जो तथ्य सामने आए उनके अनुसार अपनी पूर्व धारणाओं की गलती को ईमानदारी के साथ स्वीकार कर लिया।

गोरोरस्की ने अपने बाद के प्रतिपादनों में कई व्यक्तियों की अतींद्रिय क्षमता को पूरी ईमानदारी के साथ स्वीकार किया है। उन्होंने बूल्फ मेसिंग नामक एक व्यक्ति का उल्लेख किया है, जिसमें अनायास ही ऐसी क्षमता उत्पन्न हो गई, जिससे वह दूरस्थ घटनाओं एवं विचारों का परिचय प्राप्त कर लेता था। गोरोरस्की के अतिरिक्त अन्य कई व्यक्तियों ने भी उसका परीक्षण किया और पाया कि टैलीपैथी कोई जादूगरी अथवा धोखाधड़ी नहीं बल्कि एक ध्रुवसिद्ध सत्य है।

भारतीय योग शास्त्रों में स्थूलनेत्रों के अतिरिक्त एक तीसरे सूक्ष्मनेत्र का उल्लेख भी मिलता है, जिसे आज्ञाचक्र कहते है। इसका स्थान दोनों ध्रुवों के बीच में बताया जाता है। ध्यान-साधना के समय यहीं दृष्टि केंद्रित करने का निर्देश भी विभिन्न शास्त्रों में मिलता है। इस केंद्र को संसार की स्थूल और सूक्ष्म परिस्थितियाँ जानने-समझने की ही नहीं, वस्तुओं और व्यक्तियों को प्रभावित करने की भी क्षमता है। इतना ही नहीं वातावरण में व्यापक परिवर्तन भी इस केंद्र के उपयोग द्वारा संभव बताया गया है। दूरदर्शन, परोक्ष दर्शन, तो उसकी आरंभिक कला है। एक्स-किरण जिस प्रकार ठोस पदार्थों से पार हो जाती है, वे पदार्थ उसमें कोई बाधा नहीं पहुँचते और वह आँखों से न दिखाई देने वाली भीतरी स्थिति का भी चित्र खींचकर रख देती है, उसी प्रकार आज्ञाचक्र की संकल्प- किरणें दूर अदृश्य को भी तमाम अवरोधों—बाधाओं के बाद भी जान लेती हैं। इस माध्यम से न केवल पदार्थों को देखने का प्रयोजन पूरा होता है, वरन् जीवित प्राणियों की मनःस्थिति को भी समझ पाना संभव हो जाता है। आज्ञाचक्र द्वारा मात्र देखना-समझना ही संभव नहीं होता अपितु उसकी क्षमता दूसरों को भी प्रभावित और परिवर्तित कर सकती है।

इस तथ्य को तो विज्ञान भी स्वीकार करता है कि विश्व का हर पदार्थ अपने साथ ताप और प्रकाश की विद्युत-किरणें संजोए हुए हैं। वे कंपन लहरियों के साथ इस निखिल विश्व में अपना प्रवाह फैलाता है और ईथरतत्त्व के द्वारा दूर-दूर तक जा पहुँचती हैं। यदि उन्हें ठीक प्रकार से पकड़ा जा सके तो दृश्य बहुत दूरी पर अवस्थित होते हुए भी देखा जा सकता है। इस प्रवाह को पकड़ पाना किसी प्रकार संभव हो सके तो जो घटनाएँ बहुत दूर घटित हो रही हैं उन्हें निकटवर्ती दृश्यों की तरह देख पाना सहज संभव है। आस-पास की वस्तुओं और ध्वनियों को नेत्र तथा कर्णेंद्रियाँ देख-सुन सकती है। प्रत्यक्ष को ये ही देखती- सुनती है। आज्ञाचक्र वह तीसरा नेत्र और तीसरा श्रोत्र है जो अदृश्य भी कहा गया है। छठी इंद्रियाँ अर्थात् जो पाँचों इंद्रियों का वह क्रिया-व्यापार संपादित कर सकती है, जो स्थूलइंद्रियों के माध्यम से संभव न हो। यही है—अतींद्रिय क्षमता और उसका विज्ञान।


मृदुल मनोहर वातावरण (Kahani)

स्वामी रामतीर्थ संन्यास से पूर्व जिस मुहल्ले में रहते थे उसमें वेश्याएँ भी रहती थीं। मुहल्ले वालों ने सरकार को अर्जी दी कि इन वेश्याओं को यहाँ से हटाया जाए। अर्जी पर हस्ताक्षर करने के लिए रामतीर्थ से भी कहा गया।

उनने अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए कहा—"मैंने आज तक यहाँ कोई वैश्या नहीं देखी। हर घर में इधर तो मृदुल-मनोहर बहनें ही रहती हैं।"


जो कुछ चाहें, वह सब पाएँ

अध्यात्म मान्यताओं के अनुसार सभी प्राणियों में एक ही चेतना का अस्तित्व विद्यमान है। शरीर की दृष्टि से वे भले ही अलग-अलग हों, पर वस्तुतः आत्मिक मान्यता है। विश्वमानस एक अथाह और असीम जलराशि की तरह है। व्यक्तिगत चेतना उसी विचार महासागर (यूनिवर्सल माइंड) की एक नगण्य -सी तरंग है। इसी के माध्यम से व्यक्ति अनेकविध चेतनाएँ उपलब्ध करता है और अपनी विशेषताएँ सम्मिलित करके फिर उसे वापस उसी समुद्र को समर्पित कर देता है।

अब तक इस तरह की अध्यात्म मान्यताओं को कल्पित और मनगढ़ंत समझा जाता था। पर जबसे मनुष्य की अतींद्रिय क्षमताओं के वैज्ञानिक प्रमाण मिलने लगे है, तब से परामनोविज्ञान भी इस दिशा में सक्रिय हुआ और जो निष्कर्ष प्राप्त हुए उनसे उपरोक्त अध्यात्म मान्यताओं की ही पुष्टि होती है। विदेशों में इस विषय पर काफी खोज-बीन हुई है, तथा अनेकों प्रयोग-परीक्षण और अतींद्रिय क्षमताओं के प्रदर्शन किए गए हैं। कुछ वर्ष पूर्व ही मैक्सिको (अमेरिका) में डाॅ. राल्फ एलेक्जेंडर ने इच्छाशक्ति की प्रचंड क्षमता का सार्वजनिक प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन में प्रायः सभी प्रतिष्ठित पत्रों के प्रतिनिधि और अन्यान्य वैज्ञानिक, तार्किक, बुद्धिजीवी तथा संभ्रान्त नागरिक आमंत्रित किए गए थे। प्रदर्शन यह था कि आकाश में छाए बादलों को किसी भी स्थान से किसी भी दशा में हटाया जा सकता है और उसे कैसी भी शक्ल दी जा सकती है। इतना ही नहीं, बादलों को बुलाया और भगाया जा सकता है।

नियत समय पर प्रदर्शन आरंभ हुआ। उस समय आकाश में एक भी बादल नहीं था। पर डाॅ. राल्फ ने देखते ही देखते घटाएँ बुला दीं तथा दर्शकों की माँग के अनुसार पूर्वघोषणा सहित बादलों के टुकड़े अभीष्ट दिशाओं में बिखेर देने तथा उनकी चित्र-विचित्र शक्लें बना देने का सफल प्रदर्शन किया। इस अद्भुत प्रदर्शन की चर्चा उन दिनों अमेरीका के प्रायः सभी अखबारों में मोटे हेडिंग देकर छपी थी। उपरोक्त प्रदर्शन पर टिप्पणी करते हुए एक प्रसिद्ध विज्ञानी ऐलेन एप्रागेट ने ‘साइकोलॉजी’ पत्रिका में एक विस्तृत लेख छापकर यह बताया कि, "मनुष्य की इच्छाशक्ति अपने ढंग की एक सामर्थ्यवान विद्युत-धारा है और उसके आधार पर प्रकृति की हलचलों को प्रभावित कर सकना पूर्णतया संभव है। इसे जादू नहीं समझना चाहिए।"

इच्छाशक्ति द्वारा वस्तुओं को प्रभावित करना अब एक स्वतंत्र विज्ञान बन गया है, जिसे ‘साइकोकिर्नास्त्रस’ कहते है। इस विज्ञान-पक्ष का प्रतिपादन है कि ठोस दीखने वाले पदार्थों के भीतर भी विद्युत अणुओं की तीव्रगामी हलचलें जारी रहती है। इन अणुओं के अंतर्गत जो चेतनातत्त्व विद्यमान है, उन्हें मनोबल की शक्ति-तरंगों द्वारा प्रभावित, नियंत्रित और परिवर्तित किया जा सकता है। इस प्रकार मौलिक जगत पर मनःशक्ति के नियंत्रण को एक तथ्य माना जा सकता है। अमेरिका के ही ओरीलियो शहर में डाॅ. एलेक्जेंडर ने एक शोध संस्थान खोल रखा हैं, जहाँ वस्तुओं पर मनःशक्ति के प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन विधिवत किया जा रहा है। कई शोधकर्त्ता और विद्यार्थी इस संस्थान में शोधनिरत हैं। एक व्यक्ति के विचार दूरवर्ती दूसरे व्यक्ति तक भी पहुँच सकते है और वस्तुओं को ही नहीं व्यक्तियों को भी प्रभावित कर सकते है, यह तथ्य अब असंदिग्ध हो चला है। अनायास घटने वाली घटनाएँ ही इसकी साक्षी नहीं है, वरन् प्रयोग करके भी यह संभव बनाया जा सका है कि यदि इच्छाशक्ति आवश्यक परिमाण में विद्यमान हो या दो व्यक्तियों के बीच पर्याप्त घनिष्ठता हो तो विचारों के वायरलैस द्वारा एकदूसरे से संपर्क संबंध स्थापित किया जा सकता है और अपने मन की बात कही-सुनी जा सकती है।

इच्छा और संकल्पशक्ति के आधार पर असंभव लगने वाले दुष्कर कार्य भी किए जा सकते है। सन् १९०२ में बंगाल के एक हठयोगी साधु ने प्रतिज्ञा की कि वह १० वर्षों तक अपना बायाँ हाथ उठाए ही रहेगा, कभी नीचे नहीं गिराएगा और सचमुच ही वह लगातार १० वर्षों तक बिना हिलाए अपना बायाँ हाथ ऊँचा किए रहा। हठयोगी साधु का नाम था—'अगस्तिया'। साधु अगस्तिया के हाथ में इस बीच एक चिड़िया ने घोंसला भी बना लिया और उसमें अंडे भी दिए। हाथ इतना स्थिर रखा जाता था कि चिड़िया को भी संभवतः यह भ्रम हो गया कि वह किसी पेड़ पर रहती है। सो उसने बड़े मजे के साथ योगी के उठाए हुए हाथ की हथेली पर घोंसला बना लिया। योगी अगस्त्य के हाथ की हड्डियाँ सीधी और मजबूत हो गईं। इतने समय तक हाथ उठाए रहने के कारण हड्डियाँ इतनी सख्त हो गईं कि उनका मुड़ना बंद हो गया और इस तरह एक प्रकार से हाथ बेकार ही हो गया। पर योगी का कहना था कि इस प्रतिज्ञा के पालन में उसे जरा भी कष्ट नहीं हुआ। योग की ऐसी साधनाओं के पीछे कोई विशेष सिद्धांत नहीं है। है भी, तो इतना मात्र ही कि तितिक्षा के अभ्यास द्वारा अपनी इच्छाशक्ति को प्रखर बनाया जाए।

शरीर में यदि एक नन्हीं-सी सुई भी चुभ जाती है तो बड़ा कष्ट होता है किंतु सिंगापुर के एक भारतीय योगी ने अपने शरीर में ५० भाले आर-पार घुसेड़ लिए तथा इस स्थिति में भी वह लोगों से हँस-हँसकर बात-चीत करता रहा। लोगों ने कहा—"यदि आपको कष्ट नहीं हो रहा है, तो आप थोड़ा चलकर दिखाइए।" इस पर योगी ने तीन मील चलकर भी दिखा दिया। उन्होंने बताया कि कष्ट दरअसल शरीर को होता है, आत्मा को नहीं। इस योगी का उल्लेख—'ए वंडर बुक ऑफ स्ट्रेंज फैक्ट्स' नामक प्रसिद्ध पुस्तक में भी किया गया है, साथ ही योगी का यह अभिवचन भी कि यदि अनुभव अपने को आप को आत्मा में स्थित कर ले तो जिन्हें सामान्य लोग यातनाएँ कहते है वह कष्ट भी साधारण खेल जैसे लगने लगते हैं।

विंध्याचल के एक योगी गणेश गिरि ने अपने होठों के आगे ठोडी वाले हिस्से में थोड़ी गीली मिट्टी रखकर उसमें सरसों बो दिए। जब तक सरसों उगकर बड़े नहीं हो गए और उनकी जड़ों ने खाल चीरकर अपना स्थान मजबूत नहीं कर लिया तब तक वे धूप में चित्त लेटे रहे। साहिब उल्लाह शाह नामक लाहौर का एक मुसलमान फकीर ६०० पौंड से भी अधिक वजन की मोटी साँकलें पहने रहता था। वृद्ध हो जाने पर भी इतना वजन अभ्यास के कारण भार नहीं बना। पंजाब में आज भी यह फकीर साँकल वाला और जिगलिंग के नाम से याद किया जाता है। उसकी मृत्यु के बाद साँकलों की तौल की गई तो वह 670 पौंड निकलीं।

अन्य देशों में भी अभ्यास द्वारा इच्छाशक्ति बढ़ाने और उसे प्रखर बना लेने के रूप में ऐसी कई विचित्रताएँ देखने को मिल जाती हैं जो इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य कुछ विशेष परिस्थितियों में ही शांत, संतुलित, सुखी और संतुष्ट भले ही रहता हो, परंतु इच्छाशक्ति को बढ़ाया जाए तथा अभ्यास किया जाए तो वह अपने को चाहे जिस रूप में बदल सकता है। इंका जाति के राजा अहाहुल्लाया ने अपने कानों में वजनदार छल्ले डालकर उन्हें १५ इंच तक बढ़ा लिया था। उसका शरीर मनुष्यों जैसा होते हुए भी कान हाथी के समान लगते थे। राजा रणजीत सिंह के दरबार में प्रसिद्ध भारतीय योगी संत हरदास ने जनरल वेटुरा के सम्मुख अपनी जीभ को निकालकर माथे का वह हिस्सा जीभ से छूकर दिखा दिया था जो दोनों भौहों के बीच होता है। संत हरदास बता रहे थे कि, "जीभ को मोड़कर गरदन के भीतर जहाँ चिड़िया होता है उस छेद को बंद कर लिया जाए तो योगी मस्तिष्क में अमृत का पान करता है, ऐसा योगी अपनी मृत्यु को भी जीत लेता है।" अंग्रेज जनरल का कहना था कि,"जीभ इतनी लंबी हो ही नहीं सकती।" इस पर संत हरदास ने अपनी जीभ को आगे निकाल दिखा दिया। उन्होंने बताया कि,"कुछ विशेष औषधियों द्वारा जीभ को सूँतकर इस योग्य बना लिया जाता है।"

भारतीय योगी चांगदेव की योगगाथाएँ भारत भर में प्रसिद्ध हैं। एक-एक करके उन्होंने 14 बार अपनी मृत्यु को वापस लौटाया था। उनकी आयु 1400 वर्ष हो गई बताई जाती है। ईसा मसीह के समय से लेकर बारहवीं शताब्दी में संत ज्ञानेश्वर के समय तक उनकी गाथाओं के उल्लेख मिलते है। वह शेर की सवारी किया करते थे और शेर को हाँकने के लिए जहरीले साँप का चाबुक लिए रहते थे। एक बार उन्हें हवा में स्थिर रहने की चुनौती दी गई तब उन्होंने हजारों लोगों के सामने प्रवचन करने का प्रस्ताव किया। एक-एककर चौबीस चौकियाँ रखी गईं और सबसे ऊपरी चौकी पर बैठकर उन्होंने प्रवचन देना आरंभ किया। पीछे उनके पूर्व आदेशानुसार शिष्यों ने एक-एक चौकी नीचे से हटाना आरंभ किया और इस प्रकार सभी चौकियाँ हटा ली गईं। पर चांगदेव वैसे ही २४ वीं चौकी जितनी ऊँचाई पर बैठकर प्रवचन देते रहे। लोगों ने उनकी जय-जयकार की तो वे बोले—"भाइयों! इसमें मेरा कुछ भी बड़प्पन नहीं। योगक्रियाओं के अभ्यास द्वारा मनुष्य चाहे तो पक्षियों की तरह हवा में उड़ सकता है और सितारों की तरह हवा में अधर में लटककर संसार का दृश्य देखता रह सकता है।"

अब तक इस प्रकार की घटनाओं को कपोल-कल्पित समझा जाता था, पर हस्तगत कई प्रामाणिक तथ्य के आधार पर यह प्रतिपादित किया गया है कि मनुष्य अलग-थलग एकाकी इकाई दिखाई पड़ने पर भी वह है, तो उसी का अंश। अपनी बढ़ी हुई इच्छाशक्ति को बढ़ाकर इस संसार के सिरजनहार की तरह समर्थ और शक्तिमान बन सकता है।


अव्यवस्थित होने से राज्य की हानि (kahani)

प्राचीनकाल में चंद्रवंश में चित्र नामक नरेश हुआ। दक्षिण में समुद्रतटवर्ती द्रविड़ राज्य का वह अधिपति था। वह धार्मिक प्रवृत्ति का था तथा सभी धर्म-मतों का सम्मान करता था।

एक बार पर्यटन के समय अरण्य में उसे एक भव्य आश्रम दीखा। कौतूहलवश राजा चंद्र वहाँ गया। आश्रम के प्रमुख लोगों ने अपने तर्कों से राजा को यह बताया कि," मात्र उनका ही धर्म-मत श्रेष्ठ है।" उन्होंने अपना धर्मग्रंथ दिखाया, जिसमें उल्लेख था कि इस धर्म के मानने वालों का कर्त्तव्य था कि वे अपने इष्टदेव को प्रसन्न करने के लिए अन्य मतावलंबियों का निश्शंक वध करे।

राजा उन दाढ़ी-बाल रखे हुए साधुवेशी चालाकों के जाल में फँस उसी धर्म-मत में दीक्षित हो गया। लौटकर राजधानी पहुँचा तो घोषणा कर दी कि," सभी नागरिक इस धर्म-मत को मानने को बाध्य है। अन्य धर्मावलंबी दंडित होंगे।"

अनेक प्रतिभासम्पन्न लोग, विद्वान, विचारक, धनिक कलाकार आदि जो भिन्न मत रखते थे, यह घोषणा सुन राज्य छोड़ चल दिए। चापलूसों और पाखंडियों की बाढ़ आ गई, जो राजा के मत के कट्टर अनुयायी बने फिरने लगे और मनमानी करने लगे। इस सांप्रदायिकता के परिणामस्वरूप शीघ्र ही राज्य में श्रेष्ठ नागरिकों की कमी हो गई, अव्यवस्था फैलने लगी, राजकोष रिक्त हो चला, उद्योग उखड़ गये, व्यापार-बाजार अनियंत्रित हो गया। विद्वजन उस राजा को नर-पिशाच कहने लगे। जब स्थिति काबू से बाहर हो गई, तब राजा को भूल का भान हुआ, पर शीघ्र ही शत्रुओं ने उस राज्य पर आक्रमण कर दिया। और अव्यवस्थित राज्य को पराजित कर दिया।


निश्चित रूप से आपने आत्महत्या करना चाहा

“किसी भी इमारत की सबसे ऊपरी मंजिल की छत पर चढ़कर तुम अगर नीचे झाँकते हो तो डरने क्यों लगते हो?"—ब्रिटेन के प्रसिद्ध मनःशास्त्री डा. स्टेनले ने अपने छात्रों से प्रश्न किया। छात्रों ने इसके अलग-अलग उत्तर दिए, किंतु उनमें से एक भी उत्तर सही नहीं था। बाद में स्वयं डा. स्टेनले ने अपने ही प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा—”क्योंकि, उस समय तुम्हें यह भय होने लगता है कि कहीं मैं यहाँ से गिर न जाऊँ। किसी भी व्यक्ति के दिमाग में बहुत ऊँचे स्थान पर चढ़कर नीचे झाँकने से यह विचार आ सकता है कि यदि मैं यहाँ से कूद जाऊँ तो क्या होगा? यह विचार अकारण नहीं, बल्कि मनुष्य का अपना अवचेतन मन ही उसे कूद पड़ने या गिर जाने के लिए प्रेरित करता है।”

डा. स्टेनले का यह प्रतिपादन विवाद का विषय हो सकता है, पर इसमें काई संदेह नहीं है कि अधिकांश लोग अपने जीवन को निस्सार, व्यर्थ और निरर्थक अनुभव करते हैं। यही कारण है कि सामान्य-सी रोग, बीमारियों के समय, थोड़ी-सी प्रतिकूल परिस्थितियाँ आने पर व्यक्ति मर जाने अथवा जीवन का अंत हो जाने की कामना करने लगता है। एक मनोवैज्ञानिक के मतानुसार प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में एक से अधिक बार आत्महत्या कर लेने की बात सोचता है। यह बात अलग है कि वह अपने जीवन का अंत कर लेने का साहस नहीं जुटा पाता है।

फिर भी कई दुस्साहसी व्यक्ति परीक्षा में असफलता, नौकरी छूट जाने या उन्नति न होने, परिवार में कलह होने, मुकदमेबाजी में हार जाने के छोटे-छोटे कारणों से आत्महत्या कर लेते हैं। इन कारणों से आत्महत्या करने वालों की संख्या दिनों-दिन बढ़ती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिर्पोट के अनुसार प्रतिदिन 12 हजार व्यक्ति आत्महत्या का प्रयास करते है। अर्थात एक मिनट में लगभग 9 व्यक्ति आत्महत्या की चेष्टा करते हैं। इन नौ व्यक्तियों में से आठ व्यक्ति या तो बचा लिए जाते हैं अथवा मृत्यु की यंत्रणा न सह पाने के कारण स्वयं ही सहायता के लिए पुकारने लगते है और किसी न किसी प्रकार बच जाते है। नौ में से एक व्यक्ति प्रति मिनट आत्महत्या करता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आत्महत्या करने वालों की संख्या पिछले बीस वर्षों में तीन गुना बढ़ी है। प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि लोग आत्महत्या क्यों करते है? मनोवैज्ञानिक इस प्रश्न के अलग-अलग उत्तर देते है। कुछ लोगों का कहना है कि व्यक्ति अपने चारों ओर के निराशापूर्ण वातावरण से इतना घबड़ा उठता है कि उसे इसके अलावा कोई चारा ही नहीं सूझता। कुछ मनोविश्लेषणकर्त्ताओं के अनुसार, जो व्यक्ति हिंसक प्रवृत्ति के होते है और वे इसे व्यक्त नहीं कर पाते, वे इस प्रवृत्ति से स्वयं को ही नष्ट कर लेते है। इसके समर्थन में यह तर्क दिया जाता है कि युद्ध के दिनों में आत्महत्या की घटनाएँ कम होती है, क्योंकि उस समय लोगों की हिंसावृत्ति युद्ध में होने वाले नरसंहार से तृप्त हो लेती है।

कुछ लोग अपने आपको इतना अकेला और असहाय अनुभव करते है कि उन्हें जीवन में कोई लाभ नहीं दिखाई देता और वे सोचने लगते हैं कि क्यों न आत्महत्या कर ली जाए। जीने में क्या रखा है? कोई व्यक्ति आत्महत्या का विचार भावात्मक उत्तेजना में आकर करने लगता है और उस उत्तेजना की स्थिति में कार्यक्रम भी बना लेता है। इस संदर्भ में न्यूयार्क की एक घटना का प्रायः उल्लेख किया जाता है, जिसमें एक युवक ने 200 फुट ऊँचे पुल से पानी में छलांग लगा ली थी। संयोगवश उधर से बचाव के लिए पुलिस की नाव भी आ गई। नाव में सवार पुलिस वालों ने उस युवक से बाहर निकलने के लिए कहा और पकड़ भी लिया। इस पर युवक छटपटाने लगा कि,"मुझे अकेला छोड़ दो, मैं मरना चाहता हूँ, मुझे मर जाने दो।" इस पर पुलिस वालों ने कहा—”ठीक है, हम तुम्हारी इच्छा पूरी किए देते है।" यह कहकर उन्होंने युवक को निशाना बनाकर बंदूक तान दी तो उसका मरने का उत्साह न जाने कहाँ काफूर हो गया।

मनोविश्लेषज्ञ आत्महत्या का प्रमुख कारण अवसाद बताते है, जो किसी भी कारण से उत्पन्न हो सकता है। चाहे वह शारीरिक रोग के कारण उत्पन्न हुआ हो, अथवा परीक्षा, प्रेम या प्रतियोगिता में असफलता के कारण। एक लड़का,जिसकी माँ मर चुकी थी, आत्महत्या करने के लिए ढेर-सारी गोलियाँ खा गया। यह बात किसी तरह घर के अन्य लोगों को पता चल गईं और उन्होंने उसे दिल्ली के अस्पताल में भर्ती कर दिया। उपचार के बाद जब वह ठीक हो गया तो उसने बताया कि,"इस प्रकार वह अपनी मृतक माँ से मिलना चाहता था।"

कुछ मनःशास्त्री आत्महत्या के पीछे प्रतिशोध की भावना भी देखते हैं। उनके मतानुसार परिवार का कोई सदस्य अपने परिवार के अन्य सदस्यों को सबक सिखाने के लिए भी आत्महत्या कर लेता है। उस समय आत्महत्या करने वाला यही सोचता है कि इससे इन लोगों को काफी परेशानियाँ उठानी पड़ेंगी और इन्हें यह पता चल जायगा कि मैं कितना अच्छा था? कई व्यक्ति अपराध-भावना से दबे रहने के कारण भी आत्महत्या कर लेते है। क्योंकि उन्हें इसके अलावा अपराध-बोध से मुक्त होने का कोई दूसरा अच्छा उपाय ही नहीं सूझता। दूसरे कई लोग वृद्धावस्था, जीवनसाथी की उपेक्षा, बेरोजगारी, मुकदमेबाजी जैसे कारणों से तंग आकर आत्महत्या करते है। कुल मिलाकर आत्महत्या का कारण जीवन की व्यर्थता का अनुभव होना है और यह सच है कि प्रत्येक व्यक्ति जीवन में एक नहीं, अनेक बार अपने जीवन को व्यर्थ तथा कई बार तो भारस्वरूप समझने लगता है। उस भार से छुटकारा पाने के लिए ही वे आत्महनन की बात सोचते हैं। प्रश्न उठता है कि जीवन क्या सचमुच इतना व्यर्थ है कि छोटी-छोटी बातों से निराश होकर उसका अंत करने की बात सोची जाए? गंभीरतापूर्वक आत्मविश्लेषण किया जाए तो प्रतीत होगा कि प्रत्येक व्यक्ति कई बार अपने जीवन को व्यर्थ और भाररूप अनुभव करता है। कारण कुछ भी हो सकता है, पर जीवन की व्यर्थता इतनी तीव्रता के साथ अनुभव होती है कि उसे रहने, न रहने देने से कोई अंतर प्रतीत नहीं होता। बल्कि भला इसी में दीखता है कि ऐसे निरर्थक जीवन को फटे हुए कपड़ों की तरह फेंक दिया जाए, कूड़े-कचरे की तरह नष्ट कर दिया जाए।

जाने-अनजाने प्रत्येक व्यक्ति के मन में अपने जीवन के प्रति निराशा, हताशा और निरर्थकता की भावना भी होती रहती है। कभी असफलताजन्य खिन्नता के रूप में तो कभी थकान के कारण उत्पन्न हुए तनाव के रूप में, कभी अधिक परिश्रम के कारण खीझ के रूप में तो कभी किसी के व्यवहार से क्षुब्ध होने के रूप में। इस तरह के जितने भी निषेधात्मक भाव है, वे सब निरर्थकता बोध की ही प्रच्छन्न अभिव्यक्तियाँ है। अन्यथा जीवन है— एक पुष्प की भाँति, जो अपने चटखने से लेकर धरती पर गिरने तक निरंतर खिला ही रहता है और अपनी सुगंधित सुवास चतुर्दिक बिखेरता रहता है। जीवन है—एक सरिता की भाँति, जो अपने स्त्रोत से लेकर सागर तक निरंतर बहती ही रहती है। कहीं न रुकती है और न सड़ांद फैलाती है। यदि जीवन व्यर्थ अनुभव होता है तो इसका अर्थ है—उसे खिलने नहीं दिया गया, खिलने से पहले ही तोड़ दिया गया और न उसमें प्रवाह ही आने दिया गया।

फूल खिलेगा नहीं तो धरती पर गिरेगा भी नहीं—यह निश्चित है। नदी बहेगी नहीं तो सागर तक नहीं ही पहुँचेगी, यह भी निश्चित है और साथ ही यह भी सच है कि वह नदी न रहकर झील बन जाएगी। इस दृष्टि से डाॅ. स्टेनले की यह व्याख्या शत-प्रतिशत सही सिद्ध हो सकती है कि ऊँचाई पर चढ़ने के बाद कोई व्यक्ति नीचे झाँकता है तो उसके मन में केवल इसलिए भय उत्पन्न होने लगता है कि कहीं मैं आत्महत्या न कर लूँ? कहीं नीचे न कूद पड़ूँ? स्पष्ट ही यह भय इस कारण अनुभव होता है कि उसके अवचेतन में भरा हुआ जीवन के प्रति व्यर्थता का बोध उसे नीचे कूद पड़ने के लिए प्रेरित करता है। अन्यथा इतनी ऊँचाई पर से कौन नीचे धकेलना चाहता होगा।

माना कि भय ऊँचाई पर उपस्थित अन्य लोगों की उपस्थिति से उत्पन्न होता होगा। या हवा के झोकों से गिर जाने का डर पैदा होता होगा। किंतु देखा यह गया है कि भीड़ की अपेक्षा अकेले होने पर यह भय और तीव्रता के साथ व्यापता है। हवा शांत हो, वातावरण निस्पंद हो तब तो और अधिक स्पष्ट अनुभव होता है कि कोई नीचे कूद पड़ने के लिए प्रेरित करता है। भीड़ होने पर तो फिर भी सुरक्षा का भाव रहता है कि गिरने से कोई भी बचा लेगा, किंतु एकांत में व्यक्ति नितांत असुरक्षित और असहाय अनुभव करता है। क्यों? इसलिए कि उस समय सुरक्षा का ऐसा कोई आश्वासन कहीं से मिलता दिखाई नहीं देता।

जीवन व्यर्थ होने का भाव आत्महनन की प्रेरणा देता है, यह इस बात से भी सिद्ध होता है कि मनुष्य केवल उपयोगी और सार्थक वस्तुओं को ही अपने पास रखना चाहता है। व्यर्थ का कूड़ा-कर्कट जमा करने में, ऐसी वस्तुएँ संग्रहित करने में जिनकी कोई उपयोगिता नहीं है, किसी की भी रुचि नहीं होती। इसलिए जीवन भी व्यर्थ अनुभव हो रहा है तो उसे बचाने की अपेक्षा नष्ट कर देने में ही मनुष्य की प्रवृत्ति होना स्वाभाविक है। कहीं कोई सूत्र होते है, जो मोह और आसक्ति के कारण उसे बचाए रखने का संतुलन साधते है और जब कभी ये सूत्र टूट जाते है तो आत्महनन की स्पष्ट इच्छा होने लगती है। यह इच्छा भी तभी पूरी हो पाती है, जब वैसा करने का साहस जुटाया जा सके। अन्यथा व्यक्ति केवल कामना करके ही रह जाता है।

इस व्यर्थता के बोध से ही अधिकांश व्यक्ति खिन्न, दुखी, उदास, म्लान और उद्विग्न हुए देखे जाते हैं। अन्यथा ऐसा कोई बाहरी कारण नहीं हैं जिससे दुखी हुआ जाए। प्रश्न उठता है कि व्यर्थता के इस बोध से कैसे छुटकारा पाया जाए? और किस प्रकार जीवन को सार्थक बनाया जाए? उत्तर स्पष्ट है। अब तक जिन त्रातों में जीवन की सार्थकता खोजी गई है, वे व्यर्थ और दिग्भ्रांत ही सिद्ध हुई हैं। किंहीं ने धन में जीवन की सार्थकता खोजी, किंतु धनवान् व्यक्ति भी आत्महत्या करते देखे गए हैं। यश, ख्याति और प्रसिद्धि प्राप्त कर अनेकों ने अपने जीवन को सफल बनाने का प्रयास किया है। उन प्रयासों के सफल होने पर भी आत्मसंतोष नहीं मिलता दिखाई दिया। कोई सोचते है कि विद्वता, पांडित्य और ज्ञान-संपादन से जीवन सार्थक होता है, किंतु बड़े-बड़े विद्वान पंडित और ज्ञानी-विज्ञानी आत्महत्या करते देखे गए हैं। इस तरह की सभी सफलताएँ सार्थकता का भ्रम तो उत्पन्न करती है, पर जीवन को सार्थक नहीं बनातीं। यदि इनसे जीवन की सार्थकता सिद्ध होती तो बड़े-बड़े नेताओं, पंडितों और विद्वानों को कभी भी हताश, निराश और दुखी नहीं देखा जा सकता था।

फिर जीवन की सार्थकता किस बात में है? थोड़ा-सा विचार करने पर यह स्पष्ट हो जाता है। मनुष्य की अपनी जीवन-चेतना विराट समष्टि चेतना का एक अंग है। बूँद जिस प्रकार सागर से अलग होकर वापस सागर में ही मिलने के लिए छटपटाती है, कभी मेघमाला बनकर धरती पर बरसती है और सागर की ओर दौड़ने लगती है तो कभी जलाशयों में जा गिरती है। जलाशय में गिरने के बाद फिर वह बादल बनकर उड़ती है या धरता की अतल गहराइयों में घुसकर अपने उसी विराटरूप की ओर दौड़ लगाती है। उसी प्रकार मनुष्य की सीमाबद्ध व्यष्टि-चेतना भी समष्टि-चेतना के सागर से मिलन के लिए आतुर है। जिनने भी इस आतुरता को समझा है, अपने संकीर्ण-स्वार्थों को विराट हितों में घुला देने की चेष्टा की है, उन्हें कभी भी निराश होते नहीं देखा गया है और न किसी ऐसे व्यक्ति का कोई विवरण ही मिलता है, जिसने यह दिशा ग्रहण करने के बाद आत्महनन किया हो। बूँद जिस प्रकार अपने मूलस्वरूप को प्राप्त कर स्वयं को सार्थक बनाती है, उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी अपने क्षुद्र-अहं की परिधि को तोड़कर विराट-चेतना से मिलकर स्वयं को सार्थक और धन्य बनाता है। फिर आत्महत्या करने का विचार आने का तो कोई प्रश्न ही नहीं उठता।


अध्यात्म ज्ञान ही मुक्ति है!

प्रख्यात बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन का एक महत्त्वपूर्ण प्रतिपादन यह था कि, 'संसार' निर्वाण से किंचित भिन्न नहीं है और निर्वाण "संसार से किंचित भिन्न नहीं है।” स्वयं तथागत बुद्ध भी यह कहते थे कि, “निर्वाण का अर्थ— विच्छेद या विनाश बतलाना एक दुष्टतापूर्ण प्रवाद है।” डाॅ. राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक ‘इंडियन फिलासफी’ (भाग?) में लिखा है कि," 'सर्वसिद्धांत संग्रह' के अनुसार बुद्ध के मत में मुक्ति या निर्वाण का अर्थ व्यक्ति-चित्त में निर्दोष चेतना का निरंतर प्रवाह है।”

वस्तुतः मुक्ति का लौकिक अभ्युदय से विरोध नहीं है। अपितु वह सर्वांगीण समग्र अभ्युदय का नाम है। लौकिक प्रगति स्वयं में वस्तुतः पदार्थों की  हलचलमात्र है। पदार्थ सृष्टि के आदि में भी थे और अनंतकाल तक रहेंगे। उन्हें अस्वीकार या स्वीकार करने का कोई महत्त्व नहीं।

महत्त्व तो पदार्थों की इन हलचलों के प्रति चेतन मनुष्य द्वारा पाली गई भावनाओं का, उनके साथ व्यवहार का और उनके प्रति विचार का है। पदार्थविद्या स्वयं में मुक्ति की विरोधी नहीं, अपितु वह तो ज्ञानवृद्धि में ही सहायक है।

एक ही दृश्य भिन्न-भिन्न दर्शकों में भिन्न-भिन्न भाव उत्पन्न करता है। इसलिए महत्त्वपूर्ण दृश्य नहीं, दृष्टा का चेतना स्तर एवं उसकी संवेदनात्मक संरचना है। दृश्य स्वयं में न तो मुक्तिकारक है, न ही बंधनकारक है। अज्ञ, आसक्तजनों को वह बाँधता है विज्ञ, विरक्तजनों में वही वैराग्य उत्पन्न करता है। इस प्रकार मुक्ति या बंधन अन्तश्चेतना की स्थिति पर निर्भर है।

शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या भौतिक सामर्थ्य का विकास स्वयं में न तो बंधनकारक होता, न ही मुक्तिकारक। यद्यपि ये सब क्षमताएँ भी ज्ञान का ही परिणाम होती हैं। तब वह कौन-सा ज्ञान है, जो मुक्तिकारक है? उत्तर स्पष्ट है— वह है अध्यात्म ज्ञान, जिसे शास्त्रीय शब्दावली में मात्र ‘ज्ञान’ कहा जाता रहा है और उससे इतर शेष ज्ञानस्वरूपों को विज्ञान नाम दिया जाता रहा है। विज्ञान स्वयं में बंधन या मुक्ति का कारण नहीं। वैज्ञानिक विकास किस स्तर का है, इससे अन्तश्चेतना मुक्त है। इसका किंचितमात्र निर्णय नहीं हो सकता। विज्ञान की विभिन्न शाखाओं-प्रशाखाओं में युगानुसार विकास-ह्रास होता रहता है, किंतु मुक्ति के लिए आवश्यक ज्ञान जिसे अध्यात्म ज्ञान कहते है, उससे अप्रभावित रह सकता है।

विज्ञान-क्षेत्र में कालक्रम से भिन्न-भिन्न प्रविधियाँ (टेक्नलॉजी) विकसित होती रहती हैं। पदार्थों की सूक्ष्मशक्तियों से लेकर मन की सूक्ष्मशक्तियों तक की जानकारी प्राप्त करना, उन पर नियंत्रण प्राप्त करना—वैज्ञानिक प्रगति का प्रयोजन रहता है। यंत्रों-उपकरणों के निर्माण एवं संचालन से लेकर मनःशक्तियों के विनियोजन और उनसे विभिन्न प्रगति ही है। इस वैज्ञानिक प्रगति का आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्व मात्र यही है कि इस जानकारी से दृश्य और दृष्टा के, प्रकृति और भोक्ता के संबंधों पर प्रकाश पड़ता है और इन संबंधों के अस्थाईत्व की परिवर्तनशीलता की जानकारी मिलती है। यह दार्शनिक-बोध, यह  जीवन-दृष्टि ही अध्यात्म का क्षेत्र है। संपूर्ण वैज्ञानिक प्रगति के आधार में क्रियाशील जो चेतना है, उस चेतना के वास्तविक स्वरूप को समझना-जानना, उसका साक्षात्कार करना ही अध्यात्म दर्शन या अध्यात्म ज्ञान है। वह अध्यात्म ज्ञान ही मुक्ति है।

मुक्ति को सर्वोच्च पुरुषार्थ बताने वाले प्राचीन मनुष्यों ने वैज्ञानिक एवं प्राविधिक प्रगति कम नहीं की थी। वस्तुतः भौतिक जगत के रहस्यों को जानना यानी भूतजय करना और इंद्रिय-बोध की क्षमताओं-प्रक्रियाओं को जानना यानी इंद्रियजय करना आत्मदर्शन के लिए आवश्यक सहायक ज्ञान है, किंतु इस संपूर्ण शक्ति और उपलब्धि की सार्थकता तभी है, जब इस समस्त सृष्टि-व्यापार का मूल प्रयोजन जाना जाए। ज्ञान की स्वयं की सार्थकता को समझा जाए।  सृष्टि के संपूर्ण क्रिया-व्यापार की अर्थवत्ता का अभिज्ञान ही अध्यात्म ज्ञान है। वही मुक्ति की स्थिति है, क्योंकि अन्तःकरण की निस्संगता, निर्लिप्तता उसी स्थिति में संभव है। सामान्यतः आज के युग को प्राविधिक विकास का युग कहा जाता है। किंतु आगे ऐसी प्राविधि का भी विकास संभव है, जिसमें यांत्रिक उपकरणों को मानवीय इच्छाशक्ति से इच्छानुसार संचालित किया जा सके। वह स्थिति आज की यांत्रिक प्राविधिकी से बहुत अधिक विकसित होगी। प्राचीन भारत में उसके समुचित विकास होने के भी प्रामाणिक संकेत मिलते हैं; किंतु वह प्रगति भी अध्यात्म की दृष्टि से इतनी ही भिन्न एवं विपरीत दिशा में होगी जितनी आज है। क्योंकि अंततः है, वह भी लौकिक अभ्युदय ही। निःश्रेयस् की दिशा उससे भिन्न है।

त्रिगुणात्मिका प्रकृति के रहस्यों का भेदन कर ही, आज भी भौतिक विज्ञान आगे बढ़ रहा है। प्रकृति जननी से प्रश्न पूछकर उसके संकेतों का अध्ययनकर, उसके क्रियाकलापों का विश्लेषणकर तथा उसकी कार्य-प्रणाली के नियमों की खोजकर ही वैज्ञानिक प्रगति की जाती है। ऐहिक समुन्नति की यही दिशा है। यह आवश्यक तो है, किंतु है यह भोगमार्ग ही। अपवर्ग या अध्यात्म मार्ग इससे भिन्न है। प्रकृति के दृश्यों का भोगवृत्ति से भी उपयोग हो सकता है। और अध्यात्मिकवृत्ति से भी। महर्षि पतंजलि ने भी कहा है—

“प्रकाशक्रियास्थिति शीलं भूतेन्द्र्रयात्मक भोगा- पवर्गार्थ’ दृश्यम्॥ (पातंजलयो. सू. २/१८)

अर्थात् प्रकाश, क्रिया एवं स्थितिशील यानी त्रिगुणमय यह दृश्य भूतेंद्रियात्मक है, यानी पंचभूतों और इंद्रियों दोनों के ही स्तरों पर ये त्रिगुणात्मक दृश्य वैविध्य घटित होते रहते हैं। ये भोग के लिए भी होते है और अपवर्ग के लिए भी।

जब दृश्यों के प्रति उपलब्धि का भाव रहता है। यह मैंने पा लिया, अमुक ऐहिक प्रगति मैंने कर ली है, आदि भाव दृढ़ रहता है, तब वे ही दृश्य भोग का आधार बनते हैं। जब उनकी विविधता का मूलस्वरूप जानने का विवेक जागृत रहता है, तब वे ही दृश्य अपवर्ग का मोक्ष का आधार बन सकते हैं।

वस्तुतः आत्मसत्ता की दृष्टि से भोग भी एक प्रकार का ज्ञान है और अपवर्ग भी ज्ञान है। अविवेकपूर्ण जानकारियाँ भोग है तथा विवेकपूर्ण-बोध अपवर्ग या मोक्ष है। जब दृश्यों प्रकृतिगत उपलब्धियों के साथ अपनत्वभाव जोड़कर प्रकृति संबंधी विभिन्न क्रियाकलापों को आत्मा के क्रियाकलाप समझ लिया जाता है, हानि-लाभ, सुख-दुख, सफलता-असफलता, भौतिक साधनों की बढ़ती-घटती आदि के साथ जब आत्मभाव जोड़ दिया जाता है तब वे ही ज्ञानात्मक अनुभव भोग कहलाते है। जब ये सारे दृश्य-परिवर्तन व्यक्ति में इस जागृत विवेक को दृढ़ बनाते चलते हैं कि ये सारे परिवर्तन भौतिक दृश्यों एवं ऐंद्रिक अनुभूतियों में हो रहे है, मूल चेतना तो साक्षीमात्र है, तब यही ज्ञान-प्रक्रिया मोक्ष की प्रक्रिया बन जाती है। इस प्रकार भोग एवं मोक्ष दोनों में वास्तविक अंतर ज्ञान के स्वरूप का है। ज्ञान, भोग के लिए भी आवश्यक है और मुक्ति के लिए भी। अज्ञानी न तो प्रचुर भोग में समर्थ हो सकता, ना ही मोक्ष में। बंधन और मोक्ष दोनों ज्ञान के या दर्शन के स्वरूप पर निर्भर है। भोग दर्शन का नाम है—बंधन और अपवर्ग दर्शन का नाम है—मोक्ष। इस प्रकार एक ही प्रकार के प्रकृति-दृश्य भोगमूलक दृष्टि या दर्शन होने पर बंधन का कारण बनते है और विवेकपूर्ण दर्शन होने पर मोक्ष का।

इसीलिए वैज्ञानिक प्रगति से मोक्ष का न तो विरोध है, नहीं मैत्रीसंबंध है। विज्ञान का संबंध प्रकृति से है और मोक्ष या बंधन का संबंध दर्शन के स्वरूप से ही।

जिन दिनों भारत में मोक्ष धर्म की प्रतिष्ठा थी, उन दिनों वैज्ञानिक प्राविधिक प्रगति आज से कम नहीं, अधिक ही थी, प्रगति की वह स्थिति इतनी सुविकसित थी कि यांत्रिक उपकरणों को इच्छाशक्ति से संचालित किया जाता था। पदार्थों के स्थूल एवं सूक्ष्म स्वरूपों का अध्ययन अनुसंधान करने पर ही ऐसी प्रगति संभव होती है। अतः पदार्थविद्या उन दिनों भी विकसित थी। साथ ही परामनोविद्याएँ भी विकसित थी, जिनका आरंभिक स्वरूप टेलीपैथी, क्लेयर वायर, आदि रूपों में सामने आ रहा है। ये सभी लौकिक प्रगति के ही विविध रूप है।

आध्यात्मिक प्रगति तब होती है, जब इस संपूर्ण वैज्ञानिक प्रगति की अर्थवत्ता को भी समझें अर्थात इसका प्रयोजन क्या है, वह निश्चित करें। वैज्ञानिक प्रगति का प्रयोजन जब उत्कृष्ट दार्शनिक चेतना के साथ समझकर उत्कृष्टता की दिशा में बढ़ने के लिए उस प्रगति का उपयोग किया जाता है, तभी आध्यात्मिक प्रगति संभव होती है। महर्षि पतंजलि ने भी यही संकेत किया है—

“स्थूल स्वरुप सूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद् भूतजय। (पात. यो ३/४४)

अर्थात् स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय तथा अर्थवत्त्व’ इन पाँचों प्रकार के भूतरूपों में संयम करने पर ही भूतजय होती है। इसी प्रकार—

‘ग्रहणस्वरुपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः।” (पातंजलि योग सूत्र ३/४७)

अर्थात ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता,अन्वय और अर्थवत्त्व इन पाँच इंद्रियरूपों में संयम करने पर इंद्रियजय होती है।

आगे बताया गया है कि इन सबसे जो सिद्धियाँ प्राप्त होती है, उनके प्रति भी वैराग्यभाव रखने पर कैवल्य या मोक्ष की अवस्था आती है।

“तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम्॥ (पात.यो. ३/५०)

इस प्रक्रिया को भली-भाँति समझ लेना चाहिए। पाँच प्रकार के भूतरूप हैं— स्थूल स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय एवं अर्थवत्त्व। स्थूलरूप वह है जो सामान्यतः दीखता है— अन्न, वस्त्र, भवन, उपकरण, नदी, पहाड़, यंत्र आदि। इनका स्वरूप, यानी इनके मूल भौतिक तत्त्वों का स्वरूप। सूक्ष्म का अर्थ है— परमाणुरूप। जिसे शास्त्रीय शब्दावली में तन्मात्ररूप कहते है। अन्वय चौथा रूप है, जिसका अर्थ है— इनका ऊर्जा रूप या प्रकाश, क्रिया एवं स्थिति की मूलभूत ऊर्जा-क्रियाएँ। भूत का पंचम रूप है— उनका अर्थवत्त्व यानी उनके आयोजन की अर्थवत्ता, सार्थकता को समझना।

इसी प्रकार इंद्रियों का ग्रहणरूप उनका प्रथम रूप है। संवेदनाओं का ग्रहण-संप्रेषण ये इंद्रियों की प्राथमिक क्रियाएँ है। उनके स्वरूप का अर्थ हैं— वे बुद्धिसत्व का किस प्रकार अंग है, यह जानना। इंद्रियाँ मस्तिष्क की अनुचर हैं, सहायक हैं, यही उनका स्वरूप है, यानी यह जानना कि देखने, सुनने, गंध, स्वाद पहचानने, स्पर्शानुभूति करने की संवेदन (फीलिंग) प्रक्रियाओं का स्वरूप क्या है? तीसरा रूप है—अस्मिता। इंद्रियगत अस्मिता की सक्रियता ही           ज्ञान-जानकारियाँ है। अतः सक्रियता जानने, नोइंग' की प्रक्रिया को समझना ही तीसरे रूप का संयम है।

अन्वय नामक चतुर्थ रूप का संयम गुणों के मूलरूप को जानना, यानी प्रकाश, क्रिया और स्थिति की सूक्ष्मचेष्टाओं को जानना तथा उन पर संयम प्राप्त करना है। पाँचवाँ रूप है—अर्थवत्त्व, यानी इंद्रियों के माध्यम से सक्रिय पुरुषार्थवत्त्व का स्वरूप जानना। भूतों और इंद्रियों के इन पाँचों-पाँचों रूपों में संयम करना. यानी इनकी प्रक्रियाओं की विशद एवं सूक्ष्मतम जानकारी प्राप्त कर उन पर नियंत्रण कर सकना। स्पष्ट है कि ऐसा संयम अर्थवत्ता को समझने पर ही होता है। जब इस संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान की सार्थकता समझकर मनुष्य अपने देवत्व को पूर्णतः विकसित कर लेता है, तभी वह कैवल्य की अवस्था में पहुँचता है। अध्यात्म ज्ञान की यह स्थिति ही मुक्ति की स्थिति है।


Quotation

जैसे काटा हुआ चंदन का वृक्ष गंध को नहीं छोड़ देता, बूढ़ा हो जाने पर भी गजराज अपनी मंदगति को नहीं छोड़ता, उसी प्रकार दरिद्र हो जाने पर भी कुलीन व्यक्ति सुशीलता आदि गुणों को नहीं छोड़ता।—चाणक्य


दुःखों की जननी—आसक्ति

वीतराग, सर्वत्यागी और निष्काम ऋषि भरत इतने निश्छल और निर्विकार रहते थे कि लोगों ने उपहास में उन्हें जड़ कहना आरंभ कर दिया। जड़ शब्द उनके लिए लोकव्यवहार में इतना प्रचलित हुआ कि उनके मूलनाम से जुड़कर उन्हें जड़भरत ही कहा जाने लगा। लोग उन्हें कुछ भी कहते, मान करते या अपमान, निंदा करते या प्रशंसा—इसकी उन्हें न कोई अपेक्षा रहती ओर न ही किसी तरह की चिंता। सरल इतने कि लोग उन्हें मूर्ख समझकर रोटी के बदले कोई भी बेगार करने को कहते तो वह भी अविचलभाव से कर लेते।

एक दिन की घटना है। सिंधु सौवीर प्रदेश के राजा रहूगणा महर्षि कपिल का सत्संग करने के लिए शिविका में बैठकर जा रहें थे। रास्ते में एक कहार बीमार पड़ गया। संयोग से उसी स्थान पर जड़भरत विचरण करते दिखाई दिए। वेश-विन्यास देखकर उन्हें महर्षि तो क्या कोई ब्राह्मण भी नहीं समझ सकता था। शरीर से हृष्ट-पुष्ट और मुद्रा से प्रसन्न सरल भरत को भारवाहकों ने कोई चरवाहा समझा और उन्हें पकड़कर सौवीर नरेश की पालकी उठाने में बीमार साथी के स्थान पर लगा दिया। स्वभाव से ही न करना, नहीं जानने वाले महर्षि भरत ने सहर्ष इस कार्य को स्वीकार किया और रुग्ण व्यक्ति के स्थान पर स्वयं आ गए।

उन्हें इस कार्य का अभ्यास तो था नहीं, इसलिए वे भारवाहकों की तरह उनके साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पा रहे थे। इसके अलावा उन्हें इस बात का भी ध्यान रहता था कि धरती पर रेंगने या चलने वाला कोई जीव पैरों से कुचलकर न मर जाए, इस सतर्कता और अनभ्यस्त होने के कारण उनके पैर लड़खड़ा जाते। जब दो-तीन बार ऐसा हुआ और अन्य भारवाहकों की तरह पालकी को कंधा न दे पाने के कारण भरत रह-रहकर लड़खड़ा जाते तो भीतर बैठे सौवीर नरेश भी उछल पड़ते।

जब तीन-चार बार ऐसा हुआ तो राजा रहूगण ने बाहर देखा। उनकी दृष्टि से ही कहरों ने समझ लिया कि नरेश क्रुद्ध हैं। कहीं एक के किए का दंड सभी को न भुगतना पड़े, इसलिए उन्होंने भरत की गलती के बारे में बता दिया। इस पर सौवीर नरेश ने व्यंग किया—"ओह बंधु! तुम कितने दुर्बल हो गए हो, वृद्धावस्था ने तुम्हें कैसा बना दिया? यह वार्धक्य भी कितना बुरा है? अच्छे-भले मनुष्य को जीर्ण और दुर्बल बना देता है, शायद तुम थके हुए भी हो और प्रतीत होता है कि तुम्हारे साथी भी ठीक से तुम्हारी सहायता नहीं कर पा रहें हैं।"

भरत ने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया। वैसे भी कोई कुछ कहता रहे, चुप रहना उनका स्वभाव था। कुछ दूर आगे चलकर वे फिर लड़खड़ा गए। अब तो राजा क्रोध से विफर उठा—“क्या बात है मूर्ख? तुम्हें मेरी बात समझ में नहीं आई या तुम बहरे हो।”

मौन तोड़कर भरत ने कहा—“राजन्! आपकी पिछली बात मैंने सुनी थी और उसका आशय भी समझा था। मुझे ज्ञात है कि बोझा ठीक से ढोने के लिए होता है और उसे ठीक से ढोना चाहिए। पर मुझे यह समझ में नहीं आता कि आदमी-आदमी के ऊपर ही बोझा क्यों बने?”

राजा को इस उत्तर की आशा नहीं थी। एक साधारण-सा भारवाहक या सामान्य-सा व्यक्ति राजपद कर आसीन व्यक्ति को प्रत्युत्तर दे, एक तो इसी की आशा नहीं थी, उस पर से इतना कड़ा उत्तर, राजा को आग-बबूला कर देने के लिए पर्याप्त था, सौवीर नरेश तुरंत पालकी से उतर पड़े। पालकी से उतरते- उतरते ही उन्होंने अपना खड्ग भी निकाल लिया था। अन्य भारवाहक भय के कारण काफी दूर जाकर खड़े हो गए। राजा रहूगण ने कहा—"रे दुष्ट! तेरी यह धृष्टता। किस से किस तरह व्यवहार करना चाहिए, यह भी तुझे नहीं पता। ठहर, मैं अभी तुझे मारकर किए का मजा चखाता हूँ।”

इस पर भी जड़भरत अविचलित भाव से चुपचाप खड़े राजा की केंद्रित मुद्रा को सदयभाव से देख रहे थे। राजा ने खड्ग तानते हुए कहा—"तुझे अपनी भूल का कोई पछतावा नहीं।’"

"भूल! भूल तो राजन् मैंने भी की है और आपने भी। इस भूल के कारण ही तो हमें इस संसार में पुनः आना पड़ा। पर मेरी भूल बड़ी थी कि मैं जान-बुझ कर मोह में पड़ा।"— भरत ने कहा।

राजा ने समझा— शायद, यह पागल है और ऐसे प्रलाप कर रहा है। उसने अन्य कहारों की ओर क्रुद्ध दृष्टि से देखा, जिन्होंने भरत को पकड़कर पालकी में जोत दिया था, साथ ही कहा—“तुम लोग हो सही में दंड के भागी। तुमने इस पागल को क्यों पकड़ लिया?”

भारवाहक थर-थर काँपने लगा।

क्रोध के कारण लाल अंगारे हुई आँखों को देखकर भरत और भी सदय हो उठे—"‘राजन्! इन लोगों का कोई दोष नहीं है। आप दंड तो मुझे देने वाले थे। मुझे ही दीजिए न।

अब राजा रहूगण फिर चौंका। कुछ समय पहले पहेलियाँ बुझाने वाला यह व्यक्ति अब कितनी विनम्रतापूर्वक बात कह रहा है। राजा की कुछ समझ में नहीं आ रहा था, तभी भरत ने कहा—"दीजिए न राजा, दंड! आप किसे दंड देने वाले थे। आपने मेरे इस स्थूलशरीर को देखकर ही व्यंग किया था न, लेकिन इसे काटकर तो आप मुझे मार नहीं सकते। जिस तरह आप इस शरीर से धड़ को काटकर अलग गिरा हुआ, छटपटाता देखेंगे उसी प्रकार मैं भी देखूँगा।”

कहते-कहते भरत के मुखमंडल पर सौवीर नरेश को एक तेजस्विता दिखाई देने लगी। जड़भरत कहे जा रहें थे—"शरीर से आत्मा का क्या वास्ता? भूख, प्यास, क्रोध, अभिमान, क्षीणता, पीनता, उसके लिए है जो इद्रियों के स्वाद में लीन है, देहासक्ति में डूबा हुआ है और आसक्ति का दंश मुझे एक बार हो चुका है; इसलिए आप निःशंक निस्संकोच दंड दीजिए।"

ब्रह्मविद्या के इन गूढ़ रहस्यों को सुनकर क्रोधाविष्ट राजा का क्रोध शांत हुआ और वे इतने विस्मित तथा पश्चाताप में दग्ध होने लगे कि उनके सामने धरती-आसमान घूमने लगा। महर्षि भरत के तत्त्वज्ञान ने उनको पूरी तरह पराभूत कर दिया और वे पैरों में गिरकर क्षमा माँगने लगे पूर्णतः अविचलभाव से भरत सौवीर नरेश के क्षण-क्षण बदलते रूप को देख रहें थे और करुणार्द्र हो रहे थे। इधर सौवीर नरेश कहें जा रहे थे—"भगवन्! मैं आपको पहचान न सका। अवश्य ही आप उच्च कुल के योगी हैं। मुझसे जो अपराध हुआ है, उसके लिए मैं क्या प्रायश्चित करूं?”

“अपराध तो तब होता राजन्! जब आप के किए से मुझे वेदना या पीड़ा होती। मुझे तो ऐसा कुछ भी आभास नहीं हुआ फिर आपको कैसे दोषी मानूँ और प्रायश्चित या क्षमा का विधान करने वाला मैं कौन होता हूँ"— भरत ने कहा।

सौवीर नरेश ने अपनी यात्रा वहीं स्थगित कर दी और महर्षि जड़भरत के चरणों में बैठकर ही ब्रह्मविद्या का ज्ञान प्राप्त किया। महर्षि भरत ने कहा— "राजन्! आसक्तिवश ही मुझे मृगयोनि में जन्म लेना पड़ा।

यह आसक्ति ही मनुष्य को तरह-तरह के दुख देती और बंधनों से बाँधती हैं। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि कुल, वंश और पद तो क्या, इस शरीर से आसक्ति न करे। अनासक्त रहकर कर्त्तव्य-कर्म का आचरण करने से मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।"

महर्षि भरत के उपदेश सुनकर सौवीर नरेश को जैसे तमिस्रापूर्ण मार्ग में प्रकाश आलोकित हो उठा और उन्होंने अपना सारा राज्य गुरुचरणों में          दक्षिणास्वरूप समर्पित कर दिया। महर्षि भरत ने यह कहकर राज्यसंचालन का दायित्व राजा रहूगण को सौंप दिया कि कर्त्तव्य समझकर कर्म करो। इसे अपना प्रायश्चित भी समझ सकते हो।


संपत्ति के दर्प का दुःखद अंत

सिकंदर जब मरने लगा, मृत्यु आना चाहती थी और अंतिम सांसें थोड़ी-सी ही बाकी थीं कि उसने अपने विश्वस्त साथियों को बुलाया। आस-पास खड़े दरबारियों ने समझा—"हमारे महान राजा अपनी कोई अंतिम इच्छा बताना चाहते हैं।" उसे पूरा करने का अवसर अपने लिए सौभाग्य मानकर सहयोगी आगे बढ़े। एक को इशारे से अपने बिलकुल नजदीक बुलाकर सिकंदर ने कहा—"देखो! जब मेरी मृत्यु हो जाए तो सारे नगर में मरी शवयात्रा निकालना।”

“ऐसी अशुभ बात मुँह से मत निकालिए, महाराज! आपके राज्य में सब लोग अनाथ हो जाएँगे। हम निराश्रय हो जाएँगे।”—एक नायक ने अपनी वेदना व्यक्त करते हुए कहा।

सिकंदर बोला कि,“कोई किसी के मरने से न अनाथ होता है और न आश्रयहीन। सब लोग अपने स्वामी हैं और प्रत्येक का आश्रय भी वह स्वयं ही है।” सिकंदर ने आगे कहा कि, ”मैं कह रहा था, जब मेरी शवयात्रा निकाली जाए और मुझे अर्थी पर सुलाया जाए तो मेरे दोनों हाथ अर्थी से नीचे लटकते हुए रखना, ताकि देखने वाले जान सकें कि मैं, सिकंदर, विश्वविजय का स्वप्न देखने वाला सिकंदर महान इस दुनिया से खाली हाथ जा रहा हूँ।”

अरस्तु के शिष्य होने और अंतिम समय में आत्ममंथन करने के कारण मरते वक्त सिकंदर को बोध हुआ। मरते-मरते भी यह जान लेना कम अच्छा नही है, अपेक्षा इसके कि अधिकांश लोग मरते समय भी अपनी संपत्ति का मोह नहीं छोड़ पाते और उसके प्रबंध की चिंता में घुलते-तड़पते मृत्यु के हाथों में अनिच्छापूर्वक अवश होकर जा पाते हैं। संपत्ति के संचय और संग्रह में ही अधिकांश लोगों का पूरा जीवनक्रम बीत जाता है और वे यह समझते रहते हैं कि उनके पास जितनी अधिक संपदा संग्रहित होगी, उतना ही उनका गौरव और वर्चस्व बढ़ेगा। उनके भाग्य और पुरुषार्थ का लोग सिक्का मानेंगे तथा बड़प्पन का सम्मान करेंगे। संभवतः इसी धारणा या मान्यता के कारण अधिकांश व्यक्तियों का जीवन-लक्ष्य भौतिक समृद्धि और संपन्नता रहा है। यह बात और है कि सभी लोग आर्थिक दृष्टि से संपन्न और समृद्ध नहीं हो पाते हैं। लेकिन लोग इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अच्छे-बुरे, नैतिक-अनैतिक उपायों की चिंता किए बिना जिस किसी तरीके से संपन्न बनने के लिए लालायित और संपत्तिसंचय के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।

संपत्ति के साथ जुड़ी हुई बड़प्पन और गौरव प्राप्त होने की आशा ही लोगों को उसका संचय करने के लिए प्रोत्साहित करती है। संपत्ति और साधन एक सीमा तक अनिवार्य रूप से आवश्यक है। जीवन की मोटी आवश्यकताएँ और उसका भौतिक निर्वाह संपत्ति के द्वारा ही होता है। अतः जितना ही  संपत्तिसंचय किया जाएगा, उतना ही मान-सम्मान, प्रतिष्ठा, गौरव और वर्चस्व बढ़ेगा। लोग इस बुरी तरह से सम्पत्तिसंचय के लिए अधीर हो उठते हैं कि उनके प्रयासों को सनक ही कहा जा सकता है। इसके बाद वे उस संचय का उद्धत प्रदर्शन करते हैं, ताकि लोगों पर बड़े होने का रोब गालिव किया जा सके। सोचा जाता है कि इस प्रकार अपनी संपत्ति के उद्धत प्रदर्शन से लोगों की आंखें चौंधियाएँगी और वे उनका बड़प्पन मान लेंगे। कुछ लोग होते भी हैं, जो उनके आसपास घिरे रहते हैं। चापलूसों की तरह उनकी इस सनक का समर्थन किया करते हैं और प्रशंसा के पुल बाँधते रहते हैं।

ऐसा नहीं होता है कि समर्थन और प्रशंसा करने वाले आंतरिक हृदय से यह सब करते हैं। वस्तुतः उनके स्वार्थ उन उद्धत प्रदर्शन करने वाले संपन्न व्यक्तियों से जुड़े रहते हैं और वे उनको इस प्रकार प्रसन्न रखकर अपने स्वार्थ-साधन की ही बात मुख्य रूप से सोचते हैं। अन्यथा मन ही मन तो वे ऐसे व्यक्तियों से ईर्ष्या और जलन रखते हैं। कई बार ऐसे समर्थक या प्रशंसक ही उनकी संपन्नता पर अपनी लार टपकाते रहते हैं और जैसे-तैसे उस संपत्ति को हथियाने की बात सोचते रहते हैं, उनके आस-पास घिरे लोगों में ही नहीं, संपत्ति का प्रदर्शन देखने वाले अन्यान्य लोगों में भी उनके प्रति ईर्ष्या उत्पन्न होती हैं और प्रायः लोग ऐसे व्यक्तियों की संपत्ति हथियाने के लिए हर तरह के दाव-पेंच चलते हैं। इस प्रकार के आक्रमणों के लिए ईर्ष्यालु व्यक्ति जितने दोषी होते हैं, संपत्ति का उद्धत प्रदर्शनकर उस आक्रमण को आमंत्रित करने वाले व्यक्ति भी उनसे कम दोषी नहीं होते। कहा जा सकता हैं कि मुख्य दोष उन्हीं का होता है।

इस प्रकार अनावश्यक संपत्ति का संग्रह और उसका उद्धत प्रदर्शन कैसे-कैसे कांड रच डालता है, इतिहास में इसके अनेकों उदाहरण हैं। कोहिनूर हीरे का इतिहास इसी प्रकार का है। वह संसार का सबसे मूल्यवान हीरा रहा है। लेकिन उसके साथ यह अभिशाप भी जुड़ा रहा कि वह जहाँ भी रहा, अपने साथ-साथ विपत्ति लिए रहा और अपने स्वामी के लिए प्राण-संकट की विभीषिका सँजोए रहा। इस हीरे का इतिहास बड़ा विचित्र और विलक्षण है। भागवत पुराण में इसका उल्लेख स्यमंतक मणि के रूप में मिलता है।

द्वारिका के एक नागरिक सत्राजित के पास यह मणि थी। उसने भगवान श्रीकृष्ण को यह मणि बताई तो श्रीकृष्ण ने कहा कि,"यह मणि तो राजा के पास होनी चाहिए, तुम इसे महाराजा उग्रसेन को दे दो, इसके बदले में वह तुम्हें अपार धन देंगे और तुम देखते ही देखते वैभवसंपन्न बन जाओगे।" परंतु सत्राजित ने श्रीकृष्ण की यह सलाह नहीं मानी और उस मणि को अपने पास ही रखा। सत्राजित का एक भाई था—'प्रसेनजित'। दोनों भाइयों में अगाध प्रेम था। दोनों भाई उस मणि को छाती से चिपटाए रहते थे। एक बार जब वह मणि प्रसेनजित के पास थी तो वन में एक सिंह ने प्रसेनजित को मार डाला और मणि उसके पास पहुँच गई। सिंह को मारकर जामवंत नामक रीछ ने वह मणि अनजाने ही उदरस्थ कर ली। रीछ भी बचा न रहा। वह श्रीकृष्ण के हाथों मारा गया और इस प्रकार वह मणि श्रीकृष्ण के पास पहुँच गई। पर भगवान श्रीकृष्ण भी उसे अपने पास रखकर चैन से नहीं बैठ सके। वे एक बहेलिये के हाथों मारे गए।

श्रीकृष्ण के न रहने पर वह मणि पांडवों के पास पहुँची। इसके बाद परीक्षित, जनमेजय, चंद्रगुप्त, बिंबिसार, अशोक, बृहद्रथ, पुष्यमित्र आदि राजाओं और सम्राटों के पास एक के बाद एक कर वह मणि पहुँचती रहीं। लेकिन यह हस्तानांतरण शांति और सद्भावनापूर्वक नहीं होता था, अपितु उसके साथ कई दुरभिसंधियाँ और षड़यंत्र जुड़े रहे तथा ऐसे ही उत्पातों के साथ वह इधर से उधर घूमता रहा। इसी प्रकार वह कनिष्क, चंद्रगुप्त और हर्षवर्धन के पास होता हुआ मालव नरेश यशोवर्मा के पास पहुँचा। उनके वंशज राजा रामदेव पर अलाउद्दीन खिल्जी ने आक्रमण किया और मालव नरेश को पददलित कर उस हीरे को हथिया लिया। इसके बाद वह हीरा दिल्ली के बादशाहों के अधिकार में देर तक बना रहा। इब्राहिम लोदी के पराजय के बाद उसकी बेगम दिल्ली छोड़कर आगरा आ गई थी। उस पर हुमायूँ ने हमला कर दिया। इज्जत बचाने के लिए बेगम को वह हीरा हुमायूँ को भेंट कर देना पड़ा। हुमायूँ की मौत सीढ़ी पर से फिसलने के कारण हो गई और वह हीरा कई पीढ़ियों तक उसके वंशजों के पास बना रहा।

इस प्रकार वह हुमायूँ के पास से मुहम्मदशाह के पास पहुँचा। मुहम्मदशाह पर ईरानी लुटेरे नादिरशाह ने हमला कर दिया और उसके पास से कोहिनूर हीरा अपने कब्जे में कर लिया। उस हीरे को देखकर नादिरशाह के मुँह से निकला—’कोह-ए-नूर’!’ अर्थात प्रकाश का पर्वत। तभी से इस हीरे का नाम ‘कोहिनूर’ पड़ा। नादिरशाह कोहिनूर के साथ प्रचुर संपदा लेकर वापस लौटा तो रास्ते में भयानक तूफान आया और उस तूफान में उसकी सेना तथा संपदा का बड़ा भाग नष्ट हो गया। नादिरशाह भी चैन से नहीं बैठ सका। उसके भतीजे अलीकुलीखाँ ने उसे मार डाला और कोहिनूर हीरा अपने कब्जे में कर लिया। यह हीरा पाने के लिए अफगान सेनापति अहमदशाह अब्दाली ने अलीकुलीखाँ को मौत के घाट उतार दिया और हीरा अपने कब्जे में कर लिया।

अब्दाली के बाद उसका बेटा तैमरशाह उस हीरे का अधिकारी बना। जब वह मरा तो सत्ता पाने के लिए उसके पुत्रों में युद्ध छिड़ा। इस युद्ध में जमानशाह जीता। उससे हीरा छीनने के लिए उसके विश्वासी भाई महमूदशाह ने ही उसे कैद में डाल दिया और यंत्रणा देकर उसकी ऑंखें निकलवा लीं। महमूद को भी शाहशुजा ने मार डाला और हीरे पर अपना अधिकार कर लिया। शाहशुजा कैद में पड़ा हुआ था। उसकी बेगम ने अपने पति की मुक्ति के लिए पंजाब के महाराज रणजीतसिंह से सहायता की प्रार्थना की। महाराज रणजीतसिंह ने काबुल के वजीर फतहखाँ की सहायता से शाहशुजा को मुक्त कराया और बदले में कोहिनूर हीरा प्राप्त कर लिया। महाराज रणजीतसिंह की मृत्यु के बाद उनका राज्य अंग्रेजों के हाथ में चला गया और कोहिनूर हीरा भी। इस हीरे को यूरोप के कुशलतम रत्नपिशाचियों ने करीब चालीस दिन तक तराशा, चमकाया तथा और अधिक सुंदर बनाया। इसके बाद वाद हीरा महारानी विक्टोरिया के ताज में जड़ा गया।

इस प्रकार यह हीरा अपने साथ इतिहास के कई पृष्ठों को रक्तरंजित करते हुए इधर-उधर घूमता रहा। कोहिनूर प्रसिद्ध हीरा है, इसलिए इसकी चर्चाएँ भी बड़ी प्रसिद्ध हैं। देखा जाए तो अन्यान्य छोटी-बड़ी रत्नराशियाँ भी इसी प्रकार की विपत्तियाँ अपने साथ सँजोए मिलेंगी। इसी प्रकार का इतिहास शाहजहाँ द्वारा बनवाए गए तख्तताऊस के साथ भी जुड़ा हुआ है। शाहजहाँ ने तख्तताऊस (मयूरसिंहासन) इसलिए बनवाया था कि वह संसार के वैभवशाली लोगों में गिना जा सके। उसके उत्तराधिकारी इस सिंहासन पर बैठकर उसका गुणगान करते रहे। इस सिंहासन में उस समय 12 करोड़ रुपये मूल्य के रत्न जड़े गये थे और बनाने में सात वर्ष लगाए गए। सोने, हीरे, लाल, मोती और पन्ने से बना सजा यह सिंहासन बनवाते समय शाहजहाँ ने जो स्वप्न सँजोए थे, वे पूरे नहीं हुए। वह कुछ ही दिन उस पर बैठ पाया था कि उसके बेटे औरंगजेब ने उसे पकड़कर कैद में डाल दिया।

औरंगजेब के बाद मुगल साम्राज्य का पतन आरंभ हो गया और मुहम्मदशाह उत्तराधिकारी बना। उस पर ईरान के नादिरशाह ने आक्रमण कर दिया और वह लूट-खसोट में अन्य प्रचुर संपदा के साथ-साथ तख्तताऊस भी उठाकर फारस ले गया। उसी के कुटुंबी कुर्दा ने नादिरशाह की हत्या कर दी और उसका सारा माल-असबाब छीन लिया, जिसमें यह मयूरजड़ित सिंहासन भी सम्मिलित था। लुटेरों ने उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले और उन्हें आपस में बाँट लिया।

ईरान की सत्ता सँभालने के बाद आगा मुहम्मदशाह ने नादिरशाह के लुटेरे वंशजों से तख्तताऊस सहित लूट का सारा माल छीन लिया। तख्तताऊस को जौहरियों द्वारा पुनः नया रूप दिया गया, किंतु जो भी शाह इस पर आरूढ़ हुआ, उसकी दुर्गति ही हुई। आज तक यही क्रम जारी है।

कोहिनूर और तख्तताऊस बहुमूल्य किंतु अनमोल संपदा रही है, इसलिए उनके इतिहास सर्वविदित और सर्वपरिचित रहे हैं। छोटी-मोटी संपदाएँ अपने साथ जो दुर्भाग्य, अभिशाप और विपत्तियाँ सँजोए रहती हैं। उनकी विपत्तियाँ और प्रतिक्रियाएँ भी ऐसी ही होती हैं, जो संबद्ध लोगों को तो पूरी तरह संत्रस्त करती हैं, पर ऐतिहासिक घटनाओं में अपना स्थान नहीं बना पातीं, लेकिन इतना तय है कि संग्रह और संचय छोटे हों या बड़े, उनका परिणाम दुखद ही रहता है। अहंकारी मनुष्य न जाने कब तक संपन्नता में बड़प्पन पाने का स्वप्न देखता रहेगा। रावण और हिरण्यकश्यप से लेकर नेपोलियन, सिकंदर तक इसी मूर्खता में अपनी प्रतिभा को नष्ट कर चुके हैं और उनका दुखद अंत हो चुका है। इस तथ्य को समझा जाए कि उपार्जन संग्रह के लिए नहीं, सदुपयोग के लिए किया जाना चाहिए तो इसमें मनुष्य का व्यक्तिगत हित, उत्कर्ष और संतोष तो है ही, समाज को भी उससे बहुत बड़ा लाभ मिल सकता है।


॥ ऐसा मद भूल न पीवई जे बहुरि पछताया॥

ब्याह-शादियों और अन्य अवसरों पर शराब पी लेने के कारण बड़ी संख्या में लोगों के मर जाने की घटनाएँ आए दिनों समाचारपत्रों में प्रकाशित होती रहती हैं। उस समय लोग थोड़ी देर तक शराब की हानियों और उसकी बुराईयों की चर्चा करने लगते हैं, पर जिन्हें यह दुर्व्यसन लगा हुआ है, उन पर न तो ऐसी घटनाओं का कोई प्रभाव पड़ता है और न इसके बाद होने वाली चर्चाओं का ही। मद्यपान के दुर्व्यसन वाले व्यक्ति ऐसे अवसरों  पर यह कहकर छुटकारा पा लेते हैं कि इन लोगों ने घटिया किस्म की शराब पी होगी अथवा ज्यादा पी ली होगी या सहन नहीं कर सके होंगे, इस कारण यह दुर्घटना घटी।

ऐसे तर्क अपने व्यसन को बुरा सिद्ध न होने देने के लिए ही दिए जाते हैं। अन्यथा शराब कैसी भी और कितनी भी क्यों न हो, स्वास्थ और बुद्धि पर निश्चित रूप से अपना दुष्प्रभाव डालती है। कई लोगों की यह मान्यता है कि यदि थोड़ी मात्रा में शराब का सेवन किया जाए तो उससे भूख खुलकर लगती और पाचनशक्ति ठीक रहती है, शरीर में स्फूर्ति आती है और मानसिक तनाव दूर होता है। ऐसा मानने वाले व्यक्ति सीमित मात्रा में शराब का सेवन करने को कोई बुराई नहीं समझते। पहले कभी चिकित्सा विज्ञान की भी यही मान्यता थी, किंतु जैसे-जैसे इस क्षेत्र में प्रयोग और अनुसंधान किये गए, वैसे-वैसे नए  तथ्य सामने आने लगे और पुरानी मान्यता ध्वस्त हो गई।

कुछ वर्षों पूर्व अमेरिका में संपन्न हुए एलाई निस्ट्रस एंड न्यू रोला निस्ट्स के नेशनल कन्वेशन (राष्ट्रीय सम्मेलन) में सम्मिलित चिकित्सकों ने इस विषय में एक राय व्यक्त की कि किसी भी रूप में ली गई शराब शरीर और मस्तिष्क तक के लिए विष का काम करती है। चिकित्सा विज्ञान में पुष्टिकारक औषधि अथवा खाद्य के रूप में इसकी उपयोगिता किसी भी प्रकार सिद्ध नहीं हुई है, बल्कि इसके कारण पागलपन, मृगी, मानसिक दुर्बलता जैसे विकार उत्पन्न होते है, इसमें कोई संदेह नहीं है।

शराब का घूँट हलक से नीचे उतरते ही आमाशय की श्लेष्मा झिल्ली से छेड़छाड़ करती है, और खून में मिलकर मस्तिष्क तक पहुँच जाती है। मस्तिष्क में पहुँचने के लिए पाँच मिनट से भी कम समय लगता है और वहाँ पहुँचते ही वह मस्तिष्क के उन भावों को निष्क्रिय कर देती है, जो विचार, विश्लेषण और निर्णय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहते हैं। मदिरा का जो अंश मस्तिष्क को चेतनाशून्य बनाता और नशा देता है, उसे इथाइल अल्कोहल कहते हैं। यह विशुद्ध रूप से बेहोश करने वाला तत्त्व है। जब शराब के माध्यम से अल्कोहल मस्तिष्क में पहुँचता है तो मस्तिष्क का शरीर और उमंग पर नियंत्रण घटने लगता है तथा धीरे-धीरे समाप्त हो जाता है। यही कारण है जो, मद्यपान के बाद लोग मस्ती में झूमने लगते हैं। चूँकि उनकी समीक्षाशक्ति दुर्बल या निष्क्रिय पड़ जाती है तो वह अपने और दूसरों के बारे में न जाने क्या-क्या सोचने लगता है। दुबला-पतला और कृशकाय व्यक्ति भी पीने के बाद अपने को किसी पहलवान से कम नहीं समझता। निरक्षर भट्ट होने पर भी व्यक्ति समझने लगता है, उसे अपनी शक्तियों और स्थितियों के बारे में इतना अधिक भ्रम होने लगता है कि पिया हुआ व्यक्ति यदि कार चला रहा हो और उसे किसी स्थान पर कार पास करनी हो तो वह दो कारों के बीच तीसरी कार खड़ी करने जितनी जगह न होने पर भी अपनी ड्राइवरी का घमंड करता हुआ उस जगह में अपनी कार घुसा ही देता है, भले ही कार में टक्कर लग जाए या खरोंच आ जाए।

शराब पीने पर व्यक्ति थोड़ी स्फूर्ति और उत्साह का अनुभव करता है। इस कारण यह मान लिया गया है कि शराब उत्तेजक है, किंतु सचाई यह है कि शराब से मस्तिष्क उत्तेजित नहीं होता, बल्कि दमित होता है। चूँकि मस्तिष्क का दमन होने के कारण व्यक्ति की चिंता, पीड़ा अनुभव करने की क्षमता भी दमित होने लगती है। इसलिए यह भ्रम होने लगता है कि पीने के बाद अपनी मानसिक एवं शारीरिक क्षमताएँ सहसा बढ़ गईं हैं। शराब जैसे-जैसे आदतन मजबूरी बनने लगती है वैसे-वैसे उसकी मात्रा भी बढ़ानी पड़ती है और यह बढ़ी हुई मात्रा व्यक्ति के विवेक तथा संयम को नष्ट करने लगती है। धीरे-धीरे स्थिति यहाँ तक जा पहुँचती है कि न पिए होने पर व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन स्थिर नहीं रख पाता।

सहनशक्ति से थोड़ी अधिक मात्रा होने पर व्यक्ति का अपने शरीर पर भी नियंत्रण नहीं रह पाता, उसकी जबान लड़खड़ाने लगती है, कदम डगमगाने लगता है, कोई वस्तु अपने हाथों से उठाना चाहता है तो उठा नहीं पाता। इससे भी आगे घबराहट होने लगती है। शरीर के विभिन्न अंगों की माँस-पेशियों पर से नियंत्रण और संतुलन हट जाता है। ऐसी स्थिति में आँखों से कोई चीज एक की दो दिखाई देने लगती है। कई बार इस स्थिति में टट्टी-पेशाब भी छूट जाता है और धीरे-धीरे आदमी बेहोशी की ओर बढ़ने लगता है। कुछ और पी लेने पर सांस तथा हृदय की धड़कन भी रुकने एवं बंद होने लगती है। इस दशा में यदि तुरंत उपचार न किया जाए तो मृत्यु तक हो जाती है।

फ्रेंच अकादमी आफ मेडीकल के डाॅ. पैरिर्सन ने सन् 1945 में यह बताया कि, "शराब मस्तिष्क के अतिरिक्त हृदय और रक्तवाहिनियों को भी प्रभावित करती है। उसके कारण रक्तवाहिनी नलिकाएँ फूल जाती हैं, जिससे पीने वाला गर्मी अनुभव करता है और उसका रक्तसंचार बढ़ जाता है। रक्तसंचार बढ़ जाने से पीने वाले का चेहरा भी लाल दिखाई पड़ने लगता है।"

यह लालिमा इसलिए भी दिखाई देती है कि रक्त शरीर के भीतरी अवयवों से चमड़ी की ओर अधिक आ जाता है। इस कारण चमड़ी तपने लगती है और उसकी तपिश बाहर हवा में चली जाती है। इस प्रकार शराब पीने के कारण गर्मी प्राप्त नहीं होती, बल्कि खोती अधिक है। रक्तनलिकाओं में फैलाव आ जाने के कारण शराब प्रायः हृदय रोगों को भी जन्म देती है।

शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों में एक तथ्य यह भी है कि उसे पचाने में पेट की अपेक्षा जिगर को अधिक मेहनत करनी पड़ती है। कुछ एंजाइमों की सहायता से जिगर इथाइल अल्कोहल को आक्सीजन देकर उसे कार्बन-डाई-आक्साइड तथा पानी में बदलता है। इस प्रक्रिया में काफी समय लगता है और शरीर का पोषण करने वाले कुछ बहुमूल्य विटामिन तथा एंजाइम भी इस प्रक्रिया में नष्ट होते है। दूसरे इस प्रकार शराब को पचाने में जिगर को अधिक समय भी लगता है। जितनी मात्रा में एक बार पी ली जाती है, वही काफी देर में रच-पच पाती है। निरंतर या अधिक समय तक पीते रहा जाए तो उतने ही समय में पच पाने के कारण नशा चढ़ा का चढ़ा ही रहता है। कहना नहीं होगा कि इस स्थिति में जिगर पर बहुत अधिक मात्रा में अतिरिक्त भार पड़ता है और उस पर चर्बी चढ़ने लगती है।

इस प्रकार शराब कई प्रकार से मानसिक शक्तियों और शारीरिक क्षमताओं को नष्ट करती है। इसके कारण सर्वप्रथम मस्तिष्क बुरी तरह आक्रांत होता है। इतना अधिक कमजोर हो जाता है कि दैनिक क्रियाकलाप भी ठीक से संपन्न नहीं हो पाते। कई बार तो स्थिति यहाँ तक पहुँच जाती है कि मदयपान करने वाले  स्थायी रुप से पागल हो जाते हैं। शारीरिक-दृष्टि से शरीर का संतुलन नियमन करने वाले सैरे-बेलम कोश क्षतिग्रस्त होते है। फलतः वह पिए हुए हो अथवा न पिए हुए हों, कोई भी काम स्थिरता से नहीं कर सकते। हमेशा डगमगाते ही रहते है। दूसरे मद्यपान के कारण स्नायु तंतुओं को क्षति पहुँचती है। हाथ-पैरों की पेशियाँ दुखने लगती है। कभी-कभी वे सुन्न भी पड़ जाती हैं। इस कारण तथा शराब के कारण शरीर में विटामिन बी.-वन की कमी के कारण लकवा जैसे रोग तक होते देखे गए हैं।

मद्यपान के कारण ‘कोसीकोफ’ नामक मानसिक रोग होने की अधिक संभावना रहती है। इस रोग के शिकार व्यक्ति की स्मरणशक्ति कमजोर पड़ते-पड़ते बहुत क्षीण हो जाती है। नेत्र रोगों के होने का भी भय रहता है, जिसमें एक वस्तु भी दो वस्तुएँ दिखाई देने लगती है। प्रसिद्ध हृदय रोग विशेषज्ञ डाॅ. डब्ल्यू. जी.सी. अम के अनुसार प्रायः सभी शराबियों का हृदय अपने सामान्य आकार से कुछ कम हो जाता हैं और इस कारण उसे साँस लेने में तकलीफ होने लगती है। मद्यपान पेट और आँत की झिल्लियों को भी सीधा नुकसान पहुँचाता है। तेजाब की मात्रा बढ़ जाने से अल्सर की शिकायत होने का डर रहता है। बहुत अधिक पी लेने के कारण कभी-कभी खून की उल्टियाँ भी होने लगती हैं।

बदहजमी और अपच की शिकायत बने रहना तो जैसे शराबी के लिए आम बात है। और इस कारण उसका वजन तेजी से घटने लगता है। मद्यपान के कारण पैंक्रियाज ग्रंथि और पेट को जोड़ने वाली नलिका कभी-कभी सुजन के कारण बंद हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में भयंकर उदरशूल उठता है। रक्तचाप तेजी से गिरने लगता है। अगर तुरंत उपचार न हो तो यह स्थिति जीवन-संकट भी उपस्थित कर देती है। पैंक्रियाज ग्रंथि का यह रोग बराबर बना रहता है और शराब के कारण खराब हो जाने से वह बहुत कम मात्रा में इंसुलिन बनाती है। इस कारण मधुमेह रोग होने की सम्भावना भी रहती है।

मद्यपान के कारण जिगर को होने वाला सिरोसिल बीमारी इतनी भयंकर हैं कि वह छह महीने तक रोगी को बुरी तरह तड़पा-तड़पा कर उसका प्राणहरण कर लेती है। इसके अतिरिक्त हृदय की भाँति ही जिगर का आकार भी फैलने लगता है। मरने वाले शराबियों में 30 प्रतिशत प्रायः जिगर के रोगों से ही मरते हैं, क्योंकि इस विषैले तत्त्व को परास्त करने और उससे संघर्ष करने में शराबी को ही अधिक मेहनत करनी पड़ती है।

ये प्रभाव प्रायः प्रत्यक्ष नहीं दिखाई देते और न ही ऐसा लगता है कि इनका कारण मद्यपान है। शराब की हानियों को देखने के लिए दैनिक-जीवन में मद्यपान करने वालों की दुर्दशा देखना ही पर्याप्त होता है। जब कोई व्यक्ति शराब पीता है तो उसकी बुद्धि और स्मृति अस्त-व्यस्त हो जाती है। कहावत भी है कि, ‘शराब अदर, तो अक्ल बाहर।’ शरीर और मस्तिष्क का नियंत्रण खोकर शराबी जिस तरह कहीं भी सड़क पर, नालियों में, कूड़े के ढेर पर जिस बुरी स्थिति में पड़े पाए जाते हैं, उन्हें देखकर ही किसी समझदार व्यक्ति को घृणा होने के साथ-साथ, पीने वाले के प्रति दया का भाव भी उत्पन्न होने लगता है। इस स्थिति को लक्ष्य बनाकर ही किसी सत-कवि ने गाया हैं कि ‘ऐसा मद भूल न पीबई, जे बहुरि पछताया।' वस्तुतः शराब पीने के बाद इस तरह की दुर्दशाग्रस्त स्थिति में पड़े व्यक्ति को होश आने पर अपनी स्थिति का पता चले तो वह शर्मिंदा हुए बिना नहीं रह सकता। स्वाभाविक ही उसे पश्चाताप भी होता है।

मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और नैतिक स्वास्थ्य को क्रमशः चौपट करने वाली शराब किसी भी दृष्टि से मानव शरीर और जीवन के लिए उपयोगी नही है और न अनुकूल ही सिद्ध होती है। इसके विपरीत यह जीवनीशक्ति, मानसिक क्षमता, आर्थिक और सामाजिक स्थिति तथा नैतिक मूल्यों का विध्वंस ही करती है। अस्तु, मद्यपान को उचित बताने वाले सभी तर्कों और कारणों पर विचार करना चाहिए तथा ऐसे मदमूल से मुक्त ही रहना चाहिए, जिसके अपनाने के बाद पछताने के सिवा और कुछ भी हाथ न लगे। उन व्यक्तियों को भी, जो किसी प्रकार इसके चंगुल में फँस गये हैं, इसकी जकड़ से बाहर निकालना एक श्रेष्ठ परोपकार हो सकता है।


Quotation

समझदार आदमी का यह लक्षण नहीं है कि वह कभी गलती न करे, ताकि क्योंकि ऐसा मनुष्य, जो कभी भूल न करें, दुनिया में आज तक न तो हुआ है और न  होगा ही। किंतु समझदार वह है—जो छोटी-मोटी गलती करता हो, भले ही उस गलती को तुरंत ठीक करने की योग्यता रखता हो। —लेनिन


युग-चिंतन को उभारने के लिए मनीषा का आह्वान

ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान का कार्यक्षेत्र बहुत व्यापक है। उसमें मानवी चेतना को निकृष्ट दुष्प्रवृत्तियों से विरत करने और उत्कृष्टता की सत्प्रवृत्तियों के साथ जोड़ने वाले उन सभी प्रतिपादनों का समावेश है जो जीवन-प्रक्रिया के साथ जुड़े हुए किसी भी मर्मस्थल का स्पर्श करते हैं। आज भौतिक कारणों से मनुष्य के प्रभावित होने की मान्यता ही सर्वत्र छाई हुई है। इसलिए प्रायः सभी के प्रयत्न अधिक संपन्नता—अधिक अनुकूलता पाने के लिए गतिशील रहते हैं। ऐसे लोग नगण्य ही मिलेंगे जो वस्तुस्थिति को समझते हों। मनःस्थिति को प्रधानता देते हों और यह स्वीकार करते हों कि चिंतन अपने आप में एक प्रचंड-शक्तिसंपन्न तथ्य है। उसके प्रवाह दृष्टिकोण में अंतर होने पर व्यक्तित्व का समूचा ढाँचा बदल सकता है। दिशा बदलने से परिस्थितियों में अंतर आना, सुधार होना तनिक भी कठिन नहीं है। परिस्थितियों की अनुकूलता किसी के हाथ की बात नहीं, किंतु मनःस्थिति को कोई भी मोड़ सकता है और प्रचुर प्रसन्नता तथा सफलता तक पहुँचने के लिए एक अतिसरल पगडंडी हस्तगत कर सकता हैं।

परिस्थिति से मनःस्थिति के प्रभावित होने की मान्यता का नाम 'भौतिकवाद' है। मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थितियों के ढलने-बदलने की मान्यता— ‘अध्यात्मवाद’। यों उपेक्षणीय दोनों में एक भी नहीं, फिर भी जिसकी प्रधानता समझी जाएगी, पुरुषार्थ उसी में नियोजित होगा। आज भौतिकवादी दर्शन ने मानवीसत्ता को पूरी तरह अपने शिकंजे में कस रखा है। फलतः मनःस्तर को ऊँचा उठाने की आवश्यकता भी नहीं समझी जाती।

करना यह होगा कि चिंतन की समर्थता और वरिष्ठता को उजागर करने वाले अध्यात्मवादी प्रतिपादनों को जनविवेक के सम्मुख नए सिरे से प्रस्तुत किया जाए। नए सिरे से इसलिए कि आधार बदल जाने से निर्धारण भी नए स्तर पर करने पड़ेंगे। बुद्धिवाद ने इन दिनों उत्साहवर्धक प्रगति की है। अब तो तथ्य- प्रमाण की साक्षी पग-पग माँगी जाने लगी है। श्रद्धा को एक प्रकार से अमान्य ही ठहरा दिया गया है। हर महत्त्वपूर्ण तथ्य के संदर्भ में यह अपेक्षा की जाती है कि उसकी पुष्टि विज्ञान के सहारे होनी चाहिए। यहाँ तक कि तर्क के आधार पर अपनी विशिष्टता सिद्ध करने वाला दर्शनशास्त्र भी अपने प्रतिपादनों को सही सिद्ध करने के लिए वैज्ञानिक पुष्टि का मुँह ताकता है।

स्थिति विचित्र है। अध्यात्मतत्त्व दर्शन का घोड़ा चिरकाल से श्रद्धा के सहारे मजे में चल रहा था। अब कोई कहीं मान्यता मिली भी तो उसे शास्त्र या संस्कृति के सहारे नहीं, बुद्धिवाद और विज्ञानवाद के पहियों का सहारा लेकर ही अपनी गाड़ी आगे चलानी पड़ेगी। यही है विवशता, जिसके कारण अध्यात्मतत्त्व दर्शन का प्रतिपादन नए सिरे से, नए आधार पर करना होगा। यह कार्य उतना ही कठिन है जितना कि भौतिकवादी मान्यताओं का नए सिरे से निर्धारण। यह दोनों काम एक साथ करने होंगे। इसके लिए समूचे चिंतन-क्षेत्र को मथना पड़ेगा।

लोक-चिंतन का नवनिर्धारण आज का समुद्र-मंथन है। यदि यह प्रक्रिया ठीक तरह संपन्न हो सकी तो दुहरा लाभ होगा। अहंकारी स्वार्थ-संकीर्णता का, तृष्णा और विलासिता का व्यामोह अपने युग का हलाहल है, जिसके कारण ऋषिभूमिका निभाने में पूर्णसमर्थ होते हुए भी मनुष्य पाशविक और पैशाचिक प्रवृत्तियों में तल्लीन हो रहा है। वारुणी वह है— जिसने दूरदर्शिता और उदारता को अनावश्यक ठहराने और कुसंस्कारों में मदमस्त रहने में ही प्रसन्नता मानी है। लोक-मानस में से सर्वप्रथम इन्हीं दोनों अनुपयुक्तताओं का निष्कासन करना है। यह बड़ा मोर्चा है। इसके समान ही वह उत्तरदायित्व है जो निकृष्टता हटने से खाली हुए स्थान को उत्कृष्टता के प्रबल प्रतिपादन से तत्काल भर सके। यह दुहरा काम दो मोर्चों पर एक साथ लड़ने क समान है।

‘विचार-क्रान्ति अभियान’ किसी सामाजिक कुरीति सांप्रदायिक प्रथा मान्यता जैसी छोटी परिधि तक सीमित नहीं है। ऐसा होता तो उस क्षेत्र को प्रभावित करने वाले थोड़े से सुधारकों से भी काम चल सकता था। पर बात गहरी भी, विस्तृत भी और साथ ही अतिमहत्वपूर्ण भी है। इससे भी बड़ी एवं विचित्र कठिनाई यह है कि उसे वीर बलिदानी भी नहीं कह सकते। इसके लिए ‘सद्भावसंपन्न मनीषा’ की आवश्यकता पड़ेगी। अकेली मनीषा तो सहज उपलब्ध है। उसे पैसा देकर कहीं भी खरीदा जा सकता है और उचित-अनुचित कुछ भी कराया जा सकता है। मिशन के लिए इसे प्रयुक्त करना तो गरिमा के प्रतिकूल है ही, प्राप्त करना तक कठिन है। खरीदी हुई मनीषा श्रद्धारहित होने पर अभीष्ट प्रयोजन में गहराई तक उतर भी न सकेगी। ऐसी लंगड़ी-लूली, कानी-कुबड़ी शोध किसी प्रकार किसी हद तक चल भी पड़ी तो वह निर्जीव होने के कारण वाँछित प्रयोजन सिद्ध करने में निरर्थक एवं असफल ही सिद्ध होगी। चिंतन के दा पक्ष हैं—एक बुद्धि और दूसरा भाव। बुद्धि का क्षेत्र मस्तिष्क और भाव का हृदय माना गया है। हृदय का तात्पर्य रक्त फेंकने वाली थैली नहीं, वरन अतःचेतन का वह मर्मस्थल है जहाँ आस्थाओं और आकांक्षाओं के समन्वय से बना अंतःकरण प्रतिष्ठित है। व्यक्तित्व का उद्गम आधार नाभिक एवं ध्रुवकेंद्र यहीं है। सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के लिए साहस प्रदान करने वाली सद्भावसंपन्न उमंगें यहीं से उठती हैं। बुद्धि का उपयोग तथ्यों को समझने तक सीमित है। स्वभावतः बुद्धि जिस निष्कर्ष पर पहुँचती है, वे सुख-सुविधाओं के पक्षधर ही होते हैं। उत्कृष्टता को अपनाने में निश्चय ही आकर्षणों पर नियंत्रण करना और उपभोग में संयम बरतना होता है। इस निर्णय पर पहुँचना बुद्धि का नहीं, भावना-संवेदनाओं की पृष्ठभूमि पर होगा। इस तत्त्व को अध्यात्म भाषा में ‘भक्ति अर्थात प्रकारांतर में ‘श्रद्धा’ भी उसी को कहते हैं। त्याग-बलिदान हेतु, तप-परमार्थ हेतु किसी को सहमत करना हो तो उसके लिए उसी भक्तिभावना का अवलंबन लेना होगा।

महामानवों, ऋषियों, मनीषियों में बुद्धि का अभाव तो नहीं होता पर मूलतः उनकी चेतना पर  उमंगभरी भावनाओं का ही आधिपत्य होता है। अल्पशिक्षितों और अभावग्रस्तों में से भी असंख्यों ने एक से एक बढ़-चढ़कर परमार्थ संपन्न किए हैं। इसका कारण उनकी वह आदर्शवादी अन्तःप्रेरणा ही थी जिसके भाव- प्रवाह में उनने संकटों की परवाह न करके त्याग-बलिदान के आश्चर्यजनक उदाहरण प्रस्तुत किए। नवयुग में भाव-संवेदना को उभारना, भक्तितत्त्व को तरंगित करना अतिमहत्वपूर्ण पक्ष है। इस महान प्रयोजन में धर्म और अध्यात्म की सांस्कृतिक परंपराओं का अनिवार्य रूप से आश्रय लेना पड़ेगा। उसकी उपेक्षा करके मात्र बौद्धिक कलाबाजियों पर आश्रित रहा गया तो लोग सब कुछ समझ जाने पर भी उत्कृष्टता अपनाने के लिए तत्पर न होंगे। भले ही उथले मन से उसका समर्थन करते रहें।

बुद्धिमान मनुष्य आमतौर से धूर्त होते हैं। तथाकथित बुद्धिजीवियों पर आज दृष्टिपात करते हैं तो लगता है कि इस विशिष्टता ने उन्हें चतुर, कुशल, प्रवीण तो बहुत बनाया, पर आदर्शों के निर्वाह में वे एक प्रकार से असमर्थ ही बने रहे। लेखक, कवि, वक्ता, वकील, नेता, कलाकार वर्ग के बुद्धिजीवी संख्या में थोड़े ही होते हैं, पर यदि उनकी प्रतिभा सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन में लग सकी होती तो उसका प्रभाव-परिणाम निश्चिततः भविष्यनिर्धारण की दृष्टि से अत्यंत श्रेयस्कर रहा होता, पर स्थिति निराशाजनक हैं। सच तो यह है कि बुद्धिमत्ता ने समाज को जितना लाभ दिया है उससे कहीं अधिक हानि पहुँचाई है।

चर्चा बुद्धि की महत्त्व को घटाने की नहीं भाव-संवेदनाओं को उभारने की हो रही है। यह भक्तितत्त्व का पुनर्जीवन-पुनर्जागरण है। अमृत इसी को कहते हैं। मस्तिष्क में बुद्धि बढ़े, यह प्रयत्न दूसरे लोग कर रहे हैं। हमें चिंतन की उत्कृष्टता और अन्तःकरण की भावश्रद्धा के संवद्धन में लगना हैं। ब्रह्मवर्चस् का        शोधकृत्य इसी उत्पादन-परिवर्द्धन में केंद्रिभूत हो रहा है। समग्र मानवता के उत्कर्ष को ध्यान में रखते हुए इस प्रयत्नशीलता की एक स्वर से सराहना करनी पड़ेंगी।

ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान का कार्यक्षेत्र कितना बड़ा है, इसका अनुमान इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए लगाया जा सकता है कि चार सौ करोड़ मनुष्यों के विशाल समुदाय के अंतर्गत आने वाले सहस्त्रों वर्गों को सहस्त्रों प्रकार से प्रभावित करने वाली सहस्त्रों प्रवृत्तियों और परिस्थितियों पर प्रकाश डालना होगा। पशुप्रवृत्तियों की पक्षधर कुसंस्कारी मान्यताएँ एक दिन में नहीं बनी हैं। सतयुग के बाद निकृष्टता ने अपनी जड़ें जमाने के लिए अनेक तर्क, तथ्य, उदाहरण और प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। तभी लोगों ने उन्हें लाभदायक माना और अपनाया है। यों कुड़े-कचरे के पर्वत को एक चिनगारी जला सकती है, पर अग्निकांड को हानिरहित एवं सुनियोजित ढंग से संपन्न करने के लिए सूझ-बूझ और व्यवस्था का उपयोग करना पड़ेगा। विचार-क्रांति-क्षेत्र इतना विस्तृत है कि उसकी परिधि में हर मान्यता, हर प्रथा, हर अभिरुचि एवं व्यक्तित्व को समझने एवं उपयोगी परिवर्तन लाने की अभीष्ट सामग्री संपादित करनी पड़ेगी।

यह समग्र विश्व क्रांति है। ‘समग्र’ इस अर्थ में कि वस्तुतः चिंतन ही सब कुछ है। चेतना का ‘चिंतन’ ही गुण-धर्म है। सामर्थ्य का स्रोत वही है। लोक-चिंतन को जिस अनुपात से परिष्कृत किया जा सकेगा, उसी मात्रा में समस्याओं और विपत्तियों का समाधान होता चलेगा। निश्चय ही यह बड़ा काम है। बड़े काम के लिए बड़े साधन चाहिए। इन साधनों में सर्वोपरि आवश्यकता ‘सद्भावसंपन्न मनीषा’ की है। शोधकार्य की सफलता उस उपलब्धि को समुचित मात्रा में मिल सकने पर निर्भर है।

ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान ने अपने आरंभिक चरण में चार प्रयोजन हाथ में लिए हैं— (1) मनः तत्त्व की सामर्थ्य और उसकी प्रयोगपद्धति।

(2) शरीर, मन और अंतःकरण को निरोग बनाने में समर्थ यज्ञ उपचार-प्रक्रिया।

(3) चेतना और प्रकृति के अजस्र भंडार से उपयोगी लाभसंपादन।

(4) अध्यात्म और धर्म के तत्त्व दर्शन का सार्वभौम रूप।

इन चारों को मिला देने से नवयुग के तत्त्व दर्शन की एक मोटी रूप-रेखा बनती है जिसे ढाँचा या खाका कह सकते हैं। अभी इतने ही साधन संभव हैं इसलिए जितनी सौर उतने पाँव पसारे जा रहें हैं। इनमें से प्रत्येक के कई भेद-उपभेद हैं और इनमें से हर प्रभेद इतना महत्त्वपूर्ण है कि उसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। समर्थ विचार-क्रांति का तात्पर्य ही यह है कि किसी भी छेद से नाव में पानी न घुसने पाए। प्रतिगामिता और कुसंस्कारिता के लिए कोई भी मोर्चा ऐसा खाली न छोड़ा जाए जिसमें होकर शत्रु को भीतर घुस पड़ने का अवसर मिल जाए।

ब्रह्मवर्चस् शोध-प्रक्रिया के पहले चरण की मोटी रूप-रेखा काबू में आते ही अगले चरण उठेंगे। और एक-एक करके उन सभी प्रसंगों का स्पर्श करेंगे जिनकी ओर अभी मात्र संकेत किया गया है। शोध का आरंभ हो रहा है। अंत होने में संभवतः एक पूरी पीढ़ी खा जाएगी। इनके लिए कितने मनीषियों की आवश्यकता पड़ेगी, कहना कठिन है। साधन अधिक होने से काम जल्दी होता है। यों मंथरगति से चलने वाली चींटी भी कभी न कभी तो पर्वत शिखर पर जा पहुँचने में सफल हो सकती है।

इन दिनों शोध संस्थान में कानून, चिकित्सा, दर्शन, साहित्य एवं विज्ञान के पोस्ट ग्रेजुएट एवं न्यूनाधिक इसी योग्यता के प्रायः दो दर्जन कार्यकर्त्ता क्रियासंलग्न है। यह जनशक्ति बहुत स्वल्प है। इससे कई गुनी विस्तृत और गहरी मनीषा की अभी और भी आवश्यकता है। ऐसी स्वयंसेवी मनीषा अपेक्षित है, जिसके लिए पारिश्रमिक चुकाने की चिंता न करनी पड़े। इतने बड़े पुण्य-प्रयोजनों में प्रतिभाओं को पारिश्रमिक देकर उपलब्ध करना संभव भी नहीं हो सकता। जो सहयोग करने के लिए अपने को योग्य समझते हों; उन्हें यह भी देखना पड़ेगा कि उन्हें बदले का पारिश्रमिक तो नहीं माँगना पड़ेगा। आमतौर से स्वयं अपना निर्वाह व्यय उठाकर सहयोग करने के लिए उपयुक्त परिस्थिति वालों का ही आह्वान किया गया है।

इन पूर्ण समयदानियों के अतिरिक्त ऐसे लोगों की भी बड़ी संख्या में आवश्यकता पड़ेगी जो ब्रह्मवर्चस् में आकर न्यूनतम दो महीने ठहर सकते हैं, अथवा अपने घर पर रहकर ही न्यूनतम दो घंटा प्रतिदिन इस पुण्य-प्रयोजन के लिए लगाते रह सकते हैं। समीपवर्ती बड़े पुस्तकालयों से निर्धारित विषय पर पुस्तकें प्राप्त करने एवं संदर्भ ढूँढ़ते रहने का कार्य अपने घरों पर भी चलाया जा सकता है।

रामकृष्ण परमहंस मिशन, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, साधु संप्रदाय आदि में भर्ती होने वाले कितने ही मनस्वी आत्मदान करते और समर्पित जीवन जीते हैं। इसी स्तर के शोधकर्ता ब्रह्मवर्चस् के लिए भी अपेक्षित हैं। शरीर निर्वाह की व्यवस्था तो भगवान सभी की करते हैं। ऐसा ब्राह्मणोचित प्रबंध तो समर्पित शोधकर्ताओं के लिए ब्रह्मवर्चस् में भी हो सकता है।

महाकाल ने विभीषिकाओं से जूझने और नवसृजन की उमंग उभारने का निश्चय किया है। उस प्रवाह को युगांतरीय चेतना के रूप में तूफानी गति से उभरता देखा जा सकता है। जागृत आत्माओं पर उसका प्रवाह सर्वप्रथम पड़ता है। इन दिनों जागृत आत्माओं के अनेकानेक स्तर अपने लिए उपयुक्त काम प्राप्त करने और उसमें प्राणप्रण से जुट पड़ने में अपनी विशिष्टता का परिचय दे रहे हैं। अब बारी ‘मनीषा’ की है। वह जहाँ कहीं भी जीवंत हो, भावना-चिंतन एवं भाव संस्थान के नवनिर्माण के लिए आगे आए। इस स्तर के अनुरूप रिटायर्ड व्यक्तियों की, आर्थिक दृष्टि से स्वावलंबी, गृहस्थभार से बचे हुए अविवाहितों की कमी नहीं। उनकी मनीषा को विशेष रूप से युगचेतना ने पुकारा है। ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान ने ऐसे सभी लोगों का सहयोग आमंत्रित किया हैं जिनमें मनीषा अस्तित्व ही नहीं, वरन ग्रुप सृजन के लिए आदर्शवादी उमंगें भी उमंगती हों।


मानव जीवन का अवसर (Kahani)

आरण्यकवासी विद्वान हरिमित्र पशु-पक्षियों से भी उनकी भाषा में वार्त्तालाप करने में निष्णात थे। एक दिन वे रास्ते से जा रहें थे तो देखा, जिस राजा भुवनेश के राज्य में वे पहले रहते थे, उसका शव एक उलूक नोच-नोचकर खा रहा है।

हरिमित्र ने उलूक से पूछा कि, "यह शव तो भुवनेश नृप का है। यह यहाँ क्यों है? क्या इसका दाह संस्कार नहीं हुआ? तुम इसे खा क्यों रहें हो?"

उलूक ने विनयपूर्वक कहा—”महाराज! यह भुवनेश का ही शव है। मैं स्वयं भुवनेश हूँ। आपको भिन्न धर्मपद्धति का अनुयाई देखकर मैंने ही आपके राज्य से निष्कासन की आज्ञा दी थी। मैं इसे धर्म-कर्त्तव्य मानता था कि अपनी धर्मपद्धति का प्रचार करूँ।

मेरा लड़का बड़ा होने पर भिन्न धर्मपद्धति वालों के प्रचार में पड़कर उनसे दीक्षित हो गया। उस मत में शव का दाह कर्म वर्जित है। अतः मेरी मृत्यु के बाद उस मेरे पुत्र ने मेरा शव यहाँ फिंकवा दिया। उधर यमराज ने मेरे बारे में यह व्यवस्था की है कि मैं अपनी धार्मिक मान्यता को हिंसा, आतंक और भय के द्वारा दूसरों पर थोपने का प्रयास करता था। इसलिए मुझे नया जन्म उलूक के रूप में लेना होगा तथा अपना ही मांस खाना होगा। वहीं दंड मैं भोग रहा हूँ। प्रायश्चित-भावना से अंतःकरण शुद्ध होने के बाद मुझे पुनः मनुष्य योनि में जन्म पाने का अवसर मिलेगा।"


सन् 82 की डरावनी संभावनाएँ

वर्षा होने के पूर्व बादल घिर आते हैं। आने वाले तूफान अपना पूर्वपरिचय गंभीर वातावरण के रूप में दे देते हैं। नवीन तथ्यों के अनुसार भूकंप जैसी घटनाओं का परिचय जीव-जंतुओं को पूर्व ही मिल जाता है। उसके स्वभाव में आए अप्रत्याशित परिवर्तनों के आधार पर भावी संकट का अनुमान लगाया जा सकता है। इन संकेतों के द्वारा वातावरण में होने वाले परिवर्तन और घटने वाली घटनाओं का परिचय मिल जाता है। प्रयत्न करने पर सामान्य व्यक्ति भी इन संकेतों के आधार पर छोटे-मोटे परिवर्तनों की जानकारी प्राप्त कर सकता है।

चेतना का अनंत प्रवाह ब्रह्मांड में सतत प्रवाहित हो रहा है। प्रकृति के संचालन एवं परिवर्तनों का मूल आधार वही है। परिवर्तनकारी तत्त्व इसी चेतना के गर्भ में पकते रहते तथा कालांतर में अभीष्ट परिवर्तनों के कारण बनते हैं। बीज एक निश्चित समय तक भूमि में पड़े रहने एवं विकास के लिए सुदृढ़ आधार बना लेने के उपरांत जमीन के बाहर निकलना दिखाई देता है। नौ माह तक माँ के गर्भ में पड़े रहने एवं भावी विकास की पृष्ठभूमि बना लेने के उपरांत बच्चा माँ के गर्भ से बाहर आता है। सर्वसामान्य को बच्चे के अस्तित्व का परिचय तो उसके जन्म के साथ ही मिलता है। जबकि उसका अस्तित्व नौ माह पूर्व ही बन गया था।

स्थूलजगत की सारी घटनाएँ सूक्ष्म में बनती, पकती रहती तथा परिपक्व होकर स्थलस्वरूप में प्रकट होती हैं। जनसामान्य को इसकी जानकारी तो उसके स्थलरूप में आने पर ही मिलती है। जबकि उसका उद्भव बहुत समय पूर्व ही हो चुका था। वर्षा, मौसम एवं वातावरण में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी तो सामान्य व्यक्तियों को भी मिल जाती है। किंतु सूक्ष्मचेतना के गर्भ में पक रहीं घटनाओं की पकड़ सामान्य व्यक्तियों से परे है। चेतन जगत में हो रही हलचलों की जानकारी तो अतींद्रियशक्तिसंपन्न व्यक्तियों को ही मिल पाती है। अपनी पराशक्ति के आधार पर ऐसे तत्त्वदर्शी ब्रह्मांड के चेतन-प्रवाह में हो रहीं हलचलों को जान सकने में समर्थ होते हैं। महत्त्वपूर्ण भविष्यवाणियाँ ऐसे अतीन्द्रियशक्तिसंपन्न व्यक्तियों की ही सही उतरती है। उथली भविष्यवाणियों द्वारा लोगों को दिग्भ्रांत करने वाले भविष्यवक्ताओं की इन दिनों कमी नहीं है। जो अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए लोगों के समक्ष अनाप-शनाप बकते रहते हैं। किंतु इतने पर भी संसार ऐसे प्रामाणिक भविष्यवक्ताओं से सर्वथारहित नहीं है। उनकी संख्या अवश्य गिनी-चुनी हैं। समय-समय उनके द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ जब सही घटित हुईं तो भविष्य के प्रति रुचि रखने वालों का ध्यान सहज ही इनकी ओर आकर्षित हुआ।

'जौन एडन' को एक प्रामाणिक भविष्यवक्ता के रूप में जर्मनी में ख्याति मिली है। वहाँ की प्रसिद्ध पत्रिका ‘एक्सप्रेस रिव्यू’ के जनवरी ७८ अंक में प्रकाशित उनकी भविष्यवाणी उल्लेखनीय हैं। कुछ व्यक्ति जानने के लिए पहुँचे। पूछने पर उन्होंने निराशापूर्ण शब्दों में कहा कि, “इस संबंध में हमसे न पूछा जाए तो ही अच्छा होगा।” अधिक आग्रह करने पर उन्होंने उत्तर दिया कि, “इन दिनों प्रकृति के अंतराल में मैं असामान्य परिवर्तनों को देख रहा हूँ। ध्यान की गहराइयों में पहुँचने पर मुझे स्पष्ट दिखाई पड़ता है कि प्रकृति ध्वंस का सरंजाम जुटाने में लगी है। ध्वंसात्मक तत्त्व इन दिनों सूक्ष्मजगत में बढ़ते जा रहे हैं। मेरी अंतःचेतना में संसार के नष्ट होने के स्पष्ट संकेत मिल रहें हैं।” यह पूछे जाने पर कि दुर्भाग्यशाली समय कौन-सा होगा? कुछ देर के लिए शांत होकर वे आँखें बंद करके बैठ गए। थोड़े समय पश्चात् उन्होंने कहा—”हमें जो संकेत मिल रहें हैं, उनके अनुसार यह समय फरवरी और अगस्त ८२ के मध्य होना चाहिए।" विनाश का भावी स्वरूप स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि, “मानवी दुर्बुद्धि एवं उसके कुकृत्यों के कारण प्रकृति अत्यंत क्रुद्ध है। फलस्वरूप सन् ८२ फरवरी और अगस्त के मध्य विश्व का अधिकांश भाग भयंकर भूकंप, झंझावात, तूफान तथा विस्फोट से नष्ट हो सकता है। इसी समय दो प्रभावशाली राष्ट्रों के बीच युद्ध छिड़ जाने के कारण तृतीय विश्वयुद्ध की पूरी-पूरी संभावना हैं। ये राष्ट्र कम्युनिस्ट होंगे। तृतीय विश्वयुद्ध एवं प्रकृति-प्रकोपों की दोहरी मार से जिस विदारक दृश्य की कल्पना हमारी चेतना में उठती है, उसे देखकर हमारा हृदय काँप उठता है।”

‘जौन एडन’ ने अब तक जितनी भी भविष्यवाणियाँ कीं, उनमें अधिकांशतः सही उतरी हैं। जिस समय भारत और पाकिस्तान की सेनाएँ बांग्लादेश के युद्ध में एकदूसरे के सामने डटी नरसंहार कर रहीं थीं; युद्ध विराम के एक दिन पूर्व उन्होंने अपने एक मित्र से कहा कि, "कल पाकिस्तानी सेना आत्मसमर्पण कर देगी। भारत विजयी होगा। बांग्लादेश  पाकिस्तान के हाथों से निकलकर, एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उभरेगा। दूसरे दिन जब पाकिस्तानी सेना ने आत्ममर्पण किया तो ‘एडन’ का मित्र आश्चर्यचकित रह गया। उनकी अतींद्रिय सामर्थ्य से उसने जनसामान्य को अवगत कराया। तब से लेकर अब तक संसार के विभिन्न देशों के संबंध में जो भविष्यवाणियाँ की हैं, वे अधिकांशतः सही उतरी हैं। अरब-इसराइल युद्ध में, अरब राष्ट्रों के गठजोड़ के बावजूद भी इसराइल की युद्ध में अप्रत्याशित विजय की घोषणा, भारत में ऐतिहासिक, राजनैतिक परिवर्तन, पाकिस्तानी  शासन में भुट्टों की तानाशाही का दुखद अंत जैसी भविष्यवाणियाँ समय एवं तथ्यों के अनुसार सही पाई गई हैं।

यह पूछे जाने पर, क्या भारी विनाश से बचने का कोई मार्ग है? उन्होंने कहा कि, "चेतना की सामर्थ्य प्रकृति की तुलना में जबरदस्त है। प्रकृति नियमों से मुक्त चेतना उसमें आवश्यक परिवर्तनकर सकने में समर्थ होती है। ऐसा ही प्रचंड आत्मबलसंपन्न महामानव जन-कोलाहल से दूर, भावी संकटों से मानव जाति की सुरक्षा के लिए प्रयत्नशील है। वह प्रकृति में आवश्यक हेर-फेर कर सकने में समर्थ है। उसकी आध्यात्मिक-शक्ति सभी भौतिक-शक्तियों से अधिक है। प्रकृति के अनुकूल एवं जनमानस को सही मार्ग पर चलाने में वह अपनी शक्ति का नियोजन कर रहा है। सूची की प्रकाश-किरणों के माध्यम से वह अपनी सूक्ष्मशक्ति द्वारा भावनाशील व्यक्तियों को अभिप्रेरित करने में संलग्न है। उसमें अद्भुत संगठनबल है, जिसके कारण उसके संरक्षण में संसार को दिशा देने के लिए एक दृढ़ संगठनशक्ति उभर रही है। उसके लाखों अनुयाई प्रचंड एवं विवेकयुक्त विचारों द्वारा जनमानस में लोक-मंगल की भावना उत्पन्न कर रहें हैं। उसके तर्कयुक्त एवं विज्ञानसम्मत आध्यात्मिक विचारों के समक्ष नास्तिक वर्ग भी नतमस्तक होगा। जीवन के उत्तरार्ध में वह अपनी शक्ति का विकेंद्रीकरण विभिन्न केंद्रों के माध्यम से करेगा। इस समय उस दिव्य मानव को भारत के उत्तराखंड में कहीं पहाड़ी किसी तीर्थ-स्थान पर विश्वव्यापी परिवर्तनों के कार्यों में तल्लीन होना चाहिए। उसके मानवतावादी विचार एवं कार्यक्रमों को अपनाने से ही भावी संकटों को रोका जा सकता है। वहाँ एक ऐसी संस्कृति का बीजारोपण हो रहा है, जो संप्रदाय एवं मजहब की दीवारों को तोड़ती हुई एक मानवतावादी धर्म की स्थापना करेगी।”

अखण्ड ज्योति के फरवरी ७८ अंक में प्रकाशित प्रसिद्ध भविष्यवक्ता 'क्रूम हेलर' की भविष्यवाणी एवं ‘जौन एडन’ की भविष्यवाणी में विशेष साम्य है। इनके द्वारा की गई भविष्यवाणियाँ कितनी सही उतरती हैं, यह तो समय बताएगा। किंतु जिस संस्कृति के बीजारोपण का संकेत ‘जोन एडन’ ने दिया है, उससे संभावना की जा सकती है कि मनुष्य जाति यदि अपने दुष्कर्मों को छोड़कर श्रेष्ठ मार्ग अपना सके तो संभव है कि विनाश पर उतारू प्रकृति भी अपना रवैया बदल दे।


साधना से सिद्धि के सिद्धांत और प्रयोग

साधना का स्वरूप और उद्देश्य

यह सारगर्भित लेखमाला, भविष्य में हर महीने छपा करेगी। आठ पृष्ठ निश्चित रहेंगे। इस प्रतिपादन को श्रेष्ठ साधक अपना व्यक्तिगत एवं क्रमबद्ध मार्गदर्शन मानकर चल सकते हैं।

साधना चेतना-क्षेत्र का ऐसा व्यवसाय है, जिसमें पुरुषार्थ की तुलना में लाभ की मात्रा अत्यधिक है। पूँजी, परिश्रम और अनुभव के आधार पर संसार के सभी व्यवसाय चलते हैं और परिस्थिति के अनुरूप उनसे लाभ भी मिलता है। साधना का व्यवसाय इन सबसे सरल और फलप्रद है। उसमें न बाहर की सहायता अपेक्षित होती है, न साधन जुटाने पड़ते हैं और न परिस्थितियों के अनुकूलन की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। अपने आप को समझा लेने और सुधार लेने भर से वह प्रयोजन पूरा हो जाता है, जिसमें लाभ ही लाभ है। वह भी इतना असाधारण जिसकी तुलना में अन्य सभी व्यवसायों का लाभांश हलका पड़ता हैं। दूरदर्शी सदा से साधना के व्यवसाय की महत्ता समझते, उसे प्रमुखता देते और समुचित लाभ उठाते रहें हैं। प्रगतिशीलता में रुचि लेने वाले प्रत्येक जागरूक को लाभदायक व्यवसायों में से चुनाव करते समय साधना को प्रमुखता देने में ही बुद्धिमानी प्रतीत हुई है। आज भी उसी राजमार्ग का अनुसरण सबसे अधिक दूरदर्शितापूर्ण है।

सामान्य स्थिति में हर वस्तु तुच्छ हैं, पर यदि उसे उत्कृष्ट बना लिया जाए और उसकी सूक्ष्मता तक प्रवेश पा लिया जाए तो उससे ऐसा कुछ मिलता है, जिसे विशिष्ट और महत्त्वपूर्ण कहा जा सके। समुद्र में खारी पानी भरा पड़ा है, पर उसकी गहराई में उतरने वाले मणि-मुक्तक ढूँढ़ लेते हैं और उस निरर्थक दीखने वाले जलाशय को रत्नाकर के रूप में संपदा का भांडागार पाते हैं। बात दोनों की सही है— उथली दृष्टि से खारे पानी का गड्ढा बेकार इतनी जमीन घेरे हुए है, पर सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर समस्त भूमण्डल को वर्षा के रूप में जीवन-रस देने वाला वही प्रतीत होता है। खनिज पदार्थ जब भूमि से निकलते हैं तो धूलमिश्रित अनगढ़ होते है। उस रूप में उनका कोई उपयोग नहीं, किंतु जब उन्हें परिशोधित करके धातुओं के रूप में बना लिया जाता है तो अतिमहत्त्वपूर्ण उपकरण बनाने में उनकी उपयोगिता सराहते ही बनती है। पानी भाप बनता हैं और प्रचंड शक्ति के रूप में प्रकट होता हैं। धूलि के छोटे-छोटे घटकों में प्रचंड अणुशक्ति पाई जाती है। स्थूल से सूक्ष्म में जितना गहरा उतरा जाता है, उतने ही रहस्यमय तथ्यों का उद्घाटन होता जाता है। उसी ‘साधारण ‘ में दृश्यजगत के विज्ञानी पर्यवेक्षकों ने विलक्षण शक्तियों से भरा-पूरा पाया हैं और उन्हें खोजते हुए सामर्थ्य के साम्राज्य पर आधिपत्य जमाया है।

जीवन मोटी दृष्टि से ऐसे ही एक खिलवाड़ है, जिसे ज्यों-त्यों करके काटना पड़ता है। निर्वाह की आवश्यकता जुटाने, गुत्थियों को सुलझाने और प्रतिकूलताओं के अनुकूलन में माथा-पच्ची करते-करते मौत के दिन पूरे हो जाते हैं। अभावों और संकटों से पीछा ही नहीं छूटता। कई बार तो छड़ी इतनी भारी हो जाती है कि खींचे नहीं खिंचती है। फलतः प्रयत्नपूर्वक अथवा बिना प्रयत्न ही अकाल मृत्यु के मुँह में प्रवेश करना पड़ता हैं। नीरस और निरर्थक जीवन एक ऐसा अभिशाप है जिसे दुर्भाग्य के रूप में स्वीकार करना पड़ता है,किंतु लगता यही रहता है कि बेकार जन्मे और निरर्थक जिए। साधारण जीवन का यही स्वरूप है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में तो अन्य प्राणियों से भी गया-बीता प्रतीत होता है।

असामान्य जीवन इससे आगे की बात है। सफल, समर्थ और समुन्नत स्तर के व्यक्ति सौभाग्यशाली दीखते है और उनकी स्थिति प्राप्त करने के लिए मन ललचाता हैं। भौतिक संपन्नता से संपन्न और आत्मिक विभूतियों के धनी लोगों की न प्राचीनकाल में कमी थी और न अब है। पिछड़े और समुन्नत वर्गों के मध्यांतर देखने से आश्चर्य होता है कि एक जैसी काया में रहने वाले मनुष्य प्राणियों की स्थिति का इतना ऊँचा और नीचा होने का क्या कारण हो सकता है? सृष्टा का पक्षपात एवं प्रकृति का अंधेर कहने से भी काम नहीं चलता, क्योंकि दोनों की सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित सत्ता में अंधेरगरदी के लिए कहीं रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं है। यदि व्यक्तिक्रम रहा होता तो ग्रह-नक्षत्र अपनी धुरी पर न घूमते, परमाणुओं के घटक उच्छृंखलता बरतते और परस्पर टकराकर उसी मूल स्थिति में लौट गए होते जिसमें कि महत्तत्व अपनी विज्ञात स्थिति में अनंतकाल से पड़ा था। अंधेरगरदी के रहते न यह सृष्टि बन ही पाती और न एक दिन चलती-ठहरती। यह सब कुछ परिपूर्ण व्यवस्था के अनुरूप चल रहा है।

फिर मनुष्यों के बीच पाए जाने वाले अंतर का क्या कारण है? इसका सुनिश्चित उत्तर यहीं है कि जीवन की उथली परतों तक ही जिनका वास्ता रहा उन्हें छिलका ही हाथ लगा, किंतु जिनने गहरे उतरने की चेष्टा की उन्हें एक के बाद एक बहुमूल्य उपलब्धियाँ मिलती चली गईं। गहराई में उतरने को अध्यात्म की भाषा में साधना कहते हैं। साधना किसकी? इसका उत्तर है— जीवन की। जीवन प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष है जो उसकी जितनी सदुपयोग साधना कर लेता है, वह उतना ही कृतकृत्य बनता है। जीवन का मूल्य महत्त्व और उपयोग न समझना ही वह अभिशाप है। जिसके कारण गई-बीती परिस्थितियों में दिन गुजारने पड़ते हैं। यदि स्थिति को बदल दिया जाए, जीवन देवता की अनंत सामर्थ्य तथा उसके वरदानों की असीम शृंखला को समझा जा सके तो प्रतीत होगा कि सृष्टि ने बीजरूप में वैभव का भांडागार इसी मानवीकाय-कलेवर के भीतर संजोया हुआ था। भूल इतनी ही होती रही कि न उसे खोजा गया और न काम में लाया गया। इस भूल का परिमार्जन ही आत्मज्ञान है। यह जागृति जब सक्रिय बनती है तो आत्मोत्कर्ष के लक्षण तत्काल दृष्टिगोचर होने लगते हैं। इसी आत्मपरिष्कार की प्रक्रिया का नाम साधना है।

साधना से सिद्धि का सिद्धांत सत्य है। भौतिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में साधनारत पुरुषार्थी अनेकानेक सफलताएँ अर्जित करते देखे जाते हैं। जीवन एक ऐसा क्षेत्र हैं जिसे जड़ जगत के किसी भी घटक एवं वर्ग में अत्याधिक महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है। जड़ सीमित है, चेतन असीम। जड़ से साधनमात्र मिलते हैं। चेतन में आनंद और उल्लास के भी भंडार भरे पड़े हैं। साधना का एक सुविस्तृत विज्ञान है। अध्यात्मतत्त्वज्ञान के अंतर्गत उसकी व्यापक विवेचना की गई है।

साधना के अभ्यासों को देखते हुए यह भ्रम होता है कि कहीं बाहर से कुछ माँगने-पाने का वह उपक्रम है, पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। उपयोगी उपार्जन के लिए अपने खेत में ही फसल बोनी और काटनी पड़ती है। अपने पुरुषार्थी से ही निर्वाह होता है। बाहरी सहायता के बल पर किसका काम चला है? फिर याचना पर मिलता भी किसे कितना है। बच्चे को माता का दूध उपलब्ध रहने पर भी आखिर चूसने और पचाने का पुरुषार्थ तो उसे ही करना पड़ता है। इसके बिना दयालु माता भी शिशु को अपने अनुदानों से लाभान्वित नहीं कर सकती। दैवीशक्तियों के अनुग्रह से बहुत कुछ मिलता है, यह सत्य है, पर इससे भी बड़ा सत्य यह है कि उसके लिए पात्रता उपार्जित करनी पड़ती है। इंद्रदेव की विपुल वर्षा होते रहने पर भी न तो टीले पर जलराशि ठहरती है, न चट्टान पर हरियाली उत्पन्न होती है। उर्वर-भूमि ही वर्षा से लाभान्वित होती है। हरी-भरी बनती है।

पात्रता का संवर्द्धन ही साधना है। इसके लिए जीवन के बहिरंग को व्यवस्थित और अंतरंग को परिष्कृत करना होता है। परिष्कृति को योग और व्यवस्थिति को तप कहते हैं। साधना के यही दो क्षेत्र हैं। बहिरंग को सभ्यता की मर्यादा में करना होता हैं और अंतरंग को संस्कृत बनाने के लिए प्रबल पुरुषार्थ करना पड़ता है। साधना का तत्त्वदर्शन यहीं है। सरकस का पशुप्रशिक्षक अनगढ़ जानवरों को प्रशिक्षित करता हैं और उन्हें आश्चर्यजनक करतब दिखाने में अभ्यस्त कर लेता है। प्रकारांतर से यही प्रक्रिया जीवन-संपदा के अनगढ़ और अव्यवस्थितस्वरूप को सुव्यवस्थित और समुन्नत बनाने के लिए पड़ती हैं। साधना के समस्त उपचार इसी प्रयोजन के लिए सृजे गए हैं।

लोक-मान्यता यह है कि सिद्धियाँ देव अनुग्रह से बरसती है। साधना उसी की मनुहार है। यह मान्यता आंशिक रूप से ही सत्य है। दुकानदार माँगने से ही कोई वस्तु निकालकर दिखाता और देता है। न माँगने पर तो वह देना तो दूर, कुछ बताएगा तक नहीं। प्रार्थना को अपनी आवश्यकता की अभिव्यक्ति कह सकते हैं। इस अर्थ में वह उचित भी है और आवश्यक भी। भूल वहाँ होती है जब प्रार्थना को याचना समझा जाता है। याचना का अर्थ है— बिना मूल्य या अल्प मूल्य में कुछ बहुमूल्य पाने के लिए गिड़गिड़ाना। इस उपाय से बहुत हल्के अनुदान ही प्राप्त होते देखे गए हैं। इतने पर भी वे न तो संतोषजनक होते हैं और न सम्मानास्पद। उनका उपयोग करते समय आत्मग्लानि भी होती है और बाहर से तिरस्कृत भी होना पड़ता है। फिर यह प्रचलन तो मानवी है। व्यक्तिगत याचना-अनुदान का सिलसिला तो मानव समाज में ही प्रचलित है। विश्वव्यवस्था में तो खरीदने-पाने भर का विधान है। स्रष्टा की समूची सृष्टि इसी व्यवस्था की धुरी पर परिभ्रमण करती है कि पात्रता प्रस्तुत करने वाले को अनुदान किए जाएँ। पवन प्राणवायु की प्रचुर मात्रा लिए खड़ा रहता है, पर उसे सक्षम फेफड़े ही ग्रहण कर पाते हैं। मृतकों को कुछ दे सकने में समर्थ होते हुए भी पवन सर्वथा असमर्थ ही रहता है। मनोरम दृश्यों से भरी-पूरी इस दुनिया को निहारने का आनंद मात्र उन्हीं को मिलता हैं जिनकी आँखें सही हैं। ध्वनि-प्रवाह के अगणित उतार-चढ़ावों को समझने और श्रवण का आनंद लेने की सुविधा इस संसार में विद्यमान हैं, पर उसमें लाभान्वित हो सकना उन्हीं के लिए शक्य है जिनकी कान की झिल्ली ठीक है। बाहर से दैवी अनुग्रह बरसने की बात सत्य होते हुए भी वह निर्बाध नहीं है। यह शर्त जुड़ी ही हुई है कि अनुदान उपलब्ध करने लिए पात्रता अनिवार्य है। पात्रता का संवर्द्धन ही साधना है। इस मार्ग पर चलने वाले को अतिरिक्त याचना नहीं करनी पड़ती, जो उपयुक्त है वह अनायास ही मिलता है। उपयुक्त का तात्पर्य है— अपने स्तर को बढ़ाए बिना न तो विभूतियाँ मिलती हैं और न मिलने पर ठहरती ही हैं। अतः पात्रता की पाचन की समर्थता का अभिवर्द्धन अनिवार्य रूप से आवश्यक है। साधनों में यही करना पड़ता है। यह प्रयास जितना प्रौढ़, प्रखर एवं परिपक्व होता है, उसी अनुपात में विभूतियाँ भीतर ही उफनती और बाहर से बरसती दृष्टिगोचर होने लगती हैं।

साधना में अदृश्य शक्तियों की सिद्धियों की उपलब्धि का प्रतिपादन गलत नहीं है। ईश्वर का अनुग्रह सृष्टि के हर घटक पर अनादिकाल से बरसता रहा है और अनंतकाल तक बरसता रहेगा। उसे न्यून या अधिक मात्रा में प्राप्त कर सकना अपने स्तर के अनुरूप ही हो सकता हैं। संसार में आहार के विपुल भंडार भरे पड़े हैं। उन्हें प्राप्त करने की सभी को सुविधा है, किंतु चींटी अपने स्तर की अपनी मात्रा में सामग्री प्राप्त करती है और हाथी को अपने काम के पदार्थ अपनी आवश्यकतानुसार मिलते रहते हैं। सृष्टा के अनुग्रह और अनुदान में कोई कमी नहीं। उससे याचना करने की आवश्यकता नहीं। पात्रता सिद्ध करना  पर्याप्त है। प्रार्थना का एवं साधना का उद्देश्य इसी पात्रता का अभिवर्द्धन है।

पेड़ अपनी आकर्षणशक्ति से बादलों को खींचते और बरसने के लिए विवश करते हैं। पौधों पर ओस के कण जमा होते हैं। खदानें अपने सजातीय-कणों को दूर-दूर तक आमंत्रण भेजती हैं और उन्हें अपने निकट खींच बुलाती हैं। यह चुंबकत्व है जो जहाँ जितना अधिक होता है, सजातियों को उसका उसी स्तर का आह्वान-आमंत्रण मिलता हैं। फलतः वे उसी गति से दौड़ते चले आते हैं। खिलते फूल का चुंबकत्व मधुमक्खियों, तितलियों और भौरों को न्योंत बुलाता है। खिलते हुए यौवन में अनेकों आँखें अनायास ही आकर्षित होती हैं। प्रतिभा अनेकों को प्रशंसक एवं अनुयाई बनाती हैं। यह चुंबकत्व के चमत्कार हैं। साधक का चुंबकत्व दैवीशक्तियों को अदृश्य रूप में आमंत्रित करता है और अनुग्रह बरसाने के लिए सहजता से सहमत करता है।

सिद्धियों की एक धारा ऊपर से बाहर से बरसती हैं और दूसरी नीचे भीतर से उभरती है। दैवी अनुग्रह से अनेकों लाभान्वित होते हैं। ठीक उसी प्रकार आत्मोत्कर्ष की प्रक्रिया द्वारा प्रस्तुत क्षमताओं का जागरण होता है तो उनके साथ ही वे विभूतियाँ प्रकट होती हैं जिनसे सामान्य जन वंचित ही नहीं, अपरिचित भी बने रहते हैं। मनुष्य के भीतर बहुत कुछ है। इतना कुछ जिसे स्रष्टा की सामर्थ्य के समतुल्य भी कहा जा सकता है। वृक्ष का विशालकाय ढाँचा छोटे से बीज में सुनिश्चित रूप से विद्यमान रहता है। सौरमंडल की समस्त प्रक्रिया सूक्ष्मरूप में नन्हें से परमाणु में यथावत् गतिशील रहती है। जड़ें नीचे से रस खींचती और पेड़ के कलेवर को हरा-भरा, पुष्पित, फलित बनाने के सारे सरंजाम जुटाती हैं। यद्यपि वे आँखों से दीखती नहीं, जमीन में दबी रहती हैं तो भी जानकारों को पता रहता है कि पेड़ तो मात्र कलेवर हैं, उसकी शोभा-समर्थता का स्रोत तो अदृश्य जड़ों में ही पूर्णतया संनिहित है। जीव का छोटा अंतराल लगभग उतना ही समर्थ है, जितना ब्रह्म का विराट-विस्तार। व्यक्ति भीतर से ही उगते-उठते हैं। बाहर तो उस अंतरंग प्रगति का प्रमाण-परिचय भर मिलता है।

जीव की प्रसुप्त शक्तियाँ भीतर से जगती-उभरती है। उनके उफनने पर उसी तरह की प्रवाह-धारा बहने लगती है जैसे कि यमुना, नर्मदा, चंबल, आदि कुंडों में से निकलकर भूतल पर प्रवाहित होती हैं। ब्रह्म की दिव्यशक्तियाँ साधक पर अंतरिक्ष से घटाओं की तरह बरसती हैं। निर्झर भी ऊपर से नीचे गिरते और भूमि पर गतिशील होते देखे जाते हैं। यह दोनों ही सौभाग्य हर किसी के लिए सहज-सुलभ है। पात्रता का परिचय देकर इस संसार के विभिन्न बाजारों से कुछ भी, कितनी ही मात्रा में खरीदा जा सकता हैं। मंडी में पैसे की तूती बोलती है। धनवान इच्छानुसार किसी भी स्तर के सुविधा-साधन कितनी ही मात्रा में खरीद सकते हैं। इसी प्रकार बलिष्ठता, बुद्धिमता, प्रतिभा आदि सामर्थ्यों के भी अपने-अपने क्षेत्र हैं और उनमें उपलब्धियाँ प्राप्त करने वाले अपनी योग्यता एवं तत्परता के अनुरूप जो चाहें सो, जितना चाहें सो खरीद सकते हैं। जिनकी जेब खाली है और जो अशक्त-अकर्मण्य हैं, उन्हें बड़े मनोरथ करने में भी निराशा का कष्ट सहना पड़ता है। मिलना तो उन्हें है ही क्या? प्रार्थना,याचना करते रहने पर भी उनके पल्ले कुछ नही पड़ता हैं। समर्थता ही वह पूँजी है, जिसे विभिन्न उपलब्धियों को खरीद सकने वाला पात्रता कह सकते हैं। इस बहुमुखी पात्रता का उपार्जन पुरुषार्थ ही साधना है।

साधना से सिद्धि का सिद्धांत सुनिश्चित है। भौतिक क्षेत्र में अपने प्रसंग में साधनारत पुरुषार्थी अभीष्ट मनोरथ पूरे करते देखे जाते हैं। आत्मोत्कर्ष भी चेतनात्मक विभूतियाँ उपार्जन करने की ही एक विशिष्ट प्रक्रिया हैं। उसमें सफलता प्राप्त करने का सिद्धान्त भी वहीं है जो भौतिक सफलताओं पर लागू होता हैं। साधक जीवन देवता की साधना करते हैं। उसके अंतरंग और बहिरंग दोनों पक्ष को समुन्नत बनाते हैं। सामान्य स्थिति में यहाँ सब कुछ अनगढ़ रहता हैं। उत्कृष्टता का दृष्टिकोण एवं पुरुषार्थ उसे सुंदर और सुव्यवस्थित बनाता है। झाड़ियों के स्थान पर उद्यान उगाना,वन्य पशुओं को पालतू बनाना और अनगढ़ को सुगढ़ में परिवर्तित करना संस्कृति है। इसी का चमत्कार इस दृश्य जगत में सर्वत्र बिखरा पड़ा है। साहित्य ने चिंतन को दिशा दी है। सृजन ने सुविधा-साधन खड़े किए हैं। अपने आपे को सद्गुणों की संपदा से लदा हुआ कल्पवृक्ष बना लेना— यही साधना का उद्देश्य है।

साधना से सिद्धि का सिद्धांत शाश्वत सत्य की तरह स्पष्ट है। न उसमें संदेह की गुंजाइश है, न विवाद की। अड़चन साधना का स्वरूप और उद्देश्य समझने भर की है। यदि उसे पात्रता का,समर्थता का और व्यक्तित्व का परिष्कार माना जाए, उसी दृष्टि से उस महाप्रयास में निरत हुआ जाए तो ऐतिहासिक एवं विद्यमान अध्यात्मवादियों की तरह हर कोई अपने स्तर को क्रमशः अधिकाधिक ऊँचा उठा सकता है। इतना ऊँचा जिसकी गरिमा को हिमालय से कम नहीं, वरन अधिक ही उत्तुंग, समुन्नत एवं समृद्ध कहा जा सके। साधना-क्षेत्र में निराश उन्हें रहना पड़ता है जो आत्मपरिष्कार के लिए कुछ नहीं करते, वरन देवताओं को फुसलाने वाले सस्ते तरीके ढूँढ़ने और उतने भर से ही लंबी-चौड़ी आशाएँ लगाए रहते हैं।


इष्टदेव का वरण, निर्धारण

भौतिक प्रगति के लिए भौतिक पुरुषार्थ करने पड़ते हैं और आत्मिक प्रगति के लिए चेतना का स्तर उठाने और प्रखरता को आगे बढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। भौतिक जीवन को गतिशील रखने के लिए प्राणिमात्र को प्रकृति-प्रेरणा का अनुसरण अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। पेट में भूख लगती है और आहार-उपार्जन करने के लिए दौड़-धूप करना आवश्यक हो जाता है। शरीर में समर्थता बढ़ने पर कामुकता की तरंगें उठती हैं और साथी ढूँढ़ने, परिवार बसाने का मानसिक ताना-बाना बुना जाने लगता है। प्राणि-जगत का अस्तित्व और पराक्रम, इन्हीं पेट-प्रजनन के दो प्रगति-चक्रों के सहारे सरलतापूर्वक लुढ़कता रहता है। आत्मिक प्रगति का प्रसंग दूसरा है। चौरासी लाख योनियों के संग्रहित स्वभाव-संस्कार मनुष्य जीवन के उपयुक्त नहीं रहते, ओछे पड़ जाते हैं। बच्चे के कपड़े बड़ों के शरीर में कहाँ फिट होते हैं? मानव जीवन की सार्थकता के लिए जिन सद्भावनाओं से अंतःकरण को और सत्प्रवृत्तियों से शरीर को सुसज्जित करना पड़ता है, वह पूर्व अभ्यास एवं प्रभावी प्रचलन होने के कारण कठिन पड़ता है। यह सहज-सुलभ नहीं, वरन प्रयत्नसाध्य है। नीचे गिराने में पृथ्वी की आकर्षणशक्ति का क्रम ही निरंतर सहायता करता रहता है, पर ऊँचा उठाने के लिए विशेष साधन जुटाने होते हैं। आंतरिक अभ्युत्थान के इसी पराक्रम को साधना कहते हैं।

इस तथ्य को हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि जिस साधना से सिद्धि मिलने का माहात्म्य बताया जाता है, वह जीवन देवता की अभ्यर्थना ही है। परब्रह्म की प्रसन्नता के लिए उसकी मर्यादाओं का पालन करने भर से काम चल जाता है, किंतु अंतरात्मा में विद्यमान दिव्य ज्योति को प्रखर बनाने के लिए विशेष रूप से पुरुषार्थ करने होते हैं और वही साधना कहलाती है।

साधना-मार्ग पर चलने के लिए प्रथम चरण ‘इष्टनिर्धारण’ का उठाना पड़ता है। प्रगति की आंतरिक महत्त्वाकांक्षा स्वाभाविक है, पर उसका स्वरूप भी तो निश्चित होना चाहिए। उमंगे असीम हैं और उनकी दिशाधारा भी अनेकों। पानी से उठने वाली लहरों की तरह महत्त्वाकांक्षाओं की कोई सीमा नहीं। एक के बाद दूसरी लहर उठती है और हवा के झोंकों के साथ अपनी दिशा बदलती है। प्रवाह की दिशाधारा न हो तो पराक्रम अस्त-व्यस्त रहेगा। किसी लक्ष्य तक पहुँच सकना संभव ही नहीं हो सकेगा। दिशाविहीन भगदड़ से मात्र थकान और निराशा ही हाथ लगती है। कस्तूरी के हिरन को अभीष्ट स्थान का पता नहीं होता है। फलतः वह भटकता, थकता और खिन्न रहता देखा जाता है। मानवी अंतरात्मा की भूख प्रगति की दिशा में अग्रसर होने की है। महत्त्वाकांक्षाओं के उभार इसी का परिचय देते हैं। आत्मिक प्रगति का कोई निश्चित लक्ष्य एवं स्वरूप सामने न रहने से मनुष्य जीवन की गाड़ी कायिक लिप्साओं की ओर ही लुढ़कने लगती है और वासना, तृष्णा एवं अहंता की पूर्ति जीवनोद्देश्य बनकर रह जाती है। इस स्तर की सफलताएँ काया को भले ही कुछ सुख-सुविधाएँ प्रदान कर सकें, परंतु अंतःकरण को उच्चस्तरीय प्रगति में इससे तनिक भी सहायता नहीं मिलती। कई बार तो अनियंत्रित भौतिक महत्त्वाकांक्षाएँ आतुर होकर कुकर्म करके भी वैभव उपार्जन में जुट पड़ती हैं और उलटे अधःपतन एवं विक्षोभ का कारण बनती हैं।

इन समस्त उलझनों का समाधान एक ही है—’इष्टनिर्धारण।’ इष्ट अर्थात लक्ष्य। साधक का कोई इष्टदेव होता है। साधना का विधि-विधान उसी के अनुरूप चलता है। यों उपास्य केवल एक ही है—’दिव्य जीवन’, किंतु उसके लिए पुरुषार्थ करने की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि उपासनात्मक उपचारों के सहारे ही बनती है। दिव्य जीवन की कल्पना करते रहने भर से तो कोई काम नहीं बनता, पहलवान बनने के लिए व्यायाम की, विद्वान् बनने के लिए स्वाध्याय की, धनी बनने के लिए व्यवसाय की आवश्यकता पड़ती है।  इसी प्रकार आत्मिक प्रगति का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए उपासनात्मक उपचार अपनाने पड़ते है। दिव्य जीवन की चरम परिणिति ही पूर्णता है। इसी स्थिति का स्वर्गसिद्धि एवं मुक्ति की प्राप्ति कहते है। आत्मसाक्षात्कार एवं ईश्वरदर्शन भी वही है। इस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए जो पुरुषार्थ करना पड़ता है, उसे साधना-विधान के रूप में अपनाना होता है। साधना में शिक्षा और प्रेरणा का समावेश होता है, फलतः उसकी प्रतिक्रिया जीवनोत्कर्ष के रूप में प्रत्यक्ष परिलक्षित होने लगती है।

कहा जा चुका है कि साधना-क्षेत्र का प्रथम चरण ‘इष्टनिर्धारण’ है। प्रगति के किस बिंदु तक पहुँचना है, इसका सुदृढ़ निश्चय होना आवश्यक है, भव्य भवन बनाने वाले सर्वप्रथम अभीष्ट निर्माण के नक्शे का मॉडल बनाते हैं। आत्मिक प्रगति के लिए किस मार्ग से जाता है? किस स्तर का साधन जुटाना है, उसके लिए कितने ही प्रकार के निर्धारण अपनाए जाते रहे हैं। इन्हें इष्टदेव या देव कहते हैं। रामभक्त बनने के लिए हनुमान, मर्यादा-पुरुषोत्तम बनने के लिए राम, पूर्ण पुरुष बनने के लिए कृष्ण, ब्रह्मतेजस् प्राप्त करने के लिए सविता को इष्ट बनाने की परंपरा है। इसी प्रकार ओर भी कितने ही हल्के-भारी इष्टदेव हैं, जिन्हें स्थिति एवं रुचि के अनुरूप अपनाया जाता है। इन निर्धारण से मन को एक निश्चित दिशा में आगे बढ़ना और तदनुरूप प्रयास करने हेतु साधन जुटाने का मार्ग मिल जाता है। उस प्रयत्न से न केवल प्रयास को दिशा मिलती है, वरन उसी स्तर के अंतःक्षेत्र की प्रसुप्त शक्तियाँ भी जगने लगती है। साथ ही परब्रह्म के शक्ति भंडार में से उसी स्तर की अनुग्रह वर्षा भी अनायास ही आरंभ हो जाती है। आकांक्षाएँ आवश्यकता बनती है। आवश्यकता पुरुषार्थ की प्रेरणा जगाती है। प्रेरणा मरे पराक्रम में प्रचण्ड चुंबकत्व होता है। वह तीन दिशा में काम करता है। प्रथम— व्यावहारिक गतिविधियों को अभीष्ट की प्राप्ति के अनुरूप बनाना है। द्वितीय—प्रसुप्त क्षमताओं को जगाकर प्रगति-पथ पर अग्रसर होने के लिए अदृश्य आधार खड़े करता है। तृतीय—दिव्य लोक से दैवी अनुदानों के बरसने का विशिष्ट लाभ मिलता है। तीनों ही आधार मिलकर त्रिवेणी संगम बनते है।

इष्टनिर्धारण प्रगतिक्रम का सुनिश्चित आधार-पथ निश्चित करता है। ईश्वरीय सत्ता का मनुष्य में अवतरण उत्कृष्टता के रूप में होता है। चिंतन और चरित्र में उच्चस्तरीय उमंगें उठने लगती हैं तथा उसी स्तर की गतिविधियाँ चल पड़ती हैं। उत्कृष्टता की उपासना ही ईश्वर की उपासना है। यही उपास्य है, लक्ष्य भी इसी को बनाना पड़ता है। इष्टदेव का निर्धारण किस रूप में किया जाए, आज इस संदर्भ में अनेकों विकल्पों के जंजाल बने खड़े हैं। प्राचीनकाल में ऐसा न था। तत्वज्ञानी एक निश्चय पर पहुँचे थे और उन्होंने उसी निष्कर्ष को उपयोगी बताकर समस्त साधकों को उसे अपनाने का परामर्श दिया था। भारतीय संस्कृति, जिसे वस्तुतः विश्व संस्कृति कहा जाना चाहिए—साधना-संदर्भ में एक ही निश्चय पर पहुँची है कि आत्मिक-प्रगति की साधना के लिए इष्टरूप में गायत्री का ही वरण होना चाहिए। यों गायत्री का स्थूलरूप चौबीस अक्षरों के एक शब्दगुच्छक के रूप में है और उसकी प्रतिमा हंसारूढ़ देवी के रूप में बनती है। यह नाम और रूप का निर्धारण है। उसके बिना मस्तिष्कीय-संरचना किसी तथ्य को पकड़ने, समझने में ही समर्थ नहीं होती। इसलिए चिंतन को किसी दिशा में आगे बढ़ाने के लिए नाम, रूप का अवलंबन अनिवार्य होता है। उपासना-उपक्रम इस निर्धारण के बिना बन ही नहीं पाता। समस्त देव प्रतिमाओं का निर्धारण इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया गया। श्रद्धा का आरोपण और संवर्द्धन इस प्रतिमा-प्रतिष्ठापन के सहारे ही सहज-सुलभ रीति से अग्रगामी बनता है। वस्तुतः समस्त देवालयों का अस्तित्व मनुष्य की श्रद्धा-समुच्चय पर ही आधारित होता है। एक के लिए वह शक्ति-स्त्रोत बनता है। दूसरे के लिए उपहासास्पद बनकर रहता है। अनेकानेक आकृतियों के देवताओं का गठन यही सिद्ध करता है कि मानवी श्रद्धा अपनी अभिरुचि के अनुरूप किसी केन्द्रबिंदु का, आस्था का समीकरण करती है, उसे सशक्त बनाती है और उससे असाधारण लाभ उठाती है। एकलव्य के द्रोणाचार्य, मीरा के गिरधर गोपाल, रामकृष्ण परमहंस की काली, इसी प्रकार के भाव निर्धारण कहे जा सकते हैं। श्रद्धा की शक्ति अपार है। उसके द्वारा परिपोषित तत्त्व देवताओं की तरह ही अनंत सामर्थ्यसंपन्न,अजस्र वरदायिनी एवं अद्भुत चमत्कारी बनकर प्रकट होते हैं। गायत्री महाशक्ति के नामरूप का निर्धारण भी इसी स्तर का समझा जा सकता है इसके बिना साधक का भावनात्मक समाधान हो ही नहीं सकता। ऋतंभरा प्रज्ञा को गायत्री माता के रूप में इसी आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्रतिष्ठित किया गया है।

गायत्री को इष्ट मानने की अनादि परंपरा है। सृष्टि के आदि में ब्रह्मा जी ने कमलपुष्प पर बैठकर आकाशवाणी द्वारा निर्देशित गायत्री उपासना की थी और सृष्टिसृजन की सामर्थ्य प्राप्त की थी। इसका उल्लेख पुराणों में मिलता है। त्रिदेवों की उपासना गायत्री रही है। देवगुरु बृहस्पति ने दक्षिणमार्गी और दैत्यगुरु शुक्राचार्य ने वाममार्गी-साधनाएँ गायत्री के ही आत्मिक और भौतिक पक्षों को लेकर प्रचलित की थी। आदिमानव देवों से सप्तऋषियों का नाम आता है। वे सभी गायत्री की सप्त व्याहृतियों के प्रतीक माने जाते हैं। राम-कृष्ण आदि अवतारों की इष्ट गायत्री रही है। इसी महामंत्र की व्याख्या में चारों वेद तथा अन्यान्य धर्मशास्त्र रचे गए हैं। दत्तात्रेय के चौबीस गुरु गायत्री के चौबीस अक्षर ही हैं। चौबीस योग और चौबीस तप प्रसिद्ध हैं। यह सभी गायत्री के तत्त्वज्ञान और साधना-विधान का विस्तार है। गायत्री गुरुमंत्र है। दीक्षा में उसी को माध्यम बनाया जाता है। हिंदू धर्म के दो प्रतीक है—शिखा और सूत्र। दोनों ही गायत्री के प्रतीक है। गायत्री का ज्ञानपक्ष मस्तिष्क पर शिखा के रूप में और कर्मपक्ष कंधे पर यज्ञोपवीत के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता हैं परंपरागत उपासनाविधि संध्या हे। संध्या में गायत्री का समावेश अनिवार्य है। इस तथ्यों का पर्यवेक्षण करने से स्पष्ट हो जाता है कि गायत्री ही अनादि  धर्मपरंपरा एवं अध्यात्म-प्रक्रिया का आधारभूत तथ्य है। उपासना में उसी का उपयोग सर्वोत्तम है।

तत्त्व दर्शन की दृष्टि से गायत्री ऋतंभरा प्रज्ञा है। ऋतंभरा अर्थात विवेकसंगत- श्रद्धा। प्रज्ञा अर्थात् श्रेय-साधना दूरदर्शिता। समग्र विवेकशीलता को गायत्री कह सकते है। इसी बीजमंत्र का विशाल वृक्ष ब्रह्मविद्या है। अध्यात्म का यह दार्शनिक पक्ष है। साधना-प्रयोजन में इसी के विभिन्न उपचार योगाभ्यासों, तप-साधना एवं धर्मानुष्ठानों के रूप में प्रचलित हैं। इष्ट का, लक्ष्य का, उपास्य का निर्धारण दिव्यदर्शियों ने गायत्री के रूप में गहन अध्यवसाय और अनवरत अनुभव, अभ्यास के आधार पर किया है। वह प्राचीनकाल की तरह आज भी अपनी उपयोगिता यथावत् अक्षुण्ण रखे हुए है। विज्ञ-साधकों के लिए उसी का अवलंबन ग्रहण करना हर दृष्टि से उपयोगी है।

गायत्री—सार्वभौम और सार्वजनीन है। उसे किसी देश, धर्म, जाति, संप्रदाय तक सीमित नहीं किया जा सकता। भारत में उत्पन्न होने के कारण उसका नाम भारतीय संस्कृति पड़ा है, पर उसकी कोई प्रक्रिया उन परिधि में रहने वाले लोगों तक सीमित नहीं रखी जा सकती। मालवा वालों को मालवीय, कन्नौज वालों को कान्यकुब्ज, मिथिला वालों को मैथिल, मथुरा वालों को माथुर कहा तो जाता है, पर वे उतने ही क्षेत्र में रहने के लिए बाध्य नहीं हैं। काश्मीरी सेब, नागपुरी संतरे, बंबइया केला—उसी क्षेत्र में बिकें और खाए जाएँ, ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है। गायत्री-भारतीय-संस्कृति की आत्मा कही जाती है, पर इसका तात्पर्य यह नहीं है। कि इसी देश के निवासी या इसी धर्म के अनुयायी उसका उपयोग कर सकते है। भारतीय संस्कृति वस्तुतः दैवी संस्कृति है, उसे ‘मानवी’ कह सकते है। गायत्री की उपयोगिता सबके लिए समान है। यह देश, धर्म, जाति, भाषा संप्रदाय आदि के नाम का अपने-पराए की विभाजन रेखा नहीं बननी चाहिए।

ऋतंभरा प्रज्ञा को इष्ट माना जाए। जहाँ मानव जीवन की सर्वोपरि उपलब्धि है। आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान इसी को कहा गया है। विवेकशीलता, दूरदर्शिता वही है। न्याय और औचित्य इसी के प्रतिफल हैं। सत्य को नारायण कहा गया है, उस सत्य का अन्वेषण कर सकना और पूर्णसत्य तक पहुँचने का साहसिक यात्रा-पथ पूर्ण करना—इस तथ्यान्वेषी बुद्धि के सहारे संभव होता है। वह ब्रह्मविद्या इसीलिए है, कि ब्रह्म को जीव के लिए उपलब्ध करा सकना उसी के बस की बात है।

परिस्थितियों का पर्यवेक्षण करने वाले जानते हैं कि वे मात्र मनःस्थिति की ही परिणिति होती है। बुरी परिस्थितियों के लिए बुरी मनःस्थिति हो उत्तरदाई हैं। भीतर का परिवर्तन बाहरी परिकर में आश्चर्यजनक हेर-फेर उत्पन्न करता है। दरिद्रता, विपन्नता, विग्रह, विपत्ति एवं विभीषिकाएँ आंतरिक निकृष्टता की ही प्रतिक्रियाएँ हैं। उत्कृष्ट चिंतन के कारण बन पड़ने वाले आदर्श क्रियाकलाप ही मनुष्य को आत्मसंतोष, जनसम्मान, विपुल सहयोग एवं दैवी अनुग्रह की अनेकानेक संपदाएँ तथा विभूतियाँ प्रस्तुत करते हैं। प्राचीनकाल की सतयुगी परिस्थितियाँ और देवोपम मनःस्थिति की सुखद गाथा गाने वाले जानते हैं कि अतीत को गरिमा का एकमात्र आधार उस समय अपनाया गया, उत्कृष्ट दृष्टिकोण एवं आदर्श चरित्र ही था। उस समस्त वैभव को ऋतंभरा प्रज्ञा की देन कह सकते हैं। यह प्रज्ञा की देवी का अजस्र अनुदान ही था, जिसे पाकर भारतभूमि, समस्त विश्व-वसुधा को चिरकाल तक कृतकृत्य रहने का अवसर मिला।

अपने युग की समस्याओं का, समाधान और भविष्य का उज्ज्वल निर्धारण किस प्रकार संभव हो, उसके लिए ज्ञानयज्ञ की, विचार-क्रांति की आवश्यकता अनिवार्य रूप से अनुभव की जा रही है। यह दूरदर्शी, विवेकशीलता अध्यात्म की भाषा में ऋतंभरा प्रज्ञा या गायत्री ही है। युगसृजन के लिए इसी को आधारभूत साधन मानकर चलना होगा। जनमानस का परिष्कार ही नवयुग का, सुखद संभावनाओं का आधार है। उसे वैयक्तिक एवं सामूहिक प्रगति का सुख-शांति के लिए सामयिक एवं चिरंतन आवश्यकता मानकर चला जा सकता है। श्रेयसाधकों की उपास्य गायत्री ही हो सकती है। यह इष्ट बनने योग्य है। इसी को लक्ष्य निर्धारित किया जाना चाहिए। आत्मोत्कर्ष की चरम परिणिति पूर्णता तक पहुँचने के लिए इसी राजमार्ग को अपनाया जाना चाहिए,जिस पर चलकर देव परंपरा के अनुयाई सफलता और शांति का, ऋद्धि और सिद्धि का रसास्वादन करते रहे हैं। प्रज्ञा को इष्ट मानकर चलने वाला उन सभी लाभों को प्राप्त करता है, जो गायत्री उपासना के महात्म्य वर्णन में आकर्षक एवं अलंकारिक ढंग से बताए गए हैं। “नहि ज्ञानेन सद्दश्यं पवित्रमिह विद्यते।” आत्मा वारे ज्ञातव्य श्रोतव्य निदिध्यासितव्यं” जैसे उद्बोधन वाक्यों में जिस आत्मज्ञान की गरिमा बताई गई है—जिसे प्राप्त करके भगवान बुद्ध की तरह अनेकानेक श्रेयसाधक धन्य बनते रहे हैं, वही महाप्रज्ञा—आद्या शक्ति गायत्री है। उसी को हमें लक्ष्य एवं इष्ट वरण करना चाहिए। उपासनात्मक उपक्रम को साधना-विधान की आधारशिला इसी पृष्ठभूमि पर रखी जानी चाहिए।

गायत्री का वाहन हंस है— राजहंस। विवेकवान-प्रज्ञावान। राजहंस नीर-क्षीर विवेक से युक्त, कृमि-कीटकों का भक्षण करने से विरत, मुक्ताओं पर निर्भर— यह चित्रण बताता है कि श्रेय-साधक की मनोभूमि कैसी होनी चाहिए। गायत्री जिस पर कृपा करें वह प्रज्ञावान होता है अर्थात प्रज्ञावान को गायत्री का अनुग्रह प्राप्त होता है। दोनों प्रतिपादनों का तात्पर्य एक ही है। गायत्री का इष्ट के रूप में वरण सर्वोत्तम चयन है। इतना निश्चय-निर्धारण करने पर आत्मिक प्रगति का उपक्रम सुनिश्चित गति से, द्रुतगति से अग्रगामी बनने लगता है। तब साधना से सिद्धि के सिद्धांत में कहीं संदेह की गुंजाइश नहीं रह जाती।


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ज्ञान आत्मा का अमूल्य जीवन-रस है, ज्ञान शक्तियों को जागृत रखता है, ज्ञानहीन जीवन रक्तहीन देह की तरह निर्बल और निष्प्राण ही होता है। इसलिए शरीर को अन्न से पुष्ट रखने की तरह जीवन को ज्ञान से परिपुष्ट बनाया जाना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी है। —मिल्टन


अद्भुत क्षमताओं से संपन्न मानवी मस्तिष्क

आदिमयुग से आगे बढ़कर मनुष्य ने अब तक जो आश्चर्यजनक प्रगति की है, उसके मूल में मानवीय मस्तिष्क की सक्रिय भूमिका ही है। यदि मनुष्य में मस्तिष्क न होता तो वह किसी चलते-फिरते जानवर या पेड़-पौधे से अधिक अच्छी स्थिति में नहीं होता। यों जानवरों में भी मस्तिष्क होता है, पर मानवीय मस्तिष्क की बात ही और है। मनुष्य के शिरो भाग में स्थित दीखने, नापने और तोलने में छोटा-सा लगने वाला मस्तिष्क जादुई क्षमताओं और गतिविधियों से भरा है।

प्रकृति ने इसके महत्त्व को देखते हुए इसकी सुरक्षा का अच्छा-खासा प्रबंध किया है। सबसे पहले तो सिर पर स्थित घने बालों को ही लें जो मस्तिष्क को, सर्दी, धूप और वर्षा से बचाने में बहुत बड़ा योग देते हैं। बालों के बाद चमड़ी और हड्डियाँ आती हैं। ये हड्डियाँ शरीर के अन्य अवयवों की अस्थियों से अधिक मजबूत होती हैं, जो बाहरी आघातों से मस्तिष्क के भीतरी भाग की यथासंभव रक्षा करती हैं। इन हड्डियों के नीचे भी तरल द्रव की एक परत होती है, जो बाहरी धक्कों को सहने में सहायक सिद्ध होती हैं। इस परत के नीचे खून की परत होती है, जो दिमाग को पोषण तो पहुँचाती ही है, परंतु ऐसी दूसरी वस्तुओं को मस्तिष्क में पहुँचने से रोकती है, जो मस्तिष्क के लिए हानिकारक सिद्ध हों। कई तरह के बैक्टीरिया और नशीली वस्तुएँ इसी सुरक्षाकवच के कारण मस्तिष्क के अंदर तक प्रवेश नहीं कर पाती। लेकिन दर्दनाशक दवाएँ, शामक औषधियाँ और अल्कोहल जैसे पदार्थ इस रक्षापंक्ति को पारकर अंदर तक पहुँच जाते हैं।

यह तो हुई मस्तिष्क की बाहरी संरचना। इसकी क्षमताओं का विश्लेषण करने के बाद वैज्ञानिक इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मस्तिष्क में जितनी अद्भुत शक्तियाँ हैं, उन सभी को समाहित करने वाला यदि कोई कंप्यूटर बनाया जाए तो वह इतना बड़ा होगा कि उसे रखने के लिए 5,00,00,000 वर्गमील जमीन चाहिए। अर्थात पूरी पृथ्वी पर मुश्किल से एक कंप्यूटर रखा जा सकेगा।

इतनी अद्भुत और अनुपम विशेषताओं को करीब 2600 ग्राम वजनी और 1400 घन से.मी. आयतन वाले मस्तिष्क में समाहित कर देना उस अद्वितीय कलाकार का ही काम है, जिसे ईश्वर कहा जा सकता है। विज्ञान की भाषा में कहें तो प्रकृति ही यह कर पाने में समर्थ हुई है। मस्तिष्क विज्ञान के अनुसार बाहरी धूसर पदार्थ (ग्रेमैटर) में तंत्रिका कोशिकाओं (न्यूरांस) की संख्या 30 अरब हैं। अनुमस्तिष्क (सोर्टबैलम) में 120 अरब और मेरुदण्ड में 1 करोड़ 34 लाख तंत्रिकाएँ इसके अतिरिक्त हैं। इनके अलावा ग्लाया स्तर की करीब 1 खरब लघु कोशिकाएँ इन न्यूरांस की सहयोगी बनकर काम करती हैं इन सबके मिलनस्थल को तंत्रिकाबंध (न्यूरोग्लाया) कहते हैं और इन सब का सम्मिश्रित प्रयास ही मस्तिष्कीय चेतना है।

तंत्रिका कोशिकाओं की शिराएँ आपस में एकदूसरे से जुड़ी रहती हैं। स्मरणीय है कि घर में लगे बिजली के १ प्लग से अधिकाधिक तीन या चार कनेक्शन जोड़े जा सकते हैं, पर न्यूरान तो करीब 60,000 कनेक्शंस से जुड़ा रहता है। अत्यन्त शक्तिशाली सूक्ष्मदर्शक-यंत्र से देखने पर हर न्यूरान एक मकड़ी के जाले की तरह दिखाई पड़ता है। और एक न्यूरान से दूसरे न्यूरान को संकेत मिलते हैं। यह संकेत 360 मील प्रति घंटे की चाल से चलते हैं। संकेत-ग्रहण करने के बाद न्यूरांस वापस पूर्वस्थिति में आ जाते हैं।

यह संकेत मस्तिष्कीय विद्युतशक्ति के माध्यम से चलते हैं। तंत्रिका कोशिकाओं से होता हुआ विद्युत-आवेश आगे बढ़ता हैं और ज्ञानेंद्रियों से प्राप्त सूचनाओं को मस्तिष्क के संबंधित केंद्र तक पहुँचा देता है। सामान्य जीवन में जहाँ मनुष्य को बिजली की आवश्यकता के लिए बिजलीघर पर निर्भर रहना पड़ता है, वहाँ यह आश्चर्य का विषय ही हो सकता है कि मस्तिष्क अपनी विद्युत-ऊर्जा स्वयं उत्पन्न करता है।

मस्तिष्क के अरणें कोशों में प्रत्येक की अपनी विशेषताएँ और अपनी दुनिया है। वे प्रायः अपना काम दक्षतापूर्वक निपटाने में सक्षम और अभ्यस्त है, परंतु सामान्य मनुष्यों की मस्तिष्कीय क्षमता का 96 प्रतिशत भाग प्रसुप्त और निष्क्रिय पड़ा रहता है। केवल ४ या ५ प्रतिशत भाग ही उपयोग में आता है। अत्यंत मेधावी और प्रतिभाशाली व्यक्ति भी अपने मस्तिष्क में संनिहित क्षमताओं को अधिकतम १०-१२  प्रतिशत ही उपयोग में ला पाते हैं। इस प्रकार मस्तिष्क में अनंत और अकल्पनीय विस्मयजनक क्षमताएँ विद्यमान रहती हैं।

यों मस्तिष्क की बाहरी बनावट को देखने से इतना ही पता चलता है कि यह मात्र रासायनिक पदार्थों से बना माँसपिंड ही है, पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। यदि ऐसा होता तो उसके भार-विस्तार के अनुपात से ही उसकी क्षमता भी कम ज्यादा होती दिखाई देती। हाथी और व्हेल मछली के मस्तिष्क का विस्तार मानवीय मस्तिष्क की तुलना में कई गुना अधिक है, पर मनुष्य को जो क्षमताएँ उपलब्ध है, वह इन प्राणियों में कहाँ? इसका कारण मानवी मस्तिष्क की सूक्ष्मसंरचना और उसमें निहित अद्भुत संभावनाएँ ही है।

भीतरी मस्तिष्क के चारों ओर काले रंग की दो पट्टियाँ लिपटी रहती हैं। करीब २५ वर्गइंच की एक बटा दस इंच मोटी इन पट्टियों को ‘टेंपोरल-कोरटेक्स’ कहा जाता है। कनपटियों के ठीक नीचे स्थित ये पट्टियाँ स्मृतियों का संचय और नियमन करती है। डाॅ. विल्डर पेन अपने अनुसंधान प्रयोगों के दौरान इन पट्टियों में छुपी-दबी मुद्दतों पुरानी ऐसी स्मृतियाँ जगाने में सफल हुए हैं, जो सामान्य या उपेक्षणीय कही जा सकती है। उदाहरण के लिए किसी से पूछा जाए कि १२ दिसंबर १९७८ की रात में उन्होंने क्या स्वप्न देखा था?

स्वप्न एक तो वैसे ही याद नहीं रहते। रहते भी हैं तो, थोड़े दिन बाद में वे अपने आप विस्मृत हो जाते हैं, परंतु ‘टेंपोरल कारटेक्स’ में उस दिन देखे गए  स्वप्न की स्मृति भी अंकित रहती है और उन्हें जगाकर अमुक दिन देखे गए, किंतु भुला दिए गए स्वप्न को भी याद किया जा सकता है।

सामान्यतः जीवन में महत्त्वपूर्ण प्रभाव डालने वाली घटनाएँ ही याद रहती हैं, पर दैनिक-जीवन में गुजरने वाली ऐसी अधिकांश घटनाएँ विस्मरण हो जाती हैं, जिनका कोई महत्त्व नहीं रहता। लगता तो है कि ऐसी घटनाएँ विस्मृति के गर्त में जा गिरीं, पर वस्तुतः ऐसा होता नहीं है। वे मस्तिष्क के ‘टेंपोरल कारटेक्स’ भाग में जा बैठती हैं और उसके पुराने परत को स्पर्श कर पुनः जागृत की जा सकती हैं।

जिन व्यक्तियों की स्मरणशक्ति अद्भुत विलक्षण दिखाई देती है, उसका कारण मस्तिष्क के इसी भाग का जागृत और सशक्त होना है। कई व्यक्तियों की स्मरणशक्ति तो इतनी तीव्र देखी गई है कि विस्मय-विमुग्ध रह जाना पड़ता है। लार्ड मैकाले के संबंध में विख्यात है कि उन्होंने इंग्लैंड का इतिहास १३ खंडों में लिखा था, पर इसके लिए उन्होंने किसी पुस्तक की सहायता नहीं ली थी। लिथुआनिया के रैवी एलिजा को दो हजार पुस्तकें कंठस्थ याद थी। कितनी ही बार उनकी परीक्षा ली गई, कई तरह से उन्हें जाँचा-परखा गया, पर उनकी स्मरणशक्ति ने कभी धोखा नहीं खाया। फ्रांस के राजनेता लिआर गैंवारा को किक्टर ह्यूगो की रचनाएँ बहुत पसंद थी। गैंबारा ने उनकी रचनाओं के हजारों पृष्ठ कंठस्थ कर रखे थे और आवश्यकता पड़ने पर वह घंटों तक उन्हें दोहराते रहते थे। इनमें एक भी शब्द आगे-पीछे नहीं होता, यहाँ तक कि वह पृष्ठ-संख्या तक सही-सही बता देता था।

शतरंज का जादूगर कहे जाने वाले अमेरीकी नागरिक हैरी नेल्सन विल्सवरी एक साथ बीस खिलाड़ियों की चाल को स्मरण रखते हुए सबके साथ, एक साथ खेलते थे। यहीं नहीं, वे अपने मार्गदर्शन में इससे अधिक खिलाड़ियों को भी बड़ी तेजी और मुस्तैदी से खिलाते रहते थे। ग्रीक के विद्वान रिचार्ड पेरिसन को पढ़ी हुई पुस्तकें महीनों तक याद रहती थी। जो उनने आज पढ़ा हो उसे महीने भर बाद पूछने पर भी इसी तरह बता देते थे, जैसे पुस्तक ही पढ़ी जा रही हो। कई बार उनकी परीक्षा करने के लिए पुस्तक लेकर सामने बैठा गया तो पाया गया कि महीने भर पहले पढ़ी हुई पुस्तक पोरसन को शब्दशः याद है।पर्शिया (जर्मनी) के लाइब्रेरियन मैथुरिन वेसिरे दूसरे के कहे शब्दों को हूबहू दोहरा देते थे। मैथुरिन ने बारह व्यक्तियों द्वारा एक साथ बोले गए अलग-अलग वाक्यों को यथावत् दुहरा दिया।

स्मरणशक्ति ही नहीं, प्रत्युत्पन्नमति, तीव्र बुद्धि आदि के रूप में भी मस्तिष्कीय क्षमताओं के विलक्षण उदाहरण देखने में आए हैं। इन विलक्षणताओं का विश्लेषण करते हुए स्वीडन के जीवविज्ञानी डाॅ. होल्गर हाइडेन इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मस्तिष्क को दक्ष बनाने वाले शिक्षण एवं चिंतन की प्रक्रियाएँ मस्तिष्कीय कोशिकाओं में महत्त्वपूर्ण रासायनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ा देती हैं और वे अधिक संवेदनशील बनकर बुद्धिमत्ता का क्षेत्र विस्तृत बना देती हैं।

डाॅ. जोजे डेलगाडो ने अपने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिया है कि आवश्यकतानुसार मस्तिष्क के किंहीं भी केंद्रों को उद्दीप्त ओर प्रसुप्त किया जा सकता है। विद्युत के द्वारा उन्होंने जानवरों से ऐसे कार्य करवा लेने के कई प्रदर्शन किए, जो उनकी प्रकृति के कदापि अनुकूल नहीं थे। प्रेरित सूचनाओं के अनुसार वे प्राणी ऐसे काम करने लगे, जो उनकी प्रवृत्ति के एकदम विपरीत थे। उदाहरण के लिए नम्र प्राणी उद्धत हो उठे और चंचल स्वभाव के बंदर, चूहे, बिल्ली शांत होकर बैठ गए।

इस तरह के प्रयोग मनुष्यों पर भी किए गए हैं तथा उनकी इच्छा, ज्ञान एवं क्रियाशक्ति को नियंत्रित कर अमुक ढंग से सोचने या काम करने के लिए विवश-सा कर दिया गया। सम्मोहनविद्या के द्वारा वशीकरण के लिए अब किसी व्यक्ति-विशेष के द्वारा किये गए प्रयोगों को आवश्यकता नहीं रही है। यह कार्य इलेक्ट्रानिक यंत्रों द्वारा भी किया जा सकता है।

तुलां विश्वविद्यालय के डा. राबर्ट हीथ ने ऐसा यंत्र भी बनाया है, जिसकी सहायता से किसी भी व्यक्ति की कार्यक्षमता को इच्छानुसार घटाया-बढ़ाया जा सकता है। परंतु इस तरह के वैज्ञानिक प्रयोग आसान होने के साथ-साथ खतरे से भी खाली नहीं हैं। मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए आध्यात्मिक उपाय और शिक्षण ही निरापद रूप से सफल सिद्ध हुए हैं। यह विकास मात्र उस शिक्षण पर निर्भर नहीं रहता है, जो स्कूलों में या समीपवर्ती लोगों से मिलता है। यह प्रक्रिया जानकारी बढ़ाने में सहायक हो सकती है—मस्तिष्कीय विकास में नहीं। ध्यान-धारणा, एकाग्रचित्तता और मनोयोग मस्तिष्कीय क्षमताओं के विकास में पूर्णरूपेण सफल हैं। प्राचीनकाल में इसी आधार पर ऋषि-मुनियों ने आश्चर्यजनक सिद्धियाँ अर्जित की थीं और ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में इतनी अधिक उन्नति की थी कि आधुनिक विज्ञान अभी उसकी दशमांश स्थिति में भी नहीं पहुँच सका है।


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दूध का सेवन मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है और दूध के द्वारा अनेक प्रकार की बीमारियाँ दूर हो सकती है, इस तथ्य को हमारे यहाँ के साधारण मनुष्य भी जानते हैं। बाल्यावस्था से ही हमारे यहाँ दूध पीने पर जोर दिया जाता है, क्योंकि लोगों का विश्वास है कि इस आयु में दूध का नियमपूर्वक सेवन करने से स्वास्थ्य में दृढ़ता और स्थिरता आती है, वह जन्म भर मनुष्य की सहायक रहती है। इस देश के चिकित्सा ग्रंथों में तो दूध को—’भूलोक का अमृत’ बतलाया गया है। और प्रत्येक पशु के दूध के गुण विस्तारपूर्वक बतलाए गए हैं। जिनके आधार पर भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में अपने अनुकूल उसका उपयोग हो सके।


मुस्कान—सुख की खान

अमेरिका के कैलीफोर्निया राज्य में एक स्त्री थी, जो बहुत दिनों तक खिन्न और चिंतित रहने के कारण नींद न आने के रोग से ग्रस्त थी। जीवन उसके लिए भारस्वरूप हो गया था। किसी ने उसे दिन में कम से कम तीन बार खिल-खिलाकर हँसने की सलाह दी। तद्नुसार उस ने अकारण भी दिन में कई बार हँसना शुरू किया। परिणाम यह हुआ कि केवल इसी उपाय से न केवल उसे ठीक से नींद आने लगी अपितु उसके स्वास्थ्य में वांछित सुधार भी हो गया।

प्रसन्नता प्रकृति की दी हुई बिना मोल का सबसे महत्त्वपूर्ण पौष्टिक है। इससे शारीरिक बल और मानसिक उत्साह में आशातीत अभिवृद्धि होती है। मन पर जमी विषाद की धूल झड़ जाती है। मन प्रसन्नता से भर जाता है। प्रसन्न और स्वस्थ मन ही स्वस्थ और सबल शरीर का जनक होता है।

हमारे ऋषि इस तथ्य से सुपरिचित थे उनने सर्वत्र इसका उल्लेख करके अपनी बहुज्ञता का परिचय दिया है। प्रसन्न रहने की प्रेरणा देती हुई श्रुति कहती है—

विश्वाहा सुमना दीदि हीह। अथर्ववेद ७।७४।४

हे मानव! तू इस संसार में प्रसन्नचित्त होकर चमक, स्वयं प्रकाशित हो और अन्यों को प्रकाशित कर।

प्रसन्नता का अभाव मनःक्षेत्र में नीरसता का सृजन करके व्यक्ति को निराश और अकर्मण्य बना देता है। इसलिए अप्रसन्नता का निषेध करते हुए अथर्ववेद कहता है—

‘मात्र तिष्ठःपराङ्मनाः। अथर्ववेद ८।१।९

इस संसार में गिरा मन लेकर मत रह।

सर्वदा पुष्प की भाँति रहना, मुस्कराना, ही जीवन का आनंद है। प्रगल्भ मनुष्य की कामना वही रहनी चाहिए।

विश्वदानीं सुमनसः स्याम। -ऋग्वेद ६।५२।५

हम प्रत्येक परिस्थिति में पुष्प की भाँति सदा प्रसन्न रहें—खिले रहें।

जायाः पुत्राः सुमनसो भवन्तु।’ अथर्ववेद ३।४।३

‘स्त्रियाँ तथा पुत्र सभी उत्तम, प्रसन्न मन वाले हों।

प्रजां कृण्वाथामिह मोदमानौ।’ अथर्ववेद १४।२।३९

‘हे स्त्री-पुरुषों! इस गृहस्थाश्रम में परस्पर प्रसन्न रहते हुए आनंद-विनोद करते हुए रहो।

‘मुस्कान—सुख की खान’ का सिद्धांत जो भी ठीक तरह समझते हैं और दैनिक जीवन में इसका उपयोग करते हैं, वे शरीर और मन दोनों दृष्टियों से स्वस्थ और प्रसन्न रहते है।

उन्मुक्त हास्य हँसने वाले को तो लाभ होता है, सुनने वाले भी उस उल्लास का लाभ उठाते हैं। डाॅ. सैडर्सन का मत है—’प्रसन्न रहने से शारीरिक बल में स्थायी वृद्धि होती है। आँखों में चमक, चेहरे पर कांति और मन में स्फूर्ति का संचार होता है। रोगप्रतिरोधक शक्ति भी बढ़ती है।”

भारतीय तत्त्ववेत्ता प्रसन्न रहने की कला से परिचित थे। अभावग्रस्त परिस्थितियों के साथ अजस्र प्रसन्नता की उन्होंने संगति बिठाई। फलतः स्वस्थ शरीर, दीर्घायु, आनंद एवं महानता से भरा-पूरा जीवन जी सके। उनकी अभिव्यक्ति कितनी मार्मिक है।

प्राञ्चो अगाम नृतये हसाय अघीय आयुः प्रतरं दधानाः।’ (ऋग्वेद ६०।१८।३)

दीर्घतम और अत्युत्कृष्ट जीवन को धारण करते हुए हम हास, उल्लास एवं आनंद भरे उत्तम मार्ग पर आगे ही बढ़ें।

*समाप्त*